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Gandi Kahani ♡ एक नया संसार ♡

♡ एक नया संसार ♡
अपडेट..........《 28[color=rgb(255,]》
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अब तक,,,,,,,

"पहले तो नहीं कर रहा था।" नैना ने अधीरता से कहा__"फिर जब मैंने ये कहा कि मेरे भइया भाभी खुद भी एक वकील हैं और वो जब आपको कोर्ट में घसीट कर ले जाएॅगे तब पता चलेगा उन्हें। कोर्ट में सबके सामने मैं चीख चीख कर बताऊॅगी कि आदित्य सिंह नामर्द है और बच्चा पैदा नहीं कर सकता तब तुम्हारी इज्जत दो कौड़ी की भी नहीं रह जाएगी। बस मेरे इस तरह धमकाने से उसने फिर तलाक के पेपर्स पर अपने साइन किये थे।"

"लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आ रहा कि तुम्हें इस बात का पता पहले क्यों नहीं चला कि आदित्य नामर्द है?" प्रतिमा ने उलझन में कहा__"बल्कि ये सब अब क्यों हुआ? क्या आदित्य का पेनिस बहुत छोटा है या फिर उसके पेनिस में इरेक्शन नहीं होता? आख़िर प्राब्लेम क्या है उसमें?"

"और सबकुछ ठीक है भाभी।" नैना ने सिर झुकाते हुए कहा__"लेकिन मुझे लगता है कि उसके स्पर्म में कमी है। जिसकी वजह से बच्चा नहीं हो पा रहा है। मैंने बहुत कहा कि एक बार वो डाक्टर से चेक अप करवा लें लेकिन वो इस बात को मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं।"

"ओह, चलो कोई बात नहीं।" प्रतिमा ने उसके चेहरे को सहलाते हुए कहा__"अब तुम फ्रेश हो जाओ तब तक मैं तुम्हारे लिए गरमा गरम खाना तैयार कर देती हूॅ।"

नैना ने सिर को हिला कर हामी भरी। जबकि प्रतिमा उठ कर कमरे से बाहर निकल गई। बाहर आते ही वह चौंकी क्योंकि अजय सिंह दरवाजे की बाहरी साइड दीवार से चिपका हुआ खड़ा था। प्रतिमा को देख कर वह अजीब ढंग से मुस्कुराया और फिर प्रतिमा के साथ ही नीचे चला गया।

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अब आगे,,,,,,,

गौरी को एक दम से चुप और कुछ सोचते हुए देख अभय सिंह से रहा न गया। उसके चेहरे पर बेचैनी और उत्सुकता प्रतिपल बढ़ती ही चली जा रही।

"आप चुप क्यों हो गईं भाभी?" अभय ने अधीरता से कहा__"बताइये न, मेरे मन में वो सब कुछ जानने की तीब्र उत्सुकता जाग उठी है। मैं जल्द से जल्द सब कुछ आपसे जानना चाहता हूॅ।"

अभय की उत्सुकता और बेचैनी देख गौरी के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे तथा गुलाब की कोमल कोमल पंखुड़ियों जैसे होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई। उसने अभय की तरफ देखने के बाद अपने सामने कहीं शून्य में देखने लगी।

"तुम मेरे बच्चों की तरह ही हो।" गौरी शून्य में घूरते हुए ही बोली__"और कोई भी माॅ अपने बच्चों के सामने या फिर खुद बच्चों से ऐसी बातें नहीं कर सकती जिन्हें कहने के लिए रिश्ते और मर्यादा इसकी इज़ाज़त ही न दे। लेकिन फिर भी कहूॅगी अभय। वक्त और हालात हमारे सामने कभी कभी ऐसा रूप लेकर आ जाते हैं कि हम फक़त बेबस से हो जाते हैं। हमें वो सब कुछ करना पड़ जाता है जिसे करने के बारे में हम कभी कल्पना भी नहीं करते। ख़ैर, अब जो कुछ भी मैं कहने जा रही हूॅ उसमें कई सारी बातें ऐसी भी हैं जिन्हें मैं स्पष्ट रूप से तुम लोगों के सामने नहीं कह सकती, किन्तु हाॅ तुम लोग उन बातों का अर्थ ज़रूर समझ सकते हो।"

इतना कह कर गौरी ने एक गहरी साॅस ली और फिर से उसी तरह शून्य में घूरते हुए कहने लगी__"ये सब तब से शुरू हुआ था जब मैं ब्याह कर अपने पति यानी विजय सिंह जी के घर आई थी। उस समय हमारा घर घर जैसा ही था आज की तरह हवेली में तब्दील नहीं था। मैं एक ग़रीब घर की लड़की थी। मेरे माॅ बाप ग़रीब थे, खेती किसानी करते थे। अपने माता पिता की मैं अकेली ही संतान थी। मेरा ना तो कोई भाई था और ना ही कोई बहन। ईश्वर ने मेरे सिवा मेरे माॅ बाप को दूसरी कोई औलाद दी ही नहीं थी। इसके बाद भी मेरे माॅ बाप को भगवान से कोई शिकायत नहीं थी। वो मुझे दिलो जान से प्यार व स्नेह करते थे। जब मैं बड़ी हुई तो सभी बच्चों की तरह मुझे भी मेरे माॅ बाप ने गाॅव के स्कूल में पढ़ने के लिए मेरा दाखिला करा दिया। मैं खुशी खुशी स्कूल जाने लगी थी। किन्तु एक हप्ते बाद ही मेरा स्कूल में पढ़ना लिखना बंद हो गया। दरअसल मैं छोटी सी बच्ची ही तो थी। एक दिन मास्टर जी ने मुझसे क ख ग घ सुनाने को कहा तो मैं सुनाने लगी। लेकिन मुझे आता नहीं था इस लिए जैसे आता वैसे ही सुनाने लगी तो मास्टर जी मुझे ज़ोर से डाॅट दिया। उनकी डाॅट से मैं डर कर रोने लगी। मैं अपने माॅ बाप इकलौती लाडली बेटी थी। मेरे माॅ बाप ने कभी मुझे डाॅटा नहीं था शायद यही वजह थी कि जब मास्टर जी ने मुझे ज़ोर से डाॅटा तो मुझे बेहद दुख व अपमान सा महसूस हुआ और मैं रोने लगी थी। मुझे रोते देख मास्टर जी ने मुझे चुप कराने के लिए फिर से ज़ोर से डाॅटा। उनके द्वारा फिर से डाॅटे जाने से मैं और भी तेज़ तेज़ रोने लगी थी। मास्टर जी ने देखा कि मैं चुप नहीं हो रही हूॅ तो उन्होंने मुझ पर छड़ी उठा दी। दो तीन छड़ी लगते ही मेरा रोना जैसे चीखों में बदल गया। पूरे स्कूल में मेरा रोना चिल्लाना गूॅजने लगा। मेरे इस तरह रोने और चिल्लाने से मास्टर जी बहुत ज्यादा गुस्से में आ गए। उसी वक्त एक दूसरे मास्टर जी मेरा रोना और चिल्लाना सुन कर आ गए। दूसरे मास्टर जी को देख कर पहले वाले मास्टर जी रुक गए और इस बीच मैं रोते हुए ही स्कूल से भाग कर अपने घर आ गई। घर में उस वक्त मेरे पिता जी भोजन कर रहे थे। मुझे इस तरह रोता बिलखता देख वो चौंके। मैं रोते हुए आई और अपने पिता जी से लिपट गई। मेरे पिता मुझसे पूछने लगे कि किसने मुझे रुलाया है तो मैंने रोते रोते सब कुछ बता दिया। सारी बात सुन कर मेरे पिता जी बड़ा गुस्सा हुए लेकिन माॅ के समझाने पर शान्त हो गए। लेकिन इस सबसे हुआ ये कि मेरे पिता जी ने दूसरे दिन से मुझे स्कूल नहीं भेजा। उन्होंने साफ कह दिया था कि जिस स्कूल में मेरी बेटी मार कर रुलाया गया है उस स्कूल में मेरी बेटी अब कभी नहीं पढ़ेगी। बस इसके बाद मैं घर में ही पलती बढ़ती रही। उस समय मेरी उमर पन्द्रह साल थी जब एक दिन बाबू जी(गजेन्द्र सिंह बघेल) हमारे घर आए। बाबू जी को आस पास के सभी गाॅव वाले जानते थे। उन्हें कहीं से पता चला था कि इस गाॅव में हेमराज सिंह(पिता जी) की बेटी है जो बहुत ही सुंदर व सुशील है। बाबू जी अपने मॅझले बेटे विजय सिंह जी के लिए लड़की देखने आए थे। मेरे पिता जी ने बाबू जी को बड़े आदर व सम्मान के साथ बैठाया। घर में जो भी रुखे सूखे जल पान की ब्यवस्था उन्होंने वो सब बाबू जी के लिए किया। बाबू जी ने मेरे पिता जी का मान रखने के लिए थोड़ा बहुत जल पान किया उसके बाद उन्होने अपनी बात रखी। मेरे पिता ये जान कर बड़ा खुश हुए कि ठाकुर साहब अपने बेटे के लिए उनकी लड़की का हाॅथ खुद ही माॅगने आए हैं। भला कौन बाप नहीं चाहेगा कि उसकी बेटी इतने बड़े घर में न ब्याही जाए? और फिर रिश्ता जब खुद ही चलकर उनके द्वार पर आया था तो इंकार का सवाल ही नहीं था। किन्तु पिता जी की आर्थिक स्थित अच्छी नहीं थी इस लिए लेने देने वाली बात से घबरा रहे थे। बाबू जी जानते थे इस बात को इस लिए उन्होंने साफ कह दिया था कि हेमराज हमें सिर्फ तुम्हारी लड़की चाहिए जिसे हम अपनी बेटी और बहू बना सकें। बस फिर क्या था। सब कुछ तय हो गया और एक अच्छे व शुभ मुहूर्त को मेरी शादी हो गई। मुझे नहीं पता था कि मैं किस तरह के घर में और किस तरह के लोगों के बीच आ गई हूॅ? माॅ बाप ने बस यही सीख दी थी कि अपने पति को परमेश्वर मानना। अपने सास ससुर की मन से सेवा करना। बड़ों का आदर व सम्मान करना तथा छोटों को प्यार व स्नेह देना।

एक लड़की का नसीब कितना अजीब होता है कि बचपन से जवानी तक अपने माॅ बाप के पास हॅसी खुशी से रहती है और फिर शादी हो जाने के बाद वह एक नये घर में अपने पति के साथएक नया संसारबनाने के लिए चली जाती है। अपने माॅ बाप के घर में उनका निश्छल प्यार और स्नेह पा कर पली बढ़ी वो लड़की एक दिन उन सबसे दूर चली जाती है।
शादी के बाद जब मैं इस घर में आई तो मेरे मन में डर व भय के सिवा कुछ न था। अपने माॅ बाप से यूॅ अचानक ही दूर हो जाने से हर पल बस रोना ही आ रहा था। पर ये सब तो हर लड़की की नियति होती है। हर लड़की के साथ एक दिन यही होता है। ख़ैर, रात हुई तो एक ऐसे इंसान से मिलना हुआ जो किसी फरिश्ते से कम न था। उन्होंने मुझे प्यार दिया इज्जत दी और इस क़ाबिल बनाया कि जब सुबह हुई तो मुझे लगा जैसे ये घर शदियों से मेरा ही था। मुझे लग ही नहीं रहा था कि मैं किसी दूसरे के घर में किसी अजनबी के पास आ गई हूॅ। राज के पिता ऐसे थे कि उन्होने मुझे इतना बदल दिया था। मुझे उनसे प्रेम हो गया और मैं जानती थी कि उन्हें भी मुझसे उतना ही प्रेम हो गया था।

मेरी दोनो ननदें यानी सौम्या और नैना दिन भर मेरे पास ही जमी रहती थी। उन्होने ये एहसास ही नहीं होने दिया कि वो दोनो मेरे लिए अजनबी हैं। माॅ बाबू बड़ा खुश थे। आख़िर उनकी पसंद की लड़की उनकी बहू बन कर उस घर में आई थी। ऐसे ही एक हप्ता गुज़र गया। इन एक हप्तों में मेरे मन से पूरी तरह डर व झिझक जा चुकी थी। मुझे घर के सभी लोग अच्छे लगने लगे थे। विजय जी से इतना प्रेम हो गया था कि उनके बिना एक पल भी नहीं रहा जाता था। वो दिन भर खेतों पर काम में ब्यस्त रहते और शाम को ही घर आते। जब वो कमरे में मेरे पास आते तो मुझे रूठी हुई पाते। फिर वो मुझे मनाते। हर दिन मेरे लिए छुपा कर फूलों का गजरा खुद बना कर लाते और मेरे बालों में खुद ही लगाते। आईने के सामने ले जाकर मुझे खड़ा कर देते और मेरे पीछे खड़े होकर तथा आईने में देखते हुए मुझसे कहते "मैं सारे संसार के सामने चीख चीख कर ये कह सकता हूॅ कि इस संसार में तुमसे खूबसूरत दूसरा कोई नहीं। मैं तो बेकार व निकम्मा था जाने किन पुन्य प्रतापों का ये फल था जो तुम मुझे मिली हो" उनकी इन बातों से मैं गदगद हो जाती। मुझे ध्यान ही न रहता कि मैं उनसे रूठी हुई थी। सब कुछ जैसे भूल जाती मैं।

इस बीच मैंने महसूस किया था कि बड़े भइया और बड़ी दीदी इन दोनो का ब्यौहार सबसे अलग था। बड़े भइया विजय जी से ज्यादा बात नहीं करते थे। उसी तरह प्रतिमा दीदी मुझसे ज्यादा बात नहीं करती थी। हलाॅकि वो उस समय शहर में ही रहते थे। पर जब भी वो दोनो आते तो उनका ब्यौहार ऐसा ही होता हम दोनो से।

ऐसे ही चलता रहा। हम सब खुश थे किन्तु ये सच था कि बड़े भइया और दीदी विजय जी और मुझसे हमेशा से ही उखड़े से रहते। मैने अक्सर देखा था कि बड़े भइया किसी न किसी बात पर विजय जी को उल्टा सीधा बोलते रहते थे। ये अलग बात थी कि विजय जी उनकी किसी भी बात का बुरा नहीं मानते थे और ना ही पलट कर कोई जवाब देते थे।

एक दिन की बात है मैं अपने कमरे में नहाने के बाद कपड़े पहन रही थी, मुझे ऐसा लगा जैसे छिप कर कोई मुझे कपड़े पहनते हुए देख रहा है। मैंने पलट कर देखा तो कहीं कोई नहीं था। मैंने इसे अपना वहम समझ कर फिर से कपड़े पहनने लगी। तभी कमरे के बाहर से मेरी बड़ी ननद सौम्या की आवाज़ आई। वो कह रही थी "बड़े भइया आप यहाॅ, भाभी के कमरे के दरवाजे के पास छिप कर क्यों खड़े हैं?" सौम्या की इस बात को सुन कर मैं सन्न रह गई। ये जान कर मेरे पैरों तले से ज़मीन निकल गई कि जेठ जी छिप कर मुझे कपड़े पहनते हुए देख रहे थे। मुझे ध्यान ही नहीं था कि मेरे कमरे का दरवाजा खुला हुआ है। मेरी हालत ऐसी हो गई जैसे काटो तो एक बूद भी खून न निकले। फिर जब मुझे होश आया तो अनायास ही जाने किस भावना के तहत मुझे रोना आ गया। सौम्या जब मेरे कमरे में आई तो उसने मुझे रोता पाया। वह मुझे रोते देख हैरान रह गई। उसे किसी अनिष्ट की आशंका हुई। उसने तो देखा ही था कि उसका बड़ा भाई मेरे कमरे के बाहर दरवाजे के पास छिप कर खड़ा था। उसे समझते देर न लगी कि कुछ तो हुआ है। उसने तुरंत ही मुझे शान्त करने की कोशिश की और पूछने लगी क्या हुआ है? मैंने रोते हुए यही कहा कि मुझे तो कुछ पता ही नहीं था कि कौन दरवाजे के पास छिपकर मुझे कपड़े पहनते देख रहा है, वो तो तब पता चला जब तुमने बाहर जेठ जी से वो सब कहा था। मेरी बातें सुन कर सौम्या भी स्तब्ध रह गई। फिर उसने कहा कि ये बात मैं किसी से न कहूॅ क्यों कि घर में हंगामा हो जाएगा। इस लिए इस बात को भूल जाऊॅ लेकिन आइंदा से ये ख़याल ज़रूर रखूॅ कि दरवाजा खुला न रहे।

उस दिन के बाद जेठ जी का मुझे देखने का नज़रिया बदल चुका था। वो किसी न किसी बहाने मुझे देख ही लेते। मैं पन्द्रह साल की नासमझ ही थी। मुझे सिर पर साड़ी द्वारा घूॅघट करने का भूल जाता था। जेठ जी मुझे देखते और जब मेरी नज़र उन पर पड़ती तो वो बस मुस्कुरा देते। मुझे ये सब बड़ा अजीब लगता और मैं इस सबसे डर भी जाती।

उधर विजय जी खेतों में दिन रात मेहनत करते और ज्यादा से ज्यादा मात्रा में फसल उगाते। शहर में बेंच कर जो भी मुनाफा होता वो उस सारे पैसों को बाबू जी के हाॅथ में पकड़ा देते। उन पर तो जैसे पागलपन सवार था खेतों में दिन रात मेहनत करने का। उनकी मेहनत व लगन से अच्छा खासा मुनाफा भी होता। मैं अक्सर उनके पास खेतों में उन्हें खाना देने के बहाने चली जाती। मुझे उनके साथ रहना अच्छा लगता था फिर चाहे वो किसी भी जगह हों। हम दोनो खेतों में नये नये पौधे लगाते और खूब सारी बातें करते।

समय गुज़रता रहा। समय के साथ साथ उनका स्वभाव जो पहले से ही बदला हुआ था वो और ज्यादा बदल गया था। जेठ जी जब भी बड़ी दीदी के साथ शहर से आते तो उनका बस एक ही काम होता था...मुझे ज्यादा से ज्यादा देखना। घर में अगर कोई न होता तो वो मुझसे बातें करने की कोशिश भी करते। किन्तु मैं उनकी किसी बात को कोई जवाब न देती बल्कि अपने कमरे में आकर दरवाजा अंदर से लगा लेती। जैसा की गाॅवों में होता है कि जेठ व ससुर के सामने घूॅघट करके ही जाना है और उनके सामने कोई आवाज़ नहीं निकालना है, बात करने की तो बात दूर। इस लिए जेठ जी जब खुद ही मुझसे बातें करने और करवाने की कोशिश करते तो मैं डर जाती और भाग कर अपने कमरे में जाकर अंदर से दरवाजा बंद कर लेती। इतना तो मैं समझ गई थी कि जेठ जी की नीयत मेरे प्रति सही नहीं है। मगर किसी से कह भी नहीं सकती थी। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से घर में कोई कलह शुरू हो जाए।

उधर विजय जी की मेहनत से घर में ढेर सारा पैसा आने लगा था। बाबू जी अपने इस बेटे से बड़ा खुश थे। मुझसे भी खुश थे क्योंकि मैं उनकी नज़र में एक आदर्श बहू थी। एक बार जेठ जी फिर आए शहर से। किन्तु इस बार वो पैसों के लिए आए थे क्योंकि उन्हें शहर में खुद का कारोबार करना था। उन्होने बाबू जी से इस बारे में बात की और उनसे पैसे मागे। इस बाबूजी नाराज़ भी हुए। पैसों के बारे में उन्होने यही कहा कि ये सब पैसे विजय की मेहनत का नतीजा है इस लिए उससे पूछना पड़ेगा। बाबू जी की इस बात ने जेठ जी के मन में विजय जी के लिए और भी ज़हर भर गया। मुझे आज भी नहीं पता कि ऐसी क्या वजह थी जिसकी वजह से जेठ जी के मन में अपने इस भाई के लिए इतना ज़हर भरा हुआ था? जबकि सब जानते थे कि विजय जी हमेशा उनका आदर व सम्मान करते थे। उनकी किसी भी बात का बुरा नहीं मानते थे। ख़ैर, पैसा लेकर जेठ जी शहर चले गए। इस बार जब वो आए थे तो किसी भी दिन उन्होंने वो हरकतें नहीं की जो इसके पहले करते थे मुझे देखने की। शहर में जेठ जी ने खुद का कारोबार शुरू कर लिया। इधर विजय जी के ज़ेहन में ये भूत सवार हो गया था कि घर को तुड़वा कर इसे नये सिरे से बनवा कर हवेली का रूप दिया जाए। उन्होने बाबू की सहमति से हवेली की बुनियाद रखी। हवेली को तैयार करने में भारी पैसा खर्च हुआ। यहाॅ तक की बाद में हवेली का बाॅकी काम कर्ज लेकर करना पड़ा। जेठ जी ने पैसा देने से इंकार कर दिया।

इस बीच बड़ी दीदी को एक बेटी हुई। इसका पता भी हम सबको बाद में चला था। ख़ैर, जब वो शहर से आए तो बाबू जी इस खबर से नाराज़ तो हुए किन्तु फिर हमेशा की तरह ही चुप रह गए।

मैं इस बात से खुश थी कि जेठ जी अब चोरी छिपे मुझे देखने वाली हरकतें करना बंद कर दिये थे। इस बीच अभय ने भी अपनी पसंद की लड़की से शादी कर ली। बाबू जी इस बात से नाराज़ हुए लेकिन कर भी क्या सकते थे? लेकिन करुणा का आचरण बहुत अच्छा था, वो पढ़ी लिखी थी लेकिन उसमें संस्कार भी थे। मैं उसे अपनी छोटी बहन बना कर खुश थी। हम दोनों का आपस में बड़ा प्रेम था। कोई कह ही नहीं सकता था कि वो मेरी देवरानी है। अभय गुस्सैल स्वाभाव के ज़रूर थे किन्तु उनके अंदर अपने से बड़ों का आदर सम्मान करने की भावना थी। प्रेम के चक्कर में छोटी ऊम्र ही उन्होने शादी कर ली थी। लेकिन बाबू जी शायद इस लिए चुप रह गए थे क्योंकि वो अपने पैरों पर खड़े थे। गाॅव के ही सरकारी स्कूल में अध्यापक थे वो।

इधर हवेली बन कर तैयार हो चुकी थी। कर्ज़ भी काफी हो गया था लेकिन विजय जी के लिए तो जैसे ये कर्ज़ कोई मायने ही नहीं रखता था। बाबू जी ने हवेली के तैयार होने पर बड़े धूमधाम से गृह प्रवेश का उत्सव मनाया। शहर से बड़े भइया और दीदी भी आईं। हवेली देख कर वो दोनो ही हैरान थे किन्तु प्रत्यक्ष में हमेशा की तरह ही ग़लतियाॅ बता रहे थे। बाबू जी सब जानते भी थे और समझते भी थे किन्तु हमेशा चुप रहते।

ऐसे ही चार साल गुज़र गए और मुझे एक बेटा हुआ। मेरे बेटे के जन्म के चार दिन बाद बड़े भइया और दीदी को फिर से एक बेटी हुई। बाबू जी ने अपने पोते के जन्म पर बड़े धूमधाम से उत्सव मनाया। बड़े भइया और दीदी इससे नाराज़ हुए। उनका कहना था कि उनकी बेटियों के जन्म उत्सव नहीं मनाया जबकि विजय के बेटे के जन्म पर बड़ा उत्सव मना रहे हैं आप। उनकी इन बातों से बाबू जी का गुस्सा उस दिन जैसे फट पड़ा था। उन्होंने गुस्से में बहुत कुछ सुना दिया उन दोनो को। बात भी सही थी। दरअसल वो दोनो खुद को हम सबसे अलग कर लिए थे। शहर में खुद का कारोबार और बड़ा सा एक घर था उनके पास। शायद इसी का घमंड होने लगा था उन्हें। वो सोचते थे कि कहीं हम लोग उनके कारोबार और शहर के मकान में हिस्सा न मागने लगें इस लिए वो हमेशा हम सबसे कटे कटे से रहते। जबकि यहा हवेली और ज़मीन जायदाद में अपना हक़ समझते थे।

गौरी कुछ पल के लिए रुकी और गहरी साॅसें लेने लगी। सब लोग साॅस बाधे उसकी बातें सुन रहे थे।

"मैं जानती हूॅ अभय कि मैने अभी जो कुछ कहा उस सबको तुम जानते हो।" गौरी ने कहा__"तुम सोच रहे होगे कि मैं ये सब तुम्हें क्यों बता रही हूॅ जबकि मुझे तो सिर्फ वो सब बताना चाहिए जो इन लोगों ने मेरे और मेरे पति के साथ किया था। ख़ैर, ये सब बताने का मतलब यही था कि जो कुछ हुआ उसकी बुनियाद उसकी शुरूआत यहीं से हुई थी। ज़हर के बीज यहीं से बोना शुरू हुए थे।

राज जब दो साल का हुआ तो मेरी बड़ी ननद सौम्या की शादी की बात चली। बाबू जी ने बड़े भइया को संदेश भेजवाया और कहा कि वो अपनी बहन की शादी के लिए अपनी तरफ से क्या खर्चा कर सकते हैं? बाबू जी बात से बड़े भइया ने पैसा देने से साफ इंकार कर दिया था। उनका कहना था कि उनका कारोबार आजकल बहुत घाटे में चल रहा है इस लिए वो पैसे नहीं पाएॅगे। बाबू जी उनकी इस बात से बेहद दुख हुआ। बाबू जी के दुख का जब विजय जी को पता चला तो वो खेतों से आकर हवेली में बाबू जी से मिले। उन्होने बाबू जी से कहा कि आप किसी बात की फिक्र न करें, सौम्या की शादी बड़े धूमधाम से ही होगी। बाबू जी जानते थे कि हवेली बनाने में जो कर्जा हुआ था उसे विजय जी ने कितनी मेहनत करके चुकाया था। इसके बाद कहीं फिर से न कर्ज़ा हो जाए। खैर, सौम्या की शादी हुई और वैसे ही धूमधाम से हुई जैसा कि विजय जी ने बाबू जी से कहा था। शहर से बड़े भइया और दीदी भी थे, वो दोनो हैरान थे किन्तु सामने पर यही कहते फिलते बाबू जी से कि इतना खर्च करने की क्या ज़रूरत थी? इससे जो कर्ज़ हुआ है उसे मेरे सिर पर मत मढ़ दीजिएगा। बाबू जी इस बात से बेहद गुस्सा हुए। कहने लगे कि तुम तो वैसे ही खुद को सबसे अलग समझते हो, तुम्हें किसी बात की चिन्ता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। मेरे दो दो सपूत अभी बाॅकी हैं जो मेरा हर तरह से साथ देंगे और दे भी रहे हैं। सौम्या की शादी के तीसरे दिन बड़े भइया ने बाबू जी से कहा कि अगर आप ये समझते हैं कि मैं आप सबसे खुद को अलग समझता हूॅ तो आप मुझे सचमुच ही अलग कर दीजिए। ये रोज रोज की बेज्जती मुझसे नहीं सुनी जाती। बाबू जी ने कहा कि तुम तो अलग ही हो अब किस तरह अलग करें तुम्हें? तो बड़े भइया ने कहा कि मेरे हिस्से में जो भी आता हो उसे मुझे दे दीजिए। हवेली में और ज़मीनों में जो भी मेरा हिस्सा हो। बाबू जी उनकी इस बात पर गुस्सा हो गए। कहने लगे कि तुम्हारा हवेली में तभी हिस्सा हो सकता है जब तुम अपने हिस्से की कीमत दोगे। क्योंकि हवेली में तुमने अपनी तरफ से एक रुपया भी नहीं लगाया। हवेली में जो भी रुपया पैसा लगा और जो भी कर्ज़ा हुआ उस सबको अकेले विजय ने चुकता किया है। हाॅ अगर विजय चाहे तो अपनी मर्ज़ी से तुम्हें बिना कीमत चुकाए हवेली में हिस्सा दे सकता है।

बाबू जी की बात से बड़े भइया नाराज़ हो गए। कहने लगे कि विजय होता कौन है मुझे हिस्सा देने वाला। उस मजदूर के सामने मैं हाॅथ फैलाने नहीं जाऊॅगा। मुझे आपसे हिस्सा चाहिए। उनकी इन बातों से बाबू जी भी गुस्सा हो गए। कहने लगे कि अगर ऐसी बात है तो तुम्हें भी अपने कारोबार और शहर के मकान में दोनो भाइयों को हिस्सा देना होगा। तुम्हारा कारोबार तो वैसे भी विजय के ही पैसों की बुनियाद पर खड़ा हुआ है। बाबू जी इस बात से बड़े भइया ने साफ कह दिया कि मेरे कारोबार और शहर के मकान में किसी का कोई हिस्सा नहीं है। तो बाबू जी ने भी कह दिया कि फिर तुम भी ये भूल जाओ कि तुम्हारा इस हवेली में और ज़मीनों में कोई हिस्सा है।

बाबू जी की इस बात से बड़े भइया गुस्सा हो गए। कहने लगे कि ये आप ठीक नहीं कर रहे हैं। आप बाप होकर भी अपने बेटों के बीच पक्षपात कर रहे हैं। बाबू जी ने कहा कि तुम अपने आपको होशियार समझते हो कि तुम सबके हिस्सा ले लो और तुमसे कोई न ले। ये कहाॅ का न्याय कर रहे हो तुम? अरे तुम तो बड़े भाई हो, तुम्हें तो खुद सोचना चाहिए कि तुम अपने छोटे भाइयों का भला करो और भला ही सोचो।

बाबू जी की इन बातों से बड़े भइया कुछ न बोले और पैर पटकते हुए वापस शहर चले गए। उधर ये सारी बातें जब विजय जी को पता चलीं तो वो बाबू जी से बोले कि आपको बड़े भइया से ऐसा नहीं कहना चाहिए था। भला क्या ज़रूरत थी उनसे ये कहने की कि हवेली में हिस्सा तभी मिलेगा जब वो अपने हिस्से की कीमत चुकाएॅगे? मैने ये सोच कर ये सब नहीं किया था कि बाद में मैं अपने ही भाइयों से हवेली की कीमत वसूल करूॅ। बाबू जी बोले इतना महान मत बनो बेटे। ये दुनिया बहुत बुरी है, यहाॅ बड़े खुदगर्ज़ लोग रहते हैं। समय के साथ खुद को भी बदलो बेटा। वरना ये दुनिया तुम जैसे नेक और सच्चे ब्यकित को जीने नहीं देगी। बाबू जी की इस बात पर विजय जी बोले जैसे सूरज अपना रोशनी फैलाने वाला स्वभाव नहीं बदल सकता वैसे ही मेरा स्वभाव भी नहीं बदल सकता। आप और माॅ की सेवा करूॅ छोटे भाई के लिए खुद की सारी खुशियाॅ निसार कर दूॅ। भला क्या लेकर जाऊॅगा इस दुनियाॅ से? सब यहीं तो रह जाएगा न बाबू जी। इंसान की सबसे बड़ी दौलत व पूॅजी तो वो है जिसे पुन्य कहते हैं। एक यही तो लेकर जाता है वह भगवान के पास।

विजय जी की इन बातों से बाबू जी अवाक् रह गए। कुछ देर बाद बोले तू तो कोई फरिश्ता है बेटे। मन से बैरागी है तू। तुझे किसी धन दौलत का मोह नहीं है। जब तू पढ़ता लिखता नहीं था न तो दिन रात कोसता था तुझे। सोचता था कि कैसा निकम्मा बेटा दिया था मुझे भगवान ने लेकिन भला मुझे क्या पता था कि वही निकम्मा बेटा एक दिन इतना महान निकलेगा। मुझे तुझपे गर्व है बेटे। लेकिन मेरी एक बात हमेशा याद रखना कि दूसरों खुश रखने के लिए खुद का बने रहना भी ज़रूरी होता है।

बाबू जी की इस बात को सुन कर विजय जी मुस्कुराए और फिर से अपनी कर्मभूमि यानी खेतों पर चले गए। बाबू जी की बातों में छुपे किसी अर्थ को शायद विजय जी समझ नहीं पाए थे। लेकिन बाबू जी को शायद भविष्य दिख गया था।

उधर शहर में बड़े भइया और दीदी इस बार कुछ और ही खिचड़ी पका रहे थे। सौम्या की शादी को एक महीना हो गया था जब बड़े भइया और दीदी को तीसरी औलाद के रूप में एक बेटा हुआ था। वो दोनो शहर से आए थे घर। इस बार बाबू जी ने उनके बेटे के जन्म पर राज के जन्मोत्सव से भी ज्यादा उत्सव मनाया कारण यही था कि बड़े भइया और दीदी को ये न लगे कि हमें कोई खुशी नही हुई है उनके बेटे के जन्म पर। बड़े भइया खुद भी उत्सव में खूब पैसा बहा रहे थे। वो दिखाना चाहते थे कि वो किसी से कम नहीं हैं। ख़ैर, इस बार एक नई चीज़ देखने को मिली। वो ये थी कि बड़े भइया और दीदी हम सब से बड़े अच्छे तरीके से मिल जुल रहे थे। विजय जी से भी उन्होने अच्छे तरीके से बातें की। एक दिन बड़े भइया खेतों पर घूमने गए। वहाॅ पर उन्होने देखा कि ज़मीनों पर काफी अच्छी फसल उगी हुई थी। बगल से जो बंज़र सा पहले बड़ा सा मैदान हुआ करता था अब वहाॅ पर अच्छे खासे पेढ़ लगाए जा चुके थे। खेतों पर एक तरफ बड़ा सा मकान भी बन रहा था। खेतों पर बहुत से मजदूर काम कर रहे थे। विजय जी ने बड़े भइया को वहाॅ पर देखा तो वो भाग कर उनके पास आए और बड़े आदर व सम्मान से उन्हें खेतों के बारें में तथा फसलों से होने वाली आमदनी के के बारे में बताने लगे। उन्होंने ये भी बताया कि दूसरी तरफ जो बीस एकड़ की खाली ज़मीन पड़ी थी उसमें मौसमी फलों के बाग़ लगाने की तैयारी हो रही है। उससे काफी ज्यादा आमदनी होगी।

ऐसे ही बातें चलती रही फिर बातों ही बातों में जब हवेली का ज़िक्र आया तो विजय जी ने खुद कहा कि हवेली में सबका बराबर का हिस्सा है वो जब चाहें ले सकते हैं। उन्हें कोई कीमत नहीं चाहिए। ये सब अपनो के लिए ही तो बनाया गया है। विजय जी की इन बातों से बड़े भइया खुश हो गए। किन्तु उनके मन में शायद कुछ और ही था जो उस वक्त समझ नहीं आया था।

ऐसे ही वक्त गुज़रता रहा। इसी बीच मुझे एक बेटी हुई और दस दिन बाद करुणा ने भी एक सुंदर सी बच्ची को जन्म दिया। राज उस वक्त चार साल का हो गया था। वो दिन भर अपनी उन दोनो बहनों के साथ ही रहता, और उनके साथ ही हॅसता खेलता। शहर से बड़े भइया और दीदी भी आए थे। सबके लिए कपड़े भी लाए थे। हम सब बेहद खुश थे इस सबसे।

इस बीच एक परिवर्तन ये हुआ कि बड़े भइया शहर से हप्ते में एक दो दिन के लिए हवेली आने लगे थे। माॅ बाबू जी से वो बड़े सम्मान से बातें करते और खेतों पर भी जाते। वहाॅ देखते सुनते सब। मैं और करुणा घर के सारे काम करती। उसके बाद मैं खेत चली जाती विजय जी के पास। खेतों में जो मकान बन रहा था वो बन गया था।

इस बीच बच्चे भी बड़े हो रहे थे। राज पाॅच साल का हुआ तो उसका स्कूल में दाखिला करा दिया अभय ने। गर्मियों में जब स्कूल की छुट्टियाॅ होती तो बड़े भइया और दीदी के बच्चे भी शहर से गाॅव हवेली में आ जाते। सब बच्चे एक साथ खेलते और खेतों में जाते। बड़े भइया की बड़ी बेटी रितू अपनी माॅ पर गई थी। वो ज्यादा हम लोगों से घुलती मिलती नहीं थी। शिवा अपने बाप पर ही गया था। वह अपनी चीज़ें किसी को नहीं देता था और दूसरों की चीज़ें लड़ झगड़ कर ले लेता था। राज से अक्सर उसकी लड़ाई हो जाती थी। बच्चे तो नासमझ होते हैं उन्हें अच्छे बुरे का ज्ञान कहाॅ होता है। इस लिए अगर इनकी आपस में कभी लड़ाई होती तो जेठानी जी अक्सर नाराज़ हो जाती थीं। बड़ी मुश्किल से गर्मियों की छुट्टियाॅ कटती और जेठानी जी अपने बच्चों को लेकर शहर चली जातीं।

दोस्तो, अपडेट हाज़िर है,,,,,,
अगले अपडेट से फ्लैशबैक को शार्ट करके लिखूॅगा,
 
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट..........《 29 》

अब तक,,,,,,,,,,

ऐसे ही वक्त गुज़रता रहा। इसी बीच मुझे एक बेटी हुई और दस दिन बाद करुणा ने भी एक सुंदर सी बच्ची को जन्म दिया। राज उस वक्त चार साल का हो गया था। वो दिन भर अपनी उन दोनो बहनों के साथ ही रहता, और उनके साथ ही हॅसता खेलता। शहर से बड़े भइया और दीदी भी आए थे। सबके लिए कपड़े भी लाए थे। हम सब बेहद खुश थे इस सबसे।

इस बीच एक परिवर्तन ये हुआ कि बड़े भइया शहर से हप्ते में एक दो दिन के लिए हवेली आने लगे थे। माॅ बाबू जी से वो बड़े सम्मान से बातें करते और खेतों पर भी जाते। वहाॅ देखते सुनते सब। मैं और करुणा घर के सारे काम करती। उसके बाद मैं खेत चली जाती विजय जी के पास। खेतों में जो मकान बन रहा था वो बन गया था।

इस बीच बच्चे भी बड़े हो रहे थे। राज पाॅच साल का हुआ तो उसका स्कूल में दाखिला करा दिया अभय ने। गर्मियों में जब स्कूल की छुट्टियाॅ होती तो बड़े भइया और दीदी के बच्चे भी शहर से गाॅव हवेली में आ जाते। सब बच्चे एक साथ खेलते और खेतों में जाते। बड़े भइया की बड़ी बेटी रितू अपनी माॅ पर गई थी। वो ज्यादा हम लोगों से घुलती मिलती नहीं थी। शिवा अपने बाप पर ही गया था। वह अपनी चीज़ें किसी को नहीं देता था और दूसरों की चीज़ें लड़ झगड़ कर ले लेता था। राज से अक्सर उसकी लड़ाई हो जाती थी। बच्चे तो नासमझ होते हैं उन्हें अच्छे बुरे का ज्ञान कहाॅ होता है। इस लिए अगर इनकी आपस में कभी लड़ाई होती तो जेठानी जी अक्सर नाराज़ हो जाती थीं। बड़ी मुश्किल से गर्मियों की छुट्टियाॅ कटती और जेठानी जी अपने बच्चों को लेकर शहर चली जातीं।
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अब आगे,,,,,,,,,,,,

प्रतिमा अपने पति के साथ जब अपने कमरे में पहुॅची तो अचानक ही पीछे से अजय ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया साथ ही अपने होठों को उसकी गर्दन पर लगा कर करते हुए अपने दोनो हाथों से प्रतिमा के बड़े बड़े चूॅचों को बुरी तरह मसलने लगा।

"आऽऽऽह धीरे से प्लीज़।" प्रतिमा की दर्द और मज़े में डूबी आह निकल गई थी, बोली___"ज़रा धीरे से आहहहहह मसलो न अजय। मुझे दर्द हो रहा है।"

"ये धीरे से मसलने वाली चीज़ नहीं है मेरी जान।" अजय सिंह ने उसी तरह प्रतिमा के चूॅचों को मसलते हुए कहा__"इन्हें तो आटे की तरह गूॅथा और मसला जाता है। देख लो मैं वही कर रहा हूॅ।"

"वो तो मैं देख ही रही हूॅ।" प्रतिमा ने आहें भरते हुए कहा___"पर मुझे ये नहीं समझ आ रहा कि इस समय तुम ये सब इतने उतावलेपन से क्यों कर रहे हो? आख़िर किस बात का जोश चढ़ गया है तुम्हें?"

"मत पूछो डियर।" अजय सिंह ने खुद आह सी भरते हुए कहा___"इस हवेली में आज एक और चूॅत आ गई है। मेरी छोटी बहन की प्यारी प्यारी सी चूॅत। हाय काश! उसकी उस चूॅत को पेलने का मौका मिल जाए तो कसम से मज़ा आ जाए प्रतिमा।"

"हे भगवान।" प्रतिमा उछल पड़ी__"तो इस वजह से जोश चढ़ा हुआ है तुम्हें? कसम से अजय तुम न कभी नहीं सुधर सकते। तुम्हारे ही नक्शे कदम पर हमारा बेटा भी चल रहा है। मैने हज़ार बार देखा है उसे, उसकी नज़रें अपनी बहनों पर ही नहीं खुद मुझ पर भी गड़ जाती हैं। उसे ये भी ख़याल नहीं कि मैं उसकी माॅ हूॅ। ये सब तुम्हारी वजह से है अजय। तुम खुद उसकी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ करते रहते हो।"

"अरे तो क्या हो गया मेरी जान?" अजय ने प्रतिमा को उठाकर बेड पर लेटा दिया और फिर उसके ऊपर आकर बोला___"नज़रें तो होती ही हैं नज़ारा करने के लिए। तुम तीनो माॅ बेटियाॅ हो ही इतनी हाॅट एण्ड सेक्सी कि हमारे बेटे का भी इमानडोल गया।"

"तुम्हारे बेटे का बस चले तो अपनी माॅ बहनों को भी अपने नीचे लेटा कर पेल दे।" प्रतिमा ने हॅस कर कहा था।
"तो इसमें दिक्कत क्या है डियर?" अजय ने बेशर्मी से हॅसते हुए कहा__"उसे भी अपनी कुण्ड का अमृत पिला दो। शायद उसकी प्यास और तड़प मिट ही जाए।"

"ओह अजय कुछ तो शर्म करो।" प्रतिमा ने हैरानी से देखा__"भला ऐसा मैं कैसे कर सकती हूॅ? वो मेरा बेटा है, मैने उसे पैदा किया है।"
"तो क्या हुआ मेरी जान?" अजय ने अपना एक हाॅथ सरका कर प्रतिमा की साड़ी को ऊपर कर उसकी नंगी चूॅत को मसलते हुए कहा___"इसी रास्ते से ही पैदा किया ना अपने बेटे को? अब इसी रास्ते का स्वाद भी चखा दो उसे। यकीन मानो मेरी जान उसके बाद तुम्हारा बेटा तुम्हारा गुलाम ना हो जाए तो कहना।"

"उफफफफ अजय तम्हें ज़रा भी एहसास नहीं है कि तुम क्या बकवास किये जा रहे हो?" प्रतिमा ने नाराज़गी भरे लहजे से कहा__"तुम मुझे ऐसा करने के लिए कैसे कह सकते हो? क्या तुम्हें ज़रा सी भी इस बात से तक़लीफ़ नहीं होगी कि हमारा बेटा तुम्हारी चीज़ों का भोग करे? किस मिट्टी के बने हो तुम यार?"

"यार तो कौन सा घिस जाएगी तुम्हारी ये रस से भरी हुई चूत?" अजय ने अपने हाॅथ की दो उॅगलियाॅ प्रतिमा की रिस रही चूत में अंदर तक डाल कर कहा___"एक बार अपने बेटे का हथियार भी तो डलवा कर मज़ा लो। सक्सेना के साथ तो बड़ा मज़ा करती थी तुम। दो दो हथियारों से आगे पीछे से पेलवाती थी तुम। कसम से डियर, अगर ऐसा हो जाए तो मज़ा ही आ जाए। हम दोनो बाप बेटे एक साथ मिल कर तुम्हारी आगे पीछे से ठुकाई करेंगे।"

"आआआहहहहह अजय।" प्रतिमा ने मदहोशी में कहा___"मत करो ऐसी बातें। मुझे कुछ हो रहा है।"
"हाहाहाहा जब ऐसी बातों से ही तुम्हें कुछ होने लगा है तो ज़रा सोचो डार्लिंग।" अजय ने हॅसते हुए कहा___"सोचो डियर तब क्या होगा जब हम दोनो बाप बेटों के हथियार तुम्हारी पेलाई करेंगे?"

"शशशशशशश कुछ करो अजय।" प्रतिमा की हालत ख़राब___"जल्दी से कुछ करो। मेरी चूत में आग जलने लगी है। इसे बुझाओ जल्दी। वरना मैं इस आग में जल जाऊॅगी।"

"क्या करूॅ डियर?" अजय मुस्कुराया था।
"कुछ भी करो।" प्रतिमा ने बेड सीट को दोनो हाथों की मुट्ठियों में भींचते हुए कहा___"पर मेरी इस आग को शान्त करो जल्दी। उफफफ ये आज क्या हो रहा है मुझे??"

"आज बेटे के हथियार की बात चली है ना इस लिए शायद ऐसा हो रहा है तुम्हें।" अजय ने कहा__"पर बेटे का हथियार तो इस वक्त यहाॅ नहीं है मेरी जान। कहो तो फोन करके शहर से बुला लूॅ उसे?"

"उसे तो आने में समय लगेगा अजय।" प्रतिमा ने आहें भरते हुए कहा___"तुम्हें ही इस आग को शान्त करना पड़ेगा। शशश जल्दी मुझे पेलो ना अजय।"

"इसका मतलब तुम्हें अपने बेटे से पेलवाने में अब कोई ऐतराज़ नहीं है।" अजय मुस्कुराया।
"मुझे तुम्हारी किसी बात से कभी कोई ऐतराज हुआ है क्या?" प्रतिमा ने झटके से उठ कर अजय के कपड़े उतारना शुरू कर दिया था, बोली___"मैं तो तुम्हारी हर जायज़ नाजायज़ बात को अब तक मानती ही आ रही हूॅ। अब जल्दी से मुझे आगे पीछे पेलो। बहुत आग लगी हुई है।"

"ठीक है फिर कल हम दोनो शहर चलेंगे और वहीं पर अपने बेटे के साथ थ्रीसम करेंगे।" अजय ने कहा।
"जो तुम्हारी मर्ज़ी लेकिन अभी तो मुझे शान्त करो।" प्रतिमा ने अजय को नंगा कर दिया था।

अजय ने प्रतिमा की दोनो टाॅगों को अपने दोनों कंधों पर रखा और पोजीशन बना कर प्रतिमा पर छाता चला गया। कमरे के अंदर जैसे एकाएक कोई भारी तूफान आ गया था।
_______________________

फ्लैशबैक________

उधर मुम्बई में,

कुछ पल रुकने के बाद गौरी ने गहरी साॅस ली उसके बाद फिर से कहा___"ऐसे ही कुछ साल गुज़र गए। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। राज़ अब बड़ा हो गया था। उस समय वह दस जमात में पढ़ रहा था। पढ़ने लिखने में वह शुरू से ही तेज़ था क्योंकि उसकी पढ़ाई की सारी जिम्मेदारी अभय और करुणा पर थी। विजय जी ने बाबू जी के लिए एक बढ़िया सी कार खरीद दी थी तथा अभय के लिए एक बुलेट मोटर साइकिल।

अब की बार जब गर्मियों की छुट्टियाॅ हुईं तो फिर से जेठ जेठानी अपने बच्चों के साथ शहर से गाव आए। किन्तु इस बार हालातों में बहुत बड़ा बदलाव हो चुका था।

गौरी की नज़रें सामने एक बड़े से टेबल पर रखे काॅच के एक बड़े से जार में टिकी थी। जिस जार में भरे हुए पानी पर रंग बिरंगी मछलियाॅ तैर रही थी। उसी काॅच के जार में गौरी एकटक देखे जा रही थी। जैसे वहाॅ कोई फिल्म चल रही हो। एक ऐसी फिल्म जो गुज़रे हुए कल का एक हिस्सा थी।

"कल से ही तुम अपने काम में लग जाओ मेरी जान।" अपने कमरे में बेड के एक तरफ बैठे अजय ने प्रतिमा से कहा___"हमें किसी भी कीमत पर उस मजदूर को अपने काबू में करना है।"

"और अगर उसने कोई हंगामा खड़ा कर दिया तो?" प्रतिमा ने तर्क दिया___"तब तो मैं इस घर में किसी को मुह दिखाने के काबिल भी न रह जाऊॅगी।"
"ऐसा कुछ नहीं होगा।" अजय ने पुरज़ोर लहजे में कहा___"मुझे पता है वो साला इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताएगा। और अगर उसने इस सबमें ज्यादा चूॅ चाॅ की तो उसके इलाज़ के लिए भी फिर प्लान बी अपनाया जाएगा।"

"और प्लान बी क्या है?" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए पूछा था।
"प्लान बी ये है कि तुम्हारी उन हरकतों से अगर वह घर में किसी से कुछ कहता है और अगर सारी बात तुम पर ही आती है तो तुम उल्टा उस पर ही इल्ज़ाम लगाना।" अजय सिंह उसे समझा रहा था___"चीख चीख कर सबसे यही कहना कि विजय खुद कई दिन से तुम्हारी इज्जत लूटने के चक्कर में था। बाद में फिर मैं हूॅ ही इन हालातों को अंजाम तक ले जाने के लिए।"

"तुम क्या करोगे उस सूरत में?" प्रतिमा ने पूछा।
"वो सब तुम मुझ पर छोंड़ दो।" अजय ने कहा___"अभी उतना ही करो जितना कहा है। इधर मैं भी अपने काम में लग जाता हूॅ।"

"ठीक है।" प्रतिमा ने कहा___"लेकिन अभय और करुणा से सावधान रहना। अभय की तरह करुणा भी ज़रा तेज़ तर्रार है।"
"चिन्ता मत करो।" अजय ने कहा___"सबको देख लूॅगा एक एक करके। पहले इन दोनो से तो निपट लूॅ।"

"ठीक है।" प्रतिमा ने कहा___"आज विजय का खाना लेकर मैं जाऊॅगी। गौरी की तबियत बुखार के चलते परसो से कुछ खराब है। कल तो नैना गई थी विजय को खाना देने। आज मैं जाऊॅगी।"

"ठीक है।" अजय ने कहा__"और हाॅ ब्लाउज बिलकुल बड़े गले वाला पहन कर जाना। बाॅकी तो तुम समझदार ही हो।"

प्रतिमा मुस्कुरा कर बेड से उठी और कमरे से बाहर निकल गई। जबकि अजय के होठों पर एक ज़हरीली मुस्कान तैर उठी। वह उसी बेड पर आराम से लेट कर ऊपर छत में कुंडे पर तेज़ रफ्तार से घूम रहे पंखे की तरफ घूरने लगा था।

प्रतिमा जब किचेन में पहुॅची तो उसकी छोटी ननद नैना विजय के लिए टिफिन तैयार कर रही थी। नैना उस वक्त बाइस तेइस साल की थी। उसने अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी और बीएस सी करने बाद अब घर में ही रहती थी। उसकी शादी के लिए बाबू जी लड़का तलाश कर रहे थे।

"क्या कर रही हो नैना?" प्रतिमा ने बड़े प्यार से नैना से पूछा था।
"मॅझले भइया के लिए खाने का टिफिन तैयार कर रही हूॅ भाभी।" नैना ने कहा__"मॅझली भाभी की तबियत ठीक नहीं है न इस लिए ये टिफिन मैं ही ले जा रही हूॅ कल से। ख़ैर छोड़िये आप बताइये आप किस काम से किचेन में आई हैं?"

"मैं भी इसी लिए यहाॅ आई थी कि अपने देवर के लिए खाना पहुॅचा दूॅ।" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा___"बेचारी रात दिन जी तोड़ मेहनत करते हैं।"

"हीहीहीही आप तो शहर वाली हैं भाभी आप खेतों पर टिफिन लेकर जाएॅगी तो लोग क्या कहेंगे?" नैना ने हॅसते हुए कहा___"जाने दीजिए भाभी ये आपको शोभा नहीं देगा। टिफिन तैयार हो गया है अब चलती हूॅ मैं। आज तो वैसे भी देर हो गई है। मॅझले भइया के पेट में तो अब तक चेहे भी कूदने लगे होंगे।"

"तो तुम भी मुझे ताना मारने लगी हो?" प्रतिमा ने अपने चेहरे पर दुख के भाव प्रकट करते हुए कहा___"क्या मेरा इतना भी हक़ नहीं बनता कि मैं अपनी इच्छा से इस घर में कुछ कर सकूॅ?"

"ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" नैना ने हड़बड़ाते हुए कहा___"भला मैं क्यों आपको ताना मारूॅगी। और बाकी सब भी कहाॅ आपको ताना मारते हैं?"

"सब समझती हूॅ मैं।" प्रतिमा ने कहा___"लोग मेरे सामने मेरे मुख पर नहीं बोलते लेकिन मेरे पीठ पीछे तो सब यही बोलते हैं न। एक मैं हूॅ जो हर बार यहीं सोच कर आती हूॅ कि घर में इस बार सबका हाॅथ बटाऊॅगी और सबसे खूब हॅसूॅगी बोलूॅगी। लेकिन हर बार यहाॅ आने पर मेरी इन सभी इच्छाओं पर ग्रहण लग जाता है।"

"ओह भाभी प्लीज़।" नैना कह उठी__"आप ये सब बेकार ही सोचती हैं। आपके बारे कोई कुछ नहीं बोलता है और ना ही सोचता है ऐसा वैसा।"
"तो फिर क्यों मुझे इन सब कामों को करने से मना कर रही हो तुम?" प्रतिमा ने कहा__"मुझे करने दो ना जिसे करने का मेरा बहुत मन करता है। मैं भी सबकी तरह ये सब काम खशी खुशी करना चाहती हूॅ।"

"पर भाभी आप ये।" नैना का वाक्य अधूरा रह गया।
"देखा, फिर से वही शुरू कर दिया।" प्रतिमा ने कहा__"तुम अभी भी यही समझती हो कि मैं ये सब करूॅगी तो लोग क्या सोचेंगे। अरे हर काम की शुरूआत पर लोग ऐसा ही सोचते हैं। तो क्या हम लोगों की सोच को लेकर कोई काम ही ना करें? दूसरे लोग सोचें या न सोचें किन्तु इस घर के लोग सबसे पहले सोच लेते हैं।"

नैना हैरान परेशान देखती रह गई प्रतिमा को। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अपनी भाभी को क्या कहे।

"मैं तो ये सब इसी लिए कह रही थी भाभी क्योंकि आपको इन सब कामों की आदत नहीं है।" नैना ने कहा__"बाहर जिस्म को जला देने वाली धूप है और गर्मी इतनी कि पूछो ही मत। आप बेवजह इस धूप और गरमी में परेशान हो जाएॅगी।"

"कुछ नहीं होगा मुझे।" प्रतिमा ने कहा__"और क्या अपने देवर के लिए इतना भी नहीं कर सकती मैं?"
"अच्छा ठीक है भाभी।" नैना ने कहा__"पर मैं भी आपके साथ चलूॅगी। आप अकेले इस धूप में परेशान हो जाएॅगी।"

"नहीं नैना।" प्रतिमा ने कहा__"मुझे अकेले ही जाने दो। अकेली जाऊॅगी तो देवर जी को भी लगेगा कि उनकी भाभी को उनकी फिकर है। वरना अगर तुम्हारे साथ जाऊॅगी तो वो यही सोचेंगे कि मैं वहाॅ कोई एहसान जताने आई थी।"

"विजय भइया ऐसे नहीं हैं भाभी।" नैना ने हॅस कर कहा__"वो किसी के भी बारे में कुछ भी बुरा नहीं सोचते। बल्कि वो तो हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ मनमोहन सिंह की तरह एकदम चुप व शान्त रहने वाले हैं।"

"चलो छोड़ो ये सब।" प्रतिमा ने कहने के साथ ही नैना के हाॅथ से टिफिन ले लिया__"जब तक गौरी अच्छी तरह से ठीक नहीं हो जाती तब तक खेतों में विजय को खाना पहुॅचाने की जिम्मेदारी मेरी है। और तुम्हारी जिम्मेदारी ये है कि तुम रितू और नीलम यहाॅ हैं तब तक उनको पढ़ाओ।"

"ठीक है भाभी जैसा आप कहें।" नैना ने हॅसते हुए कहा__"आप सच में बहुत स्वीट हैं। आई लव यू माई स्वीट ऐण्ड ब्यूटीफुल भाभी।"
"ओह लव यू टू माई स्वीट ननद रानी।" प्रतिमा ने भी मुस्कुराकर कहा__"चलो अब मैं चलती हूॅ।"

इतना कह कर प्रतिमा किचेन से बाहर आ कर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। जबकि नैना अपने कमरे की तरफ मुस्कुराते हुए चली गई। इधर कमरे में आकर प्रतिमा ने टिफिन को बेड के पास दीवार तरफ सटे एक टेबल पर रखा और फिर आलमारी की तरफ बढ़ गई।

"क्या हुआ तुम यहीं हो?" अजय सिंह ने चौंकते हुए कहा था___"अभी तक खेतों पर गई नहीं???"
"तुम तो इस सबको इतना आसान समझते हो जबकि तुम्हें पता होना चाहिए कि कहने और करने में ज़मीन आसमान का फर्क होता है।" प्रतिमा ने आलमारी से एक झीनी सी साड़ी निकालते हुए कहा था।

"वो तो मुझे भी पता है।" अजय सिंह ने कहा___"लेकिन मेरे कहने का मतलब ये था कि टिफिन तैयार करने में बेवजह इतना समय क्यों लगा दिया तुमने?"

