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Gandi Kahani ♡ एक नया संसार ♡

एकनयासंसार

अपडेट.........《 48 》

अब तक,,,,,,,,

"अच्छा ठीक है चल।" दीदी के होठों पर उनकी खूबसूरत सी मुस्कान उभर आई___"अपनी ज़िद तो तुझे छोंड़ना है नहीं न।"
"हाॅ तो।" मैने भी इस बार इठलाते हुए कहा___"आपसे छोटा हूॅ तो इतनी ज़िद तो आपसे करूॅगा ही और आपको मेरी ज़िद माननी ही पड़ेगी। हाॅ नहीं तो।"
"अरे तू ये तकिया कलाम कब से करने लगा?" रितू दीदी ने एकाएक ही चौंकते हुए कहा___"ये तकिया कलाम तो गुड़िया(निधी) का है न?"

"हाॅ दीदी।" मेरी ऑखों के सामने एकाएक ही निधी का चेहरा घूम गया___"हर बात में ये बोलना उसकी आदत बन चुकी है और पता है बहुत लाडली हो गई है। अपनी हर बात मनवा लेती है वो।"
"हाॅ वो ऐसी ही थी।" रितू दीदी कहीं खोई हुई सी नज़र आईं, बोली___"कैसी है अब वो?"

"सब कोई अच्छे से हैं दीदी।" मैने कहा___"माॅ गुड़िया और अभय चाचा सब।"
"काश मैं उन्हें देख पाती राज।" दीदी के चेहरे पर पीड़ा के भाव भर आए___"गौरी चाची और गुड़िया से मुआफ़ी माॅग पाती मैं।"
"ओफ्फो दीदी।" मैने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा__"ये सब आप क्यों कह रही हैं? प्लीज़ ये सब आप अपने ज़हन से निकाल दीजिए। अब इस बारे में आप खुद को दुखी नहीं करेंगी। अब चलिए वरना हम लेट हो जाएॅगे जाने में।"

मेरी बाय सुन कर दीदी ने कुछ कहना चाहा मगर मैने उनके होठों पर अपनी उॅगली रख कर उन्हें चुप करा दिया और उन्हें फ्रेश होने के लिए कह कर मैं कमरे से बाहर आ गया। बाहर आया तो मेरी नज़र दरवाजे के एक साइड खड़ी नैना बुआ पर पड़ी। उनका चेहरा ऑसुओं से तर था। शायद उन्होंने हमारी सारी बातें सुन ली थी। मुझे देखते ही उन्होंने जल्दी से अपनी साड़ी का एक छोर पकड़ कर अपने ऑसुओं को पोंछा। मैं उन्हें ये करते देख वहीं पर खड़ा हो गया।
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अब आगे,,,,,,,

विराज के कमरे से जाते ही रितू ने अपने जिस्म से पुलिस की वर्दी निकाली और एक टाॅवेल लेकर बाॅथरूम में घुस गई। उसके सिर पर जो चोंट लगी थी वो बहुत ज्यादा दर्द कर रही थी। किन्तु उसने अपने उस दर्द को बड़ी मुश्किल से जज़्ब किया हुआ था। खून तो रिसा था किन्तु उसने पाॅकेट से रुमाल निकाल कर उसे पहले ही साफ कर लिया था। चोंट इतनी भी गहरी नहीं थी जिससे बात गंभीर होती। जीप के किनारे पर लगा लोहे का पाइप उसके सिर के किनारे वाले भाग के थोड़ा सा ऊपर लगा था। उस आदमी को जीप में डालने के बाद ही उसने सिर से रिस रहे खून को रुमाल से साफ किया था। उसके बाद उसने सिर पर वापस पीकैप पहन ली थी जिससे चोंट से रिसा हुआ खून और चोंट दिखनी बंद हो गई थी। वो नहीं चाहती थी कि उसको लगी किसी भी प्रकार की चोंट फार्महाउस में किसी को भी नज़र आए या पता चले।

बाथरूम में रितू ने खुद को फ्रेश किया और फिर बाहर आ गई। कमरे में उसने एक नई वर्दी पहनी और फिर पीकैप लगा कर खुद को पूरी तरह तैयार किया। आलमारी से उसने एक दर्द की टैबलेट ली और वहीं एक साइड रखे पानी के बाटल से उसने उस टैबलेट को खाया। उसके बाद वो कमरे से बाहर आ गई।

नीचे डायनिंग हाल में इस वक्त खाना खाने के लिए सिर्फ तीन ही लोग थे। विराज, आशा, और रितू। रितू के आने के बाद पवन की माॅ ने उन तीनों को खाना परोसा। तीनों ने बड़े आराम से खाना खाया। बाॅकि सब अपने अपने कमरे में थे। कुछ ही देर में तीनों ने खाना खा लिया।

"तू क्या फिर से ड्यूटी पर जा रही है रितू?" आशा दीदी ने पूछा___"मैने तो सोचा था कि हम सब यहाॅ गप्पें लड़ाएंगे। मगर अब जबकि तू जा रही है तो फिर मैं क्या करूॅगी इसके सिवा कि कमरे में जाकर लम्बी तान कर सो जाऊॅगी।"

"लम्बी तान कर सोने की ज़रूरत नहीं है आशा।" रितू दीदी ने कहा___"शाम को तुम सबको राज के साथ मुम्बई के लिए निकलना है। इस लिए सामान की पैकिंग करके रेडी रहना।"
"क्याऽऽ???" आशा दीदी बुरी तरह चौंकी___"हम आज ही शाम को यहाॅ से जाएॅगे???"

रितू दीदी की बात सुनकर मैं भी बुरी तरह चौंक पड़ा था। मैं तो कुछ और ही सोचे हुए था। रितू दीदी के साथ जाकर रास्ते में उनसे गुनगुन जाने के लिए कहने वाला था ताकि अपनी सभी टिकटें कैंसिल करवा सकूॅ। मगर दीदी की इस बात ने मुझे हिला कर रख दिया था।

"हाॅ आशा।" उधर दीदी कह रही थीं___"तुम लोगों का यहाॅ से सुरक्षित मुम्बई निकलना ज़रूरी है। क्योंकि आने वाला हर पल एक नये ख़तरे को अपने साथ लेकर आ रहा है। तुम सबके यहाॅ रहते हुए किसी भी प्रकार की अनहोनी हो सकती है। इस लिए मैं चाहती हूॅ कि तुम सब यहाॅ से मुम्बई चले जाओ।"

"अच्छा ठीक है रितू।" आशा दीदी ने कहा___"मैं माॅ को भी बता देती हूॅ इस बारे में।"
"ठीक है ।" रितू दीदी ने कहा___"पवन और राज के उस दोस्त को भी बता देना। चल राज।"

अंतिम वाक्य मुझे देख कर कहने के साथ ही रितू दीदी कुर्सी से उठ कर बाहर की तरफ चल दी। उनके पीछे पीछे मैं भी बुझे मन से चल दिया। बाहर आकर दीदी अपनी जिप्सी की तरफ बढ़ गईं। जिप्सी की ड्राइविंग शीट पर बैठ कर दीदी ने मुझे भी साथ में बैठने को कहा तो मैं भी चुपचाप बैठ गया। मेरे बैठते ही दीदी ने जिप्सी मेन गेट की तरफ दौड़ा दिया।

"काका, यहाॅ सबका ख़याल रखना।" लोहे वाले गेट के पास रुक कर दीदी ने हरिया काका से कहा___"हम आते है कुछ देर में।"
"फिकर ना करो बिटिया।" हरिया काका ने कहा__"हमरे रहते यहाॅ काहू का कुछू न होई।"

हरिया काका की बात सुन कर दीदी मुस्कुराई और फिर जिप्सी को आगे बढ़ा दिया। मैं उतरा हुआ चेहरा लिये दूसरी तरफ देख रहा था। सच कहूॅ तो मुझे दीदी का आशा दीदी से ये कहना कि वो सब लोग मेरे साथ आज शाम ही मुम्बई जाएॅगी बिलकुल अच्छा नहीं लगा था।

"क्या हुआ मेरा भाई नाराज़ है मुझसे?" सहसा रितू दीदी ने मेरी तरफ देख कर कहा था। उनकी ये बात सुन कर मैने उनकी तरफ एक नज़र देखा और फिर बिना कुछ बोले फिर से दूसरी तरफ देखने लगा।

"अपने से दूर तो मैं भी तुझे नहीं जाने देना चाहती मेरे भाई।" दीदी ने गहरी साॅस ली___"मगर मौजूदा हालात कुछ ऐसे हैं कि मुझे ये सब करना पड़ रहा है। मगर मैं ये नहीं कह रही राज कि इस जंग में मैं या तू अकेले हैं...नहीं नहीं बल्कि हम दोनो साथ साथ ही हैं।"

उनकी इस बात से मैने चौंक कर उनकी तरफ एक झटके से देखा। वो मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी। उनकी इस मुस्कान को देख कर मेरी सारी नाराज़गी दूर हो गई।

"हाॅ राज।" उन्होंने फिर कहा___"हम दोनो साथ साथ ही इस खेल में काम करेंगे। मगर....
"मगर क्या दीदी???" मैं चकराया।
"मगर ये कि तू अभी इन सबको लेकर मुम्बई सुरक्षित पहुॅच जा।" दीदी ने कहा___"जब ये सब वहाॅ पहुॅच जाएॅगे तो इनकी सुरक्षा की चिंता से हम दोनो ही मुक्त हो जाएॅगे। उसके बाद तुम वहाॅ से वापस आ जाना यहाॅ। हम दोनो तसल्ली से फिर इस खेल को
अंजाम तक पहुॅचाएॅगे।"

"आपने ठीक कहा दीदी।" मैने कहा___"हम स्वतंत्रतापूर्वक ये जंग तभी लड़ सकेंगे जब हमारी ये सारी कमज़ोरियाॅ हमारे दुश्मन की नज़र से या पहुॅच से बहुत दूर हो जाएॅगी। क्योंकि हमारे दुश्मन ने अगर हमारी एक भी कमज़ोरी को नुकसान पहुॅचा दिया तो वो नुकसान हम हर्गिज़ भी सह नहीं सकेंगे।"

"बिलकुल ठीक समझे मेरे भाई।" रितू दीदी ने मुस्कुरा कर कहा___"मैं यही कर रही हूॅ। मैं चाहती हूॅ कि तू हमारी इन सारी कमज़ोरियों को यहाॅ से मुम्बई ले जाकर उन्हें सुरक्षित कर दे। उसके बाद तू वापस यहाॅ आ जाना, उस सूरत में हम दोनो बहन भाई खुल कर और तसल्ली से अपनी जंग लड़ सकेंगे।"

"मैं समझता था कि ये जंग सिर्फ मेरी है दीदी।" मैने सहसा गंभीर होकर कहा___"और इस जंग को अकेले ही मुझे इसके अंजाम तक पहुॅचाना है। मगर आपसे मिल कर ये पता चला कि इस जंग में मैं अकेला नहीं हूॅ बल्कि मेरे साथ मेरे हर क़दम में मेरा साथ देने के लिए मेरी सबसे अज़ीज़ दीदी भी तैयार बैठी हैं। ये मेरे लिए ऐसी खुशी है दीदी जिसका मैं बयान नहीं कर सकता।"

"चल अब तू फिर से न मुझे इमोश्नल कर देना।" रितू दीदी ने हौले से हॅसते हुए कहा___"वरना मैं फिर रोने लग जाऊॅगी।"
"नहीं दीदी।" मैने तपाक से कहा___"आप रोना नहीं। आपकी ऑखों में ऑसू देखते ही मेरे अंदर कुछ टूटने सा लगता है। जिससे मुझे तक़लीफ़ होने लगती है।"

"अच्छा ये सब छोंड़ भाई।" रितू दीदी मेरी बात पर पहले तो मुस्कुराईं फिर सहसा बेचैनी से पहलू बदलते हुए कहा___"राज तुझसे कुछ पूछूॅ?"
"ये क्या बात हुई दीदी?" मैने दीदी की तरफ देखा__"कोई बात पूछने के लिए भला आपको मुझसे इजाज़त माॅगने की क्या ज़रूरत है?"

"अच्छा नहीं माॅगती इजाज़त।" दीदी फिर मुस्कुराई, बोली___"मैं तुझसे जो कुछ भी पूछना चाहती हूॅ उसका तू सच सच जवाब देगा न?"
"हाॅ बिलकुल दीदी।" मैने कहा___"मैं आपके हर सवाल का सच सच जवाब दूॅगा। पूछिए क्या पूछना चाहती हैं आप?"

"मेरे मन में कई सारी बातें है राज।" रितू दीदी ने सामने रास्ते की तरफ देखते हुए कहा___"और उन्हीं कई सारी बातों में कई सारे सवाल भी हैं जिनके बारे में मुझे जानना है। तू तो जानता है कि मैं एक पुलिस ऑफिसर भी हूॅ इस लिए हर सवालों का सही सही जवाब पाना मेरी इस पुलिसिया फितरत में भी शामिल है।"

"कोई बात नहीं दीदी।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"आपको जो कुछ भी जानना है मुझसे आप बेझिझक पूॅछ सकती हैं। अगर आपके सवालों के जवाब मेरे पास होंगे तो ज़रूर मैं आपके हर सवाल का जवाब दूॅगा।"
"सबसे पहला सवाल तो यही है कि तू मुम्बई में कहाॅ और किस हाल में गौरी चाची और गुड़िया को साथ लिए रहता है?" रितू दीदी ने कहा___"और अब तो तू इन सबको भी अपने साथ ही लिए जा रहा है तो मेरा ये सोचना जायज़ ही है कि इतने सारे लोगों को तू कहाॅ ठहराएगा और कैसे सुरक्षित रखेगा?"

"बड़े पापा तो मेरे बारे में यही सोचते हैं दीदी।" मैने सहसा मुस्कुरा कर कहा___"कि मैं मुम्बई में कहीं किसी होटल या ढाबे में कप प्लेट धोने वाला काम करता होऊॅगा। जबकि मेरी सच्चाई का अगर आज उन्हें पता चल जाए तो उनके पैरों तले से ये ज़मीन गायब हो जाएगी।"

"क्या मतलब???" रितू दीदी बुरी तरह चौंक कर मेरी तरफ देखने लगी थी।
"मतलब साफ है दीदी।" मैने गहरी साॅस ली___"ईश्वर से बड़ा कोई नहीं होता दुनियाॅ में। ये ईश्वर की ही रहमत है दीदी कि मैं चाहूॅ तो यहाॅ पर खड़े खड़े ही पूरा हल्दीपुर गाॅव ख़रीद लूॅ। जिस मामूली सी प्रापर्टी को पाने के लिए बड़े पापा ने ये सब किया था न उस प्रापर्टी की लाखों गुनी दौलत आज मेरे पास है।"

"ये तू क्या कह रहा है राज?" रितू दीदी बुरी तरह उछल पड़ी थी। ब्रेक पैडल पर लगभग वो खड़ी ही हो गई थी। जिसके चलते जिप्सी के टायर ज़ोर से चीखते हुए सड़क पर स्थिर हो गए थे। मेरी तरफ आश्चर्यचकित नज़रों से देखते हुए बोलीं___"तेरे पास इतनी सारी दौलत कहाॅ से आ गई? तू....तूने कहीं कोई ग़लत काम करके तो नहीं ये दौलत अर्जित की है??"

"हाहाहाहा अरे नहीं दीदी।" मैने हॅसते हुए कहा___"क्या आपको लगता है कि आपका ये भाई दौलत पाने के लिए कोई ग़लत काम करेगा?"
"लगता तो नहीं है राज।" दीदी की ऑखें अभी भी फैली हुई थी, बोली___"मगर सवाल तो खड़ा होता ही है कि इतनी सारी दौलत अचानक एक साथ मिल जाना कैसे संभव हो सकता है?"

"इस दुनियाॅ में सब कुछ संभव है दीदी।" मैने कहा___"और इसका जीता जागता प्रमाण मैं खुद हूॅ।"
"लेकिन कैसे मेरे भाई??" रितू दीदी चकित भाव से बोल पड़ीं____"ये असंभव संभव कैसे हो गया? और अगर ऐसा ही है तो यकीनन राज ये बहुत ख़ुशी की बात है।"

मैने दीदी को संक्षेप में सारी कहानी बता दी। उन्हें बताया कि कैसे एक अरबपति इंसान ने मुझे अपना बेटा बना लिया और अपनी सारी संपत्ति मेरे नाम कर दी। मैने उन्हें बताया कि मैं उसी अरबपति आदमी की मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करता था। मेरे काम और मेरे नेचर से प्रभावित होकर वो आदमी एक दिन मेरा मसीहा बन गया।
मैने उन्हें बताया कि आज मैं अपने पूरे परिवार के साथ उसी आदमी के अलीशान बॅगले में शान से रहता हूॅ। मेरी ये कहानी सुन कर दीदी आश्चर्यचकित रह गईं थी। काफी देर तक उनके मुख से कोई बोल न फूटा।

"ये...ये तो कमाल हो गया राज।" फिर दीदी ने खुशी से फूली न समाते हुए कहा___"मैं समझ सकती हूॅ मेरे भाई। हाॅ भाई, मैं सब समझ गई। ईश्वर ने तुझे तेरे अच्छे कर्मों का फल दिया है। उससे तेरी दुख तक़लीफ़ें नहीं देखी गई और इसी लिए उसने उस आदमी को तेरा मसीहा बना कर भेज दिया तेरे पास। हाॅ भाई, यही सच है। मैं बहुत खुश हूॅ तेरे लिए राज।"

"अब तो आप इस बात से बेफिक्र हैं न कि इन सबको मैं मुम्बई में कैसे रखूॅगा?" मैने मुस्कुरा कर कहा था।
"हाॅ राज।" दीदी ने जिप्सी को आगे बढ़ाते हुए कहा__"अब मुझे इन लोगों की कोई चिन्ता नहीं है।"
"हम्म, अब बताइये और क्या जानना है आपको?" मैने बात को आगे बढ़ाया।

"मैं नहीं जानती राज कि जो मैं तुझसे कहने वाली हूॅ या जानने वाली हूॅ उसका तुझे पता है भी या उसका तुझसे कोई ताल्लुक है भी कि नहीं।" दीदी ने कहा___"मगर फिर भी इस लिए कह रही हूॅ कि तू मेरा भाई है और तुझे भी जानने का हक़ है कि घर परिवार के बीच या तेरी बहन के साथ क्या क्या हुआ?"

"जी कहिए न दीदी।" मैने कहा___"आप बेझिझक अपनी बात मुझसे शेयर कर सकती हैं।"
"मैने पुलिस की नौकरी अपने शौक के लिए तो की ही थी राज।" रितू दीदी ने जैसे कहना शुरू किया___"मगर दिल में ये भी हसरत थी कि मैं ये नौकरी पूरी ईमानदारी के साथ करूॅगी। ख़ैर, ड्यूटी ज्वाइन करने से पहले ही मेरे मन में ये बात थी कि मैं चार्ज़ सम्हालते ही सबसे पहले दादा दादी के केस पर काम करूॅगी। यानी मैं पता लगाऊॅगी कि उनका एक्सीडेन्ट वास्तव में एक हादसा ही था या फिर किसी की सोची समझी चाल थी? चार्ज़ सम्हालते ही मैने ऐसा किया भी, मगर पुलिस रिकार्ड में मुझे कहीं कोई ऐसा सुराग़ या क्लू तक नहीं मिला जिससे मुझे संदेह भी हो सके कि उनका एक्सीडेन्ट सोची समझी चाल का नतीजा हो सकता है। कहने का मतलब ये कि मैने दादा दादी वाले केस में बहुत छानबीन की मगर कुछ भी हाॅथ न लगा। थक हार कर मैने उस केस से अपना ध्यान हटा लिया। ये अलग बात थी कि दिल में ये मलाल अब भी है कि मैं दादा दादी के केस में कुछ भी न कर सकी।"

इतना सब कहने के बाद रितू दीदी कुछ पल के लिए रुकी और एक नज़र मेरे चेहरे की तरफ देखने के बाद फिर से सामने की तरफ देखने लगीं।

"उसके बाद फिर डैड के साथ अजीब सी घटनाएॅ होने लगीं।" रितू दीदी ने गहरी साॅस लेने के बाद फिर से कहना शुरू किया___"सबसे पहले जो उनके साथ अजीब घटना हुई वो ये थी कि कोई विदेशी ब्यक्ति उन्हें करोंड़ो का चूना लगा कर कहीं गायब हो गया। अख़बार में इस बात की ख़बर भी छपी थी। जिसके चलते डैड की इज्ज़त पर भी असर हुआ। मैं जानती हूॅ कि डैड ने उस विदेशी की खोज में धरती आसमान एक कर दिया होगा मगर उनके हाॅथ कुछ न लगा। ख़ैर, इस अजीब घटना के बाद डैड के साथ फिर से एक घटना घटी। उनकी फैक्ट्री में आग लग गई। फैक्ट्री में लगी आग की जाॅच उन्होंने अपने तरीके से करवाई थी और रिपोर्ट भी अपने तरीके से ही बनवाई थी। ऐसा शायद उन्होंने इस लिए किया था ताकि उनकी रेपुटेशन पर फिर से कोई धब्बा न लग जाए। हलाॅकि धब्बा लगने से वो तब भी नहीं रोंक पाए थे। मैने जब देखा कि कोई नतीजा ही नहीं निकला है तो मैने फैक्ट्री की जाॅच करने का खुद ही बीड़ा उठाने का सोचा। मेरे मन में ऐसा करने की सिर्फ दो ही वजहें थी। पहला ये जानना कि ऐसा कौन है जिसने डैड की फैक्ट्री में आग लगाई? दूसरा ये कि डैड के हुए उस भारी नुकसान की भरपाई करना। ज़ाहिर सी बात है कि अगर मुजरिम का पता चल जाता तो उससे इस नुकसान की भरपाई कर ली जाती। मगर ऐसा भी न हो पाया था। इसमें सबसे ज्यादा चौंकानी वाली बात ये हुई थी कि जब मैने खुद जाॅच करने के लिए केस रिओपन करवाया तब गुनगुन शहर का सारा पुलिस महकमा ही बदल दिया गया था। हर कोई इस बात से हैरान था। मगर समझ में किसी को कुछ न आया था। दूसरी हैरानी की बात ये कि लाख कोशिशों के बाद भी उस केस में ये नहीं पता चल सका कि फैक्ट्री में आग आख़िर किसने लगाई थी? हलाॅकि इसमें एक कमज़ोरी ये थी कि डैड ने पूरी ईमानदारी से कोऑपरेट नहीं किया था।"

इतना कुछ बोलने के बाद रितू दीदी चुप हो गईं। मैने सोचा शायद वो कुछ और बोलेंगी मगर ऐसा न हुआ। उनकी नज़रें सामने रास्ते पर ही लगी हुई थी।

"ये तो थी घटनाओं की बातें।" तभी उन्होंने फिर से कहना शुरू किया___"और ये सब मैने तुझसे इस लिए शेयर किया राज ताकि तू भी जान सके कि ये केस मेरी नाकामी का भी हिस्सा हैं। जिन्हें मैं सुलझा नहीं पाई। मगर जबसे ये सब हालात शुरू हुए तब से मैने हवेली के अंदर भी कान लगाना शुरू कर दिया था। उससे ज्यादा तो नहीं मगर इतना ज़रूर सुना मैने कि तेरा ज़िक्र बार बार हवेली के अंदर मेरे माॅम डैड के बीच हुआ। एक बार तो मैने ये भी सुना कि ये सब तुमने किया है। मैं ये सुन कर हैरान तो हुई मगर ज्यादा ध्यान नहीं दिया कभी। क्योंकि तब मेरे दिमाग़ में भी यही बातें थी कि तू ये सब कर ही नहीं सकता। मगर ज्यादा दिनों तक मैं तुझे भी नज़रअंदाज़ नहीं कर पाई। क्योंकि कहीं न कहीं मेरे भी दिमाग़ में ये बात आ ही गई थी कि मेरे डैड का अगर कोई सबसे ज्यादा बुरा करना चाहेगा तो वो सिर्फ तू ही था। इस लिए मैंने उन सभी घटनाओं में तुझे जोड़ना शुरू किया और फिर मुझे भी ये लगने लगा कि तेरा इन सभी घटनाओं में ताल्लुक यकीनन हो सकता है।"

ये सब कहने के बाद रितू दीदी एकदम से चुप हो गईं। जिप्सी पुल के पास पहुॅच चुकी थी। इस लिए जिप्सी रोंक कर रितू दीदी मेरी तरफ अजीब भाव से देखने लगी थीं। जैसे मेरे चेहरे से ही समझ जाना चाहती हों कि सच्चाई क्या है।

"मेरा ही तो इन सभी घटनाओं में ताल्लुक था दीदी।" मैने गहरी साॅस लेते हुए जैसे उनके ऊपर बम फोड़ा__"हाॅ दीदी। आपने जिन घटनाओं का ज़िक्र किया उन सबका कर्ता धर्ता मैं ही तो था। वो विदेशी डीलर भी मैं ही था जिसने बड़े पापा से वो डील की और फिर बिना कुछ बताए गायब हो गया था। उसके बाद उनकी फैक्ट्री में आग भी मैने ही लगाई थी। कहने का मतलब ये कि बड़े पापा के साथ जो कुछ भी अभी तक बुरा हुआ है उसका जिम्मेदार सिर्फ मैं ही रहा हूॅ और आगे भी जो कुछ उनके साथ बुरा होगा उसका भी जिम्मेदार मैं ही होऊॅगा।"

"क्याऽऽऽ????" रितू दीदी मेरी बात सुन कर बुरी तरह उछल पड़ी थीं, बोली___"नहीं नहीं मैं नहीं मान सकती राज। भला तू ये सब कैसे कर सकता था? तू तो यहाॅ था ही नहीं।"

"आपके मानने या न मानने से सच्चाई बदल नहीं जाएगी दीदी।" मैने कहा___"और हाॅ, आपको तो अभी ये भी नहीं पता कि फैक्ट्री के तहखाने में कुछ था भी या नहीं?"
"क्या मतलब??" रितू दीदी की ऑखें फैली___"फैक्ट्री के तहखाने में भला क्या था जिसकी बात कर रहा है तू?"

"आपको क्या लगता है दीदी?" मैने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"आपके डैड इतने कम कमीने इंसान हैं? अरे नहीं दीदी, वो तो ऊॅचे दर्ज़े के पापी हैं। कपड़ा मील का ब्यापार व फैक्ट्री तो महज दिखावा मात्र थी जबकि उनका असल कारोबार तो ड्रग्स अफीम चरस आदि का था। किन्तु ये कारोबार चूॅकि कानून की नज़र में ग़ैर कानूनी होता है इस लिए बड़े पापा इस कारोबार को सबकी नज़रों से छुपा कर करते थे। फैक्ट्री के अंदर मौजूद उस तहखाने में उनकी वही काली दुनियाॅ का काला चिट्ठा मौजूद था जिसे मैने फैक्ट्री में टाइम बम लगाने से पहले ही गायब कर दिया था। मैं नहीं चाहता था कि उनका ये कारनामा कानून की नज़र में आए। मैं तो अपने हाॅथों से उन्हें हर सज़ा देना चाहता हूॅ। कानून की चपेट में आने से भला मैं कैसे उन्हें अपने तरीके से सज़ा दे सकता था? इस लिए मैने तहखाने से उनका वो सारा ज़खीरा गायब कर दिया जो ग़ैर कानूनी था।"

मेरी ये बातें सुन कर रितू दीदी की ऑखें हैरत से फटी की फटी रह गई थी। उनके चेहरे पर हैरत और अविश्वास का सागर मानो हिलोरें ले रहा था।

"क्या सच में इस सबमें तेरा ही हाॅथ था राज?" रितू दीदी ने अविश्वास भरे लहजे से कहा___"मगर ये सब कैसे मुमकिन हो सकता है मेरे भाई? ये सब कैसे कर लिया तूने? बंद फैक्ट्री के अंदर और वो भी तहखाने के अंदर पहुॅचना इतनी आसान बात तो न थी। उस सूरत में तो बिलकुल भी नहीं जबकि तू कभी फैक्ट्री गया ही नही था। फिर कैसे ये सब कर लिया तूने?"

"मन में सच्ची लगन हो तो सब कुछ मुमकिन हो जाता है दीदी।" मैने कहा___"ऊपर वाला भी फिर आपके लिए राहें आसान कर देता है। ये तो मुझे पता ही था कि बड़े पापा की शहर में कहीं पर कपड़ा मील की फैक्ट्री है। पर चूॅकि मैं कभी फैक्ट्री गया नहीं था इस लिए मैने फैक्ट्री के संबंध में जानकारी हाॅसिल करने के लिए अपने दोस्त पवन को लगाया। उसने मुझे फैक्ट्री के संबंध में सारी बातें बताई। उसके बाद मैने प्लान बनाया और इस प्लान में गुड़िया(निधी) ने भी मेरा साथ देने के लिए ज़बरदस्ती मेरी वाइफ का रोल किया। उसके बाद मुझे पवन ने बताया कि बड़े पापा का एक बिजनेस पार्टनर है जिसका नाम अरविंद सक्सेना है, इतना ही नहीं इन दोनो पार्टनर्स के बीच बहुत ही गहरे संबंध हैं। पवन ने जब गहरे संबंधों की बात की तो मैं समझ न पाया था कि ये कैसे संबंधों की बात कर रहा है। मेरे पूछने पर उसने बताया कि बड़े पापा और सक्सेना आपस में एक दूसरे की बीवियों के साथ सब कुछ कर लेते हैं। ये बात जान कर मेरे पैरों तले से ज़मीन निकल गई। मैने सोचा कि बड़े पापा भला ऐसा कैसे कर सकते हैं?? मगर मैं जानता था कि ऐसे ब्यक्ति से भला अच्छे कर्म की उम्मीद कैसे की जा सकती है? ख़ैर, पवन से अरविंद सक्सेना के बारे में सुनकर मैने पवन से कहा कि सक्सेना के खिलाफ़ कोई ऐसा सबूत हाॅसिल करे जिसके आधार पर वो कुछ भी करने को तैयार हो जाए। मेरे कहने पर पवन ने वैसा ही किया और फिर एक दिन पवन ने मुझे बताया कि उसने सक्सेना के घर से कुछ फोटोग्राफ्स और वीडियोज़ हाॅसिल किये हैं। जिनमें सक्सेना बेहद आपत्तिजनक स्थित में है। मैने पवन से उन फोटुओं को कुरियर द्वारा मॅगवा लिया। इसके बाद मैने सक्सेना को तेल की धार पर लेने में ज़रा भी देरी न की। कहने का मतलब ये कि मैने उन फोटोग्राफ्स के आधार पर सक्सेना को इतना मजबूर कर दिया कि वो कुछ भी कर सकता था। सबसे पहले मैने उससे बड़े पापा के कारोबार की सारी जानकारी ली उसके बाद मैने उससे बड़े पापा की और भी बहुत सारी जानकारी हाॅसिल की। सक्सेना दरअसल थोड़ा फट्टू किस्म का आदमी था। उसे इस बात का पता चल गया था कि उसका पार्टनर उसकी ग़ैर जानकारी में ग़ैर कानूनी धंधा भी करता है और उसके कई ऐसे खतरनाॅक लोगों से भी संबंध हैं जिनका रिकार्ड कानून की फाइलों में वर्षों से दबा पड़ा है।"

मैं इतना कुछ कहने के बाद कुछ पल के लिए रुका और फिर कहना शुरू किया___"सक्सेना को डर था कि कहीं वो किसी दिन कानून की चपेट में न आ जाए। इस लिए वो बड़े पापा से पार्टनरशिप तोड़ना चाहता था मगर वो ऐसा कर नहीं पा रहा था। उसे ये भी डर था कि कहीं उसके पार्टनर को उस पर शक न हो जाए और उसे भी इस धंधे में न लपेट लें। ये बात मुझे तब पता चली थी जब मैं खुद सक्सेना से मिला था। सक्सेना से मैने एक सौदा किया। वो सौदा यही था कि मैं उसे और उसकी फैमिली को सुरक्षित विदेश भेजने का बंदोबस्त कर दूॅगा, इसके बदले उसे वो करना पड़ेगा जो मैं कहूॅगा। मैने उसे अपना सारा प्लान समझाया। सारी बात सुन कर पहले तो वो मेरी बात मानने से इंकार करने लगा। उसे डर था कि कहीं इस सबमें उसकी जान पर न बन आए। पर मैने उसे अच्छी तरह समझाया और उसे इसके लिए राज़ी किया।"

"इसका मतलब फैक्ट्री में लगी आग तूने सक्सेना के द्वारा लगवाई थी?" सहसा रितू दीदी मेरी बात के बीच में ही बोल पड़ी___"मगर जैसा कि तूने बताया कि तहखाने में डैड का ग़ैर कानूनी ज़खीरा मौजूद था तो उसे कैसे गायब करवाया तूने? क्या उसे भी सक्सेना के द्वारा ही गायब किया?"

"सक्सेना के साथ पवन था।" मैने बताया___"सक्सेना को तहखाने के लाॅक का पासवर्ड पता था। उसका काम था तहखाने का लाॅक खोल कर तहखाने में टाइम बम लगाना। पवन का काम सिर्फ यही था कि तहखाने में मौजूद उस ग़ैर कानूनी ज़खीरे को तहखाने से निकाल कर अपने कब्जे में ले ले। प्लान के अनुसार पवन उस सारे सामान को पुलिस हेडक्वार्टर में कमिश्नर के हवाले कर देगा। पुलिस कमिश्नर को ऊपर से आदेश था कि उस सामान को ब्यक्तिगत तौर पर रखे और जब उस सामान की ज़रूरत पड़े तो उसे उसी तरह मेरे हवाले कर दें जैसे वो सामान पवन के द्वारा उन्हें सौंपा गया था।"

"ये तू क्या कह रहा है राज?" रितू ने बुरी तरह चौंकते हुए कहा___"भला पुलिस का कमिश्नर ऐसा कैसे कर सकता है? दूसरी बात ऊपर से उसे ऐसा करने का आदेश कैसे मिल सकता है? ये तो बड़ी ही अविश्वसनीय बात है?"

"यही तो मज़ेदार बात है दीदी।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"जिस शख्स ने मुझे अपना बेटा मान कर अपनी अरबों की संपत्ति मेरे नाम की उसका नाम जगदीश ओबराय है। जगदीश ओबराय एक बहुत बड़ा बिजनेस टाइकून है और उसका संबंध ऐसे ऐसे लोगों से है जिसके बारे में आदमी सोच भी नहीं सकता। उसी के कहने पर ऊपर से यहाॅ कमिश्नर के पास वो आदेश आया था और इसके पहले भी सारा पुलिस महकमा भी बदला गया था। सारा पुलिस महकमा बदलने का सिर्फ यही मकसद था कि बड़े पापा इतनी आसानी से पुलिस महकमें में कोई सेंध न लगा सकें। पहले वाले उनके सारे पुलिस के कनेक्शन खत्म करना भी ज़रूरी था। इसी लिए ऐसा किया गया था। ये अलग बात है कि आज भी बड़े पापा और आपके लिए ये सारी बातें रहस्य बनी हुई थी।"

"ओह माई गाड।" रितू दीदी की ऑखें आश्चर्य से फटी पड़ी थी, बोली___"कोई सोच भी नहीं सकता कि तूने इतना बड़ा कारनामा अंजाम दिया होगा। मुझे तो अभी भी यकीन नहीं हो रहा है कि ये सब तूने किया है। ख़ैर, जैसा कि तूने बताया कि डैड का सारा ग़ैर कानूनी सामान आज भी पुलिस कमिश्नर के पास सुरक्षित मौजूद है, और वो उस सामान को तेरे हवाले तभी करेंगे जब तुझे उस सामान की ज़रूरत होगी। मेरा सवाल ये है कि उस सामान के द्वारा आने वाले समय में क्या करने वाला है तू?"

"आपके इस सवाल का जवाब बहुत ही सीधा और साफ है दीदी।" मैने सपाट भाव से कहा___"मैं चाहूॅ तो आज यहीं पर खड़े खड़े बड़े पापा को कानून की ऐसी चपेट में ला सकता हूॅ जहाॅ से वो सात जन्मों में भी उबर नहीं पाएॅगे। मगर मैं ये काम इतना जल्दी करूॅगा नहीं। क्योंकि एक ही बार में मैं उन्हें ऐसा झटका नहीं देना चाहता कि वो उस झटके से एक ही बार में खाक़ में मिल जाएॅ। बल्कि मैं तो उन्हें थोड़ा थोड़ा करके झटका देना चाहता हूॅ और उन्हें ये मौका भी देना चाहता हूॅ कि वो अपनी तरफ से जितनी भी कोशिश करनी हो कर लें अपने बचाव के लिए।"

"ओह तो ये बात है।" रितू दीदी को जैसे सब कुछ समझ आ गया था, बोली___"डैड का वो सारा ग़ैर कानूनी सामान तेरे लिए किसी तुरुप के इक्के से कम नहीं है। ख़ैर, तो अब आगे का क्या प्लान है तेरा?"
"अभी का तो यही प्लान है दीदी कि पहले इन सब लोगों को मुम्बई पहुॅचा कर इन सबको सुरक्षित कर दूॅ।" मैने गहरी साॅस ली___"उसके बाद मैं यहाॅ वापस आऊॅगा और आपके साथ मिल कर कुछ अलग और अनोखा करने की कोशिश करूॅगा।"

अभी हम बात ही कर रहे थे कि तभी वहाॅ पर एक टैक्सी आकर रुकी। हम दोनो का ध्यान उस तरफ गया। कुछ ही पलों में टैक्सी से करुणा चाची, दिव्या, शगुन और हेमराज मामा उतरे। मैं और दीदी भी जिप्सी से उतर कर उनके पास गए। टैक्सी वाले को उसका पैसा देने के बाद वो सब हमारी तरफ मुड़े। करुणा चाची की नज़र जैसे ही मुझ पर पड़ी तो उनकी ऑखों में ऑसू तैरते दिखाई देने लगे। वो तेज़ी से मेरी तरफ बढ़ीं और फिर मुझे अपने सीने से लगा लिया। मैं भी अपनी चाची से मिल कर थोड़ा भावुक सा हो गया किन्तु फिर मैने अपने जज़्बातों को काबू किया और फिर उनसे अलग हो गया। मेरी नज़र दिव्या पर पड़ी तो वो मुझे ही देख रही थी। मैने अपनी बाहें फैला दी तो वो एकदम से मेरी तरफ दौड़ पड़ी और मुझसे लिपट गई। उससे मिलने के बाद मैने शगुन को प्यार दिया।

थोड़ी देर सबसे मिलने के बाद मैने उन्हें जिप्सी में बैठने को कहा तो वो सब जिप्सी में बैठ गए। सबके बैठते ही दीदी ने जिप्सी को वापस मोड़ कर आगे बढ़ा दिया। मैं दीदी के साथ आगे ही बैठा था बाॅकी सब पिछली शीट्स पर बैठे थे। कुछ ही समय में हम सब फार्महाउस पहुॅच गए। फार्महाउस के अंदर जाकर करुणा चाची नैना बुआ से मिली और पवन की माॅ बहन आदि से। उसके बाद नैना बुआ ने चाची और मामा जी से खाने का पूॅछा तो वो बोलीं कि वो घर से खा पी कर ही चले थे। ख़ैर, लेडीज पार्टी एक जगह बैठ कर बातों में लग गईं जबकि मैं अपने दोस्त पवन और आदित्य के पास आ गया। शाम को हमे मुम्बई के लिए निकलना भी था।
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प्रतिमा अपने कमरे के अटैच बाथरूम से बाहर निकली। सामने बेड पर पूरी तरह से निर्वस्त्र पड़े शिवा की नज़र जैसे ही अपनी माॅ पर पड़ी तो उसके मुझ से आह निकल गई। प्रतिमा के गोरे सफ्फाक बदन पर इस वक्त मात्र एक पिंक कलर का टावेल था। जिसे वह अपनी भारी भरकम छातियों को आधे से ढॅके थी तथा नीचे उसकी मोटी चिकनी और गोरी जाघों तक को ढॅका हुआ था। जब से रितू हवेली से गई थी तब से दोनो माॅ बेटा कमरे में वासना और हवस के खेल में डूबे हुए थे। प्रतिमा खुश थी कि उसे बेटे के रूप में एक जवान मर्द मिल गया था जो उसके जिस्म की गर्मी को शान्त करने में कोई कसर नहीं छोंड़ेगा। अजय सिंह अब जवानी के दौर से बाहर निकल चुका था। उसके साथ सेक्स करने में प्रतिमा को मज़ा तो आता था किन्तु पूर्ण संतुष्टि नहीं मिलती थी।

शिवा, जो कि अजय सिंह की ही कार्बन काॅपी था। गुण और शक्ल से वो अपने बाप पर ही गया था। जब से उसने जवानी की देहलीज़ पर क़दम रखा था तब से उसकी नज़रें घर की लड़कियों और औरतों पर ही जमी रहती थी। वो उन सभी के जिस्मों को भोगने की लालसा में रात दिन लगा रहता था। मगर डर व भय की वजह से वो कभी ज्यादा आगे बढ़ नहीं पाया था। अपनी माॅ पर उसका सबसे ज्यादा क्रश था। अक्सर वो अपने बाप को प्रतिमा को पेलते हुए देखा करता था। प्रतिमा के भारी भरकम बूब्स और गदराया हुआ जिस्म उसके अंदर बुरी तरह वासना की आग भड़का देता था।

किन्तु उसकी चाहत आज वर्षों बाद पूरी हो चुकी थी। जिस औरत पर उसका सबसे ज्यादा क्रश था उस औरत के जिस्म को वह भोग रहा था। वो अपने बाप का शुक्र गुज़ार था कि उसने उसे ये अनमोल तोहफा दिया था। रितू जैसे ही हवेली से निकली थी वैसे ही शिवा और प्रतिमा एक दूसरे की बाहों में समा गए थे। हवेली में उन दोनो के अलावा दूसरा कोई न था। नौकर चाकर दोपहर में अपने अपने कमरों में चले जाते थे। इस लिए इस तन्हाई का भरपूर फायदा उठाया था इन दोनो ने।

शिवा को याद नहीं कि पहले दिन से अब तक वो कितनी बार अपनी माॅ को भोग चुका था। उसे तो बस इतना समझ आ रहा था कि उसका अभी दिल नहीं भरा है। ये सोच कर वो फिर से अपनी माॅ पर चढ़ जाता और अलग अलग पोजीशन में अपनी माॅ को रौंदता रहता। प्रतिमा को भी जवान मर्द का ये जोश बहुत मज़ा दे रहा था। इस लिए वो खुद भी उसी जोश से अपने बेटे का पूरी तरह से साथ देती थी।

"ऐसे क्या देख रहे हो शिव?" अपने सामने प्रतिमा अपने बेटे को ऐसे ही संबोधित करने लगी थी, बोली___"क्या दिल नहीं भरा अभी?"
"हाॅ मेरी रंडी माॅ।" शिवा ने अपने लंड को ज़ोर से मसलते हुए कहा___"तुमको जितना भी पेलूॅ उतना ही लगता है कि अभी और पेलूॅ। कसम से आज तक जितनी लड़कियों को अपने नीचे सुलाया है उन सभी में से तुम सबसे ऊपर हो। तुम्हारे जैसा जिस्म और तुम्हारे जैसी अदा किसी और में नहीं देखी मैने।"

"कैसे देखते मेरे शिव।" प्रतिमा ने बड़ी अदा से शिवा के पास आते हुए कहा___"वो सब लड़कियाॅ तुम्हारी माॅ तो नहीं थी न? वो सब तुम्हें एक माॅ जितना प्यार और समर्पण भाव कैसे कर सकती थीं?"
"हाॅ ये बात तो सच कही तुमने।" शिवा ने प्रतिमा के टावेल के छोर को पकड़ कर अपनी तरफ ज़ोर से खींचा तो टावेल प्रतिमा के बदन से अलग होता चला गया और प्रतिमा भी उसी झोंक में शिवा के ऊपर आ गई। जबकि अपने ऊपर प्रतिमा के आते ही शिवा ने कहा___"तुम एक औरत के साथ साथ मेरी माॅ भी तो हो। इसी लिए इतना प्यार और समर्पण है तुममें। तभी तो मेरा दिल बार बार यही कहता है कि एक बार और हो जाए।"

"तो करो न शिव।" प्रतिमा ने कहने के साथ ही झुक कर शिवा के होठों को चूम लिया___"रोंका किसने है तुम्हें? मैं तो खुद भी यही चाहती हूॅ कि तुम मुझे इस हवेली के हर ज़र्रे पर ले जाकर बुरी तरह से प्यार करो। मुझे ऐसे ऐसे तरीके से पेलो कि पूरी हवेली में मेरी चीखें गूॅजने लगें।"

"उफ्फ कितना विल्ड पसंद है तुम्हें?" शिवा ने प्रतिमा की एक छाती को बुरी तरह मसल दिया, बोला___"तुम तो वो चीज़ हो डियर मदर कि तुम्हें एक अकेला मर्द संतुष्ट नहीं कर सकता। तभी तो डैड तुम्हारे लिए अपने साथ साथ एक और मर्द को लेकर आते थे। क्या नाम था उसका? अरे हाॅ सक्सेना.... हाय रे वो साला कैसे कैसे मेरी इस राॅड माॅम को पेलता रहा होगा।"

"क्यों जलन हो रही है तुम्हें??" प्रतिमा ने सहसा मुस्कुरा कर पूछा।
"जलन किस बात की डियर मदर?" शिवा ने कहा__"ये तो तुम्हारी ख्वाहिशों की बात है। सबको अपनी ख्वाहिशें पूरा करना चाहिए। तुमने भी वही किया, सो मुझे इसमें जलने की क्या ज़रूरत है?"

"मतलब मुझे अगर बाहर का कोई भी आदमी पेले तो तुम्हें कोई परेशानी नहीं है??" प्रतिमा ने कहा।
"जब डैड को ही कोई परेशानी नहीं हुई तो मुझे क्यों होगी भला?" शिवा ने कहा___"ख़ैर छोंड़ो इन बातों को और आओ एक बार और घमासान पेलाई हो जाए।"
"क्यों नहीं शिव।" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा__"मुझे भी एक बार और करने की इच्छा है।"

कहने के साथ ही प्रतिमा ने अपने एक हाॅथ को सरका कर नीचे शिवा के मुरझाए हुए लंड को पकड़ लिया और उसे सहलाने लगी। इधर शिवा ने भी प्रतिमा की छातियों को हाथों से पकड़ कर मसलने लगा। अभी ये सब ये दोनो कर ही रहे थे कि बगल से एक स्टूल पर रखे फोन की घंटी बज उठी। फोन के बज उठने से दोनो के ही चेहरे पर अप्रिय भाव उभरे।

"हैलो।" फोन उठाते ही शिवा ने कहा।
".........।" उधर से कुछ कहा गया।
"क्याऽऽऽ???" शिवा अपने डैड की बात सुन कर बुरी तरह चौंका था।
".........।" उधर से फिर कुछ कहा गया।
"ऐसा कैसे हो सकता है डैड?" शिवा के चेहरे पर परेशानी के भाव उभर आए, बोला___"कहीं ऐसा तो नहीं कि दीदी को उसका पता चल गया हो और फिर उन्होंने उसे अपने रास्ते से हटा दिया हो? अगर ऐसा कर भी दिया होगा तो हम उन पर शक तो कर सकते हैं मगर उनके सामने उन पर इस बात का इल्ज़ाम नहीं लगा सकते।"

"..........।" उधर से कुछ देर तक कहा गया।
"ऐसा कब तक चलेगा डैड?" शिवा के चेहरे पर सहसा गुस्से के भाव आए___"हर बार हमारे हाथ नाकामी ही लगती है। हमें अब खुद मैदान में उतरना पड़ेगा। इस तरह तो हमारा एक एक आदमी लापता होता रहेगा और हम कुछ कर ही नहीं पाएॅगे। इस लिए हमें सीरियसली ये सब खुद ही करना पड़ेगा। रितू दीदी की गतिविधियाॅ स्पष्ट समझ में आ रही हैं कि वो हमारे खिलाफ़ हैं। अगर विराज से वो मिल चुकी हैं तो साफ है कि उन्हें हमारे बारे में सब कुछ पता चल गया होगा और अब वो उस कमीने विराज का साथ दे रही हैं। हाॅ डैड, दीदी भले ही आपकी बेटी हैं मगर बात जब अन्याय और जुर्म की आएगी तो वो हमारा साथ नहीं देंगी। ये उनके कैरेक्टर से साफ पता चलता है।"

"......।" उधर से फिर कुछ कहा गया।
"यस डैड।" शिवा कह उठा___"अब तो साफ साफ और खुल कर खेल होना चाहिए।"
".........।" उधर से अजय सिंह ने कुछ कहा।
"ओके डैड।" शिवा ने कहा___"आप आ जाइये। मैं और माॅम हवेली में ही हैं।"

इसके साथ ही संबंध विच्छेद हो गया। शिवा ने रिसीवर को केड्रिल पर रखा और धम्म से बेड पर चित्त लेट गया। प्रतिमा उसी को एकटक देखे जा रही थी।

"क्या बात हुई डैड से?" प्रतिमा ने पूछा।
"डैड बता रहे थे कि उन्होंने जिस आदमी को दीदी के पीछे लगाया था।" शिवा ने कहा___"उस आदमी का फोन काफी देर से बंद बता रहा है।"
"क्याऽऽ???" प्रतिमा हैरान____"इसका मतलब हमारा ये आदमी भी बली का बकरा साबित हो गया।"

"ये सब आपकी बेटी की वजह से हो रहा है माॅम।" शिवा ने कठोर भाव से कहा___"उसी ने हमारे उस आदमी का गेम बजाया होगा। उसे पता है कि अगर वो ऐसा करेगी तो हम उस पर बेवजह और बिना सबूत के कोई इल्ज़ाम नहीं लगा सकेंगे। मगर अब हम भी बताएॅगे उसे कि हमसे गद्दारी करने का क्या अंजाम होता है? डैड ने भी यही कहा है कि ये काम रितू दीदी का ही है और अब डैड ने भी फैंसला कर लिया है कि वो खुद इस सब का पता करेंगे और दीदी को उनके किये की सज़ा देंगे।"

"उफ्फ क्या करूॅ इस लड़की का?" प्रतिमा ने कसमसाते हुए अपने माॅथे पर हथेली मारी___"अपने ही माॅ बाप को गर्त में डुबाने पर तुली हुई है ये।"
"अब आपकी उस बेटी के साथ कोई रियायत नहीं होगी माॅम।" शिवा ने गुस्से से कहा___"अभी तक यही सोच कर हमने उस पर कोई कठोर क़दम नहीं उठाया था कि चलो कोई बात नहीं हमारी अपनी है वो, मगर अब नहीं। उसने हमसे बगावत की है माॅम। अपने ही माॅ बाप का सर्वनाश करने पर तुली हुई है वो। इस लिए अब उसे उसके इस जघन्य अपराध की शख्त सज़ा मिलेगी।"

प्रतिमा कुछ कह न सकी। अंदर ही अंदर काॅप कर रह गई वो। उसे अपनी बेटी के लिए दुख तो हुआ था किन्तु उसे भी इस बात का एहसास था कि उसकी बेटी ने अपने पैरेंट्स के खिलाफ़ जा कर ग़लत किया है। वो अपने पति और बेटे को अच्छी तरह जानती थी। वो अब किसी भी सूरत में रितू को मुआफ़ करने वाले नहीं थे। उसे खुद भी रितू के इस कृत्य पर गुस्सा आया हुआ था। मगर वो कर भी क्या सकती थी? अब तो बस वो मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर सकती थी कि सब कुछ ठीक हो जाए।
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इधर रितू के फार्महाउस पर!
मैं, आदित्य और पवन आपस में बातें ही कर रहे थे कि सहसा कमरे के दरवाजे पर बाहर से नाॅक हुई। पवन ने उठ कर दरवाजा खोला तो देखा बाहर रितू दीदी खड़ी थी। दीदी को देखते ही पवन एक तरफ हट गया तो दीदी अंदर आ गई। मैने दीदी के चेहरे पर हल्का परेशानी के भाव देखे तो चौंका।

"क्या बात है दीदी?" मैंने उनके पास आकर पूछा__"सब ठीक तो है ना?"
"हाॅ सब ठीक है राज।" रितू दीदी ने कहा___"मैं ये कहने आई हूॅ कि तुम सबको अभी यहाॅ से निकलना होगा गुनगुन के लिए। क्योंकि बाद में संभव है कि डैड अपने किसी अन्य आदमियों को यहाॅ रास्तों पर घेरा बंदी के लिए लगा दें। हलाॅकि उन्हें ये पता नहीं है कि तू अभी यहीं है या यहाॅ से जा चुका है। मगर हालात बदल चुके हैं।"

"ये आप क्या कह रही हैं दीदी?" मैने चौंकते हुए कहा__"हालात तो बदले हुए ही थे उसमें अब क्या हो गया है?"
"बहुत कुछ हुआ है मेरे भाई।" रितू दीदी ने कहा___"डैड को मुझ पर पहले से शक था इस लिए आज उन्होंने मेरे पीछे अपना एक आदमी लगाया हुआ था जिसे मैने बीच रास्ते पर ही धर लिया था और फिर उसे बेहोश करके यहाॅ ले आई थी। अब ज़ाहिर सी बात है कि डैड ने अपने आदमी से फोन पर जानकारी प्राप्त करनी चाही होगी मगर जब वो ये जानेंगे कि उनके आदमी का फोन ही बंद है तो उन्हें समझते देर नहीं लगेगी कि मैने उनके आदमी को गिरफ्तार कर लिया है या फिर उसे ठिकाने लगा दिया है। उस सूरत में वो मुझ पर बेहद गुस्सा होंगे और संभव है कि मेरी तलाश में घर से खुद ही निकल लें। अगर उन्होंने ऐसा किया तो समझ लो उनके साथ और भी आदमी होंगे जो यहाॅ के हर रास्तों पर फैल जाएॅगे। ऐसे में तुम लोगों का यहाॅ से गुनगुन के लिए निकलना मुश्किल हो जाएगा। इसी लिए कह रही हूॅ कि तुम सब जितना जल्दी हो सके यहाॅ से फौरन निकलने की तैयारी करो। बाहर मेरी जिप्सी को मिला कर दो गाड़ियाॅ हैं। उन दोनो गाड़ियों में तुम सब आराम से आ जाओगे। लेकिन सामान कुछ भी नहीं जा पाएगा। इस लिए सामान को यहीं छोंड़ देना। सारा सामान यहाॅ सुरक्षित ही रहेगा।"

"आपने तो कह दिया दीदी।" मैने सहसा दुखी भाव से कहा___"कि मैं इन सबको लेकर यहाॅ से चला जाऊॅ। मगर मैं जानता हूॅ कि आज के वक्त में आप कितने बड़े ख़तरे में हैं। मैं आपको ऐसे अकेले छोंड़ कर कैसे यहाॅ से चला जाऊॅ दीदी? मेरे जाने के बाद अगर आपको कुछ हो गया तो सारी ज़िंदगी मैं अपने आपको माफ़ नहीं कर पाऊॅगा।"

"चुप कर तू।" दीदी ने मुझे ज़बरदस्ती झिड़क दिया, हलाॅकि मैं जानता था कि वो अपने अंदर के जज़्बातों को शख्ती से दबा रही थी, बोली___"जब देखो इमोशनल होता रहता है। अब ज्यादा बोलना नहीं और चुपचाप यहाॅ से सबको लेकर निकल।"

"मैं कहीं नहीं जाऊॅगा आपको अकेला छोंड़ कर।" मेरी ऑखों में ऑसू आ गए।
"तुझे मेरी क़सम है मेरे भाई।" रितू दीदी ने झटके से मेरा हाॅथ पकड़ कर अपने सिर पर रख लिया था___"तू यहाॅ से सबको लेकर अभी इसी वक्त जाएगा। मेरी चिन्ता मत कर। तेरी दीदी कोई इतनी भी गैर मामूली नहीं है जिसे कोई भी ऐरा ग़ैरा हजम कर जाएगा। अरे मैं तेरी बहन हूॅ राज। जिसका भाई इतना प्यार करता हो उसका भगवान भी कुछ न कर सकेंगे। और फिर बस दो दिन की ही तो बात है न मेरे भाई। फिर तो तू आ ही जाएगा न मेरे पास। तू चिन्ता मत कर, मैं खुद को ऐसी जगह छुपा लूॅगी कि तेरे आने से पहले मेरा बाप तो क्या कोई भी माई का लाल मुझे ढूॅढ़ नहीं पाएगा। चल अब तू बेफिक्र होकर जा।"

ये कह कर दीदी एक पल के लिए भी नहीं रुकीं। बल्कि कहने के साथ ही कमरे से बाहर चली गईं। उनके जाने के बाद भी कुछ देर तक मैं भौचक्का सा खड़ा रह गया था। होश तब आया जब आदित्य ने मेरे कंधे पर अपना हाॅथ रख कर हल्के से दबाया।

"चलो दोस्त।" आदित्य ने भारी स्वर में कहा___"यहाॅ से चलने की तैयारी करो। अपनी इस महान दीदी की बात मानो। मैं इतने दिनों से देख रहा हूॅ कि रितू सिर्फ अपने भाई के लिए ही जी रही है। हर वक्त उसे सिर्फ तुम्हारी ही फिक्र रहती है। आज भी वो सिर्फ तुम्हारी और इन सबकी फिक्र की वजह से ही तुम्हें यहाॅ से सीघ्र चलने को कह कर गई है। उसे अपने ऊपर मॅडरा रहे भीषण खतरे की कोई फिक्र नहीं है। मैं तुमसे सिर्फ एक ही बात कहूॅगा दोस्त____और वो ये कि इन सबको मुम्बई में सुरक्षित पहुॅचाने के बाद तुम एक पल के लिए भी वहाॅ नहीं रुकना। बल्कि उल्टे पैर वापस सीधा यहीं आओगे। मैं खुद भी तुम्हारे साथ ही आऊॅगा।"

"आदि मेरे दोस्त।" मैने भावना में बह कर आदित्य को गले से लगा लिया। उसने खुद भी मुझे ज़ोर से कस लिया था।
"कितना ग़लत सोचा करता था मैं रितू दीदी के बारे में।" तभी पवन कह उठा___"हर पल शक की नज़र से देखता था उनको। मगर यहाॅ आकर पता चला कि वो कितनी अच्छी हैं और उनके अंदर तेरे लिए कितना प्यार है। उन्होंने सच का साथ देने के लिए अपने ही माॅ बाप और भाई से हर रिश्ता तोड़ लिया। सच में राज, हमारी रितू दीदी बहुत महान हैं।"

मैने पवन को भी खुद से छुपका लिया। कुछ देर ऐसे ही एक दूसरे के गले लगे रहने के बाद हम तीनो अलग हुए और फ्रेश होने के लिए अपने अपने कमरों में चले गए। अपने कमरे में पहुॅच कर मैने जगदीश अंकल को फोन लगाया और उनसे कुछ ज़रूरी बातें की। उनको यहाॅ के हालात के बारे में बताया और ये भी बताया कि मैं इन लोगों को मुम्बई पहुॅचा कर वापस आ जाऊॅगा। इस लिए मेरे और आदित्य दोनो के लौटने की टिकट का इंतजाम वो कर देंगें। जगदीश अंकल से मैने ये भी कहा कि इस सबके बारे में वो माॅ को ज़रूर मना लेंगे वरना वो मुझे वापस आने नहीं देंगी।

जगदीश अंकल से बात करने के बाद मैं बाथरूम में फ्रेश होने के लिए चला गया। कुछ ही देर में हम सब बाहर लान में खड़ी जिप्सी में थे। जिप्सी में रितू दीदी के साथ मैं, करुणा चाची, दिव्या और शगुन थे। जबकि दूसरी जीप में शंकर काका जो कि ड्राइविंग शीट पर थे उनके साथ आदित्य, पवन, आशा दीदी और माॅ आदि बैठे थे। सबसे मिल कर और हरिया काका को फार्महाउस की सुरक्षा का कह कर हम सब फार्म हाउस से बाहर निकल पड़े।

फार्महाउस में इस वक्त हरिया काका, बिंदिया, नैना बुआ और हेमराज मामा थे। हेमराज मामा को आज यहीं पर रुकने का कह दिया था करुणा चाची ने। रास्ते में रितू दीदी ने मोबाइल पर फोन लगा कर अपने महकमे में किसी से बात की और कुछ पुलिस के आदमी सादे कपड़ों में उनके आस पास ही रहने के लिए कहा।

दोनो गाड़िया ऑधी तूफान बनी गुनगुन के लिए उड़ी जा रही थी। आस पास हर तरफ हमारी नज़रें भी दौड़ रही थीं। ताकि अगर कहीं बड़े पापा या उनके आदमी हमें दिखें तो हम पहले से ही उनसे निपटने के लिए तैयार हो जाएॅ। लगभग दस मिनट बाद ही दो पुलिस की गाड़ियाॅ हमें नज़र आईं। एक हमारी गाड़ी को ओवरटेक करके हमारे आगे आगे चलने लगी और दूसरी गाड़ी हमारे पीछे पीछे चलने लगी।

आधे घंटे बाद हम सब गुनगुन के रेलवे स्टेशन पहुॅच गए। यहाॅ से मुम्बई जाने के लिए शाम को पाॅच बजे ट्रेन थी। इस वक्त साढ़े तीन बजे थे। रेलवे स्टेशन पहुॅच कर रितू दीदी ने हम सबको वेटिंग रूम में बैठाया और वहीं पर पुलिस के कुछ आदमियों को भी बैठाया। मैं दीदी के पास चुपचाप बैठा था। दीदी एकटक मुझे ही देख रही थी।

"नाराज़ है मुझसे???" दीदी ने मेरे सिर पर हाॅथ फेरते हुए कहा___"चल कोई बात नहीं मेरे भाई। तू कहीं भी रहे बस सलामत रहे तो तेरी हर नाराज़गी भी सह लूॅगी मैं। तू जब लौट के आएगा न तब तुझे मना लूॅगी मैं। फिर देखूॅगी कि तू मुझसे कितनी देर तक नाराज़ रह पाता है? बच्चूलाल मुझे ऐसे वैसे मत समझना तू। मुझे भी नाराज़ भाई को मनाना बहुत अच्छे से आता है। समझे न मेरे प्यारे भाई?"

रितू दीदी की बात पर मुझे अंदर ही अंदर हॅसी तो आई मगर मैने अपने चेहरे पर उन भावों को ज़ाहिर न होने दिया। ऐसे ही बैठे बैठे और इधर उधर की बातों से समय ब्यतीत हो गया और पाॅच बज गए। मुम्बई जाने वाली ट्रेन का एनाउंसमेन्ट होने लगा तो हम सब वेटिंगरूम से बाहर आ गए। कुछ ही देर में ट्रेन प्लेटफार्म पर आकर खड़ी हो गई। हम सब एसी वाले डिब्बों की तरफ बढ़ चले और कुछ ही देर में हम सब एसी के फर्स्ट क्लास डिब्बे में आ गए। हम सब की शीटें पास पास ही थीं। सबके बैठ जाने के बाद मैं रितू दीदी के साथ बाहर आ गया।

"मैं परसों किसी भी हाल में यहाॅ आ जाऊॅगा दीदी।" बाहर आते ही मैने दीदी से कहा___"आप खुद का बहुत अच्छे से ख़याल रखेंगी। कुछ दिनों के लिए ड्यूटी पर जाना भी बंद कर दीजिएगा। हलाॅकि मैंने भी ऐसा कुछ इंतजाम कर दिया है कि बड़े पापा कुछ कर ही नहीं पाएॅगे।"

"क्या मतलब??" रितू दीदी ने चौंक कर मेरी तरफ देखा___"क्या कर दिया है तूने??"
"बहुत जल्द आपको भी पता चल जाएगा दीदी।" मैने अजीब भाव से कहा___"काफी दिन हो गए हैं बड़े पापा को झटका दिये हुए। इस लिए मैने सोचा कि इस मौके पर उन्हें एक झटका देना बिलकुल उचित और फायदेमंद है। आख़िर मुझे भी तो आपकी फिक्र है दीदी। ऐसे ख़तरे में अकेला छोंड़ कर जा रहा हूॅ, तो कुछ तो आपकी सुरक्षा का इंतजाम कर दूॅ।"

"अरे पर तूने किया क्या है राज?" रितू दीदी ने ना समझने वाले भाव से कहा___"क्या तू मुझे नहीं बता सकता?"
"बता तो सकता हूॅ दीदी।" मैने शरारत से उनकी सुर्ख हो चुकी नाॅक पर हल्के से उॅगली मारते हुए कहा___"मगर ये एक सरप्राइज़ है। इस लिए बता नहीं सकता। मगर डोन्ट वरी कल आपको भी पता चल जाएगा।"

"तू न बहुत बदमाश हो गया है।" रितू दीदी ने तो मेरी नाॅक ही पकड़ ली, बोली___"ख़ैर, देखती हूॅ कल कि तूने क्या शरारत की है मेरे डैड के साथ?"
"यस ऑफकोर्स।" मैं मुस्कुराया और फिर एकाएक ही मैने गंभीरता से कहा___"दीदी एक बार विधी के घर भी हो आइयेगा आप। उस दिन के बाद आज तक नहीं जा पाया हूॅ मैं। जबकि ये मेरा फर्ज़ था कि मैं अपनी पत्नी की हर क्रिया को खुद अपने हाॅथों से करता।"

"तू चिंता मत कर मेरे भाई।" रितू दीदी ने कहा___"मैने सब कुछ कर दिया है। बस ये सब एक बार ठीक हो जाए उसके बाद तू खुद अपने हाॅथों से विधी की अस्थियों को पावन गंगा में विसर्जित कर देना।"
"क्या कहा आपने?" मैं खुशी से चौंकते हुए बोला___"आप ने विधी की अस्थियाॅ एकत्रित कर रखी हैं?"

"हाॅ राज।" रितू दीदी ने कहा___"मैं भला कैसे भूल सकती थी उसे? तेरा बाहर निकलना ख़तरे से खाली नहीं था इस लिए तेरे नाम से मैं खुद ही विधी के घर गई थी और फिर विधी के डैड के साथ उसकी अस्थियाॅ लेने गई थी। विधी की अस्थियों को मैने फार्महाउस में सुरक्षित रखा हुआ है।मैने सोचा था कि जब ये सब फसाद खत्म हो जाएगा तब मैं तुझसे कहूॅगी कि जा राज अपनी विधी की अस्थियों को पवित्र गंगा में बहा दे।"

"ओह दीदी, आप सच में बहुत महान हैं।" कहते हुए मेरी ऑखों में ऑसू आ गए___"आपको मेरी हर चीज़ का कितना ख़याल है।"
"विधी अगर तेरी प्रेमिका या पत्नी थी तो वो मेरी भी तो कुछ लगती थी राज।" दीदी ने गंभीर भाव से कहा__"मेरे जीवन में उसकी अहमियत बहुत ज्यादा है मेरे भाई। उसी की वजह से मेरा हृदय परिवर्तन हुआ। उसी की वजह से मुझे पता चला कि सच्चा प्यार क्या होता है। उसी ने मुझे बताया कि जिस भाई को मैने कभी देखना तक गवाॅरा नहीं किया था वो वास्तव में कितना अच्छा है। हाॅ राज, विधी ने सब बताया मुझे। उसके बाद जब उसने मुझसे कहा कि उसे एक बार अपने महबूब से मिलना है और उसी की बाहों में अपने जीवन की अंतिम साॅस लेनी है तो उस वक्त मेरा कलेजा दहल गया। मेरे अंदर से किसी ने चीख चीख कर कहा कि देख ले रितू, एक ये है कि अपने प्यार के लिए इसने कितने दुख सहे और खुद को खाक़ में भी मिला दिया और एक तू है कि एक ऐसे भाई को कभी देखना तक पसंद नहीं किया जिसका कहीं कोई दोष ही नहीं था। जिसने तेरे साथ कभी बुरा ही नहीं किया। बल्कि हमेशा इज्ज़त और सम्मान के साथ तुझे दीदी कहते हुए थकता नहीं था। कसम से भाई, उस वक्त मुझे अपनी ग़लतियों का बड़ी शिद्दत से एहसास हुआ और मैने इस सबके बारे में अलग तरह से सोचना शुरू किया। मैने विधी से वादा किया कि उसके महबूब को उसके पास ज़रूर लाऊॅगी। उसके बाद मैने तेरे दोस्तों के बारे में पता किया तो मुझे तेरे गहरे दोस्त के रूप में पवन का पता चला। मैं पवन से मिली और उससे तेरे बारे में पूछा। मगर वो मुझे तेरे बारे में कुछ भी बताने को तैयार ही नहीं हो रहा था। उसे लगता था कि मैं तेरे बारे में इस लिए पूछ रही हूॅ ताकि तेरा पता करके मैं अपने डैड को बता दूॅ कि तू फला स्थान पर है। जब पवन मुझे कुछ भी बताने से इंकार कर दिया तो मैने उसे सारी बातें बताई और खुद उसे विधी के पास ले आई। ये साबित करने के लिए कि मैं जो कुछ भी उससे कह रही थी वो सब सच है और इसके पीछे मेरे अंदर कोई भी बुरी भावना नहीं है। विधी को देखने बाद ही पवन को एहसास हुआ कि मैं सच कह रही हूॅ और तभी उसने तुझसे बात की थी।"

दीदी की बातें सुन कर मैं फिर से पिछली यादों में खो गया था। तभी दीदी की आवाज़ फिर से मेरे कानों में पड़ी___"इस सबकी वजह से ही मुझे लगा कि तू और गौरी चाची इतने भी ग़लत या बुरे नहीं हैं जितना कि बचपन से माॅम डैड ने हम तीनो भाई बहनों को बताया था या सिखाया था। उसके बाद मैने अपने माॅम डैड और भाई पर नज़र रखना शुरू किया तो जल्द ही मुझे सच्चाई का पता चल गया कि वास्तव में बुरा कौन है। बस उसके बाद तो तेरी ये दीदी सिर्फ तेरी ही बहन बन कर रह गई मेरे भाई। मैने अपने माॅम डैड व भाई सबसे रिश्ता तोड़ दिया। ऐसे रिश्तों से नाता जोड़े रखने का मतलब भी क्या था जिन रिश्तों में वासना और हवस के सिवा कुछ था ही नहीं।"

मैने रितू दीदी को अपने सीने से लगा लिया। वो बुरी तरह भावनाओं और जज़्बातों में बहने लगी थी जिसकी वजह से उनकी ऑखों से ऑसू बहने लगे थे। एसी के उस डिब्बे के पास ही हम दोनो भाई बहन एक दूसरे से गले लगे हुए थे। आस पास से आते जाते लोग हमें अजीब भाव से देखने लगे थे। ये देख कर मैने दीदी को खुद से अलग अलग किया और उन्हें लेकर डिब्बे के अंदर आ गया।

रितू दीदी एक बार फिर सबसे मिली और फिर ट्रेन के चलते ही वो ट्रेन से उतरने के लिए बाहर की तरफ जाने लगीं। मैं भी उनके पीछे पीछे गेट तक आ गया। गेट के पास पहुॅच कर जब दीदी ट्रेन से उतरने लगी तो मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी कोई अनमोल चीज़ मुझसे छूटने वाली है। मैने हौले से दीदी को दीदी कह कर आवाज़ दी तो वो तुरंत मेरी तरफ पलटीं, जैसे उन्हें मेरे पुकारने का ही इन्तज़ार था। जब पलट कर उन्होंने मेरी तरफ देखा तो ये देख कर मेरा दिल बैठ गया कि उनका चेहरा ऑसुओं से तर था। मैने उन्हें खींच कर खुद से छुपका लिया, वो खुद भी मुझसे कस कर लिपट गई। लेकिन तुरंत ही वो मुझसे अलग भी हो गईं।

"अब तू जा राज।" फिर उन्होने खुद को सम्हालते हुए कहा___"सबका ख़याल रखना। मैं तेरे आने का इंतज़ार करूॅगी और हाॅ गुड़िया को मेरा प्यार देना।"
"आप भी अपना ख़याल रखियेगा।" मैने कहा___"और अब आप सीधा फार्महाउस जाएॅगी। दो दिन के लिए ड्यूटी से छुट्टी ले लीजिएगा। मैं जब आऊॅ तो आपको फार्महाउस पर ही हॅसते मुस्कुराते हुए पाऊॅ।"

"मेरी मुस्कुराहट तो तू ही है मेरे भाई।" रितू दीदी ने मेरे चेहरे को सहलाया___"जब तू आ जाएगा न तो मेरा ये चेहरा अपने आप ही खिल उठेगा।"

मैं उनकी इस बात पर हौले से मुस्कुराया और फिर झुक कर उनके माथे पर हल्के से चूम लिया। मेरी इस क्रिया से वो भी मुस्कुरा दी और फिर मेरे गाल पर हलके से चूम कर वो सावधानी से धीरे धीरे चल रही ट्रेन से उतर गईं। मैं गेट पर खड़ा उन्हें तब तक देखता रहा जब तक कि आगे मोड़ आ जाने की वजह से दीदी मेरी नज़रों से ओझल न हो गईं। उनके ओझल होते ही मैं दरवाजे से पीछे की तरफ हटकर वहीं पर ट्रेन के उस डिब्बे की पिछली पुश्त से टेक लगाये हुए ऑखें बंद कर खड़ा हो गया। कुछ देर यूॅ ही खड़े रहने के बाद मैंने एक गहरी साॅस ली और फिर मैं अंदर अपनी शीट की तरफ आ गया।
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विराज के ओझल होते ही रितू प्लेटफार्म से बाहर की तरफ तेज़ तेज़ क़दमों के साथ बढ़ती चली गई। दिलो दिमाग़ में ज़बरदस्त तूफान तारी हो गया था उसके। दिल में भड़कते हुए जज़्बात उसके काबू से बाहर होने लगे थे जिसकी वजह से उसकी रुलाई फूटने को आतुर थी। मगर बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला हुआ था। स्टेशन से बाहर आते ही वो अपनी जिप्सी की तरफ बढ़ गई। जिप्सी के पास ही एक और जीप थी जिसमें शंकर काका बैठे हुए थे। रितू ने शंकर काका को वापस लौटने का कह दिया। पुलिस के जो आदमी आगे पीछे आए थे उनमें से एक जीप वाले पुलिस वालों को रितू ने शंकर के साथ जाने का कह दिया जबकि दूसरे जीप वालों को अपने आस पास ही रहने को कहा।

शंकर काका के जाने के बाद रितू ने भी जिप्सी को आगे बढ़ा दिया। किन्तु उसकी जिप्सी का रुख हल्दीपुर की तरफ न होकर किसी और ही तरफ था। उसके पीछे कुछ ही फाॅसले पर एक अलग गाड़ी में दूसरे पुलिस वाले भी थे जो सादे कपड़ों में थे। लगभग दस मिनट बाद रितू ने जिस जगह पर जिप्सी को रोंका उसके पास ही एक "जिम" था।

जिम के बाहर कुछ ही दूरी के फाॅसले पर उसने अपनी जिप्सी को खड़ी कर वो नीचे उतरी और पास ही एक दुकान के पास जाकर उसने दुकान से मिनरल वाटर का एक बाटल खरीदा और वापस आकर जिप्सी में बैठ गई। अपनी बाईं कलाई पर बॅधी रिस्टवाच पर उसने एक नज़र डाली। शाम के पाॅच बज कर बीस मिनट हो रहे थे।

जिप्सी में बैठी रितू थोड़ी थोड़ी देर के अंतराल में बाटल से पानी पीती रही। उसकी नज़र जिम के मुख्य दरवाजे पर थी। मतलब साफ था कि वो किसी ऐसे ब्यक्ति का इन्तज़ार कर रही थी जो उस जिम से बाहर आने वाला था। कुछ देर और गुज़रने के बाद एक बार फिर से रितू ने अपनी कलाई पर बॅधी रिस्टवाॅच में नज़र डाली। पाॅच बज कर तीस मिनट हो चुके थे। उसके पीछे कुछ ही दूरी पर दूसरी गाड़ी में बैठे दूसरे पुलिस वाले रितू की तरफ ना समझने वाले भाव से देखे जा रहे थे।

उस वक्त रितू के होठों पर अजीब सी मुस्कान उभरी जिस वक्त जिम के मुख्य द्वार से कुछ लड़के और लड़कियाॅ बाहर निकले। रितू की नज़र एक ऐसी लड़की पर स्थिर हो गई जिसके खूबसूरत बदन पर इस वक्त जिम वाले कपड़े थे। एकदम चुस्त दुरुस्त। उसको देख कर ही लग रहा था कि इसकी ऊम्र अट्ठारह या बीस से ज्यादा नहीं होगी।

रितू ने देखा कि वो लड़की जिम से निकलने के बाद पार्किंग एरिया की तरफ बढ़ गई है। कुछ ही देर में वो लड़की एक नई नवेली स्कूटी में पार्किंग से बाहर आती हुई दिखी और फिर रितू की ऑखों के सामने से ही वो दाहिने तरफ के रास्ते की तरफ सरपट जाती हुई नज़र आई। उसके जाते ही रितू ने जिप्सी को स्टार्ट किया और उस लड़की के पीछे चल पड़ी। उसके पीछे दूसरी गाड़ी में बैठे बाॅकी के पुलिस वाले भी बढ़ चले।

मेन मार्केट से निकलने के बाद रितू ने देखा कि सामने जा रही वो लड़की एक मोड़ पर मुड़ गई है। रितू ने भी जिप्सी को उस मोड़ पर मोड़ दिया। रितू की नज़र बराबर उस लड़की पर थी। सामने एक अधेड़ सा आदमी इस तरफ अचानक ही आता दिखा। शायद किसी दुकान या किसी घर से निकला था वो। उसके दोनो हाॅथों में एक एक ब्लैक कलर की प्वालिथिन थी। वो अधेड़ आदमी अपनी साइड की तरफ आने के लिए पहले पीछे की तरफ देखा और फिर रोड क्राॅस करने के लिए जैसे ही आगे बढ़ा वैसे ही वो उस लड़की की स्कूटी से टकरा गया।

रितू ने साफ तौर पर देखा था कि अधेड़ ब्यक्ति के पास पहुॅचते पहुॅचते उस लड़की ने स्कूटी की रफ्तार को काफी कम कर लिया था मगर कदाचित उसका ध्यान कहीं और था इस लिए हड़बड़ाहट में उसे समझ ही न आया कि वो अब क्या करे? जितना उससे हो सकता था उतना उसने किया था। किन्तु अब वो इसका क्या करती कि लाख कोशिशों के बाद भी उसकी स्कूटी उस अधेड़ ब्यक्ति के जिस्म से छू ही गई थी। जिसका परिणाम ये हुआ कि वो अधेड़ ब्यक्ति बीच सड़क पर भरभरा कर गिर गया था। उसके दोनो हाॅथों पर मौजूद प्वालीथिन छूट गई थी और पक्की सड़क पर गिरते ही प्वालीथिन के अंदर मौजूद सामान फूट गया था। प्वालीथिन में दवाई की बोतलें थी जो फूट गईं थी और अब सारी दवा सड़क पर फैलती जा रही थी।

अधेड़ के गिरते ही उस लड़की ने पहले स्कूटी को खड़ी किया उसके बाद वो एकदम से पैर पटकते हुए उस अधेड़ के सिर पर आ धमकी।

"देख कर नहीं चल सकते थे तुम?" फिर उसकी करकस आवाज़ वातावरण में गूॅजी___"अभी मर जाते तो क्या करते फिर? सड़क को क्या अपने बाप की जागीर समझ रखा है जो जहाॅ से चाहे चल सकते हो?"

लड़की अनाप शनाप बोलने में लगी ही थी कि आस पास से कई सारे लोग आकर वहाॅ पर इकट्ठा हो गए। सब एक दूसरे से पूछने लगे कि क्या हुआ??? सड़क पर गिरा हुआ वो अधेड़ आदमी किसी तरह उठा और कुछ ही दूरी पर अपनी दवाईयों का हाल देख कर उसके चेहरे पर बेहद पीड़ा के भाव उभर आए। उसने सिर उठा कर अपने चारों तरफ करुण भाव से देखा और फिर उसकी नज़र उस लड़की पर पड़ी जो उसके सिर पर आ धमकी थी।

"लगता है इस लड़की ने इस अधेड़ ब्यक्ति को अपनी स्कूटी से टक्कर मारी है।" आस पास खड़े लोगों के बीच से एक आदमी ने कहा___"देखो तो बेचारे की सारी दवाइयाॅ सड़क पर फूट कर फैल गई हैं।"

"आज कल तो सड़क पर चलना भी दूभर हो गया है भाई।" एक अन्य ब्यक्ति ने तंज कसा___"मोटर साइकिल और गाड़ी वाले आम आदमी को जब देखो तब टक्कर मार देते हैं और उल्टा उसी पर चढ़ दौड़ते हैं। देख रहे हो न इस लड़की को। इसने इस बेचारे बूढ़े आदमी को टक्कर मार दी और अब उल्टा इसे ही डाॅट रही है।"

"ऐ मिस्टर।" लड़की ये सुनते ही उस आदमी की तरफ पलटी___"इसमें मेरी कोई ग़लती नहीं है समझे। ये बुड्ढा खुद ही मरने के लिए मेरी स्कूटी के सामने आया था। वो तो अच्छा हुआ कि मैने टाइम पर ब्रेक मार दिया वरना इसका तो यहीं पर राम नाम सत्य हो जाना था आज।"

"अरे देखो तो कैसे बात कर रही है ये लड़की?" एक अन्य ने कहा___"एक तो खुद ही टक्कर मारी इसने और ऊपर से इस बूढ़े आदमी का दोष लगा रही है ये।"
"बड़े बाप की लगती है भाई।" एक दूसरे ने कहा__"बड़े बाप की बेटी है तभी इतना तीखा बोलती है। तमीज़ नाम की तो कोई बात ही नहीं है इसमें।"

"हाऊ डेयर यू टाक टु मी लाइक दिस?" लड़की ने गुस्से से चिल्लाते हुए कहा___"तुम्हें पता है कि तुम किससे बात कर रहे हो? अगर जान जाओगे न तो यहीं पर खड़े खड़े पेशाब कर दोगे समझे। मैं इस शहर के मंत्री की बेटी हूॅ। इस शहर के मंत्री को तो तुम सब अच्छी तरह जानते ही होगे न?"

लड़की के इतना कहते ही आस पास खड़े लोगों को साॅप सा सूॅघ गया। पलक झपकते ही वो सब वहाॅ से इस तरह गायब हो गए जैसे गधे के सिर से सींग गायब हो जाते हैं। उन सबके जाते ही लड़की के होठों पर विजयी मुस्कान उभरी और फिर उसने हिकारत के से भाव से उस अधेड़ की तरफ देखा। सड़क पर बैठा वो अधेड़ अपनी उस दवा की तरफ देख रहा था जो सड़क पर फैल गई थी। उसकी तरफ देख कर लड़की ने "हुॅह" कहा और फिर पलट कर अपनी स्कूटी की तरफ आ गई। स्कूटी को स्टार्ट कर वो आगे बढ़ चली।

ये सब तमाशा देख रितू ने मोबाइल पर किसी से कुछ कहा और लड़की की तरफ तेज़ी से जिप्सी को दौड़ा दिया। उसके चेहरे पर बेहद गुस्से के भाव थे। सीघ्र ही उसकी जिप्सी उस लड़की की स्कूटी के पास आ गई और फिर रितू ने पीछे से टक्कर मार दी उसे। परिणामस्वरूप लड़की और उसकी स्कूटी उछलते हुए सड़क पर गिरे और कुछ दूर तक घिसटते हुए चले गए। फिज़ा में लड़की की चीख़ गूॅज गई थी। यहाॅ पर आस पास कोई दुकान या घर नहीं था। मार्केट एरिया पीछे ही था। हलाॅकि कुछ ही दूरी पर बड़ी बड़ी बिल्डिंग्स दिख रही थी। ज़ाहिर था उन्हीं बड़ी बड़ी बिल्डिंग्स में से किसी एक बिल्डिंग पर इस लड़की का अलीशान घर होगा।

रितू ने जिप्सी को आगे बढ़ा कर लड़की के पास रोंका और उतर कर लड़की के पास गई। लड़की सड़क के बाएॅ साइड उल्टी पड़ी दर्द से कराह रही थी। बड़ी मुश्किल से वो उठ कर बैठी और फिर अपने बदन पर लगी चोटों को देखने लगी।

"देख कर नहीं चल सकती थी क्या?" रितू ने उसी का वाक्य उसी के लहजे में दोहराया____"अभी मर जाती तो क्या करती तुम? सड़क को क्या अपने बाप की जागीर समझ रखा है जो जहाॅ से चाहे चल सकती हो?"

रितू की बात सुनकर उस लड़की ने दर्द से कराहते हुए रितू की तरफ देखा और फिर एकाएक ही उसके चेहरे पर गुस्सा उतर आया। इस हालत में भी वो सड़क पर से किसी स्प्रिंग लगे खिलौने की तरह उछल कर खड़ी हो गई और फिर बिना कुछ बोले ही घूम कर एक फ्लाइंग किक का वार रितू पर कर दिया। मगर उसका ये वार उसे खुद ही भारी पड़ गया। क्योंकि जैसे ही उसने फ्लाइंग किक चलाई वैसे ही झुक कर रितू ने उसकी उस टाॅग पर अपनी टाॅग चला दी थी जो नीचे सड़क पर जमी थी। नतीजा ये हुआ कि जमीन से लड़की का पैर हटते ही उस लड़की का बैलेंस बिगड़ा और वो गुड़ीमुड़ी होकर सड़क पर औंधे मुह गिरी। उसके मुख से दर्द में डूबी चीख़ निकल गई।

"तेरे जैसी दो कौड़ी की फाइटर लड़कियाॅ मेरे पास ट्यूशन लेने आती हैं मूर्ख लड़की।" रितू ने उसके सिर के बाल अपनी मुट्ठियों में कस कर ऊपर उठाते हुए कहा___"तेरे अंदर अपने हरामी बाप का गंदा खून भरा है न। चल तुझे भी वहीं ले चलती हूॅ जहाॅ तेरा वो हरामी भाई और उसके हरामी दोस्त हैं।"

"मुझे छोंड़ दो वरना इसका अंजाम बहुत बुरा होगा तुम्हारे लिए।" लड़की ने छटपटाते हुए कहा___"तुम्हें पता नहीं है कि तुमने किसकी बेटी पर हाॅथ उठाने की ज़ुर्रत की है?"
"यही, बस यही अकड़ तो निकालनी है तेरी और तेरे बाप की भी।" रितू ने घुटने का वार ज़ोर से लड़की के पेट पर किया तो हिचक कर रह गई वो, जबकि रितू ने उसके बालों को और ज़ोर से खींचते हुए कहा___"बहुत जल्द तुम सबकी ऐसी हालत होने वाली है जिसकी तुम लोगों ने कभी कल्पना भी न की होगी।"

"बहुत पछताओगी तुम?" लड़की ने चीखते हुए कहा___"मेरा बाप तुम्हारा वो हाल करेगा कि तुम अपना चेहरा दुनियाॅ को दिखाने के काबिल नहीं रहोगी।"
"ये तो वक्त ही बताएगा मेरी जान।" रितू ने लड़की की कनपटी के एक खास हिस्से पर अचानक ही कराट मारी थी, जिसका नतीजा ये हुआ कि लड़की बेहोश होती चली गई। जबकि रितू ने कहा___"कि मुह दिखाने के काबिल कौन नहीं रहता।"

रितू ने लड़की के बेहोश जिस्म को उठा कर अपनी जिप्सी में डाला और पिछली शीट के नीचे से एक ब्लैक कलर की बड़ी सी प्लास्टिक की पन्नी निकाल कर उसके ऊपर ऐसे तरीके से डाल दिया कि कोई ये न सोच सके कि उसके नीचे कोई इंसानी जिस्म भी हो सकता है। ये सब करने के बाद रितू पलटी और आस पास का बारीकी से मुआयना किया तो कुछ ही दूरी पर उसे लड़की का मोबाइल पड़ा दिखा। सड़क पर गिरने से मोबाइल की स्क्रीन चटक गई थी। रितू ने किनारे साइड की एक बटन को दबाया तो तुरंत ही स्क्रीन फ्लैश कर उठी। इसका मतलब वो चालू हालत में था अभी। ये देख कर रितू ने मोबाईल का कवर निकाल कर मोबाइल के ढक्कन को खोला और बैटरी निकाल ली। उसके बाद सारी चीज़ें पाॅकेट में डालने के बाद उसने अपने दूसरे पाॅकेट से अपना आई फोन निकाला। उसे याद आया कि उसने आई फोन फार्महाउस पर ही स्विच ऑफ कर दिया था। ये ध्यान आते ही उसके होठों पर एक जानदार मुस्कान उभरी। उसने अपने आईफोन को वापस पाॅकेट में रखा और आकर जिप्सी में बैठ गई। जिप्सी को स्टार्ट कर उसने यूटर्न लिया और वापस चल दी।

मार्केट के पास आते ही उसे दूसरी गाड़ी पर वो पुलिस वाले दिखे। उनमें से एक पुलिस वाले ने रितू को बताया कि उसने उस अधेड़ आदमी को दूसरी दवाइयाॅ खरीद कर दे दी हैं। उसकी बात सुन कर रितू आगे बढ़ गई। उसके पीछे दूसरे पुलिस वाले भी अपनी गाड़ी में चल पड़े। उनकी नज़र रितू की जिप्सी पर थोड़ा सा फैली हुई उस ब्लैक कलर की प्लास्टिक की पन्नी पर पड़ी जिसके नीचे रितू ने उस लड़की को छुपा दिया था। किन्तु उन लोगों ने इस पर ज्यादा ध्यान न दिया। उनको अपने आला अफसर का आदेश था कि इंस्पेक्टर रितू के आस पास ही रहना है और उसकी किसी भी गतिविधी पर कोई सवाल जवाब नहीं करना है।

रितू की जिप्सी ऑधी तूफान बनी हल्दीपुर की तरफ बढ़ी चली जा रही थी। उसके पीछे ही दूसरी गाड़ी पर वो पुलिस वाले भी थे। रितू को अंदेशा था कि हल्दीपुर के पास वाले रास्तों पर कहीं उसका बाप या उसके आदमी मिल न जाएॅ मगर हल्दीपुर के उस पुल तक तो कोई नहीं मिला था। पुल से दाहिने साइड जिप्सी को मोड़ कर रितू फार्महाउस की तरफ बढ़ चली। कुछ दूरी पर आकर रितू ने जिप्सी को रोंक दिया। कुछ ही पलों में उसके पीछे वाली गाड़ी भी उसके पास आकर रुक गई।

"अब आप सब यहाॅ से वापस लौट जाइये।" रितू ने एक पुलिस वाले की तरफ देख कर कहा___"आज का काम इतना ही था। अगर ज़रूरत पड़ी तो वायरलेस या फोन द्वारा सूचित कर दिया जाएगा।"
"ओके मैडम।" एक पुलिस वाले ने कहा___"जैसा आप कहें। जय हिन्द।"

उन सबने रितू को सैल्यूट किया और फिर अपनी गाड़ी को वापस मोड़ कर वहाॅ से चले गए। उनके जाते ही रितू ने भी अपनी जिप्सी को फार्महाउस की तरफ बढ़ा दिया। आने वाला समय अपनी आस्तीन में क्या छुपा कर लाने वाला था ये किसी को पता न था।"
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दोस्तों, अपडेट हाज़िर है,,,,,,,,

आशा करता हूॅ कि आप सबको ये अपडेट पसंद आएगा। आप सबकी प्रतिक्रिया और खूबसूरत से रिव्यू का इन्तज़ार रहेगा।
 
एकनयासंसार

अपडेट.........《 49 》

अब तक,,,,,,,

मार्केट के पास आते ही उसे दूसरी गाड़ी पर वो पुलिस वाले दिखे। उनमें से एक पुलिस वाले ने रितू को बताया कि उसने उस अधेड़ आदमी को दूसरी दवाइयाॅ खरीद कर दे दी हैं। उसकी बात सुन कर रितू आगे बढ़ गई। उसके पीछे दूसरे पुलिस वाले भी अपनी गाड़ी में चल पड़े। उनकी नज़र रितू की जिप्सी पर थोड़ा सा फैली हुई उस ब्लैक कलर की प्लास्टिक की पन्नी पर पड़ी जिसके नीचे रितू ने उस लड़की को छुपा दिया था। किन्तु उन लोगों ने इस पर ज्यादा ध्यान न दिया। उनको अपने आला अफसर का आदेश था कि इंस्पेक्टर रितू के आस पास ही रहना है और उसकी किसी भी गतिविधी पर कोई सवाल जवाब नहीं करना है।

रितू की जिप्सी ऑधी तूफान बनी हल्दीपुर की तरफ बढ़ी चली जा रही थी। उसके पीछे ही दूसरी गाड़ी पर वो पुलिस वाले भी थे। रितू को अंदेशा था कि हल्दीपुर के पास वाले रास्तों पर कहीं उसका बाप या उसके आदमी मिल न जाएॅ मगर हल्दीपुर के उस पुल तक तो कोई नहीं मिला था। पुल से दाहिने साइड जिप्सी को मोड़ कर रितू फार्महाउस की तरफ बढ़ चली। कुछ दूरी पर आकर रितू ने जिप्सी को रोंक दिया। कुछ ही पलों में उसके पीछे वाली गाड़ी भी उसके पास आकर रुक गई।

"अब आप सब यहाॅ से वापस लौट जाइये।" रितू ने एक पुलिस वाले की तरफ देख कर कहा___"आज का काम इतना ही था। अगर ज़रूरत पड़ी तो वायरलेस या फोन द्वारा सूचित कर दिया जाएगा।"
"ओके मैडम।" एक पुलिस वाले ने कहा___"जैसा आप कहें। जय हिन्द।"

उन सबने रितू को सैल्यूट किया और फिर अपनी गाड़ी को वापस मोड़ कर वहाॅ से चले गए। उनके जाते ही रितू ने भी अपनी जिप्सी को फार्महाउस की तरफ बढ़ा दिया। आने वाला समय अपनी आस्तीन में क्या छुपा कर लाने वाला था ये किसी को पता न था।"
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अब आगे,,,,,,,

उधर एक तरफ!
एक लम्बे चौड़े हाल के बीचो बीच एक बड़ी सी टेबल के चारो तरफ कुर्सियाॅ लगी हुई थी। उन सभी कुर्सियों पर इस वक्त कई सारे अजनबी चेहरे बैठे दिख रहे थे। सामने फ्रंट की मुख्य कुर्सी खाली थी। हर शख्स के सामने मिनरल वाटर से भरे हुए काॅच के ग्लास रखे हुए थे। लम्बे चौड़े हाल में इस वक्त ब्लेड की धार की मानिन्द पैना सन्नाटा फैला हुआ था। वो सब अजनबी चेहरे ऐसे थे जिन्हें देख कर ही प्रतीत हो रहा था कि ये सब किसी न किसी अपराध की दुनियाॅ ताल्लुक ज़रूर रखते हैं। उन अजनबी चेहरों के बीच ही कुछ ऐसे भी चेहरे थे जो शक्ल सूरत से विदेशी नज़र आ रहे थे।

"और तो सब ठीक ही है।" उनमें से एक ने हाल में फैले हुए सन्नाटे को भेदते हुए कहा___"मगर ठाकुर साहब का हमसे इस तरह इन्तज़ार करवाना बिलकुल भी पसंद नहीं आता। हर बार यही होता है कि हम सब टाइम से कान्फ्रेन्स हाल में मीटिंग के लिए आ जाते हैं मगर ठाकुर साहब तो ठाकुर साहब हैं। हर बार निर्धारित समय से आधा घंटे लेट ही आते हैं।"

"अब इसमें हम क्या कर सकते हैं कमलनाथ जी?" एक अन्य ब्यक्ति ने मानो असहाय भाव से कहा___"वो ठाकुर साहब हैं। शायद हमसे इस तरह इन्तज़ार करवाने में वो अपनी शान समझते हैं। हलाॅकि ऐसा होना नहीं चाहिए, क्योंकि यहाॅ पर कोई भी किसी से कम नहीं है। हम सबको एक दूसरे का बराबर आदर व सम्मान करना चाहिए। मगर ये बात ठाकुर साहब से कौन कहे?"

"यस यू आर अब्सोल्यूटली राइट मिस्टर पाटिल।" सहसा एक विदेशी कह उठा___"हमको भी ठाकुर का इस तरह वेट करवाना पसंद नहीं आता हाय। वो क्या समझता हाय कि हम लोगों की कोई औकात नहीं हाय? अरे हम चाहूॅ तो अभी इसी वक्त ठाकुर को खरीद सकता हाय। बट हम भी इसी लिए चुप रहता हाय कि तुम सब भी चुप रहता हाय।"

"इट्स ओके मिस्टर लारेन।" पाटिल ने कहा___"ये आख़िरी बार है। आज ठाकुर से हम सब इस बारे में एक साथ चर्चा करेंगे और उनसे कहेंगे कि हम सबकी तरह वो भी टाइम पर मीटिंग हाल में आया करें। इस तरह हमसे वेट करवा कर हमारी तौहीन करने का उन्हें कोई हक़ नहीं है। अगर आप मेरी इस बात से सहमत हैं तो प्लीज जवाब दीजिए।"

पाटिल की इस बात पर सबने अपनी प्रतिक्रिया दी। जो कि पाटिल की बातों पर सहमति के रूप में ही थी। कुछ देर और समय बीतने के बाद तभी हाल में अजय सिंह दाखिल हुआ और मुख्य कुर्सी पर आकर बैठ गया। उसने सबकी तरफ देख कर बड़े रौबीले अंदाज़ से हैलो किया। उसकी इस हैलो का जवाब सबने इस तरह दिया जैसे बग़ैर मन के रहे हों। इस बात को खुद अजय सिंह ने भी महसूस किया।

"साॅरी फ्रैण्ड्स हमें आने में ज़रा देर हो गई।" अजय सिंह ने बनावटी खेद प्रकट करते हुए कहा___"आई होप आप सब इस बात से डिस्टर्ब नहीं हुए होंगे। एनीवेज़....
"ठाकुर साहब दिस इज टू मच।" एक अन्य ब्यक्ति कह उठा___"आप हर बार ऐसा ही करते हैं और फिर बाद में ये कह देते हैं कि साॅरी फ्रैण्ड्स हमें आने में ज़रा देर हो गई। आप हर बार लेट आकर हम सबकी तौहीन करते हैं। हम सब आधा घंटे तक आपके आने का वेट करते रहते हैं। आपको क्या लगता है कि हम लोगों के पास दूसरा कोई काम ही नहीं है? हम सब भी अपने अपने कामों में ब्यस्त रहते हैं मगर टाइम से कहीं भी पहुॅचने के लिए समय पहले से ही निकाल लेते हैं। इस बिजनेस में हम सब बराबर हैं। यहाॅ कोई छोटा बड़ा नहीं है। हम सबने आपको मेन कुर्सी पर बैठने का अधिकार अपनी खुशी से दिया था। मगर इसका मतलब ये नहीं कि आप उसका नाजायज़ मतलब निकाल लें। हम सबने डिसाइड कर लिया है कि अगर आपका रवैया ऐसा ही रहा तो हम सब आपसे बिजनेस का अपना अपना हिस्सा वापस ले लेंगे। दैट्स
आल।"

उस ब्यक्ति की ये सारी बातें सुन कर अजय सिंह अंदर ही अंदर बुरी तरह तिलमिला कर रह गया था। ये सच था कि हर बार वो इन सबसे इन्तज़ार करवा कर यही जताता था कि उसके सामने इन लोगों की कोई अहमियत नहीं है। बल्कि वो इन सबसे ज्यादा अहमियत रखता है। आज तक इस बिजनेस से जुड़े ये सब लोग उसकी इस आदत पर कोई सवाल नहीं खड़ा किये थे जिसकी वजह से उसे यही लगता रहा था कि यू सब उसे बहुत ज्यादा इज्ज़त व अहमियत देते हैं और इसी लिए वो ऐसा करता रहा था। मगर आज जैसे इन सबके धैर्य का बाॅध टूट गया था। जिसका नतीजा इस रूप में उसके सामने आया था। उस शख्स की बातों से उसके अहं को ज़बरदस्त चोंट पहुॅची लेकिन वो ये बात अच्छी तरह जानता था कि इस बारे में अगर उसने कुछ उल्टा सीधा बोला तो काम बिगड़ जाने में पल भर की भी देर नहीं लगेगी। इस लिए वो उस शख्स की उन सभी कड़वी बातों को जज़्ब कर गया था।

"आई नो मिस्टर तेवतिया।" अजय सिंह ने कहा__"बट इस सबसे हमारा ये मतलब हर्गिज़ भी नहीं है कि हम आप सबको अपने से छोटा समझते हैं। हम सब फ्रैण्ड्स हैं और हम में से कोई छोटा बड़ा नहीं है। हर बार हम मीटिंग में देर से पहुॅचते हैं इसका हमें यकीनन बेहद अफसोस होता है। मगर क्या करें हो जाता है। मगर हमें ये भी पता होता है कि आप सब हमारी इस ग़लती को नज़रअंदाज़ कर देंगे।"

"इट्स ओके ठाकुर साहब।" कमलनाथ ने कहा__"बट ध्यान रखियेगा कि अगली बार से ऐसा न हो। कभी कभार की बात हो तो समझ में आता है मगर हर बार ऐसा हो तो मूड ख़राब होना स्वाभाविक बात है।"

"यस ऑफकोर्स मिस्टर कमलनाथ।" अजय सिंह एक बार फिर गुस्से और अपमान का घूॅट पीकर बोला__"अब अगर आप सबकी इजाज़त हो तो काम की बात करें?"
"जी बिलकुल।" पाटिल ने कहा___"
उसके पहले हम ये जानना चाहते हैं कि समय से पहले इस तरह अचानक मीटिंग रखने की क्या वजह थी?"

"आप सबको तो इस बात का पता ही है कि मौजूदा वक्त में हमारे हालात बिलकुल भी ठीक नहीं हैं।" अजय सिंह ने बेबस भाव से कहा___"पिछले कुछ समय से हमारे साथ बेहद गंभीर और बेहद नुकसानदाई घटनाएॅ घट रही हैं। उन घटनाओं के पीछे कौन है ये भी हम पता लगा चुके हैं। इस लिए अब हम चाहते हैं कि आप सब हमारे इस बुरे वक्त में हमारा साथ दें।"

"वैसे तो आप खुद ही सक्षम हैं ठाकुर साहब।" पाटिल ने कहा___"किन्तु इसके बाद भी आप हम सबसे मदद की आशा रखते हैं तो मैं तैयार हूॅ। आख़िर हम सब एक ही तो हैं। हर तरह की मसीबत व परेशानी का एक साथ मिल कर मुकाबला करेंगे तो हर जंग में हमारी फतह होगी।"

"हमें भी आपके इन मौजूदा हालातों का पता है ठाकुर साहब।" एक अन्य ब्यक्ति ने कहा___"इस लिए हम सब आपके साथ हैं। आप हुकुम दें कि हमें क्या करना होगा?"
"आप सब हमारा साथ देने के लिए तैयार हैं इससे बड़ी बात व खुशी और क्या होगी भला? रही बात आपके कुछ करने की तो आप बस हमारे साथ ही बने रहें कुछ समय के लिए या फिर अपने कुछ ऐसे आदमी हमें दीजिए जो हर तरह के फन में माहिर हों।"

"जैसी आपकी इच्छा ठाकुर साहब।" कमलनाथ ने कहा___"हम सब आपके साथ हैं और हमारे ऐसे आदमी भी आपके पास आ जाएॅगे जो हर तरह के फन में माहिर हैं। अब से आपकी परेशानी हमारी परेशानी है। क्यों फ्रैण्ड्स आप सब क्या कहते हैं??"

कमलनाथ के अंतिम वाक्य पर सबने अपनी प्रतिक्रिया सहमति के रूप में दी। ये सब देख कर अजय सिंह अंदर ही अंदर बेहद खुश हो गया था।

"मिस्टर सिंह।" सहसा इस बीच एक विदेशी ने कहा___"पिछली डील अभी तक कम्प्लीट नहीं हुआ। क्या हम जान सकता हाय कि इतना डिले करने का तुम्हारा क्या मतलब हाय? बात थोड़ी बहुत की होती तो हम उसको भूल भी सकता था बट एज यू नो वो सारी चीज़ें लाखों करोड़ों में हाय। सो हाउ कैन आई फारगेट?"

"हम जानते हैं मिस्टर लाॅरेन।" अजय सिंह ने बेचैनी से पहलू बदला___"कि वो सब करोड़ों का सामान है। लेकिन मौजूदा वक्त में हम ऐसी स्थित में नहीं हैं कि आपका पैसा आपको दे सकें। इसके लिए आपको तब तक रुकना पड़ेगा जब तक कि हमारे सिर पर से ये मुसीबत और ये परेशानी न हट जाए। प्लीज़ ट्राई टू अण्डरस्टैण्ड मिस्टर लाॅरेन।"

"ओखे।" लाॅरेन ने कहा___"नो प्राब्लेम हम तुम्हारी हर तरह से मदद करेगा। बट सारी प्राब्लेम फिनिश होने के बाद तुम हमारा पूरा पैसा देगा। इस बात का प्रामिस करना पड़ेगा तुमको।"
"मिस्टर लाॅरेन।" सहसा कमलनाथ ने कहा___"ये आप कैसी बात कर रहे हैं? आप जानते हैं कि ठाकुर साहब के पास इस समय कितनी गंभीर समस्याएॅ हैं इसके बाद भी आप सिर्फ अपने मतलब की बात कर रहे हैं। जबकि आपको करना तो ये चाहिए था कि आप सब कुछ भूल कर सिर्फ ठाकुर साहब को उनकी समस्याओं से बाहर निकालें।"

"तो हमने कब मना किया इस बात से मिस्टर कमलनाथ?" लाॅरेन ने कहा___"हम कह ओ रहा है कि हम हर तरह से इनकी मदद करेगा।"
"हाॅ लेकिन यहाॅ पर आपको अपने पैसों की बात करना उचित नहीं है न।" कमलनाथ ने कहा___"आपको ये भी तो सोचना चाहिए कि पैसा सिर्फ आपका ही बस बकाया नहीं है ठाकुर साहब के पास, हम सबका भी है। लेकिन हमने तो इनसे पैसों के बारे में कोई बात नहीं की।"

"ओखे आयम साॅरी।" लाॅरेन ने बेचैनी से पहलू बदलते हुए कहा___"सो अब बताइये क्या करना है हम लोगो को?"
"ये तो ठाकुर साहब ही बताएॅगे।" कमलनाथ ने कहा__"कि हम सबको क्या करना होगा?"
"हमने आप सबको पहले ही बता दिया है कि आप सब अपने कुछ ऐसे आदमी हमें दीजिए जो हर तरह के काम में माहिर हों।" अजय सिंह ने कहा___"उसके बाद हम खुद ही तय करेंगे कि हमें उन आदमियों से क्या और कैसे काम लेना है?"

"ठीक है ठाकुर साहब।" पाटिल ने कहा___"हमारे पास जो भी ऐसे आदमी हैं। उन सबको आपके पास भेज देंगे।"
"ओह थैक्यू सो मच टू आल ऑफ यू डियर फ्रैण्ड्स।" अजय सिंह ने खुश होकर कहा___"और हाॅ, हम आप सबसे वादा करते हैं कि इस सबसे निपट लेने के बाद हम बहुत जल्द आप सबके पैसों का हिसाब किताब कर देंगे।"

अजय सिंह की इस बात के साथ ही मीटिंग खत्म हो गई। सबने अजय सिंह को अपने आदमी भेजने का कहा और फिर सब एक एक करके मीटिंग हाल से बाहर की तरफ चले गए। सबके जाने के बाद अजय सिंह भी बाहर की तरफ निकल गया। बाहर पार्किंग में खड़ी अपनी कार में बैठ कर अजय सिंह घर की तरफ निकल गया।

कुछ ही समय में अजय सिंह हवेली पहुॅच गया। अंदर ड्राइंगरूम में रखे सोफों पर प्रतिमा और शिवा बैठे थे। अजय सिंह भी वहीं रखे एक सोफे पर बैठ गया। उसने प्रतिमा को चाय बनाने का कहा तो प्रतिमा रसोई की तरफ बढ़ गई। जबकि अजय सिंह ने गले पर कसी टाई को ढीला कर आराम से सोफे की पिछली पुश्त से पीठ टिका कर लगभग लेट सा गया।

शिवा को समझ न आया कि अपने बाप से बातों का सिलसिला कैसे और कहाॅ से शुरू करे? ऐसा कदाचित इस लिए था क्योंकि आज सारा दिन उसने अपनी माॅ के साथ मौज मस्ती की थी। इस बात के कारण कहीं न कहीं हल्की सी झिझक उसके अंदर मौजूद थी।

"आप इतना लेट कैसे हो गए डैड?" आख़िर शिवा ने बात शुरू कर ही दी, बोला___"आपने तो कहा था कि जल्दी आ रहा हूॅ?"
"एक ज़रूरी मीटिंग में ब्यस्त हो गया था बेटे।" अजय सिंह ने उसी हालत में कहा___"कल से हमारे पास कुछ ऐसे आदमी होंगे जो हर तरह के काम में माहिर होंगे। अब मैं भी देखूॅगा कि वो हरामज़ादा विराज और रितू कैसे उन आदमियों को ठिकाने लगाते हैं?"

