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Gandi Kahani ♡ एक नया संसार ♡

अपडेट.........《 16 》

अब तक.......

"चलती हूॅ डैड।" सहसा रितू ने अपनी खूबसूरत कलाई पर बॅधी एक कीमती घड़ी पर नज़रें डालते हुए कहा__"मैं आपका पुलिस स्टेशन में इंतज़ार करूॅगी।" फिर उसने अभय की तरफ भी देख कर कहा__"चाचा जी आपका भी।"

इतना कहने के बाद ही वह खूबसूरत बला पलटी और लम्बे लम्बे डग भरती हुई ड्राइंगरूम से बाहर निकल गई। किन्तु उसके जाते ही वहाॅ पर ब्लेड की धार जैसा पैना सन्नाटा भी खिंच गया।

अजय सिंह का दिल जैसे धड़कना भूल गया था। उसे अपनी आंखों के सामने अॅधेरा सा नज़र आने लगा। जाने क्या सोचकर वह तनिक चौंका तथा साथ ही घबरा भी गया। फिर एक ठंडी साॅस खींचते हुए, तथा अपनी आॅखों को मूॅद कर सोफे की पिछली पुश्त से अपना पीठ व सिर टिका दिया। आॅख बंद करते ही उसे फैक्टरी के बेसमेंट मे बने उस कारखाने का मंज़र दिख गया जहां पर सिर्फ और सिर्फ ग़ैर कानूनी चीज़ें मौजूद थी। ये सब नज़र आते ही अजय सिंह ने पट से अपनी आंखें खोल दी तथा एक झटके से सोफे पर से उठा और अपने कमरे की तरफ भारी कदमों से बढ़ गया।

अब आगे......

उस वक्त दोपहर के लगभग साढ़े ग्यारह या बारह के आसपास का समय था जब अजय सिंह, प्रतिमा व अभय सिंह रितू के कहे अनुसार फैक्टरी पहुॅचे। इन लोगों के साथ अजय सिंह का बेटा शिवा भी आना चाहता था किन्तु अजय सिंह उसे अपने साथ नहीं लाया था। उसे डर था कि कहीं वह किसी समय ऐसा वैसा न बोल बैठे जिससे कोई बात बिगड़ जाए। शिवा इस बात से अपने स्वभाव के चलते नाराज़ तो हुआ लेकिन पिता के द्वारा सख़्ती से मना कर देने पर वह मन मसोस कर रह गया था।

फैक्टरी के अंदर जाने से पहले की तरह ही कानूनन अभी प्रतिबंध लगा हुआ था। हलाॅकि पहले हुई छानबीन के मुताबिक प्रतिबंध हटाया ही जा रहा था कि ऐन समय पर रितू के द्वारा जब केस फिर से रिओपेन हो गया तो प्रतिबंध पूर्वत् लगा ही रहा। इसके साथ ही जाने क्या सोच कर इंस्पेक्टर रितू ने वहाॅ की सिक्योरिटी भी टाइट करवा दी थी।

अजय सिंह ने अपनी तरफ से कोशिश तो बहुत की कि उसे एक बार फैक्टरी के अंदर जाने दिया जाए लेकिन उसकी एक न चली थी। उसे इस बात ने भी बुरी तरह हैरान व परेशान कर दिया था कि इस शहर का पूरा पुलिस डिपार्टमेंट ही बदल दिया गया है। ऊॅची रैंक के सभी अफसरों का तबादला हो चुका था एक दिन पहले ही। सब-इंस्पेक्टर से लेकर कमिश्नर तक सबका तबादला कर दिया गया था। अजय सिंह इस बात से बेहद परेशान हो गया था, पुलिस कमिश्नर उसका पक्का यार था जिसके एक इशारे पर उसका हर काम चुटकियों में हो जाता था। अजय सिंह अपनी हार न मानते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री से भी संबंध स्थापित कर इस केस को रफा दफा करने का दबाव बढ़ाने को कहा किन्तु मुख्यमंत्री ने ये कह कर अपने हाॅथ खड़े कर दिये थे कि वह ऐसा चाह कर भी नहीं कर सकता क्योंकि ऊपर से हाई कमान का शख्त आदेश था कि इस केस से संबंधित किसी भी प्रकार की बात किसी के द्वारा नहीं सुनी जाएगी और न ही किसी के द्वारा कोई हस्ताक्षेप किया जाएगा। पुलिस को पूरी इमानदारी के साथ इस केस की छानबीन करने की छूट दी जाए।

प्रदेश के मुख्यमंत्री की इस बात ने अजय सिंह की रही सही उम्मीद को भी तोड़ दिया था। उसकी हालत उस ब्यक्ति से भी कहीं ज्यादा गई गुज़री हो गई थी जिसे चलने के लिए दो दो बैसाखियों का भी मोहताज होना पड़ता है। अजय सिंह की समझ में नहीं आ रहा था कि एक ही दिन में ये क्या हो गया है? शहर के सारे पुलिस डिपार्टमेंट का क्यों तबादला कर दिया गया?? और....और ऐसा क्या है जिसके चलते प्रदेश के सीएम तक को अपने हाॅथ मजबूरीवश खड़े कर देने पड़े? लाख सिर खपाने के बाद भी ये सब बातें अजय सिंह की समझ में नहीं आ रही थीं। वह इतना ज्यादा परेशान व हताश हो गया था कि उसे हर तरफ सिर्फ और सिर्फ अॅधेरा ही अॅधेरा दिखाई देने लगा था। ऐसा लगता था कि वह चक्कर खा कर अभी गिर जाएगा। हलाॅकि वो ये सब अपने चेहरे पर से ज़ाहिर नहीं होने देना चाहता था किन्तु वह इसका क्या करे कि लाख कोशिशों के बाद भी दिलो दिमाग़ में ताण्डव कर रहे इस तूफान को वह अपने चेहरे पर उभर आने से रोंक नहीं पा रहा था।

इंस्पेक्टर रितु पुलिस की वर्दी पहने कुछ ऐसे पोज में खड़ी थी कि अजय सिंह को वह किसी यमराज की तरह नज़र आ रही थी।
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अजय सिंह अपनी ही बेटी से बुरी तरह भयभीत हुआ जा रहा था। बार बार वह अपने रुमाल से चेहरे पर उभर आते पसीने को पोछ रहा था।

"मैं आप सबको ये बताना चाहती हूॅ कि फैक्टरी की इसके पहले हुई छानबीन से मेरा कोई मतलब नहीं है।" रितु ने अजय सिंह के साथ आए बाॅकी सब पर एक एक नज़र डालने के बाद अजय सिंह से कहा__"अब क्योंकि ये केस फिर से मेरे द्वारा रिओपेन हुआ है तो इस केस की छानबीन मैं शुरू से और नए सिरे से ही करूॅगी। उम्मीद करती हूॅ कि आपको इस सबसे कोई ऐतराज़ नहीं होगा बल्कि इस छानबीन में आप खुद पुलिस का पूरा पूरा सहयोग देंगे।"

"तुमने बेकार ही इस केस को रिओपेन किया है बेटी।" अजय सिंह ने नपे तुले भाव से कहा__"मैं तो कहता हूॅ कि अभी भी कुछ नहीं हुआ है, अभी भी इस केस की फाइल बंद की जा सकती है। कोई ज़रूरत नहीं है इस सबकी, क्योंकि इससे वो सब कुछ मुझे वापस तो मिलने से रहा जो जल कर खाक़ हो गया है।"

"अब ये केस रिओपेन हो चुका है ठाकुर साहब।" रितु ने अपने ही बाप को ठाकुर साहब कह कर संबोधित किया। अजय सिंह इस बात से हैरान रह गया, जबकि रितु कह रही थी__"और जब तक इस केस से संबंधित कोई रिजल्ट सामने नहीं आता तब तक ये केस क्लोज नहीं हो सकता। केस को क्लोज करना मेरे बस में नहीं है बल्कि ये ऊपर से ही आदेश है कि केस को अब अच्छी तरह से ही किसी नतीजे के साथ बंद किया जाए।"

"ठीक है रितु बेटी।" सहसा प्रतिमा ने कहा__"तुम अपनी ड्यूटी निभाओ, हम भी देखना चाहते हैं कि इस सबके पीछे किसका हाॅथ है?"

"मुआफ़ कीजिये, इस वक्त मैं आपकी बेटी नहीं बल्कि एक पुलिस आॅफिसर हूॅ और अपनी ड्यूटी कर रही हूॅ।" रितु ने सपाट लहजे से कहा__"एनीवे, तो शुरू करें ठाकुर साहब??"

रितु की बात से जहाॅ प्रतिमा को एक झटका सा लगा वहीं अजय सिंह की घबराहट बढ़ने लगी थी।

"मेरा सबसे पहला सवाल।" रितु ने कहा__"फैक्टरी में आग लगने की सूचना सबसे पहले आपको कैसे हुई?"

अजय सिंह क्योंकि समझ चुका था इस लिए अब उसने भी अपने आपको इस केस से संबंधित किसी भी प्रकार की छानबीन या तहकीकात के लिए तैयार कर लिया।

"फैक्टरी में आग लगने की सूचना उस रात लगभग तीन बजे मेरे पीए के द्वारा मुझे मिली।" अजय सिंह ने कहा__"मैं अपनी पत्नी के साथ अपने कमरे में उस वक्त सोया हुआ था, जब मेरे पीए का फोन आया था। उसने ही बताया कि हमारी फैक्टरी में आग लग गई है।"

"इसके बाद आपने क्या किया?" रितू ने पूछा।
"मैने वही किया।" अजय सिंह कह रहा था__"जो हर इंसान इन हालातों में करता है। अपने पीए के द्वारा फोन पर मिली सूचना के तुरंत बाद ही मैं वहां से शहर के लिए निकल पड़ा। जब सुबह के प्रहर मैं यहाॅ पहुॅचा तो सब कुछ तबाह हो चुका था।"

"फैक्टरी पहुॅच कर आपने क्या ऐक्शन लिया?" रितू ने पूछा।
"किसी प्रकार का ऐक्शन लेने की हालत ही नहीं थी उस वक्त मेरी।" अजय सिंह बोला__"अपनी आॅखों के सामने अपना सब कुछ खाक़ में मिल गया देख होश ही नहीं था मुझे। कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या करूॅ क्या न करूॅ? वो तो मेरे पीए ने ही बताया कि फैक्टरी में आग लगने के बाद उसने इस संबंध में क्या क्या किया है?"

"मैं आपके पीए का बयान लेना चाहती हूॅ।" रितू ने कहा__"आप उन्हें बुला दीजिए प्लीज।"

अजय सिंह को बुलाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी क्यों पीए वहीं था, और पीए ही बस क्यों बल्कि फैक्टरी के स्टाफ का लगभग हर ब्यक्ति वहाॅ मौजूद था। सबको पता हो चुका था कि फैक्टरी की दुबारा छानबीन हो रही है इस लिए हर ब्यक्ति उत्सुकतावश वहाॅ मौजूद था।

अजय सिंह ने इशारे से पीए को बुलाया। वह तुरंत ही हाज़िर हो गया।

"आपका नाम?" रितु ने पीए के हाज़िर होते ही सवाल किया।
"जी मेरा नाम दीनदयाल शर्मा है।" पीए ने बताया।

"ठाकुर साहब की फैक्टरी में कब से ऐज अ पीए काम कर रहे हैं?" रितू ने पूछा।

"जी लगभग छः साल हो गए।" दीन दयाल ने कहा।
"छः साल काफी लम्बा समय होता है ये तो आप भी जानते होंगे?" रितु ने अजीब भाव से कहा__"कहने का मतलब ये कि इन छः सालो में आपको अपने मालिक और उनके काम के बारे अच्छी तरह जानकारी होगी।"

"जी शायद।" दीनदयाल ने अनिश्चित भाव से कहा__"शायद शब्द इस लिए कहा कि छः साल अपने मालिक के नजदीक रह कर भी ये बात मैं दावे के साथ नहीं कह सकता कि मैं उनके और उनके काम के बारे में पूरी तरह ही जानता हूॅ। बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो कोई भी मालिक अपने किसी नौकर को बताना ज़रूरी नहीं समझता।"

"आपने बिलकुल ठीक कहा।" रितू ने कहा__"खैर, तो अब आप बताइये कि उस रात क्या क्या और किस तरह हुआ?"

"ज जी क्या मतलब?" दीनदयाल चकराया।
"मेरे कहने का मतलब है कि जिस रात फैक्टरी में आग लगी थी।" रितू ने कहा__"उस रात की सारी बातें आप विस्तार से बताइए।"

दीनदयाल ने कुछ पल सोचा फिर वो सब बताता चला गया जो उस रात हुआ था। उसने वही सब बताया जो हवेली में अभय सिंह से पूछने पर अजय सिंह ने उसे बताया था और उधर मुम्बई में निधि ने सबको अखबार के माध्यम से बताया था। (दोस्तो, आप सबको भी पता ही होगा)

सब कुछ सुनने के बाद रितू ने गहरी साॅस ली और वहीं पर चहलकदमीं करते हुए कहा__"तो आपकी और पुलिस की छानबीन के बाद तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार फैक्टरी में आग लगने की मुख्य वजह सिर्फ सार्ट शर्किट ही है?"

"जी पुलिस ने तो अपनी यही रिपोर्ट छानबीन के बाद तैयार करके दी थी।" दीनदयाल ने कहा।

"क्या आपने इस बात पर विचार नहीं किया या फिर क्या आपने इस नज़रिये से नहीं सोचा कि फैक्टरी में आग किसी के द्वारा लगाई गई भी हो सकती है?" रितू ने पूछा था।

"इस बारे में न सोचने की भी वजह थी इंस्पेक्टर।" सहसा अजय सिंह ने कमान सम्हालते हुए कहा__"दरअसल जिस दिन फैक्टरी में आग लगी थी उस दिन सभी वर्कर्स के लिए अवकाश था। इस लिए उस रात फैक्टरी में कोई था ही नहीं। और जब कोई था ही नहीं तो भला इस बारें में कैसे कह सकते थे किसी अन्य के द्वारा फैक्टरी में आग लगी?"

"चलिए मान लिया कि उस रात अवकाश के चलते कोई भी वर्कर फैक्टरी में नहीं था।" रितू ने कहा__"किन्तु सवाल ये है कि अवकाश के चलते क्या कोई भी फैक्टरी में नहीं था? जहाॅ तक मुझे पता है तो इतनी बड़ी फैक्टरी में अवकाश के चलते हर कोई फैक्टरी से नदारद नहीं हो सकता। मतलब फैक्टरी की सुरक्षा ब्यवस्था के लिए वहाॅ गार्ड्स मौजूद होते हैं और बहुत मुमकिन है कि फैक्टरी के स्टाफ में से भी कोई न कोई फैक्टरी में मौजूद रहता है।"

"बिलकुल इंस्पेक्टर।" अजय सिंह ने कहा__"हप्ते में एक दिन फैक्टरी बंद रहती है इस लिए फैक्टरी में काम करने वाले मजदूरों को अवकाश दे दिया जाता है। लेकिन उस अवकाश वाले दिन ऐसा नहीं होता कि पूरी फैक्टरी सुनसान हो जाती है, बल्कि फैक्टरी की देख रेख और उसकी सुरक्षा ब्यवस्था के लिए वहाॅ पर चौबीसों घंटे सिक्योरिटी गार्ड्स रहते हैं तथा फैक्टरी स्टाफ के भी कई मेंबर फैक्टरी में रहते हैं।" इतना कहने के बाद अजय सिंह एक पल रुका फिर कुछ सोच कर बोला__"अगर तुम्हारा ख़याल ये है इंस्पेक्टर कि इन्हीं सब लोगों में से ही किसी ने फैक्टरी में आग लगाई हो सकती है तो तुम्हारा ख़याल ग़लत है। क्योकि ये सब मेरे सबसे ज्यादा फरोसेमंद आदमी हैं जिनकी ईमानदारी पर मुझे लेस मात्र भी शक नहीं है।"

"अपने आदमियों पर भरोसा करना बहुत अच्छी बात है ठाकुर साहब।" रितू ने कहा__"लेकिन अंधा विश्वास करना कोई सबझदारी नहीं है। ख़ैर, तो आपके कहने का मतलब है कि फैक्टरी से रिलेटेड किसी भी ब्यक्ति ने फैक्टरी में आग नहीं लगाई हो सकती?"

"बिलकुल।" अजय सिंह ने जोर देकर कहा__"इन पर मेरा ये भरोसा ही है वर्ना अगर भरोसा नहीं होता तो मैं पहले ही इन सब पर इस सबके लिए शक ज़ाहिर करता और तुम्हारे पुलिस डिपार्टमेंट से इस बारे में तहकीकात करने की बात कहता। और एक पल के लिए अगर मैं ये मान भी लूॅ कि मेरे आदमियों में से ही किसी ने ये काम किया हो सकता है तब भी ये साबित नहीं हो सकता। क्योकि अवकाश वाले दिन फैक्टरी में ताला लगा होता है और बाकी के फैक्टरी स्टाफ मेंबर फैक्टरी से अलग अपनी अपनी डेस्क या केबिन में होते हैं। यहाॅ पर अगर ये तर्क दिया जाए कि अवकाश से पहले ही या फैक्टरी में ताला लगने से पहले ही किसी ने ऐसा कुछ कर दिया हो जिससे फैक्टरी के अंदर आग लग जाए तब भी ये तर्कसंगत नहीं है। क्योकि ये तो हर स्टाफ मेंबर जानता है कि फैक्टरी में हुए किसी भी हादसे से सबसे पहले उन्हीं पर ही शक किया जाएगा, उस सूरत में उन पर कड़ी कार्यवाही भी की जाएगी और अंततः वो पकड़े ही जाएॅगे। इस लिए कोई भी स्टाफ मेंबर जानबूझ कर अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मार लेने वाला काम करेगा ही नहीं।"

"आपके तर्क अपनी जगह बिलकुल ठीक हैं ठाकुर साहब।" रितु ने एक हाॅथ में पकड़े हुए पुलिसिया रुल को अपने दूसरे हाॅथ की हॅथेली पर हल्के से मारते हुए कहा__"अब इसी बात को अपने फैक्टरी स्टाफ के नज़रिये से देख कर ज़रा ग़ौर कीजिए। कहने का मतलब ये कि मान लीजिए कि मैं ही वो फैक्टरी की स्टाफ मेंबर हूॅ जिसने फैक्टरी में आग लगाई है और मैं ये बात अच्छी तरह जानती हूॅ कि मेरे द्वारा किए गए काण्ड से आपका शक सबसे पहले मुझ पर ही जाएगा जो कि स्वाभाविक ही है, इस लिए आपके मुताबिक मैं ये काम नहीं कर सकती, क्योंकि सबसे पहले मुझ पर ही शक जाने से मैं फॅस जाऊॅगी, ये आप सोचते हैं। जबकि मैंने आपकी सोच के उलट ये काम कर ही दिया है और आप सोचते रहें कि मैंने ये काम नहीं किया हो सकता।"

"दिमाग़ तो तुमने काबिले-तारीफ़ लगाया है इंस्पेक्टर।" अजय सिंह ने मुस्कुराकर कहा__"यकीनन तुमने दोनो पहलुओं के बारे में बारीकी से सोच कर तर्कसंगत विचार प्रकट किया है लेकिन ये एक संभावना मात्र ही है, कोई ज़रूरी नहीं कि इसमें कोई सच्चाई ही हो।"

"सच्चाई का ही तो पता लगाना है ठाकुर साहब।" रितु ने कहा__"और उसके लिए हर किसी के बारे में दोनों पहलुओं पर सोचना ही पड़ेगा। ख़ैर, मुझे ऐसा लगता है कि आप ही इस प्रकार से सोच विचार नहीं करना चाहते, जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए। ये सोचने वाली बात है।"

अजय सिंह ये सुन कर एक पल के लिए गड़बड़ा सा गया। फिर तुरंत ही सहल कर बोला__"ऐसा कुछ नहीं है इंस्पेक्टर। मैं तो बस इस लिए नहीं सोच विचार कर रहा क्योंकि मेरे हिसाब से इस सबका रिजल्ट पहले निकाला जा चुका है।"

अजय सिंह की इस बात से रितू ने कुछ न कहा बल्कि बड़े ग़ौर से अपने पिता के चेहरे की तरफ देखती रही। ऐसा लगा जैसे कि वह अपने पिता के चेहरे पर उभर रहे कई तरह के भावों को समझने की कोशिश कर रही हो। वहीं अजय सिंह ने जब अपनी बेटी को अपनी तरफ इस तरह गौर से देखते हुए देखा तो उसे बड़ा अजीब सा महसूस हुआ। उससे नज़रें मिलाने में उसकी हिम्मत जवाब देने लगी। उसे लगा कहीं ऐसा तो नहीं कि उसकी बेटी उसके चेहरे के भावों को पढ़ कर ही सारा सच जान गई हो। इस एहसास ने उसे अंदर तक कॅपकॅपा कर रख दिया। बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हालते हुए कहा__"क्या हुआ इंस्पेक्टर, इस तरह क्यों देख रही हो मुझे? अपनी कार्यवाही को आगे बढ़ाओ।"

"देख रही हूॅ कि आपके चेहरे पर उभरते हुए अनगिनत भाव किस बात की गवाही दे रहे हैं?" रितू ने अजीब से भाव से कहा।
"क क्या मतलब??" अजय सिंह बुरी तरह चौंका था।

"जाने दीजिए।" रितू ने कहा__"देखिए फारेंसिक डिपार्टमेंट वाले भी आ गए। आइए फैक्टरी के अंदर चलते हैं।"

अजय सिंह एकाएक अंदर ही अंदर बुरी तरह घबरा सा गया। उसे तो लगने लगा था कि बातें अब तक उसके पक्ष में ही हैं और इतनी पूछताॅछ के बाद कार्यवाही बंद कर दी जाएगी। लेकिन उसे अब महसूस हुआ कि ये सब तो महज एक औपचारिक पूछताॅछ थी असली छानबीन तो अब शुरू होगी।

फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट की टीम आ चुकी थी तथा खोजी दस्ता भी। गाड़ियों से निकल कर सब बाहर आ गए। अजय सिंह उस वक्त और बुरी तरह चौंका जब गाड़ियों के अंदर से कुछ कुत्ते बाहर निकले। अजय सिंह को समझते देर न लगी कि ये कुत्ते इस सबकी छानबीन मे उन सबकी सहायता के लिए ही हैं।

पल भर में ही अजय सिंह की हालत ख़राब हो गई। इस सबके बारे में उसने ख्वाब तक में न सोचा था। आज पहली बार उसे लगा कि अपनी बेटी रितू को पैदा करके उसने बहुत बड़ी भूल की थी।


दोस्तो अपडेट हाज़िर है......

मुआफ़ करना मैंने यहीं पर कुछ सोचते हुए इस अपडेट को विराम दे दिया है। अपनी राय और सुझाव देते रहिए,,,,,,

कुछ सवाल हैं आप सबके लिए,,
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क्या लगता है आपको इस छानबीन को अजय सिंह रोंक पाएगा या नहीं????[/color]


क्या इंस्पेक्टर रितू को ये पता चलेगा कि किस वजह से फैक्टरी में आग लगी थी?????

छानबीन के दौरान कैसे हालात बनेंगे?????

छानबीन में अजय सिंह की असलियत सामने आएगी कि नहीं...और अगर आएगी तो क्या सीन होगा उस समय???

असलियत का पता चलने के बाद अभय सिंह का क्या रियेक्शन होगा????

अजय सिंह की असलियत खुद उसकी पत्नी प्रतिमा को पता है कि नहीं?????

ऐसे बहुत से सवाल हैं दोस्तो.....आप भी अपना अपना विचार ब्यक्त कीजिए और अगले अपडेट से अपने विचारों का मिलान कीजिए कि आपके विचार कहाॅ तक सही थे।

धन्यवाद,,,,,
 
अपडेट...........《 17 》

अब तक......

"देख रही हूॅ कि आपके चेहरे पर उभरते हुए अनगिनत भाव किस बात की गवाही दे रहे हैं?" रितू ने अजीब से भाव से कहा।
"क क्या मतलब??" अजय सिंह बुरी तरह चौंका था।

"जाने दीजिए।" रितू ने कहा__"देखिए फारेंसिक डिपार्टमेंट वाले भी आ गए। आइए फैक्टरी के अंदर चलते हैं।"

अजय सिंह एकाएक अंदर ही अंदर बुरी तरह घबरा सा गया। उसे तो लगने लगा था कि बातें अब तक उसके पक्ष में ही हैं और इतनी पूछताॅछ के बाद कार्यवाही बंद कर दी जाएगी। लेकिन उसे अब महसूस हुआ कि ये सब तो महज एक औपचारिक पूछताॅछ थी असली छानबीन तो अब शुरू होगी।

फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट की टीम आ चुकी थी तथा खोजी दस्ता भी। गाड़ियों से निकल कर सब बाहर आ गए। अजय सिंह उस वक्त और बुरी तरह चौंका जब गाड़ियों के अंदर से कुछ कुत्ते बाहर निकले। अजय सिंह को समझते देर न लगी कि ये कुत्ते इस सबकी छानबीन मे उन सबकी सहायता के लिए ही हैं।

पल भर में ही अजय सिंह की हालत ख़राब हो गई। इस सबके बारे में उसने ख्वाब तक में न सोचा था। आज पहली बार उसे लगा कि अपनी बेटी रितू को पैदा करके उसने बहुत बड़ी भूल की थी।

अब आगे......

इंस्पेक्टर रितू के निर्देशानुसार पुलिस और बाॅकी विभाग की टीम्स फैक्टरी की तरफ बढ़ चली, और साथ ही बढ़ चली थी अजय सिंह की हृदय गति। हलाॅकि उसके साथ आए बाॅकी सब नार्मल थे। प्रतिमा और अभय के चेहरे पर गंभीरता के भाव ज़रूर थे किन्तु ये दोनो अजय सिंह की तरह अपनी हालत से लाचार या परेशान नहीं थे।

छानबीन करने आई बाॅकी सब टीमों के पीछे पीछे अजय, प्रतिमा व अभय भी चल रहे थे किन्तु अजय सिंह के कदम बड़ी मुश्किल से उठ रहे थे।

"सब ठीक हो जाएगा अजय।" सहसा प्रतिमा ने अजय की हालत देख उसे दिलाशा देने की गरज से कहा__"अब तो हमारी बेटी ने खुद ही इस केस को अपने हाॅथ में ले लिया है। मुझे पूरा यकीन है कि वो सब कुछ पता कर लेगी। हमारी फैक्टरी में आग लगाने के पीछे तथा हमें बरबाद करने के पीछे जिस किसी का भी हाॅथ होगा वह उसे ज़रूर पकड़ लेगी। तुम बस खुद को सम्हालो और अपनी ऐसी शकल न बनाए रखो।"

"भाभी बिलकुल ठीक कह रही हैं बड़े भइया।" अभय ने कहा__"आपको अब इस तरह परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है। यकीनन रितू बेटी के चलते सब कुछ ठीक हो जाएगा। मुझे अपनी भतीजी पर गर्व है कि उसने पुलिस फोर्स ज्वाइन किया और ज्वाइन करते ही उसे अपनी ही फैक्टरी में लगी आग का ये केस मिल गया। मुझे उसकी काबिलियत पर पूरा भरोसा है। आप बेफिक्र हो जाइए भइया...इवरीथिंग विल वी आलराइट।"

अजय सिंह इन दोनो को भला क्या कहता??? वह भला क्या कहता कि वह किस बात से परेशान है? वह भला क्या कहता कि जिस भतीजी पर वह गर्व कर रहा है उसकी उसी भतीजी की वजह से आज वह पल पल इस हालत से मरा जा रहा है। हालात ने कितना बेबस व लाचार बना दिया था उसे कि सक्षम होने के बावजूद भी वह कुछ नहीं कर सकता था। हिन्दू धर्म के जितने भी देवी देवताओं का उसे पता था उसने उन सबको मन ही मन याद करके उनसे ये फरियाद कर डाली थी कि ये केस तथा ये छानबीन बस यहीं पर रुक जाए मगर ऐसा होता उसे अब तक नज़र नहीं आया था। इतना बेबस तथा इतना परेशान आज से पहले वह अपनी ज़िन्दगी में कभी न हुआ था। उसने तो ये तक सोच लिया था कि अगर ये छानबीन रुक जाए तथा ये केस बंद हो जाए तो वह अब से इस गैर कानूनी काम को करने से हमेशा के लिए तौबा कर लेगा। मगर ये भी सच है न दोस्तो कि जब हम किसी चीज़ के बीज बो चुके होते हैं तो फिर बाद में हमें उस बीज के द्वारा उत्पन्न हुई फसल को काटना भी पड़ता है या उस बीज से उग आए फल को खाना भी पड़ता है। यही नियति बन गई थी अजय सिंह की, मगर अब वह अपने ही द्वारा बोये हुए बीज से उत्पन्न हुए फल को खाना नहीं चाहता था।

उधर फैक्टरी के इंट्री गेट पर लगे ताले को पुलिस के एक हवलदार ने अपनी जेब से चाभी निकाल कर खोला। ताला खोलने के बाद भारी भरकम लोहे के गेट को दो आदमी की मदद से खोला गया। गेट के खुलते ही सब अंदर की तरफ बढ़ गए। पुलिस के साथ आए खोजी कुत्ते भी एक पुलिस वाले के हाथ में थमी जंजीर के सहारे फैक्टरी के अंदर चले गए। ये लिखने की आवश्यकता नहीं कि इन सबके पीछे अजय, प्रतिमा व अभय भी अंदर चले गए।

ये एक बहुत बड़ा फार्म हाउस हुआ करता था पहले। अजय सिंह ने जब इस बिजनेस की शुरुआत की थी तो किसी दूसरे सेठ की वर्षों से बंद कपड़ा फैक्टरी को सस्ते दामों में खरीदा था। (ये सब बातें कहानी के पहले या दूसरे अपडेट में बताई जा चुकी हैं) उस समय ये कपड़ा फैक्टरी शहर के बीच ही बनी हुई थी। कुछ सालों बाद जब अजय सिंह की इस बिजनेस से अच्छे खासे मुनाफे के रूप में तरक्की हुई तो उसने इस फैक्टरी को नये सिरे से तथा नई मशीनों के साथ शुरू करने का विचार किया। अजय सिंह क्योंकि बहुत ही लालची व महत्वाकांक्षी आदमी था, और बढ़ती आय के साथ उसकी बुरी आदतों में भी इज़ाफा हुआ इस लिए पैसे के लिए वह उन रास्तों को भी अपना लिया जिसे गैर कानूनी कहा जाता है। इस रास्ते में उसके कई अपने गैर कानूनी लोग भी थे। किन्तु गैर कानूनी काम में रिश्क बहुत था तथा शहर के बीच उस छोटी सी फैक्टरी में इस काम को अंजाम देने में आसानी नहीं होती थी। कभी भी लोगों के बीच खुद की असलियत सामने आ जाने का खतरा बना रहता था। इस लिए उसने बहुत सोच समझ कर शहर से बाहर एक बहुत बड़ी ज़मीन ख़रीदी तथा वहाॅ पर इसने नये तरीके से फैक्टरी का निर्माण किया। फैक्टरी काफी बड़ी थी तथा उसके नीचे एक बड़ा बेसमेंट भी बनवाया गया था जो सिर्फ गैर कानूनी चीज़ों के उपयोग में ही आता था। यहाॅ पर उसे किसी चीज़ का खतरा नहीं था। फैक्टरी में मजदूरों को हप्ते में एक दिन अवकाश देने के पीछे भी उसका एक मकसद था। वो मकसद ये था कि अवकाश वाले दिन ही वह स्वतंत्र रूप से अपने गैर कानूनी धंधे को चलाता था। जिसके बारे में कभी किसी को भनक तक न लगी थी। फैक्टरी को बहुत सोच समझ कर ही बनवाया गया था। फैक्टरी के अंदर सिर्फ मशीनें थी जहाॅ पर मजदूर काम करते थे, जबकि फैक्टरी के आला अफसर या बाॅकी स्टाफ फैक्टरी से दूर कुछ फाॅसले पर बने एक बड़े से आफिस में होते थे।

अजय सिंह ने कदाचित ख़्वाब में भी न सोचा था कि कभी ऐसा भी समय उसके जीवन में आ जाएगा जब उसकी इस विसाल फैक्टरी में आग लग जाएगी और इस सबकी छानबीन खुद उसकी ही बेटी पुलिस इंस्पेक्टर बन कर करेगी। कानून का डर उसे कभी नहीं था क्योंकि उसने कानून के नुमाइंदों को अपने वश में कर लिया था। हर महीने वह अच्छी खासी रकम पुलिस के आला अफसरों तक पहुॅचवा देता था। उसके मंत्री तक से अच्छे संबंध थे इस लिए उसे इस धंधे में किसी का कोई डर नहीं था। मगर होनी को कौन टाल सकता था भला? होनी तो अटल होती है, बिना बताए तथा बिना किसी सूचना के वो अपना काम कर डालती है। यही अजय सिंह के साथ हुआ था।

ख़ैर ये सब तो बीती बातें हैं दोस्तो, आइए हम सब वर्तमान की तरफ चलते हैं और देखते हैं कि आगे क्या हो रहा है?

