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Gandi Kahani ♡ एक नया संसार ♡

एकनयासंसार
अपडेट........《 57 》

अब तक,,,,,,,,

"अपने भगवान को याद कर ले बच्चे।" फिर उसने मेरी तरफ खतरनाक भाव से बढ़ते हुए कहा___"उनसे दुवा कर कि तेरे जिस्म की हड्डियाॅ सलामत रहें।"
"ये डाॅयालग मैं भी बोल सकता हूॅ तुम्हारे लिए।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"पर ये सोच कर नहीं बोला कि फालतू की डींगें मारना मेरी फितरत नहीं है।"

मेरी ये बात सुन कर वो जैसे बुरी तरह तिलमिला गया था। मुझे पता था कि उसके सामने मैं कुछ भी नहीं हूॅ। अगर मैं एक बार भी उसके फौलादी शिकंजे में फॅस गया तो फिर शायद भगवान ही मालिक होगा मेरा। मगर मुझे खुद पर और अपने गुरू की सिखाई हुई कला पर पूर्ण विश्वास था।

वो पूरे वेग से मेरी तरफ बढ़ा और अपने दाहिने हाॅथ को भी उसी वेग से मुझ पर चलाया था। मैं फुर्ती से नीचे झुका मगर झुकते ही मेरे हलक से चीख निकल गई। कारण उसने हाॅथ चलाने के बाद ही अपने दाहिने पैर को उठाकर उसका घुटना भी चला दिया था जो सीधा मेरे झुके हुए चेहरे से टकराया था। मैं उछलते हुए सीधा हुआ ही था कि उसने बिजली की सी फुर्ती से घूम कर मेरे सीने पर फ्लाइंग किक जमा दी। नतीजा ये हुआ कि मेरे हलक से ज़ोर की हिचकी निकली और मैं पीछे की तरफ हवा में लहराते हुए ही नीचे कच्ची ज़मीन पर चारो खाने चित्त जा गिरा। गिरते ही मेरी ऑखों के सामने अनगिनत तारे नाॅच गए। कुछ पल के लिए तो ऑखों के सामने अॅधेरा भी छा गया। प्रहार इतना ज़बरदस्त था कि मुझसे तुरंत उठा न गया। सीने में बड़ी असहनीय पीड़ा महसूस हुई मुझे। मेरे कानो में नीलम व सोनम की चीखें भी टकराई। कदाचित मुझे इस तरह गिरते देख वो बेहर डर गई थी और मुझे कुछ हो जाने की आशंका से वो बुरी तरह चीखी थीं।

सहसा मेरी नज़र मेरे नज़दीक ही पहुॅच चुके उस आदमी पर पड़ी। मेरे क़रीब पहुॅचते ही उसने अपने पैर को उठाया और ज़मीन पर चित्त गिरे मेरे पेट की तरफ तीब्र वेग से चलाया। मैं बिजली की सी फुर्ती से कई पलटा खाते हुए दूसरी तरफ हो गया तथा साथ ही उछल कर खड़ा भी हो गया। ये अलग बात है इस तरह उछल कर खड़े होने से अचानक ही मुझे अपने सीने पर पीड़ा का एहसास हुआ। मैं समझ चुका था कि अगर ये आदमी इसी तरह मुझ पर और दो चार प्रहार करने में सफल हो गया तो यकीनन मेरा काम तमाम हो जाना है। अतः अब मैं उससे पूरी तरह सतर्कता से मुकाबला करने के लिए तैयार हो गया।
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अब आगे,,,,,,,

मंत्री दिवाकर चौधरी इस वक्त गुनगुन में ही एक ऐसी जगह पर था जहाॅ पर उसके ही किसी खास जान पहचान वाले के माल का उद्घाटन समारोह था। माल का मालिक या यूॅ कहिए कि मंत्री के उस जान पहचान वाले खास आदमी का नाम शैलेन्द्र बंसल था। जो मुख्य रूप से आगरा का रहने वाला था। बहुत पहले ही उसकी मुलाक़ात मंत्री से हुई थी। कहते हैं कि जो जैसा होता है उसे वैसा मिल ही जाता है फिर चाहे वो दुनियाॅ के किसी भी कोने में चला जाए।

शैलेन्द्र बंसल और मंत्री के बीच क्या मंत्रणा हुई थी इस बारे में तो ख़ैर वो दोनो ही बता सकते थे किन्तु मंत्री के कैरेक्टर के हिसाब से सोचने पर पता चलता था कि शैलेन्द्र बंसल भी मंत्री के ही जैसे कैरेक्टर का आदमी था। इसका खुलासा तब हुआ जब मंत्री ने शैलेन्द्र को अपने यहाॅ कारोबार के रूप में एक बड़ा सा माॅल स्थापित करने का प्रस्ताव दिया था। मंत्री के ही सहयोग से तथा उसके ही निर्देशन पर गुनगुन में अच्छी खासी ज़मीन पर ग़ैर कानूनी रूप से कब्जा कर उस स्थान पर बहुत ही कम समय में एक बड़ा सा माॅल बन कर तैयार हो गया था जिसका उद्घाटन आज खुद मंत्री के द्वारा हुआ था।

मंत्री के निर्देशन में बना ये माॅल सबकी नज़र में माॅल ही था जहाॅ पर हर तरह का उपयोगी सामान लोगों को ख़रीदने पर मिल जाता मगर कोई नहीं जानता था इसी माॅल के बेसमेन्ट में दरअसल मंत्री व शैलेन्द्र बंसल ग़ैर कानूनी धंधे को अंजाम देने की बुनियाद भी रख चुके थे।

माॅल का उद्घाटन तथा वहाॅ पर कुछ ज़रूरी मीटिंग करने के बाद मंत्री माॅल से बाहर आकर अपने सुरक्षा कर्मियों से घिरा अपनी कार के पास पहुॅचा ही था कि सहसा उसकी कोट की जेब में मौजूद मोबाइल बज उठा। एक हाॅथ से मोबाइल को निकालने के साथ ही मंत्री अपनी कार की पिछली सीट पर बैठ गया। उसके बाद उसने बज रहे मोबाइल की स्क्रीन की तरफ देखा। उसके बैठते ही उसके साथ आगे पीछे उसके सुरक्षा गार्ड भी बैठ गए। इसके बाद कार आगे बढ़ चली।

"हाॅ कहो राणे।" मोबाइल की स्क्रीन पर डिटेक्टिव राणे का नाम देख कर मंत्री ने फौरन ही काल को रिसीव कर मोबाइल को कान से लगाने के साथ ही कहा___"क्या बात है? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुमने उस सारे काम को कर लिया है जिस काम को करने के लिए हमने तुम्हें लगाया था? अगर ऐसा है तो भाई मान गए तुम्हें। इतने कम समय में तो दुनियाॅ का कोई भी जासूस काम को अंजाम नहीं दे सकता। अभी कल ही तो लगे थे तुम काम में।"

"आप ग़लत समझ रहे हैं चौधरी साहब।" उधर से राणे का स्वर उभरा___"जिस काम के लिए आपने मुझे लगाया है वो काम भला इतना जल्दी कैसे हो जाएगा?"
"ओह ऐसा क्या।" मंत्री ने बुरा सा मुह बनाया___"हम तो मियाॅ खांमखां ही तुम्हें जेम्स बाण्ड का बाप नहीं बल्कि दादा समझ बैठे थे। ख़ैर, ये बताओ कि अगर काम नहीं हुआ है तो तुमने हमें फोन किस बात के लिए किया है?"

"दरअसल मैने।" उधर से राणे ने कहा___"बहुत ही ज़रूरी बात बताने के लिए आपको फोन किया है।"
"अरे तो मियाॅ।" मंत्री तपाक से बोला___"बात क्यों बढ़ा रहे हो? ज़रूरी बात तो तुमें अतिसीघ्र बताना चाहिए न। ख़ैर जल्दी बताओ कौन सी ज़रूरी बात है?"

"कल आपके यहाॅ से जाने के बाद।" उधर से राणे कह रहा था___"मैने अजय सिंह का पता किया और उसके पीछे लग गया। मैं देखना चाहता था कि उसने जो कुछ आपसे कहा था उसमें कितनी सच्चाई थी तथा वो आपके प्रति कितना वफ़ादार है?"

"ओह।" मंत्री के कान खड़े हो गए___"तो क्या देखा और क्या जाना तुमने?"
"कल तो उसने कुछ खास नहीं किया था।" हरीश राणे ने कहा___"किन्तु आज सुबह नौ या दस बजे के क़रीब वह अपनी कार में किसी आदमी को लिए गुनगुन के रेलवे स्टेशन आया था। स्टेशन से बाहर वो अकेला निकला था। मतलब कि उसके साथ जो दूसरा आदमी था उसे वो शायद रेलवे स्टेशन छोंड़ने आया था। स्टेशन के बाहर जब वह आया तो उसी समय उसके मोबाइल पर किसी का काल आया तथा उसने किसी से कुछ देर तक बातें की। बात करने के बाद ही एकदम से उसके हाव भाव बदले से नज़र आए जिसके तहत वो अपनी कार में बैठ कर फौरन स्टेशन से बंदूख से छूटी गोली की तरह हवा हो गया। मैं उसके पीछे ही था कि अचानक कुछ देर बाद उसके पास तीन अलग अलग जीपों में ढेर सारे आदमी हथियारों से लैश आए। उनमें से एक आदमी अजय सिंह की कार में बैठ गया। उसके बाद अजय सिंह की कार के चलते ही बाॅकी तीनों जीपों में सवार आदमी भी अजय सिंह के पीछे पीछे चल पड़े।"

"अब बस भी करो मियाॅ।" सहसा मंत्री राणे की बात बीच में ही काटते हुए किन्तु परेशान भाव से कह उठा___"तुम तो इस तरह शुरू हो गए जैसे कोई टेप रिकार्डर शुरू हो जाता है। मुख्य बात बताओ कि मामला क्या हुआ है बस।"

"मुख्य बात ये है कि।" उधर से राणे ने कहा___"इस वक्त जहाॅ पर मैं हूॅ वहाॅ पर एक से बढ़ कर एक धुरंधर लोगों की पूरी फौज आई हुई है। इतना ही नहीं यहाॅ पर एक
मंदिर है जिसके सामने कई सारे हट्टे कट्टे लोग खड़े हैं। एक हट्टा कट्टा आदमी एक मामूली से लड़के से ज़बरदस्त लड़ाई कर रहा है। अजय सिंह तथा उसके साथ आए सब लोग लड़ाई देख रहे हैं। मैने तो अजय सिंह को ये भी कहते सुना है कि इस हराम के पिल्ले को इतना मारो कि हगने मूतने के भी काबिल न बचे। मंदिर के पास ही दो लड़कियाॅ दो आदमियों से घिरी खड़ी हैं तथा बुरी तरह रोये जा रही हैं। उनके मुख से बार बार एक ही बात निकल रही है कि प्लीज उसे कुछ मत करो। इसका मतलब ये हुआ चौधरी साहब कि ये वही लड़का है जिसका नाम विराज है। अजय सिंह ने कदाचित उसे घेर लिया है और अब वह उसके आदमियों के रहमो करम पर है।"

"ओह तो ये बात है।" मंत्री के जिस्म में जाने क्या सोच कर झुरझुरी सी हुई, बोला___"चलो अच्छा ही हुआ कि वो साला ठाकुर की पकड़ में आ गया है। अब सब कुछ सही हो जाएगा राणे।"

"यकीनन।" उधर से राणे ने कहा___"आपका दुश्मन अजय सिंह की पकड़ में आ चुका है। अब आप अगर चाहें तो इस मौके का फायदा उठा सकते हैं। यानी आप भी यहाॅ आ जाइये और बहती गंगा में डुबकी लगा कर अपना काम भी कर लीजिए।"

"अब हमें वहाॅ आने की ज़रूरत नहीं है राणे।" मंत्री ने कहा___"वो लड़का तो अब अजय सिंह की पकड़ में आ ही गया है। अतः अजय सिंह अपने वादे के अनुसार उसे हमारे हवाले भी कर देगा। उसके बाद तो उसे हमारी हर चीज़ लौटानी ही पड़ेगी। फिर हम उसका क्या हस्र करेंगे इसके बारे में उसने सोचा भी न होगा।"

"तो फिर मेरे लिए क्या आदेश है चौधरी साहब?" उधर से हरीश राणे ने कहा___"मुझे नहीं लगता कि अब इसके बाद भी मेरा कोई काम है यहाॅ। यानी आपका दुश्मन ठाकुर अजय सिंह से देर सवेर आपको मिल ही जाएगा और फिर आप उससे जैसे चाहेंगे वैसे अपने वो वीडियोज तथा अपने बच्चे वापस ले सकेंगे।"

"ठीक कह रहे हो तुम राणे।" मंत्री ने कहा___"अगर यही आलम है वहाॅ का तो फिर अब रह ही क्या गया है तुम्हारे कुछ करने के लिए? इस लिए अगर तुम चाहो तो वापस आ सकते हो या फिर ऐसा करो कि अभी फिलहाल तुम वहीं पर रहो और देखते रहो कि नतीजा क्या निकलता है? जैसा कि इस सबके बारे में ठाकुर ने हमें सूचना तक नहीं दी है इस लिए संभव है कि उसके मन में हमारे प्रति कोई खोट हो। इस लिए तुम ठाकुर की कार्यवाही के बारे में अंत तक देखते रहो। अगर ठाकुर इसके बाद भी हमें उस सबके बारे में नहीं बताता है तो हम उसे भी देख लेंगे। तुम ये ज़रूर देखना कि ठाकुर उस लड़के को तथा अपनी बेटी को कहाॅ कैद करके रखता है?"

"ठीक है चौधरी साहब।" उधर से हरीश राणे के ऐसा कहने के साथ ही मंत्री ने काल कट कर दी। हरीश राणे से बात करने के बाद मंत्री इस सबके बारे में सोचने लगा। उसे उम्मीद तो थी कि ठाकुर उससे गद्दारी नहीं करेगा किन्तु उसे इस बात का भी एहसास था कि ठाकुर साला जब अपनों का ही नहीं हुआ तो भला उसका क्या होगा?

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रितू और आदित्य इस वक्त दो अलग अलग पेड़ों पर चढ़े हुए थे। जहाॅ से उन दोनों को मंदिर के सामने का नज़ारा स्पष्ट दिख रहा था। विराज के साथ क्या क्या हुआ था ये उन दोनो ने अपनी ऑखों से देखा था। दोनो ही विराज के लिए बेहद चिंतित व परेशान थे। उन दोनो को उम्मीद नहीं थी कि अचानक ही ऐसा कुछ हो सकता है।

विराज को इस तरह मार खाते देख आदित्य तुरंत पेड़ की शाखा से नीचे कूदने ही वाला था कि रितू ने उसे रुकने का इशारा किया था। उसे उसने समझाया था कि उसके जाने से भी इस वक्त कुछ नहीं हो सकता था। उल्टा वो खुद भी विराज की तरह पकड़ में आ सकता है। आदित्य को रितू से ये उम्मीद नहीं थी किन्तु फिर उसे भी लगा कि रितू सही कह रही है। इस वक्त वहाॅ पर जाना खतरे से खाली नहीं था। संभव था विराज उसकी वजह से कमज़ोर ही पड़ जाता।

दोनो के पास अब कोई दूसरा चारा नहीं था। हलाॅकि रितू के मन में कुछ और ही चल रहा था। उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वो इस सिचुएशन पर ज्यादा गंभीर नहीं हुई है। कदाचित उसे बस समय का इंतज़ार था।

आदित्य की नज़र सहसा शेखर के मौसा यानी केशव की तरफ पड़ी। केशव जी के साथ तीन जीपों में आदमी थे जिनके हाॅथों में बंदूख, लट्ठ तथा हाॅकी जैसे हथियार नज़र आ रहे थे। जिन पेड़ों पर ये दोनो चढ़े हुए थे उन्हीं पेड़ों के बीच से होते हुए केशव और उसके आदमियों की जीपें गुज़री थीं। ये देख कर आदित्य ने रितू की तरफ देखा। रितू ने भी आदित्य की तरफ देखा मगर उसने कोई रिएक्शन नहीं दिया। पता नहीं क्या चल रहा था उसके मन में??
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इधर मेरी तरफ।
मैं समझ गया था कि मेरा प्रतिद्वंदी ताकत के मामले में मुझसे कहीं ज्यादा है। अतः अब ताकत के साथ साथ दिमाग़ से भी काम लेना ज़रूरी था। उधर वो आदमी मेरी तरफ इस तरह देख देख कर मुस्कुरा रहा था जैसे वो मुझे सचमुच में चींटी ही समझ रहा हो और जब चाहे मुझे मसल कर रख दे किन्तु अभी वो मुझे जैसे खिला रहा था।

"क्यों बच्चे दर्द तो नहीं हो रहा न?" उस आदमी ने ब्यंगात्मक लहजे में मुस्कुरा कर कहा___"वैसे अभी तो मैने तुम पर ताकत से कोई वार ही नहीं किया है। वरना तुम इस तरह सही सलामत खड़े न रहते बल्कि अपने हाॅथ पैर की हड्डियाॅ तुड़वाए ज़मीन पर पड़े रहते।"

"मैं भी अभी तक सिर्फ देख ही रहा था कि।" मैने कहा___"भाड़े के कुत्तों में कितना दम होता है?"
"अच्छा।" वह तिलमिलाया तो ज़रूर मगर फिर भी मुस्कुरा कर ही बोला___"तो क्या देखा और क्या समझ आया तुझे?"

"यही कि।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"कुत्ते तो कुत्ते ही होते हैं वो कभी शेर का शिकार नहीं कर सकते।"
"यू बास्टर्ड।" वो बुरी तरह क्रोध में आते हुए मेरी तरफ बढ़ा और गुस्से में आग बबूला होते हुए मुझ पर हमला कर दिया।

मैं तो अब पूरी तरह से सतर्क हो चुका था और उसके किसी भी हमले के लिए पूरी तरह से तैयार था। जैसे ही उसने मेरी नाॅक में अपने दाहिने हाॅथ का पंच मारा मैं फुर्ती से एक तरफ हुआ और बिजली की सी स्पीड से पलट कर उसकी तरफ पीठ करते हुए उसके उस हाॅथ को दोनो हाॅथों से पकड़ कर अपने दाहिने कंधे पर रखा और फिर पूरी ताकत से नीचे की तरफ ज़ोर का झटका दिया। परिणामस्वरूप कड़कड़ की आवाज़ के साथ ही उसका हाॅथ बीच से टूट गया। हाॅथ के टूटते ही वह हलाल होते बकरे की तरह चिल्लाया। जबकि मैंने इतने पर ही बस नहीं किया बल्कि फुर्ती से घूम कर उसके पीछे आया और इससे पहले कि वो कुछ समझ पाता मैने फुर्ती से उसके सिर को दोनो हाथों से पकड़ा और ज़ोर से बाॅई तरफ को झटक दिया। नतीजा ये हुआ कि एक बार पुनः फिज़ा में कड़कड़ की आवाज़ हुई और उसकी गर्दन एक तरफ को झूल गई, साथ ही वह लहराते हुए ज़मीन पर गिरा और शान्त पड़ गया। उसे देख कर अब कोई भी कह सकता था कि वो मर चुका है।

आस पास खड़े उसके सभी हट्टे कट्टे आदमी ये नज़ारा देख कर आश्चर्यचकित रह गए। किसी को भी इस सब पर यकीन न आया कि ये दो पल में अचानक क्या हो गया है? अपनी अपनी जगह पर खड़े सबके सब बुत से बन गए थे। ऊपर मंदिर के दरवाजे के जस्ट सामने ही दोनो तरफ से एक एक आदमी से घिरी नीलम व सोनम दीदी भी ये सब देख कर हक्का बक्का रह गई थी।

"ओये मारो रे इस हरामज़ादे को।" सहसा फिज़ा में छा चुके सन्नाटे को एक आदमी ने ज़ोर से चिल्लाते हुए भंग किया, बोला___"इसने अब्दुल को जान से मार दिया। इस साले की हड्डी पसली तोड़ डालो सब।"

उस आदमी की इस बात से सब जैसे होशो हवाश में आए और फिर चारो तरफ से मेरी तरफ दौड़ पड़े। मैं जानता था कि सबके सब साले साॅड हैं। इस वक्त गुस्से में ये सब सचमुच मेरी हड्डियाॅ तोड़ सकते थे। अभी वो सब मेरे नज़दीक पहुॅचे भी नहीं थे कि तभी बहुत सारे आदमी हाॅथों में बंदूख, लट्ठ व हाॅकी जैसे हथियार लिए चारो तरफ से उन सब आदमियों पर टूट पड़े। मैं समझ गया कि ये सब केशव जी के आदमी हैं। ये देख कर मैने राहत की साॅस ली।

केशव जी के वो आदमी बिना कुछ सोचे समझे तथा बिना कुछ बोले एकदम से टूट पड़े थे उन हट्टे कट्टे आदमियों पर। नतीजा ये हुआ कि वो सब जिन जिन के निशाने पर आए वो सब देखते ही देखते लहू लुहान नज़र आने लगे। मंदिर के बाहर इतने सारे आदमी और उनके शोर से वातावरण गूॅज उठा। अभी ये सब हंगामा मचा ही हुआ था कि तभी अलग अलग दिशाओं से एक बार पुनः वैसे ही हट्टे कट्टे आदमी निकल कर आए और केशव जी के उन आदमियों पर पिल पड़े। हलाॅकि उन सबके हाॅथ खाली थे किन्तु जल्द ही उनके हाॅथों में भी हथियार नज़र आने लगे। उन लोगों ने केशव जी के आदमियों से उनके ही हथियार छीन कर उन पर प्रहार करना शुरू कर दिया था।

केशव जी के जिन आदमियों के पास बंदूखें थी वो गोलियाॅ बरसाए जा रहे थे। जिसका नतीजा ये हो रहा था कि जिन पर भी गोली लगती वो सीधा यमलोक ही पहुॅच रहा था। इधर मैं आस पास देख रहा था कि आदित्य व रितू दीदी कहाॅ हैं? मैं हैरान था कि वो दोनो अभी तक आए क्यों नहीं? मैं खुद भी इस मुठभेड़ में किसी न किसी से लड़े जा रहा था।

"सबके सब अपनी अपनी जगह रुक जाओ।" सहसा इस आवाज़ की गर्जना को सुन कर मैं चौंक गया। पलट कर देखा तो ऊपर जहाॅ पर नीलम व सोनम दीदी खड़ी थी उनके पास ही बड़े पापा यानी अजय सिंह खड़े थे। उनके हाॅथ में रिवाल्वर थी जिसे वो सोनम की कनपटी पर लगाए खड़े थे। उन आदमियों का पता ही नहीं था जो इसके पहले नीलम व सोनम दीदी को कवर किये खड़े थे। शायद सबके आते ही वो भी लड़ाई में शामिल हो गए थे।

अजय सिंह की ज़ोरदार आवाज़ को सुन कर सबके सब जहाॅ के तहाॅ रुक गए। उन सब के रुकते ही अजय सिंह के साथ आए फिरोज़ खान के सभी आदमियों ने केशव तथा उनके आदमियों को गन प्वाइंट पर ले लिया। सब कुछ एकदम से बदल गया। अभी कुछ ही देर पहले तो हालात हमारे हक़ नज़र आए थे किन्तु अब बाज़ी फिर से पलट गई थी।

"तुम लोगों ने बहुत तमाशा कर लिया है।" शान्त पड़ गए माहौल में अजय सिंह की आवाज़ गूॅजी___"अब ज़रा मेरी बात कान खोल कर सुनो सबके सब। अगर मेरे आदमियों के अलावा कोई दूसरा आदमी अपनी जगह से हिला तो समझ लो वो अपनी मौत का जिम्मेदार खुद होगा।"

अजय सिंह की इस बात से कोई कुछ न बोला। कुछ देर की ख़ामोशी के बाद सहसा अजय सिंह ने मेरी तरफ देखा और फिर मुस्कुरा कर कहा___"तो आख़िर तुम मेरी पकड़ में आ ही गए भतीजे? बहुत सताया तुमने और बहुत ज्यादा तड़पाया भी मुझे। मगर कोई बात नहीं, मैं उस सबका ब्याज सहित हिसाब ले ही लूॅगा। मगर उससे पहले मैं ज़रा अपनी बेटियों से तो मिल लूॅ।"

कहने के साथ ही अजय सिंह ने एक हाॅथ बढ़ा कर नीलम को उसके सिर के बालों से पकड़ कर ज़ोर से अपनी तरफ खींचा। नीलम के हलक से दर्द में डूबी चीख़ निकल गई। हलाॅकि उसकी व सोनम दीदी दोनो की ही हालत बहुत ख़राब हो चुकी थी। उनके चेहरों पर मौत जैसा ख़ौफ़ मानो ताण्डव सा कर रहा था।

"क्यों बिटिया रानी।" अजय सिंह ने दाॅत पीसते हुए नीलम के चेहरे के पास अपना चेहरा लाते हुए कहा___"तुम्हारे इस बाप के लौड़े में ऐसी क्या कमी नज़र आ गई थी जो तुम दोनो बहनों ने अपने इस भाई के लौड़े को थाम लिया?"

"अजय सिंह।" मैं पूरी शक्ति से चिल्लाया___"ज़ुबान सम्हाल कर बात कर। ये मत भूल कि जिससे तू इस घिनौने तरीके से बात कर रहा है वो खुद तेरी ही बेटी है। मेरे दिलो दिमाग़ में तेरे लिए जो इज्ज़त बाॅकी थी उसे भी आज तूने ये घिनौनी बात बोल कर खत्म कर ली है। यकीनन तू इस संसार का सबसे गंदा और सबसे पापी इंसान है, बल्कि इंसान ही नहीं है तू, राक्षस है राक्षस।"

"मैं चाहूॅ तो इसी वक्त तेरी इस कड़वी ज़ुबान को तेरे हलक से निकाल कर चील कौवों को खिला दूॅ।" मेरी बातों से तिलमिलाया हुआ अजय सिंह गुर्राया___"मगर जैसा कि मैने कहा न कि पहले मैं अपनी बिटियों से मिल लूॅ, उसके बाद तुझसे भी अच्छे से मिलूॅगा।"

"आप सच में बहुत गंदे हैं डैड।" नीलम ने बुरी तरह रोते हुए कहा___"काश ये सब सच न होता। अच्छा होता कि इस सबके बारे में मुझे पता ही न चलता। रितू दीदी ने बहुत अच्छा किया था जो उन्होंने आप जैसे गंदे व पापी माॅ बाप को ठुकरा दिया है और अभी जिस तरीके से आपने मुझे वो शब्द कहे हैं उससे आपने बता दिया कि आपके मन में अपनी ही बहू बेटियों के प्रति क्या है?"

"इन सब बातों का अब कोई मतलब नहीं रह गया है बिटिया रानी।" अजय सिंह ने अजीब भाव से कहा___"ये सच है कि मैंने हमेशा अपने ही घर की औरतों व बेटियों को अपने नीचे सुलाने की ख्वाहिश की है। मगर इसमें बुरा क्या किया है मैने ? हर इंसान को अपनी इच्छा पूरी करने का हक़ होता है। मैने भी अपनी इच्छाओं को पूरा ही तो करना चाहा है। ख़ैर छोंड़, ये बता कि तुझे यहीं पर नंगा करूॅ या हवेली ले जाकर आराम से तुझे लड़की से औरत बनाऊॅ?"

"तू कुत्ते की मौत मरेगा अजय सिंह।" मैं पूरी शक्ति से दहाड़ते हुए बोला___"तेरे जिस्म में कीड़े पड़ेंगे। तू सड़ सड़ कर मरेगा। तू वासना और हवश में इतना अंधा हो चुका है कि तुझे रिश्ते नाते भी नज़र नहीं आ रहे हैं।"

"कुत्ते की मौत तो मैं तुझे मारूॅगा भतीजे।" अजय सिंह ने कहा___"लेकिन उससे पहले मैं तेरी माॅ गौरी, तेरी बहन निधी, व तेरी चाची करुणा इन तीनो को जी भर के तेरे ही सामने पेलूॅगा, वो भी आगे पीछे दोनो तरफ से। उसके बाद उन सबको रंडी बज़ार में बेंचूॅगा भी, तब तुझे मारूॅगा।"

"अपने जैसे ही हिजड़ों की फौज ले कर आया है।" मैने कहा___"और इन्हीं हिजड़ों की फौज के बलबूते पर तू इतना कुछ बोल पा रहा है। तुझमें अगर दम है तो मुझसे खुद मुकाबला कर।"

"इसे मारो रे।" अजय सिंह ज़ोर से चिल्लाया___"इस हराम के पिल्ले को इतना मारो कि हगने मूतने के भी काबिल न बचे। बहुत देर से ये हरामज़ादा बड़ बड़ किये जा रहा है। पहले इसकी ही हड्डियाॅ तोड़ो।"

अजय सिंह के कहने की देर थी। चारो तरफ से वही हट्टे कट्टे आदमी मेरी तरफ बढ़ते हुए आ गए। वो चार थे और मैं अकेला। मैं अजय सिंह की उन अश्लीलतापूर्ण बातों से बुरी तरह क्रोध व गुस्से से भन्ना उठा था। जैसे ही एक मेरी तरफ झपटा मैने बिजली की तरह फुर्ती दिखाई और उछल कर एक ज़बरदस्त फ्लाइंग किक उसकी गर्दन पर जड़ दी। उसके मुख से घुटी घुटी सी चीख निकली साथ ही कड़कड़ की आवाज़ भी हुई। ज़मीन पर औंधे मुह जब वह गिरा तो फिर उठ न सका।

ये देख कर नीलम को उसके बालों से पकड़े अजय सिंह हक्का बक्का रह गया। कदाचित उसे मुझसे ऐसे किसी चमत्कार की स्वप्न में भी उम्मीद नहीं थी। वो ऑखें फाड़े मुझे देखने लगा था। इधर उस आदमी के गिर कर शान्त पड़ते ही बाॅकी तीन थोड़ी देर के लिए ठिठके और फिर एक साथ मेरी तरफ झपटे। मैंने अपनी जगह से ऊॅची छलांग लगाई तथा हवा में ही कलाबाज़ी खाते हुए उन तीनों के बीच से बाहर उनके पीछे आ खड़ा हुआ। जबकि वो तीनों ही झोंक में आकर आपस में ही टकरा गए।

"रुक जा सुअर की औलाद।" तभी अजय सिंह चिल्लाया___"वरना मेरे एक ही इशारे पर मेरे साथ आए मेरे ये सब हथियारों से लैश आदमी तुझे पल भर में गोलियों से भून कर छलनी कर देंगे।"

"तू मुझे गोलियों से छलनी नहीं कर सकता कुत्ते।" मैने कहने के साथ ही अपनी टाॅग चला दी एक की पीठ पर। जिसकी पीठ पर लात का प्रहार पड़ा था वो अपने साथ दूसरे को साथ लिए ही ज़मीन पर गिर गया, जबकि तीसरा अभी पलटा ही था कि मैने पैर के घुटने का वार उसके पेट में किया तो वो बिलबिला उठा। साथ ही बोलता भी जा रहा था ज़ोर से____"तेरे लिए तो मैं एक तुरुप के इक्के की तरह हूॅ न। मुझे बंधक बना कर ही तो तू बाॅकी सबको मुम्बई से यहाॅ बुलाएगा। अगर मैं ही मर गया तो तू कैसे बुला सकेगा उन सबको?"

"ज्यादा बकवास न कर समझा।" अजय सिंह पहले तो सकपकाया, फिर चिल्लाया___"मैं कहता हूॅ ये उछलना कूदना बंद कर वरना मैं नीलम को यहीं पर नंगा कर दूॅगा।"
"नहींऽऽऽ।" अपने बाप की ये बात सुन कर नीलम तो बुरी तरह रोते हुए चीखी ही उसके साथ में सोनम भी चीख पड़ी थी। इधर अजय सिंह का वाक्य जैसे ही मेरे कानों से टकराया मैं एकदम से रुक गया। मैं जानता था कि अजय सिंह ये ज़रूर कर सकता था। उसे इस वक्त अपनी व अपनी बेटी की इज्ज़त की कोई परवाह नहीं थी।

"तुम मेरी इज्ज़त की परवाह मत करो राज।" सहसा नीलम रोते हुए चिल्लाई___"वैसे भी मुझे इस नीच आदमी की ऐसी बेहूदा बातें अपने लिए सुन कर जीने की इच्छा मर गई है। इस लिए तुम मेरी चिन्ता मत करो और इन सारे राक्षसों का वध कर दो।"

"ओहो क्या बात है।" अजय सिंह चमका___"देखो तो क्या इज्ज़त दी है मेरी बिटिया रानी ने मुझे। ख़ैर कोई बात नहीं, पर हाॅ मरना तो है ही तुझे और तुझे ही बस क्यों बल्कि तेरी बड़ी बहन को भी मरना होगा। मुझे ऐसी औलाद के जीने मरने से अब कोई फर्क़ नहीं पड़ेगा जो अपने ही माॅ बाप के मौत का सामान करती फिरे। बचपन से अब तक मैंने तुम दोनो को हर चीज़ दी है। जिस चीज़ पर तुम दोनो ने हाॅथ रखा उस चीज़ को मैने तुम दोनो के नाम कर दी। मगर बदले में दिया क्या तुम दोनो ने?? अरे देने की तो बात दूर बल्कि मेरे दुश्मन का साथ देकर मेरी मौत चाही तुम दोनो ने। अरे माॅ बाप जैसे भी हों माॅ बाप ही होते हैं। ख़ैर जाने दो, मुझे इस बात का दुख नहीं है कि इस लड़के ने मेरा इतना ज्यादा नुकसान करके मेरा जीना हराम किया है बल्कि इस बात का दुख है कि मेरी अपनी बेटियाॅ मुझे और अपनी माॅ तथा भाई को त्याग कर इसका साथ दिया। इस लिए इसकी सज़ा तो मिलेगी तुम दोनो को। मगर उससे पहले तुम दोनो के साथ मैं वो करूॅगा जो दुनियाॅ में किसी भी बाप ने न किया होगा।"

"तुझ जैसे इंसान से और किसी बात की उम्मीद भी क्या की जा सकती है।" नीलम ने सहसा ज़हरीले भाव से कहा___"जो अपनी ही औलाद को अपने नीचे सुलाना चाहता हो उसके जैसा नीच व पापी दूसरा कौन होगा? उस दिन सोचते सोचते मेरा बुरा हाल हो गया था कि आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसकी वजह से दीदी ने अपने ही माॅ बाप को त्याग दिया है, मगर उस रात जब मैने अपने कानों से सब कुछ सुना तो मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। इतना बड़ा धोखा, इतना बड़ा कुकर्म किया तूने जिसके बारे में अगर किसी को पता चल जाए तो तुझ पर थूॅकना तक पसंद न करे।"

"हरामज़ादी कुतिया।" अजय सिंह बुरी तरह तमतमा गया, और फिर दो तीन थप्पड़ जल्दी जल्दी नीलम के गालों पर जड़ दिया उसने। ये देख कर सोनम उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़ी तो सहसा वहीं पर आ गए फिरोज़ खान ने उसे गन प्वाइंट पर रख लिया। इधर नीलम के गालों पर थप्पड़ पड़ते ही मेरा खून भी खौल गया।

"लड़की पर क्या हाॅथ उठाता है नीच इंसान?" मैने दहाड़ते हुए कहा___"असली मर्द है तो इधर आ और मुझसे दो दो हाॅथ कर। कसम पैदा करने वाले की तेरे जिस्म की एक एक हड्डियों को न तोड़ा तो अपने बाप ठाकुर विजय सिंह की औलाद नहीं।"

"तेरी गर्मी का इलाज अब करना ही पड़ेगा।" अजय सिंह पलट कर गुर्राया, फिर उन्हीं हट्टे कट्टे आदमियों की तरफ देखते हुए कहा___"खड़े क्या हो तुम लोग? इस साले को इतना मारो कि इसकी सारी हेकड़ी निकल जाए।"

बस फिर क्या था? उन तीनों ने मुझे धोना शुरू कर दिया। मैं कुछ करने की हालत में नहीं था। अगर कुछ करता तो अजय सिंह फिर से नीलम के साथ कुछ उल्टा सीधा करने लगता। अभी मैं मार खा ही रहा था कि सहसा मेरे अलावा किसी और की भी चीख गूॅजी वहाॅ। मैने सिर उठा कर देखा तो चौंक गया। आदित्य एक आदमी को बुरी तरह मारे जा रहा था। आदित्य के अचानक ही इस तरह आ जाने से बाॅकी खड़े सब भौचक्के से रह गए।

"तुम यहाॅ क्यों आ गए आदी?" मैंने सहसा हतास भाव से कहा___"तुम्हें यहाॅ नहीं आना चाहिए था।"
"ज्यादा बकवास मत करो समझे।" आदित्य ने तीखे भाव से कहा___"मैं कायर नहीं हूॅ जो इतनी देर से चुपचाप तुम्हें इस तरह मार खाते देखता रहता। बहुत देर से रितू के कहने पर रुका हुआ था मगर अब और नहीं रुक सकता था मेरे यार। तेरा साथ भी न दिया तो साला धिक्कार है मुझ पर।"

मैं अब क्या कहता उसे। उधर आदित्य के आ जाने से अजय सिंह भी चौंका था। उसे नहीं पता था कि आदित्य कौन है, किन्तु इतना तो वो समझ ही गया था कि आदित्य कदाचित मेरा ही साथी है। अतः उसने सीघ्र ही ऊॅची आवाज़ में मुझसे कहा___"अपने साथी को बोल भतीजे कि ज्यादा उछल कूद न करे। अगर यहाॅ पर ये तेरी तरह मार खाने ही आया है तो चुपचाप अब ये भी मार खाए।"

"तुझे तो मैं कुत्ते की तरह मारूॅगा हरामज़ादे।" आदित्य चीखा___"इतनी देर से देख रहा हूॅ कि तू भाड़े के इन टट्टुओं की वजह से ही शेर बना हुआ है, जबकि खुद तुझमें कितनी मर्दानगी है वो तो तू भी जानता ही होगा साले। कितनी बार मेरे दोस्त ने तुझे लड़ने के लिए ललकारा मगर तू इससे लड़ने नहीं आया। मतलब साफ है कि तू इससे डरता है और खुद भी जानता है कि तू अपने भतीजे से टक्कर नहीं ले सकता। हाहाहाहा राज यार, तेरा ये ताऊ तो कायर और डरपोंक निकला।"

"ठाकुर साहब।" सहसा फिरोज़ खान बोल पड़ा___"आप कहें तो एक ही झटके में इस आदमी का काम तमाम कर दूॅ। इसकी हिम्मत कैसे हुई आपसे ऐसे बात करने की?"

"कोई बात नहीं खान।" अजय सिंह बोला___"इसे भी खुजली हो रखी है। इस लिए इसकी भी धुनाई शुरू करवा दो। कुछ देर में ही हमसे रहम की भीख माॅगने लगेगा।"
"ठीक है ठाकुर साहब।" फिरोज़ खान ने कहा और फिर अपने आदमियों को हुक्म दिया।

कुछ ही देर में हम दोनो की धुनाई शुरू हो गई। ये देख कर नीलम व सोनम दीदी बुरी तरह रोये जा रही थी और साथ ही अजय सिंह से हमें ना मारने के लिए कहे भी जा रही थी। मगर उनके कहने का अजय सिंह पर कोई असर न हुआ।

अभी ये सब हो ही रहा था कि एकाएक ही संपूर्ण वातावरण में पुलिस सायरन की आवाज़ें आने लगी। इन आवाज़ों को सुन कर अजय सिंह व फिरोज़ खान बुरी तरह चौंक पड़े। उन्हें समझ न आया कि यहाॅ पुलिस कैसे आ गई? देखते ही देखते मंदिर के चारो तरफ से ढेर सारे पुलिस वालों का हुजूम उमड़ पड़ा।

"तुम सबको पुलिस ने चारो तरफ से घेर लिया है।" सहसा तभी माइक पर किसी की आवाज़ गूॅजी___"इस लिए सब अपने अपने हथियार नीचे रख कर अपने आपको पुलिस के हवाले कर दो। वरना हमें तुम सब पर गोलियाॅ चलाने में भी कोई हिचकिचाहट नहीं होगी।"

"ठाकुर साहब।" सहसा बुरी तरह घबराया हुआ फिरोज खान कह उठा___"ये पुलिस वाले यहाॅ कैसे आ गए? अब हम सब पुलिस के द्वारा पकड़ लिए जाएॅगे। कुछ कीजिए ठाकुर साहब। आप तो जानते हैं कि पुलिस को मेरी और मेरे आदमियों को बड़ी शिद्दत से तलाश है। मैं और मेरे साथी पुलिस के हाॅथ नहीं लगना चाहते। खुदा के लिए कुछ कीजिए।"

"मुझे पता है कि।" अजय सिंह ने सोचने वाले भाव से कहा___"इन पुलिस वालों को यहाॅ किसने बुलाया है? हाॅ खान, ये सब रितू का किया धरा है। उसी कुतिया ने इन पुलिस वालों को बुलाया है। इतनी देर से देख रहा हूॅ वो हरामज़ादी कहीं दिखाई नहीं दे रही है। ज़रूर पुलिस वालों के साथ ही होगी।"

"किसी का भी किया धरा हो ठाकुर साहब।" फिरोज़ खान ने कहा___"मामला तो बिगड़ ही गया है अब। मगर समझदार आदमी वही है जो ऐसे समय पर भी खुद को बचा ले और अपने दुश्मन को मात दे दे।"

"सही कहा तुमने खान।" अजय सिंह ने कहा____"मुझे ऐसा ही कुछ करना होगा। अरे हाॅ एक काम करता हूॅ। इन दोनो को यहाॅ से अपने साथ ले चलते हैं। वो साला इन्हीं दोनो को लेने आया था न। अब जब इन्हें नहीं ले जा पाएगा तो यकीनन ये उसकी ज़बरदस्त हार होगी। अब वो इन दोनो के लिए मेरे पास सिर के बल आएगा।"

"बिलकुल सही कहा आपने।" फिरोज़ खान ने कहा__"किन्तु अब हमें देर नहीं करनी चाहिए। यहाॅ से इन दोनो को लेकर बड़ी होशियारी से खिसक लेना चाहिए।"
"ठीक है।" अजय सिंह ने कहा___"चलो इन दोनो को एक एक करके उठा कर ले चलते हैं। इससे पहले कि पुलिस हम तक पहुॅचे हम पीछे के इस वाले हिस्से से निकल लेते हैं। मुख्य रास्ते की तरफ जाना यकीनन खतरे से खाली नहीं होगा। मेरी कार इसी वाले हिस्से की तरफ है। अच्छा हुआ कि कार ज्यादा पीछे की तरफ उस मुख्य रास्ते की तरफ नहीं खड़ी की थी मैने।"

अजय सिंह की बातें सुन कर नीलम व सोनम दीदी बुरी तरह घबरा गई और उनके चंगुल से छूटने के लिए छटपटाने लगी थी। मगर कदाचित अजय सिंह को उनसे इसी बात की उम्मीद थी। यही वजह थी कि उसने मजबूती से उन्हें पकड़ा हुआ था। किन्तु अब उसकी बात से फिरोज़ ने भी सोनम दीदी को पकड़ लिया। यानी एक एक को ले कर मंदिर के बगल से सीढ़ियाॅ उतरने लगे वो दोनो।

नीलम व सोनम जब खुद को उनके चंगुल से न छुड़ा पाई तो पूरी शक्ति से चिल्लाने लगीं। इधर पुलिस के आ जाने से मैं और आदित्य पहले तो हैरान हुए उसके बाद तुरंत ही बात समझ में आ गई कि ये सब रितू दीदी का लास्ट बैकअप प्लान था जिसके बारे में उन्होंने सस्पेंस बनाया हुआ था उस समय। ख़ैर पुलिस वालों ने सबको घेर लिया। इधर नीलम व सोनम दीदी के चिल्लाने से मेरा और आदित्य का ध्यान उस तरफ गया तो देखा अजय सिंह व फिरोज़ खान ज़बरदस्ती उन दोनो को अपने साथ लिए सीढ़ियाॅ उतरते चले जा रहे थे।

मैंने आदित्य की तरफ देखा और फिर हम दोनो ही उनकी तरफ तेज़ी से दौड़ पड़े। अभी हम सीढ़ियों के पास भी न पहुॅचे थे कि सहसा वातावरण में गोली चलने की आवाज़ आई और साथ ही चीख़ की भी। हम दोनो ये देख कर चौंके कि सोनम दीदी को साथ लिए उतर रहा फिरोज़ खान का अचानक ही बैलेंस बिगड़ा और उसके हाॅथ से सोनम का हाॅथ छूट गया, साथ ही वह सीढ़ियों पर लुढ़कता हुआ नीचे चला गया। उसके हाॅथ से उसका रिवाल्वर छूट कर जाने कहाॅ गिर कर गुम सा हो गया था। उसके बाएॅ पैर की टाॅग से खून बहता हुआ नज़र आया।

गोली की आवाज़ और फिरोज़ खान को यूॅ लुढ़कते देख अजय सिंह बुरी तरह उछल पड़ा। भौचक्का सा पहले तो उसने फिरोज़ खान को लुढ़कते हुए देखता रहा उसके बाद जैसे उसे होश आया तो फौरन ही इधर उधर नज़र घुमाई उसने। किन्तु तब तक देर हो चुकी थी। उसी वक्त सीढ़ियों के बगल से ही रितू दीदी मानो प्रगट सी हुई और तेज़ी से अपने बाप के पैर को पकड़ कर झटक दिया। जिसका नतीजा ये हुआ कि बुरी तरह घबरा कर चीखते हुए अजय सिंह भरभरा कर सीढ़ियों पर पिछवाड़े के बल गिर पड़ा। किन्तु उसके साथ ही नीलम भी गिर पड़ी थी। क्योंकि अजय सिंह ने उसका हाॅथ उस वक्त तक छोंड़ा ही नहीं था। छोंड़ा भी तो तब जब उसके साथ ही साथ नीलम भी अनबैलेंस होकर गिर पड़ी थी। नीलम के मुख से दर्द में डूबी कराह निकल गई।

ये सब हो ही रहा था कि हम दोनो भी उनके पास पहुॅच गए। आदित्य ने तो आते ही फिरोज़ खान को धर लिया। जबकि मैने सीढ़ियों पर गिरने के बाद उठ रहे अजय सिंह को उसके कालर से पकड़ कर उठाया और बिना कुछ बोले पैर के घुटने का वार उसके पेट पर जड़ दिया। अजय सिंह दर्द से चीख पड़ा।

"रुक जाओ राज।" सहसा मेरे क़रीब पहुॅचते ही रितू दीदी ने कहा____"ये इंसान यकीनन सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा ही शिकार है मगर, उससे पहले मुझे इस नीच व पापी इंसान से दो चार बातें तो कर लेने दो।"

दीदी की बात सुन कर मैने अजय सिंह को छोंड़ दिया। अजय सिंह इस वक्त अजीब सी हालत में था। ऐसी हालत में कि उसका वर्णन करना भी कठिन था। इधर मेरे एक तरफ हटते ही रितू दीदी अपने बाप के सामने आ कर खड़ी हो गई।

"सुना है कि माॅ बाप से बढ़ कर।" फिर रितू दीदी ने बड़े ही गंभीर भाव से कहा___"संपूर्ण सृष्टि में कोई नहीं होता। यहाॅ तक कि भगवान भी नहीं। इसी लिए माॅ बाप को श्रेस्ठ व महान कहा जाता है। मगर माॅ बाप भी ऐसे ही महान नहीं बन जाते हैं बल्कि अच्छे कर्मों से महान बनते हैं। तुम नीलम से कह रहे थे कि तुमने हमें सब कुछ दिया है बदले में हमने क्या दिया? इसका जवाब ये है कि हर माॅ बाप अपने बच्चों के लिए बहुत कुछ करते हैं, यहाॅ तक कि ज़रूरत पड़ने पर अपना बलिदान भी दे देते हैं। मगर बच्चे सच में उनके लिए कुछ नहीं कर पाते ऐसा। मगर हम ऐसे नहीं थे, हमने बचपन से लेकर अब तक आप दोनो को दुनिया का सबसे अच्छा माता पिता माना मगर जब सच का पता चला तो रूह काॅप गई हमारी। दुनियाॅ में ऐसे कौन माता पिता हैं जो अपनी ही बेटियों को अपने नीचे सुलाने के बारे में सोचते हैं? मुझे अपनी सिर्फ एक अच्छाई के बारे में बता दो अजय सिंह जो कि तुमने अपने आज तक के जीवन में की हो। अगर तुमने अपनी एक भी अच्छाई के बारे में बता दिया तो इसी वक्त तुम्हारी ये बेटी अपने माॅ बाप के पास वापस लौट आएगी।"

रितू दीदी की इस बात पर अजय सिंह कुछ बोल न सका। किन्तु हाॅ कठोर भाव से देख ज़रूर रहा था। जबकि उसकी इस कठोरता से देखने की ज़रा भी परवाह न करते हुए कहा दीदी ने कहा___"तुम वो इंसान हो अजय सिंह जिसने एक हॅसते खेलते, भरे पूरे व खुशहाल परिवार का बेड़ा गर्क कर दिया। इतना तो मैने भी अपनी ऑखों से देखा था कि विजय चाचा कभी भी तुमसे ऑखें मिला कर बात नहीं करते थे। हम इतने भी अबोध व अज्ञानी नहीं थे कि हमें कुछ समझ न आए। सच्चाई का पता चलने के बाद ही सही मगर मुझे पिछली वो सब बातें याद आईं जो मेरे सामने होती थीं। तब उनके बारे में नहीं सोचती थी क्योंकि तब तुम्हारी सिखाई हुई बातें मुझे उनके बारे में सोचने की भी ज़रूरत महसूस नहीं कराती थी। मगर अब सब कुछ खुली किताब की तरह हो गया है। तुमने धन दौलत के लालच में तथा गौरी चाची को हाॅसिल करने के जुनून में अपने देवता जैसे भाई को ज़हरीले सर्प से डसवा कर मौत के घाट उतार दिया। उसके बाद झूठ मूठ कर आरोप लगा कर मेरी देवी समान चाची को चरित्रहीन बना दिया। इतना ही नहीं एक रात तुम दोनों की बातों को जब दादा जी ने सुन लिया और वो जब गुस्से से तुम्हारे कमरे में आ धमके और तुम्हें खरी खोटी सुनाने लगे तो तुमने उन्हें भी जान से मार देने की धमकी दी। ये भी कहा कि अगर उन्होंने किसी के सामने ज्यादा गला फाड़ने की कोशिश की तो तुम उनकी छोटी बेटी यानी कि नैना बुआ को उठवा लोगे। दादा जी उस वक्त ये सोच कर डर गए कि तुम वाकई में ऐसा कर सकते हो। जो अपने भाई का न हुआ वो भला किसका हो जाएगा? दादी जी रोते हुए अपने कमरे में चले गए। उन्होंने दादी से तुम्हारा सारा काला चिट्ठा बताया जिसे सुन कर बेचारी दादी का भी बुरा हाल हो गया। दूसरे दिन अभय चाचा स्कूल पढ़ाने गए हुए थे, उस समय दादा दादी तैयार होकर विजय चाचा की दी हुई कार से जब कहीं जाने लगे तो तुमने पूछा कि वो कहाॅ जा रहे हैं तब उन्होंने एक बार फिर से गुस्सा होते हुए साफ साफ तुमसे कहा कि वो पुलिस स्टेशन जा रहे हैं। ताकि तुम्हारी रिपोर्ट कर सकें। दादा जी की बात सुन कर तुम्हारी हवा निकल गई। तुम फौरन ही माॅम के पास गए और माॅम को सारी बात बताई तब माॅम ने कहा कि इससे बचने का एक ही तरीका है कि दादा दादी को खत्म कर दिया जाए। तुम्हारे पास इसके अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं था। इस लिए फौरन ही अपनी कार लेकर निकल लिये। रास्ते में ही तुमने अपने इसी फिरोज़ खान नाम के साथी को फोन लगाया और इसे दादा दादी को जान से मार देने की सुपारी दी। इसने फौरन ही तुम्हारी बात मान कर रास्ते में ही ट्रक द्वारा दादा जी की कार को टक्कर मार दी। ट्रक की ज़ोरदार टक्कर से दादा जी की कार सड़क पर ही दो तीन पलटियाॅ खाईं। ये देख कर ये खान फौरन ही वहाॅ से ट्रक लेकर फरार हो गया। सुनसान सड़क पर उलटी पड़ी कार के अंदर दादा दादी खून से लथपथ बेहोश पड़े थे। तभी कोई वाहन वाला उसी रास्ते से आया और उसने जब वो सब देखा तो उसने इसकी सूचना पुलिस को दी। पुलिस वहाॅ पहुॅची और कार के अंदर खून से लथपथ पड़े दादा दादी को चेक किया तो वो दोनो ही ज़िंदा थे उस वक्त। अतः फौरन ही उन्हें बेहतर इलाज़ के लिए गुनगुन ले गए। तहकीक़ात में ही पता चला कि जिनका एक्सीडेंट हुआ था वो दरअसल हल्दीपुर के ठाकुर गजेन्द्र सिंह बघेल तथा उनकी धर्मपत्नी इन्द्राणी सिंह बघेल हैं। इस बात का पता चलते ही तुम्हें सूचित किया पुलिस ने। तुम ये जान कर बुरी तरह घबरा गए कि दादा दादी तो ज़िंदा हैं अभी और वो पुलिस को सब कुछ बता भी देंगे। अतः तुम फौरन ही गुनगुन के लिए हवेली से रवाना हो गए। ख़ैर दादा दादी के सिर पर बड़ी गंभीर चोंटें आई थी जिसकी वजह से वो दोनो ही कोमा में चले गए। डाक्टर अब भला क्या कर सकता था। उसने साफ कह दिया था कि अब तो बस समय का ही इन्तज़ार करें कि कब वो दोनो कोमा से बाहर आते हैं। डाक्टर की बात सुन कर तुमने फिलहाल के लिए तो राहत महसूस की मगर तुम भी जानते थे कि कोमा एक ऐसी चीज़ होती है जिसमें गया इंसान कभी भी होश में आ सकता है। यानी तुम्हें डर था कि दादा दादी अगर कोमा से बाहर आ गए तो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा। अतः तुमने फिर से माॅम के परामर्श किया और फिर दादा दादी को बेहतर इलाज़ का कह कर एक ऐसी जगह ले गए जहाॅ के बारे में ज्यादा किसी को पता ही नहीं था। ख़ैर छोंड़ो ये सब, तुम्हारे जुर्म की दास्तान तो बहुत लम्बी है मगर मैंने तुमसे ये सब इस लिए कहा है कि तुम जान सको कि मुझे सब कुछ पता है। तुमने इतने अपराध व पाप किये हैं कि इसके लिए शायद भगवान भी माफ़ नहीं करेगा और करना भी नहीं चाहिए।"

रितू दीदी की बात सुन कर अजय सिंह का मुह लटक गया इस बार। उसके चेहरे पर शर्म व अपमान के भाव एकाएक ही उभर आए थे। तभी इस बीच नीलम आई और रितू के गले लग कर सिसक सिसक कर रोने लगी। सोनम दीदी भी सिसक रही थी। उधर आदित्य ने फिरोज़ खान को मार मार कर अधमरा कर दिया था। उसमें अब हिलने तक की शक्ति नहीं बची थी। तभी दो पुलिस वाले आए और फिरोज़ खान को उठा कर ले गए।

फिरोज़ खान के जितने भी आदमी थे तथा प्रतिमा ने जो आदमी भेजे थे उन सबको पुलिस ने पकड़ लिया था। ये सारी पुलिस फोर्स गुनगुन में नये नये आए एसीपी रमाकान्त शुक्ला के द्वारा लाई गई थी। सबको पकड़ने के बाद एसीपी रमाकान्त शुक्ला चल कर अजय सिंह के पास आया।

"अब आपके भी ससुराल चलने का वक्त हो चुका है ठाकुर साहब।" एसीपी ने मुस्कुराते हुए कहा___"उम्मीद करता हूॅ कि ससुराल में आप खुद को बेहतर महसूस करेंगे।"
"नये नये आए लगते हो ऑफिसर।" अजय सिंह ने उसकी तरफ तिरछी नज़र से देखते हुए कहा___"इस लिए इतना अकड़ रहे हो। मगर ज्यादा खुशफहमी में मत रहना कि तुम मुझे सुसराल में ज्यादा देर तक रख पाओगे।"

"जानता हूॅ।" एसीपी पुनः मुस्कुराया___"मगर फिलहाल तो मेरे साथ चलना ही पड़ेगा आपको। बाद का बाद में देखा जाएगा। वैसे भी हम तो यहाॅ फिरोज़ खान जैसे वान्टेड मुजरिम को ही पकड़ने आए थे। हमें सूचना मिली थी कि यहाॅ पर वो मुज़रिम अपने पूरे दलबल के साथ मौजूद है। इस लिए आ धमके यहाॅ। मगर हमें क्या पता था कि उसके साथ साथ मुझे आप जैसी कमीनी शख्सियत को भी धर लेना पड़ेगा।"

"तमीज़ से बात करो ऑफिसर।" अजय सिंह बुरी तरह तिलमिलाते हुए तीखे भाव से बोला___"वरना ऐसा न हो कि इस बददमीजी के लिए तुम्हें बाद में पछताना पड़े।"

"रस्सी जल गई मगर कसबल बाॅकी हैं अभी।" एसीपी ने कठोर भाव से कहा___"वैसे तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूॅ कि मैं किसी के बाप से भी नहीं डरता। इस लिए मुझ पर धौंस जमाने की सोचना भी मत। वरना मेरे हाॅथ में आया हुआ मुजरिम मुख से कम बल्कि पिछवाड़े से ज्यादा चिल्लाता है। अब इज्ज़त से चलो मेरे साथ वरना ले जाने के तरीके तो हम पुलिस वालों को बड़े शानदार भी आते हैं।"

एसीपी के गरम होते मिजाज़ को देख कर अजय सिंह अंदर ही अंदर अपमान का कड़वा घूॅट पी कर रह गया। फिर उसने आग उगलती ऑखों से पहले मुझे देखा फिर रितू दीदी को उसके बाद एसीपी रमाकान्त शुक्ला के साथ चल दिया। कुछ दूर जाने के बाद सहसा अजय सिंह रुका और फिर पलट कर बोला___"अभी तो मैं जा रहा हूॅ मगर जल्द ही लौटूॅगा और इस बार जब लौटूॅगा न तो तुम में से किसी को भी ज़िंदा नहीं छोंड़ूॅगा।"

अजय सिंह की ये बात सुन कर मैं, आदित्य, रितू दीदी व सोनम दीदी ने तो कुछ न कहा किन्तु नीलम को जाने क्या हुआ कि वो तेज़ी से अपने बाप के पास गई और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता "चटाऽऽक"। अजय सिंह का दाहिना गाल झन्ना गया।

"ये तमाचा मामूली भले ही है।" फिर नीलम ने गुर्राते हुए कहा___"मगर ये तुम्हें इस बात की याद ज़रूर दिलाएगा कि तूने क्या पाप किया है जिसके तहत ये इनाम के रूप में मिला है तुझे तेरी ही बेटी से। अब जा यहाॅ से, मुझे तेरी शक्ल भी देखना अब गवाॅरा नहीं है।"

अजय सिंह से इतना कहने के बाद रोती हुई नीलम हमारे पास आ गई जबकि अपनी ही बेटी से ऐसा इनाम पा कर अजय सिंह मानो गर्त में डूबता चला गया। वह फिर रुका नहीं बल्कि एसीपी के साथ दूर होता चला गया। उसके जाते ही हम सब भी एक तरफ चल पड़े। मगर तभी गज़ब हो गया।

वातारण में धांय से गोली चलने की आवाज़ हुई और फिर फिज़ा में नीलम की चीख भी गूॅज गई। दरअसल नीलम के थप्पड़ मारने पर अजय सिंह अपमान में जल उठा था। वो एसीपी के साथ ही बगल से चल रहा था। तभी उसकी नज़र एसीपी के होलेस्टर में फॅसी उसकी रिवाल्वर पर पड़ी थी। अजय सिंह ने पलक झपकते ही जैसे निर्णय ले लिया था और फिर बेहद फुर्ती से उसने एसीपी के होलेस्टर से रिवाल्वर निकाला और पलट कर उसने नीलम पर गोली चला दी थी। हम में से किसी को भी इसकी उम्मीद नहीं थी। उधर गोली चलने की आवाज़ से एसीपी भी बौखला गया था। उसने जैसे ही पलट कर अजय सिंह की तरफ देखा तो चौंक पड़ा। कारण अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए खुद ही उसका रिवाल्वर उसे दे दिया। एसीपी उसके इस बिहैवियर से दंग रह गया था।

गोली नीलम की पीठ के दाहिने भाग के थोड़ा सा नीचे लगी थी। नीलम की पीठ से खून की तेज़ धार बहने लगी थी। वो लहरा कर गिर ही जाती अगर मैने फुर्ती से उसे पकड़ न लिया होता। सिचुएशन एकदम से ही बदल गई थी। नीलम को गोली लगने से हम सब बुरी तरह घबरा गए थे। उसकी प्रतिपल बिगड़ती हालत से हम सब रो पड़े। मैने उसे अपनी गोंद में उठा लिया और तेज़ी से मंदिर के पीछे खड़ी अपनी कार की तरफ भाग चला। मेरे पीछे ही बाॅकी सब दौड़ने लगे थे।

पुलिस और एसीपी ने सबको पकड़ा था किन्तु केशव जी तथा उनके साथ आए लोगों को नहीं पकड़ा था। ये मेरे लिए हैरानी की बात थी। किन्तु इस वक्त उनसे इसके बारे में पूछने का किसी को होश न था। रितू व सोनम दीदी बुरी तरह रोये जा रही थी। सीघ्र ही मैं नीलम को लिए कार के पास पहुॅचा। आदित्य ने जल्दी से कार का पिछला गेट खोला तो मैने नीलम को पिछली सीट पर किसी तरह लेटाया और जगह बनाते हुए खुद भी सीट पर बैठ गया। सीट पर बैठने के बाद मैने नीलम को खुद से छुपका लिया तथा उसकी ठीठ पर हाॅथ रख कर दबा दिया ताकि खून ज्यादा बहने न पाए। मेरे बैठते ही आदित्य ने कार की ड्राइंविंग सीट सम्हाली।

केशव जी ने रितू दीदी से कहा कि वो सोनम दीदी को अपनी कार में बैठा लेंगे। क्योंकि मेरी कार में आगे की सीट पर रितू दीदी बैठ गई थी और पीछे अब जगह ही नहीं थी। किन्तु सोनम दीदी न मानी। वो बुरी तरह रोये जा रही थी और कह रही थी कि वो नीलम के पास ही रहेंगी। मैने भी ज्यादा समय बरबाद न करते हुए गेट की तरफ खिसक लिया। सोनम दीदी दूसरी तरफ से आकर नीलम के पैरों की तरफ सीट पर ही बैठ गईं। ख़ैर सबके बैठते ही आदित्य ने कार को तेज़ी से दौड़ा दिया। हमारे पीछे पीछे ही केशव जी तथा उनके आदमी जीपों में आ रहे थे।
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"ये तुम क्या कह रहे हो राणे?" अपने आवास के ड्राइंग रूम में लैण्डलाइन फोन के रिसीवर को कान से लगाए मंत्री ने बुरी तरह चौंकते हुए कहा था____"ठाकुर और उसके आदमियों को पुलिस पकड़ कर ले गई?"

"..............।" उधर से हरीश राणे ने कुछ कहा।
"क्या कह रहे हो तुम।" चौधरी हैरान___"वहाॅ पर भारी मात्रा में पुलिस आई हुई थी?? मगर पुलिस वहाॅ आई कैसे? हमारा मतलब है कि पुलिस को वहाॅ पर किसने बुलाया होगा? एक मिनट राणे....एक मिनट, हम सब समझ गए। ये ज़रूर उस थानेदारनी का काम होगा। उसी ने पुलिस को बुलवाया होगा। ठाकुर के इतने सारे आदमियों को पंगु बना देने का यही तो सबसे ज़बरदस्त तरीका था राणे। साली तगड़ा गेम खेल गई। एक ही झटके में सारा खेल ही खत्म कर दिया उसने।"

"............।" उधर से राणे ने फिर कुछ कहा।
"ओह तो ठाकुर ने जाते जाते अपनी ही बेटी को गोली मार कर लहूलुहान कर दिया।" चौधरी के चेहरे पर मौजूद भावों में परिवर्तन हुआ___"और अब विराज एण्ड पार्टी ठाकुर की उस लड़की को मरने से बचाने के लिए फौरन ही हास्पिटल लेकर आ रहे हैं। उन्हें आने दो राणे, वो ज़रूर यहीं आएॅगे। ताकि गुनगुन के ही किसी अच्छे से हास्पिटल में उसे भर्ती करा सकें और उसका बेहतर से बेहतर इलाज़ करा सकें। उन्हें आने दो यहाॅ हम उन सबका बहुत अच्छे से स्वागत करेंगे। तुम बस उनके पीछे ही रहना और हमें हालातों की ख़बर देते रहना।"

"..............।" राणे ने उधर से फिर कुछ कहा।
"वो सब हम देख लेंगे राणे।" चौधरी ने कहा___"हम कमिश्नर से इस बारे में पता करेंगे तथा ठाकुर से भी मिलेंगे। अगर उसने हमसे ये कहा कि वो ये सब करने के बाद ही इस सबके बारे में बताने वाला था तो ज़रूर उसकी ज़मानत करवाएॅगे हम। वरना भला हमें क्या पड़ी है उसे जेल से छुड़ाने की? जिस काम के लिए हमने उससे संपर्क बनाया था वो काम तो तुमने बखूबी कर ही दिया है और अब हमें पल पल की ख़बर भी दे रहे हो कि हमारे दुश्मन कहाॅ आ रहे हैं। इस लिए अब ज्यादा फिक्र की बात ही नहीं है।"

"..............।" उधर से हरीश राणे ने कुछ कहा।
"हाॅ ये भी सही कहा तुमने।" चौधरी ने कहा___"यानी हमें इस वक्त अभी उन पर हाॅथ नहीं डालना चाहिए। बल्कि उनके असल ठिकानों के बारे में पता करना चाहिए। उसके बाद ही हमें उन पर कार्यवाही करनी चाहिए। ये तुमने सही सलाह दी है राणे। बात भी सही है, अभी अगर हमने उन पर हाॅथ डाला तो संभव है कि इससे हम पर या हमारे बच्चों पर ही कोई संकट आ जाए। क्या पता उसका कोई आदमी हमारी गतिविधियों पर नज़र रखे हुए हो, उस सूरत में वो हमें ही नुकसान पहुॅचा सकता है। अतः ये ज़रूरी है कि हम अभी चुप ही रहें और उसके असल ठिकाने का तुम्हारे द्वारा पता करने की कोशिश करें।"

"..................।" उधर से राणे ने फिर कुछ कहा।
"ठीक है राणे।" फिर चौधरी ने कहा___"अब ऐसा ही करेंगे। तुम बस उनके पीछे ही लगे रहना और हाॅ ये बताने की आवश्यकता नहीं है कि उनसे ज़रा सावधान रहना।"

इसके साथ ही चौधरी ने रिसीवर वापस केड्रिल पर रख दिया। इस वक्त उसके चेहरे पर राहत के भाव थे। खुशी की एक अलग ही चमक उसके चेहरे पर दिखाई देने लगी थी। रिसीवर रखने के बाद वह आया और फिर से सोफे पर बैठ गया। उसके सामने ही अगल बगल के सोफों पर अवधेश, अशोक व सुनीता आदि बैठे हुए थे।

"हमारे इस काम में उस जासूस के लिए ये सब करना कोई मुश्किल काम नहीं था।" फिर मंत्री ने शिगार सुलगाने के बाद कहा___"और ना ही ये ऐसा केस था जिसमें उसे अपना माथा पच्ची करना पड़ता। ये सब तो हम भी कर सकते थे किन्तु तब जब करने की स्थित में होते। ख़ैर, जो भी हो, अच्छी बात ये है कि हालात अब हमारे हक़ में बहुत हद तक आ चुके हैं।"

"क्या कहा राणे ने?" अशोक के पूछने पर चौधरी ने सबको सब कुछ बता दिया। सारी बातें जानने के बाद उन तीनों के भी चेहरों पर राहत व खुशी के भाव उभर आए।

"हालात तो वाकई हमारे पक्ष में हैं चौधरी साहब।" अशोक ने कहा___"और ये हमारे लिए खुशी की बात भी है। किन्तु ठाकुर के साथ आज जो कुछ भी हुआ वो अगर न होता तो यकीनन आज उसकी गिरफ्त में उसका भतीजा तथा उसकी बेटी होती। उसके बाद वो हमें इस बात की जानकारी देता। कहने का मतलब ये कि इतना कुछ हो जाने के बाद हम अतिसीघ्र ही अपने दुश्मन से मिलते और उसके कब्जे से अपनी हर चीज़ ले भी लेते। लेकिन ऐसा हो नहीं सका, पुलिस ने ऐन मौके पर आकर सारा खेल ही ख़राब कर दिया।"

"इस मामले में पहली बार पुलिस का हाॅथ भी दिखाई दिया है चौधरी साहब।" अवधेश ने कहा____"और जिस तरह से इतनी सारी पुलिस फोर्स को लेकर वो एसीपी वहाॅ पहुॅचा था इससे ज़ाहिर होता है कि कहीं न कहीं पुलिस का भी इस मामले में दखल है। बल्कि ये कहना चाहिए कि शुरू से ही दखल था। ये अलग बात है कि इसके पहले पुलिस ने खुले तौर पर इस बात को ज़ाहिर नहीं किया था।"

"ये बात तो मैने उसी दिन कही थी।" सहसा अशोक ने तपाक से कहा___"कि संभव है कि पुलिस इस सारे मामले में गुप्त रूप से शामिल हो और आज इस बात का सबूत के रूप में पता भी चल गया हमें।"

"हम कमिश्नर से इस बारे में अभी बात करेंगे।" मंत्री ने कहने के साथ ही अपना मोबाइल निकाला____"उसे अब साफ साफ बताना ही पड़ेगा कि माज़रा क्या है तथा उसने हमें धोखे में रखने की हिम्मत कैसे की?"

कहने के साथ ही मंत्री ने पुलिस कमिश्नर को काल लगा कर मोबाइल अपने कान से लगा लिया। दूसरी तरफ काफी देर तक रिंग जाने के बाद काल रिसीव की गई।

"जी कहिए मंत्री जी।" उधर से कमिश्नर की आवाज़ उभरी___"आज इस नाचीज़ को कैसे याद किया आपने?"
"ये ड्रामेबाज़ी छोंड़ो कमिश्नर।" चौधरी ने सपाट लहजे में कहा___"और ये बताओ कि ये सब क्या चक्कर चला रहे हो तुम?"

"च..चक्कर???" उधर से कमिश्नर का चौंका हुआ स्वर उभरा____"ये आप क्या कह रहे हैं मंत्री जी?"
"देखो कमिश्नर।" चौधरी ने तीखे भाव से कहा___"हमें फालतू की बकवास बिलकुल भी पसंद नहीं है। तुम अच्छी तरह जानते हो और समझते भी हो कि हम किस बारे में बात कर रहे हैं?"