"यार जब मैं किचेन में गई तो वहाॅ पर नैना आलरेडी टिफिन तैयार कर चुकी थी।" प्रतिमा ने कहा___"और वह टिफिन लेकर खेतों पर जाने ही वाली थी। इस लिए मुझे उसे इमोशनली ब्लैकमेल करना पड़ा।"

"क्या मतलब??" अजय सिंह चौंका।

प्रतिमा ने उसे किचेन में नैना और खुद के बीच हुई सारी बातें बता दी। सारी बातें सुनने के बाद अजय सिंह बोला___"ये बिलकुल सही किया तुमने। और अब इसके आगे का भी ऐसा ही परफेक्ट हो तो मज़ा ही आ जाए।"

"ऐसा ही होगा डियर।" प्रतिमा ने अपने जिस्म से पहले वाले कपड़े उतार दिये। अब वह ऊपर मात्र ब्रा में थी जबकि नीचे पेटीकोट था।

"इस ब्रा को भी उतार दो ना डियर।" अजय सिंह मुस्कुराया__"अपने बड़े बड़े तरबूजों के ऊपर सिर्फ ये लोकट वाला ब्लाउज ही पहन कर जाओ। ताकि उस साले मजदूर को नज़ारा करने में आसानी हो।"

"बड़े बेशर्म हो सच में।" प्रतिमा ने हॅसते हुए कहा और अपने हाॅथों को पीछे अपनी पीठ पर ले जाकर ब्रा का हुक खोल कर उसे अपने शरीर से अलग कर दिया।

"हाय, इन भारी भरकम तरबूजों पर जब उस मजदूर की दृष्टि पड़ेगी तो यकीनन उस साले की आॅखें फटी की फटी रह जाॅएॅगी।" अजय ने आह सी भरते हुए कहा था___"सारा इमान पल भर में चकनाचूर हो जाएगा उसका।"

"काश! ऐसा ही हो।" प्रतिमा ने ब्लाऊज को पहनते हुए कहा___"अगर बात बन गई तो मुझे भी एक नई चीज़ मिल जाएगी।"
"बिलकुल बात बनेगी डियर।" अजय सिंह ने ज़ोर देकर कहा___"तुम तो उर्वशी या मेनका से भी सुंदर व मालदार हो। भला तुम्हारे सामने वो मजदूर कब तक टिका रहेगा?"

"तुम हर बात पर उसे मजदूर क्यों बोल रहे हो अजय?" प्रतिमा ने कहा___"जबकि वह भी तुम्हारी तरह ठाकुर गजेन्द्र सिंह बघेल की औलाद है और तुम्हारा सगा भाई है।"

"जो भी हो।" अजय सिंह बोला__"है तो एक मजदूर ही ना? अब मजदूर को मजदूर ना कहूॅ तो और क्या कहूॅ?"
"चलो अब मैं जा रहीं हूॅ।" प्रतिमा ने आदमकद आईने में खुद को देखने के बाद कहा__"अब मेरा ड्रेस ठीक है ना?"
"एकदम झक्कास है मेरी जान।" अजय सिंह ने कहा___"इस ड्रेस में तुम्हें देख कर अब तो मुझे ऐसा लग रहा है कि अभी एक बार तुम्हें इसी बेड पर पटक कर पेल दूॅ पर जाने दो।"

प्रतिमा उसकी इस बात पर हॅस पड़ी और फिर टेबल से टिफिन उठा कर कमरे से बाहर जली गई।
________________________

वर्तमान_______

हल्दीपुर पुलिस स्टेशन !

"तो क्या जानकारी मिली तुम्हें?" अपनी कुर्सी पर बैठी रितू ने सामने खड़े हवलदार से पूछा था।
"मैडम जिन लड़के लड़कियों की लिस्ट आपने दी थी।" वह हवलदार कह रहा था जिसकी वर्दी की नेम प्लेट पर उसका नाम राम सिंह लिखा हुआ था, बोला___"उनमें से कुछ तो उसी काॅलेज के हैं जिस काॅलेज में वो पीड़िता यानी विधी चौहान पढ़ती है जबकि बाॅकी के सब बाहरी हैं। मेरा मतलब कि उस काॅलेज के नहीं हैं।"

"बाहर से कौन से लड़के लड़कियाॅ हैं?" रितू ने पूछा था।
"बाहर के तो सब लड़के ही हैं मैडम।" हवलदार रामसिंह ने कहा___"वो भी दो ही हैं। एक तो वही संपत है जो इसी इलाके का एक छोटा मोटा ग़ुडा मवाली है जबकि दूसरा संदीप अग्निहोत्री है, ये दूसरे काॅलेज में बीए लास्ट इयर का छात्र है।"

"ओके बाकी के सब लोगों के बारे में क्या पता चला?" रितू ने पूछा।
"विधी के साथ काॅलेज में पढ़ने वाली जिस लड़की की बर्थडे पार्टी थी उस रात, उसका नाम खुशी जिन्दल है। बड़े बाप की औलाद है। माॅ बाप पूणे में रहते हैं। यहाॅ पर वह अपनी एक आया के साथ रहती है और वो मकान भी उसके बाप ने ही उसे खरीद कर दिया था। ताकि वह अपनी आया के साथ रह कर काॅलेज में पढ़ाई कर सके। पार्टी में दोस्तों के रूप में चार लड़के थे और पाॅच लड़कियाॅ, जिनमे से एक लड़की खुशी जिन्दल की आया की थी। दो लड़के बाहरी थे। सभी लड़कों की डिटेल इस प्रकार है____

1, सूरज चौधरी, 22 साल का विधी के ही कालेज में एम ए का छात्र है। इसके बाप का नाम दिवाकर चौधरी है। ये शहर का पोलिटीसियन है। इसके बारे में सारा शहर जानता है कि ये कैसा आदमी है। इसके कई गैर कानूनी धंधे भी कानून के नाक के नीचे से चलते हैं। सूरज चौधरी अपने बाप की बिगड़ी हुई औलाद है। पता चला है कि इसने कई लड़कियों की ज़िंदिगियाॅ बरबाद की हैं। अपनी सुंदर पर्शनालिटी और पैसों की वजह से कोई भी लड़की इसकी तरफ आकर्षित हो जाती है। ये लड़कियों को प्यार के जाल में फॅसा कर उनकी अश्लील वीडियो बना कर उन्हें हर तरह के काम करने के लिए ब्लैकमेल करता है। विधी चौहान इससे प्यार करती है।

2, अलोक वर्मा, ये भी सूरज के साथ ही पढ़ता है। सूरज का पक्का यार है ये। बाप बहुत साल पहले गंभीर बीमारी से चल बसा था तब से यह अपनी विधवा माॅ के साथ ही रहता है। इसकी माॅ किसी प्राइवेट कंपनी में काम करती है।

3, किशन श्रीवास्तव, ये भी सूरज के साथ ही कालेज में पढ़ता है। इसके बाप का नाम अवधेश श्रीवास्तव है। ये इसी शहर का एक क्रिमिनल लायर है। इसके दिवाकर चौधरी से बड़े गहरे संबंध हैं। दिवाकर चौधरी के हर ग़ैरकानूनी काम में ये उसकी हर तरह से मदद करता है।

4, रोहित मेहरा, ये भी सूरज के साथ ही उस कालेज में पढ़ता है। इसके बाप ईआ नाम अशोक मेहरा है। ये शहर का बिल्डर है। पैसों की कोई कमी नहीं है इसके पास। सुना है कई ज़मीनों पर इसने अवैध कब्जा किया हुआ है। इसके भी दिवाकर चौधरी और वकील अवधेश श्रीवास्तव से बड़े गहरे संबंध हैं।

5, नीता ब्यास, ये 20 साल की है और विधी के साथ ही उस कालेज में पढ़ती है। ये इन्दौर की रहने वाली है। यहाॅ पर ये अपने मामा जी के यहाॅ रह कर ही पढ़ाई कर रही है।

6, अनीता ब्यास, ये नीता की जुड़वा बहन है तथा ये भी अपनी बहन के साथ ही मामा जी के यहाॅ रहकर पढ़ाई कर रही है।

7, स्नेहा शर्मा, ये 20 साल की है, ये भी विधी के साथ ही कालेज में पढ़ती है। इसका बाप सरकारी बैंक में मैनेजर है।

8, संजना सिंह, ये 20 साल की है, और विधी के साथ ही कालेज में पढ़ती है। इसके बाप का इसी शहर में एक बड़ा सा माॅल है। ये दो भाई बहन है। इसका भाई संजय सिंह इससे छोटा है और अभी इस साल हाई स्कूल में है।

"मैडम ये थे उस कालेज में विधी के साथ एक ग्रुप में रहने वाले लड़के लड़कियाॅ।" रामदीन ने कहा___"मैने अपने तरीके से पता किया है कि विधी के साथ जो घटना घटित हुई उसमें सूरज चौधरी मुख्य आरोपी है। सूरज के साथ ही इस हादसे को अंजाम देने में उसके ये चारों दोस्त और उस बर्थडे गर्ल यानी खुशी जिन्दल का भी बराबर का हाॅथ है। बात दरअसल ये थी कि विधी एक अच्छे घर की और अच्छे संस्कारों वाली लड़की थी। वह खूबसूरत थी। कभी किसी लड़के को भाव नहीं देती थी। आज से दो तीन साल पहले वह किसी विराज सिंह नाम के लड़के से प्यार करती थी जो उसके साथ ही स्कूल में पढ़ता था। वो स्कूल और ये कालेज लगभग पास में ही थे इस लिए सूरज की नज़र इस पर बहुत पहले से ही थी। उसने बड़ी मुश्किल से किसी तरह इससे दोस्ती कर ली थी। उसके बाद ऐसे ही एक दिन इसने अपने जन्मदिन पर अपने सभी दोस्तों को फार्महाउस पर इन्वाइट किया था। विधी को भी उसने खासतौर पर इन्वाइट किया था। विधी जब इसके फार्महाउस पर उस शाम गई तो पार्टी में सब काफी एंज्वाय कर रहे थे। इस बीच सूरज ने विधी को अपनी दोस्ती का वास्ता देकर इसे कोल्ड ड्रिंक पिला दिया। उस कोल्ड ड्रिंक में हल्का ड्रग्स भी मिला हुआ था। विधी ने जब उस कोल्ड ड्रिंक को पिया तो उसे कुछ देर बाद चक्कर से आने लगे। सूरज अपनी चाल में कामयाब हो चुका था, उसने अपनी एक दोस्त जिसका नाम रिया सचदेवा था उससे कह कर विधी को कमरे में ले गई और उसे बेड पर लिटा दिया। विधी को कुछ होश नहीं था। इधर सूरज कमरे में आया और विधी के जिस्म से सारे कपड़े उतार कर और खुद भी पूरी तरह निर्वस्त्र होकर विधी के साथ गंदा काम किया। इस सबकी वीडियो सूरज का ही एक दोस्त अलोक वर्मा बना रहा था। ख़ैर जब विधी को होश आया तो वह अपने घर में अपने ही बेडरूम थी। उसे पिछली शाम का सब कुछ याद आया। उसे इस बात की हैरानी हुई कि वह अपने घर कैसे आई? तब उसकी माॅ ने बताया कि उसकी एक दोस्त जिसका नाम रिया था वह उसे छोंड़ कर गई थी। विधी की माॅ ने उसे इस बात के लिए डाॅटा भी था कि उसने शराब क्यों पी थी? विधी ने कहा वो शराब नहीं बस कोल्ड ड्रिंक ही था शायद किसी ने ग़लती से उसमें कुछशराब मिला दी होगी। ख़ैर ये बात तो चली गई। लेकिन माॅ के जाने के बाद जब विधी बेड से उठकर बाथरूम की तरफ जाने के लिए बेड से नीचे उतरी तो उसकी चीख़ निकलते निकलते रह गई। अपने पैरों पर उससे खड़े ही ना हुआ गया। उसे समझते देर न लगी कि उसके साथ क्या हुआ है। किन्तु अब समझने से भला क्या हो सकता था? वह तो लुट चुकी थी। बरबाद हो चुकी थी। वह इस बात को अपने माॅ बाप से बता भी नहीं सकती थी। अकेले में वह खूब रोती। इस बात कई दिन गुज़र गए। वह स्कूल नहीं गई थी कई दिन से। माॅ से उसने बता दिया था कि उसकी तबियत ठीक नहीं है। फिर एक दिन उसके मोबाइल पर एक अंजान नंबर से एम एम एस आया। जिसे देख कर उसके पैरों तले से ज़मीन निकल गई। उसे सारा संसार अंधकारमय दिखने लगा था। तभी उसी नंबर से काल भी आया। उसने जब उस काल को रिसीव किया तो सामने से सूरज की आवाज़ को सुन कर चौंक गई। वह उसे बड़ी बेशर्मी से कह रहा था कि कैसी लगी हम दोनो की फिल्म? विधी रोती गिड़गिड़ाती रही और पूछती रही कि उसने उसके साथ उसकी दोस्ती के साथ इतना बड़ा छल क्यों किया? आख़िर क्यों उसने उसे इस तरह बरबाद कर दिया? मगर वो तो शिकारी था। खूबसूरत लड़कियों का शिकारी। सूरज ने धमकी देते हुए कहा कि अगले दिन स्कूल आए और उसके साथ उसके फार्महाउस पर चले वरना वह ये एम एम एस उसके बाप के मोबाइल पर भेज देगा। विधी मरती क्या न करती वाली स्थित में आ चुकी थी। बस यहीं से उसकी बरबादी की दास्तां शुरू हो गई। वह हर बार सूरज के द्वारा ब्लैकमेल होती रही। विधी जिस विराज नाम के लड़के से प्यार करती थी उससे उसने संबंध तोड़ लिया था। ऐसे ही दिन महीने साल गुजर गए। विधी पढ़ने में होशियार थी। कालेज में हमेशा वह अपनी ग्रुप की लड़कियों से टाप करती थी। खुशी जिन्दल इस बात से उससे बेहद जलती थी। इस लिए उसने सूरज के साथ मिलकर पिछली रात इस गंभीर हादसे को अंजाम दिया था।"

"मामला तो पूरी तरफ पहले ही साफ था रामदीन।" रितू ने कहा___"मैने दूसरी मुलाक़ात में विधी से इस सबकी सारी सच्चाई जानने की बहुत कोशिश की लेकिन उसने कुछ नहीं बताया। इस लिए मुझे तुम्हें इस काम में लगाना पड़ा। ख़ैर, यकीनन तुमने शानदार जानकारी हासिल की है।"

"शुक्रिया मैडम।" रामदीन खुश हो गया, बोला___"पर मुझे ये समझ में नहीं आ रहा कि विधी ने आपको इस सबकी सारी बातें क्यों नहीं बताई? जबकि होना तो ये चाहिए था कि उसे अब ऐसे हरामियों के खिलाफ सारा सच उगल कर उन्हें कानून के लेपेटे में डलवा देना चाहिए था।"

"सबकी अपनी कुछ न कुछ मजबूरियाॅ होती हैं रामदीन।" रितू ने गंभीरता से कुछ सोचते हुए कहा___"कुछ ऐसी भी बातें होती हैं जिन्हें किसी भी हाल में कह पाना संभव नहीं हो पाता। या फिर ये सोच कर उसने मुझे कुछ नहीं बताया कि कानून भी भला उन लोगों का क्या कर लेगा? वह जानती है कि जिन लोगों ने उसके साथ ये कुकर्म किया वो बड़े बड़े लोगों की बिगड़ी हुई औलादें हैं। कानून उन तक पहुॅच ही नहीं सकता।"

"तो क्या इस केस की फाइल ऐसे ही बंद कर दी जाएगी मैडम?" रामदीन चौंका___"क्या उस बेचारी लड़की के साथ इंसाफ नहीं हो पाएगा?"
"मैने ऐसा तो नहीं कहा रामदीन।" रितू कुर्सी से उठ कर तथा वहीं पर चहल कदमी करते हुए बोली___"लड़की के साथ इंसाफ ज़रूर होगा। फिर भले ही उसके लिए कोई दूसरा रास्ता ही क्यों ना चुनना पड़े।"

"मैं कुछ समझा नहीं मैडम?" रामदीन ने उलझनपूर्ण भाव से कहा।
"सब समझ जाओगे रामदीन।" रितू के चेहरे पर कठोरता आ गई थी___"बस समय का इंतज़ार करो।"

रामदीन को बिलकुल भी समझ ना आया कि उसकी ये आला अफसर क्या कहे जा रही है? जबकि रितू ने टेबल पर रखी पीकैप को उठा कर उसे सिर पाया ब्यवस्थित किया और फिर लम्बे लम्बे डग भरती हुई थाने से बाहर निकल गई।
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फ्लैशबैक अब आगे______

नैना ने सच ही कहा था कि बाहर तेज़ धूप और भयानक गर्मी में वह परेशान हो जाएगी। प्रतिमा की हालत ख़राब हो चली थी। सिर पर पड़ी तेज़ धूप और गर्मी ने उसका बुरा हाल कर दिया था। आसमान में सफेद बादल छाए थे और हवा भी न के बराबर ही चल रही थी। जिसकी वजह से वह पसीना पसीना हो चली थी।

पतली सी पिंक कलर की साड़ी तथा उसी से मैच करता बड़े गले का ब्लाउज। जिसमें कैद उसकी भारी भरकम चूचियाॅ उसके चलने पर एक लय से ऊपर नीचे थिरक रही थी। ब्लाउज के ऊपरी हिस्से से उसकी सुडौल चूचियों का एक चौथाई हिस्सा स्पष्ट दिख रहा था। गोरे सफ्फाक बदन पर ये लिबास उसकी खूबसूरती और मादकता पर जैसे चार चाॅद लगाए हुए था। प्रतिमा तीन बच्चों की माॅ थी लेकिन मजाल है कि कोई ये ताड़ सके कि ये खूबसूरत बला तीन तीन बच्चों की माॅ है।

ऐसा नहीं था कि वह कभी खेतों पर नहीं गई थी। एक दो बार वह पहले ही कभी गई थी। इस लिए उसे खेतों के रास्ते का पता था। हवेली से एक किलो मीटर की दूरी पर खेत थे। इधर का हिस्सा गाॅव के उत्तर दिशा की तरफ तथा गाॅव से हट कर था।

प्रतिमा जब खेतों पर पहुॅची तो उसने देखा कि हर तरफ सुन्नाटा फैला हुआ है। बहुत से खेतों पर गेहूॅ की फसल पक कर तैयार खड़ी थी और एक तरफ से उसकी कटाई भी चालू थी। हलाॅकि इस वक्त वहाॅ पर कहीं भी कोई मजदूर फसल काटते हुए दिख नहीं रहा था। शायद तेज़ धूप के कारण काम बंद था या फिर सभी मजदूर दोपहर में खाना खाने के लिए खए होंगे।

प्रतिमा की हालत भले ही खराब हो चुकी थी किन्तु जब उसने खेतों पर हर जगह सुनापन देखा तो वह इससे खुश भी हो गई। उसे लगा चलो जिस मकसद से वह यहाॅ आई है वह बेझिझक हो जाएगा। कोई देखने सुनने वाला भी नहीं है यहाॅ। उसने देखा एक तरफ खेतों पर ही बड़ा सा पक्का मकान बना था। मकान के बाहर दो स्वराज कंपनी के ट्रैक्टर व थ्रेशर मशीन खड़ी थी। मकान का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।

प्रतिमा ने धड़कते दिल से मुख्य दरवाजे के अंदर कदम रखा ही था कि किसी से बड़े ज़ोर से टकराई। उसकी भारी भरकम छातियों में किसी पुरूष का फौलाद जैसा सीना टकराया था। प्रतिमा इस अचानक हुई घटना से बुरी तरह घबरा गई। टक्कर लगते ही वह पीछे की तरफ बड़ी तेज़ी से गिरने ही लगी थी कि सामने नजर आए पुरूस ने बड़ी सीघ्रता से उसका हाॅथ पकड़ कर उसे पीछे गिरने से बचा लिया।

प्रतिमा का दिल बुरी तरह धड़के जा रहा था। ख़ैर सम्हलने के बाद उसकी नज़र सामने खड़े शख्स पड़ी तो चौंक गई। सामने उसका देवर विजय सिंह सिर झुकाए खड़ा था। उसे इस तरह सिर झुकाए देख प्रतिमा को समझ न आया कि ये सिर झुकाए क्यों खड़ा है?

"क्या बात है देवर जी?" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा___"ज़रा देख कर तो चला कीजिए। भला कोई इतनी भी ज़ोर से टक्कर मारता है क्या??"
"माफ़ कर दीजिए भाभी।" विजय सिंह ने सिर झुकाए हुए ही शर्मिंदगी से बोला__"मुझे उम्मीद ही नहीं थी कोई इस तरह सामने से आ जाएगा।"

"चलो कोई बात नहीं विजय।" प्रतिमा ने माहौल को समान्य बनाने की गरज से कहा___"ग़लती सिर्फ तुम्हारी ही बस नहीं है, मेरी भी है क्योंकि मैने भी तो ये आशा नहीं की थी कोई मेरे सामने से इस तरह आ टकराएगा।"

"पर मुझे देख कर बाहर आना चाहिए था न भाभी।" विजय सिंह ने खेद भरे भाव से कहा।
"ओहो विजय।" प्रतिमा ने कहा___"इसमें इतना खेद प्रकट करने की कोई ज़रूरत नहीं है। लेकिन हाॅ एक बात तो कहूॅगी मैं।"

"जी कहिए भाभी।" विजय ने कहा__"अगर आप कोई सज़ा देना चाहती हैं तो ज़रूर दीजिए। ऐसी धृष्ठता के लिए मुझे सज़ा तो मिलनी ही चाहिए।"
"ओफ्फो विजय फिर वही बात।" प्रतिमा हैरान थी कि विजय किस टाइप का इंसान है। क्या दुनियाॅ में कोई इतना भी शरीफ़ हो सकता है? फिर बोली___"मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है विजय। मैं तो बस ये कहने वाली थी कि क्या फौलाद का सीना है तुम्हारा जो मेरी कोमल छातियों का कचूमर बना दिया था?"

"ज जी क्या मतलब?" विजय बुरी तरह चौंका था। सिर उठाकर हैरानी से अपनी भाभी की तरफ देखने लगा था वह।
"इतने भोले ना बनो विजय।" प्रतिमा ने हॅसते हुए कहा___"तुम भी अच्छी तरह समझ गए हो कि मेरे कहने का क्या मतलब था?"

"अरे ये सब बेकार की बातें छोंड़िए भाभी और ये बताइये कि आप यहाॅ इतनी धूप व गर्मी में क्यों आई हैं?" विजय ने बेचैनी से पहलू बदला था___"नैना क्यों नहीं आई? और आपको भी इतना तकल्लुफ करने की क्या ज़रूरत थी भला?"

"क्या तुम्हें मेरा यहाॅ आना अच्छा नहीं लगा विजय?" प्रतिमा ने दुखी भाव का नाटक करके कहा___"क्या मैं यहाॅ नहीं आ सकती?"
"न नहीं भाभी ऐसी कोई बात नहीं है।" विजय ने हड़बड़ाकर कहा___"मैं बस इस लिए ऐसा कह रहा हूॅ क्योंकि तेज़ धूप और गर्मी बहुत है। ऐसे माहौल की आपको आदत नहीं है ना?"

"देखो विजय तुम भी नैना की तरह मुझे ताना मत मारने लग जाना।" प्रतिमा ने कहा__"तुम सब मुझे ऐसा कह कर दुखी क्यों करते हो? मेरा भी दिल करता है कि मैं भी तुम सबकी तरह ये सब करूॅ। लेकिन तुम सब अपनी इन बातों से मुझे ये सब करने ही नहीं देते। मैं ही पागल हूॅ जो बेकार में इस हवेली के लोगों को अपना मानती हूॅ और चाहती हूॅ कि सब मुझे भी अपना समझें।"

"ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" विजय हैरान परेशान सा बोला___"भला हम सब आपके लिए ऐसा क्यों सोचेंगे? माॅ बाबूजी के बाद आप दोनो ही तो हम सबसे बड़ी हैं इस लिए हम सब यही चाहते हैं आप कुछ ना करें बल्कि आराम से बैठ कर खाइये और हम छोटों को सेवा करने का भाग्य प्रदान करें।"

"बस बस सब समझती हूॅ मैं।" प्रतिमा ने तुनकते हुए कहा__"अब क्या यहीं पर खड़े रहेंगे या अंदर भी चलेंगे? चलिए अंदर और हाॅ हाॅथ मुह धोकर जल्दी से आइये। तब तक मैं थाली लगाती हूॅ।"
"जी ठीक है भाभी।" विजय ने कहा और बाहर की तरफ बढ़ गया। जबकि प्रतिमा अंदर की तरफ बढ़ गई।

अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,

दोस्तो आप ये बताइये कि फ्लैशबैक को इसी तरह वर्तमान के साथ लेकर चलूॅ या खाली फ्लैशबैक ही रहने दूॅ???
 
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट...........《 30 》

अब तक,,,,,,,,,

"क्या तुम्हें मेरा यहाॅ आना अच्छा नहीं लगा विजय?" प्रतिमा ने दुखी भाव का नाटक करके कहा___"क्या मैं यहाॅ नहीं आ सकती?"
"न नहीं भाभी ऐसी कोई बात नहीं है।" विजय ने हड़बड़ाकर कहा___"मैं बस इस लिए ऐसा कह रहा हूॅ क्योंकि तेज़ धूप और गर्मी बहुत है। ऐसे माहौल की आपको आदत नहीं है ना?"

"देखो विजय तुम भी नैना की तरह मुझे ताना मत मारने लग जाना।" प्रतिमा ने कहा__"तुम सब मुझे ऐसा कह कर दुखी क्यों करते हो? मेरा भी दिल करता है कि मैं भी तुम सबकी तरह ये सब करूॅ। लेकिन तुम सब अपनी इन बातों से मुझे ये सब करने ही नहीं देते। मैं ही पागल हूॅ जो बेकार में इस हवेली के लोगों को अपना मानती हूॅ और चाहती हूॅ कि सब मुझे भी अपना समझें।"

"ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" विजय हैरान परेशान सा बोला___"भला हम सब आपके लिए ऐसा क्यों सोचेंगे? माॅ बाबूजी के बाद आप दोनो ही तो हम सबसे बड़ी हैं इस लिए हम सब यही चाहते हैं आप कुछ ना करें बल्कि आराम से बैठ कर खाइये और हम छोटों को सेवा करने का भाग्य प्रदान करें।"

"बस बस सब समझती हूॅ मैं।" प्रतिमा ने तुनकते हुए कहा__"अब क्या यहीं पर खड़े रहेंगे या अंदर भी चलेंगे? चलिए अंदर और हाॅ हाॅथ मुह धोकर जल्दी से आइये। तब तक मैं थाली लगाती हूॅ।"
"जी ठीक है भाभी।" विजय ने कहा और बाहर की तरफ बढ़ गया। जबकि प्रतिमा अंदर की तरफ बढ़ गई।
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अब आगे,,,,,,,,,,,

फ्लैशबैक आगे_______

थोड़ी ही देर में विजय सिंह हाॅथ मुह धोकर आया और जैसे ही वह अंदर एक बड़े हाल से होते हुए एक कमरे में दाखिल हुआ तो बुरी तरह चौंका। कारण कमरे के अंदर प्रतिमा लकड़ी की एक बेन्च पर झुक कर टिफिन से खाना निकाल निकाल कर उसे अलग अलग करके रख रही थी। किन्तु झुकने की वजह से उसकी साड़ी का आॅचल कंधे से खिसक कर ज़मीन पर गिरा हुआ था। उसने आॅचल को आलपिन के सहारे ब्लाउज पर फसाया हुआ नहीं था। ऐसा उसने जानबूझ कर ही किया था। ताकि वह जब चाहे बड़ी आसानी से झुक कर अपना आॅचल गिरा कर विजय को अपनी खरबूजे जैसी बड़ी बड़ी किन्तु ठोस चूचियाॅ दिखा सके। उसने जो ब्लाउज पहना था वह बड़े गले का था, पीठ पर भी काफी ज्यादा खुला हुआ था। अंदर ब्रा ना होने के कारण उसकी आधे से ज्यादा चूचियाॅ दिख रही थी। वह जानती थी कि विजय हाथ मुह धोकर आ चुका है और अब वह कमरे के दरवाजे के पास उसके द्वारा दिखाए जाने वाले हाहाकारी नज़ारे को देख एकदम से बुत बन गया है।

प्रतिमा बिलकुल भी ज़हिर नहीं कर रही थी कि वो ये सब जानबूझ कर रही है। बल्कि वह यही दर्शा रही थी कि उसे अपनी हालत का पता ही नहीं है। उसने एक बार भी सिर उठा कर दरवाजे पर खड़े विजय की तरफ नहीं देखा था। बल्कि वह उसी तरह झुकी हुई टिफिन से खाना निकाल कर अलग अलग रख रही थी।

विजय सिंह मुकम्मल मर्द था किन्तु उसमें शिष्टाचार और संस्कार कूट कूट कर भरे हुए थे। उसे अपने से बड़ों का आदर सम्मान करना ही आता था। अपनी पत्नी के अलावा वह किसी भी औरत पर ऐसी नज़र नहीं डालता था। खेतों पर काम करने वाली हर ऊम्र की औरतें भी थी मगर मजाल है जो विजय सिंह ने कभी उन पर गंदी नज़र डाली हो। ये तो फिर भी उसकी सगी भाभी थी। कहते हैं बड़ी भाभी माॅ समान होती है, उस पर गंदी दृष्टि डालना पाप है।

विजय सिंह को तुरंत ही होश आया। वह एकदम से हड़बड़ा गया और साथ ही उसके अंदर अपराध बोझ सा बैठता चला गया। उसका मन भारी हो गया। अपने ज़हन से इस दृष्य को तुरंत ही झटक दिया उसने। मन ही मन भगवान से हज़ारों बार तौबा की उसने। उसके बाद वह बेवजह ही खाॅसते हुए कमरे के अंदर दाखिल हुआ। उसका खाॅसने का तात्पर्य यही था कि उसकी भाभी उसके खाॅसने की आवाज़ से अपनी स्थिति को सम्हाल ले। मगर विजय की हालत उस वक्त ख़राब हो गई जब उसके खाॅसने का प्रतिमा पर कोई असर ही न हुआ। बल्कि वह तो अभी भी यही ज़ाहिर कर रही थी कि उसे अपनी हालत का पता ही नहीं है। उसने तो जब विजय को देखा तो बस यही कहा___"लो विजय मैने तुम्हारा स्वादिष्ट भोजन अलग अलग करके लगा दिया है। चलो शुरू हो जाओ, देख लो अभी गरमा गरम है।"

विजय को सिर झुका चुपचाप बेन्च के इस तरफ ही रखी कुर्सी पर बैठ गया और चुपचाप खाना खाने लगा।

"उफ्फ विजय यहाॅ खेतों में इस गर्मी में भी कितनी मेहनत करते हो तुम।" प्रतिमा ने आह सी भरते हुए कहा___"पर शायद तुम्हारी इस सबकी आदत हो गई है। इस लिए तुम पर जैसे कुछ फर्क ही नहीं पड़ता। मेरा तो गर्मी के मारे बुरा हाल हुआ जा रहा है। ऐसा लगता है जैसे सारे कपड़े उतार कर फेंक दूॅ अभी।"

प्रतिमा की इस बात से विजय सिंह को ठसका लग गया। वह ज़ोर ज़ोर से खाॅसने लगा।
"अरे क्या हुआ आराम से खाओ विजय।" प्रतिमा मन ही मन मुस्कुराई थी।

उसे खाॅसता देख प्रतिमा तुरंत ही एक तरफ मटके में रखे पानी को ग्लास में भर कर ग्लास विजय के मुह से लगा दिया। विजय की नज़र एक बार फिर से प्रतिमा के खरबूजों पर पड़ गई। इस बार तो वह उसके बहुत ही पास थी। उसके खरबूजे विजय की आॅखों से बस एक फुट ही दूर थे। इतने पास से वह उन्हें स्पष्ट देख रहा था। गोरे गोरे खरबूजों पर एक एक किन्तु छोटा सा तिल जो उन्हें और भी ज्यादा रसदार व हालत को खराब करने वाला बना रहा था। प्रतिमा इस सारी क्रिया में यही दर्शा रही थी कि उसे अभी भी अपनी हालत का कुछ पता नहीं है। और इस बार तो जैसे वह फिक्रवश ऐसा कर रही थी।

बड़ी मुश्किल से विजय के गले से पानी नीचे उतरा। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? आज पहली बार वह ऐसी सेचुएशन के बीच फॅसा था। विजय जब पानी पी चुका तो प्रतिमा ने भी उसके मुख से ग्लास हटा लिया, हलाॅकि ये उसकी मजबूरी ही थी। क्योकि अगर वो ऐसा न करती तो विजय को शक भी हो सकता था कि वह इस तरह उसके इतने पास झुकी क्यों है?

किन्तु विजय सिंह पर रहम तो उसने अभी भी नहीं किया। वह अभी भी अपना आॅचल गिराए हुए ही थी। अंदाज़ वहीं था जैसे उसे इसका पता ही न हो। वह जानती थी कि विजय उसे इस तरह देख कर बहुत ज्यादा असहज महसूस कर रहा है।

उसके मन में आया कि कहीं विजय ये न सोच बैठे कि मुझे अपनी हालत का इतने देर से पता क्यों नहीं हो रहा? या फिर ऐसा मैं जानबूझ कर उसे दिखा रही हूॅ। अगर विजय को ये शक हो गया या उसने ऐसा महसूस कर लिया तो काम पहले ही ख़राब हो जाएगा। जबकि मुझे ये सब बहुत आगे तक करना है। शुरुआत में इतना ज्यादा दिखावा ठीक नहीं होगा। ये सोच कर ही वह सम्हल गई।

"हाय दैया।" उसने चौंकने और सकपकाने की बड़ी शानदार ऐक्टिंग की___"मेरा आॅचल कैसे गिर गया।"

इतना कह कर उसने जल्दी से अपने आॅचल को पकड़ कर उसे अपने खरबूजों ढॅकते हुए कंधे पर डाल लिया। फिर जैसे उसने माहौल को बदलने की गरज से विजय से कहा___"कल से मैं तुम्हारे लिए दूध भी ले आया करूॅगी विजय।"

"ज जी,,,,।" विजय बुरी तरह चौंका था___"दू दूध...मगर किस लिए भाभी?"
"तुम भी हद करते हो विजय।" प्रतिमा ने कहा___"खेतों में रात दिन इतनी मेहनत करते हो और रूका सूखा खाओगे तो कमज़ोर नहीं पड़ जाओगे? इस लिए मेहनत के हिसाब से उस तरह का आहार भी लेना चाहिए।"

"भाभी, इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।" विजय ने झिझकते हुए कहा___"और वैसे भी मुझे दू दूध पसंद नहीं है।"
"क्याऽऽ????" प्रतिमा ने चौंकने का नाटक किया___"हे भगवान! कैसे आदमी हो तुम विजय? तुम्हें दूध नहीं पसंद?? अरे दूध के लिए सारी दुनियाॅ पागल है।"

"क्या मतलब???" विजय गड़बड़ा गया, बोला___"भला इसके लिए सारी दुनियाॅ कैसे पागल हो सकती है???"
"तुम भी ना बुद्धू के बुद्धू ही रहोगे।" प्रतिमा ने बुरा सा मुह बनाया___"ये बताओ कि आज कल दूध के बिना किसी का गुज़ारा है क्या? नहीं ना? सुबह उठते ही सबसे पहले दूध की ही बनी चाय चाहिए होती है। और इतना ही नहीं बल्कि एक दिन में कम से कम चार बार आदमी चाय पीता है। बाॅकी बहुत सी चीज़ें जो दूध से ही बनती हैं उनका तो हिसाब ही अलग है। अब जब यही दूध किसी को न मिलो तो सोचो दुनिया पागल हो जाएगी कि नहीं?"

"हाॅ ये तो है।" विजय ने कहा।
"इसी लिए कहती हूॅ।" प्रतिमा ने कहा__"कल से तुम्हारे लिए दूध लाया करूॅगी और फिर मैं खुद ही तुम्हें दूध पिलाऊॅगी। देखूॅगी कैसे नहीं पियोगे तुम?"

विजय सिंह की हवा शंट। वह हैरान परेशान सा प्रतिमा को देखने लगा। जबकि उसकी इस हालत को देख कर प्रतिमा मन ही मन हॅस रही थी। किन्तु प्रत्यक्ष में यही दिखा रही थी वो ये सब उसकी सेहत का ध्यान में रख कर कह रही थी। पर चूॅकि इन बातों में उसके दो अर्थ निकल रहे थे जो विजय सिंह को असमंजस में डाल कर असहज कर रहे थे।

"क्या हुआ चुप क्यों हो गए विजय?" प्रतिमा ने कहा___"दूध की बातों से तो नहीं घबरा गए तुम?"
"न न नहीं तो।" विजय सकपका गया।
"देखो विजय।" प्रतिमा ने कहा___"तुम जो मेहनत करते हो उसके लिए दूध घी का सेवन करना बहुत ज़रूरी है। वरना बुढ़ापे में किसी काम के नहीं रह जाओगे तुम। आज गौरी को भी बोलूॅगी कि तुम्हारे खाने पीने का अच्छी तरह से ख़याल रखा करे। अभी जब तक बच्चों की छुट्टियाॅ हैं तब तक मैं रोज़ाना तुम्हें खुद अपने हाथ से टिफिन तैयार करके लाऊॅगी।"

"आ आप तो बेवजह परेशान हो रही हैं भाभी।" विजय ने बेचैनी से कहा___"मैं रोज़ाना स्वादिष्ट और फायदेमंद भोजन ही करता हूॅ।"
"वो तो मुझे दिख ही रहा है।" प्रतिमा ने घूर कर देखा विजय सिंह को, बोली___"अगर वैसा ही भोजन करते तो अपने शरीर की ऐसी हालत नहीं बना लेते तुम।"

"ऐसी हालत????" विजय ने चौंकते हुए कहा___"क्या हुआ भला मेरी हालत को?? अच्छा भला तो हूॅ भाभी।"
"बस बस रहने दो तुम।" प्रतिमा ने कहा__"पोज तो ऐसे दे रहे हो जैसे दारा सिंह तुम्हीं हो।"

विजय सिंह को समझ न आया कि वो क्या कहे? दरअसल उसे अपनी भाभी से ऐसी बात करने का ये पहला अवसर था। शादी के बाद कभी ऐसे मधुर संबंध ही नहीं रहे थे कि वो अपनी प्रतिमा भाभी से कभी बात करता या घुलता मिलता। ख़ैर विजय सिंह ने किसी तरह खाना खाया और सीघ्र ही उठ कर कमरे से बाहर चला गया। कमरे से बाहर जब वह आया तब उसने जैसे राहत की साॅस ली। वह बाहर भी रुका नहीं बल्कि खेतों की तरफ तेज़ तेज़ करमों से बढ़ता चला गया। जबकि कमरे से भागते हुए बाहर आई प्रतिमा ने जब विजय को दूर खेतों पर जाते देखा तो उसके होठों पर कमीनी मुस्कान रेंग गई।

"आज तो इतना ही काफी था विजय।" प्रतिमा ने अजीब भाव से कहा___"मगर इतने से डोज में ही तुम्हारी ये हालत बता रही है कि तुम ज्यादा दिनों तक मेरे सामने टिक नहीं पाओगे। मेरे इस हुस्न के जाल में जल्द ही फॅस जाओगे। हाय विजय, थोड़ा जल्दी फॅस जाना मेरी जान क्योंकि ज्यादा देर तक बर्दास्त नहीं कर पाऊॅगी मैं।"

यही सब बड़बड़ाती हुई प्रतिमा वापस कमरे में गई। और बेन्च से टिफिन वाले सब बर्तन इकट्ठा करके वह कमरे से बाहर आ गई। कमरे के दरवाजों को ढुलका कर वह मकान से बाहर आ गई और फिर हवेली की तरफ बढ़ चली। मन में कई तरह के ख़याल बुने जा रही थी वह।
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इधर हवेली में दोपहर को हर कोई अपने अपने कमरे में होता था। बच्चों को भी दोपहर की धूप में कहीं बाहर नहीं जाने दिया छाता था। माॅ बाबूजी हमेशा की तरह नीचे वाले हिस्से पर बने अपने कमरे में ही रहते थे। बाबू जी को महाभारत पढ़ने का बड़ा शौक था। वो खाली समय में महाभारत की मोटी सी किताब लेकर आरामदायी कुर्सी पर बैठ जाते थे अपने कमरे में। जबकि माॅ जी बिस्तर पड़ी रहती। उनके घुटनों में बात की शिकायत थी इस लिए वो ज्यादा चलती फिरती नहीं थी।

राज और गुड़िया ज्यादातर अपने चाचा चाची के पास ही रहते थे। करुणा उन दोनो को पढ़ाती थी। राज से उसे बड़ा प्यार था। हवेली में सबका अपना अपना हिस्सा था। हलाॅकि उस वक्त बटवारा नहीं हुआ था लेकिन तीनो रहते उसी तरह थे अलग अलग। जबकि खाना पीना सबका साथ में ही होता था। उस समय हवेली में ऐसा था कि अंदर से ही सबके हिस्से में जाया जा सकता था। उसके लिए हर पार्टिशन में एक बड़ा सा दरवाजे थे जो ज्यादातर खुले ही रहते थे। विजय सिंह जिस हिस्से पर रहता था उसी हिस्से में माॅ बाबूजी भी नीचे रहते थे। विजय और गौरी का कमरा ऊपर वाले फ्लोर पर था। सबका खाना भी यहीं पर बनता था। नैना अजय सिंह वाले हिस्से पर रहती थी। क्योंकि वो स्कूल के समय पर खाली ही रहता था इस लिए वह उस हिस्से में ही अकेली रहती थी। हलाॅकि उसके साथ बच्चों में से कोई भी रोज़ सोने के लिए चला जाता था।

विजय सिंह दिन में खेतों पर ही रहता था और फिर रात में ही हवेली आता था। दोपहर का खाना उसे पहुॅचा दिया जाता था। हप्ते में एक दो दिन वह खेतों पर भी रात में रुक जाता था। पर ये तभी होता था जब रुकने की ज़रूरत हो अन्यथा नहीं।

प्रतिमा के जाने के कुछ देर बाद ही अजय सिंह बेड से उठा और कमरे से बाहर आ गया। इस वक्त वह अपने हिस्से की तरफ ही था। उसे पता था कि उसकी छोटी बहन नैना उसके हिस्से पर ही ऊपर अपने कमरे में है। वह कमरे से निकल कर ऊपर जाने के लिए सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया। सीढ़ियाॅ चढ़ते हुए वह ऊपर नैना के कमरे के पास पहुॅचा। उसने बंद दरवाजे पर आहिस्ता से हाॅथ रखा और उसे कमरे की तरफ पुश किया। किन्तु कमरा अंदर से बंद था। अजय सिंह ने झुक कर दरवाजे के की-होल सें अपनी दाहिनी आॅख सटा दी। कमरे के अंदर नैना बेड पर लेटी हुई दिखी उसे। उसके हाॅथ में कोई मोटी सी किताब थी जिसे वह मन ही मन पढ़ रही थी। ये देख अजय सिंह ने राहत की साॅस ली और फिर दबे पाॅव वह नीचे उतर आया।

नीचे आकर उसने पार्टीशन वाले दरवाजे के पास पहुॅचा। किन्तु उससे पहले वह बाएॅ साइड के पार्टीशन वाले दरवाजे की तरफ भी देखा। उसने ये दरवाजा बंद कर दिया था ताकि उधर से कोई इधर का देख न सके। बाएॅ साइड वाला हिस्सा अभय सिंह व करुणा का था, तथा दाएॅ साइड विजय सिंह का जबकि बीच का हिस्सा अजय सिंह का था।

दाएॅ तरफ वाले हिस्से के पार्टीशन पर लगे दरवाजे को पार कर वह दबे पाॅव ऊपर की तरफ जाने के लिए सीढ़ियों की तरफ बढ़ा। उसे पता था कि सीढ़ियों के पास जाने के लिए उसे माॅ बाबूजी के कमरे के सामने से होकर ही गुज़रना पड़ेगा। उसका दिल अनायास ही धड़कने लगा था। माॅ बाबूजी के कमरे के पास से होकर वह दबे पाॅव ही सीढ़ियों के पास पहुॅचा। उसके बाद आहिस्ता से सीढ़ियाॅ चढ़ता चला गया वह।

ऊपर आकर वह दाहिने साइड चौड़ी बालकनी से होते हुए गौरी के कमरे के पास पहुॅचा। धाड़ धाड़ बजती धड़कनों को काबू में रखने की असफल कोशिश भी कर रहा था वह। किन्तु कहते हैं ना कि चोर का दिल बेहद कमज़ोर होता है, वही हाल अजय सिंह का था। कमरे के पास पहुॅच कर उसने दरवाजे पर हाॅथ रख कर उसे कमरे की तरफ धकेला। कमरा बेआवाज़ अंदर की तरफ पुश हो गया।

ये देख कर अजय सिंह की आॅखें चमक उठीं। उसने दरवाजे बहुत ही आहिस्ता से थोड़ा और अंदर की तरफ धकेला ताकि वह थोड़ी सी झिरी से ही पहले कमरे के अंदर की वस्तुस्थिति का पता लगा सके। ख़ैर, झिरी के बनते ही अजय सिंह ने कमरे के अंदर उस थोड़ी सी झिरी से देखा। अंदर एक कोने की तरफ रखे बेड पर गौरी दूसरी तरफ को करवट लिए पड़ी थी। ऊपर छत पर पंखा मध्यम स्पीड से घूम रहा था जिसकी हवा से उसकी साड़ी का एक सिरा हिल रहा था। गर्मी के दिन थे इस लिए गौरी ने साड़ी को अपने बदन के ऊपरी हिस्से से हटाया हुआ था। ऊपर सिर्फ ब्लाउज ही था। गर्दन के नीचे पीठ की तरफ वाला एक तिहाई भाग दिख रहा था तथा नीचे कमर दिख रही थी। कमर के नीचे उसका पिछवाड़ा था जो कि साड़ी से ढॅका हुआ ही था। उसके नीचे उसकी साड़ी पेटीकोट सहित उटनों तक ऊपर खिसकी हुई थी जिसके कारण उसकी दूध सी गोरी पिंडिलियाॅ स्पष्ट दिख रही थी। पैरों में मोटी सी किन्तु घुंघुरूदार पायल थी।

अजय सिंह दरवाजे पर खड़ा न रह सका। वह आहिस्ता से दरवाजे को खोला और अंदर दबे पाॅव कमरे के अंदर दाखिल हो गया। अंदर आकर वह दबे पाॅव ही बेड की तरफ बढ़ा। उसके दिल की धड़कनें पूरी गति से दौड़ रही थी जिसकी धमक किसी हॅथौड़े की तरह उसे अपनी कनपटियों पर स्पष्ट बजती सुनाई पड़ रही थी।

बेड के बेहद करीब पहुॅच कर अजय सिंह रुक गया। कमरे में खिड़की से आता हुआ प्रकाश फैला हुआ था जिसकी वजह से कमरे में मौजूद हर चीज़ स्पष्ट दिखाई दे रही थी। बेड के करीब पहुॅच कर अजय सिंह ने देखा कि गौरी दूसरी तरफ करवट लिए पड़ी थी। उसने अपना बायाॅ हाॅथ मोड़ कर अपनी बाॅई कनपटी के नीचे रखा हुआ था जबकि दाहिना हाॅथ उसके पेट के आगे बेड पर टिका हुआ था। अजय सिंह धड़कते दिल के साथ झुक कर गौरी के चेहरे की तरफ देखा तो उसे पता चला कि गौरी की आॅखें बंद हैं। अजय सिंह को यकीन करना मुश्किल था कि गौरी सो रही है या फिर उसने यूॅ ही अपनी आॅखें बंद की हुई हैं।

गौरी के चाॅद जैसे चेहरे पर इस वक्त ज़माने भर की मासूमियत थी। आज कल उसकी तबीयत ज़रा नाशाद थी इस लिए उसके चेहरे पर वो नूर नहीं दिख रहा था जो हमेशा रहता था। किन्तु अजय सिंह को तो जैसे ऐसा चेहरा भी किसी नूर से कम न था। वह ये मान चुका था कि गौरी दुनियाॅ की सबसे खूबसूरत औरत है। उसकी खुद की बीवी भी खूबसूरती में कम न थी लेकिन गौरी के सामने उसकी खूबसूरती जैसे फीकी पड़ जाती थी। परिवार की हर औरत खूबसूरती में एक दूसरे को मात दे रही थी। लेकिन अजय सिंह का दिल गौरी के लिए धड़कता था। वह समझ नहीं पा रहा था कि ये वह गौरी की खूबसूरती पर हवस की वजह से आकर्शित था या फिर उसे गौरी से प्रेम था।

अजय सिंह ने थोड़ा और आगे की तरफ झुक कर देखा तो एकाएक ही उसके मन में संगीत सा बज उठा। गौरी के सीने के दोनो बड़े बड़े उभार आपस में दबे होने की वजह से उसकी ब्लाउज से बाहर झाॅक रहे थे। अजय सिंह जैसे उनमें ही खो गया। तभी वह बुरी तरह डर भी गया। क्योंकि उसी वक्त गौरी ने एक गहरी साॅस लेते हुए पहले तो हल्की सी अॅगड़ाई ली और फिर सीधी लेट गई। अजय सिंह की धड़कन जो बुरी तरह बढ़ गई थी वो अब इस दृश्य को देख कर जैसे रुक ही गई। गौरी सीधी लेट गई थी। जैसा कि बताया जा चुका है कि गौरी ने गर्मी के चलते अपनी साड़ी को अपने ऊपरी भाग से हटाया हुआ था। इस लिए उसके सीधा लेटते ही ब्लाउज में कैद उसकी भारी छातियाॅ एकदम से तन गई थी। नीचे दूध सा गोरा नंगा पेट और उस पर उसकी गहरी नाभी। अजय सिंह की हालत एक पल में खराब हो गई। उसका जी चाहा कि वह तुरंत झुक कर गौरी के पेट और नाभी को अपनी जीभ से चूसना चाटना शुरू कर दे किन्तु वह ऐसा कुछ चाह कर भी नहीं कर सकता था।

गौरी की छातियाॅ बिना ब्रा के किसी कुतुब मीनार की तरह तनी हुई थी। अजय सिंह की नापाक नज़रें गौरी के पूरे जिस्म को जैसे स्कैन सा कर रही थीं। उसका खूबसूरत चेहरा और बिना लिपिस्टिक के ही लाल सुर्ख होंठ थे उसके। जिन्हें अपने होंठो में भर लेने के लिए जैसे उसे आमंत्रित कर रहे थे। और अजय सिंह ने उस निमंत्रण को स्वीकार भी कर लिया। वह मानो सम्मोहित सा हो गया था। वह सम्मोहित सा होकर ही आहिस्ता आहिस्ता गौरी के चेहरे की तरफ झुकने लगा। उसके हृदय की गति प्रतिपल रुकती हुई महसूस हो रही थी। वह गौरी के चेहरे के बेहद करीब झुक गया। उसके नथुनों में गौरी की गर्म साॅसें पड़ी। उसकी साॅसों की महक से जैसे वह मदहोश सा होने लगा। उसकी साॅस भारी हो गई। उसने गहरी साॅस खींचकर उसे तेज़ी से ही बाहर छोंड़ा और जैसे यहीं पर उससे बड़ी भारी ग़लती हो गई। एक तो गहरी साॅस लेने की आवाज़ और दूसरी तेज़ी से ही उस लम्बी साॅस को नाक के रास्ते बाहर निकालने से गौरी के चेहरे पर गर्म साॅस का तीब्र वेग से स्पर्श हुआ। जिससे गौरी की नींद टूट गई। उसने पलकें झपकाते हुए अपनी आॅखें खोल दी और....और अपने चेहरे के इतने करीब किसी को झुके देख वह बुरी तरह डर गई साथ ही हड़बड़ा भी गई। इधर अजय सिंह को भी जैसे साॅप सा सूॅघ गया। वह बड़ी तेज़ी से सीधा खड़ा हो गया। किन्तु तब तक देर हो चुकी थी।

गौरी ने जब देखा कि उसके चेहरे पर झुका हुआ शख्स कोई और नहीं बल्कि उसका जेठ है तो उसकी हालत खराब हो गई। मारे घबराहट के उसे समझ ही न आया कि क्या करे वह। फिर जैसे ही दिमाग़ ने काम किया तो उसने हड़बड़ा कर सीघ्रता से अपनी साड़ी को अपने बदन पर डाला।

"माफ़ करना गौरी।" अजय सिंह मानो तब तक खुद को सम्हाल चुका था, इस लिए बड़ी शालीनता बोला___"वो मैं दरअसल देखने आया था कि क्या हुआ है तुम्हें? मैने सुना कि कई दिन से तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है इस लिए देखने चला आया था।"

गौरी बोली तो कुछ न। बोलने वाली हालत में ही नहीं थी वह। अपने सिर पर साड़ी का घूॅघट डाल कर वह तेज़ी से ही बेड से नीचे उतर आई थी और अजय सिंह से दूर जाकर खड़ी हो गई थी। उसका दिल धाड़ धाड़ करके सरपट दौड़े जा रहा था। अपनी जगह पर खड़ी वह थरथर काॅप रही थी। उसे लग रहा था कि उसकी काॅपती हुई टाॅगें उसका भार ज्यादा देर तक सह नहीं पाएॅगी। वह बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाले खड़ी थी।

"अरे घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है गौरी।" उधर अजय सिंह उसकी हालत का बखूबी अंदाज़ा लगाते हुए बोला___"तुम मेरी छोटी बहन के समान हो। मैंने कहा न कि तुम्हें बस देखने आया था यहाॅ। तुम आराम से सो रही थी तो मैने तुम्हें जगाना उचित नहीं समझा। मैं देख रहा था कि कैसे सारे संसार भर की मासूमियत अपने चेहरे पर लिए तुम सो रही हो। अगर तुम्हें मेरा इस तरह देखना अच्छा नहीं लगा तो माफ़ कर देना अपने इस बड़े भइया को।"

गौरी ने इस बार भी कुछ नहीं कहा। बल्कि वह पूर्व की भाॅति ही खड़ी रही। अजय सिंह उसका जेठ था और यहाॅ का ये रिवाज़ था कि जेठ और ससुर के सामने घूॅघट में ही रहना है और उनसे बोलना नहीं है। यही एक भारतीय बहू के लिए नियम था यहाॅ गाॅवों में।

"पता नहीं किस शदी में जी रहे हैं ये सब लोग?" अजय सिंह कह रहा था___"आज भी वही पुरानी परंपराएॅ और फिज़ूल के नियम कानून व रीति रिवाज़ों में बॅधे हुए हैं सब। शहरों में ये सब रूढ़िवादिता नहीं है और ना ही वहाॅ पर इस सबको उचित मानता है कोई। शहर में सब लोग एक दूसरे से बोलते हैं। किसी के ऊपर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं रहती। भारतीय कानून ने भी हर मर्द व औरत को समानता का अधिकार दिया हुआ है। इस लिए ये सब बेकार की परंपराएॅ छोड़ो तुम सब। इज्जत सम्मान देने के लिए ये ज़रूरी नहीं होता कि कोई बहू अपने जेठ या ससुर के सामने चार हाथ का घूॅघट करे और उनसे बात न करे। बल्कि इज्जत सम्मान ये सब किये बग़ैर भी दिया जा सकता है।"

अजय सिंह की इन सब बातों का भला गौरी क्या जवाब देती? हलाॅकि उसे भी पता था कि शहर में वही सब नियम चलते हैं जिसके बारे में उसका जेठ उससे कह रहा है। किन्तु ये सब नियम कानून गाॅव देहातों में लागू नहीं हो सकते थे। ये सब यहाॅ इतना आसान नहीं था बल्कि ऐसा करने वाली बहू को समाज के ये लोग चरित्रहीन की संज्ञा दे देते हैं।

"ख़ैर छोंड़ो ये सब।" अजय सिंह ने कहा___"गाॅव देहात में तो ये सब चल ही नहीं सकता। पता नहीं कब समझेंगे ये लोग? देश समाज की उन्नति में बाधा ऐसी सोच ही डालती है। ख़ैर, मैं अभय को बोल दूॅगा कि तुम्हें शहर ले जाए और वहाॅ किसी अच्छे डाक्टर से तुम्हारा इलाज़ करवा दे। चलो जाओ अब तुम आराम करो।"

इतना सब कह कर अजय सिंह कमरे से बाहर की तरफ निकल गया। जबकि गौरी उसके जाने के बाद भी काफी देर तक बुत बनी खड़ी रही। मन में यही ख़याल बार बार डंक मार रहा था कि जेठ जी यहाॅ किस लिए आए थे? क्या फिर से पहले की तरह बुरी नीयत से या सच में वो उसकी तबीयत के बारे में ही जानने आए थे? वो इस तरह मेरे इतने करीब कैसे आ सकते थे? क्या मतलब हुआ इस सबका?
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गौरी के पास से आकर अजय सिंह पुनः अपने कमरे में बेड पर लेट गया था। उसका दिल अभी तक सामान्य नहीं हुआ था। अंदर अभी भी घबराहट के निसां शेष थे। बेड पर पड़े पड़े वह इन्हीं सब बातों के बारे में सोचे जा रहा था। बार बार वह इस ख़याल से डर जाता था कि अच्छा हुआ समय रहते उसने वस्तुस्थिति को सम्हाल लिया था वरना कुछ भी हो सकता था। अपनी बातों से उसने गौरी को जता दिया था कि वो सिर्फ उसकी तबीयत के बारे में ही जानने के लिए आया था उसके कमरे में। किन्तु उसके मन में बार बार ये सवाल भी उठ जाता था कि क्या वह अपनी बातों से गौरी को संतुष्ट कर पाया था? कहीं ऐसा तो नहीं कि गौरी को उस पर अभी भी कोई संदेह है? वह किसी निष्कर्श पर न पहुॅचा था।

अपने कमरे में वह जाने कितनी ही देर तक इस सबके बारे में सोचता रहा। उसे होश तब आया जब उसके कमरे का दरवाजा खोल कर उसकी पत्नी प्रतिमा अंदर दाखिल हुई। धूप और गर्मी से आने के कारण उसकी हालत खराब थी। पसीने से उसका जिस्म चमक रहा था। पतली सी साड़ी उसके शरापा बदन से चिपकी हुई थी। कमरे में आते ही प्रतिमा ने पहले कमरे का दरवाजा बंद किया उसके बाद सीधा बेड पर आकर चारो खाने चित्त होकर पसर गई। लेटते ही गहरी गहरी साॅसें लेने लगी वह। बड़े गले के ब्लाउज से उसकी भारी चूचियाॅ आधे से ज्यादा दिख रही थी।

अजय सिंह ने जब उसे इस हालत में देखा तो उससे रहा न गया। गौरी को देखकर ही उसके अंदर आग सी लग गई थी और अब अपनी पत्नी को इस तरह देखा तो होश खो बैठा वह। प्रतिमा आॅखें कर गहरी साॅसें ले रही थी जबकि अजय सिंह ने उसे पल भर में दबोच लिया। वह इतना उतावला हो चुका था कि वह प्रतिमा के ब्लाउज को उसके ऊपरी गले के भाग वाले सिरों को पकड़ कर एक झटके से फाड़ दिया। नाज़ुक सा ब्लाउज था बेचारा वह अजय सिंह झटका नहीं सह सका। ब्लाउज के सारे बटन एक साथ टूटते चले गए। अजय सिंह पागल सा हो गया था। ब्लाउज के अलग होते ही प्रतिमा की भारी भरकम चूचियाॅ उछल कर बाहर आ गईं। अजय ने उन दोनो फुटबालों को दोनो हाथों से शख्ती से दबोच कर उनके निप्पल को अपना मुह खोल कर भर लिया और बुरी तरह से उन्हें चुभलाने लगा।

प्रतिमा एकाएक ही हुए इस हमले से हतप्रभ सी रह गई। किन्तु अजय की रॅग रॅग से वाकिफ थी इस लिए बस मुस्कुरा कर रह गई। अजय सिंह उसकी चूचियों को बुरी तरह मसल रहा था और साथ ही साथ उनको अपने दाॅतों से काटता भी जा रहा था। वह पल भर में जानवर नज़र आने लगा था।

"आहहहहह धीरे से अजय।" प्रतिमा की दर्द में डूबी कराह निकल गई___"दर्द हो रहा है मुझे। ये कैसा पागलपन है? क्या हो गया है तुम्हें?"
"चुपचाप लेटी रह मेरी राॅड।" अजय सिंह मानो गुर्राया___"वरना ब्लाउज की तरह तेरा सब कुछ फाड़ कर रख दूॅगा।"

"अरे तो फाड़ ना भड़वे।" प्रतिमा भी उसी लहजे में बोली___"लगता है गौरी का भूत फिर से सवार हो गया तुझे। चल अच्छा हुआ, जब जब ये भूत सवार होता है तुझ पर तब तब तू मेरी मस्त पेलाई करता है। आहहहह हाय फाड़ दे रे....मुझ पर भी बड़ी आग लगी हुई है। शशशश आहहहह रंडे के जने नीचे का भी कुछ ख़याल कर। क्या चूचियों पर ही लगा रहेगा?"