फैक्टरी के अंदर का नज़ारा ही कुछ अलग था। जैसा कि आप सब जानते हैं कि फैक्टरी में भीषण आग लगी हुई थी जिसमें सब कुछ जल कर खाक़ में मिल चुका था। अंदर हर चीज़ कोयला बन चुकी थी। हर जगह पानी में सनी हुई राख तथा टूटे हुए बहुत से टुकड़े पड़े थे। कुछ पल के लिए तो रितू को भी समझ न आया कि इस राख में वह क्या तलाश करे? किन्तु कुछ तो करना ही था, केस रिओपेन हुआ था। इस लिए बिना किसी नतीजे के वह बंद नहीं हो सकता था। ऊपर से आदेश था कि छानबीन अच्छे से होनी चाहिए।

पुलिस के खोजी कुत्ते तथा फाॅरेंसिक डिपार्टमेंट के लोग अपने अपने काम में लग गए। खुद रितू भी वहाॅ की हर चीज़ को बारीकी से देख देख कर जाॅच करने लगी। जबकि इधर अजय, प्रतिमा व अभय चुपचाप उन सबकी कार्यप्रणाली को देखते रहे।

बड़ी बड़ी मशीनों पर जले हुए कपड़ों की राख तथा टुकड़े लिपटे हुए थे। कहीं कहीं पर पिघले हुए शीशे एवं प्लास्टिक नज़र आ रहे थे। अजय सिंह ये सब होने के बाद पहली बार ये सब ध्यान से देख रहा था तथा साथ ही अंदर ही अंदर दुखी भी हो रहा था। कुछ भी हो आखिर उसकी मेहनत का पैसा था वह, फिर चाहे गैर कानूनी वाला हो या फिर सच्चाई वाला।

"मैडम, यहाॅ पर कुछ है।" सहसा एक हवलदार रितू को दूर से ही चिल्लाते हुए कहा।

रितु के साथ साथ सबके कान खड़े हो गए। अजय सिंह की बढ़ी हुई धड़कन मानों उसे रुकती हुई प्रतीत हुई। चेहरे पर तुरंत ही ढेर सारा पसीना उभर आया, तथा चेहरा भय व घबराहट की वजह से पीला पड़ता चला गया। उसने जल्दी से खुद को सम्हाला। अपने दाहिने हाॅथ में लिए रुमाल से उसने तुरंत ही अपने चेहरे का पसीना पोंछा और सरसरी तौर पर इधर उधर देखा। प्रतिमा उसे देख कर तुरंत ही उसके करीब गई तथा हौले से पूछा__"क्या बात है अजय, तुम इतना परेशान और घबराए हुए क्यों लग रहे हो?"

"म मैं क कहाॅ परेशान हूॅ?" अजय सिंह हकलाते हुए बोला__"मैं ठीक हूॅ? ऐसा क्यों लगता है तुम्हें कि मैं परेशान व घबराया हुआ हूॅ?"

प्रतिमा ने उसे बड़े ग़ौर से देखा, फिर कहा__"मुझे ऐसा क्यों लगता है अजय कि जैसे तुम मुझसे कुछ छुपा रहे हो? या फिर ऐसा कि तुम किसी बात से इस लिए घबरा रहे हो कि किसी को वो बात पता न चल जाए।"

अजय सिंह हड़बड़ा गया, आॅखें फाड़े प्रतिमा को देखने लगा। मन में विचार उभरा 'बेटी क्या कम थी जो अब उसकी माॅ भी मेरी जान लेने पर उतारू हो गई है'।

"ऐसे क्यों देख रहे हो मुझे?" प्रतिमा ने कहा__"क्या मैंने कुछ ग़लत कह दिया है?"
"देखो प्रतिमा।" अजय सिंह ने खुद को सम्हाल कर कहा__"मैं इस वक्त किसी से कुछ नहीं कहना चाहता, इस लिए बेहतर होगा कि तुम भी मुझसे कोई सवाल जवाब न करो।"

"मैं तुम्हारी पत्नी हूॅ अजय।" प्रतिमा ने एकाएक अधीरता से कहा__"तुम्हें इस तरह परेशानी की हालत में नहीं देख सकती। तुम जानते हो कि हर काम में मैं तुम्हारे साथ हूॅ, फिर चाहे वो काम कैसा भी क्यों न हो। तुम्हारी खुशी के लिए हर वो काम कर जाती हूॅ जिसे करने का तुम मुझसे कहते हो। मैं ये भी जानती हूॅ कि तुम मुझसे कोई भी बात नहीं छुपाते फिर ऐसी क्या बात हो गई है जिसे तुम मुझसे छुपा कर खुद अंदर ही अंदर घुटे जा रहे हो?"

"ऐसी कोई बात नहीं है।" अजय सिंह ये सोच कर घबराया जा रहा था कि कहीं कोई ये सब बातें सुन न ले, इस लिए वह बोला__"अब चुप हो जाओ प्लीज।"

"अगर ऐसी कोई बात नहीं है तो यही बात तुम मेरे सिर पर हाॅथ रख कर कहो।" प्रतिमा ने कहने साथ ही अजय सिंह का एक हाॅथ पकड़ कर अपने सिर पर रख लिया।

"ये क्या पागलपन है यार?" अजय सिंह ने तुरंत ही प्रतिमा के सिर से अपना हाॅथ एक झटके में खींच कर थोड़ी ऊॅची आवाज़ में कहा था। उसकी आवाज़ सुन कर अभय का ध्यान उनकी तरफ गया तो वह सीघ्र ही उनके पास आकर ब्याकुलता से बोला__"क्या हुआ भइया? कुछ परेशानी है क्या?"

"न नहीं छोटे।" अजय सिंह मन ही मन झुंझला उठा था किन्तु प्रत्यक्ष मे उसने यही कहा__"ऐसी कोई बात नहीं है।"

अभय ने उसके चेहरे की तरफ कुछ पल देखा फिर वह वापस अपनी जगह पर आकर खड़ा हो गया। जबकि अभय के जाते ही अजय सिंह ने प्रतिमा की तरफ देख कर कहा__"फार गाड शेक..अब कुछ मत बोलना।"

"ये तुम बिलकुल भी अच्छा नहीं कर रहे हो अजय।" प्रतिमा ने कहा__"अगर कोई बात है तो तुम्हें मुझसे बेझिझक बता देना चाहिए, हो सकता है कि मैं तुम्हारी कोई मदद कर सकूॅ।"

"अगर कोई बात है भी तो।" अजय सिंह ने गहरी साॅस ली__"तो इस वक्त नहीं बता सकता, बट बिलीव मी तुम्हें सब कुछ ज़रूर बताऊॅगा। अब जाओ यहाॅ से और मुझे अकेला मेरे हाल पर छोंड़ दो।"

प्रतिमा ने कुछ देर अजय की आंखों में देखा और फिर पलट कर अभय के पास आ गई। उसके मन में हज़ारों विचार किसी बिच्छू की तरह डंक मार मार कर उछल कूद कर रहे थे।

उधर हवलदार के चिल्लाने पर रितू तेज़ी से उसके करीब पहुॅची। रितू के आते ही हवलदार ने सामने की तरफ इशारा किया। रितू ने हवलदार की बताई हुई जगह को देखा तो चौंक गई। दरअसल पिघले हुए प्लास्टिक के नीचे कोई चीज़ थी लाल रंग की। रितू फर्स पर बैठ कर उसे ध्यान से देखने लगी। अपने हाॅथों में ग्लव्स पहन कर उसने उस लाल रंग की चीज़ को उठा लिया। अभी वह उसे ध्यान से देख ही रही थी कि फाॅरेंसिक टीम का एक ब्यक्ति उसके नज़दीक आकर बोला__"मैडम, यहाॅ पर एक बेसमेंट भी है।"

"क्या??" रितू चौंकी।
"यस मैडम।" उस ब्यक्ति ने कहा__"खोजी कुत्ते के द्वारा पता चला है।"

" चलो दिखाओ।" रितू तुरंत ही उठकर चल दी। कुछ देर में ही वो ब्यक्ति रितू को लेकर उस जगह पहुॅचा। रितू ने देखा सचमुच वो तहखाना ही था। किन्तु वह ये देख कर चौंकी कि वह अस्त ब्यस्त हुआ लग रहा था जैसे किसी चीज़ से उसे उड़ाया गया हो। उसे तुरंत ही अपने हाॅथ में ली हुई चीज़ का खयाल आया। उसने अपने हाॅथ में ली हुई चीज़ को उस ब्यक्ति को दिखाकर पूछा__"इस चीज़ को देखो और बताओ ये क्या है?"

"अजयययययय।" अचानक ही एक ज़ोरदार चीख फिज़ा को चीरती हुई सबके कानों से टकराई।

चीख बाहर से आई थी, रितू के साथ साथ सबने सुना किन्तु रितू बाहर की तरफ ये कह कर दौड़ पड़ी कि__"माॅम।"

यकीनन ये चीख प्रतिमा की ही थी। रितू ने बाहर आकर देखा उसकी माॅ और अभय चाचा उसके डैड के पास अजीब हालत में बैठे थे। अजय सिंह जमीन में पड़ा था। अभय ने तुरंत ही उसे अपनी गोंद मे लिटा लिया था।

"माॅम।" रितू करीब पहुॅचते ही बोली__"ये क्या हुआ? डैड इस तरह जमीन में कैसे?"
"पता नहीं बेटा अचानक ही खड़े खड़े धड़ाम से गिर गए।" प्रतिमा ने रोते हुए कहा__"शायद फैक्टरी की ये हालत देख इन्हें गहरा सदमा लगा है जिसके चलते ये चक्कर खाकर गिर गए हैं।"

अजय सिंह पानी से सनी राख पर गिरा था। जमीन में हर तरफ छोटे बड़े पत्थर भी पड़े थे जो अजय सिंह के सिर पर लगे थे और उसके सिर से खून बहने लगा था।

"इन्हें हास्पिटल लेकर जाना पड़ेगा रितू बेटा।" अभय ने कहने के साथ ही अजय सिंह को दोनो हाथों से पकड़ कर उठा लिया और तेज़ कदमों के साथ लोहें वाले गेट से बाहर निकल गया।

"मैं भी उनके साथ हास्पिटल जा रही हूं बेटी।" प्रतिमा ने कहा__"तुझे अपनी ड्यूटी करना है तो कर या तू भी अपने डैड के साथ चल।"

"साॅरी माॅम।" रितू की आॅख में आॅसू आ गए__"इस वक्त मैं आनड्यूटी पर हूॅ और केस के सिलसिले में यहाॅ अपनी टीम्स के साथ हूॅ इस लिए मैं डैड के साथ नहीं जा सकती। लेकिन डैड से कहना कि मुझे उनकी इस हालत से बहुत तकलीफ हो रही है।"

"अच्छी बात है।" प्रतिमा ने कहा और बाहर की तरफ दौड पड़ी। जबकि अपने आॅसू पोंछते हुए रितू पलटी और फैक्टरी के अंदर की तरफ बढ़ गई।

"मैडम ये तो किसी टाइम बम्ब के टुकड़े जैसा लगता है।" रितू के आते ही फारेंसिक टीम के उस आदमी ने कहा।
"क्या???" रितू उछल पड़ी__"ये क्या कह रहे हैं आप??"

"जी पक्के तौर पर तो नहीं कह सकता मगर ज्यादातर संभावना यही है।" उस आदमी ने कहा__"और अगर इस संभावना को सच मान लिया जाय तो ऐसा भी लगता है कि किसी टाइम बम्ब द्वारा ही इस बेसमेंट को उड़ाया गया है। बेसमेंट की हालत इस बात का सबूत है मैडम।"

रितू को उस आदमी की बात में सच्चाई के ढेर सारे अंश महसूस हुए। क्योकि बेसमेंट की हालत सचमुच ऐसी थी जैसे उसे बम्ब के द्वारा उड़ाया गया हो।

"अगर ऐसा है तो।" रितू ने कहा__"ये साबित हो गया कि फैक्टरी में लगी आग महज सार्ट शर्टिक से नहीं बल्कि किसी के द्वारा बम्ब से लगाई गई।"

"बिलकुल।" उस आदमी ने कहा।
"मतलब साफ है कि किसी ने टाइम बम्ब को तहखाने में फिट किया।" रितू कह रही थी__"और वो बम्ब अपने निर्धारित समय पर फट गया। बम्ब के फटते ही बेसमेंट उड़ गया और इसके साथ ही उसके अंदर से तेज़ी से आग का झोंका बाहर आकर यहाॅ चारो तरफ फैले कपड़ों और मशीनों से टकराया। कपड़ों पर लगी आग ने तेज़ी से अपना काम किया और देखते देखते सारी फैक्टरी में आग ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया।"

"निःसंदेह।" आदमी ने कहा__"और क्योंकि फैक्टरी बाहर से अवकाश के चलते बंद थी इस लिए जब तक किसी को पता चलता तब तक आग ने उग्र रूप धारण कर सबकुछ बरबाद कर दिया।"

"बेसमेंट के अंदर की क्या पोजीशन है?" रितू ने कहा__"अगर अंदर जाने लायक है तो चलकर जाॅच शुरू करते हैं। देखते हैं और क्या पता चलता है?"

कहने के साथ ही रितू और वो आदमी बेसमेंट के अंदर की तरफ देखने लगे। बेसमेंट के अंदर पुलिस और फाॅरेंसिक के कुछ लोग थे। रितू भी उनके बीच पहुॅच गई।

उधर अजय सिंह को आनन फानन में अभय ने कार में पिछली सीट पर प्रतिमा की गोंद में लिटाया और खुद ड्राइविंग सीट पर बैठकर कार स्टार्ट की। लगभग बीस मिनट बाद वो सब हास्पिटल में थे।

अजय सिंह को तुरंत ही एक रूम में ले जाया गया और डाक्टर ने उसका चेकअप शुरू कर दिया।

अपडेट हाज़िर है दोस्तो.....

मुआफ़ करना, एक बार फिर से कुछ सोच कर अपडेट को यहीं पर विराम दे दिया है मैंने।

आप सबके सामने कुछ सवाल भी तो छोंड़ना है यारो...

क्या हुआ था अजय सिंह को???

अजय सिंह सच में सदमें की वजह से चक्कर खाकर गिरा था या इसमें भी उसकी कोई चाल थी???

इंस्पेक्टर रितू को बेसमेंट में क्या क्या मिला होगा???

क्या रितू के सामने उसके बाप का गैर कानूनी काला सच आ पाया या नहीं?????

इस केस में क्या नतीजा निकलेगा????

क्या फैक्टरी में आग लगने की सच्चाई सामने आई और अगर आई तो क्या ये पता चला कि किसने ये सब किया????

अजय सिंह अब क्या करेगा????

आप लोगों से शिकायत है कि आप लोग अपनी राय या अपनी बात खुल कर तथा दिल से नहीं देते हैं। जबकि हर अपडेट में मैं बस यही उम्मीद करके बैठा होता हूॅ। ख़ैर जाने दीजिए, हाॅ नहीं तो....!!
 
अपडेट............《 18 》

अब तक......

"निःसंदेह।" आदमी ने कहा__"और क्योंकि फैक्टरी बाहर से अवकाश के चलते बंद थी इस लिए जब तक किसी को पता चलता तब तक आग ने उग्र रूप धारण कर सबकुछ बरबाद कर दिया।"

"बेसमेंट के अंदर की क्या पोजीशन है?" रितू ने कहा__"अगर अंदर जाने लायक है तो चलकर जाॅच शुरू करते हैं। देखते हैं और क्या पता चलता है?"

कहने के साथ ही रितू और वो आदमी बेसमेंट के अंदर की तरफ देखने लगे। बेसमेंट के अंदर पुलिस और फाॅरेंसिक के कुछ लोग थे। रितू भी उनके बीच पहुॅच गई।

उधर अजय सिंह को आनन फानन में अभय ने कार में पिछली सीट पर प्रतिमा की गोंद में लिटाया और खुद ड्राइविंग सीट पर बैठकर कार स्टार्ट की। लगभग बीस मिनट बाद वो सब हास्पिटल में थे।

अजय सिंह को तुरंत ही एक रूम में ले जाया गया और डाक्टर ने उसका चेकअप शुरू कर दिया।

अब आगे.......

शाम होने से पहले पहले अजय सिंह को हास्पिटल से डिस्चार्ज कर दिया गया था। डाॅक्टर ने बताया था कि अजय सिंह को किसी गहन चिन्ता तथा किसी सदमे की वजह से चक्कर आया था। बाॅकी उन्हें कोई बीमारी नहीं है। हास्पिटल से डिस्चार्ज होने के बाद अजय सिंह अपनी पत्नी प्रतिमा तथा छोटे भाई अभय के साथ सीधा हवेली ही आ गया था। फैक्टरी में हो रही छानबीन का क्या नतीजा निकला ये उसे पता नहीं था। हलाॅकि उसका पीए और बाॅकी स्टाफ फैक्टरी में ही थे। हास्पिटल से हवेली लौटते समय सारे रास्ते अजय सिंह ख़ामोश रहा। अभय सिंह कार को ड्राइव कर रहा था जबकि अजय सिंह व प्रतिमा कार की पिछली सीट पर बैठे थे।

प्रतिमा ने इस समय अभय की मौजूदगी में अजय सिंह से कुछ भी पूॅछना उचित नहीं समझा था इस लिए वह भी चुप ही रही। ये अलग बात है कि उसके दिलो दिमाग़ में विचारों का बवंडर चल रहा था।

हवेली पहुॅच कर वो सब कुछ देर ड्राइंग रूम में बैठे रहे। अभय सिंह थोड़ी देर बाद अपने घर की तरफ चला गया। अजय सिंह व प्रतिमा का बेटा शिवा इस वक्त हवेली में नहीं था।

सोफे पर बैठा अजय सिंह खामोश था किन्तु अब उसके चेहरे पर गहन सोच और चिन्ता के भाव फिर से नुमायाॅ होने लगे थे। उसका ध्यान फैक्टरी में हो रही छानबीन पर ही लगा हुआ था।

"इस तरह चिन्ता करने से कुछ नहीं होगा अजय।" प्रतिमा अपने सोफे से उठकर अजय वाले सोफे पर उसके करीब ही बैठ कर बोली__"अब जो होना है वो तो होकर ही रहेगा। हलाॅकि मैं ये नहीं जानती कि ऐसी कौन सी बात है जिसकी वजह से तुमने अपनी ये हालत बना ली है किन्तु इतना ज़रूर समझ गई हूॅ कि ये चिन्ता या ये सदमा सिर्फ फैक्टरी में आग लगने से हुए नुकसान बस का नहीं है, बल्कि इसकी वजह कुछ और ही है।"

अजय सिंह कुछ न बोला, बल्कि ऐसा लगा जैसे उसने प्रतिमा की बात सुनी ही न हो। वह पूर्वत उसी तरह सोफे पर बैठा रहा। जबकि उसके चेहरे की तरफ ग़ौर से देखते हुए तथा उसके दोनो कंधों को पकड़ कर झिंझोड़ते हुए प्रतिमा ने ज़रा ऊॅचे स्वर में कहा__"होश में आओ अजय, क्या हो गया है तुम्हें? प्लीज मुझे बताओ कि ऐसी कौन सी बात है जिसकी चिन्ता से तुमने खुद की ऐसी हालत बना ली है?"

प्रतिमा के इस प्रकार झिंझोड़ने पर अजय सिंह चौंकते हुए गहन सोच और चिन्ता से बाहर आया। उसने अजीब भाव से अपनी पत्नी की तरफ देखा फिर एकाएक ही उसके चेहरे के भाव बदले।

"इस छानबीन को होने से रोंक लो प्रतिमा।" अजय सिंह भर्राए से स्वर में कहता चला गया__"अपनी बेटी से कहो कि वह फैक्टरी की छानबीन न करे, वर्ना सब कुछ बरबाद हो जाएगा। ये सब रोंक लो प्रतिमा, मैं तुम्हारे पैर पड़ता हूॅ। प्लीज रोंक लो अपनी बेटी को।"

प्रतिमा हैरान रह गई अपने पति का ये रूप देख कर। किसी के सामने न झुकने वाला तथा किसी से न डरने वाला और न ही किसी से हार मानने वाला इंसान इस वक्त दुनिया का सबसे कमज़ोर व दीन हीन नज़र आ रहा था। प्रतिमा को कुछ पल तो समझ ही न आया कि वह क्या करे किन्तु फिर तुरंत ही जैसे उसे वस्तुस्थित का आभास हुआ।

"कैसे इस सबको रोंकूॅ अजय?" प्रतिमा ने अधीरता से कहा__"तुमने तो मुझे कुछ बताया भी नहीं कि बात क्या है? आज तक अपनी हर बात मुझसे शेयर करते रहे मगर ऐसी क्या बात थी जिसे तुमने मुझसे कभी शेयर करने के बारे में सोचा तक नहीं? क्या तुम ये समझते थे कि तुम्हारी किसी बात से मुझे कोई ऐतराज़ होता? या फिर तुम ये समझते थे कि मैं तुम्हें किसी काम को करने से रोंक देती?? तुम जानते हो अजय कि मैं तुमसे कितना प्यार करती हूॅ तथा ये भी जानते हो कि तुम्हारे कहने पर दुनियाॅ का हर नामुमकिन व असंभव काम करने को तुरंत तैयार हो जाती हूॅ, फिर वो काम चाहे जैसा भी हो। मगर इसके बावजूद तुमने मुझसे कोई बात छुपाई अजय। क्यों किया तुमने ऐसा?"

"मुझे माफ कर दो प्रतिमा।" अजय सिंह ने प्रतिमा के दोनो हाॅथों को थाम कर कहा__"मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हो गई। तुम चाहो तो इस सबके लिए मुझे जो चाहे सज़ा दे दो लेकिन इस सबको रोंक लो प्रतिमा...वर्ना बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा। मैं अपनी ही बेटी की नज़रों में गिर जाऊॅगा, उसका और उसके कानून का मुजरिम बन जाऊॅगा।"

"ऐसी क्या बात है अजय?" प्रतिमा ने झुॅझलाकर कहा__"आखिर तुम कुछ बताते क्यों नहीं? जब तक मुझे बताओगे नहीं तो कैसे मुझे समझ आएगा कि आगे क्या करना होगा मुझे?"

"क्या बताऊॅ प्रतिमा।" अजय सिंह ने हताश भाव से कहा__"और किन शब्दों से बताऊॅ? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है।"

"भला ये क्या बात हुई अजय?" प्रतिमा ने उलझ कर कहा__"जो जैसा है उसे वैसा ही बताओ न।"

अजय सिंह ने एक गहरी साॅस ली। अंदाज़ ऐसा था उसका जैसे किसी जंग के लिए खुद को तैयार कर रहा हो।

"मुझसे वादा करो प्रतिमा।" सहसा अजय सिंह ने प्रतिमा का हाॅथ अपने हाॅथ में लेकर कहा__"कि मेरे द्वारा सब कुछ जानने के बाद तुम मुझसे न तो नाराज़ होओगी और ना ही मुझे ग़लत समझोगी।"

"ठीक है मैं वादा करती हूॅ।" प्रतिमा ने कहा__"अब बताओ क्या बात है??"

"म मैं अपने इस बिजनेस के साथ साथ ही।" अजय सिंह ने धड़कते दिल के साथ कहा__"एक और बिजनेस करता हूॅ प्रतिमा लेकिन वो बिजनेस गैर कानूनी है।"

"क क्या????" प्रतिमा बुरी तरह उछल पड़ी__"य..ये तुम क्या कह रहे हो अजय? तुम गैर कानूनी बिजनेस भी करते हो??"

"मुझे माफ कर दो प्रतिमा।" अजय सिंह ने भारी स्वर में कहा__"पर यही सच है। मैं शुरू से ही इस धंधे में था।"

प्रतिमा आश्चर्यचकित अवस्था में मुह और आॅखें फाड़े अजय सिंह को देखे जा रही थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अजय सिंह गैर कानूनी काम भी करता है। कुछ देर तक वह अवाक् सी देखती रही उसे फिर एक गहरी साॅस लेते हुए गंभीरता से बोली__"क्यों अजय क्यों...आख़िर क्या ज़रूरत थी तुम्हें ऐसा काम करने की? तुम्हें तो पता था कि ऐसे काम का एक दिन बुरा ही नतीजा निकलता है। फिर क्यों किया ऐसा?? आखिर किस चीज़ की कमी रह गई थी अजय जिसके लिए तुम्हें गैर कानूनी काम भी करना पड़ गया??"

"ये सब मेरी ही ग़लती से हुआ है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा__"मेरी ही महत्वाकांछाओं के चलते हुआ है। मैं हमेशा इसी ख्वाहिश में रहा कि मेरे और मेरे बच्चों के पास धन दौलत व ऐश्वर्य की कोई कमी न हो। मेरा एक बहुत बड़ा नाम हो और सारी दुनियाॅ मुझे पहचाने। इसके लिए मैं कुछ भी करने को तैयार था, इस बारे में कभी नहीं सोचा कि मेरी इन चाहतों से कभी मुझे ऐसा भी दिन देखना पड़ सकता है।"

"अब क्या होगा अजय?" प्रतिमा ने कहा__"तुम्हारी ख्वाहिशों ने आज क्या सिला दिया है तुम्हें और तुम्हारे साथ साथ हम सबको भी। क्या होगा जब सबको ये मालूम होगा कि तुम गैर कानूनी धंधा भी करते हो?"

"मुझे और किसी की परवाह नहीं है प्रतिमा।" अजय सिंह बोला__"मुझे तो बस इस बात की चिन्ता है कि इस सबके बाद मैं अपनी ही बेटी की नज़रों में गिर जाऊॅगा। कानून के प्रति उसकी ईमानदारी और आस्था देख कर यही लगता है कि वह मुझे इस काम की वजह से जेल की सलाखों के पीछे भी डाल सकती है।"

"ये कैसे कह सकते हो तुम?" प्रतिमा ने चौंकते हुए कहा__"हमारी बेटी भला ऐसा कैसे कर सकती है?"
"वो यकीनन ऐसा ही कर सकती है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा__"क्यों कि फैक्टरी में हो रही छानबीन में उसे वो सब मिल जाएगा जो ये साबित करेगा कि मैं गैर कानूनी धंधा करता हूॅ।"

"तुम्हारे कहने का मतलब है कि फैक्टरी में ही तुमने अपने गैर कानूनी धंधों के सबूत छोंड़ रखे हैं?" प्रतिमा की धड़कनें रुकती सी प्रतीत हुई उसे__"और वो सब सबूत अब रितू के हाॅथ लग जाएंगे?"

