[color=rgb(51,]उनत्तीसवाँ अध्याय[/color][color=rgb(51,]: मुश्किलों भरी [/color][color=rgb(51,]शुरुआत[/color]
[color=rgb(255,]भाग -5[/color]
[color=rgb(251,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]
गुस्से और नफरत से अंधे मेरे दिमाग ने इनके अभी तक के प्यार को धोके का नाम दे दिया था! मुझे इस समय ऐसा लग रहा था जैसे की मेरे साथ बहुत बड़ा विश्वासघात हुआ हो, खुद को निसहाय महसूस करने की बजाए मेरे सर पर बदले का भूत सवार हो चूका था| जलन की आग मेरे जिस्म में इस कदर भड़क चुकी थी की मुझे धीरे-धीरे भीतर से जलाती जा रही थी| अपनी इसी जलन की आग के चलते मैंने मन ही मन सोच लिया था की वापस जा कर मैं माँ से सब कुछ कह दूँगी, फिर चाहे जो हो इनके साथ, मेरी बला से! अब बस मुझे घर पहुँचने तक अपने गुस्से को काबू में रखना था ताकि कहीं मैं कुछ गलत न कह दूँ जिससे माँ के आगे मेरा पलड़ा हल्का न पड़ जाए!
वो पूरी रात मैं सो न सकी, मेरे दिल में इनकी बातें चुभती रहीं और जहन में गुस्से और जलन की आग जलती रही| ये भी रात भर बेडपोस्ट से पीठ लगाए खामोश बैठे रहे, न ही रात में इन्होने मुझसे कोई बात करने की कोशिश की और न ही मैंने पलट कर इन्हें देखा की ये जाग रहे हैं या सो रहे हैं|
अगली सुबह ये तैयार हुए मगर मैं अब भी उसी करवट लेटी थी जिस करवट कल रात लेटी थी|
[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]
"हाँ...नाश्ता?" इन्होने कड़क आवाज में मुझसे नाश्ता करने के बारे में पुछा| मैंने भी अपनी कड़क आवाज में जवाब दिया; "मैं खुद मँगा लूँगी!" मेरा जवाब सुन इन्होने और कुछ नहीं कहा तथा अपनी मीटिंग निपटाने के लिए बिना कुछ खाये चले गए| अगर आज ये मीटिंग में न जाते तो शायद कम खून खौलता मेरा मगर जिस तरह से इन्होने अभी मुझसे अकड़ कर बात की थी और अपने काम को अधिक तवज्जो देते हुए मुझे अकेला होटल के कमरे में छोड़कर चले गए थे उससे मेरा गुस्सा कम होने की बजाए अधिक बढ़ गया था!
इनके जाने के बाद मैं अपने गुस्से में कुढ़ती रही और करीब आधे घंटे बाद गुस्से और भूख के मारे जलती हुई उठी| मुझे बहुत जोर से भूख लगी थी, मैंने फटाफट ब्रश किया और कल की रात जो मैंने नाइटी पहनी थी उसे गुस्से से उतार फेंका; "हुँह!!! क्या फायदा हुआ इतनी मेहनत करने का जब ये ही धोकेबाज निकले!" मैं गुस्से में बड़बड़ाई| गुस्से की आग मेरे सर पर बहुत अच्छे से सवार थी और अपने इसी गुस्से में जलते हुए मैंने सोचा की मैं भूखी रहती हूँ, लेकिन फिर मैंने सोचा की धोकेबाजी करें ये और भूखी रहूँ मैं, ये कहाँ का इन्साफ है? "मैं तो खाऊँगी और वो भी जो मेरा दिल करेगा|" मैं गुस्से में बोली और होटल के रिसेप्शन पर कॉल किया तथा सुबह के नाश्ते में अपने लिए पिज़्ज़ा मँगाया! पिज़्ज़ा आया तो मैंने टी.वी. की आवाज तेज़ की और गुस्से से पिज़्ज़ा खाते हुए टी.वी. देखती रही|
कुछ देर बाद इन्होने मुझे फ़ोन किया, ये पूछने के लिए की मैंने नाश्ता किया या नहीं मगर मैंने जानबूझ कर फ़ोन नहीं उठाया| ये अपने गुस्से में होते हुए भी मेरा हाल-चाल जानने को चिंतित थे जबकि मैं अपने गुस्से में जलते हुए इनकी कोई चिंता किये बिना मज़े से पिज़्ज़ा खा रही थी|
दोपहर हुई और सवा बारह बजे, मुझे पता था की ये दोपहर को लौटेंगे और मुझे खाना खाने को कहेंगे| अब मुझे दिखाना था इन्हें अपना गुस्सा और अपना गुस्सा दिखाने के लिए इनके सामने खाना न खा कर इनका खून जलाने से अच्छा जरिया क्या हो सकता था? लेकिन भूखी तो मैं रहने वाली थी नहीं इसलिए मैंने इस बार अपने लिए मँगाया पास्ता! मैंने अपना सारा गुस्सा खाना खाने पर निकाला था, अगर ये आज दिनभर न आते तो मैं अलग-अलग तरह का खाना मँगा कर अपना सारा गुस्सा स्वादिष्ट खाना खा कर निकालती रहती!
