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Hindi Antarvasna एक अनोखा बंधन - पुन: प्रारंभ


[color=rgb(51,]उनत्तीसवाँ अध्याय[/color][color=rgb(51,]: मुश्किलों भरी [/color][color=rgb(51,]शुरुआत[/color]
[color=rgb(255,]भाग -5[/color]


[color=rgb(251,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

गुस्से और नफरत से अंधे मेरे दिमाग ने इनके अभी तक के प्यार को धोके का नाम दे दिया था! मुझे इस समय ऐसा लग रहा था जैसे की मेरे साथ बहुत बड़ा विश्वासघात हुआ हो, खुद को निसहाय महसूस करने की बजाए मेरे सर पर बदले का भूत सवार हो चूका था| जलन की आग मेरे जिस्म में इस कदर भड़क चुकी थी की मुझे धीरे-धीरे भीतर से जलाती जा रही थी| अपनी इसी जलन की आग के चलते मैंने मन ही मन सोच लिया था की वापस जा कर मैं माँ से सब कुछ कह दूँगी, फिर चाहे जो हो इनके साथ, मेरी बला से! अब बस मुझे घर पहुँचने तक अपने गुस्से को काबू में रखना था ताकि कहीं मैं कुछ गलत न कह दूँ जिससे माँ के आगे मेरा पलड़ा हल्का न पड़ जाए!

वो पूरी रात मैं सो न सकी, मेरे दिल में इनकी बातें चुभती रहीं और जहन में गुस्से और जलन की आग जलती रही| ये भी रात भर बेडपोस्ट से पीठ लगाए खामोश बैठे रहे, न ही रात में इन्होने मुझसे कोई बात करने की कोशिश की और न ही मैंने पलट कर इन्हें देखा की ये जाग रहे हैं या सो रहे हैं|

अगली सुबह ये तैयार हुए मगर मैं अब भी उसी करवट लेटी थी जिस करवट कल रात लेटी थी|

[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]

"हाँ...नाश्ता?" इन्होने कड़क आवाज में मुझसे नाश्ता करने के बारे में पुछा| मैंने भी अपनी कड़क आवाज में जवाब दिया; "मैं खुद मँगा लूँगी!" मेरा जवाब सुन इन्होने और कुछ नहीं कहा तथा अपनी मीटिंग निपटाने के लिए बिना कुछ खाये चले गए| अगर आज ये मीटिंग में न जाते तो शायद कम खून खौलता मेरा मगर जिस तरह से इन्होने अभी मुझसे अकड़ कर बात की थी और अपने काम को अधिक तवज्जो देते हुए मुझे अकेला होटल के कमरे में छोड़कर चले गए थे उससे मेरा गुस्सा कम होने की बजाए अधिक बढ़ गया था!

इनके जाने के बाद मैं अपने गुस्से में कुढ़ती रही और करीब आधे घंटे बाद गुस्से और भूख के मारे जलती हुई उठी| मुझे बहुत जोर से भूख लगी थी, मैंने फटाफट ब्रश किया और कल की रात जो मैंने नाइटी पहनी थी उसे गुस्से से उतार फेंका; "हुँह!!! क्या फायदा हुआ इतनी मेहनत करने का जब ये ही धोकेबाज निकले!" मैं गुस्से में बड़बड़ाई| गुस्से की आग मेरे सर पर बहुत अच्छे से सवार थी और अपने इसी गुस्से में जलते हुए मैंने सोचा की मैं भूखी रहती हूँ, लेकिन फिर मैंने सोचा की धोकेबाजी करें ये और भूखी रहूँ मैं, ये कहाँ का इन्साफ है? "मैं तो खाऊँगी और वो भी जो मेरा दिल करेगा|" मैं गुस्से में बोली और होटल के रिसेप्शन पर कॉल किया तथा सुबह के नाश्ते में अपने लिए पिज़्ज़ा मँगाया! पिज़्ज़ा आया तो मैंने टी.वी. की आवाज तेज़ की और गुस्से से पिज़्ज़ा खाते हुए टी.वी. देखती रही|

कुछ देर बाद इन्होने मुझे फ़ोन किया, ये पूछने के लिए की मैंने नाश्ता किया या नहीं मगर मैंने जानबूझ कर फ़ोन नहीं उठाया| ये अपने गुस्से में होते हुए भी मेरा हाल-चाल जानने को चिंतित थे जबकि मैं अपने गुस्से में जलते हुए इनकी कोई चिंता किये बिना मज़े से पिज़्ज़ा खा रही थी|

दोपहर हुई और सवा बारह बजे, मुझे पता था की ये दोपहर को लौटेंगे और मुझे खाना खाने को कहेंगे| अब मुझे दिखाना था इन्हें अपना गुस्सा और अपना गुस्सा दिखाने के लिए इनके सामने खाना न खा कर इनका खून जलाने से अच्छा जरिया क्या हो सकता था? लेकिन भूखी तो मैं रहने वाली थी नहीं इसलिए मैंने इस बार अपने लिए मँगाया पास्ता! मैंने अपना सारा गुस्सा खाना खाने पर निकाला था, अगर ये आज दिनभर न आते तो मैं अलग-अलग तरह का खाना मँगा कर अपना सारा गुस्सा स्वादिष्ट खाना खा कर निकालती रहती!

पास्ता खाते हुए मैंने जो बात गौर की वो ये थी की इनके मन के भीतर जरा सी भी ग्लानि नहीं थी! पहले जब ये गलती करते थे, या मेरे दिल को चोट पहुँचाते थे तो इनका मन हमेशा ग्लानि से कचोटता था और ये सीधा आ कर मुझसे माफ़ी माँग लिया करते थे| परन्तु इस बार ऐसा नहीं हुआ था, रात भर न तो इन्होने मुझे मनाने की कोशिश की और न ही सुबह मुझसे प्यार से बात शुरू की बल्कि ये तो सुबह बड़े उखड़े हुए थे! मेरे गुस्से से पागल दिमाग ने कहा की; 'मुझे इनको खुद के आगे झुकाना होगा, इनसे माफ़ी मँगवानी होगी, इन्हें इनकी गलती का एहसास करवाना होगा! इनके सामने खाना खाने से मना कर मैं इन्हें पहले ग्लानि महसूस करवाऊँगी तथा फिर इनसे हाथ जोड़कर, नाक रगड़वा कर माफ़ी मँगवाऊँगी!' लेकिन मैंने ये नहीं सोचा था की जब ये माफ़ी मांगेंगे तो में इन्हें माफ़ करूँ या नहीं?

देखा जाए ये सब ऊल-जुलूल विचार मेरे गुस्से और जिद्द के कारन पैदा हुए थे, जो की हमारे इस प्यार भरे रिश्ते को बिगाड़ने पर तुले थे!

दोपहर को 1 बजे ये लौटे और कमरे का दरवाजा खटखटाया, मैंने जानबूझ कर इन्हें दरवाजे के बाहर 10 मिनट इंतजार करवाया| दस मिनट बाद जब मैंने दरवाजा खोला तो देखा की इनके हाथ में काफी सामान था| दरवाजा खोलने में मेरे द्वारा लिए गए इतने समय के कारण भी इनके चहरे पर गुस्से का नामोनिशान नहीं था| बिना मुझे कुछ कहे ये कमरे के भीतर आये और सारा सामान इन्होने टेबल पर रखा| समान रख इन्होने मेरी तरफ बात करने के इरादे से देखा मगर मैंने अपनी गर्दन अकडाई और इनसे मुँह फेर लिया, मैंने बिलकुल ऐसे जताया जैसे मैंने इन्हें देखा ही न हो|

मेरे मुँह फेर कर इन्हें अनदेखा करने से इन्हें दुःख अवश्य हुआ होगा तभी तो ये बिना कुछ कहे बाथरूम में हाथ-मुँह धोने चले गए| बाथरूम से बाहर निकल, तौलिये से मुँह पोछते हुए ये मुझसे बोले; "खाना खाया?" इस समय इनकी आवाज में प्यार झलक रहा था, पर मैं तो गुस्से में थी इसलिए में तुनक कर बोली; "भूख नहीं है!" इतना कह कर मैंने टीवी का चैनल चेंज कर दिया| मुझे लगा था की मेरी बात सुनकर ये मुझे मनाएँगे पर इन्होने कुछ नहीं कहा और सामान पैक करने लगे| मुझे नहीं पता था की ये रिसेप्शन से पहले ही खाने-पीने का बिल पूछ आये हैं, जिससे इन्हें पता चल गया है की मैंने आज दिनभर क्या-क्या खाया है?!

मैं इन्हें अनदेखा कर टी.वी. देखने में लग गई, मैंने इनसे ये भी नहीं पुछा की आपने सुबह से कुछ खाया भी है की नहीं? ये गुस्से में होने के बावजूद भी मेरे खाने-पीने का ध्यान रख रहे थे और मैं अपने गुस्से में चूर इनकी बिमारी का ध्यान होते हुए भी इनसे कुछ खाने को नहीं पूछ रही थी! ये क्रोध भी कितनी जहरीली चीज़ होती है!

करीब दस मिनट बाद वेटर हमारा बिल ले कर आ गया, इनके हाथ में बिल देख मैं समझ गई की कमरे में आते समय इन्होने रिसेप्शनिस्ट से बिल बनाने को कहा होगा| अब जाहिर था की इस बिल में सुबह से अभी तक मेरे द्वारा ठूसा हुआ पिज़्ज़ा और पास्ता का जिक्र किया गया होगा!

ये बिल पढ़ रहे थे की तभी मैंने जोर से अपना सर पीट लिया क्योंकि कहाँ मैं तो मैं सोच रही थी की मैं खाना न खा के इनके ऊपर दबाव बना कर इन्हें अपने आगे झुका लूँगी तथा इनसे माफ़ी मँगवाऊँगी मगर इस बिल ने सब कुछ सत्यानाश कर दिया था| उस समय मन ही मन मैंने होटल वाले को कई सारी गालियाँ दी की कमबख्त मेरे खाने-पीने का बिल न बनाता! अब इसे मेरी बेवकूफी ही कहो की मैं अपने क्रोध में होटल वाले को कोस रही थी, जबकि वो तो बस अपना काम कर रहा था| मेरे खाने-पीने का बिल अगर मेरे पति नहीं देंगे तो क्या वो होटल वाला देगा?

शुक्र है की वेटर ने मुझे सर पीटते हुए नहीं देखा था वो बिल दे कर चला गया था मगर इन्होने मुझे सर पीटते हुए देख लिया था और शायद ये मेरे सर पीटने का कारण भी समझ गए थे तभी तो इनके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान थी! मेरे पेट भर कर खाना खा लेने पर इन्होने मुझे कुछ नहीं कहा बल्कि समान पैक कर ये पलंग पर पीठ टिका कर बैठ गए और ख़ामोशी से टी.वी. देखने लगे|

शाम के 5 बजे तक हमने कोई बात नहीं की, हाँ बीच में नेहा का फ़ोन आया था और दोनों बाप-बेटी ने करीब 20 मिनट बात की थी मगर न नेहा ने मेरे बारे में पुछा और न ही इन्होने मेरी उससे बात करवाई| ये सुबह से भूखे थे और मेरे पिज़्ज़ा, पास्ता खाने की बात जानकार भी इन्होने अपने लिए खाना नहीं मँगवाया, अगर मैं खाती तो ये जर्रूर मेरे साथ खाना खा लेते मगर मैं तो अपने गुस्से में अन्धी थी! हम दोनों ही अपने-अपने गुस्से और घमंड को सर पर चढ़ाये बैठे थे, कोई भी झुकने को राज़ी न था!

सवा पाँच बजे तो ये मुझसे बोले; "checkout करना है!" बस इतना बोल कर ये अपने कपड़े बदलने लगे| मैं गुस्से में तमतमाती हुई उठी और बाथरूम से कपडे बदल कर आ गई तथा अपने उतारे हुए कपडे मैंने गुस्से में पलंग पर फेंक दिए| मैंने जानबूझ कर अपने उतारे हुए कपड़े पलंग पर फेंके थे क्योंकि मैं चाहती थी की ये मुझे कुछ कहें ताकि मैं अपना गुस्सा इन पर निकाल सकूँ मगर इन्होने मुझसे कुछ नहीं कहा और मेरे उतारे हुए कपडे तहा कर बैग में रख दिए|

सामान उठा कर ये पहले कमरे से बाहर निकले, मैंने फिर से इन्हें गुस्सा दिलाने के लिए जानबूझ कर दस मिनट कमरे में आईने के सामने अपनी शक्ल ठीक करने में लगाए, लेकिन इन्हें गुस्सा नहीं आया! हम नीचे रिसेप्शन पर आये और इन्होने होटल के बिल का भुगतान किया, फिर इन्होने ऑटो किया जिसने हमें आगरा कैंट स्टेशन छोड़ा| हमारी ट्रैन 'ताज एक्सप्रेस' थोड़ी देर में आने वाली थी इसलिए हम प्लेटफार्म पर बैठ इंतज़ार करने लगे| अब मुझे लगी थी भूख तो मैं चुप-चाप उठी और स्टेशन पर एक खाने के स्टॉल की तरफ चल पड़ी| मैंने अपने लिए एक सैंडविच और एक चाय ली तथा वहीं खड़ी हो कर खाने लगी| मैं ये तक भूल गई की मेरे पति भी मेरे साथ हैं जो की सुबह से भूखे हैं!

अपना गड्ढा रुपी पेट भर कर मैं वापस आ कर बड़ी बेशर्मी से इन्हीं के बगल में बैठ गई| इन्होने मुझे खाते हुए देख लिया था मगर फिर भी इन्होने मुझे कुछ नहीं कहा| कुछ देर बाद बच्चों का फ़ोन आया और इन्होने उनसे बड़े प्यार से बात करना शुरू कर दिया| आयुष की परीक्षा खत्म हो चुकी थीं इसलिए वो आज दिनभर अपने दादा जी के साथ साइट पर घूम रहा था, वो शाम को घर लौटा था और अपने पापा जी को सारी दिनचर्या बताने के लिए बहुत उत्सुक था| बच्चों से बात करते-करते हमारी ट्रैन लग गई थी, इन्होने बच्चों का कॉल होल्ड पर डाला और समान हमारी सीट पर रख मुझे खिड़की की सीट पर बैठने को कहा| कल हम जिस बोगी में आये थे आज भी उसी एग्जीक्यूटिव कार (executive car) वाली बोगी में हमारी सीट थी| मैं आराम से सीट पर बैठ गई तथा ये ट्रैन से नीचे उतर कर बच्चों से बात करने लगे| ट्रैन चलने के समय तक ये बच्चों से प्लेटफार्म पर टहलते हुए बात करते रहे और मैं अंदर सीट पर बैठी इन्हें शीशे से देखती रही| एक पल के लिए न तो बच्चों ने मुझसे बात करने में अपनी कोई रूचि दिखाई और न ही इन्होने कहा की बच्चों मैं आपकी बात आपकी मम्मी से करवा देता हूँ!

ट्रैन चलने से एक मिनट पहले ये अपनी सीट यानी मेरी बगल वाली सीट पर आ कर बैठे| ट्रैन छूटी तो इन्होने अपना फ़ोन निकाला, उसमें हेडफोन्स लगाए और फिल्म देखने में व्यस्त हो गए| अब मैं अपना फ़ोन चार्ज करना भूल गई थी, ऊपर से मैं हो रही थी बोर तो मैंने इनके हाथ से इनका मोबाइल छीन लिया और इनके हेडफोन्स निकाल कर इनको दे अपने हेडफोन्स अपने हैंड बैग से निकाल फ़ोन से लगा कर फिल्म देखने लगी| मेरा मकसद इन्हें गुस्सा दिलाने का था मगर पता नहीं इन जनाब ने क्या घुट्टी पी रखी थी की इन्हें गुस्सा आ ही नहीं रहा था! इन्हें तो मेरा गुस्सा मेरा बचपना लग रहा था जिसकी वजह से इनके चेहरे पर मुस्कान आ गई थी| मैंने इनकी मुस्कान खिड़की के शीशे में देख ली थी, इनकी मुस्कान देख मेरा गुस्सा और तेज हो गया था इसलिए मैं तुरंत इनसे मुँह फेर फिल्म देखने में लग गई|

उधर ये बेचारे इधर-उधर देख कर अपना समय पार करने लगे! अब कब तक ये इधर-उधर देख कर अपना समय बिताते इसलिए इन्होने सो कर अपना टाइम पार करने की सोची| ये अपने हाथ सामने की ओर बाँधे हुए, पीठ पीछे टिका कर सोने की कोशिश करने लगे, मैं जल रही थी अपने गुस्से की आग में तो मैं कैसे इन्हें चैन से सोने देती?! मैंने फिल्म देखना बंद किया और माँ के फ़ोन पर कॉल घुमाया| माँ का फ़ोन नेहा के हाथ में था और चूँकि मैंने इनके फ़ोन से कॉल किया था तो नेहा ने एक ही घंटी में फ़ोन उठा लिया;

मैं: शैतानों! मम्मी की याद नहीं आती न तुम दोनों को? बस पापा से बात कर ली तो हो गया?

मैंने नेहा को थोड़ा डाँटते हुए कहा| नेहा ने फ़ोन स्पीकर पर किया ताकि आयुष भी मेरी डाँट सुन ले|

नेहा: वो...मम्मी...वो...

नेहा बेचारी घबरा गई थी और मेरी डाँट से बचने के लिए बहाना सोचने लगी थी| लेकिन आयुष बिलकुल इन पर गया था, वो मुझे अपने पापा जी की तरह मस्का लगाते हुए बोला;

आयुष: Sooooooooooooorrrrrrrrryyyyyyyyyy Mummmmmmmmmyyyyyyyy!

आयुष ने सॉरी मम्मी लम्बा खींचते हुए कहा| मैं आयुष की होशियारी समझ गई और इनकी तरफ देखते हुए बोली;

मैं: हाँ-हाँ अब ज्यादा मक्खन मत लगा, आने दे मुझे वापस फिर तुम दोनों की खैर नहीं! बहुत सर पर चढ़ा रखा है न तुम दोनों को, वापस आ कर तुम दोनों का सारा भूत उतारती हूँ!

इतना कह मैंने गुस्से में फ़ोन काट दिया| बच्चे मेरे इतने से गुस्से से डर गए थे इसीलिए दोनों ने दुबारा मुझे कॉल नहीं किया| वहीं इन्होने मेरी सारी बात सुनी थी पर फिर भी ये चुप-चाप आँख मूँदे रहे|

बाकी का सारा सफर हम दोनों मियाँ-बीवी ने ख़ामोशी से ही काटा, न ये कुछ बोले और न ही मैं कुछ बोली| मथुरा पहुँचने पर पीने का पानी खत्म हो गया था, जैसे ही पानी वाला आया तो मैंने उससे पानी की बोतल ली और पैसे इन्होने बिना मुझसे कुछ कहे उस पानी बेचने वाले आदमी को दे दिए|

खैर साढ़े दस बजे ट्रैन ने हमें निजामुद्दीन स्टेशन पर उतारा, स्टेशन से बाहर आ कर इन्होने मुझसे खाने के बारे में पुछा; "खाना खा लो?!" मैंने इनके पूछे सवाल का जवाब नहीं दिया और सीधा स्टेशन के बाहर बने रेस्टोरेंट के तरफ चल पड़ी| काउंटर पर मैंने सीधा एक थाली आर्डर की और टोकन ले कर आगे वाले काउंटर की तरफ बढ़ गई, पैसे इन्होने दिए जबकि मैं अपनी थाली काउंटर से ले कर खाने बैठ गई| ये पानी की बोतल ले कर मेरे सामने बैठ गए, न मैंने इनको खाने को पुछा और न ही इन्होने अपने लिए खाना मँगवाया| मैं पूरी बेशर्मी दिखाते हुए इनके सामने बैठी खाना खाती रही| मेरे खाना खाने के बाद इन्होने घर जाने के लिए ऑटो किया और आधे घंटे बाद हम घर पहुँचे| ये आगे थे और मैं जानबूझ कर पीछे-पीछे अपनी गति से आ रही थी!

रात के ग्यारह बज रहे थे और ऐसे में दरवाजा खटखटा कर माँ-पिताजी की नींद खराब करना ठीक नहीं था इसलिए इन्होने दरवाजा अपनी चाभी से खोला| दरवाजा खोलने से हुई हलचल से माँ-पिताजी जाग गए थे, उनके कमरे की लाइट जली देख ये सीधा उनके कमरे में चले गए जबकि मैं अंदर आते है सीधा हमारे कमरे में जा कर बिस्तर पर लेट गई|

जब ये माँ-पिताजी के कमरे में पहुँचे तो इन्हें अकेला देख माँ-पिताजी थोड़ा चिंतित हुए;

माँ: बहु कहाँ है?

माँ ने चिंतित होते हुए पुछा तो इन्होने झूठ बोल दिया;

ये: वो थक गई थी इसलिए लेट गई होगी|

पिताजी ने इनकी बात पर विश्वास कर लिया था मगर माँ को शक हो गया था की कुछ तो गड़बड़ है?! उस वक़्त तो माँ ने कुछ नहीं कहा और इन्हें आराम करने के लिए कहा| माँ-पिताजी को शुभरात्रि बोल जैसे ही ये उनके कमरे से बाहर आये की नेहा ने अचानक से इनका हाथ पकड़ लिया| दो दिन बाद अपने पापा को देख नेहा बहुत खुश थी और उसकी ये ख़ुशी उसके चहरे पर मुस्कान बन कर छलक रही थी|

ये: मेरा बच्चा सोया नहीं?

इन्होने नेहा को गोद में उठाते हुए पुछा|

नेहा: पापा जी, आपकी कहानी सुने बिना नींद कहाँ आती है!

इतना कह नेहा ने इनके दोनों गालों पर पप्पी दी| नेहा को गोद में लिए हुए ये बच्चों वाले कमरे में दाखिल हुए, जैसी ही इन्होने कमरे की लाइट जलाई की आयुष एकदम से उठ बैठा;

आयुष: पापा जी, मेरे लिए क्या लाये आप?

आयुष सीधे अपने मतलब की बात बोला| आयुष को जगा हुआ देख ये हँस पड़े, पहले इन्होने नेहा को नीचे उतरा और फिर बैग खोल कर दोनों के लिए जो लाये थे वो दिखाने लगे;

ये: बेटा ये देखो डोडा पेठा!

इन्होने पेठे का डिब्बा खोल कर बच्चों को दिखाते हुए कहा| पेठे का रंग चोक्लेटी था जिसे देख कर बच्चों की रूचि उसे खाने में जाग गई| इन्होने थोड़ा सा पेठा बच्चों को टेस्ट करने को दिया;

नेहा: वाओ पापा!

आयुष: ये तो बहुत टेस्टी है!

दोनों बच्चे खुश होते हुए बोले| दोनों बच्चों ने एक साथ अपने छोटे-छोटे हाथ आगे कर दिए क्योंकि उन्हें एक पूरा पीस खाना था| इन्होने दोनों बच्चों को एक-एक पीस दिया और बोले;

ये: कहा था न मैंने की आपको ये वाला पेठा बहुत पसंद आएगा?!

दोनों बच्चों ने ख़ुशी से एक साथ अपना सर दाएँ-बाएँ हिलाना शुरू कर दिया|

ये: और ये देखो...

ये कहते हुए इन्होने बैग से दोनों बच्चों के लिए लाई हुई जुत्तियाँ निकाली;

ये: ...आप दोनों के लिए चमड़े की बनी जुत्तियाँ!

नेहा होशियार थी इसलिए वो समझ गई की आगरा में पेठा और लेदर के बने जूते-चप्पल मशहूर हैं;

नेहा: ओ...तो ये दोनों चीजें आगरा में मशहूर हैं?!

ये: हाँ जी बेटा! ये डोडा पेठा 'पंछी' ब्रांड का है और आगरा में बहुत मशहूर है| दूसरी चीज जिसके लिए आगरा फेमस है वो है लेदर फुटवेयर्स|

इन्होने अपने हाथों से दोनों बच्चों को जुत्तियाँ पहनाई और दोनों बच्चों ने बड़े चाव से जुत्ती पहन कर इन्हें दिखाईं|

बच्चों के कमरे से आ रही इनकी और बच्चों की आवाज सुन पिताजी बाहर आ गए, बच्चों को जागा हुआ देख पिताजी मुस्कुराते हुए बच्चों से बोले;

पिताजी: तुम दोनों शैतान, सोये नहीं?!

ये: पिताजी बिना मेरी कहानी सुने मेरे बच्चे कहाँ सोते हैं?!

इन्होने दोनों बच्चों को अपनी गोदी में लेते हुए कहा| दोनों बच्चे इनकी गोदी में चढ़ कर इनका लाड करने लगे और उन्हें यूँ लाड करता देख पिताजी बोले;

पिताजी: बेटा रात बहुत हो रही है...

पिताजी के आगे कुछ बोलने से पहले ही ये बच्चों की तरह उत्साह से बोले;

ये: अब आप और माँ जागे हो तो मैं आप दोनों के लिए कुछ ख़ास लाया हूँ|

ये कहते हुए ये बच्चों को साथ ले कर माँ-पिताजी के कमरे में घुस गए|

माँ: तू सोने नहीं गया?

माँ ने इन्हें दोनों बच्चों के साथ देख थोड़ा डाँटते हुए कहा|

ये: पहले आप ये देखो|

इन्होने माँ की डाँट की परवाह किये बिना अपना बचपना दिखाते हुए कहा| इन्होने पिताजी और माँ के लिए एक आराम दायक चप्पल निकाली और उन्हें जबरदस्ती अपने हाथों से पहनाई|

पिताजी: बेटा ये तो बहुत नरम है! ऐसा लगता है मानो रुई पर चल रहा हूँ!

पिताजी चप्पल की तारीफ करते हुए बोले, पर माँ को मेरी चिंता थी क्योंकि घर लौट कर मैं उनसे मिले बिना ही सो गई थी| मेरे बारे में इस समय पूछ कर माँ इन्हें पिताजी से डाँट नहीं पढ़वाना चाहतीं थीं इसलिए उन्होंने बात घूमाते हुए इन्हें डाँटा;

माँ: तू अपने और बहु के लिए क्या लाया?

माँ का सवाल सुन इन्होने मेरे लिए लाई हुई जुत्ती निकाली और उन्हें दिखाई| जुत्ती देख माँ ने उस वक़्त तो कुछ नहीं कहा और इन्हें सोने जाने को हुक्म दे कर बात खत्म की|

लेकिन बच्चे कहाँ इनका पीछा छोड़ने वाले थे, उन्होंने अपने पापा जी से कहानी सुनने की जिद्द पकड़ ली| दोनों बच्चों को गोद ले कर इन्होने बच्चों को उनके कमरे में छोड़ा;

ये: बेटा, मैं कपड़े बदल कर आता हूँ|

ये कमरे में लौटे, मुझे लगा ये कुछ कहेंगे इसलिए मैं कठोर बन कर लेटी रही| लेकिन ये बिना कुछ बोले अपने कपड़े बदल कर बच्चों के पास कहानी सुनाने चले गए| दोनों बच्चों ने इन्हें पलंग के बीचों-बीच लिटाया, आयुष इनकी छाती पर चढ़ इनसे लिपट गया और नेहा इनकी बाईं तरफ लेट कर इनसे लिपट गई| इन्हें बच्चों को कहानी बना कर सुनाने की जर्रूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि बच्चे इनसे लिपटे हुए फ़ट से सो गए| इधर मैं कमरे में अकेली लेटी हुई अपने गुस्से और जलन की आग में कुढ़ती रही तथा करवटें बदलते हुए रात काटी!

अगली सुबह मैं जल्दी उठी, फ्रेश हो कर रसोई में जा ही रही थी की माँ आ गईं, मैंने उनके पाँव छुए और माँ ने मुझे आशीर्वाद देते हुए पुछा;

माँ: बहु, मानु बच्चों के कमरे में क्यों सोया है?

माँ ने जब इनके बारे में सवाल पुछा तो मुझे बहुत गुस्सा आया, परन्तु माँ पर तो मैं गुस्सा निकाल नहीं सकती थी इसलिए मैंने सर झुकाते हुए अपना गुस्सा छुपाते हुए कहा;

मैं: जी, पता नहीं|

माँ जान गईं की कुछ गड़बड़ है, माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे हमारे कमरे में पलंग पर बिठा कर पुछा;

माँ: बता बेटी क्या हुआ? कोई कहा-सुनी हुई तुम दोनों के (मेरे और इनके) बीच?

माँ ने इतने प्यार से पुछा की मैंने उन्हें कल रात हमारे बीच हुई सारी बहस और इनके द्वारा कही हुई सारी बात बता दी| मेरी पूरी बात सुन माँ को बहुत झटका लगा, आखिर माँ का लाडला बेटा उनसे झूठ कैसे बोल सकता है? परन्तु फिर भी माँ को अपने बेटे पर विश्वास था की उनका बेटा मेरे साथ धोका नहीं कर सकता;

माँ: बेटी तेरी नाराजगी जायज है! हाँ मानु ने मुझसे झूठ बोला, अपने पिताजी से झूठ बोला, शादी से पहले तुझसे करुणा के बारे में ये सब बातें छुपाई मगर बेटी, मेरा बेटा धोकेबाज़ नहीं हो सकता?! मुझे पूरा भरोसा है मानु पर, मुझे पूरा यक़ीन है की उसकी नीयत बस करुणा की मदद करने की थी, एक कमरे में रहते हुए उसने करुणा को छुआ नहीं होगा! मानु सिर्फ और सिर्फ तुझसे प्यार करता है और तेरे साथ वो कभी धोका नहीं कर सकता!

माँ सच कह रहीं थीं पर मेरे दिमाग में भरा गुस्सा मुझे उनकी बातों पर विश्वास नहीं करने दे रहा था| मेरे हाव-भाव देख माँ समझ गईं की मेरा मन अभी भी गुस्से से जल रहा है इसलिए उन्होंने मुझे सारी बात विस्तार से बताई;

माँ: बेटी, दरअसल गलती सारी मेरी है! मानु के कॉलेज खत्म होने के बाद तेरे ससुर जी चाहते थे की मानु उन्ही के साथ काम करे मगर मानु नौकरी करना चाहता था| इसके चलते एक दिन दोनों बाप-बेटों में बहुत झगड़ा हुआ, मजबूरन मुझे ही मानु को समझना पड़ा पर उसने जो कहा उसे सुन कर मैं दंग रह गई! बचपन से मानु ने अपने पिताजी का झुकाव अपने भाई-भाभी की तरफ देखा था| कई बार तेरे ससुरजी हम दोनों को यहाँ अकेला छोड़ कर गाँव जाते और हफ्ते-हफ्ते वहीं रुक कर जेठ जी का काम में हाथ बँटाते| मैंने कई बार उन्हें समझना चाहा की वो इस तरह न जाएँ और अपने काम-धँधे पर ध्यान दें मगर ये उल्टा मुझ पर ही बरस पड़ते! अब आखिर मर्द तो मर्द ही होता है, कई बार इन्होने मुझे बहुत बुरी तरह झाड़ा और नशे की हालत में मुझ पर हाथ भी उठाया| तब मानु बहुत छोटा था और अपनी माँ पर होने वाले ये अत्याचार देख दुखी होता था| तभी से मानु ने फैसला कर लिया था की वो जब कमाने लायक होगा तो मुझे ले कर अलग रहेगा! यही वो कारन था जिसके चलते मानु ने नौकरी करने की जिद्द की थी| किसी तरह मैंने मानु को समझा-बुझा कर उसका गुस्सा शांत किया और अपने इस घर को टूटने से बचाया| फिर मैंने मानु के पिताजी को भी समझाया और उन्हें मानु के नौकरी करने के लिए मनाया|

लेकिन फिर एक दिन तेरे ससुर जी जेठ जी के बीमार होने पर गाँव गए और कुछ दिनों के लिए वहीं रुक गए, मानु तब नौकरी कर रहा था और उसे तरक्की भी मिल गई थी तथा साथ ही अपने ऑफिस के कोई बहुत बड़े प्रोजेक्ट पर मानु काम कर रहा था| उन्हीं दिनों मैं मैं अचानक बीमार पड़ गई, मेरे बीमार पड़ने की खबर सुनकर भी तेरे ससुर जी गाँव से नहीं आये इसलिए मानु ने ही मेरी देखभाल करने के लिए अपने ऑफिस से छुट्टी माँगी मगर मानु के बॉस ने उसे छुट्टी देने से साफ़ मना कर दिया| मानु को इस बात पर इतना गुस्सा आया की उसने अपनी अच्छी खासी नौकरी को लात मार दी मगर मानु को मजबूरी में दो महीने उसी कंपनी में और काम करना था! उसके ऑफिस जाने से मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं था, तब मानु ने डॉक्टर सरिता से मदद माँगीं और उसने ही करुणा को नर्स के तौर पर मेरी देखभाल करने को भेजा| मानु की गैर मौजूदगी में करुणा मेरा ध्यान रखती थी, वो रोज़ सुबह 7 बजे आती और रात 8 बजे यानी मानु के आने के बाद ही जाती| मेरा खाना-पीना, नहाना-धोना सब का ख्याल करुणा रखती थी और इसी कारण मेरा उससे थोड़ा लगाव बन गया| मानु और करुणा बस दुआ-सलाम करते थे, या अगर दोनों में कभी बात भी होती तो ज्यादा से ज्यादा मेरी तबियत के बारे में बात करते थे|

कुछ दिन बाद मेरी तबियत ठीक हो गई थी और करुणा अब घर नहीं आती थी, पर चूँकि करुणा से मेरा थोड़ा लगाव बन गया था तो वो कभी-कभार मुझसे मिलने आ जाया करती थी| ऐसे ही एक दिन वो मुझसे मिलने घर आई थी, तब मैंने ही इन दोनों की बात शुरू करवाई थी, उसी दिन से दोनों में दोस्ती हो गई| कुछ समय बाद घर में पूजा थी और उस पूजा में मैंने करुणा और उसकी बहन को बुलाया था, मेरे हिसाब से उसी दिन से इन दोनों का मेल-जोल बढ़ा होगा मगर ये मेल-जोल बस दोस्ती तक ही सीमित था! अब तू सोच रही होगी की मुझे कैसे पता की इन दोनों का मेल-जोल प्यार-मोहब्बत तक कैसे नहीं पहुँचा? तो मैं तुझे बताऊँ की, एक दिन मैंने मानु से पुछा था की अगर उसे करुणा पसंद है तो मैं दोनों की शादी की बात मानु के पिताजी से करूँ मगर तेरे पति ने साफ़ कह दिया की करुणा बस उसकी अच्छी दोस्त है और उससे अधिक कुछ नहीं!

माँ की सारी बात सुन मुझे कुछ इत्मीनान आया था मगर उनकी कही बात की वो मेरी इनसे शादी होने से पहले करुणा से इनकी शादी की सोच रहीं थीं सुन कर मेरा गुस्सा करुणा पर जर्रूर खौला था! अगर मैं दिल्ली न आई होती तो इनकी शादी करुणा से जर्रूर हो जाती, ये सोच कर मुझे फ़िज़ूल की चिंता होने लगी थी;

माँ: बेटी, तू चिंता मत कर मैं मानु से बात करती हूँ और उसे समझाती हूँ की वो करुणा से बात करना बंद कर दे| लेकिन बेटी तू मानु के हमसे झूठ बोल कर करुणा के साथ जाने की बात अपने ससुर जी से मत कहना, वरना वो घर में कलेश खड़ा कर देंगे| मैं ही उनसे बात करुँगी और आज के आज ही हम सारी बात का फैसला कर देंगे|

मैंने माँ की बात सुन, हाँ में सर हिला उन्हें आश्वस्त किया की मैं पिताजी को कुछ नहीं कहूँगी| व

माँ की बातों से मेरे सर पर जो गुस्से के बादल मंडरा रहे थे वो अब धीरे-धीरे छटने लगे थे| माँ के जाने के बाद मैं कुछ समय तक उनकी कही बातों के बारे में सोचती रही| मेरा दिमाग अब शांत होने लगा था और दिमाग अक्ल की घास चरने लगा था| 'तू जानती है की ये किसी की भी मदद करने से नहीं चूकते मगर ये कभी किसी लड़की का नाजायज फायदा नहीं उठा सकते! ये मुझसे इतना प्यार करते हैं की ये मुझे कभी धोखा नहीं दे सकते! भले ही इन्होने मुझे करुणा के बारे में कुछ नहीं बताय हो पर ये उसके साथ हमबिस्तर नहीं हो सकते! अगर इन्होने ये पाप किया होता तो ये मुझे जरूर बताते!' मेरी अंतरात्मा बोली| मेरे मन में इनके लिए जो प्यार था अब वो मेरे दिमाग में भरे गुस्से को खत्म करने लगा था|

कुछ देर बाद ये उठ गए और दोनों बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने लगे, इधर मैं सबके लिए चाय और बच्चों के लिए नाश्ते बनाकर तैयार करने लगी|

माँ: बच्चों, आप दोनों खुद तैयार हो जाओ मुझे आपके पापा से कुछ बात करनी है|

माँ ने बच्चों के कमरे में आते हुए कहा| नेहा की आज परीक्षा थी इसलिए वो जल्दी से तैयार हो कर अपनी रिवीजन करने बैठ गई| वहीं आयुष को आज उसके स्कूल वाले रेल मियूजियम घुमाने ले जा रहे थे इसलिए आयुष का उत्साह थमने का नाम ही नहीं ले रहा था!

बच्चे तैयार होने लगे और माँ इनसे बात करने बच्चों के कमरे में बैठ गईं;

माँ: बैठ बेटा!

माँ ने इन्हें अपने सामने बैठने को कहा| माँ की गंभीर आवाज सुन ये समझ गए की मैंने माँ को सब सच बता दिया है|

माँ: बेटा तूने मुझसे और अपने पिताजी से झूठ बोला? तू हमसे झूठ बोल कर करुणा के साथ अकेला जयपुर गया, वो भी एक नहीं कई बार! उसके साथ होटल में रात गुजारी, मैं तुझ पर भरोसा करती हूँ और तूने मेरे भरोसे का ये सिला दिया?

माँ ने गुस्से से कहा था परन्तु उनकी आवाज इतनी ऊँची नहीं हुई थी की पिताजी उनकी बात सुन लें| उधर माँ की कहीं बातों से इन्हें ग्लानि हो रही थी की इन्होने माँ-पिताजी से झूठ बोला|

ये: माँ...मुझे माफ़ कर दो की मैंने झूठ बोलकर आपका और पिताजी का भरोसा तोडा मगर माँ मेरे मन में जरा भी गन्दी इच्छा या स्वार्थ नहीं था| मैंने जो भी किया वो बस करुणा की मदद करने के लिए किया, उसके भले के लिए किया| मैंने आप को और पिताजी को इसलिए ये सब नहीं बताया क्योंकि आप मुझे कभी करुणा के साथ अकेले नहीं जाने देते| हाँ...मैं उसके साथ एक कमरे में रुका मगर मेरा विश्वास करो माँ, मैंने करुणा को न कभी गंदी नज़र से देखा और न ही कभी उसे हाथ लगाया| मैं तो बस उसकी मदद करना चाहता था, उससे ज्यादा और कुछ भी नहीं|

इन्होने सच्चे दिल से अपनी सफाई दी| माँ को अपने बेटे पर भरोसा था इसलिए माँ इन्हें प्यार से समझाते हुए बोलीं;

माँ: बेटा, मुझे अपने लाल पर पूरा भरोसा है की तूने करुणा के साथ कोई गलत काम नहीं होगा इसीलिए मैं तुझसे आराम से बात कर रही हूँ वरना कहीं तूने अगर कुछ गलत किया होता तो मैं तुझसे माँ कहने का हक़ छीन लेती!

माँ की बात सुन इनकी साँस हलक़ में अटक गई थी! एक बेटे से उसकी अपनी माँ अगर माँ कहने का हक़ छीन ले तो उस बेटे की क्या दुर्दशा होगी ये कल्पना करना भी मुश्किल है!

माँ: लेकिन आज के बाद तूने अगर कभी मुझसे झूठ बोला या मुझसे बात छुपाई न तो नतीजा अच्छा नहीं होगा!

माँ ने इन्हें तड़ी देते हुए कहा| माँ की तड़ी सुन ये डर के मारे सहम गए और बोले;

ये: आज के बाद मैं आपसे कुछ नहीं छुपाउँगा माँ!

इन्होने हाथ जोड़ते हुए माँ से कहा| माँ ने इनकी बात पर विश्वास करते हुए इनके सर पर हाथ फेरा|

माँ: बेटा, जो हो गया सो हो गया मगर आज के बाद से तू करुणा से बात नहीं करेगा!

माँ आगे कुछ और कहतीं उससे पहले पिताजी बच्चों वाले कमरे में आ गए, माँ-बेटे को यूँ गंभीर बैठे देख वो समझ गए की मामला कुछ गंभीर है| वो कुछ पूछते उससे पहले ही माँ इन्हें आदेश देते हुए बोलीं;

माँ: चल अब जा कर बच्चों को स्कूल छोड़ आ फिर बात करते हैं|

माँ ने पिताजी को कुछ पूछने का मौका ही नहीं दिया और उन्हें साथ ले कर अपने कमरे में चली गईं|

[color=rgb(163,]जारी रहेगा भाग - 6 में...[/color]
 

[color=rgb(51,]उनत्तीसवाँ अध्याय[/color][color=rgb(51,]: मुश्किलों भरी [/color][color=rgb(51,]शुरुआत[/color]
[color=rgb(255,]भाग -6[/color]


[color=rgb(251,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

माँ: बेटा, जो हो गया सो हो गया मगर आज के बाद से तू करुणा से बात नहीं करेगा!

माँ आगे कुछ और कहतीं उससे पहले पिताजी बच्चों वाले कमरे में आ गए, माँ-बेटे को यूँ गंभीर बैठे देख वो समझ गए की मामला कुछ गंभीर है| वो कुछ पूछते उससे पहले ही माँ इन्हें आदेश देते हुए बोलीं;

माँ: चल अब जा कर बच्चों को स्कूल छोड़ आ फिर बात करते हैं|

माँ ने पिताजी को कुछ पूछने का मौका ही नहीं दिया और उन्हें साथ ले कर अपने कमरे में चली गईं|

[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]

इनके
बच्चों को स्कूल छोड़ने जाने के बाद माँ ने पिताजी को अगरा में हमारे झगड़े के बारे में बता दिया था, लेकिन माँ ने इनके करुणा के साथ जयपुर जाने और वहाँ एक ही कमरे में रुकने की बात पिताजी को नहीं बताई थी| सारी बात सुन पिताजी को इन पर बहुत गुस्सा आया;

माँ: आप मानु को कुछ मत कहना, मैं ही उससे बात करुँगी|

माँ ने पिताजी को प्यार से समझाते हुए कहा| पिताजी ने माँ की बात का कोई जवाब नहीं दिया और अपना गुस्सा काबू करने लगे| जब ये बच्चों को स्कूल छोड़ कर वापस आये तो माँ ने इन्हें सीधा अपने कमरे में बुला लिया| फिर माँ ने मुझे भी आवाज दे कर बुलाया;

माँ: बहु...बेटी, तू भी आ जा|

मैं समझ गई थी की अभी माँ द्वारा इनकी क्लास लगने वाली है, मैं जाना नहीं चाहती थी क्योंकि मेरे सामने इनकी क्लास लगने पर ये जान जाते की ये आग मैंने ही लगाई है मगर माँ का हुक्म कैसे टालती इसलिए मैं सर झुकाये माँ-पिताजी के कमरे में पहुँच गई|

माँ: बेटा हमने तुम दोनों को आगरा, कुछ समय साथ बिताने भेजा था न की लड़ाई-झगड़ा करने!

माँ ने आराम से बात शुरू करते हुए कहा, माँ की बात सुन इनका सर शर्म से झुक गया।

माँ: बेटा तू शादी-शुदा है और ऐसे में तेरा एक पराई लड़की से घंटों बात करना तुझे शोभा नहीं देता।

माँ प्यार से इन्हें समझाना चाह रहीं थीं जबकि पिताजी का गुस्सा अब चरम पर था| पिताजी ने भोयें सिकोड़ कर गुस्से से इन्हें देखा, फिर वो माँ की तरफ देख उन्हें डाँटते हुए बोले;

पिताजी: मैंने कहा था न उस दिन अस्पताल में की इसका उस लड़की से बात करना ठीक नहीं? लेकिन तब तुमने मेरी बात नहीं सुनी, अब भुगतो!