"बिलकुल।" अजय सिंह के चेहरे पर चिंता के भाव थे__"यही सच है प्रतिमा। फैक्टरी में ही मैंने एक गुप्त तहखाना बनवाया हुआ था, और उसी तहखाने में मैं गुप्तरूप से अपना ये गैर कानूनी धंधा करता था। इस धंधे में कानून के द्वारा पकड़े जाने का मुझे कोई डर नहीं था क्योंकि मेरे संबंध कानून तथा मंत्रियों से थे। ये सब मेरे इस धंधे से होने वाले मुनाफे से हिस्सा पाते थे। अगर ये कहूॅ तो ग़लत न होगा कि इन्हीं लोगों की कृपा से मेरा ये धंधा चल रहा था।"

"अगर ऐसी बात है तो तुम्हें इतना परेशान और चिन्ता करने की क्या ज़रूरत है?" प्रतिमा ने कहा__"ये सब तुम रोंकवा भी तो सकते हो। कानून और मंत्रियों में तो सब तुम्हारे ही आदमी हैं, तो उनसे कह कर इस छानबीन को रुकवाया भी तो जा सकता है?"

"अब ऐसा नहीं हो सकता प्रतिमा।" अजय सिंह बोला__"क्योंकि इसके पहले जो छानबीन हुई थी वो मेरे अनुरूप हुई थी। उसमें सब मेरे ही आदमीं थे लेकिन अब जो छानबीन हो रही है उसमें मैं कुछ नहीं कर सकता।"

"क्यों?" प्रतिमा चौंकी__"क्यों नहीं कर सकते? अब क्या हो गया है ऐसा?"
"अब वो हुआ है प्रतिमा।" अजय सिंह ने गहरी साॅस छोंड़ी__"जिसके बारे में मैं कभी सोच भी नहीं सकता था।"

"क्या मतलब??" प्रतिमा हैरान।
"मतलब कि रातों रात सारे पुलिस डिपार्टमेंट को बदल दिया गया।" अजय सिंह कह रहा था__"पुलिस में कमिश्नर तक जो भी मेरे आदमी थे उन सबका तबादला कर दिया गया है। अब तुम समझ सकती हो कि इन हालात में मैं क्या कर सकता हूॅ। मंत्री से मदद माॅगी लेकिन उसने भी अपने हाॅथ खड़े कर लिए। मंत्री ने कहा कि वो कुछ नहीं कर सकता क्योंकि ये सब ऊपर हाई कमान के आदेश पर हो रहा है।"

"हे भगवान!" प्रतिमा चकित भाव से बोली__"ये तो बहुत ही सीरियस मामला हो गया है।"
"वही तो।" अजय सिंह ने कहा__"मुझे समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा क्यों हो रहा है? आखिर क्या वजह है जो इस सबके लिए हाई कमान से आदेश दिया गया? आखिर किस वजह से रातों रात इस शहर के सारे पुलिस विभाग का तबादला कर दिया गया?"

"यकीनन अजय।" प्रतिमा ने कुछ सोचते हुए कहा__"ये तो बड़ा ही पेंचीदा मामला हो गया है। लेकिन रितु ने तो कहा था कि इस केस को उसने रिओपेन करवाया है, उस सूरत में मामले को इतना सीरियस नहीं होना चाहिए था। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी बेटी ने ही हाई कमान को किसी ज़रिये इस सबके लिए सूचित किया हो?"

"हो भी सकता है और नहीं भी?" अजय सिंह ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा।
"क्या मतलब?" प्रतिमा के माथे पर सिलवटें उभरी।

"साधारण रूप से अगर हम ये सोच कर चलें।" अजय सिंह बोला__"कि रितू ने सिर्फ अपने पिता की फैक्टरी में आग लगने से हुए भारी नुकसान के चलते ये सोच कर इस केस को रिओपेन करवाया है कि कदाचित ये सब हमारे किसी दुश्मन के द्वारा ही किया गया हो सकता है तो इस मामले की छानबीन साधारण तरीके से ही होती। लेकिन अगर हम ये सोचें कि हो सकता है रितू को किसी वजह से ये पता चला हो कि उसका बाप इस बिजनेस की आड़ में गैर कानूनी धंधा भी करता है तो यकीनन इस केस की छानबीन का ये मामला संगीन है।"

"बात तो तुम्हारी बिलकुल दुरुस्त है अजय।" प्रतिमा ने कहा__"लेकिन सवाल ये उठता है कि रितू को ये कैसे पता चल सकता है कि उसका बाप ये सब भी करता है??"

"संभव है कि पुलिस में आते ही थाने में उसने बारीकी से सभी फाइलों का अध्ययन किया हो?" अजय सिंह ने कहा__"उन्हीं फाइलों में कहीं उसे कोई ऐसा सबूत मिला हो जिससे उसे इस सबका पता चल गया हो। कानून में आस्था रखने वाली हमारी बेटी ने इस सबके पता चलते ही ये सोच लिया हो कि उसे अपने बाप को गैर कानूनी धंधा करने के जुर्म में गिरफ्तार करके जेल की सलाखों के पीछे डाल देना चाहिए।"

"ये सब तो ठीक है अजय।" प्रतिमा ने कहा__"लेकिन क्या ये संभव है कि किसी थाने में तुम्हारे खिलाफ कोई ऐसा सबूत फाइल के रूप में कहीं दबा हो सकता है? जैसा कि तुमने कहा था कि इसके पहले इस शहर में पुलिस महकमें में कमिश्नर तक की रैंक का कानूनी नुमाइंदा तुम्हारा ही आदमी था, तो क्या ये संभव है कि पुलिस के तुम्हारे ही आदमियों ने अपने थाने में कहीं तुम्हारे ही खिलाफ़ कोई सबूत बना कर रखा हुआ हो सकता था?"

"इस बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता।" अजय सिंह ने कहा__"ऐसा हो भी सकता है। संभव है किसी पुलिस के नुमाइंदे ने गुप्त रूप से मेरे खिलाफ़ किसी प्रकार का सबूत बना कर रखा रहा हो। आखिरकार पुलिस तो पुलिस ही होती है, वो न तो किसी की दोस्त हो सकती है और न ही दुश्मन।"

"इन सब बातों के बाद तो यही निष्कर्स निकलता है।" प्रतिमा ने गंभीरता से कहा__"कि हमारी बेटी को किसी वजह से अपने पिता के खिलाफ कोई सबूत मिला और अब वह पक्के तौर पर बारीकी से छानबीन करके कुछ और ठोस सबूत हासिल करना चाहती है जिससे उसे तुमको जेल की सलाखों के पीछे डालने में कोई अड़चन न हो सके।"

"हो सकता है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कुछ सोचते हुए कहा__"लेकिन एक बात समझ में नहीं आ रही।"
"कौन सी बात अजय?" प्रतिमा ने ना समझने वाले भाव से अजय सिंह की तरफ देखते हुए कहा था।

"यही कि रातों रात सारे पुलिस डिपार्टमेंट का तबादला क्यों कर दिया गया?" अजय सिंह बोला__"ये छानबीन तो वैसे भी हो जाती। कोई भी पुलिस का अफसर इस छानबीन में किसी भी प्रकार का हस्ताक्षेप नहीं करता। फिर क्यों तबादला कर दिया गया सबका?"


"अगर इस बात को हम अपनी इंस्पेक्टर बेटी के हिसाब से सोचें तो संभव है उसी ने इस सबके लिए ऊपर हाई कमान को अर्जी लिख कर गुज़ारिश की हो या फिर इसकी माॅग की हो?" प्रतिमा ने संभावना ब्यक्त की__"क्योकि शायद उसे इस बात की खबर हो कि इस शहर का सारा पुलिस विभाग तुम्हारे हाॅथों में है।"

"नहीं प्रतिमा।" अजय सिंह ने मजबूती से अपने सिर को इंकार के भाव से हिलाते हुए कहा__"रातों रात शहर के सारे पुलिस विभाग का तबादला कर देना कोई मामूली बात नहीं है, और उस सूरत में तो बिलकुल भी नहीं जबकि हमारी बेटी ने अभी अभी पुलिस फोर्स ज्वाइन किया हो। किसी भी नये पुलिस वाले के लिए इतनी दूर तक पहुॅच रखना नामुमकिन है प्रतिमा। पुलिस में रह कर बहुत दिन तक पहले पुलिस के दाॅव पेंच सीख कर उसका अनुभव करना पड़ता है। मैं ये बात मानता हूॅ कि हमारी बेटी ने पुलिस में आते ही किसी मॅझे हुए पुलिस अफसर की भाति पुलिसिया तौर तरीका अपना लिया है और उसका अंदाज़ भी अनुभवी लगता है लेकिन फिर भी इस बात को हजम करना मुश्किल है कि उसने ही शहर के सारे पुलिस विभाग को बदल देने की अपील की हो सकती है।"

"तो फिर।" प्रतिमा ने कहा__"तुम्हारे ख़याल से ये सब किसने किया हो सकता है?"
"यही तो समझ नहीं आ रहा।" अजय सिंह ने कहा__"दिमाग़ की नशें दर्द करने लगी हैं इस सबके बारे में सोचते सोचते।"

"तुम एक शख्स को तो भूल ही गए हो अजय।" प्रतिमा ने मानो धमाका करने वाले भाव से कहा__"ये सब उसने भी तो किया हो सकता है?"

"किसकी बात कर रही हो तुम?" अजय सिंह चौंका था।
"तुम्हारे भतीजे विराज की बात कर रही हूॅ मैं।" प्रतिमा ने कहा।

"वो साला इस मामले में कहाॅ से फिट होता है प्रतिमा?" अजय सिंह ने अजीब भाव से कहा।
"बात इस मामले में उसके फिट होने की नहीं है अजय।" प्रतिमा ने गहरी साॅस लेकर कहा__"बल्कि बात है ऐसे मामले में हर तरह की संभावना की। हमें भले ही लगता है कि विराज का इस मामले में कोई हाॅथ नहीं हो सकता किन्तु सवाल है कि क्यों नहीं हो सकता उसका हाॅथ?"

"बेवकूफों की तरह बात मत करो प्रतिमा।" अजय सिंह ने झुंझलाते हुए कहा__"मामले की गंभीरता और उसकी पेंचीदगियों को समझो। उसकी कोई औकात नहीं हो सकती इस सबमें शहर के सारे पुलिस विभाग का तबादला करवा देने की और न ही ये औकात हो सकती है कि वह सीधा हाई कमान से इस सबके लिए बात कर सके। तुम्हारा दिमाग़ फिर गया लगता है।"

"चलो मान लिया कि उसकी कोई औकात नहीं हो सकती इन सब कामों को करवाने की।" प्रतिमा ने ज़ोर देकर कहा__"मगर क्या ये नहीं हो सकता कि उसने ही हमारी फैक्टरी में बम्ब लगा कर सब कुछ आग के हवाले कर दिया हो? तुम हर बार उसकी औकात की बात करके उसे तुच्छ समझ लेते हो अजय जबकि उसे तुच्छ समझ लेने का भी तुम्हारे पास कोई सबूत नहीं है। जबकि कम से कम उसकी इतनी तो औकात हो ही सकती है कि वह फैक्टरी में किसी भी तरह ही सही लेकिन आग लगा सके।"

अजय सिंह खामोश रह गया। प्रतिमा की बातों में उसे सौ मन की सच्चाई नज़र आई। और इस एहसास ने ही उसे हिला कर रख दिया कि ये सब उसके भतीजे विराज ने किया हो सकता है।

"ये तो तुम भी अच्छी तरह समझते हो अजय कि वो हमें अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझता है।" प्रतिमा कह रही थी__"उसे लगता है कि हमने उसे और उसके परिवार को बरबाद कर दिया है। इस लिए इस सबका प्रतिशोध लेने के लिए वह क्या नहीं कर सकता? वह हर उस काम को कर गुज़रने पर अमादा हो सकता है जिस काम से वह हमारा बाल भी बाॅका कर सके।"

अजय सिंह कुछ कह न सका। किसी गहरी सोच में डूबा नज़र आने लगा था वह।

"तुमने कहा था कि तुम्हारे आदमी उन्हें ढूॅढ़ने के लिए मुम्बई की खाक़ छान रहे है।" प्रतिमा मजबूत लहजे में कहती जा रही थी__"जबकि आज तक तुम्हारे आदमियों के हाॅथ में उनसे संबंधित कोई छोटा सा सुराग़ भी नहीं लग सका। इस बारे में क्या कहोगे तुम, बताओ?"

"क्या कहूॅ यार?" अजय सिंह के चेहरे पर कठोर भाव उभरे__"जाने कहाॅ गुम हो गए हैं वो सब? उन सुअर की औलादों को ये ज़मीन खा गई है या आसमान निगल गया है। एक बार....सिर्फ एक बार मेरे हाॅथ लग जाएॅ फिर देखना क्या हस्र करता हूॅ मैं उन सबका।"

"मुझे नहीं लगता अजय कि तुम उन लोगों का कुछ कर लोगे।" प्रतिमा ने अजीब भाव से कहा__"जबकि लग ये रहा है कि वो कमीना रंडी की औलाद विराज हमारा ही बेड़ा गर्क़ कर रहा है।"

अभी ये सब बातें ही कर रहे थे कि बाहर से किसी के आने की आहट सुनाई दी। कुछ ही पल में इंस्पेक्टर रितू ड्राइंग रूम में दाखिल हुई। उसके चेहरे पर थकान के भाव गर्दिश करते नज़र आ रहे थे। अजय सिंह अपनी बेटी को देखकर घबरा सा गया। उसे लगा फैक्टरी की छानबीन में रितू को उसके काले कारनामों का सारा काला चिट्ठा मिल गया है और अब वह उसे गिरफ्तार करने आई है।

"आई एम साॅरी डैड।" रितू ने आते ही अजय सिंह का हाॅथ पकड़ कर तथा खेद भरे लहजे में कहा__"मैं आपके साथ हास्पिटल नहीं जा सकी। आप तो मेरी मजबूरी समझ सकते हैं डैड, उस वक्त मैं अपनी ड्यूटी को छोंड़ कर नहीं जा सकती थी आपके साथ। उस सूरत में तो हर्गिज़ नहीं जब किसी केस की छानबीन चल रही हो। एनीवे, अब आपकी तबियत कैसी है?"

अजय सिंह को समझ नहीं आ रहा था कि रितू को देख कर अब वह कैसा रिऐक्ट करे? मनो-मस्तिष्क में हज़ारों ख़याल मानो ताण्डव सा करने लगे थे। पल भर में ढेर सारा पसीना उसके सफेद पड़ चुके चेहरे पर उभर आया था। दोनो कानों में दिल पर धम्म धम्म करके पड़ने वाली किसी भारी हथौड़े की चोंट उसकी हृदय की गति को रोंक देने के लिए काफी थी जो सुनाई दे रही थी। जबकि उसके अंदर की हालत से अनभिज्ञ रितु ने अपने पिता को खामोश देख कर पुनः कहा__"प्लीज डैड, अब माफ भी कर दीजिए न अपनी इस बेटी को। आपको पता है आपकी उस हालत से मैं कितना परेशान और दुखी हो गई थी। लेकिन घटना स्थल पर मौजूद रहना मेरी मजबूरी थी, आप तो समझ सकते हैं न डैड? लेकिन इस सबसे फुर्सत होकर मैं सीघ्र ही पुलिस स्टेशन से भागी भागी आपसे मिलने आई हूॅ।"

अजय सिंह के मन मस्तिष्क में एकाएक मानो झनाका सा हुआ। दिमाग़ की सारी बत्तियाॅ जल उठीं। दिमाग़ ने सही तरीके से काम करना शुरू कर दिया। मन में बिजली की सी तेज़ी से ये ख़याल उभरा कि 'उसकी बेटी इस तरह बिहैव क्यों कर रही है जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो? इसके मासूम बर्ताव से तो यही लग रहा है जैसे छानबीन करते हुए तहखाने में इसे कुछ नहीं मिला वर्ना उसके हाथ अगर कोई गैर कानूनी चीज़ लग गई होती तो ये यहाॅ अपने पीछे पुलिस फोर्स लेकर तथा अपने हाॅथ में हॅथकड़ी लेकर उसे गिरफ्तार करने आती। लेकिन ऐसा तो दूर दूर तक होता हुआ दिखाई नहीं देता। इसका क्या मतलब हो सकता है?'

अजय सिंह के दिमाग़ में एकाएक जैसे हज़ार तरह के सवाल खड़े हो गए थे लेकिन जवाब किसी का नहीं था उसके पास। मन में ये ख़याल बार बार किसी हथौड़े की भाॅति चोंट मार रहे थे कि आख़िर क्या हुआ फैक्टरी की छानबीन में? उसकी बेटी को तहकीकात में उसके खिलाफ क्या कोई गैर कानूनी चीज़ मिली?

"क्या बात है डैड?" अपने पिता को गहरे समुद्र में डूबे देख रितू ने इस बार अपने दोनों हाॅथों की मदद से झिंझोड़ते हुए कहा था__"आप कुछ बोलते क्यों नहीं है? कहाॅ खोए हुए हैं आप?"

"आॅ..हाॅ...तु..तुमने कुछ कहा क्या बेटी?" अजय सिंह बुरी तरह चौंकते हुए कहा था। एकाएक ही उसके मन में ये ख़याल उभरा कि 'ये क्या बेवकूफी कर रहा है अजय सिंह, अपने आपको सम्हाल वर्ना तेरी हालत और तेरे चेहरे की ये हालत देख कर तेरी बेटी को कहीं सचमुच कुछ पता न चल जाए।' इस ख़याल के द्वारा खुद को समझाए जाने पर अजय सिंह ने तुरंत ही अपने आपको सम्हाला। और फिर मुस्कुरा कर उसने अपनी बेटी की तरफ देखा।

"मैं ये कह रही हूॅ डैड कि आप कुछ बोल क्यों नहीं रहे थे?" रितू कह रही थी__"पता नहीं कहाॅ खोए हुए थे आप?"

"कुछ नहीं बेटा।" अजय सिंह ने एक नज़र अपनी पत्नी की तरफ डालने के बाद कहा__"तुम सुनाओ, कैसा रहा पुलिस के रूप में आज का तुम्हारा पहला दिन?"

अजय सिंह ये पूॅछने से हिचकिचाने के साथ साथ डर भी रहा कि 'आज तहकीकात में क्या हुआ?' इस लिए ये न पूछ कर कुछ और ही पूॅछ बेठा था।

"बहुत अच्छा था डैड।" रितू ने मुस्कुरा कर कहा__"बस थोड़ा थक गई हूॅ।"
"अभी आदत नहीं है न।" सहसा इस बीच प्रतिमा कह उठी__"जब इस सबकी आदत हो जाएगी तो सब ठीक हो जाएगा।"

"आप ठीक कहती हैं माॅम।" रितू ने कहा__"धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा। लेकिन अभी तो आप मुझे मस्त गरमा गरम काॅफी पिलाइए प्लीज।"

"अभी बना कर लाती हूॅ बेटी।" प्रतिमा ने हॅस कर कहा और सोफे से उठ कर अंदर किचेन की तरफ चली गई।

इधर अजय सिंह सोच रहा था कि आज की छानबीन के संबंध में उसकी बेटी ने अभी तक कोई बात क्यों नहीं की?? वह खुद इस बारे में पूॅछने से हिचकिचा भी रहा था और डर भी रहा था। लेकिन ये भी सच था कि उसके लिए इस सबके बारे में जानना निहायत ही ज़रूरी था। मगर सबसे बड़ा सवाल था कि वह अपनी बेटी से पूॅछें कैसे???

"डैड, आपने अभी तक मुझसे पूछा नहीं।" सहसा रितू ने अजीब से अंदाज़ में कहा__"कि आज फैक्टरी में हुई छानबीन में क्या नतीजा निकला??"

अजय सिंह मन ही मन बुरी तरह चौंका भी और घबरा भी गया, किन्तु अपने किसी भी भाव को चेहरे पर उभरने नहीं दिया। खुद को मजबूती से सम्हाल कर संतुलित लहजे से कहा__"पूॅछ कर क्या करूॅगा बेटी? इस सबसे कुछ होने वाला तो है नहीं। क्या इस सबसे वो सब कुछ वापस मिल जाएगा जो जल कर खाक़ में मिल चुका है?"

"बात सब कुछ मिल जाने की नहीं है डैड।" रितू ने कहा__"बल्कि इस बात की है कि ये सब किसने और किस वजह से किया? आपको ये जानकर हैरानी के साथ साथ शायद खुशी भी होगी कि फैक्टरी में आग किसी सार्ट शर्किट की वजह से नहीं बल्कि फैक्टरी के तहखाने में किसी के द्वारा लगाए गए टाइम बम्ब के भीषण धमाके से उत्पन्न हुई आग से लगी थी।"

"क् क्या????" अजय सिंह बुरी तरह चौंकने का बेहतरीन नाटक किया था फिर बोला__"ये ये क्या कह रही हो तुम?"

"ये सच है डैड।" रितू ने कहा__"मगर मैं इस बात से हैरान हूॅ कि इसके पहले हुई छानबीन में ये सब क्यों नहीं बताया पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में? जबकि ये सब बातें कोई भी साधारण ब्यक्ति जाॅच करके बता सकता था। ये अपने आप में एक बहुत बड़ा सवाल है डैड। ख़ैर पुलिस इंक्वायरी में इस सबका जवाब उन पुलिस आफिसर्स को ही देना पड़ेगा जिन्होंने इसके पहले फैक्टरी की छानबीन की थी। मगर इस सबका जवाब आपको भी देना पड़ेगा डैड। मुझे पक्का यकीन है कि पुलिस द्वारा इस प्रकार की छानबीन करके रिपोर्ट आपके कहने पर ही बनाई गई थी।"

अजय सिंह अवाक् सा देखता रह गया अपनी बेटी को। फिर तुरंत ही खुद को सम्हालते हुए कहा__"ये सब झूॅठ है बेटी। हमने ऐसी कोई रिपोर्ट बनाने के लिए नहीं कहा।"

"आप अपनी इस बात को साबित नहीं कर पाएंगे डैड।" रितू ने कहा__"सारे हालात इस बात की चीख चीख कर गवाही दे रहे हैं कि इसके पहले की गई छानबीन महज एक औपचारिकता बस थी। वर्ना कोई भी पुलिस वाले अंधे नहीं थे जो उन्हें ये न दिखता कि फैक्टरी में लगी आग किसी के द्वारा लगाए गए टाइम बम्ब की मेहरबानी थी। इसके बावजूद उन्होंने अपनी रिपोर्ट में यही दिखाया कि फैक्टरी में आग सिर्फ शार्ट शर्किट की वजह से लगी थी। यहाॅ पर कोई भी सवाल खड़ा कर सकता है डैड कि सब कुछ स्पष्ट नज़र आते हुए भी पुलिस ने ऐसी रिपोर्ट क्यों बनाई? इसमें पुलिस का क्या मकसद था? या फिर एक ही बात हो सकती है कि पुलिस को ऐसी ही रिपोर्ट बनाने के लिए खुद आपने कहा हो। अगर यही सच है तो फिर यहाॅ पर सवाल खड़ा हो जाता है कि आपने पुलिस को ऐसी रिपोर्ट बनाने के लिए क्यों कहा??? बात यहीं पर खत्म नहीं हो जाती डैड, बल्कि ऐसी स्थिति में फिर और भी सवाल खड़े होने लगते हैं जिनका जवाब मिलना ज़रूरी हो जाता है।"

अजय सिंह को लगा कि अभी ज़मीन फटे और वह उसमें पाताल तक समाता चला जाए। हलाॅकि रितू ने कोई तीर नहीं मार लिया था ये सब करके क्योंकि फैक्टरी की छानबीन अगर पहले ही पूरी ईमानदारी से की गई होती तो पहले ही पुलिस को ये सब पता चल जाता। लेकिन क्योंकि ऐसा हुआ नहीं था। बल्कि अजय सिंह अपने तरीके से रिपोर्ट बनवा कर चैन से बैठ गया था। वो भला कैसे इस बात की कल्पना कर लेता कि अगले ही दिन उसकी अपनी बेटी इन गड़े मुर्दों को निकाल कर उसकी हालत को खराब करना शुरू कर देगी।

"आपकी ख़ामोशी इस बात का सबूत है डैड कि आप ही ने पुलिस को ऐसी रिपोर्ट बनाने को कहा था।" रितू ने कहा__"क्या आप बताने का कष्ट करेंगे कि आपने ऐसा क्यों किया?"

अजय सिंह क्योंकि जानता था कि इस संबंध में अब झूॅठ बोलने का कोई मतलब नहीं है इस लिए सच बताना ही बेहतर समझा उसने।

"ये सच है बेटी कि मेरे ही कहने पर पुलिस ने वैसी रिपोर्ट बनाई थी।" अजय सिंह ने गंभीरता से कहा__"लेकिन ये सब करना मेरी मजबूरी थी बेटी क्योंकि मैं इस सबको और अधिक उछालना नहीं चाहता था। मैं नहीं चाहता था बेटी कि मेरी इज्जत का अब और कचरा हो। सब कुछ तो जल ही गया था, कुछ मिलना तो था नहीं, इस लिए कम से कम अपनी इज्जत को तो नीलाम होने से बचा लेता। इसी वजह से बेटी...सिर्फ इसी वजह से मैंने पुलिस अधिकारियों से मिन्नतें कर करके ऐसी रिपोर्ट बनाने को कहा था।"

रितू देखती रही अपने पिता के चेहरे की तरफ। अंदाज़ ऐसा था जैसे परख रही हो कि उसके बाप की बातों में कितनी सच्चाई है? जबकि अपनी बेटी को इस तरह अपनी तरफ देखते हुए देख अजय सिंह के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं थी।

"वाह डैड वाह!" रितू ने अजीब भाव से कहा__"आपने तो ये सब करके कमाल ही कर दिया। मतलब आपने ये भी नहीं सोचा कि अगर इस सबकी पुलिस द्वारा बारीकी से तहकीकात करवाई जाए तो इससे आपको कुछ हासिल भी हो सकता है?"

तभी प्रतिमा हाॅथ में ट्रे लिए ड्राइंगरूम में दाखिल हुई। उसने एक एक कप सबको पकड़ाया और खुद भी एक कप लेकर वहीं सोफे पर बैठ गई।

"इससे भला क्या हासिल होता बेटी?" अजय सिंह ने कहा था।
"छानबीन से ये तो पता चल ही गया है डैड कि फैक्टरी में आग टाइम बम्ब के फटने से लगी थी।" रितू ने कप में भरी काॅफी का एक सिप लेकर कहा__"अब ये पता लगाना पुलिस का काम है कि फैक्टरी में टाइम बम्ब किसने फिट किया था? आपके अनुसार उस दिन और रात अवकाश के चलते फैक्टरी बंद थी तथा बाहर से फैक्टरी में ताला भी लगा था। अब सोचने वाली बात है कि कोई बाहरी आदमी कैसे ये सब कर सकता है? क्योंकि सबसे पहले तो उसे फैक्टरी के अंदर पहुॅच पाना ही नामुमकिन था, कारण फैक्टरी में जो ताला लगा था वो कोई साधारण झूलने वाला ताला नहीं था जिसे आराम से तोड़ कर फैक्टरी अंदर जाया जा सके, बल्कि गेट पर जो ताला था वो लोहे वाले गेट के अंदर फिक्स था।"

"ताला खोलना कोई बड़ी बात या कोई समस्या नहीं है बेटी।" सहसा प्रतिमा ने हस्ताक्षेप किया__"आज के समय में एक से बढ़ कर एक खलीफा हैं जो पलक झपकते ही कोई भी ताला खोल भी सकते हैं और उसे तोड़ भी सकते हैं।"

"यू आर अब्सोल्यूटली राइट माॅम।" रितू ने मुस्कुरा कर कहा__"पर उस स्थिति में ये संभव नहीं है जबकि फैक्टरी के गेट पर दरबान मौजूद हों। मैंने इसकी जाॅच की है और पता चला है कि गेट पर दरबान मौजूद था। अब सवाल ये है कि दरबान की मौजूदगी में कोई बाहरी आदमी अंदर कैसे जा सकता है?"

"इसका मतलब तो यही हुआ कि गेट पर तैनात दरबान झूॅठ बोल रहा है।" प्रतिमा ने कहा__"या फिर ऐसा भी हो सकता है कि फैक्टरी का ही कोई स्टाफ मेंबर फैक्टरी के अंदर गया हो। स्टाफ के अंदर जाने पर गेट में मौजूद दरबान को कोई ऐतराज़ नहीं हो सकता था।"

"अगर कोई स्टाफ का ही आदमी फैक्टरी के अंदर गया था।" रितू ने कहा__"तो दरबान को इस बात की जानकारी पुलिस के पूछने पर देनी चाहिए थी। मगर इस संबंध में दरबान का हर बार यही कहना है कि रात कोई भी ब्यक्ति फैक्टरी के अंदर नहीं गया।"

"बड़ी हैरत की बात है ये।" प्रतिमा कह उठी__"जब फैक्टरी के अंदर कोई गया ही नहीं तो फैक्टरी के अंदर, वो भी तहखाने में टाइम बम्ब क्या कोई भूत लगा कर चला गया था???"