"बड़ी अजीब बात कर रहे हैं आप मंत्री जी।" उधर से कमिश्नर ने कहा___"भला जिस बात को आप बताएॅगे ही नहीं उस बात के बारे में मैं कैसे कुछ जान पाऊॅगा? आप तो जानते हैं कि इंसान अंतर्यामी तो होता ही नहीं है।"

"हम हल्दीपुर में आधा घंटा पहले घटी घटना के बारे में बात कर रहे हैं।" चौधरी ने मन ही मन दाॅत पीसते हुए कहा___"अब ये मत कहना कि तुम इस घटना के बारे में भी नहीं जानते।"

"ओह तो आप उस घटना की बात कर रहे हैं?" उधर जैसे कमिश्नर की अब बात समझ में आई थी, बोला___"उस घटना के बारे में तो मुझे अच्छी तरह पता है मंत्री जी। लेकिन आपका उस घटना से क्या लेना देना है? जबकि हमारे डिपार्टमेंट के एसीपी ने तो वहाॅ पर एक मोस्ट वान्टेड अपराधी को पकड़ने के लिए घेराबंदी की थी और फिर अपराधी को पकड़ कर अपने साथ ले भी आए।"

"किस अपराधी को पकड़ने गई थी तुम्हारी पुलिस?" मंत्री ने पूछा।
"यूॅ तो शहर कई तरह के मुजरिमों से भरा पड़ा है मंत्री जी मगर।" उधर से कमिश्नर ने कहा___"हमारी पुलिस फोर्स ने जिस मोस्ट वान्टेड अपराधी को पकड़ने के लिए हल्दीपुर के पास वाले गाॅव माधोपुर में घेराबंदी की थी उसका नाम फिरोज़ खान है। इस नाम के अपराधी के बारे में तो आपने भी काफी सुना होगा। आप तो जानते हैं कि ये अपराधी कब से पुलिस व कानून के लिए सिर का दर्द बना हुआ था। आज हमारे ही एक विश्वासपात्र मुखबिर ने हमें बताया कि फिरोज़ खान अपनी गैंग के साथ इस समय माधोपुर में मौजूद है। बस फिर क्या था, हमने उसे पकड़ने के लिए अभी हाल ही में नये नये आए एसीपी रमाकान्त शुक्ला को भेज दिया। मगर मेरी समझ में ये नहीं आता कि आपको इस मामले से क्या लेना देना हो गया? अगर मुनासिब समझें तो मुझे भी बताइये मंत्री जी।"

"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।" चौधरी ने बात को टालने की गरज़ से कहा___"वैसे पता चला है कि तुम्हारी पुलिस ने हल्दीपुर के ठाकुर अजय सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया है। भला ये क्या चक्कर है कमिश्नर? क्या वो ठाकुर भी फिरोज़ खान की तरह मोस्ट वान्टेड अपराधी है?"

"ठाकुर अजय सिंह को तो ज़रूरी पूॅछताॅछ के लिए गिरफ्तार किया गया है मंत्री जी।" उधर से कमिश्नर ने कहा___"दरअसल हमारे मुखबिर ने बताया था कि फिरोज़ खान हल्दीपुर के ठाकुर अजय सिंह की कार में ही बैठा हुआ था। इस लिए उन्हें गिरफ्तार करना पड़ा। तहकीक़ात में उनसे पूछा जाएगा कि फिरोज़ खान नाम का खतरनाक अपराधी उनकी कार में उनके साथ क्यों बैठा हुआ था? आख़िर उनका फिरोज़ खान से क्या संबंध है?"

"ओह तो ये बात है।" चौधरी को मानो बात समझ में आ गई, बोला____"वैसे सुना है कि ठाकुर और उसके भतीजे के बीच किसी मामले में तगड़ी रंजिश है। सुना तो ये भी है कि ठाकुर की बेटी खुद तुम्हारे पुलिस डिपार्टमेंट की इंस्पेक्टर है और वो अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ होकर ठाकुर के दुश्मन भतीजे का साथ दे रही है।"

"बाॅकी सारी बातों के बारे में तो मुझे कुछ नहीं पता है मंत्री जी।" उधर से कमिश्नर ने कहा___"लेकिन ये सच है कि ठाकुर अजय सिंह की बेटी हमारे पुलिस डिपार्टमेंट में इंस्पेक्टर के रूप में कार्यरत है। बहुत ही इमानदार तथा बहादुर ऑफीसर है वो।"

"अब इस बारे में तो तुम्हें ही पता होगा कमिश्नर।" चौधरी ने कहा___"आफ्टरआल वो तुम्हारे पुलिस महकमे से है। चलो कोई बात नहीं, अच्छा अब हम फोन रखते हैं।"

इतना कह कर चौधरी ने काल कट कर दी। फिर बुझ चुके शिगार को सामने टेबल पर रखे ऐशट्रे में रखा और दूसरा शिगार निकाल कर सुलगा लिया। शिगार के दो तीन गहरे गहरे कश लेने के बाद उसने ढेर सारा धुआॅ ऊपर की तरफ उछाला।

"क्या कहा कमिश्नर ने चौधरी साहब?" अवधेश श्रीवास्तव पूछे बग़ैर न रह सका था।
"बेवकूफ़ बनाने की कोशिश कर रहा था हमें।" चौधरी ने कहा___"उस साले को ये पता ही नहीं है कि वो किसे बेवकूफ बनाने चला था? साला राजनीति का खेल हम खेलते हैं और वो हमसे राजनीति कर रहा था।"
"ऐसा क्या कह रहा था वो आपसे?" अशोक ने पूछा।

मंत्री ने उसे सारी बातें बता दी, उसके बाद उसने फिर से शिगार का एक कश लिया फिर बोला___"जबकि साफ पता चलता है कि सच्चाई क्या है? डिटेक्टिव राणे के अनुसार विराज एण्ड पार्टी ठाकुर की दूसरी बेटी को लेने गए थे। किसी तरह से इस बात की जानकारी ठाकुर को हुई और वह फिरोज़ खान को उसके गुर्गों के साथ माधोपुर जा धमका, जहाॅ पर उसका आमना सामना विराज एण्ड पार्टी से हुआ। विराज को अंदेशा रहा होगा कि उसका ताऊ उसे पकड़ने का ऐसा ही कुछ इंतजाम करके आएगा। इस बात को ध्यान में रखते हुए उन लोगों ने भी ठाकुर से बचने का उपाय सोचा होगा। ठाकुर की बेटी क्योंकि अब विराज के साथ ही है इस लिए ठाकुर से बचने के लिए उसने अपने पुलिस महकमें का सहारा लिया। उसे पता था कि पुलिस के आ जाने से अजय सिंह कुछ कर नहीं पाएगा। बात भी सही है कि पुलिस से पंगा करने का कोई मतलब ही नहीं था। यानी वो सब पुलिस की मदद से बड़े आराम से ठाकुर की दूसरी बेटी को ले आएॅगे और ठाकुर कुछ भी नहीं कर पाएगा।"

"यकीनन चौधरी साहब।" अवधेश ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"ठाकुर ने विराज एण्ड पार्टी को घेर कर पकड़ने का ज़बरदस्त प्लान बनाया था। ये अलग बात है कि बदकिस्मती से उसके उस ज़बरदस्त प्लान की खुद उसकी ही बेटी ने धज्जियाॅ उड़ा दी। इतना ही नहीं पुलिस को बुलवा कर वो अपनी छोटी को बहन को तो अपने साथ ले ही गई ऊपर से अपने बाप को भी गिरफ्तार करवा दिया।"

"लेकिन ठाकुर भी कम कमीना नहीं था।" अशोक ने झट से कहा___"पुलिस के साथ जाते जाते भी उसने एसीपी का रिवाल्वर निकाल कर अपनी छोटी बेटी को गोली मार दी। ये इस बात का सबूत है चौधरी साहब कि उस वक्त वह अपनी औलाद से किस क़दर ख़फा था और फिर गुस्से में आकर उसने बेटी को जान से मारने की कोशिश की। अगर समय रहते उसकी बेटी का विराज एण्ड पार्टी ने इलाज़ करवा लिया तब तो ठीक है वरना ठाकुर ने तो अपनी बेटी का काम तमाम कर ही दिया है समझिये।"

"जो भी होता है अच्छे के लिए ही होता है।" मंत्री दिवाकर चौधरी ने कहा___"इस सबकी वजह से हमारा फायदा ये हुआ है कि हमारा दुश्मन हमारे जासूस राणे की नज़र में आ गया है। राणे विराज एण्ड पार्टी के पीछे साये की तरह लगा रहेगा। अभी तो वो सब किसी हाॅस्पिटल में ही गए होंगे क्योंकि ठाकुर की बेटी को मौत से बचाना उन सबकी पहली प्राथमिकता होगी। उसके बाद वो यकीनन उस जगह जाएॅगे जहाॅ पर उन लोगों ने अपना ठिकाना बनाया होगा। राणे को जैसे ही उनके ठिकाने का पता चल जाएगा वैसे ही वो हमें सूचित कर देगा। बस, उसके बाद क्या होगा ये बताने की ज़रूरत नहीं है शायद।"

"ये तो वाकई हमारे ही हक़ में है।" सहसा इस बीच सुनीता बोल पड़ी___"ठाकुर की घटना ने उसे भले ही करारी शिकस्त दी हो मगर इस सबमें हमारा यकीनन फायदा हो गया है। दूसरी बात जासूस राणे को इस काम के लिए बुलाने का भी बहुत अच्छा निर्णय साबित हुआ हमारा।"

"बिलकुल सही कहा तुमने।" चौधरी ने कहा___"अगर राणे को हमने बुलाया न होता तो हमें इतनी बड़ी सफलता हर्गिज़ भी नहीं मिल सकती थी। क्योंकि इस बात का हमें पता ही न चलता कि विराज एण्ड पार्टी और ठाकुर के बीच क्या हुआ है? ठाकुर का भी कोई भरोसा नहीं था कि वो हमें इस बारे में कुछ बताता भी या नहीं।"

"ख़ैर, जो भी हो।" अवधेश ने कहा___"इस सबसे हमें फायदा तो यकीनन ही हुआ है मगर इस बीच हमारे लिए ये सोचना भी महत्वपूर्ण है कि इस मामले में पुलिस का दखल किस उद्देश्य से हुआ है? क्या सचमुच ही वो मोस्ट वान्टेट अपराधी फिरोज़ खान को ही पकड़ने के उद्देश्य से वहाॅ पर पहुॅची थी या फिर इसके पीछे भी पुलिस की कोई ऐसी चाल थी कि वो एक तीर से दो शिकार कर सके। कहने का मतलब ये कि ज़ाहिर तौर पर उसने हमें यही दिखाया हो कि उसका दखल महज फिरोज़ खान को ही पकड़ना था जबकि असल में उसका मकसद कुछ और ही रहा हो, जिसका संबंध हमसे हो।"

"हो सकता है।" चौधरी के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए____"किन्तु कमिश्नर की बातों से भी कुछ ज़ाहिर नहीं हो सका। या तो उसने जान बूझ कर हमें घुमा दिया है या फिर ऐसा कुछ हो ही न। यानी हो सकता है कि हम जिस चीज़ की शंका कर रहे हैं वो बेवजह ही हो।"

"शंका तो शंका ही होती है चौधरी साहब।" अशोक ने कहा___"भले ही वो बेवजह ही हो मगर हमारे मन में शंका तो है न। इस लिए जब तक हमें इस मामले में सच्चाई का पता नहीं चलता तब तक हमारी ये शंका हमारे अंदर से जाएगी भी नहीं।"

"चलो अगर ऐसा है भी।" चौधरी ने कहा___"तो वो आने वाले समय में ज़ाहिर तो हो ही जाएगा। तब हम देख लेंगे कि हमें उस बारे में क्या करना है। अभी के हालात में जो ज़रूरी है, हमे उस पर ज्यादा ध्यान देना है। हमें किसी भी कीमत पर अपने बच्चे तथा हमारे लिए डायनामाइट बने उन वीडियोज को हाॅसिल करना है। मौजूदा हालातों पर ग़ौर करें तो ये स्पष्ट हो चुका है कि बहुत जल्द राणे के द्वारा हमें इस सबमें सफलता मिलेगी।"

चौधरी की बात सुन कर सबके सिर सहमति में हिले। उसके बाद कुछ और इधर उधर की बातें हुई उन लोगों के बीच। फिर सब अपने अपने काम पर चले गए।
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इधर आदित्य ऑधी तूफान की तरह दौड़ाते हुए कार को हास्पिटल की तरफ लिए जा रहा था। नीलम की हालत की वजह से हम सब बेहद दुखी हो गए थे। मैं बार बार नीलम को पुकार रहा था। उसकी पलकें बार बार बंद हो जाती थी। मैने अपने एक हाॅथ की हॅथेली को नीलम की पीठ पर कस के लगाया हुआ था ताकि उसका खून न बहने पाए। नीलम पहले तो दर्द और पीड़ा से कराह रही थी किन्तु अब वो प्रतिपल शान्त पड़ती जा रही थी। उसकी ये हालत देख कर मैं बदहवाश सा था और बार बार उसे पुकार रहा था। मेरे बाएॅ साइड ही नीलम के पैरों के पास बैठी सोनम दीदी अभी भी सिसक रही थीं। वो खुद भी पागलों की तरह नीलम को पुकारे जा रही थी।

रितू दीदी आगे बैठी हुई थी। उनके चेहरे पर भी पीड़ा के भाव उभर आते थे किन्तु उन्होंने खुद को सम्हाला हुआ था। उनके चेहरे पर मौजूद भाव प्रतिपल बदल रहे थे। कभी कभी तो ऐसे भाव उभर आते थे जैसे उन्होंने किसी बात के लिए कठोर फैसला किया हो। आदित्य फुल स्पीड से कार को भगा रहा था। तभी डैश बोर्ड के पास ही रखा मेरा मोबाइल फोन बज उठा। फोन के बजने से जैसे रितू दीदी की तंद्रा टूटी। उन्होंने हाॅथ बढ़ा कर मोबाइल उठाया और स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे मौसा जी नाम को देख कर काल रिसीव की उन्होंने।

उधर से मौसा जी ने जाने ऐसा क्या कहा कि रितू दीदी एकदम से चौंक पड़ी, साथ ही कार की खिड़की से इधर उधर देखने भी लगी थी। फिर उन्होंने ये कह कर फोन रख दिया कि___"आपने यकीनन ये बहुत बड़ी ख़बर दी है मौसा जी। किन्तु उसे बोलिए कि अगर संभव हो सके तो उसे पकड़ ले। आप भी जल्दी से उसके पास जाइये और जाकर उसे अपने कब्जे में ले लीजिए।"

"क्या हुआ रितू??" कार चलाते हुए आदित्य ने सहसा एक नज़र रितू दीदी की तरफ डालते हुए पूछा।
"मंत्री मेरी चेतावनी के बावजूद अपनी हरकतों से बाज नहीं आया।" रितू दीदी ने कहा___"उसने जब देखा कि वो खुद कुछ नहीं कर सकता है तो उसने अपने काम के लिए एक जासूस को बुलवाया और उस जासूस को हमारे पीछे लगा दिया।"

"ये क्या कह रही हो तुम?" आदित्य रितू की बात सुन बुरी तरह चौंका था, फिर बोला___"मगर तुम्हें ये सब कैसे पता चला?"
"मुझे नहीं।" रितू दीदी ने कहा___"बल्कि मौसा जी के एक आदमी को पता चला है। उसी ने बताया है मौसा जी को। दरअसल हम सब लोग तो वहाॅ से चले आए मगर मौसा जी का एक आदमी ग़लती से वहीं रह गया। मौसा जी बता रहे थे कि उनका वो आदमी उस वक्त अपना पेट साफ करने चला गया था। इसी बीच हम सब वहाॅ से जल्दबाज़ी में निकल आए। कुछ देर में जब वो अपना पेट साफ करके आया तो हम लोगों को दूर जाते हुए देखा उसने। वो वहाॅ से चलते हुए कुछ दूर आया। फिर उसने अपना मोबाइल निकाल कर मौसा जी को फोन करने ही वाला था कि तभी उसे किसी के बात करने की आवाज़ सुनाई दी। वो आवाज़ की दिशा में गया तो उसने देखा कि मंदिर से लगभग पचास मीटर की दूरी पर एक आदमी पेड़ की ओट में खड़ा किसी से फोन पर बातें कर रहा था। मौसा जी का आदमी उससे कुछ ही दूरी पर था। उसने उस आदमी के कुछ पास जाकर उसकी बातें सुन ली। उसकी बातों में डैड के अलावा हमारा भी ज़िक्र था, साथ ही वह जिससे बात कर रहा था उसे वह चौधरी साहब कह कर संबोधित कर रहा था। मौसा जी के आदमी को उसकी बातों से समझ आ गया कि वो हम सबके पीछे ही लगा हुआ है। अतः उसने तुरंत ही इस बात की सूचना मौसा जी को फोन लगा कर दे दी।"

"ओह तो ये बात है।" आदित्य ने कहा।
"हाॅ, मैने अपने मुखबिरों को मंत्री तथा उसके सभी साथियों के पीछे लगाया हुआ था।" रितू दीदी ने कहा___"उन सबकी रिपोर्ट यही थी कि मंत्री या उसके साथियों ने ऐसा वैसा कुछ नहीं किया है। बल्कि उन सबकी दिन चर्या तथा कार्य सामान्य ही था। मुझे भी उम्मीद नहीं थी कि वो कमीना अपने इस काम के लिए किसी जासूस को हायर कर लेगा। मगर कोई बात नहीं, ये बहुत अच्छा हुआ कि मंत्री के उस जासूस का पता चल गया। कहते हैं कि ईश्वर जो भी करता है उसके पीछे कोई ठोस वजह ज़रूर होती है। वरना सोचने वाली बात है कि मौसा जी जिन आदमियों को अपने साथ लेकर आए थे उन आदमियों में से किसी एक को उस वक्त टायलेट क्यों आता? ये ईश्वर की ही मर्ज़ी थी कि उसे उस वक्त टायलेट आया और वो टायलेट के लिए हमसे दूर चला गया। उसके बाद जब वह आया तो हम सब उस जगह से निकल चुके थे जबकि वो वहीं छूट गया। ईश्वर हमारे साथ है आदित्य, वो नहीं चाहता कि किसी वजह से हम फॅस जाएॅ। हमें नहीं पता था कि मंत्री ने कोई जासूस हमारे पीछे लगाया हुआ है अतः ईश्वर इस सबके द्वारा हमें उस जासूस के बारे में भी बता दिया।"

"सचमुच।" आदित्य कह उठा___"कुदरत का हर काम हैरतअंगेज़ होता है। ख़ैर, अब उस जासूस का क्या करना है?"
"अभी तो फिलहाल उसे किसी भी तरह से पकड़ लेने के लिए मैंने मौसा जी से कहा है।" रितू दीदी ने कहा___"उसका पकड़ में आना भी बेहद ज़रूरी है वरना वो हमारा पीछा करता रहता और अंततः हमारे ठिकाने तक पहुॅच जाता। उसके बाद वो हमारे ठिकाने के बारे में मंत्री को बता देता। बस फिर तो खेल ही खत्म हो जाना था।"

"सचमुच।" आदित्य ने कहा___"बहुत बड़ी मुसीबत में फॅसने वाले थे हम सब।"
"हाॅ आदित्य।" रितू दीदी ने कहा___"मंत्री अपने दलबल के साथ अगर हमारे ठिकाने पर आ धमकता तो हम उस हालात में उस वक्त कुछ कर नहीं पाते और फिर हम सबके साथ मंत्री क्या सुलूक करता इसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता।"

"शुकर है।" आदित्य ने कहा___"ईश्वर ने हमें बचा लिया। अब तो यही दुवा करो कि वो जासूस मौसा जी की पकड़ में आ ही जाए। वरना अगर वो हाॅथ से निकल गया तो मुसीबत एक बार फिर से हम पर आ जाएगी। ईश्वर बार बार ऐसा संयोग नहीं बनाएगा।"

"सही कहा तुमने।" रितू दीदी ने कहा___"देखते हैं मौसा जी तथा उनके आदमी क्या करते हैं? इस वक्त तो हमें नीलम को बचाना है।"
"वैसे एक बात कहूॅ रितू।" आदित्य ने कहा___"तुम्हारे जैसा कमीना बाप मैने आज तक न कहीं देखा है और ना ही कहीं सुना है। खुद पापों की गठरी लिए फिरता है और अपनी ही बेटी के साथ......छिः..मुझे तो सोच कर ही ऐसे आदमी से घृणा हो रही है।"

"अगर मेरी बहन को कुछ हुआ न आदित्य।" सहसा रितू दीदी के मुख से ज़हर में डूबे शब्द निकले___"तो उस इंसान का मैं वो हाल करूॅगी कि बड़े से बड़ा जल्लाद भी उसका हाल देख कर थर्रा जाएगा।"

"अब तो उसकी नियति ही ऐसी बन चुकी है।" आदित्य ने कहा___"कि उसकी जब भी मौत होगी तो यकीनन बहुत भयानक तरीके से होगी।"

आदित्य की बात पर रितू दीदी कुछ न बोली। किन्तु उनके चेहरे के भाव बता रहे थे कि अपने अंदर के तूफान को उन्होंने कितनी मुश्किल से रोंका हुआ है। मैं उन दोनों की सारी बातें सुन रहा था। तभी रितू दीदी ने किसी को फोन लगाया और उससे कुछ बातें की। आदित्य ने बहुत ही कम समय में कार को हाॅस्पिटल पहुॅचा दिया।

हाॅस्पिटल के सामने कार के रुकते ही मैने जल्दी से गेट खोला और नीलम को सावधानी से निकाल कर अपनी गोंद में लिया और बिना किसी की तरफ देखे हाॅस्पिटल की तरफ लगभग दौड़ते हुए जाने लगा। मेरे पीछे ही बाॅकी सब भी आ रहे थे। कुछ ही देर में मैं नीलम को लिए हाॅस्पिटल के अंदर आ गया। वहाॅ का माहौल देख कर ऐसा लगा जैसे वहाॅ के डाक्टर तथा कर्मचारी हमारा ही इन्तज़ार कर रहे थे। जल्द ही दो आदमी स्ट्रेचल लिये मेरे पास आए। मैने आहिस्ता से नीलम को स्ट्रेचर पर लिटा दिया। मेरे लेटाते ही वो दोनो आदमी स्ट्रेचर को तेज़ी से ठेलते हुए ले जाने लगे। मैं, आदित्य, रितू व सोनम दीदी भी साथ ही साथ चलने लगे थे। थोड़ी ही देर में वो दोनो आदमी नीलम को स्ट्रेचर सहित ओटी में ले गए। डाक्टर ने हम सबको ओटी के बाहर ही रोंक दिया और खुद अंदर चला गया।

हम चारो वहीं पर खड़े रह गए थे। हम चारों के मन में बस एक ही बात थी कि नीलम को कुछ न हो। अभी हम सब वहाॅ पर खड़े ही थे कि तभी वहाॅ पर एसीपी रमाकान्त शुक्ला भी आ गया। उसने आते ही रितू दीदी से नीलम के बारे में पूछा तो दीदी ने बता दिया कि अभी अभी उसे ओटी में ले जाया गया है। एसीपी ने रितू दीदी से कहा कि उसने समूचे हास्पिटल में अंदर बाहर पुलिस के आदमी सादे कपड़ों में तैनात कर दिये हैं। इस लिए अब किसी का ख़तरा नहीं है। एसीपी की बात सुन कर रितू दीदी ने उसे इसके लिए धन्यवाद किया। कुछ देर बाद एसीपी ये कह कर चला गया कि वो नीलम का हाल चाल लेने फिर आएगा।

एसीपी के जाने के कुछ देर बाद हम चारों वहीं गैलरी पर दीवार से सटी हुई रखी लम्बी चेयर्स पर बैठ गए। कुछ देर बाद मैं उठा और हाॅस्पिटल से बाहर पानी लाने के लिए चला गया। पानी लाकर मैने रितू दीदी व सोनम दीदी को दिया। उसके बाद उसी कुर्सी पर बैठ कर हम सब डाक्टर के बाहर आने का इन्तज़ार करने लगे। हम सबके लबों से बस एक ही दुवा निकल रही कि नीलम को कुछ न हो।
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दोस्तो, आप सबके सामने अपडेट हाज़िर कर दिया है। आशा करता हूॅ कि आप सबको पसंद आएगा।

आप सबकी प्रतिक्रिया तथा आप सबके रिव्यू का इन्तज़ार रहेगा।
 
एकनयासंसार
अपडेट........《 58 》

अब तक,,,,,,,

हाॅस्पिटल के सामने कार के रुकते ही मैने जल्दी से गेट खोला और नीलम को सावधानी से निकाल कर अपनी गोंद में लिया और बिना किसी की तरफ देखे हाॅस्पिटल की तरफ लगभग दौड़ते हुए जाने लगा। मेरे पीछे ही बाॅकी सब भी आ रहे थे। कुछ ही देर में मैं नीलम को लिए हाॅस्पिटल के अंदर आ गया। वहाॅ का माहौल देख कर ऐसा लगा जैसे वहाॅ के डाक्टर तथा कर्मचारी हमारा ही इन्तज़ार कर रहे थे। जल्द ही दो आदमी स्ट्रेचर लिये मेरे पास आए। मैने आहिस्ता से नीलम को स्ट्रेचर पर लिटा दिया। मेरे लेटाते ही वो दोनो आदमी स्ट्रेचर को तेज़ी से ठेलते हुए ले जाने लगे। मैं, आदित्य, रितू दीदी व सोनम दीदी भी साथ ही साथ चलने लगे थे। थोड़ी ही देर में वो दोनो आदमी नीलम को स्ट्रेचर सहित ओटी में ले गए। डाक्टर ने हम सबको ओटी के बाहर ही रोंक दिया और खुद अंदर चला गया।

हम चारो वहीं पर खड़े रह गए थे। हम चारों के मन में बस एक ही बात थी कि नीलम को कुछ न हो। अभी हम सब वहाॅ पर खड़े ही थे कि तभी वहाॅ पर एसीपी रमाकान्त शुक्ला भी आ गया। उसने आते ही रितू दीदी से नीलम के बारे में पूछा तो दीदी ने बता दिया कि अभी अभी उसे ओटी में ले जाया गया है। एसीपी ने रितू दीदी से कहा कि उसने समूचे हास्पिटल में अंदर बाहर पुलिस के आदमी सादे कपड़ों में तैनात कर दिये हैं। इस लिए अब किसी बात का ख़तरा नहीं है। एसीपी की बात सुन कर रितू दीदी ने उसे इसके लिए धन्यवाद किया। कुछ देर बाद एसीपी ये कह कर चला गया कि वो नीलम का हाल चाल लेने फिर आएगा।

एसीपी के जाने के कुछ देर बाद हम चारों वहीं गैलरी पर दीवार से सटी हुई रखी लम्बी चेयर्स पर बैठ गए। कुछ देर बाद मैं उठा और हाॅस्पिटल से बाहर पानी लाने के लिए चला गया। पानी लाकर मैने रितू दीदी व सोनम दीदी को दिया। उसके बाद उसी कुर्सी पर बैठ कर हम सब डाॅक्टर के बाहर आने का इन्तज़ार करने लगे। हम सबके लबों से बस एक ही दुवा निकल रही कि नीलम को कुछ न हो।
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अब आगे,,,,,,,,

उधर हवेली में।
ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठी प्रतिमा अपने मोबाइल से बार बार अपने पति अजय सिंह के मोबाइल पर फोन लगा रही थी किन्तु अजय सिंह का फोन बंद बता रहा था। अजय सिंह का फोन बंद बताने से प्रतिमा को किसी अनहोनी आशंका होने लगी थी। उसके चेहरे पर एकाएक ही गहन चिंता, परेशानी तथा बेचैनी के भाव उभर आए थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अजय ने अपना फोन क्यों बंद कर रखा है? वो अजय सिंह से फोन पर बात करके ये जानना चाहती थी कि वो इस वक्त कहाॅ है तथा बाॅकियों के हालात कैसे हैं? मगर अजय सिंह का फोन बंद बताने से प्रतिमा को अब प्रतिपल बेचैनी सी होने लगी थी। उसके मन में तरह तरह के ख़यालों का आवागमन शुरू हो गया था।

उसके सामने ही दूसरे सोफे पर शिवा किसी और ही दुनियाॅ में खोया हुआ नज़र आ रहा था। उसे जैसे अपने माॅ बाप की कोई ख़बर ही नहीं थी। वो तो बस सोनम के ख़यालों में खोया हुआ था। नीलम व सोनम को अब तक तीन से चार घंटे हो गए थे। मगर वो दोनो अब तक वापस नहीं लौटी थी। किन्तु शिवा को जैसे समय का ख़याल ही नहीं था। वो तो बस अपनी ऑखों के सामने नज़र आ रहे सोनम के खूबसूरत चेहरे को ही अपलक देखे जा रहा था। हलाॅकि जब प्रतिमा ने उसे इस बात से अवगत कराया कि वो दोनो यहाॅ से भागने का सोच कर ही गई हो सकती हैं तो शिवा का दिल एकदम से बैठ सा गया था। बाद में प्रतिमा के ही निर्देश पर उसने कुछ नये आदमियों की मजबूत टीम बना कर उनके पीछे लगा दिया था।

"उफ्फ क्या करूॅ इस इंसान का।" सहसा तभी प्रतिमा की खीझी हुई इस आवाज़ से शिवा हकीक़त की दुनियाॅ में आया, जबकि प्रतिमा कह रही थी____"कभी कोई काम ठीक से नहीं कर सकते हैं। ये तो हद हो गई, इतना लापरवाह इंसान मैने आज तक नहीं देखा।"

"क्या हुआ माॅम?" शिवा ने प्रतिमा के एकाएक ही तमतमा गए चेहरे को देखते हुए कहा____"किस लापरवाह इंसान की बात कर रही हैं आप?"
"तुम्हारे बाप की।" प्रतिमा ने आवेश में कहा___"जो कि हद दर्ज़े का लापरवाह और बेवकूफ इंसान है।"

"अरे ये आप क्या कह रही हैं माॅम?" शिवा अपनी माॅ की बातों से बुरी तरह हैरान रह गया।
"सच ही तो कह रही हूॅ मैं।" प्रतिमा ने कहा___"वरना कौन ऐसा करता है कि इतनी ख़राब सिचुएशन में होकर अपना फोन ही बंद कर दे?"

"क्या मतलब???" शिवा जैसे चकरा सा गया।
"तुम्हारे बाप से फोन द्वारा पूछना चाहती थी कि वहाॅ के हालात कैसे हैं?" प्रतिमा ने कहा___"मगर महाशय का मोबाइल फोन ही ऑफ बता रहा है। अब तुम ही बताओ कि ऐसे हालात में कौन अपना फोन कर बंद करके रखता है?"

"बात तो आपने सही कही माॅम।" शिवा के चेहरे पर एकाएक सोचने वाले भाव उभरे____"ऐसे हालात में कोई भी अपना फोन ऑफ नहीं रख सकता। हाॅ अगर मोबाइल ही डिस्चार्ज़ हो गया हो तो अलग बात है। लेकिन माॅम मुझे यकीन है डैड अपना फोन ऑफ नहीं करेंगे ऐसे वक्त में। ज़रूर कोई बात हो गई होगी।"

"चुप कर तू।" प्रतिमा अंदर ही अंदर जाने क्यों बुरी तरह हिल गई, बोली___"जो मुह में आता है बिना सोचे समझे बोल देता है।"
"ऐसा नहीं है माॅम।" शिवा ने नर्म भाव से कहा___"लेकिन आप खुद सोचिए कि क्या डैड ऐसे वक्त में अपना फोन ऑफ कर सकते हैं, नहीं ना? उन्हें भी पता है कि हालात कितने गंभीर हैं। लेकिन ये भी सच है कि अगर डैड का फोन ऑफ बता रहा है तो ज़रूर कोई ऐसी बात होगी जिसके बारे में फिलहाल हमें कुछ भी पता नहीं है।"

शिवा की इस बात पर प्रतिमा तुरंत कुछ बोल न सकी। उसके चेहरे पर गहन सोचों के भाव ज़रूर उभर आए थे। जैसा सोच रही हो कि क्या सच में ऐसा कुछ हुआ होगा? उधर अपनी माॅम को सोचों में गुम देख कर शिवा पुनः कह उठा____"इस तरह बैठने से कुछ नहीं होगा माॅम। मुझे लगता है कि हमें डैड का पता करना चाहिए। जैसा कि आपने मुझे बताया था कि आज विराज रितू दीदी के साथ नीलम व सोनम को लेने आने वाला है शायद, इसी लिए आपने उनके पीछे अलग से एक मजबूत टीम बना कर मेरे द्वारा भेजवाया था। वहीं दूसरी तरफ से डैड भी अपने साथ कुछ आदमियों को लिए आ रहे हैं। इस बात से यही ज़ाहिर होता है कि अगर विराज सचमुच आ रहा है तो डैड तथा हमारे आदमियों के साथ उसकी भिड़ंत अनिवार्य है। इस भिड़ंत में यकीनन हमारी जीत होगी। यानी कि अंततः विराज रितू दीदी के साथ पकड़ा ही जाएगा। उसके बाद डैड उन सबको फार्महाउस ले जाएॅगे। फार्महाउस पहुॅचने के बाद ही वो हमें फोन करने वाले थे। किन्तु उनके फोन बंद बताने से ऐसा प्रतीत होता है जैसे हमने जो उम्मीद की थी वो हुआ ही नहीं
है।"

"नहीं नहीं।" प्रतिमा ने पूरी मजबूती से इंकार में सिर हिलाया, बोली___"ऐसा नहीं हो सकता बेटा। इस बार मैने और तेरे डैड ने उस विराज की सोच से बहुत आगे बढ़ कर प्लान बनाया था। मुझे उसकी सोच का अब अंदाज़ा हो चुका था, इसी लिए तो डबल बैकअप रखा था हमने। एक हमारे आदमियों का दूसरा तेरे डैड के साथ आए आदमियों का। डबल बैकअप के बाद तो जीत हमारी ही होनी निश्चित थी बेटा।"

"काश! ऐसा ही हुआ हो माॅम।" शिवा ने कहा___"उन सबके साथ साथ नीलम व सोनम भी तो पकड़ ली गई होंगी। उफ्फ! कितना भरोसा था मुझे कि सोनम ये गाॅव तथा हमारे खेते घूम कर वापस यहीं आएगी। मगर कदाचित नीलम ने उसे भी सब कुछ बता दिया था तभी तो दोनो एक साथ चली गईं। मगर अब मैं अपने दिल का क्या करूॅ माॅम? ये तो उसी का होकर रह गया है।"

शिवा की इस बात का प्रतिमा अभी कुछ जवाब देने ही वाली थी सहसा तभी ड्राइंग रूम में बड़े वेग से एक आदमी दाखिल हुआ। उसके चेहरे से ही लग रहा था कि वो कहीं से मैराथन दौड़ लगा कर आया है। बुरी तरह हाॅफ रहा था वह। प्रतिमा व शिवा उसे देख कर बुरी तरह चौंक पड़े।

"क्या बात है हैदर?" शिवा ने उसकी तरफ हैरानी से देखते हुए कहा___"तुम इतना हाॅफ क्यों रहे हो? और...और तुम यहाॅ कैसे, तुम तो टीम के साथ ही गए थे न?"
"हाॅ छोटे ठाकुर।" हैदर नाम के उस आदमी ने हाॅ में सिर हिलाते हुए कहा___"गया तो मैं टीम के साथ ही था। मगर,

"मगर क्या???" शिवा उतावलेपन में पूछ बैठा।
"सब कुछ गड़बड़ हो गया छोटे ठाकुर।" हैदर ने दीनहीन दशा में बोला____"ठाकुर साहब ने तो सबको पकड़ ही लिया था और बाज़ी भी हमारे ही हाॅथ में थी। मगर ऐन वक्त पर वहाॅ पुलिस की पूरी फौज आ गई और फिर एसीपी के निर्देश पर सबको हिरासत में ले लिया गया। यहाॅ तक कि ठाकुर साहब को भी वो एसीपी गिरफ्तार करके ले गया है। मैं किसी तरह छुपता छुपाता वहाॅ से निकल कर ये सब बताने के लिए आपके पास आया हूॅ।"

हैदर की बात सुन कर शिवा तथा प्रतिमा दोनो को ही जैसे साॅप सूॅघ गया। दोनो के ही चेहरों की हालत ऐसे हो गई जैसे कपड़े से पानी निचोड़ लेने पर कपड़े की हो जाती है। प्रतिमा को तो ऐसा लगा जैसे दिल का दौरा पड़ जाएगा। उसकी ऑखों के सामने अॅधेरा सा छा गया। शिवा की नज़र जब प्रतिमा पर पड़ी तो वह अपने सोफे से उठ कर बड़ी तेज़ी से उसके पास आकर उसे सम्हाला। हालत तो उसकी भी ख़राब हो चुकी थी। किन्तु जवान खून था अभी इस लिए हैदर की इस डायनामाइट जैसी बात को हजम कर गया था।

"सब कुछ खत्म हो गया बेटा।" प्रतिमा अपने बेटे की बाहों में सिमटी एकदम से असहाय भाव से बोली___"अब कुछ भी शेष नहीं रहा। तेरी बहन रितू ने अपने महकमे का सहारा ले कर अपने बाप को एक और क्षति पहुॅचा दी। उसने अपने बाप के माथे पर एक और नाकामी की मुहर लगा दी। इस बात से ज़ाहिर होता है कि उसके दिल में अपने माॅ बाप के प्रति ज़रा सी भी जगह नहीं रह गई है।"

"मैं उस कुतिया को ज़िंदा नहीं छोंड़ूॅगा माॅम।" शिवा के मुख से सहसा गुर्राहट निकली___"डैड को जेल भिजवा कर उसने ये अच्छा नहीं किया है। भला उसकी हमसे क्या दुश्मनी है माॅम, दुश्मनी तो विराज से है।"

"मैडम, ठाकुर साहब ने गुस्से में आकर अपनी छोटी बेटी नीलम को गोली भी मार दी है।" सहसा हैदर ने ये कह कर मानो धमाका सा किया____"नीलम की हालत बहुत ही गंभीर है। उसे वो लोग यकीनन हास्पिटल ले गए होंगे।"

"ये क्या कह रहे हो तुम??" प्रतिमा हैदर की ये बात सुन कर सकते में आ गई। चेहरा सफेद फक्क पड़ गया।
"हाॅ मैडम।" हैदर ने कहा___"गुस्से में पागल हुए ठाकुर साहब ने एसीपी का रिवील्वर निकाल कर नीलम पर फायर कर दिया था। गोली नीलम की पीठ पर लगी थी। जहाॅ से खूॅन बहे जा रहा था।"

"हे भगवान!।" प्रतिमा की ऑखें छलक पड़ीं___"ये कैसा दिन दिखा रहे हो हमे? एक बाप अपनी ही बेटियों के खून का प्यासा हो चुका है।"
"लेकिन हैदर।" प्रतिमा के रुदन पर ज़रा भी ध्यान दिये बग़ैर शिवा ने पूछा___"डैड ने नीलम पर गोली क्यों चलाई थी?"

हैदर ना शुरू से लेकर अंत तक की सारी राम कहानी संक्षेप में कह सुनाई। उसकी इस राम कहानी में वो सीन भी था जिसमें अजय सिंह ने अपनी ही बेटी नीलम से अश्लील बातें की थी। ये भी कि अंत में कैसे नीलम ने ठाकुर साहब को थप्पड़ मारा था जिसकी वजह से गुस्से में आकर अजय सिंह ने एसीपी का रिवाल्वर छीन कर नीलम पर गोली चलाई थी। सारी बातें सुनने के बाद शिवा तो बस हैरान ही था किन्तु प्रतिमा एकदम से मानो बुत बन गई थी। उसका चेहरा एकदम से तेज़हीन सा हो गया था।

"अब मेरे लिए क्या आदेश है छोटे ठाकर?" हैदर ने कहा।
"तुम जाओ हैदर।" शिवा ने गंभीरता से कहा___"गेस्ट हाउस में आराम करो। हम सोचते हैं कि अब इसके आगे हमें क्या करना है?"

शिवा के कहने पर हैदर वहाॅ से चला गया। उसके जाने के बाद ड्राइंगरूम में मरघट जैसा सन्नाटा छा गया। काफी देर तक माॅ बेटे के बीच यही आलम रहा। जैसे उनमें से किसी को कुछ सूझ ही न रहा हो कि अब क्या बात करें?

"आख़िर जिस चीज़ की नियति बन चुकी थी।" सहसा प्रतिमा ने कहीं खोये हुए से कहा___"उसका आग़ाज हो ही गया। इस लड़ाई में किसी न किसी को तो शहीद होना ही है। फिर चाहे वो नीलम ही क्यों न हो?"

"आपने बिलकुल सही कहा माॅम।" शिवा ने भी गंभीर भाव से कहा___"किसी न किसी के साथ तो ये होना ही है। मगर एक बात तो मैं भी कहूॅगा, और वो ये कि डैड ने नीलम पर गोली चला कर अच्छा नहीं किया। मैं जानता हूॅ कि आपको मेरी ये बात नागवार लग सकती है। मगर इसके बावजूद कहूॅगा मैं कि डैड को नीलम पर गोली नहीं चलाना चाहिए था। मैं मानता हूॅ कि मेरी दोनो बहनों ने हमसे बगावत करके ग़लत किया है। उन्हें सोचना चाहिए था कि माॅ बाप कैसे भी हों हैं तो अपने ही। वैसे ही डैड को भी सोचना चाहिए था माॅम। हम उन्हें उनके किये की सज़ा ज़रूर देते मगर इस तरह नहीं कि उनको जान से ही मार दें। ये सब उस विराज की वजह हे हुआ है, उसी ने मेरी दोनो बहनों को बहकाया है। उसी ने उन दोनो का ब्रेनवाश किया है, वरना उनके दिलो दिमाग़ में कम से कम ये सोच तो रहती ही कि माॅ बाप जैसे भी हों, वो अपने ही होते हैं।"

प्रतिमा शिवा की ये बातें सुन कर मन ही मन हैरान थी। शिवा का बदला हुआ ये रवैया उसे हजम नहीं हो रहा था। किन्तु उसे ये भी पता था कि शिवा अपने बाप की टूकाॅपी है। यानी सूरज कभी पश्चिम से उदय नहीं हो सकता।

"क्या बात है।" प्रतिमा ने हैरानी से कहा___"आज अपनी बहनों से इतनी हमदर्दी? क्या ये सोनम से हुए इश्क़ का असर है बेटा? जिसने तेरी सोच को इस हद तक बदल दिया है?"
"मुझे खुद पता नहीं है माॅम।" शिवा ने नज़रें चुराते हुए कहा___"मैं सिर्फ इतना समझ रहा हूॅ कि डैड ने नीलम पर गोली चला कर अच्छा नहीं किया। अगर वही गोली वो विराज पर चला देते तो शायद मुझे उनसे कोई शिकायत न रहती।"

"ख़ैर छोंड़।" प्रतिमा ने इस मैटर को ज्यादा न बढ़ाने की गरज़ से कहा___"अब हमें ये सोचना है कि तेरे डैड को पुलिस से कैसे छुड़ाया जाए? उन पर नीलम को जान से मारने की कोशिश का भी केस लग सकता है, और संभव है कि उस एसीपी ने ये केस लगा भी दिया हो उन पर। अतः हमें अब किसी क़ाबिल वकील से मिलना पड़ेगा। ताकि वो उनको जेल से किसी तरह छुड़ा सके।"

"हाॅ ये सच कहा आपने।" शिवा ने कहा___"डैड को जेल से तो छुड़ाना ही पड़ेगा।"
"रुको मैं पता करती हूॅ।" प्रतिमा ने कहा___"मेरी जानकारी में एक क़ाबिल वकील है जो अजय को जेल से छुड़ा सकती है। मेरी एक काॅलेज फ्रैण्ड है। मैने और अनीता ब्यास ने एक साथ ही एलएलबी किया था। उसके बाद उसने वकालत को ही अपना पेशा बना लिया जबकि मैं अजय के साथ घर बसा कर सिर्फ एक हाउसवाइफ बन कर रह गई। हलाॅकि अजय ने मुझे इस बात के लिए कभी भी मना नहीं किया कि मैं वकालत न करूॅ। बल्कि हमने तो साथ में ही इसकी पढ़ाई की थी। अजय तो चाहते थे कि हम दोनो वकील बन जाएॅ। मगर मैने ही इंकार कर दिया था। किन्तु आज सोचती हूॅ कि काश मैं बन ही जाती तो आज अपने अजय को चुटकियों में जेल से छुड़ा लाती।"

"वकालत तो आप आज भी कर सकती हैं माॅम।" शिवा ने कहा___"आपके पास इस सबके राइट्स तो होंगे ही।"
"सब कुछ है बेटा।" प्रतिमा ने कहा___"मगर ये सब अब इतना आसान भी नहीं है। उसके लिए पहले इस सबकी बारीकियों को समझना पड़ता है। कई तरह के केसों का अध्ययन करना पड़ता है। मैं कभी कोर्ट के अंदर वकील का चोंगा पहन कर नहीं गई, इस लिए मुझे इसका तज़ुर्बा भी नहीं है। दूसरी बात अनुभव भी कोई चीज़ होती है। जो कि मुझे नहीं है। हर चीज़ का एक क्रम होता है। अगर आप समय के साथ ही साथ लाइन पर चल रहे हैं तब तो आप सीधी लाइन पर ही बिना किसी रुकावट के चलते रहेंगे पर अगर आपने लाइन को बहुत पहले ही छोंड़ दिया है तो फिर लम्बे समय बाद उसी लाइन पर चलना ज़रा मुश्किल सा हो जाता है। वो फिर तभी अपनी लय पर आएगा जब उसकी नियमित प्रैक्टिस हो। ख़ैर, छोंड़ इस बात को। मैं अनीता को फोन लगा कर उससे बात करती हूॅ। मेरे फ्रैण्ड सर्कल में एक वही है जो अब तक मेरे टच में में है। बाॅकियों का तो कहीं पता ही नहीं है।"

कहने के साथ ही प्रतिमा ने अपने मोबाइल को अनलाॅक करके उस पर अनीता ब्यास का नंबर ढूॅढ़ने लगी। जबकि शिवा ये कह कर सोफे से उठा कि वो कुछ देर में आता है अभी।
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केशव जी के जिस आदमी ने फोन पर उस जासूस के बारे में सूचित किया था उसका नाम निरंजन वर्मा था। रितू ने जब केशव जी से कहा कि वो अपने उस आदमी से कहे कि उसे पकड़ने की कोशिश करे और खुद भी वापस जाएॅ वहाॅ तो केशव ने वैसा ही किया था। उन्होंने निरंजन को फोन करके उससे पूछा था कि क्या वो अकेले उस जासूस को पकड़ सकता है तो निरंजन ने कहा कि वो इस बारे में कुछ कह नहीं सकता है। क्योंकि उसने सुना था कि कोई कोई जासूस लड़ने के मामले में भी काफी निपुण होते हैं। इस लिए बेहतर यही होगा कि वो उस पर सिर्फ नज़र रखे और फिर जब वो सब आ जाएॅगे तो उसे जल्द ही घेर लिया जाएगा। केशव जी को भी निरंजन की बात सही लगी। इस लिए वो फुल स्पीड में अपने आदमियों को लिए आ रहे थे।

इधर निरंजन बड़ी सफाई से हरीश राणे पर नज़र रखे हुए था। किन्तु उसे भी पता था कि ये जासूस यहाॅ पर ज्यादा देर तक रुकने वाला नहीं है। उसके पास काले रंग की एक पल्सर बाइक थी। इस वक्त वह बाइक के ही पास नीचे बैठा बाइक में कुछ कर रहा था। निरंजन को समझ नहीं आ रहा था कि वो बाइक के पास इस तरह बैठ कर क्या कर रहा है? निरंजन उससे बस कुछ ही दूरी पर एक पेड़ की ओट में छुप कर खड़ा था और उस पर नज़र रखे हुए था। उसके पास हथियार के रूप में कुछ भी नहीं था। जबकि उसे पूर्ण विश्वास था कि उस जासूस के पास रिवाल्वर ज़रूर होगा। यही वजह थी कि वो खुल कर उसके सामने नहीं जा रहा था।

निरंजन के चेहरे पर प्रतिपल बेचैनी बढ़ती जा रही थी। क्योंकि उसे पता था कि जासूस अगर यहाॅ से चला गया तो फिर उसे ढूॅढ़ पाना मुश्किल होगा। अतः वह बार बार देवी माॅ से प्रार्थना कर रहा था कि केशव जी सारे आदमियों को लेकर जल्दी आ जाएॅ। उसकी नज़र सामने ही थी। जहाॅ पल्सर बाइक के पास नीचे बैठा वो जासूस कुछ कर रहा था। जासूस का चेहरा उसके बगल से दिख रहा था। निरंजन के मन में कई बार ये ख़याल आया था कि वो चुपके से जाए और उस जासूस को दबोच ले मगर अगले ही पल वो उसके पास जाने का अपना ये ख़याल त्याग देता था। क्योंकि बार बार उसे उसके पास रिवाल्वर होने का बोध करा देता था। उसने आस पास देख भी लिया था। पास में कहीं भी उसे कोई डंडे जैसी वस्तु भी न नज़र आई थी जिसे लेकर वो उस जासूस के पास चला जाता।

अभी निरंजन उस जासूस को देख ही रहा था कि तभी वो जासूस उठ कर खड़ा हुआ और अपने दाहिने पैर को बाइक के आगे वाले पहिये पर रिम में रख कर उस पर ज़ोर से दबाव बनाया। ये देख कर निरंजन के मस्तिष्क में झनाका सा हुआ। एकाएक ही उसके दिमाग़ की बत्ती जल उठी। साला इतनी देर से वो समझ नहीं पा रहा था कि ये जासूस बाइक के पास बैठा कर क्या रहा था? अब उसे समझ आया था। दरअसल बाइक का अगला पहिया पंचर था अथवा उसमें हवा कम थी। पहिये पर निरंजन का ध्यान पहली बार गया था। उसने ग़ौर से देखा पहिये पर जहाॅ पर से हवा भरी जाती है वहाॅ पर कोई पतली सी तार या फिर यू कहें कि पतला सा पाइप लगा हुआ था। जिसका दूसरा सिरा इस वक्त उस जासूस के दाहिने हाॅथ में था।

निरंजन को समझ न आया कि अगर बाइक का अगला पहिया पंचर है या उसमे हवा कम है तो वो जासूस यहाॅ पर उसे ठीक कैसे कर लेगा और ये पतला सा पाइप क्यों लगा रखा है उसने पहिये की निब पर? तभी वो जासूस पुनः बैठ गया। इस बार निरंजन ने भी अपनी जगह बदली और फिर ध्यान से देखा उसने। पाइप का दूसरा सिरा उस जासूस ने अपने होठों पर दबाया और फिर निरंजन ने देखा कि जासूस के दोनो गाल फूल गए। ये देख कर निरंजन की हॅसी छूट ही गई होती अगर उसने जल्दी से अपने मुह को अपने हाथों से भींच न लिया होता तो। दरअसल वो जासूस पाइप लगा कर मुह से हवा भर रहा था पहिये पर। बस यही देख कर निरंजन को बड़ी ज़ोर की हॅसी आ गई थी। उसने सोचा कि इसे जासूस किसने बना दिया? भला मुह से भी कोई बाइक के पहिये पर हवा भरता है? ये तो दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य ही है।

निरंजन ने भी सोचा कि बेचारा यहाॅ पर बाइक में हवा भरवाए भी तो कैसे? किन्तु मुख से हवा तो भरने से रही। कहने का मतलब ये कि जासूस की इस क्रिया पर निरंजन उसे बेवकूफ ही समझ रहा था। मगर वो उस वक्त हैरान रह गया जब वो जासूस पुनः उठा और पहले की भाॅति अपना दाहिना पैर रिम में रख दबाव बनाया। उसके चेहरे से ज़ाहिर हुआ कि अब वो संतुष्ट है। उसने झुक कर तुरंत ही पाइप को पहिये के निब से निकाला। निरंजन ने देखा कि निब के पास लगे पाइप के उस छोर पर कोई चीज़ लगी हुई थी। ये देख कर निरंजन का दिमाग़ घूम गया। चकित होकर वह उस जासूस को देखे जा रहा था। अब उसे समझ आया कि वो जासूस यूॅ ही तो नहीं बन गया होगा। ज़रूर उसमें काबीलियत थी।

अभी निरंजन ये सब सोच ही रहा था कि तभी उसने देखा कि वो जासूस उस पाइप को लिए बाइक के बाएॅ साइड आया और फिर अपनी दाहिनी टाॅग उठा कर बाइक की सीट पर बैठ गया। ये देख कर निरंजन एकदम से हड़बड़ा गया। वो समझ गया कि अब ये जासूस यहाॅ से चला जाएगा। निरंजन को समझ न आया कि वो उसे कैसे यहाॅ से जाने से रोंके? वो खुद निहत्था था वरना वो कोई जोखिम उठाने का सोचता भी। उसे पूरा यकीन था कि उस जासूस के पास पिस्तौल होगी। यही वजह थी कि वो उसके पास खुल कर जा नहीं रहा था। किन्तु अब हालात बदल गए थे। क्योंकि निरंजन की ऑखों के सामने ही वो जासूस बाइक पर बैठ चुका था और अब ये भी तय था कि वो बाइक को स्टार्ट कर यहाॅ से चला ही जाएगा।

निरंजन ने देखा कि बाइक पर बैठा जासूस उस पतले से पाइप को गोल गोल छल्ली की शक्ल देकर समेट रहा था। उसकी पीठ निरंजन की तरफ ही थी। पाइप का दूसरा सिरा जासूस की दाहिनी जाॅघ से थोड़ा ही नीचे झूल रहा था और प्रतिपल ऊपर की तरफ उठता भी जा रहा था। ये देख कर निरंजन के दिमाग़ की बत्ती जली। उसके चेहरे पर एकाएक ही कुछ सोच कर चमक आ गई। वो फुर्ती से अपनी जगह से हिला और फिर बड़ी सावधानी व सतर्कता से लम्बे लम्बे क़दम बढ़ाते हुए जासूस के पीछे पहुॅच गया।

हरीश राणे को सहसा अपने पीछे किसी की मौजूदगी का एहसास हुआ। उसने इस एहसास के तहत ही जल्दी से पीछे मुड़ कर देखना चाहा मगर अगले ही पल जैसे बिजली सी कौंधी। निरंजन ने डर व भय की वजह से बड़ी ही फुर्ती का प्रदर्शन किया था। उसने जासूस के मुड़ने से पहले ही झुक कर जासूस के नीचे जाॅघ के पास झूलते उस पाइप को पकड़ा और फिर तेज़ी से खड़े होकर उसी छोर से दूसरा हाॅथ सरका कर उसने जासूस के सिर से अपनी एक कलाई घुमा कर बड़ी फुर्ती से उस पाइप को जासूस की गर्दन पर कस दिया।

हरीश राणे को ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि उसके साथ पलक झपकते ही ऐसा कुछ हो सकता है। वह एकदम से हकबका कर रह गया था। हलाॅकि उसने खुद को बड़ी तेज़ी से सम्हाला था मगर तब तक उसके गले में निरंजन ने उस पाइप को किसी फाॅसी के फंदे की तरह कस दिया था। निरंजन ये सोच कर जी जान लगाए हुए था कि अगर उसने ज़रा सी भी ढील दी तो ये जासूस उसे जान से मार देगा। निरंजन के दिमाग़ में बस एक यही बात थी, बाॅकी उसे किसी बात का कोई होश ही नहीं था। उसे इस बात का ज़रा भी इल्म नहीं रह गया था कि उसके द्वारा इतनी ताकत से गले में पाइप को कसने से वो जासूस कुछ ही पलों में मर भी सकता है।

उधर राणे जल बिन मछली की तरह छटपटाए जा रहा था। वो अपने दोनो हाथों से अपने गले में फॅसे पाइप को पकड़ने की कोशिश कर रहा था मगर पाइप में निरंजन की पूरी ताकत लगी हुई थी। जिसकी वजह से राणे उसे हिला भी नहीं पा रहा था। देखते ही देखते राणे का बुरा हाल हो गया। उसका गोरा चेहरा लाल सुर्ख पड़ गया। चेहरे पर पसीना और तड़प साफ पता चल रही थी। किसी किसी पल वह खाॅसने भी लगता था। उसकी ऑखों की पुतलियाॅ जैसे बाहर कूद पड़ने को आतुर हो उठी थीं।

राणे की हालत प्रतिपल बिगड़ती जा रही थी। बाइक पर बैठा वह बुरी तरह खुद को झटके भी दे रहा था मगर मजाल है कि निरंजन की पकड़ में ज़रा सा भी ढीलापन आया हो। कहते हैं कि मौत से बचने के लिए इंसान अंत तक हर तरह से प्रयास करता है फिर भले ही उसके प्रयास विफल ही होते रहें। निरंजन के सिर पर जुनून सवार था और वो किसी यमराज की तरह राणे के सिर पर आ खड़ा हुआ था। राणे को एहसास हो गया कि अब वो मरने ही वाला है। उसे अब साॅस लेना भी मुश्किल पड़ रहा था। बुरी तरह छटपटाते हुए राणे ने एकाएक अपने एक हाॅथ को गले में फॅसे पाइप से हटा कर उसी हाॅथ की कुहनी का वार बड़ी तेज़ी से पीछे निरंजन के पेट के हल्का ऊपरी भाग पर किया। उसके इस वार से निरंजन के हलक से पीड़ा भरी कराह निकल गई और उसकी पकड़ तथा उसकी ताकत कमज़ोर पड़ गई। हलाॅकि उसने जल्दी से उस दर्द को बर्दास्त करके पुनः पाइप को कसना चाहा मगर तक मानो देर हो गई। क्योंकि जैसे ही निरंजन ने पुनः ताकत लगाई वैसे ही राणे ने कुहनी का वार जल्दी जल्दी कई बार निरंजन के पेट में कर दिया था। नतीजा ये हुआ कि निरंजन की पकड़ काफी ज्यादा ढीली व कमज़ोर पड़ गई। वह बुरी तरह दर्द व पीड़ा से बिलबिला उठा था।

निरंजन के कमज़ोर पड़ते ही हरीश राणे ने बड़ी तेज़ी से अपने गले से उस पाइप को पकड़ कर खींचा और फिर उसे ऊपर करते हुए सिर से निकाल दिया। हालत तो उसकी अब भी बहुत ख़राब थी। बुरी तरह खाॅस रहा था तथा बुरी तरह गहरी गहरी साॅसें भी ले रहा था। गोरा चेहरा लाल सुर्ख पड़ गया था। चेहरे पर ढेर सारा पसीना उभर आया था। गले से पाइप को निकालते ही वह बाइक से खुद को बाएॅ साइड गिरा लिया था तथा साथ ही कई पलटियाॅ भी खा लिया था। मगर तब तक उसकी पसली में निरंजन के बूट की ज़बरदस्त ठोकर लग चुकी थी। निरंजन जानता था कि अगर वह अब भी उसे सम्हलने का मौका दिया तो वो उसके लिए काल बन सकता है। अतः वह मौत के डर से उस पर वार पे वार किये जा रहा था।

हरीश राणे अभी अभी मौत से बच कर निकला था। इस लिए उसे खुद पर नियंत्रण पाने के लिए कुछ समय चाहिए था मगर निरंजन था कि उस पर प्रहार किये जा रहा था। अचानक ही निरंजन ने देखा कि जासूस ने अपने हाॅथ को पीछे ले जाकर रिवाल्वर निकाल रहा है। ये देख कर निरंजन के समूचे जिस्म में मौत की सिहरन दौड़ गई। जैसे ही राणे ने रिवाल्वर निकाल कर अपने हाॅथ को निरंजन की तरफ उठाना चाहा वैसे ही मौत के डर से निरंजन ने उसकी उस कलाई पर अपनी टाॅग चला दी। नतीजा ये हुआ कि राणे के हाॅथ से रिवाल्वर छूट कर दूर जा गिरा तथा कलाई पर तेज़ ठोकर लगने से वो दर्द से कराह उठा।

निरंजन ने देखा कि रिवाल्वर उसकी पहुॅच में ही है इस लिए वो जल्दी से रिवाल्वर की तरफ लपका मगर तभी वह मुह के बल ज़मीन पर गिरा। गिरते ही उसके मुख से चीख़ निकल गई। राणे ने पलट कर उसका पैर पकड़ कर खींच लिया था जिससे वो अनबैलेंस होकर मुह के बल गिरा था। रिवाल्वर उसकी पहुॅच से लगभग डेढ़ दो हाॅथ ही दूर था। इधर निरंजन का पैर पकड़ कर खींचते ही राणे उसके ऊपर एकदम से आने की कोशिश की तो निरंजन घबरा कर पलट गया। नतीजतन इस बार राणे मुह के बल गिरा। किन्तु उसके एक हाॅथ में निरंजन का पैर अभी भी था।

निरंजन ने अपने पैर को उससे छुड़ाने के लिए ज़ोर से झटका दिया मगर उसका पैर तो न छूटा किन्तु झटकने से उसका पैर राणे की छाती से टकराया। निरंजन आवेश और घबराहट में अपने पैर को झटका देता ही रहा, जिसका नतीजा ये हुए कि बार बार छाती पर उसका पैर ज़ोर से लगने से आख़िर राणे को उसका पैर छोंड़ना ही पड़ा। इधर निरंजन जो कि दोनो हाॅथ पीछे की तरफ ज़मीन पर टिका कर बैठ चुका था वो अपने पाॅव के आज़ाद होते ही तेज़ी से रिवाल्वर की तरफ पलट कर लगभग उस पर कूद सा गया। उसके हाॅथ में रिवाल्वर आ चुका था। अभी वह रिवाल्वर के साथ पलटा ही था कि तभी राणे उसके ऊपर जंप मार कर आ गया।

राणे ने तुरंत ही निरंजन के रिवाल्वर वाले हाॅथ को पकड़ने के लिए अपना एक हाॅथ बढ़या तो निरंजन ने अपने उस हाॅथ को ऊपर अपने सिर के पीछे साइड कर लिया। राणे जैसे ही उसे पकड़ने के लिए उस तरफ झुका वैसे ही निरंजन ने अपना दूसरा हाॅथ छुड़ा कर ज़ोर से एक मुक्का राणे की कनपटी में मारा जिससे राणे उसके ऊपर से दूसरी तरफ पसर गया। इधर राणे के गिरते ही निरंजन लेटे लेटे ही एक साथ तीन चार पलटियाॅ खाता चला गया। जब तक राणे उठ कर उसके पास पहुॅचता तब तक निरंजन उठ कर बैठ चुका था, साथ ही रिवाल्वर वाला हाॅथ भी ऊपर उठा कर उस पर तान चुका था।

"रुक जा मादरजाद।" निरंजन आवेश में जल्दी से चिल्लाया था___"वरना इस रिवाल्वर की सारी गोलियाॅ तेरे सीने में उतार दूॅगा और ये मैं यूॅ ही नहीं कह रहा हूॅ बल्कि सचमुच ऐसा कर भी दूॅगा। क्योंकि तुझे जान से मार देने पर भी मुझे कुछ नहीं वाला। बल्कि इनाम ही मिलेगा मुझे।"

हरीश राणे निरंजन का ये डायलाॅग तथा उसके खतरनाॅक लहजे को देख कर एकदम से अपनी जगह पर गया। उसके चेहरे पर पहली बार डर व भय के चिन्ह नज़र आए। किन्तु उसे ये समझ नहीं आया कि ये आदमी है कौन और उसके पीछे उसकी मौत बन कर कहाॅ से आ गया था? क्या ये विराज व रितू का आदमी है जो उसके पीछे ही लगा हुआ था?

"कौन हो तुम?" हरीश राणे ने सतर्क भाव से पूछा___"और इस तरह मुझ पर जानलेवा हमला करने का क्या मतलब है तुम्हारा?"
"जिस तरह तू मंत्री का कुत्ता बन कर हमारे बाॅस के अज़ीज़ लोगों के पीछे लगा हुआ था।" निरंजन ने लहजे को कठोर बनाते हुए कहा___"उसी तरह मैं भी तेरे पीछे लगा हुआ था। ख़ैर, अब तू पकड़ में आ ही चुका है तो ये भी समझ गया होगा कि अब तेरा क्या हस्र होने वाला है?"

"ओह तो तुम्हें ये ग़लतफहमी है।" हरीश राणे ने बड़े अजीब भाव से कहा____"कि तुमने मुझे पकड़ लिया है?"
"ज्यादा शेखी मत झाड़।" निरंजन उसकी बात पर गड़बड़ा सा गया, फिर बोला___"वरना बता ही चुका हूॅ कि तुझे जान से मार देने पर मुझे कुछ नहीं होगा बल्कि इनाम ही मिलेगा।"

"अच्छा।" हरीश राणे सहसा मुस्कुराया___"तो फिर देर किस बात की है प्यारे? तुम्हारे निशाने पर हूॅ, खत्म कर दो मुझे और जल्दी से अपना इनाम भी हाॅसिल कर लो।"
"लगता है।" निरंजन अंदर ही अंदर हैरान___"कि तुझे मरने की बहुत जल्दी है।"

"क्या करें दोस्त?" राणे ने कहा___"अब जब तुमने कह ही दिया है ऐसा तो फिर देर किस बात की करना? मुझे लगता है कि तुम्हें भी अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। अतः मेरी सलाह मानो और जल्दी से मुझे खत्म कर दो।"

निरंजन उसकी इस बात पर समझ न सका कि ये जासूस आख़िर है किस किस्म का ब्यक्ति? मौत सामने खड़ी है और ये ऐसी बातें कर रहा है। इसे ज़रा भी मौत का ख़ौफ नहीं है। जबकि निरंजन तो बस उसे डरा और धमका ही रहा था। ताकि वह कोई बेजा हरकत करने की कोशिश न करे। उसे पता था थोड़ी ही देर में उसके बाॅस यानी कि केशव शर्मा अपने आदमियों सहित यहाॅ पहुॅच ही जाएॅगे। अतः तब तक उसे इस जासूस को रोंके रखना था। मगर उसकी इन ऊल जुलूल बातों ने उसका सिर चकरा कर रख दिया था।

"क्या सोचने लगे प्यारे?" हरीश राणे उसे चुप देख कर कह उठा___"अरे भई चलाओ गोली मुझ पर और खत्म करो मुझे। तुम तो यार लगता है बस डींगे ही मारना जानते हो। जबकि मुझसे अब इन्तज़ार नहीं हो रहा।"
"ओये ज्यादा बकवास न कर समझा।" निरंजन ने उत्तेजित भाव से कहा___"वरना सच में तेरा राम नाम सत्य कर दूॅगा मैं।"

हरीश राणे कोई मामूली इंसान नहीं था। घुटा हुआ जासूस था, उसे समझते देर न लगी कि निरंजन उसे सिर्फ धमका रहा है। अगर उसे जान से मारना ही होता तो इतनी बातें न करता बल्कि कब का उसे यमलोक पहुॅचा दिया होता। अतः उसने पूरी सतर्कता से निरंजन की हर गतिविधी को नोट करते हुए बेख़ौफ निरंजन की तरफ बढ़ने लगा। ये देख कर निरंजन अंदर ही अंदर बुरी तरह घबरा गया। साथ ही उसके दिमाग़ ने काम करना भी बंद कर दिया। उसे समझ न आया कि ये साला अब उसकी तरफ क्यों बढ़ रहा है?

