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Gandi Kahani ♡ एक नया संसार ♡

♡ एक नया संसार ♡
अपडेट........《 38 》

अब तक,,,,,,,,,

उन लोगों के जाने के बाद मैं वापस पलटा। मैने उस लड़की की तरफ देखा। वो दूसरी तरफ सिर झुकाए खड़ी थी। उसका दुपट्टा मेरे सामने कुछ ही दूरी पर जमीन में पड़ा हुआ था। मैं आगे बढ़ कर उसका पीले रंग का दुपट्टा उठाया और उस लड़की की तरफ बढ़ गया।

"ये लीजिए मिस।" मैने पीछे से उसे उसका दुपट्टा देते हुए बोला___"आपका दुपट्टा।"
"जी धन्यवाद आपका।" उसने मेरे हाॅथ से दुपट्टा लिया, और फिर मेरी तरफ पलटते हुए बोली____"अगर आप नहीं आते तो वो न जाने मेरे सा...........।"

उसका वाक्य अधूरा रह गया। मुझ पर नज़र पड़ते ही उसकी ऑखे फैल गई। वह आश्चर्यचकित भाव से मुझे देखने लगी। मेरा भी हाल कुछ वैसा ही था। जैसे ही वह मेरी तरफ पलटी तो मेरी नज़र उसके चेहरे पर पड़ी। और मैं उसका चेहरा देख कर उछल ही पड़ा था।

"नी..लम???" मेरे मुख से लरजता हुआ स्वर निकला।
"रा......ज।" उसके मुख से अविश्वसनीय भाव से निकला।
"ओह साॅरी।" मैने एकदम से खुद को सम्हालते हुए कहा___"आपका दुपट्टा।"

मैने उसे उसका दुपट्टा पकड़ाया और तुरंत पलट गया। मैं उसके पास रुकना नहीं चाहता था। मैं तेज तेज चलते हुए उस जगह से दूर चला गया। जबकि नीलम बुत बनी वहीं पर खड़ी रह गई।
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अब आगे,,,,,,,,,,

उधर रितू अपने फार्महाउस पर पहुॅची। हरिया काका से उसने उन चारों का हाल चाल पूछा और फिर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। कमरे में पहुॅच कर उसने दरवाजा बंद किया और कमरे में एक तरफ रखी आलमारी की तरफ बढ़ी। आलमारी को खोल कर उसने उस बैग को निकाला जिसे वह चौधरी के फार्महाउस से लेकर आई थी। बैग को बेड पर रख कर उसने उसमें से कई सारी चीज़ें निकाल कर बेड पर रखा।

कुछ फोटोग्राफ्स थे उसमें, कुछ लेटर्स और कई सारी पेनड्राइव्स। रितू ने उठ कर आलमारी से अपना लेपटाॅप निकाला। उसे ऑन किया। कुछ देर बाद जब वह ऑन हो गया दिया तो रितू ने उसमें एक पेनड्राइव लगाया। कुछ ही पल में लेपटाॅप की स्क्रीन पर पेनड्राइव को ओपेन करने का ऑप्शन आया। रितू ने उस पर क्लिक किया। पर भर में ही स्क्रीन पर उसे बहुत सारी फोटोज और वीडियोज दिखने लगी।

फोटोज देख कर रितू का दिमाग़ खराब होने लगा। वो सारी फोटो न्यूड रूप में कई सारी लड़कियों की थी। रितू उन लड़कियों को पहचानती तो नहीं थी लेकिन फोटो में उन लड़कियों के पोज से उसे पता चल रहा था कि इन लड़कियों की मर्ज़ी से ही ये फोटोज खींचे गए थे। रितू के चेहरे पर उन लड़कियों के प्रति नफ़रत और घ्रणा के भाव उभर आए।

उसके बाद उसने एक वीडियो पर क्लिक किया। क्लिक करते ही वो वीडियो चालू हो गई। इस वीडियो में जो लड़का था वह रोहित था। वो किसी लड़की के साथ सेक्स कर रहा था। लड़की अपनी दोनो टाॅगों को कैंची शक्ल देकर रोहित की कमर पर जकड़ा हुआ था। रितू ने फौरन ही वीडियो को बंद कर दिया और दूसरी वीडियो को ओपेन किया। इस वीडियो में अलोक लड़की की चूॅत चाट रहा था। रितू ने तुरंत ही वीडियो बंद कर दिया। उसके अंदर गुस्सा बढ़ने लगा था।

एक एक करके रितू ने सारे वीडियो देख लिए। वो सारे वीडियो इन चारो लड़कों के ही थे जो अलग अलग लड़कियों के साथ बनाए गए थे। रितू ने लेपटाॅप से पेनड्राइव निकाल कर अलग साइड पर रखा और दूसरा पेनड्राइव लेपटाॅप पर लगा दिया। कुछ ही देर में उसने देखा कि इस पेनड्राइव में भी यही चारो लड़के किसी न किसी लड़की के साथ सेक्स कर रहे थे। रितू ने उस पेनड्राइव को भी अलग रख दिया। इसी तरह रितू एक एक पेनड्राइव को लेपटाॅप पर लगा कर देखती रही। कुछ पेनड्राइव्स में उसने देखा कि इन चारों लड़कों ने लड़कियों को उनकी बेहोशी में उनके सारे कपड़े उतारे और फिर उनके साथ अलग अलग पोजीशन में सेक्स किया था। रितू समझ सकती थी कि इन लड़कियों के साथ इन लोगों ने धोखे से ये सब किया था। ज्यादातर पेनड्राइव्स में इन लड़कों के ही वीडियोज थे।

रितू ने एक और पेनड्राइव लेपटाॅप पर लगाया। इस पेनड्राइव में कई फोल्डर बने हुए थे। जिन पर नाम डाला हुआ था। एक फोल्डर पर लिखा था "डैडी"। रितू ने तुरंत ही इस फोल्डर को ओपेन किया। स्क्रीन पर कई सारे वीडियोज आ गए। एक वीडियो पर क्लिक किया रितू ने। क्लिक करते ही वीडियो चालू हो गई। वीडियो में सूरज का बाप दिवाकर चौधरी किसी लड़की के साथ सेक्स कर रहा था। ये वीडियो सिर्फ एक ही एंगल से लिया गया था। मतलब साफ था कि कहीं पर वीडियो कैमरा छुपाया गया था और दिवाकर चौधरी को इस बात का पता ही नहीं था। वरना वो अपनी ऐसी वीडियो बनाने की सोचता भी नहीं।

रितू ने फौरन ही वो वीडियो काॅपी कर एक अलग से फोल्डर बना कर उसमें डाल दिया। उसके बाद रितू ने एक एक करके सभी वीडियो देखे। सभी वीडियों में दिवाकर चौधरी लड़की के साथ सेक्स कर रहा था। रितू ने दूसरा फोल्डर खोला। उसमें भी वीडियोज थे। रितू समझ गई कि ये उन लोगों के काले कारनामों के वीडियोज हैं जिनका संबंध दिवाकर चौधरी से है।

उन चारो लड़कों बापों के वीडियोज भी इसमें थे। रितू के लिए ये काफी मसाला था दिवाकर चौधरी को काबू में करने के लिए। उसने उन चारो लड़कों के बापों का एक एक वीडियो अपने लैपटाॅप में बनाए गए उस फोल्डर में डाल लिया।

सारे सामान को वापस बैग में भर कर उसने उस बैग को वापस आलमारी में रख कर आलमारी को लाॅक कर दिया। इसके बाद वह पलटी और एक तरफ रखे उस छोटे से थैले को उठाया जिसमें आज का खरीदा हुआ मोबाइल फोन और सिम था। उसने थैले से फोन कि डिब्बा निकाला और उसे खोलने लगी। मोबाइल निकाल कर उसने मोबाइल के चार्जर को भी निकाला। चार्जर में एक अलग से केबल थी। उसने उस केबल को मोबाइल में लगाया और दूसरा सिरा लैपटाॅप में। तुरंत ही लैपटाॅप की स्क्रीन पर एक ऑप्शन आया। मोबाइल की स्क्रीन पर भी शो हुआ। रितू ने सेटिंग सही की और फिर उन वीडियोज को काॅपी कर मोबाइल के स्टोरेज पर पेस्ट कर दिया। चारो वीडियोज कुछ ही देर में मोबाइल में अपलोड हो गई।

इसके बाद रितू ने केबल निकाल कर वापस मोबाइल के डिब्बे पर रख दिया। एक नज़र उसने मोबाइल की बैटरी पर डाली तो पता चला कि मोबाइल पर अभी 27% बैटरी है। रितू ने फौरन ही चार्जर निकाल कर मोबाइल फोन को चार्जिंग पर लगा दिया। इसके बाद वह कमरे का दरवाजा खोल कर बाहर निकल गई।

बाहर आकर उसने काकी से काका को बुलवाया। थोड़ी ही देर में हरिया काका रितू के पास आ गया।
"का बात है बिटिया?" काका ने कहा__"ऊ बिंदिया ने हमसे कहा कि तुम हमका बुलाई हो।"

"हाॅ काका।" रितू ने कहा___"मैने सोचा कि एक नज़र मैं भी देख लूॅ उन चारो पिल्लों को। वैसे उन सबकी खातिरदारी में कोई कमी तो नहीं की न आपने?"
"अइसन होई सकत है का बिटिया?" हरिया काका ने अपनी बड़ी बड़ी मूॅछों पर ताव देते हुए कहा___"तुम्हरे हर आदेश का हम बहुतै अच्छी तरह से पालन किया हूॅ। ऊ ससुरन केर अइसन खातिरदारी किया हूॅ कि ससुरन केर नानी का नानी केर नानी भी याद आ गई रहे।"

"अगर ऐसी बात है तो बहुत अच्छा किया है आपने।" रितू ने कहा___"उनकी खातिरदारी करने की जिम्मेदारी आपकी है। उनकी खातिरदारी के लिए आप शंकर काका को भी बुला लीजिएगा।"

"अरे ना बिटिया।" हरिया काका ने झट से कहा___"ऊ ससुरे शंकरवा केर कौनव जरूरत ना है। हम खुदै काफी हूॅ ऊ ससुरन केर खातिरदारी करैं केर खातिर। ऊ का है ना बिटिया ऊ शंकरवा से ई काम होई नहीं सकत है। ई ता हम हूॅ जो यतनी अच्छी तरह से खातिरदारी कर सकत हूॅ।"

"ओह ऐसी बात है क्या?" रितू मुस्कुराई।
"अउर नहीं ता का।" काका ने सीना तान कर कहा___"हम ता ई काम मा बहुतै एकसपरट हूॅ बिटिया।"
"काका वो एकसपरट नहीं बल्कि एक्सपर्ट होता है।" रितू ने हॅसते हुए कहा।

"हाॅ हाॅ ऊहै बिटिया।" हरिया काका ने झेंपते हुए कहा___"ऊहै एक्सपरट हूॅ।"
"अच्छा चलिए अब।" रितू ने कहा___"मैं भी तो देखूॅ कि आपने कैसी खातिरदारी की है उन लोगों की?"
"बिलकुल चला बिटिया।" काका ने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहा___"ऊ लोगन का देख के तुम्हरे समझ मा जरूर आ जई कि हम खातिरदारी करैं मा केतना एकसपरट हूॅ हाॅ।"

रितू, काका की बात पर मुस्कुराती हुई तहखाने में पहुॅची। तहखाने का नज़ारा पहले की अपेक्षा ज़रा अलग था इस वक्त। उन चारों की हालत बहुत ख़राब थी। उन लोगों से ठीक से खड़े नहीं हुआ जा रहा था। सबसे ज्यादा सूरज चौधरी की हालत खराब थी। वह बिलकुल बेजान सा जान पड़ता था। बाॅकी तीनों उससे कुछ बेहतर थे। उन सभी की गर्दनें नीचे झुकी हुई थी। जबकि उनके सामने वाली दीवार पर बॅधे दोनो गार्ड्स की हालत खराब तो थी पर उन चारो जैसी दयनीय नहीं थी। इसकी वजह ये थी कि हरिया या रितू ने उन पर किसी भी तरह से हाॅथ नहीं उठाया था। वो तो बस बॅधे हुए थे।

"काका एक बात समझ में नहीं आई।" रितू ने उन चारों को ध्यान से देखते हुए कहा__"इन चारों में से सबसे ज्यादा इस मंत्री के हरामी बेटे की हालत खराब क्यों हैं जबकि बाॅकी ये तीनों इससे तो ठीक ठाक ही नज़र आ रहे हैं।"

रितू की ये बात सुन कर हरिया काका बुरी तरह हड़बड़ा गया। उससे तुरंत कुछ कहते न बना। भला वह कैसे बताता रितू को कि उसने सूरज चौधरी की गाॅड मार कर ऐसी बुरी हालत की थी जबकि बाॅकी वो तीनो तो उसे देख देख कर ही अपनी हालत ख़राब कर बैठे थे। हरिया ने उन तीनों की अभी गाॅड नहीं मारी थी। उसने सोचा था कि एक दिन में एक की ही तबीयत से गाॅड मारेगा।

"ऊ का है न बिटिया।" हरिया काका ने झट से कहा___"हम ई सोचत रहे कि ई ससुरन केर एक एक करके खातिरदारी करूॅगा। कल ता हम ई ससुरे की खातिरदारी किया हूॅ अउर आज दुसरे केर नम्बर हाय।"
"ओह तो ये बात है।" रितू ने कहा__"चलो ठीक है जैसे आपको ठीक लगे वैसा खातिरदारी करिये। बस इतना ज़रूर ध्यान दीजिएगा कि इनमें से कोई मर न जाए।"

"चिन्ता ना करा बिटिया।" काका ने कहा__"ई ससुरे बिना हमरी इजाजत के मर नाहीं सकत। जब तक हम इन सब केर पेल न लूॅगा तब तक ई कउनव ससुरे मर नाहीं सकत हैं।"
"क्या मतलब?" रितू को समझ न आया।
"अरे हम ई कह रहा हूॅ बिटिया कि जब तक हम ई ससुरन केर अच्छे से खातिरदारी न कर लूगाॅ।" काका ने बात को सम्हालते हुए कहा___"तब तक ई ससुरे कउनव नाहीं मर सकत। काहे से के ई हमरी ख्वाईश केर बात है हाॅ।"

"ख्वाहिश के बात?" रितू चौंकी___"इसमें आपकी कौन सी ख्वाहिश की बात है काका?"
"अरे हमरा मतबल है बिटिया कि खातिरदारी करैं केर ख्वाईश वाली बात।" काका मन ही मन खुद पर गुस्साते हुए और खिसियाते हुए बोला___"ई ता तुमको भी पता है बिटिया कि हमका केहू केर खातिरदारी करैं का केतना शौक है। उहै बात हम करथैं।"

तहखाने में इन लोगों की आवाज़ गूॅजते ही उन चारों को होश आया। दरअसल वो उस हालत में ही ऊॅघ रहे थे। इन लोगों की आवाज़ काॅनों में टकराने से उन लोगों को होश सा आया था। उन चारों ने सिर उठा कर रितू और काका की तरफ देखा। काका को देख कर वो चारो बुरी तरह घबरा गए। लेकिन जैसे ही उनकी नज़र रितू पर पड़ी तो उनमें उम्मीद की कोई आसा नज़र आई।

"इ इंस्पेक्टर इंस्पेक्टर।" अलोक ने मरी मरी सी आवाज़ में चिल्लाते हुए कहा___"हमें यहाॅ से निकालो प्लीज़। हमें छोंड़ दो इंस्पेक्टर, हमे यहाॅ जाने दो वरना ये आदमी हमारी जान ले लेगा।"

"हाॅ हाॅ इंस्पेक्टर हमे जल्दी से यहाॅ से निकालो। ये आदमी बहुत खतरनाॅक है।" रोहित मेहरा गिड़गिड़ा उठा___"इसने सूरज की बहुत बुरी हालत कर दी है। प्लीज़ इंस्पेक्टर हमें इस आदमी से बचा लो। हम तुम्हारे आगे हाॅथ जोड़ते हैं। तुम्हारे पैर पड़ते हैं। हमें छोड़ दो प्लीज़।"

"अबे चुप।" हरिया काका इस तरह उन चारों की तरफ देख कर गरजा था जैसे कोई शेर दहाड़ा हो___"हम कहता हूॅ चुप कर ससुरे वरना हमका ता जान गए हो न। ससुरे टेंटुआ दबा दूगा हम तुम सबकेर।"

हरिया की दहाड़ का तुरंत असर हुआ। उन चारों की बोलती इस तरह बंद हो गई जैसे बिजली के स्विच से बटन बंद कर देने पर बजते हुए टेपरिकार्डर का बजना बंद हो जाता है। मगर वो चुप ज़रूर हो गए थे मगर उन सबकी ऑखों में करुण याचना और विनती करने जैसे भाव स्पष्टरूप से दिख रहे थे।

"तुम लोगों के लिए अब कोई रहम नहीं हो सकता समझे?" रितू ने कठोरता से कहा___"तुम लोगों ने जो पाप किया है और जो भी अपराध किया उसके लिए तुम सबको अब यहीं पल पल मरना है।"

"हमें मारना ही है तो एक ही बार में हमारी जान ले लो इंस्पेक्टर।" निखिल ने कहा__"पर इस आदमी के हवाले मत करो हमे। ये आदमी बहुत बेरहम है। इसने सूरज के साथ बहुत बुरा किया है।"

"चिन्ता मत करो।" रितू ने कहा___"अभी इससे भी बुरा होगा तुम सबके साथ। दूसरों की बहन बेटियों की इज्ज़त लूटने का बहुत शौक है न तुम लोगों को तो अब खुद भी भुगतो। तुम सबका वो हाल होगा जिसकी कभी किसी ने कल्पना भी न की होगी।"

"ई लोगन का का करना है बिटिया?" काका ने उन दो गार्डों की तरफ देखते हुए कहा__"हमका लागत है ई ससुरे फालतू मा ईहाॅ कस्ट उठाय रहे हैं।"
"इन दोनो को छोंड़ नहीं सकते हैं।" रितू ने कहा___"क्योंकि ये दोनो हमारा काम खराब कर देंगे। इस लिए इन लोगों को यहीं पर रहने दो। बस इन पर हाॅथ नहीं उठाना। इन्होने कोई अपराध नहीं किया है।"

"हम किसी से कुछ नहीं कहेंगे बेटी।" एक गार्ड ने कहा___"हम अपने बाल बच्चों की कसम खाकर कहते हैं कि हम किसी से भी आपके और इन लोगों के बारे में कुछ नहीं बताएॅगे। हम इस शहर से ही बहुत दूर चले जाएॅगे। ताकि इन लोगों के बाप हमें ढूॅढ़ ही न पाएॅ।"

"हम आप दोनो पर कैसे यकीन करें?" रितू ने कहा___"आप खुद सोचिए कि अगर आप हमारी जगह होते तो क्या करते?"
"हम सब समझते हैं बिटिया।" दूसरे गार्ड ने कहा___"मगर यकीन तो करना ही पड़ेगा न बिटिया। क्योंकि हम अगर चाहें भी तो यकीन नहीं दिला सकते। हमारे पास कोई सबूत भी नहीं है जिसकी वजह से हम आपको यकीन दिला सकें। पर आपको सोचना चाहिए बेटी कि कोई बाप अपने बाल बच्चों की झूॅठी क़सम नहीं खाया करता। अधर्मी से अधर्मी आदमी भी अपनी औलाद की झूठी कसम नहीं खाता। हम तो गरीब आदमी है बेटी। दो पैसे के लिए इनके यहाॅ काम करते थे। मंत्री ने हमारे हाॅथ में बंदूखें पकड़ा दी। हम तो उन बंदूखों को चलाना भी नहीं जानते थे।"

दोनो गार्डों की बातें सुन कर रितू और हरिया सोच में पड़ गए। वो दोनो ही इन्हें सच्चे लग रहे थे। उनकी बातों में सच्चाई की झलक थी। मगर हालात ऐसे थे कि उन्हें छोंड़ना भी नीति के खिलाफ़ था। मगर फिर भी रितू ने ये सोच कर उनको छोंड़ देने का फैसला लिया कि जिनसे ये लोग बताएॅगे वो लोग तो खुद ही बहुत जल्द इसी तहखाने में आने वाले हैं।

ठीक है।" रितू ने कहा___"हम तुम दोनो को छोंड़ रहे हैं। सिर्फ इस लिए कि तुम दोनों ने अपने बच्चों की कसम खा कर कहा हैं तुम लोग यहाॅ के बारे में या इन चारों के बारे में किसी से कुछ नहीं कहोगे।"

"ओह धन्यवाद बेटी।" गार्ड ने खुश होते हुए कहा___"हम सच कह रहे हैं हम किसी से कुछ नहीं कहेंगे। हम आज ही अपने गाव अपने प्रदेश चले जाएॅगे। काम ही तो करना है कहीं भी कर लेंगे।"

"काका इन दोनो को छोंड दो।" रितू ने हरिया से कहा___"और यहाॅ से इन्हें ले जाकर शंकर काका के पास ले जाओ। काका से कहना कि इन्हें नहला धुला कर तथा अच्छे से खाना खिलाकर रेलवे स्टेशन ले जाएॅ और इनके राज्य की तरफ जाने वाली ट्रेन में बैठा आएॅ।"

"ठीक है बिटिया।" हरिया ने कहा___"हम अभी इनका छोंड़ देता हूॅ।" कहने के साथ ही हरिया आगे बढ़ा और फिर कुछ ही देर में उन दोनो को रस्सियों के बंधन से मुक्त कर दिया। उन दोनो के हाॅथ अकड़ से गए थे। नीचे लाने में थोड़ी तक़लीफ़ हुई।

"बेटी एक चीज़ की इजाज़त चाहते हम।" एक गार्ड ने रितू से कहा था।
"कहो क्या चाहते हो?" रितू ने कहा।
"इन चारों को एक एक थप्पड़ लगाना चाहते हैं हम।" उस गार्ड के लहजे में एकाएक ही आक्रोश दिखा___"ये अधर्मी व दुराचारी लोग हैं। इन लोगों की वजह से सच में कितनी ही मासूम लड़कियों की जिदगी बरबाद हो गई।"

रितू ने उन्हें इजाज़त दे दी। इजाज़त मिलते ही दोनो उन चारों की तरफ बढ़े और फिर खींच कर एक थप्पड़ उन चारों के गालों पर रसीद कर दिया। चारों के हलक से चीखें निकल गई। ऑखों से पानी छलक पड़ा।

"धन्यवाद बेटी।" दूसरे गार्ड ने कहा__"इन लोगों के साथ बदतर से बदतर सुलूक करना। हरिया भाई, आप बिलकुल ठीक कर रहे हैं।"

इसके बाद हरिया उन दोनो को लेकर तहखाने से बाहर निकल गया। रितू खुद भी तहखाने से बाहर आ गई थी। तहखाने का गेट बंद कर वो अपने कमरे की तरफ बढ़ गई।
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नीलम को उसका दुपट्टा पकड़ा कर मैं एक झटके से पलट कर कालेज की कंटीन की तरफ बढ़ता चला गया था। इस वक्त मेरे मन में तूफान चालू था। मैं सोच भी नहीं सकता था कि आज कालेज में नीलम से मेरी इस तरह से मुलाक़ात होगी। नीलम को देख कर मेरी ऑखों के सामने फिर से पिछली ज़िंदगी की ढेर सारी बातें किसी चलचित्र की मानिन्द दिखती चली गई थी। जिनमें प्यार था, घ्रणा थी, धोखा था। मेरा दिलो दिमाग़ एकदम से किसी भवॅर में फसता हुआ महसूस हुआ मुझे।

कंटीन में पहुॅच कर मैं एक कुर्सी पर चुपचाप बैठ गया और अपनी ऑखें बंद कर ली। मुझे अपने अंदर बहुत बेचैनी महसूस हो रही थी। मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। मेरा दिल रह रह कर दुखी होता जा रहा था। मेरी ऑखों में ऑसुओं का सैलाब सा उमड़ता हुआ लगा मुझे। मैने अपने अंदर के जज़्बात रूपी तूफान को बड़ी मुश्किल से रोंका हुआ था। मैं नहीं जानता कि मेरे वहाॅ से चले आने के बाद नीलम पर क्या प्रतिक्रिया हुई।

मुझे नहीं पता कि मैं उस हालत में कंटीन पर कितनी देर तक बैठा रहा। होश तब आया जब किसी ने पीछे से मेरी पीठ पर ज़बरदस्त तरीके से वार किया। उस वार से मैं कुर्सी समेत जमीन पर मुह के बल पछाड़ गया। अभी मैं उठ भी न पाया था कि मेरे पेट पर किसी के जूतों की ज़ोरदार ठोकर लगी। मैं उछलते हुए दूर जाकर गिरा।

मगर गिरते ही उछल कर खड़ा हो गया मैं। मेरी नज़र मेरे सामने से आते एक हट्टे कट्टे आदमी पर पड़ी। उसकी ब्वाडी किसी भी मामले में किसी रेसलर से कम न थी। मुझे समझ न आया कि ये कौन है, कहाॅ से आया है और मुझ पर इस तरह अटैक क्यों किये जा रहा है।

"हीरो बनने का बहुत शौक है न तुझे?" उस आदमी ने अजीब भाव से कहा___"साले मेरे छोटे भाई पर हाॅथ उठाया तूने। तुझे इसका अंजाम भुगतना ही पड़ेगा। ऐसी ऐसी जगह से तेरी हड्डियाॅ तोड़ूॅगा कि दुनियाॅ का कोई डाॅक्टर तेरी हड्डियों को जोड़ नहीं पाएगा।"

"ओह तो तुम उस हराम के पिल्ले के बड़े भाई हो।" मैने कहा___"और मुझसे अपने छोटे भाई का बदला लेने आए हो। अच्छी बात है, लेना भी चाहिए। मगर, मेरी एक फरमाइश है भाई।"
"क्या बक रहा है तू?" वो आदमी शख्ती से गुर्राया___"कैसी फरमाइश?"

"मेरी फरमाइश ये है कि एक एक करके आने का कोई मतलब नहीं है।" मैने कहा__"ऐसे में सिर्फ वक्त की बर्बादी होगी। इस लिए एक काम करो। तुम्हारे पास जितने भी आदमी हों उन सबको यहीं पर बुला लो। उसके बाद मुकाबला करें तो थोड़ा मज़ा भी आए।"

"साले बहुत बोलता है तू।" वो आदमी मेरी तरफ बढ़ते हुए बोला___"तेरे लिए मैं ही काफी हूॅ। अभी तेरी हड्डियों का चूरमा बनाता हूॅ रुक।"

वो मेरे पास आते ही मुझ पर अपनी बलिस्ट भुजा का वार कर दिया। मैं तो पहले से ही चौकन्ना हो गया था और जानता भी था कि अगर इसका एक वार भी मुझे लग गया तो मेरी हालत खराब हो जानी थी। ख़ैर, जैसे ही उसने तेजी से अपना दाहिना हाथ घुमाया, मैं फौरन ही नीचे झुक गया। उसका हाथ मेरे ऊपर से निकल गया। उसके सम्हलने से पहले ही मैने उछल कर एक फ्लाइंग किक उसकी कनपटी पर जड़ दी। वो धड़ाम से जमीन पर गिरा। मुझे हैरानी हुई मगर मुझे उसके गिरने का कारण समझ आ गया। गुस्से में यही होता है। मुझे मारने के लिए जब उसने गुस्से से अपना हाथ घुमाया था तो मैं झुक गया था। उसका हाथ जैसे ही मेरे सिर से निकला वैसे ही उछल कर मैने ज़ोरदार फ्लाइंग किक उसकी कनपटी पर जड़ी थी। वो सम्हल नहीं पाया था। अपने ही प्रहार के वेग में वह मेरे प्रहार के लगते ही धड़ाम से गिरा था।

उसके गिरते ही मैंने उछल कर उसके ऊपर जंप मारी मगर वह पलट गया। जैसे ही मेरे दोनो पैर जमीन पर आए उसकी एक टाॅग घूम गई और मेरी एक टाॅग पर लगी। नतीजा ये हुआ कि मैं पिछवाड़े के बल गिर गया मगर पल भर में ही उछल कर खड़ा भी हो गया। और सच कहूॅ तो ये मेरा भाग्य ही अच्छा था कि मैं उछल कर खड़ा हो गया था। क्योंकि जैसे ही मैं गिरा था वैसे ही उसने तेज़ी अपनी दाहिनी कोहनी का वार मेरी छाती की तरफ किया था। मगर मेरे उछल कर खड़े हो जाने पर उसका वो वार जमीन पर तेजी से लगा। कोहनी का तीब्र वार जब पक्की ज़मीन से टकराया तो उसके हलक से चीख निकल गई। अपनी कोहनी को दूसरे हाथ से जल्दी जल्दी सहलाने लगा था वह। ऐसा अवसर छोंड़ना निहायत ही बेवकूफी थी। मैने अपनी दाहिनी टाॅग पूरी शक्ति से घुमा दी। जो कि उसकी कनपटी पर लगी। वो दूसरी कनपटी के बल ज़मीर पर गिर गया। उसका सिर ज़ोर से ज़मीन से टकराया था। उसके मुख से घुटी घुटी सी चीख़ निकल गई। निश्चित ही उसकी ऑखों के सामने कुछ पल के लिए अॅधेरा छा गया होगा।

अब मैने रुकना मुनासिब न समझा। मैं एकदम से पिल पड़ा उस पर। लात घूॅसों से उसकी जमकर ठोकाई की मैने। वो बचने के लिए इधर उधर हाॅथ पैर मार रहा था। जबकि मैं बिजली की स्पीड से उस पर वार किये जा रहा था। अचानक ही उसके हाथ में मेरी टाॅग आ गई। उसने मेरी उस टाॅग को पकड़ कर पूरी शक्ति से उछाल दिया। मैं हवा में लहराते हुए एक टेबल पर गिरा। मेरी पीठ पर टेबल का किनारा बड़ी तेज़ी से लगा। मैं चाह कर भी उस दर्द से निकलने वाली चीख को रोंक न सका। तभी मेरी नज़र सामने पड़ी और मैं पलक झपकते ही दर्द को बरदास्त करके टेबल से हट गया। नतीजा ये हुआ कि मेरे हटते ही टेबल पर कुर्सी का तेज़ प्रहार पड़ा और टेबल व कुर्सी दोनो ही टूटती चली गई।

इधर प्रहार करने के बाद वो आदमी सम्हल भी न पाया था कि एक कुर्सी उठा कर मैने बड़ी तेज़ी से उसके सिर पर वार कर दिया। वार ज़बरदस्त था। हाॅथ में टूटी हुई कुर्सी लिए वह सामने टूटी हुई ही टेबल पर मुह के बल गिर गया। सिर से भल्ल भल्ल करके खून बहने लगा था उसके। मुझे समझते देर न लगी कि उसका सिर फट गया है। वह बुरी तरह चीखा था। कंटीन में उसकी चीख गूॅज गई थी। लेकिन मैं रुका नहीं। मैंने वही कुर्सी एक बार फिर से अपने सिर से ऊपर तक उठा कर उस पर पटक दी। इस बार उसकी पीठ पर कुर्सी लगी थी। लकड़ी की कुर्सी थी वो। उसके दो पाए चटाक से टूट गए। वो आदमी धड़ाम से वहीं पर पसर गया।

अभी मैं उस पर फिर से वार करने ही वाला था कि मैंने देखा कि वो आदमी एकदम से सिथिल पड़ गया था। मैने अपने हाॅथ में ली हुई कुर्सी फेंक दी। झपट कर मैं उसके पर पहुॅचा। वो बुरी तरह खून में नहाये जा रहा था। उसके मुख से कराहटें निकल रही थी। मुझे लगा साला कहीं मर ही न जाए। वरना पंगा हो जाएगा।

मैने देखा उसकी ऑखें बंद होती जा रही थी। मैं ये देख कर बुरी तरह घबरा गया। इधर उधर देखा तो चौंक गया। पूरी कंटीन में लड़के लड़कियों की भीड़ जमा थी। सब लोग फटी फटी ऑखों से देखे जा रहे थे।

"भाईऽऽऽ।" तभी उस भीड़ से आशू राना चीखते हुए आया, बुरी तरह रोने लगा था वह___"ये क्या हो गया भाई तुम्हें? उठो भाई, मेरी तरफ देखो ना भाई।"
"देखो इस तरह रोने से कुछ नहीं होगा समझे।" मैने कहा___"इसे जल्दी से हास्पिटल ले जाना पड़ेगा वरना ये मर जाएगा।"

"तुमने मारा है मेरे भाई को तुमने।" आशू राना ने बिफरे हुए लहजे में कहा___"अगर मेरे भाई को कुछ भी हुआ तो आग लगा दूॅगा मैं इस पूरे काॅलेज में।"
"देखो ये सब बातें तुम बाद में भी कर लेना भाई।" मैने उसके भाई की हालत को देखते हुए कहा___"पहले एम्बूलेंस को बुलाओ।"

"एम्बूलेंस की ज़रूरत नहीं है।" आशू राना ने रोते हुए कहा___"मेरा भाई अपनी गाड़ी से आया था। बाहर खड़ी है।"
"ओह ठीक है फिर।" मैने कहा___"इसे गाड़ी तक ले चलने में मेरी मदद करो। ये बहुत भारी है मैं अकेले इसे कैसे ले जाऊॅगा?"

मेरे कहने पर आशू राना ने अपने भाई को एक तरफ से पकड़ा, दूसरी तरफ से मैंने उसे पकड़ा। काफी मेहनत के बाद आखिर मैं और आशू राना उसके भाई को गाड़ी तक ले आकर उसे कार की पिछली सीट पर लेटा दिया।

"कार की चाभी दो मुझे।" मैने आशू राना से कहा___"तुम अपने भाई को लेकर पीछे बैठ जाओ। मैं कार को जल्दी से हास्पिटल ले चलता हूॅ।"
"पहले तो मेरे भाई को मार कर इस हालत में पहुॅचा दिया और अब उसे हास्पिटल भी ले जा रहे हो।" आशू राना ने गुस्से मे कहा__"ये बहुत अच्छा कर रहे हो तुम, है न? मगर याद रखना कि इसका हिसाब तुम्हें देना होगा।"

"हाॅ ठीक है यार ले लेना हिसाब।" मैने उसके हाथ से चाभी खींचते हुए कहा___"पहले जो ज़रूरी है वो तो करने दो।"

मैं कार की ड्राइविंग सीट पर बैठ कर कार के इग्नीशन में चाभी लगाया और घुमाकर उसे स्टार्ट किया। मैने देखा कि काॅलेज के काफी सारे लड़के लड़कियाॅ बाहर आ गए थे। उनमें एक चेहरा नीलम का भी था। वह मुझे देखकर हैरान थी। मैने उससे नज़र हटाई और कार को एक झटके से आगे बढ़ा दिया।

ऑधी तूफान बनी कार बहुत जल्द हास्पिटल के सामने आकर खड़ी हो गई। मैं झट से गेट खोल कर बाहर आया। पिछला गेट खोल कर मैने आशू राना को बाहर आने को कहा। मैने नज़र घुमा कर देखा तो दो लोग एक खाली स्ट्रेचर को लिए जा रहे थे। मैंने झट से उनको आवाज़ दी। वो मुड़ कर मेरी तरफ देखने लगे।

"अरे जल्दी स्ट्रेचर ले आओ।" मैने चिल्लाते हुए कहा___"इट्स अर्जेन्ट।"
मेरी बात सुनकर वो तुरंत ही हमारी तरफ दौड़ते हुए आए। हम चारों ने आशू राना के भाई को सीट से निकाल कर स्ट्रेचर पर लिटाया। हास्पिटल वाले आदमी उसे उठा कर ले जाने लगे। मैं और आशू राना भी उनके पीछे हो लिए।

कुछ ही देर में वो लोग आशू के भाई को ओटी में ले गए। इधर आशू राना ऑखों में ऑसू लिए हास्पिटल की गैलरी में इधर से उधर बेचैनी और परेशानी में टहलने लगा।

"उम्मीद है कि बहुत जल्द तुम्हारा भाई पहले के जैसा हो जाएगा।" मैने आशू राना की तरफ देख कर कहा था।
"बात मत करो तुम मुझसे।" आशू राना अजीब भाव से गुर्राया___"मेरे भाई की इस हालत के तुम ही जिम्मेदार हो।"

"देख भाई, ये जो कुछ भी हुआ है न उसका जिम्मेदार सिर्फ तू है समझा?" मैने भी शख्त भाव से कहा___"तूने कालेज में उस लड़की की इज्ज़त पर हाथ डाला। इस लिए मैने उस लड़की की इज्ज़त बचाने के लिए तुझ पर हाथ उठाया। और तूने क्या किया? तू गया तो अपने बड़े भाई को बुला लाया अपनी हार और अपनी मार का बदला लेने के लिए। इस लिए ये तो होना ही था। हम दोनो में से किसी एक के साथ तो ये होना ही था। वक्त और हालात की बात है। मेरा दाॅव चल गया और मैने तेरे भाई की ये हालत बना दी। वरना कोई नहीं सोच सकता था कि तेरे उस मुस्टंडे भाई से मैं बचूॅगा।"

अभी आशू राना कुछ बोलने ही वाला था कि सहसा हमारे पास डाॅक्टर आ गया।
"देखिये सिर पर गहरी चोंट लगी है।" डाक्टर कह रहा था___"सिर फट गया है जिसकी वजह से खून काफी मात्रा में निकल गया है। हमने ब्लड टेस्ट किया तो उनके ग्रुप का ब्लड हमारे हास्पिटल में इस वक्त अवायलेवल नहीं है। जबकि उनको बल्ड चढ़ाना बहुत ज़रूरी है। वरना उनकी जान भी जा सकती है।"

"डाक्टर आप मेरा खून ले लीजिए।" आशू राना ने कहा___"मगर मेरे भाई को बचा लीजिए प्लीज़।"
"ठीक है आइये।" डाक्टर ने कहा___"मैं पहले आपके ब्लड का टेस्ट लूॅगा अगर उनके ब्लड से मैच हो गया तो आपका ही ब्लड उनको चढ़ा देंगे।"

डाक्टर आशू राना को लेकर चला गया। जबकि मैं परेशानी की हालत में आ गया था। मैं भगवान से दुआ करने लगा कि राना के भाई को कुछ न हो। थोड़ी देर में ही डाक्टर के साथ आशू राना बाहर आ गया।

"क्या हुआ डाक्टर साहब?" मैंने हैरानी से देखते हुए कहा___"आप इसे बाहर क्यों ले आए?"
"इनका ब्लड ग्रुप उनके ब्लड ग्रुप से मैच नहीं कर रहा है।" डाक्टर ने कहा___"हमने फोन द्वारा दूसरे हास्पिटलों में भी पता कर लिया है मगर इस वक्त यहाॅ आस पास के किसी भी हास्पिटल में उस ग्रुप का ब्लड उपलब्ध नहीं है।"
"डाक्टर साहब मेरा ब्लड भी चेक कर लीजिए न।" मैने कहा___"शायद मैच हो जाए।"
"ठीक है चलिए।" डाक्टर ने कहा___"आपका भी देख लेते हैं।"

मैं डाक्टर के साथ चला गया। अंदर डाक्टर ने मेरा ब्लड टेस्ट किया और आश्चर्यजनक रूप से मेरा ब्लड मैच कर गया। डाक्टर और मैं दोनो ही खुश हो गए।
"ओह वैरी गुड यंगमैन।" डाक्टर ने कहा__"ये तो कमाल हो गया। आपका ब्लड इनके ब्लड से मैच कर रहा है।"

"तो फिर देर किस बात की है डाक्टर?" मैने कहा___"जल्दी से इसको मेरा खून चढ़ा दीजिए।"
"ओह यस यंगमैन।" डाक्टर ने कहा__"आइये मेरे साथ।"

मैं उस कमरे से निकल कर डाक्टर के साथ उस कमरे में गया जहाॅ पर राना के भाई को बेड पर लिटाया गया था। वहाॅ दो नर्सें मौजूद थी।
"अंकिता।" डाक्टर ने एक नर्स से कहा___"इस यंगमैन का ब्लड ग्रुप इनके ग्रुप से मैच कर रहा है इस लिए फौरन प्रोसेस शुरू करो।"

उसके बाद मुझे भी राना के भाई के बगल वाले बेड पर लेटा दिया गया। मैंने भगवान का शुक्रिया अदा किया और अपनी ऑखें बंद कर ली। कुछ ही देर में मुझे अपने हाॅथ में सुई चुभती महसूस हुई।

लगभग दो घंटे बाद !
डाक्टर ने आकर बताया कि आशू का भाई अब ठीक है। मेरे शरीर से खून की उचित मात्रा लेने के बाद मुझे डाक्टर ने बाहर भेज दिया था। मुझे कमज़ोरी का एहसास हो रहा था। मगर दिल में ये खुशी थी कि मेरे खून से आशू के भाई की जान बच गई थी।

आशू राना जो अब तक मुझसे चिढ़ा चिढ़ा सा था अब वह मुझसे बड़े सलीके से बात कर रहा था। उसने ये स्वीकार किया कि इस सबके लिए सच में वही जिम्मेदार था। डाक्टर ने आशू राना के भाई के सिर पर टाॅके लगा कर उस पर पट्टी कर दी थी।

मैं आशू राना के साथ उस हास्पिटल में तब तक रहा जब तक कि उसके भाई को होश नहीं आ गया था। डाक्टर ने आकर बताया कि राना के भाई को होश आ चुका है तो हम दोनो खुशी खुशी उससे मिलने गए।

कमरे में पहुॅच कर आशू राना अपने भाई को ठीक ठाक देख कर बेहद खुश हुआ। मैं आगे बढ़ कर उसके भाई से बोला___"कैसे हो भाई?"
"अब तो ठीक हूॅ।" उसने कहा___"मुझे डाक्टर ने बताया कि तुमने मुझे बचाने के लिए अपना खून मुझे दिया। ऐसा क्यों किया तुमने भाई? भला क्या लगता था मैं तुम्हारा जो तुमने अपना खून देकर मुझे मरने से बचाया?"

"कोई न कोई रिश्ता तो बन ही गया था हम दोनो के बीच में।" मैने कहा___"फिर चाहे वो दुश्मनी का रिश्ता ही क्यों न हो। सब जानते थे कि मैं तुम्हारे सामने एक पल के लिए भी टिक नहीं पाऊॅगा मगर ये मेरी किस्मत थी कि मुझे कुछ नहीं हुआ बल्कि मैने खुद को कुछ होने से बचा लिया। मगर तुम्हारी किस्मत में ये सब होना था सो हो गया और मजे की बात देखो कि मेरे ही खून से तुम्हें जीवित भी बच जाना था।"

"सच कहा तुमने।" राना के बड़े भाई ने कहा___"ये किस्मत ही तो थी। मैने भी तो यही उम्मीद की थी कि दो मिनट के अंदर तुम्हारी हड्डियाॅ तोड़ कर कालेज से चला जाऊॅगा। मगर क्या पता था कि उल्टा मुझे ही इस हाल में पहुॅच जाना होगा। मैं हैरान था कि एक मामूली सा लड़का मुझे इस तरह कैसे मात दे रहा था। मतलब साफ है कि तुम भी कम नहीं थे।"

"चलो छोड़ो उस बात को।" मैने कहा___"सबसे अच्छी बात ये है कि तुम सही सलामत हो भाई।"
"भाई इस सबका जिम्मेदार मैं हूॅ।" आशू राना ने दुखी भाव से कहा___"सारे फसाद की शुरुआत तो मैने ही की थी। मैं उस लड़की की रैगिंग कर रहा था। मेरी कुछ बातों से उस लड़की को गुस्सा आया और उसने मुझे सबके सामने थप्पड़ मार दिया था। उसके थप्पड़ मारने की वजह से ही मुझे गुस्सा आया हुआ था जिसकी वजह से मैं उसके साथ वो सब कर रहा था। तभी ये भाई आया और मुझे मारने लगा था। इससे मार और मात खा कर ही मैं तुम्हारे पास आया था कि तुम इसे सबक सिखा कर मेरा बदला लो। मगर कुछ और ही हो गया भाई।"

"तुमने ग़लत किया और उस ग़लती में मुझे भी शामिल करवा लिया।" राना के भाई ने कहा__"इसका नतीजा ये तो होना ही था छोटे। कितनी बार तुझे समझाया है कि ऐसे काम मत किया कर बल्कि पढ़ाई किया कर। मगर तू तो पापा पर गया है न। कहाॅ किसी की सुनोगे?"

"अब से सिर्फ तुम्हारी ही बात सुनूॅगा भाई कसम से।" आशू ने कहा___"मैं वो सब ग़लत काम छोड़ दूॅगा।"
"ये सब तो तुमने पहले भी जाने कितनी बार मुझसे कहा था छोटे।" आशू के भाई ने कहा___"मगर क्या तुम कभी अपने फैसले पर अटल रहे? नहीं न? रह भी नहीं सकते छोटे। तुम बिलकुल पापा की तरह हो जैसे उन्हें अपने गुरूर में किसी की परवाह नहीं थी। उसी का नतीजा था कि आज हम बिना माॅ के हैं। तुम भी उनकी तरह ही हो छोटे। आज अगर मैं मर भी जाता तो तुम पर और पापा पर कोई असर नहीं होता।"

"नहीं भाई ऐसा मत कहो प्लीज।" आशू रो पड़ा था, बोला___"मुझे याद है भाई कि आज तक तुमने कैसे मेरी माॅ बन कर मुझे पाला पोषा है। पापा ने तो कभी ध्यान भी नहीं दिया कि उनके बेटे किस हालें हैं। मैं आपकी कसम खा कर कहता हूॅ भाई कि मैं अब से आपका एक अच्छा भाई बन कर दिखाऊॅगा।"

"चल मान ली तेरी ये बात भी।" आशू के भाई ने कहा___"और अगर सचमुच ऐसा हो गया तो मैं तहे दिल से तुम्हारा शुक्रगुजार हूॅ दोस्त कि तुमने मेरी आज ये हालत कर दी। वरना भला कैसे मेरा भाई सही रास्ते पर चलने की बात करता।"

"बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि जो कुछ भी होता है अच्छे के लिए ही होता है।" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"हो सकता है ये जो कुछ भी हुआ आज वो इसी अच्छे के लिए हुआ हो।"
"हाॅ दोस्त।" आशू के भाई ने कहा___"आज से तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो और मेरे इस नालायक भाई के भी। इसे अपने साथ ही रखना। और अगर कहीं ग़लती करे तो वहीं पर इसकी धुनाई भी कर देना। मैं कुछ नहीं बोलूॅगा।"

"भाई ये आप क्या कह रहे हैं?" आशू राना की ऑखें फैल गईं___"मुझे इसके साथ रहने को कह रहे हैं? ये हर रोज़ मेरी कुटाई करेगा भाई। प्लीज ऐसा मत कीजिए।"

"यार तुम ऐसा क्यों सोचते हो कि मैं तुम्हारी कुटाई करूॅगा?" मैने कहा___"तुम आज से मेरे दोस्त हो। हम सब साथ में ही पढ़ेंगे। लेकिन एक बात ज़रूर याद रखना कि भूल से भी किसी के साथ कोई बुरा बर्ताव नहीं करोगे। वरना सुन ही लिया है न कि भूषण भाई ने क्या कहा है। ख़ैर, मैं तुमसे ये कहना चाहता हूॅ कि एक ऐसा इंसान बनो आशू जिससे हर ब्यक्ति के दिल में तुम्हारे लिए इज्ज़त हो, प्यार हो और सम्मान हो। किसी का बुरा करने से या सोचने से कभी भी तुम लोगों की नज़र में अच्छे नहीं बन सकते। तुम खुद सोचो कि तुमने अपने ग़लत दोस्तों की शोहबत में अपनी क्या इमेज बना ली है सबके बीच? सब लोग तुमसे दूर भागते हैं। कोई भी अच्छा ब्यक्ति तुमसे किसी तरह का ताल्लुक नहीं रखना चाहता। लोग तुमसे तुम्हारे ग़लत ब्यौहार की वजह से कतराते हैं। किसी को डरा धमका कर तुम ये समझते हो कि लोगों के बीच तुम्हारा दबदबा है। जबकि ऐसी सोच सिरे से ही ग़लत है। क्योंकि वो लोग तुमसे डरते नहीं हैं बल्कि तुम जैसे बुरे इंसान के मुह नहीं लगना चाहते। इस लिए वो सब तुमसे दूर भागते हैं। इस लिए दोस्त ऐसा इंसान बनो जिसमें हर कोई तुम्हारे पास खुद आने के लिए रात दिन सोचे। और ये सब तभी होगा जब तुम सबके लिए अच्छा सोचोगे। किसी को अपने से कमज़ोर नहीं समझोगे।"

"वाह दोस्त।" भूषण राना प्रसंसा के भाव से कह उठा___"कितनी गहरी बातें कही है तुमने। काश तुम्हारी ये बातें मेरे इस छोटे को समझ आ जाएॅ और ये उसी राह पर चल पड़े जिस राह पर चलने से ये एक अच्छा इंसान बन जाए।"

"मैं चलूॅगा भाई।" आशू राना कह उठा__"अब से आपको कोई शिकायत का मौका नहीं दूॅगा। इस भाई की बात मेरी समझ में आ गई है। मुझे एहसास हो रहा है भाई कि इसने जो कुछ भी मेरे बारे में कहा वो एक कड़वा सच है। सच ही तो कहा है भाई ने कि सब लोग मेरे बुरे आचरण की वजह से मुझसे दूर भागते हैं। मगर अब ऐसा नहीं होगा भाई। मैं इसके साथ रह कर एक अच्छा इंसान बनूॅगा और ज़रूर बनूॅगा।"

"ये हुई न बात।" मैने कहा___"चल आजा इसी बात पर गले लग जा मेरे। कितनी बड़ी बात है कि आज काॅलेज के पहले ही दिन में पहले दुश्मनी हुई और फिर दोस्ती भी हो गई।"

आशू मेरे गले लग गया। मैने देखा बेड पर पड़े भूषण राना की ऑखों में खुशी के ऑसूॅ थे। कुछ देर और वहाॅ पर रुकने के बाद मैने भूषण राना से जाने की इजाज़त माॅगी तो उसने पहले मुझसे मेरा फोन नंबर लिया और मैने भी उसका लिया। फिर भूषण के कहने पर आशू मुझे भूषण की कार से काॅलेज तक छोंड़ा। पूरे रास्ते आशू राना का चेहरा खिला खिला नज़र आया मुझे। मैं समझ गया कि ये अब ज़रूर सुधर जाएगा।

काॅलेज के गेट के पास उतार कर आशू वापस लौट गया जबकि मैं पार्किंग की तरफ बढ़ गया अपनी बाइक को लेने के लिए। पार्किंग से अपनी बाइक पर सवार होकर अभी मैने बाइक को स्टार्ट करने के लिए सेल्फ पर अॅगूठा रखा ही था कि मेरा मोबाइल फोन बज उठा। मैने पैंट की जेब से मोबाइल निकाल कर स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नंबर को देखा तो मेरे चेहरे पर सोचने वाले भाव उजागर हो गए।

अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,,,,
 
एकनयासंसार

अपडेट.......《 39 》

अब तक,,,,,,,,

"मैं चलूॅगा भाई।" आशू राना कह उठा__"अब से आपको कोई शिकायत का मौका नहीं दूॅगा। इस भाई की बात मेरी समझ में आ गई है। मुझे एहसास हो रहा है भाई कि इसने जो कुछ भी मेरे बारे में कहा वो एक कड़वा सच है। सच ही तो कहा है भाई ने कि सब लोग मेरे बुरे आचरण की वजह से मुझसे दूर भागते हैं। मगर अब ऐसा नहीं होगा भाई। मैं इसके साथ रह कर एक अच्छा इंसान बनूॅगा और ज़रूर बनूॅगा।"

"ये हुई न बात।" मैने कहा___"चल आजा इसी बात पर गले लग जा मेरे। कितनी बड़ी बात है कि आज काॅलेज के पहले ही दिन में पहले दुश्मनी हुई और फिर दोस्ती भी हो गई।"

आशू मेरे गले लग गया। मैने देखा बेड पर पड़े भूषण राना की ऑखों में खुशी के ऑसूॅ थे। कुछ देर और वहाॅ पर रुकने के बाद मैने भूषण राना से जाने की इजाज़त माॅगी तो उसने पहले मुझसे मेरा फोन नंबर लिया और मैने भी उसका लिया। फिर भूषण के कहने पर आशू मुझे भूषण की कार से काॅलेज तक छोंड़ा। पूरे रास्ते आशू राना का चेहरा खिला खिला नज़र आया मुझे। मैं समझ गया कि ये अब ज़रूर सुधर जाएगा।

काॅलेज के गेट के पास उतार कर आशू वापस लौट गया जबकि मैं पार्किंग की तरफ बढ़ गया अपनी बाइक को लेने के लिए। पार्किंग से अपनी बाइक पर सवार होकर अभी मैने बाइक को स्टार्ट करने के लिए सेल्फ पर अॅगूठा रखा ही था कि मेरा मोबाइल फोन बज उठा। मैने पैंट की जेब से मोबाइल निकाल कर स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नंबर को देखा तो मेरे चेहरे पर सोचने वाले भाव उजागर हो गए।
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अब आगे,,,,,,,,

"हम कुछ भी नहीं सुनना जानते कमिश्नर हमारे बच्चे जहाॅ भी हों उन्हें ढूॅढ़ कर हमारे सामने तुरंत हाज़िर करो।" दिवाकर चौधरी फोन पर गुस्से में कह रहा था___"वरना तुम सोच भी नहीं सकते कि हम क्या कर सकते हैं? हमें पता चला है कि बच्चों ने किसी लड़की के साथ रेप किया है। मगर ये सब तो चलता ही रहता है इस उमर में। अगर हमें पता चला कि इस रेप की वजह से ही हमारे बच्चे गायब हैं तो समझ लेना कमिश्नर इस शहर में कोई इंसान ज़िदा नहीं बचेगा।"

".................."उधर से कुछ कहा गया।
"तो अगर पुलिस ने उस लड़की के रेप पर कोई केस नहीं बनाया तो कहाॅ गए हमारे बच्चे?" दिवाकर चौधरी गर्जा___"आज दो दिन हो गए कमिश्नर। अभी तक बच्चों का कहीं कोई अता पता नहीं है।"

"............." उधर से फिर कुछ कहा गया।
"तुम्हारे पास चौबीस घंटे का टाइम है कमिश्नर।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"अगर चौबीस घंटे के अंदर हमारे बच्चे हमारी ऑखों के सामने न दिखे तो समझ लेना कि हम क्या करते हैं फिर।"

कहने के साथ ही दिवाकर चौधरी ने फोन के रिसीवर को केड्रिल पर पटक दिया। गुस्से से तमतमाया हुआ आया और वहीं सोफे पर बैठ गया। इस वक्त वहाॅ रखे बाॅकी सोफों पर उसके सभी मित्र यार बैठे हुए थे। सबके चेहरों पर चिंता व परेशानी साफ दिखाई दे रही थी।

"क्या कहा कमिश्नर ने?" अशोक मेहरा ने उत्सुकता से पूछा था।
"क्या उस रेप की वजह से हमारे बच्चे गायब हैं?" सुनीता वर्मा ने कहा___"ज़रूर पुलिस वालों ने ही उन सबको गिरफ्तार किया होगा।"

"पुलिस की इतनी हिम्मत नहीं है सुनीता कि वो हमारे बच्चों को छू भी सके।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"मुझे लगता है कि हमारे बच्चे खुद ही अंडरग्राउण्ड हो गए हैं। उन्होंने सोचा होगा कि इस हादसे से कहीं उनको पुलिस न पकड़ ले। इस लिए वो कहीं छुप गए होंगे। उन बेवकूफों का इतना भी दिमाग़ नहीं चला कि उनको किसी से डरने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी। ख़ैर, तुम लोग चिन्ता मत करो। हमारे बच्चे जहाॅ भी होंगे सही सलामत ही होंगे।"

"पर चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"उन लोगों को हमें एक बार फोन तो कर ही देना चाहिये था। मगर दो दिन से फोन ही बंद हैं उन सबका। समझ में नहीं आ रहा कि कहाॅ गए होंगे वो। आपके फार्महाउस पर भी नहीं हैं। हमारे आदमी देख आए हैं वहाॅ। लेकिन हैरानी की बात है कि आपके फार्महाउस के वो दोनो गार्ड्स भी वहाॅ नहीं हैं। इसका क्या मतलब हो सकता है?"

"भाग गए होंगे साले कामचोर।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"उस समय जब उनके हाॅथ में बंदूखें थमाई थी तभी समझ आ गया था कि ये इस काम के लिए बेहद कमज़ोर हैं। ख़ैर छोड़ो। कमिश्नर को हमने डोज दे दी है। वो ज़रूर पता करेगा बच्चों का।"

"आप तो ऐसे बेफिक्र हैं चौधरी साहब जैसे आपको अपने बच्चों की कोई चिंता ही नहीं है।" सुनीता वर्मा ने कहा___"पर मुझे चिंता है। क्योंकि मुझ विधवा का एक वही तो सहारा है। अगर उसे कुछ हो गया तो किसके लिए जियूॅगी मैं?"

"ओफ्फो सुनीता।" दिवाकर चौधरी ने सहसा उसे अपनी तरफ खींच लिया। एक हाॅथ से उसकी ठुड्डी पकड़ कर बोला___"वैसे तो उसे कुछ नहीं होगा। और अगर थोड़े पल के लिए मान भी लिया जाए तो चिंता क्यों करती हो? हम हैं न तुम्हारे सहारे के लिए। अब तक भी तो सहारा ही बने हुए थे हम और आगे भी बने ही रहेंगे।"

"आपको तो बस हर वक्त मस्ती ही सूझती रहती है चौधरी साहब।" सुनीता ने कहा__"जबकि इस वक्त हालात किस क़दर गंभीर हैं इसका आपको अंदाज़ा भी नहीं है।"
"तुम भूल रही हो सुनीता डार्लिंग कि हम कौन हैं?" दिवाकर चौधरी ने कहा__"हम इस शहर की वो हस्ती हैं जिसकी इजाज़त के बिना एक पत्त भी नहीं हिल सकता। इस लिए तुम इस बात की चिंता करना छोंड़ दो कि बच्चों के साथ कोई बुरा करेगा।"

"चौधरी साहब बिलकुल ठीक कह रहे हैं सुनीता।" अशोक मेहरा ने कहा___"हमारे बच्चे ज़रूर किसी दूसरे शहर में मौज मस्ती कर रहे होंगे।"
"मौज मस्ती हमें भी तो करनी चाहिए न अशोक?" दिवाकर ने कहा___"बहुत दिन हो गए सुनीता के साथ भरपूर मस्ती नहीं की हमने।"

"आपने तो मेरे मन की बात कह दी चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने मुस्कुराते हुए कहा___"आज हो ही जाए मस्ती।"
"क्या कहती हो डार्लिंग?" दिवाकर चौधरी ने सुनीता के एक भारी बोबे को ज़ोर से मसलते हुए कहा___"हो जाए वन टू का फोर?"

"अरे मैं तो चाहती ही हूॅ कि आप सब मुझे मसल कर रख दो।" सुनीता ने अपने होठों को दाॅतों तले दबाते हुए कहा___"मेरे जिस्म में तो हर वक्त आग लगी रहती है। अलोक का बाप तो कमीना मुझे भरी जवानी में छोंड़ कर मर गया। वो तो भगवान का शुकर था कि आप लोग मेरे जीवन में आ गए वरना जाने क्या होता मेरा?"

"भगवान सब अच्छे के लिए ही करता है मेरी राॅड सुनीता।" दिवाकर चौधरी ने सुनीता के ब्लाउज के बटन खोलते हुए कहा___"और आज तो हम सब तेरी आगे पीछे दोनो साइड से अच्छे से लेंगे।"

"हाॅ तो ठीक है न।" सुनीता ने अपना हाथ बढ़ा कर दिवाकर के पजामें के ऊपर से ही उसके लौड़े को पकड़ लिया___"मेरा कोई भी छेंद खाली न रखना।"
"आज तो साली तेरी चीखें निकालेंगे हम तीनों।" दिवाकर चौधरी ने कहा___"चलो भाई लोग अंदर कमरे में चलो। आज इस राॅड को तबीयत से पेलते हैं।"

दिवाकर चौधरी की बात सुन कर बाॅकी तीनो भी मुस्कुराते हुए सोफों से उठ खड़े हुए।
"चौधरी साहब आपकी बेटी तो नहीं है न बॅगले में?" अशोक मेहरा ने पूछा__"वरना उसे पता चल जाएगा कि हम सब क्या कर रहे हैं।"
"नहीं है यार।" दिवाकर ने कहा___"शायद कहीं बाहर गई हुई है।"

अभी वे सब कमरे की तरफ बढ़े ही थे कि सहसा पीछे से दिवाकर के पीए ने आवाज़ दी।
"चौधरी साहब, चौधरी साहब।" पीए ने बदहवास से लहजे में कहा था।

"क्या बात है मनोहर लाल?" दिवाकर चौधरी के लहजे में कठोरता थी__"क्यों गला फाड़ रहे तुम? देख नहीं रहे, हम ज़रूरी काम से कमरे में जा रहे हैं?"
"ज़रूर जाइये चौधरी साहब।" मनोहर लाल ने अजीब भाव से कहा___"लेकिन उससे पहले इसे तो देख लीजिए।"

"क्या है ये?" दिवाकर चौधरी की भृकुटी तन गई, बोला___"तुम हमें मोबाइल देखने का कह रहे हो इस वक्त? दिमाग़ तो ठीक है न तुम्हारा?"
"आप एक बार देख लीजिए न चौधरी साहब।" मनोहर लाल ने विनती भरे भाव से कहा___"उसके बाद आपको जो करना है करते रहिएगा।"

"दिखाओ क्या है ये?" दिवाकर चौधरी ने मनोहर लाल के हाथ से मोबाइल छींन लिया था। मोबाइल की स्क्रीन पर कोई वीडियो पुश मोड पर नज़र आ रहा था।
"तुमने हमें ये दिखाने के लिए रोंका है मनोहर लाल?" दिवाकर चौधरी ने गुस्से से कहा।
"गुस्सा मत कीजिए चौधरी साहब।" मनोहर लाल ने कहा___"एक बार उस वीडिओ को प्ले तो कीजिए।"

दिवाकर चौधरी ने पहले तो खा जाने वाली नज़रों से मनोहर लाल को देखा फिर मोबाइल की स्क्रीन पर देखते हुए उस वीडिओ को प्ले कर दिया। बड़े से स्क्रीन टच मोबाइल में वीडिओ के प्ले होते ही जो कुछ नज़र आया उसे देख कर दिवाकर चौधरी के होश उड़ गए। दिलो दिमाग़ सुन्न सा पड़ता चला गया। ये सच है कि उसके हाॅथ से मोबाइल छूटते छूटते बचा था। सिर पर एकाएक ही जैसे पूरा आसमान ही भरभरा कर गिर पड़ा था उसके।

चौधरी की हालत एक पल में ऐसी हो गई जैसे उसका सब कुछ लुट गया हो। चेहरा फक्क पड़ गया था उसका। बाॅकी दोनो और सुनीता भी चौधरी की ये दशा देख कर बुरी तरह चौंके। उन्हें समझ न आया कि अचानक चौधरी साहब को क्या हो गया है।

"क्या हुआ चौधरी साहब?" अवधेश श्रीवास्तव ने हैरानी से कहा__"आप इस तरह बुत से क्यों बन गए? क्या है उस मोबाइल में?"
"आं हा, लो तुम भी देख लो।" दिवाकर चौधरी ने मोबाइल पकड़ा दिया उसे।

अवधेश के साथ साथ अशोक व सुनीता ने भी मोबाइल में चालू वीडियो को देखा। और अगले ही पल उनकी भी हालत खराब हो गई।
"ये सब क्या है मनोहर लाल?" अशोक वर्मा ने गुस्से से कहा___"चौधरी साहब का ऐसा वीडियो इस मोबाइल में कहा से आया?"

"ये वीडियो किसी अंजान नंबर से भेजा गया है सर।" मनोहर ने कहा___"अभी पाॅच मिनट पहले ही आया है। इतना ही नहीं अलग अलग चार वीडियो और भी हैं। बाॅकियों को भी प्ले करके देख लीजिए।"

अशोक ने वैसा ही किया। कहने का मतलब ये कि चारो वीडियो अलग अलग ब्यक्तियों के थे। पहला दिवाकर चौधरी का, दूसरा अशोक मेहरा का, तीसरा सुनीता वर्मा का और चौथा अवधेश श्रीवास्तव का।

चारो वीडियो देखने के बाद उन चारों की हालत बेहद खराब हो गई। सबके पैरों तले से ज़मीन कोसों दूर निकल गई थी।

"चौधरी साहब ये सब वीडियो हम लोगों के कैसे बन गए?" अशोक मेहरा ने कहा__"और इन वीडियोज में जो जगह है वो तो आपके फार्महाउस की ही है। मतलब साफ है कि वहीं पर हमारे ऐसे वीडियो बनाए गए। मगर सवाल है कि किसने बनाए ऐसे वीडियो? क्या हमारे बच्चों ने? यकीनन चौधरी साहब, ये उन लोगों ने ही बनाया है।"

"अशोक सही कह रहे हैं चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"हमारे बच्चों ने ही ये वीडियो बनाया। क्योंकि बाहरी कोई वहाॅ जा ही नहीं सकता।"
"ये सब छोंड़ो और ये सोचो कि ये वीडियो किसने भेजा हमारे फोन पर?" दिवाकर चौधरी ने कहा___"हमारे बच्चे तो ऐसा करेंगे नहीं। क्योंकि ऐसा करने की उनके पास कोई वजह ही नहीं है। उन्होंने ये सोच कर वीडियो बनाया कि हम अपने बाप वोगों की मौज मस्ती अपनी ऑखों से देखेंगे। उनके दिमाग़ में ऐसे वीडियोज हमारे पास भेजने का कोई सवाल ही नहीं है क्योंकि उनकी हर इच्छाओं की पूर्ति हम बखूबी करते हैं। ये किसी और का ही काम है अवधेश। हमारे फोन में वीडियो भेजने का मतलब है कि सामने वाला हमें बताना चाहता है कि उसके पास हमारी इस करतूत का सबूत है और वो हमें जब चाहे एक्सपोज कर सकता है। अब सवाल ये है कि वो कौन है जिसने ये वीडियो भेजा और किस मकसद के तहत भेजा?"

"मामला बेहद गंभीर हो गया है चौधरी साहब।" सुनीता ने कहा___"हमारे बच्चों ने तो हमें बड़ी भारी मुसीबत में डाल दिया है।"
"मुसीबत तो अब हो ही गई है मगर इससे निपटने का रास्ता तो अब ढूढ़ना ही पड़ेगा न?" दिवाकर चौधरी ने कहा__"सबसे पहले ये पता करना होगा कि ये वीडियो उसके पास कैसे आए और उसने हमें किस मकसद से भेजा है?

"वीडियो आपके फार्महाउस के उसी कमरे में बनाया गया है चौधरी साहब जिस कमरे में हम लोग अक्सर शबाब का मज़ा लूटा करते हैं।" अशोक ने कहा___"मतलब साफ है वीडियो भेजने वाले को ये वीडियो वहीं से मिले होंगे। अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि आपके फार्महाउस पर ऐसा कौन ब्यक्ति गया और ये सब वीडियोज वहाॅ से उठा कर चंपत हो गया? आपके फार्महाउस के वो गार्ड्स कहाॅ थे उस वक्त जब कोई बाहरी वहाॅ आकर ये सब काण्ड कर गया?"

अशोक मेहरा की इन बातों से सन्नाटा छा गया हाल में। सबका दिमाग़ मानो चकरघिन्नी बन कय रह गया था। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि ये सब अचानक कौन सी आफत आ गई थी। जिसने उन सब महारथियों को अपंग सा बना दिया था।

"मनोहर लाल पता करो किसने ये हिमाकत की है?" दिवाकर चौधरी ने कहा___"जिस नंबर से ये वीडियोज आईं हैं उस नंबर पर फोन करो।"
"मैने बहुतों बार फोन लगाया चौधरी साहब लेकिन नंबर बंद बता रहा है।" मनोहर लाल ने कहा___"आप कहें तो पुलिस को ये नंबर दे दूॅ वो जल्द ही पता कर लेंगे कि ये नंबर किसका है और किस जगह से इस नंबर के द्वारा ये वीडियोज भेजी गई हैं?"

"तुम्हारा दिमाग़ तो नहीं ख़राब हो गया मनोहर लाल।" दिवाकर गुस्से से बोला__"ये घटिया ख़याल आया कैसे तुम्हारे ज़हन में? सोचो अगर हमने पुलिस को नंबर दिया तो उसका अंजाम क्या हो सकता है? जिसने भी ये दुस्साहस किया है वो कोई मामूली ब्यक्ति नहीं हो सकता। उसे भी ये पता होगा कि हम उसका पता लगाने के लिए उसका नंबर पुलिस को दे सकते हैं। उसने पुलिस को नंबर न देने की कोई चेतावनी भले ही हमें नहीं दी है मगर हमें तो सोचना समझना चाहिए न? अगर हमने ऐसा किया तो संभव है कि वो हमारे ये वीडियो पुलिस को दे दे या सार्वजनिक कर दे। उस सूरत में हमारा सारा किस्सा ही खत्म हो जाएगा। शहर की जनता और ये पुलिस प्रशासन सब हमारे खिलाफ़ हो जाएॅगे। इस लिए हमें ठंडे दिमाग़ से इसके बारे में सोचना होगा। बिना मतलब के या बिना मकसद के कोई किसी के साथ ऐसा नहीं करता। उसने ऐसा किया है तो देर सवेर ज़रूर उसका कोई मैसेज या फोन भी आएगा। तब हम उससे पूछेंगे कि वह क्या चाहता है हमसे?"

"इसका मतलब अब हम उस ब्यक्ति के किसी फोन या मैसेज का इंतज़ार करें जिसने ये वीडियोज हमें भेजा है?" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा।
"इसके अलावा हमारे पास दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं है।" दिवाकर ने कहा___"हमें एक बार उससे बात तो करनी पड़ेगी। आख़िर पता तो चले कि उसने ऐसा किस मकसद से किया है? उसके बाद ही हम कोई अगला क़दम उठा सकते हैं।"

"ठीक है चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने कहा___"जैसा आप उचित समझें वैसा कीजिए। मगर ये मैटर ऐसा है कि हम सबके होश उड़ा देगा। सब कुछ बरबाद कर देगा।"
"बस एक बार उसका कोई फोन या मैसेज तो आने दो।" दिवाकर ने कहा___"उसके बाद हम बताएॅगे उसे कि हमारे साथ ऐसी हरकत करने का अंजाम कितना भयावह होता है।"

दिवाकर चौधरी की इस बात से एक बार फिर हाल में सन्नाटा छा गया। किन्तु सबके मन में जो तूफान उठ चुका था उसे रोंकना उनके बस में न था।
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"चौधरी आज से तेरे बुरे दिन शुरू हो गए हैं। मासूम और मजलूमों पर तूने, तेरे साथियों ने और तेरे हराम के पिल्लों ने जो भी ज़ुल्म ढाए हैं उनका हिसाब देने का समय आ गया है।" रितू की कार ऑधी तूफान बनी फार्महाउस की तरफ दौड़ी जा रही थी। साथ ही मन ही मन वह ये सब कहती भी जा रही थी।

रितू ने ऐसी जगह से अपने नये मोबाइल फोन द्वारा वो वीडियोज चौधरी के मोबाइल पर भेजे थे जिस जगह पर एक नई बिल्डिंग का निर्माण कार्य चल रहा था। किन्तु इस वक्त वहाॅ पर कोई न था। यहीं से उसने चौधरी को वोडियोज भेजे थे। वीडियो भेजने के बाद उसने फोन को स्विचऑफ कर दिया था। उसका खुद का जो आईफोन था वो पहले से ही स्विचऑफ था। उसके दिमाग़ में हर चीज़ से बचने की भी सोच थी।

ऑधी तूफान बनी उसकी जिप्सी उसके फार्महाउस पर रुकी। जिप्सी से उतर कर वह तेज़ी से अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। बाहर मेन गेट पर शंकर काका नज़र आया था उसे किन्तु हरिया काका नज़र नहीं आया था। कमरे में जाकर उसने नया वाला फोन आलमारी में रखा और उसे लाॅक कर तुरंत पलटी।

जिप्सी में बैठी रितू का रुख अब अपने हवेली की तरफ था। उसके दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से कई सारी चीज़ें चल रही थी। उसके ज़हन में ये बात हर पल बनी हुई थी कि उसने विधी से वादा किया था कि विराज को उसके पास ज़रूर लाएगी।

रितू के पास विराज का कोई काॅन्टैक्ट करने का ज़रिया न था। इस लिए उसने ये पता लगाने के लिए किसी आदमी को लगाया हुआ था कि उसके किसी दोस्तों के पास विराज का कोई अता पता हो। दूसरे दिन सुबह ही उसके आदमी ने उसे बताया था कि विराज के दो ही लड़के खास दोस्त हुआ करते थे। एक का नाम दिनेश सिंह था जो कि आजकल देश के किसी दूसरे राज्य में नौकरी कर रहा है। दूसरे दोस्त का नाम है पवन सिंह चंदेल। ये विराज का स्कूल के समय से ही दोस्त था। ग़रीब है, आज कल हल्दीपुर में ही बस स्टैण्ड के पास पान की दुकान खोल रखा है। घर में विधवा माॅ के अलावा एक बहन है जो ऊम्र में उससे बड़ी है। मगर आर्थिक परेशानी की वजह से वह अपनी बड़ी बहन की शादी नहीं करा पा रहा है।

रितू के खबरी ने उसे पवन सिंह का नंबर लाकर दिया था। रितू ने पवन को फोन लगा कर उसे अपना परिचय दिया और मिलने का कहा था। खैर, रातू जब पवन से मिली तो उससे विराज के बारे में पूछा तो पवन ने बड़ा अजीब सा जवाब दिया था उसे।

"आप मेरे दोस्त राज की बड़ी बहन हैं इस लिए आप मेरी भी बड़ी बहन के समान ही हैं।" पवन ने कहा था___"आप मेरे घर पर आई हैं, आपका तहे दिल से स्वागत है। लेकिन अगर आप मुझसे मेरे जिगरी यार का पता या फोन नंबर पूछने आई हैं तो माफ़ कीजिएगा दीदी। मैं आपको ना तो उसका पता बताऊॅगा और ना ही उसका फोन नंबर दूॅगा।"

"लेकिन क्यों पवन क्यों?" रितू ने चकित भाव से कहा था___"तुम एक बहन को उसके भाई का अता पता क्यों नहीं बताओगे?"
"बहन.....भाई???" पवन सिंह बड़े अजीब भाव से हॅसा था, उसकी उस हॅसी में रितू ने साफ साफ दर्द महसूस किया____"कौन बहन भाई दीदी? अरे मेरे यार ने तो सबको हमेशा अपना ही माना था मगर उसके खुद के माॅ बाप और बहन के अलावा किसी भी परिवार वाले ने उसे अपना नहीं माना। और और आप???? आप भी बताइये दीदी, आप ने राज को कब अपना भाई माना था? अरे उसे तो आपने बचपन से लेकर आज तक सिर्फ दुत्कारा है दीदी। ख़ैर, जाने दीजिए। आपसे ये सब कहने का मुझे कोई हक़ नहीं है। माफ़ करना दीदी, आपको देख कर जाने कैसे गुस्सा सा आ गया था और दिल का गुबार मुख से निकल गया। मगर, जिस काम के लिए आप यहाॅ आई हैं वो हर्गिज़ नहीं होगा। मुझे सब पता है दीदी, मेरे दोस्त राज और उसकी माॅ बहन को खोजने के लिए आपके डैड ने अपने आदमियों को जाने कब से लगाया हुआ है। मगर कोई भी उनका आदमी उसे ढूॅढ़ नहीं पाएगा।"

"तुम ग़लत समझ रहे हो पवन।" रितू ने बेचैनी भरे भाव से कहा था___"मैं ये मानती हूॅ कि मैने अपने उस भाई को कभी अपना नहीं माना था लेकिन आज ऐसा नहीं है भाई। आज तुम्हारी ये दीदी बहुत प्यार करने लगी है अपने उस भाई से। इस वक्त अगर राज मेरे सामने आ जाए तो मैं उसके पैरों में पड़ कर उससे अपने किये की मुआफ़ी माॅग लूॅगी। ये सब समय समय की बातें हैं पवन। हम जब बच्चे होते हैं तो बिलकुल कुम्हार के पास रखी हुई उस गीली और कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं। हमारे माता पिता कुम्हार की तरह ही होते हैं। वो जैसे चाहें अपने बच्चों को किसी मिट्टी के घड़े की तरह ढाल देते हैं। कहने का मतलब ये कि, मेरे माॅम डैड ने हम बहन भाइयों को बचपन से जो सिखाया पढ़ाया हम उसी को करते चले गए। लेकिन वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता पवन। हर सच्चाई को एक दिन पर्दे से निकल कर बाहर आना ही पड़ता है। यही उसकी नियति होती है। और सच्चाई क्या है क्या नहीं ये मुझे समझ आ गया है। मुझे पता है पवन कि मेरा भाई राज वो कोहिनूर है जिसका कोई मोल हो ही नहीं सकता।"

"वाह दीदी वाह।" पवन कह उठा___"आज आपके मुख से ये अमृत वाणी कैसे निकल रही है? हैरत की बात है, खैर मुझे क्या है। मगर इतना जान लीजिए कि मैं आपकी इन मीठी बातों के जाल में फॅसने वाला नहीं हूॅ। मेरी वजह से मेरे दोस्त को कोई नुकसान नहीं पहुॅचा सकता। अब आप जाइये दीदी। मुझे आपसे और कोई बात नहीं करनी है।"

"कैसे यकीन दिलाऊॅ पवन?" रितू की ऑखों में ऑसू आ गए___"आखिर कैसे तुम्हें यकीन दिलाऊॅ कि मैं अब वैसी नहीं रही? मैं हनुमान जी की तरह अपना सीना चीर कर नहीं दिखा सकती मगर भगवान जानता है कि मेरे सीने में मेरा भाई ज़रूर मौजूद हो गया है। तुम मुझे उसका गुनहगार समझते हो तो चलो ठीक है पवन। तुम मुझे राज का अता पता भी न दो मगर इतना तो उसे बता ही सकते हो न वो कुछ देर के लिए अपनी उस विधी के पास आ जाए जिससे वह आज भी उतना ही प्यार करता होगा जितना पहले करता था।"

"नाम मत लीजिए उस बेवफ़ा का।" पवन ने सहसा आवेशयुक्त लहजे में कहा___"उसी की बेवफ़ाई की वजह से मेरा दोस्त रात रात भर मेरे पास रोता रहता था। कितना चाहता था वो उसे। मगर उस दिन पता चला कि दुनियाॅ भर की कसमें और दलीलें देने वाली वो लड़की कितनी झूठी और मक्कार थी जिस दिन आप लोगों ने मेरे दोस्त को और उसके माॅ बहन को हवेली से बाहर धकेल दिया था। उधर आप लोगों ने हवेली से धकेला और इधर उस कम्बख्त ने मेरे दोस्त को अपने दिल से धकेल दिया। एक पल में गिरगिट की तरह रंग बदल लिया था उस लड़की ने। रुपये पैसे से मोहब्बत थी उसे ना कि मेरे दोस्त से।"

"सच्चाई क्या है इसका तुम्हें पता नहीं है पवन।" रितू ने दुखी भाव से कहा__"तुम और विराज ही क्या बल्कि नहीं समझ सकता कि उसने ऐसा क्यों किया था?"
"अरे दौलत के लिए दीदी दौलत के लिए।" पवन ने झट से कहा___"उसने मेरे दोस्त की सच्ची मोहब्बत को अपने पैरों तले रौंदा था।"

"ये सच नहीं है पवन।" रितू ने कहा__"अगर सच्चाई जान लोगे न तो पैरों तले से ज़मीन गायब हो जाएगी तुम्हारे। उसने ये सब इस लिए किया था ताकि विराज उससे नफ़रत करने लगे और किसी दूसरी लड़की के साथ प्यार मोहब्बत करने का सोचे। माना कि ये आसान नहीं था मगर वक्त और हालात हर ज़ख्म भर देता और एक नया मोड़ भी जीवन में ले आता है।"

"आप कहना क्या चाहती हैं दीदी?" पवन ने कहा___"और इन सब बातों का आज कहने का क्या मतलब है?"
"विधी को ब्लड कैंसर था पवन।" रितू ने मानो धमाका किया___"और वो भी लास्ट स्टेज का। इसी लिए उसने ये सब किया था राज के साथ। ताकि वह उसे भूल जाए और दूर हो जाए उससे।"

"क क्या?????" पवन बुरी तरह चौंका था___"ये ये आप क्या कह रही हैं दीदी? विधी को कैंसर?? नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। ये सब झूठ है।"
"अगर तुम्हें मेरी बात का यकीन नहीं है तो मेरे साथ चल कर खुद अपनी ऑखों से देख लो तुम।" रितू ने कहा___"इस वक्त भी वह हास्पिटल में ही है। तुमने शायद सुना नहीं होगा उस रेप के बारे में जो अभी कुछ दिनों पहले ही हुआ था। विधी के साथ ये हादसा हुआ था जिससे उसकी हालत बहुत खराब हो गई थी। हास्पिटल में जब उसे भर्ती किया गया तभी उसके चेकअप से डाक्टर को ये पता चला कि विधी को लास्ट स्टेज का ब्लड कैंसर है। जबकि कैंसर वाली बात विधी को पहले से ही पता थी।"

पवन सिंह रितू को अजीब भाव से इस तरह देखने लगा था जैसे रितू का सिर धड़ से अलग होकर ऊपर हवा में अचानक ही कत्थक करने लग गया हो। अविश्वास से फटी हुई उसकी ऑखों में एकाएक ही ऑसू आ गए।

"हे भगवान! ये क्या हो गया?" पवन ने ऊपर की तरफ देख कर दुखी भाव से कहा__"एक और सच्चे प्रेम की ये दशा कर दी तूने। बहुत बेरहम और बेदर्द है तू। दीदी, मुझे उस महान लड़की को देखना है। उससे मुआफ़ी माॅगना है। हे भगवान कितना बुरा भला कहा मैने उसे और आज तक बुरा भला सोचता भी रहा हूॅ।"

रितू पवन को लेकर हास्पिटल पहुॅची तो पवन ने देखा विधी को। विधी की कुरुण हालत देख कर पवन का कलेजा मुह को आ गया। वह विधी के पैरों में अपना सिर रख दिया और माफ़ी माॅगने लगा। पवन बहुत ही भावुक किस्म का लड़का था, इस लिए ज्यादा देर तक वह विधी के पास न रह सका था। उसे रह रह कर रोना आने लगता था।

हास्पिटल से बाहर आकर उसने खुद को और अपने अंदर के जज़्बातों को शान्त किया। तभी पीछे से रितू ने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसने पलट कर देखा उसे।

"क्या अब भी तुम्हें लगता है पवन कि मैं तुमसे झूॅठ बोल रही हूॅ?" रितू ने कहा था।
"नहीं दीदी, प्लीज माफ़ कर दीजिए।" पवन ने अपने हाथ जोड़ कर कहा था।
"इसी विधी ने मुझे एहसास कराया कि मैं कितना ग़लत सोचती थी अब तक अपने भाई विराज के लिए।" रितू ने कहा___"विधी की कहानी ने मुझे ये एहसास कराया भाई कि मेरा अपने भाई के लिए आज तक अनुचित ब्यौहार करना कितना ग़लत था। इसको मैने वचन दिया है पवन कि इसके महबूब को इसके पास ज़रूर लाऊॅगी। मैं इसी लिए तुम्हारे पास आई थी पवन। मैंने अपने भाई के साथ क्या किया है अबतक उसका फल मुझे ज़रूर मिलेगा और मिलना भी चाहिए।"

"ऐसा मत कहिए दीदी।" पवन ने कहा__"ये सब समय समय की बातें हैं। जो बीत गया उसे भूल जाइये और एक नया संसार बनाने की सोचिये। मैं अभी विराज को फोन करता हूॅ और उसे विधी के बारे में सब बताता हूॅ।"

"नहीं नहीं पवन।" रितू ने झट से कहा__"उसे ये मत बताना कि विधी को क्या हुआ है। बल्कि कुछ और बोलो। कुछ ऐसा कि वो दूसरे दिन मुंबई से यहाॅ आने के लिए चल दे।"
"ठीक है दीदी।" पवन ने कहा था__"मैं ऐसा ही करता हूॅ।"

कहने के साथ ही पवन ने विराज को फोन को फोन लगा दिया था। उसका दिल बुरी तरह धड़के जा रहा था। रिंग जाने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। और तभी,

"हाॅ भाई बोल कैसे याद किया?" उधर से विराज ने कहा था।
"भाई अगर तेरे पास टाइम हो तो तू जल्दी से गाॅव आ जा।" पवन ने कहा था।
"अरे क्या हुआ भाई?" विराज के चौंकने जैसी आवाज़ आई___"सब ठीक तो है ना?"