"ऐसे वो कौन से आदमी हैं डैड?" शिवा ने ना समझने वाले भाव से कहा___"क्या आप अभी भी ऐसे किन्हीं आदमियों पर ही भरोसा करेंगे? जबकि पालतू आदमियों का क्या हस्र हुआ है ये आपको बताने की ज़रूरत नहीं है।"

"हमारे आदमी दिमाग़ से पूरी तरह पैदल थे बेटे।" अजय सिंह ने कहा___"वो सब अपने शारीरिक बल को महत्व देते थे तभी तो मात खा गए। उन्होंने ये कभी सोचा ही नहीं कि शरीरिक बल से कहीं ज्यादा दिमाग़ी बल कारगर होता है। ख़ैर, अब जो आदमी यहाॅ आएॅगे वो सब खलीफ़ा लोग होंगे। जो हर वक्त हर तरह के ख़तरे वाले कामों को ही अंजाम देते हैं। दूसरी बात ये है कि रितू एक आम लड़की नहीं है जिसे कोई भी ऐरा गैरा ब्यक्ति आसानी से पकड़ लेगा, बल्कि वो एक पुलिस वाली भी है। जिसके पास सारा पुलिस डिपार्टमेन्ट भी है। ऐसे में अगर हम खुद उस पर हाॅथ डालेंगे तो वो हमें कानून की चपेट में डाल सकती है। इस लिए हमने सोचा है कि हम पहले ऐसे आदमियों के द्वारा उसे पकड़ लें कि जिनसे वो आसानी से मुकाबला भी न कर सके। मुकाबले से मेरा मतलब ये है कि मेरे वो आदमी उसे ऐसा घेरा बना कर पकड़ेंगे जिसके बारे में उसे अंदेशा तक न हो पाएगा।"

"ओह आई सी।" शिवा को सारी बात जैसे समझ आ गई थी, बोला___"ये सही रणनीत है डैड। अगर वो सब आदमी वैसे ही हर काम में माहिर हैं जैसा कि आप बता रहे हैं तो फिर यकीनन ये सही क़दम है।"

अभी अजय सिंह कुछ बोलने ही वाला था कि तभी किचेन से आती हुई प्रतिमा हाॅथ में चाय का ट्रे लिए वहाॅ पर आ गई। उसने दोनो बाप बेटे को एक एक कप चाय पकड़ाई और एक कप खुद लेकर वहीं एक सोफे पर बैठ गई।

"कौन से आदमियों की बात चल रही है अजय?" प्रतिमा ने सोफे पर बैठने के साथ ही पूछा था। उसके पूछने पर अजय सिंह ने उसे भी वही सब बता दिया जो अभी उसने शिवा को बताया था। सारी बात सुनने के बाद प्रतिमा कुछ देर गंभीरता से सोचती रही।

"तो अब तुमने बाहर से आदमी मॅगवाए हैं।" फिर प्रतिमा ने तिरछी नज़र से देखते हुए कहा___"और उन पर भरोसा भी है तुम्हें कि वो तुम्हें इस बार नाकामी का नहीं बल्कि फतह का स्वाद चखाएॅगे?"
"बिलकुल।" अजय सिंह ने स्पष्ट भाव से कहा___"ये सब ऐसे आदमी हैं जिनका वास्ता अपराध की हक़ीक़त दुनियाॅ से है और ये सब उस अपराध की दुनियाॅ के सफल खिलाड़ी हैं।"

"चलो इनका कारनामा भी देख लेते हैं।" प्रतिमा ने सहसा गहरी साॅस ली___"वैसे इस बात पर भी ध्यान देना कि समय हर वक्त इसी बस के लिए नहीं रहता।"
"क्य मतलब??" अजय सिंह चकराया।
"मतलब ये कि हर बार एक जैसी ही चाल चलना एक सफल खिलाड़ी की पहचान नहीं होती।" प्रतिमा ने समझाने वाले भाव से कहा__"ऐसे में सामने वाले खिलाड़ी के दिमाग़ में ये मैसेज जाता है कि उसका प्रतिद्वंदी कमज़ोर है जो सिर्फ एक ही तरह की चाल चलना जानता है और उसकी ये बेवकूफी भी कि उसी एक तरह की चाल से वह खेल को जीत लेने की उम्मीद भी करता है। इस लिए एक अच्छे खिलाड़ी को चाहिए कि बीच बीच में अपनी चाल को बदल भी लेना चाहिए।"

"बात तो तुम्हारी ठीक है डियर।" अजय सिंह ने चाय का खाली कप सामने काॅच की टेबल पर रखते हुए बोला___"लेकिन इसको इस एंगल से भी तो सोच कर देखो ज़रा। मतलब ये कि सामने वाले खिलाड़ी के दिमाग़ में हम जानबूझ कर ये मैसेज डाल रहे हैं कि हमारे पास सिर्फ एक ही तरह की चाल है। उसे ऐसा समझने दो। जबकि हम सही समय आने पर अपनी चाल को बदल कर उसे ऐसे मात देंगे कि उसे इसकी उम्मीद भी न होगी हमसे। जिसे वो हमारी कमज़ोरी समझेगा वो दरअसल हमारी चाल का ही एक हिस्सा होगा।"

"ओहो क्या बात है डियर हस्बैण्ड।" प्रतिमा ने सहसा मुस्कुराते हुए कहा___"क्या तर्क निकाला है। ये भी ठीक है। चल जाएगा। मगर सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात ये है कि हमारे पास समय नहीं है समय बर्बाद करने के लिए भी। सोचने वाली बात है कि हम अब भी वहीं हैं जहाॅ पर थे जबकि हमारा दुश्मन बहुत कुछ करके यहाॅ निकल भी चुका है। हाॅ अजय, वो रंडी का जना विराज अब यहाॅ नहीं होगा। बल्कि जिस काम से वो यहाॅ आया था उस काम को करके वो वापस मुम्बई चला गया होगा। आख़िर इस बात का एहसास तो उसे भी है कि उसने हमारे इतने सारे आदमियों का क्रियाकर्म करके गायब किया है जिसका अंजाम किसी भी सूरत में उसके हित में नहीं होगा। इस लिए अपना काम पूरा करने के बाद वो यहाॅ पर एक पल भी रुकना गवाॅरा नहीं करेगा।"

"माॅम ठीक कह रही हैं डैड।" सहसा इस बीच शिवा ने भी अपना पक्ष रखा___"वो यकीनन यहाॅ से चला गया होगा। भला ऐसे ख़तरे के बीच रुकने की कहाॅ की समझदारी ।होगी? अब ये भी स्पष्ट हो गया है कि उसके बाद यहाॅ सिर्फ रितू दीदी ही रह गई हैं।"

"रितू ही बस नहीं है बेटे।" अजय सिंह ने कहा___"बल्कि उसके साथ तुम्हारी नैना बुआ भी है।"
"क्याऽऽ???" अजय सिंह की इस बात से शिवा और प्रतिमा दोनो ही बुरी तरह चौंके थे, जबकि प्रतिमा ने कहा___"तुम ये कैसे कह सकते हो अजय? नैना तो वापस अपने ससुराल चली गई थी न उस दिन?"

"वो ससुराल नहीं।" अजय सिंह ने कहा___"बल्कि रितू के साथ कहीं और गई थी। नैना ने तो ससुराल जाने का सिर्फ बहाना बनाया था जबकि हक़ीक़त ये थी कि रितू उसे खुद यहाॅ से निकाल कर ले गई थी। ये सब रितू का ही किया धरा था।"

"लेकिन ये सब तुम्हें कैसे पता अजय?" प्रतिमा ने चकित भाव से कहा___"और रितू ने भला ऐसा क्यों किया होगा?"
"उस दिन नैना जब रितू के साथ गई तो ये सच है कि एक भाई होने के नाते मुझे खुशी हुई थी कि चलो अच्छा हुआ कि नैना को उसके ससुराल वालों ने बुलाया है।" अजय सिंह कह रहा था___"मगर जब दो दिन बाद भी नैना का कोई फोन नहीं आया तो मैने सोचा कि मैं ही फोन करके पता कर लूॅ कि वहाॅ सब ठीक तो है न? इस लिए मैने नैना के ससुराल में नैना को फोन लगाया मगर नैना का फोन बंद बता रहा था। कई बार के लगाने पर भी जब नैना का फोन बंद ही बताता रहा तो मैने नैना के हस्बैण्ड को फोन लगाया और उनसे पूछा नैना के बारे में तो उसने साफ साफ कठोरता से मना कर दिया कि उसके यहाॅ नैना नहीं आई और ना ही उसका नैना से कोई लेना देना है अब। नैना के पति की ये बात सुन कर मेरा दिमाग़ घूम गया। मुझे समझते देर न लगी कि नैना को हवेली से निकाल कर रितू ही ले गई है। उसे शायद ये बात कहीं से पता चल गई होगी कि हम दोनो बाप बेटे की गंदी नज़र नैना पर है। इस लिए रितू ने उसे इस हवेली से बड़ी चालाकी से निकाल लिया और अपनी बुआ को किसी ऐसी जगह पर सुरक्षित रखने का सोचा होगा जहाॅ पर हम आसानी से पहुॅच भी न सकें।"

"हे भगवान! इतना बड़ा खेल खेल गई रितू।" प्रतिमा ने हैरानी से कहा___"अगर ये बात सच है तो यकीनन हमारी बेटी ने हमें उल्लू बना दिया है। उसने बड़ी सफाई और चतुराई से आपके मुह से आपका मन पसंद निवाला छीन लिया है जिसका हमें एहसास तक नहीं हो सका।"

"जब हमारी बेटी ने ही हमें धोखा दे दिया तो कोई क्या कर सकता है?" अजय सिंह ने कहा___"लेकिन अब जो हम उसके साथ करेंगे उसकी उसने कल्पना भी न की होगी। हम उसके माॅ बाप हैं, हमने उसे बचपन से लेकर अब तक क्या कुछ नहीं दिया। उसने जिस चीज़ की आरज़ू की हमने पल भर में उस चीज़ को लाकर उसके क़दमों में डाल दिया। मगर उसने हमारे लाड प्यार का ये सिला दिया हमें। इतने सालों का लाड प्यार उसके लिए कोई मायने नहीं रखता। देख लो प्रतिमा, ये है तुम्हारी बेटी का अपने माॅ बाप के प्रति प्रेम और लगाव। जो अपने बाप के दुश्मन के साथ मिल कर खुद अपने ही पैरेंट्स के लिए मौत का सामान जुटाने पर तुली हुई है। इस हाल में अगर तुम मुझसे ये कहो कि मैं उसकी इस धृष्टता को माफ़ कर दूॅ तो ऐसा हर्गिज़ नहीं हो सकता अब। तुम्हारी बेटी ने अपने ही बाप के हाथों अब ऐसी मौत को चुन लिया है जिसके दर्द का किसी को एहसास नहीं हो सकता।"

"पहले मुझे भी लगता था अजय कि वो आख़िर हमारी बेटी है।" प्रतिमा ने कठोरता से कहा___"मगर उसके इस कृत्य से मुझे भी उस पर अब बेहद गुस्सा आया हुआ है। मैं जानती हूॅ कि वो अब दूध पीती बच्ची नहीं रही है जिसके कारण उसे हर चीज़ का पाठ पढ़ाना पड़ेगा। बल्कि अब वो बड़ी हो गई है। जिसे अपने और अपनों के अच्छे बुरे का बखूबी ख़याल है। इसके बाद भी वो अपने ही पैरेंट्स का बुरा चाहने वाला काम किया है तो अब मैं भी यही कहूॅगी कि उसे उसके इस अपराध की शख्त से शख्त सज़ा मिले। दैट्स आल।"

कुछ देर और तीनो के बीच बातें होती रहीं उसके बाद तीनों ने रात का खाना खाया और सोने के लिए कमरों में चले गए। इस बात से अंजान कि आने वाली सुबह उनके लिए क्या धमाका करने वाली है????
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रितू की जिप्सी फार्महाउस पहुॅची।
लोहे वाले गेट के पास ही शंकर और हरिया काका बंदूख लिए खड़े थे। रितू की जिप्सी को देखते ही दोनो ने गेट खोल दिया। गेट खुलते ही रितू ने जिप्सी की गेट के अंदर बढ़ा दिया। कुछ ही पल में रितू की जिप्सी पोर्च में जाकर रुकी। जिप्सी से उतर कर रितू ने हरिया काका को आवाज़ देकर बुलाया। हरिया के आते ही रितू ने उससे जिप्सी के पीछे बड़ी सी प्वालीथिन के नीचे ढॅकी मंत्री की बेटी को उठा कर तहखाने में ले जाने को कहा। उससे ये भी कहा कि तहखाने में उसे अच्छी तरह बाॅध कर ही रखे।

रितू के कहने पर हरिया ने वैसा ही किया। आज एक लड़की को इस तरह तहखाने में ले आते देख हरिया काका अंदर ही अंदर बेहद खुश हो गया था। लड़की को देख कर उसके मन में ढेर सारे लड्डू फूट रहे थे। काफी दिन से लड़की गाॅड मार मार कर वो अब उकता सा गया था। अब उसे एक फ्रेश माल की ज़रूरत महसूस हो रही थी। बिंदिया को ज्यादा सेक्स करना पसंद नहीं था इस लिए हरिया को वह रोज रोज अपने पास नहीं आने देती थी। जिसकी वजह से हरिया उससे खूब नाराज़ हो जाया करता था। मगर कर भी क्या सकता था??

मन में ढेर सारे खुशी के लड्डू फोड़े वह लड़की को तहखाने में ले जाकर उसे वहीं तहखाने के फर्स पर लेटा दिया। लड़की अभी भी बेहोश ही थी। तहखाने में रस्सियों से बॅधे वो चारो असहाय अवस्था में लगभग झूल से रहे थे। उन चारों की हालत ऐसी हो गई थी कि पहचान में नहीं आ रहे थे। जिस्म पर एक एक कच्छा था उन चारों के और कुछ नहीं। इस वक्त चारो के सिर नीचे की तरफ झुके हुए थे। उनमें इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि सिर उठा कर सामने की तरफ देख भी सकें कि कौन किसे लेकर आया है? हरिया काका ने एक नज़र उन चारों पर डाली उसके बाद वो लड़की की तरफ एक बार देखने के बाद तहखाने से बाहर की तरफ चला गया। कुछ देर में जब वो आया तो उसके दोनो हाॅथ में एक लकड़ी की कुर्सी थी।

लकड़ी की कुर्सी को तहखाने में एक तरफ रख कर वो पलटा और फिर लड़की उठा कर उस कुर्सी पर बैठा दिया। उसने लड़की के दोनो हाथों को कुर्सी के दोनो साइड एक एक करके रस्सी से बाॅध दिया। उसके बाद उसके पैरों को भी नीचे कुर्सी के दोनो पावों पर एक एक कर बाॅध दिया। लड़की के झुके हुए सिर को ऊपर उठा कर उसने कुर्सी की पिछली पुश्त से टिका दिया। कुछ देर तक हरिया काका उस लड़की को ललचाई नज़रों से देखता रहा उसके बाद वो तहखाने से बाहर आ गया। तहखाने का गेट बंद कर वो बाहर गेट के पास खड़े शंकर के करीब आ गया।

उधर, मंत्री की बेटी को हरिया के हवाले करने के बाद रितू अंदर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। कमरे में आकर उसने अपनी वर्दी को उतारा और बाथरूम में घुस गई। जब वह फ्रेश होकर बाहर आई तो कमरे में नैना बुआ को देख कर वह चौंकी। दरअसल इस वक्त वह सिर्फ एक हल्के पिंक कलर के टाॅवेल में थी।

बाॅथरूम का दरवाजा खुलने की आवाज़ से बेड पर बैठी नैना का ध्यान उस तरफ गया तो रितू को मात्र टाॅवेल में देख कर वह हौले से मुस्कुराई। उसके यूॅ मुस्कुराने से रितू के चेहरे पर अनायास ही लाज और हया की सुर्खी फैल गई। होठों पर हल्की मुस्कान के साथ ही उसकी नज़रें झुकती चली गईं। रितू का इस तरह शरमाना नैना को काफी अच्छा लगा। उसे पता था कि उसकी ये भतीजी भले ही ऊपर से कितनी ही कठोर हो किन्तु अंदर से वह एक शुद्ध भारतीय लड़की है जो ऐसी परिस्थिति में शरमाना भी जानती है।

"चल मुझसे शरमाने की ज़रूरत नहीं है रितू।" नैना ने मुस्कुराते हुए कहा___"तू आराम से अपने कपड़े पहन ले। फिर हम बातें करेंगे।"
"शर्म तो आएगी ही बुआ।" रितू ने इजी फील करने के बाद ही हौले से मुस्कुराते हुए कहा___"मैं इस तरह पहले कभी भी किसी के सामने नहीं आई। भले ही वो मेरे घर का ही कोई सदस्य हो।"

"हाॅ जानती हूॅ मैं।" नैना ने कहा___"पर इतना तो आजकल आम बात है मेरी बच्ची। सो फील इजी एण्ड कम्फर्टेबल।"
नैना की इस बात से रितू बस मुस्कुराई और फिर पास ही एक साइड रखी आलमारी से उसने अपने कपड़े निकाले और फिर वापस बाथरूम में घुस गई। ये देख कर नैना एक बार पुनः मुस्कुरा उठी।

थोड़ी देर बाद रितू जब बाथरूम से बाहर आई तो इस बार उसके खूबसूरत से बदन पर भारतीय लड़कियों का शुद्ध सलवार सूट था और सीने पर दुपट्टा। वो इन कपड़ों में बहुत ही खूबसूरत लग रही थी। नैना ने उसे गहरी नज़र से एक बार ऊपर से नीचे तक देखा फिर बेड से उठ कर रितू के पास आई और रितू का सिर पकड़ कर अपनी तरफ किया और उसके माथे पर हल्के चूम लिया।

"बहुत खूबसूरत लग रही है मेरी बच्ची।" फिर नैना ने मुस्कुरा कर कहा___"किसी की नज़र न लगे। ईश्वर हर बला से दूर रखे तुझे।"
"आप भी न बुआ।" रितू ने हॅसते हुए कहा___"ख़ैर छोड़िये ये बताइये आपको यहाॅ अच्छा तो लगता है न? कहीं ऐसा तो नहीं कि आप यहाॅ पर इजी फील नहीं करती हैं और खुद को यहाॅ मजबूरीवश रहने का सोचती हैं?"

"अरे नहीं रितू।" नैना ने रितू का हाॅथ पकड़ कर उसे बेड पर बैठाने के बाद खुद भी बैठते हुए कहा___"यहाॅ मुझे बहुत अच्छा लगता है। हर मुसीबत हर परेशानी से दूर हूॅ यहाॅ। यहाॅ शान्त व साफ वातावरण मन को बेहद सुकून देता है। यहाॅ बिंदिया भौजी हैं और तू है बस इससे ज्यादा और क्या चाहिए? पिछले कुछ दिनों में अपने कुछ अज़ीज़ों से भी मिल लिया, ऐसा लगा जैसे फिर से इस घर में वही पुराना वाला दौर लौट आया है।"

"चिन्ता मत कीजिए बुआ।" रितू ने कहा___"पुराना वाला समय फिर से आएगा। फिर से पहले जैसी ही खुशियाॅ हमारे बीच रक्श करेंगी। बस इन खुशियों को बरबाद करने वालों का एक बार किस्सा खत्म हो जाए। उसके बाद फिर से वही हमारा वही संसार होगा मगर एक नये संसार के रूप में। जिसमें सबके बीच सिर्फ बेपनाह प्यार होगा। जहाॅ किसी घृणा अथवा किसी प्रकार की नफ़रत के लिए कोई स्थान हीं नहीं होगा।"

"क्या सच में तूने अपने माता पिता के लिए उनका अंजाम बुरा ही सोचा हुआ है?" नैना ने पूछा___"क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उन्हें उनके कर्मों की सज़ा भी मिल जाए और वो हमारे साथ भी रहें एक अच्छे इंसानों की तरह?"

"ये असंभव है बुआ।" रितू ने कठोरता से कहा__"जो इंसान इतना ज्यादा अपने सोच और विचार से गिर जाए कि वो अपनी ही औलाद के बारे में इतना गंदा करने का सोच डाले उससे भविष्य में अच्छाई की उम्मीद हर्गिज़ नहीं करनी चाहिए। दूसरी बात, भले ही ईश्वर उनके अपराधों के लिए उन्हें माफ़ कर दे मगर मैं किसी सूरत पर उन्हें माफ़ नहीं कर सकती। उन्होंने माफ़ी के लिए कहीं पर भी कोई रास्ता नहीं छोंड़ा है। उन्होंने हर रिश्ते के लिए सिर्फ गंदा सोचा है और गंदा किया है। उन्होने अपने स्वार्थ के लिए अपने देवता जैसे भाई की हत्या की। अपनी बहन सामान छोटे भाई की पत्नी पर बुरी नज़र डाली। सबसे बड़ी बात तो उन्होंने ये की कि अपने ही बेटे के साथ अपनी पत्नी को उस काम में शामिल किया जिस काम को किसी भी जाति धर्म में उचित नहीं माना जाता बल्कि सबसे ऊॅचे दर्ज़े का पाप माना जाता है। ऐसे इंसानों को माफ़ी कैसे मिल सकती है बुआ? नहीं हर्गिज़ नहीं। ना तो मैं माफ़ करने वाली हूॅ और ना ही मेरा भाई राज उन घटिया लोगों को माफ़ करेगा। एक पल के लिए अगर ऐसा हो जाए कि राज उन्हें माफ़ भी कर दे मगर मैं....मैं नहीं माफ़ कर सकती। हाॅ बुआ....मेरे अंदर उनके प्रति इतना ज़हर और इतनी नफ़रत भर चुकी है कि अब ये उनकी मौ से ही दूर होगी। मुझे दुख इस बात का नहीं होगा कि मेरे माॅ बाप दुनियाॅ से चले गए बल्कि मरते दम तक इस बात का मलाल रहेगा कि ऐसे गंदे इंसानों की औलाद बना कर ईश्वर ने मुझे इस धरती पर भेज दिया था।"

रितू की इन बातों से नैना चकित भाव से देखती रह गई उसे। उसे एहसास था कि रितू के अंदर इस वक्त किस तरह की भावनाओं का चक्रवात चालू था जिसके तहत वो इस तरह अपने ही माॅ बाप के लिए ऐसा बोल रही थी। नैना खुद भी यही समझती थी कि रितू अपनी जगह परी तरह सही है। ऐसे इंसान के मर जाने का कोई दुख या संताप नहीं हो सकता।

"माॅ बाप तो वो होते हैं बुआ जो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देते हैं।" रितू दुखी भाव से कहे जा रही थी__"बाल्य अवस्था से ही अपने बच्चों के अंदर अच्छे संस्कार डालते हैं। सबके प्रति आदर व सम्मान करने की भावना के बीज बोते हैं। सबके लिए अच्छा सोचने की सीख देते हैं। कभी किसी के बारे में बुरा न सोचने का ज्ञान देते हैं। मगर मेरे माॅ बाप ने तो अपने तीनों बच्चों को बचपन से सिर्फ यही पाठ पढ़ाया था कि हवेली के अंदर रहने वाला हर ब्यक्ति बुरा है। इनसे ज्यादा बात मत करना और ना ही इन्हें अपने पास आने देना। कहते हैं इंसान वही देता है जो उसके पास होता है। सच ही तो है बुआ, मेरे माॅ बाप के पास यही सब तो था अपने बच्चों को देने के लिए। वो खुद ऊॅचे दर्ज़े के बुरे इंसान थे, उनके अंदर पाप और बुराईयों का भण्डार था। वही सब उन्होंने अपने बच्चों को भी दिया। ये तो समय की बात है बुआ कि वो हमेशा एक जैसा नहीं रहता। हर चीज़ की हकीक़त कैसी होती है ये बताने के लिए समय ज़रूर आपको ऐसे मोड़ पर ले आता है जहाॅ आपको हर चीज़ की असलियत का पता चल जाता है। इस लिए ये अच्छा ही हुआ कि समय मुझे ऐसे मोड़ पर ले आया। वरना मैं जीवन भर इस बात से बेख़बर रहती कि जिन लोगों के बारे में मुझे बचपन से ये पाठ पढ़ाया गया था कि ये सब बुरे लोग हैं वो वास्तव में कितने अच्छे थे और गंगा की तरह पवित्र थे।"

"हर इंसान की सोच अलग होती है रितू।" नैना ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"और हर इंसान की इच्छाएॅ भी अलग होती हैं। कुछ लोग अपनी इच्छा और खुशी के लिए अनैतिकता की सीमा लाॅघ जाते हैं और कुछ लोग दूसरों की खुशी और भलाई के लिए अपनी हर खुशी और इच्छाओं का गला घोंट देते हैं। अनैतिकता की राह पर चलने वाले ये सोचना गवाॅरा नहीं करते कि जो कर्म वो कर रहे हैं उससे जाति समाज और खुद के घर परिवार पर कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा? उन्हें तो बस अपनी खुशियों से मतलब होता है। जबकि इसके विपरीत अच्छे इंसान अपने अच्छे कर्मों से आदर्श के नये नये कीर्तिमान स्थापित करते हैं। ख़ैर छोंड़ इन बातों को और ये बता कि आगे का क्या सोचा है?"

"सोचना क्या है बुआ?" रितू ने कहा___"मेरा भाई मुझसे कह गया है कि मैं उसके वापस आने का इन्तज़ार करूॅ। उसके बाद हम दोनो बहन भाई इस किस्से का खात्मा करेंगे।"
"पर ये सब होगा कैसे?" नैना ने कहा___"तुम दोनो इस काम को अकेले कैसे अंजाम तक पहुॅचाओगे?"

"मुझे खुद पर और अपने भाई राज पर पूरा भरोसा है बुआ।" रितू ने गर्व से कहा___"आप देखना हम दोनो कैसे इस सबको फिनिश करते हैं? अब तो रितू राज स्पेशल गेम होगा बुआ। मैं बस राज के आने का बेसब्री से इन्तज़ार कर रही हूॅ।"

"तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे ये सब बहुत सहज है।" नैना ने हैरानी से कहा___"जबकि मेरा तो सोच सोच कर ही दिल बुरी तरह से घबराया जा रहा है।"
"इसमें घबराने वाली क्या बात है बुआ?" रितू ने स्पष्ट भाव से कहा___"सीधी और साफ बात है कि जो लोग सिर पर मौत का कफ़न बाॅध कर चलते हैं वो फिर किसी चीज़ से घबराते नहीं हैं। बल्कि मौत से भी डॅट कर मुकाबला करते हैं। जहाॅ तक मेरी बात है तो अब अगर मेरी जान भी मेरे भाई की सुरक्षा में चली जाए तो कोई ग़म नहीं है। बल्कि मुझे बेहद खुशी होगी कि मेरी जान मेरे ऐसे भाई की सलामती के लिए फना हो गई जिसने वास्तव में मुझे हमेशा अपनी दीदी माना और हमेशा मुझे इज्ज़त व सम्मान दिया।"

"ऐसा मत कह रितू।" नैना की ऑखों से ऑसू छलक पड़े, बोली____"तुझे कुछ नहीं होगा और ख़बरदार अगर दुबारा से ऐसी फालतू की बात की तो। तू मेरी जान है मेरी बच्ची। तुझे कुछ नहीं होगा क्योंकि तू सच्चाई की राह पर चल रही है, धर्म की राह पर मुकीम है तू। अगर किसी को कुछ होगा तो वो उन्हें होगा जो इस देश समाज और परिवार के लिए कलंक हैं।"

"ख़ैर जाने दीजिए बुआ।" रितू ने मानो पहलू बदला__"इन सब बातों में क्या रखा है? होना तो वही है जो हर किसी की नियति में लिखा हुआ है। आइये खाना खाने चलते हैं। बिंदिया काकी ने खाना तैयार कर दिया होगा।"

रितू की ये बात सुन कर नैना उसे कुछ देर अजीब भाव से देखती रही, फिर रितू के उठते ही वो भी बेड से उठ बैठी। कमरे से बाहर आकर दोनो डायनिंग हाल की तरफ बढ़ चलीं। जहाॅ पर करुणा का भाई और अभय सिंह का साला बैठा इन्हीं का इन्तज़ार कर रहा था। ये दोनो भी वहीं रखी एक एक कुर्सियों पर बैठ गई। कुछ ही देर में बिंदिया ने सबको खाना परोसा। खाना खाने के बाद सब अपने अपने कमरों की तरफ सोने के लिए चले गए।
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सुबह हुई!
उस वक्त सुबह के लगभग साढ़े आठ बज रहे थे जब रास्तों पर धूल उड़ाती हुई कई सारी गाड़ियाॅ आकर हवेली के बाहर एक एक करके रुकीं। वो तीन गाड़ियाॅ थी। एक सफारी, एक इनोवा, और एक आई20 थी। तीनों गाड़ियों के रुकते ही सभी गाड़ियों के दरवाजे एक साथ खुले और खुल चुके दरवाजे से एक एक दो दो करके कई सारे आदमी गाड़ियों से बाहर निकले।

बाहर आते ही वो सब एक साथ हवेली के उस हिस्से के मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़े जो हिस्सा अजय सिंह का था। इस वक्त दरवाजा बंद था। आस पास कुछ ऐसे आदमी भी बाहर मौजूद थे जिनके हाॅथों में बंदूख, रिवाल्वर आदि हथियार थे। गाड़ियों से आने वाले सभी लोग मुख्य दरवाजे की तरफ मुड़ चले। आस पास खड़े अजय सिंह के बंदूखधारी आदमियों के चेहरों पर अजीब से भाव उभरे। अजीब से इस लिए क्यों कि गाड़ियों से आने वाले सभी आदमी एकदम दनदनाते हुए मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ चले थे।

आस पास खड़े बंदूखधारी आदमी उन लोगों की इस धृष्टता को देख उन्हें रोंकने के लिए उन लोगों के सामने आ गए और उन्हें रोंक कर उनसे पूछने लगे कि वो कौन लोग हैं और इस तरह कैसे बिना कुछ पूछे अंदर की तरफ बढ़े चले जा रहे हैं? किन्तु बंदूखधारियों के पूछने पर उन लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि अपने अपने कोट की सामने वाली पाॅकेट से अपना अपना आई कार्ड निकाल कर बंदूखधारियों को दिखा दिया। बंदूखधारी ये देख कर बुरी तरह चौंके कि वो सब सी बी आई की स्पेशल ऑफीसर थे। बंदूखधारियों को बिलीउल भी समझ न आया कि वो लोग यहाॅ क्यों आए हैं और वो खुद अब क्या करें? उधर आई कार्ड दिखाने के बाद वो लोग मुख्य दरवाजे के पास पहुॅच गए और दरवाजे पर लगी कुण्डी को ज़ोर से बजा दिया।

कुछ ही देर में दरवाजा खुला। दरवाजे पर नाइट गाउन पहने प्रतिमा नज़र आई। अपने सामने इतने सारे अजनबी आदमियों को देख कर वो चौंकी। उसके चेहरे पर ना समझने वाले भाव उभरे।

"जी कहिए।" फिर उसने अजीब भाव से कहा___"आप लोग कौन हैं? और यहाॅ किस काम से आए हैं?"
"हमें अंदर तो आने दीजिए मैडम।" एक आदमी ने ज़रा शालीन भाव से कहा___"मिस्टर अजय सिंह से मिलना है।"

"पर आप लोग हैं कौन?" प्रतिमा ने दरवाजे पर खड़े खड़े ही पूछा___"ये तो बताया नहीं आपने।"
"सब पता चल जाएगा मैडम।" उस आदमी ने कहा__"हम सब मिस्टर अजय सिंह के गहरे दोस्त यार हैं। प्लीज, उन्हें कहिए कि हम उनसे मिलने आए हैं।"

प्रतिमा उस आदमी की बात सुन कर देखती रह गई उसे। उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे उसे यकीन न आ रहा हो कि ये लोग अछय सिंह के दोस्त हो सकते हैं। कुछ देर उस आदमी को देखते रहने के बाद जाने क्या सोच कर प्रतिमा दरवाजे से हट कर पलटी और अंदर की तरफ बढ़ती चली गई। उसके पीचे पीछे ये सब भी ओल दिये।

कुछ ही देर में प्रतिमा के पीछे पीछे ये सब ड्राइंग रूम में पहुॅच गए। प्रतिमा ने सोफों की तरफ हाॅथ का इशारा कर उन लोगों को बैठने के लिए कहा। प्रतिमा के इस प्रकार कहने पर वो सब लोग सोफों पर बैठ गए जबकि प्रतिमा अंदर कमरे की तरफ बढ़ गई।

थोड़ी ही देर में अजय सिंह ड्राइंग रूम में दाखिल हुआ। ड्राइंग रूम में सोफों पर बैठे इतने सारे लोगों पर नज़र पड़ते ही उसके चेहरे पर अजनबीयत के भाव उभरे। जैसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो कि ये सब लोग कौन हैं?

"माफ़ करना मगर हमने आप लोगों को पहचाना नहीं।" फिर उसने एक अलग सोफे पर बैठते हुए कहा।
"इसके पहले कभी हम लोग आपसे मिले ही कहाॅ थे जो आप हमें पहचान लेते।" एक कोटधारी ने अजीब भाव से कहा___"ख़ैर, आपकी जानकारी के लिए हम बता दें कि हम सब सी बी आई से हैं और यहाॅ आपको चरस, अफीम, और ड्रग्स का धंधा करने के जुर्म में गिरफ्तार करने आए हैं। हमारे पास आपके खिलाफ़ स्पेशल वारंट भी है। इस लिए आप बिना कुछ सवाल जवाब किये हमारे साथ चलने का कस्ट करें।"

सी बी आई के उस आदमी के मुख से ये बात सुन कर अजय सिंह के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। बुत सा बन गय था वह। मुख से कोई बोल न फूटा। जिस्म के सभी मसामों ने पल भर में ढेर सारा पसीना उगल दिया। चेहरा इस तरह नज़र आने लगा था जैसे धमनियों में दौड़ते हुए लहू की एक बूॅद भी शेष न बची हो। एकदम फक्क पड़ गया था।

"ये...ये...क्...क्या बकवास कर रहे हैं आप?" फिर सहसा बदहवाश से अजय सिंह ने जैसे खुद को सम्हाला था और फिर वापस ठाकुरों वाले रौब में आते हुए बोला था। ये अलग बात है कि उसके उस रौब में रत्ती भर भी रौब दिखाई न दिया, बोला___"आप होश में तो हैं न? आप जानते हैं कि आप किसके सामने क्या बकवास कर रहे हैं?"

"हम तो पूरी तरह होशो हवाश में ही हैं मिस्टर अजय सिंह।" सीबीआई ऑफिसर ने कहा___"किन्तु आपके होशो हवाश ज़रूर कहीं खो गए से नज़र आने लगे हैं। रही बात आपकी कि आप कौन हैं और हम आपसे क्या कह रहे हैं तो इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता। क्योंकि हम कानून के नुमाइंदे हैं। हमारे लिए छोटे बड़े सब एक जैसे ही होते हैं। ख़ैर, हमने आपके शहर वाले मकान से भारी मात्रा में ग़ैर कानूनी ज़खीरा बरामद किया है। सारी जाॅच पड़ताल के बाद जब हमें ये पता चला कि वो सब आपकी संमत्ति है तो हम कोर्ट से स्पेशल वारंट लेकर आपको यहाॅ गिरफ्तार करने चले आए। इस लिए अब आपके पास हमारे साथ चलने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं है।"

ऑफीसर की ये बात सुन कर एक बार फिर से अजय सिंह की हालत ख़राब हो गई। वो सोच भी नहीं सकता था कि उसके साथ ऐसा भी कभी हो सकता है। उसे तुरंत ही फैक्ट्री में लगी आग का वाक्या याद आया जब तहखाने से उसका ग़ैर कानूनी सामान गायब होने का पता चला था उसे। वो ये भी समझ गया था कि ये सब विराज ने ही किया था। प्रतिमा ने इस बात का अंदेशा भी ब्यक्त किया था कि किसी ऐसे मौके पर वो ये सब कानून के हवाले कर सकता है जबकि हम कुछ भी करने की स्थिति में ही न रह जाएॅगे। मतलब साफ था कि प्रतिमा की कही बात आज सच हो गई थी। यानी विराज ने उस सारे सामान को उसके शहर वाले मकान में रखा और फिर इसकी सूचना सीबीआई को दे दी और अब सीबीआई वाले अजय सिंह के पास स्पेशल वारंट लेकर आ गए थे। अजय सिंह खुद भी सरकारी वकील रह चुका था इस लिए जानता था कि ऐसे मौके पर वह कुछ भी नहीं कर सकता था। कोई दूसरा जुर्म होता तो कदाचित वो कोई जुगाड़ लगा कर अपनी ज़मानत करवा भी लेता मगर यहाॅ तो जुर्म ही संगीन था।

"किस सोच में डूब गए मिस्टर अजय सिंह?" तभी उसे सोचो में गुम देख ऑफीसर ने कहा___"आप अपनी मर्ज़ी से हमारे साथ चलेंगे तो बेहतर होगा, वरना आप जानते है कि हमारे पास बहुत से तरीके हैं आपको यहाॅ से ले चलने के लिए।"

"ऑफीसर।" सहसा अजय सिंह ने अजीब भाव से कहा___"ये सब झूॅठ हैं। हम ऐसा कोई काम नहीं करते जिसे कानून की नज़र में जुर्म कहा जाए। ये यकीनन किसी की साजिश है हमें फसाने की। हाॅ ऑफीसर, ये साजिश ही है। काफी समय से हमारा शहर वाला मकान खाली पड़ा है इसलिए संभव है कि किसी ने ये सब गैर कानूनी चीज़ें वहाॅ पर छुपा कर रखी रही होंगी। हमारा इस सबसे कीई लेना देना नहीं है।"

"सच और झूठ का फैसला तो अब अदालत ही करेगी मिस्टर अजय सिंह।" ऑफिसर ने कहा___"हमारा काम तो बस इतना है कि प्राप्त सबूतों के आधार पर आपको गिरफ्तार कर अदालत के समक्ष खड़ा कर दें। इस लिए अब आपकी कोई दलील हमारे सामने चलने वाली है।"

अभी अजय सिंह कुछ कहने ही वाला था कि तभी अंदर से प्रतिमा और शिवा आकर वहीं पर खड़े हो गए। दोनो के चेहरों पर हल्दी पुती हुई थी। मतलब साफ था कि यहाॅ की सारी वार्तालाप उन दोनो ने सुन ली थी।

"ये सब क्या है डैड?" शिवा ने अंजान बनते हुए पूछा___"ये कौन लोग हैं और यहाॅ किस लिए आए हैं?"
"ये सब सीबीआई से हैं बेटे।" अजय सिंह ने बुझे मन से कहा___"और ये हमे गिरफ्तार करने आए हैं। इनका कहना है कि हमारे शहर वाले मकान से इन्होंने भारी मात्रा में चरस अफीम ड्रग्स आदि चीज़ें बरामद की हैं।"

"व्हाऽऽट??" शिवा ने चौंकते हुए कहा___"ये आप क्या कह रहे हैं डैड? भला ऐसा कैसे हो सकता है? हमारे शहर वाले मकान में वो सब चीज़ें कहाॅ से आ गई?"
"मैं तो पहले ही कहती थी कि तुम शहर वाले उस मकान को बेंच दो।" प्रतिमा ने जाने क्या सोच कर ये बात कही थी, बोली___"मगर मेरी सुनते कहाॅ हो तुम? अब देख लो इसका अंजाम। जाने कब से खाली पड़ा था वह। आज कल किसी का क्या भरोसा कि वो मकान के अंदर आकर क्या क्या खुराफात करने लग जाएॅ।"

"अरे तो भला हमें क्या पता था प्रतिमा कि ऐसा भी कोई कर सकता है?" अजय सिंह ने प्रतिमा की चाल को बखूबी समझते हुए कहा___"अगर पता होता तो हम उस मकान की देख रेख के लिए कोई आदमी रख देते न।"
"किसने किया होगा ये सब?" प्रतिमा ने कहा___"भला हमसे किसी की ऐसी क्या दुश्मनी हो सकती है जिसके तहत उसने हमारे साथ इतना बड़ा काण्ड कर दिया?"

"मिस्टर अजय सिंह।" सहसा ऑफिसर ने हस्ताक्षेप करते हुए कहा___"ये सब बातें आप बाद में सोचिएगा। इस वक्त आप हमारे साथ चलने का कस्ट करें प्लीज़।"
"अरे ऐसे कैसे ले जाएॅगे आप डैड को?" सहसा शिवा आवेशयुक्त भाव से बोल पड़ा___"मेरे डैड बिलकुल बेगुनाह हैं। आप इन्हें ऐसे कहीं नहीं ले जा सकते। ये तो हद ही हो गई कि करे कोई और भरे कोई और।"

"तुम शान्त हो जाओ बेटे।" अजय सिंह ने अपने कूढ़मगज बेटे की बातों पर मन ही मन कुढ़ते हुए बोला___"बात चाहे जो भी हो लेकिन हमें इनके साथ जाना ही पड़ेगा। ये सब कानून के रखवाले हैं। दूसरी बात इन्हें हमारे मकान से वो सब चीज़ें मिली हैं इस लिए पहली नज़र में हर कोई यही समझेगा और कहेगा कि वो सब चीज़ें हमारी हैं। यानी हम ग़ैर कानूनी धंधा भी करते हैं। दूसरा ब्यक्ति ये नहीं सोचेगा कि कोई अन्य ब्यक्ति ये सब चीज़ें हमारे मकान में रख कर हमें फॅसा भी सकता है। अतः मौजूदा हालात में हमें कानून का हर कहा मानना पड़ेगा और उसका साथ देना पड़ेगा। तुम फिक्र मत करो बेटे, ये हमें ले जाकर हमसे इस सबके बारे में पूॅछताछ करेंगे। इस सबके लिए हमें तभी सज़ा मिलेगी जब ये साबित हो जाएगा कि वो सब चीज़ें वास्तव में हमारी ही हैं या हम कोई ग़ैर कानूनी धंधा भी करते हैं।"

अजय सिंह की बात सुन कर शिवा कुछ बोल न सका। प्रतिमा ने भी कुछ न कहा। कदाचित वो खुद भी अजय सिंह की इस बात से सहमत थी। दूसरी बात, वो तो जानती ही थी कि वो सब चीज़ें सच में अजय सिंह की ही हैं। इस लिए ये सब सोच कर और इसके अंजाम का सोच कर वो अंदर ही अंदर बुरी तरह घबराए भी जा रही थी। वो अच्छी तरह जानती थी कि ऐसे मामले में कानून की गिरफ्त से बचना असंभव नहीं तो नामुमकिन ज़रूर था।

इधर अजय सिंह के मन में भी यही सब चल रहा था। उसे भी एहसास था कि इससे बचना बहुत मुश्किल काम है। इस लिए वो कोई न कोई जुगाड़ लगाने भी सोच रहा था। मगर चूॅकि उसके पुराने कानूनी कनेक्शन पहले ही खत्म हो चुके थे इस लिए वो कुछ कर पाने की हालत में नहीं था। दूसरी सबसे बड़ी बात ये थी कि उसे इस बात का एहसास हो चुका था कि अगर किसी तरह वो पुलिस कमिश्नर अथवा प्रदेश के मंत्री को अपने हक़ में कर भी ले तो तब भी बात अपने पक्ष में नहीं होनी थी। क्योंकि उसने देखा था कि उसके साथ घटी पिछली सभी घटनाओं में ऐसा हुआ था कि ऊपर से ही शख्त आदेश मिला था।

अजय सिंह के पसीने छूट रहे थे मगर उसके दिमाग़ में कोई बेहतर जुगाड़ आ नहीं रहा था। वक्त और हालात ने अचानक ही इस तरह से अपना रंग बदल लिया था कि उसको कुछ करने लायक छोंड़ा ही नहीं था। उसने कल्पना तक न की थी कि वो इतना बेबस व लाचार हो जाएगा और इतनी आसानी से कानून की चपेट में आ जाएगा।

"तो चलें मिस्टर अजय सिंह?" सहसा ड्राइंग रूम में छाए सन्नाटे को भेदते हुए उस ऑफिसर ने कहा__"अगर आपको ये लगता है कि ये सब किसी ने आपको फॅसाने के उद्देश्य से किया है और इस सबमें आपका कोई हाॅथ नहीं है तो फिक्र मत कीजिए। हम सच्चाई का पता लगा लेंगे। किन्तु उससे पहले आपको हमारे साथ चलना ही पड़ेगा और तहकीक़ात में हमारा सहयोग करना पड़ेगा।"

उस ऑफिसर के इतना कहते ही अजय सिंह ने गहरी साॅस ली और फिर सोफे से उठ खड़ा हुआ। इस वक्त उसके बदन पर नाइट ड्रेस ही था इस लिए उसने ऑफिसर से ड्रेस बदल लेने की परमीशन माॅगी। ऑफिसर ने परमीशन दे दी। परमीशन मिलते ही अजय सिंह कमरे की तरफ बढ़ गया। उसके जाते ही ऑफिसर ने एक अन्य ऑफिसर की तरफ देख कर ऑखों से कुछ इशारा किया। ऑफिसर का इशारा समझ कर दूसरा ऑफिसर तुरंत ही अजय सिंह के पीछे कमरे की तरफ बढ़ गया। मतलब साफ था कि ऑफिसर को इस बात का अंदेशा था कि अंदर कमरे अजय सिंह कहीं फोन पर किसी से कोई बात वगैरा न करने लगे। जबकि मौजूदा हालात में ऐसा करना हर्गिज़ भी जायज़ बात न थी।

कुछ ही देर में ऑफिसर के साथ ही अजय सिंह कमरे से आता दिखाई दिया। उसके आते ही सभी लोग सोफों पर से उठे और अजय सिंह के साथ ही बाहर आ गए। जबकि पीछे बुत बने अजय सिंह की बीवी और बेटा खड़े रह गए थे। फिर जैसे प्रतिमा को होश आया। वो एकदम से तेज़ क़दमों के साथ बाहर की तरफ भागते हुए गई। जब वो बाहर आई तो उसने देखा कि सीबीआई के सभी ऑफिसर अपनी अपनी गाड़ियों में बैठ रहे थे। एक अन्य गाड़ी की पिछली शीट पर अजय सिंह को बिठाया जा रहा था, और उसके बाद उसके बगल से ही एक अन्य ऑफिसर बैठ गया था।

प्रतिमा के देखते ही देखते सीबीआई वालों का वो क़ाफिला अजय सिंह को साथ लिए हवेली से दूर चला गया। प्रतिमा को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसकी मुकम्मल दुनियाॅ ही नेस्तनाबूत हो गई हो। इस एहसास के साथ ही प्रतिमा की ऑखें छलक पड़ीं और फिर जैसे उसके जज़्बात उसके काबू में रह सके। वो दरवाजे पर खड़ी खड़ी ही फूट फूट कर रो पड़ी। तभी उसके पीछे शिवा नमूदार हुआ और अपनी रोती हुई माॅ को उसके कंधे से पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया और फिर उसे अपने सीने से लगा लिया।
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उधर रितू के फार्महाउस पर भी सुबह हो गई थी। अपने कमरे के अटैच बाथरूम में नहाने के बाद रितू कपड़े पहन रही थी जब उसके कमरे का दरवाजा बाहर से कुण्डी के दवारा बजाया गया था। रितू ने पूछा कौन है तो बाहर से नैना की आवाज़ आई थी कि मैं हूॅ बेटा जल्दी से दरवाज़ा खोलो। बस, उसके बाद रितू ने आनन फानन में अपने कपड़े पहने और फिर जाकर कमरे का दरवाज़ा खोला। दरवाज़ा खुलते ही नैना बुवा पर नज़र पड़ी तो वह हल्के से चौंकी।

"क्या बात है बुआ?" रितू ने शशंक भाव से पूछा__"आप इस तरह? सब ठीक तो है न?"
"ये ले।" नैना ने जल्दी से अपना दाहिना हाथ रितू की तरफ बढ़ाया___"ये अख़बार पढ़। इसमें ऐसी ख़बर छपी है छिसे पढ़ कर तेरे होश न उड़ जाएॅ तो कहना।"

"अच्छा।" रितू ने अख़बार अपने हाॅथ में लेते हुए कहा___"भला ऐसी क्या ख़बर छपी है इस अख़बार में जिसे पढ़ने पर मेरे होश ही उड़ जाएॅगे?"
"तू पढ़ तो सही।" नैना कहने के साथ ही दरवाजे के अंदर रितू को खींचते हुए ले आई, बोली___"बताने में वो बात नहीं होगी जितना कि खुद ख़बर पढ़ने से होगी।"

नैना, रितू को खींचते हुए बेड के क़रीब आई और उसमें रितू को बैठा कर खुद भी बैठ गई और रितू के चेहरे के भावों को बारीकी से देखने लगी। रितू ने अख़बार की फ्रंट पेज़ पर छपी ख़बर पर अपनी दृष्टि डाली और ख़बर की हेड लाईन पढ़ते ही वो बुरी तरह उछल पड़ी। अख़बार में छपी ख़बर कुछ इस प्रकार थी।

*शहर के मशहूर कपड़ा ब्यापारी अजय सिंह के मकान से करोड़ों का ग़ैर कानूनी सामान बरामद*

(गुनगुन): हल्दीपुर के रहने वाले ठाकुर अजय सिंह बघेल वल्द गजेन्द्र सिंह बघेल जो कि एक मशहूर कपड़ा ब्यापारी हैं उनके गुनगुन स्थित मकान पर कल शाम को सीबीआई वालों ने छापा मारा। मकान के अंदर से भारी मात्रा में चरस अफीम ड्रग्स आदि जानलेवा चीज़ें सीबीआई के हाथ लगी। ग़ौरतलब बात ये है कि गुनगुन स्थित ठाकुर अजय सिंह का वो मकान कुछ समय से खाली पड़ा था, इस लिए ये स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता कि ग़ैर कानूनी चीज़ों का इतना बड़ा ज़खीरा उनके मकान में कहाॅ से आ गया? ऐसा इस लिए क्योंकि ठाकुर अजय सिंह जैसे मशहूर कारोबारी से ऐसे संगीन धंधे की बात सोची नहीं जा सकती जो कि जुर्म कहलाता है। इस लिए संभव है कि ये सब उनके किसी दुश्मन की सोची समझी साजिश का ही नतीजा हो। ख़ैर, अब देखना ये होगा कि सीबीआई वालों की जाॅच पड़ताड़ से क्या सच्चाई सामने आती है? अब ये तो निश्चित बात है कि ठाकुर अजय सिंह के मकान से मिले इतने सारे ग़र कानूनी सामान के तहत सीबीआई वाले बहुत जल्द ठाकुर अजय सिंह को अपनी हिरासत में लेकर इस बारे में पूछताॅछ करेंगे। किन्तु अगर सीबीआई की जाॅच में ये बात सामने आई कि वो सब ग़ैर कानूनी सामान ठाकुर अजय सिंह का ही है तो यकीनन ठाकुर अजय सिंह को इस संगीन जुर्म में कानून के द्वारा शख्तसे शख्त सज़ा मिलेगी।

अख़बार में छपी इस ख़बर को पढ़ कर यकीनन रितू के होश उड़ ही गए थे। उसके दिमाग़ की बत्ती बड़ी तेज़ी से जली थी और साथ ही उसे विराज की वो बात याद आई जब उसने गुनगुन रेलवे स्टेशन पर रितू से कहा था कि बहुत जल्द अजय सिंह को एक झटका लगने वाला है। ये भी कि उसकी सेफ्टी के लिए वह भी ऐसा करेगा कि अजय सिंह या उसका कोई आदमी उस तक पहुॅच ही नहीं पाएगा।

"इसका मतलब तो यही हुआ बुआ कि अब तक डैड को सीबीआई वाले गिरफ्तार कर लिए होंगे।" रितू ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"और अगर ऐसा हो गया होगा तो यकीनन डैड लम्बे से नप जाएॅगे। एक ही झटके में वो कानून की ऐसी चपेट में आ जाएॅगे जहाॅ से निकल पाना असंभव नहीं तो नामुमकिन ज़रूर है।"

"ये तो अच्छा ही हुआ न रितू।" नैना ने कहा___"बुरे काम करने का ये अंजाम तो होना ही था। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि ये सब हुआ कैसे?
"ये सब राज की वजह से हुआ है बुआ।" रितू ने बताया___"उसने कल रेलवे स्टेशन में मुझसे कहा था कि वो कुछ ऐसा करेगा जिससे डैड मुझ तक पहुॅच ही नहीं पाएॅगे। ये तो सच है बुआ कि डैड ग़ैर कानूनी धंधा करते थे और फैक्ट्री में मौजूद तहखाने में उनका ये सब ग़ैर कानूनी सामान भी था जिसे राज ने ही गायब किया था। ऐसा उसने इस लिए किया था ताकि वह उस सामान के आधार पर जब चाहे डैड को कानून की गिरफ्त में डलवा सके। इस लिए उसने ऐसा ही किया है बुआ लेकिन मुझे लगता है कि ये सब महज डैड को डराने और मौजूदा हालात से निपटने के लिए राज ने किया है। क्योंकि राज उन्हें अपने हाॅथों से उनके अपराधों की सज़ा देगा, नाकि कानून द्वारा उन्हें किसी तरह की सज़ा दिलवाएगा।"

"लेकिन बेटा।" नैना ने तर्क सा दिया___"कानून की चपेट में आने के बाद बड़े भइया भला कानून की गिरफ्त से कैसे बाहर आएॅगे और फिर कैसे राज उन्हें अपने हाॅथों से सज़ा देगा?"
"उसका भी इंतजाम राज ने किया ही होगा बुआ।" रितू ने कहा___"आज के इस अख़बार में छपी ख़बर के अनुसार ग़ैर कानूनी सामान डैड के मकान से बरामद ज़रूर हुआ है लेकिन ये भी बताया गया है कि चूॅकि गुनगुन स्थित मकान काफी समय से खाली था इस लिए संभव है कि डैड को फॅसाने के लिए उनके किसी दुश्मन ने ऐसा किया होगा। इस लिए सीबीआई वाले इस बारे में सिर्फ पूॅछताछ करेंगे। अब आप खुद समझ सकती हैं बुआ कि राज ने केस को इतना कमज़ोर क्यों बनाया हुआ है कि डैड कानून की गिरफ्त से मामूली पूछताछ के बाद छूट जाएॅ?।"

"लेकिन ये सवाल तो अपनी जगह खड़ा ही रहेगा न रितू कि बड़े भइया के मकान में वो ग़ैर कानूनी सामान कैसे पाया गया?" नैना ने कहा___"इस लिए इस सवाल के साल्व हुए बिना बड़े भइया इस केस से कैसे छूट जाएॅगे भला?"

"बहुत आसान है बुआ।" रितू ने कहा___"पैसों के लिए आजकल लोग बहुत कुछ कर जाते हैं। कहने का मतलब ये कि वो किसी ऐसे ब्यक्ति को ढूॅढ़ लेंगे जो पैसों के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाए। वो ब्यक्ति इस बात को खुद स्वीकार करेगा कि वो सारा ग़ैर कानूनी सामान उसका खुद का है और उसने डैड के मकान में उसे इस लिये छुपाया हुआ था क्योंकि वो मकान काफी समय से खाली था तथा उसके लिए एक सुरक्षित जगह की तरह था।"

"चलो ये तो मान लिया कि ऐसा हो सकता है।" नैना ने मानो तर्क किया___"किन्तु सबसे बड़ा सवाल ये ये है कि तुम्हारे डैड ऐसे किसी ब्यक्ति को लाएॅगे कहाॅ से? जबकि वो खुद ही सीबीआई वालों की निगरानी में रहेंगे और उनके पास किसी से संपर्क स्थापित करने के लिए कीई ज़रिया ही नहीं होगा।"

"सवाल बहुत अच्छा है बुआ।" रितू ने कुछ सोचते हुए कहा__"किन्तु अगर हम ये सोच कर देखें कि ये सब राज का ही किया धरा है तो ये भी निश्चित बात है कि वो खुद ही ऐसा कुछ करेगा जिससे डैड सीबीआई या कानून के चंगुल से बाहर आ जाएॅ।"

"ऐसे मामलों में कानून के चंगुल से किसी का बाहर आ जाना नामुमकिन तो नहीं होता रितू।" नैना ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"किन्तु अगर तू ये कह रही है कि राज तेरे डैड को किसी हैरतअंगेज कारनामे की वजह से बाहर निकाल ही लेगा तो सवाल ये उठता है कि ऐसा क्या करेगा राज? दूसरी बात, जब उसे कानून की गिरफ्त से निकाल ही लेना है तो फिर तेरे डैड की कानून की चपेट में लाने का मतलब ही क्या था?"

"खजूर पर चढ़े इंसान को ज़मीन पर पटकने का मकसद था उसका।" रितू ने कहा___"वो कहते हैं न कि जब तक ऊॅट पहाड़ के सामने नहीं आता तब तक उसे यही लगता है कि उससे ऊॅचा कोई है ही नहीं। यही हाल मेरे डैड का था बुआ। राज का मकसद कदाचित यही है कि वो डैड को एहसास दिलाना चाहता है कि इस दुनियाॅ में उनसे भी बड़े बड़े ख़लीफा मौजूद हैं। वो चाहे तो उन्हें एक पल में चुटकियों में मसल सकता है। आज के इस वाक्ये के बाद संभव है कि डैड की विचारधारा में कुछ तो परिवर्तन ज़रूर आया होगा।"

"ये तो सच कहा तूने।" नैना ने कहा___"अगर सीबीआई वाले बड़े भइया को अपने साथ ले गए होंगे तो ये सच है कि बड़े भइया को आज आटे दाल के भाव का पता चल जाएगा।"

"हाॅ बुआ।" रितू ने कहा___"राज को मौजूदा हालातों का बखूबी एहसास था। कदाचित उसे ये अंदेशा था कि इतनी नाकामियों के बाद डैड अब खुद मैदान में उतरेंगे और हमें खोज कर हमारा क्रिया कर्म करेंगे। इसी लिए राज ने ये क़दम उठाया कि जब डैड ही कानून की गिरफ़्त में रहेंगे तो भला हम पर किसी तरह का उनकी तरफ से कोई संकट आएगा ही कैसे?"

"तो इसका मतलब ये हुआ कि बड़े भइया को राज ने कानून की गिरफ्त में फॅसाया।" नैना को जैसे सारी बात समझ में आ गई थी, बोली___"सिर्फ इस लिए कि वो तेरे डैड को एहसास दिला सके कि वो जिसे पिद्दी का शोरबा समझते हैं वो दरअसल ऐसा है कि उनको छठी का दूध याद दिला सकता है। ख़ैर, इन बातों से ये भी एक बात समझ में आती है कि राज ने तुझको सेफ करने के लिए भी तेरे डैड को कुछ दिनों के लिए कानून की गिरफ्त में फॅसाया है। दो दिन बाद तो वो खुद ही यहाॅ आ जाएगा और संभव है ऐसा कुछ कर दे जिससे उसका शिकार कानून की चपेट से बाहर आ जाए।"

"यू आर अब्सोल्यूटली राइट बुआ।" रितू ने कहा___"राज का यकीनन यही प्लान हो सकता है। ख़ैर, अब तो इस बात की फिक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है कि डैड या उनके किसी आदमी से हमें कोई ख़तरा है।"
"लेकिन एक बात सोचने वाली है रितू।" नैना ने सोचने वाले भाव से चहा___"तेरे डैड की इस गिरफ्तारी से तेरी माॅ और तेरे भाई पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा होगा। प्रतिमा भाभी ने खुद भी वकालत की पढ़ाई की है इस लिए संभव है कि वो तेरे डैड को कानून की गिरफ्त से निकालने का कोई जुगाड़ लगाएॅ।"

"कोई फायदा नहीं होने वाला बुआ।" रितू ने कहा__"जिसे जितना ज़ोर लगाना है लगा ले मगर हाॅथ कुछ नहीं आएगा। क्योंकि एक तो मामला ही इतना संगीन है दूसरे इस सबमें राज का हाॅथ है। उसकी पहुॅच काफी लम्बी है, इस लिए उसकी पहुॅच के आगे इन लोगों का कोई भी पैंतरा काम नहीं करने वाला। ये तो पक्की बात है कि होगा वहीं जो राज चाहेगा।"

"हाॅ ये तो है।" नैना ने कहा___"ख़ैर देखते हैं क्या होता है? वैसे इस बारे में क्या अभी तक तुमने राज से बात नहीं की??"
"अभी तो नहीं की बुआ।" रितू ने कहा___"पर अब जल्द ही उससे बात करूॅगी। वास्तव में उसने बड़ा हैरतअंगेज काम किया है। मुझे तो उससे ये उम्मीद ही नहीं थी।"

"वक्त और हालात एक इंसान को कहाॅ से कहाॅ पहुॅचा देते हैं और उससे क्या क्या करवा देते हैं ये सब उस तरह का समय आने पर ही पता चलता है।" नैना ने जाने क्या सोच कर कहा___"सोचने वाली बात है कि राज जो एक बेहद ही सीधा सादा लड़का हुआ करता था आज वो इतना जहीन तथा इतना शातिर दिमाग़ का भी हो गया है।"

"इसमें उसकी कोई ग़लती नहीं है बुआ।" रितू ने भारी मन से कहा___"उसे इस तरह का बनाने वाले भी मेरे ही पैरेंट्स हैं। इंसान अपनों का हर कहा मानता है और उसका जुल्म भी सह लेता है लेकिन उसकी भी एक समय सीमा होती है। इतना कुछ जिसके साथ हुआ हो वो ऐसा भी न बन सके तो फिर कैसा इंसान है वो?"

नैना, रितू की बात सुन कर उसे देखती रह गई। कुछ देर और ऐसी ही बातों के बाद वो दोनो ही कमरे से बाहर आ गईं और नीचे नास्ते की टेबल पर आकर बैठ गईं। जहाॅ पर करुणा का भाई हेमराज पहले से ही मौजूद था। रितू अपनी नैना बुआ के साथ अलग अलग कुर्सियों पर बैठी ही थी कि उसका आई फोन बज उठा। उसने मोबाइल की स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे "माॅम" नाम को देखा तो उसके होठों पर अनायास ही नफ़रत व घृणा से भरी मुस्कान फैल गई। कुछ सेकण्ड तक वो मोबाइल की स्क्रीन को देखती रही फिर उसने आ रही काल को कट कर दिया। काल कट करते वक्त उसके चेहरे पर बेहद कठोरता के भाव थे।
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उधर मुम्बई में!
सुबह हुई!
अजय सिंह व प्रतिमा की दूसरी बेटी नीलम की ऑखें गहरी नींद से खुल तो गईं थी मगर वो खुद बेड से न उठी थी अभी तक। हॅसती मुस्कुराती हुई रहने वाली मासूम सी नीलम एकाएक ही जैसे बेहद गुमसुम सी रहने लगी थी। काॅलेज में हुई उस घटना को आज हप्ता से ज्यादा दिन गुज़र गया था किन्तु उस घटना की ताज़गी आज भी उसके ज़हन में बनी हुई थी। उसे अपनी इज्ज़त के तार तार हो जाने का इतना दुख न होता जितना आज उसे इस बात पर हो रहा था कि उसका चचेरा भाई उसे नफ़रत और घृणा की दृष्टि से देख कर इस तरह उसके सामने से मुह फेर कर चला गया था जैसे वो उसे पहचानता ही न था। नीलम और विराज दोनो ही हमउमर थे किन्तु नीलम का बिहैवियर भी रितू की तरह रहा था विराज के साथ।

उस दिन की घटना ने नीलम के मुकम्मल वजूद को हिला कर रख दिया था। उसने इस घटना के बारे में अपने खुद के पैरेंट्स को बिलकुल भी नहीं बताया था। मौसी की लड़की को बस बताया था किन्तु उसने उससे भी वादा ले लिया था कि वो उसके घरवालों को ये बात न बताए कभी।

उस दिन की घटना के बाद पहले तो दो दिन नीलम काॅलेज नहीं गई थी किन्तु फिर तीसरे दिन से जाने लगी थी। काॅलेज में हर जगह उसकी नज़रें बस अपने चचेरे भाई विराज को ही ढूॅढ़तीं मगर पिछले कई दिनों से उसे अपना वो चचेरा भाई काॅलेज में कहीं न दिखा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर विराज काॅलेज क्यों नहीं आ रहा? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसकी वजह से उसने ये काॅलेज ही छोंड़ दिया हो। ये सोच कर ही नीलम की जान उसके हलक में आकर फॅस जाती। वो सोचती कि अगर विराज ने सच में उसकी ही वजह से काॅलेज छोंड़ दिया होगा तो ये कितनी बड़ी बात है। मतलब कि आज के समय में विराज उससे इतनी नफ़रत करता है कि वो उसे देखना तक गवाॅरा नहीं करता। ये सब बातें नीलम को रात दिन किसी ज़हरीले सर्प की भाॅति डसती रहती थी।

"बस एक बार।" नीलम के मुख से हर बार बस यही बात निकलती____"सिर्फ एक बार फिर से मुझे मिल जाओ मेरे भाई। तुमसे मिल कर मैं अपने किये की माफ़ी माॅगना चाहती हूॅ। मुझे एहसास है कि मेरे भाई कि मैने बचपन से लेकर अब तक तुम्हें सिर्फ दुख दिया है। तुम्हें तरह तरह की बातों से जलील किया था। मगर एक तुम थे कि मेरी उन कड़वी बातों का कभी भी बुरा नहीं मानते थे। जबकि कोई और होता तो जीवन भर मुझे देखना तक पसंद न करता। मुझे सब कुछ अच्छी तरह से याद है भाई। मेरे माॅम डैड ने हमेशा हम भाई बहनों को यही सिखाया था कि तुम सब बुरे लोग हो इस लिए हम तुमसे दूर रहें और कभी भी किसी तरह का कोई मेल मिलाप न रखें। हम बच्चे ही तो थे भाई, जैसा माॅ बाप सिखाते थे उसी को सच मान लेते थे और फिर इस सबकी आदत ही पड़ गई थी। मगर उस दिन तुमने मेरी इज्ज़त बचा कर ये जता दिया कि तुम बुरे नहीं हो सकते। जिस तरह से तुम मुझे देख कर नफ़रत व घृणा से अपना मुह मोड़ कर चले गए थे, उससे मुझे एहसास हो चुका था कि तुमने जो किया वो एक ऊॅचे दर्ज़े का कर्म था और जो मैंने अब तक किया था वो हद से भी ज्यादा निचले दर्ज़े का कर्म था। मुझे बस एक बार मिल जाओ राज। मैं तुमसे अपने गुनाहों की माफ़ी माॅगना चाहती हूॅ। तुम जो भी सज़ा दोगे उस सज़ा को मैं खुशी खुशी कुबूल कर लूॅगी। प्लीज़ राज, बस एक बार मुझे मिल जाओ। तुम काॅलेज क्यों नहीं आ रहे हो? क्या इतनी नफ़रत करते हो तुम अपनी इस बहन से कि जिस काॅलेज में मैं हूॅ वहाॅ तुम पढ़ ही नहीं सकते? ऐसा मत करना मेरे भाई। वरना मैं अपनी ही नज़रों में इस क़दर गिर जाऊॅगी कि फिर उठ पाना मेरे लिए असंभव हो जाएगा।"

ये सब बातें अपने आप से ही करना जैसे नीलम की दिनचर्या में शामिल हो गया था। उसके मौसी की लड़की उसे इस बारे में बहुत समझाती मगर नीलम पर उसकी बातों का कोई असर न होता। काॅलेज में हुई घटना से नीलम थोड़ा गुमसुम सी रहने लगी थी। मगर इसका कारण यही था कि विराज काॅलेज नहीं आ रहा था। वो हर रोज़ समय पर काॅलेज पहुॅच जाती और सारा दिन काॅलेज में रुकती। उसकी नज़रें हर दिन अपने भाई को तलाश करती मगर अंत में उन ऑखों में मायूसी के साथ साथ ऑसू भर आते और फिर वो दुखी भाव से घर लौट जाती। कालेज के बाॅकी स्टूडेंट्स नार्मल ही थे। उस घटना के बाद किसी ने कभी कोई टीका टिप्पणी न की थी।

कुछ देर ऐसे ही सोचो में गुम वह बेड पर पड़ी रही उसके बाद वो उठी और बाथरूम की तरफ बढ़ गई। बाथरूम में फ्रेश होने के बाद वो वापस कमरे में आई और काॅलेज के यूनीफार्म पहन कर तथा कंधे पर एक मध्यम साइज़ का बैग लेकर वो कमरे से बाहर की तरफ बढ़ी ही थी कि उसका मोबाइल बज उठा। उसने बैग के ऊपरी हिस्से की चैन खोला और अपना मोबाइल निकाल कर स्क्रीन पर नज़र आ रहे "माॅम" नाम को देखा तो उसने काल रिसीव कर मोबाइल कानों से लगा लिया।

"............।" उधर से प्रतिमा ने कुछ कहा।
"क्याऽऽऽ????" नीलम के हाॅथ से मोबाइल छूटते छूटते बचा था। उसके हलक से जैसे चीख सी निकल गई थी, बोली___"ये ये आप क्या कह रही हैं माॅम? डैड को सीबीआई वाले ले गए? मगर क्यों??? आख़िर ऐसा क्या किया है डैड ने?"

"............।" उधर से प्रतिमा ने फिर कुछ कहा।
"ओह अब क्या होगा माॅम?" प्रतिमा की बात सुनने के बाद नीलम ने संजीदगी से कहा___"क्या रितू दीदी ने कुछ नहीं किया? वो भी तो एक पुलिस ऑफिसर हैं?"
"..............।" उधर से प्रतिमा ने कुछ देर तक कुछ बात की।

"क्याऽऽ???" नीलम बुरी तरह उछल पड़ी____"ये आप क्या कह रही हैं? दीदी भला ऐसा कैसे कर सकती हैं माॅम? नहीं नहीं, आपको और डैड को ज़रूर कोई ग़लतफहमी हुई है। रितू दीदी ये सब कर ही नहीं सकती हैं। आप तो जानती हैं कि दीदी ने कभी उसकी तरफ देखना तक पसंद नहीं किया था। फिर भला आज वो कैसे उसका साथ देने लगीं? ये तो इम्पाॅसिबल है माॅम।"

"...........।" उधर से प्रतिमा ने फिर कुछ कहा।
"मैं इस बारे में दीदी से बात करूॅगी माॅम।" नीलम ने गंभीरता से कहा___"उनसे पूछूॅगी कि आख़िर वो ये सब क्यों कर रही हैं?"
"............।" उधर से प्रतिमा ने झट से कुछ कहा।
"क्यों नहीं पूॅछ सकती माॅम?" नीलम ने ज़रा चौंकते हुए कहा___"आख़िर पता तो चलना ही चाहिए कि उनके मन में क्या है अपने पैरेंट्स के प्रति? इस लिए मैं उनसे फोन लगा कर ज़रूर इस बारे में बात करूॅगी।"

"..........।" उधर से प्रतिभा ने फिर कुछ कहा।
"मैं भी आ रही हूॅ माॅम।" नीलम ने कहा___"ऐसे समय में में मुझे अपने माॅ डैड के पास ही रहना है। दूसरी बात मैं देखना चाहती हूॅ कि रितू दीदी ये सब कैसे करती हैं अपने ही माॅ बाप और भाई के खिलाफ़?"
"...............।" उधर से प्रतिमा ने कुछ कहा।
"ओके माॅम।" नीलम ने कहा और काल कट कर दिया।

इस वक्त उसके दिलो दिमाग़ में एकाएक ही तूफान सा चालू हो गया था। मन में तरह तरह के सवाल उभरने लगे थे। जिनका जवाब फिलहाल उसके पास न था किन्तु जानना आवश्यक था उसके लिए। दरवाजे की तरफ न जाकर वह वापस पलट कर बेड पर बैठ गई और गहन सोच में डूब गई।

"डैड को सीबीआई वाले अपने साथ ले गए।" नीलम मन ही मन सोच रही थी___"वजह ये कि उनके शहर वाले मकान से भारी मात्रा में चरस अफीम व ड्रग्स जैसी गैर कानूनी चीज़ें सीबीआई वालो को बरामद हुई। सवाल ये उठता है कि क्या सच में डैड इस तरह का कोई ग़ैर कानूनी धंधा करते हैं? वहीं दूसरी तरफ रितू दीदी आज कल अपने ही पैरेंट्स के खिलाफ़ जाकर राज का साथ दे रही हैं। भला ये असंभव काम संभव कैसे हो सकता है? आख़िर ऐसा क्या हुआ है कि दीदी माॅम डैड के सबसे बड़े दुश्मन का साथ देने लगी हैं? माॅम ने बताया कि राज गाॅव आया था, इसका मतलब इसी लिए वो काॅलेज नहीं आ रहा था। मगर वो गाॅव गया किस लिए था? और गाॅव में ऐसा क्या हुआ है कि दीदी अपने उस चचेरे भाई का साथ देने लगीं जिसे वो कभी देखना भी पसंद नहीं करती थीं?"

नीलम के ज़हन में हज़ारों तरह के सवाल इधर उधर घूमने लगे थे मगर नीलम को ये सब बातें हजम नहीं हो रही थी। सोचते सोचते सहसा नीलम के दिमाग़ की बत्ती जली। उसके मन में विचार आया कि वो खुद भी तो कभी राज को अपना भाई नहीं समझती थी जबकि आज हालात ये हैं कि वो अपने उसी भाई से मिल कर अपने उन गुनाहों की उससे माफ़ी माॅगना चाहती है। कहीं न कहीं उसका अपने इस भाई के प्रति हृदय परिवर्तन हुआ था तभी तो उसके दिल में ऐसे भावनात्मक भाव आए थे। दूसरी तरफ रितू दीदी भी राज का साथ दे रही हैं। इसका मतलब कुछ तो ऐसा हुआ है जिसके चलते दीदी का भी राज के प्रति हृदय परिवर्तन हुआ है और वो आज उसका साथ भी दे रही हैं। इतना ही नहीं अपने ही पैरेंट्स के खिलाफ़ राज के साथ लड़ाई लड़ रही हैं।

नीलम को अपना ये विचार जॅचा। उसको एहसास हुआ कि कुछ तो ऐसी बात हुई जिसका उसे इस वक्त कोई पता नहीं है। ये सब सोचने के बाद उसने मोबाइल पर रितू दीदी का नंबर ढूॅढ़ा और काल लगा कर मोबाइल कान से लगा लिया। काल जाने की रिंग बजती सुनाई दी उसे। कुछ ही देर में उधर से रितू ने काल रिसीव किया।

"............।" उधर से रितू ने कुछ कहा।
"मैं तो बिलकुल ठीक हूॅ दीदी।" नीलम ने कहा___"आप बताइये आप कैसी हैं?"
"...........।" उधर से रितू ने फिर कुछ कहा।
"हाॅ दीदी काॅलेज अच्छा चल रहा है और साथ में पढ़ाई भी अच्छी चल रही है।" नीलम ने कहने के साथ ही पहलू बदला___"दीदी, अभी अभी माॅम का फोन आया था मेरे पास। उन्होंने कुछ ऐसा बताया जिसे सुन कर मेरे होश ही उड़ गए हैं। वो कह रही थी कि डैड को सीबीआई वाले ग़ैर कानूनी सामान के चलते अपने साथ ले गए हैं। ये भी कि आप विराज का साथ दे रही हैं। ये सब क्या चक्कर है दीदी? प्लीज़ बताइये न कि ऐसा क्या हो गया है कि आप अपने ही पैरेंट्स के खिलाफ़ हैं? माॅम कह रही थी कि आपने उनका काल भी रिसीव नहीं किया। वो आपको भी डैड के बारे में सूचित करना चाहती थी।"

".............।" उधर से रितू ने काफी देर तक कुछ कहा।
"बातों को गोल गोल मत घुमाइये दीदी।" नीलम ने बुरा सा मुह बनाया____"साफ साफ बताइये न कि आख़िर क्या बात हो गई है जिसकी वजह से आप माॅम डैड के खिलाफ़ हो कर उस विराज का साद दे रही हैं?"

"...........।" उधर से रितू ने फिर कुछ कहा।
"इसका मतलब आप खुद मुझे कुछ भी बताना नहीं चाहती हैं।" नीलम ने कहा___"और ये कह रही हैं कि सच्चाई का पता मैं खुद लगाऊॅ। ठीक है दीदी, मैं आ रही हूॅ। क्या आपसे मिल भी नहीं सकती मैं?"

"............।" उधर से रितू ने कुछ कहा।
"ठीक है दीदी।" नीलम ने कहा___"लेकिन मैं इतना ज़रूर जानती हूॅ कि बात भले ही चाहे जो कुछ भी हुई हो मगर ऐसा नहीं होना चाहिए कि बच्चे अपने माॅ बाप से इस तरह खिलाफ़ हो जाएॅ।"

इतना कहने के बाद नीलम ने काल कट कर दिया और फिर दुखी भाव से बेड पर कुछ देर बैठी जाने क्या सोचती रही। उसके बाद जैसे उसने कोई फैसला किया और फिर उठ कर काॅलेज की यूनिफार्म को उतारने लगी। कुछ ही देर में उसने दूसरे कपड़े पहन लिए और फिर कमरे से बाहर निकल गई।
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इधर विराज एण्ड पार्टी की ट्रेन अपने निर्धारित समय से कुछ ही समय की देरी से आख़िर मुम्बई पहुॅच ही गई थी। सब लोग ट्रेन से बाहर आए और फिर प्लेटफार्म से बाहर की तरफ निकल गए। विराज ने मुम्बई पहुॅचने से पहले ही जगदीश ओबराय को फोन कर दिया था। इस लिए जैसे ही ये लोग स्टेशन से बाहर आए वैसे ही जगदीश ओबराय बाहर मिल गया। उसके साथ एक कार और थी। सब लोग कार मे बैठ कर घर के लिए निकल गए।

रास्ते में जगदीश अंकल ने मुझे बताया कि उन्होंने माॅ से बात कर ली है। पहले तो माॅ मेरी वापसी की बात सुन कर नाराज़ हुईं। मगर जगदीश अंकल ने उन्हें सारी बात तरीके से बताई और ये यकीन दिलाया कि मुझे कुछ नहीं होगा तब जाकर वो राज़ी हुई थी। लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि वो एक बार मुझे देखना चाहती हैं। अतः अब मैं इन लोगों के साथ ही घर तक जा रहा था। वरना मेरा प्लान ये था कि मैं यहाॅ से वापस उसी ट्रेन से लौट जाता।

मुम्बई से वापसी के लिए इसी ट्रेन को लगभग कुछ घण्टे बाद जाना था इस लिए मैं बड़े आराम से गर जाकर माॅ से मिल सकता था। ख़ैर, कुछ ही समय बाद हम सब घर पहुॅच गए। घर पर सब एक दूसरे से मिले। करुणा चाची जब माॅ से मिली तो बहुत रो रही थी और बार बार माॅ से माफ़ियाॅ माॅग रही थी। माॅ ने उन्हें अपने सीने से लगा लिया था। करुणा चाची को वो हमेशा अपनी छोटी बहन की तरह मानती थी और प्यार करती थी। आशा दीदी और उनकी माॅ से भी मेल मिलाप हुआ। मिलने मिलाने में ही काफी समय ब्यतीत हो गया था।

मैं अपने कमरे में जाकर फ्रेश हो गया था। आदित्य भी फ्रेश हो गया था। उसे मेरे साथ ही वापस गाॅव जाना था। निधी भी सबसे मिली। करुणा चाची ने उसे ढेर सारा प्यार व स्नेह दिया था। दिव्या और शगुन को माॅ ने अपने सीने से ही छुपकाया हुआ था। अभय चाचा खुश थे कि उनके बीवी बच्चे सही सलामत यहाॅ आ गए थे। अब उन्हें उनके लिए कोई फिक्र नहीं थी। शायद यही वजह थी कि वो खुद भी मेरे साथ चलने की बात करने लगे थे। उनका कहना था कि वो खुद भी इस जंग में हिस्सा लेंगे और अपने बड़े भाई से इस सबका बदला लेंगे। मगर मैने और जगदीश अंकल ने उन्हें समझा बुझा कर मना कर दिया था।

मैने एक बात महसूस की थी कि निधी का बिहैवियर मेरे प्रति कुछ अलग ही था। इसके पहले वह हमेशा मेरे पषास में ही रहने की कोशिश करती थी जबकि अब वो मुझसे दूर दूर ही रह रही थी। यहाॅ तक कि मेरी तरफ देख भी नहीं थी वो। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वो ऐसा क्यों कर रही थी। मैने एक दो बार खुद उससे बात करने की कोशिश की मगर वो किसी न किसी बहाने से मेरे पास से चली ही जाती थी। मुझे उसके इस रूखे ब्यवहार से तक़लीफ़ भी हो रही थी। वो मेरी जान थी, मैं उसकी बेरुखी पल भर के लिए भी सह नहीं सकता था मगर सबके सामने भला मैं उससे इस बारे कैसे बात कर सकता था? मेरे पास वक्त नहीं था, इस लिए मैने मन में सोच लिया था कि सब कुछ ठीक करने के बाद मैं उससे बात करूॅगा और उसकी किसी भी प्रकार की नाराज़गी को दूर करूॅगा।

मैं माॅ से मिला तो माॅ मेरी वापसी की बात से भावुक हो गईं। उन्हें पता था कि मैं वापस किस लिए जा रहा हूॅ इस लिए वो मुझे बार बार अपना ख़याल रखने के लिए कह रही थी। ख़ैर मैने उन्हें आश्वस्त कराया कि मैं खुद का ख़याल करूॅगा और मुझे कुछ नहीं होगा।

चलने से पहले मैने सबसे आशीर्वाद लिया और फिर आदित्य के साथ वापसी के लिए चल दिया। मेरे साथ जगदीश अंकल भी थे। पवन और आशा दीदी मुझे अपना ख़याल रखने का कहा और खुशी खुशी मुझे विदा किया। हलाॅकि मैं जानता था कि वो अंदर से मेरे जाने से दुखी हैं। उन्हें मेरी फिक्र थी। अभय चाचा ने मुझे सम्हल कर रहने को कहा। करुणा चाची ने मुझे प्यार दिया और विजयी होने का आशीर्वाद दिया। मैं दिव्या और शगुन को प्यार व स्नेह देकर निधी की तरफ देखा तो वो कहीं नज़र न आई। मैं समझ गया कि वो मुझसे मिलना नहीं चाहती है। इस बात से मुझे तक़लीफ़ तो हुई किन्तु फिर मैंने उस तक़लीफ़ को जज़्ब किया और जगदीश अंकल के साथ कार में बैठ कर वापस रेलवे स्टेशन की तरफ चल दिया।

रेलवे स्टेशन पहुॅच कर मैं और आदित्य कार से उतरे। जगदीश अंकल ने मुझे एक पैकिट दिया और कहा कि मैं उसे अपने बैग में चुपचाप डाल लूॅ। मैने ऐसा ही किया। उसके बाद जगदीश अंकल से मेरी कुछ ज़रूरी बातें हुईं और फिर मैं और आदित्य प्लेटफार्म की तरफ बढ़ गए। ट्रेन वापसी के लिए बस चलने ही वाली थी। हम दोनो ट्रेन में अपनी अपनी शीट पर बैठ गए। मैने मोबाइल से रितू दीदी को फोन किया और उन्हें बताया कि सब लोगों को मैने सुरक्षित पहुॅचा दिया है और अब मैं वापस आ रहा हूॅ। रितू दीदी इस बात से खुश हो गईं। फिर उन्होंने मुझे अख़बार में छपी ख़बर के बारे में बताया और पूॅछा कि ये सब क्या है तो मैने कहा कि मिल कर बताऊॅगा।

रितू दीदी से बात करने के बाद मैं आदित्य से बातें करने लगा। तभी मेरी नज़र एक ऐसे चेहरे पर पड़ी जिसे देख कर मैं चौंक पड़ा और हैरान भी हुआ। मेरे मन में सवाल उठा कि क्या उसने मुझे देख लिया होगा????? मैने अपनी पैंट की जेब से रुमाल निकाल कर अपने मुख पर बाॅध लिया और फिर आराम से आदित्य से बातें करने लगा। किन्तु मेरी नज़र बार बार उस चेहरे पर चली ही जाती थी। जिस चेहरे पर मैं एक अजीब सी उदासी देख रहा था।
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अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,

देरी के लिए मैं तहे दिल से माफ़ी चाहता हूॅ दोस्तो। बीच में मैं काम की वजह से बहुत ज्यादा ब्यस्त हो गया था। अपडेट कल ही तैयार हो गया था और मैं अपडेट को आप सबके सामने हाज़िर भी करना चाहता था, मगर इस फोरम की साइट मेरे मोबाइल पर खुल ही नहीं रही थी। अभी सुबह मैने फिर से ओपेन किया तो खुल गई, तो मैने आपके सामने अपडेट हाज़िर कर दिया।

आप सबकी खूबसूरत प्रतिक्रिया और शानदार रिव्यू का इन्तज़ार रहेगा,,,,,,,,
 
कहानी अब आगे,,,,,,,,,

उधर हवेली में!
कई सारी गाड़ियाॅ हवेली के बाहर विसाल मैदान में आकर रुकीं। सभी गाड़ियों के सभी दरवाज़े एक साथ खुले और उनमें से कई सारे अजनबी लोग बाहर निकले। सभी आदमियों में ज्यादातर आदमी हट्टे कट्टे व बाॅडी बिल्डथ टाइप के थे। जबकि कुछ आदमी साधारण कद काठी के थे। वो सब हट्टे कट्टे आदमियों से घिरे हुए थे।

हवेली के बाहर अजय सिंह के कुछ आदमी हाॅथों में बंदूख लिए खड़े थे। उन लोगों ने जब इतने सारे आदमियों को एक साथ हवेली की तरफ आते देखा तो उनके चेहरों का रंग सा उड़ने लगा। उन्हें लगने लगा अब ये कौन सी नई मुसीबत आ गई यहाॅ? सब एक दूसरे की तरफ देखने लगे थे। जैसे एक दूसरे से पूछ रहे हों कि ये सब क्या है? किन्तु जवाब किसी के पास नहीं था।

"ठाकुर साहब से कहो कि हम लोग उनके कहे अनुसार अपने आदमियों को यहाॅ लेकर आ गए हैं।" एक आदमी ने अजय सिंह के एक आदमी से कहा___"हमारे पास ज्यादा समय नहीं है। इस लिए अभी हमें जाना होगा किन्तु हमारे ये आदमी उनके किसी भी आदेश का पालन करने के लिए पूरी तरह तैयार रहेंगे।"

उस आदमी की ये बात कदाचित गार्ड की समझ में न आई थी। इसी लिए वह मूर्खों की तरह उस आदमी को देखता रह गया। उसके चेहरे पर उलझन के से भाव उभर आए थे।

"अरे भाई ऐसे क्यों देख रहे हो हमें?" आदमी ने चौंकते हुए कहा__"हम सब ठाकुर साहब के बिजनेस वाले फ्रैण्ड्स हैं। अतः जल्दी जाओ और उन्हें बताओ कि मिस्टर कमलनाथ और उनके साथ सभी उनके दोस्त यहाॅ आए हुए हैं।"

गार्ड के चेहरे पर फैले उलझन के भाव कम तो न हुए किन्तु उसने इतना अवश्य किया कि पाॅकिट से मोबाइल निकाल कर किसी को फोन लगाया। उधर से काल रिसीव करते ही उसने कहा___"मालकिन, कुछ लोग मालिक से मिलने आए हैं। कह रहे हैं कि उनके बिजनेस से संबंधित फ्रैण्ड्स हैं। मेरे लिए क्या आदेश है मालिकन?"
"............।" उधर से कुछ कहा गया और इसके साथ ही काल कट हो गई।

"आप कृपया एक मिनट रुकिये।" फिर उस गार्ड ने बड़ी विनम्रता से कहा___"मालकिन आ रही हैं बाहर।"
"ओके नो प्राब्लेम।" उस आदमी ने कहा और दूसरी तरफ पलट कर इधर उधर देखने लगा।

कुछ ही देर में हवेली का दरवाजा खुला और प्रतिमा उसमे से बाहर निकली। उसके पीछे ही उसका बेटा शिवा भी था। हवेली के बाहर इतनी सारी गाड़ियाॅ और इतने सारे लोगों को देख कर वो चौंकी। मनो मस्तिष्क में एक ही बात चकरघिन्नी की तरह नाचने लगी कि 'कहीं फिर से कोई सीबीआई वाले नहीं आ गए यहाॅ'।

प्रतिमा की देखते ही गार्ड ने उस आदमी के पास जाकर उसे बताया कि मालकिन आ गई हैं। वो आदमी पलट कर प्रतिमा के पास आया।
"नमस्कार भाभी जी।" उस आदमी ने खुशदिली से हाॅद जोड़ कर नमस्कार करते हुए बोला__"हम सब ठाकुर साहब के फ्रैण्ड सर्कल के लोग हैं। ठाकुर साहब से कल मीटिंग में हमारी कुछ बातें हुई थी। जिसके तहत उन्होंने हमसे हमारे कुछ बेहतरीन आदमियों की माॅग की थी। सो इस वक्त हम उसी सिलसिले में यहाॅ आए हैं। हमारे पास ज्यादा समय नहीं है इस लिए हम ठाकुर साहब से मिल कर तुरंत ही यहाॅ से जाना चाहेंगे। उसके बाद ये उनका काम है कि वो हमारे इन आदमियों के द्वारा क्या काम लेते हैं?"

प्रतिमा उस आदमी की बातों से समझ गई कि कल अजय सिंह किसी ज़रूरी मीटिंग में था इसी लिए शाम को देर से आया था। तो इसका मतलब मीटिंग इस सबके लिए थी। किन्तु समस्या ये थी कि ये लोग जिससे मिलने आए थे उसे तो सीबीआई वाले सुबह ही अपने साथ ले गए थे। इस लिए अब वो इन्हें क्या जवाब दे यही उसकी समझ में नहीं आ रहा था। सच्चाई बताने पर संभव है कि बात बिगड़ जाती। अगर इन लोगों को अभी पता चल जाए कि अजय सिंह को सीबीआई वाले ले गए हैं तो ये लोग तुरंत ही यहाॅ से रफूचक्कर हो जाएॅगे।

"क्या बात है भाभी जी?" उस आदमी ने कहा___"आप किसी गहरी सोच मे डूबी हुई प्रतीत हो रही हैं। कहिए सब ठीक तो है न? ठाकुर साहब को बुलाइये हम उनसे मिलना चाहते हैं।"
"ठाकुर साहब तो इस वक्त हवेली के अंदर नहीं हैं।" फिर प्रतिमा को बहाना बनाना पड़ा___"सुबह ही कहीं चले गए थे। कहाॅ गए हैं इस बारे में कुछ बताया भी नहीं उन्होंने।"

"ओह आई सी।" उस आदमी ने कहा___"कोई बात नहीं भाभी जी। हम फोन पर बात कर लेंगे उनसे। अच्छा अब हम चलते हैं। हम अपने इन आदमियों कों यहीं पर छोंड़े जा रहे हैं।"
"अरे ऐसे कैसे चले जाएॅगे आप लोग?" प्रतिमा ने औपचारिकता के भाव से कहा___"अंदर आइये और कम से कम चाय या काॅफी तो पीकर ही जाइये। वरना आपके ठाकुर साहब मुझे ही डाॅटेंगे कि मैने आप लोगों को बिना चाय पानी करवाए ही जाने दिया।"

"इसकी ज़रूरत नहीं है भाभी जी।" आदमी ने हॅसते हुए कहा___"आपने कह दिया इतना ही बहुत है हमारे लिए। अच्छा अब हम चलते हैं, नमस्कार।"
"नमस्कार जी।" प्रतिमा ने भी प्रत्युत्तर में अभिवादन किया।

इसके बाद वो जितने भी साधारण कद काठी के आदमी सूट बूट पहने आए थे
वो सब गाड़ियों में सवार होकर वहाॅ से चले गए। उनके जाने के बाद प्रतिमा ने बाॅकी बचे हट्टे कट्टे व बाॅडी बिल्डर आदमियों की तरफ देखा।

"बेटा इन सबको सर्वेंट क्वार्टर में ले जाओ।" फिर प्रतिमा ने शिवा से कहा___"और इनके रहने का इंतजाम करो। तब तक मैं सविता(नौकरानी) से कह कर इन लोगों के लिए चाय पानी का उचित बंदोबस्त कराती हूॅ।"
"ओके माॅम।" शिवा ने कहा और हवेली की सीढ़ियाॅ उतर कर नीचे आ गया उन लोगों के पास।

उन सबको लेकर शिवा हवेली के पूर्व दिशा की तरफ बने सर्वेंट क्वार्टर की तरफ बढ़ गया। ये सर्वेंट क्वार्टर अजय सिंह ने साल भर पहले ही बनवाया था। उन लोगों के जाने के बाद प्रतिमा भी अंदर की तरफ चली गई। उसके चेहरे पर सहसा गहन चिंता व परेशानी के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे थे। उसे पता था कि अजय सिंह के जो बिजनेस संबंधी दोस्त आए थे वो अजय सिंह से फोन पर ज़रूर बात करेंगे। लेकिन जब अजय सिंह का फोन नहीं लगेगा तो वो सब परेशान भी हो जाएॅगे। उस सूरत में उनका क्या रिऐक्शन होगा इसका कुछ भी अंदाज़ा लगाना मुश्किल था।

प्रतिमा को समझ नहीं आ रहा था कि इस परिस्थिति में वो क्या करे? उसने मदद के उद्देश्य से ही अपनी इंस्पेक्टर बेटी रितू को फोन लगाया था किन्तु उसने काल को रिसीव न करके कट कर दिया था। ये प्रतिमा के लिए शायद आख़िरी सबूत था कि उसकी बेटी ने सचमुच ही अपने माॅ बाप के खिलाफ़ बगावत कर दी थी।

अंदर प्रतिमा ने सविता को उन आदमियों के लिए चाय का कह दिया और खुद आकर ड्राइंग रूम में रखे सोफे पर बैठ गई। उसके चेहरे से चिन्ता व परेशानी के भाव जा ही नहीं रहे थे। वो कुछ भी करके अजय सिंह को सीबीआई के चंगुल से बाहर निकालना चाहती थी। हलाॅकि उसे पता था कि ऐसे मामलों में अपराधी का कानून की गिरफ्त से बाहर आना बेहद मुश्किल काम होता है किन्तु इसके बावजूद प्रतिमा अजय सिंह को बाहर निकालना चाहती थी।

सहसा प्रतिमा को अपने पिता जगमोहन सिंह का ख़याल आया। प्रतिमा का बाप जगमोहन सिंह आज कल इलाहाबाद हाई कोर्ट में बतौर क्रिमिनल लायर था। ऊम्र से ज्यादा अधेड़ नहीं लगता था। कहा जाता है कि जगमोहन सिंह बहुत ही काबिल व तेज़ तर्रार वकील था। चाहे जैसा भी केस हो, मुहमाॅगी फीस मिलने पर वह अपने मुवक्किल को बाइज्ज़त बरी करा लेता था। मगर यहाॅ पर प्रतिमा के लिए सबसे बड़ी समस्या ये थी कि वो अपने बाप से मदद माॅगे तो माॅगे कैसे?

दरअसल, जब प्रतिमा ने अपने बाप को बताया कि वह अजय सिंह से प्यार करती है और उससे शादी करना चाहती है तो जगमोहन सिंह बुरी तरह भड़क गया। उसे प्यार शब्द से ही नफ़रत थी। पता नहीं ऐसा क्या था कि प्रेम प्रसंग होने पर वह आपे से बाहर हो जाता था। उसके घर में नियम कानून बड़े शख्त थे। उसकी दो ही बेटियाॅ थी। जिनमें से प्रतिमा छोटी वाली थी। जबकि पहली बेटी मुम्बई में रहती थी, जहाॅ आजकल अजय सिंह की बेटी नीलम रहती है। जगमोहन सिंह को कोई बेटा नहीं था। धन दौलत की शुरू से ही कोई कमी नहीं थी। ख़ैर, बाप के साफ इंकार कर देने पर प्रतिमा ने पहली बार अपने बाप से मुहज़ुबानी की थी और साफ शब्दों में कह दिया था कि वो शादी करेगी तो अजय सिंह से ही वरना वो कभी किसी से शादी नहीं करेगी। जगमोहन को अपनी इस बेटी की धृष्टता पर बेहद गुस्सा आया और उसने उसी वक्त कह दिया उससे कि आज के बाद वो उसके लिए मर गई है। बस प्रतिमा ने आव देखा न ताव, बाप का घर छोंड़ दिया और सीधा अजय सिंह के पास पहुॅच गई। अजय सिंह के साथ ही वह रहने लगी। इस बीच वो प्रग्नेन्ट हो गई तो आनन फानन में अजय सिंह और प्रतिमा ने आपस में कोर्ट मैरिज कर ली थी।

तब से लेकर अब तक प्रतिमा ने कभी भी अपने बाप से कोई मतलब नहीं रखा था और ना ही उसके बाप जगमोहन ने। प्रतिमा की इस बगावत से उसकी बड़ी बहन को धक्का तो ज़रूर लगा था किन्तु वो कर भी क्या सकती थी? ऐसे ही समय गुज़रता गया। प्रतिमा अपनी बड़ी बहन से फोन पर ही हाल समाचार ले लिया करती थी। दोनो बहनें वर्षों से एक दूसरे से न मिली थी।

ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठी प्रतिमा इन्हीं सब यादों में खोई थी। उसकी ऑखों में ऑसू भर आए थे। माॅ का साया तो पहले ही उसके सिर से उठ गया था। दोनो बहनों में ये सबसे ज्यादा लाड प्यार में पली पढ़ी थी और शायद यही वजह थी कि जिद्दी हो गई थी। जिसका नतीजा ये हुआ था कि उसने अपने बाप के खिलाफ़ जाकर अजय सिंह से शादी कर ली थी। मगर आज के हालात बहुत और तब के हालात में बहुत फर्क़ हो गया था। आज के हालात में प्रतिमा किसी के भी सामने झुकने और किसी के भी नीचे लेटने को तैयार थी। बदले में उसे अजय सिंह सीबीआई की गिरफ्त से बाहर चाहिए था।

प्रतिमा की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो दुबारा अपने बाप से बात कर सके। शादी वाली बात को तो वर्षों हो गए थे। किन्तु इन वर्षों में उसने एक बार भी अपने बाप से बात करना ज़रूरी नहीं समझा था। और आज जब बुरा वक्त आया तो उसे अपने बाप का ख़याल आया और उससे मदद माॅगने का भी। प्रतिमा को पहली बार लगा कि उसे अपने बाप से इस तरह मुहज़ुबानी नहीं करनी चाहिए थी और ना ही तैश में आकर इस तरह बाप के घर की दहलीज़ को छोंड़ देना चाहिए था। मामले को प्यार से और समझा बुझा कर भी सुलझाया जा सकता था। आज अगर ग़ौर किया जाए तो दो दो बेटियाॅ होने के बाद भी उसका बाप घर में अकेला ही था। सोचने वाली बात है कि उतने बड़े घर में उसका बाप पिछले कितने ही वर्षों से अकेला रह रहा है। क्या उसे अपने उस अकेलेपन से दुख नहीं होता होगा? क्या उसे इस बात का दुख नहीं होगा कि उसकी बेटी ने आज तक उसकी सुधि तक न ली। अपनी खुशियों को गले लगा कर अपने बाप को अकेला छोंड़ दिया। तन्हाई इंसान को जीते जी मार डालती है। मगर उसने कभी अपनी इस बेटी को फोन करके उस सबका गिला न किया था।

प्रतिमा को बड़ी शिद्दत से एहसास हुआ कि उससे कितनी बड़ी भूल हुई है। कहते हैं कि माॅ बापप का गुस्सा या नाराज़गी जीवन भर के लिए नहीं होती। आख़िर बाप को औलाद के आगे हार जाना ही होता है। मगर यहाॅ तो जगमोहन दोनो तरफ से हारा हुआ बाप बन चुका था। प्रतिमा की ऑखों से पश्चाताप के ऑसू बह रहे थे। उसे इस बात का बखूबी एहसास था कि भले ही उसके बाप ने उसे त्याग दिया था मगर आज भी वो अपनी बेटियों के मंगलमय जीवन की कामना करता होगा। ये सब सोच सोच कर प्रतिमा को भारी दुख हो रहा था। उसे अपनी अज्ञानता और अपने छोटेपन का शिद्दत से एहसास हो रहा था मगर अब रोने से क्या हो सकता था? पच्चीस साल का वक्त थोड़ा सा नहीं होता अपने बाप से अनबन किये हुए।

प्रतिमा को लगने लगा कि ये जो कुछ भी आज उसके और उसके परिवार के साथ हो रहा है वो सब उसी का फल है जो उसने इतने वर्षों से बाप को दुखी किया हुआ है। ये सब सोच कर ही प्रतिमा को चक्कर सा आने लगा। उसने अपना सिर दोनो हाॅथों से पकड़ लिया। तभी ड्राइंग रूम में शिवा दाखिल हुआ। अपनी माॅम को इस तरह पीड़ा में देख वह घबरा सा गया। तुरंत ही प्रतिमा के पास पहुॅचा वह और उसे उसके कंधों से पकड़ कर झकझोरा।

"क्या हुआ माॅम?" शिवा ने घबरा कर कहा___"आप ठीक तो हैं न माॅम? प्लीज़ बताइये न क्या हुआ है आपको?"
"कुछ नहीं बेटा।" प्रतिमा ने खुद को सम्हालते हुए कहा___"बस थोड़ा चक्कर सा आ गया था।"
"आप इतना टेंशन क्यों लेती हैं माॅम?" शिवा ने प्रतिमा के चेहरे को दोनो हथेलियों में लेकर कहा___"सब कुछ ठीक हो जाएगा। डैड बहुत जल्द वापस आ जाएॅगे।"

"हाॅ बेटा।" प्रतिमा ने कहीं खोए हुए से कहा___"सब कुछ ठीक हो जाएगा। तेरे डैड जल्द ही हमारे पास वापस आ जाएॅगे।"
"आप चलिये माॅम।" शिवा ने प्रतिमा को उठाते हुए कहा___"अपने कमरे में आराम कीजिए आप और हाॅ ज्यादा सोच विचार मत किया कीजिए।"

शिवा की बात का प्रतिमा ने फीकी सी मुस्कान के साथ जवाब दिया और कमरे की तरफ शिवा के साथ बढ़ गई। कमरे में बेड पर प्रतिमा को लेटा कर शिवा रसोई की तरफ बढ़ गया। रसोई में सविता चाय बनाकर केतली में डाल रही थी। ये देख कर शिवा वापस बाहर की तरफ आया और हवेली से बाहर आ गया। बाहर उसने एक आदमी को बुलाया और अंदर ले गया उसे। अंदर आकर उसने सविता से कहा कि वो चाय नास्ता काका को पकड़ा दे। सविता ने वैसा ही किया। शिवा और वो आदमी दोनो ही चाय नास्ता का सामान लिये सर्वेंट क्वार्टर की तरफ बढ़ गए।
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उधर फार्महाउस पर!
शंकर काका की कहानी से माहौल थोड़ा गंभीर सा हो गया था किन्तु हरिया काका की मज़ेदार बातों से फिर से खुशनुमा हो गया था। रितू को सहसा कुछ याद आया तो उसने हरिया काका की तरफ देखा।

"अरे काका।" फिर उसने कहा___"इन सब बातों के बीच हम ये तो भूल ही गए कि तहखाने में मंत्री की बेटी कैद है और वो कल से भूखी प्यासी भी होगी।"
"हाॅ बिटिया।" हरिया काका के चेहरे पर चौंकने वाले भाव उभरे___"ई ता सही मा हम भुलाय दीन्हें रहे। ऊ ससुरी मंत्रीवा की छोकरिया अबे तक ता ज़रूरै भूख पियास से मरत होई।"

"आप भी कमाल करते है काका।" रितू ने कहा___"ऐसा लगता है जैसे आप उस बेचारी को ऐसे ही मार देंगे। जबकि अभी तो मुझे उसके अंदर की गर्मी निकालनी है। चलिये देखें तो सही क्या हाल चाल हैं उसके?"
"हाॅ हाॅ चला बिटिया।" हरिया काका ने बंदूख को शंकर के हाथ में थमाते हुए कहा___"अब ता देखहिन का पड़ी कि ऊ ससुरी अबे ज़िंदा बा के मर गईल है।"

रितू हरिया की बात पर मुस्कुराती हुई तहखाने की तरब बढ़ गई। उसके पीछे पीछे हरिया भी चल रहा था। कुछ ही देर में वो दोनो तहखाने के दरवाजे के पास खड़े थे। हरिया ने चाभी हे तहखाने का दरवाजा खोला और एक साइड हट गया। रितू दरवाजे के अंदर की तरफ दाखिल हो गई। अभी वो दो तीन सीढ़ियाॅ ही नीचे उतरी थी कि सहसा उसे रुक जाना पड़ा और जल्दी से पैन्ट की जेब से रुमाल निकाल कर अपने मुह व नाॅक पर रखना पड़ा।

तहखाने में तेज़ दुर्गंध फैली हुई थी। मतलब साफ था अंदर मौजूद सूरज और उसके दोस्त या फिर सूरज की बहन में से किसी का टट्टी पेशाब छूट गया था जिसकी वजह हे अंदर दुर्गंध फैली हुई थी। रितू से बर्दास्त न हुआ तो वो वापस तहखाने से बाहर आ गई।

"काका इन लोगों ने तो यहाॅ गंध फैला रखी है।" रितू ने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा___"ऐसे में अंदर जाया नहीं जाएगा। इस लिए सबसे पहले आप तहखाने का हाल सही करवाइये। उसके बाद ही आगे का कार्यक्रम होगा।"
"ठीक है बिटिया।" हरिया ने कहा___"हम इहाॅ की सफाई करवाता हूॅ तब तक तू बाहर रहा।"
"ठीक है काका।" रितू ने कहा___"मैं कुछ देर के लिए कमरे में जा रही हूॅ। जब यहाॅ का सब ठीक हो जाए तो आप मुझे बुला लीजिएगा।"

ये कह कर रितू वहाॅ से बाहर आकर इस तरफ से अंदर गई और अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। कमरे में आकर रितू बेड पर लेट गई। अभी वह लेटी ही थी कि नैना बुआ भी कमरे में आ गई और बेड के किनारे भाग में बैठ गई।

"आइये बुआ।" रितू ने अधलेटी अवस्था में कहा__"आप भी आराम से लेट जाइये।"
"चल ठीक है तू कहती है तो लेट जाती हूॅ।" नैना ने रितू के इस तरफ आते हुए कहा___"अच्छा ये बता कि तेरे इस फार्महाउस पर और क्या क्या होता है?"
"क्या मतलब??" रितू बुरी तरह चौंकी___"यहाॅ क्या क्या होता है से आपका क्या मतलब है?"

"इतनी नासमझ व बुद्धू नहीं हूॅ मैं जितना तू समझ रही है मुझे।" नैना ने कहा___"यहाॅ आए मुझे कुछ समय तो हो ही गया है। मैने महसूस किया है कि ये फार्महाउस असल में मुजरिम लोगों के लिए एक ऐसी जेल की तरह है जिसकी कैद से मुजरिम का निकल पाना नामुमकिन ही नहीं बल्कि असंभव है। कह दे भला कि मैं झूॅठ कह रही हूॅ?"

रितू चकित भाव से देखती रह गई अपनी बुआ को। किन्तु फिर तुरंत ही सम्हल भी गई। चेहरे पर शशंक भाव लाते हुए बोली___"ये सब आपने खुद महसूस किया है या ये सब बातें किसी के द्वारा पता चली है आपको?"

"बात अगर सच है तो इस बात से कोई मतलब ही नहीं रह जाता मेरी बच्ची कि मुझे ये सब कैसे पता चला?" नैना ने स्पष्ट भाव से कहा___"दूसरी बात मुझे इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं है कि तू इस फार्महाउस पर क्या कर रही है। बल्कि खुशी है कि मुजरिमों को उचित सज़ा दे रही है तू। मगर मैं बस यही कहूॅगी कि ऐसे कामों में अपनी जान का ख़तरा भी बहुत होता है इस लिए अपना भी ख़याल रखना।"

"ख़तरा तो हर इंसान के जीवन में होता है बुआ।" रितू ने कहा___"चाहे वो कोई आम इंसान हो या फिर कोई ऐसा इंसान जो हर वक्त ख़तरों के बीच ही रहता है। मैं इस फार्महाउस पर इसके पहले कभी भी किसी मुज़रिम को कानून अपने हाॅथ में लेकर नहीं आई बुआ और नाही ऐसा करने का मैने कभी सोचा था। मगर ये सब तो मैने तब किया जब विधी का मामला आया। हमारे देश में किसी मुजरिम को उसके संगीन से भी संगीन अपराध के लिए कोई शख्त सज़ा नहीं हो पाती। इसकी कई सारी वजहें हैं मगर मुख्य वजहें ये हैं कि हमारा कानूनी सिस्टम बहुत कमज़ोर व ढीला है। कोर्ट में आज भी लाखों ऐसे संगीन अपराधों के केस फाइलों के नीचे दबे हुए हैं जिनकी समयावधी का पता चलते ही हमारा कानून पर से विश्वास उठने लगता है। दूसरी बात हमारा यही कानूनी सिस्टम बड़े लोगों और मंत्री मिनिस्टरों के हाॅथ की कठपुतली बना हुआ है। जबकि सच्चाई ये है कि कानून की नज़र में कोई भी छोटा बड़ा नहीं होता। अगर अपराध देश के सबसे बड़े ब्यक्ति ने किया है तो उसे भी वैसी ही सज़ा मिलनी चाहिए जो किसी आम मुजरिम को मिलती है। मगर ये सब कहने की बातें हैं बुआ, हकीक़त में ऐसा होता नहीं है। कानून के इसी कमज़ोर सिस्टम की वजह से एक शरीफ आदमी मजबूरीवश जुर्म का दामन थाम बैठता है।"

"तुम जिन चीज़ों की बात कर रही हो बेटा।" नैना ने गहरी साॅस ली___"वो हमेशा ऐसी ही रहेंगी। बल्कि अगर ये कहूॅ तो ग़लत न होगा कि इससे भी बदतर बन जाएॅगी। इस लिए इस विषय पर बात करने का कोई मतलब नहीं है। तुमने कहा कि विधी का मामला जब सामने आया तब तुमने ऐसा क़दम उठाया। विधी के बारे में भी तुमने ही मुझे बताया था कि उसके साथ चार ऐसे लड़कों ने घिनौना कुकर्म किया था जो बड़े बाप की पैदाईश हैं। मैं ये कहना चाहती हूॅ कि ऐसे बड़े बाप की औलादों को यहाॅ लाकर और उनको सज़ा देने से कहीं तुम पर तो कोई ख़तरा नहीं आ जाएगा। आख़िर सवाल तो बड़े लोगों का है न। जिनके ये बच्चे हैं उन्हें अगर पता चल जाए कि उनके बच्चों को तुमने क्या और कैसे सज़ा दी है तो यकीनन वो बड़े लोग तुझ पर बिजली बन कर गिरेंगे।"

"फिक्र मत कीजिए बुआ।" रितू ने सहसा कठोर भाव से कहा___"मैंने उन सबका अच्छा खासा इंतजाम किया हुआ है। आप यूॅ समझिये कि उन बड़े बड़े खलीफाओं की जान मेरी मुट्ठी में कैद है। आज की डेट में वो सब ऐसी कठपुतलियाॅ बने हुए हैं जो सिर्फ मेरे ही इशारे पर नाचने के लिए मजबूर हैं। वो अपनी मर्ज़ी से ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जो मुझे पसंद ही न आए।"

"ऐसा तेरे पास उनके खिलाफ क्या है?" नैना ने चकित भाव से पूछा___"जिसकी वजह से वो सब बड़े बड़े सूरमा तेरे इशारों पर नाचने के लिए मजबूर बन गए हैं?"