"हरामज़ादी साली।" अजय सिंह उठ कर प्रतिमा की साड़ी को पेटीकोट सहित एक झटके में उलट दिया। साड़ी और पेटीकोट के हटते ही प्रतिमा नीचे से पूरी तरह नंगी हो गई।

"साली पेन्टी भी पहन कर नहीं गई थी उस मजदूर के पास।" अजय सिंह ने ज़ोर से प्रतिमा की चूत को अपने एक हाॅथ से दबोच लिया। प्रतिमा की सिसकारी गूॅज उठी कमरे में।

"आहहहह दबोचता क्या है रंडी के जने उसे मुह लगा कर चाट ना।" प्रतिमा अपने होशो हवाश में नहीं थी___"उस हरामी विजय ने तो कुछ न किया। हाय अगर एक बार कहता तो क्या मैं उसे खोल कर दे न देती? आहहह ऐसे ही चाट.....शशशशश अंदर तक जीभ डाल भड़वे की औलाद।"

अजय सिंह पागल सा हो गया। उसे इस तरह की गाली गलौज वाला सेक्स बहुत पसंद था। प्रतिमा को भी इससे बड़ा आता था। और आज तो दोनो पर आग जैसे भड़की हुई थी। अजय सिंह प्रतिमा की चूत में मानो घुसा जा रहा था। उसका एक हाॅथ ऊपर प्रतिमा की एक चूची पर जिसे वह बेदर्दी से मसले जा रहा था जबकि दूसरा हाथ प्रतिमा की चूत की फाॅकों पर था जिन्हें वह ज़रूरत के हिसाब से फैला रहा था।

कमरे में हवस व वासना का तूफान चालू था। प्रतिमा की सिसकारियाॅ कमरे में गूॅजती हुई अजीब सी मदहोशी का आलम पैदा कर रही थी। अजय सिंह उसकी चूत पर काफी देर तक अपनी जीभ से चुहलबाजी करता रहा।

"आहहहह ऐसे ही रे बड़ा मज़ा आ रहा है मुझे।" प्रतिमा बड़बड़ा रही थी। उसकी आॅखें मज़े में बेद थी। बेड पर पड़ी वह बिन पानी के मछली की तरह छटपटा रही थी।

"शशशश आहहह अब उसे छोंड़ और जल्दी से पेल मुझे भड़वे हरामी।" प्रतिमा ने हाॅथ बढ़ा कर अजय सिंह के सिर के बालों को पकड़ कर ऊपर उठाया। अजय सिंह उसके उठाने पर उठा। उसका पूरा चेहरा प्रतिमा के चूत रस से भींगा हुआ था। ऊपर उठते ही वह प्रतिमा के होठों पर टूट पड़ा। प्रतिमा अपने ही चूत रस का स्वाद लेने लगी इस क्रिया से।

प्रतिमा ने खुद को अलग कर बड़ी तेज़ी से अजय सिंह के कपड़ों उतारना शुरू कर दिया। कुछ ही पल में अजय सिंह मादरजाद नंगा हो गया। उसका हथियार फनफना कर बाहर आ गया। प्रतिमा उकड़ू लेट कर तुरंत ही उसे एक हाथ से पकड़ कर मुह में भर लिया।

अजय सिंह की मज़े से आॅखें बंद हो गई तथा मुह से आह निकल गई। वह प्रतिमा के बालों को मजबूती से पकड़ कर उसके मुह में अपनी कमर हिलाते हुए अपना हथियार पेलने लगा। वह पूरी तरह जानवर नज़र आने लगा था। ज़ोर ज़ोर से वह प्रतिमा के गले तक अपना हथियार पेल रहा था। प्रतिमा की हालत खराब हो गई। उसका चेहरा लाल सुर्ख पड़ गया। आॅखें बाहर को आने लग जाती थी साथ ही आॅखों से आॅसू भी आने लगे। तभी अजय ने उसके सिर को पीछे की तरफ से पकड़ कर अपने हथियार की तरफ मजबूती से खींचा। नतीजा ये हुआ कि उसका हथियार पूरा का पूरा प्रतिमा के मुह मे गले तक चला गया। प्रतिमा की आॅखें बाहर को उबल पड़ी। आॅखों से आॅसू बहने लगे। साॅस लेना मुश्किल पड़ गया उसे। उसका जिस्म झटके खाने लगा। उसके मुह से लार टपकने लगी।

प्रतिमा को लगा कि उसकी साॅसें टूट जाएॅगी। अजय सिंह उसे मजबूती से पकड़े हुए था। वह अपने मुह से उसके हथियार को निकालने के लिए छटपटाने लगी। अजय को उसकी इस हालत का ज़रा भी ख़याल नहीं था, वह तो मज़े में आॅकें बंद किये ऊपर की तरफ सिर को उठाया हुआ था।

प्रतिमा के मुह से गूॅ गूॅ की अजीब सी आवाज़े निकल रही थी। जब उसने देखा कि अजय सिंह उसे मार ही डालेगा तो उसने अपने दोनो हाॅथों से अजय सिंह के पेट पर पूरी ताकत से चिकोटी काटी।

"आहहहहहहह।" अजय सिंह के मुह से चीख निकल गई। वह एक झटके से उसके सिर को छोंड़ कर तथा उसके मुह से अपने हथियार को निकाल कर अलग हट गया। मज़े की जिस दुनियाॅ में वह अभी तक परवाज़ कर रहा था उस दुनिया से गिर कर वह हकीकत की दुनियाॅ में आ गया था। बेड के दूसरी तरफ घुटनो पर खड़ा वह अपने पेट के उस हिस्से को सहलाए जा रहा था जहाॅ पर प्रतिमा ने चिकोटी काटी थी। उसे प्रतिमा की इस हरकत पर बेहद गुस्सा आया था किन्तु जब उसने प्रतिमा की हालत को देखा तो हैरान रह गया। प्रतिमा का चेहरा लाल सुर्ख तमतमाया हुआ था। वह बेड पर पड़ी अपनी साॅसें बहाल कर रही थी।

"तुमको ज़रा भी अंदाज़ा है कि तुमने क्या किया है मेरे साथ?" प्रतिमा ने गुस्से से फुंकारते हुए कहा___"तुम अपने मज़े में ये भी भूल गए कि मेरी जान भी जा सकती थी। तुम इंसान नहीं जानवर हो अजय। आज के बाद मेरे करीब भी मत आना वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"

अजय सिंह उसकी ये बातें सुनकर हैरान रह गया था। किन्तु जब उसे एहसास हुआ कि वास्तव में उसने क्या किया था तो वह शर्मिंदगी से भर गया। वह जानता था कि प्रतिमा वह औरत थी जो उसके कहने पर दुनिया का कोई भी काम कर सकती थी और करती भी थी। ये उसका अजय के प्रति प्यार था वरना कौन ऐसी औरत है जो पति के कहने पर इस हद तक भी गिरने लग जाए कि वह किसी भी ग़ैर मर्द के नीचे अपना सब कुछ खोल कर लेट जाए???? अजय सिंह को अपनी ग़लती का एहसास हुआ। वह तुरंत ही आगे बढ़ कर प्रतिमा से माफी माॅगने लगा तथा उसको पकड़ने के लिए जैसे ही उसने हाथ बढ़ाया तो प्रतिमा ने झटक दिया उसे।

"डोन्ट टच मी।" प्रतिमा गुर्राई और फिर उसी तरह गुस्से में तमतमाई हुई वह बेड से नीचे उतरी और बाथरूम के अंदर जाकर दरवाजा बंद कर लिया उसने। अजय सिंह शर्मिंदा सा उसे देखता रह गया। उसमें अपराध बोझ था इस लिए उसकी हिम्मत न हुई कि वह प्रतिमा को रोंक सके। उधर थोड़ी ही देर में प्रतिमा बाथरूम से मुह हाॅथ धोकर निकली। आलमारी से एक नया ब्लाउज निकाल कर पहना, तथा उसी साड़ी को दुरुस्त करने के बाद उसने आदमकद आईने में देख कर अपने हुलिये को सही किया। सब कुछ ठीक करने के बाद वह बिना अजय की तरफ देखे कमरे से बाहर निकल गई। अजय सिंह समझ गया था कि प्रतिमा उससे बेहद नाराज़ हो गई है। उसका नाराज़ होना जायज़ भी था। भला इस तरह कौन अपनी पत्नी की जान ले लेने वाला सेक्स करता है?? अजय सिंह असहाय सा नंगा ही बेड पर पसर गया था।


दोस्तो अपडेट हाज़िर है,,,,,,,,,,
 
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट...........《 31 》

अब तक,,,,,,,

"तुमको ज़रा भी अंदाज़ा है कि तुमने क्या किया है मेरे साथ?" प्रतिमा ने गुस्से से फुंकारते हुए कहा___"तुम अपने मज़े में ये भी भूल गए कि मेरी जान भी जा सकती थी। तुम इंसान नहीं जानवर हो अजय। आज के बाद मेरे करीब भी मत आना वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"

अजय सिंह उसकी ये बातें सुनकर हैरान रह गया था। किन्तु जब उसे एहसास हुआ कि वास्तव में उसने क्या किया था तो वह शर्मिंदगी से भर गया। वह जानता था कि प्रतिमा वह औरत थी जो उसके कहने पर दुनिया का कोई भी काम कर सकती थी और करती भी थी। ये उसका अजय के प्रति प्यार था वरना कौन ऐसी औरत है जो पति के कहने पर इस हद तक भी गिरने लग जाए कि वह किसी भी ग़ैर मर्द के नीचे अपना सब कुछ खोल कर लेट जाए???? अजय सिंह को अपनी ग़लती का एहसास हुआ। वह तुरंत ही आगे बढ़ कर प्रतिमा से माफी माॅगने लगा तथा उसको पकड़ने के लिए जैसे ही उसने हाथ बढ़ाया तो प्रतिमा ने झटक दिया उसे।

"डोन्ट टच मी।" प्रतिमा गुर्राई और फिर उसी तरह गुस्से में तमतमाई हुई वह बेड से नीचे उतरी और बाथरूम के अंदर जाकर दरवाजा बंद कर लिया उसने। अजय सिंह शर्मिंदा सा उसे देखता रह गया। उसमें अपराध बोझ था इस लिए उसकी हिम्मत न हुई कि वह प्रतिमा को रोंक सके। उधर थोड़ी ही देर में प्रतिमा बाथरूम से मुह हाॅथ धोकर निकली। आलमारी से एक नया ब्लाउज निकाल कर पहना, तथा उसी साड़ी को दुरुस्त करने के बाद उसने आदमकद आईने में देख कर अपने हुलिये को सही किया। सब कुछ ठीक करने के बाद वह बिना अजय की तरफ देखे कमरे से बाहर निकल गई। अजय सिंह समझ गया था कि प्रतिमा उससे बेहद नाराज़ हो गई है। उसका नाराज़ होना जायज़ भी था। भला इस तरह कौन अपनी पत्नी की जान ले लेने वाला सेक्स करता है?? अजय सिंह असहाय सा नंगा ही बेड पर पसर गया था।

अब आगे,,,,,,,,,,
फ्लैशबैक अब आगे______

उस दिन और उस रात प्रतिमा ने अजय सिंह की तरफ देखा तक नहीं बात करने की तो बात दूर। अजय सिंह अपनी पत्नी के इस रवैये बेहद परेशान हो गया था, वह अपने किये पर बेहद शर्मिंदा था। वह जानता था कि उसने ग़लती की थी किन्तु अब जो हो गया उसका क्या किया जा सकता था? उसने कई बार प्रतिमा से उस कृत्य के लिए माफ़ी माॅगी लेकिन प्रतिमा हर बार उसे गुस्से से देख कर उससे दूर चली गई थी।

ख़ैर दूसरा दिन शुरू हुआ। आज प्रतिमा का रवैया एकदम सामान्य था। कदाचित् रात के बाद अब उसका गुस्सा उतर गया था। पिछली रात वह दूसरे कमरे में अंदर से कुंडी लगा कर सोई थी। वह जानती थी अजय उसे मनाने उसके पास आएगा और हुआ भी वही लेकिन प्रतिमा कमरे का दरवाजा नहीं खोला था। अजय सिंह मुह लटकाए वापस चला गया था। रात में प्रतिमा ने इस बारे में बहुत सोचा और इस निष्कर्स पर पहुॅची कि अजय सिंह का इसमें भला क्या दोष हो सकता है? उस सूरत में कोई भी मर्द वही करता जो उसने किया। मज़े की चरम सीमा का एक रूप ऐसा भी हो सकता है कि वह उस सूरत में सब कुछ भूल बैठता है। अजय सिंह के साथ भी तो वही हुआ था। प्रतिमा उससे प्यार भी बहुत करती थी, वह उससे इस तरह बेरूखी अख्तियार नहीं कर सकती थी बहुत देर तक।

सुबह जब हुई तो सबसे पहले वह अजय सिंह से बड़े प्यार से मिली। अजय सिंह इस बात से बेहद खुश हुआ। ख़ैर, दोपहर में प्रतिमा फिर से विजय सिंह के लिए खाने का टिफिन तैयार कर तथा एक प्लास्टिक के बोतल में पका हुआ दूध लेकर खेतों की तरफ चल दी। आज भी उसने पिछले दिन की ही तरह लिबास पहना हुआ था। खूबसूरत गोरे बदन पर आज उसने पतली सी पीले रंग की साड़ी और उसी से मैच करता बड़े गले का ब्लाउज पहना था। ब्लाउज के अंदर आज भी उसने ब्रा नहीं पहना था।

प्रतिमा मदमस्त चाल से तथा मन में हज़ारों ख़याल बुनते हुए खेतों पर बने मकान में पहुॅची। पिछले दिन की ही तरह आज भी आस पास खेतों पर कोई मजदूर नज़र नहीं आया उसे,अलबत्ता विजय सिंह ज़रूर उसे दाईं तरफ लगे बोरबेल पर नज़र आया। वह बोर के पानी से हाॅथ मुह धो रहा था।

प्रतिमा ने ग़ौर से उसे देखा फिर मुस्कुरा कर मकान के अंदर की तरफ बढ़ गई। कमरे में पहुॅच कर उसने पिछले दिन की ही तरह बेन्च पर टिफिन से निकाल कर खाना लगाने लगी। आज उसने अपना आॅचल ढुलकाया नहीं था। शायद ये सोच कर कि विजय कहीं ये न सोच बैठे कि रोज़ रोज़ मैं अपना आॅचल क्यों गिरा देती हूॅ?

कुछ ही देर में विजय सिंह कमरे में आ गया। कमरे में अपनी भाभी को देख कर वह चौंका फिर सामान्य होकर वहीं बेन्च के पास कुर्सी पर बैठ गया।

"आज भी आपको ही कस्ट उठाना पड़ा भाभी।" विजय सिंह ने कहा___"कितनी तेज़ धूप और गर्मी होती है, कहीं आपको लू लग गई और आप बीमार हो गई तो??"

"अरे कुछ नहीं होगा मुझे।" प्रतिमा ने कहा___"इतनी भी नाज़ुक नहीं हूॅ जो इतने से ही बीमार हो जाऊॅगी। और अगर हो भी जाऊॅगी तो क्या हुआ? मेरी दवाई करवाने तुमको ही जाना पड़ेगा। जाओगे न मुझे लेकर?"

"अरे क्या बात करती हैं आप?" विजय सिंह गड़बड़ाया___"भगवान करे आपको कभी कुछ न हो भाभी।"
"हमारे चाहने से क्या होता है?" प्रतिमा ने कहा___"जिसको जब जो होना होता है वो हो ही जाता है। इस लिए कह रही हूॅ कि अगर मैं बीमार पड़ जाऊॅ तो तुम मुझे ले चलोगे न डाक्टर के पास??"

"इसमें भला पूछने की क्या बात है?" विजय सिंह ने कहा___"और हाॅ आपको डाक्टर के पास ले जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी बल्कि डाक्टर को मैं खुद आपके पास ले आऊॅगा।"

"ऐसा शायद तुम इस लिए कह रहे हो कि तुम मुझे अपने साथ ले जाना ही नहीं चाहते।" प्रतिमा ने बुरा सा मुह बनाया___"सोचते होगे कि मुझ बुढ़िया को कौन ढोता फिरेगा?"

"बु बुढ़िया???" विजय सिंह को फिर से ठसका लग गया। वह ज़ोर ज़ोर से खाॅसने लगा। प्रतिमा ने सीघ्रता से उठ कर मटके से ग्लास में पानी लिये उसके मुह से लगा दिया। इस बीच उसे सच में ध्यान न आया कि उसका आॅचल नीचे गिर गया है।

"क्या हुआ आज भी ठसका लग गया तुम्हें?" प्रतिमा ने कहा___"क्या रोज़ ऐसे ही होता है खाते समय?"

विजय सिंह कुछ बोल न सका। उसकी आॅखों के बहुत पास प्रतिमा की बड़ी बड़ी चूचियाॅ आधे से ज्यादा ब्लाउज से झूलती दिख रही थी। विजय सिंह की हालत पल भर में खराब हो गई। वह पानी पीना भूल गया था।

"क्या हुआ पानी पियो न?" प्रतिमा ने कहा फिर अनायास ही उसका ध्यान इस तरफ गया कि विजय उसके सीने की तरफ एकटक देखे जा रहा है। ये देख वह मुस्कुराई।
"आज दूध लेकर आई हूॅ तुम्हारे लिए।" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा___"और हाॅ जहाॅ देख रहे हो न वहाॅ सूखा पड़ा है। इस लिए तो अलग से लाई हूॅ।"

विजय सिंह को जबरदस्त झटका लगा। प्रतिमा को लगा कहीं उसने ज्यादा तो नहीं बोल दिया। अंदर ही अंदर घबरा गई थी वह किन्तु चेहरे से ज़ाहिर न होने दिया उसने। बल्कि सीधी खड़ी होकर उसने अपने आॅचल को सही कर लिया था।

"अरे ऐसे आॅखें फाड़ फाड़ कर क्या देख रहे हो मुझे?" प्रतिमा हॅसी___"मैं तो मज़ाक कर रही थी तुमसे। देवर भाभी के बीच इतना तो चलता है न? चलो अब जल्दी से खाना खाओ।"

विजय सिंह चुपचाप खाना खाने लगा। इस बार वह बड़ा जल्दी जल्दी खा रहा था। ऐसा लगता था जैसे उसे कहीं जाने की बड़ी जल्दी थी।

"तुम खाना खाओ तब तक मैं बाहर घूम लेती हूॅ।" प्रतिमा ने कहा___"और हाॅ दूध ज़रूर पी लेना।"
"जी भाभी।" विजय ने नीचे को सिर किये ही कहा था।

उधर प्रतिमा मुस्कुराती हुई कमरे से बाहर निकल गई। पता नहीं क्या चल रहा था उसके दिमाग़ में?"
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वर्तमान________

"अरे नैना बुआ आप??" रितू जैसे ही हवेली के अंदर ड्राइंग रूम में दाखिल हुई तो सोफे पर नैना बैठी दिखी___"ओह बुआ मैं बता नहीं सकती कि आपको यहाॅ देख कर मैं कितना खुश हुई हूॅ।"

"ओह माई गाड।" नैना सोफे से उठते हुए किन्तु हैरानी से बोली___"तू तो पुलिस वाली बन गई। कितनी सुन्दर लग रही है तेरे बदन पर ये पुलिस की वर्दी। आई एम सो प्राउड आफ यू। आ मेरे गले लग जा रितू।"

दोनो एक दूसरे के गले मिली। फिर दोनो एक साथ ही सोफे पर बैठ गई।

"मुझे डैड ने बताया ही नहीं कि आप आईं हैं यहाॅ।" रितू ने खेद भरे भाव से कहा___"वरना मैं पुलिस थाने से भाग कर आपके पास आ जाती। ख़ैर, आब बताइये कैसी हैं आप और फूफा जी कैसे हैं?"

"मैं तो ठीक ही हूॅ रितू।" नैना ने सहसा गंभीर होकर कहा___"लेकिन तेरे फूफा जी का पूछो ही मत।"
"अरे ऐसा क्यों कह रही हैं आप?" रितू ने चौंकते हुए कहा____"फूफा जी के बारे में क्यों न पूछूॅ भला?"

"क्यों कि अब वो तेरे फूफा जी नहीं रहे।" नैना ने कहा___"मैने उस नामर्द को तलाक़ दे दिया है और अब यहीं रहूॅगी अपने घर में।"
"त...ला...क़????" रितू बुरी तरह उछल पड़ी थी___"लेकिन क्यों बुआ? ऐसी भी भला क्या बात हो गई कि आपने उन्हें तलाक़ दे दिया?"

नैना ने कुछ पल सोचा और फिर सारी बात बता दी उसे जो उसने प्रतिमा को बताई थी। सारी बातें सुनने के बाद रितू सन्न रह गई।

"ठीक किया आपने।" फिर रितू ने कहा___"ऐसे आदमी के पास रहने का कोई मतलब ही नहीं है जो ऐसी सोच रखता हो।"
"रितू मैं सोच रही हूॅ कि मैं कोई ज्वाब कर लूॅ।" नैना ने हिचकिचाते हुए कहा___"अगर तेरी नज़र में मेरे लिए कोई ज्वाब हो तो दिलवा दे मुझे।"

"आपको ज्वाब करने की क्या ज़रूरत है बुआ?" रितू ने हैरानी से कहा___"क्या आप ये समझती हैं कि आप हमारे लिए बोझ बन जाएॅगी?"
"ऐसी बात नहीं है रितू।" नैना ने कहा__"बस मेरा मन बहलता रहेगा। सारा दिन बेड पर पड़े पड़े इस सबके बारे में सोच सोच कर कुढ़ती रहूॅगी। इस लिए अगर कोई ज्वाब करने लगूॅगी तो मेरा दिन आराम से कट जाया करेगा।"

"क्या इस बारे में आपने डैड से बात की है?" रितू ने कहा।
"भइया और भाभी से मैने अभी इस बारे में कोई बात नहीं की है।" नैना ने कहा___"पर मैं जानती हूॅ कि भइया मुझे ज्वाब करने की इजाज़त कभी नहीं देंगे। वो भी यही समझेंगे कि मैं उनके लिए बोझ बन जाऊॅगी ऐसा मैं सोच रही हूॅ।"

"हाॅ ये बात है ही।" रितू ने कहा___"हम में से कोई नहीं चाहेगा कि आप कोई ज्वाब करें।"
"नहीं रितू प्लीज़।" नैना ने रितू के हाॅथ को अपने हाथ में लेकर कहा___"समझने की कोशिश कर मेरी बच्ची। क्या तू चाहती है कि तेरी बुआ उस सबके बारे में सोच सोच कर दुखी हो?"

"नहीं बुआ हर्गिज़ नहीं।" रितू ने मजबूती से इंकार में सिर हिलाया___"मैं तो चाहती हूॅ कि मेरी प्यारी बुआ हमेशा खुश रहें।"
"तो फिर कोई ज्वाब दिलवा दे मुझे।" नैना ने कहा___"मैं कोई भी काम करने को तैयार हूॅ। बस काम ऐसा हो कि मुझे एक सेकण्ड के लिए भी कुछ सोचने का समय न मिले।"

"ज्वाब तो मैं आपको दिलवा दूॅगी।" रितू ने कहा____"लेकिन उससे पहले एक बार डैड से भी इसके लिए पूछना पड़ेगा।"
"ठीक है मैं बात करूॅगी भइया से।" नैना ने कहा___"अब जा तू भी चेन्ज कर ले तब तक मैं तेरे कुछ खाने का बंदोबस्त करती हूॅ।"

"आप परेशान मत होइये बुआ।" रितू ने कहा____"माॅम हैं ना इस सबके लिए।"
"इसमें परेशानी की क्या बात है?" नैना ने कहा___"शादी से पहले भी तो मैं यही करती थी तेरे लिए भूल गई क्या?"

"कैसे भूल सकती हूॅ बुआ?" रितू ने मुस्कुरा कर कहा___"मुझे सब याद है। आप हम तीनो बहन भाई को पढ़ाया करती थी और पिटाई भी करती थी।"
"अरे वो तो मैं प्यार से मारती थी।" नैना हॅस पड़ी___"और वो ज़रूरी भी तो था न?"
"सही कह रही हैं आप।" रितू ने कहा__"जब तक हम बच्चे रहते हैं तब तक हमें ये सब बुरा लगता है और जब बड़े हो जाते हैं तो लगता है कि बचपन में पढ़ाई के लिए जो पिटाई होती थी वो हमारे भले के लिए ही होती थी।"

"मैने घर के सभी बच्चों को पढ़ाया था।" नैना ने कुछ सोचते हुए कहा___"किन्तु उन सभी बच्चों में एक ही ऐसा बच्चा था जो मेरे हाॅथों मार नहीं खाया और वो था हमारा राज। मैं सोचा करती थी कि ऐसा कौन सा सवाल उससे करूॅ जो उससे न बने और फिर मैं उसकी पिटाई करूॅ मगर हाय रे कितना तेज़ था राज। हर विषय उसका कम्प्लीट रहता था। छोटे भइया भाभी ने उसे बचपन से ही पढ़ाई में जीनियस बना रखा था। वैसी ही निधी भी थी। जाने कहाॅ होंगे वो सब?"

कहते कहते नैना की आॅखों में आॅसू आ गए। रितू के चेहरे पर बेहद ही गंभीर भाव आ गए थे। उसके मुख से कोई शब्द नहीं निकला बल्कि शख्ती से उसने मानो लब सी लिए थे।

"क्या हो गया है इस घर की खुशियों को?" नैना ने गंभीरता से कहा___"न जाने किसकी नज़र लग गई इस घर के हॅसते मुस्कुराते हुए लोगो पर? सब कुछ बिखर गया। विजय भइया क्या गए जैसे इस घर की रूह ही चली गई। माॅ बाबू जी उनके सदमें में कोमा में चले गए। गौरी भाभी और उनके बच्चे जाने दुनियाॅ के किस कोने में जी रहे होंगे? बड़ी भाभी ने बताया कि करुणा भाभी भी अपने बच्चों के साथ अपने मायके चली गईं हैं जबकि अभय भइया किसी काम से कहीं बाहर गए हैं। इतनी बड़ी हवेली में गिनती के चार लोग हैं। ये भाग्य की कैसी विडम्बना है रितू???"

"ये सवाल ऐसा है बुआ जो हर शख्स की ज़ुबां पर रक्श करता है।" रितू ने कहा___"लेकिन उसका कोई जवाब नहीं है।"
"जबाव तो हर सवाल का होता है रितू।" नैना ने कहा___"संसार में ऐसा कुछ है ही नहीं जिसका जवाब न हो।"

"आप कहना क्या चाहती हैं बुआ?" रितू ने हैरानी से देखा था।
"कहने को तो बहुत कुछ है रितू।" नैना ने गहरी साॅस ली___"लेकिन कहने का कोई मतलब नहीं है।"

"प्लीज कहिए न बुआ।" रितू ने कहा__"अगर कोई बात है मन में तो बेझिझक कहिये।"
"जाने दे रितू।" नैना ने पहलू बदला___"तू सुना कैसी चल रही है तेरी पुलिस की नौकरी??"

"बस ठीक ही है बुआ।" रितू की आॅखों के सामने विधी का चेहरा नाच गया___"आप तो जानती ही हैं इस नौकरी में दिन रात भागा दौड़ी ही होती रहती है। कभी इस मुजरिम के पीछे तो कभी किसी क़ातिल के पीछे।"

"हाॅ ये तो है।" नैना ने कहा___"लेकिन पुलिस आफीसर बनने का सपना तो तूने ही देखा था न बचपन से।"
"बचपन में तो बस ये सब एक बचपना टाइप का था बुआ।" रितू ने कहा___"लेकिन जब बड़े होने पर हर चीज़ की समझ आई तो लगा कि सचमुच मुझे पुलिस आफीसर बनना चाहिए। मेरी ख्वाहिश थी कि पुलिस आफीसर बन कर मैं दादा दादी जी के एक्सीडेन्ट वाला केस फिर से रिओपेन करके उसकी तहकीक़ात करूॅगी। मगर सब कुछ जैसे एक ख्वाहिश मात्र ही रह गया।"

"क्या मतलब???" नैना चौंकी।
"मतलब ये बुआ कि मैं दादा जी के एक्सीडेन्ट वाले केस में कुछ नहीं कर सकती।" रितू ने असहाय भाव से कहा___"क्योंकि मैने उस केस की फाइल को बहुत बारीकी से पढ़ा है, उसमें कहीं पर भी ये नहीं दिखाया गया कि वो एक्सीडेन्ट एक सोची समझी साजिश का नतीजा था बल्कि ये रिपोर्ट बना कर फाइल बंद कर दी गई कि वो एक्सीडेन्ट महज एक हादसा या दुर्घटना थी जो कि सामने से आ रहे ट्रक से टकराने से हो गई थी। ट्रक का ड्राइवर नशे में था जिसकी वजह से उसने ध्यान ही नहीं दिया और साइड होने बजाय उसने दादा जी की कार से टकरा गया था।"

"लेकिन सवाल ये है कि तुझे ऐसा क्यों लगता है कि वो एक्सीडेन्ट महज दुर्घटना नहीं बल्कि किसी की सोची समझी साजिश थी?" नैना ने हैरानी से कहा___"यानी कोई बाबूजी को जान से मार देना चाहता था।"

"मुझे शुरू में इस बात का सिर्फ अंदेशा था बुआ।" रितू कह रही थी___"वो भी इस लिए क्योंकि ऐसा शहरों में होता है। दादा जी की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी। फिर भी उनके साथ ये हादसा हुआ। उस समय इसके बारे में इस एंगल से मेरा सिर्फ सोचना था। मैं नहीं जानती थी मैं ऐसा क्यों सोचती थी? शायद इस लिए कि शुरू से ही मेरे ज़हन में क्राइम के प्रति सोचने का ऐसा नज़रिया था। किन्तु पुलिस की नौकरी ज्वाइन करने बाद जब मैने उस केस की फाइल को बारीकी से अध्ययन किया तो मुझे यकीन हो गया कि वो एक्सीडेन्ट महज कोई दुर्घटना नहीं थी बल्कि जान बूझ कर दादाजी की कार में टक्कर मारी गई थी।"

"ऐसा क्या था उस फाइल में?" नैना की आॅखें हैरत से फटी पड़ी थी____"जिससे तुझे यकीन हो गया कि ये सब सोच समझ कर किया गया था?"
"फाइल में जिस जगह पर एक्सीडेन्ट यानी कि दादा जी की कार का एक्सीडेन्ट हुआ था उस जगह पर जाकर मैने खुद निरीक्षण किया है।" रितू ने कहा___"मेन हाइवे पर उस जगह भले ही ज्यादातर वाहनों का आना जाना नहीं है लेकिन फिर भी इक्का दुक्का वाहन तो आते जाते ही रहते हैं वहाॅ पर। इतनी चौड़ी सड़क पर कोई ट्रक वाला अपनी लेन से आकर कैसे किसी कार को टक्कर मार सकता है? ये ठीक है कि वो टू-लेन सड़क नहीं थी बल्कि टू-इन-वन थी। फिर भी इतनी चौड़ी सड़क पर कोई ट्रक वाला अपनी लेन से हट कर कैसे टक्कर मार देगा। फाइल में लिखा है कि ट्रक का ड्राइवर नशे में था तो सवाल है कि नशे की उस हालत में उसने एक ही एक्सीडेन्ट क्यों कियों किया? बल्कि एक से ज्यादा एक्सीडेन्ट हो सकते थे उससे मगर ऐसा नहीं था। अब चूॅकि फाइल में ना तो उस ट्रक वाले का कोई अता पता है और ना ही कोई ऐसा सबूत जिसके तहत आगे की कोई कार्यवाही की जा सके इस लिए मैं कुछ नहीं कर सकती।"

"क्या सिर्फ यही एक वजह है जिससे तुझे लगता है कि बाबू जी का एक्सीडेन्ट महज दुर्घटना नहीं थी?" नैना ने कहा___"या फिर कोई और भी वजह है तेरे पास??"

अभी रितू कुछ बोलने ही वाली थी कि उसकी पैन्ट की जेब में पड़ा मोबाइल बज उठा। उसने पाॅकेट से मोबाइल निकाल कर स्क्रीन में फ्लैश कर रहें नंबर को देखा फिर काल रिसीव कर उसे कान से लगा कर कहा___"हाॅ रामदीन बोलो क्या बात है?"

"....................." उधर से पता नहीं क्या कहा गया।
"ओह चलो ठीक है।" रितू ने कहा___"मैं फौरन पहुॅच रही हूॅ।"

फोन काटने के बाद रितू एक झटके से सोफे से खड़ी हो गई और फिर नैना से कहा__"माफ़ करना बुआ मुझे तत्काल पुलिस स्टेशन जाना होगा।"

"ठीक रितू आराम से जाना।" नैना ने कहा___"शाम को जल्दी आना।"
"जी बिलकुल बुआ।" रितू ने मुस्कुरा कर कहा___"रात में हम दोनो खूब सारी बातें करेंगे।"

इसके बाद रितू वहाॅ से चली गई। जबकि नैना वहीं सोफे पर बैठी उसे बाहर की तरफ जाते देखती रही। इस बात से अंजान कि पीछे दीवार के उस तरफ खड़ा अजय सिंह इन दोनो की बातें सुन रहा था। उसके पीछे प्रतिमा भी खड़ी थी।
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फ्लैशबैक अब आगे_______

विजय सिंह खाना खाने के बाद तथा दूध पीने के बाद थोड़ी देर वहीं एक तरफ रखे बिस्तर पर आराम करना चाहता था। किन्तु उसने सोचा कि उसकी भाभी बाहर धूप में जाने कहाॅ घूम रही होंगी? इस लिए उसे देखने के लिए तथा ये कहने के लिए कि वो अब घर जाएॅ बहुत धूप व गर्मी है, वह कमरे से निकल कर बाहर आ गया।

बाहर आकर उसने आस पास देखा लेकिन प्रतिमा उसे कहीं नज़र न आई। ये देख कर वह चिन्तित हो उठा। वह तुरंत ही आगे बढ़ते हुए आस पास देखने लगा। चलते चलते वह आमों के बाग़ की तरफ बढ़ गया। यहाॅ लगभग दस एकड़ में आमों के पेड़ लगाए गए थे। आधुनिक प्रक्रिया के तहत बहुत कम समय में ही ये बड़े हो कर फल देने लगे थे। ये मौसम भी आमों का ही था।

विजय सिंह जब बाग़ के पास पहुॅचा तो देखा कि प्रितिमा एक आम के पेड़ के पास खड़ी ऊपर की तरफ देख रही थी। उसने अपने पल्लू को कमर में घुमा कर खोंसा हुआ था। उसके दोनो हाॅथ ऊपर थे। विजय सिंह के देखते ही देखते वह ऊपर की तरफ उछली और फिर नीचे आ गई। विजय सिंह उसे ये हरकत करते देख मुस्कुरा उठा। उसे देख कर कोई नहीं कह सकता था कि ये तीन तीन बच्चों की माॅ है बल्कि इस वक्त वह जिस तरह से उछल उछल कर ऊपर लगे आम को तोड़ने का प्रयास कर रही थी उससे यही लगता था कि वो अभी भी कोई अल्हड़ सी लड़की ही थी। वह बार बार पहले से ज्यादा ज़ोर लगा कर ऊपर उछलती लेकिन वह नाकाम होकर नीचे आ जाती। आम उसकी पहुच से दूर था किन्तु फिर भी वो मान नहीं थी। उछल कूद के चक्कर में वह पसीना पसीना हो गई थी। उसकी दोनो काख पसीने से भीगी हुई थी तथा ब्लाउज भी भीग गया था। चेहरे और कनपटियों पर भी पसीना रिसा हुआ था।

विजय सिंह उसके पास जाकर बोला___"तो आप यहाॅ आम तोडने का प्रयास कर रही हैं। मैं ढूॅढ रहा था कि जाने आप कहाॅ गायब हो गई हैं?"
"अरे भला मैं अब कहाॅ गायब हो जाऊॅगी विजय?" प्रतिमा ने मुस्कुरा कर कहा__"इस ऊम्र में तुम्हारे भइया को छोंड़ कर भला कहाॅ जा सकती हूॅ?"

"चलिये मैं आपको आम तोड़ कर दे देता हूॅ फिर आप आराम से बैठ कर खाइयेगा।" उसकी बात पर ज़रा भी ध्यान दिये बग़ैर विजय ने कहा था।
"नहीं विजय।" प्रतिमा ऊपर थोड़ी ही दूरी पर लगे आम को देखती हुई बोली___"इसे तो मैं ही तोड़ूॅगी।"

"पर वो तो आपकी पहुॅच से दूर है भाभी।" विजय भी आम की तरफ देखते हुए बोला___"भला आप उस तक कैसे पहुॅच पाएॅगी? और जब पहुॅचेंगी ही नहीं तो उसे तोड़ेंगी कैसे?"

"कह तो तुम भी ठीक ही रहे हो।" प्रतिमा ने बड़ी मासूमियत से दोनो हाथ कमर पर रख कर कहा___"सचमुच मैं काफी देर से प्रयास कर रही हूॅ इस मुए को तोड़ने का लेकिन ये मेरे हाॅथ ही नहीं लग रहा।"

"इसी लिए तो कहता हूॅ कि मैं तोड़ देता हूॅ भाभी।" विजय ने कहा___"आप फालतू में ही इस गर्मी में परेशान हो रही हैं।"
"लेकिन मैं इसे अपने हाॅथ से ही तोड़ना चाहती हूॅ विजय।" प्रतिमा ने कहा___"मुझे बहुत खुशी होगी अगर मैं इसे अपने से तोड़ कर खाऊॅगी तो।"

"फिर तो ये संभव नहीं है भाभी।" विजय ने कहा___"या फिर ऐसा कीजिए कि नीचे से एक पत्थर उठाइये और उस आम को निशाना लगा कर पत्थर मार कर तोड़ लीजिए।"
"उफ्फ विजय ये तो मुझसे और भी नहीं होगा।" प्रतिमा ने आहत भाव से कहा___"क्या तुम मेरी मदद नहीं कर सकते?"

"म मैं...????" विजय चौंका___"भला मैं कैसे आपकी मदद कर सकता हूॅ?"
"बिलकुल कर सकते हो विजय।" प्रतिमा ने खुश होकर कहा___"तुम मुझे अपनी बाहों से ऊपर उठा सकते हो। उसके बाद मैं बड़े आराम से उस आम को तोड़ लूॅगी।"

"क क्या????" विजय सिंह बुरी तरह उछल पड़ा, हैरत से उसकी आॅखें फैलती चली गई थी, बोला___"ये आप क्या कह रही हैं भाभी? नहीं नहीं ये मैं नहीं कर सकता। आप कोई दूसरा आम देख लीजिए जो आपकी पहुॅच पर हो उसे तोड़ लीजिए।"

"अरे तो इसमें क्या है विजय?" प्रतिमा ने लापरवाही से कहा___"थोड़ी देर की तो बात है। तुम मुझे बड़े आराम से उठा सकते हो, मैं इतनी भी भारी नहीं हूॅ। तुम्हारी गौरी से तो कम ही हूॅ।"

"पर भाभी मैं आपको कैसे उठा सकता हूॅ?" विजय की हालत खराब___"नहीं भाभी ये मुझसे हर्गिज़ भी नहीं हो सकता।"
"क्यों नहीं हो सकता विजय?" प्रतिमा उसके पास आकर बोली___"बल्कि मुझे तो बड़ी खुशी होगी विजय कि तुम्हारे द्वारा ही सही किन्तु मैं अपने हाॅथों से उस आम को तोड़ूॅगी। प्लीज़ विजय....मेरे लिए...मेरी खुशी के लिए ये कर दो न?"

विजय सिंह को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? वह तो खुद को कोसे जा रहा था कि वह यहाॅ आया ही क्यों था?

"उफ्फ विजय पता नहीं क्या सोच रहे हो तुम?" प्रतिमा ने कहा___"भला इसमें इतना सोचने की ज़रूरत है? तुम कोई ग़ैर तो नहीं हो न और ना ही मैं तुम्हारे लिए कोई ग़ैर हूॅ। हम दोनो देवर भाभी हैं और इतना तो बड़े आराम से चलता है। मैं तो कुछ नहीं सोच रही हूॅ ऐसा वैसा। फिर तुम क्यों सोच रहे हो?"

"पर भाभी किसी को पता चलेगा तो लोग क्या सोचेंगे हमारे बारे में?" विजय सिंह ने हिचकिचाते हुए कहा।
"सबसे पहली बात तो यहाॅ पर हम दोनो के अलावा कोई तीसरा है ही नहीं।" प्रतिमा कह रही थी___"और अगर होता भी तो मुझे उसकी कोई परवाह नहीं होती क्योंकि हम कुछ ग़लत तो कर नहीं रहे होंगे फिर किसी से डरने की या किसी के कुछ सोचने से डरने की क्या ज़रूरत है? देवर भाभी के बीच इतना प्यारवश चलता है। अब छोड़ों इस बात को और जल्दी से आओ मेरे पास।"

विजय सिंह का दिल धाड़ धाड़ करके बज रहा था। उसे लग रहा था कि वह यहाॅ से भाग जाए किन्तु फिर उसने भी सोचा कि इसमें इतना सोचने की भला क्या ज़रूरत है? उसकी भाभी ठीक ही तो कह रही है कि इतना तो देवर भाभी के बीच चलता है। फिर वो कौन सा कुछ ग़लत करने जा रहे हैं।

"ओफ्फो विजय कितना सोचते हो तुम?" प्रतिमा ने खीझते हुए कहा____"तुम्हारी जगह अगर मैं होती तो एक पल भी न लगाती इसके लिए।"
"अच्छा ठीक है भाभी।" विजय उसके पास जाते हुए बोला___"लेकिन इसके बारे आप किसी से कुछ मत कहियेगा। बड़े भइया से तो बिलकुल भी नहीं।"

"अरे मैं किसी से कुछ नहीं कहूॅगी विजय।" प्रतिमा हॅस कर बोली___"ये तो हमारी आपस की बात है न। अब चलो जल्दी से मुझे उठाओ। सम्हाल कर उठाना, गिरा मत देना मुझे। पता चले कि लॅगड़ाते हुए हवेली जाना पड़े।"

विजय सिंह कुछ न बोला बल्कि झिझकते हुए वह प्रतिमा के पास पहुॅचा। प्रतिमा की हालत ये सोच सोच कर रोमाॅच से भरी जा रही थी कि विजय उसे अपनी बाहों में उठाने वाला है। अंदर से थराथरा तो वह भी रही थी किन्तु दोनो की मानसिक अवस्था में अलग अलग हलचल थी।

विजय सिंह झुक कर प्रतिमा को उसकी दोनो टाॅगों को अपने दोनो बाजुओं से पकड़ कर ऊपर की तरफ खड़े होते हुए उठाना शुरू किया। प्रतिमा ने झट से अपने दोनो हाॅथों को विजय सिंह के दोनो कंधो पर रख दिया। वह एकटक विजय को देखे जा रही थी। उस विजय को जिसके चेहरे पर इस बात की ज़रा भी शिकन नहीं थी कि उसने कोई बोझ उठाया हुआ है। ये अलग बात थी कि दिल में बढ़ी घबराहट की वजह से उसके चहरे पर पसीना छलछला आया था।

प्रतिमा बड़ी शातिर औरत चालाक औरत थी। उसने विजय को उसके कंधो पर से पकड़ा हुआ था। जैसे ही विजय ने उसे ऊपर उठाना शुरू किया तो वह झट से खुद को सम्हालने के लिए अपने सीने के भार को विजय के सिर पर टिका दिया। उसकी भारी भारी चूचियाॅ जो अब तक पसीने से भींग गई थी वो विजय के माथे से जा टकराई। विजय के नथुनों में प्रतिमा के जिस्म की तथा उसके पसीने की महक समाती चली गई। विजय को किसी नशे के जैसा आभास हुआ।

"वाह विजय तुमने तो मुझे किसी रुई की बोरी की तरह उठा लिया।" प्रतिमा ने हॅ कर कहा___"अब और ऊपर उठाओ ताकि मैं उस आम को तोड़ सकूॅ।"

विजय ने उसे पूरा ऊपर उठा दिया। प्रतिमा का नंगा पेट विजय के चेहरे के पास था। उसकी गोरी सी किन्तु गहरी नाभी विजय की ऑखों के बिलकुल पास थी। उसका पेट एकदम गोरा और बेदाग़ था। विजय इस सबको देखना नहीं चाहता था मगर क्या करे मजबूरी थी। उसे अपने अंदर अजीब सी मदहोशी का एहसास हो रहा था। उधर प्रतिमा मन ही मन मुस्कुराए जा रही थी। आम का वो फल तो उसके हाॅथ में ही छू रहा था जिसे वह बड़े आराम से तोड़ सकती थी किन्तु वह चाहती थी इस परिस्थिति में विजय उसके साथ कुछ तो करे ही। ये सच था कि अगर विजय उसे वहीं पर लेटा कर उसका भोग भी करने लग जाता तो उसे कोई ऐतराज़ न होता मगर ये संभव नहीं था।

विजय प्रतिमा के पेट पर अपने चेहरे को छूने नहीं देना चाहता था। वह जानता था कि गर्मी किसी के सम्हाले नहीं सम्हलती। गर्मी जब सिर चढ़ने लगती है तो सबसे पहले विवेक का नास होता है। उसके बाद सब कुछ तहस नहस हो जाता है। उधर प्रतिमा बखूबी समझती थी कि विजय कलियुग का हरिश्चन्द्र है, यानी वो किसी भी कीमत वो नहीं करेगा जो वह चाहती है। मतलब जो कुछ करना था उसे स्वयं ही करना था।

प्रतिमा ने महसूस किया कि विजय उसके नंगे पेट से अपने चेहरे को दूर हटाने की कामयाब कोशिश कर रहा है। ये देख कर प्रतिमा ने अपने जिस्म को अजीब से अंदाज़ में इस तरह हिलाया कि विजय को यही लगे कि वह अपना संतुलन बनाए रखने के लिए ही ऐसा किया है। प्रतिमा ने जैसे ही अपने जिस्म को हिलाया वैसे ही उसका पेट विजय के चेहरे से जा लगा। उसका मुह और नाॅक बिलकुल उसकी गहरी नाभी में मानो दब सा गया था। विजय सिंह इससे बुरी तरह विचलित हो गया। उसने पुनः अपने चेहरे को दूर हटाने की कोशिश की किन्तु इस बार वह कामयाब न हुआ। क्योंकि प्रतिमा ऊपर से उससे चिपक सी गई थी। विजय सिंह की हाॅथ की पकड़ ढीली पड़ गई। परिणामस्वरूप प्रतिमा का जिस्म नीचे खिसकने लगा।

"क्या कर रहे हो विजय?" प्रतिमा ने सीघ्रता से कहा___"ठीक से पकड़ो न मुझे।"
"आपने आम तोड़ लिया कि नहीं?" विजय ने उसे फिर सै ऊपर उठाते हुए कहा___"जल्दी तोड़िये न भाभी।"

"क्या हुआ विजय?" प्रतिमा हॅस कर बोली___"मेरा भार नहीं सम्हाला जा रहा क्या तुमसे?"
"ऐसी बात नहीं है भाभी।" विजय ने झिझकते हुए कहा___"पर एक आम तोड़ने में कितना समय लगेगा आपको?"

"अरे मैं एक आम थोड़ी न तोड़ रही हूॅ विजय।" प्रतिमा ने कहा___"कई सारे तोड़ रही हूॅ ताकि तुम्हें बार बार उठाना ना पड़े मुझे।"
"ठीक है भाभी।" विजय ने कहा___"पर ज़रा जल्दी कीजिए न क्योंकि खेतों में काम करने वाले मजदूरों के आने का समय हो गया है।"

"अच्छा ठीक है।" प्रतिमा ने कहा___"अब और आम नहीं तोड़ूॅगी। अब आहिस्ता से नीचे उतारो मुझे।"

विजय सिंह तो जैसे यही चाहता था। उसने अपनी पकड़ ढीली कर दी जिससे प्रतिमा नीचे खिसकने लगी। उसने दोनो हाॅथों में आम लिया हुआ था इस लिए सहारे के लिए उसने कोहनी टिकाया हुआ था विजय पर। प्रतिमा का भारी छातियाॅ विजय के चेहरे पर से रगड़ खाती हुई घप्प से उसके सीने में जा लगी। प्रतिमा के मुह से मादक सिसकारी निकल गई। विजय ने उसकी इस सिसकारी को स्पष्ट सुना था।

"उफ्फ विजय बड़े चालू हो तुम तो।" प्रतिमा ने हॅस कर कहा___"मेरे दोनो हाॅथों में आम हैं इस लिए ठीक से संतुलन नहीं बना पाई और तुम इसी का फायदा उठा रहे हो। चलो कोई बात नहीं। कम से कम आम तो मिल ही गए मुझे। चलो दोनो बैठ कर खाते हैं यहीं पेड़ की ठंडी छाॅव के नीचे बैठ कर।"

"आप खा लीजिए भाभी।" विजय ने असहज भाव से कहा___"मैं तो रोज़ ही खाता हूॅ। अभी ठीक से पके नहीं हैं। एक हप्ते बाद इनमें मीठापन आ जाएगा।"

"देखो न विजय यहाॅ कितना अच्छा लग रहा है।" प्रतिमा ने कहा___"पेड़ों की छाॅव और मदमस्त करने वाली ठंडी ठंडी हवा। इस हवा के सामने तो एसी भी फेल है। मन करता है यहीं पर सारा दिन बैठी रहूॅ। घर में पंखा और कुलर में भी गर्मी शान्त नहीं होती और ऊपर से बीच बीच में लाइट चली जाती हो तो फिर समझो कि प्राण ही निकलने लगते हैं।"

"हाॅ गाॅवों में तो लाइट का आना जाना लगा ही रहता है।" विजय ने कहा___"मैं सोच रहा हूॅ कि हवेली में एक दो जनरेटर रखवा देता हूॅ ताकि अगर लाइन न रहे तो उसके द्वारा बिजली मिल सके और किसी को इस गर्मी में परेशान न होना पड़े।"

"ये तो तमने बहुत अच्छा सोचा है।" प्रतिमा ने कहने के साथ ही वहीं पेड़ के नीचे साफ करने के बाद साड़ी के पल्लू को बिछा कर बैठ गई। उसे इस तरह पल्लू को बिछाकर बैठते देख विजय हैरान रह गया। उसकी भारी छातियाॅ उसके बड़े गले वाले ब्लाउज से स्पष्ट नुमायाॅ हो रही थी।

"आओ न विजय तुम भी मेरे पास ही बैठ जाओ।" प्रतिमा ने एक आम को उठाकर कहा__"ऐसा लगता है कि इन्हें पहले पानी से धोना पड़ेगा।"
"जी बिलकुल भाभी।" विजय ने कहा__"इन्हें धोना ही पड़ेगा वरना इनका जो रस होता है वो अखर बदन में लग जाएगा तो वहाॅ इनफेक्शन होने की संभावना होती है।"

"तो अब क्या करें विजय?" प्रतिमा ने कहा__"मेरा मतलब पानी तो यहाॅ पर है नहीं।"
"दीजिए मैं इन्हें धोकर लाता हूॅ।" विजय ने कहा और उन सारे आमो को उठा कर बाग़ से बाहर चला गया।

"कितने भोले हो विजय।" विजय के जाने के बाद प्रतिमा बड़बड़ाई___"किन्तु समझते सब कुछ हो। और शायद ये भी समझ ही गए होगे कि तुम्हारी भाभी एक नंबर की छिनाल या राॅड है। उफ्फ विजय क्या करूॅ तुम्हारा? तुम्हारी जगह कोई और होता तो अब तक मुझे मेरे आगे पीछे से पेल चुका होता था। तुम भी मुझे पेलोगे विजय....बस थोड़ा और मेहनत करनी पड़ेगी तुम्हें पटाने में। और अगर उससे भी न पटे तो फिर आख़िर में एक ही चारा रह जाएगा। हाय विजय आ जाओ न....समझ क्यों नहीं रहे हो कि तुम्हारी ये राॅड भाभी यहाॅ बाग़ में अकेले तुम्हारे साथ मज़े करना चाहती है। मुझे अपनी मजबूत बाहों में कस लो न विजय....मेरे जिस्म से ये कपड़े चीर फाड़ कर निकाल दो और टूट पड़ो मुझ पर। आहहहहहह शशशशश विजय मुझे तब तक पेलो जब तक की मेरा दम न निकल जाए। देख लो विजय....तुम्हारी ये राॅड भाभी सिर्फ तुम्हारे लिए यहाॅ आई है। मुझे मसल डालो.....मुझे रगड़ डालो.....हाय मेरे अंदर की इस आग को शान्त कर दो विजय।"

पेड़ के नीचे बैठी प्रतिमा हवश व वासना के हाथों अंधी होकर जाने क्या क्या बड़बड़ाए जा रही थी। कुछ ही देर में विजय सिंह आ गया और उसने धुले हुए आमों को एक बाॅस की टोकरी में रख कर लाया था। उसने प्रतिमा की तरफ देखा तो चौंक पड़ा।

"आपको क्या हुआ भाभी?" विजय ने हैरानी से कहा___"आपका चेहरा इतना लाल सुर्ख क्यों हो रखा है? कहीं आपको लू तो नहीं लग गई। हे भगवान आपकी तबीयत तो ठीक है न भाभी।"
"मैं एकदम ठीक हूॅ विजय।" विजय को अपने लिए फिक्र करते देख प्रतिमा को पल भर के लिए अपनी सोच पर ग्लानी हुई उसके बाद उसने कहा___"और मेरे लिए तुम्हारी ये फिक्र देख कर मुझे बेहद खुशी भी हुई। मैं जानती हूॅ तुम सब हमें अपना समझते हो तथा हमारे लिए तुम्हारे अंदर कोई मैल नहीं है। एक हम थे कि अपनो से ही बेगाने बन गए थे। मुझे माफ़ कर दो विजय.... ।" कहने के साथ ही प्रतिमा की आॅखों में आॅसू आ गए और वह एक झटके से उठ कर विजय से लिपट गई।

विजय उसकी इस हरकत से हैरान रह गया था। किन्तु प्रतिमा की सिसकियों का सुन कर वह यही समझा कि ये सब उसने भावना में बह कर किया है। लेकिन भला वह क्या जानता था कि औरत उस बला का नाम है जिसका रहस्य देवता तो क्या भगवान भी नहीं समझ सकते।


अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,
 
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.........《 32 》

अब तक,,,,,,,,,

पेड़ के नीचे बैठी प्रतिमा हवश व वासना के हाथों अंधी होकर जाने क्या क्या बड़बड़ाए जा रही थी। कुछ ही देर में विजय सिंह आ गया और उसने धुले हुए आमों को एक बाॅस की टोकरी में रख कर लाया था। उसने प्रतिमा की तरफ देखा तो चौंक पड़ा।

"आपको क्या हुआ भाभी?" विजय ने हैरानी से कहा___"आपका चेहरा इतना लाल सुर्ख क्यों हो रखा है? कहीं आपको लू तो नहीं लग गई। हे भगवान आपकी तबीयत तो ठीक है न भाभी।"
"मैं एकदम ठीक हूॅ विजय।" विजय को अपने लिए फिक्र करते देख प्रतिमा को पल भर के लिए अपनी सोच पर ग्लानी हुई उसके बाद उसने कहा___"और मेरे लिए तुम्हारी ये फिक्र देख कर मुझे बेहद खुशी भी हुई। मैं जानती हूॅ तुम सब हमें अपना समझते हो तथा हमारे लिए तुम्हारे अंदर कोई मैल नहीं है। एक हम थे कि अपनो से ही बेगाने बन गए थे। मुझे माफ़ कर दो विजय.... ।" कहने के साथ ही प्रतिमा की आॅखों में आॅसू आ गए और वह एक झटके से उठ कर विजय से लिपट गई।

विजय उसकी इस हरकत से हैरान रह गया था। किन्तु प्रतिमा की सिसकियों का सुन कर वह यही समझा कि ये सब उसने भावना में बह कर किया है। लेकिन भला वह क्या जानता था कि औरत उस बला का नाम है जिसका रहस्य देवता तो क्या भगवान भी नहीं समझ सकते।
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अब आगे,,,,,,,,,,,

फ्लैशबैक अब आगे_______

उस दिन के बाद से तो जैसे प्रतिमा का यह रोज़ का काम हो गया था। वह हर रोज़ विजय सिंह के लिए खाने का टिफिन और दूध लेकर खेतों पर जाती और वहाॅ पर विजय को अपना अधनंगा जिस्म दिखा कर उसे अपने रूपजाल में फाॅसने की कोशिश करती। किन्तु विजय सिंह उसके जाल में फॅस नहीं रहा था। ये बात प्रतिमा को भी समझ में आ गई थी कि विजय सिंह उसके जाल में फॅसने वाला नहीं है। उधर गौरी की तबीयत अब ठीक हो चुकी थी इस लिए खाने का टिफिन वह खुद ही लेकर जाने लगी थी। प्रतिमा अपना मन मसोस कर रह गई थी। अजय सिंह खुद भी परेशान था इस बात से कि विजय सिंह कैसे उसके जाल में फॅसे?