"बस भाई तू कल ही आजा यहाॅ।" पवन ने गंभीरता से कहा___"तुझे मेरी क़सम है भाई। तू कल यहाॅ आएगा।"
"पर बात क्या है पवन?" विराज का चिंतित स्वर उभरा___"देख तू मुझसे कुछ भी मत छुपा ओके। चाची(पवन की माॅ) की तबीयत तो ठीक है ना? पूजा दीदी ठीक तो हैं ना मेरे भाई? सच सच बता न क्या बात है?"

"भाई परेशान न हो।" पवन ने कहा__"बस तू कल आजा भाई। बाॅकी सब कुछ तुझे यहाॅ आने पर ही पता चलेगा। तू आएगा न कल?"
"मैं आज ही रात की ट्रेन से निकल लूॅगा यहाॅ से।" विराज ने कहा___"कल दोपहर तक पहुॅच जाऊॅगा।"

"ठीक है भाई मैं तुझे बस स्टैण्ड पर ही मिलूॅगा।" पवन ने कहा___"मुझे पहुॅचते ही फोन कर देना।"
"आखिर बात क्या है यार?" विराज की आवाज़ आई___"तू बता क्यों नहीं रहा है?"
"तू आजा बस।" पवन ने कहा___"चल रखता हूॅ फोन।"

पवन ने फोन काट दिया। एक गहरी साॅस ली उसने और फिर रितू की तरफ देखते हुए कहा___"लीजिए दीदी। मेरा यार कल दोपहर को आ जाएगा यहाॅ।"

"तुमने मेरे वचन को झूठा होने से बचा लिया मेरे भाई।" रितू ने की ऑखें भर आई। उसने झपट कर पवन को अपने गले से लगा लिया।
"आपने भी तो मुझे पाप करने से बचाया दीदी।" पवन ने कहा___"आज तक मैं अपने मन में उस विधी को जाने कितना बुरा भला कहता था जिस विधी को मुझे प्रणाम करना चाहिए था।"

"ऐसी बातें मेरे भाई विराज का एक अच्छा दोस्त ही कह सकता है।" रितू ने पवन से अलग होकर कहा___"इतने ऊॅचे संस्कार उसके ही दोस्तों में हो सकते हैं। मुझे अपने भाई और उसके ऐसे दोस्तों पर नाज़ है। चलो अब मैं चलती हूॅ भाई। लेकिन एक विनती है तुमसे, विराज से ये मत कहना कि ये सब मैने कहा था तुमसे।"

"अरे मगर क्यों दीदी?" पवन चौंका था__"आप ऐसा क्यों चाहती हैं? अब तो आप उसे अपने गले से लगा लीजिए दीदी। क्यों अपनी बेरुखी और बेदर्दी से उसका दिल दुखाना चाहती हैं? या फिर मैं ये समझूॅ कि आपने वो सब जो कहा था वो सब एक झूठ था?"

"नहीं मेरे भाई।" रितू ने कहा___"मैं तो चाहती हूॅ कि अपने भाई को मैं अपने कलेजे से लगा लूॅ मगर मुझे ये भी पता है कि उसकी जान को खतरा भी है। अगर मेरे डैड को पता चल जाए कि विराज गाॅव आया हुआ है तो सोचो क्या होगा? इस लिए मैं सबसे पहले उसकी सेफ्टी का ख़याल रखूॅगी।"

"ओह दीदी सचमुच।" पवन ने कहा__"ये तो मैं भूल ही गया था। तो आप उसकी सेफ्टी के लिए क्या करेंगी दीदी?"
"वो तुम मुझ पर छोंड़ दो भाई।" रितू ने कहा___"मेरे रहते मेरे भाई को कोई छू भी नहीं सकेगा।"

रितू के चेहरे पर एकाएक ही कठोरता आ गई थी। पलक झपकते ही शेरनी की भाॅति ज़लज़ला नज़र आने लगा था उसके चेहरे पर। पवन सिंह एक बार को तो काॅप ही गया था उसे इस रूप में देख कर।

रितू के मन में यही सब फिल्म की तरह चल रहा था। उसकी जिप्सी ऑधी तूफान बनी हवेली की तरफ दौड़ी जा रही थी। उसे पता था कि उसका बाप विराज को खोजने के लिए अपने आदमियों को लगाया हुआ है। संभव है कि अजय सिंह ने अपने आदमियों को गाॅव हल्दीपुर और शहर गुनगुन में भी फैला रखा हो। रितू के मन में सिर्फ एक ही विचार था कि विराज को किसी भी हालत में अपने बाप और उसके आदमियों की नज़र में नहीं आने देना है। ये उसकी जिम्मेदारी थी कि विराज पर किसी तरह का कोई संकट न आ पाए। क्योंकि वास्तविकता तो यही थी न कि विराज को उसने ही पवन सिंह के द्वारा बुलवाया है।

रितू की जिप्सी हवेली के गेट से अंदर दाखिल होते हुए पोर्च में जाकर रुकी। जिप्सी से उतर कर वह अंदर की तरफ बढ़ गई।

दोस्तो अपडेट हाज़िर है,,,,,,,,

मैने आप लोगों को अपनी दूसरी कहानी के अपडेट में बताया था कि मेरे रिलेटिव में शादी है इस लिए मुझे वापस घर जाना है। मैं उसी दिन घर के लिए निकल गया था दोस्तो। इसी लिए अपडेट नहीं दे पाया। आप लोग तो जानते हैं इस समय शादियों का सीजन चल रहा है। तो दोस्तो उसी के लिए वापस छुट्टी लेकर आया हूॅ घर।

ये अपडेट मैने जल्दी जल्दी में लिखा है ताकि आप लोगों को इरिटेट न होना पड़े। लेकिन इसके बाद अपडेट आने में देर हो सकती है दोस्तो इस लिए नाराज़ न होना।

धन्यवाद,,,,,
 
एकनयासंसार

अपडेट........《 40 》

अब तक,,,,,,,,

"ओह दीदी सचमुच।" पवन ने कहा__"ये तो मैं भूल ही गया था। तो आप उसकी सेफ्टी के लिए क्या करेंगी दीदी?"
"वो तुम मुझ पर छोंड़ दो भाई।" रितू ने कहा___"मेरे रहते मेरे भाई को कोई छू भी नहीं सकेगा।"

रितू के चेहरे पर एकाएक ही कठोरता आ गई थी। पलक झपकते ही शेरनी की भाॅति ज़लज़ला नज़र आने लगा था उसके चेहरे पर। पवन सिंह एक बार को तो काॅप ही गया था उसे इस रूप में देख कर।

रितू के मन में यही सब फिल्म की तरह चल रहा था। उसकी जिप्सी ऑधी तूफान बनी हवेली की तरफ दौड़ी जा रही थी। उसे पता था कि उसका बाप विराज को खोजने के लिए अपने आदमियों को लगाया हुआ है। संभव है कि अजय सिंह ने अपने आदमियों को गाॅव हल्दीपुर और शहर गुनगुन में भी फैला रखा हो। रितू के मन में सिर्फ एक ही विचार था कि विराज को किसी भी हालत में अपने बाप और उसके आदमियों की नज़र में नहीं आने देना है। ये उसकी जिम्मेदारी थी कि विराज पर किसी तरह का कोई संकट न आ पाए। क्योंकि वास्तविकता तो यही थी न कि विराज को उसने ही पवन सिंह के द्वारा बुलवाया है।

रितू की जिप्सी हवेली के गेट से अंदर दाखिल होते हुए पोर्च में जाकर रुकी। जिप्सी से उतर कर वह अंदर की तरफ बढ़ गई।
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अब आगे,,,,,,,,

पवन से फोन पर बात करने के बाद मैं थोड़ी देर के लिए गहरी सोच में डूब गया था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि पवन ने आख़िर किस वजह से मुझे गाॅव आने के लिए कहा था? पूछने पर भी उसने कुछ नहीं बताया था। काफी देर तक इस बारे में सोचने के बाद भी जब मुझे कुछ समझ न आया तो मैने अपने दिमाग़ से इस बात को झटक कर बाइक स्टार्ट की और घर की तरफ चल दिया।

रास्ते में मैं ये सोच रहा था कि गाॅव जाने के लिए माॅ से कैसे अनुमति मिलेगी मुझे? क्योंकि मेरे गाॅव जाने का सुन कर ही उनके होश उड़ जाना है और ये भी निश्चित था कि वो मुझे गाॅव जाने की इजाज़त किसी भी हाल में नहीं देंगी। लेकिन मेरा गाॅव जाना तो अब ज़रूरी हो गया था।

घर पहुॅच कर मैने बाइक को गैराज में लगाया और मुख्य दरवाजे के पास आ गया। डोर बेल पर उॅगली से पुश किया। अंदर बेल की आवाज़ गई। कुछ ही पलों में दरवाजा खुला। मेरी माॅ मेरे सामने दरवाजा खोल कर खड़ी थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही उनके गुलाबी होंठो पर मुस्कान फैल गई।

"आ गया मेरा बेटा।" माॅ ने मेरे सिर से लेकर चेहरे तक अपना हाॅथ फेरते हुए कहा__"चल आजा हम सब तेरे आने का ही इन्तज़ार कर रहे थे।"

मैं के साथ चलते हुए ड्राइंग रूम में पहुॅचा। वहाॅ पर रखे सोफों पर जगदीश अंकल और अभय चाचा बैठे हुए थे। निधि शायद अपने कमरे में थी।
"तो कैसा रहा हमारे राज का काॅलेज में पहला दिन?" जगदीश अंकल ने मुस्कुरा कर कहा___"आई होप, बहुत ही बेहतर रहा होगा।"

"आपने सही कहा अंकल।" मैने एक सोफे पर बैठते हुए कहा___"और आपको पता है आज पहले ही दिन मेरी दोस्ती कुछ खास लोगों से हो गई है।"
"ओह ये तो बहुत अच्छी बात है बेटे।" अंईल ने कहा___"वैसे मैने सुना है कि काॅलेजों में रैगिंग वगैरा होती है। जिसमें सीनियर स्टूडेन्ट्स अपने जूनियर्स को कई तरह से परेशान करते हैं। सो तुम्हें तो किसी सीनियर ने परेशान नहीं किया न?"

"नहीं अंकल ऐसा कुछ नहीं था और थोड़ा बहुत तो चलता है।" मैने कहा।
"वैसे राज क्या नीलम से भी तुम्हारी मुलाक़ात हुई क्या?" अभय चाचा ने पूछा।
"हाॅ चाचा जी।" मैने कहा___"लेकिन बस हमने एक दूसरे को देखा ही है। कोई बात चीत न मैने की उससे और ना ही उसने।"

"तुम्हें वहाॅ पर देख कर हैरान तो बहुत हुई होगी वो।" चाचा ने कहा___"और अब वो ज़रूर फोन करके बड़े भइया को बताएगी कि तुम भी उसी काॅलेज में पढ़ रहे हो। उसके बाद भगवान ही जाने कि क्या होगा?"

"कुछ नहीं होगा भाई साहब।" सहसा जगदीश अंकल ने कहा___"ये मुम्बई है मुम्बई। यहाॅ पर आपके बड़े भाई साहब का राज नहीं चलेगा। यहाॅ अगर उन्होंने राज को छूने की भी कोशिश की तो पल भर में उनको नेस्तनाबूत कर दिया जाएगा।"

जगदीश अंकल की बात सुन कर अभय चाचा कुछ न बोले। कदाचित वो समझ गए थे कि जगदीश अंकल सच कह रहे थे। आज के वक्त में मैं कोई मामूली इंसान नहीं था। बल्कि मुम्बई शहर के टाॅप धन कुबेरों में मेरा नाम दर्ज़ हो चुका था।

ख़ैर, इन सब बातों के बीच मैं ये सोच रहा था कि गाॅव जाने की बात माॅ से कैसे कहूॅ? मेरे पास वैसे भी ज्यादा समय नहीं रह गया था। मैं अपनी जगह से उठ कर माॅ के पास उनके सोफे पर बैठ गया। मुझे अपने पास बैठते देख माॅ ने प्यार से एक बार फिर मेरे सिर पर हाॅथ फेरा। मेरे चेहरे की तरफ कुछ पल देखने के बाद कहा___"क्या बात है राज? कुछ कहना है क्या तुझे?"

"वो माॅ वो...मुझे न..वो मुझे।" मेरी आवाज़ अटक सी रही थी___"मुझे न आज और इसी समय गाॅव जाना होगा। बहुत ज़रूरी है।"
"क्या?????" माॅ मेरी बात सुन कर उछल ही पड़ी थी, बोली__"ये तू क्या कह रहा है? नहीं हर्गिज़ नहीं। तू गाॅव नहीं जाएगा। तेरे मन में गाॅव जाने का ख़याल आया कैसे?"

मेरी बात से माॅ तो उछली ही थी किन्तु उनके साथ ही साथ जगदीश अंकल और अभय चाचा भी बुरी तरह चौंके थे।
"ये तुम क्या कह रहे हो राज?" जगदीश अंकल ने हैरानी से कहा___"तुम्हें गाॅव किस लिए जाना है? आख़िर ऐसा क्या ज़रूरी काम आ गया?"

"वो पवन का फोन आया था मुझे काॅलेज से आते समय।" मैने कहा___"पवन मेरा बचपन का बहुत ही गहरा दोस्त है। उसी का फोन आया था। उसने मुझे अर्जेटली गाॅव बुलाया है। मैने उससे वजह पूछी मगर उसने बस इयना ही कहा कि तू बस आजा।"

मैने उन सबको पवन से हुई सारी बात बता दी। मेरी बातें सुनने के बाद ड्राइंगरूम में सन्नाटा सा छा गया।
"किसी का भी फोन हो और चाहे जितना भी ज़रूरी हो।" माॅ ने सन्नाटे को चीरते हुए कहा___"तू गाॅव नहीं जाएगा बस। मैं तुझे मौत के मुह में जाने की हर्गिज़ भी इजाज़त नहीं दूॅगी।"

"लेकिन तुम्हारे दोस्त को कोई वजह तो बताना ही चाहिये था राज।" जगदीश अंकल ने कहा___"भला ये क्या बात हुई कि फोन घुमा दिया और कह दिया कि तुम्हें यहाॅ आना है बस?"

"कहीं ऐसा तो नहीं भाई साहब कि राज का दोस्त अजय भइया के हाथ लग गया हो और ये सब बातें उसने उनके ही कहने पर की हों?" अभय चाचा ने कुछ सोचते हुए कहा___"यकीनन ऐसा हो सकता है। उन्होंने कहीं से पता कर लिया होगा कि गाॅव में राज का कोई दोस्त है जो अक्सर राज से फोन पर बातें करता रहता है। इस लिए उन्होंने उसे पकड़ लिया होगा और डरा धमका कर फोन करवाया होगा।"

"आपकी बातों में यकीनन वजन है भाई साहब।" जगदीश अंकल ने कहा___"यकीनन ऐसा हुआ होगा। उन्होंने राज के दोस्त को मजबूर किया होगा इस सबके लिए।"
"उसने जब मुझसे फोन पर बात की थी तब ऐसा बिलकुल भी नहीं लग रहा था कि वो किसी के द्वारा मजबूर किया गया है।" मैने कहा___"वो बिलकुल नार्मली ही बातें कर रहा था। हाॅ थोड़ा थोड़ा दुखी और उदास सा ज़रूर समझ में आ रहा था।"

"ये सब बातें छोंड़िये आप लोग।" सहसा माॅ ने कहा___"राज कहीं नहीं जाएगा बस। ये मेरा आख़िरी फ़ैसला है।"
"लेकिन बहन।" जगदीश अंकल ने कहा___"पता तो चलना ही चाहिए कि बात क्या है? मान लो कि सचमुच कोई ऐसी बात हो जिससे राज का वहाॅ पर जाना बहुत ज़रूरी ही हो तब क्या? ये सब संभावनाएॅ हैं। हमें सच्चाई जानना ज़रूरी है। एक काम करो राज तुम अभी अपने दोस्त को फोन लगाओ और उससे बात करो। हम सब सुनेंगे कि बात क्या है।"

मुझे जगदीश अंकल की बात सही लगी इस लिए मैने फोन निकाल कर तुरंत पवन को फोन लगा कर स्पीकल ऑन कर दिया। कुछ देर फोन की रिंग जाने की आवाज़ आती रही।

"हाॅ भाई चल दिया क्या वहाॅ से?" उधर से पवन का स्वर उभरा।
"यार मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि आख़िर ऐसा क्या ज़रूरी काम है जिसकी वजह से तूने मुझे वहाॅ अर्जेंट बुलाया है?" मैने कहा।

"मेरे भाई मैं तुझे फोन पर नहीं बता सकता। तू बस आजा और खुद अपनी ऑखों से देख सुन ले।" उधर से पवन अधीर भाव से कह रहा था___"मुझे पता है भाई कि तेरा यहाॅ पर आना खतरे से खाली नहीं है। मैं खुद भी तुझे किसी ऐसे खतरे में डालने का सोच भी नहीं सकता। लेकिन भाई बात ही ऐसी है कि तुझे बुलाना पड़ रहा है यहाॅ। भाई तुझे हमारी दोस्ती की कसम है, तू आजा भाई। चाहे दो पल के लिए ही आजा लेकन आजा भाई। मैं तेरे हाॅथ जोड़ता हूॅ, तू आजा मेरे यार।"

"अच्छा ये बता कि तू किसी के दबाव में या किसी के द्वारा मजबूर हो कर तो नहीं बुला रहा न मुझे?" मैने बाॅकी सबकी तरफ नज़रें घुमा कर देखते हुए कहा था।
"ये तू क्या कह रहा है राज?" पवन के स्वर में हैरानी थी, बोला___"भाई तू सोच भी कैसे सकता है कि मैं किसी के द्वारा मजबूर होकर तुझे खतरे में डाल दूॅगा? मैं मर जाऊॅगा भाई लेकिन ऐसा कभी नहीं कर सकता।"

"चल ठीक है भाई मैं आने की कोशिश करूॅगा।" मैने कहा।
"कोशिश नहीं भाई।" पवन ने कहा__"तुझे ज़रूर आना है। कल मैं तुझे बस स्टैण्ड पर ही मिलूॅगा। तेरे बड़े पापा के आदमी काफी समय से यहाॅ आस पास नहीं दिखे हैं। शायद उन्हें यकीन हो गया है कि अब तू गाॅव नहीं आएगा। किसी को कानो कान खबर नहीं होगी तेरे आने की। तू फिक्र मत ईर भाई। तू बस आजा।"

"चल ठीक है।" मैने कहा और फोन काट दिया।
"तुम्हारे दोस्त की बातचीत से तो साफ पता चलता है कि वो ये सब किसी के द्वारा मजबूर होकर नहीं बल्कि अपनी स्वेच्छा से कह रहा है।" जगदीश अंकल ने कहा___"लेकिन अब सवाल यही है कि आख़िर किस अर्जेन्ट काम के लिए उसने तुम्हें गाॅव आने के लिए कहा हो सकता है? उसने इस बारे में कुछ भी नहीं बताया। बस यही कहा कि तुम खुद अपनी ऑखों से देख सुन लो। भला ऐसी क्या बात हो सकती है जिसे अपनी ऑखों और कानों से देखने सुनने की बात की उसने?"

"ये तो वहाॅ जाकर ही पता चलेगा अंकल।" मैने कहा___"मेरा ये दोस्त ऐसा है कि मेरे बारे में कभी भी अहित नहीं सोच सकता। यही वो दोस्त है जिसने अब तक मुझे हवेली में रहने वाले लोगों की पल पल की ख़बर दी। चाचा जी जब आप यहाॅ आ रहे थे तब भी इसी ने फोन करके मुझे बताया था कि आप यहाॅ आ रहे हैं। हवेली में कुछ बात हो गई थी जिसकी वजह से हवेली में उस समय तनाव हो गया था।"

"कोई भी वजह हो तू गाॅव नहीं जाएगा मेरे बच्चे।" माॅ की ऑखों में ऑसू आ गए__"मैं तुझे नहीं जाने दूॅगी। तू यहीं मेरी नज़रों के सामने ही रहेगा।"
"आपकी इजाज़त के बिना तो मैं वैसे भी कहीं नहीं जाऊॅगा माॅ।" मैने माॅ की ऑखों से ऑसू पोंछते हुए कहा___"लेकिन ये तो आपको भी पता है न कि जो खेल शुरू हो चुका है उसको अंजाम तक ले जाना मेरा संकल्प है और फर्ज़ भी। आपका बेटा न पहले कायर और बुजदिल था और ना ही अब है। उन्होंने धोखे से हम पर वार किया था जबकि मैं सामने से उनके सीने पर वार करूॅगा।"

"ऐसा ही होगा राज बेटे।" अभय चाचा ने कहा___"मुझे सारी सच्चाई का भाभी से पता चल चुका है। इस लिए अब इस लड़ाई में मैं भी तुम्हारे साथ हूॅ। बस चिंता एक ही बात की है कि तेरी चाची और तेरे भाई बहन भले ही तेरे मामा जी के यहाॅ हैं लेकिन वो सुरक्षित नहीं हैं वहाॅ। काश! मुझे पता होता तो उन्हें भी अपने साथ ही ले आता यहाॅ।"

"अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है भाई साहब।" जगदीश अंकल ने कहा___"करूणा बहन और उसके बच्चों को सुरक्षित यहाॅ बुलाया जा सकता है।"
"वो कैसे भाई साहब?" चाचा जी के माथे पर बल पड़ता चला गया।

"गौरी बहन।" जगदीश अंकल ने माॅ की तरफ देखते हुए कहा___"तुम राज की ज़रा भी फिक्र मत करो। राज यहाॅ से गाॅव ज़रूर जाएगा लेकिन अकेला नहीं। मैं राज के साथ एक ऐसे शख्स को भेजूॅगा जो हर पल राज के साथ उसका सुरक्षा कवच बन कर रहेगा। अभय भाई साहब अपने ससुराल में फोन कर देंगे, और समझा देंगे कि कैसे उन लोगों को वहाॅ से यहाॅ आना है।"

"भइया आप भी??" माॅ ने फिक्रमंदी से कहा___"आप भी इसे भेजने की ही बात कर रहे हैं?"
"मेरी बहन मैने कहा न तुम राज की बिलकुल भी चिंता न करो।" जगदीश अंकल ने कहा___"राज अगर तुम्हारा बेटा है और तुम्हारे प्राण उस पर बसते हैं तो ये समझ लो कि मेरे प्राण भी राज पर ही बसते हैं। मैं राज के ऊपर लेश मात्र का भी खतरा नहीं चाह सकता। मगर मैं ये भी जानता हूॅ कि राज के सामने प्यार और ममता की दीवार खड़ी करके उसे उसके कर्तब्य पथ पर जाने से रोंकना भी उचित नहीं है। खतरा तो इंसान के जीवन का एक हिस्सा है बहन। इंसान का हर दिन एक नया जन्म होता है और हर दिन एक मृत्यु होती है। सुबह की पहली किरण के साथ ही इंसान के नये जीवन की शुरूआत हो जाती है और फिर जब इंसान रात में सो जाता है तो वह एक तरह से मृत समान ही हो जाता है। ख़ैर, मैं ये कह रहा हूॅ कि तुम अपने इस भाई पर यकीन रखो। मैं राज पर किसी भी तरह का संकट नहीं आने दूॅगा।"

जगदीश अंकल की बात सुन कर माॅ कुछ न बोली। बस ऑखों में नीर भरे देखती रही उन्हें।
"राज तुम जाने की तैयारी करो।" जगदीश अंकल ने कहा___"तब तक मैं भी उस शख्स को फोन कर के बुला लेता हूॅ और तुम दोनो के लिए ट्रेन की टिकट का भी इंतजाम कर देता हूॅ।"

जगदीश अंकल की बात सुन कर मैने माॅ की तरफ देखा। माॅ ने अपने सिर को हल्का सा हिला कर मुझे जाने की इजाज़त दे दी। मैं तुरंत ही उठ कर अपने कमरे की तरफ तेज़ी से बढ़ गया। लगभग पन्द्रह मिनट बाद मैं तैयार होकर तथा एक छोटे से पिट्ठू बैग में कुछ कपड़े व कुछ ज़रूरी चीज़ें डाल कर कमरे से बाहर आ गया।

कमरे से बाहर आकर मुझे निधि का ख़याल आया। मैं उसके कमरे की तरफ बढ़ गया। दरवाजे को बाहर से नाॅक कर उसे आवाज़ दी मगर अंदर से कोई प्रतिक्रिया न हुई। मैंने दरवाजे को अंदर की तरफ धकेला तो वो खुलता चला गया। कमरे के अंदर दाखिल होकर मैने देखा कि निधि बेड पर करवॅट लिए सो रही थी। सोते हुए वो बिलकुल मासूम सी बच्ची लग रही थी। मुझे उस पर बड़ा प्यार आया। मैने झुक कर उसके माथे पर हल्के से चूॅमा और फिर झुके हुए ही कहा___"अपना ख़याल रखना गुड़िया। मैं गाॅव जा रहा हूॅ अभी। जल्द ही वापस आऊॅगा।"

इतना कह कर मैंने एक बार फिर से उसके माथे को चूमा फिर पलट कर कमरे से बाहर आ गया। इस बात से अंजान कि मेरे बाहर आते ही निधि ने अपनी ऑखें खोल दी थी। उन समंदर सी गहरी ऑखों में ऑसू तैर रहे थे।

ड्राइंगरूम में जब मैं पहुॅचा तो देखा एक अंजान ब्यक्ति एक तरफ सोफे पर बैठा था। दिखने में हट्टा कट्टा था। ऊम्र यही कोई तीस या पैंतीस के बीच रही होगी उसकी। चेहरे पर पत्थर जैसी कठोरता विद्यमान थी। जबड़े कसे हुए लग रहे थे।

"राज बेटा इनसे मिलो।" मुझे देखते ही जगदीश अंकल ने उस ब्यक्ति की तरफ इशारा करते हुए कहा___"ये हैं आदित्य चोपड़ा। ये काफी अच्छे मार्शल आर्टिस्ट हैं। ये सबको सिक्योरिटी प्रोवाइड करते हैं। मैने इन्हें सबकुछ समझा दिया है। अब से ये हर पल तुम्हारे साथ तुम्हारा साया बन कर रहेंगे।"

"ओह हैलो।" मैने कहने के साथ ही उसकी तरफ हैण्ड शेक करने के लिए हाथ बढ़ाया। उसने भी हैलो करते हुए मुझसे हाथ मिलाया। उसके हाॅथ मिलाने से ही मुझे महसूस हो गया कि ये बंदा काफी ठोस व मजबूत है।

ख़ैर सबसे आशीर्वाद लेकर मैं बाहर की तरफ चल दिया। मेरे साथ ही बाॅकी सब भी बाहर आ गए। कार की तरफ जाने से पहले माॅ ने मुझे अपने सीने से लगा कर प्यार दिया। आदित्य ने कार की ड्राइविंग शीट सम्हाली। जबकि मैं और जगदीश अंकल कार की पिछली शीट पर बैठ गए। उसके बाद कार रेलवे स्टेशन की तरफ तेज़ी से बढ़ चली। जगदीश अंकल मेरे साथ इस लिए थे ताकि वापसी में वो स्टेशन से कार वापस ला सकें।

रेलवे स्टेशन पहुॅच कर मैने जगदीश अंकल को वापस घर जाने का कह दिया। उन्होंने मुझे कुछ हिदायतें दी और शुभकामनाएॅ भी। उनके जाने के बाद मैं और आदित्य प्लेटफार्म की तरफ बढ़ गए। प्लेटफार्म में जब हम पहुॅचे तो ट्रेन जाने ही वाली थी। इस लिए हम दोनो एसी फर्स्ट क्लास की तरफ दौड़ चले। कुछ ही देर में हम दोनो अपनी अपनी शीटों पर आ गए थे।
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काॅलेज में हुई घटना से नीलम मानसिक रूप से काफी दुखी हो गई थी और जिस तरह से विराज ने वहाॅ पर आकर उसकी इज्ज़त को तार तार होने से बचाया था वो उसके लिए निहायत ही अविश्वसनीय था। उसने तो कल्पना भी न की थी कि उसके चाचा का लड़का यानी कि उसका भाई जो उमर में उससे मात्र दस दिन बड़ा था वो यहाॅ पर आएगा और इस तरह से उसकी इज्ज़त को मिट्टी में मिल जाने से बचाएगा।

उसने तो माॅम डैड के मुख से अक्सर यही सुना था कि विराज मुम्बई में किसी होटेल या ढाबे में कप प्लेट धोता होगा। मगर मुम्बई के इतने बड़े काॅलेज में जहाॅ पर एडमीशन लेने के लिए हाई पर्शेन्टेज मार्क्स का होना और अच्छे खासे पैसे का होना अनिवार्य था उस काॅलेज में विराज को एक स्टूडेंट के रूप में देख कर नीलम के आश्चर्य की कोई सीमा न रही थी।

विराज को अपने इस काॅलेज में देख कर नीलम को ये तो समझ में आ गया था कि उसके माॅम डैड विराज के बारे में जो सोच और विचार रखे हुए हैं वो सिरे से ही ग़लत है। आज काॅलेज में हुई घटना के बाद नीलम जैसे पत्थर की मूर्ति में परिवर्तित हो गई थी। उसने देखा था कि कैसे विराज ने उन लड़कों को दो मिनट में धूल चटाया था उसके बाद उसने उसका दुपट्टा उसे लौटाया था। किन्तु जब उसने देखा कि जिसे वह दुपट्टा दे रहा था वो उसी की चचेरी बहन थी तो उसने तुरंत उससे मुह फेर लिया था और उसके पास से चला गया था।

नीलम को तो काफी देर तक कुछ समझ न आया था कि वह क्या करे? वो तो बुत बन गई थी। अपने भाई के सामने उसकी स्थित दो कौड़ी की न रह गई थी। उस भाई के सामने जिसे उसके माॅम डैड दो कौड़ी का भी नहीं समझते थे और वो खुद भी कभी उसे अपने भाई का दर्जा नहीं देती थी।

काफी देर बाद जब नीलम की तंद्रा टूटी तो वह बदहवास सी होकर कंटीन की तरफ खिंची चली गई थी। मगर कंटीन में जो नज़ारा उसे देखने को मिला उसने उसे और भी ज्यादा हैरान कर दिया। जिस विराज को वो आज तक एक सीधा सादा और दो कौड़ी का भी नहीं समझती थी वो आज इतना खतरनाक दिख रहा था कि आशू राना के हट्टे कट्टे भाई को अधमरा कर दिया था। उसकी ऑखों के सामने उसने भूषण को पहले तो अधमरा किया और फिर उसे खुद ही आशू के साथ हास्पिटल भी ले गया।

काॅलेज में पहले दिन ही इस तरह की घटना से सनसनी सी फैल गई थी। वो खुद भी मानसिक रूप से ब्यथित थी इस लिए वह काॅलेज से सीधा अपनी बड़ी मौसी पूनम के घर चली गई थी। इस वक्त वह अपने कमरे में बेड पर पड़ी हुई थी। उसकी ऑखें ऊपर छत पर घूम रहे पंखे को अपलक देखे जा रही थी।

नीलम की ऑखों के सामने बार बार वही मंज़र आ रहा था। उसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि वो विराज ही था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसने खुली ऑखों से कोई ख्वाब देखा था। मगर हकीक़त उसे अच्छी तरह पता थी। काॅलेज से जल्दी आ जाने पर उसकी मौसी ने पूछा था कि इतना जल्दी काॅलेज से कैसे आ गई वह? मगर उसने गोल मोल जवाब दे दिया था और सीधा अपने कमरे में बेड पर लेट गई थी।

वह विराज से नफ़रत तो नहीं करती थी किन्तु हाॅ उसे वह अपना भाई भी नहीं मानती थी और ना ही उसकी नज़र में उसकी कोई अहमियत थी। उसके माॅम डैड बचपन से ही ये हिदायत देते थे कि विराज, निधि और उसके माॅ बाप अच्छे लोग नहीं हैं। इनसे न कभी बात करना और ना ही कभी इनके पास जाना। ये हमारे कुछ नहीं लगते हैं। बचपन से एक ही पाठ पढ़ाया गया था इन्हें। समय के साथ साथ उसी तरह की सोच भी बन गई थी इनकी। हालात ऐसे बनाए गए थे कि इन लोगों ने कभी ये सोचा ही नहीं कि हम जिनके बारे में ऐसी धारणा बनाए बैठे हैं वो वास्तव में वैसे हैं भी या नहीं? समय गुज़रा और फिर वो सब हादसे हुए जिनसे इनकी सोच में और भी ज्यादा वो सब बातें बैठ गईं।

मगर आज के हादसे ने नीलम के अस्तित्व को हिला कर रख दिया था। उसे उस सोच और धारणा के महासागर से बाहर निकाल दिया जिस महासागर में आज तक वो डूबी हुई गोते लगा रही थी। कहते हैं कि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। समय बदलता रहता है और बदलते हुए समय के साथ ही साथ इंसान की सोच भी बदलती रहती है। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो एक ही बात को गाॅठ बाॅध कर जीवन भर ढोते रहते हैं। उन्हें किसी की बात सही नहीं लगती। वो हमेशा अपनी ही सोच को यथार्थ और हकीक़त मान कर जीते हैं। उन्हें अपनी सोच और धारणा के ग़लत होने का तब पता चलता है जब वक्त खुद उन्हें आईना दिखाता है या एहसास कराता है।

नीलम के पास आज वही वक्त आईना दिखाने आया था और आईना दिखा कर उसने उसे एहसास करा दिया था कि अब तक वो कितना ग़लत थी जो अपने माता पिता के द्वारा मिली सीख और निर्देशों पर चल रही थी। वक्त ने आकर उसे आईना दिखाया, एहसास कराया और उससे एक सवाल भी कर गया कि 'अगर ये इतना ही बुरा होता तो आज किसी काॅलेज में किसी लड़की की इज्ज़त बचाने के लिए इतनी भीड़ में से अकेला नहीं आता। ये तो उसे बाद में पता चला कि वो लड़की कोई और नहीं बल्कि उसकी बहन ही थी। अपनी जान को खतरे में डाल कर आज के युग में कौन किसी के लिए ऐसा करता है? ये तो वही कर सकता है जो सच्चा होता है और जो किसी बेकसूर व मजलूम पर अत्याचार होते नहीं देख सकता। बल्कि अत्याचार करने वाले से भिड़ जाता है फिर चाहे भले ही खुद उसकी जान ही क्यों न चली जाए।

नीलम की ऑखों के सामने बचपन से लेकर अब तक की सारी यादें किसी फिल्म की तरह चलने लगी। उसे याद आया कि एक बार हवेली में उससे एक कीमती मूर्ति गिर कर टूट गई थी, उस वक्त नीलम और शिवा ही थे। आवाज़ सुन कर विराज भी आ गया था। वो मूर्ति के टुकड़ों को पास से जाकर देखने लगा था। उसी वक्त विजय चाचा और नैना बुआ भी आ गई थी। विजय चाचा ने मूर्ति को टूट कर बिखरी हुई देख कर पूछा था कि ये किसने तोड़ा तो शिवा जो कि छोटा ही था उस वक्त उसने भोलेपन में डर की वजह से तुरंत नीलम की तरफ उॅगली कर दिया था। मगर तभी विराज ने कहा था कि उससे ही गिर कर टूट गई थी वो मूर्ति। उसकी बात सुनकर विजय चाचा ने विराज की काफी ज्यादा पिटाई कर दी थी। विराज पिटता रहा मगर मुख से ये न बताया था कि मूर्ति असल में नीलम से टूटी थी।

ज़ोरदार पिटाई के चलते विराज की हालत ख़राब हो गई थी, जबकि वो और उसके भाई बहन उसके पिट जाने पर बहुत खुश थे। एक बार अजय सिंह की जेब से शिवा ने पैसे चुरा लिए थे और चुराकर शिवा ने कमरे में सो रहे विराज की शर्ट की जेब में वो पैसा डाल दिया था। ये सब सिर्फ इस लिए मिली भगत द्वारा किया गया था ताकि विराज की फिर से पिटाई हो और वही हुआ भी। शिवा नीलम को लेकर अपने बाप के पास गया और उससे बोला कि डैड विराज ने आपकी जेब से पैसा चुराया है जिसे उसने अपनी ऑखों से देखा है। बस फिर क्या था अजय सिंह को तो बहाना चाहिए होता था विजय सिंह और उसके बच्चों को उल्टा सीधा बोलने के लिए। तलाशी में वो पैसा विराज की शर्ट की जेब में मिल ही गया। उसके बाद विजय सिंह ने सोते हुए विराज की पिटाई शुरू कर दी। बेचारे को समझ ही न आया था कि वो किस बात पर मार खा रहा था। जबकि उसकी पिटाई से नीलम शिवा और रितू ये तीनों बड़ा खुश हो रहे थे।

ऐसी
[color=rgb(0,] बहुत सी बातें थी जो इस वक्त नीलम की ऑखों के सामने घूम रही थी। विराज में एक खासियत ये थी कि वो अपनी सफाई में कभी कुछ नहीं बोलता था। मार खाने के बाद और इतना ज्यादा जलील होने के बाद भी वह इन लोगों के साथ खेलने के लिए आ जाता था। ये अलग बात थी कि ये लोग उसे दुत्कार कर भगा देते थे।

नीलम को पता ही नहीं चला कि कब उसकी ऑखों में ऑसू भर आए थे। पता तो तब चला जब वो ऑसू दोनो ऑखों की कोरों से बहते हुए कानों गिरे। एक हूक सी उठी दिलो दिमाग़ में उसके। मनो मस्तिष्क झनझना कर रह गया। भावनाओ और जज़्बातों का एकाएक ही तीब्र तूफान उठ खड़ा हुआ। हृदय का जब परिवर्तन होता है तो एक नये युग का प्रारंभ हो जाता है। परिवर्तन अगर नफ़रत के लिए होता है तो बहुत जल्द एक बड़े अनिष्ट की नियति बन जाती है और अगर प्रेम के लिए होता है तो एक नया संसार बनने लगता है।

"मुझे माफ़ कर दे भाई।" भावना या जज़्बात जब प्रबल हो जाते हैं तो कोई धैर्य कोई संयम नहीं हो सकता। बल्कि हर दरो दीवार को तोड़ते हुए हृदय में ताण्डव करते हुए जज़्बात ऑखों के रास्ते से ऑसू बन कर बहने लग जाते हैं_____"माफ़ कर दे मुझे। कितना ग़लत सोचती थी आज तक मैं तेरे बारे में। मगर तू तो पहले भी हीरा था भाई और आज भी हीरा है। बचपन से लेकर आज तक हमेशा तुझे जलील किया अपमानित किया और न जाने कैसे कैसे इल्ज़ाम लगा कर तुझे तेरे ही पिता जी से पिटवाया। कोई इतना बुरा कैसे हो सकता है भाई? और तू इतना अच्छा कैसे हो सकता है? आज जिस तरह से तूने मुझे अनदेखा कर के अजनबीपन दिखाया उसने मुझे समझा दिया है भाई कि मेरी औकात तेरे सामने कुछ भी नहीं है।"

नीलम खुद से ही बड़बड़ाये जा रही थी और ऑसू बहाए जा रही थी। अभी वह रो ही रही थी कि सहसा किसी ने उसके कंधे पर हाॅथ रखा। वह बुरी तरह उछल पड़ी। पलट कर देखा तो बगल से ही उसकी मौसी की दूसरी बेटी सोनम उसकी तरफ झुकी हुई खड़ी थी।
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दोस्तो यहाॅ पर मैं नीलम की मौसी और उसके परिवार का संक्षिप्त परिचय देना चाहूॅगा,,,,,,,,,

●पूनम सिंह, ये नीलम की माॅ यानी प्रतिमा की बड़ी बहन है। इस नाते ये नीलम की मौसी लगती है। ऊम्र पचास के आसपास। प्रतिमा की तरह ही दिखने में बेहद सुंदर है।

●महेश सिंह, ये नीलम के मौसा और पूनम के पति हैं। ऊम्र पचपन के आसपास। पेशे से डाॅक्टर हैं।

● अंजली सिंह, ये नीलम की मौसी की बड़ी बेटी है। ऊम्र पच्चीस के आसपास। दिखने में बहुत ही खूबसूरत है। पेशे से ये भी डाॅक्टर है। अभी शादी नहीं हुई है इसकी।

●सोनम सिंह, ये नीलम के मौसी की दूसरी बेटी है। ऊम्र बाईस साल है। अपनी बहन की ही तरह खूबसूरत है। ये काॅलेज में साइंस से एम एस सी कर रही है।

● विकास सिंह, ये नीलम की मौसी का इकलौता व सबसे छोटा बेटा है। ऊम्र उन्नीस के आसपास। अपने बाप महेश की तरह ही ये भी डाॅक्टर बनना चाहता है।

दोस्तो ये था नीलम की मौसी का संक्षिप्त परिचय। अब कहानी की तरफ चलते हैं,,,,,,,

"दीदी आप।" सोनम पर नज़र पड़ते ही नीलम लगभग हड़बड़ा गई थी।
"हूॅ तो मैं ही।" सोनम ने मुस्कुराते हुए कहा___"मगर तू चाहे तो कुछ और भी समझ सकती है। ख़ैर, ये बता कि कौन है वो?"

"क क्या मतलब??" नीलम बुरी तरह चौंकी थी।
"मतलब कि वो कौन है जिसकी याद में तू ऑसू बहा रही है?" सोनम कहने के साथ ही बेड पर बैठ गई____"तू मुझे बता सकती है नीलम। मैं तेरी बड़ी बहन से कहीं ज्यादा तेरी दोस्त की तरह हूॅ। अब चल बता कि कौन है वो जिसने मेरी प्यारी सी दोस्त की ऑखों को रुलाया है?"

"ऐसा कुछ नहीं है दीदी।" नीलम ने कहा__"ये ऑसू तो पश्चाताप के हैं। आज तक जिसे अजनबी समझकर उसे जलील और दुत्कारती रही थी उसी ने आज मेरी इज्ज़त बचाई दीदी।"

"क्या???" सोनम उछल पड़ी___"ये तू क्या कह रही है नीलम? क्या हुआ था आज काॅलेज में तेरे साथ? सच सच बता मुझे।"

नीलम ने उसे सब कुछ बता दिया कि कैसे आशू राना नाम का लड़का अपने कुछ दोस्तों के साथ उसकी रैगिंग कर रहा था। उसने उसे कहा था कि वो उसके साथ साथ उसके दोस्तों के होठों को भी चूमे। उसकी इस बात पर उसने आशू राना को थप्पड़ मार दिया था। जिससे आशू राना ने सबके सामने उसकी इज्ज़त लूटने की कोशिश की। तभी उस भीड़ से निकल कर कोई आया और उसने आशू राना के साथ साथ उसके सभी दोस्तों की खूब पिटाई कर उसकी इज्ज़त को लटने से बचाया था। नीलम ने सारी बात सोनम को बता दी। नीलम की सारी बातें सुनकर सोनम हैरान रह गई थी।

"तो वो लड़का तेरा चचेरा भाई है?" सोनम ने कहा___"जिसे आज तक तू भाई नहीं मानती थी। बात कुछ समझ में नहीं आई नीलम। भला ऐसा तू कैसे कर सकती है?"
"वही तो दीदी।" नीलम की ऑखें छलक पड़ीं___"अपने फरिश्ता जैसे भाई के साथ मैने आज तक वो सब कैसे किया? आज की उस घटना ने मुझे एहसास करा दिया दीदी कि कितनी बुरी हूॅ मैं। जिसकी ऑखों में अपने लिए हमेशा प्यार और सम्मान देखा था आज उसी ऑखों में अपने लिए हिकारत के भाव देखा है मैने। वो ऐसे मुह फेर कर चला गया था जैसे उससे मेरा कोई दूर दूर नाता नहीं है। उस वक्त मुझे पहली बार लगा दीदी कि मैं उसकी नज़र में क्या रह गई हूॅ। सच ही तो है, आख़िर उसकी नज़र में मेरी कोई औकात हो भी कैसे सकती है? मैने और मेरे माॅ बाप ने हमेशा उसे और उसके माॅ बाप को तुच्छ समझा था।"

"ये तू क्या कह रही है नीलम?" सोनम बुरी तरह हैरान थी, बोली___"ये तू कैसी बातें कर रही है? आख़िर बात क्या है?"
"सारी बातें तो मुझे भी नहीं पता दीदी लेकिन इतना समझ गई हूॅ कि बचपन से मेरे माॅम डैड ने जिनके बारे में ऐसा करने की सीख दी थी वो ग़लत था।" नीलम ने कहा___"किसी के बारे में खुद भी तो जाॅचा परखा जाता है न? ऐसा तो नहीं होना चाहिए न कि हमें किसी ने जो कुछ बता दिया उसे ही सच मान लें और फिर सारी ऊम्र उसी को लिए बैठे रहें। कीचड़ अगर इतना ही गंदा होता तो उसमें कमल जैसा फूल कभी नहीं खिलता। गंदगी तो वहाॅ भी होती है दीदी जिस जगह को लोग पाक़ समझते हैं।"

"मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा नीलम कि तू ये सब क्या कहे जा रही है?" सोनम ने उलझनपूर्ण भाव से कहा था।
"बताऊॅगी दीदी।" नीलम ने कहा___"सब कुछ बताऊॅगी आपको। लेकिन इस वक्त नहीं। इस वक्त मुझे अकेला छोंड़ दीजिए। मुझे अकेला छोंड़ दीजिए दीदी।"

कहने के साथ ही नीलम फूट फूट कर रोने लगी थी। सोनम ने उसे खींच कर अपने से छुपका लिया था।
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उथर हवेली में।
रितू जब हवेली पहुॅची तो शाम हो चुकी थी। अजय सिंह हवेली में नहीं था बल्कि फैक्टरी में था। फैक्टरी का काम लगभग पूरा ही हो गया था। बस कुछ ही दिनों में फैक्टरी चालू हो जानी थी। रितू अंदर आते ही अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। किचेन में प्रतिमा और नैना डिनर तैयार कर रही थी।

कमरे में पहुॅच कर रितू ने अपने कपड़े बदले और फिर बाथरूम की तरफ बढ़ गई। बीस मिनट बाद जब वह बाथरूम से बाहर आई तो उसकी नज़र बेड पर पड़े आई फोन पर पड़ी। आई फोन पर किसी का काॅल आ रहा था। फोन साइलेन्ट मोड पर था।

रितू टाॅवेल को अपने संगमरमरी बदन पर लपेट कर तेज़ी से बेड के पास पहुॅची और फोन को उठा कर स्क्रीन पर फ्लैश कर रहा नंबर को देखा। नंबर को देख कर उसके होठों पर हल्की सी मुस्कान उभ आई।

"हैलो।" फिर उसने काॅल रिसीव करते ही कहा।
".............. ।" उधर से कुछ कहा गया।
"क्या सच कह रहे हो तुम?" रितू के चेहरे पर खुशी के भाव उभर आए थे।
".............।" उधर से फिर कुछ कहा गया।
"ठीक है भाई।" रितू ने धीमे स्वर में कहा___"तुम उसे रिसीव कर लेना और अपने साथ ही पहले घर ले जाना। उसके बाद मैं तुम्हें फोन करूॅगी और बताऊॅगी कि अब तुम उसे अपने साथ वहाॅ पर ले आओ।"

"..............।" उधर से फिर कुछ कहा गया।
"डोन्ट वरी भाई।" रितू ने कहा___"मैं सब देख लूॅगी। चलो अब रखती हूॅ फोन।"
रितू ने कहा और फोन कट कर दिया। फिर मन ही मन कहा___"आजा मेरे भाई। तेरी विधी तुझे बस एक बार देखने के लिए ही ज़िदा है। अपने आपको सम्हालना मेरे भाई। मैं जानती हूॅ कि वो लम्हाॅ तेरे लिए बेहद दर्दनाक होगा। मगर खुद को सम्हालना भाई। काश! ये सब न हुआ होता। हे भगवान ये तूने मेरे भाई के साथ क्या कर दिया है। कितना दुख दर्द देगा तू उसे? नहीं नहीं, मैं अपने भाई को कोई दुख दर्द सहने नहीं दूॅगी। उसको अपने सीने से लगा कर खूब प्यार दूॅगी मैं। अब तक तो मैने उसे नफ़रत ही दी थी लेकिन अब बेइंतेहां प्यार दूॅगी उसे। हाॅ हाॅ खूब प्यार दूॅगी उसे।"

ऑखों से छलक आए ऑसुओं को पोंछा रितू ने और फिर आलमारी की तरफ बढ़ गई। आलमारी से रात में पहनने वाले कपड़े निकाल कर उसने उन्हें पहना और फिर कमरे से बाहर आ गई।

रात में सबने एक साथ डिनर किया। रितू ने देखा कि उसका भाई शिवा भी आ गया था। वह उससे बड़े प्यार व चापलूसी के से अंदाज़ में मिला था। रितू को उसे और उसके इस अंदाज़ पर आज पहली बार नफ़रत सी हुई थी। हलाॅकि वो जैसा भी था उसका सगा भाई ही था। अजय सिंह भी फैक्ट्री से आ गया था। सबने डिनर किया और इसी बीच थोड़ी बहुत बातें भी हुईं। उसके बाद सब अपने अपने कमरों में सोने के लिए चले गए।

उस वक्त रात के बारह बजे के आस पास का वक्त था। हवेली में हर तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। हवेली के अंदर अॅधेरा तो था मगर पूरी तरह नहीं क्योंकि खिड़कियों से चाॅद की रोशनी और अंदर लगे नाइट बल्ब की धीमी रोशनी थी। विराज के आने की खुशी में रितू को नींद नहीं आ रही थी। उसके मन में तरह तरह के ख़याल बन रहे थे। कभी उसका चेहरा खुशी से चमकने लगता तो कभी एकदम से उदास सा हो जाता। बेड पर इधर से उधर करवॅट बदलते हुए पल पल गुज़रता जा रहा था। मगर उसे ऐसा प्रतीत हो रहा जैसे रात का ये वक्त तो जैसे एक जगह ठहर ही गया था। रितू को लग रहा था कि ये रात कितना जल्दी गुज़र जाए और सुबह हो जाए। ऐसे ही बारह बज गए थे।

उसे प्यास लगी तो वह बेड से उठ कर दरवाजे की तरफ बढ़ी। दरवाजे को खोल कर वह बाहर आ गई। गैलरी से चलते हुए उसे नैना बुआ का कमरा दिखा। उसके बाद नीचे जाने के लिए सीड़ियाॅ। सीढ़ियों से उतरते हुए वह किचेन की तरफ बढ़ गई। किचेन में रखे फ्रिज़ को खोलकर उसने ठंडे पानी का एक बाॅटल निकाला और उसका ढक्कन खोल कर उसे मुख से लगा लिया।

पानी पीकर वह वापस किचेन से बाहर आ गई। बाएॅ साइड पर ड्राइंगरूम था। उसने सोचा कि नींद तो आ नहीं रही इस लिए थोड़ी देर ड्राइंगरूम में ही बैठ जाती हूॅ, मगर फिर जाने क्या सोच कर उसने अपना ये इरादा बदल दिया। वह वापस दाहिने साइड सीढ़ियों की तरफ बढ़ी ही थी कि सहसा रुक गई। सीढ़ियों की तरफ से बाएं साइड पर पार्टीशन की दीवार पर लगे दरवाजे की तरफ देखा उसने। दरवाजा पूरी तरह तो नहीं मगर खुला हुआ स्पष्ट नज़र आया उसे।

पार्टीशन की दीवार पर लगे दरवाजे को इस तरह खुला देख कर रितू के पुलिसिया मन में सवाल उभरा कि आज ये दरवाजा इस वक्त खुला क्यों है? आम तौर पर वह बंद ही रहता था। उस तरफ का हिस्सा विजय चाचा का था। पुलिसिया दिमाग़ में जब कोई सवाल उभरता है तो वह उस सवाल का जवाब तुरंत ही खोजने लग जाता है।

रिते सीढ़ियों की तरफ से पलट कर पार्टीशन के उस खुले हुए दरवाजे की तरफ बढ़ चली। कुछ ही पल में वह दरवाजे के पास पहुॅच गई। कुछ पल दरवाजे के पास खड़े होकर उसने उस जगह का मुआयना किया फिर अपना हाॅथ बढ़ा कर उसने दरवाजे का दाहिने साइड वाला पल्ला पकड़ कर आगे की तरफ पुश किया। दरवाजे का वो पल्ला बेआवाज़ खुलता चला गया। अब एक पल्ले में ही इतना स्पेस बन गया था कि एक आदमी आराम से इधर से उस तरफ जा सकता था। रितू ने वही किया। वो उस स्पेस से उस तरफ दाखिल हो गई।

उस तरफ जाकर उसने बारीकी से हर तरफ का मुआयना किया और फिर आगे की तरफ बढ़ गई। मेरे पाठकों को पता है कि ये हवेली किस तरह बनाई गई थी। दो मंजिला इमारत के अलग अलग तीन हिस्सों को आपस में जोड़ दिया गया था। तीनों हिस्सों में एक जैसा ही डिजाइन था।

आगे बढ़ते हुए रितू ड्राइंगरूम की तरफ आ गई। यहाॅ पर भी नाइट बल्ब का प्रकाश था। यहाॅ पर भी सन्नाटा फैला हुआ था। ड्राइंगरूम में आकर रितू खड़ी हो गई। उसे समझ नहीं आ रहा था यहाॅ पर कौन आया होगा इस वक्त और किस लिए? जबकि इस तरफ आने का कोई सवाल ही नहीं था। ड्राइंगरूम के उस तरफ ऊपर जाने के लिए वैसी ही सीढ़ियाॅ बनी हुई थी जैसी इस तरफ बनी हुई थी। ड्राइंगरूम के के पीछे साइड एक तरफ किचेन था और एक साइड की तरफ वो कमरा था जिसमें दादा दादी रहते थे। रितू की निगाह जब किचेन से होते हुए जब दूसरी साइड दादा दादी के कमरे की तरफ गई तो वह चौंक गई।

दादा दादी के कमरे में इस वक्त बल्ब की पर्याप्त रोशनी हो रखी थी जोकि ऊपर छत के पास ही बने रोशनदान से समझ में आ रही थी। कमरे के दरवाजा बंद था। रितू ये देख कर हैरान थी कि इतनी रात को वहाॅ उस कमरे के अंदर कौन हो सकता है? जबकि उसे जहाॅ तक पता था इस तरफ के हिस्से पर कोई नहीं आता था। विजय सिंह के बीवी बच्चों को हवेली से निकालने के बाद ये हिस्सा पूरी तरह बंद ही रहता था। फिर आज इस वक्त यहाॅ पर कौन हो सकता है? ये सवाल ऐसा था जो रितू के मस्तिष्क में कत्थक सा करने लगा था।

अपने मन उठे इस सवाल और खुद की उत्सुकता को मिटाने के लिए रितू उस कमरे की तरफ बहुत ही संतुलित कदमों से बढ़ गई। कुछ ही पलों में वह उस कमरे के दरवाजे के पास पहुॅच गई। उसका दिल अनायास ही ज़ोरों से धड़कने लगा था। तभी उसके कानों में कमरे के अंदर मौजूद ब्यक्ति की आवाज़ पड़ी। उस आवाज़ को सुन कर रितू बुरी तरह चौंकी। ये आवाज़ उसकी अपनी माॅ प्रतिमा की थी। रितू ने दरवाजे से अपने कान लगा दिये।

"आहहहहह ऐसे ही मेरे बेटे।" अंदर से प्रतिमा की मादकता से भरी हुई आवाज़ उभरी____"ऐसे ही आहहहह हचक हचक के चोद मुझे। आज बहुत दिनों बाद दो दो लंड का मज़ा मिला है मुझे। ओहे भड़वे हरामी साले नीचे से पेल न मेरी गाॅड में अपना लौड़ा। आहहहहह हाय बड़ा मज़ा आ रहा है रे।"

"ये लो माॅम आज डैड के साथ साथ अपने इस बेटे का भी लंड लो अपनी चूत में।" शिवा की आवाज़ आई___"आज मेरी वर्षों की वो ख्वाहिश पूरी हो रही है। थैंक्स डैड जो आपने मुझे शहर से बुला लिया और आज मुझे अपनी माॅम को चोदने का सौभाग्य दिया।"

"थैंक्स की कोई बात नहीं है बेटे।" अजय सिंह की आवाज़ उभरी___"ये तो तेरे माॅम की ही इच्छा थी कि तू भी इसे रगड़ कर चोदे।"
"अब बातें मत करो तुम दोनो।" प्रतिमा की आवाज़ आई___"मुझे रगड़ रगड़ कर चोदना शुरू करो वरना तुम दोनो के लंड को काट कर फैंक दूॅगी।"

"ओके माॅम।" शिवा ने कहा___"तो फिर ये लो।"
"आहहहहहह शशशशशश हाय ऐसे ही चोदो मुझे।" प्रतिमा की आहें और सिसकारियाॅ गूजने लगी अंदर___"पूरी रात मुझे आगे पीछे से चोदो। फाड़ कर रख दो मेरी चूत और गाॅड को। हाय रे कितना मज़ा आ रहा है। काश! एक और लंड होता तो उसे अपने मुह में भर लेती मैं।"

दरवाजे पर कान लगाए खड़ी रितू के पैरों तले दूर दूर तक ज़मीन का नामो निशान न था। दिलो दिमाग़ में जैसे सारा आसमान भर भरा कर गिर पड़ा था। मनो मस्तिष्क सुन्न सा पड़ता चला गया। उसे लगा कि उसके पैरों में कोई जान ही न बची हो। उसे चक्कर सा आने लगा था। बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला। ऑखों ने ऑसुओं की बाढ़ सी कर दी। कमरे के अंदर इतना बड़ा पाप हो रहा था। एक माॅ अपने ही बेटे से नाजायज संबंध बना रही थी वो भी अपने पति की सहमति से। रितू को यकीन नहीं हो रहा था कि ये उसके माॅ बाप और भाई थे।

अंदर से आती मादक सिसकारियों की आवाज़ें उसके कानों को छलनी करती जा रही थीं। हवस और वासना का इतना भयावह चेहरा उसने आज अपने ही पैदा करने वालों के द्वारा देखा था। सहसा उसके मन में ये विचार उठा कि नहीं नहीं ये मेरे माॅम डैड और भाई नहीं हो सकते बल्कि ये कोई और ही हैं। कोई छलावा है या फिर कोई ख्वाब है।

पल भर में पगलाई सी रितू ने अपने हाथ से बहुत ही धीमे और संतुलित अंदाज़ से दरवाजे को अंदर की तरफ धकेला। दरवाजा बेआवाज़ कुलता चला गया। दरवाजे पर बस थोड़ी सी ही झिरी बनाकर रितू ने अंदर की तरफ देखा। मगर उस झिरी में उसे कुछ नज़र न आया बल्कि ये ज़रूर हुआ कि अंदर से आती हुई आवाजें ज़रा तेज़ हो गई थी।

रितू ने दरवाजे को थोड़ा और अंदर की तरफ धकेला। अपने सिर को दरवाजे के अंदर की तरफ ले जाकर उसने अंदर आवाज़ की दिशा में देखा तो उसके होश उड़ गए। आश्चर्य और अविश्वास से उसकी ऑखें फटी की फटी रह गई थी। अंदर बेड पर उसके माॅम डैड व भाई पूरी तरह नंगी हालत में थे। सबसे नीचे उसके डैड थे फिर उसकी माॅम उनके ऊपर पीठ के बल लेटी हुई थी। उसकी दोनो टाॅगें शिवा के दोनो हाॅथों के सहारे ऊपर उठी हुई थी। शिवा उसके ऊपर था जो कि माॅम की दोनो टाॅगों को पकड़े तेज़ तेज़ धक्के लगा रहा था। नीचे से उसके डैड अपने दोनो हाथों से प्रतिमा की कमर को थामे धक्का लगे रहे थे। ये हैरतअंगेज नज़ारा देख कर रितू पत्थर बन गई थी। होश तब आया जब उसकी माॅम की ज़ोरदार आह की आवाज़ उसके कानों में पड़ी। रितू ने तुरंत ही अपना सिर अंदर से बाहर कर लिया। दरवाजे को उसी तरह बंद कर वह पलटी और ऑसुओं से तर चेहरा लिए वह दरवाजे से हट गई।

कुछ ही देर में वह अपने कमरे मे पहुॅच गई। वह यहाॅ तक कैसे आई थी ये वही जानती थी। उसके पैर इतने भारी हो गए थे कि उससे उठाए नहीं जा रहे थे। बेड पर औंधे मुह गिर कर वह ज़ार ज़ार रोये जा रही थी। उसे लग रहा था कि वो क्या कर डाले। उसके दिलो दिमाग़ में अपने माता पिता और भाई के लिए नफ़रत व घृणा भर गई थी। वह एक बहादुर लड़की थी। उसने अपने आपको सम्हाला और तुरंत बेड से उठ बैठी। चेहरा पत्थर की तरह कठोर हो गया उसका। बेड से उतर कर वह आलमारी की तरफ बढ़ी। आलमारी खोल कर उसने अपना सर्विस रिवाल्वर निकाला। लाॅक खोल कर उसने चैम्बर को देखा तो खाली था। उसने तुरंत ही अंदर लाॅकर से गोलियाॅ निकाली और उसमें पूरी छहो गोलियाॅ भर दी। उसके बाद वह चेहरे पर ज़लज़ला लिए दरवाजे की तरफ बढ़ी ही थी कि किसी की आवाज़ सुन कर चौंक पड़ी।


दोस्तो समय निकाल कर इतना ही अपडेट तैयार कर पाया हूॅ। परिवार में मेरी बहन की शादी है इस लिए उसमें उलझा हुआ हूॅ। आशा करता हूॅ कि आप मेरी मजबूरियों को समझेंगे।

इस सबसे फुर्सत होकर जब वापस लौटूॅगा तो दोनो कहानियों के अपडेट कान्टीन्यू करूॅगा। तब तक के लिए मुझे क्षमा करें दोस्तो। अपना प्यार और सहयोग बनाए रखियेगा।
 
एकनयासंसार

अपडेट.........《 41 》

अब तक,,,,,,,,,

रितू ने दरवाजे को थोड़ा और अंदर की तरफ धकेला। अपने सिर को दरवाजे के अंदर की तरफ ले जाकर उसने अंदर आवाज़ की दिशा में देखा तो उसके होश उड़ गए। आश्चर्य और अविश्वास से उसकी ऑखें फटी की फटी रह गई थी। अंदर बेड पर उसके माॅम डैड व भाई पूरी तरह नंगी हालत में थे। सबसे नीचे उसके डैड थे फिर उसकी माॅम उनके ऊपर पीठ के बल लेटी हुई थी। उसकी दोनो टाॅगें शिवा के दोनो हाॅथों के सहारे ऊपर उठी हुई थी। शिवा उसके ऊपर था जो कि माॅम की दोनो टाॅगों को पकड़े तेज़ तेज़ धक्के लगा रहा था। नीचे से उसके डैड अपने दोनो हाथों से प्रतिमा की कमर को थामे धक्का लगे रहे थे। ये हैरतअंगेज नज़ारा देख कर रितू पत्थर बन गई थी। होश तब आया जब उसकी माॅम की ज़ोरदार आह की आवाज़ उसके कानों में पड़ी। रितू ने तुरंत ही अपना सिर अंदर से बाहर कर लिया। दरवाजे को उसी तरह बंद कर वह पलटी और ऑसुओं से तर चेहरा लिए वह दरवाजे से हट गई।

कुछ ही देर में वह अपने कमरे मे पहुॅच गई। वह यहाॅ तक कैसे आई थी ये वही जानती थी। उसके पैर इतने भारी हो गए थे कि उससे उठाए नहीं जा रहे थे। बेड पर औंधे मुह गिर कर वह ज़ार ज़ार रोये जा रही थी। उसे लग रहा था कि वो क्या कर डाले। उसके दिलो दिमाग़ में अपने माता पिता और भाई के लिए नफ़रत व घृणा भर गई थी। वह एक बहादुर लड़की थी। उसने अपने आपको सम्हाला और तुरंत बेड से उठ बैठी। चेहरा पत्थर की तरह कठोर हो गया उसका। बेड से उतर कर वह आलमारी की तरफ बढ़ी। आलमारी खोल कर उसने अपना सर्विस रिवाल्वर निकाला। लाॅक खोल कर उसने चैम्बर को देखा तो खाली था। उसने तुरंत ही अंदर लाॅकर से गोलियाॅ निकाली और उसमें पूरी छहो गोलियाॅ भर दी। उसके बाद वह चेहरे पर ज़लज़ला लिए दरवाजे की तरफ बढ़ी ही थी कि किसी की आवाज़ सुन कर चौंक पड़ी।
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अब आगे,,,,,,,,

आवाज़ की दिशा में रितू ने पलट कर देखा तो बगल से दीवार से सट कर रखे ड्रेसिंग टेबल के आदमकद आईने में खुद को एक अलग ही रूप में खड़े पाया। ये देख कर रितू के चेहरे पर हैरत व अविश्वास के मिले जुले भाव उभरे। आदमकद आईने में रितू का अक्श एक अलग ही रूप और अंदाज़ में खड़ा था।

"ये तुम क्या करने जा रही हो रितू?" आदम कद आईने में दिख रहे रितू के अक्श ने रितू से कहा___"क्या तुम इस रिवाल्वर से अपने माॅ बाप और भाई का खून करने जा रही हो?"
"हाॅ हाॅ मैं उन हवस के पुजारियों का खून करने ही जा रही हूॅ।" रितू के मुख से मानो दहकते अंगारे निकले___"ऐसे नीच और घृणित कर्म करने वालों को जीने का कोई अधिकार नहीं है। आज मैं उन सबको अपने हाॅथों से मौत के घाट उतारूॅगी। मगर तुम कौन हो? और मुझे रोंका क्यों?"

"मैं तुम्हारा अक्श हूॅ। मुझे तुम अपना ज़मीर भी समझ सकती हो। और हाॅ, मौत के घाट उतरना तो अब उन सबकी नियति बन चुकी है रितू।" अक्श ने कहा___"मगर ये नेक काम तुम्हारे हाॅथों नहीं होगा।"
"क्यों नहीं होगा?" रितू गुर्राई___"मैं अभी जाकर उन तीनों को गोलियों से भून कर रख दूॅगी। आज मेरे हाॅथों उन्हें मरने से कोई नहीं बचा सकता। खुद भगवान भी नहीं।"

"क्या तुम भी अपने बाप की तरह दूसरों का हक़ छीनोगी रितू?" अक्श ने कहा___"अगर ऐसा है तो तुममें और तुम्हारे बाप में क्या अंतर रह गया?"
"ये तुम क्या बकवास कर रही हो?" रितू के गले से गुस्से मे डूबा स्वर निकला___"मैं कहाॅ किसी का हक़ छीन रही हूॅ?"

"तुम जिन्हें जान से मारने जा रही हो न उन सबको जान से मारने का अधिकार तुम्हारा नहीं है रितू।" अक्श ने कहा___"बल्कि उसका है जिसके साथ तुम्हारे बाप ने हद से कहीं ज्यादा अत्याचार किया है। हाॅ रितू, ये सब विराज और उसकी माॅ बहन के दोषी हैं। इस लिए इन लोगों सज़ा या मौत देने का अधिकार उनको ही है तुम्हें नहीं। अब ये तुम पर है कि तुम उनका ये हक़ छीनती हो या फिर उनका अधिकार उन्हें देती हो।"

आदमकद आईने में दिख रहे अपने अक्श की बातें सुन कर रितू के मनो मस्तिष्क में झनाका सा हुआ। उसे अपने अक्श की कही हर बात समझ में आ गई और समझ में आते ही उसका क्रोध और गुस्सा साबुन के झाग की तरह बैठता चला गया।

"तुम यकीनन सच कह रही हो।" रितू ने गहरी साॅसे लेते हुए कहा___"ऐसे पापियों को सज़ा या मौत देने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ मेरे भाई विराज को है। मैं दुवा करती हूॅ कि बहुत जल्द इन पापियों को इनके पापों की सज़ा दे मेरा भाई। जिन माॅ बाप को मैं इतना अच्छा समझती थी आज उन लोगों का इतना गंदा चेहरा देख कर मुझे नफ़रत हो गई है उनसे। मुझे शर्म आती है कि मैं ऐसे पाप कर्म करने वाले माॅ बाप की औलाद हूॅ। लेकिन अब मैं क्या करूॅ?"

"समय का इन्तज़ार करो रितू।" अक्श ने कहा___"और इस वक्त तुम फिर से उन लोगों के पास जाओ। दरवाजे के पास कान लगा कर सुनो। हो सकता है कि कुछ ऐसा जानने को मिल जाए तुम्हें जिन चीज़ों से आज भी बेख़बर होगी तुम।"

"हर्गिज़ नहीं।" रितू के जबड़े शख्ती से कस गए___"मैं उन लोगों के पास उनकी गंदी रासलीला देखने सुनने नहीं जाऊॅगी।"
"मैं तुम्हें उनकी रासलीला देखने सुनने को नहीं कह रही रितू।" अक्श ने कहा__"मैं तो बस ये कह रही हूॅ कि ऐसे माहौल में इंसान के मुख से कभी कभी ऐसा कुछ निकल जाता है जिससे उसका कोई रहस्य या राज़ पता चल जाता है। ऐसा राज़ जिसे आम हालत में कोई भी इंसान अपने मुख से नहीं निकालता।"

"यकीनन, तुम्हारी बात में सच्चाई है।" रितू ने कहा___"ऐसा हो भी सकता है। इस लिए मैं जा रही हूॅ फिर से उन लोगों के पास।"
"ये हुई न बात।" अक्श ने मुस्कुराते हुए कहा___"चलो अब मैं भी वापस तुम्हारे अंदर चली जाती हूॅ। तुम्हें सही रास्ता दिखा रही थी सो दिखा दिया और अब तुम भी ज़रा सतर्क रहना।"

रितू के देखते ही देखते आदमकद आईने में दिख रहा उसका अक्श आईने पर से गायब हो गया। अक्श के गायब होते ही रितू ने पहले एक गहरी साॅस ली फिर पलट करवापस आलमारी की तरफ बढ़ी। रिवाल्बर से गोलियाॅ निकाल कर उसने रिवाल्वर और रिवाल्वर की गोलियाॅ अंदर लाॅकर में रख कर आलमारी बंद कर दी।

इसके बाद पलट कर वह कमरे से बाहर निकल कर थोड़ी देर में फिर वहीं पहुॅच गई जहाॅ पर उसके माॅ बाप और भाई तीनो एक साथ संभोग क्रिया कर रहे थे। रितू दबे पाॅव कमरे के दरवाजे के पास पहुॅच गई थी। अंदर से अभी भी सिसकारियों की आवाज़ें आ रही थी। रितू ने दरवाजे को हल्का सा खोल दिया था ताकि उसके कानों में उन लोगों के बोलने की आवाज़ स्पष्ट सुनाई दे सके।

"एक बात तो है डैड कि न आप और ना ही मैं परिवार की किसी भी औरत या लड़की को अपने नीचे लिटा नहीं सके अब तक।" शिवा की आवाज़ आई____"इसे हमारा दुर्भाग्य कहें या उन लोगों की अच्छी किस्मत?"

"ये उन रंडियों की किस्मत ही है बेटे।" अजय सिंह ने कहा___"जो अब तक हम बाप बेटों के लंड की सवारी न कर सकी हैं। दूसरी बात तुम्हारी इस रंडी माॅ ने भी अपना काम सही से नहीं किया। वरना हम दोनो बाप बेटे गौरी और करुणा की जवानी का मज़ा ज़रूर लूटते।"

"ओये भड़वे की औलाद साले कुत्ते।" प्रतिमा बीच में सैण्डविच बनी बोल उठी___"मैने क्या नहीं किया इन सबको जाल में फाॅसने के लिए। आआआहहहह मादरचोद धीरे से मसल न मेरी चूची को दर्द भी होता है मुझे। हाॅ तो मैं ये कह रही थी कि क्या नहीं किया मैने। तुम्हारे ही कहने पर उस रंडी के जने विजय को अपने हुस्न के जाल में फाॅसने की कोशिश की, यहाॅ तक कि एक दिन सोते समय उसके घोड़े जैसे लंड को अपने मुह में भी भर लिया था। मगर वो कुत्ता तो हरिश्चन्द्र था। कलियुग का हरिश्चन्द्र। उसने मुझे उस सबके लिए कितना बुरा भला कहा और जलील किया था ये मैं ही जानती हूॅ। उसने मुझ जैसी हूर की परी औरत को उस कुलमुही गौरी के लिए ठुकरा दिया था। तभी तो अपने उस अपमान का बदला लेने के लिए मैने तुमसे कहा था कि अब इसको जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है।"

"ओह माई गाड ये तुम क्या कह रही हो माॅम?" धक्के लगाता हुआ शिवा हैरान होकर बोल पड़ा था____"इसका मतलब विजय चाचा की वो मौत नेचुरल नहीं थी?"
"हाॅ बेटे ये सच है।" नीचे से ज़ोर का शाॅट मारते हुए अजय ने कहा___"उस हादसे के बाद हम डर गए थे कि विजय वो सब कही माॅ बाबूजी से न बता दे। इस लिए दूसरे दिन ही हम सब शहर चले गए थे। शहर आ तो गए थे मगर एक पल के लिए सुकून की साॅस नहीं ले पा रहे थे। हर पल यही डर सता रहा था कि विजय वो सब माॅ बाबूजी से बता देगा। उस सूरत में हमारी इज्ज़त का कचरा हो जाता। माॅ बाबूजी के सामने खड़ा होने की भी हम में हिम्मत न रहती। इस लिए हमने तय किया कि इस मुसीबत से जल्द से जल्द छुटकारा पा लेना चाहिए। ये सोच कर मैं दूसरे दिन ही गुप्त तरीके से शहर से वापस गाॅव आ गया। प्रतिमा को तुम बच्चे लोगों के पास ही रहने दिया। लेकिन अपने साथ में यहाॅ से एक ज़हरीला सर्प भी ले गया मैं। मुझे पता था कि आजकल खेतों में फलों का सीजन था इस लिए मंडी ले जाने के लिए फलों की तुड़ाई चालू थी। विजय सिंह रात में वहीं रुकता था। मैं जब गाॅव पहुॅचा तो हवेली न जाकर सीधा खेतों पर ही पहुॅच गया। खेतों पर विजय के साथ एक दो मजदूर रह रहे थे उस समय। उस रात जब मैं वहाॅ पहुॅचा तो रात काफी हो चुकी थी। विजय और दोनो मजदूर सो रहे थे। मैं सीधा विजय के कमरे में गया और उसे पहले बेहोशी की दवा सुॅघाई। वो सोते हुए ही बेहोश हो गया। उसके बाद मैने अपने थैले से वो बंद पुॅगड़ी निकाली जिसमें मैं शहर से ज़हरीले सर्प को भर कर लाया था। विजय के पैरों के पास जाकर मैने पुॅगड़ी का ढक्कन खोल दिया। ढक्कन खुलते ही उसमे से जीभ लपलपाता हुआ उस ज़हरीले सर्प ने अपना सिर निकाला फिर वो विजय के पैरों और टाॅगों की तरफ देखने लगा। मैने पुॅगड़ी को विजय के पैरों के और पास कर दी। मगर हैरानी की बात थी कि वो ज़हरीला विजय के पैरों को देखने के सिवा कुछ कर ही नहीं रहा था। ये देख कर मैने पुॅगड़ी को हल्का झटका दिया तो वो सर्प डर गया और डर की वजह से ही उसने विजय के घुटने के नीचे दाहिनी टाॅग पर काट लिया। सर्प के काटते ही मैने जल्दी से पुॅगड़ी का ढक्कन बंद कर दिया। उधर विजय की टाॅग में जिस जगह सर्प ने काटा था उस जगह दो बिंदू बन गए थे जो कि विजय के लाल सुर्ख खून में डूबे नज़र आने लगे थे। देखते ही देखते विजय का बेहोश जिस्म हिलने लगा। उसका पूरा जिस्म नीला पड़ने लगा। मुझ से सफेद झाग निकलना शुरू हो गया और कुछ ही देर में विजय का जिस्म शान्त पड़ गया। मैं समझ गया कि मेरे छोटे भाई की जीवन लीला समाप्त हो चुकी है। उसके बाद मैने मृत विजय के जिस्म को किसी तरह उठाया और कमरे से बाहर ले आया। बाहर आकर मैं विछय को उठाये उस तरफ बढ़ता चला गया जिस जगह पर खेतों पर उस समय पानी लगाया जा रहा था। मैं विजय को लिए उस पानी लगे खेत के अंदर दाखिल हो गया और एक जगह विजय के मृत जिस्म को उतार कर उसी पानी लगे खेत में ऐसी पोजीशन में चित्त लेटाया कि उसके मुख पर दिख रहा झाग साफ नज़र आए। खेत के कीचड़ में लेटाने के बाद मैने विजय के दोनो हाॅथों और पैरों में खेत का वही कीचड़ लगा दिया। ताकि लोगों को यही लगे कि विजय खेत में पानी लगा रहा था और उसी दौरान किसी ज़हरीले सर्प ने उसे काट लिया था जिसकी वजह से उसकी मौत हो गई है। ये सब करने के बाद मैं जिस तरह गुप्त तरीके से शहर से आया था उसी तरह वापस शहर लौट भी गया। किसी को इस सबकी भनक तक नहीं लगी थी।"

दरवाजे से कान लगाए खड़ी रितू का चेहरा ऑसुओं से तर था। उसके चेहरे पर दुख और पीड़ा के बहुत ही गहरे भाव थे। आज उसे पता चला कि उसके माॅ बाप कितने बड़े पापी हैं। अपनी खुशी और अपने पाप को छुपाने के लिए उसके बाप ने अपने सीधे सादे और देवता समान भाई को सर्प से कटवा कर उसकी जान ले ली थी। इतना बड़ा कुकर्म और इतना बड़ा घृणित काम किया था उसके माॅ बाप ने। रितू को लग रहा था कि वो क्या कर डाले अपने माॅ बाप के साथ। उसे लग रहा था कि ये ज़मीन फटे और वह उसमे समा जाए। आज अपने माॅ बाप की वजह से वो अपने भाई विराज और उसकी माॅ बहन की नज़रों में बहुत ही छोटा और तुच्छ समझ रही थी। अभी वो ये सोच ही रही थी कि उसके कानों में फिर से आवाज़ पड़ी।

"ओह तो ये बात है डैड।" शिवा के चकित भाव से कहा___"उसके बाद क्या हुआ?"
"होना क्या था?" अजय सिंह ने कहा__"वही हुआ जिसकी मुझे उम्मीद थी। अपने इतने प्यारे और इतने अच्छे बेटे की मौत पर माॅ बाबू जी की हालत बहुत ही ज्यादा खराब हो गई थी। अभय ने शहर में हमे भी विजय की मौत की सूचना भेजवाई। उसकी सूचना पाकर हम सब तुरंत ही गाव आ गए और फिर वैसा ही आचरण और ब्यौहार करने लगे जैसा उस सिचुएशन पर होना चाहिए था। ख़ैर, जाने वाला चला गया था। किसी के जाने के दुख में जीवन भर भला कौन शोग़ मनाता है? कहने का मतलब ये कि धीरे धीरे ये हादसा भी पुराना हो गया और सबका जीवन फिर से सामान्य हो गया। मगर माॅ बाबूॅ जी सामान्य नहीं थे। बेटे की मौत ने उन दोनो को गहरे सदमें डाल दिया था।"

"तुम लोगों की ये महाभारत अगर खत्म हो गई हो तो आगे का काम भी करें अब?" तभी प्रतिमा ने खीझते हुए कहा___"सारे मज़े का सत्यानाश कर दिया तुम दोनो बाप बेटों ने।"
"अरे मेरी जान सारी रात अपनी है।" अजय सिंह ने नीचे से अपने दोनो हाथ बढ़ा कर प्रतिमा की भारी चूचियों को धर दबोचा था, फिर बोला___"बेटे को सच्चाई जानना है तो जान लेने दो न। आख़िर हर चीज़ जानने का हक़ है उसे। मेरे बाद इस हवेली का अकेला वही तो वारिश है। इस घर की सभी औरतों और लड़कियों को हमारा बेटा भोगेगा प्यार से या फिर ज़बरदस्ती।"

"डैड मुझे सबसे पहले उस रंडी करुणा को पेलना है।" शिवा ने कहा___"उसकी वजह से ही उस मादरचोद अभय ने मुझे कुत्ते की तरह मारा था। इस लिए जब तक मैं उसकी उस राॅड बीवी और बेटी को आगे पीछे से ठोंक नहीं लेता तब तक मुझे चैन नहीं आएगा।"

"तेरी ये ख्वाहिश ज़रूर पूरी होगी मेरे जिगर के टुकड़े।" अजय सिंह ने कहा___"और तेरे साथ साथ मेरी भी ख्वाहिश पूरी होगी। तेरी माॅ ने तो कोई जुगाड़ नहीं किया लेकिन अब मैं खुद अपने तरीके से वो सब करूॅगा। हाय मेरी बड़ी बेटी रितू की वो फूली हुई मदमस्त गाॅड और उसकी बड़ी बड़ी चूचियाॅ। कसम से बेटे जब भी उसे देखता हूॅ तो ऐसा लगता है कि साली को वहीं पर पटक कर उसे उसके आगे पीछे से पेलाई शुरू कर दूॅ।"

"यस डैड यू आर राइट।" शिवा ने मुस्कुराते हुए कहा___"रितू दीदी को पेलने में बहुत मज़ा आएगा। आप जल्दी से कुछ कीजिए न डैड।"
"करूॅगा बेटे।" अजय सिंह ने कहा___"मगर सोच रहा हूॅ कि उससे पहले अपनी बहन नैना को पेल दूॅ। बेचारी लंड के लिए तड़प रही होगी। उसके पति और उसके ससुराल वालों ने उसे बाॅझ समझकर घर से निकाल दिया है। इस लिए मैं सोच रहा हूॅ कि उसे अपने बच्चे की माॅ बना दूॅ और फिर से उसे उसके ससुराल भिजवा दूॅ।"

"ये तो आपने बहुत अच्छा सोचा है डैड। लेकिन आप अपने इस बेटे को भूल मत जाइयेगा।" शिवा ने कहा___"बुआ को पेलने का सुख मुझे भी मिलना चाहिए।"
"अरे तेरे लिए तो इस घर की हर लड़की और औरत हैं बेटे।" अजय सिंह ने कहा___"सबकी चूतों पर सिर्फ तेरे ही लंड की मुहर लगेगी।"

"ओह डैड थैक्यू सो मच।" शिवा खुशी से झूम उठा___"यू आर रियली दि ग्रेट पर्सन।"
"उफ्फ अब बस भी करो तुम लोग।" प्रतिमा ने कुढ़ते हुए कहा___"इस तरह बीच में लटके लटके मेरा बदन दुखने लगा है अब।"
"चल बेटा अब ज़रा इस राॅड का भी ख़याल कर लिया जाए।" अजय सिंह ने कहा__"तू ऊपर से हट तो ज़रा मुझे भी पोजीशन चेंज करना है।"

अजय सिंह से कहने पर शिवा प्रतिमा के ऊपर से हट गया। अजय सिंह ने प्रतिमा को पलट कर अपनी तरफ मुह करके अपने ऊपर ही लेटने को कहा। प्रतिमा ने वैसा ही किया। नीचे से अजय ने अपने लंड को पकड़ कर प्रतिमा की चूत में डाल दिया।

"बेटे अब तू भी आजा और अपनी राॅड माॅ की गाॅड में लंड डाल दे।" अजय सिंह ने कहा तो शिवा फौरन अपना लंड पकड़ कर अपनी माॅ की गोरी चिट्टी गाॅड के गुलाबी छेंद पर डाल दिया। शिवा ने हाॅथ बढ़ा कर अपनी माॅ के बालों को मुट्ठी में पकड़ लिया था। अब दोनो बाप बेटे ऊपर नीचे से प्रतिमा की पेलाई शुरू कर दिये थे। कमरे में प्रतिमा की आहें और मदमस्त करने वाली सिसकारियाॅ फिर से गूॅजने लगी थी।

दरवाजे से अंदर सिर करके रितू ने एक नज़र उन तीनों को देखा फिर अपना चेहरा वापस बाहर खींच लिया। उसकी ऑखों में आग थी और आग के शोले थे जो धधकने लगे थे। चेहरे पर गुस्सा और नफ़रत के भाव ताण्डव सा करने लगे थे।

"तुम लोग अपने मंसूबों पर कभी कामयाब नहीं होगे कुत्तो।" रितू ने मन ही मन उन लोगों को गालियाॅ देते हुए कहा___"बल्कि अब मैं दिखाऊॅगी कि प्यार और नफ़रत का अंजाम किस तरह से होता है?"