"यही तो सोचने वाली बात है माॅम।" रितू ने हॅस कर कहा__"खैर, पता चल ही जाएगा देर सवेर ही सही। मैं तो डैड से ये कह रही थी कि उन्होंने इस सबके बारे में जानना ज़रूरी क्यों नहीं समझा? आखिर ये जानना तो ज़रूरी ही था कि किसने ये सब किया?"

अजय सिंह के मन में सिर्फ यही सवाल चकरा रहे थे, और वो ये थे कि 'तहखाने में उसकी बेटी को और क्या मिला? क्या उसके हाॅथ कोई ऐसी चीज़ लगी जिससे उसकी असलियत रितू को पता चल सके? इस बारे में रितू ने अभी तक कोई बात नहीं की, इसका मतलब उसे कुछ भी नहीं मिला। मगर ऐसा कैसे हो सकता है???? तहखाने में तो गैर काननी वस्तुओं का अच्छा खासा स्टाक था। क्या वह सब भी आग में जल गया है??? कहीं ऐसा तो नहीं कि रितु को सब पता चल गया हो किन्तु इस वक्त वह अंजान बनी होने का नाटक कर रही हो? हे भगवान! कैसे पता चले इस सबके बारे में??? मेरे गले में तो अभी भी जैसे कोई तलवार लटक रही है।

अपडेट हाज़िर है दोस्तो......
आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,,,,,,,,
 
अपडेट............《 19 》

अब तक......

"बड़ी हैरत की बात है ये।" प्रतिमा कह उठी__"जब फैक्टरी के अंदर कोई गया ही नहीं तो फैक्टरी के अंदर, वो भी तहखाने में टाइम बम्ब क्या कोई भूत लगा कर चला गया था???"

"यही तो सोचने वाली बात है माॅम।" रितू ने हॅस कर कहा__"खैर, पता चल ही जाएगा देर सवेर ही सही। मैं तो डैड से ये कह रही थी कि उन्होंने इस सबके बारे में जानना ज़रूरी क्यों नहीं समझा? आखिर ये जानना तो ज़रूरी ही था कि किसने ये सब किया?"

अजय सिंह के मन में सिर्फ यही सवाल चकरा रहे थे, और वो ये थे कि 'तहखाने में उसकी बेटी को और क्या मिला? क्या उसके हाॅथ कोई ऐसी चीज़ लगी जिससे उसकी असलियत रितू को पता चल सके? इस बारे में रितू ने अभी तक कोई बात नहीं की, इसका मतलब उसे कुछ भी नहीं मिला। मगर ऐसा कैसे हो सकता है???? तहखाने में तो गैर काननी वस्तुओं का अच्छा खासा स्टाक था। क्या वह सब भी आग में जल गया है??? कहीं ऐसा तो नहीं कि रितु को सब पता चल गया हो किन्तु इस वक्त वह अंजान बनी होने का नाटक कर रही हो? हे भगवान! कैसे पता चले इस सबके बारे में??? मेरे गले में तो अभी भी जैसे कोई तलवार लटक रही है।

अब आगे........

अभी ये सब बातें ही कर रहे थे कि बाहर से किसी के आने की आहट सुनाई दी उन्हें। पलट कर देखा तो अभय और शिवा के साथ नीलम अपने हाथ में एक हैण्डबैग लिए आ रही थी।

"डैड...।" अपने पिता को देखते ही नीलम दौड़ कर आई और अजय सिंह से लिपट गई। अजय सिंह ने उसके सिर पर प्यार से हाॅथ फेर कर कहा__"कैसी है मेरी बेटी??"

[color=rgb(102,]"मैं बिलकुल अच्छी हूॅ डैड।" नीलम ने कहा__"आपकी याद बहुत आती थी वहाॅ।"

"ओह अच्छा जी।" अजय सिंह ने मुस्कुरा कर कहा और फिर नीलम को साइड से छुपका लिया।[/color]


अभय व शिवा भी आकर वहाॅ पर रखे सोफों पर बैठ गए। अपने डैड से अलग होने के बाद नीलम अपनी माॅ और बहन से गले मिली।

"कन्ग्रैट्स दी।" नीलम ने रितू के गले मिलते हुए कहा__"आख़िर आपकी ख़्वाहिश पूरी हो ही गई। आप अब एक पुलिस इंस्पेक्टर बन गई हैं।"

"थैंक्यू छोटी।" रितू ने मुस्कुरा कर कहा__"और बता, मुम्बई में तेरी पढ़ाई कैसी चल रही है? काॅलेज अच्छा है न? और माॅसी लोग सब कैसे हैं?"

"सब अच्छे हैं दी।" नीलम ने मुस्कुराते हुए कहा__"और काॅलेज भी अच्छा ही होगा?"
"अच्छा होगा?" रितू ने ना समझने वाले भाव से कहा__"इस बात से क्या मतलब है तेरा?"

"मतलब ये कि काॅलेज जाना अभी शुरू नहीं किया है मैने।" नीलम ने कहा__"क्योंकि काॅलेज खुलने में अभी पाॅच दिन का समय शेष है।"
"ओह।" रितू ने कहा__"चल कोई बात नहीं। तू बैठ, मैं ज़रा कपड़े चेन्ज कर लूॅ। अभी भी पुलिस की यूनीफार्म ही पहन रखी हूॅ मैं।"

"ओके दी।" नीलम ने कहा और एक बार फिर अपने पिता की तरफ पलटते हुए कहा__"डैड, ये सब कैसे हुआ?"
"बस हो गया बेटी।" अजय सिंह भला अब उसे क्या बताता__"सब नसीब की बातें हैं।"

"ऐसा क्यों कहते हैं डैड?" नीलम ने अजय सिंह का हाॅथ अपने हाॅथ में लेकर कहा__"बिना वजह के कैसे हमारी फैक्टरी में आग लग सकती है? ज़रूर कोई वजह रही होगी। आप पुलिस के द्वारा पता लगवाइए डैड।"

"पुलिस पता लगा रही है दी।" सहसा शिवा कह उठा__"और आपको पता है, रितू दीदी ही इस सबका पता लगा रही हैं? देखना सब कुछ पता लग जाएगा जल्द ही। जिसने भी ये सब किया होगा न मैं उसे छोंड़ूॅगा नहीं।"

"ज़्यादा सूरमा बनने की ज़रूरत नहीं है तुम्हें।" नीलम ने कहा__"अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। और ये तो अच्छी बात है कि इस सबकी जाॅच दीदी कर रही हैं, है न डैड?" अंतिम वाक्य उसने अपने पिता की तरफ देख कर कहा था।

"ह हाॅ बेटी।" अजय सिंह चौंकते हुए बोला था__"यकीनन इस सबका पता चल ही जाएगा।"

"क्या अभी तक कुछ पता नहीं चला भइया?" अभय ने कहा__"मेरा मतलब है कि रितू ने इस बारे में अभी तक क्या कुछ नहीं बताया कि उसकी छानबीन में क्या नतीजा निकला?"

"नतीजा सिर्फ इतना ही निकला है चाचा जी कि हमारी फैक्टरी में आग किसी के द्वारा फैक्टरी के तहखाने में लगाए गए टाइम बम्ब से लगी थी।" अंदर की तरफ से आते हुए रितू ने कहा__"और आपको ये जानकर हैरानी होगी कि फैक्टरी के तहखाने में लगभग दो से तीन टाइम बम्ब लगाए गए थे।"

"क्या??????" लगभग वहाॅ मौजूद हर कोई बुरी तरह चौंका था, फिर अभय ने पूॅछा__"लेकिन फैक्टरी के अंदर तहखाना कहाॅ से आ गया और तो और उस तहखाने के अंदर जाकर किसने टाइम बम्ब लगाया हो सकता है??"

"ये सवाल तो मेरे पास भी है चाचा जी कि फैक्टरी में कोई तहखाना कैसे था?" रितू ने अभय से कहने के बाद अपने पिता की तरफ देखा__"क्या आप बताएॅगे डैड कि फैक्टरी में तहखाने का क्या काम था?"

अजय सिंह बुरी तरह घबरा गया, लेकिन तुरंत ही सहल कर बोला__"फैक्टरी के अंदर अगर कोई तहखाना था तो इसमें कौन सी बड़ी बात है बेटी? मैंने तो बस शौक के लिए बनवाया था। क्या तहखाना बनवाना भी कोई कानूनन जुर्म है?"

"जुर्म तो नहीं है डैड।" रितू ने सपाट लहजे में कहा__"लेकिन तहखाने का निर्माण आम तौर पर लोग अपनी किसी प्राइवेसी के चलते बनवाते हैं। ख़ैर, क्योंकि तहखाने में तीन तीन टाइम बम्ब लगाए गए थे और जब वो फटे तो सब कुछ जल कर खाक़ में मिल गया। हलाॅकि तहखाने में शायद कुछ नहीं था क्योंकि अगर होता तो हमारे हाॅथ कुछ न कुछ ज़रूर लगता। वहाॅ तो बस फैक्टरी के जले हुए कुछ अवशेष ही पड़े थे।"

रितू की ये बात सुन कर कि 'तहखाने में कुछ नहीं था' अजय सिंह बुरी तरह मन ही मन चौंका था। उसके दिमाग़ का फ्यूज उड़ गया। फिर जब दिमाग़ ने काम करना शुरू किया तो सबसे पहले उसके दिमाग़ में यही सवाल उभरा कि ऐसा कैसे हो सकता है? तहखाने में मौजूद उसकी गैरकानूनी चीज़ें कहाॅ गईं? क्या सब कुछ जल गया??? मगर सवाल ये है कि अगर जल गया होता तो रितू को कुछ तो उसके अवशेष सबूत के तौर पर मिलते?

अजय सिंह कुछ समझ नहीं पा रहा था कि ये सब क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसकी बेटी इस बारे में झूॅठ बोल रही हो कि तहखाने में उसे कुछ नहीं मिला है? मगर रितू उससे झूॅठ क्यों बोलेगी? बल्कि होना तो ये चाहिए था कि अगर उसके खिलाफ कोई सबूत उसे मिल जाता तो अब तक रितू को उसे हॅथकड़ी लगा कर गिरफ्तार कर लेना चाहिए था। मगर उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया, क्यों? आख़िर क्या चक्कर है ये? अजय सिंह जितना सोचता उतना ही उलझता जा रहा था। यहाॅ तक कि सोचते सोचते उसका दिमाग़ हैंग सा होने लगा था।

"ये तो बहुत ही गंभीर बात है रितू बेटी।" अभय ने कहा__"फैक्टरी में बम्ब लगाया किसी ने और सब कुछ जला कर खाक़ कर दिया। भला ये सब किसने किया होगा? क्या ये किसी दुश्मन का किया धरा है?"

"ये तो डैड ही बता सकते हैं।" रितू ने कहा__"डैड को ये अच्छी तरह पता होगा कि इस बिजनेस में उनका कौन दुश्मन है? जिसने इतने बड़े काम को अंजाम दिया है।"

"मैं खुद इस बात से हैरान व परेशान हूॅ बेटी।" अजय सिंह बोला__"क्योंकि मेरी समझ में मेरा ऐसा कोई भी शत्रू नहीं है जिसने ये सब किया हो। मेरे सबसे बहुत अच्छे संबंध थे और हैं बेटी। भला मैं बिना वजह और बिना सबूत के किसका नाम लूॅ कि हाॅ इसी ने मेरी फैक्टरी में आग लगाई है?"

"लेकिन बिना वजह के ये भी तो संभव नहीं है भइया कि कोई भी शख्स हमारे साथ इतना बड़ा कारनामा करे?" अभय ने कहा__"मैं समझ सकता हूॅ और जानता हूॅ कि यकीनन आपका कोई दुश्मन नहीं है लेकिन आप खुद सोचिए कि बिना किसी वजह के ये सब कोई क्यों करेगा?"

"मैं नहीं जानता छोटे।" अजय सिंह हताश भाव से बोला__"मैं नहीं जानता कि किसने ये सब करके मुझसे अपनी दुश्मनी निकाली है? अगर जानता तो क्या मैं इस तरह चुप चाप बैठा होता? बल्कि अगर जानता कि ये सब किसने किया है तो अपने हाथों से उसे गोली मार देता। ये भी न पूॅछता गोली मारने से पहले उससे कि ये सब उसने क्यों किया था?"

"आप परेशान मत होइए डैड।" रितू ने कहा__"मैं इस सबका पता लगा कर ही रहूॅगी कि किसने ये सब किया है?"

इसके साथ ही ड्राइंग रूम में सन्नाटा छा गया। कुछ देर बाद सब वहाॅ से चले गए। अजय सिंह अपने कमरे में चला गया, उसका सिर बड़ा ज़ोरों से दर्द कर रहा था। कमरे में आकर वह बेड पर आखें बंद करके लेट गया।

"क्या हुआ अजय?" कमरे के अंदर आते ही प्रतिमा ने कमरे का दरवाज़ा बंद करने के बाद कहा__"तबीयत तो ठीक है न तुम्हारी?"
"सिर में बड़ा दर्द हो रहा है प्रतिमा ज़रा कोई टेबलेट तो दो।" अजय सिंह ने कहा__"ऐसा लगता है जैसे सिर फट जाएगा।"

प्रतिमा ने पास ही रखी आलमारी से एक बाक्स मे रखी कुछ दवाइयों से एक गोली निकाली और अजय सिंह की तरफ बढ़ा दिया।

"अरे क्या गोली ऐसे ही खाऊॅगा?" अजय सिंह बोला__"पानी भी दो न।"
"पानी बगल से टेबल में रखा है।" प्रतिमा ने कहा__"मैं पहले पानी ही लाई थी यहाॅ, जानती थी कि तुम्हारा सिर दर्द कर रहा है और तुम्हें इसके लिए गोली खानी पड़ेगी।"

अजय सिंह कुछ न बोला। बगल में टेबल पर रखे पानी के ग्लास को एक हाॅथ से उठाया और गोली को मुह में डालने के बाद उसे पानी के साथ निगल गया। जबकि प्रतिमा बेड पर उसके समीप ही बैठ गई।

"अब तो तुम्हें इतना परेशान नहीं होना चाहिए अजय।" प्रतिमा ने हल्के स्वर में कहा__"क्योंकि तुम जिस बात से डर रहे थे वो तो हुई ही नहीं। हमारी बेटी को फैक्टरी के तहखाने में कुछ भी ऐसा नहीं मिला जिससे ये साबित हो कि तुम गैर कानूनी धंधा भी करते हो। इस लिए अब जब ऐसा कुछ उसे मिला ही नहीं तो किसी बात से डरने या परेशान होने की अब कोई ज़रूरत नहीं है तुम्हें। बस शुकर मनाओ कि फैक्टरी के साथ साथ वो सब भी जल गया।"

"तुम सबसे बड़ी बात पर ग़ौर ही नहीं कर रही हो प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा__"तुम इस बात की तरफ ध्यान क्यों नहीं दे रही हो कि फैक्टरी के तहखाने में बम्ब फिट किया था किसी ने?"

"हाॅ तो?" प्रतिमा ने लापरवाही से कहा।
"तो ये कि जिसने भी तहखाने में बम्ब लगाया।" अजय सिंह बोला__"क्या उसने न देखा होगा कि तहखाने में क्या क्या चीज़ें मौजूद हैं? बल्कि यकीनन देखा होगा उसने। अब अगर हमारी बेटी ये कह रही है कि उसे तहखाने में कुछ नहीं मिला तो इसका क्या मतलब हो सकता है? इसके तो दो ही मतलब हो सकते हैं, और वो ये कि या तो हमारी बेटी हमसे झूॅठ बोल रही है कि उसे तहखाने में कुछ नहीं मिला या फिर ऐसा हो सकता है कि जिसने तहखाने में बम्ब लगाया उसने ही तहखाने में मौजूद सारी गैर कानूनी चीज़ों को गायब कर दिया।"

प्रतिमा चकित सी देखती रह गई अजय सिंह को। कुछ देर यूॅ ही देखने के बाद उसने कहा__"ओह माई गाड अजय, ये तो मैंने सोचा ही नहीं था। हद हो गई, भला इस बात पर मेरा ध्यान क्यों नहीं गया?"

"क्योंकि औरतों का दिमाग़ उसके घुटनों में होता है न।" अजय सिंह हॅस पड़ा।
"ज्यादा शुभम कुमार बनने की कोशिश मत करो।" प्रतिमा ने बुरा सा मुह बनाया था।

"शु शुभम कुमार???" अजय सिंह चकरा गया__"ये किस चिड़ीमार का नाम है?"
"तुम शुभम कुमार को नहीं जानते?" प्रतिमा ने हैरत से कहा__"अरे ये बहुत बड़ा डिटेक्टिव है। जासूसी टाइप के उपन्यास भी लिखता है ये। इसके आगे जेम्स बाॅण्ड वगैरा सब फेल हैं। ऐसा इसका मानना है, हलाॅकि मैं इसे ज्यादा भाव नहीं देती"

"हाहाहाहा ज्यादा भाव देना भी नहीं मेरी जान।" अजय सिंह हॅसा__"वर्ना उसका जासूसी दिमाग़ तुम्हारे पिछवाड़े में घुस जाएगा।"

"उसके बारे में ऐसा मत बोलो डियर।" प्रतिमा ने कहा__"वो बड़ा शरीफ लड़का है।"
"लड़का है???????" अजय सिंह चौंका__"ये क्या कह रही हो?"

"अरे अभी वो लड़का ही है।" प्रतिमा ने कहा__"बेचारा अभी कुवाॅरा है न इस लिए।"
"हाहाहाहा अच्छा अब छोड़ो इस लड़के की बात को।" अजय सिंह ने एकाएक गंभीर होकर कहा__"मैं ये कह रहा था कि हमारी बेटी को अगर तहखाने से कुछ नहीं मिला तो इसकी यही दो वजह हो सकती हैं।"

"लेकिन रितू इस बात को क्यों छुपाएगी भला?" प्रतिमा ने कहा__"बल्कि अगर उसके पास कोई ऐसा सबूत होता तो वह किसी भी समय तुम्हारे हाॅथ में हॅथकड़ी डाल देती। मुझे तो लगता है कि रितू को सचमुच तहखाने से कुछ नहीं मिला है। बल्कि तुम्हारा ये ख़याल ज्यादा सही लगता है कि तहखाने में टाइम बम्ब लगाने वाले ने ही उन सब चीज़ों को गायब किया है।"

"लेकिन ये हैरत के साथ साथ अविश्वास वाली बात भी है कि बंद फैक्टरी के अंदर तथा तहखाने का भी लाॅक तोड़ कर वो शख्स अंदर पहुॅच कैसे गया?" अजय सिंह ने कहा__"और तहखाने से सारी चीज़ें गायब कैसे किया उसने? क्या वो सब चीज़ें वह अपने साथ ले गया? जबकि फैक्टरी के गेट पर तैनात दरबान के अनुसार गेट पर बाहर से ताला ही लगा था। कहने का मतलब ये कि ये सब अगर उसने ही किया है तो कैसे किया ये?"

"यकीनन अजय।" प्रतिमा ने गहरी साॅस लेते हुए कहा__"ये बड़े ही आश्चर्य की बात है। कोई बंद फैक्टरी के तहखाने में आसानी से पहुॅच गया और अपना सारा काम बड़ी आसानी से ही करके उड़नछू हो गया। किसी को इस सबकी कानों कान भनक तक न लगी। यकीन नहीं होता।"

"अगर ऐसा ही है।" अजय सिंह कह रहा था__"तो सबसे बड़ी परेशानी की बात तो अब हुई है प्रतिमा। ज़रा सोचो जिसने भी ये सब किया है वो कभी भी हमारे खिलाफ वो सब चीजें पुलिस तक पहुॅचा सकता है, या फिर उन सब चीज़ों के आधार पर वह कभी भी हमें ब्लैकमेल कर सकता है। हमारा जीना हराम कर सकता है प्रतिमा...समझ में नहीं आता कि अब क्या करूॅ मैं??"

"अब तो यही कर सकते हैं कि हम उस शख्स के ब्लैकमेल करने का इंतज़ार करें।" प्रतिमा ने कहा__"इसके सिवा दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है।"

अजय सिंह चिंता व परेशान सा बैठा रह गया। उसे क्या पता था कि ये सब चक्कर चलाने वाला वही है जिसे वह होटल या ढाबे में कप प्लेट धोने वाला समझता है।

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"ये क्या कह रहे हो तुम?" जगदीश ने चौंकते हुए सामने सोफे पर बैठे विराज की तरफ देख कर कहा__"अजय सिंह की फैक्टरी के तहखाने से वो सारी चीज़ें तुमने गायब करवाई थी???"

"यही सच है अंकल।" विराज ने अजीब भाव से कहा__"और ये सब करने के पीछे भी मेरा एक मकसद था।"
"कैसा मकसद राज?" गौरी ने हैरानी से अपने बेटे की तरफ देखते हुए कहा।

"मैं नहीं चाहता था कि अजय सिंह अपनी ही बेटी की वजह से इतना जल्दी कानून के हाॅथ लग जाए।" विराज ने कहा__"अगर ऐसा हो जाता तो खेल का मज़ा ही ख़राब हो जाता अंकल। जेल में पहुॅच कर अजय सिंह को वो मज़ा नहीं मिल पाता जो मज़ा आने वाले समय में मेरे द्वारा उसे मिलने वाला है। उसकी जगह जेल में नहीं है अंकल बल्कि जेल के बाहर ही है। मैं उसे कभी भी कोई शिकायत का मौका नहीं देना चाहता, वर्ना जेल में बंद होने पर वो ये कहेगा कि मुझे तो अपने हाॅथ पैर चलाने का मौका ही नहीं दिया गया। अब आप ही बताइए अंकल, क्या ऐसा करना सही होगा? नहीं न......इसी लिए मैंने उसे उसकी बेटी द्वारा जेल जाने से बचा लिया।"

"वो सब तो ठीक है बेटे।" जगदीश ने कहा__"मगर मुझे ये समझ नहीं आ रहा कि तहखाने से वो सब चीज़ें तुमने कैसे और कब गायब करवाई?"

"आपके सभी सवालों का जवाब आपको दूॅगा अंकल।" विराज ने हॅस कर कहा__"लेकिन उससे पहले मैं गरमा गरम चाय पीना चाहता हूॅ। फिर तसल्ली से आपको समझा समझा कर सब कुछ बताऊॅगा।"

"ये तो चीटिंग है भइया।" निधि ने बुरा सा मुॅह बना कर कहा__"कितना अच्छा मज़ा आ रहा था मुझे और आपने इंटरवल करके सारा मज़ा ही ख़राब कर दिया मेरा। जाइए मुझे बात ही नहीं करना आपसे, हाॅ नही तो।"

"तुमने बिलकुल ठीक कहा बेटी इसने सारा मज़ा ख़राब कर दिया।" जगदीश ने हॅस कर कहा__"मैं भी अब इससे बात नहीं करूॅगा। अपने आपको बड़ा सूरमा समझने लगा है ये। है न बेटी?"

"बिलकुल।" रितू ने मुॅह फुला कर कहा__"हाॅ नहीं तो।"
"चुप कर।" सोफे से उठते हुए गौरी ने निधी को झिड़का__"हाॅ नहीं तो की बच्ची, वर्ना लगाऊॅगी एक।"

"भइया।" निधी ने विराज की तरफ मासूमियत से देखकर कहा__"देख लीजिए आपकी जान को माॅ एक लगाने को कह रही हैं। आप ऐसे कैसे चुप बैठ सकते हैं? हाॅ नहीं तो।"

गौरी तब तक अंदर किचेन की तरफ जा चुकी थी। जबकि निधि की इस बात से विराज बोला__"मैं चुप नहीं बैठा हूॅ लेकिन माॅ को कुछ कह भी तो नहीं सकता न गुड़िया। समझा कर न।"

"हांएॅ।" निधि एक दम से विराज से दूर हटते हुए बोली__"अब तो पक्का आपसे बात नहीं करूॅगी। देख लेना, हाॅ नहीं तो।" इतना कहने के बाद वह उठी और जगदीश वाले सोफे पर जा कर जगदीश के बिलकुल पास बैठ गई मुॅह फुला कर।

"आपको पता है अंकल।" विराज ने निधि की तरफ देखते हुए कहा__"आज शाम को मैं शिप द्वारा समंदर में घूमने का मज़ा लेने की सोच रहा था गुड़िया के साथ, लेकिन कोई बात नहीं मैं माॅ को लेकर चला जाऊॅगा। ठीक रहेगा न अंकल..माॅ भी समंदर में घूमने का आनंद ले लेंगी।"

"वाॅव, समंदर में बहुत मज़ा आएगा न भइया?" निधि बिजली की स्पीड से जगदीश वाले सोफे से उठकर विराज के पास उससे चिपक कर बैठते हुए बोली__"मैं न शिप के ऊपर बैठूॅगी जैसे फिल्मों में हीरो हिरोईन बैठते हैं, हाॅ नहीं तो।"

"तू कैसे बैठ जाएगी भला?" विराज ने कहा__"तू तो मेरे साथ जाएगी ही नहीं। मैं माॅ को लेकर जाऊॅगा।"
"ऐसा नहीं हो सकता।" निधि ने अकड़ कर कहा__"मैं जाऊॅगी और आपके ही साथ जाऊगी, और अगर आप मुझे अपने साथ नहीं जाएॅगे तो ये आपके लिए अच्छा नहीं होगा। देख लेना, हाॅ नहीं तो।"

"नहीं वो माॅ कह रही थीं कि गुड़िया यहीं रह कर अपनी पढ़ाई करेगी।" विराज ने कहा__"और वो मेरे साथ शिप में घूमने जाएंगी। इस लिए तुम मेरे साथ नहीं जा पाओगी।"

"मैं कुछ नहीं जानती।" निधि ने सहसा रुआॅसे होकर कहा__"मैं आपके साथ ही जाऊॅगी। क्या आप मुझे नहीं ले चलेंगे अपने साथ....मैं आपकी जान हूॅ ना?" कहते कहते निधि की आॅखों से आॅसू छलक गए, ये देख विराज का कलेजा हाहाकार कर उठा। उसे खुद पर बेहद गुस्सा आया कि वो अपनी गुड़िया को इस तरह भला कैसे रुला सकता है?

विराज ने उसे अपने सीने से छुपका लिया, निधि खुद भी उससे किसी फेवीकोल की तरह चिपक गई थी।

"मुझे माफ कर दे मेरी गुड़िया।" फिर विराज ने भर्राए गले से कहा__"मैं तो बस मज़ाक कर रहा था। तुझे चिढ़ा रहा था और कुछ नहीं। चल अब रोना नहीं...तू जानती है न कि मैं अपनी जान की आॅखों में आॅसू नहीं देख सकता। और हाॅ...शिप में जाने का कोई प्रोग्राम नहीं था वो तो बस ऐसे ही कह रहा था मैं लेकिन अब ज़रूर हम दोनो संडे को शिप में बैठ कर समंदर में घूमेंगे और खूब मज़ा करेंगे ठीक है न?"

"हाॅ नहीं तो।" निधि ने हल्का सा सिर उठा कर विराज की तरफ मुस्कुरा कर कहा और फिर से उसके सीने में अपना चेहरा छुपा लिया। सामने बैठा जगदीश ओबराय ये सब देख कर मुस्कुरा रहा था। उसकी आॅखों में भी आॅसू थे।

"कहाॅ घूमने जाने और मज़ा करने की बात कर रहे हो तुम दोनो?" हाॅथ में ट्रे लिए आते हुए गौरी ने कहा।

"पता है माॅ।" निधि ने विराज के सीने से सिर उठा कर तथा मारे खुशी के कहा__"संडे को मैं और भइया समुंदर में शिप में बैठ कर घूमेंगे और खूब मस्ती करेंगे। हाॅ नहीं तो।" निधि की इस बात से विराज ने अपना सिर पीट लिया जबकि......

"क्या???" गौरी ने हैरानी से निधि और विराज की तरफ देख कर कहा__"नहीं तुम लोग कहीं नहीं जाओगे। समुंदर में तो बिलकुल भी नहीं।"

गौरी ने सबको चाय दी और खुद भी एक कप लेकर वहीं सोफे पर बैठ गई। जबकि उसकी इस बात से निधि का चेहरा उतर गया। उसने कातर भाव से विराज की तरफ देखा। विराज ने इशारे से कहा कि 'तू चिन्ता मत कर हम ज़रूर चलेंगे'। विराज के इस इशारे से निधि का चेहरा फिर से खिल उठा। और अब वह मुस्कुराते हुए आराम से चाय पीने लगी। उसे यूॅ मुस्कुराता देख गौरी का माथा ठनका, बोली__"अब इस तरह मुस्कुरा क्यों रही है? चुप चाप चाय पी।"

"अब क्या मैं मुस्कुरा भी नहीं सकती माॅ?" रितू ने हॅस कर कहा__"आप भी कमाल करती हैं।" इतना कहने के बाद एकाएक ही उसने विराज की तरफ देखा और धीरे से बोली__"हाॅ नहीं तो।"

उसकी इस क्रिया से चाय पी रहे विराज को ज़ोर का ठस्का लग गया और वह खाॅसने लगा। खाॅसने के साथ साथ वह हॅस भी रहा था। जबकि उसके इस प्रकार एकाएक खाॅसने से निधि हड़बड़ा गई। जानती तो वह भी थी कि उसके भाई को अचानक ठस्का क्यों लगा था जिसकी वजह से उसे खाॅसी आने लगी थी इस लिए पकड़े जाने के डर से हड़बड़ा गई थी वह।

"क्या हुआ बेटा?" गौरी ने चौंकते हुए पूछा।
"ये दोनो एक नम्बर के शैतान हैं गौरी बहन।" जगदीश ठहाका लगा कर हॅसते हुए बोला था__"तुम नहीं समझ पाई कि इन दोनो ने आपस में क्या खिचड़ी पका ली है?"