"ये...ये तू क्या कर रहा है मादरजाद?" बुरी तरह बौखलाते हुए निरंजन हकलाते हुए बोल उठा____"मैं कहता हूॅ रुक जा वरना सच में गोली मार दूॅगा तुझे।"
"मैं भी तो यही चाहता हूॅ प्यारे।" हरीश राणे ने मुस्कुराते हुए कहा___"मगर तुम हो कि मुझे जान से मारते ही नहीं। इस लिए अब मैं खुद ही तुमसे रिवाल्वर लेकर खुद को गोली मार लूॅगा। मुझे समझ आ गया है कि तुमसे रिवाल्वर चलाया नहीं जाएगा।"

"तू...तू पागल है क्या रे?" निरंजन हैरान परेशान सा बोल पड़ा___"देख मेरी तरफ मत आ। वरना अगर मेरा भेजा गरम हो गया न तो तू सच में मेरे हाॅथों मारा जाएगा।"
"नहीं प्यारे।" हरीश राणे बोला___"मुझे पता चल गया है कि अब तुम मुझे गोली नहीं मार सकते। क्योंकि तुम्हें मुझसे अचानक ही बेइंतहां मोहब्बत हो गई है। हाय, ये मोहब्बत भी न बहुत बुरी चीज़ होती है कम्बख़्त।"

"साले।" निरंजन उसकी बातों से बुरी तरह भन्ना गया, बोला___"तुझे एक बार में बात समझ में नहीं आती है क्या? अब अगर एक क़दम भी आगे बढ़ाया तूने तो देख लेना यहीं पर ढेर हुआ नज़र आएगा।"

"ऐसा ग़ज़ब मत करना प्यारे।" राणे चहका___"ऐसा लगता है कि तुम्हारी तरह मुझे भी तुमसे मोहब्बत हो रही है। ओह नहीं नहीं....मुझे किसी से भी मोहब्बत नहीं हो सकती। खास कर उससे तो हर्गिज़ भी नहीं जो खुद ही मेरी तरह औज़ार लिए फिरता हो।"

निरंजन बोला तो कुछ नहीं किन्तु उसे एहसास हुआ कि फालतू की बकवास करते हुए ये जासूस उसके काफी पास आ गया है। अभी निरंजन ये सोच ही रहा था कि अचानक ही मानो बिजली सी कौंधी। हरीश राणे ने हैरतअंगेज़ कारनामा किया था। पलक झपकते ही उसका जिस्म हवा में लहराया और इससे पहले की निरंजन कुछ समझ पाता राणे उसको लिए ज़मीन पर कई पलटियाॅ खाता चला गया। निरंजन के हाॅथ से रिवाल्वर जाने कब छूट गया था। अपने ऊपर हुए इस अप्रत्याशित हमले से निरंजन बुरी तरह बौखला गया था। जब तक उसे कुछ होश आया तब तक देर हो चुकी थी।

पलटियाॅ खाने के बाद राणे सबसे पहले उठा और फिर उसने निरंजन को कुछ भी करने का अवसर नहीं दिया। लात घूॅसों की बरसात सी कर दी उसने। निरंजन की चीख़ें फिज़ा में गूॅजती रही।

"हमने कहा था न प्यारे।" हरीश राणे निरंजन की छाती पर बैठा हुआ बोला___"कि तुमसे रिवाल्वर नहीं चलाया जाएगा। हमने तो ये भी कहा था कि हमें खत्म कर दो मगर नहीं तुम्हें तो हमसे मोहब्बत हो गई थी न। अब भुगतो मेरी जान। पीछे से वार करने वाला कायर बुज़दिल व हिंजड़ा होता है और ये सब बातें तुम में हैं, ये तुमने पहले ही साबित कर दिया था।"

अभी राणे ये सब निरंजन को बोल ही रहा था कि तभी वातावरण में वाहनों के आने का शोर गूॅजा। हरीश राणे ये महसूस करते ही बुरी तरह उछल पड़ा। उसने पलट कर देखा ही था कि निरंजन ने तेज़ी से एक मुक्का उसकी गर्दन के पास जड़ दिया। जिससे एक चीख़ के साथ राणे पलट कर नीचे गिर गया। उसके गिरते ही निरंजन उठा और सबसे पहले उसने राणे की पसली में बूट की ज़ोरदार ठोकर मारी। ठोकर लगते ही राणे दर्द से बिलबिला उठा।

इधर देखते ही देखते चारो तरफ से केशव जी ने तथा उनके आदमियों ने दोनो को घेर लिया। कुछ लोग दौड़ते हुए आए और हरीश राणे को पकड़ लिया। हरीश राणे समझ गया कि अब कुछ नहीं हो सकता। अतः उसने भी समझदारी का परिचय दिया और बिना कोई हील हुज्जत किये उनके द्वारा पकड़ कर ले जाने से चला गया। थोड़ी ही देर में वह केशव जी के आदमियों के बीच जीप में बैठा था। उसके दोनो हाॅथ पीछे की तरफ करके रस्सी से बाॅध दिये गए थे। उसका जो रिवाल्वर लड़ते वक्त निरंजन के हाॅथ से छूट कर गिर गया था उसे निरंजन ने फिर से उठा कर अपने पास रख लिया था। हरीश राणे को लिए वो काफिला वापस रेवती के लिए चल पड़ा था। केशव जी राणे को पकड़ कर बेहद खुश थे। उन्होंने निरंजन को इसके लिए शाबाशी दी तथा ये भी कहा कि उसने वास्तव में बहुत बड़ा काम किया है इस लिए उसे इसके लिए इनाम ज़रूर मिलेगा। निरंजन इनाम की बात से बेहद खुश हो गया था। इतना ही नहीं जासूस को पकड़वाने से उसका सिर गर्व से ऊॅचा हो गया था।
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उधर हास्पिटल में।
हम सब बुझे बुझे से बैठे थे। नीलम के लिए हर कोई चिंतित व परेशान था। हम में से किसी को भी ये उम्मीद नहीं थी कि अजय सिंह ऐसा कुछ कर सकता है। वरना ऐसा होता ही नहीं। ख़ैर, लम्बे इन्तज़ार के बाद आख़िर ओटी का दरवाजा खुला और डाॅक्टर बाहर आया। हम सब उसे देख कर एक साथ एक ही झटके से उस लम्बी चेयर से उठ कर खड़े हो गए थे। फिर लगभग एक साथ ही डाॅक्टर की तरफ लपके थे।

"डाॅक्टर साहब।" मैने उतावलेपन से किन्तु बेहद ही अधीर भाव से पूछा___"सब कुछ ठीक तो है न? नीलम ठीक तो है न?"
"डोन्ट वरी यंग मैन।" डाॅक्टर ने कहा___"वो अब ख़तरे से बाहर हैं। शुकर था कि बुलेट उनकी राइट साइड की पीठ पर थोड़ा निचले हिस्से पर लगी थी। अगर लेफ्ट साइड थोड़ा ऊपर लगती तो यकीनन वो गोली उनके दिल को भेद सकती थी। हमने बुलेट निकाल दिया है। अब वो ठीक हैं। थोड़ी देर बाद उन्हें दूसरे कमरे में शिफ्ट कर दिया जाएगा तो आप सब उनसे मिल सकेंगे।"

"ओह थैंक्यू डाॅक्टर।" आदित्य बोल पड़ा___"थैंक्यू सो मच। आपने बहुत बड़े संकट से बचा लिया।"
"थैक्यू तो आप लोगों का भी करना चाहिए।" डाॅक्टर ने कहा___"जो आप वक्त रहते उन्हें यहाॅ लाने में कामयाब हो गए। वरना सचमुच कुछ भी हो सकता था। मुझे फोन पर एसीपी साहब ने इस बारे में बता दिया था और कहा भी था कि जैसे ही आप लोग यहाॅ आए वैसे ही हम उनका तुरंत इलाज़ शुरू कर दें।"

थोड़ी देर डाॅक्टर से और बातचीत हुई उसके बाद वो चला गया। हम सब अब खुश थे कि नीलम अब ठीक है। थोड़ी ही देर में एक नर्स आई उसने बताया कि हम नीलम से मिल सकते हैं। अतः उसके कहने के साथ ही हम सब लगभग दौड़ते हुए नर्स के पीछे पीछे गए और उस कमरे में दाखिल हो गए जिसमें नीलम को शिफ्ट किया गया था।

कमरे में पहुॅचते ही हमने देखा कि हास्पिटल वाले बेड पर नीलम करवॅट के बल लेटी हुई थी। उसका चेहरा दरवाजे की तरफ ही था किन्तु ऑखें बंद थी। हम लोगों के आने की आहट पाते ही उसने अपनी ऑखें खोल दी। जैसे ही उसने हमे देखा उसके चेहरे पर एक साथ कई तरह के भाव आए और फिर सहसा उसके होठों पर फीकी सी मुस्कान फैल गई।

रितू दीदी व सोनम दीदी एक साथ ही उसकी तरफ बढ़ीं और उसके पास खड़ी हो गई। रितू दीदी ने नम ऑखों से उसके माथे से होते हुए सिर पर हाॅथ फेरा और फिर झुक कर उसके माॅथे को चूम लिया। उनके मुख से कोई लफ्ज़ नहीं निकला। कदाचित कुछ कहने की हिम्मत ही न हुई थी उनमें। किन्तु इस क्रिया से ही उन्होंने जता दिया कि उसके ठीक होने पर उन्हें कितनी खुशी हुई है। सोनम दीदी भी नम ऑखों से नीलम को देख रही थी।

"भगवान का लाख लाख शुकर है नील।" सोनम दीदी उसे प्यार से नील कहा करती हैं, बोलीं____"उसने तुझे कुछ नहीं होने दिया वरना जब तुझे गोली लगी थी न तो जैसे हम सबके जिस्मों से प्राण ही निकल गए थे।"

"ये ज़िंदगी उसी गंदे इंसान की दी हुई थी दीदी।" नीलम ने करुण भाव से कहा___"जिसे उसने गोली मार कर अपनी तरफ से अब खत्म कर दिया है। अब ये मेरा दूसरा जन्म है जिसमें अब उसका कोई हक़ नहीं है। बल्कि आप लोगों का है।" कहने के साथ ही नीलम ने रितू दीदी की तरफ देखा फिर बोली___"मुझे आप पर नाज़ है दीदी कि आपने राज का साथ दिया और सच्चाई का साथ दिया। आज आपकी ही वजह से हम सब उस शैतान से बच कर यहाॅ आ गए हैं।"

"साथ तो हमेशा उसी का देना चाहिए नीलम।" रितू दीदी ने कहा___"जिसका साथ देने से हमारे ज़मीर तथा हमारी आत्मा को तक़लीफ न हो बल्कि उन्हें तृप्ति का एहसास हो। माॅ बाप हमेशा वंदनीय होते हैं और वो मेरे लिए भी हमेशा रहेंगे किन्तु वो माॅ बाप जिनकी अच्छी छवि में मन में है ना कि वो जो अपनी ही बहू बेटियों के बारे में ग़लत सोचते हैं। थोड़ा बहुत जो सम्मान बाॅकी था उनके लिए वो आज की इन घटनाओं से पूरी तरह खत्म हो चुका है। अब इस दिल में उनके लिए सिर्फ और सिर्फ नफ़रत व घृणा है। आज अगर तुझे कुछ हो जाता न तो क़सम ऊपर वाले की मैं उस इंसान का वो हाल करती कि दुबारा इस धरती पर पैदा होने से इंकार कर देता।"

"जाने दीजिए दीदी।" नीलम ने कहने के साथ ही मेरी तरफ देखा, फिर मुस्कुरा कर बोली____"एक तरह से ये अच्छा ही हुआ। इसी बहाने सही मगर मुझे आज अपने इस भाई का अपने लिए इतना सारा प्यार व तड़प तो देखने को मिल गई। मैं महसूस कर रही थी उस वक्त जब मैं इसकी बाहों में असहाय सी पड़ी थी। मेरे कानों में इसकी हर बात सुनाई दे रही थी। मैं सोच रही थी कि एक मेरा वो भाई था जिसने कभी ये नहीं जताया कि वो अपनी बहनों से कितना प्यार करता है और एक ये भाई है जिसे हमने बचपन से जलील करके दुख दिया आज वो मुझे उस हालत में देख कर ऐसे तड़प रहा था जैसे गोली मुझे नहीं बल्कि इसको लगी थी। ये ख़याल बार बार मन में आता है कि इतना प्यार करने वाले भाई से हमने अब तक इतनी घृणा कैसे की थी?"

"ओये बंदरिया।" मैं एकदम से उसके पास आकर बोल पड़ा____"ये क्या बकवास किये जा रही है तू? तुझसे मैं कोई प्यार, व्यार नहीं करता समझी। उस वक्त तो मैं वो सब नाटक कर रहा था।"
"चल ठीक है भाई।" नीलम ने मुस्कुरा कर कहा___"मान लिया कि वो सब तेरा नाटक था मगर सच कहूॅ तो मुझे वो तेरा नाटक भी बहुत भाया राज। मैं चाहती हूॅ कि तू जीवन भर मेरे साथ ऐसा ही नाटक करता रहे।"

"अब तुम दोनो यहीं पर न शुरू हो जाना।" सहसा सोनम दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा___"जाओ जाकर पता करो डाॅक्टर से कि हम इसे यहाॅ से कब तक ले जा सकते हैं?"
"अरे इसकी क्या ज़रूरत है दीदी?" मैने मुस्कुरा कर कहा___"मैं तो कहता हूॅ कि इसे यहीं पर पड़ी रहने देना चाहिए और हम लोगों को अब घर चलना चाहिए।"

"तू न अब मुझसे पिटेगा सच में।" सोनम दीदी ने ऑखें दिखाते हुए कहा___"अब जा जल्दी यहाॅ से।"
"जो हुकुम आपका।" मैने अदब से सिर झुका कर कहा और फिर कमरे से बाहर चला आया। मेरे पीछे पीछे आदित्य भी मुस्कुराता हुआ चला आया।

"मेरे भाई को इस तरह भगा कर आपने अच्छा नहीं किया दीदी।" सहसा नीलम ने कहा___"जब वो मुझे इस तरह चिढ़ाता है तो मुझे भी बड़ा अच्छा लगता है। मैं भी उसके जैसा ही बर्ताव करने लगती हूॅ। मैं चाहती हूॅ कि जिन चीज़ों के लिए वो बचपन से तरसा था वो उन सभी चीज़ों को आज जी भर के जिए। हमारी वजह से अब तक जितना उसका दिल दुखा है अब वो हमारे साथ ऐसी ही नोंक झोंक करके अपने उस दिल को खुश रखे।"

"मुझे पता है नील।" सोनम दीदी ने कहा___"मुझे भी अच्छा लगता है जब वो तुझे इस तरह बंदरिया कह कर चिढ़ाने लगता है। किन्तु मैं उसे ये सब कह कर इस लिए रोंक देती हूॅ कि मुझे भी बड़े होने का इस तरह से फायदा उठाने में मज़ा आता है। मैं ये देख कर खुश हो जाती हूॅ कि कैसे वो अपने से बड़ों की बात सहजता से मान जाता है। अब रितू से ही पूछ ले, ये तो उसके साथ ही रहती है। संभव है कि ये भी मेरी तरह अपने बड़े होने का फायदा उठाती हो। क्यों रितू सच कहा न मैने?"

"सबकी सोच अलग अलग होती है सोनम।" रितू दीदी ने कहा___"तुम दोनो को ऐसा करके खुशी मिलती है जबकि मेरा कुछ और ही हिसाब है। तुम तो जानती ही हो कि मेरा स्वभाव कैसा है?"

"हाॅ जानती हूॅ।" सोनम दीदी ने कहा___"कि तेरा स्वभाव हिटलर वाला है। मगर कभी खुद को बदल कर भी देख। संभव है कि कुछ नया नज़र आये।"

सोनम दीदी की इस बात पर रितू दीदी मुस्कुराई और कुछ पल के लिए कहीं खो सी गईं फिर जैसे उन्होंने तुरंत ही खुद को सम्हाला और ये कह कर बाहर की तरफ चली गईं कि उसे कुछ ज़रूरी फोन काल करना है। रितू दीदी के जाने के बाद सोनम दीदी ने वापस नीलम की तरफ देखा।

"तो आपको भी राज के साथ ऐसा करने में मज़ा आता है?" नीलम ने मुस्कुराते हुए कहा।
"अरे नहीं रे।" सोनम दीदी ने अजीब भाव से कहा___"ऐसी कोई बात नहीं है। मैं तो ऐसे ही कह रही थी। ख़ैर छोंड़, अब तू ठीक है न? तुझे पीठ पर पेन तो नहीं हो रहा न अभी?"

"नहीं दीदी।" नीलम ने कहा___"अब अच्छा लग रहा है। बस सीधा लेटने में प्राब्लेम हो रही है।"
"वो तो होगी ही।" सोनम दीदी ने कहा__"अभी नया नया ज़ख्म है। इस लिए तुझे सीधा लेटने में कुछ दिन प्राब्लेम होगी। तुझे भी इस बात का ख़याल रखना होगा और हाॅ राज के साथ ज्यादा उछल कूद मत करने लगना। वरना तेरा ये ज़ख्म फिर से ताज़ा हो जाएगा।"

"ऐसा तो तभी संभव है दीदी।" नीलम ने मुस्कुराते हुए कहा___"जब वो मेरे सामने ही न आए। क्योंकि जैसे ही वो मेरे सामने आएगा। मैं फिर उसे छेंड़ूॅगी और फिर क्या होगा ये तो आप जानती ही हैं।"

"तू नहीं सुधरने वाली।" सोनम दीदी ने हैरानी से देखते हुए कहा___"अरे पागल कुछ दिन तो सबर कर ले।"
"हाय दीदी! कुछ दिन राज से झगड़ा किये बिना कैसे रह पाऊॅगी मैं?" नीलम ने आह सी भरते हुए कहा___"पता नहीं क्यों पर उससे झगड़ा करने का हर पल दिल करता है मेरा। मैं अकेले में सोचा करती हूॅ कि हर वक्त राज को छेंड़ना क्या अच्छी बात है? मगर ये सब सोचने के बावजूद ऐसा हो जाता है। आप ही बताइये मैं क्या करूॅ दीदी?"

सोनम दीदी नीलम की बात सुन कर बस मुस्कुरा कर रह गई। उसके चेहरे पर कई तरह के भाव आए और चले गए। जबकि उसकी मनोदशा से अंजान नीलम ने इस बार ज़रा गंभीरता से कहा___"एक बात कहूॅ दीदी??"

"हम्म कहो।" सोनम दीदी ने धीरे से कहा।
"काश! राज मेरा भाई न होता।" नीलम ने धड़कते हुए दिल के साथ कहा।
"ये...ये क्या कह रही हो तुम??" सोनम दीदी उसकी इस बात पर बुरी तरह चौंकी। ऑखों में हैरत के चिन्ह लिए वो बोलीं___"इसके पहले तो कह रही थी कि राज जैसा भाई पा कर तू बहुत खुश है। फिर अब ऐसा क्यों कह रही है?"

"हर लड़की सोचती है कि उसे ऐसा जीवन साथी मिले जो उससे बहुत ही ज्यादा प्यार करे।" नीलम ने कहीं खोये हुए से कहा___"उसकी केयर करे तथा उसे एक पल के लिए भी खुद से दूर न करे। उसे कभी किसी बात पर दुखी न होने दे। ये सारी खूबियाॅ राज में हैं दीदी। मुझे पता है कि वो अपनी बहनों पर अपनी जान छिड़कता है। मगर उसे देख कर ये ख़याल भी मन में आता है कि काश राज के जैसा ही हमें जीवन साथी मिले। मगर आज के समय में ये संभव नहीं है और अगर मान भी लें कि ऐसे इंसान इस दुनियाॅ में मिल भी सकते हैं तो क्या उनमें से कोई हमारा जीवन साथी बनेगा?"

"तो तू कहना क्या चाहती है?" सोनम दीदी के चेहरे पर सशंक भाव उभरे।
"आपको मेरी बातें यकीनन बुरी अथवा ग़लत लगेंगी दीदी।" नीलम ने उसी गंभीरता से कहा___"मगर ये सच है कि मेरे मन में कभी कभी ये ख़याल आता है कि काश राज मेरा भाई न होता तो मैं उसे ही अपना जीवन साथी बना लेती। राज को देखते ही उस पर निसार हो जाने का दिल करता है दीदी। उसे देख कर मैं भूल जाती हूॅ कि वो मेरा भाई है, और फिर जब ख़याल आता है कि वो मेरा भाई है तो जाने क्यों इस बात से दिल में दर्द होने लगता है? अंदर से एक टीस उभरती है और फिर समूचा जिस्म काॅप कर रह जाता है।"

"तू न कुछ भी बोलती रहती है।" सोनम दीदी ने बुरा सा मुह बनाया। ये अलग बात है कि नीलम की इन बातों से उसके अंदर एक अजीब से एहसास की झुरझरी सी दौड़ गई थी, बोली___"चल अब ज्यादा इस बारे में मत सोच। राज आता ही होगा अभी। तुझे यहाॅ से लेकर भी तो चलना है न।"

"आप मेरी बातों को नज़रअंदाज़ कर रही हैं न?" नीलम ने सोनम दीदी के चेहरे को ग़ौर से देखते हुए कहा___"ऐसा मत कीजिए न दीदी। एक आप ही हैं जिनसे मैं अपने दिल की हर बात कर सकती हूॅ। इस लिए मेरी बात सुन लीजिए और उस पर अपनी राय भी दीजिए कि मैं जो कुछ कह रही हूॅ वो सही है या ग़लत?"

"क्या राय दूॅ मैं?" सोनम दीदी ने नीलम की ऑखों में झाॅकते हुए कहा___"तूने तो सब कुछ कह कर ये ज़ाहिर कर ही दिया है कि तेरे मन में राज के प्रति अब क्या है? अब अगर मैं इस पर ये कहूॅ कि ये सब सोचना भी ग़लत है तो क्या फर्क़ पड़ता है उससे? इतना तो मैं समझ ही सकती हूॅ कि अगर राज के प्रति तेरे मन में ऐसे ख़याल आ चुके हैं तो इसका साफ मतलब है कि कहीं न कहीं तेरे दिल में राज के प्रति भाई वाली फीलिंग के अलावा भी एक अलग फीलिंग्स आ चुकी है। अतः ऐसी फीलिंग्स जब एक बार किसी के दिल में आ जाती हैं तो फिर उसकी सोच भी बदल जाती है। वो उसे ही सही मानता है फिर चाहे भले ही वो सबसे ज्यादा अनैतिक अथवा ग़लत हो।"

"मुझे पता है दीदी।" नीलम की ऑखें एकाएक ही सजल हो उठीं, बोली___"राज के प्रति ऐसी फीलिंग्स रखना ग़लत बात है। मगर ये भी सच है कि अब ये फीलिंग्स मेरे दिल से आसानी से जाएगी नहीं। इस लिए मैने अब एक फैंसला किया है।"

"फ..फैंसला???" सोनम दीदी चौंकी___"कैसा फैंसला?"
"यही कि मैं राज के क़रीब नहीं रहूॅगी।" नीलम ने दृढ़ता से कहा___"बल्कि उससे दूर चली जाऊॅगी। इस लड़ाई के बाद ये सच है कि मेरे माॅ बाप व भाई या तो ज़िन्दगी भर जेल की सलाखों के पीछे कैद हो कर रह जाएॅगे या फिर ऐसे भी हालात बन सकते हैं कि वो सब जान से मारे जाएॅ। तब तो हम दोनो बहनें अनाथ ही हो जाएॅगी। हलाॅकि इसके बाद भी मेरे अपनों में गौरी चाची, अभय चाचा और करुणा चाची आदि सब भी होंगे मगर इनके पास रहने से अक्सर मेरा सामना राज से होता ही रहेगा। उस सूरत में मेरे मन में ना चाहते हुए भी उसके प्रति आकर्शण बढ़ेगा जिसे शायद मैं रोंक भी नहीं पाऊॅगी। इस लिए बेहतर है कि इस सबके बाद मैं आपके साथ मुम्बई में मौसी के पास ही रहूॅ। राज से दूर रहने से कम से कम ये तो होगा कि धीरे धीरे मैं अपने दिल से उसे निकाल पाने में सफल हो सकती हूॅ।"

"इसका मतलब।" सोनम दीदी ने कहा___"ये सच है कि तू अपने ही भाई राज को अब एक प्रेमी की दृष्टि से देखने लगी है और उसके प्रति तेरे अंदर चाहत की भावना प्रतिपल बढ़ती ही जा रही है?"

"शायद यही सच है दीदी।" नीलम ने सहसा आहत भाव से कहा___"राज ने मेरी इज्ज़त की रक्षा जिस तरह से की थी उसके बाद से ही मुझे ये महसूस हुआ था कि राज के बारे में अब तक जो कुछ मैं अपने माॅम डैड के द्वारा पढ़ाए गए पाठ के तहत सोचती थी वो सब सिरे से ही ग़लत था। मेरे अंदर इस बात के एहसास होने के साथ ही राज के प्रति कोमल भावनाओं का उदय हुआ था। उसके बाद मुझे नहीं पता कि मैं उसके बारे में सोचते सोचते कब उसे चाहने लगी? जब उसने अचानक ही काॅलेज आना बंद कर दिया था तब मैं यही सोच कर रोती थी कि वो आज के समय में मुझसे कितनी नफ़रत करने लगा है कि अब उसने मेरी वजह से काॅलेज आना भी बंद कर दिया। ये सब सोच सोच कर मुझे अपने आप से घृणा होने लगी थी कि मैने अपने उस भाई का बचपन से दिल दुखाया जिसका कभी कोई दोष था ही नहीं। बल्कि उसके दिल में तो हम दोनों बहनों के लिए वैसा ही प्यार व सम्मान था जैसा उसके दिल में गुड़िया(निधी) के लिए है। उसके बाद जब वो दुबारा मेरी इज्ज़त की रक्षा करते हुए मुझे ट्रेन पर मिला तो एक बार फिर से मेरा अंतर्मन ये सोच कर ज़ार ज़ार रो पड़ा कि उसने एक बार फिर से मेरी इज्ज़त की रक्षा की। यानी उसके दिल में आज भी हम दोनो बहनों के लिए वही प्यार व सम्मान है और चाहता है कि हम दोनों को कभी कोई ऑच तक न आए। बस उसके बाद तो जैसे सब कुछ बदल गया दीदी। जब मैने ये महसूस किया कि वो मुझसे झगड़ा करते हुए फिर से अपने बचपन को जीना चाहता है तो मैंने भी उसकी चाहत में उसका पूरा साथ दिया। मुझे भी उसे खुश देखने में अच्छा लगने लगा। इन्हीं सब बातों के बीच ही शायद ऐसा हुआ है कि मेरे दिल में उसकी अच्छाई और खूबियों को देख कर ऐसी चाहत जागी है। आज जब उसने मुझे अपनी बाहों में समेटे तथा मुझे उस हालत में देख कर पागल हुआ जा रहा था तो मैं उस हालत में भी ये सोच रही थी कि ये इतना अच्छा कैसे हो सकता है? इससे कोई नफ़रत कैसे कर सकता है? बस उसके बाद मैंने पहली बार अपने दिल की आवाज़ को सुना और फिर उसकी हो गई। मुझे पता है कि ये ग़लत है। अगर राज को मेरे दिल की बात पता चल गई तो संभव है कि वो मुझे ग़लत समझ बैठे। वो सोचेगा कि जैसे माॅ बाप थे वैसी ही उसकी औलाद भी है। जो अपने ही सगे रिश्तों के प्रति ऐसी सोच रखती है।"

"अगर यही सब बात है।" सोनम दीदी ने कहा___"और अगर ये भी कि तुम उसकी हो गई हो तो फिर ये अचानक उससे दूर हो जाने का फैंसला क्यों किया तुमने? क्या सिर्फ इस लिए कि राज तुझे ग़लत समझेगा?"

"ये वजह तो है ही दीदी।" नीलम ने सहसा कुछ सोचते हुए कहा___"किन्तु एक दूसरी महत्वपूर्ण वजह और भी है।"
"दूसरी ऐसी कौन सी वजह हो सकती है?" सोनम दीदी के चेहरे पर सोचों के भाव नुमायां हुए।

"आपने शायद ग़ौर नहीं किया दीदी।" नीलम ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"किन्तु मैने बहुत अच्छे से ग़ौर किया है।"
"क्या मतलब??" सोनम दीदी चकरा सी गईं।
"आप और मैं।" नीलम ने कहा___"जिस रितू दीदी को हिटलर समझते हैं, उन्हीं हिटलर दीदी की ऑखों में आज मुझे उस वक्त थोड़ी देर के लिए कुछ खास नज़र आया जब आपने उनसे कहा था कि____'कभी खुद को बदल कर भी देख। संभव है कि कुछ नया नज़र आये।' उस वक्त उनकी ऑखों में पल भर के लिए एक टीस सी नज़र आई थी फिर उन्होंने जल्दी ही खुद को सम्हाल लिया था। कहते हैं कि चोंट के दर्द का एहसास वही कर सकता है जिसे कभी वैसी ह चोंट लगी हो। उस वक्त उनकी ऑखों में जो भाव थे उन भावों ने मुझे बता दिया कि वो दरअसल क्या है?"

"ये तू क्या अनाप शनाप बके जा रही है नील?" सोनम दीदी ने हैरत से कहा___"कहीं तू ये तो नहीं कहना चाहती है कि रितू भी राज से प्यार करती है? ओह माई गाड, ऐसा कैसे हो सकता है? नहीं नहीं...रितू ऐसा नहीं कर सकती नील। वो एक सुलझी हुई तथा समझदार लड़की है। उसे पता है कि ऐसा सोचना भी पाप होता है।"

"प्यार तो हर मायने में पवित्र ही होता है दीदी।" नीलम ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"फिर चाहे वो किसी से भी हो गया हो। दूसरी बात, जब किसी को किसी से प्यार हो जाता है न तब सबसे पहले उस इंसान का विवेक शून्य हो जाता है। प्यार में पड़ा हुआ इंसान उसी को सही मानता है जिसे आम इंसान अनैतिक व पाप की संज्ञा देता है। मैने रितू दीदी की ऑखों में उस पवित्र प्यार को देखा है दीदी। मुझे नहीं पता कि ये सब कैसे संभव हो सकता है? मगर ऑखें कभी ग़लत नहीं होती हैं। ख़ैर मुझे इससे कोई प्राब्लेम नहीं है बल्कि मैं खुश हूॅ कि मेरी जो दीदी लड़कों की ज़ात से नफ़रत करती थी तथा प्यार व्यार को बकवास कहती थीं आज वो खुद राज की चाहत में गिरफ्तार हैं। यकीनन उनकी सोच बदल गई होगी और अब उनके सीने में एक ऐसा दिल धड़कता होगा जो बहुत ही नाज़ुक हो चुका होगा तथा जिसमें किसी के लिए बेपनाह प्यार का सागर हिलोरें लेता होगा। अब जबकि मुझे इस बात का एहसास हो ही चुका है तो क्यों मैं उनकी राह का रोड़ा बनूॅ दीदी? मेरी दीदी के दिल में जीवन में पहली बार किसी के लिए ऐसी भावनाओं का उदय हुआ है। मैने देखा है कि वो सबसे हट कर रहती थी। उनका स्वभाव बहुत शख्त होता था। प्यार की भाषा से बात करना जैसे उन्हें आता ही नहीं था। मैं और शिवा उनसे बहुत डरते थे। यहाॅ तक कि डैड भी उनसे ज्यादा हॅसी मज़ाक नहीं करते थे। अतः अपनी उस दीदी को खूबसूरत प्यार के एहसास के साथ इस खूबसूरती से बदलता देख कर मैं कैसे उनकी खुशियाॅ छीनने का काम कर दूॅगी? नहीं दीदी, मैं अपनी दीदी की उम्मीदों को चकनाचूर नहीं कर सकती। उनकी पाक़ भावनाओं को नहीं कुचल सकती मैं। वरना वो यकीनन इस सबसे टूट कर बिखर जाएॅगी। इस लिए मैने फैंसला कर लिया है कि मैं इस सबके बाद वापस आपके साथ मुम्बई चली जाऊॅगी।"

"तू इतनी गहरी बातें कर सकती है यकीन नहीं होता नील।" सोनम दीदी की आवाज़ भर्रा गई___"तेरा इतना बड़ा दिल होगा मैने सोचा भी नहीं था। अपनी दीदी के लिए इतना बड़ा त्याग करना कोई मामूली बात नहीं है। इसके पहले मैं तेरी बातों से सचमुच तुझे ग़लत समझ बैठी थी किन्तु आख़िर की तेरी इस बात ने मुझे ये एहसास करा दिया कि ये प्यार भले ही अपने भाई से हो गया हो मगर इसमें कोई गंदगी तथा कोई पाप नहीं है।"

अभी सोनम दीदी ने ये कहा ही था कि तभी कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई और फिर मैं आदित्य के साथ अंदर आ गया। आते ही मैने अपने अंदाज़ में सबसे पहले नीलम को छेंड़ा जिस पर वह बस मुस्कुरा कर रह गई। उसके बाद मैंने उसे कहा कि डाॅक्टर ने कहा है कि हम तुम्हें ले जा सकते हैं। अतः अब चलो यहाॅ से। ख़ैर थोड़ी ही देर में मैं नीलम को लिए हास्पिटल से बाहर आया और कार की पिछली सीट पर उसे वैसे ही लेकर बैठ गया जैसे आते समय लेकर बैठा था। सोनम दीदी भी मेरे दूसरी साइड बैठ गईं। आदित्य कार की ड्राइविंग सीट पर बैठा ही था कि रितू दीदी भी आ गईं। रितू दीदी के बैठते ही आदित्य ने कार को आगे बढ़ा दिया।

लगभग पंद्रह मिनट में ही हम रेवती में शेखर के घर के सामने पहुॅच गए। हम सब कार से बाहर आये। नीलम ने कहा कि वो अब ठीक है और खुद अपने पैरों पर चल सकती है। अतः मैने उसे सहारा देकर कार से बाहर ले आया। उसके बाद हम सब घर के अंदर आ गए। अंदर ड्राइंगरूम में नैना बुआ तथा बिंदिया काकी थी। नैना बुआ ने जैसे ही हम सबको देखा वो भाग कर आईं और नीलम को अपने गले से लगाया ही था कि नीलम के मुख से कराह निकल गई। दरअसल नैना बुआ ने नीलम की पीठ के उस हिस्से पर अपनी बाॅह का कसाव कर दिया था गलती से, जहाॅ पर उसे गोली लगी थी।

नीलम की कराह सुन कर नैना बुआ जल्दी से नीलम से अलग हुईं और फिर उससे माफ़ी माॅगने लगीं। उनकी ऑखों में ढेर सारे ऑसू थे। कदाचित केशव जी यहाॅ आए थे और उन्होंने बुआ को सब कुछ बता दिया था। यही वजह थी कि नैना बुआ नीलम को देख कर भागते हुए आईं थी। ख़ैर, उसके बाद मैं सोनम के साथ नीलम को सहारा देते हुए उसे उसके रूम में ले आया और बेड पर करवॅट के बल आहिस्ता से लेटा दिया। मेरे पीछे पीछे ही बाॅकी सब आ गए थे। बिंदिया काकी की भी ऑखों में ऑसू थे। रितू दीदी थोड़ी पीछे खड़ी हुई थीं, उनकी ऑखें हल्का सुर्ख नज़र आ रही थीं। ऐसा लगता था जैसे वो रोई हों। मैं उन्हें देख कर चौंका और ऑखों के इशारे से ही पूछा कि क्या हुआ आपको? जवाब में उन्होंने सिर हिला कर बताया कि कुछ नहीं बस ऐसे ही।

इधर नैना बुआ नीलम के पास ही बेड पर बैठ गईं थी और उससे थोड़ी बहुत बातें कर रही थी। साथ ही अपने भाई को बुरा भला भी कहे जा रही थी। मैं कुछ देर तक रूम में रहा और फिर आदित्य के साथ ही बाहर आ गया।
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उधर मंत्री दिवाकर चौधरी के आवास पर।
अजय सिंह इस वक्त उसके पास ही सामने वाले सोफे पर बैठा था। अभी कुछ ही देर पहले चौधरी उसे अपने सोर्स से तथा अपने वकील को लेकर ज़मानत पर छुड़ा कर लाया था। गुनगुन में नया नया आया एसीपी उसे काफी शख्त मिजाज़ लगा था। किन्तु चौधरी का तो ये इलाका ही था अतः वो खुद भी किसी से डरने वाला नहीं था। कहने का मतलब ये कि बड़ी आसानी से वो अजय सिंह को छुड़ा लाया था। इस वक्त अजय सिंह अपना मुह लटकाए बैठा हुआ था। ड्राइंग रूम में इस वक्त वो दोनो ही थे।

"इतनी शातिर दिमाग़ वाली बीवी के रहते हुए भी तुम इतनी बुरी तरह से मात खा गए ठाकुर।" सहसा चौधरी ने अजय सिंह की तरफ देखते हुए कहा___"हैरत की बात है। अच्छा होता कि तुम हमें इस मामले में पहले से बताए होते तो हम इसमें ज़रूर तुम्हारी मदद करते। हमारे दखल पर यहाॅ की पुलिस में इतनी हिम्मत ही नहीं होती कि वहाॅ जा कर तुम सबको गिरफ्तार कर लेती। हम बड़ी आसानी से तुम्हारे उस भतीजे को और तुम्हारी दोनो बेटियों को पकड़ लेते। उसके बाद तो उनका खेल खत्म ही हो जाना था।"

"डबल बैकअप का प्लान भी अपनी जगह कमज़ोर नहीं था चौधरी साहब।" अजय सिंह ने गंभीरता से कहा___"हमने उन सबको लगभग पकड़ ही लिया था। मगर हमारी उम्मीद से परे वहाॅ भारी संख्या में पुलिस फोर्स आ गई और सबकुछ हमारे हाथ से निकल गया।"

"इसमें यकीनन तुम्हारी ग़लती है ठाकुर।" चौधरी ने पुरज़ोर लहजे में कहा___"तुम्हें और तुम्हारी पत्नी को इस बात पर भी ग़ौर करना चाहिए था कि तुम्हारी बेटी, तुम्हारी बेटी होने के साथ साथ एक पुलिस वाली भी है जो ऐसे हालात पर अपने डिपार्टमेंट से पुलिस फोर्स को भी बुलवा सकती है। उस सूरत में तुम्हें हमसे संपर्क करना चाहिए था। हम इस समस्या का तुरंत समाधान करते। हम मंत्रियों के पास ऐसे हालात में पुलिस फोर्स को मनचाही जगह पर ले जाने का बहुत आसान तरीका आता है। कहने का मतलब ये कि हम आनन फानन में किसी जगह का दौरा करते जहाॅ पर भारी मात्रा में हम पुलिस को अपने पास बुला लेते। पुलिस डिपार्टमेंट को इतना जल्दी इतनी पुलिस फोर्स वहाॅ पर भेजने के लिए सोचना पड़ जाता।"

"मैं मानता हूॅ चौधरी साहब।" अजय सिंह ने नज़रें चुराते हुए कहा___"कि मैने आपको इस बारे में न बता कर भारी ग़लती की है। वरना आज ऐसा नहीं होता। मगर इसमें भी मेरी आपके लिए एक पाक़ भावना ही थी। मैं चाहता था कि ये सब होने के बाद मैं आपके सामने आपके उन दुश्मनों को लाकर आपको सर्प्राइज दूॅगा और यही मेरी दोस्ती व वफ़ादारी का प्रमाण भी होता। मगर अफसोस ऐसा नहीं कर पाया मैं। इसके लिए आप मुझे माफ़ कर दीजिए मंत्री जी। आपने मुझे अपना समझ कर जेल से भी छुड़ा लिया। इसके लिए मैं जीवन भर आपका आभारी और ऋणी रहूॅगा।"

"कोई बात नहीं ठाकुर।" चौधरी ने कहा___"जीवन में हार जीत का खेल तो चलता ही रहता है। इस लिए इसमें ज्यादा चिंता करने की कोई बात नहीं है। इस सबके बाद भी हम उन लोगों को बहुत जल्द पकड़ लेंगे। क्योंकि हमने इस सबके लिए एक जासूस को लगाया हुआ है। आज उसी ने बताया था कि माधोपुर में क्या हो रहा था? उस समय के हालात के अनुसार हमें लगा कि तुम यकीनन उनको पकड़ लोगे और फिर उन्हें हमारे सामने ले आओगे। इसी लिए हमने भी कोई ऐक्शन नहीं लिया। बाद में उस जासूस ने बताया कि वहाॅ पर भारी मात्रा में पुलिस फोर्स आई और तुम सबको पकड़ कर ले भी गई तो हमने सोचा चलो कोई बात नहीं तुम्हें तो हम जेल से छुड़ा ही लेंगे। किन्तु हमने जासूस को ये भी कहा कि ठाकुर की बेटी को गोली लगी है तो वो लोग उसका इलाज कराने हास्पिटल ज़रूर जाएॅगे। उसके बाद वो उस जगह जाएॅगे जहाॅ पर उन लोगों ने अपना ठिकाना बनाया हुआ है। बस उसके ठिकाने का पता चलते ही हम उसे उसके ही ठिकाने पर घेर लेंगे। हम चाहते तो उन लोगों को हास्पिटल में भी घेर सकते थे किन्तु हमने ऐसा नहीं किया। क्योंकि हमें सबसे पहले अपने बच्चों को तलाशना था और ये तभी हो सकता था जब वो लोग हास्पिटल के बाद अपने ठिकाने पर जाते। हमने उस जासूस को इसी का पता लगाने के लिए लगा रखा है। वो हमें बहुत जल्द सूचित करेगा कि उन लोगों का ठिकाना कहाॅ है। उसके बाद हम अपने आदमी लेकर जाएॅगे और उसके ठिकाने पर धावा बोल देंगे।"

"ये तो बहुत ही अच्छा किया है आपने।" अजय सिंह के चेहरे पर एकाएक ही रौनक आ गई___"इसका मतलब ये हुआ कि हम पूरी तरह से हारे नहीं हैं। बल्कि बाज़ी अभी भी हमारे हाॅथ में हैं।"

"बिलकुल।" चौधरी ने मुस्कुरा कर कहा___"बस जासूस के फोन आने की देर है। जैसे ही उसका फोन आया और उसने हमें बताया वैसे ही हम यहाॅ से चल पड़ेंगे।"
"वाह चौधरी साहब।" अजय सिंह के चेहरे पर खुशी की चमक आ गई___"मानना पड़ेगा आपको। आपने भी ऐसा कारनामा कर रखा है जिसके बारे में वो लोग सोच भी नहीं सकते हैं।"

अजय सिंह की बात पर चौधरी बस मुस्कुरा कर रह गया। कुछ देर उन दोनो के बीच और भी कुछ बातें हुईं उसके बाद अजय सिंह चौधरी से इजाज़त लेकर उसके आवास से अपने गाॅव हल्दीपुर के लिए निकल लिया। चौधरी ने उसे जाने के लिए अपनी एक जीप दे दी थी।
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दोस्तो, आप सबके सामने अपडेट हाज़िर है। आशा करता हूॅ कि आप सबको पसंद आएगा।

आप सबकी प्रतिक्रिया और आपके रिव्यू का इन्तज़ार रहेगा।
 
एकनयासंसार
अपडेट........《 59 》

अब तक,,,,,,,,
"ये तो बहुत ही अच्छा किया है आपने।" अजय सिंह के चेहरे पर एकाएक ही रौनक आ गई___"इसका मतलब ये हुआ कि हम पूरी तरह से हारे नहीं हैं। बल्कि बाज़ी अभी भी हमारे हाॅथ में हैं।"

"बिलकुल।" चौधरी ने मुस्कुरा कर कहा___"बस जासूस के फोन आने की देर है। जैसे ही उसका फोन आया और उसने हमें बताया वैसे ही हम यहाॅ से चल पड़ेंगे।"
"वाह चौधरी साहब।" अजय सिंह के चेहरे पर खुशी की चमक आ गई___"मानना पड़ेगा आपको। आपने भी ऐसा कारनामा कर रखा है जिसके बारे में वो लोग सोच भी नहीं सकते हैं।"

अजय सिंह की बात पर चौधरी बस मुस्कुरा कर रह गया। कुछ देर उन दोनो के बीच और भी कुछ बातें हुईं उसके बाद अजय सिंह चौधरी से इजाज़त लेकर उसके आवास से अपने गाॅव हल्दीपुर के लिए निकल लिया। चौधरी ने उसे जाने के लिए अपनी एक जीप दे दी थी।
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अब आगे,,,,,,,

आदित्य के साथ जब मैं नीचे आया तो देखा ड्राइंग रूम में केशव जी बैठे थे। हम दोनो को देखते ही उनके होठों पर मुस्कान उभर आई। उसके बाद उन्होंने मुझसे नीलम के बारे में पूछा तथा ये भी कहा कि वो खुद उसे देखना चाहते हैं। अतः मैं उन्हें अपने साथ ऊपर नीलम के कमरे में ले गया। कमरे में पहुॅच कर उन्होंने सबके सामने ही नीलम को देखा और फिर बड़े प्यार से उससे उसकी तबीयत का पूछा। उनके पूछने पर नीलम ने भी बड़ी शालीनता से अपनी तबीयत के बारे में उन्हें बता दिया। उसके बाद वो कमरे से बाहर आ गए और मेरे साथ ही नीचे आ गए। नीचे आकर मैं आदित्य के साथ बैठा ही था कि रितू दीदी भी आ गईं।

"उस जासूस का क्या हुआ मौसा जी?" नीचे आते ही रितू दीदी ने केशव जी की तरफ देखते हुए भावहीन स्वर में पूछा___"क्या आप उसे पकड़ने में कामयाब हुए?"
"हमारी किस्मत बहुत अच्छी थी रितू बेटा।" केशव जी ने कहा___"जिसके तहत वो हमारे हाॅथ लग गया। मेरा वो आदमी जिसने हमें उसके बारे में फोन पर बताया था उसका नाम निरंजन वर्मा है। उसने बड़ी बहादुरी का काम किया है। उसने मुझे बताया कि अगर उस जासूस की बाइक के अगले पहिये की हवा न निकली होती तो वो हमारे हाथ न लगता।"

"ये आप क्या कह रहे हैं मौसा जी?" रितू दीदी के साथ साथ हम सब भी हैरान हो गए, फिर दीदी ने कहा___"उस जासूस की बाइक की वजह से वो हमारे हाॅथ लगा है?"

रितू की इस बात पर केशव जी ने निरंजन और उस जासूस की सारी राम कहानी बताई। सारी बात सुनने के बाद हम तीनों ही चकित रह गए थे। कुछ देर तक कोई कुछ न बोला।

"ये तो बड़े ही आश्चर्य की बात है मौसा जी।" मैने सोचने वाले भाव से कहा___"उस जासूस की बाइक के अगले पहिए में हवा नहीं थी इस लिए वो उतने समय तक वहाॅ रुका रहा। आपका वो आदमी भी वाकई में बड़ा काम का साबित हुआ। उसने उस जासूस को पकड़ने में अपनी जान तक दाॅव पर लगा दी। वरना अगर वो जासूस हाॅथ से निकल जाता तो यकीनन हमारे लिए बहुत बड़ा संकट हो सकता था।"

"बेशक।" केशव जी ने कहा___"अगर उसके बारे में हमें पता न चलता तो वो हमारा पीछा करता ही रहता और फिर जब उसे तुम लोगों के इस ठिकाने का पता चल जाता तो वह तुरंत ही मंत्री को सब कुछ बता देता। उसके बाद मंत्री क्या करता इसका तुम बखूबी अंदाज़ा लगा सकते हो।"

"अब इस मंत्री का खेल खत्म करना ही पड़ेगा।" सहसा रितू दीदी ने कठोर भाव से कहा___"मेरी चेतावनी के बावजूद इसने इतना बड़ा दुस्साहस किया और हमारे पीछे किसी जासूस को भी लगाया। अब तो इसका किस्सा खत्म करना ही पड़ेगा। बहुत हो गया अब।"

"मेरा भी यही ख़याल है दीदी।" मैने कहा___"कम से कम इससे इसकी तरफ से तो हम बेफिक्र हो जाएॅगे और फिर खुल कर तथा बेझिझक बड़े पापा से मुकाबला कर सकेंगे।"

"सही कहा तूने।" रितू दीदी ने कहा___"किन्तु उससे पहले हमें उस जासूस से मिलना भी होगा। उसे हम ऐसे ही नहीं छोंड़ सकते हैं। उसका भी कोई न कोई इंतजाम करना पड़ेगा हमें।"

"मेरे ख़याल से उसे हम तब तक अपने पास रखते हैं जब तक कि मंत्री का किस्सा खत्म नहीं हो जाता।" सहसा आदित्य कह उठा___"उसके बाद हम उसे छोंड़ सकते हैं। जब मंत्री ही नहीं रहेगा तो वो किसके लिए हमारे पीछे लग कर जासूसी करेगा?"

"आदी की बात एकदम करेक्ट है दीदी।" मैने कहा__"ऐसा ही करना चाहिए हमें।"
"आपका क्या कहना है मौसा जी?" रितू दीदी ने सहसा केशव की तरफ देखते हुए कहा___"ये तो सच है कि हम उस जासूस को मौजूदा हालात में छोंड़ नहीं सकते हैं और ना ही उसे जान से मारने का सोच सकते हैं। क्योंकि वो निर्दोष है। उसने वही किया है जो एक जासूस को करना चाहिए था। ये उसका पेशा ही है, अतः आप भी अपनी राय दीजिए कि क्या किया जाए?"

"देखो मैं तो एक ही बात जानता हूॅ बेटा।" केशव जी ने कहा___"कि ऐसे हर उस आदमी को खत्म कर दो जिससे हमें किसी प्रकार के ख़तरे का अंदेशा हो। किन्तु मामला चूॅकि एक जासूस का है इस लिए उसे खत्म करना ग़लत होगा। अतः मैं भी आदित्य की बात से सहमत हूॅ। यानी कि उसे तब तक यहाॅ कैद करके रखा जाय जब तक कि मंत्री का कल्याण नहीं हो जाता। मगर,

"मगर क्या मौसा जी?" रितू दीदी के माथे पर शिकन उभरी।
"मगर मुझे एक बात समझ नहीं आई।" केशव जी ने सोचने वाले अंदाज़ में कहा___"और वो ये कि जब मंत्री के खिलाफ़ तुम्हारे पास ऐसा डायनामाइट जैसा सबूत है तो उसे अब तक छोंड़ क्यों रखा था तुमने? जबकि होना तो यही चाहिए था कि उसे तुरंत ही कानून की चपेट में ले लिया
जाता।"

"आपका सोचना बिलकुल सही है मौसा जी।" रितू दीदी ने कहा___"किन्तु मंत्री को अब तक छोंड़े रखने के दो कारण थे। पहला ये कि उसे एहसास कराना था कि जब उसके खुद के बच्चों के साथ बहुत बुरा होता है तब कैसा महसूस होता है? दूसरा कारण ये कि उसके संबंध ऐसे ऐसे लोगों से हैं जिनकी पूर्ण जानकारी हमारे पास अभी भी नहीं है। ये तो लगभग सब जानते हैं कि वो कैसे कैसे ग़ैर कानूनी धंधा करता है किन्तु पुलिस के पास उसके खिलाफ़ ऐसे कोई सबूत नहीं हैं जिसकी वजह से उसे गिरफ्तार किया जा सके। मेरे पास भी उन वीडियोज के अलावा और कुछ नहीं है। मैं चाहती थी कि ये वाला मामला निपट जाने के बाद मंत्री के खिलाफ मौजूद उन सबूतों का पता करूॅगी। यही वजह थी कि मंत्री के मैटर को इतना लम्बा खींचना पड़ा। किन्तु अब ऐसा लगता है कि मंत्री को सबक सिखाना ही पड़ेगा। उसके सामने खुल कर जाना ही पड़ेगा और फिर उसकी ऑखों में ऑखें डाल कर उसे बताना पड़ेगा कि वो हमारा कुछ नहीं कर सकता है जबकि हम चाहें तो उसका कुछ भी कर सकते हैं।"

"ओह आई सी।" केशव जी ने कहा___"तो ये बात है। ठीक है फिर, जैसा तुम्हें बेहतर लगे वैसा करो। किन्तु हाॅ उससे पहले चलो उस जासूस से भी तो मिल लो तुम लोग। संभव है कि उससे भी कोई महत्वपूर्ण जानकारी मिल जाए।"

केशव जी की इस बात से हम सब सोफों से उठ कर खड़े हो गए और फिर केशव जी के साथ ही बाहर की तरफ चले गए। बाहर आकर हम सब केशव जी की कार में बैठ गए। आदित्य केशव जी के बगल में आगे की सीट पर बैठ गया था जबकि मैं और रितू दीदी पिछली सीट पर बैठ गए थे। हम सबके बैठते ही केशव जी ने कार को आगे बढ़ा दिया।

लगभग पाॅच मिनट बाद ही केशव जी ने कार को एक मकान के पास ले जाकर रोंका। कार के रुकते ही हम सब कार से बाहर आ गए। हम सबकी नज़र उस मकान पर पड़ी जिसके सामने के पोर्च पर एक लकड़ी का तखत रखा हुआ था और उसमे चार साॅवले रंग के आदमी बैठ कर ताश खेल रहे थे। कार की आवाज़ से ही उनका ध्यान हमारी तरफ गया था। जिससे उन चारों ने ताश खेलना बंद करके तखत से उतर गए थे।

हम तीनों केशव जी के पीछे पीछे मकान के पोर्च में आ गए। पोर्च में रुक कर केशव जी ने अपने एक आदमी से कहा सब ठीक है न? जवाब में आदमी ने बड़े अदब से हाॅ में सिर हिलाया। उस आदमी की हाॅ देख कर केशव जी मकान के अंदर की तरफ बढ़ चले। उनके साथ हम तीनों भी बढ़ चले थे।

ये मकान यूॅ तो पक्का ही था किन्तु इसकी हालत देख कर तथा केशव जी की छवि देख कर यही लगता था कि इस मकान पर केशव जी अपने आदमियों को रखते थे। या फिर उनके रहने की जगह ही यही थी। हलाॅकि सोचने वाली बात तो ये भी थी कि केशव जी का कैरेक्टर ऐसा क्यों था कि उनके अंडर में ऐसे ऐसे लोग थे और उनका हर कहा भी मानते थे? इस बारे में हम सबके दिमाग़ में सवाल तो उभरा था किन्तु केशव जी से इस बारे में पूछने का या तो समय ही नहीं मिला था हमें या फिर हम उनकी निजी ज़िंदगी में कोई हस्ताक्षेप ही नहीं करना चाहते थे। हमारे लिए यही बहुत था कि वो हमारी मदद कर रहे थे।

मकान के अंदर भी कुछ लोग नज़र आए हमें जो कि अलग अलग जगहों पर इस वक्त खड़े दिख रहे थे। बाहर से अंदर आते ही सबसे पहले एक छोटा सा हाल था उसके बाद दोनो तरफ तीन तीन कमरे बने हुए थे। सामने की तरफ ऊपर के फ्लोर में जाने के लिए चौड़ी सीढ़ी थी। उस सीढ़ी के अगल बगल भी एक एक कमरा था। केशव जी के साथ हम तीनो सीढ़ी के दाहिने साइड वाले कमरे की तरफ बढ़ गए।

केशव जी के कहने पर ही एक आदमी ने उस कमरे का ताला खोला और फिर उसके बाद दरवाजा भी खोला। ये देख कर हमें समझते देर न लगी कि केशव जी इस मामले में काफी होशियारी से काम ले रहे थे। ख़ैर कमरे के अंदर हम सब दाखिल हुए तो बाॅए साइड ही दीवार से सट कर खड़े उस जासूस पर हमारी नज़र पड़ी। उसके दोनो हाॅथ ऊपर की तरफ एक साथ मोटी रस्सी से बॅधे थे। इतना ही नहीं उसके मुख पर एक टेप भी चिपका हुआ था ताकि वह चीखे चिल्लाए न। उसके दोनो हाॅथ तो ऊपर की तरफ रस्सी से बॅधे हुए थे ही साथ ही उसके दोनो पैर भी अलग अलग दिशा में फैले हुए रस्सी से बॅधे थे।

ये कमरा अंदर से एकदम खाली था। जासूस की स्थित देख कर ये समझना ज़रा भी मुश्किल नहीं था कि केशव जी ने उसका तगड़ा इंतजाम किया था। उसे इस हालत में देख कर मैं केशव जी की समझदारी का कायल हो गया।

"आपने तो मेहमान का बहुत अच्छे तरीके से स्वागत कर रखा है मौसा जी।" मैंने जासूस की तरफ एक नज़र डालने के बाद केशव जी से कहा___"ख़ैर कोई बात नहीं। इनके मुह से ज़रा ये टेप तो हटाइए। इन महानुभाव की मनमोहक आवाज़ सुनने का बहुत दिल कर रहा है।"

मेरी बात पर केशव जी मुस्कुराए और फिर राणे के मुख से टेप निकाल दिया। टेप के हटते ही राणे गहरी गहरी साॅसें लेने लगा। यद्यपि टेप तो सिर्फ उसके मुख पर ही चिपकाया गया था, साॅस लेने के लिए उसकी नाॅक तो खुली ही थी।

"हाॅ तो मिस्टर डिटेक्टिव।" मैने उस जासूस के बिलकुल पास आते हुए कहा___"आप इज्ज़त से खुद ही सब कुछ बताएॅगे या फिर मुझे आपके मुख से कुछ भी उगलवाने के लिए कोई दूसरा हथकंडा इस्तेमाल करना पड़ेगा? हलाॅकि मुझे उम्मीद है कि आप खुद ही सब कुछ बता देंगे। क्योंकि आप जासूस हैं और आपको पता है कि ऐसी परिस्थितियों में क्या होता है? ख़ैर, मैं आपकी जानकारी के लिए बता दूॅ कि जिस मंत्री के लिए आप जासूसी कर रहे थे वो इस प्रदेश का निहायत ही घटिया ब्यक्ति है। ऐसा कोई कुकर्म तथा ऐसा कोई जुर्म नहीं है जो वो करता न हो। यहाॅ तक कि दूसरों की बहू बेटियों के साथ ग़लत तो करता ही है साथ ही उनका सौदा भी करता है। मैं ये सब बातें आपसे इस लिए बता रहा हूॅ ताकि आपको भी पता होना चाहिए कि आप जिसके लिए हमारा बेड़ा गर्क करने चले हैं वो कैसा इंसान है? अपने ज़मीर को जगाइये जासूस महोदय। जीवन में रुपया पैसा कमाने के लिए और भी कई अच्छे रास्ते हैं। जासूस का मतलब ये नहीं होता कि आप किसी के लिए भी काम करना शुरू कर दें। बल्कि उस ब्यक्ति के लिए काम करें जिसे आप समझते हों कि ये अच्छा ब्यक्ति है तथा इसे किसी बुरे इंसान ने सताया है।"

मेरी ये बातें सुन कर वो जासूस कुछ न बोला। बस मेरी तरफ देखता रहा। उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभर आए थे जैसे एकाएक ही वह किन्हीं विचारों के आधीन हो गया हो। मैं कुछ देर तक उसे देखता रहा।

"आपको पता है ये कौन हैं?" मैने रितू दीदी की तरफ इशारा करके उस जासूस से कहा___"ये मेरी बड़ी बहन हैं और पुलिस में इंस्पेक्टर हैं। इन्होंने जब ये जाना कि कानूनन ये मंत्री के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर सकती हैं तो इन्होंने कानून को अपने हाॅथ में ले लिया।इन्होंने इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं की कि इसके लिए इन्हें कानून खुद कठोर सज़ा दे सकता है तथा अगर ये मंत्री जैसे राक्षस इंसान के पकड़ में आ गईं तो मंत्री इनका क्या हस्र कर सकता है। कहने का मतलब ये कि अपनी जान को जोखिम में डाल कर इन्होंने मंत्री के खिलाफ बिगुल बजाया हुआ है। सिर्फ इस लिए कि इस प्रदेश से मंत्री दिवाकर चौधरी जैसे लोगों की गंदगी दूर हो सके तथा ऐसे लोगों से मासूम व निर्दोष जनता को निजात मिल सके। रुपया पैसा सबकी ज़रूरत है जासूस महोदय किन्तु उससे बढ़ कर अपनी जान भी प्यारी होती है। हम सब सच्चाई की राह पर चलने वाले वो इंसान हैं जिनके सिर पर क़फन बॅधा हुआ है।"

"ये सब तुम क्या बातें सुना रहे हो दोस्त।" सहसा आदित्य ने कहा___"क्या तुम समझते हो कि तुम्हारी इन बातों से इस जासूस के विचार बदल जाएॅगे। नहीं भाई, इन्हें तो सिर्फ पैसों से मतलब हैं। इन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि प्रदेश में आम इंसानों के साथ क्या अत्याचार हो रहा है? मैं तो कहता हूॅ कि इससे कुछ पूछना ही बेकार है। हमारे पास जो भी सबूत मंत्री के खिलाफ है उसी के आधार पर हम उसे धर लेंगे।"

"आप लोग क्या जानना चाहते हैं मुझसे?" सहसा जासूस गंभीर भाव से बोल पड़ा___"पूछो, मैं सब कुछ बताने को तैयार हूॅ। मुझे भी इस बात का अंदेशा है कि मंत्री के खिलाफ़ खुद पुलिस विभाग गुप्त रूप से लगा हुआ है। मुझे पता है कि मंत्री तथा उसके साथी बहुत ही अपराधी किस्म के इंसान हैं। तुमने मुझे एहसास करा दिया है कि वाकई मैं ग़लत ब्यक्तियों का साथ दे रहा था। तुमने बिलकुल सही कहा भाई कि जीवन में पैसा ही सब कुछ नहीं होता है।"

"तो फिर बताइये।" मैने मन ही मन हैरान होते हुए कहा___"कि मंत्री ने आपको किस किस काम के लिए हमारे पीछे लगाया था?"
"आप लोगों ने मंत्री को तथा उसके साथियों को इस लायक छोंड़ा ही नहीं है कि वो खुद इस मामले में कोई ऐक्शन ले सके।" जासूस ने कहा___"इस लिए उसने इस काम के लिए मुझे हायर किया। एक और महत्वपूर्ण बात है जो कि तुम्हारे लिए जानना बेहद ज़रूरी है। वो बात ये है कि मंत्री आपके ताऊ अजय सिंह के साथ भी मिला हुआ है। मैं अजय सिंह के ही पीछे लगा था और उसी का पीछा करते हुए मैं आज उस जगह पहुॅचा था जहाॅ तुम्हारा और अजय सिंह का आमना सामना हो रहा था। मैने उस सबकी सूचना फोन द्वारा मंत्री को दी थी। मंत्री को मैने कहा भी था कि वो अगर चाहें तो इस मौके पर खुद भी आकर तुम लोगों के साथ कुछ भी कर सकते हैं। मगर मंत्री ने शायद ये सोच कर इसके लिए बाद में मना कर दिया कि संभव है कि उस सूरत में तुम्हारे द्वारा उसके बच्चों का कुछ अहित हो जाता। इस लिए उसने मुझसे बस यही कहा कि मैं तुम लोगों के पीछे लग कर तुम्हारे ठिकाने का पता करूॅ। जैसे ही मेरे द्वारा उसे तुम लोगों के ठिकाने का पता चल जाता वैसे ही वो अपने दलबल के साथ तुम लोगों के ठिकाने पर धावा बोल देता।"

हरीश राणे की बात सुन कर हम सब बुरी तरह हैरान रह गए थे। हम सब ये जान कर चौंके थे कि अजय सिंह मंत्री से मिला हुआ है। इस तरफ तो हमने सोचा ही नहीं था और यकीनन ये हमारी सबसे बड़ी ग़लती भी थी। ख़ैर अब तो जासूस द्वारा हमें इस बात का पता चल ही चुका था।

"एक और बात।" तभी राणे ने फिर कहा___"जब मैने मंत्री से फोन पर बात की थी तो ये सवाल भी उभरा था कि संभव है कि अजय सिंह उसे धोखा दे रहा हो। क्योंकि उसने मंत्री को बताए बिना ही तुम सबको पकड़ने के लिए वो सब किया था। जबकि मंत्री से हुई दोस्ती के अनुसार उसे उस सबके बारे में मंत्री से बताना चाहिए था। इस बात पर मंत्री ने कहा था कि अगर अजय सिंह सचमुच उसे धोखा दे रहा है तो वो उसे इसके लिए सज़ा ज़रूर देगा। किन्तु अगर उसने ये सब ये सोच कर किया है कि बाद में वो हमें अपने भतीजे को तथा अपनी बेटी को हमारे सामने ले आएगा और अपनी दोस्ती का प्रमाण देगा तो यकीनन हम उसे जेल से भी छुड़ाएॅगे। मंत्री की इस बात से तुम लोग समझ सकते हो कि अजय सिंह जेल से उसके द्वारा छूट भी सकता है। अगर ये कहूॅ तो भी ग़लत न होगा कि वो अब तक छूट ही गया होगा।"

"ऐसा कैसे कह सकते हो तुम?" केशव जी ने पूछा।
"सीधी सी बात है।" राणे ने कहा___"बात चाहे जो भी हो किन्तु मंत्री एक बार अजय सिंह से मिलना ज़रूर चाहेगा और मिल कर ये भी जानना चाहेगा कि उसने वो सब कारनामा उसको बिना बताए कैसे अंजाम दिया था? क्या इसके पीछे उसकी गद्दारी थी या फिर कुछ और? मंत्री की इस बात पर अजय सिंह ज़रूर यही कहेगा कि वो ये सब करके अपने भतीजे और अपनी बेटी को उसके सामने ले आकर उसे सरप्राइज के रूप में तोहफा देना चाहता था। किन्तु ऐसा हो न सका। अजय सिंह की ये बात सुन कर मंत्री को भी लगेगा कि अजय सिंह वास्तव में उसके लिए ये सब पाक़ भावना से करना चाहता था। अतः ये सोच कर मंत्री उसे जेल से ज़रूर छुड़ाएगा। जिस समय मैने उसे फोन पर अजय सिंह को पुलिस द्वारा ले जाने के बारे में बताया था। उस समय और अब के समय के बीच कई घंटों का फर्क़ हो चुका है। इस लिए ये संभव है कि अब तक मंत्री ने अजय सिंह को जेल से छुड़ा ही लिया होगा।"

"हम भी तो यही चाहते हैं जासूस महोदय।" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"कि वो जेल से छूट कर फिर से बाहर आ जाए और इसी लिए रितू दीदी ने उसके छूट जाने का इंतजाम भी किया हुआ था।"

"क्या मतलब।" हरीश राणे बुरी तरह चौंका___"भला तुम लोग ऐसा क्यों चाहते हो? बात कुछ समझ में नहीं आई। ये सब क्या चक्कर है?"

"मंत्री को और अजय सिंह को अगर जेल में सड़ाना ही होता।" मैने कहा___"तो ये काम तो हम बहुत पहले ही कर चुके होते। मगर ऐसा किया नहीं क्योंकि इनके गुनाहों की सज़ा हम अपने तरीके से ही देना चाहते हैं। रितू दीदी ने पुलिस कमिश्नर से जब पुलिस प्रोटेक्शन की बात की तभी ये तय हो गया था कि अजय सिंह को सबके साथ पकड़ कर ले तो जाएॅगे मगर उस पर कोई केस नहीं बनाया जाएगा। केस न बनने से अजय सिंह का जेल से छूट जाना आसान ही हो जाना था। वरना आप खुद सोचिए जासूस महोदय कि उसने तो अपनी ही बेटी को जान से मारने की कोशिश की थी वो भी एसीपी के रिवाल्वर से। उस सूरत में तो वो लम्बे से नप सकता था। एसीपी रमाकान्त शुक्ला तो गुस्से में आकर अजय सिंह पर केस बनाने के लिए तैयार भी हो गया था किन्तु कमिश्नर साहब ने इसके लिए उसे मना कर दिया। वरना अगर केस बन जाता तो मंत्री इतनी सहजता से अजय सिंह को छुड़ा न पाता। उसकी पहुॅच का भी कोई असर न होता। क्योंकि एसीपी कोई मामूली ब्यक्ति नहीं था। उसे केन्द्र से भेजा गया है, इस लिए उसके काम में किसी की भी दखलअंदाज़ी नहीं चलती।"

"अगर ऐसी बात है।" राणे ने कहा___"तो फिर वो इस सबके लिए राज़ी कैसे हो गया? मेरे कहने का मतलब ये है कि जैसा कि तुमने कहा कि एसीपी को केन्द्र सरकार ने भेजा है तथा उसके काम में कोई हस्ताक्षेप भी नहीं कर सकता तो फिर ये कैसे हो गया कि उसने अजय सिंह पर कमिश्नर के मना कर देने पर केस ही नहीं बनाया? जबकि उसे तो इस मामले में शख्त से शख्त कार्यवाही ही करनी चाहिए थी।"

"वो यहाॅ शख्त कार्यवाही के लिए ही आया था।" रितू दीदी ने हस्ताक्षेप किया___"किन्तु कमिश्नर साहब ने उसे यहाॅ के सारे हालातों के बारे में बताया, ये भी कि कैसे मैं अपने ही माॅ बाप के खिलाफ हूॅ और कैसे मंत्री का काम तमाम करने के काम पर लगी हुई हूॅ? सारे हालातों पर ग़ौर करने के बाद वो इसके लिए तैयार हो ही गया। दूसरी बात ये भी थी कि उसे यहाॅ भेजा ही इस लिए गया है कि वो मंत्री जैसे लोगों की गंदगी को इस प्रदेश से मिटा सके और ये काम तो मैं कर ही रही हूॅ। उसे तो इस प्रदेश की गंदगी मिटाने से मतलब है फिर चाहे वो किसी भी तरीके से मिटाई जाए।"

"ओह तो ये बात है।" राणे को जैसे सब कुछ समझ आ गया था, फिर बोला___"किन्तु शुरू में मैने महसूस किया था कि मैने जब मंत्री और अजय सिंह के एक होने की बात बताई तो तुम सब उस बात से हैरान हो गए थे। इसका मतलब ये हुआ कि तुम लोगों को इस बात का अंदेशा तक नहीं था कि अजय सिंह और मंत्री आपस में मिले भी हो सकते हैं?"

"कमिश्नर साहब ने फोन पर मुझे ये ज़रूर बताया था।" रितू दीदी ने कहा___"कि मंत्री ने उन्हें फोन किया था तथा फोन पर वो ऐसे सवाल जवाब कर रहा था जैसे ये जानना चाहता हो कि पुलिस गुप्त रूप से कहीं उसके पीछे तो नहीं लगी हुई है। उसने बातों बातों में इस बात को भी पूछा था कि हल्दीपुर के ठाकुर अजय सिंह को पुलिस पकड़ कर ले गई है तो ये सब क्या चक्कर है? उसने कमिश्नर से घुमा फिरा कर ये भी कहा कि सुना है कि अजय सिंह की बेटी पुलिस में है और अपने बाप के खिलाफ भी है। मंत्री के पूछने पर कमिश्नर साहब ने यही कहा कि ये सब पारिवारिक मामला है अतः उन्हें इस बारे में ज्यादा पता नहीं है। कहने का मतलब ये कि ये तो समझ में आया कि मंत्री ने कमिश्नर से अजय सिंह का ज़िक्र किया मगर उसकी बातें ऐसी थी कि उससे इस बात का अंदेशा उस वक्त मुझे न हो पाया था कि वो अजय सिंह से वास्तव में मिला हुआ ही हो सकता है। दूसरी बात ये कि मेरे मुखबिरों ने भी ऐसी किसी बात का ज़िक्र नहीं किया। जबकि मैने तो दोनो के ही पीछे मुखबिर लगाए हुए थे।"

"कमाल की बात है।" राणे मुस्कराया___"कैसे मुखबिर थे जो ये भी न पता लगा सके कि अजय सिंह और मंत्री कब कहाॅ किससे मिलते हैं? जैसा कि तुमने बताया कि तुमने इन दोनो के पीछे मुखबिर लगाया हुआ था तो ये कैसे हो सकता है कि तुम्हारे मुखबिरों को इन दोनो की गतिविधियों का पता ही न चल सके? अजय सिंह के पीछे लगा हुआ मुखबिर बड़ी आसानी से पता लगा सकता था कि वह कब कहाॅ जाता है? यानी अगर वो मंत्री से मिलने उसके आवास पर जाता तो क्या ये सब उस मुखबिर ने अपनी ऑखों से नहीं देखा होता? इसका तो यही मतलब हुआ कि तुम्हारे मुखबिरों ने अपना काम इमानदारी से किया ही नहीं बल्कि तुम्हें धोखे में ही रखा।"

राणे की इस बात से रितू दीदी तुरंत कुछ बोल न सकीं थी। मैने भी हैरानी से उनकी तरफ देखा था। रितू दीदी के चेहरे पर कई तरह के भाव आए और चले भी गए। सहसा उनके चेहरे पर कठोर भाव उभर आए।

"यकीनन ऐसा ही है।" फिर उन्होंने गहरी साॅस लेकर कहा___"मेरे मुखबिरों ने अपना काम सही से नहीं किया। इसके लिए उन्हें कठोर दंड ज़रूर मिलेगा। दोनो तरफ की घटनाओं से इस बात की तरफ मेरा ध्यान भी नहीं गया। दूसरी बात मुझे अपने मुखबिरों से इस बात की उम्मीद भी नहीं थी कि वो कमीने ऐसी लापरवाही करेंगे।"

"चलो कोई बात नहीं रितू बेटा।" सहसा केशव जी ने कहा___"माना कि तुम्हारे मुखबिरों ने इस काम में थोड़ी नहीं बल्कि बहुत ही ज्यादा लापरवाही दिखाई किन्तु इससे हमें नुकसान तो नहीं हुआ न? अतः इस बात को छोंड़ो और अब ये सोचो की आगे क्या करना है?"

"मैं भी ये कहना चाहता हूॅ कि।" रितू दीदी के बोलने से पहले ही राणे बोल पड़ा____"अब आप लोगों को भी मुझे यहाॅ से जाने देना चाहिए। आप लोगों को मैने पूरी इमानदारी से सारी बातें सच सच बता दी हैं। अतः अब मुझे इस तरह यहाॅ कैद करके रखने का तो कोई मतलब नहीं बनता न।"

"ज्यादा होशियारी दिखाने की कोशिश मत करो जासूस महोदय।" मैने कहा___"माना कि आपने हमें सारी बातें सच सच बता दी हैं। मगर मौजूदा हालात में इसके बावजूद हम आपको यहाॅ से जाने नहीं दे सकते। क्योंकि इतना तो हम भी सोच सकते हैं कि आपने ये सब ये सोच कर बता दिया हमे कि सब कुछ सुनने के बाद हमें यही लगे कि अब आप हमारे ही हक़ में हैं और हमारा किसी भी तरह का नुकसान नहीं कर सकते हैं। इस लिए हम आपको छोंड़ देंगे। जबकि यहाॅ से छूटते ही आप पुनः अपना रंग बदल सकते हैं और हमारा काम तमाम करवा सकते हैं। इस लिए जासूस महोदय आपको छोंड़ देने का काम तो फिलहाल हम किसी भी सूरत में नहीं कर सकते। अतः आप अपने दिमाग़ से छूटने का ख़याल निकाल दें। किन्तु हाॅ हम ये वादा करते हैं कि यहाॅ आपको कोई तक़लीफ नहीं होने देंगे और जैसे ही मंत्री का काम तमाम हो जाएगा वैसे ही आपको भी यहाॅ से आज़ाद कर दिया जाएगा।"

"सबसे पहली बात तो तुम मुझे जासूस महोदय कहना बंद करो।" राणे ने कहा___"मेरा नाम हरीश राणे है। अतः मुझे राणे कह कर संबोधित कर सकते हो। दूसरी बात तुम बेवजह ही ये शक कर रहे हो कि यहाॅ से चूटते ही मैं ऐसा वैसा कुछ कर दूॅगा। मेरा यकीन करो यंग मैन, मुझे रियलाइज हो चुका है कि मैं जो कुछ भी अब तक मंत्री के लिए कर रहा था वो उचित नहीं था। मुझे पता है कि मंत्री और उसके सभी साथी जुर्म व अपराध करने वाले महान पापी हैं। इस लिए अब मैं उनके लिए कोई काम नहीं करूॅगा। बल्कि यहाॅ से छूटने के बाद मैं वापस अपने शहर लौट जाऊॅगा।"

"हो सकता है कि आपकी बातें सच ही हों मिस्टर राणे।" मैने कहा___"मगर चूॅकि आप एक जासूस हैं अतः आप भी समझ सकते हैं कि मौजूदा हालात मैं हम आपको छोंड़ देने का जोखिम नहीं उठा सकते। इस लिए आप इसके लिए हमे माफ़ करें और यहीं रहें।"

मेरी बात सुन कर राणे बेबस भाव से मुझे देखता रह गया। फिर एकाएक ही उसके होठों पर मुस्कान उभर आई, बोला___"सही कहते हो भाई। मैं समझ सकता हूॅ कि ऐसे हालात में तुम मुझे यकीनन छोंड़ देने का जोखिम नहीं उठा सकते। ख़ैर कोई बात नहीं, जैसा तुम्हें अच्छा लगे करो। और हाॅ मेरी तरफ से बेस्ट ऑफ लक इसके लिए।"

राणे की ये बात सुन कर हम सब मुस्कुराए और फिर केशव जी के इशारे पर एक आदमी ने पुनः राणे के मुख में टेप चिपका दिया। उसके बाद सभी आदमियों को कुछ ज़रूरी हिदायतें दे कर हम सब वहाॅ से बाहर की तरफ चल पड़े।
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उधर अजय सिंह जब हवेली पहुॅचा तो शाम के चार बज चुके थे। अजय सिंह को प्रतिमा ड्राइंग रूम में ही बैठी मिली थी। उसके चेहरे से साफ पता चल रहा था कि वो अपने पति के लिए कितनी चिंतित व परेशान थी। उसने अपनी वकील दोस्त अनीता ब्यास से फोन पर बात की थी। अनीता के पूछने पर उसने संक्षेप में कुछ बातें बताई थी उसे। उसकी उस दोस्त ने उसे आश्वस्त किया था कि वो चिंता न करे, वो उसके पति को छुड़ाने की पूरी कोशिश करेगी। उसने प्रतिमा से कहा था कि वो शाम को उससे मिलने भी आएगी।

इधर अजय सिंह जैसे ही ड्राइंग रूम में दाखिल हुआ तथा प्रतिमा के बगल वाले सोफे पर बैठा वैसे ही कहीं खोई हुई प्रतिमा का ध्यान अजय सिंह की तरफ गया। उसे पहले तो यकीन नहीं हुआ किन्तु फिर एकाएक ही उसके चेहरे पर पहले हैरानी के भाव उभरे उसके बाद तुरंत ही खुशी के भावों ने उसका मुरझाया हुआ चेहरा ताज़े खिले गुलाब की मानिन्द खिला दिया।

"ओह अजय तुम आ गए।" खुशी से फूली न समाती हुई प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा था किन्तु तुरंत ही उसके चेहरे पर हैरानी व उलझन के भाव भी उभर आए, बोली___"मगर तुम वहाॅ से आ कैसे गए अजय? तुम्हें तो पुलिस का वो एसीपी गिरफ्तार करके ले गया था न? फिर तुम पुलिस से छूट कर आ कैसे गए? क्या पुलिस ने तुम्हें यूॅ ही छोंड़ दिया या फिर तुमने कुछ ऐसा वैसा किया है?"