माँ, पिताजी की डाँट सुन चुप हो गईं| फिर पिताजी ने इनकी ओर देखा और इन्हें डाँटते हुए बोले;

पिताजी: और तू बता, क्यों करता है तू उस लड़की से बात?

पिताजी के गुस्से से पूछे सवाल के जवाब में कहीं ये भी गुस्से से न उबल पड़ें इसलिए माँ बीच में बोल पड़ीं;

माँ: देख बेटा, माना की वो सिर्फ तेरी दोस्त है पर ये भी तो देख की बहु जिसे तू इतना प्यार करता है, उसे करुणा जरा भी पसंद नहीं तो आखिर क्यों तू उससे बात करता है?

माँ इनकी तरफ से जवाब दे कर इन्हें पिताजी के गुस्से से बचा रहीं थीं और पिताजी ये बात अच्छे से जानते थे| परन्तु पिताजी का गुस्सा शांत होने से रहा;

पिताजी: खबरदार जो तूने आज के बाद उस लड़की से कोई बात की तो?! उस लड़की को मेरे सामने अभी फ़ोन कर और खत्म कर अपना ये दोस्ती का रिश्ता!

पिताजी ने इन्हें डाँटते हुए हुक्म दिया| इन्होने पिताजी की बात सर झुकाये हुए सुनी मगर अपनी सफाई में एक शब्द भी नहीं कहा|

इनकी ये ख़ामोशी देख कर मुझे इनके दिल में पैदा हुआ दुःख और दर्द नज़र आया| दुःख इस बात का की इनके दोस्ती के रिश्ते को माँ-पिताजी गलत समझ रहे थे और दर्द इस बात का की माँ-पिताजी को अपने बेटे पर विश्वास नहीं तभी तो वो इन्हें करुणा से दोस्ती का रिश्ता खत्म करने को कह रहे थे! इनके दुःख-दर्द को महसूस कर मुझे अब इनके लिए बुरा लग रहा था, मेरे ही कारण आज इन्हें माँ-पिताजी की इतनी बातें सुन्नी पड़ रही थीं|

पिताजी: मैंने जो कहा वो सुनाई नहीं दिया तुझे? अभी फ़ोन कर करुणा को और बोल दे की आज के बाद वो तुझे कॉल न करे|

पिताजी ने चिल्लाते हुए इन्हें हुक्म दिया| ये चुप-चाप उठे और हमारे कमरे में चले गए| हमें लगा की ये करुणा से फ़ोन पर बात कर रहे होंगे मगर ये तो साइट पर जाने के लिए तैयार हो रहे थे| कुछ देर बाद ये तैयार हो कर कमरे से बाहर निकले और बिना कुछ बोले बाहर चले गए| हम सब ने इन्हें निकलते हुए देखा था, माँ ने इन्हें पीछे से रोकने के लिए बहुत आवाज दी मगर ये बिना कुछ कहे ही घर से चले गए|

इनके इस तरह माँ की आवाज को अनसुना करने से पिताजी को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने इन्हें कॉल किया लेकिन इनका फ़ोन बिजी था| इनका फ़ोन बीजी होने से पिताजी क्रोधित हो गए थे, तब माँ ने उन्हें ये कह कर शांत किया की ये करुणा को फ़ोन कर के उसे दुबारा कॉल करने से मना कर रहे होंगे इसीलिए फ़ोन बीजी है| खैर, अभी के लिए माँ की बात को मानते हुए पिताजी का गुस्सा शांत हो गया|

घडी में 11 बजे थे और इन्होने कल से सिर्फ एक कप चाय ही पी थी इसलिए मुझे अब जा कर इनकी चिंता होने लगी थी, मैं जानती थी की अगर मैंने इन्हें फ़ोन किया तो ये मुझे बहुत सुनाएंगे की मैंने क्यों इनकी चुगली माँ-पिताजी से की इसलिए मैंने माँ का सहारा लेते हुए उन्हें ही कॉल करने को कहा| माँ ने जब इन्हें कॉल किया तो इन्होने फ़ोन उठा लिया;

माँ: कहाँ पर है बेटा?

माँ ने बड़े प्यार से इनसे पुछा|

ये: गुड़गाँव वाली साइट पर हूँ माँ|

इन्होने बड़े संक्षेप में जवाब दिया|

माँ: बेटा, बहु ने बताया तूने कल से कुछ खाया-पीया नहीं है, चल जल्दी से घर आ जा|

माँ चिंता करते हुए बोलीं|

ये: माँ, दोपहर के खाने के समय तक आ जाऊँगा|

इन्होने घर न आने के लिए बहाना किया|

माँ: बेटा अभी आ|

माँ इन्हें प्यार से हुक्म देते हुए बोलीं|

ये: माँ, साइट पर सामान नहीं आया है, दुकानदार से मिलकर थोड़ी देर में आ रहा हूँ|

इन्होने फिर बहाना कर के खाना खाने घर आने से बचना चाहा मगर माँ के आगे इनकी कहाँ चलती?

माँ: घंटे भर में घर पहुँच वरना मैं तेरे पिताजी के साथ वहाँ आ रही हूँ!

माँ ने इन्हें प्यार से धमकाया तो ये हार मानते हुए बोले;

ये: ठीक है माँ|

माँ ने फ़ोन काटा और मुझे इनका पसंदीदा पोहा बनाने को कहा| मैंने भी बड़े मन से इनका पसंदीदा पोहा बनाया, आखिर 24 घंटे बाद ये खाना खाने वाले थे| ठीक एक घंटे बाद ये घर पहुँचे और हम सब एक साथ डाइनिंग टेबल पर नाश्ता करने बैठ गए|

ये अभी पहला निवाला खा ही रहे थे की पिताजी ने गुस्से से पुछा;

पिताजी: बात हो गई तेरी करुणा से?

पिताजी का सवाल सुन इन्होने अपनी पैंट की जेब में हाथ डाला और फ़ोन निकाल कर मेरी तरफ सरका दिया;

मैं: उसे केरला में दूसरी जॉब मिल गई है और वो हमेशा के लिए वहीं जा रही है|

इन्होने बिना पिताजी की तरफ देखे हुए कहा तथा नाश्ता करने लगे| फिर इन्होने मेरी तरफ देखे बिना ही कहा;

ये: व्हाट्स अप्प पर चैट पढ़ लो!

मैं इनका चेहरा नहीं देख पाई थी मगर अपने में में इनकी तस्वीर बनाने लगी थी| इनकी आँखें सूनी थीं और चेहरे पर कोई भाव नहीं थे तथा दिल में गुस्सा और दर्द दोनों पर्याप्त मात्रा में भरे थे| वहीं इन्होने मुझे अपना मोबाइल चेक करने को इसलिए कहा था ताकि मुझे तसल्ली हो जाए की ये झूठ नहीं बोल रहे| उधर पिताजी को उनके पूछे सवाल का जवाब नहीं मिला था इसलिए पिताजी इनपर और अधिक क्रोधित हो गए;

पिताजी: मैंने तुझे कहा था न उसे कॉल कर के मना करने को, समझ नहीं आता तेरे?

पिताजी गुस्से में इन्हें डाँटते हुए बोले| पिताजी के गुस्से के कारण ये नाश्ता करते हुए रुक गए थे| ये अपना सर झुकाये हुए चुप-चाप बैठे थे, माँ को इनके भीतर पनप रहे गुस्से का आभास हो गया था| इससे पहले की ये गुस्से में फट पड़ें और घर में क्लेश खड़ा हो, माँ घर में कलेश बचाने के लिए बीच-बचाव करने उतर पड़ीं| माँ ने पिताजी को हाथ दिखा कर शांत कराया और इनसे बड़े प्यार से बोलीं;

माँ: बेटा, एक बार करुणा को कॉल कर के सब बात खत्म कर दे ताकि ये मामला यहीं खत्म हो जाए|

माँ के प्यार से समझाने पर इनका गुस्सा शांत होने लगा और इन्होने सर झुकाये हुए माँ की बात का जवाब दिया;

ये: मैं करुणा को कॉल कर के ये दोस्ती नहीं तोड़ सकता क्योंकि मैंने उससे वादा किया था की चाहे कुछ भी हो मैं कभी ये दोस्ती नहीं तोडूँगा| आजतक मैंने अपना किया कोई वादा नहीं तोडा और ये भी नहीं तोड़ सकता! आप सब यही चाहते हो न की मैं उससे कभी बात न करूँ तो मैं आप सभी को वचन देता हूँ की मैं उससे कभी बात नहीं करूँगा! वैसे भी उसके केरला जाने से हमारे बीच बात-चीत उसी तरह खत्म हो जाएगी जैसे पिछलीबार उसके केरला जाने से बंद हो गई थी|

इतना कह कर ये आधे खाने पर से उठ गए और सीधा साइट पर निकल गए| इनके इस तरह जाने से पिताजी को बहुत गुस्सा आया और अपना गुस्सा उन्होंने माँ पर निकाला;

पिताजी: तुम्ही ने इसे सर पर चढ़ा रखा है, देख रही हो कितनी अकड़ दिखाता है हमें? उस लड़की को फ़ोन करने को कहा तो ये अपना 'वादा' निभाने की बात कह रहा है, अरे मैं पूछता हूँ की माँ-बाप का आदेश बड़ा होता है या वादा? आने दो इसे आज इसकी खटिया खड़ी और बिस्तरा गोल करता हूँ!

पिताजी का गुस्सा देख माँ ने उन्हें प्यार से समझाते हुए कहा;

माँ: आप गुस्सा न हो, मानु ने कहा है न की वो अब करुणा से बात नहीं करेगा तो नहीं करेगा। इतना तो विश्वास है मुझे अपने बेटे पर!

माँ ने बड़े गर्व से कहा और अपनी प्लेट जिसमें आधा नाश्ता बचा था उसे ले कर उठ गईं|

डाइनिंग टेबल अब बस मैं और पिताजी ही रह गए थे, मेरे गुस्से के कारण आज सभी ने आधा नाश्ता किया था, इस बात को सोच-सोच कर मैं ग्लानि में गड़ी जा रही थी|

मैं: पिताजी, मुझे माफ़ कर दीजिये! मेरे कारण आज घर में..

मैं आगे कुछ बोल पाती उससे पहले ही पिताजी बोल पड़े;

पिताजी: नहीं बहु तूने कुछ गलत नहीं किया! ये सब मानु की गलती है, बचपन से मैंने उसपर लगाम लगा कर रखी थी पर जब से तुम दोनों की शादी हुई तब से मैंने इसे कुछ ज्यादा ही छूट दे दी! लेकिन अब तू चिंता मत कर, इसे तो अब मैं सुधारूँगा! अगर करुणा का फ़ोन मानु को आये तो मुझे बताइओ, मैं इसकी ऐसी-तैसी करता हूँ!

इतना कह कर पिताजी भी गुस्से में आधा नाश्ता कर के ही उठ गए तथा अपने कमरे में कुछ हिसाब-किताब देखने लगे|

दोपहर को ये बच्चों को स्कूल से ले कर घर आये और हम सब माँ-पिताजी के कमरे में खाना खाने बैठ गए| माँ ने पिताजी को समझा बुझा कर बच्चों के सामने इन्हें डाँटने से रोका हुआ था मगर पिताजी को इन्हें देखते ही गुस्सा आने लगा था| वहीं बच्चों के सामने इनका चेहरा पहले की ही तरह खिला हुआ था ताकि बच्चों को शक न हो की घर में कलेश चल रहा है|

दोनों बच्चे इनके सामने अपना मुँह खोले हुए खड़े थे तथा ये बारी-बारी दोनों को खाना खिला रहे थे| उधर पिताजी का क्रोध छलकने लगा था, उन्होंने सुबह जैसी सख्ती से ही इनसे बिज़नेस के बारे में कुछ सवाल पूछे लेकिन इन्होने बड़ी हलीमी से पिताजी के सवालों का जवाब दिया;

पिताजी: गुडगाँव वाली साइट का काम कब खत्म होगा?

ये: जी अगले हफ्ते तक हो जायेगा|

इन्होने आयुष को एक कौर खिलाते हुए कहा|

पिताजी: लाला जी को पेमेंट कर दी?

ये: हाँ जी, सुबह ही कर दी बिल मेरे बैग में है|

इन्होने नेहा को एक कौर खिलाते हुए कहा| पिताजी और कुछ पूछते उससे पहले ही माँ ने उन्हें मूक इशारा कर चुप करा दिया| दरअसल पिताजी के सख्ती से पूछे गए सवालों से बच्चे थोड़ा सहम गए थे| माँ का इशारा समझते हुए पिताजी ने आगे कुछ नहीं पुछा और अपना खाना खा कर उठ गए|

हम चारों का खाना हुआ तो इन्होने बच्चों को माँ के पास आराम करने को कहा मगर आयुष को आज अपनी रेल मियूज़ियम में की गई मस्ती के बारे में बताना था इसलिए वो इनके पीछे-पीछे घूम रहा था| वहीं मेरी इनसे बात करने की हिम्मत नहीं हो रही थी क्योंकि मैं जानती थी की अगर मैंने कुछ कहा तो ये मुझे अच्छे से डाँट देंगे इसीलिए मैं इनसे नजरें चुराते हुए घर के कामों में लगी हुई थी| कोई और दिन होता तो मैं भी आयुष की तरह इनके पीछे-पीछे घूम रही होती और कोई न कोई मौका निकाल कर दिल्लगी कर रही होती|

एक तो पिताजी की खाना खाते समय इनसे पूछे गए सख्ती से सवाल और दूसरा आज जब मैं इनसे दूर-दूर रह रही थी तो नेहा को शक होने लगा था की कुछ तो गड़बड़ है| नेहा अपनी शक्की निगाहों से हालात का जायजा ले रही थी और मन ही मन आंकलन कर रही थी|

"बेटा, मुझे अभी साइट पर काम देखने जाना है| वापस आऊँगा न तब आप सारी बात आराम से बताना, ठीक है?!" इन्होने आयुष को प्यार से समझाते हुए कहा| दरअसल आयुष इनके साथ साइट पर जाने की जिद्द कर रहा था ताकि वो इन्हें अपनी आज की मस्ती भरी कहानी सुना सके| आयुष इनकी बात मान गया, लेकिन उसे किसी को तो अपनी मस्ती की कहानी सुनानी थी इसलिए वो इनके गाल पर अपनी पप्पी दे कर माँ को अपनी मस्ती वाली कहानी सुनाने चल दिया| नेहा बड़ी ख़ामोशी से बैठी सब कुछ देख और सुन रही थी, इन्होने नेहा के सर को चूम उसे बॉय कह साइट पर चले गए|

रात को ये घर 7 बजे आये और इनके घर आते ही आयुष इनकी गोदी में चढ़ गया तथा अपनी रेल मियूज़ियम की कहानी सुनाने लगा| नेहा भी इनकी बगल में आ कर बैठ गई और इन्होने दोनों बच्चों को अपनी बाहों में जकड़ लिया| तीनों बाप-बेटा-बेटी खाना बनने तक बैठे बातें करते रहे, जब खाना बना तो इन्होने बच्चों को खाना खिलाया और फिर खुद खाने लगे| आज खाना खाते समय सब खामोश थे, जबकि बाकी दिन हम सब किसी ने किसी मुद्दे पर बातें करते हुए खाना खाते थे| ये बात नेहा को खटक रही थी तथा उसका शक धीरे-धीरे पक्का होने लगा था!

खाना खा कर इन्होने दोनों बच्चों को उनके कमरे में कहानी सुना कर सुला दिया और फिर हमारे कमरे में आ कर चुप-चाप लेट गए| मैं तो इनसे पहले ही बात करने से डर रही थी ऊपर से इनको भी अब जैसे मुझसे बात करने का मन नहीं था| पूरे कमरे में सन्नाटा पसरा हुआ था, अब नींद तो आ नहीं रही थी इसलिए मेरे शांत दिमाग ने सोचना शुरू कर दिया था| 'आज तक जब भी इन्होने कोई गलती की है तो सबसे पहले मुझे बताया है, इनका दिल इतना पाक़ है की वो अपने भीतर कोई गलती, कोई गुनाह छुपा ही नहीं सकता| फिर चाहे वो माधुरी वाला काण्ड हो या रसिका वाला काण्ड, या फिर वो कोचिंग में मिली इनको लड़की जिसके प्रति ये आकर्षित हुए थे! इन्होने कभी मुझसे कोई बात नहीं छुपाई, ऐसे में अगर इन्होने करुणा के बारे में मुझे कुछ नहीं बताया तो हो सकता है की ये भूल गए हों?! इन्होने कल रात का कहा था न की जब मैं दिल्ली आई तब करुणा यहाँ नहीं थी, हो सकता है ये उसके बारे में बताना भूल गए हों!' मेरी अंतरात्मा बोली| मेरी अंतरात्मा ने आजतक मुझे गलत रास्ते नहीं भटकने देता था, उसकी बात हमेशा सच होती थी|

दरअसल आज दिनभर मेरे कारण जो घर में कलेश पैदा हुआ था और इन्हें माँ-पिताजी से सुनना पड़ा था उससे मुझे बहुत ग्लानि हो रही थी| ग्लानि जब हद्द से बढ़ गई तो मेरी अंतरात्मा अंदर से बोलते हुए मुझे सही रास्ता दिखाने लगी|

अगली सुबह ये पहले उठे और दोनों बच्चों के कमरे में चले गए, मैं भी उठी और फ्रेश हो कर चाय बनाने लगी| आज बच्चों के स्कूल की छुट्टी थी इसलिए इन्होने बच्चों को जगाया नहीं था बल्कि ये तो दोनों बच्चों को अपने से लिपटाये सो रहे थे! माँ ने जब इन्हें बच्चों के साथ सोता हुआ देखा तो वो मुझसे पूछने लगीं;

माँ: बहु, मानु रात को बच्चों के पास सोया था?

माँ के इस प्रश्न का कारण ये जानना था की क्या हमारे बीच रात में कोई कहा-सुनी हुई है?

मैं: नहीं माँ, रात में तो ये कमरे में ही सोये थे सुबह उठ कर बच्चों के पास लेट गए| बच्चों के बिना कहाँ दिल लगता है इनका?!

मैंने नक़ली मुस्कान लिए इनका बचाव किया| माँ मुझे इनका बचाव करता देख मुस्कुराईं और मुझे आशीर्वाद दे कर इन्हें बड़े लाड से जगाने लगीं;

माँ: ओ मेरे लाल, उठ जा बेटा!

माँ की एक आवाज में इनकी आँख खुल गई| माँ को अपने सामने मुस्कुराते देख इनके चेहरे पर भी मुस्कान आ गई, इन्होने दोनों बच्चों के सर को चूम उन्हें जगाया, नेहा तो झट से जाग गई तथा इनके गाल पर अपनी गुड मॉर्निंग वाली पप्पी दे कर फ्रेश होने चली गई मगर आयुष की नींद नहीं खुली| इन्होने आयुष को गोद में लिया और बाहर बैठक में आ गए| पिताजी बैठक में बैठे अखबार पढ़ रहे थे, इन्होने हर रोज़ की तरह पिताजी के पाँव छू कर आशीर्वाद लेना चाहा मगर पिताजी ने इन्हें नज़र अंदाज़ किया और अपना अखबार पढ़ते रहे| उधर नेहा जब बाथरूम से निकली तो उसने ये पिता-पुत्र के बीच तनाव भरा दृश्य देख लिया था, वो अपने दादा जी से कुछ पूछ नहीं सकती थी इसलिए वो सर झुकाये हुए अपने दादा जी के पास आई और पाँव छूने लगी| पिताजी ने तुरंत अखबार बंद किया और उसे गोदी में उठा लिया;

पिताजी: बेटी, तू हमारे घर की लक्ष्मी है, तू पाँव मत छुआ कर तू तो बस मुझे सुबह पप्पी दे दिया कर, जैसे अपने बाप को सुबह-सुबह पप्पी देती है|

अपने दादा जी की बात सुन नेहा ने ख़ुशी-ख़ुशी अपने दादा जी को पप्पी दी| इतने में आयुष भी जाग गया और इन्हें गुड मॉर्निंग वाली पप्पी दे कर अपने दादा जी के पाँव छूने लगा| पिताजी ने आयुष को भी अपनी गोदी में ले लिया और दोनों बच्चों को लाड करने लगे| अपने पिताजी को अपने बच्चों को लाड करते देख ये खुश थे, जबकि इनका मन था की पिताजी भी माँ की ही तरह इनसे भी थोड़ा लाड करें!

चाय पीने के दौरान पिताजी मुझसे नाश्ते में बच्चों का पसंदीदा कुछ बनाने को कह रहे थे और इन्हें नजर अंदाज कर रहे थे| तभी माँ ने होशियारी से इन्हें भी इस चर्चा में शामिल कर लिया था;

माँ: बहुत दिन हुए मानु के हाथ का नाश्ता खाये इसलिए आज तो मानु ही नाश्ता बनाएगा|

माँ की बात सुन दोनों बच्चों ने अपने पापा जी को जकड़ लिया और बोले;

आयुष: पापा जी, आमलेट बनाओ|

नेहा: हाँ पापा जी, मैं आयुष और मम्मी आमलेट खाएंगे|

नेहा ने भी अपनी दादी जी की तरह बड़ी होशियारी से मुझे आगे किया था ताकि हम मियाँ-बीवी के बीच कोई बात हो सके| लेकिन ये आगे कुछ कहते उससे पहले ही पिताजी बोले;

पिताजी: बच्चों आज मंगलवार है, आज अंडा नहीं खाते!

ये सुन बच्चे थोड़ा मायूस हो गए| अपने बच्चों को खुश करने के लिए ये तुरंत बोले;

ये: चलो बच्चों आज मैं आपको वेजेटेरियन (vegetarian) आमलेट बना कर खिलाता हूँ|

इनकी बात सुन आयुष फ़ट से बोला;

आयुष: पर पापा जी आमलेट तो अंडे से बनता है न?!

नेहा: तुझे सब पता है न?

नेहा ने आयुष की पीठ पर थपकी मारते हुए कहा और उसे चुप करा दिया|

नेहा: आप इसकी बात मत सुनो पापा जी, आप और मम्मी हम सब के लिए वेजेटेरियन आमलेट बनाओ|

नेहा ने फिर चपलता दिखाते हुए मुझे इनके साथ नाश्ता बनाने के लिए आगे बढ़ा दिया|

ये: बेटा, खाना बनाने में जब दो लोग एक साथ अपना दिमाग लगते हैं न तो खाने का सत्यानाश हो जाता है| आप दोनों यहाँ बैठो मैं नाश्ता बना कर लाता हूँ|

इन्होने बड़ी चपलता से नेहा की बात का काट किया था| नेहा इनका जवाब सुन चुप हो गई थी मगर उसके दिमाग ने अपने शक को पक्का करना शुरू कर दिया था| अपने मम्मी-पापा को नेहा ने हमेशा ही एक दूसरे से बड़े प्यार से बात करते हुए, दिल्लगी करते देखा था| आज जब हम दोनों एकदम से एक दूसरे से दूर रहने लगे तो नेहा का शक करना लाज़मी था|

नाश्ता बना कर ये लाये तो पता चला की वेजेटेरियन आमलेट कुछ और नहीं बेसन का चिल्ला था जिसमें इन्होने प्याज, शिमला मिर्च और पनीर बारीक-बारीक काट कर डाले थे| बच्चों को तो ये नाश्ता बहुत पसंद आया था और दोनों ने अपने सर दायें-बाएँ हिलाने शुरू कर दिए थे! उधर माँ भी इनकी तारीफ करते हुए बोलीं; "वाह भई, बड़ा स्वाद बनाया है आमलेट तूने!" एक बस मैं और पिताजी थे जो खामोश थे, पिताजी को इन पर गुस्सा था की ये उनकी बात नहीं मान रहे तथा मेरी डर के मारे कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी|

नाश्ता कर ये तैयार होने लगे तो नेहा और आयुष इनके आस-पास मंडराने लगे| आयुष की परीक्षायें खत्म हो गईं थीं इसलिए घर पर रह कर बोर होने से अच्छा वो अपने पापा के साथ साइट पर जाना चाहता था| जबकि नेहा इनके पास सिर्फ इसलिए घूम रही थी क्योंकि वो अपना शक और पक्का करना चाहती थी| "बेटा, यहाँ रह कर आप गेम खेल कर टाइम पार कर तो सकते हो, वहाँ साइट पर तो आप कुछ खेल नहीं पाओगे इसलिए वहाँ ज्यादा बोर होगे|" ये आयुष को समझाते हुए बोले| तभी मैं कमरे में आई और बिना इनसे कुछ कहे बिस्तर ठीक करने लगी| ये आयुष को बहलाने में लगे हुए थे और इधर मैं ख़ामोशी से अपना काम किये जा रही थी| नेहा हमारे बीच मौजूद इस ख़ामोशी और तनाव को महसूस कर रही थी परन्तु अभी के लिए खामोश थी|

आखिर ये तैयार हो गए और आयुष को भी चॉकलेट का लालच दे कर घर पर रहने के लिए मना लिया| बच्चों को बॉय कह तथा मेरी बगल से होते हुए मुझे बिना कुछ कहे ये सीधे माँ के पास गए और उन्हें बता कर साइट पर चले गए| इनके जाने के बाद नेहा ने आयुष को अपने साथ अपने कमरे में बैठा कर बात करना शुरू कर दिया| उसने कल से अभी तक जो भी अजीब व्यवहार घर में महसूस किया था वो सब आयुष को बताया तथा उसे अपने साथ रख कर हमसे (मुझसे और इनसे) बात करने का फैसला किया| नेहा बहुत होशियार थी, वो ये सीधी बात हमसे कह नहीं सकती थी क्योंकि उसे डर था की कहीं उसके पापा या मैं उसे डाँट न दें?! इसलिए नेहा ने चलाकी दिखाते हुए आयुष को आगे किया था, वो जानती थी की आयुष के भोलेपन और बचपने में कही बात से हम दोनों मियाँ-बीवी गुस्सा नहीं होंगें!

दोपहर हुई और आज ये काम के चलते खाना खाने घर नहीं आने वाले थे| नेहा को जब इस बात का पता चला तो उसका हमसे बात करने का प्लान फ्लॉप होने लगा, उसने फ़ौरन अपने पापा जी को फ़ोन किया और उन्हें हुक्म देते हुए बोली; "पापा जी, अगर आप खाना खाने नहीं आये तो मैं भी खाना नहीं खाऊँगी|" नेहा ने अपने प्यार भरे गुस्से से कहा और फ़ोन काट दिया| इन्होने इसे नेहा का बचपना समझा और बेटी का दिल न टूटे इसलिए ये घर पर खाना खाने आ गए| नेहा ने जब अपने पापा जी को देखा तो वो ख़ुशी से फुदकती हुई इनकी गोदी में चढ़ गई| नेहा को आज इन पर कुछ अधिक ही प्यार आ रहा था क्योंकि आज उसके पापा ने उसकी बात मानी थी| माँ ने जब दोनों बाप-बेटी को लाड-प्यार करते देखा तो माँ पूछने लगीं;

माँ: क्या बात है भई, आज तो बाप को अपनी बेटी पर बड़ा प्यार आ रहा है?

माँ के पूछे सवाल के जवाब में ये मुस्कुराये और नेहा के गाल की पप्पी लेते हुए बोले;

ये: वो क्या है न माँ, आज मेरी लाड़ली ने मुझे प्यार भरा हुक्म दिया और कहा की अगर मैं खाना खाने घर नहीं आया तो वो भी खाना नहीं खायेगी|

इनकी बात सुन नेहा शर्मा गई और इनसे लिपट गई| वहीं माँ दोनों बाप-बेटी का प्यार देख बहुत खुश थीं|

हम सभी माँ-पिताजी के कमरे में खाना खाने बैठ गए| आज खाना खाते समय बच्चे कम उत्साहित थे, ख़ास कर आयुष जो की थोड़ा घबराया हुआ था| इन्होने आयुष को घबराया हुआ देखा तो उसे अपनी गोदी में बिठा कर थोड़ा अधिक लाड करना शुरू कर दिया| आयुष की घबराहट कोई और न देख ले इसलिए नेहा ने कुछ पल के लिए सबका ध्यान अपने ऊपर खींच लिया था| वो अपनी सहेली रेखा की बातें करने लगी थी, जिससे एक पल के लिए सभी का ध्यान आयुष से हट गया था|

कुछ पल बाद माँ ने मुझसे कुछ दूसरी बात करनी शुरू कर दी जिससे हम सास-बहु का ध्यान बातों में लग गया| ये तो पहले ही बच्चों को खाना खिलाने में व्यस्त थे, बचे पिताजी तो वो बच्चों के कारण अपना गुस्सा दबाये हुए थे| अपने दादा जी को खामोश देख नेहा उनके पास जा पहुँची और अपना मुँह खोल कर खड़ी हो गई ताकि पिताजी उसे खाना खिला सकें| पिताजी ने जब नेहा को मुँह खोल कर खड़े देखा तो तुरंत उन्होंने नेहा को रोटी का एक कौर खिलाया| नेहा को अपने सामने देख पिताजी का चेहरा खिल गया था और वो सप्रेम अपनी पोती को खाना खिलाने लगे| आयुष तो पहले ही इनकी गोदी में बैठा था और किसी राजकुमार की तरह इनके हाथ से खाना खा रहा था|

खाना खाने के बाद पिताजी सीधा साइट चले गए और माँ बैठक में बैठीं टी.वी. देखने लगीं| इधर दोनों बच्चों ने हम दोनों मियाँ-बीवी का हाथ पकड़ा और हमें खींचते हुए अपने कमरे में ले आये| दोनों बच्चों ने हमें पलंग पर बिठाया और हमारी ओर मासूमियत से देखने लगे| दोनों बच्चों को यूँ खामोश देख हम दोनों चिंतित थे, हमेशा हँसते-खेलते रहने वाले बच्चे एकदम से जो खामोश हो गए थे! हम बच्चों से कुछ पूछते उससे पहले ही नेहा ने बात शुरू की;

नेहा: पापा जी, मम्मी जी...आप एक दूसरे से बात क्यों नहीं करते? आपकी आपस में लड़ाई हुई है?

नेहा का मासूमियत से भरा सवाल सुन हम दोनों नेहा को बड़े गौर से देखने लगे| कल से ले कर आज तक हम दोनों अपनी पूरी कोशिश कर रहे थे की हम बच्चों के सामने अपना ये कलेश छुपा सकें, लेकिन फिर भी बच्चों ने हमारे बीच उतपन्न हुआ ये लड़ाई-झगड़ा महसूस कर लिया था| बहरहाल हम दोनों नेहा के पूछे सवाल का कुछ जवाब देते उससे पहले ही आयुष ने अपना डर हमारे सामने प्रकट किया;

आयुष: क्या आप दोनों डाइवोर्स ले रहे हो?!

आयुष का सवाल ने हमें झकझोड़ कर रख दिया था! इतनी छोटी सी उम्र में आयुष ने इतना बड़ा शब्द सीख लिया था, ऐसा शब्द जिसका मतलब शायद वो जानता भी नहीं था! दरअसल नेहा ने हमारे बात न करने की बात को आयुष को कुछ इस तरह से बताया था की आयुष बहुत डर गया था| खैर, आयुष का सवाल सुनते ही इन्होने आयुष को कस कर अपने गले लगा लिया और बोले;

ये: बेटा, आपने ये शब्द कहाँ से सीखा? और किसने कहा की मैं और आपकी मम्मी डाइवोर्स ले लेंगे?

इनके सवाल को सुन कर आयुष की आँखें भीग गई थीं और वो रुँधे गले से बोला;

आयुष: मेरी क्लास में एक लड़का है...उसके मम्मी-पापा भी बात नहीं करते थे और फिर एक दिन...दोनों ने डाइवोर्स ले लिया|

ये कहते हुए आयुष रोने लगा| आयुष के रोने से ये बहुत भावुक हो गए थे, इन्होने आयुष के सर को चूम कर उसे चुप कराया और बोले;

ये: बेटा ऐसा नहीं सोचते! आपके दोस्त के साथ जो हुआ वो बहुत दुखद था मगर हमारे घर में ऐसा कभी नहीं होगा| आप जानते हो न मैं आपकी मम्मी से कितना प्यार करता हूँ?! तो मैं उनसे अलग कैसे हो सकता हूँ? हाँ कभी-कभी हमारे बीच गलतफैमियाँ हो जाती है पर इसका मतलब ये नहीं की हम दोनों डाइवोर्स ले लेंगे!

इन्होने आयुष को अपने आलिंगन से आज़ाद किया और उसके आँसूँ पोछे| अब मेरी बारी थी आयुष को प्यार से समझाने की, मैंने उसे अपने पास बुलाया और बोली;

मैं: बेटा, आप कई बार अपनी दीदी को बहुत तंग करते हो न और तब आपकी दीदी आपसे नाराज हो जाती है, लेकिन क्या वो आपको छोड़ कर कहीं चली जाती है? नहीं न? मैं भी आपकी ही तरह आपके पापा को कई बार बहुत तंग करती हूँ, तो गुस्से में आ कर वो मुझसे बात नहीं करते मगर दिल ही दिल में वो मुझसे बहुत प्यार करते हैं|

मैंने इनकी तरफ देखते हुए कहा| मैं उम्मीद कर रही थी की शायद ये मेरी बात सुन मुस्कुरायेंगे या मुझे कुछ कहेंगे पर इन्होने कुछ नहीं कहा|

उधर नेहा ख़ामोशी से इनकी बात सुन रही थी, उसे अपने छोटे भाई को इस तरह डराने से और उसके (आयुष के) रोने से ग्लानि होने लगी थी| नेहा की आँखें भी नम थीं इसलिए इन्होने नेहा को अपने गले से लगाया और उसे भी प्यार से समझाने लगे;

ये: बेटा, रोते नहीं! आपके मम्मी-पापा कभी अलग नहीं होंगें|

इतना कह इन्होने नेहा के आँसूँ पोछे| अपने पिता का प्यार देख नेहा ने आखिर सब सच कह दिया;

नेहा: पापा जी, मुझे माफ़ कर दो! मैंने कल से आप को और मम्मी को आपस में बात करते हुए नहीं देखा, दादा जी को आपको गुस्सा करते देखा तो मुझे लगा की आप दोनों के बीच में लड़ाई हुई है| मैंने आयुष को आज ये साब बातें बताईं और उसे अपनी बातों से इस कदर डरा दिया की वो अभी रो रहा है!

ये कहते हुए नेहा पुनः भावुक हो गई थी तथा सिसकने लगी थी| नेहा की बात सुन इन्होने नेहा को रोने नहीं दिया और समझाने लगे;

ये: आप आयुष से बड़े हो इसलिए उसे ये सब बातें मत सोचने दिया करो! कभी भी आपको लगे की मेरे और आपकी मम्मी के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा तो आप सीधा आ कर हमसे बात करो|

ये मुस्कुराते हुए बोले और नेहा की नाक से अपनी नाक रगड़ने लगे| इन्होने आयुष को अपने पास बुलाया और दोनों बच्चों को अपने गले से लगाते हुए बोले;

ये: मेरे बच्चों, हमें माफ़ कर दो की हम दोनों (मेरे और) के बीच बनी इस गलतफैमी के कारण आप दोनों को इतनी तकलीफ हुई| मैं वादा करता हूँ की आगे से हम दोनों (मैं और ये) कभी लड़ाई नहीं करेंगे और हमेशा प्यार से रहेंगे|

इन्होने मुस्कुराते हुए कहा| बच्चे इनकी बात से संतुष्ट थे और उनके मन में अब कोई शक नहीं रह गया था|

नेहा अपनी कल की अंतिम परीक्षा की तैयारी करने लगी थी और आयुष गेम खेलने बैठ गया था| इधर मैं अपने किये पर पछता रही थी, मेरे इन पर शक करने के कारण मेरा ये परिवार टूटने की कगार पर पहुँच चूका था| मेरे ही कारण, मेरे बच्चों ने डाइवोर्स जैसे घातक शब्द को सीख लिया था, पिताजी मेरे ही कारण इनसे खफा थे और ठीक से बात नहीं कर रहे थे| मुझे घर में फिर से प्यार-मोहब्बत की बहार लानी थी और इसके लिए मुझे सबसे पहले माँ-पिताजी से बात करनी थी|

साढ़े तीन बजे पिताजी घर लौटे तो मैंने उनसे और माँ से बात करनी शुरू की;

मैं: माँ...पिताजी, मुझे माफ़ कर दीजिये! गलती सारी मेरी थी, मेरी ही जलन के कारण हमारे घर में अशांति फैली हुई है, जिस वजह से बच्चे भी उदास थे!

ये कहते हुए मैंने पिताजी को बच्चों द्वारा हमसे कही सारी बात बताई| बच्चों की कही बात सुन कर माँ-पिताजी को बहुत धक्का लगा, इतनी सी उम्र में बच्चे घर में उठी अशांति के कारण दुखी थे|

मैं: प्लीज पिताजी इन्हें माफ़ कर दीजिये और इनसे पहले की तरह प्यार से बात कीजिये|

मैंने पिताजी से विनती करते हुए कहा| मेरी बात सुन पिताजी को लगा की शायद इन्होने मुझसे फिर लड़ाई की है या मुझे डाँटा है इसलिए उनका पारा इनपर चढ़ने लगा;
पिताजी: मानु ने तुझसे कुछ कहा बेटी?

पिताजी का सवाल सुन मैं एकदम से बोली;

मैं: नहीं-नहीं पिताजी, इन्होने मुझे नहीं कहा! मुझे खुद एहसास हो गया की गलती मेरी ही थी, मुझे इनके प्यार पर शक नहीं करना चाहिए था|

मैंने सर झुकाये हुए कहा| मेरे भीतर ग्लानि भरी थी मगर पिताजी को अब भी शक था की मैं इन्हें बचाने के लिए झूठ बोल रही हूँ|

पिताजी: झूठ मत बोल बहु, जर्रूर मानु ने ही तुझसे कुछ कहा होगा!

मैं: नहीं पिताजी, मैं आपसे झूठ नहीं बोल रही| मुझे सच में मेरी गलती का एहसास हो गया है| आप प्लीज मेरे लिए इनसे पहले की तरह प्यार से बात कीजिये ताकि घर में फिर से खुशियाँ आ जाएँ!

मैंने हाथ जोड़ते हुए पिताजी से कहा| पिताजी मुझे अपनी बहु नहीं बेटी मानते थे इसलिए मेरी ख़ुशी के लिए वो मान गए परन्तु उन्होंने मुझे प्यार भरी सख्ती के साथ चेताया;

पिताजी: ठीक है बहु! लेकिन अगर मानु ने कभी भी तुझसे कुछ कहा तो तू सीधा मुझे बताएगी, समझी?

ये पिताजी का गुस्सा नहीं था बस अपनी बेटी के प्रति चिंता थी|

पिताजी ने उसी समय संतोष भैया को कॉल किया और उन्हें गुडगाँव वाली साइट पर जाने को बोला| फिर उन्होंने इनको फ़ोन मिलाया;

पिताजी: कहाँ हो लाड-साहब?

पिताजी ने अपने प्यार भरे अंदाज में इनसे पुछा| पिताजी के अचानक से नरम रूख को देख ये हैरान जर्रूर हुए होंगे|

ये: जी...गुडगाँव में हूँ|

पिताजी: अभी के अभी घर आ|

पिताजी इन्हें प्यार से हुक्म देते हुए बोले|

ये: सब ठीक तो है पिताजी?

ये पिताजी द्वारा एकदम से घर बुलाने पर चिंतित होते हुए पूछने लगे|

पिताजी: हाँ यहाँ सब ठीक है, बस तू घर आ जा|

पिताजी प्यार से बोले|

ये: पर पिताजी साइट पर अभी....

ये आगे कुछ बोलते उससे पहले ही पिताजी इनकी बात काटते हुए बोले;

पिताजी: मैंने संतोष को फ़ोन कर दिया है, वो आ कर सारा काम देख लेगा तू अभी घर आजा|

पिताजी ने इन्हें प्यार से समझाया तो ये हार मानते हुए बोले;

ये: जी ठीक है|

करीब घंटे भर बाद ये घर पहुँचे, पिताजी ने मुझे और माँ को बाहर भेज दिया तथा इन्हें अपने कमरे में बिठा कर समझाने लगे;

पिताजी: देख बेटा औरत ज़ात बड़ी शक्की होती है! कई बार बिना बात के भी शक करती है और यहाँ तो तू खुलेआम उस लड़की से बात करता था तो बहु का शक करना जायज बात थी| चल मैं एक बार को मान लेता हूँ की वो लड़की सिर्फ तेरी दोस्त है पर संगीता तेरी पत्नी है और वो पेट से भी है, तो ऐसे में तुझे उसका ज्यादा ख्याल रखना चाहिए न की करुणा से बात करते रहना चाहिए| खैर, जो हुआ उसे भूल जा और संगीता के शक करने का बुरा मत मान| देख वो मेरी बेटी है इसलिए अब तू उससे पहले की तरह हँस-खेल कर बात कर|

पिताजी की बात इन्होने सर झुकाये हुए सुनी थी| चूँकि पिताजी अब नरम पड़ चुके थे इसलिए अब इन्हें अपनी सफाई देनी थी;

ये: पिताजी मुझे संगीता के शक करने का बुरा नहीं लगा, बुरा लगा तो बस इस बात का की उसे अपने पति पर भरोसा नहीं| संगीता की बात सुन क्या आप और माँ ने मुझ पर शक किया की मेरा और करुणा का कोई नाजायज रिश्ता है या हो सकता है? फिर संगीता इतना गंदा कैसे सोच सकती है? पराई स्त्री से जलना एक पत्नी का धर्म होता है, ये मैं जानता हूँ मगर संगीता को कम से कम मुझसे एक बार पूछना तो चाहिए था की जितना गंदा वो सोच रही है वो सच है भी या नहीं? अगर पति-पत्नी के बीच भरोसा ही न रहे तो ये जीवन गाडी कैसे चलेगी?

इन्होने बड़े हलीमी से पिताजी के सामने अपनी बात रखी| ये बहस नहीं कर रहे थे बस दो दिन से जो इनके दिल में बात दबी हुई थी उसे पिताजी के साथ साझा कर रहे थे| देखा जाये तो इन्होने एक-एक बात सही कही थी, बजाये इन पर शक करने के मुझे पहले इनसे सारी बार जननी चाहिए थी मगर शक का कीड़ा मेरे दिमाग में बैठा था तो कहाँ से मेरी बुद्धि काम करती?!

पिताजी: देख बेटा, कई बार पति-पत्नी के बीच विश्वास की नीव हिल जाती है| ऐसे में उस नीव की मरम्मत कर प्यार की इमारत को सुरक्षित किया जाता है न की उस हिली हुई नीव को अपने गुस्से से तोडा जाता है! जो हो गया उसे भूल जा और संगीता के साथ फिर से नई शुरुआत कर|

पिताजी ने इन्हें बड़े प्यार से सीख दी| आदमी का 'अहम्' कई बार उसे झुकने नहीं देता, पिताजी को लग रहा था की कहीं अपने अहम् के चलते ये नम्र नहीं पड़े तो हम पति-पत्नी का ये रिश्ता और उलझ जायेगा, इसलिए पिताजी ने इन्हें थोड़ा मजाकिये ढंग से एक और बात समझाई;

पिताजी: और एक बात का ध्यान रखना बेटा, (नई शुरुआत की) पहल हमेशा पति को करनी पड़ती है! तू संगीता से प्यार से बात करना शुरू कर, फिर देख संगीता भी तुझसे प्यार से बात करने लगेगी|

पिताजी इन्हें प्यार से समझाते हुए बोले| पिताजी की बात सुन ये मुस्कुराये और बोले;

ये: जी पिताजी, मैं बात करूँगा संगीता से|

बच्चों ने जब अपने पापा जी को घर पर देखा तो दोनों जा कर इनसे लिपट गए, उनके लिए तो जैसे इनका जल्दी घर आना ही सब कुछ था| आयुष इन्हें अपने साथ कंप्यूटर पर गेम खेलने के लिए खींच रहा था तो नेहा अपने साथ पढ़ाई करने के लिए इन्हें खींच रही थी| तब पिताजी बीच में आये और आयुष से बोले; "बेटा, मुझे भी कंप्यूटर पर गेम खेलना सीखा दे तो फिर मैं तेरे साथ गेम खेलूँगा|" आयुष ये सुन कर जोश से भर गया और अपने दादा जी को गेम खेलना सिखाने लगा| इधर ये नेहा को ले कर बैठक में बैठ गए और उसकी परीक्षा की तैयारी करवाने लगे| मैं और माँ डाइनिंग टेबल पर बैठे रात के खाने की तैयार कर रहे थे, परन्तु मेरी नजर इन्हीं से चिपकी हुई थी, वहीं इनका ध्यान बस नेहा को पढ़ाने में लगा हुआ था|

बच्चों के कमरे से आयुष की जोश से भरी हुई आवाजें आ रही थी, वो अपने दादा जी को कंप्यूटर में गाडी चलाना सीखा रहा था| जब-जब पिताजी की गाडी दूसरी गाड़ियों से लड़ जाती तो आयुष चिल्लाते हुए उन्हें ठीक से गाडी चलाने को कहता| आयुष किसी अध्यापक की तरह अपने शिष्य यानी अपने दादाजी को बार-बार डाँट रहा था| माँ ने जब ये शोर सुना तो वो मेरा हाथ पकड़ कर मुझे आयुष के पास ले आईं, साथ ही माँ ने इशारे से इन्हें और नेहा को भी कमरे में बुला लिया| "क्यों जी, अब कैसा लग रहा है पोते की डाँट खा कर? याद है, आप भी ऐसे ही डाँट-डाँट कर मानु को पढ़ाते थे?! बेचारा (ये) पढ़ते-पढ़ते इतना सहम जाता था की रो पड़ता था!" माँ ने पिताजी को प्यार भरा उल्हाना देते हुए कहा| माँ की बात सुन हम सभी खिलखिला कर हँस पड़े!