पास्ता खाते हुए मैंने जो बात गौर की वो ये थी की इनके मन के भीतर जरा सी भी ग्लानि नहीं थी! पहले जब ये गलती करते थे, या मेरे दिल को चोट पहुँचाते थे तो इनका मन हमेशा ग्लानि से कचोटता था और ये सीधा आ कर मुझसे माफ़ी माँग लिया करते थे| परन्तु इस बार ऐसा नहीं हुआ था, रात भर न तो इन्होने मुझे मनाने की कोशिश की और न ही सुबह मुझसे प्यार से बात शुरू की बल्कि ये तो सुबह बड़े उखड़े हुए थे! मेरे गुस्से से पागल दिमाग ने कहा की; 'मुझे इनको खुद के आगे झुकाना होगा, इनसे माफ़ी मँगवानी होगी, इन्हें इनकी गलती का एहसास करवाना होगा! इनके सामने खाना खाने से मना कर मैं इन्हें पहले ग्लानि महसूस करवाऊँगी तथा फिर इनसे हाथ जोड़कर, नाक रगड़वा कर माफ़ी मँगवाऊँगी!' लेकिन मैंने ये नहीं सोचा था की जब ये माफ़ी मांगेंगे तो में इन्हें माफ़ करूँ या नहीं?
देखा जाए ये सब ऊल-जुलूल विचार मेरे गुस्से और जिद्द के कारन पैदा हुए थे, जो की हमारे इस प्यार भरे रिश्ते को बिगाड़ने पर तुले थे!
दोपहर को 1 बजे ये लौटे और कमरे का दरवाजा खटखटाया, मैंने जानबूझ कर इन्हें दरवाजे के बाहर 10 मिनट इंतजार करवाया| दस मिनट बाद जब मैंने दरवाजा खोला तो देखा की इनके हाथ में काफी सामान था| दरवाजा खोलने में मेरे द्वारा लिए गए इतने समय के कारण भी इनके चहरे पर गुस्से का नामोनिशान नहीं था| बिना मुझे कुछ कहे ये कमरे के भीतर आये और सारा सामान इन्होने टेबल पर रखा| समान रख इन्होने मेरी तरफ बात करने के इरादे से देखा मगर मैंने अपनी गर्दन अकडाई और इनसे मुँह फेर लिया, मैंने बिलकुल ऐसे जताया जैसे मैंने इन्हें देखा ही न हो|
मेरे मुँह फेर कर इन्हें अनदेखा करने से इन्हें दुःख अवश्य हुआ होगा तभी तो ये बिना कुछ कहे बाथरूम में हाथ-मुँह धोने चले गए| बाथरूम से बाहर निकल, तौलिये से मुँह पोछते हुए ये मुझसे बोले; "खाना खाया?" इस समय इनकी आवाज में प्यार झलक रहा था, पर मैं तो गुस्से में थी इसलिए में तुनक कर बोली; "भूख नहीं है!" इतना कह कर मैंने टीवी का चैनल चेंज कर दिया| मुझे लगा था की मेरी बात सुनकर ये मुझे मनाएँगे पर इन्होने कुछ नहीं कहा और सामान पैक करने लगे| मुझे नहीं पता था की ये रिसेप्शन से पहले ही खाने-पीने का बिल पूछ आये हैं, जिससे इन्हें पता चल गया है की मैंने आज दिनभर क्या-क्या खाया है?!
मैं इन्हें अनदेखा कर टी.वी. देखने में लग गई, मैंने इनसे ये भी नहीं पुछा की आपने सुबह से कुछ खाया भी है की नहीं? ये गुस्से में होने के बावजूद भी मेरे खाने-पीने का ध्यान रख रहे थे और मैं अपने गुस्से में चूर इनकी बिमारी का ध्यान होते हुए भी इनसे कुछ खाने को नहीं पूछ रही थी! ये क्रोध भी कितनी जहरीली चीज़ होती है!
करीब दस मिनट बाद वेटर हमारा बिल ले कर आ गया, इनके हाथ में बिल देख मैं समझ गई की कमरे में आते समय इन्होने रिसेप्शनिस्ट से बिल बनाने को कहा होगा| अब जाहिर था की इस बिल में सुबह से अभी तक मेरे द्वारा ठूसा हुआ पिज़्ज़ा और पास्ता का जिक्र किया गया होगा!
ये बिल पढ़ रहे थे की तभी मैंने जोर से अपना सर पीट लिया क्योंकि कहाँ मैं तो मैं सोच रही थी की मैं खाना न खा के इनके ऊपर दबाव बना कर इन्हें अपने आगे झुका लूँगी तथा इनसे माफ़ी मँगवाऊँगी मगर इस बिल ने सब कुछ सत्यानाश कर दिया था| उस समय मन ही मन मैंने होटल वाले को कई सारी गालियाँ दी की कमबख्त मेरे खाने-पीने का बिल न बनाता! अब इसे मेरी बेवकूफी ही कहो की मैं अपने क्रोध में होटल वाले को कोस रही थी, जबकि वो तो बस अपना काम कर रहा था| मेरे खाने-पीने का बिल अगर मेरे पति नहीं देंगे तो क्या वो होटल वाला देगा?