"मैने कुछ भी ऐसा वैसा नहीं किया है प्रतिमा।" अजय सिंह ने सपाट लहजे में कहा___"बल्कि मुझे मंत्री जी ने पुलिस से ज़मानत पर छुड़ाया है। मगर...।"
"मगर क्या अजय??" प्रतिमा के माॅथे पर बल पड़ा।

"यही कि मंत्री का तो नाम ही है कि उसने मुझे पुलिस से छुड़ाया है।" अजय सिंह ने सोचने वाले भाव से कहा___"सच तो ये कि पुलिस मुझे खुद ही छोंड़ देना चाहती थी।"

"ये..ये क्या कह रहे हो तुम?" प्रतिमा हैरान___"भला पुलिस तुम्हें क्यों छोंड़ना चाहेगी? और....और ऐसा भला तुम कैसे कह सकते हो?"
"बेवकूफी भरे सवाल मत करो प्रतिमा।" अजय सिंह ने नाराज़गी के साथ कहा___"साधारण मामला होता तो सोचा भी जा सकता था कि पुलिस ने मामूली बात पर पकड़ा और फिर छोंड़ भी दिया। किन्तु ये मामला साधारण नहीं था। मैने एसीपी का रिवाल्वर छीन कर उसके सामने ही नीलम को गोली मारी थी। इस लिए इस अपराध के लिए तो मुझे लम्बे से नप जाना चाहिए था। मुझ पर साफ साफ अटेम्प्ट टू मर्डर का केस लगता। तुम अच्छी तरह जानती हो कि इस केस के तहत मेरा कानून से छूटना उस सूरत में तो नामुमकिन ही था जबकि उस संगीन अपराध का चश्मदीद गवाह खुद एसीपी ही था। इतने बड़े अपराध के बावजूद वो मंत्री मुझे बड़ी आसानी से छुड़ा लाया। वो साला समझता होगा कि ये सब उसके रुतबे तथा दबदबे का कमाल है जबकि ऐसा है नहीं। बल्कि सच्चाई यही है कि पुलिस खुद चाहती थी कि मैं सहजता से छूट जाऊॅ। इसका मतलब ये भी हुआ कि उस संगीन अपराध के लिए एसीपी ने मुझ पर कोई केस ही नहीं बनाया है।"

"बात तो तुम्हारी यकीनन सौ पर्शेन्ट सही है।" प्रतिमा के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे___"किन्तु सवाल ये है कि पुलिस ऐसा क्यों चाहेगी कि तुम उसकी गिरफ्त से आसानी से छूट जाओ? दूसरी बात, अगर पुलिस को तुम्हें इस तरह सहजता से छोंड़ ही देना था तो उस वक्त उसने तुम्हें गिरफ्तार ही क्यों किया था?"

"कमाल है।" अजय सिंह ने हैरानी से प्रतिमा की तरफ देखा, फिर बोला___"ये सब तुम पूछ रही हो प्रतिमा? जबकि तुम तो छोटी सी छोटी बात को पकड़ कर उलझी हुई बातों को सुलझाने में माहिर हो।"

"हाॅ मगर।" प्रतिमा ने कहा___"तब जब मन में तुम्हारे प्रति ऐसी चिंता नहीं होती। हलाॅकि सोच तो मैं अभी भी सकती हूॅ। किन्तु तुम खुद ही बता दो तो क्या बुराई है?"

"ये तो साबित हो चुका है कि।" अजय सिंह ने कहा___"विराज मुझसे कानूनी रूप से कोई बदला नहीं लेना चाहता। क्योंकि अगर उसे इस तरीके से लेना ही होता तो वो ये काम पहले ही कर लेता। यानी कि मेरे खिलाफ उसके पास जो सामान है उसे वो पुलिस को सौंप देता और बता देता कि ये सब उसके ताऊ यानी कि मेरा है। बस खेल खत्म। किन्तु उसने ऐसा नहीं किया। मतलब साफ है कि वो जो कुछ भी करेगा अपने तरीके से तथा अपने बलबूते पर करेगा। नीलम व सोनम को यहाॅ से ले जाने वाला वाक्या जब सामने आया तो उसे बखूबी पता था कि हम उसके मंसूबों को नाकाम करने की जी तोड़ कोशिश करेंगे। ये सोच कर उसने भी अपने पक्ष को मजबूत किया। रितू ने उसे सुझाव दिया होगा कि अगर इसके बावजूद उसका पलड़ा कमज़ोर पड़ता है तो उस सूरत में वो पुलिस का सहारा लेगी। पुलिस फोर्स के आ जाने से सारा मामला ही उलट जाएगा और फिर वो बड़ी आसानी से नीलम व सोनम को अपने साथ ले जाएॅगे और कोई कुछ कर भी नहीं पाता। ऐसा हुआ भी। किन्तु उसे ये उम्मीद नहीं थी कि इस सबके बीच नीलम को मेरे द्वारा गोली भी मार दी जाएगी। उनका मकसद तो इतना ही था कि पुलिस के आने के आने के बाद जब मैं और मेरे आदमी कुछ नहीं कर पाएॅगे तो वो बड़े आराम से नीलम व सोनम को ले जाएॅगे और मेरे माॅथे पर एक और हार व नाकामी की मुहर लगा जाएॅगे। किन्तु नीलम को गोली लगने से मामला थोड़ा बिगड़ गया। उसे लगा कि सबके साथ मुझे गिरफ्तार तो होना ही था और फिर बाद मुझे छोंड़ ही दिया जाना था, किन्तु नीलम को गोली मार देने से केस बन जाने वाली बात हो गई थी। केस बन जाने की सूरत में मेरा पुलिस से छूटना मुश्किल हो जाता। जो कि विराज हर्गिज़ भी नहीं चाहता था। तब उसने रितू से कहा होगा कि वो कुछ ऐसा करे कि मुझ पर कोई केस ही न बने। उस सूरत में फिर जब कोई मुझे ज़मानत पर छुड़ाने आएगा तो मैं आसानी से छूट जाऊॅगा। विराज के इस सुझाव को या यूॅ कहो कि उसकी इस इच्छा को रितू ने तुरंत मान लिया होगा और फिर उसने ऐसा ही कोई इंतजाम कर दिया होगा। जिसका नतीजा ये निकला कि बाद में मंत्री मुझे बड़ी आसानी से छुड़ाने में कामयाब हो गया। दैट्स आल।"

"ओह तो ये बात है।" प्रतिमा ने कहा___"वैसे कमाल की बात है कि आज तुम्हारा दिमाग़ भी काफी शार्प साबित हुआ जो इतनी बारीकी से ये सब सोचा और इस सबका जूस निकाल कर भी रख दिया। मगर....।"

"अब क्या हुआ??" अजय सिंह बोल पड़ा।
"तुमने नीलम को जान से मारने की कोशिश क्यों की अजय?" प्रतिमा ने सहसा गंभीर होकर कहा___"उसने तो हमारे साथ ऐसा वैसा कुछ भी नहीं किया था। उस वक्त भी उसने तुमसे उस लहजे में सिर्फ इसी लिए बात की क्योंकि तुमने उससे बात ही ऐसे गंदे तरीके से की थी। तुम खुद सोचो अजय कि तुमने जीत के अहंकार तथा आवेश में आकर कितना ग़लत ब्यौहार किया था। सबके सामने तुम्हें अपनी ही बेटी से उस तरीके से बात नहीं करनी चाहिए थी। क्योंकि इसका असर हमारे ही आदमियों पर पड़ेगा। वो सोचेंगे कि जो इंसान सबके सामने अपनी ही बेटी के साथ ऐसी अश्लीलता और ऐसी कूरता कर सकता है वो वास्तव में कितना घटिया होगा। हाॅ अजय, इससे हमारी ही इमेज ख़राब होती है। कोई भी सभ्य लड़की ये बर्दाश्त नहीं कर पाएगी कि सबके सामने उसका ही बाप उससे ऐसी अश्लीलता से बात करके उसे जलील व शर्मसार करे।"

"यकीनन सच कह रही हो तुम।" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेकर कहा___"बाद में मुझे भी एहसास हुआ कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। मगर उस वक्त हालात ही ऐसे बन गए थे कि मैं आपे से बाहर हो गया था। एक तो मैं उस हरामज़ादे की बातों से तथा उसे देख कर पागल हुआ जा रहा था जिसने अब तक मुझे शिकस्त ही दी थी। साला ऐसे ऐसे डाॅयलाग बोल रहा था कि मेरे अंदर उन डायलाग को सुनकर उन्हें सहने की शक्ति ही नहीं बची थी। मुझे लग रहा था कि उस हराम के पिल्ले को कैसे भी करके खत्म कर दूॅ और ऐसा होता भी अगर वहाॅ पुलिस फोर्स न आ गई होती तो। मैं अंदर ही अंदर एक और हार व नाकामी से पागल व ब्यथित हुआ जा रहा था ऊपर से मेरी दोनो बेटियों ने सामने आकर जो कुछ कहा उसने मेरे गुस्से को और भी बढ़ा दिया था। रही सही कसर नीलम ने सबके सामने मुझे थप्पड़ मार कर पूरी कर दी थी। बस उसके बाद मैंने अपना आपा खो दिया और वो सब कर बैठा। तुम खुद अंदाज़ा लगा सकती हो प्रतिमा कि उस वक्त मैं किस मानसिक हालत में रहा होऊॅगा?"

"चलो ये सुन कर अच्छा लगा कि तुम्हें नीलम को गोली मारने वाली बात पर अपनी ग़लती का एहसास हुआ।" प्रतिमा ने कहा___"किन्तु क्या तुम्हारे मन में ये विचार भी उठा है कि तुम्हें एक बार नीलम का हाल चाल जान लेना चाहिए? कुछ भी हो आख़िर वो है तो हमारी बेटी ही।"

"नहीं प्रतिमा।" अजय सिंह का चेहरा एकाएक कठोर हो गया, बोला___"मेरे लिए मेरी दोनो बेटियाॅ अब मर चुकी हैं। इस दुनियाॅ में अब तुम्हारे और हमारे बेटे के अलावा मेरा कोई नहीं है। एक बात और आज के बाद तुम मुझसे उन दोनो के बारे में कोई भी बात नहीं करोगी। ये मेरी पहली और आख़िरी वार्निंग है।"

"मर्द कभी नहीं समझ सकता एक औरत की पीड़ा को।" प्रतिमा ने सहसा भारी स्वर में कहा___"मगर मुझे तुमसे उम्मीद थी अजय कि तुम मेरी पीड़ा को समझोगे।"

"कहना क्या चाहती हो तुम?" अजय सिंह ने अजीब भाव से प्रतिमा की तरफ देखा।
"तुम जानते हो अजय कि मैं आज भी तुमसे उतना ही प्यार करती हूॅ जितना पहले करती थी।" प्रतिमा ने कहा___"और मैं जाने कितनी बार तुम्हें अपने बेपनाह प्यार का सबूत भी दे चुकी हूॅ। तुम्हारे सिर्फ एक इशारे पर मैं पराए मर्द के नीचे खुशी खुशी लेट गई। कभी इसके लिए तुमसे शिकायत नहीं की और ना ही तुमसे नाराज़ हुई। तुम्हारी हर खुशी में मैने अपनी खुशी देखी। तुम्हारी तरह सबके लिए कठोर भी बन गई। मगर मैं एक औरत के साथ साथ एक माॅ भी हूॅ अजय। औलाद चाहे जैसी भी हो वो अपनी माॅ के लिए सबसे सुंदर व सबसे अनमोल होती है। मुझे अब तक इतनी ज्यादा तकलीफ़ नहीं हुई थी किन्तु इस हादसे से हुई है। मैं मानती हूॅ कि मेरी दोनो बेटियों ने हमारे खिलाफ जा कर ग़लत किया है मगर जब ये सोचती हूॅ कि उन दोनो ने ऐसा क्यों किया तब इस क्यों के जवाब को सोच कर ही दिल दहल जाता है। आख़िर अपने सामने तो इस सच्चाई को हमें भी मानना ही पड़ेगा न कि हमने अपनी ही बेटियों के साथ तथा बाॅकी सबके साथ ग़लत सोचा और ग़लत किया भी।"

"इन सब बातों को कहने का क्या मतलब है?" अजय सिंह ने कहा___"और....और आज अचानक ये बातें ही क्यों? नहीं प्रतिमा, अब इन सब बातों को सोचने का कोई मतलब नहीं है और सोचना भी नहीं। क्योंकि अब बात बहुत आगे निकल चुकी है। अब तो इसका फैसला दो पक्षों में से किसी एक पक्ष के खत्म हो जाने पर ही होगा। उसके पहले तो कुछ हो ही नहीं सकता। इसके पहले तो ये था कि मैंने ये सब अपने बीवी बच्चों के लिए किया किन्तु अब ये भी है कि जिन चीज़ों की ख्वाहिश थी उसे हर हाल में पूरा करना है। अगर मेरे द्वारा वो सब बरबाद हुए हैं तो उनके द्वारा मेरा भी तो बहुत कुछ नुकसान हुआ। इस लिए अब ऐसी बातें अपने ज़हन में मत लाओ। ख़ैर छोंड़ो, मुझे भी ज़रा फ्रेश होना है। एक बात और, चिंता की कोई बात नहीं है। विराज भले ही मुझे शिकस्त देकर चला गया है मगर बहुत जल्द उसका भी किस्सा खत्म होने वाला है। क्योंकि मंत्री ने उसके पीछे जासूस लगाया हुआ है। वो जासूस बहुत जल्द उसके ठिकाने का पता मंत्री जी को देगा उसके बाद मंत्री विराज के ठिकाने पर धावा बोल देगा। उस साले विराज के साथ साथ तुम्हारी दोनो बेटियों का भी खेल खत्म हो जाएगा।"

ये सब कहने के बाद अजय सिंह उठा और अंदर कमरे की तरफ बढ़ गया। जबकि उसकी बातें सुनने के बाद प्रतिमा पहले तो हैरान हुई फिर सामान्य हो कर बैठी रही। चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते रहे।
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उस वक्त रात के दो बज रहे थे।
गुनगुन स्थित मंत्री दिवाकर चौधरी के बॅगले के पिछले भाग पर जहाॅ कि अशोक व देवदार जैसे पेड़ लगे हुए थे दो काले साए अॅधेरे में छिपे खड़े थे। दोनो के ही जिस्मों पर काला स्याह लबादा था। यहाॅ तक कि दोनो के चेहरे तथा हाॅथ तक काले कपड़ों से ढॅके हुए थे। चेहरे व सिर पर चढ़े काले मास्क से सिर्फ उनकी ऑखें ही झाॅक रही थी या फिर ये भी कि जब वो दोनो बात करने के लिए मुह खोलते तो उनके दाॅत चमक उठते थे। कहने का मतलब ये कि वो दोनो ही सिर से लेकर पाॅव तक काले किन्तु चुस्त दुरुस्त कपड़ों से ढॅके हुए थे।

बॅगले के चारो तरफ बाउण्ड्री वाल थी जिसमें थोड़ी थोड़ी दूरी पर रोशनी के लिए मध्यम साइज के एलईडी बल्ब लगे हुए थे। बाउण्ड्री वाल के अंदर तथा बाहर दोनो तरफ हाॅथों में गन लिए गार्ड्स भी खड़े नज़र आ रहे थे। रात के इतने समय भी वो सब मुस्तैदी से खड़े थे। उन सभी के जिस्मों पर भी काले ही कपड़े थे तथा सिर पर काली कैप थी।

बॅगले का मुख्य दरवाजा जो कि खालिश स्टील का ही था। उस दरवाजे के पास भी दोनो तरफ गनमैन तैनात थे। ख़ैर हम बात कर रहे थे उन दो रहस्यमय सायों की। ये दोनो ही साए क़रीब दस मिनट से उन पेड़ों के पास अॅधेरे में छिपे खड़े थे। बारह फीट ऊॅची बाउण्ड्री वाल को दोनो ने बड़ी ही दक्षता से लाॅघ लिया था। जिसके लिए उन्हें रस्सी की मदद लेनी पड़ी थी। उनकी चारो ऑखें बड़ी बारीकी से चारो तरफ का अध्ययन कर रही थीं। दोनो ने एक बात नोट की कि जितने भी गनमैन वहाॅ तैनात थे वो सब अपनी जगह पर ही कायम थे। यानी वो सब अपनी पोजीशन नहीं बदलते थे। सिर्फ दो ही ऐसे गनमैन थे जो हर पाॅच मिनट में इस तरफ आते थे और फिर इधर उधर सरसरी सी नज़र डाल कर वापस लौट जाते थे।

बाउण्ड्री वाल से बॅगले की इमारत की दूरी लगभग बीस फुट थी। नीचे ज़मीन पर चारो तरफ विदेशी घाॅस उगी हुई थी। बाउण्ड्री वाल की तरफ ही ये सारे पेड़ लगे हुए थे। हलाॅकि बीच बीच में ऐसे छोटे छोटे पौधे भी लगे हुए थे जो अक्सर बाग़ों की शोभा बढ़ाने के उपयोग में आते थे। किन्तु ये पौधे दो तरफ ही दिख रहे थे। सामने की तरफ विदेशी घाॅस तो थी ही साथ ही बीचो बीच सफेद मारबल लगा हुआ था जो कि मुख्य दरवाजे तक था।

इस बार जब वो दोनो गनमैन आकर वापस लौटे तो उन दोनो सायों की नज़रें आपस में मिलीं और फिर दोनो ही बारी बारी पेड़ के पास से निकल कर बड़ी तेज़ी से इमारत की दीवार की तरफ उस हिस्से की तरफ बढ़े जहाॅ पर लगभग पंद्रह फुट की ऊॅचाई पर एक शीशे की खिड़की थी तथा उस खिड़की के सामने ही छोटी सी बालकनी थी। खिड़की पर देखने से ऐसा प्रतीत होता था जैसे अंदर अॅधेरा हो। बालकनी में भी स्टील की रेलिंग लगी हुई थी। ये हिस्सा बॅगले के बाएॅ साइड था।

बालकनी के नीचे पहुॅचते ही एक साए ने तुरंत ही अपने हाॅथ में ली हुई रस्सी को एक हाॅथ से गोल गोल घुमाया और फिर तेज़ी से ऊपर की तरफ उछाल दिया। रस्सी बड़े वेग से लहराती हुई ऊपर की तरफ गई और रेलिंग के ऊपरी भाग से ऊपर उठ कर वापस नीचे की तरफ आने को हुई तो वो रेलिंग के दूसरे हिस्से से पर फॅस गई। हलाॅकि रस्सी के छोर पर लगे लोहे के मामूली से राॅड से आवाज़ हुई किन्तु वो आवाज़ बहुत धीमी हुई थी। क्योंकि वो राॅड स्टील में लगने के साथ ही नीचे से ऊपर की तरफ उठा तो वो बीच से निकल कर नीचे दीवार पर टकरा गया था।

"जल्दी करो।" दूसरे साए ने धीमी आवाज़ में उस पहले साए से कहा जिसने रस्सी को ऊपर बालकनी की तरफ उछाला था, बोला___"हमें पाॅच मिनट से पहले ऊपर पहुॅचना होगा। वरना वो दोनो गनमैन फिर से इधर आ जाएॅगे।"

"बस हो ही गया है।" पहले साए ने ऊपर देखते हुए अपने एक हाॅथ को हल्का सा झटका दिया। परिणामस्वरूप दीवार के पास ही झूल रहा वो मामूली सा राॅड तेज़ी से नीचे सरका और कुछ ही पलों में पहले वाले साए के हाॅथ में आ गया। राॅड के हाॅथ में आते ही उसने दूसरे साए की तरफ देख कर बोला___"गो।"

पहले साए की बात सुनते ही दूसरा साया तेज़ी से आगे बढ़ा और रस्सी के दोनो भागों को पकड़ कर पहले उसे हल्का सा अपनी तरफ खींचा। जैसे चेक कर रहा हो कि सब ठीक है कि नहीं। उसके बाद वो दोनों हाॅथों से रस्सी को थोड़ा और ऊपर से पकड़ा और फिर झूल गया। कुछ ही पलों में वो रस्सी में झूलता हुआ ऊपर बालकनी के पास पहुॅच गया। नीचे खड़ा पहला साया चारो तरफ देख रहा था। तभी ऊपर पहुॅच गए साये ने रस्सी को झटका दिया तो नीचे खड़े साए ने उसकी तरफ देखा। ऊपर पहुॅच चुके साए ने हाॅथ के इशारे से उसे ऊपर आने को कहा।

उसका इशारा मिलते ही पहला वाला साया भी रस्सी को पकड़ कर ऊपर झूलते हुए कुछ ही पलों में पहुॅच गया। उसके पहुॅचते ही दूसरे साए ने रस्सी को ऊपर खींच लिया। तभी पहले वाले साए ने नीचे देखा, वो दोनो गन मैन इसी तरफ आ रहे थे। ये देख कर दोनो साए वहीं बालकनी पर बैठ कर छिप गए। थोड़ी ही देर में उन्होंने देखा कि वो दोनो गन मैन वापस जा रहे हैं तो ये दोनो भी उठ गए।

"चलो अब काम पर लग जाओ।" दूसरे साए ने धीमी आवाज़ में कहा___"किन्तु सावधानी से।"
"जो हुकुम।" पहले साए ने अदब से सिर को हल्का सा खम करते हुए धीमी आवाज़ में कहा।

पहले वाले साए ने पलट कर खिड़की को देखा। उस खिड़की पर शीशा लगा हुआ था तथा दो पल्लों की खिड़की थी। पहले साए ने खिड़की में हाॅथ लगा कर उसे अंदर की तरफ हल्के से पुश किया तो कुछ न हुआ। मतलब साफ था खिड़की के दोनो पल्ले अंदर से बंद थे।

"ये अंदर से बंद है।" पहले वाले साए ने पलट कर दूसरे साए से कहा___"शुकर है कि हम काॅच काटने वाला हीरा लेकर आए थे, लाओ उसे।"
"ऐसे काम के लिए।" दूसरे साए ने धीरे से कहा___"ऐसी चीज़ की ज़रूरत तो पड़ती ही है।"

दूसरे साए ने कहा और अपने काले लबादे से हीरा निकाल कर पहले वाले साए के हाथ में दे दिया। हीरा लेकर पहला साया वापस मुड़ा और दाहिने पल्ले में एक हाॅथ जमा कर हीरे से पल्ले पर लगे शीशे को खास तरीके से काटना शुरू कर दिया। उसके दूसरे हाॅथ में एक अजीब सी चीज़ थी जो कि शीशे से ही चिपकी हुई थी। कुछ ही देर में शीशे का एक आयताकार टुकड़ा कट गया। पहले साए ने अपने दूसरे हाॅथ को अपनी तरफ बहुत ही सावधानी से खींचा। नतीजा ये हुआ कि वो कटा हुआ टुकड़ा उस अजीब सी चीज़ से चिपका हुआ अपनी जगह से बाहर आ गया।

अभी पहला साया उस टुकड़े को खींचा ही था कि दूसरे साए ने धीरे से कहा कि जल्दी से किन्तु सम्हल कर बैठ जाओ, क्योंकि नीचे वो दोनो गन मैन इस तरफ वापस आ गए हैं। अगर हम दोनो बालकनी में खड़े रहेंगे तो संभव है कि वो ऊपर देखें और फिर उनकी नज़र हम दोनो पर पड़ जाए। साये की बात सुन कर दोनो ही वहीं पर दुबक कर बैठ गए थे। ख़ैर कुछ ही देर बाद जब वो दोनो गन मैन वापस चले गए तो ये दोनो साए भी उठ कर खड़े हो गए।

पहले वाले साए ने काॅच का वो टुकड़ा बैठे समय ही बालकनी में एक तरफ रख दिया था। अतः अब उसने खिड़की के कटे हुए हिस्से में अपना दाहिना हाॅथ सावधानी से डाला और फिर अंदर से ही नीचे की तरफ लाकर उसने खिड़की की कुण्डी को तलाशा और उसे ऊपर उठा कर खोल दिया। उसके बाद उसने अंदर से ही दूसरे पल्ले की कुण्डी को भी खोल दिया। साये को अंदर की तरफ पर्दा लगा होने का भी पता चला। ख़ैर, अपना हाॅथ सावधानी से बाहर निकाल कर उसने खिड़की के दोनो पल्लों को अंदर की तरफ पुश किया तो हल्की सी आवाज़ हुई किन्तु दोनो ही पल्ले अंदर की तरफ खुले न। पहले साये को समझते देर न लगी कि पल्लों के अंदर की तरफ ऊपर भी कुण्डियाॅ हैं जो कि बंद हैं। अतः साए ने फिर से उसी कटे हुए भाग से अंदर हाथ डाला और फिर ऊपर हाॅथ करके ऊपर की कुण्डी को नीचे की तरफ हल्के से खिसका दिया। ऐसा ही उसने दूसरे पल्ले पर भी किया।

थोड़ी ही देर में खिड़की के दोनो पल्ले अंदर की तरफ पुश किये जाने से खुलते चले गए। ये देख कर दोनो सायों के होठों पर मुस्कान उभर आई। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि खिड़की के अंदर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कि अॅधेरा था। हलाॅकि खिड़की में अंदर की तरफ पर्दे लगे होने की वजह से भी अॅधेरे का आभास हो सकता था। अतः पहले साए ने पल्ले खोलने के बाद अॅधेरे में डूबे पड़े कमरे की तरफ अपने कान लगा दिया। कदाचित इस लिए कि वो अंदर की किसी भी चीज़ की आहट को सुन सकें। किन्तु अंदर से कोई भी बारीक से बारीक आवाज़ नहीं आ रही थी। मतलब साफ था कि कमरा पूरी तरह खाली था। उसमें किसी भी आदमी का कोई वजूद नहीं था।

पहले साए ने एक छोटी सी पेंसिल टार्च अपने लबादे से निकाली और कमरे के अंदर की तरफ एक हाॅथ से पर्दे को हटा कर उसे रौशन किया। पेंसिल टार्च के प्रकाश का हल्का सा फोकस कमरे के अंदर की हर चीज़ पर साए के द्वारा हाॅथ से घुमाने पर घूमने लगा। कमरे के बाएॅ तरफ ही एक आलीशान बेड नज़र आया। उसके कुछ ही फाॅसले पर दो सोफे रखे नज़र आए। खिड़की के नीचे लगभग तीन फुट की दूरी पर कमरे का फर्स था जिसमें बेहतरीन टाइल्स लगी हुई नज़र आई। सारी चीज़ों को देखने के बाद पहला साया आराम से पर्दा हटा कर खिड़की के रास्ते कमरे में आ गया। उसके बाद दूसरा साया भी आ गया।

कमरे में आते ही दूसरे साए ने खिड़की के दोनो पल्ले बंद किये और फिर सावधानी से पर्दा खींच दिया। उसके बाद पेंसिल टार्च की मदद से ही हर जगह को बारीकी से देखने लगे। दीवार पर लगी पेंटिंग्स से ही पता चला कि ये कमरा मंत्री के बेटे सूरज चौधरी का है। दीवार पर कई जगह उसकी खुद की भी फोटो लगी हुई थी साथ ही कई जगह ऐसी पेंटिंग्स भी लगी हुई थी जो कि लड़कियों व औरतों की नग्नता को उजागर कर रही थी।

"ज़रा चेक करो कि कमरे का दरवाजा अनलाॅक है या नहीं।" दूसरे साए ने धीरे से कहा___"और अगर अनलाॅक है तो तुम यहाॅ से उस कमरे में जाने की कोशिश करो जो कमरा खुद मंत्री का हो। वहाॅ जा कर बारीकी से हर चीज़ को देखो। इस वक्त मंत्री अपने इस आवास पर नहीं है। किसी ज़रूरी काम से बाहर गया हुआ है। फिर भी ज़रा सावधानी से काम लेना। अब जाओ।"

दूसरे साए की बात सुन कर पहला साया कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ा। दरवाजे के पास पहुॅच कर उसने दरवाजे के हैण्डल को पकड़ कर घुमाया मगर वह घूमा नहीं। इसका मतलब कमरा बाहर से लाॅक था। बात भी जायज़ थी, मंत्री का बेटा तो यहाॅ था नहीं इस लिए मंत्री ने या फिर उसके किसी कर्मचारी ने इस कमरे को बाहर से लाॅक कर दिया होगा। ख़ैर, दरवाजे को लाॅक जान कर वो साया पलट कर दूसरे साए के पास आया और उसे बताया कि दरवाजा बाहर से लाॅक है। उसकी बात सुन कर दूसरे साए ने अपने लबादे से निकाल उसके हाॅथ में कोई चीज़ दी।

पहले साए ने पेंसिल टार्च की रोशनी में उस चीज़ को देखा तो अनायास ही उसके होठों पर मुस्कान उभर आई। दरअसल वो चीज़ "मास्टर की" थी। फिर क्या था, मास्टर की लेकर पहला साया तुरंत दरवाजे के पास गया और दरवाजे पर लगे हैण्डिल के कीहोल में उस मास्टर की को डाला और विपरीत दिशा में घुमा दिया। नतीजा ये हुआ कि दरवाजा अनलाॅक हो गया। ये देख कर वो साया एक बार फिर मुस्कुराया और फिर दरवाजे को अपनी तरफ सावधानी से खींचा। दरवाज़े के बाहर गैलरी थी जो कि एलईडी ट्यूब लाइट तथा बल्बों के प्रकाश से रौशन थी।

बाहर बल्बों का प्रकाश देख कर साया अपनी जगह रुक गया। कदाचित वो सोचने लगा था कि रोशनी में वो आगे कैसे बढ़े? किन्तु शायद बढ़ना ज़रूरी था। अतः उसने दरवाजे से अपना सिर बाहर निकाल कर गैलरी के दोनों तरफ देखा। गैलरी पूरी तरह सुनसान पड़ी थी। हलाॅकि गैलरी बहुत लम्बी नहीं थी, बल्कि कुछ ही दूरी पर वो विपरीत दिशा में मुड़ गई थी। साये ने कुछ देर सोचने में लगाया और फिर बड़ी सावधानी से दरवाजे से बाहर गैलरी में आ गया। सनसान गैलरी पर सावधानी से चलते हुए वो मोड़ तक आ गया। मोड़ पर ठिठक कर उसने दूसरी तरफ की किसी भी आहट को सुनने के लिए दीवार के किनारे की तरफ अपना कान सटा दिया।

थोड़ी ही देर में वह अपनी जगह से हिला और गैलरी के मोड़ पर मुड़ गया। किन्तु थोड़ी ही दूर जाने के बाद उसे वापस लौटना पड़ा क्योंकि आगे गैलरी समाप्त थी। आगे कोई रास्ता नहीं था। साये को समझ आ गया कि वह दूसरी तरफ आ गया है। तभी तो उसे यहाॅ पर कहीं कोई दूसरे कमरे का दरवाजा नहीं दिखा था। ख़ैर, वापस उसी जगह आकर वह दूसरी साइड वाली गैलरी की तरफ बढ़ चला। आठ दस कदम चलने के बाद ही उसे अंदर की तरफ वाली बालकनी की रेलिंग नज़र आई। रेलिंग के पास पहुॅच कर उसने देखा कि बालकनी दोनो तरफ थी लगभग बीस कदम की दूरी पर उसे नीचे जाने के लिए सीढ़ियाॅ नज़र आई। रेलिंग के दूसरी तरफ नीचे काफी बड़ा ड्राइंगरूम नज़र आया। अपने स्थान पर खड़ा साया कुछ देर तक कुछ सोचता रहा फिर वह बाएॅ साइड की तरफ बढ़ चला। कुछ ही दूरी पर उसे एक और गैलरी नज़र आई। उसने गैलरी की तरफ देखा तो उसे एक कमरे का दरवाजा नज़र आया। दरवाज़ा देख कर वह तेज़ी से उसकी तरफ बढ़ा। थोड़ी ही देर में वो दरवाजे के पास पहुॅच गया। दरवाजे के हैण्डिल को पकड़ कर उसने उसे घुमाया तो पता चला कि वो लाॅक है। ये देख कर उसने फौरन ही अपने लबादे से वो मास्टर की निकाली और की होल में चाभी डाल कर घुमा दिया। दरवाजा हल्की सी आवाज़ के साथ खुल गया।

उसने बहुत ही आहिस्ता से दरवाजे को अंदर की तरफ पुश किया तो पता चला अंदर अॅधेरा है। साया कुछ देर तक किसी तरह की आवाज़ को सुनने की कोशिश करता रहा मगर कोई आवाज़ उसे अंदर की तरफ से सुनाई नहीं दी। ये महसूस कर उसने लबादे से पैंसिल टार्च निकाली और उसके प्रकाश को कमरे के अंदर की तरफ फोकस किया। फोकस जिस चीज़ पर पड़ा वो बेड था। किन्तु बेड पर कोई इंसान सोया हुआ नज़र न आया। साया बेख़ौफ अंदर दाखिल हो गया। कमरे के अंदर हर चीज़ को उसने पैंसिल टार्च की रोशनी में देखा। मगर उसे ऐसा कुछ नज़र न आया जिसे शायद उसे तलाश थी।

लगभग दस मिनट बाद वह कमरे से वापस बाहर आ गया। अभी वह दरवाजे से बाहर निकला ही था किसी से टकरा गया। किसी दूसरे ब्यक्ति के होने की आशंका से ही वह बुरी तरह हड़बड़ा गया। किन्तु जैसे ही टकराने वाले पर उसकी नज़र पड़ी तो सामान्य हो गया। टकराने वाला वो दूसरा साया था जो उसके साथ ही यहाॅ इस तरह आया था।

"क्या हुआ?" उस दूसरे साये ने धीमी आवाज़ से पूछा___"कुछ मिला क्या??"
"नहीं।" पहले वाले ने कहा___"अभी तो यही नहीं पता चल रहा कि मंत्री का निजी कमरा कौन सा है? वो यहाॅ ऊपर है या फिर नीचे है।"

"पता तो करना ही पड़ेगा।" दूसरे साए ने कहा___"मंत्री के परिवार में उसके दो बच्चे ही हैं। बीवी कुछ साल पहले ही ईश्वर को प्यारी हो चुकी है। ख़ैर, इस वक्त क्योंकि मंत्री अपने आवास पर नहीं है इस लिए ये बॅगला अंदर से खाली ही है। बाहर गनमैन तैनात हैं। हमें जल्द से जल्द मंत्री के कमरे को ढूॅढ़ना होगा।"

"ठीक है।" पहले वाले ने कहा___"मैं नीचे की तरफ चेक करता हूॅ।"
"ओके।" दूसरे वाले ने कहा___"अगर तुम्हें या मुझे मंत्री का कमरा मिलता है तो तुरंत फोन पर मिस काल देना है। फोन बाइब्रेशन पर है अतः बाइब्रेशन से ही पता चल जाएगा। अब जाओ तुम।"

दूसरे साए की बात सुन कर पहला साया सीढ़ियों की तरफ तेज़ी से बढ़ गया। आख़िर काफी मसक्कत के बाद मंत्री का कमरा मिल ही गया। मंत्री का कमरा नीचे ही था। पहले साये ने दूसरे साये को फोन पर मिस काल देकर सूचित कर दिया। थोड़ी ही देर में वो दोनो मंत्री के कमरे में थे।

मंत्री चूॅकि बॅगले में नहीं था इस लिए बॅगले के अंदर कोई था ही नहीं। बॅगले के बाहर गनमैन ज़रूर तैनात थे किन्तु उनमें से किसी को भी इस बात का अंदेशा नहीं था कि बॅगले के अंदर दो चोर बड़ी सफाई से उनकी ऑखों में धूल झोंक कर घुस चुके हैं। ख़ैर, दोनो सायों ने मंत्री के कमरे में जाकर सबसे पहले तो दरवाजे को अंदर से बंद किया उसके बाद जिस काम के लिए आए थे उस काम में लग गए। कमरे में पहले से ही नाइट बल्ब जल रहा था। किन्तु पहले वाले साए ने तेज़ रोशनी के लिए मेन बल्ब भी जला दिया। अब कमरे में तेज़ प्रकाश था तथा कमरे में रखी हर चीज़ स्पष्ट नज़र आने लगी थी।

दोनो ने बहुत ही बारीकी से हर चीज़ को देखना शुरू कर दिया। दोनो के हाव भाव से ऐसा लग रहा था जैसे वो इस काम में काफी माहिर हों। लगभग बीस मिनट की मेहनत के बाद वो दोनो ही इस तरह एक दूसरे के पास खड़े हो गए जैसे किसी चीज़ के न मिलने से बेहद चिंतित व परेशान हो गए हों।

"लगता है यहाॅ कुछ नहीं है।" पहले साए ने धीमी आवाज़ से कहा___"मंत्री ने उन चीज़ों को ज़रूर किसी ऐसी जगह छुपाया होगा जहाॅ पर वो चीज़ें किसी बाहरी आदमी को किसी सूरत में न मिल सकें।"

"वो चीज़ें ऐसी हैं भी नहीं जो इतनी आसानी से हमें मिल जाएॅगी।" दूसरे साये ने कहा___"ऐसी चीज़ों को तो हर इंसान सात तिज़ोरियों के अंदर ही छुपा कर रखता है। इस लिए हमें ऐसी ही किसी जगह को तलाश करना होगा जहाॅ पर हमारी नज़रें पड़ी तो हों किन्तु हमने उस जगह को अंजाने में नज़रअंदाज़ कर दिया हो।"

"हाॅ ये भी सही कहा।" पहले साए ने इधर उधर नज़रें घुमाते हुए कहा___"तो ठीक है एक बार फिर से हम हर जगह बारीकी से चेक करते हैं। संभव है कि इस बार हमारे हाॅथ कुछ लग ही जाए।"

पहले साए की बात सुन कर दूसरे साए ने सहमति में सिर हिलाया और फिर से वो हर जगह का बारीकी से मुआयना करने में लग गया। कमरे में मौजूद हर चीज़ बेसकीमती थी। फिर चाहे वो मंत्री का बेड हो, सोफे हों, फर्श में बिछा कालीन हो या फिर दीवारों पर लगी पेंटिंग्स।

पहला साया बेड के दाहिने साइड की दीवार की तरफ देख रहा था। उस दीवार पर हर दीवार की तरह ऊॅचाई पर पेंटिंग्स लगी हुई थी किन्तु पेंटिंग्स के नीचे दीवार पर नीचे से लगभग छः फुट की ऊॅचाई पर ऐसे नक्काशी की गई थी जैसे किसी बड़े से आदम कद शीशे के फ्रेम पर खूबसूरत नक्काशी की हुई होती है। दरअसल दीवार पर वो एक फ्रेम जैसा ही कुछ बना हुआ था। किन्तु फ्रेम के अंदर का भाग खाली था। यानी कि उसमें कोई चित्र वगैरह नहीं बना हुआ था। बल्कि ऐसा लगता था जैसे कि किसी बड़ी सी चीज़ का सिर्फ फ्रेम बना दिया गया हो। पहला साया दीवार में बने उस खाली फ्रेम को बड़े ध्यान से देखने लगा। एकाएक ही उसकी ऑखें सिकुड़ीं। उसने तुरंत ही दीवार के इधर उधर किसी खास चीज़ की तलाश में अपनी नज़रें दौड़ाईं।

दीवार पर बने उस फ्रेम के बाईं तरफ एक मध्यम साइज़ की पेंटिंग लगी हुई थी। पहला साया जाने क्या सोच कर उस पेंटिंग की तरफ बढ़ा। पेंटिंग के पास पहुॅच कर उसने अपने एक हाॅथ से पेंटिंग के फ्रेम को पकड़ कर बाईं तरफ किया। पेंटिंग के निचले भाग के बाईं तरफ होते ही जो चीज़ नज़र आई उसे देख कर साये की ऑखें पहले तो हैरत से फटीं फिर एकाएक ही उनमें चमक आ गई। उसने तुरंत ही पलट कर दूसरे साये को धीमी आवाज़ देकर अपने पास बुलाया।

दूसरे साये के पास आते ही उसने उस साये को भी पेंटिंग के पीछे दीवार पर नज़र आ रही उस चीज़ को दिखाया। दरअसल वो चीज़ एक छोटे से कम्प्यूटर के माॅनीटर जैसी थी। ऊपरी तरफ दीवार से चिपकी हुई स्क्रीन और स्क्रीन के नीचे कीबोर्ड। स्क्रीन के ऊपरी भाग पर दो कलर की बत्तियाॅ थीं। जिनमें से एक हरी तथा दूसरी लाल कलर की थी। लाल कलर वाली बत्ती इस वक्त रौशन थी। स्क्रीन पर लिखा था "प्लीज इन्टर योर पासवर्ड"।

"मुझे लगता है कि।" पहले साए ने धीमे स्वर में कहा___"ये किसी ऐसी जगह के लिए है जहाॅ पर जाने के लिए इसमें सबसे पहले पासवर्ड डालना पड़ता है।"
"बिलकुल ठीक कहा तुमने।" दूसरे साये ने दीवार पर इधर उधर नज़र दौड़ाते हुए कहा____"किन्तु यहाॅ पर ऐसा तो कुछ नज़र नहीं आ रहा जिससे ऐसा प्रतीत होता हो कि यहाॅ से कहीं दूसरी जगह जाने का कोई रास्ता हो।"

"ज़रा इस चीज़ को देखिए।" पहले साए ने दाहिनी तरफ दीवार पर नज़र आ रहे उस खाली फ्रेम की तरफ इशारा करते हुए कहा___"इस दीवार पर ये छः फीट ऊॅचा तथा साड़े तीन फीट चौड़ा फ्रेम भला किस उद्देश्य से बनवाया गया होगा? अगर ये मान कर चलें कि ये दीवार पर महज शोभा बढ़ाने के लिए बनवाया गया है तो फिर इसी तरह के सेम फ्रेम दो तरफ की दीवारों पर भी बने होने चाहिए थे। एक तरफ तो कमरे का दरवाजा है। अतः उस तरफ ना भी बनवाया जाता तो कोई बात न थी। किन्तु ऐसा फ्रेमनुमा डिजाइन सिर्फ इसी एक तरफ की दीवार पर क्यों बनवाया गया हो सकता है?"

"यकीनन तुम्हारी बात में प्वाइंट है।" दूसरे साए ने दीवार पर बने उस फ्रेम की आकृति को गौर से देखते हुए कहा___"अगर इस स्क्रीन से ये पता चलता है कि ये किसी चीज़ के लिए पासवर्ड माॅग रहा है तो ये भी हो सकता है कि यहाॅ पर कोई ऐसी जगह हो सकती है जहाॅ जाने के लिए हमें इसमें पासवर्ड डालना होगा। इसका मतलब ये हुआ कि यहाॅ पर कहीं कोई दूसरी जगह भी है जहाॅ जाने का रास्ता बना होगा। जोकि फिलहाल हमें नज़र नहीं आ रहा। हलाॅकि ऐसा भी हो सकता है कि ये माॅनीटर सिस्टम किसी और ही चीज़ के लिए हो।"

"बिलकुल हो सकता है।" पहले साए ने कहा___"किन्तु इस कमरे में ऐसे खास सिस्टम का उपयोग भला किस चीज़ के लिए हो सकता है? मुझे लगता है कि ये इलेक्ट्रिक सिस्टम लगाया ही इस लिये गया है कि इसके माध्यम से ही हमें कहीं जाने का रास्ता नज़र आए। कहने का मतलब ये कि अगर हम इस स्क्रीन पर सही पासवर्ड डाल दें तो मुमकिन है कि किसी जगह जाने का रास्ता नज़र आ जाए या फिर रास्ता ही बन जाए। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि कुछ और ही हो जाए।"

"हाॅ ये सही कहा तुमने।" दूसरे साए ने कहने के साथ ही दीवार पर बने उसी फ्रेम की तरफ पुनः देखा___"कहीं ऐसा तो नहीं कि ये फ्रेम ही वो रास्ता हो। बेशक ऐसा ही हो सकता है क्योंकि ये फ्रेम नीचे फर्श से ऊपर की तरफ है। दूसरी बात इसका साइज बिलकुल वैसा ही है जैसे किसी दरवाजे का होता है। वरना सोचने वाली बात है कि अगर ऐसा कोई फ्रेम सिर्फ कमरे की शोभा बढ़ाने के लिए बनाया गया होता तो ये फर्श से लगा हुआ नहीं होता बल्कि फर्श से एक या दो फीट की ऊॅचाई से बना हुआ होता। तीसरी बात ये बनाया ही इस तरह गया है कि आम इंसान इसे देख कर यही समझेगा कि ये सिर्फ एक फ्रेम ही है जो कि कमरे की शोभा बढ़ाने के लिए एक तरफ की दीवार पर बनाया गया है।"

"इसका मतलब कि ये साबित होता हुआ नज़र आ रहा है कि ये फ्रेम कहीं जाने का दरवाजा ही है।" पहले साये ने कहा___"और ये तभी खुलेगा जब हम इस इलेक्ट्रिक सिस्टम में पासवर्ड डालेंगे?"

"करेक्ट।" दूसरे साये ने कहा____"अब सवाल ये है कि इसका पासवर्ड क्या होगा?"
"इसका कीबोर्ड बिलकुल वैसा ही है जैसे किसी कम्प्यूटर का होता है।" पहले साये ने उस स्क्रीन से लगे ही कीबोर्ड की तरफ देखते हुए कहा___"इसका पासवर्ड किसी के नाम से अथवा किन्हीं संख्याओं से भी हो सकता है।"

"बेशक हो सकता है।" दूसरे साए ने कहा___"और ये हमारे लिए काफी चिंता का विषय भी हो गया है। क्योंकि अगर हमें इसका सही पासवर्ड न मिला तो ये दरवाजा नहीं खुलेगा। मुझे पूरा यकीन है कि इस दरवाजे के पार ही ऐसी वो जगह है जहाॅ पर हमें वो चीज़ें मिल सकती हैं जिसके लिए हम यहाॅ आए हैं। हलाॅकि ये सिर्फ हमारा अंदेशा ही है कि यहाॅ पर कोई दरवाजा हो सकता है जहाॅ पर जाने के लिए ये इलेक्ट्रिक सिस्टम लगाया गया है। ऐसा भी हो सकता है कि इसका उपयोग इसके अलावा भी किसी और चीज़ के लिए हो। किन्तु एक बार चेक तो करना ही चाहिए हमें। संभव है कि वैसा ही हो जैसे का हमें अंदेशा है।"

"कुछ भी हो सकता है। मगर चेक तो यकीनन करना ही पड़ेगा। ख़ैर, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इसका पासवर्ड यहीं कहीं मौजूद हो?" पहले साये ने कहा___"मेरे कहने का मतलब है कि इसका पासवर्ड मंत्री ने आलमारी में ही कहीं छुपा कर रखा हुआ हो। मैं ऐसा ये सोच कर कह रहा हूॅ कि जब ये सिस्टम लगवाया गया होगा तब इसका सबकुछ नया नया ही रहा होगा। शुरू शुरू में किसी भी चीज़ का पासवर्ड हमें इतना जल्दी याद नहीं होता और अगर याद हो भी गया तो उसके भूल जाने के चान्सेस ज्यादा रहते हैं। ऐसा हम सबके साथ होता है। इस लिए ऐसा मुमकिन है कि जैसे हम किसी चीज़ का पासवर्ड अलग से लिख कर उसे सम्हाल कर रख लेते हैं वैसे ही मंत्री ने भी किया हो।"

"सही कहा तुमने।" दूसरे साये ने कहा___"ऐसा हो सकता है। मंत्री ने इसका पासवर्ड यहीं कहीं छुपा कर रखा होगा। अतः हम कमरे में रखी इन आलमारियों की तलाशी लेते हैं।"

दूसरे साये की बात सुन कर पहले साये ने हाॅ में सिर हिलाया और फिर दोनो ही कमरे में रखी तीन तीन आलमारियों की तरफ बढ़े। उन तीन आलमारियों में एक अनलाॅक थी जबकि बाॅकी की दो आलमारियाॅ लाॅक थी। दोनो ने एक एक लाॅक आलमारी को सम्हाल लिया। मास्टर की से दोनो आलमारियों को अनलाॅक किया और फिर उसके अंदर तलाशी अभियान शुरू कर दिया।

दोनो ही आलमारियों में कई तरह के काग़जात भरे पड़े थे। जिन्हें उलट पलट कर वो दोनो ही साये बारीकी से देख रहे थे। किन्तु उन कागजातों में उन्हें उस सिस्टम का पासवर्ड जैसा कुछ न मिला। आलमारी के अंदर ही एक और लाॅकर था जोकि बंद था। उन दोनों ने उन लाॅकरों को भी मास्टर की से खोला। अंदर वाले लाॅकर्स में काफी सारी ज्वेलरी तथा बैंक की काॅपी पासबुक वगैरह थी तथा काफी सारे नोटों के बंडल भी थे।

तभी दूसरे साये को उस लाॅकर से कुछ मिला जिसे उसने लाॅकर से बाहर निकाला। वो एक डायरी थी। दूसरे साये ने उस डायरी को खोल कर उसके हर पेज को बारीकी से देखना शुरू कर दिया। उसमें काफी कुछ चीज़ें लिखी हुई थी। काफी सारे पेज़ देखने के बाद सहसा एक पेज पर साये की नज़र ठहर गई।

"मिल गया।" साये के मुख से ज़रा ऊॅची आवाज़ निकल गई। मारे खुशी के उसे होश ही नहीं रह गया था कि वो दोनो इस वक्त मंत्री के बॅगले में चोर की हैंसियत से आए हुए हैं। वो तो शुकर था कि बॅगले के अंदर कोई था नहीं वरना उसकी इस आवाज़ से ज़रूर किसी न किसी को पता चल जाता। ख़ैर उसकी आवाज़ से और तो किसी को पता न चला किन्तु पहला साया ज़रूर चौंक कर उसकी तरफ देखने लगा था। दूसरे साये को भी तुरंत ही ख़याल आ गया था कि खुशी के आवेश में उसके मुख से कुछ ज्यादा ही ऊॅची आवाज़ निकल गई थी। दोनो ही कुछ देर अपनी साॅसें रोंके खड़े रहे।

पहला साया दूसरे वाले के पास आया और फिर उसकी तरफ देख कर बोला___"बाहर जो गनमैन तैनात हैं उन्हें यहाॅ बुलाना है क्या?"
"साॅरी।" दूसरा साया बोला___"मारे खुशी के याद ही नहीं रह गया था कि हम यहाॅ चोर बन कर आए हुए हैं। ख़ैर, ये देखो। हमें जिसकी तलाश थी वो इस डायरी में है। तुम्हारा कहना बिलकुल सही था कि मंत्री ने उस सिस्टम का पासवर्ड अलग से कहीं लिख कर छुपाया हुआ होगा।"

"तो फिर देर किस बात की है?" पहले साये ने धीमें स्वर में मुस्कुराते हुए कहा___"हमें यहाॅ पर आए हुए काफी समय हो गया है। इस लिए अब हमें जल्दी जल्दी अपने काम को अंजाम देना होगा। ऐसा न हो कि मंत्री वापस लौट आए यहाॅ। साला दुर्भाग्य को कोई नहीं जानता कि कब किसके सिर पर आ धमके।"
"सही कहा तुमने।" दूसरे साये ने कहा___"आओ फिर शुरू करते हैं।"

कहने के साथ ही दूसरा साया उस सिस्टम की तरफ बढ़ चला, उसके पीछे पीछे ही पहला साया भी बढ़ चला था। सिस्टम के पास पहुॅच कर दूसरे साये ने डायरी पर लिखे पासवर्ड को सिस्टम पर बड़ी सावधानी से डाला और फिर इंटर का बटन दबा दिया। इन्टर का बटन दबाते ही स्क्रीन के ऊपर लगी हरी बत्ती जल उठी साथ ही स्क्रीन पर "वैलकम" लिखा नज़र आया। ये देख कर वो दोनो साये अभी मुस्कुराये ही थे कि तभी उनके दाहिनी तरफ हल्की सी आवाज़ हुई। दोनो ने पलट कर उस तरफ देखा।

दीवार में जिस जगह वो फ्रेम बना हुआ था उसी फ्रेम के बीचों बीच से एक दरवाजा खुलता हुआ अंदर की तरफ जाने लगा था। वो एक ही पल्ले का मोटा सा दरवाजा था। जो बंद होने पर बिलकुल दीवार की तरह ही नज़र आता था। कुछ ही पलों में वो दरवाजा पूरा खुल कर दाहिने साइड हो गया। दरवाजे के उस तरफ अॅधेरा था जो कि इस तरफ के उजाले से थोड़ा दूर हो गया था। दोनो ही साये दरवाजे के पास आकर खड़े हो गए। दरवाजे से आगे लगभग तीन फीट पर फर्श था उसके बाद नीचे जाने के लिए सीढ़ियाॅ नज़र आ रही थीं।

"कमाल है।" पहला साया बोल पड़ा___"ये तो बेसमेंट लगता है। कोई सोच भी नहीं सकता था कि यहाॅ पर ऐसा कुछ हो सकता है।"
"ऐसे लोग।" दूसरे साये ने कहा____"ऐसे कामों के लिए ऐसी ही जगहों का ज्यादातर चुनाव करते हैं और इससे सेफ्टी भी रहती है। वरना खुद सोचो कि कोई दूसरा यहाॅ तक कैसे पहुॅच जाएगा? ख़ैर छोंड़ो, आओ इसके अंदर चलते हैं।"

"मुझे लगता है कि।" पहले साये ने कहा___"हम में से किसी एक को ही अंदर जाना चाहिए जबकि किसी एक को यहीं पर रहना चाहिए। क्योंकि ऐसा भी हो सकता है कि बाहर तैनात गनमैनों में से कोई बॅगले के अंदर ये सोच कर आ जाए कि एक बार अंदर की तरफ का हाल चाल भी देख लिया जाए। अतः अगर ऐसी वैसी कोई बात होती है तो कम से कम हम में से कोई एक यहाॅ रह कर उसे सम्हालने की कोशिश तो करेगा।"

"ये भी सही कहा तुमने।" दूसरे साये ने कहा___"तो ठीक है तुम यहीं रहो। इसके अंदर जाने का काम अब मेरा है।"
"ओके बेस्ट ऑफ लक।" पहले साए ने कहने के साथ ही अपने दाहिने हाॅथ का अॅगूठा दिखाया उसे___"लेकिन हाॅ ज़रा सम्हाल कर।"

दूसरे साये ने हाॅ में सिर हिलाया और दरवाजे के उस पार बढ़ चला। उस पार के फर्श पर आकर वह ठिठका और दोनो तरफ देखा तो उसे बाईं तरफ दीवार पर एक स्विच नज़र आया। उसने उस स्विच को पहले ध्यान से देखा उसके बाद उसने हाॅथ बढ़ा कर स्विच का बटन दबा दिया। परिणामस्वरूप सीढ़ियों के ऊपर लगी एक ट्यूबलाइट रौशन हो गई। अब वहाॅ पर काफी प्रकाश था।

दूसरा साया सामने की तरफ मुड़ कर बड़ी सावधानी से सीढ़ियों पर उतरता चला गया। जबकि कमरे में दीवार के पास ही खड़ा पहला साया उसे जाते हुए देखता रहा। उसके दिल की धड़कनें अनायास ही बढ़ गईं थी। उधर कुछ ही पलों में दूसरा साया सीढ़ियाॅ उतर कर बेसमेंट में पहुॅच गया। नीचे की लास्ट सीढ़ी से थोंड़ी ही दूरी पर दाहिनी तरफ की दीवार में एक और स्विच नज़र आया। साये ने उस स्विच का बटन ऑन कर बेसमेंट की लाइट जला दी। लाइट के जलते ही बेसमेंट में तीब्र प्रकाश फैल गया।

तीब्र रौशनी में बेसमेंट की हर चीज़ स्पष्ट नज़र आने लगी थी। किन्तु जिस खास चीज़ पर साये की नज़र पड़ी उसे देख कर उसकी ऑखें फटी की फटी रह गईं। बेसमेंट काफी बड़ा था। ऐसा लगता था जैसे ये कोई लम्बा चौड़ा हाल हो। चारो तरफ की दीवारों पर अलग अलग चीज़ों का क्रमशः स्टाक था यहाॅ। किन्तु सबसे खास चीज़ ये थी कि हाल के सामने अंतिम छोर के फर्स पर ही एक बड़ी सी ट्राली थी जिसके ऊपर दो हज़ार के तथा पाॅच सौ के नोटों के बंडल नीचे से ऊपर की तरफ रखे हुए थे। ये सब न्यू करेन्सी थी। जोकि पाॅलिथिन में बंद थी। इतने सारे रुपये को देख कर किसी की भी ऑखें फटी की फटी रह जातीं। उस ट्राली के आगे दीवार से सटे स्टील के खाॅचे बने हुए थे जिनके दो खाॅचों में चमचमाते हुए गोल्ड के बिस्किट रखे हुए थे। बिस्किट के वो दोनो ही खाॅचे पारदर्शी शीशे से बंद थे। बाॅकी के खाॅचों में लकड़ी के बाक्स थे। फर्श पर भी काफी सारे बाॅक्स रखे हुए थे।

ये सारी चीज़ें देख कर साये की ऑखें फटी हुई थी। किन्तु जल्द ही उसने खुद को मानो सम्हाला और आगे की तरफ बढ़ चला। लकड़ी के एक बाक्स के पास पहुॅच कर उसने बाक्स के ऊपर लगे लकड़ी के ही ढक्कन रूपी पटरे को पकड़ कर अपनी तरफ खींच कर उसे निकाला। ढक्कन के हटते ही बाक्स में रखी हुई जो चीज़ नज़र आई उसे देख कर साये की ऑखें एक बार पुनः हैरत से फैलीं। बाक्स में एक जैसी कई सारी गन रखी हुई थी। मतलब साफ था कि यहाॅ पर जितने भी ऐसे बाक्स थे उन सब में तरह तरह की गन्स ही थीं।

साये ने चारो तरफ नज़र घुमा कर बारीकी से देखना शुरू कर दिया। दाएॅ तरफ एक केबिन जैसा बना हुआ था। साया उस तरफ बढ़ गया। केबिन में पहुॅच कर उसने देखा कि ये एक छोटा सा केबिन है जिसमें एक तरफ ऊॅची सी मेज थी तथा मेज के ऊपर एक कम्प्यूटर रखा हुआ था। मेज में कई सारे दराज थे। साये ने एक एक करके सभी दराज को खोल कर देखा। उन सब में कई तरह की रसीद व काग़जात थे तथा कई सारी फाइलें भी थीं। साये ने उन सभी फाइलों को बारीकी से देखना शुरू कर दिया।

फाइलों में से कुछ फाइलों को उसने अलग करके एक तरफ रखा। उसके बाद उसने एक नज़र कम्प्यूटर पर डाली। कुछ देर तक वह उसे देखते हुए सोचता रहा। फिर वह अलग की हुई फाइलों को लेकर केबिन से बाहर आ गया। जैसा कि बताया जा चुका है कि बेसमेंट काफी बड़ा था। साया हर जगह जा जा कर बारीकी से देखने लगा। तभी एक तरफ उसे एक बड़ा सा दरवाजा नज़र आया। ये दरवाजा ठीक वैसा ही था जैसा कि बेसमेंट में आने के लिए उस कमरे में था। इस दरवाजे के बाईं तरफ वैसा ही एक और सिस्टम लगा हुआ था। जिसमें पासवर्ड डालने के लिए स्क्रीन पर "प्लीज इन्टर योर पासवर्ड" लिखा हुआ था। साये ने कुछ सोचते हुए अपने लबादे से एक छोटा सा मोबाइल निकाला और उसमें से हरा बटन दबाया। हरा बटन दबाते ही उसमें डायल काल की लिस्ट में एक ही नंबर दिखा जिसे उसने पुनः हरा बटन दबा कर डायल कर दिया। डायल करते ही मोबाइल को कान से लगा लिया उसने, कुछ ही सेकण्ड में दूसरी तरफ से काल रिसीव किया गया।

"यहाॅ पर वैसा ही एक और दरवाजा है।" काल रिसीव किये जाने पर साये ने तुरंत बिना किसी भूमिका के धीमे स्वर में कहा___"अतः तुम उस डायरी में देखो कि क्या इसका भी पासवर्ड उसमें है या फिर इन दोनो दरवाजों का एक ही पासवर्ड है। जल्दी से देख कर मुझे बताओ।"

उधर यकीनन पहला वाला साया ही था। दूसरे साये को अपने कान में कुछ देर सुरसराहट की आवाज़ आती रही उसके बाद कुछ कहा गया। जिसके जवाब में साये ने कहा___"ओह एक मिनट।"

कहने के साथ ही ये साया दरवाजे के बाएॅ साइड दीवार पर लगे सिस्टम के पास तेज़ी से गया। सिस्टम के पास पहुॅचते ही बोला___"हाॅ अब बताओ।"

उधर से शायद पहला वाला साया इस साये को पासवर्ड बता रहा था जिसे ये वाला साया उसके बताने के साथ ही कीबोर्ड पर अपनी एक उॅगली से पंच करता जा रहा था। थोड़ी ही देर में साये के द्वारा "इन्टर" का बटन दबाए जाते ही सिस्टम पर लगी हरी बत्ती जल उठी। बत्ती के जलते ही वो दरवाजा हल्की आवाज़ के साथ इस तरफ ही खुलता चला गया। दूसरी तरफ अॅधेरा था जोकि इधर की रौशनी से हल्का सा दूर हो गया। हल्की रोशनी होते ही सामने सींढ़ियाॅ नज़र आईं जो कि ऊपर की तरफ जा रही थी। साया उन सीढ़ियों को देख कर पहले कुछ देर कुछ सोचा फिर आगे बढ़ कर उन सीढ़ियों पर चढ़ता चला गया। सीढ़ी के ऊपर आकर उसने देखा कि सामने एक और दरवाजा है किन्तु ये दरवाजा लोहे का था। दरवाजे के निचले भाग की दरार में हल्की रोशनी दिख रही थी। मतलब साफ था दरवाजे के दूसरी तरफ कुछ और भी था किन्तु क्या? इस सवाल का जवाब तो उस तरफ पहुॅच कर ही मिल सकता था।

साये ने देखा कि दरवाजा इस तरफ से ही बंद है। क्योंकि मोटा सा ताला कुण्डे पर झूल रहा था। ऐसा ताला साये ने पहली बार ही देखा था। कुण्डे के पास ही एक छिद्र था, वो छिद्र ऐसा था जैसे कीहोल हो। यानी कि ये दरवाजा दो तरह से लाॅक था। साये ने झुक कर कीहोल से अपनी एक ऑख सटा दी। दूसरी तरफ काफी उजाला था तथा उस उजाले में ही उसे ऐसा नज़र आया जैसे उस तरफ कोई फैक्ट्री हो। कुछ लोग भी उस तरफ नज़र आए। जिनमें कुछ आम आदमियों के साथ साथ हाॅथों में गन लिए कुछ गार्ड्स भी थे।

उस तरफ का नज़ारा देख कर साये ने कीहोल से अपनी ऑख हटा ली। उसके बाद वह एक पल के लिए वहाॅ नहीं रुका बल्कि पलट कर वापस चल दिया। बेसमेंट में आकर उसने दरवाजे को बड़ी सावधानी से बंद किया। दरवाजा जैसे ही पूरा बंद हुआ वैसे ही बगल से दीवार पर लगे उस सिस्टम के स्क्रीन पर "डोर हैज बीन क्लोज्ड" लिखा नज़र आया और साथ ही ऊपर लगी लाल बत्ती जल उठी। लाल बत्ती के जलते ही स्क्रीन पर फिर से "प्लीज इन्टर योर पासवर्ड" लिख गया।

कुछ ही देर में बेसमेंट से चलता हुआ वो साया सीढ़ियों के पास आया और फिर सीढ़ियाॅ चढ़ते हुए कमरे में पहले वाले साये के पास आ गया। दरवाजे को बंद करने के बाद उसने पहले गहरी गहरी साॅसें ली। उसके बाद उसने पहले साए की तरफ देखा तो हल्के से चौंका।

"ये क्या है?" दूसरे साये ने पहले साये के हाॅथ में बैग देख कर पूछा।
"इसमें मंत्री का लैपटाॅप है।" पहले साये ने कहा___"ये मुझे इस बेड के नीचे बने बाक्स में मिला है। मैने इसे अभी देखा नहीं है। हो सकता है कि इसमें भी पासवर्ड वाला चक्कर हो इस लिए इसे हम अपने साथ ही ले चलेंगे।"

"ये बहुत अच्छा हुआ।" दूसरे साए ने कहा___"मंत्री के लैपटाॅप में भी काफी कुछ मसाला मिल सकता है। ख़ैर, इन फाइलों को भी इस बैग में डाल लो। उसके बाद हमें तुरंत यहाॅ से निकलना है। अब यहाॅ पर ज्यादा देर रुकना ठीक नहीं है।"
"ठीक है।" पहले साए ने कहने के साथ ही बैग को बेड पर रखा और दूसरे साये से फाइलें लेकर बैग में डाल लिया।

उसके बाद ये दोनो ही शातिर चोर जिस तरह छुपते छुपाते हुए यहाॅ बड़ी होशियारी से आए थे वैसे ही यहाॅ से निकल भी गए। बालकनी से जब दोनो नीचे ज़मीन पर उतर आए तो बालकनी में इनकी वो रस्सी ही फॅस गई। वो तो शुकर था कि इस तरफ आने वाले वो दोनो गनमैन इस तरफ आए ही नहीं। वरना उन्हें बालकनी की रेलिंग से झूलती हुई ये रस्सी ज़रूर दिख जाती और ये दोनो भी। ख़ैर दोनो ने किसी तरह उस रस्सी को निकाल ही लिया और फिर उसी रस्सी के द्वारा बाउण्ड्री वाल के उस पार भी चले गए। थोड़ी ही देर में वो दोनो अॅधेरे का लाभ उठाते हुए कहीं गायब से हो गए।
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दोस्तो, आप सबके सामने मेगा अपडेट हाज़िर है। आशा करता हूॅ कि आप सबको पसंद आएगा।

आप सबकी प्रतिक्रिया का बेसब्री से इन्तज़ार रहेगा।
 
एकनयासंसार
अपडेट........《 60 》

अब तक,,,,,,,

"ये क्या है?" दूसरे साये ने पहले साये के हाॅथ में बैग देख कर पूछा।
"इसमें मंत्री का लैपटाॅप है।" पहले साये ने कहा___"ये मुझे इस बेड के नीचे बने बाक्स में मिला है। मैने इसे अभी देखा नहीं है। हो सकता है कि इसमें भी पासवर्ड वाला चक्कर हो इस लिए इसे हम अपने साथ ही ले चलेंगे।"

"ये बहुत अच्छा हुआ।" दूसरे साए ने कहा___"मंत्री के लैपटाॅप में भी काफी कुछ मसाला मिल सकता है। ख़ैर, इन फाइलों को भी इस बैग में डाल लो। उसके बाद हमें तुरंत यहाॅ से निकलना है। अब यहाॅ पर ज्यादा देर रुकना ठीक नहीं है।"

"ठीक है।" पहले साए ने कहने के साथ ही बैग को बेड पर रखा और दूसरे साये से फाइलें लेकर बैग में डाल लिया।

उसके बाद ये दोनो ही शातिर चोर जिस तरह छुपते छुपाते हुए यहाॅ बड़ी होशियारी से आए थे वैसे ही यहाॅ से निकल भी गए। बालकनी से जब दोनो नीचे ज़मीन पर उतर आए तो बालकनी में इनकी वो रस्सी ही फॅस गई। वो तो शुकर था कि इस तरफ आने वाले वो दोनो गनमैन इस तरफ आए ही नहीं। वरना उन्हें बालकनी की रेलिंग से झूलती हुई ये रस्सी ज़रूर दिख जाती और ये दोनो भी। ख़ैर दोनो ने किसी तरह उस रस्सी को निकाल ही लिया और फिर उसी रस्सी के द्वारा बाउण्ड्री वाल के उस पार भी चले गए। थोड़ी ही देर में वो दोनो अॅधेरे का लाभ उठाते हुए कहीं गायब से हो गए।
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अब आगे,,,,,,,

सुबह हुई।

मंत्री दिवाकर चौधरी एक विशेष दौरे पर गया हुआ था। किन्तु दौरे पर भी उसका पूरा ध्यान अपने जासूस उस हरीश राणे के फोन पर ही था। उसे पता था कि राणे बहुत जल्द उसे विराज और रितू के ठिकाने का पता फोन पर बताएगा। पिछला सारा दिन और फिर लगभग सारी रात गुज़र गई थी मगर हरीश राणे का फोन अब तक न आया था उसके पास। उसने सोचा कि संभव है कि विराज और रितू अभी हास्पिटल में ही अपनी बहन नीलम का इलाज़ करवा रहे होंगे। जिसके चलते वो लोग अभी अपने ठिकाने पर वापस न गए होंगे। शायद यही वजह होगी कि राणे ने उसे अब तक कोई फोन न किया था। ख़ैर उम्मीद पर तो दुनियाॅ कायम है। यही हाल चौधरी का था। पिछली शाम को ही वह दौरे पर निकल गया था। उसका प्रोग्राम पहले से ही फिक्स था। अतः दौरे से लौटने में उसे दूसरा दिन शुरू हो जाना था।

सुबह मंत्री की ऑख उसके मोबाइल फोन के बजने से ही खुली थी। उसने उठ कर टाइम देखा तो सुबह के साढ़े पाॅच बज रहे थे। मोबाइल की स्क्रीन पर हरीश राणे का नाम देख कर उसके होठों पर मुस्कान उभर आई, साथ ही चेहरे पर चमक भी पैदा हो गई। उसने बेहद खुशी के साथ काल को रिसीव कर मोबाइल को कान से लगाया था और खुशी खुशी पूछा भी था कि 'बोलो राणे सुबह सुबह खुश ख़बरी सुनने के बहुत उतावले हो रहे हैं हम'। उसकी इस बात पर राणे ने उधर से खुशी वाले लहजे में ही कहा था कि चौधरी साहब आपका काम संपन्न हो गया है। इस लिए आप जल्दी से अपने आवास पर आ जाइये।

हरीश राणे की ये बात सुन कर चौधरी खुशी से फूला नहीं समाया था। वह फोन पर ही सारी बात जान लेना चाहता था मगर राणे ने कहा कि आमने सामने बात करने का मज़ा ही कुछ और होगा। इस लिए आप आइये और अपने सभी साथियों को भी बुला लीजिएगा। उसके बाद ही तसल्ली से सारी बात बताई जाएगी। राणे की इस बात से मंत्री ने हॅसते हुए कहा था कि ठीक है राणे हम जल्द से जल्द पहुॅच रहे हैं।

मंत्री जब अपने दलबल के साथ वापस लौट कर गुनगुन स्थित अपने आवास पर आया तो उस वक्त सुबह के सात बज गए थे। उसने अपने साथियों को राणे से बात करने के बाद ही फोन पर अपने आवास पर आ जाने को कह दिया था। शानदार बॅगले के अंदर पहुॅचते ही मंत्री दिवाकर चौधरी को ड्राइंगरूम में अपने सभी साथी सोफों पर बैठे मिल गए। किन्तु हरीश राणे उसे कहीं नज़र न आया। ये देख कर उसके चेहरे पर चौकने के भाव उभरे। बाॅकी उसके साथी लोग तो सामान्य ही बैठे हुए थे।

"अरे अवधेश।" मंत्री ने सोफे पर बैठने के बाद अवधेश की तरफ देखते हुए कहा___"राणे कहाॅ गया भई? उसने तो हमें सुबह फोन करके जल्द से जल्द यहाॅ आने को कहा था और अब वह खुद ही यहाॅ नहीं है। कमाल है भाई, इन जासूसों का भी कुछ समझ नहीं आता। कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं।"

"मैं तो यहीं हूॅ चौधरी साहब।" सहसा तभी हरीश राणे की चिर परिचित आवाज़ ड्राइंग रूम में गूॅजी___"और अपने साथ आपके लिए ऐसा तोहफा भी लेकर आया हूॅ कि आप उस तोहफ़े को देखेंगे तो यकीनन आप मुझ पर अपनी ये सारी दौलत लुटा देंगे।"

राणे की इस आवाज़ को सुन कर चौधरी ने पलट कर राणे की तरफ देखा। राणे के साथ साथ आ रहे जिन दो इंसानी चेहरों पर उसकी नज़र पड़ी उन्हें देख कर उसके चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे। यहाॅ पर एक अजीब बात ये भी हुई कि चौधरी के बाॅकी साथियों पर हरीश की इस बात का कोई भी प्रभाव न पड़ा था। वो तीनो ऐसे चुपचाप बैठे थे जैसे कि वो माटी के पुतले में तब्दील हो गए हों।

"ओह तो तुम यहीं हो।" राणे के साथ साथ उन दो चेहरों को भी देखते हुए चौधरी ने कहा___"हमें लगा कि हमें सीघ्र बुला कर तुम खुद ही गायब हो। ख़ैर, ये बताओ कि किस तोहफ़े की बात कर रहे थे
तुम?"