नैना के पूछने पर रितू ने कुछ पल सोचा और फिर उसने वीडियो वाली सारी बात बता दी उसे। ये भी बताया कि उसने खुद मर्द की आवाज़ में फोन पर मंत्री से बात भी की थी और कल तो वो मंत्री की बिगड़ैल बेटी को भी पकड़ कर ले आई है जो इस वक्त तहखाने में बंद है। सारी बातें जानने के बाद नैना का मुह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया।

"हे भगवान!।" फिर उसके मुख से निकला___"ये तू क्या कर रही है रितू? लड़कों की बात तक तो ठीक था और लड़कों के बापों तक भी ठीक था किन्तु लड़की को क्यों कैद कर किया तूने? ये ठीक नहीं है मेरी बच्ची। उन लोगों ने घृणित कर्म किया क्योंकि वो उनकी फितरत थी मगर तेरी फितरत तो ऐसी नहीं है न बेटा? इस लिए मेरी बात मान और मंत्री की बेटी को छोंड़ दे तू।"

"आपने बहुत दूर तक का सोच लिया बुआ।" रितू ने मुस्कुरा कर कहा___"जबकि मेरा ऐसा करने का कोई इरादा ही नहीं है। मेरा मकसद तो बस ये है कि मैं उन्हें भी उस चीज़ का एहसास कराऊॅ जिस चीज़ को करने में उन्हें सबसे ज्यादा मज़ा आता है। मैं उन्हें दिखाना चाहती हूॅ बुआ कि जब वैसा ही सब कुछ अपने साथ होता है तब कैसा प्रतीत होता है? जब अपने ऊपर वैसा जुल्म होता है तो कितनी तक़लीफ़ होती है? हाॅ बुआ यही, बस यही एहसास कराना चाहती हूॅ मैं उन सबको।"

"अगर ऐसी बात है तो फिर ठीक है।" नैना ने सहसा मुस्कुराते हुए कहा___"जो भी करना इस बात का ख़याल रखते हुए करना कि तुम एक अच्छे संस्कारों वाली लड़की हो जो किसी का भी बुरा नहीं कर सकती।"
"अच्छा अब आप आराम कीजिए बुआ।" रितू ने बेड से उतरते हुए कहा___"मैं ज़रा तहखाने में उन सबका हाल चाल देख लूॅ।"
"ठीक है जाओ।" नैना ने कहा और आराम से लेट गई।

रितू कमरे से निकल कर बाहर आ गई। उसने अपने आईफोन के बाईब्रेशन को महसूस किया था। वो समझ गई थी कि हरिया काका ने ही उसे मिस काल दिया था। मतलब साफ था कि उसने तहखाने की गंदगी को साफ कर दिया था। ख़ैर, कुछ ही देर में रितू तहखाने में पहुॅच गई। अब वहाॅ पर कोई गंध नहीं थी। बल्कि सबकुछ एकदम से साफ सुथरा हो गया था।
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उधर मंत्री दिवाकर चौधरी की तरफ!
इस वक्त मंत्री के सभी साथी ड्राइंगरूम में जमा हुए बैठे थे। सबके बीच ब्लेड की धार की मानिन्द पैना सन्नाटा फैला हुआ था। अभी थोड़ी देर पहले ही मंत्री दिवाकर चौधरी अपने आवास पर अपने साथियों के साथ आया था। दिवाकर चौधरी कल शाम से चिंतित व परेशान था। कल शाम को ही आया ने बताया था कि रचना बेटी जिम से नहीं लौटी है। चौधरी को पहले इस बात पर ज्यादा चिंता की बात नज़र नहीं आई थी। उसे लगा था कि रचना अपनी फ्रैण्ड्स के साथ होगी। किन्तु जब आधी रात गुज़र जाने पर भी रचना न आई तो चौधरी को चिंता सताने लगी। उसने रचना की जान पहचान वाली सभी लड़कियों को फोन लगा कर रचना के बारे में पूॅछा था। मगर सबने यही कहा कि रचना उनके पास नहीं है। एक लड़की ने बताया कि शाम को जिम से बाहर आते समय रचना उसके साथ ही थी किन्तु फिर वो अपनी स्कूटी लेकर घर के लिए निकल गई थी।

दिवाकर चौधरी को कल सारी रात नींद नहीं आई थी। अपनी बेटी के लौटने के इंतज़ार में वह जागता ही रहा था। मगर रात गुज़र गई और अब ये दूसरा दिन शुरू होकर दोपहर भी हो रही थी। फिर भी रचना के बारे में कोई ख़बर न मिली थी उसे। चौधरी के लिए चिंता वाली सबसे ज्यादा बात ये थी कि रचना का मोबाइल फोन कल से लगातार बंद बता रहा था। दिवाकर चौधरी को अब अपनी बेटी की बहुत ज्यादा चिंता सता रही थी। उसने अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर ली थी मगर रचना को ढूॅढ़ पाने में वह नाकाम रहा था। दूसरी चिंता की बात ये थी कि उसका बेटा और बेटे के तीनों दोस्तों का भी कहीं कोई पता नहीं चल रहा था। ये सब बातें चौधरी की रातों की नींद उड़ाए हुई थी।

"बड़ी हैरत की बात है चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव कह उठा___"पहले हम अपने बच्चों के लिए चिंतित व परेशान थे। उसके बाद हम अपने लिए परेशान हो गए उन वीडियोज़ की वजह से और अब रचना बेटी के लिए परेशान हो गए हैं। पिछले कुछ समय से ये सब हमारे साथ क्या होने लगा है इसका अंदाज़ा भी है किसी को?"

"हमसे सबसे बड़ी ग़लती ये हुई कि हमने हर चीज़ को तुच्छ व ग़ैरमामूली समझा।" अशोक मेहरा ने कहा__"पर अब हमें गंभीरता से इस सबके बारे में सोचना पड़ेगा चौधरी साहब। हमें शुरू से हर घटना पर ग़ौर करना होगा। हमारे साथ राहू कुतू का ये चक्कर तब से शुरू हुआ जबसे हमारे बच्चों ने उस लड़की का रेप किया था। उस रेप के बाद से ही हमारे बच्चे गायब हुए हैं और अब तक हमें उनकी कोई खोज ख़बर नहीं लगी है। उसके बाद उस अंजान ब्यक्ति का हमें वो वीडियोज़ भेजना, साथ ही उसकी वो धमकी भरी बात। और अब रचना बेटी का अकस्मात गायब हो जाना। ये सारी घटनाएॅ इस बात की तरफ स्पष्ट रूप से इशारा करती हैं कि इन सभी घटनाओं का कर्ता धर्ता एक ही ब्यक्ति है। दूसरा कोई शख्स ऐसा करने का सोच भी नहीं सकता है।"

"मैं अशोक की इन बातों से पूरी तरह सहमत हूॅ चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"ये सच है कि सारी घटनाओं का केन्द्र बिन्दु उस लड़की के रेप वाली वो घटना ही है। ऐसे मामलों में आम तौर पर वही होता है जो ऐसे हर रेपिस्ट के साथ होता है। यानी रेप पीड़िता के घरवाले पुलिस में एफआईआर दर्ज़ करवाते हैं और अदालत से इंसाफ की गुहार लगाते हैं। हलाॅकि ऐसा कम ही होता है क्योंकि कोई भी शरीफ ब्यक्ति अपनी बदनामी नहीं कराना चाहता इस लिए केस को रफा दफा करवा लेता है किन्तु कुछ ऐसे भी होते हैं जो बदनामी से नहीं डरते और इंसाफ के लिए सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा पार कर जाते हैं। मगर हैरत की बात है कि जिस लड़की के साथ हमारे बच्चों ने रेप किया उस पर किसी ने कोई ऐक्शन ही नहीं लिया। जबकि कानून के ही डर से हमारे बच्चे शायद कहीं छुप गए और आज तक लौट कर घर नहीं आए। दूसरी बात ये कि हमने भी ये जानने की कोशिश नहीं की कि रेप के बाद उस लड़की का क्या हुआ? जबकि हमें ऐसे मामले की पल पल की ख़बर रखनी चाहिए थी। आज उस घटना को घटे क़रीब क़रीब दो हप्ते हो गए होंगे।"

"ये सच है कि हमने हर चीज़ को मामूली ही नहीं समझा बल्कि उसे नज़रअंदाज़ भी किया।" दिवाकर चौधरी ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"जिसका नतीजा आज हमें इस रूप में देखने को मिल रहा है। मगर, अब भी शायद कुछ नहीं बिगड़ा है। हमें इस मामले में अपनी तरफ से जाॅच पड़ताल करनी चाहिए। सबसे ज्यादा उस लड़की के बारे में, क्योंकि घटनाओं का सिलहिला उस रेप से ही शुरू हुआ है। संभव है कि हमें कोई ऐसा सुराग़ मिल जाए जिससे हमें सारी बातों का पता चल जाए। हलाॅकि हमने उस दिन पुलिस कमिश्नर से फोन पर पूॅछा था कि हमारे बच्चों के लापता होने में अगर पुलिस का हाॅथ हुआ तो अच्छा नहीं होगा। इस पर कमिश्नर ने साफ साफ कहा था कि हमारे बच्चों पर कानून का हाॅथ तभी पड़ सकता था जबकि रेप पीड़िता के घरवालों ने थाने में एफआईआर दर्ज़ करवाया होता। इस लिए जब ऐसा कुछ हुआ ही नहीं है तो हमारे बच्चों पर कानून कोई कार्यवाही कैसे कर देगा? इस लिए ये तो साफ है कि हमारे बच्चों के गायब होने में नुलिस या कानून का कोई हाॅथ नहीं है। मगर बच्चे गायब हैं ये सच बात है। इस लिए अब इसका पता लगाना बेहद ज़रूरी है कि ये सब किसने किया है हमारे बच्चों के साथ? दूसरा मामला वो वीडियो भेजने वाला है। वीडियो भेजने वाले ने उस दिन फोन पर स्पष्ट कहा था कि उसके पास हमारे खिलाफ ऐसे ऐसे सबूत हैं जिनके बेस पर वो हमें जब चाहे बीच चौराहे पर नंगा दौड़ा सकता है। उसकी इस बात पर हमने ये निष्कर्श निकाला था कि संभव है कि उसी ने हमारे बच्चों को पकड़ा हो और फिर उन्हें टार्चर करके उनसे हमारे खिलाफ़ उन वीडियो के रूप में सबूत प्राप्त किया होगा।"

"फिर तो ये साबित हो गया चौधरी साहब कि इन सभी घटनाओं का कर्ता धर्ता एक ही ब्यक्ति है।" अशोक मेहरा बीच में बोल पड़ा___"आपकी बातों में यकीनन ठोस सच्चाई है। यकीनन हमारे बच्चे उस वीडियों भेजना वाले के पास ही हैं। इस बात से ये भी सोचा जा सकता है कि रचना बेटी को भी उसी ने किडनैप किया होगा।"

"बिलकुल ऐसा हो सकता है चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"अभी तक हमें वस्तुस्थित का ज़रा भी एहसास नहीं था किन्तु अब हो रहा है और समझ में भी आ रहा है कि वोडियो भेजने वाला हमसे चाहता क्या है?"

"क्या चाहता है वह??" दिवाकर चौधरी फिरकिनी की मानिंद अवधेश की तरफ घूम कर पूछा था।
"हो सकता है कि इन मामलों के तहत उस वीडियो भेजने वाले के संबंध में जो थ्यौरी मेरे दिमाग़ में बनी है वो ग़लत भी हो।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"किन्तु फिर भी प्रकट कर रहा हूॅ। बात उस लड़की के रेप से ही शुरू हुई। रेप पीड़िता के घरवालों को जब इस बात का पता चला होगा कि रेप करने वाले लड़के बड़े बाप की औलाद हैं तो वो समझ गए कि पुलिस में एफआईआर दर्ज़ कराने का कोई फायदा नहीं होगा। क्योंकि बड़े लोगों के प्रभाव से सीघ्र ही इस केस को इतना कमज़ोर बना दिया जाएगा कि उसमें कोई दम नहीं रह जाएगा। बल्कि ऐसा भी हो सकता है कि उल्टा लड़की को ही कोर्ट में चरित्रहीन और बदचलन साबित कर दिया जाए। उस सूरत में इंसाफ तो मिलने से रहा ही ऊपर से समाज के बीच उनकी जो इज्ज़त खाक़ में मिलेगी उसकी भरपाई इस जन्म में तो संभव नहीं हो सकती थी। इस लिए लड़की के घरवालों ने अपनी बेटी के साथ हुए रेप का बदला लेने के लिए दूसरा तरीका अपनाया। दूसरा तरीका ये था कि किसी तरह वो हमारे बच्चों को पकड़ लें और फिर अपने तरीके से जो चाहे सज़ा दें उन्हें। अब तक वो इसी लिए अपने हर काम में सफल रहे क्योंकि हमने इन सब चीज़ों की तरफ ध्यान ही न दिया था। ध्यान तो तब आया जब मामला हमारे हाॅथ से निकल गया। हाॅ चौधरी साहब, मामला हमारे हाॅथ से निकल ही तो गया है। क्योंकि उस ब्यक्ति के पास हमारे खिलाफ जो सबूत है वो हमें किसी भी पल बीच चौराहे पर नंगा होकर दौड़ने पर मजबूर कर देगा।"

"तो तुम्हारे हिसाब से ये सब लड़की के घरवालों ने किया है?" चौधरी ने कहा___"मतलब कि उन लोगों ने हमारे बच्चों को पकड़ा और उनसे हमारे खिलाफ़ सबूत भी प्राप्त कर लिए?"
"जी बिलकुल।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"आप खुद सोचिए कि ऐसा करने की उनके सिवा भला किसके पास वजह थी? ये तो एक यथार्थ सच्चाई है न चौधरी साहब कि बेवजह कभी कुछ नहीं होता है। इस लिए ये सब करने की वजह सिर्फ और सिर्फ रेप पीड़िता के घरवालों के पास थी। दूसरा ब्यक्ति ऐसा करने का शौक तो नहीं रख सकता न?"

"चलो मान लिया कि ये सब उस रेप पीड़िता लड़की के घरवालों ने किया है।" चौधरी ने कहा___"किन्तु सवाल ये है कि उन्हें हमारी बेटी को भी किडनैप या पकड़ने की क्या ज़रूरत थी? हमारी बेटी ने तो कोई गुनाह नहीं किया था न? फिर क्यों उसे पकड़ा उन्होंने?"

"संभव है कि रचना बेटी के ज़रिये।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"वो हमें ये एहसास दिलाना चाहते हों कि जब वैसा ही रेप केस हमारे साथ हो तो हमें कैसा लगेगा? हमें उससे कितनी तक़लीफ़ होगी?"

अवधेश श्रीवास्तव के इस तर्क से दिवाकर चौधरी कुछ बोल न सका। जैसे निरुत्तर हो गया था वह या फिर कदाचित उसे बात समझ में आ गई थी कि अवधेश का तर्क बिलकुल सही था। ख़ैर, अवधेश श्रीवास्तव की उस बात से कुछ देर सन्नाटा छाया रहा।

"तो अब क्या किया जाए?" सहसा अशोक मेहरा ने उस सन्नाटे को चीरते हुए कहा___"अगर हम सही लाइन पर हैं तो हमारा अगला क़दम अब क्या होना चाहिए?"
"बड़ा सीधा व सरल जवाब है अशोक।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"हमारा अगला क़दम ये होना चाहिए कि हमें जल्द से जल्द उस रेप पीड़िता लड़की के घरवालों को धर लेना चाहिए। उसके बाद खुद ही हम अपने तरीके से उनका क्रिया कर्म करेंगे।"

"तुम तो ऐसे कह रहे हो अवधेश जैसे कि ये सब वैसा ही आसान काम हो जैसे थाली से दाल चावल का निवाला बना कर उसे खा लेना आसान होता है।" अशोक ने कहा___"जबकि हमें इस बात पर भी ज़रा ग़ौर कर लेना चाहिए कि जिस ब्यक्ति को हम धर लेने के लिए अपने क़दम बढ़ाने जा रहे हैं उसने क्या इस सबके बारे में नहीं सोचा होगा? बल्कि ज़रूर सोचा होगा भाई, उसे भी इस बात का अच्छी तरह से पता है कि हम क्या चीज़ हैं। अगर वो हमारे बच्चों को धर लेगा तो सबसे पहले हमारा शक़ उसी पर ही जाएगा। उस सूरत में हम उसकी उस धृष्टता के लिए उसका क्या हस्र करेंगे ये बात भी उसने ज़रूर सोची होगी। अब सोचने वाली बात ये है कि जब उसने ये सब सोचा होगा तो अपने बचाव का कोई न कोई रास्ता भी सोचा होगा। ऐसे ही तो नहीं कोई साॅप के बिल में अपना हाॅथ डाल देता है।"

"यकीनन तुम्हारी बात में दम है।" अवधेश श्रीवास्तव ने जैसे स्वीकार किया__"और उसके जिस बचाव वाले रास्ते की तुम बात कर रहे हो वो यकीनन यही हो सकता है कि आज की डेट में उसके पास हमारे खिलाफ़ सबूत के रूप में वो वीडियो रूपी ब्रम्हास्र है।"

"बिलकुल ठीक समझे।" अशोक ने कहा__"इस लिए अब हम अगर कोई क़दम भी उठाएॅ तो ज़रा सोच समझ कर उठाएॅ। क्योंकि अगर उसे पता चल गया कि हम उसके खिलाफ़ कुछ करने जा रहे हैं तो संभव है कि अगले ही पल वो हम पर क़यामत बरपा दे।"

"इसका मतलब तो ये हुआ कि हम कुछ कर ही नहीं सकते।" सहसा चौधरी आवेश में कह उठा__"उस साले ने हमें पंगु बना कर रख दिया है। मगर ऐसा कब तक चलेगा यार? हमें कुछ तो करना ही पड़ेगा न? वरना वो दिन दूर नहीं जबकि हम चारों किसी चौराहे पर नंगे दौड़ लगा रहे होंगे।"

"कुछ तो करना ही पड़ेगा चौधरी साहब?" अशोक ने कहा___"साला नुकसान तो दोनो तरफ से होना ही है। इस लिए कुछ करके ही नुकसान झेलते हैं। शायद ऐसा भी हो जाए कि सारा खेल हमारे हक़ में हो जाए।"
"बात तो सच कही तुमने।" चौधरी ने कहा___"मगर सवाल ये है कि हम करेंगे क्या?"

"वही जो करने का सजेशन थोड़ी देर पहले अवधेश भाई ने दिया था।" अशोक ने कहा___"मगर उसमें थोड़ा चेंज करना पड़ेगा। वो ये कि लड़की के घरवालों को पहले हम दिलेरी से धरने जा रहे थे जबकि अब वही काम हम इस तरीके से करने की कोशिश करेंगे कि उस कम्बख्त को इसकी भनक तक न लग सके।"

"ओह आई सी।" अवधेश श्रीवास्तव बोला__"मगर मुझे लगता है कि हमें एक बार ये सब करने से पहले फिर से इस बारे में सोच लेना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि हम खुद ही धर लिए जाएॅ।"
"कायर व डरपोंक जैसी बातें मत करो अवधेश।" चौधरी ने कठोरता से कहा___"अब हम चुप भी नहीं बैटना चाहते हैं। साला हिंजड़ा बना कर रख दिया है उसने हमें। मगर अब और नहीं। अब जो होगा देखा जाएगा।"

बस चौधरी की इस बात ने जैसे फैंसला सुना दिया था। किसी में भी इस फैंसले के खिलाफ़ जाने की हिम्मत न थी। इस लिए अब इस काम को अंजाम देने की समय सीमा पर विचार विमर्ष किया गया और उसके बाद अशोक और अवधेश अपने अपने घर चले गए। मगर आगे किसके साथ क्या होने वाला है ये किसी को कुछ पता न था।
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दोस्तो, आप सबके सामने अपडेट हाज़िर है,,,,,,,
आप सबकी प्रतिक्रिया और फीडबैक का इन्तज़ार रहेगा।

दोस्तो, अपडेट नंबर 50 एक ही ब्रैकेट में आ ही नहीं रहा था इस लिए ऐसा देना पड़ा। शब्द संख्या 72000 दिखा रहा था शायद।
 
एकनयासंसार

अपडेट........ 《 51 》

अब तक,,,,,,,,

"कुछ तो करना ही पड़ेगा चौधरी साहब?" अशोक ने कहा___"साला नुकसान तो दोनो तरफ से होना ही है। इस लिए कुछ करके ही नुकसान झेलते हैं। शायद ऐसा भी हो जाए कि सारा खेल हमारे हक़ में हो जाए।"
"बात तो सच कही तुमने।" चौधरी ने कहा___"मगर सवाल ये है कि हम करेंगे क्या?"

"वही जो करने का सजेशन थोड़ी देर पहले अवधेश भाई ने दिया था।" अशोक ने कहा___"मगर उसमें थोड़ा चेंज करना पड़ेगा। वो ये कि लड़की के घरवालों को पहले हम दिलेरी से धरने जा रहे थे जबकि अब वही काम हम इस तरीके से करने की कोशिश करेंगे कि उस कम्बख्त को इसकी भनक तक न लग सके।"

"ओह आई सी।" अवधेश श्रीवास्तव बोला__"मगर मुझे लगता है कि हमें एक बार ये सब करने से पहले फिर से इस बारे में सोच लेना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि हम खुद ही धर लिए जाएॅ।"
"कायर व डरपोंक जैसी बातें मत करो अवधेश।" चौधरी ने कठोरता से कहा___"अब हम चुप भी नहीं बैटना चाहते हैं। साला हिंजड़ा बना कर रख दिया है उसने हमें। मगर अब और नहीं। अब जो होगा देखा जाएगा।"

बस चौधरी की इस बात ने जैसे फैंसला सुना दिया था। किसी में भी इस फैंसले के खिलाफ़ जाने की हिम्मत न थी। इस लिए अब इस काम को अंजाम देने की समय सीमा पर विचार विमर्ष किया गया और उसके बाद अशोक और अवधेश अपने अपने घर चले गए। मगर आगे किसके साथ क्या होने वाला है ये किसी को कुछ पता न था।
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अब आगे,,,,,,,

उधर तहखाने में रितू जब पहुॅची तो वहाॅ की साफ सफाई देख कर खुश हो गई। अब यहाॅ पर पहले जैसी गंद नहीं थी। एक तरफ सूरज और उसके तीनो दोस्त हाथ ऊपर किये रस्सी से बॅधे खड़े थे। रितू को तहखाने में आया देख कर उन चारों की निगाह स्वयमेव ही उस तरफ उठती चली गई थी। चेहरों पर घबराहट के भाव एकाएक ही उजागर हो गए थे। चारों की हालत काफी ख़राब हो चुकी थी। ठीक से भोजन न मिलने की वजह से उनके जिस्म कमज़ोर से दिखाई दे रहे थे। दाढ़ी मूॅछें बढ़ गई थी जिससे पहचान में नहीं आ रहे थे वो। वहीं दूसरी तरफ दीवार के पास ही लकड़ी की एक कुर्सी पर मंत्री की बेटी रचना बैठी हुई थी। उसके दोनो हाॅ तथा दोनो पैर कुर्सी से इस तरह बॅधे हुए थे कि वह हिल डुल भी नहीं सकती थी।

"वाह काका।" तहखाने के फर्श पर चलते हुए रितू ने हरिया की तरफ देख कर कहा___"आपने तो कमाल ही कर दिया है। यहाॅ की साफ सफाई देख कर लगता ही नहीं है कि अभी थोड़ी देर पहले यहाॅ गंदगी का कितना बड़ा साम्राज्य कायम था।"

"ई सुसरे लोगन ने इहाॅ बड़का वाला गंदगी फेरे रहे बिटिया।" हरिया काका ने कहा___"यसे साफ तो करइन का परत ना। बस थोड़ी दिक्कत ता हुई पर हम सब बहुत अच्छे से कर लिया हूॅ।"
"हाॅ वो तो दिख ही रहा है काका।" रितू ने सहसा पहलू बदलते हुए कहा___"ख़ैर, इन लोगों की ख़ातिरदारी अच्छी चल रही है न?"

"अरे बिटिया।" हरिया ने अजीब भाव से कहा___"ई कइसन सवाल हा? ई बात ता ई ससुरा लोगन का देख के ही समझ मा आ जई कि हम कितना अच्छे से ई लोगन केर खातिरदारी किया हूॅ। बस ई ससुरी छोकरिया बहुतै उछलत रही।"

"ऐसा क्यों काका?" रितू चौंकी।
"अरे ऊ का है ना बिटिया।" हरिया ने ज़रा नज़रें झुकाते हुए कहा___"ई चारो लोगन के जइसन एखरौ टट्टी पेशाब छूट गइल रहे। एसे हमका एखर नीचे का कपड़ा उतारैं का परा। पर हम सच कहत हूॅ बिटिया। हम एखे बदनवा का कछू नाहीं देखेन। एखे बावजूदव ई ससुरी चिल्लात रही यसे हम भी गुस्सा मा एक लाफा दै दिये इसको। ससुरी बहुतै गंदा गरियावत रही हमका। पर हमहू तबहिनै माने जब एखर सब कुछ साफ कर के चकाचक कर दिहे।"

"ओह तो ये बात है।" रितू मन ही मन मुस्कुराते हुए बोली___"कोई बात नहीं काका। आपने अपना काम बहुत अच्छे से किया है। वरना तो ये सब गंद फैलाते ही रहते न?"
"एक बार मेरे हाॅथ पैर को इस रस्सी से आज़ाद कर के देख कुतिया।" सहसा रचना ने एकाएक बिफरे हुए अंदाज़ से चीखते हुए कहा___"तेरे हाथ पैर तोड़ कर तेरे हाॅथ में न दे दूॅ तो कहना।"

रचना की इस बात से जहाॅ हरिया का पारा गरम हो गया था वहीं रितू उसे देख कर बस मुस्कुरा कर रह गई। फिर उसने सूरज और उसके दोस्तों की तरफ इशारा करते हुए रचना से कहा___"इन चारों को ग़ौर से देखो और पहचानो कि ये चारो कौन हैं?"

"मुझे नहीं पहचानना किसी को।" रचना ने पूर्व की भाॅति ही तीखे भाव से कहा___"ये सब तेरे यार हैं तू ही पहचान इन्हें।"
"मैं चाहूॅ तो इसी वक्त तेरी इस गंदी ज़ुबान को काट कर तेरे पिछवाड़े में डाल दूॅ।" रितू के मुख से शेरनी की भाॅति गुर्राहट निकली___"मगर उससे पहले तुझे ये दिखाना चाहती हूॅ और बताना चाहती हूॅ कि तू जिनके दम पर इतना उछल रही है न उनकी औकात मेरे सामने कीड़े मकोड़ों से भी बदतर है। ग़ौर से देख इन चारों को। इनमें तेरा ही कोई अपना नज़र आएगा।"

रितू की ये भात सुन कर रचना ने पहले तो उसे आग्नेय नेत्रों से घूरा उसके बाद उसने उन चारों की तरफ अपनी निगाह डाली। सूरज अपनी बहन को ग़ौर से अपनी तरफ देखते देख बुरी तरह घबरा गया। वो नहीं चाहता था कि उसकी बहन उसे पहचाने। क्योंकि उसे पता था कि उस सूरत में उसकी बहन भयभीत हो जाएगी। उसने जब पहली बार ऑखें खोल कर रचना को देखा था तो बुरी तरह चौंका था साथ ही डर भी गया था। उसे रितू से इस सबकी उम्मीद नहीं थी। हलाॅकि रितू ने उससे कहा ज्ररूर था कि वो उसकी बहन को भी यहाॅ ले आएगी और वो सब उसके साथ बलात्कार करेंगे। मगर उसे लगा था कि ये सब रितू महज गुस्से में कह रही थी। जबकि ऐसा वो करेगी नहीं। मगर अब उसे समझ आ गया था कि रितू ने उस समय कोई कोरी धमकी नहीं दी थी बल्कि सच ही कहा था। जिसका प्रमाण इस वक्त रचना के रूप में उसके सामने कुर्सी पर बॅधा हुआ मौजूद था। ख़ैर उधर,

रितू की ये बातें सुन कर रचना ने जब ग़ौर से उन चारों की तरफ देखा तो एकाएक ही उसके चेहरे पर चौंकने के भाव आए और फिर जैसे एकाएक ही जैसे उसके दिलो दिमाग़ में विष्फोट हुआ। उसने पलट कर रितू की तरफ देखा।

"तेरे चेहरे के ये भाव चीख़ चीख़ कर इस बात की गवाही दे रहे हैं कि तूने इन चारों को पहचान लिया है।" रचना के देखते ही रितू ने अजीब भाव से कहा___"और अब जब तूने पहचान ही लिया है तो पूछ इन चारों से कि ये सब यहाॅ कैसे और क्यों मौजूद हैं?"

रितू की इस बात का असर रचना पर तुरंत ही हुआ। उसके चेहरे पर एकाएक ही ऐसे भाव उभरे जैसे उसे
उन चारों को इस हालत में देख कर बेहद दुख हुआ हो। ऑखों में पानी तैरता हुआ नज़र आने लगा था उसके।

"भ भाई।" फिर उसके मुख से लरज़ता हुआ स्वर निकला___"ये सब क्या है? आप चारो यहाॅ कैसे??"

रचना के इस सवाल पर सूरज चुप न रह सका। बल्कि ये कहना चाहिए कि अब उसके सामने कोई चारा ही नहीं रह गया था। इस लिए उसे अब अपनी बहन के सामने अपनी यहाॅ पर मौजूदगी का कारण बताना ही था। इस लिए चेहरे पर दुख के भाव लिए वह रचना को अपनी राम कहानी शुरू से लेकर अंत तक बताता चला गया। सारी बातें जानने के बाद रचना भौचक्की सी रह गई थी।

"और हम सब ये समझ रहे थे कि आप लोग उस घटना के चलते कहीं ऐसी जगह छुप गए हैं जहाॅ पर आप पुलिस व कानून की पहुॅच से दूर होंगे।" सारी बातें सुनने के बाद रचना ने आहत भाव से कहा___"मगर आप तो यहाॅ हैं भाई। ख़ैर, देख लिया न भाई बुरे का काम का बुरा अंजाम। कितना कहती थी आप लोगों को कि इस तरह किसी की ज़िंदगियों से मत खेलो। मगर आप लोग कभी मेरी बात नहीं सुनते थे। बल्कि हमेशा यही कहते थे कि लाइफ को एंज्वाय करो और मस्त रहो। मुझे भी ऐसा ही करने की नसीहत देते थे। मगर इससे हुआ क्या भाई? आज आप चारो यहाॅ इस हालत में मौजूद हैं। डैड को तो ख़्वाब में भी ये उम्मीद नहीं है कि उनके साहबज़ादे किस जगह किस हाल में हैं इस वक्त?"

"तूने सच कहा मेरी बहन।" सूरज ने रुॅधे हुए गले के साथ बोला___"ये सब मेरे पापों का ही प्रतिफल है। मैने कभी इस बारे में नहीं सोचा था कि जो कुछ मैं कर रहा था उसका अंजाम ऐसा भी होगा। हमेशा वही करता था जिसे करने में कदाचित मुझे दुनियाॅ का सबसे बड़ा और ज्यादा आनंद आता था। ख़ैर, मुझे अपने इस अंजाम का दुख नहीं है रचना क्योंकि ये मैने खुद ही कमाया है। दुख तो इस बात का है कि मेरी वजह से आज तू भी यहाॅ आ गई है और मैं ये सोच कर ही अंदर से बुरी तरह भयभीत हुआ जा रहा हूॅ कि जाने तेरे साथ ये इंस्पेक्टरनी क्या करेगी?"

"ये कुछ नहीं करेगी भाई।" रचना ने सहसा पुनः तीखे भाव अख़्तियार कर लिए___"इसे पता नहीं है कि इसने किसके बच्चों पर हाॅथ डाला है? इसने अब तक जो कुछ भी आपके और मेरे साथ किया है उसका अंजाम इसे ज़रूर भुगतना पड़ेगा। इसे इस बात का ज़रा सा भी एहसास नहीं है कि इसके साथ क्या क्या होगा?"

"रस्सी जल गई पर बल नहीं गया अब तक।" रितू ने रचना के सिर के बालों को पकड़ कर झटका दिया__"मुझे पता है कि तू ये सब किसके दम पर बोल रही है। मगर तुझे पता ही नहीं है कि तू जिसके दम पर ये राग अलापे जा रही है वो खुद बहुत जल्द यहाॅ तेरे सामने हाज़िर होने वाला है। मैने तेरे बाप दिवाकर चौधरी और उसके उन सभी दोगले दोस्तों को वो वीडियोज़ भेज दिये हैं जिन वीडियोज़ पर उनकी काली करतूतों का सामान मौजूद है। कितनी मज़े की बात है कि एक बेटा अपने ही बाप की ऐसी अश्लील वीडियो बना कर रखे हुए था जो अगर किसी के हाॅथ लग जाएॅ तो वो बड़ी आसानी से इसके बाप को बीच चौराहे पर नंगा दौड़ा दे।"

रितू की ये बात सुन कर रचना तो चौंकी ही साथ ही साथ सूरज और उसके दोस्त भी बुरी तरह चौंक पड़े थे। पलक झपकते ही उनके चेहरों पर से रहा सहा रंग भी उड़ गया।

"कुछ समझ आया तुझे?" इधर रितू ने रचना के बालों को ज़ोर से खींचा___"सारे शहर को अपनी मुट्ठी में रखने वाला तेरा बाप और उसके दोस्त अब मेरी गुलामी करने पर मजबूर हैं। मैं अगर उसे कहूॅ कि टट्टी खा तो उसे खाना पड़ेगा। अब बता किसके दम पर इतना उछल रही है तू? जबकि मैने तो यहाॅ तक सोचा हुआ कि जिस दिन तेरा बाप और दोस्त यहाॅ आएॅगे तो उनके स्वागत में तुझे ही नंगी करके उनके सामने डाल दूॅगी। फिर देखूॅगी कि नंगी और गोरी चमड़ी को उस हालत में देख कर कैसे उनके खून में उबाल आता है?"

"नहींऽऽ।" रितू की बात को समझते ही तहखाने में रचना के साथ साथ सूरज और उसके दोस्तों का आर्तनाद गूॅज उठा, जबकि सूरज गिड़गिड़ाया___"प्लीज ऐसा मत करना इंस्पेक्टर। मैं तुम्हारे आगे हाॅथ जोड़ता हूॅ। हर चीज़ के अपराधी मैं और मेरा बाप है ये सच है मगर मेरो बहन बेकसूर है। उसे इस सबमें मत घसीटो प्लीज।"

"हाहाहाहाहा ई का?" सहसा वहीं पर खड़ा हरिया ज़ोर से हॅस पड़ा___"ई का बिटिया। ई सरवा ता एतने मा ही गला फाड़ै लाग। कउनव सच ही कहे रहा कि जब बात ससुरी अपने मा आवथै तबहिन समझ मा आवथै कि ओसे का मज़ा मिलथै? ई ससुरन के साथ ता इहै होय का चाही बिटिया। हम भी देखूॅगा कि ऊ सबसे ई लोगन केर का हाल होथै?"

"बिलकुल काका।" रितू ने कहा___"ये काम भी आपको ही करना है और कैसे करना है ये आप जानो।"
"अरे चिंता न करा बिटिया।" हरिया अंदर ही अंदर खुशी से झूमता हुआ बोल पड़ा___"ई काम ता हम बहुतै अच्छे से करूॅगा। कउनव शिकायत ना होई तोहरा के, ई तोहरे हरिया काका के वादा बा। ऊ ससुरे मंत्रीवा केर ओखे ई छोकरिया के साथ बहुतै अच्छे से ख़ातिरदारी करूॅगा हम।"

"शाबाश काका।" रितू मुस्कुराई___"मुझे आपसे यही उम्मीद है। मुझे पता है आप अपना काम बहुत अच्छे से करते हैं।"
"हाॅ ई ता हा बिटिया।" हरिया काका गर्व से अकड़ते हुए बोला___"हम आपन काम बहुतै अच्छे से करता हूॅ। कउनव परकार केर शिकायत का मौका नाहीं देता हूॅ। समय आवैं ता पहिले फेर तू देख लीहा। हम ई ससुरन के नानी केर नानी ना याद दिलाई ता कहना।"

"नहीं नहीं।" रचना तो भयभीत होकर चीखी ही किन्तु सूरज बुरी तरह भयभीत होकर रो पड़ा था___"ये सब मत करो इंस्पेक्टर। ये आदमी बहुत ज़ालिम है। प्लीज मेरी बहन के साथ कुछ भी ऐसा वैसा मत करो। जो कुछ करना है हमारे साथ करो।"

"और चीखो।" रितू बिजली की तरह सूरज के पास पहुॅची थी, गरजते हुए बोली___"और तड़पो। मगर कोई फायदा नहीं होगा। मैं तुम सबका वो हाल करूॅगी कि किसी भी जन्म में ये सब करने के बारे में सोचोगे भी नहीं और अगर सोचोगे भी तो कर नहीं पाओगे। क्योंकि नामर्द कुछ कर नहीं सकते और तुम सब हर जन्म में नामर्द ही पैदा होगे।"

"अगर ये बात है।" सहसा सूरज ने अजीब भाव से कहा___"तो मुझमें और तुममें क्या फर्क़ रह गया इंस्पेक्टर? हर अपराध की तो यकीनन सज़ा होती है मगर उस सज़ा में वो सब तो नहीं होता न जिस सज़ा को पाप कहा जाए या उसे अनैतिक करार दिया जाए? तुमने जो कुछ करने का सोचा हुआ है वो तो हर तरह से अनैतिक है, पाप है।"

"तुम्हारे मुख से अनैतिक व पाप पुन्य की ये बातें अच्छी नहीं लगती मिस्टर।" रितू ने कहा___"मुझे तुमसे ज्यादा इन चीज़ों का ज्ञान है। मुझे पता है कि मैं क्या करने जा रही हूॅ। तुम्हें इस बात से कोई फर्क़ नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि तुम तो अनैतिक व पाप कर्म करने के आदी हो। इस लिए बस खुली ऑखों से उस सबको देखने के लिए तैयार हो जाओ जो बहुत जल्द यहाॅ दिखने वाला है।"

"इस कुतिया के सामने मत गिड़गिड़ाओ भाई।" सहसा रचना बोल पड़ी___"ये खुद भी वैसा ही कर्म करने वाली लगती है, वरना ऐसी बातें इसके दिमाग़ आती ही नहीं। पुलिस वाली है न, इस लिए हर किसी के नीचे लेट जाती होगी। ऐसी नौकरी में होता ही यही है आहहहहह।"

"तोहरी माॅ को चोदूॅ छिनाल।" रचना की बात सुनते ही हरिया आग बबूला होकर उसको धर दबोचा था___"तोहरी ई हिम्मत की हमरी बिटिया के बारे मा अइसन कहथो। रुक अबहिन हम तोहरा का बताथैं कि कउन केखर सामने लेटत है?" हरिया ने सहसा रितू की तरफ देखा__"बिटिया तू जा इहाॅ से। हम एखर ई ज़बान बोलैं का अंजाम दिखावथैं।"

"नहीं प्लीज उसे छोंड़ दो।" रितू के कुछ कहने से पहले ही सूरज चीख पड़ा था___"उसकी तरफ से मैं माफ़ी माॅगता हूॅ। प्लीज इंस्पेक्टर इस आदमी को कहो कि मेरी बहन को कुछ न करे।"
"काका इसे बस थोड़ा सा डोज देना।" रितू ने सूरज की बात की तरफ ध्यान दिये बिना हरिया से कहा___"बाॅकी इसके साथ आग़ाज़ तो इसका बाप करेगा। आप समझ रहे हैं न मेरी बात?"

"हम सब समझ गया हूॅ बिटिया।" हरिया ने कहा__"अब तू जा इहाॅ से। हम ई ससुरी का बतावथैं कि तोहसे अइसन बोलैं का अंजाम का होथै?"
"मेरे साथ अगर कोई बद्दतमीजी की तो अंजाम अच्छा नहीं होगा तुम्हारे लिए।" रचना चीखी___"छोंड़ दो मुझे। वरना बहुत पछताओगे तुम सब।"

रितू ने उसकी तरफ हिकारत भरी दृष्टि से देखा और तहखाने के बाहर की तरफ चली गई। उसके इस तरह जाते ही सूरज गला फाड़ कर चिल्लाने लगा था। बार बार कह रहा था कि उसकी बहन को छोंड़ दो। मगर रितू न रुकी। जबकि रितू के जाते ही हरिया ने लपक कर तहखाने का दरवाजा अंदर से बंद किया और फिर वापस पलट कर सूरज की तरफ बढ़ा।

"का रे मादरचोद।" हरिया ने सूरज के पेट में एक लात जमाते हुए कहा___"काहे अइसन गला फाड़ रहा है? अब बता तोहरी ई राॅड बहन केर का खातिरदारी करूॅ हम? हमरा ता बहुतै मन करथै कि तोरी ई बहनिया केर मदमस्त जलानी केर मजा लूॅ मगर हमरी बिटिया ने ऊ सब केर इजाजत ना दिये रही। एसे अब हम तोरे साथै आपन ऊ पसंद वाला काम करूॅगा।"

"नहीं नहीं प्लीज काका।" हरिया की बात समझ कर सूरज बुरी तरह हिल गया, बोला___"वो सब मत करो। मैं अपनी बहन के सामने वो सब नहीं करना चाहता।"
"अबे बुड़बक।" हरिया ने सूरज के चेहरे पर अपनी हथेली फेरते हुए कहा___"हम ससुरे तोहरी इच्छा थोड़ी न पूछत हूॅ। हम ता अपनी पसंद केर बात करत हूॅ। अउर ऊ ता होबै करी बछुवा काहे से के ऊ हमरी ख्वाहिश केर बात हा। एसे चल अपना पिछवाड़ा खोल।"

सूरज नहीं नहीं करता ही रह गया मगर हरिया भला कहाॅ मानने वाला था। उसने सूरज की रस्सी को ऊपर से छोरा और मजबूती से पकड़ कर उसके कच्छे को एक हाॅथ से नीचे सरका दिया। रचना ये सब अपनी खुली ऑखों से देख रही थी। जैसे ही हरिया ने उसके भाई के कच्छे को नीचे किया वैसे ही उसे झटका लगा। आश्चर्य से उसकी ऑखें फटी रह गईं। फिर सहसा जैसे उसे होश आया उसने झट से अपनी ऑखें बंद कर ली। भला वो अपने भाई को नग्न हालत में कैसे देख सकती थी?

उधर हरिया ने सूरज को पकड़े ही उसे रचना के पास खींच कर लाया और उसके सामने लाकर रचना की तरफ देख कर बोला___"ई देख ससुरी हम तोहरे ई भाई के साथ का करथूॅ। हम चाहूॅ ता अबहिन दुई मिनट मा तोहरे भाई का ई दुई इन्च का लौड़ा तोहरी चूॅत मा पाल दूॅ मगर पेलूॅगा नाहीं। ऊ ता तोहरा बाप अपने लौड़ा से तोहरी चूत का पेलेगा। ई बखत ता हम तोहरे ई भाई की गाड पेलूॅगा। ई देख।"

हरिया की बातों ने रचना के होश उड़ा दिये थे। उसे पहली बार एहसास हुआ कि वो कितनी खतरनाक जगह पर आ गई है। यहाॅ पर उसकी उसके भाई की और उसके बाप की चलने वाली नहीं थी। ये सोच सोच कर ही वह थरथर काॅपे जा रही थी। उसने शख्ती से अपनी ऑखें बंद की हुई थी। उधर सूरज शर्म की इंतेहां की हद से गुज़र रहा था। आत्मग्लानी और अपमान में डूबा था वह। वह बुरी तरह हरिया से छूटने की मसक्कत कर रहा था। किन्तु छूट नहीं पा रहा था। उसमें अब इतनी ताकत भी न बची थी कि वो कोई ज़ोर आजमाइश कर सके।

हरिया ने मजबूती से पकड़ कर उसे आगे की तरफ झुका दिया और अपनी धोती को एक साइड कर अपने हलब्बी लौड़े को बाहर निकाल लिया। एक हाथ से अपने लौड़े को पकड़ कर उसने सूरज की गाड में निशाना लगा दिया। इसके साथ ही सूरज की हृदय विदारक चीख तहखाने में गूॅज गई। सूरज के लाख प्रयासों के बावजूद उसके हलक से चीख निकल गई थी और वो हो गया जिसे वह किसी सूरत में होने नहीं देना चाहता था। इधर अपने भाई की इतनी भयानक चीख सुनकर रचना बुरी तरह डर गई। उसने पट्ट से अपनी ऑखें खोल कर अपने भाई की तरफ देखा और ये देख कर तो उसकी ऑखें ही बाहर की तरफ उबल पड़ी कि उसके भाई की गाड में हरिया का मोटा तगड़ा लौड़ा जड़ तक घुसा पड़ा था। जबकि सामने की तरफ झुका हुआ उसका भाई झटके खा रहा था। उसकी ऑखों से ऑसू बह रहे थे। रचना को अपने भाई की इस दसा पर बड़ा अजीब सा लगा। उसकी अंतर्आत्मा तक काॅप गई थी ये भयावह मंज़र देख कर। उसे एकाएक ही एहसास हुआ कि उसके भाई की ये दसा उसकी वजह से ही हुई है। अगर उसने रितू को वो सब न कहा होता तो शायद ये सब न होता। उसे खुद पर बेहद गुस्सा आया। मगर अब क्या हो सकता था। अपने भाई को इस दीनहीन दसा में देख कर उसकी ऑखों से ऑसू बहने लगे।

उधर हरिया थोड़ी देर रुकने के बाद अपनी कमर को झटका देना शुरू कर दिया था। सहसा उसने अपने सिर को ज़रा सा घुमा कर रचना की तरफ देखा। रचना और हरिया की ऑखें आपस में टकरा गईं। रचना ने घबरा कर तुरंत ही अपनी ऑखें बंद कर अपने सिर को झुका लिया। ये देख कर हरिया मुस्कुरा उठा। उसके बाद तो जैसे तहखाने में हरिया के झटकों से निकलती थाप थाप की आवाज़ें और सूरज की घुटी घुटी सी गूॅजती रहीं। जहाॅ एक तरफ अपने दोस्त की इस दसा पर उसके तीनो दोस्त बेहद दुखी थे वहीं दूसरी तरफ रचना अपने भाई की इस दसा पर थरथर काॅपे जा रही थी।
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तहखाने से बाहर आकर रितू तेज़ तेज़ क़दमों के साथ अपने कमरे की तरफ बढ़ गई थी। कमरे में आते ही उसने आलमारी से अपना वो मोबाइल निकाला जिसे उसने अपने एक मुखबिर से खरिदवाया था। उस फोन को अपनी पाॅकेट में डाल कर उसने अपने आईफोन को स्विच ऑफ किया और उसे भी अपनी जेब में डाल लिया। उसके बाद उसने आलमारी से अपना सर्विस रिवाल्वर निकाल कर उसे चेक किया तत्पश्चात उसे भी अपनी जीन्स की बेल्ट में खोंस लिया। टाप के ऊपर उसने एक लेदर की जाकेट पहना और टेबल से जिप्सी की चाभी लेकर वह कमरे से बाहर निकल गई।

बाहर लान में एक तरफ खड़ी जिप्सी में बैठ कर उसने जिप्सी को स्टार्ट किया और मेन गेट से बाहर आ गई। इस बार उसकी जिप्सी का रुख पुल की तरफ न होकर उस तरफ था जिस तरफ फार्महाउस के बगल से एक अन्य रास्ता किसी दूसरी जगह की तरफ जाता था। रितू ने इस रास्ते को जानबूझ कर चुना था क्योंकि उसे पता था कि नहर पर बने पुल की तरफ वाले रास्ते पर आगे ख़तरा था। उसके बाप के आदमी कहीं भी उसे मिल सकते थे। हलाॅकि रितू को पता था कि उसके बाप को सीबीआई वाले ले गए थे। किन्तु फिर भी उसे ये तो एहसाह था ही कि उसके बाप के आदमी खुले घूम रहे हैं।

लगभग दस मिनट बाद रितू ने जिप्सी को एक ऐसी जग। पर रोंका जहाॅ पर एक पवन चक्की लगी थी। दाहिने तरफ दूर एक पहाड़ था जो कि गेरुए रंग का था। बाॅकी दूर दूर तक सुनसान इलाका पड़ा हुआ था। पवन चक्की से लगभग पचास गज की दूरी पर ही रितू ने मेन सड़क हे उतार कर जिप्सी को रोंका हुआ था। कुछ देर आस पास का जायजा लेने के बाद उसने अपने जीन्स की पाॅकेट से नये मोबाइल को निकाला और उसे स्विच ऑन किया। स्विच ऑन होते ही उसने उस पर कोई नंबर डायल कर उसने मोबाइल को कान से लगा लिया।

"क्या हाल चाल हैं तेरे मंत्री?" उधर से फोन उठाते ही रितू ने मर्दाना आवाज़ में कहा था।
"मेरे हाल की छोंड़।" उधर से मंत्री का लगभग तीखा स्वर उभरा__"तू अपने हाल की चिन्ता कर।"
"ओहो ऐसा क्या?" रितू ने नाटकीय अंदाज़ से कहा___"मेरे हाल का क्या होने वाला है भला?"

"चिंता मत कर।" उधर से मंत्री ने कहा___"बहुत जल्द तेरा हाल बेहाल करने वाला हूॅ मैं। मुझे पता चल गया है कि मेरे साथ ऐसा दुस्साहस करने वाला तू कौन है। इस लिए अब मैं तेरा वो अंजाम करूॅगा जो आज तक किसी ने ना तो सोचा होगा और ना ही सुना होगा।"

मंत्री दिवाकर चौधरी की इस बात से रितू बुरी तरह चौंकी। उसके मन में सवाल उभरा कि मंत्री को भला उसके बारे में कैसे पता चल गया? क्या कमिश्नर साहब ने उसे उसके बारे में बताया? नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। कमिश्नर साहब उसके बारे में उसको तो क्या बल्कि किसी को भी कुछ नहीं बता सकते। उन्हें पता है कि मंत्री इस प्रदेश के लिए कितना हानिहारक है। उन्होंने मंत्री के खिलाफ़ इस जंग को अंजाम तक पहुॅचाने का खुद हुक्म दिया था। फिर भला वो कैसे उसके बारे में उसे बता देंगे? नहीं नहीं ऐसा संभव नहीं है। तो फिर मंत्री को उसके बारे में कैसे पता चल गया? रितू का दिमाग़ तेज़ी से इधर उधर भाग दौड़ कर रहा था। मगर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। सहसा उसके मन में ख़याल आया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उसके ही पुलिस डिपार्टमेन्ट का कोई पुलिस वाला मंत्री को सब कुछ बताया हो। मगर ऐसा कैसे हो सकता है? क्योंकि ये केस बहुत ही गोपनीय था। इसके बारे में कमिश्नर के सिवा किसी को कुछ पता नहीं था। सहसा रितू को उन पुलिस वालों की याद आई जिन्हें उसने सूरज के फार्महाउस में सूरज से लड़ाई करने के बाद सस्पेण्ड किया था। रितू की लगा कि यकीनन उन्हीं ने मंत्री को सब कुछ बताया होगा। क्योंकि उन्हें तो पता ही था कि उसने सूरज और उसके दोस्तों से फार्महाउस पर लड़ाई की थी और उन चारों को अधमरा कर दिया था। रितू को यकीन हो गया कि उन पुलिस वालों ने ही मंत्री को सब कुछ बताया है और अब मंत्री उसके लिए काल बन कर अपना क़हर बरसाने वाला है।

"क्या हुआ चौहान के बच्चे?" रितू को इतनी देर से ख़ामोश जान कर उधर से मंत्री ने चहकते हुए कहा___"हवा निकल गई क्या तेरी?"

मंत्री का ये वाक्य सुन कर रितू के ज़हन में जैसे विष्फोट सा हुआ। सारा मामला पल भर में उसकी समझ में आ गया। उसे समझ में आ गया कि मंत्री ने उस रेप पीड़िता लड़की यानी विधी के चलते ये पता लगाया है। उसने पता किया होगा कि उसके बच्चों ने जिस लड़की के साथ रेप को अंजाम दिया था वो लड़की विधी थी जो उसके ही बच्चों के काॅलेज में पढ़ती थी। मंत्री ने अपनी तरफ से छानबीन की होगी कि इस मामले में पुलिस ने तो अपना हाॅथ नहीं डाला और ना ही कोई केस वगैरह हुआ। मगर लड़की के साथ जो कुछ हुआ उसे उसके घर वाले सहन नहीं कर सके। इस लिए संभव है कि लड़की के बाप ने अपनी बेटी के साथ हुए इस अत्याचार का बदला लेने के लिए ये सब किया है। रितू ने स्वीकार किया कि मंत्री का सोचना एकदम जायज़ है। क्योंकि उसके साथ ये सब करने की वजह सिर्फ और सिर्फ विधी के बाप के पास ही थी और अब वह इस मामले को जान कर विधी के घर वालों के ऊपर क़हर बन कर टूटने वाला है।

रितू ने राहत की साॅस तो ली किन्तु उसे अब विधी के माॅ बाप की चिंता सताने लगी थी। वो जानती थी कि इस केस से विधी के घर वालों का कोई लेना देना नहीं है। वो बेचारे तो बेक़सूर हैं। रितू विधी के पैरेन्ट्स के लिए फिक्रमंद हो उठी थी। मगर फिर जैसे उसे ख़याल आया कि उसे इतना चिंता करने की क्या ज़रूरत है? उसके पास तो मंत्री और उसके साथियों के खिलाफ़ सबूत के रूप में ऐसा डायनामाइट है जो अगर पब्लिक के सामने आ जाए तो मंत्री और उसके साथी एक ही पल में उस डायनामाइट के विष्फोट से तहस नहस हो जाएॅगे। इस ख़याल के आते ही रितू के खूबसूरत होठों पर मुस्कान फैल गई। जबकि,

"लगता है तेरे सभी देवता कूच कर गए हैं चौहान।" उधर से मंत्री का ठहाका गूॅजा___"तुझे समझ आ गया होगा कि अब तेरे साथ क्या होने वाला है। मगर चिंता मत कर। मैं तुझे एक सुनहरा मौका देता हूॅ। सुना है कि तेरी बीवी बहुत सुंदर है, बिलकुल वैसी ही जैसी तेरी वो बेटी थी जिसे हमारे बच्चों ने रगड़ रगड़ कर पेला था। हो भी क्यों न, आख़िर खूबसूरत माॅ की कार्बन काॅपी जो थी। ख़ैर, मैं ये कह रहा हूॅ कि अगर तुझे अपनी और अपने परिवार की ज़रा सी भी फिक्र है तो तू अपनी उस खूबसूरत बीवी को हमारे हरम में ले आ। अगर तेरी बीवी ने मुझे और मेरे सभी साथियों को खुश कर दिया तो सोचूॅगा कि तुझे तेरी इस हिमाक़त के लिए माफ़ कर दूॅ।"

"ज्यादा उड़ मत रंडी की औलाद।" रितू ने मर्दाना आवाज़ में गरजते हुए कहा___"तूने अगर मेरे बारे में ऐसा वैसा सोचने की कोशिश की तो सोच लेना कि तेरी बेटी मेरे कब्जे में ही है। उसके साथ मैं क्या क्या करूॅगा ये तू सोच भी नहीं सकता। मुझे अपनी ज़रा सी भी परवाह नहीं है क्योंकि मैं छोटा आदमी हूॅ और बेटी के मरने के बाद वैसे भी अब मुझमें जीने की कोई ख्वाहिश नहीं है। मगर तेरा क्या होगा नाली के कीड़े? तू तो इस प्रदेश की नाॅक और कान है न। तेरे वो रंगीन वीडियो अभी भी मेरे पास हैं। मैं चाहूॅ तो इसी वक्त उन्हें सोसल मीडिया पर डाल कर तेरी और तेरी इज्ज़त की धज्जियाॅ उड़ा दूॅ। उसके बाद तेरे पीछे प्रदेश की जनता और पुलिस इस तरह कुत्तों की तरह दौड़ पड़ेगी कि साले तुझे कहीं पर छुपने की जगह भी न मिलेगी।"

रितू की इन खतरनाक बातों से उधर सन्नाटा सा छा गया। ऐसा लगा जैसे मंत्री को साॅप सूॅघ गया हो। सच ही तो था। उसे कदाचित इस बात का ध्यान ही नहीं रह गया था कि उसके सबसे बड़े रक़ीब के पास उसके खिलाफ़ कितना बड़ा डायनामाइट मौजूद है।

"अब बोलता क्यों नहीं हरामज़ादे?" रितू ने पुनः दहाड़ते हुए कहा___"तेरी अम्मा मर गई क्या? एक बात कान खोल कर सुन ले। तू ये मत समझना कि मैं यहाॅ पर अकेला हूॅ और तेरे आदमी मुझे पल भर में हजम कर जाएॅगे। इतना कमज़ोर भी नहीं हूॅ मैं। मुझे तेरे क्रिया कलाप की पल पल की ख़बर है और मैने अपने चारो तरफ गुप्त रूप से ऐसे आदमी लगा रखे हैं जो मुझे सुरक्षा भी प्रदान करते हैं और ये भी बताते हैं कि तेरा अगला क़दम क्या होने वाला है। इस लिए तू कुछ भी करने या सोचने से पहले ये ज़रूर सोच लेना कि तेरी कोई भी छोटी बड़ी हरकत तेरा वो अंजाम कर देगी जिसके बारे में अभी मैने तुझे बताया था। तेरी बेटी और वो चारो लड़के मेरे कब्जे में हैं और मैं चाहूॅ तो तेरी बेटी के साथ तेरे ही बच्चों की वैसी वीडियो क्लिप बना कर तुझे भेज दूॅ जैसी वीडियो तेरे पास मैं पहले भी भेज चुका हूॅ। यकीन न हो तो बोल, मुझे तेरी बेटी की हाॅट वीडियो बनाने में ज़रा भी वक्त नहीं लगेगा।"

"नहीं नहीं प्लीज ऐसा ग़ज़ब मत करना।" उधर से मंत्री का गिड़गिड़ाहट से भरा स्वर उभरा___"मैं तुम्हारे आगे हाॅथ जोड़ता हूॅ। मुझसे ग़लती हो गई जो मैने तुम्हें वो सब कहा। मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूॅगा जिससे मुझे खुद ही गर्त में डूब जाना पड़े। मगर,,,,

"अटक क्यों गया हिजड़े?" रितू गुर्राई___"बोल न, मगर क्या?"
"मगर मैं ये जानना चाहता हूॅ।" मंत्री ने कहा___"कि ये सब कब तक चलेगा? मेरा मतलब है कि तुम्हें जो चाहिए वो मैं बिना सोचे समझे देने को तैयार हूॅ। मगर तुम मेरे बच्चों को कुछ भी नहीं करोगे।"

"तू मेरे सामने कोई कंडीशन रखने की पोजीशन में कहाॅ है कुत्ते?" रितू ने कहा___"और तू भला मुझे देगा क्या? तेरी औकात क्या है मुझे कुछ देने की? तू तो साले खुद ही भिखारी है। हर पाॅच साल में भिखारी की तरह जनता के सामने हाॅथ फैलाए पहुॅच जाता है। ये अलग बात है कि जनता की भीख का तू गंदे तरीके से फल देता है। उसी का अंजाम तो भुगतना है तुझे। इस प्रदेश से तेरे जैसे लोगों की सल्तनत ही नहीं बल्कि नामो निशान तक मिटाने का सोच लिया है मैने। और हाॅ, किसी भी तरह की रियायत की उम्मीद मत करना। क्योंकि वो तेरे जैसों के लिए मेरी अदालत में है ही नहीं।"

"मैं मानता हूॅ कि मेरे बच्चों ने तुम्हारी बेटी के साथ बहुत बुरा सुलूक किया था।" उधर से मंत्री का धीर गंभीर स्वर उभरा___"और ये भी मानता हूॅ कि मैने अपने कार्यकाल में प्रदेश की जनता के साथ बहुत बुरा किया है। मगर जो गुज़र गया उसे तो लौटाया नहीं जा सकता न? हाॅ इतना वचन ज़रूर देता हूॅ कि आइंदा से प्रदेश की जनता के साथ कुछ भी बुरा नहीं करूॅगा बल्कि हर दम हर पल अच्छा करने की कोशिश करेगा। मैने जिसका जो भी बुरा किया है उसका नुकसान मैं दोगुने भाव से भरूॅगा।"

"तू क्या भरेगा दोगले इंसान।" रितू ने फटकार सी लगाते हुए कहा___"तू तो सिर्फ जनता का खून चूसना जानता है। आज ये सब इस लिए बक रहा है क्योंकि मैने तेरे पिछवाड़े में डंडा घुसाया हुआ है। वरना तू अपनी वही औकात दिखाता जो हमेशा से सबको दिखाता आया है। मैं तेरी किसी भी बातों पर आने वाला नहीं हूॅ। तेरा और तेरे साथियों का अंजाम मेरे द्वारा लिखा जा चुका है चौधरी। इस लिए मुझसे रहम की भीख मत माॅग। बल्कि मरने से पहले अगर कुछ अच्छा करना चाहता है तो उन मजलूम लोगों के कुछ कर जिनका तूने खाया है और जिन पर तूने अत्याचार किया है। संभव है कि तेरे ऐसा करने पर मैं तेरे अंजाम को बदतर न होने की सूरत पर विचार करूॅ।"

"मैं करूॅगा चौहान।" उधर से मंत्री के स्वर में राहत के भावों की झलक दिखी___"ज़रूर करूॅगा मैं। मैं हर उस ब्यक्ति का भला करूॅगा जो मेरे द्वारा किसी भी तरह से सताया गया है और ये काम मैं आज से ही नहीं बल्कि अभी से करना शुरू कर दूॅगा। बस तुम मेरे बच्चों के साथ कुछ बुरा मत करना।"

"पहले जो कह रहा है उसे करके तो दिखा चौधरी।" रितू ने कहा___"अगर मुझे नज़र आया कि तेरी वजह से प्रदेश की समूल जनता खुश हो गई है तो यकीन मान तेरे अंजाम की स्थित में ज़रूर कुछ कमी कर दूॅगा।"
"ओह बहुत बहुत शुक्रिया चौहान।" मंत्री ने खुश होकर कहा___"मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूॅ कि बहुत जल्द तुम प्रदेश की इस जनता को मेरी वजह हे खुश होते हुए देखोगे।"
"ओके बेस्ट ऑफ लक।" रितू ने कहा और काल कट कर दी।

मंत्री दिवाकर चौधरी से बात करने के तुरंत बाद ही रितू ने उस मोबाइल फोन को स्विच ऑफ कर दिया था। इस वक्त उसके चेहरे पर असीम राहत के भाव थे। राहत के भाव इस लिए कि उसने विधी के माॅ बाप को चौधरी के क़हर से किसी तरह बचा लिया था। मगर उसे पता था कि चौधरी बहुत ही दोगला इंसान है। संभव है कि उसने उसे झूॅठा आश्वासन दिया हो। जबकि वो करे वही जो उसने उससे शुरू में कहा था। अतः रितू का अब पहला काम यही था कि किसी तरह से विधी के माॅ बाप को मंत्री के क़हर से सुरक्षित करे। मगर समस्या ये थी कि कैसे? क्योंकि विधी का गाॅव हल्दीपुर के बाद पड़ता था। जिसका रास्ता दो तरफ से था। एक हल्दीपुर से तो दूसरा नहर के पास से जो दूसरा रास्ता गया था। ये दोनो रास्ते ऐसे थे जिन पर मौजूदा हालात में जाना ख़तरे से खाली नहीं था। क्योंकि रितू को पता था कि उसका बाप भले ही इस वक्त सीबीआई के सिकंजे में था मगर उसके साथी और उसके आदमी तो आज़ाद ही थे जो हर तरफ फैले हुए होंगे।

रितू के लिए आज बस का दिन और रात किसी तरह गुज़ारनी थी। कल तो उसका भाई विराज आ ही जाएगा। हलाॅकि वो चाहती तो पुलिस प्रोटेक्शन ले सकती थी और धड़ल्ले से कहीं भी आ जा सकती थी किन्तु वह अपने प्यारे भाई राज की बात को टालना नहीं चाहती थी। उसने भी तो वादा किया था उससे कि वो ये जंग उसके साथ ही मिल कर लड़ेगी। मगर अब चूॅकि विधी के माॅ बाप की सुरक्षा का सवाल था तो उसे कुछ तो करना ही था। इस लिए अब वो यही सोच रही थी कि विधी के माॅ बाप को किस तरह से सुरक्षित करे?

पवन चक्की के पास जिप्सी में बैठी रितू कुछ देर तक इस समस्या के बारे में सोचती रही। उसके बाद उसने इस सबको अपने दिमाग़ से झटका और जिप्सी को स्टार्ट कर वापसी के लिए मुड़ गई।
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उधर हवेली में!
सुबह से दोपहर और दोपहर से अब शाम होने वाली थी। प्रतिमा अपने कमरे में बेड पर पड़ी हुई थी। सारा दिन उसने इसी सोच विचार में गुज़ार दिया था कि वो अपने बाप से कैसे बात करे? हलाॅकि इस बीच उसने मुम्बई में अपनी बड़ी बहन से फोन पर अपने बाप जगमोहन सिंह का मोबाइल नंबर ले लिया था। उसकी बहन इस बात से हैरान भी हुई थी। उसके पूछने पर प्रतिमा ने उसे सारी बातें बता दी थी कुछ बातों को छोंड़ कर। किन्तु अपने बाप का मोबाइल नंबर लेने के बाद भी प्रतिमा की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो अपने पिता को फोन लगाए।

उसकी इस हालत से शिवा भी परेशान था। उसने उन आदमियों का गेस्ट हाउस में रहने का इंतजाम भी कर दिया था। चिंतित व परेशान तो वो खुद भी था अपने बाप के लिए मगर उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो खुद ऐसा क्या करे जिससे सारी समस्याएॅ खत्म हो जाएॅ।

इस वक्त भी वो अपनी माॅ के कमरे में ही आया हुआ था और कमरे में ही एक तरफ रखे सोफे पर बैठा हुआ था। उसकी नज़रें अपनी माॅ के मुरझाए हुए चेहरे पर केन्द्रित थीं। उसे इस बात से तक़लीफ भी हो रही थी कि वो कुछ कर नहीं पा रहा था। उसे आज समझ आ रहा था कि खुद कोई काम करना कितना मुश्किल होता है। आज तक तो वह बनी बनाई जलेबी ही खा रहा था। मगर जब खुद ही जलेबी बनाने का नंबर आया तो उसका दिलो दिमाग़ जैसे कुंद सा पड़ गया था। उसे पहली बार लगा कि बेबसी क्या होती है? सब कुछ होते हुए भी कुछ न कर पाना किसे कहते हैं?

"ऐसे कब तक हताश बैठी रहेंगी माॅम?" फिर उसने प्रतिमा को देखते हुए ही कहा___"ये तो आपको भी पता है कि हम अगर कुछ करना भी चाहें तो नहीं कर सकते। इस लिए अगर नाना जी के द्वारा हमारी समस्या का समाधान हो सकता है तो क्यों नहीं बात करती आप उनसे? दोपहर से देख रहा हूॅ मैं आपको। आप इसी तरह गहरी सोच में डूबी बैठी हुई हैं। इस तरह भला कब तक बैठी रहेंगी आप? आप जानती हैं कि डैड को सीबीआई के चंगुल से निकालना कितना ज़रूरी है। डैड के बिजनेस से संबंधित साथियों ने अपने आदमी हमारी मदद के लिए भेज दिये हैं। अब उनको हम यूॅ ही तो चुपचाप यहाॅ नहीं बैठाए रह सकते न? इस लिए माॅम आप अपने दिमाग़ से सारी बातों को निकालिए और नाना जी को फोन लगा कर उनसे बात कीजिए।"

"कैसे फोन लगा दूॅ बेटा?" प्रतिमा ने सहसा हताश भाव से कहा___"और किस मुह से फोन लगाऊॅ अपने बाप को?"
"क्या मतलब माॅम??" शिवा चकराया।
"तुम इस सब को जितना आसान समझते हो न वो इतना आसान नहीं है बेटा।" प्रतिमा ने कहा___"ज़रा सोचो कि अपने बाप से संबंध तोड़े मुझे कितने साल हो गए। अपनी खुशी व अपने स्वार्थ के लिए मैने अपने उस पिता को त्याग दिया था जिनका इस दुनियाॅ में हम दोनो बहनों के सिवा दूसरा और कोई नहीं था। मैं ही सबसे ज्यादा अपने पिता की लाडली थी और मैने ही उन्हें सबसे ज्यादा दुख दिया और निराश भी किया। आज मुझे इस बात का बखूबी एहसास है बेटा कि अपनी औलाद की बेरुखी के चलते एक बाप ने आज तक कितनी तक़लीफ़ और कितना दुख सहा होगा। ये सवाल तो उठेगा ही बेटा कि इसके पहले मुझे अपने बाप की याद क्यों नहीं आई? इसके पहले मैने क्यों ये जानना भी ज़रूरी नहीं समझा कि जगमोहन सिंह नाम का कोई ब्यक्ति जो कि मेरा बाप है वो ज़िंदा भी है या कि मर गया है? आज अगर मुझ पर ये मुसीबत न आती तो ज़ाहिर है कि आइंदा भी मैं अपने बाप से बात करने के बारे में सोचती भी नहीं। ये ऐसी बात है बेटा जिसकी वजह से मेरी हिम्मत नहीं पड़ रही कि मैं अपने बाप को फोन लगा कर उससे बात कर सकूॅ। जबकि इस बात का मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरी समस्या के बारे में जानकर मेरा बाप मेरी मदद करने से हर्गिज़ भी इंकार नहीं करेगा।"

"ये सच है माॅम कि आपने अपने पिता जी से बात न करके अब तक बहुत बड़ी भूल ही की है।" शिवा ने गंभीरता से कहा___"मगर ये भी सच है कि इस बारे में सोचते रहने से भी क्या होगा? वो सब अपनी जगह से गायब तो नहीं हो जाएगा। भूल इंसान से ही होती है, आपसे भी हुई है। भले ही आपकी वो भूल माफ़ी के लायक हो या ना हो। मगर किसी भी भूल या अपराध के चलते यूॅ चुप तो नहीं बैठे रहा जा सकता। उसके लिए सबसे पहले अपने अपराधों के लिए नाना जी से माफ़ी माॅगनी होगी आपको। वो जो भी इसके लिए सज़ा दें उसे आपको स्वीकार करना ही पड़ेगा। हलाॅकि मुझे ऐसा लगता है कि नाना जी आपको कोई सज़ा देंगे ही नहीं। मगर औपचारिकता तो करनी ही पड़ेगी आपको। उन्हें भी इस बात का बोध होगा कि चलो मुसीबत में ही सही किन्तु उनकी बेटी को उनका ख़याल तो आया। बस, उसके बाद तो सब कुछ आसान ही हो जाना है माॅम। इस लिए मैं तो यही कहूॅगा कि आप ये सब सोचना छोंड़िये और नाना जी को हिम्मत बाॅध कर फोन लगाइये।"

प्रतिमा अपने बेटे शिवा की इस सूझ बूझ भरी बातें सुन कर चकित रह गई थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका बेटा ऐसी समझदारी भरी बातें भी कर सकता है। मगर चूॅकि शिवा की बातें न्यायपूर्ण व तर्कसंगत थी इस लिए उसे भी इस बात का एहसास हुआ कि इस तरह सोचते रहने से भला क्या होगा? आख़िर बिना फोन किये अथवा बिना बात किये किसी भी समस्या का समाधान तो होने वाला नहीं है। उसके लिए शारीरिक और मानसिक कर्म तो करना ही पड़ेगा।

"तुमने बिलकुल ठीक कहा बेटे।" फिर प्रतिमा ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"जो हो गया और जो कुछ मैने किया है उसका सामना तो मुझे करना ही पड़ेगा। अतः मैं अब ज़रूर अपने पिता जी को फोन लगाऊॅगी। उनसे अपने किये की माफ़ी भी मागूॅगी। उनसे कहूॅगी कि अपनी बेटी की इस संगीन भूल को हो सके तो माफ कर दें और अपनी कृपा मुझ पर बरसा दें।"

"ये हुई न बात।" शिवा ने सहसा मुस्कुरा कर कहा__"मुझे यकीन है माॅम कि नाना जी आपको कुछ नहीं कहेंगे। दुख तो होगा उन्हें मगर उससे भी ज्यादा खुशी भी होगी उन्हें कि उनकी लाडली बेटी ने आख़िर उन्हें याद करके फोन तो किया।"

"तेरे मुह में घी शक्कर हो बेटा।" प्रतिमा ने प्रसन्नतापूर्ण भाव से कहा___"ईश्वर करे तू जैसा कह रहा है वैसा ही हो।"
"ऐसा ही होगा माॅम।" शिवा ने जोशीले अंदाज़ के साथ कहा___"आप बिलकुल भी इस सबकी चिंता न करें। बस मोबाइल निकालिये और लगा दीजिए नाना जी को फोन।"

प्रतिमा ने अपने बेटे के उस चेहरे को कुछ देर तक देखा जो इस वक्त हज़ार हज़ार वाॅट के बल्बों की तरह रोशन था। फिर बेड के सिरहाने पर ही रखे अपने मोबाइल को एक हाथ से उठाया और अपने पिता का नंबर ढूॅढ़ कर काॅपते हाॅथों से उसे डायल कर दिया। काल लगाते ही प्रतिमा के हृदय की गति असाधारण रूप से तेज़ हो गई। दिलो दिमाग़ में एक अजीब सा एहसास मानो ताण्डव सा करने लगा। मन में एक अंजाना सा भय अपने पाॅव पसारने लगा। उधर काल लगाते ही रिंग जाने की आवाज़ प्रतिमा के कानों में सुनाई देने लगी। उसकी नज़र जब शिवा पर पड़ी तो शिवा को मोबाइल का स्पीकर ऑन करने का इशारा करते हुए पाया। प्रतिमा ने हड़बड़ा कर जल्दी से मोबाइल का स्पीकर ऑन कर दिया। तभी,,,,

"यस जगमोहन सिंह स्पीकिंग हियर।" उधर से बहुत ही खुर्राटदार आवाज़ उभरी। प्रतिमा को उस आवाज़ से ही ऐसा लगा जैसे उसकी हवा शंट हो गई हो। प्रत्युत्तर में उसके मुख से कोई लफ्ज़ न फूट सका। जबकि,

"हैलो हू इज देयर?" जगमोहन की आवाज़ पुनः उभरी।
"पि..पिता...जी।" प्रतिमा ने बहुत हिम्मत करके आख़िर टूटे हुए शब्दों से कह ही दिया___"म..मैं आ..आपकी बेटी प्रतिमा बोल..रही हूॅ।"

प्रतिमा की इस बात से उस तरफ सन्नाटा सा छा गया। जबकि उधर के छा गए इस सन्नाटे ने प्रतिमा की हृदय गति को मानो रोंक सा दिया। उसके मनो मस्तिष्क में तरह तरह की आशंकाएॅ पल भर में उत्पन्न हो गईं।

"आ..आपने..सुना पिता जी??" प्रतिमा ने उस तरफ की ख़ामोशी से भयभीत होकर पुनः लरज़ते हुए स्वर में कहा___"मैं..आपकी बेटी प्रतिमा बोल रही हूॅ।"
"हाॅ सुन तो लिया है मैने।" उधर से जगमोहन का अजीब सा अंदाज़ झलका___"मगर सोच रहा हूॅ कि ऐसा कैसे हो सकता है और क्यों हो सकता है?"

"ज जी मैं कुछ समझी नहीं पिता जी।" प्रतिमा का मनो मस्तिष्क जैसे चकरा सा गया।
"समझने की ज़रूरत भी क्या है तुम्हें?" उधर से जगमोहन के लहजे में एकाएक ही जैसे शिकायत और नाराज़गी के भाव एक साथ घुल मिल गए थे___"जब समझने का वक्त था तो तुमने उस वक्त बेहतर तरीके समझ तो लिया ही था। अब और कुछ समझने की भला तुम्हें क्या ज़रूरत पड़ गई?"

"मु मुझे माफ़ कर दीजिए पिता जी।" प्रतिमा की ऑखों से सहसा ऑसू छलक पड़े, उसकी आवाज़ एकदम से भारी हो गई, बोली___"मैने आपका बहुत दिल दुखाया है। जबकि मुझे पता है कि बचपन से लेकर युवा अवस्था तक आपने मेरी हर इच्छा को ऑख बंद करके पूरी की थी। बदले में मैने आपको दुख तक़लीफ़ और रुसवाई के सिवा कुछ भी नहीं दिया।"

"अरे ये क्या???" जगमोहन का ऐसा स्वर उभरा जैसे उसे प्रतिमा की इस बात पर ज़रा भी यकीन न आया हो। अतः बोला___"ये मैं क्या सुन रहा हूॅ भई? आज मेरी बेटी के मुख से इस लहजे में ऐसी बातें निकल रही हैं जिन बातों का मेरी बेटी के मुख से निकलने का कोई सवाल ही पैदा नहीं हो सकता था। सबसे पहले मुझे ये बता कि तेरी तबीयत तो ठीक है न?"

प्रतिमा कुछ बोल न सकी। अपने पिता की इन बातों में चुपे तंज को समझ कर उसकी रुलाई फूट गई। उसे अपने पिता की इन तंजपूर्ण बातों का ज़रा भी बुरा नहीं लगा था। बल्कि रुलाई तो उसकी इस बात पर फूटी थी आज उसका वही बाप उससे इस लहजे में बात कर रहा था जो बाप इसके पहले उससे सिर्फ प्यार से बातें करता था। बिना माॅ की थी दोनों बहनें। मगर उस बाप नें माॅ बनकर भी अपनी बेटियों की परवरिश की थी। उसने दूसरी शादी नहीं की, बल्कि पना सम्पूर्ण जीवन और अपनी सम्पूर्ण खुशियाॅ अपनी बेटियों पर कुर्बान कर दिया था। जगमोहन अपनी दोनो बेटियों को जी जान से चाहता था मगर उसकी जान तो जैसे उसकी छोटी बेटी प्रतिमा पर बसती थी। इसका कारण ये था कि प्रतिमा बिलकुल अपनी माॅ पर गई थी। मगर प्रतिमा पर जिसकी जान बसती थी आज वही बाप अपनी बेटी से तंजपूर्ण बातें कर रहा था। प्रतिमा को इस बात का एहसास था कि उसके बाप का ये तंज दरअसल उसके अंदर छुपे दर्द रूपी गुबार का महज एक मामूली सा हिस्सा है।

"ये क्या बेटा?" उधर से जगमोहन का स्वर एकदम से भारी सा हो गया___"अपने बाप के अंदर छिपे दर्द रूपी इस गुबार को क्या ज़रा सा भी नहीं निकलने देना चाहती तू? इसे निकल जाने देती तो कदाचित दिल का दर्द कुछ कम हो जाता। मगर ख़ैर, जाने दे। मैं तो ख्वाब में भी तुझे रुलाने का सोच नहीं सकता, ये तो फिर भी हक़ीक़त है।"

प्रतिमा का हृदय बुरी तरह काॅप कर रह गया। वो ये सोच कर बुरी तरह फफक फफक कर रो पड़ी कि उसके बाप का दिल कितना विसाल है। अपने अंदर छुपे असहनीय दर्द के बावजूद वह अपनी बेटी को रुलाना नहीं चाहता। बाप की इस महानता ने प्रतिमा को इतना छोटा और मामूली बना कर रख दिया कि उसे अपने आप से एकाएक घृणा सी होने लगी। उसकी ऑखों के सामने पल भर में वो सारे मंज़र घूम गए जो अब तक उसने किया था और उस मंज़र को देखते ही प्रतिमा को लगा जैसे दुनियाॅ में उससे बड़ा कोई पापी नहीं है। प्रतिमा का जी चाहा कि ये ज़मीन फटे और वो उसमें पाताल तक समाती चली जाए। मगर हाए रे किस्मय! ऐसा भी नहीं हो सकता था। उसके दिल में भावनाओं और जज़्बातों का इतना भयंकर ज्वारभाॅटा मचल उठा कि उसे लगा कि कहीं उसका दिल उसका सीना फाड़ कर बाहर न उछल पड़े। अगले ही पल उसे ज़ोर का चक्कर आया और वह बेड पर एक तरफ गिर गई।

"माॅऽऽऽम।" शिवा जो एकटक प्रतिमा को ही देख रहा था वो अपनी माॅ को इस तरह चक्कर खा कर गिरते देख बुरी तरह चीखते हुए सोफे से उठ कर प्रतिमा की तरफ लपका था, बदहवाश सा प्रतिमा के चेहरे को थपथपाते हुए बोला___"क्या हुआ माॅम? आप ठीक तो हैं न? प्लीज बताइये न माॅम...क्या हो गया आपको? प पानी..पानी स सविता ऑटी...कहाॅ हैं आप? प्लीज जल्दी से पानी लाइये। डाॅक्टर को बुलाईये।"

शिवा बुरी तरह घबरा गया था और उसी घबराहट में चीखे जा रहा था। वहीं बेड पर ही पड़े प्रतिमा के मोबाइल से भी जगमोहन की घबराई हुई आवाज़ गूॅज रही थी। वो उधर से पूछे जा रहा था___"क्या हुआ बेटी? तू ठीक तो है न? तू चिंता मत कर मेरी बेटी। मैं तुझसे ज़रा सा भी नाराज़ या गुस्सा नहीं हूॅ। अरे तू तो मेरी लाडली बेटी है न।"

उधर शिवा के चिल्लाने का असर जल्द ही हुआ था। सविता जो कि नौकरानी थी वो तुरंत ही हाॅथ में पानी का ग्लास लिए भागते हुए आई। वो खुद भी बुरी तरह घबराई हुई लग रही थी।

"शिवा बेटे क्या हुआ है मालकिन को?" सविता ने पानी का ख्लास शिवा को पकड़ाते हुए बोली थी।
"पता नहीं ऑटी।" शिवा ने दुखी भाव से कहा___"माॅम तो नाना जी से फोन पर बातें कर रही थी। फिर जाने क्या हुआ इन्हें कि चक्कर खा कर बेड पर गिर गई हैं। आप प्लीज जल्दी से डाक्टर को फोन कीजिए और उनसे कहिए कि वो दो मिनट के भीतर यहाॅ आ जाएॅ।"

"ठीह है बेटा।" सविता ने कहा___"मैं अभी डाक्टर साहब को फोन लगाती हूॅ।" ये कह कर सविता वहाॅ से चली गई। जबकि इधर कमरे में मोबाइल में से गूॅजती जगमोहन की आवाज़ पर सहसा शिवा का ध्यान गया। उसने लपक कर मोबाइल उठा लिया।

"नाना जी मैं शिवा बोल रहा हूॅ।" फिर शिवा ने सीघ्रता से कहा___"देखिए न माॅम को क्या हो गया है? कुछ बोल ही नहीं रही हैं। ऐसा क्या कह दिया है आपने जिसकी वजह से मेरी माॅम की ये हालत हो गई है?"
"ब बेटा मैने तो ऐसा वैसा कुछ नहीं कहा था।" उधर से जगमोहन का भारी स्वर उभरा___"मगर तुम चिंता मत करना बेटे। तुम्हारी माॅ को बस चक्कर आया हुआ है और कुछ नहीं। डाक्टर आएगा वो अच्छे से चेकअप कर लेगा। तुम मुझे बताओ कि कहाॅ से बोल रहे हो? मैं सारे काम धाम छोंड़ कर अभी यहाॅ से तुम लोगों के पास आ रहा हूॅ।"

"नाना जी मैं जिला गुनगुन के हल्दीपुर गाॅव से बोल रहा हूॅ।" शिवा ने मन ही मन खुश होते हुए कहा था___"आप जब यहाॅ पहुॅचेंगे तो किसी से भी पूछ लीजिएगा कि ठाकुर साहब की हवेली जाना है। बस कोई न कोई आपको हवेली तक छोंड़ने ज़रूर आ जाएगा आपके साथ।"
"ओह ठीक है बेटा।" उधर से जगमोहन ने कहा___"बस तुम अपनी माॅ का अच्छे से ख़याल रखना। मैं कल तक तुम्हारे पास हर हालत में पहुॅच जाऊॅगा।"

इसके साथ ही उधर से जगमोहन ने काल को कट कर दिया। जबकि शिवा के होठों पर मुस्कान उभर आई। उसने पलट कर प्रतिमा को देखा और ग्लास में भरे पानी को अपनी हथेली में लेकर प्रतिमा के चेहरे पर छिड़कना शुरू कर दिया। कुछ ही देर में प्रतिमा को होश आ गया। उसने पलकों को लपलपाते हुए अपनी ऑखें खोल दी। शिवा ने उसे बेड पर अच्छे से लिटाया और बेड के किनारे पर ही बैठ गये।

"पि पिता जी।" होश में आते ही प्रतिमा दुखी भाव से कह उठी थी।
"डोन्ट वरी माॅम।" शिवा ने प्रतिमा के हाथ को पकड़ कर हल्का सा दबाया___"इवरीथिंग इज अब्सोल्यूटली फाइन एण्ड फार काइण्ड योर इन्फाॅरमेशन आपके पिता जी कल यहाॅ आ जाएॅगे।"

"क्याऽऽ???" शिवा की बात सुन कर प्रतिमा बुरी तरह उछल पड़ी थी।
"यस माॅम।" शिवा ने मुस्कुराते हुए कहा___"एण्ड यू नो व्हाट आपके इस चक्कर ने कमाल कर दिया।"
"क्या मतलब???" प्रतिमा हैरान।
"मतलब ये कि जो चीज़ बातों में नहीं हो सकती थी वो चीज़ आपके इस चक्कर से हो गई।" शिवा ने उत्साहित भाव से कहा___"क्या सही समय पर आपको चक्कर आया माॅम।"

"ये तू क्या बकवास कर रहा है??" प्रतिमा के चेहरे पर एकाएक शख्त भाव उभर आए___"ये सब तुझे मज़ाक लग रहा है? तुझे मेरे और मेरे पिता की भावनाओं का ज़रा सा भी एहसास नहीं हुआ? कैसा बेटा है तू मेरा? तुझे इस सब में भी एक चाल नज़र आई? मेरा यू चक्कर खाकर गिर जाना भी तुझे किसी कामयाबी का हिस्सा नज़र आया? वाह बेटा वाह...आज तूने साबित कर दिया कि तू सिर्फ और सिर्फ अपने बाप पर गया है। तेरे लिए किसी के जज़्बात किसी के दुख दर्द कोई मायने नहीं रखते। आज अगर मुझे चक्कर की वजह से दिल का दौरा पड़ जाता तब भी शायद तुझे और तेरे बाप को कोई फर्क़ नहीं पड़ता।"

"म माॅम।" शिवा बुरी तरह से झेंपते हुए बोला___"ये आप क्या कह रही हैं?"
"शटअप।" प्रतिमा ज़ोर से चीखी थी। उसकी ऑखों से एकाएक ऑसू बह चले___"क्या नहीं किया मैने और क्या नहीं दिया मैने तुम दोनो बाप बेटों को? मगर मेरे त्याग और बलिदान का कोई मोल नहीं है तुम दोनो की नज़र में। मैने वो काम भी किया जिसके लिए कोई भी भारतीय औरत किसी भी सूरत में तैयार नहीं हो सकती। मैने अपने साथ साथ अपनी आत्मा तक को जहन्नुम में झोंक दिया मगर उसका भी कोई मोल नहीं तुम लोगों की नज़र में। अभी तक तो नहीं मगर अब एहसास हो रहा है कि मेरे कर्मों की सज़ा मुझे मिलनी शुरू हो गई है।"

"आई एम स्वारी माॅम।" शिवा ने सिर झुकाते हुए कहा___"मेरा वो मतलब हरगिज़ भी नहीं था जो आप समझ बैठी हैं। मैं तो.....
"बस।" प्रतिमा ने अपना दाहिना हाथ उठा कर अपने पंजे से उसे रुकने का संकेत देते हुए कहा___"कुछ भी सफाई देने की ज़रूरत नहीं है। मैं कोई बच्ची नहीं हूॅ जिसे किसी भी तरह की बातों से बहला फुसला दिया जाए। मेरे सीने में भी एक दिल है जिसमें प्यार मोहब्बत और ममता का सागर उछाल मारता है। मगर तूने और तेरे बाप ने कभी उसकी कद्र नहीं की।"

"आप बेवजह बातों का पतंगड़ बना रही हैं माॅम।" शिवा ने कहा___"जबकि मैं क़सम खा कर कहता हूॅ कि मेरे कहने का वो मतलब नहीं था। हाॅ मैं ये मानता हूॅ कि मैंने वो सब उस समय कह दिया जबकि हालात वैसे नहीं थे। इसी लिए मैं आपसे उसके लिए माफ़ी भी माॅग रहा हूॅ। और दूसरी बात मुझे पहली नज़र में यही लगा कि आपने चक्कर खा कर गिरने का नाटक किया है। इस लिए आपके नाटक को ज़ारी रखने के लिए मैं भी ज़ोर से चीखते हुए आपके पास आकर वो सब आपसे कहने लगा था। क्योंकि ये तो मुझे पता ही था कि मोबाइल चालू हालत में है और नाना जी को वो सब कुछ साफ साफ सुनाई देगा जो कुछ हम यहाॅ करेंगे और ऐसा हुआ भी। तभी तो जब मैने देखा कि आपके चक्कर खाने से उधर नाना जी भी चिंतित व परेशान हो उठे हैं तो मैने जल्दी से मोबाइल उठा कर उनसे बात की थी और उन्हें आपके बारे में सब कुछ बताया था। उसके बाद उन्होंने यहाॅ आने के लिए कहा और यहाॅ का पता पूछा मुझसे तो मैने बता दिया। बस, यही हुआ था। उसके बाद मुझे लगा कि नाटक खत्म हो गया है तो मैने आपके चेहरे पर पानी छिड़क कर आपको होश में ले आया और आपसे वो सब कहा। मगर आपने तो कुछ और ही मुझे सुना दिया।"

"तभी तो कहती हूॅ कि तुम दोनो बाप बेटों को किसी के दुख दर्द का एहसास नहीं है।" प्रतिमा ने दुखी भाव से कहा__"अगर होता तो उसी वक्त समझ जाते कि वो कोई नाटक नहीं बल्कि हक़ीक़त था। तुम्हें समझना चाहिए था कि वर्षों की बिछड़ी एक बेटी अपने बाप से बात कर रही थी। उस वक्त बाप बेटी के दिलों में भावनाओं का कैसा ज्वार भाॅटा ताण्डव कर रहा होगा? ये उन प्रबल भावनाओ का ही असर था कि मेरा दिल उन भीषण जज़्बातों को सहन न कर पाया और मैं चक्कर खा कर गिर गई थी। मगर, जैसा कि मैने कहा तुम दोनो बाप बेटों को किसी के दुख दर्द का एहसास नहीं है। तभी तो मेरी उस हालत को भी नाटक समझ लिया।"

"मुझे माफ़ कर दीजिए माॅम।" शिवा ने सहसा भारी लहजे में कहा___"मुझसे सच में बहुत बड़ी ग़लती हो गई है। मगर आइंदा ऐसा नहीं होगा माॅम, ये मेरा वादा है आपसे। आप तो जानती हैं कि आपकी अहमियत मेरी लाइफ में कितनी है। मैं ऐसा कोई काम कर ही नहीं सकता जिससे आपके दिल को ठेस पहुॅचे। बस एक बार माफ़ कर दीजिए न।"

प्रतिमा ने इस वक्त शिवा के चेहरे पर उभरे हुए मासूम से भावों को देखा तो सहसा उसकी ममता जाग गई। उसने तुरंत ही शिवा को पकड़ कर अपने ऊपर खींच लिया और कस कर अपने सीने से भींच लिया। तभी किसी के आने की आहट से दोनो ही अलग हुए। कुछ ही पलों में सविता ने कमरेएं प्रवेश किया। उसने बताया कि डाक्टर साहब आ गए हैं। सविता की बात सुन कर शिवा बेड से उठ कर कमरे से बाहर की तरफ चला गया। थोड़ी ही देर में अजय सिंह का फैमिली डाक्टर अनिल जैन शिवा के साथ कमरे में दाखिल हुआ। अनिल जैन चालीस की उमर का तथा मध्यम कद काठी का ब्यक्ति था। अजय सिंह जैसे इंसान से संबंध रखने वाला ये पहला ऐसा ब्यक्ति था जो शक्ल और सीरत से शरीफ़ था।

शिवा ने अनिल को प्राथमिक बातें बताईं कि क्या हुआ था उसकी माॅम को। उसके बाद अनिल ने चेकअप करना शुरू किया। थोड़ी देर तक प्रतिमा को चेक करने के बाद उसने कुछ दवाईयाॅ दी और उन्हें सेवन करने की विधि बताई। फिर उसने शिवा को अपने साथ बाहर आने का इशारा करते हुए कमरे से बाहर की तरफ चल दिया।

"क्या बात है डाक्टर अंकल?" शिवा ने बाहर आते ही सहसा गंभीरता से पूछा___"मेरी माॅम पूरी तरह ठीक तो हैं न?"
"चिंता की कोई बात नहीं है बेटा।" अनिल ने कहा__"बस थोड़ी कमज़ोरी थी इस वजह से उन्हें चक्कर आया था। ठाकुर साहब आएॅ तो उनसे कहना कि मैने उन्हें याद किया है। अगर उनके पास समय हो तो कुछ समय के लिए मेरे पास ज़रूर आएॅ वो।"
"जी बिलकुल डाक्टर अंकल।" शिवा ने विनम्रता से कहा___"मैं डैड को ज़रूर आपके पास जाने के लिए कहूॅगा।"

उसके बाद डाक्टर अनिल जैन हवेली से अपना थैला लिये चला गया। शिवा भी वापस अपने माॅम के पास आ गया। सविता रात के लिए खाना बनाने चली गई थी। उसे प्रतिमा ने कह दिया था कि कुछ और लोगों को साथ में लेकर उन लोगों के लिए भी खाना बना लेना जो लोग आज गेस्टरूम में ठहरे हुए हैं। कुछ देर अपनी माॅ के पास बैठने के बाद शिवा प्रतिमा के ही कहने पर गेस्टरूम की तरफ चला गया। जबकि प्रतिमा अपने पिता के आने के बाद उससे मिलने के सुनहरे ख़याल बुनने लगी।
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उधर विराज की तरफ!
रात हुई तो विराज और आदित्य ने थोड़ा बहुत खाना खाया। हलाॅकि खाना पीना वो लोग लेकर नहीं चले थे इस लिए एक स्टेशन पर जब ट्रेन रुकी तो वहीं इन दोनो ने अपने लिए खाने की कुछ चीज़ें ले लिये थे और फिर ट्रेन में ही दोनो ने बैठ कर खा लिया था।

नीलम की मौजूदगी में मैने इतना ज़रूर किया कि अपनी शीट पर आदित्य को बैठा दिया था और आदित्य की शीट पर मैं बैठ गया था। इससे हुआ ये कि अब नीलम की तरफ मेरी पीठ हो गई थी। हलाॅकि इस तरफ बैठने से मेरी पीठ भी उसे दिखाई नहीं देनी थी। ख़ैर खाना पीना करके हम दोनो ही आराम से लेट कर सो गए थे। नींद भी ज़बरदस्त लगी थी क्योंकि हम दोनो लगातार यात्रा ही कर रहे थे।

रात के किसी प्रहर हमें शोर सा सुनाई दिया। ऐसा लगा जैसे कुछ लोग आपस में झगड़ा कर रहे थे। ये एसी का डिब्बा नहीं था। मैने जानबूझ कर एसी में टिकट बनवाने को नहीं कहा था जगदीश अंकल से। रिजर्वेशन वाले डिब्बे में भी कुछ लोग जनरल डिब्बे की भीड़ देख कर घुस आते थे। ख़ैर, उस शोर शराबे की वजह से हमारी नींद टूट गई और हमारी ऑखें खुल गई।

शोर शराबा मेरे पीछे की तरफ से सुनाई दे रहा था। आदित्य जैसे ही उठ कर अपनी शीट पर बैठा वैसे ही उसकी नज़र मेरे पीछे उस तरफ पड़ी जिस तरफ शोर हो रहा था। आदित्य ने देखा कि चार पाॅच लड़के मेरे पीछे की तरफ वाली शीट के पास फर्श पर खड़े थे और शीट पर बैठे हुए यात्रियों को अनाप शनाप बके जा रहे थे। उन लड़कों की आवाज़ों के बीच कुछ औरतों व लड़कियों की भी आवाज़ें आ रही थी। इस बीच मैं भी उठ कर अपनी शीट पर बैठ गया था। मैने ये सोच कर अपने पीछे की तरफ नहीं देखा कि कहीं नीलम की नज़र मुझ पर न पड़ जाए। किन्तु उस वक्त मैं चौंका जब नीलम की तेज़ तेज़ आवाज़ मेरे कानों पर पड़ी। उसकी आवाज़ से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो बस रोने ही वाली हो।

ये जान कर मेरे मनो मस्तिष्क में झनाका सा हुआ। मुझे समझते देर न लगी कि उन लड़कों से नीलम तथा अन्य लोगों की कहा सुनी हो रही है। मुझे ये तो समझ न आया कि आख़िर बात क्या हुई है किन्तु इतना ज़रूर समझ गया कि नीलम इस तरह किसी से झगड़ा करने वाली लड़की नहीं है। उस हालत में तो बिलकुल भी नहीं जबकि वो ट्रेन में अकेली सफर कर रही हो। मुझे लगा नीलम इस वक्त बेहद परेशान हालत में है। मेरे अंदर का भाई जाग गया। बात भले ही चाहे जो हो मगर मैं ये हर्गिज़ भी बरदास्त नहीं कर सकता था कि कोई ऐरा गैरा मेरी बहन को कुछ उल्टा सीधा कहे या उससे किसी तरह का झगड़ा करे।

मैने आदित्य को इशारा किया। आदित्य मेरा इशारा समझ गया। उसके बाद हम दोनो ही उस तरफ चल दिये। इस बीच मैने जल्दी से अपने मुख और नाक को रुमाल से ढॅक लिया था। कुछ ही पल में हम दोनो उन लड़कों के पास पहुॅच गए। मैने एक लड़के को हल्का सा दबाव देकर एक तरफ किया और शीट की तरफ देखने की कोशिश की। मैं देख कर चौंका कि नीलम अपनी शीट पर बैठी सिसक रही थी। उसके बगल से ही एक और लड़की बैठी हुई थी। उसकी हालत भी नीलम जैसी ही थी। मुझे समझ न आया कि नीलम और वो लड़की सिसक क्यों रही हैं? जबकि उन दोनो के बगल से एक औरत भी बैठी थी जिसके साथ एक दस बारह साल का लड़का था। नीलम की सामने की शीट पर दो आदमी व दो औरतें बैठी हुई थी। उनके चेहरों पर लगभग बारह बजे हुए थे।

"ओये कौन है बे तू?" सहसा उस लड़के ने मुझे धक्का देते हुए कहा जिसे दबाव देकर मैं अंदर शीट की तरफ देखने लगा था, बोला___"और तू मुझे एक तरफ करके अंदर कहाॅ घुसा आ रहा है? क्या तुझे भी ये दोनो लौंडियाॅ पसंद आ गई हैं?"

"पसंद तो आएॅगी ही दिनेश।" एक अन्य लड़के ने हॅस कर कहा___"आख़िर माल तो ज़बरदस्त ही है न।"
"अरे तो पहले हमें तो चखने दे भाई।" दिनेश नाम के उस लड़के ने कहा___"उसके बाद ये भी चख लेगा।"
"कैसे चख लेगा यार?" तीसरे लड़के ने कहा___"हम साले इतनी देर से इन मालों से कह रहे हैं कि बाथरूम चलो मगर ये हैं कि सुनती ही नहीं हैं हमारी बात।"

उन लड़कों की इन बातों से ही ज़ाहिर हो गया था कि माज़रा क्या है। मगर मैं हैरान इस बात पर था कि वहाॅ पर बैठे बाॅकी सब उन लड़कों की बददमीची सहन कैसे कर रहे थे? या फिर वो सब डर रहे थे कि ये लड़के कहीं उनकी औरतों या बेटियों को कुछ कहने न लगें। ये यो हद ही हो गई थी। सबको अपनी फिक्र थी, कोई ये नहीं सोच रहा था कि दूसरी लड़कियाॅ भी तो किसी की बहन बेटी होंगी। इस सबसे मेरा दिमाग़ बेहद ख़राब हो चुका था। मैने पलट कर आदित्य की तरफ देखा। वो मुझे देखते ही समझ गया कि क्या करना है।

"ओ भाई ज़रा बात तो सुन।" मैने अपनी आवाज़ बदलते हुए कहा दिनेश नाम के उस लड़के से कहा___"तेरे अगर और भी साथी इस ट्रेन में हों तो फोन करके बुला ले उन्हें। क्योंकि अब जो तुम लोगों के साथ होने वाला है उसके बाद तुम लोगों हास्पिटल पहुॅचाने वाला भी तो कोई होना चाहिए न।"

"ओये चिकने।" दिनेश से पहले ही उसका एक अन्य साथी बोल पड़ा___"ज्यादा हीरोपंती करने का शौक चढ़ा है क्या तेरे को? चल फूट ले इधर से वरना हम लोगों से पंगा लेने का अंजाम अच्छा नहीं होगा समझा? और हाॅ आपन के और भी छोकरे लोग इस ट्रेन में मौजूद हैं। इस लिए आपन एक ही बार तेरे से बोलेगा कि इधर से खिसक ले तू।"

"किसी ने सच ही कहा है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते।" मैने गुस्से से उबलते हुए उस लड़के का कालर पकड़ा और ज़ोर से अपनी तरफ खींच लिया___"तुम जैसे गटर के कीड़ों को मसलना ही बेहतर होता है।"

मैने जैसे ही उस लड़के को अपनी तरफ खींचा तो एक अन्य हरकत में आ गया। अभी वो हरकत में आया ही था कि आदित्य ने धर लिया उसे। इधर मैने उस लड़के के चेहरे पर ज़ोर का पंच जड़ दिया। उनमें से किसी को भी इस सबकी उम्मीद नहीं थी। चेहरे पर ज़ोरदार पंच पड़ते ही उस लड़के की नाक की हड्डी टूट गई और भल्ल करके खून बहने लगा। वो बुरी तरह बिलबिलाते हुए अपनी नाक को अपने दोनो हाॅथों से पकड़ लिया। अचानक हुए इस हमले से दो लड़के जो अभी खाली थे वो भी हरकत में आ गए। आस पास फर्श पर खड़े हुए लोग एकदम से उस जगह से दूर हटते चले गए।

आदित्य ने जिस लड़के को धरा था उसका एक हाॅथ पकड़ कर ज़ोर से उमेठ दिया। जिससे वो दर्द में चीखा। हाॅथ उमेठते ही आदित्य ने पीछे से अपने घुटने का वार उसके पिछवाड़े पर किया तो उसका सिर ऊपर की शीट पर लगे लोहे के पाइप से टकराया। उसके हलक से चीख निकल गई। इधर दो लड़को के हाथ में पलक झपकते ही जाने कहाॅ से चाकू प्रकट हो गया था। मतलब साफ था कि वो चारो पेशेवर अपराधी थे। मगर उन्हें क्या पता था कि आज उनका पाला उनसे भी बड़े खलीफा से पड़ गया था।

एक लड़के ने जैसे ही अपना चाकू वाला हाथ ऊपर हवा में उठा कर मुझ पर चलाया तो मैने उसके उस हाॅथ को एक हाॅथ से हवा में ही रोंका और दूसरे हाॅथ से उसकी कलाई पर कराट का वार किया जिससे उसके हाथ से चाकू छूट कर फर्श पर गिर गया। चाकू के गिरते ही मैने उसके पेट में ज़ोर की लात मारी तो वो झोंक में ही बाएॅ साइड के डंडे से टकरा कर फर्श पर चित्त गिर पड़ा। उधर ऐसा ही हाल आदित्य की तरफ भी था। कहने का मतलब ये कि दो मिनट के अंदर ही वो चारो लड़के ट्रेन के फर्श पर पड़े बुरी तरह कराह रहे थे और हम दोनो से रहम की भीख माॅगने लगे थे।

"जी तो करता है कि।" मैने खूंखार भाव से कहा__"जो घिनौना कर्म तुम लोगों ने किया है उसके लिए तुम सबके हाथ पैर तोड़ कर तुम सबके हाॅथों में दे दूॅ। मगर मैं यहाॅ पर ज्यादा बखेड़ा नहीं करना चाहता। इस लिए जितना जल्दी हो सके यहाॅ से दफा हो जाओ वरना ये भी सोच लेना कि जिस बखेड़े की अभी मैं बात कर रहा हूॅ उससे मैं डरता भी नहीं हूॅ।"

मेरी इस बात का असर फौरन ही हुआ। वो चारो बुरी तरह लड़खड़ाते हुए फर्श से उठे और नौ दो ग्यारह हो गए। उन चारों के जाते ही मैं वापस पलटा और नीलम की देखा तो चौंक गया। वो मुझे ही देखे जा रही थी। उसकी ऑखों में ढेर सारे ऑसू थे। अभी मैं उसे देख ही रहा था कि सहसा वह अपनी जगह से उठी और बिजली की तरह दौड़ कर मुझसे लिपट गई।

"राऽऽज मेरे भाई।" फिर वो मुझसे लिपटी फूट फूट कर रोने लगी थी। उसकी इस क्रिया से जहाॅ मैं भौचक्का रह गया था वहीं शीट पर बैठी वो दूसरी लड़की भी हैरान रह गई थी। तभी मुझे ध्यान आया कि उन लड़कों से लड़ते वक्त जाने कब मेरे मुख से रुमाल निकल गया था। शायद यही वजह दी कि नीलम जान गई थी कि मैं वास्तव में कौन हूॅ।

"ओह राज।" मुझसे लिपटी नीलम रोते हुए कह रही थी___"तुम यहाॅ भी मेरी इज्ज़त बचाने के लिए पहुॅच गए। इतने अच्छे और इतने महान कैसे हो सकते हो तुम? ये सच है कि अगर तुम नहीं होते तो कदाचित वो लड़के मुझे और सोनम दीदी को अपनी उन अश्लील बातों से ही मार देते।"

"बस चुप हो जाओ।" मैने उसे खुद से अलग कर उसके चेहरे को अपने दोनो हाॅथ की हॅथेलियों में लेते हुए कहा___"कुछ नहीं होता। मैं जब तक ज़िंदा हूॅ तुम्हारा कीई भी बुरा नहीं कर सकता।"

मेरी ये बात सुन कर नीलम एकटक मेरी ऑखों में देखने लगी। कुछ इस तरह जैसे मेरी ऑखों में कुछ तलाश कर रही हो। आस पास मौजूद लोग हमारी तरफ ऑखें फाड़े देख रहे थे। मुझे ये सब बड़ा अजीब सा लगने लगा।

"जाओ अब अपनी शीट पर बैठ जाओ।" मैंने सहसा गंभीर भाव से कहा___"सब लोग अजीब तरह से इधर ही देख रहे हैं।"
"देखने दो राज।" कहने के साथ ही नीलम पुनः मुझसे छुपक गई, फिर बोली___"मुझे किसी की कोई परवाह नहीं। मैं बस इतना जानती हूॅ कि मैं ऐसे शख्स की पनाहों में हूॅ जिसना मेरी अस्मत की दो दो बार रक्षा की है। इस पनाह में आकर मुझे ऐसा एहसास हो रहा है मेरे भाई जैसे ये जगह मेरे लिए दुनियाॅ की सबसे महफूज़ और सबसे सुंदर जगह है। राज, मुझे अपनी इस पनाह से अब कभी जुदा न करना।"

"हाॅ बाबा नहीं करूॅगा।" मैने नीलम को खुद से अलग करके कहा___"अब जाओ अपनी शीट पर बैठ जाओ। और हाॅ मैं अगली शीट पर ही हूॅ। अगर किसी तरह की कोई परेशानी हो तो मुझे आवाज़ लगा देना।"

"तुम भी मेरे पास ही बैठ जाओ न राज।" नीलम ने किसी बच्ची की तरह ज़िद करते हुए कहा___"या फिर ऐसा करो कि मुझे भी अपने पास बैठा लो। मैं तुम्हारे पास ही रहना चाहती हूॅ। प्लीज मेरी इतनी सी बात मान जाओ न।"

नीलम की इस बात से मैं एकदम से उसकी तरफ देखता रह गया। फिर मैने चेहरा घुमा कर आदित्य की तरफ देखा और सामने शीट पर बैठी सोनम की तरफ भी। दोनो मुझे ही देख रहे थे। मुझे समझ न आया कि अब मैं क्या करूॅ?