शुक्र है की वेटर ने मुझे सर पीटते हुए नहीं देखा था वो बिल दे कर चला गया था मगर इन्होने मुझे सर पीटते हुए देख लिया था और शायद ये मेरे सर पीटने का कारण भी समझ गए थे तभी तो इनके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान थी! मेरे पेट भर कर खाना खा लेने पर इन्होने मुझे कुछ नहीं कहा बल्कि समान पैक कर ये पलंग पर पीठ टिका कर बैठ गए और ख़ामोशी से टी.वी. देखने लगे|
शाम के 5 बजे तक हमने कोई बात नहीं की, हाँ बीच में नेहा का फ़ोन आया था और दोनों बाप-बेटी ने करीब 20 मिनट बात की थी मगर न नेहा ने मेरे बारे में पुछा और न ही इन्होने मेरी उससे बात करवाई| ये सुबह से भूखे थे और मेरे पिज़्ज़ा, पास्ता खाने की बात जानकार भी इन्होने अपने लिए खाना नहीं मँगवाया, अगर मैं खाती तो ये जर्रूर मेरे साथ खाना खा लेते मगर मैं तो अपने गुस्से में अन्धी थी! हम दोनों ही अपने-अपने गुस्से और घमंड को सर पर चढ़ाये बैठे थे, कोई भी झुकने को राज़ी न था!
सवा पाँच बजे तो ये मुझसे बोले; "checkout करना है!" बस इतना बोल कर ये अपने कपड़े बदलने लगे| मैं गुस्से में तमतमाती हुई उठी और बाथरूम से कपडे बदल कर आ गई तथा अपने उतारे हुए कपडे मैंने गुस्से में पलंग पर फेंक दिए| मैंने जानबूझ कर अपने उतारे हुए कपड़े पलंग पर फेंके थे क्योंकि मैं चाहती थी की ये मुझे कुछ कहें ताकि मैं अपना गुस्सा इन पर निकाल सकूँ मगर इन्होने मुझसे कुछ नहीं कहा और मेरे उतारे हुए कपडे तहा कर बैग में रख दिए|
सामान उठा कर ये पहले कमरे से बाहर निकले, मैंने फिर से इन्हें गुस्सा दिलाने के लिए जानबूझ कर दस मिनट कमरे में आईने के सामने अपनी शक्ल ठीक करने में लगाए, लेकिन इन्हें गुस्सा नहीं आया! हम नीचे रिसेप्शन पर आये और इन्होने होटल के बिल का भुगतान किया, फिर इन्होने ऑटो किया जिसने हमें आगरा कैंट स्टेशन छोड़ा| हमारी ट्रैन 'ताज एक्सप्रेस' थोड़ी देर में आने वाली थी इसलिए हम प्लेटफार्म पर बैठ इंतज़ार करने लगे| अब मुझे लगी थी भूख तो मैं चुप-चाप उठी और स्टेशन पर एक खाने के स्टॉल की तरफ चल पड़ी| मैंने अपने लिए एक सैंडविच और एक चाय ली तथा वहीं खड़ी हो कर खाने लगी| मैं ये तक भूल गई की मेरे पति भी मेरे साथ हैं जो की सुबह से भूखे हैं!
अपना गड्ढा रुपी पेट भर कर मैं वापस आ कर बड़ी बेशर्मी से इन्हीं के बगल में बैठ गई| इन्होने मुझे खाते हुए देख लिया था मगर फिर भी इन्होने मुझे कुछ नहीं कहा| कुछ देर बाद बच्चों का फ़ोन आया और इन्होने उनसे बड़े प्यार से बात करना शुरू कर दिया| आयुष की परीक्षा खत्म हो चुकी थीं इसलिए वो आज दिनभर अपने दादा जी के साथ साइट पर घूम रहा था, वो शाम को घर लौटा था और अपने पापा जी को सारी दिनचर्या बताने के लिए बहुत उत्सुक था| बच्चों से बात करते-करते हमारी ट्रैन लग गई थी, इन्होने बच्चों का कॉल होल्ड पर डाला और समान हमारी सीट पर रख मुझे खिड़की की सीट पर बैठने को कहा| कल हम जिस बोगी में आये थे आज भी उसी एग्जीक्यूटिव कार (executive car) वाली बोगी में हमारी सीट थी| मैं आराम से सीट पर बैठ गई तथा ये ट्रैन से नीचे उतर कर बच्चों से बात करने लगे| ट्रैन चलने के समय तक ये बच्चों से प्लेटफार्म पर टहलते हुए बात करते रहे और मैं अंदर सीट पर बैठी इन्हें शीशे से देखती रही| एक पल के लिए न तो बच्चों ने मुझसे बात करने में अपनी कोई रूचि दिखाई और न ही इन्होने कहा की बच्चों मैं आपकी बात आपकी मम्मी से करवा देता हूँ!