"यही तो हैं।" राणे मुस्कुराते हुए अपने साथ आए उन दोनो की तरफ इशारा करते हुए कहा___"हाॅ चौधरी साहब, ये दोनो ही तो तोहफ़े हैं आपके लिए जिन्हें मैं अपने साथ लेकर आया हूॅ। क्या आपने इन दोनो को पहचाना नहीं?"

राणे की ये बात सुन कर चौधरी एकदम से चौंका। बड़े ग़ौर से उन दोनो को देखने लगा था वह। चौधरी जिन दो चेहरों को ग़ौर से देखे जा रहा था वो दोनो उसे इस संसार के सबसे खूबसूरत कपल नज़र आए। ऐसा लग रहा था जैसे वो दोनो सबसे अलग हों। इस वक्त वो दोनो चौधरी को देख कर मुस्कुरा रहे थे।

"ये दोनो खूबसूरत कपल कौन हैं भाई?" चौधरी के माॅथे पर उलझन के भाव आए थे___"और ये दोनो भला हमारे लिए तोहफे जैसे कैसे हो सकते हैं?"
"आप भी कमाल करते हैं चौधरी साहब।" हरीश राणे ने ठहाका लगा कर हॅसने के बाद कहा___"आप इन दोनो को नहीं पहचानते हैं? ये तो दुनियाॅ का सबसे बड़ा आश्चर्य है। अरे ये दोनो तो वही हैं चौधरी साहब जिन्होंने आपकी रातों की नींद हराम कर रखी थी। जी हाॅ, ये वही हैं जिन्होंने आपके बच्चों को अपने कब्जे में लिया हुआ था और उन वीडियोज के बल पर आपको भीगी बिल्ली बनाया हुआ था।"

"क्याऽऽऽ????" सोफे पर बैठा चौधरी राणे की इस बात को सुन कर इस तरह उछल पड़ा था जैसे अचानक ही उसके पिछवाड़े के निचले हिस्से की सोफे की पुश्त गर्म तवे में तब्दील हो गई हो। आश्चर्य से ऑखें फाड़े वह कुछ देर तक हकबकाया सा देखता रहा। फिर जैसे उसे होश आया तो अजीब भाव से बोला___"ये..ये दोनो वही हैं?? नहीं नहीं राणे....ये दोनो तो बहुत मासूम दिख रहे हैं, ये भला इतना बड़ा काण्ड कैसे कर सकते हैं?"

"लो भाई।" राणे फिर हॅसा और फिर मेरी तरफ देखते हुए कहा___"अब तुम ही बताओ इन्हें।"
राणे की बात सुन कर मैं मुस्कुराया और फिर मैं चौधरी के क़रीब आ गया। मेरे साथ ही रितू दीदी भी आ गई।

"तुझे मंत्री किसने बना दिया चौधरी?" मैने सहसा तीखे भाव से कहा___"तुझमें तो इतनी भी समझ नहीं है कि मौजूदा हालात में तुम्हारे लिए तोहफे के रूप में राणे किसे ला सकता है? अगर समझ होती तो फौरन ही समझ जाता कि हम दोनो कौन हैं?"

"ज़बान को लगाम दे लड़के।" बुरी तरह तिलमिलाया हुआ चौधरी सहसा गुर्रा उठा___"तुझे पता नहीं है कि तू इस वक्त कहाॅ खड़ा है? हमसे इस लहजे में बात करने वालों का बहुत ही भयावह अंजाम होता है।"

"अंजाम का डर उन्हें होता है चौधरी।" मैने कहा___"जिन के पिछवाड़े में दम नहीं होता। तुझे तो इतना भी एहसास नहीं हो रहा कि तेरे आवास में आकर मैं तेरे ही सामने तुझसे इस लहजे में बात कैसे कर सकता हूॅ?"

"जब किसी की मौत आती है तो वो ऐसे ही तेरे जैसे अनाप शनाप बकने लगता है।" चौधरी ने कहा।
"तुझे क्या लगता है?" रितू दीदी ने कहा___"हम लोग तेरे सामने राणे की वजह से आए हैं? नहीं चौधरी, ये सब तो हमारा ही खेल है। हमने ही राणे के द्वारा फोन करवा के तुझे यहाॅ बलवाया है। तेरे ये सभी साथी इतनी देर से पुतले की तरह क्यों बैठे हैं क्या तुझे कुछ समझ नहीं आया?"

रितू दीदी की बात सुन कर चौधरी के मस्तिष्क में मानो एकाएक ही विष्फोट सा हुआ। दिमाग़ की सारी बत्तियाॅ रौशन हो उठी। सारी बातें बड़ी तेज़ी से उसके मन में चलने लगी। उसने अजीब भाव से अपने साथियों की तरफ देखा और फिर राणे की तरफ।

"खेल खत्म हो चुका है चौधरी साहब।" राणे तुरंत बोल उठा___"मैं तो कल ही इनके आदमियों के द्वारा पकड़ लिया गया था। उसके बाद इन लोगों ने मुझसे सब कुछ पूछ लिया और मुझे बताना ही पड़ा। मुझे भी इस बात का अंदेशा था कि आपके पीछे गुप्त रूप से कार्यवाही की जा रही है। अतः मैने सोचा कि अगर मैने आपके लिए काम किया तो निश्चय ही मैं भी कानून की चपेट में आ जाऊॅगा इस लिए मैंने वही रास्ता चुना जो सच्चा था और मेरे लिए बेहतर भी था।"

"गद्दार।" चौधरी पूरे क्रोध में बोल पड़ा___"अपनी सलामती के लिए तूने हमें फॅसवा दिया। तुझे ज़िंदा नहीं छोंड़ेंगे हम। तुम सबको अब मौत ही मिलेगी। तुम लोग अब यहाॅ से ज़िंदा वापस नहीं जा सकते।"

"जिनके दम पर तू हमें मौत देने की बात कर रहा है न वो सब तो पुलिस की गिरफ्त में आ चुके हैं।" मैने सहसा झुक कर चौधरी की ऑखों में ऑखें डाल कर कहा___"और तेरे में इतना दम ही नहीं है कि तू मेरा बाल भी उखाड़ सके।"

मेरी इस बात से चौधरी को साॅप सा सूॅघ गया। अनुभवी आदमी था। उसे समझते देर न लगी कि जिस अंदाज़ से मैं उससे बात कर रहा था वो तभी संभव था जब वो कुछ भी कर पाने की पोजीशन में न हो। अभी मैं उसे देख ही रहा था कि सहसा तभी बाहर से ढेर सारे पुलिस के आदमी अंदर दाखिल हुए। उन सभी पुलिस वालों के बीच से ही एसीपी रमाकान्त शुक्ला चलता हुआ हमारे पास आया।

"वेल डन इंस्पेक्टर रितू।" फिर उसने दीदी की तरफ देख कर कहा___"यकीनन तुम दोनो ने बहुत ही बड़ा काम किया है।" कहने के साथ ही एसीपी चौधरी की तरफ पलटा___"दुनियाॅ की कोई भी ताकत अब तुम्हें कानून की सलाखों के पीछे से नहीं निकाल सकती। तुम्हारे खिलाफ़ हमें इतने सबूत मिल चुके हैं कि अब तुम किसी भी कीमत पर बच नहीं सकते।"

"किन सबूतों की बात कर रहे हो आफीसर?" चौधरी ने हैरानी से कहा___"और ये इतनी सारी पुलिस फोर्स यहाॅ किस लिए लेकर आए हो तुम?"
"देखते जाओ चौधरी।" एसीपी ने कहा___"कुछ ही देर में सब कुछ पता चल जाएगा तुम्हें।"

पुलिस वालों को कदाचित पहले ही समझा दिया गया था कि क्या करना है। अतः वो यहाॅ आते ही अपने काम पर लग गए थे। चौधरी ये सब देख कर एकाएक बुरी तरह बौखला गया। उसके चेहरे पर डर व घबराहट के भाव उभर आए। चिंता व परेशानी के चलते पूरा चेहरा पसीने पसीने हो गया उसका। उसके साथियों का भी वही हाल था।

कुछ ही देर में वहाॅ पर पुलिस महकमे के कुछ और आला अधिकारी आ गए। चौधरी को कुछ भी करने का मौका न मिला। वो तो यही नहीं समझ पा रहा था कि इतनी सारी पुलिस फोर्स इतनी जल्दी यहाॅ कैसे आ गई? अंदर की तरफ गए हुए पुलिस वाले थोड़ी ही देर में बाहर आए और उन्होंने जो कुछ बताया उसे सुन कर चौधरी के सिर पर सारा आसमान भरभरा कर गिर गया। उसका चेहरा एकदम से निस्तेज पड़ गया।

लगभग एक घंटे की कठोर कार्यवाही के बाद आला अधिकारियों के साथ मंत्री को गिरफ्तार कर बॅगले से बाहर ले जाया जाने लगा। बाहर आते ही चौधरी ने देखा कि बाहर भीड़ जमा है। उस भीड़ में प्रेस व मीडिया के लोग थे जो मंत्री व पुलिस के आला अधिकारियों से तरह तरह के सवाल पूछने लगे थे। प्रेस व मीडिया वालों को संक्षेप में उनके सवालों के कुछ जवाब देकर चौधरी को लेकर पुलिस वाले चले गए। मंत्री के आवास को सील कर पुलिस सिक्योरिटी लगा दी गई।

ये मामला ही ऐसा था कि पलक झपकते ही मंत्री की गिरफ्तारी की ख़बर प्रदेश में हर तरफ फैल गई। मंत्री के चाहने वाले तथा पार्टी के उसके सहयोगियों ने विरोध प्रदर्शन तो किया किन्तु उस सबको पुलिस वालों ने सम्हाल लिया। मैं और रितू दीदी मंत्री के इस किस्से को खत्म करके वापस लौट आए थे। हरीश राणे को खुशी खुशी हमने छोंड़ दिया था। वो खुद भी इस सबसे खुश था कि उसने अच्छाई का साथ दिया। राणे जाते जाते हम लोगों के कान्टैक्ट नंबर ले गया था।
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उधर मंत्री के पकड़े जाने की ये ख़बर हवेली में अजय सिंह को भी हो गई। इस ख़बर ने अजय सिंह की हालत को लकवा मारने जैसी बना दिया। कुछ समय के लिए तो उसे ऐसा लगा जैसे इस संसार में अब कुछ बचा ही नहीं है बल्कि सब कुछ शून्य में ही खो गया है। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा कुछ हो जाएगा। विराज और रितू ने उसके लिए जैसे हर तरफ से रास्ता ही बंद कर दिया था। कहाॅ वह मंत्री के फोन द्वारा ये पता चलने का इन्तज़ार कर रहा था कि उसका भतीजा और उसकी बेटी आदि सब पकड़ लिए गए हैं और कहाॅ अब इस ख़बर ने उसके मुकम्मल वजूद को ही हिला कर रख दिया था।

अजय सिंह मंत्री के पकड़े जाने से चिंतित व परेशान तो था ही साथ ही वह इस बात के लिए भी बेहद परेशान हो गया था कि उसके दोस्तों ने अपने जिन आदमियों को उसकी सहायता के लिए भेजा था वो सब पुलिस द्वारा पकड़ लिए गए थे। सुबह से फोन पर फोन आ रहे थे उसे। ये सब फोन उसके उन दोस्तों के ही थे। जो कह रहे थे कि उन्हें अपने आदमियों के पकड़े जाने का इतना दुख नहीं है बल्कि चिंता इस बात की है कि उनके वो सब आदमी पुलिस के सामने अपना मुह न खोल दें जिसकी वजह से वो सब भी कानून की चपेट में आ जाएॅ। अतः इससे बचने के लिए वो सब अजय सिंह से कोई न कोई समाधान चाह रहे थे। मगर अजय सिंह कुछ कहने की हालत में ही नहीं था। वो तो खुद भी अब मंत्री की वजह से असहाय सा हो गया था। मंत्री का कानूनन इस तरह पकड़े जाना उसके लिए बहुत बड़ी क्षति थी। क्योंकि अब उसे मंत्री पर ही भरोसा था कि वो उसे इस सारे खेल में जीत दिलाएगा। मगर अब सब कुछ जैसे स्वाहा हो चुका था।

प्रतिमा और शिवा सुबह से उसके पास ही थे। इस वक्त दोपहर हो चुकी थी। अजय सिंह अकेला ही ड्राइंग रूम में गुमसुम सा बैठा था। प्रतिमा किसी काम से बाहर गई हुई थी। शिवा अपने कमरे में था। सोफे पर बैठा अजय सिंह शिगार पे शिकार फूके जा रहा था। सविता जो उसकी घरेलू नौकरानी थी उसने उसे अब तक जाने कितनी बार चाय बना कर पिलाया था। हालात की गंभीरता का उसे भी एहसास था। उसे इस हवेली का सब कुछ पता था किन्तु उसने कभी इस मामले में हवेली के किसी भी सदस्य से कोई बात नहीं की थी। उसे पता था कि इस बारे में बात करने का सबसे पहले तो उसका कोई हक़ ही नहीं है दूसरी बात उसकी बातों को कोई सुनना पसंद भी नहीं करता।

सारी बातों को सोचते सोचते अजय सिंह इतना परेशान हो चुका था कि उसका सिर दर्द करने लगा था। वह उठा और सविता को आवाज़ दे कर कहा कि वो उसके सिर की बढ़िया से मालिश कर दे। ये कह कर अजय सिंह अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। सविता चालीस के आस पास की साॅवली सी औरत थी। उसका पति उसे बरसों पहले छोंड़ कर चला गया था। सविता और उसका पति पहले खेतों पर ही काम करते थे। बाद में उसका पति जब वापस लौट कर न आया तो गजेन्द्र सिंह ने उसे हवेली के काम धाम पर लगा लिया। सविता को हवेली में रहते हुए लगभग दस साल हो गए थे। उसने इस हवेली के अंदर अब तक क्या क्या हुआ सब कुछ देखा सुना था। मगर उसने कभी इस बारे में कोई दखलअंदाज़ी न की थी। उसे ये भी पता था कि अजय सिंह का परिवार कैसा है तथा ये भी कि ये रिश्तों को नहीं मानते। उसने शिवा को अपनी ऑखों से अपनी ही माॅ को संभोग करते देखा था। उस दिन उसे लगा था कि कलियुग वाकई आ चुका है।

अजय सिंह ने सविता के साथ जाने कितनी बार संभोग किया था इसका उसे खुद पता नहीं था। कई बार वह पेट से भी हुई थी किन्तु अजय सिंह ने हर बार उसके पेट से अपना बीज गिरवा दिया था। सविता ने परिस्थितियों के साथ पहले ही समझौता कर लिया था। उसका अपना कोई नहीं था। रितू व नीलम को वो अपनी ही बेटी की तरह मानती थी और हमेशा दुवा किया करती थी कि वो दोनो खुश रहें। रितू व नीलम भी उसे बहुत इज्ज़त व सम्मान देती थीं। उन दोनो ने कभी उसे नौकरानी नहीं समझा था। बल्कि हमेशा उसे काकी ही कहती थी। हलाॅकि शिवा का ब्यौहार अपने बाप की तरह ही था। किन्तु सविता के साथ ज़बरदस्ती करने की हिम्मत उसमे कभी न हुई थी। सविता एक तंदुरुस्त तबीयत की औरत थी। मेहनत कर करके वह बेहद मजबूत हो गई थी। वह दिखती भी ऐसी थी कि शिवा जैसा छोकरा उससे ज़बरदस्ती करने की हिम्मत कर ही नहीं सकता था। पिछले कुछ सालों से अजय सिंह ने सविता को भोगना बंद कर दिया था। इस बात से सविता को राहत महसूस हुई थी। अजय सिंह के सविता के साथ संबंधों की जानकारी प्रतिमा को शुरू से ही थी। किन्तु उसे इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी।

थोड़ी ही देर में सविता अपने हाॅथ में एक कटोरी लिए अजय सिंह के कमरे में दाखिल हुई। कटोरी में शुद्ध सरसो का तेल था। कमरे में पहुॅचते ही सविता ने देखा कि अजय सिंह बेड पर लेटा हुआ है। आज काफी समय बाद अकेले कमरे में अजय सिंह के पास आते हुए सविता को थोड़ा असहज सा लगा। किन्तु उसे पता था कि मालिश तो उसे करनी ही पड़ेगी और अगर अजय सिंह ने उसके साथ संभोग करने की इच्छा ज़ाहिर की तो उसे उसकी वो इच्छा भी पूरी करनी पड़ेगी।

अजय सिंह की नज़र हाॅथ में कटोरी लिए आई सविता पर पड़ी तो उसने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। पहले की अपेक्षा सविता का जिस्म काफी आकर्षक सा हो गया था। हर अंग अपनी जगह सही से ढला हुआ था। ऊम्र का असर उसके सिर के बालों से दिख रहा था। बाॅकी उसका समूचा जिस्म कसा हुआ था। सीने के उभार प्रतिमा से कतई कम न थे। ब्लाऊज फाड़ कर बाहर आने को आतुर थे। अजय सिंह को ग़ौर से अपनी तरफ देखते देख सविता के संपूर्ण जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई।

"चलिए मालिक।" फिर उसने खुद को सामान्य बनाते हुए कहा___"आपके माॅथे पर मालिश कर देती हूॅ।"
"ओह हाॅ हाॅ।" अजय सिंह उसकी बात सुनते ही कुछ झेंप सा गया___"इस वक्त मालिश की वाकई बहुत ज़रूरत है सविता। प्रतिमा बाहर गई हुई है वरना तुम्हें तक़लीफ न देता। वो खुद भी बहुत अच्छी मालिश कर लेती है।"

"कोई बात नहीं मालिक।" सविता ने बेड के क़रीब आते हुए कहा___"मैं तो अक्सर मालकिन की मालिश करती ही रहती हूॅ। आज आपकी भी कर देती हूॅ। चलिए लेट जाइये अब।"
"इन कपड़ों को उतार दूॅ क्या?" अजय सिंह ने अपने बदन के ऊपर पहने कपड़ों की तरफ दःखते हुए कहा।

"मालिश तो माॅथे पर करनी है न मालिक।" सविता ने जल्दी से कहा___"कपड़े उतारने की क्या ज़रूरत है?"
"बात तो ठीक ही है तुम्हारी।" अजय सिंह कहने के साथ ही मुस्कुराया___"पर अगर पूरे बदन की मालिश कर दोगी तो क्या बुराई है? मुझे भी तो पता चले कि तुम अपनी मालकिन की किस तरह से मालिश किया करती हो?"

अजय सिंह की बात सुन कर सविता को साॅप सा सूॅघ गया। उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था। ऐसा नहीं था कि उसने अजय सिंह को बिना कपड़ों के देखा नहीं था बल्कि उसने तो इसके पहले न जाने कितनी बार खुद बिना कपड़ों के उसके साथ संभोग किया था किन्तु एक दो सालों से ये रिश्ता लगभग मिट सा गया था। इस लिए उसे इस बात का अंदेशा था कि कहीं आज फिर ऐसे हालात न बन जाएॅ कि उसे संभोग करना पढ़ जाए। दूसरी बात ये भी थी कि अब वो किसी सूरत में नहीं चाहती थी कि वो इस आदमी के साथ वो सब करे। उसने मन ही मन ईश्वर को याद किया कि उसे इस परिस्थिति से बचाए।

उसकी इस फरियाद को मानो ईश्वर ने सुन भी लिया, क्योंकि तभी कमरे में एक तरफ टेबल पर रखे लैण्डलाइन फोन की घंटी घनघना उठी थी। फोन के बजने से अजय सिंह के चेहरे पर अप्रिय भाव उभरे। फिर उसने बेड के किनारे पर खिसक कर फोन के रिसीवर को उठा कर कान से लगाते ही हैलो कहा।

".............।" उधर से जाने क्या कहा गया। किन्तु इतना ज़रूर हुआ कि उसके चेहरे पर बुरी तरह चौंकने के भाव उभरे और फिर सहसा उसने पलट कर सविता को कमरे से चले जाने को कहा। उसके इस तरह चले जाने का सुन कर पहले तो सविता चौंकी फिर जल्द ही वापस कमरे से बाहर की तरफ चल पड़ी।

कमरे से बाहर आते ही सविता ने राहत की साॅस ली और फिर किचेन की तरफ बढ़ गई। किचेन में उसने तेल की कटोरी को रखा और फिर किचेन से बाहर ड्राइंगरूम की तरफ बढ़ गई। ड्राइंगरूम में आते ही उसकी नज़र मालकिन यानी की प्रतिमा पर पड़ी जो एक तरफ टेबल पर ही रखे फोन के रिसीवर को कान से लगाए खड़ी थी। उसका चेहरा दूसरी तरफ था। सविता अपनी मालकिन को देख कर वापस अंदर की तरफ चली गई।

उधर कमरे में अजय सिंह काफी देर तक किसी से बात करता रहा। उसके चेहरे पर कई तरह के भावों का आवागमन चालू था। ख़ैर कुछ देर बाद उसने अपने कान से हटा कर रिसीवर को वापस केड्रिल पर रख दिया। रिसीवर रखने के बाद उसने एक गहरी साॅस ली और फिर सहसा जाने क्या सोच कर मुस्कुरा उठा।

अभी अजय सिंह मुस्कुरा ही रहा था कि तभी कमरे में प्रतिमा दाखिल हुई। प्रतिमा को देख कर अजय सिंह की मुस्कान और गहरी हो गई। उसके होठों पर फैली इस मुस्कान को देख कर प्रतिमा के होठों पर भी मुस्कान फैल गई।

"क्या बात है जनाब।" फिर प्रतिमा ने उसके समीप आते हुए कहा___"बहुत मुस्कुरा रहे हो। कारून का कोई ख़जाना मिल गया है क्या?"
"ऐसा ही समझो डियर।" अजय सिंह कहने के साथ ही आलमारी की तरफ बढ़ा, फिर बोला___"बल्कि अगर ये कहूॅ तो ग़लत न होगा कि कारून का ख़जाना भी उसके सामने कुछ नहीं है।"

"ओह ऐसा क्या?" प्रतिमा की ऑखें फैली___"ज़रा मुझे भी तो बताओ कि ऐसा कौन सा ख़जाना मिल गया है जिसके सामने कारून के ख़जाने की कोई औकात ही नहीं है।"
"ज़रूर बताऊॅगा प्रतिमा।" आलमारी से कोट निकालने के बाद अजय सिंह ने कहा___"पहले ख़जाने को मेरे हाॅथ तो लगने दो।"

"क्या मतलब??" प्रतिमा के चेहरे पर चौंकने के भाव उभरे___"क्या वो ख़जाना अभी तुम्हारे हाॅथ नहीं लगा है?"
"लग जाएगा माई डियर।" अजय सिंह ने कोट पहनते हुए कहा___"और इस ख़जाने को मेरे हाथ लगने से ब्रम्हा भी नहीं रोंक पाएॅगे।"

"बड़ी अजीब बातें कर रहे हो आज।" प्रतिमा ने सहसा तिरछी नज़रों से देखते हुए कहा___"कहीं तुम्हारे इस ख़जाने का संबंध रितू अथवा विराज से तो नहीं है?"
"ज्यादा दिमाग़ मत चलाओ प्रतिमा।" अजय सिंह ने सपाट लहजे में कहा___"बस समय का इन्तज़ार करो। ख़ैर, मैं ज़रूरी काम से बाहर जा रहा हूॅ शाम तक लौटूॅगा। शिवा से कहना वो कहीं बाहर न जाए बल्कि हवेली में ही रहे।"

प्रतिमा की प्रतिक्रिया सुने बिना ही अजय सिंह कमरे से बाहर निकल गया। उसके जाते ही प्रतिमा के चेहरे पर सहसा गहन पीड़ा के भाव उभरे और फिर एकाएक ही उसकी ऑखें छलक पड़ीं। आगे बढ़ कर वह बेड पर धम्म से बैठ गई। उसके मनो मस्तिष्क में ऑधियाॅ सी चलने लगी थी।
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उधर मंत्री दिवाकर चौधरी के अपने साथियों सहित पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए जाने की सूचना मैने मंत्री के बेटे सूरज चौधरी व उसके तीनो साथियों को भी दे दी। चारो इस ख़बर को सुन कर बिलकुल असहाय से हो गए। ऐसा लग रहा था जैसे उनके जिस्मों में जान ही न रह गई हो। चारो की हालत वैसे भी बहुत ही दयनीय हो चुकी थी। भरपेट खाना न मिलने की वजह से तथा शारीरिक व मानसिक यातनाओं के चलते वो चारो ही बेहद कमज़ोर लगने लगे थे। दूसरे कमरे में मंत्री की बेटी को भी रितू दीदी ने उसके बाप के संबंध में सूचित कर दिया था। रचना चौधरी इस ख़बर से बुत बन कर रह गई थी। किन्तु जब उसके मुख से लफ्ज़ निकले तो बड़े अजीब थे। उसका कहना था कि मेरे बाप भाई ने जितने पाप कर्म किये थे उसका अंजाम तो यही होना था न।

सूरज चौधरी व उसके तीनो दोस्त हर तरह से टूट चुके थे। मौत की भीख माॅग रहे थे चारो मगर मौत मिलना इतना आसान नहीं था। इस बीच मैने फैंसला किया कि इन सबको यहाॅ से आज़ाद कर दिया जाए। उन चारो की हालत देख कर मुझे इस बात का बोध हो चुका था कि वो पश्चाताप की आग में जल रहे हैं। बड़े से बड़े अपराध के लिए भी इंसान को क्षमा कर दिया जाता है और उसे सुधरने का एक मौका दिया जाता है। दूसरी बात, ये सब करके मुझे मेरी विधी तो मिलनी नहीं थी। उसके साथ हुए अत्याचार का मैने बदला ले लिया था इन लोगों से।

उन चारों को आज़ाद कर देने वाले मेरे फैंसले से थोड़ी न नुकुर के बाद आख़िर सब राज़ी हो गए थे। किन्तु सवाल ये था कि वो आज़ाद होने के बाद जाएॅगे कहाॅ? क्योंकि मंत्री का बॅगला तो पुलिस द्वारा सील कर दिया गया था। इस सवाल का जवाब रितू दीदी ने दिया, ये कह कर कि ये सब चिमनी में अपने पुश्तैनी घर जा सकते हैं। रितू दीदी की इस बात से समस्या का समाधान हो चुका था। अतः अब यही फैंसला हुआ कि इन सबको बेहोश करके चिमनी भेज दिया जाए।

मैने मौसा जी को फोन करके सारी बात बताई और उनसे आग्रह किया कि क्या वो इन चारो को चिमनी भेजने का काम करवा सकते हैं? मेरी इस बात पर वो हॅस कर बोले इसमें संकोच की क्या बात है बेटा? थोड़ी ही देर में केशव जी अपने कुछ आदमियों को लेकर हमारे पास आ गए। मैने और आदित्य ने चारो को बेहोश कर दिया और केशव की गाड़ी में उन सबको डलवा दिया। उनके साथ ही रचना को भी बेहोश करके डाल दिया था। ये सब होने के बाद केशव जी अपने आदमियों के साथ चिमनी गाॅव के लिए निकल गए।

उन सबको आज़ाद करने के बाद मन को थोड़ा शान्ति सी मिल गई थी। इस वक्त ड्राइंग रूम में मैं रितू दीदी तथा आदित्य बैठे हुए थे। नैना बुआ व सोनम दीदी नीलम के पास उसके कमरे में थीं।

"चलो मंत्री और उसके बच्चों से छुटकारा मिल गया आख़िर।" सहसा आदित्य ने कहा___"अब हम सारा फोकस तुम्हारे ताऊ पर लगा सकते हैं। वैसे मुझे तो लगता है कि अब हमें खुल कर हवेली में उसके सामने ही चले जाना चाहिए और फिर उन सबका भी काम तमाम कर देना चाहिए। अजय सिंह मौजूदा हालात में कुछ भी कर सकने की पोजीशन में नहीं है। उसकी आख़िरी उम्मीद निःसंदेह मंत्री ही था जोकि अब वो भी कानून की लम्बी चपेट में आ चुका है। दूसरी बात उसके जितने भी आदमी थे उन सबको भी पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है। कहने का मतलब ये कि इस वक्त अजय सिंह निहत्था व असहाय अवस्था में है। हम बड़ी आसानी से उसे लपेटे में ले सकते हैं और उसका हिसाब किताब कर सकते हैं।"

"इस बात का एहसास तो उसे भी हो ही गया होगा मेरे यार।" मैने कहा___"वो भी इस बात को समझता होगा कि मौजूदा हालात में हम उसके बारे में क्या सोच रहे होंगे? इस लिए वो पूरी कोशिश करेगा कि वो हमारी सोच को सही साबित न होने दे। यानी कि वो कुछ ऐसा ज़रूर करेगा जिससे हम उसके सामने इस तरह न जा सकें जिस तरह की तुम बात कर रहे हो।"

"राज बिलकुल सही कह रहा है आदित्य।" रितू दीदी ने गहरी साॅस लेकर कहा___"मैं अपने डैड को बहुत अच्छी तरह से जानती हूॅ। वो इस परिस्थिति में भी कोई ऐसा जुगाड़ कर ही लेंगे कि हम उनके पास इस तरह से उनका तिया पाॅचा करने न पहुॅच सकें।"

"तुम्हारे हिसाब से वो ऐसा क्या जुगाड़ कर सकता है अब?" आदित्य ने पूछा___"जबकि मौजूदा हालात साफ शब्दों में बता रहे हैं कि वो अब कुछ भी करने की पोजीशन में नहीं रह गया है।"

"इस बारे में मैं कुछ कह नहीं सकती।" रितू दीदी ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा___"किन्तु उनके संबंध कई ऐसे लोगों से रहे हैं अथवा ये कहूॅ कि हैं जो ऊॅचे दर्ज़े के अपराधी हैं। अतः संभव है कि डैड अपने ऐसे ही किन्हीं अपराधी दोस्तों से मौजूदा हालात में मदद की गुहार लगाएॅ।"

"चलो ये मान लिया कि तुम्हारे डैड के ऐसे लोगों से संबंध हैं और वो उन लोगों से इस समय मदद माॅग सकते हैं।" आदित्य ने कहा___"किन्तु यहाॅ पर मैं एक सलाह देना चाहता हूॅ, और वो सलाह ये है कि तुम्हारे डैड को उस आधार पर भी तो बड़ी आसानी से भीगी बिल्ली बना कर अपने पास बुलाया जा सकता है जो आधार इस वक्त राज के पास मौजूद है, यानी कि अजय सिंह का ग़ैर कानूनी सामान। उस सामान के आधार पर अजय सिंह यकीनन भीगी बिल्ली बन कर हमारे पास खुद ही आ जाएगा।"

"ऐसा नहीं हो सकता आदी।" मैने कहा___"क्योंकि अब तक ये बात मेरे ताऊ को भी ताई के समझाने पर समझ आ ही गई होगी कि मैं उन्हें उनके ग़ैर कानूनी सामान के आधार पर कोई क्षति नहीं पहुॅचाना चाहता बल्कि अपने बलबूते पर ही अपने व अपने परिवार के साथ हुए हर अत्याचार का बदला लेना चाहता हूॅ। अगर मुझे उस सामान के आधार पर ही अपने ताऊ का क्रियाकर्म करना होता तो मैं ये काम बहुत पहले ही कर चुका होता। इस लिए इस बात पर सोचने का कोई मतलब ही नहीं है दोस्त।"

"मैं तुम्हारी बातों से पूर्णतया सहमत हूॅ।" आदित्य ने कहा___"किन्तु उन्हें ये भी तो पता होगा न कि अगर तुम अपने बलबूते पर अपने ताऊ का कोई भी बाल बाॅका न कर पाए तो फिर तुम्हारे पास अंतिम चारा वो ग़ैर कानूनी सामान ही तो होगा। यानी कि तुम उस सामान के आधार पर ही आख़िरी चारे के रूप में अपने ताऊ का काम तमाम करोगे। कहने का मतलब ये कि इस वक्त अगर तुम उसी ग़ैर कानूनी सामान की धमकी देकर अपने ताऊ को भीगी बिल्ली बना कर अपने पास आने पर मजबूर करोगे तो वो यही समझेंगे कि शायद तुम्हारे पास अब यही एक चारा रह गया था जिसके तहत तुमने अजय सिंह के उस ग़ैर कानूनी सामान का सहारा लिया है और उसे अपने पास इस तरह बुला रहे हो।"

"मनोविज्ञान की दृष्टि से तुम्हारा ये सोच कर कहना यकीनन सही है।" मैने कहा___"किन्तु मत भूलो कि उस तरफ बड़ी माॅ हैं जो खुद दिमाग़ के मामले में हम सबसे बीस ही हैं। कहने का मतलब ये कि सारे हालातों पर ग़ौर करने के बाद वो इसी नतीजे पर पहुॅचेंगी कि इतना कुछ होने के बाद तो हमारा पक्ष पहले से और भी ज्यादा मजबूत हो गया है, तो फिर अचानक ये गैर कानूनी सामान को आधार बना कर अजय सिंह को हम क्यों अपने पास बुला रहे हैं?"

"अरे तो उनके नतीजों से हमें क्या लेना देना भाई?" आदित्य ने कहा___"वो सारे हालातों पर ग़ौर करके क्या नतीजा निकालती हैं इससे हमें क्या फर्क़ पड़ता है? हमें तो अपने काम से मतलब है, फिर चाहे वो जैसे भी हो।"

"और मेरे सिद्धान्तों व उसूलों का क्या?" मैने आदित्य की तरफ अजीब भाव से देखते हुए कहा___"हम सच्चाई व धर्म की राह पर चल रहे हैं दोस्त। हम भले ही अब तक धोखे से या किसी चाल से यहाॅ तक पहुॅचे हैं किन्तु प्यार व जंग में ये जायज था। मगर यहाॅ पर एक नियम अथवा एक सिद्धान्त तो मैंने उन्हें जता ही दिया था कि मैं अजय सिंह के खिलाफ उसके ग़ैर कानूनी सामान के आधार पर कोई ऐक्शन नहीं लूॅगा, बल्कि सब कुछ अपने बलबूते पर ही करूॅगा। इस बात को मैं अब तक निभाता भी आया हूॅ और आगे भी इसे निभाना चाहता हूॅ। ये मेरे जिगर व मेरी मर्दानगी का सबूत भी होगा भाई कि मैने अपने बलबूते पर ही सब कुछ किया। इसके विपरीत अगर मैने जंग के आख़िर में ये क़दम उठाया तो फिर मेरी साख़ का क्या औचित्य रह जाएगा? मेरा ताऊ इस बात को भले ही न समझ पाए मगर मुझे यकीन है कि मेरी इस मनोभावना को बड़ी माॅ ज़रूर समझेंगी, और मैं चाहता भी हूॅ कि उनके मन में मेरे कैरेक्टर का ये मैसेज जाए। दूसरी बात, हमे ऐसा करने की ज़रूरत भी क्या है दोस्त? आप दोनो के रहते तो मैं सारी दुनिया को फतह कर सकता हूॅ।"

"एक सच्चा इंसान तथा एक सच्चा वीर ऐसा ही होना चाहिए।" सहसा रितू दीदी ने मेरी तरफ प्रसंसा भरी नज़रों देखते हुए कहा___"मुझे तुझ पर नाज़ है मेरे भाई। मेरा दिल करता है कि तेरे लिए अपनी अंतिम साॅस तक निसार कर दूॅ।"

"ऐसा मत कहिए दीदी।" मैने सहसा भावुकतावश उनकी तरफ देखते हुए कहा___"अभी तो हम सबको एक साथ बहुत सारी खुशियाॅ बाॅटनी हैं। इस सबके बाद हम एक नये संसार का शुभारम्भ करेंगे। उस नये संसार में बेपनाह प्यार और बेपनाह खुशियाॅ होंगी।"

"और मुझे अपनी उन खुशियों से किनारा कर दोगे क्या तुम लोग?" आदित्य मुस्कुराते हुए बोल पड़ा___"ऐसा सोचना भी मत राज। वरना देख लेना तुम्हारे घर के बाहर धरना देकर बैठ जाऊॅगा।"

"ऐसा मत करना दोस्त।" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"गाॅव के लोग धरने के रूप में एक ही आदमी को बैठा देखेंगे तो उसे कुछ और ही समझ लेंगे।"
"ओ हैलो।" आदित्य ने ऑखें दिखाई___"क्या मतलब है तुम्हारा? क्या समझ लेंगे गाॅव के लोग___भिखारी?? चल कोई बात नहीं यार। तुम्हारे लिए ये भी बन जाऊॅगा।"

"तुम्हें बाहर धरने पर बैठने की ज़रूरत नहीं है आदित्य।" रितू दीदी ने कहा___"रक्षाबंधन आने वाला है। इतने वर्षों में पहली बार मैं राज को राखी बाधूॅगी। राज की तरह तुम भी मेरे भाई ही हो। मैं और भी बहुत खुश हो जाऊॅगी कि तुम्हारे जैसा एक नेक दिल इंसान मेरा भाई बन जाएगा।"

"कितनी सुंदर बात कही है तुमने।" आदित्य सहसा किसी गहरे ख़यालों में खोता नज़र आया___"तुम्हारे ही जैसी एक बहन थी मेरी___प्रतीक्षा। मेरी लाडली थी वो, हर साल रक्षाबंधन के दिन मेरी कलाई पर एक साथ ढेर सारी राखियाॅ बाॅध देती थी। फिर कहती कि सभी राखियों का वो अलग अलग पैसा लेगी मुझसे।" कहने के साथ ही आदित्य की ऑखों से ऑसू छलक पड़े, बोला___"मगर चार साल पहले अपने प्यार में धोखा खाने की वजह से उसने खुदखुशी की कोशिश की। दो मंजिला मकान की छत से कूद गई वो। हास्पिटल में इलाज चला मगर डाक्टर ने बताया कि वो कोमा में जा चुकी है। आज चार साल हो गए। आज भी वो लाश बनी पड़ी है। जिस लड़के ने उसे धोखा दिया था उसे ऐसी सज़ा दी थी मैने कि वो किसी भी लड़की से संबंध बनाने का सोच ही नहीं सकता अब।"

आदित्य की ये बातें सुन कर मैं और रितू दीदी भी सीरियस हो गए। रितू दीदी उठ कर आदित्य के पास गई और उसे अपने से छुपका लिया। मैं खुद भी आदित्य की दूसरी तरफ बैठ कर उसके कंधे को थपथपा रहा था।

"दुखी मत हो आदित्य।" रितू दीदी ने कहा___"प्रतीक्षा जल्द ही ठीक हो जाएगी। चलो अब शान्त हो जाओ। देखो ये ईश्वर का विधान ही तो था कि मैं तुम्हारी बहन के रूप में तुम्हें मिली और चार साल से सूनी पड़ी तुम्हारी कलाई में राखी भी बाधूॅगी।"

"भगवान का बहुत बहुत शुक्रिया।" आदित्य ने रितू दीदी से अलग होते हुए ऊपर की तरफ सिर करके कहा___"जो उसने मुझे बहन के रूप में मेरी प्रतीक्षा को मेरे पास भेज दिया। मैं तुमसे यही कहूॅगा रितू कि तुम भी प्रतीक्षा की तरह मेरी कलाई पर ढेर सारी राखियाॅ बाॅधना।"

"जैसी तुम्हारी इच्छा।" दीदी ने मुस्कुरा कर कहा___"तुम दोनो बैठो मैं ज़रा काकी(बिंदिया) को चाय बनाने के लिए कहने जा रही हूॅ।"
"ठीक है।" आदित्य ने कहा। उसके बाद रितू दीदी उठ कर अंदर की तरफ चली गईं। जबकि मैं और आदित्य वहीं बैठे रहे।
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उधर मुम्बई में।
जगदीश ओबराय बॅगले के बाहर लान में एक तरफ हरी हरी विदेशी घाॅस के बीचो बीच रखी कुर्सी पर बैठा शाम का अखबार पढ़ रहा था। इस वक्त वह यहाॅ पर अकेला ही था। उसके सामने की बाॅकी सभी कुर्सियाॅ खाली थी। तभी मेन गेट से अंदर आती हुई एक कार की आवाज़ से उसका ध्यान मेन गेट की तरफ गया।

मेन गेट से अंदर दाखिल हुई कार चलते हुए सीधा पोर्च में जाकर रुकी। कार के रुकते ही पैसेंजर सीट की तरफ का गेट खुला और अभय सिंह अपने पैर पोर्च के फर्श पर रखते हुए बाहर निकला। बाहर आते ही उसने लान में एक तरफ कुर्सी में बैठे जगदीश ओबराय की तरफ देखा। जगदीश ओबराय को देखते ही उसके होठों पर मुस्कान उभर आई और वह उस तरफ ही बढ़ता चला गया।

"कहो भाई क्या कहा डाक्टर ने?" अभय के कुर्सी पर बैठते ही जगदीश ओबराय ने मुस्कुराते हुए उससे पूछा___"वैसे तुम्हारे चेहरे की चमक देख कर ज़ाहिर हो रहा है कि रिपोर्ट पाॅजिटिव ही है।"

"बिलकुल सही कहा आपने भाई साहब।" अभय सिंह ने खुशी से कहा___"रिपोर्ट एकदम सही है। बस कुछ ही दिनों में सब कुछ सही हो जाएगा और ये सब आपकी वजह से ही संभव हो सका है। इसके लिए मैं आपका हमेशा आभारी रहूॅगा।"

"अरे इसमें मेरा आभारी रहने की क्या बात है भई?" जगदीश ओबराय ने कहा___"सब कुछ करने वाला तो ऊपरवाला है। हम तो बस माध्यम ही होते हैं।"
"ऊपरवाले को भी तो कुछ करने के लिए किसी न किसी माध्यम की आवश्यकता ही पड़ती है भाई साहब।" अभय सिंह ने कहा____"ये उसी का नतीजा है कि आप इस सबके लिए माध्यम बने और ये सब हुआ वरना अब तक जो कुछ भी हुआ है उसके बारे में तो हम में से कोई ख़्वाब में भी नहीं सोच सकता था।"

"पर इसमें भी सबसे बड़ा योगदान गौरी बहन का है अभय भाई।" जगदीश ओबराय ने कहा___"उसने करुणा बहन से कुरेद कुरेद कर तथा ज़बरदस्ती पूछा था और तब करुणा ने बताया कि तुममें समस्या क्या है? गौरी बहन ने वो बात बहाने से ही सही किन्तु मुझसे कही। मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि तुम में ये समस्या हो सकती है। तुम भी अपने बिना मतलब के स्वाभिमान व शर्म के चलते इस बारे में किसी से कहना नहीं चाहते थे। बेकार की सोच और बेकार के सिद्धान्त लिए बैठे थे। तुम्हें अपनी पत्नी की इच्छाओं का खुशियों का कोई ख़याल ही नहीं था। ख़ैर, जो भी हुआ अच्छा ही हुआ। अब खुशी की बात ये है कि तुम फिजिकली अब कुछ ही दिनों में पूरी तरह से ठीक हो जाओगे और तुम्हारे पति पत्नी के रिश्तों के बीच फिर से खुशियाॅ भी आ जाएॅगी।"

"सचमुच गौरी भाभी को सबका ख़याल रहता है।" अभय सिंह ने मुग्ध भाव से कहा___"वो यकीनन देवी हैं भाई साहब। कभी कभी सोचा करता हूॅ कि इतने अच्छे लोगों के साथ ईश्वर ऐसा अन्याय कैसे कर देता है? भला क्या बिगाड़ा था किसी का उन्होंने?"

"एक नये अध्याय को शुरू करने के लिए पुराने ख़राब हो चुके अध्याय को खत्म करना ही पड़ता है।" जगदीश ओबराय ने कहा___"हम आम इंसान ईश्वर के क्रिया कलाप को समझ नहीं पाते हैं जबकि सबसे ज्यादा उसे ही पता होता है कि हमारे लिए क्या अच्छा हो सकता है? ईश्वर ने मेरे साथ क्या कुछ नहीं कर दिया है। आज से पहले अरब पति होते हुए भी मैं इतनी बड़ी सल्तनत में अकेला था किन्तु आज मेरे पास गौरी जैसी बहन है और विराज व निधी जैसे मेरे बच्चे हैं। उनके साथ साथ तुम सब भी मिल गए। इन सभी रिश्तों में मुझे प्यार व सम्मान हद से ज्यादा मिल रहा है। अब इससे ज्यादा क्या चाहिए मुझे? इस दुनियाॅ में हम क्या लेकर आए थे और क्या लेकर जाएॅगे? सब कुछ यहीं रह जाएगा, असली दौलत व असली सुख तो इन्हीं में है। आज ईश्वर के इस न्याय से मैं बहुत खुश हूॅ।"

"सही कहा आपने भाई साहब।" अभय सिंह ने कहा___"काश हर इंसान आप जैसी सोच वाला हो जाए तो ये संसार कितना खूबसूरत हो जाए। एक मेरे बड़े भाई साहब हैं जिन्होंने अपने मतलब के लिए हर रिश्ते की बलि चढ़ा दी तथा अपनों के साथ इतना बड़ा अत्याचार कर डाला। क्या उन्हें ये बात नहीं पता होगी कि उन्होंने जिन चीज़ों के लिए ये सब किया वो चीज़ें मरने के बाद उनके साथ नहीं जाएॅगी। बल्कि उनके इस कर्म से उनके मरने के बाद भी लोग उन्हें बुरा भला ही कहेंगे।"

"इस संसार में हर तरह के इंसानों का होना ज़रूरी है अभय।" जगदीश ने कहा___"ईश्वर हर तरह के प्राणियों की रचना करता है, फिर उन्हीं के द्वारा खेल भी रचाता है और उस खेल का आनंद भी लेता है। उसने हम इंसानो के लिए नियम बनाए और उन नियमों पर चलने के लिए उसने समय समय पर हमें किसी न किसी माध्यम से रास्ता भी बताया। ख़ैर ये प्रसंग तो बहुत बड़ा है भई, इसे समझना और इस पर अमल करना बहुत कठिन है। तुम बताओ क्या कहा डाक्टर ने?"

"बाॅकी का तो आपको पता ही है।" अभय सिंह ने कहा___"उस दिन की रिपोर्ट के अनुसार इलाज शुरू हो चुका था। आज उसने टेस्ट लिया तो रिजल्ट बेहतर निकला। उसने बताया कि बहुत जल्द पहले जैसी बात हो जाएगी।"

"चलो ये तो अच्छी बात है।" जगदीश ओबराय ने कहा___"तुम भी ज़रा संजम और संयम का ख़याल रखना और दवा दारू समय समय पर करते रहना। ईश्वर ने चाहा तो बहुत जल्द सब कुछ ठीक हो जाएगा।"

"जी बिलकुल।" अभय सिंह ने कहा___"अच्छा भाई साहब मैं ज़रा आज की दवाइयों को अंदर रख कर आता हूॅ। वो अभी कार में ही रखी हुई हैं।"
"ओह हाॅ।" जगदीश ओबराय ने कहा___"और हाॅ अंदर गौरी बहन से कहना ज़रा गरमा गरम चाय तो बना कर पिलाए।"

जगदीश ओबराय की बात सुन कर अभय सिंह ने हाॅ में सिर हिलाया और कुर्सी से उठ कर कार की तरफ बढ़ गया। कार से उसने एक प्लास्टिक की थैली निकाली और उसे लेकर बॅगले के अंदर चला गया।

वहीं एक तरफ निधी के कमरे में निधी और आशा बेड पर बैठी हुई थी। पिछले दिन हुई बातचीत से निधी आशा के सामने आने से थोड़ा असहज सा महसूस करती थी, किन्तु आशा के समझाने पर उसकी झिझक व शर्म बहुत हद तक दूर हो गई थी। आशा पहले भी ज्यादातर उसके पास ही रहती थी किन्तु जब से उसके सामने ये बात खुल गई थी कि निधी विराज से प्यार करती है तब से वो और भी निधी के समीप ही रहती थी। आशा उमर में रितू जैसी ही थी तथा एक समझदार व सुलझी हुई लड़की थी इस लिए वो निधी को एक पल के लिए उदास या मायूस नहीं होने देती थी।

आशा के ही पूछने पर निधी ने उसे बताया कि कैसे उसे अपने भाई से प्यार हुआ और कैसे उसने अपने उस प्यार को विराज के सामने उजागर भी किया था। आशा सारी बातें सुन कर हैरान थी। सबसे ज्यादा इस बात पर कि निधी ने विराज से अपने प्यार का इज़हार भी कर दिया है। ये अलग बात है कि विराज ने इसे अनुचित व ग़लत कहते हुए उसे इस संबंध में समझाया था। उसने उसे ये भी समझाया था कि इस रिश्ते को दुनियाॅ वाले कभी स्वीकार नहीं कर सकते और ना ही उसके घर वाले। विराज अपनी इस लाडली को जी जान से चाहता था किन्तु एक बहन भाई के रूप में। वो नहीं चाहता था कि उसकी कठोरता से निधी को ज्यादा दुख पहुॅचे। छोटी ऊम्र का आकर्शण कभी कभी ज़िद के चलते इतना उग्र रूप धारण कर लेता है कि अगर उसे समय रहते सम्हाला न गया तो परिणाम गंभीर भी निकल आते हैं।

शुरू शुरू में आशा को भी यही लगा था कि निधी अपने भाई पर महज आकर्षित है। किन्तु जब उसने निधी से इस संबंध में सारी बातों को जाना और उसकी डायरी के हर पेज पर दिल को झकझोर कर रख देने वाले मजमून को पढ़ा तो उसे महसूस हुआ कि ये महज आकर्शण नहीं है बल्कि ये बेपनाह मोहब्बत का प्रत्यक्ष सबूत है। आशा ने निधी की इजाज़त से ही उसकी डायरी को पढ़ना शुरू किया था। यूॅ तो डायरी में लिखी हर बात अपने आप में निधी की तड़प बयां करती थी किन्तु निधी के द्वारा लिखी गई ग़ज़लें ऐसी थीं जो आशा के दिल को बुरी तरह तड़पा देती थी। उसे ऐसा लगता जैसे ग़ज़ल की हर बात में उसी का हाले दिल बयां किया गया है। निधी अपने आपको बहलाने के लिए ज्यादातर किताबों में ही डूबी रहती थी। आशा उसकी पढ़ाई में कोई हस्ताक्षेप नहीं करती थी। किन्तु उसे भी पता था कि किसी चीज़ में अति हानिकारक होती है। इस लिए वो निधी का हर तरह से ख़याल भी रखती थी। इस वक्त भी वह उसके लिए चाय लेकर आई थी।

निधी ने चाय पिया और फिर कुछ देर इधर उधर की बातें करने के बाद वह फिर से किताबों में डूब गई थी। जबकि आशा बेड पर सिरहाने की तरफ रखे पिल्लो के नीचे से निधी की डायरी निकाल कर उसे पढ़ने लगी थी। उसमें एक ग़ज़ल थी जिसे वो बार बार पढ़े जा रही थी।

अब किसी भी बात का यूॅ मशवरा न दे कोई।
इश्क़ गुनाहे अजीम नहीं तो सज़ा न दे कोई।।

अज़ाब तो मोहब्बत के साथ ही मिल जाते हैं,
फिर ग़मों को हमारे घर का पता न दे कोई।।

कैसे समझाएॅ के ऑधियों के बस का भी नहीं,
ये तो दिल के चिराग़ हैं इन्हें हवा न दे कोई।।

दिल की चोंट तो दिलबर से ही रफू होती है,
बेवजह इस दिल की अब दवा न दे कोई।।

इस लिए अपने दिल को समझा लिया हमने,
सरे राह मेरे महबूब का सिर झुका न दे कोई।।

आग लगे इस इश्क़ को के इसकी वजह से,
परेशां हो के मुझको कहीं भुला न दे कोई।।

आशा ने इस ग़ज़ल को बार बार पढ़ा। उसके दिल में अजीब सी हचचल होने लगी थी। काफी देर तक वो उसके बारे में सोचती रही। वो हैरान भी थी कि निधी इतना कुछ कैसे लिख सकती है? पर सबूत तो उसकी ऑखों के सामने ही था। आशा ने निधी से पूछा भी था कि ये किस शायर की लिखी हुई ग़ज़ल है, जवाब में निधी ने बस मुस्कुरा दिया था। जब आशा ने ज़ोर दिया तो उसने बताया कि ये उसके ही दिल की आवाज़ है जिसे उसने शब्दों में पिरो कर ग़ज़ल का रूप दे दिया है। निधी की इस बात पर आशा सोचों में गुम हो गई। फिर जैसे उसने खुद को सम्हाला। उसकी नज़र डायरी के दाहिने वाले पेज़ पर लिखी एक और ग़ज़ल पर पड़ी। उसने उस ग़ज़ल को भी पढ़ना शुरू किया।

दिल तो दरिया ही था इक ग़म भी समंदर हो गया।
फक़त दर्द से फाॅसला था वो भी मयस्सर हो गया।।

हर वक्त ज़हन में अब उनका ही ख़याल तारी है,
मेरी पलकों के तले हर ख़्वाब सिकंदर हो गया।।

इसके पहले तो बहारे गुल का हर मौसम हरा रहा,
अब खिज़ां क्या आई के हर बाग़ बंज़र हो गया।।

मेरी ज़रा सी आह पर तड़प उठते थे कुछ लोग,
आजकल तो मोम का हर पुतला पत्थर हो गया।।

कितनी हसीं थी ज़िन्दगी मरीज़-ए-दिल से पहले,
अब तो नज़र के सामने बस वीरां मंज़र हो गया।।

अपनी बेबसी का ज़िक्र भला करें भी तो किससे,
बस छुप छुप के रोना ही अपना मुकद्दर हो गया।।

इस ग़ज़ल को पढ़ कर आशा के संपूर्ण जिस्म में झुरझुरी सी हुई। दिल में इक हूक सी उठी जिसने उसकी ऑखों में पलक झपकते ही ऑसुओं का सैलाब सा ला दिया। उसने पलट कर चुपके से निधी की तरफ देखा। निधी पूर्व की भाॅति ही किताबों में खोई हुई थी। ये देख कर आशा को ऐसा लगा जैसे उसका दिल एकदम से धड़कना बंद कर देगा। उसने बड़ी मुश्किल से अपने अंदर के प्रबल वेग में मचलने लगे जज़्बातों को सम्हाला और फिर डायरी को बंद कर बेड पर चुपचाप ऑखें बंद करके लेट गई। दिलो दिमाग़ एकदम से शून्य सा हो गया था उसका। उसे निधी के दर्द का बखूबी एहसास हो चुका था। किन्तु दिमाग़ में ये सवाल ताण्डव सा करने लगा कि कोई लड़की इस हद तक कैसे किसी को चाह सकती है कि उसके प्रेम में इस तरह बावरी सी होकर ग़ज़ल व कविता लिखने लग जाए? मन ही मन जाने क्या क्या सोचते हुए आशा को पता ही नहीं चला कि कब नींद ने उसे अपनी आगोश में ले लिया था।
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अजय सिंह तेज़ रफ्तार से कार चलाते हुए शहर की तरफ जा रहा था। इस वक्त उसके चेहरे पर पत्थर सी कठोरता विद्यमान थी। उसकी नज़र बार बार कार के अंदर लगे बैक मिरर पर पड़ जाती थी। वह काफी समय से देख रहा था कि उसके पीछे लगभग सौ मीटर के फाॅसले पर एक जीप लगी हुई है। पहले उसे लगा था कि शायद कोई लोकल आदमी होगा जो उसकी तरह ही शहर जा रहा है किन्तु फिर जाने क्या सोच कर अजय सिंह ने उसे परखने का सोचा था? अजय सिंह ने कई बार अपनी कार की रफ्तार को धीमा किया था, ये सोच कर कि पीछे आने वाली जीप उसे ओवरटेक करके उसके आगे निकल जाएगी मगर ऐसा एक बार भी नहीं हुआ था। बल्कि उसकी कार के धीमा होते ही उस जीप की रफ्तार भी धीमी हो जाती थी।

अनुभवी अजय सिंह को समझते देर न लगी कि पीछे लगी जीप वास्तव में उसका पीछा कर रही है। इस बात के समझते ही उसे ये भी समझ आ गया कि संभव है ऐसा उसके साथ अब से पहले भी हो चुका हो। उसके मस्तिष्क में दो नाम आए रितू और विराज। यकीनन इन दोनो ने उसकी हर गतिविधि पर नज़र रखने के लिए कोई आदमी उसके पीछे लगा रखा था। अजय सिंह को अब सब समझ आ गया था कि क्यों वो बार बार मात खा रहा था अपने दुश्मन से। उसके दुश्मन को उसकी हर ख़बर रहती थी तभी तो वो उससे चार क़दम आगे रहता था। अजय सिंह को अपने आप पर बेहद गुस्सा भी आया कि उसने इस बारे में पहले क्यों नहीं सोचा था? जबकि ये एक अहम बात थी। उसकी बेटी के लिए ये सब करना महज बाएॅ हाथ का खेल था। वो एक पुलिस वाली थी, जिसके तहत मुजरिमों को खोजने के लिए उसके अपने गुप्त मुखबिर होना लाजमी बात थी। किन्तु अब भला इस बारे में सोचने का क्या फायदा था? जो होना था वो तो हो ही चुका था, मगर अब जो होने वाला था ये उसने सोच लिया था।

अजय सिंह ने अपने पीछे लगी उस जीप को चकमा देने का मन बना लिया था। अब वो अपनी गतिविधियों की जानकारी अपने दुश्मन तक नहीं पहुॅचने देना चाहता था। उसने कार को तेज़ रफ्तार से दौड़ा दिया और कुछ ही समय में शहर के अंदर दाखिल हो गया। बैक मिरर पर उसकी नज़र बराबर थी। वो देख रहा था कि पीछे लगी जीप भी उसी रफ्तार से आ रही थी। अजय सिंह को पता था कि उस जीप को चकमा देने का काम वो शहर में ही कर सकता था। क्योंकि यहाॅ पर आबादी थी तथा कई सारे रास्ते थे जहाॅ पर पल में गुम हो सकता था। अजय सिंह ने ऐसा ही किया, यानी शहर में दाखिल होते ही कई सारे रास्तों से चलते हुए पीछे लगी जीप की पहुॅच से दूर हो गया। इस बीच उसने किसी से फोन पर बात भी की थी।

थोड़ी ही देर में अजय सिंह ने कार को सड़क के किनारे रोंक दिया। वह बैक मिरर पर अभी भी देख रहा था। लगभग दस मिनट गुज़र गए। पीछे लगी जीप का कहीं कोई पता न था। अलबत्ता इस बीच एक कार ज़रूर उसके सामने आकर रुकी। कार से एक साधारण कद काठी का आदमी बाहर निकला और चल कर अजय सिंह के पास आया। उस आदमी को देख कर अजय सिंह अपनी कार से नीचे उतरा। अजय सिंह के उतरते ही वो आदमी अजय सिंह की कार में बैठ गया। कार में बैठते ही उसने कार को आगे पीछे करके यू टर्न लिया और वहाॅ से चला गया। उस आदमी से अजय सिंह ने कोई बात न की थी, शायद उसने फोन पर ही उसे सब कुछ समझा दिया था। ख़ैर उस आदमी के जाते ही अजय सिंह भी उस आदमी की कार के पास पहुॅचा और कार की ड्राइविंग सीट पर बैठ कर कार को आगे बढ़ा दिया।

कुछ ही समय में अजय सिंह की ये कार जिस जगह रुकी उसके बाएॅ तरफ एक ऊॅची सी बिल्डिंग थी। ये बिल्डिंग पाॅच मंजिला थी। नीचे के ग्राउंड फ्लोर पर कई दुकानें थी जबकि दूसरे फ्लोर पर बिल्डिंग की बाहरी दीवार पर स्टील के बड़े बड़े अच्छरों से "दा जिम" लिखा था। बाॅकी के ऊपरी फ्लोर पर कुछ और भी चीज़ें थीं जिनका ज़िक्र करना यहाॅ ज़रूरी नहीं है।

कार से उतर कर अजय सिंह उसी बिल्डिंग की तरफ बढ़ चला। बिल्डिंग के ऊपरी फ्लोर पर जाने के लिए दोनो तरफ की दुकानों के बीच एक बड़ा सा चैनल गेट लगा था। उस चैनल गेट से ही सीढ़ियाॅ लगी थी। अजय सिंह तेज़ तेज़ क़दमों से चलता हुआ उस चैनल गेट के पास पहुॅचा और फिर सीढ़ियाॅ पर चढ़ता हुआ ऊपर की तरफ चला गया। कुछ ही देर में वो दूसरे फ्लोर यानी कि दा जिम वाले हिस्से के एक बड़े से मीटिंग हाल में दाखिल हुआ। मीटिंग हाल में पहले से ही कुछ गिनती के लोग बैठे हुए थे।

"हैलो फ्रैण्ड्स।" अजय सिंह उन सबकी तरफ देखते हुए कहा और फिर फ्रंट की मुख्य कुर्सी पर बैठ गया।
"अच्छा हुआ ठाकुर साहब।" उनमे से एक ने अजय सिंह की तरफ देखते हुए कहा___"कि आपने ये मीटिंग की और हम सबको यहाॅ बुला लिया। हम खुद भी चाहते थे कि सामने बैठ कर इस बारे में तसल्ली से बात करें। हम सबने आपकी मदद के लिए अपने अपने आदमियों को आपके पास भेजा था किन्तु उस दिन के हादसे में हमारे वो सब आदमी पुलिस द्वारा पकड़ लिए गए। ये हमारे लिए बिलकुल भी अच्छा नहीं हुआ है। आप समझ सकते हैं कि पुलिस के पास पत्थरों का भी मुह खुलवा लेने की कूवत होती है। इस लिए अगर हमारे आदमियों ने पुलिस के सामने अपना अपना मुह खोल दिया तो उसका अंजाम यही होगा कि बहुत जल्द हम सब भी पुलिस के द्वारा धर लिये जाएॅगे।"

"मामला वाकई बेहद गंभीर हो गया है कमलकान्त।" अजय सिंह ने कहने के साथ ही शिगार सुलगा लिया, फिर बोला___"इस मामले को हम बड़ी आसानी से सुलझा लेते मगर आज मंत्री जी की गिरफ्तारी से बहुत बड़ा झटका लगा है। हम में से किसी को भी ये उम्मीद नहीं थी कि मंत्री जैसा चतुर व शातिर इंसान इस तरह पलक झपकते ही पुलिस के द्वारा धर लिया जाएगा। ख़ैर, आप सब चिंता न करें, क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि पुलिस उन सबको छोंड़ देगी।"

"क्याऽऽऽ???" मीटिंग हाल में बैठे वो सब इस बात को सुन कर उछल पड़े थे, एक अन्य बोला___"ऐसा आप कैसे कह सकते हैं ठाकुर साहब? जबकि ये असंभव बात है। पुलिस भला ऐसे संगीन अपराधियों को कैसे छोंड़ देगी?"

"उसकी एक ठोस वजह है।" अजय सिंह ने कहा___"इस शहर की पुलिस का सारा महकमा भले ही बदल गया था किन्तु इस बात को गुज़रे हुए काफी समय हो गया है। इस देश में ऐसे पुलिस वालों की कमी नहीं है जिनका इमान थोड़े से पैसों के लिए डगमगा जाता है। कहने का मतलब ये कि पुलिस महकमे में एक खास पुलिसिया ऐसा ही है जिसका इमान हमने पैसे से डगमगा दिया है। उसी ने हमे फोन पर इस सबके बारे में जानकारी दी थी।"

"क..कैसी जानकारी ठाकुर साहब?" कमलकान्त के चेहरे पर हैरानी के भाव आए।
"यही कि पुलिस ने हमारे जिन आदमियों को गिरफ्तार किया था।" अजय सिंह ने कहा___"उनके खिलाफ कोई केस फाइल नहीं किया गया है अब तक और महकमे के अंदर का माहौल भी यही ज़ाहिर कर रहा है कि आगे भी अभी उन पर कोई केस फाइल होने की संभावना नहीं है। दरअसल पुलिस डिपार्टमेंट अभी मंत्री की गिरफ्तारी पर ज्यादा ज़ोर दे रहा है। पुलिसिये ने बताया कि एसीपी रमाकान्त शुक्ला को केन्द्र से भेजा गया था मंत्री और उसके साथियों के खिलाफ़ गुप्तरूप से सबूत इकट्ठा कर उन्हें गिरफ्तार करने के लिए। ताकि इस प्रदेश से गंदगी दूर हो सके।"

"वो सब तो ठीक है ठाकुर साहब।" अभिजीत सहाय नाम का आदमी बोल पड़ा___"लेकिन इससे ये तो साबित नहीं होता कि मंत्री की वजह से पुलिस हमारे आदमियों पर कोई केस फाइल नहीं करेगी। बल्कि पुलिस का तो काम ही यही है मुजरिमों को सज़ा दिलाना। अतः देर सवेर पुलिस अपना काम ज़रूर करेगी।"

"पूरी बात तो सुनो भाई।" अजय सिंह बोला___"एसीपी मंत्री तथा मंत्री के साथियों को लेकर यहाॅ से जा चुका है। उनका फैसला अब अदालत में होगा और ज़ाहिर है कि प्राप्त सबूतों के आधार पर उन सबको संगीन से संगीन सज़ा होगी। एसीपी का काम सिर्फ इतना ही था यानी अब यहाॅ पर वो नहीं आएगा। उसी पुलिसिये ने बताया था कि पुलिस कमिश्नर की उसने बातें सुनी थी जो वो मेरी बेटी से कर रहे थे। मामला ये है कि ये सारा फसाद रितू और विराज ने पुलिस कमिश्नर की सहमति से ही किया था। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि कमिश्नर की बातों से ये पता चला है कि उसे इस बात की जानकारी विराज या रितू द्वारा नहीं दी गई है कि उनके पास हमारे खिलाफ ऐसा डायनामाइट सबूत है जिसके बेस पर वो हमे जब चाहे कानून की चपेट में ला सकते हैं। कहने का मतलब ये कि कमिश्नर की समझ में मामला यही है कि ये महज एक पारिवारिक मामला है जिसमें हमने विराज व उसकी फैमिली के साथ ग़लत किया है, जिसके लिए वह हमसे अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहा है। विराज का साथ रितू दे रही है जो कि कमिश्नर की सहमति पर ही है। अब सोचने वाली बात ये है कि जब कमिश्नर को इस बारे में पता ही नहीं है कि हम क्या धंधा करते हैं तो फिर भला वो हमारे आदमियों किस बारे में पूछताॅछ करेगा? और अगर करेगा भी तो वो यही कहेंगे कि उन लोगों को हमने किराए पर हायर किया था। यानी उनमे से कोई आप लोगों का नाम नहीं लेगा। रही बात उस हादसे की जिसके कारण वो गिरफ्तार किये गए थे तो वो भी रितू की ही वजह से हुआ था। उस हादसे में ग़ैर कानूनी तरीके से हमारा साथ देने के लिए उन लोगों को सज़ा के तौर पर थोड़ी बहुत सज़ा मिल सकती है अथवा ज़ुर्माना भरवा कर उन्हें छोंड दिया जा सकता है।"

"अगर ऐसा है।" कमलकान्त बोला___"तब तो ठीक है ठाकुर साहब। हम किसी तरह से अपने आदमियों को छुड़ाने की कोशिश कर लेंगे। किन्तु आपसे गुजारिश है ऐसा फिर न हो।"

"ऐसा भी इसी लिए हो गया कमलकान्त।" अजय सिंह ने पुरज़ोर लहजे में कहा___"क्योंकि हमें उस सबकी ज़रा भी उम्मीद नहीं थी। हलाॅकि वो हमारी ग़लती थी। हमें इस बात की तरफ भी ध्यान देना चाहिए था कि दुश्मन की तरफ हमारी बेटी है जो एक पुलिस वाली है और वो इस सबके लिए अपने पुलिस महकमे का सहारा ले सकती है। ख़ैर, छोंड़िये इस बात को। हमने वकील से बात कर ली है वो सब आदमी बहुत जल्द छूट जाएॅगे।"

"अब आगे का क्या प्रोग्राम है आपका?" अभिजीत सहाय ने कहा___"उस हादसे की वजह से जीती हुई बाज़ी आप हार गए थे। इस लिए इसके आगे क्या करने का सोचा है आपने?"
"कहते हैं कि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता।" अजय सिंह ने दार्शनिकों वाले अंदाज़ से कहा___"हार जीत जंग करने वाले हर ब्यक्ति के हिस्से में आती है। कभी वह हारता है तो कभी जीतता भी है। कहने का मतलब ये कि दुर्भाग्य की वजह से अब तक हम हारते ही आए थे मगर अब ऐसा नहीं होगा।"

"क्या मतलब है आपका?" कमलकान्त के माॅथे पर शिकन उभरी, बोला___"आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे कि आपके पास अपने दुश्मन के खिलाफ कोई बहुत बड़ा सबूत लग गया है जिसके तहत आप अपने दुश्मन को बड़ी आसानी से अपने पंजे पर दबोच लेंगे।"

"बिलकुल सही कहा कमलकान्त।" अजय सिंह के चेहरे पर चमक थी, बोला___"ऐसा ही हुआ है। उसने हमारे साथ बहुत खेल खेला अब एक खेल हम भी दिखाएॅगे उसे। एक ऐसा खेल जिसके बारे में उसने ख़्वाब में नहीं सोचा होगा। सबके सब एक ही झटके में हमारे क़दमों तले पालतू कुत्तों की तरह दुम हिलाते नज़र आएॅगे।"

"ऐसी क्या बात हो गई है ठाकुर साहब?" अभिजीत के चेहरे पर हैरानी थी___"जिसके तहत आप इतनी दृढ़ता व इतने विश्वास के साथ कह रहे कि सबके सब आपके पैरों तले आ जाएॅगे?"