"मैं सब जानती हूॅ भइया।" गौरी ने भी हॅस कर कहा__"ये दोनो सोचते हैं कि ये मुझे बेवकूफ बना लेते हैं। ये दोनो ये भूल जाते हैं कि इन्होंने मुझे नहीं बल्कि मैंने इन दोनो को पैदा किया है।"

विराज और निधि ने एक दूसरे की तरफ अजीब भाव से इस तरह देखा जैसे चोरी पकड़ी गई हो।

"ख़ैर, अब बताओ राज।" जगदीश ने कहा__"कि फैक्टरी के तहखाने से वो सब चीज़ें तुमने कब और कैसे गायब करवाई थी और ये भी कि किसके द्वारा?"

"आपको याद होगा अंकल।" विराज ने कहना शुरू किया__"मैंने आपसे कहा था कि 'अजय सिंह तो ये सोच भी नहीं सकता कि मैं अरविंद सक्सेना के द्वारा अभी और क्या खेल खलने वाला हूॅ'। जैसा कि मैने आपको बताया था कि सक्सेना की कमज़ोरी फोटोग्राफ्स के रूप में मेरे पास थी। इस लिए वह मेरे कहने पर कुछ भी करने को मजबूर था, और बदले में मैं उसे उसके परिवार सहित सुरक्षित विदेश भेजवा दूॅगा। अजय सिंह की नज़र में सक्सेना पहले ही उससे अपना हिसाब किताब करके विदेश जा चुका था जबकि सच्चाई कुछ और ही थी। सक्सेना तो उस दिन विदेश जाने वाली फ्लाइट पर बैठा था जिस रात अजय सिंह की फैक्टरी में आग लगी थी। मुझे सक्सेना के द्वारा ये पता था कि हप्ते में एक दिन व रात फैक्टरी में मजदूरों का अवकाश रहता है, यानी फैक्टरी बंद रहती है। इसी बात का ख़याल रख कर ही प्लान बनाया गया था। सक्सेना के अनुसार फैक्टरी का मेन गेट जो कि लोहे से बना हुआ है, उसकी चाभी मैनेजर या अजय सिंह के पीए के पास रहती है। सक्सेना ने उस चाभी की डुप्लीकेट चाभी पहले ही बनवा ली थी। इस लिए फैक्टरी के अंदर जाने की समस्या नहीं रह गई थी। समस्या थी तहखाने के अंदर पहुॅचने की। क्योंकि तहखाने के गेट पर पिनकोड सिस्टम वाला लाॅक था, जिसका पिनकोड सिर्फ अजय सिंह ही जानता था। इस लिए पिनकोड हासिल करने के लिए दिमाग़ का प्रयोग किया गया। सक्सेना को ये तो पता ही था कि अजय सिंह अवकाश वाले दिन या रात ही अपने गैर कानूनी धंधे वाला काम करता था। मैने सक्सेना के द्वारा पिनकोड हासिल करने के लिए उस रात तहखाने के पिनकोड लाॅक सिस्टम पर एक पाॅलिथिन नम्बरों के ऊपर इस प्रकार चिपकवा दी कि अजय सिंह ग़ौर से देखने पर भी ताड़ न पाए कि सिस्टम के ऊपर पाॅलिथिन चढ़ी हुई है। अजय सिंह जब तहखाने के अंदर जाने के लिए सिस्टम पर पिन नम्बर डालता तो वो सब पिन नंबर्स उस पाॅलिथिन में अजय सिंह के फिंगर प्रिंट्स के रूप में छप जाते। यहाॅ पर एक सवाल ये भी था कि अगर पिन का कोई नम्बर यानी संख्या एक से दो या तीन बार अजय सिंह के द्वारा डाल दी जाती तो कैसे पता चलता कि उस संख्या के कितने नंबर थे? एक्सपर्ट ने बताया था कि जो नंबर एक बार डाला जाएगा वो पाॅलिथिन पर कम दबाव के साथ छपेगा जबकि अगर कोई नंबर दो या तीन बार दबाया जाएगा वो ज्यादा दबाव के साथ छपेगा। इसके बाद उन नंबरों को चेक कर लिया जाएगा। मैं एक्सपर्ट की इस बात से मुतमईन न था क्योंकि इससे नंबर इधर उधर भी हो सकते थे। इस लिए पाॅलिथिन के साथ साथ मैने वहाॅ पर एक मिनी कैमरा इस प्रकार लगवाया कि उसमें अजय सिंह का पिन कोड डालना स्पष्ट दिखाई दे। बस फिर क्या था..अजय सिंह जब वहाॅ आया तो सब कुछ रिकार्ड हो गया। अजय सिंह कभी सोच भी नहीं सकता था कि कोई उसके लिए कितना बड़ा खेल रच रहा है। ये सब काम तब हुआ था जब सक्सेना ने पार्टनरशिप नहीं तोड़ी थी अजय सिंह से।"

"तुम्हारे कहने का मतलब है।" जगदीश ने बीच में ही विराज की बात काटते हुए कहा__"कि ये सब तुम सक्सेना से पहले ही करा चुके थे? लेकिन इस बीच अगर अजय सिंह पिनकोड बदल देता तो क्या करते तुम?"

"मेरे दिमाग़ में भी यही सवाल था अंकल।" विराज ने कहा__"इस लिए जब दूसरा अवकाश हुआ फैक्टरी में तो सक्सेना ने मेरे कहने पर फिर से वहाॅ पर मिनी कैमरा लगा दिया था, कारण यही जानना था कि अजय सिंह ने पिनकोड बदल दिया है या पहले वाला ही है। मगर बाद में पता चला कि पिनकोड पहले वाला ही था।"

"चलो ये तो ठीक है।" जगदीश ने कहा__"लेकिन इतना कुछ पता करने के बाद तुमने ये सब पहले ही क्यों नहीं कर दिया था? मेरा मतलब है कि पहले ही फैक्टरी में आग क्यों नहीं लगवाई थी, इतने दिन बाद ही क्यों किया ऐसा?"

"इसमें भी एक मज़ेदार खेल छुपा था अंकल।" विराज ने मुस्कुरा कर कहा था__"मुझे पता था कि अजय सिंह की बेटी पुलिस की ट्रेनिंग कर रही है, उसकी ट्रेनिंग के बाद सीधा उसे किसी थाने में चार्ज सम्हाल लेना था। मैंने सोचा क्यों न अजय सिंह की बेटी को उसके थाना इंचार्ज बनते ही उसके बाप की फैक्टरी का केस सौंप कर उसे एक तोहफा दिया जाए। बस यही सोच कर कुछ दिन रुका रहा था मैं। आपसे कहा था कि मंत्री जी से बात करके रितू सिंह बघेल को वहीं का थाना उसकी पहली पोस्टिंग में मिले। बस सब कुछ सेट करने के बाद प्लान के अनुसार काम शुरू हो गया। फैक्टरी के बाहर गेट पर एक ही दरबान था उस रात, दूसरा दरबान नहीं था। पता चला था कि उस रात उसकी बीवी को बच्चा होने वाला था इस लिए वह छुट्टी लेकर चला गया था। उसकी जगह दूसरा कोई दरबान था ही नहीं। एक दरबान बचा था वह भी डबल ड्यूटी की वजह से उस रात आधी रात के समय कुर्सी में बैठा बार बार जम्हाई ले रहा था। उसे इस तरह जम्हाई लेता देख सक्सेना ने उसे क्लोरोफाॅम डाला हुआ रुमाल सुॅघा दिया। कुछ ही पल में बेचारा अंटा गाफिल हो गया। उसके बाद कोई समस्या ही नहीं थी। सक्सेना डुप्लीकेट चाभी की सहायता से फैक्टरी का गेट खोल कर अंदर गया उसके साथ चार आदमी और थे उसकी सहायता के लिए। सबके अंदर आते ही सक्सेना ने अंदर से गेट भी बंद कर लिया। तहखाने के पास पहुॅच कर उसने तहखाने के गेट पर लगे पिन सिस्टम पर कोड नंबर डाला और दरवाजा खोल कर तहखाने के अंदर पहुॅच गया। सभी ने तहखाने में मौजूद गैर कानूनी सामान को अपने साथ लाई हुई बोरियों में भरना शुरू कर दिया। एक घंटे बाद वो सब लोग तहखाने में रखी हर गैर कानूनी चीज़ को बोरियों में भर लिया था। उसके बाद वहाॅ तीन टाइम बम्ब लगा कर वो सब सुरक्षित बाहर आ गए। फैक्टरी का बाहर वाला गेट उसी तरह बाहर से लाॅक करके वो सब वहाॅ से लौट आए। अपने पीछे कोई सबूत नहीं छोंड़ा था उन्होने। हलाॅकि बम्ब के फटने पर कोई सबूत रह ही नहीं जाना था लेकिन बाहर गेट पर सबूत हो सकते थे इसके लिए उन लोगों ने पहले से ही अपने हाथों में दस्ताने पहन रखे थे। इतनी बड़ी बात को अंजाम दिया गया लेकिन किसी को उस रात कोई भनक तक न हुई। कारण एक तो रात का समय, दूसरे बाॅकी स्टाफ फैक्टरी से दूर बने आफिसों में था और सबसे बड़ी बात किसी को गुमान ही नहीं था कि कोई इस सबके लिए शहर से दूर यहाॅ आएगा।"

"तो आख़िर इस तरह तुमने सक्सेना और कुछ आदमियों के द्वारा ये सब करवाया था?" जगदीश ओबराय ने कहा__"सक्सेना तो उसी रात अपने परिवार के साथ बम्ब फटने के तीन घंटे पहले ही विदेश जाने के लिए फ्लाइट में बैठ चुका था, किन्तु वो आदमी कौन थे? उन सबको इस बारे में पता है, हो सकता है वो इस सबका कभी भाॅडा फोड़ दें तो क्या करोगे तुम?"

"पहली बात तो वो ये सब करेंगे नहीं क्योंकि वो यही जानते हैं कि ये सब उन्होने किसी माफिया गैंग के लिए किया है।" विराज ने कहा__"सक्सेना भी उन सबकी तरह ही उस रात अपने चेहरे पर नकाब पहना हुआ था। सक्सेना ने उनसे यही कहा था कि वो माफिया का आदमी है। इस सबका कोई डर नहीं है। दूसरी बात ये है कि मैं खुद भी ज्यादा दिनों तक इस सबको अजय सिंह से छुपा कर नहीं रखूॅगा। बल्कि डंके की चोंट पर उसके सामने जाकर उसे बताऊॅगा कि उसके साथ जो कुछ भी अब तक हुआ है वो सब मैंने किया है।"

"वो सब तो ठीक है राज।" जगदीश ने कहा__"लेकिन इंस्पेक्टर रितू तो छानबीन कर ही रही है न? संभव है कि वह किसी तरह इस सबका पता लगा ले कि ये सब तुमने किया है तो??"

"उससे कुछ भी फर्क नहीं पड़ता अंकल।" विराज ने कहा__"क्योंकि आगे चल कर मैं खुद ही ये सब उन लोगों को बताऊॅगा कि मैंने ही ये सब किया है। और यकीन मानिए अंकल उनमें से कोई भी मेरा बाल भी बाॅका नहीं कर सकेगा। रही बात उस पुलिस वाली की तो वो भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती, क्योंकि सब कुछ जान लेने से या पता कर लेने से कुछ नहीं होता। बल्कि किसी भी चीज़ को साबित करने के लिए उस कानून वाली के पास सबूत और गवाह होने चाहिए, बिना सबूत के वो मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। और सबूत उसे इस जनम में तो क्या किसी भी जनम में नहीं मिलेंगे।"

"जुर्म चाहे जितनी सफाई से किया जाए राज।" जगदीश ने कहा__"वो अपने पीछे कोई न कोई ऐसा सबूत ज़रूर छोंड़ जाता है जिसकी वजह से वो एक दिन कानून की गिरफ्त में आ जाता है।"

"आप बताइए अंकल।" विराज ने मुस्कुराते हुए कहा__"मैंने इस सबके पीछे क्या सबूत छोड़ा है? जबकि मैंने अभी तक जो कुछ भी किया वो भी यहीं बैठे बैठे किया है। इस सबको अंजाम देने वाले तो कोई और ही थे।"

"अरविंद सक्सेना तुम्हारे लिए एक कमज़ोर प्वाइंट है बेटे।" जगदीश ने कहा__"मान लो तहकीकात में रितू को ये पता चल जाए कि इस सबमें सक्सेना का हाॅथ है तो? वह सक्सेना को शक की बिना पर धर लेगी और फिर उससे सारा सच उगलवा लेगी। सक्सेना को पुलिस के सामने ये कबूल करना ही पड़ेगा कि ये सब उसने तुम्हारे कहने पर किया था।"

"इतनी दूर तक जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी अंकल।" विराज ने कहा__"क्यों कि उससे पहले मैं ही मैदान में आ जाऊॅगा। मैं खुद उन लोगों के सामने इस सबका इकबाले जुर्म करूॅगा। और पता है अंकल, अजय सिंह को ये भी एहसास दिलाऊॅगा कि उसका गैर कानूनी सामान अभी भी मेरे पास ही है, तथा उसके खिलाफ ऐसे ऐसे सबूत भी हैं मेरे पास जिससे उसको कानून के लपेटे में आने के लिए ज़रा भी देर नहीं लगेगी। बेचारा खुद ही इस सबके डर से अपनी इंस्पेक्टर बेटी से मेरी पैरवी करने लगेगा।"

"बात तो तुम्हारी ठीक है।" जगदीश हॅस पड़ा__"संभावनाओं पर कुछ नहीं होता, कानून को तो सबूत चाहिए। और सबूत कोई है नहीं। वाह....ये तो कमाल हो गया बेटे।"

"अभी तो दिमाग़ से ही उनकी हालत खराब कर रखी है अंकल।" विराज ने कहा__"जबकि मैदान में खुल कर आना अभी बाॅकी है। जिस दिन आमने सामने का खेल होगा न उस दिन से अजय सिंह हर पल रोएगा, गिड़गिड़ाएगा, रहम की भीख माॅगेगा मुझसे और मेरी माॅ से।"

"उसके साथ यही होना चाहिए राज बेटे।" जगदीश ने कहा__"जो अपने माॅ बाप और भाई का न हुआ बल्कि उनके साथ इतना घिनौना कर्म किया ऐसे गंदे इंसान के साथ किसी भी कीमत पर रहम नहीं होना चाहिए।"

"उनके लिए रहम शब्द मैंने अपनी डिक्शनरी से निकाल कर फेंक दिया है अंकल।" विराज ने एकाएक ठंडे स्वर में कहा__"एक एक चीज़ का हिसाब लूॅगा मैं।"

"मैं तो उस कमीने शिवा को अपने हाथों से कुत्ते की तरह मारूॅगी।" सहसा निधि ने तपाक से कहा__"मुझे उसकी शकल से भी नफरत है। हाॅ नहीं तो।"

निधि के इस तकिया कलाम को सुन कर सब मुस्कुरा कर रह गए।


अपडेट हाज़िर है दोस्तो.....
आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,,,,,,,
 
अपडेट.............《 20 》

अब तक.......

"बात तो तुम्हारी ठीक है।" जगदीश हॅस पड़ा__"संभावनाओं पर कुछ नहीं होता, कानून को तो सबूत चाहिए। और सबूत कोई है नहीं। वाह....ये तो कमाल हो गया बेटे।"

"अभी तो दिमाग़ से ही उनकी हालत खराब कर रखी है अंकल।" विराज ने कहा__"जबकि मैदान में खुल कर आना अभी बाॅकी है। जिस दिन आमने सामने का खेल होगा न उस दिन से अजय सिंह हर पल रोएगा, गिड़गिड़ाएगा, रहम की भीख माॅगेगा मुझसे और मेरी माॅ से।"

"उसके साथ यही होना चाहिए राज बेटे।" जगदीश ने कहा__"जो अपने माॅ बाप और भाई का न हुआ बल्कि उनके साथ इतना घिनौना कर्म किया ऐसे गंदे इंसान के साथ किसी भी कीमत पर रहम नहीं होना चाहिए।"

"उनके लिए रहम शब्द मैंने अपनी डिक्शनरी से निकाल कर फेंक दिया है अंकल।" विराज ने एकाएक ठंडे स्वर में कहा__"एक एक चीज़ का हिसाब लूॅगा मैं।"

"मैं तो उस कमीने शिवा को अपने हाथों से कुत्ते की तरह मारूॅगी।" सहसा निधि ने तपाक से कहा__"मुझे उसकी शकल से भी नफरत है। हाॅ नहीं तो।"

निधि के इस तकिया कलाम को सुन कर सब मुस्कुरा कर रह गए।

अब आगे......

ऐसे ही कुछ दिन गुज़र गए। अजय सिंह अब अपनी हालत पर काबू पा चुका था। बल्कि ये कहिये कि हर बात से काफी हद तक बेफिक्र हो चुका था। उसकी बेटी रितू द्वारा उसे पता चल चुका था कि तहखाने में बाॅकी कुछ नहीं मिला था। हलाॅकि रितू को इस बात के पता होने का सवाल ही नहीं था कि उसका बाप गैर कानूनी काम करता है। उसने तो फाॅरेंसिक रिपोर्ट को देखकर यही बताया था कि फैक्टरी में आग टाइम बम्ब के द्वारा ही लगी थी। अब उसकी तहकीकात सिर्फ इसी तरफ थी कि फैक्टरी के अंदर जाकर तहखाने में टाइम बम्ब किसने लगाया था??

रितू को एक सवाल ये भी परेशान कर रहा था कि इस केस की बारीकी से जाॅच पड़ताल कराने के पीछे होम मिनिस्टर का क्या मकसद था?? उसने तो सिर्फ केस को रिओपेन करने की अप्लीकेशन बस दी थी। उसका मकसद तो सिर्फ ये पता करना था कि इस केस में पुलिस ने इस प्रकार की रिपोर्ट क्यों बनाई थी?? दूसरी बात ये थी कि उसे लगता था कि फैक्टरी में लगी आग महज कोई इत्तेफाक़ की बात नहीं थी। बल्कि उसके पिता के किसी दुश्मन द्वारा लगाई गई थी। इस लिए वह इस सबका पता करके उस ब्यक्ति द्वारा अपने पिता के हुए भारी नुकसान की भरपाई करना चाहती थी। उसे तो इस बात से भी हैरानी थी कि रातों रात इस शहर के सारे पुलिस डिपार्टमेंट का तबादला क्यों कर दिया गया था??? इसके पीछे क्या सिर्फ ये वजह थी कि इस केस की पुलिस ने अपनी पूरी ईमानदारी के साथ छानबीन नहीं की, बल्कि किसी के कहने पर ऐसी रिपोर्ट तैयार की?? क्या सिर्फ यही वजह थी या फिर इसके पीछे भी कोई ऐसा कारण है जो फिलहाल अभी उसकी समझ से बाहर नज़र आ रहा है??

अजय सिंह बेफिक्र ज़रूर हो गया था किन्तु इस बात का उसे एहसास था कि एक तलवार अभी भी उसकी गर्दन पर लटकी हुई है, जो कभी भी उसका गला रेत सकती है। वह पक्के तौर पर समझ चुका था कि तहखाने से वह सब चीज़ें तहखाने में टाइम बम्ब लगाने वाले ने ही गायब की हैं। वह नहीं जानता था कि ये सब किसने किया है लेकिन इतना अवश्य जानता था कि देर सवेर उस ब्यक्ति का इस संबंध में कोई न कोई मैसेज ज़रूर आएगा। अजय सिंह उसी मैसेज के इन्तज़ार में था। दूसरी बात अपने बिजनेस को फिर से खड़ा करने के लिए वह कार्यरत भी हो गया था। फैक्टरी भले ही जल गई थी उसकी लेकिन उसके पास पैसों की कमी नहीं थी। गैर कानूनी धंधे में उसने बड़ी धन दौलत इकट्ठी कर ली थी। उसने फैक्टरी को फिर से शुरू करने के लिए उसकी मरम्मत का काम शुरू करवा दिया था। इस समय वह रात दिन इसी में ब्यस्त रहता था। उसकी छोटी बेटी नीलम वापस मुम्बई जा चुकी थी। अजय सिंह फैक्टरी को फिर से शुरू करने के लिए कार्यरत था, इस बात से अंजान कि उसके पीछे उसका बेटा शिवा अपने आचरण से क्या हंगामा खड़ा करने जा रहा था???

शिवा का ज्यादातर समय अपने आवारा दोस्तों के साथ मस्ती करने और गाॅव की किसी न किसी लड़की को पटा कर उनके साथ अपने अंदर की हवस मिटाने में जाता था। माॅ बाप की तरह वो भी अपने ही घर की औरतों व लड़कियों को गंदी नज़रों से देखता था और रात दिन अपनी ही माॅ बहनों तथा चाची को अपने नीचे लेटाने की सोचता रहता था।

ऐसे ही एक दिन उसकी हरकतों की वजह से हंगामा हो गया। अपने बाप की तरह ही उसकी नीयय अपनी चाची करुणा पर बिगड़ी हुई थी। करुणा की बेटी दिव्या भी जवान हो रही थी, हलाॅकि अभी वह स्कूल में पढ़ती थी किन्तु आज की जनरेशन ज़रा एडवाॅस होती है, ये अपनी ऊम्र से पहले ही जवान हो जाते हैं। खेला खाया शिवा चाची की बेटी दिव्या को भी हवस भरी नज़रों से देखता था। चाची के गदराए व खूबसूरत जिस्म का वह शुरू से ही दिवाना था। किन्तु कुछ कर नहीं सकता था क्योंकि वह अपने चाचा अभय के गुस्सैल स्वभाव के चलते डरता था, दूसरी बात उसकी चाची करुणा भी ऐसी वैसी औरत नहीं थी जिससे वह अपने इरादों में कामयाब हो पाता। उससे जितनी हो सकती थी उतनी कोशिश वह फिर भी किया करता था। मतलब चाची के पास उठना बैठना तथा उनके द्वारा दिये गए हर काम को खुशी खुशी करना। उनसे हॅसना बोलना, बातों के बीच यदा कदा मज़ाक भी कर लेना। करुणा ज्यादातर दिन में अकेली ही होती थी, उसके साथ उसका बारह साल का दिमाग़ से डिस्टर्ब बेटा शगुन रहता था। उसका पति और बेटी दिव्या सुबह स्कूल चले जाते थे, फिर शाम चार बजे के आस पास ही आते थे। सुबह दस बजे से चार बजे तक करुणा अकेली ही घर में रहती थी। हलाॅकि दिन भर वह कोई न कोई काम करती ही रहती थी ताकि उसका समय पास हो जाए।

एक दिन की बात है, उस दिन गुरूवार था। अभय व दिव्या रोज़ की तरह स्कूल गए हुए थे। शिवा की आदत थी कि वह करुणा के घर तभी जाता था जब उसका चाचा और चाचा चाची की बेटी स्कूल चले जाते थे। उसे अपनी चाची करुणा की दिनचर्या का बखूबी पता था। वह जानता था कि चाचा और दिव्या के स्कूल जाने के बाद ही करुणा नहाने जाती थी बाॅथरूम में। बाहर मेन गेट बंद रहता था किन्तु अंदर से कुंडी नहीं लगी होती थी। करुणा कुंडी नहीं लगाती क्योंकि उसे पता होता था कि शिवा आएगा। ख़ैर, रोज़ की तरह ही शिवा उस दिन भी अपने निर्धारित समय पर पहुॅचा। दरवाजे को हल्के से खोल कर वह अंदर दाखिल हो गया। अपनी चाची के नहाने के समय पर वह इसी लिए आता था कि वह किसी तरह अपनी चाची को बाथरूम में नहाते हुए देख सके। हलाॅकि ऐसा कभी हुआ नहीं था बल्कि वह हमेशा अपने मनसूबों में नाकामयाब रहा था। यानी उसकी चाची कमरे से अटैच बाथरूम में जाने से पहले अपने उस कमरे का दरवाजा बंद करके अंदर से कुंडी लगा देती थी। शिवा को अपनी चाची को नहाते देखने के लिए पहले चाची के कमरे में जाना पड़ता फिर बाथरूम में। जबकि दरवाजा ही बंद रहता था इस लिए वह कुछ कर ही नहीं सकता था। वह अपनी चाची से कह भी नहीं सकता था कि आप अपने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद मत किया कीजिए।

मगर कहते हैं न कि होनी अटल होती है। यानी जिस वक्त जो होना होता है वो होकर ही रहता है। कहने का मतलब ये कि करुणा बाथरूम में नहाने जाने से पहले आज अपने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद करना भूल गई, या यूॅ कहिए कि नियति के चलते उससे ये भूल हो गई।

शिवा जब भी आता था तो सबसे पहले ये ज़रूर चेक करता था कि उसकी चाची ने दरवाजा अंदर से बंद किया है या नहीं। हलाकि वह जानता था कि चाची दरवाजा खुला रखने की ग़लती कभी नहीं करती हैं, फिर भी वह अपनी तसल्ली के लिए एक बार ज़रूर चेक करता था। आज भी उसने ऐसा ही किया, और दरजाजा जब उसकी उम्मीद के विपरीत उसके द्वारा दिए गए हल्के से दबाव में बेआवाज़ तथा बिना किसी विरोध के खुलता चला गया तो वह पहले तो हैरान हुआ मगर जल्द ही उसका मन मयूर खूशी से नाचने भी लगा। वह दबे पाॅव कमरे में दाखिल हुआ। उसकी धड़कने एकाएक बढ़ गई थीं जिसके धक धक करने की हर थाप उसे अपनी कनपटियों में बजती महसूस हो रही थी।

कमरे में पहुॅचते ही उसने देखा कि बेड पर उसकी चाची के वो कपड़े रखे हैं जिन्हें उसकी चाची नहाने के बाद पहनने वाली थी। शिवा ने आगे बढ़ कर उन कपड़ों को ग़ौर से देखा। साड़ी ब्लाउज पेटीकोट व ब्रा पैन्टी सब बड़े सलीके से रखे हुए थे। शिवा की नज़र ब्रा और पैन्टी पर पड़ी। उसने बिना कुछ सोचे समझे तथा बिना एक पल गवाॅए अपना हाॅथ बढ़ा कर बेड से चाची की लाल रंग की ब्रा को उठा लिया। ब्रा अच्छी क्वालिटी की थी, उसके कप देख कर शिवा की आॅखों में अजीब सी चमक आ गई। उसने ब्रा को अच्छी तरह से उलटा पलटा कर देखा। 36D पर नज़र पड़ते ही वह अजीब तरह से मुस्कुराया और फिर उस ब्रा को अपनी नाॅक के पास लाकर उसे सूॅघने लगा। ब्रा की सुगंध ने अपना असर दिखाया और शिवा की आॅखें एक अजीब सी खुमारी से बंद होती चली गई। उसका रोम रोम रोमाॅच से भरता चला गया। कुछ देर इसी तरह वह ब्रा को सूॅघता रहा फिर उसने अपनी आॅखें खोली और ब्रा से नज़र हटा कर उसने बेट पर पड़ी चाची की पैन्टी की तरफ देखा। तुरंत ही उसने पैन्टी को उठा लिया और उसे भी उलट पलट कर देखने लगा 38 साइज पर नज़र पड़ी तो एक बार फिर वह अजीब तरह से मुस्कुराया और फिर सीघ्र ही पैन्टी के उस भाग को अपनी नाॅक के पास लाकर सूॅघने लगा जिस भाग में उसकी चाची का योनि भाग होता है। पैन्टी के योनि भाग को सूॅघते ही उसकी आॅखें पुनः बंद होती चली गई। वह अपनी नाॅक से ज़ोर ज़ोर से साॅसे खींचने लगा। तभी वह किसी आहट से बुरी तरह चौंका, उसने तुरंत अपनी आॅखें खोल कर इधर उधर देखा किन्तु कहीं कोई नहीं था, बस कानों में कमरे से अटैच बाथरूम में पानी गिरने की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

शिवा को सहसा ख़याल आया कि चाची तो अंदर बाॅथरूम में है। जिसे नहाते हुए देखने के लिए वह न जाने कब से तड़प रहा था। आज उसे ये सुनहरा मौका मिला है तो उसे ये मौका किसी भी कीमत पर गवाॅना नहीं चाहिए। ये सोचते ही उसने अपने हाॅथ में ली हुई ब्रा पैन्टी को बेड पर उसी तरह सलीके से रख दिया और फिर पलट कर दबे पाॅव बाथरूम के दरवाजे की तरफ बढ़ा।

बाथरूम के दरवाजे के पास पहुॅच कर उसने देखा कि बाथरूम का दरवाजा बंद तो था किन्तु अंदर से कुंडी नहीं लगी थी। बल्कि हल्का सा खुला ही नज़र आ रहा था। करुणा ने शायद इस लिए बाथरूम की कुंडी अंदर से नहीं लगाई थी कि उसकी समझ में कमरे का दरवाजा अंदर से बंद है, इस लिए किसी के अंदर आने का कोई सवाल ही नहीं है। जबकि इधर शिवा ये देख कर हैरानी के साथ साथ खुश हो गया कि उसकी चाची ने आज हर तरफ से उसका रास्ता खुला रखा है।

शिवा ने अपने ज़ोर ज़ोर से धड़क रहे दिल के साथ बाथरूम के दरबाजे में बाहर इस तरफ लगे हैण्डल को आहिस्ता से पकड़ कर दरवाजे को बाथरूम की तरफ हल्के से ढकेला। परिणामस्वरूप दरवाजा बेआवाज़ खुलता चला गया किन्तु शिवा ने दरवाजे को ज्यादा खोलना मुनासिब न समझा बल्कि उतना ही खोला जितने में वह अंदर नहाती हुई अपनी चाची को आराम से देख सके। शिवा ने धाड़ धाड़ बजती हुई अपने दिल की धड़कनों के साथ बाथरूम के अंदर की तरफ देखा....और यहीं पर दो चीज़ें एक साथ हुईं। इधर शिवा ने अंदर नहाती हुई अपनी चाची के बेपर्दा जिस्म को देखा और उधर बाहर से कमरे में दाखिल होकर अभय ने बाथरूम में अंदर की तरफ झाॅकते अपने भतीजे शिवा को देखा। और....और.....