"तुम अपनी सोनम दीदी को अकेला छोंड़ कर कैसे मेरे पास बैठ सकती हो?" मैने कहा___"और उधर मेरे साथ मेरा दोस्त आदित्य भी तो है। मैं उसे अकेला छोंड़ कर तुम्हारे पास भला कैसे बैठ जाऊॅगा? इस लिए ये बेकार की ज़िद छोंड़ो और अपनी शीट पर बैठ जाओ। मैं पास में ही तो हूॅ।"

"हाॅ लेकिन मुझे तब भी तुम्हारे पास ही बैठना है।" नीलम ने बुरा सा मुह बना लिया___"अपने दोस्त से कह दो कि यहाॅ मेरी शीट पर सोनम दीदी के साथ बैठ जाएॅ।"
"ये कैसी ज़िद है नीलम?" मैने हैरान___"अगर सोनम दीदी को इस बात से ऐतराज़ हुआ तो?"

मेरी बात सुन कर नीलम ने झट से पलट कर सोनम की तरफ देखा और फिर कहा___"दीदी, क्या आपको इनके यहाॅ बैठने से ऐतराज़ है?"
"क क्या मतलब??" नीलम के द्वारा एकाएक ही इस तरह पूछने पर सोनम लगभग हड़बड़ा गई थी।
"मैं ये पूछ रही हूॅ आपसे।" नीलम ने मानो अपने वाक्य को दोहराया___"कि क्या आपको राज के दोस्त के यहाॅ पर बैठने से ऐतराज़ है?"

सोनम ने नीलम की इस बात पर बड़े अजीब भाव से उसकी तरफ देखा। नीलम को देखने के बाद मेरी तरफ और फिर आदित्य की तरफ। सबको देखने के बाद पुनः नीलम की तरफ देखते हुए कहा___"अगर तू यही चाहती है तो ठीक है। मुझे कीई ऐतराज़ नहीं है इनके यहाॅ बैठ जाने से।"

"ओह थैंक्यू सो मच दीदी।" नीलम ने खुश होकर कहा___"आप सच में बहुत अच्छी हैं।"
"चल चल अब मस्का मत लगा।" सोनम ने कहा___"जा बैठ जा राज के पास। मगर उसे परेशान मत करना ज्यादा।"
"ओ हैलो।" मैं एकदम से बोल पड़ा___"कोई मेरे दोस्त से भी जानना चाहेगा कि उसे यहाॅ बैठने से ऐतराज़ है कि नहीं?"

मेरी इस बात से नीलम व सोनम एकदम से चुप हो गई। मैने आदित्य की तरफ देखा तो उसे मुस्कुराते हुए पाया। तभी नीलम व सोनम की नज़रें एकदम से आदित्य की तरफ दौड़ गईं। जैसे उसे देख कर ही ऑखों से पूछ रही हों कि आपको ऐतराज़ है क्या यहाॅ बैठने से? आदित्य उनकी ऑखों में उभरे सवाल का आशय समझ कर बोला__"ठीक है मैं सोनम जी के पास ही बैठ जाता हूॅ।"

"लो राज।" आदित्य के मुख से ये सुनते ही नीलम ने मेरी तरफ देख कर कहा___"अब तो किसी को कोई ऐतराज़ नहीं है। सो अब मैं तुम्हारे साथ ही अगली वाली शीट पर बैठूॅगी। चलो अब हम जल्दी से अपनी शीट पर चलते हैं।"

मरता क्या न करता की तर्ज़ पर मैं हैरान परेशान होकर नीलम के साथ वापस अपनी शीट पर आ गया। जबकि आदित्य सोनम के पास ही नीलम वाली शीट पर बैठ गया। इधर मेरी शीट पर आते ही नीलम मेरे बगल से ही धम्म से बैठ गई। बैठते ही उसने अपना एक हाथ मेरी काख से डाल कर मेरा एक हाॅथ मानो अपने कब्जे में ले लिया था।

"अरे अब ये क्या है?" नीलम के ऐसा करते ही मैने हैरानी से कहा___"सोना नहीं है क्या? चलो जाओ ऊपर वाली शीट पर लेट कर सो जाओ।"
"मुझे नींद नहीं आ रही है राज।" नीलम ने एकदम से बच्चियों वाले अंदाज़ से कहा___"तुम भी मत सोना। हम सारी रात ढेर सारी बातें करेंगे। मुझे तुमसे बहुत सारी बातें करनी हैं।"

"वो सब तो ठीक है।" मैने एकाएक अजीब भाव से कहा___"मगर क्या तुम्हें ऐसा महसूस नहीं हो रहा कि आज सूरज पश्चिम दिशा से निकल रहा है? ये तो कमाल हो गया न कि जो नीलम मुझसे कभी बात करना तो दूर कभी मुझे देखना तक गवाॅरा नहीं करती थी आज वही नीलम मुझसे सारी रात ढेर सारी बातें करेंगी? यकीन नहीं हो रहा मुझे। ये चमत्कार है या फिर खुली ऑखों का मेरा कोई ख़्वाब?"

मेरी इन बातों से नीलम को झटका सा लगा। अभी तक जो चेहरा एकदम से ताज़े गुलाब की मानिंद खिला हुआ दिख रहा था वो मेरी इन बातों से पलक झपकते ही मुरझा गया था। उसके चेहरे पर पल भर में गहन पीड़ा व दुख के भाव उभर आए और ऑखों में ऑसू रूपी समंदर मानों हिलोरें लेने लगा था। कुछ कहने के लिए उसके होंठ बस थरथरा कर रह गए थे।

"मुझे मेरे उन सभी बुरे कर्मों की सज़ा दो राज।" नीलम ने रुऑसे स्वर में कहा___"यकीन मानो, तुम्हारी हर सज़ा को मैं खुशी खुशी क़बूल कर लूॅगी। मगर अब तुम्हारी किसी भी तरह की बेरुखी सहन नहीं कर पाऊॅगी मैं। मुझे पता है कि मैने तुम्हारे साथ अब तक क्या किया था। किन्तु अगर ग़ौर से सोचोगे तो इस सबमें तुम्हें ज़रूर समझ आएगा कि उस सबमें मेरी कोई ग़लती नहीं थी। मैने तो वही किया था अब तक जो बचपन से हमें सिखाया गया था। सही ग़लत का पाठ तो हमें हमारे माॅ बाप ने ही बचपन से पढ़ाया था। जबकि वास्तव में सही ग़लत क्या है वो अब समझ आया है मुझे। मैं सच कहती हूॅ मेरे भाई कि मैं अपने उन सभी कर्मों के बारे में सोच सोच कर बेहद दुखी हूॅ। मुझे अपने आप से घृणा होती है।"

"इंसान जिन्हें दिल से चाहता है।" मैने कहा___"वही अगर ऐसा करें तो तक़लीफ़ तो यकीनन होती है नीलम। मैने कभी भी तुम सबके बारे में ग़लत नहीं सोचा था। बल्कि हमेशा यही चाहता था तुम सब मुझसे उसी तरह बातें करो हॅसो बोलो जैसे बाॅकी सब करते थे। मगर मुझे आज तक समझ न आया कि हमने ऐसा कौन सा गुनाह किया था हमें आप सबकी सिर्फ नफ़रत मिली। ख़ैर, ये सब तो कल की बातें है मगर मैं ये जानना चाहता हूॅ कि आज ऐसा क्या हो गया है कि तुम्हें वही राज अपना भाई लगने लगा और इतना ही नहीं बल्कि दुनियाॅ का सबसे अच्छा इंसान भी लगने लगा। क्या सिर्फ इस लिए कि मैने इत्तेफाक़ से दो बार तुम्हारी इज्ज़त की रक्षा की या फिर इसकी कोई दूसरी वजह है?"

"इंसान का चरित्र जैसा भी हो राज।" नीलम ने गंभीर भाव से कहा___"वो दूसरों के सामने उजागर हो ही जाता है। ये अलग बात है कि इसमें थोड़ा बहुत समय लग जाता है। तुम लोगों के जिस चरित्र का पाठ हम भाई बहनों को बचपन से पढ़ाया गया था उसे हमने ये सोच कर यकीन के साथ मान लिया क्योंकि हम यही समझते थे कि कोई भी माॅ बाप अपने बच्चों को ग़लत नसीहत नहीं देते हैं। मगर जो ग़लत होता है उसका भी पर्दाफाश हो ही जाता है एक दिन। तुमने मेरी दो बार इज्ज़त बचाई इसे संयोग समझो या समय का बदलाव, जिसके फलस्वरूप मुझे ये समझ आया कि अपने जिस माॅ बाप से मैने तुम लोगों के चरित्र का पाठ पढ़ा था वो दरअसल झूॅठा भी तो हो सकता था। क्योंकि एक बुरे इंसान से अच्छे कर्म की उम्मीद नहीं की जा सकती। जबकि तुमने जो किया वो निहायत ही अच्छे कर्म की पराकाष्ठा थी। तुम्हारे उस कर्म ने मुझे ये सोचने पर बिवश कर दिया कि तुम वैसे नहीं हो जैसा मेरे माॅ बाप ने अब तक समझाया था। बस, इंसान जब किसी के बारे में गहराई से सोचता है तो उसे कुछ न कुछ तो एहसास होता ही है कि हक़ीक़त क्या है? अब तक तो मैने तुम्हारे बारे में उस तरीके से सोचा ही नहीं था राज मगर उस हादसे के बाद जब मैने तुम्हारे बारे में आदि से अंत तक सोचा तो मुझे एहसास हुआ कि तुम बुरे नहीं हो सकते। इंसान को अपनी सफाई में कुछ भी कहने का अधिकार है जबकि हमने तो तुम लोगों की किसी बात को सुनना ही कभी गवाॅरा नहीं किया था। ऐसे में भला हमें कैसे समझ आता कि सच क्या है? हमसे यकीनन ग़लती हुई है राज और मैं इस ग़लती को ज़रूर सुधारूॅगी। घर पहुॅचते ही माॅम डैड से बताऊॅगी कि कैसे तुमने दो दो बार उनकी बेटी की इज्ज़त की रक्षा की है।"

"तुम्हारे बताने से कुछ नहीं होने वाला नीलम।" मैने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"तुम्हें तो अभी सारी असलियत का पता ही नहीं है। मगर मेरा दावा है कि जब तुम्हें सारी सच्चाई का पता चलेगा तो तुम्हारा दिल हाहाकार कर उठेगा।"

"क्या मतलब??" नीलम ने चौंकते हुए कहा___"तुम्हारी इन बातों का क्या मतलब है राज? तुम किस असलियत की बात कर रहे हो?"
"मैं तुम्हें इस बारे में खुद कुछ नहीं बताऊॅगा।" मैने गंभीर भाव से कहा___"क्योंकि मेरे बताने पर तुम्हें यही लगेगा कि मैं तुम्हारे माॅम डैड के विषय में बेवजह ही अनाश शनाप बक रहा हूॅ। इस लिए इस सबके बारे में तुम्हें खुद ही पता करना होगा नीलम। जब तक तुम्हें खुद सारी बातों का पता नहीं चलेगा या तुम खुद अपनी ऑखों से नही देख लोगी तब तक तुम दूसरे की बताई हुई बात का यकीन नहीं कर सकोगी।"

"आख़िर ऐसी कौन सी बातें हैं राज?" नीलम के चेहरे पर गहन चिंता के तथा सोचने वाले भाव उभरे___"जिनके बारे में तुम बात कर रहे हो? तुम मुझे बताओ राज, मुझे तुम्हारी हर बात पर यकीन होगा।"
"नहीं होगा नीलम।" मैने पुरज़ोर लहजे में कहा__"कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन पर यकीन करना बेहद मुश्किल होता है। यहाॅ तक कि अगर इंसान खुद अपनी ऑखों से भी देख ले तो यकीन नहीं कर पाता। इस लिए मेरे कुछ भी बताने का कोई मतलब नहीं है। तुम खुद सारी बातों का पता लगाओ और फिर उन पर विचार करो।"

"क्या रितू दीदी भी उन सारी बातों को जानती हैं?" नीलम ने कहा___"जिनके बारे में तुम बात कर रहे हो?"
"हाॅ।" मैने कहा___"रितू दीदी को आरी असलियत का पता है।"
"तो क्या यही वजह है कि।" नीलम ने कहा___"आजकल वो माॅम डैड के ख़िलाफ हैं?"
"हाॅ यही वजह है।" मैने कहा___"अब तुम सोच सकती हो कि भला ऐसी वो क्या बातें होंगी जिसके चलते तुम्हारी अपनी दीदी अपने ही माॅम डैड के खिलाफ हो गई हैं?"

मेरी बात सुन कर नीलम कुछ बोल न सकी, बस एकटक मेरी तरफ देखती रही। मैं समझ सकता था कि वो इन सब बातों के चलते अपने दिलो दिमाग़ को विचारों भॅवर में डुबा रही है। कुछ और हमारे बीच ऐसी ही बातें होती रहीं। उसके बाद मैने उसे सो जाने का कह दिया। हलाॅकि मैं जानता था कि अब उसे सारी रात नींद नहीं आने वाली थी। वो रात भर इन्हीं बातों को सोचती रहेगी कि आख़िर ऐसी कौन सी सच्चाई है जिसकी मैं बात कर रहा हूॅ और जिस सच्चाई को जान कर उसकी अपनी दीदी अपने ही माॅम डैड के खिलाफ़ हो गई है?

नीलम को ऊपर के बर्थ पर लिटाने के बाद मैं भी अपने नीचे वाले बर्थ पर लेट गया और नीलम के साथ हुई बातों के बारे में सोचने लगा। आख़िर क्या करेगी नीलम जब उसे अपने माॅ बाप और भाई की असलियत का पता चलेगा? वो कैसा रिऐक्ट करेगी जब उसे पता चलेगा कि उसके माॅ बाप ने किस तरह इस हॅसते खेलते परिवार को बरबाद किया था? सब कुछ जानने के बाद क्या नीलम भी अपनी बड़ी बहन की तरह अपने माॅ बाप के खिलाफ़ हो जाएगी? मैं इन्ही सब बातों के बारे में सोच रहा था। तभी सहसा मुझे अजय सिंह का ख़याल आया। मैने परसों आने से पहले ही जगदीश अंकल को फोन करके अजय सिंह के साथ एक धाॅसू खेल खेलने का कह दिया था। ये उसी का परिणाम था कि इस वक्त अजय सिंह सीबीआई की गिरफ्त में था। मगर अब जबकि मैं कल दोपहर तक हल्दीपुर रितू दीदी के फार्महाउस पहुॅच जाऊॅगा तो अजय सिंह को भी सीबीआई की गिरफ्त से आज़ाद कर देने का समय आ जाएगा।

अजय सिंह जब सीबीआई की गिरफ्त से निकल कर अपनी हवेली पहुॅचेगा तब वो प्रतिमा को जो कुछ बताएगा उसे सुन कर सबके पैरों के नीचे से ज़मीन गायब हो जाएगी। अजय सिंह का दिमाग़ उस सबके बारे में सोचते सोचते फटने को आ जाएगा मगर उसे कुछ समझ नहीं आएगा। वो इस तरह किंकर्तब्यविमूढ़ सी स्थित में बैठा रह जाएगा जैसे कोई मौत के मुह से अचानक बचने के बाद शून्य में खोया हुआ सा रह जाता है।

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दोस्तो, वादे के मुताबिक आप सबके सामने मेगा अपडेट हाज़िर है,,,,,,,

आप सबकी प्रतिक्रिया और रिव्यू का बेसब्री से इन्तज़ार रहेगा।
इस अपडेट को तैयार करने में मैने कितनी मेहनत की है इसका ज़िक्र करना उचित तो नहीं है, पर मुझे यकीन है कि आप सब समझ गए होंगे।
 
एकनयासंसार

अपडेट.........《 52 》

अब तक,,,,,,,,

मेरी बात सुन कर नीलम कुछ बोल न सकी, बस एकटक मेरी तरफ देखती रही। मैं समझ सकता था कि वो इन सब बातों के चलते अपने दिलो दिमाग़ को विचारों भॅवर में डुबा रही है। कुछ और हमारे बीच ऐसी ही बातें होती रहीं। उसके बाद मैने उसे सो जाने का कह दिया। हलाॅकि मैं जानता था कि अब उसे सारी रात नींद नहीं आने वाली थी। वो रात भर इन्हीं बातों को सोचती रहेगी कि आख़िर ऐसी कौन सी सच्चाई है जिसकी मैं बात कर रहा हूॅ और जिस सच्चाई को जान कर उसकी अपनी दीदी अपने ही माॅम डैड के खिलाफ़ हो गई है?

नीलम को ऊपर के बर्थ पर लिटाने के बाद मैं भी अपने नीचे वाले बर्थ पर लेट गया और नीलम के साथ हुई बातों के बारे में सोचने लगा। आख़िर क्या करेगी नीलम जब उसे अपने माॅ बाप और भाई की असलियत का पता चलेगा? वो कैसा रिऐक्ट करेगी जब उसे पता चलेगा कि उसके माॅ बाप ने किस तरह इस हॅसते खेलते परिवार को बरबाद किया था? सब कुछ जानने के बाद क्या नीलम भी अपनी बड़ी बहन की तरह अपने माॅ बाप के खिलाफ़ हो जाएगी? मैं इन्ही सब बातों के बारे में सोच रहा था। तभी सहसा मुझे अजय सिंह का ख़याल आया। मैने परसों आने से पहले ही जगदीश अंकल को फोन करके अजय सिंह के साथ एक धाॅसू खेल खेलने का कह दिया था। ये उसी का परिणाम था कि इस वक्त अजय सिंह सीबीआई की गिरफ्त में था। मगर अब जबकि मैं कल दोपहर तक हल्दीपुर रितू दीदी के फार्महाउस पहुॅच जाऊॅगा तो अजय सिंह को भी सीबीआई की गिरफ्त से आज़ाद कर देने का समय आ जाएगा।

अजय सिंह जब सीबीआई की गिरफ्त से निकल कर अपनी हवेली पहुॅचेगा तब वो प्रतिमा को जो कुछ बताएगा उसे सुन कर सबके पैरों के नीचे से ज़मीन गायब हो जाएगी। अजय सिंह का दिमाग़ उस सबके बारे में सोचते सोचते फटने को आ जाएगा मगर उसे कुछ समझ नहीं आएगा। वो इस तरह किंकर्तब्यविमूढ़ सी स्थित में बैठा रह जाएगा जैसे कोई मौत के मुह से अचानक बचने के बाद शून्य में खोया हुआ सा रह जाता है।

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अब आगे,,,,,,,,,

उधर रितू मंत्री दिवाकर चौधरी से फोन पर बातें करने के बाद अपने फार्महाउस पहुॅची। उसने जिप्सी को तेज़ रफ्तार से दौड़ाया था और पाॅच मिनट में ही फार्महाउस पहुॅच गई थी। उसे मंत्री की बातों पर ज़रा सा भी ऐतबार नहीं था। हलाॅकि उसने धमकी के रूप में मंत्री को तगड़ी डोज दी थी। मगर इसके बावजूद वो इस बात से संतुष्ट नहीं हो पाई थी कि मंत्री की वजह से विधी के माॅ बाप अब सुरक्षित हैं। उसे पता था कि मौजूदा वक्त में भले ही मंत्री ने उससे वादा कर लिया था कि विधी के माॅ बाप को कुछ नहीं कहेगा मगर वो अपने इस वादे पर ज्यादा देर तक कायम नहीं रह सकता था। क्योंकि वो मंत्री था, वो ये बरदास्त नहीं कर पाएगा कि कोई ऐरा ग़ैरा उसे किसी चीज़ के लिए बिवश करे।

फार्महाउस पर पहुॅच कर रितू तेज़ क़दमों से चलती हुई अपने कमरे में पहुॅची। कमरे में पहुॅच कर सबसे पहले उसने अपनी पाॅकेट से उस मोबाइल की निकाल कर आलमारी में रखा जिस नये मोबाइल से उसने मंत्री से बात की थी। उसके बाद उसने अपने आईफोन को स्विच ऑन किया। फोन के स्विच ऑन होते ही उसने पुलिस कमिश्नर को काल लगाया और मोबाइल कान से सटा लिया।

"यस ऑफिसर।" उधर से कमिश्नर का प्रभावशाली स्वर उभरा___"क्या प्रोग्रेस चल रही है तुम्हारे ऑपरेशन की?"
"ऑपरेशन तो अभी सफलता पूर्वक चल ही रहा है सर।" रितू ने सहसा गंभीर भाव से कहा___"मगर इस बीच एक प्रोब्लेम आ गई है।"

"व्हाट??" उधर से कमिश्नर का चौंकता हुआ स्वर उभरा___"कैसी प्रोब्लेम आ गई है? इवरीथिंग ओके न?"
"यस सर।" रितू ने कहा___"बट प्रोब्लेम ये है कि मंत्री दिवाकर चौधरी के साथ जो कुछ मौजूदा समय में हो रहा है उसके वजह का उसने अपने तरीके से पता लगाया है। मेरा मतलब है कि वो ये समझता है कि उसकी इस बरबादी के पीछे विधी के घरवालों का हाॅथ है। उसे लगता है कि उसके बच्चों को विधी के बाप ने किडनैप किया है।"

"ऐसा तो उसे लगेगा ही ऑफीसर।" कमिश्नर का स्वर उभरा___" मऐसे मामले में कोई भी ब्यक्ति सर्व प्रथम विधी के घर वालों पर ही शक करेगा, क्योंकि मंत्री के साथ ये सब करने की वजह सिर्फ विधी के घर वालो के पास ही है। इस लिए अगर मंत्री सारी बातों पर विचार करके ये नतीजा निकाला है कि ये सब उस रेप पीड़िता लड़की के घर वाले ही कर रहें हैं तो उसका सोचना ग़लत नहीं है। ख़ैर, तुम बताओ कि अब तुम क्या चाहती हो?"

"ज़ाहिर सी बात है सर।" रितू ने कहा___"कि मंत्री के इस नतीजे के बाद अब विधी के माॅ बाप पर मंत्री का खतरा हो गया है। आप जानते हैं कि इस मामले में उन बेचारों का दूर दूर तक कोई हाॅथ नहीं है। वो तो बेकार में ही इस मौत रूपी खतरे में फॅस पड़े हैं। इस लिए मैं चाहती हूॅ सर कि विधी के माॅ बाप को जल्द से जल्द सुरक्षा मुहय्या कराएॅ आप।"

"ऐसा करना सही नहीं होगा ऑफिसर।" कमिश्नर ने समझाने वाले भाव से कहा___"क्योंकि अगर हम विधी के माॅ बाप को पुलिस प्रोटेक्शन देंगे तो मंत्री के सामने सारी बातें ओपेन हो जाएॅगी। उस सूरत में उनके ऊपर ख़तरा और भी बढ़ जाएगा। ये ऑपरेशन चूॅकि सीक्रेट है इस लिए इसकी सारी चीज़ें सीक्रेट ही रहें तो बेहतर होगा।"

"मगर सर।" रितू ने कहा___"विधी के घर वालों को सुरक्षित तो ईरना ही होगा हमें। वरना उनके ऊपर मंत्री का क़हर कभी भी टूट पड़ेगा।"
"एक काम करो तुम।" कमिश्नर ने कहा___"विधी के माॅ बाप को भी अपने पास ही रखो।"

"लेकिन सर।" रितू ने कहा___"उन्हें मैं अपने पास लेकर कैसे आऊॅगी? संभव है कि मंत्री ने अपने आदमी उनके आस पास निगरानी में लगा दिये हों। उस सूरत में जब वो देखेंगे कि मिस्टर एण्ड मिसेस चौहान किसी के द्वार ले जाए जा रहे हैं तो वो ज़रूर उस बात की सूचना मंत्री को दे देंगे और हमारा पीछा भी कर सकते हैं।"

"रिस्क तो लेना ही पड़ेगा ऑफिसर।" कमिश्नर का गंभीर स्वर___"तुम चौहान को फोन करके कहो कि वो तुम्हें किसी ख़ास जगह पर आकर मिलें उसके बाद उस खास जगह पर हमारे पुलिस के आदमी सादे कपड़ों में उन्हें वहाॅ से रिसीव कर लेंगे। पुलिस के वो आदमी चौहान और उनकी पत्नी को किसी खास जगह पर ही लेकर आ जाएॅगे जहाॅ से तुम उन्हें रिसीव कर अपने साथ ले जाना।"

"दैट्स ए गुड आइडिया सर।" रितू ने कहा___"हलाॅकि रिस्की तो ये भी है किन्तु जैसा कि आपने कहा रिस्क तो लेना ही पड़ेगा। इस लिए ऐसा ही करते हैं सर।"
"ठीक है।" कमिश्नर ने कहा___"तुम ऐसा ही करो। मगर होशियारी और सतर्कता से।"
"यस सर।" रितू ने कहा।

इसके साथ ही काल कट गई। रितू के चेहरे पर इसके पहले जहाॅ चिंता व परेशानी के भाव थे वहीं अब राहत के भाव झलकने लगे थे। यद्यपि उसे पता था कि ऐसा करना भी रिस्की ही था। क्योंकि मंत्री ने अगर अपने आदमियों को विधी के माॅ बाप की निगरानी में लगा दिया होगा तो यकीनन वो लोग जान जाएॅगे और पीछा करेंगे। मगर ये भी सच था कि विधी के माॅ बाप को सुरक्षित करना ज़रूरी था। अतः रितू ने मोबाइल में विधी के पापा का नंबर खोज कर काल लगा दिया।

"हैलो अंकल मैं रितू बोल रही हूॅ।" उधर से काल रिसीव किये जाते ही रितू ने कहा था।
"ओह हाॅ रितू बेटा।" उधर से मिस्टर चौहान का तनिक चौंका हुआ स्वर उभरा___"कैसी हो तुम? उस दिन के बाद से फिर आई नहीं तुम। क्या विधी के जाने से सारे रिश्ते खत्म हो गए? मेरा दामाद तो अपनी मरहूम पत्नी की अस्थियाॅ तक लेने नहीं आया। ऐसी उम्मीद तो न थी मुझे उससे।"

"राज की जगह उसके नाम से अस्थियाॅ लेने मैं ही तो आई थी अंकल।" रितू ने कहा___"आप से बताया तो था हालातों के बारे में।"
"ओह हाॅ हाॅ बताया था तुमने बेटा।" उधर से चौहान का स्वर उभरा___"क्या करूॅ बेटी कुछ याद ही नहीं रहता। जब से बेटी हमें छोंड़ कर गई है तब से एकदम अकेले हो गए हैं हम दोनो। सच कहें तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता। ये ज़िंदगी तो बस बोझ सी लगने लगी है।"

"ऐसा मत कहिए अंकल।" रितू ने दुखी भाव से कहा___"विधी के चले से आप दुखी मत होइये। मैं भी तो आपकी बेटी ही हूॅ। आप मुझे अपनी विधी ही समझिये अंकल। मैने तो उसी दिन आप सबसे रिश्ता बना लिया था जिस दिन विधी को मैने अपनी छोटी बहन बनाया था। उसके जाने का हम सबको बेहद दुख है मगर ये भी सच है कि इस दुख को लेकर बैठा तो नहीं रहा जा सकता न। आप बिलकुल भी दुखी मत होइये और ना ही ये समझिए कि आप अब अकेले हो गए हैं। हम सब आपके ही तो हैं। आपका हम पर वैसा ही हक़ है जैसा कि विधी पर था आपका।"

"ओह शुक्रिया बेटी।" चौहान का लरज़ता हुआ स्वर उभरा___"तुमने ये कह कर सच में मुझे अकेलेपन के एहसास से मुक्त करवा दिया। मेरे दिल में जीने की चाह जाग उठी है। ख़ैर, ये बताओ बेटी कि अब कैसे हालात हैं वहाॅ पर?"

"हालात तो अभी काबू में ही हैं अंकल।" रितू ने कहा___"मगर एक गंभीर समस्या पैदा हो गई है।"
"क कैसी समस्या बेटा?" चौहान के स्वर में एकाएक चिंता के भाव आ गए थे___"सब ठीक तो है न?"

रितू ने संक्षेप में चौहान को मंत्री से संबंधित सारी बातें बता दी। चौहान ये जान कर चकित था हो गया था कि उसकी बेटी के साथ कुकर्म करने वालों को रितू खुद सज़ा दे रही है। इस बात से चौहान को बड़ी खुशी भी हुई। किन्तु रितू ने मौजूदा हालातों के बारे में जो कुछ भी उसे बताया उससे वो चिंतित भी हो उठा था।

"इस लिए अंकल।" सारी बातें बताने के बाद फिर रितू ने कहा___"मैं चाहती हूॅ कि आप और ऑटी जितना जल्दी हो सके तो घर से निकल कर मेरे पास आने की कोशिश कीजिए।"
"लेकिन बेटा।" उधर से चौहान ने कहा___"उस मंत्री ने हमारे आस पास निगरानी के लिए अपने आदमियों को लगाया होगा तो उस सुरत में हम भला कैसे निकल पाएॅगे यहाॅ से?"

"उसका भी इंतजाम कर दिया है मैने।" रितू ने कहा___"आप बस वो करते जाइये जो मैं कहूॅ।"
"ठीक है बेटा।" चौहान ने कहा___"बताओ क्या करना है हमें?"
"आप अपना ज़रूरी सामान लेकर इसी वक्त तैयार हो जाइये।" रितू ने कहा___"थोड़ी ही देर में मेरे पुलिस डिपार्टमेन्ट के आदमी सादे कपड़ों में आपको लेने आएॅगे। आप उनके साथ चले आइयेगा। उसके बाद का काम मेरे पुलिस के वो आदमी और मैं सम्हाल लेंगे।"

"ठीक है बेटा।" उधर से चौहान ने कहा___"जैसा तुम कहो।"
"ओके फिर आप जल्दी से तैयारी कर लीजिए।" रितू ने कहा___"मैं अपने आदमियों को भेजती हूॅ आपके पास।"

इसके साथ ही रितू ने काल कट कर दी। कुछ पल रुकने के बाद उसने फिर से किसी को फोन लगाया और थोड़ी देर तक किसी से कुछ बातें की। उसके बाद काल कट करके बेड पर आराम से लेट गई। अभी वह लेटी ही थी कि उसका फोन बज उठा। उसने मोबाइल फोन उठाकर स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नाम को देखा तो सहसा उसके चेहरे पर सोचो के भाव उभरे।

"कहो प्रकाश क्या ख़बर है?" रितू ने सोचने वाले भाव से काल रिसीव करते ही पूछा।
"...........। उधर से कुछ कहा गया।
"ओह तो ये बात है।" रितू ने कुछ सोचते हुए कहा__"वैसे कितने आदमी होंगे वो लोग?"
"...........।" उधर से प्रकाश नाम के आदमी ने फिर कुछ कहा।

"चलो अच्छी बात है।" रितू ने कहा___"और कुछ?"
"...........। उधर से फिर कुछ कहा गया।
"क्या???" रितू चौंकी___"डाक्टर भला किस लिए आया था वहाॅ?"
"...........।" उधर से पुनः कुछ कहा गया।
"ओह आई सी।" रितू ने कहा___"लेकिन माॅम को चक्कर कैसे आ गया था? क्या तुमने पता नहीं किया?"

"..........।" उधर से प्रकाश ने कुछ बताया।
"ओह तो ये बात है।" रितू चौंकने के साथ मुस्कुराई भी___"चलो ठीक है प्रकाश। बहुत अच्छी ख़बर दी है तुमने। ऐसी ही अंदर की ख़बर देते रहना और हाॅ ज़रा होशियार और सतर्क रहना।"

ये कह कर रितू ने फोन काट दिया। उसके चेहरे पर इस वक्त कई तरह के भावों का आवागमन चालू हो गया था। ख़ैर उसके बाद रितू अपने डिपार्टमेन्ट के पुलिस वालों के फोन काल का इन्तज़ार करने लगी। लगभग बीस मिनट बाद रितू का आईफोन बजा। रितू ने तुरंत काल को रिसीव किया। काल पुलिस के आदमियों का ही था। उन्होंने बताया कि वो लोग मिस्टर एण्ड मिसेस चौहान को लेकर चल दिये हैं और बताई हुई जगह पर आ रहे हैं। उन्होंने ये भी बताया कि आस पास ऐसा कोई आदमी नहीं दिखा जिस पर किसी तरह का ज़रा सा भी संदेह किया जा सके।

पुलिस के उस आदमी से बात करने के बाद रितू भी बेड से उठी और जिप्सी की चाभी लेकर कमरे से बाहर की तरफ निकल पड़ी। सीढ़ियों से उतर कर जब वो नीचे आई तो ड्राइंगरूम में रखे सोफों पर नैना और कुरुणा का भाई बैठा दिखा उसे। रितू नीचे आते देख नैना ने उससे कहा___"रितू बेटा, तुम्हारे ये मामा जी कह रहे हैं कि इन्हें अब अपने घर वापस जाना है। कह रहे हैं बहुत काम बाॅकी है घर में।"

"क्यों मामा जी इतना जल्दी?" रितू ने कहा___"अभी तो हमने आपसे ठीक से बातें भी नहीं की है और आप जाने की बात करने लगे।"
"बातें तो हो ही गई हैं रितू बेटा।" हेमराज ने कहा__"अब मुझे जाने दो। बहुत काम है। तुम्हें तो पता है दूसरे की नौकरी में अपनी मनमर्ज़ी तो नहीं चलती न।"

"ठीक है मामा जी।" रितू ने कहा___"जैसा आपको अच्छा लगे। तो कब जा रहे हैं आप?"
"मैं तो तैयार ही बैठा हूॅ बेटा।" हेमराज ने कहा___"बस तुम्हारे आने का ही इन्तज़ार कर रहा था।"
"ओह।" रितू ने कहा___"चलिए फिर। मैं भी उधर ही जा रही हूॅ। सो आपको भी छोंड़ दूॅगी।"

रितू के कहने पर हेमराज सोफे से उठा और बगल से ही रखे एक छोटे से बैग को पीठ पर लाद कर बाहर की तरफ चल दिया। उसके पीछे रितू भी चल दी। थोड़ी ही देर में वो दोनो जिप्सी में सवार सड़क पर चल रहे थे। दोनो के बीच थोड़ी बहुत बात चीत होती रही और फिर वो नहर वाली जगह के पास बने पुल के इसी तरफ रुक गए।

लगभग बीस मिनट बाद सामने से एक टोयटा आती दिखी। रितू को पहचानने में ज़रा भी देरी न हुई कि उस गाड़ी में उसके पुलिस के ही आदमी हैं। कुछ ही देर में वो गाड़ी रितू के पास आकर रुकी। गाड़ी के आगे पीछे के दरवाजे खुले। अगले दरवाजे से पुलिस का एक आदमी उतरा जबकि पीछे के दरवाजे से विधी के माॅ बाप उतरे।

रितू उनके पास जाकर उन्हें नमस्ते किया और उन्हें अपने साथ ला कर अपनी जिप्सी की पिछली शीट पर बैठने का इशारा किया। उन दोनो के बैठने के बाद रितू ने पुलिस वालों से कहा कि वो हेमराज को हरीपुर छोंड़ आएॅ जो यहाॅ से लगभग तीस किलो मीटर की दूरी पर था। रितू के कहने पर वो पुलिस वाले हेमराज की अपनी गाड़ी में बैठा कर वहाॅ से चले गए। उनके जाने के बाद रितू भी अपनी जिप्सी को स्टार्ट कर वापस फार्महाउस की तरफ चल दी।

विधी के माता पिता की सुरक्षित करके रितू अब बेफिक्र हो चुकी थी। अब वो बेफिक्री से कोई भी काम कर सकती थी। रास्ते में रितू ने विधी के माॅ बाप को विराज के बारे में भी बता दिया कि वो कल दोपहर तक मुम्बई से वापस आ जाएगा। ऐसे ही बातें करते हुए ये लोग कुछ ही समय में फार्महाउस पहुॅच गए। जिप्सी से उतर कर रितू विधी के माता पिता को अंदर ले गई। जहाॅ पर नैना बुआ बैठी थी। रितू ने नैना को विधी के माॅ बाप का परिचय दिया और कहा कि इनके रहने के लिए एक कमरा साफ सुथरा करवा दें। थोड़ी देर ड्राइंग रूम में उन सबसे बातचीत करने के बाद रितू अपने कमरे में चली गई।
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अजीब संयोग था।
जैसा कि रितू को पहले से ही अंदेशा था कि मंत्री अपनी हरकतों से बाज नहीं आएगा। कहने का मतलब ये कि जैसे ही मिस्टर एण्ड मिसेस चौहान रितू के फार्महाउस पहुॅचे थे वैसे ही मंत्री ने अपने आदमियों को गुप्त तरीके से विधी के घर के आस पास निगरानी के लिए लगा दिया था। किन्तु मुश्किल से आधे घंटे बाद ही मंत्री के आदमी ने मंत्री को फोन करके बताया कि जिस ब्यक्ति की निगरानी में हम लोग यहाॅ आए थे उसके घर में तो ताला लगा हुआ है। कुछ लोगों ने बताया कि एक सफेद रंग की गाॅड़ी आई थी जिसमे चौहान अपनी बीवी को लिए बैठ गया था। उसके हाॅथ में एक बड़ा सा बैग भी था। उन दोनों के बैठते ही वो सफेद रंग की गाड़ी चली गई थी।

फोन पर अपने आदमी की ये ख़बर सुन कर मंत्री भौचक्का सा रह गया था। वो समझ गया कि भले ही उसने अपने बच्चों के किडनैपर से वादा किया था इसके बाद भी किडनैपर को उसके वादे पर ऐतबार न हुआ था। शायद यही वजह थी कि किडनैपर ने वक्त रहते अपनी सुरक्षा के मद्दे नज़र अपने घर में ताला लगा कर कहीं ऐसी जगह नया ठिकाना बना लिया था जिस जगह के बारे मंत्री को पता तक न चल सके। फोन पर अपने आदमी की ख़बर सुनने के बाद इस वक्त मंत्री अपने उन्हीं तीनों साथियों के साथ ड्राइंगरूम में गंभीर मुद्रा में बैठा हुआ था।

"शिकार हमारे हाॅथ से बहुत ही आसानी से निकल गया चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"उसे आपके वादे के बावजूद पता था कि आप ऐसा कोई क़दम उठाएॅगे। इसी लिए तो उसने फौरन ही अपनी सुरक्षा का इंतजाम कर लिया। सबसे बड़ी बात ये कि आपको ऐसे वक्त में ऐसा कोई क़दम उठाना ही नहीं चाहिए था। क्योंकि संभव है कि इससे हमें भारी खामियाजा भुगतना पड़ जाए। दूसरी बात जब आपको पता चल ही गया था तो उस बात को फोन पर उस किडनैपर को बताना ही नहीं चाहिए था बल्कि आपको जो करना था वो उस किडनैपर की जानकारी में आए बग़ैर ही करना चाहिए था।"

"ग़लती तो हमसे यकीनन हो गई है अवधेश।" दिवाकर चौधरी ने अफसोस भरे भाव से कहा___"हमें लगा कि जब हम उसे बताएॅगे कि उसकी असलियत हम जान गए हैं तो उसके होश उड़ जाएॅगे और अपने बुरे अंजाम का सोच कर वो सब कुछ हमारे हवाले कर देगा जिसके बलबूते पर वो इतना उछल रहा है। इतना ही नहीं वो हमारे बच्चों को भी सही सलामत हमारे पास भेज देगा। इसके बाद वो हमसे अपने उस अपराध की माफ़ी माॅगेगा। मगर ऐसा हुआ नहीं बल्कि वो तो हम पर और भी ज्यादा हावी हो गया था।"

"अब जो होना था वो तो हो ही गया चौधरी साहब।" सहसा अशोक मेहरा ने कहा___"और इस पर अब बहस करने का कोई फायदा नहीं है। इस लिए हमें अब ये सोचना चाहिए कि अब आगे हमें क्या करना है? वैसे उस चौहान के अचानक अपने घर से गायब हो जाने से एक बात तो साफ हो गई है कि वो अकेला इस काम में नहीं है। बल्कि कोई और भी है जो उसकी मदद कर रहा है।"

"ये तुम कैसे कह सकते हो?" दिवाकर चौधरी के माथे पर बल पड़ा___"और भला कौन ऐसे मामले में उसकी मदद कर सकता है? जबकि सब जानते हैं कि ये मामला हमसे संबंधित है। भला हमसे दुश्मनी मोल लेने का दुस्साहस दूसरा कौंन कर सकता है?"

"कोई तो होगा ही चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा___"मैने भी अपने तरीके से उस लड़की के बारे में पता लगाया है।"
"क्या मतलब?" चौधरी के साथ साथ सुनीता व अवधेश भी चौंके थे, जबकि अवधेश ने ही पूछा___"क्या पता लगाया है उस लड़की के बारे में?"

"यही कि वो लड़की हमारे बच्चों के ही कालेज में पढ़ती थी।" अशोक मेहरा कह रहा था___"और हमारे बच्चों की फ्रैण्ड ही थी। किन्तु उसके बारे में एक बात ये भी पता चली कि वो लड़की किसी दूसरे लड़के को चाहती थी और फिर एक दिन अविश्वसनीय तरीके से उस लड़के से प्रेम संबंध तोड़ लिया था। उस लड़के से अलग होने के बाद ही वो सूरज के क़रीब आई थी। सूरज के ही एक दूसरे दोस्त ने इस बारे में बताया कि विधी नाम की वो लड़की उस लड़के से संबंध ज़रूर तोड़ लिया था कि किन्तु अकेले में अक्सर वो उस लड़के की याद में ही रोती रहती थी।"

"लेकिन इस मैटर से उस बात का कहाॅ संबंध है अशोक भाई जिसकी बात तुम कर रहे हो कि चौहान की मदद कोई दूसरा भी कर रहा है?" अवधेश ने कहा था।

"संबंध क्यों नहीं हो सकता भाई?" अशोक मेहरा ने कहा___"खुद सोचो कि जो लड़की अपने प्रेमी से अलग होकर उसकी याद में इस तरह रोती थी तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वो फिर से अपने प्रेमी से मिलने की चाह कर बैठे और मिल ही जाए? दूसरी ग़ौर करने वाली बात ये भी है कि इश्क़ मुश्क कभी दुनियाॅ से नहीं छुपता। संभव है कि विधी और उसके प्रेमी के उन प्रेम संबंधों की ख़बर दोनो के घर वालों को भी रही हो। लेकिन किसी कारणवश मिल न पाएॅ हों वो दोनो या फिर मिलने वाले रहे हों। मगर तभी लड़की के साथ रेप सीन हो गया। लड़की के साथ हुए हादसे का पता विधी के प्रेमी को लगा होगा और उसने अपनी प्रेमिका के साथ हुए इस जघन्य अपराध का बदला लेने के लिए उतारू हो गया हो। जिसका नतीजा आज इस रूप में हमारे सामने है।"

"तम्हारी बातों में वजन तो है अशोक।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"मगर ये महज तुम्हारी संभावनाएॅ हैं जो कि ग़लत भी हो सकती हैं। फिर भी अगर तुम्हारी बातों को मान भी लिया जाए तो इसका मतलब ये हुआ कि हमारे बच्चों को किडनैप करने वाला चौहान नहीं बल्कि उस लड़की का प्रेमी है।"

"बिलकुल।" अशोक ने कहा___"एक पल के लिए ये सोचा जा सकता है कि लड़की के बाप ने अपनी बेटी के साथ हुए उस कुकर्म का बदला ये सोच कर न लिया कि बदला लेने से वो सब तो वापस मिलने से रहा जो इज्ज़त के रूप में लुट चुका है। या फिर ये भी सोच लिया होगा कि कानूनन भी वो हमारा कुछ नहीं कर पाएगा। मगर लड़की का प्रेमी बदला लेने के सिवा कुछ और सोचेगा ही नहीं और वही वो कर रहा है।"

अशोक मेहरा की इस बात से ड्राइंग रूम में कुछ देर के लिए ब्लेड की धार की मानिंद सन्नाटा छा गया। सभी के चेहरों पर गहन सोचों के भाव नुमायाॅ हो उठे थे।

"मुझे लगता है कि अशोक भाई साहब का ये सोचना एकदम सही है।" सहसा इस बीच पहवी बार सुनीता ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"क्योंकि जिस प्रकार से उसने इतने कम समय में हमारे बच्चों को और हमारी रचना बेटी को किडनैप किया है उस तरह से वो चौहान तो कम से कम कर ही नहीं सकता। वो लड़का जवान है और गरम खून है। रेप केस होने के दूसरे दिन ही जिस तरह से उसने हमारे बच्चों को हमारे ही फार्महाउस से किडनैप किया और इतना ही नहीं बल्कि हमारे खिलाफ़ ऐसा खतरनाक सबूत वहाॅ से प्राप्त किया वो चौहान के बस का तो हर्गिज़ नहीं था। आज जब उसे चौधरी साहब से ये पता चला कि मंत्री महोदय उसकी ये असलियत जान गए हैं कि वो दरअसल चौहान ही है तो उसे चौहान की फिक्र हुई इसी लिए उसने वक्त रहते चौहान को सुरक्षित कर दिया और हमारी पहुॅच से शायद दूर भी कर दिया है।"

"अरे वाह।" दिवाकर चौधरी ने हैरत से ऑखें फैलाते हुए कहा___"क्या खूब दिमाग़ लगाया है मेरी राॅड ने। असलियत भले ही कुछ और ही हो मगर जिस तरह से अशोक और सुनीता ने अपनी बातें रखीं उससे यही लगता है कि ये सब लड़की के उस प्रेमी का ही किया धरा है। ख़ैर, अब सवाल ये है कि लड़की का वह प्रेमी कौन है जिसके पिछवाड़े में इतनी ज्यादा मिर्ची लग गई कि वो अपनी जाने बहार के साथ हुए उस काण्ड का बदला लेने लगा है। आख़िर पता तो चले कि वो किस खेत की पैदाईश है जिसने हम पर हाॅथ डालने का दुस्साहस किया है।"

"मैने उस लड़के का पता भी करवाया है चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने कहा___"वो लड़का हल्दीपुर का है। बड़े घर परिवार से ताल्लुक रखता है किन्तु।"
"किन्तु क्या अशोक?" चौधरी के माथे पर शिकन पैदा हुई।
"पता चला है कि लड़के के ताऊ ने उसे और उसकी माॅ बहन को हर चीज़ से बेदखल कर रखा है।" अशोक मेहरा ने कहा___"लड़के के ताऊ का नाम ठाकुर अजय सिंह है। हल्दीपुर में बड़ी भारी किन्तु शानदार हवेली है तथा अच्छी खासी ज़मीन जायदाद भी है। खुद अजय सिंह एक बड़ा कारोबारी इंसान है। परिवार की आपसी कलह की वजह से उसने अपने मॅझले किन्तु स्वर्गवाशी भाई विजय सिंह के उस लड़के को और लड़के की माॅ बहन को हवेली से बेदखल कर दिया है।"

"ओह बड़ी अजीब बात है ये तो।" चौधरी ने सोचने वाले भाव से कहा___"फिर तो वो लड़का दर दर का भिखारी ही है। ऐसी हालत में वो ये सब हमारे साथ कैसे रहा पा रहा है? ये तो हैरत की बात है।"

"हैरत वैरत की कोई बात नहीं है चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने कहा___"ताऊ के द्वारा हवेली से बेदखल होने के बाद वो लड़का आजकल मुम्बई में रहता है अपनी विधवा माॅ और बहन के साथ।"
"अच्छा।" चौधरी ने कहा___"तो क्या वो मुम्बई में रहते हुए ये सब कर रहा है?"

"इस बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता मगर।" अशोक मेहरा ने कहा___"मगर संभव है कि उसे अपनी प्रेमिका के साथ हुए काण्ड का पता चला हो और वो मुम्बई से यहाॅ आया हो। उसके बाद उसने ये सब शुरू किया हो।"

"ओह।" चौधरी को जैसे बात समझ आ गई___"संभव है ऐसा ही हो। ख़ैर उस लड़के के परिवार में और कौन कौन लोग हैं?"
"लड़के का बाप तीन भाई थे।" अशोक ने कहा___"सबसे बड़ा अजय सिंह, फिर लड़के का बाप विजय सिंह और उसके बाद अभय सिंह। अजय सिंह के दो बेटियाॅ और एक लड़का है। उसकी बड़ी बेटी हल्दीपुर थाने में थानेदार है।"

"क क्या????" चौधरी ही नहीं बल्कि सभी बुरी तरह चौंके थे, फिर चौधरी ने ही कहा___"उस ठाकुर की बेटी थानेदार है। मतलब की पुलिस वाली है वो?"
"हाॅ मगर आप ये हर्गिज़ भी न सोचें कि।" अशोक मेहरा ने कहा____"कि उसका इस मामले में कोई हाथ है।"

"अरे, क्यों नहीं हो सकता ऐसा?" चौधरी से पहले अवधेश बोल पड़ा था___"वो अपने चचेरे भाई की मदद तो यकीनन कर सकती है भाई।"
"ऐसा नहीं है अवधेश भाई।" अशोक ने कहा___"क्योंकि अजय सिंह ही नहीं बल्कि उसकी औलादें भी उस लड़के और उसकी माॅ बहन से नफ़रत करती हैं।"

"एक मिनट अशोक भाई।" सहसा अवधेश श्रीवास्तव ने कुछ सोचते हुए कहा___"एक मिनट। हमारे बच्चों ने उस लड़की के साथ रेप सीन को अंजाम दिया उसके बाद वो चिमनी में बने अपने फार्महाउस पर चले गए। जहाॅ से उन्हें किडनैप कर लिया गया। चिमनी हल्दीपुर के बाद ही पड़ता है। ख़ैर रेप की वारदात हल्दीपुर के आस पास के ही क्षेत्र में हुई या फिर ऐसा होगा कि हमारे बच्चों ने अपने फार्महाउस पर ही उस लड़की से सामूहिक रेप किया और उसके बाद उसे हल्दीपुर की सीमा के अंदर ले जा कर छोंड़ आए होंगे। ये सब मैं इस लिए कह रहा हूॅ कि वो रेप सीन उस समय काफी फैल गया था उस क्षेत्र में। ख़ैर अब सोचने वाली बात ये है कि अगर रेप पीड़िता लड़की हल्दीपुर की सीमा में पाई गई तो क्या हल्दीपुर के थाने में मौजूद वो थानेदारनी चुप बैठी रही होगी? उसने शुरुआती ऐक्शन तो लिया ही होगा।"

"तुम आख़िर कहना क्या चाहते हो?" अशोक मेहरा ने पूछा___"इस मामले में अचानक तुम इस एंगिल से क्यों सोचने लगे?"
"दरअसल मैं भी तुम्हारी तरह संभावनाएॅ ही ब्यक्त कर रहा हूॅ भाई।" अवधेश ने कहा___"मामला काफी पेचीदा है। मगर मैं इधर उधर की कड़ियाॅ समेटने की कोशिश कर रहा हूॅ।"

"साफ साफ बोलो क्या कहना चाहते हो तुम?" सहसा चौधरी कर उठा___"यूॅ बातों को घुमाने का क्या मतलब है?"
"जैसा कि अशोक भाई ने कहा।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"कि थानेदारनी अपने भाई की मदद नहीं कर सकती क्योंकि वो भी अपने माॅ बाप की तरह ही उससे नफ़रत करती है। मगर सवाल ये है कि थानेदारनी के क्षेत्र में रिप पीड़िता पाई गई तो क्या थानेदारनी ने इस पर कोई ऐक्शन नहीं लिया होगा?"

"अगर उसने कोई ऐक्शन लिया होता तो उसका पता हमें ज़रूर चलता।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"ये तो सच है कि वो रेप स्कैण्डल एक पुलिस केस ही था मगर उस स्कैण्डल का कोई पुलिस केस नहीं बना। इस बात खुलासा कमिश्नर खुद कर चुका है।"

"या फिर ऐसा हुआ होगा कि उस थानेदारनी ने केस बनाने की कोशिश की होगी।" अशोक ने कहा___"मगर कमिश्नर ने उसे केस बनाने या उस वारदात पर कोई ऐक्शन लेने से मना कर दिया होगा। थानेदारनी भला अपने आला अफसर के खिलाफ़ कैसे कोई क़दम उठाती? "

"हाॅ ऐसा भी हो सकता है।" चौधरी ने कहा___"और आम जनता ने इस पर हो हल्ला इस लिए नहीं किया क्योंकि उसे भी पता है कि मामला सीधा मंत्री के बेटे और उसके बेटे के दोस्तों का था। यानी कि हमारे डर की वजह से जनता ख़ामोश रह गई।"

"तो इन बातों का निष्कर्स ये निकला।" सहसा सुनीता ने गहरी साॅस लेने के बाद कहा___"कि वो लड़का जिसे कि उसके ताऊ ने उसकी माॅ बहन के साथ घर से दर बदर किया वही इस सबके पीछे है। यानी वो अपनी प्रेमिका के साथ हुए उस रेप का बदला ले रहा है।"

"बिलकुल।" अशोक ने पुरज़ोर लहजे में कहा__"विधी के माॅ बाप के अलावा वही एक ऐसा है जो ये सब कर सकता है। यानी ये सब करने की वजह उसके पास भी है।"
"अगर ये वाकई सच है।" अवधेश ने कहा___"तो अब हमें उस लड़के का पता लगाना होगा। मगर इस बार पहले जैसी ग़लती हर्गिज़ भी नहीं होनी चाहिए। वरना इस बार इसका खामियाजा हमें भारी कीमत पर चुकाना पड़ सकता है।"

"बड़ी हैरत की बात है।" दिवाकर चौधरी के लहजे में कठोरता थी, बोला___"एक पिद्दी से इंसान ने हमें इस तरह अपने शिकंजे में कसा हुआ है कि हम आज़ाद होते हुए भी आज़ाद व बेफिक्र नहीं हैं। वो जब चाहे हम सबको बीच चौराहे पर नंगा दौड़ा सकता है और हम कुछ कर नहीं सकते। सारे प्रदेश में हमारी एकछत्र हुकूमत है। हमारी इजाज़त के बिना इस प्रदेश में कहीं का कोई पत्ता भी नहीं हिल सकता। मगर कमाल देखो कि हम सब जो खुद को सबसे बड़ा सूरमा समझ रहे हैं आज उस हरामज़ादे की मुट्ठी में कैद हो कर रह गए हैं। लानत है हम पर और हमारे सूरमा होने पर।"

"आप चिंता मत कीजिए चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने कहा___"बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी? आज भले ही उस कमीने का पलड़ा हम पर भारी है मगर किसी दिन तो उससे भी कोई चूक होगी जिसके तहत वो हमारे हत्थे चढ़ेगा। उसके बाद हम बताएॅगे कि हमारे साथ इतना बड़ा दुस्साहस करने का कितना खूबसूरत अंजाम होता है।"

"बकवास मत करो अशोक।" चौधरी ने बिफरे हुए से लहजे में लगभग चीखते हुए कहा___"तुम्हारा ये डायलाग हम इसके पहले भी जाने कितनी बार सुन चुके हैं मगर अब तक ऐसा कोई पल नहीं आया जिससे हमें लगे कि हाॅ अब हालात हमारे हक़ में हैं। मादरचोद ने अपाहिज बना के रख दिया है हमे। किसी से ठीक से मिल नहीं सकते। किसी समारोह में नहीं जा सकते। साला हर पल डर लगा रहता है कि ऐसी किसी जगह पर वो हरामज़ादा कोई ऐसी वैसी हरकत न कर दे कि सबके सामने हमारी इज्ज़त का कचरा हो जाए।"

"बुरा मत मानिएगा चौधरी साहब।" अशोक ने कहा___"मगर हमें इतना बेबस बना देने में सबसे बड़ा हाॅथ आपके बेटे सूरज का है।"
"क्या मतलब है तुम्हारा?" चौधरी एक झटके से अशोक की तरफ घूमते हुए कहा था।

"आप खुद सोचिए।" अशोक ने कहा___"हमारे सभी बच्चों का लीडर कौन है___आपका बेटा ही न?"
"हाॅ तो।" चौधरी चकराया।
"आप ये बताइये कि फार्महाउस पर हमारे ऐसे संबंधों की वीडियो क्लिप बनाने की क्या ज़रूरत थी उसे?" अशोक ने कहा___"क्या उसे इतना भी एहसास नहीं था कि ऐसे वीडियो किसी डायनामाइट से कम नहीं होते। हम जैसे लोगों के हज़ारो प्रतिद्वंदी होते हैं जिन्हें हमारी ऐसी ही किसी कमज़ोरी की तलाश रहती है। आज उन्हीं वीडियोज की वजह से हम इतना बेबस व लाचार बने बैठे हैं। अगर वो वीडियोज बने ही न होते तो आज किसी की हिम्मत ही न होती हमें इतना मजबूर करने की।"

"हाॅ हम जानते हैं कि हमारे बेटे ने ऐसे वीडियोज बना कर बहुत बड़ी ग़लती की है।" चौधरी ने खेद भरे भाव से कहा___"मगर अब जो हो गया उसका कोई कर भी क्या सकता है? हमें तो सारे बच्चों की फिक्र है। जाने उनके साथ कैसा सुलूक कर रहा होगा वो हरामज़ादा?"

"हम खुद तो कुछ कर नहीं सकते हैं।" अवधेश ने कहा___"मगर किसी और को इस काम में ज़रूर लगा सकते हैं।"
"क्या मतलब??" अशोक के माथे पर शिकन उभरी।
"मुझे लगता है कि हमें इस काम के लिए किसी क़ाबिल व बहादुर डिटेक्टिव को हायर करना चाहिए।" अवधेश ने कहा___"जासूस लोग गुप्त तरीके से काम करने में काफी माहिर होते हैं। वो अपने और अपनी गतिविधियों के बारे में किसी को तब तक पता नहीं चलने देते जब तक कि वो खुद न चाहें। अगर यही काम हम अपने आदमियों से कराएॅगे तो हमारी किसी गतिविधी का उस लड़के को पता चलने में देर नहीं लगेगी। अब तक के उसके क्रिया कलाप से ये ज़ाहिर हो चुका है कि वो अपने हर काम में बेहद होशियारी और सतर्कता रखता है और हमारी पल पल की ख़बर रखता है। इस लिए हमें किसी डिटेक्टिव को हायर करना चाहिए।"

"आइडिया बुरा नहीं है।" अशोक ने कहा___"मैं तुम्हारी इस सलाह से सहमत हूॅ। यकीनन इस काम में एक डिटेक्टिव ही कुछ कर सकता है। वो उस लड़के की सारी जन्मकुण्डली भी निकाल लेगा और हमारे बच्चों का पता भी लगा लेगा।"

"तो फिर देर किस बात की है?" चौधरी ने कहा___"अगर तुम दोनों को लगता है कि कोई डिटेक्टिव इस काम को बखूबी सफलतापूर्वक कर सकता है तो फिर ऐसे किसी डिटेक्टिव को फौरन हायर करो।"

"मेरी जानकारी में ऐसा एक डिटेक्टिव है।" अवधेश ने कहा___"मैं आज ही उससे फोन पर बात करता हूॅ और उसे जल्द से जल्द यहाॅ बुलाता हूॅ।"
"अच्छी बात है।" चौधरी ने कहा___"उसे बोलो फौरन हमारे सामने हाज़िर हो जाए। उसको उसके काम की मुहमाॅगी फीस के रूप में रकम मिलेगी।"

अवधेश ने चौधरी की बात सुनकर अपने कोट की पाॅकेट से मोबाइल निकाला और उसमें से किसी को फोन लगाया। थोड़ी देर बात करने के बाद उसने मोबाइल वापस अपनी पाॅकेट में डाल लिया।

"चौधरी साहब।" फिर उसने मंत्री की तरफ देखते हुए कहा___"मैने डिटेक्टिव से बात कर ली है। वो कल तक हमारे पास पहुॅच जाएगा। अब आप किसी बात की फिक्र मत करें। बहुत जल्द हमारा दुश्मन हमारे कब्जे में होगा और हमारे बच्चे हमारे पास होंगे।"

"अच्छी बात है अवधेश।" चौधरी ने कहा___"अब तो हमें तुम्हारे उस डिटेक्टिव पर ही भरोसा करना है। इसके सिवा दूसरा कोई चारा भी नहीं है।"
"आप निश्चिंत हो जाइये चौधरी साहब।" अवधेश ने कहा___"डिटेक्टिव बहुत ही क़ाबिल ब्यक्ति है। मुझे यकीन है कि बिना कोई नुकसान हुए हमारा हर काम हो जाएगा।"

"इससे ज्यादा हमें और चाहिए भी क्या?" चौधरी ने कहने के साथ ही सहसा सुनीता की तरफ देखा___"इतने दिनों में आज पहली बार एक नई उम्मीद पैदा हुई है। इस लिए हम चाहते हैं कि आज तबीयत खुश कर दो तुम।"
"हाय।" सुनीता ने दाॅतों तले अपने होंठ दबा कर आह सी भरते हुए कहा___"कितनी सुंदर बात कही है मेरे बलम ने। मैं तो कब से इसके लिए तड़प रही हूॅ। अब जब मूड बन ही गया है तो चलिए कमरे में और तबीयत हरी कर लीजिए।"

सुनीता की इस बात से चौधरी तो मुस्कुराया ही उसके साथ अशोक व अवधेश भी मुस्कुरा पड़े। इसके बाद चारो ही सोफों से उठ कर कमरे की तरफ बढ़ गए।
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सुबह हुई और एक नये जीवन के नये सफ़ की शुरुआत हुई। ट्रेन की शीट पर सोते हुए मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे ऊपर कोई झुका हुआ है। मुजे मेरे चेहरे पर गरम गरम हवा लगती हुई प्रतीत हो रही थी साथ ही किसी औरत के बदन पर लगे परफ्यूम की खुशबू भीमेरे नथुनों में समा रही थी। मेरी नींद टूटने की यही वजह थी। मैने पट से अपनी ऑखें खोल दी और अगले ही पल मैं ये देख कर बुरी तरह चौंका कि नीलम मेरे चेहरे के पास झुकी हुई थी।

उधर यही हाल नीलम का भी हुआ था। उसे कदाचित उम्मीद नहीं थी कि मैं इस तरह झटके से ऑखें खोल दूॅगा और फिर जैसे ही मैने पट से अपनी ऑखें खोली तो वो एकदम से हड़बड़ा गई थी। मगर हैरत की बात ये हुई कि उसने पलक झपकते ही खुद को सम्हाल भी लिया था।

"गुड माॅर्निंग राज।" फिर उसने मुस्कुराते हुए बड़ी नज़ाक़त से कहा___"सोते हुए कितने मासूम लगते हो तुम। मैं काफी देर से यही देख रही थी कि मेरा भाई सोते वक्त किसी छोटे से बच्चे की तरह मासम व क्यूट सा दिखता है। पहले मैने सोचा कि तुम्हें जगाऊॅ मगर फिर जब मैने देखा कि तुम गहरी नीद में हो और एकदम से मासूम दिख रहे हो तो मैने तुम्हें जगाना उचित नहीं समझा। बल्कि एकटक तुम्हें देखने लगी थी।"

"अच्छा तो मैं तुम्हें।" मैने उठते हुए किन्तु शरारत से कहा___"छोटा सा बच्चा नज़र आ रहा था सोते वक्त?"
"हाॅ बिलकुल।" नीलम ने मुस्कुराई___"तभी तो उस छोटे से बच्चे की मासूमियत को एकटक निहारे जा रही थी मैं।"
"पर मैने जब तुम्हें देखा रात में।" मैने पुनः शरारत से ही कहा___"तो तुम सोते वक्त ऐसी दिख रही थी जैसे कोई अस्सी साल की बुढ़िया सो रही हो। मैं तो टोटली कन्फ्यूज हो गया था उस वक्त।"

"क्या कहा???" नीलम एकदम से राशन पानी लेकर चढ़ दौड़ी___"मैं तुम्हें बुढ़िया नज़र आ रही थी। रुको अभी बताती हूॅ तुम्हें?"
"अरे नहीं यार।" मैंने एकदम से हड़बड़ाते हुए कहा__"मैं तो मज़ाक कर रहा था। तुम बुढ़िया तो किसी एंगिल से नहीं लगती हो मगर...।"

"मगर क्या???" नीलम ने ऑखें दिखाई।
"मगर दादी माॅ ज़रूर लगती हो।" मैने हॅसते हुए कह दिया।
"क्या बोला???" नीलम एकदम से मेरे ऊपर चढ़ कर मेरे पेट पर बैठ गई, और फिर मेरे सीने में मुक्के मारते हुए बोली___"मैं दादी माॅ लगती हूॅ। रुक बेटा बताती हूॅ अब तुझे मैं।"

नीलम मेरे सीने में मुक्के मारे जा रही थी। मैं भी उससे बचने का कोई खास प्रयास नहीं कर रहा था। मैने तो उसे छेंड़ा ही इस लिए था कि वो ये सब करे। दरअसल इन्हीं सब चीज़ों के लिए तो मैं तरसा था। अब तक तो रितू और नीलम ने कभी मुझे अपना भाई समझा ही नहीं था। भाई बहन के बीच कैसी कैसी शरारतें होती हैं उस सबका मैने कभी स्वाद ही नहीं चखा था। मगर आज और इस वक्त वही सब मेरे और नीलम के बीच हो रहा था। सच कहूॅ तो मुझे इस सबसे बेहद खुशी हो रही थी। दिल में भड़कते हुए जज़्बात जाने क्यों मुझे रुलाने पर उतारू हो रहे थे। मेरा दिल कर रहा था कि इस वक्त भावनाओं में बहते हुए मैं नीलम से लिपट कर खूब रोऊॅ मगर मैं ऐसा नहीं करना चाहता था। क्योंकि उससे माहौल दुखी सा हो जाता जबकि मैं इस पल को जी भर के जीना चाहता था।

उधर हम दोनो बहन भाई की इस धमा चौकड़ी से आस पास बैठे ट्रेन के सब लोग आश्चर्य से ऑख व मुह फाड़े एकटक देखे जा रहे थे। हम दोनो को भी जैसे उन सबसे कोई मतलब नहीं था और ना ही कोई परवाह थी। नीलम ज़ोर ज़ोर से जाने क्या क्या बोले जा रही थी और मेरे ऊपर चढ़ी हुई मुझ पर मुक्कों की बरसात किये जा रही थी। उसकी इस आवाज़ और मेरे तेज़ हॅसी को सुन कर पीछे साइड ऊपर नीचे बर्थ पर सो रहे सोनम और आदित्य को भी जगा दिया। वो दोनो फौरन ही भाग कर हमारे पास आ गए और इधर का नज़ारा देख कर हैरान रह गए।

"ये तुम दोनो क्या ऊधम मचा रखे हो?" सहसा सोनम ने लगभग ऊॅची आवाज़ में कहा___"तुम दोनो को कुछ होश भी है कि इस वक्त कहाॅ हो तुम दोनो और तुम दोनो की इस हरकत से आस पास वाले कितना डिस्टर्ब हो रहे हैं।"

"दीदी इसने मुझे दादी माॅ बोला।" नीलम ने मुक्के मारना बंद करके शिकायत भरे लहजे मे कहा___"पहले कह रहा था कि मैं बुढ़िया लगती हूॅ फिर बात बदल कर बोला कि मैं दादी माॅ लगती हूॅ।"
"हाॅ तो क्या हो गया?" सोनम दीदी ने हाॅथ नचाते हुए कहा___"उसके ऐसा कहने से क्या तुम सच में दादी माॅ लगने लगी? देखो तो अभी उसके ऊपर बैठी हुई है बेशरम। चल उतर राज के ऊपर से वरना दो चार लगाऊॅगी अभी।"

"नहीं उतरूॅगी।" नीलम ने दो टूक भाव से कहा___"इसने मुझे दादी माॅ क्यों कहा? इससे पहले बोलिए कि ये मुझे बोले कि मैं हूर की परी लगती हूॅ। वरना आप भी देखिये कि कैसे मैं इसे मार मार के इसका भुर्ता बनाती हूॅ?"

"हूर की परी और तू???" मैंने सहसा नीलम की खिल्ली उड़ाने वाले अंदाज़ से कहा___"कभी आईने में अपनी शक्ल देखी है तूने? दादी माॅ तो मैने ऐसे ही कह दिया था तुझे, वरना तो तू बिलकुल बंदरिया लगती है। यकीन न हो तो पूछ ले सोनम दीदी से।"

मेरी इस बात से जहाॅ सोनम दीदी ने अपना सिर पीट लिया वहीं नीलम की त्यौरियाॅ चढ़ गईं। वह एकदम से तमतमाए हुए बोली___"क्या कहा बंदरिया लगती हूॅ? रुक अब तो तुझे सच में नहीं छोंड़ूॅगी। दीदी आप हमारे बीच में मत पड़ना। इसे तो मैं आज छोंडूॅगी नहीं।"

सोनम दीदी चिल्लाती रह गईं जबकि नीलम ने फिर से मुझ पर मुक्कों की बरसात कर दी। मैं महसूस कर रहा था कि वो मुझे मार ज़रूर रही थी मगर बस हल्के हल्के। कदाचित उसे भी इस सबमें मज़ा आ रहा था। किन्तु वो यही ज़ाहिर कर रही थी कि वो मेरी बातों से बेहद गुस्सा हो गई है।

"सोनम दीदी इससे कहिए कि ज्यादा झाॅसी की रानी न बने।" मैने हॅसते हुए कहा___"वरना अगर मैं महाराणा प्रताप बन गया तो फिर ये रोने के सिवा कुछ न कर पाएगी, बंदरिया कहीं की।"
"ओये तू महाराणा प्रताप बन के तो दिखा।" नीलम ने ऑखें निकाली___"मैं भी झाॅसी की रानी से माॅ दुर्गा न बन जाऊॅ तो कहना। बड़ा आया महाराणा प्रताप बनने, बंदर कहीं का।"

"ओये बंदर कौन??" मैने सहसा उसके दोनो हाॅथ पकड़ते हुए कहा___"ठीक से देख आई एम विराज दि ग्रेट।"
"विराज दि ग्रेट माई फुट।" नीलम ने मेरे हाॅथ से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा___"छोंड़ मेरे हाथ वरना नीलम परी को गुस्सा आ जाएगा और फिर विराज दि ग्रेट को मुर्गा बना देगी समझा?"

"मैं क्यों तेरे हाथ छोंड़ूॅ??" मैने कहा___"तू खुद ही छुड़ा ले न। मैं भी तो देखूॅ कि इस बंदरिया में कितना दम है।"
"ओये तू न दम की बात न कर।" नीलम ने कहा___"मैं चाहूॅ तो दो पल में अपने हाथ छुड़ा लूॅ समझा।"
"अच्छा छुड़ा के तो दिखा।" मैने ताव दिया उसे।

"रहने दे रहने दे।" नीलम ने कहा___"वरना बाद में सब तुझ पर ही हॅसेंगे कि खुद को महाराणा प्रताप कहने वाला एक मासूम सी लड़की से हार गया।"
"कोई बात नहीं।" मैने कहा___"तुझसे हारना मंजूर है। आख़िर तू मेरी प्यारी सी बहन है न।"

"अब ये मस्का क्यों लगा रहा है?" नीलम ने चौंकते हुए कहा___"क्या नीलम परी से डर गया है?"
"डरता तो मैं उस परवर दिगार से भी नहीं।" मैने नीलम का हाथ छोंड़ कर अपने हाथ की उॅगली को ऊपर की तरफ करते हुए कहा___"मगर मुझे लगता है कि अब बाॅकी सबको बक्श देना चाहिए जो बेचारे हमारी वजह से शायद डिस्टर्ब हो रहे हैं। दूसरी बात सोनम दीदी ने डंडा उठा लिया तो फिर हम दोनो की ख़ैर नहीं रहेगी। कुछ समझ में आया नीलम परी जी?"

"अगर ऐसी बात है।" नीलम ने इस तरह कहा जैसे अहसान कर रही हो___"तो चल बक्श ही देती हूॅ तुझे भी और बाॅकी सबको भी। मगर आइंदा नीलम परी से टकराने की सोचना भी मत वरना खांमाखां बेइज्जती हो जाएगी तेरी।"

"ओये अब ज्यादा उड़ मत समझी।" मैने उसका हाथ पकड़ कर उसे अपने ऊपर से उठाते हुए कहा___"चल अब उतर नीचे।"

मेरे ऐसा कहने पर नीलम मुस्कुराते हुए मेरे ऊपर से उतर गई मगर अंदाज़ ऐसा था उसका जैसे अभी भी जता रही हो कि आइंदा याद रखना। मुझे उसके इस अंदाज़ पर बड़ी ज़ोर की हॅसी आई मगर मैने खुद को रोंक लिया। उधर सोनम दीदी और आदित्य भी ये सब देख कर मुस्कुरा रहे थे। ख़ैर कुछ ही पलों में मैं और नीलम शीट पर आराम से बैठ गए। आदित्य और सोनम भी हमारी ही शीट पर बैठ गए। आस पास बैठे सब लोग अभी भी हमें हैरानी से देख रहे थे। मैने देखा कि नीलम का चेहरा अब एकदम से खिला खिला लग रहा था। उसके होठों पर बहुत ही हल्की सी मुस्कान थी। वो बार बार मेरी तरफ देखने लगती थी। पता नहीं क्या चल रहा था उसके मन में?

"चलो सुबह तो हो गई है।" सोनम दीदी ने मानो बातों का सिलसिला शुरू किया___"इस वक्त अगर गरमा गरम चाय या काॅफी मिल जाती तो कितना अच्छा होता।"
"हाॅ दीदी।" नीलम ने कहा___"मगर यहाॅ पर अभी ये सब कैसे मिल सकता है भला?"

"चिंता मत करो।" मैने कहा___"अगले स्टाप पर जब ट्रेन रुकेगी तो चाय या काॅफी का बंदोबस्त करने की कोशिश करूॅगा मैं।"
"विराज भाई।" सहसा आदित्य ने कहा___"मैं ज़रा फ्रेश होकर आता हूॅ।"

"ओके भाई तुम जाओ।" मैने कहा___"उसके बाद मुजे भी फ्रेश होना है।"
"और हम भी तो फ्रेश होंगे।" नीलम बोल पड़ी___"इस लिए इनके बाद सबसे पहले मैं जाऊॅगी।"
"हर्गिज़ नहीं।" मैने कहा___"आदि के बाद मैं ही जाऊॅगा।"

"तू जा के दिखाना भला।" नीलम ने मानो धमकी सी दी मुझे।
"ऐ अब तुम दोनो फिर से न शुरू हो जाओ।" सोनम दीदी ने कहा था।
"पर दीदी सेकण्ड नंबर पर मैं ही जाऊॅगी।" नीलम ने बुरा सा मुह बनाया___"इसे कह दीजिए कि ये मेरे बाद चला जाएगा।"

आदित्य हम दोनो की इस बात से मुस्कुराता हुआ उठ कर फ्रेश होने चला गया। जबकि मैने सोनम दीदी के कुछ बोलने से पहले ही कहा___"हाॅ ठीक है तुम ही चली जाना। वैसे भी मुझे इतनी जल्दी नहीं है तेरे जैसे। पहले बता देती तो आदित्य को रोंक देता।"

"ओये अब तू बकवास न कर समझे।" नीलम ने ऑखे दिखाते हुए कहा___"मुझे भी इतनी जल्दी नहीं है।"
"उफ्फ।" सोनम दीदी कह उठी___"तुम दोनो फिर से शुरू हो गए। ओके फाइन अगर तुम दोनो को इतनी जल्दी नहीं है तो मैं चली जाऊॅगी एण्ड दिस इज क्लियर।"

"ये सही कहा दीदी आपने।" मैने हॅसते हुए कहा___"अब आप ही जाना फ्रेश होने। सबसे लास्ट में यही जाएगी।"
"नहींऽऽ।" नीलम एकदम से हड़बड़ा गई___"आदि भैया के बाद मैं ही जाऊॅगी।"
"क्यों अब क्या हुआ तुझे?" सोनम दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा___"अभी तो कह रही थी न कि तुझे कोई जल्दी नहीं है तो अब क्या हुआ?"

"मैं कुछ नहीं जानती।" नीलम ने मानो फैंसला सुना दिया___"आदि भैया के बाद मैं ही जाऊॅगी और अगर आपने दोनो ने मुझे नहीं जाने दिया तो मैं यहीं पर हड़ताल कर दूॅगी।"
"उसे हड़ताल नहीं।" मैने हॅसते हुए कहा___"पोट्टी कर देना कहते हैं पगली।"

"ओये चुप कर तू।" नीलम पहले तो सकपकाई फिर घुड़की सी दी मुझे___"ज्यादा चपड़ चपड़ मत कर वरना ट्रेन के नीचे फेंक दूॅगी तुझे।"
" वैसे बात तो राज ने सही कही है।" सोनम दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा___"उसे हड़ताल करना थोड़ी न कहते हैं।"

सोनम दीदी की इस बात से मेरी हॅसी छूट गई और मेरे साथ ही साथ सोनम दीदी भी हॅसने लगी थी। हम दोनो के हॅसने से नीलम का चेहरा देखने लायक हो गया। ऐसा लगा जैसे वो अभी रो देगी। सामने की शीट पर बैठे लोग भी मुस्कुरा उठे थे। मैने जब देखा कि नीलम कहीं सच में ही न रो दे तो मैने अपनी हॅसी रोंक कर झट से उसे खींच कर खुद से छुपका लिया।

"तुम दोनो बहुत गंदे हो।" नीलम मुझसे अलग होने की कोशिश करते हुए किन्तु रूठे हुए भाव से बोली___"जाओ मुझे तुम दोनो से अब कोई बात नहीं करनी।"
"अरे ऐसा मत करना तू।" मैने उसे मजबूती से छुपकाए हुए कहा___"हड़ताल भले ही यहीं पर कर देना।"

मेरी इस बात से इस बार सोनम दीदी की भी ज़ोरदार हॅसी छूट गई। जबकि मैं नहीं हॅसा क्योंकि मुझे पता था कि मेरे इस बार हॅसने से नीलम की हालत ख़राब हो जाएगी। मैं नहीं चाहता था कि उसका दिल दुख जाए। मुद्दतों बाद तो वो मुझे ऐसे मिली थी। नीलम ने थोड़ी देर मुझसे नाराज़गीवश अलग होने की कोशिश की फिर वो खुद ही मुझसे छुपक कर मुझे कस के पकड़ लिया। वो कुछ बोल नहीं रही थी बल्कि उसने अपनी ऑखें बंद कर ली थी।

ऐसे ही हॅसी मज़ाक करते हुए हम चारो ही बारी बारी से फ्रेश हो गए। अगले स्टाप पर ट्रेन रुकी तो मैं और आदित्य ट्रेन से उतर कर उन दोनो के लिए चाय ले आए। हम चारों ने चाय पी और फिर से बातों में मशगूल हो गए। ट्रेन अपनी गति से चलती रही। बातों बातों में समय का पता ही नहीं चला और सुबह से दोपहर होने को आ गई।

हम गुनगुन स्टेशन के पास पहुॅचने वाले थे। इस बीच नीलम फिर से गंभीर हो गई थी। मैने उसे समझा दिया कि वो सोनम दीदी को लेकर आराम से गाॅव जाए। मैने उसे खासकर ये कहा कि सारी बातों पता वो खुद ही लगाए तो बेहतर होगा। नीलम और सोनम दीदी ने मुझे अपना अपना मोबाइल नंबर दिया और मुझसे भी लिया।

गुनगुन स्टेशन पहुॅच कर ट्रेन रुकी तो हम सब ट्रेन से नीचे उतरने के लिए गेट की तरफ आए। मैने आस पास का मुआयना किया और आदित्य के साथ नीचे उतर आया। हम दोनो के उतरने के बाद नीलम भी सोनम दीदी के साथ उतर आई। मैने नीलम को बता दिया था कि यहाॅ से अब हम साथ नहीं रह सकते क्योंकि यहाॅ से मेरे लिए ख़तरा शुरू था। ख़ैर, उसके बाद मैं और आदित्य बड़ी सावधानी व सतर्कता से स्टेशन से बाहर की तरफ बढ़ चले। जबकि नीलम व सोनम दीदी हमारे काफी पीछे पीछे आ रही थी।

बाहर आकर मैने आस पास का मुआयना किया तो मुझे एक आदमी हमारी तरफ ही आता दिखा। उसकी निगाह हमारी तरफ ही थी। मैं उसे अपनी तरफ आते देख पहले तो हड़बड़ा सा गया, किन्तु जैसे ही वो कुछ पास आया तो मैं उसे पहचान गया। वो रितू दीदी के पुलिस डिपार्टमेन्ट का आदमी था। पास आते ही उसने मुझे अपने पीछे आने का इशारा किया। मैं और आदित्य उसके पीछे चल दिये। मैं आस पास भी नज़रें घुमा रहा था कि कहीं कोई ऐसा आदमी तो यहाॅ मौजूद नहीं है जो अजय सिंह से संबंध रखता हो। मगर मुझे ऐसा कोई नज़र न आया।

उस पुलिस वाले के पीछे चलते हुए हम एक टीयटा कार के पास पहुॅचे। उस आदमी ने हमें कार की पिछली शीट पर बैठने का इशारा किया। उसके इशारे पर हम दोनो कार का पिछला दरवाजा खोल कर अंदर बैठ गए। इस बीच वो पुलिस वाला भी ड्राइविंग शीट पर बैठ चुका था। कुछ ही पल में कार मंज़िल की तरफ बढ़ चली। कार के अंदर बैठ कर मैने एक बार पीछे मुड़ कर देखा मगर नीलम व सोनम दीदी कहीं नज़र न आईं मुझे। मैं उन दोनों के लिए चिंतित भी था कि वो गाॅव तक कैसे जाएॅगी? हलाॅकि मुझे पता था कि उन्हें लेने कोई न कोई बड़े पापा का आदमी आया ही होगा। मगर मैं एक बार पता कर लेना चाहता था। इस लिए मैने मोबाइल निकाल कर नीलम को फोन लगाया। दूसरी रिंग पर ही नीलम ने फोन उठा लिया। मैने उससे पूछा कि वो कहाॅ है अभी तो उसने बताया कि उसके डैड का एक आदमी जीप लेकर आया है और अब वो उसमें बैठ कर गाॅव जाने वाली है। नीलम की ये बात सुन कर मैं बेफिक्र हो गया और फिर काल कट कर दी।

टोयटा कार तेज़ रफ्तार से मंज़िल की तरफ दौड़ी जा रही थी। मैने रितू दीदी को फोन करके बताया कि मैं उनके द्वारा भेजे गए आदमी के साथ आ रहा हूॅ। रितू दीदी मेरी ये बात सुन कर खुश हो गईं और कहने लगी कि मैं जल्दी आ जाऊॅ। मैने उन्हें नीलम व सोनम दीदी के बारे में भी बताया और ट्रेन में हुई सारी बातों के बारे में भी बताया। सारी बातें सुन कर वो पहले तो ख़ामोश रहीं फिर बोली चलो जो हुआ अच्छा ही हुआ। रितू दीदी से बात करने के बाद मैने जगदीश अंकल से थोड़ी देर बात की। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपना वो काम कर दिया है जिसके लिए मैने उन्हें कहा था। जगदीश अंकल से बात करने के बाद मैं आराम से शीट की पिछली पुश्त से पीठ टिका कर तथा ऑखें बंद कर लगभग लेट सा गया। मेरे दिमाग़ में आने वाले समय की कई सारी बातें चल रही थीं।
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उस वक्त दोपहर के एक या डेढ़ बज रहे थे जब अजय सिंह टैक्सी के द्वारा अपनी हवेली पहुॅचा था। उसका दिलो दिमाग़ बुरी तरह भन्नाया हुआ था। उसके अंदर इतना ज्यादा गुस्सा भरा हुआ था कि अगर उसका बस चले तो सारी दुनियाॅ को आग लगा दे मगर अफसोस वह ऐसा कुछ भी नहीं कर सकता था। कुछ करे तो तब जब उसे पता हो कि करना किसके साथ है? और जिसके साथ करना भी है तो वो है कहाॅ???

नीलम और सोनम तो बारह बजे ही हवेली पहुॅच गई थीं। प्रतिमा अपनी बड़ी बहन की बेटी को आज पहली बार ऑखों के सामने देख कर बेहद खुश भी हुई थी और थोड़ा दुखी भी। सोनम अपनी मौसी से इस तरह मिली थी जैसे वह उससे पहली बार नहीं बल्कि पहले भी मिल चुकी हो। शिवा तो अपनी मौसी की बेटी सोनम की खूबसूरती और उसके साॅचे में ढले जिस्म को देख कर आहें भरने लगा था। उसे अपनी मौसी की लड़की पहली नज़र में ही भा गई थी। उसका मन कर रहा था कि जाए और उसे अपनी बाहों में उठा कर सीधी बेड पर पटक कर उसके ऊपर चढ़ बैठे मगर ऐसा संभव नहीं था। प्रतिमा अपने बेटे की मनोदशा को तुरंत ही ताड़ गई थी, इस लिए उसे अकेले में ले जाकर समझाया था कि वो ऐसी कोई भी हरकत न करे जिससे उसके साथ साथ हम सबको बाद में पछताना पड़े। प्रतिमा के समझाने पर शिवा समझ तो गया था मगर ये तो वही जानता था कि बहुत देर तक वो प्रतिमा के समझाने पर रह नहीं पाएगा।

सफ़र की थकान के कारण नीलम व सोनम ने नहा धो कर थोड़ा बहुत खाना खाया और नीलम के कमरे में दोनों एक ही बेड पर सो गईं थी। उधर अजय सिंह टैक्सी से उतर कर टैक्सी वाले को उसका भाड़ा किराया दिया। यद्दपि उसके पास पैसे के नाम पर चवन्नी भी नहीं थी मगर जहाॅ से उसे छोंड़ा गया था वहाॅ से उसे इतना तो रुपया दे ही दिया गया था कि वो आराम से अपने घर पहुॅच जाए। उसका मोबाइल फोन भी उसे वापस लौटा दिया गया था। ये अलग बात थी कि उसके फोन से सिम कार्ड निकाल लिया गया था और फोन के कैन्टैक्ट लिस्ट से सारे फोन नंबर्स डिलीट कर दिये गए थे। कहने का मतलब ये कि उसका मोबाइल फोन फिलहाल महज एक डमी बन कर रह गया था। ना तो वो किसी को फोन कर सकता था और ना ही उसके पास किसी का फोन आ सकता था। यही वजह थी कि अजय सिंह का दिमाग़ बुरी तरह भन्नाया हुआ था।

टैक्सी से जब अजय सिंह उतरा तो हवेली में तैनात उसके आदमी हैरान रह गए। भाग कर उसके पास आए और हाल अहवाल पूछने लगे। मगर भन्नाए हुए अजय सिंह ने सबको डाॅट डपट कर अपने पास से भगा दिया और पैर पटकते हुए मुख्य दरवाजे के पहुॅचा। दरवाजे को ज़ोर से लात मारी उसने। दरवाजा कदाचित अंदर से बंद नहीं था इसी लिए लात का ज़ोरदार प्रहार पड़ते ही उसके दोनो पल्ले खुलते चले गए। दरवाजे के खुलते ही अजय सिंह ज़मीन को रौंदते हुए अंदर की तरफ बढ़ गया।

उधर ड्राइंगरूम में बैठी प्रतिमा बाहर ज़ोर की आवाज़ सुनकर चौंक पड़ी थी। अभी वह ये देखने के लिए सोफे से उठने ही वाली थी सहसा उसे ठिठक जाना पड़ा। सामने से आते अजय सिंह पर नज़र पड़ते ही वह हैरत से बुत सी बन गई। जबकि अजय सिंह आते ही सोफे पर धम्म से लगभग गिर सा पड़ा। धम्म की आवाज़ से ही प्रतिमा की तंद्रा टूटी और वह फिरकिनी की मानिंद अपनी एड़ियों पर घूमी। सोफे पर पसरे अपने पति को अस्त ब्यस्त हालत में देख कर एक बार वो पुनः हैरान हुई फिर जैसे उसने खुद को सम्हाला और एकदम से मानो बदहवाश सी होकर अजय सिंह की तरफ तेज़ी से बढ़ी।

"अ...अजय।" अजय सिंह के पास पहुॅचते ही वह लरजते हुए स्वर में बोल पड़ी___"तु..तुम अ आ गए???"
प्रतिमा के इस तरह पूछने पर अजय सिंह कुछ न बोला बल्कि अपनी ऑखें बंद किये सोफे की पिछली पुश्त से पीठ टिकाए अधलेटा सा पसरा रहा। उसके कुछ न बोलने पर प्रतिमा बुरी तरह घबरा गई। वो झट से अजय सिंह के बगल से बैठी और अजय सिंह के कंधे पर अपना एक हाॅथ रखते हुए बोली___"तुम कुछ बोलते क्यों नहीं अजय? तुम ठीक तो हो न? और...और इस तरह अचानक तुम वहाॅ से कैसे आ गए?"

प्रतिमा के दूबारा पूछने पर भी अजय सिंह कुछ न बोला। उसकी ये ख़ामोशी प्रतिमा की मानो जान लिए जा रही थी। उसका गला भर आया। आवाज़ भारी हो गई तथा ऑखों में ऑसू उमड़ आए।

"अजऽऽऽय।" फिर उसने रुॅधे हुए गले से किन्तु अजय सिंह को झकझोरते हुए लगभग चीख ही पड़ी___"क्या हो गया है तुम्हें? कुछ तो बोलो। तुम इस तरह यहाॅ कैसे आ गए? तुम तो सीबीआई की गिरफ्त में थे न फिर तुम यहाॅ कैसे? कहीं....कहीं तुम उनकी गिरफ्त से भाग कर तो नहीं आ गए हो? अगर ऐसा है तो ये तुमने ठीक नहीं किया अजय। कानून तुम्हें इसके लिए मुआफ़ नहीं करेगा। बल्कि इस तरह भाग कर आने से तुम्हें शख्त से शख्त सज़ा देगा।"

"मैं कहीं से भाग कर नहीं आया हूॅ प्रतिमा।" अजय सिंह ने सहसा खीझते हुए कहा___"बल्कि मुझे उन लोगों ने खुद ही छोंड़ दिया है।"
"क..क..क्या????" प्रतिमा बुरी तरह उछल पड़ी___"उन लोगों ने तुम्हें खद ही छोंड़ दिया? ऐसा कैसे हो सकता है? सीबीआई के वो लोग तुम्हें ऐसे कैसे छोंड़ सकते हैं? बात कुछ समझ में नहीं आई अजय। आख़िर ये क्या माज़रा है? क्या चक्कर है ये?"

"सच कहा प्रतिमा।" अजय सिंह अजीब भाव से कह उठा___"ये चक्कर ही तो है।"
"क्या मतलब??" प्रतिमा चौंकी।
"सच्चाई सुनोगी तो तुम्हारे पैरों तले से ये ज़मीन गायब हो जाएगी।" अजय सिंह ने कहा___"ये सीबीआई का जो मामला हुआ है न ये सब महज एक चाल थी मुझे किसी मकसद के तहत इस सबसे दूर करके कैद करने की।"

"ये क्या कह रहे तुम अजय?" प्रतिमा की के चेहरे पर आश्चर्य मानो ताण्डव करने लगा था___"ये सब एक चाल थी? पता नहीं क्या अनाप शनाप बोल रहे हो तुम।"
"मैं अनाप शनाप नहीं बोल रहा प्रतिमा।" अजय सिंह ने सहसा आवेश में आकर कहा___"यही सच है। जो सीबीआई वाले मुझे गिरफ्तार करने आए थे वो सब नकली थे। उनका सीबीआई से कोई ताल्लुक नहीं था। जबकि मैं और तुम सब यही समझे थे कि वो सब सीबीआई के ऑफिसर थे।"

"हे भगवान।" प्रतिमा ने मुख से बेशाख्ता निकल गया___"इतना बड़ा धोखा। अगर वो सीबीआई के लोग नहीं थे तो फिर कौन थे वो? और वो लोग तुम्हें यहाॅ से पकड़ कर क्यों ले गए थे और कहाॅ ले गए थे? आख़िर ये सब करने के पीछे उनका क्या मकसद था? कहीं ये सब हमारी बेटी रितू ने तो नहीं करवाया?"

"नहीं प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा___"ये काम रितू का नहीं है बल्कि ये सब उस हरामज़ादे विराज किया धरा था।"
"ये क्या कह रहे हो तुम?" प्रतिमा बुरी तरह चौंकी थी, बोली___"भला वो ये सब कैसे कर सकता है?"
"क्यों नहीं कर सकता?" अजय सिंह उल्टा प्रतिमा पर ही हवाल लेकर चढ़ बैठा___"तुम्हीं तो कहा करती थी न कि इस सबके पीछे अगर कोई हो सकता है तो वो है विराज। वही है जो हमारा अहित करना चाहता है क्योंकि हमने उसके साथ अत्याचार किया है?"

"हाॅ मगर।" प्रतिमा गड़बड़ा सी गई___"ये सब भी कर सकता है वो ये तो नामुमकिन सी बात है अजय।"
"ये सब उसी ने करवाया है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा___"क्योंकि जिस जगह मुझे रखा गया था वो सब उसी का ज़िक्र कर रहे थे। मैं ये सोच सोच कर आश्चर्यचकित था कि उस नामुराद के ऐसे लोगों से संबंध कैसे हो सकते हैं। आख़िर वो कमीना इतने कम समय में ऐसा कौन सा सूरमा बन गया है जिसके इशारे पर उसका हर काम हो जाए?"

"तुम क्या कह रहे हो अजय मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा।" प्रतिमा ने अपने बाल नोंच लेने वाले अंदाज़ से कहा था।
"कमाल की बात है।" अजय सिंह ने कहा___"अपने आपको दिमाग़ की जादूगरनी समझने वाली को आज मेरी ये बातें समझ में ही नहीं आ रहीं। ख़ैर, बात ये है ये जो कुछ भी हुआ है उसमें सिर्फ और सिर्फ उस गौरी के पिल्ले का ही हाॅथ है। मुझे ये नहीं समझ में आ रहा कि उस कमीने ने आख़िर किस मकसद के तहत मुझे दो दिन के लिए सीबीआई के नकली जाल में फॅसा कर कैद में रखा और फिर आज छोंड़ भी दिया।"

"ये तो सचमुच बड़े आश्चर्य की बात है अजय।" प्रतिमा ने चकित भाव से कहा___"सचमुच ये सोचने वाली बात है कि उसने किस वजह से ऐसा किया होगा? हलाॅकि वो चाहता तो बड़ी आसानी अपना बदला तुम्हारी जान लेकर ले सकता था और तुम यकीनन कुछ नहीं कर सकते थे। मगर उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया बल्कि उल्टा तुम्हें बिना कोई नुकसान पहुॅचाए छोंड़ भी दिया। ये ऐसी बात है अजय जो आसानी से हजम नहीं हो सकती। हम जिस चीज़ को बेतुकी और ना क़ाबिले ग़ौर बात समझ रहे हैं उसमें कुछ तो पेंच ज़रूर है। बेवजह तो औसने ये सब नहीं किया होगा। ज़रूर ये सब करके उसने अपना कोई अहम कार्य सिद्ध किया होगा। कोई ऐसा कार्य जो फिलहाल हमारी सोच क्या कल्पना से भी कोसों दूर है।"

"यकीनन तुम्हारी बात में सच्चाई है।" अजय सिंह ने कहा___"इस सबसे एक बात ये भी ज़ाहिर होती है कि वो अब भी यहीं है और शायद इस वक्त रितू के साथ ही है।"
"अच्छा ये बताओ।" प्रतिमा ने पहलू बदला___"कि जो सीबीआई के लोग बन कर आए थे वो लोग तुम्हें लेकर कहाॅ गए थे?"

"इस बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता चल सका।" अजय सिंह ने हताश भाव से कहा था।
"क्या मतलब??" प्रतिमा पुनः बुरी तरह चौंकी थी।

"उन लोगों ने सब कुछ पहले से प्लान किया हुआ था प्रतिमा।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली___"जब वो लोग मुझे यहाॅ से अपनी कार में बैठा कर ले जा रहे थे तभी किसी ने पीछे से मुझे बेहोश कर दिया था और फिर जब मेरी ऑख खुली तो मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया कि मैं किस जगह आ गया हूॅ? वहाॅ जिस जगह पर मैं था वहाॅ एक कमरा था जो कि किसी फाइव स्टार होटल के कमरे से हर्गिज़ भी कम न था। कमरे में दूसरा कोई नहीं था। ऐसा नहीं था कि मैं वहाॅ पर कहीं आ जा नहीं सकता था। बल्कि कहीं भी आ जा सकता था मगर उस जगह से बाहर की दुनियाॅ में जाने का जैसे कोई रास्ता ही नहीं था। कमरे से बाहर जहाॅ भी गया हर तरफ ब्लैक कलर की वर्दी में नकाबपोश अपने हाथों में गन लिए तैनात थे। वो किसी से कोई बात नहीं करते थे। जो सीबीआई के ऑफिसर बन कर आए थे उनका कहीं पता ही नहीं था। मैं उन गनधारी नकाबपोशों से चीख चीख कर पूछता रहा कि मुझे यहाॅ किस लिए लाया गया है मगर कोई कुछ बोलता ही नहीं था। उस दिन तो सारा दिन और रात मैं पागलों की तरह ही उन सबके सामने चीखता चिल्लाता रहा। फिर जब मुझे लगा कि यहाॅ पर मेरे चीखने चिल्लाने का कोई असर नहीं होने वाला तो मैं ख़ामोश हो गया। इतना तो मुझे भी पता था कि वजह कोई भी हो वो मेरे सामने ज़रूर आएगी। इस लिए ये सोच कर मैं वापस कमरे में चला गया और अपने वहाॅ होने की वजह जानने का इन्तज़ार करने लगा। वहाॅ पर जब भी मुझे किसी चीज़ की ज़रूरत होती वो मुझे मिल जाती थी। मैं आज़ाद तो था मगर फिर भी कैद ही था वहाॅ। मेरा मोबाइल फोन मेरे पास से गायब था। अतः मैं किसी अपने से कोई काॅटैक्ट भी नहीं कर सकता था।"

"ओह तो फिर आज तुम्हें उन लोगों ने कैसे छोंड़ दिया?" प्रतिमा ने पूछा___"क्या तुम्हें पता चला कि उन लोगों ने तुम्हें क्यों पकड़ा था? और सबसे बड़ी बात ये कि तुम्हें ये कैसे पता चला कि वो सब विराज का किया धरा था?"

"आज ही पता चला।" अजय सिंह ने कहा___"मैं वहाॅ पर कमरे में रखे अलीशान बेड पर लेटा हुआ था कि तभी कमरे में दो गनधारी नकाबपोश आए और मैने पहली बार उनके मुख से उनकी आवाज़ सुनी। उनमें से एक ने कहा कि मैं बाहर आऊ। मुझसे मिलने उनके कुछ साहब लोग आए हैं। मैं उस गनधारी नकाबपोश की ये बात सुनकर जल्दी से बेड पर उठ बैठा। अड़तालीस घंटे में ये पहला अवसर था जब मुझे किसी से ये जानने का अवसर मिलने वाला था कि मुझे यहाॅ क्यों लाया गया है? अतः मैं उन दोनो गनधारियों के साथ कमरे से बाहर आ गया। बाहर लंबे चौड़े हाल के बीचो बीच एक मध्यम साइज़ की टेबल रखी थी तथा उसके चारो तरफ कुर्सियाॅ रखी हुई थी। मैने टेबल और कुर्सियाॅ उस हाल में पहली बार ही देखा था। टेबल के एक तरफ की चारों कुर्सियों पर एक एक कोटधारी आदमी बैठा था। मैं जब उनके पास पहुॅचा तो उनमें से एक ने मुझे अपने सामने बैठने का इशारा किया। ये वही लोग थे जो मुझे यहाॅ से सीबीआई ऑफिसर बन कर ले गए थे। सच कहूॅ तो उस वक्त उन चाओं को देख कर मुझे बेहद गुस्सा आया मगर मैंने फिर खुद पर बड़ी मुश्किल से काबू किया।

"कहो अजय सिंह।" उन चार में से एक ने बड़ी जानदार मुस्कान के साथ मुझसे कहा___"यहाॅ किसी प्रकार की कोई परेशानी तो नहीं हुई न तुम्हें?"
"मेरी परेशानी की अगर इतनी ही फिक्र होती तुम लोगों को।" मैने आवेशयुक्त भाव से कहा___"तो मुझे इस तरह धोखे से पकड़ कर नहीं लाते यहाॅ।"

"ओह आई सी।" उसने खेद प्रकट करते हुए कहा__"माफ़ करना अजय सिंह। हमें तुम्हारे साथ धोखे के रूप में वो वैसी ज्यादती करनी पड़ी। मगर इसमें भी हमारी कोई ग़लती नहीं थी डियर। दरअसल हमारे विराज सर का ही आदेश था हम तुम्हें इस प्रकार हवेली से गिरफ्तार करके यहाॅ ले आएॅ।"

"वि..विराज..सर???" मैं उसकी ये बात सुन कर एकदम से भौचक्का सा रह गया था।
"अरे तुम हमारे विराज सर को नहीं जानते क्या?" एक अन्य ने मुस्कुराते हुए कहा___"कमाल है अजय सिंह। तुम अपने भतीजे को ही नहीं जातने। ये तो बड़ी हैरत की बात है। जबकि हमारे विराज सर तुमसे इतना स्नेह व लगाव रखते हैं कि वो तुम्हें यहाॅ पर किसी भी तरह की तक़लीफ़ नहीं देना चाहते थे। उनका शख्त आदेश था कि तुम्हें यहाॅ पर किसी भी तरह की कोई परेशानी न होने पाए। तभी तो हमने उनके कहने पर तुम्हारे लिए यहाॅ फाइव स्टार होटल से भी बेहतर सुविधाएॅ मुहैया कराई थी।"

"तो तुम्हारा मतलब है कि ये सब तुमने विराज के आदेश पर किया है?" मैं मन ही मन हैरान था, किन्तु प्रत्यक्ष में कठोर भाव से पूछ रहा था___"मगर क्यों?"
"तुम्हारे इस क्यों का जवाब तो हमारे पास है ही नहीं अजय सिंह।" उस आदमी ने कहा___"हमने तो बस उतना ही किया है जितना कि विराज सर ने हमें करने के लिए कहा था। इसके पीछे उनकी क्या मंशा थी ये तो वहीं बेहतर तरीके से बता सकते हैं तुम्हें।"

"अच्छा।" मैने कहा___"तो फिर बुलाओ उसे। मैं उससे पूछना चाहता हूॅ कि उसने क्या सोच कर ये सब किया है?"
"उन्हें यहाॅ बुलाने की हिम्मत तो हममें नहीं है।" एक अन्य ने कहा___"हाॅ मगर एक आदेश और आया है उनका हमारे लिए। वो ये कि तुम्हें बाइज्ज़त यहाॅ से आज़ाद कर दिया जाए। इस लिए अब हम वही करने वाले हैं। यानी कि अब तुम्हें आज़ाद कर दिया जाएगा। मगर क्योंकि हम अपना हर काम सीक्रेट तरीके से करते हैं इस लिए तुम्हें पुनः बेहोश करना पड़ेगा हमें।"

मैं उसकी ये बात सुनकर बुरी तरह हैरान रह गया। तभी किसी ने पीछे से मेरी नाॅक में कुछ लगा दिया। जैसे ही मैने नाॅक से साॅस ली उसके कुछ ही पलों बाद मैं बेहोशी के समंदर में डूबता चला गया। जब मेरी ऑख खुली तो मैं अब किसी दूसरी जगह पर खुद को मौजूद पाया। मेरे आस पास बड़े बड़े पेड़ पौधे लगे हुए थे। मैं ये देख कर पहले तो चौंका फिर उठ कर आस पास का जायजा लेने लगा। मैं ये देख कर उछल पड़ा कि मैं किसी जंगल के हिस्से पर पड़ा था। बाएॅ तरफ लगभग पचास या साठ गज की दूरी पर ही एक सड़क नज़र आ रही थी।

अस्त ब्यस्त हालत में मैं कुछ देर वहीं पर बैठा अपने साथ घटी पिछली सभी बातों के बारे में सोचता रहा। उसके बाद मैं किसी तरह उठा और कुछ दूरी पर नज़र आ रही सड़क की तरफ चल दिया। मैं ये समझ चुका था कि उन लोगों ने मुझे आज़ाद कर दिया था। मुझे बेहोश इस लिए किया गया था ताकि मैं उस जगह के बारे में कतई न जान सकूॅ कि उन लोगों ने मुझे कहाॅ पर रखा था। मैं ये भी समझ चुका था कि मैं चाह कर भी अब उन लोगों तक नहीं पहुॅच सकता जो लोग नकली सीबीआई के ऑफिसर बन कर हवेली से मुझे गिरफ्तार करके ले गए थे।

सड़क पर आकर मैं किनारे पर ही खड़ा हो गया और सड़क के दोनो तरफ देखने लगा। मुझा अपने मोबाइल का ख़याल आया तो अनायास ही मेरे दोनो हाथ मेरी पैंट के दोनो पाॅकेट पर रेंग गए। मैं ये जान कर चौंका तथा हैरान हुआ कि मोबाइल मेरी बाई पाॅकेट में मौजूद है। मैने जल्दी से उसे निकाला और स्विच ऑन किया। मगर मैं ये देख कर भौचक्का रह गया कि मोबाईल में मौजूद दोनो सिम कार्ड गायब थे। उसमे नेटवर्क होने का सवाल ही नहीं था। मैने फोन में काॅटैक्ट लिस्ट देखा तो मेरे होश उड़ गए। क्योंकि उसमे से सारे नंबर टिलीट कर दिये गए थे। कहने का मतलब ये कि मैं मौजूदा हालत में किसी को ना तो फोन कर सकता था और ना ही मेरे मोबाइल फोन पर किसी का फोन आ सकता था। ये देख कर मेरा खून खौल गया। उन लोगों पर मुझे भयानक गुस्सा आ गया। ऊपर से साले ऐसी जगह मुझे फेंक दिया था जहाॅ से किसी वाहन का आना जाना भी लगभग न के बराबर था।

सड़क पर मैं घंटों खड़ा रहा किसी वाहन के इन्तज़ार में मगर कोई भी वाहन आता जाता नज़र न आया। प्रतिपल उस हालत में मेरे अंदर गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था। आख़िर डेढ़ घंटे इन्तज़ार करने के बाद एक टैक्सी आती हुई नज़र आई। उसे देख कर मुझे थोड़ी राहत तो हुई मगर अगले ही पल ये सोच कर मैं मायूस हो गया कि इस वक्त किसी वाहन में जाने के लिए मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है। इसके बावजूद मैने अपनी सभी पाॅकेट पर हाॅथ फेरा और अगले ही पल मैं चौंका। पैन्ट की पिछली जेब में मुझे कुछ महसूस हुआ। मैने फौरन ही उस चीज़ को निकाला तो मुझे एक पाॅच सौ का नोट नज़र आया।

पाॅच सौ का नोट उस वक्त मैं इस तरह देख रहा था जैसे मैने कभी उसे देखा ही न हो और सोचने लखा था कि इस प्रकार का ये काग़ज आख़िर है क्या चीज़? ख़ैर, वो टैक्सी जब मेरे क़रीब पहुॅचने को हुई तो मैने उसे रुकने के लिए हाॅथ से इशारा किया। मेरे इशारे पर वो टैक्सी मेरे पास पहुॅच कर रुक गई। मैने देखा कि उसमें जो ड्राइवर था वो कोई पैंतीस के आस पास का काला सा आदमी था। टैक्सी को रुकते ही उसने विंडो से अपना सिर बाहर की तरफ निकाल कर मुझसे पूछा कहाॅ जाना है? मैने उसे पता बताया तो उसने अंदर बैठने का इशारा किया। लेकिन उससे पहले ये बताना न भूला था कि भाड़ा पाॅच सौ रुपये लगेगा। मैं उसके भाड़े का सुन कर मन ही मन चौंका। मगर बोला यही कि ठीक है भाई ले लेना मगर मुझे बताए गए पते पर पहुॅचा दो। बस ये कहानी थी।"

"बड़ी हैरत व बड़ी अजीब कहानी है।" प्रतिमा ने सोचने वाले भाव से कहा___"इसका मतलब उन लोगों ने तुमें ऐसी जगह छोंड़ा था जहाॅ से अगर कोई वाहन मिलता भी तो वो तुमसे भाड़े के रूप पाॅच सौ रुपये ही माॅगता और इसी लिए उन लोगों ने तुम्हारी जेब में पाॅच सौ रुपये डाल दिये थे ताकि तुम आराम से यहाॅ तक पहुॅच सको। ये तो कमाल ही हो गया अजय।"

"कमाल तो हो ही गया।" अजय सिंह ने सोचने वाले अंदाज़ में कहा___"मगर मुझे ऐसा लगता है जैसे वो टैक्सी वाला भी साला उन्हीं का आदमी था। क्योंकि जिस रास्ते पर वो मिला था उस रास्ते पर डेढ़ घंटे इन्तज़ार करने के बाद ही उस टैक्सी के रूप में वाहन मिला था। टैक्सी पर कोई दूसरी सवारी नहीं थी बल्कि ड्राइवर के अलावा सारी टैक्सी खाली ही थी।"

"बिलकुल ऐसा हो सकता है अजय।" प्रतिमा के मस्तिष्क में जैसे झनाका सा हुआ था, बोली___"यकीनन वो टैक्सी और वो टैक्सी ड्राइवर उन लोगों का ही आदमी था। अगर ऐसा है तो इसका मतलब ये भी हुआ कि पाॅच सौ रुपया जहाॅ से आया था तुम्हारे पास वो वापस वहीं लौट भी गया। क्या कमाल का गेम खेला है उन लोगों ने।"

"उन लोगों ने नहीं प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा___"बल्कि उस हरामज़ादे विराज ने। मुझे तो अब तक यकीन नहीं हो रहा कि वो सब विराज के आदमी हैं और विराज के ही हुकुम पर उन लोगों ने ये संगीन कारनामा अंजाम दिया था। तुम ही बताओ प्रतिमा क्या तुम सोच सकती हो कि कल का छोकरा कहीं पर बैठे बैठे ऐसा कोई कारनामा कर सकता है?"