"बस देखते जाओ सहाय।" अजय सिंह ने प्रभावशाली लहजे में कहा___"सब कुछ बहुत जल्द समझ आ जाएगा। ख़ैर, हम ये कह रहे हैं कि हमें इसी वक्त वैसे ही कुछ आदमी चाहिए जैसे आप लोगों ने हमारी मदद के लिए भेजे थे।"

अजय सिंह की इस बात पर वहाॅ बैठे सभी लोग कुछ देर तक तो चकित भाव से उसे देखते रहे फिर उन लोगों सहमति में सिर हिलाया। कुछ देर बाद ही मीटिंग खत्म हो गई। अजय सिंह के उठते ही बाॅकी सब भी अपने अपने रास्तों पर चले गए।
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दोस्तो, आप सबके सामने मेगा अपडेट हाज़िर है। आशा करता हूॅ कि आप सबको पसंद आएगा।

हमेशा की तरह आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा।
 
एकनयासंसार
अपडेट........《 61 》

अब तक,,,,,,,

"क्या मतलब है आपका?" कमलकान्त के माॅथे पर शिकन उभरी, बोला___"आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे कि आपके पास अपने दुश्मन के खिलाफ कोई बहुत बड़ा सबूत लग गया है जिसके तहत आप अपने दुश्मन को बड़ी आसानी से अपने पंजे पर दबोच लेंगे।"

"बिलकुल सही कहा कमलकान्त।" अजय सिंह के चेहरे पर चमक थी, बोला___"ऐसा ही हुआ है। उसने हमारे साथ बहुत खेल खेला अब एक खेल हम भी दिखाएॅगे उसे। एक ऐसा खेल जिसके बारे में उसने ख़्वाब में नहीं सोचा होगा। सबके सब एक ही झटके में हमारे क़दमों तले पालतू कुत्तों की तरह दुम हिलाते नज़र आएॅगे।"

"ऐसी क्या बात हो गई है ठाकुर साहब?" अभिजीत के चेहरे पर हैरानी थी___"जिसके तहत आप इतनी दृढ़ता व इतने विश्वास के साथ कह रहे कि सबके सब आपके पैरों तले आ जाएॅगे?"

"बस देखते जाओ सहाय।" अजय सिंह ने प्रभावशाली लहजे में कहा___"सब कुछ बहुत जल्द समझ आ जाएगा। ख़ैर, हम ये कह रहे हैं कि हमें इसी वक्त वैसे ही कुछ आदमी चाहिए जैसे आप लोगों ने हमारी मदद के लिए भेजे थे।"

अजय सिंह की इस बात पर वहाॅ बैठे सभी लोग कुछ देर तक तो चकित भाव से उसे देखते रहे फिर उन लोगों सहमति में सिर हिलाया। कुछ देर बाद ही मीटिंग खत्म हो गई। अजय सिंह के उठते ही बाॅकी सब भी अपने अपने रास्तों पर चले गए।
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अब आगे,,,,,,,

बड़ा ही सनसनीखेज मंज़र था।
ये कोई फार्महाउस था जो कि शहर की आबादी से दूर था। फार्महाउस काफी बड़ा था। बीचो बीच दो मंजिला इमारत बनी हुई थी। चारो तरफ हट्टे कट्टे तथा काली वर्दी पहने गनधारी तैनात थे। इमारत के सामने विशाल मैदान में कई कार व जीपें खड़ी हुई थी। किन्तु इस बीच सबसे सनसनीखेज बात ये थी कि इमारत के बगल से बने गेस्टहाउस के आकार का जो घर बना था उसके सामने की दीवार पर कुछ लोग रस्सियों में बॅधे खड़े थे। सबके हाॅथ आपस में बॅधे ऊपर की तरफ घर की रेलिंग से झूलती रस्सियों पर बॅधे हुए थे।

विराज, गौरी, निधी, अभय, करुणा, दिव्या, शगुन, आशा, रुक्मिणी, आदित्य, रितू, सोनम, नीलम, नैना, बिंदिया तथा शंकर व हरिया ये सब मोटी मोटी रस्सियों में बॅधे हुए छटपटा रहे थे। विराज, रितू व आदित्य के चेहरों पर जहाॅ कठोरता के भाव थे वहीं बाॅकी सबके चेहरे दहशत से भरे पड़े थे। जबकि इन सबके सामने खड़े थे अजय सिंह, प्रतिमा, शिवा तथा उनके कई सारे हथियारबंद आदमी। सबके होठों पर जानदार व विजयात्मक मुस्कान छाई हुई थी। अजय सिंह कुछ देर पहले ही ज़ोर ज़ोर से अट्ठहास लगा रहा था। किन्तु उसके तुरंत बाद ही उसका चेहरा गुस्से से आग बूबला नज़र आने लगा था। यही हाल प्रतिमा व शिवा का भी था। इन तीनों के चेहरों पर इस वक्त गुस्सा व नफ़रत के बेशुमार भाव गर्दिश कर रहे थे।

"हर ब्यक्ति से चुन चुन के हिसाब लूॅगा।" वातावरण में मानो अजय सिंह की दहाड़ गूॅजी___"बहुत तड़पाया है तुम सबने मुझे। मेरे दिन का चैन व रातों की नींद हराम कर रखी थी तुम लोगों ने। सबका हिसाब सूद समेत लूॅगा मैं।" कहने के साथ ही अजय सिंह विराज के नज़दीक आया फिर उसके जबड़े को अपने दाहिने हाॅथ से शख्ती से पकड़ते हुए कहा___"क्या समझता था तू अपने आपको? दो चार बार मुझे करारी शिकस्त क्या दे दी साला अपने आपको जेम्स बाॅण्ड का बाप समझने लगा। अरे तेरे जैसे जेम्स बाण्ड तो मेरे कच्छे के अंदर पाये जाते हैं समझा? देख लिया न, एक ही झटके में चारो खाने चित्त कर दिया है तुम सबको मैने। मैं चाहूॅ तो इसी वक्त तुम सबके साथ जो चाहूॅ वो कर सकता हूॅ, और करूॅगा भी। अपने हर नुकसान का बदला लूॅगा मगर उससे पहले अपनी ख़्वाहिशों को पूरा करूॅगा मैं। मेरी ख्वाहिशों के बारे में तो तुम सब बहुत अच्छी तरह जानते हो न।"

"एक बार मेरे ये हाॅथ खोल कर देखो बड़े भइया।" सहसा अभय गुस्से से उबलता हुआ बोल पड़ा___"अकेले तुम तीनों का राम नाम सत्य न कर दिया तो ठाकुर गजेन्द्र सिंह बघेल की औलाद न कहलाऊॅ।"

"यही, बस यही।" अजय सिंह तपाक से बोला___"यही अकड़ तो तुम सबकी निकालनी है मुझे। तुम सबके गुरूर और स्वाभिमान को अपने पैरों के तले रौंदना है मुझे। उसके बाद यहाॅ सबके सामने तुम सबके साथ ऐसा नंगा नाच करूॅगा कि ऊपर बैठे फरिश्तों का कलेजा भी दहल जाएगा।"

"डैड आपको जो भी करना है करिये।" सहसा अजय सिंह के पीछे से आता हुआ शिवा बोल उठा____"किन्तु अब मुझसे बरदास्त नहीं हो रहा। आप तो जानते हैं कि मेरी ख्वाहिश क्या है। अतः आप मुझे मेरी इस जाने बहार निधी का जी भर के रस पान करने की इजाज़त दीजिए।"

"अरे इजाज़त क्यों माॅगता है शहज़ादे?" अजय सिंह ने ज़ोर का ठहाका लगाते हुए कहा____"ये सब तो यहाॅ आए ही इसी सबके लिए हैं। तुझे जो पसंद आए उसे भोगना शुरू कर दे। मेरा शिकार तो ये गौरी है। कसम से इसे पाने के लिए मैं कितना तड़पा हूॅ ये तो सिर्फ मैं ही जानता हूॅ।"

"हरामज़ादे।" रस्सियों से बॅधा विराज बुरी तरह दहाड़ते हुए चिल्ला उठा____"अगर मेरी माॅ बहनों को हाॅथ लगाने की कोशिश की तो समझ लेना तेरे हाॅथ उखाड़ कर कुत्तों के सामने डाल दूॅगा।"

"चिल्ला मेरे भतीजे।" अजय सिंह ज़ोर से हॅसा___"और ज़ोर से चिल्ला। क्योंकि अब तू सिर्फ यही कर सकता है। जबकि मैं और मेरा बेटा यहाॅ मौजूद हर औरत व लड़की का रसपान करेंगे। उसके बाद यहाॅ मौजूद मेरे सभी आदमी उन्हें जी भर के भोगेंगे। उफ्फ! बाद मुद्दत के ये दिन आया है जिसका मुझे शिद्दत से इन्तज़ार था।"

अजय सिंह की इस बात पर रस्सियों में बॅधे विराज, आदित्य, अभय, हरिया व शंकर जैसे मर्द बुरी तरह छटपटा कर रह गए। गुस्सा, अपमान, व जलालत का कड़वा घूॅट पी जाने के सिवा जैसे उनके पास कोई दूसरा चारा ही नहीं था। जबकि अजय सिंह की बात तथा उसके मंसूबों का देख कर सभी औरतों व लड़कियों की रूह तक फना हो गई।

इधर ज़ोरदार कहकहे लगाते हुए अजय सिंह व शिवा अपने अपने पसंदीदा शिकार की तरफ बढ़ चले। रस्सियों में बॅधे सबके सब बुरी तरह छटपटा रहे थे। औरतों व लड़कियों की हालत पल भर में ख़राब हो गई। कुछ ही पलों में अजय सिंह व शिवा अपने अपने शिकार यानी कि गौरी व निधी के पास पहुॅच गए।

"उफ्फ।" निधी के क़रीब पहुॅचते ही शिवा ने ज़हरीली मुस्कान के साथ कहा___"मेरी राॅड बहन तो पहले से और भी ज्यादा खूबसूरत हो गई
है। लगता है मुम्बई का पानी काफी सूट किया है तुझे। चल ये तो और भी बहुत अच्छा हुआ। तेरी इस मादक किन्तु कच्ची जवानी का रसपान करने में अब और भी मज़ा आएगा।"

"हरामज़ादे कुत्ते।" विराज पूरी शक्ति से बंधनों को खींचते हुए चिल्लाया____"मेरी बहन से इस तरह बात करने का अंजाम बहुत भयंकर होगा। अगर अपनी खैरियत चाहता है तो दूर हट जा गुड़िया से वरना माॅ कसम यहीं ज़िंदा गाड़ दूॅगा तुझे।"

"ये गीदड़ भभकी किसी और को देना बेटा।" शिवा ने ज़हरीली मुस्कान के साथ कहा___"चिन्ता मत कर, तेरा भी हिसाब करना है मुझे। तूने उस समय मुझ पर हाॅथ उठाया था न। उसका हिसाब तो ज़रूर लूॅगा तुझसे। मगर उससे पहले अपनी जाने जिगर से अपना मूड तो बना लूॅ।"

शिवा की बात पर विराज बुरी तरह छटपटा कर रह गया। उसे अपनी बेबसी पर बेहद क्रोध भी आ रहा था और रोना भी। उधर अजय सिंह भी गौरी के पास पहुॅच चुका था। उसने गौरी को बहुत ही नज़ाकत से ऊपर से नीचे तक कई बार देखा और फिर उसकी ऑखों में देखते हुए मुस्कुराया।

"सचमुच।" फिर अजय सिंह ने मानो मंत्रमुग्ध हो चुके भाव से कहा___"आज भी वैसी ही हो जैसे तब थी जब मैने तुम्हें पहली बार देखा था। वही सादगी, वही तीखे नैन नक्श, वही साॅचे में ढला हुआ मदमस्त कर देने वाला गदराया हुआ जिस्म। कसम से गौरी, तुम्हें अगर हज़ार बार भी भोग लूॅ तो मेरी तिश्नगी न बुझेगी। तुम्हें पता है, तुम वो दूसरी स्त्री हो जिससे मुझे सचमुच का प्यार हो गया था। मैं चाहता था कि तुम खुशी खुशी मेरी आगोश में आ जाओ। मगर जब तुम नहीं आई तो मुझे हर वो रास्ता अख्तियार करना पड़ा जिसके तहत मुझे लगता था कि तुम मेरी आगोश में आ सकती हो। पर कदाचित मैं ग़लत था गौरी या फिर मेरे प्यार में वो बात ही नहीं थी जिसके तहत तुम मेरी हो जाती।"

"भाभी से तमीज़ से बात करो बड़े भइया।" अभय बुरी तरह छटपटाते हुए बोला___"इतनी भी नीचता मत दिखाओ कि ईश्वर को भी शर्म आ जाए।"
"ओहो।" अजय सिंह ने ब्यंगात्मक भाव से उसे देखते हुए कहा___"तो मेरा छोटा भाई भी अब मुझसे इस ज़ुबान में बात करेगा। लगता है गौरी ने थोड़ा बहुत अपनी मदमस्त जवानी का स्वाद चखा दिया है तुम्हें।"

"ख़ाऽऽऽमोश।" अभय सिंह पूरी शक्ति से दहाड़ा था, बोला____"अपनी ज़बान को लगाम दे बेशर्म इंसान। बस एक बार मुझे इस बंधन से आज़ाद कर दे। उसके बाद देख कि क्या हस्र करता हूॅ तेरा।"

"इस तरह चिल्लाने का कोई फायदा नहीं है छोटे।" अजय सिंह ने पूरी ढिठाई से कहा____"क्योंकि अब यहाॅ पर वही होगा जो सिर्फ और सिर्फ मैं चाहूॅगा। तुम सबकी ऑखों के सामने हम दोनो बाप बेटे एक एक औरत व एक एक लड़की की इज्ज़त का मर्दन करेंगे।"

इतना कहने के साथ ही अजय सिंह पलटा और पुनः गौरी के समीप आ गया। उसने जैसे ही हवस भरी ऑखों से गौरी की तरफ देखा वैसे ही गौरी ने नफरत व घृणा से उसके चेहरे पर थूॅक दिया। ये देख कर अजय सिंह तो आग बबूला हुआ ही किन्तु इस बीच गौरी के समीप तेज़ी से आकर प्रतिमा ने उसके गाल पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ दिया।

"साली कुतिया।" प्रतिमा किसी शेरनी की भाॅति गुर्राते हुए बोली___"तेरी हिम्मत कैसे हुई अजय के चेहरे पर थूॅकने की? अपने आपको बड़ी सती सावित्री समझती है न। अभी यहीं सबके सामने तेरे इस जिस्म को नुचवाती हूॅ। अपने रूप और सौंदर्य का बहुत घमंड है न तुझे, रुक ऐसा हाल करवाऊॅगी कि सब थूॅकेंगे तुझ पर।" कहने के साथ ही प्रतिमा एक झटके से अजय सिंह की तरफ पलटी, फिर गुस्से से फुंफकारते हुए बोली____"देख क्या रहे हो अजय? आगे बढ़ो और चीर फाड़ कर फेंक दो इस रंडी के जिस्म से इसके सारे कपड़े। ज़रा भी रहम न करना इस दो टके की राॅड पर।"

प्रतिमा का भभकता हुआ चेहरा तथा उसकी बातें सुन कर अजय सिंह पर तुरंत प्रतिक्रिया हुई। वह झटके से आगे बढ़ा और गौरी के जिस्म पर मौजूद सफेद साड़ी के ऑचल को पकड़ कर एक झटके से अपनी तरफ खींच लिया। जिससे गौरी का ऊपरी जिस्म अर्धनग्न सा हो गया। सफेद ब्लाउज पर कसे हुए उसके बड़े बड़े उन्नत उभार सबकी नज़रों में आ गए। उधर अजय सिंह की इस हरकत से वातावरण में कई सारी चीखें गूॅज गईं। गौरी तो लाज व शर्म की वजह से चिल्लाई ही थी किन्तु उसके साथ ही विराज आदि सब भी चीख पड़े थे। एकदम से जैसे वातावरण में कोलाहल सा मच गया था।

"हरामज़ादे।" विराज के सब्र का बाॅध मानो टूट गया। भयंकर गुस्से में भभकते हुए उसने अपने दोनो हाॅथों को नीचे की तरफ पूरी ताकत से खींचा। उसका गोरा चेहरा लाल सुर्ख पड़ता चला गया। कुछ ही पलों में रस्सी टूटती चली गई। रस्सी के टूटते ही वह तीव्र वेग से नीचे ज़मीन पर गिरा और फिर गुलाटियाॅ खाता चला गया। किन्तु तुरंत ही बिजली की स्पीड से उठ कर खड़ा भी हो गया। उसके दोनो हाॅथ आपस में अभी भी रस्सी से बॅधे हुए थे। वह उसी हालत में अजय सिंह की तरफ दौड़ पड़ा।

पलक झपकते ही वह अजय सिंह के ऊपर छलांग चुका था। अजय सिंह के ऊपर विराज का जिस्म बड़े वेग से टकराया था जिसके परिणाम स्वरूप वो भरभरा कर वहीं ज़मीन पर गिरा। विराज पहले तो उसके ऊपर ही था किन्तु ज़मीन पर दोनो के गिरते ही विराज उसके ऊपर से दूसरी तरफ लुढ़कता चला गया था। किन्तु वह फौरन ही उठा और पल भर में अजय सिंह के सीने में सवार हो गया। उसके सीने पर सवार होते ही वह अपने दोनो बॅधे हाथों का दुहत्थड़ उसके सीने पर पूरे वेग से मारने लगा। ये सब इतनी जल्दी हुआ कि कुछ देर तक तो कोई कुछ समझ भी न पाया। हर कोई हक्का बक्का रह गया था।

सबको होश तो तब आया जब वातावरण में अजय सिंह की दर्द भरी चीखें गूॅजने लगी थी। चारो तरफ तैनात गनमैन तुरंत ही हरकत में आ गए। वो एक साथ उस तरफ बढ़े जहाॅ पर विराज अजय सिंह के ऊपर चढ़ा हुआ उस पर दुहत्थड़ बरसाए जा रहा था।

"आज तुझे ज़िंदा नहीं छोंड़ूॅगा हरामज़ादे।" विराज मारने के साथ साथ गुस्से में बोलता भी जा रहा था___"तूने मेरी देवी जैसी माॅ का अपमान किया है। उन पर अपनी गंदी दृष्टि डाली है। तुझ जैसे पापी का इस दुनियाॅ में जीने का कोई अधिकार नहीं है।"

विराज अभी ये सब बोल ही रहा था कि तभी चारो तरफ से दौड़ते हुए आए गनमैनों ने उसे पकड़ कर अजय सिंह के ऊपर से खींच कर दूर कर दिया। गनमैनों के बंधन में जकड़ा हुआ विराज बुरी तरह चीखे जा रहा था तथा खुद को उनकी पकड़ से छुड़ाने के लिए पूरी ताकत लगाए जा रहा था। किन्तु चारो तरफ से हाॅथ पैर पकड़े गनमैनों की पकड़ से वह छूट नहीं पा रहा था। ये अलग बात थी कि गनमैनों को उसे सम्हालने में काफी ज़ोर आजमाईश करनी पड़ रही थी।

इधर विराज के हटते ही अजय सिंह ज़मीन से उठा और तमतमाया हुआ वह गनमैनों द्वारा पकड़े विराज की तरफ बढ़ा और फिर जल्दी जल्दी उसने विराज पर लात घूॅसों की बौछार कर दी। अजय सिंह यहीं पर ही नहीं रुका बल्कि उसने झपट कर एक गनमैन से उसकी गन छीनी और दो कदम दूर हटते हुए उसने विराज की तरफ गन का दहाना खोल दिया। परिणामस्वरूप दो पल के भीतर ही गन से निकली गोलियाॅ विराज के जिस्म को छलनी करती चली गईं। वातावरण कई सारे गलों से निकली चीख़ व चिल्लाहट से गुंजायमान हो उठा। उधर गोलियों से छलनी हो गए विराज का समूचा जिस्म उसके ही लाल सुर्ख खून से नहाता चला गया।

"राऽऽऽऽऽऽज।" अपने कमरे में बेड पर गहरी नींद में सोई पड़ी गौरी पूरी शक्ति से चिल्लाते हुए हड़बड़ा कर उठ बैठी। उसकी इस चीख से रात के गहरे सन्नाटे में डूबा समूचा बॅगला मानो झनझना कर रह गया। बेड पर बदहवाश सी बैठी गौरी विछिप्त सी हालत में इधर उधर देखे जा रही थी। उसका चेहरा भय व दहशत से पीला ज़र्द पड़ा हुआ था। समूचा जिस्म पसीने से तर बतर था। बुरी तरह हाॅफे जा रही थी वह।

गौरी की इस भयानक चीख़ से बॅगले के अंदर अपने अपने कमरों में बेड पर सोया हुआ हर इंसानी जीव बुरी तरह उछल कर उठ बैठा था। जैसे ही उन्हें ये एहसास हुआ कि चीख़ गौरी के कमरे से आई है तो सब के सब अपने अपने कमरों से दौड़ पड़े। किसी को होश भी नहीं था कि कौन किस हालत में बेड पर सोया हुआ था?

थोड़े ही समय में सबके सब गौरी के कमरे के दरवाजे पर ऑधी तूफान की तरह पहुॅचे। अभय व पवन ने दरवाजे को पूरी ताकत से थपथपाया। किन्तु दरवाजा तो खुलता चला गया। यानी कि दरवाजा अंदर से बंद नहीं था। शायद गौरी को दरवाजा बंद करने का ख़याल ही नहीं आया था। आता भी कैसे, उसके ख़यालों में तो हर पल उसका बेटा रहता था। जो उसकी ऑखों का तारा था, उसके जीने का आख़िरी सहारा था। उसे पता था कि वो इस समय मौत के मुह में है। ख़ैर, दरवाजे को खुलता देख पवन ने जल्दी से दरवाजे को पूरा धकेला और फिर सबके सब कमरे में दाखिल हो गए।

कमरे में दाखिल होते ही सबकी नज़र एक साथ बेड पर पागलों की सी हालत में बैठी गौरी पर पड़ी। गौरी को इस वक्त किसी बात का होश नहीं था और ना ही उसे अपनी हालत का ख़याल था। उसकी सफेद साड़ी का ऊपरी हिस्सा बेड शीट पर ही एक तरफ गिरा हुआ था। उसकी इस हालत को देख कर करुणा तेज़ी से उसकी तरफ बढ़ी और उसने उसके ऑचल को उसके सीने पर ढॅकते हुए खुद भी बेड के किनारे बैठ कर उसे दोनो हाॅथों से सम्हाल लिया।

"क्या हुआ दीदी???" करुणा सहसा दुखी भाव से गौरी के बुत बने जिस्म को झकझोरते हुए बोली___"आप इतनी ज़ोर से क्यों चीखी थी? बताइये न दीदी, क्या हुआ है?"
"र..र..रा..ज।" सहसा गौरी के थरथराते हुए लबों से बड़ी अजीब सी आवाज़ निकली___"मे..मेरे..बेटे..को मार दिया उन लोगों ने। उन हत्यारों ने मेरे जिगर के टुकड़े को गोलियों से भून दिया। मेरा बेटा खून से लथपथ हो गया है। वो रो रहा है...वो माॅ माॅ कह कर मुझे पुकार रहा है। हाय रे...मेरे बेटे को जान से मार दिया उन कंजरों ने।" कहने के साथ ही गौरी दहाड़ें मार मार कर रो पड़ी___"मुझे मेरे बेटे के पास जाना है। मुझे मेरे बेटे के पास पहुॅचा दो। मुझे अपना बेटा जीवित चाहिए। ईश्वर मेरे बेटे को मुझसे नहीं छीन सकता। अगर ऐसा हुआ तो उसे मेरी बद्दुवा लगेगी। मुझे मेरे बेटे के पास जाना है।"

इतना सब कहने के साथ ही गौरी को चक्कर सा आ गया और वह करुणा की बाहों में अचेत सी लुढ़क गई। गौरी की इन बातों ने सबको जैसे सकते में ला दिया। सबके पैरों तले से मानों ज़मीन गायब हो गई। सबके सब उसकी बात सुन कर इस तरह अवाक से अपनी अपनी जगह खड़े रह गए थे मानों सबको एक साथ ही लकवा मार गया हो। होश तब आया जब करुणा की करुण चीखें सबके सुन्न पड़ चुके कानों में पड़ी।

कुछ ही पल पहले मानो वक्त ठहर सा गया था। करुणा की चीख ने मानो सबके जिस्मों में प्राणों का संचार कर दिया था। वस्तुस्थित का एहसास होते ही सबसे पहले निधी के हलक से आवाज़ निकली। वह रोते हुए गौरी की तरफ दौड़ पड़ी और उससे लिपट कर रोने लगी। उसके बाद तो सब के सब अपनी अपनी भावनाओं के साथ गौरी के पास पहुॅच गए थे। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें? गौरी की इस हालत ने सबको मानों विवेकहीन सा कर दिया था। रुक्मिणी व आशा ने आगे बढ़ कर गौरी को सम्हाला और उसे ध्यान से देखा।

"जल्दी से कोई पानी ले आओ।" फिर रुक्मिणी ने दुखी भाव से लगभग ज़ोर से चिल्ला कर कहा___"इसे चक्कर आया हुआ है। इसने ज़रूर कोई बहुत ही बुरा सपना देखा है। उसी की वजह से यह इतनी ज़ोर से चीखी थी।"

रुक्मिणी की बात सुन कर पवन जो पास ही खड़ा था वो तुरंत कमरे से बाहर की तरफ दौड़ते हुए गया और कुछ ही पलों में एक स्टील के मग में पानी ले कर आ गया। अभय ने आगे बढ़ कर उससे पानी से भरा स्टील का मग लिया और उससे चुल्लू में पानी डाल कर गौरी के चेहरे पर छिड़कने लगा। अभय सिंह की ऑखों में ऑसू व चेहरे पर पीड़ा के भाव थे। कदाचित अपनी देवी समान भाभी की इस हालत से वह खुद भी बेहद दुखी हो गया था।

जगदीश ओबराय बॅगले में नहीं था। वो शाम के लगभग सात बजे ही कहीं बाहर चला गया था। उसने बताया था कि वह बिजनेस के संबंध में किसी ज़रूरी काम से जा रहा है। ख़ैर, कुछ ही देर में गौरी को पुनः होश आ गया। होश में आते ही वह रोते हुए राज राज चिल्लाने लगी। उसे यूॅ रोता देख सबकी ऑखें छलक पड़ीं। बड़ी मुश्किल से उसे सम्हाला सबने। वो बार बार यही कहती कि उसे अपने बेटे के पास जाना है। उसके बेटे को हत्यारों ने गोलियों से छलनी कर दिया है।

काफी देर तक सबके समझाने बुझाने के बाद आख़िर वह कुछ शान्त हुई। सबने उसे समझाया और यकीन दिलाया कि उसके बेटे को किसी ने कुछ नहीं किया है बल्कि उसका बेटा पूर्णतया सुरक्षित है। सबने अपने अपने तरीके से गौरी को समझाया तो था और तसल्ली भी दी थी किन्तु माॅ का हृदय पूरी तरह से शान्त न हो सका था। उसका अंतर्मन संतुष्ट नहीं था। मगर सबको दिखाने के लिए वह शान्त ज़रूर हो गई थी। कदाचित उसने भी सोचा कि ये महज एक ख्वाब ही था और इसकी वजह से उसे सबको दुखी या चिंतित नहीं करना चाहिए।

लगभग एक घंटे बाद सब अपने अपने कमरों में चले गए। गौरी के पास केवल रुक्मणि रह गई थी। अपनी माॅ की इस हालत से निधी भी काफी ब्यथित हो गई थी। खास कर इस बात को सुन कर कि उसके भाई को या यूॅ कहिए कि उसके प्यार को गोलियों से छलनी कर दिया है हत्यारे ने। गौरी के इस स्वप्न ने सबको झकझोर कर रख दिया था। उस रात फिर कोई भी ठीक से सो नहीं पाया था। कदाचित इस लिए भी कि एक ये सच्चाई तो थी ही कि विराज मौत के मुह में था। रितू तथा रितू की पुलिस भले ही उसके साथ थी किन्तु दुर्भाग्य कभी किसी को बता कर नहीं आता। हर कोई विराज के लिए चिंतित था और हर वक्त उसकी सलामती के लिए भगवान से दुवाएॅ कर रहा था।
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मैं और आदित्य बाहर से घूम फिर कर शाम को लगभग सात बजे घर पहुॅचे। अंदर आते ही आदित्य ने कहा वो फ्रेश होने अपने कमरे में जा रहा है। उसके जाने के बाद मैं सीधा नीलम के कमरे में उसको देखने के लिए चला गया। नीलम के कमरे का दरवाजा पूरी तरह से बंद नहीं था बल्कि थोड़ा सा खुला हुआ था। मैने उस खुले हुए हिस्से के पास चेहरा ले जाकर पहले सोनम दीदी को आवाज़ दी। किन्तु जब अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो मैं कुछ पल सोचने के बाद खुद ही दरवाजा खोल कर कमरे के अंदर आ गया।

कमरे में रखे शानदार बेड पर नीलम करवॅट के बल लेटी हुई थी। उसकी ऑखें बंद थी इस वक्त। कदाचित सो रही थी या फिर ऑखें बंद करके आराम कर रही थी। मैं उसके क़रीब जा कर बेड के पास ही खड़ा हो गया। मेरी नज़र उसके मासूम व खूबसूरत से चेहरे पर पड़ी। इस वक्त वो किसी छोटी सी बच्ची की भाॅति मासूम दिख रही थी। मुझे उसकी इस मासूमियत पर बेहद प्यार आया। मेरे होठों पर मुस्कान फैल गई। तभी अचानक मेरे मन में उसे छेंड़ने का ख़याल आया मगर फिर मैंने अपने मन से उसे छेंड़ने का ख़याल झटक दिया। मुझे लगा इस वक्त इसे आराम से सोने देना चाहिए। ये सोच कर मैं उसके चेहरे के क़रीब झुका और प्यार से उसके माॅथे पर हौले से चूॅम लिया। उसके बाद मैं पुनः सीधा खड़ा हुआ और फिर बिना कुछ बोले ही पलट कर कमरे से बाहर की तरफ जाने के लिए बढ़ा ही था कि सहसा तभी मैं चौंक पड़ा। पीछे से नीलम ने उसी वक्त मेरी दाहिनी कलाई को पकड़ लिया था।

उसके इस तरह मेरी कलाई पकड़ लेने पर मैं बरबस ही मुस्कुरा उठा। मेरे दिमाग़ में तुरंत ही ये बात आई कि नीलम ने कदाचित मुझे छेंड़ने के लिए ही मेरी कलाई पकड़ ली है। अतः ये सोचते हुए मैं पूर्वत मुस्कुराते हुए उसकी तरफ पलटा। नीलम ने अपने एक हाॅथ से मेरी कलाई को पकड़ा हुआ था, किन्तु उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। वो बस मुझे एकटक देखे जा रही थी। उसकी ऑखों में कुछ था जो फिलहाल मेरी समझ में नहीं आया कि वो क्या था?

"क्या बात है बंदरिया?" मैने उसे इस तरह देखते देख छेंड़ने वाले भाव से कहा___"क्या मुझसे पंगा लेने का इरादा है? देख अगर ऐसा है तो फिलहाल अपने ज़हन से इस ख़याल को निकाल दे। क्योंकि इस हालत में तुझको मुझसे पंगा लेना भारी पड़ जाएगा। इस लिए मेरी बात मान पहले तू ठीक हो जा। उसके बाद तू शौक से मुझसे जैसे चाहे पंगे ले लेना।"

"ऐसी कोई बात नहीं है राज।" नीलम ने सहसा गंभीरता से कहा___"तुमसे तो मैं इस हाल में भी पंगा लेने को तैयार हूॅ और यकीन मानो मुझे पंगे के भारी पड़ने की कोई फिक्र नहीं है। मगर मैं इस वक्त तुमसे कुछ और ही बात कहना चाहती हूॅ।"

"ओह आई सी।" मैने उसे गंभीर हालत में देखते हुए ज़रा खुद भी कुछ गंभीरता का नाटक करते हुए कहा___"तो ये बात है। फरमाइए, क्या कहना चाहती हैं आप?"
"कहने को तो बहुत कुछ है मेरे दिल में।" नीलम की आवाज़ सहसा लड़खड़ा सी गई, किन्तु तुरंत ही जैसे उसने खुद को मजबूती से सम्हालते हुए कहा___"मगर सिर्फ यही कहना चाहती हूॅ कि मेरी रितू दीदी का हमेशा ख़याल रखना। मैं नहीं चाहती कि उनका मोम का बन चुका दिल फिर से पत्थर में तब्दील हो जाए।"

"क्या मतलब???" मैं नीलम की इस बात से एकदम से चकरा सा गया, बोला___"ये क्या ऊल जुलूल बोल रही हो तुम?"
"एक गुजारिश भी है तुमसे।" नीलम ने मेरी बात पर ज़रा भी ध्यान न देते हुए फीकी मुस्कान से कहा___"इतने कम समय में भी मुझे एहसास हो चुका है कि तुम्हारे दिल में हम सबके लिए बेपनाह प्यार व सम्मान की भावना है। इस लिए मेरी गुज़ारिश है कि हमेशा ऐसे ही बने रहना। चाहे जैसी भी परिस्थितियाॅ आ जाएॅ मगर तुम खुद को नहीं बदलना।"

"ये तुम कैसी बातें कर रही हो नीलम?" मैं नीलम की इन बातों से बुरी तरह हैरान व चकित रह गया था, फिर बोला___"देखो किसी भी तरह की पहेलियाॅ मत बुझाओ। जो भी बात है उसे साफ साफ कहो।"

"अब इससे ज्यादा साफ साफ नहीं कह सकती मेरे भाई।" नीलम ने भारी आवाज़ में कहा___"मुझे पता है कि तुम बेहद समझदार हो, इस लिए मैं उम्मीद करती हूॅ कि तुम मेरी बातों को समझ जाओगे।"

"देखो अगर तुम्हारे ये सब कहने का मतलब।" मैने इस बार ज़रा गंभीर भाव से कहा___"इस बात से है कि इस सबके बाद क्या होगा तो तुम इस बात से बेफिक्र रहो। मैं जानता हूॅ कि इस जंग का अंत यकीनन बेहद दुखदायी होगा। मगर होनी तो अटल है न। पाप और बुराई का अंत तो निश्चित है। किन्तु उसके बाद हम सब साथ मिल कर एक नया संसार बनाएॅगे। उस नये संसार में हम सब एक साथ ढेर सारी खुशियों का हिस्सा होंगे। मैं तुमसे वादा करता हूॅ कि जीवन में कभी भी किसी को मैं उदास या दुखी होने का मौका नहीं दूॅगा।"

"मुझे पता है राज।" नीलम ने फीकी सी मुस्कान के साथ मेरी तरफ देखते हुए कहा____"मैं जानती हूॅ कि तुम्हारे रहते कोई भी जीवन में दुखी नहीं हो पाएगा। किन्तु मेरे ये सब कहने का मतलब इन सब बातों से नहीं था भाई, बल्कि मैं तो बस रितू दीदी के लिए वो सब कह रही थी।"

"क्या मतलब??" मेरे चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे।
"यही तो बिवसता है राज।" नीलम ने बेबस भाव से मेरी तरफ देखा___"कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें मुख से नहीं कहा जाता बल्कि सामने वाले को खु ही समझ जाना होता है और मैं तुमसे यही उम्मीद करती हूॅ कि तुम बिना कुछ बताए सब कुछ समझ जाओगे।"

"कमाल है।" मैं चकित भाव से कह उठा____"भला ये क्या बात हुई? मैं कोई अंतर्यामी हूॅ क्या जो किसी के बताए बिना ही सब कुछ जान लूॅगा या फिर समझ लूॅगा?"
"क्यों नहीं राज।" नीलम ने बड़े ग़ौर से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"तुम यकीनन बिना कुछ बताए सब कुछ समझ सकने की काबीलियत रखते हो और मुझे ऐसा लगता भी है कि तुम सब कुछ समझते भी हो।"

"अब ये क्या बात हुई यार?" मैं बुरी तरह चौंका।
"पता नहीं क्यों?" नीलम ने पूर्वत मेरी तरफ बड़े ग़ौर से देखते हुए ही कहा___"पर मुझे ऐसा लगता है कि तुम जानते समझते सब कुछ हो मगर प्रत्यक्ष रूप में ज़ाहिर यही करते हो कि तुम्हें सामने वाले की कोई भी बात समझ में नहीं आई है। है ना?"

"और मुझे ऐसा लग रहा है।" मैने कहा___"कि जैसे तुम मुझसे पंगा लेने के मूड हो। क्योंकि तुम्हारी ये बेसिर पैर की बातें इसी बात का इशारा करती हैं। मगर मिस नीलम, जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूॅ तुमसे कि तुम इस वक्त मुझसे पंगा लेने की हालत में नहीं हो। इस लिए बेहतर होगा कि अपने ज़हन से पंगा लेने वाले ख़याल निकाल दो।"

मेरी इस बात से नीलम कुछ न बोली। बस एकटक देखती रही मेरी तरफ। मैं खुद भी उसी की तरफ देख रहा था। उसके चेहरे पर कई तरह के भावों का आवागवन चालू था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी बात के लिए उसे अपने आपसे काफी ज़द्दो जहद करनी पड़ रही हो। एकाएक ही उसने मेरे चेहरे से अपनी नज़रें हटाईं और अपने सिर को दूसरी तरफ कर लिया। मैं ये देख कर बुरी तरह चौंका कि दूसरी तरफ सिर किये नीलम की ऑखों से ऑसू छलक पड़े थे। मुझे कुछ समझ न आया किन्तु इतना ज़रूर हुआ कि उसकी ऑखों से इस तरह ऑसू छलकते देख मैं बेचैन हो गया।

"अरे ये क्या मेरी प्यारी सी बहन की ऑखों से ऑसू क्यों छलक पड़े?" मैं एकदम से उसके समीप ही बेड के किनारे पर बैठ गया और फिर उसके हाॅथ को अपने हाॅथ में लेकर बोला___"देख अगर तुझे मेरी किसी बात से बुरा लगा हो तो मुझे माफ़ कर दे। मैं तुझे इस तरह ऑसू बहाते नहीं देख सकता। तू तो जानती ही है कि मैं कितना बेवकूफ हूॅ। मुझमें किसी की भावनाओं को समझने का ज्ञान नहीं है। अतः अगर तुझे मेरी किसी बात से तक़लीफ हुई है तो प्लीज माफ़ कर दे मुझे।"

"ऐसा मत कह राज।" नीलम एकदम से मेरी तरफ पलट कर सिसक उठी____"तू तो ऐसा है जो भूल से भी किसी को कोई तक़लीफ नहीं दे सकता। मुझे खुशी है दुनियाॅ में सबसे खूबसूरत दिल का लड़का मेरा भाई है। ये ऑसू तो फक़त ऐसी ही खुशी के तहत छलके हैं। मैं नहीं जानती कि किसके जीवन में क्या क्या खोना और पाना लिखा है मगर मेरी हसरत तो यही है कि मेरी रितू दीदी को हर वो चीज़ मिल जाए जिस चीज़ की उन्होंने रज़ा की हो।"

"मेरे रहते मेरी बहनों को कभी भी किसी चीज़ की कमी का एहसास तक नहीं होगा नीलम।" मैने कहा___"मैं बहनें मेरी जान हैं, उनके लिए कुछ भी कर सकता हूॅ मैं। रितू दीदी ही बस क्यों मैं तो अपनी सभी बहनों को बराबर प्यार व सम्मान दूॅगा।"

"जैसा तुम्हें अच्छा लगे वैसा करना राज।" नीलम ने गहरी साॅस ली____"अब तुम जाओ और नैना बुआ या सोनम दीदी में से किसी को भेज दो। मेरा सिर ज़रा भारी भारी सा लग रहा है।"

"सिर भारी लग रहा है???" मैं चौंका___"इतनी सी बात के लिए उनको क्यों कष्ट देना? लाओ मैं तुम्हारे सिर की मालिश कर देता हूॅ। इतना तो मैं भी कर सकता हूॅ।"
"तुम रहने दो राज।" नीलम ने कहा___"तुम परेशान न हो। सोनम दीदी को भेज देना।"

"ओये चिंता मत कर यार।" मैं सहसा मुस्कुराया___"सिर की मालिश ही करूॅगा, तेरा गला नहीं दबाऊॅगा मैं।"
"काश! तू मेरा गला ही दबा दे भाई।" नीलम की आवाज़ एक बार पुनः जाने क्या सोच कर भर्रा गई___"तेरे पास तेरी ही बाहों के दरमियां इस दुनियाॅ से रुख़्सत हो जाऊॅगी।"

"ज्यादा बकवास मत कर।" मैने सहसा कठोर भाव से कहा___"वरना कान के नीचे एक लगाऊॅगा तो सारा सेन्टिमेंट निकल जाएगा तेरा। अब अगर कुछ बोला तो देखना फिर।"

मेरी बात सुन कर नीलम बस मुस्कुरा कर रह गई। जबकि मैं उसके सिरहाने के क़रीब ही बैठ कर उसके माॅथे पर हाॅथ से मालिश का दबाव आहिस्ता आहिस्ता करने लगा और साथ ही सोचने लगा कि नीलम ने आख़िर ऐसी बात क्या सोच कर कही हो सकती है? अभी मैं नीलम की बातों के बारे में सोच ही रहा था कि तभी कमरे में नैना बुआ व सोनम दीदी एक साथ ही आ गईं। मुझे इस तरह नीलम का सिर दबाते देख वो दोनो ही चौंकते हुए एक जगह ठिठक गईं।

"ओहो।" फिर सहसा नैना बुआ ने मुस्कुराते हुए कहा___"क्या बात है राज, अपनी लाडली बहन की बड़ी सेवा कर रहे हो तुम। वैसे मैने सुना है कि तुम दोनो आपस में बड़ा लड़ते झगड़ते हो। फिर ये सेवा भाव कैसे?"

"क्या बताऊॅ बुआ?" मैने बड़ी मासूमियत से कहा__"मैं इससे चाहे जितना भी लड़ूॅ झगड़ूॅ लेकिन आख़िर है तो ये मेरी प्यारी बहन ही न? बेचारी का सिर भारी भारी सा हो रहा था तो कहने लगी कि मैं आप में से किसी को बुला दूॅ। मैने सोचा कि इतनी सी बात पर भला आप लोगों को क्यों कष्ट देना? अब जब मैं खुद ही यहाॅ पर मौजूद हूॅ तो क्या थोड़ी देर इसके सिर की मालिश करके इसके सिर का भारीपन नहीं दूर कर सकता? बस यही सोच कर सेवा करने लगा था इस बेचारी की मगर हाय रे मेरी किस्मत! ये तो इस हाल में भी मेरा भेजा फ्राई करने पर तुल गई। अच्छा हुआ कि आप दोनो यहाॅ आ गईं, अब आप ही इसे सम्हालिये। मैं तो अब यहाॅ से अब नौ दो ग्यारह ही हो जाऊॅगा।"

"अरे अब बस भी कर राज।" सोनम दीदी हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कह उठीं___"कितना बोलता है तू। हर वक्त उसे बस तंग ही करने का सूझता है तुझे।"
"लो कर लो बात।" मैने कहा___"ख़ैर क्या कहूॅ अब? ठीक है जा रहा हूॅ मैं। अब आप ही देखो इस बंदरिया को। गुड बाॅय।"

इतना कहने के बाद ही मैं पैर पटकते हुए कमरे से बाहर चला गया। जबकि मुझे इस तरह जाते देख सोनम दीदी व नैना बुआ खिलखिला कर हॅस पड़ीं। नीलम के होठों पर भी फीकी सी मुस्कान थी। किन्तु उसके चेहरे के भावों से ऐसा लगता था जैसे किसी किसी पल वो कहीं खो सी जाती थी।

कमरे से बाहर जैसे ही मैं आया तो मेरे पैंट की जेब में पड़ा हुआ मेरा मोबाइल फोन बज उठा। मैं तेज़ तेज़ क़दमों के साथ चलता हुआ नीचे आया और फिर बाहर की तरफ निकल गया। इस बीच मैने मोबाइल पर आ रही काल को रिसीव कर मोबाइल को कान से लगा लिया था।
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उस वक्त रात के लगभग बारह बज रहे थे। सारा शहर सोया पड़ा था। कही दूर किसी घंटाघर में लगे हुए घंटे ने बारह बजते ही ज़ोर की आवाज़ दी। खाली पड़ी सड़कों पर अभी कुछ ही देर पहले गहन सन्नाटा छाया हुआ था किन्तु कुछ ही पलों के भीतर इस सन्नाटे को भेदते हुए कई सारी गाड़ियाॅ सड़क पर सरपट दौड़ती हुई आईं और फिर एकाएक ही उन सबकी रफ्तार आश्चर्यजनक रूप से धीमी हो गई। वो लगभग चार गाड़ियाॅ थीं। जिनमें से एक टाटा सफारी थी बाॅकी कि तीनों बुलैरो थीं।

धीमी रफ्तार से चलती हुई वो चारों ही गाड़ियाॅ एक के बाद एक आगे के मोड़ पर दाहिने साइड मुड़ गईं। कुछ ही देर में वो चारो एक ऊॅचे मकान के सामने आकर रुकीं। गाड़ियों के रुकते ही चारो गाड़ियों के दरवाजे एक साथ मगर आहिस्ता से खुले। सभी गाड़ियों के खुल चुके दरवाजों में से एक के बाद एक आदमी बाहर निकले। सभी आदमियों के हाॅथ में पिस्तौल स्पष्ट नज़र आ रही थी। टाटा सफारी से दो आदमी बाहर निकले थे। उनमें से एक आदमी की कद काठी से प्रतीत होता था कि वह कोई युवक ही था किन्तु दूसरा आदमी कुछ एज्ड नज़र आ रहा था।

तीनो बुलैरो गाड़ियों से निकले हुए पिस्तौल धारी आदमी पलक झपकते ही उस ऊॅचे मकान के सामने की दीवार तथा मुख्य दरवाजे के इतर बितर मुस्तैदी से तैनात हो गए। उनकी मुस्तैदी देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी महत्वपूर्ण मिशन पर आए हुए हैं। जबकि टाटा सफारी से निकले हुए वो दोनो ही आदमी आराम से किन्तु बेआवाज़ चलते हुए मुख्य दरवाज़े के क़रीब आ कर खड़े हो गए। दरवाजे के पास खड़े हो कर वो दोनो ही बाएॅ साइड देखने लगे।

बाईं तरफ एक आदमी बड़ी दक्षता से रस्सी को ऊपर की बालकनी की रेलिंग में फॅसा कर ऊपर की तरफ चढ़ता चला जा रहा था। सबकुछ मानो पहले से ही प्लानिंग की गई थी कि यहाॅ पहुॅच कर कौन कब क्या करेगा। ख़ैर, कुछ ही देर में वो आदमी रस्सी के द्वारा ऊपर बालकनी में पहुॅच गया। ऊपर बालकनी से चलता हुआ वो दाईं तरफ की खिड़की के पास पहुॅचा। खिड़की के पास पहुॅच कर उसने बड़े एहतियात से खिड़की के पल्लों को अंदर की तरफ पुश किया। किन्तु खिड़की के पल्ले टस से मस न हुए। ये देख कर उस आदमी ने फौरन ही अपने एक हाॅथ को अपने काले लबादे में डाला और कोई चीज़ बाहर निकाली।

यकीनन वो चीज़ खिड़की के पल्लों पर लगे शीशों को काटने वाला हीरा था। उस आदमी ने बड़े एहतियात से तथा बड़ी सफाई से उस हीरे के द्वारा पल्ले पर लगे शीशे को काटा और उसका कटा हुआ टुकड़ा सावधानी से निकाल कर बालकनी में ही नीचे एक तरफ रख दिया। उसके बाद उसने कटे हुए पल्ले में हाॅथ डाल कर खिड़की के पल्लों की कुण्डी को खोल दिया। कुछ ही देर में खिड़की के दोनो ही पल्ले पूरी तरह अंदर की तरफ खुलते चले गए। अंदर की तरफ यूॅ तो अंधेरा ही था किन्तु खिड़की के अंदर की तरफ से लगे पर्दों को हटा कर उस आदमी ने अंदर किसी भी तरह ही चीज़ की आहट को सुनने के लिए अपने कान खड़े कर दिये थे। कुछ देर तक वह ऐसी ही पोजीशन में रहा फिर वह एकदम से खिड़की पर चढ़ कर अंदर कमरे की तरफ अंदाज़े से अपने पैर आहिस्ता आहिस्ता रखता चला गया।

कमरे में आते ही उसने सबसे पहले अपने लबादे से कोई चीज़ निकाली। कुछ ही पलों में पेंसिल टार्च का मध्यम प्रकाश कमरे के फर्श पर उसके पास ही उत्पन्न होता हुआ दिखा। उस आदमी ने पेंसिल टार्च के फोकस को धीरे धीरे आगे बढ़ाते हुए उस दिशा की तरफ किया जिस तरफ से उसे कुछ देर पहले किसी चीज़ की आवाज़ महसूस हुई थी। पेंसिल टार्च का फोकस बढ़ता हुआ कमरे में एक तरफ रखे शानदार बेड की तरफ पहुॅचा। बेड में दोनो किनारों पर दो दो पैर नज़र आए। आदमी ने टार्च के फोकस को थोड़ा ऊपर किया तो पता चला कि बेड पर दो खूबसूरत लड़कियाॅ गहरी नींद में सोई हुई हैं।

दो लड़कियों को गहरी नींद में सोते देख वो आदमी पहले तो अजीब तरह से मुस्कुराया फिर एकाएक ही वह अपनी एड़ियों पर घूम गया। घूमने के बाद वह बड़ी सावधानी से कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ता चला गया। दरवाजे के पास पहुॅच कर उसने दरवाजे पर लगे हैण्डिल को घुमाया जिससे दरवाजा खुल गया। दरवाजे को हल्का खोल कर उसने पहले बाहर की तरफ हल्का सा सिर निकाल कर इधर उधर देखा, उसके बाद वह दरवाजे को खोल कर बड़े आराम से कमरे से बाहर आ गया।

कमरे के बाहर सफेद ट्यूब लाइट का प्रकाश था। हर चीज़ स्पष्ट देखी जा सकती थी। इस वक्त समूचे मकान में गहन सन्नाटा छाया हुआ था। वो आदमी बड़ी सावधानी से आगे बढ़ता हुआ सीढ़ियों के पास आ कर रुक गया। सीढ़ियों के पास ही एक मोटे से खंभे की आड़ में छिप कर उसने पहले इधर उधर देखा उसके बाद नीचे चारो तरफ बारीकी से देखने लगा। सब कुछ बेहतर समझ कर वह खंभे की ओट से निकल कर सीढ़ियों से नीचे की तरफ बेआवाज़ उतरता चला गया।

सीढ़ियों से नीचे आकर वह दाई तरफ बढ़ा। कुछ ही देर में वह मुख्य दरवाजे के पास पहुॅच गया। मुख्य दरवाजा अंदर की तरफ से बंद था। उस आदमी ने बड़ी सावधानी से मुख्य दरवाजे के मोटे से हैण्डिल को घुमा कर दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुलते ही सामने वो दोनो ही आदमी खड़े नज़र आए जो टाटा सफारी से बाहर निकले थे। इतने से काम में ही उस आदमी को लगभग दस से पंद्रह मिनट का समय लग गया था। किन्तु वो सब इस बात से बेफिक्र से नज़र आए।

दरवाजा खुलते ही टाटा सफारी से उतरे हुए वो दोनो आदमी मकान के अंदर की तरफ दाखिल हो गए। उनके साथ ही कुछ और लोग भी अंदर की तरफ दाखिल हुए जबकि कुछ लोग बाहर ही मुस्तैदी से खड़े रहे। मुख्य दरवाजे से अभी वो आठ या दस कदम ही आगे बढ़े होंगे कि तभी किसी चीज़ के गिर कर टूटने की तेज़ आवाज़ हुई। इस आवाज़ ने उन सबकी रूह तक को कॅपकॅपा कर रख दिया। सारी सावधानी सारी सतर्कता धरी की धरी रह गई थी। किन्तु अब क्या हो सकता था?

आवाज़ होने के बाद वो सब काफी देर तक अपनी जगह चुपचाप खड़े रह गए थे। जब उस आवाज़ की वजह से कहीं से कोई भी प्रतिक्रिया न हुई तो ये सब अपनी अपनी जगह से हिले। किन्तु अभी चार कदम ही आगे बढ़े थे कि तभी उन सबके कानों में किसी नारी की आवाज़ पड़ी। जो बाईं तरफ से आती हुई नज़र आ रही थी। आते हुए ही उसने कहा था कि "कौन है वहाॅ"?

चालीस के आस पास की ऊम्र की उस मध्यम कदकाठी व शक्लो सूरत की औरत को देखते ही सबको पहले तो मानो साॅप सा सूॅघ गया किन्तु फिर जैसे अचानक ही बिजली सी कौंधी। पास आ चुकी औरत पर दो पिस्तौल धारी झपट पड़े थे। अचानक हुई इस क्रिया से वो औरत बुरी तरह डर कर अभी भयानक आवाज़ में चीखने ही वाली थी कि तभी एक पिस्तौल वाले के एक हाॅथ की हॅथेली किसी कुकर के ढक्कन की भाॅति उसके मुह से चिपक गई।

मुह पर हॅथेली रूपी ढक्कन चिपकते ही औरत गूॅ-गूॅ करती रह गई। वह उन दोनो से छूटने के लिए बुरी तरह छटपटाए जा रही थी। तभी एक तीसरा पिस्तौल वाला आदमी उसके पास सामने से पहुॅचा और बेहद धीमें किन्तु खतरनाॅक भाव से बोला____"ज्यादा छटपटा मत वरना देख रही है न, इस पिस्तौल की सारी की सारी गोलियाॅ तेरे भेजे में उतार दूॅगा। पलक झपकते ही तेरी रूह ऊपर बैठे खुदा के दरबार में हाज़िरी बजाती नज़र आएगी।"

उस आदमी के द्वारा कहे गए इन खतरनाॅक वाक्यों का तुरंत ही उस औरत पर असर हुआ। वो एकदम से बुत सी बन गई। मगर मुसीबत अभी टली न थी क्योंकि इधर जैसे ही औरत ने छटपटाना बंद किया वैसे ही उधर इस बार एक मर्दाना आवाज़ उभरी। ये आवाज़ उसी तरफ से आई थी जिस तरफ से ये औरत आई थी। मर्दाना आवाज़ में कहा गया वाक्य ये था कि____"का हुआ रे बिंदिया? ई बखत ससुरी ना खुद सोवत है तू अउर ना हमका सोने देत है।"

इस वाक्य के साथ ही बाॅकी आदमियों की सिट्टी पिट्टी गुम होती नज़र आई। मगर चूॅकि ओखली में तो सिर पड़ ही चुका था इस लिए अब मूसल से क्या डरना वाली बात हो गई थी? कहने का मतलब ये कि जैसे ही वो आदमी ये सब कहते हुए सामने आया वैसे ही उसकी नज़र बिंदिया को पकड़े दो आदमियों पर पड़ी। वह एकदम से हक्का बक्का रह गया। इससे पहले कि वह अपने होशो हवाश में आ पाता दो आदमियों ने फौरन ही उसे दबोच लिया। उसके बाद वैसा ही हाल उसका भी हुआ जैसे अभी कुछ देर पहले बिंदिया का हुआ था।

"ओहो तो तू भी यहीं है हरिया।" टाटा सफारी से आए हुए दो आदमियों में से एक ने आगे बढ़ते हुए बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में कहा____"वाह बहुत खूब। वैसे अच्छा सिला दिया नमक हलाली का। हमने तो समझा था कि हमने अपने सभी फार्महाउस पर बड़े ही वफ़ादार कुत्तों को रखा हुआ है मगर, हमें क्या पता था कि हमारे रखे हुए कुत्ते एक दिन हमें ही काटने पर उतारू हो जाएॅगे। ख़ैर, कोई बात नहीं। इसकी सज़ा तो तुम सबको मिलेगी ही मगर उससे पहले बाॅकी लोगों का भी तो अच्छी तरह से प्रबंध कर लिया जाए।"

वो आदमी यकीनन अजय सिंह था जबकि दूसरा वो युवक खुद उसका ही बेटा शिवा था। हरिया ने अजय सिंह की इस बात का कोई जवाब न दिया। बल्कि अजय सिंह को इस वक्त यहाॅ अपने दलबल के साथ देख कर उसकी सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। उसके चेहरे से ही पता चल रहा था कि वह बुरी तरह डर गया था।

इधर अजय सिंह अभी पुनः कुछ कहने ही वाला था कि ऊपर सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए किसी के आने की आहट हुई। अजय सिंह तथा उसके आदमियों ने फौरन ही इधर उधर होकर छिपने का उपाय किया। सीढ़ियों से नीचे आने वाली नैना थी। इस वक्त उसके जिस्म पर नाइट सूट था। सीढ़ियों से नीचे उतर कर वह अपनी ही धुन में किचेन की तरफ बढ़ती चली गई। अजय सिंह को समझते देर न लगी कि उसे इस वक्त के हालात के बारे में कोई अंदेशा तक नहीं है। अतः अजय सिंह ने फौरन ही अपने एक अन्य आदमी को इशारा किया।

अजय सिंह का इशारा पाते ही वो आदमी बड़ी सावधानी से तथा बेआवाज़ किचेन की तरफ बढ़ता चला गया। कुछ ही देर में जब वो वापस आया तो वह अपनी दोनों बाहों के सहारे उठाए हुए नैना को आता दिखाई दिया। नैना कोई भी हरकत नहीं कर रही थी। मतलब साफ था कि उस आदमी ने नैना को बड़ी सफाई से बेहोश कर दिया था।

"ज्यादा समय नहीं है हमारे पास।" उस आदमी के आते ही अजय सिंह ने धीमे स्वर में कहा___"इस लिए जैसा कहा गया था फौरन ही वैसा करो। उसके बाद जल्दी से यहाॅ निकलना भी है।"

अजय सिंह की इस बात को सुन कर उसके अन्य आदमी फौरन ही हरकत में आ गए। कुछ लोग नीचे की तरफ के कमरों की तलाशी लेने लगे और बाॅकी लोग सीढ़ियों के द्वारा ऊपर की तरफ चले गए। लगभग दस मिनट बाद ही मंज़र ये था कि ऊपर से आने वाले आदमियों के कंधों पर एक एक इंसानी जीव बेहोश अवस्था में लदा हुआ नज़र आ रहा था। नीचे के एक कमरे से एक आदमी शंकर के बेहोश जिस्म को कंधे पर लादे आ रहा था।

उन सबके आते ही अजय सिंह बिंदिया व हरिया को पकड़े आदमियों को भी इशारा किया। इशारा मिलते ही उन आदमियों ने पलक झपकते ही खतरनाॅक हरकत की। जिसका नतीजा ये हुआ कि कुछ ही पलों में बिंदिया व हरिया दोनो ही बेहोश हो चुके थे। सबको लेकर बाहर की तरफ बढ़ चले वो लोग।

कुछ ही देर में सभी बेहोश हो चुके लोगों को बाहर खड़ी गाड़ियों पर भूसे की तरह ठूॅस दिया गया। उसके बाद सभी आदमी अपनी अपनी गाड़ियों पर बैठ गए। टाटा सफारी के चलते ही बाॅकी तीनों गाड़ियाॅ भी उसके पीछे चल दी। गहरी नींद में सोये शहर वासियों को इस सबका ज़रा भी इल्म न हुआ कि रात के सन्नाटे में यहाॅ क्या कुछ हो चुका था? जबकि अजय सिंह सबको लेकर अपने नियत स्थान की तरफ ऑधी तूफान की तरह बढ़ा चला जा रहा था।
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सुबह हुई।
उधर मुम्बई में,
उस वक्त सब लोग सुबह का नास्ता कर रहे थे जब एकाएक ही पवन के मोबाइल फोन की घंटी बजी थी। पवन अपने कमरे से तैयार होकर ही नास्ता करने आया था। नास्ता करने के बाद उसे कंपनी चले जाना था। डायनिंग हाल में कुर्सी पर बैठे पवन का मोबाइल उसकी पैन्ट की जेब में बज रहा था। चारो तरफ कुर्सियों पर बैठे बाॅकी सबका ध्यान भी उसके मोबाइल की रिंगटोन पर गया। सबका ध्यान एक साथ जाने की विशेष बात ये थी कि पवन के मोबाइल की रिंग टोन पर "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ ना छोंड़ेंगे" बज रही थी।

पवन पहले तो हड़बड़ाया फिर सबकी तरफ देखते हुए वह कुर्सी से उठा और अपनी बाईं जेब से मोबाइल निकाला। मोबाइल की स्क्रीन पर "राज" लिखा नज़र आ रहा था। यानी कि उसके मोबाइल पर विराज की काल आ रही थी। ये देख कर पवन के चेहरे पर सहसा खुशी की चमक उभर आई। उसने मुस्कुराते हुए तुरंत ही काल को रिसीव किया और फिर जाने क्या सोच कर उसने मोबाइल का स्पीकर ऑन करके बोला___"आख़िर तुझे इतने दिनों बाद ही सही मगर मेरी याद आ ही गई न राज।"

"हमें तो तुम सबकी ही बहुत ज़ोरों से याद आती है बर्खुरदार।" मोबाइल पर उधर से अजय सिंह की इस आवाज़ को पहचानने में किसी को ज़रा सी भी देर न हुई। सबके सब इस आवाज़ को सुन कर एकदम हक्के बक्के से रह गए। जबकि उधर से स्पीकर पर पुनः अजय सिंह की इस बार ज़रा कठोर आवाज़ उभरी____"मैं अच्छी तरह जानता हूॅ कि इस वक्त इस नंबर से मेरी आवाज़ सुन कर तुम सबके पैरों तले से ज़मीन गायब हो गई होगी। हर किसी को साॅप सा सूॅघ गया होगा। ख़ैर मुझे लगता है कि तुम में से किसी को भी मुझे ये बताने की या फिर समझाने की ज़रूरत नहीं है कि इस वक्त तुम लोगों का वो मसीहा विराज तथा उसके साथ साथ और भी बाॅकी लोग मेरे रहमो करम पर हैं। इस लिए बेहतर होगा कि बग़ैर मेरी किसी चेतावनी के तुम सब वहाॅ से फौरन मेरे पास या यूॅ कहो कि मेरे सामने आकर घुटनों के बल मेरे पैरों पर झुक जाओ।"

स्पीकर से उभर रहे अजय सिंह के ये वाक्य डायनिंग टेबल पर मौजूद लगभग सभी के मनो मस्तिष्क में ऐसा धमाका कर रहे थे जिसकी भीषण गूॅज से सभी के कानों के पर्दे तक झनझना रहे थे। और फिर ऐसा लगा जैसे एक ही पल में सब कुछ खत्म हो गया हो। चारो तरफ कुर्सियों पर बैठे सबके सब मानो किसी ऋषि के द्वारा दिए गए भयंकर श्राप की वजह से अचानक ही पत्थर की शिला में तब्दील होते चले गए हों। एक ही पल में वक्त मानो ठहर सा गया था। जो जिस हालत में बैठा था वो वैसी ही हालत में स्टेच्यू में तब्दील हो गया था।

सबकी चेतना तब जागृत हुई जब पुनः स्पीकर से अजय सिंह की आवाज़ के साथ साथ ज़ोरों का अट्ठहास गूॅजा था___"देखा, मैने कहा था न कि तुम सबको साॅप सा सूॅघ जाएगा। मगर साॅप सूॅघ जाने से कुछ नहीं होगा मेरे प्यारो बल्कि जो कुछ भी होगा मेरे पास आने के बाद ही होगा। इस लिए फौरन वहाॅ से चले आओ। वरना तुम लोग सोच भी नहीं सकते कि यहाॅ पर मैं तुम्हारे उस मसीहा के साथ साथ बाॅकी सबका भी क्या हस्र कर सकता हूॅ?"

अभी स्पीकर पर अजय सिंह का ये वाक्य पूरा ही हुआ था कि सहसा डायनिंग हाल में एक भयंकर चीख़ गूॅज उठी, साथ ही फर्श पर किसी चीज़ के गिरने की ज़ोरदार आवाज़ हुई। इस चीख़ व आवाज़ को सुन कर सबके सब बुरी तरह उछल पड़े। जैसे ही सबने चीख़ की दिशा में देखा तो सबके होश उड़ गए। दरअसल ये चीख गौरी के हलक से खारिज़ हुई थी। वो अपने हाॅथ में बर्तन पर कुछ लिए हुए किचेन से आ रही थी और डायनिंग हाल में आते ही उसने स्पीकर पर उभर रही अजय सिंह की उस आवाज़ के साथ साथ उसके संपूर्ण वाक्य को सुन लिया था। उसके बाद ही उसके हलक से ये भयंकर चीख़ निकली थी।

पवन के हाॅथ से मोबाइल छूटते छूटते बचा। उधर गौरी की चीख़ सुन किचेन से रुक्मिणी व करुणा भी भागती हुई डायनिंग हाल की तरफ आ गई थीं। गौरी को डायनिंग हाल के फर्श पर अजीब हालत में लुढ़की पड़ी देख कर भौचक्की सी रह गई वो दोनो। इधर डायनिंग टेबर के चारो तरफ रखी कुर्सियों पर बैठे बाॅकी सब लोग भी अपनी अपनी जगहों से उठ कर गौरी की तरफ दौड़ पड़े थे। देखते ही देखते डायनिंग हाल में रोना धोना शुरू हो गया। यहाॅ का रोना धोना चालू मोबाइल के द्वारा अजय सिंह भी सुन रहा था और ज़ोरों से हॅसे जा रहा था।

"हाहाहाहाहा यही।" उधर से अजय सिंह की आवाज़ पुनः उभरी____"अब यही हाल होगा तुम सबका। मगर जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूॅ इस सबसे कुछ नहीं होगा बल्कि यहाॅ आने पर ही होगा। इस लिए अब मैं आख़िरी बार कह रहा हूॅ कि तुम सब वहाॅ से फौरन ही मेरे सामने हाज़िर हो जाओ। कल दोपहर तक तुम सब मेरी ऑखों के सामने होने चाहिए। दोपहर तक अगर तुम सब नहीं आए तो समझ लेना कि इसका परिणाम कितना घातक हो सकता है।"

इन वाक्यों के साथ ही अजय सिंह कहकहे लगा कर हॅसा और फिर काल कट हो गई। किन्तु उसके इन वाक्यों को सुनने की हालत में यहाॅ था ही कौन? यहाॅ तो बस रोना धोना तथा चीख़ पुकार ही मचा हुआ था। बड़ी मुश्किल से एक दूसरे को सम्हाला सबने।

उधर होश में आते ही गौरी दहाड़ें मार मार रोने लगी और चीख़ चीख़ कहने लगी____"मैने कहा था न कि हत्यारे ने मेरे बेटे को मार दिया है। हे भगवान! अब अगर मेरा बेटा ही नहीं तो मैं भला जी कर क्या करूॅगी? मुझे भी मौत दे दे भगवान। मैं अपने बेटे के बग़ैर एक पल भी जीवित नहीं रहना चाहती।"

"शान्त हो जाइये भाभी।" अभय सिंह सिसकते हुए बोल उठा___"हमारे राज को कुछ नहीं होगा। वो मादरजाद तो बस गीदड़ भभकियाॅ ही दे रहा था। जबकि मैं जानता हूॅ कि वो मेरे भतीजे का बाल भी बाॅका नहीं कर सकता। मेरा भतीजा शेर है शेर....ये साले सब गीदड़ हैं भाभी। भगवान के लिए भरोसा कीजिए और शान्त हो जाइये। सब कुछ ठीक हो जाएगा।"

"कुछ भी ठीक नहीं होगा अभय।" गौरी बुरी तरह बिलखते हुए बोली___"वो हत्यारा मेरे बेटे को गोलियों से छलनी छलनी कर देगा। वो मेरे बेटे के खून प्यासा है। मुझे मेरे बेटे के पास पहुॅचा दो अभय मैं तुम्हारे पाॅव पड़ती हूॅ।"

गौरी पागल सी हो गई थी। सचमुच ही वो अभय के पैरों पर गिर पड़ी। अभय का कलेजा ये देख कर हाहाकार कर उठा। बुरी तरह तड़प उठा वह। तेज़ी से वह पीछे की तरफ हटा और फिर तुरंत ही गौरी को दोनो कंधों से पकड़ कर ऊपर किया।

"क्यों मुझे पाप के सागर में डुबा रही हैं भाभी?" अभय सिंह रो पड़ा____"आप जानती हैं कि मैंने हमेशा आपको अपनी माॅ की तरह समझा है। मेरे पैरों में गिर कर मुझे ऐसे गर्त में मत डुबाइये कि जहाॅ से मैं फिर कभी निकल ही न पाऊॅ।"

"मुझे मेरे बेटे के पास पहुॅचा दो कोई।" गौरी पागलों की तरह सबकी तरफ याचना भरी दृष्टि से देखते हुए बोले जा रही थी___"मेरा बेटा बहुत कष्ट में है। वो सब मिलके उसे मार देंगे। मुझे अभी के अभी मेरे बेटे के पास जाना है और अगर तुम लोग मुझे नहीं पहुॅचाओगे तो मैं खुद ही चली जाऊॅगी। मुझे यहाॅ अब नहीं रहना। मेरे बेटे को मार देंगे वो लोग।"

इतना सब कहने के साथ ही गौरी को चक्कर आ गया और वह रुक्मिणी की गोंद में ही शिथिल पड़ गई। उसकी हालत देख कर हर कोई रो रहा था। निधी की हालत बेहद ख़राब थी। वो अपनी माॅ को अपने बेटे के लिए इस तरह तड़पते देख खुद भी तड़पी जा रही थी। हालत तो सबकी ही ख़राब थी।

"ऐसे कब तक यहाॅ इन्हें रोता तड़पता हुआ देखते रहेंगे अभय चाचू?" सहसा पवन ऊॅचे स्वर में मानो चीख सा पड़ा___"मेरा दोस्त वहाॅ भयंकर संकट में है। मैं खुद भी अब यहाॅ एक पल के लिए भी रुकना नहीं चाहता। उस कसाई का कोई भरोसा नहीं है। वो कुछ भी कर सकता है।"

"सही कहते हो तुम।" अभय सिंह ने सहसा अपने ऑसुओं को पोंछते हुए बोला____"फौरन यहाॅ से चलने की तैयारी करो पवन। गौरी भाभी को अगर राज के पास न ले जाया गया तो ये यहीं पर अपना सिर पटक कर मर जाएॅगी। वैसे भी जिस तरह से उसने चेतावनी देकर हम सबको वहाॅ बुलाया है तो हम सबको फौरन जाना ही पड़ेगा। इसके सिवा दूसरा कोई चारा नहीं है। मौजूदा हालात में वो कुछ भी कर सकता है। इंसान से राक्षस बन गया है वो। मगर भवानी माॅ की कसम अगर उसने मेरे भतीजे को ज़रा सी भी चोंट पहुॅचाई तो सारी दुनियाॅ को आग लगा दूॅगा मैं।"

"ठीक है चाचू।" पवन ने कहा___"आप इन्हें देखिये। मैं तब तक सबकी टिकटों का इंतजाम करता हूॅ। वैसे मुमकिन तो नहीं मगर देखता हूॅ शायद सबके लिए टिकटें मिल ही जाएॅ।"

"आप एक बार जगदीश भाई साहब को भी फोन पर इस बारे में सब कुछ बता दीजिए।" पवन के जाते ही करुणा ने अभय सिंह की तरफ देखते हुए दुखी भाव से कहा___"आख़िर इस बारे में जानकारी तो उन्हें भी होनी ही चाहिए कि हम अचानक यहाॅ से किस वजह से जा रहे हैं?"