अजय सिंह ये भी जानता था कि उसके भाई के जैसी ही उसकी मॅझली बहू यानी गौरी थी। वह भी उसके जाल में फॅसने वाली नहीं थी। ऐसे ही दिन गुज़र रहे थे। गौरी की तबीयत सही होने के बाद प्रतिमा को फिर खेतों में जाने का कोई अच्छा सा अवसर ही नहीं मिल पाता था। इधर गौरी भी अपने पति विजय सिंह को खाना लेकर हवेली से खेतों पर चली जाती और फिर वह वहीं रहती। शाम को ही वह वापस हवेली में आती थी। इस लिए अजय सिंह भी कोई मौका नहीं मिल पाता था उसे फॅसाने के लिए।

पिछले एक महीने से प्रतिमा विजय सिंह को अपने रूप जाल में फसाने की कोशिश कर रही थी। शुरू शुरू में तो उसने अपने मन की बातों को उससे उजागर नहीं किया था। बल्कि हर दिन वह विजय सिंह से ऐसी बाते करती जैसे वह उसकी कितनी फिक्र करती है। भोला भाला विजय सिंह यही समझता कि उसकी भाभी कितनी अच्छी है जो उसकी फिक्र करती है और हर रोज़ समय पर उसके लिए इतनी भीषण धूप व गर्मी में खाना लेकर आती है। इन बीस दिनों में विजय सिंह भी कुछ हद तक सहज फील करने लगा था अपनी भाभी से। प्रतिमा उससे खूब हॅसती बोलती और बात बात पर उसके गले लग जाती। विजय सिंह को उसका इस तरह अपने गले लग जाना अच्छा तो नहीं लगता था किन्तु ये सोच कर वह चुप रह जाता कि प्रतिमा शहर वाली औरत है और इस तरह अपनो के गले लग जाना शायद उसके लिए आम बात है। ऐसे ही एक दिन बातों बातों में प्रतिमा ने विजय सिंह से कहा__"हम दोनो देवर भाभी इतने दिनों से खुशी खुशी हॅसते बोलते रहे और फिर एक दिन मैं चली जाऊॅगी शहर। वहाॅ मुझे ये सब बहुत याद आएगा। मुझे तुम्हारे साथ यहाॅ इस तरह हॅसना बोलना और मज़ाक करना बहुत अच्छा लग रहा है। रात में भी मैं तुम्हारे बारे में ही सोचती रहती हूॅ। ऐसा लगा करता है विजय कि कितनी जल्दी सुबह हो और फिर कितनी जल्दी मैं दोपहर में तुम्हारे लिए खाना लेकर जाऊॅ? हाय ये क्या हो गया है मुझे? क्यों मैं तुम्हारी तरफ इस तरह खिंची चली आती हूॅ विजय? क्या तुमने मुझ पर कोई जादू कर दिया है?"

प्रतिमा की ये बातें सुन कर विजय सिंह को ज़बरदस्त झटका लगा। उसकी तरफ देखते हुए इस तरह खड़ा रह गया था जैसे किसी ने उसे पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया हो। मनो मस्तिष्क में धमाके से हो रहे थे उसके। जबकि उसकी हालत से बेख़बर प्रतिमा कहे जा रही थी___"इन चंद दिनों में ये कैसा रिश्ता बन गया है हमारे बीच? तुम्हारा तो पता नहीं विजय लेकिन मुझे अपने अंदर का समझ आ रहा है। मुझे लगता है कि मुझे तुमसे प्रेम हो गया है। हे भगवान! कोई और सुने तो क्या कहे? प्लीज़ विजय मुझे ग़लत मत समझना। ऐसा हो जाता है कि कोई हमें अच्छा लगने लगता है और उससे प्यार हो जाता है। कसम से विजय मुझे इसका पता ही नहीं चला।"

विजय सिंह के दिलो दिमाग़ होने वाले धमाके अब और भी तेज़ हो गए थे। प्रतिमा का एक एक शब्द पिघले हुए शीशे की तरह उसके हृदय पर पड़ रहा था। उसकी हालत देखने लायक हो गई थी। चेहरे पर बारह क्या पूरे के पूरे चौबीस बजे हुए थे। पसीने से तर चेहरा जिसमें हल्दी सी पुती हुई थी।

सहसा प्रतिमा ने उसे ध्यान से देखा तो बुरी तरह चौंकी। उसे पहले तो समझ न आया कि विजय सिंह की ये अचानक ही क्या हो गया है फिर तुरंत ही जैसे उसके दिमाग़ की बत्ती जल उठी। उसे समझते देर न लगी कि उसकी इस हालत का कारण क्या है? एक ऐसा इंसान जिसे रिश्तों की क़दर व उसकी मान मर्यादाओं का बखूबी ख़याल हो तथा जो कभी भी किसी कीमत पर किसी पराई औरत के बारे में ग़लत ख़याल तक न लाता हो उसकी हालत ये जान कर तो ख़राब हो ही जाएगी कि उसकी अपनी भाभी उससे प्रेम करती है। ये बात उससे कैसे पच सकती थी भला? अभी तक जितना कुछ हो रहा था वही उससे नहीं पच रहा था तो फिर इतनी संगीन बात भला कैसे पच जाती?

"वि विजय।" प्रतिमा ने उसे उसके कंधों से पकड़ कर ज़ोर से झकझोरा___"ये ये क्या हो क्या हो गया है तुम्हें?"

प्रतिमा के झकझोरने पर विजय सिंह बुरी तरह चौंका। उसके मनो मस्तिष्क ने तेज़ी से काम करना शुरू कर दिया। अपने नज़दीक प्रतिमा को अपने दोनो कंधे पकड़े देख वह तेज़ी से पीछे हट गया। इस वक्त उसके चेहरे पर बहुत ही अजीब से भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे थे।

"विजय क्या हुआ तुम्हें?" प्रतिमा ने चकित भाव से कहा___"देखो विजय मुझे ख़लत मत समझना। इसमे मेरी कोई ग़लती नहीं है।"
"ये ये अच्छा नहीं हुआ भाभी।" विजय सिंह ने आहत भाव से कहा___"आप ऐसा कैसे सोच सकती हैं? जबकि आपको पता है कि ऐसा सोचना भी पाप है?"

"मैं जानती हूॅ विजय।" प्रतिमा ने दुखी होने की ऐक्टिंग की, बोली___"मुझे पता है कि ऐसा सोचना भी ग़लत है। लेकिन ये कैसे हुआ मुझे नहीं पता विजय। शायद इतने दिनों से एक साथ हॅसने बोलने से ऐसा हुआ है। तुम्हारी मासूमियत, तुम्हारा भोलापन तथा तुम्हारी अच्छाईयाॅ मेरे दिलो दिमाग़ में उतरती चली गईं हैं। किसी के लिए दिल में भावनाएॅ जाग जाना भला किसके अख्तियार में होता है? ये तो दिल का दखल होता है। उसे जो अच्छा लगता उसके लिए धड़कने लगता है। इसका पता इंसान को तब चलता है जब उसका दिल अंदर से अपने महबूब के लिए बेचैन होने लगता है। वही मेरे साथ हुआ है विजय। कदाचित तुम मेरे इस नादान व नासमझ दिल को भा गए इस लिए ये सब हो गया।"

"आप जाइये भाभी यहाॅ से।" विजय सिंह ने कहा___"इस बात को यहीं पर खत्म कर दीजिए। अगर आपको अपने अंदर का पता चल गया है तो अब आप वहीं पर रुक जाइए। अपने क़दमों को रोंक लीजिए। मैं आपके विनती करता हूॅ भाभी। कृपया आप जाइये यहाॅ से।"

"इतनी कठोरता से मुझे जाने के लिए मत कहो विजय।" प्रतिमा ने मगरमच्छ के आॅसू छलका दिये, बोली___"तुम भी समझ सकते हो इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। और अपने क़दमों को रोंकना इतना आसान नहीं होता। ये प्रेम बड़ा अजीब होता है विजय। ये किसी की नहीं सुनता, खुद अपनी भी।"

"मैं कुछ सुनना नहीं चाहता भाभी।" विजय सिंह ने कहा___"मैं सिर्फ इतना जानता हूॅ कि ये ग़लत है और मैं ग़लत चीज़ों के पक्ष में कभी नहीं हो सकता। आप भी इस सबको अपने ज़हन से निकाल दीजिए और हो सके तो कभी भी मेरे सामने मत आइयेगा।"

"ऐसा तुम कैसे कह सकते हो विजय?" प्रतिमा ने रोने का नाटक किया__"मैने इतना बड़ा गुनाह तो नहीं किया है जिसकी सज़ा तुम इस तरह दे रहे हो? प्रेम तो हर इंसान से होता है। क्या देवर भाभी के बीच प्रेम नहीं हो सकता? बिलकुल हो सकता है विजय...प्रेम तो वैसे भी सबसे पाक होता है।"

"ये सब किताबी बातें हैं भाभी।" विजय सिंह ने कहा___"आज के युग में प्रेम की परिभाषा कुछ और ही हो गई है। अगर नहीं होती तो आपको अपने पति के अलावा किसी और से प्रेम नहीं होता। प्रेम तो वही है जो किसी एक से ही एक बार होता है और फिर ताऊम्र तक वह सिर्फ उसी का होकर रहता है। किसी दूसरे के बारे में उसके दिल में विचार ही नहीं उठता कभी।"

"ये सबके सोचने का नज़रिया है विजय कि वो प्रेम के बारे में कैसी परिभाषा को मानता है और समझता है?" प्रतिमा ने कहा___"मेरा तो मानना ये है कि प्रेम बार बार होता है। दिल भले ही हज़ारों बार टूट कर बिखर जाए मगर वह प्रेम करना नहीं छोंड़ता। वह प्रेम करता ही रहता है।"

"सबकी अपनी सोच होती है भाभी।" विजय सिंह ने कहा___"लोग अपने मतलब के लिए ग़लत को भी सही ठहरा देते हैं और उसे साबित भी कर देते हैं। मगर मेरी सोच ऐसी नहीं है। मेरे दिल में मेरी पत्नी के अलावा कोई दूसरा आ ही नहीं सकता। मैं उससे बेइंतहां प्रेम करता हूॅ, उसे से मरते दम वफ़ा करूॅगा। किसी और से मुझे वैसा प्रेम हो ही नहीं सकता। प्रेम में सिर्फ दिल का ही नहीं दिमाग़ का भी दखल होना ज़रूरी है। मन में दृढ़ संकल्पों का होना भी ज़रूरी है। अगर ये सब है तो आपको किसी दूसरे प्रेम हो ही नहीं सकता।"

"हो सकता किसी और के पास तुम्हारे जैसी इच्छा शक्ति या दृढ़ संकल्प न हो।" प्रतिमा ने कहा___"और वह मेरे जैसे ही किसी दूसरे से भी प्रेम कर बैठे।"
"तो मैं यही कहूॅगा कि उसका वो प्रेम निम्न दृष्टि का है।" विजय सिंह ने कहा___"जो अपने पहले प्रेमी के लिए वफ़ा नहीं कर सका वह अपने दूसरे प्रेमी के साथ भी वफ़ा नहीं कर सकेगा। क्योंकि संभव है कि कभी ऐसा भी समय आ जाए कि उसे किसी तीसरे इंसान से भी प्रेम हो जाए। तब उसके बारे में क्या कहा जाएगा? सच्चा प्रेम और सच्ची वफ़ा तो वही है भाभी जो सिर्फ अपने पहले प्रेमी से ही की जाए। उसी हो कर रह जाए।"

प्रतिमा को समझ ना आया कि अब वह विजय से क्या कहे? ये बात तो वह खुद भी समझती थी कि विजय ठीक ही कह रहा है। किन्तु उसे तो विजय को फाॅसना था इस लिए भला कैसे वह हार मान लेती? ये दाॅव बेकार चला गया तो कोई दूसरा दाॅव सही।

"तो तुम ये कहना चाहते हो कि मैं तुम्हारे बड़े भइया और अपने पति के लिए वफ़ादार नहीं हूॅ? प्रतिमा ने कहा___"क्योंकि मुझे उनके अलावा तुमसे प्रेम हुआ?"
"मैं किसी एक के लिए नहीं कह रहा भाभी बल्कि हर किसी के लिए कह रहा हूॅ।" विजय सिंह ने कहा___"क्योंकि मेरी सोच यही है। मैं इस जीवन में सिर्फ एक का ही होकर रहना चाहता हूॅ और भगवान से ये प्रार्थना भी करता हूॅ वो अगले जन्मों में भी मुझे मेरी गौरी का ही रहने दे।"

"ठीक है विजय।" प्रतिमा ने सहसा पहलू बदला___"मैं तुमसे ये नहीं कह रही कि तुम गौरी को छोंड़ कर मुझसे प्रेम करो। किन्तु इतना ज़रूर चाहती हूॅ कि मुझे खुद से इस तरह दूर रहने की सज़ा न दो। मैं तुमसे कभी कुछ नहीं मागूॅगी बस दिल के किसी कोने में मेरे लिए भी थोड़ी जगह बनाए रखना।"

"ऐसा कभी नहीं हो सकता भाभी।" विजय सिंह दृढ़ता से कहा___"क्योंकि ये रिश्ता ही मेरी नज़र में ग़लत है और ग़लत मैं कर नहीं सकता। हाॅ आप मेरी भाभी हैं और मेरे लिए पूज्यनीय हैं इस लिए इस रिश्ते के लिए हमेशा मेरे अंदर सम्मान की भावना रहेगी। देवर भाभी के बीच जिस तरह का स्नेह होता है वो भी रहेगा। मगर वो नहीं जिसकी आप बात कर रही हैं।"

"ऐसा क्यों कह रहे हो विजय?" प्रतिमा ने रुआॅसे भाव की ऐक्टिंग की___"क्या मैं इतनी बुरी लगती हूॅ तुम्हें? क्या मैं इस काबिल भी नहीं कि तुम्हारा प्रेम पा सकूॅ?"

"ऐसी बातें आपको करनी ही नहीं चाहिए भाभी।" विजय सिंह ने बेचैनी से पहलू बदला___"आप मुझसे बड़ी हैं हर तरह से। आपको खुद समझना चाहिए कि ये ग़लत है। जानते बूझते हुए भी आप ग़लत राह पर चलने की बात कर रही हैं। जबकि आपको करना ये चाहिए कि आप खुद को समझाएॅ और इससे पहले कि हालात बिगड़ जाएॅ आप उस माहौल से जल्द से जल्द निकल जाइये।"

प्रतिमा की सारी कोशिशें बेकार रहीं। विजय सिंह को तो जैसे उसकी कोई बात ना माननी थी और ना ही माना उसने। थक हार कर प्रतिमा वहाॅ से हवेली लौट आई थी। हवेली में उसने अपने पति से आज की सारी महाभारत बताई। उसकी सारी बातें सुन कर अजय सिंह हैरान रह गया। उसे समझ न आया कि उसका भाई आख़िर किस मिट्टी का बना हुआ है? किन्तु आज की बातों से कहीं न कहीं उसे ये उम्मीद ज़रूर जगी कि आज नहीं तो कल विजय सिंह प्रतिमा के सामने अपने हथियार डाल ही देगा। अगले दिन जब प्रतिमा फिर से विजय के लिए टिफिन तैयार करने किचेन में गई तो गौरी को उसने किचेन में टिफिन तैयार करते देखा।

"अब कैसी तबीयत है गौरी?" प्रतिमा ने किचेन में दाखिल होते हुए पूछा था।
"अब ठीक हूॅ दीदी।" गौरी ने पलट कर देखते हुए कहा___"इस लिए मैने सोचा कि उनके लिए टिफिन तैयार करके खेतों पर चली जाऊॅ।"

"अरे तुम अभी थोड़े दिन और आराम करो गौरी।" प्रतिमा ने कहा___"अभी अभी तो ठीक हुई हो। बाहर बहुत तेज़ धूप और गर्मी है। ऐसे में फिर से बीमार हो जाओगी तुम। मैं तो रोज़ ही विजय को खाना दे आती हूॅ। लाओ मुझे मैं देकर आती खाना विजय को।"

"अरे अब मैं बिलकुल ठीक हूॅ दीदी।" गौरी ने कहा___"आप चिन्ता मत कीजिए। दो चार दिन से आराम ही तो कर रही थी मैं।"
"अरे तो अभी और कुछ दिन आराम कर लो गौरी।" प्रतिमा ने कहा___"और वैसे भी मैं कुछ दिनों बाद चली जाऊॅगी क्योंकि बच्चों के स्कूल खुलने वाले हैं। मुझे अच्छा लगता है खेतों में। वहाॅ पर आम के बाग़ों में कितनी मस्त हवा लगती है। कितना सुकून मिलता है वहाॅ। मैं तो विजय को खाना देने के बाद वहीं चली जाती हूॅ और वहीं पर पेड़ों की घनी छाॅव में बैठी रहती हूॅ। यहाॅ से तो लाख गुना अच्छा है वहाॅ।"

"हाॅ ये तो आपने सही कहा दीदी।" गौरी ने मुस्कुरा कर कहा___"वहाॅ की बात ही अलग है। इसी लिए तो मैं दिन भर वहीं उनके पास ही रहती हूॅ।"
"तुम तो हमेशा ही रहती हो गौरी।" प्रतिमा ने मुस्कुरा कर कहा__"और वहीं पर तुम दोनो मज़ा भी करते हो। है ना??"
"क्या दीदी आप भी कैसी बातें करती हैं?" गौरी ने शरमा कर कहा___"ये सब खेतों में थोड़ी न अच्छा लगता है।"

"ख़ैर छोड़ो।" प्रतिमा ने कहा___"दो चार दिन बचे हैं तो मुझे वहाॅ की ठंडी छाॅव का आनन्द ले लेने दो। उसके बाद तुम जाती रहना।"
"हाॅ तो ठीक है न दीदी।" गौरी ने कहा__"हम दोनो चलते हैं और वहाॅ की ठंडी छाॅव का आनंद लेंगे।"

"तुम अभी अभी बीमारी से बाहर आई हो गौरी।" प्रतिमा ने कहा___"इस लिए तुम्हें अभी इतनी धूप में बाहर नहीं निकलना चाहिए। मैं तुम्हारे स्वास्थ के भले के लिए ही कह रही हूॅ और तुम हो ज़िद किये जा रही हो? अपनी दीदी का बिलकुल भी कहा नहीं मान रही हो तुम। या फिर तुम्हारी नज़र में मेरी कोई अहमियत ही नहीं है। ठीक है गौरी करो जो तुम्हें अच्छा लगे।"

"अरे नहीं दीदी।" गौरी ने जल्दी से कहा___"आपकी अहमियत तो बहुत ज्यादा है हम सबकी नज़र में। मैं तो बस इस लिए कह रही थी कि आप इतने दिनों से धूप और गर्मी में परेशान हो रही हैं। और भला मैं कैसे आपकी बात टाल सकती हूॅ दीदी? मुझे तो बेहद खुश हूॅ कि आप मेरे हित की बारे में सोच रहीं हैं।"

"तो फिर लाओ वो टिफिन मुझे दो।" प्रतिमा ने जो इमोशनली उसे ब्लैकमेल किया था उसमें वह सफल हो गई थी, बोली___"मैं विजय को खाना देने जा रही हूॅ और तुम अभी आराम करो अपने कमरे में।"
"जी ठीक है दीदी।" गौरी ने मुस्कुरा कहा और टिफिन प्रतिमा को पकड़ा दिया। प्रतिमा टिफिन लेकर किचेन से बाहर निकल गई। जबकि गौरी खुशी खुशी ऊपर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई।

प्रतिमा जब खेतों पर पहुॅची तो वहाॅ का माहौल देख कर उसके सारे अरमानों पर पानी फिर गया। दरअसल आज पिछले दिनों के विपरीत विजय सिंह खेतों पर अकेला नहीं था। बल्कि उसके साथ कई मजदूर भी खेतों पर आज नज़र आ रहे थे। कदाचित विजय सिंह को अंदेशा था कि प्रतिमा आज भी उसके लिए टिफिन लेकर आएगी और फिर यहाॅ पर वह फिर से अपने प्रेम का बेकार ही राग अलापने लगेगी। इस लिए विजय सिंह ने कुछ मजदूरों को कल ही बोल दिया था कि वो अपने लिए दोपहर का खाना घर से ही ले आएॅगे और यहीं पर खाएॅगे। विजय सिंह के कहे अनुसार कई मजदूर आज यहीं पर थे।

प्रतिमा ये सब देख कर अंदर ही अंदर जल भुन गई थी। उसे विजय सिंह से ऐसी उम्मीद हर्गिज़ नहीं थी। वह तो उसे निहायत ही शान्त और भोला समझती थी। किन्तु आज उसे भोले भाले विजय ने अपना दिमाग़ चला दिया था जिसका असर ये हुआ था कि प्रतिमा अब कुछ नहीं कर सकती थी।

प्रतिमा जैसे ही मकान के पास पहुॅची तो एक मजदूर उसके पास आया और बड़े अदब से बोला___"मालकिन, मॅझले मालिक हमका बोले कि आपसे उनके खाने का टिफिनवा ले आऊॅ। काह है ना मालकिन आज मॅझले मालिक हम मजदूरों के साथ ही खाना खाय चाहत हैं। ई हमरे लिए बहुतै सौभाग्य की बात है। दीजिए मालकिन या टिफिनवा हम ले जात हैं।"

प्रतिमा भला क्या कह सकती थी। वह तो अंदर ही अंदर जल कर खाक़ हुई जा रही थी। उसने आए हुए मजदूर को टिफिन पकड़ाया और पैर पटकते हुए मकान के अंदर चली गई और कमरे में जाकर चारपाई पर पसर गई। गुस्से से उसका चेहरा लाल सुर्ख पड़ गया था।

"ये तुमने अच्छा नहीं किया विजय।" प्रतिमा खुद से ही बड़बड़ा रही थी___"तुम जिस चीज़ को अपनी समझदारी या होशियारी समझ रहे हो वो दरअसल मेरा अपमान है। तुम दिखाना चाहते हो कि तुम्हारी नज़र में मेरी कोई अहमियत ही नहीं है। कितना अपने प्रेम का मैने तुमसे कल रोना रोया था किन्तु तुमने उसे ठुकरा दिया ये कह कर कि ये ग़लत है। अरे सही ग़लत आज के युग में कौन देखता है विजय? चार दिन का जीवन है उसे हॅस खुशी और आनंद के साथ जियो। मगर तुम तो सच्चे प्रेम का राग अलापे जा रहे हो। क्या है इस सच्चे प्रेम में? बताओ विजय क्या हासिल कर लोगे इस सच्चे प्रेम में? अरे एक ही औरत के पल्लू में बॅधे हो तुम। ये कैसा प्रेम है जिसने तुम्हें बाॅध कर रखा हुआ है?"

जाने कितनी ही देर तक प्रतिमा यूॅ ही बड़बड़ाती रही और ऐसे ही सो गई वह। फिर जब उसकी नीद खुली तो हड़बड़ा कर चारपाई से उठी वह। अभी वह उठ कर कमरे से बाहर ही जाने वाली थी कि तभी विजय किसी काम से कमरे में आ गया।

कमरे में अपनी भाभी को देख कर विजय सिंह हैरान रह गया। उसने तो सोचा था कि प्रतिमा उसी समय वापस चली गई होगी किन्तु यहाॅ तो वह अभी भी है। प्रतिमा को देखकर विजय हैरान हुआ फिर जल्द बाहर जाने के लिए पलटा।

"रुक जाओ विजय।" प्रतिमा ने सहसा ठंडे स्वर में कहा___"क्या समझते हो तुम अपने आपको? क्या सोच कर तुमने यहाॅ मजदूरों को बुलाया हुआ था बताओ?"

"क कुछ भी तो नहीं भाभी।" विजय सिंह हड़बड़ा गया था___"मैंने उन्हें नये फलों की फसल के बुलाया था। ताकि खेतों को उनके लिए तैयार किया जा सके।"

"झूठ मत बोलो विजय।" प्रतिमा ने आवेश मेः कहा___"मुझे अच्छी तरह पता है कि तुमने मजदूरों को यहाॅ दोपहर में क्यों बुलाया था? तुम समझते थे कि तुम्हें हर दिन की तरह यहाॅ अकेले देख कर मैं फिर से अपने प्रेम की बातें तुमसे करूॅगी। इसी सबसे बचने के लिए तुमने ये सब किया है ना?"

"आप बेवजह बातें बना रही हैं भाभी।" विजय सिंह ने कहा___"जबकि सच्चाई यही है कि मैने फलों की फसल के लिए ही मजदूरों को यहाॅ बुलाया है।"
"झूठ, सरासर झूठ है ये।" प्रतिमा एक झटके से चारपाई से उठ कर विजय के पास आ गई, फिर बोली___"जो इंसान हमेशा सच बोलता है वो अगर कभी किसी वजह से झूठ बोले तो उसका वह झूठ तुरंत ही पकड़ में आ जाता है विजय। मैं कोई अनपढ़ गवार नहीं हूॅ बल्कि कानून की पढ़ाई की है मैने। मनोविज्ञान का बारीकी से अध्ययन किया है मैने। मैं पल में बता सकती हूॅ कि कौन ब्यक्ति कब झूठ बोल रहा है?"

"चलिये मान लिया कि यही सच है।" विजय सिंह ने कहा___"यानी मैने आपसे बचने के लिए ही मजदूरों को यहाॅ बुलाया था। तब भी क्या ग़लत किया मैने? मैने तो वही किया जो ऐसी परिस्थिति में किसी समझदार आदमी को करना चाहिए। मैं वो नहीं सुनना चाहता और ना ही होने देना चाहता जो आप कहना या करना चाहती हैं। मैने कल भी आपसे कहा था कि ये ग़लत है और हमेशा यही कहता भी रहूॅगा। मैं ख़ैर अनपढ़ ही हूॅ लेकिन आप तो पढ़ी लिखी हैं न? आपको तो रिश्तों के बीच के संबंधों का अच्छी तरह पता होगा कि किन रिश्तों के बीच किन रिश्तों को देश समाज सही ग़लत अथवा जायज़ नाजायज़ ठहराता है? अगर पता है तो फिर ये सब सोचने व करने का क्या मतलब हो सकता है? आपको तो पता है कि आपके दिल में मेरे प्रति क्या है तो क्यों नहीं उसे निकाल देती आप? क्यों रिश्तों के बीच इस पाप को थोपना चाहती हैं आप?"

"किस युग में तुम जी रहे हो विजय किस युग में?" प्रतिमा ने कहा___"आज के युग के अनुसार जीना सीखो। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। तुम भी प्रकृति के नियमों के अनुसार खुद को बदलो। जो समय के साथ नहीं बदलता उसे वक्त बहुत पीचे छोंड़ देता है।"

"अगर परिवर्तन इसी चीज़ के लिए होता है तो माफ़ करना भाभी।" विजय ने कहा__"मुझे आज के इस युग के अनुसार खुद को बदलना गवारा नहीं है। वक्त मुझे पीछे छोंड़ कर कहाॅ चला जाएगा मुझे इसकी कोई चिन्ता नहीं है। मेरी आत्मा तथा मेरा ज़मीर जिस चीज़ को स्वीकार नहीं कर रहा उस चीज़ को मैं किसी भी कीमत पर अपना नहीं सकता। अब आप जा सकती हैं, क्योंकि इससे ज्यादा मैं इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहता।"

इतना कह कर विजय बाहर की तरफ जाने ही लगा था कि प्रतिमा झट से उसके पीछे से चिपक गई और फिर दुखी होने का नाटक करते हुए बोली___"ऐसे मुझे छोंड़ कर मत जाओ विजय। मैं खुद को समझाऊॅगी इसके लिए। शायद मेरे दिल से तुम्हारा प्रेम मिट जाए। लेकिन तब तक तो हम कम से कम पहले जैसे हॅस बोल सकते है ना?"

"अब ये संभव नहीं है भाभी।" विजय ने तुरंत ही खुद को उससे अलग करके कहा__"अब हालात बदल चुके हैं। आप मुझे किसी बात के लिए मुजबूर मत कीजिए। मैं नहीं चाहता कि ये बात हमारे बीच से निकल कर घर वालों तक पहुॅच जाए।"

विजय सिंह के अंतिम वाक्यों में धमकी साफ तौर पर महसूस की जा सकती थी। प्रतिमा जैसी शातिर औरत को समझते देर न लगी कि अब इससे आगे कुछ भी करना उसके हित में नहीं होगा। इस लिए वह बिना कुछ बोले कमरे से टिफिन उठा कर हवेली के लिए निकल गई।


गर्मी में बच्चों के स्कूल की छुट्टियाॅ खत्म होने में कुछ ही दिन शेष रह गए थे। विजय सिंह शाम को हवेली आ जाता था। एक दिन ऐसे ही प्रतिमा विजय के कमरे में पहुॅच गई। उस वक्त गौरी किचेन में करुणा के साथ खाना बना रही थी। जबकि नैना सभी बच्चों को अजय सिंह वाले हिस्से में ऊपर अपने कमरें में पढ़ा रही थी। माॅ जी हमेशा की तरह अपने कमरे में थी और बाबू जी गाॅव तरफ कहीं गए हुए थे। अभय सिंह भी हवेली में नहीं था।

अपने कमरे में विजय सिंह लुंगी बनियान पहने हुए ऑख बंद किये लेटा था। तभी उसने किसी की आहट से अपने ऑखें खोली। नज़र प्रतिमा पर पड़ी तो वह बुरी तरह चौंका। एक झटके से वह बेड पर उठ कर बैठ गया। ये पहली बार था कि उसके कमरे में प्रतिमा आई थी वो भी इस तरह जबकि कमरे में वह अकेला ही था। उसे समझ न आया कि प्रतिमा यहाॅ किस लिए आई है? उसके दिल की धड़कन रेल के इंजन की तरह दौड़ रही थी। उसे डर था कि कहीं उसकी पत्नी गौरी न आ जाए। हलाॅकि इसमें इतना डरने या घबराने की बात नहीं किन्तु उनके बीच हालात ऐसे थे कि हर बात से डर लग रहा था उसे।

"क्या कर रहे हो विजय?" प्रतिमा ने मुस्कुरा कर कहा___"मैने सोचा एक बार तुम्हारा दीदार कर लूॅ तो दिल को सुकून मिल जाए थोड़ा। कई दिन से देखा नहीं था तुम्हें तो दिल बड़ा बेचैन था। अब तो तुम्हारे लिए गौरी ही टिफिन लेकर जाती है। पता नहीं क्यों तुम मुझसे कटे कटे से रहते हो। अपनी एक झलक भी देखने नहीं देते मुझे। सच कहती हूॅ विजय, तुमको तो ज़रा भी मेरी चिन्ता नहीं है।"

"ऐसी बातें करते हुए आपको शर्म नहीं आती भाभी?" विजय सिंह को जाने क्यों आज पहली बार उस पर गुस्सा आया था, उसी गुस्से वाले लहजे में बोला___"अपनी ऊम्र का कुछ तो लिहाज कीजिए। तीन तीन बच्चों की माॅ हैं आप और इसके बाद भी मन में ऐसी फालतू बातें लिए फिरती हैं आप।"

"इश्क़ की न कोई जात होती है विजय और ना ही कोई ऊम्र होती है।" प्रतिमा ने दार्शनिकों वाले अंदाज़ में कहा___"इश्क़ तो कभी भी किसी से भी किसी भी ऊम्र में हो सकता है। मुझे एक बार फिर से इस ऊम्र में तुमसे हो गया तो क्या करूॅ मैं? ये तो मेरे दिल की ख़ता है विजय, इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है।"

"देखिये भाभी।" विजय ने कहा___"मैं आपकी बहुत इज़्ज़त करता हूॅ। और मैं चाहता हूॅ कि मेरे दिल में आपके लिए ये इज़्ज़त ऐसी ही बनी रहे। इस लिए बेहतर होगा कि आप खुद भी अपने मान सम्मान की बात सोचें। अब आप जाइये यहाॅ से।"

"इतने कठोर तो नहीं थे विजय तुम?" प्रतिमा ने उदास भाव से कहा__"हमारे बीच कितना हॅसी मज़ाक होता था पहले। कितना खुश रहते थे न हम दोनो वहाॅ खेतों पर? वो भी तो एक प्रेम ही था विजय। अगर नहीं होता तो क्या हमारे बीच वैसा हॅसना बोलना होता?"

"वो सब देवर भाभी के पाक रिश्तों का प्रेम था भाभी।" विजय ने कहा___"जबकि आज का आपका ये प्रेम उस पाक प्रेम से बहुत जुदा है।"
"कैसे जुदा है विजय?" प्रतिमा ने कहा__"वैसा ही तो है आज भी। तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि वो प्रेम इस प्रेम से बहुत जुदा है?"

"मैं इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहता भाभी।" विजय ने बेचैनी से कहा__"और अब आप जाइये यहाॅ से। मैं आपके पैर पड़ता हूॅ, कृपया जाइये यहाॅ से।"

प्रतिमा देखती रह गई विजय सिंह को। उस विजय सिंह को जिसके इरादे तथा जिसके संकल्प किसी फौलाद से भी ज्यादा ठोस व मजबूत थे। कुछ देर एकटक विजय को देखने के बाद प्रतिमा वहाॅ से अंदर ही अंदर जलती भुनती चली आई।
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वर्तमान______

हल्दीपुर पुलिस स्टेशन!!
रितू अपनी पुलिस जिप्सी से नीचे उतरी और थाने के अंदर लम्बे लम्बे कदमों के साथ बढ़ गई। आस पास मौजूद पुलिस के सिपाहियों ने उसे सैल्यूट किया जिसका जबाव वह अपनी गर्दन को हल्का सा खम करते हुए दे रही थी। कुछ ही पल में वह अपने केबिन में पहुॅची और टेबल के उस पार रखी कुर्सी पर बैठ गई। तभी उसके केबिन में हवलदार रामदीन दाखिल हुआ।

"कहो रामदीन क्या रिपोर्ट है लोकेशन की?" रितू ने पूछा उससे।
"मैडम पक्की ख़बर है।" रामदीन ने कहा__"उस नेता का वो हरामी कपूत अपने फार्महाउस पर अपने कुछ लफंगे दोस्तों के साथ ऐश फरमा रहा है।"

"ख़बर पक्की है ना?" रितू ने गहरी नज़र से रामदीन की तरफ देखा।
"सौ टका पक्की है मैडम।" रामदीन ने खींसें निपोरते हुए कहा__"अपनी बेवफा बीवी की कसम।"

"बेवफ़ा बीवी???" रितू ने हैरानी से रामदीन की तरफ देखा___"ये क्या बोल रहे हो तुम रामदीन?"
"अब बेवफा को बेवफा न बोलूॅ तो और क्या बोलूॅ मैडम?" रामदीन ने सहसा दुखी भाव से कहा___"मेरा एक पड़ोसी है...नाम है चालूराम। जैसा नाम वैसा ही है वो मैडम। चालूराम बड़ी चालाकी से मेरी बीवी को फॅसा लेता है और फिर उसके साथ चालू हो जाता है। इतना ही नहीं मेरी बीवी भी उसके साथ चालू हो जाती है। इन दोनो के चालूपन ने मेरा जीना हराम कर रखा है मैडम।"

"ओफ्फो रामदीन।" रितू का दिमाग़ मानो चकरा सा गया___"ये क्या बकवास कर रहे हो तुम? कौन चालूराम और कैसा चालूपन?"
"जाने दीजिए मैडम।" रामदीन ने गहरी साॅस ली___"मेरी तो बड़ी दुखभरी दास्तां है।"

"अच्छा छोड़ो ये सब।" रितू ने कहा___"दो चार हवलदार को लो हाथ में और मेरे साथ चलो जल्दी।"
"जी मैडम।" रामदीन ने नाटकीय अंदाज़ में सैल्यूट बजाया और केबिन से बाहर निकल गया। उसके पीछे रितू भी बाहर आ गई।

बाहर चलते हुए रितू ने पाॅकेट से मोबाइल फोन निकाला और उसमें कोई नंबर डायल कर उसे कान से लगा लिया।

"जय हिन्द सर।" रितू ने कहा___"मुझे इमेडिएटली एक सर्च वारंट चाहिए।"
"............"
"आप फिक्र मत कीजिए सर।" रितू कह रही थी____"मैं सब सम्हाल लूॅगी। आप बस दो मिनट के अंदर मुझे वारंट का काग़ज फैक्स कर दीजिए।"

"..............."
"डोन्ट वरी सर।" रितू ने कहा___"आई विल हैण्डल इट।"
"............"
"जय हिन्द सर।" रितू ने कहा और काल डिस्कनेक्ट करके मोबाइल पुनः पाॅकेट में डाल लिया।

ठीक दो मिनट बाद ही फैक्स मशीन से एक कागज़ निकला। रितू के इशारे पर वहीं खड़े रामदीन ने उस कागज़ को फैक्स मशीन से लेकर रितू को पकड़ा दिया। रितू ने ध्यान से कागज़ में लिखे मजमून को देखा और फिर उसे फोल्ड करके पाॅकेट में डाल लिया।

"रामदीन सबको लेकर मेरे साथ चलो।" रितू ने कहा थाने के बाहर खड़ी जिप्सी के पास आ गई। ड्राईविंग सीट पर खुद बैठी वह। चार हवलदारों के बैठते ही उसने जिप्सी को स्टार्ट कर मेन रोड की तरफ दौड़ा दिया।

लगभग आधे घंटे बाद वह हल्दीपुर की आबादी से बाहर दूर बने एक फार्महाउस के पास पहुॅची। यहाॅ पर रोड के दोनो साइड कई सारे फार्महाउस बने हुए थे। किन्तु रितू की जिप्सी जिस फार्महाउस के गेट के पास रुकी उस पर चौधरी फार्महाउस लिखा हुआ था तथा नाम के नीचे फार्महाउस का नंबर पड़ा था।

फार्महाउस के गेट पर दो बंदूखधारी गार्ड तैनात थे। पुलिस जिप्सी को देखते ही वो दोनो चौंके साथ ही दोनो के चेहरे सफेद फक्क भी पड़ गए। रितू जिप्सी से उतर कर तुरंत उन दोनो के करीब पहुॅची। तब तक चारो हवलदार भी आ चौके थे।

एकाएक ही जैसे बिजली सी चमकी। पलक झपकते ही दोनो बंदूखधारियों के कंठ से घुटी घुटी सी चीख निकली और वो लहरा कर वहीं ज़मीन पर गिर पड़े। वो दोनो बेहोश हो चुके थे। ये सब इतनी तेज़ी से हुआ था कि कोई कुछ समझ भी न पाया था कि ये सब कब और कैसे हो गया। हुआ यूॅ था कि रितू उनके पास पहुॅची और बिना कोई बात किये बिजली की सी तेज़ी से उसने अपने दोनो हाॅथों को कराटे की शक्ल देकर दोनो बंदूखधारियों की कनपटी पर बिजली की स्पीड से प्रहार किया था। वो दोनो कुछ समझ ही नहीं पाए थे और ना ही उन्हें इस सबकी कोई उम्मीद थी।

"इन दोनो की बंदूखों को अपने कब्जे में ले लो।" रितू ने आदेश दिया___"और उसके बाद इन दोनो को उठा कर जिप्सी में डाल दो।"

रितू के आदेश का फौरन ही पालन हुआ। चारो हवलदार अभी तक हैरान थे कि उनकी मैडम ने पलक झपकते ही दो दो बंदूखधारियों को अचेत कर दिया। बेचारे क्या जानते थे कि बला की खूबसूरत ये लड़की कितनी खतरनाक भी है।

सब कुछ होने के बाद चारो हवलदार तेज़ी से गेट के अंदर की तरफ दौड़े क्योंकि रितू तब तक गेट के अंदर जा चुकी थी। फार्महाउस काफी बड़ा था और काफी खूबसूरत भी। हर तरफ रंग बिरंगे फूलों की क्यारियाॅ लगी हुई थी तथा एक से बढ़ एक देशी विदेशी पेड़ पौधे लगे हुए थे। लम्बे चौड़े लान में विदेशी घास लगी हुई थी। कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि चौधरी ने अपनी काली कमाई का अच्छा खासा उपयोग किया हुआ था।

गेट से लेकर फार्महाउस की इमारत के मुख्य द्वार तक लगभग आठ फुट चौड़ी सफेद मारबल की सड़क बनी हुई थी तथा इमारत के पास से ही लगभग बीस फुट की ही चौड़ाई पर भी इमारत के चारो तरफ मारबल लगा हुआ था। बाॅकी हर जगह लान में हरी घास, पेड़ पौधे व फूलों की क्यारियाॅ थी।

मुख्य द्वार के बगल से जो कि पोर्च का ही एक हिस्सा था वहाॅ पर दो कारें खड़ी थी इस वक्त। एक ब्लैक कलर की इनोवा थी तथा दूसरी स्विफ्ट डिजायर थी। मुख्य द्वार बंद था। रितू को कहीं पर बेल लगी हुई न दिखी। इस लिए उसने दरवाजे पर हाथ से ही दस्तक दी। किन्तु अंदर से कोई दरवाजा खोलने नहीं आया। रितू ने कई बार दस्तक दी। परंतु परिणाम वही। ऐसा तो हो ही नहीं सकता था कि अंदर कोई है ही नहीं क्योंकि बाहर खड़ी दो कारें इस बात का सबूत थी कि इनसे कोई आया है जो इस वक्त इमारत के अंदर है।

जब रितू की दस्तक का कोई पराणाम सामने नहीं आया तो उसने इमारत से थोड़ा दूर आकर इमारत की तरफ ध्यान से देखा। इमारत दो मंजिला थी। मुख्य द्वार के कुछ ही फासले पर दोनो साइड काच की बड़ी सी किन्तु ब्लैक कलर की खिड़कियाॅ थी। जिनके ऊपर साइड बरसात के मौसम में पानी की बौछार से बचने के लिए रैक बनाया गया था। मुख्य द्वार पर एक लम्बा चौड़ा पोर्च था जो दोनो तरफ की उन कान की खिड़कियों तक था। पोर्च के ऊपर का भाग खाली था उसके बाद स्टील की रेलिंग लगी हुई थी।

अभी रितू ये सब देख ही रही थी कि मुख्य द्वार खुलने की आहट हुई। रितू ने बड़ी तेज़ी से चारो हवलदारों को इमारत के बगल साईड की दीवार के पीछे छुप जाने का इशारा किया जबकि खुद मुख्य द्वार के पास पहुॅच गई।

तभी दरवाजा खुला और सबसे पहले रोहित मेहरा बाहर निकला। उसके चेहरे पर अजीब से भाव थे, वह पीछे की तरफ ही देख कर हॅसते हुए बाहर आ रहा था। उसके पीछे अलोक वर्मा व किशन श्रीवास्तव था और अंत में सूरज चौधरी था। इसका बाप दिवाकर चौधरी शहर का एम एल ए था।

"भाई तुम सब यहीं रुको मैं अपनी वाली उस राॅड को भी लेकर आता हूॅ।" रोहित मेहरा ने कहा___"साली का फोन स्विच ऑफ बता रहा है। अब तो उसे लेने ही जाना पड़ेगा। आज तो इसकी अच्छे से बजाएॅगे हम सब।"

"ठीक है जल्दी आना।" अलोक ने कहा___"तब तक हम इनके होश में लाने का प्रयास करते हैं। और हाॅ सुन........।" आगे बोलते बोलते वह रुक गया क्योंकि दरवाजे के पार खड़ी पुलिस की वर्दी पहने रितू पर उसकी नज़र पड़ गई।

"क्या हुआ बे बोलते बोलते रुक क्यों गया तू?" रोहित मेहरा हॅसा___"कोई भूत देख लिया क्या?"
"ऐसा ही समझ ले।" अलोक ने ऑखों से बाहर की तरफ इशारा किया।

उसके इशारे से सबने देखा बाहर की तरफ और पुलिस इंस्पेक्टर रितू पर नज़र पड़ते ही उन सबकी नानी मर गई। शराब और शबाब का सारा नशा हिरन हो गया उनका। किन्तु ये कुछ देर के लिए ही था अगले पल वो सब मुस्कुराने लगे।

"ले भाई तू अपनी वाली को लेने जा रहा था यहाॅ तो एक ज़बरदस्त माल खुद ही पुलिस की वर्दी में चल कर आ गया।" किशन ने हॅसते हुए कहा___"अब तुझे कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है। हम सब इसके साथ ही अब मज़ा करेंगे।"

"सही कह रहा है यार।" रोहित मेहरा ने रितू को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा__"क्या फाड़ू फिगर है इसका। कसम से मज़ा आ जाएगा आज तो।"
"तो फिर देर किस बात की भाई?" अलोक ने कहा___"उठा ले चल इसे अंदर।"

"ओये एक मिनट।" किशन ने कहा___"मत भूलो कि ये पुलिस वाली है। इस वक्त अकेली दिख रही है मगर संभव है इसके साथ कोई और भी पुलिस वाले हों। ऐसे में बड़ी प्रोब्लेम
[color=rgb(0,] हो जाएगी।"

"अबे साले तू कब अपने वकील बाप की तरह सोचना बंद करेगा?" अलोक घुड़का___"ये हमारा बाल भी बाॅका नहीं कर सकती। अब चल उठा इसे और ले चल अंदर।"

रितू चुपचाप खड़ी इन सबकी बातें सुन रही थी। ये अलग बात थी कि अंदर ही अंदर वह गुस्से भभक रही थी। इधर सबसे आगे रोहित मेहरा ही था सो वही बढ़ा पहले। उसके बाद सभी दरवाजे के बाहर आ गए।

वो चारो रितू के चारो तरफ फैल गए और उसके चारो तरफ गोल गोल चक्कर लगाने लगे।

"भाई हर तरफ से पटाखा है ये तो।" अलोक ने कहा___"सूरज भाई पहले कौन इसकी ले....आहहहहहह।"

अलोक के हलक से दर्द भरी चीख गूॅज गई थी। रितु ने बिजली की सी फुर्ती से पलट कर बैक किक अलोक के सीने पर जड़ा था। किक पड़ते ही वह चीखते हुए तथा हवा में लहराते हुए पोर्च से बाहर जाकर गिरा था। रितूके सब्र का बाॅध जैसे टूट गया था। वह इतने पर ही नहीं रुकी बल्कि पलक झपकते ही बाॅकी तीनों भी पोर्च के अलग अलग हिस्सों पर पड़े कराह रहे थे।

"तुम जैसे हिजड़ों की औलादों को सुधारने के लिए मैं आ गई हूॅ।" रितू ने भभकते हुए कहा___"तुम चारों की ऐसी हालत करूॅगी कि दोबारा जन्म लेने से इंकार कर दोगे।"

"भाई ये क्या था?" किशन ने उठते हुए कहा__"ये तो लगता है करेंट मारती है। हमें इसे अलग तरीके से काबू में करना होगा।"
"सही कह रहा है तू।" अलोक ने कहा__"अब तो शिकार करने में मज़ा आएगा भाई लोग।"

"आ जाओ तुम चारो एक साथ।" रितू ने कहा___"मैंने तुम चारों का हुलिया न बिगाड़ दिया तो मेरा भी नाम रितू सिह बघेल नहीं।"
"चलो देख लेते हैं डियर।" सूरज ने पोजीशन में आते हुए कहा___"कि तुममें कोई बात है या हममें।"

चारों ने रितू को फिर से घेर लिया। किन्तु इस बार वो पूरी तरह सतर्क थे। उनकी पोजीशन से ही लग रहा था कि वो चारो जूड़ो कराटे जानते थे। रितू खुद भी पूरी तरह सतर्क थी।

चारो उसे घेरे हुए थे तथा उनके चेहरों पर कमीनेपन की मुस्कान थी। चारो ने ऑखों ही ऑखों में कोई इशारा किया और अगले ही पल चारो एक साथ रितू की तरफ झपटे किन्तु ये क्या??? वो जैसे ही एक साथ चारो तरफ से रितू पर झपटे वैसे ही रितू ने ऊपर की तरफ जम्प मारी और हवा में ही कलाबाज़ी खाते हुए उन चारों के घरे से बाहर आ गई। उसके बाहर आते ही चारो आपस में ही बुरी तरह टकरा गए। उधर रितू ने मानों उन्हें सम्हलने का मौका ही नहीं दिया बल्कि बिजली की सी स्पीड से उसने लात घूसों और कराटों की बरसात कर दी उन पर। वातावरण में चारों की चीखें गूॅजने लगी। कुछ दूरी पर खड़े वो चारो पुलिस हवलदार भी ये हैरतअंगेज कारनामा देख रहे थे।

ऐसा नहीं था कि चारो लड़के कुछ कर नहीं रहे थे किन्तु उनका हर वार खाली जा रहा था जबकि रितू तो मानो रणचंडी बनी हुई थी। जूड़ो कराटे व मार्शल आर्ट के हैरतअंगेज दाॅव आजमाए थे उसने। परिणाम ये हुआ कि थोड़ी ही देर में उन चारो की हालत ख़राब हो गई। ज़मीन में पड़े वो बुरी तरह कराह रहे थे।

"क्यों सारी हेकड़ी निकल गई क्या?" रितू ने अलोक के पेट में पुलिसिये बूट की तेज़ ठोकर मारते हुए कहा___"उठ सुअर की औलाद। दिखा न अपनी मर्दानगी। साला एक पल में ही पेशाब निकल गया तेरा।"

रितू सच कह रही थी, अलोक की पैन्ट गीली हो गई थी। बूट की ठोकर लगते ही वह हलाल होते बकरे की तरह चिल्लाया था। साथ ही अपने दोनो हाॅथ जोड़कर बोला___"मुझे माफ़ कर दो प्लीज़। आज के बाद मैं ऐसा वैसा कुछ नहीं कहूॅगा।"

"कहेगा तो तब जब कहने लायक तू बचेगा भड़वे की औलाद।" रितू ने एक और ठोकर उसके पेट में जमा दी। वह फिर से चिल्ला उठा था। तभी रितू के हलक से चीख निकल गई। दरअसल उसका सारा ध्यान अलोक की तरफ था इस लिए वह देख ही नहीं पाई कि पीछे से किशन ने उसकी पीठ पर चाकू का वार कर दिया था। पुलिस की वर्दी को चीरता हुआ चाकू उसकी पीठ को भी चीर दिया था। पलक झपकते ही उसकी वर्दी उसके खून से नहाने लगाने थी।

"साली हमसे पंगा ले रही है तू।" किशन ने गुर्राते हुए कहा___"अब देख तेरी क्या हालत बनाते हैं हम?"

बड़ी हैरानी की बात थी कि कुछ ही दूरी पर खड़े चारो हवलदार तमाशा देख रहे थे। उनकी हालत ऐसी थी जैसे जूड़ी के मरीज़ हों। हाॅथों में पुलिस की लाठी लिए वो चारो डरे सहमें से खड़े थे। और उस वक्त तो उनकी हालत और भी खराब हो गई जब किशन ने पीछे से रितू की पीठ पर चाकू से वार किया था। चाकू का वार चीरा सा लगाते हुए निकल गया था, अगर किशन उसे पीठ पर ही पेवस्त कर देता तो मामला बेहद ही गंभीर हो जाता।

"रुक क्यों गया किशन?" सूरज ने उठते हुए कहा___"चीर कर रख दे इस साली की वर्दी को। यहीं पर इसे नंगा करेंगे हम और यहीं पर इसकी इज्जत लूटेंगे।"
"सूरज सही कह रहा है किशन।" रोहित भी उठ चुका था___"इसे सम्हलने का मौका मत दे और चाकू से चीर दे इसकी वर्दी को।"

किशन ने फिर से अपना दाहिना हाथ हवा में उठाया रितू पर वार करने के लिए। उधर रितू की पीठ में तेज़ी से पीड़ा उठ रही थी। खून बुरी तरह रिस रहा था। जैसे ही किशन ने उस पर वार किया उसने एक हाथ से उसके वार को रोंका और दूसरे हाॅथ से एक ज़बरदस्त मुक्का उसकी नाॅक में जड़ दिया। किशन के नाॅक की हड्डी टूटने की आवाज़ आई साथ ही उसकी भयंकर चीख वातावरण में फैल गई। उसकी नाक से भल्ल भल्ल करके खून बहने लगा था। चाकू उसके हाॅथ से छूट गया और वह ज़मीन पर धड़ाम से गिरा। उधर किशन की ये हालत देख कर बाॅकी तीनो हरकत में आ गए। रितू ने तेज़ी से झुक कर ज़मीन से चाकू उठाया और जैसे ही वो तीनो उसके पास आए उसने चाकू वाला हाॅथ तेज़ी से चला दिया उन पर। सबकी चीखें निकल गई।

हालात बदल चुके थे। रितू जानती थी कि उसकी हालत खुद भी अच्छी नहीं है और अगर वह कमज़ोर पड़ गई तो ये चारो किसी कुत्ते की तरह नोच कर खा जाएॅगे। इस लिए उसने अपने दर्द की परवाह न करते हुए एक बार से उन पर टूट पड़ी और तब तक उन्हें लात घूॅसों पर रखा जब तक कि वो चारो अधमरे न हो गए।

रितू बुरी तरह हाॅफ रही थी। उसकी वर्दी पीक की तरफ से खून में नहा चुकी थी। उसे कमज़ोरी का एहसास होने लगा था।उसने दूर खड़े अपने हवलदारों की तरफ देखा जो किसी पुतलों की तरह खड़े थे। रितू को उन्हें देख कर बेहद क्रोध आया। वह तेज़ी से उनके पास पहुॅची और फिर दे दना दन थप्पड़ों की बरसात कर दी न पर। उन चारों के हलक से चीखें निकल गई।

"मैं तुमको यहाॅ पर क्या तमाशा देखने के लिए लेकर आई थी नामर्दो?" रितू किसी शेरनी की भाॅती गरजी थी, बोली___"तुम चारो यहाॅ पर खड़े बस तमाशा देख रहे थे। तुम दोनो को पुलिस में रहने का कोई हक़ नहीं है। आज और अभी से तुम चारो को ढिसमिस किया जाता है। अब दफा हो जाओ यहाॅ से और कभी अपनी शकल मत दिखाना।"

रितू की गुस्से भरी ये फातें सुनकर चारो की हालत खराब हो गई। वो चारो रितू के पैरों पर गिर कर माफ़ी मागने लगे। किन्तु रितू को उन पर इतना ज्यादा गुस्सा आया हुआ था कि उसने अपने पैरों पर गिरे उन चारों को लात की ठोकरों पर रख दिया।

"हट जाओ मेरे सामने से।" रितू ने गुर्राते हुए कहा___"तुम जैसे निकम्मों और नामर्दों की मेरे पुलिस थाने में कोई जगह नहीं है। अब दफा हो जाओ वरना तुम चारो को गोली मार दूॅगी।"

रितू का रौद्र रूप देख कर वो चारो बुरी तरह ठर गए और फिर वहाॅ से नौ दो ग्यारह हो गए। उनके जाते ही रितू ने उन चारो लड़कों को एक एक करके किसी तरह अपनी पुलिस जिप्सी पर पटका और फिर वह वापस उस जगह आई जहाॅ पर अभी कुछ देर पहले ये संग्राम हुआ था। उसने देखा कि पोर्च के फर्स पर कई जगह खून फैला हुआ था। उसने इधर उधर दृष्टि घुमा कर देखा किन्तु उसे ऐसा कुछ भी न दिखा जो उसके काम का हो। वह मुख्य द्वार से अंदर की तरफ चली गई। अंदर सामने ही एक कमरा दिखा उसे। वह उस कमरे की तरफ बढ़ गई। कमरे का दरवाजा हल्का खुला हुआ था। रितू ने अपने पैरों से दरवाजे को अंदर की तरफ धकेला। दरवाजा बेआवाज़ खुलता चला गया।

अंदर दाखिल होकर उसने देखा कि कमरा काफी बड़ा था तथा काफी शानदार तरीके से सजा हुआ था। एक कोने में बड़ा सा बेड था जिसमें तीन लड़कियाॅ मादरजाद नंगी पड़ी हुई थी। ऐसा लगता था जैसे गहरी नीद में हों। रितू ने नफ़रत से उन्हें देखा और फिर कमरे में उसने अपनी नज़रें दौड़ाईं। बगल की दीवार पर एक तस्वीर टॅगी हुई थी। तस्वीर कोई खास नहीं थी बस साधारण ही थी। रितू के मन में सवाल उभरा कि इतने अलीशान फार्महाउस पर इतनी मामूली तस्वीर कैसे रखी जा सकती है?