रितू मन ही मन कहते हुए उस जगह से पलट कर वापस चल दी। कुछ ही देर में वह अपने कमरे में पहुॅच चुकी थी। दरवाजे की कुण्डी लगा कर वह बेड पर लेट गई। दिलो दिमाग़ में एक ऐसा तूफान उठ चुका था जो हर चीज़ उड़ा कर ले जाने वाला था।

काफी देर तक रितू बेड पर पड़ी इस सबके बारे में सोच सोच कर कभी रो पड़ती तो कभी उसका चेहरा गुस्से से भभकने लगता। फिर सहसा उसके अंदर से आवाज़ आई कि इस सबसे बाहर निकलो और शान्ती से किसी चीज़ के बारे में सोच कर फैंसला लो।

रितू ने ऑखें बंद करके दो तीन बार गहरी गहरी साॅसें ली तब कहीं जाकर उसे कुछ सुकून मिला और उसका मन शान्त हुआ। उसे ख़याल आया कि कल उसका सबसे अच्छा भाई विराज आ रहा है। विराज का ख़याल ज़हन में आते ही रितू का मन एक बार फिर दुखी हो गया।

"मेरे भाई, जितने भी दुख मैने तुझे दिये हैं न उससे कहीं ज्यादा अब प्यार दूॅगी तुझे।" रितू ने छलक आए ऑसुओं के साथ कहा__"मैं जानती हूॅ कि तू इतने बड़े दिल का है कि तू एक पल में अपनी इस दीदी को माफ़ कर देगा और मेरी सारी ख़ताएॅ भुला देगा। तेरे हिस्से के दुख दर्द बहुत जल्द तुझसे दूर चले जाएॅगे भाई। बस विधि को देख कर तू अपना आपा मत खो बैठना। अपने आपको सम्हाल लेना मेरे भाई। वैसे मैं तुझे फिर से बिखरने नहीं दूॅगी। तेरा हर तरह से ख़याल रखूॅगी मैं।"

बेड पर पड़ी रितू अपने मन में ये सब कहे जा रही थी। उसकी ऑखों के सामने बार बार विराज का वो मासूम और सुंदर चेहरा घूम जाता था। जिसकी वजह से पता नहीं क्यों मगर रितू के होठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आती थी।

"तू जल्दी से आजा मेरे भाई।" रितू ने मन में ही कहा___"तुझे देखने के लिए मेरी ये ऑखें तरस रही हैं। वैसे कैसा होगा तू? मेरा मतलब कि आज भी वैसा ही मासूम व सुंदर है या फिर बेरहम वक्त ने तुझे इसके विपरीत कठोर व बेरहम बना दिया है? नहीं नहीं मेरे भाई, तू ऐसा मत होना। तू पहले की तरह ही मासूम व सुंदर रहना। तू वैसा ही अच्छा लगता है मेरे भाई। मैं तुझे उसी रूप में देखना चाहती हूॅ। तुझे अपने सीने से लगा कर फूट फूट कर रोना चाहती हूॅ। अब मुझे इन पापियों के साथ नहीं रहना है भाई। ये तो अपनी ही बहन बेटी को लूटना चाहते हैं। मुझे इनके पास नहीं रहना अब। मुझे भी अपने साथ ले चल मुम्बई। मैं ये नौकरी छोंड़ दूॅगी और तेरे साथ ही हर वक्त रहूॅगी। अपने प्यारे से भाई के साथ। बस तू जल्दी से आजा यहाॅ।"

जाने क्या क्या मन में कहती हुई रितू आख़िर कुछ देर में अपने आप ही सो गई। वक्त और हालात बड़ी तेज़ी से बदल रहे थे। आने वाला समय किसकी झोली में कौन सी सौगात डालने वाला था ये भला किसे पता हो सकता था।

ख़ैर, रात गुज़र गई और सुबह का आगाज़ हुआ। बेड पर गहरी नींद में सोई हुई रितू को ऐसा लगा जैसे कुछ बज रहा है। नींद के साथ ही स्थिर और सोया हुआ मन मस्तिष्क फौरन ही सक्रिय अवस्था में आ गया। जिसकी वजह से रितू की ऑख खुल गई। ऑख खुलते ही उसके कानों में उसके आई फोन की रिंग टोन उसे स्पष्ट सुनाई दी। रितू ने बाई तरफ करवॅट लेकर मोबाईल को उठाया और जब तक उस पर आ रही किसी की काल को पिक करने के लिए अपने अॅगूठे को हरकत दी तब तक काल अपने निश्चित समय सीमा के चलते कट गई।

रितू ने रिसीव काल की लिस्ट को ओपेन किया तो उसमें उसे पवन सिंह लिखा नज़र आया। ये देख कर रितू के दिमाग़ की बत्ती जली। उसे ध्यान आया कि आज उसका भाई विराज मुम्बई से यहाॅ आ रहा है। ये बात दिमाग़ मे आते ही रितू ने फौरन पवन सिंह को फोन लगा दिया। पहली ही घंटी पर पवन ने काल पिक कर ली।

"ओफ्फो दी, आप फोन क्यों नहीं उठा रही थी?" उधर से पवन ने कहा___"चार बार आपको काल कर चुका हूॅ मैं।"
"ओह आई एम सो स्वारी भाई।" रितू ने खेद भरे भाव से कहा___"वो मैं गहरी नींद में सो रही थी न। कल रात नीद ही नहीं आ रही थी। इस लिए देर से सोई थी मैं। ख़ैर छोड़ो, तुम बताओ किस लिए फोन कर रहे थे मुझे?"

"वो मेरी विराज से फोन पर बात हुई है वो बता रहा था कि वो सही समय पर गुनगुन रेलवेस्टेशन पहुॅच जाएगा।" उधर से पवन कह रहा था___"मैने सोचा आपको इस बारे में बता दूॅ। मगर,....।"
"मगर क्या भाई?" रितू के माथे पर बल पड़ा।

"मगर यही कि मैने आपके कहने पर अपने जां से भी ज्यादा अज़ीज़ दोस्त को यहाॅ बुला तो लिया है।" पवन की आवाज़ में गंभीरता और अधीरता दोनो थी, बोला____"मगर, यदि उसकी जान को या उस पर लेश मात्र का भी संकट आया तो सोच लीजिएगा। उस सूरत में मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। आप मेरी बात समझ रही हैं न?"

"मुझे बेहद खुशी है कि मेरे भाई को तुम जैसा चाहने वाला दोस्त मिला है।" रितू की ऑखों में ऑसू आ गए, बोली___"मैं तुम्हारी बातों का मतलब समझ गई हूॅ भाई। तुमको कदाचित अभी भी अपनी इस बहन पर यकीन नहीं है, और सच कहूॅ तो होना भी नहीं चाहिए। आख़िर यकीन करने लायक मैने अब तक कीई काम किया ही कहाॅ है? मगर इतना ज़रूर कहूॅगी मेरे भाई कि तेरी ये बहन पहले से बहुत ज्यादा बदल गई है। तेरी इस बहन को समझ आ गया है कि कौन सही है और कौन ग़लत? आज मेरे दिल में अगर किसी के लिए बेपनाह प्यार है तो सिर्फ और सिर्फ अपने उस भाई के लिए जिसको मैने कभी अपना भाई नहीं माना था।"

"अगर ऐसी बात है तो मुझे खुशी है दीदी कि अब मेरे यार को आप के रहते कोई ख़तरा नहीं हो सकता।" पवन ने उधर से खुश हो कर कहा___"अच्छा अब फोन रखता हूॅ दीदी। विराज जब हल्दीपुर पहुॅचेगा तो मैं उसे लेने बस स्टैण्ड पर पहुॅच जाऊॅगा। आप तो जानती ही हैं कि मेरी दुकान बस स्टैण्ड पर ही है। विराज को लेकर मैं अपने घर चला जाऊॅगा। फिर जब आपका फोन आएगा तब मैं उसे लेकर विधी के पास हास्पिटल आ जाऊॅगा।"

"ठीक है भाई।" रितू ने कहा___"तब तक मैं भी उसकी सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम करती हूॅ।"
[color=rgb(0,]ये कहने के बाद रितू ने काल कट कर दी। इस वक्त उसके चेहरे पर बहुत ही ज्यादा खुशी झलक रही थी। उसके गोरे और खूबसूरत से चेहरे पर ग़जब का नूर उतर आया था। कुछ देर बेड पर वह जाने क्या क्या सोच कर मुस्कुराती रही फिर बेड से उठ कर बाथरूम की तरफ बढ़ गई।
_____________________________

उधर मुम्बई से ट्रेन में बैठने के बाद मैं और मेरे साथ जगदीश अंकल के द्वारा भेजे हुए बाॅडीगार्ड आदित्य चोपड़ा दोनो चल दिये थे। कुछ दूर तक का सफ़र तो हम दोनो के बीच की ख़ामोशी के साथ ही कटता रहा। उसके बाद हम दोनो के बीच बातें शुरू हो गई थी। ये अलग बात है कि बात करने की पहल मैने ही की थी। आदित्य चोपड़ा कुछ ख़ामोश तबीयत का इंसान था। वो ज्यादा किसी से बोलता नहीं था। अब ये ख़ामोशी उसकी फितरत का हिस्सा थी या फिर उसके ख़ामोश रहने की कोई ऐसी वजह जिसके बारे में फिलहाल मुझे कुछ पता नहीं था।

लेकिन जब हमारे बीच कान्टीन्यू बातें होती रही तो आदित्य का स्वभाव थोड़ा बदल गया था। हलाॅकि शुरू शुरू में वह मेरी किसी भी बात का जवाब हाॅ या ना में संक्षिप्त रूप से ही देता था। किसी किसी पल वह मेरी बातों से परेशान भी नज़र आया मगर मैने उसे बड़े प्यार व इज्ज़त से समझाया कि ख़ामोश रहने से किसी भी समस्या से छुटकारा नहीं मिलता। फिर मैने उसे संक्षेप में अपनी और अपने परिवार की कहानी सुनाई। मेरी कहानी सुन कर आदित्य चोपड़ा बेहद संजीदा सा हो गया था। उसने मुझसे कहा कि अभी तक तो वो मेरे बाॅडीगार्ड की हैंसियत से साथ था लेकिन अब वो मेरे साथ मेरा सच्चा दोस्त बन कर रहेगा और मुझे हर संकट से बचाएगा।

उसके बाद हम दोनो हॅसी खुशी ट्रेन में बातें करते रहे। मेरे पूछने पर ही उसने अपने बारे में बताया। आदित्य चौपड़ा के पास किसी चीज़ की कोई कमीं नहीं थी। जब वो पच्चीस साल का था तब उसे किसी लड़की से प्यार हो गया था। लेकिन बाद में पता चला कि वो लड़की हर पल सिर्फ उसका स्तेमाल कर रही थी। दरअसल उस लड़की का पहले से ही किसी विदेशी लड़के से चक्कर था। लड़की का बाप अपनी बेटी को बग़ैर किसी सिक्योरिटी के कहीं जाने नहीं देता था। आदित्य चोपड़ा उस लड़की का ब्वाडीगार्ड था। उस चक्कर में वो लड़की अपने उस विदेशी ब्वायफ्रैण्ड से मिल नहीं पाती थी। लड़की ने किसी योजना के तहत आदित्य को अपने प्यार के जाल में फॅसाया। और फिर उस लड़की ने आदित्य को अपने प्यार में इस हद तक पागल कर दिया कि उसके कहने पर आदित्य उसे लेकर विदेश तक जाने को तैयार हो गया। विदेश जाने के लिए सारी तैयारियाॅ करने के बाद एक दिन आदित्य और वो लड़की जिसका नाम कोमल सिंहानिया था दोनो ही सिंहानिया विला से फुर्र हो गए। एयरपोर्ट के रास्ते पर ही एक जगह कोमल ने टैक्सी रुकवाई। आदित्य को समझ न या कि कोमल ने टैक्सी क्यों रुकवाई थी। टैक्सी के उतरते ही कोमल टैक्सी से उतर गई और टैक्सी ड्राइवर से अपना सामान भी टेक्सी से निकालने को कह दिया। हैरान परेशान आदित्य ने उससे पूछा कि ये सब क्या है? हम बीच रास्ते में टैक्सी से इस तरह क्यों उतर रहे हैं?

आदित्य के सवाल का जवाब देने से पहले ही उस जगह पर एक और टैक्सी आकर रुकी। उस टैक्सी का दरवाजा खोल कर कोमल का विदेशी ब्वायफ्रैण्ड बाहर आ गया। कोमल के पास आकर उस विदेशी ने कोमल को अपने गले से लगाया और फिर आदित्य के सामने ही उसने कोमल के रस भरे होठों को ज़ोर से चूॅमा। ये देख कर आदित्य के पैरों तले से ज़मीन गायब हो गई। उसके दिलो दिमाग़ को ज़बरदस्त झटका लगा था। उसकी हालत गहरे सदमे में डूब जाने जैसी हो गई थी।

"ओह रिलैक्स आदित्य।" कोमल ने खनकती हुई आवाज़ से कहा___"इस तरह रिऐक्ट करने की कोई ज़रूरत नहीं है। एण्ड साॅरी फार आल दिस। बट यू नो व्हाट, इसमें मेरी कोई ग़लती नहीं है। मुझे उस कैदखाने से हमेशा के लिए आज़ाद होना था और अपने इस ब्वायफ्रैण्ड के साथ विदेश में अपनी सेटल हो कर लाइफ एंज्वाय करना था। मगर ये तभी हो सकता था जब मैं उस कैदखाने से और इस सिक्योरिटी से बाहर निकलती। इस लिए मैने मजबूरी में तुम्हें अपने प्यार में पागल किया और इस हद तक किया कि तुम मेरे एक इशारे पर मुझे कहीं भी ले चलने को तैयार हो जाओ। वही तुमने किया, लेकिन जो मैने किया वो सिर्फ अपने प्यार और अपनी खुशी को पाने के लिए किया है। इस लिए प्लीज आदित्य इस सबके लिए मुझे माफ़ कर देना।"

कोमल की बातें आदित्य के कानों में ज़हर सा घोल रही थी और उसके दिल को चकनाचूर कर रही थी। मगर आदित्य मजबूत तबीयत का मार्शल आर्टिस्ट था। उसने खुद को सम्हाला और फिर मुस्कुरा कर कोमल से सिर्फ इतना ही कहा कि जहाॅ भी रहना खुश रहना।

उसके बाद आदित्य अपने ऑसुओं को छुपाते हुए पुनः उसी टैक्सी में बैठ गया और टैक्सी ड्राइवर से वापस चलने को कहा। सिंहानियाॅ को आदित्य ने सब कुछ सच सच बता दिया और उससे ये भी कहा कि अगर वो ये समझते हैं कि उसने कोई अपराध किया है तो वो उसे जो चाहे सज़ा दे सकते हैं। आदित्य की बातें सुन कर सिंहानियाॅ को गुस्सा तो बहुत आया मगर फिर उसने खुद को शान्त किया और आदित्य से कहा कि तुम ईमानदार हो, सच्चे हो। कोमल की खुशी के लिए तुमने उसे उसके उस विदेशी ब्वायफ्रैण्ड के साथ जाने दिया। ये भी नहीं सोचा कि इस काम के लिए तुम्हारे साथ क्या सुलूक हो सकता है। ख़ैर, हम तुम्हें कोई सज़ा नहीं देंगे। क्योंकि जब अपना ही खून इस तरह का धोखेबाज़ था तो दूसरों को क्या कहें? हम समझ सकते हैं कि तुम्हारे दिल पर इस सबसे क्या गुज़र रही है। मगर यंगमैन, तुम हमारी उस लड़की के पीछे अपनी ज़िंदगी बरबाद मत करना। बल्कि खुशी खुशी किसी अच्छी लड़की से शादी कर लेना।

बस उसके बाद आदित्य कभी सिंहानिया के घर नहीं गया और कोमल के द्वारा मिले झटके ने उसे हमेशा के लिए ख़ामोश कर दिया था। तो ये थी आदित्य चोपड़ा के ख़ामोश रहने की वजह मगर अब वो ख़ामोश नहीं था। बल्कि मेरा दोस्त बन चुका था और हम दोनो हॅसी खुशी बातें करते हुए आ रहे थे। रात में हम दोनो ने थोड़ा बहुत खाना खाया और आराम से लेट कर सो गए थे।

सुबह आदित्य ने ही मुझे उठाया। उसके दोनो हाथों में गरमा गरम चाय के दो छोटे छोटे ग्लास देख कर मैं भी उठ बैठा।

"गुड मार्निंग डियर फ्रैण्ड।" आदित्य ने मुस्कुराते हुए अपने एक हाथ में पकड़े हुए चाय के उस छोटे से ग्लास को मेरी तरफ बढ़ा दिया,___"हाज़िर हैं गरमा गरम चाय।"
"एक मिनट भाई मैं ज़रा हाथ मुह धोकर आता हूॅ।" मैने कहा और उठ कर बाथरूम की तरफ चला गया।

थोड़ी देर बाद मैं बाथरूम से वापस आया और आदित्य के सामने वाली सीट पर बैठ गया। आदित्य ने मुझे चाय पकड़ाई तो मैं उसके हाॅथ से चाय लेकर पीने लगा।

"वैसे कितने बजे तक हम तुम्हारे गाव पहुॅचेंगे?" आदित्य ने कहा अपने बाएॅ हाथ पर बॅधी रिस्टवाच पर टाइम देखते हुए कहा___"अभी तो सुबह के सात ही बजे हैं।"
"अगर ट्रेन अपने राइट समय पर चल रही है तो हम लगभग ग्यारह बजे गुनगुन स्टेशन पहुॅच जाएॅगे।" मैने बताया उसे।

"ओह इसका मतलब अभी काफी समय बाॅकी है पहुॅचने में।" आदित्य ने ठंडी साॅस ली।
"हाॅ, मेरा दोस्त पवन हल्दीपुर के बस स्टैण्ड पर मिलेगा।" मैने कहा___"ट्रेन से हम गुनगुन स्टेशन पर उतरेंगे उसके बाद वहाॅ से ऑटो करके हम बस स्टैण्ड जाएॅगे। बस से हम हल्दीपुर पहुॅचेंगे। जहाॅ पर हमें पवन मिलेगा।"

"ओह यार ये तो काफी लम्बा चक्कर लग रहा है।" आदित्य बोला___"वैसे गुनगुन स्टेशन से क्या हम किसी टैक्सी द्वारा तुम्हारे गाॅव तक नहीं जा सकते?"

आदित्य की बात सुनकर मेरे दिमाग़ की बत्ती जली। टैक्सी से जाने में काफी सुरक्षा वाली बात रहेगी। क्योंकि एक पल के लिए अगर ये मान लिया जाए कि मेरे बड़े पापा अपने आदमियों की यहाॅ लगा रखा होगा तो वो सब मुझे बस में ही खोजेंगे और टैक्सी में मेरे मौजूद होने की वो कल्पना भी न करेंगे। मुझे आदित्य की ये बात बहुत जॅची।

"क्या हुआ यार?" मुझे सोचों में गुम देख कर आदित्य कह उठा___"कहाॅ खो गए तुम?"
"मैं ये सोच रहा हूॅ कि हम गुनगुन स्टेशन पर ट्रेन से उतर कर किसी टैक्सी के द्वारा ही हल्दीपुर चलें।" मैने कहा___"तुम्हारी इस बात से मुझे यही लग रहा है कि टैक्सी में हम ज्यादा सेफ रहेंगे।"

"अगर ऐसा है तो हम टैक्सी में ही चलेंगे तुम्हारे गाॅव।" आदित्य ने कहा___"हर जगह वाहन बदलने का चक्कर भी नहीं रहेगा।"
"सही कहा तुमने।" मैने कहा___"मैं पवन को भी बता देता हूॅ कि मैं टैक्सी से डायरेक्ट हल्दीपुर आऊॅगा।"

मैने अपना फोन निकाल कर पवन को सब बता दिया। उसके बाद मैं और आदित्य समय गुज़ारने के लिए फिर से किसी न किसी चीज़ के बारे में बातें करने लगे। उधर ट्रेन अपनी रफ्तार से दोड़ी जा रही थी। मुझे नहीं पता था कि आने वाला समय मुझे क्या दिखाने वाला था या फिर किस तरह का झटका देने वाला था?

[/color]
दोस्तो, आख़िर समय निकाल कर अपडेट तैयार कर ही लिया। तो हाज़िर है आपकी अदालत में मेरा प्रयोग,,,,,,,,,,,,,,

दोस्तो, मुझे पता है कि हिन्दी फोन्ट में हो या अंग्रेजी फोन्ट में टाइपिंग करते समय शब्द इधर उधर हो जाते हैं। मेरी आदत है कि मैं अपडेट को एडिट भी नहीं करता।
 
एकनयासंसार

अपडेट.........《 42 》

अब तक,,,,,,,,

"ओह यार ये तो काफी लम्बा चक्कर लग रहा है।" आदित्य बोला___"वैसे गुनगुन स्टेशन से क्या हम किसी टैक्सी द्वारा तुम्हारे गाॅव तक नहीं जा सकते?"

आदित्य की बात सुनकर मेरे दिमाग़ की बत्ती जली। टैक्सी से जाने में काफी सुरक्षा वाली बात रहेगी। क्योंकि एक पल के लिए अगर ये मान लिया जाए कि मेरे बड़े पापा अपने आदमियों को यहाॅ लगा रखा होगा तो वो सब मुझे बस में ही खोजेंगे और टैक्सी में मेरे मौजूद होने की वो कल्पना भी न करेंगे। मुझे आदित्य की ये बात बहुत जॅची।

"क्या हुआ यार?" मुझे सोचों में गुम देख कर आदित्य कह उठा___"कहाॅ खो गए तुम?"
"मैं ये सोच रहा हूॅ कि हम गुनगुन स्टेशन पर ट्रेन से उतर कर किसी टैक्सी के द्वारा ही हल्दीपुर चलें।" मैने कहा___"तुम्हारी इस बात से मुझे भी यही लग रहा है कि टैक्सी में हम ज्यादा सेफ रहेंगे।"

"अगर ऐसा है तो हम टैक्सी में ही चलेंगे तुम्हारे गाॅव।" आदित्य ने कहा___"हर जगह वाहन बदलने का चक्कर भी नहीं रहेगा।"
"सही कहा तुमने।" मैने कहा___"मैं पवन को भी बता देता हूॅ कि मैं टैक्सी से डायरेक्ट हल्दीपुर आऊॅगा।"

मैने अपना फोन निकाल कर पवन को सब बता दिया। उसके बाद मैं और आदित्य समय गुज़ारने के लिए फिर से किसी न किसी चीज़ के बारे में बातें करने लगे। उधर ट्रेन अपनी रफ्तार से दौड़ी जा रही थी। मुझे नहीं पता था कि आने वाला समय मुझे क्या दिखाने वाला था या फिर किस तरह का झटका देने वाला था?
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अब आगे,,,,,,,,

"आप एक बार फिर से इस बारे में अच्छी तरह सोच लीजिए चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने समझाने वाले अंदाज़ में कह रहा था___"आपका इस मामले में पुलिस को सूचित करना कतई ठीक नहीं रहेगा। संभव है कि आपके द्वारा इस मामले को पुलिस को सूचित कर देने से वो ब्लैकमेलर हमारे लिए कोई गंभीर मुसीबत खड़ी कर दे। ये बात तो वो भी अच्छी तरह जानता और समझता ही होगा कि आप पुलिस को उसके बारे में बताने की सोचेंगे जो कि निहायत ही ग़लत होगा। उस सूरत में वो हमारे खिलाफ़ कुछ भी कर सकता है और हम उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएॅगे। क्योंकि अभी तक हम यही नहीं जानते हैं कि हमें ऐसी वीडियोज़ भेजने वाला वो शख्स आख़िर है कौन? उसने अब तक कोई फोन या मैसेज नहीं किया लेकिन उसके न करने से भी वो हमें यही समझा रहा है कि इस मामले में पुलिस को सूचित करने की मूर्खता हम लोग हर्गिज़ भी न करें।"

"तो आख़िर हम क्या करें अवधेश?" चौधरी ने खीझते हुए कहा___"आज दो दिन हो गए मगर उसकी तरफ से हमारे पास कोई मैसेज तक नहीं आया। हम तो चाहते हैं कि वो हमसे संबंध बनाए और बताए कि आख़िर वो ये सब करके हमसे चाहता क्या है? साला दो दिन से हमारे सुख चैन की माॅ बहन करके रखा हुआ है।"

"आप ज़रा धीरज से काम लीजिए चौधरी साहब।" अशोक मेहरा ने कहा___"आपकी तरह हम सब भी इस बात से बहुत परेशान और बेचैन हैं। हमारी जान भी हलक में अटक पड़ी है। मगर जैसा कि अवधेश भाई ने कहा कि इस बारे में पुलिस को सूचित करना ठीक नहीं है तो बात हमारे हित में ही है। आप तो जानते हैं कि साले पुलिस वाले बाल की खाल निकालने वाले होते हैं। संभव है कि वो हमसे ऐसे सवाल करने लगें जिन सवालों के जवाब देना हमारे लिए ख़तरे से खाली नहीं होगा। ऐसे में हम खुद ही उल्टा फॅस जाएॅगे। रही बात उस ब्लैकमेलर की कि उसने अब तक हमसे कांटैक्ट नहीं किया तो ये कोई समस्या नहीं है। कहने का मतलब ये कि वो देर सवेर ही सही मगर हमसे कांटैक्ट ज़रूर करेगा, क्योंकि इन वीडियोज़ को हमारे पास भेजने का कोई न कोई मकसद उसका ज़रूर होगा। अपने उस मकसद को पूरा करने के लिए वो हमसे कांटैक्ट ज़रूर करेगा। बस आप धैर्य रखें चौधरी साहब।"

"बस एक बार।" दिवाकर चौधरी गुस्से से दाॅत किटकिटाते हुए बोला___"सिर्फ एक वो हरामज़ादा हमारे हाॅथ लग जाए उसके बाद हम बताएॅगे उसे कि हमारे साथ ऐसी वाहियात हरकत करने का क्या अंजाम होता है। उस हराम के पिल्ले को ऐसी मौत मारेंगे कि उसे अपने पैदा होने पर अफसोस होगा।"

"इसका उल्टा भी तो हो सकता है चौधरी साहब।" सहसा इस बीच सहमी सी बैठी सुनीता ने अजीब भाव से कहा___"आप ये क्यों नहीं सोचते हैं कि जिसने भी आपके या हमारे साथ ऐसे दुस्साहस से भरे काम को अंजाम दिया है वो कोई ऐरा गैरा ब्यक्ति नहीं हो सकता? ये बात तो वो भी जानता होगा कि आप क्या चीज़ हैं, इसके बावजूद उसने ऐसा किया। इसका मतलब साफ है कि वो हमसे ज़रा भी ख़ौफ नहीं खाता है बल्कि अपने किसी मकसद को पूरा करने के लिए वो मौत के मुह में ही आ पहुॅचा है। दूसरी बात उसे हमसे डरने की ज़रूरत भी कहाॅ है जबकि उसके पास हमारे ख़िलाफ ऐसा सामान मौजूद है जिसके बल पर वो जब चाहे हमें बीच चौराहे पर नंगा दौड़ा सकता है। इस लिए ये बात तो आप भूल ही जाइये कि आप उसे ऐसी कोई मौत देंगे जिससे उसे अपने पैदा होने पर अफसोस होगा।"

"साली रंडी की दुम हमें डरा रही है?" चौधरी खिसियानी बिल्ली की तरह सुनीता पर चढ़ दौड़ा था, बोला___"तुझे पता नहीं है कि हम क्या चीज़ हैं। हम चाहें तो यहाॅ बैठे बैठे दिल्ली तक को हिला कर रख दें। वो हराम का जना साला तभी तक सलामत है जब तक वो हमसे दूर कहीं छुपा बैठा है। जिस दिन हमारे हाथ लग गया न उस दिन हम बताएॅगे कि दिवाकर चौधरी के साथ ऐसी हिमाकत करने का हस्र क्या होता है?"

दिवाकर चौधरी का तमतमाया हुआ चेहरा देख कर और उसकी खतरनाक बातें सुनकर सुनीता की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। ड्राइंगरूम पिन ड्राप सन्नाटा छा गया था। किसी की बोलने की हिम्मत न पड़ी। मगर तभी इस सन्नाटे को तोड़ने की हिमाकत खुद दिवाकर चौधरी के मोबाइल फोन की घंटी ने कर दी। दो पल के लिए तो दिवाकर चौधरी हड़बड़ाहट में ही रहा। फिर जल्दी से खादी के कुर्ते की जेब से मोबाइल फोन निकाल कर उसने स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नंबर को देखा। स्क्रीन पर वही नंबर फ्लैश हो रहा था जिस नंबर से चौधरी के इसी फोन पर वो वीडियोज़ भेजा था उस ब्लैकमेलर ने।

"क्या हुआ चौधरी साहब?" अवधेश श्रीवास्तव ने शशंक भाव से कहा___"क्या देख रहे हैं? काल को रिसीव कीजिए।"
"ये तो वही नंबर है अवधेश।" चौधरी ने बड़े उत्साहित भाव से कहा___"जिस नंबर से हमारे फोन पर वो वीडियो भेजे गए थे।"

"तो फिर जल्दी से काल को रिसीव कीजिए चौधरी साहब।" अशोह मेहरा कह उठा__"और फोन का स्पीकर भी ऑन कर दीजिए। हम सब भी सुनेंगे कि वो क्या कहता है?"

चौधरी ने काल रिसीव करके मोबाइल का स्पीकर ऑन कर दिया।
"कहो चौधरी कैसे हो?" उधर से मर्दाना स्वर में आवाज़ उभरी___"काल रिसीव करने में इतना टाइम कैसे लगा दिया तुमने? ओह शायद मेरा काल देख कर तुम्हें समझ में ही न आया होगा कि क्या करें और क्या न करें? होता है चौधरी, ऐसा तो यकीनन होता है। और हाॅ ये बहुत अच्छा किया जो अपने फोन का स्पीकर ऑन कर दिया तुमने। आख़िर तुम्हारे उन साथियों को भी तो मेरी मधुर आवाज़ सुनने का हक़ है।"

"हमसे ऐसे लहजे में बात करने का अंजाम नहीं जानते हो तुम।" चौधरी ने दाॅत पीसते हुए कठोर भाव से कहा___"अगर जानते तो ऐसी हिमाकत नहीं करते। और अब हमारी बात कान खोल कर सुनो तुम। ये जो कुछ तुमने किया है न उसकी सज़ा तो तुम्हें ज़रूर मिलेगी। ये मत समझना कि वोडियो भेज कर तुमने हमे चूहा बना दिया होगा।"

"ये गीदड़ भभकियाॅ किसी और को देना चौधरी।" उधर से ठंडे लहजे में कहा गया___"मैं तुम्हारी किसी बात से बाल बराबर भी डरने वाला नहीं हूॅ। मैं चाहूॅ तो पल भर में तुम्हारी ताकत और तुम्हारी शान को मिट्टी में मिला दूॅ। इस लिए बेहतर होगा कि मुझसे ज्यादा उड़ने की कोशिश मत करना और ना ही मुझ पर अपना रौब झाड़ना।"

"क्या चाहते हो तुम?" चौधरी को समझ आ गया था कि सामने वाला उससे डरने वाला नहीं है इस लिए मुद्दे की बात करना ही चित समझा उसने, बोला___"अगर तुमने ये सब हमसे रुपया पैसा ऐंठने के लिए किया है तो मुह फाड़ो अपना और बताओ कि कितना रुपया चाहिए तुम्हें? मगर ख़बरदार, डील सिर्फ एक ही बार होगी। तुम्हें जितना भी रुपया चाहिए वो बोल दो, हम तुम्हें मुहमागा रुपया दे देंगे मगर बदले में तुम हमें वो सारे वीडियोज़ लौटा दोगे।"

"ये तुमने कैसे सोच लिया चौधरी कि ये सब मैने तुमसे पैसे ऐंठने के लिए किया है?" उधर से हॅस कर कहा गया___"अरे बुड़बक, पैसा तो मेरे पास इतना है कि मैं खड़े खड़े तुम्हें और तुम्हारे पूरे खानदान को ख़रीद लूॅ। ख़ैर, तुम जैसे दो कौड़ी के भड़वों को खरीदेगा भी कौन? मैने तो ये सब सिर्फ इस लिए किया कि तुम्हें बता सकूॅ अब तुम्हारा और तुम्हारे साथियों का खेल खत्म हो चुका है। अब यहाॅ से तुम लोगों के बुरे कर्मों का हिसाब शुरू होगा।"

"हरामज़ादे तू है कौन साले?" चौधरी बुरी तरह गुस्से में चीख पड़ा था___"एक बार हमारे सामने आ फिर हम बताएॅगे कि हमसे ऐसी ज़ुर्रत करने का क्या अंजाम होता है?"
"हरामज़ादा किसे बोलता है रे मादरचोद साले रंडी की औलाद।" उधर से मानो शेर की गुर्राहट उभरी___"चिंता मत कर साले बहुत जल्द तेरी हेकड़ी निकालूॅगा मैं। साले बकरे की तरह मिमियाएगा मेरे सामने।"

"ज़ुबान सम्हाल कर बात कर हमसे।" चौधरी चीखा तो ज़रूर मगर उसने खुद महसूस किया कि उसके स्वर में कोई दम नहीं था, फिर भी बोला___"हम तुम्हारे इस अपराध को माफ़ कर देंगे। बस तुम हमें वो सब वीडियोज़ लौटा दो।"

"भीख माॅगता है क्या रे चौधरी?" उधर से ठहाके की आवाज़ आई___"अच्छा है माॅगना शुरू ही कर दे अब। ख़ैर जाने दे, मैं ये कह रहा हूॅ कि बहुत जल्द तुझे ऐसा मंज़र देखने को मिलेगा कि तू उसे देख नहीं पाएगा और तेरे ही साथ बस क्यों तेरे सभी साथियों के साथ भी वही सब होगा। अपनी बरबादी को रोंक सकता है तो रोंक ले तू।"

अभी चौधरी कुछ कहना ही चाहता था कि उधर से फोन कट गया। चौधरी ने जल्दी से उसी नंबर पर काल किया मगर नंबर स्विच ऑफ बताने लगा था। पल भर में चौधरी की हालत किसी लुटे हुए जुआॅरी जैसी नज़र आने लगी थी। चौधरी जैसा हाल बाॅकी उन सबका भी था जो वहाॅ पर बैठे फोन की हर बात सुन रहे थे। सुनीता की हालत तो ऐसी हो गई थी जैसे उसे लकवा मार गया हो। बड़े से ड्राइंगरूम में गहन सन्नाटे के सिवा कुछ न रह गया था।
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उधर हवेली में।
गहरी सोच में डूबी हुई नैना रितू के कमरे में पहुॅची। कमरे में पहुॅच कर उसने देखा कि रितू पुलिस की वर्दी पहने आईने के सामने खड़ी होकर सिर पर पीकैप को ठीक से लगाते हुए खुद को देख रही थी।

"क्या बात है रितू तूने मुझे इस तरह रहस्यमय तरीके से किस लिए बुलाया है?" नैना ने रितू की तरफ देखते हुए कहा था। उसकी बात सुन कर रितू आईने की तरफ से पलट कर अपनी नैना बुआ की तरफ देखा।

"क्या आपने अपना सब सामान ले लिया है बुआ जी?" रितू ने पूछा।
"आख़िर बात क्या है मेरी बच्ची?" नैना हैरान परेशान सी बोली___"मुझे अपना सारा सामान लेने के लिए क्यों कह रही है तू? क्या तू मुझे कहीं लेकर जा रही है?"

"हाॅ बुआ।" रितू ने तनिक गंभीरता से कहा___"लेकिन इस वक्त आप मुझसे ये न पूछिए कि ऐसा मैं क्यों कह रही हूॅ। बस आप वो कीजिए जो मैं कह रही हूॅ। यकीन मानिये बुआ मैं आपको आपके सभी सवालों का जवाब दूॅगी मगर अभी नहीं। अभी आप वही कीजिए जो मैने कहा है प्लीज़।"

"ठीक है रितू।" नैना ने बेचैनी से कहा__"पर मैं भइया भाभी से क्या कहूॅगी कि अपना सामान लेकर मैं कहा जा रही हूॅ?"
"उनको बता दीजिएगा कि आप वापस अपने ससुराल जा रही हैं क्योंकि आपके पास आपके ससुराल से फोन आया था जो आपको आने के लिए कह रहे थे।।" रितू ने जैसे तरीका बताया।

"वो तो ठीक है।" नैना ने कहा___"लेकिन अगर भइया ने मेरी ससुराल में फोन करके इस बारे में पूछा तो क्या होगा? उन्हें तो पता चल ही जाएगा कि मैं उनसे झूॅठ बोल रही हूॅ।"
"वो ऐसा कुछ नहीं करेंगे बुआ।" रितू ने कहा___"आप बस जल्दी से सामान लेकर हवेली से बाहर आइये। मैं आपको बाहर ही मिलूॅगी।"

"अरे नास्ता तो कर ले।" नैना ने कहा___"भाभी डायनिंग टेबल में तेरा इन्तज़ार कर रही हैं।"
"नहीं बुआ मुझे ज़रा भी भूॅख नहीं है।" रितू ने कहा___"और आप भी मत खाइयेगा। क्योंकि उससे हमें जाने में देर हो जाएगी।"

"बड़ी हैरानी की बात है रितू।" नैना ने चकित भाव से कहा___"ख़ैर, तू चल मैं आती हूॅ।"
"ठीक है बुआ।" रितू दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए बोली___"जल्दी आइयेगा।"

कहने के साथ ही रितू लम्बे लम्बे डग भरते हुए दरवाजे के बाहर निकल गई। उसके पीछे पीछे ही नैना भी चल दी। ये अलग बात है कि इस वक्त उसके मन में गहन विचारों का आवागमन शुरू था।

"रितू बेटा, बड़ी देर कर दी आने में।" प्रतिमा ने रितू को देखते ही कहा__"चल आजा, नास्ता ठंडा हो रहा है।"
"नहीं माॅम, मुझे अर्जेंट थाने पहुॅचना है।" रितू ने एक एक नज़र वहीं कुर्सियों पर बैठे अपने भाई शिवा और अपने पिता अजय सिंह पर डालते हुए कहा___"मैं बाहर ही नास्ता कर लूॅगी।"

"उफ्फ तेरी ये नौकरी भी न।" प्रतिमा ने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा___"चैन से तुझे नास्ता भी नहीं करने देती है। छोंड़ दे न ये नौकरी बेटा। आख़िर क्या कमी है हमारे पास और क्या कमी की है हमने तेरी इच्छाओं को पूरा करने में?"

"बात किसी भी चीज़ की कमी की नहीं है माॅम।" रितू ने कहा___"बात है शौक की और ये पुलिस की नौकरी मेरा शौक ही है। पाप और ज़ुर्म को खत्म करना मेरा शुरू से सिद्धांत रहा है। ख़ैर, आप नहीं समझेंगी मेरी भावनाओं को।"

"माॅम ठीक ही तो कह रही हैं दीदी।" सहसा शिवा ने कहा___"आपको पुलिस की नौकरी करने की क्या ज़रूरत है? इस तरह का शौक रखना निहायत ही बेकार की बात है।"
"तू अपना मुह बंद ही रख समझे।" रितू ने कठोर भाव से कहा___"मेरा शौक तेरे शौक से कहीं ज्यादा ऊॅचा और पाक़ है। पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो गई हूॅ और खुद कमा कर खा सकती हूॅ। तेरी तरह डैड के पैसों पर ऐश करना मुझे हर्गिज़ पसंद नहीं है।"

"आप ज़रूरत से ज्यादा ही भाषण दे रही हैं दीदी।" शिवा ने कहा___"बेहतर होगा कि आप अपना ये भाषण किसी और को सुनाएॅ।"
"सच कहा तूने।" रितू ने कड़वा ज़हर मानो खुद ही निगलते हुए कहा___"ये भाषण तुझे रास नहीं आ सकता। ये भाषण तो उसे ही रास आएगा जो इसके लायक होगा।"

"ये क्या बेहूदा बातें कर रही हो बेटी?" सहसा अजय सिंह कह उठा___"अपने इकलौते भाई से इस तरह रुखाई से कौन बहन बात करती है? तुमने अपनी मर्ज़ी से पुलिस की नौकरी कर ली हमें कोई प्राब्लेम नहीं हुई। मगर इस बात का भी ख़याल रखना बच्चों का फर्ज़ है कि वो अपने माता पिता के अरमानों के बारे में सोचें।"

"वाह डैड।" रितू की ऑखों में ऑसू आ गए___"इस वक्त कौन सही है कौन ग़लत ये तो आपने बिलकुल ही नज़रअंदाज़ कर दिया। मुझे याद नहीं कि मैने कब अपने माॅम डैड की इज्ज़त या सम्मान को चोंट पहुॅचाई है। बल्कि बचपन से लेकर अब तक वहीं किया जो आपने कहा। आज की दुनियाॅ में अगर बेटियाॅ अपने पैरों पर खड़े होकर कामयाबी का कोई आसमान छूती हैं तो माॅ बाप को अपनी उस बेटी पर गर्व होता है मगर मेरे माॅम डैड को मेरी पुलिस की नौकरी करना ज़रा भी पसंद नहीं आया। ख़ैर, जाने दीजिए डैड। अगर आप नहीं चाहते हैं कि मैं ये पुलिस की नौकरी करूॅ तो ठीक है छोंड़ दूॅगी इसे।"

"तुम बेवजह बातों का पतंगड़ बना रही हो रितू बेटा।" प्रतिमा ने कहा___"अपने डैड से इस लहजे में बात करना तुम्हें ज़रा भी शोभा नहीं देता।"
"साॅरी माॅम।" रितू ने अपने अंदर के जज़्बातों को बड़ी मुश्किल से दबाते हुए कहा___"साॅरी डैड, एण्ड साॅरी भाई।"

रितू ने कहा और झटके से बाहर की तरफ निकल गई। दिल एकदम से छलनी सा हो गया था उसका। कहना तो बहुत कुछ चाहती थी वो मगर ये समय सही नहीं था। अपने अंदर के सुलगते हुए जज़्बातों को शख्ती से दबा लिया था उसने। दिल में अपने माॅ बाप और भाई के लिए उसकी नफ़रत में जैसे और भी इज़ाफा हो गया था।

हवेली के बाहर आकर वह एक तरफ खड़ी अपनी पुलिस जिप्सी की तरफ बढ़ती चली गई। जिप्सी में बैठ कर उसने उसे स्टार्ट किया और आगे बढ़ा कर मुख्य दरवाजे तक आ कर रुक गई। कदाचित नैना बुआ के आने का इन्तज़ार करने लगी थी वह। लगभग पन्द्रह मिनट के इन्तज़ार के बाद नैना बाहर आती दिखी उसे। नैना के बाएॅ हाथ में उसका बैग देख कर रितू ने मन ही मन राहत की मीलों लम्बी साॅस ली। जिप्सी के पास आकर नैना ने पिछली सीट पर बैग रखा और फिर घूम कर रितू के बगल वाली सीट पर आकर बैठ गई। नैना के बैठते ही रितू ने जिप्सी को झटके से आगे बढ़ा दिया।

"हवेली से बाहर आने में काफी देर लगा दी आपने।" मेन सड़क पर पहुॅचते ही रितू ने कहा नैना से।
"हाॅ वो भइया भाभी पूछने लगे थे न कि मैं अपना ये सामान लेकर कहाॅ जा रही हूॅ?" नैना ने बताया___"बड़ी मुश्किल से उन्हें कन्विंस किया तब जाकर बाहर आ पाई मैं। लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आ रहा कि तुम मुझे इस तरह कहाॅ लेकर जा रही हो?"

"बस ये समझ लीजिए बुआ कि मैं आपको ऐसी जगह लेकर जा रही हूॅ।" रितू ने अजीब भाव से कहा___"जहाॅ पर आप पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी।"
"क्या मतलब??" नैना बुरी तरह चौंकी थी।
"मतलब किसी स्वीमिंग पुल में भरे पानी की तरह साफ है बुआ।" रितू ने कहा___"बस समझने की बात है।"

"देख तू मुझसे ऐसे पुलिसिये लहजे में बात मत किया कर।" नैना ने कहा___"मुझे बिलकुल समझ में नहीं आता कि तू क्या बोल रही है?"
"अच्छा ये बताइये।" रितू ने कहा__"कि डैड ने आपके ससुराल वालों को फोन तो नहीं किया न वो सब पूछने के लिए?"

"नहीं फोन तो नहीं किया।" नैना ने कहा__"बस यही कहा कि ये अच्छी बात है अगर मेरी ससुराल वाले मुझे फिर से बुला रहे हैं तो। मगर, ऐसा भी तो हो सकता है रितू कि वो मेरे यहाॅ आने के बाद मेरी ससुराल में फोन लगाएॅ। ये जानने के लिए कि मैं वहाॅ पर समय पर और ठीक से पहुॅच गई हूॅ कि नहीं और जब उन्हें ये पता चलेगा कि मैं वहाॅ गई ही नहीं तो क्या सोचेंगे वो मेरे बारे में?"

"अब उनके कुछ भी सोचने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला बुआ।" रितू ने कहा__"क्यों कि अब आप हवेली से बाहर आ चुकी हैं। मैं तो बस आपको उस हवेली से बाहर निकालना चाहती थी।"
"क्या मतलब है तेरा?" नैना बुरी तरह उछल पड़ी। हैरत से उसकी ऑखें फैल गईं थी।

"अभी नहीं बुआ।" रितू ने कहा___"बाद में आपको सब कुछ बताऊॅगी और तसल्ली से बताऊॅगी।"
"पता नहीं क्या अनाप शनाप बोले जा रही है तू?" नैना का दिमाग़ मानो चकरघिन्नी बन गया था, बोली___"मुझे तो कुछ पल्ले ही नहीं पड़ रही तेरी बातें।"

नैना की इस बात पर रितू कुछ न बोली। बल्कि जिप्सी को टाॅप गियर में डाल कर उसे तूफान की तरह भगाती हुई वह नियत समय से बहुत कम समय में अपने फार्महाउस पहुॅच गई। फार्महाउस के अंदर दाखिल होकर रितू ने पोर्च के नीचे जाकर जिप्सी को रोंक दिया।

"ये कौन सी जगह है रितू?" नैना ने हैरानी से इधर उधर देखते हुए कहा___"ये तू कहाॅ ले आई है मुझे?"
"अपने एक अलग घर में बुआ।" रितू ने कहा___"जहाॅ पर अपना अलग एक नया संसार बसता है।"

"एक नया संसार?" नैना चकरा सी गई, बोली___"इसका क्या मतलब हुआ भला?"
"आईये अंदर चलते हैं।" जिप्सी से उतरते हुए रितू ने कहा___"अब से आप यहीं रहेंगी।"
"ये तुम क्या कह रही हो बेटा?" नैना चकित स्वर में बोली___"मैं यहीं रहूॅगी? मगर क्यों रितू? ऐसा क्या हो गया है जिसकी वजह से तुम मुझे यहाॅ लेकर आई हो। आख़िर बात क्या है? क्या छुपा रही है तू मुझसे? देख रितू मुझे सारी बात सच सच बता, मेरा दिल बहुत घबरा रहा है।"

"अब आपको किसी भी बात के लिए घबराने की ज़रूरत नहीं है बुआ।" रितू ने पिछली सीट से नैना का बैग निकालते हुए कहा__"ये अपना ही घर है। यहाॅ पर आपको किसी बात का कोई ख़तरा नहीं है।"

"खतरा???" नैना का दिमाग़ मानो कुंद सा पड़ता चला गया, बोली___"आख़िर तू किस खतरे की बात कर रही है रितू? मुझे भला किससे खतरा है और किस बात का खतरा है? मुझे बता बेटा, वरना तेरी इन बातों से मैं पागल हो जाऊॅगी।"

"सब बताऊॅगी बुआ।" रितू ने कहा__"अंदर तो चलिए।"
रितू की इस बात से हैरान परेशान नैना किसी यंत्र चालित सी होकर रितू के पीछे पीछे अंदर की तरफ चल पड़ी।

अंदर पहुॅचते ही उन्हें हरिया काका की बीवी बिंदिया मिल गई।
"अरे बिटिया आ गई तुम?" बिंदिया ने बड़े प्यार और सम्मान से कहा___"और ये तुम्हारे साथ में बीवी जी कौन हैं?"

"काकी ये मेरी छोटी बुआ हैं।" रितू ने कहा___"और आज से ये यहीं रहेंगी। इनका हर तरह से ख़याल रखना।"
"इसमें कहने वाली कौन सी बात है बिटिया?" बिंदिया ने कहा___"मेरे लिए तो ये भी तुम्हारी तरह ही हैं।"

"इनके लिए मेरे बगल वाले कमरे को अच्छी तरह साफ कर दीजिए।" रितू ने कहा__"तब तक मैं इन्हें अपने कमरे में लिये जा रही हूॅ। और हाॅ जल्दी से गरमा गरम नास्ता भी तैयार कर दीजिए।"
"सब हो जाएगा बिटिया।" बिंदिया ने कहा___"तुम बस कुछ देर का समय दो मुझे।"
"ठीक है काकी।" रितू ने कहने के साथ ही नैना की तरफ देख कर कहा___"आइये बुआ ऊपर कमरे में चलते हैं।"

रितू ने कहा तो नैना उसके पीछे चुपचाप चल दी। उसके मन में हज़ारों सवाल और हज़ारों ख़याल पैदा हो चुके थे। कमरे में पहुॅच कर रितू ने नैना को बेड पर बैठाया और खुद भी उसके बगल में बैठ गई।

"अब तो बता बेटा कि बात क्या है?" नैना ने ब्याकुलता से पूछा___"इस तरह तू मुझे यहाॅ लेकर क्यों आई है?"
"मुझे समझ नहीं आ रहा बुआ।" रितू ने सहसा गंभीर होकर कहा___"कि आपको वो सब बातें कैसे बताऊॅ और कहाॅ से बताऊॅ?"

"देख रितू तू अब कोई बच्ची नहीं रही।" नैना ने कहा___"बल्कि तू अब बड़ी हो गई है। जो भी बात है तू मुझे बेझिझक बता सकती है। मुझे तू अपनी दोस्त या राज़दार समझ सकती है। मैं जातनी हूॅ कि तू कभी कोई ग़लत काम नहीं कर सकती है। मुझे तुझ पर हमेशा से गर्व रहा है। ख़ैर, तू बेझिझक बता कि ऐसी क्या बात है जिसकी वजह से तू मुझे इस तरह यहाॅ लेकर आई है?"

"मुझे किसी बात की भूमिका बनाना नहीं आता बुआ।" रितू ने गंभीरता से कहा__"मैं तो साफ साफ कहना जानती हूॅ। आप जानना चाहती हैं न कि मैं आपको इस तरह यहाॅ क्यों लेकर आई हूॅ यो सुनिए___हवेली में रहने वाले आपके भइया भाभी और आपका भतीजा ये तीनो ही वासना और हवस के चलते इस क़दर अंधे हो चुके हैं कि इन्हें अब ये भी नहीं दिखता कि ये लोग जिनके साथ कुकर्म करने का मंसूबा बनाए हुए हैं वो रिश्ते में इनके क्या लगते हैं।"

"ये तू क्या कह रही है रितू?" नैना की ऑखें हैरत से फैल गईं, बोली___"तुझे कुछ होश भी है कि तू किनके बारे में क्या बोल रही है?"
"होश तो अब आया है बुआ।" रितू ने भारी लहजे में कहा___"बचपन से लेकर अब तक तो मैं बेहोश ही थी। अपने उन माता पिता को देवता समझती रही जिनके हाॅथ अपने ही घर के लोगों के खून से सने हुए हैं। आपको नहीं पता बुआ, आपका भाई और मेरा बाप अपने ही भाई विजय सिंह का क़ातिल है। आज तक हम सब यही जानते रहे हैं कि विजय चाचा की मौत सर्प के काटने से हुई थी जब वो खेत में पानी लगा रहे थे। जबकि ये बात सरासर झूॅठ है बुआ। सच्चाई ये है कि मेरे बाप ने उनकी जानबूझ कर जान ली थी।"

"ये ये क्या कह रही है तू?" नैना के पैरों तले से ज़मीन गायब हो गई___"नहीं नहीं अजय भइया ऐसा नहीं कर सकते हैं। ये सब झूठ है रितू, कह दे कि ये सब झूठ है।"
"कैसे कह दूॅ बुआ?" रितू की ऑखें छलक पड़ी____"मैंने अपनी ऑखों से देखा है और कानों से सुना है।"

"कब देखा सुना तुमने?" नैना कह उठी।
"कल रात को।" रितू ने कहा___"और ये अच्छा ही हुआ बुआ कि मुझे अपने माता पिता की ये सच्चाई खुद उनके ही मुख से सुनने को मिल गई। कल रात मुझे नींद नहीं आ रही थी। अपने बेड पर पड़ी मैं करवॅटें बदल रही थी। फिर मुझे प्यास लगी तो मैं अपने कमरे से निकल कर नीचे किचेन में पानी पीने के लिए आई। पानी पीकर जब मैं वापस अपने कमरे की तरफ जाने लगी तो देखा कि गौरी चाची की तरफ जाने वाला पार्टीशन का दरवाजा खुला हुआ था। मैने सोचा ये खुला हुआ क्यों है आज। बस यही पता करने के लिए मैं उस तरफ चली गई। मगर मुझे क्या पता था कि उस तरफ मुझे कुछ ऐसा देखने सुनने को मिलेगा जिसे देख सुन कर मेरे पैरों तले से धरती गायब हो जाएगी।"

"ऐसा क्या देखा सुना तुमने?" नैना बेयकीनी भरे भाव से पूछा था। उसकी बात सुन कर रितू उसे वो सब कुछ बताती चली गई जो कुछ उसने उस तरफ कमरे के अंदर देखा और सुना था। उसने एक एक बात नैना को बताई। सारी बातें सुनने के बाद नैना की हालत काटो तो खून नहीं जैसी हो गई थी। फिर जैसे उसे खुद ही होश आया। उसका चेहरा पलक झपकते ही दुख और पीड़ा में डूबता चला गया। ऑखों से झर झर करके ऑसू बहने लगे।

"इतना बड़ा पाप।" फिर वह बिलखते हुए बोली___"और इतना बड़ा गुनाह किया इन लोगों ने मेरे देवता जैसे भाई के साथ। अरे उसके साथ ही क्यों रे, इन लोगों ने तो किसी को भी नहीं बक्शा। अपने पाप और गुनाह को छुपाने के लिए मेरे भाई की सर्प से कटवा कर जान ले ली। मेरी देवी समान भाभी गौरी पर इतने संगीन इल्ज़ाम लगाए और उन्हें हवेली से निकाल दिया। इन लोगों ने तो हवेली को नर्क बना कर रख दिया है रितू। अच्छा हुआ तू मुझे यहाॅ ले आई। वरना इन लोगों का कोई भरोसा नहीं था कि ये लोग कब मेरी या तुम्हारी इज्ज़त के साथ अपनी हवस की भूख को शान्त करते।"

"मुझे नफ़रत हो गई है बुआ अपने माॅ बाप और भाई से।" रितू ने कहा___"मैं तो कल ही अपने रिवाल्वर से इन तीनो को जान से मार देना चाहती थी मगर मेरे ज़मीर ने रोंक दिया मुझे। ये कह कर कि इनको जान से मारने का अधिकार मुझको नहीं बल्कि उसे है जिनके साथ इन लोगों ने ग़लत किया है। कसम से बुआ, मुझे ऐसे माॅ बाप और भाई के मर जाने का लेश मात्र भी दुख नहीं होगा।"

"मुझे तो अभी भी यकीन नहीं हो रहा रितू कि ये सब इन लोगों ने किया है।" नैना ने दुखी भाव से कहा___"पता नहीं मेरी देवी समान गौरी भाभी और उनके दोनो बच्चे किस हाल में होंगे? जिस तरह से इन लोगों उन पर अत्याचार किया है न उसकी इन्हें सज़ा ज़रूर मिलेगी। ईश्वर के पास सबका हिसाब है। उसका क़हर जब इन पर बरपेगा न तो इनके जिस्मों पर कीड़े पड़ जाएॅगे।"

"वो लोग मुम्बई में जहाॅ भी होंगे यहाॅ से बहुत अच्छे होंगे बुआ।" रितू ने कहा___"और आपको पता है आज मेरा वो भाई आ रहा है जिसे मैने कभी अपना भाई नहीं समझा था। लेकिन वो पगला हमेशा मुझे इज्ज़त से दीदी ही कहा करता था। मेरा सच्चा भाई आ रहा है बुआ। मेरा राज आ रहा है मुम्बई से।"

"क्या?????" नैना उछल पड़ी___"मगर तुझे कैसे पता?"
"पता तो होगा ही बुआ।" रितू ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"आख़िर बुलवाया तो मैने ही है उसे।"
"ये क्या कह रही है तू?" नैना ने बुरी तरह चौंकते हुए कहा___"तूने उसे बुलवाया है? ये जानते हुए भी कि तुम्हारे बाप से उसकी जान को खतरा है?"

"उसे कुछ नहीं होगा बुआ।" रितू ने दृढ़ता से कहा___"उसकी तरफ आने वाली हर बाधा हर मौत को सबसे पहले मुझसे मिलना होगा। कसम से बुआ अगर खुद मेरा बाप उसकी मौत बन उसके पास आया तो मौत रूपी उस बाप को भी मैं जीवित नहीं छोंड़ूॅगी।"

"लेकिन तूने उसे बुलवाया किस लिए है रितू?" नैना ने कहा___"आख़िर बात क्या है?"
"उसकी भी अजब कहानी है बुआ।" रितू ने अजीब भाव से कहा___"पगले का नसीब तो देखो। कहीं पर भी उसे प्यार और खुशियाॅ नसीब नहीं हुईं। दुख दर्द ने तो जैसे उसका दामन ही थाम रखा है।"

"क्या कह रही तू?" नैना ने ना समझने वाले भाव से कहा___"साफ साफ बता कि बात क्या है?"
"बुआ, मेरा भाई विराज एक खूबसूरत लड़की से प्यार करता था।" रितू दुखी लहजे में बोली___"मगर बाद में उस लड़की ने उसे छोंड़ दिया। और अब वहीं लड़की उसे अंतिम बार देखना चाहती है।"

"अंतिम बार???" नैना का दिमाग़ चकरा गया___"इसका क्या मतलब हुआ?"
रितू ने नैना को सारी बातें बताई। ये भी बताया कि उस लड़की का कुछ दिनों पहले गैंग रेप हो चुका है। रितू ने बताया कि कैसे उस लड़की ने विराज को छोंड़ा था और अब लास्ट स्टेज के कैंसर से अंतिम साॅसें ले रही है। वो चाहती है कि अंत समय में वो अपने महबूब को देख ले और उसी की बाहों में उसका दम निकले। सारी बातें सुनने के बाद नैना एकदम अवाक् रह गई। उसकी ऑखों में फिर से ऑसुओं का सैलाब सा आ गया।

"हे भगवान ये सब क्या कर रहा है तू?" नैना ने ऊपर की तरफ देख कर दुखी भाव से कहा___"मेरे बच्चे को कितना दुख संताप देगा तू। रितू, वो विधी को उस हाल में देख नहीं पाएगा। भगवान ही जाने क्या गुज़रेगी उस वक्त उसके दिल पर। ये प्यार मोहब्बत होती ही ऐसी चीज़ है बेटा कि इंसान को कमज़ोर दिल का बना देती है। खुद पर चाहे हज़ार चोंट खा ले इंसान मगर अपने प्रियतम के लिए वो छोटी से छोटी चोंट भी बरदास्त नहीं कर पाता। तू उसके पास ही रहना बेटा। नहीं तो तू मुझे ले चल उसके पास। मैं अपने भतीजे को उस वक्त सम्हालूॅगी। मैं उसे किसी भी कीमत पर बिखरने नहीं दूॅगी रे।"

"बस ईश्वर से दुवा कीजिए बुआ कि सब ठीक ही रहे।" रितू ने भारी स्वर में कहा__"मैं अपने भाई के पास ही रहूॅगी। मैं उसे अपने सीने से लगा लूॅगी बुआ लेकिन उसे बिखरने नहीं दूॅगी।"
"मुझे तुझ पर पूरा भरोसा है रितू।" नैना ने रितू के चेहरे को अपनी दोनो हथेलियों के बीच लेकर कहा____"आज तुझे अपने उस भाई के लिए इतना प्यार और इतनी तड़प देख कर मुझे खुशी हुई, जिस भाई को तूने कभी अपना नहीं समझा था।"

"वो मेरी सबसे बड़ी भूल थी और नादानी थी बुआ।" रितू की ऑखों में ऑसू भर आए, बोली___"जो मैने अपने पारस जैसे भाई को कभी अपना नहीं समझा था। लेकिन इसमें भी मेरा कोई कसूर नहीं है बुआ। ये सब तो मेरे उन्हीं माॅ बाप की वजह से हुआ है जिन्होंने बचपन से हम बहन भाई को यही सिखाते रहे कि ये हमारे अपने नहीं हैं बल्कि ये बुरे लोग हैं। मगर कहते हैं न बुआ कि सच्चाई हमेशा के लिए पर्दे के पीछे छुपी नहीं रह सकती। वो एक दिन उस पर्दे से निकल कर हमारे सामने आ ही जाती है। आज मुझे पता चल चुका है कि अच्छा कौन है और बुरा कौन है? जीवन भर दूसरों को बुरा बताने वाला आज खुद मेरे सामने कितना बुरा और पापी निकला जिसकी कोई सीमा नहीं है। जो बाप अपनी ही बेटी बहू और बहन को अपने नीचे सुलाने की बात करे वो अच्छा कैसे हो सकता है बुआ। वो तो सबसे ऊॅचे दर्ज़े का पापी है, कुकर्मी है। ऐसे लोगों को इस धरती पर जीने का कोई अधिकार नहीं है।"

"बड़े बड़े पापी और कुकर्मियों का इस धरती से सर्वनाश हुआ है बेटी।" नैना ने कहा__"फिर ये कैसे जीवित बच जाएॅगे। इनका भी वही हस्र होगा जो कंस और रावण का हुआ था। ख़ैर, तू ये बता कि विराज कब पहुॅच रहा है यहाॅ? और तूने उसकी सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किया है?"

"मैने उसकी सुरक्षा के लिए इंतजाम कर दिया है बुआ।" रितू ने कहा___"रेलवे स्टेशन पर सिविल वेश में पुलिस के आदमी मौजूद हैं। मुझे पवन ने फोन पर बताया था कि वो ट्रेन से उतरने के बाद किसी टैक्सी में हल्दीपुर आएगा।उसने ऐसा शायद इस लिए किया है कि डैड के आदमी अगर वहाॅ कहीं हों भी तो वो सब उसे बस में ढूॅढ़ेंगे, जबकि उसके टैक्सी से आने की वो लोग उम्मीद भी न करेंगे।"

"मेरा भतीजा होशियार है।" नैना ने खुश होकर कहा___"बहुत अच्छा सोचा है उसने। ख़ैर, अब तू क्या करने वाली है?"
"मैं पवन के फोन का इन्तज़ार करूॅगी।" रितू ने कहा___"क्योंकि विराज सीधा पवन के घर ही जाएगा। इधर मैं हास्पिटल विधी के पास जाऊॅगी। उधर से सब कुछ ठीक करने बाद मैं पवन को फोन कर दूॅगी कि अब वो विराज को लेकर हास्पिटल आ जाए। मैने हास्पिटल के चारो तरफ भी सिविल ड्रेस में पुलिस वालों को मौजूद रहने के लिए कह दिया है।"

"ये बहुत अच्छा किया तुमने।" नैना ने कहा___"और मुझे यकीन है कि तेरे रहते विराज को कुछ नहीं होगा।"
"मैं अपनी जान दे दूॅगी बुआ।" रितू ने दृढ़ता से कहा___"मगर अपने भाई को खरोंच तक आने नहीं दूॅगी।"

"क्या इतना प्यार करती है तू अपने उस भाई से?" नैना की ऑखें भर आईं थी।
"ऐसे भाई को तो सिर्फ प्यार ही किया जाता है न बुआ?" रितू के जज़्बात बेकाबू से हो गए, खुद को बड़ी मुश्किल से सम्हाल कर कहा उसने___"अगर कहीं भगवान मिले मुझे तो उससे यही कहूॅगी कि मुझे हर जन्म में विराज जैसा ही भाई दे और शिवा के जैसा भाई किसी बैरी को भी न दे।"

नैना ने तड़प कर रितू को अपने सीने से लगा लिया। दोनो की ऑखों से ऑसुओं के वो बाॅध फूट पड़े जो भावनाओं और जज़्बातों के मचल उठने से बेकाबू से हो गए थे। अभी ये दोनो एक दूसरे के गले ही लगे थे कि तभी कमरे में बिंदिया ने प्रवेश किया।

"बिटिया, नास्ता तैयार कर दिया है मैने चलो नास्ता कर लो।" बिंदिया ने कहा___"और हाॅ इनका कमरा भी साफ कर दिया है मैने।"

बिंदिया की बात सुन कर दोनो अलग हुईं और बड़ी सफाई से अपनी अपनी ऑखों से दोनो ने ऑसुओं को साफ कर लिया।
"आप चलिए काकी।" रितू ने कहा___"हम बस दो मिनट में आते हैं।"
"ठीक है बिटिया।" बिंदिया ने कहा और दरवाजे से वापस पलट गई।

बिंदिया के जाने के बाद नैना और रितू दोनो ही बाथरूम की तरफ बढ़ गईं। बाथरूम में पानी से अपने अपने चेहरों को धोने के बाद वो दोनो वापस कमरे में आईं और हुलिया सही करने के बाद नास्ते के लिए कमरे से बाहर चली गईं।

"काकी, आज काका कहीं दिखाई नहीं दिये अब तक।" नास्ते की टेबल पर बैठी रितू ने बिंदिया से कहा___"बाहर गेट पर सिर्फ शंकर काका ही दिखे थे।"
"अरे बिटिया अब क्या बताऊॅ तुमसे।" बिंदिया ने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा__"वो तो जब देखो उन चारों की खातिरदारी में ही लगा रहता है। तुमने काम जो सौंपा हुआ है उसे।"

"कौन चारो?" नैना को समझ न आया था इस लिए पूछ बैठी थी, बोली___"और किनकी खातिरदारी?"
"उन्हीं चारों की बुआ जिन्होंने विधी के साथ कुकर्म किया था।" रितू ने कहा___"वो सब बड़े बाप की बिगड़ी हुई औलादें हैं। जैसे कुकर्मी बाप वैसे ही कुकर्मी बेटे हैं। विधी के साथ इन लोगों जो कुकर्म किया उसके लिए उन चारों को कानूनी तौर पर मैं कोई सज़ा नहीं दिला सकती थी, क्योंकि वो सब अपने बाप की ऊॅची पहुॅच और ताकत के बल पर बड़ी आसानी से कानून की गिरफ्त से निकल जाते। ऐसे में विधी के साथ इंसाफ नहीं हो पाता बुआ इस लिए कानून की रखवाली करने वाली आपकी इस बेटी ने कानून को अपने हाॅथ में लेकर खुद उन चारों को सज़ा देने का फैंसला किया। ये इसी फैंसले का नतीजा है कि वो चारो आज यहाॅ पिछले कई दिनों से रोज़ाना सज़ा के रूप में यातनाएॅ झेल रहे हैं। और मज़े की बात ये है बुआ कि किसी को इस बात की भनक तक नहीं है कि यहाॅ पर किसी को ऐसी सज़ा दी जा रही है। इनके बाप लोगों को यही लगता है कि उनके बेटे कहीं बाहर गए हुए हैं और मज़े में होंगे।"

"ये तो तुमने बहुत अच्छा काम किया है रितू।" नैना ने कहा___"लेकिन अगर इन लोगों के बापों को पता चल गया कि उनके बेटों के साथ तुम यहाॅ क्या कर रही हो तब क्या होगा?"
"उसका भी पुख्ता इंतजाम कर रखा है मैने।" रितू ने कहा___"बहुत जल्द इन लोगों के बापों को भी ऐसी ही सज़ा देने वाली हूॅ मैं। किसी को पता भी नहीं चलेगा कि इन नामों के लोगों के साथ किसने क्या किया है।"

नैना, रितू के चेहरे को देखती रह गई अचरज भरी नज़रों से। से यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसकी फूल जैसी नाज़ुक सी भतीजी ऐसे खतरनाक काम भी करती है। ख़ैर, नास्ता करने के बाद रितू ने नैना से जाने की इजाज़त ली और बाहर की तरफ निकल गई जबकि नैना मन ही मन ईश्वर को याद कर रितू और विराज की सलामती की दुवाएं करने लगी थी।
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उधर ट्रेन अपने निर्धारित समय पर ही गुनगुन स्टेशन पर पहुॅची थी। ट्रेन से उतरने से पहले मैने अपने चेहरे को रुमाल से ढॅक लिया था। मेरे साथ मेरा नया दोस्त आदित्य था। उसको अपना चेहरा ढॅकने की कोई ज़रूरत नहीं थी। क्योंकि उसे यहाॅ पर कोई पहचानता ही नहीं था। हम दोनो ट्रेन से उतर कर स्टेशन से बाहर की तरफ बढ़ चले।

प्लेटफार्म पर इधर उधर मैने सरसरी तौर पर अपनी नज़रें दौड़ाई तो सहसा एक ऐसे चेहरे पर मेरी नज़र पड़ी जो यकीनन बड़े पापा का आदमी था। वो एग्जिट गेट के दाएॅ तरफ खड़ा हर आने वालों को बड़े ध्यान से देख रहा था। मैने उसकी तरफ से अपनी निगाह हटा ली और बेफिक्र होकर एग्जिट गेट की तरफ बढ़ चला। एग्जिट गेट के पास जब मैं और आदित्य पहुॅचे तो सहसा टीटी ने हमें रोंक लिया और हमसे टिकट दिखाने को कहने लगा। मैने जल्दी से अपने पाॅकेट से अपना पर्स निकाला और उससे टिकट निकाल कर टीटी को पकड़ा दिया। मैने पल भर के लिए दाएॅ तरफ कुछ ही दूरी पर खड़े बड़े पापा के उस आदमी की तरफ देखा। वो आने वाले आदमियों की तरफ बड़े ध्यान से देख रहा था। मैं ये नहीं जानता कि उसने मेरी तरफ देखा था या नहीं मगर इस वक्त उसकी नज़र सामने से आने वाले अन्य यात्रियों की तरफ ही थी। इधर टीटी ने मेरी टिकट चेक करने बाद मुझे वापस लौटा दी तो मेरे पीछे आदित्य ने भी टीटी को अपनी टिकट थमा दी। टीटी आदित्य की टिकट देखने बाद आदित्य को वापस कर दिया। मैने इशारे से आदित्य को चलने का इशारा किया। तभी उस ब्यक्ति की नज़र मुझ पर पड़ी। वो मुझे ध्यान से देखने लगा। मैं उसके देखने पर एकदम से घबरा सा गया मगर फिर जल्द ही मैने खुद को सम्हाला और आदित्य को लेकर बाहर की तरफ बढ़ गया। मैं पीछे नहीं देखना चाहता क्योंकि मुझे अंदेशा था कि वो शायद मुझे ही देख रहा होगा और गर मैने पलट कर उसकी तरफ देखा तो उसे ज़रूर मुझ पर शक हो सकता है।

बाहर आकर मैं और आदित्य टैक्सी की तरफ तेज़ी से बढ़ चले। हलाॅकि वहाॅ पर बहुत से लोगों की भीड़ थी इस लिए मुझे यकीन था कि वो आदमी इतना जल्दी मुझे ढूॅढ़ नहीं पाएगा। टैक्सी के पास पहुॅचा ही था एक आदमी हमारे पास आया और हमसे टैक्सी का पूॅछा तो हमने तुरंत उस आदमी को हाॅ कह दिया। आदमी हमारी हाॅ सुनते ही हमे लेकर अपनी टैक्सी के पास पहुॅचा और टैक्सी का गेट खोल कर हमें अंदर बैठने का इशारा किया। हम दोनो उसमे बैठ गए तो वो टैक्सी ड्राइवर भी स्टेयरिंग सीट पर बैठ गया।

"कहाॅ चलना है साहब?" ड्राइवर ने टैक्सी को स्टार्ट करते हुए पूछा।
"हल्दीपुर।" मैने कहा तो ड्राइवर ने टैक्सी को आगे बढ़ा दिया। मैने पलट कर स्टेशन की तरफ देखा तो मुझे बड़े पापा का वो आदमी कहीं नज़र न आया। अभी मैं ये सब देख ही रहा था कि तभी मेरा मोबाइल फोन बज उठा। मैने हड़बड़ा कर मोबाइल को निकाल कर स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नाम को देखा। पवन का फोन था। मैने काल रिसीव की तो वो मुझसे पूछने लगा कि मैं इस वक्त कहाॅ हूॅ तो मैने उसे बता दिया कि टैक्सी में बैठ कर हल्दीपुर के लिए निकल लिया हूॅ। मेरी बात सुन कर उसने कहा कि ठीक है वो मुझे हल्दीपुर के बस स्टैण्ड पर मिलेगा जहाॅ पर उसकी दुकान है। उसके बाद मैने काल कट कर दी।

"यहाॅ से कितना समय लगेगा तुम्हारे गाॅव पहुॅचने में?" आदित्य ने मुझसे पूछा।
"ज्यादा से ज्यादा आधे घंटे का समय लगेगा।" मैने कहा___"हल्दीपुर के बस स्टैण्ड से पवन को साथ में लेकर ही उसके घर चलेंगे।"

मेरी बात सुन कर आदित्य कुछ न बोला। मैने एक बार पीछे मुड़ कर टैक्सी के पिछले शीशे के उस पार देखा। एक जीप हमारी इस टैक्सी के पीछे आ रही थी। मैने सोचा होगा कोई। मगर मुझे कोई उम्मीद नहीं थी कि इस तरह कोई जीप वाला एक रिदम पर टैक्सी के पीछे चल रहा था। मैने कई बार नोट की वो जीप हमादे पीछे उतनी ही रफ्तार से चलती हुई आ रही थी। मुझे समझ न आया कि ऐसा कौन हो सकता है उस जीप में जो हमारे पीछे पीछे उतनी ही गति से आ रहा था जितनी गति से हमारी टेक्सी सड़क पर दौड़ी जा रही थी। मेरा माथा ठनका कि कौन हो सकता है उस जीप में?????

दोस्तो, आपके सामने अपडेट हाज़िर कर दिया हूॅ,,,,,,,

ये दो दिन से थोड़ा थोड़ा लिख रहा था मैं। आज मैं तिलक में हूॅ अभी। बाॅकी का थोड़ा अपडेट यहीं बैठे बैठे लिखा है। मुझे लगता है कि इतना काफी है।

अगले अपडेट में आगे का विवरण होगा, जो शायद कुछ ज्यादा इमोशनल होगा,,,,,,,,,,
 
एकनयासंसार

अपडेट........《 43 》

अब तक,,,,,,,

"कहाॅ चलना है साहब?" ड्राइवर ने टैक्सी को स्टार्ट करते हुए पूछा।
"हल्दीपुर।" मैने कहा तो ड्राइवर ने टैक्सी को आगे बढ़ा दिया। मैने पलट कर स्टेशन की तरफ देखा तो मुझे बड़े पापा का वो आदमी कहीं नज़र न आया। अभी मैं ये सब देख ही रहा था कि तभी मेरा मोबाइल फोन बज उठा। मैने हड़बड़ा कर मोबाइल को निकाल कर स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नाम को देखा। पवन का फोन था। मैने काल रिसीव की तो वो मुझसे पूछने लगा कि मैं इस वक्त कहाॅ हूॅ तो मैने उसे बता दिया कि टैक्सी में बैठ कर हल्दीपुर के लिए निकल लिया हूॅ। मेरी बात सुन कर उसने कहा कि ठीक है वो मुझे हल्दीपुर के बस स्टैण्ड पर मिलेगा जहाॅ पर उसकी दुकान है। उसके बाद मैने काल कट कर दी।

"यहाॅ से कितना समय लगेगा तुम्हारे गाॅव पहुॅचने में?" आदित्य ने मुझसे पूछा।
"ज्यादा से ज्यादा आधे घंटे का समय लगेगा।" मैने कहा___"हल्दीपुर के बस स्टैण्ड से पवन को साथ में लेकर ही उसके घर चलेंगे।"

मेरी बात सुन कर आदित्य कुछ न बोला। मैने एक बार पीछे मुड़ कर टैक्सी के पिछले शीशे के उस पार देखा। एक जीप हमारी इस टैक्सी के पीछे आ रही थी। मैने सोचा होगा कोई। मगर मुझे कोई उम्मीद नहीं थी कि इस तरह कोई जीप वाला एक रिदम पर टैक्सी के पीछे चल रहा था। मैने कई बार नोट की वो जीप हमादे पीछे उतनी ही रफ्तार से चलती हुई आ रही थी। मुझे समझ न आया कि ऐसा कौन हो सकता है उस जीप में जो हमारे पीछे पीछे उतनी ही गति से आ रहा था जितनी गति से हमारी टेक्सी सड़क पर दौड़ी जा रही थी। मेरा माथा ठनका कि कौन हो सकता है उस जीप में?????
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अब आगे,,,,,,,,,

उधर अजय सिंह हवेली से फैक्ट्री जाने के लिए निकल ही रहा था कि तभी उसका मोबाइल फोन बज उठा। अजय सिंह ने कोट की पाॅकेट से मोबाइल निकाल कर स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे भीमा नाम को देख कर तनिक चौंका। उसने तुरंत ही काल को रिसीव कर मोबाइल को कानों से लगा लिया।

"हाॅ भीमा बोलो क्या ख़बर है?" कान से लगाते ही अजय सिंह ने ज़रा उत्सुक भाव से बोला था।
"............. ।" उधर से कुछ कहा भीमा ने।
"ये तुम क्या कह रहे हो भीमा?" अजय सिंह ने तनिक चौंकते हुए कहा था___"वो भला यहाॅ क्यों आएगा अब? तुमने अच्छी तरह से उसे देखा है न?"

".............।" उधर से भीमा ने कुछ कहा।
"तो ख़ाक़ देखा तुमने।" अजय सिंह का लहजा एकाएक कठोर हो गया___"तुमको खुद ठीक तरह से यकीन नहीं है उसका। पहले तुम उसे अच्छी तरह से देखो और जब तुम उसे पहचान जाओ तब हमे बताओ।"

".............।" उधर से भीमा ने फिर कुछ कहा।
"ऐसे नहीं भीमा।" अजय सिंह परेशान से लहजे में बोला___"हमें पक्के तौर पर ख़बर चाहिए। हवा में लाठियाॅ मत घुमाओ समझे। तुम्हें उसके आने का सिर्फ अंदेशा है। जबकि हम ये अच्छी तरह जानते हैं कि उस कायर और डरपोंक में अब इतनी हिम्मत नहीं है कि वो इस गाॅव में क़दम भी रख सके। उसे भी पता है कि यहाॅ क़दम रखते ही उसकी जान उसके जिस्म से जुदा हो जाएगी। दूसरी बात ये है कि यहाॅ वो आएगा ही क्यों? अपनी माॅ और बहन की वजह से आता था वो, मगर अब तो वो दोनो उसके पास ही हैं। इस लिए अब उसके यहाॅ आने का कोई सवाल ही नहीं उठता।"

"..........।" उधर से भीमा ने फिर कुछ कहा।
"सिर्फ शक के आधार पर तुम हमें ये बता रहे हो भीमा।" अजय सिंह ने कुछ सोचते हुए कहा___"पर अगर तुम्हें लगता है कि वो वही था तो ठीक है तुम उसका पीछा करो। पता करो वो कहाॅ जाता है और किससे मिलता है?"

"...........।" भीमा ने कुछ कहा।
"तुम सब के सब निकम्मे हो।" अजय सिंह एकाएक बेहद गुस्से में बोला___"जब तुम्हें उस पर शक हो ही गया था तो उसका पीछा करते तुम।"
"...........।" उधर से भीमा ने फिर कुछ कहा।
"अरे तो कैसे गायब हो गया वो?" अजय सिंह चीखा___"वो ज़रूर किसी बस में या ऑटो में बैठ कर वहाॅ से निकल गया होगा। इतना जल्दी कोई गायब नहीं होता भीमा। वो यकीनन वही था। उसने तुम्हें पहचान लिया होगा और इसी लिए वो तुम्हारी नज़रों से इतना जल्दी ओझल हुआ है। मगर उसके साथ दूसरा वो आदमी कौन हो सकता है?"

"..............।" भीमा ने कुछ कहा।
"हाॅ शायद यही बात है।" अजय सिंह ने थोड़ा नरमी से कहा___"तुमने उसके साथ किसी अजनबी को देखा इसी लिए तुम्हारे मन में दो तरह के विचार पैदा हुए। तुमने सोचा होगा कि किसी अजनबी के साथ उसका क्या काम? इसी में तुम चूक गए भीमा। ख़ैर, कोई बात नहीं। अगर वो मुम्बई से यहाॅ आया है तो यकीनन वो गाॅव की ही तरफ आएगा। इस लिए अपने आदमियों से कहो कि फटाफट सारे रास्तों पर फैल जाएॅ और गाॅव के रास्तों पर भी घेराबंदी कर लें। वो ज़रूर किसी बस या ऑटो में ही होगा। हर वाहन की अच्छी तरह से तलाशी लो। साला जाएगा कहाॅ हमसे बच कर?"

"..........।" भीमा ने कुछ कहा।
"चलो अच्छी बात है।" अजय सिंह ने कहा___"जैसे ही वो मिले हमें ख़बर कर देना और हाॅ उसे पकड़ कर सीधा हमारे पास हवेली लेकर आना। हम भी फैक्ट्री ही जा रहे थे मगर अब नहीं जाएॅगे। यहीं तुम लोगों का इन्तज़ार करेंगे हम।"

ये कह कर अजय सिंह ने मोबाइल से काल कट कर दी और फिर अपने नथुने फुलाते हुए खुद ही बड़बड़ाया___"आ बेटा आ। तेरा स्वागत हम ऐसा करेंगे कि सारी दुनियाॅ हमारे स्वागत कार्यक्रम की कायल हो जाएगी। हाहाहाहाहा आ सपोले जल्दी आ।"

अभी अजय सिंह अपनी ही बातों से हॅस ही रहा था कि तभी वहाॅ पर प्रतिमा आ गई। उसके साथ में शिवा भी था।
"क्या बात है अजय?" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा___"अकेले अकेले ही मज़े ले रहे हो। मगर किस बात पर? हमे भी तो बताओ आख़िर माज़रा क्या है?"