ट्रैन चलने से एक मिनट पहले ये अपनी सीट यानी मेरी बगल वाली सीट पर आ कर बैठे| ट्रैन छूटी तो इन्होने अपना फ़ोन निकाला, उसमें हेडफोन्स लगाए और फिल्म देखने में व्यस्त हो गए| अब मैं अपना फ़ोन चार्ज करना भूल गई थी, ऊपर से मैं हो रही थी बोर तो मैंने इनके हाथ से इनका मोबाइल छीन लिया और इनके हेडफोन्स निकाल कर इनको दे अपने हेडफोन्स अपने हैंड बैग से निकाल फ़ोन से लगा कर फिल्म देखने लगी| मेरा मकसद इन्हें गुस्सा दिलाने का था मगर पता नहीं इन जनाब ने क्या घुट्टी पी रखी थी की इन्हें गुस्सा आ ही नहीं रहा था! इन्हें तो मेरा गुस्सा मेरा बचपना लग रहा था जिसकी वजह से इनके चेहरे पर मुस्कान आ गई थी| मैंने इनकी मुस्कान खिड़की के शीशे में देख ली थी, इनकी मुस्कान देख मेरा गुस्सा और तेज हो गया था इसलिए मैं तुरंत इनसे मुँह फेर फिल्म देखने में लग गई|
उधर ये बेचारे इधर-उधर देख कर अपना समय पार करने लगे! अब कब तक ये इधर-उधर देख कर अपना समय बिताते इसलिए इन्होने सो कर अपना टाइम पार करने की सोची| ये अपने हाथ सामने की ओर बाँधे हुए, पीठ पीछे टिका कर सोने की कोशिश करने लगे, मैं जल रही थी अपने गुस्से की आग में तो मैं कैसे इन्हें चैन से सोने देती?! मैंने फिल्म देखना बंद किया और माँ के फ़ोन पर कॉल घुमाया| माँ का फ़ोन नेहा के हाथ में था और चूँकि मैंने इनके फ़ोन से कॉल किया था तो नेहा ने एक ही घंटी में फ़ोन उठा लिया;
मैं: शैतानों! मम्मी की याद नहीं आती न तुम दोनों को? बस पापा से बात कर ली तो हो गया?
मैंने नेहा को थोड़ा डाँटते हुए कहा| नेहा ने फ़ोन स्पीकर पर किया ताकि आयुष भी मेरी डाँट सुन ले|
नेहा: वो...मम्मी...वो...
नेहा बेचारी घबरा गई थी और मेरी डाँट से बचने के लिए बहाना सोचने लगी थी| लेकिन आयुष बिलकुल इन पर गया था, वो मुझे अपने पापा जी की तरह मस्का लगाते हुए बोला;
आयुष: Sooooooooooooorrrrrrrrryyyyyyyyyy Mummmmmmmmmyyyyyyyy!
आयुष ने सॉरी मम्मी लम्बा खींचते हुए कहा| मैं आयुष की होशियारी समझ गई और इनकी तरफ देखते हुए बोली;
मैं: हाँ-हाँ अब ज्यादा मक्खन मत लगा, आने दे मुझे वापस फिर तुम दोनों की खैर नहीं! बहुत सर पर चढ़ा रखा है न तुम दोनों को, वापस आ कर तुम दोनों का सारा भूत उतारती हूँ!
इतना कह मैंने गुस्से में फ़ोन काट दिया| बच्चे मेरे इतने से गुस्से से डर गए थे इसीलिए दोनों ने दुबारा मुझे कॉल नहीं किया| वहीं इन्होने मेरी सारी बात सुनी थी पर फिर भी ये चुप-चाप आँख मूँदे रहे|
बाकी का सारा सफर हम दोनों मियाँ-बीवी ने ख़ामोशी से ही काटा, न ये कुछ बोले और न ही मैं कुछ बोली| मथुरा पहुँचने पर पीने का पानी खत्म हो गया था, जैसे ही पानी वाला आया तो मैंने उससे पानी की बोतल ली और पैसे इन्होने बिना मुझसे कुछ कहे उस पानी बेचने वाले आदमी को दे दिए|
खैर साढ़े दस बजे ट्रैन ने हमें निजामुद्दीन स्टेशन पर उतारा, स्टेशन से बाहर आ कर इन्होने मुझसे खाने के बारे में पुछा; "खाना खा लो?!" मैंने इनके पूछे सवाल का जवाब नहीं दिया और सीधा स्टेशन के बाहर बने रेस्टोरेंट के तरफ चल पड़ी| काउंटर पर मैंने सीधा एक थाली आर्डर की और टोकन ले कर आगे वाले काउंटर की तरफ बढ़ गई, पैसे इन्होने दिए जबकि मैं अपनी थाली काउंटर से ले कर खाने बैठ गई| ये पानी की बोतल ले कर मेरे सामने बैठ गए, न मैंने इनको खाने को पुछा और न ही इन्होने अपने लिए खाना मँगवाया| मैं पूरी बेशर्मी दिखाते हुए इनके सामने बैठी खाना खाती रही| मेरे खाना खाने के बाद इन्होने घर जाने के लिए ऑटो किया और आधे घंटे बाद हम घर पहुँचे| ये आगे थे और मैं जानबूझ कर पीछे-पीछे अपनी गति से आ रही थी!
रात के ग्यारह बज रहे थे और ऐसे में दरवाजा खटखटा कर माँ-पिताजी की नींद खराब करना ठीक नहीं था इसलिए इन्होने दरवाजा अपनी चाभी से खोला| दरवाजा खोलने से हुई हलचल से माँ-पिताजी जाग गए थे, उनके कमरे की लाइट जली देख ये सीधा उनके कमरे में चले गए जबकि मैं अंदर आते है सीधा हमारे कमरे में जा कर बिस्तर पर लेट गई|
जब ये माँ-पिताजी के कमरे में पहुँचे तो इन्हें अकेला देख माँ-पिताजी थोड़ा चिंतित हुए;
माँ: बहु कहाँ है?