"शिवाऽऽऽऽऽऽऽऽ।" अभय ने शेर की तरह दहाड़ते हुए आकर शिवा को पीछे से उसके शर्ट की कालर से पकड़ कर अपनी तरफ एक झटके से खींचा, और खींचते हुए ही कमरे से बाहर बड़े से ड्राइंगरूम में ले गया। और इसके बाद शुरू हुई शिवा की लात घूॅसों से धुनाई।

"तेरी हिम्मत कैसे हुई हरामखोर अपनी चाची को बाथरूम में इस तरह नहाते हुए देखने की??" अभय ने गुस्से से कहने के साथ ही शिवा को उठा कर पक्के फर्स पर पटक दिया। शिवा की दर्द भरी चीख पूरे घर में गूॅज गई।

"बोल हरामजादे बोल।" फर्स पर दर्द से कराहते शिवा के पेट में अभय ने ज़ोर से लात जमाते हुए कहा__"तेरी हिम्मत कैसे हुई ये नीच काम करने की?? बोल वर्ना यहीं पर ज़िदा दफन कर दूॅगा।"

"मु मुझे माफ आहहहह कर दीऽऽजिए चाचा जी।" लात घूॅसों के निरंतर पड़ने से कराहते हुए शिवा ने अपने हाॅथ जोड़ने का प्रयास करते हुए कहा__"मुझे माफ कर दीजिए, मुझसे ग़लती हो गई। आहहहहह माफ कर दीजिए चाचा जी...अब दुबारा ऐसा कभी नहीं करूॅगा चाचा जी। आहहहहह एक बार माफ कर दीजिए आहहहह।"

"तुझे माफ कर दूॅ कुत्ते???" शिवा को कालर से पकड़ कर उठाते हुए अभय ने गुर्राते हुए कहा__"नहीं हर्गिज़ नहीं। तू माफी के लायक नहीं है। तूने जो नीच काम करने का दुस्साहस किया है उसके लिए तो तुझे जिदा मार देना चाहिए।"

इधर अभय लात घूॅसों से शिवा की कुटाई किये जा रहा था उधर करुणा की हालत भी खराब हो गई थी। दरअसल अभय जब पहली बार कमरे में आकर शिवा को बाथरूम में झाॅकते देख दहाड़ा था तभी करुणा उछल पड़ी थी। अभय के मुख से शिवा का नाम सुनते ही वह समझ गई थी कि क्या माज़रा है? उसे इस ख़याल ने ही बुरी तरह हिला कर रख दिया था कि उसकी जेठानी का लड़का शिवा जो खुद भी उसके बेटे के समान ही है वो उसे नंगी हालत में नहाते हुए बाहर से छिप कर देख रहा था। इतना ही नहीं वह अभय के द्वारा ये नीच काम करते हुए रॅगे हाथों पकड़ा भी गया था।

करुणा मारे शर्म के तथा इस हादसे से बाथरूम के फर्स में उसी तरह नंगी हालत में बैठी तथा अपने दोनो घुटनों के बीच मुॅह छुपाए बुरी तरह रोए जा रही थी। उसकी मारे शर्म और अभय के डर से हिम्मत ही नहीं हो रही थी कि वह यहाॅ से बाहर कमरे में जाए। उसे जैसे खुद का होश ही नहीं रहा था कि वह इस वक्त किस हालत में है। उसके कानों में बाहर से आती आवाज़ें साफ सुनाई दे रही थी। जिन आवाज़ों में शिवा की दर्द भरी चीखें और अभय का शेर की तरह गरजना शामिल था।

इधर अभय सिंह शिवा को लात घूॅसों से मारते मारते अधमरा कर दिया। शिवा इतनी कुटाई के बाद बेहोश हो चुका। उसके जिस्म में कई जगह नीले निशान पड़ चुके थे। आॅख नाॅक मुॅह सब फूल गए थे, तथा नाॅक व होंठ फट गए थे जहाॅ से खून बह रहा था। शिवा के बेहोश होने के बाद भी अभय सिंह का गुस्सा शान्त नहीं हुआ था। उसने शिवा को उठा कर अपने कंधे में डाला और घर से बाहर निकल गया।

घर से बाहर आकर अभय अपने बड़े भाई अजय सिंह के घर की तरफ बढ़ता चला जा रहा था। कछ ही देर में वह अजय सिंह के घर के अंदर ड्राइंगरूम में पहुॅच गया। ड्राइंग रूम में इस वक्त कोई नज़र न आया।

"भाभीऽऽऽऽ।" अपने कंधे पर शिवा को उसी तरह लिए हुए अभय ड्राइंग रूम में खड़े होकर पूरी शक्ति से चिल्लाया था।

उसके इस तरह चिल्लाने का असर ये हुआ कि दो पल में ही कमरे से बाहर लगभग दौड़ती हुई प्रतिमा ड्राइंगरूम में दाखिल होती नज़र आई।

"क् क्या हुआ अभय???" प्रतिमा ने आते ही अभय से पूछा__"क्या बात है तुम इस तरह चिल्लाए क्यों???"

प्रतिमा की बात सुन कर अभय सिंह ने अपने कंधे से शिवा को उतार कर सामने रखे सोफे के पास जाकर सोफे पर शिवा को लगभग पटक दिया। प्रतिमा की नज़र जैसे ही अपने बेटे की अधमरी हालत पर पड़ी तो उसके हलक से चीख निकल गई।

"ये ये क्या हो गया मेरे बेटे को?" प्रतिमा दौड़ कर शिवा के चेहरे को अपने हाॅथों में लेकर रोते हुए बोली__"किसने की मेरे बेटे की ऐसी हालत??? अभय इसे कहाॅ से लेकर आए हो तुम?? प्लीज बताओ क्या हुआ है इसे?? किसने किया ये सब??"

"मैंने की है इसकी ये दुर्दसा।" अभय ने बर्फ की मानिंद ठंडे स्वर में कहा__"और जी तो चाहता है कि इसे अभी जान से मार दूॅ।"

"अभऽऽऽय।" प्रतिमा एक झटके में खड़ी होकर चिल्लाते हुए कहा__"तुम होश में तो हो? ये क्या बोल रहे हो तुम??"
"शुकर मनाइए भाभी कि मैंने अपना होश नहीं खोया था।" अभय ने पहली बार अपनी भाभी की आॅखों में आॅखें डाल कर तथा गुर्राते हुए कहा__"वर्ना जिस बेटे को बेटा कहते हुए आपकी ज़ुबान नहीं थकती न उसे आज ज़िन्दा ही ज़मीन के अंदर दफन कर दिया होता।"

"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझसे इस लहजे में बात करने की?" प्रतिमा ने चीखते हुए कहा__"तुम भूल गए हो कि तुम किससे बात कर रहे हो? अपने से बड़ों की तमीज़ भूल गए हो तुम? और.....और मेरे बेटे के बारे में ऐसा बोलने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी??"

"मुझे तमीज़ और संस्कार न बताइए भाभी।" अभय ने कठोर भाव से कहा__"बल्कि इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत आपके बेटे को है, इस हरामज़ादे को सिखाइए तमीज़ और संस्कार। आज इसने जो नीच हरकत की है, इसकी जगह कोई और होता तो अब तक मेरे हाॅथों जान से मार दिया गया होता। आपका और बड़े भइया का ख़याल कर लिया इस लिए इसे ज़िन्दा छोंड़ दिया है मैंने। मगर आइंदा अगर इसने मेरे घर की तरफ देखने की भी ज़ुर्रत की तो इसके लिए अच्छा नहीं होगा।"

प्रतिमा को एकाएक झटका सा लगा। सारा गुस्सा सारा चीखना चिल्लाना साबुन के झाग की तरह डण्डा पड़ता चला गया। अभय की इस बात ने उसे अंदर ही अंदर बुरी तरह चौंका दिया कि उसके बेटे ने कोई नीच हरकत की है। अपने पति व बेटे की रॅग रॅग से वाकिफ प्रतिमा समझ गई कि उसके बेटे ने कोई ग़लत हरकत की है, मगर क्या??

"आख़िर ऐसा क्या किया है मेरे बेटे ने अभय??" प्रतिमा ने तनिक हल्के लहजे से कहा__"जो तुम इसे जान से मार देने की बात कर रहे हो?"

"क्या बताऊॅ आपको?" अभय ने अजीब भाव से कहा__"मुझे तो आपसे बताने में भी शर्म आती है लेकिन इस हरामज़ादे को उस नीच काम करने में ज़रा भी शर्म नहीं आई।"

"अभय प्लीज, बताओ मुझे कि क्या किया है इसने??" प्रतिमा का दिल बुरी तरह धड़कने लगा था किसी आशंकावश।

"ये करुणा को उसके बाथरूम में छिप कर नहाते हुए देख रहा था।" अभय ने गुर्राते हुए कहा__"आज स्कूल में एक मास्टर की मृत्यु हो गई थी इस लिए स्कूल में सभी बच्चों की छुट्टी कर दी गई। मैं भी घर लौट आया, मगर मुझे क्या पता था कि घर आते ही मुझे इसकी गंदी करतूत देखने को मिलेगी? जैसे ही मैं कमरे में दाखिल हुआ तो मेरी नज़र बाथरूम के दरवाजे से छिप कर बाथरूम में देखते आपके इस नीच बेटे पर पड़ी। ये करुणा को नहाते हुए जाने कब से देख रहा था। इसे इस बात का भी ख़याल नहीं रहा कि करुणा इसकी चाची है जो खुद इसके माॅ के ही समान है उसे यह इस नीचता से कैसे देख सकता है??"

"सचमुच अभय।" प्रतिमा ने सारी बात सुनते ही दुखी भाव से कहा__"इसने बहुत बड़ा पाप किया है। इसे ऐसा करने की तो बात दूर बल्कि ऐसा करने की सोचना भी नहीं चाहिए था। अच्छा किया तुमने जो इसे इसकी नीचता की सज़ा दे दी। ये माफी के लायक नहीं है अभय....मगर मैं तुमसे हाॅथ जोड़ कर माफी माॅगती हूॅ इसकी तरफ से। आइंदा ये ऐसा कुछ नहीं करेगा।"

"जिसके मन में इस तरह के नीच और बुरे विचार एक बार पैदा हो जाते हैं वो इतना जल्दी ज़हन से नहीं जाते।" अभय ने कहा__"इस लिए इससे मेरा भरोसा अब उठ चुका है, और अब अगर ये मेरे घर के आस पास भी नज़र आया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा?"

"अब ये कुछ भी ऐसा वैसा नहीं करेगा अभय।" प्रतिमा ने कहा__"मैं इस बात का वचन देती हूॅ तुम्हें। मैं बहुत शर्मिंदा हूॅ कि मेरे बेटे ने ऐसी नीच व घटिया हरकत की।"

"ये सब आप और बड़े भइया के लाड़ प्यार का नतीजा है भाभी।" अभय ने कहा__"आप लोगों ने हमेशा इसकी ग़लतियों पर पर्दा डाला है, वर्ना ये ऐसा न बनता। मुझे इसकी करतूतों के बारे में सब पता है, ये गाॅव की हर लड़की और औरत पर गंदी नज़र रखता है। लेकिन मुझे ये नहीं पता था कि इसकी गंदी नज़र अपनी ही माॅ समान चाची पर भी हैं, और क्या पता इसकी ये गंदी नज़रें परिवार की किन किन लड़कियों और औरतों पर हैं??? जिसे अपनी हवस के आगे रिश्तों का कोई ख़याल ही न हो वो परिवार की किसी भी औरत के बारे में कुछ भी सोच और कर सकता है।"

"ऐसा नहीं है अभय।" प्रतिमा की ये सोच कर अब हालत ख़राब होने लगी थी कि अभय उसके बेटे की करतूतों को जानता है और उसके बारे में अब ऐसा बोल रहा है। वो तो जानती ही थी कि उसका बेटा अपने बाप की तरह ही परिवार की हर लड़की व औरत को अपने नीचे लेटाना चाहता है। उसका बस चले तो वो अपनी माॅ को भी अपने नीचे लेटाने में एक पल भी जाया न करे। आज उसी बेटे की करतूतों से सारा बना बनाया खेल बिगड़ गया था। अभय के सामने ये सब हो गया इस लिए हालातों को सम्हालने की गरज़ से उसने कहा__"मेरा बेटा इतना नीच और गिरा हुआ नहीं है कि वो परिवार की औरतों के बारे में ऐसा सोचे। मैं मानती हूॅ कि उसने ग़लती की है, और इस उमर में ऐसा हो जाता है, लेकिन ये सच है कि उसे अपनी माॅ समान चाची को ऐसे छिप कर नहाते हुए नहीं देखना चाहिए था। मैं समझाऊॅगी उसे कि ऐसा सोचना भी पाप है। तुम प्लीज ये सब बातें अजय से मत कहना वो इस सबके लिए इसे माफ नहीं करेंगे, बल्कि इसे मार मार कर घर से निकाल देंगे।"

"आप अब भी इसे बचाने के बारे में सोच रही हैं?" अभय ने एकाएक आवेशयुक्त लहजे से कहा__"इसकी ऐसी नीच हरकतों को बड़े भइया से छुपाने की बात कर रही हैं आप? नहीं भाभी नहीं...इसने जो किया है उसका पता बड़े भइया को भी चलना चाहिए। उन्हें भी तो पता चले कि उनका सपूत कितने बड़े बड़े काम करता है, ताकि उनका सिर गर्व से उठ जाए।"

प्रतिमा उससे क्या कहती??? उससे क्या कहती कि जिन बातों को वह अपने बड़े भाई से बताने की बात कर रहा है, उन सब बातों का उसके भाई को पहले से ही सब पता है। बल्कि अगर ये कहा जाए तो ज़रा भी ग़लत न होगा कि इस सबका असली कर्ता धर्ता ही वही है। मगर प्रतिमा ये सब अभय से कह नहीं सकती थी बल्कि उसने तो प्रत्यक्ष में बस यही कहा__"मैं तुम्हारे आगे हाॅथ जोड़ती हूॅ अभय, प्लीज इस सबके बारे में तुम अजय से कुछ मत कहना। वो इसे घर से निकाल देंगे। मैं मानती हूॅ कि इसने जो किया है वो माफी के काबिल नहीं है लेकिन प्लीज अभय इसे इसकी पहली और आख़िरी ग़लती समझ कर माफ़ कर दो, और इस सबको भूल जाओ। मैं तुमसे वादा करती हूॅ कि अब से ये तुम्हारे घर की तरफ कभी देखेगा भी नहीं।"

अभय गुस्से से भरी आॅखों से प्रतिमा की तरफ देखता रहा। कुछ बोला नहीं उसने जबकि उसके इस प्रकार गुस्से से देखने पर प्रतिमा ने कहा__"अभय, शान्त हो जाओ प्लीज। तुम चाहो तो इसके कुकर्म की मुझे जो चाहे सज़ा दे दो। इसने तुम्हारी पत्नी व अपनी चाची को जिस नीचता से छिप कर नहाते हुए देखा है उसके लिए तुम जो चाहे मुझे सज़ा दे दो। तुम्हारी हर सज़ा को मैं बिना कुछ बोले स्वीकार कर लूॅगी। मगर इस सबको भूल कर इसे माफ कर दो प्लीज।"

"भगवान जानता है कि मैंने कभी अपने परिवार के बारे में ग़लत नहीं सोचा, बल्कि हमेशा सबको अपना मान कर उन्हें यथोचित सम्मान दिया है।" अभय कह रहा था__"विजय भइया की मौत तथा माॅ बाबू जी के कोमा में चले जाने के बाद इस हवेली में रहने वालों की सोच को न जाने क्या हो गया है?? मुझे नहीं पता कि गौरी भाभी, तथा उनके बच्चों ने ऐसा क्या कर दिया था कि उन्हें उसकी कीमत इस हवेली से तथा सबसे रिश्ता तोड़ कर चुकानी पड़ी। मुझे यकीन नहीं होता कि विजय भइया और गौरी भाभी ने कभी कोई ग़लत कदम उठाया रहा होगा। बल्कि वो तो ऐसे थे कि उन्हें अगर देवी देवता की तरह पूजा भी जाता तो ग़लत न होता। विजय भइया की मौत के बाद ऐसा क्या हो गया था कि गौरी भाभी को उनके बच्चों सहित इस हवेली से बाहर हमारे खेत में बने मकान के सिर्फ एक ही कमरे में रह कर अपना जीवन यापन करना पड़ा। बात यहीं पर खत्म नहीं हो जाती बल्कि सोचने वाली बात ये भी है उन लोगों ने इस सबके बाद भी ऐसा क्या कर दिया था कि उन्हें खेत के उस कमरे को भी छोंड़ कर जाना पड़ा??? जहाॅ तक मुझे पता है विराज आया था अपनी माॅ और बहन से मिलने। सुबह शिवा के साथ उसकी मार पीट हुई थी। शायद यही वजह रही होगी कि वो लोग इस डर से वहाॅ से भी पलायन कर गए कि शिवा के साथ मार पीट करने से अजय भइया उन पर गुस्सा करेंगे। मैं सोचता था कि विराज ने शिवा के साथ मार पीट क्यों की थी?? मगर अब समझ गया हूॅ कि शिवा को मार मार कर अधमरा कर देने की वजह इसकी ही कोई नीच हरकत रही होगी। इस नीच की गंदी नज़र गौरी भाभी या निधि बिटिया पर भी रही होगी। गौरी भाभी ने अपने बेटे को इसकी इन नीच हरकतों के बारे में बताया होगा और कहा होगा कि बेटा हमें यहाॅ से ले चल। यकीनन यही सब बातें हुई रही होंगी।"

अभय सिंह क्या क्या बोले जा रहा था ये सब अब प्रतिमा के सिर के ऊपर से जाने लगा था। उसके पैरों तले से ज़मीन कब की निकल चुकी थी। दिलो दिमाग़ में भयंकर विस्फोट हो रहे थे। दिल की धड़कनें रुक रुक कर इस तरह चल रही थीं जैसे उसे ज़िंदा रखने के लिए उस पर कोई एहसान कर रही हों। आॅखों के सामने अॅधेरा छाने लगा था। ज़हन में एक ही ख़याल कत्थक कर रहा था कि 'सब कुछ खत्म'।

"आज इसने ये सब करके मुझे इस सबके बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया है भाभी।" अभय सिंह नाॅनस्टाप कहे जा रहा था__"और अब मैं खुद पता करूॅगा कि सच्चाई क्या है? मैं गौरी भाभी और उनके बच्चों को खोजूॅगा, और उनसे पूॅछूॅगा कि उन्होंने ऐसा क्या किया था कि उन लोगों को अपने ही घर से सब कुछ छोंड़ कर जाना पड़ा?? अब से मेरे पास सिर्फ यही एक काम होगा भाभी, मैं हर कीमत पर इस सच्चाई का पता लगाऊॅगा।"

इतना कह कर अभय सिंह वहाॅ से चला गया अपने घर की तरफ, इस बात से अंजान कि घर में कौन सी आफत उसका इन्तज़ार कर रही है?? जबकि उसकी इन बातों से प्रतिमा को लगा कि उसे चक्कर आ जाएगा। उसने बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाला और असहाय अवस्था में धम्म से सोफे पर लगभग गिर सी पड़ी।

इधर करुणा अब अपने कपड़े वगैरा पहन चुकी थी। तथा बेड पर गुमसुम सी बैठी थी। उसके पास ही उसकी बेटी दिव्या बैठी थी। दिव्या उमर में छोटी भले ही थी किन्तु हमेशा शान्त रहने वाली ये लड़की सब बातों को समझती थी। उसे अपने बड़े पापा व बड़ी माॅ का ये बेटा शिवा कभी पसंद नहीं आया था। वह इतनी नासमझ नहीं थी कि शिवा की हरकतों तथा उसकी आॅखों में गिजबिजाते हवस के कीड़ों को पहचान न पाती। उसने हज़ारों बार अपनी आॅखों से देखा था कि शिवा हमेशा उसकी माॅ और खुद उसे भी कभी कभी गंदी नज़र से देखता था। वह उसकी हवस से भरी नज़रों को हमेशा अपने सीने पर मौजूद छोटे छोटे उभारों पर महसूस करती थी। किन्तु डर व संकोच की वजह से वह कभी इस सबके बारे में अपनी माॅ से नहीं बताती थी।

अभय और दिव्या दोनो साथ ही स्कूल से घर आए थे। और आते ही जो हंगामा हुआ था उस सबको दिव्या ने अपनी डरी सहमी आॅखों से देखा था। वह समझ गई थी कि उसका बाप शिवा को किस बात पर इतनी बुरी तरह मार रहा था। उसने चुपके से अपनी माॅ के कमरे में जा कर बाथरूम में देखा था। बाथरूम में उसकी माॅ नग्न अवस्था में फर्स पर अपने दोनो घुटनों के बीच मुह छुपाए बैठी रो रही थी। अपनी माॅ को नग्न अवस्था में बैठे इस तरह रोते देख वह हैरान रह गई थी। पहली बार अपनी ही माॅ को नंगी हालत में देखा था उसने। जबकि खुद के जिस्म को अपने सामने भी देखने का कभी उसे ख़याल ही नहीं आया था।

डरी सहमी हालत में वह कुछ देर अपनी माॅ को देखती रही फिर हिम्मत करके वह पलटी और बेड से अपनी माॅ के सारे कपड़े उठा कर उसने बाथरूम के बाहर से ही करुणा की तरफ उछाल दिया। अपने नंगे बदन पर अचानक कपड़ों के पड़ने से करुणा बुरी तरह हड़बड़ा गई। उसकी नज़र पहले खुद के ऊपर गिरे हुए कपड़ों पर पड़ी फिर बाथरूम के गेट पर डरी सहमी खड़ी अपनी बेटी पर। दिव्या पर नज़र पड़ते ही वह चौंकी। एकाएक ही उसे अपनी नग्नता का एहसास हुआ। उसने हड़बड़ाकर अपने नंगे बदन को छिपाने के लिए उन कपड़ों से अपने बदन के गुप्तांगों को ढॅका। जबकि बाथरूम के गेट पर खड़ी दिव्या सीघ्र ही अपनी नज़रें अपनी माॅ पर से हटा कर वापस पलट गई। बाहर शिवा की धुनाई और उसकी दर्द में डूबी हुई चीखें चालू थी। कुछ देर बाद करुणा अपने कपड़े पहन कर बाथरूम से बाहर निकली और बेड पर बैठी अपनी बेटी दिव्या को देख कर उसके जिस्म में एक अजीब सी झुरझुरी महसूस होती चली गई। चेहरे पर लाज और शर्म की लाली फैल गई और उसका सिर झुक गया। अपनी ही बेटी से नज़र मिलाने की हिम्मत न हुई उसमें।

"मम्मी।" दिव्या बेड से उठकर तथा दौड़ते हुए आकर अपनी माॅ से लिपट गई। उसकी आॅखों से आॅसू बहने लगे थे। करुणा को समझ न आया कि वह अपने सीने से लिपटी तथा आॅसू बहाती बेटी से क्या कहे?? उसके दिलो दिमाग़ में अंधड़ सा मचा हुआ था। कमरे के बाहर से अब कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। शायद अभय शिवा को लेकर जा चुका था।

करुणा कुछ पल बुत बनी खड़ी रही फिर जाने क्या सोच कर उसने अपने सीने से दिव्या को अलग करके कहा__"जाओ अपने कमरे में और अपनी इस स्कूली ड्रेस को चेंज कर लो।"

दिव्या ने अजीब भाव से अपनी माॅ के चेहरे की तरफ देखा, और फिर पलट कर कमरे से बाहर निकल गई। इधर दिव्या के जाते ही करुणा के चेहरे पर एकाएक पत्थर जैसी कठोरता आ कर ठहर गई। ऐसा लगा जैसे उसने किसी बात का बहुत बड़ा फैंसला कर लिया हो।


अपडेट हाज़िर है दोस्तो......
आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,,,,,,,
 
अपडेट.........《 21 》

अब तक.......

डरी सहमी हालत में वह कुछ देर अपनी माॅ को देखती रही फिर हिम्मत करके वह पलटी और बेड से अपनी माॅ के सारे कपड़े उठा कर उसने बाथरूम के बाहर से ही करुणा की तरफ उछाल दिया। अपने नंगे बदन पर अचानक कपड़ों के पड़ने से करुणा बुरी तरह हड़बड़ा गई। उसकी नज़र पहले खुद के ऊपर गिरे हुए कपड़ों पर पड़ी फिर बाथरूम के गेट पर डरी सहमी खड़ी अपनी बेटी पर। दिव्या पर नज़र पड़ते ही वह चौंकी। एकाएक ही उसे अपनी नग्नता का एहसास हुआ। उसने हड़बड़ाकर अपने नंगे बदन को छिपाने के लिए उन कपड़ों से अपने बदन के गुप्तांगों को ढॅका। जबकि बाथरूम के गेट पर खड़ी दिव्या सीघ्र ही अपनी नज़रें अपनी माॅ पर से हटा कर वापस पलट गई। बाहर शिवा की धुनाई और उसकी दर्द में डूबी हुई चीखें चालू थी। कुछ देर बाद करुणा अपने कपड़े पहन कर बाथरूम से बाहर निकली और बेड पर बैठी अपनी बेटी दिव्या को देख कर उसके जिस्म में एक अजीब सी झुरझुरी महसूस होती चली गई। चेहरे पर लाज और शर्म की लाली फैल गई और उसका सिर झुक गया। अपनी ही बेटी से नज़र मिलाने की हिम्मत न हुई उसमें।

"मम्मी।" दिव्या बेड से उठकर तथा दौड़ते हुए आकर अपनी माॅ से लिपट गई। उसकी आॅखों से आॅसू बहने लगे थे। करुणा को समझ न आया कि वह अपने सीने से लिपटी तथा आॅसू बहाती बेटी से क्या कहे?? उसके दिलो दिमाग़ में अंधड़ सा मचा हुआ था। कमरे के बाहर से अब कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। शायद अभय शिवा को लेकर जा चुका था।

करुणा कुछ पल बुत बनी खड़ी रही फिर जाने क्या सोच कर उसने अपने सीने से दिव्या को अलग करके कहा__"जाओ अपने कमरे में और अपनी इस स्कूली ड्रेस को चेंज कर लो।"

दिव्या ने अजीब भाव से अपनी माॅ के चेहरे की तरफ देखा, और फिर पलट कर कमरे से बाहर निकल गई। इधर दिव्या के जाते ही करुणा के चेहरे पर एकाएक पत्थर जैसी कठोरता आ कर ठहर गई। ऐसा लगा जैसे उसने किसी बात का बहुत बड़ा फैंसला कर लिया हो।

अब आगे,,,,,,,

अभय गुस्से में तथा भभकते हुए अजय सिंह के घर से बाहर आकर अपने घर की तरफ जाने लगा। अभी वह अपने घर की बाउंड्री पार ही किया था कि उसे उसकी बेटी दिव्या भागते हुए घर से बाहर उसकी तरफ ही आती दिखी। बुरी तरह रोये जा रही थी वह। अभय को देख कर वह उससे रोते हुए लिपट गई, फिर तुरंत ही अपने पिता से अलग हुई।

"पापा वो म मम्मी...मम्मी ने।" दिव्या रोये जा रही थी। उसके मुख से कुछ निकल ही नहीं रहा था।
"क्या हुआ बेटी...क्या कह रही है तू?" अभय अंजानी आशंका से घबरा गया।
"पापा, वो मम्मी कमरे का दरवाजा ही नहीं खोल रही हैं।" दिव्या ने रोते हुए कहा__"मैने बहुत बार मम्मी को पुकारा लेकिन मम्मी न तो दरवाजा खोल रही हैं और ना ही कुछ बोल रही हैं। पापा मम्मी ने कहीं कुछ कर तो नहीं लिया? आप उन्हें बचा लीजिए जल्दी से।"

"क्याऽऽऽ???" अभय बुरी तरह चौंका, और साथ ही दौड़ पड़ा घर के अंदर की तरफ। उसके पीछे दिव्या भी रोते हुए दौड़ पड़ी थी।

अभय जितना तेज़ दौड़ सकता था उतना तेज़ दौड़ कर ही उस कमरे के पास पहुॅचा था जिस कमरे के अंदर करुणा थी।

"करुणाऽऽऽ दरवाजा खोलो।" अभय ने चीखते हुए कहा__"ये क्या बेवकूफी है??? दरवाजा खोलो जल्दी। करुणाऽऽऽ।"

अभय के चिल्लाने का कोई असर न हुआ। वह कुछ देर इसी तरह करुणा को पुकारता रहा। मगर ना तो दरवाजा खुला और ना ही अंदर से करुणा ने कुछ कहा। अभय को किसी अनिष्ट की आशंका हुई। उसने दरवाजे को तोड़ने की कोशिश करने लगा।

"करुणा, प्लीज दरवाजा खोलो।" अभय दरवाजे को तोड़ने के साथ साथ कहता भी जा रहा था__"ये तुम क्या पागलपन कर रही हो? अगर तुम ये समझती हो कि इस सबमें तुम्हारा कोई दोस है तो तुम ग़लत समझ रही हो करुणा। तुम मेरी करुणा हो, मुझे तुम पर खुद से भी ज्यादा भरोसा है। तुम कभी ग़लत नहीं हो सकती। मैं जानता हूॅ कि उस हरामज़ादे ने ही तुम्हें ग़लत इरादे से देखने की कोशिश की है। तुम तो उसे अपना बेटा ही मानती हो करुणा। तुम कहीं भी ग़लत नहीं हो, प्लीज ऐसा वैसा कुछ मत करना।"

अभय पूरी शक्ति से कमरे के दरवाजे को तोड़ने के लिए धक्के मार रहा था। पास में ही उसकी बेटी दिव्या भी खड़ी थी, जो सिसक सिसक कर रोये जा रही थी। अंदर ही किसी कमरे में शगुन के रोने की भी आवाज़ आ रही थी। लेकिन उसके रोने की तरफ किसी का ध्यान नहीं था।

"तुम मुझे सुन रही हो न करुणा?" अभय अधीर भाव से कह रहा था__"तुम्हें मेरी कसम है, तुम कोई भी ग़लत क़दम नहीं उठाओगी। तुम मेरी जान हो करुणा, तुम्हारे बिना जीने की मैं सोच भी नहीं सकता। तुम्हें ये सब करने की या सोचने की कोई ज़रूरत नहीं है। तुम मेरी नज़र में उसी तरह गंगा की तरह पवित्र हो करुणा। प्लीज ऐसा वैसा कुछ मत करना, वर्ना तुम्हारी कसम सारी दुनियाॅ को आग लगा दूॅगा मैं।"

बड़ी मुश्किल से और भीषण प्रहार के बाद आख़िर दरवाजा टूट ही गया। कमरे के अंदर की तरफ टूट कर गिरा था दरवाजा। अभय ने एक भी पल नहीं गॅवाया। बिजली की सी तेज़ी से वह कमरे के अंदर दाखिल हुआ। और.......