"अभी हमारे एक आदमी का फोन आया था डार्लिंग।" अजय सिंह ने शिवा की मौजूदगी में भी उसे डार्लिंग कहा___"उसने हमें बताया कि विराज यहाॅ आ रहा है।"
"क्याऽऽऽ???" प्रतिमा सोफे पर बैठी इस तरह उछल पड़ी थी जैसे अचानक ही उसके पिछवाड़े पर किसी ने गर्म तवा रख दिया हो, बोली___"ये क्या कह रहे हो तुम? वो रंडी का जना यहाॅ किस लिए आ रहा है?"

"उसे उसकी मौत यहाॅ ला रही है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा___"किसी ने सच ही कहा है कि जब गीदड़ की मौत आती है तो वो शहर की तरफ भागता है। वही हाल उस हरामज़ादे का है। उसकी भी मौत आई हुई है इसी लिए वो भागता हुआ यहाॅ आ रहा है।"

"अच्छा ही तो है डैड।" सहसा शिवा भी गर्मजोशी से कह उठा___"आने दीजिए उस हराम के पिल्ले को। उससे गिन गिन के हिसाब लूॅगा मैं। उस दिन उसने मुझे बहुत मारा था न, आज उस सबका हिसाब मैं लूॅगा। वो मेरा शिकार है डैड, आप उसे मेरे हवाले करेंगे। मुझसे प्राॅमिस कीजिए डैड।"

"तुम्हारे हवाले उसे ज़रूर करूॅगा बेटे लेकिन उसे अधमरा करने के बाद।" अजय सिंह ने कहा___"क्योंकि अधमरी हालत में वो तुमसे जीत नहीं पाएगा। वरना बेहतर हालत में तो तुम उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे।"
"डैड आप मुझे उससे कमज़ोर समझते हैं क्या?" शिवा की भृकुटी तन गई___"वो तो उस दिन मेरा दिन ही ख़राब था डैड इस लिए वो मुझे मार सका था। वरना तो वो मेरे सामने कुछ भी नहीं है।"

"दिन ख़राब नहीं होते बेटे।" अजय सिंह ने खिसियाते हुए कहा___"वो तो सब एक जैसे ही होते हैं। रही बात उसकी कि तुम्हारे सामने वो कुछ भी नहीं है तो ये बात तुम खुद को उससे ऊॅचा दर्शाने के लिए कह रहे हो। जबकि सच्चाई तुम भी जानते हो कि अकेले तुम उसका बाल भी बाॅका नहीं कर पाओगे। ख़ैर जाने दो।"

अजय सिंह की इन बातों पर शिवा बगले झाॅकने लगा था। कदाचित उसे समझ आ गया था कि उसकी डींगें महज बकवास के सिवा कुछ भी नहीं है। सच्चाई यही है कि विराज का अकेले वो बाल भी बाॅका नहीं कर सकता था। ये बात उसका बाप भी बखूबी समझ चुका था।

"लेकिन अजय वो यहाॅ आ किस लिए रहा है?" प्रतिमा ने कहा___"उसके यहाॅ आने की कोई ठोस वजह मुझे तो दूर दूर तक समझ में नहीं आ रही।"
"कोई तो वजह होगी ही प्रतिमा।" अजय सिंह ने सोचते हुए कहा___"मत भूलो कि अभय भी मुम्बई गया हुआ है। हम ये नहीं जानते कि इतने दिनों से वो वहाॅ क्या कर रहा है? उसे विराज मिला भी है कि नहीं। पर आज की सिचुएशन को देखा जाए तो यही लगता है कि अभय को विराज और विराज की माॅ बहन मिल चुकी हैं। उन लोगों ने अभय को और अभय ने उन लोगों को आपस में सारी बातें बताई होंगी।"

"पर उनकी उन बातों से विराज के यहाॅ आने का क्या कनेक्शन हो सकता है?" प्रतिमा ने तर्क दिया।
"ये तो अभय को भी पता चल चुका होगा कि हमारी असलियत क्या है?" अजय सिंह ने समझाने वाले अंदाज़ में कहा___"गौरी से सारी बातें जानने के बाद अभय को लगा होगा कि वो तो यहाॅ से मुम्बई चला आया है लेकिन उसके बीवी बच्चे तो अभी भी गाॅव में ही हैं। अभय समझता होगा कि उसके बीवी बच्चों को मुझसे बड़ा भारी खतरा है, इस लिए उसका पहला काम यही होगा कि वो अपने बीवी बच्चों को या तो भरपूर तरीके से सुरक्षित करे या फिर किसी तरह वो उन्हें भी अपने पास मुम्बई बुला ले। लेकिन सवाल ये पैदा हुआ होगा कि उसके बीवी बच्चों को यहाॅ से लेकर कौन जाएगा वहाॅ? इस लिए उसने विचार विमर्ष करके विराज को उन्हें लाने के लिए भेजा होगा।"

"तुम्हारी बातें और तुम्हारी सोच अपनी जगह यकीनन सही हैं अजय।" प्रतिमा ने गंभीरता से कहा___"मगर, अगर तुम्हारी बातों के अनुसार सोचा जाए तो इन बातों में भी एक पेंच है। वो ये कि उस सूरत में अभय ये कभी नहीं चाहेगा कि विराज की जान को कोई खतरा हो जाए। ये तो वो भी समझ ही गया होगा कि विराज की जान को हमसे खतरा है। इस लिए अपने बीवी बच्चों को यहाॅ से ले जाने के लिए वो विराज को वहाॅ से हर्गिज़ नहीं भेजेगा, और अगर भेजना चाहेगा भी तो गौरी विराज को यहाॅ आने ही नहीं देगी। इस सिचुएशन में जान को खतरे में डालने का काम खुद अभय ही करेगा। वो खुद यहाॅ आकर अपने बीवी बच्चों को यहाॅ से ले जाना उचित समझेगा ना कि विराज को भेजना।"

"ये बात भी सही है।" अजय सिंह को मानना पड़ा कि प्रतिमा का तर्क भी अपनी जगह बेहद पुख्ता है, बोला___"लेकिन ये भी सच है कि विराज के यहाॅ आने की कोई न कोई ठोस वजह तो ज़रूर है। बेवजह अपनी जान को जोखिम में डालने की मूर्खता ना तो वो खुद करेगा और ना ही उसकी माॅ या उसका चाचा उसे करने की इजाज़त देंगे।"

"बिलकुल सही कहा।" प्रतिमा ने कहा__"तो सवाल ये है कि वो आख़िर यहाॅ आ किस वजह से रहा है?"
"वजह कोई भी हो उसके आने की।" अजय सिंह ने कहा___"हमारे लिए अच्छी बात यही है कि जिसे हम महीनों से खोज रहे थे वो खुद ही चल कर हमारे पास आ रहा है। वो हमारे हाॅथ लग जाएगा तो बाॅकी के उसके चाहने वाले भी हमारे पास सिर के बल दौड़ते हुए आ जाएॅगे। अब तो मज़ा आएगा प्रतिमा। हर कोई हमारे हाथ में खुद ही चला आएगा। फिर हम अपने तरीके से उनके साथ कुछ भी कर सकेंगे। बस एक ही बात की चिंता है कि रितू इन सबके बीच टपक न पड़े। वो पुलिस वाली है और ईमानदार पुलिस अफसर भी है वो। इस लिए उसके रहते हमारे लिए समस्या भी हो सकती है।"

"अब कोई भी समस्या आए डैड।" शिवा कह उठा___"ऐसा सुनहरा मौका अपने हाॅथ से जाने नहीं देंगे हम। अगर हमारे इस अच्छे काम के बीच समस्या बन कर रितू दीदी आएॅगी तो उनका भी हिसाब किताब कर दिया जाएगा।"

"पहली बार अकल वाली बात की है तुमने बेटे।" अजय सिंह ने कहा___"ये यकीनन हमारे लिए सुनहरा मौका ही है। अगर विराज हमारे हाॅथ लग जाएगा तो उसके सभी चाहने वाले अपने आप ही चल कर हमारे पास आ जाएॅगे। इस लिए इस सुनहरे मौके पर हम किसी भी समस्या को तुरंत खत्म कर देने से पीछे नहीं हटेंगे।"

"तो क्या तुम अपनी बेटी को जान से मार दोगे अजय?" प्रतिमा अंदर ही अंदर काॅप गई थी।
"ऐसा तो सिर्फ तब होगा डियर।" अजय सिंह ने अजीब भाव से कहा___"जब हमारे पास ऐसा करने के सिवा दूसरा कोई रास्ता ही न बचेगा।"

प्रतिमा देखती रह गई अजय सिंह को। उसकी बातों से उसके जिस्म का रोयाॅ रोयाॅ खड़ा हो गया था। उसकी ऑखों के सामने उसकी सुंदर सी बेटी रितू का खूबसूरत चेहरा कई बार फ्लैश कर उठा। इस एहसास ने ही उसे अंदर तक हिला कर रख दिया कि उसकी बेटी को उसका ही बाप जान से मार भी सकता है। एक पल के लिए उसकी ऑखों के सामने रितू का मृत शरीर खून से लथपथ ज़मीन में पड़ा हुआ दिख गया उसे। ये दृष्य ऑखों के सामने चकराते ही प्रतिमा का जिस्म एकदम से ठंडा पड़ता चला गया।

"अब आगे का क्या प्रोग्राम है डैड?" तभी शिवा की आवाज़ प्रतिमा के कानों से टकराई तो जैसे उसे होश आया।
"हमने अपने आदमियों को निर्देश दे दिया है बेटे।" अजय सिंह ने कहा___"वो हर रास्तों पर घेराबंदी कर देंगे। विराज उनसे बच कर किसी भी हालत में कहीं जा नहीं सकेगा और उनके पकड़ में आ ही जाएगा। उसके बाद हमारे आदमी उसे लेकर सीधा हवेली हमारे पास आएॅगे।"

"दैट्स ग्रेट डैड।" शिवा ने खुश होकर कहा___"अब आएगा मज़ा। लेकिन डैड विराज के आने की ख़बर रितू दीदी को नहीं लगनी चाहिए। हम उसे कहीं छुपा कर रखेंगे। इस हवेली में उसे रखना मेरे ख़याल से ठीक नहीं है।"
"ये भी सही कहा तुमने बेटे।" अजय सिंह ने कहा__"आज तुम्हारा दिमाग़ भी सही तरह से काम कर रहा है। मुझे इस बात से बेहद खुशी महसूस हो रही है। ख़ैर, तुम फिकर मत करो बेटे, रितू के आने से पहले ही हम विराज को ऐसी जगह छुपा देंगे जहाॅ से किसी को कभी कुछ पता ही नहीं चल पाएगा। एक काम करते हैं, हम अपने आदमियों को बोल देते हैं कि वो विराज को लेकर हवेली न आएॅ बल्कि हमारे नये फार्महाउस पर लेकर पहुॅचें। ऐसा इस लिए बेटे कि रितू का कोई भरोसा नहीं है कि वो कब हवेली में टपक पड़े। उस सूरत में उसे अंदेशा भी हो सकता है इन सब बातों का। पुलिस वाली है न इस लिए अगर एक बार उसके मन में शक का कीड़ा आ गया तो वो उस शक के कीड़े की कुलबुलाहट हो ज़रूर शान्त करने की कोशिश करेगी। इस लिए बेहतर यही रहेगा कि हम विराज को अपने नये फार्महाउस पर ही रखें।"

"हाॅ ये ठीक रहेगा डैड।" शिवा ने कहा__"तो फिर हमें भी अब सीधा फार्महाउस ही चलना चाहिए।"
"यस ऑफकोर्स माई डियर सन।" अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा, फिर उसने प्रतिमा की तरफ देखते हुए कहा___"चलो डियर तैयार हो जाओ। हमें जल्द ही अपने नये फार्महाउस के लिए निकलना है।"

अजय सिंह की बात पर प्रतिमा ने हाॅ में सिर हिलाया और अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। जबकि अजय सिंह और शिवा वहीं ड्राइंगरूम में रखे सोफों पर बैठ कर प्रतिमा के आने का इन्तज़ार करने लगे। दोनो के चेहरे इस वक्त हज़ार वाॅट के बल्ब की तरह चमक रहे थे।
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उधर टैक्सी में बैठे हुए मैं और आदित्य आराम से बस स्टैण्ड की तरफ आए, जहाॅ पर मैने पवन को भी अपने साथ टैक्सी में बैठा लिया। पवन मेरे साथ आदित्य को देख कर थोड़ा परेशान सा दिखा तो मैने उसे आदित्य के बारे में बता दिया। मेरी बात सुन कर पवन के ज़हन से परेशानी व चिंता चली गई।

मैने पवन से बहुत पूछा कि उसने मुझे इतना अर्जेन्टली क्यों बुलाया था मगर पवन ने यही कहा कि मैं खुद अपनी ऑखों से ही देख लूॅगा। बस स्टैण्ड से पवन को लेने के बाद हम अपने गाॅव हल्दीपुर के लिए निकल चुके थे। इधर का रास्ता ऐसा था कि दूर दूर तक खाली ही रहता था। यहाॅ रास्ते के दोनो तरफ पहाड़ थे। ऐसे पहाड़ जिनमें पेड़ पौधे या झाड़ झंखाड़ नाम मात्र के ही थे। बस स्टैण्ड से जब गाॅव की तरफ आओ तो लगभग दस किलोमीटर के बाद बीच रास्ते में एक बड़ी सी नहर पड़ती थी। जिसके बीच में एक पक्का पुल बना हुआ था जो कि काफी पुराना था।

आस पास का सारा इलाका पथरीला था। बड़ी बड़ी चट्टाने थी। सड़क के दोनो तरफ की सारी ज़मीनें पथरीली और बंजर थी। एक तरफ के पहाड़ पर बाक्साइड था जिसमें पहले के समय में यहाॅ से काफी सारा बाक्साइड ट्रकों में जाता था। एक बार कुछ मजदूर पहाड़ के धसने से उसी में दब कर मर गए थे जिससे बड़ा बवाल हो गया था। ठेकेदार तो अपनी जान बचा कर वहाॅ से चंपत हो गया था। इसके बाद से वहाॅ पर से बाक्साइड ले जाने का काम बंद करवा दिया गया था।

पहाड़ की दूसरी साइड पर एक अन्य सड़क थी जो दूसरे गाॅव के लिए जाती थी। उस पुल को पार करने के बाद एक चौराहा मिलता था जिसमे से अलग अलग दिशा में अलग अलग गाॅव की तरफ जाने के लिए कच्ची सड़क बनी हुई थी। हल्दीपुर जाने के लिए सीधा ही जाना होता था। किसी भी मोड़ से मुड़ने की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन अगर आप मुड़ भी गए हैं तो दूसरे गाॅव से भी आप एक अन्य कच्चे रास्ते से हल्दीपुर जा सकते हैं। हल्दीपुर गाॅव आस पास के सभी गावों की मुख्य पंचायत था। अन्य गाॅवों की अपेक्षा हल्दीपुर गाॅव में सुख सुविधा ज्यादा थी और इस सब में सबसे बड़ी बात ये थी कि आस पास के सभी गाॅवों का पुलिस थाना हल्दीपुर में ही था। हल्दीपुर कहने के लिए गाॅव था वरना तो वो किसी कस्बे जैसा ही था। बस कस्बे की तरह थोड़ा शहरी ढाॅचे में ढला हुआ नहीं था।

बस स्टैण्ड से लगभग बीस किलोमीटर चलने के बाद टैक्सी से हम जैसे ही पुल के पास पहुॅचने वाले थे कि दूर से ही हमें सामने की तरफ धूल उड़ाती हुई कुछ जीपें हमारी तरफ ही आती हुई दिखीं। वो सब सीधे वाले रास्ते से ही आ रही थीं। मुझे समझते देर न लगी कि ये सब जीपें असल में किसकी हो सकती हैं। मेरी नज़र पवन पर पड़ी तो वो भी सामने ही देख रहा था। उसकी हालत डर और भय से ख़राब होने लगी थी।

"राज ये ये तो।" पवन ने सहमे हुए लहजे में कहा___"ये तो तेरे बड़े पापा की ही जीपें लगती हैं। लगता है उन्हें तेरे आने का पता चल गया है। मगर मगर कैसे? कैसे पता चल गया उन्हें?"
"अब जो हो गया उसे छोड़ भाई।" मैने सामने की तरफ देख कर कहा___"मुझे पता है कि मेरे आने का कैसे पता चल गया होगा उस अजय सिंह को? पर कोई बात नहीं पवन। घबराने की कोई बात नहीं है। आने दे उन सबको। मैं भी तो देखूॅ कि अजय सिंह और उसके आदमियों में कितना दम है?"

"क्या हुआ भाई?" आदित्य जो कि टैक्सी की खिड़की से उस तरफ के पहाड़ों को देख रहा था, वो मेरी तरफ पलट कर बोल पड़ा था___"किसमे कितना दम है?"
"सामने देखो दोस्त।" मैने आदित्य से कहा___"जिसका मुझे अंदेशा था वही हुआ।"

"क्या मतलब?" आदित्य ने चौंकते हुए पूछा।
"ये जो सामने से कई सारी जीपें हमारी तरफ आती हुई नज़र आ रही हैं न।" मैने कठोर भाव से कहा___"ये सब मेरे बड़े पापा की ही हैं। इन सब में उनके आदमी हैं और वो खुद भी हो सकते हैं। ये सब मुझे पकड़ने के लिए आ रहे हैं।"

"ओह इसका मतलब कि ऐक्शन का समय आ गया है।" आदित्य एकदम से सतर्क भाव से कह उठा__"चिन्ता मत करना दोस्त। मेरे रहते इनमें से कोई तुम्हें छू भी नहीं सकेगा।"
"मैं जानता हूॅ दोस्त।" मैने कहा__"मगर मैं ये भी नहीं चाहता कि तुम्हें ज़रा सी खरोंच भी आए। आख़िर तुम मेरे दोस्त हो अब।"

"मैं तुम जैसा दोस्त पा कर खुश हूॅ मेरे दोस्त।" आदित्य ने सहसा भावपूर्ण लहजे में कहा___"इस लिए मुझे अब किसी भी चीज़ के लिए रोंकना मत। बहुत दिनों बाद किसी अपने के लिए दिल से कुछ करने का मौका मिला है।"
"फिर भी दोस्त।" मैने आदित्य के कंधे पर हाॅथ रखते हुए कहा___"मैं तुम्हें अकेले कुछ नहीं करने दूॅगा। बल्कि मैं भी तुम्हारे साथ ही इन सबका मुकाबला करूॅगा।"

"नहीं विराज।" आदित्य बोला___"ये सब तुम्हारे बस का काम नहीं है। अगर तुम्हें मेरे रहते कुछ हो गया तो मैं कभी भी अपने आपको मुआफ़ नहीं कर पाऊॅगा।"
"अपने इस दोस्त को इतना कमज़ोर भी मत समझो भाई।" मैने मुस्कुरा कर कहा__"अगर तुमसे ज्यादा नहीं हूॅ तो कम भी नहीं हूॅ।"

"क्या मतलब??" आदित्य ने नासमझने वाले भाव से पूछा था।
"यही कि थोड़ा बहुत मार्शल आर्ट्स मैं भी जानता हूॅ।" मैने कहा__"और मुझे खुद पर यकीन है कि मैं तुम्हारे साथ इन लोगों का डॅट कर मुकाबला कर सकता हूॅ।"

"अगर ऐसी बात है तो ठीक है दोस्त।" मेरी बात सुन कर आदित्य ने कहा।
हम दोनो बात कर रहे थे जबकि मेरे बगल में बैठा पवन सामने की तरफ एकटक देखे जा रहा था। आदित्य टैक्सी ड्राइवर के बगल वाली शीट पर बैठा हुआ था। तभी वो मेरे पीछे की तरफ देख कर चौंका।

"अरे हमारे पीछे भी दो गाड़ियाॅ लगी हुई हैं विराज।" आदित्य ने कहा___"क्या ये भी तुम्हारे ही बड़े पापा के आदमी हैं?"
"क्याऽऽ???" मैने बुरी तरह चौंकते हुए पीछे पलट कर देखा, और पीछे आ रही दोनो गाड़ियों को ध्यान से देखते हुए कहा__"ये तो कोई और ही हैं यार। पर हो सकता है कि इसमे भी बड़े पापा के ही आदमी हों।"

मेरे साथ साथ पवन ने भी पीछे मुड़ कर देखा था। पीछे देखने के बाद उसके चेहरे पर तनिक राहत के भाव उभरे। ये बात मैने भी नोट की। मेरा माथा ठनका। इसका मतलब पवन जानता है कि हमारे पीछे आ रही दोनो गाड़ियाॅ किसकी हैं। मेरे मन में पवन से ये बात पूछने का ख़याल तो आया मगर फिर मैने तुरंत ही उससे पूछने का अपना ख़याल ज़हन से निकाल दिया। मुझे पवन पर भरोसा था। वो मेरा बचपन का सच्चा दोस्त था। मगर इस वक्त वो हमारे पीछे आ रही गाड़ियों के बारे में जानते हुए भी मुझे कुछ न बताया था। बल्कि राहत की साॅस लेकर वह आराम से बैठ गया था। मुझे समझ न आया कि एकदम से उसमें ऐसा बदलाव कैसे आ गया?

उधर पुल को पार कर वो जीपें हमारे काफी नज़दीक पहुॅच चुकी थी। मेरी नज़र अचानक ही सामने बैठे आदित्य पर पड़ी। उसने अपने बैग से एक रिवाल्वर निकाला था। मतलब साफ था कि आदित्य हर तरह से चौकन्ना और चाकचौबंद ही था। देखते ही देखते सामने से आ रही वो जीपें टैक्सी के बीस मीटर के फाॅसले पर आकर रुक गईं। बीच सड़क पर और सड़क की पूरी चौड़ाई पर दो जीपे इस तरह आकर खड़ी हो गई थी कि अब सामने से टैक्सी निकल नहीं सकती थी। उसके लिए ड्राइवर को सड़क के नीचे हल्के से ढलान पर टैक्सी को उतारना पड़ता।

हमारे पीछे आ रही दोनो गाड़ियाॅ भी टैक्सी के पीछे दस मीटर के फाॅसले पर खड़ी हो गई थी। इधर सामने खड़ी जीपों के दरवाजे एक साथ एक झटके से खुले और उसमें से मेरे बड़े पापा के चिरपरिचित आदमी बाहर निकले। सबके हाॅथों में लट्ठ थे। जीपों से उतर कर वो सब टैक्सी की तरफ आने लगे। मैने देखा कि बड़े पापा वहाॅ कहीं नज़र नहीं आए मुझे। इसका मतलब उन्होंने इन लोगों को मुझे लाने के लिए भेजा था।

"पवन, तुम इस टैक्सी में आराम से बैठे रहना।" मैने पवन से कहा__"और हाॅ चिन्ता की कोई बात नहीं है। मैं और आदित्य अभी इन लोगों से निपट कर आते हैं। चलो दोस्त।"
"चलो मैं तो एकदम से तैयार ही हूॅ।" आदित्य ने कहा___"लेकिन एक समस्या है यार।"

"समस्या?" मैने पूछा__"कैसी समस्या?"
"हमारे पीछे खड़ी गाड़ियों में कौन हो सकता है?" आदित्य ने कहा__"क्या उसमें भी दुश्मन ही हैं? ये जानना ज़रूरी है भाई। क्योंकि वो पीछे से हम पर हमला करके हमें नुकसान भी पहुॅचा सकते हैं।"

"वो हम पर हमला नहीं करेंगे दोस्त।" मैने एक नज़र पवन पर डालने के बाद कहा__"बल्कि मुझे लगता है कि वो लोग हमारी सुरक्षा के लिए हैं।"
"हमारी सुरक्षा के लिए?" आदित्य के साथ साथ पवन भी चौंका था मेरी बात से।
"हाॅ भाई।" मैने कहा___"पवन ने तो यही बोला है मुझसे।"

"क्या????" पवन बुरी तरह हड़बड़ा गया, बोला___"मैने ऐसा कब कहा तुझसे?"
"यही तो ग़लत बात है न भाई।" मैने अजीब भाव से कहा___"कि तुमने कुछ कहा ही नहीं। मगर मैं तेरे चेहरे से सब समझ गया हूॅ। तू बताना नहीं चाहता तो कोई बात नहीं। चलो आदित्य, वो टैक्सी के करीब ही आ गए हैं।"

मेरे कहते ही आदित्य अपनी तरफ का दरवाजा खोल कर टैक्सी से बाहर आ गया और इधर मैं भी। पवन मूर्खों की तरह मुझे देखता रह गया था। जब मैं उतरने लगा तो उसने मुझे पकड़ने के लिए हाॅथ बढ़ाया ज़रूर मगर मैं उसे बेफिक्र रहने का कह कर टैक्सी से बाहर आ गया। टैक्सी से उतर कर मैं और आदित्य सामने की तरफ बढ़ चले।
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उधर हास्पिटल में!
रितू समय से पहले ही हास्पिटल पहुॅच गई थी। हास्पिटल के बाहर हर तरफ सादे कपड़ों में पुलिस के आदमी तैनात कर दिये थे उसने। सबको शख्त आदेश था कि कोई भी संदिग्ध आदमी विराज को किसी भी तरह का नुकसान न पहुॅचा सके। सब कुछ ब्यवस्थित करने के बाद ही वह हास्पिटल के अंदर विधी के पास आ गई थी। उसने विधी के माता पिता को भी फोन करके बुला लिया था।

रितू के कहने पर हास्पिटल की नर्सों ने विधी को एकदम से साफ सुथरा करके नये कपड़े पहना दिये थे। विधी के बार बार पूछने पर ही रितू ने उसे बताया कि उसका महबूब उसका प्यार आज उसके पास आ रहा है। रितू के मुख से ये बात सुन कर विधी का मुरझाया हुआ चेहरा ताजे गुलाम की मानिंद खिल उठा था मगर फिर जाने क्या सोच कर उसकी ऑखें छलक पड़ीं। रितू उसकी भावनाओं और जज़्बातों को बखूबी समझ सकती थी, कदाचित यही वजह थी कि जैसे ही विधी की ऑखें छलकीं वैसे ही रितू ने उसे अपने सीने से लगा लिया था।

"हाय दीदी ये मेरे साथ क्यों हो गया?" विधी ने रोते हुए कहा___"मैने उस भगवान का क्या बिगाड़ा था जो उसने मेरी ज़िदगी और मेरी साॅसे कम कर दी? उसको ज़रा भी मेरी खुशियाॅ रास नहीं आईं। उसने मुझसे अपराध करवाया। मुझसे अपराध करवाया कि मैने अपने प्यार को दुख दिया और उसे खुद से दूर कर दिया। आज इस हालत में मैं कैसे उसके सामने खुद को पेश करूॅगी? मैं जानती हूॅ कि वो मुझे इस हाल में देखेगा तो उसे मेरी इस हालत पर बहुत दुख होगा। मैं उसे दुखी होते हुए नहीं देख सकती दीदी। मुझसे ग़लती हो गई जो मैने आपसे उसे बुलाने के लिए कहा। मैं मर जाती तो उसे इसका पता ही नहीं चलता और ना ही उसे इस सबसे दुख होता। क्या ऐसा नहीं हो सकता दीदी कि वो यहाॅ आए ही न? वापस वहीं लौट जाए जहाॅ से वह आ रहा है।"

"ऐसी बातें मत कर पागल।" रितू का हृदय ये सोच कर हाहाकार कर उठा कि इस हाल में भी वो लड़की अपने महबूब को खुश देखना चाहती है, बोली___"कुछ मत बोल तू। सब कुछ अच्छा ही होगा विधी और ये तो अच्छा ही हुआ जो तूने मुझसे विराज को बुलाने का कह दिया। तू नहीं जानती विधी कि तेरे मिलने से मुझे क्या मिल गया है। तेरा प्यार और तेरे प्यार की इस तड़प ने मेरा समूचा अस्तित्व ही बदल दिया है। इसके लिए मैं ताऊम्र तक तेरी आभारी रहूॅगी। मुझे दुख है कि तेरे जैसी पाक़ दिल वाली लड़की को मैं किसी भी तरह से बचा नहीं सकती। काश मेरे पास कोई जादू की छड़ी होती जिससे मैं तुझे पल भर में ठीक कर देती और तेरे हाॅथों में तेरे महबूब का प्यार सौंप देती।"

"दीदी मेरे बाद आप मेरे राज का ख़याल रखिएगा।" विधी ने बिलखते हुए कहा__"उसे खूब प्यार दीजिएगा। उसने अपने जीवन में कभी सुख नहीं देखा। उसके अपनों ने उसे हर पल सिर्फ दर्द दिया है। यहाॅ तक कि मैने भी उसे सबसे ज्यादा दर्द दिया है।"

"ऐसा मत कह विधी।" रितू के अंदर हूक सी उठी थी, बोली__"तेरा हर शब्द मुझे बेहद पीड़ा देता है। मैं चाहती हूॅ कि जितना भी तेरे पास जीवन शेष है उसे तू हॅसी खुशी अपने महबूब के साथ जिये। इस संसार में जो भी आया है उसे एक दिन इस दुनियाॅ से सबको छोंड़ कर चले ही जाना है। यही संसार का सबसे बड़ा सत्य है। इस लिए विधी ये दुख ये संताप अपने अंदर से निकालने की कोशिश करो। तुमने किसी को कोई दर्द नहीं दिया। ये सब तो इंसान के अपने भाग्य से मिलते हैं। कोई किसी को कुछ दे नहीं सकता। देने वाला सिर्फ ईश्वर है और लेने वाला भी। ख़ैर छोंड़ ये सब बातें और चल मेरे साथ। उस कमरे में तेरे माॅम डैड भी बैठे हुए हैं।"

"आपने उन्हें क्यों बुला लिया दीदी?" विधी ने रितू के साथ चलते हुए कहा__"वो इस सबके बारे में क्या सोचेंगे?"
"कुछ नहीं सोचेंगे वो।" रितू ने विधी को अपने एक हाथ से पकड़े हुए कहा__"तुमने कोई पाप नहीं किया है। प्यार ही किया है न, ये तो कुदरत की सबसे खास नियामत है। जब उन्हें तेरे प्यार की दास्तां पता चलेगी तो यकीन मान वो भी तेरे इस पाक़ प्रेम के सामने नतमस्तक हो जाएॅगे।"

"मुझे उनके सामने अपने महबूब से मिलने में बहुत शर्म आएगी दीदी।" विधी का मुर्झाया हुआ चेहरा एकाएक ही शर्म की लाली से सुर्ख हो उठा था, बोली___"आप प्लीज़ उन्हें उस वक्त किसी दूसरे कमरे में या फिर बाहर भेज दीजिएगा।"

"तू भी न बिलकुल पागल है।" रितू ने उसे रोंक कर उसके माॅथे पर प्यार से मगर हल्के से चूमते हुए कहा___"ख़ैर, जैसा तुझे अच्छा लगे मैं वैसा ही करूॅगी। अब खुश?"

रितू की इस बात से विधी के मुर्झाए चेहरे पर हल्की सी रंगत नज़र आई और होठों पर फीकी सी मुस्कान तैरती हुई दिखी। कुछ ही देर में रितू उसे हास्पिटल के एक स्पेशल कमरे में ले आई और उसे बेड पर आहिस्ता से लेटा दिया। कमरे में एक तरफ रखे सोफों पर विधी के माॅम डैड बैठे हुए थे। उनका चेहरा देख कर ही समझ आ रहा था कि वो अकेले में खूब रोए थे अपनी बेटी की इस हालत के लिए।
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"कैसे हैं भीमा काका?" मैंने बड़े पापा के एक आदमी को देखते हुए कहा___"मुझे ढूढ़ने में कोई परेशानी तो नहीं हुई न आपको?"
"ज्यादा शेखी मत झाड़ छोकरे।" भीमा काका ने गुस्से से कहा___"वरना यहीं पर ज़िंदा गाड़ दूॅगा समझे। शुकर कर कि मेरे मालिक का मुझे आदेश नहीं है वरना पलक झपकते ही तू इस वक्त लाश में तब्दील हुआ यहीं पड़ा होता।"

"लगता है आपको अपने बाहुबल पर ज़रूरत से ज्यादा ही घमंड है।" मैने कहा___"तभी तो आप अपने सामने किसी को कुछ समझ ही नहीं रहे हैं।"
"सही कहा छोकरे।" भीमा ने कहा__"मुझे अपने बाहुबल पर घमंड तो होगा ही। आख़िर मालिक का मैं सबसे खास आदमी हूॅ।"

"तो क्या आदेश दिया है आपके मालिक ने आपको?" मैने पूछा।
"यही कि तुझे घसीटते हुए यहाॅ से लेकर जाऊॅ।" भीमा कह रहा था___"और ले जाकर उनके पैरों पर पटक दूॅ।"
"बहुत खूब।" मैं हॅसा___"तो फिर खड़े क्यों हो काका? मुझे घसीटते हुए यहाॅ से ले चलो अपने मालिक के पास।"

"लगता है इस लड़के को मरने की बड़ी जल्दी है भीमा।" भीमा के बगल से लट्ठ लिए खड़े एक अन्य आदमी ने हॅसते हुए कहा___"और शायद इसका भेजा भी फिर गया है। तभी तो ये अनाप शनाप बके जा रहा है। मैं तो कहता हूॅ ले चल इसे घसीटते हुए।"

"सही कह रहा है तू मंगल।" भीमा काका ने उससे कहा___"जब किसी की मौत निकट होती है न तो वो आदमी ऐसी ही मूर्खतापूर्ण बातें करता है। ख़ैर, पकड़ इसे। मैं इसके साथ आए इसके इस साथी को पकड़ता हूॅ।"

भीमा के कहने के साथ ही मंगल मेरी तरफ बढ़ा और भीमा आदित्य की तरफ। मंगल ने जैसे ही मुझे पकड़ने के लिए अपना हाॅथ आगे बढ़ाया वैसे ही मैने बिजली की सी स्पीड से उसका वो हाॅथ पकड़ा और उसकी तरफ पीठ कर उसके हाथ को अपने कंधे पर रख कर ज़ोर का झटका दिया। कड़कड़ की आवाज़ के साथ ही मंगल का हाॅथ बीच से टूट गया। हाॅथ टूटते ही मंगल हलाल होते बकरे की तरह चीखा। जबकि उसका हाॅथ तोड़ने के बाद मैं पलटा और उसी स्पीड से उसके गंजे सिर को दोनो हाॅथों से पकड़ कर शख्ती से एक तरफ को झटक दिया। परिणामस्वरूप मंगल की गर्दन टूट गई और उसकी जान उसके जिस्म से जुदा हो गई। उसका बेजान हो चुका जिस्म लहराते हुए वहीं ज़मीन पर गिर गया। ये सब इतना जल्दी हुआ कि किसी को कुछ समझ में ही नहीं आया कि पल भर में ये क्या हो गया।

मेरी इस हरकत से आदित्य जो भीमा की गर्दन को अपने बाजुओं में कसे झटके दे रहा था वो चकित रह गया। उसने भी भीमा की गर्दन को झटके देकर तोड़ दिया था। पलक झपकते ही दो हट्टे कट्टे आदमियों को इस तरह मौत के मुह में जाते देख बाॅकी सब लोग पहले तो भौचक्के से रह गए फिर जैसे उन्हें वस्तुस्थित का एहसास हुआ। सब के सब एक साथ हमारी तरफ लट्ठ लिए दौड़ पड़े।

आदित्य ने मेरी तरफ देखा, मैने भी उसकी तरफ देखा। ऑखों ऑखों में ही हमारी बात हो गई। जैसे ही सामने से लट्ठ लिए वो लोग हमारे पास पहुॅचे वैसे ही आगे के दो आदमी लट्ठ को पूरी शक्ति से घुमा कर हम दोनो पर वार किया। हम दोनो ही झुक गए जिससे उनके लट्ठ का वार हमारे सिर से निकल गया।

इससे पहले कि वो दोनो सम्हल पाते उनकी पीठ पर हम दोनो की फ्लाइंग किक पड़ी। वो दोनो आदमी लट्ठ समेत ज़मीन की धूल चाटने लगे। मैने एक आदमी के गिरते ही उसके लट्ठ वाले हाथ में ज़ोर से लात मारी। उसके हलक से चीख़ निकल गई। उसने लट्ठ छोंड़ दिया तो मैने जल्दी से उसका लट्ठ उठा लिया। यही क्रिया आदित्य ने भी की थी।

हम दोनो के हाॅथ में अब लट्ठ थी। उन दोनो के गिरते ही उनके पीछे आए बाॅकी के आदमी भी हमारी तरफ एक साथ दौड़ पड़े। देखते ही देखते उन सब ने हम दोनो को चारों तरफ से घेर लिया। मैं और आदित्य आपस में पीठ के बल जुड़ गए थे और घूम रहे थे अपने स्थान पर। उधर चारों तरफ घूमते हुए उन सभी आदमियों ने एक साथ हम पर लट्ठ का वार किया। मैने और आदित्य ने तुरंत ही उनके वार को अपने अपने लट्ठ से रोंका और पूरी शक्ति से ऊपर की तरफ झटका दिया। नतीजा ये हुआ कि सब के सब इधर उधर लड़खड़ा कर गिर पड़े। उन लोगों के गिरते ही मैने और आदित्य ने उन्हें उठने का मौका नहीं दिया। हम दोनो ही उन सब पर पिल पड़े। लट्ठ के ज़ोरदार वार उन सबके जिस्मों पर पड़ने लगे थे। वातावरण में उन सबकी दर्द में डूबी हुई चीखें निकलने लगी थी।

थोड़ी ही देर में वो सब वहीं सड़क पर पड़े बुरी तरह कराहे जा रहे थे। किसी का सिर फूटा, किसी के हाॅथ टूटे तो किसी के पैर। कहने का मतलब ये कि वो सब कुछ ही देर में अधमरी सी हालत में पहुॅच गए थे। तभी वातावरण में हमे सामने की तरफ किसी जीप के स्टार्ट होने की आवाज़ सुनाई दी। हम दोनो ने सामने की तरफ देखा तो सबसे पीछे की कतार में खड़ी जीप अपनी जगह से पीछे की तरफ जाने लगी थी।

"लगता है उसमें कोई आदमी बचा हुआ है दोस्त।" आदित्य ने सामने उस जीप की तरफ देखते हुए कहा____"और वो इन सबका हाल देख कर यहाॅ से भागने की सोच रहा है, बल्कि भाग ही रहा है वो।"
"वो यहाॅ से भागने न पाए दोस्त।" मैने कठोर भाव से कहा___"वर्ना वो अजय सिंह को यहाॅ का सारा हाल बताएगा और अजय सिंह फिर से अपने कुछ आदमियों को भेजेगा या फिर वो खुद हमें पकड़ने के लिए आ सकता है। मैं इस सबसे डर तो नहीं रहा मगर इस वक्त मैं यहाॅ किसी से लड़ने के उद्देश्य से नहीं आया हूॅ बल्कि पवन के बुलाने पर आया हूॅ। तुम समझ रहे हो न मेरी बात?"

"मैं समझ गया विराज।" आदित्य ने अपनी कमर में जीन्स पर खोंसी हुई रिवाल्वर को निकालते हुए कहा___"तुम फिकर मत करो। वो साला यहाॅ से ज़िंदा वापस नहीं जा सकेगा।"

इतना कहने के साथ ही आदित्य ने रिवाल्वर वाला हाॅथ ऊपर उठाया और निशाना साध कर सामने यू टर्न ले चुकी जीप के अगले वाले दाहिने टायर पर फायर कर दिया। अचूक निशाना था आदित्य का। नतीजा ये हुआ कि टायर के फटते ही जीप अनबैलेंस हो गई और वो सड़क के किनारे ढलान की तरफ तेज़ी से बढ़ी। ढलान में उतरते ही कदाचित ड्राइवर ने उसे जल्दी से मोड़ कर वापस सड़क पर लाने की कोशिश की थी, मगर ढलान पर बाएॅ साइड से अगले पहिये के उतर जाने से जीप ढलान पर उलटती चली गई।

जीप को उलटती देख आदित्य उस तरफ को बढ़ा ही था कि फिर जाने क्या सोच कर वो रुक गया। मेरी तरफ देख कर बोला__"तुम उसे देखो, मैं इन लोगों का किस्सा खत्म करता हूॅ।"

मैं समझ गया कि आदित्य मुझे इन लोगों के पास अकेला नहीं छोंड़ना चाहता था। हलाॅकि अजय सिंह के सभी आदमी इस वक्त सड़क पर लहूलुहान हुए पड़े कराह रहे थे। उनमें से किसी में अब उठने की शक्ति नहीं थी। मगर फिर भी आदित्य मुझे उन सबके पास अकेला नहीं रहने देना चाहता था। इसी लिए उसने मुझे उस उलट चुकी जीप की तरफ जाने का कहा था। वहाॅ पर तो वो सिर्फ एक ड्राइवर ही था। मुझे आदित्य की इस बात पर अंदर ही अंदर उसकी दोस्ती पर नाज़ हुआ। मैं उसकी बात सुन कर उस तरफ बढ़ गया जिस तरफ वो जीप ढलान पर उलटती चली गई थी।

उलटी हुई जीप के पास जब मैं पहुॅचा तो देखा ड्राइवर वाले डोर पर नीचे की तरफ ढेर सारा खून बहते हुए वहीं ज़मीन पर फैलता जा रहा था। मैने झुक कर देखा ड्राइवर मर चुका था। जीप के ऊपर लगे लोहे का एक सरिया टूट कर उसके सिर के आर पार हो चुका था। उसी से खून बहता हुआ नीचे ज़मीन पर फैलता जा रहा था। जीप पूरी की पूरी उलट गई थी। उसके पहिये ऊपर की तरफ थे और ऊपर का भाग नीचे की तरफ हो गया था।

ड्राइवर का ये हाल देख कर मैं वापस आदित्य के पास आ गया। मैने आदित्य को ड्राइवर का हाल बता दिया। इधर आदित्य ने ज़मीन पर कराह रहे सभी आदमियों की गर्दनें तोड़ कर उन सबको यमलोक पहुॅचा चुका था।

"यार मज़ा तो नहीं आया मगर ख़ैर कोई बात नहीं।" मैने आदित्य की तरफ देखते हुए किन्तु मुस्कुराते हुए कहा___"अब इन लाशों का क्या करें?"
"इन्हें यहाॅ खुली जगह पर और सड़क पर इस तरह छोंड़ कर जाना भी ठीक नहीं है मेरे दोस्त।" आदित्य ने कहा___"इससे मामला बहुत गंभीर हो सकता है। पुलिस इन सबके क़ातिलों को ढूॅढ़ने के लिए एड़ी से चोंटी तक का ज़ोर लगा देगी।"

"तो अब क्या करें यार?" मैं एकाएक ही चिंता में पड़ गया था, बोला___"इन लोगों को कहाॅ ले जाएॅगे हम? दूसरी बात वो टैक्सी ड्राइवर भी इस सबका चश्मदीद गवाह बन चुका है। ऐसे में यकीनन हम बहुत जल्द कानून की गिरफ्त में आ सकते हैं।"

"वो सब हम लोग सम्हाल लेंगे।" तभी ये वाक्य पीछे से किसी ने कहा था। मैं और आदित्य ये सुन कर चौंकते हुए पीछे की तरफ पलटे। हमारे पीछे कुछ लोग खड़े हुए थे। मुझे समझते देर न लगी कि ये सब वही लोग हैं जो हमारे पीछे आ रही गाड़ियों पर थे।

"आप लोग कौन हैं?" मैने तनिक घबराते हुए एक से पूछा___"और ये आपने कैसे कहा कि हम सब इन लोगों को सम्हाल लेंगे? बात कुछ समझ में नहीं आई।"

मेरी बात सुन कर उस आदमी ने अपने शर्ट की ऊपरी जेब से एक आई कार्ड जैसा कुछ निकाला और हमारी तरफ उसे दिखाते हुए बोला___"हम सब पुलिस वाले हैं और आपके पीछे पीछे आपकी सुरक्षा के लिए ही लगे हुए थे।"

मैं और आदित्य उसकी ये बात सुन बुरी तरह चौंक पड़े थे। ये सच है कि उसकी ये बात ऐसी थी कि काफी देर तक हमारे पल्ले ही न पड़ सकी थी। मैं तो ये सोच कर हैरान था कि ये सब पुलिस वाले हैं और इन लोगों ने हम दोनो को अजय सिंह के सभी आदमियों का बेदर्दी से कत्ल करते हुए अपनी ऑखों से देखा था। इसके बावजूद ये लोग ये कह रहे हैं कि ये हमारी सुरक्षा के लिए ही हमारे पीछे लगे हुए थे। मेरे दिमाग़ की नशें तक दर्द करने लगीं ये सोचते हुए कि ये लोग हमारी सुरक्षा क्यों कर रहे थे? इनकी नज़र में तो अब हम दोनो मुजरिम ही बन चुके थे। इनकी ऑखों के सामने ही तो हमने अजय सिंह के सभी आदमियों को जान से मारा था। उस सूरत में तो इन लोगों हमें गिरफ्तार कर लेना चाहिए। मगर नहीं, ये लोग तो ये कह रहे हैं कि इन लाशों को ये सम्हाल लेंगे। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि पुलिस वाले भला ऐसा कैसे कह और कर सकते हैं? मैने आदित्य की तरफ देखा तो उसका हाल भी मुझसे जुदा न था। वो भी मेरी तरह हैरान परेशान सा उन सभी पुलिस वालों की तरफ इस तरह देख रहा था जैसे उन सबके सिर उनके धड़ों से निकल कर ऊपर हवा में कत्थक कर रहे हों।

"बात कुछ समझ में नहीं आई।" मैने खुद को सम्हालते हुए अपने सामने खड़े एक पुलिस वाले से कहा___"आप पुलिस वाले हमारी सुरक्षा किस वजह से कर रहे हैं और किसके कहने पर? इतना ही नहीं ये भी कह रहे हैं कि आप इन लाशों को सम्हाल लेंगे? जबकि आप लोगों को करना तो यही चाहिए कि ऐसे जघन्य हत्याकाण्ड के लिए हमें तुरंत गिरफ्तार कर हवालात में बंद कर दें।"

"वो सब छोंड़िये।" मेरे सामने खड़े एक पुलिस वाले ने कहा___"आप लोग यहाॅ से आगे बढ़िये, ये सोच कर कि यहाॅ कुछ हुआ ही नहीं है। हमने आपके टैक्सी ड्राइवर को भी समझा दिया है। वो इस मामले में अपना मुख किसी के सामने जीवन भर नहीं खोलेगा। आपके पीछे कुछ दूरी के फाॅसले पर हमारे कुछ आदमी आपकी सुरक्षा में उसी तरह लगे रहेंगे जैसे अब तक लगे हुए थे।"

"ये तो बड़ी ही हैरतअंगेज बात है।" मैं उसकी इस बात से चकित होकर बोला___"कैसे पुलिस वाले हैं आप लोग कि इतना कुछ होने के बाद भी आप हमें गिरफ्तार करने की बजाय यहाॅ से बड़े आराम से चले जाने का कह रहे हैं? ऊपर से हमारी सुरक्षा के लिए आप अपने पुलिस के कुछ आदमियों को भी हमारे पीछे लगा रहे हैं।"

"इस बारे में आप ज्यादा सोच विचार मत कीजिए।" पुलिस वाले ने कहा___"अब आप ज्यादा देर मत कीजिए और बेफिक्र होकर यहाॅ से गाॅव जाइये।"

इतना कह कर वो पुलिस वाला पलट गया। उसके साथ बाॅकी के पुलिस वाले भी पलट गए थे। जबकि हैरान परेशान हम दोनो उन्हें मूर्खों की तरह देखते रह गए। साला दिमाग़ का दही हो गया मगर पुलिस वालों का ये रवैया हमारी समझ में ज़रा भी न आ सका था।

"विराज भाई।" उन लोगों के जाते ही आदित्य कह उठा___"मैने अपनी इतनी बड़ी लाइफ में ऐसे विचित्र किस्म के पुलिस वाले आज तक नहीं देखे। मतलब कि____यार क्या कहूॅ अब? मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा।"
"सही कह रहे हो दोस्त।" मैने कुछ सोचते हुए कहा___"ये तो हद से भी ज्यादा वाला अंधेर हो गया। ख़ैर जाने दो, हमारे तो हक़ में ही है न? अच्छा ही हुआ, वरना अगर ये लोग हमें इस सबके लिए गिरफ्तार कर जेल की सलाखों के पीछे डाल देते तो बड़ी गंभीर समस्या हो जाती हमारे लिए।"

"हाॅ यार।" आदित्य ने कहा___"लेकिन ये बात ऐसी है कि कुछ दिन तक ही क्या साला जीवन भर हमारे ज़हन में किसी सर्प की भाॅति कुण्डली मार कर बैठी रहेगी। हम जीवन भर इस सबके बारे में सोचते रहेंगे मगर इस सबका कारण हमें समझ में ही नहीं आएगा।"

"आएगा दोस्त।" मैने पूर्वत सोचते हुए ही कहा___"इस सबका कारण ज़रूर समझ में आएगा और बहुत जल्द आएगा। फिलहाल तो हमें यहाॅ से निकलना ही चाहिए।"
"बिलकुल।" आदित्य ने कहा___"चलो चलते हैं। लेकिन यार सामने जाने का रास्ता तो बंद है। हमें सबसे पहले ये सारी जीपें सामने के रास्ते से हटानी पड़ेंगी।"

"हाॅ तो चलो हटा देते हैं।" मैने कहा__"उसमे क्या है।"
मेरे इतना कहते ही आदित्य मेरे साथ चल पड़ा। कुछ ही देर में हमने उन जीपों को रास्ते से हटा दिया। इस काम में एक दो पुलिस वाले भी हमारी मदद करने के लिए आ गए थे। सभी जीपों को रास्ते से हटाने के बाद मैने और आदित्य ने एक काम और किया। वो ये कि उन सभी जीपों के टायरों से हवा निकाल दी। उसके बाद हम दोनो आकर टैक्सी में बैठ गए।

टैक्सी में आकर मैने देखा कि पवन किसी और ही दुनियाॅ में खोया हुआ एकदम शान्त बैठा था। उसके चेहरे पर आश्चर्य का सागर विद्यमान था। मैने उसे उसके कंधों से पकड़ कर हिलाया, तब जाकर उसकी चेतना लौटी। चेतना लौटते ही वो मेरी तरफ अजीब भाव से देखने लगा। अभी भी उसके चेहरे पर गहन हैरत के भाव थे।

"ऐसे दीदें फाड़ कर क्या देख रहा है?" मैने मुस्कुराते हुए कहा उससे।
"ये ये सब क्या था?" उसके मुख से अजीब सी आवाज़ निकली___"ये तुम दोनो ने क्या और कैसे कर दिया? सबको मार दिया तुम दोनो ने। तुझे पता है ये बात जब तेरे बड़े पापा को पता चलेगी तो क्या होगा?"

"कुछ नहीं होगा भाई।" मैने कहा___"और अगर कुछ होगा भी तो वो ये होगा कि उस अजय सिंह की गाॅड फट के उसके हाॅथ में आ जाएगी समझा। खुद को बहुत बड़ा सूरमा समझने वाले अजय सिंह को जब अपने आदमियों के बारे में ऐसी ख़बर मिलेगी तो उस समय उसकी हालत क्या होगी इस बात का अंदाज़ा लगा कर देख भाई।"

"तू मेरा वही यार है या तेरी जगह तेरा चोला पहन कर कोई और आ गया है?" पवन ने चकित भाव से कहा था, बोला___"मेरा दोस्त इतना खतरनाक तो नहीं था। जिस तरह तूने एक ही झटके में अजय सिंह के मुस्टंडे आदमियों का क्रिया कर्म कर दिया है न उससे तो यही लगता है कि तू मेरा वो यार नहीं हो सकता।"

"मैं तेरा वही यार हूॅ भाई।" मैने कहा__"बस समय बदल गया है। इस लिए समय के साथ साथ मैने खुद की भी बदल लिया है। मगर यकीन रख, मेरा ये बदलाव सिर्फ उनके लिए है जिन्होंने मुझ पर और मेरे माॅ बहन पर अत्याचार किया है। अपने अज़ीज़ों के लिए तो मैं आज भी वही हूॅ जैसा पहले हुआ करता था। ख़ैर छोंड़ ये सब, ये बता कि हमारे पीछे आ रहे ये पुलिस वालों का क्या चक्कर है? ये लोग मेरी सुरक्षा की बात क्यों कर रहे थे मुझसे? और तो और इन लोगों ने तो हमे गिरफ्तार भी नहीं किया जबकि मैंने और आदित्य ने अजय सिंह के सभी आदमियों को उनकी ऑखों के सामने उन सबको जान से मार दिया है? ये सब क्या चक्कर है भाई? देख मुझसे कोई बात मत छिपा तू। जो भी बात है उसे साफ साफ बता दे मुझे। आख़िर ऐसी क्या वजह थी जिसके लिए तूने मुझे इस तरह यहाॅ आने को कहा था?"

"अब जब तू यहाॅ आ ही गया है तो थोड़ा और इन्तज़ार कर ले मेरे यार।" पवन ने कहने के साथ ही अपना चेहरा अपनी तरफ के दरवाजे की खिड़की की तरफ फेर लिया, फिर बोला___"मैं अपने मुख से तुझे कुछ नहीं बता सकता और ना ही वो सब बताने की मुझमें हिम्मत है। कुछ समय तक और धीरज रख ले, उसके बाद सब कुछ पता चल जाएगा तुझे।"

पवन ये बातें सुन कर मैं उसे अजीब भाव से देखता रह गया था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसी क्या बात है जिसे मेरा दोस्त इस हद तक मुझसे छिपा रहा है? मेरे दिलो दिमाग़ में अनगिनत आशंकाएॅ उत्पन्न हो गई थी। पवन अभी भी खिड़की के उस पार देख रहा था। उस वक्त तो मैं चौंक ही पड़ा जब पवन ने बड़ी सफाई से अपनी ऑखों से ऑसू पोछने की क्रिया की थी। ये देख कर मेरे अंदर बड़ी तेज़ी से चिंता और बेचैनी बढ़ती चली गई। सहसा मेरी ऑखों के सामने अभय चाचा के बीवी बच्चों का चेहरा नाच गया। मेरे मस्तिष्क में जैसे विष्फोट सा हुआ। मन में एक ही ख़याल उभरा कि छोटी चाची और उनके बच्चों के साथ कोई ऐसी बात तो नहीं हो गई जो कि नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन फिर मेरे मन में सवाल भरा कि इस बात को बताने में भला पवन को क्या परेशानी हो सकती है? इसका मतलब मामला कुछ और ही है। मगर ऐसा क्या मामला हो सकता है?

मैंने इस बारे बहुत सोचा मगर मुझे कुछ समझ न आया। अंत में थक हार कर मैने अपने ज़हन से ये सब बातें झटक दी, ये सोच कर कि कुछ समय बाद सब कुछ पता तो चल ही जाएगा। पवन ने तो बार बार यही कहा था मुझसे। मैने एक बार पलट कर पीछे की तरफ देखा। हमारे पीछे पुलिस वालों की एक गाड़ी कुछ फाॅसले पर लगी हुई आ रही थी। उन लोगों को देख कर एक बार फिर से मेरे मन में उनके बारे में ढेरों सवाल चकरा उठे। आख़िर ये पुलिस वाले मेरी सुरक्षा में क्यों लगे हुए हैं और किसने कहा होगा इन्हें ऐसा करने के लिए? सोचते सोचते मेरा सिर दर्द करने लगा तो मैने उनके बारे में सोचने का काम भी बंद कर दिया।

अभी मैं रिलैक्स होकर बैठा ही था कि एकाएक मेरे मस्तिष्क में धमाका हुआ। धमाके का गुबार जब छॅटा तो एक चेहरा नज़र आया मुझे। वो चेहरा था रितू दीदी का। वो भी तो पुलिस वाली थी। तो क्या उन्होंने इन लोगों को मेरी सुरक्षा के लिए भेजा है? नहीं नहीं हर्गिज़ नहीं, वो भला ऐसा कैसे कर सकती हैं? मैं भला उनका लगता ही क्या हूॅ? आज तक कभी जिसने मुझे अपना भाई नहीं माना और ना ही मुझसे कभी बात करना पसंद किया। वो भला मेरी सुरक्षा की चिंता क्यों करेंगी? ये तो सूर्य देवता के पश्चिम दिशा से उदय होने वाली बात है, जो कि निहायत ही असंभव बात है। तो फिर और क्या वजह हो सकती है? सहमा मुझे ध्यान आया कि मैं एक बार फिर से इन सब बातों पर अपना माथा पच्ची करने में लग गया हूॅ। इस ख़याल के आते ही मैने फिर से अपने ज़हन से इन सब बातों को झटक दिया और फिर आराम से रिलैक्स होकर बैठ गया। मगर मैने महसूस किया कि रिलैक्स होना इस वक्त मेरे बस में ही नहीं था। क्योंकि मेरे मन में फिर से तरह तरह के सोच विचार चलने लगे।

लगभग दस मिनट बाद ही हल्दीपुर गाॅव नज़र आने लगा था हमें और फिर कुछ ही देर में हम गाॅव में दाखिल हो गए। पवन के निर्देश पर टैक्सी ड्राइवर ने टैक्सी को पवन के घर की तरफ जाने वाली गली में मोड़ दिया था। जबकि हमारी हवेली उत्तर की तरफ थी।

कुछ ही देर में हम पवन के घर के पास पहुॅच गए। गर्मियों का समय तो नहीं था मगर इस वक्त आस पास किसी भी घर के पास कोई इंसानी जीव दिख नहीं रहा था। हलाॅकि गाॅव में जब हम दाखिल हुए थे तो दाएॅ तरफ एक चौपाल पर कुछ लोगों को बैठे देखा था हमने। मैने सबसे ज़रूरी काम ये किया था कि गाॅव में दाखिल होने से पहले ही अपने चेहरे को रुमाल से ढॅक लिया था। ताकि गाव का कोई ब्यक्ति मुझे किसी तरह से पहचान न सके।

पवन के घर के सामने टैक्सी रुकी तो ड्राइवर को छोंड़ कर हम तीनों जल्दी से टैक्सी से बाहर निकले और अपना अपना बैग लेकर पवन के घर के अंदर आ गए। टैक्सी ड्राइवर को मैने उसकी टैक्सी का भाड़ा पहले ही दे दिया था और उसे समझा भी दिया था कि हम लोगों के उतरते ही वो वापस बिजली की स्पीड से चला जाएगा। अगर यहाॅ कहीं कोई टैक्सी रुकवाए तो वो रोंके नहीं। वरना वो खुद बहुत बड़ी मुसीबत में फॅस जाएगा।

टैक्सी ड्राइवर हम लोगों से इतना डरा हुआ था कि वो हमसे पैसा भी नहीं ले रहा था। एक ही बात बोल रहा था कि हम उसे जाने दें। वो हमारी कोई भी बात कभी भी किसी से नहीं कहेगा। मगर मैने उसे समझाया कि डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। ख़ैर, हम लोगों को उतार कर उसने टैक्सी को वहीं पर किसी तरह बैक करके वापसी के लिए मोड़ा और वहाॅ से चंपत हो गया। मुझे यकीन था कि वो रास्ते में कहीं भी रुकने वाला नहीं था।

पवन के घर के अंदर जैसे ही हम तीनो आए तो पवन ने जल्दी से घर का मुख्य दरवाजा बंद कर उसमें कुण्डी लगा दी थी। पवन सिंह मेरे बचपन का दोस्त था। ग़रीब था और बिना बाप का था। उससे बड़ी उसकी एक बहन थी। जो मेरी भी मुहबोली बहन थी। वो मुझे अपने सगे भाई से भी ज्यादा मानती थी। अभी तक उसकी शादी नहीं हो सकी थी। इसकी वजह ये थी कि पवन के पास रुपये पैसे की तंगी थी। आजकल लोग दहेज की माॅग बहुत ज्यादा करते हैं। पवन की माॅ बयालिस साल की विधवा औरत थी। किन्तु स्वभाव से बहुत अच्छी थी। वो मुझे अपने बेटे की तरह ही प्यार करती थी।

हम लोग चलते हुए बैठक में पहुॅचे और वहाॅ एक तरफ किनारे पर रखी एक चारपाई पर बैठ गए। जबकि पवन अंदर की तरफ चला गया था। आदित्य इधर उधर बड़े ग़ौर से देख रहा था। कदाचित ये देख रहा था कि यहाॅ गाॅव में कच्चे खपरैलों वाले मकान बने हुए थे। जबकि उसने आज तक ऐसे मकान सिर्फ फिल्मों में ही देखे होंगे कभी।

दोस्तो, निर्धारित समय से पहले अपडेट हाज़िर है,,,,,,,,,

ये अपडेट मैं कल से थोड़ा थोड़ा करके लिख रहा था। थोड़ा थोड़ा करके इस लिए क्योंकि तीन चार घण्टे का समय एकसाथ मिल ही नहीं रहा था मुझे। हिन्दी में लिखने पर समय भी बहुत ज्यादा लगता है। इतने अपडेट को अगर अंग्रेजी फाॅन्ट में लिखना होता तो कदाचित कल ही आपके सामने अपडेट हाज़िर हो जाता। ख़ैर,,,

एक बात कहना चाहता हूॅ और वो ये कि कुछ लोग कहते हैं कि फ्री होने के बाद मैं रेगुलर अपडेट दूॅ। जबकि मैने शुरू में ही आप सबसे कहा था कि रेगुलर अपडेट देना मेरे लिए बहुत मुश्किल है। ये बात मैंने आप सबसे बीच बीच में भी कही थी। सबको लगता है कि उन्हें किसी भी कहानी का अपडेट रोज़ाना पढ़ने को मिले और ये बात यकीनन अपनी जगह सही भी है। आपकी जगह अगर मैं होता तो मैं भी यही चाहता और यही डिमाण्ड भी करता। मगर दोस्तो, ये आप भी समझ सकते हैं कि ये सब इतना आसान नहीं होता। हर लेखक चाहता है कि उसके पाठक उससे खुश रहें मगर अक्सर ऐसा होता है कि वही नहीं हो पाता जो हम बड़ी शिद्दत से चाहते हैं। आप सब मेरी इस बात से अगर सहमत हैं तो ये मेरे लिए अच्छी बात होगी। मुझे खुशी होगी कि आप सब मेरी ही बस नहीं बल्कि हर लेखक की मजबूरियों को बेहतर तरीके से समझते हैं।

!! धन्यवाद !!
 
एकनयासंसार

अपडेट........《 44 》

अब तक,,,,,,,

टैक्सी ड्राइवर हम लोगों से इतना डरा हुआ था कि वो हमसे पैसा भी नहीं ले रहा था। एक ही बात बोल रहा था कि हम उसे जाने दें। वो हमारी कोई भी बात कभी भी किसी से नहीं कहेगा। मगर मैने उसे समझाया कि डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। ख़ैर, हम लोगों को उतार कर उसने टैक्सी को वहीं पर किसी तरह बैक करके वापसी के लिए मोड़ा और वहाॅ से चंपत हो गया। मुझे यकीन था कि वो रास्ते में कहीं भी रुकने वाला नहीं था।

पवन के घर के अंदर जैसे ही हम तीनो आए तो पवन ने जल्दी से घर का मुख्य दरवाजा बंद कर उसमें कुण्डी लगा दी थी। पवन सिंह मेरे बचपन का दोस्त था। ग़रीब था और बिना बाप का था। उससे बड़ी उसकी एक बहन थी। जो मेरी भी मुहबोली बहन थी। वो मुझे अपने सगे भाई से भी ज्यादा मानती थी। अभी तक उसकी शादी नहीं हो सकी थी। इसकी वजह ये थी कि पवन के पास रुपये पैसे की तंगी थी। आजकल लोग दहेज की माॅग बहुत ज्यादा करते हैं। पवन की माॅ बयालिस साल की विधवा औरत थी। किन्तु स्वभाव से बहुत अच्छी थी। वो मुझे अपने बेटे की तरह ही प्यार करती थी।

हम लोग चलते हुए बैठक में पहुॅचे और वहाॅ एक तरफ किनारे पर रखी एक चारपाई पर बैठ गए। जबकि पवन अंदर की तरफ चला गया था। आदित्य इधर उधर बड़े ग़ौर से देख रहा था। कदाचित ये देख रहा था कि यहाॅ गाॅव में कच्चे खपरैलों वाले मकान बने हुए थे। जबकि उसने आज तक ऐसे मकान सिर्फ फिल्मों में ही देखे होंगे कभी।
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अब आगे,,,,,,,,,

उधर अजय सिंह, प्रतिमा और शिवा अपने नये फार्महाउस में पहुॅच चुके थे। तीनों के चेहरे खिले हुए थे। ये सोच कर कि बहुत दिनों बाद कुछ अच्छा सुनने को मिला था उन्हें। जिनकी तलाश में खुद अजय सिंह और उसके आदमी जाने कहाॅ कहाॅ भटक रहे थे वो खुद ही चल कर यहाॅ आया और उसके आदमियों के द्वारा बहुत जल्द उसे पकड़ कर उसके सामने उसे हाज़िर कर दिया जाएगा। उसके बाद वो जैसे चाहेगा वैसे विराज के साथ सुलूक कर सकेगा।

"डैड मैने तो सोच लिया है कि मैं क्या क्या करूॅगा?" फार्महाउस के अंदर ड्राइंगरूम में रखे सोफे पर बैठे शिवा ने कहा___"उस विराज के हाथ लगते ही बाॅकी के जब सब भी हमारे पास आ जाएॅगे तब मैं अपनी मनपसंद चीज़ों का जी भर के मज़ा लूटूॅगा। सबसे पहले तो उस हरामज़ादी करुणा को पेलूॅगा वो भी उसके पति के सामने। उसी की वजह से चाचा ने मुझे कुत्ते की तरह धोया था। इस फार्महाउस पर सब औरतों और उनकी लड़कियों को नंगा करूॅगा मैं।"

"चिंता मत करो बेटे।" अजय सिंह ने शिगार को सुलगाते हुए कहा___"जो कुछ तू सोचे बैठा है न वही सब मैने भी सोचा हुआ है। बहुत तरसाया है इन लोगों ने मुझे। सबसे ज्यादा उस कमीनी गौरी ने। पता नहीं क्यों पर उससे दिल लग गया था बेटा। मैं चाहता था कि वो अपने मन से अपना सब कुछ मुझे सौंप दे, इसी लिए तो कभी उसके साथ ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं की थी मैने। मगर अब नहीं। अब तो बलात्कार होगा बेटे। ऐसा बलात्कार कि दुनियाॅ में उसके बारे में किसी ने ना तो सोचा होगा और ना ही सुना होगा कहीं। इस फार्महाउस में उन दोनो औरतों को और उन दोनो लड़कियों को जन्मजात नंगी करके दौड़ाऊॅगा।"

"अभी दो लड़कियों को आप भूल रहे हैं डैड।" शिवा ने कमीनी मुस्कान के साथ कहा___"आपकी दोनो लड़कियाॅ और मेरी प्यारी प्यारी मगर मदमस्त बहनें।"
"उनका नंबर भी आएगा बेटे।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली___"मगर इन लोगों के बाद। पहले इन लोगों के साथ तो मज़े कर लें। इन सबको इतना बजाएॅगे कि सब की सब साली पनाह माॅग जाएॅगी। उसके बाद इन सबको रंडियों के बाज़ार में ले जाकर मुफ़्त में बेंच देंगे।"

"ये सही सोचा है डैड।" शिवा ने ठहाका लगाते हुए कहा___"रंडियों के बाज़ार में बेंचने से ये सब जीवन भर लोगों को मज़ा देती रहेंगी। लेकिन डैड मेरी बहनों को मत बेंच देना। वो सिर्फ हमारी रंडियाॅ बन कर रहेंगी जीवन भर। हम दोनो ही उनके सब कुछ रहेंगे।"

"सही कहा बेटे।" अजय सिंह ने कहा__"हम अपनी बेटियों को नहीं बेचेंगे। वो तो हमारी ही रंडियाॅ बन कर रहेंगी अपनी माॅ के साथ। क्या कहती हो डार्लिंग?"

अंतिम वाक्य अजय सिंह ने चुपचाप बैठी प्रतिमा को देख कर कहा था। प्रतिमा जो इतनी देर से बाप बेटे की बातें सुन कर मन ही मन हैरान और चकित हो रही थी वो अचानक ही अजय सिंह के इस प्रकार कहने पर चौंक पड़ी थी। तुरंत उससे कुछ कहते न बन पड़ा था। बल्कि अजीब भाव से वो दोनो बाप बेटों को देखती रह गई थी। ये देख कर अजय सिंह और शिवा दोनो ही ठहाका लगा कर हॅस पड़े थे।

"क्या हुआ प्रतिमा?" अजय सिंह हॅसने के बाद बोला___"किन ख़यालों में गुम हो भई? हमारी बातों पर ध्यान नहीं है क्या तुम्हारा?"
"मैं तुम दोनो की तरह ख़याली पुलाव नहीं बनाती अजय।" प्रतिमा ने खुद को सम्हालते हुए कहा___"मुझे इस सबमें खुशी तब होगी जब ऐसा सचमुच में होता हुआ अपनी ऑखों से देखूॅगी।"

"अरे ज़रूर देखोगी मेरी जान।" अजय सिंह ने हॅसते हुए कहा___"और बहुत जल्द देखोगी। बस कुछ ही देर की बात है। मेरे आदमी उस हराम के पिल्ले को घसीटते हुए लाते ही होंगे। उसके आने के बाद उसके बाॅकी चाहने वालों को भी बहुत जल्द आना पड़ेगा मेरे पास।"

"इसी लिए तो चुपचाप उसके आने के इन्तज़ार में बैठी हूॅ मैं।" प्रतिमा ने कहा___"ज़रा फोन करके पता तो करो कि तुम्हारे आदमी उसे लिये कहाॅ तक पहुॅचे हैं अभी? अपने आदमियों से कहो कि ज़रा जल्दी आएॅ यहाॅ।"

"जो हुकुम डार्लिंग।" अजय सिंह ने शिगार को ऐश ट्रे में मसलते हुए कहा___"मैं अभी भीमा को फोन करता हूॅ और उसे बोलता हूॅ कि भाई जल्दी लेकर आ उस हरामज़ादे को।"


कहने के साथ ही अजय सिंह ने अपने कोट की जेब से मोबाइल निकाला और उस पर भीमा का नंबर डायल कर मोबाइल को कान से लगा लिया। मगर उसे अपने कान में ये वाक्य सुनाई दिया कि___"आपने जिस एयरटेल नंबर पर फोन लगाया है वो इस वक्त उपलब्ध नहीं है या अभी बंद है।"

ये वाक्य सुनते ही अजय सिंह का दिमाग़ घूम गया। उसने काल को कट करके फिर रिडायल कर दिया मगर फिर से उसे कानो में वही वाक्य सुनाई दिया। अजय सिंह कई बार भीमा के नंबर पर फोन लगाया मगर हर बार वही वाक्य सुनने को मिला उसे।

"क्या हुआ डैड?" शिवा जो अजय सिंह की ही तरफ देख रहा था बोल उठा___"क्या भीमा का नंबर नहीं लग रहा?"
"हाॅ बेटे।" अजय सिंह ने सहसा कठोर भाव से कहा___"इन सालों को कभी अकल नहीं आएगी। ऐसे समय में भी साले ने फोन बंद करके रखा हुआ है।"

"तो किसी दूसरे आदमी को फोन लगा कर पता कीजिए डैड।" शिवा ने मानो ज्ञान दिया।
"हाॅ वही कर रहा हूॅ।" अजय सिंह ने नंबरों की लिस्ट में मंगल का नंबर खोज कर उसे डायल करते हुए कहा।

मंगल का नंबर डायल करने के बाद उसने मोबाइल को कान से लगा लिया। मगर इस नंबर पर भी वही वाक्य सुनने को मिला उसे। अब अजय सिंह का भेजा गरम हो गया। फिर जैसे उसने खुद के गुस्से को सम्हाला और अपने किसी अन्य आदमी का नंबर डायल किया। मगर परिणाम वही ढाक के तीन पात वाला। कहने का मतलब ये कि अजय सिंह ने एक एक करके अपने सभी आदमियों का नंबर डायल किया मगर सबक सब नंबर या तो उपलब्ध नहीं थे या फिर बंद थे।

अजय सिंह को इस बात ने हैरान कर दिया और वह सोचने पर मजबूर हो गया कि ऐसा कैसे हो सकता है? ये तो उसे भी पता था कि उसके आदमी इतने लापरवाह हो ही नहीं सकते क्योंकि सब उससे बेहद डरते भी थे। किन्तु इस वक्त सभी के नंबर बंद होने की वजह से उसका माथा ठनका। मन में एक ही विचार आया कि कुछ तो गड़बड़ है। किसी गड़बड़ी के अंदेशे ने अजय सिंह को एकाएक ही चिंता और परेशानी में डाल दिया।

"क्या बात है अजय?" सहसा प्रतिमा उसके चेहरे के बदलते भावों को देखते हुए बोल पड़ी___"ये अचानक तुम्हारे चेहरे पर चिन्ता व परेशानी के भाव कैसे उभर आए?"
"बड़ी हैरत की बात है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा___"मैने एक एक करके अपने सभी आदमियों को फोन लगा कर देख लिया, मगर उनमें से किसी का भी फोन नहीं लग रहा। सबके सब बंद बता रहे हैं। इसका क्या मतलब हो सकता है?"

"ऐसा कैसे हो सकता है डैड?" शिवा ने भी हैरानी से कहा___"एक साथ सबके फोन कैसे बंद हो सकते हैं? कुछ तो बात ज़रूर है। हमें जल्द से जल्द इस सबका पता लगाना चाहिए डैड।"

"शिवा सही कह रहा है अजय।" प्रतिमा ने कहा___"हमारे आदमी इतने लापरवाह नहीं हो सकते कि ऐसे माहौल में वो सब अपना फोन ही बंद कर लें। ज़रूर कोई बात हुई है। वरना अब तक तो उनमें से किसी ने तुम्हें फोन करके ये ज़रूर बताया होता कि उन लोगों ने विराज को अपने कब्जे में ले लिया है और अब वो सीधा यहीं आ रहे हैं। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ अब तक। इसका मतलब साफ है कि कोई गंभीर बात हो गई है।"

"मुझे भी ऐसा ही लगता है।" अजय सिंह ने चिंतित भाव से कहा___"कोई तो बात हुई है। मगर सवाल ये है कि ऐसी क्या बात हो सकती है भला? उन पर किसी प्रकार के संकट के आने का सवाल ही नहीं है क्योंकि वो खुद भी कई सारे एक साथ थे और खुद दूसरों के लिए संकट ही थे।"

"असलियत का पता तो तभी चलेगा अजय जब तुम इस सबका पता करने यहाॅ से जाओगे।" प्रतिमा ने कहा___"यहाॅ पर बातों में समय गवाॅने का कोई मतलब नहीं है।"
"माॅम ठीक कह रही हैं डैड।" शिवा ने कहा__"हमें तुरंत ही इस सबका पता लगाने के लिए यहाॅ से निकलना चाहिए। वरना कहीं ऐसा न हो कि हम जिस सुनहरे मौके की बात कर रहे थे वो हमारे हाॅथ से निकल जाए।"

"यू आर अब्सोल्यूटली राइट।" अजय सिंह ने कहा__"चलो चल कर देखते हैं कि क्या बात हो गई है?"
"तुम दोनो जाओ।" प्रतिमा ने कहा__"मैं यहीं पर तुम दोनो का इंतज़ार करूॅगी।"

प्रतिमा की बात खत्म होते ही दोनो बाप बेटे सोफों से उठ कर बाहर की तरफ चल दिये। बाहर आकर अजय सिंह अपनी कार का ड्राइविंग डोर खोल कर उसमें बैठ गया, जबकि शिवा उसके बगल वाली शीट पर बैठ गया। कार को स्टार्ट कर अजय सिंह ने कार को झटके से आगे बढ़ा दिया। उसकी कार ऑधी तूफान बनी सड़कों पर घूमने लगी थी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

इधर पवन के घर में मैं और आदित्य नहा धो कर फ्रेश हो गए थे और अब हम सब खाना खाने के लिए बैठे हुए थे। पवन ने अपनी माॅ और बहन दोनो की मेरे आने का पहले ही बता दिया था। बस ये नहीं बताया था कि उसने मुझे यहाॅ किस लिए बुलाया था? उनसे यही कहा था कि मैं बस घूमने आया हूॅ।

पवन की माॅ को मैं भी माॅ ही बोलता था शुरू से ही। मेरी नज़र में माॅ से बड़ा और पवित्र रिश्ता कोई नहीं हो सकता था। वो मुझे शुरू से ही बहुत चाहती थी और प्यार व स्नेह देती थीं। पवन की बहन आशा दीदी मुझसे और पवन से उमर में बड़ी थी। उनका स्वभाव पिछले कुछ सालों तक हॅस मुख और चंचल था किन्तु अब वो ज्यादा किसी से बात नहीं करती थी। उनके चेहरे पर हर वक्त गंभीरता विद्यमान रहती थी। इसकी वजह समझना कोई बड़ी बात नहीं थी। हर कोई समझ सकता था कि उनके स्वभाव में ये तब्दीली किस वजह से आई हुई थी।

खाना पीना से फुर्सत होकर हम सब बाहर बैठक में आ गए। मेरे मन में इस वक्त कुछ और ही चल रहा था। इस लिए मैं बैठक से उठ कर अंदर माॅ के पास चला गया। मैने देखा माॅ और आशा दीदी हम लोगों की खाई हुई थालियाॅ ऑगन में एक जगह रख रही थी।

मुझे ऑगन में आया देख माॅ के होठों पर मुस्कान आ गई। आशा दीदी भी मुझे देख कर हल्का सा मुस्कुराई। फिर वो वहीं पर बैठ कर थालियाॅ धोने लगी। जबकि माॅ मेरे पास आ गईं।

"चल आजा मेरे साथ।" माॅ एक तरफ को बढ़ती हुई बोली___"मुझे पता है तुझे मेरी गोंद में सिर रख कर सोना है। कितना समय हो गया मैने भी तुझे वैसा प्यार और स्नेह नहीं दिया। वक्त और हालात ऐसे बदल जाएॅगे ऐसा कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा था। बुरे लोगों का एक दिन ज़रूर नाश होता है बेटा। बस थोड़ा समय लग जाता है। अजय सिंह को उसके बुरे कर्मों की सज़ा ईश्वर ज़रूर देगा।"

माॅ ये सब बड़बड़ाती हुई अंदर कमरे मे आ गईं। मैं भी उनके पीछे पीछे आ गया था। कमरे में रखी चारपाई पर माॅ पालथी मार कर बैठ गईं और फिर मेरी तरफ देख कर मुझे अपने पास आने का इशारा किया। मैं खुशी से उनके पास गया और चारपाई के नीचे ही उकड़ू बैठ कर अपना सिर उनकी गोंद में रख दिया।

"अरे नीचे क्यों बैठ गया बेटे?" माॅ ने मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा___"ऊपर आजा और फिर ठीक से वैसे ही लेट जा जैसे पहले लेट जाया करता था मेरी गोंद में।"
"नहीं माॅ, मैं ऐसे ही ठीक हूॅ।" मैने सिर उठाकर उनकी तरफ देखते हुए बोला__"मुझे आपसे कुछ बात करनी है माॅ।"

"हाॅ तो कह ना।" माॅ ने मेरे चेहरे को एक हाथ से सहलाया___"तुझे कोई भी बात करने के लिए मुझसे पूछने की क्या ज़रूरत है? ख़ैर, बता क्या बात करना है तुझे?"
"सबसे पहले ये बताइये कि मैं आपका बेटा हूॅ कि नहीं?" मैने माॅ के चेहरे की तरफ देखते हुए कहा।

"ये कैसा सवाल है बेटा?" माॅ के चेहरे पर ना समझने वाले भाव उभरे___"तू तो मेरा ही बेटा है। जैसे पवन मेरा बेटा है वैसे ही तू भी मेरा बेटा है।"
"अगर मैं आपका बेटा हूॅ तो मुझे भी आपका बेटा होने का हर फर्ज़ निभाना चाहिए न?" मैने भोलेपन से कहा था।

"ये तो बेटों की सोच और समझदारी पर निर्भर करता है बेटा।" माॅ ने हल्का सा मुस्कुराते हुए कहा___"कि वो अपने माता पिता व परिवार के लिए कैसा विचार रखते हैं? पर हाॅ नियम और संस्कार तो यही कहते हैं कि हर ब्यक्ति को अपना कर्तब्य व फर्ज़ सच्चे दिल से निभाना चाहिए। जैसे माता पिता अपने बच्चों के लिए हर फर्ज़ सच्चे दिल से निभाते हैं।"

"मैं और तो कुछ नहीं जानता माॅ।" मैने कहा___"लेकिन इतना ज़रूर समझता हूॅ कि एक बेटे को हमेशा ऐसा काम करना चाहिए जिससे कि उसके माता पिता को अपने उस बेटे पर गर्व हो। वो अपने बेटे के हर काम से खुश हो जाएॅ। इस लिए माॅ, मैं भी अब वो फर्ज़ निभाना चाहता हूॅ।"

"ये तो बहुत अच्छी बात है बेटा।" माॅ ने खुश होते हुए कहा___"तुम्हें ऐसा करना भी चाहिए। मुझे खुशी है कि तूने इतनी मुश्किलों और परेशानियों में भी अपने अच्छे संस्कारों का हनन नहीं होने दिया। तू अब बड़ा हो गया है, इस लिए तुझे अब अपने कर्तब्यों और फर्ज़ों की तरफ ध्यान देना चाहिए। तेरी माॅ और बहन ने बहुत दुख दर्द झेला है बेटा। मैं चाहती हूॅ कि तू उन्हें हमेशा खुश रखे।"

"वो दोनो अब खुश ही हैं माॅ।" मैने कहा__"लेकिन मैं अब अपनी दूसरी माॅ का बेटा होने का भी फर्ज़ निभाना चाहता हूॅ।"
"क्या मतलब?" माॅ ने मेरी इस बात से हैरान होकर मेरी तरफ देखा___"ये तू क्या कह रहा है बेटा?"

"हाॅ माॅ।" मैने कहा___"आप मेरी दूसरी माॅ ही तो हैं और मैं आपका बेटा हूॅ। इस लिए मैं आपका बेटा होने का फर्ज़ निभाना चाहता हूॅ। आशा दीदी की शादी बड़े धूमधाम से किसी बड़े घर में किसी अच्छे लड़के के साथ करना चाहता हूॅ। आज आशा दीदी के मुरझाए हुए चेहरे को देख कर मुझे कितनी तक़लीफ़ हुई ये मैं ही जानता हूॅ माॅ। कितनी बदल गई हैं वो, हर समय बिंदास और चंचल रहने वाली मेरी आशा दीदी ने आज खुद को गहन उदासी और गंभीरता की चादर में ढॅक कर रख लिया है। मैं उन्हें इस तरह नहीं देख सकता माॅ। वो मेरी सबसे प्यारी बहन हैं। मैं चाहता हूॅ कि उनके चेहरे पर फिर से पहले जैसी चंचलता और खुशियाॅ हों। इस लिए माॅ, मैने फैंसला कर लिया है कि अब मैं वही करूॅगा जो मुझे करना चाहिए।"

"पर बेटा ये सब....।" माॅ ने कुछ कहना चाहा मगर मैने उनकी बात काट कर कहा__"मैं आपकी कोई भी बात नहीं सुनूॅगा माॅ। अगर आप मुझे सच में अपना बेटा मानती हैं तो मुझे मेरा फर्ज़ निभाने से नहीं रोकेंगी।"


मेरी इस बात से माॅ मुझे देखती रह गईं। उनकी ऑखों में ऑसूॅ भर आए थे। मैने उठ कर माॅ को अपने से छुपका लिया और फिर बोला___"आप खुद को दुखी मत कीजिए माॅ। देख लेना, आपका ये बेटा सब कुछ ठीक कर देगा।"

"मुझे खुशी है कि तू मेरा बेटा है।" माॅ ने मुझसे अलग होकर मेरे माथे पर हल्के से चूमते हुए कहा___"लेकिन बेटा तुझे अंदाज़ा नहीं है कि शादी ब्याह में कितना रूपया पैसा खर्च करना पड़ता है। तेरे पास भला इतना रुपया पैसा कहाॅ से आएगा कि तू अपनी दीदी की शादी कर सके?"