"दादी जी, मैं दादाजी को डाँट थोड़े ही रहा था, मैं तो उन्हें गाडी चलाना सीखा रहा था|" आयुष बड़े तपाक से बोला| उसकी बात सुन पिताजी ने उसे गोदी में उठा लिया और उसे लाड करते हुए बोले; "बेटा, तेरी दादी है न हमारी दोस्ती में दरार पैदा कर रही है| हम दादा-पोता कितनी मस्ती करते हैं न तो तेरी दादी को हमारी ये दोस्ती देख कर जलन होती है!" पिताजी ने मज़ाक करते हुए कहा| "मैं क्यों जलूँ, मेरे पास मेरी पोती नेहा है! सबसे होशियार और सबसे समझदार!" माँ नेहा की तारीफ करने लगीं तो नेहा झट से माँ की बगल में खड़ी हो गई और आयुष को जीभ चिढ़ाने लगी| "दादी जी, आप चलो मेरे साथ मैं है न आपके पाँव दबाती हूँ! इस बुद्धू लड़के को छोडो, ये तो दादा जी के पाँव भी नहीं दबाता|" नेहा आयुष को चिढ़ाते हुए उसकी गलती निकालते हुए बोली| अब आयुष को भी जोश आ गया था, वो अपने दादा जी की गोदी से उतरा और नेहा को देखते हुए अपने दादा जी के पाँव दबाने लगा| ये देख कर नेहा को मिर्ची लगी और उसने आयुष के पैर दबाने में गलती निकालनी शुरू कर दी; "ठीक से तो करना आता नहीं, आया बड़ा पैर दबाने वाला!" ये सुन आयुष को बड़ी मिर्ची लगी और वो नेहा को मरे से भगाने लगा|

उधर पिताजी ने मज़ाक-मज़ाक में माँ के बनाये खाने में नुक्स निकालना शुरू कर दिया; "हाँ-हाँ तुम जा कर खाना बनाना सीखो अपने लाल से! शादी के बाद पहलीबार खाना बनाया तो उसमें नमक ही नहीं डाला!" पिताजी का प्यार से दिया माँ को तना सुन माँ एकदम से बोलीं; "अच्छा जी तो आज मेरे बनाये खाने में आपको नमक न डालने की बात याद आई?! और वो जो मेरी साडी इस्त्री करते हुए जला दी थी उसका क्या?" माँ ने भी कोई बरसों पुराना किस्सा खोद निकला और उसका प्यारभरा ताना पिताजी को दिया|

तो इस तरह दादा-पोता और दादी-पोती की टीम बन गई थी तथा दोनों ही टीमें एक दूसरे की गलतियाँ निकालते हुए मीठी नोक-झोंक में लग गए थे| इस मीठी नोक-झोंक का सबसे ज्यादा स्वाद अगर किसी ने लिया तो वो था हम दोनों मियाँ-बीवी ने| भले ही हम एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे मगर ये सब बातें सुन कर बराबर हँस रहे थे|

गौर करने वाली बात ये है की इस प्यार भरी नोक-झोंक की हमारे घर को बहुत जर्रूरत थी क्योंकि इस नोक-झोंक ने ही हमारे उदास घर में ख़ुशी की लहर फूँक दी थी| अब कहने की जर्रूरत तो नहीं की माँ-पिताजी ने जानबूझ कर अपने पोता-पोती को हँसाने-बुलाने के लिए इस मीठी नोक-झोंक को हवा दी थी| बच्चे फिर से चहकने लगे थे तथा हमारा घर फिर से खुशियों से भर गया था, अब बस रह गया था तो हम मियाँ-बीवी का एक दूसरे से बात करना|

खैर, रात को खाना खाने के बाद मैं किचन समेटने लगी और ये बच्चों के साथ बैठ कर खेलने लगे| माँ-पिताजी पहले ही अपने कमरे में लेट चुके थे, किचन समेट कर मैं चुप-चाप अपने कमरे में पहुँची और दाईं करवट ले कर लेट गई| कमरा में एकदम सन्नाटा था, आज मेरा मन इनसे बात करने का मन था मगर हिम्मत नहीं पड़ रही थी की इनसे कुछ कहूँ और वैसे भी ये कमरे में थे नहीं जो मैं इनसे बात करने की हिम्मत भी करती|

लेकिन क्या है न, ये तो मेरे दिल की बात मेरे बिना कहे ही समझ जाते हैं तभी तो ये दोनों बच्चों को अपने साथ ले कर कमरे में आ गए| दोनों बच्चे जोश से भरे हुए दौड़ कर बिस्तर पर चढ़ गए, दरअसल बच्चों को अपने मम्मी-पापा के साथ सोने में बहुत मज़ा जो आता था| आयुष ने अपना जोर लगाते हुए मुझे पीठ के बल लेटने को कहा, तभी नेहा मेरी बगल में लेट गई| अंत में ये अपनी जगह पर लेटे तो आयुष इनके सीने पर चढ़ कर इनसे लिपट गया| इन्होने अपना बायाँ हाथ खोल कर मुझे अपने नजदीक आने का इशारा किया तो मैंने मुस्कुराते हुए अपना सर इनकी कलाई पर रख दिया| वहीं नेहा इनकी तरफ करवट ले कर लेटी और इनसे लिपट गई, मैंने भी अपना हाथ उठा आकर आयुष की पीठ पर रख दिया| फिर इन्होने एक कहानी बना कर दोनों बच्चों को सुनाई जिसे सुनते हुए दोनों बच्चे सो गए|

बच्चे सो गए थे और इन्हें लगा की मैं भी सो गई हूँ इसलिए ये चुपचाप उठ कर ऊपर छत पर चले गए| घडी में बजे थे रात के 12 और इनको यूँ अकेले छत पर जाता देख मुझे डर लगने लगा इसलिए मैं भी धीरे से उठी तथा इनके पीछे-पीछे छत पर जा पहुँची| ये परपेट वाल पर अपने दोनों हाथ रख कर खामोश खड़े रात के सन्नाटे में कुछ सोच रहे थे| मेरे छत पर आने से इनको मेरी पायल की आवाज सुनाई दी और ये मेरी ओर पलटे| इनके चेहरे पर अजीब सी मुस्कान थी और इनकी इस मुस्कान का कारण मेरी समझ से परे था|

ये: जान.... आई ऍम सॉरी!

ये थोड़ा संजीदा होते हुए बोले| इनके माफ़ी माँगते ही मैं एकदम से पिघल गई और जा कर इनके सीने से लग गई| इनकी इस सॉरी ने मुझे ख़ुशी नहीं बल्कि ग्लानि से भरना शुरू कर दिया था|

मैं: नहीं...आप सॉरी मत कहो! गलती मेरी है, मुझे आप पर शक नहीं करना चाहिए था|

मेरी बात सुन इन्होने मुझे अपने सीने से अलग किया और मेरी आँखों में देखते हुए बोले;

ये: जान, मुझे तुम्हारे शक करने का ज़रा भी बुरा नहीं लगा! तुम मेरी पत्नी हो, शक करना तुम्हारा पैदाइशी हक़ है, तुम्हारी जगह मैं होता तो मैं भी शक करता!

इनकी बात में थोड़ा उल्हाना और थोड़ी सीख थी, जिस कारण मेरे चेहरे पर थोड़ी मुस्कान आ गई थी| परन्तु अभी इनकी बात खत्म नहीं हुई थी;

ये: लेकिन तुमने जो मेरी बात पर भरोसा नहीं किया, बस वही बात मेरे दिल को तार-तार कर गई! हमने सच्चा प्यार किया है, करुणा जैसी छत्तीस लड़कियाँ आएँगी-जाएँगी मगर उससे हमारे बीच जो प्यार का रिश्ता है वो कभी इस तरह नहीं खींचना चाहिए था!

इनकी ये बात मेरे दिल को बहुत चुभी और मुझे मेरी गलती का एहसास हुआ, परन्तु अभी तो असली ग्लानि महसूस होना बाकी थी!

ये: लेकिन देखा जाए तो सब गलती तुम्हारी भी नहीं थी, आधी गलती मेरी भी थी| तुम्हें पा कर मैं तुम्हें करुणा से अपने रिश्ते के बारे में बताना ही भूल गया| आज मैं तुम्हें सब सच बताता हूँ की मेरी और करुणा की दोस्ती कैसे हुई...

ये कहते हुए इन्होने मुझे अपनी और करुणा के बारे में सब बताया| एक-एक बात, वो एक-एक लम्हा जो इन दोनों ने साथ गुज़ारा था| यहाँ तक की वो बात भी जहाँ करुणा ने अपने एक्स-बॉयफ्रेंड से बदला लेने के लिए इनसे सेक्स करने की इच्छा जाहिर की थी! ये सब बातें सुन कर मुझे विश्वास नहीं हो रहा था की इतना सब हो जाने के बाद भी इनके दिल में करुणा के लिए कभी प्यार क्यों नहीं जागा? कैसे इन्होने एक दूसरी लड़की के साथ रात गुज़ारते हुए खुद को काबू में रखा? मैं इन सवालों को सोच रही थी, इस बात से बेखबर की ये मेरे मन में उठे सवाल को पहले ही पढ़ चुके हैं!

ये: तुम सोच रही हो न की आखिर करुणा के इतने नज़दीक होते हुए भी, उसके मुझसे सेक्स करने के बारे में कहने पर भी मैंने कैसे खुद को रोका? चाहता तो मैं तुम्हारे मुझे खुद से दूर रखने का बदला लेने के लिए करुणा के साथ हमबिस्तर हो सकता था मगर जानती हो मुझे किसने रोका? तुम्हारे प्यार ने! भले ही तब मैं तुमसे नाराज़ था मगर मेरा दिल हमेशा तुम्हें पाने के लिए तड़पता था! एक बार मैं माधुरी के कारण तुम्हारा दिल दुखा चूका था और दुबारा दुखाने से डरता था| तुमसे इतना नाराज़ होने पर भी मैंने कभी तुम्हारे आने की उम्मीद नहीं छोड़ी, बस मैं इस बात को स्वीकारना नहीं चाहता था क्योंकि मेरा दिमाग गुस्से में जल रहा था!

इनकी पूरी बात सुन मैं ग्लानि से भर गई और मेरी आँखें छलक आईं;

मैं: मुझे माफ़ कर दीजिये! मैंने आपको बहुत...बहुत गलत समझा! आपने बिना मेरे कहे हमेशा मेरा विश्वास, भरोसा बनाये रखा जबकि मैं आप पर मन ही मन धोकेबाज का आरोप लगाती रही!

मेरी ग्लानि से भरी बातें सुन तथा मेरी आँखों में आँसूँ देख इन्होने फ़ौरन मेरे आँसूँ पोछे और एकदम से मुझे अपने गले लगाते हुए बोले;

ये: जो हुआ उसे भूल जाओ जान और मेरे साथ फिर से प्यारभरी शुरुआत करो!

इनकी बात के जवाब में मैंने मुस्कुराते हुए इनके सीने में अपना मुँह छुपाये हुए कहा;

मैं: हम्म!

ये: वैसे एक सच और कहूँ, तुम्हें जलाने में सच में बड़ा मज़ा आता है!

इन्होने मज़ाक करते हुए कहा और मैंने भी प्यार से इनके सीने में घूसा मारा!

हम दोनों हाथ में हाथ डाले नीचे आये, ये हमारे कमरे की ओर मुड़ने लगे तो मैंने इन्हें बच्चों के कमरे की तरफ खींचा| इन्हें बच्चों के कमरे में अकेले ले जाने का मेरा तातपर्य था की आयुष के जन्मदिन की रात से हमारे रोमांस पर लगाम लग गई थी तो क्यों न आज उस लगाम को निकाल फेंका जाए| अब चूँकि हम फिर से नई शुरुआत कर रहे थे तो प्यार भरी शुरुआत करना ही सबसे उपयुक्त था!

उधर इन्होने मेरे दिल की ये चुहलबाजी महसूस कर ली थी मगर फिर भी ये बच्चों के कमरे की तरफ जाने से मुझे रोकने लगे| इनके रोमांस के लिए रोकने का मैंने गलत मतलब निकाला और घबराई हुई नजरों से इन्हें देखते हुए पुछा;

मैं: आप अब भी मुझसे नाराज हो?

मेरा सवाल सुन इन्होने मेरा चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया और मुझे प्यार से समझाने लगे;

ये: जान, मैं तुमसे नाराज नहीं हूँ! दरअसल तुम्हारी प्रेगनेंसी का चौथा महीना लग चूका है, ऐसे में मैं रोमांस (sex) कर के कोई रिस्क नहीं लेना चाहता!

अब मुझे चाहिए था इनका प्यार इसलिए मैं इन्हें समझाने लगी;

मैं: जानू, कुछ नहीं होगा आप बेकार चिंता कर रहे हो! मैंने पढ़ा है की प्रेगनेंसी के दौरान सातवें महीने तक रोमांस (sex) करने से कुछ नहीं होता|

मैं: मैं कोई रिस्क नहीं लेने वाला जान, मेरे लिए मेरा ये बच्चा बहुत अहम् है! कुछ महीनों की बाद है फिर कोई पाबन्दी नहीं होगी, तब तक सब्र कर लो!

इनकी बातों से इनके पिता बनने का जूनून झलक रहा था मगर मैं क्या करूँ, मेरा भी तो मन था न?!

मैं: जानू......

ये कहते हुए मैंने आयुष की तरह अपना निचला होंठ फुला लिया! मेरा बचपना देख इन्होने मेरे लबों को अपने लबों में कैद कर मुझे प्यार की कुछ बूँदें प्रदान की| मैं इनका पिता बनने का जूनून समझती इसलिए मैंने इन्हें रोमांस के लिए और नहीं कहा| हम दोनों बिस्तर पर अपनी-अपनी जगह लेट गए तथा बच्चों से लिपट कर सो गए|

अब सब कुछ ठीक हो चूका था, हम मियाँ-बीवी के बीच कोई गिला-शिकवा नहीं बचा था| मेरे मन में इनके प्रति इज़्ज़त आज कई गुना बढ़ गई थी, मैं खुद को बहुत खुशनसीब महसूस कर रही थी की मुझे इतना प्यार करने वाला पति मिला है|


[color=rgb(255,]लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था, उसने हमारे जीवन में एक जबरदस्त मोड़ लिखा था, ऐसा मोड़ जो सब कुछ तहस-नहस करने वाला था![/color]
 

[color=rgb(255,]तीसवाँ अध्याय: नियति का खेल[/color]
[color=rgb(235,]भाग - 1[/color]

आज इनके पहलु में सोते हुए ऐसी नींद आई की सुबह मेरी आँख ही नहीं खुली और माँ को मुझे जगाने आना पड़ा| कल रात हमने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद नहीं किया था इसलिए दरवाजा थोड़ा सा खुला हुआ था| माँ ने जब देखा की सुबह घर में बड़ी शान्ति है तो वो ही हमारे कमरे तक हाल-पता लेने आईं| चूँकि दरवाजा थोड़ा खुला था तो माँ दरवाजा खोल कर भीतर आईं| अंदर कमरे का हाल देख माँ के चहरे पर मीठी सी मुस्कान तैरने लगी! आयुष रात में फिर से इनकी छाती पर चढ़ कर सो गया था, नेहा भी इनसे लिपटी हुई सो रही थी और मैं भी इन्हीं की तरफ करवट ले कर नेहा से लिपटी हुई सो रही थी|

कमरे का दरवाजा खुलने से कमरे में रौशनी आई थी जिससे इनकी आँख खुल गई, आँख खुलते ही इनकी नज़र माँ पर पड़ी जो की मंद-मंद मुस्कुरा रहीं थीं| माँ ने इन्हें जागा हुआ देखा तो वो मुस्कुराते हुए बोलीं; "बेटा, आज के आज ही तेरे पिताजी से कह कर मैं तेरा ये पलंग चार लोगों के सोने लायक बनवाती हूँ!" माँ की बात सुन ये मुस्कुरा उठे, उधर माँ की आवाज सुन कर मेरी जाग खुल गई और मैं फटाफट उठी तथा माँ के पाँव छुए| माँ ने मेरे सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया मगर ये अभी भी अपनी जगह आयुष को अपनी छाती से लिपटाये अब भी लेटे हुए थे|

माँ: तू आयुष को अपनी छाती से चिपकाए हुए, बिना करवट बदले कैसे सो लेता है?

माँ का सवाल सुन ये जवाब देते उससे पहले ही मैं बोल पड़ी;

मैं: इन्हें होश ही कहाँ रहता है माँ करवट लेने का? ये तो बस बच्चों को अपने से लिपटा कर सो जाते हैं|

मैंने इन्हें उल्हाना देते हुए कहा| मेरी बात सुन माँ हँस पड़ीं और ये भी मुस्कुराने लगे|

नेहा की आज अंतिम परीक्षा थी इसलिए इन्होने बस नेहा को जगाया और आयुष को सोते रहने दिया| नेहा को तैयार कर ये उसे स्कूल वैन में बिठा आये| मैं, माँ, पिताजी और ये बैठक में बैठ कर प्यार से बातें करते हुए चाय पी रहे थे| आज कई दिन हम सब इस तरह प्यार से बैठ कर चाय पी रहे थे| चूँकि अभी बस 7 बजे थे और नाश्ता आयुष के उठने के बाद ही बनता इसलिए चाय पी का मैं हमारे कमरे में आ कर कुछ कपड़े तह लगाने लगी| माँ नहाने बाथरूम में चली गईं थीं, पिताजी किसी लेनदार से फ़ोन पर बात करने में व्यस्त थे और ये आराम से सोफे पर बैठे अख़बार पढ़ने में लगे थे|
तभी इनके फ़ोन की घंटी बज उठी, ये कॉल मेरे पिताजी के नंबर से आया था;

ये: पायलागि पिताजी!

इन्होने हँसी-ख़ुशी कहा मगर इन्हे रोती-बिलखती मेरी माँ की आवाज सुनाई दी;

मेरी माँ: मु....मुन्ना....तो... तोहार पिताजी...

इसके आगे माँ से बोला नहीं गया और वो बिलख-बिलख कर रोने लगीं| मेरी माँ को यूँ रोता हुआ सुन ये समझ गए की बहुत बड़ी अनहोनी हुई है ऐसी अनहोनी जिसके बारे में इन्होने कभी सोचा नहीं था, ऐसी अनहोनी जिसे ये बोलने की भी हिम्मत नहीं कर पा रहे थे!

ये: न...नहीं...नहीं...माँ...क्या हुआ? कब हुआ? कैसे.....

इसके आगे इनसे बोलना दूभर हो गया और इनकी आँखों से आँसूँ बह निकले| जिस अनहोनी के होने से ये डर रहे थे वो घटित हो चुकी थी! मेरे पिताजी की मृत्यु हो चुकी थी!

पिताजी (मेरे ससुर जी) इनके सामने बैठे थे और इनकी आँखों में आँसूँ देख वो अपना कॉल काट इनके पास बैठ गए और इन्हें होंसला देने लगे| पिताजी की आँखों में चिंता और सवाल थे, परन्तु इनके लिए जवाब देना नामुमकिन था इसलिए इन्होने अपना फ़ोन स्पीकर पर डाल दिया ताकि आगे की बात पिताजी खुद सुन लें;

मेरी माँ: मुन्ना....अभी कुछ घंटा पाहिले....तू...तू जल्दी से हियाँ आई जाओ बेटा! आपन ससुर जी का मुखाग्नि तोहि का देयका है!

मेरी माँ रोती हुए बोलीं| पिताजी ने मेरी माँ की रोते हुए कही बात सुन ली थी और उनके भी आँखों से आँसूँ बह निकले थे!

ये: हम दोनों आ रहे हैं माँ!

इन्होने खुद को किसी तरह सँभालते हुए कहा| ये जानते थे की इतनी जल्दी हम सभी का जाना मुमकिन नहीं है, नेहा भी घर पर नहीं थी इसलिए इन्होने बस हम दोनों मियाँ-बीवी के जाने की बात कही थी|

मेरी माँ: नहीं बेटा, संगीता का हियाँ ना लायो...ऊ...ऊ पेट से है!

मेरी माँ इन्हें मुझे अपने साथ लाने से मना कर रहीं थीं| हमारे गाँव में गर्भवती महिलाएँ इस तरह के अशुभ समय पर कहीं नहीं जातीं क्योंकि इससे होने वाले बच्चे को खतरा हो सकता है| उधर इन्होने माँ से इस वक़्त बहस करना ठीक नहीं समझा परन्तु ये अपना मन पहले ही बना चुके थे|

ये: ठीक है माँ...मैं अभी निकल रहा हूँ!

पिताजी ने इनकी पीठ पर हाथ रख इन्हें होंसला दिया और मुझे सारी बात बताने के लिए कहा तथा वे बैठक में ही रुक गए ताकि माँ जब नहा कर आयें तो वो माँ को सारी बात बता सकें|

इधर ये हमारे कमरे में आये तो मैंने इनकी आँखों में आँसूँ देखे| इनकी आँखों में आँसूँ देख मेरा दिल जैसे धड़कना बंद हो गया था! मुझे इनकी आँखों में आये उन आँसुंओं का कारण नहीं पता था मगर कुछ बुरा घटित होने की कल्पना मैंने जर्रूर कर ली थी! इनकी आँखों से आँसूँ लगातार बह रहे थे, ये मुझे कुछ कहना चाहा रहे थे इसलिए ये अपना सर न में हिला रहे थे| मैं आँखें फाड़े इनकी बात को समझने की कोशिश कर रही थी मगर मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था! ये मेरे नजदीक आये और मेरी दोनों बाहें पकड़ कर मुझे पलंग पर बिठाया, फिर ये मेरी आँखों में आँखें डालते हुए बोले; "पिताजी..." इतना कह इनसे आगे कुछ कहा नहीं गया इसलिए ये अपना सर एक बार फिर न में हिलाने लगे! मुझे कुछ पल का समय लगा इनकी बात समझने में मगर जैसे ही मुझे इनकी बात समझ आई मैं दर्द से चीखी; "नहीं!!!!!" इतना कह मैं फफक-फफक कर रो पड़ी! इन्होने मुझे सँभाला और मेरा सर अपनी छाती से लगा कर मुझे टूट कर बिखरने से बचाने की कोशिश में लग गए| कैसा लगता है जब आपके सर से पिता का साया उठ जाता है, ये दर्द मैं उस वक़्त महसूस कर हर पल टूटती जा रही थी| वहीं ये मुझे शांत कराते हुए मेरे बालों में हाथ फेर रहे थे|

मैं इनके सीने से लगी बिलख- बिलख कर रोये जा रही थी, कुछ सेकंड बाद माँ-पिताजी हमारे कमरे में आये| पिताजी ने माँ को सारी बात बता दी थी, माँ के चेहरे पर भी आँसूँ और दुःख साफ़ झलक रहे थे| वो सीधा मेरे पास आईं और मुझे अपने सीने से लगा कर सांत्वना देने लगीं| इधर पिताजी इनसे बोले; "बेटा, तू अपनी फ्लाइट की टिकट देख और जल्दी जा, समधी जी को मुखाग्नि तूने ही देनी है|" पिताजी की बात सुन कर मैं हैरान और दुखी हुई| हैरान इसलिए की मेरे पिताजी को मुखाग्नि ये देंगे न की अनिल और दुखी इसलिए क्योंकि मैं आखरी बार अपने पिताजी का चेहरा नहीं देख पाऊँगी| "पिताजी, मैं अकेला नहीं...हम दोनों साथ जाएंगे!" इन्होने मेरी तरफ देखते हुए कहा| इनकी बात सुन मेरे दिल में अपने पिताजी को अंतिम बार देखने की आस जग गई थी, लेकिन तभी माँ सँकुचाते हुए इनसे बोलीं; "बेटा....बहु का....जाना....ठीक होगा?" माँ की आवाज में लाचारी नज़र आ रही थी, उन्हें मेरी चिंता थी इसलिए वो मेरे जाने पर लिए गए इनके फैसले पर झिझकते हुए सवाल उठा रहीं थीं|

"माँ....मैं संगीता का ध्यान रखूँगा!" इन्होने बहुत संक्षेप में जवाब दिया और अपने फ़ोन में फ्लाइट की टिकट देखने लगे| क़िस्मत से फ्लाइट की टिकट मिल गई, इन्होने फटाफट बैग में हमारे चार जोड़ी कपडे तथा मेरी दवाइयाँ डालीं और एयरपोर्ट के लिए टैक्सी बुलाई|

आयुष अभी तक सोया हुआ था और उसे उठा कर ये सब बताना आसान नहीं था इसलिए उसे सोता हुआ छोड़ कर हम माँ-पिताजी का आशीर्वाद ले कर सीधा एयरपोर्ट के लिए निकले|

टैक्सी में मैं इनका दायाँ हाथ अपने दोनों हाथों से पकड़े बैठी थी, मेरा दिल इतना घबराई हुई थी की मेरी हिम्मत टूट गई थी! आँखों से आँसूँ लगातार बह रहे थे, वो तो इनके हाथ को थामे हुए थी इसलिए थोड़ी बहुत हिम्मत बटोर पा रही थी! कुछ समय बाद हम एयरपोर्ट पहुँचे, बाहर चेकिंग हो रही थी और मैं बहुत घबराई हुई थी| इन्होने जैसे-तैसे बात सँभाली और हम चेकिंग करवा कर एयरपोर्ट के भीतर पहुँचे| बोर्डिंग अभी शुरू होने वाली थी इसलिए हम लोग बैठे इंतज़ार कर रहे थे, मैं अब भी डरी-सहमी इनके काँधे पर सर रख कर बैठी थी और मेरी आँखों से आँसूँ बहे जा रहे थे| मेरी आँखों के सामने मेरे पिताजी का चेहरा घूम रहा था, बचपन से ले कर अभी तक की पिताजी संग की सारी यादें मुझे एक-एक कर याद आ रहीं थीं|

वहीं ये नजाने कैसे अपने आप को सहेज कर बैठे थे?! मैं तो बस ये कल्पना कर सकती हूँ की इन्होने अपने आँसुओं को रोकने में कितनी ताक़त लगाई होगी| इन्हें मेरे लिए खुद को सँभालना था क्योंकि अगर ये ही रो कर टूट जाते तो मुझे कौन सँभालता?

ये अपना दायाँ हाथ मेरे बाएँ कँधे पर रख मुझे अपने से सटाये बैठे थे, इनका वो स्पर्श मेरी हारी हुई हिम्मत बढ़ाने के लिए बहुत था! आँखें बंद किये हुए मैं अपने पिताजी का वो आखरीबार देखा हुआ मुस्कुराता हुआ चेहरा याद करने लगी| वो अंतिम बार मैंने जो पिताजी को दिल्ली में अपने घर में देखा था, वही याद मेरे दिमाग में बार-बार किसी फिल्म के दृश्य की तरह चल रही थी| वहीं ये मेरे भीतर मौजूद दर्द को महसूस कर रहे थे इसलिए मुझे सहारा देने के लिए इन्होने मुझे अपने सीने से लगा लिया और मेरे बालों में हाथ फेरने लगे| मेरे डरे-सहमे दिल को चैन मिलने लगा था और मैं इन्हीं के भीतर सिमटने लगी थी!

कुछ समय बाद बोर्डिंग चालु हुई और हम अपनी सीट पर बैठ गए, लखनऊ पहुँचने तक मेरा सर इनके कँधे पर ही था तथा ये मुझे सँभाले हुए थे|

आखिर हम लखनऊ पहुँचे और एयरपोर्ट से बाहर निकल इन्होने मेरे घर तक के लिए टैक्सी बुक की| टैक्सी में बैठते ही मेरे दिल की धड़कनें तेज हो गईं थीं, मैंने कस कर इनका हाथ पकड़ लिया जिस कारण इनका ध्यान मुझ पर केंद्रित हो गया; "जान! घबराओ मत, मैं हूँ ना तुम्हारे पास?!" इनकी बात सुन कर मैंने खुद को थोड़ा सँभाला और बोली; "जानू! एक आप ही तो हो जिस कारण मैं अब तक सँभली हुई हूँ!" इन्होने मेरे आँसूँ पोछे और मुझे अपने सीने से लगा कर मेरे बालों में हाथ फेरने लगे| इनके मेरे बालों में हाथ फेरने से मेरा बेकाबू मन काबू में आने लगा और मैं एक बार फिर पिताजी को याद करने लगी|

[color=rgb(184,]जारी रहेगा भाग 2 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]तीसवाँ अध्याय: नियति का खेल[/color]
[color=rgb(235,]भाग - 2[/color]


[color=rgb(128,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

आखिर हम लखनऊ पहुँचे और एयरपोर्ट से बाहर निकल इन्होने मेरे घर तक के लिए टैक्सी बुक की| टैक्सी में बैठते ही मेरे दिल की धड़कनें तेज हो गईं थीं, मैंने कस कर इनका हाथ पकड़ लिया जिस कारण इनका ध्यान मुझ पर केंद्रित हो गया; "जान! घबराओ मत, मैं हूँ ना तुम्हारे पास?!" इनकी बात सुन कर मैंने खुद को थोड़ा सँभाला और बोली; "जानू! एक आप ही तो हो जिस कारण मैं अब तक सँभली हुई हूँ!" इन्होने मेरे आँसूँ पोछे और मुझे अपने सीने से लगा कर मेरे बालों में हाथ फेरने लगे| इनके मेरे बालों में हाथ फेरने से मेरा बेकाबू मन काबू में आने लगा और मैं एक बार फिर पिताजी को याद करने लगी|

[color=rgb(85,]अब आगे:[/color]

मेरे बचपन से ले कर अब तक, मेरी पिताजी के साथ कुछ ख़ास यादें नहीं थीं| पिताजी का अपने सभी बच्चों के प्रति रवैय्या उखड़ा हुआ ही था, हाँ एक बार मैंने उन्हें अनिल को गोद में ले कर खिलाते हुए देखा था| मेरे पिताजी शुरू से ही बड़े मेहनती किसान रहे थे इसलिए उनका सारा समय बस खेतों में काम करते हुए निकलता था परन्तु उन्होंने अपने पिता होने का दायित्व बहुत अच्छे से निभाया था| अगर मैं अपने पिताजी के साथ मीठी याद की बात करूँ तो मुझे उनका प्यार इनसे शादी होने के बाद ही मिला था| वो आखरी बार जो पिताजी दिल्ली आये थे और जाने से पहले उन्होंने मुझे अपने गले लगा कर प्यार से आशीर्वाद दिया था, बस इसी सुनहरी याद को मैं बार-बार याद किये जा रही थी क्योंकि उस दिन मुझे पहलीबार अपने पिताजी के प्यार से अवगत होने का मौका मिला था|

इधर एक ओर मैं अपने पिताजी को याद किए जा रही थी तो वहीं दूसरी ओर टैक्सी मेरे मायके के द्वार पहुँच चुकी थी| ये टैक्सी वाले को पैसे दे रहे थे और मैं अपने पिताजी को देखने के लिए लालहित हो रही थी इसलिए मैं टैक्सी से उतरते ही तेज़ी से घर के आंगन की ओर चल पड़ी| इस आँगन से मेरा रिश्ता मेरे पिताजी ने जोड़ा था, फिर उन्होंने ही आशीर्वाद दे कर मुझे डोली में बिठा कर विदा किया था| मैंने कभी नहीं सोचा था की एक ऐसा पल भी आएगा जब मैं इस आंगन में प्रवेश करूँगी और मेरे पिताजी इस दुनिया में नहीं होंगें!

खैर, आंगन में प्रवेश करते ही मुझे काफी लोग दिखाई दिए, वो सभी मुझे देख कर हैरान थे और खुसफुसा कर बात करने लगे थे| उनका खुसफुसाना कुछ और नहीं बल्कि मेरे तथा इनके प्रेम विवाह पर अपनी टिपण्णी करना ही था| मुझे न तो उन लोगों की कोई आवाज सुनाई दे रही थी और न ही मेरी इच्छा थी उन बातों को सुनने की, मुझे तो बस अपने पिताजी को देखना था.एक अंतिम बार! मैं तेजी से होते हुए आंगन के बीचों बीच पहुँची जहाँ मुझे पिताजी का शव अर्थी पर दिखाई दिया| पिताजी के शव को देख कर मेरा जिस्म पत्थर का हो चूका था, मैं जहाँ खड़ी थी वहीं जड़वत हो गई! दिमाग काम नहीं कर रहा था और मेरा डरा सहमा सा दिल मुझे कह रहा था की ये सब कोई भयानक सपना है! तभी मेरी नज़र माँ पर पड़ी जो की पिताजी के शव के नज़दीक बैठीं बिलख-बिलख कर रो रहीं थीं! उन्हें रोता हुआ देख मेरा मन बोला की ये कोई सपना नहीं है, सच में मेरे पिताजी अब इस दुनिया में नहीं रहे! मन की बात सुन मैं आँखें फाड़े पिताजी के चेहरे को देखने लगी, इस उम्मीद में की शायद अब उनकी पलकें हिलें और मैं जा कर उनके गले लग जाऊँ! लेकिन तभी अनिल मेरे पास आया और मेरे गले लग कर रोने लगा, मैं उस वक़्त इस कदर सदमें में थी की मुझे अनिल का न तो स्पर्श महसूस हो रहा था न ही उसके रोने की आवाज सुनाई दे रही थी! मेरी नज़र तो बस मेरे पिताजी के चेहरे पर थी| उधर अनिल का रोना सुन माँ की नज़र मुझ पर पड़ी और उन्होंने हाथ खोल कर मुझे अपने पास आने को कहा मगर मेरी नजरें तो पिताजी के चेहरे पर टिकी हुई थी! तभी ये पीछे से आये और मेरी बगल में खड़े हो कर अपने दोनों हाथों से मेरे दोनों कन्धों को पकड़ मुझे पिताजी के शव के नजदीक लाये| पिताजी के मृत शरीर के नजदीक आ कर मुझे जैसे थोड़ा-थोड़ा होश आने लगा था! इन्होने मुझे सहारा दे कर नीचे बिठाया, इस पूरे दौरान मेरी नजरें पिताजी के चेहरे से चिपकी हुई थीं! मेरी ख़ामोशी देख ये मन ही मन घबराने लगे थे और मेरे लिए चिंता करने लगे थे| इन्हें मुझसे कुछ बुलवाना था ताकि मेरे मन में कोई सदमा न बैठ जाए; "जान....पिताजी...." मुझसे इतना कह इनका सब्र जवाब दे गया, इतनी देर से ये जो खुद को मेरे सामने सहेज कर बैठे थे, पिताजी को यूँ देख इनका होंसला टूट गया और ये रो पड़े| "पिताजी....मुझे आपसे कितनी बातें करनी थी....और आप..." ये रोते हुए दबी आवाज में बोले| इनकी आवाज सुन मुझे होश आया और मैं बहुत जोर से चीखी; "पिताजी!!!!"

मैं पिताजी के सीने पर सर रख कर रो पड़ी, पिताजी के ठंडे पड़े शरीर के स्पर्श को महसूस कर मेरा आत्मबल टूट चूका था! इन्होने और अनिल ने मुझे सँभालने की बड़ी कोशिश की मगर मैं किसी टूटे हुए वृक्ष के समान थी, ऐसा वृक्ष जिसे सींचने वाला माली इस दुनिया से चला गया था!

मुझे यूँ रोता हुआ देख माँ सहारा ले कर उठीं और मेरे नजदीक आईं, उन्होंने मुझे अपने सीने से लगाया| माँ के सीने से लग कर मेरा रोना और बेकाबू हो गया, माँ भी खुद को नहीं रोक पाईं इसलिए हम माँ-बेटी दोनों रोने लगीं| उधर अनिल खड़ा हुआ और अपने जीजू के (इनके) गले लग कर रोने लगा, इन्होने अनिल को सँभालना शुरू किया और उससे रोते हुए पुछा; "बेटा...ये सब कैसे हुआ?"

"जीजू...पिताजी कल रात में...अच्छा खासा सोये थे और...सुबह उठे ही नहीं!" अनिल रोते हुए बोला| इन्होने अनिल के सर पर हाथ फेर उसे ढाँढस बँधाया| इधर मेरा रोना थम नहीं रहा था और मैं हरपाल बदहवास होती जा रहे थी, मेरी ये हालत देख मेरी माँ डर रहीं थीं| उन्होंने मुड़ कर पीछे देखा तो पाया की ये अनिल से गले लगे हुए उसे ढाँढस बँधा रहे हैं| "बेटा" मेरी माँ ने इन्हें पुकारा तो ये तुरंत माँ के पास आये और अपने दोनों घुटने टेक कर मेरी माँ के गले लग गए| अब दोनों सास और दमाद रोने लगे थे, अनिल को तो ये थोड़ी हिम्मत दे आये थे मगर माँ को हिम्मत देना इनके बस की बात नहीं थी!

वहीं मेरी माँ को अपनी नहीं मेरी चिंता थी, मैं रोते हुए पागल सी होने लगी थी और माँ के सँभाले भी नहीं सँभल रही थी| "बेटा....मुन्नी का सँभाल!" मेरी माँ ने इनके कान में कहा जिससे ये मेरे पास आये और मुझे अपने सीने से लगा कर शांत करवाने लगे| "बेटा, काहे ई (मुझे) का हियाँ लायो? ऊ माँ बने वाली है! गर्भवती औरत का मातम में नाहीं लावा जात है!" माँ अपना रोना काबू करते हुए बोलीं| "माँ, पिताजी को आखरीबार देखने का हक़ मैं संगीता से नहीं छीन सकता था! उसे (मुझे) इस हक़ से वंचित रख मैं कभी खुद को माफ़ नहीं कर पाता|" इन्होने अपने आँसूँ पोछते हुए कहा| इनकी बात सुन मेरे दिल में इनके लिए प्यार उमड़ने लगा था क्योंकि आज इन्होने मेरी अपने पिताजी को अंतिम बार देखने की ख्वाइश पूरी करने के लिए अपने होने वाले बच्चे की जिंदगी दाँव पर लगा दी थी, वो बच्चा जिसके स्वस्थ पैदा होने के लिए ये कल रोमांस करने के लिए मना कर रहे थे!

खैर, इनके आगोश में रहने से धीरे-धीरे मैं अपने टूटे हुए दिल को समेटने लगी थी| "जीजू....एक मिनट|" अनिल बोला और इन्हें अपने साथ दूर एक कोने पर ले गया| "जीजू, ये हमारे बड़े भाई...हमारे भाईसाहब हैं!" ये कहते हुए अनिल ने मेरे बड़े भाईसाहब की भेंट इनसे कराई| अनिल ने ये बात बड़े अपनेपन से कही थी इसलिए ये हैरान थे की भला ऐसे कैसे हो सकता है? मेरा बड़ा भाई, जिसके बारे में मैंने आजतक इन्हें नहीं बताया था.क्यों.क्योंकि मेरे भाईसाहब ने पाप ही ऐसा किया था की उनका जिक्र हमारे परिवार में कोई नहीं करता था!

उधर अनिल की बात सुन ये सोच में पड़ गए थे की, इन्हें आजतक यही लगता था की मैं ही पिताजी की सबसे पहली औलाद हूँ, ऐसे में अचानक यूँ अनिल का एक शक़्स को भाईसाहब कहना इन्हें हैरत में डाल चुका था| "पर...संगीता ने इनके बारे में कभी कुछ नहीं बताया..और तो और पिताजी ने भी कभी कुछ नहीं बताया?" इन्होने हैरान होते हुए अनिल से पुछा| परन्तु अनिल कुछ जवाब देता उससे पहले ही मेरे भाईसाहब बोल पड़े; "मुझ जैसे पापी के बारे में तुम्हें कौन बताता?" भाईसाहब आँखों में आँसूँ लिए हुए बोले| मेरे भाईसाहब की आँखों में आँसूँ देख ये पिघल गए और उन्हें सहारा देते हुए पूछने लगे; "आखिर ऐसा क्या हुआ था भाईसाहब की आप खुद को पापी कह रहे हैं?" इन्होने ईमानदारी से सवाल पुछा| अब इन्हें क्या पिता की इनके सामने खड़ा ये शक़्स कितना बड़ा पापी है?!

"आज से 27 साल पहले अपने ही पिता पर मैंने नशे की हालत में हाथ उठाने का पाप किया था!" भाईसाहब शर्म से सर झुकाते हुए बोले| भाईसाहब की बात सुन इनकी आँखें फ़ैल गईं, ये कोई आम पाप नहीं था जिसे की कोई माफ़ कर सके इसलिए कहीं न कहीं इनके दिल के भीतर भी भाईसाहब के लिए नफरत पैदा हो चुकी थी| लेकिन फिर इन्होने अनिल को देखा तो पाया की उसके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं है, वो बहुत ही शांत मन से चुपचाप खड़ा है| ये कुछ कहते या पूछते उससे पहले ही मेरे भाईसाहब ने इनके आगे हाथ जोड़ दिए और रोते हुए बोले; "मैं सच कहा रहा हूँ मानु, एक भी दिन ऐसा नहीं गया जब मैंने अपने किये पाप के लिए खुद को न कोसा हो! कई बार सोचा की आकर पिताजी से माफ़ी माँग लूँ पर कभी हिम्मत ही नहीं हुई की उनके सामने खड़ा हो सकूँ!" ये कहते हुए भाईसाहब बिफर पड़े| उनकी आँखों में इन्होने पछतावे के आँसूँ देखे थे इसलिए इन्हें मेरे भाईसाहब पर विश्वास हो गया था| इनका दिल पिघल गया और इन्होने भाईसाहब के कँधे पर हाथ रख उन्हें चुप कराया| ये भी क्या करें, पाक-साफ़ दिल के हैं जल्दी चालाक लोगों की बातों में आ जाते हैं! गौर करने वाली बात ये है की मुझे अभी तक नहीं पता था की मेरे भाईसाहब घर में कहीं मौजूद हैं!

दोपहर के दो बज रहे थे और जो लोग सुबह से मेरे पिताजी की अंतिम यात्रा में जाने के लिए आये थे वो जल्दी मचाने लगे थे! दरअसल मेरी माँ ने इनके गाँव पहुँचने तक सबको रोक कर रखा था, अब चूँकि हम दोनों आ चुके थे इसलिए सभी जल्दी निपटना चाहते थे| चरण काका इन्हें और अनिल को बुलाने गए; "मुन्ना...चलो!" इतना सुनते ही दोनों जीजा-साले आ गए मगर मेरे भाईसाहब नहीं आये, शायद वो मेरा सामना करने से डर रहे थे!