"न नहींऽऽऽऽ।" अभय के हलक से चीख निकल गई। कमरे में पहुॅचते ही उसने देखा कि करुणा कमरे की छत पर लगे पंखे के नीचे रस्सी के सहारे झूल रही थी। रस्सी का फंदा उसके गले में था तथा रस्सी का दूसरा सिरा कमरे की छत पर बीचो बीच लगे लोहे के कुंडे में फॅसा था। नीचे फर्स पर एक स्टूल लुढ़का हुआ पड़ा था।

स्पष्ट था कि करुणा ने आत्म हत्या करने के लिए ही ये सब किया था। वह इस घटना के बाद खुद को ही इस सबका दोसी मानती थी। वो समझती थी कि अब वह किसी को मुॅह दिखाने के काबिल नहीं रही है। वह समझती थी कि इस सबके बाद उसके पति उसे ग़लत समझेंगे। शायद इसी वजह से उसने ये क़दम उठाया था।

अभय बुरी तरह उसके पैरों से लिपटा रोये जा रहा था, उसकी बेटी दिव्या का भी वही हाल था। अचानक अभय को जाने क्या सूझा कि उसने तुरंत ही बेड को खींचा और करुणा के पैरों के नीचे उसी लुढ़के पड़े स्टूल को रखा। जिससे करुणा के गले में फॅसा रस्सी का फंदा टाइट न हो। अभय खुद बेड पर चढ़ गया और करुणा के गले से रस्सी के फंदे को छुड़ाने लगा।

कुछ ही पल में करुणा के गले से रस्सी का फंदा निकल गया। करुणा के गले में फंदा फॅसा हुआ था जिसकी वजह से करुणा की आॅखें व जीभ बाहर आ गई थी। अभय ने करुणा को अपने दोनो हाथों से सम्हाल कर उसी बेड पर आहिस्ता से लिटाया, और करुणा की नब्ज चेक करने लगा। अभय ये महसूस करते ही खुश हो गया कि करुणा की नब्ज अभी चल रही है। मतलब उसने करुणा को सही समय पर सही सलामत बचा लिया था। अगर थोड़ी देर और हो जाती तो शायद भगवान भी करुणा को मौत से बचा नहीं पाते। अभय ने खुश हो कर करुणा को खुद से चिपका लिया। दिव्या भी दौड़ कर अपनी माॅ से लिपट गई।

करुणा अभी बेहोशी की अवस्था में थी। अभय के कहने पर दिव्या ने तुरंत ही एक ग्लास में पानी लाकर अभय को दिया। अभय उस पानी से हल्के हल्के छीटे डालकर करुणा को होश में लाने की कोशिश करने लगा। कुछ ही देर में करुणा को होश आ गया। उसने गहरी गहरी साॅसे लेते हुए अपनी आॅखें खोली। सबसे पहले नज़र अपने पति पर ही पड़ी उसकी। वस्तुस्थित का ख़याल आते ही उसका चेहरा बिगड़ने लगा। आॅखों से आॅसू बहने लगे।

"मुझे क्यों बचाया अभय आपने?" फिर उसने उठकर रोते हुए कहा__"मुझे मर जाने दिया होता न। इस सबसे मुक्ति तो मिल जाती मुझे।"
"तुमने ये सब करने से पहले क्या एक बार भी नहीं सोचा था करुणा कि तुम्हारे बाद मेरा और हमारे बच्चों का क्या होता?" अभय ने भर्राए स्वर में कहा__"तुमने क्या सोच कर ये सब किया करुणा? क्या तुम ये समझती थी कि इस सबकी वजह से मैं तुम पर किसी प्रकार का शक या तुम पर कोई लांछन लगाऊॅगा?? नहीं करुणा नहीं..हमारा प्यार इतना कमज़ोर नहीं है जो इतनी सी बात पर तुम्हें मुझसे जुदा कर देगा। मुझे तो हर हाल में तुम पर यकीन है करुणा लेकिन शायद तुम्हें मुझ पर यकीन नहीं रहा। तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं था, अगर होता तो इतना बड़ा फैसला नहीं करती तुम।"

"मुझे माफ कर दीजिए अभय।" करुणा ने रोते हुए कहा__"मैं जानती हूॅ कि आपको मुझ पर हर तरह से भरोसा है। मगर हालात ऐसे बन गए थे कि मुझे यही लग रहा था कि इस सबकी वजह से मैं अब कहीं भी किसी को मुह दिखाने के काबिल नहीं रही। इसी लिए मैं इस सबको सहन नहीं कर पाई और खुद को खत्म करने का फैसला कर लिया था।"

"आज अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो।" अभय ने एकाएक ठंडे स्वर में कहा__"मैं उस हरामज़ादे को ज़िंदा नहीं छोंड़ता जिसकी वजह से ये सब हुआ।"
"मुझे नहीं पता था अभय कि वो कमीना मुझे इस नज़र से देखता है।" करुणा ने कहा__"अगर पता होता तो कभी उसे इस घर में घुसने ही नहीं देती।"

"पापा, शिवा भइया बहुत गंदे हैं।" सहसा इस बीच दिव्या ने भी हिम्मत करके कहा__"वो अक्सर अकेले में मुझे गंदी नज़र से देखते हैं।"
"क्याऽऽ???" अभय बुरी तरह उछल पड़ा, फिर गुर्राते हुए बोला__"उस हरामखोर की ये हिम्मत थी की वो मेरी बेटी को भी गंदी नज़र से देखता था?? नहीं छोंड़ूॅगा उस नीच और घटिया इंसान को, अभी उसे जान से मार दूॅगा मैं।"

अभय ये सब कह कर बेड से उठने ही लगा था कि करुणा ने हड़बड़ा कर तुरंत ही अभय का हाॅथ पकड़ लिया, फिर बोली__"नहीं अभय, आप ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे। जो कुछ हुआ उससे ये तो पता चल ही गया है कि वो कैसा लड़का है। इस लिए अब उससे कोई मतलब नहीं रखेंगे हम, और ना ही उसे इस घर में आने देंगे।"

"करुणा उस नीच की हिम्मत तो देखो,वो हमारी इस नन्हीं सी बच्ची के बारे में भी ऐसी नीयत रखता है।" अभय ने मारे गुस्से के उफनते हुए कहा__"उसने एक बार भी नहीं सोचा होगा कि वो ये सब क्या सोचता है और करने का इरादा रखता है? नहीं करुणा, ऐसे नीच और गिरी हुई सोच वाले लड़के को एक पल भी जीवित रखना पाप है। मुझे भइया भाभी की कोई परवाह नहीं है, मैं उसे किसी भी कीमत पर अब ज़िंदा नहीं छोंड़ूॅगा।"

"नहीं अभय, प्लीज रुक जाइए। आपको मेरी कसम।" करुणा ने भारी स्वर में कहा__"सबसे पहले हमें उसके माता पिता से इस बारे में बात करना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि उनका बेटा कैसी सोच रखता है अपने ही घर की माॅ बहनों के लिए। जल्दबाज़ी में उठाया हुआ क़दम अच्छा नहीं होता अभय। खुद को शान्त कीजिए"

"मैं भाभी से बोल आया हूॅ कि आज के बाद अगर उनके इस नीच बेटे ने मेरे घर की तरफ देखा भी तो उसके लिए अच्छा नहीं होगा।" अभय ने कहा।

"ये आपने अच्छा किया।" करुणा ने कहा__"दीदी ज़रूर इस संबंध में बड़े भइया से बात करेंगी।"
"हमसे बहुत बड़ी ग़लती हुई है करुणा।" अभय ने एकाएक अधीर होकर कहा__"आज मुझे एहसास हो रहा है कि क्यों मेरी देवी समान गौरी भाभी हम सबको छोंड़ कर इस हवेली से अलग खेतों में बने उस मकान पर रहती थी? सिर्फ इसी हरामज़ादे की वजह से करुणा। उस रात विराज आया था मुम्बई से, और सुबह उसने ही शिवा को मार मार कर अधमरा किया था। तब हमने सोचा था कि उसने बेवजह ही किसी खुंदक में शिवा को मारा था। जबकि अब मुझे सब बातों की समझ आई है कि क्यों विराज ने शिवा को मारा था?"

"क्या मतलब है आपका?" करुणा चौंकी।
"इसी नीच की वजह से करुणा।" अभय ने आवेश में कहा__"ये तो समझ ही गई हो तुम कि शिवा अपने ही घर की माॅ बहनों के बारे में ऐसी नीयत रखता है। उसने उसी नीयत से गौरी भाभी और हमारी फूल सी बच्ची निधि पर भी यही सब किया रहा होगा। इसी वजह से ये सब हुआ है।"

"लेकिन अगर ऐसी बात थी तो।" करुणा ने सोचने वाले भाव से कहा__"गौरी दीदी को इस बारे में बड़ी दीदी और बड़े भइया को बताना चाहिए था। अगर वो ये सब उनसे बताती तो वो अपने बेटे पर लगाम लगाती। लेकिन वो तो हवेली ही छोंड़ कर खेतों वाले मकान में गुड़िया के साथ रहने लगी थी। क्या सिर्फ इतनी सी बात की वजह से??"

"वजह तो हमें यही बताया था भइया भाभी ने कि गौरी भाभी ने प्रतिमा भाभी के कमरे से उनके जेवर चुराए थे।" अभय ने कहा__"और इतना ही नहीं बल्कि बड़े भइया को अपने रूप जाल में फसाने की कोशिश भी की थी। इस लिए बड़े भइया ने उन लोगों को हवेली से निकाल दिया था।"

"हाॅ तो ग़लत क्या था अभय?" करुणा ने अजीब भाव से कहा__"गौरी दीदी ने तो सच में बड़े भइया के साथ ग़लत करने की कोशिश की थी। इस सबका सबूत भी दिखाया था प्रतिमा दीदी ने हम लोगों को। उन फोटोग्राफ्स में साफ साफ दिखता था कि कैसे गौरी दीदी ने बड़े भइया को उनके ही कमरे में अपनी बाहों में जकड़ा हुआ था।"

"क्या ये स्वाभाविक बात लगती है करुणा कि बड़े भइया गौरी भाभी के साथ उस स्थित में हों और दूसरा कोई उस स्थिति में उनकी फोटो खींचे?" अभय ने सोचने वाले भाव से कहा__"जबकि उस स्थिति में होना तो ये चाहिए था कि अगर गौरी भाभी ने बड़े भइया को ग़लत नीयत से जकड़ा हुआ था तो इस सबका बड़े भइया विरोध करते, और गौरी भाभी को इस सबके लिए डाॅटते। दूसरी बात उन लोगों की उस वक्त की फोटो बनाने वाला कौन था?? अगर फोटो खींचने वाली प्रतिमा भाभी थी तो उन्हें फोटो खींचने की बजाय इस सबको रोंकना था। आखिर फोटो खींचने के पीछे उनका क्या उद्देश्य था? क्या सिर्फ ये कि हम सब उन फोटोज़ को देख कर ये यकीन कर सकें कि गौरी भाभी सच में बड़े भइया के साथ ये सब करने की नीयत रखती हैं या ये सब करती भी हैं???"

"आप कहना क्या चाहते हैं अभय??" करुणा ना समझने वाले भाव से बोली।
"आज के इस हादसे से मेरे सोचने का नज़रिया बदल गया है करुणा।" अभय ने गंभीर लहजे में कहा__"हम सब जानते थे कि विजय भइया और गौरी भाभी किसी देवी देवता से कम नहीं थे। उन्होंने भूल से भी किसी के साथ कभी भी कुछ ग़लत नहीं किया था। वो पढ़ाई लिखाई में भले ही ज़ीरो थे, लेकिन जब से उन्होने खेती बाड़ी का काम सम्हाला था तब से हमारे घर के हालात हज़ार गुना बेहतर हो गए थे। यहाॅ तक कि उनकी मेहनत और लगन से किसी भी चीज़ की कभी कोई कमी न रही थी। उनकी ही मेहनत और रुपये पैसे से इतनी बड़ी हवेली बनी और उनके ही पैसों से बड़े भइया ने अपने कारोबार की बुनियाद रखी थी। माॅ बाबूजी विजय भइया और गौरी भाभी को सबसे ज्यादा मानते थे। विजय भइया और गौरी भाभी ने कभी भी मुझे किसी बात के लिए कुछ नहीं कहा, बल्कि विजय भइया ने तो उस समय के हिसाब से मुझे एक बुलेट मोटर साइकिल खरीद कर दी थी। पूरे गाॅव में किसी के पास बुलेट नहीं थी। इतना ही नहीं उन्होंने अपने ही पैसों से बाबूजी के लिए एक शानदार कार खरीदी थी ताकि बाबूजी बड़े शान से उसमें सवारी करें। घर का बड़ा बेटा होने का जो फर्ज़ अजय भइया को निभाना चाहिये था वो फर्ज़ विजय भइया निभा रहे थे वो भी अपनी पूरी निष्ठा के साथ। मुझे याद है करुणा कि अजय भइया और प्रतिमा भाभी कभी भी विजय भइया और गौरी भाभी से ठीक से बात नहीं करते थे। बल्कि उनके हर काम में कोई न कोई नुक्स निकालते ही रहते थे। फिर समय गुज़रा और एक रात विजय भइया को किसी ज़हरीले सर्प ने काट लिया और वो इस दुनिया से चल बसे। उनके इस दुनिया से जाते ही हम सबकी खुशियों पर ग्रहण सा लग गया करुणा। माॅ बाबूजी को उनकी मौत से गहरा सदमा लगा था। हम सब उनके सदमे की वजह से परेशान हो गए थे। बड़े भइया और भाभी ने ही उन्हें सम्हाला था। एक दिन माॅ बाबूजी उसी कार से शहर जा रहे थे तो रास्ते में उनका एक्सीडेंट हो गया और वो दोनो उस एक्सीडेंट की वजह से कोमा में चले गए। समझ में नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा था हम सबके साथ?"

"इन सब बातों को सोचने का क्या मतलब है अभय?" करुणा ने कहा__"जो होना था वो तो हो ही गया। इसमें कोई क्या कर सकता था भला?"

"मैं ये सब कभी नहीं भूला करुणा।" अभय ने कहा__"मैं कभी किसी से कुछ कहता नहीं मगर मेरे अंदर हमेशा ये सब गूॅजता रहता है। आज के इस हादसे ने मेरी आॅखें खोल दी है करुणा। इस हादसे ने ये सोचने पर मजबूर कर दिया है मुझे कि ये जो कुछ भी हुआ वो सब क्या सच था या फिर किसी झूॅठ को छुपाने के लिए उस पर इन सब बातों को गढ़ कर पर्दा डाला गया था? ये तो सच है करुणा कि माॅ बाप का खून और उनके अच्छे संस्कारों की वजह से ही कोई औलाद सही रास्तों पर चलते हुए भविश्य में अपने अच्छे काम और नाम की वजह से अपने माॅ बाप और कुल का नाम रोशन करते हैं। शिवा को देख कर अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल नहीं है कि उसकी परवरिश और उसके खून में कितनी गंदगी है। दुनियाॅ में बहुत से ऐसे माॅ बाप हैं जिनके एक ही बेटा होता है मगर वो अपने एक ही बेटों को क्या ऐसे संस्कार देते हैं जिसकी वजह से वो अपने ही घर की माॅ बहनो पर बुरी नीयत रखे?? नहीं करुणा नहीं....कम से कम मेरी जानकारी में तो ऐसे माॅ बाप और ऐसे बेटे नहीं हैं। ज़रूर इनमें ही कहीं न कहीं कोई ख़राबी है। मैने फैंसला कर लिया है कि मैं खुद सारी सच्चाई का पता लगाऊॅगा।"

"सच्चाई???" करुणा चौंकी__"कैसी सच्चाई अभय?"
"वहीं सच्चाई करुणा।" अभय ने मजबूत लहजे में कहा__"जो हमसे छुपाई गई और उसके बदले कुछ और ही हमें दिखाया गया। उस समय मैंने इस सबका पता करने की कोशिश इस लिए नहीं की थी क्यों जो कुछ मुझे सबूत के साथ दिखाया गया था उससे मैं अत्यधिक क्रोध और गुस्से में था। उस सूरत में मैं उन लोगों की शकल तक नहीं देखना चाहता था। मगर अब नहीं, अब मैं पता लगाऊॅगा इस सबका। मैं मुम्बई जाऊगा करुणा...और गौरी भाभी तथा उनके दोनो बच्चों को ढूढूॅगा। उनसे ही सच्चाई का पता चलेगा। मैने अपने गुस्से और नाराज़गी की वजह से इतने साल बर्बाद कर दिये। कभी सोचा तक नहीं कि एक बार गौरी भाभी से भी पूछ लेना चाहिए कि उन पर जो आरोप लगाया गया था वो सच भी था या झूॅठ? काश! मैंने ये सब उनसे पूछा होता। अरे कानून भी हर मुजरिम को अपनी सफाई में कुछ कहने का अवसर देता है, जबकि मैंने तो पूॅछा तक नहीं था। मान लो कि अगर गौरी भाभी पर लगाए गए सारे आरोप सिरे से ही ग़लत हों तो सोचो क्या होगा करुणा? मैं अपनी ही नज़रों में गिर जाऊॅगा। कितना बड़ा पापी कहलाऊॅगा कि अपनी देवी समान भाभी पर लगे झूॅठे आरोपों को सच मान कर उनके बारे में क्या क्या सोच लिया था मैंने?? मुझे नरक में भी जगह नहीं मिलेगी करुणा....मैं तो शर्म से ही मर जाऊॅगा।"

"खुद को सम्हालिए अभय।" करुणा की आॅखें छलक पड़ी थी__"यकीनन हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई है। मगर अब जो हो गया उसे लौटाया भी तो नहीं जा सकता न? ईश्वर जानता है कि इस सबके बाद भी हमने कभी उनका बुरा नहीं चाहा है। हमें जो कुछ बताया गया था उससे हमें दुख ज़रूर पहुॅचा मगर इसके बावजूद हमने कभी उनके बारे में बुरा नहीं चाहा। आज आपने अगर इस सबका पता लगाने का फैसला कर ही लिया है तो ये अच्छी बात है अभय। सच्चाई का पता तो चलना ही चाहिए।"

"तुम चिन्ता मत करो करुणा।" अभय ने कहा__"मैंने अब इस बात को जानने का फैसला कर लिया है कि इस सबके पीछे की सच्चाई क्या है। मैं कल ही स्कूल में लम्बी छुट्टी की अर्ज़ी दे दूॅगा। अब मेरे पास सिर्फ यही काम रहेगा..किसी भी हाल में सच्चाई का पता लगाना।"

"आप हर सच्चाई का ज़रूर पता लगाइये अभय।" करुणा ने कहा__"लेकिन इस बात का भी ध्यान दीजिए कि वो लोग भी शान्त नहीं बैठेंगे जिन्होंने गौरी दीदी पर ये सब आरोप लगाये थे। संभव है कि अपनी पोल खुल जाने के डर से वो कोई भी कठोर कदम उठा लें। इस लिए उन लोगों से सतर्क और सावधान रहिएगा।"

"चिन्ता मत करो करुणा।" अभय ने कठोर भाव से कहा__"मुझे पता है कि अपने रास्ते पर आने वाली रुकावट से कैसे निपटना है।"
"फिर भी सावधान रहिएगा।" करुणा ने कहा__"क्योंकि इस सबसे ये तो समझ आ ही गया है कि वो लोग किसी के साथ कुछ भी कर सकते हैं।"

"कुछ भी करने वालों को मैं देख लूॅगा करुणा।" अभय ने कहा__"मेरे मुम्बई जाने के बाद तुम यहाॅ सबकी देख भाल अच्छे से करना। दिव्या तब तक स्कूल नहीं जाएगी जब तक मैं मुम्बई से लौट नहीं आता।"

"क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम सब ही मुम्बई चलें?" करुणा ने कहा__"कौन जाने आपके जाने के बाद यहाॅ कैसे हालात बन जाएॅ? उस स्थिति में मैं अकेली औरत भला किसी का कैसे मुकाबला करूॅगी??"

"मैं तुम सबको मुम्बई नहीं ले जा सकता क्योंकि मुम्बई में तुम लोगों को लिए मैं कहाॅ कहाॅ भटकूॅगा? अंजान शहर में अपना कहीं कोई ठिकाना भी तो होना चाहिए।" अभय ने कहा__"इस लिए तुम ऐसा करो कि कुछ दिन के लिए दिव्या और शगुन को लेकर अपने मायके चली जाओ। वहाॅ तुम सब सुरक्षित रहोगे, और मैं भी तुम लोगों के लिए निश्चिंत रहूॅगा।"

"हाॅ ये ठीक रहेगा।" करुणा ने कहा__"आप मेरे भाई को फोन कर दीजिए वो आ जाएगा और हम लोगों को अपने साथ ले जाएगा।"
"ठीक है।" अभय ने कहा__"मैं बात करता हूॅ तुम्हारे भाई से, तब तक तुम ज़रा चाय तो बना कर पिला दो मुझे।"
"जी अभी लाई।" करुणा ने बेड से उठते हुए कहा।
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अपडेट हाज़िर है दोस्तो.....
आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,,,,

दोस्तो आपको पहले ही बता चुका हूॅ कि इस समय मैं काम के सिलसिले में घर से बाहर हूॅ, इस लिए अपडेट देने में सक्षम नहीं हूॅ। आप मेरी मजबूरी समझेंगे, यही आशा करता हूॅ।
 
अपडेट...........《 22 》

अब तक,,,,,,,

"चिन्ता मत करो करुणा।" अभय ने कठोर भाव से कहा__"मुझे पता है कि अपने रास्ते पर आने वाली रुकावट से कैसे निपटना है।"
"फिर भी सावधान रहिएगा।" करुणा ने कहा__"क्योंकि इस सबसे ये तो समझ आ ही गया है कि वो लोग किसी के साथ कुछ भी कर सकते हैं।"

"कुछ भी करने वालों को मैं देख लूॅगा करुणा।" अभय ने कहा__"मेरे मुम्बई जाने के बाद तुम यहाॅ सबकी देख भाल अच्छे से करना। दिव्या तब तक स्कूल नहीं जाएगी जब तक मैं मुम्बई से लौट नहीं आता।"

"क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम सब ही मुम्बई चलें?" करुणा ने कहा__"कौन जाने आपके जाने के बाद यहाॅ कैसे हालात बन जाएॅ? उस स्थिति में मैं अकेली औरत भला किसी का कैसे मुकाबला करूॅगी??"

"मैं तुम सबको मुम्बई नहीं ले जा सकता क्योंकि मुम्बई में तुम लोगों को लिए मैं कहाॅ कहाॅ भटकूॅगा? अंजान शहर में अपना कहीं कोई ठिकाना भी तो होना चाहिए।" अभय ने कहा__"इस लिए तुम ऐसा करो कि कुछ दिन के लिए दिव्या और शगुन को लेकर अपने मायके चली जाओ। वहाॅ तुम सब सुरक्षित रहोगे, और मैं भी तुम लोगों के लिए निश्चिंत रहूॅगा।"

"हाॅ ये ठीक रहेगा।" करुणा ने कहा__"आप मेरे भाई को फोन कर दीजिए वो आ जाएगा और हम लोगों को अपने साथ ले जाएगा।"
"ठीक है।" अभय ने कहा__"मैं बात करता हूॅ तुम्हारे भाई से, तब तक तुम ज़रा चाय तो बना कर पिला दो मुझे।"
"जी अभी लाई।" करुणा ने बेड से उठते हुए कहा।


अब आगे,,,,,,,,

जैसा कि अभय ने निर्णय ले लिया था इस लिए उसने ससुराल में अपने साले युवराज सिंह को फोन कर दिया था और उसे जल्द से जल्द यहाॅ से करुणा के साथ दिव्या तथा शगुन को ले जाने के लिए कह दिया था। अभय के साले युवराज ने अचानक इस तरह यहाॅ आने और फिर अपने साथ उसकी बहन व भांजा भांजी को घर ले जाने का कारण पूॅछा तो अभय ने कुछ नहीं बताया। बस यही कहा कि वह कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहा है।

अभय ने करुणा तथा दिव्या से भी कह दिया था कि इस बात की चर्चा वो लोग अपने मायके तथा ननिहाल में किसी से नहीं करेंगी। अभय की ससुराल हल्दीपुर से ज्यादा दूर नहीं थी। बल्कि एक घंटे की दूरी पर थी। इस लिए उसके साले को आने में ज़्यादा देर नहीं हुई।

करुणा ने अपने पति अभय के लिए शाम का खाना बना कर रख दिया था जिसे वह गरम करके शाम को खा लेगा और खुद भारी मन से अपने बच्चों को लेकर अपने भाई के साथ अपने मायके मणिपुर चली गई थी। अभय ने उसे बता दिया था कि वह अगले दिन सुबह ही यहाॅ से मुम्बई के लिए निकलेगा। अभय ने अपनी पत्नी और बच्चों को अपने साले के साथ बेहद ही गुप्त रूप से भेजा था। किसी को भनक तक न लगने दी थी कि उसकी पत्नी और बच्चे किसके साथ कब कहाॅ गए हैं?

करुणा ने अभय से कहा था कि वह आज रात यहाॅ हवेली में न रहे बल्कि अपने किसी दोस्त या मित्र के यहाॅ रात रुक जाए और सुबह वहीं से मुम्बई के लिए रवाना हो जाएं। करुणा ये सब किसी अंजानी आशंका की वजह से कह रही थी जबकि उसकी इस सलाह पर अभय ने आवेश में कहा था__"मैं किसी से बाल बराबर भी नहीं डरता करुणा। मैंने किसी के साथ कोई ग़लत काम नहीं किया है, इस लिए किसी से डरने का सवाल ही नहीं है। रही बात बड़े भइया की तो उन्हें भी देख लूॅगा। मैं भी तो देखूॅ कि कितने बड़े तीसमारखाॅ हैं वो???" करुणा अभय की इस बात पर कुछ न बोल सकी थी।

उधर प्रतिमा ने अपने पति अजय सिंह को फोन करके आज हुई इस घटना के बारे में सब कुछ बता दिया था। जिसे सुन कर अजय सिंह के पैरों तले से ज़मीन निकल गई थी। उसे अपने बेटे पर बेहद गुस्सा आ रहा था। उसी की वजह से ये सब हुआ था वर्ना अभय ये सब कभी न सोचता कि उससे क्या कुछ छुपाया गया था??