रितू ने आगे बढ़ कर तस्वीर को ध्यान से देखा। तस्वीर सच में कोई खास नहीं थी। रितू को जाने क्या सूझा कि उसने हाॅथ बढ़ा कर दीवार से तस्वीर को निकाल लिया। तस्वीर के निकलते ही दीवार पर एक स्विच नज़र आया। रितू ये देख कर चकरा गई। भला दीवार पर लगे स्विच के ऊपर तस्वीर को इस तरह क्यों लगाया गया होगा? क्या स्विच को तस्वीर द्वारा छुपाने के लिए??? रितू को अपना ये विचार कहीं से भी ग़लत नहीं लगा। उसने तस्वीर को एक हाॅथ से पकड़ कर दूसरे हाॅथ को दीवार पर लगे स्विच बटन को ऊपर की तरफ पुश किया। बटन को ऊपर की तरफ पुश करते ही कमरे में अजीब सी घरघराहट की आवाज़ हुई। रितू ये देख कर बुरी तरह चौंकी कि उसके सामने ही दीवार पर एक दरवाजा नज़र आने लगा था।

उसे समझते देर न लगी कि ये दिवाकर चौधरी का गुप्त कमरा है। वह धड़कते दिल के साथ कमरे में दाखिल हो गई। अंदर पहुॅच कर उसने देखा बहुत सारा कबाड़ भरा हुआ था यहाॅ। ये सब देख कर रितू हैरान रह गई। उसे समझ में न आया कि कोई कबाड़ को ऐसे गुप्त रूप से क्यों रखेगा?? रितू ने हर चीज़ को बारीकी से देखा। उसके पास समय नहीं था। क्योंकि उसकी खुद की हालत ख़राब थी। काफी देर तक खोजबीन करने के बाद भी उसे कोई खास चीज़ नज़र न आई। इस लिए वह बाहर आ गई मखर तभी जैसे उसे कुछ याद आया। वह फिर से अंदर गई। इस बार उसने तेज़ी से इधर उधर देखा। जल्द ही उसे एक तरफ की दीवार से सटा हुआ एक टेबल दिखा। टेबल के आस पास तथा ऊपर भी काफी सारा कबाड़ सा पड़ा हुआ था। किन्तु रितू की नज़र कबाड़ के बीच रखे एक छोटे से रिमोट पर पड़ी। उसने तुरंत ही उसे उठा लिया। वो रिमोट टीवी के रिमोट जैसा ही था।

रितू ने हरा बटन दबाया तो उसके दाएॅ तरफ हल्की सी आवाज़ हुई। रितू ने उस तरफ देखा तो उछल पड़ी। ये एक दीवार पर बनी गुप्त आलमारी थी जो आम सूरत में नज़र नहीं आ रही थी। रितू ने आगे बढ़ कर आलमारी की तलाशी लेनी शुरू कर दी। उसमें उसे काफी मसाला मिला। जिन्हें उसने कमरे में ही पड़े एक गंदे से बैग में भर लिया। उसके बाद उसने रिमोट से ही उस आलमारी को बंद कर दिया।

रितू उस बैग को लेकर वापस बाहर आ गई और ड्राइविंग सीट पर बैठ कर जिप्सी को फार्महाउस से मेन सड़क की तरफ दौड़ा दिया। इस वक्त उसके चेहरे पर पत्थर जैसी कठोरता तथा नफ़रत विद्यमान थी। दिलो दिमाग़ में भयंकर चक्रवात सा चल रहा था। उसकी जिप्सी ऑधी तूफान बनी दौड़ी चली जा रही थी।
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अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,,,,,
 
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट..........《 33 》

अब तक,,,,,,,

उसे समझते देर न लगी कि ये दिवाकर चौधरी का गुप्त कमरा है। वह धड़कते दिल के साथ कमरे में दाखिल हो गई। अंदर पहुॅच कर उसने देखा बहुत सारा कबाड़ भरा हुआ था यहाॅ। ये सब देख कर रितू हैरान रह गई। उसे समझ में न आया कि कोई कबाड़ को ऐसे गुप्त रूप से क्यों रखेगा?? रितू ने हर चीज़ को बारीकी से देखा। उसके पास समय नहीं था। क्योंकि उसकी खुद की हालत ख़राब थी। काफी देर तक खोजबीन करने के बाद भी उसे कोई खास चीज़ नज़र न आई। इस लिए वह बाहर आ गई मखर तभी जैसे उसे कुछ याद आया। वह फिर से अंदर गई। इस बार उसने तेज़ी से इधर उधर देखा। जल्द ही उसे एक तरफ की दीवार से सटा हुआ एक टेबल दिखा। टेबल के आस पास तथा ऊपर भी काफी सारा कबाड़ सा पड़ा हुआ था। किन्तु रितू की नज़र कबाड़ के बीच रखे एक छोटे से रिमोट पर पड़ी। उसने तुरंत ही उसे उठा लिया। वो रिमोट टीवी के रिमोट जैसा ही था।

रितू ने हरा बटन दबाया तो उसके दाएॅ तरफ हल्की सी आवाज़ हुई। रितू ने उस तरफ देखा तो उछल पड़ी। ये एक दीवार पर बनी गुप्त आलमारी थी जो आम सूरत में नज़र नहीं आ रही थी। रितू ने आगे बढ़ कर आलमारी की तलाशी लेनी शुरू कर दी। उसमें उसे काफी मसाला मिला। जिन्हें उसने कमरे में ही पड़े एक गंदे से बैग में भर लिया। उसके बाद उसने रिमोट से ही उस आलमारी को बंद कर दिया।

रितू उस बैग को लेकर वापस बाहर आ गई और ड्राइविंग सीट पर बैठ कर जिप्सी को फार्महाउस से मेन सड़क की तरफ दौड़ा दिया। इस वक्त उसके चेहरे पर पत्थर जैसी कठोरता तथा नफ़रत विद्यमान थी। दिलो दिमाग़ में भयंकर चक्रवात सा चल रहा था। उसकी जिप्सी ऑधी तूफान बनी दौड़ी चली जा रही थी।
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अब आगे,,,,,,,,,,

वर्तमान अब आगे_______

रितू की पुलिस जिप्सी जिस जगह रुकी वह एक बहुत ही कम आबादी वाला एरिया था। सड़क के दोनो तरफ यदा कदा ही मकान दिख रहे थे। इस वक्त रितू जिस जगह पर आकर रुकी थी वह कोई फार्महाउस था। जिप्सी की आवाज़ से थोड़ी ही देर में फार्महाउस का बड़ी सी बाउंड्री पर लगा लोहे का भारी गेट खुला। गेट के खुलते ही रितू ने जिप्सी को आगे बढ़ा दिया, उसके पीछे गेट पुनः बंद हो गया। जिप्सी को बड़े से मकान के पास लाकर रितू ने रोंक दिया और फिर उससे नीचे उतर गई।

रितू की हालत बहुत ख़राब हो चुकी थी। बदन में जान नहीं रह गई थी। गेट को बंद करने के बाद दो लोग भागते हुए उसके पास आए।

"अरे क्या हुआ बिटिया तुम्हें?" एक लम्बी मूॅछों वाले ब्यक्ति ने घबराकर कहा___"ये क्या हालत बना ली है तुमने? किसने की तुम्हारी ये हालत? मैं उसे ज़िन्दा नहीं छोंड़ूॅगा बिटिया।"
"काका इन सबको अंदर तहखाने में बंद कर दो।" रितू ने उखड़ी हुई साॅसों से कहा__"और ध्यान रखना किसी को इन लोगों का पता न चल सके। ये तुम्हारी जिम्मेदारी है काका।"

"वो सब तो मैं कर लूॅगा बिटिया।" काका की ऑखों में ऑसू तैरते दिखे___"लेकिन तुम्हारी हालत ठीक नहीं है। तुम्हें जल्द से जल्द हास्पिटल लेकर जाना पड़ेगा। मैं बड़े ठाकुर साहब को फोन लगाता हूॅ बिटिया।"

"नहीं काका प्लीज़।" रितू ने कहा___"जितना कहा है पहले उतना करो। मैं ठीक हूॅ..बस काकी को फस्ट एड बाक्स के साथ मेरे कमरे में भेज दीजिए जल्दी। लेकिन उससे पहले इन्हें तहखाने में बंद कीजिए।"

"ये सब कौन हैं बेटी?" एक अन्य आदमी ने पूछा___"इन सबकी हालत भी बहुत खराब लग रही है।"
"ये सब के सब एक नंबर के मुजरिम हैं शंभू काका।" रितू ने कहा___"इन लोगों बड़े से बड़ा संगीन गुनाह किया है।"

"फिर तो इनको जान से मार देना चाहिए बिटिया।" काका ने जिप्सी में बेहोश पड़े सूरज और उसके दोस्तों को देख कर कहा।
"इन्हें मौत ही मिलेगी काका।" रितू ने भभकते हुए कहा___"लेकिन थोड़ा थोड़ा करके।"

उसके बाद रितू के कहने पर उन दोनो ने उन सभी लड़को को उठा उठा कर अंदर तहखाने में ले जाकर बंद कर दिया। जबकि रितू अंदर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। थोड़ी ही देर में काकी फर्स्ट एड बाक्स लेकर आ गई। रितू के कहने पर काकी ने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया।

रितू ने वर्दी की शर्ट किसी तरह अपने बदन से उतारा। काकी हैरत से देखे जा रही थी।उसके चेहरे पर चिन्ता और दुख साफ दिख रहे थे।

"ये सब कैसे हुआ बिटिया?" काकी ने आगे बढ़ कर शर्ट उतारने में रितू की मदद करते हुए कहा___"देखो तो कितना खून बह गया है, पूरी शरट भींग गई है।"

"अरे काकी ये सब तो चलता रहता है।" रितू ने बदन से शर्ट को अलग करते हुए कहा__"इस नौकरी में कई तरह के मुजरिमों से पाला पड़ता रहता है।"
"अरे तो ऐसी नौकरी करती ही क्यों हो बिटिया?" काकी ने कहा___"भला का कमी है तुम्हें? सब कुछ तो है।"

"बात कमी की नहीं है काकी।" रितू ने कहा___"बात है शौक की। ये नौकरी मैं अपने शौक के लिए कर रही हूॅ। ख़ैर ये सब छोड़िये और मैं जैसा कहूॅ वैसा करते जाइये।"

कहने के साथ ही रितू बेड पर उल्टा होकर लेट गई। इस वक्त वह ऊपर से सिर्फ एक पिंक कलर की ब्रा में थी। दूध जैसी गोरी पीठ पर हर तरफ खून ही खून दिख रहा था। ब्रा के हुक के ऊपरी हिस्से पर दाएॅ से बाएं चाकू का चीरा लगा था। जो कि दाहिने कंधे के थोड़ा नीचे से टेंढ़ा बाएॅ तरफ लगभग दस इंच का था। काकी ने जब उस चीरे को देखा तो उसके शरीर में सिहरन सी दौड़ गई।

"हाय दइया ये तो बहुत खराब कटा है।" काकी ने मुह फाड़ते हुए कहा___"ये सब कैसे हो गया बिटिया? पूरी पीठ पर चीरा लगा है।"
"ये सब छोड़ो आप।" रितू ने गर्दन घुमा कर पीछे काकी की तरफ देख कर कहा___"आप उस बाक्स से रुई लीजिए और उसमे डेटाॅल डाल कर मेरी ठीठ पर फैले इस खून को साफ कीजिए।"

"पर बिटिया तुम्हें दर्द होगा।" काकी ने चिन्तित भाव से कहा___"मैं ये कैसे कर पाऊॅगी?"
"मुझे कुछ नहीं होगा काकी।" रितू ने कहा__"बल्कि अगर आप ऐसा नहीं करेंगी तो ज़रूर मुझे कुछ हो जाएगा। क्या आप चाहती हैं कि आपकी बिटिया को कुछ हो जाए?"

"नहीं नहीं बिटिया।" काकी की ऑखों में ऑसू आ गए___"ये क्या कह रही हो तुम? तुम्हें कभी कुछ न हो बिटिया। मेरी सारी उमर भी तुम्हें लग जाए। रुको मैं करती हूॅ।"


रितू काकी की बातों से मुस्कुरा कर रह गई और अपनी गर्दन वापस सीधा कर तकिये में रख लिया। काकी ने बाक्स से रुई निकाला और उसमे डेटाॅल डाल कर रितू की पीठ पर डरते डरते हाॅथ बढ़ाया। वह बहुत ही धीरे धीरे रितू की पीठ पर फैले खून को साफ कर रही थी। कदाचित वह नहीं चाहती थी कि रितू को ज़रा भी दर्द हो।

"आप डर क्यों रही हैं काकी?" सहसा रितू ने कहा___"अच्छे से हाॅथ गड़ा कर साफ कीजिये न। मुझे बिलकुल भी दर्द नहीं होगा। आप फिक्र मत कीजिए।"

रितू के कहने पर काकी पहले की अपेक्षा अब थोड़ा ठीक से साफ कर रही थी। मगर बड़े एहतियात से ही। कुछ समय बाद ही काकी ने रितू की पीठ को साफ कर दिया। किन्तु चीरा वाला हिस्सा उसने साफ नहीं किया। रितू ने उससे कहा कि वो चीरे वाले हिस्से को भी अच्छी तरह साफ करें। क्योंकि जब तक वो अच्छी तरह साफ नहीं होगा तब तक उस पर दवा नहीं लगाई जा सकती। काकी ने बड़ी सावधानी से उसे भी साफ किया। फिर रितू के बताने पर उसने बाक्स से निकाल कर एक मल्हम चीरे पर लगाया और फिर उसकी पट्टी की। चीरे वाले स्थान से जितना खून बहना था वह बह चुका था किन्तु बहुत ही हल्का हल्का अभी भी रिस रहा था। हलाॅकि अब पट्टी हो चुकी थी इस लिए रितू को आराम मिल रहा था। उसने दर्द की एक टेबलेट खा ली थी।

"अब तुम आराम करो बिटिया।" काकी ने कहा___"तब तक मैं तुम्हारे लिए गरमा गरम खाना बना देती हूॅ।
"नहीं काकी।" रितू ने कहा___"आप खाना बनाने का कस्ट न करें। बस एक कप काफी पिला दीजिए।"

"ठीक है जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।" काकी ने कहा और रितू के ऊपर एक चद्दर डाल कर कमरे से बाहर निकल गई। जबकि रितू ने अपनी आॅखें बंद कर ली। कुछ देर ऑखें बंद कर जाने वह क्या सोचती रही फिर उसने अपनी ऑखें खोली और बेड के बगल से ही एक छोटे से स्टूल पर रखे लैण्डलाइन फोन की तरफ अपना हाथ बढ़ाया।

रिसीवर कान से लगा कर उसने कोई नंबर डायल किया। कुछ ही पल में उधर बेल जाने की आवाज़ सुनाई देने लगी।

"हैलो कमिश्नर जगमोहन देसाई हेयर।" उधर से कहा गया।
"जय हिन्द सर मैं इंस्पेक्टर रितू बोल रही हूॅ।" रितू ने उधर की आवाज़ सुनने के बाद कहा।
"ओह यस ऑफिसर।" उधर से कमिश्नर ने कहा___"क्या रिपोर्ट है?"

"सर एक फेवर चाहिए आपसे।" रितू ने कहा।
"फेवर???" कमिश्नर चकराया__"कैसा फेवर हम कुछ समझे नहीं।"
"सर सारी डिटेल मैं आपको आपसे मिल कर ही बताऊॅगी।" रितू ने कहा___"फोन पर बताना उचित नहीं है।"

"ओकेनो प्राब्लेम।" कमिश्नर ने कहा__"अब बताओ कैसे फेवर की बात कर रही थी तुम?"
"सर मैं चाहती हूॅ कि इस केस की सारी जानकारी सिर्फ आप तक ही रहे।" रितू कह रही थी___"आप जानते हैं कि मैंने विधी के रेप केस की अभी तक कोई फाइल नहीं बनाई है। बस आपको इस बारे में इन्फार्म किया था।"

"हाॅ ये हम जानते हैं।" कमिश्नर ने कहा__"पर तुम करना क्या चाहती हो ये हम जानना चाहते हैं?"
"कल आपसे मिल कर सारी बातें बताऊॅगी सर।" रितू ने कहा___"इस वक्त मैं आपसे बस ये फेवर चाहती हूॅ कि दिवाकर चौधरी के बेटे और उसके दोस्तों के बारे में अगर आपके पास कोई बात आए तो आप यही कहिएगा कि पुलिस का इस बात से कोई संबंध नहीं है।"

"क्या मतलब??" कमिश्नर बुरी तरह चौंका था__"आख़िर तुम क्या कर रही हो ऑफिसर? उस समय भी तुमने हमसे इमेडिएटली सर्च वारंट के लिए कहा था और हमने उसका तुरंत इंतजाम भी किया। लेकिन अब तुम ये सब बोल रही हो आख़िर हुआ क्या है?"

"सर मैं आपको सारी बातें मिल कर ही बताऊॅगी।" रितूने कहा___"प्लीज़ सर ट्राई टू अंडरस्टैण्ड।"
"ओके फाइन।" कमिश्नर ने कहा__"हम कल तुम्हारा वेट करेंगे आफिसर।"
"जय हिन्द सर।" रितू ने कहा और रिसीवर वापस केड्रिल पर रख दिया।

रितू ने फिर से आॅखें बंद कर ली। तभी कमरे में काकी दाखिल हुई। उसके हाथ में एक ट्रे था जिसमें एक बड़ा सा कप रखा था। आहट सुन कर रितू ने ऑखें खोल कर देखा। काकी को देखते ही वह बड़ी सावधानी से उठ कर बेड पर बैठ गई। उसके बैठते ही काकी ने रितू को काफी का कप पकड़ाया।

काफी पीने के बाद रितू को थोड़ा बेहतर फील हुआ और वह बेड से उतर आई। आलमारी से उसने एक ब्लू कलर का जीन्स का पैन्ट और एक रेड कलर की टी-शर्ट निकाल कर उसे पहना तथा ऊपर से एक लेदर की जाॅकेट पहन कर उसने आईने में खुद को देखा। फिर पुलिस की वर्दी वाले पैन्ट से होलेस्टर सहित सर्विस रिवाल्वर निकाल कर उसे जीन्स के बेल्ट पर फॅसाया तथा आलमारी से एक रेड एण्ड ब्लैक मिक्स गाॅगल्स निकाल कर उसे ऑखों पर लगाया और फिर बाहर निकल गई।

बाहर उसे काकी दिखी। उसने काकी से कहा कि वह जा रही है। काकी उसे यूॅ देख कर हैरान रह गई। उसे समझ में न आया कि ये लड़की तो अभी थोड़ी देर पहले गंभीर हालत में थी और अब एकदम से टीम टाम होकर चल भी दी।

मकान के बाहर आकर रितू पुलिस जिप्सी की तरफ बढ़ी। वह ये देख कर खुश हो गई कि काका ने जिप्सी को अच्छे से धोकर साफ सुथरा कर दिया था। रितू को काका की समझदारी पर कायल होना पड़ा। जिप्सी को स्टार्ट कर रितू मेन गेट की तरफ बढ़ चली।

"काका उन लोगों का ध्यान रखना।" रितू ने गेट के पास खड़े काका और शंभू काका दोनो की तरफ देख कर कहा___"आज रात का खाना उन्हें नहीं देना। कल मैं दोपहर को आऊॅगी।"

"ठीक है बिटिया।" काका ने कहा__"तुम बिलकुल भी चिन्ता न करो। वो अब यहाॅ से कहीं नहीं जा पाएॅगे।"
"चलो फिर कल मिलती हूॅ आपसे।" रितू ने कहने के साथ ही जिप्सी को गेट के बाहर की तरफ निकाल दिया और मेन रोड पर आते ही जिप्सी हवा से बातें करने लगी।
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फ्लैशबैक अब आगे_______

कमरे से प्रतिमा के जाने के बाद विजय सिंह वापस अपने बिस्तर पर लेट गया। उसके ज़हन में यही ख़याल बार बार उभर रहा था कि वह अपनी भाभी का क्या करे? वह स्पष्टरूप से उससे कह चुकी थी कि वो उससे प्रेम करती है और वह अपने दिल में उसके लिए भी थोड़ी सी जगह दे। भला ऐसा कैसे हो सकता था? विजय सिंह इस बारे में सोचना भी ग़लत व पाप समझता था। उधर प्रतिमा उसकी कोई बात सुनने या मानने को तैयार ही नहीं थी। वह प्रतिमा से बहुत ज्यादा परेशान हो गया था। उसे डर था कि कहीं किसी दिन ये सब बातें उसके माॅ बाबूजी को न पता चल जाएॅ वरना अनर्थ हो जाएगा। आज वो जो मुझे सबसे अच्छा और अपना सबसे लायक बेटा समझते हैं , तो इस सबका पता चलते ही मेरे बारे में उनकी सोच बदल जाएगी। वो यही समझेंगे कि वासना और हवस के लिए मैने ही अपनी माॅ समान भाभी को बरगलाया है या फिर ज़बरदस्ती की है उनसे। कोई मेरी बात का यकीन नहीं करेगा। बड़े भइया को तो और भी मौका मिल जाएगा मेरे खिलाफ ज़हर उगलने का।

विजय सिंह ये सब सोच सोच कर बुरी तरह परेशान व दुखी भी हो रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? वह अब किसी भी सूरत में प्रतिमा के सामने नहीं आना चाहता था। उसने तय कर लिया था कि अब वह देर रात में ही खेतों से हवेली आया करेगा और अपने कमरे में ही खाना मॅगवा कर खाया करेगा।

अगले दिन से विजय की दिनचर्या यही हो गई। वह सुबह जल्दी हवेली से निकल जाता, दोपहर में गौरी उसके लिए खाना ले जाती। गौरी उसके साथ खेतों पर दिन ढले तक रहती फिर वह हवेली आ जाती जबकि विजय सिंह देर रात को ही हवेली लौटत। गौरी कई दिन से गौर कर रही थी कि विजय सिंह कुछ दिनों से कुछ परेशान सा रहने लगा है। उसने उसकी परेशानी का पूछा भी किन्तु विजय सिंह हर बार इस बात को टाल जाता। भला वह क्या बताता उसे कि वह किस वजह से परेशान रहता है आजकल?

विजय सिंह की इस दिनचर्या से प्रतिमा को अब उसके पास जाने की तो बात ही दूर बल्कि उसे देख पाने तक को नहीं मिलता था। इस सबसे प्रतिमा बेहद परेशान व नाखुश हो गई थी। अजय सिंह भी परेशान था इस सबसे। उसकी भी कोई दाल नहीं गल रही थी। गौरी के चलते प्रतिमा को खेतों पर जाने का मौका ही नहीं मिलता था। ऐसा नहीं था कि वह जा नहीं सकती थी लेकिन वह चाहती थी कि वह जब भी खेतों पर जाए तो खेतों पर गौरी न हो बल्कि वह और विजय सिंह बस ही हों वहाॅ। ताकि वह बड़े आराम से विजय पर प्रेम बाॅण चलाए।

एक दिन प्रतिमा को मौका मिल ही गया। दरअसल सुबह सुबह जब गौरी अपने कमरे के बाथरूम में नहा रही तो फर्स पर उसका पैर फिसल गया और वह बड़ा ज़ोर से गिरी थी। जिससे उसकी कमर में असह पीड़ा होने लगी थी। इस सबका परिणाम ये हुआ कि गौरी खेतों पर विजय के लिए खाना लेकर न जा सकी बल्कि प्रतिमा को जाने का सुनहरा मौका मिल गया। प्रतिमा पहले की भाॅति ही पतली साड़ी और बिना ब्रा का ब्लाउज पहना और विजय के लिए टिफिन लेकर खेतों पर चली गई।

प्रतिमा को पता था कि ये मौका उसे बड़े संजोग से मिला है इस लिए वह इस मौके को खोना नहीं चाहती थी। उसने सोच लिया था कि आज वह विजय से अपने प्रेम के लिए कुछ न कुछ तो करेगी ही। उसके पास समय भी नहीं बचा था। बच्चों के स्कूल की छुट्टियाॅ दो दिन बाद खत्म हो रही थी।

नियति को जो मंजूर होता है वही होता है। ये संजोग था कि गौरी का पैर फिसला और उसने बिस्तर पकड़ लिया जिसके कारण प्रतिमा को खेतों में जाने का अवसर मिल गया और एक ये भी संजोग ही था कि आज खेतों पर फिर कोई मजदूर नहीं था। सारी रात जुती हुई ज़मीन पर पानी लगाया और लगवाया था उसने। सुबह नौ बजे सारे मजदूर गए थे। आज के लिए सारा काम हो गया था।

प्रतिमा जब खेतों पर पहुॅची तो हर तरफ सन्नाटा फैला हुआ पाया। आस पास कोई न दिखा उसे। वह मकान के अंदर नहीं गई बल्कि आस पास घूम घूम कर देखा उसने हर तरफ। न कोई मजदूर और ना ही विजय सिंह उसे कहीं नज़र न आए। प्रतिमा को खुशी हुई कि खेतों पर कोई मजदूर नहीं है और अब वह बेफिक्र होकर कुछ भी कर सकती है।

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मकान के अंदर जाकर जब वह कमरे में पहुॅची तो विजय को बिस्तर पर सोया हुआ पाया। उसके मुख से हल्के खर्राटों की आवाज़ भी आ रही थी। इस वक्त उसके शरीर पर नीचे एक सफेद धोती थी और ऊपर एक बनियान। वह पक्का किसान था। पढ़ाई छोंड़ने के बाद उसने खेतों पर ही अपना सारा समय गुज़ारा था। ये उसकी कर्मभूमि थी। यहाॅ पर उसने खून पसीना बहाया था। जिसका परिणाम ये था कि उसका शरीर पत्थर की तरह शख्त था। छः फिट लम्बा था वह तथा हट्टा कट्टा शरीर था। किन्तु चेहरे पर हमेशा सादगी विद्यमान रहती थी उसके। उसका ब्यक्तित्व ऐसा था कि गाॅव का हर कोई उसे प्रेम व सम्मान देता था।

प्रतिमा सम्मोहित सी देखे जा रही थी उसे। फिर सहसा जैसे उसे होश आया और एकाएक ही उसके दिमाग़ की बत्ती जल उठी। जाने क्या चलने लगा था उसके मन में जिसे सोच कर वह मस्कुराई। उसने टिफिन को बड़ी सावधानी से वहीं पर रखे एक बेन्च पर रख दिया और सावधानी से विजय की चारपाई के पास पहुॅची।[/color]


विजय चारपाई पर चूॅकि गहरी नींद में सोया हुआ था इस लिए उसे ये पता नहीं चला कि उसके कमरे में कौन आया है? प्रतिमा उसके हट्टे कट्टे शरीर को इतने करीब से देख कर आहें भरने लगी। उसने नज़र भर कर विजय को ऊपर से नीचे तक देखा। उसके अंदर काम वासना की अगन सुलग उठी। कुछ देर यूॅ ही ऑखों में वासना के लाल लाल डोरे लिए वह उसे देखती रही फिर सहसा वह वहीं फर्स पर घुटनों के बल बैठती चली गई। उसके हृदय की गति अनायास ही बढ़ गई थी। उसने विजय के चेहरे पर गौर से देखा। विजय किसी कुम्भकर्ण की तरह सो रहा था। प्रतिमा को जब यकीन हो गया कि विजय किसी हल्की आहट पर इतना जल्दी जगने वाला नहीं है तो उसने उसके चेहरे से नज़र हटा कर विजय की धोती यानी लुंगी के उस हिस्से पर नज़र डाली जहाॅ पर विजय का लिंग उसकी लुंगी के अंदर छिपा था। लिंग का उभार लुंगी पर भी स्पष्ट नज़र आ रहा था।

प्रतिमा ने धड़कते दिल के साथ अपने हाॅथों को बढ़ा कर विजय की लुंगी को उसके छोरों से पकड़ कर आहिस्ता से इधर और उधर किया। जिससे विजय के नीचे वाला हिस्सा नग्न हो गया। लुंगी के अंदर उसने कुछ नहीं पहन रखा था। प्रतिमा ने देखा गहरी नींद में उसका घोंड़े जैसा लंड भी गहरी नींद में सोया पड़ा था। लेकिन उस हालत में भी वह लम्बा चौड़ा नज़र आ रहा था। उसका लंड काला या साॅवला बिलकुल नहीं था बल्कि गोरा था बिलकुल अंग्रेजों के लंड जैसा गोरा। उसे देख कर प्रतिमा के मुॅह में पानी आ गया था। उसने बड़ी सावधानी से उसे अपने दाहिने हाॅथ से पकड़ा। उसको इधर उधर से अच्छी तरह देखा। वो बिलकुल किसी मासूम से छोटे बच्चे जैसा सुंदर और प्यारा लगा उसे। उसने उसे मुट्ठी में पकड़ कर ऊपर नीचे किया तो उसका बड़ा सा सुपाड़ा जो हल्का सिंदूरी रंग का था चमकने लगा और साथ ही उसमें कुछ हलचल सी महसूस हुई उसे। उसने ये महसूस करते ही नज़र ऊपर की तरफ करके गहरी नींद में सोये पड़े विजय की तरफ देखा। वो पहले की तरह ही गहरी नींद में सोया हुआ लगा। प्रतिमा ने चैन की साॅस ली और फिर से अपनी नज़रें उसके लंड पर केंद्रित कर दी। उसके हाॅथ के स्पर्श से तथा लंड को मुट्ठी में लिए ऊपर नीचे करने से लंड का आकार धीरे धीरे बढ़ने लगा था। ये देख कर प्रतिमा को अजीब सा नशा भी चढ़ता जा रहा था उसकी साॅसें तेज़ होने लगी थी। उसने देखा कि कुछ ही पलों में विजय का लंड किसी घोड़े के लंड जैसा बड़ा होकर हिनहिनाने लगा था। प्रतिमा को लगा कहीं ऐसा तो नहीं कि विजय जाग रहा हो और ये देखने की कोशिश कर रहा हो कि उसके साथ आगे क्या क्या होता है? मगर उसे ये भी पता था कि अगर विजय जाग रहा होता तो इतना कुछ होने ही न पाता क्योंकि वह उच्च विचारों तथा मान मर्यादा का पालन करने वाला इंसान था। वो कभी किसी को ग़लत नज़र से नहीं देखता था, ऐसा सोचना भी वो पाप समझता था। उसके बारे में वो जान चुका था कि वह क्या चाहती है उससे इस लिए वो हवेली में अब कम ही रहता था। दिन भर खेत में ही मजदूरों के साथ वक्त गुज़ार देता था और देर रात हवेली में आता तथा खाना पीना खा कर अपने कमरे में गौरी के साथ सो जाता था। वह उससे दूर ही रहता था। इस लिए ये सोचना ही ग़लत था कि इस वक्त वह जाग रहा होगा। प्रतिमा ने देखा कि उसका लंड उसकी मुट्ठी में नहीं आ रहा था तथा गरम लोहे जैसा प्रतीत हो रहा था। अब तक प्रतिमा की हालत उसे देख कर खराब हो चुकी थी। उसे लग रहा था कि जल्दी से उछल कर इसको अपनी चूत के अंदर पूरा का पूरा घुसेड़ ले। किन्तु जल्दबाजी में सारा खेल बिगड़ जाता इस लिए अपने पर नियंत्रण रखा उसने और उसके सुंदर मगर बिकराल लंड को मुट्ठी में लिए आहिस्ता आहिस्ता सहलाती रही।

प्रतिमा को जाने क्या सूझी कि वह धीरे से उठी और अपने जिस्म से साड़ी निकाल कर एक तरफ फेंक दी। इतना हीं नहीं उसने अपने ब्लाउज के हुक खोल कर उसे भी अपने जिस्म से निकाल दिया। ब्लाउज के हटते ही उसकी खरबूजे जैसी भारी चूचियाॅ उछल पड़ीं। इसके बाद उसने पेटीकोट को भी उतार दिया। अब प्रतिमा बिलकुल मादरजाद नंगी थी। उसका चेहरा हवस तथा वासना से लाल पड़ गया था।

अपने सारे कपड़े उतारने के बाद प्रतिमा फिर से चारपाई के पास घुटनों के बल बैठ गई। उसकी नज़र लुंगी से बाहर उसके ही द्वारा निकाले गए विजय सिंह के हलब्बी लंड पर पड़ी। अपना दाहिना हाॅथ बढ़ा कर उसने उसे आहिस्ता से पकड़ा और फिर आहिस्ता आहिस्ता ही सहलाने लगी। प्रतिमा उसको अपने मुह में भर कर चूसने के लिए पागल हुई जा रही थी, जिसका सबूत ये था कि प्रतिमा अपने एक हाथ से कभी अपनी बड़ी बड़ी चूचियों को मसलने लगती तो कभी अपनी चूॅत को। उसके अंदर वासना अपने चरम पर पहुॅच चुकी थी। उससे बरदास्त न हुआ और उसने एक झटके से नीचे झुक कर विजय के लंड को अपने मुह में भर लिया....और जैसे यहीं पर उससे बड़ी भारी ग़लती हो गई। उसने ये सब अपने आपे से बाहर होकर किया था। विजय का लंड जितना बड़ा था उतना ही मोटा भी था। प्रतिमा ने जैसे ही उसे झटके से अपने मुह में लिया तो उसके ऊपर के दाॅत तेज़ी से लंड में गड़ते चले गए और विजय के मुख से चीख निकल गई साथ ही वह हड़बड़ा कर तेज़ी से चारपाई पर उठ कर बैठ गया। अपने लंड को इस तरह प्रतिमा के मुख में देख वह भौचक्का सा रह गया किन्तु फिर तुरंत ही वह उसके मुह से अपना लंड निकाल कर तथा चारपाई से उतर कर दूर खड़ा हो गया। उसका चेहरा एक दम गुस्से और घ्रणा से भर गया। ये सब इतना जल्दी हुआ कि कुछ देर तक तो प्रतिमा को कुछ समझ ही न आया कि ये सब क्या और कैसे हो गया? होश तो तब आया जब विजय की गुस्से से भरी आवाज़ उसके कानों से टकराई।

"ये क्या बेहूदगी है?" विजय लुंगी को सही करके तथा गुस्से से दहाड़ते हुए कह रहा था__"अपनी हवस में तुम इतनी अंधी हो चुकी हो कि तुम्हें ये भी ख़याल नहीं रहा कि तुम किसके साथ ये नीच काम कर रही हो? अपने ही देवर से मुह काला कर रही हो तुम। अरे देवर तो बेटे के समान होता है ये ख़याल नहीं आया तुम्हें?"

प्रतिमा चूॅकि रॅगे हाॅथों ऐसा करते हुए पकड़ी गई थी उस दिन, इस लिए उसकी ज़ुबान में जैसे ताला सा लग गया था। उस दिन विजय का गुस्से से भरा वह खतरनाक रूप उसने पहली बार देखा था। वह गुस्से में जाने क्या क्या कहे जा रहा था मगर प्रतिमा सिर झुकाए वहीं चारपाई के नीचे बैठी रही उसी तरह मादरजात नंगी हालत में। उसे ख़याल ही नहीं रह गया था कि वह नंगी ही बैठी है। जबकि,,,

"आज तुमने ये सब करके बहुत बड़ा पाप किया है।" विजय कहे जा रहा था__"और मुझे भी पाप का भागीदार बना दिया। क्या समझता था मैं तुम्हें और तुम क्या निकली? एक ऐसी नीच और कुलटा औरत जो अपनी हवस में अंधी होकर अपने ही देवर से मुह काला करने लगी। तुम्हारी नीयत का तो पहले से ही आभास हो गया था मुझे इसी लिए तुमसे दूर रहा। मगर ये नहीं सोचा था कि तुम अपनी नीचता और हवस में इस हद तक भी गिर जाओगी। तुममें और बाज़ार की रंडियों में कोई फर्क नहीं रह गया अब। चली जाओ यहाॅ से...और दुबारा मुझे अपनी ये गंदी शकल मत दिखाना वर्ना मैं भूल जाऊॅगा कि तुम मेरे बड़े भाई की बीवी हो। आज से मेरा और तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं...अब जा यहाॅ से कुलटा औरत...देखो तो कैसे बेशर्मों की तरह नंगी बैठी है?"

विजय की बातों से ही प्रतिमा को ख़याल आया कि वह तो अभी नंगी ही बैठी हुई है तब से। उसने सीघ्रता से अपनी नग्नता को ढॅकने के लिए अपने कपड़ों की तरफ नज़रें घुमाई। पास में ही उसके कपड़े पड़े थे। उसने जल्दी से अपनी साड़ी ब्लाउज पेटीकोट को समेटा किन्तु फिर उसके मन में जाने क्या आया कि वह वहीं पर रुक गई।

विजय की बातों ने प्रतिमा के अंदर मानो ज़हर सा घोल दिया था। जो हमेशा उसे इज्ज़त और सम्मान देता था आज वही उसे आप की जगह तुम और तुम के बाद तू कहते हुए उसकी इज्ज़त की धज्जियाॅ उड़ाए जा रहा था। उसे बाजार की रंडी तक कह रहा था। प्रतिमा के दिल में आग सी धधकने लगी थी। उसे ये डर नहीं था कि विजय ये सब किसी से बता देगा तो उसका क्या होगा। बल्कि अब तो सब कुछ खुल ही गया था इस लिए उसने भी अब पीछे हटने का ख़याल छोंड़ दिया था।

उसने उसी हालत में खिसक कर विजय के पैर पकड़ लिए और फिर बोली__"तुम्हारे लिए मैं कुछ भी बनने को तैयार हूॅ विजय। मुझे इस तरह अब मत दुत्कारो। मैं तुम्हारी शरण में हूॅ, मुझे अपना लो विजय। मुझे अपनी दासी बना लो, मैं वही करूॅगी जो तुम कहोगे। मगर इस तरह मुझे मत दुत्कारो...देख लो मैंने ये सब तुम्हारा प्रेम पाने के लिए किया है। माना कि मैंने ग़लत तरीके से तुम्हारे प्रेम को पाने की कोशिश की लेकिन मैं क्या करती विजय? मुझे और कुछ सूझ ही नहीं रहा था। पहले भी मैंने तुम्हें ये सब जताने की कोशिश की थी लेकिन तुमने समझा ही नहीं इस लिए मैंने वही किया जो मुझे समझ में आया। अब तो सब कुछ जाहिर ही हो गया है,अब तो मुझे अपना लो विजय...मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए।"

"बंद करो अपनी ये बकवास।" विजय ने अपने पैरों को उसके चंगुल से एक झटके में छुड़ा कर तथा दहाड़ते हुए कहा__"तुझ जैसी गिरी हुई औरत के मैं मुह नहीं लगना चाहता। मुझे हैरत है कि बड़े भइया ने तुझ जैसी नीच और हवस की अंधी औरत से शादी कैसे की? ज़रूर तूने ही मेरे भाई को अपने जाल में फसाया होगा।"

"जो मर्ज़ी कह लो विजय।" प्रतिमा ने सहसा आखों में आॅसू लाते हुए कहा__"मगर मुझे अपने से दूर न करो। दिन रात तुम्हारी सेवा करूॅगी। मैं तुम्हें उस गौरी से भी ज्यादा प्यार करूॅगी विजय।"

"ख़ामोशशशश।" विजय इस तरह दहाड़ा था कि कमरे की दीवारें तक हिल गईं__"अपनी गंदी ज़ुबान से मेरी गौरी का नाम भी मत लेना वर्ना हलक से ज़ुबान खींचकर हाॅथ में दे दूॅगा। तू है क्या बदजात औरत...तेरी औकात आज पता चल गई है मुझे। तेरे जैसी रंडियाॅ कौड़ी के भाव में ऐरों गैरों को अपना जिस्म बेंचती हैं गली चौराहे में। और तू गौरी की बात करती है...अरे वो देवी है देवी...जिसकी मैं इबादत करता हूॅ। तू उसके पैरों की धूल भी नहीं है समझी?? अब जा यहाॅ से वर्ना धक्के मार कर इसी हालत में तुझे यहाॅ से बाहर फेंक दूॅगा।"

प्रतिमा समझ चुकी थी कि उसकी किसी भी बात का विजय पर अब कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं था। उल्टा उसकी बातों ने उसे और उसके अंतर्मन को बुरी तरह शोलों के हवाले कर दिया था। उसने जिस तरीके से उसे दुत्कार कर उसका अपमान किया था उससे प्रतिमा के अंदर भीषण आग लग चुकी थी और उसने मन ही मन एक फैंसला कर लिया था उसके और उसके परिवार के लिए।

"ठीक है विजय सिंह।" फिर उसने अपने कपड़े समेटते हुए ठण्डे स्वर में कहा था__"मैं तो जा रही हूं यहाॅ से मगर जिस तरह से तुमने मुझे दुत्कार कर मेरा अपमान किया है उसका परिणाम तुम्हारे लिए कतई अच्छा नहीं होगा। ईश्वर देखेगा कि एक औरत जब इस तरह अपमानित होकर रुष्ट होती है तो भविष्य में उसका क्या परिणाम निकलता है??"

प्रतिमा की बात का विजय सिंह ने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि गुस्से से उबलती हुई ऑखों से उसे देख गर वहीं मानो हिकारत से थूॅका और फिर बाहर निकल गया। जबकि बुरी तरह ज़लील व अपमानित प्रतिमा ने अपने कपड़े पहने और हवेली जाने के लिए कमरे से बाहर निकल गई। उसके अंदर प्रतिशोध की ज्वाला धधक हुई उठी थी।

हवेली पहुॅच कर प्रतिमा ने अपने पति अजय सिंह से आज विजय सिंह से हुए कारनामे का सारा व्रत्तान्त मिर्च मशाला लगा कर सुनाया। उसकी सारी बातें सुन कर अजय सिंह सन्न रह गया था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि आज इतना बड़ा काण्ड हो गया है।

"मुझे उस हरामज़ादे से अपने अपमान का प्रतिशोध लेना है अजय।" प्रतिमा ने किसी ज़हरीली नागिन की भाॅति फुंकारते हुए कहा___"जब तक मैं उससे अपमान का बदला नहीं लूॅगी तब तक मेरी आत्मा को शान्ति नहीं मिलेगी।"

"ज़रूर डियर।" अजय सिंह ने सहसा कठोरता से कहा___"तुम्हारे इस अपमान का बदला ज़रूर उससे लिया जाएगा। आज के इस हादसे से ये तो साबित हो ही गया कि वो मजदूर हमारे झाॅसे में आने वाला नहीं है। सोचा था कि सब मिल बाॅट कर खाएॅगे और मज़ा करेंगे लेकिन नहीं उस मजदूर को तो कलियुग का हरिश्चन्द्र बनना है। इस लिए ऐसे इंसान का जीवित रहना हमारे लिए अच्छी बात नहीं है। उसके रहते हम अपनी हसरतों को पूरा नहीं कर पाएॅगे प्रतिमा। वो मजदूर हमारे रास्ते का सबसे बड़ा काॅटा है। इस काॅटे को अब जड़ से उखाड़ कर फेंकना ही पड़ेगा।"

"जो भी करना हो जल्दी करो अजय।" प्रतिमा ने कहा___"मैं उस कमीने की अब शकल भी नहीं देखना चाहती कभी। साला कुत्ता मुझे दुत्कारता है। कहता था कि मैं उसकी गौरी की पैरों की धूल भी नहीं हूॅ। मुझे रंडी बोलता है। मैं दिखाऊॅगी उसे कि मेरे सामने उसकी वो राॅड गौरी कुछ भी नहीं है। उसे सबके नीचे न लेटाया तो मेरा भी नाम प्रतिमा सिंह बघेल नहीं। उसे कोठे की नहीं बल्कि बीच चौराहे की रंडी बनाऊॅगी मैं।"

"शान्त हो जाओ प्रतिमा।" अजय सिंह ने उसे खुद से लगा लिया___"सब कुछ वैसा ही होगा जैसा तुम चाहती हो। लेकिन ज़रा तसल्ली से और सोच समझ कर बनाए गए प्लान के अनुसार। ताकि किसी को किसी बात का कोई शक न हो पाए।"

"ठीक है अजय।" प्रतिमा ने कहा___"लेकिन मैं ज्यादा दिनों तक उसे जीवित नहीं देखना चाहती। तुम जल्दी ही कुछ करो।"
"फिक्र मत करो मेरी जान।" अजय ने कुछ सोचते हुए कहा___"आज से और अभी से प्लान बी शुरू। अब चलो गुस्सा थूॅको और मेरे साथ प्यार की वादियों में खो जाओ।"

ये दोनो तो अपने प्यार और वासना में खो गए थे लेकिन उधर खेतों में विजय सिंह बोर बेल के पास बने एक बड़े से गड्ढे में था। उस गड्ढे में हमेशा बोर का पानी भरा रहता था। विजय सिंह उसी पानी से भरे गड्ढे में था। उसके ऊपर बोर का पानी गिर रहा था। वह एकदम किसी पुतले की भाॅति खड़ा था। उसका ज़हन उसके पास नहीं था। बोर का पानी निरंतर उसके सिर पर गिर रहा था।

विजय सिंह के की ऑखों के सामने बार बार वही मंज़र घूम रहा था। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे अभी भी उसका लंड प्रतिमा के मुह मे हो। इस मंज़र को देखते ही उसके जिस्म को झटका सा लगता और वह ख़यालों की दुनियाॅ से बाहर आ जाता। उसका मन आज बहुत ज्यादा दुखी हो गया था। उसे यकीन नहीं आ रहा था कि उसकी सगी भाभी उसके साथ ऐसा घटिया काम कर सकती है। विजय सिंह के मन में सवाल उभरता कि क्या यहीं प्रेम था उसका?

विजय सिंह ये तो समझ गया था कि उसकी भाभी ज़रा खुले विचारों वाली औरत थी। शहर वाली थी इस लिए शहरों जैसा ही रहन सहन था उसका। कुछ दिन से उसकी हरकतें ऐसी थी जिससे साफ पता चलता था कि वह विजय से वास्तव में कैसा प्रेम करती है। किन्तु विजय सिंह को उससे इस हद तक गिर जाने की उम्मीद नहीं थी। विजय सिंह को सोच सोच कर ही उस पर घिन आ रही थी कि कितना घटिया काम कर रही थी वह।

उस दिन विजय सिंह सारा दिन उदास व दुखी रहा। उसका दिल कर रहा था कि वह कहीं बहुत दूर चला जाए। किसी को अपना मुह न दिखाए किन्तु हर बार गौरी और बच्चों का ख़याल आ जाता और फिर जैसे उसके पैरों पर ज़ंजीरें पड़ जातीं।किसी ने सच ही कहा है कि बीवी बच्चे किसी भी इंसान की सबसे बड़ी कमज़ोरी होते हैं। जब आप उनके बारे में दिल से सोचते हैं तो बस यही लगता है कि चाहे कुछ भी हो जाए पर इन पर किसी तरह की कोई पराशानी न हो।

विजय सिंह हमेशा की तरह ही देर से हवेली पहुॅचा। अन्य दिनों की अपेक्षा आज उसका मन किसी भी चीज़ में नहीं लग रहा था। उसने खुद को सामान्य रखने बड़ी कीशिश कर रहा था वो। अपने कमरे में जाकरवह फ्रेश हुआ और बेड पर आकर बैठ गया।


अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,
 
एक नया संसार ♡
अपडेट.........《 34 》

अब तक,,,,,,,,,,

विजय सिंह के की ऑखों के सामने बार बार वही मंज़र घूम रहा था। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे अभी भी उसका लंड प्रतिमा के मुह मे हो। इस मंज़र को देखते ही उसके जिस्म को झटका सा लगता और वह ख़यालों की दुनियाॅ से बाहर आ जाता। उसका मन आज बहुत ज्यादा दुखी हो गया था। उसे यकीन नहीं आ रहा था कि उसकी सगी भाभी उसके साथ ऐसा घटिया काम कर सकती है। विजय सिंह के मन में सवाल उभरता कि क्या यहीं प्रेम था उसका?