खैर, ये और अनिल एक साथ मेरे पिताजी के पार्थिव शरीर के पास आये, हमारे गाँव में स्त्रियाँ श्मशान नहीं जातीं इसलिए सभी स्त्रियाँ घर पर रुक रहीं थीं| मेरी माँ और मेरी बहनों ने मुझे उठा कर पिताजी के शव से दूर किया परन्तु मेरा दिल उनसे दूर नहीं जाना चाहता था इसलिए मैंने छटपटाते हुए रोना शुरू कर दिया| मुझे ऐसा लग रहा था जैसे ये दुनियावाले मुझे मेरे पिताजी से अलग कर रहे हों! बड़ी मुश्किल से सोनी और जानकी ने मुझे कस कर पकड़ा हुआ था जबकि मेरा मन पिताजी के सीने से आखरीबार लग कर रोने का था|

एक-एक कर काफी आदमी अर्थी उठाने के लिए आगे आये, ये पिताजी के दाहिने पाँव के पास कांधा दे रहे थे, चरण पिताजी के बाएँ काँधे के पास अर्थी को काँधा दे रहे थे और अनिल आगे एक मटकी ले कर खड़ा था| बाकी बचे आदमी मिल कर पिताजी की अर्थी को काँधा दे रहे थे| मेरे बड़े भाईसाहब अभी तक मेरे सामने नहीं आये थे|

वहीं ये दृश्य देख मुझसे मेरा रोना नहीं रोका जा रहा था, मुझे अपने पिताजी को फिर न देख पाने का दुःख भीतर से झिंझोड़े जा रहा था| पिताजी की अर्थी को यूँ जाता हुआ देख मेरा दुःख आपे से बाहर हो गया था तथा मेरे दिलों-दिमाग पर हावी हो चूका था! रोते-बिलखते हुए मेरा होश अब धीरे-धीरे कम होने लगा था, अभी पिताजी की अर्थी घर के आंगन से निकली ही होगी की मैं बेहोश हो गई! मेरी माँ और बहनों ने मिलकर मुझे सँभाला और मुझे चारपाई पर लिटाया, मेरी माँ ने तुरंत गाँव के वैद जी को बुलवाया जिंन्होने आ कर मेरा उपचार शुरू किया|

उधर इस सब से अनजान ये और अन्य पुरुष श्मशान की ओर निकल चुके थे| घर के आंगन से पिताजी की अर्थी निकली तो मेरे बड़े भाईसाहब अपने बेटे होने का फ़र्ज़ निभाने के लिए आगे आये और पिताजी की अर्थी को काँधा दिया|

श्मशान पहुँच कर पंडित जी ने विधिवत कार्य शुरू किये, इस समय इन्हें आगे रहना था मगर इन्होने अपने साथ अनिल तथा मेरे बड़े भाईसाहब को साथ बिठाया और जो भी रस्में निभाईं गईं उसमें ये तीनों साथ थे| देखने वाले लोग ये दृश्य देख कर बातें करने लगे थे क्योंकि मेरी दोनों बहनों के पतियों को किसी ने पुछा भी नहीं था! फिर आया मुखाग्नि देने का समय, पंडित जी ने जब पुछा की मुखाग्नि कौन देगा तो अनिल ने इन्हें आगे कर दिया| ये दृश्य देख सोनी के पति ने बवाल खड़ा कर दिया; "मुखाग्नि ई (ये) काहे देइ, ऊ तो तोहार बड़के भैया का देय का चाहि! जब से आयन है, हम देखित है की ई (ये) ही चौधरी बना फिरत है! हम सभायें (जानकी का पति और सोनी का पति) का कउनो पूछतेय नाहीं?!" दरअसल मेरी इनसे दुबारा शादी करना हमारे खानदान में किसी के भी गले नहीं उतरा था, मेरी दोनों बहनों के परिवार हमसे (मुझसे और इनसे) नफरत करते थे| ऐसे में पिताजी ने मुखाग्नि देने का हक़ इनको दे कर परिवार में सबसे ऊँचा औदा इन्हें दे दिया था, जो की किसी को भी पसंद नहीं था!

सोनी के पति की कही ये बात अनिल से सहन नहीं हुई इसलिए वो गुस्से से तमतमाते हुए बोला; "मुखाग्नि जीजू ही दीहियें काहे से की ई पिताजी की अंतिम इच्छा रही, तोहका जो करेका है कर लिहो!" अपने छोटे साले से तीखे बोल सुन सोनी और जानकी के पति तिलमिला गए थे, वो कुछ कहते इससे पहले ही मेरे भाईसाहब भी इन्हीं के बराबर में खड़े हो गए और अपना हक़ इन्हें आदरपूर्वक देते हुए बोले; "पिताजी को मुखाग्नि मानु ही देगा!" भाईसाहब की कद काठी और उनके इनके प्रति झुकाव को देख कर सब चुप हो गए!

वहीं ये कुछ और सोचे बैठे थे, इन्होने आज तक किसी का हक़ नहीं मारा था ऐसे में ये मेरे बड़े भाईसाहब द्वारा पिताजी को मुखाग्नि देने का सांसारिक हक़ कैसे मारते? "भाईसाहब, पिताजी को मुखाग्नि हम दोनों देंगे!" इन्होने अपना फैसला सुनाते हुए कहा| इनकी बात सुनते ही मेरे भाईसाहब की आँखें भर आईं और उन्होंने सर न में हिलाते हुए मना किया; "मानु, तु जानता है न मैंने क्या पाप किया है?! मेरे मुखाग्नि देने से पिताजी की आत्मा को दुःख पहुँचेगा!" भाईसाहब रुनवासे हो कर बोले|

"भाईसाहब, मुखाग्नि देना आपका न केवल हक़ है बल्कि सामाजिक दायित्व है, हमारे पुराणों में यही लिखा है की बड़ा बेटा ही पिता को मुखाग्नि देता है और मैं आप से ये हक़ नहीं छीन सकता! जो हुआ वो बहुत दुखद था पर जहाँ तक मैं पिताजी को जानता हूँ वो इतने सालों बाद आपको अवश्य माफ़ कर देते!" ये बड़े आत्मविश्वास से बोले|

"पर पिताजी की इच्छा थी की मुखाग्नि तुम....." भाईसाहब ने इन्हें पिताजी की अंतिम इच्छा का वास्ता देना चाहा मगर ये तो पहले से ही बातों के धनी हैं, भाईसाहब की बात पूरी होने से पहले ही ये बोल पड़े; "भाईसाहब, पिताजी की अंतिम इच्छा का मन रखते हुए मैं भी आपके साथ मुखाग्नि दूँगा! इस तरह उनकी इच्छा भी पूरी होगी और आपका धर्म भी पूरा होगा!" ये तर्क करते हुए बोले| इनकी बातों ने भाईसाहब को बहुत प्रभावित किया था, उनके पास कहने के लिए शब्द नहीं थे इसलिए उन्होंने ने इन्हें अपने गले लगा लिया और वो बिफर कर रो पड़े| इनकी कही बात ने वहाँ मौजूद सभी लोगों का मुँह बंद कर दिया था!

बहरहाल, पूरे विधि-विधान से पंडित जी ने कार्य किये तथा अंत में इन्होने और भाईसाहब ने मिलकर पिताजी को मुखाग्नि दी| साफ़ जाहिर था की वहाँ मौजूद हर इंसान को ये दृश्य नग्वार गुजरा था, वो तो एक समय में मेरे बड़े भाईसाहब का गाँव में बड़ा दबदबा था इसलिए सब के सब डर के मारे चुप बैठे थे!

कुछ समय बाद सब श्मसान से घर को लौटने लगे, बाकी सब आगे-आगे थे और ये तथा अनिल सबसे पीछे बात करते हुए आ रहे थे| अभी ये कुछ दूर पहुँचे ही थे की चन्दर इनके सामने आ गया| दरअसल बड़के दादा के पास भी मेरे पिताजी के देहांत की खबर पहुँची थी मगर उन्होंने आने से मना आकर दिया| चन्दर जानता था की ये ऐसे दुखद समय में जर्रूर आएंगे, बस यही सोच कर चन्दर श्मशान के रास्ते में खड़ा इनका इंतज़ार कर रहा था| जब चन्दर ने इन्हें अनिल के सतह अकेले आता हुआ देखा तो उसका इनसे बदला लेने का इरादा पक्का गया| वो एकदम से इनके सामने अपनी घिनौनी मुस्कान ले कर खड़ा हो गया|

उधर चन्दर को देखते ही इनका चेहरा गुस्से से तमतमा गया क्योंकि इन्हें वो दिन याद आ गया जब चन्दर हमारे घर में घुसा आया था और मेरी जान लेने की कोशिश कर रहा था| "आओ सरउ, तोहरे इंतज़ार करत रहन! ऊ दिन आपन घर मा, आपन गली मा बहुत शेर बनत रहेओ न? अब देखित है की हमार गाँव में कितना शेर बनत हो?" चन्दर अपने घिनौनी हँसी हँसते हुए इनसे बोला| चन्दर को लग रहा था की चूँकि ये गाँव में हैं तो यहाँ ये बड़के दादा के डर से चन्दर का कुछ नहीं बिगाड़ सकते, लेकिन उसे क्या पता की शेर जंगल में हो या शहर में, शेर शिकार करना नहीं भूलता!

चन्दर इनसे कोई 10-12 कदम की दूरी पर था इसलिए आँखों में गुस्सा लिए ये चन्दर पर लपके और उसका गिरेबान पकड़ कर उसकी आँखों में देखते हुए बोले; "ये मत सोच की मैं बड़के दादा के डर के मारे कुछ नहीं करूँगा, शुक्र मना बड़की अम्मा की मैं तुझे ज़िंदा छोड़ रहा हूँ! आज के बाद अगर तू मेरे या मेरे परिवार के आस-पास भी दिखा न तो मैं बड़की अम्मा का भी ख्याल नहीं करूँगा और तुझे वहीं के वहीं ज़मीन में गाड़ दूँगा!" इन्होने चन्दर को धमकाते हुए कहा| तभी अनिल ने पीछे से आ कर इनके हाथों से चन्दर का गिरेबान छुड़वाया और बोला; "छोड़ दो इसे जीजू!" इतना कह कर वो इन्हें घर की ओर चलने को कहने लगा| ये दो कदम चले होंगें की चन्दर ने इन्हें धमकी दे डाली; "ऊ बारी तोहार बीवी का जान से मारा चाहत रहन, लेकिन ई बारी पाहिले तोहका जान से मारब फिर तोहार बीवी का!" ये सुनते ही इनका गुस्सा इनके आपे से बाहर हो गया और इन्होने चन्दर के जबड़े पर जोरदार घूसा दे मारा! घूसा पड़ने से चन्दर थोड़ा डगमगा गया था, ये उसे एक और घूसा मारने वाले थे की तभी अनिल ने पीछे से आ कर इनको जकड़ लिया और पीछे की ओर खींचने लगा| जिस्मानी तौर पर ये अनिल से ज्यादा से बलिष्ट थे इसलिए इन्होने अनिल की पकड़ छुड़ाई और फुर्ती से चन्दर के उसी जबड़े पर एक और घूसा जड़ दिया!

वहीं मेरे बड़े भाईसाहब ने पीछे मुड़ कर जब शोर-शराबा सुना तो वो दौड़े-दौड़े आये| ये तब चन्दर के तीसरा घूसा जड़ने वाले थे की तभी भाईसाहब ने पीछे से आ कर इन्हें अपनी बाहों में जकड़ कर पीछे खींचा| इन्होने भाईसाहब की पकड़ से छूटने के लिए बड़े हाथ-पैर मारे मगर भाईसाहब इनसे भी बलिष्ट थे इसलिए ये उनकी पकड़ से खुद को छुड़ा नहीं पाए| "नहीं मानु! खुद को सँभालो!" भाईसाहब इन्हें जकड़े हुए सँभलने को कह रहे थे जबकि ये गुस्से से चन्दर को घूरते हुए गाली दे रहे थे; "हरामजादे, तुझे छोड़ूँगा नहीं!" जब ये काबू में नहीं आये तो भाईसाहब ने अनिल को इशारा किया की वो चन्दर को भगा दे, अनिल चन्दर के पास गया और बोला; "चला जा यहाँ से, अगर भाईसाहब ने जीजू को छोड़ दिया न तो तू आज जिन्दा नहीं बचेगा!" चन्दर को इनसे बदला लेना था मगर न तो ये सही समय था और न ही उसके पास सही मौका था! आखिर वो अपने जबड़े को सहलाता हुआ वहाँ से चला गया|

ये मार-पीट देख कुछ लोग तमाशा देखने के लिए इकठ्ठा हो गए थे, भाईसाहब ने सभी को अपने रास्ते जाने को कहा और इन्हें समझाने लगे; "मानु, अपने गुस्से पर काबू रखना सीखो! तुम्हारा पूरा परिवार है, तुम्हारी की गई जरा सी गलती तुम्हारे पूरे परिवार पर भारी पड़ सकती है!"

"इस हरामजादे ने संगीता को जान से मारने की कोशिश की थी, उस सदमें से संगीता का क्या हाल था ये आप नहीं जानते!" इन्होने अपने गुस्से पर काबू करते हुए कहा| भाईसाहब ने सारी बात जाननी चाहि और अनिल ने उन्हें सारी बात शुरू से ले कर अंत तक बताई| ये सारी बात जानकर भाईसाहब को अचम्भा हुआ की हमने (मैंने और इन्होने) अपने प्यार को पाने के लिए कितना कुछ झेला है! जब मैं बहुत छोटी थी तो मेरे बड़े भाईसाहब मुझसे बहुत प्यार करते थे, इसलिए जब आज उन्हें पता चला की चन्दर मेरी जान लेना चाहता था तो उनका खून भी खौल गया!

खैर, कुछ देर बाद सभी लोग घर लौट आये थे, चरण काका के यहाँ जो कुआँ था वहीं सबने एक-एक कर नहाना शुरू किया| मैंने इनके कपड़े अपनी मझली बहन जानकी के हाथ भेज दिए थे| आज ये पहलीबार मेरी बहन जानकी से मिले थे, दोनों ही शर्मीले थे इसलिए न मेरी बहन कुछ बोली और न ही ये कुछ बोले!

[color=rgb(184,]जारी रहेगा भाग 3 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]तीसवाँ अध्याय: नियति का खेल[/color]
[color=rgb(235,]भाग - 3[/color]


[color=rgb(128,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

कुछ देर बाद सभी लोग घर लौट आये थे, चरण काका के यहाँ जो कुआँ था वहीं सबने एक-एक कर नहाना शुरू किया| मैंने इनके कपड़े अपनी मझली बहन जानकी के हाथ भेज दिए थे| आज ये पहलीबार मेरी बहन जानकी से मिले थे, दोनों ही शर्मीले थे इसलिए न मेरी बहन कुछ बोली और न ही ये कुछ बोले!

[color=rgb(51,]अब आगे:[/color]

कपड़े बदलकर ये मुझे ढूँढ़ते हुए घर के भीतर पहुँचे तथा मुझे आंगन की चारपाई पर लेटा हुआ देख, माँ मेरे सिरहाने बैठीं मेरे बालों में हाथ फेर रहीं थीं, ये दृश्य देख तो एकदम से इनके प्राण सूख गए और ये तेजी से मेरे पास आये| मेरी कमर के पास बैठते हुए ये मुझे चिंतित नजरों से देखने लगे, इन्होने माँ से मेरा हाल-चाल पुछा तो माँ ने इन्हें सब बताया;

माँ: बेटा, कउनो घबड़ाये का बात नाहीं है! तोहार जाए का बाद, मुन्नी (मैं) रोवत-रोवत बेहोश होइ गई रही! हम तुरंते वैद जी का बुलाये दिहिन, ऊ आये के मुन्नी की नाड़ी देखिन और कहिन की कउनो घबड़ाये का बात नहीं है! एक तो मुन्नी माँ बने वाली है और फिर ई सब दृश्य देख ऊ (मैं) रोये-रोये के कमजोरी से बेहोश हो गई रही, आज भर आराम करे का है और कलिहाँ से मुन्नी ठीक हुई जाई!

माँ की बात सुन इनकी जान में जान आई|

ये: जान, अपना ख्याल रखा करो, तुम्हें कुछ हो गया तो मैं क्या करूँगा?!

इन्होने मेरे बाएँ गाल पर हाथ फेरते हुए कहा| इनके इस छोटे से स्पर्श मात्र से ही मेरे चेहरे पर हलकी सी मुस्कराहट आ गई थी! आज सुबह से ये पहला मौका था जब मेरे चेहरे पर थोड़ी सी मुस्कान आई थी और इस मुस्कान को देख कर इनके दिल को करार आ रहा था|

ये: कुछ खाया?

इन्होने प्यार से पुछा तो मैंने अपनी गर्दन न में हिलाई| मेरे सुबह से भूखे रहने की बात सुन ये पुनः चिंतित हो गए;

ये: रुको, मैं सबके लिए कुछ खाने के लिए लाता हूँ|

इतना कह ये उठने को हुए थे की मेरी माँ ने इन्हें रोक दिया;

मेरी माँ: रहे दिहो बेटा, तोहार चरण काका के घरे से आभायें चाय आवत है|

मेरी माँ ने इनके कँधे पर हाथ रखते हुए कहा|

हमारे बीच ये प्यार देख माँ का दिल भर आया था और उनकी आँखें फिर नम हो गई थीं, ये उठ कर खड़े हुए तथ माँ के गले लगते हुए माँ को सँभालते हुए बोले;

ये: माँ आप चिंता मत करो, आपका बेटा है न यहाँ?!

इनकी बात सुन माँ को हिम्मत मिली और वो सर हाँ में हिलने लगीं और इनके माथे को चूमने लगी| अब मुझे कुछ और बात करनी थी ताकि माँ का मन भटका सकूँ;

मैं: माँ-पिताजी (मेरे सास-ससुर) का फ़ोन आया था, आपका फ़ोन तो बंद था इसलिए उन्होंने अनिल के नंबर पर किया| अनिल का फ़ोन माँ के पास था इसलिए माँ ने उनसे बात की, आयुष और नेहा ने भी माँ से बात की तथा दोनों रोये भी बहुत| दोनों (आयुष और नेहा) आपसे बात करना चाह रहे थे तो ज़रा उनको फ़ोन कर लो|

मेरी बात सुन इन्होने तुरंत माँ (मेरी सासु माँ) के नंबर पर कॉल मिलाया, नेहा माँ का फ़ोन पकड़े बैठी थी इसलिए एक घंटी बजते ही उसने फ़ोन उठा लिया;

नेहा: हेल्लो पापा जी?!

ये: मेरा बच्चा कैसा है?

इन्होने नेहा से प्यार से बात शुरू करते हुए पुछा|

नेहा: पापा जी...नाना जी...अब नहीं रहे?

नेहा एकदम से भावुक होते हुए भारी गले से बोली| नेहा का सवाल सुन इनकी आँखें भर आईं मगर फिर भी इन्होने खुद को सँभाला और हम माँ-बेटी से थोड़ा दूर जा कर बोले;

ये: हाँ जी बेटा! आपके नाना जी हमें छोड़ कर भगवान के पास चले गए|

ये जानबूझ कर उठ कर कुछ दूर गए थे ताकि मेरे पिताजी का दुबारा जिक्र होने से मेरी माँ फिर से दुखी न हो जाएँ|

उधर, इनकी बात सुनते ही नेहा रोने लगी, एक बाप अपनी बेटी को कैसे रोता हुआ देखता इसलिए इन्होने नेहा को फ़ोन पर ही हिम्मत बँधानी शुरू कर दी;

ये: बेटा...देखो...आपको strong बनना होगा! अगर आप इस तरह रोओगे तो आयुष को कौन सँभालेगा? फिर आप दोनों भाई-बहन (आयुष और नेहा) रोओगे तो आपके दादा-दादीजी को कितना दुःख होगा और फिर उन्हें कौन सँभालेगा? आप तो मेरा सबसे बहादुर बच्चा हो न?! तो अब रोना नहीं और मेरी गैरहाजरी में आप ही को सबका ख्याल रखना है...ओके?

इन्हें बच्चों को सँभालना अच्छे से आता था, जब भी बच्चे रोते तो ये उन्हें थोड़ी सी जिम्मेदारी दे कर जिम्मेदार बना देते, जिससे की बच्चों का ध्यान खुद पर से हट कर अपने इर्द-गिर्द मौजूद अपने परिवार पर लग जाता| वही अभी भी हुआ, इनकी दी हुई जिम्मेदारी से नेहा ने रोना बंद किया और अपने आँसूँ पोछे| तभी वहाँ आयुष आ गया और उसने इनसे बात की;

ये: मेरा प्यारा बेटा क्या कर रहा है?

इन्होने बड़े प्यार से आयुष से बात शुरू की जिससे आयुष का ध्यान थोड़ा भटक गया|

आयुष: आई मिच्छ यू पापा जी! (I miss you!)

आयुष थोड़ा तुतलाते हुए बोला| इन्होने आयुष के भीतर मौजूद अपने नानाजी को खोने का दुःख महसूस कर लिया था, वो तो आयुष इन पर गया है इसलिए खुद को रोने से रोक रहा था|

ये: बेटा आई मिस यू टू! (I miss you too!)

इनकी बात सुन आयुष भावुक हो गया और रोने लगा| नेहा उसकी बगल में बैठी थी इसलिए नेहा अपनी बड़ी बहन होने का फ़र्ज़ निभाते हुए आयुष को चुप करवा रही थी|

ये: बेटा रोते नहीं! आप रोओगे तो आपकी नानी जी को कौन सँभालेगा?

इन्होने मेरी माँ का यानी आयुष की नानी जी को सँभालने की जिम्मेदारी आयुष को दी तो आयुष ने खुद को सँभाला और अपने आँसूँ पोछते हुए अपने पापा जी से बोला;

आयुष: पापा जी.मुझे नानी जी से बात करनी है!

ये तुरंत हम माँ-बेटी के पास लौटे और फ़ोन स्पीकर पर डालते हुए आयुष से बोले;

ये: बेटा मैं आपकी नानी जी के पास बैठा हूँ और फ़ोन स्पीकर पर है|

आयुष: नानी जी...मैं है न...कल आ रहा हूँ...फिर है न...मैं आपको बहुत सारी पप्पी दूँगा! आपके लिए चॉकलेट...लाऊँगा....और आपको रोज़ कहानी सुनाऊँगा!

आयुष की भोलेपन से भरी बातें सुन मेरी माँ के चेहरे पर गर्वपूर्ण मुस्कान आ गई क्योंकि एक छोटा सा बच्चा उन्हें अपना प्यार दे कर सँभालना जो चाहता था|

मेरी माँ: ठीक है हमार बेटा, हम तोहार रस्ता देखित है!

इतने में पीछे से नेहा भी बोली;

नेहा: नानी जी, मेरा इंतज़ार भी करोगे न?

नेहा का बचपना देख माँ के चेहरे पर मुस्कान आ गई और वो बोलीं;

मेरी माँ: अरे ई कहे वाली बात थोड़े ही है मुन्नी! तू दुनों को ही तो देखे खतिर हम बैठी हन!

अपनी नानी जी की बात सुन दोनों बच्चों ने फ़ोन पर ही माँ को पप्पी दी तथा फ़ोन पिताजी (मेरे ससुर जी) को दे कर चले गए|

पिताजी: बेटा कैसा है तू? समधन जी से बात हुई थी और उन्होंने बताया था की बहु की तबियत गड़बड़ा गई थी, अब बहु की तबियत कैसी है?

पिताजी चिंता करते हुए पूछने लगे| इन्होने फ़ोन स्पीकर से हटाया और हमारे पास बैठे ही बात करने लगे;

ये: माफ़ करना पिताजी, मैं आपको यहाँ पहुँच कर फ़ोन नहीं कर पाया!

इन्होने माफ़ी माँगते हुए बात शुरू की|

पिताजी: कोई बात नहीं बेटा, मैं समझ सकता हूँ की वहाँ पहुँच कर तू बहुत दुखी था और फिर सभी कुछ तुझे सँभालना भी था!

ये तो पहले से ही बहुत भावुक थे और फिर यहाँ पहुँच कर मेरे पिताजी को देख इन पर क्या बीती होगी इसका पिताजी को अंदाजा था इसीलिए वो गुस्सा नहीं थे|

ये: जी संगीता अब ठीक है, हम बस चाय ही पीने जा रहे थे| आप और माँ कैसे हैं? बच्चे बहुत रो रहे होंगे न?!

पिताजी: आयुष तुम्हारे जाने के बाद जगा था और तुझे घर पर न पाकर उदास हो गया था| फिर मैंने उसे उसके नाना जी के देहांत के बारे में बताया तो आयुष बहुत रोया| जब नेहा आई तो उसे तेरी माँ ने सब बात बताई तो वो भी बहुत रोई| दोनों बच्चों को तुझसे बात करनी थी मगर तेरा फ़ोन बंद था, इसलिए मैंने उन्हें समझा-बुझा दिया की शाम को तेरे से बात होगी|

पिताजी की बात सुन ये उन्हें आश्वस्त करते हुए बोले;

ये: पिताजी, अब मेरे से बात हो गई दोनों बच्चों की तो अब आयुष और नेहा आपको तंग नहीं करेंगे| रात की लखनऊ मेल की टिकट मिल गई न आपको?

जब इन्होने ट्रैन के बारे में पुछा तो पिताजी थोड़ा चिंतित होते हुए बोले;

पिताजी: बेटा आज रात की टिकट तो नहीं मिली, कल रात की मिली है! अकेला आना होता तो मैं रात की रोडवेज की बस पकड़ कर आ जाता मगर बच्चों के साथ इस तरह आना मुश्किल है|

ये: कोई बात नहीं पिताजी, आप कल रात की गाडी (ट्रैन) से आ जाइये|

इन्होने पिताजी को निश्चिंत करते हुए कहा| पिताजी के परसों आने की बात सुन मैं और माँ खामोश रहे क्योंकि हम जानते थे की पिताजी के लिए माँ तथा दोनों बच्चों को अकेला सँभालना आसान नहीं होगा|

पिताजी से बात खत्म हुई ही थी की अनिल हम सबके लिए चाय ले आया| हमें चाय दे कर अनिल बाहर चला गया, चाय पीते हुए मेरी माँ इनसे बोलीं;

मेरी माँ: समधी जी और समधन जी परसों सुबह आवत हैं?

ये: जी माँ, पिताजी को आज रात की टिकट नहीं मिली| शाम हो चुकी है और उत्तर प्रदेश परिवहन की आखरी वॉल्वो (Volvo) भी निकल चुकी थी इसलिए सबा परसों सुबह पहुँचेंगे| तब तक आपका ये बेटा है आपके पास!

इनकी बात सुन माँ ने इनके सर पर हाथ रख आशीर्वाद दिया और बोलीं;

मेरी माँ: तोहार ई बचपने पर ही तो हम और अनिल के बापू मोहात रहे! जानत हो कलिहाँ शाम एहि समय तोहार ससुर जी कतना खुस रहे? हम आभायें तक उनका कभौं अतना खुस नाहीं देखेन| कलिहाँ ऊ (मेरे पिताजी) तोहार बहुत बड़ाई करत रहे, कहत रहे की मानु हमार सभय दुःख-तकलीफ दूर कर दिहिस, अइसन आज्ञाकारी मुन्ना पाइके तो हर माँ-बाप धन्य हो जाए!

इन्हें अपनी बड़ाई सुनने का कभी शौक नहीं था इसलिए ये सर झुकाये बैठे थे, तभी मेरी माँ ने पिताजी की अंतिम इच्छा का ज़िक्र किया;

मेरी माँ: तोहार ससुर जी का सर पर कउनो कर्ज़ा, कउनो ग़म नाहीं रहा और एहि से ऊ कल कहत रहे की 'अनिल का कोर्स पूर हुई जाए तो ऊ अच्छी नौकरी पकड़ लेइ, फिर मानु से कहेऊ की ऊ ही अनिल खतिर कउनो अच्छी लड़की पसंद करि के ओकर (अनिल का) ब्याहव कराये देइ!'

माँ की बात सुन मुझे ऐसा लगने लगा जैसे पिताजी को पहले ही अंदेशा था की वो हम सबको छोड़ कर जाने वाले हैं|

मेरी माँ: जब हम तोहार ससुर जी से कहिन की अइसन काहे कहत हो तो कहे लागे; 'अब हमार सभाएं फ़र्ज़ पूर हुई गए! हमार मुन्ना से कहेऊ की हमार एक आखरी इच्छा जरूर पूरी करी, कल का अगर हमका कछु हुई जाए तो ओहि का हमार चिता का आग देय का है!'

इतना कह माँ भाव-विभोर हो उठीं और इन्होने माँ को सँभालते हुए अपने गले लगा लिया|

मेरी माँ: हम नहीं जानित कैसे...लेकिन तोहार ससुर जी का....कलिहाँ अंदेसा हुई गवा रहा की ऊ हम सभाएं का छोड़ कर जावत हैं!

मेरी माँ ने सिसकते हुए इनके सीने से लगे हुए कहा|

ये: माँ...जो दिल के पाक-साफ़ लोग होते हैं पुण्यात्मा होते हैं.उन्हें पहले से ही ऐसा अंदेसा हो जाता है...फिर पिताजी (इनके ससुर) ने अपने पिता होने का दायित्व अच्छी तरह से निभाया था| अपनी तीन बेटियों की अच्छे से शादी की, अनिल को पढ़ाया... और उनकी जो ख्वाइशें अधूरी रह गई हैं उन्हें हम...उनके बच्चे मिलकर पूरा करेंगे!

इन्होने मेरी माँ को ढाँढस बँधाते हुए कहा|

हम दोनों मियाँ-बीवी, माँ से बातें करते हुए माँ को सँभाल रहे थे की तभी वो शक़्स मेरे सामने आया जिसके आने की मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी. मेरे भाईसाहब!

मैं: आपकी हिम्मत कैसे हुई इस घर में आने की?

मैं चीखती हुई एकदम से उठी और अपने भाईसाहब की गर्दन पकड़ने को लपकी, लेकिन तभी इन्होने मुझे अपनी बाहों में कैद कर आगे बढ़ने से रोक लिया| दरअसल भाईसाहब, माँ और इनसे विदा लेने आये थे, परन्तु उन्हें क्या पता था की यहाँ उनका सामना मुझसे होगा?! इधर इनके द्वारा मुझे पकड़ लेने से मैं छटपटाने लगी थी;

मैं: आप (ये) छोड़ दो मुझे, मैं इन्हें (मेरे भाईसाहब को) नहीं छोडूंगी!

मैंने खुद को इनकी पकड़ से छुड़ाने का प्रयास करते हुए कहा, मगर इनकी पकड़ मज़बूत थी इसलिए मैं खुद को इनकी पकड़ से छुड़ा न सकी|

ये: संगीता होश में आओ, क्या बकवास कर रही हो!

इन्होने मुझे डाँटते हुए कहा और तब मुझे होश आया की मैंने आजतक इन्हें अपने भाईसाहब के बारे में कुछ नहीं बताया तो ये मेरा गुस्सा कैसे समझते इसलिए इनका मुझे डाँटना जायज लगा|

मैं: आप नहीं जानते इन्होने...

मैं अपनी बात अभी आधी ही कह पाई थी की ये मेरी बात काटते हुए बोले;

ये: मैं सब जानता हूँ! अब होश में आओ!

इन्होने मुझे पीछे खींचा और मेरे दोनों कँधे पकड़ कर मेरी आँखों में देखते हुए कहा;

ये: भाईसाहब अपने किये पर बहुत शर्मिंदा हैं, उनकी आँखों में बस आत्मग्लानि है! Look at him...he...he's broken!

मेरे गुस्से में आ कर कहे शब्दों को सुन कर इनकी आँखों में मुझे गुस्सा नजर आया जिसे देख मैं घबरा गई और शांत हो गई| इनका दिल साफ़ था इसलिए इन्होने भाईसाहब को माफ़ कर दिया था मगर मैं अपने भाईसाहब पर विश्वास नहीं कर रही थी!

ये: भाईसाहब, संगीता की तरफ से मैं माफ़ी माँगता हूँ!

इन्होने भाईसाहब के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा| भाईसाहब ने एकदम से इनके हाथ पकड़ लिए और आँखों में आँसूँ लिए बोले;

भाईसाहब: ऐसा न कहो मानु! संगीता सही कहती है, मैं इस लायक ही नहीं की इस घर में एक पल भी रुक सकूँ! मैं तो बस आप सब से विदा लेने आया था!

ये कहते हुए मेरे भाईसाहब का सर शर्म से झुक गया| बचपन से ले कर आज तक मैंने अपने भाईसाहब को किसी के आगे यूँ सर झुकाते हुए नहीं देखा था, वो इतने बलिष्ट थे के सभी उनके आगे सर झुकाते थे इसलिए ये दृश्य देख कर मैं अवाक रह गई| हाँ वो बात अलग है की मुझे अब भी उन पर रत्तीभर विश्वास नहीं था!

ये: भाईसाहब इस मुश्किल घडी में आप भी इस घर को छोड़ कर चले जायेंगे तो माँ को कौन सँभालेगा?

इन्होने भाईसाहब को माँ का वास्ता दे कर रोकना चाहा| मुझे ये न मंजूर था मगर इनके डर के मारे मेरी घिघ्घी बँध गई थी!

भाईसाहब: तुम्हारे होते हुए मुझे अब कोई चिंता नहीं!

भाईसाहब ने इनके कँधे पर हाथ रख अपना विश्वास जताया| मुझे लगा था की ये मान जायेंगे, परन्तु इन्हें तो जैसे भाईसाहब को घर में रोकने का भूत सवार हो गया था?!
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ये: मैं आपको कहीं नहीं जाने दूँगा!

इन्होने अपना हक़ जताते हुए कहा और भाईसाहब का हाथ पकड़ उन्हें बाहर ले आये तथा बैठ कर मनाने लगे| आखिर भाईसाहब इनकी बात मान गए और पंद्रह दिन के लिए रुकने को मान गए| इधर माँ मेरे पास खामोश खड़ीं थीं, वो मेरा भाईसाहब के लिए गुस्सा जानती थीं इसीलिए उन्होंने भाईसाहब की ज़रा भी पैरवी नहीं की|

कुछ समय बाद ये भाईसाहब से बात कर के मेरे पास लौटे तथा माँ को भाईसाहब के पास जाने के लिए बोला| माँ बाहर गईं तो ये मेरे सामने चारपाई पर बैठ गए, इन्हें अपने सामने देख डर के मारे मेरा सर अपने आप झुक गया| लेकिन इस बार इन्होने मुझे नहीं डाँटा बल्कि बड़े ही प्यार से मुझसे बात शुरू की;

ये: मेला बाबू... इस तरह गुच्छा (गुस्सा) नहीं करते!

इन्होने मुझे बच्चों की तरह लाड करते हुए तुतला कर समझाते हुआ कहा| इनका प्यार देख मेरा डर खत्म हुआ और मैंने हिम्मत करते हुए कहा;

मैं: जानू, आप ने आजतक जो फैसला लिया मैंने आपका साथ दिया क्योंकि मैं जानती थी की आप कभी कोई गलत फैसला नहीं ले सकते| लेकिन आज मुझे आपका यूँ भाईसाहब का पक्ष लेना अच्छा नहीं लगा!

ये: जानता हूँ जान, लेकिन हर बार सिर्फ हमें अपने स्वार्थ के बारे में ही नहीं सोचना चाहिए! भाईसाहब ने जो किया वो पाप था, लेकिन उन्हें इसकी सजा तुम नहीं भगवान देगा| फिर ये भी तो सोचो की इस वक़्त माँ को उनके बड़े बेटे की कितनी जर्रूरत है?! तुम जानती हो न की माँ भाईसाहब से कितना प्यार करती हैं?! भले ही घर में सब भाईसाहब को भूल गए हों मगर आजतक माँ कभी अपने बड़े बेटे को नहीं भूल पाईं!

इनकी बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी की मैं बीच में बोल पड़ी;

मैं: मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ की माँ भाईसाहब से कितना प्यार करती हूँ, पिताजी ने जब भाईसाहब को घर से निकला था तो माँ आधी-आधी रात को भाईसाहब को याद कर रोया करती थीं मगर इस घर को अपने बड़े बेटे की नहीं आपकी जर्रूरत है! आपके होते हुए माँ को किसी बड़े बेटे की जर्रूरत नहीं!

मैं इनसे बहस करते हुए बोली|

ये: जान मेरी बात को समझने की कोशिश करो, मैं अपनी जिम्मेदारियों से पीछा नहीं छुड़ा रहा बस व्यवहारिक हो कर सोच रहा हूँ| मैं यहाँ गाँव में नहीं रह सकता क्योंकि वहाँ शहर में काम कौन सँभालेगा? अनिल इस वक़्त मुंबई में पढ़ रहा है, माँ यहाँ गाँव में अकेली नहीं रह सकतीं और न ही वो हमारे साथ दिल्ली जाएँगी क्योंकि यहाँ घर कौन देखेगा फिर? अब तुम बताओ की क्या हम माँ को यहाँ अकेला रहने दें?

इनकी बात सुन मैं सोच में पड़ गई, क्योंकि मैंने अभी तक नहीं सोचा था की माँ यहाँ अकेली कैसे रहेंगी?! इधर मैं सोच में पड़ी तो ये मुझे समझाते हुए बोले;

ये: एक बस भाईसाहब हैं जो यहाँ माँ के पास अपने परिवार सहित रह सकते हैं, जिससे इस घर की भी देखभाल होगी और माँ को अपने बड़े बेटे तथा उसके परिवार के साथ हँसी-ख़ुशी रहने का मौका भी मिलेगा|

इनकी बात सही थी, मेरी माँ मेरे साथ दिल्ली में रहने के लिए कभी नहीं मानती और यहाँ मैं उन्हें अकेला भी नहीं छोड़ सकती थी| भाईसाहब का सपरिवार यहाँ रहना मुझे माँ की भलाई के लिए एक समझौता लग रहा था, कोई और दिन होता तो मैं ये समझौता कभी नहीं करती मगर इस समय मैं इस समझौते को करने के लिए तैयार थी|

ये: देखो जान, समय के साथ इंसान बदल जाता है| भाईसाहब में भी बहुत बदलाव आया है, लखनऊ में उनका अपना मसालों का कारोबार है| फिर ये भी देखो की माँ ने उन्हें (भाईसाहब को) माफ़ आकर दिया, अनिल ने माफ़ कर दिया, जानकी ने भी उन्हें माफ़ कर दिया और मुझे पूरा यक़ीन है की अगर पिताजी आज ज़िंदा होते तो वो भी भाईसाहब को जर्रूर माफ़ कर देते, आखिर हमें भी पिताजी ने माफ़ किया था न?!

इनकी कही अंतिम बात मुझे बहुत चुभी क्योंकि इन्होने अनजाने में हमारे प्यार की तुलना भाईसाहब के पाप से कर दी थी!

मैं: हमने कौनसा पाप किया था जो पिताजी ने हमें माफ़ कर दिया?! हमने तो सच्चा प्यार किया था जिसे पिताजी ने आदरपूर्वक स्वीकारा था|

मैंने थोड़ा गुस्से से कहा|

ये: जान, मेरा वो मतलब नहीं था! मेरा मतलब था की माँ-बाप अपने बच्चों की हर गलती माफ़ कर देते हैं, जर्रूरत होती है तो बस बच्चों को उनकी गलती का एहसास होने की! आज जब मैं भाईसाहब से मिला तो मैंने उनकी आँखों में पश्चाताप के आँसूँ देखे, उनके भीतर मौजूद ग्लानि उन्हें खाये जा रही है! इंसान को उसकी गलती सुधारने का एक मौका तो मिलना ही चाहिए न?

इनकी ये बात सुन कर मैं खामोश हो गई क्योंकि इनकी इस बात के आगे मेरा कोई तर्क काम नहीं आता| हाँ इतना तय था की मैं भाईसाहब को माफ़ नहीं करने वाली!

ये: अब गुस्सा छोड़ दो और भाईसाहब को माफ़ कर दो!

इन्होने मुस्कुराते हुए कहा|

मैं: नहीं! मैं उन्हें कभी माफ़ नहीं कर सकती!

मैंने बड़ी सख्ती से कहा, जिसे सुन कर ये खामोश हो गए| मेरे मन में बैठा भाईसाहब के लिए क्रोध इतनी जल्दी ठंडा नहीं होने वाला था| लेकिन फिर अगले ही पल मुझे एहसास हुआ की मैं अपने भाईसाहब का गुसा अपने पति पर निकाल रही हूँ इसलिए शर्म से मेरा सर झुक गया| मुझे यूँ सर झुकाये बैठा देख ये मुझसे प्यार से बोले;

ये: अच्छा बाबा, आपको जो ठीक लगता है वो करो पर मेरे लिए अपना ये गुस्सा तो छोडो!

इन्होने मुस्कुराते हुए इतने प्यार से कहा की मेरे दिल को आराम मिला की मैंने इनके दिल को नहीं दुखाया है| मैंने इन्हें अपनी बगल में बैठने को कहा तथा इनके कँधे पर सर रख कर बैठ गई|

जब से हमलोग आये थे तब से मेरी दोनों बहनों के ससुराल वालों ने हम दोनों मियाँ-बीवी से दूरी बनाई हुई थी| मेरी दोनों बहनों में से बस जानकी ही थी जो मेरे से बात कर रही थी, सोनी से न तो मेरी बात करने की इच्छा थी और न ही उसने मुझसे बात करने में कोई इच्छा जाहिर की थी| जैसे ही रात ढलने लगी तो मेरी दोनों बहनों के ससुराल वाले अपने-अपने घर चले गए, रह गए तो बस अनिल के दोनों जीजा| एक गौर करने वाली बात ये थी की घर में चन्दर के साथ हुई इनकी हाथापाई की खबर किसी को नहीं थी, यहाँ तक की इन्होने मुझे भी ये बात बताना जर्रूरी नहीं समझा था|

खैर, चरण काका के घर से हम सबके लिए खाना बन कर आ चूका था| मेरे भाईसाहब, अनिल, चरण काका और मेरी दोनों बहनों के पति सब बाहर आंगन में बैठे खाना खा रहे थे| जबकि ये बाहर सब मर्दों के साथ न बैठकर मेरे पास बैठे हुए थे इसलिए इनका खाना परोस कर मेरी बहन जानकी घर के भीतर ही ले आई थी| इन्होने खाने की थाली ली और माँ की बगल में बैठ गए तथा उन्हें खाना शुरू करने को कहा;

मेरी माँ: तू खाओ मुन्ना, हम खा लेब!

मेरी माँ इनके गाल पर हाथ फेरते हुए बोलीं|

ये: हम पाहिले काहे खाई? हम तो आप सभी के संगे खाब!

इनकी ये टूटी-फूटी देहाती सुन माँ हँस पड़ीं और उन्हीं के साथ मैं तथा मेरी दोनों बहनें भी हँसने लगी! इनका ये भोलापन सभी को भा गया था और घर में ग़म का माहौल हँसी-ख़ुशी भरा हो गया था| माँ ने मुस्कुराते हुए जानकी से कहा की वो हम सभी स्त्रियों का खाना परोस कर घर के भीतर ही ले आये| जानकी और उसकी बेटी एक-एक कर सबकी थालियाँ परोस लाईं तथा हम सभी ने खाना शुरू किया| खाना खाते हुए मैंने इनका तार्रुफ़ जानकी से कराया;

मैं: मेरी छोटी बहन जानकी से मिले की नहीं आप?

ये कुछ जवाब देते उससे पहले ही जानकी बोल पड़ी;

जानकी: हम कपड़ा लेके गयन रहन पर जीजा, कछु बोलतेय नाहीं!

जानकी ने इन्हें साली की तरह प्यारभरा उल्हाना दिया|

ये: गीले बदन खड़ा था, ठंड ऊपर से लग रही थी! पहले कपड़े पहनता या आप से बात करता? फिर आप भी कहाँ मेरे कपड़े पहनने तक रुके, आप भी तो कपड़े दे कर भाग गए!

इन्होने थोड़े मजाकिया ढंग से जानकी के उलहाने का जवाब दिया| दोनों जीजा-साली का ये प्यारा सा मज़ाक देख कर मैं और माँ मुस्कुराये जा रहे थे क्योंकि इस मज़ाक में कहीं से भी कुछ गंदापन नहीं था| उधर अब तक खामोश बैठी सोनी बीच में अपनी टाँग अड़ाते हुए बोल पड़ी;

सोनी: चलो दीदी का तो नाहीं चीनहत रहेओ मगर हमका तो चीन्हत रहेओ, हमसे कौन सा बात कर लिहो?!

सोनी की बात में गन्दी शरारत छुपी थी, उसकी ये दोमुही बात सुन मुझे बहुत गुस्सा आया और मैं बीच में बोल पड़ी;

मैं: कुछ लोगो से बात करने से पहले उनका चरित्र देखा जाता है!