माँ ने चिंतित होते हुए पुछा तो इन्होने झूठ बोल दिया;
ये: वो थक गई थी इसलिए लेट गई होगी|
पिताजी ने इनकी बात पर विश्वास कर लिया था मगर माँ को शक हो गया था की कुछ तो गड़बड़ है?! उस वक़्त तो माँ ने कुछ नहीं कहा और इन्हें आराम करने के लिए कहा| माँ-पिताजी को शुभरात्रि बोल जैसे ही ये उनके कमरे से बाहर आये की नेहा ने अचानक से इनका हाथ पकड़ लिया| दो दिन बाद अपने पापा को देख नेहा बहुत खुश थी और उसकी ये ख़ुशी उसके चहरे पर मुस्कान बन कर छलक रही थी|
ये: मेरा बच्चा सोया नहीं?
इन्होने नेहा को गोद में उठाते हुए पुछा|
नेहा: पापा जी, आपकी कहानी सुने बिना नींद कहाँ आती है!
इतना कह नेहा ने इनके दोनों गालों पर पप्पी दी| नेहा को गोद में लिए हुए ये बच्चों वाले कमरे में दाखिल हुए, जैसी ही इन्होने कमरे की लाइट जलाई की आयुष एकदम से उठ बैठा;
आयुष: पापा जी, मेरे लिए क्या लाये आप?
आयुष सीधे अपने मतलब की बात बोला| आयुष को जगा हुआ देख ये हँस पड़े, पहले इन्होने नेहा को नीचे उतरा और फिर बैग खोल कर दोनों के लिए जो लाये थे वो दिखाने लगे;
ये: बेटा ये देखो डोडा पेठा!
इन्होने पेठे का डिब्बा खोल कर बच्चों को दिखाते हुए कहा| पेठे का रंग चोक्लेटी था जिसे देख कर बच्चों की रूचि उसे खाने में जाग गई| इन्होने थोड़ा सा पेठा बच्चों को टेस्ट करने को दिया;
नेहा: वाओ पापा!
आयुष: ये तो बहुत टेस्टी है!
दोनों बच्चे खुश होते हुए बोले| दोनों बच्चों ने एक साथ अपने छोटे-छोटे हाथ आगे कर दिए क्योंकि उन्हें एक पूरा पीस खाना था| इन्होने दोनों बच्चों को एक-एक पीस दिया और बोले;
ये: कहा था न मैंने की आपको ये वाला पेठा बहुत पसंद आएगा?!
दोनों बच्चों ने ख़ुशी से एक साथ अपना सर दाएँ-बाएँ हिलाना शुरू कर दिया|
ये: और ये देखो...
ये कहते हुए इन्होने बैग से दोनों बच्चों के लिए लाई हुई जुत्तियाँ निकाली;
ये: ...आप दोनों के लिए चमड़े की बनी जुत्तियाँ!
नेहा होशियार थी इसलिए वो समझ गई की आगरा में पेठा और लेदर के बने जूते-चप्पल मशहूर हैं;
नेहा: ओ...तो ये दोनों चीजें आगरा में मशहूर हैं?!
ये: हाँ जी बेटा! ये डोडा पेठा 'पंछी' ब्रांड का है और आगरा में बहुत मशहूर है| दूसरी चीज जिसके लिए आगरा फेमस है वो है लेदर फुटवेयर्स|
इन्होने अपने हाथों से दोनों बच्चों को जुत्तियाँ पहनाई और दोनों बच्चों ने बड़े चाव से जुत्ती पहन कर इन्हें दिखाईं|
बच्चों के कमरे से आ रही इनकी और बच्चों की आवाज सुन पिताजी बाहर आ गए, बच्चों को जागा हुआ देख पिताजी मुस्कुराते हुए बच्चों से बोले;
पिताजी: तुम दोनों शैतान, सोये नहीं?!
ये: पिताजी बिना मेरी कहानी सुने मेरे बच्चे कहाँ सोते हैं?!
इन्होने दोनों बच्चों को अपनी गोदी में लेते हुए कहा| दोनों बच्चे इनकी गोदी में चढ़ कर इनका लाड करने लगे और उन्हें यूँ लाड करता देख पिताजी बोले;
पिताजी: बेटा रात बहुत हो रही है...
पिताजी के आगे कुछ बोलने से पहले ही ये बच्चों की तरह उत्साह से बोले;
ये: अब आप और माँ जागे हो तो मैं आप दोनों के लिए कुछ ख़ास लाया हूँ|
ये कहते हुए ये बच्चों को साथ ले कर माँ-पिताजी के कमरे में घुस गए|
माँ: तू सोने नहीं गया?
माँ ने इन्हें दोनों बच्चों के साथ देख थोड़ा डाँटते हुए कहा|
ये: पहले आप ये देखो|
इन्होने माँ की डाँट की परवाह किये बिना अपना बचपना दिखाते हुए कहा| इन्होने पिताजी और माँ के लिए एक आराम दायक चप्पल निकाली और उन्हें जबरदस्ती अपने हाथों से पहनाई|
पिताजी: बेटा ये तो बहुत नरम है! ऐसा लगता है मानो रुई पर चल रहा हूँ!