विजय सिंह ये तो समझ गया था कि उसकी भाभी ज़रा खुले विचारों वाली औरत थी। शहर वाली थी इस लिए शहरों जैसा ही रहन सहन था उसका। कुछ दिन से उसकी हरकतें ऐसी थी जिससे साफ पता चलता था कि वह विजय से वास्तव में कैसा प्रेम करती है। किन्तु विजय सिंह को उससे इस हद तक गिर जाने की उम्मीद नहीं थी। विजय सिंह को सोच सोच कर ही उस पर घिन आ रही थी कि कितना घटिया काम कर रही थी वह।

उस दिन विजय सिंह सारा दिन उदास व दुखी रहा। उसका दिल कर रहा था कि वह कहीं बहुत दूर चला जाए। किसी को अपना मुह न दिखाए किन्तु हर बार गौरी और बच्चों का ख़याल आ जाता और फिर जैसे उसके पैरों पर ज़ंजीरें पड़ जातीं।किसी ने सच ही कहा है कि बीवी बच्चे किसी भी इंसान की सबसे बड़ी कमज़ोरी होते हैं। जब आप उनके बारे में दिल से सोचते हैं तो बस यही लगता है कि चाहे कुछ भी हो जाए पर इन पर किसी तरह की कोई पराशानी न हो।

विजय सिंह हमेशा की तरह ही देर से हवेली पहुॅचा। अन्य दिनों की अपेक्षा आज उसका मन किसी भी चीज़ में नहीं लग रहा था। उसने खुद को सामान्य रखने बड़ी कीशिश कर रहा था वो। अपने कमरे में जाकरवह फ्रेश हुआ और बेड पर आकर बैठ गया।
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अब आगे,,,,,,,,,,,

वर्तमान अब आगे________

इंस्पेक्टर रितू उस हास्पिटल में पहुॅची जहाॅ पर रेप पीड़िता विधी को एडमिट किया गया था। विधी की हालत पहले से काफी ठीक थी। रितू के पहुॅचने के पहले ही विधी के परिवार वाले उससे मिल कर गए थे। इस वक्त विधी के पास उसकी माॅ गायत्री थी। गायत्री अपनी बेटी की इस हालत से बेहद दुखी थी।

रितू जब उस कमरे में पहुॅची तो उसने विधी के पास ही एक कुर्सी पर गायत्री को बैठै पाया। रितू ने औपचारिक तौर पर उससे नमस्ते किया और उसे अपने बारे में बताया। रितू के बारे में जानकर गायत्री पहले तो चौंकी फिर सहसा उसके चेहरे पर अजीब से भाव आ गए।

"मेरी बेटी के साथ जो कुछ हुआ है वो तो वापस नहीं लौट सकता बेटी।" गायत्री ने अधीरता से कहा___"ऊपर से इस सबका केस बन जाने से हमारी समाज में बदनामी ही होगी। इस लिए मैं चाहती हूॅ कि तुम ये केस वेस का चक्कर बंद कर दो। मैं जानती हूॅ कि इस केस में आगे क्या क्या होगा? वो सब बड़े लोग हैं बेटी। वो बड़े से बड़ा वकील अपनी तरफ से खड़ा करेंगे और बड़ी आसानी से केस जीत जाएॅगे। वो कुछ भी कर सकते हैं, वो तो जज को भी खरीद सकते हैं। अदालत के कटघरे में खड़ी मेरी फूल जैसी बेटी से उनका वकील ऐसे ऐसे सवाल करेगा जिसका जवाब देना इसके बस का नहीं होगा। वो सबके सामने मेरी बेटी की इज्ज़त की धज्जियाॅ उड़ाएंगे। ये केस मेरी बेटी के साथ ही एक मज़ाक सा बन कर रह जाएगा। इस लिए मैं तुमसे विनती करती हूॅ बेटी कि ये केस वेस वाला चक्कर छोड़ दो। हमें कोई केस वेस नहीं करना।"

"आप जिस चीज़ की कल्पना कर रही हैं आॅटी जी।" रितू ने विनम्रता से कहा__"मैं उस सबके बारे में पहले ही सोच चुकी हूॅ। मैं जानती हूॅ कि आप जो कह रही हैं वो सोलह आने सच है। यकीनन ऐसा ही होगा मगर, आप चिन्ता मत कीजिए आॅटी। विधी अगर आपकी बेटी है तो ये मेरी भी दोस्त है अब। इसके साथ जो कुछ भी उन लोगों ने घिनौना कर्म किया है उसकी उन्हें ऐसी सज़ा मिलेगी कि हर जन्म में उन्हें ये सज़ा याद रहेगी और वो अपने किसी भी जन्म में किसी की बहन बेटियों के साथ ऐसा करने का सोचेंगे भी नहीं।"

"बात तो वही हुई बेटी।" गायत्री ने कहा__"तुम उन्हें कानूनन इसकी सज़ा दिलवाओगी जबकि मैं जानती हूॅ कि उन लोगों के बाप लोगों के हाॅथ तुम्हारे कानून से भी ज्यादा लम्बे हैं। तुम उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगी बेटी। उल्टा होगा ये कि इस सबके चक्कर में खुद तुम्हारी ही जान का खतरा पैदा हो जाएगा।"

"मुझे अपनी जान की कोई परवाह नहीं है आॅटी।" रितू ने सहसा मुस्कुराकर कहा__"और मेरी जान इतनी सस्ती भी नहीं है जो यूॅ ही किसी ऐरे गैरे के हाॅथों शिकार हो जाएगी। खैर, मै ये कहना चाहती हूॅ कि उन लोगों को कानूनन सज़ा दिलवाने का फैसला मैने बदल दिया है।"

"क्या मतलब??" गायत्री के साथ साथ बेड पर लेटी विधी भी चौंक पड़ी थी।
"ये तो मुझे भी पता है ऑटी कि वो लोग कितने बड़े खेत की पैदाइस हैं।" रितू ने अजीब भाव से कहा___"कहने का मतलब ये कि कानूनी तौर पर यकीनन मैं उन्हें वैसी सज़ा नहीं दिला सकती जैसी सज़ा के वो लोग हक़दार हैं। इस लिए अब सज़ा अलग तरीके से दी जाएगी उन्हें। बिलकुल वैसी ही सज़ा जैसी सज़ा ऐसे नीच लोगों को देनी चाहिये।"

"तुम क्या कह रही हो बेटी मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा।" गायत्री का दिमाग़ मानो जाम सा हो गया था।
"ये सब छोंड़िये ऑटी।" रितू ने कहा__"मैं बस आपसे ये कहना चाहती हूॅ कि अगर आपसे कोई इस बारे में कुछ भी पूछे तो आप यही कहियेगा कि हमने कोई केस वगैरा नहीं किया है। ये मत कहियेगा कि मैं आपसे या विधी से मिली थी। यही बात आप विधी के डैड को भी बता दीजिएगा। मेरी तरफ से उनसे कहना कि दिल पर कोई बोझ या मलाल रखने की कोई ज़रूरत नहीं है। बहुत जल्द कुछ ऐसा उन्हें सुनने को मिलेगा जिससे उनकी आत्मा को असीम तृप्ति का एहसास होगा।"

"तुम क्या करने वाली हो बेटी?" गायत्री का दिल अनायास ही ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था, बोली___"देखो कुछ भी ऐसा वैसा न करना जिससे पुनः मेरी बेटी पर कोई संकट आ जाए।"

"आप बेफिक्र रहिए ऑटी।" रितू ने गायत्री का हाथ पकड़ कर उसे हल्का सा दबाते हुए कहा___"मैं विधी पर अब किसी भी तरह का कोई संकट नहीं आने दूॅगी। मुझे भी उसकी फिक्र है।"

गायत्री कुछ बोल न सकी बस अजीब भाव से रितू को देखती रही। बेड पर लेटी विधी का भी वही हाल था। तभी कमरे में एक नर्स आई। उसने रितू से कहा कि डाक्टर साहब उसे अपने केबिन में बुला रहे हैं। रितू नर्स की बात सुनकर गायत्री से ये कह कर बाहर निकल गई कि वह डाक्टर से मिल कर आती है अभी। कुछ ही देर में रितू डाक्टर के केबिन में उसके सामने टेबल के इस पार रखी कुर्सी पर बैठी थी।

"कहिए डाक्टर साहब।" रितू ने कहा__"किस लिए आपने बुलाया है मुझे?"
"देखो बेटा।" डाक्टर ने गंभीरता से कहा__"तुम मेरी बेटी के समान हो। मैं तुमको तुम्हारे बचपन से जानता हूॅ। ठाकुर साहब से मेरे बहुत अच्छे संबंध हैं आज भी। मुझे ये जान कर बेहद खुशी हुई है कि तुम आज पुलिस आफिसर बन गई हो। लेकिन, इस केस में जिन लोखों पर तुमने हाॅथ डालने का सोचा है या सोच कर अपना कदम बढ़ा लिया है वो निहायत ही बहुत खतरनाक लोग हैं। इस लिए मैं चाहता हूॅ कि तुम इस केस को यहीं पर छोंड़ दो। क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम पर कोई ऑच आए। तुम हमारे ठाकुर साहब की बेटी हो।"

"मैं आपके जज़्बातों की कद्र करती हूॅ डाक्टर अंकल।" रितू ने कहा___"लेकिन आप बेफिक्र रहिए मैने विधी के केस की कोई फाइल बनाई ही नहीं है अब तक। क्योंकि मुझे भी पता है कि जिनके खिलाफ केस बनाना है वो कैसे लोग हैं। इस लिए आप बेफिक्र रहिए।"

"ये तो अच्छी बात है बेटी।" डाक्टर ने खुश होकर कहा__"लेकिन तुम यहाॅ पर फिर आई किस लिए हो? अगर केस नहीं बनाया है तो तुम्हारे यहाॅ पर आने का क्या मतलब है? जबकि होना तो ये चाहिये कि तुम्हें इस सबसे दूर ही रहना चाहिए था।"

"इंसानियत नाम की कोई चीज़ भी होती है डाक्टर अंकल।" रितू ने कहा___"इसी लिए आई हूॅ यहाॅ। वरना यूॅ फारमल ड्रेस में न आती बल्कि पुलिस की वर्दी में आती।"
"चलो ठीक है।" डाक्टर ने कहा__"पर ड्रेस बदल देने से तुम्हारा काम तो नहीं बदल जाएगा न। आख़िर हर रूप में तो तुम पुलिस वाली ही कहलाओगी। अब अगर आरोपी के के आकाओं को पता चल जाए कि तुम यहाॅ हो तो वो तो यही समझेंगे कि तुम केस के सिलसिले में ही यहाॅ आई हो।"

"देखिए अंकल।" रितू ने कहा___"फारमेलिटी तो करनी ही पड़ती है। वरना पुलिस की नौकरी के साथ इंसाफ नहीं हो पाएगा। और इसी फाॅरमेलिटी के तहत अभी मुझे दिवाकर चौधरी से भी मिलने जाना है। मुझे पता है कि वो पुलिस को बहुत तुच्छ ही समझेगा। इस लिए उससे मिल कर मैं भी फौरी तौर पर यही कहूॅगी कि फाॅरमेलिटी तो करनी ही पड़ती है न सर। बाॅकी आप इस बात से बेफिक्र रहें कि आपके बेटे और उसके दोस्तों का कोई केस बनेगा। और केस भी तो तभी बनेगा न जब पीड़िता या उसके घरवाले चाहेंगे। अगर वो लोग ही केस नहीं करना चाहेंगे तो भला कैसे कोई केस बन जाएगा? मेरी इन सब बातों से वो खुश हो जाएगा अंकल। वो यही समझेगा कि उसके रुतबे और डर से पीड़िता या उसके घर वालों ने उसके खिलाफ़ केस करने की हिम्मत ही नहीं कर सके।"

"ओह आई सी।" डाक्टर ने कहा___"मगर मुझे ऐसा क्यों लगता है कि असल चक्कर कुछ और ही है जिसे तुम चलाने वाली हो या फिर चलाना शुरू भी कर दिया है।"
"ये सब छोड़िये आप ये बताइये कि आपने और किस लिए बुलाया था मुझे?" रितू ने पहलू बदल दिया।

"पुलिस की नौकरी में आते ही काफी शार्प दिमाग़ हो जाता है न?" डाक्टर मुस्कुराया फिर सहसा गंभीर होकर बोला___"बात ज़रा सीरियस है बेटी।"
"क्या मतलब?" रितू चौंकी।

"विधी की रिपोर्ट आ चुकी है।" डाक्टर ने कहा___"और रिपोर्ट ऐसी है जिसके बारे में जानकर शायद तुम्हें यकीन न आए।"
"ऐसी क्या बात है रिपोर्ट में?" रितू की पेशानी पर बल पड़े___"ज़रा बताइये तो सही।"

"विधी को ब्लड कैंसर है बेटी।" डाक्टर ने जैसे धमाका किया___"वो भी लास्ट स्टेज में है।"
"क्याऽऽऽ????" रितू बुरी तरह उछल पड़ी___"ये आप क्या कह रहे हैं अंकल?"
"यही सच है बेटी।" डाक्टर ने कहा___"वो बस कुछ ही दिनों की मेहमान है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि ये बात मैं उसके पैरेन्ट्स को कैसे बताऊॅ? एक तो वैसे भी वो अपनी बेटी की इस हालत से बेहद दुखी हैं दूसरे अगर उन्हें ये पता चल गया कि उनकी बेटी को कैंसर है और वो बस कुछ ही दिनों की मेहमान है तो जाने उन पर इसका क्या असर हो?"

रितू के दिलो दिमाग़ में अभी भी धमाके हो रहे थे। अनायास ही उसकी ऑखें नम हो गई थी। हलाॅकि विधी से उसका कोई रिश्ता नहीं था। उसने तो बस उसे दोस्त कह दिया था ताकि वह आसानी से कुछ बता सके। बाद में उसे ये भी पता चल गया कि ये वही विधी है जिससे विराज प्यार करता था। लेकिन फिर वो दोनो अलग हो गए थे। रितू के मन में एकाएक ही हज़ारों सवाल उभर कर ताण्डव करने लगे थे।

"इसके साथ ही विधी जो दो महीने की प्रेग्नेन्ट है तो उसके पेट में पनप रहे शिशु का भी पतन हो जाएगा।" डाक्टर ने कहा___"यानी एक साथ दो लोगों की जान चली जाएगी।"
"ये तो सचमुच बहुत बड़ी बात है डाक्टर अंकल।" रितू गंभीरता से बोली___"पर सोचने वाली बात है कि इतनी कम उमर में उसे ब्लड कैंसर हो गया।"

"आज कल ऐसा ऐसा सुनने को मिलता बेटा जिसकी आम इंसान तो क्या हम डाक्टर लोग भी कल्पना नहीं कर सकते।" डाक्टर ने कहा___"ख़ैर, मैंने यही बताने के लिए तुम्हें बुलाया था। अभी मुझे मिस्टर चौहान को भी इस बात की सूचना देनी होगी। वो बेचारे तो सुन कर ही गहरे सदमे में आ जाएॅगे।"

"आप सही कह रहे हैं।" रितू ने कहा___"वैसे क्या ये कैंसर वाली बात विधी को पता है??"
"पता नहीं।" डाक्टर ने कहा___"हो भी सकता है और नहीं भी।"
"अच्छा मैं चलती हूॅ अंकल।" रितू ने कुर्सी से उठते हुए कहा___"मुझे विधी से अकेले में कुछ बातें करनी है।"
"ओके बेटा।" डाक्टर ने कहा।

रितू भारी मन से डाक्टर के केबिन से बाहर निकल गई। उसे ये बात हजम ही नहीं हो रही थी कि विधी को लास्ट स्टेज का कैंसर है। उसे विधी के लिए इस सबसे बड़ा दुख सा हो रहा था। उसके मन में कई तरह की बातें चल रही थी। जिनके बारे में उसे विधी ही बता सकती थी। इस लिए वह तेज़ी से उस कमरे की तरफ बढ़ गई।

विधी के कमरे में पहुॅच कर रितू ने गायत्री से बड़े ही विनम्र भाव से कहा कि उसे विधी से अकेले में कुछ बातें करनी है। इस लिए अगर आपको ऐतराज़ न हो तो आप बाहर थोड़ी देर के लिए चले जाइये। गायत्री उसकी ये बात सुन कर कुछ पल तो उसे देखती रही फिर कुर्सी से उठ कर कमरे से बाहर चली गई। रितू ने दरवाजे की कुंडी लगा दी और फिर आ कर वह गायत्री वाली कुर्सी पर ही विधी के बेड के पास ही बैठ गई। विधी उसे बड़े ग़ौर से देख रही थी। रितू भी उसके चेहरे की तरफ देखने लगी।

"तो डाक्टर ने आपको बता दिया कि मुझे लास्ट स्टेज का कैंसर है?" विधी ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा था।
"तुम्हें कैसे पता कि डाक्टर ने मुझे किस लिए बुलाया था?" रितू मन ही मन बुरी तरह चौंकी थी उसकी बात से।

"बड़ी सीधी सी बात है।" विधी ने कहा__"जब कोई ब्यक्ति मरीज़ बन कर हास्पिटल में आता है तो उसकी हर तरह की जाॅच होती है। उसके बाद ये जान जाना कौन सी बड़ी बात है कि मुझे असल में क्या है? ये तो मैं जानती थी कि यहाॅ पर मेरी जाॅच हुई होगी और जब उसकी रिपोर्ट आएगी तो डाक्टर को पता चल ही जाएगा कि मुझे लास्ट स्टेज का कैंसर है। इस लिए जब नर्स आपको बुलाने आई तो मुझे अंदाज़ा हो गया कि डाक्टर यकीनन आपको उस रिपोर्ट के बारे में ही बताएगा। इस कमरे में आते वक्त आपके चेहरे पर जो भाव थे वो दर्शा रहे थे कि आप अंदर से कितनी गंभीर हैं मेरे बारे में जान कर। इस लिए आपसे कहा ऐसा।"

"यकीनन काबिले तारीफ़ दिमाग़ है।" रितू ने कहा___"थोड़े से सबूतों पर कैसे कड़ियों को जोड़ना है ये तुमने दिखा दिया। पुलिस विभाग में होती तो जटिल से जटिल केस बड़ी आसानी से सुलझा लेती तुम।"

"आपने तो बेवजह ही तारीफ़ कर दी।" विधी ने कहा___"जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है।"
"तो इस लिए ही तुमने मेरे भाई विराज से बेवफाई की थी?" रितू के मन में सबसे ज्यादा यही सवाल उछल रहा था___"तुमको पहले से पता था कि तुम्हें कैंसर है इस लिए तुमने ये रास्ता अपनाया। है न?"

"वि विरा...ज??" विधी का चेहरा फक्क पड़ गया। लाख कोशिशों के बाद भी उसकी ज़ुबान लड़खड़ा गई____"क कौन वि..रा..ज? आप किसकी बात कर रही हैं?"
"अब भला झूॅठ बोलने की क्या ज़रूरत है विधी।" रितू ने कहा___"मुझे बहुत अच्छी तरह पता है कि तुम मेरे भाई विराज से आज भी बेपनाह मोहब्बत करती हो। बेवफाई तो तुमने जान बूझ कर की उससे। ताकि वो तुम्हारी उस ज़िंदगी से चला जाए जो बस कुछ ही समय की मेहमान थी। उसे अपने से दूर करने का यही तरीका अपनाया तुमने। जब मेरे डैड ने उसे और उसके परिवार को हवेली से निकाल दिया तब तुम्हें भी मौका मिल गया और तुमने उसी मौके में उससे ऐसी बातें कही कि उसे तुमसे नफरत हो जाए।"

"तो और क्या करती मैं?" विधी के अंदर का बाॅध मानो ज्वारभाॅटा बन कर फूट पड़ा। वह फूट फूट कर रो पड़ी। रोते हुए ही उसने कहा___"मैं उसकी ज़िंदगी में चंद महीनों की मेहमान थी। वो मुझे इतना चाहता था कि वह मेरे बिना जीवन की कल्पना भी नहीं करता था। प्यार तो मैं भी उससे उतना ही करती थी और आज भी करती हूॅ मगर, उस प्यार से क्या हो सकता था भला? हम हमेशा साथ तो नहीं रह सकते थे न। मेरी मौत पर वह टूट जाता। मैने सोचा कि उसके अंदर से अपने प्रति चाहत निकाल दूॅ किसी तरह ताकि वो किसी और के साथ अपने जीवन में आगे बढ़ने का सोच सके। मुझे जो सही लगा वो मैने किया। मैने अपने आपको पत्थर बना लिया और उससे उस तरह की दो टूक बातें की। उसके अंदर अपने प्रति नफरत पैदा करने के लिए मैने सूरज नाम के लड़के से दोस्ती भी कर ली। मैं जानती थी कि सूरज कैसा लड़का है मगर अब मेरे पास जीवन ही कहाॅ बचा था और ना ही मुझमें जीने की चाह रह गई थी। मुझे ये भी पता है कि मेरे पेट में सूरज का ही पाप है लेकिन मुझे इसकी कोई परवाह नहीं है क्योंकि इस पाप का भी मेरे साथ ही अंत हो जाएगा। सूरज ने मेरे शरीर को भोगा मगर मेरे दिल में मेरे मन में तो हर जन्म में सिर्फ विराज ही रहेगा।"

"ये सब तो ठीक है।" रितू ने कहा___"लेकिन क्या तुमने ये नहीं सोचा कि तुम्हारे ऐसा करने से विराज किस हद तक टूट कर बिखर जाएगा? तुमने तो ये सोच कर उससे बेवफाई की कि वह किसी और के साथ जीवन में आगे बढ़ जाएगा, लेकिन ये क्यों नहीं सोचा कि अगर उसने ऐसा नहीं किया तो???"

"मैने बहुत कुछ सोचा था रितू दीदी।" विधी ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"ये दिल बड़ा ही अजीब होता है। कोई हज़ारों बार चाहे इसके साथ खिलौने की तरह खेल कर इसे टुकड़ों में बिखेर दे फिर भी ये मोहब्बत करना बंद नहीं करता। इसके अंदर हर रूप में मोहब्बत विद्यमान रहती है फिर चाहे वो नफरत के रूप में ही क्यों न हो। नफरत से पत्थर बन जाओ फिर भी मोहब्बत से पिघल जाओगे। विराज वो कोहिनूर है जिसे हर लड़की मोहब्बत करना चाहेगी और करती भी थी। मोहब्बत एक एहसास है दीदी, पत्थर भी इस एहसास से पिघल जाते हैं। आपको फिर से कब किसी से मोहब्बत हो जाए ये आपको भी पता नहीं चलेगा। मोहब्बत करने वाला पत्थर दिल में भी मोहब्बत का एहसास जगा देता है। बस यही सोच कर मैने ये सब किया था। मुझे पता था उसके जीवन में कोई न कोई ऐसी लड़की ज़रूर आ जाएगी जो अपनी मोहब्बत से उसकी नफरत को मिटा देगी और फिर से उसके टूटे हुए दिल को जोड़ कर उसे मोहब्बत करना सिखा देगी।"

"क्या पता ऐसा हुआ भी है कि नहीं?" रितू ने कहा___"क्या तुमने कभी पता करने की कोशिश की कि विराज किस हाल में है?"
"कोशिश करने का सवाल ही कहाॅ रह गया दीदी?" विधी ने कहा___"मैंने तो ये सब किया ही उससे दूर होने के लिए था। दुबारा उसके पास जाने का या ये पता करने का कि वो किस हाल में है ये सवाल ही नहीं था। क्योंकि मैने बड़ी मुश्किल से वो सब किया था, मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं अपने महबूब के उदास चेहरे को दुबारा देख पाती।"

"ख़ैर, ये बताओ कि जब तुमको पता चल गया था कि तुमको कैंसर है तो तुमने अपने माता पिता को क्यों नहीं बताया?" रितू ने पहलू बदलते हुए पूछा___"अगर बता देती तो संभव था कि तुम्हारा इलाज होता और तुम ठीक हो जाती?"

"ऐसा कुछ न होता दीदी।" विधी ने कहा__"क्योंकि मेरे पिता उस हालत में ही नहीं थे कि वो मेरा कैंसर का इलाज करवा पाते। आप तो बस यही जानती हैं कि वो बड़े आदमी हैं मगर ये नहीं जानती हैं कि उस बड़े आदमी के साथ उसके बड़े भाईयों ने कितना बड़ा अत्याचार किया है? दादा जी के मरते वक्त बड़े ताऊ ने धोखे से सारी प्रापर्टी पर उनके हस्ताक्षर करवा लिया। उसके बाद दादा जी की तेरवीं होने के बाद ही अगले दिन ताऊ और उनके दोगले भाई ने मेरे माता पिता को सारी प्रापर्टी से बेदखल कर दिया। अब आप ही बताइये कि कैसे मेरे पापा मेरा इलाज करवा सकते थे?"

रितू को समझ ही न आया कि वह क्या बोले? विधी की कहानी ही ऐसी थी कि वह बेचारी हर तरह से मजबूर थी। उसके ठीक होने का कहीं कोई चाॅस ही नहीं था।

"अगर मैं अपने कैंसर की बात पापा से बताती तो वो बेचारे बेवजह ही परेशान हो जाते।" विधी कह रही थी___"जिसकी कंपनी में लोग काम करते थे और जो खुद कभी किसी का मालिक हुआ करता था वो आज खुद किसी दूसरे की कंपनी में बीस हजार की नौकरी करता है। बीस हज़ार में अपने तीन बच्चों और खुद दोनो प्राणियों का खर्चा चला लेना सोचिये कितना मुश्किल होगा? ऐसे में वो कैसे मेरा इलाज करवा पाते? इससे अच्छा तो यही था दीदी कि मैं मर ही जाऊॅ। दो चार दिन मेरे लिए रो लेंगे उसके बाद फिर से उनका जीवन आगे चल पड़ेगा।"

"इतनी छोटी सी उमर में इतनी बड़ी सोच और इतना बड़ा त्याग किया तुमने।" रितू की ऑखों में ऑसू आ गए___"ये सब कैसे कर लिया तुमने?"

रितू ने झपट कर उसे अपने सीने से छुपका लिया। विधी को उसके गले लगते ही असीम सुख मिला। भावना में बह गई वह। वर्षों से अपने अंदर कैद वेदना को वह रोंक न पाई बाहर निकलने से। वह हिचकियाॅ ले लेकर रोने लगी थी।

"मेरी आपसे एक विनती है दीदी।" फिर विधी ने अलग होकर तथा ऑसू भरी ऑखों से कहा।
"विनती क्यों करती है पागल?" रितू का गला भर आया___"तू बस बोल। क्या कहना है तुझे?"

"मु मुझे एक बार।" विधी की रुलाई फूट गई, लड़खड़ाती आवाज़ में कहा___"मुझे बस ए एक बार वि..विरा...ज से मिलवा दीजिए। मुझे मेरे महबूब से मिलवा दीजिए दीदी। मैं उसकी गुनहगार हूॅ। मुझे उससे अपने किये की माफ़ी माॅगनी है। मैं उसे बताना चाहती हूॅ कि मैं बेवफा नहीं हूॅ। मैं तो आज भी उससे टूट टूट कर प्यार करती हूॅ। उसे बुलवा दीजिए दीदी। मेरी ख़्वाहिश है कि मेरा अगर दम निकले तो उसकी ही बाहों में निकले। मेरे महबूब की बाॅहों में दीदी। आप बुलवाएॅगी न दीदी? मुझे एक बार देखना है उसे। अपनी ऑखों में उसकी तस्वीर बसा कर मरना चाहती हूॅ मैं। अपने महबूब की सुंदर व मासूम सी तस्वीर।"

"बस कर रे।" रितू का हृदय हाहाकार कर उठा___"मुझमें इतनी हिम्मत नहीं है कि मैं तेरी ऐसी करुण बातें सुन सकूॅ। मैं तुझसे वादा करती हूॅ कि तेरे महबूब को मैं तेरे पास ज़रूर लाऊॅगी। मैं धरती आसमान एक कर दूॅगी विधि और उसे ढूॅढ़ कर तेरे सामने हाज़िर कर दूॅगी। मैं अभी से उसका पता लगाती हूॅ। तू बस मेरे आने का इंतज़ार करना।"

रितू ने कर्सी से उठ कर बेड पर लेटी विधी के माॅथे को झुक कर चूॅमा और अपने ऑसू पोंछते हुए बाहर निकल गई।
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फ्लैशबैक अब आगे_______

विजय सिंह खाना पीना खा कर अपने कमरे में लेटा हुआ था। उसके दिलो दिमाग़ से आज की घटना हट ही नहीं रही थी। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसकी माॅ समान भाभी उसके साथ इतनी गिरी हुई तथा नीचतापूर्ण हरकत कर सकती है। उसकी ऑखों के सामने वो दृश्य बार बार आ रहा था जब प्रतिमा ने उसके लंड को अपने मुह में लिया हुआ था। विजय सिंह अपनी ऑखों के सामने इस दृश्य के चकराते ही बहुत अजीब सा महसूस करने लग जाता था। उसके मन में अपनी भाभी के प्रति तीब्र घृणा और नफ़रत भरती जा रही थी।

उधर अजय सिंह और प्रतिमा को ये डर भी सता रहा था कि विजय सिंह आज की इस घटना का ज़िक्र कहीं किसी से कर न बैठे। हलाॅकि उसकी फितरत के हिसाब से उन दोनो को यही लग रहा था कि वो इस बारे में किसी से कुछ कहेगा नहीं। पर कहते हैं न कि अपराध का बोध अगर स्वयं को हो तो उसका दिमाग़ एक जगह स्थिर नहीं रह सकता। वही हाल प्रतिमा व अजय सिंह का था। दोनो ने फैसला कर लिया था कि कल ही अपने बच्चों को लेकर शहर चले जाएॅगे। जब ये घटना पुरानी हो जाएगी तो फिर उस हिसाब से देखा जाएगा।

रात को सारे कामों से फुरसत हो कर गौरी ऊपर अपने कमरे में पहुॅची। बच्चे क्योंकि अब बड़े हो गए थे इस लिए वो सब अब अलग कमरों में सोते थे। निधि हमेशा की तरह अपने भइया विराज के साथ ही सोती थी।

गौरी जब कमरे में पहुॅची तो विजय सिंह को बेड पर पड़े हुए किसी गहरी सोच में डूबा हुआ पाया। वो खद भी पिछले काफी दिनों से महसूस कर रही थी कि विजय सिंह काफी उदास व परेशान सा रहने लगा है। उसके द्वारा पूछने पर भी उसने कुछ न बताया था।

"पिछले कुछ दिनो की अपेक्षा आज कुछ ज्यादा ही परेशान नज़र आ रहे हैं आप।" गौरी ने बेड के किनारे पर बैठते हुए किन्तु विजय के चेहरे पर देखते हुए कहा___"मैं जब भी आपसे इस परेशानी की वजह पूछती हूॅ तो आप टाल जाते हैं विजय जी। क्या आप पर मेरा इतना भी हक़ नहीं कि मैं आपके मन की बातें जान सकूॅ?"

"ऐसा क्यों कहती हो गौरी?" विजय ने चौंक कर कहा था___"तुम्हारा तो मुझ पर सारा हक़ है। मेरे दिल में और मेरे मन में भी। लेकिन, कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जिन्हें अगर ज़ुबान से बाहर निकाल दी जाएॅ तो कयामत आ जाती है। तुम्हारे पूछने पर हर बार मैं टाल देता हूॅ, यकीन मानो मुझे तुम्हारी बातों का जवाब न दे पाने पर बेहद दुख होता है। पर मैं क्या करूॅ गौरी? मैं चाह कर भी वो सब तुम्हें बता नहीं सकता।"

"अगर आप बताना नहीं चाहते हैं विजय जी तो कोई बात नहीं।" गौरी ने गंभीरता से कहा___"मैं तो बस इस लिए जानना चाहती थी कि मैं आपको इस तरह उदास और परेशान नहीं देख सकती। हर वक्त सोचती रहती हूॅ कि आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसकी वजह से आपके चेहरे का वो नूर खो गया है जो इसके पहले दमकता था।"

"समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता।" विजय ने गहरी साॅस ली___"ये तो बदलता ही रहता है और बदलते हुए इस समय के साथ ही इंसान से जुड़ी हर चीज़ भी बदलने लगती है।"

"आपने कहा कि कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें अगर ज़ुबान से बाहर निकाल दी जाएॅ तो कयामत आ जाती है।" गौरी ने कुछ सोचते हुए कहा___"मेरे मन में ये जानने की तीब्र उत्सुकता जाग गई है कि ऐसी भला कौन सी बातें हैं जिनके बाहर आ जाने से कयामत आ सकती है? मैं तो आपकी धर्म पत्नी हूॅ, हमारे बीच आज तक किसी का कोई राज़ राज़ नहीं रहा फिर क्या बात है कि आज कोई बात मेरे सामने राज़ ही रख रहे हैं?"

"मैं जानता हूॅ गौरी कि जब तक तुम उस बात को जान नहीं लोगी तब तक तुम्हारे मन को शान्ति नहीं मिलेगी।" विजय सिंह ने गंभीरता से कहा___"इस लिए मैं तुम्हें वो सब बता ही देता हूॅ लेकिन उससे पहले तुम्हें मुझे एक वचन देना होगा।"

"वचन??" गौरी के माॅथे पर बल पड़ा___"कैसा वचन चाहते हैं आप मुझसे?"
"यही कि जो कुछ मैं तुम्हें बताने वाला हूॅ उस बात को कभी किसी से कहोगी नहीं।" विजय सिंह ने कहा___"वो सारी बात हम दोनो के बीच ही रहेगी। यही वचन चाहिए तुमसे।"

"ठीक है विजय जी।" गौरी ने कहा__"मैं आपको वचन देती हूॅ कि आपके द्वारा कही गई किसी भी बात का ज़िक्र मैं कभी किसी से नहीं करूॅगी।"

गौरी के वचन देने पर विजय सिंह कुछ पल तक उसे देखता रहा फिर एक लम्बी व गहरी साॅस लेकर उसने वो सब कुछ गौरी को बताना शुरू कर दिया। उसने गौरी से कुछ भी नहीं छुपाया। शुरू से लेकर आज तक की सारी राम कहानी उसने गौरी को विस्तार से बता दी। उसके मुख से ये सब बातें सुन कर गौरी की हालत किसी निर्जीव पुतले की मानिन्द हो गई। उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे उसे इन सारी बातों पर ज़रा सा भी यकीन न हो रहा हो।

"आज की इस घटना ने तो मुझे अंदर से बुरी तरह हिला कर रख दिया है गौरी।" विजय सिंह ने कहा___"समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूॅ मैं? मैं सोच भी नहीं सकता था कि वो कुलटा औरत मेरे साथ इतनी नीच और घटिया हरकत भी कर सकती थी।"

"ये सब मेरी वजह से हुआ है विजय जी।" गौरी ने नम ऑखों से कहा___"अगर मैं बीमार ना होती तो कभी भी वो औरत खेतों में आपको खाने का टिफिन देने न जा पाती। आज तो मैं खुद ही आपको खाना लेकर आने वाली थी लेकिन उसने ही मुझे जाने नहीं दिया। कहने लगी कि अभी मुझे और आराम करना चाहिये। भला मैं क्या जानती थी कि उसके मन में क्या खिचड़ी पक रही थी?"

"इसका चरित्र तो निहायत ही घटिया है गौरी।" विजय सिंह ने कहा__"ये बहुत शातिर औरत है। इसी ने मेरे भाई को अपने रूप जाल में फॅसाया रहा होगा। मेरे भइया तो ऐसे नहीं हैं। वो बस इसकी बातों में ही आ जाते हैं।"

"आपके बड़े भाई का चरित्र भी कुछ ठीक नहीं है विजय जी।" गौरी ने कहा___"हो सकता है कि आपको मेरी इस बात से बुरा लगे मगर सच्चाई तो यही है कि आपके बड़े भाई साहब खुद भी आपकी भाभी की तरह ही चरित्रहीन हैं।"

"ये क्या कह रही हो तुम गौरी?" विजय सिंह ने हैरतअंगेज लहजे में कहा___"बड़े भइया के बारे में तुम ऐसा कैसे कह सकती हो?"
"मैने आज तक आपसे उनके बारे में यही सोच कर नहीं बताया था कि आपको बुरा लगेगा।" गौरी ने कहा___"पर आज जब आपने अपनी भाभी के चरित्र का वर्णन किया तो मैंने भी आपको आपके भाई के चरित्र के बारे में बताने का सोच लिया।"

"आख़िर ऐसा क्या किया है बड़े भइया ने तुम्हारे साथ?" विजय सिंह का लहजा एकाएक ही कठोर हो गया, बोला__"मुझे सबकुछ साफ साफ बताओ गौरी।"

गौरी ने विजय सिंह को शुरू से लेकर अब तक की बात बता दी। सुन कर विजय सिंह ठगा सा बैठा रह गया बेड पर। ऑखों में आश्चर्य के साथ साथ दुख के भाव भी नुमायां हो गए थे।

"पहले मुझे लगा करता था कि ये सब शायद मेरा वहम है।" गौरी धीर गंभीर भाव से कह रही थी___"पर धीरे धीरे मुझे समझ आ गया कि ये वहम नहीं बल्कि सच्चाई है। जेठ जी की नीयत में ही खोट है। वो अपने छोटे भाई की बीवी पर ग़लत नीयत से हाॅथ डालना चाहते हैं।"

"ये सब तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया गौरी?" विजय सिंह ने कहा___"भगवान जानता है कि मैंने कभी भूल से भी अपने बड़े भाई व भाभी का कभी बुरा नहीं सोचा। बल्कि हमेशा उन्हें राम और सीता समझ कर उनका मान सम्मान किया है। मगर मुझे क्या पता है कि ये दोनो राम व सीता जैसे कभी थे ही नहीं। मैं कल ही बाबू जी से इस बारे में बात करूॅगा। ये कोई मामूली बात नहीं है जिसे चुपचाप सहन करते रहें। हमारे आदर सम्मान देने को वो लोग हमारी कमज़ोरी समझते हैं। मगर अब ऐसा नहीं होगा। माॅ बाबू जी को इस बात का पता तो चलना ही चाहिए कि उनका बड़ा बेटा और बड़ी बहू कैसी सोच रखते हैं?"

"नहीं विजय जी।" गौरी बुरी तरह घबरा गई थी, बोली___"भगवान के लिए शान्त हो जाइये। आप ये सब माॅ बाबू जी से बिलकुल भी नहीं बताएॅगे। बड़ी मुश्किल से तो उन्हें ऐसा दिन देखने को मिला है जब उनके बड़े बेटे और बहू खुशी खुशी हम सबसे मिल जुल रहे हैं। इस लिए आप ये सब उनसे बताकर उन्हें फिर से दुखी नहीं करेंगे।"

"क्यों न बताऊॅ गौरी?" विजय सिंह ने आवेश में कहा___"ये ऐसी बात नहीं है जो अगले दिन खत्म हो जाएगी बल्कि ऐसी है कि ये आगे चलती ही रहेगी। जब किसी का मन इन बुरी चीज़ों से भर जाता है तो वो ब्यक्ति किसी के लिए फिर अच्छा नहीं सोच सकता। अभी तो ये शुरूआत है गौरी। जब आज ये हाल है तो सोचो आगे कैसे हालात होंगे?"

"सब ठीक हो जाएगा विजय जी।" गौरी ने समझाने वाले भाव से कहा___"आप बस उनसे दूर रहियेगा। माॅ बाबूजी से आप इस सबका ज़िक्र नहीं करेंगे।"
"ज़िक्र तो होगा गौरी।" विजय सिंह ने निर्णायक भाव से कहा___"अब तो रात काफी हो गई है वरना अभी इस बात का ज़िक्र होता। मगर सुबह सबसे पहले इसी बात का ज़िक्र होगा।"

"आप ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे।" गौरी ने कहा___"आपको हमारे राज की कसम है विजय जी आप माॅ बाबू जी से उनके बारे में कुछ भी नहीं कहेंगे।"
"मेरे बेटे की कसम देकर तुमने ये ठीक नहीं किया गौरी।" विजय सिंह असहाय भाव से कहा था।

"मुझे माफ कर दीजिए विजय जी।" गौरी ने नम ऑखों से कहा___"पर आपको भी तो सोचना चाहिए था न। सोचना चाहिये था कि इस सबसे माॅ बाबू जी पर क्या गुज़रेगी जब उन्हें ये पता चलेगा कि उनका बड़ा बेटा और बड़ी बहू क्या करतूत कर रहे हैं?"

विजय सिंह कुछ न बोला बल्कि बेड पर एक तरफ करवॅट लेकर लेट गया। गौरी को समझते देर न लगी कि विजय सिंह उससे नाराज़ हो गया है। आज जीवन में पहली बार ऐसा हुआ था कि विजय सिंह गौरी से नाराज़ हो गया था।

कुछ देर गौरी उसे एकटक देखती रही फिर वह भी उसके बगल में लेट गई। ऑखों में ऑसू थे और मन में बस एक ही बात कि मुझे माफ कर दीजिए विजय जी।

सुबह जब[color=rgb(179,] गौरी की नीद खुली तो बगल में विजय सिंह को न पाया उसने। वह समझ गई कि हर दिन की तरह विजय सिंह खेतों पर चले गए हैं। मगर तुरंत ही उसे रात की बायों का ख़याल आया। वह एकदम से हड़बड़ा गई। उसे आशंका हुई कि विजय सिंह कहीं अपनी कसम तोड़ कर माॅ बाबू जी से वो सब बताने तो नहीं चले गए? ये सोच कर गौरी झट से बेड से उठी। अपनी सारी को दुरुस्त करके वह बिना हाॅथ मुॅह धोए ही कमरे से बाहर निकल गई।

नीचे आकर देखा तो सब कुछ सामान्य था। उसे कहीं पर भी कुछ महसूस न हुआ कि जैसे कुछ बात हुई हो। ये देख कर उसने राहत की साॅस ली। मन में खुशी के भाव भी जागृत हो गए, ये सोच कर कि विजय जी ने बेटे की कसम नहीं तोड़ी।

हवेली के मुख्य द्वार की तरफ जाकर उसने बाहर लान में देखा तो चौंक पड़ी। बाहर अजय सिंह प्रतिमा व उसके बच्चे सब कार में बैठ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे वो लोग शहर जा रहे हों। गौरी को समझते देर न लगी कि वो लोग इतना जल्दी क्यों यहाॅ से शहर जा रहे हैं। हर बार तो ऐसा होता था कि जब भी उसके जेठ व जेठानी शहर जाते थे तब वह उनके पाॅव छूकर आशीर्वाद लेती थी। मगर आज उसने ऐसा नहीं किया। बल्कि दरवाजे से तुरंत ही पलट गई वह, ताकि किसी की नज़र न पड़े उस पर। जेठ जेठानी के लिए उसके मन में नफरत व घृणा सी भर गई थी अचानक। वह पलटी और वापस अपने कमरे की तरफ बढ़ गई।[/color]

अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,,,
 
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.........《 35 》

अब तक,,,,,,,,,,,,

सुबह जब गौरी की नीद खुली तो बगल में विजय सिंह को न पाया उसने। वह समझ गई कि हर दिन की तरह विजय सिंह खेतों पर चले गए हैं। मगर तुरंत ही उसे रात की बायों का ख़याल आया। वह एकदम से हड़बड़ा गई। उसे आशंका हुई कि विजय सिंह कहीं अपनी कसम तोड़ कर माॅ बाबू जी से वो सब बताने तो नहीं चले गए? ये सोच कर गौरी झट से बेड से उठी। अपनी सारी को दुरुस्त करके वह बिना हाॅथ मुॅह धोए ही कमरे से बाहर निकल गई।

नीचे आकर देखा तो सब कुछ सामान्य था। उसे कहीं पर भी कुछ महसूस न हुआ कि जैसे कुछ बात हुई हो। ये देख कर उसने राहत की साॅस ली। मन में खुशी के भाव भी जागृत हो गए, ये सोच कर कि विजय जी ने बेटे की कसम नहीं तोड़ी।

हवेली के मुख्य द्वार की तरफ जाकर उसने बाहर लान में देखा तो चौंक पड़ी। बाहर अजय सिंह प्रतिमा व उसके बच्चे सब कार में बैठ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे वो लोग शहर जा रहे हों। गौरी को समझते देर न लगी कि वो लोग इतना जल्दी क्यों यहाॅ से शहर जा रहे हैं। हर बार तो ऐसा होता था कि जब भी उसके जेठ व जेठानी शहर जाते थे तब वह उनके पाॅव छूकर आशीर्वाद लेती थी। मगर आज उसने ऐसा नहीं किया। बल्कि दरवाजे से तुरंत ही पलट गई वह, ताकि किसी की नज़र न पड़े उस पर। जेठ जेठानी के लिए उसके मन में नफरत व घृणा सी भर गई थी अचानक। वह पलटी और वापस अपने कमरे की तरफ बढ़ गई।
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अब आगे,,,,,,,,,,,
वर्तमान अब आगे________

रितू विधी से मिलने के बाद शाम को अपने घर हवेली पहुॅची। विधी की कहानी और उसकी बातों ने उसे सच में अंदर तक हिला दिया था। वह प्यार मोहब्बत जैसी चीज़ों को बकवास ही मानती थी। किन्तु विधी से मिलने के बाद उसे इस प्यार मोहब्बत की अहमियत समझ आई थी। उसे समझ आया कि कैसे लोग किसी के प्यार में इस क़दर पागल से हो जाते हैं कि अपने महबूब की खुशी के लिए वो कोई भी काम किस हद से बाहर तक कर सकते हैं। विधी से मिलकर और उसके प्यार की सच्चाई व गहराई को जानकर उसे एहसास हुआ कि आज के युग में भी अभी ऐसे लोग हैं जो प्यार के लिए क्या नहीं कर डालते?

विधी की हालत और उसके प्यार की दास्तां ने रितू के अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया था। एक तेज़ तर्रार लड़की जो खुद को किसी भी मामले में लड़कों से कम नहीं समझती थी आज विधी की असलियत ने उसके दिल को छू लिया था। उसके हृदय में विधी के प्रति पीड़ा जाग गई थी और जिस पीड़ा ने उसकी ऑखों से ऑसू छलका दिये थे।

वह आज तक नहीं समझ पाई और ना ही कभी समझने की कोशिश की कि क्यों वह अपने चाचा चाची के लड़के विराज से नफ़रत करती थी? क्यों उसने कभी उससे बात करना ज़रूरी नहीं समझा? क्यों उसने हमेशा विराज को अपना भाई नहीं समझा? आख़िर क्या अपराध किया था उसने उसके साथ? जहाॅ तक उसे याद था जब कभी भी विराज उससे बात किया था तो बड़ी इज्ज़त से किया था। हमेशा उसे दीदी और आप कह कर संबोधित करता था।

विधी से मिलने के बाद रितू हवेली में जाकर सीधा अपने कमरे में बेड पर लेट गई थी। उसकी माॅ ने तथा उसकी छोटी बुआ नैना ने उससे बात करना चाहा था मगर उसने सबको ये कह कर अपने पास से वापस लौटा दिया था कि वह कुछ देर अकेले रहना चाहती है।

बेड पर पड़ी हुई रितू ऊपर छत के कुंडे पर लगे हुए पंखे को घूर रही थी अपलक। उसकी ऑखों के सामने विधी का वो रोता बिलखता हुआ चेहरा और उसकी वो करुण बातें घूम रही थी।

"मेरी आपसे एक विनती है दीदी।" फिर विधी ने अलग होकर तथा ऑसू भरी ऑखों से कहा।
"विनती क्यों करती है पागल?" रितू का गला भर आया___"तू बस बोल। क्या कहना है तुझे?"

"मु मुझे एक बार।" विधी की रुलाई फूट गई, लड़खड़ाती आवाज़ में कहा___"मुझे बस ए एक बार वि..विरा...ज से मिलवा दीजिए। मुझे मेरे महबूब से मिलवा दीजिए दीदी। मैं उसकी गुनहगार हूॅ। मुझे उससे अपने किये की माफ़ी माॅगनी है। मैं उसे बताना चाहती हूॅ कि मैं बेवफा नहीं हूॅ। मैं तो आज भी उससे टूट टूट कर प्यार करती हूॅ। उसे बुलवा दीजिए दीदी। मेरी ख़्वाहिश है कि मेरा अगर दम निकले तो उसकी ही बाहों में निकले। मेरे महबूब की बाॅहों में दीदी। आप बुलवाएॅगी न दीदी? मुझे एक बार देखना है उसे। अपनी ऑखों में उसकी तस्वीर बसा कर मरना चाहती हूॅ मैं। अपने महबूब की सुंदर व मासूम सी तस्वीर।"

"बस कर रे।" रितू का हृदय हाहाकार कर उठा___"मुझमें इतनी हिम्मत नहीं है कि मैं तेरी ऐसी करुण बातें सुन सकूॅ। मैं तुझसे वादा करती हूॅ कि तेरे महबूब को मैं तेरे पास ज़रूर लाऊॅगी। मैं धरती आसमान एक कर दूॅगी विधि और उसे ढूॅढ़ कर तेरे सामने हाज़िर कर दूॅगी। मैं अभी से उसका पता लगाती हूॅ। तू बस मेरे आने का इंतज़ार करना।"

ये सब बातें रितू की ऑखों के सामने मानो किसी चलचित्र की तरह बार बार चलने लगती थी। जितनी बार ये दृष्य उसकी ऑखों के सामने से गुज़रता उतनी बार रितू के अंदर एक हूक सी उठती और उसके समूचे अस्तित्व को हिला कर रख देती।

"क्या सचमुच प्यार ऐसा होता है विधी?" रितू ने सहसा करवॅट बदल कर मन ही मन में कहा___"क्या सचमुच प्यार में लोग अपने महबूब की खुशी के लिए इस हद से बाहर तक गुज़र जाते हैं? तुम्हें देख कर और तुम्हारी बातें सुन कर तो ऐसा ही लगता है विधी। तुम सच में बहुत महान हो विधी। मेरे उस भाई से तुमने इस हद तक प्यार किया जिस भाई से मैं बात तक करना अपनी शान के खिलाफ़ समझती थी। और एक वो था कि हमेशा मुझे इज्ज़त देता था, मुझे दीदी कहते हुए उसका मुह नहीं थकता था। जब भी वो मुझसे बात करने की कोशिश करता तो हर बार मैं उसे दुत्कार देती थी। मुझे याद है विधी, जब मैं उसे दुत्कार कर भगा देती थी तब उसकी ऑखों में ऑसू होते थे। जिन्हें वह ऑखों से छलकते नहीं देता था बल्कि उन्हें ऑखों में ही जज़्ब कर लेता था। मैने तेरे विराज को बहुत दुख दिये हैं विधी। हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।"

एकाएक ही रितू की ऑखों से ऑसू छलक कर उसके कपोलों को भिगोने लगे। सहसा जैसे उसे कुछ याद आया। वह तुरंत ही बेड से उठी और तेज़ी से बगल में दीवार से सटी हुई आलमारी के पास पहुॅची। उसने आलमारी का हैण्डल घुमाया लेकिन वो न घूमा। मतलब साफ था कि आलमारी लाॅक थी।

रितू दूसरी साइड रखे एक टेबल की तरफ बढ़ी और उसकी कबड को खोल कर उसमें से एक चाभी का गुच्छा निकाला। गुच्छा लेकर वह तुरंत आलमारी के पास वापस पहुॅची और गुच्छे से एक चाभी को चुन कर उसने आलमारी के की-होल पर डाल कर घुमाया। आलमारी एकदम से अनलाॅक हो गई। रितू ने हैण्डल पकड़ कर घुमाया और फिर आलमारी के दोनो फटकों को दोनो साइड खोल दिया।

आलमारी के अंदर कई सारे पार्ट्स थे जिनमें कुछ पर कपड़े व कुछ पर कुछ किताबें व फाइलें रखी हुई थी। किन्तु रितू की नज़र उन सब पर नहीं बल्कि आलमारी के अंदर मौजूद एक और लाॅकर पर थी। उसने एक दूसरी चाभी से उस लाकर को खोला। उसके अंदर भी कुछ काग़जात जैसे ही थे। एक प्लास्टिक का डिब्बा था। रितू ने उन काग़जातों को एक ही बार में सारा का सारा बाहर निकाल लिया।

उन सबको निकाल कर वह पलटी और बेड पर उन सभी काग़जातों को फैला दिया। उनमें कुछ रसीदें थी, कुछ एग्रीमेंट जैसे काग़जात थे और कुछ लिफाफे थे। रितू ने झट से एक लिफाफा उठा लिया। उसे खोल कर देखा तो उसमें कुछ फोटोग्राफ्स थे। रितू ने लिफाफे से सारे फोटोग्राफ्स निकाल लिये और फिर एक एक कर देखने लगी। पाॅच छः फोटोग्राफ्स को देखने के बाद रितू एक दम से रुक गई। एक फोटोग्राफ्स पर उसकी नज़र जैसे गड़ सी गई थी। कुछ देर देखने के बाद उसने बाॅकी सारे फोटोग्राफ्स को बेड पर गिरा दिया और बस एक फोटोग्राफ्स को लिए वह बेड पर एक साइड बैठ गई।

फोटोग्राफ्स में उसके माॅम डैड, नीलम, शिवा एवं वह खुद भी थी। किन्तु रितू की नज़र उन सबके पीछे कुछ दूरी पर खड़े विराज पर टिकी हुई थी। ये फोटोग्राफ्स कुछ साल पहले का था। हवेली में कोई कार्यक्रम था तब ही शहर से किसी फोटोग्राफर को बुलवाया गया था और ये तस्वीरें खींची गई थी। अन्य तस्वीरों में बाॅकी सबकी तस्वीरें थी लेकिन विजय सिंह गौरी व उनके बच्चों की कोई तस्वीरें नहीं थी। इस तस्वीर में भी ग़लती से ही विराज की फोटो आ गई थी। रितू को याद आया कि शिवा बार बार विराज से इस बात पर लड़ पड़ता था कि वो उसके साथ फोटो न खिंचवाए। मगर उत्सुकतावश वो आ ही जाता था।

"वि..राज मेरे भाई।" रितू ने अपने एक हाॅथ से तस्वीर में विराज के चेहरे पर हाॅथ फेरा। उसकी ऑखों से ऑसू बह चले, बोली__"मैं जानती हूॅ कि तुझे भाई कहने का भी मुझे कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। मगर बस एक बार मुझे मिल जा भाई। अपनी इस दीदी के लिए नहीं बल्कि अपनी उस विधी के लिए जिसे तू आज भी उतना ही प्यार करता होगा मैं जानती हूॅ। मुझे पता है कि आज भी अगर तू मुझे मिल जाए तो तू मुझे उतनी ही इज्ज़त से के साथ दीदी कहेगा जैसे पहले कहा करता था। और सच कहूॅ तो मुझे नाज़ है तुझ पर कि मेरा भाई है। एक मेरा है जिसने मुझे इज्ज़त तो दी लेकिन उसकी उस इज्ज़त में भी कितनी इज्ज़त होती है ये मुझसे बेहतर भला और कौन जानता होगा भाई। पर ये तो मेरी सोच और मेरे नसीब की बात है मेरे भाई कि जिसने मुझे सच में इज्ज़त दी उसे मैने हमेशा दुत्कारा और जिसकी इज्ज़त में भी गंदगी भरी थी उसे अपने सीने से लगा कर भाई कहा। ख़ैर, ये सब छोड़ भाई। ये बता कि कहाॅ है तू? मुम्बई में ऐसी कौन सी जगह पर है जहाॅ से मुझे तेरा पता मिल जाए? मैने तेरी विधी से वादा किया है भाई कि मैं उसके सामने तुझे ले आऊॅगी। इस लिए भाई मुझे किसी तरह से मिल जा।"

रितू उस तस्वीर से जाने क्या क्या कहे जा रही थी मगर भला वो तस्वीर उसको विराज का पता कैसे बताती?

"मैने कभी इस बात पर ग़ौर नहीं किया भाई कि क्यों मेरे अंदर तेरे लिए ये नफ़रत थी? क्यों मैं तुझसे हमेशा मुह मोड़ लेती थी?" रितू करुण भाव से कह रही थी___"इसकी वजह शायद ये हो सकती है कि बचपन से ही मेरे माॅम डैड ने मुझे और मेरे भाई बहनों को तुझसे और तेरे माता पिता व बहन से दूर ही रहने की शिक्षा दी। वो हमेशा हमें यही बताते थे कि तुम लोग अच्छे लोग नहीं हो। बचपन से हमें यही सब सिखाया पढ़ाया गया था भाई, इस लिए हम भी उनके कहे अनुसार तुम लोगो से दूर ही रहे। और जब चाची पर वो सब इल्जाम लगा और उन्हें हवेली से निकाल दिया गया तो हम बच्चों के मन में और भी ये बात बैठ गई कि तुम लोग वाकई में अच्छे लोग नहीं हो। मगर आज जब मैंने विधी से उसके और तुम्हारे प्यार के बारे में जाना तो जाने क्यों ऐसा लगा कि तुम उतने बुरे तो नहीं हो सकते मेरे भाई जितना कि आज तक हम तुम्हें समझते आ रहे थे। अगर होते तो कोई भी लड़की तुम्हारे लिए प्यार में इस हद तक अपनी कुर्बानी नहीं देती। इंसान की बुराई कभी किसी से नहीं छिपती भाई। अगर तुम वास्तव में बुरे होते तो क्या ये बात विधी को कभी पता न चलती? ज़रूर चलती भाई, मगर ऐसा नहीं था। वो पागल तो कह रही है कि वो तुम्हारी ही बाॅहों में अपनी आख़िरी साॅस लेना चाहती है। आख़िर कुछ तो खूबी होगी ही न तुझमें भाई। मैने कभी तुझे समझा ही नहीं भाई...मुझे माफ़ कर दे विराज।"

रितू उस तस्वीर को अपने सीने से लगा कर रोए जा रही थी। इस वक्त उसे इस हालत में देख कर कोई नहीं कह सकता था कि ये वही तेज़ तर्रार रितू है जो अकेले चार चार हट्टे कट्टे लड़कों धूल चटा देती है। हौंसले ऐसे बुलंद कि आसमान की बुलंदी भी क्या चीज़ है।

तभी उसका मोबाइल बजा। उसने देखा बेड के एक साइड पर रखे आईफोन की स्क्रीन पर कोई नम्बर फ्लैश कर रहा था। रितू ने फोन उठाया और काल रिसीव कर उसे कनपटी से सटा कर कहा___"हैलो।"

"..............." उधर से कुछ कहा गया।
"ये क्या कह रहे हो तुम?" रितू के चेहरे पर चेहरे पर चौंकने वाले भाव थे।
"..............." उधर से फिर कुछ कहा गया।
"पूरी बात बताओ साफ साफ।" रितू ने कहा।
".............." उधर से कुछ देर तक बताया गया।
"ओह चलो ठीक है।" रितू ने कहा__"तुमने बहुत अच्छा काम किया है। अब एक काम और तुम्हें दे रही हूॅ। और वो काम क्या है ये तुम्हें तुम्हारे फोन पर मेरे द्वारा भेजे गए मैसेज से पता चल जाएगा। सारे काम छोंड़ कर तुम्हें ये काम करना है। तुम्हारे पास सिर्फ और सिर्फ आज रात बस का समय है। कल मार्निंग में मेरी ऑख तुम्हारे फोन करने पर ही खुले। ये बात भूलना मत।"

रितू ने कहा और फोन काट दिया। उसने बेड पर बिखरे हुए काग़जातों की तरफ देखा और फिर उसकी नज़र विराज वाली तस्वीर पर पड़ी। उस तस्वीर को एक तरफ रख कर बाॅकी सारी चीज़ें उसने उठा कर वापस उसी लाॅकर के अंदर रख दी और आलमारी बंद कर दी। विराज वाली तस्वीर को तकिये के नीचे सरका वह बेड से नीचे उतरी और अपने कपड़े उतारने लगी। कुछ ही देर में वह सिर्फ पैन्टी और ब्रा में थी। कपड़े उतारने में उसे थोड़ी तक़लीफ हुई थी। क्योंकि पीठ पर चाकू का लछा चीरा आज ही का तो था। वह ब्रा पैन्टी में किसी हालीवुड की सुपर माॅडल से कम नहीं लग रही थी। उसने तुरंत ही बाथरूम की तरफ रुख़ किया। बाथरूम से फ्रेश होने के बाद वह पुनः कमरे में आई और दूसरे कपड़े पहन कर वह कमरे से बाहर निकल गई। बेड से मोबाइल फोन उठाना नहीं भूली थी वह। पीछे साइड कमर में सर्विस रिवाल्वर छुपा हुआ था उसके।

कुछ ही देर में वह डायनिंग हाल में पहुॅच कर एक कुर्सी पर बैठ गई।
"माॅम अगर खाना रेडी हो तो जल्दी से दे दीजिए मुझे।" उसने किचेन की तरफ मुह करके ज़रा ऊॅची आवाज़ में कहा था।
"बस दो मिनट बेटी।" किचेन से प्रतिमा की आवाज़ आई।

ठीक दो मिनट बाद ही रितू के सामने बड़ी सी टेबल पर एक थाली रख दी गई। थाली लाने वाली नैना थी।
"तो अकेले रहने से उकता गई हमारी पुलिस वाली रितू बेटी?" नैना ने ज़रा मुस्कुराते हुए कहा था।

"कुछ चीज़ों के लिए तन्हाॅई सबसे अच्छी होती है बुआ।" रितू ने रोटी का एक निवाला तोड़ते हुए कहा___"अगर यही तन्हाई हमें काटती है तो यही तन्हाई कभी कभी हमें बड़ा सुकून भी देती है।"

"ओहो क्या बात कही है तुमने।" नैना ने हैरानी से कहा___"इतनी गहरी बात यूॅ ही तो तुम्हारे दिमाग़ में नहीं आई होगी? आई नो कुछ तो वजह है इसकी। इस लिए अगर उचित समझो तो अपनी इस बुआ को बताओ फिर।"

"ज़रूर बताऊॅगी बुआ।" रितू ने अजीब भाव से कहा___"पर आज नहीं। पहले मैं खुद भी तो इसकी वजह समझ लूॅ। आख़िर मुझे भी तो समझ आए कि इतनी गहरी बात मेरे दिमाग़ में आई कैसे? क्योंकि ये सब बातें तो उनके ही दिमाग़ में आती हैं जो ज़रा गंभीर तबीयत का होता है फिर सबसे अलग रहना पसंद करता है।"

"ओहो अनादर वन।" नैना मुस्कुराई___"सच सच बता किसी लड़के से कोई चक्कर वक्कर तो नहीं चल गया? वैसे जहाॅ तक मैं तुझे समझती हूॅ तो ऐसा प्वासिबल है नहीं। कोई पागल ही होगा जो तुमसे प्यार का राग अलापेगा। वरना अपने हाॅथ पैर की हड्डियाॅ तो सबको प्यारी ही होती हैं।"

"व्हाट डू यू मीन बुआ?" रितू की ऑखें फैल गई___"मतलब आप ये समझती हैं कि मैं कोई बैंडिड क्वीन हूॅ जो किसी की भी हड्डियाॅ तोड़ दूॅगी?"
"अरे तुम तो नाराज़ हो गई मेरी डाल।" नैना ने हॅस कर कहा___"मेरा वो मतलब नहीं था रे। आई वाज जस्ट किडिंग डियर।"

"कोई बात बेवजह ही मुख से नहीं निकला करती बुआ।" रितू सहसा गंभीर हो गई__"हर बात के पीछे उसका कोई न कोई मतलब भी छिपा होता है। और ये बात भी आपने मेरे कैरेक्टर को देख कर ही कही है। मैं मानती हूॅ बुआ कि मुझे लड़के लड़कियों के बीच की ये चोंचलेबाज़ी शुरू से ही पसंद नहीं थी मगर ये भी सच है बुआ कि मेरे सीने में भी एक दिल है। जो धड़कना जानता है। उसको भी ये एहसास होता है कि प्यार क्या है और नफ़रत क्या है?"