"सही कहा तुमने।" अभय सिंह ने कहने के साथ पैन्ट की जेब से अपना मोबाइल निकाला, फिर बोला___"भाई साहब को बताना बेहद ज़रूरी है। वैसे भी वो हमें अपने सगे जैसा ही मानते हैं। उन्हें इस बारे में बताना ही चाहिए। रुको मैं अभी बात करता हूॅ उनसे।"

कहने के साथ ही अभय ने जगदीश ओबराय को फोन लगाया। कुछ देर तक टुक टुक की आवाज़ आती रही, उसके बाद सहसा मोबाइल से आवाज़ उभरी___"आप जिस उपभोक्ता से बात करना चाहते हैं वो इस समय उपलब्ध नहीं है अथवा नेटवर्क क्षेत्र से बाहर हैं।"

ये सुन कर अभय सिंह परेशान सा हो गया। उसने पुनः नंबर रिडायल कर फोन लगाया। किन्तु फिर से वही जवाब मिला। अभय ने कई बार फोन मिलाया मगर हर बार यही बताया गया कि वो इस समय उपलब्ध नहीं है अथवा नेटवर्क क्षेत्र से बाहर हैं। अभय को चिंतित व परेशान देख कर करुणा ने उससे पूछा कि क्या हुआ? उसके सवाल पर अभय सिंह ने उसे सब कुछ बता दिया। जिसे सुन कर वो भी चिंता में पड़ गई।

ख़ैर, जितना जल्दी हो सकता था उतना जल्दी किया गया। यानी फौरन ही सबको तैयार कर चलने के लिए कहा गया। किन्तु यहाॅ किसी को भला क्या तैयार होना था? जो जिन कपड़ों में था वो वैसे ही चलने को तैयार हो गया था। लगभग एक घंटे बाद पवन सिंह बॅगले पर आया। उसने बताया कि रिज़र्व में सिर्फ पाॅच ही टिकटों का इंतजाम हो सका है। बाॅकी की सब वेटिंग या आरएसी की टिकटें मिली हैं। पवन की बात सुन कर अभय ने कहा कोई बात नहीं। जाना तो अनिवार्य ही है फिर चाहे भले ही जनरल में ही क्यों न जाना पड़े। पवन ने बताया कि ट्रेन शाम की है। उससे पहले एक और थी जो कि सुबह नौ बजे की थी मगर वो जा चुकी है।

पवन की इस बात ने सबको निराश व मायूस सा कर दिया। सबके सब अतिसीघ्र यहाॅ से जाना चाहते थे। मगर जाने का साधन तो अब शाम को ही मिलने वाला था। अतः शाम का इन्तज़ार करना ही सबकी नियति थी। कहते हैं कि जब हम बड़ी शिद्दत से चाहते हैं कि वक्त गुज़र जाए तब ऐसा कदापि नहीं होता। बल्कि एक एक पल मानो शदियों में तब्दील हो जाता है। कुछ ऐसा ही आलम था यहाॅ पर।

सारा दिन सबके बीच ऐसा आलम रहा जैसे कोई हमारे बीच का दुनियाॅ से ही जा चुका हो। डायनिंग टेबल पर नास्ते के लिए परोसी गई थाली व प्लेट सब वैसी की वैसी ही रखी रह गई थी। किसी ने उस तरफ देखा तक न था और ना ही कोई अपने कमरे की तरफ गया था। बॅगले के नौकर चाकर तक संजीदा थे इस सबसे। अभय सिंह सुबह से अब तक हज़ारों बार जगदीश ओबराय को फोन लगा चुका था किन्तु उसका नंबर अभी भी नेटवर्क क्षेत्र के बाहर ही बता रहा था।

बड़ी मुश्किल से ही सही किन्तु वक्त अतिमंद्र गति से गुज़र ही गया। ट्रेन के निर्धारित समय से आधा घंटा पहले ही सबके सब रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर पहुच गए। रुक्मिणी व करुणा गौरी के साथ ही थी। हर कोई उदास व दुखी था। आधे घंटे बाद जब ट्रेन आई तो सब ट्रेन की तरफ लगभग भागते हुए बढ़े। ट्रेन में चढ़ कर हर कोई सीट पर बैठ चुका था। रिज़र्व सीटों पर औरतों और लड़कियों को बैठा दिया गया था। हलाॅकि रिज़र्व में पाच ही सीटें मिली थी। जिनमें गौरी रुक्मिणी करुणा निधी व दिव्या को बैठा दिया गया था। शगुन दिव्या के साथ ही बैठा हुआ था। जबकि पवन अभय व आशा ट्रेन के फर्श पर ही खड़े थे।

गौरी को रुक्मिणी व करुणा ने बड़ी मुश्किल से सम्हाला हुआ था। सारा दिन रोती रही थी वो जिसकी वजह से उसकी ऑखें लाल सुर्ख पड़ चुकी थीं। चेहरे पर ऐसी वीरानी थी जैसे इस चेहरे ने कभी किसी तरह की खुशियो से भरी बहार को देखा ही न हो। कुछ ही समय बाद ट्रेन अपने गंतब्य स्थान के लिए चल पड़ी। ट्रेन के चल पड़ने से सबके मन में थोड़ी राहत के भाव उभर आए थे। आने वाले समय में किसके साथ क्या क्या होने वाला था इसकी कल्पना से ही सबकी रूहें काॅप जाती थी।
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दोस्तो, अपडेट हाज़िर है। आशा है आप सभी को पसंद आएगा।

आप सबकी प्रतिक्रिया का बेसब्री से इन्तज़ार रहेगा।
 
एकनयासंसार
अपडेट.......《 62 》

अब तक,,,,,,,
सारा दिन सबके बीच ऐसा आलम रहा जैसे कोई हमारे बीच का दुनियाॅ से ही जा चुका हो। डायनिंग टेबल पर नास्ते के लिए परोसी गई थाली व प्लेट सब वैसी की वैसी ही रखी रह गई थी। किसी ने उस तरफ देखा तक न था और ना ही कोई अपने कमरे की तरफ गया था। बॅगले के नौकर चाकर तक संजीदा थे इस सबसे। अभय सिंह सुबह से अब तक हज़ारों बार जगदीश ओबराय को फोन लगा चुका था किन्तु उसका नंबर अभी भी नेटवर्क क्षेत्र के बाहर ही बता रहा था।

बड़ी मुश्किल से ही सही किन्तु वक्त अतिमंद्र गति से गुज़र ही गया। ट्रेन के निर्धारित समय से आधा घंटा पहले ही सबके सब रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर पहुच गए। रुक्मिणी व करुणा गौरी के साथ ही थी। हर कोई उदास व दुखी था। आधे घंटे बाद जब ट्रेन आई तो सब ट्रेन की तरफ लगभग भागते हुए बढ़े। ट्रेन में चढ़ कर हर कोई सीट पर बैठ चुका था। रिज़र्व सीटों पर औरतों और लड़कियों को बैठा दिया गया था। हलाॅकि रिज़र्व में पाच ही सीटें मिली थी। जिनमें गौरी रुक्मिणी करुणा निधी व दिव्या को बैठा दिया गया था। शगुन दिव्या के साथ ही बैठा हुआ था। जबकि पवन अभय व आशा ट्रेन के फर्श पर ही खड़े थे।

गौरी को रुक्मिणी व करुणा ने बड़ी मुश्किल से सम्हाला हुआ था। सारा दिन रोती रही थी वो जिसकी वजह से उसकी ऑखें लाल सुर्ख पड़ चुकी थीं। चेहरे पर ऐसी वीरानी थी जैसे इस चेहरे ने कभी किसी तरह की खुशियो से भरी बहार को देखा ही न हो। कुछ ही समय बाद ट्रेन अपने गंतब्य स्थान के लिए चल पड़ी। ट्रेन के चल पड़ने से सबके मन में थोड़ी राहत के भाव उभर आए थे। आने वाले समय में किसके साथ क्या क्या होने वाला था इसकी कल्पना से ही सबकी रूहें काॅप जाती थी।
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अब आगे,,,,,,,

दूसरे दिन।
उस वक्त दोपहर हो चुकी थी।
अजय सिंह के इस विशाल फार्महाउस पर इस वक्त अलग ही नज़ारा था। ये दृष्य तो गौरी के स्वप्न की तरह ही था किन्तु उससे थोड़ा भिन्न ही था। लम्बे चौड़े फार्महाउस के बीचो बीच दो मंजिला बड़ा सा मकान बना हुआ था। चारों तरफ हरी हरी घाॅस से भरा हुआ विशाल मैदान तथा हर तरफ लगे हुए तरह तरह के पेड़ पौधे यहाॅ की खूबसूरती का एक बड़ा ही सुंदर नज़ारा पेश कर रहे थे। किन्तु इस वक्त इस खूबसूरत नज़ारे में भी जैसे ग्रहण सा लगा हुआ था।

मैदान में लगे पेड़ पौधों के बीच का ही दृष्य था ये। कतार में लगे पेड़ों पर कई सारे लोग रस्सियों से बॅधे जकड़े हुए थे। विराज, रितू, आदित्य, नैना, सोनम, नीलम, बिंदिया, हरिया व शंकर आदि सब कतार से ही पेड़ों से रस्सियों द्वारा बॅधे हुए थे। विशाल मैदान में चारो तरफ काली वर्दी में तैनात गुंडे मवालियों जैसी शक्ल के काफी सारे लोग हाथों में बंदूखें लिए खड़े थे। मैदान में एक तरफ कुछ दूरी पर कई सारी गाड़ियाॅ भी खड़ी हुई थी।

उन्हीं पेड़ों की गहरी छाॅव में अजय सिंह एक कुर्सी पर बैठा हाॅथ में लिए हुए रिवाल्वर को बार बार अपनी उॅगली पर नचा रहा था। उसके पीछे उसका बेटा शिवा खड़ा था। उसकी कमर में भी एक रिवाल्वर ठुॅसा हुआ था। अजय सिंह की पत्नी यानी कि प्रतिमा भी अजय सिंह के पास ही खड़ी हुई थी। वातावरण में चारो तरफ एक अजीब सा भयावह सन्नाटा फैला हुआ था।

"दोपहर तो हो चुकी है ठाकुर साहब।" तभी सहसा एक आदमी अजय सिंह के पास आता हुआ बोला____"किन्तु आपके बाॅकी शिकार तो अभी तक यहाॅ नहीं पहुॅचे। कहीं ऐसा तो नहीं कि वो लोग पुलिस के पास चले गए हों सहायता माॅगने के लिए? अगर ऐसा हुआ तो यकीन मानिए हमारे सारे किये कराए पर पानी फिर जाएगा और हम सब जेल के अंदर चक्की पीसते नज़र आएॅगे।"

"नहीं सहाय।" अजय सिंह ने कठोर भाव से कहा___"वो लोग पुलिस के पास जाने का सोच भी नहीं सकते हैं। वो जानते हैं कि अगर उन लोगों ने इस मामले में पुलिस को कुछ भी बताया तो उसका अंजाम बहुत ही खतरनाॅक हो सकता है। इस लिए तुम इस बात से बेफिक्र रहो। वो सब सिर के बल भागते दौड़ते हुए रेलवे स्टेशन से सीधा यहीं आएॅगे। उसके बाद क्या होगा ये समझाने की ज़रूरत नहीं है तुम्हें।"

"हाॅ ये तो सही कहा आपने।" अभिजीत सहाय ने कमीनी मुस्कान के साथ कहा___"आज यहाॅ पर एक अनोखा इतिहास लिखा जाएगा। आने वाले बाॅकी शिकार यहाॅ आ तो जाएॅगे मगर तुरंत ही हमारे आदमियों द्वारा धर लिए जाएॅगे और फिर वो सब भी इन लोगों की तरह पेड़ों पर रस्सियों में बॅधे नज़र आने लगेंगे।"

"मुझसे तो अब बरदास्त ही नहीं हो रहा डैड।" शिवा अपने बाप के सामने आते हुए बोला____"एक एक पल कैसे काट रहा हूॅ ये सिर्फ मैं जानता हूॅ। मेरी ऑखों के सामने ही मेरी ये बहने रस्सियों में बॅधी पेड़ों पर चिपकी खड़ी हैं और आप मुझे कुछ करने ही नहीं दे रहे हैं।"

"बस थोड़ी देर और सब्र करो मेरे बेटे।" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"उसके बाद तुम्हें जो करना हो करते रहना। मज़ा तो तभी आएगा न जब बाॅकी के लोग भी यहाॅ पर हर तरह का तमाशा देखने के लिए पहुॅच जाएॅ।"

"ठीक है डैड।" शिवा ने मन मसोस कर कहा___"आप कहते हैं तो मैं थोड़ी देर और सब्र कर लेता हूॅ।"
"ये हुई न बात।" अजय सिंह मुस्कुराया, फिर सहाय की तरफ देखते हुए बोला___"अपने आदमियों को पूरी तरह से सतर्क रहने का अल्टीमेटम दे दिया है न सहाय तुमने?"

"डोन्ट वरी ठाकुर साहब।" अभिजीत सहाय ने कहा___"हमारे आदमी पूरी तरह से सतर्क हैं। उनकी नज़र से एक परिंदा भी यहाॅ से छूट कर नहीं जा सकेगा।"

"वेरी गुड।" अजय सिंह ने कहा____"उन लोगों के आते ही हमारे आदमी उन सबको धर लेंगे और फिर उन्हें भी इन लोगों की तरह यहाॅ के पेड़ों पर रस्सियों से बाॅध देंगे। ये फाइनल गेम है सहाय और इस गेम का विनर सिर्फ और सिर्फ हम ही होंगे। असली खिलाड़ी वही है जो सामने वाले को पूरी तरह से पस्त करके उसे नेस्तनाबूत कर दे।"

अभी अजय सिंह ने इतना कहा ही था कि पीछे की तरफ से किसी के ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ें सुनाई देने लगी थीं। चिल्लाने की आवाज़ें सुनते ही सबका ध्यान उस तरफ गया। कई सारे बंदूख धारियों से घिरे हुए अभय, पवन, गौरी, रुक्मिणी, करुणा, आशा, निधी, दिव्या व शगुन, इस तरफ ही चले आ रहे थे। ये सब देख कर अजय सिंह के साथ साथ सहाय, शिवा व प्रतिमा के होंठो पर जानदार मुस्कान उभर आई।

देखते ही देखते कुछ ही देर में सबको अलग अलग पेड़ों पर रस्सियों से बाॅध दिया गया। रस्सियों में जकड़ी गौरी बुरी तरह छटपटाए जा रही थी। उसकी नज़र जैसे ही रस्सियों में बॅधे अपने बेटे विराज पर पड़ी वैसे ही वह बुरी तरह तड़प कर रोने लगी थी। विराज के साथ साथ रितू नीलम सोनम आदित्य आदि को रस्सियों में बॅधे थे, किन्तु इस वक्त ये सब अचेत अवस्था में
थे।

"तो आख़िर तुम सब लोग यहाॅ पर मरने के लिए आ ही गए।" अजय सिंह उन सबके बीच ज़मीन पर चहल क़दमी करते हुए कठोर भाव से बोला___"वैसे क्या समझते थे तुम सब लोग कि मेरे क़हर से बचे रहोगे? हाहाहाहा ऐसा कभी नहीं हो सकता। जब तक मेरे द्वारा तुम सबको सज़ा नहीं मिल जाती तब तक तुम लोग किसी भी चीज़ से मुक्त नहीं हो सकते थे।"

"मेरे बेटे को कुछ मत करना।" सहसा गौरी ने रोते हुए कहा____"मैं आपके सामने हाॅथ जोड़ती हूॅ। भगवान के लिए उसे छोंड़ दो। उसके किये की सज़ा मुझे दे लो मगर मेरे बेटे को कुछ मत करना।"

"हाय! मेरी बुलबुल ये क्या हालत बना ली है तुमने?" अजय सिंह गौरी के क़रीब आते हुए चहका___"यकीन मानो तुम्हारी ये हालत देख कर मेरे दिल को बहुत दुख हो रहा है। अरे तुम तो मेरी जाने बहार हो डियर। कभी मेरे दिल के बारे में भी सोचा होता तो समझ में आता तुम्हें कि कोई किस क़दर चाहता है तुम्हें? मगर तुमने तो कभी मेरे बारे में सोचना तक गवारा न किया। आख़िर क्या कमी थी मुझमें? तुम्हारे उस अनपढ़ गवार पति से तो लाख गुना अच्छा था मैं। उससे कहीं ज्यादा अच्छी हैंसियत भी है मेरी। वो तो खेतों पर दिन रात काम करने वाला महज एक मजदूर था जबकि मैं तो यहाॅ का सम्पन्न राजा था। तुमको दुनियाॅ हर ऐशो आराम व सुख देता। मगर तुमको तो उस मजदूर से ही प्रेम था।"

"कोई भी इंसान धन दौलत से राजा नहीं बन जाता नीच इंसान।" गौरी का लहजा एकाएक कठोर हो उठा___"राजा बनने के लिए दूसरों के प्रति अपनी खुशियों का तथा अपने हर सुखों का त्याग करना पड़ता है। तुझमें तो सिर्फ एक ही खूबी है बेग़ैरत इंसान और वो है हर रिश्तों की मान मर्यादा का हनन करना। तेरे जैसे कुकर्मी के लिए सिर्फ और सिर्फ नफ़रत व घृणा ही हो सकती है।"

"उफ्फ।" अजय सिंह ने बुरा सा मुह बनाया___"मेरे प्रति इतनी घटिया बात कैसे सोच सकती हो तुम? अरे तुम कहती तो मैं तुम्हारे लिए खुद को पूरी तरह बदल भी देता मेरी जान। मैं वो सब बनने को तैयार हो जाता जो तुम मुझे बनने को कहती। मगर तुमने तो मुझसे इस बारे में कभी कुछ कहा ही नहीं। इसमे भला मेरा क्या कसूर है गौरी? मैं तो बस अपने दिल के हाॅथों मजबूर था और वही करता चला गया जो मेरा दिल कहता रहा था। मगर कोई बात नहीं डियर, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। तुम कहोगी तो मैं अब भी वैसा ही बन जाऊॅगा जैसा तुम कहोगी। ये समझ लो कि तुम्हारी स्वीकृति से सब कुछ एक पल में बदल जाएगा। कहने का मतलब ये कि तुम अगर अब भी मेरी हो जाओ तो ये सब लोग मेरे क़हर से बच जाएॅगे।"

"तू अपने और अपने इस सपोले के बारे में सोच हरामज़ादे।" होश में आते ही मेरी आवाज़ वातावरण में गूॅज उठी___"तू अगर ये समझता है कि तूने हम सबको रस्सियों में इस तरह बाॅध कर बहुत बड़ा तीर मार लिया है तो इस खुशफहमी में मत रह तू। दुनियाॅ की कोई भी ताकत तुझको मेरे हाॅथों मरने से बचा नहीं सकती।"

"तू अब कुछ नहीं कर सकता भतीजे।" अजय सिंह ने विराज की तरफ देखते हुए कहा___"तेरा सारा उछलना कूदना समाप्त हो चुका है। अब तक तुझे जो कुछ भी करना था वो सब कर लिया है तूने। अब तो मेरी बारी है और यकीन मान मैं अपनी बारी में अब कोई कसर नहीं छोंड़ूॅगा कुछ भी करने में। ख़ैर, अभी तो तुझे ये भी पता नहीं है कि मेरे एक ही झटके में तू और ये सब मेरी कैद में कैसे आ गए? तुझे पूछना चाहिए भतीजे कि मुझे तेरे ठिकाने का कैसे पता चला? और फिर कैसे तुम सब यहाॅ पहुॅच गए?"

अजय सिंह की इस बात पर सन्नाटा सा छा गया। ये सच था कि विराज एण्ड पार्टी को होश आते ही सबसे पहले उनके मन में यही सवाल उभरा था कि वो अचानक यहाॅ कैसे आ पहुॅचे हैं? एक के बाद एक सब कोई होश में आ चुका था। खुद को इस तरह रस्सियों में बॅधे देख वो सब बुरी तरह चौंके थे तथा बुरी तरह छटपटाने लगे थे। किन्तु जब यहाॅ के दृष्य व माहौल पर सबकी नज़र पड़ी तो जैसे सबके पैरों तले से ज़मीन ही गायब हो गई थी। विराज और रितू ये देख कर आश्चर्यचकित थे कि मुम्बई से बाॅकी सब लोग भी यहाॅ आ चुके हैं और वो सब भी उनकी तरह रस्सियों से बॅधे हुए हैं।

"हाहाहाहाहा क्यों भतीजे ज़बान को लकवा क्यों मार गया तुम्हारे?" अजय सिंह ठहाका लगा कर हॅसा___"पूछ न कि ये सब कैसे हुआ? खुद को बड़ा तीसमारखां समझ रहा था न तू? अब पूछ कि ये सब कैसे हो गया? एक ही झटके में तू भी यहाॅ आ गया और मुम्बई में रह रहे तेरे ये सब चाहने वाले भी यहाॅ आ गए। होश में आने के बाद तुझे सबसे पहले यही पूछना चाहिए था।"

"तुम बताने के लिए इतना ही मरे जा रहे हो तो खुद ही बता दो।" आदित्य ने कहा____"वैसे मुझे पूरा यकीन है कि इसमें भी तेरे जैसे कूढ़मगज का अपना कोई दखल नहीं होगा।"

"इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता बेटा।" अजय सिंह ने कहा___"जंग में सेना का सारा ही योगदान होता है किन्तु जंग की जीत का सारा श्रेय राजा को ही जाता है। ख़ैर, अगर मेरा भतीजा ये जान जाए कि ये सब कैसे हुआ है तो यकीनन उसे दिल का दौरा पड़ जाएगा।"

"क्या मतलब??" मैं चकरा सा गया।
"छोटे को रस्सियों से मुक्त कर दो सहाय।" अजय सिंह ने अभिजीत सहाय की तरफ देखते हुए कहा___"मुझे लगता है कि ये खुद ही बताए तो ज्यादा बेहतर होगा।"

अजय सिंह की इस बात से हर कोई भौचक्का रह गया। सचमुच सबके पैरों के तले से ज़मीन खिसक गई किन्तु अभी भी बात पूरी तरह से समझ में नहीं आई थी। उधर अजय सिंह के कहने पर अभिजीत सहाय ने एक आदमी को इशारा किया तो उसने जा कर अभय सिंह को रस्सियों से मुक्त कर दिया। रस्सी से छूटते ही अभय सिंह मुस्कुराया और फिर अपने कपड़ों को झाड़ता हुआ अजय सिंह के पास आ कर खड़ा हो गया।

अभय सिंह के होठों पर इस वक्त बहुत ही रहस्यमय मुस्कान थी। मैं ही क्या हम सब भी उसे इस तरह देख कर चकित थे। जबकि अभय सिंह कुछ देर हम सबकी तरफ उसी रहस्यमय मुस्कान के साथ देखता रहा।

"माफ़ करना राज।" अभय सिंह ने मेरी तरफ देखने के बाद माॅ की तरफ देखा___"आप भी मुझे माफ़ कीजिएगा भाभी जी। मगर मैं क्या करता? इस दुनियाॅ में हर कोई सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में ही तो सोचता है।"

"अ..भय तुम।" गौरी के होठ बुरी तरह थरथरा कर रह गए, बोली___"तुमने ये सब किया है??"
"करने वाले तो बड़े भइया ही हैं भाभी।" अभय सिंह ने मुस्कुरा कर कहा___"मैने तो सिर्फ इन्हें फोन पर राज के ठिकाने के बारे में बताया था। आप सब समझ सकते हैं कि राज के ठिकाने का पता चल जाने के बाद बड़े भइया के लिए ये सब कर लेना कितना आसान रहा होगा।"

"नहींऽऽऽ।" गौरी के कुछ बोलने से पहले ही करुणा बुरी तरह रोते हुए चीख पड़ी____"आप ऐसा नहीं कर सकते। आप ऐसे नीच इंसान का साथ कैसे दे सकते हैं जिसके बेटे ने खुद आपकी पत्नी व बेटी के साथ ग़लत करने की कोशिश की थी? नहीं नहीं, आप इस नीच आदमी की तरह नहीं हो सकते। भगवान के लिए कह दीजिए कि ये सब आपने नहीं किया।"

हम सब अभय सिंह की इस बात से हक्के बक्के थे। मुख से कोई बोल ही नहीं फूट रहा था। अभय सिंह का इस तरह पलटी मारना हम सबके लिए यकीनन अविश्वसनीय था। किन्तु सच्चाई तो अब सबके सामने ही थी। उसे कैसे कोई नकार सकता था?

"वाह अभय।" गौरी ने हताश भाव से कहा___"क्या खूब बेटे होने का फर्ज़ निभाया है तुमने। कल तक तो बड़ा कह रहे थे कि तुमने हमेशा मुझे अपनी माॅ की तरह समझा है। फिर आज ऐसा क्या हो गया कि एक झटके में तुम फरिश्ता से राक्षस बन गए? आख़िर मैंने या मेरे बच्चों ने ऐसा क्या बुरा कर दिया था तुम्हारा कि तुमने हम सबको इस आदमी के सामने ला कर इस तरह खड़ा कर दिया?"

"मैने कहा न भाभी।" अभय सिंह ने कहा___"हर कोई सिर्फ अपने बारे में ही सोचता है। बड़े भइया ने अपने बारे में सोचा था इस लिए उन्होंने वो सब किया। किन्तु क्या किसी ने मेरे बारे में सोचा कभी? भगवान ने एक बेटा दिया वो भी दिमाग़ से डिस्टर्ब। आपके बेटे को अरबपति आदमी ने अपनी संपूर्ण दौलत से नवाज दिया। इस लिए आप भी खुश हो गए। मगर मेरा क्या??? मेरा तो कहीं कोई महत्व ही न रह गया। दिमाग़ से डिस्टर्ब बेटा है, उसका क्या भविष्य हो सकता है ये बताने की ज़रूरत नहीं है। इस लिए मैने बहुत सोच समझ कर एक सौदा किया।"

"स सौदा???" गौरी के होंठ काॅपे। हम सब के चेहरों पर भी गहन उलझन के भाव उभर आए।
"हाॅ भाभी।" अभय सिंह ने कहा____"मैने बड़े भइया को फोन लगाया और उनसे कहा कि अगर आपको इस जंग में जीत हासिल करनी है तो आपको मेरा कहना मानना पड़ेगा। वरना आप किसी भी तरह से इस जंग में जीत नहीं पाएॅगे। क्योंकि इनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी तो विराज के पास रखा इनका वो सब ग़ैर कानूनी सामान है। उस सामान के तहत विराज इन्हें जब चाहे कानून की गिरफ्त में जीवन भर के लिए डलवा सकता है। ये बात इन्हें भी अच्छी तरह पता है। तब इन्होंने मुझसे कहा कि मैं इस जंग में क्या कर सकता हूॅ? मैने बताया कि इनका सारा ग़ैर कानूनी सामान आज की तारीख़ में मेरे कब्जे में है। इस सामान की कीमत ये होगी कि ये मेरे बेटे का बेहतर से बेहतर इलाज़ करवाएॅगे, साथ ही ज़मीन जायदाद में आधा हक़ मेरा होगा। इन्हें मेरा वो सौदा मंजूर था, इस लिए बात को आगे बढ़ा दिया गया। ये उसी का नतीजा है कि आज आप सब यहाॅ हैं। कल जगदीश ओबराय का फोन इसी लिए नहीं लग रहा था क्योंकि मैं ग़लत नंबर पर काल लगा रहा था। मैं नहीं चाहता था कि उस सिचुएशन में जगदीश वहाॅ आ जाए और मेरे काम में कोई अड़चन आ जाए। ये मेरी ही स्कीम थी कि सुबह नास्ते के समय में बड़े भइया विराज के फोन से पवन के फोन पर काल करें ताकि वैसे हालात बन जाएॅ। हलाॅकि जैसा मैने सोचा था उससे बेहतर ही माहौल बन गया था। क्योंकि पवन ने अपने मोबाइल का स्पीकर खुद ही ऑन कर दिया था।"

"ओह तो तुमने सिर्फ इस वजह से हम सबके साथ इतना बड़ा धोखा किया है।" गौरी ने कहा____"तुम्हें क्या लगता है कि अभय जिस आदमी के साथ तुमने हम सबका सौदा किया है वो आदमी तुम्हारे लिए इतना कुछ करेगा? अरे जिसने ज़मीन जायदाद के लिए अपने माॅ बाप व भाई तक को जान से मार दिया वो तुम्हें भी तो मार सकता है। रही बात तुम्हारे बेटे के इलाज़ की तो वो हम भी करवा देते। मैने तो इस बारे में सोच भी लिया था। याद करो मैने ही इस बात के लिए ज़ोर दिया था कि तुम खुद की समस्या को भी दूर कर लो। मैने जगदीश भाई साहब से बात की और फिर तुम्हारा इलाज हुआ। मैं नहीं जातनी कि इस सबके बाद भी तुम्हारे अंदर ये बात कैसे आ गई कि हम सबको एक ही झटके में इस तरह मौत के मुह में डाल दिया जाए?"

गौरी की ये बातें सुन कर अभय सिंह तुरंत कुछ बोल न सका। कदाचित गौरी की इस बात ने उसे सोचने पर मजबूर किया कि "एक तो अजय सिंह अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद से गुज़र सकता है दूसरी ये कि वो खुद उसके बेटे के बेहतर इलाज़ के बारे में सोचे बैठी थी"। इधर अभय सिंह को एकदम से चुप हो जाते देख अजय सिंह मन ही मन बुरी तरह चौंका।

"ये औरत तुझे बरगलाने की कोशिश कर रही है छोटे।" अजय सिंह ने तपाक से कहा___"ये ऐसा कुछ भी नहीं कर सकती जिसकी इस वक्त ये बातें गढ़ रही है। तुम्हारे बेटे का बेहतर इलाज़ मैं करवाऊॅगा। बल्कि अगर ये कहूॅ तो ज्यादा उचित होगा कि मैंने तो इस बारे में शुरूआत भी कर दी है। तुम अपने बच्चे के लिए बिलकुल भी फिक्र मत करो छोटे। उसका इलाज़ मैं खुद विदेश में करवाऊॅगा।"

"तुम अपनी मर्ज़ी से कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हो अभय।" गौरी ने कहा___"ईश्वर जानता है कि मैने या मेरे मरहूम पति ने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा था। हॅसते खेलते घर में आग लगाने वाला तो सिर्फ यही एक शख्स था। इतना तो अब तुम भी समझ ही गए हो कि इसने अपनी खुशी के लिए तथा अपने स्वार्थ के लिए हम सबके साथ क्या कुछ नहीं किया है। ज़मीन जायदाद और हवेली को हड़पने के चक्कर में इसने अपने ही भाई को ज़हरीले सर्प से डसवा कर मार डाला। उसके बाद अपनी करतूत को छुपाने के लिए इसने माॅ बाबू जी का एक्सीडेन्ट करवाया। आज जब ईश्वर ने इंसाफ किया तो तिलमिला उठा ये। मैं हैरान हूॅ कि तुम सब कुछ जानते बूझते हुए भी इसका साथ देने के लिए अथवा इससे इस तरह का सौदा कैसे कर बैठे? हमें इस बात का दुख नहीं है कि तुमने हम सबको धोखा दिया और फिर यहाॅ ले आए। क्योंकि जीवन में इतना कुछ पा लिया है और सहन कर लिया है कि अब किसी बात से कोई फर्क़ ही नहीं पड़ता। किन्तु हाॅ इस सबके बाद भी तुम्हारे प्रति यही दिल करता है कि तुम ऐसी मुसीबत में न फॅस जाओ जिसके तहत एक बार फिर से ये कहानी दोहरा दी जाए।"

"माॅ की बात सही है चाचा जी।" सहसा मैने भी इस बीच हस्ताक्षेप किया____"दूसरी बात, आपको क्या लगता है कि मैं ये सब अपने हक़ को पाने के लिए कर रहा हूॅ?? नहीं चाचू, आप तो देख ही चुके हैं कि आज के समय में मैं अगर चाहूॅ तो इस पूरे गाॅव को एक पल में खरीद लूॅ। बात ज़मीन जायदाद या किसी प्रापर्टी की नहीं है बल्कि बात है अपने साथ हुए अन्याय की और अत्याचार की। सवाल उठता है कि आख़िर इन्हें किस चीज़ की कमी थी? दादा जी की ज़मीन जायदाद में तो उनके सभी बेटों का बराबर ही हक़ था। ज़मीनों में रात दिन खून पसीना बहा कर मेरे पिता जी ने एक मामूली से घर को इतनी बड़ी हवेली में तब्दील कर दिया। घर में हर सुख सुविधाएॅ हो गईं, यहाॅ तक कि मेरे ही पिता जी के खून पसीने की कमाई से इनके खुद के कारोबार की बुनियाद भी रखी गई। बदले में इन्होंने कभी कुछ दिया नहीं था और ना ही किसी ने इनसे कुछ पाने की आशा की थी कभी। अब सवाल ये उठता है कि ऐसी क्या वजह थी कि इन्होंने एक हॅसते खेलते परिवार को ख़ाक में मिला दिला? अगर इन्हें ज़मीन जायदाद की इतनी ही भूॅख थी तो खुल के कहते। मुझे पूरा यकीन है कि उस समय मेरे पिता जी इनकी भूॅख को शान्त करने की पूरी कोशिश करते। भले ही उन्हें अपने बीवी बच्चों को लेकर घर से निकल जाना पड़ता।"

"देखो तो।" अजय सिंह अंदर ही अंदर बुरी तरह भिन्ना गया था, बोला____"साला आज का छोकरा, कैसी भाषणबाज़ी कर रहा है। इसे तो इतनी भी तमीज़ नहीं है कि जब बड़े आपस में बात कर रहे हों तो बच्चों को बीच में नहीं बोलना चाहिए।"

"और जब बड़े ही पाप करने की हर सीमा लाॅघ जाएॅ तो उसका क्या?" सहसा रितू दीदी बोल पड़ीं____"इस लड़ाई में किसके साथ क्या होगा इस बात का फैंसला तो ऊपर वाला कर ही देगा। किन्तु यहाॅ पर मैं भी ये कहना चाहती हूॅ कि दुनियाॅ में ऐसा कौन सा बाप है जो अपनी ही बेटियों को अपने नीचे सुलाने का तसव्वुर भी करता हो? आप कहते हैं कि राज को तमीज़ नहीं है बात करने की। जबकि सच्चाई तो ये है कि तमीज़, मान मर्यादा, इज्ज़त इन सब चीज़ों का अगर किसी में हद से ज्यादा अभाव है तो वो सिर्फ और सिर्फ आप में है। इस जन्म में तो किसी तरह ये जीवन काटना ही होगा मुझे, क्योंकि मैने अपना ये जीवन अपने सच्चे भाई राज की सुरक्षा में अर्पण कर दिया है। किन्तु मरने के बाद ईश्वर से सिर्फ यही फरियाद करूॅगी कि किसी ग़रीब बाप की औलाद बना देना मगर आप जैसे किसी पापी की औलाद न बनाना।" कहते कहते रितू दीदी की ऑखें छलक पड़ी थीं, फिर वो अभय सिंह की तरफ देखते हुए बोलीं___"आपसे ये उम्मीद नहीं थी चाचू कि आप अपने बेटे के बेहतर इलाज़ के स्वार्थ में अपने इस नीच व घटिया भाई का साथ देंगे। इससे अच्छा तो यही होता कि आपका बेटा जीवन भर वैसा ही रहा आता।"

"तुम ठीक कहती हो रितू।" करुणा ने रोते हुए कहा___"मेरा बेटा ऐसे ही अच्छा है। मुझे इसका कोई इलाज विलाज नहीं करवाना। इस नीच आदमी के पैसे का एक आना भी अपने बेटे पर नहीं लगाना चाहती मैं।" कहने के साथ ही करुणा ने अभय सिंह की तरफ देखा और फिर बोली____"कितना अभिमान था मुझे कि कम से कम मेरा पति अपने मॅझले भाई की तरह नेक दिल तो है। मगर आज आपने मेरे उस अभिमान को चकनाचूर कर दिया है अभय सिंह। किन्तु एक बात कान खोल कर सुन लो, ये मेरा बेटा है। मैं इसे खुद जान से मार देना पसंद करूॅगी मगर इस आदमी के पाप का पैसा इस पर नहीं लगाऊॅगी। और अगर आपने मुझे मजबूर किया तो देख लेना अच्छा नहीं होगा। मैं अपने बच्चों के साथ खुद ज़हर खा कर जान दे दूॅगी।"

"नहींऽऽऽ करुणा नहीं।" अभय सिंह पूरी शक्ति से चीख़ पड़ा, बुरी तरह तड़प कर बोला____"तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगी। मुझसे ग़लती हो गई करुणा, प्लीज मुझे माफ़ कर दो। मेरी मति मारी गई थी जो मैने इस आदमी के साथ ऐसा सौदा कर लिया।" कहने के साथ ही अभय सिंह गौरी की तरफ बढ़ा फिर बोला____"मुझे माफ़ कर दो भाभी। आपने मेरे लिए इतना कुछ किया और मेरी जानकारी के बिना भी मेरे बेटे के इलाज़ करवाने का सोचा, और मैं मूरख आप ही के साथ इतना बड़ा पाप कर बैठा। हे भगवान! तू मुझे इस सबके लिए माफ़ न करना।"

अभय सिंह को इस तरह पलटी खाते देख अजय सिंह भौचक्का सा रह गया। किन्तु फिर जल्द ही सम्हल भी गया वह। कदाचित उसे अंदेशा था कि अभय सिंह अपनी बातों से मुकर जाएगा। अतः उसने फौरन ही सहाय की तरफ देखते हुए कहा____"इस नामुराद को फौरन रस्सियों में बाॅधो सहाय। मुझे पता था ये अपनी बात पर कायम नहीं रह पाएगा। शायद इसका भी इन लोगों के साथ ही मरना लिखा है तो यही सही।"

अजय सिंह की बात सुन कर सहाय फौरन ही हरकत में आया। उसने अपने आदमियों को भी इशारा किया और खुद भी अभय सिंह की तरफ लपका। उधर अजय सिंह की ये बात अभय सिंह के भी कानों में पड़ चुकी थी। जैसे ही सहाय उसके पीछे पहुॅचा वैसे ही अभय सिंह तेज़ी से पलटा और पलक झपकते ही उसने एक हाथ से सहाय को उसकी गर्दन से पकड़ कर अपनी बाहों में कसा और दूसरे हाथ में लिए रिवाल्वर को उसकी कनपटी पर रख दिया।

अजय सिंह ये देख कर हक्का बक्का रह गया। उसे समझ न आया कि अभय सिंह के पास रिवाल्वर कहाॅ से और कब आ गया? उधर अभय सिंह के बंधनों में जकड़ा अभिजीत सहाय उससे छूटने के लिए छटपटाए जा रहा था।

"अपने आदमियों से कह सहाय।" अभय सिंह ने खतरनाक भाव से कहा___"कि ये सब अपने अपने हथियार फेंक दें और फिर इन सब को रस्सियों के बंधन से मुक्त कर दें। वरना तेरा काम तमाम करने में मुझे ज़रा भी समय नहीं लगेगा।"

"फ..फेंक दो।" मौत के डर से थरथराता हुआ सहाय एकदम से चीखा____"अपने अपने हथियार फेंक दो और वही करो जो इसने कहा है।"
"कोई भी अपने हथियार नहीं फेंकेगा सहाय।" अजय सिंह ने कहा___"और हाॅ डरो मत। ये तुम्हें कुछ नहीं करेगा।"

"मैं मरना नहीं चाहता ठाकुर साहब।" सहाय बुरी तरह छटपटाते हुए बोला___"इस आदमी का लहजा बता रहा है कि ये इस वक्त कुछ भी कर सकता है। हाॅ ठाकुर साहब अगर मैने अपने आदमियों को हथियार फेंकने के लिए नहीं कहा तो ये मुझे खत्म कर देगा।"

"बड़े भइया।" अभय सिंह गुर्राया____"आजमाने की कोशिश मत करो। समय की नज़ाकत को देख कर काम करो। और हाॅ एक बात याद रखो, मुझे मरने का कोई डर नहीं है। अब तो बस हर जगह मुझे मौत ही मौत दिखाई दे रही है। इस लिए अगर भलाई चाहते हो तो वही करो जो मैने कहा है।"

अजय सिंह अपने छोटे भाई के गुस्से से भलीभाॅति परिचित था। इस लिए उसने उसका कहा मानने में ही अपनी भलाई समझी। वो देख रहा था कि इस वक्य अभय सिंह सहाय को अपने आगे किये हुए है और हर तरफ उसकी पैनी नज़र है। छोटी सी एक ग़लती सहाय का भेजा उड़ा सकती थी और सहाय के मर जाने से उसके आदमी उसका कोई आदेश नहीं मानेंगे।

बहुत ही मजबूर व लाचार भाव से अजय सिंह ने एक बार सबकी तरफ देखा उसके बाद उसने सभी गनमैनों की तरफ देखते हुए हाॅ में अपने सिर को हिलाया। प्रतिमा व शिवा ये सब देख कर बुरी तरह आतंकित से नज़र आने लगे थे। ख़ैर अजय सिंह के इशारे से सभी गनमैनों ने अपने हथियार फेंक दिये।

"अब इन सबके बंधनों को भी खोलो।" अभय सिंह ने गनमैनों को हुक्म सा दिया।
अजय सिंह का दिमाग़ बड़ी तेज़ी से दौड़ रहा था। वो जानता था कि ऐसे में वह जीती हुई बाज़ी हार जाएगा। अतः वह कोई न कोई जुगत लगाने में लगा हुआ था। उधर अभय सिंह के कहने पर कुछ गनमैन आगे बढ़े और सबके बंधनों को खोलने लगे।

अभय सिंह पूरी तरह सतर्क था। वह सहाय की कनपटी पर रिवाल्वर सटाए हर तरफ देख रहा था। किन्तु ज्यादा देर तक उसकी सतर्कता उसके काम न आ सकी। अचानक ही एक तरफ से धाॅय की आवाज़ हुई थी और फिर अभय सिंह के हलक से दर्द में डूबी चीख़ निकल गई। रिवाल्वर की गोली सीधा उसके कान को छू कर गुज़र गई थी। गर्म गर्म शोला कान की लौ को मानो भीषण तपिश देकर गुज़रा था। जिसका असर ये हुआ कि अभय सिंह छिटक कर दूर हट गया था। रिवाल्वर जाने कब उसके हाॅथ से निकल गया था। सहाय उसकी गिरफ्त से छूटते ही एक तरफ को सरपट भागा था।

इधर अभय सिंह के साथ हुए इस हादसे ने अजय सिंह के पलड़े को पुनः मजबूत करने की राह पकड़ ली। सबके बंधनों को छुड़ाने में लगे गनमैन इस हादसे के होते ही फौरन अपनी अपनी गन्स की तरफ लपके। उधर आदित्य, रितू, मैं और पवन जल्दी जल्दी अपने बंधन खोलते जा रहे थे। दरअसल जो गनमैन हमारे बंधनों को खोल रहे थे वो इस हादसे के होते ही उसे वैसी ही हालत में छोंड़ कर अपने अपने हथियारों की तरफ दौड़ पड़े थे।

उधर अभय सिंह जब तक खुद को सम्हालता अजय सिंह उसके पास पहुॅच चुका था। उसने ज़ोर की लात अभय सिंह के पेट में मारी। अभय सिंह लहराता हुआ दूर जा कर गिरा। अजय सिंह इस वक्त हिंसक जानवर की तरह लग रहा था। अफरा तफरी के माहौल को देख कर शिवा का भी दिमाग़ चल गया। वह फौरन ही इधर उधर देखने लगा। तत्काल ही उसकी नज़र सोनम पर पड़ी। वह तेज़ी से उसकी तरफ बढ़ा। सोनम के पास पहुॅच कर उसने बेख़ौफ होकर उसकी दाहिनी कलाई को पकड़ लिया फिर बोला___"आओ मेरी जान। हम भी अपना प्रोग्राम बनाते हैं। सोचा था कि दिल की बात मान कर इस सबसे तौबा कर लूॅगा। मगर कदाचित ये मेरी किस्मत में ही नहीं है।"

"छोंड़ दे मुझे।" सोनम ने अपनी कलाई को उससे छुड़ाते हुए कहा____"तेरे जैसा घटियाॅ इंसान तो सारे संसार में भी न होगा। अपनी ही बहन के बारे में इतना गंदा सोचने में तुझे ज़रा भी शर्म नहीं आती।"

"यही तो बात है सोनम।" शिवा अपने से बड़ी ऊम्र की बहन को पूरी ढिठाई से उसके नाम से संबोधित करते हुए कहा___"जब मुझे पता चला कि मुझे तुमसे प्यार हो गया है तो मैने भी सोचा चलो अच्छा ही हुआ। दुनियाॅ की एक हसींन लड़की से अगर मेरी शादी हो जाएगी तो मेरा जीवन धन्य हो जाएगा। मगर जल्द ही समझ में आ गया कि प्यार मोहब्बत साली होती ही उसी से है जो हमें कभी मिलने वाला नहीं होता। मुझे लगा यार इससे अच्छा तो वही था जबकि मैं सिर्फ रासलीला से ही खुश रहता था।"

"मुझे तेरी ये बकवास नहीं सुननी कमीने।" सोनम ने गुस्से में कहा____"मैं कहती हूॅ छोंड़ दे मेरा हाॅथ वरना तेरे लिए अच्छा नहीं होगा।"
"पर अगर तुम चाहो तो मैं अब भी बदल सकता हूॅ।" शिवा ने उसकी बात पर ध्यान दिये बिना ही बोला___"हाॅ सोनम, तुम मेरी मोहब्बत को स्वीकार कर लो और मुझसे शादी कर लो। हलाॅकि मैं जानता हूॅ कि हम दोनो के माॅ बाप इस रिश्ते के लिए एग्री नहीं होंगे। इस लिए हम कहीं दूर चले जाएॅगे। वहीं कहीं एक नया संसार बसाएॅगे। मैने तो सबकुछ सोच भी लिया है सोनम। तुम किसी भी बात की चिन्ता मत करो। धन दौलत बहुत है, उसी में हम जीवन भर ऐश करेंगे। क्या कहती हो...आहहहहह।"

अभी शिवा का वाक्य पूरा ही हुआ था कि तभी उसके गाल पर झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ा था। उसके कान एकदम से झनझना कर रह गए थे। अपने गाल को सहलाता हुआ शिवा जब सीधा हुआ तो उसकी नज़र विराज पर पड़ी। विराज को देखते ही उसकी नानी मर गई।

"इससे बेहतर मौका नहीं मिलेगा बेटा।" मैने उसकी ऑखों में झाॅकते हुए कहा___"सुना है मुझसे दो दो हाॅथ करने के लिए बड़ा फुदकता था तू। अब आ गया हूॅ सामने तो हो जाए दो दो हाॅथ? क्या कहता है?"

"सब वक्त वक्त की बातें हैं भाई।" शिवा ने सहसा फीकी सी मुस्कान के साथ कहा____"हो सकता है कि मैं पहले भी तुमसे दो दो हाॅथ करने के काबिल न रहा होऊॅ किन्तु फिर भी दो दो हाॅथ करने की हिमाकत ज़रूर करता मगर अब वो बात नहीं रह गई।"

"क्यों क्या हुआ?" मैने मुस्कुरा कर कहा___"शेर का सामना होते ही सारी हेकड़ी निकल गई?"
"हेकड़ी तो अभी भी है भाई।" शिवा ने कहा___"मगर जैसा कि मैने कहा न कि अब वो बात नहीं रह गई। अब तो बस बात ये है कि किसी से इश्क़ हुआ और हम खुद ही मर गए। अब अगर तुम एक मरे हुए को मारना चाहते हो तो ठीक है लो हाज़िर हूॅ, जो जी में आए कर लो। वादा करता हूॅ कि उफ्फ तक नहीं करूॅगा।"

शिवा की ये बात सुन कर मैं बुरी तरह हैरान रह गया। मुझे समझ न आया कि ये बद्जात बोल क्या रहा है। जबकि मेरी उलझन को देखते हुए सोनम दीदी ने कहा___"ये कमीना कहता है कि ये मुझसे प्यार करता है और अब शादी भी करना चाहता है।"

"क्याऽऽऽ?????" सोनम दीदी की बात सुन कर मैं बुरी तरह उछल पड़ा। आश्चर्य से शिवा की तरफ देखते हुए बोला___"आख़िर गंदा खून कर भी क्या सकता है? जिसका बाप हमेशा अपने ही घर की बहू बेटियों पर नीयत ख़राब करता रहा हो उसका बेटा भला कैसे दूध का धुला हुआ हो जाएगा?"

"इस बारे में बात करने का कोई फायदा नहीं है भाई।" शिवा ने कहा___"क्योंकि इश्क़ जब किसी के सिर चढ़ जाता है न तो फिर उसे ब्रम्हा भी नहीं समझा सकता। अतः तुम इस चक्कर में मत पड़ो। बल्कि उस चक्कर में पड़ो जिसके लिए तुम्हें पड़ना चाहिए। इस वक्त तुम खुद के साथ साथ अपने लोगों की जान की फिक्र करो। एक बात और, मेरी तरफ से बेफिक्र रहना।"

शिवा ने इतना कहा और फिर बड़े ही करुण भाव से सोनम की तरफ देखा। उसके बाद वह एक पल के लिए भी उस जगह नहीं रुका। मैं उसकी इस विचित्र सी हरकत से तथा उसकी बातों से बुरी तरह चकित था। तभी वातावरण में गोलियाॅ चलने की आवाज़ें आने लगी। मैं एकदम से फिरकिनी की मानिंद घूमा।

आदित्य, रितू दीदी व पवन के हाॅथों में गनें थी और वो अधाधुंध गोलियाॅ बरसाए जा रहे थे। पवन का तो निशाना ही नहीं लग रहा था। ये देख कर मैं मुस्कुराया। साले ने जीवन में कभी खिलौने का तमंचा तक न देखा था और आज दोस्ती के लिए गन लिए मौत का ताण्डव कर रहा था। मैने चारो तरफ देखा, मुझे औरतों में कहीं कोई दिखाई न दिया। ये देख कर मैं बुरी तरह चौंक गया। मन में सवाल उभरा कि ये सब कहाॅ गईं? कहीं किसी को कुछ हो तो नहीं गया। मैं सोनम दीदी को छोंड़ कर एक तरफ को भागा।

रितू दीदी, आदित्य व पवन पेड़ों की ओट में पोजीशन लिए हुए थे। अजय सिंह, प्रतिमा, अभय चाचा, व सहाय कहीं दिख नहीं रहे थे। संभव है उन्होंने भी किसी पेड़ की ओट में पोजीशन लिया हुआ था। मैं छिपते छिपाते हुए फार्महाउस की इमारत के पिछले भाग में आ गया। यहाॅ आ कर मैने चारों तरफ देखा। कहीं कोई नहीं था। नीचे ज़मीन पर मरे हुए गनमैन अपने ही खून में नहाए पड़े थे।

माॅ लोगों को कहीं न देख कर मैं बहुत ज्यादा चिंतित व परेशान हो गया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ये सब इतना जल्दी कहाॅ चले गए? मैं इमारत के पिछले भाग से निकल कर सामने की तरफ आया ही था कि तभी धाॅय की आवाज़ हुई। कहीं से गोली चली थी जो कि मेरे दाहिने बाजू को छू कर निकल गई थी। मैं इस सबसे बेखबर सा हो गया था। मेरे ज़हन में सिर्फ माॅ लोगों का ही ख़याल तारी था।

गोली की आवाज़ से तथा अपनी बाजू में उसकी छुवन से मैं बुरी तरह उछल पड़ा था और इसी उछलाहट में मैं फौरन ही एक पेड़ की ओट में आ गया। ओट से सिर निकाल कर मैंने आस पास का बारीकी से मुआयना किया। तभी मेरे कानों में इमारत के अंदर से कुछ लोगों की आवाज़ सुनाई दी। मैं आवाज़ों को सुनने के लिए ग़ौर से ध्यान लगाया। तभी मेरे कानों में मेरी माॅ की आवाज़ पड़ी। वो कह रही थी____"मुझे बाहर जाने दो। वहाॅ मेरा बेटा गोलियों के बीच में खड़ा है और तुम सब कहती हो कि मैं यहीं पर रहूॅ। अरे मेरे बेटे को कुछ हो गया तो मेरे ज़िन्दा रहने का क्या मतलब रह जाएगा?"

मैं सब समझ गया। मतलब माॅ लोग सब इमारत के अंदर हैं और शायद सुरक्षित भी हैं। वरना वो ऐसी बात उन लोगों को न कहतीं। ये सोच कर मैं फौरन ही जम्प मार कर दूसरे पेड़ की तरफ भागा। मेरे ऐसा करते ही एकदम से गोलियों की आवाज़ें आने लगीं। किसी तरह बचते बचते मैं आदित्य के पास पहुॅच ही गया। आदित्य ने मुझे देखा तो इशारे से ही पूछा बाॅकी सब कैसे हैं? तो मैने बताया सब ठीक हैं।

अभी मैं आदित्य को इशारे से ये बताया ही था कि तभी सोनम दीदी की चीख़ गूज उठी। ऐसा लगा जैसे उन्हें कोई मार रहा हो। मैने फौरन ही उस तरफ देखने की कोशिश की। बाॅई तरफ अजय सिंह सोनम दीदी को उनके सिर के बालों से पकड़े घसीटते हुए लिए आ रहे थे। उनके एक हाॅथ में रिवाल्वर भी था। ये देख कर मैं सकते में आ गया।

"अगर इस लड़की को ज़िन्दा देखना चाहते हो तो तुम सब सामने आ जाओ।" अजय सिंह की आवाज़ गूॅजी___"और हाॅ अपने अपने हथियार फेंक कर ही आना, वरना मैं इस लड़की को गोली मार दूॅगा।"

अजय सिंह की इस धमकी पर हम में से कोई कुछ न बोला। कुछ पलों तक अजय सिंह इधर उधर देखते हुए खड़ा रहा। उसके बाद फिर बोला___"मैं सिर्फ तीन तक गिनूॅगा। अगर मेरे तीन गिनने तक तुम लोग मेरे सामने नहीं आए तो समझ लो ये लड़की अपनी जिंदगी से हाॅथ धो बैठेगी।"

अजय सिंह ने गिनना शुरू कर दिया। पेड़ों की ओट में छुपे हम सब को बाहर निकलना अब अनिवार्य था। अजय सिंह ने जैसे ही तीन कहा हम सब उसके सामने आ गए। हम लोगों को देख कर अजय सिंह मुस्कुराया किन्तु फिर एकाएक ही उसके चेहरे के भाव खतरनाॅक रूप से बदले। उसने रिवाल्वर वाला हाॅथ उठाया और बिना कुछ कहे फायर कर दिया। गोली सीधा रितू दीदी के पेट में लगी। फिज़ा में रितू दीदी की हृदयविदारक चीख़ गूॅज गई।

अजय सिंह से अचानक इस कृत्य की कल्पना हम में से किसी ने न की थी। उधर पेट में गोली लगते ही रितू दीदी कटे हुए वृक्ष की तरह लहरा कर वहीं ज़मीन पर गिरने लगी। मैं बिजली की सी तेज़ी से उनकी तरफ लपका। रितू दीदी को बाॅहों में सम्हाले मैं बुरी तरह रोते हुए चीखने लगा। वो मेरी बाॅहों में थीं। उनके चेहरे पर पीड़ा के असहनीय भाव थे किन्तु ऑखें मुझ पर स्थिर थीं।

"दीदी, ये क्या हो गया दीदी?" मैं उन्हें सम्हालते हुए वहीं ज़मीन पर उकड़ू सा बैठ गया____"नहीं नहीं, आपको कुछ नहीं हो सकता।"
"अभी जंग खत्म नहीं हुई पगले।" रितू दीदी ने पीड़ित भाव से कहा____"अभी तो इस धरती पर वो इंसान जीवित है जिसने अपना आख़िरी सबूत ये दे दिया है कि उसके दिल में किसी के लिए भी कोई रहम अथवा प्यार नहीं है। ऐसे इंसान को जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है।"

"मैं उसे ज़िंदा नहीं छोंड़ूॅगा दीदी।" मैने सिसकते हुए कहा___"बस आप को कुछ नहीं होना चाहिए। मैं आपको खोना नहीं चाहता।"
"होनी को कौन टाल सकता है राज?" दीदी ने सहसा मेरे चेहरे को एक हाॅथ से सहलाते हुए कहा___"बड़ी आरज़ू थी कि जीवन भर तेरे साथ रहूॅगी। तुझे खुद से दूर नहीं जाने दूॅगी। मगर देख ले, आज खुद ही तुझसे दूर जा रही हूॅ।"

"नहीं नहीं।" मैने उन्हें खुद से छुपका लिया और बुरी तरह रोते हुए बोला___"आप कहीं नहीं जा रही हैं। मैं आपको कहीं जाने भी नहीं दूॅगा। मुझे मेरी दीदी सही सलामत चाहिए। मैं आपके बिना जी नहीं पाऊॅगा।"

"इतना प्यार मत दिखा राज।" रितू दीदी की आवाज़ लड़खड़ा गई____"वरना मरने के बाद भी मुझे शान्ति नहीं मिलेगी। ख़ैर, अभी तू जा मेरे भाई। वरना वो राक्षस फिर किसी को गोली मार देगा। देख तुझे मेरी कसम है, तू जा राज।"

दीदी की कसम ने मुझे मजबूर कर दिया। मैं भारी मन से उन्हें वहीं पर छोंड़ कर पलटा। इधर रितू के साथ हुए इस हादसे ने आदित्य पवन व अभय चाचा को भी अचेत सा कर दिया था। वो सब ठगे से ऑखें फाड़े देखे जा रहे थे।

"अपनी ज़िद व अपने अहंकार में किस किस को मारोगे अजय?" सहसा इस बीच प्रतिमा ने अजय सिंह की तरफ देखते हुए बेहद ही करुण भाव से रोते हुए कहा___"उस दिन भी तुमने नीलम को जान से मार ही दिया था और आज एक और बेटी को जान से मार दिया। आख़िर किस किस को जान से मारोगे तुम? ये दौलत ये ज़मीन जायदाद किसके भोगने के लिए बनाई है तुमने? मुझे भी मार दो, अपनी ऑखों के सामने अपनी बेटियों को इस तरह मरते देख कर भला कैसे चैन से जी पाऊॅगी मैं?"

"ये मेरी कोई नहीं लगती प्रतिमा।" अजय सिंह गुर्राया___"अगर लगती तो आज ये अपने बाप के साथ खड़ी होती ना कि अपने बाप के दुश्मनों के साथ।"

"तो क्या ग़लत किया इन्होंने?" प्रतिमा ने बिफरे हुए लहजे से कहा___"अरे इन लोगों ने तो वही किया जो हर लड़की को करना चाहिए। अपने इज्ज़त और सम्मान की रक्षा करना हर लड़की या औरत का धर्म है। तुम तो उसके बाप हो न, तुम्हें तो खुद अपने घर की इज्ज़त की हर तरह से रक्षा करना चाहिए थी। मगर तुम तो खुद ही अपनी ही बहू बहन व बेटियों की अस्मत को लूटने वाले बन गए।"

"ये तुम कौन सी भाषा बोल रही हो प्रतिमा?" अजय सिंह की ऑखें फैली____"आज तुम्हारे मुख से ऐसी बातें कैसे निकलने लगीं? क्या सब कुछ भूल गई हो तुम? तुम तो खुद भी उतनी ही गुनहगार हो जितना कि तुम इस वक्त मुझे समझ रही हो। इस लिए ऐसी बात मत करो, क्योंकि ये सब तुम पर शोभा नहीं देती हैं।"

"मैं मानती हूॅ कि मैं इस सबमें बराबर की गुनहगार हूॅ अजय।" प्रतिमा ने कहा___"मगर ये भी एक सच है कि इस सबके लिए भी सिर्फ तुम ही जिम्मेदार हो। मैं तो तुमसे अंधाधुंध प्यार ही करती थी। किन्तु अपने मतलब के लिए तुमने ही मुझे ऐसे काम को करने के लिए प्रेरित किया था। तुम्हारे प्यार में अच्छा बुरा ऊॅच नीच कभी नहीं सोचा मैने। सिर्फ यही सोचा कि मेरे किसी भी काम से सिर्फ तुम खुश रहो। मगर अब ये जो कुछ भी हो रहा है उसने मुझे इस बात का एहसास करा दिया है कि तुमने कभी मुझे प्यार किया ही नहीं था। तुम्हें तो सिर्फ खुद से और अपनी ख़्वाहिशों से ही प्यार था। अगर ऐसा न होता तो आज तुम इस तरह अपनों के दुश्मन न बन गए होते और ना ही इस तरह क्रूरता से अपनी ही बेटियों को जान से मार देने का सोचते। ख़ैर, देर से ही सही मगर मैं ये स्वीकार कर चुकी हूॅ कि मैंने तुम्हारे प्यार के चलते सबके साथ ऐसा गुनाह व पाप किया है जो कदाचित माफ़ी के लायक हो ही नहीं सकता है। मुझे भी किसी से माफ़ी की इच्छा नहीं है। इतना कुछ होने के बाद तो वैसे भी अब जीने का दिल नहीं करता। मेरा वजूद इतना घिनौना हो चुका है कि दुनिया का गिरा से गिरा हुआ इंसान भी कदाचित मेरी तरफ देखना भी पसंद न करे। किन्तु सुना है पश्चाताप करने से और नेक काम करने से मन को शान्ति मिलती है। इसी लिए मैने पश्चाताप के रूप में वो किया जो मुझे बहुत पहले करना चाहिए था।"

"क्या मतलब???" अजय सिंह चौंका____"क..क्या किया है तुमने?"
"अब तक तो दिमाग़ पर दिल ही हावी था अजय।" प्रतिमा ने कहा___"मगर जब दिल ही टूट कर बिखर गया तो दिमाग़ का ज़ोर पड़ ही गया उस पर। उस शाम जब तुम फोन पर अभय से बातें कर रहे थे तब मैने भी ड्राइंग रूम में रखे फोन पर तुम दोनो की बातें सुनी थी। तुम तो जानते हो कि वो दोनो ही फोन एक ही हैं। अगर एक पर किसी का फोन आएगा तो उस दूसरे फोन के माध्यम से भी दूसरा ब्यक्ति पहले वाले फोन पर हो रही बातचीत को बड़े आराम से सुन सकता है। ख़ैर तुम दोनो की बातें सुनी मैने और तब मुझे पूरी तरह समझ आ गया कि सारी ज़िंदगी तुम्हारे लिए अपना सब कुछ लुटाने वाली मैं कितनी पापिन थी जो कभी तुम्हारी खुशियों के सिवा किसी और पर होते अत्याचार को न देख सकी थी। तुमने अभय को विश्वास दिलाया कि तुम उसके बेटे का बेहतर इलाज़ करवाओगे और ज़मीन जायदाद में आधा हिस्सा भी दोगे। बदले में तुम्हें तुम्हारा वो ग़ैर कानूनी सामान व विराज के सभी चाहने वाले अपने पास चाहिए। अभय तो अपने बेटे के लिए अपना विवेक खो कर यकीन के साथ तुमसे इतना बड़ा सौदा कर बैठा जबकि मैं जानती थी कि तुम वैसा कभी नहीं करोगे जिस बात के लिए तुमने अभय को विश्वास दिलाया था। अपना मतलब निकल जाने के बाद तुम वही करोगे जो सबके साथ करना चाहते हो। मैं हैरान थी कि पढ़ा लिखा अभय इतनी बड़ी बेवकूफी व अपनों के साथ सिर्फ अपने बेटे के बारे में सोच कर इतना बड़ा विश्वासघात कैसे कर सकता है? लेकिन जल्द ही मुझे समझ आया कि भाई किसका है। मेरे दिमाग़ में ये बात भी आई कि संभव है कि अभय ने कोई दूर की कौड़ी सोची हुई है। कहने का मतलब ये कि इस जंग में अगर तुम्हारे साथ साथ मैं व हमारा बेटा मारे गए या कानून की चपेट में आ गए तो ये विराज को भी किसी तरह अपने रास्ते से हटा देगा। उस सूरत में सारी ज़मीन जायदाद का ये अकेला हक़दार हो जाएगा। ये सब बातें सोच कर मुझे एहसास हुआ कि जिसने इस सारी ज़मीन जायदाद को हीरे की शक्ल दी तथा जिसका कहीं कोई कसूर ही नहीं था उसे उसके भाई ने तो पहले ही मिटा दिया था और अब एक और भाई आ गया उसी इतिहास को दोहराने के लिए। मुझे पहली बार गौरी के बारे में सोच कर उस पर तरस आया। एकाएक ही मेरा हृदय झनझना उठा। अंदर कहीं से कोई बड़े ज़ोर से चीख कर कहा 'इस बेचारी ने ऐसा कौन सा पाप किया था जिसकी वजह से इसके साथ इतना कुछ हो गया?' इंसान को बदलने के लिए सिर्फ एक ही मामूली सी चीज़ काफी होती है। अगर हम किसी के बारे में एक बार इस तरह से सोच लें तो फिर बहुत मुमकिन है कि फिर हमें उसकी अथवा अपनी वास्तविकता का बोध होने लगता है। वही हुआ मेरे साथ। हृदय परिवर्तन तो अपनी बेटी के साथ हुए हादसे से ही होने लगा था किन्तु उस फोन की वजह से पूरी तरह से ही हो गया। सारी बातों को सोचने के बाद मैने फैंसला कर लिया कि अब वो नहीं होंने दूॅगी जिसके लिए तुमने एक हॅसते खेलते परिवार की बलि चढ़ाई थी। हाॅ अजय, जैसे अभय ने अपने स्वार्थ के लिए अपनों के साथ विश्वासघात कर तुमसे वो सौदा किया उसी तरह मैने भी एक फोन किया।"

"क्या मतलब??" अजय सिंह बुरी तरह चौंका___"कैसा फोन किया तुमने?"
"मेरे पास विराज का नंबर नहीं था।" प्रतिमा ने कहा___"और मेरी बेटी मेरा फोन उठाती ही नहीं थी। तब मैने सीधा पुलिस कमिश्नर को फोन किया। पुलिस कमिश्नर को इस लिए क्योंकि मौजूदा वक्त में जो कुछ भी हुआ उससे ये बात साबित हो चुकी थी कि रितू अपने पुलिस महकमें की सह पर ही वो सब कर रही थी। हलाॅकि मैं पूरी तरह श्योर नहीं थी। किन्तु फिर भी मैने एक बार कमिश्नर से बात करने का ही सोचा और फिर उन्हें फोन लगाया। फोन पर मैने कमिश्नर से साफ साफ शब्दों में बता दिया कि सिचुएशन क्या है। उसके बाद मैंने उनसे कहा कि मुझे एक बार विराज से बात करना है। उन्होंने मेरी बातों को बारीकी से सोचा समझा और फिर रितू को फोन किया और उससे विराज का नंबर लेकर मुझे दिया।"

"उस वक्त मैं और आदित्य बाहर घूमने गए थे जब मेरे फोन पर बड़ी माॅ का फोन आया था।" बड़ी माॅ की बात खत्म होते ही मैने तुरंत कहा___"इन्होंने मुझे फोन पर सारी बातें बता दी। हलाॅकि मुझे शुरू शुरू में इनकी बात पर ज़रा भी यकीन न हुआ। क्योंकि मैं सोच ही नहीं सकता था कि अभय चाचा हमारे साथ ऐसा कर सकते हैं। तब इन्होंने कहा कि ये अपनी बातों का सबूत तो नहीं दे सकती हैं मगर मैं खुद इस बात की जाॅच पड़ताल तो कर ही सकता हूॅ। दूसरी बात मुझे भी कहीं न कहीं लग रहा था कि अपनी बेटी के साथ हुए हादसे के चलते बड़ी माॅ में कुछ तो परिवर्तन आना ही चाहिए था। ख़ैर, इनकी ख़बर के बाद मैने भी वहाॅ पर रितू दीदी आदि को सब कुछ बता दिया और रात में ये सब होने का इंतज़ार करने के लिए कह दिया। वहीं मैने मुम्बई में भी पवन को फोन कर दिया था। उसे मैने समझाया था कि वो इस बारे में किसी से कुछ न कहे किन्तु अगर बड़े पापा का फोन उसके पास आए तो वो फोन का स्पीकर ऑन करके ज़रूर सबको इनकी बात सुनाए। क्योंकि उसके बाद तो उन्हें यहाॅ आना ही था। मैं भी अब खुल के इनके सामने आना चाहता था। किन्तु ये सब बहुत ही ज्यादा खतरनाक भी था। क्योंकि इससे किसी को भी कुछ भी हो सकता था। ख़ैर रितू दीदी ने कमिश्नर से बात की और उन्हें सारी बातों से अवगत कराया और पुलिस प्रोटेक्शन की माॅग भी की। कमिश्नर ने हमें बेफिक्र रहने को कहा। कल रात जब आप अपने दलबल के साथ हमारे ठिकाने पर पहुॅचे तब हम सब जाग रहे थे। आप ये समझ रहे हैं कि आप बड़ी आसानी से हम सबको बेहोश कर यहाॅ ले आए जबकि सच्चाई तो यही है कि आपका काम हमने खुद आसान किया था। वरना आप ही सोचिए कि ऐसे आलम में इतने लापरवाह हम कैसे हो जाएॅगे कि कोई आए और हम सबको बड़ी सहजता से बेहोश करके अपने साथ जहाॅ चाहे ले जाए। जबकि मैं चाहता तो उसी वक्त आप और आपके सभी आदमी मौत के घाट उतर चुके होते। मगर मैने अपने दोस्त शेखर के मौसा जी को उस रात वहाॅ पर सिक्योरिटी रखने से मना कर दिया था। उसके बाद क्या हुआ वो तो आप अच्छी तरह जानते ही हैं।"

"चलो अच्छा हुआ कि तुमने खुद ही ये सब बता दिया।" अजय सिंह ने भभकते हुए लहजे से कहने के साथ ही बड़ी माॅ की तरफ देखा___"पर तुमने ये सब करके अच्छा नहीं किया प्रतिमा और इसके लिए तुम्हें मौत से कम सज़ा तो हर्गिज़ भी नहीं मिल सकती।"

"कितनी आश्चर्य की बात है न अजय।" प्रतिमा ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"इतना कुछ होने के बाद भी तुम्हारा हृदय परिवर्तन नहीं हुआ। तुम्हें ज़रा भी एहसास नहीं हुआ कि ये जो कुछ भी तुमने किया है वो कितना ग़लत था। बल्कि अभी भी तुम वही सब करने पर आमादा हो जिसका नतीजा तुम्हारे लिए किसी भी सूरत में अच्छा नहीं हो सकता। आज तुम्हारी इस हालत को देख कर सचमुच मुझे तरस आ रहा है। आज मैं ये सोचने पर मजबूर हूॅ कि पच्चीस साल पहले मैने तुममे ऐसा क्या देखा था कि तुमसे इस क़दर प्यार कर बैठी थी? तुम किसी के नहीं हो सकते अजय, तुम अकेले ही ऐसी मौत मरोगे जिसकी लाश पर कीड़े पड़ेंगे।"

"हरामज़ादी कुतिया।" गुस्से में तिलमिलाए हुए अजय सिंह ने बड़ी तेज़ी से अपने रिवाल्वर वाले हाॅथ को ऊपर हवा में उठाया और फिर___धाॅय।

प्रतिमा के सबसे क़रीब अभय सिंह ही था। माहौल की नज़ाकत का जैसे उसे बखूबी एहसास था तभी तो उन्होंने गोली के चलते ही जम्प लगाई थी। किन्तु गोली की स्पीड ने अपना काम तमाम करने में कोई कसर न छोंड़ी थी। प्रतिमा को बचाने के चक्कर में गोली अभय सिंह के कंधे पर जा लगी थी। फिज़ा में अभय सिंह की दर्द से डूबी चीख़ निकल गई थी। अभय सिंह प्रतिमा को लिए ज़मीन पर उलटता चला गया था।

इधर इस नज़ारे को देख कर मैने भी अजय सिंह पर जम्प लगाई थी। मगर मेरे जम्प लगाने से पहले ही उसने एक और फायर कर दिया था। जिसका नतीजा ये हुआ कि इस बार गोली अभय सिंह के पेट में लगी थी। उस वक्त वो जल्दी से उठने की कोशिश कर रहा था तभी गोली आकर उसके पेट में लग गई थी। एक साथ कई चीखें फिज़ा में गूॅज गई थी। इधर तीसरा फायर करने से पहले ही मैं अजय सिंह के ऊपर आ गिरा था। इस गुत्थम गुत्था में सोनम दीदी भी लोट पोट हो गई थीं। अजय सिंह की पकड़ से छूटते ही सोनम दीदी अभय सिंह व प्रतिमा की तरफ चिल्लाते हुए दौड़ पड़ी थी।

इधर मैने अजय सिंह के उस हाॅथ में एक कराट मारी जिसमें वो रिवाल्वर लिये हुए था। कराट लगते ही अजय सिंह के हाॅथ से रिवाल्वर छूट कर गिर गया। मैने उस पर लात घूॅसों की बरसात कर दी। अजय सिंह हलाल होते बकरे की तरह चिल्लाने लगा। वह खुद भी हाॅथ पैर चला रहा था किन्तु सब ब्यर्थ। मैं उसके ऊपर से उठा और फिर उसे उठा कर पूरी ताकत से दूर फेंक दिया। हवा में लहराते हुए अजय सिंह दूर जा कर गिरा।

जहाॅ पर अजय सिंह गिरा था वहीं पर एक गन पड़ी थी। जिसे देख कर वह अपना हर दर्द भूल गया और झपट कर उसने उस गन को उठा लिया। तभी फिज़ा में पुलिस सायरन की आवाज़ गूॅजने लगी। अजय सिंह गन लेकर तुरंत पलटा और मेरी तरफ देखते हुए गन को ऊपर करने लगा। इससे पहले की वह गन का ट्रिगर दबा पाता कहीं से एक साथ दो फायर हुए। एक गोली सीधा अजय सिंह के सीने में दिल वाले स्थान पर लगी जबकि दूसरी उसके थोड़ा नीचे। पलक झपकते ही उन दोनो जगहों से खून की धार फूट पड़ी और अजय सिंह कटे हुए बृक्ष की भाॅति लहरा कर ज़मीन पर गिरा और फिर एकदम से शान्त पड़ गया।

फायर की आवाज़ से मैं बिजली की तरह पलटा था। अजय सिंह के दाहिनी तरफ कुछ ही दूरी पर शिवा रिवाल्वर लिए खड़ा था। उसके चेहरे पर अजीब से भाव थे। मैं उसे चकित भाव से देखे जा रहा था। जबकि वह अपने बाप को मारने के बाद पलटा और मेरी तरफ देखते हुए बोला____"अपने हाॅथ इस पापी के खून से मत रॅगो भाई। इसे इससे बड़ी सज़ा और क्या मिलेगी कि इसने जिसे सबसे ज्यादा प्यार किया उसी ने इसकी साॅसें छीन ली। नफ़रत के इस पुजारी को मर ही जाना चाहिए था।"

"मगर तूने..।" मेरा वाक्य अधूरा रह गया।
"कुछ मत कहिए भाई।" शिवा की आवाज़ लड़खड़ा गई, बोला___"मैं नहीं जानता कि मुझसे ये सब कैसे हो गया। मगर अंदर से कोई कह रहा है कि बहुत अच्छा किया तुमने। माॅ बाप अपने बच्चों को अच्छे संस्कार व स्वावलम्बी बनने की सीख देते हैं मगर मेरे इस बाप ने तो मुझे अपनी ही तरह बनने की सीख दी। ख़ैर छोंड़िये भाई, मुझे भी अब खुशी हो रही है कि मैने आज कोई अच्छा काम किया है। ये नियति मैने खुद चुनी है। अपने बाप के कत्ल के इल्ज़ाम में या तो मुझे फाॅसी हो जाएगी या फिर ऊम्र कैद। किसी से बेपनाह इश्क़ भी हुआ मगर सिर्फ मुझे ऊम्र भर तड़पाने के लिए। मैने अपने इस छोटे से जीवन में ही इतने ऊॅचे दर्ज़े के पाप किये हैं जिसके लिए ईश्वर मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा।"

"ये तू कैसी बकवास कर रहा पगले?" उसकी बातें सुन मेरा गला रुॅध सा गया। जाने क्यों इस वक्त वो मुझे बहुत प्यारा सा लगा जिसके लिए मेरा दिल रोने लग गया था। हलाॅकि उसने भी अपने बाप की तरह हमें जलील करने में कोई कसर न छोंड़ी थी।

"जाइये भाई।" तभी शिवा ने कहा____"अब तो सब खेल खत्म हो गया है। पुलिस भी आ गई है और अब वो मुझे कानूनन फाॅसी के फंदे पर झुलाने के लिए यहाॅ से ले जाएगी। सबकी देख भाल करना भाई, और सबको ढेर सारी खुशियाॅ देना। एक नया संसार बनाइये और उसमें सबको खुश रखिये।"

अभी शिवा अपनी इन बातों से मुझे चकित ही किये था कि हर तरफ पुलिस के आदमी फैलते हुए आ गए। मेरी नज़र दूर से ही कमिश्नर पर पड़ी। मैने पलट कर देखा तो शिवा अपने बाप के मृत शरीर के पास ही अपने हाॅथ में रिवाल्वर लिए बैठ गया था। मतलब साफ था कि वो पुलिस को दिखाना चाहता था कि उसने खुद ही अपने बाप का खून किया है और अब पुलिस को उसे गिरफ्तार कर लेना चाहिए। बड़ी अजीब बात थी वो चाहता तो खुद को बचा भी सकता था। क्योंकि खून करते हुए पुलिस ने उसे देखा ही नहीं था और हम लोग ये बात पुलिस को बताने के बारे में सोच भी सकते थे या नहीं भी।

कमिश्नर जब शिवा के पास पहुॅचा तो शिवा उसकी तरफ देख कर बोला___"अच्छा हुआ कि आप आ गए। आज इस पापी को इसके ही पापी बेटे ने मौत के घाट उतार दिया है। लीजिए अब मुझे गिरफ्तार कर लीजिए।"

शिवा की इस बात पर कमिश्नर बुरी तरह हैरान रह गया। किन्तु अपराधी जब खुद ही अपना गुनाह कबूल कर रहा था तो भला उन्हें क्या आपत्ति हो सकती थी? कमिश्नर ने अपने साथ आए एक एसआई को इशारा किया। एसआई ने शिवा के हाॅथ से रिवाल्वर को रुमाल में लपेट कर लिया और फिर उसके दोनो हाॅथों में हॅथकड़ी डाल दी।

मैं दौड़ते हुए रितू दीदी के पास आया था। रितू दीदी को आदित्य अपनी गोंद में लिए बैठा था। रितू दीदी की साॅसें अभी चल रही थी। पवन अभय चाचा के पास चला गया था। जहाॅ पर प्रतिमा अभय की हालत को देख कर रो रही थी। अभय चाचा की हालत भी काफी ख़राब थी। उनका पूरा जिस्म उनके खून से नहाया हुआ था। प्रतिमा बार बार एक ही बात कह रही थी कि मुझे मर जाने दिया होता। मुझ पापिन को क्यों बचाया तुमने?