मेरी कही ये बात सोनी को बहुत बुरी लगी और वो अपना सड़ा हुआ मुँह ले कर मुझे देखने लगी, वहीं मैंने भी भोयें सिकोड़ कर उसे देखना शुरू किया| हम दोनों बहनों की ये तकरार सिवाए इनके और मेरी बहन जानकी के कोई नहीं जानता था इसीलिए दोनों जीजा-साली खामोश बैठे थे| उधर माँ को मेरी बात अच्छी नहीं लगी और वो मुझसे पूछने ही वाली हुई थीं की तभी जानकी ने बात शुरू करते हुए माँ का ध्यान भटका दिया|

खाना खा कर सभी आदमी बाहर आंगन में लेट चुके थे, हम सभी स्त्रियाँ यहाँ घर के भीतर लेटी हुई थीं| माँ और मेरी दोनों बहनें तो सो चुकी थीं मगर मेरी आँखों से नींद कोसों दूर थी| इस सन्नाटे में मुझे मेरे पिताजी की मौजूदगी का एहसास हो रहा था, बार-बार लगता था की अभी पिताजी घर के भीतर आएंगे और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए मुझे जगायेंगे!

उधर बाहर आँगन में लेटे हुए इन्हें भी नींद नहीं आ रही थी, इनके दिल ने मेरे तड़पते दिल के दर्द को महसूस कर लिया था इसलिए ये मुझे अपने प्यार से सँभालने के लिए दबे पाँव घर के भीतर आये| मुझे जागते हुए देख, ये आ कर सीधा मेरे सिरहाने बैठ गए और प्यार से मेरे सर पर हाथ फेरने लगे| इनके हाथ के उस प्यार भरे स्पर्श ने मेरे तड़पते दिल को शांत कर दिया और करीब दस मिनट बाद ही मेरी आँख लग गई!

[color=rgb(184,]जारी रहेगा भाग 4 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]तीसवाँ अध्याय: नियति का खेल[/color]
[color=rgb(235,]भाग - 4 (1)[/color]


[color=rgb(128,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

उधर बाहर आँगन में लेटे हुए इन्हें भी नींद नहीं आ रही थी, इनके दिल ने मेरे तड़पते दिल के दर्द को महसूस कर लिया था इसलिए ये मुझे अपने प्यार से सँभालने के लिए दबे पाँव घर के भीतर आये| मुझे जागते हुए देख, ये आ कर सीधा मेरे सिरहाने बैठ गए और प्यार से मेरे सर पर हाथ फेरने लगे| इनके हाथ के उस प्यार भरे स्पर्श ने मेरे तड़पते दिल को शांत कर दिया और करीब दस मिनट बाद ही मेरी आँख लग गई!

[color=rgb(51,]अब आगे:[/color]

अगली
सुबह, सोनी और जानकी के पति अपने घर लौट गए| हाँ जानकी और सोनी कुछ दिनों के लिए माँ के पास रूक गई थीं| हम दोनों मियाँ-बीवी से तो वैसे भी कोई बात नहीं कर रहा था, हम तो यहाँ बस माँ को सँभालने के लिए रुके थे| वहीं सारा घर अब लगभग खाली हो चूका था और मुझे फिर से मेरे पिताजी की कमी महसूस होने लगी थी| न जाने मुझे ऐसा क्यों लगता था की पिताजी अभी घर के भीतर से आवाज देंगे और मुझे अपने सीने से लगा लेंगे! लेकिन मेरी ये इच्छा अब कभी पूरी नहीं होने वाली थी!

इधर मेरे भाईसाहब, चरण काका, अनिल और इन्हें श्मशान फूल चुगने जाना था, जिसके बाद ये सभी सीधा अस्ति विसर्जन के लिए हरिद्वार जाने वाले थे| लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था, उसे तो इन्हें घर पर रोके रखना था इसलिए नियति ने अपनी चाल चलते हुए इन्हें छींकें शुरू करवा दी!

दरअसल मार्च के महीने का पहला हफ्ता था ओर ठंड में रात को बाहर खुले आसमान के तले सोने से ही इनकी छींकें शुरू हुई थीं| जब इनकी छींकें शुरू हुई तो इनकी तबियत खराब होने लगी, एक के बाद एक छींकें आने से इनका बदन ठंडा पड़ने लगा था| इन्हें यूँ छींकते देख मैं बहुत घबरा गई थी, मैंने तुरंत जानकी से कहा की वो चरण काका के यहाँ से पानी गर्म कर लाये ताकि ये भाँप ले सकें| जब तक पानी गर्म हो कर आया तब तक लगातार छींकने से इनकी आँखों से पानी आने लगा था! इन्हें यूँ बीमार देख हम सभी चिंतित थे, माँ तो कह रहीं थीं की इनको डॉक्टर के ले जाया जाए मगर ये थे की कहीं जाने के लिए मान ही नहीं रहे थे!

आखिर जानकी गर्म पानी लाइ और इन्होने दस मिनट भाँप ली, तब जा कर इनकी छींकों की रफ़्तार कुछ कम हुई| छींकों की रफ़्तार कम होते ही ये भाईसाहब के साथ जाने को तैयार हो गए मगर मेरे भाईसाहब ने अक्लमंदी दिखाते हुए इन्हें आराम करने को कहा; "तू आराम कर मानु, हम श्मशान से पिताजी की अस्तियाँ ले कर सीधा घर आएंगे फिर हम सब एक साथ यहीं से हरिद्वार निकलेंगे|" ये इतनी जल्दी तो मानने वाले थे नहीं इसलिए मैंने थोड़ी चपलता दिखाई; "थोड़ी देर आराम कर लोगे तो आपकी छींकें बंद हो जाएंगी और आप आराम से हरिद्वार जा पाओगे वरना इसी तरह छींकते रहोगे तो सफर में आपका ध्यान कौन रखेगा?" इन्हें मेरी बात जचि इसलिए ये घर रुकने के लिए मान गए| तब मुझे क्या पता था की मेरी ये दिखाई गई चपलता मुझ पर और मेरे परिवार पर कितनी भारी पड़ने वाली है?!

आखिर भाईसाहब, अनिल और चरण काका फूल चुगने के लिए चले गए| इधर घर पर मैं, माँ, ये, सोनी, जानकी और जानकी की बेटी रह गए थे| "जानकी, आपन जीजा खतिर काली मिर्ची की चाय बनाये लैहौ?! काली मिर्ची की चाय पीहें तभायें आयुष के पापा की छींक बंद होइ!" आज मैंने पहलीबार इन्हें सब के सामने 'आयुष के पापा' कह कर सम्बोधित किया था जिसकी ख़ुशी इनके चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान बन कर छलक रही थी!

जानकी चाय बनाने गई और ठीक तभी बच्चों का फ़ोन आ गया| बच्चे थोड़ा उदास थे क्योंकि एक तो उन्हें अपने पापा जी से वीडियो कॉल पर बात करनी थी जो की यहाँ इंटरनेट न होने के कारण नामुमकिन था, दूसरा बच्चों को अपनी नानी जी से मिलने के लिए एक और दिन रुकना था! इन्होने अपनी छींक-छींक कर खराब हुई हालत को सँभाला और बच्चों से अच्छे से बात कर उन्हें प्यार से समझाया|

कुछ देर बाद जानकी चाय बना कर ले आई, गरमा-गर्म चाय पीने से धीरे-धीरे इनकी छींकें काबू में आईं और मैंने रहत की साँस ली| मैं, मेरी माँ और ये बाहर आंगन में बैठे बात कर रहे थे| चूँकि हमारे घर में चूल्हा नहीं जल सकता था इसलिए मेरी दोनों बहनें चरण काका के घर में दोपहर के खाने की तैयारी कर रही थीं| मैं और मेरी माँ एक चारपाई पर बैठे थे तथा हमारी पीठ सड़क की ओर थी, जबकि ये हमारे सामने यानी सड़क की ओर मुँह कर के बैठे थे जिससे की हमारे घर की ओर कौन आ रहा है ये साफ़ देख सकते थे|

नियति ने अपने सारे पासे फेंक दिए थे, हमें तो बस नियति के इस खेल में अपना-अपना किरदार अदा करना था!

[color=rgb(184,]जारी रहेगा भाग 4(2) में...[/color]
 

[color=rgb(255,]तीसवाँ अध्याय: नियति का खेल[/color]
[color=rgb(235,]भाग - 4 (2)[/color]

[color=rgb(128,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

कुछ देर बाद जानकी चाय बना कर ले आई, गरमा-गर्म चाय पीने से धीरे-धीरे इनकी छींकें काबू में आईं और मैंने रहत की साँस ली| मैं, मेरी माँ और ये बाहर आंगन में बैठे बात कर रहे थे| चूँकि हमारे घर में चूल्हा नहीं जल सकता था इसलिए मेरी दोनों बहनें चरण काका के घर में दोपहर के खाने की तैयारी कर रही थीं| मैं और मेरी माँ एक चारपाई पर बैठे थे तथा हमारी पीठ सड़क की ओर थी, जबकि ये हमारे सामने यानी सड़क की ओर मुँह कर के बैठे थे जिससे की हमारे घर की ओर कौन आ रहा है ये साफ़ देख सकते थे|

नियति ने अपने सारे पासे फेंक दिए थे, हमें तो बस नियति के इस खेल में अपना-अपना किरदार अदा करना था!


मेरी लेखनी:

[color=rgb(51,]अब आगे:[/color]

मैं खुद बहुत ही भावुक व्यक्ति हूँ और बड़ी मुश्किल से अपने भावों को छुपा पाता हूँ, ऐसे में अपनी पत्नी और सासु माँ को सँभालना मेरे लिए आसान नहीं था| मैंने इस तरह के भावुक हालात का कभी सामना नहीं किया था इसलिए मुझे ये भी नहीं पता था की मुझे अपनी प्रतिक्रिया कैसी देनी है?! क्या मैं अपनी सासु माँ के पास बैठ कर रोने लगूँ या फिर किसी पडोसी की तरह एक मूक दर्शक बनकर हाथ बाँधे खड़ा सबको रोता बिलखता देखता रहूँ?! उस समय जो भी मैंने प्रतिक्रिया दी वो मेरे दिल से अपने आप ही निकली थी, जुबान से जो टूटे-फूटे शब्द निकले थे वो मेरा ससुर जी के प्रति मेरे मोह को दर्शाते थे| उधर मेरे ससुर जी के प्रति मेरा यही मोह सभी के गले नहीं उतर रहा था| जहाँ एक तरफ मेरे माता-पिता को मुझ पर गर्व हो रहा था की मेरे ससुर जी ने अपनी चिता को अग्नि देने का हक़ मुझे दिया वहीं बड़के दादा को ये बात गले में फाँस की तरहचुभ रही थी इसीलिए वो जानबूझ कर अपने समधी की क्रिया में नहीं आये थे|

मेरे प्रति ससुर जी के लगाव के कारण ही उन्होंने मेरे काँधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी छोड़ी थी, ऐसी जिम्मेदारी जिसे निभाने को मैं ततपर था| इन जिम्मेदारियों में सबसे पहली और जाररूरी थी मेरी सासु माँ, जिन्हें मुझे एक बेटे का प्यार दे कर प्यार से सँभालना था| मेरी सासु माँ बिलकुल मेरी अपनी माँ जैसी थीं और माँ को खुश करने के लिए सिवाए बच्चा बनने के मुझे कोई दूसरा उपाए नहीं सूझ रहा था| अपनी बचपने से भरी बातों से मैं अपनी सासु माँ का मन मोहने में लग गया था| वहीं सासु माँ जानती थी की मैं क्या और क्यों कर रहा हूँ, मेरा बचपना वो अच्छे से जानती थीं इसलिए उनका दिल अब पहले जैसा दुखी नहीं था, उनके दिल के जख्म पर अब मेरे प्यार के कारण पपड़ी बन ने लगी थी|

ससुर जी के बड़े बेटे यानी के भाईसाहब से पहलीबार मिलकर मुझे बहुत झटका लगा था क्योंकि न कभी ससुर जी ने और न ही संगीता ने मुझे उनके बारे में कुछ बताया था! परन्तु जब मुझे भाईसाहब के किये पाप का पता चला तो मेरे मन में संगीता के प्रति कोई शिकवा नहीं रहा| जिस तरह मैंने करुणा की अनुपस्थिति में संगीता को कुछ नहीं बताया था उसी तरह संगीता ने भी मुझे अपने भाईसाहब की अनुउपस्थिति में कुछ नहीं बताया था| जो इंसान हमारे जीवन में हो ही न या हम उसे भुला चुके हों उसके बारे में क्या किसी को बताना?! रही बात भाईसाहब के किये पाप की तो मैंने उन्हें आज तक कभी नहीं आँका और न ही उन्हें कोई प्रवचन दिया| उनकी आँखों में मैंने हमेशा ही शर्मिंदगी देखि थी, अब जो इंसान पहले से ही इतना शर्मिंदा हो उसे प्रवचन दे कर मैं ग्लानि के अथाह सागर में नहीं डुबोना चाहता था|

वहीं दूसरी ओर, संगीता के मन में अपने भाईसाहब के लिए बस नफरत भरी हुई थी| मैं नहीं जानता था की संगीता किसी से इतनी नफरत भी कर सकती है की उसे मारने के लिए लपक पड़े! शुक्र है की बच्चे यहाँ मौजूद नहीं थे वरना वो अपनी मम्मी का ये रौद्र रूप देख कर सहम जाते| संगीता का यही गुस्सा देख कर मैंने उसे श्मशान में क्रिया के समय भाईसाहब के साथ होने का जिक्र नहीं किया था वरना हो सकता था की संगीता मुझ पर ही बरस पड़ती|

अब ये तो समय ही बताएगा की क्या संगीता अपने भाईसाहब को कभी माफ़ कर पाती है या नहीं?!

खैर कहानी पर लौटते हुए:



(संगीता के घर का नक्शा)

मैं, सासु माँ और संगीता बाहर आंगन में चारपाई पर बैठे थे| संगीता और सासु माँ एक चारपाई पर सड़क की ओर पीठ कर के बैठे थे तथा मैं उनके सामने दूसरी चारपाई पर सड़क की ओर मुँह कर के बैठा था| सासु माँ मुझसे आयुष और नेहा के बारे में पूछ रहीं थीं, मैंने जब दोनों बच्चों के समय-समय पर जिम्मेदारी उठाने की बात कही तो सासु माँ को अपने नाती-नातिन पर बहुत गर्व हुआ की बच्चे इतने समझदार हैं| सासु माँ ने इसका सारा श्रेय मुझे दिया की मेरे प्यार के कारण ही बच्चे इतने समझदार हुए हैं|

बहरहाल, जहाँ हम सभी बैठे थे वहाँ से सड़क करीब 100 कदम के फासले पर थी, जब भी कोई सड़क से हमारे घर की ओर आता तो आंगन से साफ दिखाई देता था| विधि का विधान कहो या नियति का खेल, मुझे अचानक प्यास लग गई ओर मैंने संगीता से पानी लाने को कहा| संगीता उठी ओर घर में मटकी से पानी लेने चली गई, उसके जाते ही मेरी नज़र सड़क की ओर पड़ी और मैंने एक चित-परिचित आदमी को घर की ओर आते हुए देखा| कमीज और पतलून पहने ये व्यक्ति जैसे ही 10 कदम नजदीक आया होगा की मैं इस इंसान को देख पहचान गया, ये आदमी कोई और नहीं बल्कि चन्दर था! पता नहीं क्यों मगर चन्दर को देखते ही मेरे दिमाग में गुस्सा फूट पड़ता था, आज भी वही गुसा मेरे चहरे पर दिखने लगा था और मैं गुस्से में उठ कर खड़ा होने को हुआ था की तभी मेरी नज़र चन्दर के दाहिने हाथ पर पड़ी| उसके दाहिने हाथ में कुछ था जिसे चन्दर अपनी तर्जनी ऊँगली पर घुमा रहा था! मुझे समझते देर नहीं लगी की उसके हाथ में देसी कट्टा है!

उस कट्टे को देख जो सबसे पहलीबाट मुझे याद आई वो थी कल श्मशान से लौटते समय जब चन्दर से मेरी मुठभेड़ हुई थी तब उसने मुझे धमकी दी थी; "[color=rgb(255,]ऊ बारी तोहार बीवी का जान से मारा चाहत रहन, लेकिन ई बारी पाहिले तोहका जान से मारब फिर तोहार बीवी का![/color]" चन्दर की इस धमकी को याद कर मेरे दिमाग में गुस्से और डर के विचार एक साथ जगा दिए| गुस्सा मुझे आज चन्दर की जान लेने के लिए उकसा रहा था और डर मुझे संगीता तथा मेरे होने वाले बच्चे की जिंदगी की रक्षा करने के लिए प्रेरित कर रहा था|

इधर संगीता घर के भीतर मेरे लिए पानी लेने गई थी और अगर वो बाहर आकर चन्दर को देखती तो मेरी ढाल बन जाती जिस कारन उसकी अपनी जिंदगी खतरे में पड़ जाती! फिर यहाँ मेरी सासु माँ भी मौजूद थीं जो की बेक़सूर थीं और चन्दर और मेरे झगड़े में उनकी जान खतरे में पड़ सकती थी| मुझे कैसे भी कर के पहले अपनी सासु माँ को घर के भीतर भेजना था और संगीता को भी घर के भीतर रोके रखना था|

मैंने तुरंत एक तरकीब सोच ली और अपनी सासु माँ से बोला; "माँ, मेरे बैग में सबसे पीछे की जेब में मेरी एक दवाई रखी है, आप वो ला दो|" मैंने बहाना बनाते हुए माँ से कहा| माँ को मेरा यूँ उनसे दवाई लाने को कहना अटपटा नहीं लगा इसलिए वो मेरी दवाई लेने के लिए घर के भीतर जाने को चल पड़ीं| मैं, माँ से 5 कदम की दूरी बना कर चुपचाप चल रहा था, जैसे ही माँ ने घर के भीतर प्रवेश किया उनको संगीता गिलास में पानी ले कर बाहर आती हुई मिली| "मुन्नी, मानु कहत रहा की ऊ की कउनो दवाई बैग का पिछली जेब मा है, ऊ निकाल दिहो!" सासु माँ, संगीता से बोलीं| अपनी माँ की बात सुन संगीता सोच में पड़ गई की आखिर मैं कौनसी दवाई माँग रहा हूँ क्योंकि बैग की पिछली जेब में मेरी कोई दवाई थी ही नहीं| ठीक तभी मैं दरवाजे पर पहुँचा और एकदम से प्रमुख दरवाजे को बंद कर उसकी साँकल ऊपर की ओर चढ़ा दी! मुझे दरवाजा बंद करता हुआ माँ और संगीता ने देख लिया था, मेरे दरवाजा बंद करने पर पहले तो माँ और संगीता को लगा की मैं कोई बचपना दिखा रहा हूँ लेकिन फिर अगले ही पल चन्दर की जोर से चिलाने की आवाज संगीता के कानों में पड़ी; "ओ मरिकटओ! हमका देखि के कहाँ छुपत हो? फाट गई का तोहार हमार हाथ मा ई कट्टा देखि के?! " चन्दर की बात घर के भीतर से सुनकर संगीता के हाथ-पाँव फूलने लगे थे, घबराहट उसके सर पर सवार हो चुकी थी और उसने दरवाजा अंदर से पीटना शुरू कर दिया था; "Please दरवाजा खोलो!" संगीता मुझसे बोली मगर मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और बाहर आँगन की ओर चल दिया| घर के दरवाजे के बगल में एक छोटी सी खिड़की थी जिसमें रात को ढिबरी (तेल भरा दीपक) जलाया जाता था, संगीता ने उसी खिड़की से बाहर झाँका तो उसे चन्दर कुछ 20 कदम दूर खड़ा हुआ नज़र आया, फिर संगीता की नज़र पड़ी चन्दर के हाथ में जो कट्टा था! चंदर के हाथ में कट्टा देख संगीता जान गई थी की मेरी जान खतरे में है इसलिए उसकी दिल की धड़कन अत्यधिक तेज हो हो गई थी! "नहीं...नहीं जानू...नहीं...रुक जाओ....मत जाओ!" संगीता खिड़की पर से मेरी ओर देखते हुए चिल्लाई|

चन्दर के मुझे गाली देने से मेरे सर पर बदले का भूत सवार हो गया था इसलिए मैं संगीता की बात की अनसुनी करते हुए आंगन में आ कर चन्दर के सामन खड़ा हो गया| मुझे अपने सामने देखते ही चन्दर ने मुझ पर कट्टा तान दिया, वहीं मैं निहथ्था उसके सामने अपना सीना चौड़ा कर के खड़ा हो गया था| बदला लेने का जूनून मेरे सर पर इस कदर सवार था की मैं बिना कोई रणनीति बनाये चन्दर के सामने खड़ा था| उसके हाथ में कट्टा देख मुझे कुछ-कुछ होश आने लगा और मैं सोचने लगा की मैं कैसे चन्दर के हाथ से इस कट्टे को छुड़ाऊँ?!

मेरे और चन्दर के बीच यही कोई 6-7 फुट का फासला था और इतने फासले पर से मैं चन्दर पर झपट नहीं सकता था, मेरे फुर्ती दिखाने से पहले ही चन्दर कट्टा चला देता और गोली मेरे जिस्म के आर-पार निकल जाती! न ही मैं चन्दर के गोली चलाने से पहले झुक कर अपनी जान बचा सकता था क्योंकि एक तो मैं इतना फुर्तीला कतई नहीं था की गोली को मात दे देता और दूसरा की अगर मेरी खुशनसीबी से मैं नीचे झुक जाता और गोली मुझे नहीं भी लगती तो गोली जा कर सीधा घर की खिड़की वाली दिवार में जा कर लगती, जिसेक पीछे मेरी सासु माँ और संगीता खड़े थे! तब मेरी तो जान बच जाती मगर संगीता या सासु माँ की जान चली जाती!

इधर मेरा दिमाग इन गणनाओं में लगा था और उधर संगीता अपने सुहाग को खतरे में देख दरवाजा पीटते हुए चिलाये जा रही थी| चन्दर ने जैसे ही संगीता की आवाज सुनी उसने चिलाते हुए कहा; "अरे तनिक सबर करो, तोहार खसम का काम तमाम कर देइ फिर तोहरा के मारे खतिर ही आइथ है!" चन्दर की बात सुन संगीता चन्दर के मंसूबे जान गई थी, उसे अपनी जान की नहीं बल्कि मेरी जान की चिंता हो रही थी! वहीं मेरी सासु माँ ने जब चन्दर की आवाज सुनी तो सासु माँ भी बहुत घबराई हुईं थीं मगर फिर भी उन्होंने दिमाग से काम लेते हुए अपनी दोनों बेटियों (जानकी और सोनी) को आवाज लगाई ताकि वो आ कर दरवाजा खोल दें मगर वो दोनों बहनें चन्दर के डर के मारे चरण काका के घर में दुबक गईं तथा अपनी जान बचाने के लिए दरवाजा अंदर से बंद कर लिया था!

जब सासु माँ की दोनों बेटियों के मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकली तो सासु माँ जान गईं की उनकी बेटियाँ अपनी जान बचाने के लिए खामोश हैं! सासु माँ को अब अपनी बेटियों से कोई आस नहीं थी इसलिए वो खिड़की में से झांकते हुए मुझसे ही गुहार लगाने लगीं;

सासु माँ: मानु....तू जाओ...जाओ हियाँ से....एकरे मुँह न लगो!

मैंने सासु माँ की आवाज़ सुन ली थी मगर मैं इस वक़्त अपने ही बदले की आग में जल रहा था| मेरे सामने वो शक़्स खड़ा था जो पहले मुझे और फिर मेरी पत्नी और बच्चे की जान लेने की कसम खा कर आया था, लेकिन मैं उसे उसके इस नापाक़ इरादे में कामयाब नहीं होने देने वाला था|

उधर संगीता ने फफक कर रोना शुरू कर दिया था उसने अपनी हिम्मत बटोरी और खिड़की से बाहर झाँकते हुए मुझे अपनी कसम से बाँधना चाहा ताकि मैं अपनी जान बचा सकूँ;

संगीता: प्लीज...आयुष के पापा...आपको मेरी कसम....आप भाग जाओ!

अपनी पत्नी को यूँ रोता हुआ सुन मुझे बहुत दुःख हुआ था मगर मेरे दिमाग ने इस दुःख का कारण चन्दर को बताया था और चन्दर से बदला लेने के लिए मुझे पूरी तरह उकसा दिया था|

खैर, मैंने अपने गुस्से और सनक के चलते अपनी सासु माँ और अपनी पत्नी की गुहार को पूरी तरह अनसुना कर दिया था| मेरी गुस्से से जल रही आँखें चन्दर के चेहरे पर गड़ी थीं और दिमाग चन्दर के हाथ से कट्टा छुड़ाने के यत्न सोचने में लगा था|

उधर घर के भीतर संगीता का रो-रो कर बुरा हाल था मगर उसने हार न मानते हुए मेरी जान बचाने के लिए अपना दिमाग लड़ाना शुरू कर दिया| सबसे पहले उसने अपना फ़ोन ढूँढना शुरू किया ताकि वो किसी को फ़ोन कर के मदद के लिए बुला सके मगर संगीता का फ़ोन मेरे फ़ोन के साथ ही बाहर आंगन में पड़ा था! सासु माँ के पास भी कोई फ़ोन नहीं था, वो तो केवल ससुर जी का या अनिल का ही फ़ोन इस्तेमाल करती थीं तथा ये दोनों फ़ोन इस समय अनिल के पास थे! जब संगीता को फ़ोन नहीं मिला तो वो कोशिश करने लगी की किसी तरह घर की दिवार फाँद ले मगर घर की दीवारें बहुत ऊँचीं थीं, उसपर संगीता माँ बनने वाली थी इसलिए उसका दिवार चढ़ना या फाँदना वैसे ही नामुमकिन था! संगीता को कोई अन्य उपाए नहीं सूझा तो उसने मदद के लिए चीखना शुरू कर दिया ताकि उसकी चीख सुन कर कोई पडोसी, कोई सड़क से गुजरने वाला इंसान हमारी मदद को आ जाए;

संगीता: प्लीज...मदद करो...चरण काका....अनिल....रमेश भैया (पडोसी)...सुनिए...प्लीज....कोई तो हमारी मदद करो.....मेरे पति की जान खतरे में है.....!!!!

परन्तु, संगीता की इस चीख पुकार का कोई असर नहीं हुआ! हार कर, बेबस हो कर संगीता दरवाजा पीटते हुए रोती रही और मुझसे विनती करती रही की मैं अपनी जानबचा कर भाग जाऊँ|

जब चन्दर को मैंने घर की ओर आते हुए देखा था, उसी समय यदि मैं मदद लेने भाग गया होता तो हालात कुछ और होते, मगर चन्दर को देख मेरे सर पर गुस्सा सवार हो चूका था तथा उसे पीठ दिखा कर जाना मेरे लिए बुजदिली थी! मैं उसके सामने छोटा न दिखूं इसीलिए मैं अपने गुस्से में भरा चन्दर के सामने आ कर खड़ा हो गया था| कहना गलत तो नहीं होगा पर अपने अहम् के कारण ही मैं आज एक विकट परिस्थिति में फँस गया था|

इधर संगीता को घर के भीतर रोता-बिलखता हुआ सुन चन्दर के चेहरे पर एक घिनौनी मुस्कान आ गई थी| उसे ये सोच कर गर्व हो रहा था की उसके हाथ में कट्टा देख कर संगीता रो-रो कर बेहाल है और मेरी फटी पड़ी है!

वहीं मैंने चन्दर के हाथ से कट्टा छुड़ाने की योजना बना ली थी| मेरे लिए कोई अचानक हरकत करना नामुमकिन था क्योंकि चन्दर और मेरे बीच फासला अधिक था| मेरी एक हरकत और चन्दर अपना कट्टा चला देता! मुझे कैसे भी कर के चन्दर के नजदीक पहुँचना था ताकि मैं उससे कट्टा छीनने की कोशिश कर सकूँ, लेकिन चन्दर के नजदीक जाने के लिए मुझे पहले चन्दर को अपनी बातों में लगाना था तथा उसे ऐसे दिखाना था जैसे मुझे चन्दर के हाथ में कट्टा देख कर कोई फर्क ही न पड़ा हो क्योंकि अगर चन्दर को मेरी आँखों में जरा सा भी डर दिख जाता तो वो फ़ट से कट्टा चला देता!

चन्दर: देख तोहार मेहरारू तोहका भागे खतिर कहत है! जाओ भागी जाओ, काहे से हियाँ अगर रहिओ तो तोहका हम जिन्दा न छोड़ब!

चन्दर, संगीता का रोना सुन रहा था और एक औरत को रुला कर उसे घमंड ने जकड़ लिया था| चन्दर ने जब मुझे भागने को कहा तो उसके चेहरे पर मैंने कुटिल मुस्कान देखि, ये मुस्कान इसलिए थी क्योंकि चन्दर चाहता था की मैं पीठ दिखा कर भागूँ और वो मेरी पीठ पर गोली मारकर मुझे भगोड़ा कह अपनी शेखी बघार सके की कैसे मैं मौत को अपने सामने देख अपनी बीवी को अकेला छोड़कर भाग खड़ा हुआ!

खैर, चन्दर की इस बात ने मुझे उसे अपनी बातों में उलझाने का मौका दे दिया था;

मैं: मैं भाग जाऊँ? अबे भूल गया दिल्ली में तुझे कितना पेला था!

मैंने चन्दर को जनवरी में की हुई उसकी पिटाई याद दिलाई, जिसे याद कर के चन्दर का चेहरा गुस्से से तमतमा गया था| मैंने इस मौके का फायदा उठाया और एक कदम आगे बढ़ गया|

चन्दर: सब याद है हमका! ओहि हिसाब-किताब चुकाए खातिर तो हम हियाँ आयन है!

चन्दर मुझे घूरते हुए अपने दाँत पीसते हुए बोला|

मैं: अबे साले, मैंने तो तुझे अपने इन्हीं दोनों हाथों से मारा था, तेरी तरह मुझे इस खिलोने की जर्रूरत नहीं पड़ी थी!

मैंने चन्दर को अपने दोनों हाथ दिखाते हुए ललकारा तथा बड़ी ही होशियारी से एक कदम और उसके नज़दीक पहुँच गया|

चन्दर: काहे? ई का (कट्टे को) देख तोहार फाट गई का?

चन्दर नकली हँसी हँसते हुए बोला! उसे लग रहा था की उसकी बात सुनकर मैं डर जाऊँगा मगर मैं अपने डर को दबाये हुए एक नकली मुस्कान के साथ बोला;

मैं: फटी तो तेरी पड़ी है बे, तभी तो ये (कट्टा) ले कर मेरे सामने खड़ा है क्योंकि रु भी जानता है की बिना इसके (कट्टे के) तो तू मुझसे जीतने से रहा!

मैंने बड़े गर्व से अपनी बात कही तथा धीरे से एक कदम और चन्दर के पास बढ़ गया| मेरे चेहरे पर नकली हँसी देख कर चन्दर समझ गया था की मेरी कट्टे को देख कर ज़रा भी नहीं फटी है इसलिए उसकी हिम्मत और सब्र जवाब देने लगे थे;

चन्दर: सरऊ! बहुत हीरो बनत है न तू, आज देखित है तोहार हीरोगिरी!

चन्दर अपने झूठी हेकड़ी दिखाते हुए बोला| चन्दर बेचारा सोच कर आया था की उसके हाथों में कट्टा देख कर मेरी फ़ट कर चार हो जायेगी और मैं घुटने टेक कर उससे अपनी जान बक्शने की दुहाई दूँगा, तब वो मेरा कुत्ता बना कर मुझे एक बुज़दिल की मौत मार कर अपनी शेखी मारता फिरेगा मगर यहाँ तो सारी बात ही उलटी पड़ रही थी! अपने झूठे घमंड के चलते ही वो इस समय नकली हँसी हँस कर मेरे सामने खुद को मज़बूत दिखाने की कोशियश कर रहा था, वो नहीं जानता था की मैं धीरे-धीरे उसके नज़दीक बढ़ता जा रह हूँ!

बहरहाल, मेरे और चन्दर के बीच अब करीबन 4 फुट का फासला रह गया था और इतने फासले से मैं उसके हाथ से कट्टा छुड़ाने के लिए लपक सकता था! इस वक़्त चन्दर के हाथ में जो कट्टा था उसका मुँह मेरी छाती जो ओर था, मेरा कट्टे पर झपटना कामयाब रहे उसके लिए मुझे कट्टे का मुँह अपने सर की ओर करवाना था| मैंने अपनी चाल चलते हुए चन्दर को ललकारा;

मैं: तेरे हाथ में कट्टा है, अगर है हिम्मत तो यहाँ निशाना लगा?!

मैंने अपनी तर्जनी ऊँगली से अपने माथे के बीचों बीच इशारा करते हुए चन्दर को ललकारा| चन्दर भी मेरी बातों में आ गया और कट्टे की नली का मुँह मेरे माथे की ओर कर अपना निशाना लगाने लगा| इस वक़्त मैंने एक बात गौर की, भले ही चन्दर मेरी जान लेने के मकसद से यहाँ न आया था मगर मेरी हिम्मत देख कर उसका आत्मविश्वास डगमगा गया था तभी तो वो कट्टा चलाने से झिझक रहा था!

बहरहाल, मेरे ललकारने से चन्दर का गर्म खून खौल गया था, उसने कट्टे की नली मेरे माथे की ओर कर दी थी और कट्टा चलाने ही वाला था की मैंने एकदम से लपक कर उसका दाहिना हाथ अपने दोनों हाथों से पकड़ कर कट्टे का मुँह आसमान की ओर मोड़ दिया!

फिर शुरू हुई मेरे और चन्दर के बीच कट्टे की छीना-झपटी! चन्दर कट्टे का मुँह मेरी तरफ घूमना चाह रहा था और मैं उसके हाथ से कट्टा छुड़वाना चाहता था| इधर हम दोनों की छीना- झपटी चल रही थी, उधर घर के भीतर मेरी सासु माँ और संगीता रोते हुए दरवाजा तोड़ने की कोशिश करने में लगे थे|

चन्दर के शरीर में भले ही ताक़त नहीं थी पर ससुरे ने कट्टे को अपने हाथ से ऐसे जकड़ा हुआ था मानो वो कभी कट्टे को अपने हाथ से जाने ही नहीं देगा! मैंने अपने दिमाग का इस्तेमाल करते हुए चन्दर को अड़ंगी दी और उसे पीछे की ओर पीठ के बल गिरा दिया, इस अकस्मात हमले के कारण चन्दर ज़मीन पर इस कदर गिरा की उसका सर धड़ाम से जमीन से लगा और उसकी कट्टे पर से पकड़ कुछ ढीली हो गई| मैंने इसी मौके का फायदा उठाया और चन्दर के हाथ से कट्टा छुड़ा कर कुछ दूर फेंक दिया| वक़्त कम था इसलिए मैं कट्टे को ज्यादा दूर नहीं फेंक पाया था|

वक़्त न गँवाते हुए मैं उठा और अपने दोनों घुटने चन्दर की कमर के इर्द-गिर्द टेक कर उसके चेहरे पर मुक्के जड़ने लगा| उसकी शक्ल देख कर मुझे वैसे ही बहुत गुस्सा आता था मगर इस वक़्त तो जैसे मेरे भीतर का मौजूद कोई शैतान जाग गया था जिस कारण चन्दर को पीटने में मुझे आज कुछ ज्यादा ही आनंद आ रहा था!

उधर घर के भीतर संगीता खिड़की से बाहर झाँकने लगी और मुझे चन्दर को ज़मीन पर गिरा कर कूटते हुए देख उसके दिल को कुछ आराम मिला की कम से कम अब मेरी जान खतरे में नहीं है| संगीता को यक़ीन हो गया था की मैंने चन्दर पर काबू कर लिया है और अनिल तथा भाईसाहब के घर लौटने तक मैं चन्दर को पूरी तरह से धराशाई कर दूँगा!

लेकिन नियति ने आज चन्दर के अंत की पूरी तैयारी कर ली थी! अगले ही पल चन्दर ने अपनी एक टाँग कुछ इस कदर मोड़ी की उसकी टांग मेरे और उसके जिस्म के बीच आ गई, जिसका जोर लगा कर चन्दर ने मुझे जोर से धक्का दे कर पीछे को गिरा दिया| जबतक मैं संभल कर उठ पाता तबतक चन्दर अपना कट्टा उठाने के लिए उठ खड़ा हुआ! जब मैंने चन्दर को अड़ंगी दे कर गिराया था तब मुझे कट्टा अधिक दूर फेकने का मौका नहीं मिल पाया था, इस समय चन्दर और कट्टे के बीच फासला यही कोई 7-8 फुट था और इससे पहले की चन्दर कट्टा उठा पाता मैंने पीछे से उसकी कमीज पकड़ कर उसे पीछे जोर लगा कर खींच कर गिरा दिया तथा कट्टा उठाने के लिए थोड़ा आगे बढ़ा| अब मेरे और कट्टे के बीच फासला करीब 6 फुट का था और चन्दर कट्टे से करीब 10 फुट दूर जमीन पर गिरा था| मैंने रुक कर पीछे मुड़कर देखा तो पाया की चन्दर कभी मुझे देखता तो कभी कट्टे को, वो ये जान गया था की वो समय रहते कट्टा नहीं उठा पायेगा लेकिन मैं कट्टा अवश्य उठा सकता हूँ| अब चन्दर को अपनी दूसरी चाल चलनी थी, वो एकदम से उठ खड़ा हुआ और अपनी पैंट की जेब में हाथ डालकर रामपुरी चाक़ू निकाल लिया| चन्दर मुझे उस चाक़ू का डर दिखा कर चाक़ू को खोलने लगा, इधर मैं उस चाक़ू को देख कर मन ही मन बोला; 'बहनचोद! ये साला तो सारी तैयारी कर के आया है|"

चन्देर ने ये चाक़ू सिर्फ और सिर्फ मेरा कट्टे पर से ध्यान भटकाने के लिए निकाला था| वहीं मेरे लिए चन्दर के हाथ से चाक़ू छीनना बहुत मुश्किल था क्योंकि चाक़ू छीनने की छीना-झपटी में मैं बड़ी आसानी से घायल हो सकता था| चन्दर के हाथ में चाक़ू होने से मुझे उसका मुक़ाबला करने के लिए कोई हथियार चाहिए था और वो हथियार था ज़मीन पर पड़ा हुआ वो कट्टा|

इससे पहले की चन्दर मुझ पर अपने चाक़ू से वार करता उससे पहले मुझे जल्द से जल्द वो कट्टा उठाना था मगर वो कट्टा था मुझसे करीब 6 फुट दूर, जिस कारन मुझे कमसकम दो कदम चल कर फिर झुक कर वो कट्टा उठाना था, वहीं मेरे कट्टा उठाते-उठाते चन्दर एक बार लपक कर वो रामपुरी चाक़ू मेरे सीने में उतार सकता था! मैंने आनन-फानन में बिना कुछ सोचे सीधा कट्टा उठाने के लिए dive लगा दी, वहीं दूसरी तरफ चन्दर भी चाक़ू ले कर मुझे मारने के लिए मेरे ऊपर लपका! मैंने फटाफट कट्टा उठाया और उसे उठा कर पीठ के बल लेटे-लेटे ही चन्दर की ओर तान दिया, तब मुझे नहीं पता था की चन्दर मुझे चाक़ू मारने के लिए लपक चूका है! उसे अपने इतना नज़दीक देख मैंने बिना कुछ सोचे-समझे आनन-फानन में कट्टा चला दिया! सेकंड के करोड़वें भाग के भीतर ही मेरे भीतर बैठा कोई शैतान आज आजाद हो चूका था और उसी ने मेरे नेक दिल पर काबू पा कर कट्टे का घोडा दबवाया था!

"[color=rgb(255,]धायें[/color]" से गोली चली और चन्दर का सीना चीरते हुए निकल गई! गोली की आवाज से पूरे आंगन और आस-पास में सन्नाटा पसर गया! मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था की मैंने चन्दर पर बिना कुछ सोचे कट्टा चला दिया है?! जिस शैतान ने मेरी उँगलियों पर जोर दे कर कट्टा चलवाया था वो शैतान कहीं गायब हो गया था! मेरे पास अपने लिए फैसले पर सोच-विचार करने का समय नहीं था क्योंकि चन्दर मुझ पर चाक़ू से वार करने के लिए मुझपर लपक चूका था और जब वो हवा में था तभी गोली उसके सीने से पार हुई थी परन्तु उसके हाथ में जो चाक़ू था वो चन्दर के हाथ से नहीं छूटा था, अंततः वो सीधा मेरे ऊपर आ गिरा तथा उसके हाथ में जो चाक़ू था वो सीधा मेरे बाएँ कँधे में आ धँसा!

[color=rgb(184,]जारी रहेगा भाग 5 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]तीसवाँ अध्याय: नियति का खेल[/color]
[color=rgb(235,]भाग - 5[/color]

[color=rgb(128,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

"[color=rgb(255,]धायें[/color]" से गोली चली और चन्दर का सीना चीरते हुए निकल गई! गोली की आवाज से पूरे आंगन और आस-पास में सन्नाटा पसर गया! मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था की मैंने चन्दर पर बिना कुछ सोचे कट्टा चला दिया है?! जिस शैतान ने मेरी उँगलियों पर जोर दे कर कट्टा चलवाया था वो शैतान कहीं गायब हो गया था! मेरे पास अपने लिए फैसले पर सोच-विचार करने का समय नहीं था क्योंकि चन्दर मुझ पर चाक़ू से वार करने के लिए मुझपर लपक चूका था और जब वो हवा में था तभी गोली उसके सीने से पार हुई थी परन्तु उसके हाथ में जो चाक़ू था वो चन्दर के हाथ से नहीं छूटा था, अंततः वो सीधा मेरे ऊपर आ गिरा तथा उसके हाथ में जो चाक़ू था वो सीधा मेरे बाएँ कँधे में आ धँसा!

[color=rgb(51,]अब आगे:[/color]

"[color=rgb(255,]आआआआआहहहहहह!!!![/color]" मैं दर्द के मारे जोर से चीखा! गोली चलने से आंगन में जो कुछ पल के लिए सन्नाटा पसरा था वो मेरी चीख के साथ टूट गया क्योंकि वो रामपुरी चाक़ू मेरे बाएँ कँधे में घुस कर जैसे फँस गया था और मुझे असहनीय दर्द हो रहा था| चन्दर का जिस्म मेरे ऊपर पड़ा किसी कटे हुए पेड़ के समान आ गिरा था और ये बोझ मुझे नाक़ाबिले बर्दाश्त था! गौर करने की बात ये है की मुझे नहीं पता था की चन्दर जीवित है की मर गया? मुझे तो इस समय बस उसके भारी शरीर को अपने ऊपर से हटाना था| मैंने चन्दर के शरीर को अपने ऊपर से हटाने के लिए अपने दोनों हाथों का इस्तेमाल करना चाहा मगर चूँकि मेरे बाएँ कँधे के पास चाक़ू घुसा था इसलिए मेरे लिए बायाँ हाथ को हिलाते ही दर्द का ज्वालामुखी फट पड़ा! इस असहनीय दर्द को महसूस कर मैंने अपने बायें हाथ को कष्ट देने का विचार त्याग दिया| मैं अपने दायें हाथ से ही चन्दर के शरीर को अपने ऊपर से हटाने की कोशिश करने में लग गया मगर कुछ सेकंड के भीतर ही मैंने हार मान ली क्योंकि एक तो चन्दर का शरीर हिल ही नहीं रहा था और दूसरा चाक़ू लगने से मेरे जिस्म से बह रहे खून के कारण मुझे अत्यधिक थकावट होने लगी थी! एक गौर करने वाली बात ये भी थी की मुझे ये तो पता था की मुझे चाक़ू लगा है मगर मेरे घाव की दशा क्या है, कितना खून बह रहा है इसका मुझे कोई अनुमान नहीं था!

उधर घर के भीतर संगीता और मेरी सासु माँ की दशा खराब थी! दोनों ने ही गोली चलने की आवाज और मेरी दर्द भरी चीख सुनी थी! चूँकि मैं ज़मीन पर पड़ा था इसलिए खिड़की से बाहर झाँकने पर संगीता और मेरी सासु माँ को कुछ भी नहीं दिख रहा था| दोनों माँ-बेटी ने मुझे कई आवाजें दी मगर मेरा दिमाग सुन्न होने के कारण मुझे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था!