नैना कुछ बोल न सकी बल्कि आश्चर्य से रितू को देखती रह गई। उसे अहसास हुआ कि उसकी बड़ी भतीजी आज गंभीर है। और शायद बहुत ज्यादा गंभीर है। पर किस लिए ये उसे समझ न आया।

"क्या बातें हो रही हैं बुआ भतीजी के बीच ज़रा मुझे भी बताओ?" प्रतिमा ने किचेन से आते हुए कहा था।
"कुछ नहीं माॅम।" रितू ने सहसा सामान्य होकर कहा___"बुआ पूछ रही थी कि अब रात में मैं कहाॅ जा रही हूॅ?"

"क्या???" प्रतिमा तो चौंकी ही लेकिन नैना उससे ज्यादा चौंकी थी, जबकि प्रतिमा ने कहा___"तुम इस वक्त अब कहाॅ जा रही हो?"
"कुछ ज़रूरी काम है माॅम।" रितू ने सामान्य भाव से कहा___"आप तो जानती हैं कि पुलिस की नौकरी में किसी भी वक्त कहीं भी जाना पड़ जाता है।"

"मुझे तो तुम्हारा ये पुलिस की नौकरी करना शुरू से ही नापसंद था बेटी।" प्रतिमा ने बुरा सा मुह बना कर कहा__"मगर मेरी बात मानता ही कौन है यहाॅ? जिसे जो करना है करे।"
"शुरू से आपकी और डैड की बात मानते ही तो आ रहे हैं माॅम।" रितू के मुह से जाने ये कैसे निकल गया__"अब अगर एक काम मैने अपनी खुशी से कर लिया तो क्यों ऐतराज़ हो गया आपको?"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" प्रतिमा ने हैरानी से ऑखें फैला कर कहा___"और ये किस लहजे में बात कर रही हो तुम? दिमाग़ तो सही है ना तुम्हारा?"
"पता नहीं माॅम।" रितू ने हाॅथ धोते हुए अजीब भाव से कहा___"कभी कभी सोचती हूॅ कि इसी हवेली के अंदर कभी परिवार के सारे लोग कितना हॅसी खुशी से रहा करते थे। मगर जाने ऐसा क्या हो गया कि आज इस हवेली में सिर्फ हम रह गए। बाॅकियों को ये ज़मीन खा गई या फिर आसमान निगल गया कुछ समझ ही नहीं आया आजतक?"

"आज ये क्या हो गया है तुझे?" प्रतिमा की हवा निकल गई थी अंदर ही अंदर, बोली__"ये कैसी फालतू की बातें कर रही है तू?"
"कमाल है न माॅम?" रितू ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"आज आपको अपनी ही बेटी की बात फालतू लग रही है। सुना है कि कोई अगर ग़लती कर दे तो उसे आख़िर में माफ़ ही कर दिया जाता है। मगर कुछ ऐसे भी बेचारे बदनसीब होते हैं जिनको कोई माफ़ भी नहीं करता। सुना तो ये भी है माॅम कि परिवार अगर किसी कारण से एक दूसरे से अलग हो जाता है या बिखर जाता है तो परिवार के मुखिया हर संभव यही प्रयास करता है कि उसका बिखरा हुआ परिवार फिर से जुड़ जाए। कदाचित तभी एक सच्चे मुखिया के दिल को सुकून मिलता है। कहते हैं कि हर परिवार के बीच कभी न कभी कोई न कोई अनबन हो ही जाती है मगर उसका मतलब ये तो नहीं होता न कि फिर उनसे हर रिश्ता ही तोड़ लिया जाए? या फिर उस अनबन को दूर ही न किया जाए।"

"तू आख़िर कहना क्या चाहती है?" प्रतिमा ने तीखे भाव से कहा___"क्या चल रहा है तेरे मन में? अगर कोई बात है तो उसे साफ साफ कह। यूॅ घुमा फिरा कर कहने का क्या मतलब है तेरा?"

"जाने दीजिए माॅम।" रितू कुर्सी से उठते हुए बोली___"मैं क्या कह रही हूॅ वो आप समझ तो गई ही हैं न? फिर साफ साफ कहने की क्या ज़रूरत है? ख़ैर चलती हूॅ माॅम। बाय डियर बुआ जी।"
"बाय बेटा।" नैना ने रुॅधे हुए गले से कहा। उसकी ऑखों में ऑसू तैर रहे थे।

"पुलिस की नौकरी क्या करने लगी इसका सारा दिमाग़ ही ख़राब हो गया है।" प्रतिमा भुनभुनाते हुए टेबल से थाली उठाते हुए कहा___"पता नहीं कहाॅ से ऐसी बेकार की बातें सीख कर आती है ये?"

"सच ही तो कह रही थी वो।" नैना ने गंभीरता से कहा___"भला ऐसा किस परिवार में होता है भाभी कि अगर परिवार में किसी से कोई ग़लती हो जाए तो उसे कभी माफ़ ही न किया जाए? कितनी खुशियाॅ थी इस घर में। हम सब कितना हॅसी खुशी से रहते थे सबके साथ। परिवार में सबकी एकता को देख कर माॅ बाबूजी कितना खुश थे। मगर आज इस घर में न वो खुशियाॅ हैं और न ही खुशियाॅ फैलाने वाला परिवार का कोई बाॅकी सदस्य। विजय भइया की मौत क्या हुई मानो इस घर से खुशियाॅ ही चली गई। माॅ बाबू जी आज भी कोमा से बाहर नहीं आए। अगर कोई पूछे कि इस सबका जिम्मेदार कौन है तो किसका नाम लिया जाए?"

"अभी एक यही राग अलाप कर गई है और अब तुम भी यही राग अलापने लगी नैना?" प्रतिमा की भृकुटी तन गई__"और ये क्या कह रही हो तुम कि इस सबका जिम्मेदार कौन है और किसका नाम लिया जाए? इस बात का क्या मतलब हुआ? क्या तुम ये कहना चाहती हो कि इस सबके जिम्मेदार हम हैं?"

"मैने ऐसा तो नहीं कहा भाभी।" नैना ने अधीरता से कहा___"पर एक बात तो सही है न कि जो परिवार का बड़ा सदस्य होता है उसे सबको एक साथ में लेकर चलना चाहिए? घर के मुखिया तो अजय भइया और आप ही हैं। गाॅव समाज के लोग तो यही कहेंगे न कि छोटे अगर नासमझ थे या कोई ग़लती कर रहे थे तो ये बड़े का फर्ज़ था कि छोटे को उसकी ग़लती पर एक बार माफ़ ही कर देना चाहिये था। लोग तो कहेंगे न भाभी कि किसी ग़लती की इतनी बड़ी सज़ा नहीं देना चाहिए कि छोटे से हर रिश्ता तोड़ कर उसे घर से बेदखल ही कर दिया जाए।"

"कुछ ग़लतियाॅ ऐसी होती हैं नैना जिनके लिए कोई मुआफ़ी नहीं होती।" प्रतिमा ने ठोस लहजे में कहा___"बल्कि अगर उन ग़लतियों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए तो उससे सब कुछ बरबाद हो जाता है। तुम्हारे भइया ने क्या नहीं किया इस परिवार के लोगों को एक करने के लिए मगर हुआ क्या? नैना, हमारी अच्छाईयाॅ और कुर्बानियाॅ कोई नहीं देखेगा बल्कि सिर्फ यही देखेगा कि हम परिवार को एक नहीं कर पाए।"

"कल पड़ोस की वो कमला भाभी मुझे मिली थी आते वक्त।" नैना ने कहा___"मुझे देख कर उसने आवाज़ दी मुझे। उससे थोड़ी देर बातें हुई। उसकी बातों का असल मुद्दा हमारे परिवार से ही था।"

"क्या कह रही थी वो?" प्रतिमा के कान खड़े हो गए।
"कह रही थी कि मझली ठकुराईन(गौरी) तो ऐसी थी ही नहीं।" नैना ने कहा___"वो दोनो मियां बीवी तो बड़े धर्मात्मा इंसान थे। दूर दूर तक उनकी अच्छाई और उनके उच्च आचरण की चर्चा होती थी। आज भी कोई यकीन नहीं करता कि मझली ठकुराइन ने ऐसा कोई नीच काम अपने जेठ के साथ किया होगा।"

"उस कलमुही को क्या पता?" प्रतिमा ने सहसा गुस्से में कहा___"वो क्या यहाॅ देखने आई थी कुतिया? जबकि मैने अपनी ऑखों से देखा है। पहले भी कई बार मैने गौरी को ऐसे ही चोरी चोरी अजय के कमरे में जाते देखा था। मैने इस बारे में अजय से भी बताया था और अजय से ये भी कहा था कि उससे दूर रहना। पति मर गया है तो अब उससे अपने जिस्म की गरमी बर्दास्त ही नहीं हो रही है। इसी लिए अब वो मेरे पति पर डोरे डाल रही है। एक दिन तो मैने अपने कमरे ही उसे सारी उतारे हुए अपने भोसड़े में उॅगली करते हुए पकड़ लिया था। वो तो अच्छा था कि मैं कमरे में पहुॅच गई थी वरना अगर कहीं तुम्हारे भइया पहुॅच गए होते तो क्लेश ही हो जाना था उस दिन। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि गौरी को उसकी इस नीच हरकत करने से कैसे रोंकूॅ? किसी से कह भी नहीं सकती थी। क्योंकि कोई मेरी बातों का यकीन ही नहीं करता। उल्टा मुझ पर ही दोषारोपण लग जाता। इस लिए मैने सोचा कि इस बार जब गौरी ऐसी कोई हरकत करेगी तो मैं उसकी इस नीचता का सबूत तैयार करूॅगी। अजय शिवा के लिए एक कैमरा लाए थे। कुछ दिन बाद ही मुझे फिर से गौरी की हरकत का पता चल गया। मैं जब कमरे में गई तो अंदर से आवाजें आ रही थी। मैने कमरे को हल्का अंदर की तरफ धकेल कर देखा तो गौरी अजय के ऊपर चढ़ी हुई थी। जबकि अजय उसे डाॅटे जा रहे थे और उसे अपने से दूर कर रहे थे। मैने सोचा इससे बड़ा सबूत और क्या होगा। मैं तुरंत शिवा के कमरे में गई और उसका कैमरा उठा लाई। अपने कमरे के दरवाजे के पास पहुॅच कर मैने अंदर चल रहे काण्ड की फोटो खींची। मैं और भी फोटो खींचना चाहती थी। मगर कैमरे में रील खत्म हो चुकी थी। शायद शिवा ने पहले ही सारी रील खत्म कर दी थी। शुकर था लास्ट की एक बची थी। उसमें एक ही फोटो खींची मैने। उसके बाद फिर मैं अंदर गई और उस गौरी की चुटिया पकड़ कर उसे अजय के ऊपर से खींच कर नीचे लाई। मैं बहुत गुस्से में थी इस लिए पहले मैने उसे वहीं पर पीटा फिर बाहर लेकर आई। साली कितनी कमीनी और निर्लज्ज थी कि वैसा नीच काम करने के बाद भी उल्टा यही बोले जा रही थी कि मैने कुछ नहीं किया मुझे फॅसा रहे हैं ये सब मिलकर। तो ये थी उस जलील और कुलटा औरत की करतूत।"

नैना प्रतिमा की ये लम्बी चौड़ी बात सुन कर हैरान नहीं हुई क्योंकि ये बात प्रतिमा पहले भी सबसे बता चुकी थी। पर उसे न पहले उसकी बात पर यकीन था और ना ही आज यकीन हो रहा था। मगर वो इसके खिलाफ़ कुछ कह नहीं सकती थी। क्योंकि उसके खिलाफ़ कुछ बोलने के लिए भी कोई न कोई आधार के रूप में सबूत चाहिए था जो कि उसके पास भला कैसे हो सकता था। नैना और सौम्या दोनो बहनों को तो ये सब बाद में बताया गया था।

"ये बात तो वो कमला भाभी भी कह रही थी कि मझली ठकुराईन को जान बूझ कर फॅसाया गया था।" नैना ने कहा___"वो कह रही थी गाॅव का हर ब्यक्ति यही कहता है कि उन्हें फॅसाया गया था।"

"भला उसे कोई क्यों फॅसाएगा नैना?" प्रतिमा ने झुॅझला कर कहा___"वो हमारी कोई दुश्मन तो नहीं थी और ना ही हमारा उससे कोई बैर था। फिर भला उसे क्यों कोई जान बूझ कर फॅसाएगा? गाॅव के लोगों को तो बस बातें बनाना आता है नैना। ये किसी के भी बारे में अच्छा नहीं सोच सकते।"

"ख़ैर जाने दीजिए भाभी।" नैना भला अब क्या कहती___"सब कुछ समय पर छोड़ दीजिए। जो जैसा करेगा वो उसका फल तो पाएगा ही।"
"ये अजय अब तक नहीं आए।" प्रतिमा ने पहलू बदला___"वो भी आ जाते तो हम सब मिल कर डिनर कर लेते।"
"आते ही होंगे भाभी।" नैना ने कहा___"फैक्टरी को रिन्यू कराने में काफी ब्यस्त हैं वो आजकल।"

इनके बीच बस ऐसी ही थोड़ी देर बातें होती रही। कुछ देर बाद ही अजय सिंह आ गया था।
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उस वक्त रात के नौ बजे थे जब रितू पुनः अपने फार्महाउस पर पहुॅची थी। लोहे वाले गेट पर दो बंदूखधारी ब्यक्ति खड़े। रितू की कार को देखते ही दोनो ने गेट को खोल दिया। गेट के खुलते ही रितू ने कार को गेट के अंदर की तरफ बढ़ा दिया और फिर वो सीधा पोर्च में ही रुकी। कार से बाहर आ कर रितू ने कार को लाॅक किया। तब तक वो दोनो बंदूखधारी भी आ गए।

"क्या समाचार है काका?" रितू ने एक से पूछा।
"समाचार बढ़िया है बिटिया।" काका ने कहा___"जैसा तुमने कहा था वैसा ही कर दिया है हमने। वो सब वहीं तहखाने मा रस्सी से बॅधे हुए हैं। कुछ देर पहले ही हम जाकर देखे थे तो सब होश में आ गए थे। सबने जब खुद को अजनबी जगह पर इस तरह रस्सियों से बॅधा हुआ पाया तो सब के सब रोने लगे बिटिया। हमका देख के पूछन लगे कि ये हमें कहाॅ ले आया गवा है और ई तरह रस्सी से काहे बाॅथा गवा है?"

"अच्छा, चलो फिर उनको जवाब भी दे देते हैं न काका।" रितू ने ज़हरीली मुस्कान के साथ कहा___"क्या विचार है आपका?"
"हम तो एक ही बात जानत हैं बिटिया कि ऐसे ससुर के नातियों को बीच चौराहे पर नंगा करके गोली मार दैं।" काका ने गर्मजोशी से कहा___"ऐसे लोगन का जीयै का कौनव अधिकार नहीं है।"

"बात तो आपकी बिलकुल दुरुस्त है काका।" रितू ने कहा___"लेकिन ये तो बहुत आसान मौत होगी न उन सबके लिए?"
"हाॅ ई बात तो है बिटिया।" शंकर काका ने कहा___"तो फिर ऐसा करत हैं कि ससुरों को तड़पा तड़पा के मारते हैं।"

"शंकर काका ये तो आपने बिलकुल ठीक कहा।" रितू मुस्कुराई___"हरिया काका तो एक ही बार में गोली मार देने को कह रहे थे।"
"अरे ऊ ता हम जल्दबाज़ी मा अउर एकदम से गुस्से मा कह दिये रहे बिटिया।" हरिया काका ने झेंपते हुए कहा___"वरना ई बात ता हम ई सरवा शंकर से पहले ही कह देते।"

"चलो कोई बात नहीं काका।" रितू ने कहा__"अब तो कह दिये न आप? अब चलो उनको देखे ज़रा।"
"अउर कुछू साथ मा लेके चलैं का है का बिटिया?" हरिया काका झट बोल पड़ा था।
"और क्या ले चलना है भला?" रितू चकराई।
"अरे बाल्टी मा पानी ले चलत हैं ना बिटिया।" हरिया ने कहा__"ऊ का है ना, हमका अइसन लागत है कि उहाॅ जाइके तुम उन सबको बहुतै धुनाई करोगी। ता थुनाई मा कउनौ सारे बेहोश होई गै तो? उनका होश मा लाने की खातिर पानी ता चाहिए ना बिटिया।"

"क्या बात है काका।" रितू हॅस पड़ी___"क्या दिमाग़ लगाया है आपने। मानना पड़ेगा आपको। दिमाग़ बहुत तेज़ है आपका।"

रितू की प्रसंसा पाने से हरिया काका तन कर चलने लगा। वह शंकर को इस तरह देखने लगा था जैसे अब उसके सामने उसकी कोई औकात ही नहीं है। शंकर उसे इस तरह अकड़ते हुए चलते देख बुरा सा मुह बना कर रह गया।

"पर काका।" रितू ने कहा___"मुझे लगता है कि आपका ये दिमाग़ काकी की वजह से तेज़ हुआ है।"
"अरे का बात करती हो बिटिया?" हरिया काका ने नागवारी भरे भाव से कहा___"ऊ ससुरी तो शुरू से ही दिमाग़ से पैदल है। हमरे साथ रह रह के ही तो थोड़ा बहुत दिमाग़ आ गवा है उसमे।"

"ओए तूने भाभी जी को ससुरी बोला?" शंकर ने झड़प कर कहा हरिया से___"रुक अभी जा के बताता हूॅ उनसे।"
"अबे रुक जा बे खबीस।" हरिया काका की सारी अकड़ तेल लेने चली गई___"सरवा मरवाएगा का हमका?"

"हाॅ तो भाभी जी को ससुरी क्यों बोला?" शंकर अभी भी उसे घुड़कता बोला__"और क्या बोला कि तेरे साथ रह रह कर ही उनमें थोड़ा बहुत अकल आई है। साला झूॅठा कहीं का।"
"तू ना अब मुह बंद ही कर ले समझा।" हरिया भी ताव खा गया___"वरना उल्टा तुझे ही पिटवा दूॅगा मैं उस ससुरी से।"

"वो कैसे भला?" शंकर बुरी तरह हैरान।
"अरे हम कह देंगे कि ये शंकरवा तुझे कहत रहा कि अब भौजी ससुरी बुड्ढी होई गई है।" हरिया ने कहा___"अउर ये भी कह देंगे कि मोटी भैस जइसन होई गई है।"

"ओये ये मैने कब कहा?" शंकर परेशान।
"नहीं कहा ता का हुआ?" हरिया बोला__"हम ता कह देंगे न कि ई शंकरवा अइसनै कहत रहा।"
"देखा रितू बिटिया।" शंकर ने मानो रितू से गुहार लगाई___"ये जबरदस्ती मुझे अपनी जोरू से पिटवाना चाहता है।"

"चिन्ता मत कीजिए काका।" रितू ने कहा___"सिर्फ आप ही बस नहीं पिटेंगे बल्कि आपके साथ साथ हरिया काका भी काकी से पिटेंगे।"
"अरे ई का कहत हो बिटिया?" हरिया काका ने हड़बड़ा कर कहा___"हम भला काहे पिटेंगे ऊ ससुरी से?"

"वो इस लिए कि मैं काकी से बताऊॅगी कि काका आपको जब देखो तब दिमाग़ से पैदल और ससुरी ससुरी कहते रहते हैं।" रितू ने कहा___"आपकी तो कोई इज्ज़त ही नहीं करते ये दोनो। फिर देखना काका, कैसे आप दोनो का हाल बनाएॅगी काकी।"
"अरे हमका माफ़ कर दो बिटिया।" काका ने दोनो हाॅथ जोड़ लिए बोला___"ई सब ना ई शंकरवा की कारण होई जात है। वरना हम ता बिंदिया की बहुत इज्जत करत हैं। ऊ ता हमरी जान है, प्राण प्यारी है बिटिया।"

"अच्छा छोड़ो ये सब।" रितू ने कहा__"अब चलिये उन सबका हाल चाल भी तो देखना है।"
"ठीक है बिटिया चलो।" हरिया ने कहा और फिर वो रितू के पीछे चल दिया। जबकि शंकर लोहे वाले गेट की तरफ बढ़ गया।

कुछ ही देर में रितू और हरिया काका तहखाने में पहुॅचे। तहखाना काफी बड़ा था। वहाॅ पर सामान तो कुछ नहीं था बस ज़मीन पर सीलन जैसा प्रतीत होता था। दीवार के चारो तरफ बल्ब लगे हुए थे। एक तरफ की दीवार से सटे वो चारो रस्सी में बॅधे खड़े थे। सभी के हाॅथों को ऊपर करके बाॅधा गया था और पैरों को नीचे विश्राम की पोजीशन में चारों लड़कों के पैरों से जोड़ते हुए बाॅधा गया था। लेकिन उनमें से कोई भी अपने पैरों को हिला नहीं सकता था। दोनो तरफ की दीवारों पर एक एक तरफ से पैरों में बॅधी रस्सी को खींच कर बाॅधा गया था।

उन चारों की हालत बहुत ही अजीब हो गई थी। डर और दहशत से उन सभी का बुरा हाल था। पहले से ही रितू की मार से लहू लुहान थे वो चारो और अब इस डर व भय ने उनकी हालत खराब कर दी थी जाने वो यहाॅ कैसे और क्यों लाए गए हैं। ये तो वो भी समझ चुके थे कि उनके साथ कुछ बहुत ही बुरा होने वाला है।

तहखाने में दो तरफ के बल्ब जल रहे थे। इस लिए तहखाने में काफी रोशनी थी। पसीने तथपथ उन चारों के चेहरों को बखूबी देखा जा सकता था। रितू और हरिया काका जैसे ही तहखाने में पहुॅचे तो उन चारो ने उनकी आहट से अपनी अपनी गर्दन उठा कर सामने देखा। रितू पर नज़र पड़ते ही सबकी घिग्घी बॅध गई। चेहरे पर डर के मारे हल्दी सी पुत गई। जूड़ी के मरीज़ की तरफ एकदम से काॅपने लगे थे वो चारो।

"काका इन लोगों की खातिरदारी नहीं की क्या आपने?" रितू ने उन चारों को एक एक नज़र देखने के बाद हरिया से कहा था।
"अरे हमरा मन ता बहुत रहा बिटिया।" हरिया ने कहा___"लेकिन ऊ का है न हमका परमीशॅनवा ही मिला था। वरना हम ता इन ससुरन की अइसन पेलाई करते कि ई ससुरे यहीं पषर टट्टी कर देते।"

"चलो अच्छा हुआ काका जो मैने आपको परमीशन नहीं दी थी।" रितू ने कहा___"वर्ना अगर ये टट्टी कर देते तो साफ भी तो आपको ही करना पड़ता न?"
"अरे हाॅ बिटिया।" हरिया ने हैरानी से कहा___"ई ता हम सोचे ही नहीं। पर कउनव बात नहीं बिटिया। हम ता साफ न करते लेकिन ई सब ससुरे लोग जरूर साफ करते। अउर ना करते तो हम ई ससुरन का अउर अच्छे से पेलते।"

रितू ने हरिया की बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया बल्कि वह ऑखों में आग लिए उन चारो की तरफ बढ़ी। उन सबकी हालत बड़ी ही दयनीय हो गई। उन सबकी टाॅगें इस तरह काॅपने लगी थी जैसे उन पर अब उनका कोई ज़ोर ही न रह गया हो।

"क्या सोचा था तुम सबने? रितू के मुख से शेरनी की सी गुर्राहट निकली___"इतने सारे गुनाह करके तुम सब बड़े मज़े में रहोगे?? कोई तुम्हारा बाल बाॅका कर ही नहीं सकता?"

"ह हमें माफ़ कर दो।" सूरज चौधरी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा___"हम किसी के साथ कोई भी ग़लत काम नहीं करेंगे अब।"
"करोगे तो तब जब करने के लिए ज़िंदा बचोगे।" रितू ने बर्फ की मानिन्द ठंडे स्वर में कहा___"अब तो तुम चारों का रिज़र्वेशन हो गया है नरक में जाने का। लेकिन चिन्ता मत करो क्योंकि नरक में यहाॅ से ज्यादा तुम लोगों को यातनाएॅ नहीं सहनी पड़ेगी।"

"नहीं नहीं।" रोहित बुरी तरह रो पड़ा__"हमें कुछ मत करो प्लीज़। हम मरना नहीं चाहते। आ आख़िर किस वजह से तुम हमारे साथ ये सब कर रही हो? हमें यहाॅ से जाने दो इंस्पेक्टर वरना तुम नहीं जानती कि हमें इस तरह यहाॅ बंधक बना कर रखने से तुम्हारा क्या अंजाम हो सकता है?"

"और तुम्हें भी ये अंदाज़ा नहीं है लड़के कि मैं तुम सबके बापों के साथ क्या कर सकती हूॅ?" रितू ने सहसा रोहित के सिर के बाल को मुट्ठी मे पकड़ कर खींचते हुए कहा___"अगर मैं चाहूॅ तो इसी वक्त तुम्हारे बापों बीच चौराहे पर नंगा करके दौड़ाऊॅ। मगर फिलहाल ये बाद में अभी तो तुम सबके साथ ही हिसाब किताब करना है।"

"हरामज़ादी कुतिया साली हमारे बाप को बीच चौराहे पर नंगा दौड़ाएगी तू।" सहसा सूरज चौधरी गुर्रा उठा___"एक बार मेरे हाॅथ पैर खोल दे फिर देख तेरा क्या हस्र करता हूॅ मैं?"
"देखा था सुअर की औलाद।" रितू नोंकदार बूट की ठोकर ज़ोर से सूरज के पेट में मारते हुए कहा। सूरज के मुख से हलाल होते बकरे की सी चीखें निकली जबकि रितू बोली__"उस दिन तेरी मर्दानगी भी देखी थी। तुम सबकी देखी थी। उसी का नतीजा है कि आज यहाॅ बॅधे पड़े हो।"

"हमें छोड़ दो इंस्पेक्टर।" किशन ने गुहार लगाते हुए कहा___"आख़िर हमने किया क्या है? किस लिए हमें यहाॅ लाकर हमारे साथ ये सब कर रही हो तुम?"
"काका, इसे पता ही नहीं है कि इसने किया क्या है?" रितू ने कहा___"ये साला ऐसा शरीफ बन रहा है बहनचोद जैसे इसने कभी किसी चींटी तक को चोंट न पहुॅचाई हो।"

"ज़ुबान सम्हाल कर बात करो इंस्पेक्टर।" सहसा सूरज कह उठा___"और याद रखो कि अगर हममें से किसी को भी कुछ हुआ तो उसका खामियाजा तुम्हें और तुम्हारे पूरे खानदान को भुगतना होगा।"

"मेरे खानदान की तू फिक्र मत कर।" रितू ने कहा___"मेरे खानदान तक जाने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि तेरे और तेरे बाप को कुत्ते की मौत मार देने के लिए मैं ही काफी हूॅ। तुम चारों को ऐसा तड़पा तड़पा कर मारूॅगी कि मौत की भीख माॅगोगे मगर मौत दूॅगी नहीं आसानी से।"

"पर ये तो बताओ इंस्पेक्टर।" अलोक वर्मा के तिरपन काॅप गए, बोला___"हमने ऐसा किया क्या है जिसके कारण तुम हमारे साथ ऐसा ब्यौहार कर रही हो?"
"हाॅ हाॅ बताती क्यों नहीं हमें?" किशन ने अलोक की बात में कहा___"हमें भी तो पता चले कि हमने ऐसा किया क्या है?"

"विधी चौहान याद है???" रितू ने अलोक का गिरहबान पकड़ कर झिंझोड़ा___"वही विधी चौहान जो तुम लोगों के साथ ही काॅलेज में पढ़ती थी, और जिसके साथ तुम चारों ने मिल कर गैंग रेप किया था? कुछ याद आया या फिर इतना जल्दी भूल गए सब?"

चारों के दिलो दिमाग़ में जैसे विष्फोट हुआ। दिमाग़ की बत्ती एक साथ सबकी जल उठी। अब समझ आया था उन्हें कि ये सब उनके साथ क्यों हो रहा था। सब कुछ समझ में आते ही चारों के चेहरे पीले पड़ गए। किसी के भी मुख से बोल न फूटा।

"किसी की बहन बेटियों की इज्ज़त से इस तरह खेलने का बहुत शौक है न?" रितू ने गुर्राते हुए कहा___"कितनी लड़कियों की ज़िंदगियाॅ बरबाद कर दी है तुम सब हराम के पिल्लों ने। उन सब लड़कियों की बरबादी का हिसाब देना होगा तुम लोगों को।"

"ये सब झूठ है।" सूरज पूरी शक्ति से चीखा था, बोला___"सरासर झूॅठ है इंस्पेक्टर। हम में से किसी ने भी उसके साथ कुछ नहीं किया। तुम बेवजह ही हमें इस तरह यहाॅ पकड़ कर ले आई हो। हमने कुछ नहीं किया। हमें छोड़ वरना बहुत पछताओगी तुम देख लेना।"

"तू साले रंडी की औलाद मुझे पछताने का बोल रहा है बहनचोद।" रितू ने सूरज के पेट में दो चार घूॅसे एक साथ ही जड़ दिये। सूरज बुरी तरह दर्द से बिलबिलाया था, जबकि रितू ने कहा___"तेरी भी एक बहन है न। मुझे सब पता है। तेरी बहन का नाम रचना चौधरी है न। सुना है वो बहुत ही जवान है। तू चिन्ता मत कर बहुत जल्द वो तेरे सामने यहीं पर होगी और तुम चारो खुद एक एक करके उसका रेप करोगे।"

"इंस्पेक्टर।" सूरज गीदड़ की तरह चीखा___"अगर तूने मेरी बहन को हाॅथ भी लगाया तो देख लेना।"
"क्यों पिछवाड़े में आग लगी क्या तेरे?" रितू ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ सूरज के गाल पर रसीद करते हुए कहा___"और जब तू दूसरों की बहन बेटियों को बरबाद करता तब क्या मज़ा आता है मादरचोद?"

"बिटिया हम का कहत हैं कि ये बाल्टी का पानी जो हम लेके आए हैं।" सहसा हरिया काका ने कहा___"ऊ का बेकार मा लेके आए हैं? हम ता सोचत रहे कि तुम इन ससुरों को मार मार कर बेहोश करती जाओगी अउर हम इन ससुरन का ई पानी से होश मा ले आते रहेंगे।"

"चिन्ता मत करो काका।" रितू गुर्राई__"बहुत जल्द ऐसा भी होने वाला है।
"फेर ता ठीक है बिटिया।" काका ने कहा___"अगर कहौ ता हमहू इन ससुरन का जी भर कै धुन देई? ऊ का है ना हमरा हाॅथ मा बहुतै खुजली होई रही है।"

"तो ठीक है काका आप ही अपने हाॅथ की खुजली मिटा लो।" रितू ने कहा___"मैं इन कुत्तों से कल मिलूॅगी। तब तक आप इनकी अच्छे से खातिरदारी करना। बस इतना याद रहे कि इनमें कोई भी मरने न पाए।"

"अइसनै होई बिटिया।" काका ने खुश होते हुए कहा___"हम ई ससुरन केर अम्मा चोद देब। तुम फिकर ना करो बिटिया। अब जाओ तुम इहाॅ से। अब ई.....डि...अरे बिटिया ऊ का कहत हैं एखा...? अरे हाॅ याद आई गा। अब ई डिपारटमेंट हमरा है। हाॅ डिपारटमेंट।"
"डिपारटमेंट नहीं काका उसे डिपार्टमेन्ट कहते हैं।" रितू ने मुस्कुराकर कहा।

"अरे हाॅ बिटिया उहै।" काका ने कहा___"तुम समझ गई हौ ना। ई है बहुत है।"
"अच्छा काका मैं चलती हूॅ।" रितू ने कहा__"आप सम्हाल लेना ओके?"
"अरे तुम कउनव चिन्ता न करा बिटिया ई ता हमरे बाएं हाथ का चीज है।" काका ने गर्व से कहा___"ई ससुरन का मार मार के हम इनकर टट्टी निकाल देब। अउर का।"

रितू हरिया काका की बात पर मुस्कुराती हुई तहखाने से बाहर निकल गई। जबकि रितू के जाते ही काका ने तहखाने का गेट बंद किया और फिर अपने दोनो हाॅथ मलते हुए रोहित मेहरा के पास पहुॅचा।

"का रे मादरचोद।" काका ने कहा___"तोरे केतनी अम्मा है अउर केतने बाप हैं?"
"तमीज़ से बात करो ओके।" रोहित डर तो गया था लेकिन फितरत के चलते बोल ही गया था।
"तोरी माॅ की चूत मारूॅ ससुरे के।" काका के हाॅथ में जो मोटा सा लट्ठ था उसने घुमा कर रोहित की टाॅग में ज़ोर से धमक दिया। रोहित दर्द से बुरी तरह चीखने चिल्लाने लगा। काका तो बहुत देर से सब्र किये बैठा था। उसे इस बात का बेहद गुस्सा भी था कि इन लोगों ने रितू उल्टा सीधा भी बोला था।

हरिया काका उन चारों पर पिल पड़ा। फिर तो तहखाने में बस रोने और चीखने की आवाज़ें ही आ रही थी। हरिया काका तब तक उन सबकी धुनाई करता रहा जब तक कि उसका पेट न भर गया था। धुनाई करने के बाद वह उन चारों को अधमरी हालत में छोंड़ कर तहखाने से बाहर चला गया और बाहर से तहखाने को लाॅक कर दिया।


अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,,,
 
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.........《 36 》

अब तक,,,,,,,,,

रितू हरिया काका की बात पर मुस्कुराती हुई तहखाने से बाहर निकल गई। जबकि रितू के जाते ही काका ने तहखाने का गेट बंद किया और फिर अपने दोनो हाॅथ मलते हुए रोहित मेहरा के पास पहुॅचा।

"का रे मादरचोद।" काका ने कहा___"तोरे केतनी अम्मा है अउर केतने बाप हैं?"
"तमीज़ से बात करो ओके।" रोहित डर तो गया था लेकिन फितरत के चलते बोल ही गया था।
"तोरी माॅ की चूत मारूॅ ससुरे के।" काका के हाॅथ में जो मोटा सा लट्ठ था उसने घुमा कर रोहित की टाॅग में ज़ोर से धमक दिया। रोहित दर्द से बुरी तरह चीखने चिल्लाने लगा। काका तो बहुत देर से सब्र किये बैठा था। उसे इस बात का बेहद गुस्सा भी था कि इन लोगों ने रितू उल्टा सीधा भी बोला था।

हरिया काका उन चारों पर पिल पड़ा। फिर तो तहखाने में बस रोने और चीखने की आवाज़ें ही आ रही थी। हरिया काका तब तक उन सबकी धुनाई करता रहा जब तक कि उसका पेट न भर गया था। धुनाई करने के बाद वह उन चारों को अधमरी हालत में छोंड़ कर तहखाने से बाहर चला गया और बाहर से तहखाने को लाॅक कर दिया।
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अब आगे,,,,,,,,,
फ्लैशबैक अब आगे______

गौरी अभी ये सब बता ही रही थी कि सहसा डोर बेल की आवाज़ से सबका ध्यान भंग हो गया। डोर बेल की आवाज़ से ही उन सबको ये एहसास हुआ कि समय कितना हो चुका था। वरना ड्राइंगरूम में रखे सोफों पर बैठे हुए उन्हें समय का आभास ही न हुआ था। वो सब तो गौरी के द्वारा सुनाए जा रहे अतीत के किस्सों में ही डूबे हुए थे।

"लगता है कि जगदीश भाई साहब आ गए हैं।" गौरी ने गहरी साॅस लेते हुए कहा__"जा गुड़िया दरवाज़ा खोल दे।"
"जी माॅ।" निधी ने भी गहरी साॅस लेकर कहा और सोफे से उठ कर मुख्य द्वार की तरफ बढ़ गई।

"रात के नौ बज गए हैं।" गौरी ने सामने दीवार पर लगी घड़ी पर देखते हुए कहा___"इस कहानी के चक्कर में रात का खाना बनाना भी रह गया अभय। चलो ये कहानी अब कल बताऊॅगी। अभी खाना बना लूॅ फटाफट। जगदीश भाई साहब को दस बजे तक खाना खाकर सो जाने की आदत है।"

"ठीक है भाभी आप जाइए।" अभय ने गंभीर भाव से कहा था। वो अभी भी उन अतीत के दृष्यों में खोया हुआ लगा। उसके ऐसा कहने पर गौरी उठ कर किचेन की तरफ बढ़ गई।

तभी ड्राइंगरूम में जगदीश ओबराय दाखिल हुआ। उसके पीछे पीछे ही निधी भी आ गई। जगदीश ओबराय की नज़र अभय सिंह पर पड़ी तो उसने बगल से रखे सोफे पर बैठे विराज की तरफ देखा।

"ये मेरे अभय चाचा जी हैं अंकल।" विराज ने जगदीश का आशय समझ कर कहा___"आज सुबह करीब ग्यारह बजे के आस पास आए हैं।"
"ओह ये तो बहुत अच्छी बात है।" जगदीश ओबराय के चेहरे पर खुशी के भाव नुमायां हुए, फिर उसने अभय की तरफ देखते हुए कहा___"कैसे हैं भाई साहब?"

अभय ने हल्की मुस्कान के साथ पहले उसे नमस्ते किया फिर बोला___"जी मैं ठीक हूॅ आप सुनाइये।"
"मैं तो बहुत ज्यादा ठीक हूॅ भाई साहब।" जगदीश ने हॅस कर कहा___"जब से ये बच्चे और गौरी बहन यहाॅ आए हैं तब से ज़िंदगी खुशहाल लगने लगी है। वर्ना इतने बड़े बॅगले में नौकर चाकर रहने के बाद भी अकेलापन ही महसूस होता था।"

"ऐसा क्यों कहते हैं आप?" अभय सिंह चौंका था___"इसके पहले अकेलापन क्यों महसूस होता था आपको?"
"अरे भाई अब मेरे सिवा मेरा कोई था ही नहीं तो अकेलापन महसूस तो होगा ही।" जगदीश ने कहा___"नसीब और भाग्य बहुत अजीब होते हैं। अच्छा खासा परिवार हुआ करता था मेरा। मगर फिर सब कुछ खत्म हो गया। धन दौलत तो नसीब से बहुत मिली हमें लेकिन उस दौलत को भोगने वालों को नसीब ने छीन लिया हमसे। जी जान से प्यार करने वाली बीवी थी, वो भी हमें छोंड़ कर इस फानी दुनियाॅ को अलविदा कह दिया। एक बेटा और बहू थे तो वो भी चले गए हमें छोंड़ कर। बस तब से अकेले ही थे। मगर फिर शायद भगवान को हमारे अकेलेपन पर तरस आ गया और उसने हमारे उजड़े हुए गुलशन में फिर से बहार लाने के लिए इन सबको भेज दिया। अब लगता है कि अपना भी कोई है।"

अभय सिंह जगदीश ओबराय की बातें सुन कर हैरान था। उसे याद आया कि विराज ने उससे कहा था कि ये सब अब अपना ही है। तो इसका मतलब वो सही कह रहा था। यानी मेरा भतीजा अब करोड़ों की सम्पत्ति का मालिक है? अभय सिंह को यकीन नहीं हो रहा था मगर हक़ीक़त तो उसके सामने ही थी इस लिए यकीन करना ही पड़ा उसे। वह सोचने लगा कि उसका बड़ा भाई यानी अजय सिंह तो अक्सर यही कहता था कि विराज किसी होटल या ढाबे में कप प्लेट धोता होगा। मगर भला वो भी कैसे ये कल्पना कर सकता था कि विराज आज के समय में कितना बड़ा आदमी बन चुका था। वह चाहे तो चुटकियों में उसे और उसकी पूरी प्रापर्टी को खरीद सकता था।

"ये सब भगवान की अजब लीला ही है भाई साहब।" फिर अभय सिंह ने गहरी साॅस लेकर कहा___"वो जो कुछ भी करता है बहुत सोच समझ कर करता है। किस इंसान कब कहाॅ और किस चीज़ की ज़रूरत होती है वो उसे उस जगह पहुॅचा ही देता है। हम नासमझ होते हैं जो ये समझ बैठते हैं कि भगवान ने हमें दिया ही क्या है?"

"हाॅ ये बात तो है।" जगदीश ने कहा___"और सच पूछो तो भगवान की इस लीला से मैं खुश हूॅ भाई साहब। पहले ज़रूर उससे शिकायतें थी कि उसने मेरा सब कुछ छीन लिया मगर आज कोई शिकायत नहीं है। ये सब मुझे अपना समझते हैं। मुझे वैसे ही चाहते हैं जैसे कोई सगा अपनों को चाहता है। यूॅ तो इस दुनियाॅ में अपने भी अपनों के लिए नहीं होते। मगर कोई अजनबी भी ऐसा मिल जाता है जो अपनों से कम नहीं होता। चार दिन का जीवन है, इसे सबके साथ खुशी खुशी जी लो तो आत्मा तृप्त हो जाती है। क्या लेकर हम इस दुनियाॅ में थे और क्या लेकर जाएॅगे? ये धन दौलत तो सब यहीं रह जाएगी मगर हमारे कर्म ज़रूर हमारे साथ जाएॅगे।"

"आप ठीक कहते हैं भाई साहब।" अभय ने कहा___"आप तो वैसे भी किसी फरिश्ते से कम नहीं हैं वरना कौन ऐसा है जो किसी ग़ैर को अपना सब कुछ दे दे?"
"अगर मैने अपना सब कुछ विराज बेटे को दे दिया है तो उससे मुझे मिला भी तो बहुत कुछ है भाई साहब।" जगदीश ने कहा___"मुझे वो मिला है जिसके लिए मैं वर्षों से तड़प रहा था। मैं किसी अपने के लिए तड़प रहा था, तथा अपनों के बीच रह कर जो खुशी मिलती है मैं उसके लिए तरस रहा था। आज मेरे पास ये सब खुशियाॅ है भाई साहब और ये सब मुझे किसी रिश्वत के चलते नहीं मिला है। बल्कि मेरे नसीब से मिला है। मैं तो विराज को बहुत पहले से अपनी सारी प्रापर्टी का वारिस बनाना चाहता था मगर ये ही मना कर रहा था। एक अच्छे व खुद्दार इंसान का बेटा जो था। किसी की ऐसी मेहरबानी को कबूल कैसे कर सकता था ये? मगर मैं चाहता था कि विराज ही मेरा वारिस बने। क्योंकि इसके चेहरे पर ही मुझे अपने बेटे की झलक दिखती थी। अगर ये मेरी बात नहीं मानता तो मैं इसके सामने अपनी झोली फैला कर भीख भी माॅग लेता भाई साहब।"

अभय सिंह जगदीश की ये सब बातें सुन कर चकित रह गया। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि दुनियाॅ कोई इंसान ऐसा भी हो सकता है। ख़ैर इन दोनों के बीच ऐसी ही बातें होती रहीं। कुछ समय बाद ही गौरी ने सबको खाने का कहा। सब डायनिंग हाल में आ गए और कुर्सियों में बैठ गए। गौरी ने सबको खाना सर्व किया। सबके खाने के बाद गौरी ने भी खाना खाया और फिर सब अपने अपने कमरे में सोने के लिए चल दिये। रास्ते में चलते समय विराज से गौरी ने पूछा___"तेरा काॅलेज कब से शुरू हो रहा है??"

"कल से माॅ।" विराज ने कहा___"कल सुबह मुझे थोड़ा जल्दी उठा दीजिएगा। ऐसा न हो कि पहले दिन ही मैं लेट हो जाऊॅ।"
"चल ठीक है।" गौरी ने कहा___"मैं तुझे भोर के समय पर ही उठा दूॅगी। अब जा आराम से सो जाना।"

गौरी के कहने पर विराज अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। उधर गौरी भी पलट कर अपने कमरे की तरफ चली गई।
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वर्तमान अब आगे______

हरिया काका को उन चारों की खातिरदारी करने का कह कर रितू तहखाने से बाहर आकर सीधा अपने कमरे में चली गई थी। थोड़ी ही देर में हरिया काका की बीवी बिंदिया रितू के कमरे में खाना खाने को पूछने आई तो रितू ने मना कर दिया। बिंदिया के जाने के बाद रितू ने दरवाजा बंद किया और बेड पर जाकर लेट गई। काफी देर तक वह इस सबके बारे में सोचती रही। फिर जाने कब उसकी ऑख लग गई।

सुबह उसकी ऑख उसके मोबाइल फोन के बजने पर खुली। उसने अलसाए हुए से मोबाइल की स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नम्बर को देखा तो उसका सारा आलस पल भर में ही दूर हो गया। साथ ही उसके होठों पर एक मुस्कान तैर गई।

"हैलो।" फिर उसने काल रिसीव करते ही कहा।
"................." उधर से कुछ कहा गया।
"वैरी गुड।" रितू ने कहा___"सारी डिटेल मुझे सेन्ड कर दो। एण्ड थैंक्स।"

रितू ने इतना कह कर काल कट कर दी। उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी। वह तुरंत ही बेड से उठ कर बाथरूम की तरफ चली गई। करीब आधे घंटे बाद रितू ड्राइंगरूम में सोफे पर बैठी काॅफी पी रही थी। बिंदिया ने हल्का फुल्का नास्ता बना दिया था उसके लिए। रितू नास्ता और काफी पीकर कर के बाहर निकल गई। लोहे वाले गूट के पास शंकर और हरिया काका बंदूख लिए मिल गए उसे।

"क्या हाल समाचार है काका?" रितू ने हरिया काका की तरफ देख कर कहा___"उन लोगों की खातिरदारी में कोई कमी तो नहीं की न आपने?"
"अइसन होई सकत है का बिटिया?" हरिया काका ने मुस्कुरा कर कहा___"हम ता ऊ ससुरन अइसन पेलेन है कि उन सबकी अम्मा चुद गई है।"

"काका कभी कभी आप बहुत गंदा बोल जाते हैं।" रितू ने बुरा सा मुह बनाया___"आप ये भी नहीं देखते हैं कि मैं आपकी बेटी जैसी हूॅ और आप भी तो मुझे अपनी बेटी जैसी ही मानते हैं न? फिर भला आप कैसे मेरे सामने ऐसे गंदे शब्द बोल सकते हैं?"

"हमका माफ कर दो बिटिया।" हरिया ने तुरंत ही दोनो हाॅथ जोड़ लिये___"ई ससुरी जबान हमरे काबू न रह पावत है। अउर हमहु सरवा जोश जोश मा बोल ही जात हैं। बस अबकी बारी माफ कर दो बिटिया। अगली बारी से अइसन गलती ना होई। हमार कसम।"

"कोई बात नहीं काका।" रितू ने कहा__"अब बताओ उन लोगों का हाल कैसा है अब?"
"कल रात ता खातिरदारी करे रहे हम उनकी ऊके बाद हम अभी तक ना गए हैं।" हरिया ने कहा___"पर ई ता पक्का है बिटिया कि ऊ ससुरन के हाल बेहाल होईगा होई अब तक।"

"चलिए चल कर देखते हैं एक बार।" रितू ने कहा और पलट वापस अंदर की तरफ जाने लगी। हरिया भी उसके पीछे पीछे चल दिया। थोड़ी देर बाद ही वो दोनो तहखाने का दरवाजा खोल कर अंदर पहुॅचे। अंदर पहुॅचते ही रितू और हरिया की नाॅक में बदबू भरती चली गई।

दोनो ने जल्दी से अपने मुह पर रुमाल लगा ली। अंदर का दृश्य बड़ा ही अजीब था। एक तरफ की दीवार पर चारो लड़के बॅधे हुए बेहोशी की हालत में सिर नीचे झुलाए खुद भी झूल से रहे थे। दूसरी तरफ की दीवार में दो बंदूखधारी थे जो सूरज के फार्महाउस पर गार्ड थे।

"काका इन लोगो ने तो यहाॅ गंध फैला रखी है?" रितू ने कहा___"क्या इतनी ज्यादा खातिरदारी की है आपने इन सबकी?"
"अरे ना बिटिया।" हरिया कह उठा__"इनकी खातिरदारी ता हिसाबै से भई रही।"
"तो फिर ये गंध क्यों है यहाॅ?" रितू ने कहा___"ऐसा लगता है जैसे इन लोगों का टट्टी पेशाब सब छूट गया है।"

"वा ता छुटबै करी बिटिया।" हरिया ने कहा___"खुद सोचौ ई ससुरे कल से ईहाॅ बॅधे हैं। अब जब ई ससुरन का टट्टी पेशाब लागी ता का करिहैं ई लोग? कब तक ई सारे ऊ का दबा के रखिहैं? ई चीज़ ता अइसन है बिटिया जे सरकार भी ना रोक पाइहैं, ई ससुरे ता अभी नवा नवा लौंडा हैं।"

"ओह ये तो बिलकुल सही कहा आपने काका।" रितू ने कहा___"लेकिन इन लोगों की इस गंदगी को भी तो दूर करना पड़ेगा वरना ये सब इसी से मर जाएॅगे और मैं इन्हें इतना जल्दी मरने नहीं दे सकती। इस लिए आप यहाॅ की इस गंदगी को हटाने का तुरंत काम शुरू करो।"

"ठीक है बिटिया।" हरिया ने कहा___"पाईप ता लगा ही है। बस मोटरवा का चालू करै का है। ई ता दुई मिनट मा होई जाई बिटिया।"
"ठीक है काका।" रितू ने कहा___"आप ये सब साफ करवा दीजिए मैं पाॅच मिनट में आती हूॅ।"

रितू ये कह कर बाहर निकल गई। उन लोगों की ये दुर्दशा देख कर उसके मन को बड़ी खुशी मिल रही थी। उसने सोचा कि ऐसे हरामियों के साथ ऐसा ही होना चाहिए। पर अभी तो ये शुरूआत है। कुछ देर बाद ही हरिया काका रितू को बुलाने आया। रितू उसके साथ पुनः तहखाने में पहुॅची। इस बार का दृश्य काफी अलग था। तहखाने में जो गंध फैली हुई थी वो अब नहीं थी। काका ने मोटे पाइप से जो पानी का प्रेसर निकलता था उससे तहखाने का पूरा फर्स और दीवारें साफ कर दिया था। फर्स की दीवारों के चारो तरफ किनारे किनारे बड़े बड़े छेंद बने हुए थे। उसमें ही पानी के साथ सारी गंदगी को निकाल दिया था काका ने। उसके बाद तहखाने में रूम फ्रशनर कर दिया था ताकि गंध दूर हो जाए या समझ में न आए।

दीवारों पर रस्सी से बॅधे चारो लड़के और वो दोनो गार्ड्स अब होश में आ चुके थे। रितू ये देख कर चौंकी थी कि उन सभी के जिस्मों पर नीचे कमर से एक लॅगोट टाइप का कपड़ा बाॅध दिया था काका ने बाॅकी पूरा जिस्म नंगा था। ऐसा शायद इस लिए था क्यों कि उन सभी के कपड़े गंदे हो चुके थे और बदबू फैला रहे थे।

इस वक्त वो सभी होश में थे। पाइप के पानी से वो सब नहाए हुए थे। मगर कल से न कुछ खाया था न ही कुछ पिया था उन लोगों ने इस लिए उन सबकी हालत खराब थी।

"हमें छोंड़ दो इंस्पेक्टर।" रोहित ने रोते हुए कहा___"हम तुम्हारे पैर पकड़ते हैं। हमें जाने दो यहाॅ से। हम कसम खाते हैं कि कभी भी किसी लड़की के साथ ऐसा वैसा कुछ नहीं करेंगे।"
"हाॅ हाॅ हम कुछ नहीं करेंगे।" अलोक ने बुरी तरह गिड़गिड़ाते हुए कहा___"हमें इस नर्क से निकाल दो इंस्पेक्टर। यहाॅ हमारा दम घुटा जा रहा है। कल से हम यहाॅ वैसे के वैसे ही बॅधे हुए हैं। न हमारे पैरों में जान है ना ही हाॅथों में ताकत। हमसे अब और नहीं खड़ा हुआ जा रहा इंस्पेक्टर। प्लीज हमें छोंड़ दो।"

"अभी तो ये शुरूआत है।" रितू ने कठोर भाव से कहा___"मैं तुम लोगों का वो हाल करूॅगी जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं होगा आज तक। तुम लोगों ने जो कुकर्म किया है उसके लिए कानून तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि तुम लोगों के हरामी बाप बड़ी आसानी से तुम लोगों को कानून की गिरफ्त से निकाल लेते। इस लिए मैंने सोचा कि तुम लोगों को कानूनन सज़ा दिलाने से कोई फायदा नहीं होगा बल्कि तुम लोगों को कानून के बाहर आकर ही सज़ा दी जा सकती है। वही मैने किया है। तुम्हारे बाप दादाओं को पता ही नहीं चलेगा कभी कि उनके बच्चे कहाॅ गए हैं?"