पिताजी चप्पल की तारीफ करते हुए बोले, पर माँ को मेरी चिंता थी क्योंकि घर लौट कर मैं उनसे मिले बिना ही सो गई थी| मेरे बारे में इस समय पूछ कर माँ इन्हें पिताजी से डाँट नहीं पढ़वाना चाहतीं थीं इसलिए उन्होंने बात घूमाते हुए इन्हें डाँटा;
माँ: तू अपने और बहु के लिए क्या लाया?
माँ का सवाल सुन इन्होने मेरे लिए लाई हुई जुत्ती निकाली और उन्हें दिखाई| जुत्ती देख माँ ने उस वक़्त तो कुछ नहीं कहा और इन्हें सोने जाने को हुक्म दे कर बात खत्म की|
लेकिन बच्चे कहाँ इनका पीछा छोड़ने वाले थे, उन्होंने अपने पापा जी से कहानी सुनने की जिद्द पकड़ ली| दोनों बच्चों को गोद ले कर इन्होने बच्चों को उनके कमरे में छोड़ा;
ये: बेटा, मैं कपड़े बदल कर आता हूँ|
ये कमरे में लौटे, मुझे लगा ये कुछ कहेंगे इसलिए मैं कठोर बन कर लेटी रही| लेकिन ये बिना कुछ बोले अपने कपड़े बदल कर बच्चों के पास कहानी सुनाने चले गए| दोनों बच्चों ने इन्हें पलंग के बीचों-बीच लिटाया, आयुष इनकी छाती पर चढ़ इनसे लिपट गया और नेहा इनकी बाईं तरफ लेट कर इनसे लिपट गई| इन्हें बच्चों को कहानी बना कर सुनाने की जर्रूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि बच्चे इनसे लिपटे हुए फ़ट से सो गए| इधर मैं कमरे में अकेली लेटी हुई अपने गुस्से और जलन की आग में कुढ़ती रही तथा करवटें बदलते हुए रात काटी!
अगली सुबह मैं जल्दी उठी, फ्रेश हो कर रसोई में जा ही रही थी की माँ आ गईं, मैंने उनके पाँव छुए और माँ ने मुझे आशीर्वाद देते हुए पुछा;
माँ: बहु, मानु बच्चों के कमरे में क्यों सोया है?
माँ ने जब इनके बारे में सवाल पुछा तो मुझे बहुत गुस्सा आया, परन्तु माँ पर तो मैं गुस्सा निकाल नहीं सकती थी इसलिए मैंने सर झुकाते हुए अपना गुस्सा छुपाते हुए कहा;
मैं: जी, पता नहीं|
माँ जान गईं की कुछ गड़बड़ है, माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे हमारे कमरे में पलंग पर बिठा कर पुछा;
माँ: बता बेटी क्या हुआ? कोई कहा-सुनी हुई तुम दोनों के (मेरे और इनके) बीच?
माँ ने इतने प्यार से पुछा की मैंने उन्हें कल रात हमारे बीच हुई सारी बहस और इनके द्वारा कही हुई सारी बात बता दी| मेरी पूरी बात सुन माँ को बहुत झटका लगा, आखिर माँ का लाडला बेटा उनसे झूठ कैसे बोल सकता है? परन्तु फिर भी माँ को अपने बेटे पर विश्वास था की उनका बेटा मेरे साथ धोका नहीं कर सकता;
माँ: बेटी तेरी नाराजगी जायज है! हाँ मानु ने मुझसे झूठ बोला, अपने पिताजी से झूठ बोला, शादी से पहले तुझसे करुणा के बारे में ये सब बातें छुपाई मगर बेटी, मेरा बेटा धोकेबाज़ नहीं हो सकता?! मुझे पूरा भरोसा है मानु पर, मुझे पूरा यक़ीन है की उसकी नीयत बस करुणा की मदद करने की थी, एक कमरे में रहते हुए उसने करुणा को छुआ नहीं होगा! मानु सिर्फ और सिर्फ तुझसे प्यार करता है और तेरे साथ वो कभी धोका नहीं कर सकता!