'कहीं वो गोली मुझे तो नहीं लग गई!' ये सोच कर मेरी सासु माँ और संगीता डर के मारे काँप गए थे और उन्होंने आनन-फानन में दरवाजा तोड़ना शुरू कर दिया| संगीता ने सिल बट्टे का सील उठा कर दरवाजे को तोडना शुरू कर दिया, वहीं मेरी सासु माँ ने धान कूटने वाला डण्डा उठाया और दरवाजा तोड़ने की कोशिश करने लगीं| ऐसा नहीं था की घर का वो दरवाजा बहुत मज़बूत था, था तो वो चरमराता हुआ ही मगर साला आज अपनी सारी ताक़त दिखाने पर आमादा था!

इधर बाहर आंगन में ज़मीन पर पड़ा मैं कुछ भी सुनने की ताक़त खोने लगा था| मुझे सासु माँ और संगीता के चीखने तथा दरवाजा तोड़ने की हल्की-हल्की आवाजें आ रही थीं, परन्तु मुझ में इतनी ताक़त नहीं थी की मैं उठ कर बैठ सकूँ या चिल्ला कर कुछ कह सकूँ! मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मानो मेरे भीतर की सारी ताक़त चूस ली गई हो! खून बहने के कारण मुझे ये कमजोरी महसूस हो रही थी, बायें हाथ में जहाँ चाक़ू घुसा था वो दर्द अब हर पल बढ़ता जा रहा था! धीरे-धीरे मेरा होश कम होता जा रहा था और इस समय मुझे मेरी आँखों के आगे मेरे परिवार की तस्वीर दिख रही थी| मैंने सुना था की मनुष्य के अंतिम पलों में उसे अपने द्वारा किये सभी कर्म याद आते हैं, मुझे भी इस पल लग रहा था की क्यों नहीं मैंने चन्दर को दिल्ली में ही मौत के घाट उतार दिया?! "मेरे बच्चे....नेहा...आयुष....स....संगीता....माँ....पिताजी....." मैं अपनी अधखुली आँखों से आसमान की ओर देखते हुए बुदबुदाया| मेरा दिमाग मुझे ये सोच कर डरा रहा था की मेरा अंत समय आ गया है और मैं आज के बाद फिर कभी अपने बच्चों और अपने परिवार को नहीं देख पाऊँगा!" ये ख्याल इतना डरावना था की मैं अपनी आँखें खुली रखने के लिए संघर्ष करने लगा| अपने परिवार को खो देने के डर ने मुझे लड़ना सीखा दिया था| अपने उस असहनीय दर्द को झेलते हुए मैंने अपने जिस्म की बच हुई ताक़त झोंकी और किसी तरह चन्दर के शरीर को धक्का दे कर अपने ऊपर से दाईं तरफ धकेल कर गिरा दिया| चन्दर था तो टिटिहरी टाँग (हल्का-फुल्का) मगर इस समय उसके शरीर का वजन मेरे लिए 100 किलो के समान था| चन्दर को अपने ऊपर से हटा कर मैं लम्बी-लम्बी साँस लेने लगा, मेरे भीतर अब नेश मात्र भी ताक़त नहीं बची थी मगर दिमाग अब भी मुझे उठ कर खड़ा होने को कह रहा था ताकि मैं घर का दरवाजा खोल सकूँ| लेकिन मेरे जिस्म के लिए लिए ज़मीन से उठ कर खड़ा होना, फिर घर के दरवाजे तक चल कर जाना नामुमकिन था| जबरदस्ती करते हुए मैंने उठना चाहा और तभी मेरी नज़र मेरे बायें कँधे पर पड़ी जहाँ की चाक़ू अब भी धँसा हुआ था! चाक़ू अपने माँस में धँसा हुआ देख मेरी आँखें फटने के हद्द तक बड़ी हो गईं, मेरे दिल की धड़कन जैसे रुक ही गई थी! अपनी ये दशा देख मुझे चन्दर पर गुस्सा आने लगा; "बहनचोद!" मैं दाँत पीसते हुए बड़बड़ाया| गुस्से से भरा मैं फिर से उठने का प्रयास करने लगा मगर कोई फायदा नहीं हुआ, उल्टा मेरा ये बार-बार प्रयास करना मेरे जिस्म के लिए इतना कष्टदायक था की मैं बेहोशी की गोद में जा पहुँचा था| जिस्म में जान बची नहीं थी और आँखों के आगे अब अँधेरा छाने लगा था, जो भी शरीर में ताक़त बची थी उसे मैंने पूरी तरह खत्म कर दिया था!

करीब 5 मिनट बाद भाईसाहब, अनिल और चरण काका घर लौटे, आंगन की दशा देख तीनो सन्न थे! तीनों ने मुझे आ कर घेर लिया और मुझे होश में लाने की कोशिश करने लगे मगर मेरा खून इतना बह चूका था की मुझे इस समय डॉक्टरी इलाज की जर्रूरत थी| फिर तीनों की नजर पड़ी चन्दर पर, चचन्दर को यूँ औंधे मुँह पड़ा देख तीनों समझ गए की चन्दर के प्राण-पखेरू उड़ चुके हैं| परन्तु फिर भी एक बार तसल्ली करने के लिए चरण काका ने चन्दर की नाक के पास अपनी ऊँगली ले जाते हुए ये सुनिश्चित किया की उसकी साँस चल भी रही है या नहीं?! भाईसाहब और अनिल आँखे फाड़े चरण काका को देख रहे थे तथा उनके जवाब का इंतज़ार कर रहे थे| चरण काका को जब अपनी ऊँगली पर चन्दर की सांसें महसूस नहीं हुई तो उन्हें यक़ीन हो गया की चन्दर मर चूका है| चरण काका, भाईसाहब की ओर देखते हुए सर न में हिलाते हुए मूक भाषा में कहा की चन्दर खत्म हो चूका है! चन्दर मर चूका है ये जानकार भाईसाहब, अनिल और चरण काका घबरा गए थे| "काका, ई का (चन्दर को) हियाँ ही पड़ा रहए दिहो, हम पाहिले मानु का अस्पताल ले चलित है|" भाईसाहब की बात सुन चरण काका और अनिल ने एकसाथ हाँ में सर हिलाया| फिर उन्होंने (चरण काका ने) इशारे से मेरे बाएँ कँधे में गड़े चाक़ू की ओर इशारा करते हुए पुछा; "ई...ई का (चाक़ू को) निकारा चाहि?!" चरण काका का सवाल सुन भाईसाहब एकदम से सर न में हिलाने लगे ओर बोले; "नाहीं-नहीं काका! कहीं ई का (चाकू को) निकारे के चक्कर मा कउनो नस कट जाई तो और जोर से खून बहे लागि! हम मानु का ऐसे ही अस्पताल ले चलित है, डॉक्टर ही ई का निकारि!" चरण काका को भाईसाहब की बात सही लगी इसलिए उन्होंने सर हाँ में हिलाया| भाईसाहब ने अनिल को गाडी की चाभी दी और उसे गाडी घुमा कर आंगन में ले आने को कहा, अनिल चाभी ले कर जाने ही वाला था की इतने में घर के भीतर, संगीता ने अनिल, भाईसाहब और चरण को खिड़की से देख लिया था; "अनिल....बेटा जल्दी से दरवाजा खोल!" संगीता चीखी तो अनिल ने दौड़ते हुए जा कर घर का दरवाजा खोला| संगीता लगभग दौड़ती हुई बाहर आई, परन्तु जैसे ही उसने बाहर का खून-खराबे से भरा दृश्य देखा उसके पाँव जम गए! चन्दर औंधे मुँह पड़ा था और उसके बगल में मैं, सीने में चाक़ू घुसा हुआ तथा खून से लथपथ बेहोश पड़ा था|

मेरी ये दशा देख संगीता न तो कुछ बोल पा रही थी और न ही अपनी जगह से हिल-डुल पा रही थी! ये भयानक दृश्य देखना संगीता के लिए नाकाबिले बर्दाश्त था! तभी मेरी सासु माँ भी घर के भीतर से निकलीं और वो भी आंगन में खून-खराब देख कर दंग थीं| ठीक तभी संगीता अपनी सुध-बुध खोने लगी और गिरने को हुई की थी की मेरी सासु माँ ने उसे किसी तरह सँभाला| सासु माँ संगीता को अकेली नहीं संभाल पातीं इसलिए अनिल ने दौड़कर संगीता को सहारा दिया और उसे एक चारपाई पर लिटाया| संगीता की दोनों बहनें अभी भी चरण काका के घर में दुबकी हुई थीं इसलिए मेरी सासु माँ ने उन्हें गाली देते हुए बाहर बुलाया| जैसे ही दोनों बहनें बाहर आईं और बाहर का दृश्य देखा तो उनके हाथ-पाँव फूल गए,वो तो भाईसाहब ने उन्हें डाँटा तब जा कर दोनों हिलीं तथा संगीता की देख-रेख में लग गईं|

इधर भाईसाहब ने अनिल को आवाज दे कर बुलाया और बोले; "मानु को जल्दी अस्पताल ले जाना होगा!" भाईसाहब ने सम्भल कर मुझे उठाया और अपनी गाडी की पिछली सीट पर लिटाया| अनिल पीछे मेरी टांगें अपनी गोद में ले कर बैठ गया तथा चरण काका और भाईसाहब आगे बैठ गए| मेरे ससुर जी के घर से private अस्पताल करीब 20-25 किलोमीटर दूर था| भाईसाहब ने जो गाडी भगाई...जो गाडी भगाई की गाडी सीधा गोंडा अस्पताल जा कर ही रुकी!

अस्पताल तो पहुँच गए मगर मेरे कँधे पर गड़े चाक़ू को देख किसी डॉक्टर की हिम्मत ही नहीं हो रही थी की वो मुझे हाथ लगाए! सभी पुलिस केस बोल कर अपना-अपना पल्ला झाड़ने में लग गए! गाँव-देहात में खून-खराबे के पचड़े में पड़ने से सभी घबराते थे, कोई भी पुलिस के चक्करों में नहीं पड़ना चाहता था|

जब किसी भी डॉक्टर ने कोई करवाई नहीं की तो भाईसाहब को आया गुस्सा और उन्होंने एक डॉक्टर का गिरेबान पकड़ उसे जकझोड़ते हुए कहा; "मेरे बहनोई को कुछ हो गया न तो मैं तुम्हारे अस्पताल को आग लगा दूँगा!" अपने से अकार में बड़े इंसान द्वारा धमकाने से डॉक्टर घबरा गया था! बात बिगड़े इससे पहले ही अनिल बीच में आया और भाईसाहब के हाथ से डॉक्टर का गिरेबान छुड़ाते हुए बोला; "डॉक्टर साहब हम पुलिस को बुला रहे हैं मगर तबतक आप मेरे जीजू का इलाज तो शुरू कर दीजिये!" अनिल ने हाथ जोड़ते हुए डॉक्टर से कहा| भाईसाहब का डर कहलो या फिर अनिल के विनती करने का असर, डॉक्टर ने मुझे सीधा ICU में shift किया और बड़े डॉक्टर के साथ मिलकर मेराoperation शुरू किया|

इधर ICU के बाहर खड़े हुए ही भासाहब ने थाने में फ़ोन कर के सारी जानकारी दी| पुलिस की एक गाडी अस्पताल आने के लिए रवाना हुई और दूसरी गाडी घर पर जहाँ चन्दर की लाश पड़ी थी वहाँ पहुँच गई| थाना घर के पास था इसलिए पुलिस वहाँ जल्दी पहुँची थी जबकि गोंडा आने में पुलिस को समय लगना था| घर में जब पुलिस पहुँची तो वहाँ का दृश्य देख दरोगा ने पूरे आंगन को ही crime scene बना घेराबंदी कर दी तथा अपनी तहकीकात शुरू कर दी| लाश की शिनाक्त करने के लिए सासु माँ से पुछा गया तो उन्होंने चन्दर के बारे में सब बताया| वहाँ मौजूद सभी लोगों से एक-एक कर दरोगा ने सवाल किया, पहले संगीता की दोनों बहनों से पूछताछ हुई तो दोनों ने अपन घर में दुबके होने और कुछ न सुनने की बात कह कर चुप्पी साध ली! रमेश, जो की पडोसी था उसने साफ़ झूठ बोल दिया की वो घर पर था ही नहीं इसलिए उसे कुछ नहीं पता| पुलिस के पचड़े में किसी को भी पड़ने का शौक नहीं था इसलिए सभी झूठ बोल रहे थे|

वहीं सासु माँ ने पुलिस का अपना आँखों-देखा सब सिलसिलेवार से बताना शुरू किया| चन्दर के आने से ले कर उसके द्वारा दी जा रही खुलेआम धमकी की एक-एक बात मेरी सासु माँ बिना डरे बता रहीं थीं| उनमें इतना साहस इसलिए आया था क्योंकि वो अपने दामाद यानी की मुझे बचना चाहती थीं|

इधर संगीता जो बेहोश हो गई थी, उसे शोर-शराबा सुन कर होश आने लगा था| संगीता उठ कर बैठी तो उसे पूरे आंगन में पुलिस तथा तमाशा देखने वालों का जमावड़ा नज़र आया| पुलिस वहाँ मौजूद सभी लोगों से पूछ-ताछ करने में लगी थी और संगीता को समझ नहीं आ रहा था की यहाँ हो क्या रहा है? बेहोशी से उठने के बाद संगीता की यादाश्त शायद थोड़ी धुंधली पड़ गई थी| संगीता उठी और माँ (मेरी सासु माँ) को ढूढ़ने लगी, तभी उसकी नज़र चन्दर की लाश पर पड़ी! चन्दर की लाश देख संगीता को सब कुछ याद आ गया तथा उसके चेहरे पर डर और चिंता के बादल छा गए! वो बौखलाते हुए माँ (मेरी सासु माँ) के पास पहुँची; "माँ...आयुष के पापा. कहाँ हैं?" संगीता को इस कदर बौखलाया देख सासु माँ ने उसे बताया की भाईसाहब, अनिल और चरण काका मुझे अस्पताल ले कर गए हैं| सासु माँ के इस संक्षेप जवाब से संगीता को तसल्ली मिलने वाले नहीं थी, उसे तो तसल्ली तब मिलती जब वो मुझे खुद अपनी आँखों से देख लेती इसलिए संगीता ने अस्पताल जाने की जिद्द पकड़ ली! लेकिन तभी दरोगा ने संगीता को होश में देख लिया और उसने संगीता का ब्यान दर्ज़ करने के लिए रोक लिया| संगीता ने दरोगा से बहुत विनती की कि उसे पहले अस्पताल मुझे देखने जाने दिया जाए मगर दरोगा नहीं माना| संगीता का गुस्सा अब चरम पर पहुँच गया था, संगीता ने दरोगा को अपना ब्यान लिखवाने के बजाए सीधा अनिल को फ़ोन किया और उस पर चिल्लाते हुए बोली; "अनिल, मुझे अभी अस्पताल आना है और यहाँ दरोगा मुझे जबरदस्ती पूछताछ के लिए रोक रहा है!" संगीता ने गुस्से से दरोगा को देखते हुए अपनी बात कही|

इधर अस्पताल में, संगीता का फ़ोन अनिल ने नहीं बल्कि भाईसाहब ने उठाया था, संगीता की गुस्से से भरी बात सुन भाई साहब बोले; "मुन्नी, तू चिंता न कर! मैं अभी मुखिया जी को भेजता हूँ, वो दरोगा से बात कर के तुझे अपने साथ अस्पताल ले आएंगे|" इतना कह कर भाईसाहब ने फ़ोन काटा और सीधा गाँव के मुखिया जी को फ़ोन मिला दिया| भाईसाहब का रसूख बड़ा था इसलिए उनके एक फ़ोन करने पर ही मुखिया धड़धड़ाता हुआ घर आया और दरोगा से बोला की वो उसकी ज़मानत पर संगीता को मुझे देखने के लिए अस्पताल जाने दे, आखिर दरोगा मान गया और संगीता मुखिया जी के संग अस्पताल पहुँच गई| संगीता तो अस्पताल पहुँची ही साथ उसके पीछे-पीछे पुलिस की दूसरी गाडी जो गोंडा आने के लिए रवाना हुई थी वो भी आ पहुँची|

संगीता मुझे देखने के लिए उत्सुक थी मगर फिलहाल ICU मेरा operation चल रहा था इसलिए संगीता ICU के बाहर ही bench पर बैठ डॉक्टर के बाहर आने का इंतज़ार करने लगी| वहीं पुलिस के दरोगा ने आते ही भाईसाहब, अनिल और चरण काका से पूछताश्च शुरू कर दी| ये दरोगा बड़ा गुस्से वाला था, जैसे ही उसने संगीता को देखा तो उसने संगीता को डराने के लिए उससे सवाल-जवाब शुरू कर दिया| संगीता मेरे कारन पहले ही घबराई हुई थी, ऊपर से दरोगा के सवालों को सुन वो और घबरा गई थी! "दारोगा साहब, हमरी बहिन माँ बने वाली है तनिक आराम से सवाल पुछा!" भाईसाहब आराम से बीच में बोले तो दरोगा उन्हें घूर कर देखने लगा|

इतने में डॉक्टर साहब ICU से निकले और उन्हें देखते ही सब ने उन्हें घेर लिया; "Patient का खून बहुत बहा रहा! ई कहो की patient बाल-बाल बची गवा जो चाक़ू कन्धे मा ऊपर लाग रहा, नाहीं तो चाक़ू तनिक भी नीचे घुसा रहत तो main धमनी कट जावत और patient का नाहीं बचावा जा सकत रहा! फिलहाल patient बेहोश है, होश मा आये का टैम लागि!" डॉक्टर की बात सुन कर संगीता, भाईसाहब, चरण काका और अनिल की जान में जान आई| लेकिन दरोगा को लगी थी जल्दी तो उसने सीधा पुछा की मुझे होश आने में कितना time लगेगा? "दरोगा साहब कछु कहा नाहीं जा सकता है की कब तक होश आई|" डॉक्टर बोला तो दरोगा चिढ गया, उसने फ़ौरन हवलदार को बुलाया और बोला; "भीतर जाओ और हथकड़ी पहिरा आओ, कहीं होश में आये के भाग ना जाये!" अपने साहब का आदेश पा कर हवलदार ICU में घुसा और मेरे दाएँ हाथ में हथकड़ी बाँध कर हथकड़ी का दूसरा छोर अस्पताल के पलंग से बाँध दिया| ये दृश्य देख कर संगीता, भाईसाहब, अनिल और चरण काका को बहुत गुसा आया! "You can't do this!" संगीता गुस्से से बोली|

"ओ मैडम! ई अंग्रेजी मा गिटिर-पिटिर न करो हमसे! हम दरोगा हन, कानूनी काम मा दखलंदाजी करिहो तो तोहका भी तोहरे खसम संगे अंदर कर देब!" दरोगा अकड़ते हुए बोला|

"काहे का दरोगा हो तुम, औरत से कइसन बात की जावत ई तक नहीं जानत हो?!" भाईसाहब संगीता के बचाव में बोले| भाईसाहब की बात से दरोगा को मिर्ची लगी और वो अपना रुबाब दिखाने लगा; "तो तू हमका दारोगाई सिखाबो? चलो थाने, तोहका दरोगा का पावर दिखाइत है!" इतना सुनना था की भाईसाहब ने अपनी जेब से फ़ोन निकाला और नंबर मिलाते हुए गुस्से में दरोगा से बोले; "रुक दो मिनट, तोहार दारोगाई हम आभायें घुसेडित है!" इतना कहते-कहते भाईसाहब का फ़ोन लग गया था, सामने किसने फ़ोन उठाया ये तो कोई नहीं जानता था पर भाईसाहब उस व्यक्ति से बड़े गुस्से में बोले; "बेटा, हमार बहनोई हियाँ अस्पताल मा पड़ा है और तोहार ई दरोगा हमका, हमार बहिन का और हमार बहनोई का जेल मा डाले का धमकी देत है!" भाईसाहब की बात सुन कर ये तो तय था की उन्होंने किसी बड़ी हस्ती को फ़ोन मिलाया है, मगर ये हस्ती है कौन ये कोई नहीं जनता था|

तभी भाईसाहब ने फ़ोन स्पीकर पर डाला और फिर लगी दरोगा की class; "हम SP प्रशांत बोलिथ है! तो तू ससुर, हमार जीजा और उनका परिवार का अंदर करिहो? रुको हुआँ, हम आभायें आईथ है और तोहका कानूनी कारवाही करा सिखाइत है!" इतना कह फ़ोन कट गया और इधर उस दरोगा के पसीने छूट गए!

करीब पोना घंटे बाद लाल बत्ती वाली गाडी अस्पताल पहुँची, SP साहब बाहर निकले तथा उनके साथ दो हवलदार भी निकले| SP साहब ने आते ही सबसे पहले अपने जीजा जी यानी भाईसाहब के पाँव छुए| फिर भाईसाहब ने उनका तार्रुफ़ संगीता, अनिल और चरण काका से कराया| संगीता माँ बनने वाली थी और वो फट्टे की बेंच पर बैठी थी, ये देख कर SP साहब को बहुत गुस्सा आया| उन्होंने अपने एक हवलदार को किसी भी डॉक्टर के कमरे से आरामदायक कुर्सी लाने को कहा| आरामदायक कुर्सी पर संगीता को बिठा कर SP साहब खुद फट्टे वाली bench पर बैठे और संगीता से सारी बात जानी| "SP साहब, मेरे पति ने मजबूरी में...अपनी आत्मरक्षा में गोली चलाई थी! उनका उद्देश्य चन्दर को जान से मारने का कतई नहीं था!" संगीता ने जोर देते हुए अपनी बात कही|

"दीदी, आप मुझे SP साहब नहीं प्रशांत कहिये! और आप तनिक भी चिंता मत करिये, मैं मानु जी को कुछ नहीं होने दूँगा|" इतना कह उन्होंने एक हवलदार को डॉक्टर को बुलानेको कहा और दूसरे हवलदार से उस खड़ूस दरोगा को बुलाने को कहा|

SP साहब ने बुलाया है ये सुन कर दरोगा दौड़ता हुआ हाजिर हुआ और ठीक तभी अस्पताल का सबसे senior डॉक्टर भी हाजिर हो गया| SP साहब डॉक्टर को ले कर ICU में प्रवेश कर गए और वहाँ मेरे हाथ में हथकड़ी देख उनके गुस्से की सीमा नहीं रही, वो तेज़ी से बाहर आये और दरोगा पर चिल्लाये; "मरीकटौ, गदहा (गधा) के से पूछ कर तू मानु जी का हथकड़ी लागए रहेऊ? तोहार दिमाग मा का भूसा भरा है! बिना जुर्म सिद्ध हुए तू कौन हक़ से हथकड़ी पहनाये दिहो! निकार आभायें ये हथकड़ी नाहीं तो आभायें तोहका यहीं गोली मार देब!" SP साहब कमर में बँधी अपनी बंदूक पर हाथ रखते हुए बोले! दरोगा की हालत इतनी पतली थी की वो दौड़ता हुआ ICU के अंदर गया और मेरे हाथ से हथकड़ी खोल कर लाया| "तोहरा से बाद में निपटब" SP साहब दरोगा को गुस्से से देखते हुए बोले और फिर डॉक्टर साहब से बोले;"डॉक्टर साहब, मानु जी को फ़ौरन private ward में shift कीजिये और उनके इलाज में तनिक भी कमी नहीं होनी चाही!" SP साहब का गुस्सा देख पहले ही सब की हवा टाइट थी, तो जैसे ही उन्होंने डॉक्टर साहब को हुक्म दिया तो डॉक्टर साहब अपना सर हाँ में हिलाते हुए बोले; "आप चिंता न करें साहब!"

अब बारी आई दरोगा की class लगाने की, SP साहब दरोगा से अकड़ते हुए बोले; "एक औरत से और ऊ भी एक गर्भवती महिला से कैसे बात की ज़ात है, ई जानत हो की नाहीं? कहाँ है महिला पुलिसकर्मी, बिना ऊ की मौजूदगी मा तोहार हिम्मत कैसे भई दीदी से बात करे की? और ऊपर से दीदी से का कहत रहेऊ की, कानूनी कारवाही मा दखलनदाजी करहिओ तो अंदर कर देब! कौन पुलिस कायदा जानत हो तुम ई बताओ?!" दरोगा अगर अपने अफसर के सवाल का जवाब देता तो सबके सामने पिटता, इसलिए दरोगा चुप-चाप अपना सर झुका कर खड़ा हो गया! दरोगा की class और लगती लेकिन तभी भाईसाहब ने बीच में पड़ते हुए कहा; "बेटा, छोड़ दे इसे! बस ये मामला सुलटा दे!"

"ई हमार जीजा हैं और अगर आज के बाद ई कभौं तोहका फ़ोन करें तो नंगे पाँव दौड़ जायो, वरना तोहार वर्दी उतरवा देब!" SP साहब ने दरोगा को झाड़ते हुए कहा| दरोगा ने जब देखा की भाईसाहब ने उसकी पैरवी की है तो उसने तुरंत भाईसाहब के आगे हाथ जोड़कर माफ़ी माँग ली|

"अब सुनो जउन हम कहित है! ऊ कट्टे का पता लगाओ की के बेचिस है और ऊ का पकड़ कर थाने लाओ! और ई केस की सारी फाइल हमार टेबल पर कल सवेरे पहुँची चाहि! अब दौड़ो जल्दी!" SP साहब ने दरोगा को काम पर लगा दिया| फिर वो भाईसाहब को ले कर डॉक्टर के पास गए और डॉक्टर को अकेले में समझाते हुए बोले; "डॉक्टर साहब, मानु की रिपोर्ट में लिखना की उसे 3 महीने का bedrest करना है!" SP साहब की बात सुन डॉक्टर ने बिना कोई सवाल पूछे फ़ौरन सर हाँ में हिला दिया|

फिर SP साहब और भाईसाहब, संगीता के पास लौटे तथा संगीता को समझाते हुए बोले; " दीदी, खून का मामला है इसलिए केस मैं ऐसे ही रफा-दफा नहीं कर सकता| लेकिन आप ज़रा भी चिंता मत कीजिये, मैं आप में से किसी को भी कचेहरी के चक्कर काटने नहीं दूँगा| मानु जी के लिए डॉक्टर रिपोर्ट बना देगा की उन्हें 3 महीने तक bedrest करना अनिवार्य है, इसी report को आधार बनाते हुए मैं मानु जी की अदालत में पेशी रुकवा दूँगा| आप भी माँ बनने वाली हैं इसलिए मैं आपकी भी एक झूठी रिपोर्ट बनवा कर आपकी हाजरी भी रुकवा दूँगा|

अब बात आई चन्दर की, चूँकि कट्टा चन्दर लाया था तो जाहिर सी बात है की उसने ही खरीदा होगा! जिस आदमी ने चन्दर को कट्टा बेचा है मैं उसी को पकड़ कर गवाही करवा कर चन्दर पर attempt to murder का चार्ज लगवा दूँगा| रही मानु जी की बात, तो उन्हें victim बना मैं case ये बनाऊँगा की मानु जी ने गोली अपनी आत्मरक्षा में चलाई थी| एक चश्मदीद गवाह की जर्रूरत होगी वो मैं किसी न किसी को पकड़ कर बना दूँगा, तो इस तरह ये सारा मामला जल्दी से सुलट जाएगा|" SP साहब की बातों से सभी को इत्मीनान आ गया था की कम से कम इस कानूनी पचड़े से तो मेरी (मानु की) जान छूटी! अब बस रह गया था तो बस मेरा होश में आना, जिसमें अभी थोड़ा समय लगना था|
[color=rgb(184,]जारी रहेगा भाग 6 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]तीसवाँ अध्याय: नियति का खेल[/color]
[color=rgb(235,]भाग - 6[/color]


[color=rgb(128,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

फिर SP साहब और भाईसाहब, संगीता के पास लौटे तथा संगीता को समझाते हुए बोले; " दीदी, खून का मामला है इसलिए केस मैं ऐसे ही रफा-दफा नहीं कर सकता| लेकिन आप ज़रा भी चिंता मत कीजिये, मैं आप में से किसी को भी कचेहरी के चक्कर काटने नहीं दूँगा| मानु जी के लिए डॉक्टर रिपोर्ट बना देगा की उन्हें 3 महीने तक bedrest करना अनिवार्य है, इसी report को आधार बनाते हुए मैं मानु जी की अदालत में पेशी रुकवा दूँगा| आप भी माँ बनने वाली हैं इसलिए मैं आपकी भी एक झूठी रिपोर्ट बनवा कर आपकी हाजरी भी रुकवा दूँगा|

अब बात आई चन्दर की, चूँकि कट्टा चन्दर लाया था तो जाहिर सी बात है की उसने ही खरीदा होगा! जिस आदमी ने चन्दर को कट्टा बेचा है मैं उसी को पकड़ कर गवाही करवा कर चन्दर पर attempt to murder का चार्ज लगवा दूँगा| रही मानु जी की बात, तो उन्हें victim बना मैं case ये बनाऊँगा की मानु जी ने गोली अपनी आत्मरक्षा में चलाई थी| एक चश्मदीद गवाह की जर्रूरत होगी वो मैं किसी न किसी को पकड़ कर बना दूँगा, तो इस तरह ये सारा मामला जल्दी से सुलट जाएगा|" SP साहब की बातों से सभी को इत्मीनान आ गया था की कम से कम इस कानूनी पचड़े से तो मेरी (मानु की) जान छूटी! अब बस रह गया था तो बस मेरा होश में आना, जिसमें अभी थोड़ा समय लगना था|

[color=rgb(51,]अब आगे:[/color]

मेरा मानना है की
नियति हर व्यक्ति को समस्या से निकलने के लिए एक विकल्प अवश्य देती है| चन्दर के पास अवसर था की वो सब कुछ भुला कर आगे बढ़ जाए मगर उसने मुझसे बदला लेने का विकल्प चुना, वहीं मुझे भी नियति ने चन्दर की जान लेने से रोकने के लिए भाग कर मदद लाने का विकल्प दिया था, परन्तु अपने गुस्से के आगे मैंने चन्दर का सामना करने का विकल्प चुना था|

खैर जो घटित हो चूका था उस पर अब विचार कर के कुछ फायदा नहीं था|

बहरहाल, इधर अस्पताल में मुझे ICU से निकाल कर एक private कमरे में shift कर दिया गया था| संगीता मुझे अपनी आँखों से दूर नहीं होने देना चाहती थी इसलिए वो भी उस private ward में आ गई| कमरे में एक सोफे था जिस पर संगीता बैठ गई तथा अपनी नजरें मेरे चेहरे पर गड़ा दी ताकि जैसे ही मेरी आँखें खुलें वो झट से मेरे पास आ जाए और मेरे सीने से लग कर उसके बेकरार दिल को चैन आये|

उधर गाँव में बवाल शुरू हो चूका था! पुलिस की गाडी चन्दर के घर यानी मेरे बड़के दादा के घर पहुँच चुकी थी| जब बड़के दादा को पता चला की चन्दर की मौत हो चुकी है और उस पर गोली मैंने चलाई है तो बड़के दादा नंगे पाँव मेरे ससुराल यानी संगीता के घर आ धमके! उन्होंने जोर से चिल्लाते हुए मुझे आवाज दी; "मानु!" परन्तु मैं तो यहाँ अस्पताल में बेहोश पड़ा था इसलिए मेरी सासु माँ ही सामने आईं और बोलीं; "मानु अस्पताल म बेहोश पड़ा है! तोहार लड़िकवा हियाँ हमार मानु का जान लिए खतिर आवा रहा, दुनो (मेरे और चन्दर) का बीच हाथापाई भई और गोली चल गई रही!" सासु माँ की बात सुन बड़के दादा का गुस्सा फट पड़ा; "ऊ लड़िकवा (मैं) हमार लड़िकवा (चन्दर) का मारिस है! हम ऊ का और ओकरे बाप का जिन्दा न छोड़ब!" बड़के दादा अकड़ते हुए बोले| ठीक तभी, SP साहब और भाईसाहब घर आ पहुँचे और उनका सामना बड़के दादा से हुआ| न भाईसाहब बड़के दादा को जानते थे और न ही बड़के दादा भाईसाहब को जानते थे, बड़के दादा का बढ़ा हुआ गुस्सा देख भाईसाहब को गुस्सा आ गया| "के हुए ये?" उन्होंने माँ (मेरी सासु माँ) से चिढ़ते हुए पुछा तो सासु माँ ने उन्हें बताया की ये ही चन्दर के पिताजी हैं| इतना सुनना था की SP साहब बीच में कूद पड़े और बड़के दादा को डराते हुए बोले; "तोहार लड़िकवा हियाँ मानु जी और संगीता दीदी का जान से मारे खतिर आवा रहा| मानु जी, आपन जान बचाये खतिर गोली चलाये रहे ई बात आपन बुद्धि म उतार लिहो! बाकी पुलिस की छान-बीन आभायें चलत है और अगर तब तक तू या तोहार कउनो लड़िकवा ई घर का 3 किलोमीटर का दायरे म भी आये तो सभायें का जेल म डाल देब! बेहतरी इसी म है की चुपेय हियाँ से निकरो नाहीं तो अच्छा न होइ!" SP साहब ने बड़के दादा को हड़काते हुए कहा| अब गाँव के लोगो तो पुलिस को देखते ही घबरा जाते हैं, ऐसे में एक पुलिस वाला अफसर अगर हड़का दे तो क्या हाल होगा इसकी कल्पना कर लीजिये, वही हाल इस समय बड़के दादा का था| "ऐ दरोगा, इनका साथे लेके घरे जाओ और ताहिकात सुरु करो और हमका सारी रपट आज साम तक चाहि|" SP साहब ने छोटे दरोगा को इशारा करते हुए बड़के दादा के साथ भेज दिया|

बड़के दादा के जाने के बाद सासु माँ ने भाईसाहब से मेरा हाल चाल पुछा मगर जवाब SP साहब ने दिया, उन्होंनेमेरी सासु माँ कोआश्वस्त करते हुए बताया की मुझे कुछ देर में होश आ जायेगा|

सासु माँ SP साहब के हमारी तरफदारी करने से चिंता मुक्त थीं, उन्हें लग रहा था की SP साहब से भाईसाहब की अच्छी जान-पहचान है तभी वो हमारी तरफदारी कर रहे हैं| अब समय था भाईसाहब का SP साहब से तार्रुफ़ कराने का; "माँ, ई हमार साला है!" भाईसाहब की आवाज में गर्व झलक रहा था और ये देख कर माँ को बहुत ख़ुशी हुई| सासु माँ ने आगे बढ़कर SP साहब के सर पर हाथ रख उन्हें आशीर्वाद दिया; "जुग-जुग जियो मुन्ना!" सासु माँ का प्यार पा कर SP साहब भावुक हो गए, आज उन्हें बहुत समय बाद किसी ने इस कदर प्यार दिया था| "अम्मा, हम कभौं आपन माँ का प्यार नाहीं पायन, काहे से की जब छोट रहन तबहयें हमार माँ का स्वर्गवास हुई गवा रहा| बस एक बहिन है जो हमका बहुत लाड-प्यार करत रही, पिताजी आपन कुश्ती का अखाड़ा चलावत रहे मगर ऊ हमका प्यार कम और कुश्ती का दाँव-पेच ज्यादा सिखावत रहे| जीजा, पिताजी को बहुत मोहात रहे और तो और पिताजी के प्रिय शिष्य रहे! जानत हो, जीजा national खेले रहे और आगे खेले खतिर जावत रहे मगर पिताजी का अचानक स्वर्गवास हुई गवा! हमार घर एकदम से टूटे वाला रहा, तभाएं जीजा पूरा घर संभाले लागे| दीदी इनसे प्यार करे लागीं तो दुनो जन बियाह कर लिहिन, तब हम स्कूल म पढ़त रहन| जीजा पाहिले तो कुश्ती का अखाड़ा चलावत रहे और फिर आमदनी बढाए खतिर मसालों का व्यापार शुरू कर दिहिन| हमका आगे पढ़ाये खतिर जीजा बहुत मेहनत किहिन और अब देखो हम ई जिला का SP बन गयन|" SP साहब ने जब माँ को सारी बात बताई तो माँ का सीना गर्व से फूल गया की उनका बड़ा बेटा घर से निकाले जाने पर बिगड़ा नहीं बल्कि सँभल गया|

"जीजा ई घर से भले ही दूर रहे मगर ऊ सब खबर रखत रहे, अनिल के पैदा भय (होने) से ले कर शगुन के बिया तलक! बस ऊ ई नाहीं जानत रहे की संगीता दीदी का मानु जी से बिया भवा रहा! हम कतना बार कहिन की चलो घरे चली के अम्मा-बप्पा से मिल आवा जाए मगर जीजा डरात रहे, कहत रहे की हमका देखिके पिताजी का दिल बहुत दुखी!" SP साहब थोड़ा भावुक होते हुए बोले|

उनकी बात पूरी होते ही सासु माँ ने अपने बड़े बड़े बेटे को गले लगा लिया और उन्हें समझाते हुए बोलीं; "मुन्ना, अइसन काहे सोचत रहेओ? माँ-बाप का गुस्सा इतना देर तलक नाहीं रहत! तू तब आये होतेयु तो आपन पिताजी से भेंटाये लेतयु, वोऊ (वो भी) आपन लड़िकवा का एक बार आपन गले से लगाए लेत!" माँ अपनी आँखों में आँसूँ लिए हुए बोलीं|

"हमका माफ़ कर दिहो माँ! हम मूरख रहन जो अतना समय बर्बाद किहिन की आपन पिताजी का आखरी बार गले लगने का मौका तक खोये दिहिन!" भाईसाहब रोते हुए बोले| वो समा बहुत ही भावुक था, इतना भावुक की माँ-बेटे का प्यार देख कर खुद SP साहब की आँखें भी नम हो गई थीं|

"मुन्ना, हमका मानु लगे लेइ चलो!" सासु माँ ने अपने आँसूँ पोछते हुए भाईसाहब से कहा| SP साहब ने अपनी गाडी में सासु माँ, भाईसाहब को अस्पताल छोड़ा तथा वो खुद इस case की कारवाही में जुट गए| मेरी सासु माँ उसी private ward के कमरे में आ गईं जहाँ संगीता, अनिल और चरण काका बैठे थे| मेरी सासु माँ ने संगीता से मेरा हालचाल पुछा तो संगीता ने भारी मन से कहा; "आभायें तलक इनका होस नाहीं आवा!!" संगीता को यूँ उदास देख मेरी सासु माँ ने उसे हिम्मत देते हुए कहा; "मुन्नी, तू चिंता न कर! मानु का कछु न होइ, आभायें देख्यो ऊ उठी और हँसे-बोले लागि!" सासु माँ ने संगीता को प्यार से उम्मीद बँधाते हुए कहा|

तभी मेरी सासु माँ को याद आया की मेरे माँ-पिताजी को तो अभी तक घर में आज हुए इस काण्ड के बारे में कुछ पता ही नहीं! "मुन्नी, तू आपन सासु और ससुर जी का मानु का बारे में बताया की नाहीं?!" मेरी सासु माँ ने संगीता से सवाल किया, उनका सवाल संगीता का चेहरा एकदम से फीका पड़ गया! सुबह के साढ़े ग्यारह बजने को आये थे और अभी तक मेरे घर पर इस काण्ड की कोई घबर नहीं गई थी! सासु माँ में अपने समधी-समधन को फ़ोन कर ये बताने की हिम्मत नहीं थी की मेरे हाथों खून हो गया है और मैं इस वक़्त अस्पताल में बेहोश पड़ा हूँ, इसलिए संगीता को ही ये बात मेरे माँ-पिताजी यानी अपने सास-ससुर जी से कहनी थी!

वहीं संगीता की व्यथा ये थी की वो ये मनहूस खबर मेरी माँ (संगीता की सासु माँ) को दे या फिर मेरे पिताजी (संगीता के ससुर जी) को दे?! मेरे पिताजी दिमाग के गर्म थे तथा ये खबर सुनते ही वो बौखला जाते, वहीं मेरी माँ थोड़ा सूझबूझ से काम लेती थीं इसलिए संगीता ने मेरी माँ (संगीता की सासु माँ) को ही फ़ोन करने का निर्णय लिया|

संगीता ने मेरी माँ को फ़ोन मिलाया, माँ का फ़ोन बजा और संगीता की तस्वीर माँ के फ़ोन पर दिखने लगी, माँ समझ गईं की ये संगीता का फ़ोन है इसलिए माँ फ़ोन उठाते ही संगीता से बोलीं;

माँ: हेल्लो बेटी, कैसी है तू? समधन जी कैसी हैं?

मेरी माँ के सवाल सुन संगीता से आगे कुछ बोला नहीं गया, वहीं संगीता की ये चुप्पी मेरी माँ को किसी अप्रिय घटना के घटने का संकेत दे रही थी!

माँ: बहु....तू चुप क्यों है? सब ठीक तो है न?

मेरी माँ ने थोड़ा गंभीर होते हुए पुछा तो संगीता सिसकते हुए बोली;

संगीता: माँ...आज सुबह....चन्दर घर आया था! उसके हाथ में कट्टा था.और...और वो इनकी तथा मेरी जान लेना चाहता था! इन...इन्होने मुझे और मेरी माँ को घर के भीतर बंद कर दिया और खुद चन्दर का सामना करने लगे! दोनों में छीना झपटी हुई और अपनी जान बचाते हुए इनके हाथ से गोली चल गई और...और चन्दर की जान चली गई!

इतना सुनना था की मेरी माँ चिंता के समुन्द्र में डूब गईं, उन्हें चन्दर के मरने का जरा भी दुःख नहीं था, चिंता थी तो बस मेरी;

माँ: म...मानु....कहाँ है?

मेरी माँ के थरथराते हुए होठों से एप बेटे के लिए चिंता निकली!

संगीता: वो...वो फिलहाल बेहोश हैं....

संगीता की आधी बात सुन मेरी माँ को बहुत बड़ा धक्का लगा, उन्हें डर लग रहा था की मुझे कुछ हो तो नहीं गया?

माँ: क्या? बहु...मुझे सच-सच बता?!

मेरी माँ रुँधे गले से बोलीं|

संगीता: चन्देर इन्हें मारने के लिए हाथ में चाक़ू ले कर इन पर लपका था, तभी इन्होने अपनी जान बचाने के लिए चन्दर पर गोली चला दी! चन्दर के प्राण तो तभी निकल गए थे मगर चूँकि वो इन्हें मारने के लिए लपक चूका था इसलिए उसके हाथ में मौजूद चाक़ू इनके बायें कँधे में आ घुसा! बहुत खून निकला था माँ, लेकिन तभी मेरे भाईसाहब, अनिल और चरण काका आ गए...तीनों इनको ले कर अस्पताल भागे! डॉक्टर ने operation कर चाक़ू निकाल दिया है, बहुत खून बहा था इसलिए खून चढ़ाया जार अहा है और फिलहाल ये बेहोश हैं!