"बेशक नहीं सोच सकती अजय।" प्रतिमा ने गंभीरता से कहा___"मगर शुरू से लेकर अब तक की उसकी सारी गतिविधियाॅ ऐसी रही हैं कि अब अगर वो कुछ भी अविश्वसनीय करे तो सोचा जा सकता है। इससे एक बात ये भी साबित होती है कि वो कोई मामूली चीज़ नहीं रह गया है। या तो उसे किसी पहुॅचे हुए ब्यक्ति का आशीर्वाद प्राप्त है या फिर सच में वो इतना क़ाबिल हो गया है कि वो आज के समय में हर चीज़ अफोर्ड कर सकता है।"

"यही तो हजम नहीं हो रहा प्रतिमा।" अजय ने झुंझलाहट के मारे कहा___"इतने कम समय में आख़िर उसने ऐसा क्या पा लिया है जिसके बलबूते पर वो कुछ भी कर सकने की क्षमता रखता है? आज के समय में सच्चाई और नेकी कक राह पर चलते हुए इतनी बड़ी चीज़ अथवा कामयाबी नहीं पाई जा सकती। ज़रूर वो कोई ग़लत काम कर रहा है। हाॅ प्रतिमा, ग़लत कामों के द्वारा ही कम समय में बड़ी बड़ी चीज़ें हाॅसिल होती हैं, फिर भले ही चाहे उन बड़ी बड़ी चीज़ों की ऊम्र छोटी ही क्यों न हो।"

"यकीनन अजय।" प्रतिमा ने कहा___"ऐसा ही लगता है। मगर सबसे बड़े सवाल का जवाब तो अभी तक नहीं मिला न।"
"कौन सा सवाल?" अजय सिंह चौंका।
"यही कि उसने तुम्हारे साथ।" प्रतिमा ने कहा___"मेरा मतलब है कि उसने तुम्हें नकली सीबीआई वालों के द्वारा गिरफ्तार करवा के दो दिन तक किसी गुप्त कैद में रखा तो इसमें उसका क्या मकसद छिपा था? आख़िर उसने तुम्हें कैद करवा के अपना कौन सा उल्लू सीधा किया हो सकता है? हमारे लिए ये जानना बेहद ज़रूरी है अजय। आख़िर पता तो चलना ही चाहिए इस सबका।"

"पता चलना तो चाहिए।" अजय सिंह ने कहा___"मगर कैसे पता चलेगा? हमारे पास ऐसा कोई छोटा से भी छोटा सबूत या क्लू नहीं है जिसके आधार पर हम कुछ जान सकें।"
"एक सवाल और भी है अजय।" प्रतिमा ने कुछ सोचते हुए कहा___"जो कि कुछ दिनों से मेरे दिमाग़ में चुभ सा रहा है।"

"ऐसा कौन सा सवाल है भला?" अजय सिंह के माथे पर शिकन उभरी।
"यही कि हमारी बेटी रितू।" प्रतिमा ने कहा___"जब से हमसे खिलाफ़ हुई है तब से वो घर वापस नहीं आई। तो सवाल ये है कि वो रहती कहाॅ है? मुझे लगता है कोई ऐसी जगह ज़रूर है जहाॅ पर वो नैना और विराज के साथ रह रही है। ऐसी कौन सी जगह हो सकती है?"

प्रतिमा की इस बात से अजय सिंह उसे इस तरह देखता रह गया था मानो प्रतिमा के सिर पर अचानक ही दिल्ली का लाल किला आकर खड़ा हो गया हो। फिर जैसा उसे होश आया।

"सवाल तो यकीनन वजनदार है।" फिर अजय सिंह ने कहा___"मगर संभव है कि वो यहीं कहीं आस पास ही किसी के घर में कमरा किराये पर लिया हो और हमारे पास रह कर ही वो हमारी हर गतिविधी पर बारीकी से नज़र रख रही हो।"

"हो सकता है।" प्रतिमा ने कहा___"मगर हमारे इतने क़रीब रहने की बेवकूफी वो हर्गिज़ भी नहीं कर सकती जबकि उसे बखूबी अंदाज़ा हो कि पकड़े जाने पर उसके साथ साथ नैना और विराज का क्या हस्र हो सकता है। इस लिए इस गाॅव में वो किसी के घर में पनाह नहीं ले सकती।"

"इस गाॅव में न सही।" अजय सिंह बोला___"किसी ऐसे गाॅव में तो पनाह ले ही सकती है जो हमारे इस हल्दीपुर गाॅव के करीब भी हो और वो बड़ी आसानी से हमारी हर मूवमेन्ट को कवरप कर सके।"
"हाॅ ये हो सकता है।" प्रतिमा ने कहा___"किसी दूसरे गाॅव में वो यकीनन रह रही है और हम पर बारीकी से नज़र रखे हुए है। ख़ैर छोंड़ो ये सब बातें, मैं ये कह रही हूॅ कि आज तुम्हारे ससुर जी आ रहे हैं।"

"क क्या???" अजय सिंह उरी तरह चौंका___"स ससुर जी? मतलब कि तुम्हारे पिता जगमोहन सिंह जी??"
"हाॅ डियर।" प्रतिमा ने सहसा खुश होते हुए कहा___"आज वर्षों बाद मैं अपने पिता जी से मिलूॅगी। मगर अजय मुझे अंदर से ऐसा लग रहा है जैसे मैं उनके सामने जा ही नहीं पाऊॅगी। तुम तो जानते हो कि मैने तुमसे शादी उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ जाकर तथा उनसे हर रिश्ता तोड़ कर की थी। इतने वर्षों के बीच कभी भी मैने उनसे न मिलने की कोशिश की और ना ही कभी उनसे फोन पर बात करने की। ये एक अपराध बोझ है अजय जिसके चलते मुझमें हिम्मत नहीं है कि मैं अपने पिता का सामना कर सकूॅ।"

"पर मैं इस बात से हैरान हूॅ।" अजय सिंह ने चकित भाव से कहा___"कि इतने वर्षों बाद उन्हें अपनी बेटी की याद कैसे आई और यहाॅ आने का विचार कैसे आया उनके मन में?"
"ये सब मेरी वजह से ही हुआ है अजय।" प्रतिमा ने कहा___"दरअसल जब तुम्हें सीबीआई के वो लोग गिरफ्तार करके ले गए थे तब मैं बहुत परेशान व घबरा गई थी। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि कैसे मैं तुम्हें सीबीआई की कैद से आज़ाद कराऊॅ? तब पहली बार मुझे अपने पिता का ख़याल आया। हाॅ अजय, तुम तो जातने हो कि मेरे पिता जी बहुत बड़े वकील हैं। कैसा भी केस हो उनके अंडर में आने के बाद उनका मुवक्किल बाइज्ज़त बरी ही होता है। इस लिए मैने सोचा कि तुम्हें कानून की उस गिरफ्त से छुड़ाने के लिए मुझे अपने पिता से ही मदद लेनी चाहिए। मगर चूॅकि मैने उनसे अपने हारे संबंध वर्षों पहले ही तोड़ लिये इस लिए हिम्मत नहीं हो रही थी उनसे बात करने की।"

"ओह।" अजय सिंह हैरत से बोला___"फिर क्या हुआ?"
अजय सिंह के पूछने पर प्रतिमा ने सारा किस्सा बता दिया उसे। ये भी कि कैसे उसके चक्कर खा कर गिरने पर शिवा ने रिऐक्ट किया जिसके तहत उसके पिता जी भी घबरा गए और फिर उन्होंने तुरंत यहाॅ आने के लिए कहा। उनके पूछने पर ही शिवा ने उन्हें यहाॅ का पता भी बताया था। सारी बातें सुन कर अजय सिंह अजीब सी हालत में सोफे पर बैठा रह गया।

"ये तुमने अच्छा नहीं किया प्रतिमा।" फिर अजय सिंह मानो गंभीरता की प्रतिमूर्ति बना बोला___"मैं इस बात से दुखी नहीं हुआ हूॅ कि मेरे सुसर और तुम्हारे यहाॅ आ रहे हैं बल्कि दुखी इस बात पर हुआ हूॅ कि ऐसे हालात में उनका आगमन हो रहा है। तुमें तो सब पता ही है डियर हमारे हालातों के बारे में। तुम्हारे पिता एक तेज़ तर्रार व क़ाबिल वकील हैं तथा उनका दिमाग़ तेज़ गति से काम करता है। इस लिए अगर इस हालातों के संबंध में कोई एक बात शुरू हुई तो समझ लो कि फिर उस बात से और भी बहुत सी बातें शुरू हो जाएॅगी। उस सूरत में हमारी हालत और भी ख़राब हो सकती है। हम भला ये कैसे चाह सकते हैं कि हमारी असलियत उनके सामने फ़ाश हो जाए?"

"तुम सच कह रहे हो अजय।" प्रतिमा को भी जैसे वस्तु- स्थिति का एहसास हुआ___"इस बारे में तो मैने सोचा ही नहीं था। सोचने का ख़याल ही नहीं आया अजय। हालात ही ऐसे थे कि मुझे मजबूर हो कर अपने पिता डी से बात करनी पड़ी और उन्होंने यहाॅ आने का भी कह दिया। दूसरी बात मुझे तो ये ख्वाब में भी उम्मीद नहीं थी कि तुम आज वापस इस तरह आ जाओगे। वरना मैं अपने पिता को फोन ही नहीं करती।"

"इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है डियर।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली___"तुमने जो कुछ भी किया उसमें सिर्फ तुमहारी अपने पति के प्रति चिंता व फिक्र थी। ख़ैर अब जो हो गया सो हो गया मगर अब हमें बड़ी ही होशियारी और सतर्कता से काम लेना होगा। तुम उन्हें ये नहीं बताओगी कि कल तुमने उन्हें किस वजह हे फोन किया था बल्कि यही कहोगी कि तुम्हें उनकी बहुत याद आ रही थी। दूसरी बात शिवा को भी समझा दो कि वो उनके सामने ऐसी कोई भी बात न करे जिससे किसी भी तरह की बात खुलने का चाॅस बन जाए।"

"हमारी दूसरी बेटी नीलम भी तो आज आ गई है मुम्बई से।" प्रतिमा ने कहा___"इतना ही नहीं उसके साथ में मेरी बहन की बेटी सोनम भी है।"
"क्या????" अजय सिंह चौंका।
"हाॅ अजय।" प्रतिमा ने बेचैनी से कहा___"वो दोनो ऊपर कमरे में इस वक्त सो रही हैं।"

"अरे तो तुम उनके पास जाओ।" अजय सिंह एकदम से फिक्रमंद हो उठा था, बोला___"और उन दोनो को अच्छी तरह समझा दो कि वो दोनो अपने नाना जी के सामने हालातों के संबंध में किसी भी तरह की कोई बात नहीं करेंगी।"
"ठीक है।" प्रतिमा ने सोफे से उठते हुए कहा___"मैं अभी जाती हूॅ उनके पास और सब कुछ समझाती हूॅ उन्हें।"

ये कह कर प्रतिमा तेज़ तेज़ क़दमों के साथ ऊपर के कमरे में जाने के लिए सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई। जबकि उसके जाने के बाद अजय सिंह एक बाथ पुनः असहाय सा सोफे की पिछली पुश्त से पीठ टिका कर पसर गया था। चेहरे पर चिंता व परेशानी के भाव गर्दिश करते हुए नज़र आ रहे थे।

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दोस्तो, आप सबके सामने अपडेट हाज़िर है। आप सबकी प्रतिक्रिया और आपके शानदार रिव्यू का इन्तज़ार रहेगा।
 
एकनयासंसार
अपडेट........《 53 》

अब तक,,,,,,,,

"इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है डियर।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली___"तुमने जो कुछ भी किया उसमें सिर्फ तुमहारी अपने पति के प्रति चिंता व फिक्र थी। ख़ैर अब जो हो गया सो हो गया मगर अब हमें बड़ी ही होशियारी और सतर्कता से काम लेना होगा। तुम उन्हें ये नहीं बताओगी कि कल तुमने उन्हें किस वजह हे फोन किया था बल्कि यही कहोगी कि तुम्हें उनकी बहुत याद आ रही थी। दूसरी बात शिवा को भी समझा दो कि वो उनके सामने ऐसी कोई भी बात न करे जिससे किसी भी तरह की बात खुलने का चाॅस बन जाए।"

"हमारी दूसरी बेटी नीलम भी तो आज आ गई है मुम्बई से।" प्रतिमा ने कहा___"इतना ही नहीं उसके साथ में मेरी बहन की बेटी सोनम भी है।"
"क्या????" अजय सिंह चौंका।
"हाॅ अजय।" प्रतिमा ने बेचैनी से कहा___"वो दोनो ऊपर कमरे में इस वक्त सो रही हैं।"

"अरे तो तुम उनके पास जाओ।" अजय सिंह एकदम से फिक्रमंद हो उठा था, बोला___"और उन दोनो को अच्छी तरह समझा दो कि वो दोनो अपने नाना जी के सामने हालातों के संबंध में किसी भी तरह की कोई बात नहीं करेंगी।"
"ठीक है।" प्रतिमा ने सोफे से उठते हुए कहा___"मैं अभी जाती हूॅ उनके पास और सब कुछ समझाती हूॅ उन्हें।"

ये कह कर प्रतिमा तेज़ तेज़ क़दमों के साथ ऊपर के कमरे में जाने के लिए सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई। जबकि उसके जाने के बाद अजय सिंह एक बाथ पुनः असहाय सा सोफे की पिछली पुश्त से पीठ टिका कर पसर गया था। चेहरे पर चिंता व परेशानी के भाव गर्दिश करते हुए नज़र आ रहे थे।

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अब आगे,,,,,,,,

उधर पुलिस वालों की कार से मैं और आदित्य भी सुरक्षित रितू दीदी के पास फार्महाउस पर पहुॅच गए थे। सारे रास्ते मैं सारी बातों और सारे हालातों के बारे में बारीकी से मनन करता आया था। इस जंग में मुझे दो ताकतों से भिड़ना था। एक तो अपने ताऊ अजय सिंह से और दूसरा मंत्री से। रितू दीदी ने मुझे मंत्री के संबंध में सारी बातें बता दी थी। मैं जान कर खुश था कि रितू दीदी के पास मंत्री के खिलाफ़ ऐसे सबूत हैं कि वो जब चाहे उस मंत्री और उसके साथियों को बीच चौराहे पर नंगा दौड़ने पर बिवश कर दें। इधर वही हाल मेरा भी था। मेरे पास भी अजय सिंह के खिलाफ़ ऐसे सबूत थे कि उन सबूतों के आधार पर अजय सिंह पलक झपकते ही कानून की ऐसी गिरफ्त में पहुॅच जाएगा जहाॅ से बच कर निकलना उसी तरह नामुमकिन था जैसे किसी नदी के दो किनारोउअं आपस मिलना नामुमकिन ही नहीं असंभव होता है।

मेरे मन में कभी कभी ये ख़याल भी आता था कि इस खेल को एक पल में खत्म कर दूॅ। यानी ग़ैर कानूनी धंधा करने और अवैध गैर कानूनी ऐसा पदार्थ रखने के जुर्म में अजय सिंह ऊम्र भर का लिए जेल की सलाखों के पीछे चला जाए जो पदार्थ किसी भी इंसान की ज़िंदगी खत्म करने के लिए काफी थे। मगर मैं ऐसा करना नहीं चाहता था बल्कि मैं तो अजय सिंह को खुद अपने हाथों से ऐसी सज़ा देना चाहता था कि वो मौत के लिए गिड़गिड़ाए मगर मौत उसे नसीब न हो सके।

मुझे इस बात का भी एहसास था कि आज भले ही मंत्री सच्चाई को पूरी तरह न जानता हो मगर देर सवेर उसे सब कुछ पता चल ही जाएगा। वो चुप नहीं बैठेगा बल्कि कुछ तो ऐसा करेगा ही कि उसके गले में फॅसी हुई हड्डी निकल सके और उसके बच्चे सही सलामत उसे वापस मिल सकें। मुझे एहसास था कि ये दोनो ही ताकतें बहुत ही खतरनाक साबित हो सकती है हमारे लिए। हम अभी तक इसी लिए सेफ रह सके थे क्योंकि हमने खुल कर तथा सामने आकर कोई काम नहीं किया था। बल्कि हर काम दोनो ताकतों की ग़ैर जानकारी में एवं छुप कर किया था। मगर हालात ज्यादा दिन तक ऐसे ही नहीं बने रह सकते थे। इस लिए इन सब बातों पर विचार करके मुझे सबसे पहले अपनी सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करना था।

फार्महाउस पर हमें छोंड़ कर वो पुलिस के आदमी वापस चले गए थे। रितू दीदी मुझे वापस आया देख कर बेहद खुश हो गई थी। आदित्य तो सीधा कमरे की तरफ चला गया था जबकि मैं और कुछ देर वहीं ड्राइंगरूम में बैठा सबसे बातें करता रहा। नैना बुआ ने मुझसे मुम्बई में सबका हाल चाल पूछा। उसके बाद मैं भी उठ कर कमरे की तरफ बढ़ गया।

कमरे के अटैच बाथरूम में मैं मस्त ठंडे पानी से नहाया तो तबीयत हरी हो गई। नहा कर मैं टावेल लपेटे ही बाथरूम से कमरे में आ गया। जैसे ही मैं कमरे में आया तो बेड पर आराम से बैठी रितू दीदी पर मेरी नज़र पड़ी तो मैं चौंका। दरअसल मैं इस वक्त सिर्फ एक टावेल में ही था। बाॅकी ऊपर का समूचा जिस्म नंगा ही था मेरा। रितू दीदी के सामने इस तरह आ जाने से मुझे शर्म सी महसूस हुई।

"ओहो क्या बात है राज।" सहसा रितू दीदी की चहकती हुई आवाज़ मेरे कानों से टकराई___"क्या बाॅडी शाॅडी बना रखी है तुमने। ओहो सिक्स पैक भी है। पक्का जिम करते होगे तुम, है न?"

"हाॅ थोड़ा बहुत करता हूॅ दीदी।" मैने शर्माते हुए कहा।
"अरे तुम शर्मा क्यों रहे हो राज?" रितू दीदी का चौंका हुआ स्वर___"भला मुझसे किस बात की शरम भाई? मैं तो तेरी बहन हूॅ कोई ग़ैर लड़की नहीं जिससे तू शरमाए।"

"पर दीदी।" मैने असहज भाव से कहा___"मैं कभी आपके सामने इस हालत में नहीं आया न। इस लिए मुझे थोड़ी शरम आ रही है।"

मेरी ये बात सुन कर रितू दीदी बेड से उतर कर मेरे क़रीब आ गई और फिर मेरे चेहरे को अपनी हॅथेलियों के बीच लेते हुए कहा___"ओए ये क्या बात हुई भला? तू मेरा सबसे अच्छा और सबसे हैण्डसम भाई है। तुझे मुझसे किसी भी तरह से शरमाने की या झिझकने की ज़रूरत नहीं है। तुझे पता है राज, अब तक मैं ऐसे रिश्तों के बीच थी जो कहने को तो मेरे अपने थे मगर उन सभी के अंदर पाप और गंदगी भरी हुई थी। ऐसे लोगों से मेरा कोई संबंध नहीं है अब। दुनियाॅ में मेरा अगर कोई अपना है तो वो है तू। मेरी ज़िंदगी का अब एक ही मकसद है भाई और वो है तेरे साथ ग़लत करने वालों सर्वनाश करना और तुझे संसार की हर खुशी देना। मेरा दिल करता है कि मैं तुझ पर कुर्बान हो जाऊॅ मेरे भाई, फना हो जाऊॅ तुझ पर।"

"मुझे पता है दीदी।" मैने सहसा मुस्कुरा कर कहा___"कि आप मुझसे बहुत प्यार करती हैं। इसका सबसे बड़ा सबूत यही है कि आज आप अपने ही माता पिता के खिलाफ़ हो गई हैं और अपने माता पिता के सबसे बड़े दुश्मन का साथ दे रही हैं। मुझे इस बात की खुशी नहीं है कि आपने मेरे लिए अपने माता पिता से बगावत की है बल्कि इस बात की खुशी है कि मैं जिस रितू दीदी से बात करने के लिए अब तक तरस रहा था वो आज मेरे पास हैं।"

"काश ये सब मैं पहले ही सोच
लेती राज।" रितू दीदी एकदम से दुखी होकर मुझसे लिपट गईं। फिर भारी स्वर में बोलीं___"तो इतने सालों तक मैं अपने भाई से दूर न रहती और ना ही ऐसे हालात पैदा होते।"

"हालात तो तब भी ऐसे ही पैदा होते दीदी।" मैने कहा___"क्योंकि इंसानों की फितरत कभी नहीं बदलती। वो अपनी फितरत से मजबूर होकर पहले भी वही करता जो आज कर रहा है।"
"माना कि मेरे पिता अपनी फितरत के चलते वही सब करते जो आज कर रहे हैं।" रितू दीदी ने कहा___"मगर मैं तेरी बात कर रही हूॅ राज। तू मुझे पहले ही तो मिल जाता न? मेरी वजह से तेरे दिल को इतनी तक़लीफ तो न होती जितनी अब तक हुई थी।"

"कोई बात नहीं दीदी।" मैने प्यार से कहा___"जो गुज़र गया उसे भूल जाइये और आज की बात करिये तथा आज के माहौल में खुश रहिए।"
"तू साथ है तो अब मैं खुश ही रहूॅगी राज।" रितू दीदी ने मेरी ऑखों में देखते हुए कहा___"तुझे पता है राज, इसके पहले मैं कभी किसी लड़के के क़रीब नहीं गई। पता नहीं क्यों पर मुझे हर लड़के से एक नफ़रत सी थी। आज के समय में हर लड़का लड़की एक दूसरे के जाने कितने क़रीब आ जाते हैं मगर मुझे इन सब बातों से बेहद चिढ़ थी। मगर विधी से मिलने के बाद और उसकी प्रेम कहानी सुनने के बाद मुझे एहसास हुआ कि आज भी ऐसे लोग हैं जो पाक़ मोहब्बत करते हैं और एक मिसाल बन जाते हैं। मैं बहुत खुश थी मेरे भाई कि ऐसा इंसान मेरा अपना भाई ही है और फिर मुझे एहसास हुआ कि कितनी ग़लत थी मैं जो तुझे बचपन से ही ग़लत समझती आ रही थी। बस उसके बाद जब सबकुछ पता चला तो तेरे लिए मेरे हृदय में और भी जगह हो गई भाई। मेरी अंतर्आत्मा से बस एक ही आवाज़ आती है और वो ये कि अब तुझसे ही मेरी हर खुशी है और दुख भी।"

"जो होता है सब अच्छे के लिए ही होता है दीदी।" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"आज मेरी सबसे अच्छी दीदी मेरे पास है और मुझे इतना प्यार करती है। मैं बता नहीं सकता कि इस बात से मैं कितना खुश हूॅ दीदी। मेरा तो मुम्बई जाने का बिलकुल भी मन नहीं था। मगर सबको लेकर जाना भी ज़रूरी था। लेकिन वहाॅ से वापस आपके पास आ जाने के लिए मैं उतावला हो रहा था। मुझे लग रहा था कि मैं पलक झपकते ही आपके पास पहुॅच जाऊॅ।"

"ऐसी बातें मत कर राज।" रितू दीदी की आवाज़ काॅप सी गई। वो मुझसे कस के लिपट गईं और फिर बोली___"तुझे नहीं पता कि तेरी ऐसी बातों से मैं कितनी कमज़ोर हो सकती हूॅ। कहीं ऐसा न हो जाए कि मैं तेरे बिना एक पल भी रह न पाऊॅ।"

"तो क्या हुआ दीदी?" मैंने कहा___"सब कुछ ठीक होने के बाद हम सब एक साथ ही तो रहेंगे। फिर आप ऐसा क्यों कह रही हैं?"
"तू नहीं समझेगा राज।" रितू दीदी ने सहसा बेचैनी से पहलू बदला___"ख़ैर छोंड़ ये सब। मैं ये कह रही हूॅ कि विधी के माता पिता भी यहाॅ आ गए हैं। उनसे भी मिल लेना तुम।"

"मैं आपसे एक ज़रूरी बात जानना चाहता हूॅ।" मैने दीदी से कहा___"और वो ये कि ये फार्महाउस आपके पास कैसे है?"
"ये फार्महाउस डैड ने मेरे नाम बहुत पहले ही कर दिया था।" रितू दीदी ने कहा___"ऐसे ही दो फार्महाउस और हैं। एक नीलम के लिए और दूसरा शिवा के लिए। पर तू ये क्यों पूछ रहा है राज?"

"इसका मतलब।" राज को झटका सा लगा था___"इस फार्महाउस के बारे में बड़े पापा जानते हैं। जाने भी क्यों न आख़िर दिया तो उन्होंने ही है आपको। इस लिए अब आप ये भी जान लीजिए कि यहाॅ पर रहना भी हमारे लिए खतरे से खाली नहीं है।"

"क्या????" रितू दीदी भी बुरी तरह हिल गईं, कदाचित उन्हें भी अब तक इस बात का एहसास नहीं था। किन्तु अब हो गया था___"ये तो यकीनन सच कहा तूने। ओह माई गाड मुझे इस बारे में पहले ही सोच लेना चाहिए था। सचमुच राज यहाॅ हममें से कोई भी सुरक्षित नहीं है। ये तो अच्छा हुआ कि अभी तक डैड का ध्यान फार्महाउस की तरफ नहीं गया है। मगर इसमें अब ज़रा भी शक नहीं कि बहुत जल्द उन्हें इस फार्महाउस का ख़याल आ सकता है। वो सोच सकते हैं कि मैं और तुम यहाॅ छुपे हो सकते हैं। अतः वो ज़रूर इसका पता लगाएॅगे। अब क्या होगा राज?"

"फिक्र मत कीजिए।" मैने कहा___"सारे रास्ते मैं यही सोच रहा था और फिर मैने इसका बंदोबस्त भी किया है।"
"बंदोबस्त??" रितू दीदी हैरान।

"हाॅ दीदी।" मैने कहा___"इसका तो मुझे भी अंदाज़ा था कि ये फार्महाउस आपके पास बड़े पापा की वजह से ही आया हो सकता है। इस लिए इसका ख़याल देर सवेर उन्हें आ ही जाएगा। अतः मैने फौरन ही अपने एक दोस्त को फोन किया। मेरा वो दोस्त आजकल इंदौर में है अपने माता पिता व भाई बहन के साथ। घर से और दौलत से भी सम्पन्न है वो। उसके पापा इन्कमटैक्स के बड़े ऑफिसर हैं तथा उसका बड़ा भाई पुलिस में एसीपी है। गुनगुन से क़रीब दस किलोमीटर पहले ही उसका गाॅव है रेवती। जहाॅ पर उसका बड़ा भारी पुश्तैनी घर है। किन्तु उस घर में कोई नहीं रहता है। घर की देख रेख के लिए एक दो केयरटेकर रखे हुए हैं उसके डैड ने। मैने अपने उसी दोस्त से बात की थी तथा उसको सारी बातें भी बताई और कहा कि कुछ समय के लिए मुझे उसके घर की ज़रूरत है रहने के लिए। मेरी सारी बातें सुनकर उसने अपनी माॅम से बात किया। उसकी माॅम मुझे अपने बेटे की तरह ही चाहती थी। शेखर ने जब अपनी माॅ से मेरी सारी कहानी बताई तो वो मेरे लिए चिंतित हो गईं और फौरन ही उन्होंने कह दिया कि मुझे आज ही उनके घर में शिफ्ट हो जाना चाहिए। उन्होंने घर के केयरटेकर को फोन करके मेरे बारे में बता दिया है। एक काम उन्होंने ये भी किया कि अपनी बहन को जो कि रेवती में ही रहती हैं भी सूचित कर दिया है। उनसे कहा कि वो अपने पति को किसी ऐसे वाहन के साथ मेरे पास भेज दें जिसमें हम सब और हमारा सामान आराम से आ सके।"

"ये तो बहुत ही अच्छी बात है राज।" रितू दीदी ने खुश होकर मेरे गाल पर चुम्बन जड़ दिया___"तूने सचमुच बहुत ही कमाल का और होशियारी का काम किया है। मगर एक समस्या भी है।"
"कैसी समस्या दीदी?" मैं चकराया।
"यही कि हम सब और हमारा सामान वगैरह तो यहाॅ से वहाॅ शिफ्ट हो जाएगा।" रितू दीदी ने कहा___"मगर हम तहखाने में मौजूद उस मंत्री के पिल्लों को कैसे ले जाएॅगे और वहाॅ उन्हें कैसे रखेंगे? यहाॅ तो तहखाना था जहाॅ पर मैने उन सबको कैद किया हुआ है जबकि वहाॅ पर ऐसा कोई तहखाना नहीं हो सकता।"

"कोई ज़रूरी तो नहीं कि उन सबको तहखाने में ही रखा जाए।" मैने कहा___"हम उन लोगों को किसी कमरे में भी वैसे ही बाध कर रख सकते हैं। बस इस बात का ख़याल रखना होगा कि वो चीख चिल्ला न सकें। वरना उनकी आवाज़ से बाहरी लोगों को पता भी लग सकता है।"

"हाॅ ये भी सही है।" रितू दीदी ने कहा___"और हाॅ हरिया काका और शंकर काका भी हमारे साथ ही जाएॅगे। वो बेचारे मुझे अपनी बेटी की तरह ही चाहते हैं। मेरे लिए वो कुछ भी कर सकते हैं। वो दोनो अच्छे इंसान है राज। यहाॅ पर उन्हें अकेले छोंड़ चले जाना कतई उचित नहीं है।"

"ठीक है दीदी।" मैने कहा___"हम उन्हें भी साथ ले चलेंगे। मगर यहाॅ से चलने की फौरन तैयारी कीजिए। मेरे दोस्त शेखर का कभी भी फोन आ सकता है ये बताने के लिए कि उसके मौसा वाहन लेकर हमारे पास पहुॅचने ही वाले हैं।"

"क्या हमें आज ही यहाॅ से निकलना होगा?" रितू दीदी ने हैरानी से कहा था।
"बिलकुल दीदी।" मैने कहा___"हम एक पल की भी देरी नहीं कर सकते। बड़े पापा का कुछ पता नहीं कि उनके मन में किस पल इस फार्महाउस का ख़याल आ जाए और वो फौरन हम सबका पता लगाने के लिए यहाॅ आ धमकें। इस लिए बेहतर यही है कि उनके यहाॅ धमकने से पहले ही हम लोग यहाॅ से कूच कर जाएॅ।"

"सही कह रहा है तू।" रितू दीदी ने हालात की गंभीरता को समझते हुए कहा___"वक्त और हालात का कोई भरोसा नहीं किया जा सकता।"
"ठीक है दीदी।" मैने कहा___"अब आप जाइये और सबको बता दीजिए। मैं भी कपड़े पहन कर आता हूॅ हाथ बटाने।"

"चल ठीक है।" दीदी ने कहा और फौरन ही कमरे से बाहर निकल गईं। उनके जाने के बाद मैने भी आनन फानन में कपड़े पहने। तभी मेरा आई फोन बजा। (यहाॅ पर मैं आप सबको (खास कर नैना जी को) ये बता दूॅ कि आई फोन सिर्फ रितू दीदी के पास ही नहीं था बल्कि मेरे और गुड़िया (निधी) के पास भी है)

मैने मोबाइल उठाकर देखा तो शेखर का ही काल था। मैने तुरंत ही काल रिसीव कर मोबाइल को कान से लगा लिया। उधर से शेखर ने बताया कि उसके मौसा कुछ ऐसे आदमियों को भी साथ में लेकर आ रहे जो तुम सबकी सुरक्षा का भी ख़याल रखेंगे। मैं उसकी बात सुन कर मुस्कुराया और उसे इसके लिए धन्यवाद दिया। उसने बताया कि दस से बीस मिनट के बीच उसके मौसा मेरे पास पहुॅच जाएॅगे। उसके बाद काल कट हो गई।

मैं फौरन ही कमरे से निकल कर नीचे आया और सबके साथ सामान को इकट्ठा कर उसे पैक करवाने लगा। मैने आदित्य से कहा कि वो हरिया काका को भी इस बात का बता दे और उससे कहे कि वो तहखाने से उन चारों पिल्लों को तथा मंत्री की बेटी को बेहोश कर तहखाने से बाहर निकालने की तैयारी करें। मेरी बात सुनकर आदित्य फौरन ही हरिया काका के पास चला गया। इधर नैना बुआ तथा विधी के माता पिता भी सारे सामान को पैक करने में लगे हुए थे। रितू दीदी ने बताया कि पवन का सामान भी पैक रखा हुआ है जिसे साथ ही यहाॅ से ले चलना है।

लगभग बीस मिनट बाद ही दो इनोवा कार तथा उसके पीछे एक टैम्पो फार्महाउस में दाखिल हुए। मैं ये देख कर हैरान रह गया कि इतने सारे वाहन शेखर ने भेजवा दिये थे। कदाचित उसे अंदाज़ा था कि सबको लाने में इतने ही वाहनों की ज़रूरत पड़ सकती थी। टैम्पो में सारा सामान और दोनो कारों में हम सब लोग बैठ कर आराम से यहाॅ से जा सकता थे। ख़ैर सामान तो पैक हो ही चुका था। अतः मैं और आदित्य जल्दी जल्दी सारे सामान को टैम्पो में लोड करने लगे। इस काम में मौसा के साथ आए हुए चार पाॅच आदमी भी लग गए। कुछ ही देर में सारा सामान टैम्पो में लोड हो गया।

हरिया काका और शंकर काका ने उन चारों पिल्लों और उस पिल्ली को भी टैम्पो में ही ठूॅस दिया और खुद भी उसी टैम्पो में चढ़ गए। मौसा के तीन आदमी भी टैम्पो में चढ़ गए। टैम्पो का पिछला फटका लगा कर ऊपर से मोटी तिरपाल को ढॅक दिया गया। जिससे अंदर का कुछ भी देखा नहीं जा सकता था।

उसके बाद मैने विधी के माता पिता, नैना बुआ, तथा बिंदिया काकी को एक इनोवा में बैठा दिया। उस इनोवा में मौसा का एक आदमी भी आगे की शीट पर हाॅथ में बंदूख लिए बैठ गया। दूसरी इनोवा में मैं आदित्य और रितू दीदी बैठ गए। आगे की शीट पर आख़िरी बचा बंदूकधारी भी बैठ गया। उसके बाद सारा क़ाफिला चल दिया वहाॅ से। इसके पहले हमने अच्छी तरह से चेक कर लिया था कि हमारी कोई ऐसी चीज़ तो नहीं छूट गई जो ज़रूरी हो।

रितू दीदी ने रास्ते में किसी को फोन लगाया और उससे कहा कि उसके फार्महाउस से पुलिस जिप्सी अपने साथ ले जाकर थाने में खड़ा कर दें। फार्महाउस में एक और जीप थी जो कि अजय सिंह की ही थी उसे वहीं खड़े रहने दिया था। लगभग आधा घंटे बाद हम रेवती पहुॅच गए। इस बीच रास्ते में हमें इक्का दुक्का वाहन तो मिले मगर उनमें कोई मंत्री या अजय सिंह का आदमी नहीं था। रेवती में शेखर के मकान के सामने ही हमारा क़ाफिला रुका। घर के बाहर ही दो केयरटेकर खड़े दिखे। वाहनों के रुकते ही वो हमारे पास आ गए।

हम सब वाहनों से उतर कर बाहर आए तो वो दोनो केयर टेकर हमें घर के अंदर की तरफ ले गए। मैं और आदित्य बाहर ही थे। टैम्पो से पहले उन पाॅचों कैदियों को निकाल कर घर के अंदर एक ऐसे कमरे में ले आए जो सबसे अलग और आख़िर में था। उसके बाद हम सबने मिल कर टैम्पो से सारा सामान उतार कर अंदर ले गए। उन बंदूखधारियों हमारी बड़ी मदद की।

शेखर के मौसा, जिनका नाम केशव शर्मा था वो बड़े ही खुशदिल इंसान थे। मुझे उनका नेचर बड़ा पसंद आया था। वो अंत तक हमारे पास ही रहे और हमारी हर ब्यवस्था के बारे में देखते सुनते रहे तथा हमारी हर ज़रूरों की लिस्ट बनाते रहे। दरअसल यहाॅ रहता तो कोई था नहीं। दो केयरटेकर थे जो कि घर से अलग एक तरफ बने सर्वेन्ट क्वार्टर में रहते थे। वो सारा दिन सारे सामान को जमाने में और रखने में चला गया। इस बीच शेखर की माॅम सुगंधा ऑटी का फोन भी आया था। उन्होंने मुझसे बड़े प्यार से बात की और ये भी कहा कि मैं यहाॅ पर किसी भी चीज़ के लिए संकोच न करूॅ। ये घर अपना ही है और हर चीज़ का उपयोग बड़े शौक से कर सकते हैं हम। मैं सुगंधा ऑटी से बात करके मुतमईन हो गया था और खुश भी। उसके बाद मैं और आदित्य मौसा जी के साथ मार्केट चले गए। जहाॅ से हमें राशन पानी तथा और भी कई सारी चीज़ें लेनी थी। मौसा जी ने कहा कि गैस सिलेण्डर वो अपने यहाॅ से हमे दे देंगे।

सारी ब्यवस्था और सब कुछ सही करवाने के बाद मौसा जी ये कह कर अपने घर चले गए कि हमें जब भी किसी चीज़ की ज़रूरत पड़े तो हम बेझिझक उनसे फोन बता सकते हैं। उन्होंने कहा कि वो बीच बीच में आते रहेंगे हाल चाल के लिए। मौसा जी का घर रेवती में ही था किन्तु मुख्य सड़क के पीछे था। पैदल चल कर जाने में लगभग दस मिनट से भी कम का समय लगता था।

शेखर का ये घर दो मंजिला था तथा काफी बड़ा था। आज के समय का बना ये घर वेल डेकोरेटेड था। अंदर से ऐसा लगता था जैसे कोई बॅगला हो। हलाॅकि मुम्बई वाले मेरे बॅगले के मुकाबले ये कुछ भी नहीं था। होता भी कैसे उस बॅगले की कीमत भी तो डेढ़ सौ करोड़ रुपये थी। ख़ैर रात हो चुकी थी इन सब कामों में। अतः बिंदिया काकी ने अपनी रसोई सम्हाल ली थी। उनकी मदद के लिए नैना बुआ भी साथ थी। विधी की माॅ भी खाना बनाने में मदद करना चाहती थी मगर नैना बुआ ने साफ कह दिया था कि वो बस आराम करें। उन्हें यहाॅ पर कोई काम करने की ज़रूरत नहीं है।

रात का डिनर करने के बाद हम सब अपने अपने कमरों में सोने के लिए चल दिये। विधी के माता पिता ग्राउण्ड फ्लोर पर ही बने कमरे को चुना था अतः वो उसी कमरे में चले गए। नीचे तीन कमरे और भी थे। जिनमे से एक पर हरिया काका व बिंदिया काकी तथा दूसरे पर शंकर काका सोने के लिए चले गए। जबकि ऊपर के कमरों में मैं आदित्य नैना बुआ व रितू दीदी चले गए।

इन सब कामों से हम सब काफी थक चुके थे अतः बेड पर लेटते ही नींद को आन् ही था। किन्तु मुझे नींद नहीं आ रही थी। मेरे मन में कई सारी बातें चल रही थी। फार्महाउस से यहाॅ शिफ्ट हो जाने से अब किसी का ख़तरा नहीं था। बल्कि अब तो खुल कर हम कोई काम कर सकते थे। मैं ये सब सोच ही रहा था कि सहसा मुझे ऐसा लगा जैसे दरवाजे पर बाहर से किसी ने दस्तक दी हो। मैं ये सोचते हुए बेड से उठ कर दरवाजे की तरफ चल दिया कि इस वक्त कौन हो सकता है?
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उधर हवेली में प्रतिमा का बाप व अजय सिंह का ससुर जगमोहन सिंह उस वक्त हवेली पहुॅचा जब अजय सिंह फ्रेश होने के बाद खाना खाने के लिए डायनिंग टेबल के चारो तरफ लगी कुर्सियों में से मुख्य कुर्सी पर बैठा था। जगमोहन सिंह को हवेली के बाहर तैनात अजय सिंह का एक आदमी अंदर लेकर आया था।

अपने ससुर को आज वर्षों बाद देख कर अजय सिंह फौरन ही अपनी कुर्सी से उठ कर जगमोहन की तरफ बढ़ा और उसके पैर छू कर आशीर्वाद लिया। अभी अजय सिंह अपने ससुर के पाॅव छू कर खड़ा ही हुआ था कि तभी प्रतिमा भी किचेन से हाॅथ में थाली लिए आई। प्रतिमा की नज़र जब अपने पिता पर पड़ी तो वो एकदम से मानो बुत बन गई। काफी देर बाद उसकी तंद्रा तब टूटी जब अजय सिंह ने उससे कहा कि देखो प्रतिमा पापा जी आ गए।

हाॅथ में ली हुई थाली को प्रतिमा ने डायनिंग टेबल पर रखा और फिर भाग कर जगमोहन की तरफ बढ़ी और अपने पिता के गले से लग गई। भावनाओं और जज़्बातों ने मानो प्रबल रूप धारण कर लिया जिसके प्रभाव से उसकी ऑखों से ऑसू झर झर करके बहने लगे थे। प्रतिमा अपने पिता के सीने से छुपकी ज़ार ज़ार रोये जा रही थी। जगमोहन खुद भी बेहद ग़मगीन हो गया था और हो भी क्यों न आख़िर प्रतिमा उसकी लाडली बेटी जो थी। अपनी बेटी को अपने कलेजे से लगाए जगमोहन को आज असीम सुख शान्ति मिल रही थी। वर्षों से उसके अंदर दर्द से भरी हुई टीस कम हो गई थी।

कितनी ही देर तक प्रतिमा अपने पिता के गले लगी रही उसके बाद जब उसके अंदर का गुबार खत्म हुआ तो वो अपने पिता से अलग हुई और अपने पिता से उनका हाल चाल पूछने लगी। कुछ देर बाद अजय सिंह ने प्रतिमा और अपने ससुर से कहा कि वो फ्रेश हो लें ताकि हम साथ में बैठ कर ही खाना खाएॅ। अजय सिंह की बात पर जगमोहन सिंह बोले कि वो बेटी के घर का अन्न कैसे खा सकते हैं? इस पर अजय सिंह ने हॅसते हुए कहा कि पापा जी आप भी क्या बाबा आदम के रीति रिवाज लिए बैठे हैं। आज के समय के सबसे बड़े वकील होते हुए भी ऐसी बात करते हैं। आख़िर अपने दामाद और बेटी के बार बार कहने पर जगमोहन सिंह को अजय सिंह के साथ बैठ कर खाना ही पड़ा।

खाना खाने के बाद ससुर दामाद के बीच ढेर सारी बातें हुईं उसके बाद अजय सिंह प्रतिमा को बता कर अपनी फैक्ट्री के लिए निकल गया। काफी दिन से फैक्ट्री नहीं गया था वह। वैसे भी वो चाहता था कि वर्षों के बाद बाप बेटी मिले हैं तो वो फ्री होकर एक दूसरे से बातें करें। अजय सिंह प्रतिमा को किनारे पर बुला कर उससे एक बार पुनः ये कहा कि वो या कोई भी जगमोहन जी से हमारे हालातों के संबंध में कोई बात न करे। सब कुछ समझा बुझा कर अजय सिंह हवेली से बाहर आ गया।

बाहर आते ही उसे शिवा इस तरफ ही आता दिखाई दिया। अजय सिंह उसे देख कर ठिठक गया। अपनी ही धुन में मस्ती से आता हुआ शिवा अपने बाप को देख कर हैरान रह गया और फिर एकदम से झपट कर उसके गला लग गया।

"ओह डैड आप आ गए।" शिवा खुशी से झूमता हुआ बोला था।
"मैं तो आ ही गया बर्खुरदार।" अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा___"मगर तुम इस वक्त कहाॅ से इस तरह मस्ती में डूबे चले आ रहे थे?"
"वो मैं गेस्टहाउस की तरफ से आ रहा था डैड।" शिवा ने कहा___"दरअसल आपके बिजनेस संबंधी दोस्तों ने अपने आदमी हमारी मदद के लिए यहाॅ भेज गए थे। इस लिए मैं उन्हीं के पास बैठा हुआ था। माॅम ने कहा था कि उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो उन सबका ख़याल रखूॅ।"

"ओह आई सी।" अजय सिंह आदमियों का सुन कर सहसा चौंक पड़ा था फिर बोला___"चलो ये तो बहुत अच्छी बात है बेटे। मुझे खुशी हुई कि तुम अपनी जिम्मेदारियों को समझने लगे हो। ख़ैर मैं ये कह रहा हूॅ कि आज तुम्हारे नाना जी आए हुए हैं इस लिए तुम या कोई भी उनके सामने हमारे हालातों के संबंध में कोई भी बात नहीं करोगे। और हाॅ, तुम भी ज़रा सम्हल कर उनसे बात करना। वो बहुत ही जहीन इंसान हैं। इंसान को पहचानने में उन्हें ज़रा भी वक्त नहीं लगेगा। अतः सोच समझ कर और होशियारी से उनके सामने जाना। ऐसा न हो कि तुम्हारे हाव भाव से उन्हें ऐसा प्रतीत हो जाए कि तुम किस टाइप के लड़के हो? तुम समझ रहे हो न कि मैं क्या कहना चाहता हूॅ?"

"डोन्ट वरी डैड।" शिवा ने कहा___"मेरी वजह से नाना जी को कुछ और सोचने का मौका ही नहीं मिलेगा और न ही उन्हें हमारे हालातों का कुछ पता चलेगा।"
"गुड ब्वाय।" अजय सिंह मुस्कुराया___"अब जाओ तुम। मैं भी ज़रा उन आदमियों से मिल लूॅ, उसके बाद मुझे थोड़ी देर के लिए फैक्ट्री भी जाना है।"
"ओके बाय डैड।" ये कह कर शिवा हवेली के अंदर की तरफ बढ़ गया।

शिवा का जाने के बाद अजय सिंह भी गेस्ट हाउस की तरफ चल दिया। अभी वो कुछ क़दम ही चला था कि सहसा पीछे से उसे प्रतिमा की आवाज़ सुनाई दी। उसने पलट कर देखा तो प्रतिमा हवेली के मुख्य दरवाजे पर खड़ी थी। अजय सिंह के पलटते ही प्रतिमा ने उसे बताया कि लैण्डलाइन फोन पर किसी का काल आया हुआ है और वो उससे बात करना चाहता है। प्रतिमा की बात सुन कर अजय सिंह वापस हवेली के अंदर की तरफ चल दिया। उसे याद आया कि उसके मोबाइल पर तो सिम कार्ड है ही नहीं।

"हैलो।" अपने कमरे में रखे लैण्डलाइन फोन के रिसीवर को कान से लगाते ही अजय सिंह ने अपनी आवाज़ को प्रतभावशाली बनाते हुए कहा था।
"ठाकुर।" उधर से किसी की स्पष्ट आवाज़ उभरी__"हम इस प्रदेश के मंत्री दिवाकर चौधरी बोल रहे हैं।"

"म..मंत्री???" अजय सिंह उधर ईआ वाक्य सुन कर बुरी तरह चौंका था, फिर लरजते हुए स्वर में बोला____"क्या सच में आप मंत्री जी ही बोल रहे हैं?"
"हाॅ ठाकुर।" उधर से दिवाकर चौधरी ने खास अंदाज़ में कहा___"क्या तुम्हें हमारे मंत्री होने पर शक़ है?"

"न..न..नहीं नहीं मंत्री जी।" अजय सिंह बुरी तरह सकपकाया___"म मैं तो बस इस लिए ऐसा कह गया क्योंकि मुझे उम्मीद ही नहीं थी कि प्रदेश की इतनी बड़ी शख्सियत का फोन मेरे पास आ सकता है। मैं तो ये सोच सोच कर हैरान हूॅ कि भला मुझसे मंत्री जी का क्या काम हो सकता है जिसके तहत आपने मुझे फोन किया है।"

"कुछ तो खास वजह होगी ही ठाकुर।" उधर से दिवाकर चौधरी ने कहा___"वरना इस फानी दुनियाॅ में बेमतलब कोई भी किसी को याद नहीं करता।"
"हाॅ ये बात तो बिलकुल सच है मंत्री जी।" अजय सिंह के दिमाग़ के घोड़े बड़ी तेज़ी से ये पता लगाने के लिए दौड़ रहे थे कि मंत्री ने उसे किस वजह से फोन किया हो सकता है? किन्तु प्रत्यक्ष में बोला___"आज के समय में हर इंसान मतलबी बन चुका है। ख़ैर आप बताइये मेरे लिए क्या आदेश है आपका?"

"दोस्तों को आदेश नहीं देते ठाकुर।" उधर से चौधरी ने कहा___"बल्कि साफ शब्दों में कह दिया जाता है जो कहना होता है। ख़ैर हम ये कह रहे है कि हम तुमसे मिलना चाहते हैं। मिलने के बाद ही तसल्ली से हमारे बीच बात चीत होगी और ये भी कि वो खास वजह क्या है जिसके तहत हमने तुम्हें फोन किया है?"

"जैसा आप कहें मंत्री जी।" अजय सिंह मंत्री के मुख से दोस्तों शब्द सुन कर सोचने पर मजबूर हो गया था। हलाॅकि मंत्री का उसे फोन करना मौजूदा हालात के हिसाब से उसके लिए कहीं न कहीं राहत और खुशी की बात थी। उसे भी पता था कि मंत्री दिवाकर चौधरी क्या चीज़ है। फिर बोला___"बताइये मुझे कब और कहाॅ मिलने आना होगा आपसे?"

"वैसे समय तो अभी भी है ठाकुर।" उधर से मंत्री ने कहा___"क्योंकि अभी शाम भी नहीं हुई है। इस लिए चाहो तो अभी हमारे यहाॅ आ सकते हो। इस वक्त हम गुनगुन में ही अपने आवास पर मौजूद हैं। किन्तु अगर तुम्हारे पास इस वक्त टाइम नहीं है तो कोई बात नहीं कल सुबह आ जाना। हमें कोई परेशानी नहीं है।"

"ये कैसी बात कर रहे हैं मंत्री जी?" अजय सिंह ने चापलूसी वाले अंदाज़ से कहा___"आप मुझे अपना समझ कर इतनी इज्ज़त से बुलाएॅ और मैं तत्काल न आऊॅ ऐसा कैसे हो सकता है भला? मैं तो अपने सारे ज़रूरी काम छोंड़ कर आपके पास ही दौड़ा चला आऊॅगा चौधरी साहब। बस कुछ देर तक इंतज़ार कर लीजिए। मैं फौरन ही अपने गाॅव हल्दीपुर से गुनगुन में आपके आवास पर आने के लिए निकल रहा हूॅ।"

"ओके हम इन्तज़ार कर रहे हैं ठाकुर।" उधर से मंत्री ने कहा___"तुम हमारे दोस्त की तरह ही हो इस लिए अपने दोस्त का वैलकम भी हम शानदार तरीके से ही करेंगे।"
"ये तो मेरी खुशनसीबी है मंत्री जी।" अजय सिंह एकदम से खुश होते हुए बोला___"जो आप मुझे अपना दोस्त कह रहे हैं वरना मेरी आपके सामने भला क्या औकात?"

"ऐसी कोई बात नहीं है ठाकुर।" मंत्री ने कहा___"हर इंसान अपनी जगह पर औकात वाला ही होता है। तुम भी अपनी जगह किसी से कम नहीं हो। हमें सब पता है तुम्हारे बारे में। ख़ैर छोंड़ो ये सब। आओ फिर मिलकर ही बाॅकी बातें होंगी।"
"जी ठीक है चौधरी साहब।" अजय सिंह के ऐसा कहते ही उधर से काल कट गई।

रिसीवर को हाॅथ में पकड़े अजय सिंह किसी बुत की मानिंद खड़ रह गया था। उसकी ऑखें ऐसी चमकने लगी थी जैसे उसकी ऑखों के अंदर हज़ारों वाट के बल्ब एकाएक ही रौशन हो उठे थे। चेहरे पर खुशी साफ झलक रही थी। कुछ देर तक अजय सिंह इसी तरह रिसीवर हाॅथ में खड़ा रहा फिर जैसे उसे होश आया। उसने मुस्कुरा कर रिसीवर को वापस केड्रिल पर रखा और फिर कमरे में ही एक तरफ रखी आलमारी की तरफ बढ़ चला।

आलमारी से उसने अपने सबसे अच्छे और सबसे कीमती कपड़े निकाले। अपने जिस्म पर पहले से ही पहने हुए कपड़ों को निकाला उसने और फिर उन कपड़ों को पहनना शुरू किया जिन्हें उसने आलमारी से निकाला था। उसके चेहरे पर इस वक्त एक अलग ही चमक दिख रही थी। ख़ैर कुछ ही देर में वह कपड़ों को पहन कर एक तरफ दीवार से सटे आदमकद आईने के सामने आया और उसमें खुद को देखने लगा। कीमती कोट पैन्ट में इस वक्त वो काफी जॅच रहा था और लग भी रहा था कि वो कोई बहुत बड़ा आदमी है। सब कुछ ठीक ठाक करने के बाद वो मुस्कुराते हुए ही कमरे से बाहर की तरफ चल दिया।

ड्राइंगरूम में बैठे जगमोहन सिंह, प्रतिमा व शिवा की नज़र जैसे ही अजय सिंह पर पड़ी तो जगमोहन सिंह को छोंड़ कर प्रतिमा व शिवा के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे। जबकि जगमोहन सिंह के चेहरे पर ये सोच कर खुशी के भाव उभरे कि उसका दामाद वाकई में एक शख्सियत वाला तथा प्रभावशाली ब्यक्तित्व रखने वाला इंसान है। उसे पहली बार लगा कि उसकी बेटी ने अपने पति के रूप में ग़लत चुनाव नहीं किया था। यहाॅ आने के बाद उसने इतनी बड़ी हवेली और अंदर बाहर इतने सारे नौकर चाकर देखे तो उसे समझ आ गया था कि उसका दामाद वास्तव में कोई ऐरा ग़ैरा नहीं था। बल्कि इस गाॅव का राजा था वो।

"प्रतिमा मैं ज़रा मंत्री जी के पास जा रहा हूॅ।" अजय सिंह ने ये बात कुछ इस अंदाज़ से कही थी कि सोफे पर बैठे जगमोहन सिंह पर अपना एक खास असर डाल सके और ऐसा हुआ भी। जबकि अजय सिंह बोला___"अभी उन्हीं का फोन आया हुआ था। उन्होने मुझे किसी ज़रूरी काम से याद किया है। अतः हो सकता है कि मुझे वापस आने में देर हो जाए तो तुम पापा जी का अच्छे से ख़याल रखना।"

"ठीक है आप जाइये।" प्रतिमा ने अपने पिता की मौजूदगी में अजय सिंह से आप कह कर बात की, बोली___"मैं पापा का बहुत अच्छे से ख़याल रखूॅगी।"
"इसमें ख़याल रखने की क्या बात है बेटा?" सहसा जगमोहन सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा___"ये तो मेरा भी अपना ही घर है। अगर किसी चीज़ की ज़रूरत हुई तो मैं खुद ही ले लूॅगा। क्यों बेटी?"

"जी आपने बिलकुल ठीक कहा पापा।" प्रतिमा ने खुशी से मुस्कुराते हुऐ कहा।
"फिर तो ठीक है पापा।" अजय सिंह भी मुस्कुराया__"मुझे आपकी ये बात बहुत अच्छी लगी। ख़ैर मैं जल्दी वापस आने की कोशिश करूॅगा और फिर आपसे ढेर सारी बातें होंगी। अच्छा अब चलता हूॅ।"

अजय सिंह के कहने पर जगमोहन सिंह ने हाॅ में सिर हिलाया जबकि अजय सिंह फौरन ही हवेली से बाहर की तरफ बढ़ चला। उसके मन में इस वक्त मंत्री से मिलने की बड़ी ब्याकुलता पैदा हो गई थी। उसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि प्रदेश का मंत्री उसे दोस्त मान कर उससे मिलना चाहता है। मंत्री से संबंध होना उसके लिए कितना फायदेमंद हो सकता था इसका बखूबी अंदाज़ा था उसे। इसी लिए तो वो जल्द से जल्द मंत्री के पास पहुॅच जाना चाहता था।

बाहर एक तरफ खड़ी अपनी मर्सडीज कार के पास पहुॅच कर उसने कार का दरवाजा खोला और ड्राइंविंग शीट पर बैठ गया। कुछ ही पलों में उसकी कार गुनगुन के लिए रवाना हो गई थी।
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उधर गुनगुन में अपने आवास पर मंत्री दिवाकर चौधरी अपने दो दोस्तों और एक रखैल दोस्त यानी सुनीता के साथ ड्राइंग रूम में रखे सोफे पर बैठा था। इस वक्त ड्राइंग रूम में इन चारों के अलावा और कोई नहीं था। मंत्री के सुरक्षा गार्ड सब बाहर ही तैनात थे।

"वैसे आपको क्या लगता है चौधरी साहब।" सहसा अशोक मेहरा कह उठा___"वो ठाकुर हमारी इस मामले में क्या सहायता कर सकता है? जबकि उसकी खुद की बेटी ही उसके खिलाफ़ है।"

"इन्हीं सब चीज़ों के बारे में तो जानना है अशोक।" मंत्री ने सोचते हुए कहा___"मुझे लगता है कि इस मामले से जुड़ी हर चीज़ ठाकुर को क्राॅस करती है। हमने ये तो समझ लिया कि हमारे मामले जो हो रहा है वो कौन और क्यों कर रहा है मगर हम ये भी जानना चाहते हैं कि जो हमारा दुश्मन है उसने या उसकी माॅ बहन ने ऐसा क्या किया था जिसकी वजह से ठाकुर ने उन तीनों को हवेली से ही नहीं बल्कि सारी ज़मीन जायदाद से भी बेदखल कर दिया है? सबसे महत्वपूर्ण बात हमें ये भी जानना है कि ऐसा क्या हुआ है जिसके तहत ठाकुर की अपनी बेटी खुद अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ हो गई है?"

"बात तो आपकी एकदम सही है चौधरी साहब।" अशोक ने कहा___"किन्तु इससे निष्कर्श क्या निकलेगा? मेरा मतलब है कि इससे हमारा फायदा क्या होगा?"

"नफ़ा नुकसान तो अपनी जगह है ही अशोक।" चौधरी ने कहा___"किन्तु इस मामले में कुछ बातें ऐसी हैं जिनके बारे में पक्के तौर पर जानना बहुत ज़रूरी है। तुमने कहा था कि ठाकुर की बेटी जो थानेदारनी है और अपने पैरेन्ट्स के खिलाफ़ है वो हमारे दुश्मन और ठाकुर के भतीजे की मदद इस लिए नहीं कर सकती क्योंकि वो भी उससे अपने माॅ बाप की तरह नफ़रत करती है। ये बातें एक दूसरे से मैच नहीं खा रही हैं अथवा ये भी कह सकते हैं कि जॅच नहीं रही हैं।"

"जी मैं कुछ समझा नहीं चौधरी साहब।" अशोक मेहरा के माॅथे पर उलझनपूर्ण भाव आए___"कौन सी बातें नहीं जॅच रही आपको?"

"यही कि एक तरफ तो तुम ये भी कह रहे हो कि ठाकुर की थानेदारनी बेटी उस विराज नाम के अपने भाई से नफ़रत करती है।" मंत्री ने कहा___"इस लिए वो उसकी मदद नहीं कर सकती। जबकि दूसरी तरफ तुम ये भी कह रहे हो कि ठाकुर की वही थानेदारनी बेटी खुद अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ है। सोचने वाली बात हैं अशोक कि ऐसा कैसे हो सकता है? आम तौर पर बच्चे वही करते हैं जो उनके माॅ बाप उन्हें सीख देते हैं अथवा करने को कहते हैं। यहाॅ सोचने वाली बात ये है कि अगर वो थानेदारनी अपने माॅ बाप की सीख अथवा कहे के अनुसार अपने चचेरे भाई से नफ़रत करती है तो फिर अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ वो किस वजह से हो गई है?"

"आपकी इन सब बातों में ज़बरदस्त प्वाइंट है चौधरी साहब।" सहसा अवधेश श्रीवास्तव कह उठा___"सचमुच ये सोचने वाली बात है कि आख़िर ऐसा क्या हुआ है जिसके चलते ठाकुर की बेटी उसके खिलाफ़ है? संभव है कि उसे कोई ऐसी बात अपने माॅ या पिता की पता चल गई हो जिसके चलते उसने अपने माॅ बाप से किनारा कर लिया हो। या फिर ऐसा हो सकता है कि सोच या विचारों के चलते थानेदारनी अपने पैरेन्टस् से दूर हो।"

"ये सब तो महज संभावनाएॅ हैं अवधेश।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"जो सही भी और ग़लत भी हो सकती हैं मगर हमें वो बात पता करना है जो सिर्फ और सिर्फ सच हो। ख़ैर फिक्र की कोई बात नहीं है, हमने ठाकुर को बुलाया है। वो आता ही होगा हमारे पास। उसी से पूछेंगे कि सच्चाई क्या है?"

"लेकिन चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने एक बार पुनः हस्ताक्षेप किया___"सवाल तो एक बार फिर खड़ा हो जाता है कि इस सबसे हमारा फायदा क्या होगा? हम ये तो जानते ही हैं कि हमारा दुश्मन ठाकुर का वो भतीजा है जिसका नाम विराज है और वो मुम्बई में रहता है। फिर अचानक आप ठाकुर और उसकी बेटी को बीच में कैसे ले आए? इस मामले में ये कहाॅ से आ गए? ठाकुर की बेटी अपने माॅ बाप के खिलाफ़ है ये उनका आपसी मैटर है। इस लिए हमें इससे क्या लेना देना भला? हमें तो अपने टार्गेट पर फोकस रखना है ना?"

"तुम बात को या तो अनसुना कर गए हो अशोक या फिर बात को समझने की कोशिश ही नहीं कर रहे हो।" मंत्री ने स्पष्ट भाव से कहा___"जबकि तुम्हें सबसे पहले ये सोचना चाहिए कि हम बेवजह फालतू की बकवास करने का शौक नहीं रखते हैं। ख़ैर, बात दरअसल ये कि अगर ठाकुर की बेटी सचमुच में अपने पैरेंट्स के खिलाफ़ है तो वो अपने उस भाई की मदद क्यों नहीं कर सकती जो अपने माॅ बाप की तरह ही उस लड़के से नफ़रत करती थी? संभव है कि उसे उस वजह का पता चल गया हो जिस वजह के चलते उसके बाप ने विराज और विराज की माॅ बहन को हर चीज़ से बेदखल किया था। उसे पता चल गया हो कि जिस वजह से विराज को बेदखल किया था उसके बाप ने वो वजह वास्तव में बेवजह ही थी। यानी विराज व विराज की माॅ बहन अपनी जगह सही रहे हों। उस सूरत में संभव है कि रितू ने उस संबंध में अपने पैरेंट्स से बात की हो और उनसे कहा हो कि विराज और उसकी माॅ बहन को बेदखल करके उसने अच्छा नहीं किया। वो अगर बेक़सूर हैं तो उन्हें उनका हक़ मिलना ही चाहिए। इस संबंध में अपनी बेटी की ये बात शायद ठाकुर को पसंद न आई हो और उसने विराज का हक़ देने से साफ इंकार कर दिया हो। इस वजह से थानेदारनी अपने माॅ बाप से अलग हो गई और संभव है कि इसी के चलते वो अपने उस चचेरे भाई के प्रति अपनी नफ़रत को मिटा कर उसकी मदद भी करने लगी हो। हलाॅकि ये सब भी महज संभावनाएॅ ही हैं किन्तु हो सकता है कि यही सच हो।"

अशोक मेहरा ही नहीं बल्कि वहाॅ बैठे अवधेश व सुनीता भी चौधरी की इन संभावना भरी बातें सुन कर चकित रह गए थे। एक बेटी का अपने पैरेंट्स के खिलाफ़ होने की क्या खूब वजह सोच कर बयान किया था उसने।

"अगर आपकी संभावनाएॅ सच हैं।" फिर अवधेश ने कहा___"तो यकीनन वो थानेदारनी विराज की मदद कर सकती है। मैं सब समझ गया चौधरी साहब, आपने यही सब सोच कर ठाकुर को यहाॅ बुलाया है।"

"बिलकुल।" चौधरी मुस्कुराया___"किन्तु इस वजह के अलावा भी एक महत्वपूर्ण वजह है।"
"वो क्या चौधरी साहब?" तीनो एक बार फिर चौंके।
"अगर ठाकुर ने सचमुच ही विराज और उसकी माॅ बहन को बेवजह ही हर चीज़ से बेदखल किया है।" चौधरी ने कहा___"तो ये भी सच ही होगा कि विराज अपने ताऊ को दुश्मन समझता होगा और ये भी चाहता होगा कि उसका हक़ किसी भी सूरत में उसे मिले। ठाकुर ने अगर धन दौलत अथवा सारी प्रापर्टी को हथियाने की गरज से उसे बेदखल किया होगा तो फिर ये पक्की बात है कि ठाकुर किसी भी कीमत में वो प्रापर्टी अथवा उस प्रापर्टी में से विराज का हक़ नहीं देगा। कहने का मतलब ये कि विराज को अपना हक़ आसानी से नहीं मिलने वाला। इस लिए वो ऐसा कुछ ज़रूर करेगा जिसके तहत उसे अपने ताऊ से अपना हक़ वापस मिल सके।"

तीनो मुह फाड़े देखते रह गए चौधरी को। किसी के मुख से कोई बोल न फूट सका था। जबकि चौधरी उन सबके चेहरों पर मॅडराते भावों को देखते हुए पुनः कहना शुरू किया____"हलाॅकि ये भी महज संभावनाएॅ ही हैं दोस्तो जो ग़लत भी हो सकती हैं। मगर हमें कहीं न कहीं ऐसा आभास भी हो रहा है कि हमारी इन संभावनाओं पर कुछ न कुछ तो सच्चाई ज़रूर है। हमने ठाकुर, ठाकुर की बेटी, तथा विराज, इन तीनों पर ग़ौर किया है और इनके बीच पैदा हुए हालातों पर भी ग़ौर किया है। इसके बाद ही हमारे दिमाग़ में इन संभावनाओं का आगमन हुआ है।"

"मुझे तो ऐसा लगता है चौधरी साहब।" सहसा अवधेश कह उठा___"कि आपने उन तीनों का ऑपरेशन कर दिया है। आपकी संभावनाओं में कहीं पर भी ऐसा नहीं लग रहा है कि उनमें कहीं कोई लोचा है।"

"ठाकुर की बेटी का अपने माॅ बाप से भले ही चाहे जो पंगा हो अवधेश।" चौधरी ने गहरी साॅस ली___"जिसके तहत वो अपने माॅ बाप के खिलाफ़ है। मगर ये बात तो सच ही समझो कि ठाकुर और विराज का छत्तीस का ऑकड़ा है। ज़र ज़ोरू ज़मीन ये कभी किसी की नहीं हुई। इसने जाने जाने कितने पाक़ रिश्तों को नेस्तनाबूत किया होगा अब तक इसका हममें से कोई अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता। विराज व ठाकुर के बीच हक़ की लड़ाई है ये पक्की बात है और जब तक इस लड़ाई का अंत नहीं होगा दोनो में से कोई भी चैन से नहीं बैठेगा। ख़ैर, तुमने सुना होगा कि हमने फोन पर ठाकुर को दोस्त कहा था। वो इसी लिए कहा था कि मौजूदा हालात में हम दोनो का एक ही टार्गेट है-----विराज। इस लिए हमने उसे दोस्त कहा। हम उससे विराज के संबंध में सारी जानकारी हासिल करेंगे और फिर उस हिसाब से आगे की रणनीति बनाएॅगे।"

अभी चौधरी ने ये कहा ही था कि सहसा तभी ड्राइंग रूम में एक आदमी दाखिल हुआ। उसने बड़े अदब से चौधरी को बताया कि बाहर कोई आदमी आपसे मिलने आया है। वो आदमी अपना नाम ठाकुर अजय सिंह बता रहा है। उस आदमी की बात सुन कर चौधरी मुस्कुराया और अपने उस आदमी से कहा कि उसे इज्ज़त से अंदर ले आओ। चौधरी की बात सुन कर वो आदमी पहले अदब से सिर झुकाया फिर वापस बाहर की तरफ चला गया।

कुछ ही देर में उसी आदमी के साथ अजय सिंह ड्राइंग रूम में दाखिल हुआ। उसे देखते ही चौधरी अपने सोफे से उठा हलाॅकि वो प्रदेश का मंत्री था और अजय सिंह के लिए उठना उसकी शान के खिलाफ़ था किन्तु फिर भी वो उठा ही। उसकी देखा देखी बाॅकी सब भी उठ गए।

"मोस्ट वेलकम ठाकुर।" चौधरी ने गर्मजोशी से तथा मुस्कुराते हुए अजय सिंह से हाॅथ मिलाया और फिर एक अन्य खाली सोफे की तरफ बैठने का इशारा किया और खुद भी अपनी जगह पर आ कर बैठ गया।

"बहुत बहुत शुक्रिया चौधरी साहब।" अजय सिंह ने अपने अंदर ही हड़बड़ाहट पर काबू पाते हुए किन्तु बड़ी शालीनता से कहा___"आज तो मेरे भाग्य ही खुल गए है जो आपके दर्शन हो गए।"

"ऐसा कुछ भी नहीं है ठाकुर।" चौधरी ने कहा___"इस वक्त हम किसी मंत्री की हैसियत से नहीं बल्कि एक आम इंसान तथा एक दोस्त की हैसियत से तुमसे मिल रहे हैं। और वैसे भी ये तो हमें भी पता चला है कि हमसे पहले जो मंत्री थे उनसे तुम्हारे बहुत गहरे ताल्लुकात थे। सारा पुलिस महकमा ही तुम्हारी मुट्ठी में होता था। किन्तु हमने सुना कि रात भर में सारा कुछ बदल गया था। इस सबका बड़ा हो हल्ला भी हुआ था। मगर किसी की समझ में न आया कि ऐसा क्यों हुआ था। आज भी ये रहस्य ही बना हुआ है।"

दिवाकर चौधरी की इस बात से अजय सिंह तो चौंका ही मगर उसके साथ साथ अशोक, अवधेश व सुनीता आदि भी चौंके थे। किन्तु उन लोगों ने बीच में कहा कुछ नहीं।

"हाॅ ये तो आपने सच कहा चौधरी साहब।" अजय सिंह ने सहसा गहरी साॅस ली___"एक वक्त था जब हर चीज़ मेरे लिए आसान थी मगर एक ऑधी आई और सब कुछ उड़ा कर ले गई। अब उन जगहों पर गहन ख़ामोशी के सिवा कुछ भी शेष नहीं रहा।"

"इसका मतलब तो ये हुआ कि वो सारा कुछ तुम्हारी वजह से बदल गया था?" इस बार चौंकने की बारी मानो चौधरी की थी। हैरत से बोला___"मगर आख़िर ऐसा हुआ क्या था ठाकुर? यकीनन कोई बड़ी वजह थी क्योंकि इतना बड़ा सिस्टम यहाॅ तक कि प्रदेश के मंत्री का तबादला हो जाना कोई मामूली बात नहीं है। उस सबसे तो हर कोई हैरान रह गया था। आज जबकि तुम्हारे मुख से ही पता चला कि वो सब तुम्हारी वजह से हुआ था तो इस सबको जानने की उत्सुकता और भी बढ़ गई है।"

अजय सिंह समझ सकता था कि उसे मंत्री को इस सबके बारे में बताना ही पड़ेगा। वो भी चाहता था कि किसी वजह से ही सही मगर उसे मंत्री का साथ मिल जाए। अतः उसने संक्षेप में अपनी फैक्ट्री में लगी आग वाले केस के संबंध में बता दिया। ये भी कि बाद में उसे ये पता चल ही गया कि फैक्ट्री में लगी आग के पीछे उसके अपने ही भतीजे विराज का हाॅथ था। मंत्री ये जान कर हैरान रह गया कि विराज ने इतना बड़ा काण्ड किया हुआ है अपने ताऊ के साथ। अजय सिंह ने मंत्री को ये भी बताया कि मंत्री का तबादला और सारे पुलिस महकमे को बदल देने में भी विराज का ही हाॅथ था। ये बात सुन कर तो चौधरी की गाॅड में कीड़े ही कुलबुलाने लगे। वो सोचने पर मजबूर हो गया कि विराज आख़िर चीज़ क्या है जो मंत्री और सारे पुलिस डिपार्टमेन्ट तक को इधर से उधर कर देने की क्षमता रखता है? चौधरी जैसा ही हाल वहाॅ बैठे बाॅकी सबका भी था।

"तुम्हारी कहानी तो वाकई में हैरतअंगेज है यार।" चौधरी ने चकित भाव से कहा___"मगर ये समझ नहीं आया कि तुम्हारे भतीजे विराज ने ऐसा किया क्यों?"

मंत्री ने जानबूझ कर ये सवाल किया था। उसे पता तो था किन्तु वो अजय सिंह के मुख से सच्चाई सुनना चाहता था।

"बड़ी लम्बी कहानी है चौधरी साहब।" अजय सिंह ने गहरी साॅस छोंड़ते हुए कहा___"कभी कभी हमारे साथ वो सब भी हो जाता है जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती है। दरअसल बात ये थी मैने अपने मॅझले भाई की बीवी और उसके दोनो बच्चों को घर और ज़मीन जायदाद से बेदखल कर दिया था। इसकी वजह ये थी कि मेरे भाई की बीवी गौरी एक चरित्रहीन औरत थी। जवानी में ही उसके पति की मौत हो गई थी जिसकी वजह से उससे अपने अंदर की गर्मी बर्दास्त नहीं हुई। शुरू शुरू में तो सब ठीक था मगर फिर उसके चाल चलन दिखने शुरू हुए। मैं जो कि उसका जेठ लगता था और गाॅवों में रिवाज है कि छोटे भाई की बीवी अपने जेठ के सामने सिर खुला नहीं रखती और ना ही उसे छूती है। मगर गौरी अपनी वासना और हवश की वजह से मुझ पर ही डोरे डालने लगी। मैं उसकी उस हरकत से हैरान था। हमारे खानदान कभी ऐसा नहीं हुआ था। हर कोई छोटे बड़े की मान मर्यादा का ख़याल रखता था। उधर दिनप्रति गौरी की हरकतों से मेरा दिमाग़ खराब होने लगा। मैने उसकी हरकतों के बारे में सबसे पहले अपनी पत्नी को बताया और उससे कहा भी कि वो गौरी को समझाए बुझाए कि ये सब कितना ग़तना ग़लत और पाप कर रही है। मेरी पत्नी ने गौरी को बहुत समझाया। मगर गौरी तो जैसे वासना और हवश में अंधी हो चुकी थी। जिसका नतीजा ये निकला कि एक दिन वो मुझे मेरे कमरे में अकेला देख कर आ धमकी और ज़बरदस्ती मुझसे सेक्स संबंध बनाने को कहने लगी। मैं उसकी उस हरकत और बातों से बहुत गुस्सा हुआ। जबकि वो मुझसे लपटी पड़ी थी। तभी इस बीच मेरी पत्नी आ गई। उसने गौरी को मुझसे छुड़ाया और उसे घसीटते हुए कमरे से बाहर ले गई। मेरी पत्नी ने उस सबके कैमरे द्वारा फोटोग्राफ्स भी निकाले थे। ऐसा इस लिए क्योंकि अगर हम गौरी की इन हरकतों के बारे में घर में किसी से बताते तो कोई भी हमारी बात पर यकीन ही न करता। क्योंकि सब गौरी को बहुत ही ज्यादा संस्कारी और आदर्श औरत मानते थे। ख़ैर उस दिन हमारे पास सबूत भी था इस लिए सबको मानना ही पड़ा और फिर सबकी सहमति से ही मैने उसे और उसीए बच्चों को हवेली से बाहर निकाल दिया। हवेली से बाहर मैने उसे खेतों पर बने मकान में रहने की रियायत ज़रूर दे दी थी। ऐसा इस लिए क्योंकि वो आख़िर थी तो हमारे खानदान की बहू ही। हमने सोचा था कि हवेली से दूर खुतों पर बने मकान में रहेगी तो सब कुछ ठीक ही रहेगा। मगर हमारा ऐसा सोचना भी ग़लत हो गया। क्योंकि वो खेतों पर काम कर रहे मजदूरों पर ही वासना और हवस के चलते डोरे डालने लगी थी। एक दिन हमारे एक मजदूर ने इस बारे में मुझसे डरते हुए बताया। उसकी बात सुनकर मुझे गौरी पर हद से ज्यादा गुस्सा आया। उसके बाद मैने फैसला कर लिया कि अब उसे और उसके बच्चों को मैं उस गाॅव में नहीं रहने दूॅगा। क्योंकि इससे हमारी और हमारे खानदान की बहुत बदनामी होती। अतः मैने उसे हर चीज़ से बेदखल कर दिया। गौरी का लड़का थोड़ा बहुत समझदार था मगर वो भी अपनी माॅ की बातों को ही सच मानता था। उसे लगता था कि हमने उसकी माॅ को बेवजह ही हवेली से निकाला था। वो अपना और अपनी माॅ बहन का घर खर्चा चलाने के लिए मुम्बई में कहीं नौकरी करने चला गया था। जबकि उसके पीछे यहाॅ उसकी माॅ ये सब गुल खिला रही थी। ख़ैर, एक दिन बाद पता चला कि विराज अपनी माॅ व बहन को अपने साथ मुम्बई ले गया। उसके बाद अभी कुछ समय पहले से ही ये सब शुरू हुआ। यानी विराज ये सोच कर मुझसे बदला ले रहा है कि मैने उसके और उसके परिवार के साथ ग़लत किया है।"

"ओह तो ये हैं सारी बातें।" सब कुछ सुनने के बाद चौधरी ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"लेकिन इतना कुछ हुआ और तुमको अंदाज़ा भी न हुआ कि ये सब तुम्हारे भतीजे ने ही किया है?"

"अंदाज़ा तो तब होता चौधरी साहब।" अजय सिंह ने कहा___"जब मुझे उससे इस सबकी उम्मीद होती। मैं तो यही समझता था कि वो लड़का निहायत ही सीधा सादा और भोला है। भला मुझे क्या पता था कि वो किसी डायनामाइट से कम नहीं है।"

"ख़ैर।" चौधरी ने पहलू बदला___"हमने सुना है कि तुम्हारी अपनी बेटी जो कि पुलिस इंस्पेक्टर है वो आजकल तुम्हारे खिलाफ़ हो चुकी है। ये क्या चक्कर है?"
"चक्कर वक्कर कुछ नहीं है चौधरी साहब।" अजय सिंह मन ही मन बुरी तरह चौंका था किन्तु चेहरे पर चौंकने के भावों को आने न दिया था, बोला___"दरअसल बात ये है कि हमें उसका पुलिस की नौकरी करना ज़रा भी पसंद नहीं था। जबकि पुलिस की नौकरी करना उसका शौक था बचपन से ही। मैने और मेरी पत्नी प्रतिमा ने उससे कहा कि ये पुलिस की नौकरी छोंड़ दो, भला उसे नौकरी करने ज़रूरत ही क्या है? उसे जिस चीज़ की भी ज़रूरत होती है हम उसके बोलने से पहले ही वो चीज़ लाकर उसके क़दमों में डाल देते हैं। मगर वो हमारी बात सुनती ही नहीं। बचपन से ही ज़िद्दी थी वो। एक दिन उसकी माॅ ने कदाचित कुछ ज्यादा ही कड़े शब्दों में कह दिया था। जिसकी वजह से वो गुस्सा हो गई और कहने लगी कि उसे हमारी किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है। वो अपनी ज़रूरतें खुद पूरी कर लेगी। बस उस दिन के बाद से वो ना तो मुझसे बोलती है और ना ही अपनी माॅ से। यहाॅ तक कि घर भी नहीं आती।"

"बड़ी अजीब बात है।" दिवाकर चौधरी ने कहा__"भला तुम लोगों को उसका नौकरी करने से एतराज़ क्यों है? आज की जनरेशन ज़रा एडवाॅस टेक्नालाॅजी में सम्मिलित है। वो खुद पर और अपने टैलेन्ट के बल पर ही जीवन जीना चाहते हैं। अतः तुम दोनो का उसका नौकरी करने से ऐतराज़ करना सरासर ग़लत था। ख़ैर, जैसा कि तुमने बताया कि उस दिन से वो घर भी नहीं आती है तो सवाल ये है कि वो रहती कहाॅ है फिर? क्या तुमने पता करने की कोशिश नहीं की कि तुम्हारी लड़की रहती कहाॅ है? दिन का तो चलो ठीक है कि वो पुलिस में अपनी ड्यूटी के चलते कहीं न कहीं ब्यस्त ही रहती होगी मगर रात को? रात को कहाॅ रहती होगी वो?"

"पुलिस वाली है चौधरी साहब।" अजय सिंह ने कहा__"खुद कमाती है। इस लिए कहीं न कहीं अपने रहने के लिए कोई किराये से कमरा ले लिया होगा।"
"ये तो तुम संभावना ब्यक्त कर रहे हो ठाकुर।" चौधरी ने कहा___"जबकि तुम्हें खुद पता लगाना चाहिए था कि अगर वो लौटकर हवेली नहीं आती है तो रहती कहाॅ है? कैसे बाप हो तुम ठाकुर?"

अजय सिंह कुछ बोल न सका। उसे एहसास था कि चौधरी सच कह रहा था कि उसे खुद अपनी बेटी के बारे में पता करना चाहिए था। भले ही वो पुलिस वाली थी मगर ये भी सच था कि वो एक लड़की भी थी। वो भले ही अपनी सुरक्षा बखूबी कर ले मगर वो तो उसका बाप था न? उसे तो अपनी बेटी की चिन्ता होनी चाहिए थी। अजय सिंह सोचो में गुम तो था मगर उसके ज़हन में ये भी था कि रितू के साथ उसकी छोटी बहन नैना भी है। शायद यही वजह थी कि उसने अब तक पता करने की कोशिश नहीं की थी कि वो दोनों कहाॅ रहती हैं? अकेले रितू बस होती तो उसे चिंता यकीनन होती मगर उसके साथ में नैना जैसी पढ़ी लिखी व समझदार उसकी बहन भी थी। इस लिए वो बेफिक्र था अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए।

"क्या सोचने लगे ठाकुर?" उसे सोचों में गुम देख कर चौधरी ने कहा___"ख़ैर छोंड़ो यार, ये तुम्हारे घर की बात है तुम्हें जो उचित लगे वो करो। अच्छा एक बात बताओ।"
"ज जी????" अजय सिंह चौंका___"प..पूछिए।"

"क्या ऐसा हो सकता है।" चौधरी ने बड़े ग़ौर से अजय सिंह को देखते हुए कहा___"तुम्हारी बेटी और तुम्हारा भतीजा विराज एक हो गए हों? क्या ऐसा हो सकता है कि विराज ने तुम्हारी बेटी को अपने साथ मिला लिया हो??"

"प..प.पता नहीं।" अजय सिंह के ऊपर जैसे एकाएक सारा आसमान भरभरा कर गिर पड़ा था। बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हालते हुए कहा उसने___"आप ऐसा क्यों कह रहे हैं चौधरी साहब? जबकि ऐसा हर्गिज़ नहीं हो सकता। इसकी वजह ये है कि मेरे तीनो ही बच्चे उसकी माॅ की हरकतों की वजह से उससे और उसकी माॅ बहन से कभी कोई बात करने की तो बात दूर बल्कि उन्हें देखना तक पसंद नहीं करते।"

"ऐसा तुम सोचते हो ठाकुर।" दिवाकर चौधरी ने दार्शनिकों वाले अंदाज़ में कहा___"जबकि अक्सर ऐसा हो जाया करता है जिसकी हमें पूरी उम्मीद होती है कि ऐसा तो कभी हो ही नहीं सकता।"

"क्या मतलब???" अजय सिंह चकरा सा गया।
"मतलब साफ है ठाकुर।" चौधरी ने कहा___"तुम ये सोच कर ये नहीं मान रहे हो कि तुम्हारी बेटी विराज को देखना तक पसंद नहीं करती इस लिए वो उससे मिल नहीं सकती जबकि ऐसा हो भी सकता है कि वो उससे मिल ही गई हो। विराज की कारगुजारियों से इतना तो पता चल ही गया है कि वो कितना शातिर दिमाग़ रखता है और कितनी ऊॅची पहुॅच भी रखता है। अतः अगर वो अपने शातिर दिमाग़ के चलते तुम्हारी बेटी को अपनी तरफ कर भी ले तो हैरत की बात नहीं होगी। संभव है कि उसने रितू को ऐसा कोई पाठ पढ़ा दिया हो जिसके चलते तुम्हारी बेटी का ब्रेन वाश हो गया हो और अब वो उसे सही मान रही हो और तुम्हें यानी कि अपने बाप को ग़लत।"

अजय सिंह मंत्री की सूझ बूझ तथा उसकी दूरदर्शिता की मन ही मन दाद दिये बिना न रह सका। सच्चाई भले ही कुछ और थी मगर जितना उसने उहे बताया था उस हिसाब से कड़ियों को जोड़ कर सच्चाई के रूप में अपनी संभावनाएॅ इस तरह बयां करना आसान बात न थी। सहसा उसे ख़याल आया कि जबसे वो यहाॅ आया है तब से मंत्री सिर्फ उसी के संबंध में बातें पूछ रहा है जबकि उसे अब तक यही समझ में नहीं आया था कि मंत्री ने आख़िर उसे बुलाया किस लिए था??

"भगवान जाने चौधरी साहब।" फिर उसने पहलू बदलने की गरज से कहा___"कि सच्चाई है इस संबंध में। ख़ैर छोंड़िये ये सब और ये बताइये कि इस नाचीज़ को किस लिए बुलाया था आपने?"

अजय सिंह द्वारा अचानक ही इस तरह पहलू बदल लेना चौधरी को मन ही मन चौंकाया मगर उसने उसे ज़ाहिर न किया। बल्कि उसके पूछने पर वह मुस्कुराया और सेन्टर टेबल पर सजे फल फूल व मॅहगी शराब की तरफ इशारा किया।

"ये तो कमाल हो गया ठाकुर।" फिर चौधरी ने मुस्कुराते हुए ही कहा___"तुम आज यहाॅ पहली बार आए और हमने बातों के चक्कर में ये भी ख़याल नहीं रखा कि घर आए मेहमान का आतिथ्य भी किया जाता है।"

"मैं कोई मेहमान नहीं हूॅ चौधरी साहब।" अजय सिंह ने भी मुस्कुराते हुए कहा___"आपने मुझे दोस्त कह कर मेरा मान बढ़ा दिया है यही बहुत है मेरे लिए। इस नाते अब तो ये भी अपना ही घर हुआ और अपने ही घर में भला कोई मेहमान कैसा हो सकता है?"

"हाॅ तो सही कहा तुमने।" चौधरी हॅसा और फिर बगल से ही बैठे अशोक, अवधेश व सुनीता की तरफ इशारा करते हुए कहा___"इनसे मिलो ठाकुर, ये सब भी हमारे गहरे दोस्त हैं। बल्कि यूॅ समझो कि ये तीनो हमारे दोस्तों की लिस्ट में सबसे ऊपर हैं और आज से तुम भी शामिल हो गए हो।"

"ये तो मेरा सौभाग्य है चौधरी साहब।" अजय सिंह ने खुश होते हुए कहा___"जो आपने मुझे अपने दोस्त का दर्ज़ा दिया है। मैं पूरी कोशिश करूॅगा कि इस दोस्ती पर खरा उतर सकूॅ।"
"चलो फिर इसी बात पर एक एक जाम हो जाए।" चौधरी ने मुस्कुराते हुए कहा___"और हमारी दोस्ती को सेलीब्रेट किया जाए।"

"जी बिलकुल।" अजय सिंह हॅसा और उन तीनों की तरफ देख कर उन तीनो से हैलो किया तथा हाॅथ भी मिलाया। चौधरी के कहने पर सुनीता ने सबके लिए जाम बनाया और साक़ी बन कर सबको पिलाया भी। इस बीच चौधरी ने अजय सिंह को बताया कि सुनीता उसके साथ साथ बाॅकी उन दोनो को भी हर तरह से खुश रखती है। अजय सिंह ये जान कर हैरान भी हुआ था। मगर फिर ये सोच कर मुस्कुराया भी कि चौधरी भी उसी की तरह ही औरतबाज है।

लगभग आधा घंटे से ऊपर तक जामों का दौर चलता रहा। सब के सब हल्के नशे के सुरूर में आ चुके थे। उसके बाद बातों का सिलसिला फिर से शुरू हुआ। अजय सिंह सबसे काफी खुल चुका था। बाॅकी सब भी अजय सिंह से खुल चुके थे। सुनीता को अजय सिंह की पर्शनाल्टी पहली नज़र में ही भा गई थी और वो उसके नीचे लेटने के लिए बेक़रार हो उठी थी। मगर अभी उसको भी पता था कि उसकी ये बेक़रारी शान्त नहीं होने वाली है। यानी कुछ समय तक इन्तज़ार करना पड़ेगा उसे।

"मज़ा आ गया चौधरी साहब।" अजय सिंह ने नशे के हल्के सुरूर में मुस्कुराते हुए कहा___"आप सच में बहुत अच्छे हैं। एक पल के लिए भी मुझे ऐसा नहीं लगा जैसे इसके पहले आप मेरे लिए ग़ैर थे। सच कहता हूॅ आपसे मिल कर और आपका दोस्त बन कर बहुत अच्छा लग रहा है। बहुत दिनों बाद ऐसे खुश होने का मौका मिला है मुझे।"

"अभी तो इससे भी ज्यादा मज़ा आएगा ठाकुर।" चौधरी ने भी नशे के हल्के सुरूर में कहा___"हमारी दोस्ती में और हमारे साथ में ऐसा ही होता है। हमें वही इंसान अच्छा लगता है जो हमसे वफ़ा करे। वफ़ादार ब्यक्ति के लिए हम कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं।"

"मैं ज़रूर आपका वफ़ादार रहूॅगा चौधरी साहब।" अजय सिंह ने कहा___"आप जब भी मुझे याद करेंगे मैं आपके सामने हर काम छोंड़ कर हाज़िर हो जाऊॅगा। मुझे भी वफ़ादार इंसान ही अच्छे लगते हैं जो दोस्त के लिए कुछ भी कर जाए मगर...।"

"मगर क्या ठाकुर।" चौधरी ने सिर उठा कर अजय सिंह की तरफ देखा___"तुम्हारे स्वागत में हमसे कोई कमी हो गई है क्या? अगर ऐसा है तो बेझिझक बोल दो यार। जो बोलोगे वो मिलेगा तुम्हें। ये दिवाकर चौधरी का वचन है।"

"न नहीं नहीं चौधरी साहब।" अजय सिंह ने हड़बड़ाते हुए कहा___"आपने किसी बात की कमी नहीं की है। मेरे कहने का मतलब ये था कि आपने मुझे बताया नहीं कि आपने मुझे किस वजह से यहाॅ बुलाया था? देखिए अब तो हम दोनो दोस्त बन गए हैं न। इस लिए अगर कोई बात है आपके मन में तो बेझिझक कहिए। मैं वादा करता हूॅ कि अगर मेरे लिए आपका कोई आदेश है तो मैं जान देकर भी उसे पूरा करूॅगा।"

अजय सिंह की बात इस पर चौधरी ने उसे बड़े ध्यान से देखा जैसे जाॅच रहा हो कि उसकी बात पर कितना दम है। फिर अपने हाॅथ में लिए शराब के प्याले को मुह से लगा कर शराब का हल्का सा घूॅट लिया उसके बाद अजय सिंह की तरफ देखते हुए कहा___"आदेश तो कुछ भी नहीं है ठाकुर। बस ये समझो कि आज के समय में जो तुम्हारा दुश्मन है वही हमारा भी दुश्मन है।"

"ये आप क्या कह रहे हैं चौधरी साहब?" अजय सिंह ने ऑखें फैलाते हुए कहा____"मेरा दुश्मन तो मेरा वो हरामज़ादा भतीजा बना हुआ है किन्तु वो आपका दुश्मन कैसे बन गया? बात कुछ समझ में नहीं आई चौधरी साहब।"

"तुमने कुछ समय पहले किसी लड़की के सामूहिक रेप के बारे में तो सुना ही होगा न?" चौधरी ने कहा।
"र रेप के बारे में???" अजय सिंह के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे। फिर सहसा जैसे उसे याद आया___"ओह हाॅ हाॅ सुना था। आप उसी रेप स्कैण्डल की बात कर रहे हैं न जिस पर कुछ समय पहले काफी हो हल्ला हुआ था? मगर फिर सब कुछ शान्त हो गया था। उसके बाद कुछ पता ही नहीं चला कि क्या हुआ? मगर आपका उस रेप केस से क्या संबंध?"

"दरअसल वो रेप हमारे बच्चों की करतूत का नतीजा था ठाकुर।" चौधरी ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"तुम्हारे गाॅव के ही पास की एक विधी नाम की लड़की थी जिसके साथ हमारे बच्चों ने मिल कर रेप किया था। वो लड़की हमारे बच्चों के ही काॅलेज में पढ़ती थी। उस रेप केस पर हो हल्ला तो ज़रूर हुआ था किन्तु उस पर कोई शख्त ऐक्शन इस लिए नहीं लिया गया था क्योंकि मामला हमारे बच्चों का था। यहाॅ का पुलिस कानून हमारे खिलाफ कोई क़दम उठा ही नहीं सकता था। ये बात उस लड़की के घरवालों को भी समझ आ गई थी। इसी लिए लड़की के घरवालों ने भी कोई केस नहीं किया था और इसी वजह से मामला शान्त पड़ गया था। मगर....।"

"मगर????" अजय सिंह के चेहरे पर हैरत के भाव थे।
"मगर रेप के तीसरे दिन हमारे बच्चे हमारे ही फार्महाउस से गायब हो गए।" चौधरी कह रहा था___"और अब तक उनका कहीं कुछ पता नहीं चल सका है। उन बच्चों में एक हमारा बेटा है और तीन लड़कों में से एक अशोक का है दूसरा अवधेश का और तीसरा सुनीता का। हमने सब कुछ करके देख लिया मगर आज तक कहीं भी बच्चों का पता नहीं चला। सबसे गज़ब तो तब हो गया जब हमारी बेटी भी गायब हो गई।"

"ये आप क्या कह रहे हैं चौधरी साहब??" अजय सिंह हक्का बक्का नज़र आने लगा था, बोला___"मगर आपके बच्चों को गायब किसने किया हो सकता है? और अगर बच्चे अगर रेप के बाद से ही गायब हैं तो ज़ाहिर सी बात है कि उन्हें उसी ने गायब किया होगा जिसके साथ उन बच्चों ने अहित किया है। लेकिन गायब करने वाले का आपके पास कोई फोन या किसी तरह की सूचना तो आनी ही चाहिए थी। सीधी सी बात है कि अगर ये सब उसने बदला लेने के उद्देष्य से किया है तो वो देर सवेर ये ज़रूर सूचित करता कि आपके बच्चे उसके कब्जे में हैं।"

"बिलकुल सही कहा तुमने ठाकुर।" चौधरी एकाएक कह उठा__"उसे ज़रूर सूचित करना चाहिए था और उसने ऐसा किया भी है।"
"क्या????" अजय सिंह चौंका___"मेरा मतलब है कि क्या सूचित किया उसने?"

"उसने फोन पर हमें बताया कि हमारे बच्चे उसके कब्जे में ही हैं।" चौधरी ने कहा___"और ये भी बताया कि वो उनके साथ क्या करेगा? शुरू शुरू में तो हमें समझ ही नहीं आया कि ऐसा कौन कर सकता है, क्योंकि हमें यही पता नहीं था कि हमारे बच्चों ने किस लड़की के साथ वो सब किया था? दूसरी बात हम ये सोच रहे थे कि अगर मामला इतना बड़ा था तो पुलिस केस ज़रूर होता। इस लिए ये जानने के लिए हमने यहाॅ के पुलिस कमिश्नर से भी बात की थी मगर उसने बताया कि पुलिस ने कोई केस नहीं बनाया। पुलिस केस भी तभी बनाती जब लड़की के घर वाले एफआईआर कराने थाने में जाते। मगर लड़की के घर वाले तो पुलिस की दहलीज़ पर गए ही नहीं थे। हमने भी यही समझा था कि वो हमसे डर गए होंगे इसी लिए पुलिस केस नहीं किया। मगर फिर उस किडनैपर से और अशोक के द्वारा ही समझ में आया कि ऐसा कौन और क्यों कर सकता है?"

"ओह तो फिर क्या समझ आया आपको?" अजय सिंह ने पूछा।
"रेप पीड़िता के घर वाले तो ऐसा कर नहीं सकते।" चौधरी ने कहा___"क्योंकि उन्हें पता था कि पुलिस केस से कुछ होने वाला नहीं है और ऐसा करने की क्षमता उनमें थी नहीं। मगर अशोक ने अपने तरीके से पता लगाया कि एक शख्स और है ऐसा जो हमारे बच्चों को इस संबंध में किडनैप कर सकता है।"

"ऐसा शख्स भला कौन हो सकता है चौधरी साहब?" अजय सिंह चौंका।
"तुम्हारा भतीजा विराज।" चौधरी ने मानो अजय सिंह के सिर पर बम्ब फोड़ा।
"क्या????" अजय सिंह इस तरह उछला था जैसे औसके पिछवाड़े पर किसी ने चुपके से गर्म तवा रख दिया हो। फिर हैरत से ऑखें फाड़े हुए बोला___"ये आप क्या कह रहे हैं? भला विराज ऐसा क्यों करेगा?"

"इसकी बहुत बड़ी वजह है ठाकुर।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"दरअसल जिस लड़की का रेप किया था हमारे बच्चों ने उस विधी नाम की लड़की से तुम्हारा भतीजा विराज प्रेम करता था। जब उसे अपनी प्रेमिका के साथ हुए उस भयावह रेप का पता चला तो वो आग बबूला हो गया होगा और फिर मुम्बई से यहाॅ आ कर उसने अपनी प्रेमिका के साथ हुए रेप का बदला लेने के लिए ये सब कारनामा अंजाम दिया। हलाॅकि ये एक संभावना है ठाकुर क्योंकि हमारे पास अभी इस बात का कोई सबूत नहीं है कि विराज ही ये सब कर रहा है। संभावना इस लिए है क्योंकि ये काम या तो विधी के घर वाले कर सकते या फिर विराज। दोनो के ही पास ये सब करने की मजबूत वजह थी। ख़ैर जब हमें अशोक की तहकीक़ात से ये पता चला कि विधी किसी विराज नाम के लड़के से प्रेम करती थी तो हमने विराज के बारे में भी जानकारी हाॅसिल की। उसी जानकारी के तहत ये पता चला कि तुम्हारा भी विराज के साथ ऐसा ही कुछ हाल है। इस लिए हमने सोचा तुमसे मिल कर ही इस संबंध में बात की जाए।"

"सच कहूॅ तो ये बात मेरे लिए निहायत ही नई और चौंकाने वाली है चौधरी साहब।" अजय सिंह के मस्तिष्क में धमाके से हो रहे थे। उसके दिमाग़ की बत्ती भी एकाएक जल उठी थी। अब उसे समझ आया था कि विराज मुम्बई से यहाॅ किस लिए आया था? इसके पहले वो सोच सोच कर परेशान था कि विराज यहाॅ किस वजह से आया रहा होगा। ख़ैर उसने इन सब बातों को अपने दिमाग़ से झटका और फिर बोला___"मुझे तो पता क्या बल्कि इस बात का अंदाज़ा ही नहीं था कि मेरे भतीजे का किसी लड़की से प्रेम संबंध भी हो सकता है और वो उसके चक्कर में आपके साथ इतना कुछ कर सकता है।"

"दूसरी बात ये कि हम तुम्हारी बेटी के विराज से मिल जाने की बात इस लिए कह रहे हैं क्योंकि वो एक पुलिस ऑफिसर थी।" चौधरी कह रहा था___"उसके थाना क्षेत्र के अंतर्गत रेप की वो वारदात हुई थी। इस लि ऐसा हो ही नहीं सकता कि उसे उस वारदात का पता ही न चला हो। बल्कि ज़रूर चला होगा और जब उसने विधी को उस हालत में देखा होगा तो खुद ही कानूनन कोई ऐक्शन लेने का सोचा होगा। मगर ऐक्शन वो बिना आला ऑफिसर की अनुमति से कैसे ले सकती थी अथवा बिना पीड़िता के घर वालों द्वारा दर्ज़ करवाई गई एफआईआर के कैसे लेसकती थी? कमिश्नर ने उसे इस केस को बनाने से शख्त मना कर दिया होगा। ख़ैर, क्योंकि वो भी पुलिस वाली के साथ साथ एक लड़की थी इस लिए उसे उस रेप पीड़िता विधी से हमदर्दी हुई होगी। जिसके तहत वो उसी हमदर्दी के तहत विधी से मिलने भी गई होगी। उधर विधी के साथ हुई उस घटना की जानकारी किसी तरह विराज को भी हुई और वो फौरन ही मुम्बई से अपनी प्रेमिका के पास आ गया होगा। अतः संभव है कि इसी दौरान विराज की मुलाक़ात तुम्हारी बेटी से हुई हो और उसे भी ये पता चल गया हो कि विधी और विराज दरअसल प्रेमी कॅपल थे। ऐसी मार्मिक घटना के बीच किसी के अंदर मौजूद नफ़रत अगर प्यार में परिवर्तित हो जाए तो कोई हैरत की बात नहीं। ठाकुर, बस इसी वजह से हम कह रहे हैं कि तुम्हारी बेटी इन हालातों में विराज से मिल गई होगी। बाॅकी सच्चाई क्या है ये तो ईश्वर ही बेहतर तरीके से जानता है।"

अजय सिंह चौधरी की संभावना से भरी बातों को सुन कर बुरी तरह चकित था। उसे लगा कहीं यही सब सच तो नहीं? चौधरी की बातों में उसे सच्चाई की बू आ रही थी। हलाॅकि उसे तो पता ही था कि उसकी बेटी विराज का साथ दे रही है आजकल। उसने ये बात चौधरी से बताई नहीं थी, इसकी वजह ये थी कि फिर उसे और भी सारी बातें बतानी पड़ती जिनका हक़ीक़त से संबंध था। मगर अजय सिंह हक़ीक़त बता नहीं सकता था। उसे लगता था कि हक़ीक़त बताने से उसका कैरेक्टर चौधरी के सामने नंगा हो कर रह जाएगा।

"आपकी बातें और आपकी संभावनाएॅ सच भी हो सकती हैं चौधरी साहब।" फिर अजय सिंह ने कहा___"मगर क्योंकि महज संभावनाओं के आधार पर ही तो नहीं चला जा सकता न। इस लिए हमें साथ मिल कर सारी बातों का पता लगाना होगा।"

"हम भी यही कहना चाहते हैं तुमसे।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"मगर हमारे सामने समस्या ये है कि इस मामले में हम कोई भी क़दम खुल कर नहीं उठा सकते। क्योंकि तुम्हारे भतीजे ने साफ शब्दों में धमकी दी है कि अगर हमने कुछ उल्टा सीधा करने की कोशिश की तो वो हमें ही नहीं बल्कि इन तीनों को भी बीच चौराहे पर नंगा दौड़ा देगा।"

"ये क्या कह रहे हैं आप?" अजय सिंह चौधरी की ये बात सुन कर बुरी तरह हैरान रह गया था, बोला__"भला वो ऐसा कैसे कर सकता है?"
"दरअसल।" चौधरी ने ज़रा झिझकते हुए कहा___"उसके पास हम सबके खिलाफ़ ऐसे सबूत हैं जो अगर पब्लिक के सामने आ जाएॅ तो हम चारों का बेड़ा गर्क हो जाएगा।"

चौधरी की बात सुन कर अजय सिंह चौधरी को इस तरह देखने लगा था जैसे अचानक ही उसके सिर पर गधे का सिर नज़र आने लगा हो। अजय सिंह ये सोच कर भी हक्का बक्का रह गया था कि विराज के पास उसके खिलाफ़ तो उसका बेड़ा गर्क कर देने वाला सबूत था ही और अब चौधरी के खिलाफ़ भी ऐसा सबूत है उसके पास। अजय सिंह को लगा कि उसे चक्कर आ जाएगा ये जान कर मगर फिर उसने खुद को बड़ी मुश्किल से सम्हाला। उसे ये भी समझ आ गया कि जिस उम्मीद से और खुशी से वह चौधरी के पास आया था वो चौधरी तो खुद ही विराज के सामने भीगी बिल्ली बना बैठा है। ये सोचते ही अजय सिंह का सारी उम्मीद और सारी खुशी एक ही पल में नेस्तनाबूत हो गई।

"ये तो बहुत ही गजबनाक बात कह रहे हैं आप।" फिर उसने खुद को सम्हालते हुए कहा___"बड़े आश्चर्य की बात है चौधरी साहब कि आप जैसा इंसान सब कुछ करने की क्षमता रखते हुए भी कुछ नहीं कर सकता है।"

"ये सच है ठाकुर।" चौधरी ने गंभीर भाव से कहा___"जब तक उसके पास हमारे खिलाफ़ वो सबूत हैं तब तक हम कोई ठोस क़दम उठाने का सोच भी नहीं सकते हैं। दूसरी बात उसके कब्जे में हमारे बच्चे भी हैं जिनके साथ वो कुछ भी उल्टा सीधा कर सकता है। ऐसे हालात में हम उसके खिलाफ भला कोई कठोर क़दम कैसे उठा सकते हैं? इस लिए हमने सोचा कि हमारा जो दुश्मन है वही तुम्हारा भी है तो तुम ज़रूर इस मामले में कोई ठोस कार्यवाही कर सकते हो। यकीन मानो ठाकुर, अगर तुम उस नामुराद का पता करके तथा उसके कब्जे से हमारे बच्चों के साथ साथ उस सबूत को भी लाकर हमारे हवाले कर दो तो हम जीवन भर तुम्हारे एहसानमंद रहेंगे। तुम जिस चीज़ की हसरत करोगे वो चीज़ हम लाकर तुम्हें देंगे।"

मंत्री की ये बात सुन कर अजय सिंह चकित रह गया था। उसके मुख से कोई लफ्ज़ न निकल सका था। चौधरी उससे मदद की उम्मीद किये बैठा था जबकि उसे पता ही नहीं था कि इस मामले में तो वो खुद भी पंगु हुआ बैठा है। कितनी अजीब बात थी दोनो एक दूसरे से मदद की उम्मीद कर रहे थे जबकि दोनो ही एक दूसरे की कोई मदद नहीं कर सकते थे। अजय सिंह को एकाएक ही उसका भतीजा किसी भयावह काल की तरह लगने लगा था। उसके समूचे जिस्म में मौत की सी झुरझुरी दौड़ गई थी।

"क्या सोचने लगे ठाकुर।" उसे चुप देख कर चौधरी पुनः बोल पड़ा___"तुमने हमारी बात का कोई जवाब नहीं दिया। जबकि हम तुमसे इस मामले में मदद की बात कर रहे हैं।"
"मैं तो ये सोचने लगा था चौधरी साहब।" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"कि एक पिद्दी से लड़के ने प्रदेश की इतनी बड़ी हस्ती का जीना हराम कर दिया है। अभी तक तो मैं यही सोच रहा था कि उसने तो सिर्फ मेरा ही जीना हराम किया हुआ था मगर हैरत की बात है कि उसने अपने निशाने पर आपको भी लिया हुआ है।"

"सब वक्त और हालात की बातें हैं ठाकुर।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"उसके पास हमारे खिलाफ़ सबूत भी हैं और हमारे बच्चे भी हैं जिनके तहत उसका पलड़ा बहुत भारी है। अगर कम से कम हमारे बच्चे उसके पास नहीं होते तो हम उसे बताते कि हमारे साथ ऐसी ज़ुर्रत करने की क्या सज़ा मिल सकती थी उसे? ख़ैर छोंड़ो, तुम बताओ कि क्या तुम इस मामले में हमारी कोई मदद कर सकते हो या नहीं?"