"आपके इस बेटे के पास इतना पैसा है माॅ कि वो चाहे तो पूरे हल्दीपुर को खड़े खड़े खरीद ले।" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"जिस मिल्कियत को पाने के लिए मेरे बड़े पापा ने हमारे साथ ये सब किया है न उससे कहीं ज्यादा मेरे पास आज के समय में मिल्कियत है।"

"क्या????" माॅ की ऑखें आश्चर्य से फट पड़ी थी, फिर सहसा अविश्वास भरे भाव से बोली___"पर बेटा तेरे पास इतना पैसा कहाॅ से आ गया?"
"सब कुदरत के करिश्मे हैं माॅ।" मैने सहसा गंभीर होकर कहा___"भगवान अगर किसी को दुख तक़लीफ़ें देता है तो एक दिन उसे उस दुख तक़लीफ़ से मुक्त भी कर देता है। मेरे अपनों ने मेरे साथ क्या किया ये तो आप जानती हैं माॅ मगर किसी ग़ैर ने अपना बन कर मेरे लिए क्या किया ये आप नहीं जानती हैं। वो ग़ैर मेरे लिए फरिश्ता क्या बल्कि भगवान बन कर आया और आज मुझे हर दुख दर्द से मुक्त कर दिया।"

"ये तू क्या कह रहा है बेटा?" माॅ ने गहन आश्चर्य के साथ कहा___"मेरी समझ में तेरी ये बातें नहीं आ रही।"

मैने माॅ को संक्षेप में सारी कहानी बताई। उन्हें बताया कि मुम्बई में मैं जिस मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था उस कंपनी के मालिक जगदीश ओबराय मुझसे प्रभावित होकर मुझे क्या क्या काम दिया और फिर कैसे उनके दिल में मेरे लिए प्यार और स्नेह जागा। कैसे उन्होंने मुझे अपना बेटा बना लिया और फिर कैसे उन्होंने अपनी सारी प्रापर्टी जो करोड़ों अरबों में थी उसे मेरे नाम कर दिया और आज मैं अपनी माॅ और बहन के साथ उनके ही अलीशान बॅगले में रहता हूॅ। मैने माॅ को ये भी बताया कि कुछ दिन पहले अभय चाचा भी मुझे ढूॅढ़ते हुए वहाॅ पहुॅचे थे। पवन के बताने पर मैं उनको रेलवे स्टेशन से अपने बॅगले में ले गया और अब वो भी मेरे साथ ही वहाॅ पर हैं। सारी बातें सुनने के बाद माॅ मुझे इस तरह देखने लगी थी जैसे मेरे सिर पर अचानक ही उन्हें दिल्ली का कुतुब मीनार खड़ा हुआ नज़र आने लगा हो।

"अब आपका ये बेटा करोड़ क्या बल्कि अरबपति है माॅ।" मैने माॅ को उनके कंधों से पकड़ते हुए कहा___"इस लिए आप इस बात की बिलकुल भी चिंता मत कीजिए कि आशा दीदी की शादी मैं कैसे क पाऊॅगा?"
"भगवान का लाख लाख शुकर है बेटा कि उसने तुझ पर इतनी अनमोल कृपा की।" माॅ ने खुशी से छलक आई अपनी ऑखों को पोंछते हुए कहा___"दिन रात मैं यही सोचती रहती थी कि किस हाल में होगा तू वहाॅ पर और किस तरह तू अपनी माॅ बहन को अपने साथ रखा हुआ होगा? मगर तेरी ये बातें सुन कर मेरे मन का बोझ हल्का हो गया है। मेरा बेटा इतना बड़ा आदमी बन गया है इससे ज्यादा खुशी की बात एक माॅ के लिए क्या हो सकती है?"

"सब आपकी दुवाओं और आशीर्वाद का फल है माॅ।" मैने कहा___"माॅ की दुवाओं में बहुत असर होता है। भगवान माॅ की दुवाओं को कभी विफल नहीं होने दे सकता।"

मेरी ये बात सुनकर माॅ ने मुझे अपने गले से लगा लिया। मेरे सिर पर प्यार से हाॅथ फेरती रहीं वो। फिर मैं उनसे अलग हुआ और बोला___"माॅ मैं दीदी से भी मिल लूॅ। उनके चेहरे पर फिर से मुझे पहले वाली खुशियाॅ देखना देखना है।"

"ठीक है जा मिल ले उससे।" माॅ ने कहा__"तेरे समझाने से शायद वो खुश रहने लगे।"
"वो ज़रूर खुश रहेंगी माॅ।" मैने कहा__"मैं उनके चेहरे पर वही खुशी लाऊॅगा। उनका ये भाई उनकी दामन में हर तरह की खुशियाॅ लाकर डाल देगा।"

मेरी बात सुन कर माॅ की ऑखें भर आईं जिन्हें उन्होंने अपनी सफेद सारी के ऑचल से पोंछ लिया। मैं उनके पास से चल कर कमरे से बाहर आया और आशा दीदी के कमरे की तरफ बढ़ गया। दीदी के कमरे का दरवाजा हल्का सा खुला हुआ था। मैने दरवाजे पर लगी साॅकल को पकड़ कर बजाया। किन्तु अंदर से कोई प्रतिक्रिया न हुई। मैने बाहर से ही आवाज़ लगाई उन्हें तब जाकर अंदर से दीदी की आवाज़ आई। वो कह रही थी कि आजा राज दरवाजा तो खुला ही है।

मैं अंदर गया तो देखा दीदी चारपाई के किनारे पर बैठी हुई थी। उनका सिर नीचे झुका हुआ था। मैं उनके पास जाकर उनके बगल से बैठ गया और उनके कंधे पर हाॅथ रखा। दीदी ने सिर उठा कर मेरी तरफ देखा तो मैं चौंक गया। उनका चेहरा ऑसुओं से तर था। उनकी इस हालत को देख कर मेरा दिल तड़प उठा।

"ये क्या दीदी?" मैने कहा___"मेरी इतनी प्यारी दीदी की ऑखों में इतने सारे ऑसू?"
मेरी बात पूरी भी न हुई थी कि आशा दीदी झपट कर मुझसे लिपट गई और फूट फूट कर रोने लगी।

मुझे उनके इस तरह फूट फूट कर रोने से बड़ा दुख हुआ। लेकिन मैने उन्हें रोने दिया। शायद ये उनके अंदर का गुबार था। जिसका बाहर निकल जाना बेहद ज़रूरी था। मैं उनके सिर पर बड़े प्यार व स्नेह भाव से हाॅथ फेरता रहा।

सहसा मुझे उनके साथ बिताए हुए कुछ खुशियों भरे पल याद आ गए। मैं,पवन और आशा दीदी हमेशा ऊधम मचाते थे इस घर में। माॅ हमारी शैतानियाॅ देख कर खुस्सा करती, हलाॅकि हम तीनों जानते थे कि हम तीनों का ये प्यार देख कर माॅ खुद भी अंदर ही अंदर खुश हुआ करती थी। मगर प्रत्यक्ष में माॅ हमेशा दीदी को डाॅटने लगती। कहती कि वो तो हम दोनो से बड़ी है फिर क्यों हमारे साथ बच्ची बन जाती है। माॅ के डाॅटने से दीदी मुह फुला कर बैठ जाती। उसके बाद मैं और पवन उन्हें मनाने लगते। हम दोनो के पास उन्हें मनाने का बड़ा ही साधारण और खूबसूरत सा तरीका होता था। इस वक्त वही तरीका मेरे ज़हन में आया तो बरबस ही मेरे होठों पर मुस्कान उभर आई।

"दुनियाॅ में सबसे सुंदर कौन?" मैने दीदी को अपने से छुपकाए हुए ही प्यार से कहा।
"सिर्फ मैं।" मेरी बात सुनते ही दीदी को पहले तो झटका सा लगा फिर उसी हालत में बोल पड़ी थी।
"दुनियाॅ में सबसे प्यारी कौन?" मैने फिर से कहा।
"सिर्फ मैं।" दीदी ने लरजते स्वर में कहा।
"दुनियाॅ में सबसे चंचल कौन?" मैने पूछा।
"सिर्फ मैं।" दीदी ने भारी स्वर में कहा।
"दुनियाॅ में सबसे नटखट कौन?" मैने पूछा।
"सिर्फ मैं?" दीदी की आवाज़ लड़खड़ा गई।
"और दुनियाॅ में सबसे शैतान कौन?" मैने सहसा मुस्कुरा कर पूछा।
"सिर्फ मैं।" दीदी ने कहा तो मैं चौंक पड़ा। उन्हें खुद से अलग कर उनके चेहरे की तरफ बड़े ध्यान से देखा मैने।

आशा दीदी का दूध सा गोरा चेहरा ऑसुओं से तर था। नज़रें झुकी हुई थी उनकी। मैं हैरान इस बात पर हुआ था कि मेरे पूछने पर कि "दुनियाॅ में सबसे शैतान कौन" का जवाब भी उन्होंने यही दिया कि "सिर्फ मैं"। जबकि अक्सर यही होता था कि इस सवाल पर वो यही कहती कि शैतना तुम दोनो ही हो। मैं तो मासूम हूॅ। लेकिन आज उन्होंने खुद को ही शैतान कह दिया था।

"ये तो कमाल हो गया दीदी।" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"आज आपने खुद को ही कह दिया कि आप ही सबसे शैतान हो। आज आपने ये नहीं कहा कि मैं और पवन ही सबसे ज्यादा शैतान हैं। आप तो मासूम ही हैं।"
"हाॅ तो क्या हुआ?" दीदी ने सहसा तुनक कर कहा___"आज मैं शैतान बन जाती हूॅ। तुम दोनो मासूम बन जाओ।"

मैं उनकी इस बात को सुन कर मुस्कुराया। दीदी ने ये बात बिलकुल वैसे ही अंदाज़ में कही थी जैसा अंदाज़ उनका आज से पहले हुआ करता था। दीदी को भी इस बात का एहसास हुआ और फिर एकाएक ही उनकी रुलाई फूट गई।

"अरे अब क्या हुआ दीदी?" मैने उनको अपने से छुपका कर कहा___"देखो अब रोना नहीं। मुझे बिलकुल पसंद नहीं कि आप मेरी इतनी प्यारी सी दीदी को बात बात पर इस तरह रुला दो। चलो अब जल्दी से रोना बंद करो और अपनी वही मनमोहक मुस्कान और नटखटपना दिखाओ मुझे ताकि मेरे मन को सुकून मिल जाए।"

"अब तू आ गया है न तो अब मैं नहीं रोऊॅगी राज।" आशा दीदी ने कहा___"तुझे पता है मैं तुझे कितना मिस करती थी। हम तीनो का वो बचपन जाने कहाॅ गुम हो गया था? तुम दोनो मेरे खिलौने थे जिनके साथ मैं हॅसती खेलती रहती थी।"

"मैं जानता हूॅ दीदी।" मैने उन्हें खुद से अलग करते हुए कहा___"मगर आप तो जानती हैं कि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। समय के साथ साथ सब कुछ बदल जाता है। ख़ैर, छोंड़िये ये सब और मुझसे वादा कीजिए कि अब से आप हमेशा खुश रहेंगी। अपने चेहरे पर वो उदासी और किसी भी तरह के दुख के भाव नहीं आने देंगी।"

"हम्म।" दीदी ने हाॅ में सिर हिलाया।
"अब बताइये आपको अपने इस भाई से क्या तोहफ़ा चाहिए?" मैने मुस्कुराते हुए पूछा।
"तू आ गया है मेरे पास।" दीदी ने मेरे चेहरे को अपने हाथ से सहला कर कहा___"इससे बड़ा तोहफ़ा मेरे लिए और क्या होगा?"

"पर मैं तो आपके लिए आपकी मनपसंद चीज़ लेकर ही आया हूॅ।" मैने कहा__"अब अगर आपको नहीं चाहिए तो ठीक है मैं उसे किसी और को दे दूॅगा।"
"ख़बरदार अगर किसी और को दिया तो।" दीदी ने ऑखें दिखाते हुए कहा___"ला दे मेरी चीज़ मुझे। वैसे क्या लेकर आया है राज?"

"सोचिये।" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"क्या हो सकती है वो चीज़?"
मेरी ये बात सुनकर आशा दीदी सोच में पड़ गईं। मैने देखा कि इस वक्त उनके चेहरे पर वही चंचलता और वही बिंदासपन आ गया था। उनका चेहरा एकदम से अब खिला खिला लग रहा था।

"सोच लिया मैने।" आशा दीदी एकदम से उछलते हुए बोली___"कि तू मेरे लिए कौन सी चीज़ लेकर आया है?"
"अच्छा तो बताइये।" मैने हॅस कर कहा__"ज़रा मैं भी तो जानूॅ कि आपने क्या सोच लिया है?"

"तू न मेरे लिए।" आशा दीदी ने धीरे धीरे और आराम आराम से कहना शुरू किया__"तू न मेरे लिए......एक प्यारी सी, सुंदर सी सोने की घड़ी लेकर आया है। जिसे मैं अपने इस हाॅथ में पहनूॅगी। अब बता बच्चू, मैंने सही कहा न? हाॅ...बोल बोल।"

मैं दीदी की इस बात पर और उनके इस अंदाज़ पर मुस्कुरा उठा। उन्होने जो कहा वो यकीनन सच ही तो था। मैं उनके लिए एक सोने की घड़ी लेकर ही आया था। मुझे याद है जब वो मेरे हाथ की कलाई में एक आम सी घड़ी देखती तो यही कहती कि__"अरे ये तो मामूली सी घड़ी है बेटा, आशा रानी तो अपने हाॅथ में सोने की घड़ी पहनेगी एक दिन। देख लेना। वरना सारी उमर घड़ी ही नहीं पहनेगी। मैं और पवन उनकी इस बात पर अक्सर हॅसने लगते। हमारे हॅसने पर उन्हें लगता कि हम दोनो उनका मज़ाक उड़ा रहे हैं। इस लिए वो मुह फुला कर एक तरफ बैठ जाती। उसके बाद हम दोनो फिर से उन्हें उसी तरीके से मनाने लगते और वो खुश हो जाती। ऐसी थी आशा दीदी। वो हम लोगों से उमर में तीन चार साल बड़ी थी मगर हमारे साथ वो हमसे भी छोटी बन जाती थी।

ये सब सोच कर सहसा मेरी ऑखों से ऑसू छलक पड़े। आशा दीदी ने मेरी ऑखों से छलके ऑसूॅ को देखा तो। उन्होंने मुझे खुद से छुपका लिया।
"ओये ये क्या है अब?" फिर उन्होंने कहा__"अभी तक तो बड़ा मुजसे कह रहा था कि अब से मैं खुद को न रुलाऊॅ और अब तू क्यों रोने लगा? चल रोना नहीं वरना मैं भी रो दूॅगी।"

"ये तो खुशी के ऑसू हैं दीदी।" मैं उनसे अलग होते हुए बोला___"कुछ यादें ऐसी होती हैं जिनके याद आने से बरबस ही ऑखें छलक पड़ती हैं। ख़ैर, ये लीजिए आपकी घड़ी। देख लीजिए सोने की ही है न?"

"मुझे पता है कि मेरा भाई मेरी कलाई में सोने के अलावा कोई और घड़ी नहीं पहनाएगा।" दीदी ने कहा मुस्कुराकर कहा___"उसे पता है कि मैने क्या प्रण किया था?"
"आपने सही कहा दीदी।" मैने कहा__"मैं आपके प्रण को कैसे भुला सकता हूॅ? जब मैं वहाॅ से चलने वाला था तो मुझे आपकी याद आई और फिर सबकुछ याद आया। इस लिए मैं गया और ज्वैलरी की दुकान से आपके लिए ये घड़ी खरीद लाया।"

मेरी बात से दीदी मुस्कुरा दी और फिर उस पैकिट को खोलने लगी जिसमें मैं उनके लिए घड़ी लेकर आया था। कुछ ही देर में पैकेट खोल कर उन्होने उस घड़ी को निकाल कर देखा। वो सचमुच सोने की ही घड़ी थी। घड़ी देख कर दीदी की ऑखें फिर से भर आईं।

"राज, आज मैं बहुत खुश हूॅ।" फिर उन्होने कहा___"इस लिए नहीं कि तू घड़ी लेकर आया है बल्कि इस लिए कि तू यहाॅ आया और तुझे अपनी दीदी के प्रण का ख़याल था। मुझे खुशी है कि तेरे जैसा लड़का मेरा भाई है।"

"मुझे भी तो खुशी है दीदी।" मैने कहा__"कि आप मेरी सबसे प्यारी बहन हो। आपको मैं गुड़िया(निधी) की तरह ही प्यार करता हूॅ।"
"हाॅ ये मैं जानती हूॅ।" दीदी ने मुस्कुरा कर कहा___"अच्छा राज, इस घड़ी को तू ही पहना दे न मुझे।"
"ठीक है दीदी।" मैने कहा___"जैसी आपकी इच्छा।"

मैने उनके हाॅथ से घड़ी ल। दीदी ने अपने बाएॅ हाथ की कलाई मेरी तरफ बढ़ा दी। मैने उनकी खूबसूरत कलाई पर उस घड़ी को डाल कर पहना दी। ये देख कर आशा दीदी खुश हो गई और एकदम से मुझसे लिपट गई।

"कितनी अच्छी लग रही है न राज?" वो खुशी से मानो चहकती हुई बोली___"अच्छा ये बता कि इसके अंदर पानी तो नहीं जाएगा न?"
"नहीं जाएगा दीदी।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"ये फुल वाटरप्रूफ है।"
"फिर ठीक है।" दीदी ने मुझसे अलग होकर कहा___"अब न मैं इसे कभी भी अपनी कलाई से नहीं उतारूॅगी।"

"ठीक है दीदी।" मैने कहा___"जैसी आपकी मर्ज़ी। अच्छा दीदी अब मैं चलता हूॅ और हाॅ याद है न....अब से आप खुद को उदास या दुखी नहीं रखेंगी।"
"हाॅ हाॅ याद है बाबा।" दीदी ने हॅस कर कहा___"और अब तो मेरे भाई ने मेरी पसंद की चीज़ भी दे दी। फिर किस लिए खुद को उदास या दुखी रखना?"

"ये हुई न बात।" मैने दीदी के माथे पर हल्के से चूमा और फिर पलट कर वापस दरवाजे की तरफ चल दिया। अभी मैं दो ही क़दम दरवाजे की तरफ बढ़ा था कि मेरी नज़र दरवाजे पर खड़े पवन और माॅ पर पड़ी। मैं उन्हें देख कर पहले तो चौंका फिर हौले से मुस्कुरा दिया। दरवाजे बाहर आकर मैने दरवाजे के दोनो पाटों को आपस में सटा कर चल दिया।

मेरे पीछे पीछे पवन और माॅ भी आने लगे। माॅ के कमरे में आकर मैं एक जगह बैठ गया।
"तो बहन को खुश कर दिया उसके भाई ने?" माॅ ने ऑखों से अपने ऑसू पोंछते हुए कहा___"आज काफी समय बाद उसे इतना खुश और चहकते हुए देखा है मैने।"

"अब से वो हमेशा खुश ही रहेंगी माॅ।" मैने कहा___"और हाॅ बहुत जल्द मैं उनके लिए एक अच्छा सा रिश्ता तलाश करूॅगा। उनकी शादी एक ऐसे घर में और एक ऐसे लड़के से करूॅगा जो उन्हें दुनियाॅ की हर खुशी देगा।"
"अब मुझे उसकी शादी की चिंता नहीं है बेटे।" माॅ ने कहा___"उसका भाई आ गया है तो अब सब वहीं सम्हालेगा।"

मैने पवन की तरफ देखा वो अपनी ऑखों में ऑसू लिये एक तरफ खड़ा था। मैं उसके पास जाकर उससे बोला___"तूने मुझे बुला कर बहुत अच्छा किया है भाई। मगर आज जो कुछ भी रास्ते में हुआ है उस सबसे बहुत जल्द एक नई मुसीबत सामने आने वाली है। बड़े पापा को पता लगाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा कि वो सब किसने किया उनके आदमियों के साथ? वो ये भी पता कर लेंगे कि मैं यहाॅ किसके यहाॅ रुका हुआ हूॅ। इस लिए अब तुम ये भी समझ लो कि इस घर में रहते हुए तुममें से कोई भी सुरक्षित नहीं है।"

"ये तुम क्या कह रहे हो बेटा?" माॅ ने चकित भाव से कहा___"क्या हुआ है आज रास्ते में?"
मैने माॅ को संक्षेप में सबकुछ बता दिया। मेरी बात सुन कर माॅ सकते में आ गई। उनके चेहरे पर एकदम से डर व भय के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे।

"ये तो बहुत बड़ा अनर्थ हो गया है बेटा।" माॅ ने सहमे हुए लहजे में कहा___"तुमने अजय सिंह के आदमियों को मार कर अच्छा नहीं किया। अजय सिंह इस सबका बदला ज़रूर लेगा।"
"ये तो होना ही था माॅ।" मैने कहा___"आप खुद सोचिए कि अगर मैं और आदित्य ये सब नहीं करते तो उनके आदमी हमें अपने साथ ले जाकर बड़े पापा के हवाले कर देते। उस सूरत में बड़े पापा हमारे साथ क्या करते इसका अंदाज़ा आप नहीं लगा सकती माॅ। वो मुझे बंधक बना कर मुझसे ज़बरदस्ती मेरी माॅ बहन और अभय चाचा को मुम्बई से यहाॅ बुलवा लेते। उसके बाद क्या होता ये आप सोच कर देखिये।"

"राज सही कह रहा है माॅ।" पवन ने कहा__"रास्ते में इसके बड़े पापा के आदमी इसे पकड़ने के लिए ही आए थे और अगर वो लोग इसे पकड़ कर ले जाते तो सचमुच बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता। इस लिए अजय चाचा के आदमियों को मारने के सिवा दूसरा कोई रास्ता ही नहीं था इसके पास।"

"पर इसने अजय सिंह के उतने सारे आदमियों को कैसे खत्म कर दिया?" माॅ के चेहरे पर हैरत के भाव थे।
"आपको नहीं पता माॅ।" पवन कह रहा था___"इसने और आदित्य ने पाॅच मिनट में उन सबका काम तमाम कर दिया था। मैने वो सब अपनी ऑखों से देखा था। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि ये वही राज है जो इतना शान्त और भोला भाला हुआ करता था।"

"ये सब छोड़ो।" मैने कहा___"मैं ये कह रहा हूॅ कि बड़े पापा को इस बात का पता बहुत जल्द चल जाएगा कि मैं यहाॅ पवन के घर में रुका हुआ हूॅ। इस लिए वो आप सबको भी अपना दुश्मन समझ लेंगे और आप लोगों के साथ कुछ भी बुरा कर सकते हैं। अतः अब आप लोगों का यहाॅ रहना किसी भी तरह से ठीक नहीं है।"

"बात तो तुम्हारी ठीक ही है भाई।" पवन ने कहा___"लेकिन हम तेरे बड़े पापा के डर से अपना ये घर छोंड़ कर भला कहाॅ जाएॅगे?"
"मुम्बई।" मैने कहा___"हाॅ पवन। अब आप लोगों का यहाॅ रहना खतरे से खाली नहीं है। इस लिए अब आप लोग मेरे साथ मुम्बई चलोगे। तुम्हें पता है, अभय चाचा ने भी मुझे कुरुणा चाची और उनके बच्चों को मुम्बई ले आने को कहा है। क्योंकि उन्हें भी पता है कि करुणा चाची और दिव्या व शगुन सुरक्षित नहीं हैं।"

"लेकिन बेटा।" माॅ ने झिझकते हुए कहा___"हम सब वहाॅ तेरे लिए बोझ बन जाएॅगे। इतने सारे लोग वहाॅ कैसे रह पाएॅगे?"
"ये कह कर आपने मुझे पराया कर दिया माॅ।" मैने दुखी भाव से कहा___"भला आप ऐसा कैसे सोच सकती हैं कि मेरे लिए आप लोग बोझ बन जाएॅगे?"

माॅ को अपनी ग़लती का एहसास हुआ इस लिए उन्होंने मुझे अपने गले से लगा कर कहा___"मेरा वो मतलब नहीं था बेटा। मैं तो बस ये कहना चाहती थी कि वहाॅ पर हम सब इतने सारे लोग कैसे रहेंगे?"
"आप इस बात की फिक्र मत कीजिए माॅ।" मैने कहा___"मुम्बई में जहाॅ मैं रहता हूॅ वो एक बहुत बड़ा बॅगला है। वहाॅ पर सौ आदमी भी रहेंगे न तब भी जगह बच जाएगी।"

"क्या????" माॅ ने हैरानी से कहा___"क्या इतना बड़ा गर है वहाॅ?"
"हाॅ माॅ।" मैने कहा__"इसी लिए तो कह रहा हूॅ कि आप रहने की चिंता मत कीजिए। बस यहाॅ से फौरन चलने की तैयारी कीजिए। आप सब अपना ज़रूरी सामान ले लीजिए, और चलने के लिए तैयार हो जाइये जल्दी।"

"क्या हम आज ही यहाॅ से चल देंगे?" सहसा पवन ने कुछ सोचते हुए कहा था।
"जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी हमें से निकल लेना चाहिए भाई।" मैने कहा__"यहाॅ ज्यादा समय तक रुकना ठीक नहीं है।"

"ठीक है भाई।" पवन ने कहा___"पर हम यहाॅ से इतने सारे सामान को लेकर जाएॅगे कैसे?"
"तू किसी भी तरह से किसी ऐसे वाहन का इंतजाम कर जिसमे सारा सामान भी आ जाए और हम सब उसमें आराम से बैठ भी जाएॅ।" मैने कहा___"और ये काम तुझे बहुत जल्द करना है।"

"ठीक है भाई।" पवन ने कहा___"मैं कोशिश करता हूॅ ऐसे किसी वाहन को लाने की।"
ये कह कर पवन कमरे से बाहर चला गया। उसके जाने के बाद मैने माॅ से कहा कि वो भी अपना सब ज़रूरी सामान इकट्ठा करके उसे पैक कर लें। मेरे कहने पर माॅ ने हाॅ में सिर हिलाया और कमरे से बाहर चली गईं। मैं भी बाहर आकर बैठक की तरफ बढ़ गया।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

उधर हास्पिटल में एकाएक ही रितू का मोबाइल बजा। उसने मोबाइल को पाकेट से निकाल कर देखा। स्क्रीन पर पवन लिखा आ रहा था। ये देख कर रितू के होठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई। वो मोबाइल को लिए विधी के पास से उठ कर बाहर की तरफ आ गई। फिर मोबाइल पर आ रही काल को रिसीव कर कानो से लगा लिया उसने।

"हाॅ भाई बोलो।" फिर उसने कहा__"सब रेडी है न?"
".............।" उधर से पवन ने कुछ कहा।
"ये तुम क्या कह रहे हो पवन?" रितू ने बुरी तरह चौंकते हुए कहा___"तुम सब लोग राज के साथ मुम्बई जाने वाले हो?"

"............।" उधर से पवन फिर कुछ कहा।
"हाॅ मुझे पता चल गया उस बारे में।" रितू ने कहा___"मेरे आदमियों ने फोन पर बताया है सब कुछ। ये भी बताया कि उन लोगों ने डैड के आदमियों को ठिकाने लगा दिया है। राज और उसके दोस्त ने सबको खत्म कर दिया था। अगर उन दोनो के बस का न होता तो मेरे वो पुलिस के आदमी उन सबको गोलियों से भून कर रख देते। मेरा उनके लिए यही आदेश था। ख़ैर, सबसे अच्छी बात यही हुई कि तुम लोग सकुशल घर गए। लेकिन खतरा अभी टला नहीं है पवन। डैड अपने आदमियों की खोज ख़बर लेने ज़रूर इधर उधर जाएॅगे। राज ने सही फैसला लिया है तुम लोगों को अपने साथ ले जाने का। मगर उसका क्या होगा जिसके लिए मैने राज की तुम्हारे द्वारा बुलवाया था?"

"............।" उधर से पवन ने कुछ कहा।
"अरे मैं तो चाहती ही हूॅ भाई।" रितू ने ज़ोर दे कर कहा___"तुम एक काम करो, राज की लेकर यहाॅ आ जाओ। मैं तुम लोगों को यहाॅ से सुरक्षित जाने का बंदोबस्त कर दूॅगी।"
"............।" उधर से पवन ने फिर कुछ कहा।
"हाॅ ठीक है।" रितू ने कहा___"तुम उसे लेकर आओ। मैं अभी किसी वाहन का इंतजाम करती हूॅ। तुम किसी भी प्रकार की चिंता मत करो। बस उसे लेकर आ जाओ। यहाॅ मैने उसकी सुरक्षा का सारा इंतजाम किया हुआ है। रास्तों पर भी पुलिस के आदमी सादे कपड़ों में मौजूद हैं।"

".........।" उधर से पवन ने कुछ कहा।
"तुम बेफिकर रहो भाई।" रितू ने कहा___"उसे कुछ नहीं होने दूॅगी मैं। अपनी जान पर खेलकर भी मैं उसकी हिफाज़त करूॅगी। यहाॅ आने के बाद जो कुछ भी होगा उसकी देखभाल भी मैं कर लूॅगी। तुम बस उसे लेकर आ जाओ। अब इंतज़ार नहीं होता मेरे भाई। जबसे तुमने बताया है कि राज आ गया है तब से उससे मिलने के पागल हुई जा रही हूॅ मैं। दिल तो करता है कि अभी भाग कर तुम्हारे घर आ जाऊॅ और अपने भाई को अपने सीने से लगा कर खूब रोऊॅ। मगर, उससे मिलने का सबसे पहला हक़ विधी का है मेरे भाई। मैने उसे वचन दिया है कि मैं उसके महबूब से उसे मिलाऊॅगी। इस लिए भाई, जल्दी से उसे लेकर आजा। मेरे वचन की लाज रख ले। विधी को उसके महबूब से मिला दे जल्दी।"

".........।" उधर से पवन ने कुच कहा।
"ठीक है भाई जल्दी आना।" रितू ने कहा और फिर फोन कट कर दिया। उसकी ऑखों में ऑसू भर आए थे। फोन को पाॅकेट में डालने के बाद वह वापस गैलरी की तरफ चल पड़ी। रास्ते मे एक तरफ उसे श्री कृष्ण का छोटा सा मंदिर दिखा तो वह उसी तरफ बढ़ गई। मंदिर के पास पहुॅच कर वह घुटनों के बल बैठ गई।

"हे कृष्णा अब सब कुछ आपके ही हवाले है।" रितू ने ऑखों में ऑसू लिए तथा दोनो हाॅथ जोड़े कहा___"सब कुछ ठीक कर देना कान्हा। मेरा भाई जब विधी से मिले तो उसकी हालत को देख कर वो खुद को सम्हाल सके। उसके दिल को मजबूत बनाए रखना कन्हैया। वो अपनी प्रेयसी से मिलने आ रहा है। उसे हर दुख दर्द सहने की शक्ति देना कृष्णा। मेरा भाई भी इस वक्त कृष्ण ही है जो अपनी राधा से मिलने आ रहा है।"

इतना कहने के बाद रितू उठी और कृष्ण की मूर्ती के पास थाली में रखे फूलों से कुछ फूल उठा कर कृष्ण के चरणों में अर्पण कर दिया।

"सब कुछ तुम ही तो करते हो कन्हैया। इस संसार में सब कुछ तुम्हारे ही इशारे से हो रहा है।" रितू ने कहा___"ये भी कि मेरा भाई जिसे टूट कर प्रेम करता है उस लड़की को ब्लड कैंसर के लास्ट स्टेज पर पहुॅचा दिया आपने। ये कैसी लीला है कृष्णा? लोग कहते हैं कि जो कुछ भी तुम करते हो वो सब अच्छे के लिए ही करते हो, तो बताओ मुझे कि ऐसा करके कौन सा अच्छा कर रहे हो तुम? लेकिन ख़ैर कोई बात नहीं। मैं तुमसे यहाॅ इस सबकी शिकायत नहीं कर रही हूॅ। हाॅ इतनी विनती ज़रूर कर रही हूॅ कि मेरे भाई को कभी कुछ न हो। वो यहाॅ आए तो विधी की हालत देख कर वो खुद को सम्हाल सके। बस यही प्रार्थना करती हूॅ तुमसे।"

इतना कहने के बाद रितू अपने ऑसू पोंछते हुए कृष्णा को प्रणाम कर विधी के कमरे की तरफ बढ़ गई। उसका मन बहुत भारी हो गया था। रह रह कर उसके मन में आने वाले वक्त के प्रति घबराहट सी बढ़ती जा रही थी।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

उधर घर में पवन मुझे लिए बाहर आया। मैने देखा कि बाहर एक मोटर साइकिल खड़ी थी। पवन ने मुझसे कहा कि मैं अपने चेहरे को रुमाल से ढॅक लूॅ। मैं उसकी बात सुन कर चौंका। उससे पूछा कि कहाॅ जा रहे हैं हम मगर उसने मुझे कुछ न बताया। बल्कि मोटर साइकिल में बैठ कर से स्टार्ट किया और मुझे पीछे बैठने को कहा। मैं उसकी इस आनन फानन वाली क्रिया से हैरान था। बड़ा अजीब सा ब्यौहार कर रहा था वो।

ख़ैर, उसके बार बार ज़ोर देने पर मैं उसके पीछे मोटर साइकिल पर बैठ गया। आदित्य दरवाजे पर खड़ा हैरानी से ये सब देख रहा था। उसने भी कई बार पवन से पूछा कि वो मुझे लेकर कहाॅ जा रहा है मगर पवन ने कुछ न बताया। बल्कि उससे यही कहा कि वो यहीं रहे, हम थोड़ी देर में आते हैं। आदित्य बेचारा हैरानी से देखता रह गया था उसे। माॅ और आशा दीदी अंदर सामान पैक करने में लगी हुईं थी। उन्हें इस सबका कुछ पता ही नहीं था। आशा दीदी को जब पता चला कि वो सब लोग मेरे साथ मुम्बई चल रहे हैं तो वो बड़ा खुश हुई थी।

इधर मेरे बैठते ही पवन ने मोटर साइकिल को आगे बढ़ा दिया। जहाॅ तक मुझे पता था पवन के पास कोई साइकिल तक नहीं थी, इसका मतलब वो ये मोटर साइकिल किसी जान पहचान वाले से माॅग कर ही लाया था।

"अब तो बता दे मेरे बाप कि हम कहाॅ जा रहे हैं?" रास्ते में मैने ये बात पवन से खीझते हुए कही थी, बोला___"साले तूने इस सवाल पर ऐसे अपना मुह बंद कर रखा है जैसे अगर तू बता देगा तो क़यामत आ जाएगी।"

"ऐसा ही समझ ले तू।" पवन ने कहा__"अब चुपचाप बैठा रह। कितना बोलने लगा है तू आजकल?"
"क्या कहा तूने?" मैने हैरत से देखते हुए उसे पीछे से उसकी पीठ पर हल्के से मुक्का मारा, फिर बोला___"मैं बहुत बोलने लगा हूॅ। हाॅ, और तू जैसे मौनी बाबा ही बन गया है न।"

पवन मेरी इस बात पर मुस्कुरा कर रह गया। मगर सिर्फ एक पल के लिए। अगले ही पल उसके चेहरे पर संजीदगी के भाव नुमायाॅ हो गए। जैसे उसे कोई बात याद आ गई हो। मैने एक बात नोट की थी कि वो जब से मुझे मिला था तब से मैने उसे संजीदा ही देखा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इसकी क्या वजह थी। मुझे याद आया कि उसने मुझे सीघ्र मुम्बई से आने के लिए कहा था। इसका मतलब ये मुझे उसी काम से लिए जा रहा है। लेकिन आख़िर किस काम से? साला दिमाग़ का दही हो गया मगर मुझे कोई वजह समझ में नहीं आई।

लगभग दस मिनट बाद पवन ने जिस जगह पर मोटर साइकिल रोंकी उस जगह को देख कर मैं चौंका तो ज़रूर मगर मुझे समझ में न आया कि पवन मुझे हास्पिटल लेकर क्यों आया है? सहसा मेरे ज़हन में एक बार फिर करुणा चाची और उनके बच्चों का चेहरा नाच गया। मन में सवाल उभरा कि क्या करुणा चाची या उनके बच्चों में से किसी को कुछ हो गया था जो वो यहाॅ हास्पिटल में शायद एडमिट हैं? मगर इस बात को मुझसे छिपाने की भला क्या ज़रूरत थी?

मोटर साइकिल के खड़े होते ही मैं उतर गया। मेरे बाद पवन भी उतर गया और मोटर साइकिल को स्टैण्ड पर खड़ा कर वो मेरी तरफ देखा और बोला____"तू यहीं रुक मैं आता हूॅ दो मिनट में।"

"अरे अब कहाॅ जा रहा है तू मुझे यहाॅ पर अकेला छोंड़ कर?" मैंने हैरानी से पूछा।
"मैने कहा न यहीं रुक।" पवन ने शख्ती से कहा___"मैं आता हूॅ अभी।"

ये तो हद ही हो गई। पवन ने मुझे शख्ती से रुकने को कहा था। मेरा दिमाग़ घूम गया। ये साला हो क्या रहा है? मैने देखा कि पवन हास्पिटल की सीढ़ियाॅ चढ़ कर ऊपर वाली सीढ़ी के पास जाकर रुक गया। उसके बाद उसने अपने पैन्ट की जेब से मोबाइल निकाल कर उससे किसी को फोन किया। मोबाइल को कान से लगा कर उसने सामने वाले से जाने क्या बात की। एक मिनट भी नहीं लगे उसे बात खत्म करने में। मोबाइल को पुनः जेब के हवाले कर उसने मेरी तरफ देखा और मुझे अपनी तरफ आने का हाथ से इशारा किया।

उसके इस इशारे पर मैं फिर चौंका। मगर कर भी क्या सकता था? मैं अपने मन में हज़ारों तरह के विचार लिए उसकी तरफ बढ़ने लगा। कुछ ही देर में सीढ़ियाॅ चढ़ कर उसके पास पहुॅच गया।

"साला इतना ज्यादा सस्पेन्स तो किसी जासूसी उपन्यास में भी मैने नहीं देखा जितना तू क्रियेट कर रखा है।" ऊपर उसके पास पहुॅचते ही मैने कहा उससे___"मेरे दिमाग़ का कचूमर निकाल दिया तूने कसम से। अच्छा है तू किसी जासूसी उपन्यास का राइटर नहीं बन गया। वरना पाठकों के दिमाग़ की नसें ही फट जाती।"

"ज्यादा बकवास न कर।" मेरी बात पर पवन ने भावहीन स्वर में कहा___"और अब चल मेरे साथ।"
"जो हुकुम माई बाप।" मैने अदब से सिर को झुकाते हुए कहा और चल दिया उसके पीछे।

पवन के पीछे चलते हुए मैं हास्पिटल के अंदर की तरफ आ गया। मेरा मन अंजानी आशंका के चलते ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था। पता नहीं क्यों पर मैं मन ही मन भगवान से दुवा कर रहा था कि यहा हर कोई ठीक ही हो। ख़ैर, पवन के साथ चलते हुए मैने देखा कि पवन एक कमरे के सामने आकर रुक गया।

कमरे के दरवाजे के पास रुक कर पवन ने कुछ पल कुछ सोचा फिर मेरी तरफ पलट कर कहा___"तू जानना चाहता था न कि मैने तुझे इतना जल्दी यहाॅ आने के लिए क्यों कहा था?"
"वो तो मैं तुझसे कब से पूछ रहा हूॅ?" मैने उससे कहा___"मगर तू बता ही नहीं रहा था।"

"बताने की ज़रूरत नहीं है मेरे यार।" सहसा पवन की आवाज़ भर्रा गई, बोला___"तू इस कमरे में जा और सब कुछ अपनी ऑखों से देख सुन ले। लेकिन उससे पहले तू मुझसे वादा कर कि अंदर सब कुछ देखने सुनने के बाद तू खुद को सम्हाल कर रखेगा।"

"इस बात का क्या मतलब हुआ?" मैंने सहसा चौंकते हुए कहा___"ऐसा क्या है अंदर कि मुझे उसे देख कर खुद को सम्हालना पड़ेगा?"
"अब जा तू।" पवन ने कहने के साथ ही मुह फेर लिया मुझसे, दो चार क़दम चलने के बाद मेरी तरफ पलट कर बोला___"मैं बाहर ही तेरा इन्तज़ार करूॅगा।"

बस इसके बाद वो एक पल के लिए भी नहीं रुका। बल्कि तेज़ तेज़ क़दम बढ़ाते हुए बाहर की तरफ चला गया। मुझे कुछ समझ न आया कि ये सब क्या चल रहा है यहाॅ? पवन जब मेरी नज़रों से ओझल हो गया तो मैं उस कमरे के दरवाजे की तरफ पलटा जिस कमरे के अंदर जाने के लिए पवन ने मुझसे कहा था।

कुछ पल तक मैं उस दरवाजे को घूरता रहा। मेरा दिल अनायास ही बड़ी तेज़ी से धड़कने लगा था। मन में तरह तरह के ख़याल उछल कूद मचाने लगे थे। मैने अपने हाॅथों को दरवाजे की तरफ बढ़ाया। मैने देखा मेरे वो हाॅथ काॅप रहे थे। पता नहीं मगर, इन कुछ ही पलों में मेरी अजीब सी हालत हो गई थी। ख़ैर, मैने दरवाजे पर हाॅथ रख कर उसे अंदर की तरफ आहिस्ता से धकेला तो दरवाजा बेआवाज़ खुलता चला गया।

खुल चुके दरवाजे अंदर की तरफ मेरी नज़र पड़ी तो सामने दीवार के पास एक टेबल रखा दिखा मुझे जिस पर कुछ दवाइयाॅ और कुछ पेपर जैसे रखे हुए थे। बाॅकी कुछ न दिखा मुझे। मेरे मन में सवाल उभरा कि इस कमरे में ऐसा क्या है जिसे देखने के लिए कदाचित पवन ने मुझे अंदर जाने को कहा था?

अपने मन में उठे सवाल की खोज के लिए मैंने दरवाजे के अंदर की तरफ अपने क़दम बढ़ाए। दो ही क़दमों में मैं कमरे के अंदर दाखिल हो गया। अंदर आकर मैने इधर उधर देखा तो दाहिनी तरफ एक बेड दिखा जिस पर कोई पड़ा हुआ था। बेड के बगल से ही दो सोफा सेट रखे हुए थे किन्तु उन पर कोई बैठा हुआ नज़र न आया मुझे। बाॅकी पूरा कमरा खाली था। ये देख कर मेरा दिमाग़ हैंग सा हो गया। कुछ समझ न आया कि यहाॅ मुझे क्या दिखाने के लिए पवन ने भेजा है?

बेड पर पड़े हुए ब्यक्ति पर मेरी नज़र पुनः पड़ी। उसका चेहरा दूसरी तरफ था इस लिए मैं जान न सका बेड पर कौन पड़ा हुआ है? किन्तु इतना ज़रूर अब समझ आ गया था कि शायद बेड पर पड़े हुए इंसान को देखने के लिए ही मुझे पवन ने यहाॅ भेजा है। अतः मैं धड़कते हुए दिल के साथ बेड की तरफ बढ़ा।

कुछ ही क़दमों में मैं बेड के समीप पहुॅच गया। किन्तु बेड पर पड़े हुए ब्यक्ति का चेहरा दूसरी तरफ था इस लिए मैं इस तरफ से चलते हुए उस तरफ उस ब्यक्ति के चेहरे की तरफ बढ़ गया। मैने महसूस किया कि कमरे हीं नहीं बल्कि पूरे हास्पिटल में सन्नाटा छाया हुआ था। ऐसा सन्नाटा कि अगर कहीं सुई भी गिरे तो उसके गिरने की आवाज़ किसी बम के धमाके से कम न सुनाई दे।

बेड पर पड़े ब्यक्ति के चेहरे की तरफ आकर मेरी नज़र जिस चेहरे पर पड़ी उसे देख कर मैं बुरी तरह उछल पड़ा। हैरत और आश्चर्य से मेरी ऑखें फट पड़ीं। किन्तु फिर जैसे एकदम से मुझे होश आया और मेरी ऑखों के सामने मेरा गुज़रा हुआ वो कल घूमने लगा जिसमें मैं था एक विधी नाम की लड़की थी और उस लड़की के साथ शामिल मेरा प्यार था। फिर एकाएक ही तस्वीर बदली और उस तस्वीर में उसी विधी नाम की लड़की का धोखा था, उसकी बेवफाई थी। उसी तस्वीर में मेरा वो रोना था वो चीखना चिल्लाना था और नफ़रत मेरी थी। ये सब चीज़ें मेरी ऑखों के सामने कई बार तेज़ी से घूमती चली गई।

मेरे चेहरे के भाव बड़ी तेज़ी से बदले। दुख दर्द और नफ़रत के भाव एक साथ आकर ठहर गए। ऑखों में ऑसूॅ भर आए मगर मैने उन्हें शख्ती से ऑखों में ही जज़्ब कर लिया। दिल में एक तेज़ गुबार सा उठा और उस गुबार के साथ ही मेरी ऑखों में चिंगारियाॅ सी जलने बुझने लगीं।

मेरे दिल की धड़कने और मेरी साॅसें तेज़ तेज़ चलने लगी थी। मेरे मुख से कोई अल्फाज़ नहीं निकल रहे थे। किन्तु ये सच है कि कुछ कहने के लिए मेरे होंठ फड़फड़ा रहे थे। मुझे ऐसा लग रहा था कि या तो मैं खुद को कुछ कर लूॅ या फिर बेड पर ऑखें बंद किये आराम से पड़ी इस लड़की को खत्म कर दूॅ। किन्तु जाने कैसे मैं कुछ कर नहीं पा रहा था।

अभी मैं अपनी इस हालत से जूझ ही रहा था कि सहसा बेड पर आराम से करवॅट लिए पड़ी उस बला ने अपनी ऑखें खोली जिस बला को मैने टूट टूट कर चाहा था।


दोस्तो, अपडेट हाज़िर है,,,,,,,,,

आज के लिए इतना ही। मैं जानता हूॅ कि आप इस आख़िरी सीन से आगे भी पढ़ना चाहेंगे और इस चैप्टर को खत्म हो जाने की आशा करते हैं। किन्तु दोस्तो, यकीन मानिए आज मैने इस अपडेट को तैयार करने में सारा दिन लगा दिया। बीच बीच में मुझे काम की वजह से रुकना भी पड़ा। लेकिन चूॅकि मैने आपसे कहा था कि आज अपडेट ज़रूर दूॅगा इस लिए इतना ही लिख कर आपके सामने हाज़िर कर देना चाहता हूॅ।

अपने अंदर की एक बात आपसे शेयर कर रहा हूॅ, वो ये कि ऐसे सीन लिखने में दिलो दिमाग़ की हालत ख़राब हो जाती है। आज तो इतने में ही हालत ख़राब हो गई मेरी। अभी इसके आगे का आप खुद अंदाज़ा लगाइये कि क्या होगा????

हर बात को और हर चीज़ को बारीकी से लिखना मुझे अच्छा लगता है। अपडेट लिखने से पहले मुझे ये ज़रूर लगा करता है कि यार अब इससे आगे कैसे लिखूॅ?? लेकिन जब लिखना शुरू करता हूॅ तो हर चीज़ खुद ही आसान होती चली जाती है। कदाचित इसका कारण ये हो सकता है कि राइटर उस माहौल में डूब जाता है। उसे लगने लगता है कि ये सब उसके साथ ही हो रहा है।

मुझे ये बात समझ आ गई है दोस्तो कि कोई भी चीज़ नामुमकिन नहीं होती। मेरे लिए हर अपडेट को लिखना किसी चैलेंज से कम नहीं होता मगर आप सबके प्यार और सहयोग से हर चैलेंज को मैंने कबूल किया है और उस पर फतह हाॅसिल की है।

अगले अपडेट में इस चैप्टर को खत्म कर दूॅगा दोस्तो।
 
एकनयासंसार

अपडेट........《 45 》

अब तक,,,,,,,,,

बेड पर पड़े ब्यक्ति के चेहरे की तरफ आकर मेरी नज़र जिस चेहरे पर पड़ी उसे देख कर मैं बुरी तरह उछल पड़ा। हैरत और आश्चर्य से मेरी ऑखें फट पड़ीं। किन्तु फिर जैसे एकदम से मुझे होश आया और मेरी ऑखों के सामने मेरा गुज़रा हुआ वो कल घूमने लगा जिसमें मैं था एक विधी नाम की लड़की थी और उस लड़की के साथ शामिल मेरा प्यार था। फिर एकाएक ही तस्वीर बदली और उस तस्वीर में उसी विधी नाम की लड़की का धोखा था, उसकी बेवफाई थी। उसी तस्वीर में मेरा वो रोना था वो चीखना चिल्लाना था और नफ़रत मेरी थी। ये सब चीज़ें मेरी ऑखों के सामने कई बार तेज़ी से घूमती चली गई।

मेरे चेहरे के भाव बड़ी तेज़ी से बदले। दुख दर्द और नफ़रत के भाव एक साथ आकर ठहर गए। ऑखों में ऑसूॅ भर आए मगर मैने उन्हें शख्ती से ऑखों में ही जज़्ब कर लिया। दिल में एक तेज़ गुबार सा उठा और उस गुबार के साथ ही मेरी ऑखों में चिंगारियाॅ सी जलने बुझने लगीं।

मेरे दिल की धड़कने और मेरी साॅसें तेज़ तेज़ चलने लगी थी। मेरे मुख से कोई अल्फाज़ नहीं निकल रहे थे। किन्तु ये सच है कि कुछ कहने के लिए मेरे होंठ फड़फड़ा रहे थे। मुझे ऐसा लग रहा था कि या तो मैं खुद को कुछ कर लूॅ या फिर बेड पर ऑखें बंद किये आराम से पड़ी इस लड़की को खत्म कर दूॅ। किन्तु जाने कैसे मैं कुछ कर नहीं पा रहा था।

अभी मैं अपनी इस हालत से जूझ ही रहा था कि सहसा बेड पर आराम से करवॅट लिए पड़ी उस बला ने अपनी ऑखें खोली जिस बला को मैने टूट टूट कर चाहा था।
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अब आगे,,,,,,,,,

उथर, अभय चाचा की ससुराल में।
करुणा चाची इस वक्त अपने कमरे में आराम कर रही थी। दोपहर हो चुकी थी। सब लोगों के खाना खा लेने के बाद उन्होंने भी खाया और फिर आराम करने के लिए अपने कमरे में चली गईं। करुणा चाची के मायके वालों का परिचय देने की यहाॅ पर कदाचित कोई ज़रूरत तो नहीं है पर फिर भी पाठकों की जानकारी के लिए दे ही देता हूॅ।

चन्द्रकान्त सिंह राजपूत, ये करुणा चाची के दादा जी हैं। इनकी उमर इस समय पैंसठ के ऊपर है। ये एक फौजी आदमी हैं। फौज में मेजर थे ये। अब तो ख़ैर सरकारी पेंशन ही मिलती है इन्हें किन्तु खुद भी घर परिवार और ज़मीन जायदाद से सम्पन्न हैं ये।

हेमलता सिंह राजपूत, ये करुणा चाची की दादी हैं। ये बाॅसठ साल की हैं। चन्द्रकाॅत सिंह और हेमलता सिंह के तीन लड़के और एक लड़की थी।

उदयराज सिंह राजपूत, ये चन्द्रकाॅत सिंह के बड़े बेटे थे जो कुछ साल पहले गंभीर बीमारी के चलते भगवान को प्यारे हो चुके हैं।
सुभद्रा सिंह राजपूत, ये करुणा चाची की माॅ हैं। उमर यही कोई पचास के आस पास। विधवा हैं ये। इनके दो ही बच्चे हैं। सबसे पहले करुणा चाची उसके बाद हेमराज सिंह राजपूत। हेमराज सिंह की भी शादी हो चुकी है और उसके दो बच्चे हैं।

मेघराज सिंह राजपूत, ये करुणा चाची के चाचा हैं। इनकी उमर पचास के आस पास है। पढ़े लिखे हैं ये। मगर अपनी सारी ज़मीनों पर खेती बाड़ी का काम करवाते हैं। इनकी पत्नी का नाम सरोज है जो कि पैंतालीस साल की हैं। इनके दो बेटे हैं जो शहर में रह कर पढ़ाई करते हैं।

गिरिराज सिंह राजपूत, ये करुणा चाची के छोटे चाचा हैं। ये पैंतालीस साल के हैं और शहर में ही रहते हैं। शहर में ये एक बड़ी सी प्राइवेट कंपनी में बड़ी पोस्ट पर कार्यरत हैं। इनकी पत्नी का नाम शैलजा है। इनके दो बच्चे हैं जो शहर में ही रहते हैं अपने माॅ बाप के साथ।

पुष्पा सिंह, ये करुणा चाची की इकलौती बुआ हैं। उमर यही कोई चालीस के आस पास। इनके पति का नाम भरत सिंह है। ये पेशे से सरकारी डाक्टर हैं। पुष्पा बुआ के दो बच्चे हैं। एक बच्चा पढ़ाई करके एक बड़ी कंपनी में नौकरी कर रहा है जबकि दूसरा बेटा अपने बाप की तरह डाक्टर बनना चाहता है इस लिए डाक्टरी की पढ़ाई कर रहा है।

तो ये था करुणा चाची के मायके वालों का संक्षिप्त परिचय। अब कहानी की तरफ चलते हैं।
करुणा चाची अपने कमरे में बेड पर पड़ी किसी गहरे ख़यालों में गुम थी। कल उनके पास उनके पति अभय का फोन आया था। उन्होंने बताया था कि विराज किसी काम से गाव आया है, इस लिए वो बच्चों को लेकर उसके साथ ही मुम्बई आ जाए। अभय ने करुणा को पहले ही बता दिया था कि वो मुम्बई में विराज के साथ ही रह रहा है। उसने सारी राम कहानी करुणा को बता दिया था।

करुणा अपने पति से असलियत जान कर बहुत हैरान हुई थी और बेहद दुखी भी। उसने स्वप्न में भी उम्मीद न की थी कि एक भाई अपने भाई को इस तरह जान से मार सकता है। अपनी जेठानी प्रतिमा के चरित्र का सुन कर उसे लकवा सा मार गया था। उसके मन में प्रतिमा के प्रति घृणा व नफ़रत पैदा हो गई थी। उसे याद आता कि कैसे प्रतिमा उसके पास आकर उससे अश्लील बातें किया करती थी।

करुणा को अब समझ में आया था कि उसकी जेठानी उससे ऐसी अश्लील बातें क्यों किया करती थी। उसका एक ही मकसद होता था कि वो करुणा से ऐसी बातें करके उसके अंदर वासना की आग को भड़का दे ताकि करुणा उस आग में जलते हुए कुछ भी करने को तैयार हो जाए। करुणा ये सब सोच सोच कर हैरान थी कि उसकी जेठानी उसके साथ क्या करना चाहती थी।

करुणा ने भगवान का लाख लाख शुक्रिया अदा किया कि अच्छा हुआ कि वो अपनी जेठानी की उन बातों से खुद को सम्हाले रखा था। वरना जाने कैसा अनर्थ हो जाता। अभय ने उसे सब कुछ बता दिया था। उसने करुणा को बता दिया था कि उसका भतीजा विराज अब बहुत बड़ा आदमी बन गया है। उसने बताया कि कैसे एक ग़ैर इंसान ने उसे अपना बेटा बना लिया और उसके नाम अपनी अरबों की संपत्ति कर दी। करुणा ये सब जान कर बहुत खुश हुई थी। उसकी ऑखों से ऑसू छलक पड़े थे ये सब जान कर।

अभय ने जब उससे कहा कि वो बच्चों को लेकर विराज के साथ मुम्बई आ जाए तो वो इस बात से बड़ा खुश हुई थी। उसे लग रहा था कि कितना जल्दी वो मुम्बई पहुॅच जाए और बड़ी बहन के समान अपनी जेठानी गौरी से मिले। उससे मिल कर वो अपने बर्ताव के लिए माफ़ी मागना चाहती थी और उससे लिपट कर खूब रोना चाहती थी। जब से उसे अभय के द्वारा सारी सच्चाई का पता चला था तब से वह अकेले में अक्सर ऑसू बहाती रहती थी। उसे अपनी जेठानी गौरी के साथ बिताए हर पल याद आते। उसे याद आता कि कैसे गौरी उसे अपनी छोटी बहन की तरह मानती थी और उससे प्यार करती थी। उसे कोई काम नहीं करने दिया करती थी। वो हमेशा यही कहती कि तुम पढ़ी लिखी हो इस लिए तुम्हारा काम सिर्फ बच्चों को पढ़ाना है। घर के सारे काम वो खुद कर लेगी।

बेड पर
पड़ी करुणा ये सब सोच सोच कर ऑसू बहा ही रही थी कि सहसा उसका मोबाइल बज उठा। वो ख़यालों के अथाह सागर से बाहर आई और सिरहाने रखे मोबाइल को उठाकर उसकी स्क्रीन में फ्लैश कर रहे 'अभय जी' नाम को देखा तो तुरंत ही उसने काल को रिसीव कर मोबाइल को कान से लगा लिया।

"...........।" उधर से अभय ने कुछ कहा।
"क्या???" करुणा हल्के से चौंकी____"आज ही निकलना होगा मुझे? मगर बात क्या है जी? आप तो कह रहे थे कि कल जाना है।"
"........।" उधर से अभय ने फिर कुछ कहा।
"ये क्या कह रहे हैं आप?" करुणा के चेहरे पर एकाएक ही चिंता के भाव आ गए___"ऐसा कैसे हो सकता है?"

".......।" उधर से अभय कुछ देर तक उससे कुछ कहता रहा।
"ठीक है आप चिंता मत कीजिए।" करुणा ने कहा__"मैं हेमराज के साथ ही बच्चों को लेकर यहाॅ से निकलूॅगी। उसके बाद मैं रेलवे स्टेशन पर विराज से मिल लूॅगी।"

"..........।" उधर से अभय ने फिर कुछ कहा।
"जी ठीक है।" करुणा ने कहा___"मैं अभी माॅ और दादा जी से बात करती हूॅ। सामान कुछ ज्यादा नहीं है। बस एक बैग ही है। बाॅकी जैसा आप कहें।"
"..........।" उधर से अभय ने कुछ कहा।
"हाॅ ठीक है।" करुणा ने सिर हिलाया___"मैं सामान ज्यादा नहीं लूॅगी। आप हेमराज को समझा दीजिएगा।"

उधर से अभय ने कुछ और कहा जिस पर करुणा ने हाॅ कह कर सिर हिलाया उसके बाद काल कट हो गई। काल कट होने के बाद करुणा ने गहरी साॅस ली और फिर बेड से उतर कर कमरे से बाहर आ गई।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

इधर हास्पिटल में।
मेरे दिलो दिमाग़ में ऑधी तूफान चल रहा था। मुझ पर नज़र पड़ते ही बेड पर पड़ी विधी के चेहरे पर ऐसे भाव उभरे जैसे वह मुझे देख कर एकदम से स्टेचू में तब्दील हो गई हो। एकटक मेरी तरफ देखे जा रही थी वह। फिर सहसा उसके चेहरे के भाव एकाएक ही बदले। उस चेहरे पर दुख और पीड़ा के भाव उभर आए। पथराई हुई ऑखों ने अपने अंदर से किसी टूटे हुए बाॅध की तरह ऑसुओं को बाहर की तरफ तेज़ प्रवाह से बहाना शुरू कर दिया।

उसके चेहरे के बदले हुए उन भावों को देख कर भी मेरे अंदर की नफ़रत और आक्रोश में कोई कमी नहीं आई। मेरी ऑखों के सामने कोई और ही मंज़र घूम रहा था। गुज़रे हुए कल की तस्वीरें बार बार ऑखों के सामने घूम रही थीं। अभी मैं इन सब तस्वीरों को देख ही रहा था कि तभी बेजान हो चुके विधी के जिस्म में हल्का सा कंपन हुआ और उसके थरथराते हुए होठों से जो लड़खड़ाता हुआ शब्द निकला उसने मुझे दूसरी दुनियाॅ से लाकर इस हकीक़त की दुनियाॅ में पटक दिया।

"र..राऽऽऽज।" बहुत ही करुण भाव से मगर लरज़ता हुआ विधी का ये स्वर मेरे कानो से टकराया। हकीक़त की दुनियाॅ में आते ही मेरी नज़र विधी के चेहरे पर फिर से पड़ी तो इस बार मेरा समूचा अस्तित्व हिल गया। विधी की ऑखों से ऑसू बह रहे थे, उसके चेहरे पर अथाह पीड़ा के भाव थे। ये सब देख कर मेरा हृदय हाहाकार कर उठा। पल भर में मेरे अंदर मौजूद उसके प्रति मेरी नफ़रत घृणा और गुस्सा सब कुछ साबुन के झाग की तरह बैठता चला गया। मेरे टूटे हुए दिल के किसी टुकड़े में दबा उसके लिए बेपनाह प्यार चीख उठा।

मैने देखा कि करवॅट के बल लेटी विधी का एक हाॅथ धीरे से ऊपर की तरफ ऐसे अंदाज़ में उठा जैसे वो मुझे अपने पास बुला रही हो। मेरा समूचा जिस्म ही नहीं बल्कि अंदर की आत्मा तक में एक झंझावात सा हुआ। मैं किसी सम्मोहन के वशीभूत होकर उसकी तरफ बढ़ चला। इस वक्त जैसे मैं खुद को भूल ही चुका था। कुछ ही पल में मैं विधी के पास उसके उस उठे हुए हाॅथ के पास पहुॅच गया।

"त तुम आ गए राज।" मुझे अपने करीब देखते ही उसने अपने उस उठे हुए हाथ से मेरी बाॅई कलाई को पकड़ते हुए कहा___"मैं तुम्हारे ही आने का यहाॅ इन्तज़ार कर रही थी। मेरी साॅसें सिर्फ तुम्हें ही देखने के लिए बची हुई हैं।"

मेरे मुख से उसकी इन बातों पर कोई लफ्ज़ न निकला। किन्तु मैं उसकी आख़िरी बात सुन कर बुरी तरह चौंका ज़रूर। हैरानी से उसकी तरफ देखा मैने। मगर फिर अचानक ही जाने क्या हुआ मुझे कि मेरे चेहरे पर फिर से वही नफ़रत और गुस्सा उभर आया। मैने एक झटके से उसके हाॅथ से अपनी कलाई को छुड़ा लिया।

"अब ये कौन सा नया नाटक शुरू किया है तुमने?" मेरे मुख से सहसा गुर्राहट निकली___"और क्या कहा तुमने कि तुम मेरा ही इन्तज़ार कर थी? भला क्यों कर रही थी मेरा इन्तज़ार? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हें पता चल गया हो कि इस समय मैं फिर से रुपये पैसे वाला हो गया हूॅ? इस लिए पैसों के लिए फिर से मुझे बुला लिया तुमने। वाह क्या बात है जवाब नहीं है तेरा। अब समझ में आई सारी बात मुझे। मुझे मुम्बई से बुलाने के लिए मेरे ही दोस्त का इस्तेमाल किया तूने। क्या दिमाग़ लगाया है तूने लड़की क्या दिमाग़ लगाया है। मगर तेरे इस दिमाग़ लगाने से अब कुछ नहीं होने वाला। मैं तेरे इस नाटक में फॅसने वाला नहीं हूॅ अब। इतना तो सबक सीख ही लिया है मैने कि तुझ जैसी लड़की से कैसे दूर रहा जाता है। मुश्किल तो था मगर सह लिया है मैने, और अब उस सबसे बहुत दूर निकल गया हूॅ। अब कोई लड़की मुझे अपने रूप जाल में या अपने झूठे प्यार के जाल में नहीं फॅसा सकती। इस लिए लड़की, ये जो तूने नाटक रचा है न उसे यहीं खत्म कर दे। अब कुछ नहीं मिलने वाला यहाॅ। मेरा यार भोला था नासमझ था इस लिए तेरी बातों के जाल में फॅस गया और मुझे यहाॅ बुला लिया। मगर चिंता मत कर मैं अपने यार को सम्हाल लूॅगा।"

मैने ये सब बिना रुके मानो एक ही साॅस में कह दिया था और कहने के बाद उसके पास एक पल भी रुकना गवाॅरा न किया। पलट कर वापस चल दिया, दो क़दम चलने के बाद सहसा मैं रुका और पलट कर बोला___"एक बात कहूॅ। आज भी तुझे उतना ही प्यार करता हूॅ जितना पहले किया करता था मगर बेपनाह प्यार करने के बावजूद अब तुझे पाने की मेरे दिल में ज़रा सी भी हसरत बाॅकी नहीं है।"

ये कह कर मैं तेज़ी से पलट गया। पलट इस लिए गया क्योंकि मैं उस बेवफा को अपनी ऑखों में भर आए ऑसुओं को दिखाना नहीं चाहता था। मेरा दिल अंदर ही अंदर बुरी तरह तड़पने लगा था। मुझे लग रहा था कि मैं हास्पिटल के बाहर दौड़ते हुए जाऊॅ और बीच सड़क पर घुटनों के बल बैठ कर तथा आसमान की तरफ चेहरा करके ज़ोर ज़ोर से चीखूॅ चिल्लाऊॅ और दहाड़ें मार मार कर रोऊॅ। सारी दुनियाॅ मेरा वो रुदन देखे मगर वो न देखे सुने जिसे मैं आज भी टूट कर प्यार करता हूॅ।

"तुम्हारी इन बातों से पता चलता है राज कि तुम आज के समय में मुझसे कितनी नफ़रत करते हो।" सहसा विधी की करुण आवाज़ मेरे कानों पर पड़ी____"और सच कहूॅ तो ऐसा तुम्हें करना भी चाहिए। मुझे इसके लिए तुमसे कोई शिकायत नहीं है। मैने जो कुछ भी तुम्हारे साथ किया था उसके लिए कोई भी यही करता। मगर, मेरा यकीन करो राज मेरे मन में ना तो पहले ये बात थी और ना ही आज है कि मैने पैसों के लिए ये सब किया।"

"बंद करो अपनी ये बकवास।" मैने पलट कर चीखते हुए कहा था, बोला___"तेरी फितरत को अच्छी तरह जानता हूॅ मैं। आज भी तूने मुझे इसी लिए बुलवाया है क्योंकि तुझे पता चल चुका है कि अब मैं फिर से पैसे वाला हो गया हूॅ। पैसों से प्यार है तुझे, पैसों के लिए तू किसी भी लड़के के दिल के साथ खिलवाड़ कर सकती है। मगर, अब तेरी कोई भी चाल मुझ पर चलने वाली नहीं है समझी? मेरा दिल तो करता है कि इसी वक्त तुझे तेरे किये की सज़ा दूॅ मगर नहीं कर सकता मैं ऐसा। क्योंकि मुझसे तेरी तरह किसी को चोंट पहुॅचाना नहीं आता और ना ही मैं अपने मतलब के लिए तेरे साथ कुछ करना चाहता हूॅ। तुझे अगर मैं कोई दुवा नहीं दे सकता तो बद्दुवा भी नहीं दूॅगा।"

मेरी बातें सुन कर विधी के दिल में कदाचित टीस सी उभरी। उसकी ऑखें बंद हो गई और बंद ऑखों से ऑसुओं की धार बह चली। मगर फिर जैसे उसने खुद को सम्हाला और मेरी तरफ कातर भाव से देखने लगी। उसे इस तरह अपनी तरफ देखता पाकर एक बार मैं फिर से हिल गया। मेरे दिल में बड़ी ज़ोर की पीड़ा हुई मगर मैने खुद को सम्हाला। आज भी उसके चेहरे की उदासी और ऑखों में ऑसू देख कर मैं तड़प जाता था किन्तु अंदर से कोई चीख कर मुझसे कहने लगता इसने तेरे प्यार की कदर नहीं की। इसने तुझे धोखा दिया था। तेरी सच्ची चाहत को मज़ाक बना कर रख दिया था। बस इस एहसास के साथ ही उसके लिए मेरे अंदर जो तड़प उठ जाती थी वो कहीं गुम सी हो जाती थी।

"तुमने तो मुझे कोई सज़ा नहीं दी राज।" सहसा विधी ने पुनः करुण भाव से कहा___"मगर मेरी ज़िदगी ने मुझे खुद सज़ी दी है। ऐसी सज़ा कि मेरी साॅसें बस चंद दिनों की या फिर चंद पलों की ही मेहमान हैं। किस्मत बड़ी ख़राब चीज़ भी होती है, एक पल में हमसे वो सब कुछ छीन लेती है जिसे हम किसी भी कीमत पर किसी को देना नहीं चाहते। किस्मत पर किसी का ज़ोर नहीं चलता राज। ये मेरी बदकिस्मती ही तो थी कि मैने तुम्हारे साथ वो सब किया। मगर यकीन मानो उस समय जो मुझे समझ में आया मैने वही किया। क्योंकि मुझे कुछ और सूझ ही नहीं रहा था। भला मैं ये कैसे सह सकती थी कि मेरी छोटी सी ज़िदगी के साथ तुम इस हद तक मुझे प्यार करने लगो कि मेरे मरने के बाद तुम खुद को सम्हाल ही न पाओ? उस समय मैने तुम्हें धोखा दिया मगर उस समय के मेरे धोखे ने तुम्हें इतना भी टूट कर बिखरने नहीं दिया कि बाद में तुम सम्हल ही न पाते। मैं मानती हूॅ कि दिल जब किसी के द्वारा टूटता है तो उसका दर्द हमेशा के लिए दिल के किसी कोने में दबा बैठा रहता है। मगर, उस समय के हालात में तुम टूटे तो ज़रूर मगर इस हद तक नहीं बिखरे। वरना आज मेरे सामने इस तरह खड़े नहीं रहते। आज तुम जिस मुकाम पर हो वहाॅ नहीं पहुॅच पाते।"

विधी की बातें सुन कर मुझे कुछ समझ न आया कि ये क्या अनाप शनाप बके जा रही है? मगर उसके लहजे में और उसके भाव में कुछ तो ऐसा था जिसने मुझे कुछ हद तक शान्त सा कर दिया था।

"तो तुम क्या चाहती थी कि मैं टूट कर बिखर जाता और फिर कभी सम्हलता ही नहीं?" मैने तीके भाव से कहा___"अरे मैं तो आज भी उसी हालत में हूॅ। मगर कहते हैं न कि इंसान के जीवन में सिर्फ उसी बस का हक़ नहीं होता बल्कि उसके परिवार वालों का भी होता है। मेरी माॅ मेरी बहन ने मुझे प्यार ही इतना दिया है कि मैं बिखर कर भी नहीं बिखरा। मैने भी सोच लिया कि ऐसी लड़की के लिए क्या रोना जिसने प्यार को कभी समझा ही नहीं? रोना है तो उनके लिए रोओ जो सच में मुझसे प्यार करते हैं।"

"ये तो खुशी की बात है कि तुमने ऐसा सोचा और खुद को सम्हाल लिया।" विधी ने फीकी मुस्कान के साथ कहा__"मैं भी यही चाहती थी कि तुम उस सबसे खुद को सम्हाल लो और जीवन में आगे बढ़ जाओ। किसी एक के चले जाने से किसी का जीवन रुक नहीं जाता। समझदार इंसान को सबकुछ भूल कर आगे बढ़ जाना चाहिए। वही तुमने किया, इस बात से मैं खुश हूॅ राज। यही तो चाहती थी मैं। यकीन मानो तुम्हें आज इस तरह देख कर मेरे मन का बोझ उतर गया है। मैं तुमसे ये नहीं कहूॅगी कि तुम मुझे उस सबके लिए माफ़ कर दो जो कुछ मैने तुम्हारे साथ किया था। अगर तुम ऐसे ही खुश हो तो भला मैं माफ़ी माॅग कर तुम्हारी उस खुशी को कैसे मिटा सकती हूॅ? अब तुम जाओ राज, जीवन में खूब तरक्की करो और अपनों के साथ साथ खुद को भी खुश रखो। और हाॅ, जीवन में मुझे कभी याद मत करना, क्योंकि मैं याद करने लायक नहीं हूॅ।"

विधी की इन विचित्र बातों ने मुझे उलझा कर रख दिया था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आज इसे हो क्या गया है? ये तो ऐसी बातें कह रही थी जैसे कोई उपदेशक हो। मेरे दिलो दिमाग़ में तरह तरह की बातें चलने लगी थीं।

"जाते जाते मेरी एक आरज़ू भी पूरी करते जाओ राज।" विधी का वाक्य मेरे कानों से टकराया___"हलाॅकि तुमसे कोई आरज़ू रखने का मुझे कोई हक़ तो नहीं है मगर मैं जानती हूॅ कि तुम मेरी आरज़ू ज़रूर पूरी करोगे।" कहने के बाद विधी कुछ पल के लिए रुकी फिर बोली___"मेरे पास आओ न राज। मैं तुम्हें और तुम्हारे चेहरे को जी भर के देखना चाहती हूॅ। तुम्हारे चेहरे की इस सुंदर तस्वीर को अपनी ऑखों में फिर से बसा लेना चाहती हूॅ। मेरी ये आरज़ू पूरी कर दो राज। इतना तो कर ही सकते हो न तुम?"

विधी की बात सुन कर मेरे दिलो दिमाग़ में धमाका सा हुआ। मेरे पूरे जिस्म में झुरझुरी सी हुई। पेट में बड़ी तेजी से जैसे कोई गैस का गोला घूमने लगा था। दिमाग़ एकदम सुन्ना सा पड़ता चला गया। कानों में कहीं दूर से सीटियों की अनवरत आवाज़ गूॅजती महसूस हुई मुझे। पल भर में मेरे ज़हन में जाने कितने ही प्रकार के ख़याल आए और जाने कहाॅ गुम हो गए। बस एक ही ख़याल गुम न हुआ और वो ये था कि विधी ऐसा क्यों चाह रही है?

किसी गहरे ख़यालों में खोया हुआ मैं इस तरह विधी की तरफ बढ़ चला जैसे मुझ पर किसी तरह का सम्मोहन हो गया हो। कुछ ही पल में मैं विधी के करीब उसके चेहरे के पास जा कर खड़ा हो गया। मेरे खड़े होते ही विधी ने किसी तरह खुद को उठाया और बेड की पिछली पुश्त से पीठ टिका लिया। अब वो अधलेटी सी अवस्था में थी। चेहरा ऊपर करके उसने मेरे चेहरे की तरफ देखा। उसकी ऑखों में ऑसुओं का गरम जल तैरता हुआ नज़र आया मुझे। मैने पहली बार उसके चेहरे को बड़े ध्यान से देखा और अगले ही पल बुरी तरह चौंक पड़ा मैं। मुझे विधी के चेहरे पर मुकम्मल खिज़ा दिखाई दी। जो चेहरा हर पल ताजे खिले गुलाब की मानिन्द खिला हुआ रहा करता था आज उस चेहरे पर वीरानियों के सिवा कुछ न था। ऐसा लगता था जैसे वो शदियों से बीमार हो।

उसे इस हालत में देख कर एक बार फिर से मेरा दिल तड़प उठा। जी चाहा कि अभी झपट कर उसे अपने सीने से लगा लूॅ मगर ऐन वक्त पर मुझे उसका धोखा याद आ गया। उसका वो दो टूक जवाब देना याद आ गया। मुझे भिखारी कहना याद आ गया। इन सबके याद आते ही मेरे चेहरे पर कठोरता छाती चली गई। एक बार फिर से मेरे अंदर से नफ़रत और गुस्सा उभर कर आया और मेरे चेहरे तथा ऑखों में आकर ठहर गया।

"मैं तुम्हें दुवा में ये भी नहीं कह सकती कि तुम्हें मेरी उमर लग जाए।" तभी विधी ने छलक आए ऑसुओं के साथ कहा___"बस यही दुवा करती हूॅ कि तुम हमेशा खुश रहो। जीवन में हर कोई तुम्हें दिलो जान से प्यार करे। कभी किसी के द्वारा तुम्हारा दिल न दुखे। खुदा मिलेगा तो उससे पूछूॅगी कि मैने ऐसा क्या गुनाह किया था जो उसने मुझे ऐसी ज़िंदगी बक्शी थी? ख़ैर, अब तुम जाओ राज, मैने तुम्हारी तस्वीर को इस तरह अपनी ऑखों में बसा लिया है कि अब हर जन्म में मुझे सिर्फ तुम ही नज़र आओगे।"

विधी की इस बात से एक बार फिर से मेरे चेहरे पर उभर आए नफ़रत व गुस्से में कमी आ गई। मैंने उसे अजीब भाव से देखा। मेरे अंदर कोई ज़ोर ज़ोर से चीखे जा रहा था कि इसे एक बार अपने सीने से लगा ले राज। मगर मैने अपने अंदर के उस शोर को शख्ती से दबा दिया और पलट कर कमरे के बाहर की तरफ चल दिया। मैने महसूस किया कि मेरी कोई अनमोल चीज़ मुझसे हमेशा के लिए दूर हुई जा रही है। मेरे दिल की धड़कने अनायास ही ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगी। मनो मस्तिष्क में बड़ी तेज़ी से कोई तूफान चलने लगा था। अभी मैं दरवाजे के पास ही पहुॅचा था कि.....

"रुक जाओऽऽ।" ये वाक्य एक नई आवाज़ के साथ मेरे कानों से टकराया था। दरवाजे के करीब बढ़ते हुए मेरे क़दम एकाएक ही रुक गए। मैं बिजली की सी तेज़ी से पलटा। कमरे में ही बेड के पास खड़ी जिस शख्सियत पर मेरी नज़र पड़ी उसे देख कर मैं हक्का बक्का रह गया। आश्चर्य और अविश्वास से मेरी ऑखें फटी की फटी रह गईं। मुझे अपनी ऑखों पर यकीन नहीं हुआ कि जिस शख्सियत को मेरी ऑखें देख रही हैं वो सच में वही हैं या फिर ये मेरी ऑखों का कोई भ्रम है।

"मुझे तुमसे ये उम्मीद नहीं थी राज।" सहसा ये नई आवाज़ फिर से मेरे कानों से टकराई___"तुम इस तरह कैसे यहाॅ से जा सकते हो? इतनी बेरुख़ी तो कोई अपने किसी दुश्मन से भी नहीं जाहिर करता जितनी तुम विधी को देख कर ज़ाहिर कर रहे हो।"

इस बार मैं बुरी तरह चौंका। ये तो सच में वही हैं। यानी रितू दीदी। जी हाॅ दोस्तो, ये वही रितू दीदी हैं जिन्होंने अपने जीवन में कभी भी मुझे भाई नहीं माना और ना ही मुझसे बात करना ज़रूरी समझा। मगर मैं इस बात से हैरान था कि वो यहाॅ कैसे मौजूद हो सकती हैं? जब मैं आया था इस कमरे में तब तो ये यहाॅ नहीं थी, फिर अचानक ये कहाॅ से यहाॅ पर प्रकट हो गईं?

"प्लीज़ दीदी।" तभी बेड पर अधलेटी अवस्था में बैठी विधी ने रितू दीदी से कहा___"कुछ मत कहिए उसे।"
"नहीं विधी।" रितू दीदी ने आवेशयुक्त भाव से कहा__"मुझे बोलने दे अब। माना कि तूने जो किया वो उस समय के हिसाब से ग़लत था मगर इसका मतलब ये नहीं कि बिना किसी बात को जाने समझे ये तुझे इस तरह बोल कर यहाॅ से चला जाए।"

"नहीं दीदी प्लीज़।" विधी ने विनती करते हुए कहा___"ऐसा मत कहिए उसे। मुझे किसी बात की सफाई नहीं देना है उससे। आप जानती हैं कि मैं उसे किसी भी तरह का दुख नहीं देना चाहती अब।"
"क्यों करती है रे ऐसा तू?" रितू दीदी की आवाज़ सहसा भारी हो गई, ऑखों में ऑसू आ गए, बोली___"ऐसा मत कर विधी। वरना ये ज़मीन और वो आसमान फट जाएगा। तू चाहती थी न कि तू अपने आख़िरी समय में अपने इस महबूब की बाहों में ही दम तोड़े? फिर क्यों अब इस सबसे मुकर रही हो तू? अब तक तो तड़प ही रही थी न तो अब अपने अंतिम समय में क्यों इस तड़प को लेकर जाना चाहती है? नहीं नहीं, मैं ऐसा हर्गिज़ नहीं होने दूॅगी।"

रितू दीदी की बातें सुन कर मेरे दिलो दिमाग़ में भयंकर विष्फोट हुआ। ऐसा लगा जैसे आसमान से कोई बिजली सीधा मेरे दिल पर गिर पड़ी हो। पलक झपकते ही मेरी हालत ख़राब हो गई। दिमाग़ में हर बात बड़ी तेज़ी से घूमने लगी। एक एक बात, एक एक दृष्य मेरे ज़हन से टकराने लगे। पवन का मुझे फोन करके यहाॅ अर्जेन्ट बुलाना, मेरे द्वारा वजह पूछने पर उसका अब तक चुप रहना। हास्पिटल के इस कमरे के बाहर से ये कह कर चले जाना कि मैं यहाॅ जो कुछ भी देखूॅ सुनूॅ उसे देख सुन कर खुद को सम्हाले रखूॅ। हास्पिटल के इस कमरे के अंदर विधी का मुझसे मिलना, उसकी वो सब विचित्र बातें और अब रितू दीदी का यहाॅ मौजूद होकर ये सब कहना। ये सब चीज़ें मेरे दिलो दिमाग़ में बड़ी तेज़ी घूमने लगी थी।

मुझे अब समझ आया कि असल माज़रा क्या है। मेरे दिमाग़ ने काम करना शुरू कर दिया और अब मुझे सब कुछ समझ में आने लगा था। दरअसल विधी को कुछ हुआ है जिसके लिए पवन ने मुझे यहाॅ बुलाया था। मगर विधी को ऐसा क्या हो गया है? रितू दीदी ने ये क्या कहा कि____ "तू चाहती थी न कि तू अपने आख़िरी समय में अपने इस महबूब की बाहों में ही दम तोड़े?" हे भगवान! ये क्या कहा रितू दीदी ने?