संगीता की पूरी बात सुन मेरी माँ को दिल अपने बेटे को देखने के लिए बेचैन हो गया! उन्होंने जोर से चिल्लाते हुए मेरे पिताजी को बुलाया; "सुनिए जी, जल्दी आइये!" माँ की चीख सुन पिताजी और बच्चे दौड़े-दौड़े कमरे में आये, बच्चों को देखते ही मेरी माँ ने दोनों बच्चों को कमरे से भगा दिया; "तुम दोनों बाहर जाओ!" मेरी माँ की आवाज थोड़ी खुश्क थी जिससे बच्चे थोड़ा सहम गए थे, आयुष तो डर के मारे दौड़ते हुए कमरे से बाहर भाग गया मगर नेहा को शक हो गया था की; 'जर्रूर कोई बात है जो दादी जी हमसे छुपा रहीं हैं?!" नेहा कमरे से बाहर तो आ गई थी मगर उसने अपना कान दिवार से लगा कर अंदर की सारी बातें सुननी शुरू कर दी|

इधर कमरे के भीतर मेरी माँ ने मेरे पिताजी को संगीता द्वारा बताई सारी बात सुनाई| मेरे अस्पताल में होने की बात से नहीं बल्कि मेरे हाथों चन्दर का खून होने की बात से मेरे पिताजी को बहुत बड़ा धक्का लगा था! वहीं कमरे के बाहर छुपकर नेहा ने जब पूरी बात सुनी तो उसे मेरे खून करने की बात से नहीं बल्कि मेरे अस्पताल में बेहोश पड़े होने से धक्का लगा! नेहा चीखती हुई कमरे के भीतर आई; "पापा जी!" नेहा की इस चीख ने मेरे माँ-पिताजी को दहला दिया था! नेहा दौड़ती हुई आई रोते हुए अपनी दादी जी से बोली; "द...दादी जी...मुझे पापा जी से बात करनी है!" नेहा का दिल मेरे अस्पताल में होने की बात से दहल चूका था, उसके मासूम दिल को तभी चैन मिलता जब वो मुझसे यानी अपने पापा जी से बात करती| लेकिन मैं होश में तो था नहीं की मैं नेहा से बात करता इसलिए माँ नेहा को समझाने लगीं; "बेटा, तेरे पापा को होश नहीं आया! जैसे ही होश आएगा हम सभी मानु से बात करेंगे|" बच्चों का दिल बड़ा कोमल होता है, उन्हें कई बार सीधी सी बात समझ नहीं आती| माँ की बात सुन भी नेहा को चैन नहीं पड़ा, उसने रोते हुए जिद्द पकड़ ली की उसे अपने पापा यानी की मुझे देखना है: "नहीं!!!! मुझे पापा जी को देखना है! मुझे उनसे अभी बात करनी है!" अब जाहिर है ऐसे समय पर जबकि परिवार पर क़यामत टूट पड़ी हो और कोई बच्चा जिद्द करे तो घर के बड़ों को गुस्सा आ ही जाता है इसलिए माँ को भी गुस्सा आ गया; "बस! बोला न अभी मानु होश में नहीं आया है! जा यहाँ से!" मेरी माँ ने नेहा को गुस्से में डाँट दिया|

एक तो मेरे अस्पताल में होने से नेहा पहले ही दहल चुकी थी, उस पर अपनी दादी जी की डाँट खा कर नेहा डरी-सहमी-घबराई रोती-बिलखती हुई कमरे से बाहर आ गई! लेकिन नेहा हार मानने वाली नहीं थी इसलिए उसने माँ-पिताजी के कमरे की चौखट पर ही ज़मीन पर बैठ कर धरना दे दिया! चौखट से सर टिकाये नेहा सिसकती रही और मेरे जल्दी होश में आने की दुआ करने लगी!

उधर कमरे के भीतर मेरे पिताजी एक अजीब सी कश्मकश में फँस गए थे! वो चन्दर के मरने का गम मनाएँ या फिर मेरे अस्पताल में पड़े होने की चिंता में कुढ़ते जाएँ?! उनका दिमाग एकदम से सुन्न हो गया था, उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था की वो क्या करें? नेहा जब अपनी दादी जी से मुझसे बात करने की जिद्द कर रही थी उस समय पिताजी अपनी इसी कश्मकश में फँसे थे इसीलिए उन्होंने नेहा के जिद्द करने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी! माँ ने जब पिताजी को अपने मन के ख्यालों से जूझता हुआ मौन देखा तो उन्होंने पिताजी को उनके ख्यालों से बाहर निकालते हुए पुछा; "सुनिए....सुनिए...कुछ तो कहिये?"

"हाँ..." पिताजी अपनी कश्मकश से बाहर आते हुए बोले, पिताजी का यूँ अजीब बर्ताव देख माँ हैरान थीं| "अपना फ़ोन दो, मैं बहु से बात करता हूँ|" इतना कहते हुए पिताजी ने माँ से फ़ोन लिया जो की अभी तक चालु था, यानी की संगीता ने यहाँ हुई सारी चीख-पुकार सुन ली थी|

पिताजी: बहु, मानु कौन से अस्पताल में है और क्या पुलिस आई थी?

पिताजी के मुँह से मेरे स्वास्थ की चिंता कर सवाल पूछने के बजाए पुलिस के बारे में पूछना मेरी माँ को बहुत अटपटा लगा, वो चुप थीं तो इसलिए की उन्हें अपने बेटे की अधिक चिंता थी और इस समय पिताजी से लड़ाई कर वो कोई अन्य बखेड़ा खड़ा नहीं करना चाहतीं थीं|

संगीता: पिताजी हम सभी गोंडा के निजी अस्पताल में हैं और यहाँ इनके लिए हमें private ward मिला हुआ है| पुलिस आई थी मगर मेरे भाईसाहब के साले साहब यहाँ के SP हैं तो उन्होंने सारी बात सँभाल ली है|

संगीता अपने भाईसाहब द्वारा की गई मदद से कृतज्ञ थी|

पिताजी: ठीक है बहु! तुम सब रुको मैं अभी हवाई जहाज से आ रहा हूँ|

ये बोल पिताजी के मुँह से अपने आप निकले थे, जो उनके दिल में मेरे लिए पैदा हुई चिंता दर्शाते थे|

खैर, मेरे पिताजी ने फ़ोन काटा और माँ से बोले;

पिताजी: मैं किसी से पूछ कर अपनी हवाई जहाज की टिकट कटवाता हूँ और अभी गाँव के लिए निकलता हूँ, तुम बच्चों के साथ रात की गाडी (train) से आ जाना|

पिताजी के अकेले गाँव जाने से माँ की चिंता खत्म नहीं हो रही थी बल्कि बढ़ रही थी!

माँ: आप गाँव अकेले चले जाओगे तो मैं बच्चों को ले कर गाँव अकेली कैसी आऊँगी? जाएंगे तो सब साथ जाएंगे, आप हवाई जहाज की चार टिकट निकलवाओ!

मेरी माँ पिताजी को आदेश देते हुए बोलीं| पिताजी ने माँ की बात का कोई जवाब नहीं दिया और उठ कर बाहर चल दिए| जब पिताजी कमरे के दरवाजे पर पहुँचे तो उन्हें रोती हुई नेहा मिली, नेहा ने अपने दादा जी की टाँग पकड़ ली और सिसकते हुए बोली; "द...दादा जी...मैं भी...आपके...साथ गाँव जाऊँगी!" नेहा को रुनवासा देख पिताजी का दिल पिघल गया और उन्होंने नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए कहा; "हाँ बेटा!" इतना कह पिताजी हमारे घर के नज़दीकी travel agent के पास चल दिए|

माँ-पिताजी के कमरे का दरवाजा खुला था और माँ ने नेहा को चौखट पर बैठे हुए रोते देख लिया था| माँ नेहा को मनाने के लिए उठीं ही थीं की वहाँ आयुष आ धमका| आयुष को घर में मचे इस कोहराम के बारे में कुछ नहीं पता था, जब उसने अपनी बहन को रोते हुए देखा तो वो नेहा के सामने आलथी-पालथी मार कर बैठ गया| आयुष ने नेहा का दाहिना हाथ अपने दोनों हाथों में लिया और उदास होते हुए पूछने लगा; "दीदी, क्या हुआ? आप रो क्यों रहे हो?" आयुष का सवाल सुन नेहा ने अपने आँसूँ पोछे और सर न में हिला कर "कुछ नहीं" बोली| पिछलीबार जब हम दोनों मियाँ-बीवी आगरा से लड़-झगड़ कर घर लौटे थे तब नेहा ने आयुष को हमारी लड़ाई के बारे में बता कर बहुत डरा दिया था, तब मैंने नेहा को समझाया था की वो इस तरह से आयुष का न डराया करे, बल्कि बड़ी बहन होते हुए अपने प्यार से आयुष को खुश रखा करे| मेरी दी हुई उसी सीख को याद कर नेहा अपने छोटे भाई आयुष से ये सब बात छुपा रही थी|

उधर माँ ने जब दोनों भाई-बहन (आयुष और नेहा) को यूँ गुमसुम देखा तो माँ भी नेहा की बगल में ज़मीन पर बैठ गईं, बिना कुछ कहे माँ ने अपनी बाहें खोलीं और नेहा एकदम से उनके सीने से लगा कर फफक कर रो पड़ी!

माँ: बस बेटा! रोना नहीं है, तेरे दादा जी गए हैं अभी टिकट लेने, फिर है न हम सब एक साथ गाँव जाएंगे|

मेरी माँ ने नेहा को प्यार से समझाया| अपनी दादी जी की बात सुन नेहा की बेचैनी कुछ कम हुई और उसने फौरन अपने कान पकड़ते हुए माफ़ी माँगी;

नेहा: दादी जी, मुझे माफ़ कर दो! मुझे आपसे यूँ जिद्द नहीं करनी चाहिए थी!

नेहा की बात सुन माँ ने नेहा को फिर से अपने गले लगा लिया और उसके सर को चूमते हुए बोलीं;

मेरी माँ: जब घर में कोई परेशानी होती है, क्लेश होता है न, तब ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए न की रो कर, जिद्द कर के सबकी परेशानी बढ़ानी चाहिए|

मेरी माँ ने नेहा को प्यार से समझाते हुए कहा| उधर आयुष बेचारा मुँह बाए अपनी दादी जी और दीदी को देख रहा था, उसे ये समझ ही नहीं आ रहा था की आखिर हो क्या रहा है?

आयुष: दादी जी, दीदी रो क्यों रही है?

आयुष का सवाल सुन माँ ने आयुष को अपनी बगल में बिठाया और उसे गोलमोल जवाब देते हुए बोलीं;

माँ: बेटा, आपके पापा की तबियत खराब हो गई है और हम सब अभी कुछ देर में गाँव जा रहे हैं|

माँ के दिये गोलमोल जवाब से आयुष के छोटे से दिमाग में हजारों सवाल खड़े हो गए| मेरा बीमार होना मतलब की मैं फिर से coma में चला गया हूँ, ये सोच कर आयुष घबरा गया था और एकदम से उठ खड़ा हुआ| आयुष को घबराता हुआ देख नेहा ने बड़ी बहन होने का फ़र्ज़ निभाया और उसे प्यार से समझाया;

नेहा: पापा जी को छींकें आती हैं न, बस वही थोड़ी बढ़ गई हैं| तू चिंता मत कर, अभी दादा जी हमारी हवाई जहाज की टिकट ले कर आएंगे और हम सब फुर्र्ररर से पापा जी के पास पहुँच जाएंगे|

आयुष अपनी बहन की बातों में आ गया था, उसे मेरे पास गाँव जाने का जोश चढ़ गया और वो अपने इसी जोश में बहते हुए बोला;

आयुष: दादी जी, आप मेरी चिंता मत करो, मैं इन्हीं कपड़ों में गाँव जाऊँगा| मैं हम सबकी अटैची उठा कर दरवाजे के पास रखता हूँ, तब तक आप और दीदी तैयार हो जाओ!

आयुष का जोश देख माँ बोलीं;

मेरी माँ: बेटा अटैची तेरे दादा जी और मैं उठा लेंगे, तू अटैची उठाएगा और कहीं अटैची तेरे ऊपर गिर गई तो?!

माँ ने आयुष को समझाया| फिर उन्होंने नेहा से कहा;

मेरी माँ: नेहा बेटा, तू जा कर खुद भी तैयार हो जा और आयुष को भी जूते-मोज़े पहनाकर तैयार कर दे| तेरे दादा जी जैसे ही टिकट ले कर आएंगे हम वैसे ही चल पड़ेंगे!

अपनी दादी जी की बात सुन नेहा एकदम से उठ खड़ी हुई, दोनों बच्चों ने तैयार क्या होना था उन्होंने तो बस अपनी जुराबें तथा जूते पहन लिए और हो गए वो तैयार| वही हाल मेरी माँ कभी था, उन्होंने जो साडी पहनी हुई थी उसे ही पहनकर वो पिताजी के साथ airport के लिए निकलने वाली थी|

पिताजी को घर लौटने में समय लग गया, वो करीब आधे-पौने घंटे बाद निराश घर लौटे! पिताजी को यूँ निराश देख माँ और भी चिंतित हो गईं;

माँ: क्या हुआ जी?

पिताजी कुछ जवाब दें उससे पहले ही दोनों बच्चे उनके सामने हाथ बाँधे खड़े हो गए, दोनों बच्चों के चेहरे उत्सुकता से भरे थे मगर उन्हें अपने दादा जी के चेहरा पर निराशा नज़र आ रही थी|

पिताजी: लखनऊ की flight कुछ देर पहले ही चली गई, अब अगली flight शाम 5 बजे की है!

पिताजी की बात ने माँ और बच्चों को निराश कर दिया था|

माँ: तो train से चलते हैं न?

माँ के लिए अगला विकल्प train था इसलिए उन्होंने उम्मीद की रस्सी पकड़ते हुए पुछा|

पिताजी: पौने एक की एक गाडी (train) है तो मगर वो booked है, उसमें तत्काल भी नहीं मिल रही! अकेला जाना होता तो मैं किसी तरह निकल भी जाता मगर तुम सब को साथ ले कर जाना नामुमकिन है!

पिताजी ने फिर से निराशाजनक जवाब दिया|

माँ: तो बस?

बस से सफर करना आखरी विकल्प था और बस का नाम आते ही नेहा भी अपनी दादी जी के साथ हो गई;

नेहा: हाँ दादा जी, हम बस से चलते हैं|

पिताजी: बेटा, गाँव जाने की बस कुछ देर में छूट जाएगी!

पिताजी के जवाब से नेहा की हिम्मत टूटने लगी थी, की तभी उन्होंने माँ और बच्चों को उम्मीद की किरण दिखाते हुए कहा;

पिताजी: मैंने travel agent से बात की है, वो कह रहा है की शाम 5 बजे दिल्ली से लखनऊ के लिए एक flight है| वो कोशिश कर रहा है की हम चारों की टिकट हो जाए, अगर टिकट नहीं हो पाई तो हम बस से चल पड़ेंगे!

पिताजी द्वारा दिखाई हुई ये उम्मीद की किरण माँ और बच्चों के लिए अँधेरे में लालटेन के समान थी| सभी पिताजी की बात से राजी हो गए थे, माँ ने तुरंत संगीता को फ़ोन कर के मेरा हाल-चाल पुछा तथा अपने आने का समय भी बता दिया| मेरी माँ से बात कर संगीता ने कमरे (अस्पताल का private ward) में मौजूद सभी को मेरे माँ-पिताजी और बच्चों के आने की बात बताई|

इधर अस्पताल में सुबह से किसी ने कुछ नहीं खाया था, फिर संगीता तो माँ बनने वाली थी इसलिए उसका खाना तो सबसे जर्रूरी था इसलिए मेरी सासु माँ ने संगीता से कुछ खाने को कहा: "मुन्नी, तू सुबह से कछु नहीं खायो है! कछु खाये लिहो..." मेरी सासु माँ की बात अधूरी सुन संगीता आँखों में आँसूँ लिए हुए बोली; "एक बार इनको होश आने दो माँ, फिर आप जो कहोगे मैं वो करुँगी|" संगीता की मानसिक स्थिति ऐसी नहीं थी की वो कुछ समझ सके इसलिए मेरी सासु माँ ने उस पर जोर नहीं दिया| कुछ देर बाद भाईसाहब की पत्नी तथा लड़का अस्पताल पहुँचे, वो दरअसल मुझे देखने तथा माँ और संगीता को सँभालने आये थे| परन्तु संगीता के गुस्से को देखते हुए उन्होंने केवल माँ को इशारे से बहार बुलाया तथा अपने परिवार से मिलवाया| मेरी सासु माँ को अपने बड़े बेटे के परिवार से मिलकर बहुत ख़ुशी हुई और उन्होंने भाभी जी और अपने पोते को गले लगा कर खूब प्यार किया| भाभी, संगीता से मिलना चाहतीं थीं मगर भाईसाहब ने उन्हें रोक दिया ये कह कर की इस वक़्त संगीता मेरे बेहोश होने के कारन बहुत परेशान है! भाभी और उनका बेटा मेरी सासु माँ से मिलकर बाहर ही बाहर से चले गए तथा दोनों माँ-बेटा (भाईसाहब और मेरी सासु माँ) वापस कमरे में आ कर बैठ गए|

उधर बड़के दादा के घर पर मातम पसरा हुआ था| दरोगा ने चन्दर को ले कर सवाल पूछ-पूछ कर पूरे परिवार की नाक में दम कर रखा था| बड़की अम्मा का रो-रो कर बुरा हाल था और उन्हें सहारा देने वाला कोई नहीं था! चन्दर जैसा भी था, था तो वो बड़की अम्मा और बड़के दादा का खून इसलिए अपने बेटे को खोने का दुःख बस वे दोनों ही जानते थे! बड़की अम्मा अपने बेटे चन्दर का आखरी बार चेहरा देखना चाहतीं थीं मगर दरोगा ने कहा था की लाश का पंचनामा होना है और सारी पुलिस करवाई के बाद ही उन्हें लाश अंतिमसंस्कार करने के लिए सौंपी जाएगी!

वहीं बड़के दादा के चारों बेटे मुझसे लड़ने को अपनी कमर कस चुके थे, उन चारों का चन्दर से खून का रिश्ता था, जानते वो भी थे की चन्दर ही गलत है मगर खून आखिर खून की ओर ही बहता है इसलिए चारों मेरे खिलाफ हो गए थे| यहाँ तक की अजय भैया, जिनसे मेरे सगे भाई जैसे संबंध थे वे भी मेरे खिलाफ हो गए थे! वो तो बड़के दादा ने चारों को SP साहब का डर दिखा कर रोका हुआ था वरना क्या पता चारों अस्पताल पर ही धावा बोल देते!

बड़के दादा के घर में कोई नहीं जानता था की मेरी अस्पताल में क्या दशा है, उनके लिए मैं सिर्फ बेहोश था उन्हीं नहीं पता था की चन्दर ने मुझे चाक़ू मारकर घायल कर दिया है! वहीं बड़के दादा का गुस्सा आपे से बाहर होता जा रहा था, एक तो उन्होंने अपने बेटे को खोया था उस पर वे पुलिस के चक्करों में फँस गए थे! उनकी नज़र में मैं ही इस सबका कसूरवार था, अब मुझे तो वो पुलिस दबाव के कारन कुछ कह नहीं सकते थे इसलिए उन्होंने सीधा मेरे पिताजी को फ़ोन मिला दिया|

इधर शहर में मेरे पिताजी का फोन खनका तो उन्होंने अपना फ़ोन देखा, फ़ोन की screen पर अपने भाईसाहब का नाम देख पिताजी घबरा गए! उन्हें समझ नहीं आ रहा था की वो फ़ोन उठा कर अपने भाईसाहब से क्या कहें? चन्दर के मरने का अफ़सोस जतायें या फिर अपने बेटे का बचाव करें| देखा जाए तो पिताजी के लिए विकल्प चुनना इतना भी मुश्किल नहीं था, उन्हें अपने बेटे को निर्दोष बताते हुए बचाव ही करना था मगर पिताजी ठहरे 'भाईभक्त' वो अपने भाईसाहब के आगे कैसे कुछ कहते?!

बड़के दादा ने पिताजी को भर-भरकर गाली देना शुरू किया और मेरे बारे में अपने दिल में मौजूद सारा ज़हर उगल दिया! बड़के दादा ने चन्दर के खून का आरोपी मुझे बनाया और अपने बेटे को दूध का धुला हुआ बताया| मेरे और संगीता के शादी करने से आस-पड़ोस के गाँव में जो उनकी मट्टी-पलीत हुई थी उसका ठीकरा भी मेरे सर फोड़ दिया!

पिताजी ने सर झुकाये हुए अपने भाईसाहब की सारी बात सुनी, उनके मुँह से मेरे बचाव में चू तक न निकली, शायद इसीलिए की मेरे पिताजी मुझे अपने भाई के लड़के की मौत का कसूरवार मान चुके थे!

वहीं माँ ने जब पिताजी का यूँ झुका हुआ सर देखा तो वो समझ गईं की कुछ गड़बड़ है| माँ कुछ पूछें तब तक बड़के दादा ने अपनी सारी भड़ास मेरे पिताजी पर निकाल कर फ़ोन रख दिया था| पिताजी ने फ़ोन रखा और माँ ने पुछा की फ़ोन किसका था, जवाब में पिताजी ने सर झुकाये हुए बस एक ही शब्द कहा; "भाईसाहब"|

पिताजी के मुँह से निकले उस एक शब्द से माँ सब समझ गईं, उन्हें हैरानी थी तो बस इस बात की कि पिताजी के चेहरे पर अपने बेटे के लिए चिंता नहीं बल्कि शर्मिंदगी नज़र आ रही थी! जबकि मेरी माँ को मेरे किये पर कोई शर्मिंदगी नहीं थी, उन्हें फक्र था की उनके बेटे ने अपने परिवार कि भलाई के लिए चन्दर पर गोली चलाई थी| पिताजी के चेहरे पर ये शर्मिंदगी देख कर माँ को बहुत गुस्सा आ रहा था, मेरी माँ अगर चुप थीं तो बस इसलिए क्योंकि इस मुश्किल कि घड़ी में पिताजी से लड़ाई-झगड़ा कर वो घर में एक और आग नहीं लगाना चाहतीं थीं!

ठीक तभी मेरी माँ के फ़ोन पर फ़ोन आया, ये फ़ोन मामी जी ने किया था, उन्होंने मुझे ले कर मेरी माँ को सुनाना शुरू कर दिया की मैंने गुस्से में आ कर क्यों बड़के दादा के कुलदीपक की जान ले ली?! यदि ये बात सच होती तो मेरी माँ कुछ नहीं कहतीं मगर मेरी माँ को अपने बेटे पर पूरा विश्वास था, वो जानती थीं की मैं गुस्से में आ कर कभी ऐसा कोई काम नहीं कर सकता| मेरी माँ मेरा पक्ष लेते हुए मामी जी से भिड़ गईं; "हमार लड़िकवा कछु नाहीं करिस! तोहार भाँजा हमार लड़िकवा का जान से मारे खतिर संगीता बहु के घरे गवा रहा, न की मानु ओका बुलाइस रहा! तोहरे भाँजा कट्टा लेइ के गवा रहा और हमार मानु आपन जान बचाये खतिर जउन करिस ऊ ठीक ही करिस!" माँ ने पिताजी की ओर देखते हुए ये बात बड़े गर्व से कही थी| ये मेरी माँ का पिताजी को सुनाने का ढंग था, मेरी माँ पिताजी को ये एहसास कराना चाहतीं थीं की वो (पिताजी) अपने खून पर शक न करें! लेकिन पिताजी पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा, उनके चेहरे पर अपने बेटे के लिए शर्मिंदगी अब भी बनी हुई थी!

एक-एक कर कई बार माँ का फ़ोन बजा, जिन नाते-रिश्तेदारों ने मेरे और संगीता के शादी करने के बाद हमसे तालुक्कात खत्म कर दिए थे, उन सभी ने माँ को सुनाने के लिए फ़ोन किया लेकिन मेरी माँ ने हरबार बड़े गर्व से मेरा बचाव किया तथा सभी को खूब सुनाया|

दोपहर के खाने का समय हो गया था, सुबह से बच्चों ने बस नाश्ता किया था ओर उन्हें भूख लग आई थी मगर अपने पापा जी की चिंता करते हुए दोनों बच्चे खामोशी से बैठे घडी के 5 बजने का इंतज़ार कर रहे थे| भूख लगने और मेरी चिंता में बच्चों का मुँह लटक गया था, माँ ने जब अपने पोता-पोती को यूँ उदास देखा तो माँ ने दोनों बच्चों को अपने पास बुलाया तथा उन्हें खाने के लिए कहा;

माँ: नेहा बेटा, दोपहर हो गई है और तुम दोनों को भूख लग आई होगी, ऐसा कर बाहर से अपने लिए खाने को कुछ मँगा ले|

अपनी दादी जी की बात सुन नेहा सर न में हिलाने लगी;

नेहा: दादी जी, जब तक मैं पापा जी को होश में नहीं देख लेती मैं कुछ नहीं खाऊँगी!

काहिर था की नेहा को मेरी बहुत चिंता थी, उसका नाज़ुक सा दिल बहुत घबराया हुआ था| वहीं अपनी बहन की देखा-देखि आयुष भी एकदम से बोला;

आयुष: दादी जी, मुझे भी भूख नहीं है!

माँ: बेटा ऐसा नहीं कहते! भूल गए तुम दोनों के पापा जी क्या कहते थे? "बच्चे भूखे नहीं रहते, वरना तुम दोनों बड़े कैसे होगे?"

पिछले साल जब मैं नवरात्रों में व्रत रखना चाहता था और बच्चे मेरे साथ व्रत रखना चाहते थे तब मैंने ही ये बात दोनों बच्चों को समझाई थी| माँ ने बड़े प्यार से मेरी कही ये बात दोनों बच्चों को आज दिला दी थी| माँ की बात का असर सबसे पहले आयुष पर हुआ, वो खाना खाने के लिए लगभग तैयार था मगर नेहा थोड़ी जिद्दी थी इसलिए उसे पिघलाने के लिए माँ ने फिर थोड़ी चपलता दिखाई;

माँ: नेहा बेटा, आयुष अभी छोटा है और उसका यूँ भूखा रहना उसकी सेहत खराब कर देगा| अगर तू नहीं खायेगी तो आयुष कैसे खायेगा?

अपनी दादी जी की ये बात सुन नेहा आयुष से बोली;

नेहा: आयुष, तू खाना खा ले, मैं बाद में खाऊँगी|

नेहा की बात सुन आयुष एकदम से अपना सर न में हिलाते हुए बोला;

आयुष: न!

अगर माँ यहाँ मौजूद नहीं होती तो अबतक नेहा को गुस्सा आ जाता और वो आयुष को डाँट देती, परन्तु चूँकि वहां माँ मौजूद थीं इसलिए नेहा खामोश रही, माँ को नेहा पर खाना खाने का दबाव बनाने का अच्छा मौका मिल चूका था;

माँ: तू यही चाहती है की तेरी वजह से आयुष भी भूखा रहे?

माँ ने नेहा से तर्कपूर्ण सवाल पुछा तो नेहा निरुत्तर हो गई| नेहा के निरुत्तर होने का फायदा उठाते हुए माँ ने खुद दूकान फ़ोन किया और दोनों बच्चों के लिए चाऊमीन मँगवाई|

जब खाना आया तब माँ ने खुद बच्चों को खाना परोसा मगर बच्चे खा ही नहीं रहे थे|

आयुष: दादी जी, पहले आप और दादा जी भी हमारे साथ बैठ कर खाओ|

आयुष की बात सुन माँ ने उसके सर पर हाथ फेरा और उसे बहलाते हुए बोलीं;

माँ: बेटा, आप दोनों ने खा लिया तो हमारा पेट अपने आप भर जायेगा|

आयुष को अपनी दादी जी की बात समझ नहीं आई और वो हैरत से आँखें बड़ी कर के अपनी दादी जी को देखने लगा| तभी नेहा बोल पड़ी;

नेहा: दादी जी, पाप जी ने आज सवेरे ही मुझसे कहा था की मैं आपका, दादा जी और आयुष का ध्यान रखूँ| पापा जी जब ठीक हो जाएंगे और उन्हें पता चलेगा की हमने (आयुष और नेहा ने) पहले खाना खाया और आपने नहीं खाया तो वो हम दोनों को डाटेंगे, आप मुझे पापा जी से डाँट पढ़वाना चाहते हो?

नेहा ने आज पहलीबार अपनी दादी जी के साथ प्रेमपूर्वक तर्क किया| नेहा का ये प्रेमपूर्वक तर्क सुन एक पल के लिए मेरी माँ के चेहरे पर गर्वपूर्ण मुस्कान आ गई| माँ को नेहा की चपलता देख कर आज बहुत गर्व हो रहा था|

माँ: बेटा मैं माँ हूँ और माँ तब ही खाना खाती है जब उसके बच्चे खा लेते हैं| तेरे पापा एक बार होश में आ कर कुछ खा लें फिर तू ही मुझे अपने हाथों से खाना खिलाना| और तेरे पापा जी तुझे क्या डाँटेंगे मैं ही उसे (मुझे) पहले डाँट दूँगी, उसकी (मेरी) ये हिम्मत की मेरे पोता-पोती को डाँटे?!

माँ ने थोड़ा बचपना दिखाते हुए मुझे मारने की प्यार भरी धमकी दी| माँ का ये बचपना देख आयुष हँस पड़ा, आयुष को यूँ खिलखिलाकर हँसता हुआ देख एक पल के लिए माँ और नेहा के चेहरे पर भी प्यारी सी मुस्कान आ गई|

फिर माँ ने बड़े प्यार से दोनों बच्चों को अपने हाथ से चाऊमीन खिलाई और अपनी पूरी कोशिश करती रहीं की नेहा-आयुष फिर से मायूस न हो जाएँ, जबकि पिताजी अपने कमरे में खामोश बैठे कुछ सोचते रहे|

शाम के पौने पाँच हुए थे, भाईसाहब, मेरी सासु माँ और अनिल कमरे के बाहर doctor साहब से मेरे होश में आने के बारे में पूछ रहे थे| चरण काका अपने घर लौट चुके थे क्योंकि वहाँ संगीता की दोनों बहनों के ससुराल वाले आ धमके थे तथा आज हुए काण्ड को अपने फायदे के लिए बवाल बनाने पर तुले हुए थे|

अस्पताल के कमरे के भीतर बस संगीता मौजूद थी, होठों पर मेरी सालमति की दुआ और आँखें मेरे चेहरे पर गड़ी थीं, इस उम्मीद में की मैं अब उठ कर बैठ जाऊँगा| आखिर भगवान जी ने संगीता की सुन ली धीरे-धीरे मुझे होश आने लगा! मेरा पूरा शरीर कमजोरी और दर्द ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था, मेरे लिए आँखें खोलना ऐसा था मानो मैं कोई पहाड़ धकेल रहा हूँ! मेरी आँखें खुलते ही संगीता को देखने के लिए प्यासी हो चली थीं, मैंने गर्दन दाईं तरफ घुमा कर देखा तो संगीता सोफे पर बैठी थी, उसे देखते ही दिल को ठंडक मिलने लगी! लेकिन फिर अगले ही पल मेरे दिमाग में एक घृणा पैदा हो गई और मैं संगीता को भोयें सिकोड़ कर देखने लगा!

वहीं संगीता ने जैसे ही मेरी आँखें खुली हुई देखीं वो एकदम से दौड़ती हुई मेरे पास आने लगी, उसके चेहरे पर दुनियाभर की ख़ुशी झलक रही थी! संगीता मेरे नज़दीक आ कर मुझे छूती उससे पहले ही मैंने गुस्से से संगीता को देखते हुए रोक दिया; "[color=rgb(255,]DON'T TOUCH ME!!![/color]"
[color=rgb(184,]जारी रहेगा भाग 7 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]तीसवाँ अध्याय: नियति का खेल[/color]
[color=rgb(235,]भाग - 7[/color]


[color=rgb(128,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

अस्पताल के कमरे के भीतर बस संगीता मौजूद थी, होठों पर मेरी सालमति की दुआ और आँखें मेरे चेहरे पर गड़ी थीं, इस उम्मीद में की मैं अब उठ कर बैठ जाऊँगा| आखिर भगवान जी ने संगीता की सुन ली धीरे-धीरे मुझे होश आने लगा! मेरा पूरा शरीर कमजोरी और दर्द ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था, मेरे लिए आँखें खोलना ऐसा था मानो मैं कोई पहाड़ धकेल रहा हूँ! मेरी आँखें खुलते ही संगीता को देखने के लिए प्यासी हो चली थीं, मैंने गर्दन दाईं तरफ घुमा कर देखा तो संगीता सोफे पर बैठी थी, उसे देखते ही दिल को ठंडक मिलने लगी! लेकिन फिर अगले ही पल मेरे दिमाग में एक घृणा पैदा हो गई और मैं संगीता को भोयें सिकोड़ कर देखने लगा!

वहीं संगीता ने जैसे ही मेरी आँखें खुली हुई देखीं वो एकदम से दौड़ती हुई मेरे पास आने लगी, उसके चेहरे पर दुनियाभर की ख़ुशी झलक रही थी! संगीता मेरे नज़दीक आ कर मुझे छूती उससे पहले ही मैंने गुस्से से संगीता को देखते हुए रोक दिया; "[color=rgb(255,]DON'T TOUCH ME!!![/color]"

[color=rgb(51,]अब आगे:[/color]

आजतक मुझे लगता था की अंग्रेजी के सबसे कठिन 3 शब्द पहलीबार 'I love you' कहना होता है मगर आज मुझे पता चला की 'don't touch me' कहना भी कितना मुश्किल काम होता है! अंग्रेजी के ये तीन शब्द कहने में मैंने अपनी पूरी ताक़त लगा दी थी और मेरी साँसें फूल गई थीं! उधर संगीता मेरे इस अजीब व्यवहार से हैरान और परेशान थी, उस बेचारी को ये समझ ही नहीं आ रहा था की आखिर उसने ऐसी क्या ख़ता की है की मैं उस पर यूँ चिल्लाया? संगीता की चेहरे पर आई उदासी को देख मेरा दिल उसे अपने बर्ताव की सफाई देने को किया मगर शब्द मुँह से फूटे ही नहीं!

दरअसल जब मैं होश में आया और संगीता को मैंने पहली नज़र से देखा तो मुझे आज सुबह हुआ काण्ड एक पल में याद आ गया| मेरे हाथों से जो गोली चली थी उसने चन्दर की जान ली या फिर वो सिर्फ घायल है, ये जानने के लिए मेरा दिमाग बौखलाया हुआ था| दिल इस चन्दर रुपी बला से पीछा छुड़ाना चाहता था और चाहता था की चन्दर मर चूका हो जबकि मन साला अलग ही पीपड़ी बजा रहा था, वो मेरे बेचारे दिल को डाँट रहा था की तू क्यों किसी का बुरा सोच रहा है?! मन के इसी दबाव ने मेरे मन में घृणा पैदा कर दी थी की मैंने एक इंसान पर गोली चलाई और दिल उस आदमी के मरने की दुआ कर रहा है!

खैर, संगीता डरी-सहमी सी मेरी ओर देख रही थी और मुझसे करीब 2 कदम की दूरी पर खड़ी थी| मेरी गर्दन संगीता की तरफ ही घूमी हुई थी और मैं उसे अपनी आँखों के जरिये अपने दिमाग में उठे सवाल को समझाने की कोशिश कर रहा था की तभी भाईसाहब, सासु माँ तथा अनिल कमरे में दाखिल हुए| मुझे होश में देखते ही उन तीनों के चेहरे खिल गए! लेकिन अगले ही पल तीनों की नजर हम दोनों मियाँ-बीवी पर पड़ी, हम दोनों मियाँ-बीवी ख़ामोशी से एक दूसरे की ओर देख रहे थे और ये मूक भाषा किसी को समझ नहीं आ रही थी| भाईसाहब ने अनिल को इशारे से डॉक्टर को बुलाने को कहा, फिर वो तथा मेरी सासु माँ मेरे नज़दीक आये| वो कोई सवाल करें उससे पहले ही मेरी नज़र भाईसाहब पर पड़ी और मैंने उनसे अपने दिमाग में उठ रहा सवाल पुछा; "चन्दर?" मैंने सिर्फ चन्दर का नाम लिया था क्योंकि उसके आगे बोलने के लिए मेरे पास सही शब्द नहीं थे! मेरा मन मुझे चन्दर के लिए 'मरने' शब्द का प्रयोग करने से रोक रहा था|

भाईसाहब ने जैसे ही चन्दर शब्द सुना उनका चेहरा फीका पड़ गया और वो जवाब देने से अपना जी चुराने लगे| भाईसाहब के हाव-भाव देख मैं समझ गया की चन्दर मर चूका है! चन्दर की मरने की खबर ने मेरे अंतर्मन में एक विस्फोट किया था, मुझे उसके मरने से ज़रा भी दुःख नहीं हुआ था क्योंकि मेरा दिल तो पहले ही उसके मरने की कामना कर रहा था, दुःख हो रहा था तो बस इस बात का की मैंने बड़की अम्मा की गोद उजाड़ दी! मैं अपने दाहिने हाथ को देखने लगा और उस पल को याद करने लगा जब मैंने चन्दर पर कट्टा चलाया था! बड़की अम्मा का ख्याल आने से मेरा मन बहुत भारी हो गया था और कुछ पल पहले जो घृणा मेरे मन में थी वो अब ग्लानि बन पूरी तरह से मेरे मस्तिष्क पर छा चुकी थी| एक माँ को उसके बच्चे से दूर करने का पाप मेरे माथे पर लग चूका था और अपने माथे पर लगे इस कलंक के कारण मुझे खुद से घृणा होने लगी थी! 'क्या कहेगा तू अम्मा से, जब वो तेरा गिरेबान पकड़ कर पूछेंगे की तूने क्यों उनके बेटे की जान ली?' मन में ये सवाल उमड़ा और मेरा सारा आत्मविश्वास चूर-चूर हो गया|

मेरी आँखों से आँसूँ बह निकले, भाईसाहब तथा माँ मुझे संभालने के लिए आगे आये मगर मैंने अपना हाथ दिखा कर उन्हें रोक दिया; "कोई मुझे नहीं छायेगा!" मेरे मुख से फूटे बोल, मेरे मन में उतपन्न हुई घृणा को दर्शा रहे थे| "मुन्ना..." मेरी सासु माँ ने मुझे समझना चाहा मगर मैंने सर न में हिलाते हुए कहा; "नहीं माँ, मेरे हाथों एक इंसान का खून हुआ है|" मैंने अपने दाएँ हाथ को देखते हुए कहा| "ये आप क्या कह रहे हो? वो इंसान नहीं जानवर था, उसे मार कर अपने अपनी यानी मेरे सुहाग, मेरी और हमारे होने वाले बच्चे की रक्षा की है न की कोई पाप किया है! भूल गए आप उस दिन जब चन्दर दिल्ली में हमारे घर में घुस आया था तो अपने पिताजी से क्या कहा था?! आपने कहा था की 'जब किसी के घर में कोई जंगली जानवर घुस आता है तब इंसान पहले अपने परिवार को बचाने की सोचता है न की ये की वो ये सोचता है की वो एक जीव हत्या करने जा रहा है!' तो ये कहाँ से पाप हुआ?" संगीता मेरे साथ तर्क करते हुए बोली|

"मुझे चन्दर की मौत का ज़रा भी अफ़सोस नहीं, दुःख है तो एक माँ से उसके बेटे को छीन लेने का! मेरे ये हाथ खून से रंगे हैं और जबतक मैं अपने ये खून से रंगे हाथ धो नहीं लेता, अपना मन साफ़ नहीं कर लेता मुझे कोई नहीं छुएगा!" मैंने संगीता की ओर बिना देखे कहा| "हम अभी हरिद्वार के लिए निकलेंगे, पहले मैं गंगाजी में डुबकी लगा कर अपने पाप धोऊँगा फिर हम (मैं, अनिल ओर भाईसाहब) पिताजी का अस्थि विसर्जन करेंगे तभी मैं घर लौटूँगा||" मैं जोश में भरते हुए बोला| मेरी बात ने सभी को हैरान-परेशान कर दिया था, मैं अभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं था और ऐसे में मैं इसी वक़्त हरिद्वार जाने की जिद्द पकड़े बैठा था|

तभी अनिल बड़े डॉक्टर साहब को ले आया, उन्होंने मेरी सारी जाँच की तथा मुझसे मेरे स्वास्थ्य को ले कर सवाल किये| मैंने उनके सवालों का जवाब पूरे आत्मविशास से दिया ताकि वो मेरे हरिद्वार जाने के लिए अस्पताल से discharge पर रोक न लगा दें! मेरी जाँच कर डॉक्टर साहब संगीता से बोले की कोई भी घबराने वाली बात नहीं है, परन्तु डॉक्टर साहब की बात से किसी को अधिक ख़ुशी नहीं हुई! सभी मेरी हरिद्वार जाने की जिद्द से पहले ही परेशान थे, उस पर जब डॉक्टर साहब ने कह दिया की मेरे लिए अब घबराने वाली कोई बात नहीं तो सब जानते थे की मैं अब हरिद्वार जाए बिना नहीं मानने वाला|

लेकिन संगीता ने एकदम से अपनी चपलता दिखाई और डॉक्टर साहब से सवाल पुछा; "डॉक्टर साहब, कितने दिनों तक इन्हें अस्पताल में रहना होगा?" संगीता का सवाल सुन मैं बहुत हैरान हुआ और उसकी सारी चपलता समझ गया| "कम से कम 3 महीने bedrest की जर्रूरत है|" डॉक्टर साहब ने ठीक वही कहा जो की SP साहब ने उन्हें कहा था| अब चूँकि मैं इन बातों से अनजान था इसलिए डॉक्टर साहब का जवाब सुन मैंने फ़ौरन अपना सवाल दागा; "डॉक्टर साहब, 3 महीने तो बहुत ज्यादा हैं! अभी तो आपने कहा की घबराने की कोई बात नहीं है, फिर भी आप मुझे 3 महीने का bedrest लेने को कह रहे हैं?! क्या घाव इतना गहरा है की उसे भरने में इतना समय लगेगा?!" मेरे सवाल सुन डॉक्टर साहब भाईसाहब को देखने लगे, उन्हें लगा था की भाईसाहब ने मुझे SP साहब की सब बात बता दी होगी मगर मैं पहले ही अपनी जिद्द पकड़े बैठा था! डॉक्टर साहब को भाईसाहब की शक्ल देख कर एहसास हो गया की मैं सब बातों से अनजान हूँ इसलिए उन्होंने बात घुमाते हुए मुझे समझना शुरू कर दिया; "देखिये, आप बाल-बाल बचे हैं जो चाक़ू आपकी धमनी में नहीं धँसा वरना आपकी जान बचाना नामुमकिन हो जाता! चाक़ू सीधा माँस में घुसा था और काफी देर तक भीतर था, इसलिए घाव को भरने में अधिक समय लगेगा|" फिर उन्होंने भाईसाहब को इशारे से कुछ बात कही और वो चले गए| मुझे डॉक्टर साहब की बात ने संतुष्ट नहीं किया था इसलिए मैं अपनी जिद्द पर अड़ा रहा|

डॉक्टर साहब की बातों को आधार बना कर सभी ने मुझे समझाना शुरू कर दिया की मुझे आराम करना चाहिए और अपने मन से ये पाप-पुण्य का ख्याल निकाल देना चाहिए|

मेरी सासु माँ: मुन्ना देखो जिद्द नाहीं करो, के कहत है की तू पाप किहो है? अरे तू आपन बीवी-बच्चों की रक्षा किहो है, ई कउनो पाप नाहीं!

भाईसाहब: मानु, देखो मैंने तुम्हें उस दिन भी समझाया था न?! कोई भी कदम उठाने से पहले अपने परिवार के बारे में सोचा करो| अभी तुम पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो ऐसे में तुम्हारी ये हरिद्वार जाने की जिद्द में अगर बीच रास्ते तुम्हारी तबियत खराब हो गई तो?

अनिल: Please जीजू, आप इस तरह जिद्द मत कीजिये!

सभी ने मुझे समझाना शुरू कर दिया, कोई मेरे साथ तर्क करता कोई मुझे भावुक कर बहलाने की कोशिश करता मगर मैं टस से मस न हुआ| आखिर संगीता ने फिर अपनी चपलता दिखाते हुए मुझे अपनी कसम से बाँधना चाहा;

संगीता: आपको मेरी कसम...

संगीता अपनी बात पूरी करती उससे पहले ही मैंने उसे रोक दिया;

मैं: जान, मैं नहीं चाहता की मैं अपने गंदे हाथों से तुम्हें या अपने परिवार के किसी भी शक़्स को स्पर्श करूँ!

मैंने संगीता को भावुक करते हुए कहा तो वो फिलहाल के लिए खामोश हो गई| वो मेरी जिद्द जानती थी, अगर मैं जिद्द पर अड़ जाता हूँ तो फिर अपनी बात मनवा कर ही चैन लेता हूँ, लेकिन यहाँ मेरे स्वास्थ्य की बात थी और संगीता के शस्त्रागार में अभी एक और हथियार बचा था! ये ऐसा हथियार जिसके आगे मैं अपने हथियार डालने पर मजबूर हो जाता!

संगीता: मैं माँ-पिताजी (मेरे माता-पिता) को फ़ोन करती हूँ, वही इन्हें समझायेंगे!

संगीता नाराज़ होते हुए मेरी सासु माँ से बोली और अपना फ़ोन उठा लिया| माँ-पिताजी का नाम सुन मेरी थोड़ी सी हवा खिसक गई थी क्योंकि मेरे माँ-पिताजी मुझ पर दबाव डालकर मुझे हरिद्वार जाने से रोक लेते|

मैं: तुम्हें मेरी कसम है अगर तुमने या किसी ने भी माँ-पिताजी को फ़ोन कर के मेरे हरिद्वार जाने के बारे में बताया तो!