"मैं पूरी कोशिश करूॅगा चौधरी साहब।" अजय सिंह ने कहा___"कि मैं इस मामले में आपके लिए कुछ खास कर सकूॅ और जैसा कि आपको मैं बता ही चुका हूॅ कि वो नामुराद मुझे भी अपना दुश्मन समझता है और मुझसे बदला ले रहा है तो उस हिसाब से ये भी सच है कि मैं भी यही चाहता हूॅ कि जल्द से जल्द वो मेरी पकड़ में आ जाए। एक बार पता चल जाए कि वो कमीना किस कोने में छुपा बैठा है उसके बाद तो मैं उसका खात्मा बहुत ही खूबसूरत ढंग से करूॅगा।"

"ठीक है ठाकुर।" चौधरी ने कहा___"हम भी यही चाहते हैं कि उसके ठिकाने का पता किसी तरह से चल जाए। उसके बाद हमारे लिए कोई क़दम उठाना भी आसान हो जाएगा।"

ऐसी ही कुछ देर और कुछ बातें होती रहीं। शाम घिर चुकी थी और अब रात होने वाली थी। इस लिए अजय सिंह चौधरी से इजाज़त लेकर वापस हल्दीपुर के लिए निकल चुका था। सारे रास्ते वह चौधरी के बारे में सोचता रहा था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका भतीजा इतना बड़ा सूरमा हो सकता है कि वो प्रदेश के मंत्री तक को अपनी मुट्ठी में कैद कर ले। उसने मंत्री से कह तो दिया था कि वो इस मामले में उसकी मदद करेगा मगर ये तो वही जानता था कि वो उसकी कितनी मदद कर सकता था? ख़ैर थका हारा व परेशान हालत में अजय सिंह अपनी हवेली पहुॅच गया था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो खुद अपने तथा चौधरी के लिए अब क्या करे?
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दोस्तो, आप सबके सामने अपडेट हाज़िर है,,,,,,,

आप सबकी प्रतिक्रिया तथा रिव्यू का इन्तज़ार रहेगा।
 
एकनयासंसार
अपडेट.......《 54 》

अब तक,,,,,,

"सब वक्त और हालात की बातें हैं ठाकुर।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"उसके पास हमारे खिलाफ़ सबूत भी हैं और हमारे बच्चे भी हैं जिनके तहत उसका पलड़ा बहुत भारी है। अगर कम से कम हमारे बच्चे उसके पास नहीं होते तो हम उसे बताते कि हमारे साथ ऐसी ज़ुर्रत करने की क्या सज़ा मिल सकती थी उसे? ख़ैर छोंड़ो, तुम बताओ कि क्या तुम इस मामले में हमारी कोई मदद कर सकते हो या नहीं?"

"मैं पूरी कोशिश करूॅगा चौधरी साहब।" अजय सिंह ने कहा___"कि मैं इस मामले में आपके लिए कुछ खास कर सकूॅ और जैसा कि आपको मैं बता ही चुका हूॅ कि वो नामुराद मुझे भी अपना दुश्मन समझता है और मुझसे बदला ले रहा है तो उस हिसाब से ये भी सच है कि मैं भी यही चाहता हूॅ कि जल्द से जल्द वो मेरी पकड़ में आ जाए। एक बार पता चल जाए कि वो कमीना किस कोने में छुपा बैठा है उसके बाद तो मैं उसका खात्मा बहुत ही खूबसूरत ढंग से करूॅगा।"

"ठीक है ठाकुर।" चौधरी ने कहा___"हम भी यही चाहते हैं कि उसके ठिकाने का पता किसी तरह से चल जाए। उसके बाद हमारे लिए कोई क़दम उठाना भी आसान हो जाएगा।"

ऐसी ही कुछ देर और कुछ बातें होती रहीं। शाम घिर चुकी थी और अब रात होने वाली थी। इस लिए अजय सिंह चौधरी से इजाज़त लेकर वापस हल्दीपुर के लिए निकल चुका था। सारे रास्ते वह चौधरी के बारे में सोचता रहा था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका भतीजा इतना बड़ा सूरमा हो सकता है कि वो प्रदेश के मंत्री तक को अपनी मुट्ठी में कैद कर ले। उसने मंत्री से कह तो दिया था कि वो इस मामले में उसकी मदद करेगा मगर ये तो वही जानता था कि वो उसकी कितनी मदद कर सकता था? ख़ैर थका हारा व परेशान हालत में अजय सिंह अपनी हवेली पहुॅच गया था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो खुद अपने तथा चौधरी के लिए अब क्या करे?
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अब आगे,,,,,,,,

मैंने दरवाजा खोला तो देखा बाहर रितू दीदी थी। मेरे द्वारा दरवाजा खुलते ही वो मुझे देख कर पहले तो मुस्कुराई फिर जैसे ही उन्हें देख कर मैं एक तरफ हुआ तो वो दरवाजे से अंदर की तरफ कमरे में आ गईं। उन्हें कमरे में आते देख मुझे समझ न आया कि रितू दीदी रात में सोने की बजाय इस वक्त यहाॅ मेरे पास किस वजह से आई हैं?

दरवाजा बंद करके मैं पलटा और बेड की तरफ आ गया। रितू दीदी बेड पर ही एक किनारे पर बैठी हुई थी। इस वक्त उनके खूबसूरत बदन पर नाइट ड्रेस था। मैं खुद भी एक हाफ बनियान और शार्ट्स में था। हलाॅकि मुझे उनके यहाॅ इस वक्त आने पर कोई ऐतराज़ नहीं था बल्कि मैं तो खुश ही हुआ था मगर सोचने वाली बात तो थी ही कि इस वक्त उनके यहाॅ आने की क्या वजह हो सकती है?

"कहीं मैने तुझे डिस्टर्ब तो नहीं किया न राज?" मुझे बेड की तरफ आते देख सहसा रितू दीदी ने बड़ी मासूमियत से कहा___"कहीं ऐसा तो नहीं कि मैने यहाॅ आ कर तेरी नींद में खलल डाल दिया हो?"

"ये आप कैसी बातें कर रही हैं दीदी?" मैं उनके पास ही बेड पर बैठते हुए बोला___"भला आपकी वजह से मैं कैसे डिस्टर्ब हो जाऊॅगा? बिलकुल भी नहीं दीदी, मुझे भी अभी नींद नहीं आ रही थी।"

"अच्छा भला वो क्यों?" रितू दीदी ने सहसा मेरे चेहरे की तरफ ग़ौर से देखते हुए कहा___"क्या विधी की याद आ रही थी?"
"उसकी याद आने का तो सवाल ही नहीं है।" मैने अजीब भाव से कहा___"क्योंकि मैं उसे एक पल के लिए भी भूलता ही नहीं हूॅ। दूसरी बात याद तो उन्हें करते हैं न जिन्हें हम भूले हुए होते हैं?"

"ओह राज।" रितू दीदी ने एकदम से मेरा चेहरा अपनी हॅथेलियों के बीच ले लिया, और फिर भारी स्वर में मुझसे बोली___"मैं जानती हूॅ कि तू विधी को इतनी आसानी से भूल नहीं सकता है। आख़िर तुम दोनो ने एक दूसरे से टूट कर मोहब्बत जो की थी, ऊपर से वो सब हो गया। मगर भाई, उस सबको याद करने से भी भला क्या होगा? बल्कि होगा ये कि तू हर पल उसे याद करके दुखी होता रहेगा। इस लिए तू खुद को सम्हाल मेरे भाई और उस सबसे बाहर निकल। तुझे पता है न कि मैं तुझे अब किसी भी सूरत में दुखी होते हुए नहीं देख सकती हूॅ। अगर तू खुश नहीं रहेगा तो मैं भी खुश नहीं रहूॅगी। अब तो तेरे ही खुशी में मेरी खुशी है राज और तेरे दुख में मेरा दुख है।"

"मैं जानता हूॅ दीदी।" मैंने उदास भाव से कहा___"मगर क्या करूॅ? यादों पर मेरा कोई अख़्तियार ही नहीं है। दिन तो गुज़र जाता है किसी तरह मगर ये रात.....ये रात और रात की ये तन्हाई जाने कहाॅ से मेरे दिल को दुखी करने के लिए उसकी यादें ले आती हैं? बस उसके बाद सब कुछ ऐसा लगने लगता है जैसे इस संसार में अब कुछ भी नहीं रह गया ऐसा जिसकी वजह से मैं खुश हो सकूॅ।"

"ऐसा मत कह मेरे भाई।" रितू दीदी ने मुझे एकदम से खुद से छुपका लिया और फिर दुखी भाव से बोली___"हम सब भी तो हैं न जिनकी वजह से तू खुश हो सकता है। क्या सिर्फ विधी ही ऐसी थी जिसकी वजह से तू खुश हो सकता था? क्या गौरी चाची और गुड़िया कुछ भी नहीं जिनके लिए तू खुश रह सके?"

"हर रिश्ते की अपनी एक अलग अहमियत होती है दीदी।" मैने कहा___"मगर जो दिल का रिश्ता होता है और प्रेम के रिश्ते से जुड़ा होता है उसकी बात ही अलग होती है। हलाॅकि रिश्ता कोई भी हो उसके टूट जाने पर अथवा उसके न रह जाने पर तक़लीफ़ तो होती ही है। हम जिन्हें चाहते हैं तथा जिनसे प्रेम करते हैं वो अगर दुनियाॅ जहाॅन में हैं तो उनसे ताल्लुक न रहने के बाद भी इतनी तक़लीफ़ नहीं होती लेकिन अगर वो इस दुनियाॅ में ही नहों तो ये सोच सोच कर और भी ज्यादा तक़लीफ़ होती है कि अब वो इंसान उसे कभी भी नहीं मिल सकता। इंसान के दुनियाॅ में बने रहने से ये उम्मीद तो बनी ही रहती है कि कभी न कभी उसे वो ब्यक्ति मिलेगा ही। मगर......।"

"बस कर राज।" रितू दीदी फफक कर रो पड़ी___"मैं और कुछ नहीं सुन सकती। मुझे तो इतने से ही इतनी तक़लीफ़ हो रही है जबकि वो सब तो तेरे साथ घटा है तो तुझे कितनी ज्यादा तक़लीफ़ होती होगी। मुझे उस सबका एहसास है मेरे भाई मगर प्लीज....भगवान के लिए खुद को अपनी इस तक़लीफ़ से निकालने की कोशिश कर।"

"फिक्र मत कीजिए दीदी।" मैने दीदी को खुद से अलग कर उनके चेहरे को अपनी हॅथेलियों में लेते हुए कहा___"ये दुख तक़लीफ़ें लाख असहनीय सही मगर ये मुझे नेस्तनाबूत नहीं कर सकती हैं। इतनी हिम्मत तो और इतनी कूबत तो है मुझमें कि मैं इन सबको जज़्ब कर सकूॅ। ख़ैर छोंड़िये ये सब और ये बताइये कि आप इस वक्त यहाॅ किस वजह से आई थी? क्या कोई काम था मुझसे?"

"क्या मैं तेरे पास बेवजह नहीं आ सकती राज?" रितू दीदी ने पुनः बड़ी मासूमियत से मुझे देखा था__"क्या मुझे अपने भाई के पास आने के लिए किसी वजह की ज़रूरत है?"
"नहीं दीदी ऐसी तो कोई बात नहीं है।" मैने झेंपते हुए कहा___"बल्कि आप जब चाहें तब मेरे पास आ सकती हैं। मैने
तो हालातों के बारे में सोच कर आपसे ऐसा कहा था।"

"हालातों के बारे में बात करने के लिए दिन काफी है मेरे भाई।" रितू दीदी ने कहा___"कम से कम रात में तो उस सबसे दूर होकर हमें सुकून मिले। हर पल उसी के बारे में सोच सोच कर परेशान होना क्या अच्छी बात है?"

"आपने सही कहा दीदी।" मैने कहा___"हर वक्त एक ही चीज़ के बारे में सोच सोच कर परेशान होना बिलकुल भी उचित नहीं है। किन्तु ये भी सच है कि हालात ऐसे हैं कि हम भले ही ये सब सोच कर ऐसा कहें मगर ज़हन से वो सब बातें जाती भी तो नहीं हैं।"

"कोशिश करोगे तो ज़रूर जाएॅगी राज।" रितू दीदी ने कहा___"मगर तुम तो कोशिश ही नहीं करते हो। बस सोचते रहते हो जाने क्या क्या? अच्छा ये बता कि नीलम से क्या बात हुई थी तेरी?"

"बताया तो था आपको।" मैने कहा।
"हाॅ बताया तो था तूने।" रितू दीदी ने सहसा मुस्कुराते हुए कहा___"और ये भी बताया था कि कैसे तुम दोनो ट्रेन में धमाल मचा रखे थे।"
"क्या करता दीदी।" मैने सहसा गंभीर होकर कहा__"उसी सबके लिए तो तरसा था मैं। मैं हमेशा ये चाहता था कि नीलम मुझसे लड़ाई करे, हम दोनो के बीच में खूब शैतनी भरा माहौल बना रहा करे। मगर वो सब ख्वाहिशें ही रहीं। आज सुबह जब ट्रेन में नीलम मेरे ऊपर झुकी हुई मुझे देख रही थी तो अचानक ही मेरे मन में वो सब बातें आ गई थी और फिर मैने उसे छेंड़ा। उसके बाद सचमुच वैसा ही हुआ दीदी जैसे की मैं हमेशा आरज़ू किया करता था। उस वक्त मैं बहुत खुश था औरुझे पता था नीलम भी उस सबसे बेहद खुश थी। उसके हाव भाव से ज़ाहिर हो रहा था कि वो भी मेरे साथ वो सब करके उन पलों को एंज्वाय कर रही थी।"

"काश उस वक्त मैं भी वहाॅ होती राज।" रितू दीदी ने सहसा आह सी भरते हुए कहा___"मैं भी नीलम की तरह तेरे साथ वैसी ही मस्ती करती।"
"अरे पर आप कैसे करती दीदी?" मैं दीदी की ये बात सुन कर चौंक पड़ा था___"आप तो मुझसे बड़ी हैं न, जबकि नीलम और मैं एक ही ऊम्र के हैं इस लिए हमारे बीच वैसी मस्ती हो सकती थी।"

"तो क्या हुआ भाई?" रितू दीदी ने कहा___"मैं तुझसे बड़ी हूॅ तो क्या हुआ? क्या मैं बड़ी होने की वजह से अपने भाई के साथ मस्ती नहीं कर सकती? ये किस कानून की किताब में लिखा है मुझे बता तो ज़रा?"

"हाॅ लिखा तो नहीं है मगर।" मैं दीदी की बात सुन कर सकपका गया था___"फिर भी आप मुझसे बड़ी तो हैं ही और मैं आपसे खुल कर वैसी मस्ती नहीं कर सकता था।"
"सीधे सीधे कह दे न कि तुझे मेरे साथ मस्ती करना पसंद ही नहीं आता।" रितू दीदी ने सहसा बुरा सा मुह बनाते हुए कहा___"एक नीलम ही बस तो है जिसके साथ तुझे वो सब करना अच्छा लगता है। जाओ मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी।"

रितू दीदी ये कहने के साथ ही मुझसे ज़रा हट कर बैठ गईं और एक तरफ को मुह फुला कर बैठ गईं। मैं ये सब देख कर भौचक्का सा रह गया। मुझे उनसे इस सबकी उम्मीद बिलकुल भी नहीं थी। कदाचित इस लिए क्योंकि उनका कैरेक्टर ही ऐसा था। वो शुरू से ही हिटलर स्वभाव की रही थी। उन्हें ये सब बिलकुल भी पसंद नहीं था। मगर इस वक्त वो हिटलर दीदी नहीं बल्कि किसी छोटी सी बच्ची की तरह मुह फुला कर एक तरफ बैठ गई थी। उनके चेहरे पर इस वक्त इतनी क्यूट सी नाराज़गी देख कर मैं हैरान भी था और अंदर ही अंदर ये सोच कर खुश भी कि इस वक्त रितू दीदी सच में किसी मासूम सी बच्ची की तरह लग रही थी। मुझे उनके इस तरह रूठ कर मुह फुला लेने से उन पर बेहद प्यार आया। मुझे ऐसा लगा जैसे इस क्यूट सी बच्ची पर मैं सारी दुनियाॅ हार जाऊॅ।

"अरे ये क्या बात हुई दीदी?" फिर सहसा मुझे वस्तुस्थित का बोध हुआ तो मैं उनके क़रीब जाते ही उनके कंधे पर हाॅथ रख कर बोला था मगर....।
"दूर रहो मुझसे।" रितू दीदी ने अपने कंधे से मेरे हाॅथ को झटकते हुए उसी रूठे हुए भाव से कहा___"और हाॅ मुझसे बात मत करो अब। मैं तुम्हारी कोई दीदी वीदी नहीं हूॅ। जाओ उस नीलम के पास।"

"ये आप कैसी बातें कर रही हैं दीदी?" मैं हैरान परेशान सा हो कर कह उठा___"आप तो मेरी सबसे अच्छी व सबसे प्यारी दीदी हैं। भला मैं आपसे कैसे दूर हो सकता हूॅ और आपसे बात न करूॅ ऐसा तो हो ही नहीं सकता।"

"बस बस खूब समझती हूॅ मैं।" रितू दीदी ने उसी अंदाज़ से मगर इस बार ज़रा तीखे भाव से कहा___"मस्का लगाना कोई तुमसे सीखे।"
"मैं मस्का नहीं लगा रहा दीदी।" मैं एक बार से उनके पास खिसक कर गया और फिर बोला___"मैं किसी की भी कसम खा कर कह सकता हूॅ कि आप मेरी सबसे अच्छी दीदी हैं और मेरे दिल में जो स्थान आपका है वो किसी और का नहीं हो सकता।"

मेरी इस बात का मानो तुरंत असर हुआ। रितू दीदी एकदम से मेरी तरफ इस तरह देखने लगीं थी जैसे उन्हें मेरी इस बात से कितनी ज्यादा खुशी हुई हो। फिर सहसा जैसे उन्हें याद आया कि वो तो मुझसे रूठी हुई थीं। इस लिए उनके चेहरे के भाव पलक झपकते ही पहले जैसे हो गए और वो फिर से मुह फुला कर एक तरफ को अपना चेहरा कर लिया। मुझे उनके इस तरह रंग बदल लेने से मन ही मन हॅसी तो आई मगर मैं हॅसा नहीं। वरना मुझे पता था कि उसके बाद कैसे हालात हो जाने थे।

"ठीक है दीदी आप मुझसे मत बात कीजिए।" मैने इमोशनल ब्लैकमेल का नाटक किया___"शायद मेरा नसीब ही ऐसा है कि जिसे भी अपना समझता हूॅ वो मेरा अपना नहीं रहता। एक आप ही तो थी जिन्हें सबसे ज्यादा अपना समझता था और अपनी दुख तक़लीफ़ें दिखाता था मगर....।"

मेरा वाक्य पूरा भी न हो पाया था कि अचानक ही रितू दीदी की एक हॅथेली कुकर के ढक्कन की तरह मेरे मुह पर आकर फिट हो गई। उनकी ऑखों में ऑसू थे। वो मुझे इस तरह देखे जा रही थी जैसे कह रही हों कि आइंदा ऐसी बातें कभी मत करना।

"क्यों ऐसी बातें करता है राज?" फिर दीदी ने सहसा दुखी भाव से कहा___"क्या मैं तुझसे रूठ भी नहीं सकती? मुझे भी नीलम की तरह तुझसे लड़ना झगड़ना है भाई। मुझे भी अपने इस प्यारे भाई के साथ जी भर के मस्ती करनी है। तुझे तो पता है कि मुझे इसके पहले ये सब पसंद ही नहीं था मगर अब मुझे भी लगता है कि मैं तुझसे तेरी बड़ी बहन बन कर नहीं बल्कि तेरी छोटी बहन बन कर रूठूॅ लड़ूॅ और तुझे परेशान करूॅ। मगर तू ही नहीं चाहता कि मुझे भी वैसी खुशी मिले जैसे तुझे और नीलम को वो सब करके मिली थी।"

"ऐसा नहीं है दीदी।" मैने उनको उनके कंधों से पकड़ते हुए कहा___"हमारे पारिवारिक रिश्तों में मेरी और भी कई दीदी होंगी मगर मेरी जो सबसे ज्यादा फेवरेट दीदी है वो सिर्फ आप हो। आपके लिए हॅसते हॅसते अपनी जान भी दे सकता हूॅ मैं। ख़ैर अगर आपकी भी यही इच्छा है तो ठीक है दीदी अब से आप भी मुझसे नीलम की तरह रूठ सकती हैं और लड़ाई झगड़ा कर सकती हैं। मुझे खुशी होगी कि आप भी खुद को इस रूप में खुशी देना चाहती हैं।"

"हाॅ मगर ये तभी होगा न भाई जब तू मुझे भी तुम या तू कह कर संबोधित करे।" रितू दीदी ने कहा___"जैसे तू नीलम से करता है। तभी तो वो सब करने में मज़ा आएगा।"
"ऐसा कैसे हो सकता है दीदी?" मैं दीदी की बात सुन कर बुरी तरह हैरान रह गया था, बोला___"आप मुझसे बड़ी हैं इस लिए मैं उस सबके लिए आपके मान सम्मान को ताक पर नहीं रख सकता।"

"ठीक है मगर उस वक्त तो बोल सकता है न जब हम आपस में वैसी मस्ती करेंगे।" दीदी ने कहा___"बाॅकी आम सिचुएशन में तू वही बोलना जो अब तक बोलता आया है। और हाॅ अब यही फाइनल है। इससे आगे मुझे कुछ नहीं सुनना है, समझ गया न?"

मेरी हालत मरता क्या न करता वाली हो गई थी। मैं अब कुछ नहीं कह सकता था। अगर कहता या कोई ऑब्जेक्शन करता तो निश्चिय ही दीदी नाराज़ हो जाती जो कि मैं कभी नहीं चाह सकता था।

"ठीक है दीदी।" फिर मैने गहरी साॅस ली___"जैसा आपको अच्छा लगे।"
"गुड।" दीदी के चेहरे पर रौनक आ गई___"तो शुरू करें?"
"क्या मतलब??" मैं उनकी इस बात से एकदम से चकरा गया।

"अरे वही भाई।" दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा___"जो तू नीलम के साथ कर रहा था। मैं चाहती हूॅ कि श्रीगणेश हो ही जाए मस्ती का।"
"पर दीदी इस वक्त ये सब??" मैं बुरी तरह घबरा सा गया था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करूॅ?

"इस वक्त क्या??" रितू दीदी ने ऑखें दिखाई।
"आप भी कमाल करती हैं।" मैने कहा___"भला ये भी कोई वक्त है इन सब चीज़ों का? हमारी वजह से बेकार में ही सब लोगों की नींद का कबाड़ा हो जाएगा। वैसे भी आज सब बहुत थके हुए हैं। इस लिए इस वक्त नहीं दीदी हम दिन में किसी वक्त धमाल कर लेंगे।"

"हाॅ ये तो सच कहा तूने।" रितू दीदी ने कहा___"सचमुच सबकी नींद का सत्यानाश हो जाएगा। चल कोई बात नहीं। इस वक्त तो तुझे बक्श दिया मगर याद रख कल छोंड़ूॅगी नहीं तुझे।"

"क्या???" मैं दीदी की इस बात से चौंका। फिर सहसा ऊपर की तरफ देखते हुए बोला___"हे भगवान मुझे शैतान की इस बच्ची से बचा लेना।"
"क्या कहा तूने?" रितू दीदी की ऑखें फैल गईं। वो एकदम से मेरी तरफ पलटीं फिर बोली___"मैं शैतान की बच्ची? रुक बताती हूॅ तुझे।"

इससे पहले कि मैं अपने बचाव के लिए कुछ कर पाता रितू दीदी मुझ पर झपट पड़ीं। उन्होंने मुझे धक्का दे कर बेड पर गिरा दिया और खुद भी बेड के बीचो बीच आकर मेरे जिस्म के हर हिस्सों पर गुदगुदी करने लगीं। मुझे उनकी गुदगुदी से हॅसी तो नहीं आ रही थी मगर मैं जानबूझ कर हॅसने लगा था और उनसे अपने कहे की माफ़ियाॅ माॅगने लगा था। मगर रितू दीदी मेरे माफ़ी माॅगने पर भी मुझे गुदगुदी करना बंद नहीं कर रही थीं।

"प्लीज बस कीजिए न दीदी।" मैने हॅसते हुए कहा__"सब लोगों की नींद टूट जाएगी।"
"टूट जाने दे अब।" रितू दीदी ने कहा___"मुझे किसी की कोई परवाह नहीं है समझे? तूने मुझे शैतान की बच्ची बोला है न तो तुझे अब शैतान की ये बच्ची छोंड़ेगी नहीं।"

"अच्छा जी।" मैने कहा___"ऐसी बात है क्या? लगता है इस बच्ची का इलाज करना ही पड़ेगा।"
"तू कुछ नहीं कर पाएगा भोंदूराम।" रितू दीदी ने कहा___"जबकि मैं तेरी हालत ख़राब कर दूॅगी आज।"
"ओ हैलो।" मैने सहसा दीदी के दोनों हाथ पकड़ लिए फिर बोला___"कहीं ऐसा न हो कि मेरी हालत ख़राब करने के चक्कर में खुद तुम्हारी ही हालत ख़राब हो जाए।"

"अच्छा बच्चू।" दीदी अपने हाॅथों को मेरी पकड़ से छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा___"इतनी बड़ी ग़लतफहमी भी है तुझको। शायद तुझे पता नहीं है कि मैं जूड़ो कराटे में ब्लैक बेल्ट होल्डर हूॅ।"

"फाॅर काइण्ड योर इन्फाॅरमेशन।" मैने कहा___"मैं भी मार्शल आर्ट्स में ब्लैक बेल्ट हूॅ। इतना ही नहीं कुंग फूॅ का भी एक्सपर्ट हूॅ मैं। इस लिए तुम मुझे कम समझने की ग़लती मत करना।"

"चल चल हवा आने दे तू।" रितू दीदी ने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा___"बड़ा आया कुंग फू एक्सपर्ट। मेरे सामने तेरा कोई भी आर्ट्स नहीं चलने वाला।"
"और अगर चल गया तो??" मैने मुस्कुराते हुए कहा।
"चल ही नहीं सकता।" रितू दीदी कहने के साथ ही मेरे ऊपर आ गई___"अब बोल बच्चू। बड़ा कुंग फू एक्सपर्ट बनता है न।"

मैने एकदम से पलटी मारी, रितू दीदी को मुझसे इतनी जल्दी इसकी उम्मीद नहीं थी। परिणाम ये हुआ कि जहाॅ पहले मैं पड़ा हुआ था वहाॅ रितू दीदी पड़ी थी और मैं उनके ऊपर। मेरी इस हरकत से पहले तो रितू दीदी घबरा ही गईं फिर मुझे देखते ही बोली___"ओये ये क्या है? तूने ये कैसे किया?"

"हाहाहाहा क्या हुआ बहना?" मैने उनके दोनो हाॅथ दोनो साइड से बेड पर रख दिया___"हवा निकल गई क्या तुम्हारी? बड़ा जूड़ो कराटे बता रही थी न। अब बोलो क्या करूॅ तुम्हारे साथ?"
"तूने चीटिंग की है।" रितू दीदी मेरी पकड़ से अपने हाॅथ छुड़ाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा___"तूने धोखे से मुझे नीचे कर दिया है।"

"अच्छा जब हारने लगी तो चीटिंग का नाम दे दिया।" मैने कहा___"चलो यही सही, लेकिन तुम तो जानती हो न प्यार और जंग में सब जायज है। अब बताओ शैतान की बच्ची कि क्या करूॅ तुम्हारे साथ?"

"ओये ज्यादा दिमाग़ न चला समझे।" रितू दीदी ने एकाएक ही मेरे पीछे से अपनी दोनो टाॅगों को दोनो साइड से ऊपर कर मेरी गर्दन में फॅसा लिया और फिर हल्का झटका दिया। परिणाम ये हुआ कि मैं उनके पैरों की तरफ उलटता चला गया। इधर दीदी पलक झपकते ही बेड से उठ कर फिर से मेरे ऊपर आ गईं।

"क्यों कुंग फू एक्सपर्ट अब क्या हाल हैं तेरे?" रितू दीदी मेरे पेट पर बैठी उछलने लगी थी, उन्होंने अपने दोनो हाथों से मेरे हाथ भी पकड़ रखे थे।
"हाल तो बहुत अच्छा है।" मैने कहा___"आपकी जीत में भी मेरी ही जीत है दीदी।"

मेरे ऐसा कहने पर रितू दीदी एकदम से शान्त पड़ गईं। मेरी ऑखों में एकटक देखने लगी थी वो। फिर जाने क्या उनके मन में आया वो उसी हालत में मेरे ऊपर ही मेरे सीने से लग कर छुपक गईं।

"तूने खेल क्यों बंद कर दिया राज।" फिर दीदी उसी हालत में उदास होकर कहा___"मुझे तो बहुत अच्छा लग रहा था।"
"मुझे पता है दीदी।" मैने उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा___"मगर ऐसी चीज़ों की शुरूआत थोड़ी थोड़ी से ही होती है न। वैसे भी रात काफी हो गई है। इस सबसे कोई भी यहाॅ आ सकता है और हमें ये सब करते देख कर क्या सोचेगा। इस लिए मुझे लगता है इतना बहुत है आज के लिए। अब आपको भी अपने कमरे में जा कर सो जाना चाहिए।"

"क्यों, क्या मैं तेरे कमरे में तेरे साथ नहीं सो सकती?" रितू दीदी ने सहसा मेरे सीने से अपना सिर उठा कर मेरी तरफ देखते हुए कहा।
"बिलकुल सो सकती हैं दीदी।" मैंने मुस्कुरा कर कहा___"पर मैने ऐसा इस लिए कहा कि आपको शायद अपने कमरे में ही बेहतर तरीके से नींद आए और आप कंफर्टेबल महसूस करें।"

"ऐसा कुछ नहीं है मेरे भाई।" रितू दीदी ने मेरे गाल खींचते हुए किन्तु मुस्कुरा कर कहा___"मुझे तो तेरे साथ सोने में और भी अच्छी नींद आएगी और मुझे कंफर्टेबल भी महसूस होगा। ऐसा लगेगा जैसे मैं दुनियाॅ की सबसे सुरक्षित जगह पर हूॅ।"

"अगर ऐसी बात है तो ठीक है दीदी।" मैने भी मुस्कुराते हुए कहा___"जैसा आपको अच्छा लगे वैसा कीजिए। अब चलिए सो जाते हैं।"
"ओये क्या तुझे नींद आ रही है?" दीदी ने ऑखें फैलाते हुए कहा था।
"हाॅ लग तो रहा है ऐसा।" मैने कहा।

"ठीक है तू सो जा फिर।" दीदी ने कहने के साथ ही अपना सिर वापस मेरे सीने में रख लिया।
"पर आप तो मेरे ऊपर लेटी हुई हैं न दीदी।" मैने असहज भाव से कहा___"ऐसे में कैसे मैं सो सकूॅगा भला?"
"जिसको सोना होता है न वो कैसे भी सो जाता है।" रितू दीदी ने अजीब भाव से कहा___"मैं तो तेरे ऊपर ही सोऊॅगी। तुझे भी ऐसे ही सोना पड़ेगा आज।"

रितू दीदी की इस बात से मैं हैरान रह गया मगर करता भी क्या? कोई ज़ोर ज़बरदस्ती भी उनसे नहीं कर सकता था। इस लिए चुपचाप अपनी ऑखें बंद कर ली मैने और सोने की कोशिश करने लगा। जबकि मेरे चुप हो जाने पर रितू दीदी जो मेरे सीने पर अपना सिर रखे हुए थी वो मुस्कुराए जा रही थी। उनका पूरा बदन ही मेरे ऊपर था। मुझे बड़ा अजीब भी लग रहा था और असहज भी। असहज इस लिए क्योंकि दीदी के सीने के उभार मेरे सीने के बस थोड़ा ही नीचे धॅसे हुए महसूस हो रहे थे। हलाॅकि मेरे ज़हन में उनके प्रति कोई भी ग़लत भावना नहीं थी मगर सोचने वाली बात तो थी ही। ख़ैर, कुछ ही देर में मुझे नींद आ गई और मैं सो गया। मुझे नहीं पता दीदी को कब नींद आई थी।
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उधर मंत्री दिवाकर चौधरी के यहाॅ से आने के बाद अजय सिंह सारे रास्ते सोचों में गुम रहा था। हवेली से जब वह चला था तो सबसे पहले गुनगुन में वो एयरटेल के सर्विस सेन्टर गया था। जहाॅ से उसने अपने पहले वाले नंबर के ही दो सिम कार्ड लिया था और उन्हें अपने मोबाइल फोन पर डाल लिया था। उसे पता था कि फोन बंद होने की वजह से उससे संबंध रखने वाले सभी उसके चाहने वाले परेशान होंगे। रास्ते में ही कई सारे लोगों के फोन आए थे उसे जिनसे उसने बात की और उन्हें बताया कि किस वजह हे उसका फोन बंद था।

अजय सिंह ने अपने उन बिजनेस दोस्तों से भी बात की जिन्होंने उसकी मदद के लिए अपने अपने आदमी भेजे थे। सबसे फारिग़ होकर ही वह अपने घर पहुॅचा था। हवेली पहुॅचते पहुॅचते उसे रात के साढ़े आठ से ऊपर हो गए थे। अंदर उसे ड्राइंगरूम में सब मिल गए। सब आपस में बात चीत कर हॅसे जा रहे थे। नीलम, सोनम, शिवा, तथा प्रतिमा आदि सब जगमोहन सिंह के पास ही बैठ थे।

अजय सिंह को आया देख कर नीलम व सोनम उससे मिली। अजय सिंह ने उन दोनो को प्यार दिया और फिर कपड़े चेन्ज करने का कह कर अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। प्रतिमा के कहने पर बाॅकी सब भी फ्रेश होने चले गए। रात का डिनर सविता ने तैयार कर दिया था अतः फ्रेश होने के बाद सब एक साथ डायनिंग हाल में आ कर बैठ गए। डिनर के दौरान सबके बीच नार्मल ही बातें हुई। इस बीच जगमोहन सिंह ने कहा कि उसे कल वापस जाना होगा क्योंकि वो इस समय एक ज़रूरी केस के सिलसिले में लखहगा हुआ है। प्रतिमा की हार्दिक इच्छा थी कि उसके पापा अभी कुछ दिन यहाॅ रुकें मगर उसे भी पता था कि उसके पिता एक बहुत बड़े वकील हैं जिनके पास समय का बहुत ही ज्यादा अभाव है।

जगमोहन सिंह ने ये ज़रूर कहा कि अब वो आते रहेंगे यहाॅ। उनकी इस बात से सब खुश हो गए। ख़ैर डिनर के बाद सब सोने के लिए अपने अपने कमरों में चले गए।

"तो मिल आए तुम मंत्री जी से?" अपने कमरे में आते ही प्रतिमा ने बेड पर लेटे अजय सिंह की तरफ देखते हुए कहा___"वैसे किस सिलसिले में बुलाया था उसने तुम्हें? क्या कोई खास वजह थी?"

"इस बारे में कुछ न ही पूछो तो अच्छा है प्रतिमा।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली थी।
"अरे ये क्या बात हुई भला?" प्रतिमा बेड पर आते हुए बोली___"क्या कोई ऐसी बात है जिसे तुम मुझसे बताना नहीं चाहते हो?"

"नहीं यार ऐसी कोई बात नहीं है।" अजय सिंह ने बेचैनी से पहलू बदला___"भला ऐसी कोई बात हुई है अब तक जिसे मैने तुमसे शेयर न किया हो?"
"वही तो।" प्रतिमा ने अजय सिंह से सट कर लेटते हुए कहा___"वही तो डियर, मुझे भी तो पता चले कि मंत्री ने किस वजह से मेरे अजय को बुलाया था?"

"दरअसल बात ऐसी है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा___"कि तुम सुनोगी तो हजम नहीं कर पाओगी।"
"अरे जाने भी दो।" प्रतिमा मुस्कुराई___"बड़ी से बड़ी बात तुम्हारी ये प्रतिमा हजम कर चुकी है फिर भला ये क्या चीज़ होगी।"

"मंत्री का जब फोन आया।" अजय सिंह ने कहा___"और जब उसने मुझे दोस्त कहा तो ये सच है कि मुझे उस वक्त बेहद खुशी हुई थी। किन्तु उससे मिल कर तथा उसकी बातें सुनकर मेरी सारी खुशी कपूर की तरह काफूर हो गई।"

"ये तुम क्या कह रहे हो अजय?" प्रतिमा के चेहरे पर हैरत के भाव उभरे___"ऐसी भला क्या बातें कही उसने जिसकी वजह से तुम्हारी उम्मीदों और खुशियों पर पानी फिर गया?"

प्रतिमा के पूछने पर अजय सिंह ने मंत्री का सारा किस्सा उसे सुना दिया। ये भी बताया कि मंत्री उससे खुद मदद की उम्मीद किये बैठा है। सारी बातें सुनने के बाद प्रतिमा का मारे आश्चर्य के बुरा हाल हो गया। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अजय सिंह जो किस्सा सुना रहा है उसमें कहीं कोई सच्चाई है। मगर उसे पता था कि अजय सिंह झूठ मूठ का कोई किस्सा उसे हर्गिज़ भी नहीं सुनाएगा। यानी उसके द्वारा कहा हर लफ्ज़ सही था।

"ये तो बड़ी ही हैरतअंगेज बात है अजय।" प्रतिमा के चेहरे पर मौजूद हैरत कम नहीं हो रही थी, बोली___"उस गौरी का वो पिल्ला इस प्रदेश के मंत्री को भी अपने शिकंजे में लिया हुआ है। यकीन नहीं होता कि कल का छोकरा इतने बड़े बड़े काण्ड कर रहा है।"

"गए थे मंत्री के पास उससे मदद की उम्मीद लेकर।" अजय सिंह ने अजीब भाव से कहा___"मगर खुद उसकी उम्मीद बन कर आ गए।"
"तुम्हें मंत्री से साफ साफ कह देना चाहिए था अजय कि तुम इस मामले में उसकी कोई मदद नहीं कर सकते।" प्रतिमा ने कहा___"क्योंकि तुम खुद भी कुछ कर सकने की स्थित में नहीं हो।"

"उसे अपने बारे में सारी सच्चाई नहीं बता सकता था डियर।" अजय सिंह ने कहा___"तुम खुद सोचो कि मैं वो सब उससे कैसे बता देता? इससे तो उसके सामने मेरी इज्ज़त का कचरा हो जाता न। वो क्या सोचता मेरे बारे में कि मैंने अपनी वासना और हवश के चलते अपने ही घर की बहू बेटियों की इज्ज़त पर अपनी नीयत ख़राब ही नहीं की बल्कि उनके साथ वो सब करने के लिए क़दम भी बढ़ाया। नहीं प्रतिमा नहीं, इससे तो उसकी नज़र में कोई वैल्यू ही न रह जाती। वो साला मुझे गंदी नाली का कीड़ा समझने लगता।"

"बात तो तुम्हारी ठीक ही है अजय।" प्रतिमा ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा___"मगर अब क्या करोगे तुम? तुमने तो उससे वादा कर लिया है कि तुम इस मामले में उसकी मदद करोगे। जबकि तुम खुद अच्छी तरह जानते हो कि तुम खुद अपनी ही मदद नहीं कर पा रहे हो, फिर उसकी मदद कैसे कर सकोगे? मंत्री से मदद का वादा करके तुमने एक नई मुसीबत को दावत दे दी है अजय। वो मंत्री अब हर समय तुम्हें फोन करेगा अथवा बुलाएगा ये जानने के लिए कि तुमने उसकी मदद के रूप में अब तक क्या किया है? उस सूरत में तुम उसे क्या जवाब दोगे?"

"मैने उससे मदद का वादा नहीं किया है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा___"सिर्फ ये कहा है कि मैं इस मामले में उसकी मदद के लिए अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूॅगा बस। इसमे मुसीबत की बात भला कहाॅ से आ गई? मैने कोई एग्रीमेंट तो किया नहीं है जिसके चलते वो मुझ पर कोई ऐक्शन लेगा। सीधी सी बात है मैने उसकी मदद के लिए अपनी तरफ से कोशिश की मगर उसका काम नहीं हो सका इसमें मैं और ज्यादा क्या कर सकता था?"

"चलो ये तो आने वाला समय ही बताएगा कि इस मामले में क्या होता है?" प्रतिमा ने गहरी साॅस ली___"किन्तु हाॅ ये ज़रूर सोचने वाली बात है कि विराज ने मंत्री को इस ढंग से पंगु बनाया हुआ है। हम तो ये सोच सोच कर परेशान थे कि वो यहाॅ आया किस लिए था, पर अब पता चला कि वो अपनी उस प्रेमिका की वजह से यहाॅ आया था।"

"हाॅ प्रतिमा।" अजय सिंह के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे___"मंत्री से मिल कर तथा उसकी बातों से ही इस सच्चाई का पता चला वरना तो हमें पता भी न चलता कि वो साला यहाॅ आया किस वजह से था? इतना ही नहीं उसने मेरे अलावा और किसे अपने मक्कड़ जाल में फॅसा रखा था? मंत्री के जिन लड़कों ने उस विधी नाम की लड़की का रेप किया था वो विराज की प्रेमिका थी और वो गंभीर हालत में हल्दीपुर थाना क्षेत्र में हमारी बेटी रितू के द्वारा पाई गई थी।"

"एक मिनट अजय।" प्रतिमा के चेहरे पर एकाएक ही चौंकने के भाव उभरे थे, फिर उसने कहा___"मुझे अब सारा मामला समझ आ गया है। ये भी समझ आ गया है कि हमारी बेटी हमारे खिलाफ़ हो कर क्यों उस विराज का साथ देने लगी है जिस विराज की वो अब तक शक्ल भी नहीं देखना चाहती थी।"

"क्या समझ आ गया है तुम्हें?" अजय सिंह के माथे पर सहसा शिकन उभरी।
"ये मामला विधी के रेप से ही शुरू हुआ है।" प्रतिमा ने कहना शुरू किया___"हाॅ अजय ये सारी कहानी विधी के रेप केस से ही शुरू हुई है। मंत्री के द्वारा बताई गई सारी बातों पर ग़ौर करने के बाद इसकी कड़ियाॅ कुछ इस प्रकार से मेरे दिमाग़ में जुड़ी हैं, ग़ौर से सुनो। विधी नाम की जिस लड़की का रेप हुआ वो गंभीर हालत में हमारी बेटी को मिली। रितू चूॅकि पुलिस वाली थी इस लिए ये उसकी ड्यूटी थी कि वो इस मामले में रेप की गई लड़की के रेपिस्टों की तलाश करे और उन्हें कानूनन सज़ा दिलवाए। किन्तु उससे पहले उसने ये किया होगा कि गंभीर हालत में पाई गई उस लड़की को उसने हास्पिटल में भर्ती कराया तथा लड़की के विषय में जानकारी भी हासिल की होगी। रितू ने विधी से तहकीक़ात के रूप में उस लड़की से उसके साथ हुए उस हादसे की सच्चाई प्राप्त की होगी। इसी सच्चाई के दौरान उसे पता चला होगा कि विधी वो लड़की है जो उसके चचेरे भाई विराज से प्यार भी करती थी और विराज भी उससे प्यार करता था। किन्तु उसे ये समझ में न आया होगा कि दो प्यार करने वाले एक दूसरे से दूर कैसे हैं? क्योंकि अगर दूर न होते तो विधी के साथ वो हादसा होता ही नहीं। इस लिए रितू ने विधी से उसके और विराज के बीच की दूरियों के बारे में पूछा होगा तब विधी ने उसे बताया होगा कि सच्चाई क्या है। वो सच्चाई ज़रूर ऐसी रही होगी जिसने रितू के दिल में चोंट की होगी। विधी के द्वारा ही उसे पता चला होगा कि विराज असल में कितना अच्छा लड़का है तथा ये भी कि उसके साथ उसके बड़े पापा ने कितना अत्याचार किया है। विधी की बातों ने रितू को सोचने पर मजबूर कर दिया होगा। किन्तु उसे इतना जल्दी इस बात पर यकीन नहीं आया होगा कि हमने विराज व विराज की माॅ बहन के साथ ग़लत किया हो सकता है। अतः उसने अपने तरीके से इस सबका पता लगाने का सोचा होगा। याद करो अजय ये उसी समय की बात है जब नैना यहीं थी और एक रात मैं तुम और शिवा साथ में ही वो मौज मस्ती कर रहे थे। मुझे पूरा यकीन है कि सच्चाई का पता लगाने की राह पर चलते हुए रितू उस रात हमारी वो रास लीला देख ली होगी। मैं ऐसा इस लिए कह रही हूॅ क्योंकि उस रात के बाद से ही रितू का बिहैवियर हमारे प्रति बदला था। याद करो दूसरे दिन कैसे उसने शिवा को खरी खोटी सुना दी थी। उस वक्त हमें पता नहीं था किन्तु अब समझ आ रहा है कि उसने शिवा को इतने गुस्से से क्यों झिड़का था? ख़ैर, उसके बाद वो बड़ी सफाई से नैना को भी यहाॅ से निकाल ले गई। उसको पता चल गया होगा कि तुम अपनी ही बहन को अपने नीचे लेटाने का मंसूबा बनाए बैठे हो। इस लिए वो नैना को बड़ी सफाई से यहाॅ ले गई। इस सबसे उसे और कुछ जानने की ज़रूरत ही नहीं रह गई थी। उसने उस रात हम तीनों की सारी बातें सुन ली होगी और जान गई होगी कि विराज की माॅ के साथ असल में हुआ क्या था? अथवा हमने उसके साथ किया क्या था? इतना सब कुछ काफी था उसका हमारे खिलाफ होने के लिए और विराज के साथ मिल जाने के लिए। इन्हीं सब के दौरान उसने विराज को मुम्बई से बुलाया होगा। किन्तु उसके पास विराज का कोई काॅटेक्ट नहीं था इस लिए उसने विराज के क़रीबी दोस्तों के बारे में पता लगाया होगा। विराज के दोस्त के रूप में उसे पवन मिला, पवन को उसने विधी का वास्ता देकर कहा होगा कि वो विराज को यहाॅ बुला ले। बस उसके बाद क्या क्या हुआ इसका तो पता ही है तुम्हें।"

प्रतिमा की इतनी लम्बी चौड़ी थ्यौरी सुन कर अजय सिंह आश्चर्यचकित रह गया था। काफी देर तक उसके मुख से कोई बोल न फूटा। फिर सहसा उसके चेहरे पर प्रतिमा के प्रति प्रसंसा के भाव उभरे। उसे प्रतिमा की सूझ बूझ और दूरदर्शिता की दाद देनी पड़ी। जबकि....।

"अब रहा सवाल इस बात का कि रितू ने इसके पहले विधी के साथ हुए उस रेप हादसे पर उन रेपिष्टों को कानूनन सज़ा क्यों नहीं दिलवाई?" प्रतिमा ने मानो पुनः कहना शुरू किया___"तो इसका जवाब तुम मंत्री के द्वारा पा ही चुके हो। मंत्री के अनुसार इंस्पेक्टर रितू ने विधी रेप केस के रेपिस्टों को पकड़ कर उन्हें कानूनन सज़ा दिलवाने की ज़रूर कोशिश की हो सकती है किन्तु मामला क्योंकि मंत्री के बच्चों का था इस लिए मंत्री की ताकत व पहुॅच के चलते कानूनन भी कुछ नहीं हो सकता था इस लिए रितू के आला अफसर ने भी रितू को इस मामले में हस्ताक्षेप न करने की सलाह दी होगी। विधी के माॅ बाप को भी यही समझ आया होगा, इसी लिए उन्होंने भी कोई केस करने का ख़याल अपने ज़हन से निकाल दिया होगा। दैट्स इट।"

"तुमने तो इस तरह इन सब बातों को खोल दिया है जैसे कि तुम इन सब चीज़ों का लाइव टेलीकास्ट देख रही थी और उसकी कमेंट्री भी कर रही थी।" अजय सिंह प्रभावित लहजे में बोला___"यकीनन तुम्हारा दिमाग़ काफी शार्प है। ख़ैर यहाॅ पर इसके आगे की कड़ी कुछ इस तरह है। विराज जब मुम्बई से आया और उसने अपनी लवर की वो हालत देखी तो उससे सहन नहीं हुआ। बल्कि उसका खून खौल गया होगा। किन्तु उसे भी समझ आ ही गया होगा कि वो विधी को कानूनन कोई न्याय नहीं दिला सकता। क्योंकि रेप करने वालों के आका बहुत बड़ी हस्ती थे। मगर जवान खून इसके बाद भी शान्त न हुआ होगा। तब उसने खुद उन लड़कों को सज़ा देने का सोचा होगा जिन लड़कों ने उसकी प्रेमिका के साथ वो घिनौना कुकर्म किया था। विराज के फैसले पर रितू ने भी अपनी सहमति दी होगी और उसकी मदद करने का वादा भी किया होगा। मंत्री के ही अनुसार, विराज और रितू मंत्री के फार्महाउस पहुॅचे और वहाॅ से मंत्री के उन बच्चों को धर लिया और वहीं से ही उनके हाथ कुछ ऐसे सबूत भी लगे जो मंत्री को विराज की मुट्ठी में कैद करने के लिए काफी थे दैट्स आल।"

"बिलकुल।" प्रतिमा ने कहा___"मंत्री को जब पता चला कि उसके बच्चों का किडनैपर हल्दीपुर के ठाकुर अजय सिंह का भतीजा है तो उसने आज तुम्हें ये सोच कर फोन किया कि तुम इस मामले में उसकी यकीनन मदद कर सकते हो। ये अलग बात है कि तुम खुद भी मंत्री की तरह ही विराज की मुट्ठी में कैद हो।"

"ये क्या कह रही हो तुम?" अजय सिंह चौका___"मैं भला कैसे उस हरामज़ादे की मुट्ठी में कैद हूॅ?"
"कमाल है डियर।" प्रतिमा मुस्कुराई___"ये बात कैसे भूल सकते हो तुम कि विराज के पास तुम्हारी वो सब चीज़ें हैं जो तुम्हें किसी भी पल कानून की भयानक चपेट में ले लेने के लिए काफी हैं।"

"ओह हाॅ वो न।" अजय सिंह को अचानक ही जैसे सब कुछ याद आ गया और ये भी सच है कि वो सब याद आते ही उसके समूचे जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई थी। उससे आगे कुछ कहते न बन सका था।

"बड़ी गंभीर सिचुएशन है अजय।" प्रतिमा ने उसके चेहरे के भावों को पढ़ते हुए गंभीरता से कहा___"सबकुछ कर सकने की कूबत होते हुए भी कुछ नहीं कर सकते, न तुम और ना ही वो मंत्री। मगर मुझे एक बात ये समझ नहीं आती कि जब इतना मसाला विराज के पास तुम दोनो के खिलाफ़ मौजूद है तो वो उस मसाले का उपयोग क्यों नहीं करता?"

"किया तो था उपयोग उसने।" अजय सिंह ने कहा___"उस मसाले के आधार पर ही तो उसने नकली सीबीआई वालों को भेजा था मुझे यहाॅ से ले जाने के लिए।"
"अरे हाॅ डियर।" प्रतिमा के मस्तिष्क में जैसे एकाएक ही बल्ब रौशन हुआ, बोली___"इस नये चक्कर को तो मैं भूल ही गई थी। ये भी तो सोचने का एक जटिल मुद्दा है। आख़िर विराज ने ऐसा किस वजह से किया होगा? नकली सीबीआई वालों को भेज कर उसने तुम्हें ग़ैर कानूनी धंधा करने तथा ग़ैर कानूनी पदार्थ रखने के जुर्म में गिरफ्तार करवाया और फिर दो दिन बाद बिना तुमसे कुछ पूछताॅछ किये छोंड़ भी दिया। सोचने वाली बात है कि इस सबसे उसे क्या मिला होगा? या फिर इससे उसका कौन सा फायदा हुआ होगा?"

"साला ऐसे ऐसे काम करता है कि कुछ समझ में ही नहीं आता।" अजय सिंह ने कठोर भाव से कहा___"सोचते सोचते दिमाग़ की नशें तक दर्द करने लगती हैं। मगर मजाल है जो कुछ समझ आए। हद हो गई ये तो। साला कल का छोकरा इतना शातिर होगा ये तो ख्वाब में भी नहीं सोचा था मैने।"

"मुझे कुछ कुछ समझ आ रहा है उसके ऐसा करने का चक्कर।" प्रतिमा ने ये कह कर मानो अजय सिंह के ऊपर बम्ब फोड़ दिया था।
"क..क..क्या समझ आ रहा है तुम्हें?" अजय सिंह बुरी तरह हैरानी से पूछ बैठा था।

"ये तो तुम भी समझते हो न।" प्रतिमा ने समझाने वाले अंदाज़ से कहा___"कि विराज की नज़र में ये एक जंग है जो उसने हमारे साथ शुरू की हुई है। जब कोई इंसान किसी से जंग शुरू करता है तब वो सबसे पहले अपनी कमज़ोरियों को अपने प्रतिद्वंदी से या तो छुपाता है या फिर उसकी पहुॅच से बहुत दूर कर देता है।"

"तुम क्या कह रही हो?" अजय सिंह उलझ कर रह गया, बोला___"मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा?"
"याद करो अजय।" प्रतिमा ने कहा___"हमारे आदमी ने हमें क्या ख़बर दी थी? यही न कि विराज मुम्बई से आए अपने दोस्त के साथ पवन की फैमिली को एम्बूलेन्स में बैठा कर चला गया था और एम्बूलेन्स के आगे आगे एक जीप भी थी। जिसमें कि यकीनन रितू ही थी। यहाॅ पर मेरे कहने का मतलब ये है कि विराज ने ऐसा क्यों किया? आख़िर उसे क्या ज़रूरत थी पवन और उसकी फैमिली को अपने साथ कहीं ले जाने की? इस सवाल के बारे में अगर ग़ौर से सोचोगे तो जवाब ज़रूर मिल जाएगा। मतलब ये कि पवन और पवन की फैमिली विराज की कमज़ोरी थे। उसने सोचा होगा कि देर सवेर हमे इस बात का पता चल ही जाएगा कि उसके दोस्त पवन ने उसकी सहायता की थी और वो यहाॅ उसके ही घर में रुका था। अतः हम इसके लिए उसके दोस्त और उसकी फैमिली को कोई नुकसान भी पहुॅचा सकते हैं। ये सोच कर उसने पवन आदि को सुरक्षित रखना अपना कर्तब्य समझा। किन्तु उसके सामने समस्या रही होगी कि वो पवन आदि को सुरक्षित कैसे करे? उसकी समस्या का समाधान रितू ने किया होगा। उसने उन सब को किसी ऐसी जगह चलने को कहा होगा जहाॅ पर वो सब लोग पूर्णरूप से सुरक्षित रह सकते थे। यहाॅ पर ये भी समझ आ रहा है कि वो लोग एम्बूलेन्स से ही क्यों गए थे? दरअसल एम्बूलेंस ही एक ऐसा किफायती वाहन हो सकता था जिसमें सब लोग बड़े आराम से तथा बिना किसी बाधा के कहीं भी जा सकते थे। हम या हमारे आदमी सोच ही नहीं सकते थे कि वो लोग किसी एम्बूलेंस जैसे वाहन में यहाॅ से जा सकते हैं।एम्बूलेन्स के आगे आगे कुछ फाॅसले पर रितू अपनी जिप्सी में जा रही थी। फाॅसले पर इस लिए ताकि अगर हम या हमारे आदमी रास्ते में कहीं मिलें भी तो वो उस पर शक न कर सकें किसी बात का। कहने का मतलब ये कि रितू की मदद से विराज ने अपनी एक कमज़ोरी को हमारी पहुॅच से दूर कर दिया।"

"मगर इसमें ये कहाॅ फिट बैठता है कि वो इस सबके लिए मुझे ऐसे चक्कर में फॅसा कर बाद में छोंड़ भी दे?" अजय सिंह सहसा बीच में ही बोल पड़ा था___"और वैसे भी ये वाला चक्कर तो उस सबके बहुत बाद अभी हुआ है।"

"मेरी बात तो पूरी होने दो डियर।" प्रतिमा ने कहा___"मैं सब कुछ विस्तार से ही बता रही हूॅ और तुम्हारे सवाल की तरफ ही आ रही हूॅ। विराज के यहाॅ आने पर हमने ये अनुमान लगाया था कि संभव है कि वो यहाॅ पर अभय के बीवी बच्चों को लेने आया हो। हलाॅकि ये भी एक अहम बात है अजय, क्योंकि आज के हालात में विराज की दूसरी कमज़ोरी अभय के बीवी बच्चे भी हैं। इस लिए संभव है कि वो उन्हें भी अपने साथ ही ले गया हो। अभय ने उससे कहा होगा कि अगर संभव हो सके तो वो अपने साथ अपनी चाची व अपने भाई बहन को भी ले आए। विराज मुम्बई से यही सोच कर आया रहा होगा कि वो विधी को देखेगा और फिर अपनी छोटी चाची व उसके बच्चों को साथ ले कर पुनः मुम्बई लौट जाएगा। मगर यहाॅ आने के बाद विधी के मामले में वो एक अलग ही चक्कर में पड़ गया। ऐसे माहौल में वो भला वो कैसे यहाॅ से चला जाता? दूसरी बात यहाॅ पर तो वैसे भी उसके लिए खतरा ही था। अतः अपने साथ साथ अपनी कमज़ोरियों को भी दूर करना उसकी पहली प्राथमिकता थी। रितू के द्वारा उसे कोई सुरक्षित जगह तो ज़रूर मिल गई रही होगी मगर उससे कदाचित वो संतुष्ट न रहा होगा। वो चाहता रहा होगा कि उसकी सभी कमज़ोरियाॅ हमारी पहुॅच से काफी दूर होनी चाहिए और काफी दूर तो मुम्बई ही थी। अतः उसने फैसला किया होगा कि सबको मुम्बई भेज दिया जाए। उधर उसे इस बात का भी एहसास रहा होगा कि रितू अब चूॅकि हमारे खिलाफ होकर उसकी मदद कर रही है इस लिए अब उस पर भी खतरा ही है और वो उसे खतरा के बीच में अकेला छोंड़ भी नहीं सकता था। तब उसने एक प्लान बनाया और वो प्लान यही था कि वो तुम्हें कम से कम दो दिन के लिए सीबीआई की गिरफ्त में डलवा दे। इसका फायदा ये था कि जब तुम ही मैदान पर न होते तो रितू पर खतरे की सीमा न के बराबर ही रह जाती। उधर प्लान के मुताबिक विराज अपनी कमज़ोरियों को लेकर वापस मुम्बई चला गया। मुम्बई में सबको छोंड़ कर वो उसी दिन वापस यहाॅ के लिए चल दिया।"

"तो तुम्हारे हिसाब से विराज ने इसी सबके लिए मुझे ऐसे चक्करें फाॅसा था?" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"मगर तुमने ये कैसे कह दिया कि विराज उन सबको लेकर मुम्बई ही गया था?"

"इस आधार पर कि उसने तुम्हें दो दिन के लिए ही उस चक्कर में फाॅसा था।" प्रतिमा ने कहा___"इन दो दिनों में वो आराम से मुम्बई जाकर लौट भी सकता है। उसने तुम्हें नकली सीबीआई के जाल में फाॅसा जबकि वो चाहता तो तुम्हें सचमुच में ही रियल सीबीआई की गिरफ्त में पहुॅचा देता। मगर उसने ऐसा नहीं किया। उसका मकसद सिर्फ इतना ही था कि तुम दो दिन के लिए अंडरग्राउण्ड रहो"

"यकीनन ऐसा ही हुआ लगता है।" अजय सिंह ने कहा___"ख़ैर, सोचने वाली बात है कि रितू उसकी मदद कर रही है और वो उसे तथा उसके साथ साथ पवन आदि को भी सुरक्षित ले गई थी। मगर सवाल है कि ऐसी कौन सी जगह वो ले गई होगी?"

"किसी ऐसी जगह।" प्रतिमा ने सोचने वाले भाव से कहा___"जहाॅ पर किसी ग़ैर का आना जाना न हो और जहाॅ पर उन्हें किसी के खतरे का भी आभास तक न हो।"
"ऐसी कौन सी जग......।" अजय सिंह कहते कहते एकदम से रुक गया था। उसके चेहरे पर चौंकने के भाव उभर आए और फिर वो सहसा अजीब भाव से बोल पड़ा___"अरे....ओह माई गाड मैं भी न बहुत बड़ा बेवकूफ हूॅ प्रतिमा।"

"क्यों, क्या हुआ?" प्रतिमा उसके मुख से ये सुन कर चौंक पड़ी थी, बोली___"ऐसा क्यों कह रहे हो तुम?"
"क्यों न कहूॅ यार?" अजय सिंह एकाएक ही आहत भाव से बोला___"मैं बेवकूफ ही तो हूॅ। इस बारे में तो मुझे पहले ही सोच लेना चाहिए था कि रितू नैना को लिये कहाॅ रह सकती है?"

"क्या मतलब??" प्रतिमा के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे।
"तुम्हें याद है न कि हमने अपने तीनों बच्चों के नाम एक एक फार्महाउस किया था?" अजय सिंह ने आवेशयुक्त भाव से कहा था।
"ओह हाॅ।" प्रतिमा एकदम से उछल पड़ी थी। एकदम से जैसे उसे अजय सिंह की बात समझ में आ गई थी, अतः बोली___"तो क्या तुम ये कह रहे कि रितू....?"

"हाॅ प्रतिमा।" अजय सिंह प्रतिमा की बात पूरी होने से पहले ही बोल पड़ा___"मैं यही कह रहा हूॅ कि रितू उस समय नैना को लिए अपने उसी फार्महाउस पर गई होगी जिस फार्महाउस को मैने उसके नाम किया था। सोचो प्रतिमा वो जगह उन सबके लिए कितनी आसान तथा महफूज हो सकती है। उफ्फ ये बात मेरे ज़हन में पहले क्यों नहीं आई वरना हम पहले ही रितू नैना आदि सबको पकड़ सकते थे। बहुत बड़ी ग़लती हो गई प्रतिमा, मैं खुद अपनी ही ग़लती की वजह से जीती हुई बाज़ी को हार गया।"

"अरे तो अभी भी क्या बिगड़ा है अजय?" प्रतिमा ने कहा___"हो सकता है कि वो सब अभी भी वहीं पर मौजूद हों। तुम्हें तुरंत ही वहाॅ जाना चाहिए।"
"नहीं प्रतिमा।" अजय सिंह ने पूरी मजबूती से गर्दन को न में हिला कर कहा___"अब कुछ नहीं हो सकता। वो लोग अब हमें फार्महाउस पर नहीं मिलेंगे। क्योंकि ये बात तो वो भी समझते रहे होंगे कि फार्महाउस उनके लिए कुछ समय के लिए ज़रूर सुरक्षित जगह हो सकती है मगर हमेशा के लिए नहीं। ये मत भूलो कि रितू के साथ में विराज भी है। वो कमीना बहुत शातिर है। अब तक की उसकी सारी गतिविधियाॅ ये बताती हैं कि वो हमसे दो क़दम आगे ही रहता है। हम जिस चीज़ के बारे में सोचते हैं वो शातिर लड़का उस चीज़ को पहले ही अंजाम दे चुका होता है।"

"फिर भी एक बार पता करने में क्या जाता है?" प्रतिमा ने कहा___"हो सकता है वो अभी भी वहीं पर हों। उनके दिमाग़ में ये सोच होगी कि उनके वहाॅ होने का पता तुम्हें ज़रूर चलेगा इस लिए तुम फिर ये सोच कर वहाॅ उनका पता करने नहीं जाओगे कि अब वो वहाॅ हो ही नहीं सकते हैं। ये एक मनोवैज्ञानिक सोच है अजय, इसी के आधार पर वो तुम्हारे दिमाग़ को पढ़ता है और वही करता है जिसकी तुम उम्मीद ही नहीं करते। कहने का मतलब ये कि तुम इस वक्त ये सोच रहे हो कि वो लोग वहाॅ होंगे ही नहीं अतः तुम उनका पता करने नहीं जाओगे जबकि वो तुम्हारी इसी सोच के चलते वहाॅ मौजूद रहेंगे।"

"मनोविज्ञान के रूप में तुम्हारा तर्क अच्छा है और अपनी जगह सही भी है।" अजय सिंह ने कहा___"मगर मुझे नहीं लगता है कि विराज जैसा शातिर दिमाग़ लड़का इतना बड़ा जोखिम उठाएगा। बल्कि संभव है कि उसने कोई दूसरा सुरक्षित ठिकाना ढूॅढ़ लिया होगा। फिर भी अगर तुम्हारा मन नहीं मानता तो ठीक है मैं अभी पता करवा लेता हूॅ।"

ये कह कर अजय सिंह ने सिरहाने की तरफ ही रखे अपने लैण्डलाइन फोन का रिसीवर उठाकर कान से लगाया और उस पर कोई नंबर पंच करने लगा। थोड़ी देर बाद ही उसने अपने किसी आदमी से कहा कि वो फला जगह पर बने उसके फार्महाउस में जाए और पता करे कि वहाॅ इस वक्त कौन कौन मौजूद है? अपने आदमी को हुकुम देने के बाद अजय सिंह ने रिसीवर वापस केड्रिल पर रख दिया।

"थोड़ी ही देर में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा डियर।" अजय सिंह ने कहा___"मेरा आदमी कुछ ही देर में पता करके मुझे उस सबकी सूचना फोन पर दे देगा।"
"इस बात का यकीन तो मुझे भी है अजय।" प्रतिमा ने कहा___"वो लोग फार्महाउस में नहीं होंगे मगर इसके बावजूद एक बार पता करना भी कोई हर्ज़ की बात नहीं है। ख़ैर, चलो ये मान के चलते हैं कि वो लोग फार्महाउस पर नहीं होंगे तो सवाल ये है कि उन लोगों ने आख़िर किस जगह पर अपना दूसरा सुरक्षित ठिकाना बनाया होगा?"

"इस बारे में भला क्या कहा जा सकता है?" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली___"सच कहूॅ तो मेरा अब दिमाग़ ही काम नहीं कर रहा है। समझ में नहीं आता कि आख़िर ऐसा क्या करूॅ जिससे कि सब कुछ मेरी मुट्ठी में आ जाए?"

"सबसे पहले तो तुम्हें अपनी सोच का दायरा बड़ा करना होगा अजय।" प्रतिमा ने उसे ज्ञान देने वाले अंदाज़ से कहा___"तुम्हें विराज की सोच से दो नहीं बल्कि चार क़दम आगे की सोच रखनी होगी। तभी वो सब संभव हो सकता है जो तुम चाहते हो।"

"सबसे बड़ी समस्या ये है डियर कि उसके पास मेरे खिलाफ वो ग़ैर कानूनी सबूत हैं।" अजय सिंह बेचैनी से बोला___"वो साला उनके आधार पर कभी भी कानून की चपेट में ला सकता है।"

"वो उन सबूतों इस्तेमाल नहीं करेगा अजय।" प्रतिमा ने कहा___"अगर करना ही होता तो वो कब का कर चुका होता। वो सबूत तो उसके पास महज तुरुप के इक्के की तरह मौजूद हैं। यानी जब वो दूसरे किसी तरीके से तुमसे अपना बदला नहीं ले पाएगा तब वो उनका इस्तेमाल करेगा। कदाचित उसके मन में ये सोच है कि वो तुम्हें कानून की सलाखों के पीछे पहुॅचा कर आसान सज़ा नहीं देना चाहता। बल्कि खुद अपने हाॅथों से तुम्हें कोई ऐसी सज़ा देना चाहता है छिसके बारे में तुमने ख्वाब में भी न सोचा हो।"

"यकीनन तुम सही कह रही हो प्रतिमा।" अजय सिंह के जिस्म में झुरझरी सी हुई थी, बोला___"उसके मन में यकीनन यही होगा। वो मुझे खुद अपने हाॅथों से सज़ा देना चाहता है। दूसरी बात, जिस तरह से उसने मुझे फॅसा रखा है उससे वो निश्चय ही अपने मंसूबों में कामयाब हो जाएगा। मगर मुझे ये समझ में नहीं आता कि जब उसकी मुट्ठी में सब कुछ है तो वो देर किस बात पर कर रहा है?"

"यही तो सोचने वाली बात है अजय।" प्रतिमा के चेहरे पर सोचों के भाव उभरे___"वो इतना शातिर है कि हम उसकी सोच को समझ हीं नहीं पाते। जबकि वो हमारी उम्मीदों से परे वाला काम कर जाता है। वो चाहे तो यकीनन एक झटके में ऐसा कुछ कर सकता है जिसके तहत हम सब उसके सामने दीन हीन दसा में हाज़िर हो जाएॅ मगर वो ऐसा इस लिए नहीं कर रहा क्योंकि उसे लगता होगा कि ये काम तो वो कभी भी कर सकता है। वो कुछ ऐसा करने की फिराक़ में होगा जो हमारे लिए हद से भी ज्यादा असहनीय हो। यकीनन ऐसा ही हो सकता है अजय और कदाचित वो ऐसा कर भी रहा है।"

"क क्या कर रहा है वो?" अजय सिंह मानो अंदर ही अंदर काॅप कर रह गया था।
"सबसे पहले तो उसने यही किया।" प्रतिमा ने कहा___"कि उसने हमारी बेटी को हमसे अलग कर अपने साथ मिला लिया। क्या ये बड़ी बात नहीं है अजय कि हमारी जो बेटी उसकी शक्ल तक देखना पसंद नहीं करती थी वो आज शायद विराज को ही सच्चे दिल से अपना भाई मानने लगी है और इतना ही नहीं उसके लिए अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ हो गई। अगर उसे हमारी हर असलियत का पता चल चुका है तो ये भी संभव है कि उसने हमसे रिश्ता भी तोड़ लिया हो। सारी बातों को ग़ौर से सोचो तो समझ में आता है कि वास्तव में विराज ने कितना बड़ा तीर मार लिया है।"

"इसमे कोई संदेह नहीं है यार।" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"रितू को अपने साथ इस तरह से मिला लेना बहुत बड़ी बात है।"
"और मुझे तो ये भी लगता है अजय।" प्रतिमा ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा___"कि विराज का अगला क़दम हमारी दूसरी बेटी नीलम को भी अपनी तरफ मिला लेना होगा। नीलम को ज्यादा दुनियादारी का पता नहीं है। किन्तु हाॅ ये सच है कि वो भी अपनी बड़ी बहन की ही तरह सच्चाई की राह पर चलने की सोच रखती है। इस लिए अगर उसे हमारी असलियत के बारे में पता चल गया तो ये निश्चित बात है कि वो भी हमारे खिलाफ़ हो जाएगी। वैसे क्या पता हो ही गई हो।"

"ऐसा तुम कैसे कह सकती हो भला?" अजय सिंह को अपने पैरों तले से मानो ज़मीन खिसकती हुई महसूस हुई, बोला___"नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। पता नहीं क्या अनाप शनाप बोले जा रही हो तुम?"

"विराज की सोच से अगर चार क़दम आगे चलना है तो ऐसा सोचना ही पड़ेगा डियर हस्बैण्ड।" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा___"मैं ऐसा बेवजह ही नहीं कह रही हूॅ बल्कि ऐसा कहने की मेरे पास कुछ पुख्ता वजहें भी हैं।"

"क कैसी वजहें?" अजय सिंह के चेहरे पर हैरत के भाव उभरे।
"पिछली दो तीन दिन की घटनाओं पर ज़रा बारीकी से ग़ौर करो डियर।" प्रतिमा ने कहा___"विराज ने तुम्हें नकली सीबीआई के जाल में फॅसा कर क्यों अंडरग्राउण्ड किया? इसका जवाब ये है कि उसे अपनी कमज़ोरियों को सुरक्षित या तुम्हारी पहुॅच से दूर करना था। किन्तु उसे लगा होगा कि उसके मुम्बई चले से यहाॅ रितू और नैना अकेली पड़ जाएॅगी। हालात ऐसे थे कि उन दोनो पर किसी भी समय तुम्हारे रूप में कोई संकट आ सकता था। अतः विराज ने एक तीर से दो शिकार किया, पहला ये कि तुम्हें नकली सीबीआई की कैद में रख कर सुरक्षित सबको यहाॅ से मुम्बई ले जाएगा और दूसरा ये कि उसके यहाॅ न रहने पर रितू व नैना के ऊपर तुम्हारा कोई संकट भी न रहता। दो दिन बाद उसने तुम्हें इसी लिए छोंड़ दिया क्योंकि वो मुम्बई से वापस यहाॅ आ गया और फिर आते ही उसने सबसे महत्वपूर्ण काम ये किया कि फार्महाउस से रितू व नैना को अपने साथ किसी दूसरी ऐसी जगह शिफ्ट किया जहाॅ पर तुम्हारा खतरा न के बराबर ही हो। ये उसी दिन की बात है अजय जब तुम्हें सीबीआई वाले ले गए थे, तब मैने रितू को फोन लगाया था तुम्हारे बारे में बताने के लिए मगर उसने मेरा फोन नहीं उठाया बल्कि काट दिया था। तब मैने नीलम को फोन लगाया और उसे बताया कि यहाॅ क्या हुआ है। उसे मैने ये भी बताया कि उसकी बड़ी बहन हमारे खिलाफ हो गई है। मेरी बात सुन कर वो घबरा गई और उसने यहाॅ आने के लिए कहा था। यहाॅ पर ग़ौर करने की बात ये है कि संभव है कि नीलम ने मुझसे बात करने के बाद रितू से बात की हो और उससे पूछा हो कि वो क्यों माॅम डैड के खिलाफ हो गई हैं। उसके पूछने पर संभव है कि रितू ने उसे हमारी सारी सच्चाई बता दी हो। हलाॅकि ऐसा हुआ नहीं है, क्योंकि अगर ऐसा हुआ होता तो यहाॅ आने के बाद नीलम का बिहैवियर कुछ तो अलग हमें समझ ही आता। किन्तु वो यहाॅ आने पर नार्मल ही थी। इसका मतलब कि रितू ने उसे कुछ नहीं बताया था उस दिन। किन्तु हाॅ ऐसा हो सकता है कि नीलम के द्वारा माॅम डैड के खिलाफ़ हो जाने का कारण पूछने पर रितू ने उससे बस यही कहा हो कि वो खुद सच्चाई का पता लगाए। अतः संभव है कि नीलम अब बड़ी ही सफाई से सच्चाई का पता भी लगा रही हो। दूसरी बात विराज के यहाॅ से जाने के दिन की काॅउटिंग करें तो पता चलता है कि विराज उसी दिन वापस यहाॅ के लिए मुम्बई से चल दिया था जिस दिन हमारी बेटी नीलम वहाॅ से चली थी और फिर आज यहाॅ पहुॅची है। मेरे कहने का मतलब ये है कि ऐसा यकीनन हो सकता है कि विराज और नीलम एक ही ट्रेन से यहाॅ आए हों अथवा ऐसा भी हो सकता है कि ट्रेन में ये दोनो मिले भी हों और उनके बीच कोई बातचीत भी हुई हो।"

"अब बस भी करो यार।" अजय सिंह सहसा खीझते हुए बोल पड़ा था___"तुम तो ऐसी ऐसी बातें नाॅन स्टाप करती चली जा रही हो जो कि अब मेरे सिर के ऊपर से जाने लगी हैं। मुझे समझ में नहीं आता कि ये सब बातें तुम्हारे दिमाग़ में आती कैसे हैं? कभी ऐसा तो कभी वैसा, कभी ये हो सकता है तो कभी वो हो सकता है। व्हाट दा हेल इज दिस यार? तुम तो मेरे दिमाग़ का अपनी बातों से ही दही किये दे रही हो।"

"कमाल करते हो डियर हस्बैण्ड।" प्रतिमा ने सहसा खिलखिला कर हॅसते हुए कहा___"अगर ऐसा नहीं सोचोगे तो कैसे विराज की सोच से आगे जा पाओगे? कैसे उसे अपनी मुट्ठी में कैद कर पाओगे तुम?"

"भाड़ में जाए विराज।" अजय सिंह सहसा गुस्से में बोल पड़ा___"साले ने जीना हराम कर दिया है मेरा। ऊपर से मेरी बेटी को भी अपने साथ मिला लिया उसने। बस एक बार....एक बार मेरे सामने आ जाए वो। उसके बाद मैं बताऊॅगा कि मेरे साथ ऐसी चुहलबाज़ी करने का अंजाम क्या होता है?"

"सोचने वाली बात है डियर हस्बैण्ड।" प्रतिमा ने अजय सिंह के चेहरे की तरफ देखते हुए कहा___"जो लड़का बग़ैर सामने आए तुम्हारी ये हालत कर रखा है वो अगर खुल कर सामने आ जाए तो सोचो क्या हो?"

"क्या होगा?" अजय सिंह ताव में बोला___"साले माॅ बहन बीच चौराहे पर चोदूॅगा मैं। एक बार सामने बस आ जाए वो हरामज़ादा।"
"इसका उल्टा भी तो हो सकता है डियर।" प्रतिमा ने सहसा मुस्कुरा कर कहा___"हाॅ डियर इसका उल्टा भी तो हो सकता है। यानी कि तुम तो बीच चौराहे पर उसकी माॅ बहन को न चोद पाओ मगर वो सच में ही तुम्हारे बीवी बच्चों को बीच चौराहे पर रौंद डाले।"

"ये क्या बकवास कर रही हो तुम?" अजय सिंह ने कठोर भाव से कहा___"होश में तो हो न तुम? ये तुम कैसी वाहियात बातें कर रही हो?"
"सच हमेशा कड़वा ही लगता है मेरे बलम।" प्रतिमा ने अजय सिंह के चेहरे को अपनी एक हॅथेली से सहला कर कहा___"मगर सोचो तो सही। हालात जिस तरह से उसकी मुट्ठी में हैं उससे क्या वो ये सब नहीं कर सकता?"

प्रतिमा की इस बात पर अजय सिंह कुछ बोन न सका। कदाचित उसे एहसास हो गया था कि प्रतिमा सच कह रही थी। सच ही तो था, वो भला क्या कर सकता था विराज का? जबकि विराज अगर चाहे तो यकीनन वो सब कर सकता है जिस चीज़ की बात प्रतिमा कर रही थी। ख़ैर अभी अजय सिंह ये सब सोच ही रहा था कि तभी सिरहाने की तरफ रखा लैण्डलाइन फोन बज उठा। अजर सिंह ने हाथ बढ़ा कर रिसीवर उठाया और कान से लगा लिया। दूसरी तरफ से कुछ देर तक जाने क्या कहा। जवाब में ये कह कर अजय सिंह ने रिसीवर वापस रख दिया कि "चलो कोई बात नहीं"।

"क्या कहा तुम्हारे आदमी ने?" अजय सिंह के रिसीवर रखते ही प्रतिमा ने उससे पूछा था।
"यही कि इस वक्त फार्महाउस पर कोई इंसान तो क्या एक परिंदा तक मौजूद नहीं है।" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"किन्तु हाॅ वहाॅ पर हमारी वो जीप ज़रूर उसे मिली है जो जीप हमारे ही एक आदमी के साथ लापता हो गई थी।"

"इसका मतलब।" प्रतिमा ने सोचने वाले भाव के साथ कहा___"विराज ने मुम्बई से आते ही फार्महाउस से सबको दूसरी किसी सुरक्षित जगह पर शिफ्ट कर दिया है। कदाचित उसे अब ये आभास हो चुका था कि फार्महाउस पर अब एक भी पल रुकना उनके लिए ठीक नहीं है। इस लिए इससे पहले कि तुम्हें उसके वहाॅ होने का पता चले और तुम वहाॅ पहुॅचो उससे पहले ही वो उन सबको लेकर कही दूसरी जगह कूच कर गया। वाकई अजय, बड़ा ही शातिर दिमाग़ है उसका। वरना सोचने वाली बात है कि इतने दिन तक तो वो वहीं पर रहा था। भला एक दिन और वहाॅ रुक जाने में उसे क्या प्राब्लेम हो सकती थी। मगर नहीं, उसे तो आभास हो गया था कि अब वहाॅ पर खतरा बढ़ गया था उन सबके लिए। अतः फौरन ही सबको लेकर चलता बना वो। अब बताओ डियर हस्बैण्ड, उसकी सोच तुम्हारी सोच से दो क़दम आगे है कि नहीं?"

अजय सिंह निरुत्तर सा हो गया था। उसे समझ में ही नहीं आया कि अब वो प्रतिमा की इस बात का क्या जवाब दे? प्रतिमा बड़े ग़ौर से उसके चेहरे की तरफ कुछ देर तक देखती रही। फिर ये कह कर उसके बगल से ही लेट गई कि___"अब सो जाओ माई डियर। ज्यादा सोचने से कुछ नहीं होगा अब। नई सुबह के साथ तथा नई सोच के साथ कुछ नया करने की कोशिश करना।" अजय सिंह को भी लगा कि प्रतिमा ठीक कह रही है। अतः उसने भी अपने ज़हन से इन सारी बातों को झटका और दूसरी तरफ करवॅट लेकर लेट गया। किन्तु दोनो ही इस बात से बेख़बर थे कि सिरहाने के ऊपर ही एक बड़ी सी खिड़की थी जिसका एक पल्ला हल्का सा खुला हुआ था और उस हल्के खुले हुए पल्ले पर दो कान खरगोश की तरह खड़े उन दोनो की अब तक की सारी बातें सुन चुके थे।
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सुबह मेरी नींद खुली तो देखा कि रितू दीदी अभी भी उसी हालत में मेरे ऊपर लेटी हुई हैं। उनका वजन या ये कहिए कि उनका बोझ ज्यादा तो नहीं था मगर क्योंकि वो रात भर मेरे ऊपर ही लेटी रही थीं तो मुझे अब ऐसा लग रहा था जैसे मेरे ऊपर कितना भारी बोझ रखा हुआ हो। मेरी नींद खुलने का कारण बोझ का एहसास तो था ही किन्तु दूसरा एक कारण ये भी था कि मुझे शूशू आई हुई थी। आप तो जानते ही हैं कि सुबह सुबह शूशू के चलते हमारे महाराज स्टैण्डप पोजीशन में होते हैं।

मुझे महाराज के स्टैण्डप होने का जैसे ही एहसास हुआ मैं एकदम से घबरा सा गया। मुझे लगा कि कहीं अगर रितू दीदी जग गईं और उन्हें भी मेरे महाराज के स्टैण्डप होने का एहसास हो गया तो भारी गड़बड़ हो सकती है। वो मेरे बारे कुछ भी उल्टा सीधा सोच सकती हैं। अतः मुझे उनके जगने से पहले ही अपनी इस हालत को ठीक कर लेना था। मैने हल्का सा सिर उठा कर देखा तो रितू दीदी किसी छोटी सी बच्ची की तरह मेरे सीने पर वैसे ही छुपकी हुई सो रही थी जैसे रात को वो सोई थी।

मैने बहुत ही आहिस्ता से दाहिने तरफ करवॅट लेकर रितू दीदी को बेड पर इस तरह बड़ी सफाई से लेटाया कि उनकी नींद में ज़रा भी खलल न पड़ सके। राइट साइड बेड पर लेटा कर मैने उन्हें ठीक से सीधा कर दिया। हलाॅकि वो सीधी ही थी मगर उनके दोनो हाॅथ मुड़े हुए थे जिन्हें मैने सीधा कर दिया था। मैने देखा रितू दीदी के खूबसूरत चेहरे पर इस वक्त संसार भर की मासूमियत विद्यमान थी। उन्हें मेक-अप का ज़रा भी शौक नहीं था। वो बिना मेक-अप के ही बहुत खूबसूरत थी। बड़ी माॅ(प्रतिमा) की तरह ही वो बेहद खूबसूरत थी। किन्तु एक अच्छे नेचर की वजह से उनकी खूबसूरती बड़ी माॅ से लाख गुना ज्यादा थी। मुझे रितू दीदी को देख कर उन पर बेपनाह प्यार आ रहा था। मैने झुक कर उनके माॅथे पर हौले से एक किस किया और फिर मुस्कुराते हुए मैं पलट कर आहिस्ता से ही बेड से उतर कर कमरे से अटैच बाथरूथ की तरफ बढ़ गया।

कुछ देर बाद जब मैं बाथरूम से सुबह के कामों से फारिग़ हो कर वापस कमरे में बेड के पास आया तो देखा रितू दीदी अभी भी वैसी ही लेटी हुईं थी किन्तु इस वक्त उनके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठों पर बहुत ही दिलकस मुस्कान फैली हुई थी। ये देख कर मैं चौंका फिर मैं मुस्कुराते हुए आहिस्ता से बेड पर आ कर रितू दीदी के पास ही बैठ गया और उन्हें देखने लगा।

"गुड मार्निंग माई दा मोस्ट ब्यूटीपुल दीदी।" फिर मैने हौले से मुस्कुराते हुए किन्तु उन्हें देखते हुए ही कहा___"मुझे पता है आप जग चुकी हैं। किन्तु ये समझ नहीं आया कि आपके होठों पर ये खूबसूरत मुस्कान किस बात पर फैली हुई है? हलाॅकि आपको सुबह सुबह इस तरह मुस्कुराते हुए देख कर मैं बहुत खुश हो गया हूॅ।"

मेरी इस बात पर रितू दीदी के होठों की उस मुस्कान में और भी इज़ाफा हुआ और उन्होंने पट से अपनी ऑखें खोल दी। कुछ देर तक मुझे वो उसी मुस्कान के साथ देखती रहीं फिर बोलीं____"मेरे होठों पर ये मुस्कान तेरी ही वजह से है राज। मुझे नहीं पता था कि सुबह सुबह मेरा सबसे खूबसूरत और सबसे अच्छा भाई मुझे इतना प्यार से लेटा कर तथा मेरे माॅथे पर चूम कर मुझसे इतना ज्यादा प्यार करने का सबूत देगा। सच कहती हूॅ मेरे भाई, आज की ये सुबह मेरे लिए अब तक की सबसे बेस्ट सुबह थी।"

"ओह तो आप उस वक्त जगी हुई थीं?" मैने चौंकते हुए कहा___"अगर ऐसा था तो फिर आप चुपचाप ऑखें बंद कर सोये होने का नाटक क्यों कर रही थी?"
"अरे बुद्धूराम।" रितू दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा___"अगर मैं दिखा देती कि मैं जाग चुकी हूॅ तो फिर मुझे तेरा वो प्यार कैसे मिल पाता भला जो तूने मेरे माॅथे पर चूम कर जताया था?"

"अच्छा जी।" मैं कह तो गया मगर अब ये सोच सोच कर घबराने भी लगा था कि रितू दीदी अगर जग गई थी तो कहीं उन्हें मेरे महाराज के स्टैण्डप होने का बोध तो नहीं हो गया? और अगर ऐसा हो गया होगा तो यकीनन वो मेरे में ग़लत सोचने लगी होंगी। मैं भगवान से विनती करने लगा कि प्लीज ऐसा कुछ न होने देना। फिर मैने खुद को सम्हालते हुए बोला___"पर आप जगी कब थीं दीदी?"

"मैं तो तेरे जगने से पहले ही जाग गई थी।" ये कह कर रितू दीदी ने जैसे मेरे सिर पर बम्ब फोड़ा___"पर उठी इस लिए नहीं कि मुझे उस तरह लेटे रहने में बड़ा मज़ा आ रहा था।"
"क्या????" मेरे मुख से मानो चीख सी निकल गई थी, फिर बुरी तरह सकपकाते हुए बोला___"मेरा मतलब आप मेरे जगने से पहले कैसे जग गई थी?"

"अरे ये कैसा सवाल है राज?" रितू दीदी के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे। ये अलग बात थी कि उनके होठों पर मुस्कान वैसी ही बरकरार थी, बोली___"क्या मैं तेरे जागने से पहले खुद नहीं जाग सकती और तू इस तरह चौंक क्यों रहा है मेरे जगने की बात सुन कर? क्या तुझे मेरे जाग जाने पर कोई प्राब्लेम हुई है?"

"न.न..नहीं तो।" मैं एक बार फिर बुरी तरह सकपका गया। मुझे समझ न आया कि क्या कहूॅ___"ऐसी तो कोई बात नहीं है दीदी।"
"फिर तू इस तरह चौंका क्यों?" रितू दीदी की मुस्कान और भी गहरी हो गई___"अरे ये क्या???"

"क..क.क्या हुआ दीदी?" मैं उनके इस प्रकार कहने पर बुरी तरह डर गया। मेरे चेहरे पर उभरे पसीने में पल भर में इज़ाफा हो गया।
"ये तेरे माॅथे पर सुबह सुबह इतना पसीना कैसे उभर आया राज?" रितू दीदी ने मानो एक और बम्ब मेरे सिर पर फोड़ दिया___"क्या बात है मेरे भाई तेरी तबीयत तो ठीक है न?"

"त..त.तबीयत???" उनकी इस बात से मेरी हालत पल भर में ख़राब हो गई___"क्या मतलब है आपका? मैं तो एकदम ठीक हूॅ दीदी।"
"तू सच कहा रहा है न?" रितू दीदी ने अजीब भाव से मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए पूछा___"और तू सच में ठीक ठाक है न?"

"ओफ्फो दीदी।" मैंने बेचैनी और परेशानी की हालत में कहा___"ये सुबह सुबह क्या अपनी पुलिसगीरी दिखाने लगी हैं आप?"
"पुलिसगीरी??" रितू दीदी चौंकी___"मैं कहाॅ पुलिसगीरी दिखा रही हूॅ तुझे? मैं तो तेरी तबीयत के बारे में ही पूछ रही हूॅ।"

"तो फिर ये पुलिस वालों की तरह तहकीक़ात करने का क्या मतलब है आपका?" मैं अब तक अपनी हालत से काफी हद तक उबर चुका था, बोला___"इतनी देर से देख रहा हूॅ कि आप बाल की खाल निकालने पर तुली हुई हैं। इतना भी नहीं सोचा कि मुझ मासूम पर इस सबसे क्या गुज़रने लगी है, हाॅ नहीं तो।"

मैने ये बात इतने भोलेपन और इतनी मासूमियत से कही थी कि रितू दीदी की हॅसी छूट गई। वो एकदम से बेड पर उठ कर बैठ गई और फिर झपट कर मुझे अपने गले से लगा लिया।

"तू सचमुच बहुत स्वीट है राज।" रितू दीदी ने मेरी पीठ पर अपने दोनो हाथ फेरते हुए कहा___"ऊपर से तेरा आज अपनी इस बात में गुड़िया(निधी) का वो तकिया कलाम यूज करना। उफ्फ जान ही ले गया रे।"

गुड़िया का ख़याल आते ही मेरे अंदर भी एक अजीब सी झुरझुरी दौड़ गई। पलक झपकते ही उसका चेहरा मेरी ऑखों के सामने उभर आया। उस चेहरे में ज़माने भर की उदासी थी, तड़प थी। मेरा दिल एकदम से निधी के लिए बेचैन हो उठा। सुबह सुबह रितू दीदी की जो मुस्कान देख कर मुझे खुशी हुई थी वो गुड़िया का उदास चेहरा मेरी ऑखों के सामने उभर आने से जाने कहाॅ गायब हो गई थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि निधी ने अचानक मुझसे बात करना क्यों बंद कर दिया था? बात करना तो दूर बल्कि वो तो मेरे सामने ही नहीं आती थी।

"क्या हुआ राज?" रितू दीदी ने मुझे चुप जान कर मुझसे अलग होते हुए पूछा___"तू एकदम से गुमसुम सा क्यों हो गया? क्या मेरी बातों से तेरा दिल दुख गया है? देख अगर ऐसी बात है तो प्लीज मुझे माफ़ कर दे।"

"नहीं दीदी।" मैने उनके मुख पर अपना हाॅथ रख दिया, फिर बोला___"आपने कुछ नहीं किया है। आप भला कैसे मेरा दिल दुखा सकती हैं? मुझे पता है आप मुझे बहुत प्यार करती हैं।"

"तो फिर क्या बात है?" रितू दीदी ने सहसा गंभीर होकर पूछा___"तू एकदम से ही गुमसुम सा क्यों नज़र आने लगा है? आख़िर किस बात ने तुझे इतना सीरियस कर दिया है? क्या मुझे नहीं बताएगा?"

"मैं दरअसल गुड़िया की वजह से सीरियस हो गया हूॅ दीदी।" मैने गंभीरता से कहा___"पता नहीं क्या बात है जो वो मुझसे बात करने की तो बात दूर बल्कि वो मेरे सामने भी नहीं आती। जबकि उसे पता है कि मैं उसकी शरारत भरी बातों के बिना पल भर भी नहीं रह सकता।"

"ऐसा कब से है?" रितू दीदी ने पूछा___"तूने उसे कुछ कहा था क्या? या फिर तूने उसे किसी बात पर डाॅटा होगा। वो तेरी लाडली है इस लिए वो तेरे ज़ारा से भी डाॅट देने पर सीरियस हो सकती है। संभव है ऐसा ही कुछ हो।"

"मैं उसे ख्वाब में भी नहीं डाॅट सकता दीदी।" मैने पुरज़ोर लहजे में कहा___"और ना ही मैने उसे कुछ ऐसा वैसा कहा है जिससे उसे बुरा लग जाए।"
"तो फिर कोई दूसरी वजह होगी।" रितू दीदी ने सोचने वाले भाव से कहा___"कोई ऐसी वजह जिसके बारे में तुम्हें पता ही न हो।"

"ऐसी क्या वजह हो सकती है भला?" मैने कहा___"अगर कोई बात होती तो गुड़िया मुझे ज़रूर बताती।"
"कुछ बातें ऐसी भी होती हैं राज।" रितू दीदी ने समझाने वाले अंदाज़ से कहा___"जिन्हें एक बहन अपने भाई से नहीं कह सकती। वैसे इसका पता करने का सबसे अच्छा तरीका ये है कि तू उसे फोन लगा और उससे बात कर।"

"वो मेरा फोन नहीं उठाएगी दीदी।" मैने कहा___"और ना ही मुझसे बात करेगी। अगर करना होता तो अभी जब मैं मुम्बई गया था तो वो मुझसे कुछ तो बात करती। मगर वो तो मेरे सामने आई तक नहीं। आते समय मैं ही उससे मिलने उसके कमरे में गया था। मैने देखा कि कमरे में बेड पर वो ऑखें बंद कर सोने का दिखावा कर रही थी। मतलब साफ था कि वो मुझसे ना तो मिलना चाहती है और ना ही बात करना चाहती है।"

"बड़ी हैरत की बात है ये तो।" रितू दीदी के चेहरे पर हैरत के भाव उभरे___"चल ठीक है मैं अपने फोन से उसे काल करती हूॅ और मैं उससे बात करती हूॅ।"
"हाॅ ये ठीक रहेगा दीदी।" मैने खुश होते हुए कहा___"पर आप उससे ये मत कहना कि आपने उसे मेरे बातों के चलते फोन किया है और ना ही ये बताना कि मैं आपके ही पास बैठा हुआ हूॅ।"

रितू दीदी ने मेरी बात पर हाॅ में अपना सिर हिलाया और ये कह कर बेड से नीचे उतरने लगी कि वो अपने कमरे से अपना फोन लेकर अभी आती हैं। उनके जाने के बाद मैं बेड पर ही उनके आने का इन्तज़ार करने लगा। बेड के पास ही एक छोटी सी टेबल थी जिसमें मेरा मोबाइल फोन रखा हुआ था। मुझे ख़याल आया कि रितू दीदी के पास तो गुड़िया(निधी) का नंबर है ही नहीं। अतः मैने टेबल से अपना फोन उठा कर उसमे से गुड़िया का नंबर दीदी को देने का सोचा।

मैने अपने फोन को उठा कर मोबाइल के बगल से लगी बटन पर अॅगूठे से पुश किया तो स्क्रीन जल उठी। स्क्रीन जलते ही उसमें मुझे एक मैसेज नज़र आया जो व्हाट्सएप में था और जिसे नीलम ने भेजा था। मैने फोन को अनलाॅक करके उस मैसेज को खोला। नीलम के भेजे गए मैसेज को पढ़ता चला गया मैं। मैं ये जान कर हैरान हुआ कि नीलम ने मैसेज में सच्चाई का पता लग जाने वाली बात कही थी और वो मुझसे मिलना चाहती थी। मैं चकित था कि नीलम ने इतना जल्दी सच्चाई का पता कैसे लगा लिया? उसने मैसेज में सिर्फ इतना ही लिखा था कि___"राज मुझे पता चल गया है कि सच्चाई क्या है और किस वजह से रितू दीदी माॅम डैड के खिलाफ होकर तुम्हारे साथ हो गई हैं। सारी बातें तुमसे मिलने के बाद ही बताऊॅगी इस लिए मुझे तुमसे फौरन ही मिलना है। अब ये तुम बताओ कि मैं तुमसे कब कैसे और कहाॅ मिल सकती हूॅ। मेरे इस मैसेज का जवाब जितना जल्दी हो सके देना। तुम्हारी बहन नीलम परी।"

मैं नीलम के इस मैसेज से हैरान भी था और खुश भी। हैरान इस लिए कि उसने इतनी जल्दी सच्चाई का पता कर लिया था और खुश इस लिए कि अब वो भी कदाचित रितू दीदी की तरह मेरे पास ही रहेगी। अभी मैं ये सब सोच कर खुश ही हो रहा था कि तभी रितू दीदी मेरे कमरे में अपना फोन लिए आ गईं। उनकी नज़र मेरे चेहरे पर मौजूद खुशी के भावों पर पड़ी तो उनके चेहरे पर चौंकने के भाव उभरे।

"ओये होये बड़ा खुश लग रहा है भाई।" फिर वो मुस्कुराते हुए मुझसे बोली___"कोई दूसरी गर्लफ्रैण्ड मिल गई क्या तुझे?"
"अरे नहीं दीदी।" मैं उनकी इस बात से मुस्कुराते हुए बोला___"ऐसी कोई बात नहीं है। दरअसल मेरे फोन पर नीलम का मैसेज आया था रात में। उसके मैसेज को पढ़ कर ही खुश हो रहा था।"

"ओह तो ये बात है।" रितू दीदी बेड पर मेरे पास ही बैठते हुए कहा___"ऐसा क्या लिख कर भेजा है उसने मैसेज में जिसके चलते तू इतना खुश हो रहा है? ज़रा मुझे भी तो सुना उसका मैसेज।"

लीजिए, आप खुद ही पढ़ लीजिए।" मैने मोबाइल उनके हाथ में पकड़ाते हुए कहा___"हो सकता है कि आप भी मेरी तरह उसका मैसेज पढ़ कर खुश हो जाएॅ।"
"उसके लिए मुझे मैसेज पढ़ने की ज़रूरत नहीं है मेरे प्यारे भाई।" रितू दीदी ने मुझे देखते हुए कहा___"क्योंकि अगर तू खुश है तो मैं तुझे खुश देख कर ही खुश हो जाऊॅगी।"

मैं उनकी इस बात से बस मुस्कुरा कर रह गया। जबकि ऐसा कहने के बाद दीदी ने नीलम के मैसेज की तरफ देखा और मैसेज को पढ़ने लगीं। मैसेज पढ़ते ही उनके चेहरे पर हैरत और खुशी के मिले जुले भाव उभरे और फिर एकाएक ही उनके चेहरे पर गंभीरता छा गई।

"क्या हुआ दीदी?" मैं उनके चेहरे पर अचानक ही उभर आई उस गंभीरता को देख चौंकते हुए पूछा___"आपको नीलम के इस मैसेज को पढ़ कर खुशी नहीं हुई?"
"खुशी तो हुई राज।" रितू दीदी ने पूर्वत गंभीर भाव से ही कहा___"ये जानकर अच्छा भी लगा कि नीलम को भी सच्चाई का पता चल गया है मगर गंभीरता वाली बात ये है कि कहीं डैड को भी न इस बात का आभास हो जाए कि नीलम को भी सच्चाई पता चल गई होगी। उस सूरत में नीलम पर खतरा भी पैदा हो सकता है।"

"ये आप क्या कह रही हैं दीदी?" मैने हैरानी से कहा__"भला बड़े पापा को इस बात का आभास कैसे हो जाएगा कि नीलम उनकी सच्चाई जान चुकी होगी?"
"तुम मेरी माॅम को नहीं जानते राज।" रितू दीदी ने उसी गंभीरता से कहा___"उन्होंने डैड के साथ ही वकालत की पढ़ाई की थी। उनका दिमाग़ बहुत ही शार्प है। डैड से कई गुना ज्यादा उनका दिमाग़ चलता है। वो पिछले कुछ दिनों की घटनाओं को मद्दे नज़र रखते हुए डैड को ये बात समझा सकती हैं कि नीलम को सच्चाई का पता ज़रूर चल गया होगा अथवा वो सच्चाई का पता लगाने की राह पर चल रह होगी।"

"बात कुछ समझ में नहीं आई दीदी।" मैंने उलझनपूर्ण भाव से कहा___"भला बड़ी माॅ ऐसा क्या सोच कर बड़े पापा को समझाएॅगी?"
"सीधी सी बात है राज।" दीदी ने कहा___"ये तो उन्हें अब तक समझ आ ही गया होगा कि हमने क्या क्या और किस तरीके से किया है? इस लिए उन्हें इस सबकी कड़ियाॅ जोड़ने में कोई मुश्किल नहीं होगी। कहने का मतलब ये कि सारी घटनाओं के बाद वो अब उस दिन की घटनाओं को आपस में मिलाएॅगी जिस दिन डैड को हमारे नकली सीबीआई वाले गिरफ्तार करके ले गए थे और फिर बिना कुछ पूछताॅछ किये उन्हें दो दिन बाद छोंड़ भी दिया था। डैड को ये यो पता चल ही गया था कि वो सब तुम्हारा ही किया धरा था, क्योंकि तुम्हारे उन नकली सीबीआई वाले आदमियों ने अपनी बातों के बीच तुम्हारा ही नाम लिया था। अतः सारी बातें जानने के बाद माॅम को ये सोचने में ज़रा भी समय नहीं लगेगा कि तुमने डैड को दो दिन के लिए अंडरग्राउण्ड करके अपना कौन सा अहम किया हो सकता है। यानी उन्हें ये तो अंदाज़ा था ही कि तुम अभी यहीं हो और यहीं से ही सारी घटनाओं को अंजाम दे रहे हो। मगर ये भी भूलने वाली बात नहीं है कि तुम्हारे पास पवन और उसकी फैमिली भी है जो कि तुम्हारी कमज़ोरी के रूप में हैं। तुम ये हर्गिज भी नहीं चाहोगे कि तुम्हारी कमज़ोरी डैड के हाॅथ लग जाए। क्योंकि उस सूरत में तुम बहुत ही ज्यादा कमज़ोर पड़ जाओगे और ये भी संभव है कि उस सूरत में तुम मजबूरन डैड के हाॅथ भी लग जाओ। उसके बाद किस्सा खत्म। इस लिए तुम यही चाहोगे कि सबसे पहले तुम अपनी कमज़ोरियों को या तो पूर्णरूप से सुरक्षित कर दो या फिर उन्हें डैड की पहुॅच से बहुत दूर कर दो। माॅम के दिमाग़ में यही बातें होगी और वो सोचेंगी कि तुम ऐसा ही करना चाहोगे। यानी पवन तथा उसकी माॅ बहन को डैड की पहुॅच से दूर मुम्बई भेज देना चाहोगे। किन्तु तुम्हारे पास समस्या ये होगी कि पवन आदि को लेकर जाने के बाद मैं और नैना बुआ यहाॅ अकेली रह जाएॅगी, और हम दोनो पर डैड का खतरा रहेगा। अतः तुम कोई ऐसा जुगाड़ लगाओगे जिससे तुम्हारे दोनो काम आसानी से और सुरक्षित तरीके से हो जाएॅ। तब तुमने सोचा कि डैड के रूप में राजा को ही सह और मात दे दी जाए जिससे ना रहेगा बाॅस और ना ही बजेगी बाॅसुरी वाली बात हो जाएगी। यही तुमने किया भी और जब तुम वापस मुम्बई से लौट आए तो डैड को भी छोंड़ दिया अपने नकली सीबीआई के आदमियों के हवाले से।"

"ये सब तो ठीक है दीदी।" मैने शख्त हैरानी से दीदी की तरफ देखते हुए कहा___"किन्तु इसमें ये बात कहाॅ से आती है कि उन्हें ये पता चल सकता है कि नीलम भी उनकी सच्चाई को जान चुकी है या फिर सच्चाई जानने की राह पर चल रही होगी?"

"वहीं पर आ रही हूॅ माई डियर ब्रदर।" रितू दीदी ने सहसा मुस्कुराते हुए कहा___"माॅम ये सोचेंगी कि उसी दिन तीन तीन लोग हल्दीपुर कैसे आ गए? मतलब कि डैड तो हवेली आए ही उनके साथ साथ उसी दिन नीलम भी हवेली आ पहुॅची और ये भी उनके ज़हन में होगा कि तुम भी वापस मुम्बई से आ गए होगे और इसी लिए डैड को छोंड़ भी दिया था। तो सोचने वाली बात थी ये तीन लोग संयोगवश तो नहीं आ गए थे यहाॅ। यानी कहीं न कहीं इसमें कोई पेंच या भेद ज़रूर था। माॅम को सोचने और समझने में देर नहीं लगेगी कि जिस ट्रेन से तुम आए उसी ट्रेन से नीलम भी आई होगी और बहुत हद तक ये भी संभव है कि तुम दोनो की मुलाक़ात भी ट्रेन में हुई हो। मुलाक़ात जब होती है तो कुछ न कुछ बात चीत भी होती है। अब चूॅकि हालात ऐसे थे कि तुम दोनो के बीच में नार्मल बातें तो होंगी नहीं यानी कि तक़रार भरी अथवा गिले शिकवे संबंधी बातें हुई होंगी। दूसरी बात माॅम ने मुझे फोन किया था पर मैने उनका फोन उठाया नहीं तब उन्होंने नीलम को फोन किया। नीलम ने मुझे फोन कर मुझसे बात की थी और पूछा था कि मैं अपने ही माॅम डैड के खिलाफ होकर तुम्हारे साथ क्यों हूॅ तब मैने उससे कहा था कि वो सच्चाई का पता खुद लगाए। यही बात माॅम ने भी सोचा होगा। यानी उन्हें ये लगा होगा कि मैने नीलम को सारी बातें बता दी होंगी और अब नीलम सच्चाई जान चुकी है। या फिर अगर मैने नहीं बताया होगा तो इतना तो ज़रूर ही कहा होगा कि मेरे माॅम डैड के खिलाफ़ होने की वजह का पता वो खुद लगाए। इस लिए नीलम वजह या सच्चाई का पता लगाने आई होगी।" रितू दीदी ने इतना कहने के बाद गहरी साॅस ली और फिर बोली___"इन सब बातों की वजह से ही मैं कह रही हूॅ राज कि नीलम पर अब ख़तरा है और उस नादान व नासमझ को इस बात का एहसास भी नहीं होगा कि वो कितनी बड़ी मुसीबत में फॅस सकती है। उसे उस जगह से निकालना होगा राज वरना सच में अनर्थ हो सकता है। वो हवश के पुजारी मेरी मासूम बहन को बरबाद कर सकते हैं।"

"नहींऽऽ।" मैंने सहसा आवेश में आकर कहा___"ऐसा हर्गिज़ नहीं होगा दीदी और मैं होने भी नहीं दूॅगा। अगर मेरी मासूम बहन को उन लोगों ने छुआ भी तो उन्हें इसका अंजाम बहुत ही भयानक रूप से भुगतना पड़ेगा।"

"नीलम के साथ में सोनम भी है।" रितू दीदी ने गंभीरता से कहा___"उसे भी उन लोगों से दूर करना होगा। मैं उस कमीने शिवा को बहुत अच्छे तरीके से जानती हूॅ। उसे वासना और हवश के चलते रिश्तों का कोई भान नहीं रहेगा और वो सोनम को भी हवश भरी नज़रों से देख रहा होगा। हे भगवान ये नीलम उसे अपने साथ लेकर यहाॅ आई ही क्यों थी?"

"फिक्र मत कीजिए दीदी।" मैने कठोरता से कहा___"उन दोनो को कुछ नहीं होगा। अब मैदान में खुल कर आने का समय आ गया है। आपके डैड को ये बताने का समय आ गया है कि अगर मैं उनके सामने भी आ जाऊॅ तो मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं।"

"कुछ भी करने से पहले तुम्हें नीलम और सोनम को सुरक्षित वहाॅ से निकालना होगा।" रितू दीदी ने समझाने वाले अंदाज़ से कहा___"उसके बाद ही हम कोई ठोस क़दम उठाने में सक्षम हो सकते हैं।"

"ठीक है दीदी।" मैने कहा___"मैं नीलम से बात करके उसे सब कुछ समझाता हूॅ कि उसे क्या और कैसे करना है। आप भी गुड़िया से बात कर लीजिए। और हाॅ इस बात की बिलकुल भी फिक्र मत कीजिए कि नीलम व सोनम दीदी में से किसी को भी मेरे रहते कुछ होगा। मैं अपनी जान देकर भी उनकी इज्ज़त और जान की हिफाज़त करूॅगा।"

"ऐसा मत कह राज।" रितू दीदी की ऑखें छलक पड़ी, बोली___"तुझे कुछ होने से पहले ही मैं अपनी जान दे दूॅगी। मेरा सबसे प्यारा भाई ही नहीं रहेगा तो मैं इस पापी दुनियाॅ में अकेली जी कर क्या करूॅगी।"

"सब ठीक ही होगा दीदी।" मैने दीदी को अपने से छुपका लिया___"और मैं सब कुछ ठीक करने की पूरी कोशिश भी करूॅगा। चलिए अब आप भी फ्रेश हो लीजिए, सुबह हो गई है। नैना बुआ आपको आपके कमरे में न देखेंगी तो कहीं आपको ढूॅढ़ने न लग जाएॅ। अतः अब आप जाइये और हाॅ गुड़िया से ज़रूर बात कर लीजिएगा।"

मेरे कहने पर रितू दीदी ने मुझसे अलग होकर हाॅ में सिर हिलाया। मैने उन्हें अपने फोन से गुड़िया का नंबर मैसेज किया। उसके बाद दीदी कमरे से चली गईं। उनके जाने के बाद मैंने गहरी साॅस ली तथा फिर मैने नीलम को मैसेज किया। अपने मोबाइल को हाॅथ में लिए मैं नीलम की तरफ से उसके रिप्लाई का इन्तज़ार करने लगा।
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दोस्तो, आप सबके सामने अपडेट हाज़िर है,,,,,,,,
आप सबकी खूबसूरत प्रतिक्रिया और आपके शानदार रिव्यू का बेसब्री से इन्तज़ार रहेगा।
 
एकनयासंसार
अपडेट.......《 55 》

अब तक,,,,,,,,

"कुछ भी करने से पहले तुम्हें नीलम और सोनम को सुरक्षित वहाॅ से निकालना होगा।" रितू दीदी ने समझाने वाले अंदाज़ से कहा___"उसके बाद ही हम कोई ठोस क़दम उठाने में सक्षम हो सकते हैं।"

"ठीक है दीदी।" मैने कहा___"मैं नीलम से बात करके उसे सब कुछ समझाता हूॅ कि उसे क्या और कैसे करना है। आप भी गुड़िया से बात कर लीजिए, और हाॅ इस बात की बिलकुल भी फिक्र मत कीजिए कि नीलम व सोनम दीदी में से किसी को भी मेरे रहते कुछ होगा। मैं अपनी जान देकर भी उनकी इज्ज़त और जान की हिफाज़त करूॅगा।"

"ऐसा मत कह राज।" रितू दीदी की ऑखें छलक पड़ी, बोली___"तुझे कुछ होने से पहले ही मैं अपनी जान दे दूॅगी। मेरा सबसे प्यारा भाई ही नहीं रहेगा तो मैं इस पापी दुनियाॅ में अकेली जी कर क्या करूॅगी?"