"नननहींऽऽऽऽ।" अपने ही सोचों में डूबा मैं पूरी शक्ति से चीख पड़ा था, पल भर में मेरी ऑखों से ऑसुओं का जैसे कोई बाॅध टूट पड़ा। मैं भागते हुए विधी के पास आया। इधर मेरी चीख से रितू दीदी और विधी भी चौंक पड़ी थी।

मैं भागते हुए विधी के पास आया था, बेड के किनारे पर बैठ कर मैने विधी को उसके दोनो कंधों से पकड़ कर खुद से छुपका लिया और बुरी तरह रो पड़ा। मैं विधी को अपने सीने से बुरी तरह भींचे हुए था। मेरे मुख से कोई बोल नहीं फूट रहा था। मैं बस रोये जा रहा था। मुझे समझ में आ चुका था कि विधी को कुछ ऐसा हो गया है जिससे वो मरने वाली है। ये बात मेरे लिए मेरी जान ले लेने से कम नहीं थी।

"नहीं राज।" विधी मुझसे छुपकी खुद भी रो रही थी, किन्तु उसने खुद को सम्हालते हुए कहा___"इस तरह मत रोओ। मैं अपनी ऑखों के सामने तुम्हें रोते हुए नहीं देख सकती। प्लीज़ चुप हो जाओ न।"
"नहीं नहीं नहीं।" मैंने तड़पते हुए कहा___"तुम मुझे छोंड़ कर कहीं नहीं जाओगी। तुम नहीं जानती कि तुम्हारे लिए कितना तड़पा हूॅ मैं। पर अब और नहीं विधी। मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूॅगा।"

"पागल मत बनो राज।" विधी ने मेरे सिर को सहलाते हुए कहा___"खुद को सम्हालो और जीवन में आगे बढ़ो।"
"मैं कुछ नहीं जानता विधी।" मैने सिसकते हुए कहा___"मैं फिर से तुम्हें खोना नहीं चाहता। मुझे बताओ कि क्या हुआ है तुम्हें? मैं तुम्हारा इलाज़ करवाऊॅगा। दुनियाॅ भर के डाक्टरों को तुम्हारे इलाज़ के लिए पल भर में ले आऊॅगा।"

"अब कुछ नहीं हो सकता राज।" विधी ने सहसा मुझसे अलग होकर मेरे चेहरे को अपनी दोनो हॅथेलियों में लेते हुए कहा___"मैने कहा न कि मेरा सफर खत्म हो चुका है। मुझे ब्लड कैंसर है वो भी लास्ट स्टेज का। मेरी साॅसें किसी भी पल रुक सकती हैं और मैं भगवान के पास चली जाऊॅगी।"

"ननहींऽऽऽ।" विधी की ये बात सुनकर मुझे ज़बरदस्त झटका लगा। ऑखों के सामने अॅधेरा सा छा गया। हर चीज़ जैसे किसी शून्य में डूबती महसूस हुई मुझे। कानों में कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था मुझे। दिल की धड़कने रुक सी गई और मैं एकदम से अचेत सी अवस्था में आ गया।

"राऽऽऽज।" विधी के हलक से चीख निकल गई, वो मेरे चेहरे को थपथपाते हुए बुरी तरह रोने लगी। पास में ही खड़ी रितू दीदी भी दौड़ कर मेरे पास आ गईं। मुझे पीछे से पकड़ते हुए मुझे ज़ोर ज़ोर से आवाज़ें लगाने लगीं। सब कुछ एकदम से ग़मगीन सा हो गया था। वक्त को एक जगह ठहर जाने में एक पल का भी समय नहीं लगा।

वो दोनो बुरी तरह रोये जा रही थी। रितू दीदी के दिमाग़ ने काम किया। पास ही टेबल पर रखे पानी के ग्लास को उठा कर उससे मेरे चेहरे पर पानी छिड़का उन्होंने। थोड़ी ही देर में मुझे होश आ गया। होश में आते ही मैं विधी से लिपट कर ज़ार ज़ार रोने लगा।

"क्यों विधी क्यों?" मैने बिलखते हुए उससे कहा___"क्यों छुपाया तुमने मुझसे? क्या इसी लिए तुमने मेरे साथ वो सब किया था, ताकि मैं तुमसे दूर चला जाऊॅ? और मैं मूरख ये समझता रहा कि तुमने मेरे साथ कितना ग़लत किया था। कितना बुरा हूॅ मैं, आज तक मैं तुम्हें भला बुरा कहता रहा। तुम्हारे बारे में कितना कुछ बुरा सोचता रहा। मैने कितना बड़ा अपराध किया है विधी। हाय कितना बड़ा पाप किया मैने। मुझे तो भगवान भी कभी माफ़ नहीं करेगा।"

"नहीं राज नहीं।" विधी ने तड़प कर मुझे अपने से छुपका लिया, बोली___"तुमने कोई अपराध नहीं किया, कोई पाप नहीं किया। तुमने तो बस प्यार ही किया है मुझे, हर रूप में तुमने मुझे प्यार किया है राज। मुझे तुम पर नाज़ है। ईश्वर से यही दुवा करूॅगी कि हर जन्म में मुझे तुम्हारा ही प्यार मिले।"

"अपने आपको सम्हालो राज।" सहसा रितू दीदी ने मुझे पीछे से पकड़े हुए कहा___"ईश्वर इस बात का गवाह है कि तुम दोनो ने कोई पाप नहीं किया है। विधी ने उस समय जो किया उसमें भी उसके मन में सिर्फ यही था कि तुम उससे दूर हो जाओ और एक नये सिरे से जीवन में आगे बढ़ो। तुम खुद सोचो राज कि जो विधी तुम्हें दिलो जान से प्यार करती थी उसने तुम्हें अपने से दूर करने के लिए खुद को कैसे पत्थर दिल बनाया होगा? उसका दिल कितना तड़पा होगा? मगर इसके बाद भी उसने तुम्हें खुद से दूर किया। उस समय का वो दुख आज के इस दुख से भारी नहीं था।"

"लेकिन दीदी इसने मुझसे ये बात छुपाई ही क्यों थी?" मैने रोते हुए कहा___"क्या इसे मेरे प्यार पर भरोसा नहीं था? मैं इसके इलाज़ के लिए धरती आसमान एक कर देता और इसको इस गंभीर बिमारी से बचा लेता।"

"नहीं राज।" दीदी ने कहा___"तुम उस समय भी कुछ न कर पाते क्योंकि तब तक कैंसर इसके खून में पूरी तरह फैल चुका था। पहले इस बात का इसे पता ही नहीं था और जब पता चला तो डाक्टर ने बताया कि इसके इलाज में ढेर सारा पैसा लगेगा और इसका इलाज हमारे देश में हो पाना भी मुश्किल था। उस समय ना तो तुम इतने सक्षम थे और ना ही इसके माता पिता जो इसका इलाज करवा पाते। इस लिए विधी ने फैंसला किया कि वो तुमसे जितना जल्दी हो सके दूर हो जाए। क्योंकि तब तुम्हें इस बात का भी दुख होता कि तुम इसका इलाज नहीं करवा पाए। सब कुछ हमारे हाॅथ में नहीं होता राज। कुछ ईश्वर का भी दखल होता है।"

"कुछ भी कहिये दीदी।" मैने कहा___"कम से कम मैं अपनी विधी के साथ तो रहता। उसे खुद से अलग करके उसे दुखों के सागर में डूबने तो न देता।"
"नहीं राज तुम इस सबसे दुखी मत हो।" विधी ने कहा___"सब कुछ भूल जाओ। मैं बस ये चाहती हूॅ कि तुम मुझे खुशी खुशी इस दुनियाॅ से अलविदा करो। आज तुम्हारी बाहों में हूॅ तो मेरे सारे दुख दर्द दूर हो गए हैं। मेरी ख्वाहिश थी कि मेरा दम निकले तो सिर्फ मेरे महबूब की बाहों में। तुम्हारी सुंदर छवि को अपनी ऑखों में बसा कर यहाॅ से जाना चाहती थी। इस लिए दीदी से मैने अपनी ये इच्छा बताई और दीदी ने मुझसे वादा किया कि ये तुमको मेरे पास लेकर ज़रूर आएॅगी।"

मैं विधी की इस बात से चौंका। पलट कर रितू दीदी की तरफ देखा तो रितू दीदी की नज़रें झुक गईं। उनके चेहरे पर एकाएक ही ग्लानि और अपराध बोझ जैसे भाव उभर आए।

"राज, तुम्हारी रितू दीदी अब पहले जैसे नहीं रहीं।" सहसा विधी ने मुझसे कहा___"ये तुमसे बहुत प्यार करती हैं। इन्हें कभी खुद से दूर न करना। इन्होंने जो कुछ किया उसमे इनका कोई दोष नहीं था। इन्होंने तो वही किया था जो इन्हें बचपन से सिखाया गया था। आज हर सच्चाई इनको पता चल चुकी है इस लिए अब ये तुम्हें ही अपना भाई मानती हैं। तुम इन्हें माफ़ कर देना। इनका मुझ पर बहुत बड़ा उपकार है राज। ये मुझे अपनी छोटी बहन जैसा प्यार देती हैं। जब से ये मुझे मिली हैं तब से मुझे यही एहसास होता रहा है जैसे कि तुम मेरे पास ही हो।"

विधी की इन बातों से मुझे झटका सा लगा। मैने एक बार फिर से पलट कर रितू दीदी की तरफ देखा। उनका सिर पूर्व की भाॅति ही झुका हुआ था। मैने अपने दोनो हाॅथों से उनके चेहरे को लेकर उनके चेहरे को ऊपर उठाया। जैसे ही उनका चेहरा ऊपर हुआ तो मुझे उनका ऑसुओं से तर चेहरा दिखा। मेरा कलेजा हिल गया उनका ये हाल देख कर। मैने उन्हें अपने सीने से लगा लिया। मेरे सीने से लगते ही रितू दीदी की रुलाई फूट गई। वो फूट फूट कर रोने लगी थी। जाने कब से उनके अंदर ये गुबार दबा हुआ था और अब वो इस रूप में निकल रहा था।

"ये क्या दीदी?" मैने उनके सिर को प्यार से सहलाते हुए कहा___"चुप हो जाइये दीदी। अरे आप तो मेरी सबसे प्यारी और बहादुर दीदी हैं। चलिये अब चुप हो जाइये।"
"तू इतना अच्छा क्यों है राज?" रितू दीदी का रोना बंद ही नहीं हो रहा था____"तुझे मुझ पर गुस्सा क्यों नहीं आता? मैने तुझे कभी अपना भाई नहीं माना। हमेशा तेरा दिल दुखाया मैने। मुझे वो सब याद है मेरे भाई जो कुछ मैने तेरे साथ किया है। जब जब मुझे वो सब याद आता है तब तब मुझे खुद से घृणा होने लगती है। मुझे ऐसा लगने लगता है कि मैं अपने आपको क्या कर डालूॅ।"

"नहीं दीदी।" मैने उन्हें खुद से अलग करके उनके ऑसुओं को पोंछते हुए कहा___"ऐसा कभी सोचना भी मत। मेरे मन में कभी भी आपके प्रति कोई बुरा ख़याल नहीं आया। कहीं न कहीं मुझे भी इस बात का एहसास था कि आप वही कर रही हैं जो आपको सिखाया जाता था।"

"ये सब तू मेरा दिल रखने के लिए कह रहा है न?" रितू दीदी ने कहा___"जबकि मुझे पता है कि तुझे मेरे उस बर्ताव से कितनी तक़लीफ़ होती थी।"
"हाॅ बुरा तो लगता था दीदी।" मैने कहा___"मगर उस सबके लिए आप पर कभी गुस्सा नहीं आता था। हर बार यही सोचता था कि इस बार आप मुझसे ज़रूर बात करेंगी।"

"और मैं इतनी बुरी थी कि हर बार तेरी उन मासूम सी उम्मीदों को तोड़ देती थी।" रितू ने सिर झुका लिया, बोली___"तू उस सबके लिए मुझे सज़ा दे मेरे भाई। तेरी हर सज़ा को मैं हॅसते हुए कुबूल कर लूॅगी।"
"ठीक है दीदी।" मैने कहा___"आपकी सज़ा यही है कि अब से आप ये सब बिलकुल भी नहीं सोचेंगी और ना ही ये सब सोच कर खुद को रुलाओगी। यही आपकी सज़ा है।"

मेरी ये सज़ा सुन कर रितू दीदी देखती रह गईं मुझे और सहसा फिर से उनकी ऑखों से ऑसू बह चले। वो मुझसे लिपट गईं। वो इस तरह मुझसे लिपटी हुई थी जैसे वो मुझे अपने अंदर समा लेना चाहती हों।

विधी अपना ऑसुओं से तर चेहरा लिए हम दोनो बहन भाई को देख रही थी। उसके होठों पर मुस्कान थी। सहसा तभी उसे ज़ोर का धचका लगा। हम दोनो बहन भाई का ध्यान विधी की तरफ गया। विधी को आए उस ज़ोर के धचके से अचानक ही खाॅसी आने लगी। मैं बुरी तरह चौंका। उधर विधी को लगातार खाॅसी आने लगी थी। मैं ये देख कर बुरी तरह घबरा गया। मेरे साथ साथ रितू दीदी भी घबरा गई। मैने विधी को अपनी बाहों में ले लिया।

"विधी, क्या हुआ तुम्हें?" मैं बदहवाश सा कहता चला गया___"तुम ठीक तो हो न? ये खाॅसी कैसे आने लगी तुम्हें। डाक्टरऽऽऽ.....डा डाक्टर को बुलाओ कोई।"

मैं पागलों की तरह इधर उधर देखने लगा। मेरी नज़र रितू दीदी पर पड़ी तो मैं उन्हें देख कर एकाएक ही रो पड़ा___"दीदी, देखो न विधी को अचानक ये क्या होने लगा है? प्लीज़ दीदी जल्दी से डाक्टर को बुलाइये। जाइये जल्दी.....डाक्टर बुलाइये। मेरी विधी को ये खाॅसी कैसे आने लगी है अचानक?"

मेरी बात सुन कर रितू दीदी को जैसे होश आया। वो बदहवाश सी होकर पहले इधर उधर देखी फिर भागते हुए कमरे से बाहर की तरफ लपकी। इधर मैं लगातार विधी को अपनी बाहों में लिए उसे फुसला रहा था। मेरा दिलो दिमाग़ एकदम से जैसे कुंद सा पड़ गया था। उधर विधी को रह रह कर खाॅसी आ रही थी। सहसा तभी उसके मुख से खून निकला। ये देख कर मैं और भी घबरा गया। मैं ज़ोर ज़ोर से डाक्टर डाक्टर चिल्लाने लगा। विधी की हालत प्रतिपल ख़राब होती जा रही थी। उसकी हालत देख कर मेरी जान हलक में आकर फॅस गई थी।

तभी कमरे में भागते हुए डाक्टर नर्सें और रितू दीदी आ गई। उनके पीछे ही विधी के माॅम डैड भी आ गए। उनके चेहरे से ही लग रहा था कि उनकी हालत बहुत ख़राब है। डाक्टर ने आते ही विधी को देखा।

"देखिये इनकी हालत बहुत ख़राब है।" डाक्टर ने विधी को चेक करने के बाद कहा___"ऐसा लगता है कि आज इनका बचना बहुत मुश्किल है।"
"डाऽऽऽऽक्टर।" मैं पूरी शक्ति से चीख पड़ा था___"ज़ुबान सम्हाल कर बात कर वरना हलक से ज़ुबान खींच कर तेरे हाॅथ में दे दूॅगा समझे? मेरी विधी को कुछ नहीं होगा। इसे कुछ नहीं होने दूॅगा मैं। मैं इसे ठीक कर दूॅगा।"

"बेटीऽऽऽ।" विधी की माॅ भाग कर विधी के पास आई और रोते हुए बोली___"मैं कैसे जी पाऊॅगी अगर तुझे कुछ हो गया तो?"
"ममाॅ।" खाॅसते हुए विधी के मुख से लरजते हुए शब्द निकले___"आज मैं बहुत खुश हूॅ। अपने महबूब की बाहों में हूॅ। कितने अच्छे वक्त पर मेरा दम निकलने वाला है। उस भगवान से शिकायत तो थी मगर अब कोई शिकायत भी नहीं रह गई। उसने मेरी आख़िरी ख्वाहिश को जो पूरी कर दी माॅम। मेरे जाने के बाद डैड का ख़याल रखियेगा।"

"नहीं नहीं।" मैं ज़ार ज़ार रो पड़ा___"तुम्हें कुछ नहीं होगा विधी और अगर कुछ हो गया न तो सारी दुनियाॅ को आग लगा दूॅगा मैं। सबको जीवन मृत्यु देने वाले उस ईश्वर से नफ़रत करने लगूॅगा मैं।"
"ऐसा मत कहो राज।" विधी ने थरथराते लबों से कहा___"मरना तो एक दिन सबको ही होता है, फर्क सिर्फ इतना है कि कोई जल्दी मर जाता है तो कोई ज़रा देर से। मगर हर कोई मरता ज़रूर है। मेरे लिए इससे बड़ी भला और क्या बात हो सकती है कि मैं अपने जन्म देने वाले माता पिता के सामने और अपने महबूब की बाहों में मरने जा रही हूॅ। मुझे हॅसते हुए विदा करो मेरे साजन। तुम्हारी ये दासी तुम्हारे इन खूबसूरत अधरों की मुस्कान देख कर मरना चाहती है। मुझसे वादा करों मेरे महबूब कि मेरे जाने के बाद तुम खुद को कभी तक़लीफ़ नहीं दोगे। किसी ऐसी लड़की के साथ अपनी दुनियाॅ बसा लोगे जो तुमसे इस विधी से भी ज्यादा प्यार करे।"

"नहीं विधी नहीं।" मैंने रोते हुए झुक कर उसके माथे से अपना माथा सटा लिया___"मत करो ऐसी बातें। तुम मुझे छोंड़ कहीं नहीं जाओगी। मैं तुम्हारे बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता।"
"क्या यही प्यार करते हो मुझसे?" विधी ने अटकते हुए स्वर में कहा___"बोलो मेरे देवता। ये कैसा प्यार है तुम्हारा कि तुम अपनी इस दासी की अंतिम इच्छा भी पूरी नहीं कर रहे?"

"मैं कुछ नहीं जानता विधी।" मैने मजबूती से सिर हिलाते हुए कहा___"मुझे प्यार व्यार कुछ नहीं दिख रहा। मैं सिर्फ इतना जानता हूॅ कि तुम मुझे अकेला छोंड़ कर कहीं नहीं जाओगी बस।"
"अरे मैं तुम्हें छोंड़ कर कहाॅ जा रही हूॅ राज?" विधी ने मेरे चेहरे को सहला कर कहा___"मेरा दिल मेरी आत्मा तो तुममें ही बसी है। तुम मुझे हर वक्त अपने क़रीब ही महसूस करोगे। ये तो जिस्मों की जुदाई है राज, और इस जिस्म का जुदा होना भी तो ज़रूरी है। क्योंकि मेरा ये जिस्म तुम्हारे लायक नहीं रहा। ये बहुत मैला हो चुका है मेरे महबूब। इसका खाक़ में मिल जाना बहुत ज़रूरी हो गया है।"

"दीदी इसे समझाओ न।" मैने पलट कर दीदी की तरफ देखते हुए कहा___"देखिये कैसी बेकार की बातें कर रही है ये। इससे कहिये न दीदी कि ये मुझे छोंड़ कहीं न जाए। इससे कहिये न कि मैं इसके बिना जी नहीं पाऊॅगा।"

मेरी बात सुन कर दीदी कुछ बोलने ही वाली थी कि सहसा इधर विधी को फिर से खाॅसी का धचका लगा। मैने पलट कर विधी को देखा। उसके मुख से खून निकल कर बाहर आ गया था।

"रराऽऽज।" विधी ने उखड़ती हुई साॅसों के साथ कहा___"अब मुझे जाना होगा। मुझे वचन दो मेरे हमदम कि तुम मेरे बाद कभी भी खुद को दुखी नहीं रखोगे। अपनी इस दासी को वचन दो मेरे देवता। मुझे हॅसते हुए विदा करो। और....और एक बार अपनी वो मनमोहक मुस्कान दिखा दो न मुझे। मेरे पास समय नहीं है, मेरे प्राण लेने के लिए देवदूत आ रहे हैं। मैं उन्हें अपनी तरफ आते हुए स्पष्ट देख रही हूॅ।"

"नहींऽऽऽ।" मैं बुरी तरह रो पड़ा___"ऐसा मत कहो। मुझे यूॅ छोंड़ कर मत जाओ प्लीऽऽऽज़। मैं मर जाऊॅगा विधी।"
"हठ न करो मेरे महबूब।" विधी को हिचकियाॅ आने लगी थीं, बोली___"मुझे वचन दो राज। मेरी अंतिम यात्रा को आसान बना दो मेरे देवता।"

मेरे दिलो दिमाग़ ने काम करना मानों बंद कर दिया था। मगर विधी की करुण पुकार ने मुझे बिवश कर दिया। मैंने देखा कि उसका एक हाथ मुझसे वचन लेने के लिए हवा में उठा हुआ था। मैने उसके हाॅथ में अपना हाॅथ रख दिया। मेरे हाॅथ को पकड़ कर उसने हल्के से दबाया। उसके निस्तेज पड़ चुके चेहरे पर हल्का सा नूर दिखा।

"अब अपने अधरों की वो खूबसूरत मुस्कान भी दिखा दो राज।" विधी ने बंद होती पलकों के साथ साथ मगर टूटती हुई साॅसों के साथ कहा___"एक मुद्दत हो गई मैने इन अधरों की उस मनमोहक मुस्कान को नहीं देखा। देर न करो मेरे देवता, जल्दी से दिखा दो वो मुस्कान मुझे।"

ये कैसा सितम था मुझ पर कि इस हाल में भी मुझे वो मुस्कुराने को कह रही थी। भला ये कैसे कर सकता था मैं और भला ये कैसे हो सकता था मुझसे? मगर मेरी जान ने ये रज़ा की थी मुझसे। उसकी आख़िरी ख्वाहिश को पूरा करना मेरा फर्ज़ था, भले ही ये मेरे लिए नामुमकिन था। मैने खुद को बड़ी मुश्किल से सम्हाला। रितू दीदी मेरे पीछे ही मुझे पकड़े बैठी हुई थी। सिरहाने की तरफ विधी के माॅम डैड ऑसुओं से तर चेहरा लिए खड़े थे। कुछ दूरी पर वो डाक्टर और नर्स खड़ी थी। जिनके चेहरों पर इस वक्त दुख के भाव गर्दिश कर रहे थे।

मैने देखा कि मेरी बाहों में पड़ी विधी बड़ी मुश्किल से अपनी ऑखें खोले मुझे ही देखने की कोशिश में लगी थी। मेरे ऑखों से रह रह कर ऑसूॅ बह जाते थे। दिलो दिमाग़ के जज़्बात मेरे बस में नहीं थे। मैने खुद को सम्हालने के लिए और अपने अधरों पर मुस्कान लाने के लिए अपनी ऑखें बंद कर बेकाबूॅ हो चुके जज़्बातों पर काबू पाने की नाकाम सी कोशिश की। उसके बाद ऑखें खोल कर मैने विधी की तरफ देखा, मेरे होठों पर बड़ी मुश्किल से हल्की सी मुस्कान उभरी। मेरी उस मुस्कान को देख कर विधी के सूखे हुए अधरों पर भी हल्की सी मुस्कान उभर आई। और फिर तभी.......

मैने महसूस किया कि उसका जिस्म एकदम से ढीला पड़ गया है। हलाॅकि वो मुझे उसी तरह एकटक देखती हुई हल्का सा मुस्कुरा रही थी। उसके जिस्म में कोई हरकत नहीं हो रही थी। अभी मैं ये सब महसूस ही कर रहा था कि तभी मेरे कानों में विधी की माॅ की ज़ोरदार चीख सुनाई दी। उनकी इस चीख़ से जैसे सबको होश आया और फिर तो जैसे चीखों का और रोने का बाज़ार गर्म हो गया। मुझे मेरे कानों में सबका रुदन स्पष्ट सुनाई दे रहा था मगर मेरी निगाहें अपलक विधी के चेहरे पर गड़ी हुई थी। मैं एकदम से शून्य में खोया हुआ था।

हास्पिटल के उस कमरे में मौजूद विधी के माॅम डैड और रितू दीदी बुरी तरह विधी से लिपटे रोये जा रहे थे। सबसे ज्यादा हालत ख़राब विधी की माॅम की थी। उसके डैड मानो सदमें में जा चुके थे। मेरे कानों में सबका रोना चिल्लाना ऐसे सुनाई दे रहा था जैसे किसी अंधकूप में ये सब मौजूद हों।

सहसा रितू दीदी का ध्यान मुझ पर गया। मैं एकटक विधी की खुली हुई ऑखों को और उसके अधरों पर उभरी हल्की सी उस मुस्कान को देखे जा रहा था। मेरा दिलो दिमाग़ एकदम से सुन्न पड़ा हुआ था। रितू दीदी ने मुझे पकड़ कर ज़ोर से हिलाया। किन्तु मुझ पर कुछ भी असर न हुआ। मेरे चेहरे पर कोई भाव नहीं थे, ऐसा लग रहा था जैसे मैं ज़िंदा तो हूॅ मगर मेरे अंदर किसी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही है।

"राऽऽऽऽज।" रितू दीदी मुझे पकड़ कर झकझोरते हुए चीखी___"होश में आ मेरे भाई। देख विधी हमे छोंड़ कर चली गई रे। तू सुन रहा है न मेरी बात?"
"शान्त हो जाओ दीदी।" मैने धीरे से उनसे कहा___"मेरी विधी मुझे सुकून से देख रही है। उसे देखने दो दीदी। देखिये न दीदी, मेरी विधी के होंठो पर कितनी सुंदर मुस्कान फैली हुई है। इसे ऐसे ही मुस्कुराने दीजिए। अरे....आप सब इतना शोर क्यों कर रहे हैं? प्लीज़ चुप हो जाइये। वरना मेरी विधी को अच्छा नहीं लगेगा। उसे सुकून से मुस्कुराने दीजिए।"

रितू दीदी ही नहीं बल्कि विधी के माॅम डैड भी मेरी इस बात से सन्न रह गए। जबकि मैं बड़े प्यार से विधी के चेहरे पर आ गई उसके बालों की लट को एक तरफ हटाते हुए उसे देखे जा रहा था। मैं उसकी उस मुस्कान को देख कर खुद भी मुस्कुरा रहा था।

सहसा पीछे से रितू दीदी मुझसे लिपट गई और बुरी तरह सिसकने लगीं। विधी की माॅ ने मेरे सिर पर प्यार से अपना हाॅथ रखा। वो खुद भी सिसक रही थी।
"बेटा, अपने आपको सम्हालो।" वो बराबर मेरे सिर पर हाॅथ फेरते हुए सिसक रही थी___"जाने वाली तो अब चली गई है। वो लौट कर वापस नहीं आएगी। कब तक तुम अपनी इस विधी को इस तरह देखते रहोगे?"

"चुप हो जाइये माॅ।" मैने सिर उठाकर बड़ी मासूमियत से कहा___"कुछ मत बोलिए। देखिए न विधी सुकून से कैसे मुझे देख कर मुस्कुरा रही है। इसे ऐसे ही मुस्कुराने दीजिए माॅ। इसे डिस्टर्ब मत कीजिए।"

मेरी बातों से सब समझ गए थे कि मुझ पर पागलपन सवार हो चुका है। मैं इस बात को स्वीकार नहीं कर रहा हूॅ कि विधी अब इस दुनियाॅ में नहीं रही। ये देख कर सबकी ऑखों से ऑसू छलकने लगे। विधी के डैड मेरे पास आए और मुझे उन्होंने अपने से छुपका लिया।

"ये कैसा प्यार है बेटा?" फिर वो रुॅधे हुए गले से बोल पड़े___"तुम दोनो का ये प्रेम हमें पहले क्यों नहीं पता चल पाया? तुम्हारे जैसा दामाद मुझे मिलता तो जैसे मुझे सारी दुनियाॅ की दौलत मिल जाती। हे भगवान कितना बेरहम है तू। मेरे मासूम से बच्चों के साथ इतना बड़ा घात किया तुमने? तेरा कलेजा ज़रा भी नहीं काॅपा?"

विधी के डैड खुद को सम्हाल न सके और वो मुझे अपने से छुपकाए बुरी तरह रो पड़े। पास ही में खड़े डाक्टर और नर्स भी हम सबकी हालत देख कर बेहद दुखी नज़र आ रहे थे। ख़ैर, काफी देर तक यही माहौल कायम रहा। हर कोई मुझे समझा रहा था, बहला रहा था मगर मैं बस यही कहता जा रहा था कि___"आप सब शान्त रहिए, मेरी विधी को यूॅ शोर करके डिस्टर्ब मत कीजिए।"

उस वक्त तो मेरा दिमाग़ ही ख़राब हो गया जब सब लोग मुझे विधी से अलग करने लगे। डाक्टर ने एम्बूलेन्स का इंतजाम कर दिया था। इस लिए विधी के डैड अब अपनी बेटी के मृत शरीर को हास्पिटल से ले जाने के लिए मुझे विधी से अलग करने लगे। मैं विधी से अलग नहीं हो रहा था। सब मुझे समझा रहे थे। विधी की माॅ मेरे इस पागलपन से बुरी तरह रोते हुए मुझे अपने से छुपकाये हुए थी। रितू दीदी मुझे छोंड़ ही नहीं रही थी।

आख़िर, सबके समझाने बुझाने के बाद और काफी मसक्कत करने के बाद मैं विधी से अलग हुआ। मगर मैने विधी को हाथ नहीं लगाने दिया किसी को। मैने खुद ही उसे अपनी बाहों में उठा लिया और फिर सबके ज़ोर देने पर कमरे से बाहर की तरफ बढ़ चला। मेरे चेहरे पर दुख दर्द के कोई भाव नहीं थे। मैं अपनी बाहों में विधी को लिए बाहर की तरफ आ गया। विधी की जो ऑखें पहले खुली हुई थी उन ऑखों को उनकी पलकों के साथ विधी के डैड ने अपनी हॅथेली से बंद कर दिया था। किन्तु उसके अधरों पर फैली हुई वो मुस्कान अभी भी वैसी ही कायम थी।

थोड़ी ही देर में हम सब हास्पिटल के बाहर आ गए। हास्पिटल के बाहर एम्बूलेन्स खड़ी थी। बाएॅ साइड मोटर साइकिल खड़ी थी जिसके पास ही खड़ा पवन किसी गहरे ख़यालों में खोया हुआ खड़ा था। हास्पिटल के बाहर आते ही जब कुछ शोर शराबा हुआ तो बरबस ही पवन का ध्यान हमारी तरफ गया। उसने पलट कर देखा हमारी तरफ। मेरी बाहों में विधी को इस हालत में देख कर वह सकते में आ गया। पलक झपकते ही उसकी हालत ख़राब हो गई। अपनी जगह पर खड़ा वो पत्थर की मूर्ति में तब्दील हो गया।

इधर थोड़ी ही देर में मैं विधी को लिए एम्बूलेन्स में सवार हो गया। मेरे साथ ही रितू दीदी, विधी की माॅ और उसके डैड बैठ गए। हम लोगों के बैठते ही एम्बूलेन्स का पिछला दरवाजा बंद ही किया जा रहा था कि सहसा भागते हुए पवन हमारे पास आया। एम्बूलेन्स के अंदर का दृष्य देखते ही उसके होश फाख्ता हो गए। एक स्ट्रेचर की तरह दिखने वाली लम्बी सी पाटरी पर विधी को सफेद कफन में गले तक ढॅका देखते ही पवन की ऑखें छलछला आईं। वो बुरी तरह मुझे देखते हुए रोने लगा। जबकि मैं एकदम शान्त अवस्था में विधी के होठों पर उभरी उस मुस्कान को देखे जा रहा था।

पवन के रोने की आवाज़ जैसे ही मेरे कानों में पड़ी मैने तुरंत पवन की तरफ देखा और उॅगली को अपने होठों पर रख कर उसे चुप रहने का इशारा किया। मेरे चेहरे के आव भाव देख कर पवन का कलेजा फटने को आ गया। वो बिना एक पल गवाॅए एम्बूलेन्स में चढ़ कर मेरे पास आ गया और मुझे शख्ती से पकड़ कर खुद से छुपका लिया। उसकी ऑखों से ऑसू रुक ही नहीं रहे थे।

रितू दीदी ने पवन को समझा बुझा कर चुप कराया और उसे घर जाने को कहा। किन्तु पवन मुझे छोंड़ कर जाने को तैयार ही नहीं हो रहा था। इस लिए रितू दीदी ने उसे समझाया कि उसका घर में रहना बहुत ज़रूरी है। क्योंकि उसके डैड यानी अजय सिंह का कोई भरोसा नहीं था कि वो क्या कर बैठे। ये तो उसे पता चल ही जाएगा कि राज यहाॅ पर किसके यहाॅ आया है? अगर उसे पता चल गया कि वो पवन के यहाॅ आया है तो उसके घर वालों के लिए ख़तरा हो जाएगा। रितू दीदी के बार बार समझाने पर पवन दुखी मन से एम्बूलेन्स से उतर गया।

पवन के उतरते ही एम्बूलेन्स चल पड़ी। विधी की माॅ अभी भी धीमी आवाज़ में सिसक रही थी। सामने की शीट पर विधी के माॅम डैड बैठे थे और इधर की शीट पर मैं व रितू दीदी। हमारे बीच का पोर्शन जो खाली था उसमें विधी को बड़ी सी स्ट्रेचर रूपी पाटरी पर लिटाया गया था। मैं एकटक उसकी मुस्कान को घूरे जा रहा था। मेरे लिए दुनियाॅ जहान से जैसे कोई मतलब नहीं था।

रितू दीदी को जैसे कुछ याद आया तो उन्होंने पाॅकेट से मोबाइल निकाल कर किसी से कुछ देर कुछ बात की और फिर काल कट करके मोबाइल पुनः अपनी पाॅकेट में डाल लिया। कुछ समय बाद ही एम्बूलेन्स रुकी और थोड़ी ही देर में पिछला गेट खुला तो विधी के माॅम डैड बाहर आ गए। उनके साथ ही रितू दीदी भी एम्बूलेन्स से बाहर आ गई। रितू दीदी ने मेरा हाॅथ पकड़ कर बाहर आने का इशारा किया। मैं बाहर की तरफ अजीब भाव से देखने लगा। सब मुझे ही दुखी भाव से देख रहे थे।

ख़ैर, हास्पिटल से आए दो कर्मचारियों ने उस स्ट्रेचर को बाहर निकाला जिस पर विधी लेटी हुई थी। स्ट्रेचर को बाहर निकाल कर उन्होंने उसे ज़मीन पर रखना ही चाहा था कि मैंने उन्हें पकड़ लिया। जिससे हवा में ही उन लोगों ने स्ट्रेचर को उठाये रखा। मैने विधी को अपनी बाहों में उठा लिया। विधी के माॅम डैड ये देख कर एक बार फिर से रो पड़े।

विधी को लेकर मैं विधी के घर की तरफ बढ़ा तो विधी के माॅम डैड भी आगे आ गए। आस पास के लोगों ने देखा तो कुछ ही समय में वहाॅ भीड़ जमा हो गई। आस पास के जिन लोगों से इनके अच्छे संबंध थे उन लोगों ने ये सब देख कर भारी दुख जताया। लगभग एक घण्टे बाद फिर से विधी को एक लकड़ी की स्ट्रेचर बना कर उसमे लिटाया गया। इन सब कामों के बीच मैं बराबर विधी के पास ही था और मेरे पास रितू दीदी मौजूद रहीं।

उस वक्त दिन के चार बज रहे थे जब मैं विधी के जनाजे को तीन और आदमियों के साथ लिए मरघट में पहुॅचा था। आगे की तरफ मैं और विधी के डैडी अपने अपने कंधे पर जनाजे का एक एक छोर रखा हुआ था। काफी सारे लोग हमारे साथ थे। मेरे चेहरे पर कोई भाव नहीं था। इतना कुछ होने के बाद भी मैं आश्चर्यजनक रूप से एकदम शान्त चित्त था। मरघट में पहुॅच कर हमने विधी के जनाजे को वहीं ज़मीन पर रखा। कुछ औरतें साथ आई हुई थी। उन लोगों ने वहाॅ पर कपड़ों के द्वारा चारो तरफ से पर्दा करके विधी को नहलाया धुलाया और फिर उसे कपड़े पहनाए। इसके बाद उसे लकड़ी की चिता पर लेटा दिया गया।

विधी को चिता में लेटे देख सहसा मुझे ज़ोर का झटका लगा। मेरी ऑखों के सामने पिछली सारी बातें बड़ी तेज़ी से घूमने लगीं। चिता के चारो तरफ सफेद कपड़ों में खड़े लोगों पर मेरी दृष्टि पड़ी। उन सबको देखने के बाद मेरी नज़र चिता पर सफेद कपड़ों में लिपटी विधी पर पड़ी। उसे उस हालत में देखते ही सहसा मेरे अंदर ज़ोर का चक्रवात सा उठा।

"विधीऽऽऽऽऽ।" मैं पूरी शक्ति से चीख पड़ा और भागते हुए चिता के पास पहुॅच गया। सफेद कपड़ों में ऑखें बंद किये लेटी विधी के चेहरे को देख कर मैं उससे लिपट गया और फूट फूट कर रोने लगा। पल भर में मेरी हालत ख़राब हो गई। विधी के चेहरे को दोनो हाॅथों से पकड़े मैं दहाड़ें मार मार कर रोये जा रहा था।

मुझे इस तरह विधी से लिपट कर रोते देख कुछ लोग भागते हुए मेरे पास आए और मुझे विधी के पास से खींच कर दूर ले जाने लगे। मैने उन सबको झटक दिया, वो सब दूर जाकर गिरे। खुद को उनके चंगुल से छुड़ाते ही मैं फिर से भागते हुए विधी के पास आया और फिर से उससे लिपट कर रोने लगा। मुझे इस हालत में ये सब करते देख विधी के डैड और रितू दीदी दौड़ कर मेरे पास आईं और मुझे विधी के पास से दूर ले जाने लगीं।

"खुद को सम्हालो राज।" रितू दीदी बुरी तरह रोते हुए बोली___"ये क्या पागलपन है? तुम ऐसा कैसे कर सकते हो? तुम अपनी विधी को दिये हुए वचन को कैसे तोड़ सकते हो? क्या तुम भूल गए कि अंतिम समय में विधी ने तुमसे क्या वचन लिया था?"

"दीदी विधी मुझे छोंड़ कर कैसे जा सकती है?" मैं उनसे लिपट कर रोते हुए बोला___"उससे कहो कि वो उठ कर मेरे पास आए।"
"अपने आपको सम्हालो बेटा।" सहसा विधी के डैड ने दुखी भाव से कहा___"इस तरह विलाप करने से तुम अपनी विधी की आत्मा को ही दुख दे रहे हो। ज़रा सोचो, वो तुम्हें इस तरह दुखी होकर रोते हुए देख रही होगी तो उस पर क्या गुज़र रही होगी? क्या तुम अपनी विधी को उसके मरने के बाद भी दुखी करना चाहते हो?"

"नहीं हर्गिज़ नहीं पापा जी।" मैंने पूरी ताकत से इंकान में सिर हिलाया___"मैं उसे ज़रा सा भी दुख नहीं दे सकता और ना ही उसे दुखी देख सकता हूॅ।"
"तो फिर ये पागलपन छोंड़ दो बेटे।" विधी के डैड मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोले___"अगर तुम इस तरह दुखी होगे और रोओगे तो विधी को बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा बल्कि उसे बहुत ज्यादा दुख होगा इस सबसे। इस लिए बेटा, अपने अंदर के जज़्बातों को शान्त करने की कोशिश करो और खुशी खुशी अपनी विधी को चिताग्नि दो। हाॅ बेटे, अब तुम्हें ही उसे चिताग्नि देनी है। तुम दोनो का रिश्ता आत्माओं से जुड़ा हुआ है इस लिए उसे चिताग्नि देने का हक़ सिर्फ तुम्हारा ही है। मेरी बेटी भले ही अब इस दुनियाॅ में नहीं है, मगर मेरे लिए तुम ही मेरे दामाद व बेटे रहोगे हमेशा। अब चलो बेटा और अपनी विधी को चिताग्नि दो।"

"अगर आप खुद इस बात को इस तरह कुबूल करके कहते हैं तो ठीक है पापा जी।" मैने दुखी भाव से कहा___"मगर मैं भी उसे यूॅ ही चिताग्नि नहीं दूॅगा। बल्कि उसे पहले सुहागन बना कर अपनी पत्नी बनाऊॅगा। फिर उसे चिताग्नि दूॅगा।"

मेरी ये बातें सुन कर विधी के डैड की ही नहीं बल्कि हर किसी की ऑखों से ऑसू छलक पड़े। विधी के डैड ने मुझे अपने सीने से लगा लिया। पंडित वहाॅ पर मौजूद था ही इस लिए सबकी सहमति से मैं विधी के पास गया और एक औरत के हाॅथ में मौजूद सिंदूर की डिबिया से अपनी दो चुटकियों में सिंदूर लिया और फिर उसे विधी की सूनी माॅग में भर दिया। मैंने अपने अंदर के जज़्बातों को लाख रोंका मगर मेरे ऑसुओं ने जैसे ऑखों से बगावत कर दी।

रितू दीदी और विधी के डैड दोनो ने मुझे कंधों से पकड़ा। मैने विधी की माॅग में सिंदूर भर कर उसे सुहागन बनाया, फिर उसके माथे को चूम कर पीछे हट गया। शान्त पड़े मरघट में एकाएक ही तेज़ हवा चली और फिर दो मिनट में ही शान्त हो गई। ये कदाचित इशारा था विधी का कि मेरी इस क्रिया से वह कितना खुश हो गई है।

पंडित ने कुछ देर कुछ पूजा करवाई और फिर उसने मुझसे अंतिम संस्कार की सारी विधि करवाई। तत्पश्चात मेरे हाथ में एक मोटा सा डण्डा पकड़ाया जिसके ऊपरी छोर पर मशाल की तरह आग जल रही थी। पंडित के ही निर्देश पर मैने उस मशाल से विधी को चिताग्नि दी।

देखते ही देखते लकड़ी की उस चिता पर आग ने अपना प्रभाव दिखाया और वह उग्र से उग्र होती चली गई। मैं भारी मन से विधी की जलती हुई चिता को देखे जा रहा था। मेरे पास रितू दीदी और विधी के माॅम डैड खड़े थे। कुछ समय बाद वहाॅ पर मौजूद लोग वहाॅ से धीरे धीरे जाने लगे। अंत में सिर्फ हम चार लोग ही रह गए।

विधी के डैड के ज़ोर देने पर ही मैं उनके साथ घर की तरफ वापस चला। मेरे अंदर भयंकर तूफान चल रहा था। मगर मैने शख्ती से उसे दबाया हुआ था। मुझे लग रहा था कि मैं दहाड़ें मार मार कर खूब रोऊॅ। उस ऊपर वाले से चीख चीख कर कहूॅ कि वो मेरी विधी को सही सलामत वापस कर दे मुझे। मगर कदाचित ऐसा होना अब संभव नहीं था। ख़ैर भारी मन के साथ ही हम सब घर आ गए।
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इस सब में शाम हो चुकी थी। रितू दीदी के फोन पर पवन का बार बार काल आ रहा था। इस वक्त मैं और रितू दीदी विधी के घर पर ही थे। घर में कोई न कोई बाहरी आदमी आता और शोग प्रकट करके चला जाता। धीरे धीरे शाम का अॅधेरा भी छाने लगा था। विधी के माॅम डैड ने मुझे और रितू दीदी को भी घर जाने को कहा। हम लोगों का वहाॅ से आने का मन तो नहीं था पर मजबूरी थी। इस लिए रितू दीदी मुझे लेकर वहाॅ से चल दी।

रास्ते में रितू दीदी के मोबाइल पर किसी का काल आया तो उन्होने देखा उसे और काल को पिक कर मोबाइल कान से लगा लिया। कुछ देर तक उन्होंने जाने क्या बात की फिर उन्होंने काल कट कर दी।

हास्पिटल के पास आते ही मैने देखा कि उनके सामने एक पुलिस जिप्सी आकर रुकी। रितू दीदी ने मुझे उस पर बैठने को कहा तो मैं चुपचाप बैठ गया। पुलिस जिप्सी से एक आदमी बाहर निकला। उसने दीदी को सैल्यूट किया।
"अब तुम जाओ रामसिंह।" रितू दीदी ने उससे कहा___"बाॅकी लोगों को भी सूचित कर देना कि सावधान रहेंगे और उन पर नज़र रखे रहेंगे।"
"यह मैडम।" उस आदमी ने कहने के साथ ही पुनः सैल्यूट किया और एक तरफ बढ़ गया।

उस आदमी के जाते ही दीदी जिप्सी की ड्राइविंग शीट पर बैठीं और उसे यूटर्न देकर एक तरफ को बढ़ा दिया। दीदी के बगल वाली शीट पर मैं चुपचाप बैठा था। मेरी ऑखें शून्य में डूबी हुई थी। मुझे पता ही नहीं चला कि जिप्सी कहाॅ कहाॅ से चलते हुए कब रुक गई थी। चौंका तब जब दीदी की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी। मैने इधर उधर देखा तो पता चला कि ये तो पवन के घर के सामने जिप्सी पर बैठा हुआ हूॅ मैं।

ये देख कर मैं जिप्सी से बिना कुछ बोले उतर गया और पवन के घर के अंदर की तरफ बढ़ा ही था कि सहसा दीदी ने कहा___"मेरी बात सुनो राज।"

दीदी की इस बात से मैने पलट कर उन्हें देखा। वो जिप्सी से उतर कर मेरे पास ही आ गई। तब तक जिप्सी की आवाज़ सुन कर अंदर से पवन और आदित्य भी आ गए थे। पवन और आदित्य मुझे देखते ही मुझसे लिपट कर रोने लगे। शायद पवन ने आदित्य को सारी कहानी बता दी थी। कुछ देर वो दोनो मुझसे लिपटे रोते रहे। उसके बाद रितू दीदी के कहने पर वो दोनो अलग हुए।

"मैं जानती हूॅ कि इस वक्त तुम लोग कहीं भी जाने की हालत में नहीं हो।" दीदी ने गंभीरता से कहा___"खास कर राज तो बिलकुल भी नहीं। मगर मैं ये भी जानती हूॅ कि तुम लोगों का यहाॅ पर रुकना भी सही नहीं है। इस लिए तुम सब मेरे साथ ऐसी जगह चलो जहाॅ पर तुम लोगों के होने की उम्मीद मेरे डैड कर ही नहीं सकते। हाॅ पवन, तुम सब मेरे फार्महाउस पर चल रहे हो अभी के अभी।"

"शायद आप ठीक कह रही हैं दीदी।" पवन ने बुझे मन से कहा___"मगर इतने सारे सामान के साथ हम सब एकसाथ कैसे वहाॅ जा सकेंगे? और कैसे जा सकेंगे? क्योंकि संभव है कि रास्ते में ही कहीं हमे अजय चाचा या उनके आदमी मिल जाएॅ।"
"उसकी चिंता तुम मत करो भाई।" दीदी ने कहा___"मैने वाहन का इंतजाम कर दिया है। लो वो आ भी गया।"

दीदी के कहने पर पवन ने पलट कर देखा तो सच में एक ऐसा वाहन उसे दिखा जिसे देख कर वो चौंक गया। दरअसल वो वाहन एक एम्बूलेन्स था। मेरी नज़र भी एम्बूलेन्स पर पड़ी तो उसे देख कर अनायास ही मेरा मन भारी हो गया। लाख रोंकने के बावजूद मेरी ऑखों से ऑसू छलक गए। ये देख कर रितू दीदी ने मुझे अपने सीने से लगा लिया।

"नहीं मेरे भाई।" रितू दीदी ने तड़प कर कहा__"ऐसे मत रो। तू नहीं जानता कि तेरी ऑखों से अगर ऑसू का एक कतरा भी गिरता है तो मेरे दिल में नस्तर सा चल जाता है। मैं जानती हूॅ कि इस सबको भूलना या इससे बाहर निकलना इतना आसान नहीं है तेरे लिए मगर खुद को सम्हालना तो पड़ेगा ही भाई। किसी और के लिए न सही मगर अपनी उस विधी के लिए जिसको तुमने वचन दिया है।"

"कैसे दीदी कैसे?" मेरी रुलाई फूट गई___"कैसे मैं उस सबको भुला दूॅ? मुझे तो अभी भी यकीन नहीं हो रहा है कि ऐसा कुछ हो गया है।"
"बस कुछ मत बोल मेरे भाई।" रितू दीदी ने मेरी ऑखों से ऑसू पोंछते हुए कहा___"शान्त हो जा। सब कुछ ठीक हो जाएगा। भगवान जब दुख देता है तो उसे सहने की शक्ति भी देता है। तू अपने अंदर उस शक्ति को महसूस कर भाई।"

मैं कुछ न बोला। मेरी इस हालत से पवन और आदित्य की ऑखों से भी ऑसू बहने लगे थे।
"पवन तुमने ये बात चाची और आशा को तो नहीं बताई न?" दीदी ने पवन से पूछा था।

दीदी के पूछने पर पवन ने अपना सिर झुका लिया। दीदी को समझते देर न लगी कि उसने ये बातें सबको बता दी है। अभी दीदी कुछ कहने ही वाली थी कि अंदर से रोने की आवाज़ें आने लगीं जो प्रतिपल तीब्र होती जा रही थी। रितू दीदी तेज़ी से मुझे लिये अंदर की तरफ बढ़ी। उनके पीछे पवन और आदित्य भी बढ़ चले।

अंदर बैठक तक भी न पहुॅचे थे कि रास्ते में ही पवन की माॅ और बहन रोते हुए मिल गईं। शायद उनको पता चल गया था कि मैं आ गया हूॅ। इस लिए दोनो ही रोते हुए बाहर की तरफ भागी चली आ रही थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो दोनो मुझसे लिपट कर बुरी तरह रोने लगीं। आशा दीदी की हालत तो बहुत ख़राब थी। वो मुझसे लिपटी बहुत ज्यादा रो रही थी। उन दोनो को देख कर मेरी भी रुलाई फूट पड़ी थी। रितू दीदी ने बड़ी मुश्किल से हम तीनों को चुप कराया। मगर आशा दीदी सिसकती रहीं।

"चाची आप तो समझदार हैं न।" रितू दीदी कह रही थी___"आपको तो समझना चाहिए न कि इस तरह रोने से राज को और भी ज्यादा तक़लीफ़ होगी। ये तो वैसे भी इसी सदमें में डूबा हुआ है। आपको तो इसे सम्हालना चाहिए पर आप दोनो तो खुद रो रो कर इसके दुख को बढ़ा रही हैं।"

रितू दीदी की बात माॅ के समझ में आ गई थी इस लिए उन्होंने जल्दी से अपने ऑसू पोंछ लिए और मुझे अपने से छुपका कर मुझे प्यार दुलार करने लगीं।

"पवन तुम दोनो सामान को जल्दी से उस वाहन पर रखो और जल्द से जल्द यहाॅ से चलने की तैयारी करो।" रितू दीदी ने पवन की तरफ देखते हुए कहा। दीदी के कहने पर पवन और आदित्य दोनो अंदर की तरफ बढ़ गए। कुछ ही देर में जो कुछ भी ज़रूरी सामान पैक कर दिया गया था उसे लाकर बाहर खड़ी एम्बूलेन्स में रख दिया उन दोनो ने।

सामान रख जाने के बाद रितू दीदी ने हम सबको उस एम्बूलेन्स में बैठने को कहा और खुद अकेले जिप्सी में बैठ गईं। घर से बाहर आकर माॅ ने दरवाजे पर ताला लगा दिया और मुझे साथ में लिये एम्बूलेन्स में बैठ गईं। पवन आदित्य और आशा दीदी पहले ही उसमें बैठ चुके थे। हम लोगों के बैठते ही रितू दीदी ने एम्बूलेन्स के ड्राइवर को अपने पीछे आने का इशारा कर दिया।

रितू दीदी के दिमाग़ की दाद देनी होगी, क्योंकि उन्होंने बहुत कुछ सोच कर वाहन के रूप में एम्बूलेन्स को चुना था। उनकी सोच थी कि एम्बूलेन्स में हम लोगों के बैठे होने की उनके डैड कल्पना भी न कर सकेंगे। और ऐसा हुआ भी। रास्ते में कहीं पर भी हमें अजय सिंह या उसका कोई आदमी नहीं मिला। एक जगह मिला भी पर उन लोगों ने एम्बूलेन्स पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। एम्बूलेन्स के सौ मीटर की दूरी पर रितू दीदी की जिप्सी आगे आगे चल रही थी। इतनी दूरी इस लिए ताकि कोई ये भी शक न करे कि एम्बूलेन्स रितू दीदी के साथ ही है।

ऐसे ही हम हल्दीपुर गाॅव से बाहर आ गए और उस नहर के पुल के पास से हम लोग पूर्व दिशा की तरफ मुड़ गए। लगभग बीस मिनट बाद हम सब दीदी के फार्महाउस पर पहुॅच गए। दीदी को ये भी पता चल चुका था कि मेरे साथ करुणा चाची और उनके बच्चों को भी मुम्बई जाना था मगर इस सबके हो जाने से उन्होंने मेरे फोन से करुणा चाची को फोन कर कह दिया था कि मैं आज नहीं जा रहा बल्कि वो अपने भाई के साथ यहीं पर आ जाएॅ कल।

फार्महाउस पर पहुॅच कर दीदी ने एम्बूलेन्स से सारा सामान उतरवा कर अंदर रखवा दिया। एम्बूलेन्स के जाने के बाद हम सब अंदर की तरफ बढ़ चले। अंदर ड्राइंगरूम में ही सोफे पर बैठी नैना बुआ पर मेरी नज़र पड़ी तो मैं हल्के से चौंका। नैना बुआ मुझे देखते ही सोफे से उठ कर भागते हुए मेरे पास आईं और झटके से मुझे अपने सीने से लगा लिया। उनकी ऑखों में ढेर सारे ऑसू आ गए थे मगर उन्होने उन्हें छलकने नहीं दिया। अपने जज़्बातों को बड़ी मुश्किल से दबाया हुआ था उन्होंने। शायद दीदी ने उन्हें सबकुछ बता दिया था और समझा भी दिया था कि मुझसे मिल कर वो ज्यादा रोयें नहीं।

ख़ैर, ऐसे माहौल में हम सब बेहद दुखी थे इस लिए उस रात किसी ने अन्न का एक दाना तक अपने मुख में नहीं डाला। रात में मेरे साथ बेड पर मेरे एक तरफ रितू दीदी थीं तो दूसरी तरफ आशा दीदी। सारी रात किसी भी ब्यक्ति को नींद नहीं आई। सबने मुझे अपने अपने तरीके से बहुत समझाया था। तब जाकर मुझे कुछ होश आया था। बेड पर मैं अपनी दोनो बहनों के बीच लेटा ऊपर घूम रहे पंखे को देखता रहा। सारी रात ऐसे ही गुज़र गई। मेरी दोनो बहनें अपने हृदय में मेरे प्रति दुख छुपाए मुझे अपनी अपनी तरफ से छुपकाए यूॅ ही लेटी रह गईं थी। आने वाली सुबह मेरे जीवन में और कैसे दुख दर्द की भूमिका बनाएगी इसके बारे में वक्त के सिवा कोई नहीं जानता था।


दोस्तो, अपडेट हाज़िर है,,,,,,,,

मैं नहीं जानता दोस्तो कि इस अपडेट में मैं वो सब डाल पाया हूॅ या नहीं जिन चीज़ों ने आप सबके दिलो दिमाग़ को हिला कर रख दिया हो। इतना ज़रूर कहूॅगा कि पिछले सभी एक से लेकर 44 अपडेट तक लिखना मेरे लिए इतना मुश्किल काम नहीं लगा था जितना कि इस अपडेट को लिखने में लगा है।

ख़ैर, आप सबकी खूबसूरत प्रतिक्रियाएॅ और शानदार फीडबैक का इन्तज़ार रहेगा।
 
एकनयासंसार

अपडेट.......《 46 》

अब तक,,,,,,,,

ऐसे ही हम हल्दीपुर गाॅव से बाहर आ गए और उस नहर के पुल के पास से हम लोग पूर्व दिशा की तरफ मुड़ गए। लगभग बीस मिनट बाद हम सब दीदी के फार्महाउस पर पहुॅच गए। दीदी को ये भी पता चल चुका था कि मेरे साथ करुणा चाची और उनके बच्चों को भी मुम्बई जाना था मगर इस सबके हो जाने से उन्होंने मेरे फोन से करुणा चाची को फोन कर कह दिया था कि मैं आज नहीं जा रहा बल्कि वो अपने भाई के साथ यहीं पर आ जाएॅ कल।

फार्महाउस पर पहुॅच कर दीदी ने एम्बूलेन्स से सारा सामान उतरवा कर अंदर रखवा दिया। एम्बूलेन्स के जाने के बाद हम सब अंदर की तरफ बढ़ चले। अंदर ड्राइंगरूम में ही सोफे पर बैठी नैना बुआ पर मेरी नज़र पड़ी तो मैं हल्के से चौंका। नैना बुआ मुझे देखते ही सोफे से उठ कर भागते हुए मेरे पास आईं और झटके से मुझे अपने सीने से लगा लिया। उनकी ऑखों में ढेर सारे ऑसू आ गए थे मगर उन्होने उन्हें छलकने नहीं दिया। अपने जज़्बातों को बड़ी मुश्किल से दबाया हुआ था उन्होंने। शायद दीदी ने उन्हें सबकुछ बता दिया था और समझा भी दिया था कि मुझसे मिल कर वो ज्यादा रोयें नहीं।

ख़ैर, ऐसे माहौल में हम सब बेहद दुखी थे इस लिए उस रात किसी ने अन्न का एक दाना तक अपने मुख में नहीं डाला। रात में मेरे साथ बेड पर मेरे एक तरफ रितू दीदी थीं तो दूसरी तरफ आशा दीदी। सारी रात किसी भी ब्यक्ति को नींद नहीं आई। सबने मुझे अपने अपने तरीके से बहुत समझाया था। तब जाकर मुझे कुछ होश आया था। बेड पर मैं अपनी दोनो बहनों के बीच लेटा ऊपर घूम रहे पंखे को देखता रहा। सारी रात ऐसे ही गुज़र गई। मेरी दोनो बहनें अपने हृदय में मेरे प्रति दुख छुपाए मुझे अपनी अपनी तरफ से छुपकाए यूॅ ही लेटी रह गईं थी। आने वाली सुबह मेरे जीवन में और कैसे दुख दर्द की भूमिका बनाएगी इसके बारे में वक्त के सिवा कोई नहीं जानता था।
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अब आगे,,,,,,,,

उधर, दोपहर से शाम और शाम से रात हो गई मगर अजय सिंह और शिवा को अपने उन आदमियों का कहीं कोई सुराग़ तक न मिल सका जिन आदमियों ने उन्हें विराज के आने की ख़बर दी थी। कहने का मतलब ये कि भीमा और मंगल आदि में से कोई भी अजय सिंह का भरोसेमंद आदमी अजय सिंह को न मिला। इस बात से दोनो बाप बेटे बेहद परेशान हो चुके थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उसके आदमी एक साथ सारे के सारे कैसे गायब हो गए?

अजय सिंह के बाॅकी के आदमी तो उसे मिले लेकिन उन लोगों को ना तो विराज का कोई सुराग़ मिला था और ना ही उन्हें ये पता था कि भीमा और मंगल के साथ साथ रहे बाॅकी आदमी कहाॅ और कैसे गायब हो गए? हैरान परेशान दोनो बाप बेटे वापस अपने नये वाले फार्म हाउस पर लौट आए थे। अपने बाॅकी बचे आदमियों को शख्त आदेश भी दे आए थे कि विराज के साथ साथ अपने उन गायब हुए आदमियों की भी खोज ख़बर करते रहें।

इस वक्त अजय सिंह और शिवा अपने फार्महाउस के ड्राइंगरूम में रखे सोफों पर चिंतित व परेशान हालत में बैठे थे। उन दोनो के सामने वाले सोफे पर प्रतिमा भी बैठी हुई थी। उसकी नज़रें दोनो बाप बेटों के चेहरों पर उभरे हुए भावों पर थी। उसे समझते ज़रा भी देर न लगी थी कि दोनो बाप बेटे शिकस्त खाकर आए हैं। पर जाने क्यों प्रतिमा को इस बात का पहले से ही अंदेशा था कि ऐसा ही कुछ होगा।

"ये तो कमाल ही हो गया न अजय।" प्रतिमा ने अजीब भाव से कहा___"तुम्हारे इतने सारे हट्टे कट्टे आदमियों ने एक बार फिर से तुम्हें नीचा दिखा दिया। तुम्हारी बड़ी बड़ी वो बातें महज कोरी बकवास के सिवा कुछ न थी। तुमने और तुम्हारे आदमियों ने आज तक वो काम किया ही नहीं जिस काम को 'फतह' के नाम से जाना जाता है। हर बार तुम अपने मंसूबों पर नाकामयाब ही हुए हो अजय। तुम्हारे पास पिछला ऐसा कोई काम नहीं है जिसका हवाला देकर तुम ये कह सको कि तुमने उस काम को सफलतापूर्वक किया था।"

प्रतिमा की इन बातों पर दोनो बाप बेटों के चेहरे झुक से गए थे। ऐसा लग रहा था जैसे उन दोनो में से किसी में भी बोलने की हिम्मत शेष न हो। ये अलग बात थी कि अजय सिंह के चेहरे पर भूकंप के से भाव अनायास ही गर्दिश करते नज़र आते और फिर वो लुप्त हो जाते।

"एक अदने से लड़के को पकड़ने गए थे तुम्हारे आदमी और खुद ही सारे के सारे गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गए।" प्रतिमा ने फिर कहना शुरू किया___"इस बात को कौन हजम कर पाएगा अजय? क्या तुम खुद हजम कर पा रहे हो कि तुम्हारे इतने सारे आदमियों के रहते हुए भी वो विराज को पकड़ने की तो बात दूर बल्कि खुद अपना ही ख़याल नहीं रख सके? क्या तुम ये कल्पना कर सकते हो कि अकेले विराज ने तुम्हारे इतने सारे आदमियों को इस तरह से गायब कर दिया कि तुम दोनो बाप बेटे उनका पता भी नहीं लगा सके?"

"यकीनन प्रतिमा।" सहसा अजय सिंह ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"ये सच है कि इस सबकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। ये सब जो कुछ भी हुआ है और जैसे भी हुआ है उसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। मगर, इस सब में अकेले विराज बस का हाॅथ नहीं हो सकता।"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" प्रतिमा हल्के से चौंकी थी।
"मतलब साफ है प्रतिमा।" अजय सिंह ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा___"मेरे इतने सारे आदमियों को एक साथ गायब कर देना कोई आसान बात नहीं है। मगर ये भी सच है कि ऐसा ही हुआ है। इस लिए इस काम को विराज खुद अकेले नहीं कर सकता। इस काम में ज़रूर उसकी किसी ने मदद की है। तुम खुद सोचो प्रतिमा कि मेरे बारह मुस्टंडे जैसे आदमियों को परास्त करना या उन्हें उस हालत पर ले आना कि वो अधमरे ही हों जाएॅ ये काम कितना मुश्किल हो सकता है? नहीं प्रतिमा नहीं, मैं किसी सूरत में नहीं मान सकता कि ये सब अकेले विराज ने किया है।"

"चलो मान लिया कि ये सब अकेले विराज नहीं कर सकता।" प्रतिमा ने कहा___"बल्कि इस काम में किसी ने उसकी मदद की, मगर सवाल ये है कि किसने की उसकी मदद? यहाॅ पर ऐसा कौन है जो इस तरीके से विराज की मदद कर सकता है?"

"मुझे लगता है कि इस बारे में हमें शुरू से सोच विचार करना चाहिए।" अजय सिंह ने कहने के साथ ही शिगार सुलगा लिया___"हाॅ प्रतिमा, हमें इस बारे में शुरू से विचार विमर्ष करना होगा, वो भी बड़ी बारीकी से। ग़लती तो यकीनन हुई है हमसे। हमने शुरू से ही विराज को बहुत छोटा समझा था। हमारे मन में ये बात बैठी हुई थी कि वो ये सब कर ही नहीं सकता। हमने हमेशा उसकी औकात पर सवाल उठाया, शायद इसी का ये परिणाम है कि हम शुरू से हर बात में नाकामी का स्वाद चख रहे हैं। मगर अब हमें समझ आ चुका है डियर। हमें समझ आ चुका है कि हमारे साथ ये सब एक खेल ही हो रहा है शुरू से। एक अच्छा खिलाड़ी वही होता है जो अपने प्रतिद्वंदी को कभी भी कम करके न ऑके, बल्कि उसे भी अपनी तरह ही उच्च कोटि का खिलाड़ी समझे। तभी हमें समझ आता है कि अब हमें किस तरह की
अब हमें किस तरह की चाल चलना चाहिए? मगर ये सब बातें मैने कभी भी सोचने की जहमत नहीं की।"

"शुकर है अजय।" प्रतिमा ने कहा___"कि तुम्हें ये बात समझ में आ गई कि तुम्हारा हमेशा से विराज को तुच्छ समझना सरासर ग़लत और नासमझी थी। हलाॅकि इस बारे में मैने तुम्हें पहले भी कहा था कि विराज को तुच्छ समझना निहायत ही ग़लत बात है। क्योंकि मौजूदा हालात में अगर तुम्हारा कोई दुश्मन हो सकता था तो सिर्फ विराज। ख़ैर, अब जब ये बात तुम्हारी समझ में आ ही गई है तो अब क्या सोच विचार करना चाहोगे इस बारे में तुम?"

"सोच विचार करने के लिए बहुत सारी बातें हैं।" अजय सिंह ने शिगार का गहरा कश लेकर उसका धुऑ ऊपर हवा में छोंड़ते हुए कहा___"पर बात चूॅकि शुरू से सोच विचार करने की है इस लिए शुरू से ही शुरू करते हैं। मैं सवाल खड़ा करूॅगा और तुम उस पर अपनी राय ब्यक्त करना।"

"ओके आई एम रेडी।" प्रतिमा ने सम्हल कर बैठते हुए कहा___"यू मे प्रोसीड।"
"हमारे साथ ये खेल फैक्ट्री में आग लगने से शुरू हुआ था।" अजय सिंह ने सोचते हुए कहा___"इसमें कई सवाल हैं, पहला ये कि फैक्ट्री में आग कैसे लगी या किसने लगाई थी? दूसरा सवाल ये कि फैक्ट्री में बने उस गुप्त तहखाने के अंदर मौजूद मेरा वो ग़ैर कानूनी सामान रितू द्वारा छानबीन करने पर क्यों नहीं मिला? वो सारा सामान उस गुप्त तहखाने से किसने गायब किया? यहाॅ ये सवाल नहीं पैदा हो सकता कि वो सब चीज़ें बमों के धमाके से लगी भीषण आग में जल गई होंगी, क्योंकि जली हुई चीज़ के अवशेष ज़रूर मिलते हैं और फाॅरेंसिक जाॅच से ये बात भी पता चल जाती है कि जो चीज़ जली थी वो असल में क्या थी? ख़ैर, मैं ये कह रहा हूॅ फैक्ट्री में लगी आग के बारे में और तहखाने से उन सारी चीज़ों के गायब हो जाने के बारे में तुम्हारी क्या राय है?"

"सबसे पहली बात तो ये है कि फैक्ट्री में लगी आग का मामला ज़रा पेंचीदा था।" प्रतिमा ने बेचैनी से पहलू बदलते हुए कहा___"पेंचीदा इस लिए क्योंकि उसमें किसी के भी बारे में कोई ठोस निष्कर्श नहीं निकल सकता था। घुमा फिरा कर बात सिर्फ विराज पर ही आकर रुकती थी। हलाॅकि ये बात ग़लत हो ऐसा कम ही लगता था। लेकिन मेरे ज़हन में एक बात ये भी है कि जिस समय फैक्ट्री में आग लगने का मामला आया था उसी समय तुम्हारे पार्टनर सक्सेना ने भी पार्टनरशिप तोड़ने की बात की ही नहीं बल्कि तोड़ ही दी थी। सक्सेना ने पार्टनरशिप तोड़ने की वजह ये बताई थी कि वो विदेश में सेटल होना चाहता है और वहीं पर अपना कोई बिजनेस करना चाहता है। इस बात पर कितना इत्तेफाक़ रखा जा सकता है?"

"तुम आख़िर कहना क्या चाहती हो?" अजय सिंह का दिमाग़ मानो चकरा सा गया था।
"मैं ये कहना चाहती हूॅ कि सक्सेना ने पार्टनरशिप तोड़ने की जो वजह बताई थी उसमें कितनी सच्चाई थी?" फिर प्रतिमा ने कहा___"तुम्हारे अनुसार उसे ये पता नहीं था कि फैक्टरी में कोई गुप्त तहखाना है जहाॅ पर तुम अपना गैर कानूनी सामान छुपा कर रखते थे। जबकि ऐसा भी तो हो सकता है कि ये सब उसे किसी तरह से पता चल ही गया रहा हो। उस सूरत में वो डर गया हो कि ऐसे काम में वह किसी दिन तुम्हारे साथ साथ खुद भी न कानून की गिरफ्त में आ जाए। इस लिए उसने तुमसे पार्टनरशिप तोड़ लेने में ही अपनी भलाई समझी हो, किन्तु उसे लगा होगा कि पार्टनरशिप तोड़ने की कोई माकूल वजह भी होनी चाहिए तभी उसे अपना सारा पैसा तुमसे मिल सकता था।"

"लेकिन इसमें ऐसा तो नहीं हो सकता था न कि सारा हिसाब किताब चुकता होने के बाद सक्सेना मेरी फैक्ट्री में आग लगा देता।" अजय सिंह ने कहा___"सीधी सी बात है डियर, तुम्हारे अनुसार सक्सेना को कानून का डर सताया इस लिए उसने मुझसे पार्टनरशिप तोड़ी और अपना हिसाब किताब चुकता कर लिया। लेकिन इस सबके बाद वो भला मेरी फैक्ट्री में आग क्यों लगाएगा? उसे जिस चीज़ का डर था वो तो पार्टनरशिप टूटते ही दूर हो गया था। अगर तुम ये समझती हो कि फैक्ट्री में आग सक्सेना ने लगाई थी तो मैं इस बात से सहमत नहीं हूॅ।"

"इसका मतलब तुम इस मामले में सक्सेना को क्लीन चिट दे रहे हो?" प्रतिमा ने गहरी नज़र से देखा उसे।
"बेशक।" अजय सिंह ने पूरे आतमविश्वास के साथ कहा।
"और कोई दूसरा ऐसा कर ही नहीं सकता?" प्रतिमा ने कहा___"मेरा मतलब तुम्हारे किसी बिजनेस कम्पटीटर से है।"

"यस आफकोर्स।" अजय सिंह ने कहा___"मेरा ऐसा कोई बिजनेस कम्पटीटर ही नहीं है जो मेरी फैक्ट्री में आग लगा कर मेरा इतना बड़ा नुकसान कर दे।"
"तो फिर बचा कौन?" प्रतिमा ने कहा।
"क्या मतलब??" अजय सिंह एकाएक ही चौंक पड़ा।

"अरे डियर, हम हर चीज़ के बारे में विचार विमर्ष कर रहे हैं न?" प्रतिमा मुस्कुराई।
"ओह हाॅ।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली___"ख़ैर, तो फिर बचा कौन का क्या मतलब है तुम्हारा?"
"तुम्हारी लाइफ में तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन कौन है?" प्रतिमा ने पूछा था।

"विराज और उसकी माॅ बहन।" अजय सिंह के भाव बड़ी तेज़ी से कठोर हो गए थे।
"बिलकुल सही।" प्रतिमा ने कहा___"विराज एक ऐसा शख्स है जो मौजूदा वक्त में तुम्हारे साथ कुछ भी कर सकता है। इस लिए अगर फैक्ट्री में लगी आग में सिर्फ और सिर्फ विराज का ही हाॅथ है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।"

"लेकिन सवाल ये है कि उसने इतना बड़ा अविश्वसनीय काम किया कैसे होगा?" अजय सिंह के माथे पर सोच के भाव उभर आए___"दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि उसे कैसे पता कि फैक्ट्री में कोई गुप्त तहखाना है और उस तहखाने के अंदर मैने एक अलग ही जुर्म की दुनियाॅ बना रखी है?"

"किसी तरह उसने इस सबका पता तो कर ही लिया होगा माई डियर हस्बैण्ड।" प्रतिमा ने कहा___"काम जब ऐसे बड़े बड़े करने होते हैं न तो उसके बारे में अपने पास हर चीज़ की जानकारी का होना भी ज़रूरी होता है।"
"यही तो सवाल है डियर।" अजय सिंह ने कहा__"भला उसे इस बात की जानकारी कैसे हो गई कि फैक्ट्री के अंदर मैने क्या क्या चीज़ें छुपाई हुईं हैं? जबकि ये भी सच है कि वह कभी मेरी फैक्ट्री में गया ही नहीं था। फिर कैसे ये सब पता हो सकता है उसे? दूसरी बात, वो तो मुम्बई में है फिर वो वहाॅ से ये काम कैसे कर सकता है?"

"संभव है कि विराज उस समय मुम्बई से यहाॅ आया रहा हो।" प्रतिमा ने तर्क दिया।
"अगर वो मुम्बई से यहाॅ आता तो क्या वो मेरे आदमियों की नज़र में नहीं आ जाता?" अजय सिंह बोला__"आज भी तो वो मेरे आदमी भीमा की नज़र में आ ही गया था।"

"ऐसा भी तो हो सकता है कि उसने तुम्हारे आदमियों को चकमा दे दिया रहा हो उस समय।" प्रतिमा ने पुनः तर्क दिया___"क्योंकि बिना उसके यहाॅ आए वह हमारी फैक्ट्री में कैसे आग लगा देता? या फिर ऐसा हो सकता है कि उसके इशारे पर ये काम उसके ही किसी साथी ने किया होगा।"

"हाॅ ऐसा हो सकता है।" अजय सिंह के मस्तिष्क में जैसे झनाका सा हुआ, बोला___"ये यकीनन हो सकता है प्रतिमा। बचपन से जवानी तक वो इस गाॅव में रहा है, इस लिए ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि यहाॅ पर उसका कोई घनिष्ठ दोस्त या मित्र न बना हो, बल्कि ज़रूर बना होगा। सबका कोई न कोई घनिष्ठ मित्र ज़रूर होता है, उसका भी कोई ऐसा ही खास मित्र होगा यहाॅ। इस लिए ये संभव है कि विराज ने ये काम अपने किसी ऐसे ही मित्र द्वारा करवाया हो सकता है। इस बारे में तो हमें पहले ही सोचना चाहिए था डियर। वो भले ही मुम्बई में है लेकिन अपने किसी खास दोस्त के द्वारा वो ज़रूर हमारी पल पल की ख़बर लेता रहा होगा। अब भी ले रहा होगा।"

"आपने बिलकुल सही कहा डैड।" सहसा इतनी देर से चुप बैठा शिवा कह उठा___"उस कमीने के कई दोस्त हैं यहाॅ। लेकिन एक दोस्त तो उसका बहुत ही खास है। मैं उसे अच्छी तरह जानता हूॅ। कई बार मैने उसके दोस्त को उसके साथ देखा भी था। उसके उस दोस्त का नाम शायद पवन है, यस डैड...पवन सिंह। यही नाम है उसके दोस्त का।"

"वैरी गुड।" अजय सिंह के चेहरे पर बड़ी मुद्दत के बाद राहत के भाव उभरे, बोला___"इसका मतलब वो हरामज़ादा अपने उस दोस्त पवन के ज़रिये ये सब करवा रहा था। नहीं छोंड़ूॅगा उस मादरचोद को। उसके सारे खानदान का नामो निशान मिटा दूॅगा मैं।"

"तुम्हें क्या लगता है अजय?" प्रतिमा ने सहसा अजीब भाव से कहा___"ये कि विराज महामूर्ख है?"
"व्हाट डू यू मीन?" अजय सिंह की ऑखें फैली।
"जिस विराज ने अपने दोस्त को इतने बड़े काम को करने के लिए कहा होगा उसने क्या अपने दोस्त और उसके परिवार की सुरक्षा का ख़याल नहीं रखा होगा?" प्रतिमा एक ही साॅस में कहती चली गई___"ये तो विराज को भी पता है कि अगर वो किसी के द्वारा अपना कोई काम करवाएगा तो देर सवेर तुम्हें इसका पता चल ही जाएगा। उस सूरत में तुम उसके साथ क्या सुलूक करोगे इसका अंदाज़ा उसने पहले ही लगा लिया होगा। हाॅ अजय, विराज ये कभी नहीं चाहेगा कि उसके काम की वजह से उसके दोस्त के साथ साथ उसके दोस्त के परिवार वालों की ज़िंदगी भी ख़तरे में पड़ जाए। इस लिए मेरा ख़याल यही है कि विराज ने अपने दोस्त और उसके परिवार की सुरक्षा के बारे में सोचते हुए कुछ तो ऐसा ज़रूर किया होगा जिससे तुम्हारा क़हर उन पर न टूटने पाए।"

"तुम्हारी इस बात में यकीनन सच्चाई की झलक दिख रही है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा___"मगर एक बार पता तो करना ही चाहिए हमें। क्योंकि अगर एक पल के लिए ये मान लें कि वैसा कुछ किया ही नहीं होगा विराज ने जैसे की तुम बात कर रही हो तो इस वक्त ज़रूर उसका दोस्त इसी गाॅव में अपने घर पर होगा। मैं एक बार इस बात की पक्के तौर पर जाॅच करवा लेना चाहता हूॅ।"

"ज़रूर जाॅच करवाओ अजय।" प्रतिमा ने अजीब भाव से कहा___"मगर मेरा अनुमान यही है कि तुम्हारे हाथ कुछ नहीं लगने वाला।"
"माॅम ये आप क्या कह रही हैं?" शिवा के स्वर में नाराज़गी थी, बोला___"क्या आप चाहती हैं कि हमारे हाॅथ कुछ न लगे?"

"बात ये नहीं है बेटे कि मैं चाहती नहीं हूॅ।" प्रतिमा ने शख्त भाव से कहा___"बात ये है कि अब तक हाॅसिल भी क्या हुआ है? हर बार तो नाकामी ही हाॅथ लगी है हमें और अब तो ये आलम हो गया है कि किसी भी चीज़ के हाॅसिल होने की उम्मीद ही नहीं होती।"

"मैं तुम्हारे जज़्बातों को समझ सकता हूॅ माई स्वीट डार्लिंग।" अजय सिंह ने कहा___"मैं जानता हूॅ कि हर बार मिली नाकामी से तुम निराश हो गई हो। मगर यकीन मानो डियर, हमेशा ऐसा नहीं होता है। एक दिन ऐसा ज़रूर आता है जब हमें कामयाबी भी मिलती है। तुम देखना कि जिस दिन हमें कामयाबी मिली उस दिन हम अपनी उस कामयाबी को किस किस तरीके से सेलीब्रेट करेंगे?"

अजय सिंह की बात का प्रतिमा ने कोई जवाब न दिया। वो बस अजय सिंह को अजीब भाव से देखती रही। जबकि अजय सिंह ने उसके चेहरे से नज़र हटा कर शिवा से पवन सिंह के घर के बारे में पहले पूॅछा फिर अपनी कोट की पाॅकेट से मोबाइल निकाला। मोबाइल पर उसने किसी को फोन लगाया। दूसरी तरफ से काल रिवीव किये जाने के बाद अजय सिंह ने उसे पवन सिंह के घर का पता बताया और उससे जल्द से जल्द पवन सिंह का पता लगाने का हुक्म दिया। उसके बार उसने काल कट करके मोबाइल को अपने सामने रखी टेबल पर रख दिया।

"तो डिबेट को आगे बढ़ाएॅ डियर?" अजय सिंह ने प्रतिमा की तरफ देख कर कहा___"मैने अपने एक आदमी को पवन सिंह का पता करने के लिए बोल दिया है। वो जल्द ही इस बारे में हमें सूचित करेगा। तब तक हम अपनी डिबेट को आगे बढ़ते हैं।"

"ठीक है जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।" प्रतिमा ने भावहीन स्वर में कहा___"शुरू करो।"
"यहाॅ पर इन सब बातों को संक्षेप में ये निर्णय निकालते हैं कि बाहरी कोई भी ब्यक्ति मेरे साथ ये सब नहीं कर रहा है।" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेकर कहा__"बल्कि ये सब करने वाला सिर्फ एक ही शख्स है और वो है विराज। पवन सिंह का नाम जुड़ने से जो बात सामने आई वो ये है कि मुम्बई में रहते हुए विराज ने अपने दोस्त के द्वारा ये सब करवाया। किन्तु यहाॅ सवाल ये है कि विराज के इस काम में उसके और कितने दोस्त शामिल थे? क्योंकि ये काम सिर्फ एक आदमी से तो हो नहीं सकता। इस लिए ये जानना ज़रूरी है उसने किस किस को अपने इस काम पर लगाया हुआ है?"

"तुम एक बात भूल रहे हो अजय।" प्रतिमा ने कहा__"वो ये कि फैक्ट्री में आग लगने से पहले भी एक खेल तुम्हारे साथ खेला गया था। याद है, वो विदेशी ब्यापारी। जो अपनी बीवी के साथ आया था और उसने तुम्हें भारी मात्रा में कपड़ा तैयार करने को कहा था। डील पक्की होने के बाद जब डिलीवरी का समय आया तो उस विदेशी ब्यापारी का कहीं कोई पता ही नहीं था। अगले दिन अख़बार में ख़बर छपी कि शहर के मशहूर बिजनेस मैन अजय सिंह को किसी विदेशी ब्यक्ति ने करोड़ों का चूना लगाया।"

"ओह हाॅ यार।" अजय सिंह की ऑखों के सामने दो विदेशी पति पत्नी की शक्ल घूम उठी___"उसका तो मुझे ख़याल ही नहीं रहा था।"
"होना चाहिए अजय।" प्रतिमा ने कहा___"क्योंकि तुम्हारे साथ खेल खेलने का आग़ाज़ तो वहीं से शुरू हुआ था न? ख़ैर, मेरा ख़याल ये है कि वो विदेशी ब्यक्ति कोई और नहीं खुद विराज ही था और उसकी पत्नी के रूप में खुद उसकी ही बहन निधी थी।"

"व्हाऽऽऽट???" अजय सिंह उछल पड़ा___"ऐसा तुम यकीन से कैसे कह सकती हो?"
"नायकीनी की भी कोई वजह बता दो मुझे?" प्रतिमा ने बड़े आत्मविश्वास से कहा___"तुम यकीन इस लिए नहीं कर पा रहे क्योंकि तुम अब भी यही समझते हो कि विराज किसी ढाबे या होटल में कप प्लेट धो रहा होगा और उसकी औकात नहीं कि वो ये सब अफोर्ड कर सके। लेकिन मैं इस बात को अलग तरह से सोचती हूॅ अजय। मैं ये सोचती हूॅ कि विराज एक पढ़ा लिखा लड़का है। वो बचपन से ही पढ़ने लिखने में सभी बच्चों से आगे था। उसका माइंड बड़ा शार्प था। कहने का मतलब ये कि जितना वो पढ़ा लिखा था उससे उसे कोई नौकरी मिल जाना कोई मुश्किल काम नहीं था। संभव है कि उसे कोई ऐसी नौकरी मिल गई हो जिसके तहत वो इतना तो अफोर्ड कर ही सके कि वो तुम्हारे साथ ऐसा खेल खेल सके। अगर तुम इस एंगल से सोचोगे अजय तो तुम्हें भी लगने लगेगा कि हाॅ वो लड़का ऐसा कर सकता है।"

प्रतिमा की इन सब बातों से अजय सिंह को भी एहसास हुआ कि प्रतिमा की बात में सच्चाई है। इस बात को उसे भी स्वीकार करना ही पड़ा कि विराज सभी बच्चों में सबसे ज्यादा पढ़ने में तेज़ था। उसे ये भी मानना पड़ा कि उसे कोई ऐसी नौकरी ज़रूर मिल गई रही होगी जिससे वो ये सब कर सके। अजय सिंह की ऑखों के सामने शिवा का वो अधमरी हालत मिलना घूम गया। इस बात से ये साफ ज़ाहिर होता है कि विराज़ के मन में इन लोगों के प्रति आक्रोश और बदले की भावना है। इस लिए उसका तो ये हमेशा प्रयास रहेगा कि वो अपने साथ हुए अत्याचार का बदला ले सके।

अजय सिंह के मनो मस्तिष्क में ये सब बातें बड़ी तेज़ी से चलने लगी थी, जिसका असर ये हुआ कि उसने इस सब को स्वीकार कर लिया कि ये सब कुछ विराज ने ही किया हो सकता है। फिर चाहे उसका वो विदेशी बनना हो या फिर फैक्ट्री में आग लगाना। अभी अजय सिंह ये सब सोच ही रहा था कि सामने टेबल पर रखा उसका मोबाइल बजने लगा। उन तीनों ध्यान एक साथ मोबाइल पर गया।

अजय सिंह ने हाॅथ बढ़ा कर मोबाइल उठाया और उस पर आ रही काल को रिसीव कर उसे कान से लगा लिया। उस तरफ से कुछ देर तक वो कुछ सुनता रहा उसके बाद उसने ये कह कर काल कट कर दिया कि___"अपने सब आदमियों से कहो कि वो सब उन लोगों का पता लगाएॅ। मुझे हर हाल में उन सबका पता चाहिए।"

"क्या बात हुई तुम्हारी अपने उस आदमी से?" प्रतिमा ने पूछा।
"तुम्हारा कहना बिलकुल सही था प्रतिमा।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली___"विराज ने सच में अपने उस दोस्त और उसके परिवार की सुरक्षा का ख़याल रखा हुआ था।"

"आख़िर क्या बताया तुम्हारे आदमी ने?" प्रतिमा ने कहा___"पूरी बात साफ साफ मुझे भी बताओ।"
"मेरा आदमी पवन सिंह के घर पर गया था।" अजय सिंह ने बताना शुरू किया___"किन्तु जब वो पवन ने घर के दरवाजे पर पहुॅचा तो देखा कि वहाॅ बड़ा सा ताला लगा हुआ था। उसके बाद मेरे उस आदमी ने आस पास वालों से पवन और उसके घर वालों के बारे में पूछा तो कुछ लोगों ने उसे बताया कि शाम को पवन के घर के सामने एक एम्बूलेन्स आई थी। उस एम्बूलेन्स में घर के अंदर से कुछ सामान लाकर रखा गया था और फिर उस एम्बूलेन्स में पवन, पवन की विधवा माॅ और उसकी एक बेटी बैठ गईं थी। इन लोगों के साथ दो आदमी और थे। वो दोनो भी उस एम्बूलेन्स में बैठ गए थे। एम्बूलेन्स के आगे ही एक जीप खड़ी थी। उस जीप के चलते ही वो एम्बूलेन्स भी चल पड़ी थी। इसके बाद वो लोग कहाॅ गए इसका किसी को कोई पता नहीं।"

"ओह इसका मतलब उन लोगों को पता था कि तुम्हें देर सवेर ये पता चल ही जाएगा कि विराज मुम्बई से आने के बाद पवन के घर पर ही ठहरा था।" प्रतिमा ने सोचने वाले भाव से कहा___"इस लिए, इससे पहले कि उन लोगों तक तुम्हारे आदमी पहुॅचें वो पहले ही वहाॅ से कूच कर गए। ख़ैर, अब तो तुम्हें यकीन आ गया न कि विराज ने ही ये सब किया है?"