मैंने थोड़ा गुस्सा होते हुए संगीता से कहा तो संगीता फ़ोन मिलाते हुए रुक गई|

मैं: अनिल बेटा, एक taxi book कर हरिद्वार तक|

मैंने अनिल को हुक्म देते हुए कहा| मैंने 'बेटा' शब्द पर थोड़ा जोर देते हुए कहा था ताकि अनिल मुझे न नहीं कह सके! मेरा हुक्म मिलते ही अनिल कभी संगीता का मुँह ताके तो कभी भाईसाहब का मुँह, वो बेचारा अजीब कश्मकश में फँस गया था की वो अपने जीजू की बात सुने या फिर अपनी दीदी की बात?! संगीता से कुछ कहते नहीं बन रहा था, वो बेचारी तो मेरे गले लगने को बेकरार थी, इसलिए भाईसाहब ने ही आखरी तर्क प्रस्तुत किया;

भाईसाहब: ठीक है मानु, लेकिन पहले तुम्हें SP साहब से बात करनी होगी, बिना उनकी इजाजत के तुम कहीं नहीं जा सकते!

भाईसाहब ने जब पुलिस का नाम लिया तो मैं उनसे इस बात पर बहस नहीं कर सकता था इसलिए मैंने हाँ में सर हिलाया, भाईसाहब ने मेरे सामने ही SP साहब को फ़ोन किया और उनसे बात करते हुए कमरे से बाहर चले गए|

इधर मैंने अनिल से कहा की वो मेरे पलंग के सामने लगे हैंडल को घुमाये ताकि पलंग मेरी पीठ की तरफ से ऊँचा हो और मैं उठ कर बैठ सकूँ| अनिल ने धीरे-धीरे पलंग के सामने की ओर लगे हैंडल को घुमाया और मैं बैठने वाली स्थिति में आ गया| फिर मैंने संगीता से घर माँ-पिताजी को फ़ोन मिलाने को कहा, जब से संगीता ने उनका जिक्र किया था मुझे उनकी चिंता हो रही थी की मेरे अस्पताल में होने की बात से उन सब पर न जाने क्या बीत रही होगी|

संगीता ने फ़ोन मिलाया और मैंने उससे फ़ोन ले लिया, फ़ोन लेते समय मैंने ध्यान रखा की मैं संगीता को छू न लूँ| संगीता ने फ़ोन मेरी माँ को मिलाया था और पहली घंटी बजते ही माँ ने फ़ोन उठा लिया था;

माँ: हेल्लो?

माँ के मुँह से ये शब्द सुन कर मेरे दिल को जैसे ठंडक मिली थी और मैं एक पल के लिए आँख बंद किये हुए खामोश हो गया| उस एक पल में मैंने एक माँ-बेटे के बीच के प्यार को महसूस कर लिया था और उस प्यार को महसूस कर मेरी आँखों के आगे अचानक बड़की अम्मा का चेहरा आ गया तथा मेरा मन फिर से एक माँ-बेटे को दूर करने के लिए कचोटने लगा!

माँ: हेल्लो...बहु?

माँ को लग रहा था की फ़ोन संगीता ने किया है और संगीता की चुप्पी को सुन कर मेरी माँ का दिल फिर किसी अप्रिय घटना के बारे में सोच कर बैठा जा रहा था|

मैं: माँ

मैं अपने मन को सख्त करते हुए होश में आया और आँखें खोल कर माँ से बोला| मेरी आवाज सुन कर माँ के चेहरे पर ख़ुशी की लहार दौड़ गई, माँ का दिल बड़ी जल्दी भावुक हो जाता है इसलिए मेरी माँ की आँखों से ख़ुशी के आँसूँ भी बह निकले|

माँ: बेटा....तू कैसा है?....तू....

माँ का गला भर आया था इसलिए उनसे बोला नहीं जा रहा था इसलिए मैंने ही बात सँभाली और माँ के बिना पूछे ही उनके सवालों का जवाब देने लगा;

मैं: माँ आपको बिलकुल चिंता करने की जर्रूरत नहीं है, मैं बिलकुल ठीक हूँ| आपका आशीर्वाद मेरे साथ था तो मुझे क्या होता, बस थोड़ी सी चोट लगी थी वो भी ठीक हो रही है| डॉक्टर साहब आये थे मुझे देखने और बोले की मैं हृष्ट-पुष्ट हूँ और कल सुबह तक तो मुझे अस्पताल से discharge भी मिल जाएगा| कल सुबह जब आप यहाँ गाँव आओगे न तब मैं आपको घर (मेरे ससुराल) पर ही मिलूँगा|

मैंने माँ के सामने अपने दुःख-दर्द छुपाते हुए इस तरह बात की कि मेरी माँ के बेचैन दिल को करार आ गया|

माँ: बेटा तूने तो सच मेरी जान निकाल दी थी, लेकिन भगवान जी का लाख-लाख शुक्र है कि उन्होंने मेरे बेटे कि जान बचा ली|

माँ भगवान जी को धन्यवाद देते हुए बोलीं| इतने में पिताजी कमरे में आ गए और माँ ने अपना फ़ोन उन्हें देते हुए कहा;

माँ: मानु को होश आ गया, ये लो बात करो|

अगली आवाज पिताजी कि आई;

पिताजी: बेटा तू कैसा है?

पिताजी चिंतित स्वर में बोले तो मैंने फिर अपना झूठ दोहरा दिया;

मैं: पिताजी, आपका बेटा हँसी-ख़ुशी बैठा हुआ है! कल सवेरे तक अस्पताल से छुट्टी ले कर मैं आप सभी से घर (मेरे ससुराल) पर ही भेंट करूँगा|

मेरी आवाज में पिताजी को जरा सा भी दर्द या पीड़ा मह्सूस नहीं हुई थी, जबकि पिताजी आस लगाए बैठे थे कि मैं चन्दर को मारने के ग़म में ग्लानि से भरा बैठा हूँगा| मेरे इस विचित्र व्यवहार से मेरे पिताजी के जहन में अनेकों सवाल पैदा हो गए थे, लेकिन उनमें माँ के सामने मुझसे ये सवाल पूछने कि हिम्मत नहीं थी!

पिताजी खामोश थे और इसी बीच माँ ने नेहा को आवाज लगा दी;

माँ: नेहा मुन्नी, देख तेरे पापा जी का फ़ोन है!

इतना सुनना था की नेहा राकेट की तरह तरह दौड़ती हुई आई और पिताजी की ओर बड़ी आस से देखने लगी की पिताजी उसे फ़ोन दें| पिताजी ने फ़ोन नेहा को दिया तो नेहा से खुद को सँभाल पाना मुश्किल हो गया, वो एकदम से चीखी;

नेहा: पापा!!!!

नेहा चीखते हुए फफक कर रो पड़ी| नेहा के आँसूँ हमेशा से ही मेरी कमजोरी रहे हैं, जब वो आज यूँ फफक कर रोने लगी तो मेरा दिल टूट कर चकना चूर हो गया!

मैं: बस मेरा बच्चा! मेरा प्यारा बच्चा.....रोना नहीं....बस देखो मैं ठीक-ठाक हूँ!

मैंने नेहा का रोना रोकने की कोशिश की मगर चूँकि मैं नेहा के सामने नहीं था इसलिए नेहा के नाज़ुक से दिल को इत्मीनान नहीं आ रहा था|

मैं: अच्छा बेटा, मैं आपको video call करता हूँ|

मैंने फ़ोन काटा ओर नेहा को skype पर कॉल किया, नेहा ने एक ही घंटी बजते फ़ोन उठा लिया| मुझे अस्पताल के पलंग पर बैठे देख मेरी बच्ची का दिल दहल गया ओर उसका रोना रुकने के बजाए और तेज़ हो गया!

मैं: बस मेरा बच्चा! देखो मैं बिलकुल ठीक हूँ और आपसे बात कर रहा हूँ न?!

मैंने नेहा को प्यार से समझाया| इतने में नेहा के पीछे माँ-पिताजी और आयुष आ गए और मुझे mobile की screen में देखने लगे| मुझे यूँ देख कर सभी की आँखें नम हो गई थीं, वहीं इधर मैं अपनी बाईं बाँह का दर्द छुपा कर चेहरे पर हँसी चिपकाए अपने परिवार को धोके में रख रहा था|

मैं: मेरा बच्चा! बस, अब और रोना नहीं है वरना मैं फ़ोन रख दूँगा!

मैंने नेहा को फ़ोन रखने का डर दिखाया तो नेहा ने अपने आँसूँ पोछे और सिसकते हुए बोली;

नेहा: I...love...you...पापा...जी!

मैं: I love you too मेरा बच्चा! आपको मेरा brave बच्चा बनना है और आयुष तथा अपने दादा-दादी जी का ख्याल रखना है| Okay?

मैंने नेहा को प्यार से समझाते हुए जिम्मेदारी सौंप दी|

आयुष: पापा जी...मुझे भी आपसे बात करनी है!

आयुष अपनी भोली सी आवाज में बोला| नेहा ने आयुष को अपने साथ खड़ा किया मगर फ़ोन उसे नहीं दिया|

आयुष: पापा जी, आप कैसे हो? आपको क्या हुआ था?

आयुष को इस काण्ड के बारे में कुछ नहीं पता था, इसलिए मैंने भी उससे गोलमोल बात की;

मैं: बेटा मुझे तो कुछ नहीं हुआ, देखो मैं कितने आराम से बैठा हूँ! बस थोड़ी सी चोट लगी थी लेकिन अब मैं ठीक हूँ!

मैंने आयुष को बहलाते हुए कहा| आयुष मेरी बात में आ गया और मुस्कुराने लगा|

मैं: बेटा आप दोनों ने खाना खाया?

मैंने दोनों बच्चों से सवाल पुछा था मगर जवाब आयुष ने दिया;

आयुष: मैंने और दीदी ने तो खाया मगर दादा जी और दादी जी ने नहीं खाया! मैंने और दीदी ने उन्हें खाने को कहा था मगर दादी जी ने कहा की वो आपसे बात करने के बाद कुछ खाएँगी!

आयुष ने प्यार से अपनी दादी जी की चुगली कर दी|

माँ: बदमाश!

मेरी माँ ने आयुष को झूठ-मूठ में मारने को हाथ उठाया| ये दृश्य देख मेरे चेहरे पर हँसी आ गई और मैं हँस पड़ा! मेरे बेटे के भोलेपन ने हमारे परिवार को ख़ुशी के चंद लम्हें दे दिए थे! मेरे चेहरे पर आई हँसी देख नेहा, माँ और आयुष खुश थे, लेकिन मेरे पिताजी के चेहरे पर ख़ुशी नहीं बल्कि हैरानी झलक रही थी!

मैं: अच्छा बेटा अब आप दोनों की duty है की अपने दादा-दादी जी को अपने हाथों से खाना खिलाओ और फिर रात में train में चढ़ते समय अपने दादा-दादी जी का हाथ पकड़े रहना ताकि उन्हें चढ़ने-उतरने में समस्या न हो| फिर जब train चल पड़े तो मुझे कॉल करना और तबतक अपने दादा-दादी जी को तंग मत करना|

मैंने प्यार से दोनों बच्चों को उनकी जिम्मेदारी दी लेकिन तभी आयुष अपने उत्साह में बोल पड़ा;

आयुष: पर पापा जी, हम सब तो अभी बस से आ रहे हैं!

ये सुन कर मुझे हैरानी हुई और मैंने माँ से बात की;

मैं: माँ आपकी तो रात की train की tickets booked हैं, फिर आप बस से धक्के खा कर क्यों आ रहे हो?

माँ: बेटा, तेरे बिना मुझसे यहाँ एक पल नहीं रहा जा रहा इसलिए हम बस से आ रहे हैं|

माँ की चिंता मैं समझ रहा था मगर इस तरह उनका बस में धक्के खा कर आना मुझे खल रहा था|

मैं: नहीं माँ आप सब रात की गाडी से ही आइये, बस में पिताजी कैसे सबको सँभाल पाएंगे?! आपने देख लिया न आपका बेटा बिलकुल ठीक है फिर किस बात की चिंता है आपको?!

मैंने माँ को प्यार से समझाया मगर माँ नहीं मानी|

माँ: बेटा हम वो बड़ी वाली बस (volvo) से आ रहे हैं तो कोई दिक्कत नहीं आएगी|

माँ ने जानबूझ कर मुझसे झूठ बोला|

मैं: माँ, आपको मेरी कसम जो आप रात की train की बजाये बस से आये तो!

मैंने जोश-जोश में माँ को अपनी कसम से बाँध दिया| मेरे इस बचपने से माँ को थोड़ा गुस्सा आ गया;

माँ: बस कर! तू एक माँ के दिल को क्या समझेगा?! जानता है सुबह से यहाँ हम सब कितनी चिंता में हैं और तू इस तरह की फज़ूल की बातें करता है!

माँ का ये गुस्सा देख कर बच्चे सहम गए थे इसलिए मैंने माँ को प्यार से समझाया;

मैं: ठीक है माँ, मैं एक माँ के दिल को नहीं समझता! लेकिन आप भी तो एक बेटे की चिंता को नहीं समझ रहे?! मैं आप सबको आराम से आने को इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैं जानत हूँ की बस की 10 घंटे की यात्रा में बैठे रहने से आपके पाँव में सूजन बढ़ जाएगी! फिर मेरे पिताजी जिनकी उम्र हो गई है वो कैसे आपको और मेरे दोनों शैतान बच्चों को सँभालेंगे?! नेहा तो फिर भी समझदार है एक seat पर बैठी रहेगी मगर आयुष जोशीला है वो कहाँ एक जगह टिक कर बैठेगा?! इसलिए मैं आपसे हाथ जोड़ कर विनती करता हूँ की आप सब रात की गाडी (train) से ही आइये|

मैंने माँ को प्यार से समझाया| थोड़ी न-नुकुर के बाद आखिर मैंने अपनी माँ को रात की train से आने के लिए मना ही लिया|

माँ: ठीक है बेटा, तू जीता मैं हारी!

माँ मेरे आगे हाथ जोड़ते हुए प्यार से बोलीं|

माँ: मैंने तेरी बात मानी न, अब तू मेरी बात मान, पहले खाना खा और पूरा आराम कर...

माँ आगे कुछ कहें उससे पहले ही मैं बोल पड़ा;

मैं: मैं इधर खाना खाता हूँ और आप सब उधर खाना खाइये|

फिर मैंने नेहा की duty लगाते हुए कहा;

मैं: नेहा बेटा, आपको अपने हाथ से अपने दादा-दादी जी को खाना खिलाना है और फिर मुझे फ़ोन कर के बताना है| अगर आपके दादा-दादी जी खाना न खाएं तो मुझे तुरंत फ़ोन करना, मैं डाटूँगा उनको!

मेरी बात सुन दोनों बच्चे हँस पड़े और उनके साथ मेरी माँ भी हँस पड़ीं|

तो इस तरह से मैंने झूठ और प्यार का सहारा ले कर अपने परिवार से दूर होते हुए भी उन्हें चिंता के सागर से बाहर निकाल लिया था, अब रह गया था तो बस मेरे सामने मौजूद मेरे परिवार को सँभालना|

मैं: आप सब मेरे कारण सुबह से भूखे-प्यासे होंगे, चलिए आप सभी जा कर कुछ खाइये|

मैंने भाईसाहब और अपनी सासु माँ की तरफ देखते हुए कहा, परन्तु मेरे कहने को कोई असर नहीं हुआ क्योंकि कोई भी अपनी जगह से हिला तक नहीं|

मैं: जान, तुम अनिल के साथ जाओ और सबके खाने के लिए कुछ ले कर आओ|

मैंने संगीता की duty लगाई तो वो मुझे गुस्से से देखते हुए अनिल को अपने साथ ले कर चली गई| संगीता को गुस्सा इसलिए आ रहा था क्योंकि मैं अपनी हरिद्वार की जिद्द पकड़े बैठा था और ऐसा दिखा रहा था जैसे ये कोई बड़ी बात हो ही न! जबकि मुझे संगीता के गुस्सा होने पर न जाने क्यों प्यार आ रहा था|

खैर, जब संगीता और अनिल गए तो एक बार फिर भाईसाहब और मेरी सासु माँ ने मुझे प्यार से समझना शुरू कर दिया की मैं अपनी जिद्द छोड़ दूँ, लेकिन मैं अपनी बात पर अडिग रहा| 5 मिनट बाद अनिल लौटा और उसके दोनों हाथों में चाय और जेब में biscuit के packet थे| अनिल ने चाय रखी मगर किसी ने चाय को हाथ नहीं लगाया, इतने में संगीता गुस्से में कमरे में आई और अपने साथ एक थैली भर कर मेरे लिए फल ले आई| संगीता ने फलों की थैली से एक सेब निकाला और उसे धो कर मुझे दिया, संगीता की नाक पर जो गुस्सा बैठा था उसे देख कर मुझे डर नहीं हँसी आ रही थी|

इधर मेरा मन कुछ खाने का नहीं था मगर मैं जानता था की मैंने अगर खाने में आनाकानी की तो संगीता मुझ पर बरस पड़ेगी इसलिए उसका दिल रखने के लिए मैंने सेब ले लिया| लेकिन सेब मैंने इस कदर लिया की कहीं संगीता मुझे छू न ले! मेरे द्वारा की जा रही इस छुआ-छूत से संगीता को बहुत गुस्सा आ रहा था और उसका ये गुस्सा मुझे हँसने पर मजबूर कर रहा था|

बहरहाल मैं सेब खाने लगा और तब जा कर सबने चाय पीनी शुरू की, लेकिन संगीता ने अपनी चाय नहीं छुई|

मैं: जान, चाय पियो वरना मैं सेब नहीं खाऊँगा|

मैं प्यार से संगीता को blackmail किया तो संगीता गुस्से से मुझे देखती हुई चाय पीने लगी| इतने में नेहा ने संगीता के नंबर पर मुझे कॉल किया और मुझे बताने लगी की उसने और आयुष ने मिल कर माँ-पिताजी को समोसे खिला दिए हैं| बच्चों का दिल अपने पापा जी को देखने के लिए बेचैन था इसलिए वो मुझसे आज कुछ अधिक बात कर रहे थे| हम बाप-बेटा-बेटी की बात आगे होती उससे पहले ही SP साहब आ गए;

मैं: बेटा, मैं आपको थोड़ी देर बाद फ़ोन करता हूँ|

आयुष: क्यों पापा जी?

आयुष अपनी मासूम सी आवाज में बोला|

नेहा: पापा जी थक गए हैं, उन्हें आराम करने दे!

नेहा ने आयुष को समझाया और फिर मुझसे बोली;

नेहा: पापा जी, आप है न आराम करो हम आपको और disturb नहीं करेंगे| हम है न आपको रात को train में बैठने के बाद ही कॉल करेंगे|

नेहा की बात सुन मुझे उस पर प्यार आ रहा था;

मैं: ठीक है बेटा जी!

मैंने फ़ोन रखा और SP साहब से नमस्ते की|

भाईसाहब: मानु, ये हैं हमारे जिले के SP साहब और मेरे साले साहब!

भाईसाहब मुस्कुराते हुए बोले और मेरा तार्रुफ़ अपने साले साहब से बड़े गर्व से कराया|

SP साहब: तो मानु जी, अब कैसी तबियत है आपकी?

SP साहब ने मेरे साथ बात शुरू करते हुए कहा|

मैं: जी बहुत बेहतर है|

मैंने बड़े आत्मविश्वास से झूठ बोला, मेरा झूठ सुन संगीता मुझे घूर कर देखने लगी की कैसे मैं सबके सामने धड़ल्ले से SP साहब से झूठ बोल रहा हूँ|

SP साहब: अरे वाह!

SP साहब मेरा झूठ पकड़ चुके थे इसलिए उनके चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी|

SP साहब: तो मानु जी, वैसे तो मैं सारी हकीकत अम्मा जी (मेरी सासु माँ) से और संगीता दीदी से सुन चूका हूँ लेकिन कागजी करवाई के लिए मुझे आपका ब्यान दर्ज़ करना है|

SP साहब ने अपनी बात इत्मीनान से कही| उनकी बात सुन मैं एकदम से गंभीर हो गया और मैंने SP साहब को सारी बात बतानी शुरू की;

मैं: Sir...

मैं इसके आगे कुछ कहता उससे पहले ही SP साहब ने मुझे रोक दिया और बोले;

SP साहब: अरे मानु जी, आप क्यों मेरे साथ formal हो रहे हो? हम सब एक परिवार के हैं इसलिए आप मुझसे एक परिवार के सदस्य की तरह ही बात कीजिये, मुझे sir नहीं प्रशांत कहिये|

SP साहब मुस्कुराते हुए बोले|

मैं: Sir मैं जनता हूँ हम एक परिवार का हिस्सा हैं लेकिन इस समय आप और मैं रिश्ते से नहीं बँधे बल्कि मेरे लिए आप एक कानून के नुमाइंदे हैं इसलिए मैं आपको 'sir' ही कहूँगा| फिर आप मेरे से उम्र में भी बड़े हैं और ऐसे में मैं आपको आपके नाम से तो कतई नहीं बुला सकता!

मेरी बातें सुन SP साहब को मुझ पर बड़ा गर्व हुआ| वहीं संगीता जो अभी तक मुझपर गुस्सा थी उसे भी मुझ पर गर्व हो रहा था| खैर मैंने अपनी बात जारी रखी;

मैं: Sir जिस दिन मेरे ससुर जी की मृत्यु हुई, हम मियाँ-बीवी उसी दिन गाँव पहुँचे थे| श्मशान से लौटते वक़्त चन्दर मुझे रास्त में मिला था और उसी समय उसने मुझे और फिर संगीता को जान से मारने की धमकी दी थी| उसकी धमकी से मैं तिलमिला गया और उसे मारने के लिए उस पर लपका, मैंने उसे 2-4 मुक्के ही मारे थे की तभी अनिल ने पीछे से आ कर मुझे खींच कर चन्दर से दूर कर दिया| मैं बहुत गुस्से में था इसलिए अनिल से मुझे सँभाला नहीं जा रहा था, तभी भाईसाहब आये और उन्होंने मुझे कस कर पीछे से पकड़ लिया| मैं भाईसाहब की पकड़ से छूटने के लिए छटपटा रहा था इसलिए भाईसाहब ने अनिल से कहा की वो चन्दर को भगा दे ताकि मेरा गुस्सा शांत हो जाए| अनिल ने चन्दर को भगा दिया और मेरा गुस्सा धीरे-धीरे शांत होने लगा तथा हम तीनों घर लौट आये|

मैंने अपनी बात बड़े इत्मीनान से कही ताकि SP साहब मेरी कही सारी बात आराम से लिख सकें| उधर संगीता ने जब ये बात सुनी तो उसका पारा चढ़ गया, आखिर मैंने उससे इतनी बड़ी बात जो छुपाई थी!

संगीता: आपने इतनी बड़ी बात मुझसे छुपाई?

संगीता पहले ही मेरे हरिद्वार जाने की जिद्द के कारन भरी बैठी थी उस पर जब उसे इतनी बड़ी बात का पता चला तो वो गुस्से में मुझ पर बरस पड़ी|

संगीता: और तू अनिल, तूने भी मुझे ये बात नहीं बताई?

संगीता ने अनिल के कान खींचते हुए गुस्से से पुछा| अब मुझे ही अपने साले साहब का बचाव करना था;

मैं: मैंने ही तुम्हें कुछ भी बताने से अनिल और भाईसाहब को मना किया था!

मेरी बात सुन संगीता ने अनिल के कान छोड़ दिए और मुझे गुस्से से देखने लगी|

मैं: यार तुम पहले ही घर आ कर रो-रो कर बदहवास हो गई थी और ऐसे में मैं तुम्हें ये बात बता कर और परेशान नहीं करना चाहता था!

मैंने संगीता को अपनी सफाई दी तो वो SP साहब की मौजूदगी का लिहाज़ कर कुछ शांत हुई| बहरहाल, मैंने अब अपना ध्यान SP साहब की ओर केंद्रित किया और अपना ब्यान देना जारी रखा;

मैं: Sorry sir! मैं अपने ब्यान देने से भटक गया था|

मैंने SP साहब से ब्यान देने की बजाए संगीता का गुस्सा शांत करने में ध्यान लगाने पर माफ़ी माँगी|

मैं: अगले दिन सुबह-सुबह अनिल, भाईसाहब और चरण काका फूल चुगने के लिए श्मशान गए थे, मैं नहीं जा पाया क्योंकि मुझे sinus की समस्या है तथा सुबह मेरा छींक-छींक कर बुरा हाल हो गया था| सबके जाने के कुछ देर बाद की बात है, मैं, मेरी सासु माँ और संगीता आंगन में बैठे बात कर रहे थे| जब मेरी नज़र चन्दर पर पड़ी जो की हमारे घर की ओर ही आ रहा था, संगीता और सासु माँ की पीठ चन्दर की ओर थी इसलिए उन्होंने अभी तक चन्दर को नहीं देखा था| मैंने गौर किया तो पाया की चन्दर के दाएँ हाथ में कट्टा था जिसे वो बड़े ताव में घुमा रहा था, उसके हाथ में कट्टा देख मैं समझ गया की वो यहाँ अपनी कल की दी हुई धमकी को सिद्ध करने आया है| अगर मैं अकेला होता तो शायद मदद लेने के लिए भाग जाता मगर मेरे सामने संगीता और मेरी सासु माँ बैठे थे, मेरे भागने से दोनों की जान खतरे में पड़ जाती इसलिए मैंने पीने का पानी माँगने का बहाना कर संगीता को घर के भीतर भेज दिया| फिर मैंने थोड़ी होशियारी दिखाते हुए अपनी सासु माँ को भी मेरी दवाई लाने के बहाने से घर के भीतर भेज दिया| उसके बाद मैंने अपनी चालाकी दिखाते हुए दोनों (मेरी सासु माँ और संगीता) को घर के भीतर बंद कर दिया ताकि मेरी और चन्दर की झड़प के बीच में कोई न आये, क्योंकि किसी की भी दखलंदाजी से कोई भी जख्मी हो सकता था जो की मैं नहीं चाहता था|

चन्दर ने घर के आंगन में आते ही मुझ पर कट्टा तान दिया था, या बात साफ़ थी की वो यहाँ मुझे और फिर मेरी पत्नी संगीता को मौत के घाट ही उतारने आया है| मेरा इरादा बस अपनी और अपने परिवार की जान बचाने का था, कट्टा अपने सामने देख कर भी मेरे मन में चन्दर को जान से मारने का ख्याल नहीं आया था| मेरा इरादा केवल चन्दर को बुरी तरह से पीटने और उसके हाथ-पैर तोड़ने का था| चन्दर मुझ पर कट्टा चलाये उससे पहले ही मैंने उसे उकसाना शुरू कर दिया और अपनी बातों में उलझाते हुए उसका ध्यान बँटा दिया| चन्दर को बातों में उलझा कर मैं धीरे-धीरे उसके नजदीक पहुँच गया था| फिर मौका पा कर मैंने उससे कट्टा छीनने की कोशिश की और फिर शुरू हुई हमारे बीच छीना-झपटी जिसमें मैंने चन्दर को अड़ंगी देते हुए नीचे गिरा दिया तथा उसके हाथ से कट्टा छूट गया| मैंने कट्टा दूर फेंकना चाहा मगर मैं कट्टा ज्यादा दूर नहीं फेंक पाया| मैं चन्दर के छाती पर चढ़ बैठा और उसके चेहरे पर घूसे बरसाने लगा, मौका पा कर चन्दर ने मुझे लात से धक्का दे कर पीछे की ओर गिरा दिया| मैं सँभलता उससे पहले ही चन्दर ने कट्टा उठाना चाहा मगर इससे पहले की चन्दर कट्टा उठाये मैंने चन्दर को कमर से पकड़ कर पीछे खींच कर गिरा दिया तथा कट्टा उठा कर दूर फेकने के इरादे से कट्टा उठाने को आगे बढ़ा| लेकिन इससे पहले की मैं कट्टा उठाऊँ, चन्दर ने अपनी पैंट की जेब से चाक़ू निकाल लिया तथा मुझे देखते हुए चाक़ू खोलने लगा| अब खाली हाथ तो मैं चन्दर का मुक़ाबला कर नहीं सकता था इसलिए मैंने कट्टा उठाने के लिए छलाँग लगा दी, इस समय भी मेरे मस्तिष्क में चन्दर को कट्टे का डर दिखा कर भगाने का इरादा था| लेकिन इससे पहले की मैं कट्टा उठा कर खड़ा हूँ, चन्दर मुझे मारने के लिए चाक़ू ले कर मुझ पर कूद पड़ा था| ज़मीन पर लेटे हुए जैसे ही मैं कट्टा उठा कर पलटा की मुझे चन्दर मेरे ऊपर हमला करता हुआ दिखाई दिया, मेरे पास कुछ भी सोचने-समझने का मौका नहीं था इसलिए आनन-फानन में मेरे हाथों कट्टा चल गया!

कट्टा चला और मैंने गोली को चन्दर के सीने में घुसते हुए देखा, लेकिन फिर अगले ही पल चन्दर जो मुझ पर चाक़ू ले कर लपका था वो चाक़ू चन्दर समेत मेरे बाएँ कँधे में आ धँसा! मैं दर्द से चिल्लाया और किसी तरह से चन्दर को अपने ऊपर से हटाया, तब मुझे नहीं पता था की चन्दर जिन्दा है या मर चूका है?! मैंने उठ कर घर का दरवाजा खोलना चाहा मगर मेरे जिस्म में ताक़त नहीं बची थी और हर पल होश कम होता जा रहा था! बस उसके बाद मुझे नहीं पता की क्या हुआ क्योंकि जब मैं होश में आया तो मैं अस्पताल में था!

मैंने सारी बात शुरू से अंत तक बताई तो मेरी बात सुन सभी काफी चिंतित हुए, अब जा कर सब को पता चला था की किन हालातों में मेरे हाथों गोली चली थी|

SP साहब ने मेरा इक़बालिया ब्यान लिख लिया था, उन्होंने मुझे एक बार सारा ब्यान पढ़कर दस्तखत करने को बोला, मैंने सारा ब्यान पढ़ा और दस्तखत कर दिए|

इधर भाईसाहब ने SP साहब को मेरी जिद्द के बारे में फ़ोन पर ही सब बता दिया था और अब SP साहब मुझे इसी बारे में समझाने वाले थे;

SP साहब: कत्ल के मामले में जब हम ब्यान दर्ज़ करते हैं तो कौन झूठ बोल रहा है, कौन फायदा उठाने के चक्कर में है और कौन असली कातिल है ये सब हम पुलिस वाले जल्दी भाँप जाते हैं| ख़ास कर जो असली मुजरिम होता है. उसके हाव-भाव, उसके चेहरे पर मौजूद ग्लानि हम पुलिस वालों से कभी नहीं छुप पाती| लेकिन मानु जी, जब आप अपना ब्यान दे रहे थे तब आपके चेहरे पर या आपकी बातों में कोई ग्लानि नहीं थी| चन्दर जब आप पर कट्टा ताने खड़ा था तब भी आपके मन में उसे जान से मारने की कोई इच्छा नहीं थी, यहाँ तक की जब आपने कट्टा उठाया था तब भी आप बस केवल चन्दर को डरा कर भगाना चाहते थे| आपसे गोली चली क्योंकि आप अपनी और अपने परिवार की जान बचाना चाहते थे, it's a clear case of self defence! तो आखिर आपको क्यों लगता है की आपके हाथों कोई पाप हुआ है, जिसे धोने के लिए आप इस हालत में हरिद्वार जाना चाहते हो?

SP साहब का सवाल सुन मैं समझ गया की भाईसाहब ने ही उन्हें मेरी जिद्द के बारे में बताया है|

मैं: भैया (SP साहब), मुझे ग्लानि चन्दर की हत्या करने के लिए नहीं है अपितु उसकी माँ यानी मेरी बड़की अम्मा की गोद उजाड़ने की है! एक माँ को उसके बेटे से अलग करने के पाप ने मेरा मन भारी कर रखा है और इस पाप से छुटकारा पाने के लिए ही मैं हरिद्वार जाना चाहता हूँ| जब तक मैं गंगाजी में डुबकी लगा कर अपने पाप से निजात नहीं पा लेता तबतक मैं अपने परिवार में से किसी भी व्यक्ति को स्पर्श नहीं कर सकता क्योंकि मेरा मन कहता है की मेरे किसी को छूने से इस पाप का दुष्प्रभाव उनके जीवन पर अवश्य पड़ेगा! संगीता माँ बनने वाली है और मैं नहीं चाहता की मैं अपने इन पापी हाथों से अपनी होने वाली संतान को या उसकी माँ को स्पर्श करूँ!

मैंने इस बार अपनी बात SP साहब को भैया कहते हुए शुरू की थी क्योंकि अब जो हम बात कर रहे थे ये पारिवारिक बात थी न की कानूनी बात| बहरहाल, मेरी बातों में कोई तर्क नहीं था ये बात तो बस मेरी अपनी भावनाओं और विश्वास से जुडी थी| मैं अपनी जिद्द पर अडिग था इसलिए SP साहब ने हार मान ली और मुस्कुराते हुए अपने जीजा जी से बोले;

SP साहब: जीजा, जब कोई इंसान दिल से सोचता है न तो आप उसे कितना भी समझाओ वो नहीं समझता| SP साहब के हार मान जाने से अब मेरा रास्ता आसान था, अब मुझे कोई भी हरिद्वार जाने से नहीं रोक सकता था| ये बात संगीता भी जान गई थी इसलिए उसकी नाक पर अब भी गुस्सा बैठा हुआ था, जब SP साहब ने संगीता को गुस्से में देखा तो वो हम पति-पत्नी के बीच की लड़ाई समझ गए और संगीता को शांत करते हुए बोले;

SP साहब: दीदी, मानु जी सच में बातों के धनी हैं इसलिए अब आप उनसे नाराज़ मत होना!

SP साहब मज़ाकिया ढंग से बोले और फिर अपने हवलदार को बुला कर उसे बड़े doctor साहब को बुलाने को कहा|

बड़े डॉक्टर साहब के आने तक SP साहब मुझे मेरे case के बारे में बताने लगे;

SP साहब: देखो मानु जी, ये case मैं handle कर रहा हूँ| आपको court में पेश न होना पड़े उसके लिए मैंने यहाँ के बड़े डॉक्टर साहब से कह कर आपकी report कुछ यूँ बनाई है की आप 3 महीने तक बिस्तर से उठ नहीं सकते| इसके अलावा court में आपका जो case चलेगा उसमें मैं आपको victim बना रहा हूँ, जिसने अपनी आत्मरक्षा में गोली चलाई थी| ऐसे case में बस हमें चन्दर को आरोपी साबित करना है जो की मेरे लिए इतना मुश्किल नहीं होगा| चूँकि कट्टा चन्दर लाया था तो जिस आदमी ने उसे कट्टा बेचा था वही गवाही देगा की चन्दर ने कट्टा आपको मारने के लिए खरीदा था| इसके अलावा एक चश्मदीद गवाह मैं पकड़ कर लाऊँगा जो की ये गवाही देगा की उसने ये काण्ड होते हुए देखा था| तो आपको इस case को ले कर कोई चिंता नहीं करनी है, आप बस अपना ध्यान रखो|

SP साहब की बात सुन मुझे इत्मीनान हो गया की कम से कम मेरा परिवार कचेहरी के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे|

इतने में बड़े डॉक्टर साहब आ गए और SP साहब ने उन्हें सारी बात समझाई;

SP साहब: डॉक्टर साहब, मेरे जीजा जी के पिताजी की अस्थि विसर्जन के लिए मानु को जाना है इसलिए जबतक मैं न कहूँ आप मानु के discharge papers मत बनाइयेगा| आपके अस्पताल के records में मानु अब भी यहीं admit है ऐसा ही दिखाइयेगा|

SP साहब के डर के मारे डॉक्टर साहब कुछ नहीं बोले, वे बस अपना सर हाँ में सर हिलाने लगे| बड़े डॉक्टर साहब चले गए तब SP साहब अपने जीजा जी (भाईसाहब) से बोले;

SP साहब: जीजा जी, मैं आप सभी के हरिद्वार जाने के लिए गाडी भिजवाता हूँ|

SP साहब पहले ही case को ले कर हमारी इतनी मदद कर रहे थे, ऐसे में उनका यूँ हमारे हरिद्वार जाने के लिए अपनी गाड़ी भेजना मुझे ठीक नहीं लग रहा था|

मैं: नहीं भैया, आप पहले ही हमारे लिए इतना कुछ कर रहे हैं, मैं अब आपको और कष्ट नहीं देना चाहता! गाडी का इंतज़ाम हमने पहले ही कर लिया है, आपने बस जो डॉक्टर साहब से मेरी जाने की अनुमति दिला दी वही काफी है|

मेरी बात सुन SP साहब मुस्कुराते हुए बोले;

SP साहब: मैंने कोई मदद नहीं की, मैंने अपना फ़र्ज़ निभाया है| फिर आप तो वैसे भी बेगुनाह हो और एक बेगुनाह को बचाना मेरा कर्तव्य भी है!

SP साहब में कोई भी अकड़, गुमान नहीं था इसीलिए वो हम सब से इतना प्यार से बात कर रहे थे|

मैं: भैया मैं आपकी बात समझता हूँ लेकिन आपका यूँ अपनी गाडी हमारे साथ भेजना कहीं आपके औदे के गलत इस्तेमाल करने पर कोई सवाल न खड़ा कर दे|

मैंने अपनी बात थोड़ी गोल घुमा कर कही, कारण था SP साहब का मुझसे उम्र में बड़ा होना| वहीं मेरी बात सभी को समझ आ गई थी इसलिए इस बार सभी मेरे साथ हो गए थे;

भाईसाहब: ये तुमने बिलकुल ठीक कहा मानु|

संगीता: हाँ प्रशांत भैया, हम नहीं चाहते की हमारे कारण आपकी नौकरी पर, आपके पद पर कोई भी सवाल उठाये|

SP साहब सभी के मना करने पर कुछ न कह पाए और हार मानते हुए बोले;

SP साहब: ठीक है, मैं आप सभी की बात का मान रखता हूँ|

फिर उन्होंने अपने हवलदार को आवाज दे कर भीतर बुलाया और उसे हमारे लिए private taxi मँगाने को कहा|

कुछ देर बाद SP साहब सबसे विदा ले कर चले गए, उनके जाने के बाद एक नर्स आई जिसने मेरे बाएँ हाथ को support देने के लिए एक ख़ास तरह की belt पहनाई| Belt काफी आरामदयाक थी और मेरे बाएँ हाथ को आरामदायक support मिल रहा था, फिर नर्स ने मुझे दी जाने वाली सभी दवाइयाँ तथा मुझे बैठते-लेटते समय क्या-क्या एहतियात बरतनी है वो मुझे अच्छे से समझाई| संगीता ने सभी बातें बड़े ध्यान से सुनी और अनिल को डाँटते हुए सारी बात कागज में लिख कर रखने को भी कहा| मेरे कारण संगीता को आया गुस्से सारा अनिल पर उतर रहा था और मैं बेचारे अनिल पर तरस खाते हुए खामोश बैठा था|

खैर, 7 बजे अस्पताल की ओर से मेरे लिए खाना आ गया, अब अगर मैं खाना नहीं खाता तो संगीता मुझे कहीं नहीं जाने देती इसलिए मैंने चुप कर के खाने का फैसला किया|

मैं: भाईसाहब ने आपके और माँ (मेरी सासु माँ) के घर जाने का प्रबंध कर दिया है| मुखिया जी अपनी गाडी ले कर आते होंगे, आप दोनों उनके साथ घर चले जाना और घर पहुँचते ही मुझे फ़ोन करना|

मैंने प्यार से संगीता से बात की तो उसका गुस्सा कुछ कम हुआ|

मैं: और माँ आप संगीता को खाना खिला देना, वरना ये पगली मेरी चिंता करतेहुए खाना नहीं खायेगी|

मैंने अपनी सासु माँ को संगीता को खाना खिलाने की जिम्मेदारी दे दी| मैंने संगीता को 'पगली' कह कर उसे आखिर मुस्कुराने पर विवश कर ही दिया था|

जैसे ही मेरा खाना खत्म हुआ की हमारी हरिद्वार जाने वाली taxi आ चुकी थी| जब मैं पलंग पर से उठ कर खड़ा होने लगा तो ऐसा लगा जैसे मैं चलना ही भूल गया हूँ! मुझे कमजोरी बहुत थी और मैं अपनी ये शारीरिक कमजोरी सभी से छुपाना चाहता था, क्योंकि अगर किसी को ये कमजोरी दिख जाती तो मुझे कोई अस्पताल के पलंग से उठने नहीं देता! मैं बहुत संभल कर उठा और सोचने लगा की कैसे अपनी ये कमजोरी छुपाऊँ, तभी ward boy एक wheel chair ले कर आ गया| वो wheel chair देख कर मैंने राहत की साँस ली की अब कम से कम मुझे गाडी तक चल कर जाना नहीं पड़ेगा| Ward boy का सहारा ले कर मैं wheel chair पर बैठ गया और उसे धीमी आवाज में "thank you" बोला| Ward boy मेरी wheel chair को धकेलते हुए बाहर लाया और मैं किसी तरह से फिर खड़ा हुआ और taxi में बैठने लगा| चूँकि मैं बस अपने दाएँ हाथ का ही इस्तेमाल कर सकता था इसलिए taxi में बैठना मेरे लिए एक चुनौती थी| बड़ी मुश्किल से मैं taxi में बैठा, लेकिन बैठते-बैठते ही मेरा बायाँ हाथ थोड़ा गाडी की seat से रगड़ खा गया जिससे मेरा दर्द बढ़ गया! मैंने दातों तले अपने होंठ दबा कर अपनी दर्द भरी आह रोकी और दूसरी ओर मुँह कर के बैठ गया| शुक्र है की किसी ने मेरा दर्द से फीका पड़ा चेहरा नहीं देखा था वरना सब मुझे खींच कर वापस अस्पताल के भीतर ले जाते!

भाईसाहब driver साहब की बगल वाली सीट पर बैठने वाले थे, संगीता ने अनिल को इशारे से मेरे साथ बैठने को कहा| अनिल मेरे पास बैठा ही था की संगीता ने एकदम से अनिल के कान उमेठ दिए;

संगीता: मेरी बात ध्यान से सुन! जब तुम सब खाना खाने रुकोगे तब इन्हें (मुझे) भी कुछ हल्का-फुल्का खिला दियो! इनकी दवाई का ख़ास ध्यान रखिओ और मुझे माँ के फ़ोन पर sms कर के पल-पल की खबर देता रहिओ की तुम सब कहाँ पहुँचे हो! इनको तेरे सहारे छोड़ रही हूँ इसलिए अगर रास्ते में इनकी तबियत कहीं भी गड़बड़ाई तो तू उसी वक़्त गाडी वापस घूमा कर यहाँ वापस लौटेगा...समझा! फिर चाहे ये (मैं) तुझे कितना रोकें, कितना ही डाटें तू इनकी एक नहीं सुनेगा...समझा! अगर इन्हें कुछ हो गया न तो मैं तुझे जान से मार दूँगी!

संगीता ने अनिल को इस कदर तड़ी दी की बेचारा डर के मारे काँप गया था! संगीता ने बेचारे अनिल की खाट खड़ी कर दी थी और अनिल अपनी दीदी की डाँट से घबरा गया था| जो बात मुझे बुरी लगी थी वो थी संगीता का अपने भाईसाहब पर भरोसा न कर के अनिल पर भरोसा करना जो की खुद अभी बच्चा ही था! खैर अनिल की जान बचाने के लिए मैं उसकी तरफदारी करते हुए बोला;

मैं: अच्छा अब आप मेरे साले साहब के कान छोड़ भी दो, देखो बेचारा कितना डर गया है?!

मैंने संगीता को मस्का लगाने के लिए इस तरह प्यार से बात की थी| संगीता ने मेरी बात सुन कर अनिल का कान छोड़ दिया| तभी चरण काका गाँव के मुखिया जी की गाडी में आ गए;

भाईसाहब: अम्मा, देखो मुखिया जी और चरण काका आई गए, तू दुनो जन उनका साथे घर निकर जाओ|

भाईसाहब ने सासु माँ को प्यार से समझाते हुए कहा तथा उन्हें मुखिया जी की गाडी में बिठा आये| सासु माँ, संगीता और चरण काका की गाडी घर जाने के लिए पहले निकली, उनके पीछे-पीछे हमारी गाडी हरिद्वार के लिए निकली|
[color=rgb(184,]जारी रहेगा भाग 8 में...[/color]
 
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