पुलिस सायरन की आवाज़ सुन कर इमारत के अंदर से बाॅकी सब लोग भी आ गए थे। यहाॅ का मंज़र देख कर सबकी चीख़ें निकल गई थी। माॅ ने जब मुझे सही सलामत देखा तो मुझे खुद से छुपका लिया और मेरे चेहरे पर हर जगह चूमने चाटने लगीं। मैने उन्हें खुद से अलग किया और बताया कि रितू दीदी व अभय चाचा को गोली लगी है। उन्हें जल्द ही हास्पिटल ले जाना पड़ेगा। मेरी बात सुन कर सब लोग रितू दीदी व अभय चाचा के पास आ गए।

रितू दीदी व अभय चाचा की हालत बहुत ख़राब थी। सब लोग रो रहे थे। मैं और पवन दौड़ते हुए कुछ ही दूरी पर खड़ी कई सारी गाड़ियों की तरफ गए। उनमें से एक गाड़ी को स्टार्ट कर मैं फौरन ही उसे इस तरफ ले आया। आदित्य ने रितू दीदी को उठा कर जल्दी से टाटा सफारी में बड़े एहतियात से बिठाया। रितू दीदी के बैठते ही नैना बुआ भी उनके पास आकर बैठ गईं। आदित्य भाग कर गया और दूसरी गाड़ी ले आया। उस गाड़ी में अभय चाचा को फौरन लेटाया गया। उसमें करुणा चाची व रुक्मिणी चाची बैठ गईं। दूसरी अन्य गाड़ियों में बाॅकी सब लोग भी बैठ गए। इसके बाद हम सब तेज़ी से गुनगुन की तरफ बढ़ चले।
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दोस्तो, आप सबके सामने अपडेट हाज़िर है। आशा है आप सबको पसंद आएगा।

दोस्तो इस अपडेट के बाद अब एक आख़िरी अपडेट ही आएगा। ख़ैर, आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा।
 
एकनया संसार
अपडेट.......《 63 》

अब तक,,,,,,,,
शिवा की इस बात पर कमिश्नर बुरी तरह हैरान रह गया। किन्तु अपराधी जब खुद ही अपना गुनाह कबूल कर रहा था तो भला उन्हें क्या आपत्ति हो सकती थी? कमिश्नर ने अपने साथ आए एक एसआई को इशारा किया। एसआई ने शिवा के हाॅथ से रिवाल्वर को रुमाल में लपेट कर लिया और फिर उसके दोनो हाॅथों में हॅथकड़ी डाल दी।

मैं दौड़ते हुए रितू दीदी के पास आया था। रितू दीदी को आदित्य अपनी गोंद में लिए बैठा था। रितू दीदी की साॅसें अभी चल रही थी। पवन अभय चाचा के पास चला गया था। जहाॅ पर प्रतिमा अभय की हालत को देख कर रो रही थी। अभय चाचा की हालत भी काफी ख़राब थी। उनका पूरा जिस्म उनके खून से नहाया हुआ था। प्रतिमा बार बार एक ही बात कह रही थी कि मुझे मर जाने दिया होता। मुझ पापिन को क्यों बचाया तुमने?

पुलिस सायरन की आवाज़ सुन कर इमारत के अंदर से बाॅकी सब लोग भी आ गए थे। यहाॅ का मंज़र देख कर सबकी चीख़ें निकल गई थी। माॅ ने जब मुझे सही सलामत देखा तो मुझे खुद से छुपका लिया और मेरे चेहरे पर हर जगह चूमने चाटने लगीं। मैने उन्हें खुद से अलग किया और बताया कि रितू दीदी व अभय चाचा को गोली लगी है। उन्हें जल्द ही हास्पिटल ले जाना पड़ेगा। मेरी बात सुन कर सब लोग रितू दीदी व अभय चाचा के पास आ गए।

रितू दीदी व अभय चाचा की हालत बहुत ख़राब थी। सब लोग रो रहे थे। मैं और पवन दौड़ते हुए कुछ ही दूरी पर खड़ी कई सारी गाड़ियों की तरफ गए। उनमें से एक गाड़ी को स्टार्ट कर मैं फौरन ही उसे इस तरफ ले आया। आदित्य ने रितू दीदी को उठा कर जल्दी से टाटा सफारी में बड़े एहतियात से बिठाया। रितू दीदी के बैठते ही नैना बुआ भी उनके पास आकर बैठ गईं। आदित्य भाग कर गया और दूसरी गाड़ी ले आया। उस गाड़ी में अभय चाचा को फौरन लेटाया गया। उसमें करुणा चाची व रुक्मिणी चाची बैठ गईं। दूसरी अन्य गाड़ियों में बाॅकी सब लोग भी बैठ गए। इसके बाद हम सब तेज़ी से गुनगुन की तरफ बढ़ चले।
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अब आगे,,,,,,,

ऑधी तूफान बने हम सब आख़िर हास्पिटल पहुॅच ही गए। जल्दी जल्दी हमने रितू दीदी व अभय चाचा को स्ट्रेचर पर लिटा कर हास्पिटल के अंदर ले गए। कुछ ही देर में उन दोनो को ओटी के अंदर ले जाया गया। उन्हें अंदर ले जाते ही ओटी का दरवाज़ा बंद हो गया और हम सब बाहर ही चिंता व परेशानी की हालत में खड़े रह गए।

हम सब बेहद दुखी थे और भगवान से उन दोनो को सलामत रखने की मिन्नतें कर रहे थे। करुणा चाची के ऑसू बंद ही नहीं हो रहे थे। कमिश्नर साहब ने पहले ही फोन करके यहाॅ पर डाक्टरों को बता दिया था ताकि यहाॅ पर किसी प्रकार की परेशानी न हो सके और जल्द ही उनका इलाज़ शुरू हो जाए।

बड़ी माॅ हम सब से अलग एक तरफ गुमसुम सी खड़ी थीं। उनकी माॅग का सिंदूर मिटा हुआ था तथा हाॅथ की चूड़ियाॅ भी कुछ टूटी हुई थीं। मतलब साफ था कि पति की मौत के बाद उन्होंने खुद को विधवा बना लिया था। इस वक्त उनके चेहरे पर संसार भर की वीरानी थी। ऑखों में सूनापन था।

अधर्म पर धर्म की तथा बुराई पर अच्छाई की जीत तो हो चुकी थी किन्तु इस जीत में सच्चाई की राह पर चलने वाले दो ब्यक्ति जीवन और मृत्यु के बीच लटके हुए थे। मैं रितू दीदी के लिए सबसे ज्यादा दुखी था। मेरी ऑखों के सामने रह रह कर उनकी सुंदर छवि चमक उठती थी। उनके साथ बिताए हुए हर लम्हें याद आ रहे थे। रितू दीदी ने शुरू से लेकर अब तक मेरा कितना साथ दिया था ये बताने की आवश्यकता नहीं है। अगर मैं ये कहूॅ तो ज़रा भी ग़लत न होगा कि इस जीत का सारा श्रेय ही उनको जाता है। उन्होंने क़दम क़दम पर मुझे सम्हाला था और मेरी रक्षा की थी। यूॅ तो मैं जीवन भर उनका ऋणी ही बन चुका था किन्तु एक ये भी सच्चाई थी कि मैं उन्हें किसी भी सूरत में खोना नहीं चाहता था। मैं बचपन से ही उन्हें बेहद पसंद करता था और उनके लिए कुछ भी कर गुज़रने की चाहत रखता था। अब तक तो नहीं पर अब लग रहा था कि अगर उन्हें कुछ हो गया तो मैं एक पल भी जी नहीं पाऊॅगा।

आदित्य मेरे पास आया और मुझसे बोला कि मैं खुद को सम्हालूॅ और सबको भी सम्हालूॅ। वो खुद भी बेहद दुखी था। उसने हम सबको अपना ही मान लिया था। उसने मुझे समझाया कि मैं खुद को मजबूत करूॅ वरना सब इस सबसे दुखी होते रहेंगे। आदित्य की बात सुन कर मैने खुद को सम्हाला और फिर सबको वहीं एक तरफ लम्बी सी बेंच में बैठ जाने के लिए कहा। मेरे ज़ोर देने पर आख़िर सब लोग बैठ ही गए। मेरी नज़र दूर एक तरफ खड़ी बड़ी माॅ पर पड़ी तो मैं उनके पास चला गया।

बड़ी माॅ कहीं खोई हुई सी खड़ी एकटक शून्य को घूरे जा रही थीं। मैं उनके पास जा कर उनके कंधे पर हाॅथ रखा तो जैसे उनकी तंद्रा टूटी। उन्होंने मेरी तरफ अजीब भाव से देखा और फिर बिना कुछ बोले फिर से शून्य में देखने लगीं। मैने बड़ी माॅ से भी बैठ जाने के लिए कहा तो वो मेरे साथ ही दूसरी साइड की बेंच की तरफ आईं और बैठ गईं। उनके पास ही मैं भी बैठ गया। हलाॅकि मेरे उनके पास बैठ जाने से सामने ही बेंच पर बैठे सब लोग मुझे घूर कर देखने लगे थे मगर मैने उनके घूरने की कोई परवाह नहीं की।

मेरे मन में बड़ी माॅ की उस वक्त की बातें गूॅज रही थी जब उन्होंने मुझे फोन किया था। इतना तो मुझे पता था कि हर इंसान को एक दिन अपने गुनाहों का एहसास होता है। वक्त और हालात इंसान को ऐसी जगह ला कर खड़ा कर देते हैं जब उसे शिद्दत से अपने गुनाहों का एहसास होने लगता है। वही हाल बड़ी माॅ का भी था। एक ये भी सच्चाई थी कि उन्होंने अपने पति से ऑख बंद करके तथा बिना कुछ सोचे समझे बेपनाह प्रेम किया था। जिसका सबूत ये था कि उन्होंने अजय सिंह के हर गुनाह में उसका खुशी खुशी साथ दिया था। उन्होंने कभी भी अपने पति से ये नहीं कहा कि वो ग़लत कर रहा है और वो ग़लत में उसका साथ नहीं देंगी। इंसान जब बार बार गुनाह करने लगता है तब उसका ज़मीर ख़ामोश होकर बैठ जाता है। या फिर इंसान ज़बरदस्ती अपने ज़मीर का करुण क्रंदन दबाता चला जाता है। मगर अंत तो हर चीज़ का एक दिन होता ही है। फिर चाहे वो जिस रूप में हो। ख़ैर, मेरे मन में बड़ी माॅ से फोन पर हुई वो सब बातें चल रही थीं।

बड़ी माॅ से फोन पर पहले तो मैने कठोरतापूर्ण ही बातें की थी किन्तु जब उन्होंने अभय चाचा की असलियत और अपने पति से उनके द्वारा फोन पर हुई बातों के बारे में बताया तो पहले तो मैं हॅसा था, क्योंकि मुझे लगा कि बड़ी माॅ मुझसे कोई चाल चलने का सोच रही हैं जिसमें वो अभय चाचा के खिलाफ ऐसी बातें बता कर मेरे मन में चाचा के प्रति शंका या दरार जैसा माहौल बनाना चाहती हैं। मगर उनकी बातों ने जल्द ही मुझे ये सोचने पर मजबूर कर दिया था कि भला उन्हें ऐसा करने की क्या ज़रूरत थी? दूसरी बात उन्होंने मुझसे कुछ ऐसी बातें भी कीं जिन बातों की मैं उनसे उम्मींद ही नहीं कर सकता था।

काफी समय तक हम सब ऐसे ही बैठे रहे थे। हम सबकी साॅसें हमारे हलक में अटकी हुई थी।
ना चाहते हुए भी मन में ऐसे भी ख़याल आ जाते जिनके तहत हमारे जिस्म का रोयाॅ रोयाॅ तक काॅप जाता था। आख़िर लम्बे इन्तज़ार के बाद ओटी के ऊपर लगा लाल बल्ब बुझा और फिर दरवाजा खुला। दरवाज़ा खुलते ही हम सब एक साथ ही खड़े होकर डाक्टर के पास तेज़ी से पहुॅचे।

"डाक्टर साहब।" सबसे पहले माॅ गौरी ने ही ब्याकुल भाव से पूछा___"मेरा बेटा और बेटी कैसी है अब? वो दोनो ठीक तो हैं न? जल्दी बताइये डाक्टर साहब। वो दोनो ठीक तो है न?"

गौरी माॅ की ब्याकुलता को देख कर डाक्टर तुरंत कुछ न बोला। ये देख कर हम सब पलक झपकते ही घबरा गए। एक साथ हम सब डाक्टर पर चढ़ दौड़े। करुणा चाची बुरी तरह रोने लगी थी। उन्हें इस तरह रोते देख दिव्या भी रोने लगी थी। हम सब को इस तरह ब्यथित देख डाक्टर के चेहरे के भाव बदले।

"आप सबको इस तरह।" डाक्टर ने कहा___"दुखी होने की ज़रूरत नहीं है। वो दोनो ही अब खतरे से बाहर हैं। हमने उनके शरीर से बुलेट निकाल दी है। फिलहाल वो खतरे से बाहर हैं किन्तु खून ज्यादा बह जाने से उनकी हालत अभी बेहतर नहीं है। ख़ैर अभी तो वो दोनो बेहोश हैं। इस लिए आप लोग उनसे बात नहीं कर सकते हैं।"

डाक्टर की बात सुन कर हम सबके निस्तेज पड़ चुके चेहरों पर जैसे नई ताज़गी सी आ गई। हम सब एक दूसरे की तरफ देख देख कर एक दूसरे से कहने लगे कि सब ठीक है। डाक्टर कुछ और भी बातें बता कर चला गया। उसके जाते ही हम सबने ईश्वर का लाख लाख धन्यवाद किया। गौरी माॅ को अचानक ही जाने क्या हुआ कि वो पलटी और गैलरी में एक तरफ को लगभग दौड़ते हुई गईं। हम सब उन्हें इस तरह जाते देख चौंके तथा साथ ही हम सब भी उनके पीछे की तरफ तेज़ी से बढ़ चले।

कुछ ही देर में हम सब जिस जगह उनका पीछा करते हुए पहुॅचे उस जगह का दृष्य देख कर हम सबकी ऑखें नम हो गईं। दरअसल वो गणेश जी का एक छोटा सा मंदिर था। जिसके सामने अपने दोनो हाॅथ जोड़े बैठी गौरी माॅ नज़र आईं हमें। हम सब भी उनके पास जाकर गणेश जी के सामने अपने अपने हाॅथ जोड़ कर खड़े हो गए। गणेश जी की मूर्ति के सामने खड़े हो कर हम सबने उनकी स्तुति की और उनकी इस कृपा के लिए हम सबने उन्हें सच्चे दिल से धन्यवाद दिया।

जैसा कि डाक्टर ने बताया था कि अभी रितू दीदी व अभय चाचा बेहोश हैं। अतः हम सब उनके होश में आने की प्रतीक्षा करने लगे थे। ख़ैर दिन ढल चुका था। मुझे पता था कि इस सबके चक्कर में किसी ने सुबह से कुछ खाया भी नहीं था। अतः मैंने आदित्य व पवन को साथ लिया और पास के ही एक होटेल से सबके लिए खाने पीने का प्रबंध किया। मेरे और आदित्य के ज़ोर देने पर आख़िर सबको थोड़ा बहुत खाना ही पड़ा। हलाॅकि इसके लिए कोई तैयार नहीं था क्योंकि आज हमारे परिवार के एक बड़े सदस्य की मौत हो चुकी थी तथा दूसरा अपने पिता के कत्ल के इल्ज़ाम में गिरफ्तार हो चुका था। निश्चय ही उसे या तो फाॅसी की सज़ा होगी या फिर ऊम्र कैद।

वो दोनो बुरे ही सही किन्तु उनसे खून का रिश्ता तो था ही। फार्महाउस पर कदाचित अभी भी अजय सिंह का मृत शरीर पड़ा होगा। हम सब तो रितू दीदी व अभय चाचू को लेकर हास्पिटल आ गए थे। उसके बाद वहाॅ पर अजय सिंह की लाश यूॅ ही लावारिश ही पड़ी रह गई होगी। या फिर ऐसा हुआ होगा कि कमिश्नर ने इस पर कोई कानूनी प्रक्रिया की होगी। जिसके तहत वो अजय सिंह की लाश का पंचनामा कर उसे पोस्टमार्डम के लिए ले गए होंगे। इस बारे में हमें कोई जानकारी अभी तक मिली नहीं थी, बल्कि ये महज हम सबका ख़याल ही था।
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उस वक्त रात के दस बज रहे थे जब हास्पिटल की एक नर्स ने आ कर हमें बताया कि रितू दीदी व अभय चाचू को होश आ गया है। हम सब नर्स की ये बात सुन कर बेहद खुश हुए और फिर फौरन ही हम सब उस कमरे में पहुॅचे जहाॅ पर रितू दीदी व अभय चाचू को शिफ्ट किया गया था। हम सबने उन दोनो को सही सलामत देखा तो जान में जान आई। करुणा चाची अभय के पास जा कर रोने लगी थी। ये देख कर माॅ ने उन्हें समझाया कि अब उसे रोना नहीं चाहिए बल्कि खुश होना चाहिए कि ईश्वर ने सब कुछ ठीक कर दिया है।

मैं रितू दीदी के पास ही बैठ गया था और एकटक उनके चेहरे की तरफ देख रहा था। वो खुद भी मुझे देखे जा रही थी। उनकी ऑखों में खुशी के ऑसू थे तथा होंठ कुछ कहने के लिए काॅपे जा रहे थे। ये देख कर मैने उन्हें इशारे से ही शान्त रहने को कहा और फिर झुक कर उनके माथे पर चूम लिया। मेरे ऐसा करते ही उनकी ऑखें बंद हो गईं। ऐसे जैसे कि मेरे ऐसा करने से उन्हें कितना सुकून मिला हो। नीलम, सोनम दीदी, आशा दीदी, निधी व दिव्या पास ही चारो तरफ से घेरे खड़ी थीं।

यहाॅ पर मुझे एक चीज़ बहुत अजीब लग रही थी और वो था बड़ी माॅ का बिहैवियर। वो हम सबसे अलग दूर खड़ी थीं। दूर से ही वो अपनी बेटी रितू को देख रही थी। उनकी ऑखों में ऑसू थे। उनसे कोई बात नहीं कर रहा था और ना ही वो किसी से बात करने की कोई कोशिश कर रही थीं। उन्होंने तो जैसे खुद को हम सबसे अलग समझ लिया था।

उस रात हम सब हास्पिटल में ही रहे। दूसरे दिन डाक्टर से मिले तो डाक्टर ने कुछ दिन बेड रेस्ट के लिए यहीं रहने का कहा। इस बीच कमिश्नर साहब भी हमसे मिलने आए और सबका हाल अहवाल लिया। रितू दीदी से वो बड़े प्यार से मिले तथा उन्हें ये भी कहा कि उन्हें उन पर नाज़ है। कमिश्नर साहब ने बताया कि अजय सिंह की डेड बाॅडी पोस्टमार्डम के बाद आज दोपहर तक मिल जाएगी। ताकि हम उनका अंतिम संस्कार कर सकें।

अभय चाचा के बार बार ज़ोर देने पर माॅ इस बात पर राज़ी हुई कि वो बाॅकी सबको लेकर गाॅव जाएॅ। अभय चाचा ने बड़ी माॅ से भी आग्रह किया कि वो सबके साथ गाॅव जाएॅ। मैने नैना बुआ आदि को पवन के साथ ही हवेली जाने का कह दिया। जबकि मैं और आदित्य रितू दीदी व अभय चाचा के पास ही रुकना चाहते थे।

आख़िर बहुत समझाने बुझाने के बाद सब जाने के लिए राज़ी हुए। हास्पिटल से बाहर आकर मैने सबको गाड़ियों में बैठा दिया। मैने केशव जी को फोन करके बुला लिया था। सारी घटना के बारे में जान कर पहले तो वो हैरान हुए उसके बाद खुश भी हुए। मैने उनके कुछ आदमियों को माॅ लोगों के साथ हल्दीपुर जाने के लिए उनसे कहा। केशव जी मेरी बात तुरंत मान गए और फिर उन्होंने सीघ्र ही अपने आदमियों बुला लिया।

करुणा चाची जाने को तैयार ही नहीं हो रही थी। मैने बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाया और कहा कि वो किसी बात की फिक्र न करें। ख़ैर उन सबके जाने के बाद मैने कमिश्नर साहब से शिवा के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्होंने शिवा से बात की थी कि वो चाहे तो कानून से छूट सकता है। किन्तु शिवा अपनी बात पर अडिग है। उसका कहना है कि वो इस जीवन से मुक्ति चाहता है। उसमें अब इतनी हिम्मत नहीं है कि वो वापस सबके बीच रह सके। सारी ज़िंदगी वो सबके सामने शर्म से गड़ा रहेगा और चैन से जी नहीं पाएगा। शिवा के न मानने पर ही कमिश्नर साहब ने केस फाइल किया। अपने बाप की चिता को आग देने के लिए उसे यहाॅ लाया जाएगा उसके बाद पुलिस उसे वापस जेल में बंद कर देगी। अदालत का फैसला क्या होगा इसका पता चलते ही उस पर कानूनी कार्यवाही होगी।

कमिश्नर साहब के जाने के बाद मैं और आदित्य वापस रितू दीदी व अभय चाचा के पास आ गए। अभय चाचा ने मुझसे कहा कि मैं इस सबके बारे में अपनी बड़ी बुआ यानी सौम्या बुआ को भी बता दूॅ और यहाॅ बुला लूॅ। फोन पर सारी बातें बताना उचित नहीं था। चाचा की बात सुन कर मैने बुआ को फोन लगाया। थोड़ी ही देर में दूसरी तरफ से बुआ की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी। मैने उन्हें अपना परिचय दिया और जल्द से जल्द हल्दीपुर आने को कहा। मेरे इस तरह बुलाने पर वो चिंतित होकर पूछने लगीं कि बात क्या है? उनके पूछने पर मैने बस यही कहा कि आप बस आ जाइये।

शाम होते होते कमिश्नर साहब की मौजूदगी में शिवा ने अपने बाप अजय सिंह की चिता को अग्नि दे दी। हल्दीपुर ही नहीं बल्कि आस पास के गाॅव में भी ये ख़बर जंगल की आग की तरह फैल गई थी कि ठाकुर गजेन्द्र सिंह बघेल का बड़ा बेटा अब इस दुनियाॅ में नहीं रहा। शमशान पर लोगों की भारी भीड़ जमा थी। आदित्य को रितू दीदी व अभय चाचू के पास छोड़ कर मैं भी गाॅव आ गया था।

सौम्या बुआ आ चुकी थी। यहाॅ आ कर जब उन्हें अपने भाई की मौत का पता चला तो वो दहाड़ें मार मार कर रोने लगी थी। किन्तु बड़ी माॅ ने उन्हें सम्हाल लिया था और कठोर भाव से ये भी कहा कि ऐसे इंसान के मरने का शोक मत करो जिसने अपने जीवन में किसी के साथ कोई अच्छा काम ही न किया हो। बड़ी माॅ की ऐसी बातें सुन कर सौम्या बुआ हतप्रभ रह गई थीं। उन्हें थोड़ी बहुत पता तो था किन्तु सारी असलियत से वो अंजान थीं।

सारी क्रिया संपन्न होते ही सब अपने अपने घर चले गए। इधर हवेली में हर तरफ एक भयावह सा सन्नाटा फैला हुआ था। हवेली के नौकर चाकर सब संजीदा थे। सौम्या बुआ के साथ उनके पति भी आए थे। मैने उनसे सब का ख़याल रखने का कहा और जीप लेकर वापस गुनगुन आ गया। ऐसे ही एक हप्ता गुज़र गया। मैं और आदित्य डाक्टर की परमीशन से रितू दीदी व अभय चाचा को हास्पिटल से घर ले आए। दोनो की हालत अभी नाज़ुक ही थी। इस लिए उनकी देख रेख के लिए सब मौजूद थे।

तेरवीं के दिन ब्राम्हणों को भोज कराया गया। सभी नात रिश्तेदार आए हुए थे। सबकी ज़ुबान पर बस एक ही बात थी कि ठाकुर खानदान में ये अचानक क्या हो गया है? हलाॅकि इतना तो सब समझते थे कि ठाकुर खानदान में कुछ सालों से ग्रहण सा लगा हुआ था। दबी ज़मान में तो लोग ये भी कहते थे कि अजय सिंह ने घर की खुशियों में खुद आग लगाई थी। ख़ैर, एक दिन कमिश्नर साहब का फोन आया उन्होंने बताया कि अदालत ने शिवा को ऊम्र कैद की सज़ा सुनाई है। ये जान कर हम सबको बहुत अजीब लगा था। शिवा ने अपनी मर्ज़ी से अपने इस अंजाम का चुनाव किया था, जबकि वो चाहता तो बड़े आराम से वो कत्ल के इल्ज़ाम से बरी हो जाता। बल्कि अगर ये कहा जाए तो ग़लत न होगा कि उस पर कत्ल जैसा कोई इल्ज़ान लगता ही नहीं। मेरे ज़हन में उससे अंतिम मुलाक़ात की वो सब बातें घूम रहीं थी। मैं समझ सकता था कि वह एकदम से जुनूनी हो चुका था। उसकी सोच ऐसी हो चुकी थी कि उसे कोई समझा नहीं सकता था।

अजय सिंह की मौत के बारे में मैने जगदीश ओबराय को पहले ही सब कुछ बता दिया था। वो ये जान कर आश्चर्यचकित थे कि अभय चाचा ने इतना बड़ा धोखा किया था हमारे साथ। तेरवीं के दिन जगदीश ओबराय हमारे गाॅव आए थे। एक दो दिन रुक कर वो वापस मुम्बई चले गए थे। साथ ही हम सबको समझाया बुझाया भी था कि अब हम सब एक नये सिरे से जीवन पथ पर आगे बढ़ें। जाते समय वो थोड़ा मायूस लगे मुझे तो मैने और माॅ ने उनसे पूॅछ ही लिया कि क्या बात है? हमारे पूछने पर उन्होंने बस इतना ही कहा कि वो अकेले मुम्बई में रह नहीं पाएॅगे। उनकी बातों को हम बखूबी समझते थे। इस लिए उन्हें तसल्ली दी कि वो फिक्र न करें। माॅ ने कहा कि राज और गुड़िया की तो पढ़ाई ही चल रही है अभी। इस लिए वो बहुत जल्द मुम्बई आ जाएॅगे।

जैसा कि आप सबको पता है कि हवेली में तीनों भाइयों का बराबर हिस्सा था तथा हवेली बनाई भी इस तरह गई थी कि सबको बराबर बराबर मिल सके। अतः हवेली में आते ही हम सब अपने अपने हिस्सों में रहने लगे थे। किन्तु इसमें नई बात ये थी कि हम सबका खाना पीना एक ही रसोई में बनने लगा था। रितू दीदी व अभय चाचा की सेहत में काफी सुधार हो गया था। रितू दीदी हमारे हिस्से पर ही एक कमरे में रह रही थीं। बड़ी माॅ(प्रतिमा) अपने हिस्से पर अकेली रहती थी। वो किसी से कोई बात नहीं करती थी और ना ही किसी के सामने आती थी। सारा दिन और रात वो अपने कमरे में ही रहती। रितू दीदी व नीलम उनसे कोई बात नहीं करती थीं। हलाॅकि ऐसा नहीं होना चाहिए था मगर कदाचित दिलो दिमाग़ से वो सब बातें अभी निकली नहीं थी। इस लिए उनसे कोई बात करना ज़रूरी नहीं समझता था। हलाॅकि मैं आदित्य व पवन उनसे बात करते थे और उनके लिए दोनो टाइम का खाना व चाय नास्ता मैं ही लेकर उनके पास जाता था और तब तक उनके पास रहता जब तक कि वो खा नहीं लेती थी।

ऐसे ही समय गुज़र रहा था। धीरे धीरे सब नार्मल हो रहे थे। किन्तु एक चीज़ ऐसी थी जिसने मुझे दुखी किया हुआ था और वो था गुड़िया(निधी) का मेरे प्रति बर्ताव। इतना कुछ होने के बाद और इतने दिन गुज़र जाने के बाद मैने ये देखा था कि उसने मुझसे कोई बात नहीं की थी और ना ही मेरे सामने आने की कोई ख़ता की थी। मैं समझ नहीं पा रहा था कि अपने दिल की इस धड़कन को कैसे मनाऊॅ? मेरे मन में कई बार ये विचार आया कि मैं उसके पास जाऊॅ और उससे बातें करूॅ। उससे पूछूॅ कि ऐसा क्या हो गया है कि उसने मुझसे बात करने की तो बात दूर बल्कि मेरे सामने आना भी बंद कर रखा है? मगर मैं चाह कर भी ऐसा कर नहीं पा रहा था क्योंकि गुड़िया के पास हर समय आशा दीदी बनी रहती थी। अपनी इस बेबसी को मैं किसी के सामने ज़ाहिर भी नहीं कर सकता था।
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ऐसे ही कुछ दिन और गुज़र गए। नीलम तो अब लगभग पूरी तरह ठीक ही हो गई थी। उसकी पीठ का ज़ख्म भी अब ठीक हो चला था। मैं नीलम को अक्सर छेंड़ता रहता था, जिसके जवाब में वो बस मुस्कुरा कर रह जाती थी। मैं उसकी इस प्रतिक्रया से हैरान भी होता और मायूस भी। हैरान इस लिए क्योंकि वो मेरे छेंड़ने पर जवाब में खुद भी मुझे छेंड़ने का कोई उपक्रम नहीं करती थी बल्कि सिर्फ मुस्कुरा कर रह जाती थी। जबकि मायूस इस लिए क्योंकि मैं उससे यही उम्मींद करता था कि वो भी मुझें छेंड़े अथवा मुझसे लड़े झगड़े। मगर जब वो ऐसा न करती तो मैं बस मायूस ही हो जाता था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि नीलम ऐसा क्यों कर रही थी। मैं महसूस कर रहा था कि नीलम कुछ दिनों से बड़ी अजीब अजीब सी बातें करती थी। उसकी बातों में सबसे ज्यादा इसी बात पर ज़ोर होता था कि मैं रितू दीदी का हमेशा ख़याल रखूॅ और उन्हें कभी दुखी न होने दूॅ।

एक दिन सुबह के लगभग आठ बजे सोनम दीदी व नीलम अपने अपने हाॅथों में छोटा सा बैग लिए तथा तैयार होकर हम सबके बीच आईं और माॅ(गौरी) से कहा कि वो मुम्बई जा रही हैं। कारण ये था कि उनके काॅलेज की पढ़ाई का नुकसान हो रहा था। बात पढ़ाई की थी इस लिए किसी ने उन दोनो को जाने से मना नहीं किया। जाते वक्त नीलम मेरे गले लग मुझसे मिली और एक पुनः उसने रितू दीदी का तथा सबका ख़याल रखने का कहा और फिर मेरी तरफ अजीब भाव से देखने के बाद वह पलट कर सोनम दीदी के साथ हवेली से बाहर निकल गई।

नीलम के जाने से मुझे ऐसा लगा जैसे मेरा कुछ छूटा जा रहा है। नीलम की ऑखों में ऑसू के क़तरे थे। जिन्हें उसने बड़ी सफाई से पोंछ लिया था। दूसरे दिन रुक्मिणी चाची ने हम सबसे अपने घर जाने को कहा। माॅ ने उनसे कहा भी मगर वो नहीं मानी। अतः उन्हें उनके सामान के साथ उनके घर भेज दिया गया। माॅ ने उनसे कहा था कि उनका जब भी दिल करे वो यहाॅ आती रहें।

हम सब अब फिर से एक साथ हो गए थे। इस बात से गाॅव के लोग भी काफी खुश थे। दिन भर किसी न किसी का आना जाना लगा ही रहता था हवेली पर। अभय चाचा व मैं उन सबसे मिलते और दुनियाॅ जहान की बातें होतीं। बड़ी माॅ का रवैया वही था यानी वो अपने कमरे से बाहर नहीं निकलती थीं। पवन लोगों के जाने के बाद मुझे लगा कि अब गुड़िया से बात करने का मौका मिलेगा मगर मेरी उम्मीदों पर पानी फिर गया। क्योंकि आशा दीदी के जाने के बाद गुड़िया का सारा समय उनके घर पर ही गुज़रता था और रात में भी वो उनके घर पर ही सो जाती थी। हवेली में अगर वो आती भी तो दिव्या व रितू दीदी के पास ही रहती। कहने का मतलब ये कि वो खुद को अकेली रखती ही नहीं थी। कदाचित उसे अंदेशा था कि मैं उससे मिलने की तथा उससे बात करने की कोशिश करूॅगा। गुड़िया के इस रवैये से मेरा दिल बहुत दुखी होने लगा था। एक नये संसार का ये रूप देख कर मैं ज़रा भी खुश नहीं था।

मेरा ज्यादातर समय या तो रितू दीदी के पास रहने से या फिर आदित्य के साथ ही गुज़र रहा था। एक दिन अभय चाचा ने कहा कि जब तक उनका स्वास्थ सही नहीं हो जाता मैं खेतों की तरफ का हाल चाल देख लिया करूॅ। चाचा की इस बात से मैं और आदित्य खेतों पर गए और वहाॅ पर सब मजदूरों से मिला। खेतों पर काम कर रहे सभी मजदूर मुझे वहाॅ पर इस तरह देख कर बेहद खुश हो गए थे। सबकी ऑखों में खुशी के ऑसू थे। सब एक ही बात कह रहे थे कि हम अपने जिन मालिक को(मेरे पिता जी) देवता की तरह मानते थे उनके जाने के बाद हम सब बेहद दुखी थे। अजय सिंह ने तो हमेशा हम पर ज़ुल्म ही किया था। किन्तु अब वो फिर से खुश हो गए थे। अपने असल मालिक की औलाद को देख कर वो खुश थे और चाहते थे कि अब वैसा कोई बुरा समय न आए।

एक दिन सुबह जब मैं बड़ी माॅ के लिए चाय नास्ता देने उनके कमरे में गया तो कमरे में बड़ी माॅ कहीं भी नज़र न आईं। उनकी तरफ का सारा हिस्सा छान मारा मैने मगर बड़ी माॅ का कहीं पर भी कोई नामो निशान न मिला। इस बात से मैं भचक्का रह गया। मुझे अच्छी तरह याद था कि जब मैं रात में उनके पास उन्हें खाना खिलाने आया था तब वो अपने कमरे में ही थीं। मैने अपने हाॅथ से उन्हें खाना खिलाया था। हर रोज़ की तरह ही मेरे द्वारा खाना खिलाते समय उनकी ऑखें छलक पड़तीं थी। मैं उन्हें समझाता और कहता कि जो कुछ हुआ उसे भूल जाइये। मेरे दिल में उनके लिए कोई भी बुरा विचार नहीं है।

मैं कमरे को बड़े ध्यान से देख रहा था, इस उम्मीद में कि शायद कोई ऐसा सुराग़ मिल जाए जिससे मुझे पता सके कि बड़ी माॅ कहाॅ गई हो सकती हैं। मगर लाख सिर खपाने के बाद भी मुझे कुछ न मिला। थक हार कर मैं कमरे से ही क्यों बल्कि उनके हिस्से से ही बाहर आ गया। अपनी तरफ डायनिंग हाल में आकर मैने अभय चाचा से बड़ी माॅ के बारे में सब कुछ बताया। मेरी बात सुन कर अभय चाचा और बाॅकी सब भी हैरान रह गए। इस सबसे हम सब ये तो समझ ही गए थे कि बड़ी माॅ शायद हवेली छोंड़ कर कहीं चली गई हैं। उनके जाने की वजह का भी हमें पता था। इस लिए हमने फैसला किया कि बड़ी माॅ की खोज की जाए।

नास्ता पानी करने के बाद मैं आदित्य अभय चाचा बड़ी माॅ की खोज में हवेली से निकल पड़े। अपने साथ कुछ आदमियों को लेकर हम निकले। अभय चाचा अलग गाड़ी में कुछ आदमियों के साथ अलग दिशा में चले जबकि मैं और आदित्य दूसरी गाड़ी में कुछ आदमियों के साथ दूसरी दिशा में। हमने आस पास के सभी गाॅवों में तथा शहर गुनगुन में भी सारा दिन बड़ी माॅ की तलाश में भटकते रहे मगर कहीं भी बड़ी माॅ का पता न चला। रात हो चली थी अतः हम लोग वापस हवेली आ गए। हवेली आ कर हमने सबको बताया कि बड़ी माॅ का कहीं भी पता नहीं चल सका। इस बात से सब बेहद चिंतित व परेशान हो गए।

नीलम तो मुम्बई जा चुकी थी, उसे इस बात का पता ही नहीं था। रितू दीदी को मैने बताया तो उन्होंने कोई जवाब न दिया। उनके चेहरे पर कोई भाव न आया था। बस एकटक शून्य में घूरती रह गई थी। उस रात हम सब ना तो ठीक से खा पी सके और ना ही सो सके। दूसरे दिन फिर से बड़ी माॅ की तलाश शुरू हुई मगर कोई फायदा न हुआ। हमने इस बारे में पुलिश कमिश्नर से भी बात की और उनसे कहा कि बड़ी माॅ की तलाश करें।

चौथे दिन सुबह हम सब नास्ता करने बैठे हुए थे। नास्ते के बाद एक ही काम था और वो था बड़ी माॅ की तलाश करना। नास्ता करते समय ही बाहर मुख्य द्वार को किसी ने बाहर से खटखटाया। दिव्या ने जाकर दरवाज़ा खोला तो बाहर एक आदमी खड़ा था। उसकी पोशाक से ही लग रहा था कि वो पोस्टमैन है। दरवाजा खुलते ही उसने दिव्या के हाॅथ में एक लिफाफा दिया और फिर चला गया।

दिव्या उससे लिफाफा लेकर दरवाज़ा बंद किया और वापस डायनिंग हाल में आ गई। हम लोगों के पास आते ही दिव्य ने वो लिफाफा अभय चाचा को पकड़ा दिया। अभय चाचा ने लिफाफे को उलट कर देखा तो उसमें मेरा नाम लिखा हुआ था। ये देख कर अभय चाचा ने लिफाफा मेरी तरफ सरका दिया।

"ये तुम्हारे नाम पर आया है राज।" अभय चाचा ने मेरी तरफ देखते हुए कहा___"देखो तो क्या है इसमें?"
"जी अभी देखता हूॅ चाचा जी।" मैने कहने के साथ ही टेबल से लिफाफा उठा लिया और फिर उसे एक तरफ से काट कर खोलने लगा। लिफाफे में एक तरफ मेरा नाम व पता लिखा हुआ था तथा दूसरी तरफ भेजने वाले के नाम में "नारायण रस्तोगी" तथा उसका पता लिखा हुआ था।

लिफाफे के अंदर तह किया हुआ कोई काग़ज था। मैने उसे निकाला और फिर उस तह किये हुए काग़ज को खोल कर देखा। काग़ज में पूरे पेज पर किसी की हैण्डराइटिंग से लिखा हुआ कोई मजमून था। मजमून का पहला वाक्य पढ़ कर ही मैं चौंका। मैने लिफाफे को उलट कर भेजने वाले का नाम पुनः पढ़ा। मुझे समझ न आया कि ये नारायण रस्तोगी कौन है और इसने मेरे नाम ऐसा कोई ख़त क्यों लिखा है? जबकि मेरी समझ में इस नाम के किसी भी ब्यक्ति से मेरा दूर दूर तक कोई वास्ता ही नहीं था। मुझे हैरान व चौंकते हुए देख अभय चाचा ने पूछ ही लिया कि क्या बात है? मैने उन्हें बताया लिफाफा भेजने वाले को तो मैं जानता ही नहीं हूॅ फिर इसने मेरे नाम पर ये लिफाफा क्यों भेजा हो सकता हैं? अभय चाचा ने पूछा कि ख़त में क्या लिखा है उसने? उनके पूछने पर मैंने ख़त में लिखे मजमून को सबको सुनाते हुए पढ़ने लगा। खत में लिखा मजमून कुछ इस प्रकार था।

मेरे सबसे अच्छे बेटे राज!
सबसे पहले तो यही कहूॅगी कि तू वाकई में एक देवता जैसे इंसान का नेकदिल बेटा है और मुझे इस बात की खुशी भी है कि तू अच्छे संस्कारों वाला एक सच्चा इंसान है। ईश्वर करे तू इसी तरह नेकदिल बना रहे और सबके लिए प्यार व सम्मान रखे। जिस वक्त तुम मेरे द्वारा लिखे ख़त के इस मजमून को पढ़ रहे होगे उस वक्त मैं इस हवेली से बहुत दूर जा चुकी होऊॅगी। मुझे खोजने की कोशिश मत करना बेटे क्योंकि अब मेरे अंदर इतनी हिम्मत व साहस नहीं रहा कि मैं तुम सबके बीच सामान्य भाव से रह सकूॅ। जीवन में जिसके लिए सबके साथ बुरा किया उसने खुद कभी मेरी कद्र नहीं की। मेरी बेटियाॅ मुझे देखना भी गवाॅरा नहीं करती हैं, और करे भी क्यों? ख़ैर, मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है बेटे। दिल से बस यही दुवा व कामना है कि वो जीवन में सदा सुखी रहें।
मेरा जीवन पापों से भरा पड़ा है। मैने ऐसे ऐसे कर्म किये हैं जिनके बारे में सोच कर ही अब खुद से घृणा होती है। मुझमें अब इतनी हिम्मत नहीं है कि मैं किसी को अपना मुह भी दिखा सकूॅ। आत्मग्लानी, शर्म व अपमान का बोझ इतना ज्यादा है कि इसके साथ अब एक पल भी जीना मुश्किल लग रहा है। बार बार ज़हन में ये विचार आता है कि खुदखुशी कर लूॅ और इस पापी जीवन को खत्म कर दूॅ मगर मैं ऐसा भी नहीं करना चाहती। क्योंकि जीवन को खत्म करने से ईश्वर मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। मुझे इस सबका प्रयाश्चित करना होगा बेटे, बग़ैर प्रयाश्चित के भगवान भी मुझे अपने पास फटकने नहीं देगा। इस लिए बहुत सोच समझ कर मैने ये फैसला किया है कि मैं तुम सबसे कहीं दूर चली जाऊॅ और अपने पापों का प्रयाश्चित करूॅ। तुम सबके बीच रह कर मैं ठीक से प्रयाश्चित नहीं कर सकती थी।
ज़मीन जायदाद के सारे काग़जात मैने अपनी आलमारी में रख दिये हैं बेटा। वकील को मैने सब कुछ बता भी दिया है और समझा भी दिया है। अब इस सारी ज़मीन जायदाद के सिर्फ दो ही हिस्से होंगे। पहला तुम्हारा और दूसरा अभय का। मैने अपने हिस्से का सबकुछ तुम्हारे नाम कर दिया है। कुछ हिस्सा अभय के बेटे के नाम भी कर दिया है। इसे लेने से इंकार मत करना बेटे, बस ये समझ लेना कि एक माॅ ने अपने बेटे को दिया है। मुझे पता है कि तुम्हारे अंदर मेरे प्रति वैसा ही आदर सम्मान है जैसा कि तुम्हारा अपनी माॅ के प्रति है। ख़ैर, इसी आलमारी में वो कागजात भी हैं जो तुम्हारे दादा दादी से संबंधित हैं। उन्हें तुम देख लेना और अपने दादा दादी के बारे में जान लेना।
अंत में बस यही कहूॅगी बेटे कि सबका ख़याल रखना। अब तुम ही इस खानदान के असली कर्ताधर्ता हो। मुझे यकीन है कि तुम अपनी सूझ बूझ व समझदारी से परिवार के हर सदस्य को एक साथ रखोगे और उन्हें सदा खुश रखोगे। अपनी माॅ का विशेष ख़याल रखना बेटे, उस अभागिन ने बहुत दुख सहे हैं। हमारे द्वारा इतना कुछ करने के बाद भी उस देवी ने कभी अपने मन में हमारे प्रति बुरा नहीं सोचा। मैं किसी से अपने किये की माफ़ी नहीं माग सकती क्योंकि मुझे खुद पता है कि मेरा अपराध क्षमा के योग्य नहीं है।
मेरी बेटियों से कहना कि उनकी माॅ ने कभी भी दिल से नहीं चाहा कि उनके साथ कभी ग़लत हो। मैं जहाॅ भी रहूॅगी मेरे दिल में उनके लिए बेपनाह प्यार व दुवाएॅ ही रहेंगी। मुझे तलाश करने की कोशिश मत करना। अब उस घर में मेरे वापस आने की कोई वजह नहीं है और मैं उस जगह अब आना भी नहीं चाहती। मैंने अपना रास्ता तथा अपना मुकाम चुन लिया है बेटे। इस लिए मुझे मेरे हाल पर छोंड़ दो। यही मेरी तुमसे विनती है। ईश्वर तुम्हें सदा सुखी रखे तथा हर दिन हर पल नई खुशी व नई कामयाबी अता करे।
अच्छा अब अलविदा बेटे।
तुम्हारी बड़ी माॅ!
प्रतिमा।

ख़त के इस मजमून को पढ़ कर हम सबकी साॅसें मानों थम सी गई थी। ख़त पढ़ते समय ही पता चला कि ये ख़त तो दरअसल बड़ी माॅ का ही था। जिसे उन्होंने फर्ज़ी नाम व पते से भेजा था मुझे। काफी देर तक हम सब किसी गहन सोच में डूबे बैठे रहे।

"बड़ी भाभी के इस ख़त से।" सहसा अभय चाचा ने इस गहन सन्नाटे को चीरते हुए कहा____"ये बात ज़ाहिर होती है कि अब हम चाह कर भी उन्हें तलाश नहीं कर सकते। क्योंकि ये तो उन्हें भी पता ही होगा कि हम उन्हें खोजने की कोशिश करेंगे। इस लिए अब उनकी पूरी कोशिश यही रहेगी कि हम उन्हें किसी भी सूरत में खोज न पाएॅ। कहने का मतलब ये कि संभव है कि उन्होंने खुद को किसी ऐसी जगह छुपा लिया हो जिस जगह पर हम में से कोई पहुॅच ही न पाए।"

"सच कहा आपने।" मैने कहा___"ख़त में लिखी उनकी बातें यही दर्शाती हैं। किन्तु सवाल ये है कि अगर उन्होंने ख़त के माध्यम से ऐसा कहा है तो क्या हमें सच में उन्हें नहीं खोजना चाहिए?"

"हर्गिज़ नहीं।" अभय चाचा ने कहा___"कम से कम हम में से कोई भी ऐसा नहीं चाह सकता कि बड़ी भाभी हमसे दूर कहीं अज्ञात जगह पर रहें। बल्कि हम सब यही चाहते हैं कि सब कुछ भुला कर हम सब एक साथ नये सिरे से जीवन की शुरुआत करें। हवेली को छोंड़ कर चले जाना ये उनकी मानसिकता की बात थी। उन्हें लगता है कि उन्होंने हम सबके साथ बहुत बुरा किया है इस लिए अब उनका हमारे साथ रहने का कोई हक़ नहीं है। सच तो ये है कि हवेली छोंड़ कर चले जाने की वजह उनका अपराध बोझ है। इसी अपराध बोझ के चलते उनके मन में ऐसा करने का विचार आया है।"

"बात चाहे जो भी हो।" सहसा इस बीच माॅ ने गंभीर भाव से कहा___"उनका इस तरह हवेली से चले जाना बिलकुल भी अच्छी बात नहीं है। उन्हें तलाश करो और सम्मान पूर्वक उन्हें वापस यहाॅ लाओ। हम सब उन्हें वैसा ही आदर सम्मान देंगे जैसा उन्हें मिलना चाहिए। उन्हें वापस यहाॅ पर लाना ज़रूरी है वरना कल को यही गाॅव वाले हमारे बारे में तरह तरह की बातें बनाना शुरू कर देंगे। वो कहेंगे कि अपना हक़ मिलते ही हमने उन्हें हवेली से वैसे ही बेदखल कर दिया जैसे कभी उन्होंने हमें किया था। आख़िर उनमें और हम में फर्क़ ही क्या रह गया? इस लिए सारे काम को दरकिनार करके सिर्फ उन्हें खोज कर यहाॅ वापस लाने का का ही काम करो।"

"आप फिक्र मत कीजिए भाभी।" अभय चाचा ने कहा___"हम एड़ी से चोंटी तक का ज़ोर लगा देंगे बड़ी भाभी की तलाश करने में। हम उन्हें ज़रूर वापस लाएॅगे और उनका आदर सम्मान भी करेंगे।"

"ठीक है फिर।" माॅ ने कहने के साथ ही मेरी तरफ देखा___"बेटा तू तब तक यहीं रहेगा जब तक कि तुम्हारी बड़ी माॅ वापस इस हवेली पर नहीं आ जातीं। मैं जानती हूॅ कि तुम दोनो की पढ़ाई का नुकसान होगा किन्तु इसके बावजूद तुझे अभय के साथ मिल कर अपनी बड़ी माॅ की तलाश करना है।"

"ठीक है माॅ।" मैने कहा___"जैसा आप कहेंगी वैसा ही होगा। मैं जगदीश अंकल को फोन करके बता दूॅगा कि मैं और गुड़िया अभी वहाॅ नहीं आ सकते।"
"पर मुझे अपनी पढ़ाई का नुकसान नहीं करना है माॅ।" सहसा तभी गुड़िया(निधी) कह उठी___"बड़ी माॅ को तलाश करने का काम मुझे तो करना नहीं है। अतः मेरा यहाॅ रुकने का कोई मतलब नहीं है। पवन भइया को भी कंपनी में काम करने के लिए जाना ही है मुम्बई। मैने आशा दीदी से बात की है वो मेरे साथ मुम्बई जाने को तैयार हैं। इस लिए मैं कल ही यहाॅ से जा रही हूॅ।"

गुड़िया की इस बात से हम सब एकदम से उसकी तरफ हैरानी से देखने लगे थे। किसी और का तो मुझे नहीं पता किन्तु उसकी इस बात से मैं ज़रूर स्तब्ध रह गया था और फिर एकाएक ही मेरे दिल में बड़ा तेज़ दर्द हुआ। अंदर एक हूक सी उठी जिसने पलक झपकते ही मेरी ऑखों में ऑसुओं को तैरा दिया। मैं खुद को और अपने अंदर अचानक ही उत्पन्न हो चुके भीषण जज़्बातों को बड़ी मुश्किल से सम्हाला। अपने ऑसुओं को ऑखों में ही जज़्ब कर लिया मैने।

"ये तू क्या कह रही है गुड़िया?" तभी माॅ की कठोर आवाज़ गूॅजी___"तूने मुझे बताए बिना ही ये फैंसला ले लिया कि तुझे मुम्बई जाना है। मुझे तुझसे ऐसी उम्मीद नहीं थी।"

"मैं आपको इस बारे में बताने ही वाली थी माॅ।" निधी ने नज़रें चुराते हुए किन्तु मासूम भाव से कहा___"और वैसे भी इसमे इतना सोचने की क्या बात है? बड़ी माॅ की खोज करने मुझे तो जाना नहीं है, बल्कि ये काम तो चाचा जी लोगों का ही है। दूसरी बात अब मेरे यहाॅ रहने का फायदा भी क्या है, बल्कि नुकसान ही है। आज एक महीना होने को है स्कूल से छुट्टी लिए हुए। इस लिए अब मैं नहीं चाहती कि मेरी पढ़ाई का और भी ज्यादा नुकसान हो।"

"बात तो तुम्हारी सही है गुड़िया।" अभय चाचा ने कहने के साथ ही माॅ(गौरी) की तरफ देखा___"भाभी अब जो होना था वो तो हो ही चुका है। आज महीना होने को आया उस सबको गुज़रे हुए। धीरे धीरे आगे भी सब कुछ ठीक ही हो जाएगा। रही बात बड़ी भाभी को खोजने की तो वो मैं राज और आदित्य करेंगे ही। गुड़िया के यहाॅ रुकने से उसकी पढ़ाई का नुकसान ही है। इस लिए ये अगर जा रही है तो इसे आप जाने दीजिए। आप तो जानती ही हैं कि मुम्बई में भी जगदीश भाई साहब अकेले ही हैं। वो आप लोगों के न रहने से वहाॅ पर बिलकुल भी अच्छा महसूस नहीं कर रहे होंगे। इस लिए गुड़िया पवन और आशा जब उनके पास पहुॅच जाएॅगे तो उनका भी मन लगेगा वहाॅ।"

अभय चाचा की इस बात से माॅ ने तुरंत कुछ नहीं कहा। किन्तु वो अजीब भाव से निधी को देखती ज़रूर रहीं। ऐसी ही कुछ और बातों के बाद यही फैंसला हुआ कि निधी कल पवन व आशा के साथ मुम्बई चली जाएगी। इस बीच सवाल ये भी उठा कि पवन व आशा के चले जाने से रुक्मिणी यहाॅ पर अकेली कैसे रहेंगी? इस सवाल का हल ये निकाला गया कि पवन और आशा के जाने के बाद रुक्मिणी यहाॅ हवेली में हमारे साथ ही रहेंगी।

नास्ता पानी करने के बाद मैं, आदित्य व अभय चाचा बड़ी माॅ की तलाश में हवेली से निकल पड़े। अभय चाचा का स्वास्थ पहले से बेहतर था। हलाॅकि मैंने उन्हें अभी चलना फिरने से मना किया था किन्तु वो नहीं मान रहे थे। इस लिए हमने भी ज्यादा फिर कुछ नहीं कहा। दूसरे दिन निधी पवन व आशा के साथ मुम्बई के लिए निकल गई। गुनगुन रेलवे स्टेशन उनको छोंड़ने के लिए मैं और आदित्य गए थे। इस बीच मेरा दिलो दिमाग़ बेहद दुखी व उदास था। गुड़िया के बर्ताव ने मुझे इतनी पीड़ा पहुॅचाई थी कि इतनी पीड़ा अब तक किसी भी चीज़ से न हुई थी मुझे। मगर बिना कोई शिकवा किये मैं ख़ामोशी से ये सब सह रहा था। मैं इस बात से चकित था कि मेरी सबसे प्यारी बहन जो मेरी जान थी उसने दो महीने से मेरी तरफ देखा तक नहीं था बात करने की तो बात ही दूर थी।

ट्रेन में तीनो को बेठा कर मैं और आदित्य वापस हल्दीपुर लौट आए। मेरा मन बेहद दुखी था। आदित्य ने मुझसे पूछा भी कि क्या बात है मगर मैने उसे ज्यादा कुछ नहीं बताया बस यही कहा कि बड़ी माॅ और गुड़िया के जाने की वजह से कुछ अच्छा नहीं लग रहा है। एक हप्ते पहले आदित्य बड़ा खुश था जब रितू दीदी ने उसकी कलाई पर राखी बाॅधी थी। उसके दोनो हाॅथों में ढेर सारी राखियाॅ बाॅधी थी दीदी ने। जिसे देख कर आदित्य खुद को रोने से रोंक नहीं पाया था। उसके इस तरह रोने पर माॅ आदि सब लोग पहले तो चौंके फिर जब रितू दीदी ने सबको आदित्य की बहन प्रतीक्षा की कहानी बताई तो सब दुखी हो गए थे। सबने आदित्य को इस बात के लिए सांत्वना दी। माॅ ने तो ये तक कह दिया कि आज से वो मेरा बड़ा बेटा है और इस घर का सदस्य है। आदित्य ये सुन कर खुशी से रो पड़ा था। मेरी सभी बहनों ने राखी बाॅधी थी। गुड़िया ने भी मुझे राखी बाॅधा था किन्तु उसका बर्ताव वही था। उसके इस रूखे बर्ताव से सब चकित भी थे। माॅ ने तो पूछ भी लिया था कि ये सब क्या है मगर उसने बड़ी सफाई से बात को टाल दिया था।

हवेली आ कर मैं अपने कमरे में चला गया था। जबकि आदित्य अभय चाचा के पास ही बैठ गया था। सारा दिन मेरा मन दुखी व उदास रहा। जब किसी तरह भी सुकून न मिला तो उठ कर रितू दीदी के पास चला गया। मुझे अपने पास आया देख कर रितू दीदी मुस्कुरा उठीं। उनको भी पता चल गया था गुड़िया वापस मुम्बई चली गई है। मेरे चेहरे के भाव देख कर ही वो समझ गईं कि मैं गड़िया के जाने की वजह से उदास हूॅ।

मुझे यूॅ मायूस व उदास देख कर उन्होंने मुस्कुरा कर अपनी बाहें फैला दी। मैं उनकी फैली हुई बाहों के दरमियां हल्के से अपना सिर रख दिया। मेरे सिर रखते ही उन्होंने बड़े स्नेह भाव से मेरे सिर पर हाॅथ फेरना शुरू कर दिया। अभी मैं रितू दीदी की बाहों के बीच छुपका ही था कि तभी नैना बुआ भी आ गईं और बेड पर मेरे पास ही बैठ गईं।

"क्या बात है मेरा बेटा उदास है?" नैना बुआ ने मेरे सिर के बालों पर उॅगलियाॅ फेरते हुए कहा____"पर यूॅ उदास रहने से क्या होगा राज? अगर कोई बात है तो उसे आपस में सलझा लेना होता है।"

"सुलझाने के लिए मौका भी तो देना चाहिए न बुआ।" मैंने दीदी की बाहों से उठते हुए कहा___"खुद ही किसी बात का फैंसला ले लेना कहाॅ की समझदारी है? उसे ज़रा भी एहसास नहीं है उसके इस रवैये से मुझ पर आज दो महीने से क्या गुज़र रही है।"

"ये हाल तो उसका भी होगा राज।" रितू दीदी ने कहा___"वो तेरी लाडली है। ज़िद्दी भी है, इस लिए वो चाहती होगी कि पहल तू करे।"
"किस बात की पहल दीदी?" मैने अजीब भाव से उनकी तरफ देखा।
"मुझे लगता है कि ये बात तू खुद समझता है।" रितू दीदी ने एकटक मेरी तरफ देखते हुए कहा___"इस लिए पूछने का तो कोई मतलब ही नहीं है।"

मैं उनकी इस बात से उनकी तरफ ख़ामोशी से देखता रहा। नैना बुआ को समझ न आया कि किस बारे में रितू दीदी ने ऐसा कहा था। इधर मैं खुद भी हैरान था कि आख़िर रितू दीदी के ये कहने का क्या मतलब था? मैने रितू दीदी की तरफ देखा तो उनके होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई थी। फिर जाने क्या सोच कर उनके मुख से निकलता चला गया।

कौन समझाए हमें के आख़िर ये बला क्या है।
दर्द में भी मुस्कुराऊॅ मैं, तो फिर सज़ा क्या है।।

हम जिस बात को लबों से कह नहीं सकते,
कोई उस बात को न समझे, इससे बुरा क्या है।।

रात दिन कुछ भी अच्छा नहीं लगता हमको,
इलाही ख़ैर हो, खुदा जाने ये माज़रा क्या है।।

समंदर में डूब कर भी हमारी तिश्नगी न जाए,
इस दुनियाॅ में इससे बढ़ कर बद्दुवा क्या है।।

अपनी तो बस एक ही आरज़ू है के किसी रोज़,
वो खुद आ कर कहे के बता तेरी रज़ा क्या है।।

रितू दीदी के मुख से निकली इस अजीबो ग़रीब सी ग़ज़ल को सुन कर मैं और नैना बुआ हैरान रह गए। दिलो दिमाग़ में इक हलचल सी तो हुई किन्तु समझ में न आया कि रितू दीदी ने इस ग़ज़ल के माध्यम से क्या कहना चाहा था?

रात में खाना पीना करके हम सब सो गए। दूसरे दिन नास्ता पानी करने के बाद मैं और आदित्य अभय चाचा के साथ फिर से बड़ी माॅ की खोज में निकल गए। ऐसे ही हर दिन होता रहा। किन्तु कहीं भी बड़ी माॅ के बारे में कोई पता न चल सका। हम सब इस बात से बेहद चिंतित व परेशान थे और सबसे ज्यादा हैरान भी थे कि बड़ी माॅ ने आख़िर ऐसी कौन सी जगह पर खुद को छुपा लिया था जहाॅ पर हम पहुॅच नहीं पा रहे थे। उनकी तलाश में ऐसे ही एक महीना गुज़र गया। इस बीच हमने सभी नात रिश्तेदारों को भी बता दिया था उनके बारे में। बड़ी माॅ के पिता जी यानी जगमोहन सिंह भी अपनी बेटी के बारे में सब कुछ जान कर बेहद दुखी हुए थे। किन्तु होनी तो हो चुकी थी। वो खुद भी अपनी बेटी के लापता हो जाने पर दुखी थे।

एक दिन अभय चाचा के कहने पर मैने रितू दीदी की मौजूदगी में बड़ी माॅ के कमरे में रखी आलमारी को खोला और उसमें से सारे काग़जात निकाले। उन काग़जातों में ज़मीन और जायदाद के दो हिस्से थे। तीसरा हिस्सा यानी कि अजय सिंह के हिस्से की ज़मीन व जायदाद तथा दौलत में से लगभग पछत्तर पर्शैन्ट हिस्सा मेरे नाम कर दिया गया था जबकि बाॅकी का पच्चीस पर्शेन्ट अभय चाचा के बेटे शगुन के नाम पर था। उसी आलमारी में कुछ और भी काग़जात थे जो दादा दादी के बारे में थे। उनमें ये जानकारी थी कि दादा दादी को कहाॅ पर रखा गया है?

सारे काग़जातों को देख कर मैने रितू दीदी से तथा अभय चाचा से बात की। मैने उनसे कहा कि मुझे उनके हिस्से का कुछ भी नहीं चाहिए बल्कि उनके हिस्से का सब कुछ रितू दीदी व नीलम के नाम कर दिया जाए। मेरी इस बात से अभय चाचा भी सहमत थे। जबकि रितू दीदी ने साफ कह दिया कि उन्हें कुछ नहीं चाहिए। मगर मैं ज़मीन जायदाद पर कोई ऐसी बात नहीं बनाना चाहता था जिससे भविष्य में किसी तरह का विवाद होने का चान्स बन जाए।

एक दिन हम सब दादा दादी से मिलने शिमला गए। शिमला में ही किसी प्राइवेट जगह पर उन्हें रखा था बड़े पापा ने। शिमला में हम सब दादा दादी से मिले। वो दोनो अभी भी कोमा में ही थे। उन्हें इस हाल में देख कर हम सब बेहद दुखी हो गए थे। डाक्टर ने बताया कि पिछले महीने उनकी बाॅडी पर कुछ मूवमेंट महसूस की गई थी। किन्तु उसके बाद फिर से वैसी ही हालत हो गई थी। डाक्टर ने कहा कि तीन सालों में ये पहली बार था जब पिछले महीने ऐसा महसूस हुआ था। उम्मीद है कि शायद उनके जिस्म में फिर कभी कोई मूवमेन्ट हो।

हमने डाक्टर से दादा दादी को साथ ले जाने के लिए कहा तो डाक्टर ने हमसे कहा कि घर ले जाने का कोई फायदा नहीं है, बल्कि वो अगर यहीं पर रहेंगे तो ज्यादा बेहतर होगा। क्योंकि यहाॅ पर उनकी देख भाल के लिए तथा किसी भी तरह की मूवमेन्ट का पता चलते ही डाक्टर उस बात को बेहतर तरीके से सम्हालेंगे।

डाक्टर की बात सुन कर माॅ ने कहा कि वो माॅ बाबू जी को साथ ही ले जाएॅगी। वो खुद उनकी बेहतर तरीके से देख भाल करेंगी। उन्होंने डाक्टर से ये कहा कि वो किसी क़ाबिल नर्स को हमारे साथ ही रहने के लिए भेज दें। काफी समझाने बुझाने और बहस के बाद यही फैंसला हुआ कि हम दादा दादी को अपने साथ ही ले जाएॅगे। डाक्टर अब क्या कर सकता था? इस लिए उसने हमारे साथ एक क़ाबिल नर्स को भेज दिया। शाम होने से पहले ही हम दादा दादी को लेकर हल्दीपुर आ गए थे।

बड़ी माॅ की तलाश ज़ारी थी। किन्तु अब इस तलाश में फर्क़ ये था कि हमने अपने आदमियों को चारो तरफ उनकी तलाश में लगा दिया था। पुलिस खुद भी उनकी तलाश में लगी हुई थी। अभय चाचा के कहने पर मैं भी अब अपनी पढ़ाई को आगे ज़ारी रखने के लिए मुम्बई जाने को तैयार हो गया था। मैं तो अपनी तरफ से यही कोशिश कर रहा था कि ये जो एक नया संसार बनाया था उसमे हर कोई सुखी रहे, मगर आने वाला समय इस नये संसार के लिए क्या क्या नई सौगात लाएगा इसके बारे में ऊपर बैठे ईश्वर के सिवा किसी को कुछ पता नहीं था।

~~~~~~~~~~समाप्त~~~~~~~~~~~~~

दोस्तो, आप सबके सामने इस कहानी का आख़िरी अपडेट हाज़िर है। उम्मीद करता हूॅ कि आप सबको पसंद आएगा।

हमेशा की तरह आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा।
 
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