"वो सब तो ठीक है डियर।" अजय सिंह के चेहरे पर गहन सोच के भाव थे, बोला___"मैंने मान लिया कि ये सब विराज ने ही किया होगा। मगर सोचने वाली बात है कि ये सब उसने कितना शातिराना ढंग से किया है। पवन और उसकी माॅ बहन को वो वहाॅ से एम्बूलेन्स जैसे वाहन से ले गया। कोई सोच भी नहीं सकता कि एम्बूलेन्स के अंदर कोई मरीज़ नहीं बल्कि ये सब मौजूद हो सकते हैं। मगर यहाॅ पर दो चीज़ें हैं जो समझ में नहीं आ रहीं।"

"कौन सी दो चीज़ें डैड?" शिवा ने चकित भाव से पूॅछा था।
"पहली चीज़ ये कि विराज के पास एम्बूलेन्स कहाॅ से आई?" अजय सिंह ने कहा___"साधारणरूप से यहाॅ पर उसके लिए एम्बूलेन्स का मिलना असंभव नहीं तो नामुमकिन बात तो है ही। दूसरी चीज़ ये कि एम्बूलेन्स के आगे जो जीप थी वो किसकी थी और उसमें कौन बैठा था? ये बात मेरे आदमी को पूछने पर भी किसी ने नहीं बताई कि उस जीप पर कौन कौन बैठा हुआ था? इसका मतलब तो यही हुआ कि पवन सिंह के अलावा भी कोई और है जो विराज की मदद कर रहा है।"

"विराज को एम्बूलेन्स कैसे मिल गई ये तो चलो साधारण बात हो सकती है।" प्रतिमा ने भी मानो अपने दिमाग़ के घोड़े दौड़ाए___"हो सकता है कि उसने ज्यादा पैसे देकर एम्बूलेन्स का जुगाड़ कर लिया होगा। मगर सोचने वाली बात तो उस जीप की है। यकीनन ये एक नया प्वाइंट है अजय। तुमने सही पकड़ा। पवन के अलावा भी कोई है जो इस समय विराज की मदद कर रहा है। पर कौन हो सकता है ऐसा ब्यक्ति? इस गाॅव में ऐसा कौन है जिसके पास खुद की जीप हो सकती है?"

"तुम्हारा मतलब है कि इस गाॅव में जिसके पास खुद की जीप होगी।" अजय सिंह ने चौंकते हुए कहा___"वही विराज की मदद कर रहा है?"
"हाॅ बिलकुल।" प्रतिमा ने झट से कहा___"क्या ऐसा नहीं हो सकता?"

"हो तो सकता है डियर।" अजय सिंह ने कहा___"मगर ये भी तो हो सकता है कि विराज ने वो जीप किराये पर हायर की हुई हो।"
"अगर विराज को अलग से कोई जीप हायर ही करना था तो पवन और उसकी माॅ बहन के साथ खुद भी एम्बूलेन्स से इस गाॅव से निकलने की क्या ज़रूरत थी?" प्रतिमा एक ही साॅस में कहती चली गई___"या तो वो किराये पर ली गई जीप से ही सबको साथ ले जाता या फिर सिर्फ एम्बूलेन्स के द्वारा ही सबको यहाॅ से ले जाता। दो अलग अलग वाहन साथ में रखने का क्या मतलब हो सकता है?"

"बात तो तुम्हारी सही है डियर।" अजय सिंह ने कहा___"मेरे आदमी ने बताया कि विराज सबको लेकर एम्बूलेन्स में ही बैठ गया था, ऐसा मेरे आदमी के पूछने पर कुछ लोगों ने उसे बताया है। जबकि दूसरी जीप में कौन बैठा था ये पता नहीं चला। इसका मतलब शायद ये भी हो सकता है कि पवन के अलावा जो दूसरा ब्यक्ति विराज की मदद कर रहा है वही उस जीप में था। एम्बूलेन्स के आगे आगे चलने का भी यही मतलब हो सकता है कि वो विराज एण्ड पार्टी को सुरक्षापूर्वक गाॅव से बाहर निकाल देना चाहता था। अब सवाल ये है कि वो जीप वाला दूसरा ब्यक्ति विराज एण्ड पार्टी को लेकर कहाॅ गया हो सकता है? शहर या फिर अपनी ही किसी सुरक्षित जगह पर?"

"सवाल तो ये भी है अजय कि विराज मुम्बई से यहाॅ आया किस लिए था?" प्रतिमा ने कहा___"यहाॅ पर उसका ऐसा क्या ज़रूरी काम था जिसके लिए उसने अपनी जान को भी ख़तरे में डाल दिया? विराज की माॅ गौरी ने उसे यहाॅ आने की इजाज़त कैसे दे दी होगी उसको?"

"संभव है कि वो अभय के बीवी बच्चों को लेने यहाॅ आया हो।" अजय सिंह ने संभावना ब्यक्त की थी।
"अगर उसके आने की यही वजह थी तो वो यहाॅ नहीं बल्कि सीधा अभय की ससुराल जाता।" प्रतिमा ने कहा___"करुणा तो अपने बच्चों के साथ अपने मायके में ही है। विराज सीधा वहीं जाता, और हमें उसके आने का पता भी नहीं चल पाता। मगर ऐसा हुआ नहीं बल्कि वो यहीं आया है। इसका मतलब यही हुआ कि वो जिस किसी भी काम से यहाॅ आया था वो कोई दूसरा ही काम था।"

"अब इसका पता तो खुद विराज ही बता सकता था या फिर उसका दोस्त पवन।" अजय सिंह ने एक नया शिगार सुलगाते हुए कहा___"मेरे आदमी उनकी खोज में लगे हैं। देखते हैं क्या नतीजा सामने आता है? ख़ैर, तब तक हम डिबेट को आगे बढ़ाते हैं।"

"अब कैसी डिबेट अजय?" प्रतिमा के माथे पर बल पड़ता चला गया___"ये बात तो क्लियर हो ही गई न उस सबमें विराज का ही हाॅथ था। उसने ही अपने दोस्त की मदद से वो सब किया था। फिर अब किस बात की डिबेट?"

"अभी तो बहुत कुछ बाॅकी है माई डियर।" अजय सिंह ने शिगार का गहरा कश लिया, बोला___"विचार विमर्ष के लिए और भी कई बातें शेष हैं।"
"अब और क्या बातें शेष हैं?" प्रतिमा ने पूछा।
"अभी तो एक सवाल ऐसा भी है डियर जिसे हम इग्नोर नहीं कर सकते।" अजय सिंह बोला___"जैसा कि हमारी डिबेट पर ये नतीजा निकला कि फैक्ट्री में आग विराज ने ही लगाई या लगवाई हो सकती है। इसमें भी दो बातें हैं, पहली ये कि क्या विराज को ये भी पता था कि फैक्ट्री में कोई गुप्त तहखाना है जिसके अंदर ग़ैर कानूनी चीज़ों का ज़खीरा मौजूद है? अगर हाॅ तो, क्या उसी ने उस ग़ैर कानूनी ज़खीरे को गायब किया या करवाया? या फिर दूसरी बात ये कि इस सबमें किसी और का भी हाॅथ था? क्योंकि सवाल इसी से निकल रहा है कि विराज को ये बात कैसे पता चली कि फैक्ट्री के अंदर कोई गुप्त तहखाना है जिसके अंदर मेरी ग़ैर कानूनी चीज़ें मौजूद हैं?"

"तुम कहना क्या चाहते हो अजय?" प्रतिमा ने उलझनपूर्ण भाव से पूछा था।
"बहुत साफ बात है डियर।" अजय सिंह ने कहा__"अगर ये मान कर चलें कि विराज मुझसे बदला लेना चाहता है तो उस सूरत में वो मेरी फैक्ट्री में यकीनन आग लगा सकता है और उस आग में फैक्ट्री के अंदर का सब कुछ जल कर ख़ाक़ में मिल जाएगा। उसे इस बात से कोई मतलब नहीं होगा कि इस सबमें मेरा क्या क्या और कितना नुकसान हो जाएगा? बदला लेने के रूप में ये एक नेचुरल बात हो गई। मगर, तहखाने से उन सब चीज़ों के गायब हो जाने से एक नई और सोचपूर्ण बात सामने आती है कि विराज ने उस सबको क्यों गायब किया और उस सबके बारे में उसे पता कैसे चला? मतलब साफ है डियर कि विराज को इस बात का अच्छी तरह से पता था कि फैक्ट्री के अंदर एक गुप्त तहखाना है और उस तहखाने के अंदर मेरी एक ग़ैर कानूनी दुनियाॅ मौजूद है। अब सवाल ये उठता है कि विराज को इस सबका कैसे पता था? क्योंकि वो तो कभी फैक्ट्री गया ही नहीं था, दूसरी बात वो मौजूदा वक्त में यहाॅ था भी नहीं तो कैसे उसे इतनी गुप्त बात का पता चल गया? इसका मतलब तो यही हुआ कि कोई ऐसा ब्यक्ति उसे मिला जिसने उसे फैक्ट्री के अंदर की इतनी बड़ी गुप्त बात बताई। वरना क्या उसे कोई ख़्वाब चमका था जिसमें उसने ये सब देख लिया होगा?"

"यकीनन तुम्हारी इस बात में प्वाइंट है।" प्रतिमा ने प्रभावित होने वाले भाव से कहा___"ये एक ज़बरदस्त प्वाइंट है अजय। फैक्ट्री में आग लगने वाले हादसे की कड़ियाॅ ऐसी हो सकती हैं____ विराज को सब कुछ पहले से ही किसी के द्वारा पता चल चुका था कि फैक्ट्री के अंदर मौजूद तहखाने में तुम्हारे द्वारा ग़ैर कानूनी धंधा भी किया जाता है। इस लिए उसने उस हिसाब से ही प्लान बनाया। मतलब ये कि फैक्ट्री में आग लगाने से पहले ही उसने तहखाने से वो सब चीज़ें निकाल कर अपने कब्जे में की, उसके बाद उसने तहखाने में टाइम बम फिट किया। कुछ टाइम बम उसने फैक्ट्री के अंदर उन जगहों पर भी फिट किये जहाॅ पर कपड़ों का स्टाॅक था और मशीनें थी। सारे टाइम बमों के फटने का टाइम एक ही था। सारी क्रिया करने के बाद वो फैक्ट्री के अंदर से बड़ी ही आसानी से बाहर निकल गया। उसके बाद क्या हुआ ये सबको पता ही है।"

"बिलकुल यही हुआ था।" अजय सिंह ने कहा___"अब सवाल यही है कि ऐसा वो कौन शख्स था जिसने विराज को तहखाने से संबंधित जानकारी दी? तहखाने के बारे में मेरे अलावा किसी को भी पता नहीं था। इस बात के पता होने का तो सवाल ही नहीं उठता कि उसके अंदर क्या मौजूद है।"

"कोई तो ऐसा ब्यक्ति ज़रूर था अजय।" प्रतिमा ने सोचने वाले भाव से कहा___"जिसने विराज को इतनी बड़ी गुप्त जानकारी दी। एक मिनट अजय.......जिस दिन फैक्ट्री में वो हादसा हुआ था उसी दिन या रात को तुम्हारा भूतपूर्व पार्टनर विदेश जाने के लिए प्लेन में बैठा था। एक बार इस बारे में फिर से सोचो डियर, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सक्सेना को पता चल गया हो कि फैक्ट्री के अंदर तहखाना भी है और उस तहखाने में तुम क्या धंधा करते हो? ऐसा बिलकुल हो सकता है अजय, सक्सेना के पास दूसरी कोई ठोस वजह नहीं थी यहाॅ से रफूचक्कर हो जाने की। वो तो तुम्हारा जिगरी यार भी था, ऐसा जिगरी कि उससे हमारे बड़े गहरे संबंध थे। उसकी बीवी तौम्हारे नीचे और तुम्हारी ये बीवी यानी कि मैं उसके नीचे। हम सब एक साथ कितना इन सबमें एन्ज्वाय करते थे। ऐसे मज़ेदार रिश्तों को अनायास ही छोंड़ कर विदेश चले जाने का दूसरा और क्या मतलब हो सकता है भला?"

"तुम ये कहना चाहती हो कि सक्सेना को फैक्ट्री के अंदर मौजूद तहखाने से संबंधित सबकुछ पता था।" अजय सिंह बोला___"उसके बाद वो मुझसे पीछा छुड़ाने के लिए कोई जुगत लगाने लगा। और फिर संयोग से उसकी मुलाक़ात विराज से हुई। उसने विराज को सब कुछ बता दिया और फिर वह मुझसे अपना हिसाब किताब करके यहाॅ से रफूचक्कर हो गया?"

"मेरा मतलब यकीनन यही है डियर हस्बैण्ड मगर इसमें बात इस तरह नहीं हुई जैसी कि तुमने सोच कर बयां की है।" प्रतिमा ने कहा___"बल्कि ऐसी हुई है, मेरी थ्योरी ये है ____विराज को तुमसे किसी भी तरह से बदला लेना था ये एक सच बात है। मगर उसने सोचा कि तुमसे अपना बदला लेने की उसमें क्षमता नहीं है। इस लिए उसने दिमाग़ लगाया। उसने तुमको अंदर से कमज़ोर करने का प्लान बनाया। सबसे पहले उसने अपनी बहन के साथ मिल कर विदेशी बिजनेस मैन का गेटअप बनाया और फिर तुमसे वो डील की। बाद में डिलीवरी के वक्त वो गायब हो गया। इसका नतीजा ये हुआ कि भारी मात्रा में तैयार किया गया कपड़ा बिक नहीं पाया और जो तुमने उसे तैयार करवाने में पैसा लगाया वो वसूल नहीं हो पाया। इससे तुम्हें काफी नुकसान हुआ। इसका एक नुकसान ये भी हुआ कि बिजनेस के क्षेत्र में इस तरह किसी विदेशी के हाॅथों धोखा खा जाने से तुम्हारी रेपुटेशन पर इसका बुरा असर पड़ गया। उसके बाद फैक्ट्री में आग लग जाने से जो भारी नुकसान हुआ उससे तुम पूरी तरह हिल गए। इतना कुछ होने के बाद भी तुम ये नहीं समझ पाए कि ये सब तुम्हारे क्यों और कौन कर रहा है? मगर विराज ने अपनी तरफ से तुम्हारे लिए एक क्लू भी छोंड़ा, वो क्लू ये था कि तहखाने के अंदर से उसने तुम्हारी सारी ग़ैर कानूनी चीज़ें गायब कर दी। यहाॅ उसने तुम्हें ये जता दिया कि ऐसा कैसे और कौन कर सकता है? ये अलग बात है कि ये बात तुम आज समझे हो। ख़ैर, इस बार तो वो खुद ही यहाॅ आया और तुम्हारे इतने सारे आदमियों को आश्चर्यजनक रूप से पता नहीं कहाॅ और कैसे गायब कर दिया?"

"ओह वैरी गुड।" अजय सिंह मुस्कुराया___"यकीनन इस थ्यौरी में दम है डियर। अब ये भी बता दो कि विराज ने तहखाने से मेरी वो सब ग़ैर कानूनी चीज़ें क्यों गायब की? उनसे उसे क्या फायदा हो सकता है भला?"
"कमाल करते हो अजय।" प्रतिमा चौंकी___"इतनी सी बात का मतलब पूछते हो मुझसे। खुद सोचो कि विराज ने वो सब क्यों गायब किया होगा? सीधी सी बात है अजय, वो सब चीज़ें तुम्हारे काले कारनामों का पुख्ता सबूत हैं। विराज अगर चाहे तो आज तुम्हें उन सब चीज़ों के आधार पर जेल पहुॅचवा सकता है। तुम्हें ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि ग़ैर कानूनी धंधा करने के जुर्म में कानून तुम्हें कितनी बड़ी सज़ा सुना सकता है? कहने का मतलब ये कि तुम्हारी स्वतंत्रता विराज के हाॅथों में है। वो अगर चाहे तो तुम कानून की गिरफ्त से दूर रहोगे और अगर वो चाहे तो आज इसी वक्त तुम कानून के शिकंजे में फॅस जाओ। मगर चूॅकि अब तक उसने ऐसा कुछ नहीं किया है इस लिए अभी तुम कानून की पहुॅच से बाहर हो। मगर इसका मतलब ये नहीं है भविष्य में भी ऐसा ही रहेगा। संभव है कि विराज किसी ऐसे वक्त पर ये सब करे जब उसे लगे कि यही सही वक्त है। दैट्स इट।"

प्रतिमा की ये बातें सुन कर अजय सिंह के समूचे जिस्म में झुरजुरी सी दौड़ गई। बगल से ही सोफे पर बैठे शिवा की ऑखों के सामने उसके बाप के दोनो हाॅथ कानून की हथकड़ी में बॅधे नज़र आए। इस दृष्य के घूमते ही शिवा की धड़कने एकाएक ही बढ़ चली थी। अभी ये सब ये लोग सोच ही रहे थे कि तभी एक बार फिर से अजय सिंह का मोबाइल बज उठा। हड़बड़ा कर अजय सिंह ने मोबाइल की काल को रिसीव कर मोबाइल को कान से लगा लिया।

".........।" उधर से कुछ देर तक कुछ कहा गया। जिसे सुन कर अजय सिंह के चेहरे पर चौंकने के भाव उभरे। उधर की बातें सुनने के बाद अजय सिंह ने ये कह कर फोन रख दिया कि____"ठीक है, तुम अपने कुछ आदमियों को गुनगुन रेलवे स्टेशन जाने को बोल दो और बाॅकी के लोग आस पास के क्षेत्र की अच्छे से छानबीन करते रहो।"

"क्या कहा तुम्हारे आदमी ने?" अजय सिंह के फोन रखते ही प्रतिमा ने पूछा था।
"उसने जो कुछ भी मुझे बताया है।" अजय सिंह ने अजीब भाव से कहा___"उसे जान कर मुझे यकीन नहीं हो रहा है प्रतिमा।"
"क्या मतलब??" प्रतिमा के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे___"किस बात का यकीन नहीं हो रहा तुम्हें?"

प्रतिमा के पूछने पर अजय सिंह ने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया। बल्कि चेहरे पर गंभीरता लिए उसने एक नया शिगार सुलगाया और दो तीन जल्दी जल्दी कश लेने के बाद उसने नाॅक व मुह से ढेर सारा धुआॅ उगला। प्रतिमा और शिवा दोनो ही उसके मुख से जवाब सुनने के लिए बेचैन से होने लगे थे। किन्तु अजय सिंह ने शिगार पी लेने के बाद भी कोई जवाब नहीं दिया। वो किसी गहरी सोच में डूबा नज़र आया। प्रतिमा उसके चेहरे पर इस तरह सोच के भाव देख कर चौंकी। उसने अजय सिंह को आवाज़ देकर सोच के सागर से निकाला। हक़ीक़त की दुनियाॅ में आकर अजय सिंह ने गहरी साॅस ली और एक झटके से सोफे पर से उठ कर खड़ा हो गया। उसने शिवा और प्रतिमा दोनो को हवेली चलने को कहा और बाहर की तरफ बढ़ता चला गया। दोनो माॅ बेटा भौचक्के से देखते रह गए थे अजय सिंह को।
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उधर रितू दीदी के फार्महाउस पर!
सुबह हुई और एक नये दिन तथा एक नये जीवन की शुरूआत हुई। सबके प्यार ने और सबके समझाने का असर ये हुआ था कि पिछले दिन की अपेक्षा आज मेरी हालत में काफी हद तक सुधार था। कल तो मैं सदमे में ही डूबा हुआ था। किसी से कोई मतलब ही नहीं था और ना ही किसी से कोई बात करने का दिल कर रहा था। मगर आज मैं काफी हद तक नार्मल था।

जब मेरी नींद खुली तो मैने देखा मेरे दोनो तरफ मुझसे छुपकी हुई मेरी दोनो बहनें सुकून से सो रही थी। उन दोनो के खूबसूरत तथा मासूम से चेहरों को देख कर ही मेरा मन खुश सा हो गया। वो दोनो मुझसे ऐसे छुपकी हुई थी मानो उन्हें डर हो कि मैं उन्हें छोंड़ कर कहीं दूर चला जाऊॅगा। मैं काफी देर तक उन दोनो को एकटक देखता रहा। आशा दीदी की तो ख़ैर बात ही अलग थी किन्तु रितू दीदी की बात सबसे जुदा थी। वो इस लिए क्योंकि बचपन से लेकर अब तक मैं उनके मुख से राज या भाई सुनने को तरस गया था। वो मुझे देखना तक गवाॅरा नहीं करती थी बात करने की तो बहुत दूर की बात है। मगर आज मेरी वही रितू दीदी मुझसे छुपकी हुई सो रही थी। उनके दिल में मेरे लिए बेपनाह प्यार व स्नेह था।

उन्हें इस तरह सुकून से सोते देख जाने क्यों मेरी ऑखों में ऑसू भर आए। मेरे दिल में दर्द की एक तेज़ लहर सी दौड़ गई। अभी मैं इस लहर से ब्यथित हुआ ही था कि सहसा रितू दीदी के सम्पूर्ण जिस्म में हरकत हुई और देखते ही देखते उनकी ऑखें खुल गईं। उनकी नज़र सबसे पहले मुझ पर ही पड़ी। मेरी ऑखों में ऑसू देखते ही वो बेचैन सी नज़र आने लगीं। उन्होंने अपना हाॅथ बढ़ा कर मेरे चेहरे को सहलाया और सिर को ना में हिलाते हुए मुझे इशारा किया कि मैं दुखी न होऊॅ।

इधर आशा दीदी की भी ऑखें खुल गई थी। सिर को ऊपर की तरफ उठा कर उन्होंने मुझे देखा और मेरी ऑखों में ऑसू देखते ही उन पर भी वही प्रतिक्रिया हुई जो रितू दीदी पर हुई थी। दोनो ने एक साथ ऊपर की तरफ खिसक कर मेरे माथे पर हल्के से चूमा। मैं अपनी दोनो बहनों का ये प्यार देख कर अंदर ही अंदर गदगद सा हो गया। मुझे एक अलग ही तरह का एहसास हुआ। ऐसा लगा कि अब मैं यहाॅ पर अकेला नहीं हूॅ बल्कि यहाॅ भी मेरे अपने हैं, जो मुझे इस हद तक प्यार करते हैं।

"तू इस तरह अब कभी दुखी मत होना राज।" रितू दीदी ने गंभीरता से कहा___"मैं मानती हूॅ कि अभी जो कुछ भी हुआ उससे तुझे गहरा सदमा लगा है। मगर तुझे खुद को सम्हालना होगा मेरे भाई। तू मुझे भाई के रूप में मिल गया है इस लिए मैं चाहती हूॅ कि मेरा भाई हमेशा खुश रहे। तेरे पास किसी भी प्रकार का दुख दर्द न आए। मैने भी ठान लिया है कि मैं तुझे कभी भी दुखी नहीं होने दूॅगी, और इसके लिए मैं किसी भी हद तक गुज़र जाऊॅगी।"

"रितू सही कह रही है राज।" आशा दीदी ने कहा__"अब से हम दोनो बहनें तुझे कभी भी दुखी नहीं होने देंगे। उसके लिए चाहे हमें जो भी करना पड़े हम करेंगे।"
"इसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी दीदी।" मैने हल्के से मुस्कुरा कर कहा___"क्योंकि जिसके पास आप जैसी इतना प्यार करने वाली दो दो बहनें हों उसको कोई दुख तक़लीफ कैसे हो जाएगी? आप चिन्ता मत कीजिए धीरे धीरे सब ठी हो जाएगा।"

"ये हुई न बात।" रितू दीदी ने मुस्कुरा कर कहा__"मुझे पता है कि मेरा स्वीट सा भाई कितना समझदार है। ख़ैर, चल अब तू फ्रेश हो ले। हम दोनो भी फ्रेश हो जाते हैं, उसके बाद नास्ता करेंगे साथ में। मुझे भी थाने जाना पड़ेगा न।"
"मुबारक हो दीदी।" मैने कहा___"आप पुलिस ऑफीसर बन गई हैं। मुझे पता है आपका शुरू से ही ये सपना था कि आप एक दिन पुलिस ऑफिसर बनो। इस लिए इसके लिए आपको ढेर सारी बॅधाईयाॅ दीदी।"

"थैंक्स राज।" दीदी ने कहा___"लेकिन मेरे माॅम डैड को मेरा पुलिस ऑफीसर बनना बिलकुल पसंद नहीं आ रहा है। आए दिन इस बारे में कोई न कोई बात होती रहती है घर में। मैने भी फैंसला कर लिया है कि अब ये पुलिस की नौकरी छोंड़ दूॅगी।"

"अरे ऐसा क्यों दीदी?" मैने चौंकते हुए कहा___"नहीं नहीं आप ऐसा बिलकुल नहीं करेंगी। पुलिस ऑफीसर बनना आपका ख़्वाब था और जब ये ख़्वाब पूरा हो ही गया है तो इसे इस तरह छोड़ कर अंदर ही अंदर हमेशा के लिए दुखी रहने वाला काम मत कीजिए। रही बात बड़े पापा और बड़ी माॅ की तो मुझे पता है वो ऐसा क्यों चाह रहे हैं?"

"अच्छा क्या पता है तुझे?" रितू दीदी ने मुस्कुरा कर पूछा___"ज़रा मैं भी तो सुनूॅ।"
"जिनके हाॅथ खून से रॅगे हों।" मैने कहा___"और जो जुर्म की दुनियाॅ से ताल्लुक रखता हो, वो तो पुलिस और कानून से डरेगा ही। आप तो वैसे भी एक तेज़ तर्रार पुलिस ऑफीसर हैं। उन्हें भी पता है कि आपको अगर ये पता चल जाए उनके डैड जुर्म की दुनियाॅ से ताल्लुक रखते हैं तो आप सेकण्ड भर का भी समय नहीं लगाएॅगी उन्हें कानून की गिरफ्त में लेने में। इस लिए वो नहीं चाहते हैं कि आप पुलिस की नौकरी करें।"

मेरी ये बातें सुन कर रितू दीदी ही नहीं बल्कि आशा दीदी भी बुरी तरह उछल पड़ी थी। रितू दीदी मुझे इस तरह देख रही थीं जैसे मैं कोई अजूबा हूॅ।

"तू ये बात इतने यकीन से कैसे कह सकता है कि मेरे डैड जुर्म की दुनियाॅ से ताल्लुक रखते हैं?" रितू दीदी ने चकित भाव से पूछा था।
"मुझे उनके बारे में हर चीज़ पता है दीदी।" मैने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"और मैं ये भी जानता हूॅ कि आप भी अपने डैड के बारे में बहुत कुछ जान चुकी हैं।"

"क्या मतलब????" रितू दीदी की ऑखें आश्चर्य से फैल गईं___"मैं बहुत कुछ क्या जान चुकी हूॅ?"
"जाने दीजिए दीदी।" मैने पहलू बदलने की गरज़ से कहा___"उन सब बातों को ज़ुबाॅ पर लाने का कोई मतलब नहीं है। आप ये पूछिये कि मुझे कैसे पता कि आप भी हुत कुछ जानती हैं?"

"हाॅ हाॅ बता न राज।" रितू दीदी के आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं था, बोली___"मैं जानना चाहती हूॅ कि ये सब तुझे कैसे पता है?"
"बड़ी सीधी सी बात है दीदी।" मैने कहा___"सबसे पहले तो यही कि आपका मेरे प्रति इतना प्यार ही ये ज़ाहिर कर देता है कि आपको उनकी असलियत के बारें में कुछ तो ऐसा पता चला ही जिसके तहत आपके दिल में मेरे प्रति प्यार जाग गया। दूसरी बात ये कि आप इस फार्महाउस में नैना बुआ के साथ रह रही हैं। इससे साबित हो जाता है कि आपको अपने माॅम डैड के बारे में कुछ तो ऐसा पता चल ही चुका है। वरना नैना बुआ को साथ लिए यहाॅ रहने का क्या कारण हो सकता है? तीसरी बात, मेरे दोस्त पवन से कह कर मुझे विधी से मिलाने के लिए मुम्बई से बुलाना। पवन और विधि के द्वारा भी आपको कुछ तो ऐसा पता चल ही चुका होगा जिससे आपको ये लगने लगा कि मैं और मेरी माॅ बहन इतने बुरे नहीं हो सकते जितना आपको बताया गया था बचपन से।"

रितू दीदी मेरी ये बातें सुन कर हैरान रह गईं। फिर सहसा उनके चेहरे पर प्रशंसा के भाव उभर आए। होठों पर हल्की सी मुस्कान भी फैल गई।
"यकीनन तूने बड़ी खूबसूरती से इन सब बातों का अंदाज़ा लगाया है राज।" फिर उन्होंने कहा___"और ये सच है कि मुझे अपने माॅम डैड की असलियत के बारे में पता चल चुका है। किन्तु अभी भी कुछ बातें हैं जिनका मुझे शायद पता नहीं है।"

"डोन्ट वरी दीदी।" मैने कहा___"जब इतना कुछ पता चल गया है तो बाॅकी का भी आपको पता चल ही जाएगा।"
"चल ठीक है मेरे प्यारे भाई।" रितू दीदी ने मेरे चेहरे को प्यार से सहलाया___"मैं तो बस इस बात से ही खुश हूॅ कि मुझे मेरा वो भाई मिल गया है जो सच में मुझे अपनी दीदी मानता है और मेरी इज्ज़त करता है। आने वाले समय में क्या होने वाला है ये तो वक्त ही बताएगा। मैं बस ये चाहती हूॅ कि जितने दिन तू यहाॅ है उतने दिन तक तुझ पर किही भी तरह के ख़तरे को न आने दूॅ।"

"आप फिक्र मत कीजिए दीदी।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"आपका ये भाई कोई दूध पीता बच्चा नहीं है जिसे कोई भी चोंट पहुॅचा देगा। इतना तो अब मुझमें सामर्थ है कि मैं अपनी सुरक्षा खुद कर सकूॅ।"
"हाॅ मुझे पता है।" रितू दीदी हॅस कर बोली___"मुझे पता है कि मेरे भाई ने दो मिनट के अंदर मेरे डैड के उतने सारे आदमियों का खात्मा कर दिया था।"

"वो तो बस हो गया दीदी।" मैने कहा___"पर आपके सामने तो कुछ भी नहीं हूॅ मैं। आपने भी तो मेरी सुरक्षा के लिए क्या कुछ नहीं किया है। मैं सोच भी नहीं सकता था कि आप मेरे लिए इतना कुछ कर सकती है।"
"तेरे लिए तो अब कुछ भी कर सकती हूॅ मेरे भाई।" दीदी की आवाज़ भारी हो गई___"बचपन से लेकर अब तक मैने तेरे साथ क्या किया है ये सोच कर ही मुझे खुद से घृणा होने लगती है। इस लिए अब मैं तेरे लिए और अपने भाई के लिए कुछ भी करूॅगी।"

मैने देखा कि ये सब कहते हुए दीदी की ऑखों में ऑसू आ गए थे इस लिए मैने उन्हें खुद से छुपका लिया। वो खुद भी मुझसे किसी जोंक की तरह चिपक गई थी।

"तुम दोनो का हो गया हो तो मेरा भी कुछ ख़याल कर लो।" सहसा आशा दीदी ने कहा___"मुझे तो भुला ही दिया तुम दोनो ने।"
"क्या आप सोच सकती हैं दीदी कि हम आपको भुला देंगे?" मैने आशा दीदी को खुद से छुपकाते हुए कहा था।

ऐसे ही कुछ देर तक हम तीनो भाई बहन एक दूसरे से छुपके रहे फिर हम तीनो अलग हुए। रितू दीदी ने मुझे फ्रेश हो जाने का कहा और खुद भी फ्रेश होने के लिए आशा दीदी को लेकर कमरे से बाहर निकल गईं। उन दोनो के जाने के बाद मैं कुछ देर यूॅ ही बेड पर लेटा किसी सोच में डूबा रहा फिर मैं उठ कर बाथरूम में चला गया।

नास्ते की टेबल पर सब कोई साथ में ही बैठ कर नास्ता कर रहा था। किचेन में हरिया काका की बीवी बिंदिया और पवन की माॅ ने नास्ता तैयार किया था। मैं अपनी नैना बुआ से ठीक तरह से मिला। उन्होंने मुझे अपने सीने से लगा कर बहुत प्यार दिया और हमेशा खुश रहने की दुवाएॅ दी।

रितू दीदी ने बताया कि आज करुणा चाची भी बच्चों के साथ यहीं आ रही हैं। उनको सुरक्षा पूर्वक यहाॅ पर लाने की जिम्मेदारी खुद रितू दीदी ने ही ली। हलाॅकि मैने उन्हें समझाया भी कि आप आराम से ड्यूटी जाइये, मैं और आदित्य करुणा चाची को उनके बच्चों के साथ सुरक्षित यहाॅ ले आएॅगे, मगर दीदी नहीं मानी। इस लिए मैने भी ज्यादा ज़ोर नहीं दिया। दीदी ने मुझे यहीं पर आराम करने की सलाह दी थी। हलाॅकि मैं चाहता था कि मैं एक बार विधी के घर जाऊॅ और उसके माॅम डैड का हाल चाल देख लूॅ मगर रितू दीदी ने कहा कि वो सब देख सुन लेंगी।

नास्ता करने के बाद रितू दीदी अपनी पुलिस जिप्सी में बैठ कर थाने चली गईं। नैना बुआ, आशा दीदी और पवन की माॅ ये तीनो एक साथ ही बातें करने में लग गईं। जबकि मैं पवन और आदित्य फार्महाउस के बाहर की तरफ आ गए। मैने देखा कि फार्महाउस काफी लंबा चौड़ा था। बाहर फ्रंट गेट पर दो बंदूखधारी खड़े थे। गेट के बगल से ही एक छोटी सी चौकी बनी हुई थी। जो शायद उन दोनो बंदूखधारियों के आराम करने के लिए थी।

हम तीनो एक साथ बाॅई तरफ बढ़ गये। उस तरफ एक सुंदर सा पेड़ था जिसके नीचे हरी हरी घास उगी हुई थी तथा पेड़ के पास ही स्टील की बड़ी बड़ी दो तीन बेंच रखी हुई थी बैठने के लिए। हम तीनो जाकर उन बेंचों पर बैठ गए। कल विधी वाले मैटर के बाद से हम तीनो कुछ बुझे बुझे से थे। मुझे रह रह कर विधी के बारे में वो सब याद आ जाता था जिसकी वजह से मेरा दिल दुखने लगता था।

"वैसे विराज।" सहसा आदित्य ने कहा___"हम यहाॅ से कब निकलने वाले हैं? ये जो कुछ भी हुआ वो यकीनन बहुत दुखद हुआ है मगर ये भी सच है दोस्त कि हमें जीवन में आगे बढ़ना ही होता है। ये सब तुम्हीं ने मुझसे कहा था न? इस लिए दोस्त विधी की खूबसूरत यादों को दिल में ही दबा के रखो और आगे बढ़ो।"

"मैं जानता हूॅ आदित्य।" मैने भारी मन से कहा___"मुझे पता है कि इस सबको लेकर बैठ जाने का कोई मतलब नहीं निकलने वाला है। मगर एक दो दिन मैं यहीं रह कर खुद को और अपने दिल को शान्त कर लेना चाहता हूॅ। मैं नहीं चाहता कि मेरे चेहरे पर छाई उदासी या किसी दुख के भाव को देख कर मुम्बई में मेरी माॅ और बहन को कुछ पता चल जाए। वो मुझे किसी भी कीमत पर दुखी नहीं देख सकती हैं।"

"बात तो तुम्हारी ठीक है दोस्त।" आदित्य ने कहा__"पर ये भी तो सोचो कि यहाॅ पर ज्यादा दिन तुम्हारा रुकना ठीक नहीं है। तुम्हारी जान को हर वक्त ख़तरा बना रहेगा।"
"मैं किसी ख़तरे से नहीं डरता आदित्य।" सहसा मेरे चेहरे पर कठोरता आ गई___"पहले मुझे कुछ पता नहीं था और मैं किसी दूसरे उद्देश्य से यहाॅ आया था इस लिए मैं अजय सिंह या उसके आदमियों से उलझना नहीं चाहता था। मगर अब मुझे किसी की कोई परवाह नहीं है। मैं भी तो देखूॅ कि अजय सिंह कैसे मेरा बाल बाॅका करता है?"

"ये सब तुम आवेश में कह रहे हो दोस्त।" आदित्य ने कहा___"जबकि तुम भूल रहे हो कि इस वक्त तुम्हारी कई कमज़ोरियाॅ तुम्हारे साथ साथ हैं। अगर तुम अकेले होते तो मान सकता था कि तुम धड़ल्ले के साथ उन सबका मुकाबला कर लेते मगर इस वक्त तुम अकेले नहीं हो। पवन और उसकी माॅ बहन भी तुम्हारे साथ हैं और तुम्हारे अभय चाचा के बीवी बच्चे भी तुम्हारे साथ तुम्हारी कमज़ोरी के रूप में जुड़ जाएॅगे। उस सूरत में तुम खुद की सुरक्षा करोगे या उन लोगों की जो इस वक्त तुम्हारे साथ जुड़ गए हैं?"

"आदित्य सही कह रहा है राज।" पवन ने भी हस्ताक्षेप किया___"इस वक्त तुम किसी से उलझने की पोजीशन में नहीं हो। दूसरी बात ये भी है कि मान लो अगर तुम्हारे बड़े पापा को ये पता चल गया कि तुम्हारे हर काम में तुम्हारी मदद रितू दीदी भी कर रही हैं तो सोचो क्या होगा? अरे रितू दीदी के लिए भी उनका ख़तरा हो जाएगा। भला अजय चाचा ये कैसे बरदास्त कर पाएॅगे कि उनकी बेटी उनके सबसे बड़े दुश्मन का साथ दे रही है? जिस तरह का कैरेक्टर तुम्हारे बड़े पापा का है उससे यही बात सामने आती है कि वो ये सब जानने के बाद अपनी बेटी को किसी भी सूरत में माफ़ नहीं करेंगे।"

"मैं पवन की इस बात से पूरी तरह सहमत हूॅ।" आदित्य ने कहा___"तुम अपनी वजह से भला अपनी रितू दीदी की जान को भी संकट में कैसे डाल सकते हो? उनके हित के बारे में सोचना तुम्हारा सबसे बड़ा फर्ज़ होना चाहिए दोस्त। उन्होंने तुम्हारी सुरक्षा के लिए क्या कुछ नहीं किया है?"

"कभी कभी वक्त और हालात के हिसाब से भी कोई फैंसला लेना चाहिए राज।" पवन ने कहा___"विधी के जाने का दुख हम सबको है मगर खुद विधी भी ये नहीं चाहेगी कि तुम पर या तुम्हारी वजह से किसी और पर कोई ऐसा संकट आए। इस लिए मैं यही कहूॅगा कि जितना जल्दी हो सके हमें यहाॅ से निकल जाना चाहिए। मैं तुम्हें जंग के लिए नहीं रोंक रहा भाई, वो तो तसल्ली से और सबको सुरक्षित करने के बाद भी की जा सकती है।"

"ठीक है यार।" मैने उन दोनो की बातों पर विचार करते हुए कहा___"जैसा तुम दोनो कहोगे मैं वैसा ही करूॅगा। हम सब कल ही यहाॅ से मुम्बई के लिए निकलेंगे। सबकी टिकटों का इंतजाम करवाता हूॅ मैं।"
"उसकी ज़रूरत नहीं है दोस्त।" आदित्य ने कहा__"सबकी टिकटों का इंतजाम हो गया है। मैने कल ही सर(जगदीश ओबराय) से बात की थी। उन्हें मैने यहाॅ कुछ बातें संक्षेप में बताई थी, और ये भी कहा था कि वो हम सबकी टिकटों का इंतजाम करवा दें। आज सुबह मेरे मोबाइल पर उन्होंने सबकी टिकट की पिक व्हाट्सएप पर भेज दी हैं।"

"चलो ये अच्छा हुआ।" मैने कहा___"लेकिन एक बात अभी भी सोचने वाली है। वो ये कि देर सवेर अजय सिंह को ये पता चल भी सकता है कि रितू दीदी मेरी हर तरह से मदद कर रही थी। इस लिए अगर ऐसा हुआ तो रिते दीदी के लिए भी ख़तरा हो सकता है।"

"तो तुम अब क्या चाहते हो?" आदित्य ने पूछा।
"मैं तो यही चाहूॅगा यार कि रितू दीदी पर कोई संकट न आए।" मैने कहा___"हलाॅकि वो एक पुलिस ऑफिसर हैं और किसी भी ख़तरे से निपटने के लिए वो खुद ही सक्षम हैं मगर फिर भी उन्हें यहाॅ अकेला छोंड़ देने का मेरा दिल नहीं करता है। दूसरी बात उनके साथ नैना बुआ भी तो हैं। रितू दीदी के साथ वो भी तो अजय सिंह के लपेटे में आ सकती हैं।"

"मेरे ख़याल से इस में इतना सोच विचार करने की ज़रूरत नहीं है राज।" पवन ने कहा___"रितू दीदी के रहते ये सब हो जाने का चान्स बहुत ही कम है। फिर भी अगर उन्हें लगेगा कि उन दोनो पर ख़तरा है तो वो अपनी सुरक्षा के लिए अपने आला अधिकारियों से पुलिस प्रोटेक्शन भी ले सकती हैं। मुझे यकीन है कि अजय चाचा उस सूरत में उनका और नैना बुआ का कुछ नहीं बिगाड़ सकेंगे।"

"यस पवन इज राइट।" आदित्य ने कहा___"इस लिए तुम्हें रितू दीदी और नैना बुआ की फिक्र नहीं करनी चाहिए।"
"ठीक है भाई।" मैने गहरी साॅस ली___"तो फाइनल हो गया कि हम सब कल यहाॅ से मुम्बई के लिए निकल लेंगे।"

मेरी इस बात से पवन और आदित्य मुस्कुरा कर रह गए। मैंने इधर उधर नज़रें घुमाई तो मेरी नज़र फार्महाउस के गेट पर खड़े दोनो बंदूखधारियों पर पड़ी। वो दोनो हॅस हॅस के कुछ बातें कर रहे थे। एक ब्यक्ति दूसरे वाले की पीठ भी ठोंक रहा था। मुझे समझ न आया कि ये दोनो ऐसी कौन सी बात पर हॅस रहे हैं और दूसरा उसकी पीठ ठोंक रहा है।

ख़ैर, कुछ देर तक हम वहीं बेंच पर बैठे रहे। उसके बाद हम तीनो उठे और वापस अंदर की तरफ बढ़ने लगे। अभी मैं दो चार क़दम ही आगे बढ़ा था कि उन दो बंदूखधारियों में से एक उससे कुछ बोला और फिर एक बार हम तीनों की तरफ सरसरी नज़र से देखा। उसके बाद वो मुस्कुराते हुए ही फार्महाउस के बाएॅ साइड बने एक अलग दरवाजे की तरफ बढ़ गया। मेरी नज़र बराबर उसी पर थी, वो आदमी उस दरवाजे के पास पहुॅच कर एक बार पहले वाले आदमी की तरफ मुस्कुरा कर देखा उसके बाद दरवाजे के अंदर दाखिल हो गया। मेरे मन में उसकी इन सब क्रियाओं से संदेह पैदा हो गया।

मुख्य द्वार के पास पहुॅचते ही मैने पवन और आदित्य को अंदर जाने का कह दिया और खुद बाहर ही थोड़ी देर बैठने का बोल कर वहीं खड़ा रह गया। मेरे कहने पर पवन और आदित्य दोनो ने मुझे अजीब भाव से देखा तो मैने अपनी पलकें झपका कर उन्हें तसल्ली रखने का इशारा किया। मेरे इस इशारे से वो दोनो अंदर की तरफ बढ़ गए। उनके जाने के कुछ देर बाद ही मैंने पहले वाले की तरफ देखा तो वो मुझे गेट के पास बनी चौकी की तरफ मुड़ कर हाॅथों में खैनी मलता नज़र आया। मैं बड़ी तेज़ी से उस दरवाजे की तरफ बढ़ गया जिस तरफ वो दूसरा आदमी गया था।

दरवाजे के पास पहुॅच कर मैने आहिस्ता से दरवाजे को अंदर की तरफ धकेला तो वो हल्की सी आवाज़ के साथ खुल गया। दरवाजे के खुलते ही मैं उसके अंदर दाखिल हो गया। अंदर आते ही मैने इधर उधर देखा तो मुझे दाईं तरफ एक गैलरी दिखी तो मैं उस गैलरी में आगे की तरफ बढ़ चला। कुछ ही दूरी पर मुझे एक कमरा नज़र आया जिसका दरवाजा हल्का सा खुला हुआ था। मैं उस खुले हुए दरवाजे के पास पहुॅच कर उसके खुले हुए भाग से अंदर की तरफ का मुआयना किया और फिर दरवाजे को खोल कर अंदर की तरफ दाखिल हो गया।

इस कमरे में मध्यम सी रोशनी थी। बाईं तरफ एक ऐसा दरवाजा नज़र आया जैसा कि वो किसी ऐसे वोल्ट का हो जिसके अंदर सरकार का बहुत सारा गोल्ड रखा गया हो। ये देख कर मेरे चेहरे पर नासमझने वाले भाव उभरे। उत्सुकतावश मैं उस दरवाजे की तरफ बढ़ गया। दरवाजे के पास पहुॅच कर मैने ध्यान से उस दरवाजे को देखा तो पता चला कि ये दरवाजा किसी मोटे लोहे से बना बहुत ही मजबूत दरवाजा है। किन्तु मैने देखा कि एक ही तरफ खुलने वाले उस दरवाजे पर भी हल्की सी झिरी थी। इसका मतलब वो आदमी जो अंदर आया था वो इसके अंदर ही गया है।

मेरा दिल ने अनायास ही किसी अंजानी आशंकावश ज़रा तेज़ी से धड़कना शुरू कर दिया था। मैने उस झिरी पर अपने कान सटा दिये। मैं अंदर की आवाज़ सुनने की कोशिश कर रहा था मगर मैं उस वक्त चौंका जब अंदर से किसी के ज़ोर से चीखने की आवाज़ आई। अंदर की तरफ किसी चीख़ की आवाज़ से मेरा दिमाग़ घूम गया। मैंने बिना कुछ सोचे समझे दरवाजे को हाथ बढ़ा कर खोल दिया और अंदर की तरफ बढ़ा ही था कि अचानक ही मैं एकदम से रुक गया। कारण दरवाजे के अंदर तीन फुट की दूरी पर ही सीढ़ियाॅ बनी हुई थी जो कि नीचे की तरफ जा रही थी। इसका मतलब ये कोई तहखाना था।

इस फार्महाउस पर किसी तहखाने के मौजूद होने का देख कर ही मैं सोच में पड़ गया। ख़ैर, मैने खुद को सम्हाला और नीचे की तरफ जा रही सीढ़ियों पर उतरता चला गया। नीचे तहखाने में एक अलग ही नज़ारा दिखा मुझे। जिसे देख कर मैं भौचक्का सा रह गया था।
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उस वक्त दोपहर के एक बज रहे थे जब रितू अपनी पुलिस जिप्सी में बैठी हवेली पहुॅची थी। यहाॅ पर वो आना तो नहीं चाहती थी किन्तु वो ये नहीं चाहती थी कि उसके न आने से उसके माॅम डैड उसके बारे में कोई अलग धारणा बना बैठें। वो इस बात को बखूबी समझती थी कि बहुत जल्द ऐसा कुछ होने वाला है जिससे हवेली का हर ब्यक्ति दहल जाएगा। वो आने वाले उस समय के लिए खुद को पूरी तरह तैयार कर चुकी थी।

जिप्सी से उतर कर रितू हाॅथ में पुलिसिया रुल लिए मुख्य द्वार की तरफ बढ़ चली। दरवाजे के पास पहुॅच कर उसने बंद दरवाजे को उसकी कुंडी से पकड़ कर बजाया। कुछ ही देर में दरवाजा खुला तो उसे अपने सामने शिवा खड़ा नज़र आया। शिवा पर नज़र पड़ते ही उसके चेहरे पर अप्रिय भाव उभरे मगर तुरंत ही उसने उन भावों को दबा कर दरवाजे के अंदर की तरफ बढ़ गई।

कुछ ही पलों में वो ड्राइंगरूम में पहुॅच गई। ड्राइंगरूम में इस वक्त अपने डैड अजय सिंह को बैठे देख वो मन ही मन चौंकी। बगल के सोफे पर प्रतिमा भी बैठी थी। रितू ने खुद को एकदम से नार्मल दर्शाते हुए एक अलग सोफे पर बैठ कर अजय सिंह की तरफ देखा, फिर बोली__"कैसे हैं डैड? आज आप फैक्ट्री नहीं गए?"

"हाॅ वो आज ज़रा थोड़ा लेट ही जाना था न।" अजय सिंह ने कहा___"इस लिए सुबह नहीं गया। ख़ैर, छोड़ो ये बताओ तुम्हें भी हमारी कुछ ख़ैर ख़बर रहती है कि नहीं?"
"आप ऐसा क्यों कह रहे हैं डैड?" रितू ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा___"भला आपकी ख़ैर ख़बर क्यों नहीं होगी मुझे?"

"अब ये तो तुम ही जानो बेटा।" अजय सिंह ने अजीब भाव से कहा___"क्योंकि पिछले कुछ समय से हर चीज़ बदली हुई नज़र आ रही है मुझे। पता नहीं पर जाने क्यों ऐसा लगता है मुझे कि मेरे जो अपने हैं वही मुझसे दूर जा रहे हैं।"
"क्या मतलब डैड??" रितू ने मन में एकाएक ही हैरत के भाव उभरे थे___"ये आज आप कैसी बाते कर रहे हैं? कहीं आप उस दिन की बात पर तो ऐसा नहीं कह रहे जब मैने शिवा को दो बातें सुना दी थी?"

"वो सब तो नार्मल बात है बेटा।" अजय सिंह ने बेचैनी से पहलू बदला___"तुमने अपने भाई से जो कुछ कहा वो बड़ी बहन होने के नाते तुम्हारा हक़ था।"
"तो फिर और क्या बात है डैड?" रितू ने कहा___"मुझे बताइये कि आपकी ऐसा क्यों लग रहा है कि आपके अपने आपसे दूर जा रहे हैं? अगर आपका इशारा मेरी तरफ है तो ये मेरे लिए शर्म की ही बात होगी कि मेरी वजह से आपको ऐसा लगा और आपके मन को ठेस पहुॅची है। प्लीज़ डैड बताइये न कि मुझसे ऐसा क्या हो गया है जिससे आपको मेरे बारे में ऐसा लग रहा है?"

"शायद तुम्हें इस बात का एहसास नहीं है बेटा कि मैं तुम सबसे कितना प्यार और दुलार करता हूॅ।" अजय सिंह ने सहसा भारी आवाज़ में कहा___"बचपन से लेकर अब तक हर वो चीज़ तुम सबके क़दमों में लाकर रखी जिन चीज़ों की तुम लोगों ने मुझसे फरमाईश की थी। इसके बावजूद मेरे प्यार में क्या कमी रह गई कि आज मेरी बेटी अपने ही माॅ बाप और भाई को बेगाना समझने लगी है?"

अजय सिंह की इस बात से रितू तो चौंकी ही मगर अलग अलग सोफों पर बैठे दोनो माॅ बेटा भी चौंक पड़े थे। दोनो कल से पूॅछ रहे थे कि क्या बताया था फोन पर उस आदमी ने मगर अजय सिंह ने उन दोनो के सवाल पर अब तक अपने होंठ सिले हुए थे। कदाचित वो ये सब रितू के आने के बाद ही उससे कहना चाहता था।

"ये आप क्या कह रहे हैं डैड?" रितू ने चकित भाव से कहा___"भला मैं ऐसा क्यों समझने लगूॅगी? मैं तो इस बारे में सोच भी नहीं सकती समझने की तो बात ही दूर है।"
"मुझे भी ऐसा ही लगता था बेटी।" अजय सिंह ने दुखी भाव से कहा___"मैं भी यही सोचा करता था कि मेरे बच्चे ऐसा कभी सोच भी नहीं सकते। मगर...मगर मेरी सारी सोच और सारी उम्मीदों को तोड़ दिया है तुमने।"

"नहीं डैड ऐसा मत कहिए प्लीज़।" रितू की ऑखें भर आईं____"अगर आपको मेरा पुलिस की नौकरी करना अच्छा नहीं लगता है तो मैं इस नौकरी को छोंड़ दूॅगी डैड। आपकी खुशी में ही मेरी खुशी है।"
"बात तुम्हारी नौकरी की नहीं है बैटा।" अजय सिंह ने कहा___"मुझे तुम्हारी पुलिस की नौकरी से कोई परेशानी नहीं है। यहाॅ पर बात हो रही है भरोसे की, विश्वास की। मुझे बहुत भरोसा था कि मेरे बच्चे कभी भी मेरे खिलाफ़ नहीं जा सकते। मगर मेरी ये भरोसा उसी तरह टूट कर बिखर गया जैसे कीई आईना टूट कर बिखर जाता है।"

"आख़िर आप कहना क्या चाहते हैं डैड?" रितू ने गंभीरता से कहा___"मैने ऐसा क्या कर दिया है जिससे आपका भरोसा टूट गया है? मुझे बताइये डैड, अगर मुझसे कहीं कोई ग़लती हुई है तो मैं उसे सुधार लूॅगी।"
"ये बात तो तुम्हें भी पता चल ही गई होगी।" अजय सिंह ने रितू के चेहरे की तरफ ज़रा गहरी नज़र से देखते हुए कहा___"कि हमारा सबसे बड़ा दुश्मन विराज यहाॅ हल्दीपुर आया हुआ था?"

"वि विराज??" रितू ने चौंकने की लाजवाब ऐक्टिंग की, बोली___"विराज यहाॅ आया? ये आप क्या कह रहे है डैड? भला वो कमीना यहाॅ किस लिए आएगा?"
"ओह, हैरत की बात है।" अजय सिंह ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"मतलब कि इस बारे में तुम्हें कुछ पता ही नहीं है। जबकि मेरे आदमी का स्पष्ट रूप से कहना है कि कल शाम जिस एम्बूलेन्स में बैठ कर विराज, उसका दोस्त, पवन और पवन की माॅ बहन अपने घर से निकले थे उस एम्बूलेन्स के आगे आगे एक जीप भी चल रही थी।"

"ये आप क्या कह रहे हैं डैड?" रितू अंदर ही अंदर बुरी तरह घबरा गई थी, किन्तु प्रत्यक्ष में खुद को सम्हालते हुए कहा___"मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा।"
"मैं जिस जीप की बात कर रहा हूॅ बेटा।" अजय सिंह ने सहसा शख्त भाव से कहा___"वो जीप असल में तुम्हारी पुलिस जिप्सी ही थी। इस गाॅव में हमारे अलावा किसी और के पास ऐसी कोई जीप है ही नहीं। हमारे आदमियों का अपनी जीप में बैठ कर विराज की उस एम्बूलेन्स के आगे आगे चलने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। फिर वो जीप किसकी हो सकती थी? हल्दीपुर में ऐसी कोई जीप पुलिस थाने में सिर्फ तुम्हें मिली हुई है। अब तुम सच सच बताओ कि तुम्हारा एम्बूलेन्स के आगे आगे चलने का क्या मतलब था?"

"ये तो हद हो गई डैड।" रितू की ऑखों से ऑसू छलक पड़े____"आप सरासर अपनी बेटी पर इल्ज़ाम लगा रहे हैं कि उस एम्बूलेन्स के आगे आगे चल रही जीप में मैं थी। जबकि आप अच्छी तरह जानते हैं कि ऐसा कुछ करने के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती हूॅ। सबसे पहली बात तो मुझे यही पता नहीं था कि वो कमीना विराज यहाॅ आया हुआ है जिसने कुछ समय पहले मेरे भाई शिवा को बुरी तरह मारा था। अगर पता होता तो मैं उसे खोज कर सबसे पहले अपने भाई की मार का बदला लेती उससे। उसके बाद उसे आपके हवाले कर देती। और आप कह रहे हैं कि मैं वो जीप मेरी थी जो उस एम्बूलेन्स के आगे आगे चल रही थी। इसका मतलब तो ये हुआ डैड कि आप ये समझ रहे हैं कि मैं उस विराज की पुलिस प्रोटेक्शन दे रही थी। ओह माई गाड....ऐसा कैसे सोच सकते हैं आप? आप मुझे अपने उस आदमी से मिलवाइये डैड जिसने आपको ये ख़बर दी है। मैं उससे पूछूॅगी कि उसने ये कैसे समझ लिया उस जीप में थी?"

रितू की इस बात से अजय सिंह का दिमाग़ चकरा गया। उसे समझ न आया कि वो किसकी बात पर यकीन करे? अपने उस आदमी की बात पर या अपनी बेटी की बातों पर? ये तो सच बात थी कि उसके आदमी को भी पक्के तौर पर ये पता नहीं चल पाया था कि उस जीप में कौन बैठा था। उसने भी यही सोच कर अनुमान में ही अजय से बताया था कि उस जीप में शायद उसकी बेटी रितू थी। क्योंकि यहाॅ पर अजय सिंह के अलावा अगर किही और के पास कोई जीप थी तो वो सिर्फ पुलिस इंस्पेक्टर रितू के पास। अजय सिंह के आदमी ने यही सोच कर उसे बताया था। पक्के तौर पर उसे भी पता नहीं था। दूसरी बात वो खुद जानता था कि रितू विराज को प्रोटेक्ट करने जैसा काम कर ही नहीं सकती थी क्योंकि वो विराज से कभी कोई मतलब ही नहीं रखती थी। विराज का ज़िक्र आते ही उसके अंदर गुस्सा भर जाता था।

रितू ने ये सब बातें जिस आत्मविश्वास और भावपूर्ण लहजे में कही थी उससे अजय सिंह को यही लगा कि रितू सच कह रही है। मगर उसके मन में अपने आदमी की भी बातें चल रही थी। इस लिए वो समझ नहीं पा रहा था कि कौन सच बोल रहा है?

"इस बात पर तो मैं भी यकीन नहीं कर सकती अजय कि रितू विराज को प्रटेक्ट करने वाला काम करेगी।" सहसा इस बीच प्रतिमा ने भी कहा___"मुझे समझ नहीं आ रहा कि तुम अपने आदमी की उस बात पर यकीन कैसे कर सकते हो? क्या उसने अपनी ऑखों से देखा था कि उस जीप पर रितू ही बैठी थी या फिर ये बात किसी ने पक्के तौर पर पूछने पर किसी ने उसे बताई थी?"

"माॅम, ऐसा संभव ही नहीं है।" रितू ने अपनी माॅ की तरफ देख कर कहा___"मैं सिर पटक कर मर जाना पसंद करूॅगी मगर उस कमीने को प्रोटेक्ट करने के बारे में सोचूॅगी भी नहीं। पता नहीं कैसे उस आदमी की उन फिज़ूल बातों पर यकीन कर लिया डैड ने? क्या आपने अपनी बेटी को इतना ही जाना समझा है डैड?"

"पर बेटा ग़लत वो भी तो नहीं है न।" अजय सिंह ने बात को सम्हालते हुए कहा___"उसने ये सब सिर्फ इसी लिए कहा क्योंकि इस गाॅव में हमारे अलावा सिर्फ तुम्हारे ही पास पुलिस की जीप है। इस लिए उसने सोचा कि शायद तुम ही थी उस एम्बूलेन्स के आगे।"
"कमाल है डैड।" रितू ने मन ही मन राहत की साॅस लेते हुए कहा___"आप पढ़े लिखे और वकालत कर चुके होने के बावजूद भी इतना नहीं सोच सके कि अगर इस गाॅव में किसी के पास जीप नहीं तो क्या उसे कहीं भी जीप नहीं मिलती? ऐसा भी तो हो सकता है कि उस विराज ने शहर से ही किसी जीप को किराये पर हायर किया रहा होगा।"

"चलो मान लिया बेटा कि वो कमबख्त उस जीप को शहर से किराये पर ले आया होगा।" अजय सिंह ने कहने के साथ ही शिगार सुलगा लिया था, बोला___"मगर उसे लाने की भला क्या ज़रूरत थी? जबकि उसे इस बात का बखूबी अंदाज़ा था कि जीप में वो कहीं हमारे आदमियों द्वारा पकड़ा जा सकता है। एम्बूलेन्स तो उसके लिए सबसे बढ़िया और सुरक्षित वाहन था, जिसमें वो सबको बैठा कर बड़े आराम से हल्दीपुर से निकल जाता। तो फिर अलग से जीप हायर करने का क्या मतलब हो सकता है भला?"

"आपकी ये बात यकीनन काबिले ग़ौर है डैड।" रितू ने सोचने वाले भाव से कहा___"अलग से किसी जीप को हायर करना यकीनन बेवकूफी वाली बात है। मगर मौजूदा हालात में क्या वो ऐसी बेवकूफी कर सकता है?"
"यही तो सोचने वाली बात है बेटा।" अजय सिंह ने शिगार का कश लेने के बाद उसका धुऑ ऊपर छोंड़ते हुए कहा___"उससे ऐसी बेवकूफी की उम्मीद हर्गिज़ भी नहीं की जा सकती। मगर ये तो सच है न कि उसके आगे आगे जीप चल रही थी।"

"हो सकता है कि ऐसा उसने किसी विशेष प्लान के तहत किया हो डैड।" रितू ने अपने चेहरे पर गहन सोच के भाव दर्शाते हुए कहा___"ये तो आप भी जानते हैं डैड कि वो आपसे खुल कर टकराने की हिम्मत नहीं कर सकता। इस लिए उसने सोचा होगा कि वो हमारे बीच किसी प्रकार की दरार या अविश्वास पैदा कर देगा। उससे होगा ये कि हम आपस में ही एक दूसरे से उलझने लगेंगे। जबकि वो अपना काम करके निकल जाएगा।"
"बात कुछ समझ में नहीं आई बेटी।" प्रतिमा के माथे पर सिलवॅटें उभर आई___"हमारे बीच वो भला कैसे दरार या अविश्वास पैदा कर सकता है?"

"ठीक वैसे ही माॅम।" रितू ने कहा___"जैसे अभी कुछ देर पहले डैड के मन में अपनी बेटी के प्रति हो गया था। ज़रा सोचिए माॅम___ये तो उसे भी पता ही था कि अलग से जीप हायर करने का कोई मतलब नहीं है जबकि एम्बूलेन्स में वो सबको लेकर बड़ी आसानी से यहाॅ से निकल ही जाता। मगर इसके बाद भी उसने ऐसा किया। मतलब कि उसने अलग से एक जीप इस लिए हायर की ताकि जब आपको उसके यहाॅ से जाने का पता चले तो आपके आदमी उसका पता करके आपको उसके बारे में विस्तार से बताएॅ। यानी वो आपको बताएॅ कि एम्बूलेन्स में तो वो अपने साथ सबको लिए बैठा ही था किन्तु उसके आगे आगे अलग से एक जीप भी चल रही थी। जीप का सुन कर आप या आपके आदमी यही सोच बैठेंगे कि जीप तो आपके अलावा सिर्फ मेरे ही पास है, इस लिए उस जीप में मैं ही थी जो उस एम्बूलेन्स के आगे आगे चल रही थी। आप ये जानते हुए भी कि आपकी बेटी ऐसा करने का सोच भी नहीं सकती है, ऐसा सोच बैठेंगे और बाद में आप मुझ पर शक़ करते हुए मुझसे इसके बारे में ऐसा सब कुछ कहने लगेंगे या पूछने लगेंगे। यही उसका प्लान हो सकता था डैड। अब आप ही बताइये क्या ऐसा नहीं हो सकता?"

रितू की बातें सुन कर अजय तो अजय बल्कि खुद को दिमाग़ की सूरमा समझने वाली प्रतिमा भी आश्चर्य चकित रह गई थी। दोनो ही मियाॅ बीवी अपनी इंस्पेक्टर बेटी की तरफ ऐसी नज़रों से देखने लगे थे जैसे रितू के सिर पर अचानक ही आगरा का ताजमहल आकर कत्थक करने लगा हो। काफी देर तक दोनो के मुख से कोई बोल न फूटा था। फिर जैसे उन दोनो को होश आया। वस्तुस्थित का एहसास होते ही दोनो के चेहरों पर अपनी बेटी की बुद्धि पर प्रशंसा के भाव उभर आए।

"अगर वो वैसा ही कर सकता है जैसा कि तुमने अभी बताया मुझे।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली___"तो फिर यकीनन उसके दिमाग़ की दाद देनी पड़ेगी। हलाॅकि मुझे पहली बार में अभी भी यकीन नहीं हो रहा कि वो ऐसा सोच सकता है मगर वर्तमान में मैने उसके बारे में जितना विचार किया है उससे यही पता चला है कि यकीनन वो ऐसा सोच भी सकता है और कर भी सकता है।"

"लेकिन डैड वो कमीना यहाॅ आया किस लिए है?" रितू ने जानबूझ कर ऐसा सवाल किया___"और आपको कैसे पता चला कि वो यहाॅ आया है?"
"हमारी हज़ारों ऑखें हैं बेटी।" अजय सिंह ने बड़े गर्व से कहा___"हमें सबकी ख़बर होती है। ख़ैर छोंड़ो ये सब। जाओ तुम भी आराम कर लो। पता नहीं कहाॅ कहाॅ ड्यूटी के चक्कर में घूमती रहती हो तुम? बेटा कुछ अपना भी ख़याल रखा करो। हमे हर वक्त तुम्हारी फिक्र रहती है।"

"जी डैड।" रितू ने कहने के साथ ही सोफे से उठ कर खड़ी हो गई___"पर आप तो जानते हैं न कि पुलिस की नौकरी का कोई टाइम टेबल नहीं होता। इस लिए कहीं न कहीं तो भटकना ही पड़ता है।"

ये कहने के साथ ही रितू लम्बे लम्बे क़दम बढ़ाती हुई अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। जबकि वो तीनो उसे जाते हुए देखते रह गए। उसके जाने के बाद अजय सिंह ने एक नया शिगार सुलगा लिया और उसके दो तीन गहरे गहरे कश लेने के बाद उसका धुऑ ऊपर की तरफ उछाल दिया। चेहरे पर सोचो के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे थे उसके।

"तुम्हें क्या लगता है अजय?" सहसा प्रतिमा ने उसके चेहरे के भावों को रीड करते हुए कहा___"रितू की बातों में कितनी सच्चाई है?"
"मतलब तुम्हें भी इस बात का शक है कि हमारी बेटी हमसे झूॅठ बोल रही है?" अजय सिंह ने भावहीन स्वर में कहा___"ये भी कि उसने बड़ी सफाई से अपनी बात साबित भी कर दी।"

"ये बात तो मैं तुमसे पूछ रही हूॅ डियर।" प्रतिमा ने पहलू बदला___"तुमने ही तो उससे कहा था कि जीप में वही बैठी थी ऐसा तुम्हारे आदमी ने फोन पर तुमसे कहा था। अब जबकि रितू ने अपनी सफाई दे दी है तो तुम्हें क्या लगता है अब?"
"मुझे यकीन तो नहीं हो रहा प्रतिमा कि रितू ने विराज को प्रोटेक्ट किया होगा।" अजय सिंह ने कहा___"मगर उसके बदले हुए बिहैवियर की वजह से ऐसा सोचने पर मजबूर भी हो गया हूॅ। उसकी बातों में कितनी सच्चाई है इसका पता लगाना भी ज़रूरी है। इस लिए मैने सोच लिया है कि उस पर नज़र रखने के लिए अपने किसी आदमी को उसके पीछे लगा दूॅगा। इससे कोई न कोई सच्चाई तो पता चल ही जाएगी हमे।"

"हाॅ ये सही सोचा है तुमने।" प्रतिमा ने कहा___"इससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। ख़ैर, छोंड़ो ये सब। मेरा तो इस सबसे बहुत सिर दर्द कर रहा है अब। इस लिए मैं जा रही हूॅ अपने कमरे में।"
"ठीक है डियर।" अजय सिंह ने सोफे से उठते हुए कहा___"मैं भी फैक्ट्री के लिए निकल रहा हूॅ।"

ये कह कर अजय सिंह बाहर की तरफ बढ़ गया। उसके जाते ही प्रतिमा ने शिवा की तरफ गहरी नज़रों से देखा और मुस्कुरा दी। शिवा उसकी मुस्कुराहट का मतलब समझ कर खुद भी मुस्कुरा उठा। प्रतिमा सोफे से उठ कर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। उसके जाने के कुछ देर बाद शिवा भी उसी कमरे की तरफ बढ़ गया था।
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अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,,

आशा करता हूॅ कि आज का ये अपडेट आप सबको पसंद आएगा और अगर न आए तो आप बेझिझक अपनी राय दे सकते हैं,,,,,,,,,,,,
 
एकनयासंसार

अपडेट.........《 47 》

अब तक,,,,,,,,

"तुम्हें क्या लगता है अजय?" सहसा प्रतिमा ने उसके चेहरे के भावों को रीड करते हुए कहा___"रितू की बातों में कितनी सच्चाई है?"
"मतलब तुम्हें भी इस बात का शक है कि हमारी बेटी हमसे झूॅठ बोल रही है?" अजय सिंह ने भावहीन स्वर में कहा___"ये भी कि उसने बड़ी सफाई से अपनी बात साबित भी कर दी।"

"ये बात तो मैं तुमसे पूछ रही हूॅ डियर।" प्रतिमा ने पहलू बदला___"तुमने ही तो उससे कहा था कि जीप में वही बैठी थी ऐसा तुम्हारे आदमी ने फोन पर तुमसे कहा था। अब जबकि रितू ने अपनी सफाई दे दी है तो तुम्हें क्या लगता है अब?"
"मुझे यकीन तो नहीं हो रहा प्रतिमा कि रितू ने विराज को प्रोटेक्ट किया होगा।" अजय सिंह ने कहा___"मगर उसके बदले हुए बिहैवियर की वजह से ऐसा सोचने पर मजबूर भी हो गया हूॅ। उसकी बातों में कितनी सच्चाई है इसका पता लगाना भी ज़रूरी है। इस लिए मैने सोच लिया है कि उस पर नज़र रखने के लिए अपने किसी आदमी को उसके पीछे लगा दूॅगा। इससे कोई न कोई सच्चाई तो पता चल ही जाएगी हमे।"

"हाॅ ये सही सोचा है तुमने।" प्रतिमा ने कहा___"इससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। ख़ैर, छोंड़ो ये सब। मेरा तो इस सबसे बहुत सिर दर्द कर रहा है अब। इस लिए मैं जा रही हूॅ अपने कमरे में।"
"ठीक है डियर।" अजय सिंह ने सोफे से उठते हुए कहा___"मैं भी फैक्ट्री के लिए निकल रहा हूॅ।"

ये कह कर अजय सिंह बाहर की तरफ बढ़ गया। उसके जाते ही प्रतिमा ने शिवा की तरफ गहरी नज़रों से देखा और मुस्कुरा दी। शिवा उसकी मुस्कुराहट का मतलब समझ कर खुद भी मुस्कुरा उठा। प्रतिमा सोफे से उठ कर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। उसके जाने के कुछ देर बाद शिवा भी उसी कमरे की तरफ बढ़ गया था।
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अब आगे,,,,,,,

तहखाने के अंदर का नज़ारा ही कुछ अलग था जिसे मैं ऑखें फाड़े अपलक देखे जा रहा था। कुछ देर के लिए तो जैसे मेरा दिमाग़ ही कुंद पड़ गया था। तहखाने के अंदर चारो तरफ छत पर लगे सफेद एल ई डी बल्बों की तीब्र रोशनी थी। अंदर मौजूद एक एक चीज़ स्पष्ट देखी जा सकती थी। किन्तु मेरी ऑखें जिस नज़ारे को देख कर हैरत से फट गई थी वो कुछ अलग ही किस्म का था। राइट साइड की दीवार से सटे हुए चार लड़के थे। उन चारों लड़कों के दोनो हाॅथ मजबूत रस्सी से बॅधे हुए जो कि ऊपर ही उठे हुए थे। चारों लड़कों जिस्म पर इस वक्त कपड़े का कोई रेसा तक न था बल्कि वो चारो जन्मजात नंगे थे। उन चारों की शक्ल सूरत से ही पता चल रहा था कि उन चारों ने यहाॅ कितनी दर्दनाक यातनाएॅ सही होंगी।

बाहर से तहखाने में आया हुआ वो आदमी भी इस वक्त पूरी तरह नंगा था और उन चारों में से एक लड़के को उसके सिर के बालों से मजबूती से पकड़ कर अपने लंड पर झुकाया हुआ था। मैं साफ देख रहा था कि वो आदमी उस लड़के के मुख में अपने लंड को ज़बरदस्ती डाले अपनी कमर को आगे पीछे कर रहा था। उसका सिर ऊपर की तरफ था और उसकी दोनो ऑखें मज़े में बंद थी।

ये सब देख कर मेरा दिमाग़ कुछ देर के लिए हैंग सा हो गया था। फिर जैसे मुझे होश आया। मेरे अंदर क्रोध और गुस्से की आग बिजली की सी तेज़ी से बढ़ती चली गई। मेरे जबड़े कस गए और मुट्ठिया भिंच गई। मैं तेज़ी से बढ़ते हुए उस आदमी के पास पहुॅचा और अपनी पूरी शक्ति से एक लात उसके बाजू में जड़ दी। परिणामस्वरूप वो आदमी उछलते हुए पीछे की दीवार से टकराया और फिर भरभरा कर नीचे तहखाने के पक्के फर्स पर गिरा। उसके हलक से दर्द में डूबी हुई चीख़ निकल गई थी।

फर्स पड़ा वो आदमी बुरी तरह कराहने लगा था। उसकी दोनो टाॅगें आपस में जुड़ कर मुड़ गई थी और उसके दोनो हाॅथ उसकी टाॅगों के बीच उसके प्राइवेट पार्ट पर थे। मुझे समझते देर नहीं लगी कि अचानक हुए इस हमले से उसका जो प्राइवेट पार्ट उस लड़के के मुख में था वो झटके से निकल गया था और झटके से निकलने से शायद उसके प्राइवेट पार्ट में उस लड़के के दाॅत गड़ गए होंगे या फिर दाॅतों से उसका लंड छिल गया होगा।

इधर अचानक हुए इस हमले से वो लड़का भी फर्स पर लुढ़क कर गिर गया था, और बाॅकी के तीन लड़के जो दीवार से सटे रस्सियों में बॅधे खड़े थे वो इस सबसे बुरी तरह घबरा गए थे। मेरे अंदर गुस्से की आग धधक रही थी इस लिए उस आदमी को एक लात जड़ने के बाद मैं उसकी तरफ बढ़ा और झुक कर उसके सिर के बालों को पकड़ कर उसे झटके से उठा लिया। वो आदमी फिर से दर्द में कराह उठा। अभी वो सम्हला भी नहीं था कि मैने एक पंच उसके चेहरे पर जड़ दिया जिससे वो फिर से उछलते हुए दूर जाकर गिरा। मैने इतने पर ही बस नहीं किया बल्कि मैंने तो उसकी धुनाई में कोई कसर ही नहीं छोंड़ी। वो खुद भी अपने हाथ पैर चला रहा था मगर उसकी मेरे सामने एक नहीं चल रही थी। कुछ ही देर में वो अधमरी हालत में पहुॅच गया था। जब मैने देखा कि वो फर्स पर पड़ा अब हिल डुल भी नहीं रहा है तो मैने उसे मारना बंद कर दिया।

मुझे उस पर इस लिए इतना गुस्सा आया हुआ था कि वो उस लड़के के साथ ज़बरदस्ती इतना घिनौना काम कर रहा था। मैं ये भी समझ चुका था कि वो ये काम उस लड़के के अलावा बाॅकी उन तीनों के साथ भी करता होगा। बस इसी बात पर मुझे उसके ऊपर इतना गुस्सा आया था और मैने उसे मारते मारते अधमरा कर दिया था।

उस आदमी के शान्त पड़ने के बाद मैने अपने गुस्से को काबू करने की कोशिश की और फिर तेज़ी से पलटा। मेरी नज़र फर्श पर गिरे उस लड़के पर पड़ी जिसके साथ वो आदमी वो घिनौना काम कर रहा था। मैने देखा कि वो लड़का बुरी तरह डर से काॅप रहा था। मुझे उस पर बड़ा तरस आया और उसकी हालत देख कर उस आदमी पर फिर से गुस्सा आ गया। मगर मैने अपने गुस्से को काबू किया और उस लड़के के पास उकड़ू होकर बैठ गया।

"कौन है ये आदमी?" मैने उस लड़के से पूॅछा___"और वो तुम्हारे साथ इतना घिनौना काम क्यों कर रहा था? मुझे सब कुछ साफ साफ बताओ।"

वो लड़का मेरी ये बात सुन कर कुछ न बोला बल्कि डरी सहमी हुई ऑखों से देखते रहा मुझे। मैं समझ गया कि इन चारों को उस आदमी ने इतना डरा दिया है कि ये लोग अपनी ज़ुबान तक नहीं खोल पा रहे हैं। इस बात पर मुझे उस आदमी पर फिर से बड़ा तेज़ गुस्सा आ गया। मैने अपनी ऑखें बंद कर अपने गुस्से को शान्त किया।

"देखो अब तुम्हें किसी से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है समझे?" मैने उससे ज़रा अपनापन दिखाते हुए कहा__"तुम मुझे सब कुछ साफ साफ बताओ कि ये आदमी तुम लोगों के साथ ये सब क्यों कर रहा था और तुम लोग इस तहखाने में कब से कैद हो?"

"प् प्लीज़ हमें बचा लीजिए।" सहसा उस लड़के की ऑखों से ऑसू छलछला आए और वो बुरी तरह रोते हुए बोल पड़ा___"हमें इस नर्क से निकाल दीजिए। इस आदमी ने हम चारो को बहुत बुरी तरह से टार्चर किया है। ये हर रोज़ दिन में चार बार आता है और हमारे साथ यही सब घिनौना काम करके चला जाता है। हम चारो इससे अपने किये की लाखों दफा मुआफ़ी माॅग चुके हैं मगर फिर भी ये आदमी हमारे साथ ये सुलूक करता है। प्लीज़ हमे इस आदमी से बचा लीजिए। हमें यहाॅ से निकाल कर हमें हमारे घर जाने दीजिए। हम आपके पैर पकड़ते हैं, प्लीज़ प्लीज़।"

उस लड़के का ये रुदन देख कर मैं अंदर तक काॅप गया। मैं इस बात की कल्पना कर सकता था कि इन चारों के साथ किस हद तक उस आदमी ने अत्याचार किया होगा। किन्तु सहसा मेरे मन में सवाल उभरा कि वो आदमी इन लोगों के साथ ये सब किस वजह से कर रहा है? जबकि ये फार्महाउस उसका नहीं बल्कि रितू दीदी का है? क्या रितू दीदी को इस सबका पता है? या फिर ये सब उनकी जानकारी में ही हो रहा है? नहीं नहीं, रितू दीदी ऐसे घिनौने काम का सोच भी नहीं सकती हैं। तो फिर उनके फार्महाउस के तहखाने में ये सब कैसे हो सकता है? मेरे मन में हज़ारों सवाल एक साथ आकर खड़े हो गए। मगर जवाब किसी का भी नहीं था मेरे पास।

"मैने तुमसे जो कुछ पूछा है उसका सही सही जवाब दो पहले।" मैने उस लड़के से कहा___"आख़िर किस वजह से ये सब तुम लोगों के साथ कर रहा है वो आदमी? तुम सब कुछ मुझे साफ साफ बताओ। और हाॅ किसी से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। तुमने देखा है न कि मैने कैसे उस आदमी का दो मिनट में काम तमाम कर दिया है? इस लिए तुम अब बेफिक्र रहो कि कोई तुम पर अब दुबारा ऐसा कर सकेगा। मैं तुम्हें यहाॅ से निकाल कर तुम लोगों को घर भी भेजवा दूॅगा। मगर उससे पहले तुम मुझे बताओ कि ये सब क्यों हो रहा है तुम लोगों साथ? ऐसा क्या अपराध किया है तुम लोगों ने? और अगर ये सब तुम लोगों के साथ बेवजह ही हो रहा है तो यकीन मानो मैं अपने हाॅथों से इस आदमी को मौत दूॅगा। चलो अब बताओ सारी बात।"

"ये सच है कि हम चारों ने एक साथ बराबर का अपराध किया था।" उस लड़के ने नज़रें झुका कर कहना शुरू किया___"मगर, उस अपराध के लिए हमें कानूनी तरीके से सज़ा भी तो दिलवाई जा सकती थी, मगर इन लोगों ने ऐसा कुछ नहीं किया। बल्कि हम चारों को पकड़ कर यहाॅ ले आए और फिर हर रोज़ हमारे साथ ये घिनौना काम करते रहे। हमने इन लोगों से अपने किये की लाखों दफा मुआफ़ी माॅगी। ये तक कहा कि आप हमें गोली मार कर खत्म कर दो उस अपराध के लिए मगर ये लोग हमारी कोई भी बात नहीं माने और हमारे साथ यही सब करते रहे।"

"ओह आई सी।" मैने कुछ सोचते हुए कहा___"लेकिन तुम लोगों ने आख़िर किस तरह का अपराध किया था जिसकी कीमत तुम लोगों को इस रूप में चुकानी पड़ रही है? और तुमने अभी ये कहा कि "इन लोगों ने" मतलब इस आदमी के अलावा भी कोई है जो तुम लोगों के साथ ये सब कर रहा है? कौन कौन हैं इस आदमी के साथ बताओ मुझे?"

"एक लड़की है।" उस लड़के ने कहा___"उसका नाम रितू है और वो पुलिस में इंस्पेक्टर है। वहीं हम चारों को पकड़ कर यहाॅ लाई थी। उसके बाद उसने इस आदमी को हमारी ख़ातिरदारी करने का काम दे दिया था। बस उसके बाद से ही ये आदमी हमारी ख़ातिरदारी के रूप में हमारे साथ ये सब कर रहा है।"

मैं उसके मुख से रितू दीदी का नाम सुन कर मन ही मन बुरी तरह उछल पड़ा था। मुझे समझ न आया कि रितू दीदी ने इन लोगों को किस लिए पकड़ा होगा और फिर पकड़ कर यहाॅ लाया होगा? अपने आदमी को इन लोगों की ख़ातिरदारी करने का काम सौंप दिया। इसका मतलब रितू दीदी को भी ये पता नहीं होगा कि उनका ये आदमी इन लोगों की कैसी ख़ातिरदारी करता है? मुझे यकीन था कि मुजरिम को सज़ा देने के लिए रितू दीदी भले ही कानून की थर्ड डिग्री का स्तेमाल कर लेतीं मगर ऐसा घिनौना काम करने को अपने आदमी से किसी सूरत में न कहती। अरे कहने की तो बात ही दूर वो तो इस बारे में सोचती ही नहीं। मतलब साफ है कि ख़ातिरदारी की आड़ में ये घिनौना काम दीदी का ये आदमी अपनी मर्ज़ी से ही कर रहा है, जिसका दीदी को पता ही नहीं है। अब सवाल ये था कि इन लड़कों ने ऐसा कौन सा जघन्य अपराध किया था जिसकी वजह से रितू दीदी इन लोगों को कानूनन सज़ा दिलाने की बजाय यहाॅ अपने फार्महाउस के तहखाने में लाकर बंद कर दिया था?