"सब ठीक ही होगा दीदी।" मैने दीदी को अपने से छुपका लिया___"और मैं सब कुछ ठीक करने की पूरी कोशिश भी करूॅगा। चलिए अब आप भी फ्रेश हो लीजिए, सुबह हो गई है। नैना बुआ आपको आपके कमरे में न देखेंगी तो कहीं आपको ढूॅढ़ने न लग जाएॅ। अतः अब आप जाइये और हाॅ गुड़िया से ज़रूर बात कर लीजिएगा।"

मेरे कहने पर रितू दीदी ने मुझसे अलग होकर हाॅ में सिर हिलाया। मैने उन्हें अपने फोन से गुड़िया का नंबर मैसेज किया। उसके बाद दीदी कमरे से चली गईं। उनके जाने के बाद मैंने गहरी साॅस ली तथा फिर मैने नीलम को मैसेज किया। अपने मोबाइल को हाॅथ में लिए मैं नीलम की तरफ से उसके रिप्लाई का इन्तज़ार करने लगा।
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अब आगे,,,,,,,,

उधर मंत्री दिवाकर चौधरी के आवास पर।
अशोक मेहरा व अवधेश श्रीवास्तव ड्राइंग रूम में बैठे थे। सामने के सोफे पर एक ब्यक्ति और बैठा हुआ था जो कि अवधेश के साथ ही आया हुआ था। उसका नाम हरीश राणे था। हरीश राणे पेशे से एक प्राइवेट डिटेक्टिव था। उसने बाकायदा अपनी एक अलग डिटेक्टिव एजेंसी खोली हुई थी तथा उसके अंडर में काफी सारे लोग काम करते थे। अवधेश श्रीवास्तव और हरीश राणे की मुलाक़ात कई साल पहले किसी केस के सिलसिले पर ही हुई थी। तब से इन दोनो के बीच यारी दोस्ती का गहरा नाता था।

हरीश राणे बहुत ही क़ाबिल और तेज़ दिमाग़ का डिटेक्टिव था। उसके बारे में कहा जाता है कि उसने अब तक जिस केस को भी अपने हाॅथ में लिया उसे बहुत ही कम समय में साल्व किया था। कदाचित यही वजह है कि आज के समय में हरीश राणे एक केस के लिए अच्छी खासी फीस चार्ज़ करता था। फीस तो उसकी होती ही थी किन्तु उसके आने जाने का खर्चा पानी भी उसे अलग से देना पड़ता था। ख़ैर, इस वक्त ये तीनों ही ड्राइंग रूम में बैठे चौधरी के आने का पिछले एक घंटे से इन्तज़ार कर रहे थे।

चौधरी के पीए ने बताया था कि चौधरी साहब अपनी रखैल सुनीता के साथ कमरे में हैं। अवधेश व अशोक ये जान कर हैरान रह गए थे कि चौधरी आज सुबह सुबह ही सुनीता को भोगने में लग गया था। आम तौर पर ऐसा होता नहीं था, और ना ही चौधरी इस क़दर सुनीता का दीवाना था। मगर जाने क्या बात थी कि आज सुबह सुबह ही चौधरी सुनीता के साथ कमरे में बंद था। उसे ये तक होश नहीं था कि हालात कितने गंभीर थे आजकल।

अवधेश श्रीवास्तव अपने डिटेक्टिव दोस्त हरीश राणे को चौधरी से मिलवाने लाया था। वो चाहता था कि चौधरी राणे से मिल कर अपने तरीके से उसे केस के सिलसिले में बताएॅ और आगे का काम शुरू करने की परमीशन दे। ख़ैर एक घंटे दस मिनट बाद चौधरी और सुनीता एकदम से फ्रेश होकर ड्राइंग रूम में आए। उन दोनो के हाव भाव से बिलकुल भी ऐसा नहीं लग रहा था कि वो दोनो बाॅकी सबकी जानकारी के अंदर क्या गुल खिला कर आए थे। बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे कुछ हुआ ही न हो।

"माफ़ करना यारो।" दिवाकर चौधरी ने सोफे पर बैठते हुए तथा सबकी तरफ नज़रें दौड़ाते हुए कहा___"तुम सबको इन्तज़ार करना पड़ा।"
"कोई बात नहीं चौधरी साहब।" अवधेश ने मजबूरी में ही सही किन्तु मुस्कुराते हुए कहा___"इतना तो चलता है। ख़ैर जैसा कि मैने आपसे ज़िक्र किया था तो मैं अपने साथ अपने डिटेक्टिव दोस्त हरीश राणे को लेकर आया हूॅ। आप इनसे मिल लीजिए और केस से संबंधित बात कर लीजिए।"

"ओह हैलो राणे।" चौधरी ने हरीश की तरफ देखते हुए किन्तु तनिक मुस्कुराते हुए कहा___"भई तुम अवधेश के दोस्त हो तो हमारे भी दोस्त ही हुए। इस लिए हमसे किसी भी बात के लिए संकोच या झिझक करने की ज़हमत मत उठाना।"

"जी बिलकुल चौधरी साहब।" हरीश राणे ने भावहीन स्वर में कहा___"वैसे भी हमारे पेशे में संकोच या झिझक के लिए कोई जगह नहीं होती है। ख़ैर आप बताएॅ मेरे लिए क्या आदेश है? आपके लिए कुछ कर सकूॅ ये मेरा सौभाग्य ही होगा।"

"सारी बातें तो तुम्हें अवधेश ने बता ही दी होंगी।" चौधरी ने कहा___"और शायद ये भी समझा दिया होगा कि तुम्हें करना क्या है?"
"जी बिलकुल।" हरीश राणे ने कहा___"अवधेश ने मुझे इस केस से संबंधित सारी बातें बताई हैं। इसके बावजूद आप अगर अपने मुख से एक बार फिर से इस बारें में मुझे बता देंगे तो ज्यादा बेहतर होगा।"

"दरअसल हालात ऐसे हैं।" दिवाकर चौधरी ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"कि हम सब कुछ कर गुज़रने की क्षमता रखते हुए भी कुछ कर नहीं सकते। अवधेश ने ही सुझाव दिया था कि इस काम में हमारे अलावा एक डिटेक्टिव ही बेहतर तरीके से कोई कार्यवाही कर सकता है। हमें भी लगा कि आइडिया अच्छा है। ख़ैर, हम सिर्फ ये चाहते हैं कि जिस शख्स की वजह से हम कुछ कर नहीं पा रहे हैं उसे तुम हमारे सामने लाकर खड़ा कर दो। किन्तु इस बात का बखूबी और सबसे पहले ख़याल रहे कि उसे इस बात की भनक भी न लगे कि हमने तुम्हारे रूप में कोई जासूस उसके पीछे लगा रखा है। क्योंकि अगर उसे तुम्हारे बारे में पता चल गया तो तुम सोच भी नहीं सकते हो कि तुम्हें हायर करने के लिए तथा उसके पीछे लगाने के लिए हमें इसका कितना संगीन अंजाम भुगतना पड़ सकता है। ख़ैर, हम ये चाहते हैं कि उस शख्स के पास से वो सारे वीडियोज तुम हमें वापस लाकर दो और उसकी कैद से हमारे बच्चों को भी सही सलामत यहाॅ लेकर आओ। उसके बाद हम खुद देख लेंगे उस बास्टर्ड को कि वो खाली हाॅथ हमारा क्या उखाड़ लेता है?"

"ठीक है चौधरी साहब।" हरीश राणे ने कहा___"मैं आज और अभी से इस काम में लग जाता हूॅ। हलाॅकि इस काम में कोई बहुत बड़ी बात नहीं है जिसके लिए आपको किसी डिटेक्टिव की ज़रूरत पड़ती, मगर चूॅकि आप उस शख्स के द्वारा पंगू बने हुए हैं इस लिए खुद कुछ कर नहीं सकते हैं। अतः आपको कोई ऐसा ब्यक्ति चाहिए जो आपके लिए ये सब इस
तरीके से करे कि खुद डिटेक्टिव को भी पता न चल पाए कि वो क्या कर गया है?"

"बिलकुल, तुम सही समझे राणे।" चौधरी ने प्रभावित नज़रों से हरीश को देखते हुए कहा___"तुम खुद समझ सकते हो कि जब तक उसके पास हम लोगों के वो वीडियोज हैं तब तक हम में से कोई भी कोई ठोस ऐक्शन नहीं ले सकता उसके खिलाफ।"

"आप बेफिक्र रहिए चौधरी साहब।" हरीश राणे ने कहा___"बहुत जल्द आप इस बेबसी के आलम से उबर जाएॅगे और फिर आप स्वतंत्र रूप से कुछ भी करने की हालत में भी आ जाएॅगे।"

"आई होप कि ऐसा ही हो।" चौधरी ने कहा___"हम चाहते हैं कि ये काम जितना जल्दी हो सके तुम कर डालो। क्योंकि हमसे अब और ज्यादा ये सब झेला नहीं जा रहा है। अपनी फीस के रूप में जितना चाहो रुपया ले सकते हो हमसे। हमें जल्द से जल्द बस अच्छा रिजल्ट चाहिए।"

"डोन्ट वरी चौधरी साहब।" हरीश राणे ने कहा___"आपको इस सबसे बहुत जल्द ही मुक्ति मिल जाएगी। अच्छा अब मुझे यहाॅ से जाने की इजाज़त दीजिए।"
"ठीक है तुम जाओ राणे।" चौधरी ने कहा___"हमें बड़ी शिद्दत से उस दिन की प्रतीक्षा रहेगी जबकि हमारे बच्चे और वो वीडियोज हमारे पास होंगे।"

मंत्री दिवाकर चौधरी से इजाज़त लेकर हरीश राणे नाम का वो डिटेक्टिव वहाॅ से चला गया। उसके जाने के बाद कुछ देर तक ड्राइंगरूम में सन्नाटा छाया रहा। सबके चेहरों पर सोचो के भाव गर्दिश करते नज़र आ रहे थे।

"ये काम तो बहुत अच्छा हुआ चौधरी साहब।" सहसा पहली बार इस बीच अशोक मेहरा ने अपना मुख खोलते हुए कहा___"मगर आपने तो उस ठाकुर से भी इसके लिए मदद करने की बात की थी तो फिर उसका क्या? मेरा मतलब है कि क्या सचमुच इस मामले में वो हमारी मदद करेगा अथवा उसका वो मदद के लिए हाॅमी भरना महज उस वक्त की बस एक औपचारिकता थी?"

"बेशक, उसकी औपचारिकाता भी समझ सकते हो।" मंत्री ने कहा___"क्योंकि हमें भी ऐसा लगता है कि वो इस मामले में कुछ खास हमारी मदद नहीं कर सकता। उसकी खुद की थानेदारनी बेटी उसके खिलाफ़ है। बेटी के खिलाफ़ होने की जो वजह उसने हमें बताई थी उस वजह में कोई खास बात नहीं थी। क्योंकि महज इतनी सी बात पर कि उसके और उसकी पत्नी को बेटी का पुलिस की नौकरी करना पसंद नहीं था और वो इस बारे में बेटी से बोलते भी थे तो ऐसा नहीं हो सकता कि बेटी इतनी सी बात पर वो अपने पैरेंट्स के खिलाफ़ हो जाए। खिलाफ़ होने के पीछे ज़रूर कोई ऐसी ठोस वजह होगी जिसके बारे में ठाकुर ने हमें बताना शायद ज़रूरी नहीं समझा या फिर ऐसा हो सकता है कि वो उस वजह को हमसे बताना ही न चाहता रहा हो।"

"बात तो आपकी एकदम सही है चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने सोचने वाले भाव से कहा___"किन्तु सोचने वाली बात तो है ही कि ऐसी क्या वजह हो सकती है जिसके तहत उसकी खुद की बेटी उसके खिलाफ़ हो गई है?"

"हमें लगता है कि ठाकुर खुद भी दूध का धुला हुआ नहीं है।" चौधरी ने कहा___"उसने अपने भतीजे और छोटे भाई की बीवी के संबंध में जो कुछ भी हमें बताया था संभव है कि उसकी उस बात में कोई सच्चाई हो ही न। कहने का मतलब ये कि जिन आरोपों के तहत उसने अपने छोटे भाई की बीवी और उसके बच्चों को हर चीज़ से बेदखल किया था वो सभी आरोप महज उसी की चाल का एक हिस्सा रहे हों। हम ऐसा उसकी बेटी के खिलाफ़ हो जाने की बात के आधार पर कह रहे हैं। ये तो एक यथार्थ सच्चाई है कि झूॅठ या बुराई एक न एक दिन अपना चेहरा सबको दिखा ही देती है। इस लिए अगर ठाकुर ने वो आरोप किसी साजिश के तहत झूॅठ की बुनियाद पर लगाए रहे होंगे तो संभव है कि उसकी वो सच्चाई किसी तरह सामने आ गई हो और उसकी बेटी को भी पता चल गई हो। इतना तो वो भी समझ सकती है कि बुरा करने वाला कभी पलट कर अपने हक़ के लिए इस तरह लड़ाई नहीं किया करता। अगर विराज की माॅ का चरित्र सचमुच में गिरा हुआ रहा होगा तो ये बात कहीं न कहीं से विराज को भी पता चलती और वो उस सूरत में शर्म से पानी पानी होता तथा साथ ही फिर वो कभी पलट कर गाॅव में किसी को अपनी शक्ल न दिखाता। मगर उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया उल्टा इसके विपरीत वो ठाकुर से अपने हक़ के लिए तथा अपने साथ हुए अन्याय के लिए लड़ाई कर रहा है। इस बात से कहीं न कहीं सोचने वाली बात हो ही जाती है कि कहीं ठाकुर ने वो सब आरोप झूठ मूॅठ में ही तो नहीं लगाए थे विराज की माॅ पर? वरना वो इस तरह सीना तान कर तथा इतनी दिलेरी से उससे जंग क्यों करता? यही बात ठाकुर की बेटी भी सोची होगी और फिर उसने सच्चाई का पता भी लगाया होगा। संभव है कि उसे वास्तविक सच्चाई का पता चल गया हो, उस सूरत में वो अपने माॅ बाप के खिलाफ़ हो गई। हलाॅकि सोचने वाली बात तो ये भी है कि अगर माॅ बाप बुरे हैं तो संतान इतनी पाक़ साफ कैसे हो गई कि वो अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ हो जाए?"

"आपकी बातों में यकीनन वजन है।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"मगर ऐसा होता है चौधरी साहब कि कीचड़ में ही कमल खिलते हैं। कहने का मतलब ये कि भले ही ठाकुर और ठाकुर की बीवी बुरे चरित्र वाले रहे हों किन्तु ज़रूरी नहीं कि उसके सभी बच्चे भी उनकी तरह ही बुरे निकलें। हर इंसान की सोच व स्वभाव अलग होता है। अतः संभव है कि ठाकुर की बेटी अच्छी सोच व अच्छे नेचर की लड़की हो और वो अन्याय का साथ देने की सोच न रखती हो।"

"बिलकुल।" चौधरी ने कहा___"अगर तुम्हारी बातों को मान कर चलें तो ये सवाल भी पैदा हो जाता है कि अगर ठाकुर की बेटी अपने पैरेंट्स के रूप में अन्याय के खिलाफ़ हो गई है तो ये भी ज़ाहिर सी बात है कि फिर उसने न्याय और सच्चाई का साथ देने का भी सोचा हो।"

"यकीनन ऐसा हो सकता है चौधरी साहब।" अशोक मेहरा कह उठा___"न्याय और सच्चाई का साथ देने का मतलब है कि वो विराज का साथ दे रही होगी। उसे सच्चाई का पता चल गया होगा कि विराज और उसकी माॅ पर उसके बाप द्वारा लगाए गए वो सभी आरोप फर्ज़ी थे इस लिए उसे विराज और उसकी माॅ से सहानुभूति हुई होगी और उसने विराज का हक़ दिलाने के लिए उसका साथ देने लगी होगी।"

"अगर सच्चाई यही है।" अवधेश ने कहा___"तो इसका मतलब ये हुआ कि हमारा दुश्मन विराज ही नहीं बल्कि ठाकुर की बेटी भी हुई। इससे एक बात और भी समझ में आती है जो कि अपनी जगह सटीक ही बैठती है।"

"कौन सी बात??" चौधरी के माॅथे पर शिकन उभर आई।
"यही कि।" अवधेश ने कहा___"विधी रेप केस के समय रितू ने ही विराज को मुम्बई से यहाॅ बुलाया होगा।"
"ये तुम क्या कह रहे हो अवधेश?" चौधरी के साथ साथ बाॅकी सबकी भी ऑखें फैली।

"हाॅ चौधरी साहब।" अवधेश ने कहा___"रितू का नाम आने से कुछ बातें मुझे समझ आ रही हैं। जैसा कि ठाकुर की बेटी अपने पैरेंट्स के खिलाफ है तो यकीनन वो विराज का ही साथ दे रही होगी। इस मामले में बहुत गहरी बात भी छुपी है चौधरी साहब जिसकी हमने कल्पना भी नहीं कर सकते थे।"

"ये तुम क्या ऊल जलूल बकने लगे अवधेश?" चौधरी ने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा___"साफ साफ बोलो कि क्या कहना चाहते हो तुम?"
"इन सारी बातों का केन्द्र बिंदू।" अवधेश ने कहा___"विधी का रेप केस ही है। हम सब यही समझ रहे थे कि उस रेप केस पर पुलिस का कोई हाथ नहीं है और ये सच भी था। मगर गौर कीजिए रितू के ही थाना क्षेत्र में विधी गंभीर हालत में पाई गई थी। रितू क्योंकि थानेदारनी थी इस लिए उसे जब गंभीर हालत में पड़ी किसी लड़की की सूचना मिली होगी तो वो फौरन वहाॅ पहुॅची होगी। गंभीर हालत में पड़ी उस लड़की को सर्वप्रथम उसने किसी हास्पिटल में भर्ती कराया होगा। लड़की के होश में आने पर उसने उससे रेप के बारे में सब कुछ पूछा होगा। रितू ने लड़की के घर वालों को भी बुलाया होगा जैसा कि आम तौर होता है। विधी के माॅ बाप आए होंगे और अपनी बेटी की उस हालत को देख कर वो यकीनन दुखी भी हुए होंगे। यहाॅ पर पुलिस केस करने की भी बात आई होगी। किन्तु जब विधी ने बताया होगा कि उसके साथ रेप करने वाले लड़के कौन थे तो विधी के माॅ बाप के हाथ पाॅव फूल गए होंगे और उन्होंने केस करने से मना कर दिया होगा। इधर रितू ने अपने आला अफरान को भी विधी रेप केस के बारे में बताया होगा। बात कमिश्नर तक पहुॅची होगी और कमिश्नर ने भी रितू को यही कहा होगा कि मामले को किसी तरह दबा दो। ख़ैर, रितू को विधी के द्वारा ही तहकीक़ात में पता चला होगा कि विधी असल में उसके भाई विराज से प्रेम भी करती थी। ये जान कर निश्चय ही रितू ने विराज से संबंध स्थापित कर उसे सब बताया होगा और यहाॅ बुलाया होगा। विराज यहाॅ आया और उसने अपनी प्रेमिका की वो हालत देखी तो उसे सहन नहीं हुआ। उसने अपनी मासूक़ा का बदला लेने के लिए ऐलान किया होगा। इसमे उसका साथ देने के लिए रितू भी सहमत हुई होगी। उसके बाद क्या हुआ आप सबको पता ही है।"

"तुम्हारे कहने का मतलब है कि ठाकुर की थानेदारनी बेटी के द्वारा ही विराज यहाॅ आया और फिर उसने बदला लेने के रूप में ये सब किया?" चौधरी ने कहा___"और इतना ही नहीं वो खुद अपने भाई का साथ भी दे रही है?"

"मैं यही कहना चाहता हूॅ चौधरी साहब।" अवधेश ने पुरज़ोर लहजे में कहा___"और मुझे तो ये भी लगता है कि ये सारा बखेड़ा ही उस थानेदारनी के द्वारा हुआ है।"
"पता नहीं तुम क्या फालतू की बकवास किए जा रहे हो अवधेश।" चौधरी ने खीझते हुए कहा___"तुम अपनी कोई बात पर कामय ही नहीं हो। पहले कह रहे थे कि विराज ने ये सब किया है और अब कह रहे हो कि ठाकुर की उस बेटी ने किया है। आख़िर तुम्हारे दिमाग़ में ये बेसिर पैर की बातें कहाॅ से आती हैं?"

"ये मामला ही ऐसा था चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"कि हम में से कोई भी इसके बारे में ठीक से समझ नहीं पाया था। मगर जैसे जैसे हालात सामने आए उस हिसाब से संभावनाओं की बातें की हमने। ख़ैर, मैं ऐसा इस लिए कह रहा हूॅ कि इसके पीछे भी एक वजह है। जैसे कि जिस समय विधी के रेप का मामला सामने आया उस समय तो विराज यहाॅ था ही नहीं बल्कि रितू ही थी। जिसने पुलिस के रूप में ही सही मगर विधी के केस को हाॅथ में लिया था। ये अलग बात है कि हमारे दबदबे और पुलिस कमिश्नर के मना कर देने पर उसने कोई केस फाइल नहीं किया था। मगर जब उसे पता लगा कि विधी वो लड़की है जो खुद उसके ही चचेरे भाई से प्रेम करती थी तो उसके प्रति रितू की हमदर्दी या सहानुभूति यकीनन अलग ही तरह की हो गई होगी। उसके मन में ये तो आया ही होगा कि विधी के साथ हुए इस कुकर्म पर इंसाफ हो यानी रेप करने वाले लड़कों को कानूनन शख्त से शख्त सज़ा मिले। मगर मामला क्योंकि आपसे ताल्लुक रखता था अतः उस केस पर कानूनी तौर पर कोई ऐक्शन वो चाहते हुए भी न ले पाई थी। इस लिए संभव है कि उसने हमारे बच्चों को सज़ा देने के लिए कानून को अपने हाॅथ में ले लिया हो। जिसके तहत सबसे पहले वो हमारे बच्चों के बारे में अपने मुखबिरों से पता लगवाया होगा और जब उसे पता चल गया होगा कि रेप करने वाले हमारे बच्चे हमारे फार्महाउस पर हैं तो वो उन्हें पकड़ने के लिए वहाॅ जा धमकी होगी। वहाॅ पर उसने हमारे बच्चों को जबरन ग़ैर कानूनी तरीके से गिरफ्तार किया होगा तथा फार्महाउस की तलाशी भी ली होगी। जहाॅ से उसे हमारे खिलाफ़ वो सारे वीडियोज मिले। इसके बाद वो हमारे बच्चों को लेकर ऐसी जगह गई जहाॅ पर कोई भी जा ही नहीं सकता था।"

"अगर तुम्हारी बातों को सच मानें तो।" चौधरी का दिमाग़ साॅय साॅय करने लगा था, बोला___"फिर वो वीडियोज और वो फोन भी उसी ने किया था हमें। मगर उसकी आवाज़ से ऐसा तो लगता ही नहीं था कि वो किसी लड़की की आवाज़ है बल्कि वो आवाज़ किसी भरभूर मर्द की ही लगती थी।"

"आज के समय में किसी किसी मोबाइल फोन पर ऐसे ऑप्शन भी होते हैं चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"जिसमें एक ब्यक्ति किसी की भी आवाज़ बदल कर बात कर सकता है। संभव है कि उसने ऐसे ही किसी फोन से मर्दाना आवाज़ में आपसे बात की थी। ऐसा इस लिए ताकि आप यही समझें कि सामने वाला कोई मेल पर्शन ही है ना कि फीमेल। इससे होगा ये कि आप इस बारे में सोच ही न सकेंगे कि कोई लड़की ऐसा कर सकती है। आप अपना हर क़दम ये सोचते हुए ही उठाएॅगे कि आपका दुश्मन कोई मेल पर्शन है।"

दिवाकर चौधरी तुरंत कुछ बोल न सका। उसे कहीं न कहीं अवधेश की बातों में सच्चाई की बू आ रही थी। कदाचित यही वजह थी कि वह सोचने पर मजबूर हो गया था।

"उस दिन जब आपने उससे फोन पर ये कहा कि आप ये जान चुके हैं कि वो कौन है।" उधर अवधेश मानो फुल फार्म में कहे जा रहा था___"तो वो चौंक पड़ी होगी। उसे लगा होगा कि आपका सोचना भी अपनी जगह सही है। आख़िर ऐसा करने की वजह विधी के बाप के पास ही तो हो सकती थी। ख़ैर जब उसने जाना कि आप उसको विधी का बाप समझ रहे हैं तो उसे ये भी लगा होगा कि अब विधी के पैरेंट्स को आपसे खतरा हो गया है। इस लिए इससे पहले कि आप विधी के पैरेंट्स तक पहुॅच पाते उससे पहले ही उसने बुद्धिमानी का परिचय देते हुए विधी के पैरेंट्स को आपसे सुरक्षित कर दिया। वरना सोचने वाली बात है कि इससे पहले तो उसे विधी के पैरेंट्स को सुरक्षा प्रदान करने का ख़याल तक न आया था और अगर उस दिन आप वैसा उसे न कहते तो आगे भी ये ख़याल उसके मन में आने वाला नहीं था। कहने का मतलब ये कि आपने खुद ही उसे बता दिया और फिर उसने बड़ी खूबसूरती से आपकी चतुराई को बेवकूफी में बदल दिया।"

"यकीनन तुम्हारी बातों में वजन है अवधेश।" चौधरी ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"जितने कम समय में उसने ये सब किया था उसे विराज तो हर्गिज़ भी नहीं कर पाता। क्योंकि मामला प्रेम का था। वो विधी के साथ हुए उस हादसे के सदमें में ही रह जाता और फिर अगर किसी के समझाने बुझाने पर वो सदमे से बाहर आता भी तो ये सब करने में उसे कुछ तो समय लगता ही।"

"जी बिलकुल।" अवधेश ने कहा___"यही सारी बातें हैं जिसकी वजह से मुझे ऐसा लग रहा है कि ये सब ठाकुर की बेटी का ही किया धरा हो सकता है। दूसरी बात विराज जब यहाॅ आया तो उसे विधी के साथ हुए उस सदमें से भी रितू ने ही निकाला होगा और फिर उसने उसे बताया होगा उसकी प्रेमिका के साथ जिन लोगों ने ये सब किया है उन लोगों को उसने अपने कब्जे में लिया हुआ है। बस उसके बाद आप खुद सोच लीजिए कि विराज ने क्या किया होगा अथवा ये सब करना उसके लिए कितना आसान हो गया होगा।"

"अगर ठाकुर की उस थानेदारनी बेटी ने ये सब विधी के लिए हमदर्दी के चलते तथा कानून को अपने हाॅथ में लेकर किया है।" चौधरी ने सोचते हुए कहा___"तो ये भी हो सकता है कि उसने इस सबके बारे में अपने पुलिस विभाग के किसी आला अफसर को भी नहीं बताया होगा।"

"ज़ाहिर सी बात है।" अवधेश ने कहा___"अगर वो बताती तो उसे ये सब करने का कोई भी उसका आला अफसर इजाज़त न देता और अगर उसके इस कृत्य की जानकारी किसी आला अफसर को होती तो ज़रूर वो उसके खिलाफ़ कानून को अपने हाॅथ में लेने के लिए ऐक्शन लेता।"

"यहाॅ पर मैं भी अपनी बात रखना चाहता हूॅ।" सहसा अशोक मेहरा ने कहा___"और वो ये कि ऐसा भी तो हो सकता है कि रितू के इस कृत्य के बारे में उसके किसी आला अधिकारी को सब कुछ पता ही हो और वो उसकी सहमति में ही ये सब कर रही हो।"

"ये तुम कैसी बेवकूफी की बातें कर रहे हो अशोक?" चौधरी की ऑखें फैलीं___"ये बात तुम भी अच्छी तरह जानते हो कि यहाॅ के पुलिस महकमें के किसी भी आला ऑफिसर की ऐसी ज़ुर्रत नहीं हो सकती कि वो हमारे खिलाफ़ ऐसा कोई क़दम उठाने के लिए अपने किसी जूनियर शिपाही को कह सके। उन्हें भी पता है कि ऐसा करने का अंजाम कितना भयंकर हो सकता है उनके लिए।"

"भयंकर अंजाम तो तब होगा न चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने कहा___"जब आपको सबूत के साथ ये नज़र आए कि पुलिस ने ऐसा कुछ किया है। जब आपको कुछ ऐसा नज़र ही नहीं आएगा तो आप भला क्या कर लेंगे उनका? ख़ैर ये बात तो पुलिस के आला अफसरान को पता ही है कि वो आपके खिलाफ़ ज़ाहिर रूप से कोई ठोस कार्यवाही नहीं कर सकते हैं, इस लिए संभव है कि उन लोगों ने ये सब गुप्त रूप से शुरू किया हो ताकि हमें उनकी किसी कार्यवाही का भान तक न हो सके। वरना आप खुद सोचिए चौधरी साहब कि पुलिस की एक मामूली सी इंस्पेक्टरनी में इतना साहस और जज़्बा कैसे हो जाएगा कि वो आपके खिलाफ़ खुद कोई ऐक्शन ले सके? ये तो उसे भी पता होगा न कि पोल खुल जाने पर आप उसका क्या हस्र कर सकते हैं? इस लिए ये स्पष्ट हैं चौधरी साहब कि बग़ैर किसी आला ऑफीसर की सह के वो थानेदारनी ऐसा करने का सोच भी नहीं सकती है।"

"तुम्हारी बात भी सही है।" चौधरी के दिमाग़ की बत्तियाॅ जैसे एकाएक ही रौशन हो उठी थीं, बोला___"दूसरी बात ये कि सारा प्रदेश और पुलिस महकमा इस बात को जानता है कि हम जनता के साथ कितना बड़ा अत्याचार करते हैं। यही नहीं बल्कि ऐसा वो हर काम भी करते हैं जिसे ग़ैर कानूनी क़रार दिया जाता है। पुलिस महकमा इसके लिए हमारे खिलाफ़ कोई कार्यवाही इस लिए नहीं कर पाता क्योंकि एक तो उसके पास हमारे खिलाफ़ कोई सबूत नहीं होता दूसरे हमारा दबदबा और पहुॅच के असर से भी वो ख़ामोश रह जाते हैं।"

"निःसंदेह।" अवधेश कह उठा___"आपकी बात बिलकुल सच है चौधरी साहब। इस लिए अब पुलिस प्रशासन के पास यही एक चारा है कि वो गुप्त रूप से हमारे खिलाफ़ किसी कार्यवाही को अंजाम दें।"

"इसका मतलब ये हुआ।" अशोक ने कहा___"कि रितू और विराज के साथ साथ अब हमें पुलिस का भी ख़तरा है। इन दोनो भाई बहन से तो हम निपट भी लेंगे मगर पुलिस प्रशासन से कैसे निपटेंगे? मामला अगर केन्द्र तक गया होगा तो हमारे लिए बड़ी मुश्किल हो जाएगी चौधरी साहब।"

"नहीं अशोक।" चौधरी ने ठोस लहजे में कहा___"ये मामला इतना भी संगीन नहीं है कि इसकी गूॅज केन्द्र तक पहुॅच जाए। तुम कुछ ज्यादा ही ऊपर की सोच रहे हो।"
"फिर भी चौधरी साहब।" सहसा इस बीच अवधेश बोल पड़ा___"हमें इस बारें में भी सोचना तो चाहिए ही। क्या पता हमारा कोई ऐसा दुश्मन हो जिसने इसके लिए केन्द्र सरकार के काॅन खड़े कर दिये हों।"

"अगर ऐसा होता भी।" चौधरी ने कहा___"तो केन्द्र सरकार अपनी तरफ से हमारे खिलाफ़ जाॅच पड़ताल के लिए किसी सीबीआई जैसे लोगों को नियुक्त करती। वो यहाॅ आते और हमसे पूॅछताछ करते। मगर ऐसा तो कहीं दूर दूर तक समझ में ही नहीं आ रहा कि ऐसा कुछ है। ज़ाहिर है कि ये मामला यहीं तक सीमित है। अतः हम यहाॅ के पुलिस महकमें के आला ऑफिसर्स की क्लास अब ज़रूर लेंगे।"

"वैसे डिटेक्टिव के रूप में हमने हरीश राणे को इस मामले में लगा तो दिया ही है।" अवधेश ने कहा___"सारी सच्चाई का पता अब वही लगाएगा। देखते हैं वो इस सबकी क्या रिपोर्ट देता है हमें?"

अवधेश की बात पर चौधरी सिर्फ सिर हिलाकर रह गया। कुछ देर ऐसी ही कुछ और बातें हुईं उसके बाद सब अपने अपने काम के सिलसिले में वहाॅ से निकल लिए।
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उधर हवेली में।
सबने एक साथ ही बैठ कर ब्रेकफास्ट किया था। उसके बाद प्रतिमा के पिता जगमोहन सिंह सबसे विदा लेकर हवेली से निकल लिए थे। उनको गुनगुन तक छोंड़ने के लिए खुद अजय सिंह अपनी कार से गया था। प्रतिमा को अपने पिता के चले जाने से काफी दुख हुआ था। वर्षों बाद उसे अपने पिता इस रूप में मिले थे। उसका दिल कर रहा था कि वो भी अपने पिता के साथ ही चली जाए। जगमोहन सिंह ने चलने के लिए कहा भी था मगर ज़रूरी कामों का हवाला देकर अजय सिंह ने यही कहा कि हम सब फिर कभी ज़रूर आएॅगे। अजय सिंह जानता था कि हालात अभी ऐसे नहीं हैं कि उसके बीवी बच्चे कहीं आ जा सकें।

इस वक्त ड्राइंग रूम में प्रतिमा और शिवा ही थे। जो आमने सामने सोफों पर बैठे हुए थे। प्रतिमा जहाॅ अपने पिता के बारे में सोच सोच कर दुखी हो रही थी वहीं शिवा नीलम व सोनम के बारे में सोच सोच कर ख़याली पुलाव बना रहा था। उसके चेहरे पर गर्दिश कर रहे भावों में प्रतिपल बदलाव आता नज़र रहा था। सोनम उसे पहली नज़र में ही बेहद पसंद आ गई थी और उसने इस बात का ज़िक्र अपनी माॅ प्रतिमा से भी किया था। उसने प्रतिमा से कहा था कि उसे सोनम बहुत अच्छी लगती है। काश उससे उसकी शादी हो जाए। मगर प्रतिमा ने इस बात के लिए शिवा को शख्ती से समझा दिया था कि ऐसा कभी नहीं हो सकता। वो उसकी बड़ी बहन है और बहन से भाई की शादी कभी नहीं हो सकती है। प्रतिमा की ये बात सुन कर शिवा का दिल बुरी तरह से टूट गया था।

गाॅव की हर लड़की या औरत को सिर्फ भोगने की चीज़ समझने वाला शिवा आजकल सोनम के प्यार में देवदास सा नज़र आने लगा था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि ये अचानक उसे क्या हो गया है? सोनम के प्रति उसके दिल में मीठा मीठा सा दर्द क्यों होने लगा है? हर लड़की की भाॅति वो उसे भी हाॅसिल करके भोगने की बात क्यों नहीं सोच रहा? पिछली सारी रात वो इन्हीं सब बातों की वजह से सो नहीं पाया था। उसे सोनम से खुल कर बात करने में अब झिझक होने लगी थी। हलाॅकि वो उसकी मौसी की लड़की थी और उसकी बड़ी बहन लगती थी। मगर पहली नज़र में उसे देखने के बाद ही उसके प्रति उसकी सोच और उसके अंदर का हाल बड़ा अजीब सा गया था। ब्रेकफास्ट करते वक्त भी वह सबकी नज़रें बचा कर सोनम को चोरी से देख ही लेता था। यद्दपि सोनम उससे खुल कर बातें कर रही थी, किन्तु एक भाई बहन के रिश्ते से। सोनम की बातों का वो हाॅ या नहीं में थोड़ा बहुत जवाब दे देता था। उसके इस बिहैवियर से अजय सिंह भी अंदर ही अंदर चौंक पड़ा था। अनुभवी अजय सिंह को समझते देर न लगी कि उसका अय्याश बेटा सोनम के हुश्नो शबाब को देख कर चारो खाने चित्त हो चुका है। हलाॅकि सोनम और नीलम को देख कर उसका खुद का हाल भी शिवा से जुदा न था मगर उसके अंदर उनके प्रति प्रेमी वाला प्यार का अंकुर न फूटा था।

नाना और अजय सिंह के जाने के कुछ देर बाद ही नीलम व सोनम ऊपर अपने कमरे में चली गई थी। जबकि प्रतिमा व शिवा ड्राइंगरूम में ही बैठे रहे थे। इस ड्राइंग रूम में छाई गहन ख़ामोशी से सहसा प्रतिमा की तंद्रा टूटी। उसने अपने बेटे शिवा की तरफ देखा तो उसे गहन सोचों में गुम हुआ पाया। ये देख कर वह हौले से चौंकी।

"कहाॅ गुम है मेरा बेटा?" फिर प्रतिमा ने ज़रा खुद को सम्हालते हुए कहा___"क्या अभी तक भूत नहीं उतरा?"
"अ..आपने कुछ कहा क्या?" शिवा ने सहसा चौंकते हुए कहा।
"हाॅ पूछ रही हूॅ कि क्या अभी भी भूत नहीं उतरा है दिलो दिमाग़ से?" प्रतिमा कहने के साथ ही मुस्कुराई थी।

"भ..भूत???" शिवा चकरा सा गया___"कौन सा भूत माॅम?"
"प्यार वाला भूत।" प्रतिमा ने कहा___"बेटा ये प्यार वाला भूत बहुत ही खतरनाॅक होता है। जिसके सिर चढ़ता है न फिर कभी उतरता ही नहीं है।"

"ये आप क्या कह रही हैं माॅम?" शिवा ने झेंपते हुए कहा।
"हाय रे।" प्रतिमा मुस्कुराई___"देखो तो कैसे शरमा रहा है आज मेरा बेटा। बेटा ये इश्क़ न बहुत बुरी बला है। ये इश्क़ कम्बख्त उसी से होता है जो हमें कभी नसीब ही नहीं हो सकता।"

"ये तो ग़लत बात है माॅम।" शिवा ने कहा___"आपने भी तो डैड से इश्क़ ही किया था और फिर वो आपको नसीब भी तो हो गए।"
"हाॅ मगर तेरे डैड और मैं आपस में भाई बहन तो नहीं थे न।" प्रतिमा ने कहा___"उन रिश्तों में अगर इश्क़ हो तो कुछ भी करके हम एक हो सकते हैं मगर इस रिश्ते में ऐसा नहीं होता। क्योंकि इस रिश्ते वाले इश्क़ को ये समाज ये दुनियाॅ कभी स्वीकार नहीं करती बल्कि इन रिश्तों के बीच हो गए इश्क़ को पाप का नाम देती है ये दुनिया। इससे परिवार की मान मर्यादा और इज्ज़त का हनन हो जाता है।"

"मैं ये सब समझता हूॅ माॅम।" शिवा ने कहा___"मुझे पता है कि भाई बहन के बीच ये रिश्ता ग़लत है। मगर ये उनके लिए ग़लत होता है न माॅम जो पाक़ साफ होते हैं। हम तो ऐसे हैं जो इन्हीं रिश्तों को भोगने की खूबसूरत इच्छा रखते ही नहीं हैं बल्कि भोगते भी हैं।"

"हाॅ लेकिन ये बात देश समाज को पता तो नहीं है न।" प्रतिमा ने कहा___"ये सब तो घर के अंदर होता है और बिना किसी की जानकारी के होता है। इस लिए जब तक इन रिश्तों के बीच की सच्चाई दुनिया से छुपी है तब तक हम भी पाक़ साफ ही हैं बेटा।"

"कुछ भी कहिये माॅम।" शिवा ने जैसे दृढ़ता से कहा___"मैं सोनम को हद से ज्यादा पसंद करने लगा हूॅ। मेरे दिल में उसके प्रति प्रेम का अंकुर फूट चुका है। कल सारी रात मैं इस बारे में सोचता रहा और फिर इस नतीजे पर पहुॅचा हूॅ कि मैं अगर किसी लड़की से शादी करूॅगा तो वो सोनम से ही करूॅगा। हाॅ माॅम, पता नहीं क्यों पर मुझे अब ऐसा लगने लगा है कि अगर सोनम मेरी जाने हयात न बनी तो मैं एक भी पल जी न सकूॅगा।"

प्रतिमा अपने बेटे की इस बात से आश्चर्यचकित रह गई। अभी तक तो उसे यही लग रहा था कि शिवा ये सब उससे सोनम को भोगने के उद्देश्य से ही कह रहा था मगर इस वक्त उसके चेहरे के भाव चीख चीख कर उसे बता रहे थे कि वो सोनम के लिए कितना सीरियस हो चुका है। प्रतिमा का दिलो दिमाग़ सुन्न सा पड़ गया। उसे समझ न आया कि इस विषम परिस्थिति में वो अपने बेटे को आख़िर कैसे समझाए? वो समझ सकती थी कि प्यार मोहब्बत कैसी चीज़ होती है और फिर इंसान की क्या हालत हो जाती है।

"देखो बेटा।" फिर प्रतिमा ने बहुत ही सीरियस भाव से किन्तु समझाते हुए कहा___"ये सब ठीक नहीं है। सोनम के प्रति ऐसी फीलिंग्स रखना अच्छी बात नहीं है। हो सकता है कि तुम्हारा सोनम के प्रति ये सिर्फ एक आकर्षण हो, जिसे तुम प्यार समझ रहे हो। ख़ैर, मैं ये कह रही हूॅ कि ये अभी पहली स्टेज है। अभी तुम इस सबके लिए खुद को समझा भी सकते हो और खुद को इसके प्रभाव से बचा भी सकते हो। इस लिए बेहतर होगा कि तुम इस पर विचार करके अमल करो। दूसरी बात, सोनम तुम्हारी बड़ी बहन है। उसके मन में तुम्हारे प्रति ऐसा कुछ भी नहीं होगा मुझे अच्छी तरह पता है। किन्तु अगर उसे पता चल गया कि तुम उसके बारे में ऐसा सोचते हो तो वो तुम्हारे दिल का हाल नहीं समझेगी बल्कि तुम्हें ग़लत नेचर का मानते हुए तुमसे नफ़रत करने लगेगी।"

"ऐसा नहीं होगा माॅम।" शिवा की आवाज़ सहसा भर्रा सी गई, बोला___"मैं उसे खुद समझाऊॅगा कि मैं उससे कितना प्यार करने लगा हूॅ। उसे बताऊॅगा कि मेरे दिल में उसके लिए सिर्फ और सिर्फ प्यार है और हाॅ ये भी कहूॅगा माॅम कि अगर उसे लगता है कि मेरे प्यार में कोई खोट या गंदगी है तो उसे मुझे ठुकरा देने का और मुझसे नफ़रत करने का पूरा हक़ है। मैं सारी ज़िंदगी उसके खूबसूरत चेहरे को अपनी ऑखों में बसा कर तथा उसकी यादों के सहारे जी लूॅगा। उसके अलावा मेरी ज़िंदगी में दूसरी कोई लड़की कभी नहीं आएगी।"

प्रतिमा को ज़बरदस्त झटका लगा। ऐसा लगा जैसे सारा आसमान एकाएक ही भरभरा कर उसके सिर पर गिर पड़ा हो। उसे अपने काॅनों पर यकीन नहीं हो रहा था कि उसने शिवा के मुख से जो सुना वो सच है या ग़लत। कितनी ही देर तक वो किंकर्तब्यविमूढ़ सी स्थिति में बैठी उसे अपलक देखती रही।

"मैं जानता हूॅ माॅम कि आपको आज मेरी इन सब बातों पर बेहद आश्चर्य हो रहा होगा।" शिवा गंभीरता से कह रहा था___"बात भी सच है। किसी कौए से ये उम्मीद नहीं की जा सकती कि वो कोयल की तरह मीठा भी बोल सकता है। मगर सुना है कि जहाॅ किसी चीज़ की उम्मीद नहीं होती वहीं पर एक नया चमत्कार हुआ करता है। कदाचित मेरे साथ भी ऐसा ही हो गया है। कल सारी रात सोचता रहा मैं कि मैं क्यों सोनम की तरफ इस हद तक अट्रैक्ट होता जा रहा हूॅ? मेरे दिल में क्यों उसके लिए प्यार जाग रहा है? सवाल तो मुझे नहीं मिला मगर इतना एहसास ज़रूर हुआ कि सोनम के बिना मेरी ज़िंदगी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। आज आपकी बातों ने मुझे अंदर से हिला तो दिया है माॅम मगर मेरे दृढ़ निश्चय में और भी ज्यादा इज़ाफा भी हो गया है।"

प्रतिमा को झटके पर झटके लग रहे थे। उसका दिलो दिमाग़ जाम सा हो चुका था। सुना तो था उसने भी कि प्रेम का रोग जब लगता है तो पत्थर से पत्थर दिल इंसान को भी पिघला देता है और उसका असर ये होता है कि इश्क़ के नशे में डूबा हुआ इंसान फिर बहुत ही खूबसूरत ख़यालों का बन जाता है। उसके मुख से कड़वी बातें नहीं निकला करती। इश्क़ हो जाने के बाद इंसान की सोच और उसके ख़यालात बदल जाते हैं। वो अपने प्रियतम की ही खुशियों के बारें में सोचता रहता है। हर पल यही सोचता है कि कभी ऐसा कोई पल न आने पाए जिसके तहत उसके प्रियतम को ज़रा सी भी तक़लीफ हो जाए। किसी के खूबसूरत चेहरे को अपनी पलकों तले बसा कर तथा उसकी याद के सहारे सारी ऊम्र काट लेने वाले डायलाॅग आज शिवा के मुख से खारिज़ हो रहे थे। जिसने किसी से इश्क़ किया होगा उसे ये बात ज़रूर समझ में आई होगी कि शिवा के ये डायलाॅग किस हद तक सच थे।

अभी प्रतिमा शिवा की इन सब बातों से बुत बनी बैठी ही थी कि सहसा तभी ड्राइंगरूम में नीलम व सोनम एक साथ आकर खड़ी हो गईं। प्रतिमा की नज़र जैसे ही उन दोनो पर पड़ी तो उसने जल्दी से अपने चेहरे के भावों को छुपा लिया और फिर एकाएक ही उसकी नज़र शिवा पर पड़ी तो मन ही मन चौंक पड़ी। शिवा की नज़र सोनम पर स्थिर थी। एकाएक ही उसकी ऑखों में सोनम के प्रति बेपनाह मोहब्बत का सागर भीषण हिलोरें लेता हुआ नज़र आया उसे। कहते हैं कि ऑखें सब कुछ बयां कर देती हैं। प्रतिमा को शिवा की ऑखों ने बता दिया कि वो सोनम के प्रति अपने वजूद के हर ज़र्रे पर सिर्फ और सिर्फ मोहब्बत छलकाए बैठी हैं।

"माॅम मैं और सोनम दीदी।" उधर ड्राइंगरूम में आते ही नीलम ने खुशी वाले लहजे में कहा___"घूमने जा रहे हैं। दीदी कह रही हैं कि उन्हें हमारा ये गाॅव देखना है औ हमारे खेत भी देखना है।"

"ओह चल ठीक है।" प्रतिमा ने सहसा नीलम की तरह ध्यान से देखते हुए कहा___"पर तुम दोनो अकेले कैसे जाओगी?"
"इनके साथ मैं चला जाता हूॅ माॅम।" शिवा भला ये सुनहरा अवसर अपने हाॅथ से कैसे जाने देता, अतः तपाक से बोल पड़ा था____"मैं इन्हें बहुत अच्छे से अपना ये गाॅव और अपने सारे खेत दिखा दूॅगा।"

"कोई ज़रूरत नहीं तुझे हमारे साथ जाने की।" नीलम ने सहसा तुनक मिजाज़ी से कहा___"हम दोनो खुद ही देख लेंगे। क्यों दीदी?"
"बात तो तेरी सही है।" सोनम ने कहा___"लेकिन शिवा को भी साथ ले लेंगे तो कोई दिक्कत थोड़ी न है। आख़िर भाई है वो हमारा। हमारे साथ रहेगा तो हमें भी कंफर्टेबल फील होगा। है न मौसी?"

"बिलकुल ठीक कहा तुमने बेटा।" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा___"लेकिन अगर ये जाएगा तो नीलम और ये दोनो आपस में झगड़ा ही करेंगे। इस लिए एक काम करो बाहर खड़े हमारे सुरक्षा करने वाले आदमियों में से एक दो को साथ ले जाओ। वो क्या है न ज़माना बहुत ख़राब है। कोई ऊॅच नीच हो गई तो समस्या हो जाएगी। इस लिए तुम दोनो के साथ में दो सुरक्षा करने वाले आदमी रहेंगे तो मैं भी बेफिक्र रहूॅगी।"

"हाॅ ये ठीक रहेगा माॅम।" नीलम ने शिवा को चिढ़ाने के लिए अपनी जीभ दिखाते हुए कहा___"इस लंगूर से तो वो ही अच्छे रहेंगे। हमें भी लगेगा कि उनके रहते हम पर कोई ऑच नहीं आएगी। इसके रहते तो कोई भी हमें छेंड़ सकता है और ये बेचारा मार के डर से कुछ बोल भी नहीं पाएगा।"

"ओये क्यों मेरे भाई को ऐसा बोल रही है तू?" सोनम ने ऑखें दिखाते हुए कहा___"अच्छा भला स्मार्ट तो है हमारा भाई। तेरी ऑखें ख़राब हैं जो तुझे वो लंगूर नज़र आता है।"

"आपने सही कहा दीदी।" शिवा ने आवेश में सोनम को दीदी कह तो दिया मगर अगले ही पल उसकी आवाज़ काॅप गई। मन ही मन उसे अपनी बेबसी पर बेहद क्रोध आया मगर फिर खुद को सम्हाल कर बोला___"जो खुद ही बंदरिया जैसी हों उन्हें सामने वाला लंगूर ही दिखेगा न।"

"ओये तमीज़ से बात कर समझा।" नीलम ने घुड़की सी दी उसे___"भूल मत कि मुझसे छोटा है तू और फिर अगर मैने तुझे लंगूर कह भी दिया तो क्या हो गया? मैने तो तुझे प्यार से लंगूर कहा है।"

"वाह दीदी वाह।" शिवा कह उठा___"प्यार से कहने के लिए लंगूर शब्द ही मिला था आपको? देख लीजिए माॅम, मैं छोटा हूॅ तो सब मुझसे अपने बड़े होने का रौब झाड़ते हैं।"

शिवा ने इतनी मासूमियत से ये कहा था कि सोनम के होठों पर मुस्कान उभर आई। वो तुरंत ही शिवा के बगल पर जाकर बैठी और फिर उसे अपने साइड से छुपका कर बोली____"जाने दे न भाई। ये छिपकली तो है ही दिमाग़ से पैदल लेकिन मैने तो तुझे ऐसा वैसा कुछ नहीं कहा न? मुझे पता है तू हमारा सबसे स्वीटेस्ट भाई है। चल अब नाराज़गी छोंड़ और मुस्कुरा कर दिखा। उसके बाद हमें घूमने भी जाना है।"

सोनम की बातों का असर पलक झपकते ही शिवा पर न हो ऐसा तो अब हो ही नहीं सकता था। वैसे भी अब तो अगर वो उसे ज़हर खाने को भी बोलती तो वो खुशी से खा लेता। ख़ैर सोनम के कहने पर उसके इस तरह उसे छुपका लेने पर शिवा का चेहरा ताज़े खिले गुलाब की मानिंद खिल उठा था। इस वक्त वो इतना खुश हो गया था कि अब अगर उसे मौत भी आ जाती तो वो उसके लिए भगवान से शिकवा न करता।

उधर प्रतिमा चुप बैठी इन तीनो की बातें सुन रही थी और नीलम व सोनम दोनो के ही चेहरों को बड़े ध्यान से देखे जा रही थी। जैसे समझना चाहती हो कि दोनो के मन में घूमने जाने के सिवा कुछ और तो नहीं है। शिवा को वो इन दोनो के साथ जान बूझ कर नहीं भेज रही थी। क्योंकि उसे पता था कि शिवा इस वक्त सोनम के प्यार में पागल है। सोनम ने अगर उसे किसी बात के लिए कहीं भेज दिया तो वो बिना कुछ सोचे समझे चला जाएगा और ये दोनो उसके चले जाने पर कुछ भी करने के लिए आज़ाद हो जाएॅगी। प्रतिमा इस बात के लिए मना भी नहीं कर सकती थी कि वो दोनो घूमने न जाएॅ। इसी लिए शिवा की जगह वो उन्हें सुरक्षा गार्ड्स को साथ में जाने का कह रही थी।

"तो कब जाना है तुम दोनो को?" फिर प्रतिमा ने पूछा।
"कब जाना है क्या मतलब है माॅम?" नीलम ने कहा___"हम दोनो तो तैयार होकर आ ही गए हैं और जा ही रहे थे।"
"चलो ठीक है।" प्रतिमा ने कहने के साथ ही शिवा की तरफ देखा___"बेटा जाओ तुम गेस्ट हाउस से दो आदमियों को बोल दो। वो इन दोनो के साथ चले जाएॅगे।"

प्रतिमा के मन में अचानक ही गेस्ट हाउस में ठहरे उन आदमियों का ख़याल आया था। जिन्हें अजय सिंह के बिजनेस संबंधी दोस्त मदद के लिए भेज गए थे। नीलम व सोनम के साथ उनमे से ही किन्हीं दो आदमियों को भेजना उचित लगा था उसे। वो हर तरह से इन दोनो की सुरक्षा कर सकते थे। उसे अपने आदमियों की काबीलियत पर अब कोई भरोसा नहीं रह गया था। ख़ैर प्रतिमा के कहने पर शिवा सोफे से उठा और बाहर की तरफ चला गया।

"तो तुम दोनो कैसे जाओगी यहाॅ से?" प्रतिमा ने शिवा के जाते ही पूछा___"मेरा मतलब है कि घूमने के लिए किसी कार या जीप से जाओगी या ऐसे ही पैदल जाना है?"
"इतना ज्यादा पैदल कौन चल पाएगा माॅम?" नीलम ने कहा___"पहले सारा गाॅव घूमना फिर खेतों की तरफ जाना। नहीं माॅम, इतना ज्यादा पैदल चलना मेरे बस का तो हर्गिज़ भी नहीं है।"

"हाॅ मुझे पता था यही कहोगी तुम।" प्रतिमा ने मन ही मन खुश होते हुए कहा___"ख़ैर, बाहर जीप खड़ी है। उसमे ही बैठ कर चले जाना और हाॅ उन आदमियों के साथ ही रहना।"
"ओके माॅम।" नीलम ने कहा___"वैसे आज लंच में क्या बनेगा? वो क्या है न मुझे आज आपके हाॅथ का बना बैगन का हलवा खाना है।"

"क..क्या कहा????" सोनम उसकी बात सुन कर बुरी तरह चौंकी थी। जबकि प्रतिमा कहने के साथ ही इधर उधर देखने लगी थी।
"भागो दीदी भागो।" नीलम सोनम का हाॅथ पकड़ कर खींचते हुए बोली___"वरना माॅम मेरे साथ साथ आपकी भी पिटाई करने लगेंगी डंडे से।"

सोनम को कुछ भी समझ में न आया कि ये अचानक हुआ है क्या है? बैगन का हलवा और फिर नीलम का ये कहना कि भागो वरना माॅम डंडे से पिटाई करने लगेंगी। सोनम को कुछ समझ न आया। ये अलग बात है कि नीलम के खींचने पर वह सोफे से उठ कर बाहर की तरफ ही लड़खड़ाते हुए भाग ली थी। जबकि इधर प्रतिमा उन दोनो के जाते ही मुस्कुरा कर रह गई थी।

नीलम व सोनम जैसे ही बाहर आईं तो देखा कि शिवा के साथ दो हट्टे कट्टे आदमी जीप के पास ही खड़े थे। शिवा उन्हें कुछ बता रहा था। ये देख कर नीलम व सोनम उस तरफ बढ़ चलीं। जीप के पास पहुॅचते ही वो दोनो शिवा के पास ही खड़ी हो गईं।

"दीदी ये दोनो आप लोगों के साथ जाएॅगे।" शिवा ने नीलम की तरफ देखते हुए कहा___"बाॅकी माॅम ने तो आपको सब कुछ समझा ही दिया होगा।"
"हाॅ समझा दिया है।" नीलम ने कहा___"और हाॅ इनको बोल दे कि हमारा हर कहना भी मानेंगे।"

"अरे दीदी ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है।" शिवा ने कहा___"ये दोनो बहुत अच्छे और समझदार ब्यक्ति हैं। आपको पता नहीं है ये दोनो ही तगड़े फाइटर हैं। इनके रहते आप दोनो को कोई छू भी नहीं सकता।"
"ओह आई सी।" नीलम ने कहा___"फिर तो अच्छी बात है। चलिये दीदी जीप में बैठते हैं।"

थोड़ी ही देर में नीलम व सोनम जीप में बैठ गईं। एक आदमी जीप की ड्राइविंग शीट पर बैठ गया जबकि दूसरा उसके बगल में। जीप की पिछली शीट पर नीलम व सोनम बैठ गई थी। जीप जैसे ही चलने लगी तो शिवा ने सोनम की तरफ प्यार भरी नज़रों से देखते हुए बस इतना ही कहा घूम फिर कर जल्दी आइयेगा। उसकी इस बात पर नीलम व सोनम दोनो ही मुस्कुरा उठीं। किन्तु इस बार उनकी इस मुस्कान में ऐसा भेद छिपा था जिसे शिवा जैसा कूढ़मगज लड़का किसी भी तरह से नहीं समझ सकता था।
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उधर मुम्बई में।
सबके आ जाने से पूरे बॅगले में एक अलग ही रौनक तथा चहल पहल सी हो गई थी। किन्तु खिले खिले चेहरों पर भी एक उदासी थी जो इस बात का सबूत थी कि विराज के यहाॅ न होने से सब कितने उदास थे। सबको पता था कि विराज किस काम के लिए इस बार गाॅव गया हुआ था। सबके साथ तो गौरी घुली मिली रहती किन्तु अकेले में अपने बेटे के लिए बहुत दुखी हो जाती थी। उसे इस बात की तक़लीफ भी थी कि विराज जब से गया था तब से एक दिन भी फोन नहीं लगाया था और ना ही जगदीश ओबराय की वजह से उसने अपने बेटे को फोन लगाया था।

जगदीश ओबराय ने गौरी से कहा था कि वो फोन करके विराज को कमज़ोर न बनाए। माॅ बेटे के बीच का रिश्ता भावनाओं के बहुत ही नाज़ुक बंधन से जुड़ा होता है जिससे दोनो ही ऐसे हालातों में कमज़ोर पड़ जाते हैं। किन्तु जगदीश ओबराय ने ये भी कहा था वो ईश्वर से अपने बेटे की सलामती की दुवा करे। ये उसकी जंग है उसे स्वतंत्रता पूर्वक इस जंग को इसके अंजाम तक पहुॅचाने दो। सब अपनी अपनी जगह विराज के लिए चिंतित थे तथा परेशान थे मगर सबके दिलों में उसके लिए प्यार था। सबके होठों पर उसकी सलामती के लिए दुवाएॅ थी।

गौरी, करुणा तथा पवन की माॅ। पवन की माॅ का नाम रुक्मणी था। ये तीनो ही आपस में खूब सारी बातें करती रहती थी। किन्तु अकेले में तीनों ही विराज के लिए चिंतित हो जाती थी। एक दूसरे को अपनी चिंता व परेशानी नहीं दिखाती थी। क्योंकि कोई नहीं चाहता था कि सबके बीच एक तनाव या दुख भरा माहौल क्रियेट हो जाए। जगदीश ओबराय व अभय सिंह खुद भी अपनी जगह विराज के लिए चिंतित थे मगर सबको तसल्ली देते रहते थे और यही कहते कि सच्चाई की हमेशा विजय होती है। इस लिए इसके लिए इतना चिंतित व परेशान न हों कोई।

पवन को जगदीश ओबराय ने अपनी कंपनी में ही एक अच्छी पोस्ट पर काम में लगा दिया था। अतः पवन अब ज्यादातर कंपनी में ही रहता था। किन्तु हर वक्त उसका मन अपने दोस्त के लिए अशान्त रहता था। उसे विराज से शिकायत भी थी कि वो उसे यहाॅ सुरक्षित छोंड़ कर खुद मौत के मुह में चला गया था।

पवन की बहन आशा ज्यादातर निधी के साथ ही रहती थी। निधी सुबह स्कूल जाती और फिर शाम को वापस आ जाती थी। हर समय अपनी शरारतों से सबको परेशान करने वाली ये गुड़िया अचानक से इस तरह ख़ामोश हो गई थी जैसे ये शदियों से ऐसी ही रही थी। उसकी इस ख़ामोशी को सब यही समझते कि वो अपने प्यारे से बड़े भइया के लिए सबकी तरह ही दुखी है। कोई ये नहीं जानता था कि उसने अपनी छोटी सी इस ऊम्र अपने ही भइया से प्रेम का कितना बड़ा रोग लगा लिया था। जिसके चलते उसका हर समय शरारतें करना जाने कहाॅ गुम होकर रह गया था।

आशा को पता था कि निधी शुरू से ही ऐसी नहीं थी। शुरू शुरू में उसकी इस ख़ामोशी को वो खुद भी यही समझती थी कि वो सबकी तरह विराज के लिए दुखी है। इस लिए अब वो शरारतें नहीं करती है। मगर जल्द ही उसे इस कारण के अलावा भी दूसरा कारण समझ में आ गया था। दरअसल निधी भी अब अपने भाई की तरह डायरी लिखने लगी थी। जिसमें वो अपने और अपने प्रियतम भाई के बीच जन्में इस प्रेम के हर पहलुओं के बारें में लिखती थी। अपने दिल के जज़्बातों को वो डायरी के कागज़ों पर लिखती थी। उसे पता था कि डायरी में उसके द्वारा लिखा गया हर लफ़्फ किसी डायनामाइट से कम नहीं है। कहने का मतलब ये कि अगर किसी को ये पता चल जाए कि सबके दिलों में राज करने वाली उनकी ये नटखट गुड़िया अपने ही सगे भाई से प्रेम करती है तो यकीनन इस बात से डायनामाइट की तरह विस्फोट हो जाना था।

डायरी में अपने दिल का हाल बयां करने के बाद निधी उस डायरी को अपने कमरे में ही रखी आलमारी के अंदर वाले लाॅकर में रख कर लाॅक लगा देती थी। मगर एक दिन कदाचित उसका भेद खुल जाना था इस लिए उससे ग़लती हो गई। दरअसल पिछले दिन सुहब सुबह की ही बात है। आशा चाय लेकर निधी के कमरे में पहुॅच गई। उसने देखा कि बेड पर चित्त अवस्था में लेटी निधी के सीने पर एक मोटी सी डायरी थी जिसे वो दोनो हाॅथों से पकड़े सोई हुई थी। आशा जो कि निधी के साथ ही रहती थी। पिछली रात उसे आधी रात के क़रीब शूशू लगी तो उसकी नींद खुल गई। उसने देखा कि रात के उस वक्त टेबल लैम्प जला कर निधी कुछ लिख रही थी। उस वक्त उसने सोचा था कि वो अपनी पढ़ाई ही कर रही है। बाथरूम से आने के बाद उसने कहा भी था उससे कि अब उसे सो जाना चाहिए।

आशा ने प्लेट सहित चाय के कप को बेड के पास ही दीवार से सटे एक छोटे से टेबल पर रखा और फिर वो निधी के पास गई। उसकी नज़र डायरी पर पड़ी। आशा ने ग्रेजुएशन तो नहीं किया था किन्तु दस बारह तक पढ़ी लिखी थी वो। हल्दीपुर गाॅव में बारवीं तक स्कूल था। आगे काॅलेज की पढ़ाई पढ़ने के लिए चिमनी जाना पड़ता था, जो कि पास के ही गाॅव में था। ख़ैर, डायरी देख कर उसे ये तो समझ आ गया कि ऐसी डायरी निधी की पढ़ाई में तो उपयोग होती नहीं होगी तो फिर ऐसा क्या है इसमें जिसे वो सोते समय भी लिए हुए है।

आशा ने बहुत ही आहिस्ता से निधी के हाॅथों से उस डायरी को निकाला और फिर बेड से दो कदम पीछे हट कर उसने डायरी को खोला। डायरी के शुरू के काफी पेज अलग अलग चीज़ों से भरे थे। जैसे कि हर देश के कोड्स वगैरा। अपने देश भारत के अलग अलग राज्यों के मानचित्र। उसके बाद मुख्य पेज शुरू होते थे।

मुख्य पेज पर ही मोटे मोटे अच्छरों में आशा को लिखा नज़र आया____"जियें तो जियें कैसे....बिन आपके??" इस टाइटल के नीचे ही एक मध्यम साइज़ के दो दिल बने हुए थे, जो कि साथ में ही मिले हुए थे। जिसमे एक तरफ वाले में राज और दूसरे वाले में निधी लिखा था। उसके नीचे मोटे अच्छरों में ही लिखा था____"MY LOVE"

आशा को ये सब देख कर ज़बरदस्त झटका लगा। इतना कुछ देख कर कोई भी समझ सकता था कि माज़रा क्या है? आशा ये जान कर हैरान रह गई कि निधी अपने ही बड़े भाई से प्यार करती है। आशा ने झटके से बेड पर सो रही निधी के चेहरे की तरफ देखा। निधी के चेहरे पर इस वक्त सारे संसार की मासूमियत विद्यमान थी। उस चेहरे को देख कर उसे यकीन ही नहीं हुआ कि ये ऐसा कर सकती है। मगर उसके ही द्वारा लिखा गया ये हर लफ्ज़ क्या झूॅठा हो सकता था?

आशा के पूरे जिस्म में एक अजीब सी झुरझुरी तेज़ रफ्तार से दौड़ गई। अंदर ही अंदर जैसे एकाएक ही कोई तेज़ जज़्बातों का भयंकर तूफान उठा जिसने उसके समूचे अस्तित्व को हिला कर रख दिया। उसी जज़्बातों के तूफान का असर था कि उसकी ऑखों में एकाएक ही ऑसू भर आए थे। फिर जैसे उसने खुद के जज़्बातों को सम्हाला और डायरी के उस पेज को पलटा। दूसरे पेज पर कोई ग़ज़ल लिखी हुई थी जिसे आशा ने पढ़ना शुरू किया।

अजब हाल है दिल का बताना भी नहीं मुमकिन।
लब ख़ामोश हैं ऑखों से जताना भी नहीं मुमकिन।।

सबके सामने मुस्कुराने का हुनर भी सीख लेंगे,
मगर तन्हाई में वो हुनर आजमाना भी नहीं मुमकिन।।

तौबा तो की है हमने के तुमसे रूबरू न होंगे मगर,
एक पल फाॅसलों में रह पाना भी नहीं मुमकिन।।

बहुत दिल को समझाया मगर ये एहसास हुआ,
किसी तरह दिल को बहलाना भी नहीं मुमकिन।।

ज़हर दे दो हमको और ये किस्सा तमाम कर दो,
यूॅ तड़प तड़प कर जी पाना भी नहीं मुमकिन।।

माफ़ करना के हमने बेरुख़ी अख़्तियार कर ली,
क्या करें के कोई और बहाना भी नहीं मुमकिन।।

पूरी ग़ज़ल पढ़ने के बाद आशा का दिलो दिमाग़ सुन्न सा पड़ता चला गया। अभी वो ये सब सोच ही रही थी कि सहसा वो बुरी तरह चौंकी। बेड पर पड़ी निधी के जिस्म में हलचल सी हुई प्रतीत हुई उसे। ये देख कर आशा ने जल्दी से डायरी को आगे बढ़ कर निधी के बगल से ही ऐसी पोजीशन में रख दिया कि अगर निधी की नज़र उस पर पड़े भी तो उसे यही लगे कि वो डायरी उसके हाॅथों से सोते वक्त ही छूट कर एक तरफ गिर गई थी। डायरी रखने के बाद आशा जल्दी से टेबल पर से चाय का कब प्लेट सहित उठाया और फिर अपने चेहरे पर खुशी तथा प्यार के भाव लाते हुए निधी के चेहरे के क़रीब झुकते हुए कहा____"गुड मार्निंग गुड़िया। चलो चलो सुबह हो गई है। देखो तो गरमा गरम चाय तुम्हारे पेट में जाने के लिए कैसे उतावली हो रही है।"

आशा के इस प्रकार कहने पर निधी ने कुछ ही पलों में अपनी ऑखें खोल दी और फिर आशा की तरफ देख कर वो बस ज़रा सा ही मुस्कुराई। आशा के हाॅथ में चाय का कप देख कर वो बेड से उठी और बेड की पिछली पुश्त की तरफ खिसक कर उसने अपनी पीठ उस पर टिकाई और फिर उसने आशा के हाथ से चाय का कप ले लिया। जबकि चाय का कप पकड़ाते ही आशा सीधी खड़ी हो गई। वो देखना चाहती थी कि निधी की नज़र जब अपनी डायरी पर पड़ेगी तो उसका कैसा रिएक्शन होता है?

आशा को इसके लिए ज्यादा देर तक इन्तज़ार नहीं करना पड़ा। निधी ने कप से चाय का पहला ही शिप लिया था कि उसकी नज़र बाएॅ साइड उल्टी पड़ी अपनी डायरी पर पड़ी और फिर उसके चेहरे पर एकदम से डर और घबराहट के मिले जुले भाव उभर आए। उसके पीछे खिसकने से डायरी उलट कर थोड़ी और दूर हो गई थी तथा उलट सी गई थी। निधी ने फौरन ही अपना एक हाॅथ बढ़ा कर डायरी को अपने कब्जे में ले लिया और वहीं अपने हिप्स के पास ही लगभग छुपा सा लिया उसे। उसकी इस नादानी पूर्ण हरकत से आशा के होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई। उसके मन में पहले तो आया कि वह उससे उस डायरी तथा डायरी में लिखे मजमून के संबंध में कोई बात करे मगर उसने ये सोच कर अपने मन से इस ख़याल को झटक दिया कि उसके पूछने पर कहीं निधी बुरी तरह डर न जाए।

"अच्छा मैं जा रही हूॅ गुड़िया।" फिर आशा ने सामान्य भाव से कहा___"पवन को भी उठा दूॅ। उसे भी ड्यूटी जाना होगा न और हाॅ तू भी जल्दी से फ्रेश होकर नीचे आ जाना। ब्रेकफास्ट रेडी होने ही वाला है।"
"ठीक है दीदी।" निधी ने भी खुद को सामान्य दर्शाते हुए कहा___"आप जाइये मैं आती हूॅ थोड़ी देर में।"

निधी की बात सुन कर आशा कमरे से बाहर चली गई। जबकि उसके जाने के बाद निधी एकाएक ही गहन विचारों में कहीं खो सी गई। अभी वो विचारों में खोई ही थी कि तभी उसका मोबाइल फोन बज उठा। उसने सिरहाने पर ही एक तरफ रखे मोबाइल को उठाया और स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे अनजान नंबर को देखा। उसके चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे। उसे समझ न आया कि उसके मोबाइल पर ये अनजान नंबर से आने वाली काल किसकी हो सकती है?

"हैलो।" फिर जाने क्या सोच कर उसने काल रिसीव किया और उसे कानों से लगाते ही कहा था।
"हैलो गुड़िया।" उधर से रितू की जानी पहचानी आवाज़ सुन कर निधी बुरी तरह चौंक पड़ी थी। उसे आशा, रुक्मणी, पवन और करुणा आदि के द्वारा पता चल गया था कि रितू विराज का पूरी तरह से साथ दे रही है। रितू के इस तरह अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ हो जाने से हर कोई हैरान था। मगर सब ये भी जानते थे कि रितू एक अच्छी लड़की है। वो ग़लत का साथ कभी नहीं दे सकती। उसके माॅ बाप ने अब तक उससे सच छुपाया हुआ था इसी लिए उसका बर्ताव इन लोगों के प्रति ऐसा था।

"गुड़िया तू सुन रही है न?" निधी के चुप रह जाने पर उधर से रितू की पुनः आवाज़ उभरी___"देख, तुझे पूरा हक़ है मुझसे नाराज़ होने का और तुझे नाराज़ होना भी चाहिए। मैं चाहती हूॅ कि तेरा जो मन करे तू मुझे वो सज़ा दे मेरी गुड़िया। तेरी हर सज़ा मैं हॅसते हॅसते कुबूल कर लूॅगी। बस एक बार अपने मुख से मुझे दीदी कह दे। कसम से उसके बाद अगर मुझे मौत भी आ जाएगी तो उसका मुझे कोई दुख नहीं होगा।"

"न..नहींऽऽऽ।" रितू की बातों से निधी की ऑखों से पलक झपकते ही ऑसू बह चले, बुरी तरह तड़प कर बोली___"ये आप कैसी बातें कर रही हैं दीदी? मुझे आपसे कोई शिकायत कोई नाराज़गी नहीं है। मुझे पता है कि इस सबमें आपका कभी कोई दोष था ही नहीं। इस लिए प्लीज आप ये सब मत कहिए। मुझे तो बहुत खुशी हो रही है कि मेरी सबसे अच्छी वाली दीदी ने मुझे फोन किया।"

"हाॅ पर मुझे खुशी नहीं हुई।" उधर से रितू ने अजीब भाव से कहा___"और वो इस लिए कि मेरी सबसे प्यारी गुड़िया ने अपनी इस गंदी दीदी को कोई सज़ा नहीं सुनाई।"
"प्लीज दीदी।" निधी ने आहत भाव से कहा___"ऐसा मत कहिए न खुद को और अगर आपने दुबारा फिर से अपने लिए ऐसा कहा तो मैं आपसे बात नहीं करूॅगी, हाॅ नहीं तो।"

इस बार निधी के ऐसा कहने पर उधर से रितू की रुलाई फूट गई। यही यो सुनना चाहती थी वो निधी के मुख से। निधी के मुख से उसका ये तकिया कलाम कितना मीठा लगता था इसका एहसास वहीं कर सकती थी। मोबाइल पर रितू के सिसकने की आवाज़ सुन कर निधी भी दुखी हो गई। वह फोन पर ही रितू को अपने तरीके से मनाने लगी कि वो न रोएॅ। आख़िर कुछ देर बाद सब ठीक हो ही गया।

"और बताइये दीदी।" फिर निधी ने सामान्य भाव से कहा___"आज आपको मेरी याद कैसे आ गई?"
"तेरी याद तो रोज़ ही आती है गुड़िया।" उधर से रितू ने सहसा गंभीरता से कहा___"किन्तु अपराध बोझ के चलते तुझसे बात करने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी।"

"आप फिर से ऐसी बातें करने लगीं।" निधी ने कहा___"इन बातों को अब जाने दीजिए न दीदी। ख़ैर ये बताइये कि कैसी हैं आप?"
"मैं तो अच्छी ही हूॅ गुड़िया।" रितू ने कहा___"पर मेरा दिल करता है कि तुझे कितना जल्दी अपनी ऑखों के सामने देखूॅ और तुझसे ढेर सारी अच्छी अच्छी बातें करूॅ भी और तुझसे सीखूॅ भी।"

"मेरा भी ऐसा ही दिल करता है दीदी।" निधी ने कहा___"मगर शायद अभी ये मुमकिन नहीं है।"
"हाॅ ये तो है गुड़िया।" रितू ने कहा___"अच्छा एक बात पूछूॅ तुझसे?"
"हाॅ जी दीदी।" निधी के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे___"पूॅछिए न।"

"क्या राज ने तुझे कुछ कहा है?" उधर से रितू ने कहा___"या फिर किसी बात पर उसने तुझे डाॅटा है। तू मुझसे बता गुड़िया मैं यहाॅ इसके काॅन खींचूॅगी। इसकी हिम्मत कैसी हुई मेरी गुड़िया को कुछ कहने की।"
"नहीं नहीं दीदी।" निधी बुरी तरह हड़बड़ा गई थी, बोली___"ऐसा कुछ भी नहीं है। मुझे किसी ने कुछ नहीं कहा। आपको ऐसा क्यों लगा दीदी?"

"राज बता रहा था।" रितू ने निधी की धड़कनों को बढ़ाते हुए कहा___"कि तू कुछ समय से उससे बात ही नहीं कर रही है और ना ही तू उसके सामने आती है। उसका कहना है कि उसने तो ऐसा तुझे कुछ भी नहीं कहा जिससे तू उससे बात ही करना बंद कर दे। मुझे पता है कि वो तुझे अपनी जान से भी ज्यादा चाहता है। अगर तुझे ज़रा सी भी किसी चीज़ से तक़लीफ हो जाए तो उसकी जैसे जान पर बन आती है। फिर क्या बात है गुड़िया, आख़िर ऐसी कौन सी बात हो गई है जिससे तू उससे बात नहीं करती है। यहाॅ तक कि उसके सामने भी नहीं आना चाहती?"

निधी को समझ न आया कि वो रितू को इसका क्या जवाब दे? सच्चाई वो बता नहीं सकती थी और झूॅठ तो ऐसा होता है जो ज्यादा दिनों तक छुपा नहीं रह सकता था। हलाॅकि उसे ये उम्मीद नहीं थी कि विराज ये सब समझता न होगा। उसे तो ये भी उम्मीद नहीं थी कि वो ये बात सीधे तौर पर रितू दीदी से बोल देगा।

"क्या हुआ गुड़िया?" निधी को ख़ामोश जान कर उधर से रितू ने फिर कहा___"तू चुप क्यों हो गई? बता न क्या बात हो गई है ऐसी?"
"ऐसी कोई बात नहीं है दीदी।" निधी अब बोले भी तो क्या___"मैं तो बस ऐसे ही नाराज़ हूॅ उनसे। आप तो जानती ही हैं कि मैं कैसी हूॅ।"

"एक बात हमेशा याद रखना गुड़िया।" उधर से रितू ने कहा___"तू हम सबकी जान है, खास कर राज की। तुझे नहीं पता कि तेरे बात न करने से वो यहाॅ कितना दुखी रहता है। मुझे तो पता ही न चलता अगर मैं कल रात उसके कमरे में अचानक पहुॅच न गई होती तो। मेरे पूछने पर ही उसने ये सब बताया। ख़ैर, एक बात और कहना चाहती हूॅ गुड़िया और वो ये कि मैने तो अपने माॅ बाप और भाई से हर रिश्ता तोड़ लिया है। क्योंकि वो सब बुरे ही नहीं बल्कि पापी लोग हैं। इस दुनिया में अब अगर मेरा कोई सच्चा भाई है तो वो है राज। मुझे पता है कि हमारा भाई राज कोहिनूर हीरा है। उसके दिल में सबके लिए बेपनाह प्यार और सम्मान है। इस लिए ये हम सबका भी फर्ज़ बनता है कि हम उसे वैसा ही प्यार व सम्मान दें।"

"मुझे पता है दीदी।" निधी ने कहा___"और यकीन मानिए कि उनके लिए मेरे दिल में बेपनाह प्यार व सम्मान है और ये मरते दम तक कम न होगा बल्कि बढ़ता ही जाएगा।"

"मुझे तुमसे यही उम्मीद है गुड़िया।" रितू ने निधी की बातों को सामान्य ही समझते हुए कहा___"और देखना जिस दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा न उस दिन से हम सब एक साथ ही रहेंगे और हम सभी बहनें अपने भाई को जी भर के प्यार करेंगे।"

"जी बिलकुल दीदी।" निधी के होठों पर सहसा फीकी सी मुस्कान उभर आई___"अच्छा दीदी अब हम बाद में बात करेंगे। वो क्या है न कि मुझे बाथरूम जाना है। फिर स्कूल भी जाना है।"
"ओह हाॅ।" रितू ने कहा___"चल ठीक है गुड़िया। अच्छे से पढ़ाई करना और हाॅ अपना ख़याल भी रखना।"

इसके साथ ही फोन काल कट गई। निधी ने गहरी साॅस ली और फिर कुछ देर तक इन सारी बातों के बारे में सोचती रही। फिर वो उठी और बाथरूम की तरफ बढ़ गई।
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इधर मैं नीलम को मैसेज के द्वारा सब कुछ समझाने के बाद विधी के मम्मी पापा या यूॅ कहूॅ कि अपने सास ससुर से मिला। ये पहला अवसर था जब मैं उनके पास हर काम से फारिग़ होकर मिला था। मैने इसके पहले उनसे न मिल पाने के लिए माफ़ी भी माॅगी। ये अलग बात है कि उन दोनो ने मुझे अपने सीने से लगा लिया और ढेर सारा प्यार और दुवाएॅ दी। मुझे अपने सीने से जाने कितनी ही देर तक लगाए रहे थे वो। मैं समझ सकता था कि वो इस वक्त भावनाओं के भॅवर में गोते लगा रहे होंगे। नैना बुआ ने मेरे बारे में सब कुछ उन्हें बता दिया था। सब कुछ जान कर उन्हें दुख भी हुआ और खुशी भी हुई।

काफी देर तक मैं उनके पास ही बैठा रहा उसके बाद मैं उनसे इजाज़त लेकर हरिया काका के पास आ गया। हरिया काका से मैने मंत्री के पिल्लों का हालचाल लिया और उन्हें ये कहा कि मंत्री की बेटी को गंदे तरीके से टार्चर न करें। उन्हें ये भी कहा कि वो उन लड़कों के साथ भी वो सब न करें जो इसके पहले वो कर रहे थे। मैने ऐसा इस लिए कहा कि अब उन लड़कों के साथ ही उनकी बहन भी थी। उसका इस सबमें कोई कुसूर तो था नहीं इस लिए उसके सामने उन लड़कों के साथ वो सब करना उचित नहीं था।

मेरी बातें हरिया काका को समझ में आ गई थी। मंत्री की बेटी रचना पहले की अपेक्षा अब बिलकुल चुप ही रहती थी। अपने भाई के साथ साथ तथा भाई के तीनों दोस्तों की तरफ उसका देखने का भी मन नहीं करता था। ज़ाहिर है कि उसकी ऑखों के सामने हरिया काका ने उसके भाई के साथ वो सब किया था जिसके चलते उसे अपने आप में जिल्लत महसूस हुई थी और वो सब उसके भाई की करतूतों की वजह हे ही हुआ था।

सुबह का नास्ता हम सबने एक साथ ही किया और फिर मैं और आदित्य घर से बाहर की तरफ चल दिये। अभी दो क़दम ही हम दोनो आगे बढ़े थे कि पीछे से रितू दीदी की आवाज़ आई। उनकी आवाज़ से हम दोनो ही ठिठक गए। थोड़ी देर में रितू दीदी हमारे पास आ गईं। इस वक्त वो कत्थई कलर के जीन्स और उसी से मैच करते टाप में थी। टाप के ऊपर लेदर की छोटी सी जाॅकेट डाला हुआ था उन्होंने। ऑखों में सन ग्लासेज था। मैं उन्हें इस लुक में देखता ही रह गया। मेरे इस तरह देखने पर उन्होंने मुस्कुरा कर मेरे दाहिने गाल पर हल्की सी चपत लगाई और फिर हमारे साथ ही बाहर की तरफ चलने लगीं।

"एक बात तुम दोनो ही कान खोल कर सुन लो।" बाहर आते ही रितू दीदी ने हिटलरी अंदाज़ में हम दोनो की तरफ एक एक नज़र देखते हुए कहा___"मुझसे बग़ैर पूॅछे अथवा मेरी जानकारी के बिना तुम दोनो कोई भी काम नहीं करोगे। हम हर काम एक साथ ही करेंगे। कुछ समझ में आया तुम दोनो को? या फिर मैं दूसरे तरीके से समझाऊॅ?"

"दूसरे तरीके से कैसे दीदी?" मैने मुस्कुराते हुए शरारत से पूछा था।
"मेरे पास दूसरा एक ही तरीका है माई डियर ब्रदर।" रितू ने लेदर की जाॅकेट के एक छोर को पकड़ कर हल्का सा एक तरफ किया तो जींस के पैन्ट में खोंसा हुआ उनका सर्विस रिवाल्वर नज़र आ गया हमें। जबकि उसे दिखाते ही उन्होंने कहा____"जब काम बातों से न बने तो फौरन इस रिवाल्वर की नाल सामने वाले की खोपड़ी में लगा कर सारा काम उसे समझा देना चाहिए। दैट्स आल। आई होप कि तुम दोनो अब अच्छी तरह समझ गए होगे।"

"चलिए आपने इतना कान्फिडेंस के साथ कहा है तो समझ ही लेते हैं।" मैने पुनः शरारत से कहा___"वरना हम दोनो तो ऐसे कूढ़मगज इंसान हैं जो किसी भी तरह से नहीं समझ पाते। क्यों आदी??"

"तू मुझे ज़रूर मरवाएगा अब।" आदित्य दूर हटते हुए बोल पड़ा था।
"क्या यार।" मैने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा___"सारे इमेज का बेड़ा गर्क़ कर दिया तुमने। मेरा दोस्त होकर डर गया? हद है यार, तुम्हें तो मेरी तरह थर थर काॅपने लग जाना चाहिए था।"

"बहुत हो गया।" रितू दीदी ने ऑखें दिखाईं___"अब बोल राज क्या प्लान बनाया है तूने नीलम व सोनम को सुरक्षित यहाॅ लाने का?"
"भाई कार कहाॅ गई?" मैने दीदी के सवाल के जवाब में आदित्य की तरफ देखते हुए कहा___"तुम तो कह रहे थे कि सुबह जब हम यहाॅ से चलेंगे तो कार हमारे दरवाजे पर खड़ी मिलेगी। जबकि यहाॅ तो कार कहीं दिख ही नहीं रही। भाई इतना खूबसूरत मज़ाक मत किया करो न, वरना तुम नहीं जानते मुझे दिल का दौरा सा पड़ने लगता है।"

"अबे मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूॅ यार।" आदित्य ने अपना हाॅथ नचाते हुए कहा___"वो क्या है कि अभी कुछ ही देर पहले शेखर के मौसा जी आए थे। उन्होंने जब घर के बाहर कार खड़ी देखी तो पूछने लगे कि ये कहाॅ से आई? उनके पूछने पर मैने बताया कि हमने खरीदा है इसे। बस फिर क्या था, बोले चला कर बताएॅगे कि उन्हें कार कैसी लगी।"

"ओह तो इसका मतलब।" मैने कहा___"मौसा जी लेके गए हैं। मगर अभी तक आए क्यों नहीं वो?"
"आ जाएॅगे यार।" आदित्य ने कहा___"अभी थोड़ी देर पहले ही तो वो गए हैं जब मैं अंदर तुम्हें बताने गया था।"

"ओये तूने मुझे बताया क्यों नहीं कि तूने कोई कार खरीदी है?" सहसा रितू दीदी शिकायती लहजे में बोल पड़ीं___"और मैं अभी क्या बोल रही थी कि तुम दोनो बिना मुझसे पूछे कोई काम नहीं करोगे फिर क्यों किया?"

"ये बात तो आपने अभी कही है न दीदी।" मैने उन्हें मनाने वाले लहजे से कहा___"जबकि कार लेने की बात तो हमने चार दिन पहले आपस में की थी। बट प्राॅमिस दीदी, इसके बाद का हर काम आपसे पूछ कर ही करेंगे।"

"चल कोई बात नहीं।" रितू दीदी ने कहा___"लो कार भी आ गई। क्या बात है राज, कार तो बहुत अच्छी ली है तूने।"
"इतनी भी अच्छी नहीं है दीदी।" मैने कहा___"सेकण्ड हैण्ड है। ज़रूरत थी इस लिए थोड़ा ज्यादा पैसे देकर लेना पड़ा। नई कार लेने का अभी कोई मतलब नहीं है।"

अभी हम बात ही कर रहे थे कि शेखर के मौसा जी ने हमारे पास ही कार को रोंका और फिर ड्राइविंग डोर खोल कर बाहर आए।

"यार आदित्य कार तो अच्छी है ये।" केशव जी ने कहा___"कितने में पड़ी ये?"
"ज्यादा नहीं मौसा जी।" आदित्य ने कहा___"दो लाख अस्सी हज़ार। हलाॅकि गरज़ हमारी थी वरना अस्सी हज़ार का चूना नहीं लगता हमें।"

"फिर भी यार।" केशव जी ने कहा___"घाटा इतने में भी नहीं है। ख़ैर, छोंड़ो मैं भी किसी ज़रूरी काम से इधर से गुज़र रहा था। इस लिए अब मैं चलता हूॅ।"
"जी ठीक है मौसा जी।" हम सबने अदब से हाॅथ जोड़ लिए थे।

मौसा जी के जाने के बाद हम तीनो ही उस कार में जाकर बैठ गए। मैने ड्राइविंग शीट सम्हाली। मेरे बगल से रितू दीदी बैठ गई जबकि आदित्य पिछली शीट पर बैठ गया। सबके बैठ जाने के बाद मैने कार को स्टार्ट कर आगे बढ़ा दिया।

"तो क्या प्लान बनाया है तूने?" रास्ते में रितू दीदी ने फिर मुझसे पूछा___"हम उन दोनो को वहाॅ से कैसे यहाॅ लाएॅगे? प्रकाश नाम का मेरा एक आदमी हवेली में ही सुरक्षा गार्ड के रूप में काम करता है। उसी के द्वारा मुझे पता चला था कि जिस दिन तुम्हारे वो नकली सीबीआई वाले डैड को ले कर गए थे उसी दिन हवेली पर डैड के कुछ बिजनेस संबंधी दोस्त भी आए थे। उन सबके साथ काफी सारे ऐसे आदमी थे जो दिखने में फाइटर लगते थे। प्रकाश ने बताया कि उनमे से एक का नाम पाटिल था जो माॅम से कह रहा था कि ठाकुर साहब आएॅ तो बता दीजिएगा कि हमारे ये सभी आदमी आज से उनके ही आदेशों का पालन करेंगे।"

"हाॅ इस बात का ज़िक्र नीलम ने भी मुझसे किया था कल।" मैने दीदी की तरफ एक नज़र डालने के बाद कहा___"उसने बताया था कि गेस्ट रूम में कुछ ऐसे लोग ठहरे हुए हैं जो दिखने में काफी हट्टे कट्टे लगते हैं।"

"मतलब साफ है कि हवेली जाकर वहाॅ से उन दोनो को लाना असंभव काम है।" रितू दीदी ने कहा___"वैसे भी उन सभी आदमियों के रहते हवेली जाने का मतलब है कि मौत के मुह में जाना। सीबीआई वाले हादसे के बाद तो वैसे भी डैड का गुस्सा तुम पर या यूॅ कहो कि हम पर अपने चरम पर होगा। अतः उन्होंने सिक्योरिटी का भी तगड़ा प्रबंध कर लिया होगा। ऐसे में हम हवेली नहीं जा सकते और अगर जाने का सोचें भी तो हमें रात के समय में ही जाना चाहिए क्योंकि रात के अॅधेरे में खतरा कम ही रहता है।"

"हमें हवेली जाने की ज़रूरत ही नहीं है दीदी।" मैने दीदी से कहा___"नीलम और सोनम दीदी खुद ही हवेली से बाहर आएॅगी।"
"ऐसा कैसे संभव हो सकता है?" रितू दीदी के चेहरे पर चौंकने के भाव उभरे थे, बोली___"मौजूदा हालात में माॅम या डैड उन दोनो को बाहर आने ही नहीं देंगे। क्योंकि अगर उन्होंने ये जान लिया होगा कि नीलम भी सच्चाई जान गई है तो वो भी मेरी तरह उनके खिलाफ हो जाएगी और हवेली से बाहर जाने की कोशिश करेगी। ये सोच कर माॅम या डैड उन दोनो को किसी भी वजह से हवेली के बाहर नहीं जाने देंगे।"

"और अगर मैं ये कहूॅ।" मैने दीदी के ऊपर जैसे धमाका सा किया___"कि इस सबके बावजूद नीलम और सोनम दीदी हवेली से बाहर आएॅगी तो?"
"ये तो फिर चमत्कार ही होगा।" रितू दीदी ने चकित भाव से कहा___"जिस चमत्कार की मौजूदा हालात में ज़रा भी उम्मीद नहीं है।"

"जहाॅ उम्मीद नहीं होती असल में वहीं पर उम्मीद की संभावना होती है दीदी।" मैने दार्शनिकों वाले अंदाज़ से कहा____"खैर, ये चमत्कार तो होने ही वाला है। मैने नीलम को हवेली से बाहर निकलने का शानदार तरीका समझाया दिया था।"

"त तरीका???" रितू दीदी बुरी तरह चौंक पड़ी____"कैसा तरीका?"
"दरअसल मैने सोनम दीदी के बारे में सोच कर ही प्लान बनाया है दीदी।" मैने कहा____"ये तो मुझे भी पता है कि सोनम दीदी पहली बार ही यहाॅ आई हैं। इस लिए ये तो एक स्वाभाविक बात होती है कि जो इंसान पहली बार कहीं जाता है तो वो उस जगह के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने या देख लेने की ख्वाहिश रखता है। मैने भी इसी सोच के तहत प्लान बनाया। दूसरी महत्वपूर्ण बात नीलम ने ये भी बताया कि आज आपके नाना जी जा रहे हैं तथा उन्हें गुनगुन तक छोंड़ने के लिए खुद बड़े पापा कार से जाने वाले हैं। मैने इन सब बातों को भी अपने प्लान के लिए सोचा था। कहने का मतलब ये कि जब बड़े पापा नाना जी को लेकर गुनगुन जा चुके होंगे तब नीलम व सोनम दीदी तैयार होकर तथा अपने मिनी बैग में अपनी सबसे ज्यादा ज़रूरी चीज़ ही लेकर बड़ी माॅ के पास आएॅगी। बड़ी माॅ से नीलम ये कहेगी कि सोनम दीदी हमारा गाॅव तथा हमारे खेत देखना चाहती हैं, इस लिए हम दोनो जा रहे हैं। नीलम के मुख से सोनम सहित जाने की बात सुन कर यकीनन बड़ी माॅ के मन में ये बात आएगी कि कहीं ये लोग यहाॅ से भागने का तो नहीं सोच रही हैं। किन्तु वो इसके लिए उन्हें मना भी नहीं कर पाएॅगी। क्योंकि बात तो सिर्फ गाॅव तथा खेत देखने की होगी। इसके लिए मना करने की उनके पास कोई ठोस वजह नहीं होगी। इस लिए वो उन दोनो को जाने से रोंक न सकेंगी, मगर हाॅ ऐसा प्रबंध ज़रूर कर सकती हैं कि वो हवेली से भागने वाले अपने काम में सफल न हो सकें। इसके लिए संभव है कि वो उन दोनो के साथ एक दो उन दो आदमियों को भेजेंगी जो फाइटर जैसे दिखते हैं। उनके साथ अपने आदमियों को ये सोच कर नहीं भेजेंगी कि उन्हें अपने आदमियों पर अब भरोसा हीं नहीं होगा। बात भी सही है, भला उनके आदमियों ने भरोसा करने लायक अब तक कोई काम ही क्या किया है? ख़ैर, इस सारे मामले के लिए मैने नीलम को भली भाॅति समझाया हुआ है कि वो तथा सोनम दीदी एक पल के लिए भी अपने चेहरों पर ऐसे भाव न लाएॅगी जिससे बड़ी माॅ को उन पर शक हो जाए। क्योंकि फिर उस सूरत में उनका वहाॅ से निकलना मुश्किल हो जाना है। यानी आप ये भी कह सकती हैं कि वो दोनो वहाॅ से अपने सफलता पूर्वक किये गए अभिनय के द्वारा ही निकल पाएॅगी। अब सवाल ये था कि गाॅव या खेत घूमने पैदल या जीप से जाएॅगी तो इसमें ज्यादा कोई समस्या नहीं थी। क्योंकि मुख्य काम ये है कि उन दोनो का हवेली से बाहर आकर गाॅव की सीमाओं की तरफ बढ़ना था। हवेली के बाहर या यूॅ कहें कि गाॅव की सीमा में ही किसी खास जगह पर हम उन्हें घेर लेंगे। दैट्स आल।"

"उन दोनों को हवेली से बाहर निकालने का तरीका तो बहुत ही अच्छा सोचा है तुमने।" रितू दीदी ने कहा___"मगर उन आदमियों के रहते उन दोनो को अपने पास सुरक्षित लाना इतना आसान काम नहीं है। दूसरी बात ये भी है कि संभव है कि यही बात मेरी माॅम के मन में भी आई हो। यानी कि उन्होने ये अंदाज़ा लगा लिया हो कि नीलम ने तुम्हें मैसेज भेज दिया होगा कि उसे सच्चाई पता चल गई है अतः अब वो तुमसे मिलना चाहती है। उस सूरत में तुम सोचोगे कि अगर नीलम का राज़ बड़ी माॅ के सामने फाश हो गया तो वो यकीनन बड़े पापा से बताएॅगी और फिर बहुत मुमकिन है कि नीलम व सोनम दोनो ही भयानक खतरे में पड़ जाएॅ। ऐसे हाल में तुम्हारी सबसे पहली प्राथमिकता यही होगी कि तुम उन दोनो को हवेली से सुरक्षित बाहर निकलना चाहोगे। आज जब नीलम ने उनसे ये कहा होगा कि सोनम दीदी ये गाॅव तथा हमारे खेत देखना चाहती हैं और वो उन्हें लेकर जा रही है तो यकीनन उनके मन में सबसे पहले यही बात आई होगी कि कहीं ऐसा तो नहीं ये दोनो यहाॅ से बहाना बना कर निकल जाना चाहती हों। किन्तु उनके मन में ये भी होगा कि ऐसे हालात में वो क्या करेंगी इसका अंदाज़ा भी तुम लगा लोगे। अतः वो कुछ ऐसा इंतजाम करेंगी जो तुम्हारी सोच से परे हो अथवा जिसके बारे में तुम सोच ही न सको। यानी कि संभव है कि उन्होंने तुम्हारे अंदाज़े को ध्यान में रखते हुए अपने दो आदमियों को उन दोनो के साथ भेज तो दिया ही हो साथ ही उनके जाने के बाद उन्होंने कुछ आदमी और भी उनके पीछे ये सोच कर लगा दिये हों कि अगर उनकी शंका सच हुई तो बैकअप के लिए कुछ आदमी एक्स्ट्रा रहेंगे। ताकि अगर ऐसी सिचुएशन बन जाए कि तुम उनके पहले वाले आदमियों का तिया पाॅचा करने में कामयाब हो जाओ तो पीछे से आ रहे उनके दूसरे आदमी तुम्हें तुम्हारे इरादों में कामयाब न होने दें।"

"मैं रितू की इन बातों से पूरी तरह सहमत हूॅ राज।" सहसा आदित्य पीछे से बोल पड़ा था____"यकीनन ऐसा हो सकता है। रितू की माॅम के दिमाग़ के बारे में जैसा तुमने बताया था उस हिसाब से मुझे भी लगता है कि वो ऐसा कुछ अंदाज़ा लगा कर सकती हैं। अतः हमें भी उनके अनुसार ही सोच कर क़दम बढ़ाना होगा। वरना हम पर तो जो मुसीबत आएगी वो तो आएगी ही किन्तु इस सबके लिए नीलम व सोनम का कितना बुरा हाल हो सकता है इसका हम अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते।"

"तुम्हें क्या लगता है आदी?" मैने कहा___"कि ये सब बातें मेरे दिमाग़ में नहीं आई होंगी? बेशक आई हैं मेरे यार। मुझे भी इस बात का ख़याल है कि हर बार एक ही दाॅव अथवा तरीका कारगर सिद्ध नहीं हो सकता। इससे सामने वाला हमारी सोच का दायरा ताड़ लेता है। हलाॅकि मेरा उसूल ही यही है कि मैं सामने वाले को वही सोचने पर मजबूर कर देता हूॅ जो मैं चाहता हूॅ। मैं चाहता हूॅ कि सामने वाला ये सोच बैठे या ये समझ जाए कि मेरे पास बस एक ही तरह का दाॅव है। क्योंकि जब ऐसा होगा तो सामने वाला फिर उसी के हिसाब से अपनी चालें चलता है। जबकि मैं उसकी उस चाल के बाद अपना दूसरा पैंतरा शुरू करूॅगा। ऐसा पैंतरा जिसके बारे में वो सोच भी न सकेगा।"

"इसका मतलब।" रितू दीदी ने कहा___"तुमने इस बारे में पहले से ही कुछ सोचा हुआ है या फिर ये कहूॅ कि ऐसा कुछ इंतजाम कर रखा है तुमने।"
"बिलकुल सही कहा दीदी आपने।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"आख़िर मुझे भी तो इस बात का ख़याल रखना ही पड़ेगा न कि उस तरफ शातिर दिमाग़ वाली मेरी बड़ी माॅ भी मौजूद हैं। बात अगर सिर्फ बड़े पापा की होती तो इतना घुमा फिरा कर काम करने की ज़रूरत ही न पड़ती। किन्तु बड़ी माॅ तो फिर बड़ी माॅ हैं न। ख़ैर, मैं ये कह रहा हूॅ कि जिस तरह बैकअप के लिए बड़ी माॅ ने दिमाग़ लगाया हो सकता है उसी तरह मैने भी बैकअप का इंतजाम किया हुआ है। और वैसे भी जंग में बैकअप का होना तो निहायत ही ज़रूरी होता है। जिस योद्धा के पास बैकअप नहीं होता वो जंग के शुरू होते ही मात खा जाता है।"

"वो सब तो ठीक है।" आदित्य रितू दीदी से पहले ही पूछ बैठा____"लेकिन तुमने बैकअप का आख़िर इंतजाम क्या किया है?"
"क्या यार आदी।" मैने पलट कर एक नज़र उसे देखने के बाद कहा____"तुम न ज़रा भी दिमाग़ नहीं लगाते हो।"

"ज्यादा बनो मत।" आदित्य ने तीखे भाव से कहा___"साफ साफ बताओ कि क्या तीर मारा है तुमने?"
"लगता है शेखर के मौसा को भूल गए हो तुम।" मैने पुनः पलट कर आदित्य को देख कर कहा___"कल देखा नहीं था क्या तुमने कि कैसे वो फार्महाउस पर अपने लट्ठधारी आदमियों को लेकर हम लोगों को लेने आए थे? बाद में उन्होंने कहा भी था कि अगर किसी बात की ज़रूरत पड़े तो तुरंत उन्हें याद करें हम। बस फिर क्या था समझदार आदमी को ऐसे मददगार आदमी का सहारा लेने में ज़रा भी देर नहीं करना चाहिए। कहने का मतलब ये कि मैने उन्हें सारी सिचुएशन के बारे में समझा दिया था और ये कहा था कि बैकअप के रूप में वो हमारे पीछे ही रहें। वो मैदान में तभी आएॅ जब उन्हें यकीन हो जाए कि हमारा पलड़ा अब डगमगाने लगा है और हम हारने वाले हैं। तब उन्हें अचानक ही मैदान में एन्ट्री मारनी है। बस उसके बाद तो फिर हम सब कुछ सम्हाल ही लेंगे।"

"ओह अब समझ आया।" आदित्य ने सहसा गहरी साॅस लेकर कहा___"इसी लिए वो उस वक्त बोल रहे थे कि वो किसी ज़रूरी काम से यहाॅ से गुज़र रहे थे।"
"अब समझे तो क्या समझे डियर?" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"बात तो तब थी जब तुम इसके पहले ही समझ जाते।"

"हाॅ हाॅ ठीक है न।" आदित्य ने खिसियाते हुए कहा___"पर मुझे ये बात समझ नहीं आई कि अगर यही बात थी तो उस वक्त उन्होंने हम में से किसी को बताया क्यों नहीं कि वो किस ज़रूरी काम से गुज़र रहे थे?"

"लो कर लो बात।" मैने हॅसते हुए कहा___"उन्हें भला बताने की ज़रूरत ही क्या थी? मुझे तो सब पता ही था क्योंकि मैने ही उनसे बात की थी। उन्होंने तुमसे या दीदी से इस लिए नहीं बताया कि उन्होंने सोचा होगा कि मैने आप दोनो को बता दिया होगा। दूसरी बात आप में से कोई उनसे पूछा भी तो नहीं कि वो किस ज़रूरी काम के लिए वहाॅ से गुज़र रहे थे?"

"हाॅ ये तो सही कहा तुमने।" सहसा दीदी ने मेरी तरफ प्रसंसा भरी नज़रों से देखते हुए कहा___"हमने तो उनसे पूछा ही नहीं था। लेकिन सवाल तो है ही कि वो किस ज़रूरी काम से गुज़र रहे थे?"

"ओफ्फो दीदी।" मैने कहा___"आपसे ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी मुझे। बड़ी सीधी सी बात है वो अपने आदमियों को इकट्ठा करने के लिए जा रहे थे।"
"ओह आई सी।" रितू दीदी ने कहा___"चल ये तो बहुत अच्छा किया तुमने जो खुद के लिए भी बैकअप इंतजाम कर लिया है। वरना मैं तो सोच रही थी कि कहीं हम फॅस ही न जाएॅ किसी जाल में।"

"ऐसे कैसे फॅस जाएॅगे दीदी?" मैने कहा___"और फिर रिस्क तो लेना ही पड़ेगा। ये तो कुछ भी नहीं है, आने वाले समय में इससे कई गुना ज्यादा खतरा भी होगा जिसका हमें सामना करना पड़ेगा।"

"हाॅ ये तो है।" दीदी ने कहा____"ख़ैर अभी तो सबसे ज़रूरी यही है कि किसी तरह नीलम व सोनम सुरक्षित हमें हाॅसिल हो जाएॅ। उसके बाद की इतनी चिंता नहीं है क्योंकि तब इस बात का भय नहीं रहेगा कि हमारा कोई अपना उनके चंगुल में है।"

मैं रितू दीदी की इस बात पर बस मुस्कुरा कर रह गया। ऐसे ही बातें करते हुए हम बढ़े चले जा रहे थे हल्दीपुर की तरफ। हम तीनों ही पूरी तरह सतर्क थे। हम इस बात को भी बखूबी समझते थे कि खतरा सिर्फ अजय सिंह की तरफ बस का ही नहीं था बल्कि मंत्री दिवाकर चौधरी की तरफ से भी था। दूसरी बात अब हम पहचाने जा चुके थे दोनो तरफ इस लिए ख़तरा और भी बढ़ गया था हमारे लिए। मगर सच्चाई की राह पर चलने के लिए हम अपने अपने हौंसलों को आसमां की बुलंदियों में परवाज़ करवा रहे थे। आने वाला समय बताएगा कि इस खेल में किसकी जीत मिलती है और किसे हार का कड़वा स्वाद चखना होगा??
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दोस्तो, आप सबके सामने मेगा अपडेट हाज़िर है। आशा करता हूॅ कि आप सभी को पसंद आएगा।

आप सबकी प्रतिक्रिया और आपके रिव्यू का इन्तज़ार रहेगा।
 
एकनयासंसार
अपडेट........《 56 》

अब तक,,,,,,,,

"हाॅ ये तो सही कहा तुमने।" सहसा दीदी ने मेरी तरफ प्रसंसा भरी नज़रों से देखते हुए कहा___"हमने तो उनसे पूछा ही नहीं था। लेकिन सवाल तो है ही कि वो किस ज़रूरी काम से गुज़र रहे थे?"