माँ सच कह रहीं थीं पर मेरे दिमाग में भरा गुस्सा मुझे उनकी बातों पर विश्वास नहीं करने दे रहा था| मेरे हाव-भाव देख माँ समझ गईं की मेरा मन अभी भी गुस्से से जल रहा है इसलिए उन्होंने मुझे सारी बात विस्तार से बताई;
माँ: बेटी, दरअसल गलती सारी मेरी है! मानु के कॉलेज खत्म होने के बाद तेरे ससुर जी चाहते थे की मानु उन्ही के साथ काम करे मगर मानु नौकरी करना चाहता था| इसके चलते एक दिन दोनों बाप-बेटों में बहुत झगड़ा हुआ, मजबूरन मुझे ही मानु को समझना पड़ा पर उसने जो कहा उसे सुन कर मैं दंग रह गई! बचपन से मानु ने अपने पिताजी का झुकाव अपने भाई-भाभी की तरफ देखा था| कई बार तेरे ससुरजी हम दोनों को यहाँ अकेला छोड़ कर गाँव जाते और हफ्ते-हफ्ते वहीं रुक कर जेठ जी का काम में हाथ बँटाते| मैंने कई बार उन्हें समझना चाहा की वो इस तरह न जाएँ और अपने काम-धँधे पर ध्यान दें मगर ये उल्टा मुझ पर ही बरस पड़ते! अब आखिर मर्द तो मर्द ही होता है, कई बार इन्होने मुझे बहुत बुरी तरह झाड़ा और नशे की हालत में मुझ पर हाथ भी उठाया| तब मानु बहुत छोटा था और अपनी माँ पर होने वाले ये अत्याचार देख दुखी होता था| तभी से मानु ने फैसला कर लिया था की वो जब कमाने लायक होगा तो मुझे ले कर अलग रहेगा! यही वो कारन था जिसके चलते मानु ने नौकरी करने की जिद्द की थी| किसी तरह मैंने मानु को समझा-बुझा कर उसका गुस्सा शांत किया और अपने इस घर को टूटने से बचाया| फिर मैंने मानु के पिताजी को भी समझाया और उन्हें मानु के नौकरी करने के लिए मनाया|
लेकिन फिर एक दिन तेरे ससुर जी जेठ जी के बीमार होने पर गाँव गए और कुछ दिनों के लिए वहीं रुक गए, मानु तब नौकरी कर रहा था और उसे तरक्की भी मिल गई थी तथा साथ ही अपने ऑफिस के कोई बहुत बड़े प्रोजेक्ट पर मानु काम कर रहा था| उन्हीं दिनों मैं मैं अचानक बीमार पड़ गई, मेरे बीमार पड़ने की खबर सुनकर भी तेरे ससुर जी गाँव से नहीं आये इसलिए मानु ने ही मेरी देखभाल करने के लिए अपने ऑफिस से छुट्टी माँगी मगर मानु के बॉस ने उसे छुट्टी देने से साफ़ मना कर दिया| मानु को इस बात पर इतना गुस्सा आया की उसने अपनी अच्छी खासी नौकरी को लात मार दी मगर मानु को मजबूरी में दो महीने उसी कंपनी में और काम करना था! उसके ऑफिस जाने से मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं था, तब मानु ने डॉक्टर सरिता से मदद माँगीं और उसने ही करुणा को नर्स के तौर पर मेरी देखभाल करने को भेजा| मानु की गैर मौजूदगी में करुणा मेरा ध्यान रखती थी, वो रोज़ सुबह 7 बजे आती और रात 8 बजे यानी मानु के आने के बाद ही जाती| मेरा खाना-पीना, नहाना-धोना सब का ख्याल करुणा रखती थी और इसी कारण मेरा उससे थोड़ा लगाव बन गया| मानु और करुणा बस दुआ-सलाम करते थे, या अगर दोनों में कभी बात भी होती तो ज्यादा से ज्यादा मेरी तबियत के बारे में बात करते थे|
कुछ दिन बाद मेरी तबियत ठीक हो गई थी और करुणा अब घर नहीं आती थी, पर चूँकि करुणा से मेरा थोड़ा लगाव बन गया था तो वो कभी-कभार मुझसे मिलने आ जाया करती थी| ऐसे ही एक दिन वो मुझसे मिलने घर आई थी, तब मैंने ही इन दोनों की बात शुरू करवाई थी, उसी दिन से दोनों में दोस्ती हो गई| कुछ समय बाद घर में पूजा थी और उस पूजा में मैंने करुणा और उसकी बहन को बुलाया था, मेरे हिसाब से उसी दिन से इन दोनों का मेल-जोल बढ़ा होगा मगर ये मेल-जोल बस दोस्ती तक ही सीमित था! अब तू सोच रही होगी की मुझे कैसे पता की इन दोनों का मेल-जोल प्यार-मोहब्बत तक कैसे नहीं पहुँचा? तो मैं तुझे बताऊँ की, एक दिन मैंने मानु से पुछा था की अगर उसे करुणा पसंद है तो मैं दोनों की शादी की बात मानु के पिताजी से करूँ मगर तेरे पति ने साफ़ कह दिया की करुणा बस उसकी अच्छी दोस्त है और उससे अधिक कुछ नहीं!
माँ की सारी बात सुन मुझे कुछ इत्मीनान आया था मगर उनकी कही बात की वो मेरी इनसे शादी होने से पहले करुणा से इनकी शादी की सोच रहीं थीं सुन कर मेरा गुस्सा करुणा पर जर्रूर खौला था! अगर मैं दिल्ली न आई होती तो इनकी शादी करुणा से जर्रूर हो जाती, ये सोच कर मुझे फ़िज़ूल की चिंता होने लगी थी;
माँ: बेटी, तू चिंता मत कर मैं मानु से बात करती हूँ और उसे समझाती हूँ की वो करुणा से बात करना बंद कर दे| लेकिन बेटी तू मानु के हमसे झूठ बोल कर करुणा के साथ जाने की बात अपने ससुर जी से मत कहना, वरना वो घर में कलेश खड़ा कर देंगे| मैं ही उनसे बात करुँगी और आज के आज ही हम सारी बात का फैसला कर देंगे|
मैंने माँ की बात सुन, हाँ में सर हिला उन्हें आश्वस्त किया की मैं पिताजी को कुछ नहीं कहूँगी| व
माँ की बातों से मेरे सर पर जो गुस्से के बादल मंडरा रहे थे वो अब धीरे-धीरे छटने लगे थे| माँ के जाने के बाद मैं कुछ समय तक उनकी कही बातों के बारे में सोचती रही| मेरा दिमाग अब शांत होने लगा था और दिमाग अक्ल की घास चरने लगा था| 'तू जानती है की ये किसी की भी मदद करने से नहीं चूकते मगर ये कभी किसी लड़की का नाजायज फायदा नहीं उठा सकते! ये मुझसे इतना प्यार करते हैं की ये मुझे कभी धोखा नहीं दे सकते! भले ही इन्होने मुझे करुणा के बारे में कुछ नहीं बताय हो पर ये उसके साथ हमबिस्तर नहीं हो सकते! अगर इन्होने ये पाप किया होता तो ये मुझे जरूर बताते!' मेरी अंतरात्मा बोली| मेरे मन में इनके लिए जो प्यार था अब वो मेरे दिमाग में भरे गुस्से को खत्म करने लगा था|
कुछ देर बाद ये उठ गए और दोनों बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने लगे, इधर मैं सबके लिए चाय और बच्चों के लिए नाश्ते बनाकर तैयार करने लगी|
माँ: बच्चों, आप दोनों खुद तैयार हो जाओ मुझे आपके पापा से कुछ बात करनी है|
माँ ने बच्चों के कमरे में आते हुए कहा| नेहा की आज परीक्षा थी इसलिए वो जल्दी से तैयार हो कर अपनी रिवीजन करने बैठ गई| वहीं आयुष को आज उसके स्कूल वाले रेल मियूजियम घुमाने ले जा रहे थे इसलिए आयुष का उत्साह थमने का नाम ही नहीं ले रहा था!