"यकीनन तुम लोगों के साथ बहुत बुरा हुआ है।" फिर मैने उससे कहा___"उस इंस्पेक्टर को ऐसा नहीं करना चाहिये था। उसे तो तुम लोगो को कानून के सामने लेकर जाना चाहिए था। ख़ैर, अब तुम बेफिक्र हो जाओ। ये बताओ कि तुम लोगों एक साथ ऐसा कौन सा अपराध किया था?"

"वो वो हम चारों ने एक साथ एक लड़की की इज्ज़त लूटी थी।" उस लड़के ने नज़रें चुराते हुए कहा___"और फिर उसे शहर के बाहर ऐसे ही अधमरी हालत में फेंक आए थे।"
"क्या?????" उसकी ये बात सुन कर मैं बुरी तरह चौंका___"तुम लोगों ने किसी लड़की की इज्ज़त लूटी थी? वो भी इस तरीके से कि उसे बाद में अधमरी हालत में कहीं फेंक भी आए? ये तो सच में तुम लोगों ने बहुत बड़ा अपराध किया है। ख़ैर, उसके बाद क्या हुआ था? मेरा मतलब कि तुम लोग उस इंस्पेक्टर रितू के द्वारा पकड़े कैसे गए?"

"तीसरे दिन हम चारो दोस्त अपने फार्महाउस पर मौज मस्ती कर रहे थे।" उस लड़के ने कहा___"तभी वो इंस्पेक्टर हमारे उस फार्महाउस पर आ धमकी थी। उसने हम चारों को पहले वहीं पर खूब मारा उसके बाद हम चारों को अपनी जीप में डाल कर यहाॅ ले आई तब से हम यहीं हैं और इस आदमी के द्वारा यातनाएं झेल रहे हैं। प्लीज़ हमें यहाॅ से निकाल लो भाई, हम जीवन भर तुम्हारी गुलामी करेंगे।"

"उस लड़की का क्या हुआ?" मैने उसकी अंतिम बात पर ध्यान न दिया___"जिसकी तुम चारों ने इज्ज़त लूटी थी?"
"इस बारे में मुझे कुछ पता नहीं है।" उस लड़के ने असहाय भाव से कहा___"हमने उसे उस दिन से देखा ही नहीं है और ना ही किसी ने हमें उसके बारे में बताया।"

"क्या तुम्हें इस बात का एहसास है कि जिस लड़की की तुम लोगों ने इज्ज़त लूटी है?" मैने ज़रा शख्त भाव से कहा___"उस पर क्या गुज़र रही होगी? उसके माॅ बाप पर क्या गुज़र रही होगी? अपनी हवस के लिए तुम लोगों ने किसी की लड़की का जीवन बरबाद कर दिया। तुम लोगों को तो सीधा फाॅसी पर लटका देना चाहिए।"

"हम सबको फाॅसी की सज़ा मंज़ूर है भाई।" उस लड़के ने कहा___"हमें इस बात का एहसास हो चुका है कि हमसे बहुत बड़ा गुनाह हुआ है। जब से जवानी की देहलीज़ पर हमने क़दम रखा था तब से किसी न किसी लड़की का जीवन हमने बरबाद ही तो किया है। इस लिए भाई फाॅसी से भी बढ़ कर अगर कोई सज़ा है तो हम चारों को वो सज़ा भी मंजूर है।"

"बहुत खूब।" मैने नाटकीय अंदाज़ से कहा___"ऐसी बातें अपराध करते वक्त मन में क्यों नहीं आती हैं? ये तब क्यों समझ में आती हैं जब मौत सिर पर आकर खड़ी हो जाती है या फिर जब वैसा ही कुकर्म खुद के साथ हुआ करता है? ख़ैर, ये बताओ कि ये एहसास अब क्या इस लिये हुआ है कि खुद पर जब वैसा ही गुज़रने लगा या फिर सच में लगता है कि हाॅ तुम लोगों ने ग़लत किया था उस लड़की के साथ?"

"ये तो सच बात है भाई कि इंसान को कोई बात तभी समझ में आती है जब उसे ठोकर लगती है।" उस लड़के ने कहा___"ये बात मुझ पर भी लागू होती है। मगर मुझे इस बात का अब गहरा दुख हो रहा है भाई कि मैने उस लड़की के साथ इतना बड़ा नीच काम किया था। प्यार मोहब्बत दोस्ती ये सब कितनी खूबसूरत चीज़ें हैं जिनके लिए और जिनके आधार पर इंसान कितना कुछ कर जाता है। अगर विश्वास हो तो कोई भी ब्यक्ति किसी के भी साथ कहीं भी आ जा सकता है या फिर वो आपके भरोसे आपके ऊपर कितनी ही बड़ी जिम्मेदारी सौंप देता है। मगर ये छल कपट और ये धोखा कितनी ख़राब चीज़ें हैं जो प्यार मोहब्बत दोस्ती, और भरोसा आदि सबको नस्ट कर देता है।"

"वाह तुम तो यार किसी बहुत बड़े उपदेशक की तरह बड़ी बड़ी बातें करने लगे।" मैने सहसा ब्यंगात्मक भाव से कहा___"काश! ये सब बड़ी बड़ी बातें तब भी तुम करते और समझते जब तुम किसी लड़की का जीवन नष्ट कर रहे थे। कम से कम इससे तुम दोनो का भला तो होता। वैसे प्यार मोहब्बत दोस्ती और भरोसा जैसी बातें तुम्हारे मन में कैसे आ गईं? क्या तुमने इन्हीं के आधार पर उस लड़की का जीवन बरबाद किया है?"

"बिलकुल सही कहा भाई।" उस लड़के ने बेचैनी से पहलू बदलते हुए कहा___"मेरे जीवन में लड़कियाॅ तो बहुत आईं थी जिनके साथ मैने अपने इन तीनों दोस्तों के साथ मौज मस्ती की थी। वो सब लड़कियाॅ मेरे पैसों के लालच में अपना सब कुछ खोल कर हमारे सामने बेड पर लेट जाती थीं मगर इस लड़की में बात ही कुछ खास थी। ये एक ऐसे लड़के से बेपनाह प्यार करती थी जिसका नाम विराज था, विराज सिंह बघेल। मैं भी इससे प्यार करता था पर कभी कह न सका था इससे। हलाॅकि दोस्ती के रिश्ते से हमारी हैलो हाय हो जाती थी। एक दिन जाने क्या हुआ इसे कि ये मुझे लेकर उस विराज के पास गई और उससे दो टूट भाव से कह दिया कि वो उससे प्यार नहीं करती थी बल्कि उसकी दौलत से प्यार करती थी। और अब जबकि वो कंगाल हो चुका है तो उसका उससे कोई रिश्ता नहीं। मैं उसकी इस बात से मन ही मन हैरान तो था मगर खुश भी हुआ कि चलो अब तो ये मेरे पास ही आएगी। वही हुआ भी। वो अपने एक्स ब्वायफ्रैण्ड को छोंड़ कर मेरे साथ ही कालेज में रहने लगी। मगर मुझे जल्द ही पता चल गया कि ये मेरे साथ रहते हुए भी मेरे साथ नहीं है। मैं अक्सर देखता था कि वो अकेले में बेहद उदास और दुखी रहती थी। मुझे लगा कि ये कहीं फिर से न उस विराज के पास लौट जाए, इस लिए मैने इसे अपने साथ हमेशा के लिए रखने का सोच लिया। मेरे ये तीनो दोस्त बार बार मुझसे कहते कि प्यार व्यार का चक्कर छोंड़ बस मज़े ले और हमें भी मज़ा करवा। मैने भी सोचा कि यार ऐसे प्यार का क्या मतलब जो अपना है ही नहीं। बस उसके बाद मैने वही किया जो अब तक दूसरी अन्य लड़कियों के साथ किया था। अपनी बर्थडे वाली शाम मैने इसे भी इन्वाइट किया था। जब ये उस शाम मेरे फार्महाउस पर आई तो मैने इसको कोल्ड ड्रिंक का वो ग्लास प्यार हे दिया जिस ग्लास में मैने नींद की दवा मिलाई हुई थी। कोल्ड ड्रिंक पीने के कुछ देर बाद ही वो नीद के नशे में झूमने लगी। मैने सबकी नज़र बचा कर उसे अपने कमरे में ले गया और उस कमरे में मैने उसके सारे कपड़े उतार कर उसकी इज्ज़त से खूब खेला। मेरा एक दोस्त इस सबकी वीडियो भी बना रहा था। बस उसके बाद तो उसे अपनी ही बने रहना था, इस लिए वो बनी रही और हम जब भी उसे बुलाते तो उसे आना पड़ता और हम सबको खुश रखना पड़ता उसे। यही सब चलता रहा मगर कुछ दिन पहले की बात है। मैने उसे फिर से अपने बर्थडे पर इन्वाइट किया मगर उसने आने से इंकार कर दिया। कहने लगी कि उसकी तबीयत ख़राब है। मैं समझ गया कि वो बहाने बना रही है न आने का। इस लिए मैने उसे फिर से वीडियो को उसके डैड के पास भेज देने की धमकी दी। मेरी इस धमकी से उसे मेरे फार्महाउस पर आना पड़ा। उस दिन भी मैंने अपने इन तीनो दोस्तों के साथ मिल कर उसके साथ सेक्स किया और और उसी हालत में सो गए थे। रात के लगभग तीन या चार बजे के करीब मेरी ऑख खुली तो देखा कि विधी की हालत बहुत ख़राब थी। उसके प्राइवेट पार्ट से ब्लड निकला हुआ था और उसके मुख से भी। ये देख कर मैं बहुत ज्यादा घबरा गया। मुझे लगा कहीं ये मर न जाए। मगर उसे उस हालत में लेकर हम भला उतने समय कहाॅ जाते। इस लिए मैने अपने इन दोस्तो को जगाया और इन लोगों को भी विधी की हालत के बारे में बताया। ये तीनो भी विधी की वो हालत देख कर घबरा गए थे। फिर हम चारों ने सोच विचार करके फैंसला लिया कि इसे कहीं छोंड़ आते हैं। इस फैंसले के साथ ही हम चारों ने विधी को किसी तरह कपड़े पहनाए और उसे उसी हालत में उठा कर बाहर खड़ी अपनी कार की डिक्की में डाल दिया। उसके बाद हम चारो उस तरफ चल पड़े जिस तरफ पिछले कुछ साल पहले ही एक नये हाइवे का निर्माण हुआ था। रात के उस सन्नाटे में किसी के भी द्वारा देख लिए जाने का कोई ख़तरा नहीं था। हाइवे में पहुॅच कर हमने कुछ दूरी पर सड़क के किनारे झाड़ियों के पास ही विधी को डिक्की से निकाल कर चुपचाप लिटा दिया और फिर हम चारों वहाॅ से वापस फार्महाउस आ गए। उसके बाद क्या हुआ इसका हमें आज तक कुछ भी पता नहीं है।"

"क्या तुम जानते हो कि मैं कौन हूॅ?" उसकी बात सुनने के बाद मैने सहसा कठोर भाव से उससे पूछा___"ठीक से देखो मुझे। मेरा दावा है कि तुम मुझे ज़रूर पहचान जाओगे कि मैं कौन हूॅ?"

मेरी इस बात को सुन कर वो लड़का जो कि वास्तव में सूरज चौधरी ही था मेरी तरफ बड़े ध्यान से देखने लगा। उसके चेहरे पर पहले तो उलझन के भाव उभरे थे किन्तु जल्द ही उसके चेहरे पर चौंकने के भाव उभरे और फिर एकाएक ही आश्चर्य से मेरी तरफ ऑखें फाड़े देखने लगा। पल भर में उसका चहेरा डर और दहशत से पीला ज़र्द पड़ता चला गया। वह एकदम से ही जूड़ी के मरीज़ की तरह काॅपने लगा था।

"क्या हुआ सूरज चौधरी?" मेरे मुख से एकाएक शेर की सी गुर्राहट निकली___"पहचाना मुझे या मैं खुद अपने तरीके से बताऊॅ तुझे कि मैं कौन हूॅ??"
"वि...वि...विराऽज।" सूरज चौधरी के मुख से दहशत में डूबा स्वर निकला___"तुम वि..विराज हो। वही विराज जिसे वो विधी बेपनाह मोहब्बत करती थी।"

"और जिसके साथ तूने इतना बड़ा वहशियाना कुकर्म किया है।" मैंने गुस्से में आग बबूला होते ही उसे उसके सिर के बालों से पकड़ कर उठा लिया और फिर पीछे से उसकी गर्दन में अपने दोनो हाॅथ जमाते हुए मैने पूरी ताकत से झटका दिया। सूरज चौधरी के हलक से हृदय विदारक चीख निकल गई। दीवार पर कुंडे में बॅधी रस्सी एक झटके में ही टूट गई थी और इधर झटका लगते ही सूरज के दोनो हाॅथों में वो रस्सी गड़ सी गई थी।

"हरामज़ादे।" मैंने कहने के साथ ही सूरज को अपने सिर के ऊपर तक उठा लिया और पूरी ताकत से सामने की दीवार की तरफ उछाल दिया, फिर बोला___"तूने मेरी विधी के साथ इतना घिनौना कुकर्म किया। नहीं छोंड़ूॅगा तुझे....तुम चारों को एक एक करके ऐसी भयावह मौत दूॅगा कि उसे देख कर ये ज़मीन और वो आसमां तक थर्रा जाएॅगे।"

उधर दीवार से टकरा कर सूरज नीचे फर्श पर मुह के बल गिरा। गिरते ही उसके मुख से दर्द भरी चीख निकल गई। उसके दोनो हाथ अभी भी रस्सी से बॅधे हुए थे इस लिए वो सहारे के लिए अपने हाॅथ आगे या इधर उधर नहीं कर सकता था। इधर सूरज का ये हाल देख कर बाॅकी तीनों लड़कों के देवता कूच कर गए। वो मेरी तरफ बुरी तरह घबराए हुए से देखने लगे थे।

आगे बढ़ कर मैने सूरज के सिर के बाल पकड़ कर उसे उठाया और कहा___"तेरी कहानी सुनने से पहले मुझे लग रहा था कि तेरे साथ वो आदमी बहुत ग़लत कर रहा था मगर अब समझ में आया कि वो कितना अच्छा कर रहा था। तू जिस इंस्पेक्टर रितू की बात कर रहा था न वो मेरी बड़ी बहन है। मैं सब कुछ समझ गया अब कि तेरे यहाॅ होने का असल माज़रा क्या था?"

कहने के साथ ही मैने सूरज के पेट में अपने घुटने का ज़बरदस्त वार किया तो वो हलाल होते बकरे की तरह चिल्लाया। उसके झुकते ही मैने उसकी पीठ पर दुहत्थड़ जड़ दिया, जिससे वो फर्श पर मुह के बल गिरा। नीचे झुक कर मैने फिर उसे उसके बालों से पकड़ कर उठाया, फिर बोला___"अब सारी कहानी समझ गया हूॅ मैं। तू अपने इन कमीने दोस्तों के साथ विधी को उस दिन वहाॅ हाइवे के किनारे झाड़ियों के पास छोंड़ आया। सुबह हुई तो हाइवे से गुज़र रहे किसी वाहन में आ रहे ब्यक्ति की नज़र विधी पर पड़ी होगी तो उसने इसकी सूचना पुलिस को दी होगी। ये मामला चूॅकि हल्दीपुर का था इस लिए हल्दीपुर पुलिस थाने में मेरी बड़ी बहन रितू दीदी ही थी, उनको जब इस सबकी सूचना किसी अज्ञात ब्यक्ति द्वारा मिली तो वो उस जगह पर पहुॅच गईं। विधी की उस गंभीर हालत को देख कर दीदी ने विधी को तुरंत ही हल्दीपुर के सरकारी हास्पिटल में एडमिट कर दिया। दीदी को शायद कहीं से ये पता था कि मैं किसी विधी नाम की लड़की से प्यार करता था। इस लिए हास्पिटल में जब दीदी को डाक्टर द्वारा विधी के बारे में पता चला होगा तो उनके दिमाग़ में तुरंत ही ये बात आई होगी कि किसी विधी नाम की लड़की से ही उनका भाई विराज प्यार करता था। किन्तु उन्होंने विधी को देखा तो था नहीं पहले इस लिए उन्होंने इस बारे में कन्फर्म करने के लिए विधी से पूछताॅछ की होगी। दीदी के पूछने पर आख़िर विधी ने बता ही दिया होगा कि हाॅ वो ही वो विधी है जिसे उनका भाई विराज प्यार करता था। बस उसके बाद ही दीदी का मेरे प्रति भी हृदय परिवर्तन हुआ होगा या फिर खुद विधी ने बताया होगा उन्हें कि सच्चाई क्या है? ख़ैर, उसके बाद विधी ने दीदी से अपनी अंतिम इच्छा की बात कही और दीदी ने उससे वादा किया कि वो उसके महबूब को उसके पास ज़रूर लेकर आएॅगी। दीदी ने मेरी खोज करना शुरू किया और उन्हें मेरा दोस्त पवन मिला। पवन से दीदी ने सारी बातें बताईं होंगी। तभी तो पवन मुझसे वो सब बता नहीं रहा था बल्कि यही कहे जा रहा था कि मैं आ जाऊॅ। वाह रितू दीदी! आप ग्रेट हो दीदी। आपने मुझे मेरी विधी से मिलवाया वरना मैं तो उसे अंतिम समय में भी देख न पाता। आपने ये बहुत बड़ा उपकार किया है दीदी। आज आप मेरी नज़र में बहुत महान हो गईं हैं।"

मैं भावावेश में जाने क्या क्या कहे जा रहा था जबकि मेरे चंगुल में फॅसा सूरज बड़ी मुश्किल से अपनी पलकें उठा कर मेरी तरफ हैरत से देखे जा रहा था। शायद वो मेरी कुछ बातें समझने की कोशिश कर रहा था मगर समझ नहीं पा रहा था।

"इतना कुछ मेरी विधी के साथ हो गया और मुझे इसका आभास तक न था।" मेरी ऑखों से ऑसू छलक पड़े। मेरे दिल में हूक सी उठी। विधी के साथ हुए इस घृणित कुकर्म का सोच कर ही मेरी आत्मा काॅप उठी, मेरा दिल तड़प उठा। एकाएक ही मेरे चेहरे पर गुस्से की आग धधक उठी। मैने सूरज को उसकी गर्दन से पकड़ कर एक ही हाॅथ से ऊपर उठा लिया, फिर बोला___"तेरा और तेरे साथियों का मैं वो हाल करूॅगा कि दुबारा इस धरती पर पैदा होने से मना कर दोगे।"

"मुझे माफ़ कर दो विराज।" सूरज की ऑखें बाहर को निकली आ रही थी, फिर भी किसी तरह बोला__"मैं मानता हूॅ कि मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया है जिसके लिए कोई मुआफ़ी हो ही नहीं सकती। मगर.....
"हरामज़ादे जब जानता है कि कोई मुआफ़ी नहीं हो सकती तो क्यों माॅग रहा है मुआफ़ी?" मैने ऊपर से ही उसे उछाल दिया। वो लहराते हुए उस जगह पर गिरा जिस जगह पर वो आदमी बेहश अवस्था में पड़ा था। सूरज जब फर्श से टकराया तो उसके हलक से चीख निकल गई और उसका बाजू ज़ोर से उस आदमी के जिस्म पर लगा।

उस आदमी के जिस्म में हरकत हुई और वो कुछ ही पलों में होश में आ गया। ऑख खुलते ही उसने अपनी तरफ बढ़ते हुए मुझे देखा तो एकाएक ही उसके चेहरे पर घबराहट के भाव उभर आए। जबकि मेरा ध्यान तो सूरज की तरफ था जो उस आदमी के ही पास पड़ा कराह रहा था। उसके पास पहुॅच कर मैने उसे फिर से उसके बालो से पकड़ कर उठाया।

"तूने मेरी विधी के साथ जो कुकर्म किया है उसके लिए मैं मुआफ़ी कैसे दे दूॅगा तुझे?" मैने गुर्रा कर उसे झकझोरते हुए कहा___"तू ये सोच भी कैसे सकता है कि तुझे मुआफ़ी मिल जाएगी। तुझे अगर कुछ मिलेगा तो सिर्फ वो जिसे तड़प तड़प कर और सड़ सड़ कर मरना कहते हैं।"

दीवार से सटे बाॅकी तीनों लड़कों की ये सब देख कर ही हालत ख़राब थी। मेरे चेहरे पर इस वक्त हिंसक दरिंदे जैसे भाव थे। उधर फर्श पर पड़ा वो आदमी मेरी बातें सुन कर हैरान रह गया था। फिर सहसा उसे खुद का ख़याल आया। वो सूरज की तरह ही जन्मजात नंगा था। ये देख कर वो किसी तरह उठा और एक तरफ रखे अपने कपड़ों की तरफ बढ़ गया। कपड़े उठा कर वो जल्दी जल्दी उन्हें पहनने लगा।

इधर मैने गुस्से में उबलते हुए सूरज के चेहरे पर ज़ोर का घूॅसा मारा तो वो पीछे की दीवार में ज़ोर से टकराया और फिर फर्श पर लुढ़कता चला गया। उसके नाॅक और मुख से भल्ल भल्ल करके खून बहने लगा था। फर्श पर गिरते ही उसकी ऑखें बंद होती चली गई। मैं समझ गया कि ये बेहोश हो चुका है।

बेहोश हो चुके सूरज के जिस्म पर मैने पैर की एक ठोकर जमाई और पलट कर बाएॅ साइड दीवार की तरफ देखा। दीवार से सटे वो तीनो लड़के रस्सियों में बॅधे ऊपर की तरफ हाॅथ किये खड़े थरथर काॅप रहे थे। ऑखों में आग और चेहरे पर ज़लज़ला लिए मैं उनकी तरफ बढ़ा।

मुझे अपनी तरफ आते देख उन तीनों की हालत ख़राब हो गई। किनारे साइड की तरफ जो बॅधा खड़ा हुआ था उसका डर के मारे पेशाब छूट गया। उनके क़रीब पहुॅच मैने पहले एक एक घूॅसा उन तीनों के जबड़ों पर रसीद किया। तीनो ही दर्द में बिलबिला उठे। मुझसे रहम की भीख माॅगने लगे किन्तु मैं इन लोगों को भला कैसे माफ़ कर सकता था? ये मेरी विधी के रेपिस्ट थे, उसके हत्यारे थे ये। इनको तो अब ऐसी मौत मरना था जिसके बारे में आज तक किसी ने सुना तक न होगा।

"तुम सबको ऐसी मौत मारूॅगा किसके बारे में किसी कल्पना तक न की होगी।" मैने भभकते हुए कहा__"तुम सब ने मेरी मासूम विधी के साथ ऐसा घिनौना अपराध किया है जिसके लिए मैं तुम लोगों को अगर कुछ दूॅगा तो है सिर्फ दर्दनाक मौत। इसके सिवा और कुछ नहीं। रहम के बारे में तो सोचो ही मत। क्योंकि वो मैं ब्रम्हा के कहने पर भी नहीं करने वाला।"

मेरी ये बात सुन कर उन तीनों के चेहरे डर से पीले ज़र्द पड़ गए। पल भर में ऐसी सूरत नज़र आने लगी उन तीनो की जैसे लकवा मार गया हो। इधर मैं पलटा। मेरी नज़र उस आदमी पर पड़ी जो सूरज के मुख में अपना लंड डाले हुए था। वो मेरी तरफ सकते ही हालत में देखे जा रहा था। मैं उसकी तरफ बढ़ा तो वो एकदम से भयभीत सा हो गया।

"मुझे माफ़ कर दो काका।" उसके पास पहुॅचते ही मैने विनम्र भाव से कहा___"मैने बिना कुछ जाने समझे आप पर हाॅथ उठा दिया। उसके लिए आप चाहें तो मुझे सज़ा दे सकते हैं।"
"अ अरे ना ना बेटवा।" हरिया काका हड़बड़ाते हुए एकदम से बोल पड़ा___"ई का कहत हो तुम? तोहरे से कउनव ग़लती ना हुई है। एसे माफी मागे के कउनव जरूरत ना है। हमहू का कहाॅ पता रहे बेटवा कि तुम असल मा हमरे रितू बिटिया के छोट भाई हो।"

"आप बहुत अच्छे हैं काका।" मैने हरिया काका के दाएॅ कंधे पर हाथ रखते हुए कहा___"आपने इन लोगों की वैसी ही ख़ातिरदारी की है जैसी इन लोगों की करनी चाहिए थी।"
"अब का करें बेटवा हमरे मन मा एखे अलावा र कउनव बात आईये न रही।" काका ने कहा___"रितू बिटिया जब हमसे कहा कि ई ससुरन केर अच्छे से ख़ातिरदारी करै का है ता हमरे मन मा इहै बात आई। बस ऊखे बाद हम शुरू होई गयन। ई ससुरन के पिछवाड़े से बजावै मा बड़ी मज़ा आई बेटवा। लेकिन अब एकै बात केर चिन्ता है कि कहीं ई बात रितू बिटिया का पता न चल जाय। ऊ का है ना बेटवा, ई अइसन काम है कि केहू का पता चल जाय ता बहुतै शरम केर बात होई जाथै न। अउर हम ई नाहीं चाही कि ई बात रितू बिटिया का पता चलै। काहे से के ई बात पता चले मा सरवा हमरी इज्जत का बहुतै कचरा होई जाई।"

"चिन्ता मत करो काका।" मैं मन ही मन उसकी बात पर और उसकी भाषा पर मुस्कुराते हुए बोला___"इस बात का पता रितू दीदी को बिलकुल भी नहीं चलेगा। लेकिन एक बात अब आप भी सुन लीजिए। वो ये कि आपने अपना काम कर लिया अब बारी मेरी है। मैं इन्हें ऐसी मौत दूॅगा कि आपने उसके बारे में कभी सोचा भी नहीं होगा। इस लिए अब आप सिर्फ तमाशा देखेंगे।"

"ठीक है बेटवा।" काका ने सिर हिलाया___"हमहू ईहै चाहिथे कि ई ससुरन का कुत्तन जइसन मौत हो। जितना बड़ा अपराध ई लोगन ने किया है न उसके लिए ई लोगन का कौनव परकार केर रियाइत ता मिलबै न करै।"
"ऐसा ही होगा काका।" मैने उन चारों पर एक एक नज़र डालते हुए कहा___"मुझे कुछ सामान चाहिए आपसे। और हाॅ बाॅकी किसी और को मत बताइयेगा कि मैं यहाॅ हूॅ।"

"ठीक है बेटवा।" काका ने कहा___"अउर सामान का चाहै का है तुमका?"
"एक रेज़र ब्लेड।" मैने कहा___"और एक प्लास चाहिए काका।"
"ठीक है बेटवा।" हरिया काका ने कहा___"हम अभी लावथैं दुई मिनट मा।"

कहने के साथ ही हरिया काका तहखाने के दरवाजे से बाहर चला गया। जबकि उनके जाते ही मैं सूरज के पास पहुॅचा और उसे उठा कर फिर से एक अलग रस्सी जोड़ कर उसे वैसे ही बाॅध दिया जैसे बाॅकी तीनो बॅधे हुए थे। सूरज को बाॅधने के बाद मैं पलटा और एक तरफ रखी पानी की बाल्टी से एक मग पानी लेकर सूरज के चेहरे पर ज़ोर से उलट दिया। पानी का तेज़ प्रहार पड़ते ही सूरज होश में आ गया। होश में आते ही वो दर्द से चीखने लगा।

"तुम हमारे साथ क्या करने वाले हो?" बाॅकी तीन मे से एक ने घबराते हुए पूछा___"देखो, हम मानते हैं कि हमने बहुत बड़ा गुनाह किया है और उसके लिए अगर तुम हमे गोली मार कर जान से मार भी दो तो हमें मंजूर है मगर ऐसे तड़पा तड़पा कर मत मारो भाई। प्लीज़ कुछ तो रहम करो। उस आदमी ने तो वैसे भी हम लोगों के वो सब करके हमें जान से ही मार दिया है। तुम क्या जानो कि उस हवशी ने हमारे पिछवाड़ों की क्या दुर्गत की है?"

"जब अपने पर बीतती है तभी एहसास होता है कि दर्द और तक़लीफ़ क्या होती है।" मैने उससे गुर्राते हुए कहा___"तुम लोगों को तब इस बात का एहसास नहीं हुआ था कि जिन जिन लड़कियों के साथ तुम सबने कुकर्म किया है उन पर उस वक्त क्या गुज़री रही होगी?"

"सच कहा भाई।" एक दूसरे लड़के ने कहा___"लेकिन अब जो हो गया उसे लौटाया तो नहीं जा सकता न। हमें हमारे गुनाहों की इतनी सज़ाएॅ तो मिल ही चुकी हैं। तुम हमें एक ही बार में जान से मार दो। मगर वो सब न करो भाई जो तुम अपने मन सोचे बैठे हो। प्लीज भाई हम पर रहम करो।"

"शट-अऽऽऽप।" मैं पूरी शक्ति से दहाड़ा___"यहाॅ तुम लोगों की मर्ज़ी से कुछ नहीं होगा, बल्कि वही होगा जो मैं चाहूॅगा। मैं क्या चाहता हूॅ इसका पता जल्द ही तुम चारो को चल जाएगा।"

मैने इतना कहा ही था कि हरिया काका तहखाने में पुनः दाखिल हुए। उनके हाॅथ में वो सामान था जो मैने उनसे मॅगवाया था। यानी कि रेज़र ब्लेड और प्लास। मेरे हाॅथ में सामान पकड़ाने के बाद हरिया काका ने तहखाने का दरवाज़ा बंद कर दिया और फिर एक तरफ खड़े हो गए। इधर सामान लिए मैं उस सामान को सरसरी तौर पर देख ही रहा था कि मेरा मोबाइल फोन बज उठा।
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हवेली पर!
अपने कमरे में रितू आराम कर रही थी। ऊपर छत के कुण्डे पर घूम रहे पंखे को एकटक घूर रही रितू के चेहरे पर इस वक्त गहन सोचो के भाव थे। उसके मन में कई सारी बाॅतें चल रही थीं। आज जब वह हवेली में आई तो उसका सामना अपने डैड से उस हिसाब से हो ही गया था जिसका उसे अंदेशा था कि देर सवेर ऐसा होगा ही।

उसके डैड ने उससे जो कुछ कहा था उससे अब ये बात खुल ही चुकी थी उनकी बेटी उनके पक्ष में नहीं है। उनके आदमी ने जो ख़बर उसके बारे में उसके डैड को दी थी उसका उसके पास कोई पुख्ता सबूत तो नहीं था किन्तु ज़हन में ये बात तो पड़ ही गई थी कि रितू किस तरफ करवॅट ले सकती है? हलाॅकि उसने अपनी तरफ से अपनी सफाई में अपने डैड को समझा बुझा तो दिया था किन्तु उसे ये भी एहसास था कि मौजूदा हालात में इस वक्त भले ही उसका बाप कोई कठोर क़दम उसके साथ न उठाये मगर जिस वक्त उसे पक्के तुर पर पता चल जाएगा कि उसके आदमी की वो ख़बर यकीनन सच ही थी तो वक्त अजय सिंह कोई भी कठोर क़दम उठा सकता है।

रितू के ज़हन में ये सारी बातें चल रही थीं। उसे इस बात का भी अंदेशा हो चुका था कि अब उसका बाप सच्चाई का पता लगाने के लिए संभव है कि उसके पीछे अपने आदमी लगा दे। उस सूरत में रितू को क्या करना था ये उसने भली भाॅति सोच लिया था। रितू अभी ये सब सोच ही रही थी कि तभी उसका मोबाइल बज उठा। मोबाइल के बजने से वो सोच के गहरे सागर से हक़ीक़त की दुनियाॅ में आई और सिरहाने रखे मोबाइल को एक हाॅ से उठा कर उसने मोबाइल की स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे हरिया काका नाम को देखा तो उसके चेहरे पर सोच के भाव उभर आए।

"कहिए काका क्या बात है?" फिर उसने काल को रिसीव करते ही कहा।
"..........।" उधर से हरिया काका ने उसे जो कुछ बताया उसे सुन कर रितू बुरी तरह चौंक पड़ी थी। उसके चेहरे पर पल भर में चिंता व परेशानी के भाव उभर आए थे।

"ये आपने बहुत अच्छा किया काका।" रितू ने कहा___"जो मुझे फोन कर दिया आपने। ख़ैर, आप बाॅकी सबका ध्यान रखियेगा मैं बात करती हूॅ उससे।"

ये कह कर रितू ने काल कट कर दी। उसके चेहरे पर चिंता व परेशानी के भाव कम नहीं हो रहे थे। हरिया काका ने उसे फोन पर सारी बात बता दी थी कि विराज तहखाने में उन चारों लड़कों के साथ क्या करने वाला है। उसने ये भी बताया कि विराज इस वक्त गुस्से में आग बबूला हुआ पड़ा है और उससे रेज़र ब्लेड के साथ साथ एक प्लास भी मॅगवाया है। हरिया काका से बातें जानने के बाद रितू समझ गई कि विराज को अब सब कुछ पता चल गया है। इस लिए अब उसे डर था कि कहीं विराज उससे इस बात के लिए नाराज़ न हो जाए कि विधी के साथ इतना कुछ हुआ जिसे उसने विराज से नहीं बताया। इस परिस्थिति में वो क्या क़दम उठा लेगा इसका अंदाज़ लगाना मुश्किल था। यही बात थी कि रितू एकाएक चिन्तित व परेशान हो गई थी। काफी देर तक वो इन्हीं सब ख़यालों में खोई रही, उसके बाद उसने मोबाइल पर विराज का नंबर देख कर उसे काल लगा दिया। उसे अंदर से डर भी लग रहा था कि विराज जाने कैसा रियेक्ट करे उससे।

".........।" उधर से काल रिसीव किये जाने पर ही रितू के कानो में विराज की आवाज़ पड़ी। उसने उधर से कुछ कहा।
"तुम्हें मेरी कसम है मेरे भाई।" रितू ने बहुत ही संतुलित लहजे में कहा___"तुम जहाॅ पर हो वहाॅ से किसी को भी कुछ किये बग़ैर वापस बाहर आ जाओ। मैं जब आऊॅगी तो तुम्हें सब कुछ समझा दूॅगी।"

".........।" उधर से विराज ने कुछ कहा।
"प्लीज़ भाई।" रितू ने विनती सी की___"अपनी इस बहन की बात मान जाओ। बस एक बार। उसके बाद मैं खुद तुम्हें उस सबके लिए इजाज़त दे दूॅगी। मगर अभी मेरी बात मान जाओ और वहाॅ से बाहर आ जाओ।"

"..........।" उधर से विराज ने फिर से कुछ कहा।
"अभी तुझे कुछ पता नहीं है मेरे भाई।" रितू ने सहसा गंभार होकर कहा___"तू मेरे आने का इंतज़ार कर मैं तुझे सारी बातें बताऊॅगी और ये भी कि उससे और क्या करना चाहती हूॅ मैं?"

".........।" उधर से विराज ने कुछ कहा।
"हाॅ भाई।" रितू ने कहा___"मैं जल्द ही तेरे पास आ रही हूॅ। मगर फिलहाल तू वहाॅ से बाहर आ जा।"
"...........।" उधर से विराज ने फिर से कुछ कहा।
"थैंक्स मेरे स्वीट भाई।" रितू के चेहरे पर राहत के भाव उभरे___"यू आर सो स्वीट। लव यू सो मच।"

ये कह कर रितू ने मुस्कुराते हौए काल कट कर दी। कुछ देर तक जाने क्या सोचती रही वो। उसके बार वह बेड से उठी और बाथरूम की तरफ बढ़ गई। लगभग दस मिनट बाद वह बाथरूम से बाहर निकली और फिर पुलिस की यूनीफार्म पहन कर तथा सिर पर पीकैप व हाथ में पुलिसिया रुल लिये वह कमरे से बाहर आ गई।

रितू जैसे ही अपनी जिप्सी में बैठ कर हवेली से बाहर गई वैसे ही इधर प्रतिमा के कमरे की खिड़की से बाहर देखते हुए शिवा ने होठों पर मुस्कान सजाते हुए अपनी जेब से मोबाइल निकाला और किसी को फोन लगाया। एक मिनट से भी कम समय तक उसने किसी से फोन पर बात की उसने बाद उसने काल कट कर दी।

इधर हवेली से बाहर निकलते ही रितू ने भी किसी को फोन लगाया और उससे कुछ देर बात की। उसकी जिप्सी गाॅव से बाहर की तरफ जा रही थी। गाव से बाहर जाने वाले रास्ते से कुछ दूर जाने पर ही रितू को अपनी जिप्सी के पीछे एकाएक ही एक ब्लैक जीप आती बैक मिरर में दिखी। ये देख कर रितू के होठों पर मुस्कान फैल गई।

सौ मीटर के फाॅसले पर पीछे से आ रही कार रितू को बराबर बैक मिरर में दिख रही थी। हलाॅकि रितू समझ गई थी कि पीछे आ रही जीप में यकीनन उसके बाप का ही कोई आदमी है, लेकिन फिर भी पक्के तौर पर जाॅचने के लिए रितू ने मन बनाया। नहर पर बने पुल के पास पहुॅचते ही रितू ने बाॅए साइड वाले रास्ते की तरफ अपनी जिप्सी की मोड़ लिया। जबकि दाएॅ साइड के रास्ते में आगे उसका फार्महाउस पड़ता था।

सौ मीटर आगे जाने पर ही रितू को मिरर में वो जीप उसी रास्ते की तरफ मुड़ती दिखी। आगे लगभग पाॅच किलो मीटर की दूरी पर मोड़ था और वहीं से दूसरे गाॅव की आबादी शुरू होती थी। जिसकी वजह से मोड़ पर मुड़ने के बाद पीछे वाले को आगे वाला वाहन दिखाई नहीं देता था। आगे कुछ दूरी पर एक चौराहा पड़ता था। रितू ने जिप्सी को चौराहे पर एक साइड रोंका और उतर कर बगल में एक दुकान थी। वो दौकान तरफ बढ़ गई। दुकान से उसने एक पेप्सी की बाट ली और वहीं पर खड़े खड़े पीने लगी।

कुछ ही देर में उसे चौराहे की तरफ आती हुई वो जीप दिखी जिसमें उसके बाप का एक आदमी ड्राइविंग शीट पर बैठा था। चौराहे पर रितू की जिप्सी को देख उसके चेहरे पर चौंकने के भाव उभरे और फिर वो एकदम से जीप को तेज़ रफ्तार से दौड़ाते हुए चौराहे के पार निकल गया। उसकी इस हड़बड़ाहट को देख कर रितू के होठों पर मुस्कान उभर आई।

पेप्सी को पीकर रितू ने दुकान वाले को पैसे दिये और फिर सामने चौराहे के उस तरफ एक बार सरसरी तौर पर अपनी नज़र दौड़ाई जिस तरफ उसके बाप के आदमी की वो जीप गई थी। उसके बाद वो अपनी जिप्सी की तरफ बढ़ी तथा उसमें बैठ कर जिप्सी को यू टर्न दिया और फिर वापस उसी रास्ते की तरफ बढ़ चली जिस तरफ से वो आई थी। इस बार रितू की जिप्सी की रफ्तार ज्यादा थी।

पुल के बगल से सीधा जो रस्ता था उसी तरफ उसकी जिप्सी ऑधी तूफान बनी जा रही थी। बैक मिरर में उसकी नज़र बराबर थी। उसके पीछे लगी वो जीप उसे कहीं नज़र न आई। पुल से काफी दूर आकर रितू ने जिप्सी को एक ऐसी जगह पर सड़क से अलग करके खड़ी किया जिस जगह पर दाएॅ साइड काफी सारे पेड़ पौधे व झाड़ियाॅ थी। यहाॅ से सड़क पर से चल रहा कीई वाहन देखा तो जा सकता था किन्तु सड़क से इस तरफ का आसानी से देखा नहीं जा सकता था।

जिप्सी से उतर कर रितू ने सबसे पहले होलेस्टर में दबे अपने सर्विस रिवाल्वर को निकाला। रिवाल्वर का चेम्बर खोल कर उसने चेम्बर के सभी खानों को देखा। सभी खानों में गोलियाॅ मौजूद थीं। ये देख कर उसने चेम्बर को वापस बंद कर रिवाल्वर को होलेस्टर के हवाले किया और एक आगे बढ़ कर सड़क के कुछ पास ही एक पेड़ की ओट में खड़ी हो गई। इस वक्त उसके चहरे पर बेहद कठोरता के भाव थे। बहुत ही धीमी आवाज़ में उसके मुख से निकला____"साॅरी डैड, अब आपका कोई भी आदमी मेरी ख़बर आप तक नहीं पहुॅचा पाएगा। इतना ही नहीं आप वो सब हर्गिज़ भी नहीं कर पाएॅगे जिस किही भी चीज़ के करने का आपने मंसूबा बनाया हुआ है। मेरे भाई के पास पहुॅचने वाले हर शख्स को सबसे पहले मुझसे टकराना होगा।"

चेहरे पर कठोरता और ऑखों में आग लिए रितू चुपचाप पेड़ के ओट में खड़ी उस जीप के आने का इन्तज़ार करने लगी थी। इन्तज़ार करते करते लगभग पन्द्रह मिनट गुज़र गए मगर अभी तक वो जीप इस तरफ आती समझ न आई। रितू को लगा वो जीप में बैठा आदमी आएगा भी या नहीं। किन्तु ऐसा नहीं था, क्योंकि तभी रितू के कानों में किसी वाहन के आने की आवाज़ सुनाई देने लगी थी।

कुछ ही देर में मोड़ से इस तरफ मुड़ती हुई वो जीप दिखी। रितू ने महसूस किया कि जीप की रफ़्तार कम थी। शायद वो आदमी धीमी रफ़्तार से इधर उधर का मुआयना करते हुए आ रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि जिसका वो पीछा कर रहा था वो इतना जल्दी कहाॅ गायब हो गई? इस तरफ मुड़ने के बाद आगे का रास्ता काफी दूर तक सीधा ही था। उस सीधे रास्ते पर दूर दूर तक उसे रितू दिखाई नहीं दे रही है। ये देखते देखते ही उसने जीप की रफ़्तार कम कर दी। रितू को लगा कि कहीं वो यहीं पर ही न रुक जाए और वही हुआ भी। उस आदमी ने सामने की तरफ देखते हुए ही जीप को एकदम से खड़ी कर दिया।

जीप खड़ी करने के बाद उसने इधर उधर देखा और फिर सहसा उसने अपनी शर्ट की जेब से मोबाइल निकाला। रितू को समझते न लगी कि वो शायद इस बात की सूचना उसके बाप को देना चाहता है कि रितू एकाएक ही उसकी नज़रों से ओझल हो गई है। रितू के मन में ख़याल आया कि उस आदमी को इस बात की सूचना नहीं दे पाना चाहिए। इस ख़याल के आते ही उसने बिजली की सी तेज़ी से ऐक्शन लिया।

जिस जगह पर रितू पेड़ के पीछे खड़ी थी वहाॅ से वो आदमी आगे की तरफ बाएॅ साइड से जीप में बैठा था। जीप ऊपर से पूरी तरह बेपर्दा टाइप की थी। ड्राइविंग शीट पर बैठा वो आदमी दाहिने हाॅथ पर मोबाइल लिए कुछ कर रहा था। रितू समझ गई कि वो उसके बाप को फोन लगाने ही वाला है। ये देख कर रितू ने होलेस्टर से रिवाल्वर निकाल कर निशाना लगाया और फिर.....धाॅयऽऽ।"

अचूक निशाना, रिवाल्वर से निकली गोली सीधा उस आदमी के दाहिने हाॅथ में मौजूद उसके मोबाइल की स्क्रीन के चिथड़े उड़ाती हुई पार होकर सामने जीप के शीशे से टकराई थी। अचानक हुए इस हमले से वो आदमी मानो सकते में आ गया था। दाहिने हाॅथ को अपने बाएॅ हाॅथ से थामे वह उसे सहलाने लगा था। ड्राइविंग शीट पर बैठा वो इधर उधर देखे जा रहा था।

इधर रितू फायर करते ही तेज़ी से जीप की तरफ बढ़ी। कुछ ही देर में वो जीप के पास पहुॅच गई। अपने इतने क़रीब इस तरह अचानक रितू के आ जाने से वो आदमी एकदम से हक्का बक्का रह गया था। चेहरे पर डर और घबराहट के भाव कत्थक करते नज़र आने लगे थे

रितू ने देर नहीं की बल्कि बिना किसी भूमिका के उसने दोनो हाॅथो से उस आदमी की शर्ट के कालर को पकड़ा और फिर एक झटके मे ही खींच कर ड्राइविंग शीट से बाहर खींच लिया। उस हट्टे कट्टे आदमी को बाहर खींच कर रितू ने उसे वहीं सड़क पर लगभग फटक दिया। आदमी के हलक से चीख़ निकल गई। रितू जानती थी कि उस आदमी ने अगर रितू को अपनी मजबूत बाहों में पकड़ लिया तो फिर उससे छूट पाना आसान नहीं होगा। इस लिए रितू ने उसे सम्हलने का मौका ही नहीं दिया। बल्कि लात घूॅसों पर रख दिया उसे।

सड़क पर गिरे हुए उस आदमी की सिर्फ चीखें निकल रही थी। सहसा उसके हाॅथ में रितू का पाॅव आ गया और उसने झटके से रितू का वो पाॅव पकड़ कर उछाल दिया। नतीजा ये हुआ कि रितू लहराते हुए सड़क पर पीठ के बल गिरी। रितू के मुख दर्द में डूबी हल्की सी चीख निकली। उधर उस आदमी को जैसे मौका मिल गया था। इस लिए वो झट से उठा और सम्हल कर उठ रही रितू के सिर के बाल पकड़ कर उसे जीप की तरफ ही झटके से धकेल दिया। रितू का सिर जीप के किनारे पर लगे मोटे लोहे के पाइप से टकराया। रितू की ऑखों के सामने तारे नाचने लगे और सहसा उसे अपनी ऑखों के सामने अॅधेरा सा दिखने लगा।

लोहे का वो पाइप रितू के सिर पर ज़ोर से लगा था। जिसके कारण तुरंत ही रितू के सिर से खून रिसने लगा था। अभी रितू दर्द को सहते हुए खुद को सम्हाल ही रही थी कि उस आदमी ने एक बार से उसके सिर को उसी लोहे के पाइप पर झटक दिया। रितू की चीख निकल गई। चोंट पर चोंट लगने से खून का रिसाव तेज़ हो गया।

"मैने मालिक से झूॅठ नहीं बोला था लड़की।" उस आदमी ने दाॅत पीसते हुए गुस्से से कहा___"उस दिन तू ही थी उस जीप में जो उस एम्बूलेन्स के आगे आगे चल रही थी। मगर पक्के तौर पर चूॅकि किसी को पता नहीं था इस लिए मुझे भी लगा कि शायद उस जीप में तेरे सिवा कोई ही न रहा हो। दूसरी बात हम में से कोई ये सोच ही नहीं सकता था कि हमारे मालिक से गद्दारी करने वाली खुद मालिक की ही छोकरी होगी।"

ये सब कहने के साथ ही उस आदमी ने पीछे से एक मुक्का रितू के पेट के बगल पर रसीद कर दिया। हट्टे कट्टे आदमी का मुक्का लगते ही रितू को भयानक दर्द हुआ। उसकी घुटी घुटी सी चीख फिज़ा में फैल गई।

"तुझे पता है आज मालिक ने मुझे साफ साफ कहा है कि अगर गद्दार के रूप में तू ही निकले तो तुझे मैं खुद ही इस गद्दारी की सज़ा दूॅ।" उस आदमी ने कहा___"मालिक को इस बात से अब कोई मतलब नहीं रह गया है कि गद्दार कौन है। उनके लिए अपना और पराया सब बराबर हैं। इस लिए ऐ छोकरी, तू अब सज़ा पाने के लिए तैयार हो जा। मैं पहले तेरे इस खूबसूरत जिस्म का मज़ा लूटूॅगा और फिर तेरी इज्ज़त की धज्जियाॅ उड़ाऊॅगा। हाहाहाहाहा कसम से पहली बार लग रहा है कि मालिक की सेवा करने का कुछ अच्छा फल मिल रहा है।"

रितू के कानों से उस आदमी की ये सब बातें टकराई तो उसके अंदर गस्से की ज्वाला धधक उठी। उसने अपने दाहिने हाॅथ को पीछे ले जाकर उस आदमी के सिर को उसके बालों से पकड़ा और पूरी ताकत से ऊपर से आगे की तरफ खींचा। वो आदमी तो पीछे से आगे न आ पाया क्योंकि वो वजनदार और हट्टा कट्टा था किन्तु सिर के बाल इतनी तेज़ी से खींचे जाने पर उसके मुख से दर्द भरी सीत्कार गूॅज उठी। इसके साथ ही रितू के सिर के बालों पर से उसकी पकड़ ढीली पड़ गई।

रितू ने एक पल का भी समय नहीं गवाॅया। उसके हाॅथ के नीचे से निकल कर उसने बिजली की सी तेज़ी से उस आदमी के बगल से आकर अपने दाहिने हाॅथ की कराट ज़ोर से उसकी गर्दन के पिछले भाग पर लगाई। नतीजा ये हुआ कि झोंक में उस आदमी का माॅथा उसी लोहे के पाइप से टकराया जिस पाइप पर अभी कुछ देर पहले रितू का सिर टकराया था। माॅथे पर लोहे का पाइप लगते ही वो आदमी दर्द से बिलबिलाया और दोनो हाॅथों से अपना माॅथा सहलाने लगा। पलक झपकते ही उसके माथे पर एक गोल सा गोला उभर आया जो हल्के नीले रंग का था।

रितू को तेज़ गुस्सा आया हुआ था। इस बार वो रुकी नहीं बल्कि जूड़ो कराटे और कुंगफू के ऐसे करतब दिखाए कि दो मिनट में ही उस आदमी को धरासाई कर दिया। एक बार पुनः वो हट्टा कट्टा आदमी सड़क पर पड़ा था, किन्तु इस बार वो दर्द से बुरी तरह कराह रहा था।

"तेरे जैसे पालतू कुत्तों का इलाज़ बहुत अच्छी तरह से करना आता है मुझे।" रितू किसी शेरनी की भाॅति गुर्राई___"चल आज तुझे इसका ट्रेलर भी और इसका अंजाम भी दिखाऊॅगी। तेरे जैसे कुत्तों का और अपने उस हरामी बाप का क्या हस्र होगा ये वक्त ही बताएगा।"

रितू की बात उस आदमी ने कोई जवाब न दिया, बल्कि वो जवाब देने की हालत में ही नहीं रह गया था। रितू ने नीचे झुक कर उस आदमी की कनपटी के पास मौजूद एक ऐसी खास जगह पर कराट मारी कि पल भर में वो आदमी बेहोश हो गया। उसके बेहोश होते ही रितू ने उस आदमी के एक हाॅथ को पकड़ कर खींचते हुए सड़क के किनारे पर लगाया और फिर पलट कर उस तरफ बढ़ चली जिस तरफ उसने अपनी जिप्सी को झाड़ियों और पेड़ों के पीछे छुपाया था।

थोड़ी ही देर में रितू जिप्सी को लेकर सड़क पर आ गई। जिप्सी को उस आदमी के पास खड़ी कर वो जिप्सी से नीचे उतरी और फिर उस आदमी के बेहोश जिस्म को किसी तरह उठा कर जिप्सी के पीछे डाल दिया। उसके बाद वो उस जीप के पास गई जिसमें बैठ कर वो आदमी यहाॅ आया था। उस जीप के इग्नीशन से चाभी निकाल कर रितू ने अपनी पैन्ट की पाॅकेट में डाला और वापस जिप्सी के पास आकर ड्राइविंग शीट पर बैठ गई।

उस आदमी को वहीं पर छोंड़ कर रितू ने अपनी जिप्सी को फार्महाउस की तरफ दौड़ा दिया। ऑधी तूफान बनी जिप्सी कुछ ही समय में फार्महाउस पहुॅच गई। फार्महाउस के मेन गेट पर ही हरिया और शंकर काका खड़े दिखे रितू को। रितू को आते देख शंकर ने लोहे वाला गेट खोल दिया। गेट खुलते ही रितू ने जिप्सी को गेट के अंदर की तरफ बढ़ा दिया। हरिया काका के पास जिप्सी को रोंक कर रितू ने अपनी पैन्ट की पाॅकेट से चाभी निकाली और शंकर की तरफ देखते हुए कहा___"शंकर काका मेरी गाड़ी से इस आदमी को बाहर निकाल कर वहीं तहखाने में डाल कर फटाफट आइये।"

"अच्छा बिटिया।" शंकर ने कहा और अपनी बंदूख को हरिया के हवाले कर जिप्सी के पास आया और उस आदमी को अपनी मजबूत बाहों से खींच कर बाहर निकाला। बाहर निकाल कर उसे उसने अपने कंधे पर लादा और अंदर तहखाने वाले हिस्से की तरफ बढ़ गया।

"काका आप ये चाभी लीजिए।" रितू हरिया की तरफ चाभी उछालते हुए कहा___"और मेरी इस गाड़ी से शंकर काका को भी साथ ले जाइये। बीच रास्ते पर ही उस आदमी की जीप खड़ी मिलेगी आपको। उसे वहाॅ से यहाॅ लेकर आना है।"

"ठीक है बिटिया।" हरिया ने कहा___"हम अभी शंकरवा का लइके जाथैं। लेकिन बिटिया ऊ ससुरा आदमी कउन है? अउर कहाॅ से मिल गवा ऊ तुमका?"
"मेरे डैड का पालतू कुत्ता है काका।" रितू ने नफ़रत के भाव से कहा___"मेरे डैड ने उसे मेरे पीछे लगाया हुआ था मेरी निगरानी के लिए। मैने उस कमीने को बीच में ही धर लिया और यहाॅ ले आई। अब आप इसकी भी ख़ातिरदारी कीजिएगा।"

"अरे बिलकुल बिटिया।" हरिया के चेहरे पर एकाएक ही खुशी के भाव उभरे लेकिन फिर जैसे उसे कुछ याद आया तो उसने फिर नार्मल भाव से कहा___"ऊ ससुरे की ख़ातिरदारी हम बहुत अच्छे से करूॅगा।"

तभी शंकर काका आता हुआ दिखाई दिया। उसके पास आते ही रितू ने उसे भी समझा दिया और हरिया के साथ अपनी जिप्सी से भेज दिया। उन दोनो के जाते ही रितू अंदर मकान की तरफ बढ़ चली।
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मैं रितू दीदी के कमरे में बड़ी बेचैनी से इधर से उधर टहल रहा था। रह रह कर सूरज की बातें मेरे ज़हन में ज़हर सा घोल रही थी। मुझे उन चारों पर भयानक गुस्सा आ रहा था। किन्तु दीदी ने फोन करके मुझे तहखाने से बाहर आ जाने के लिए कह दिया था। मुझे इस बात से बेहद तक़लीफ़ हो रही थी कि मेरी विधी के साथ कितना घिनौना कुकर्म किया गया था जिसके बारे में मुझे कुछ पता ही नहीं था और ना ही ये सब किसी ने मुझसे बताया था। मैं सोच रहा था की अगर इत्तेफाक़ से या संयोगवश मैं हरिया काका के पीछे उस तहखाने में न जाता तो मुझे पता भी न चलता कि मेरी विधी के साथ और क्या हुआ था।

मुझे इस सबके लिए पवन और दीदी दोनो पर गुस्सा भी आ रहा था मगर मैं इस बात से खुद को तसल्ली दिये हुए था कि इन्हीं की वजह से ही तो मैं अपनी विधी को अंतिम बार मिल सका था। उसके त्याग और बलिदान को जान सका था वरना सारी ज़िंदगी मैं उस मासूम व निर्दोष को कोसता रहता। इस लिए ये सब सोच कर मैं अपने गुस्से को शान्त किये हुए था। मैने खुद को बहुत समझाया था तब जाकर मुझे कुछ राहत मिली थी और सबसे ज्यादा रितू दीदी पर प्यार आया कि उन्होंने मेरे और विधी के ख़ातिर कितना कुछ किया था।

मुझे एहसास था कि रितू दीदी अब पहले जैसी नहीं रही थी बल्कि अब वो बदल गई थी। बचपन से लेकर अब तक मेरे प्रति जो उनके अंदर द्वेष या नफ़रत का भाव था वो अब बेपनाह प्यार व स्नेह में परिवर्तित हो गया था। जिस रितू दीदी से बात करने के लिए मैं अक्सर तरसता था आज वही दीदी मुझे अपनी जान से ज्यादा प्यार करने लगी हैं। इस बात से मैं बेहद खुश भी था। किन्तु हालात के मद्दे नज़र मैं अपनी इस खुशी को ज़ाहिर नहीं कर पा रहा था। इस वक्त मैं उनके कमरे में टहलते हुए उनके आने का बेसब्री से इन्तज़ार कर रहा था।

तभी कमरे का दरवाजा खुला और पुलिस इन्स्पेक्टर की वर्दी में रितू दीदी ने कमरे में प्रवेश किया। मैं उन्हें आज पुलिस की वर्दी में देख कर देखता ही रह गया। उनके खूबसूरत बदन पर ये पुलिस की वर्दी काफी जॅच रही थी। ऐसा लगता था कि पुलिस की ये वर्दी सिर्फ उन्हीं के लिए ही बनी थी। मुझे अपनी तरफ अपलक देखता देख दीदी के होठों पर मुस्कान उभर आई और फिर सहसा उनके चेहरे पर हया की सुर्खी भी नज़र आने लगी।

"ऐसे क्यों देख रहा है राज?" रितू दीदी ने मीठी सी आवाज़ में नज़रें झुकाते हुए कहा।
"देख रहा हूॅ कि मेरी रितू दीदी इस पुलिस की वर्दी में कितनी खूबसूरत लग रही हैं।" मैने सहसा मुस्कुराते हुए कहा___"ऐसा लगता है कि ये वर्दी दुनियाॅ में सिर्फ आपके लिए ही बनी है।"

"अच्छा जी।" रितू दीदी हॅस दी, बोली___"क्या सच कह रहा है भाई?"
"हाॅ दीदी।" मैने कहा___"आप तो मेरी वैसे भी दुनियाॅ की सबसे अच्छी और खूबसूरत दीदी हैं, ऊपर से इस पुलिस की यूनीफार्म पहने हुए। कसम से दीदी आप बहुत ही क्यूट और ब्यूटीफुल लग रही हैं। मेरी आपसे गुज़ारिश है कि आपने ये जो पुलिस की नौकरी छोंड़ का सोचा हुआ है उस सोच को आप अपने ज़हन से निकाल दें। मैं आपको हमेशा ऐसे ही पुलिस की इस वर्दी में देखना चाहता हूॅ।"

"अगर ऐसी बात है मेरे प्यारे भाई।" रितू दीदी ने आगे बढ़ कर मेरे गालों पर सहलाते हुए कहा___"तो फिर अब तेरी ये दीदी पुलिस की नौकरी मरते दम तक नहीं छोंड़ेगी। भले ही चाहे जैसी भी परिस्थिति आ जाए। तुझे पता है राज, मेरी इस नौकरी से मेरे माॅम डैड और वो कमीना शिवा कोई भी खुश नहीं हैं। आज तेरे मुख से ये बात सुन कर मुझे बहुत खुशी हो रही है। मैं खुश हूॅ कि तुझे मेरा नौकरी करना और पुलिस की इस वर्दी में देखना अच्छा लग रहा है। काश! ये सब मैने बहुत पहले सोचा होता। मैने सोचा होता कभी तेरे बारे में तो कभी भी मैं तुझसे दूर न रहती। भाई क्या होता है ये मुझे अब पता चला है राज। वरना तो भाई के नाम से ही नफ़रत हो गई थी मुझे। तुझसे एक ही विनती है अपनी इस दीदी को कभी खुद से दूर न करना। मैंने अपने उन रिश्तों से नाता तोड़ लिया है जिन रिश्तों के द्वारा मेरा ये वजूद दुनियाॅ में आया है। अब अगर मेरा कोई है तो सिर्फ तू है मेरे भाई। जो गुज़र गया उसे तो मैं लौटा नहीं सकती राज मगर आज जो है और जो आने वाला है उसे सवाॅरने की पूरी कोशिश करूॅगी मैं। बस तू और तेरा साथ बना रहे। बोल न भाई, तू मुझे अपने साथ रखेगा न?"

ये सब कहते हुए रितू दीदी की ऑखों से ऑसू बहने लगे थे। मैने तड़प कर उन्हें अपने सीने से लगा लिया। वो मुझसे कस के लिपट गईं और खुद को ज़ार ज़ार न रोने की नाकाम कोशिश करने लगीं। मैं उन्हें इस तरह रोते हुए नहीं देख सकता था। उनका कैरेक्टर हमेशा से ही बहादुर लड़की का रहा था मगर इस वक्त कोई देखे तो किसी कीमत पर यकीन करे कि ये लड़की बहादुर भी सकती है। बाहर से पत्थर की तरह कठोर दिखने वाली इस लड़की के सीने में भी एक नन्हा सा दिल है जो धड़कना भी जानता है अपनों के लिए।

"मत रोइये दीदी।" मैने उनकी पीठ को सहलाते हुए कहा___"आप रोते हुए बिलकुल भी अच्छी नहीं लगती हैं। आप तो मेरी सबसे ज्यादा बहादुर दीदी हैं। चलिए अब चुप हो जाइये।"
"मुझे रो लेने दे राज।" दीदी मुझसे और भी कस के लिपट गईं, बोलीं____"तुझे नहीं पता कि जब से मुझे असलियत का पता चला है तब से मैं कितना अंदर ही अंदर इन वेदनाओं में झुलस रही हूॅ। वो कैसे लोग हैं मेरे भाई जो अपनी ही बहन बेटी के बारे में इतना गंदा सोच सकते हैं? वो कैसे लोग हैं राज जिनको रिश्तों की कोई क़दर ही नहीं है? सिर्फ अपनी हवस के लिए वो किसी भी हद तक जाने को तैयार बैठे हैं।"

"अब कुछ मत कहिए दीदी।" मैने दीदी को खुद से अलग कर उनके ऑसुओं से तर चेहरे को अपनी दोनो हॅथेलियों के बीच लेकर कहा___"पाप करने वालों की उमर बहुत लम्बी नहीं होती है उनकी नियति में बहुत जल्द सड़ सड़ के मर जाना लिखा होता है। जो गुनाह जो पाप उन्होने किया है उसकी उन्हें ज़रूर सज़ा मिलेगी दीदी। बस वक्त का इन्तज़ार कीजिए।"

"तू उन सबको अपने हाॅथों से मौत की सज़ा देगा।" रितू दीदी ने कहा___"मैंने उन सबको सिर्फ तेरे लिए ही छोंड़ दिया था। मैं चाहती थी कि इन्होंने जिनके साथ पाप किया वही इन्हें अपने हाॅथों से सज़ा दें। और हाॅ, तू अपने मन में पल भर के लिए भी ये ख़याल मत लाना कि तू ऐसा करेगा तो मैं तुझे कुछ कहूॅगी। मैं सच कहती हूॅ राज, मुझे इस बात का ज़रा सा भी दुख नहीं होगा कि तूने मेरे माॅम डैड और शिवा को मौत दी।"

"आप शायद दुनियाॅ की पहली ऐसी लड़की हैं दीदी जिसे इस सबसे कोई दुख नहीं होगा।" मैने दीदी की ऑखों में देखते हुए कहा___"किन्तु आप ऐसा कह रही हैं ये हैरत की बात है मेये लिए।"
"इसमें हैरत कैसी राज?" रितू दीदी ने कहा___"हर इंसान को अपने अच्छे बुरे कर्मों का फल मिलता है। मेरे घर वालों को भी मिलेगा। तक़लीफ़ तो तब होती है जब अच्छे कर्मों का फल बुरा मिलता है, लेकिन इन लोगों ने तो सिर्फ बुरा कर्म ही किया है अपनी ज़िंदगी में। इन लोगों के मर जाने से मुझे कोई दुख नहीं होगा मेरे भाई, बल्कि इस बात का मलाल ज़रूर रहेगा कि ईश्वर ने मुझे ऐसे माॅ बाप और ऐसा भाई क्यों दिया था?"

रितू दीदी की इन बातों को सुन कर मैं हैरानी से उनकी तरफ देखता रह गया था। मुझे उन पर बड़ा स्नेह आया। मैने झुक कर उनके माॅथे पर हल्के से चूॅम लिया। मेरे इस तरह चूमने पर वो हौले से मुस्कुराईं।

"तू सच में बड़ा हो गया है राज।" रितू दीदी ने मेरे चेहरे को एक हाॅथ से सहलाते हुए कहा___"इस बात से मुझे खुशी है कि तू बड़ा हो गया है और समझदार भी। हलाॅकि ये बात तो मैं पहले भी जानती थी कि तू एक समझदार लड़का है। सबके प्रति तेरे दिल में प्यार इज्ज़त व सम्मान की भावना है। ख़ैर छोंड़ इन सब बातों को, ये बता कि तू तहखाने में कैसे पहुॅच गया था?"

"वो हरिका काका के बिहैवियर से मुझे उन पर संदेह हुआ।" मैने गहरी साॅस लेने के बाद कहा___"आप तो जानती ही हैं कि अगर किसी के मन में किसी तरह का संदेह हो जाता है तो वो हर पल यही प्रयास करता रहता है कि उसे जिस चीज़ पर संदेह हुआ है वो उसके सामने साफ तौर पर खुल जाए या उसकी हकीक़त पता चल जाए। बस हरिया काका के मामले में यही हुआ था। मुझे उन पर संदेह हुआ और जैसे ही वो तहखाने वाले रास्ते की तरफ गए तो मैं भी शंकर काका की नज़रों से खुद को छुपा कर हरिया काका के पीछे चला गया। उनके पीछे जाने से तहखाने में जो सच्चाई मुझे पता चली उसने मुझे मुकम्मल तौर पर हिला कर रख दिया। मुझे पता चला कि तहखाने में मौजूद उन चारो हरामज़ादो ने मेरी विधी के साथ क्या किया था? उसके बाद फिर मुझे वही करना था जो ऐसी परिस्थिति में कोई भी करता। मगर ऐन वक्त पर आपका फोन आ गया और मैं उन कमीनों के साथ वो न कर पाया जो करने का मैने फैंसला कर लिया था।"

"मुझे माफ़ कर दे राज।" दीदी ने गंभीरता से कहा___"पर तुझे नहीं पता कि उन लोगों के साथ साथ मैं और किन किन लोगों के साथ क्या क्या करने वाली हूॅ? इन चारों को आसान मौत मारने का कोई मतलब नहीं है मेरे भाई। मैंने ऐसा कुछ करने का सोचा हुआ है जिसके बारे किसी ने सोचा भी नहीं होगा।"

"क्या करने का सोचा है आपने?" मैने दीदी के चेहरे को ग़ौर से देखते हुए कहा___"क्या मुझे नहीं बताएॅगी आप?"
"बात कुछ ऐसी है मेरे भाई।" रितू दीदी ने सहसा पलट कर दूसरी तरफ अपना चेहरा करते हुए कहा___"कि मैं तुझे बता नहीं सकती। बस इतना समझ ले कि इन लोगों ने अगर नीचता की हद को पार किया था तो मैं इन्हें सज़ा देने में इनके साथ नीचता की इन्तेहां कर दूॅगी।"

"क्या मतलब???" मैं दीदी की बात सुन कर बुरी तरह चौंका था___"ऐसा क्या करने वाली हैं आप??"
"मैने कहा न राज।" रितू दीदी ने दूसरी तरफ मुॅह किये हुए ही कहा___"कि मैं तुझे इस बारे में कुछ बता नहीं सकती।"
"लेकिन दीदी।" मैं उनके पास जाते हुए बोला___"आपने तो सोच लिया है कि आपको उन चारों को क्या सज़ा देना है लेकिन बात जब नीचता की हो तो मैं ये कैसे सह सकता हूॅ कि मेरी बहन कोई नीचता वाला काम करे? नहीं दीदी आप ऐसा कुछ भी नहीं करेंगी। आप मुझे बताइये कि उन चारों के साथ साथ और कौन कौन ऐसे हैं जिनको उनके गुनाहों की सज़ा देनी है? मैं खुद अपने हाॅथों से उन्हें बद से बदतर सज़ा दूॅगा।"

"मुझे मजबूर मत कर मेरे भाई।" रितू दीदी सहसा मेरी तरफ पलट कर मेरे चेहरे की तरफ देखते हुए कहा__"तू मेरा भाई है, इस लिए मैं तुझे वो बात कैसे बता सकूॅगी जिसे बताने में मुझे शर्म आए। दूसरी बात तू भी यही सोचेगा कि तेरी दीदी कैसे गंदे विचारों की है?"

"ऐसा कुछ नहीं है दीदी।" मैने उनके चेहरे को अपनी दोनो हॅथेलियों के बीच लेकर कहा___"मुझे पता है कि आपका मन और दिल गंगा मइया की तरह साफ और निर्मल है। आपने अपने जीवन कभी कोई ऐसा काम नहीं किया है जिसके लिए आपको किसी के सामने शर्मिंदा होना पड़े। सच कहूॅ तो मुझे इस सबसे आप पर नाज़ है। इस लिए आप मुझे बेझिझक होकर बताइये कि इन लोगों के साथ और कौन कौन हैं जिनको आप ऐसी सज़ा देने का मन बनाया हुआ है?"

"सूरज चौधरी को तो तू जानता ही है कि वो कौन है और किसका कपूत है?" रितू दीदी ने गहरी साॅस लेने के बाद कहा___"इस प्रदेश का मंत्री है वो। सूरज के साथ बाॅकी तीन जो लड़के और हैं वो सब भी किसी न किसी बड़े बाप की औलाद हैं। जब विधी वाला हादसा इन लोगों ने अंजाम दिया और मुझे उन सबके बारे में पता चला तो मुझे ये समझते देर न लगी कि इन लड़कों को कानूनन सज़ा दिलवाने से भी कुछ नहीं होने वाला। क्योंकि इनके सबके बाप बड़े बड़े लोग हैं। सारी कानून ब्यवस्था को इन लोगों ने अपने हाॅथों पर रखा हुआ है। अगर मैं इन लोगों को गिरफ्तार करके जेल की सलाखों के पीछे डाल भी देती तो पलक झपकते ही मुझे उन लोगों को छोंड़ना भी पड़ जाता। ऊपर से यही आर्डर आता कि मंत्री साहब का बेटा और उसके तीनो साथियों मैने बेवजह ही गिरफ़्तार कर जेल में बंद किया है। कहने का मतलब ये कि कानूनी तौर पर मैं इन्हें कोई सज़ा दिला ही नहीं पाती। इस लिए मैंने कानून की मुहाफिज़ होते हुए भी कानून को अपने हाॅथ में लेने का मन बना लिया। किन्तु मैं ये भी जानती थी कि ये सब इतना आसान नहीं था। तब मैने अपने आला अफसर से इस संबंध में बात की। उन्हें मैंने इस बात का भी हवाला दिया कि प्रदेश का मंत्री कहने को तो मंत्री है मगर ऐसा कोई गुनाह या अपराध नहीं है जिसे इसने अपने बाॅकी साथियों के साथ मिल कर अंजाम न दिया हो। मेरी बात सुन कर कमिश्नर साहब राज़ी तो हुए मगर मंत्री के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत न होने की वजह से उस पर हाॅथ डालने से मुझे मना भी करने लगे। तब मैने उन्हें बताया कि मेरे पास मंत्री के खिलाफ़ ऐसे ऐसे ठोस सबूत हैं जिनकी बिना पर मैं जब चाहूॅ तब उसे और उसके सभी साथियों को बीच चौराहे पर नंगा दौड़ा देने पर मजबूर कर दूॅ। मेरी बातें सुन कर कमिश्नर साहब ने मुझे खुली छूट दे दी और कह दिया कि मेरा जो दिल करे वो मैं कर सकती हूॅ।"

"ओह तो इसका मतलब बात सिर्फ इतनी ही नहीं है जितनी कि मुझे नज़र आ रही है।" मैने चकित भाव से दीदी की तरफ देखते हुए कहा___"इस सब में प्रदेश का मंत्री और उसके कुछ साथी भी इनवाल्ब हैं?"
"इन्वाल्ब नहीं है राज।" रितू दीदी ने कहा___"बल्कि इस खेल में उन सबको भी लपेटना पड़ा मुझे। मैं चाहती थी कि एक ही काम में दोनो काम हो जाएॅ। सारा प्रदेश उस मंत्री के अत्याचार से भी दुखी है। इस लिए बाप बेटों को एक साथ लपेटने का मन बनाया मैने।"

"तो इसमें ऐसी क्या बात थी दीदी जिसे आप बताना नहीं चाहती थी?" मैने सोचने वाले भाव से कहा।
"ये तो मैने किरदारों के बारे में बताया है तुझे।" रितू दीदी ने कहा___"ये नहीं बताया कि इन सब किरदारों के साथ क्या करूॅगी मैं?"

"ओह आई सी।" मैने कहा___"आप बताना नहीं चाहती तो कोई बात नहीं दीदी। मैं सिर्फ ये चाहता हूॅ कि इस सब में आपको कुछ न हो। आपकी बातों से मैं ये बात समझ गया हूॅ कि जिन लोगों की आपने बात की है वो निहायत ही खतरनाक लोग हैं। इस लिए उन पर हाॅथ डालने से यकीनन बेहद ख़तरा है और मैं ये हर्गिज़ नहीं चाह सकता कि ऐसे ख़तरों के बीच मेरी दीदी अकेले फॅस जाएॅ। अच्छा हुआ कि आपने मुझे इस बारे में बता दिया। अब मैं खुद आपको इस ख़तरे के बीच अकेला नहीं रहने दूॅगा। ये लड़ाई अब हम दोनो बहन भाई मिल कर लड़ेंगे और जीत कर दिखाएॅगे दुनियाॅ को।"

"ये तू क्या कह रहा है मेरे भाई?" रितू दीदी एकाएक ही चौंक पड़ी थी, बोली___"नहीं नहीं, तू इस सबसे दूर ही रह। मैं तुझे ऐसे ख़तरे के बीच में आने की इजाज़त हर्गिज़ नहीं दूॅगी। बड़ी मुश्किल से तो मेरा भाई मुझे मिला है। सारी उमर मैने तुझे दुख तक़लीफ़ें दी थी अब और नहीं मेरे भाई। मैं तुझे किसी भी ख़तरे में नहीं डालूॅगी। तू इस सबसे दूर रहेगा और इन सबको साथ लेकर वापस मुम्बई चला जाएगा। तू मेरी फिक्र मत कर राज, तेरी दीदी इतनी कमज़ोर नहीं है कि कोई भी ऐरा गैरा उसे हाथ भी लगा सके।"

"मैं जानता हूॅ कि मेरी दीदी दुनियाॅ की सबसे बहादुर लड़की है।" मैने दीदी को उनके दोनो कंधों से पकड़ कर कहा___"मगर, एक भाई होने के नाते मेरा भी कुछ फर्ज़ बनता है। मैं सक्षम होते हुए भी आपको अकेले ऐसे ख़तरे में कैसे जाने दूॅ? मेरे दिल मेरा ज़मीर हमेशा इस बात के लिए मुझे धिक्कारेगा कि मैंने अकेले आपको इतने बड़े खतरे में जाने दिया और खुद अपनी जान बचा कर मुम्बई चला गया। नहीं दीदी, ऐसा कायर और बुजदिल नहीं है आपका भाई। आप भी तो मुझे मुद्दतों बाद मिली हैं। आप जानती हैं कि बचपन से अब तक मैं आपसे बात करने के लिए तरस रहा था और आज जब मुझे मेरी सबसे प्यारी दीदी मिल गई है तो मैं कैसे आपको यूॅ अकेला मौत के मुह में छोंड़ कर चला जाऊॅगा? कभी नहीं दीदी....कभी नहीं। मैं मर जाऊॅगा मखर आपको यूॅ अकेला छोंड़ कर यहाॅ से कहीं नहीं जाऊॅगा।"

"नहींऽऽऽ।" मेरे मुख से मरने की बात सुन कर तुरंत ही दीदी के मुख से चीख निकल गई। झपट कर मुझे अपने गले से लगा लिया उन्होंने, फिर बोलीं___"ख़बरदार अगर ऐसी अशुभ बात दुबारा कही तो। मरेंगे तेरे दुश्मन। तुझे कुछ नहीं होने दूॅगी मैं।"

"तो फिर मुझे अपने पास रहने दीजिए दीदी।" मैने उनके गले लगे हुए ही कहा___"मुझे अपना फर्ज़ निभाने दीजिए। अपने इस भाई को कायर और बुजदिल मत बनाइये। वरना यकीन मानिये मैं कभी भी सुकून से जी नहीं पाऊॅगा। हम दोनो साथ मिल कर हर ख़तरे का मुकाबला करेंगे। सब कुछ ठीक होने के बाद हम सब साथ में ही रहेंगे। मुझे आपसे बहुत सारी बातें भी करनी हैं। प्लीज़ दीदी, मुझे अपने साथ रहने दीजिए न।"

"उफ्फ राज।" दीदी ने मुझे कस के पकड़ते हुए कहा___"तू इतना अच्छा क्यों है रे? इतना प्यार क्यों करता है तू अपनी इस दीदी से? क्या तू भूल गया कि ये वही दीदी है जिसने तुझे कभी अपना भाई नहीं माना और हमेशा तुझे जलील करके तेरा दिल दुखाया है। ऐसी दीदी से क्यों इतना प्यार करता है पगले?"

"मुझे आपसे कभी कोई दुख नहीं मिला दीदी।" मैं उनसे अलग होकर तथा उनके खूबसूरत चेहरे को अपनी हॅथेलियों पर लेकर कहा___"और ना ही आपने कभी मुझे कोई दुख दिया है। हर इंसान के जीवन में अच्छा बुरा समय आता है। इस लिए जो बीत गया मुझे उसका लेश मात्र भी रंज़ नहीं है, बल्कि आज इस बात की बेहद खुशी है कि मुझे वो दीदी मिल गई है जिसे मैं सबसे ज्यादा पसंद करता था।"

मेरी बात सुन कर रितू दीदी फफक कर रो पड़ी। उनकी ऑखों से झर झर करके ऑसूॅ बहने लगे। ये देख कर मैं तड़प उठा। मैने अपने दोनो हाॅथों से उनकी ऑखों से बहते हुए ऑसुओं को पोंछा।

"ऐसी बातें मत कर मेरे भाई।" दीदी ने सिसकते हुए कहा___"मैं अपने अंदर के जज़्बातों को सम्हाल नहीं पाऊॅगी। मेरा दिल धड़कना बंद कर देगा। आज मुझे एहसास हुआ कि सच्चा प्यार व स्नेह कैसा होता है? क्यों इस प्यार में लोग अपने किसी प्रिय के लिए खुद को कुर्बान कर देते हैं? तू प्यार मोहब्बत और प्रेम का जीता जागता प्रमाण है राज। मैं अपने भाई के इस सच्चे प्रेम में बह जाना चाहती हूॅ। मुझे अपने से दूर मत करना मेरे भाई।"

"शान्त हो जाइये दीदी।" मैने दीदी को अपने सीने से लगा लिया फिर बोला___"अब बिलकुल भी आप रोएॅगी नहीं। चलिए जाइये फ्रेश हो जाइये उसके बाद हम सब साथ में खाना खाएॅगे।"
"हम्म।" दीदी ने बस इतना ही कहा और मुझसे अलग हो गईं। उनकी ऑखें रोने से हल्का सूझ गई थी। मेरी खुद की ऑखें भी नम थी।

"वो दीदी, करुणा चाची और उनके बच्चे कब तक आएॅगे यहाॅ?" मैने पहलू बदलते हुए पूछा दीदी से।
"अरे हाॅ मैं तो भूल ही गई थी राज।" रितू दीदी सहसा चौंकते हुए बोलीं___"उन्होंने कल फोन पर बताया था कि वो बच्चों को लेकर मामा जी के साथ आज यहाॅ शाम से पहले लगभग तीन बजे तक हल्दीपुर के पहले जो नहर का पुल है वहाॅ पहुॅच जाएॅगी।"

"ओह ठीक है दीदी।" मैने अपनी कलाई पर बॅधी घड़ी की तरफ देखते हुए कहा___"अभी तो ढाई बज रहे हैं। मतलब आधे घण्टे में वो लोग पुल के पास पहुॅच जाएॅगे। एक काम करता हूॅ मैं आपकी जिप्सी लेकर उन्हें लेने जा रहा हूॅ।"
"नहीं नहीं।" रितू दीदी झट से बोल पड़ीं___"तू कहीं नहीं जाएगा। मैं हरिया काका को बोल दूॅगी वो ले आएॅगे उनको।"

"आपको नहीं लगता दीदी कि उन्हें लेने हमें खुद जाना चाहिए?" मैने कहा___"आख़िर वो हमारी चाची हैं। हरिया काका के भरोसे कैसे रह सकते हैं हम?"
"तो ठीक है राज।" दीदी ने कहा___"मैं खुद जा रही हूॅ उन्हें लेने।"
"मैं ये कह रहा हूॅ दीदी कि हम दोनो साथ में उन्हें लेने चलते हैं।" मैने कहा___"प्लीज़ दीदी मान जाइये न।"

"अच्छा ठीक है चल।" दीदी के होठों पर उनकी खूबसूरत सी मुस्कान उभर आई___"अपनी ज़िद तो तुझे छोंड़ना है नहीं न।"
"हाॅ तो।" मैने भी इस बार इठलाते हुए कहा___"आपसे छोटा हूॅ तो इतनी ज़िद तो आपसे करूॅगा ही और आपको मेरी ज़िद माननी ही पड़ेगी। हाॅ नहीं तो।"
"अरे तू ये तकिया कलाम कब से करने लगा?" रितू दीदी ने एकाएक ही चौंकते हुए कहा___"ये तकिया कलाम तो गुड़िया(निधी) का है न?"

"हाॅ दीदी।" मेरी ऑखों के सामने एकाएक ही निधी का चेहरा घूम गया___"हर बात में ये बोलना उसकी आदत बन चुकी है और पता है बहुत लाडली हो गई है। अपनी हर बात मनवा लेती है वो।"
"हाॅ वो ऐसी ही थी।" रितू दीदी कहीं खोई हुई सी नज़र आईं, बोली___"कैसी है अब वो?"

"सब कोई अच्छे से हैं दीदी।" मैने कहा___"माॅ गुड़िया और अभय चाचा सब।"
"काश मैं उन्हें देख पाती राज।" दीदी के चेहरे पर पीड़ा के भाव भर आए___"गौरी चाची और गुड़िया से मुआफ़ी माॅग पाती मैं।"
"ओफ्फो दीदी।" मैने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा__"ये सब आप क्यों कह रही हैं? प्लीज़ ये सब आप अपने ज़हन से निकाल दीजिए। अब इस बारे में आप खुद को दुखी नहीं करेंगी। अब चलिए वरना हम लेट हो जाएॅगे जाने में।"

मेरी बाय सुन कर दीदी ने कुछ कहना चाहा मगर मैने उनके होठों पर अपनी उॅगली रख कर उन्हें चुप करा दिया और उन्हें फ्रेश होने के लिए कह कर मैं कमरे से बाहर आ गया। बाहर आया तो मेरी नज़र दरवाजे के एक साइड खड़ी नैना बुआ पर पड़ी। उनका चेहरा ऑसुओं से तर था। शायद उन्होंने हमारी सारी बातें सुन ली थी। मुझे देखते ही उन्होंने जल्दी से अपनी साड़ी का एक छोर पकड़ कर अपने ऑसुओं को पोंछा। मैं उन्हें ये करते देख वहीं पर खड़ा हो गया।
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दोस्तो अपडेट हाज़िर है,,,,,,,,,

आप सबकी प्रतिक्रिया और रिव्यू का इन्तज़ार रहेगा,,,,,,,
 
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