"ओफ्फो दीदी।" मैने कहा___"आपसे ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी मुझे। बड़ी सीधी सी बात है वो अपने आदमियों को इकट्ठा करने के लिए जा रहे थे।"

"ओह आई सी।" रितू दीदी ने कहा___"चल ये तो बहुत अच्छा किया तुमने जो खुद के लिए भी बैकअप का इंतजाम कर लिया है। वरना मैं तो सोच रही थी कि कहीं हम फॅस ही न जाएॅ किसी जाल में।"

"ऐसे कैसे फॅस जाएॅगे दीदी?" मैने कहा___"और फिर रिस्क तो लेना ही पड़ेगा। ये तो कुछ भी नहीं है, आने वाले समय में इससे कई गुना ज्यादा ख़तरा भी होगा जिसका हमें सामना करना पड़ेगा।"

"हाॅ ये तो है।" दीदी ने कहा____"ख़ैर अभी तो सबसे ज़रूरी यही है कि किसी तरह नीलम व सोनम सुरक्षित हमें हाॅसिल हो जाएॅ। उसके बाद की इतनी चिंता नहीं है क्योंकि तब इस बात का भय नहीं रहेगा कि हमारा कोई अपना उनके चंगुल में है।"

मैं रितू दीदी की इस बात पर बस मुस्कुरा कर रह गया। ऐसे ही बातें करते हुए हम बढ़े चले जा रहे थे माधोपुर की तरफ। हम तीनों ही पूरी तरह सतर्क थे। हम इस बात को भी बखूबी समझते थे कि ख़तरा सिर्फ अजय सिंह की तरफ बस का ही नहीं था बल्कि मंत्री दिवाकर चौधरी की तरफ से भी था। दूसरी बात अब हम पहचाने जा चुके थे दोनो तरफ इस लिए ख़तरा और भी बढ़ गया था हमारे लिए। मगर सच्चाई की राह पर चलने के लिए हम अपने अपने हौंसलों को आसमां की बुलंदियों में परवाज़ करवा रहे थे। आने वाला समय बताएगा कि इस खेल में किसको जीत मिलती है और किसे हार का कड़वा स्वाद चखना होगा??
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अब आगे,,,,,,,

नीलम व सोनम के जाने के बाद शिवा वापस पलटा और हवेली के अंदर की तरफ बढ़ चला। उसके होठों पर बड़ी ही दिलकस मुस्कान थी। ज़ाहिर था कि उसकी ये मुस्कान सोनम की वजह से थी। जिसके बारे में वो जाने क्या क्या सोचने लगा था। ख़ैर सोनम के बारे में सोचते हुए ही वह चलते हुए अंदर ड्राइंग रूम में पहुॅचा।

उधर ड्राइंग रूम में प्रतिमा अभी भी बैठी हुई थी। उसके चेहरे पर सोचों के भाव गर्दिश कर रहे थे। शिवा के अंदर आते ही वह सोचो से बाहर आई और उसने शिवा को मुस्कुराते हुए देखा तो सहसा वह चौंकी। फिर अगले ही पल सामान्य भी हो गई, कदाचित उसे शिवा की मुस्कान का राज़ पता चल गया था।

"क्या बात है बेटा।" फिर उसने बेटे की तरफ देखते हुए मुस्कुरा कर कहा___"लगता है मन में बहुत ही मीठी मीठी गुदगुदी हो रही है, है ना?"
"ग..गुदगुदी???" प्रतिमा की इस बात से शिवा एकदम से चकरा सा गया___"कैसी गुदगुदी माॅम?"

"वैसी ही बेटा।" प्रतिमा ने कहा___"जैसी तब हुआ करती है जब किसी से नया नया इश्क़ होता है। तुम्हारे होठों पर थिरक रही ये मुस्कान इस बात का सबूत दे रही है कि तुम सोनम के बारे में सोच सोच अंदर ही अंदर बेहद रोमांच सा महसूस कर रहे हो।"

"हाॅ माॅम।" शिवा की मुस्कान गहरी हो गई___"ये तो आपने बिलकुल सही कहा। मैं सचमुच सोनम के बारे में ही सोच सोच कर आनंद महसूस कर रहा हूॅ। उफ्फ माॅम मैं बता नहीं सकता कि मैं सोनम के बारे में सोच सोच कर कितना खुश हो रहा हूॅ। क्या ऐसा नहीं हो सकता माॅम कि मेरे इस दिल का ये हाल मेरे बिना बताए सोनम समझ जाए और फिर वो मेरे इस दिल की चाहत को कुबूल कर ले?"

"तुम दीवाने से होते जा रहे हो बेटे।" प्रतिमा एकाएक ही गंभीर हो गई, बोली___"जो कि बिलकुल भी ठीक नहीं है। तुम खुद ये बात अच्छी तरह जानते हो कि जो तुम चाहते हो वो इस जन्म में तो हर्गिज़ भी नहीं हो सकता। फिर इस तरह बेकार की बातें करने का तथा ऐसा सोचने का क्या मतलब है बेटा? अभी भी वक्त है तुम अपने अंदर के इस एहसास को जितना जल्दी हो सके निकाल दो। वरना देख लेना इस सबके लिए बाद में तुम बहुत दुखी होगे।"

"जिन्हें इश्क़ हो जाता है न माॅम।" शिवा ने अजीब भाव से कहा___"फिर उन्हें कोई समझा नहीं सकता और ना ही इश्क़ में पागल हो चुका ब्यक्ति किसी की बातों को समझना चाहता है। उसे तो बस हर घड़ी हर पल अपने प्यार की आरज़ू रहती है। ऐसा नहीं है माॅम कि इसमें दिमाग़ काम नहीं करता है बल्कि वो तो वैसे ही काम करता रहता है जैसे आम इंसानों का करता है मगर दिल के जज़्बातों की जब ऑधी चलती है न तो उस दिमाग़ का सारा दिमाग़ उसके ही पिछवाड़े में घुस जाता है।"

प्रतिमा के चेहरे पर एक बार पुनः हैरत के भाव उभर आए। उसे इस वक्त लग ही नहीं रहा था कि ये वही शिवा है जो इसके पहले हर लड़की या औरत को सिर्फ और सिर्फ हवश की नज़र से देखता था। बल्कि इस वक्त तो वह दुनिया का सबसे शरीफ व संस्कारी दिखाई दे रहा था।

"कहते हैं कि दुनियाॅ में कुछ भी असंभव नहीं है।" उधर शिवा कह रहा था___"अगर किसी चीज़ को पाने की शिद्दत से चाहत करो तो वो यकीनन हाॅसिल हो जाती है। आप जिस चीज़ को असंभव कह रही हैं वो चीज़ भी संभव हो सकती है माॅम, अगर आप चाहो तो।"

"क्...क्या मतलब???" प्रतिमा के माथे पर सलवटें उभरीं।
"मतलब साफ है माॅम।" शिवा ने कहा___"अगर आप और डैड चाहें तो सोनम मेरी जाने हयात ज़रूर बन सकती है और मैं उसे पा कर खुश हो सकता हूॅ।"

"तुम पागल हो गए हो बेटा।" प्रतिमा के चेहरे पर गहन बेचैनी के भाव उभरे, बोली___"सब कुछ जानते व समझते हुए भी तुम बेमतलब की बातें किये जा रहे हो। तुम इस बात को समझ ही नहीं रहे कि ये कितना ग़लत है और कितना मुश्किल है। सोनम तुम्हारी बड़ी बहन है। वो तुम्हें अपना छोटा भाई ही मानती है। उसे नहीं पता है कि उसका छोटा भाई उसके प्रति कैसी सोच रखता है और क्या चाहता है?"

"आप सोनम के माॅम डैड से बात कीजिए माॅम।" शिवा ने कहा___"मैं सोनम को मना लूॅगा और अगर वो नहीं मानेगी तो उससे कहूॅगा कि वो मुझे अपने प्यार की भीख दे दे। मैं उसे बताऊॅगा कि मैं उसके बिना अब नहीं रह सकता। दूसरी बात जब उसके माॅम डैड इस रिश्ते के लिए मान जाएॅगे तो फिर उसे भी भला क्या परेशानी होगी?"

"हे भगवान।" प्रतिमा ने जैसे अपना माथा पकड़ लिया, फिर बोली___"कैसे समझाऊॅ इस लड़के को? तुमने ये सोच भी कैसे लिया कि सोनम के माॅ बाप इस रिश्ते के लिए मान जाएॅगे? बल्कि सच्चाई तो ये है कि वो ये सब पता चलते ही तुम्हारे साथ साथ हम सब पर भी लानत भेजेंगे और फिर कभी हमारी शक्ल तक देखना न
चाहेंगे।"

प्रतिमा की इस बात पर शिवा मन मसोस कर रह गया। एकाएक ही उसके चेहरे पर ऐसे भाव आए जैसे उसे इन सब बातों से बेहद तक़लीफ हुई हो। जबकि उसके चेहरे पर उभर आए इन भावों को बड़े ध्यान से देखते हुए तथा समझाते हुए प्रतिमा ने नम्र भाव से कहा____"देख बेटा इसमें इतना दुखी होने की ज़रूरत नहीं है। मैं अच्छी तरह तेरे अंदर का हाल समझ सकती हूॅ। मुझे इस बात का एहसास है कि सोनम के प्रति तू किस हद तक गंभीर हो चुका है। मगर बेटा सब कुछ वैसा ही नहीं हो जाया करता जैसा हम चाह लिया करते हैं। यथार्थ सच्चाई नाम की भी कोई चीज़ होती है जिसका हमें बेबस होकर ही सही मगर सामना करना पड़ता है और उसे मानना भी पड़ता है। ये तो तू भी अच्छी तरह जानता है कि सोनम तेरी बड़ी मौसी की लड़की है और रिश्ते में वो तेरी बड़ी बहन लगती है। सोनम की माॅ मेरी सगी बहन है इस हिसाब से ये रिश्ता सगा ही हो जाता है। अतः सगे रिश्ते के बीच तुम्हारी और सोनम की शादी हर्गिज़ भी नहीं हो सकती। अगर ऐसा होता कि सोनम की माॅ मेरी सगी बहन न होकर दूर के किसी रिश्ते से बहन लगती तो ऐसा हो भी सकता था। इस लिए तुम्हें इन सब बातों को सोच समझ कर अपने आपको समझाना होगा। मुझे पता है कि अभी ये सब तेरे लिए बहुत मुश्किल होगा मगर ये करना ही होगा बेटा। वरना अभी जिस बात से तुम्हें इतनी तक़लीफ हो रही है उसी बात से आगे चल कर और भी ज्यादा तक़लीफ होगी। दुनियाॅ में एक से बढ़ कर एक खूबसूरत लड़कियाॅ हैं, तू जिस लड़की से कहेगा हम उस लड़की से तेरी शादी करेंगे। मगर प्लीज सोनम का ख़याल अपने दिलो दिमाग़ से निकाल दे। इसी में सबकी भलाई है।"

"ठीक है माॅम।" शिवा ने गहरी साॅस ली और फिर एकाएक ही उसके चेहरे पर दृढ़ता के भाव आए, बोला____"अगर ऐसी बात है तो ठीक है। अब मैं कभी आपसे नहीं कहूॅगा कि आप सोनम से मेरी शादी करवा दीजिए। ख़ैर एक बात कहूॅ माॅम, पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि जैसे ईश्वर ने मुझे मेरे पापों की सज़ा देना शुरू कर दिया है। हाॅ माॅम, ये सज़ा ही तो है कि मुझे एक ऐसी लड़की से बेपनाह मोहब्बत हो गई जो मेरी बहन लगती है और जो मुझे नसीब ही नहीं हो सकती कभी। वरना ईश्वर अगर चाहता तो मुझे दूसरी किसी ऐसी लड़की से प्यार करवाता जो मुझे सहजता से मिल जाती। मगर नहीं उसे तो मेरे पापों की सज़ा देना था न मुझे। इस लिए ऐसा कर दिया उसने। कोई दूसरा इन सब बातों को समझे या न समझे माॅम मगर मैं अच्छी तरह समझ गया हूॅ और अगर अपने दिल की सच्चाई बयां करूॅ तो वो ये है कि मुझे ईश्वर के इस फैंसले पर कोई शिकायत नहीं है। अगर ये सब करके वो मुझे मेरे पापों की सज़ा ही देना चाहता है तो ठीक है माॅम मुझे स्वीकार है ये। हर ब्यक्ति को अपने कर्मों का फल मिलता है, फिर चाहे उसके अच्छे कर्मों का हो या बुरे कर्मों का। कितनी अजीब बात है न माॅम कि कुछ लोग सारी ज़िंदगी पाप करते हैं मगर उनको उनके पाप कर्म की सज़ा अंत में मिलती है मगर मुझे तो अभी से मिलना शुरू हो गई।"

शिवा की बातें सुन कर प्रतिमा हैरत से ऑखें फाड़े देखती रह गई उसे। उससे कुछ कहते तो न बन पड़ा था किन्तु ये समझने में उसे ज़रा भी देरी न हुई कि उसके बेटे का मानसिक संतुलन आज इस हद तक बिगड़ गया है अथवा उसकी सोच इस हद तक बदल गई है कि वो इस सबको अपने पाप कर्मों की सज़ा समझने लगा है। कहते हैं कि किसी ब्यक्ति को आप सारी ज़िदगी अच्छी चीज़ों का बोध कराते रहो मगर उसे अगर नहीं समझना होता है तो वो सारी ज़िंदगी नहीं समझता मगर वक्त और हालात के पास ऐसी खूबियाॅ होती हैं जिनके आधार पर वह पलक झपकते ही इंसान को आईना दिखा कर सब कुछ समझा देता है और मज़े की बात ये कि इंसान को समझ में भी आ जाता है। यही हाल शिवा का था। उसे सब कुछ समझ आ चुका था, मगर कहते हैं न कि "का बरसा जब कृषि सुखाने"। बस वही दसा थी उसकी।

"ख़ैर छोंड़िये इन सब बातों को माॅम।" उधर शिवा ने जैसे प्रतिमा को होशो हवाश में लाते हुए कहा___"अब से मैं कभी आपसे ऐसी बातें नहीं करूॅगा। आप ये सब डैड से भी मत बताना। वरना उन्हें लगेगा कि मैं भरपूर जवां मर्द होते हुए भी इस सबके चलते बेहद कमज़ोर हो गया हूॅ। वो इस बात को नहीं समझेंगे कि इस सबसे तो मैं और भी मजबूत हो गया हूॅ। मोहब्बत की चोंट को जो इंसान सह जाए उससे मजबूत इंसान भला दूसरा कौन हो सकता है?"

प्रतिमा को समझ न आया कि वह अपने बेटे की इन सब बातों का क्या जवाब दे। किन्तु उसकी बातें उसे आश्चर्यचकित ज़रूर किये हुए थीं। काफी देर तक वह गंभीर मुद्रा में ठगी सी बैठी रही। होश तब आया जब एकाएक ही ड्राइंग रूम में एक तरफ टेबल पर रखे लैण्ड लाइन फोन की घंटी घनघना उठी थी।

"हैलो।" शिवा अपनी जगह से उठ कर तथा फोन के रिसीवर को कान से लगाते ही कहा।
"ओह शिव बेटा।" उधर से अजय सिंह की जानी पहचानी सी आवाज़ उभरी____"मैंने तुम्हारे नाना जी को ट्रेन में बैठा दिया है और अब मैं यहीं से फैक्ट्री के लिए निकल रहा हूॅ। अतः अब शाम को ही आऊॅगा।"

"ठीक है डैड।" शिवा ने सामान्य भाव से कहा।
"ज़रा अपनी माॅम से बात करवाओ।" उधर से अजय सिंह ने कहा।
"एक मिनट डैड।" शिवा ने कहने के साथ ही पलट कर प्रतिमा की तरफ देखा और उसे बताया कि डैड उससे बात करना चाहते हैं।

"हाॅ बोलो अजय।" प्रतिमा ने शिवा से रिसीवर लेकर उसे अपने बाएं कान से लगाते हुए कहा___"क्या बता है? पापा को ट्रेन में सकुशल बैठा दिया है न तुमने?"
"हाॅ उन्हें ट्रेन में बैठा कर अभी अभी स्टेशन से बाहर आया हूॅ।" उधर से अजय सिंह ने कहा____"और अब मैं यहीं से फैक्ट्री जा रहा हूॅ। काफी दिन से नहीं गया हूॅ तो वहाॅ जाना भी ज़रूरी है। बाॅकी सब ठीक है न?"

"हाॅ बाॅकी सब तो ठीक ही है।" प्रतिमा ने कहा___"नीलम, सोनम को अपना ये गाॅव तथा अपने खेत दिखाने ले गई है। सोनम ने उससे कहा होगा कि उसे ये गाॅव और उसके खेत देखना है। अतः नीलम के साथ गई है वो।"

"ये क्या कह रही हो तुम?" उधर से अजय सिंह ने बुरी तरह चौंकते हुए कहा___"उन दोनो को तुमने जाने कैसे दिया प्रतिमा? क्या तुम्हें पता नहीं है कि वो वहाॅ से भागने के उद्देश्य से भी ये कहा होगा कि उन्हे गाॅव तथा खेत देखना है? उफ्फ प्रतिमा तुमने ये क्या बेवकूफी की?"

"फिक्र मत करो अजय।" प्रतिमा ने कहा___"उन दोनो के साथ मैने दो ऐसे आदमियों को भी भेजा है जिन आदमियों को तुम्हारे दोस्त तुम्हारी मदद के लिए यहाॅ भेज कर गए थे। उन आदमियों के रहते वो कहीं भी नहीं जा सकती।"

"अरे वो आदमी साले क्या कर लेंगे?" उधर से अजय सिंह ने खीझते हुए कहा___"तुम्हें तो पता है कि उस साले विराज ने एक साथ हमारे उतने सारे आदमियों का काम तमाम कर दिया था तो फिर ये क्या कर लेंगे उसका? ओफ्फो प्रतिमा तुम्हें उन दोनों को जाने ही नहीं देना चाहिए था। मुझे तुमसे ऐसी बेवकूफी की उम्मीद हर्गिज़ भी नहीं थी।"

"तुम बेवजह ही इतना परेशान हो रहे हो डियर।" प्रतिमा ने कहा___"मुझे भी पता है कि हालात कैसे हैं और इन हालातों में क्या हो सकता है? मैं उन दोनो को गाॅव तथा खेत देखने जाने से भला कैसे रोंक सकती थी? इसी लिए मैंने उनके साथ उन दो आदमियों को भेजा है। बात इतनी सी ही बस नहीं है बल्कि दूर का सोचते हुए मैने उनके जाने के बाद उनके पीछे लगे रहने के लिए और भी आदमियों को एक टीम बना कर भेजा है। ऐसा इस लिए कि अगर वो दोनो सचमुच यहाॅ से भागने का ही ये गाॅव तथा खेत देखने का बहाना बनाया होगा तो वो किसी भी तरह से भागने में कामयाब न हो सकेंगी। दिखावे के लिए तथा सिचुएशन को सामान्य दिखाने के लिए मैने उन दोनो के साथ सिर्फ दो ही आदमी उनकी सुरक्षा के तहत भेजे किन्तु उनकी जानकारी के बिना कुछ और आदमियों की टीम को ये सोच कर उनके पीछे भेजा कि अगर ये उनका यहाॅ से भागने का ही प्लान था तो ये भी ज़ाहिर है कि ये प्लान उन्होंने खुद नहीं बनाया होगा बल्कि यहाॅ से इस तरह निकलने का प्लान विराज ने ही उन्हें बताया होगा और कहा होगा कि वो दोनो हवेली से बाहर निकल कर किसी ऐसे स्थान पर पहुॅचेंगी जहाॅ से उन दोनो को वो बड़ी आसानी से किन्तु बड़ी सावधानी से हमारे उन दोनो आदमियों के साथ रहने के बावजूद अपने साथ ले जा सकें। विराज की इसी चाल को मद्दे नज़र रखते हुए मैने उन दोनो के पीछे कुछ और आदमियों को एक मजबूत टीम बना कर भेजा है तथा साथ ही ये भी उन्हें कह दिया है कि अगर सचमुच वहाॅ ऐसा कुछ होता दिखे तो वो बेझिझक दूसरी पार्टी यानी विराज व रितू पर गोलियाॅ चला सकते हैं। किन्तु इतना ज़रूर ध्यान देंगे कि उनकी गोलियों से उन दोनो में से किसी की भी मौत न हो जाए। बल्कि उन्हें इस स्थित में लाना है कि वो कुछ करने के लायक न रह जाएॅ। उसके बाद वो उन्हें पकड़ कर हमारे फार्महाउस पर ले आएॅगे।"

"अगर ऐसा है तो फिर ठीक है।" उधर अजय सिंह ने मानो राहत की साॅस ली थी, बोला___"मगर मुझे इस सबसे भी संतुष्टि नहीं हो रही प्रतिमा। पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है कि हमारे इतने आदमियों के रहते हुए भी वो कमीना उन दोनो को अपने साथ ले जाने में कामयाब हो जाएगा।"

"ऐसा तुम इस लिए कह रहे हो डियर।" प्रतिमा ने सहसा मुस्कुरा कर कहा___"क्योंकि तुमने अभी तक इस मामले में कोई सफलता हाॅसिल नहीं की है। हर बार तुमने अपने आदमियों की वजह से नाकामी का स्वाद चखा है। इस लिए तुम्हें इस सबके बावजूद विश्वास या संतुष्टि नहीं हो रही कि हमारे आदमी विराज के मंसूबों को नाकाम कर पाएॅगे।"

"ये तो सच कहा तुमने प्रतिमा।" अजय सिंह बोला___"पर क्या करूॅ यार हालात हर दिन पहले से कहीं ज्यादा गंभीर व बदतर होते जा रहे हैं। मैं ये किसी भी कीमत पर नहीं चाहता हूॅ कि एक और नाकामी की मुहर मेरे माथे की शोभा बढ़ाने लगे। इस लिए मैं खुद ही आ रहा हूॅ वहाॅ। फैक्ट्री जाना इतना भी ज़रूरी नहीं है। मैं आ रहा हूॅ डियर। इस बार मैं उस हरामज़ादे को कामयाब नहीं होने दूॅगा।"

"ठीक है माई डियर।" प्रतिमा ने कहा___"तुम्हें जैसा अच्छा लगे करो। वैसे कब तक पहुॅच जाओगे यहाॅ?"
"जितना जल्दी पहुॅच सकूॅ।" अजय सिंह ने कहा___"ख़ैर चलो रखता हूॅ फोन।"

इसके साथ ही काल कट हो गई। अजय सिंह से बात करने के बाद प्रतिमा पलट कर वापस सोफे की तरफ आई और बैठ गई। चेहरे पर अनायास ही गंभीरता छा गई थी उसके। फिर उसने शिवा की तरफ देखते हुए कहा___"बेटा सविता से कहो कि अच्छी सी चाय बना कर लाए मेरे लिए।"
"ओके माॅम।" शिवा ने कहा और सोफे से उठ कर अंदर की तरफ चला गया।
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उधर मुम्बई में।
ब्रेक फास्ट करने के लिए सब एक साथ ही बैठे हुए थे। जिनमें जगदीश ओबराय, अभय सिंह, पवन, दिव्या, आशा तथा निधी बैठे हुए थे। गौरी, रुक्मिणी तथा करुणा सबके लिए नास्ता परोस रही थीं। ब्रेकफास्ट करते हुए सबके बीच थोड़ी बहुत बातचीत भी हो रही थी। किन्तु इस बीच आशा की निगाहें थोड़े थोड़े समय के अंतराल से निधी पर पड़ ही जाती थी।

निधी जो कि अब ज्यादातर ख़ामोश ही रहती थी। वो किसी से भी खुद से कोई बात नहीं करती थी। हलाॅकि सब यही चाहते थे कि वो सबसे बातें करे तथा अपनी शरारत भरी बातों से माहौल को सामान्य बनाए रखे मगर ऐसा हो नहीं रहा था। सबने उससे पूछा भी था कि वो अचानक इस तरह चुप चुप तथा गुमसुम सी क्यों रहने लगी है मगर उसने बस यही कहा था कि वो बस अपने भइया के चले जाने से ऐसी हो गई है। उसकी बातों को सब यही समझ रहे थे विराज जिस काम से गया है वो यकीनन बहुत ख़तरे वाला है जिसके बारे में सोच कर निधी इस तरह चुप हो गई है। आख़िर ये बात तो सब जानते ही थे कि निधी विराज की जान है तथा निधी भी अपने भाई पर जान छिड़कती है। मगर असलियत से आशा के अलावा हर कोई अंजान था।

चुपचाप नास्ता कर रही निधी की नज़र सहसा सामने ही कुर्सी पर बैठी तथा नास्ता कर रही आशा पर पड़ी तो वो ये देख कर एकाएक ही सकपका गई कि आशा उसे ही एकटक देखे जा रही है। उसके ज़हन में पलक झपकते ही सुबह का डायरी वाला सीन याद आ गया। उसके दिमाग़ ने काम किया और उसे ये सोचने पर मजबूर किया कि आशा दीदी उसे इस तरह एकटक क्यों देखे जा रही हैं। उनकी ऑखों में कुछ ऐसा था जिसने निधी को अंदर तक हिला सा दिया था और फिर एकाएक ही जैसे उसके दिमाग़ की बत्ती रौशन हुई। उसके मन में ख़याल उभरा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आशा दीदी ने उसके सोते समय डायरी को हाॅथ ही नहीं लगाया हो बल्कि उसे पढ़ भी लिया हो। इस ख़याल के आते ही निधी की हालत पल भर में ख़राब हो गई। मन के अंदर बैठा चोर इतना घबरा गया कि फिर उसमें नज़र उठा कर दुबारा आशा की तरफ देखने की हिम्मत न हुई।

निधी ने नोटिस किया कि जिस अंदाज़ से आशा उसे देख रही थी उससे तो यही लगता है कि उसने डायरी में लिखी बातें पढ़ ली हैं और जान गई है कि उसमें लिखे गए हर लफ्ज़ का मतलब क्या है? निधी की हालत ऐसी हो गई कि अब उससे वहाॅ पर बैठे न रहा गया। उसने जो खाना था खा लिया और फिर वह एक झटके से उठी और ऊपर अपने कमरे की तरफ तेज़ तेज़ क़दम बढ़ाते हुए चली गई। कमरे में जाकर उसने स्कूल की यूनीफार्म पहनी तथा अपना स्कूली बैग उठाया और फिर फौरन ही कमरे से बाहर आ गई।

उसे इतना जल्दी बाहर आते देख हर कोई चौंका मगर चूॅकि उसके स्कूल जाने का समय होने ही वाला था अतः इस पर ज्यादा किसी ने ग़ौर न किया। उसने दूर से ही हाॅथ हिला कर सबको बाय किया और बॅगले से बाहर की तरफ बढ़ गई। बाहर आते ही उसने एक ऐसे आदमी को आवाज़ दी जो हर दिन कार से उसे स्कूल छोंड़ने और स्कूल से लाने का काम करता था। ख़ैर, कुछ ही देर में निधी कार में बैठ कर स्कूल की तरफ रवाना हो गई। किन्तु अब उसका मन बेहद अशान्त हो चुका था। उसे ये डर सताने लगा था कि अगर सचमुच आशा ने उसकी डायरी पढ़ ली होगी तो उसे यकीनन पता चल गया होगा कि वो अपने ही सगे भाई से प्यार करती है और आज कल उसी के ग़म में गुमसुम रहने लगी है।

निधी को प्रतिपल ये सब बातें और भी ज्यादा चिंतित व परेशान किये जा रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे? कैसे अब वो अपनी आशा दीदी के सामने जाएगी तथा उन्हें अपना चेहरा दिखाएगी? अगर आशा ने उससे इस बारे में कुछ पूछा तो वो क्या जवाब देगी? उसे पहली बार एहसास हुआ कि डायरी लिख कर उसने कितनी बड़ी ग़लती की है। वरना किसी को इस बात का पता ही न चलता कि उसके दिल में क्या है। मगर अब क्या हो सकता था? तीर तो कमान से निकल चुका था। अतः अब तो बस इंतज़ार ही किया जा सकता था इस सबके परिणाम का। निधी के मन ही मन ये निर्णय लिया कि अब वो आशा दीदी के सामने नहीं जाएगी और ना ही उनसे कोई बात करेगी। मगर उसे खुद लगा कि ऐसा संभव नहीं हो सकता। उसे उनका सामना तो करना ही पड़ेगा क्योंकि वो ज्यादातर उसके पास ही रहती हैं तथा रात में उसके ही कमरे में उसके साथ एक ही बेड पर सोती भी हैं।

ये मामला ही ऐसा था कि इसने निधी की हालत को इस तरह कर दिया था जैसे अब उसके अंदर प्राण ही न बचे हों। वह एकदम से जैसे ज़िदा लाश में तब्दील हो गई हो। उसके मन में ये भी ख़याल उभरा कि अगर आशा दीदी ने वो सब किसी से बता दिया तो क्या होगा? उसकी माॅ गौरी तो उसे जीते जी जान से मार देगी। कोई उसके अंदर की भावनाओं को नहीं समझेगा बल्कि सब उसे ग़लत ही समझेंगे। अगर ये भी कहें तो ग़लत न होगा कि उसने ये सब अपनी नई नई जवानी को बर्दाश्त न कर पाने की गरज़ से अपने ही भाई को फॅसाने का सोच कर किया होगा। इस ख़याल के आते ही निधी को आत्मग्लानि के चलते बेहद दुख हुआ। उसकी झील सी नीली ऑखों से पलक झपकते ही ऑसूॅ छलक कर गिर पड़े। किन्तु उसने जल्दी से उन्हें ये सोच कर पोंछ भी लिया कि कहीं ड्राइवर उसे बैकमिरर के माध्यम से ऑसू बहाते देख न ले।

सारे रास्ते इन सब बातों को सोचते हुए निधी को पता ही नहीं चला कि वो कब स्कूल पहुॅच गई? होश तब आया जब ड्राइवर ने उससे कहा कि उसका स्कूल आ गया है। ड्राइवर पचास की उमर का ब्यक्ति था। उसका ये रोज़ का ही काम था। उसे निधी से काफी लगाव भी हो गया था। उसे वो अपनी बेटी की तरह मानता था। पिछले कुछ समय से वो खुद भी देख रहा था कि निधी एकाएक ही गुमसुम सी हो गई है। उसने भी कई बार इस बारे में उससे पूछा था मगर निधी ने उससे भी यही कहा था कि वो अपने भइया के लिए दुखी रहती है। भला वो किसी से अपने गुमसुम रहने की वजह कैसे बता सकती थी?

कार से उतर कर निधी बहुत ही बोझिल मन से अपने स्कूल के मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ती चली गई। स्कूल में उसकी अच्छी अच्छी कई सहेलियाॅ बन गई थी। वो सब भी निधी की इस ख़ामोशी से परेशान व चिंतित थी। मगर वो कर भी क्या सकती थी?

इधर निधी के जाने के थोड़ी देर बाद ही आशा निधी के कमरे में पहुॅची। कमरे को उसने अंदर से कुंडी लगा कर बंद किया और फिर पलट कर निधी की डायरी की तलाश करने लगी। मगर बहुत ढूॅढ़ने पर भी उसे निधी की वो डायरी कहीं न मिली। उसने हर जगह बड़ी बारीकी से चेक किया मगर डायरी तो जैसे गधे के सिर का सींग हो गई थी। सहसा आशा को ख़याल आया कि निधी अपनी डायरी को ऐसी वैसी जगह नहीं रख सकती जिससे वो किसी के हाॅथ लग जाए। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसी डायरी वो किसी के हाॅथ लगने भी कैसे दे सकती थी जिसे किसी के द्वारा पढ़ लिए जाने के बाद उस पर क़यामत टूट पड़ती। मतलब साफ है कि उसने उस डायरी को ऐसी जगह छुपा कर रखा होगा जहाॅ से मिलना किसी दीगर ब्यक्ति के लिए लगभग असंभव ही हो।

इस ख़याल के तहत आशा ने सोचा कि ऐसी जगह तो इस कमरे में कदाचित आलमारी और आलमारी के अंदर वाला लाॅकर ही हो सकता है जहाॅ पर निधी ने अपनी डायरी छुपाई हो सकती है। अतः आशा ने आगे बढ़ कर आलमारी खोला और आलमारी के अंदर मौजूद लाॅकर को चेक किया तो उसे लाॅक पाया। अंदर के उस लाॅकर की चाभी को उसने ढूॅढ़ना शुरू कर किया मगर चाभी कहीं नहीं मिली उसे। आलमारी में रखी एक एक चीज़ तथा एक एक कपड़े को उलट पलट कर देखा उसने मगर चाभी कहीं न मिली। थक हार कर फिर उसने हर चीज़ को उसी तरह जमा कर रखना शुरू किया जैसे वो पहले रखी हुई थीं उसके बाद वह बेड पर आकर धम्म से बैठ गई और गहरी गहरी साॅसें लेने लगी।

काफी देर तक बेड पर बैठी वो चाभी के बारे में सोचती रही फिर उसे लगा कि संभव है कि लाॅकर की चाभी निधी अपने पास ही रखती हो। यानी इस वक्त वो चाभी उसके पास उसके स्कूली बैग में ही होगी। बात भी सच थी आख़िर वो चाभी अपने पास ही तो रखेगी वरना ऐसे में तो कोई भी उसकी चाभी ढूॅढ़ कर लाॅकर खोल सकता था तथा उसकी डायरी निकाल सकता था और फिर उसे पढ़ भी सकता था। आशा को ये बात सौ परसेन्ट जॅची।

आशा की ऑखों के सामने सुबह ब्रेकफास्ट करते वक्त का सीन फ्लैश करने लगा। जब वो बार बार निधी की तरफ देख रही थी और फिर निधी ने भी उसको अपनी तरफ एकटक देखते हुए देखा था। उस वक्त उसकी हालत बहुत ही दयनीय सी हो गई थी। आशा को समझते देर न लगी कि निधी को उसके इस तरह देखने से ये समझ में आ गया होगा कि उसने सुबह उसकी डायरी को शायद पढ़ लिया होगा और उसका राज़ जान चुकी होगी। ये सोच ही उसकी हालत ख़राब हो गई थी। आशा जानती थी कि प्यार करना कोई जुर्म नहीं है, किन्तु यही प्यार अगर बहन अपने ही भाई से कर बैठे तो यकीनन ये अनुचित तथा ग़लत हो जाता है। कदाचित यही वजह थी कि निधी की वैसी हालत हो गई थी। उसे डर सताने लगा था कि आशा दीदी उसके बारे में क्या क्या सोचेंगी और अगर ये बात किसी को बता दिया तो इसका क्या अंजाम हो सकता है।

आशा को ये भी एहसास था कि विराज है ही ऐसा कि उससे कोई भी लड़की प्यार कर बैठेगी। फिर चाहे वो बाहरी लड़की हो या फिर खुद उसकी ही बहन। वो खुद भी तो विराज को शुरू से ही अपना सब कुछ मानती आ रही थी। उसे खुद नहीं पता था कि वो कब विराज को अपना दिल दे बैठी थी और फिर जब उसे एहसास हुआ कि वो विराज को बेपनाह प्यार करने लगी है तो एकाएक ही हॅसती खेलती आशा का समूचा अस्तित्व ही बदल गया था। आज जिस ख़ामोशी को निधी ने अख़्तियार कर लिया था उसी ख़ामोशी को एक दिन उसने भी तो ऐसे ही अख़्तियार कर लिया था। अपने प्रेम को उसने विराज के सामने कभी उजागर नहीं किया क्योंकि उसे पता था कि विराज उसे अपनी बहन ही मानता है। दूसरी बात अगर वो उससे अपने प्रेम का इज़हार करती भी तो बहुत हद तक संभव था कि विराज उसे ग़लत समझ बैठता या उसके इस प्रेम को ये कह कर ठुकरा देता वो ऐसा सोच भी कैसे सकती हैं? दूसरी बात, एक तो उमर में वो विराज से बड़ी थी दूसरे आर्थिक तंगी के चलते उसकी शादी भी नहीं हो रही थी। इस सबसे विराज को ही नहीं बल्कि सबको भी यही लगता कि आशा से अपनी जवानी की गर्मी बर्दास्त नहीं हुई इस लिए उसने विराज के साथ संबंध बनाने के लिए प्यार का नाटक शुरू कर दिया है। तीसरी महत्वपूर्ण बात वो भले ही चुलबुल व नटखट स्वभाव की थी किन्तु सिर्फ अपने भाइयों के लिए बाॅकी बाहरी लोगों के सामने उसने कभी अपना सिर तक न उठाया था। लोक लाज तथा घर की मान मर्यादा का ख़याल ही था जिसने उसके लब हमेशा के लिए सिल दिये थे।

जब उसे डायरी के द्वारा ये पता चला कि निधी अपने ही भाई से प्यार करती है तो सहसा उसे झटका सा लगा था और उसके दिल में भावनाओं और जज़्बातों का ये सोच कर भयंकर तूफान उठा था कि जिस विराज को वो अपना सब कुछ मानती आ रही है उस पर तो उसका कोई हक़ ही नहीं है। बल्कि सबसे पहला हक़ तो उसकी खुद की बहन का ही हो गया है। उसने भी सोच लिया कि चलो यही सही। प्यार मोहब्बत तो कम्बख़्त नाम ही उस बला का है जो सिर्फ दर्द देना जानती है इश्क़ करने वालों को। उसे निधी पर बेहद तरस भी आया कि इस मासूम ने उस शख्स से दिल का रोग लगा लिया जो इसका हो ही नहीं सकता। ये समाज ये दुनिया कभी भाई बहन के इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करेगी। दुनियाॅ की छोंड़ो खुद उसके ही माॅ बाप या संबंधी इसके खिलाफ हो जाएॅगे। कहने का मतलब ये कि मोहब्बत ने एक और शिकार फाॅस लिया बेइंतहां दर्द और तक़लीफ देने के लिए।

आशा जानना चाहती थी कि निधी को अपने ही भाई से इस हद तक प्यार कैसे हो गया है? आख़िर ऐसे क्या हालात बन गए थे जिसके तहत निधी ने ये रोग लगा लिया था? दूसरी बात क्या ये बात विराज को भी पता है कि उसकी लाडली बहन उससे इस हद तक प्यार करती है? उसे पता था कि डायरी एक ऐसी चीज़ होती है जिसमें हर इंसान अपने अंदर की हर सच्चाई को पूर्णरूप से सच ही लिखता है। अतः संभव है कि निधी ने भी उस डायरी में वो सब लिखा हो जिसके तहत उसे पता चलता कि किन हालातों में ऐसा हुआ था? हलाॅकि उसे ये भी पता था कि किसी भी इंसान की पर्शनल डायरी उसकी इजाज़त के बिना पढ़ना निहायत ही ग़लत होता है मगर फिर भी वो पढ़ना चाहती थी।

आशा सोच रही थी कि ब्रेकफास्ट करते वक्त निधी की जो हालत हुई थी उससे कहीं वो कुछ उल्टा सीधा करने का न सोच बैठे। ये मामला ही ऐसा है कि वो इस सबसे बहुत डर जाएगी और किसी के पता चल जाने के डर से वो कुछ उल्टा सीधा करने का सोच बैठे। बेड पर बैठी आशा को एकाएक ही हालात की गंभीरता का एहसास हुआ। उसका दिल बुरी तरह धड़कने लगा। उसे निधी की चिंता सताने लगी। उसने फौरन ही निधी से बात करने का सोचा। किन्तु उसके पास खुद का कोई मोबाइल नहीं था।

आशा अतिसीघ्र बेड से नीचे उतरी और भागते हुए कमरे से बाहर आई और फिर नीचे की तरफ दौड़ पड़ी। थोड़ी ही देर में वो गौरी आदि लोगों के पास पहुॅच गई। उसने खुद के चेहरे पर उभर आए घबराहट के भावों को जल्दी से छुपाया और लगभग सामान्य लहजे में ही गौरी से मोबाइल फोन माॅगा। किन्तु गौरी ने बताया कि मोबाइल तो उसके पास है ही नहीं, उसे तो मोबाइल चलाना ही नहीं आता। दूसरी बात ये कि उसे मोबाइल की कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी। गौरी की ये बात सुनकर आशा बुरी तरह परेशान हो गई। लाख कोशिशों के बावजूद उसके चेहरे पर से परेशानी के वो भाव न मिट सके जो उसके चेहरे पर ढेर सारे पसीने में भींगे दिखने लगे थे। जिसका नतीजा ये हुआ कि गौरी पूछ ही बैठी उससे कि क्या बात है वो इतना परेशान क्यों हो गई है। गौरी की बात का उसने आनन फानन में ही जवाब दिया। तभी वहाॅ पर करुणा भी आ गई। गौरी ने कुछ सोचते हुए करुणा से कहा कि वो अपना मोबाइल फोन आशा को दे दे।

करुणा ने अपना मोबाइल फोन आशा को ये पूछते हुए दे दिया कि क्या बात है तुम इतना परेशान क्यों नज़र आ रही हो। कुछ बात है क्या? आशा ने कहा नहीं चाची ऐसी कोई बात नहीं है वो क्या है कि उसे गुड़िया को फोन करना है तथा उससे पूछना है कि आज वो इतना जल्दी स्कूल क्यों चली गई थी? आपने देखा नहीं था क्या उसने ठीक से नास्ता भी नहीं किया है आज? आशा की इन बातों से गौरी, करुणा तथा रुक्मिणी सहज हो गईं। उन्हें भी बात सही लगी। क्योंकि उन्होंने भी देखा था कि निधी ने बस थोड़ा बहुत ही खाया था और फिर स्कूल चली गई थी। ख़ैर आशा का निधी के लिए इस तरह चिंता करना उन सबको बहुत अच्छा लगा।

करुणा से मोबाइल लेकर आशा फौरन ही वापस कमरे में आई और उसने फिर से दरवाजा उसी तरह अंदर से कुंडी लगा कर बंद कर दिया। उसके बाद वो बेड पर आ कर बैठ गई। फिर जाने उसे क्या सूझा कि वह बेड से उठी और कमरे से ही अटैच बाथरूम की तरफ बढ़ गई। बाथरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर उसने मोबाइल पर निधी का नंबर निकाला और फिर उसे काल लगा कर मोबाइल अपने कान से लगा लिया। इस वक्त उसके चेहरे पर गहन चिंता व परेशानी स्पष्ट रूप से उभर आई थी। रिंग की आवाज़ जाती सुनाई दी उसे और इसके साथ ही उसकी धड़कनें भी बढ़ गईं। मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना भी करने लगी कि सब कुछ ठीक ही हो।

"ह..हैलो।" तभी उधर से निधी का लगभग घबराया हुआ सा स्वर उभरा___"च..चाची वो मैं.....।"
"गुड़िया।" निधी की बात को काटते हुए आशा ने फौरन ही कहा___"मैं तेरी आशा दीदी बोल रही हूॅ और हाॅ फोन मत काटना तुझे राज की क़सम है।"

"द..दीदी आप??" उधर से निधी का बुरी तरह उछला हुआ किन्तु घबराया हुआ स्वर फूटा था।
"गुड़िया।" आशा ने असहज भाव से किन्तु समझाते हुए कहा___"देख तू कोई भी उल्टा सीधा करने का ख़याल अपने मन में मत लाना। अगर तू ये सोच कर डर गई है कि मुझे डायरी के माध्यम से तेरा राज़ पता चल गया है और मैं उसकी वजह से तुझे कुछ कहूॅगी या फिर वो सब किसी से कह दूॅगी तो तू उस सबकी वजह से डर मत और ना ही उससे घबरा कर कुछ ग़लत क़दम उठाने का सोचना। मैं तुझे उसके लिए कुछ नहीं कहूॅगी गुड़िया और ना ही किसी को बताऊॅगी। मुझे पता है कि ये प्यार व्यार ऐसे ही होता है जो रिश्ते नाते नहीं देखता। अतः तू इस सबके लिए बिलकुल भी मत घबराना और ना ही फालतू का टेंशन लेना। तू सुन रही है न गुड़िया???"

"हम्म।" उधर से निधी का बहुत ही धीमा स्वर उभरा।
"मुझे इस बात के लिए माफ़ कर दे गुड़िया।" आशा ने सहसा दुखी भाव से कहा___"कि मैने तेरी डायरी को छुआ और उसे खोल कर पढ़ा भी। किन्तु ये सब मैने जान बूझ कर नहीं किया था। बल्कि वो सब अंजाने में हो गया था। दरअसल जब मैं तेरे पास सुबह तेरे लिए चाय लेकर आई तो देखा कि तू उस डायरी को अपने दोनो हाॅथों से पकड़े सो रही थी। मुझे लगा ऐसी डायरी तेरी पढ़ाई में तो उपयोग होती नहीं होगी तो फिर ये कैसी डायरी है तथा क्या है इसमें जिसे इस तरह लिये तू सो रही है? बस यही जानने के लिए मैने उस डायरी को तेरे हाॅथों से लेकर उसे खोला। किन्तु मुझे उसमें वो सब पढ़ने को मिल गया। लेकिन गुड़िया मैने और कुछ नहीं पढ़ा उसमें। शुरू का ही पेज पढ़ा था और वो ग़ज़ल पढ़ी थी जिसमें तूने लिखा था___"बताना भी नहीं मुमकिन, हाॅ ऐसे ही कुछ लिखा था उसमे।"

"क..क्या आप सचमुच इस सबके लिए मुझसे नाराज़ या गुस्सा नहीं हैं दीदी?" उधर से निधी का अभी भी धीमा ही स्वर उभरा था।
"हाॅ गुड़िया।" आशा ने सहसा मुस्कुरा कर कहा___"मैं तुझसे बिलकुल भी नाराज़ नहीं हूॅ। भला मैं तुझसे नाराज़ हो भी कैसे सकती हूॅ पागल? किन्तु हाॅ इस बात से दुखी ज़रूर हूॅ कि सबको अपनी शरारतों से परेशान करने वाली मेरी ये लाडली बहन ने एकाएक ही खुद को उदासी की चादर में ढाॅफ लिया है।"

"वक्त और हालात हमेशा एक जैसे तो नहीं हो सकते न दीदी।" उधर से निधी ने अजीब भाव से कहा___"इंसान के जीवन में कभी खुशी तो कभी ग़म वाला समय तो आता जाता ही रहता है। मेरे पास इसके पहले वैसे ही वक्त और हालात थे जबकि मैं खुश रहा करती थी और शरारतें करने के सिवा कुछ नहीं आता था मुझे। मगर अब हालात बदल गए हैं। ईश्वर को मेरा खुश रहना और मेरा वो शरारतें करना शायद अच्छा नहीं लगा तभी तो उसने मुझे दिल का रोगी बना दिया। एक ऐसे इंसान के लिए उसने मेरे दिल में प्रेम का बीज बो दिया जो इंसान मेरा हो ही नहीं सकता। ख़ैर जाने दीजिए दीदी, मैने बहुत हद तक खुद को समझा लिया है। हलाॅकि ये मुश्किल तो था मगर कोई बात नहीं। इतना तो अब सहना ही पड़ेगा न मुझे। मैने भी सोचा कि ऐसे इंसान को पाने की ज़िद भी क्या करना जो मुझे मिल ही न सके और जिसकी वजह से सब कुछ नेस्तनाबूत भी हो जाए।"

निधी की इन बातों ने आशा को जैसे एकदम से ख़ामोश सा कर दिया। उसे समझ न आया कि वो उसकी बातों का क्या जवाब दे? किन्तु इतना एहसास ज़रूर हो गया उसे कि जिस लड़की को सब लोग बच्ची समझते हैं तथा जिसके बारे में ये सोचते हैं कि उसे दुनियादारी की अभी कोई समझ नहीं है वो लड़की दरअसल अब बहुत बड़ी हो गई है। कदाचित इतनी बड़ी कि अपनी इस छोटी सी ऊम्र में भी वो बड़े बड़े बुजुर्गों तथा बड़े बड़े ज्ञानियों को नसीहतें दे सकती है। क्या प्रेम ऐसा भी होता है जो अचानक ही इंसान को इतना बड़ा और इतना बड़ा ज्ञानी बना देता है जिसके चलते वो यथार्थ और ज्ञान की बातें करने लगे?

"आपने ऐसा कह कर यकीनन मेरे दिल को राहत पहुॅचाई है दीदी।" उधर से निधी कह रही थी___"वरना ये सच है कि मैं इस सबसे बहुत ही ज्यादा घबरा गई थी और चिंतित भी हो गई थी। मैं नहीं चाहती दीदी कि मेरी वजह से सब कुछ खत्म हो जाए और अगर सच में आपने किसी से वो सब कुछ बता दिया होता तो ये भी सच है कि फिर मेरे पास आत्म हत्या कर लेने के सिवा कोई दूसरा चारा न रह जाता। मैं किसी को अपना मुह न दिखा पाती और ना ही एक पल के लिए भी वैसी जलालत भरी ज़िंदगी जी पाती।"

"चुप कर तू।" आशा की ऑखों से ऑसुओं का जैसे बाॅध सा फूट पड़ा, बुरी तरह तड़प कर बोली___"ख़बरदार जो दुबारा फिर कभी आत्महत्या वाली बात की। तू सोच भी कैसे सकती है पागल कि मैं किसी से उस बारे में कुछ कह देती? इतनी पत्थर दिल नहीं हूॅ गुड़िया। मेरे सीने में भी तेरी तरह एक ऐसा दिल धड़कता है जिसमें किसी के लिए बेपनाह मोहब्बत जाने कब से अपना आशियां बना कर रहती है।"

"य..ये आप क्या कह रही हैं दीदी??" उधर से निधी का बुरी तरह चौंका हुआ स्वर उभरा___"आप भी किसी से मोहब्बत करती हैं?"
"क्यों गुड़िया?" आशा ने सहसा फीकी मुस्कान के साथ कहा___"क्या मुझे किसी से मोहब्बत नहीं हो सकती? क्या मेरे अंदर एहसास नहीं हैं? अरे मेरे सीने में भी तो ऐसा दिल है जो धड़कना जानता है रे।"

"मेरा वो मतलब नहीं था दीदी।" उधर से निधी ने मानो सकपकाते हुए कहा___"मैं तो बस आपकी इस बात से हैरान हुई थी कि आप भी किसी से मोहब्बत करती हैं। वैसे कौन है वो शख्स जिसे मेरी प्यारी सी दीदी मोहब्बत करती है? मुझे भी तो बताइये न दीदी।"

"बहुत मुश्किल है गुड़िया।" आशा के चेहरे पर एकाएक ही कई सारे भाव आ कर ठहर गए, बोली___"बस यूॅ समझ ले कि एकतरफा मोहब्बत है ये।"
"मोहब्बत तो है न दीदी।" उधर से निधी ने कहा__"इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि वो एकतरफ से है या फिर दोनो तरफ से। मोहब्बत तो मोहब्बत ही होती है चाहे वो किसी की भी तरफ से हो। आप बताइये न किससे मोहब्बत करती हैं आप? मुझे ये जानने की बड़ी तीब्र उत्सुकता हो रही है प्लीज़ बताइये न।"

"मुझे मजबूर मत कर गुड़िया।" आशा की आवाज़ जैसे काॅप सी गई, बोली___"वर्षों से दबे उस मोहब्बत के एहसास को दबा ही रहने दे। क्योंकि मुझे इतने की ही आदत पड़ चुकी है और इतने से दर्द को ही सहने की हिम्मत है मुझमे। वो अगर बाहर आ गई तो फिर मैं उसे और उसके असहनीय दर्द को सम्हाल नहीं पाऊॅगी। इस लिए मुझसे मत पूछ मेरी गुड़िया। मैं तुझे ही क्या उस शख्स को भी नहीं बता सकती जिसे टूट टूट कर वर्षों से चाहा है मैने।"

"हाय दीदी।" उधर से निधी की मानो सिसकी सी निकल गई। कदाचित ऐसा इस लिए क्योंकि दोनो एक ही रोग के रोगी थे। ख़ैर निधी ने कहा___"ये कैसा रोग है दीदी? ये कैसा दर्द है, ये कैसा एहसास है? न जी पाते हैं और ना ही मर पाते हैं। ना चाहते हुए भी उससे फाॅसला कर लेते हैं जिसके बिना पल भी रह नहीं पाते हैं।"

"जाने दे गुड़िया।" आशा के अंदर से एक हूक सी उठी थी जिसने उसे हिला कर रख दिया था, बोली___"ऐसी बातें मत कर वरना इनका असर ऐसा होता है कि फिर एक पल भी सुकून नहीं मिलता। इस लिए ज़रूरी है कि हम अपने मन को अथवा दिल को बहला लें किसी तरह।"

"हाॅ ये तो सच कहा आपने।" निधी ने कहा___"हमें तो हर हाल में खुद को तथा अपने दिल को बहलाना ही होता है। किन्तु अगर आप बताना नहीं चाहती हैं तो कोई बात नहीं। अगर कभी दिल करे कि आपको अपने दिल के बोझ को हल्का करना है तो मुझसे वो सब बता कर ज़रूर खुद को हल्का कर लीजिएगा।"
"चल बाय।" आशा ने गहरी साॅस ली___"अपना ख़याल रखना और हाॅ अपने चेहरे की ये उदासी को कम करने की कोशिश भी करना।"

आशा की इस बात पर उधर से निधी ने हाॅ कहा और फिर काल कट गई। बाथरूम के अंदर एक तरफ की दीवार पर लगे आईने के सामने खड़ी आशा काल कट होने के बाद कुछ देर तक आईने में खुद को देखती रही और फिर सहसा उसके लब थरथराते हुए हिले___"तुझे कैसे बता दूॅ गुड़िया कि मेरे दिल में किस शख्स के प्रति बेपनाह मोहब्बत है? अगर तुझे पता चल जाए कि मुझे भी उसी से मोहब्बत है जिससे तुझे है तो बहुत हद तक संभव है कि तेरा दिल टूट जाएगा और फिर तू सब कुछ जानते समझते हुए भी खुद को बिखर जाने से रोंक नहीं पाएगी।"

आईने में दिख रहे अपने अक्श को एकटक देखती हुई आशा की ऑखों से एकाएक ही ऑसुओं के दो मोती छलकते हुए नीचे बाथरूम के फर्स पर गिर कर मानो फना हो गए। फिर उसने जैसे खुद को सम्हाला और मोबाइल को एक तरफ रख कर उसने वाश बेसिन पर लगे नलके को चला कर उसके पानी से अपने चेहरे को धोना शुरू कर दिया। उसके बाद उसने एक तरफ हैंगर पर टॅगे टाॅवेल से अपने धुले हुए चेहरे को पोंछा और फिर मोबाइल लेकर बाथरूम से बाहर आ गई।
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उधर नीलम व सोनम की तरफ।
नीलम व सोनम जीप की पिछली सीट पर बैठी हुई थी। जीप का ऊपरी हिस्सा यानी कि छत नहीं थी। इस लिए चलते हुए खुली हवा लग रही थी दोनो को तथा इधर उधर का नज़ारा भी स्पष्ट दिख रहा था। जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है कि हल्दीपुर गाॅव आस पास के सभी गाॅव से बड़ा था तथा आस पास के कई गाॅवों की पंचायत भी हल्दीपुर ही थी। अजय सिंह का परिवार हल्दीपुर गाॅव का सबसे ज्यादा संपन्न परिवार था।

नीलम की विराज से पहले ही सारी बातें मैसेज के द्वारा हो चुकी थी। विराज ने उसे प्लान भी समझा दिया था तथा ये भी कहा था कि गाॅव तथा खेत घूमने का बहाना करके निकलना हवेली से किन्तु गाॅव में घूमना ही बस नहीं है बल्कि ऐसी जगह आना है जिस तरफ गाॅव की सीमा का आख़िरी छोर हो तथा जिस तरफ से दूसरे गाॅव यानी कि चिमनी के पहले वाले गाॅव माधोपुर की तरफ जाने वाले रास्ते की तरफ आना है। ऐसा इस लिए कि नीलम व सोनम को गाॅव तथा खेत देखने जाने की जानकारी अगर प्रतिमा द्वारा अजय सिंह को होती है तो वो ज़रूर अपने ससुर जगमोहन सिंह को गुनगुन छोंड़ कर वापस सीघ्रता से मुख्य रास्ते से आएगा। ये भी संभव है कि वो अपने साथ मंत्री के आदमियों को अथवा कुछ ऐसे किराए के टट्टुओं को ले आए जो उन्हें रास्ते में ही मिल जाएॅ तो मुसीबत हो जाए।

इन्हीं सब बातों को सोच कर ही विराज ने नीलम से माधोपुर की तरफ ही आने को कहा था। हल्दीपुर के बगल से ही माधोपुर था उसके बाद चिमनी गाॅव। उधर विराज खुद भी गुनगुन के दस किलो मीटर पहले ही बसे गाॅव रेवती से मुख्य मार्ग से न आ कर घूमते हुए इस तरफ आने वाला था।

नीलम व सोनम दोनो ही ऐसा ज़ाहिर कर रही थीं जैसे सचमुच ही वो दोनो गाॅव देखने निकली हैं हवेली से। विराज ने ये भी कहा था कि संभव है उनके पीछे उसकी माॅम ने और भी ऐसे आदमी लगा दिये हों जो उसकी गतिविधी को नोट करते हुए छुप कर उनका पीछा कर रहे हों। अतः इस बात का ख़याल रखें और अगर वो दिखें तो उनकी वस्तुस्थित से उसे ज़रूर अवगत कराए किन्तु सावधानी से।

नीलम सोनम को बताती जा रही थी कि जब वो छोटी थी तो वो इन जगहों पर कभी कभी घूमने आया करती थी। दोनो ही बातें कर रहीं थी। अब तक दोनो ही गाॅव की सीमा के बाहर की तरफ आ गईं थी। तभी एक जगह ड्राइवर ने जीप को रोंक दिया। ये देख कर दोनो ही चौंकी।

"मैडम अब किधर जाना है?" ड्राइवर ने पीछे पलट कर उन दोनो से पूछा था___"आप तो जानती हैं कि हम दोनो खुद ही यहाॅ पर नये हैं इस लिए हमें रास्तों का कुछ पता नहीं है। अतः आपको जहाॅ जहाॅ घूमना हो हमें बता दीजिए। वैसे आपके भाई शिवा जी ने कहा था कि आपको ये सारा गाॅव देखना है और फिर खेतों की तरफ भी जाना है। इस लिए अब आप बताइये कि यहाॅ से किधर चलना है?"

ड्राइवर की बात सुन कर नीलम के दिमाग़ की बत्ती एकाएक ही रौशन हो उठी और वह मन ही मन ये सोच कर खुशी से झूम उठी कि ड्राइवर को तो यहाॅ के बारे में कुछ पता ही नहीं है। यानी वो अगर चाहे तो कहीं भी चलने को कह सकती है उसे। मगर एकाएक ही उसका मन मयूर ये सोच कर मुरझा भी गया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि इन दोनो को शिवा ने ऐसा ही कुछ पूछने के लिए कहा हो। ताकि मैं अपने तरीके से उसे उस तरफ चलने को कहूॅ जिस तरफ जाने से उसे किसी प्रकार की कोई शंका हो और फिर ये शिवा को मैसेज द्वारा इस सबके बारे में सूचित भी कर दे।

नीलम को अपना ये ख़याल जॅचा। इस लिए उसने ऐसा वैसा कुछ भी करने का ख़याल दिमाग़ से निकाल दिया। किन्तु ये भी उसे पता था कि माधोपुर की तरफ ही उसे जाना है। अतः वो उस तरफ जाने के लिए कोई बहाना मन ही मन में सोचने लगी।

"अरे नीलम।" सहसा सोनम एक तरफ हाॅथ का इशारा करते हुए बोल पड़ी___"वो उस तरफ क्या है?"
"क..कहाॅ दीदी?" नीलम ने भी जल्दी से उस तरफ देखते हुए पूछा जिस तरफ सोनम हाथ से इशारा कर रही थी।

"अरे वहाॅ पर।" सोनम ने अपने उठे हुए हाॅथ को हल्का सा मूवमेंट देते हुए कहा___"उस तरफ देख न। ऐसा लगता है जैसे वहाॅ पर कोई बड़ा सा मंदिर है।"
"अच्छा वो।" नीलम को जैसे दिख गया___"हाॅ वो मंदिर ही है। यहाॅ पर वही एक मंदिर है जो कि काफी प्राचीन मंदिर है। हर साल वहाॅ पर मेला भी लगता है।"

"मुझे उस मंदिर को देखना है नीलम।" सोनम ने सहसा जैसे रिक्वेस्ट की___"मुझे मंदिर में देवी देवताओं के दर्शन करना बहुत अच्छा लगता है। प्लीज इनसे कहो न कि ये मंदिर की तरफ चलें।"

"ठीक है दीदी।" नीलम का मन मयूर एकाएक ही खुशी से फिर झूम उठा था। दरअसल वो मंदिर बगल के ही गाॅव माधोपुर में ही स्थित था। मंदिर को देख कर सोनम ने उसे देखने की इच्छा ज़ाहिर की तो नीलम ये सोच कर खुश हो गई कि अब उस तरफ जाने का शानदार बहाना भी मिल गया है। अतः उसने तुरंत ही ड्राइवर से कहा कि जीप को मंदिर की तरफ मोड़ ले।

ड्राइवर ने ऐसा ही किया। उसे इस सबमें कुछ भी अटपटा नहीं लगा इस लिए वो भी बिना कोई भाव चेहरे पर लाए जीप को मोड़ दिया उस तरफ। इधर जैसे ही जीप माधोपुर में स्थित उस मंदिर की तरफ मुड़ कर चली तो सहसा सोनम ने बड़े ही रहस्यमय ढंग से नीलम की तरफ देखा।

नीलम उसके इस तरह देखने से अभी बुरी तरह चौंकने ही वाली थी कि सहसा उसे ख़याल आया कि ड्राइवर के पास ही लगे बैकमिरर से ड्राइवर उसे चौंकते हुए देख भी सकता है। अतः उसने जल्दी से अपने चेहरे के भावों को छुपाया और फिर सोनम को सामान्य लहजे में ही बताने लगी कि एक बार वो भी उस मंदिर में मेले के समय गई थी।

नीलम आस पास का नज़ारा देखते हुए ही थोड़ी थोड़ी देर के अंतराल में पीछे भी देख रही थी। विराज ने उससे कहा था कि संभव है कि उसके पीछे और भी कुछ आदमी छुप कर आएॅ। अतः उन्हीं को देख रही थी नीलम, मगर अभी तक उसे ऐसा कुछ नज़र न आया था। ये देख कर उसे लगने लगता कि विराज बेवजह ही इतनी दूर की सोच रहा है। जबकि यहाॅ तो ऐसा कुछ भी नहीं है और अगर होता तो क्या ऐसा कुछ नज़र न आता?

नीलम के एक हाॅथ में पहले से ही मोबाइल था। अतः उसने सामान्य तरीके से ही किन्तु सामने की सीट पर बैठे दोनो ही आदमियों की नज़रों को बचा कर मोबाइल की तरफ देखा। (यहाॅ पर मेरे पाठक पूछ सकते हैं कि सामने की सीट पर बैठे वो दोनो आदमियों की पीठ नीलम व सोनम की तरफ थी तो भला नीलम का उनकी नज़रों से बचाने की बात कहाॅ से आ गई तो दोस्तो इसका जवाब ये है कि ड्राइवर के पास ही बैकमिरर लगा होता है जिसमें वो पीछे की चीज़ें देखता है। यहाॅ पर मैं उसी की बात कर रहा हूॅ)। ख़ैर, नीलम ने बड़ी सावधानी से मोबाइल में व्हाट्सएप खोला और फिर विराज को मैसेज करके बताया कि वो अब कहाॅ पहुॅचने वाली है।
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विराज का ख़याल एकदम सही था। अजय सिंह को जब प्रतिमा के द्वारा ये पता चला कि नीलम व सोनम गाॅव तथा खेत देखने गईं हैं तो वो सचमुच गुनगुन से चल दिया था। किन्तु चलने से पहले उसने अपने एक ऐसे आदमी को भी फोन किया जो गुनगुन में ही रहता था तथा कई तरह के ग़ैर कानूनी धंधे करता था। उस आदमी का नाम फिरोज़ खान था। अजय सिंह ने फिरोज़ को फोन करके उसे सारी सिचुएशन से अवगत कराया और फिर तुरंत ही अपने गुर्गों को लेकर चलने को कहा था।

इस वक्त अजय सिंह और फिरोज़ खान दोनो एक ही कार में थे जबकि फिरोज़ खान के बाॅकी सभी गुर्गे पीछे अलग अलग तीन जीपों में थे। सभी के हाॅथों में हथियार के रूप में मौत का सामान था। अजय सिंह के पास भी एक रिवाल्वर था जो कि उसने फिरोज़ खान से लिया था।

"तो ये वही लड़का है ठाकुर साहब।" अजय सिंह की कार में पैसेंजर सीट पर बैठा फिरोज़ खान बोला___"जो आपका भतीजा है तथा जिसने आपका जीना हराम कर रखा है। आपने बताया था कि कैसे इसने आपकी फैक्ट्री में आग लगा दी थी जिसमें आपका बहुत तगड़ा नुकसान हुआ था?"

"हाॅ खान।" अजय सिंह सहसा दाॅत पीसते हुए कह उठा___"ये वही हरामज़ादा है और अब तो उसकी इतनी हिम्मत बढ़ गई है कि इसने पिछले दिन हमें अपने नकली सीबीआई के आदमियों के जाल में फाॅस कर कैद भी कर लिया था। मेरी बड़ी बेटी जो पुलिस में इंस्पेक्टर है उसे भी इस कम्बख्त ने अपनी तरफ मिला लिया है। ख़ैर, मुझे अपनी औलाद से ये उम्मीद नहीं थी खान कि वो अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ हो जाएगी। जैसे औलाद अगर बिगड़ी हुई हो और वो हज़ार पाप कर डाले तब भी माॅ बाप के लिए वो प्रिय ही होती है और वो उसके अपराधों को क्षमा कर देते हैं उसी तरह क्या औलाद नहीं कर सकती? मैंने जो कुछ भी किया था सिर्फ अपने बीवी बच्चों के उज्वल भविष्य के लिए ही किया था। साला अब तक तो उसी पाप के पैसों को खुश होकर उड़ाती रही थी वो। मगर आज उसे हमसे तथा हमारे उसी पैसों से नफ़रत हो गई? खान, ये मैं जानता हूॅ कि बेटी की इस बगावत से मुझे कितनी तक़लीफ हुई है। उसे इस बात का ज़रा भी ख़याल नहीं आया कि उसके द्वारा ये सब करने से उसके माॅ बाप पर क्या गुज़रेगी?"

"ये सब उस लड़के की वजह से ही हुआ है ठाकुर साहब।" फिरोज़ खान ने कठोरता से कहा___"उसी ने रितू बिटिया को बरगलाया होगा। वरना वो ऐसा कभी न करती।"

"नहीं खान।" अजय सिंह ने मजबूती से अपने सिर को इंकार में हिलाते हुए कहा___"ये सब उस लड़के के बरगलाने से नहीं हुआ है। क्योंकि इसके पहले मेरे साथ साथ मेरे बच्चे भी उस विराज से नफ़रत करते थे और उसकी तथा उसके परिवार में किसी की शक्ल तक देखना पसंद नहीं करते थे। ये सब तो किसी और ही वजह से हुआ है खान। दरअसल मेरी दोनों ही बेटियों को सच्चाई की राह पर चलना शुरू से ही पसंद था। उन्हें ये पता नहीं था कि उनका बाप वास्तव में कैसा है? ख़ैर, इस मामले में मेरा बेटा मुझ पर गया है। मुझे खुशी है कि वो मेरे जैसा है और सच कहूॅ तो मुझे उस पर नाज़ भी है। मगर अब मैने भी फैंसला कर लिया है कि मेरे इस दिल की आग तभी शान्त होगी जब उस विराज के साथ साथ मैं अपनी उन दोनो बेटियों को भी अपने हाथों से बद से बदतर मौत दूॅगा।"

फिरोज़ खान देखता रह गया अजय सिंह को। वो देख रहा था कि इस वक्त अजय सिंह के चेहरे पर ज़लज़ले के से भाव थे। यकीनन उसके अंदर गुस्सा, क्रोध व अपमान ये तीनो ही अपने पूरे जलाल पर थे।

"ख़ैर छोंड़िये इस बात को।" फिरोज़ खान ने जैसे पहलू बदला___"ये बताइये कि उन सबको पकड़ने के लिए क्या प्लानिंग की है आपने?"

"प्लानिंग में कोई कमी नहीं है खान।" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"मेरी बीवी के पास भेजा फ्राई कर देने वाला दिमाग़ है। उसने मुझे बताया था कि उसने उन दोनो के साथ पहले तो सामान्य सिचुएशन बनाए रखने के लिए दो ऐसे आदमियों को जीप में भेजा है जो तगड़े फाइटर कहे जाते हैं। उनके जाने के बाद उसने अलग से उन जैसे ही आदमियों की एक टीम बना कर उनके पीछे इस तरह लगा दिया है कि नीलम व सोनम को वो टीम नज़र ही न आए। उस टीम का काम ये है कि अगर सच में विराज नीलम व सोनम को लेने आ रहा है तो वो यकीनन पहले नीलम व सोनम के साथ गए उन दो आदमियों से भिड़ेगा। अतः हमारी टीम के वो लोग बैकअप के रूप में अपने आदमियों की मदद करेंगे। यानी इस सिचुएशन को देखते हुए ही हमारी दूसरी टीम के आदमी जल्द ही वहाॅ पहुॅच जाएॅगे। मेरी बीवी प्रतिमा के अनुसार अगर बैकअप के रूप में विराज ने भी कोई ऐसा इंतजाम किया होगा तो यकीनन वो भी विराज का पलड़ा कमज़ोर पड़ते देख कर उन सबके बीच टूट पड़ेंगे। उस सूरत में यहाॅ से हम सब भी पहुॅच जाएॅगे और विराज तथा उसके आदमियों का काम तमाम करेंगे। हम लोग एक तरह से डबल बैकअप के रूप में होंगे अपने आदमियों के पीछे। मुझे यकीन है कि इतना कुछ होने के बाद विराज एण्ड पार्टी ज्यादा देर तक हमारा सामना नहीं कर पाएगी और अंततः उन्हें हमारे सामने खुद को सरेण्डर करना ही पड़ेगा।"

"ओह।" फिरोज़ खान प्रभावित लहजे में बोला___"प्लान तो यकीनन आपका शानदार है। सचमुच इस सूरत में आपका वो भतीजा और उसके सभी आदमी घुटने टेक देंगे।"

"बिलकुल।" अजय सिंह ने कहा___"इस सबके बाद विराज और उसके साथ साथ मेरी दोनो बेटियाॅ मेरे कब्जे में होंगी। तब मैं उस हरामी के पिल्ले से अपने साथ हुए इतने भारी नुकसान का गिन गिन के बदला लूॅगा। मुम्बई में सुरक्षित बैठी उसकी माॅ बहन को यहाॅ मेरे पास मेरे पैरों तले आना ही पड़ेगा। उसके बाद तो दुनियाॅ देखेगी कि ठाकुर अजय सिंह के साथ ऐसा दुस्साहस करने वालों का क्या अंजाम होता है?"

"ऐसा ही होगा ठाकुर साहब।" फिरोज़ खान ने दृढ़ता से कहा___"आपने जिस तरह से प्लान बनाया है उस हिसाब से यकीनन आपका वो भतीजा तथा आपकी दोनो बेटियाॅ आपके चंगुल में आ जाएॅगी। मैं अपने साथ अपने लगभग बीस के आस पास आदमी लाया हूॅ। सबके सब आधुनिक हथियारों से लैश हैं। अगर ये सच है कि आपका वो भतीजा उन दोनो को लेने आ रहा है तो यकीनन तगड़ी मुठभेड़ होगी और उस मुठभेड़ में वो लोग बुरी तरह आपसे मात खाएॅगे।"

"इस बार वो हरामी की औलाद नहीं बचेगा खान।" अजय सिंह ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा___"इस बार वो मेरी मुट्ठी में ज़रूर कैद होगा और पिंजरे में कैद परिंदे की तरह फड़फड़ाएगा भी। साले की ऐसी दुर्गति करूॅगा कि मौत और रहम दोनो की ही भीख मागेगा मुझसे।"

अजय सिंह की इस बात पर फिरोज़ खान बोला तो कुछ नहीं किन्तु उसके जबड़े भिंच गए थे, जैसे जंग के लिए पूरी तरह से तैयार हो गया हो। इसके साथ ही कार के अंदर ख़ामोशी छा गई। कार हल्दीपुर की तरफ तेज़ी से बढ़ी जा रही थी। उनके पीछे पीछे तीन तीन जीपों में सवार फिरोज़ खान के गुर्गे भी चले आ रहे थे।
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कहानी अभी जारी है दोस्तो,,,,,,,,,,
 
अब आगे___________

इधर हम तीनों भी कार में बैठे पूरी रफ्तार से माधोपुर की तरफ बढ़े चले जा रहे थे। हम तीनो के बीच काफी देर से ख़ामोशी छाई हुई थी। कदाचित आने वाले समय के बारे में सब कोई सोचे जा रहा था। कुछ देर पहले रितू दीदी ने फोन पर किसी से बात की थी। उनकी बातें ऐसी थी जो उस वक्त मुझे बिलकुल भी समझ में नहीं आई थी। मैने फोन करके शेखर के मौसा जी से उनकी करेंट लोकेशन के बारे में पूछा था। उन्होंने बताया कि वो हमारे पीछे ही आ रहे हैं किन्तु फाॅसला बना कर।

अभी हमारे बीच ख़ामोशी ही थी कि तभी रितू दीदी का मोबाइल फोन बज उठा। रितू दीदी ने मोबाइल की स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नंबर को देखा और फिर काल रिसीव कर मोबाइल कान से लगा लिया।

"हाॅ प्रकाश बोलो।" फिर रितू दीदी ने कहा___"क्या ख़बर है वहाॅ की?"
"..............।" उधर से कुछ कहा गया।
"ओह आई सी।" रितू दीदी के होठों पर मुस्कान फैल गई___"कितने लोग हैं वो?"
"...............।" उधर से फिर कुछ कहा गया।
"चलो अच्छी बात है प्रकाश।" रितू दीदी ने कहा__"और हाॅ बहुत बहुत धन्यवाद इस ख़बर के लिए। चलो रखती हूॅ, तुम ज़रा होशियार रहना।"

"क्या बात है दीदी?" काल कट होते ही मैने उनकी तरफ देखते हुए पूछा___"किसका फोन था?"
"तुझे बताया था न मैने।" रितू दीदी ने कहा___"कि हवेली में प्रकाश नाम का एक आदमी सुरक्षा गार्ड के रूप में काम करता है। ये उसी का फोन था। उसने बताया कि माॅम ने नीलम व सोनम के हवेली से निकलने के कुछ देर बाद ही दो जीपों में लगभग दस आदमी उन दोनो के पीछे लगाया है। इसका मतलब मेरा अंदाज़ा सही था। माॅम ने तुम्हारी सोच को ताड़ते हुए बैकअप के रूप में नीलम व सोनम के पीछे कुछ और आदमियों को लगा दिया है।"

"हाॅ इस बात का अंदेशा तो मुझे भी था दीदी।" मैने सामने रास्ते की तरफ देखते हुए कहा___"मुझे अंदेशा था कि बड़ी माॅ ऐसा कर सकती हैं। लेकिन फिक्र की कोई बात नहीं है दीदी। हमारे पास भी बैकअप के रूप में आदमियों की कोई कमी नहीं है।"

"तुम मेरे डैड को भूल गए राज।" रितू दीदी ने कहा___"माॅम ने इस बारे में ज़रूर बताया होगा और अब वो भी आ ही रहे होंगे गुनगुन से। संभव है कि उनके साथ भी कुछ आदमी हों।"

"बिलकुल हो सकते हैं दीदी।" मैने कहा___"इसी लिए तो मैं सीधे रास्ते से नहीं बल्कि माधोपुर वाले रास्ते की तरफ जा रहा हूॅ ताकि इस रास्ते में उनसे हमारा सामना ही न हो।"

"इसके पहले मैने जिससे फोन पर बात की थी।" रितू दीदी ने कहा___"वो एक मुखबिर था। जिसे मैने शुरू से ही डैड के पीछे लगाया हुआ था। ताकि वो डैड की हर गतिविधी के बारे में मुझे सूचित करता रहे। ख़ैर उसने बताया कि डैड मुख्य रास्ते से ही आ रहे हैं किन्तु उनके साथ काफी सारे लोग भी हैं जो आधुनिक हथियारों से लैश हैं। मतलब साफ है कि वो खुद भी पूरी तैयारी के साथ आ रहे हैं। अब तुम समझ सकते हो कि इस सबसे उनकी स्थित हमारी स्थित से ज्यादा मजबूत व भारी है।"

"अगर ऐसा है।" सहसा पिछली की शीट पर बैठा आदित्य बोल पड़ा___"तो यकीनन हम उनके बीच फॅस जाएॅगे। इस लिए हमें कुछ ऐसा इंतजाम करना पड़ेगा जिससे हमारी स्थित उनकी स्थित से बेहतर हो जाए तथा हम उन्हें हरा कर नीलम व सोनम को सुरक्षित वहाॅ से ला सकें।"

"फिक्र मत करो आदित्य।" रितू दीदी ने कहा___"उसका भी इंतजाम मैने कर दिया है और वो इंतजाम ऐसा होगा कि डैड ही क्या कोई भी कुछ नहीं कर पाएॅगा और हम नीलम व सोनम को सहज ही उनके चंगुल से छुड़ा लाएॅगे।"

"ये तो कमाल ही हो गया दीदी।" मैने मुस्कुराते कहा___"अगर ऐसा है तो फिर यकीनन फिक्र की कोई बात नहीं है। मगर सवाल ये है कि आपने ऐसा क्या हैरतअंगेज इंतजाम किया है जिसके तहत हम बड़ी सहजता से नीलम व सोनम दीदी को ले आएॅगे?"

"सब्र कर मेरे प्यारे भाई।" रितू दीदी ने मुस्कुरा कर कहा__"और बस देखता जा कि क्या होता है।"
"इसका मतलब कि आप।" मैने हॅस कर कहा___"इस बारे में हमें न बता कर हम दोनो के लिए सस्पेन्स क्रियेट कर रही हैं?"

"तू अपने आपको बड़ा तीसमारखां समझता है न।" रितू दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा___"तो फिर खुद ही सोच ले कि मैने ऐसा क्या इंतजाम किया हो सकता है कि उसकी वजह से सब कुछ सहज ही हो जाएगा। इतना ही नहीं बल्कि उस वजह से कोई कुछ कर भी नहीं पाएगा।"

"ओहो ये तो चैलेन्ज देने वाली बात हो गई दीदी।" मैंने ऑखें फैलाते हुए उन्हें देखा।
"हाॅ तो क्या हुआ?" रितू दीदी भी मुस्कुराई___"अगर तू इसे चैलेन्ज समझता है तो यही सही। अब सोच कर बता कि ऐसा क्या हो सकता है इंतजाम?"

"जाने दीजिए दीदी।" मैने नाटकीय अंदाज़ से कहा___"खामखां आपके दिमाग़ का कचरा हो जाएगा। इस लिए बेहतर है कि आप मुझसे ना ही पूछो।"
"ओये चल चल हवा आने दे।" रितू दीदी ने मानो घुड़की सी दी मुझे___"बड़ा आया मेरे दिमाग़ का कचरा करने वाला। भूल मत कि मैं उसकी बेटी हूॅ जिसके दिमाग़ को
तू खुद भी सलाम करता है।"

रितू दीदी की इस बात से मैं एकदम से चुप हो गया। सच ही तो कहा था उन्होंने। बड़ी माॅ के दिमाग़ को यकीनन सलाम करने का दिल करता था मेरा। मैं हमेशा सोचता था कि अगर उनका यही शातिर दिमाग़ अच्छाई के लिए उपयोग होता तो कितनी ऊॅची शख्सियत बन सकती थीं वो। ये उनका दुर्भाग्य था या फिर वो ऐसी ही थी। किन्तु एक बात सच थी कि अपने पति से बेहद प्यार करती थीं वो। कदाचित यही वजह है कि उन्होंने पति के कहने पर हर वो काम किया था जो कि हर तरह से अनैतिक व ग़लत था।

"क्या हुआ बच्चे?" मुझे सोचों में गुम देख सहसा रितू दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा___"मेरी माॅम का सुनकर हवा निकल गई क्या तेरी? होता है बेटा, ऐसा होता है कि ऐसी हस्तियों का ज़िक्र होते ही अच्छे अच्छों की हवा निकल जाती है। तू तो फिर भी अभी बच्चा है।"

"ये कुछ ज्यादा ही नहीं हो गया दीदी?" मैने मासूम सी शक्ल बना कर कहा।
"अब हो गया तो हो गया न।" रितू दीदी मेरे द्वारा अपनी मासूम सी शक्ल बना लेने पर मुस्कुराईं____"कम से कम तू मेरे माॅम का सुन कर अब ज्यादा उड़ेगा तो नहीं।"

"ये सच है दीदी।" मैने सहसा गंभीर होकर कहा___"कि वो भले ही बुराई का साथ दे रही हैं मगर जाने क्यों उनके लिए मेरे दिल में इज्ज़त आज भी है। हलाॅकि उन्होंने मेरी माॅ के साथ बुरा करने में कोई कसर नहीं छोंड़ी थी। फिर भी ये मेरी माॅ के दिये हुए अच्छे संस्कार ही हैं कि मैं आज भी अपने से बड़ों को सम्मान देता हूॅ, भले ही उन लोगों ने हमारे साथ कितना ही बुरा किया है।"

"मैं जानती हूॅ राज।" रितू दीदी भी गंभीर हो गई___"और मुझे इस बात की बेहद खुशी भी है कि तेरे और तेरी माॅ बहन के साथ भले ही बद से बदतर सुलूक किया था मेरे माॅम डैड ने मगर इसके बाद भी तू उनकी इज्ज़त करता है। तेरी यही खूबी तुझे सबसे अच्छा और सबसे महान बनाती है। मुझे ईश्वर से इस बात की शिकायत ज़रूर है कि क्यों उसने मुझे ऐसे इंसान की बेटी बनाया जो सिर्फ और सिर्फ पाप करना जानते हैं, मगर इस बात का उसी ईश्वर से धन्यवाद भी करती हूॅ कि उसने मुझे तेरे जैसा नेक दिल भाई दिया। आज तुझे पा कर मैं बेहद खुश हूॅ राज। मुझे पता है कि इस जंग का अंत में अंजाम क्या होगा? यानी कि अधर्म व पाप करने वाले मेरे माॅम डैड तथा मेरा वो कमीना भाई अंत में अपने अधर्म व पाप कर्म करने के चलते या तो मारे जाएॅगे या फिर हमेशा के लिए जेल की सलाखों के पीछे कैद होकर रह जाएॅगे। मुझे इस सबका दुख तो यकीनन होगा भाई क्योंकि आख़िर वो सब हैं तो मेरे अपने ही मगर ये सोच कर खुद को तसल्ली भी दूॅगी कि बुरा करने वालों की नियति तो यही होती है न। उनके बदले मुझे तू मिला है और तेरे साथ साथ गौरी चाची, करुणा चाची तथा गुड़िया जैसी बहन मिल जाएॅगी। ये सब भी तो मेरे अपने ही हैं।"

"छोंड़िये इन सब बातों को दीदी।" मैने माहौल को सामान्य बनाने की गरज़ से कहा____"मुझे भी तो इस सबका दुख होगा मगर आप भी जानती हैं कि इस सबके अलावा दूसरा कोई चारा नहीं है। इस लिए इन सब बातों पर ज्यादा सोच विचार मत कीजिए।"

अभी मैंने ये कहा ही था कि सहसा मेरे मोबाइल फोन पर मैसेज टोन बजी। जिससे मेरा ध्यान सामने ही डैसबोर्ड के पास रखे अपने मोबाइल पर गया। मैने रितू दीदी को मोबाइल उठा कर देखने को कहा। उन्होंने मेरा फोन उठाया और उसमे आए हुए मैसेज को देखने लगीं।

"नीलम का मैसेज है राज।" फिर रितू दीदी ने मुझसे कहा___"उसने मैसेज में बताया है कि वो सोनम के साथ ही माधोपुर वाले मंदिर की तरफ जा रही है।"
"ओह ये तो अच्छी बात है।" मैने कहा___"इसका मतलब उस तरफ जाने का उसने कोई न कोई बहाना बनाया होगा। किन्तु ये भी सच है कि उसके पीछे पीछे ही कोई उनके पीछे भी लगा होगा। ख़ैर ये तो होगा ही, हमें अब उन सबसे निपटने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। हम बस पहुॅचने ही वाले हैं उस जगह।"

"क्या हम उसी तरफ जा रहे हैं राज?" पीछे से आदित्य ने सामने की तरफ इशारा करते हुए कहा___"जहाॅ पर वो ऊॅचा सा मंदिर का गुंबद दिखाई दे रहा है?"
"हाॅ दोस्त।" मैने कहा___"हम माधोपुर के उसी मंदिर के पास जा रहे हैं। लेकिन वहाॅ पर एक समस्या भी हो सकती है।"

"समस्या???" आदित्य के साथ साथ रितू दीदी भी बोल पड़ी थीं___"कैसी समस्या हो सकती है?"
"समस्या यही होगी कि हम सब मंदिर के पास ही इकट्ठा होंगे।" मैने कहा___"और मंदिर के पास ही हम सबका आमना सामना होगा। ये भी सच है कि हम सबके बीच इस लड़ाई में खून ख़राबा भी होगा जो कि मंदिर के पास नहीं होना चाहिए।"

"अरे ये तो अच्छी बात है राज।" रितू दीदी ने कहा___"देवी माॅ के सामने ही हर चीज़ का फैंसला होगा और यकीनन हमारी ही जीत होगी। यानी कि अंततः हम नीलम व सोनम को लेकर ही आएॅगे। भला देवी माॅ के सामने अधर्म व पाप की जीत कैसे हो सकेगी?"

"मैं रितू की इस बात से सहमत हूॅ भाई।" पीछे से आदित्य ने कहा___"दूसरी बात ये संयोग भी देवी माॅ ने बनाया है कि हम सब उनके सामने ही एकत्रित होंगे और हर चीज़ का फैंसला वो खुद करेंगी।"

"हाॅ यार।" मैने सहसा खुशी से कहा___"इस तरफ तो मेरा ध्यान ही नहीं था। सच कहा है बड़े बड़े संतों ने कि इस संसार में सब कुछ ईश्वर की ही मर्ज़ी से होता है। वो हमें वहीं ले जाता है जहाॅ के बारे में हमने सोचा भी नहीं होता है। सोचने वाली बात है न दीदी, मैने तो नीलम से सिर्फ यही सोच कर वहाॅ पर आने को कहा था कि सबसे निपटने के बाद हम उसी रास्ते से वापस भी हो जाएॅगे ताकि बड़े पापा से हमारा सामना ही न होने पाए। इस बारे में तो हमने सोचा ही नहीं था हर चीज़ का फैंसला करने के लिए वहाॅ पर देवी माॅ भी मौजूद होंगी। भला उनकी इच्छा के बग़ैर कोई काम कैसे हो सकता था?"

"अब हमारी जीत यकीनन होगी राज।" आदित्य ने कहा___"देवी माॅ को भी पता है कि हम धर्म की राह पर हैं। अतः उनके आशीर्वाद से सब कुछ हमारे ही हक़ में होगा और इसका मुझे पूरा विश्वास है।"

"हम सबको विश्वास है आदित्य।" रितू दीदी ने कहा__"इस लिए अब हम सब देवी माॅ को मन ही मन प्रणाम करके काम का श्रीगणेश करेंगे। बोलो जय माता दी।"
"जय माता दी।" दीदी के कहने पर हम सबने एक साथ जय माता दी कहा और फिर मैं एक्सीलेटर पर अपने पैर को और ज़ोर से दबा दिया। परिणामस्वरूप कार की रफ्तार और भी तेज़ हो गई।

कुछ ही देर में हमारी कार माधोपुर गाॅव के बाहर बने उस देवी माॅ के मंदिर के पास पहुॅच गई। उसके पहले ही मैने रितू दीदी तथा आदित्य को कार से उतार दिया था। ऐसा इस लिए कि हम तीनों का एक साथ रहना ठीक नहीं था। उससे हम एक साथ एक ही जगह पर फॅस सकते थे। इस लिए मैने रितू दीदी व आदित्य को मंदिर से लगभग पचास मीटर पहले ही उतार दिया था और खुद कार लेकर मंदिर की तरफ बढ़ चला था। मुम्बई से जब मैं चला था तो जगदीश अंकल ने मुझे तीन कवच दिये थे जो कि बुलेट प्रूफ थे। इस वक्त हम तीनो ने ही अपने कपड़ों के अंदर उस बुलेटप्रूफ कवच को पहना हुआ था। ये जगदीश अंकल की दूरदर्शिता का ही कमाल था कि उन्होंने हम लोगों की सुरक्षा का ऐसा इंतजाम किया था।

माधोपुर गाॅव में लगभग पचास या साठ के आस पास मकान बने हुए थे। देवी माॅ का ये प्राचीन मंदिर गाॅव के बाहर बना हुआ था। मंदिर से लगभग पचास या साठ मीटर के फासले से ही गाॅव की आबादी शुरू होती थी। कहने का मतलब ये कि हमारी इस मुठभेड़ में गाॅव के लोगों पर कोई आॅच नहीं आ सकती थी। ये हमारे लिए सबसे अच्छी बात थी। आस पास का इलाका दूर दूर हरे भरे तथा ऊॅचे ऊॅचे पेड़ पौधों से सुशोभित था। ये सभी गाॅव चारो तरफ के पहाड़ों से घिरे हुए थे। एक नहर थी जो कि माधोपुर और हल्दीपुर के बीच से निकलती थी। चिमनी की तरफ जाते जाते ये नहर दो भागों में बॅट जाती थी। जिसका एक भाग चिमनी की तरफ तथा दूसरा भाग एक अन्य गाॅव गुमटी की तरफ जाती थी किन्तु गुमटी के बाहरी इलाके की तरफ से। नहर के होने का सबसे बड़ा फायदा ये था कि यहाॅ के सभी गाॅवों में पानी का अभाव नहीं था। सभी गाॅवों में खेतों की सिंचाई के लिए इसी नहर के पानी का उपयोग होता था। जिसका नतीजा ये होता था कि आस पास के सभी गाॅवों में फसल की पैदावार अच्छी खासी होती थी।

मंदिर के नज़दीक ही मंदिर के पिछले हिस्से की तरफ मैने कार को रोंक दिया था। मैने देख लिया था कि मंदिर के सामने की तरफ एक ऐसी जीप खड़ी थी जिसके ऊपर छत नहीं थी। वो जीप यकीनन वही थी जिसमें नीलम व सोनम आई हुई थीं। चारो तरफ इस समय ख़ामोशी तो थी किन्तु मैं जानता था कि ये ख़ामोशी कुछ ही समय की मेहमान थी यहाॅ पर। ख़ैर, मैने देवी माॅ को प्रणाम किया और फिर धड़कते हुए दिल के साथ मंदिर के सामने की तरफ आहिस्ता आहिस्ता बढ़ने लगा।हलाॅकि मैं पूरी तरह सतर्क था तथा किसी भी खतरे से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार था।

आस पास का बहुत ही बारीकी से जायजा लेते हुए मैं मंदिर की दीवार से सट कर चलते हुए मंदिर के सामने वाले भाग की तरफ बढ़ रहा था। ये मेरे जीवन का पहला अवसर था जबकि मैं इस तरह की सिचुएशन को फेस करने वाला था और आने वाले समय की सिचुएशन को भी। थोड़ी ही देर बाद मुझे अपनी जगह पर रुक जाना पड़ा। क्योंकि मैने देखा कि मंदिर के सामने किन्तु कुछ ही दूरी पर वो जीप खड़ी थी तथा उस जीप के पास ही वो दो हट्टे कट्टे आदमी भी खड़े थे जिन्हें बड़ी माॅ ने नीलम व सोनम की सुरक्षा के रूप में भेजा था। वो दोनो आपस में बातें तो कर रहे थे किन्तु उनके हाव भाव से नज़र आ रहा था कि वो किसी भी खतरे से निपटने के लिए भी तैयार थे। यानी कि उन्हें बताया गया था कि ऐसा कुछ होगा।

मैं जानता था कि मेरे पास ज्यादा समय नहीं है क्योंकि अभी कुछ ही समय में यहाॅ पर आदमियों की फौज भी नज़र आने लगेगी। ये भी संभव था कि आ ही गई हो। हलाॅकि मैने आस पास बहुत बारीकी से देख चुका था किन्तु मुझे ऐसा कुछ नज़र नहीं आया था जिससे पता चले कि यहाॅ पर कोई और भी है।

मैने अपने पैन्ट के पीछे बेल्ट पर फॅसे रिवाल्वर को निकाला। उसके बाद मैने अपनी जैकेट से एक ऐसी चीज़ निकाली जिसे साइलेंसर कहा जाता है। मैने उस साइलेंसर को रिवाल्वर की नाल पर फिट किया। मैं चाहता था कि जो काम छुप कर हो जाए उसे अंजाम दे देना चाहिए। हलाॅकि ये तो तय था कि खुल कर मुकाबला करना ही पड़ेगा। मगर मेरी सोच थी कि दुश्मन को मौका ही क्यों दिया जाए?

रिवाल्वर की नाल पर साइलेंसर फिट करने के बाद मैने उन दोनो की तरफ देखते हुए अपने रिवाल्वर वाले हाॅथ को हवा में उठाया और फिर एक आदमी की गर्दन पर निशाना साध कर ट्रिगर दबा दिया। परिणाम स्वरूप हल्की सी पिट् की आवाज़ हुई और एक अजीब सी चीज़ पलक झपकते ही उनमें से एक आदमी की गर्दन पर जा लगी। मैने इतने पर ही बस नहीं किया बल्कि उसी पल रिवाल्वर का रुख मोड़ कर फिर से ट्रिगर दबा दिया था। दो पल के अंदर ही वो दोनो आदमी लहराते हुए जीप के पास ही कच्ची ज़मीन पर भरभरा कर गिरे और शान्त पड़ गए। उन दोनो की गर्दन से कोई खून नहीं बह रहा था बल्कि एक एक सुई चुभी हुई थी। आप समझ सकते हैं कि वो सुई क्या हो सकती थी। मेरा इरादा उन्हें जान से मारने का हर्गिज़ भी नहीं था बल्कि सिर्फ बेहोश करना था। इस लिए वो दोनो अब सुई के प्रभाव से कम से कम दो से तीन घंटे के लिए बेहोश हो चुके थे।

मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि आते ही मुझे इस तरह सहजता से पहले पड़ाव पर ही कामयाबी मिल जाएगी। मगर सबूत चूॅकि सामने ही ज़मीन पर बेहोश पड़े थे इस लिए यकीन करना ही था। उन दोनो के बेहोश ओ जाने के बाद मैने एक बार पुनः आस पास का बारीकी से जायजा लिया और फिर मंदिर के सामने की तरफ बढ़ चला किन्तौ सावधानी से ही। अभी मैं बढ़ ही रहा था कि तभी मंदिर के अंदर से घंटे के बजने की दो बार आवाज़ आई। मैं समझ गया कि नीलम व सोनम दीदी मंदिर के अंदर हैं।

मैं आस पास देखते हुए तेज़ी से आगे बढ़ा और मंदिर के जस्ट बगल पर ही सीढ़ियों के पास आ गया। एक बार पुनः आस पास का जायजा लिया और फिर मैने पैन्ट की जेब में हाॅथ डाला तो चौंक पड़ा। मैं मोबाइल कार में ही भूल आया था। इस वक्त मैं नीलम को मैसेज कर बोलना चाहता था कि वो दोनो मंदिर के बाहर आ जाएॅ और जल्दी से मेरे साथ चलें यहाॅ से। मगर मेरा मोबाइल कार में ही रह गया था। ख़ैर, मैने सोचा चलो कोई बात नहीं मंदिर के अंदर जाकर देवी माॅ के दर्शन भी तो करना चाहिए।

मैं तेज़ी से सीढ़ियाॅ चढ़ते हुए मंदिर के मुख्य दरवाजे पर पहुॅचा तो देखा कि मंदिर के अंदर नीलम व सोनम दोनो ही देवी माॅ की प्रतिमा के सामने अपने दोनो हाॅथ जोड़े खड़ी थी। ये देख कर मैं मुस्कुराया और फिर तुरंत ही मंदिर के दरवाजे की चौखट को छूकर पहले प्रणाम किया और फिर चौखट को पार गया।

अंदर आते ही मैने नीलम व सोनम दीदी के पीछे ही खड़े होकर तथा अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए देवी माॅ को असीम श्रद्धा से प्रणाम किया। मगर अगले ही पल मेरे मुख से घुटी घुटी सी चीख़ निकल गई साथ ही मैं पीछे की तरफ लहराते हुए चौखट के बाहर आकर पीठ के बल ज़मीन पर गिरा। मेरी ऑखों के सामने कुछ पल के लिए अॅधेरा सा छा गया। मेरी नाॅक से खून बहने लगा था तथा मेरे मुख के बाएॅ साइड की तरफ होंठों से भी खून बहने लगा था। किसी ने बड़ी ज़ोर से मुझ पर वार किया था।

अभी मैं अपने होशो हवाश में आते हुए ज़मीन से उठ ही रहा था कि तभी मेरे पेट में फिर से बड़े ज़ोर का प्रहार हुआ। जिसके प्रभाव से मैं किसी फुटबाल की तरह हवा में उड़ता हुआ सीधा सीढ़ियों के नीचे आ कर गिरा। इन कुछ ही पलों ये सब इतना तेज़ी से हुआ था कि मुझे कुछ समझने का मौका ही नहीं मिल पाया था। सीढ़ियों के ऊपरी भाग से सीधा नीचे कच्ची ज़मीन पर गिरने से एक बार फिर से मैं बुरी तरह दर्द से बिलबिला उठा था। किन्तु अब तक मैं समझ गया था कि ये एक जाल था जिसमें मैं फॅसाया गया था।

कच्ची ज़मीन से मैं उछल कर खड़ा हो गया और सीढ़ियों के ऊपर की तरफ देखा ही था कि पीछे से किसी ने मेरी पीठ पर ज़बरदस्त वार किया। मैं इसके लिए बिलकुल भी तैयार नहीं था और ना ही मुझे इसकी उम्मीद थी। अतः इस बार मुह के बल उसी कच्ची ज़मीन पर गिरा। मुझे एकाएक ही भारी खतरे का आभास हुआ और मैने अपनी संपूर्ण ताकत लगाते हुए फिर से उछल कर खड़ा हुआ। अभी मैं खड़ा ही हुआ था कि पलक झपकते ही मुझे नीचे भी झुक जाना पड़ा वरना पीछे की तरफ से जिसने वार किया था उसकी फ्लाइंग किक सीधा मेरी गर्दन पर पड़ती और यकीनन मेरी गर्दन की हड्डी टूट जाती।

मैने झुकने के साथ ही अपनी एक टाॅग को बिजली की सी तेज़ी से चलाया था, नतीजा ये हुआ कि फ्लाइंग किक मारने वाले का जो अकेला पैर ज़मीन पर टिका था वो ज़मीन से उखड़ गया और वो भरभरा कर ज़मीन पर गिरा। मैं ये देख कर आश्चर्य चकित रह गया कि ये तो वही आदमी था जिसे अभी थोड़ी ही देर पहले मैंने सुई के द्वारा बेहोश किया था। मुझे समझ न आया कि ये बेहोशी से होशो हवाश में कैसे आ गया। मैने पलट कर दूसरे आदमी की तरफ देखा तो वो भी एक तरफ पोजीशन लिए खड़ा मुस्कुरा रहा था। ये देख कर मेरे आश्चर्य की कोई सीमा न रही। साला ये दोनो चीज़ क्या थे कि इन पर उस बेहोश करने वाली सुई का भी असर नहीं हुआ?

सच तो ये था कि मैं कुछ भी नहीं समझ पा रहा था। एक तो इन दोनो पर सुई का असर न हुआ दूसरे मंदिर के अंदर से मुझे इस तरह बाहर लगभग फैंक दिया गया। सबसकुछ इतनी तेज़ी से हुआ कि मुझे कुछ समझ ही नहीं आया था। किन्तु अब मैं समझ चुका था कि ये सब क्या था। मतलब साफ था कि बड़ी माॅ के द्वारा भेजा गया बैकअप यहाॅ पहुॅच चुका था और उसके कुछ आदमी मंदिर के अंदर छुपे मेरे आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। मैं जैसे ही मंदिर के अंदर गया और देवी माॅ को प्रणाम करने लगा वैसे ही उन लोगों ने मुझ पर वार कर दिया था। इधर जिन्हें मैं बेहोश समझ रहा था वो होश में होते हुए मेरे इस तरह नीचे आ जाने का इंतज़ार कर रहे थे। उसके बाद जैसे ही मैं नीचे गिरा वैसे ही इन दोनो ने भी मुझ पर हमला कर दिया। कहने का मतलब ये कि कहीं से भी मुझे सम्हलने का या सोचने का मौका ही नहीं मिल पाया था।

अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि सहसा मुझे रितू दीदी व आदित्य का ख़याल आया। मुझे उन दोनो की बेहद चिंता होने लगी। कहीं वो दोनो भी न फॅस गए हों। मैने मन ही मन देवी माॅ से कहा____"ये सब क्या है माॅ? इन लोगों ने मुझे आपको ठीक से प्रणाम भी नहीं करने दिया और आपने भी इन्हें रोंका नहीं? ऐसी तो उम्मींद नहीं मुझे? ख़ैर कोई बात नहीं, मुझे अपना आशीर्वाद दीजिए कि मैं इन सबका मुकाबला कर सकूॅ और अपने सभी चाहने वालों को यहाॅ से सुरक्षित ले जा सकूॅ।"

"कैसी लगी बच्चे?" तभी मेरे कानों में ऊपर सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए एक हट्टे कट्टे आदमी की आवाज़ पड़ी, वो मुस्कुराते हुए कह रहा था___"ज्यादा चोंट तो नहीं आई न तुम्हें? वैसे मैं हैरान हूॅ कि तुम जैसे मामूली से लड़के के लिए हमारे बाॅस इतना ज्यादा परेशान थे। सचमुच यकीन नहीं होता कि तुम जैसा पिद्दी सा लड़का हमारे बाॅस की नींदें हराम किये हुए था। जबकि तुम्हें तो जब चाहे चीटियों की तरह मसला जा सकता था। बट डोन्ट वरी, जो पहले नहीं हुआ वो अब हो जाएगा।"

"कहते हैं ऊॅट जब तक पहाड़ के नीचे नहीं आता।" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"तब तक उसे यही लगता है कि वो इस संसार में सबसे ऊॅचा है और उसकी बराबरी कोई कर ही नहीं सकता। वही हाल तुम्हारा है भाड़े के कुत्ते। अपने बाॅस लोगों के सामने कुत्तों की तरह दुम हिलाने वाले कुत्तो इस भरम में न रहो कि तुम लोगों ने मुझे इस तरह फॅसा कर कोई तीर मार लिया है। बल्कि खेल तो अब शुरू होगा।"

"काफी कड़वी ज़बान है तेरी लड़के।" सीढ़ियों से नीचे उतर आए उस आदमी ने सहसा दाॅत पीसते हुए गुस्से से कहा____"अगर बाॅस ने मना न किया होता तो यहीं पर तुझे चीटी की तरह मसल कर तेरी जीवन लीला समाप्त कर देता।"

"अगर एक ही मर्द की औलाद है।" मैने भी तैश में आकर कहा___"तो अकेले मुझसे मुकाबला कर, फिर देखना कि चींटी की तरह कौन मसला जाता है?"
"ओहो ऐसा क्या?" वो आदमी ब्यंगात्मक भाव से ऑखों को फैलाते हुए बोला___"चल ठीक है, तेरी ये इच्छा तो पूरी करनी ही चाहिए।" ये कहने के साथ ही उसने अपने बाॅकी साथियों की तरफ देखते हुए कहा___"तुम में से कोई भी इस लड़के को हाॅथ नहीं लगाएगा। ये मुझे दिखाना चाहता है कि चींटी की तरह हम दोनो में से कौन मसला जाता है। अतः अब मुकाबला सिर्फ हम दोनों के बीच ही होगा।"

उसके सभी साथियों सहमति में सिर हिला दिया। सबके होठों पर जानदार मुस्कान थी। जैसे उन्हें मेरी मूर्खता पर हॅसी आ रही हो। हलाॅकि मुझे भी पता था ये समय इस तरह के मुकाबले का बिलकुल भी नहीं है, मगर तैश में आकर मेरी ज़बान से निकल ही गया था। अतः अब बात ज़बान की थी तथा अपने स्वाभिमान की। समय ऐसा था कि अपनी जगह रुकने वाला नहीं था। हर पल के बीतने के साथ इस बात की भी संभावना बढ़ती जा रही थी कि जो यहाॅ नहीं पहुॅचे हैं वो किसी भी वक्त पहुॅच सकते हैं और फिर हालात और भी विकट हो जाएॅगे।

इधर बाॅकी सब आदमियों की सहमति मिलते ही मैने पोजीशन ले ली। जबकि छिसके साथ मेरा मुकाबला होने जा रहा था उसने झटके से अपने जिस्म के ऊपरी हिस्से के कपड़े निकाल कर अपने एक आदमी की तरफ उछाल दिया। सहसा मेरी नज़र ऊपर मंदिर के दरवाजे के बाहर खड़ी नीलम व सोनम पर पड़ी। वो दोनो ही दोनो तरफ से एक एक आदमी से घिरी हुई खड़ी थीं। उनके चेहरों पर इस वक्त डरे सहमे से भाव कायम थे। मैं उन दोनो की तरफ देख कर अजीब तरह से मुस्कुराया और फिर अपने प्रितद्वंदी की तरफ देखने लगा।

मैने देखा कि उसके जिस्म से कपड़ा हटते ही उसका हट्टा कट्टा जिस्म नुमायाॅ हो उठा। कोई आम इंसान उसकी इतनी खतरनाक बाॅडी देख कर ही डर जाए। उससे लड़ने का ख़याल तो वो आने वाले सात जन्मों में भी न करे। ख़ैर उसने अपने दोनो हाॅथो को अगल बगल उसे ऊपर उठा कर मुझे अपने डोले दिखाए। जैसे कह रहा हो कि देख बच्चे जितने मेरे ये डोले हैं उतने में तो तेरे जिस्म का कोई हिस्सा भी फिट नहीं बैठता। ये देख कर मैं मुस्कुराया और फिर अपने दोनो हाॅथों के इशारे से उसे अपनी तरफ मुकाबले के लिए बुलाया।

मेरे ऐसा करने पर उसके चेहरे के भाव एकदम से बदले और वो पलक झपकते ही गुस्से में डूबा दिखाई देने लगा। कदाचित अपने डोले दिखा कर वो मुझे डराना चाहता था मगर जब मैं उसे डरा हुआ नज़र नहीं आया तो उसे गुस्सा आ गया था।

"अपने भगवान को याद कर ले बच्चे।" फिर उसने मेरी तरफ खतरनाक भाव से बढ़ते हुए कहा___"उनसे दुवा कर कि तेरे जिस्म की हड्डियाॅ सलामत रहें।"
"ये डाॅयालग मैं भी बोल सकता हूॅ तुम्हारे लिए।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"पर ये सोच कर नहीं बोला कि फालतू की डींगें मारना मेरी फितरत नहीं है।"

मेरी ये बात सुन कर वो जैसे बुरी तरह तिलमिला गया था। मुझे पता था कि उसके सामने मैं कुछ भी नहीं हूॅ। अगर मैं एक बार भी उसके फौलादी शिकंजे में फॅस गया तो फिर शायद भगवान ही मालिक होगा मेरा। मगर मुझे खुद पर और अपने गुरू की सिखाई हुई कला पर पूर्ण विश्वास था।

वो पूरे वेग से मेरी तरफ बढ़ा और अपने दाहिने हाॅथ को भी उसी वेग से मुझ पर चलाया था। मैं फुर्ती से नीचे झुका मगर झुकते ही मेरे हलक से चीख निकल गई। कारण उसने हाॅथ चलाने के बाद ही अपने दाहिने पैर को उठाकर उसका घुटना भी चला दिया था जो सीधा मेरे झुके हुए चेहरे से टकराया था। मैं उछलते हुए सीधा हुआ ही था कि उसने बिजली की सी फुर्ती से घूम कर मेरे सीने पर फ्लाइंग किक जमा दी। नतीजा ये हुआ कि मेरे हलक से ज़ोर की हिचकी निकली और मैं पीछे की तरफ हवा में लहराते हुए ही नीचे कच्ची ज़मीन पर चारो खाने चित्त जा गिरा। गिरते ही मेरी ऑखों के सामने अनगिनत तारे नाॅच गए। कुछ पल के लिए तो ऑखों के सामने अॅधेरा भी छा गया। प्रहार इतना ज़बरदस्त था कि मुझसे तुरंत उठा न गया। सीने में बड़ी असहनीय पीड़ा महसूस हुई मुझे। मेरे कानो में नीलम व सोनम की चीखें भी टकराई। कदाचित मुझे इस तरह गिरते देख वो बेहर डर गई थी और मुझे कुछ हो जाने की आशंका से वो बुरी तरह चीखी थीं।

सहसा मेरी नज़र मेरे नज़दीक ही पहुॅच चुके उस आदमी पर पड़ी। मेरे क़रीब पहुॅचते ही उसने अपने पैर को उठाया और ज़मीन पर चित्त गिरे मेरे पेट की तरफ तीब्र वेग से चलाया। मैं बिजली की सी फुर्ती से कई पलटा खाते हुए दूसरी तरफ हो गया तथा साथ ही उछल कर खड़ा भी हो गया। ये अलग बात है इस तरह उछल कर खड़े होने से अचानक ही मुझे अपने सीने पर पीड़ा का एहसास हुआ। मैं समझ चुका था कि अगर ये आदमी इसी तरह मुझ पर और दो चार प्रहार करने में सफल हो गया तो यकीनन मेरा काम तमाम हो जाना है। अतः अब मैं उससे पूरी तरह सतर्कता से मुकाबला करने के लिए तैयार हो गया।
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दोस्तो, आप सबके सामने अपडेट हाज़िर है।
हलाॅकि मैंने अपडेट को ऐसी जगह पर रोंक दिया है जहाॅ पर रोंक दिये जाने से यकीनन आप सबका मूड ख़राब हो गया होगा। मगर क्या करता दोस्तो??

एक तो मेगा अपडेट जितना लम्बा होना चाहिए था उतना हो चुका था दूसरे इसके आगे का कुछ सस्पेन्स भी रखना था। आख़िर आप सबके मन में इस बात को जानने की उत्सुकता तो बनी ही रहनी चाहिए कि इसके आगे विराज या उसके साथ साथ बाॅकी सबका क्या हुआ???

अतः आशा करता हूॅ कि आप सब मेरी बातों को समझते हुए नाराज़ नहीं होंगे बल्कि अपडेट का आनंद लेंगे और फिर हमेशा की तरह अपनी प्रतिक्रिया देकर बताएॅगे कि ये अपडेट कैसा लगा अथवा इसमें कहाॅ पर क्या कमी नज़र आई आपको??
 
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