"नहीं नहीं ऐसा मत करो।" किशन रो पड़ा___"हम मानते हैं कि हमने अपराध किया है मगर एक बार माफ़ कर दो। एक बार तो सब कोई माफ़ कर देता है इंस्पेक्टर।"
"अगर तम लोगों ने अपने जीवन में सिर्फ एक ही अपराध किया होता तो ज़रूर तुम लोगों को माफ़ कर देती।" रितू ने कहा___"मगर तुम लोगों ने तो एक के बाद एक संगीन अपराध किये हैं। दूसरों की बहन बेटियों की इज्जत खराब कर उनकी ज़िदगी बरबाद की है तुम लोगों ने। मेरे पास तुम सबका काला चिट्ठा मौजूद है। इतना ही नहीं तुम लोगों के बाप का भी। मेरे पास ऐसे ऐसे सबूत हैं कि तुम लोगों के बापों को मैं सबके सामने नंगा दौड़ा सकती हूॅ।"

रितू की ये बातें सुन कर उन सबकी रूह काॅप गई। उन्हें अपनी स्थित और अपने बापों की स्थित का अंदाज़ा अब हुआ था। उनके बाप तो जानते भी नहीं थे कि उनके बच्चे उनकी ही अश्लील वीडियो बनाए हुए हैं। खुफिया कैमरे से वीडियो बनाई गई थी और इन सबका मास्टर माइंड सूरज चौधरी था।

"काका इन सबको आज का भोजन दे दो।" रितू ने हरिया से कहा___"मगर भोजन भी वही देना जो हम कुत्तों को देते हैं। छलनी में आटा छालने से जो छलनी में बचता है ना उसी की मोटी रोटिया बनवाना और इन चारों को सिर्फ एक एक सूखी रोटी देना। जबकि इन दोनों गार्ड्स को ठीक ठाक भोजन दे देना। क्योंकि इन लोगों इन हरामियों के जैसा कोई अपराध नहीं किया है। ये तो बस गेहूॅ के साथ घुन की तरह यहाॅ पिसने आ गए हैं। इन्हें छोंड़ा नहीं जा सकता वरना ये दोनो उस चौधरी को यहाॅ की सारी बातें बता देंगे।"

"हम किसी से कुछ नहीं कहेंगे बेटी।" एक गार्ड शालीनता से बोला___"हम इन सबके बारे में सबकुछ जानते हैं। ये लोग सचमुच बहुत ही गंदे लोग हैं। हम तो ग़रीब आदमी हैं। दो पैसों के लिए इनके यहाॅ गार्ड की नौकरी कर रहे थे। ये लोग और इन लोगों के बाप जब भी फार्महाउस आते थे तो उन लोगों के साथ हर बार कोई दूसरी लड़कियाॅ होती थी। रात भर ये लोग अंदर अय्याशियाॅ करते। कुछ लड़कियों को ये लोग जबरदस्ती उठा लाते थे और उनकी इज्जत को तार तार करते थे। ये सब बड़े लोग हैं बेटी। पैसों की गरमी ने इन्हें शैतान बना दिया है।"

"साले हरामजादे हमारा नमक खाता है और हमारे ही बारे में ऐसी बातें करता है?" सूरज गुस्से में चीखा था।
"मेरे हाॅथ बॅधे हैं छोरे।" गार्ड ने कहा___"वरना तुझे बताता कि मुझे हरामजादा कहने का क्या अंजाम होता। नमक खाता था तो मुफ्त का नहीं खाता था समझे। बीस बीस घंटे चौकीदारी करता था तब तेरे बाप का नमक खाता था मैं। बात करता है साला रंडी की औलाद।"

"अपनी जुबान को लगाम दे कुत्ते।" सूरज पूरी शक्ति से चीखा था।
"कुत्ता तो तू है साले गस्ती की औलाद।" गार्ड ने भी ताव खाते हुए बोला___"इसी लिए तेरे लिए ऐसी रोटी बनने वाली है।"

सूरज खून के ऑसू पीकर रह गया। उसकी ऑखों में ज्वाला धधकने लगी थी। रितू उन दोनो की बाते सुन रही थी और सोच भी रही थी कि गार्ड तो बेचारे बेकसूर ही हैं। पर वो उन्हें छोंड़ कर कोई रिश्क नहीं लेना चाहती थी। क्योंकि ये भी हो सकता था कि वो दोनो अच्छा बनने का नाटक कर रहे हों। यानी सूरज ने उन लोगों को सिखाया पढ़ाया हो कि उसके आते ही हमें आपस में कैसी बातें करनी है। ताकि रितू यही समझे कि गार्ड्स बेकसूर हैं और वो उन्हें छोंड़ देने का विचार करे। और अगर वो छोंड़ देगी तो फिर वो यहाॅ से जाकर सीधा चौधरी को सारी बात बता देंगे। उसके बाद चौधरी रितू का हिसाब किताब कर लेता।

"काका, अभी भी इसमें गरमी बाॅकी है " रितू ने कहा___"इस लिए खिला पिला कर ज़रा अच्छे से फिर खातिरदारी करना। भोजन में कुत्ते वाली सिर्फ एक रोटी ही देना इन्हें। इसके बाद कल ही इन्हें खाना देना। अब चलती हूॅ मैं।"
"ठीक बिटिया।" हरिया खातिरदारी का सुन कर खुश हो गया था।

रितू पलट कर तहखाने के दरवाजे से बाहर निकल गई। उसके जाते ही हरिया ने तहखाने का दरवाजा बंद किया। एक कोने में रखे मोटे डंडे को उठाया और उन चारों की तरफ बढ़ा। हरिया को अपने करीब आते देख उन चारों की रूह काॅप गई।

"का रे मादरचोद।" हरिया ने सूरज की टाॅग में मोटा डंडा घुमा कर जड़ दिया___"बहुतै गरमी चढ़ रखी है न तोही। हम लोगन की गरमी को बहुतै अच्छे से उतारता हूॅ।"
"माफ कर दो काका।" सूरज ने सहसा हरिया से रिश्तेदारी जोड़ते हुए कह उठा___"ग़लती हो गई। अब कुछ नहीं कहूॅगा। प्लीज़ माफ़ कर दो न।"

"माफ़ी ता हम दे दूॅगा बछुवा।" हरिया ने डंडे को सूरज के पिछवाड़े पर हौले हौले सहलाते हुए कहा___"पर एखर कीमत दे का पड़ी। बोल दे सकत है तू कीमत?"
"कैसे कीमत काका?" सूरज ने नासमझने वाले भाव से कहा।

"ऊ का है ना बछुवा।" हरिया ने कहा___"हमका अपने जीवन मा एक बार ता जरूर केहू के गाॅड मारै का मन रहा। जब हमरी तोहरे काकी से शादी हुई ता हम बड़ा खुश हुए। सुहागरात मा हम तोहरे काकी से बोल दिये कि हमका तोर गाॅड मारै का है। पर ऊ ससुरी हमरी ई बात पर बिगड़ गै। फेर ता अइसनै चलत रहा बछुवा अउर हम आज तक केहू केर गाॅड मारै का ना पायन। एसे हम कहत हैं कि कीमत मा तोही आपन गाॅड हमसे मरावै का पड़ी।"

"नहीं नहीं।" सूरज हरिया की ये बात सुन कर अंदर तक काॅप गया।
"देख बछुवा ई ता तोही करै का पड़ी।" हरिया ने कठोरता से कहा__"ई हमरे खुशी का बात है। सरवा आज तक केहू केर गाॅड मारै का ना पायन हम। पर आज ता हम तोर गाॅड मार के रहब बछुवा। अब ई तै सोच ले कि तू ई सब खुशी मा करिहे या रोई रोई के। हीहीहीहीही।"

हरिया ज़ोर ज़ोर से हॅसे जा रहा था। उसकी हॅसी ने तहखाने में बड़ा ही भयानक वातावरण पैदा कर दिया था। उन चारी की अंतरआत्मा तक काॅप गई। सूरज तो हरिया को इस तरह देखने लगा था जैसे वह उसका काल हो।

"हमरे बिटिया केर बात ता तू लोग सुन ही लिये हो ना।" हरिया कह रहा था___"तू सब अब इहैं रहने वाले हो। अउर हम अब तू ससुरन के रोज बारी बारी से गाॅड मारब।"
"ऐसा मत करो काका हम तुम्हारे हाथ जोड़ते हैं प्लीज।" रोहित सहमे हुए से बोला।

"हाॅथ जोड़ै का कौनव फायदा ना होई बछुवा।" हरिया ने कहा___"काहे से के ई हमरे ख्वा....अरे ऊ का कहत हैं...ख्वाहिश...हाॅ ईहैं...हाॅ ता ई हमरे ख्वाहिश का बात है। गाॅड मारै का हमरा बहुतै ख्वाहिश है बछुवा। अब ई बात मा हम कौनव केर बात ना मानब। चल रे पहिले तोरै गाॅड का उद्घाटन हम करब हीहीही।"

सूरज की गाॅड में हरिया ने ज़ोर से मोटा डंडा जड़ दिया। सूरज दर्द के मारे पूरी शक्ति से चीखने लगा था। जबकि हरिया ने सूरज की कमर में बॅधे कपड़े को खोल कर एक तरफ उछाल दिया। सूरज बुरी तरह इधर उधर हो रहा था। मगर दोनो हाथ ऊपर बॅधे थे और दोनो पैर फैलाए हुए चारों के पैरों से बॅधे हुए थे।

"ई का रे रंडी केर दुम।" हरिया सूरज की लुल्ली को देख कर कहा___"ई ता बच्चन जइसन है रे। मादरचोद नामरद है का रे?"
"आहहहहह।" अपनी लुल्ली पर डंडे की हल्की मार पड़ते ही सूरज बिलबिला उठा था।

इधर हरिया ने ऊपर खूॅटी से रस्सी की गाॅठ खोल कर सूरज के ऊपर उठे हुए हाॅथों को नीचे की तरफ कर दिया। सूरज का बाजू बुरी तरह अकड़ गया था। कल से एक ही पोजीशन में बॅधा था वह। इस वक्त वह जन्मजात नंगा था। वह बुरी तरह हिल रहा था और हरिया से अपनी गाॅड न मारने के लिए विनती कर रहा था। मगर हरिया मानने वालों में से नहीं था।

"हमने कहा ना बछुवा।" हरिया ने सूरज की मुंडी पकड़ कर आगे की तरफ झुका दिया, फिर बोला___"हम कौनव बात ना मानब। ई हमरे ख्वाहिश केर बात है। एसे हम तोर गाॅड ता मरबै करब।"

हरिया ने अपनी सफेद धोती की गाॅठ छोरी और धोती को खोल कर ऊपर खूॅटी पर टाॅग दिया। सूरज थर थर काॅप रहा था। उसके हाॅथ आपस में अभी भी बॅधे हुए थे इस लिए वह ज्यादा कुछ कर नहीं सकता था। इस वक्त वह हरिया से ये सब न करने के लिए गिड़गिड़ाए जा रहा था।

"काहे बछुवा।" हरिया ने सूरज की नंगी गाॅड में ज़ोर से एक थप्पड़ लगाया, बोला___"अब काहे गिड़गिड़ाय रहा है। कछू याद है? अइसनै ऊ लड़कियन लोग भी तोहरे सामने गिड़गिड़ाती रही होंगी। मगर तू उन मा से केहू केर बात न माने रहे होई है ना? ता मादरजोद फेर हमसे कइसन या उम्मीद करत है कि हम तोर बात मान जाब रे वैश्या के जने सारे?"

सूरज के बगल से बॅधे बाॅकी तीनों ये सब डरे सहमे से देख रहे थे। उनकी हालत बहुत खराब थी। वो ये सोच सोच कर मरे जा रहे थे कि सूरज के बाद उनके साथ भी यही सब होगा। कभी स्वप्न में भी उन लोगों ने ये नहीं सोचा था कभी ऐसा भी वक्त उनके जीवन में आएगा।

"आआआहहहहह।" सूरज के मुख से दर्द भरी कराह निकल गई। हरिया उसके सामने आकर सूरज के सिर के बाल पकड़ कर उठाया था, बोला___"ले देख मादरचोद कि लौड़ा केही कहत हैं। देख न रंडी के पूत। हम चाहू ता अपने ई लौड़े से तुम सबकी एकै बार मा गाॅड फाड़ दूॅ मगर फाड़ूॅगा नहीं। हम ता एक एक करके अउर तसल्ली से तुम चारोन की गाॅड मारब ससुरे लोग।"

हरिया नीचे से नंगा हो चुका था और इस वक्त अपने मोटे तगड़े लौड़े को सूरज के चेहरे के बेहद पास सहला रहा था। सूरज झुका हुआ था क्योकि हरिया ने एक हाॅ से उसके सिर के बाल पकड़ कर उसे नीचे झुकाया हुआ था।

देखते ही देखते हरिया का लौड़ा अकड़ कर खड़ा हो गया। बाॅकी तीनों आश्चर्य से हरिया के लौड़े की तरफ देखे जा रहे थे। उन लोगों की ये सोच कर नानी मर गई कि यही लौड़ा उन लोगों की भी गाॅड मारेगा। हरिया सूरज के पीछे आ गया। अपने पीछे जाते देख सूरज फिर से बुरी तरह हिलने लगा। वह बार बार हरिया से मिन्नतें करने लगता था।

"चिन्ता ना कर बछुवा।" हरिया ने सूरज की गाॅड को फैलाते हुए कहा___"बस एकै बार तीनौ लोकन के दर्शन होई हैं ऊखे बाद ता मजा मिली। अउर हाॅ गाॅड का अपने ढीलै रखिहे नाहीं ता ससुरे फाट जाई ता हमरा दोष ना दीहे।"

सूरज बुरी तरह छटपटाए जा रहा था। मगर हट्टे कट्टे हरिया का एक हाॅथ सूरज के सिर पर था जिसे वह सूरज को नीचे झुके रहने के लिए मजबूर किये हुए था। जबकि दूसरे हाॅथ से वह ढेर सारा थूॅक लेकर उसे अपने लौड़े पर लगाया और फिर लौड़े पकड़ कर सूरज की गाॅड में सेट किया।

तहखाने में मौजूद बाॅकी तीनो वो लड़के और वो दोनो गार्ड्स फटी ऑखों से ये दृश्य देखे जा रहे थे। हरिया ने लौड़ा सेट कर गाॅड की तरब दबाव बढ़ाया।

"आआआहहहहह।" सूरज को दर्द होने लगा। उसकी गाॅड बेहद टाइट थी। जबकि हरिया का लौड़ा मोटा तगड़ा था। हर पल के साथ सूरज की हालत हलाल होते बकरे जैसी होती जा रही थी। वह बुरी तरह छटपटा रहा मगर हरिया की मजबूत पकड़ से वह छूट नहीं पा रहा था। बड़ी मुश्किल से हरिया के लौड़े का टोपा सूरज की गाॅड में घुसा। इतने में ही सूरज गला फाड़े चिल्लाने लगा था।

"सबर कर बछुवा।" हरिया ने कहा___"गला फाड़ने से का होई? ऊ ता हिम्मत रखै से होई। अउर ई ता अबे शुरूआतै हुआ है। अबे ता मंजिल बहुत बाॅकी है बछुवा।"
"आआहहहहहह मममममम्मी रेरेएएएएएए।" हरिया ने ज़ोर का झटका दिया। सूरज की गाॅड को चीरता हुआ हरिया का लौड़ा लगभग आधा घुस गया था। सूरज के मुख से बड़ी भयंकर चीख निकली थी। उसकी ऑखों के सामने अॅधेरा छा गया। सूरज बेहोश हो चुका था। उसकी हालत देख कर बाकी सब के होश उड़ गए। सूरज के दोस्त थर थर काॅपने लगे। वो अनायास ही ज़ोर ज़ोर से पागलों की तरह रोने चिल्लाने लगे।

"अबे चुप करा मादरचोदो वरना ई लौड़ा इसकी गाॅड से निकाल के तुम्हरी गाॅड में घुसेड़ दूॅगा हम।" हरिया गुर्राया तो वो डर के मारे एक दम से चुप हो गए। उनके चुप हो जाने के बाद हरिया ने सूरज की गाॅड में थप्पड़ मारते हुए बोला___"का बे मादरचोद। ससुरे इतने से ही टाॅय बोल गया रे। अभी ता हम पूरा लौड़ा डाला भी नहीं हूॅ।"

हरिया सूरज की गाॅड में धक्के लगाना शुरू कर दिया। हर धक्के के साथ वह थोड़ा बहुत लौड़े को सूरज की गाॅड में घुसेड़ता ही रहा था। सूरज बेहोशी की हालत में भी कराह रहा था। हरिया एक बार तेज़े से धक्का लगाया तो एच ज़ोरदार चीख के साथ सूरज होश में आ गया। होश में आते ही वह बुरी तरह रोने बिलखने लगा। रहम की भीख माॅगने लगा वह। मगर हरिया को तो अब जैसे न रुकना था और नाही रुका वह। तहखाने में सूरज का रोना और चिल्लाना ज़ारी रहा।

अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,,
 
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट........《 37 》

अब तक,,,,,,,,

"सबर कर बछुवा।" हरिया ने कहा___"गला फाड़ने से का होई? ऊ ता हिम्मत रखै से होई। अउर ई ता अबे शुरूआतै हुआ है। अबे ता मंजिल बहुत बाॅकी है बछुवा।"
"आआहहहहहह मममममम्मी रेरेएएएएएए।" हरिया ने ज़ोर का झटका दिया। सूरज की गाॅड को चीरता हुआ हरिया का लौड़ा लगभग आधा घुस गया था। सूरज के मुख से बड़ी भयंकर चीख निकली थी। उसकी ऑखों के सामने अॅधेरा छा गया। सूरज बेहोश हो चुका था। उसकी हालत देख कर बाकी सब के होश उड़ गए। सूरज के दोस्त थर थर काॅपने लगे। वो अनायास ही ज़ोर ज़ोर से पागलों की तरह रोने चिल्लाने लगे।

"अबे चुप करा मादरचोदो वरना ई लौड़ा इसकी गाॅड से निकाल के तुम्हरी गाॅड में घुसेड़ दूॅगा हम।" हरिया गुर्राया तो वो डर के मारे एक दम से चुप हो गए। उनके चुप हो जाने के बाद हरिया ने सूरज की गाॅड में थप्पड़ मारते हुए बोला___"का बे मादरचोद। ससुरे इतने से ही टाॅय बोल गया रे। अभी ता हम पूरा लौड़ा डाला भी नहीं हूॅ।"

हरिया सूरज की गाॅड में धक्के लगाना शुरू कर दिया। हर धक्के के साथ वह थोड़ा बहुत लौड़े को सूरज की गाॅड में घुसेड़ता ही रहा था। सूरज बेहोशी की हालत में भी कराह रहा था। हरिया एक बार तेज़े से धक्का लगाया तो एच ज़ोरदार चीख के साथ सूरज होश में आ गया। होश में आते ही वह बुरी तरह रोने बिलखने लगा। रहम की भीख माॅगने लगा वह। मगर हरिया को तो अब जैसे न रुकना था और नाही रुका वह। तहखाने में सूरज का रोना और चिल्लाना ज़ारी रहा।
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अब आगे,,,,,,,,,

उधर मुम्बई में भी सुुुुबह हुई।

गौरी ने सुबह पाॅच बजे ही विराज को उठा दिया था। सुबह उठ कर उसने थोड़ी बहुत एक्सरसाइज की और फिर बाथरूम में फ्रेश होने के लिए चला गया। फ्रेश होने के बाद वह कमरे में आया तो देखा कि उसकी बहन निधि बेड पर बैठी हुई है।

"अरे तुझे स्कूल नहीं जाना क्या?" मैने तौलिये से अपने सिर के बालों को पोंछते हुए कहा।
"जाना है।" निधि ने गौर से मेरे शरीर को देखते हुए कहा___"मैं तो बस आपको बेस्ट ऑफ लक कहने आई थी।"

"अच्छा तो ये बात है।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"मेरी गुड़िया मेरी जान मुझे बेस्ट ऑफ लक कहने रूम में आई है?"
"हाॅ लेकिन अपने तरीके से।" निधि ने मुस्कुरा कर कहा।
"अपने तरीके से?" मैं उसकी बात से नासमझने वाले अंदाज़ से बोला___"किस तरीके की बात कर रही है तू?"

"वो मैं कर के बताऊॅगी भइया।" निधि ने कहा___"बस आपको अपनी दोनो ऑखें बंद करना पड़ेगा। और खबरदार ग़लती से भी अपनी ऑखें मत खोलियेगा। वरना मैं आपसे बात नहीं करूॅगी। हाॅ नहीं तो।"

"अरे ये क्या कह रही है गुड़िया?" मैं उसकी बात से हैरान हुआ___"आख़िर क्या चल रहा है तेरे मन में?"
"कुछ नहीं चल रहा भइया।" निधि एकाएक ही हड़बड़ा गई थी, बोली___"बस आप अपनी ऑखें बंद कीजिए न।"

मैं उसे ग़ौर से देखता रहा। उसके चेहरे पर इस वक्त संसार भर की मासूमियत विद्यमान थी। खूबसूरती में वह बिलकुल मेरी माॅ की कार्बन काॅपी ही थी। हलाॅकि उसका चेहरा और उसका पूरा रंगरूप मेरी माॅ गौरी की तरह ही था। वो माॅ की हमशक्ल टाइप की थी।

"क्या हुआ भइया?" निधि कह उठी___"क्या सोचने लगे आप? बंद कीजिए न अपनी ऑखें।"
"अच्छा ठीक है बंद करता हूॅ।" मैने कहा__"पर कोई उटपटाॅग हरकत मत करना।"
"मैं ऐसा वैसा कुछ नहीं करूॅगी भइया।" निधि ने कहा___"और अगर कर भी दूॅ तो मेरी भूल समझ कर मुझे माफ़ कर देना। हाॅ नहीं तो।"

मैं उसकी नटखट बातों पर मुस्कुरा उठा और अपनी ऑखें बंद कर ली। कुछ पल बाद ही मुझे अपने होठों पर कोई बहुत ही कोमल चीज़ महसूस हुई। अभी मैं कुछ समझ भी न पाया था कि उस कोमल चीज़ ने मेरे होठों को जोर से दबोच कर दो सेकण्ड तक अपने अंदर रख कर उस पर कुछ किया उसके बाद छोंड़ दिया। मेरे दिमाग़ में विस्फोट सा हुआ। एकाएक ही मेरे दिमाग़ की बत्ती जली। मैने झट से अपनी ऑखें खोल दी। सामने देखा तो निधि भागते हुए कमरे के दरवाजे पर नज़र आई मुझे। दरवाजे के पास पहुॅच कर वह रुकी और फिर पलटी। उसके बाद मुस्कुराते हुए कहा__"बेस्ट ऑफ लक भइया।" इतना कह कर वह दरवाछे के बाहर की तरफ हवा की तरह निकल गई। जबकि मैं बुत बना खड़ा रह गया।

मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि मेरी बहन ने इन कुछ पलों के भीतर मेरे साथ क्या कर दिया था। वह मेरे होठों को बड़ी चतुराई से चूम कर मुझे बेस्ट ऑफ लक कहा और भाग भी गई। मुझे उससे इस सबकी उम्मीद नहीं थी। फिर मुझे ध्यान आया कि वो मुझसे प्यार करती है जिसका उसने इज़हार भी किया था।

मैं काफी देर तक बुत बना खड़ा रहा। मेरी तंद्रा तब टूटी जब माॅ कमरे में आकर बोली___"तू अभी तक तैयार नहीं हुआ काॅलेज जाने के लिए? चल तैयार होकर आ जल्दी। मैने नास्ता तैयार करके लगा दिया है।"

मैं माॅ की आवाज़ सुन कर चौंक पड़ा था। उसके बाद मैंने माॅ से कहा कि आप चलिए मैं आता हूॅ। मेरे दिमाग़ में अभी तक यही चल रहा था कि गुड़िया ने ऐसा क्यों किया? मुझे अपने होठों पर अभी भी उसके नाज़ुक होठों का एहसास हो रहा था। मैने अपने होठों पर जीभ फिराई तो मुझे मीठा सा लगा। उफ्फ ये क्या है? मेरी गुड़िया के मुख और होठों का लार इतना मीठा था। मुझे अपने अंदर बड़ा अजीब सा रोमाॅच होता महसूस हुआ। मेरा रोम रोम गनगना उठा था।

ख़ैर मैं काॅलेज की यूनीफार्म पहन कर कमरे से बाहर आया और फिर नीचे डायनिंग हाल की तरफ बढ़ गया। डायनिंग टेबल पर इस वक्त सब लोग बैठे हुए थे। जगदीश अंकल, अभय चाचा, गुड़िया और माॅ। मैं भी एक कुर्सी खींचकर बैठ गया। मेरी नज़र निधि पर पड़ी तो उसने जल्दी से अपना चेहरा झुका लिया। उसके गोरे गोरे और फूले हुए गाल कश्मीरी सेब की तरह सुर्ख हो गए थे लाज और शर्म की वजह से।

"ये बहुत अच्छा किया राज जो तुमने अपनी पढ़ाई जारी कर दी।" सहसा सामने कुर्सी पर बैठे अभय चाचा ने कहा___"मुझे खुशी है कि इतना कुछ होने के बाद भी तुम अपने रास्ते से नहीं भटके। मुझे तुम पर फक्र है राज और मेरा आशीर्वाद है कि तुम हमेशा कामयाबी और सफलता के नये और ऊॅची बुलंदियों को प्राप्त करो।"

"शुक्रिया चाचा जी।" मैने कहा___"भले ही चाहे जो हुआ हो लेकिन मैं जानता था कि आपके दिल में हमारे लिए इतनी भी नफ़रत नहीं होगी जितनी कि बड़े पापा और बड़ी माॅ के दिलों में है हमारे लिए।"

"समय बहुत बलवान होता है राज।" अभय चाचा ने कहा___"और बहुत बेरहम भी। वो हमसे वो सब भी करवा लेता है जिसे करने की हम कभी कल्पना भी नहीं करते। पर कोई बात नहीं बेटे, इंसान वही श्रेष्ठ और महान होता है जो हर तरह के कस्टों को पार करके आगे बढ़ता है।"

"राज बेटा मैने तुम्हारे लिए काॅलेज जाने के लिए एक नई और शानदार कार मगवा दी है जो कि बाहर ही खड़ी है।" जगदीश अंकल ने मुस्कुराते हुए कहा___"हम चाहते हैं कि तुम अपने नये सफर की शुरूआत उसी से करो।"

"इसकी क्या ज़रूरत थी अंकल?" मैने कहा___"मैं वहाॅ पर पढ़ने जा रहा हूॅ ना कि किसी को अपनी अमीरी दिखाने। माफ़ करना अंकल लेकिन मैं चाहता हूॅ कि मैं भी उसी तरह कालेज जाऊॅ जैसे सभी आम लड़के जाते हैं। बाॅकि ऑफिस के कामों के लिए मैं ये सब यूज करूॅगा। मुझे खुशी है कि आपने मेरे लिए एक नई कार लाकर दी।"

"ठीक है बेटे जैसी तुम्हारी इच्छा।" जगदीश अंकल ने कहा___"मुझे ये जान कर अच्छा लगा कि तुम ऐसी सोच रखते हो।"
"वैसे राज किस काॅलेज में एडमीशन लिया है तुमने?" अभय चाचा ने कुछ सोचते हुए पूछा।
"..............में चाचा जी।" मैने बताया।
"अरे इस काॅलेज में तो नीलम ने भी एडमीशन लिया हुआ है।" अभय चाचा चौंके थे___"और निश्चय ही तुम्हारी मुलाक़ात उससे होगी ही वहाॅ। वो जब तुम्हें वहाॅ पर देखेगी तो जरूर बड़े भइया को बताएगी कि तुम भी उसी काॅलेज में पढ़ रहे हो जहाॅ पर वो पढ़ रही है। उसके बाद तुम पर ख़तरा भी हो सकता है बेटे। इस लिए ज़रा सम्हल कर रहना।"

"चिन्ता मत कीजिए चाचा जी।" मैने अजीब भाव से कहा___"मैं तो चाहता ही हूॅ कि अब धीरे धीरे बड़े पापा को ये पता लगे कि मैं किस जगह पर हूॅ। उन्होने तो मेरी तलाश में जाने कब से अपने आदमियों को लगाया हुआ है। उनके आदमी आज महीने भर से मेरी खोज में मुम्बई की खाक़ छान रहे हैं।"

"तुम्हें ये सब कैसे पता?" अभय चाचा बुरी तरह चौंके थे।
"मैं उनकी हर गतिविधि पर नज़र रखता हूॅ चाचा जी।" मैने कहा___"आप अभी कुछ नहीं जानते हैं कि मैंने यहाॅ पर बैठे बैठे ही उनकी कैसी कैसी खातिरदारी की है।"

"क्या मतलब?" अभय चाचा के माथे पर बल पड़ता चला गया, बोले___"किस खातिरदारी की बात कर रहे हो तुम?"
"ये सब आपको जगदीश अंकल बता देंगे चाचा जी।" मैने कहा___"फिलहाल तो मैं अभी काॅलेज जा रहा हूॅ। आज मेरा पहला दिन है। इस लिए मुझे आशीर्वाद दीजिए कि मैं अपने इस सफर पर कामयाब होऊॅ।"

"मेरा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ ही रहेगा राज।" अभय चाचा ने कहा।
उसके बाद हम सबने नास्ता किया और फिर नास्ता करके मैंने अपना बैग लिया। सबसे आशीर्वाद लेकर मैं निधि को लेकर बाहर आ गया।

मैने गैराज से अपनी बाइक निकाली और निधि को पीछे बैठा कर लान से होते हुए मेन गेट से बाहर निकल गया। निधि मेरे साथ इस लिए थी क्योंकि उसे भी स्कूल जाना था। जोकि मेरे काॅलेज के रास्ते पर ही था। निधि मेरे पीछे चुपचाप बैठी हुई थी। वो कुछ बोल नहीं रही थी। ये बड़ी आश्चर्य की बात थी वरना वह चुप रहने वालों में से न थी।

"तो मैडम आज चुप चुप सी क्यों है भई?" मैने बाइक चलाते हुए कहा___"वैसे आज तो मैडम ने ग़जब ही कर दिया है।"
"आप किससे बात कर रहे हैं भइया?" निधि ने कहा।
"किससे का क्या मतलब है मैडम?" मैने कहा___"आप ही से बात कर रहा हूॅ।"

"अच्छा।" निधि ने कहा___"तो मैं मैडम हूॅ?"
"और नहीं तो क्या।" मैने कहा___"मेरी गुड़िया किसी मैडम से कम है क्या?"
"ओहो ऐसा क्या?" निधि एकदम से सरक कर मुझसे चिपक गई, बोली___"लेकिन आपकी टोन बदली हुई क्यों लग रही है मुझे?"

"क्या बताऊॅ गुड़िया?" मैने कहा___"आज सुबह सुबह एक बिल्ली ने मेरे होठों को काट लिया था।"
"क्या?????" निधि चीख पड़ी___"आपने मुझे बिल्ली कहा? अपनी जान को बिल्ली कहा? जाइए नहीं बात करना आपसे। हाॅ नहीं तो।"

"अरे तो तुम क्यों नाराज़ हो रही हो?" मैने कहा___"मैं तो उस बिल्ली की बात कर रहा हूॅ जिसने आज मेरे होठों को काटा था।"
"फाॅर काइण्ड योर इन्फोरमेशन।" निधि ने कहा___"आप जिसे बिल्ली कह रहे हैं वो मैं ही थी। और आपने मुझे बिल्ली कहा। बहुत गंदे हैं आप। हाॅ नहीं तो।"

"ओह माई गाॅड।" मैने कहा___"तो वो तुम थी?"
"ज्यादा ड्रामें मत कीजिए।" निधि एकाएक मुझसे अलग होकर बाइक में पीछे सरक गई, बोली___"मुझे आपसे बात नहीं करनी बस। आपने अपनी जान को बिल्ली कहा है। ये तो मेरी इनसल्ट है, हाॅ नहीं तो।"

"लेकिन मुझे ये सब अच्छा नहीं लगा गुड़िया।" मैने सहसा गंभीर होकर कहा___"तुझे वैसा नहीं करना चाहिए था मेरे साथ। ये ग़लत है।"

मेरी इस बात पर निधि की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न हुई। वो एकदम से चुप थी।
"तू जानती है न कि भाई बहन के बीच ये सब ग़लत होता है।" मैने कहा___"मैने उस दिन भी तुझसे कहा था। फिर आज तूने ऐसा क्यों किया गुड़िया? तुझे पता है अगर ये सब माॅ को पता चल गया तो उन पर क्या गुज़रेगी?"

इस बार भी निधी कुछ न बोली। मैं उसकी चुप्पी देख कर बेचैन व परेशान सा हो गया। मैंने तुरंत ही सड़क के किनारे पर बाइक को रोंक दी और पीछे पलट कर देखा तो चौंक गया। निधि का चेहरा ऑसुओं से तर था। उसकी ऑखें लाल हो गई थी। मैं उसकी इस हालत को देख कर हिल सा गया। वो मेरी बहन थी, मेरी जान थी। उसकी ऑखों में ऑसूॅ किसी सूरत में नहीं देख सकता था मैं। मैं तुरंत बाइक से नीचे उतरा और झपट कर उसे अपने सीने से लगा लिया।

"ये क्या है गुड़िया?" मैने दुखी भाव से कहा___"तू जानती है न कि मैं तेरी ऑखों में ऑसू नहीं देख सकता। फिर क्यों तूने अपनी ऑखों को रुलाया? क्या मुझसे कोई ग़लती हो गई है? बता न गुड़िया।"
"ये ऑसू तो अब मेरी तक़दीर में लिखने वाले हैं भइया।" निधि ने भर्राए गले से कहा__"जब से होश सम्हाला था तब से आप ही को देखा था, आपको ही अपना आदर्श माना था। फिर हमारे साथ वो सब कुछ हो गया। आप हमसे दूर यहाॅ नौकरी करने आ गए। मगर दो दिल तो हमेशा रोते रहे। एक अपने बेटे के लिए तो एक अपने भाई की मोहब्बत के लिए। मैं नहीं जानती भइया कि कब मेरे दिल में आपके लिए उस तरह का प्रेम पैदा हो गया। फिर मैने आपकी वो डायरी पढ़ी। जिसमें आपने अपनी मोहब्बत की दुखभरी दास्तां लिखी थी। विधी की बेवफाई से आप अंदर ही अंदर कितना दुखी थे ये मुझे उस डायरी को पढ़ कर ही पता चला था। उस दिन जब हम दोनो घूमने समंदर गए थे। तब आपने वहाॅ शराब पी और अपनी हालत खराब कर ली थी। आपको मेरे चेहरे में विधी नज़र आई और आपने अपने दिल का सारा गुबार निकाल दिया। मैं आपकी उस दशा को देख कर बहुत दुखी हो गई थी। आप तो शुरू से ही मेरी जान थे। मुझे उस दिन लगा कि आपको सहारे की ज़रूरत है। मैंने जो अब तक अपने दिल में उस प्रेम को छुपाया हुआ था उसे बाहर लाने का फैसला कर लिया। मुझे किसी की परवाह नहीं थी कि लोग मेरे बारे में क्या कहेंगे या क्या सोचेंगे? मुझे तो बस इस बात की फिक्र थी कि मेरे भइया दुखी न रहें। मैं अपकी खुशी के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो गई थी। इसी लिए उस दिन मैने आपसे अपने प्रेम का इज़हार कर दिया था। मुझे पता है कि भाई बहन के बीच ये सब नहीं हो सकता इसके बावजूद मैंने ये अनैतिक कदम उठा लिया। आपने भी तो बाद में मुझसे यही कहा था न कि ठीक है तुझे जो करना है कर। मोहब्बत तो किसी से भी हो सकती है। लेकिन आज फिर आपने कह दिया कि ये सब ग़लत है। अब तो ऐसा हाल हो चुका है कि मेरे दिल से आपके लिए वो चाहत जा ही नहीं सकती। मुझे इस बात पर रोना आया भइया कि आप कभी मेरे नहीं हो सकते। ये देश ये समाज कभी मेरी झोली में आपको जायज बना कर नहीं डाल सकता। तो फिर ये ऑसूॅ तो अब मेरी तक़दीर ही बन गए न भइया। इन ऑसुओं पर आज तक भला किसी का ज़ोर चला है जो मेरा चल जाएगा।"

मैं निधि की बातें सुन कर चकित रह गया था। मुझे उसकी हालत का एहसास था। क्योंकि इश्क़ के अज़ाब तो मुझे पहले से ही हासिल थे। जिनका असर आज भी ऐसा है कि दिल हर पल तड़प उठता है। लेकिन मैं अपनी बहन की मोहब्बत को कैसे स्वीकार कर लेता? मेरी माॅ एक आदर्शवादी और उच्च विचारों वाली है। उसे अगर ये पता चल गया कि उसकी अपनी औलादें ऐसा अनैतिक कर्म कर रही हैं तो वो तो जीते जी मर जाएगी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं किसे चुनूॅ? अपनी बहन की मोहब्बत को या फिर माॅ को?

"सब कुछ समय पर छोड़ दो गुड़िया।" मैने कहा___"और हर पल यही कोशिश करो कि ये सब तुम्हारे दिल से निकल जाए।"
"नहीं निकलेगा भइया।" निधि ने रोते हुए कहा___"मैने बहुत कोशिश की मगर नहीं निकाल सकी मैं अपने दिल से आपको। ख़ैर जाने दीजिए भइया। आप परेशान न होईये। आज के बाद आपको शिकायत का मौका नहीं दूॅगी।"

मैने निधि को ध्यान से देखा। उसके चेहरे पर दृढ़ता के भाव दिखाई देने लगे थे। जैसे उसने कोई फैंसला कर लिया हो। मैने उसकी ऑखों से ऑसू पोछे और फिर वापस बाइक पर आ गया। बाइक स्टार्ट कर मैं आगे बढ़ गया। सारे रास्ते निधि चुप रही। मुझे भी समझ न आया कि मैं क्या बातें करूॅ उससे। थोड़ी ही देर में उसका स्कूल आ गया। मैने उसे स्कूल के गेट पर उतारा और प्यार से उसके सिर पर हाॅथ फेर कर आगे बढ़ गया। निधि के बारे में सोचते सोचते ही मैं काॅलेज पहुॅच गया।
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पुलिस हेडक्वार्टर गुनगुन।
लम्बी चौड़ी मेज के उस पार पुलिस कमिश्नर बैठा हुआ था। जिसकी वर्दी पर लगी नेम प्लेट में उसका नाम कुलभूषण घोरपड़े लिखा हुआ था। पचास से पचपन के बीच की ऊम्र का वह एक प्रभावशाली ब्यक्तित्व वाला इंसान था। उसके बाएॅ साइड की एक कुर्सी पर इंस्पेक्टर रितू बैठी हुई थी। बाॅकी पूरा ऑफिस खाली था।

रितू ने कमिश्नर से गुज़ारिश की थी कि वो अपनी बात सिर्फ उनसे ही करेगी। उन दोनो के बीच कोई तीसरा नहीं होना चाहिए। कमिश्नर चूॅकि अच्छी तरह जानता था कि रितू हल्दीपुर के बघेल परिवार की ठाकुर अजय सिंह की बेटी है। इस लिए उसकी इस गुज़ारिश को उसने स्वीकार कर लिया था वरना पुलिस की एक मामूली सी इंस्पेक्टर रैंक की ऑफिसर की इस डिमाण्ड को स्वीकार करना कदाचित कमिश्नर की शान में गुस्ताख़ी करने जैसा होता।

"सो ऑफिसर, अब बताओ कि ऐसी क्या खास बात करनी थी तुम्हें जिसके लिए तुमने हमसे ऐसी गुज़ारिश की थी?" पुलिस कमिश्नर ने कहा___"ये तो हम समझ गए हैं कि मामला यहाॅ के मंत्री और उसके बेटे का है। लेकिन ये समझ नहीं आया कि अचानक से तुम्हारा प्लान कैसे बदल गया?"

"आप तो जानते हैं सर कि हमारा कानून आज के समय में बड़े बड़े लोगों के हाथ की कठपुतली बन कर रह गया है।" रितू ने कहना शुरू किया___"मंत्री के जिस बेटे ने अपने दोस्तों के साथ उस मासूम लड़की के साथ वो घिनौना कुकर्म किया था उसके लिए उसे कानूनन कोई सज़ा मिल ही नहीं पाती। क्योंकि उन सभी लड़कों के बाप इस शहर की नामचीज़ हस्तियाॅ हैं। उनके एक इशारे पर हमें पुलिस के लाॅकअप का ताला खोल कर उन लड़कों को छोंड़ देना पड़ता। हमारे पास भले ही चाहे जितने सबूत व गवाह होते मगर हम उन सबूतों और गवाहों के बाद भी उन्हें कानूनी तौर कोई सज़ा नहीं दिला पाते। उल्टा होता ये कि उन पर हाॅथ डालने वालों के साथ ही कुछ बुरा हो जाता। वो लड़की बग़ैर इंसाफ पाए ही इस दुनियाॅ से अलविदा हो जाती। आप नहीं जानते सर, उस लड़की को ब्लड कैंसर है। वह बस कुछ ही दिनों की मेहमान है। उन दरिंदों को उस पर ज़रा सी भी दया नहीं आई। आप उस लड़की की कहानी सुनेंगे तो हिल कर रह जाएॅगे सर। इस छोटी सी ऊम्र में उसने कितना बड़ा त्याग किया है इसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। ऐसे कुकर्मियों का एक ही इलाज़ है सर___सज़ा ए मौत। ऐसे लोगों को हज़ार बार ज़िंदा करके हज़ारों बार तड़पा तड़पा कर मारा जाए तब भी कम ही होगा। इस लिए सर मैने उन सबको ऐसी ही सज़ा देने का फैंसला किया है।"

"देखो ऑफिसर भावनाएॅ और जज़्बात रखना बहुत अच्छी बात है।" कमिश्नर ने कहा___"लेकिन हमारे कानून में भावनाओं और जज़्बातों के आधार पर किसी का फैंसला नहीं हुआ करता। बल्कि ठोस सबूतों और गवाहों के आधार पर ही फैंसला होता है। तुम कानून की एक रक्षक हो तुम्हें इस तरह का गैरकानूनी फैसला लेने का कोई हक़ नहीं है। किसे सज़ा देनी है और कैसे देनी है ये फैसला अदालत करेगी। तुमने अपनी मर्ज़ी से ये जो क़दम उठाया है इसके लिए तुम्हें सस्पेण्ड भी किया जा सकता है। इस लिए बेहतर होगा कि तुम ये सब करने का विचार छोंड़ दो।"

"ये सब मैं आपको बताए बग़ैर भी कर सकती थी सर।" रितू ने कहा___"मगर मैने ऐसा किया नहीं। आपको इस बारे में बताना अपना कानूनी फर्ज़ समझा था मैने। वरना उन लड़कों के साथ कब क्या हो जाता ये कभी कोई जान ही नहीं पाता। ये बात आप भी जानते हैं सर कि मंत्री खुद भी ग़ैर कानूनी काम धड़ल्ले के साथ करता है और हमारा पुलिस डिपार्टमेंट उसके खिलाफ कोई कार्यवाही करने की तो बात दूर बल्कि ऐसा सोचता तक नहीं। ऐसा कौन सा अपराध नहीं है सर जिसे वो चौधरी अंजाम नहीं देता? मगर आज तक उस पर कानून ने हाथ नहीं डाला। सिर्फ इस डर से कि कहीं उसका क़हर हमारे डिपार्टमेंट पर न बरस पड़े। वाह सर वाह, क्या कहने हैं इस पुलिस डिपार्टमेंट के। अरे इतना ही डरते हैं उससे तो पुलिस की नौकरी ही न करनी थी सर।"

"सब तुम्हारे जैसा नहीं सोचते हैं ऑफिसर।" कमिश्नर ने कहा___"और अगर सोचते भी हैं तो बहुत जल्द उनकी वो सोच बदल भी जाती है। क्योंकि डिपार्टमेंट में ऐसे कुछ लोग भी होते हैं जो वर्दी तो पुलिस की पहनते हैं मगर नौकरी उस चौधरी के यहाॅ करते हैं। उसकी जी हुज़ूरी करते हैं। क्योंकि इसी में वो अपना भला समझते हैं। हमें सब पता है ऑफिसर लेकिन कुछ कर नहीं सकते। अगर करना भी चाहेंगे तो दूसरे दिन ही हमारे सामने ट्राॅसफर ऑर्डर आ जाएगा। ये सब तो आम बात हो गई है ऑफिसर।"

"कमाल की बात है सर।" रितू ने कहा___"इस तरह में तो कोई काम ही नहीं हो सकता। पुलिस की अकर्मण्ड्यता से नुकसान किसका होगा? उन मासूम लोगों का जो दिन रात अपने बीवी बच्चों के लिए खून पसीना बहाते हैं, इसके बाद भी भर पेट वो अपने परिवार को खाना नहीं खिला पाते। चरस और अफीम जैसे ज़हर का हर दिन वो इसी तरह शिकार होते रहेंगे। ऐसे ही न जाने कितनी लड़कियों का रेप होता रहेगा। और ये सब कुकर्म करने वाले अपनी हर जीत का जश्न मनाते रहेंगे।"

"कानून ने अपनी ऑखों पर पट्टी बाॅधी हुई है तुम भी ऑखों पर पट्टी बाॅध लो।" कमिश्नर ने कहा___"इसी में इस डिपार्टमेंट का भला है ऑफिसर।"
"हर्गिज़ नहीं सर।" रितू के मुख से शैरनी की भाॅति गुर्राहट निकली। एक झटके से वह कुर्सी से खड़ी हो गई थी, बोली___"मैं इतनी कमज़ोर नहीं हूॅ जो ऐसे गीदड़ों से डर जाऊॅगी। आपको अपनी चिंता है और इस डिपार्टमेंट की तो करते रहिए चिंता। मगर मैं चुप नहीं बैठूॅगी सर। मैं उन हराम के पिल्लों को ऐसी सज़ा दूॅगी की फरिश्तों का भी कलेजा हिल जाएगा।"

"बिहैव योरसेल्फ ऑफिसर।" कमिश्नर ने शख्त भाव से कहा___"तुम कानून को अपने हाथों में नहीं ले सकती।"
"आपने मजबूर कर दिया है सर।" रितू ने आहत भाव से कहा___"बड़ी उम्मीद के साथ आई थी आपके पास। सोचा था कि आप मेरी मदद करेंगे। मगर आप तो.....ख़ैर जाने दीजिए सर। मुझे बस एक सवाल का जवाब चाहिए आपसे। क्या आप नहीं चाहते हैं कि ऐसे लोगों को सज़ा मिले?"

"बिलकुल चाहते हैं ऑफिसर।" कमिश्नर ने कहा___"मगर हमारे चाहने से क्या होता है? हम तो बस मजबूर कर दिये जाते हैं कुछ न करने के लिए।"
"अगर आप सच में चाहते हैं सर।" रितू ने कहा___"तो फिर मेरा साथ दीजिए। आपको करना कुछ नहीं है। बस इतना करना है कि अगर ऊपर से कोई बात आए तो आप यही कहेंगे कि विधी रेप केस पर कोई कार्यवाही नहीं की गई है। सबूत के तौर पर आप उन्हें फाइलें भी दिखा सकते हैं। मैं आपको यकीन दिलाती हूॅ सर कि आप पर और आपके इस डिपार्टमेंट पर किसी भी तरह की कोई बात नहीं आएगी। क्योंकि मेरे पास उस मंत्री के ऐसे ऐसे सबूत हैं कि वो चाह कर भी हमारा कुछ बुरा नहीं कर सकता। आप बस वो करते जाइये जो मैं कहूॅ। फिर आप देखिए कि कैसे मैं शहर से इस गंदगी और इस अपराध का नामो निशान मिटाती हूॅ।"

"कैसे सबूत हैं तुम्हारे पास?" पुलिस कमिश्नर चौंका था।
"बस आप ये समझिए सर कि उस मंत्री की और उस जैसे लोगों की जान अब मेरी मुट्ठी में है।" रितू ने कहा___"वो सब अपने हाथ पैर चलाना तो चाहेंगे मगर चला नहीं पाएॅगे।"

"अगर ऐसी बात है ऑफिसर तो हम यकीनन तुम्हारे साथ हैं।" कमिश्नर ने एकाएक गर्मजोशी से कहा___"तुमने हमें पहले क्यों नहीं बताया कि तुम्हारे पास इन लोगों के खिलाफ़ इतने पुख़्ता सबूत हैं?"

"आप मेरी बात ही कहाॅ सुन रहे थे सर।" रितू ने सहसा मुस्कुरा कर कहा__"बस जाने क्या क्या कहे जा रहे थे।"
"ओह साॅरी ऑफिसर।" कमिश्नर हॅसा__"तो अब बताओ क्या करना है आगे?"

"मैंने तो पहले ही करना शुरू कर दिया था सर।" रितू ने कहा___"बस आपको इस बात की जानकारी देना चाहती थी। अब तो आप बस आराम से यहीं पर बैठ कर न्यूज आने का इंतज़ार कीजिए।"
"ओके ऐज योर विश।" कमिश्नर ने कंधे उचकाए___"एण्ड हमें बेहद खुशी हुई कि तुम एक ईमानदार और बहादुर ऑफिसर हो। बेस्ट ऑफ लक।"
"थैंक्यू सर।" रितू ने कहा और फिर कमिश्नर को सैल्यूट कर वह ऑफिस से बाहर निकल गई।

बाहर आकर वह अपनी पुलिस जिप्सी में बैठ कर हैडक्वार्टर से बाहर निकल गई। उसके चेहरे पर इस वक्त खुशी और जोश दोनो ही भाव गर्दिश कर रहे थे। सड़क पर उसकी जिप्सी हवा से बातें करते हुए एक मोबाइल स्टोर की दुकान पर रुकी। लेकिन फिर जाने क्या सोच कर उसने फिर से जिप्सी को आगे बढ़ा दिया।

आधे घंटे से कम समय में ही वह एक मकान के सामने आकर रुकी। उसने अपनी पाॅकेट से अपना आईफोन निकाला और उसमें कोई नंबर डायल किया।

"बाहर आओ।" उसने काल कनेक्ट होते ही कहा, और फिर बिना उधर का जवाब सुने काल कट कर दिया। थोड़ी देर बाद ही उसके पास एक आदमी आकर खड़ा हो गया। वो आदमी यही कोई पच्चीस या तीस की उमर के आस पास का रहा होगा।

"जी मैडम कहिए क्या आदेश है?" उस आदमी ने बड़ी शालीनता से कहा।
"एक काम करो अगर यहाॅ पास में कहीं कोई मोबाइल स्टोर हो तो एक मोबाइल फोन खरीद कर ले आओ।" रितू ने जेब से दो हज़ार के पाॅच नोट निकाल कर उसे देते हुए कहा__"और एक नई सिम भी। कोशिश करना कि सिम ऐसे ही मिल जाए और तुरंत एक्टिवेट भी हो जाए। तुम समझ रहे हो न?"

"जी मैं समझ गया मैडम।" आदमी ने सिर हिलाते हुए कहा___"आप फिक्र मत कीजिए। यहीं पास में ही एक मोबाइल स्टोर है। मैं अभी दोनो चीज़ें लेकर आता हूॅ।"
"ठीक है।" रितू ने दो नोट और उसकी तरफ बढ़ाए___"इन्हें भी ले लो। अगर कम पड़ें तो लगा देना नहीं तो खुद रख लेना।"

"ठीक है मैडम।" आदमी ने खुश होकर कहा___"मैं अभी लेकर आता हूॅ। आप यहीं पर इंतज़ार कीजिए।"
"ओके ठीक है।" रितू ने कहा।

वो आदमी हवा की तरह वहाॅ से गायब हो गया। रितू उसे यूॅ तेजी से जाते देख बरबस ही मुस्कुरा पड़ी। सड़क के किनारे जिप्सी को खड़े कर वह जाने किन ख़यालों में खो गई। चौंकी तब जब उस आदमी ने वापस आकर उसे आवाज़ दी।

"ये लीजिए मैडम।" आदमी ने एक छोटा सा थैला पकड़ाते हुए कहा___"इसमें सैमसंग का एक मोबाइल है और एक सिम भी। दुकानदार ने कहा है कि आधे घंटे में सिम चालू हो जाएगी"
"ओह वैरी गुड।" रितू ने कहा___"एण्ड थैक्स। अब जाओ तुम।"
"अच्छा मैडम।" आदमी ने सलाम बजा कर कहा और चला गया।

रितू थैले को अपने बगल से रख कर जिप्सी को यू टर्न दिया और आगे बढ़ गई। अब उसकी जिप्सी का रुख शहर से बाहर की तरफ था।
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मैं काॅलेज की पार्किंग में अपनी बाइक को खड़ी कर काॅलेज के अंदर की तरफ बढ़ गया। ये मुम्बई का सबसे बड़ा और टाप क्लास का काॅलेज था। मुझे पता था काॅलेजों में रैगिंग होना आम बात है। इस लिए मैं खुद भी इसके लिए तैयार था। काॅलेज के अंदर काफी सारे स्टूडेंट्स थे। लेकिन मैं ये देख कर थोड़ा हैरान हुआ कि एक जगह काफी भीड़ सी थी।

मैं समझ तो गया कि वो भीड़ किस बात के लिए थी। मुमकिन था कि वहाॅ पर सीनियर लोग किसी जूनियर की रैगिंग ले रहे होंगे। लेकिन हैरानी की बात ये थी कि इतनी भीड़ क्यों थी वहाॅ पर। उत्सुकतावश मैं उसी तरफ बढ़ता चला गया।

थोड़ी ही देर में मैं उस भीड़ के पास पहुॅच गया। लेकिन भीड़ की वजह से समझ नहीं आया कि भीड़ के अंदर क्या चल रहा है? तभी मेरे कानों में ज़ोरदार चीख सुनाई पड़ी। ये किसी लड़की की चीख़ थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसके साथ कोई ज़ोर ज़बरदस्ती की जा रही थी। मेरा रोम रोम खड़ा हो गया। किसी कमज़ोर लड़की पर ज़ोर ज़बरदस्ती? मुझसे ये सहा न गया। मैं एकदम से उस भीड़ का हिस्सा बने लोगों को खींच कर दूर हटाने लगा। बड़ी मुश्किल से मैं उन लोगों के बीच से निकलते हुए अंदर की तरफ पहुॅचा। अंदर का दृष्य ऐसा था कि मेरा दिमाग़ खराब हो गया।

अंदर कोई लड़का किसी लड़की के ऊपर चढ़ा हुआ था। नीचे पड़ी लड़की बुरी तरह रोते हुए छटपटा रही थी और चीख रही थी। वो लड़का उस लड़की के कपड़े फाड़ने पर तुला हुआ था। उसके चारो तरफ खड़े कुछ लड़के हॅस रहे थे। मुझे लड़की का चेहरा नज़र नहीं आ रहा था। मगर ये दृष्य देख कर मेरे अंदर गुस्से की आग धधक उठी।

मैने ज़ोर से एक लात उस लड़के के पेट के बगल में मारी। वो उस लड़की से हट कर तथा लहराते हुए भीड़ के पास गिरा। चारो तरफ फैली हुई भीड़ एकदम से छितर बितर हो गई। मैने जिसे लात मारी थी उसके मुख से ज़ोरदार चीख निकल गई थी। मगर वह जल्दी से उठ कर मेरी तरफ पलटा।

"किसकी मौत आई है?" वो लड़का गरजते हुए बोला___"किसकी इतनी हिम्मत हुई कि मुझे मारा? आशू राना पर हाथ उठाया?"
"उस भीड़ की तरफ क्या देख रहा है?" मैने कहा___"ये सब तो नामर्द हैं। नपुंषक लोंग हैं ये। सिर्फ तमाशा देखना जानते हैं। तुझे कुत्ते की तरह मारने वाला मर्द तो इधर खड़ा है।"

"तूने मुझे मारा?" आशू राना ने अजीब भाव से ऑखें नचाते हुए कहा___"तुझे पता है मैं कौन हूॅ? अबे मेरे बारे में जान जाएगा न तो मूत निकल जाएगा तेरा, समझा क्या?"
"चल बता फिर।" मैं उसकी तरफ बढ़ने लगा___"बता कौन है तू? मैं भी तो देखूॅ कि तेरे बारे में जान कर मेरा मूत निकलता है कि नहीं। चल बता जल्दी।"

"ये समझा रे इसे।" आशू राना ने इधर उधर देखते हुए कहा___"इसे समझाओ रे कोई। ये साला आशू राना को नहीं जानता। ओ रहमान समझा बे इसे कि मैं कौन हूॅ? इसे बता कि मेरा बाप कौन है?"
"क्यों तेरे क्या बहुत सारे बाप हैं जो ये बोल रहा है कि तेरा बाप कौन है?" मैं उसके करीब पहुॅच गया था। झपट कर उसकी गर्दन दबोच ली मैने। अपनी गर्दन दबोचे जाने पर वह छटपटाने लगा। मुझ पर अपने दोनो हाॅथों से वार करने लगा।

"ओए खड़े क्या हो सालो।" उसने तिरछी नज़र से अपने साथियों की तरफ देखते हुए कहा___"मारो इसे। इसने मुझ पर हाथ उठाया है। इसका काम तमाम करना ही पड़ेगा अब।"

चारो तरफ खड़े उसके साथी एक साथ मेरी तरफ दौड़ पड़े। मैंने आशू राना की गर्दन को छोंड़ कर एक पंच उसकी नाॅक पर ठोंक दिया। वह बुरी तरह चीखते हुए जमीन पर गिर गया। इधर चारो तरफ से जैसे ही उसके साथी मेरे पास आए तो मैं एकदम से पोजीशन में आ गया। जैसे ही एक मेरी तरफ बढ़ा मैने घूम कर बैक किक उसके चेहरे पर रसीद कर दी। वह उलट कर धड़ाम से गिरा। दूसरे के हाॅथ में मुझे चाकू नजर आया। उसने चाकू वाला हाॅथ घुमा दिया मुझ पर। मैने बाएॅ हाथ से उसके उस वार को रोंका और दहिने हाथ से एक मुक्का उसकी नाॅक में जड़ दिया। उसके नाक से भल्ल भल्ल करके खून बहने लगा। बुरी तरह चीखते हुए वह भी लहराते हुए गिर गया। मैं तुरंत पलटा और जल्दी से नीचे झुक भी गया। अगर नहीं झुकता तो तीसरे वाले का हाॅकी का डंडा सीधा मेरे सिर पर लगता। मगर मैं ऐन वक्त पर झुक गया था। हाॅकी का वार जैसे ही मेरे सिर के ऊपर से निकल चुका तो मैं सीधा होकर उछलते हुए उसकी पीठ पर एक किक जमा दी। वह मुह के बल जमीन चाटने लगा। फिर तो जैसे वहाॅ पर उन सबकी चीखों का शोर गूॅजने लगा। कुछ ही देर में आशू राना के सभी साथी जमीन पर पड़े बुरी तरह कराह रहे थे। मैं चलते हुए आशू राना के पास गया और झुक कर उसका कालर पकड़ कर उठा लिया।

"अब एक बात मेरी भी सुन तू।" मैने ठंडे स्वर में कहा___"तू चाहे यमराज का भी बेटा होगा न तब भी मैं तुझे ऐसे ही धोऊॅगा। इस लिए आज के बाद किसी लड़की के साथ कुछ बुरा करने की सोचना भी मत। अब दफा हो जा यहाॅ से। आज के लिए इतना काफी है मगर दूसरी बार तू सोच भी नहीं सकता कि मैं तेरा और तेरे इन साथियों का क्या हाल करूॅगा।"

आशू राना के चेहरे पर डर दिखाई दिया मुझे। वो मेरे छोंड़ते ही वहाॅ से भाग लिया। उसके पीछे उसके सभी साथी भी भाग लिए। कुछ दूर जाकर आशू राना रुका और फिर पलट कर बोला___"ये तूने ठीक नहीं किया। इसका अंजाम तो तुझे भुगतना ही पड़ेगा।"
"अबे जा।" मैं दौड़ा उसकी तरफ तो वो सरपट भागा बाहर की तरफ।

उन लोगों के जाने के बाद मैं वापस पलटा। मैने उस लड़की की तरफ देखा। वो दूसरी तरफ सिर झुकाए खड़ी थी। उसका दुपट्टा मेरे सामने कुछ ही दूरी पर जमीन में पड़ा हुआ था। मैं आगे बढ़ कर उसका पीले रंग का दुपट्टा उठाया और उस लड़की की तरफ बढ़ गया।

"ये लीजिए मिस।" मैने पीछे से उसे उसका दुपट्टा देते हुए बोला___"आपका दुपट्टा।"
"जी धन्यवाद आपका।" उसने मेरे हाॅथ से दुपट्टा लिया, और फिर मेरी तरफ पलटते हुए बोली____"अगर आप नहीं आते तो वो न जाने मेरे सा...........।"

उसका वाक्य अधूरा रह गया। मुझ पर नज़र पड़ते ही उसकी ऑखे फैल गई। वह आश्चर्यचकित भाव से मुझे देखने लगी। मेरा भी हाल कुछ वैसा ही था। जैसे ही वह मेरी तरफ पलटी तो मेरी नज़र उसके चेहरे पर पड़ी। और मैं उसका चेहरा देख कर उछल ही पड़ा था।

"नी..लम???" मेरे मुख से लरजता हुआ स्वर निकला।
"रा......ज।" उसके मुख से अविश्वसनीय भाव से निकला।
"ओह साॅरी।" मैने एकदम से खुद को सम्हालते हुए कहा___"आपका दुपट्टा।"

मैने उसे उसका दुपट्टा पकड़ाया और तुरंत पलट गया। मैं उसके पास रुकना नहीं चाहता था। मैं तेज तेज चलते हुए उस जगह से दूर चला गया। जबकि नीलम बुत बनी वहीं पर खड़ी रह गई।

अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,,,
 
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