बच्चे तैयार होने लगे और माँ इनसे बात करने बच्चों के कमरे में बैठ गईं;
माँ: बैठ बेटा!
माँ ने इन्हें अपने सामने बैठने को कहा| माँ की गंभीर आवाज सुन ये समझ गए की मैंने माँ को सब सच बता दिया है|
माँ: बेटा तूने मुझसे और अपने पिताजी से झूठ बोला? तू हमसे झूठ बोल कर करुणा के साथ अकेला जयपुर गया, वो भी एक नहीं कई बार! उसके साथ होटल में रात गुजारी, मैं तुझ पर भरोसा करती हूँ और तूने मेरे भरोसे का ये सिला दिया?
माँ ने गुस्से से कहा था परन्तु उनकी आवाज इतनी ऊँची नहीं हुई थी की पिताजी उनकी बात सुन लें| उधर माँ की कहीं बातों से इन्हें ग्लानि हो रही थी की इन्होने माँ-पिताजी से झूठ बोला|
ये: माँ...मुझे माफ़ कर दो की मैंने झूठ बोलकर आपका और पिताजी का भरोसा तोडा मगर माँ मेरे मन में जरा भी गन्दी इच्छा या स्वार्थ नहीं था| मैंने जो भी किया वो बस करुणा की मदद करने के लिए किया, उसके भले के लिए किया| मैंने आप को और पिताजी को इसलिए ये सब नहीं बताया क्योंकि आप मुझे कभी करुणा के साथ अकेले नहीं जाने देते| हाँ...मैं उसके साथ एक कमरे में रुका मगर मेरा विश्वास करो माँ, मैंने करुणा को न कभी गंदी नज़र से देखा और न ही कभी उसे हाथ लगाया| मैं तो बस उसकी मदद करना चाहता था, उससे ज्यादा और कुछ भी नहीं|
इन्होने सच्चे दिल से अपनी सफाई दी| माँ को अपने बेटे पर भरोसा था इसलिए माँ इन्हें प्यार से समझाते हुए बोलीं;
माँ: बेटा, मुझे अपने लाल पर पूरा भरोसा है की तूने करुणा के साथ कोई गलत काम नहीं होगा इसीलिए मैं तुझसे आराम से बात कर रही हूँ वरना कहीं तूने अगर कुछ गलत किया होता तो मैं तुझसे माँ कहने का हक़ छीन लेती!
माँ की बात सुन इनकी साँस हलक़ में अटक गई थी! एक बेटे से उसकी अपनी माँ अगर माँ कहने का हक़ छीन ले तो उस बेटे की क्या दुर्दशा होगी ये कल्पना करना भी मुश्किल है!
माँ: लेकिन आज के बाद तूने अगर कभी मुझसे झूठ बोला या मुझसे बात छुपाई न तो नतीजा अच्छा नहीं होगा!
माँ ने इन्हें तड़ी देते हुए कहा| माँ की तड़ी सुन ये डर के मारे सहम गए और बोले;
ये: आज के बाद मैं आपसे कुछ नहीं छुपाउँगा माँ!
इन्होने हाथ जोड़ते हुए माँ से कहा| माँ ने इनकी बात पर विश्वास करते हुए इनके सर पर हाथ फेरा|
माँ: बेटा, जो हो गया सो हो गया मगर आज के बाद से तू करुणा से बात नहीं करेगा!
माँ आगे कुछ और कहतीं उससे पहले पिताजी बच्चों वाले कमरे में आ गए, माँ-बेटे को यूँ गंभीर बैठे देख वो समझ गए की मामला कुछ गंभीर है| वो कुछ पूछते उससे पहले ही माँ इन्हें आदेश देते हुए बोलीं;
माँ: चल अब जा कर बच्चों को स्कूल छोड़ आ फिर बात करते हैं|
माँ ने पिताजी को कुछ पूछने का मौका ही नहीं दिया और उन्हें साथ ले कर अपने कमरे में चली गईं|
[color=rgb(163,]जारी रहेगा भाग - 6 में...[/color]