अजय सिंह अपने बेटे के इस कार्य पर गुस्सा तो बहुत हुआ था किन्तु वह ये भी जानता था कि अब गुस्सा करने का कोई मतलब नहीं है। यानी जो होना था वो तो हो ही चुका था। अब तो उसे ये करना था कि इससे आगे कोई बात बढ़े ही न और ना ही उस पर कोई बात आए।

अजय सिंह अपनी फैक्टरी को फिर से चालू करने की कोशिशों में लगा हुआ था इस लिए वह ज्यादातर हवेली से बाहर ही रहता था। किन्तु आज हुई इस घटना की जानकारी जब उसकी पत्नी द्वारा फोन के माध्यम से उसे मिली तो वह शहर से हवेली आने के लिए कह दिया था प्रतिमा से। उसने ये भी हिदायत दी थी कि आज की घटना के बारे में उसकी बेटी रितू को पता न चले। जबकि अपने बेटे शिवा को कुछ दिन के लिए शहर में बने मकान पर रहने के लिए कह दिया था। ऐसा इस लिए था क्योंकि शिवा की बुरी हालत देखकर कोई भी ढेरों सवाल पूॅछने लगता। जबकि रितू तो अब पुलिस वाली थी, हर बात पर शक करना उसका पेशा था। दूसरी बात वह अपने भाई की आवारा गर्दी करने वाली इस असलियत से अंजान भी नहीं थी। इस लिए वह कई तरह के सवाल पूछने लगती सबसे। अजय सिंह ने प्रतिमा से ये भी कह दिया था कि वह हवेली में रहने वाले नौकर व नौकरानियों को भी इस बात की ठोस शब्दों में हिदायत दे दे कि वो लोग आज हुई इस घटना के बारे में एक लफ्ज़ भी रितू से न कहें या उनके द्वारा किसी तरह रितू के कानों तक ये बात न पहुॅचे।

अजय सिंह शाम को हवेली पहुॅचा था। हवेली में शमशान की तरह सन्नाटा फैला हुआ था। ऐसा लगता था जैसे इतनी बड़ी हवेली में किसी जीव का कहीं कोई वजूद ही न हो। अजय सिंह समझ सकता था कि हवेली में ये सन्नाटा क्यों फैला हुआ है। उसकी बेटी रितू किसी केस के सिलसिले में बाहर ही थी, यानी अभी तक वह हवेली नहीं लौटी थी पुलिस थाने से। जबकि शिवा अजय सिंह के पालतू कुछ आदमियों के साथ शहर वाले मकान में कुछ दिन रहने के लिए चला गया था।

अजय सिंह खामोशी से अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। कमरे में पहुॅचते ही अजय सिंह ने देखा कि उसकी बीवी प्रतिमा बेड पर पड़ी है। बेड पर पड़ी प्रतिमा एकटक व निरंतर कमरे की छत पर झूल रहे पंखे को घूरे जा रही थी। बल्कि अगर ये कहें तो ज़रा भी ग़लत न होगा कि वह पंखे को भी नहीं घूर रही थी वह तो बस शून्य में ही देखे जा रही थी। उसका मन कहीं और ही भटका हुआ नज़र आ रहा था। कदाचित् यही वजह थी कि उसे कमरे में अजय सिंह के दाखिल होने का ज़रा भी एहसास न हुआ था।

अजय सिंह ने गौर से अपनी बीवी की तरफ देखा फिर उसने अपने जिस्म पर मौजूद कोट को उतार कर उसे दीवार पर लगे एक हैंगर पर लटका दिया। इसके बाद वह बेड की तरफ बढ़ा। प्रतिमा अभी भी कहीं खोई हुई शून्य में घूरे जा रही थी।

"ऐसे किन ख़यालों में गुम हो प्रतिमा?" अजय सिंह ने उसे देखते हुए कहा__"जिसकी वजह से तुम्हें ये भी एहसास नहीं हो रहा कि मैं कब से इस कमरे में आया हुआ हूॅ?"

"सब कुछ खत्म हो गया अजय।" प्रतिमा उसी मुद्रा में तथा अजीब से भाव के साथ बिना अजय की तरफ देखे ही बोली__"सब कुछ खत्म हो गया। कुछ भी शेष नहीं बचा। हमने गुज़रे हुए कल में जो कुछ भी अपने हित के लिए किया था वो सब अब बेपर्दा हो चुका है। कैसी अजीब सी स्थित हो गई है हमारी। मैं और तुम ज़िंदा तो हैं मगर ऐसा लगता है जैसे हमारी एक एक साॅस हमारे मरे हुए होने की गवाही दे रही है। हम ऐसे जी रहे हैं अजय जैसे हर साॅस हमने किसी से उधार ली हुई है। आज आलम ये है कि हम अपने ही बच्चों के बीच डर डर कर जीवन का एक एक पल गुज़ार रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं अजय कि हमने जो कुछ भी अपने सुख सुविधा के लिए अपनों के साथ किया है उसी का प्रतिफल आज हमें इस रूप में मिल रहा है?"

"ये तुम क्या कह रही हो प्रतिमा?" अजय सिंह पहले तो चौंका था फिर अजीब भाव से प्रतिमा की तरफ देखते हुए कहा__"यकीन नहीं होता यार। अरे इतनी सी बात पर तुम इतना हताश व विचलित हो गई??? नहीं डियर, तुम इतनी निराशावादी बातें नहीं कर सकती। तुमने तो गुज़रे हुए कल में मेरे कहने पर ऐसे ऐसे कठिन व हैरतअंगेज कामों को अंजाम दिया है जिसे करने के लिए कोई साधारण औरत सोच भी न सके।"

"मैं भी तो एक इंसान हूॅ, एक औरत ही हूॅ अजय।" प्रतिमा ने बेड से उठ कर तथा गंभीर होकर कहा__"भले ही गुज़रे हुए कल में मैंने तुम्हारे कहने पर या हमारे हित के लिए हैरतअंगेज कामों को अंजाम दिया हो मगर मुझे इस बात का भी एहसास है कि वह सब जो मैने किया था वो निहायत ही ग़लत था। ये एक सच्चाई है अजय कि इंसान जो कुछ भी कर्म करता है उसके बारे में वो इंसान भी भली भाॅति जान रहा होता है कि वह किस प्रकार का कर्म कर रहा है? इंसान जान रहा होता है कि वह ग़लत कर्म कर रहा है इसके बावजूद वह रुकता नहीं है बल्कि ग़लत कर्म को करता ही चला जाता है। कदाचित् इस लिए कि उसमें ही उसका हित होता है। जब इंसान सिर्फ अपने ही हित के लिए ज़ोर देता है तब वह ये नहीं देखता कि अपने हित में उसने किस किस की खुशियों की या किस किस के जीवन की बलि चढ़ा दी है?"

"ये आज तुम्हें क्या हो गया है प्रतिमा?" अजय सिंह हैरान परेशान होकर बोला__"कैसी बहकी बहकी बातें कर रही हो तुम?"

"सच्चाई किसी भी तरह की हो अजय उसे सुन कर ऐसा ही लगता है सबको।" प्रतिमा ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा__"क्या ये सच नहीं है कि हमने सिर्फ अपने स्वार्थ व हित के लिए अपने ही रिश्तों के साथ अहित किया है? ये बात तुम भी भली भाॅति जानते और समझते हो अजय। हाॅ ये अलग बात है कि तुम इस सब को स्वीकार न करो।"

"इन सब बातों का अब कोई मतलब नहीं रह गया है प्रतिमा।" अजय ने बेचैनी से पहलू बदलते हुए कहा__"और मत भूलो इसके पहले तुमने भी इन सब बातों के बारे में नहीं सोचा था। आज ऐसा क्या हो गया है जिसकी वजह से तुम किसी के साथ सही ग़लत और हित अहित की बातें करने लगी? "

"आज हालात बदल गए हैं अजय।" प्रतिमा ने कहा__"पहले हम दूसरों के साथ अहित कर रहे थे इस लिए कुछ भी नहीं सोच रहे थे। मगर आज जब हमारे साथ अहित होने लगा है तब हमें इन सबका एहसास होना स्वाभाविक ही है। ये इंसानी फितरत है अजय, जब तक कोई बात खुद पर नहीं आती तब तक हमें किसी बात का एहसास ही नहीं होता।"

"ये सब बेकार की बातें हैं प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा__"आज की घटना से तुम ज़रा विचलित हो गई हो। जबकि इस सबसे इतना परेशान या दुखी होने की कोई ज़रूरत नहीं है।"

"तुम्हें आज के समय की वस्तुस्थित का एहसास ही नहीं है अजय।" प्रतिमा ने कहा__"अगर होता तो समझते कि हालात किस कदर बिगड़ गए हैं। ज़रा सोचो अजय...जो अभय आज तक हमारी ही कही बातों पर आॅख बंद करके यकीन करता आया था वही आज हमारी हर बात पर शक करने लगा है। इतना ही नहीं उसने तो हर सच्चाई का पता लगाने के लिए कदम भी उठाने की बात कर रहा था। अगर उसने ऐसा किया और इस सबसे उसे सारी सच्चाई का पता चल गया तो सोचो क्या होगा अजय?"

"कुछ नहीं होगा प्रतिमा।" अजय ने बड़ी सहजता से कहा__"तुम बेकार ही इतना परेशान हो रही हो। तुम्हें मैंने बताया नहीं है...हमारी सारी ज़मीन और ज़ायदाद अब सिर्फ हमारे ही बच्चों के नाम पर हैं। ये हवेली भी मैंने तुम्हारे नाम पर करवा दी है। मैं जब चाहूॅ तब अभय को इस हवेली और सारी ज़मीनों से बेदखल कर सकता हूॅ। यूॅ समझो कि वो सिर्फ मेरे रहमो करम पर इस हवेली पर है। मुम्बई में किसी होटल या ढाबे पर अपनी माॅ बहन के साथ कप प्लेट धोने वाले उस हरामज़ादे विराज का तो पत्ता ही साफ है। इस लिए कानूनन कोई कुछ भी नहीं कर सकता मेरा। अभय को अगर सच्चाई का पता चल भी गया तो क्या कर लेगा हमारा??"

प्रतिमा अवाक् सी देखती रह गई अजय की तरफ। उसे कुछ कहने के लिए तुरंत कुछ सूझा ही नहीं। जबकि.....

"मैने कहा था न कि तुम बेकार ही इतना परेशान हो रही हो।" अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए प्रतिमा के खूबसूरत चेहरे को सहला कर कहा__"तुमने तो खुद मेरे साथ कानून की एल एल बी की है। इस लिए जानती हो कि कानूनन कोई कुछ नहीं कर सकता। मैंने सारी ज़मीनें हमारे बच्चों के नाम कर दी हैं। और अगर कोई बात होगी भी तो इनमें से किसी के पास इतनी क्षमता ही नहीं है कि ये लोग ज़मीन ज़ायदाद को पाने के लिए मेरे साथ कोई मुकदमा वगैरह कर सकें। और अगर इन लोगों ने मुकदमा चलाने की कोशिश भी की तो सारी ज़िन्दगी इनसे कोर्ट कचहरी का चक्कर लगवाऊॅगा। इतने में ही इन सबका मूत निकल जाएगा।"

"वो सब तो ठीक है अजय।" प्रतिमा के चेहरे पर पहली बार राहत के भाव उभरे थे, किन्तु फिर तुरंत ही असहज होकर बोली__"लेकिन हम अपनी बेटियों को इस सबके लिए कैसे कन्विंस करेंगे? नीलम का तो भरोसा है कि वो हमसे कोई सवाल जवाब नहीं करेगी, लेकिन रितू का कुछ कह नहीं सकते। वो शुरू से ही तेज़ तर्रार रही हैं और न्यायप्रिय भी। अब तो वह पुलिस वाली भी बन गई है इस लिए इस सबका पता चलते ही वह कहीं हम पर ही न कोई केस ठोंक दे।"

"हद करती हो यार।" अजय सिंह ठहाका लगा कर हॅसते हुए बोला__"अपनी ही बेटी से इतना डरने लगी हो तुम।"
"ज्यादा शेखी न बघारो तुम।" प्रतिमा ने अजीब भाव से कहा__"आज भले ही इतना हॅस रहे हो तुम, मगर थोड़े दिन पहले तुम्हारी भी जान हलक में अटकी पड़ी थी जब रितू ने फैक्टरी वाला केस रिओपेन किया था।"

"यार सच कह रही हो तुम।" अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा__"यकीनन उस समय मेरी हालत की वाट लगी हुई थी। कितनी अजीब बात थी कि मेरी ही बेटी मेरी ही*****मारने पर तुली हुई थी। भला उस बेचारी को क्या पता था कि उसके द्वारा इस प्रकार से मेरी*****मारने से मुझे कितनी तक़लीफ हो रही थी।"

"अब आए न लाइन पर।" प्रतिमा खिलखिला कर हॅसते हुए बोली__"बड़ा उड़ने लगे थे अभी तो।"
"यार मेरा तो के एल पी डी भी हो गया।" अजय सिंह ने उदास भाव से कहा__"मेरे बेटे ने ही सारा काम खराब कर दिया वर्ना करुणा की आगे पीछे से लेने का चान्स बन ही जाना था। अब तो ये असंभव नहीं तो नामुमकिन ज़रूर हो गया है।"

"असंभव क्यों नहीं??" प्रतिमा चौंकी।
"असंभव इस लिए नहीं क्यों कि मैं चाहूॅ तो अभी भी उसको आगे पीछे से ठोंक सकता हूॅ।" अजय सिंह ने कहा__"लेकिन ये सब अब प्यार या उसकी रज़ामंदी से नहीं हो सकेगा बल्कि इसके लिए मुझे बल का प्रयोग करना पड़ेगा।"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" प्रतिमा हैरान।
"साली को उठवा लूॅगा किसी दिन।" अजय सिंह सहसा कठोर भाव से बोला__"और शहर में अपने नये वाले फार्महाउस पर रखूॅगा उसे। वहीं रात दिन उसकी आगे पीछे से लूॅगा। इतना ही नहीं अपने आदमियों को भी मज़ा करने का कह दूॅगा। मेरे आदमी उसकी आगे पीछे से बजा बजा कर उसकी***** का ****** बना देंगे।"

"ऐसा सोचना भी मत।" प्रतिमा ने आॅखें फैलाकर कहा__"वर्ना अभय तुम्हें कच्चा चबा जाएगा।"
"अभय की माॅ की ***** साले की।" अजय ने कहा__"उसने अगर ज्यादा उछल कूद करने की कोशिश की तो उसका भी वही अंजाम होगा जो विजय का हुआ था, लेकिन ज़रा अलग तरीके से।"

"उसकी छोंड़ो अजय।" प्रतिमा ने सहसा पहलू बदलते हुए कहा__"हमारी बेटी रितू के बारे में सोचो। उसे इस झमेले के लिए कैसे मनाएंगे?"

"उसकी भी फिक्र मत करो डियर।" अजय सिंह ने कुछ सोचते हुए कहा__"तुम तो जानती हो कि मुझे अपने रास्तों पर किसी तरह के काॅटें पसंद नहीं हैं। हम दोनो उसे इस सबके लिए पहले प्यार से समझाएंगे, अगर उसे हमारी बातें समझ आ गईं तो ठीक है वर्ना मजबूरन उसके साथ भी हमें बल का प्रयोग करना ही पड़ेगा।"

"न नहीं अजय नहीं।" प्रतिमा ने सहसा घबरा कर कहा__"तुम उसके लिए ऐसा कैसे कह सकते हो? वह हमारी अपनी बेटी है। हर ब्यक्ति की अपनी एक फितरत होती है, रितू की फितरत हम जैसी नहीं है तो इसमें उसकी क्या ग़लती है? इंसान का स्वभाव जन्म से ही बनने लगता है, और फिर हर इंसान का अपना एक प्रारब्ध भी तो होता है। सब एक जैसी सोच विचार के नहीं हो सकते अजय, ये प्रकृति के नियमों के खिलाफ है।"

"मुझे पता है प्रतिमा।" अजय सिंह ने गंभीरता से कहा__"मैं जानता हूॅ कि हमारी बेटी उनमें से है जिनकी रॅगों में सच्चाई और ईमानदारी का खून दौड़ता है। लेकिन हमारे साथ मामला ज़रा जुदा है, यानी हमारी बेटी का ये सच्चाई और ईमानदारी वाला खून भविस्य में हमारे लिए बड़ी मुसीबत भी खड़ी कर सकता है।"

"ऐसा कुछ नहीं होगा अजय।" प्रतिमा ने मजबूती से कहा__"मैं अपनी बेटी को अपने तरीके से समझाऊॅगी। वो ज़रूर मेरी बात को समझेगी और मानेगी भी।"

"अच्छी बात है।" अजय ने कहा__"तुम उसे अपने तरीके से ज़रूर समझा देना। क्योंकि तुम्हारे बाद अगर मुझे समझाना पड़ा उसे तो हो सकता है मेरा समझाना तुम्हें पसंद न आए।"

"मैं ज़रूर समझाऊॅगी अजय।" प्रतिमा के जिस्म में ठण्डी सी सिहरन दौड़ती चली गई थी, फिर बोली__"लेकिन अब अभय के बारे में भी तो सोचो। उसने साफ शब्दों में कहा है कि वह इस सच्चाई का पता लगाएगा कि गौरी और उसके बच्चों के साथ वास्तव में हुआ क्या था? इस लिए वह इस सबका पता लगाने के लिए मुम्बई में विराज तथा विराज की माॅ बहन के पास जाने का बोल रहा था। अगर उसे सारी बातों का पता चल गया तो क्या होगा अजय??"

"उसे जाने दो मेरी जान।" अजय ने अजीब से लहजे में कहा__"उसे सारी सच्चाई का पता लग भी जाएगा तो अब कोई कुछ भी नहीं कर सकेगा। जिस चीज़ के लिए हमने ये सब किया था वो तो हमें हासिल हो ही चुका है। इस लिए जाने दो जिसे जहाॅ जाना हो। विराज के साथ साथ उसकी माॅ बहन को तो मेरे आदमी भी ढूॅढ़ रहे हैं। अच्छा है कि अभय भी उन्हें तलाश करेगा वहाॅ मुम्बई में। साला इतनी बड़ी मुम्बई में कहाॅ ढूॅढेगा उन कप प्लेट धोने वालों को?"

"इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।" प्रतिमा ने कहा__"संभव है किसी संयोग के चलते अभय उन लोगों को ढूॅढ़ ही ले।"
"अगर ऐसा है तो मैं अपने कुछ आदमियों को अभय के पीछे लगा देता हूॅ।" अजय ने कुछ सोचते हुए कहा__"यदि अभय उन लोगों को ढूॅढने में कामयाब हो जाएगा तो मेरे आदमी तुरंत ही इस बात की मुझे सूचना दे देंगे।"

"हाॅ ये बिलकुल ठीक रहेगा अजय।" प्रतिमा ने खुश होकर कहा__"उस सूरत में तुम अपने आदमियों को आदेश दे देना कि वो इन सबको किसी भी तरह यहाॅ हमारे पास ले आएं। उसके बाद हम अपने तरीके से उन सबका कल्याण करेंगे।"

"ऐसा ही होगा मेरी जान।" अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा__"सब कुछ हमारे हिसाब से ही होगा और अभय के यहाॅ से जाते ही मैं उसकी खूबसूरत बीवी करुणा को भी अपने आदमियों के द्वारा उठवा लूॅगा।"

"ऐसा करना हमारे लिए कहीं खतरे का सबब न बन जाए अजय।" प्रतिमा ने अजय को अजीब भाव से देखते हुए कहा__"मुझे लगता है कि इस काम में तुम्हें अभी इतनी जल्दी इतना बड़ा क़दम नहीं उठाना चाहिए।"

"एक दिन तो ये होना ही है प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा__"और वैसे भी आज जिस तरह के हालात बन गए हैं उससे सारी बातें सबके सामने आ ही जाएॅगी। इस लिए जब सारी बातों को खुल ही जाना है तो इस काम में मैं देरी क्यों करूॅ? मुझे हर हाल में अपनी ख्वाहिशों को परवान चढ़ाना है डियर। मेरी शुरू से ही ये ख्वाहिश थी कि मैं गौरी तथा करुणा को अपने इसी बेड पर अपने नीचे लिटाऊॅ और उन दोनो के खूबसूरत किन्तु गदराए हुए मादक जिस्म का भोग करूॅ।"

"ख्वाहिश तो तुम्हारी अपनी बेटियों को भी अपने नीचे लिटाने की है अजय।" प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा__"तो क्या अपनी बेटियों के साथ भी अपने छोटे भाईयों की बीवियों की तरह जबरदस्ती करोगे?"

"अगर ज़रूरत पड़ी तो ऐसा भी करुॅगा मेरी जान।" अजय ने स्पष्ट भाव से कहा__"लेकिन हमारी बेटियों को मेरे नीचे लाने की जिम्मेदारी तुम्हारी है। तुम अगर इस काम में सफल हो जाती हो तो अच्छी बात है वर्ना घी निकालने के लिए मुझे अपनी उॅगली को टेंढ़ा करना ही पड़ेगा।"

प्रतिमा हैरान परेशान सी देखती रह गई अपने पति को। वह समझ नहीं पा रही थी कि उसका पति किस तरह का इंसान है??????
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उधर मुम्बई में।
विराज अपने वादे के अनुसार रविवार यानी स्कूल की छुट्टी के दिन निधि को बड़े से शिप में समुंदर घुमाने ले आया था। निधि बेहद खुश थी इस सबसे। पता नहीं क्या क्या उसके दिमाग़ में चलता रहता था। कदाचित् फिल्में देखने का असर ज्यादा हो गया था उस पर।

पिछली सारी रात वह विराज के कमरे में रही थी। सारी रात उसने तरह तरह की योजनाएं बना बना कर विराज को बताती रही थी कि कल समुंदर में किस किस तरह से हम मस्ती करेंगे। उसकी ऊल जुलूल बातों से विराज बुरी तरह परेशान हो गया था। किन्तु वह उसे कुछ कह नहीं सकता था क्योंकि निधि उसकी जान थी। उसकी खुशी के लिए वह कुछ भी कर सकता था। विराज ने उसकी सभी बातों पर अमल करने का उसे वचन दिया और फिर प्यार से उसे अपने सीने से छुपका कर कहा था__"गुड़िया अब हम लोग सो जाते हैं, कल सुबह हमें जल्दी निकलना भी है न।" विराज की इस बात से और उसको इस तरह सीने से छुपका लेने से निधि खुश हो गई और खुशी खुशी ही नींद की आगोश में चली गई थी।

सुबह हुई तो दोनो ने नास्ता पानी किया और कुछ ज़रूरी चीज़ें लेकर घर से निकल पड़े। गौरी के द्वारा उन्हें शख्त हिदायतें भी दी गई थी कि वहाॅ पर सावधानी से ही काम लेना और शाम होने से पहले पहले घर वापिस आ जाना। विराज निधि को लेकर कार से निकल गया था।

जगदीश ओबराय की अच्छी जान पहचान थी जिसकी वजह से विराज को किसी बात की कोई परेशानी नहीं हुई थी। कहने का मतलब ये कि विराज ने एक बेहतरीन सुख सुविधा सम्पन्न शिप को शाम तक के लिए बुक करवा लिया था।
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शिप मे दो चालक और एक गाइड करने वाला था बाॅकी पूरा शिप खाली ही था। इस खूबसूरत शिप में चढ़ कर निधि खुशी से फूली नहीं समा रही थी। उसका बस चलता तो वह मारे खुशी के आसमान में उड़ने लगती। वह विराज से चिपकी हुई थी। फिर वह उससे अलग होकर शिप के किनारे पर आ गई तथा यहीं से हर तरफ का नज़ारा करने लगी थी। विराज उसे इस तरह खुश होते देख खुद भी खुश था। उसे आज पहली बार यहाॅ खुले आसमान के नीचे समुंदर में इस तरह अपनी बहन के साथ आकर खुशी हुई थी। वह अपनी बहन को ही देख रहा था, जो कभी कहीं देखती तो कभी कहीं और देखने लगती। उसके लिए ये सब नया था, हलाॅकि फिल्मों में उसने जाने कितनी दफा एक से बढ़कर एक सीन्स देखे थे। किन्तु यह नज़ारा उसके जीवन का पहला और वास्तविक था। विराज अपनी गुड़िया को इस तरह खुश होते देख खुद भी खुश था। फिर एकाएक ही जाने क्या सोच कर उसकी आॅखों में आॅसू आ गए। कदाचित् ये सोच कर कि इसके पहले उन लोगों ने ऐसी किसी खुशी को पाने की कल्पना भी न की थी। उसके अपनों ने किस तरह उसे और उसकी माॅ बहन को हर चीज़ से बेदखल कर दिया था। कुछ दर्द ऐसे भी थे जो अक्सर तन्हाई में उसे रुलाते थे।

अभी वह ये सब सोच कर आॅसू बहा ही रहा था कि निधि उसके सामने आ गई। उसने निधि को देखकर जल्दी से मुह फेर लिया ताकि वह उसकी आॅखों में आॅसू न देख सके।

"आप क्या समझते हैं मुझे कुछ पता नहीं चलता??" निधि ने भर्राए गले से कहा__"अगर आप ऐसा समझते हैं तो ग़लत समझते हैं आप। संसार की ऐसी कोई चीज़ नहीं है जिसे देख कर मैं अपने होश खो दूॅ और मुझे ये भी न पता चल सके कि जो मेरी जान है उसे किस पल किस दर्द ने आकर रुला दिया है। आप कहीं भी रहें लेकिन मैं ये महसूस कर लेती हूॅ कि आप किस लम्हें में किस दर्द से गुज़रे हैं।"

"ये सब क्या बोल रही है पगली?" विराज ने खुद को सम्हालते हुए तथा हॅसते हुए कहा__"चल छोंड़ ये सब और आ हम दोनों एंज्वाय करते हैं।"

"आप बातों को टालिये मत।" निधि ने विराज के चेहरे की तरफ एकटक देखते हुए कहा__"मुझे वचन दीजिए कि आज के बाद आप कभी भी अपनी आॅखों में आॅसू नहीं लाएॅगे।"

"जिन चीज़ों पर किसी इंसान का कोई बस ही न हो उन चीज़ों के लिए कैसे भला कोई वचन दे सकता है गुड़िया?" विराज ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा__"हाॅ इतना ज़रूर कह सकता हूॅ कि आइंदा ऐसा न हो ऐसी कोशिश करूॅगा।"

निधि एक झटके से विराज से लिपट गई, उसकी आॅखों में आॅसू थे, बोली__"क्यों उन सब चीज़ों के बारे में इतना सोचते हैं आप जिनके बारे में सोचने से हमें सिर्फ दुख और आॅसू मिलते हैं? मत सोचा कीजिए न वो सब...आप नहीं जानते कि आपको इस तरह दुख में आॅसू बहाते देख कर मुझ पर और माॅ पर क्या गुज़रती है? सबसे ज्यादा मुझे तक़लीफ होती है...आप उसे भूल जाइए न भाईया...क्यों उसे इतना याद करते हैं जिसे आपकी पाक मोहब्बत की कोई क़दर ही न थी कभी।"

विराज के दिलो दिमाग़ को ज़बरदस्त झटका लगा। ये क्या कह गई थी उसकी गुड़िया?? उसे ऐसा लगा जैसे उसके पास में ही कोई बम्ब बड़े ज़ोर से फटा हो और फिर सब कुछ खत्म व शान्त। कानों में सिर्फ साॅय साॅय की ध्वनि गूॅजती महसूस हो रही थी। विराग किसी बुत की तरह खड़ा रह गया था। उसकी पथराई सी आॅखें निधि के उस चेहरे पर जमी हुई थी जिस चेहरे को आॅसुओं ने धो डाला था। फिर सहसा जैसे उसे होश आया। उसने निधि के मासूम से चेहरे को अपनी दोनों हॅथेलियों के बीच लिया और झुक कर उसके माॅथे पर एक चुबन लिया। इसके बाद वह पलटा और शिप के अंदर की तरफ चला गया। जबकि निधि वहीं पर खड़ी रह गई।

जब काफी देर हो जाने पर भी विराज अंदर से न आया तो निधि के चेहरे पर चिंता व परेशानी के भाव गर्दिश करने लगे। उसे अपने भाई के लिए चिन्ता होने लगी और उसका दिलो दिमाग बेचैन हो उठा। वह तुरंत ही अंदर की तरफ बढ़ गई। समुंदर में उठती हुई लहरों के बीच तैरता हुआ शिप बढ़ता ही जा रहा था। निधि जब अंदर पहुॅची तो शिप में मौजूद गाइड करने वाला आदमी बाहर की ही तरफ आता दिखाई दिया। निधि ने उससे विराज के बारे में पूछा तो उसने हाथ के इशारे से एक तरफ संकेत किया और बाहर निकल गया। जबकि निधि उसकी बताई हुई दिशा की तरफ बढ़ गई। एक कमरे में दाखिल होते ही उसकी नज़र जैसे ही अपने भाई पर पड़ी तो उसे झटका सा लगा। उसके पाॅव वहीं पर ठिठक गए। उसकी आॅखों से बड़े तेज़ प्रवाह से आॅसू बहने लगे। उसका दिल बुरी तरह हाहाकार कर उठा था।


अपडेट हाज़िर है दोस्तो.....
आप सबकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा,,,,,

दोस्तो ये अपडेट कल रात ही आधे से ज्यादा तैयार किया था, आज जैसे जैसे समय मिला इसे पूरा किया और आपके सामने हाज़िर कर दिया,,,,,
 
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट...........《 23 》

अब तक,,,,,,

निधि एक झटके से विराज से लिपट गई, उसकी आॅखों में आॅसू थे, बोली__"क्यों उन सब चीज़ों के बारे में इतना सोचते हैं आप जिनके बारे में सोचने से हमें सिर्फ दुख और आॅसू मिलते हैं? मत सोचा कीजिए न वो सब...आप नहीं जानते कि आपको इस तरह दुख में आॅसू बहाते देख कर मुझ पर और माॅ पर क्या गुज़रती है? सबसे ज्यादा मुझे तक़लीफ होती है...आप उसे भूल जाइए न भाईया...क्यों उसे इतना याद करते हैं जिसे आपकी पाक मोहब्बत की कोई क़दर ही न थी कभी।"

विराज के दिलो दिमाग़ को ज़बरदस्त झटका लगा। ये क्या कह गई थी उसकी गुड़िया?? उसे ऐसा लगा जैसे उसके पास में ही कोई बम्ब बड़े ज़ोर से फटा हो और फिर सब कुछ खत्म व शान्त। कानों में सिर्फ साॅय साॅय की ध्वनि गूॅजती महसूस हो रही थी। विराग किसी बुत की तरह खड़ा रह गया था। उसकी पथराई सी आॅखें निधि के उस चेहरे पर जमी हुई थी जिस चेहरे को आॅसुओं ने धो डाला था। फिर सहसा जैसे उसे होश आया। उसने निधि के मासूम से चेहरे को अपनी दोनों हॅथेलियों के बीच लिया और झुक कर उसके माॅथे पर एक चुबन लिया। इसके बाद वह पलटा और शिप के अंदर की तरफ चला गया। जबकि निधि वहीं पर खड़ी रह गई।

जब काफी देर हो जाने पर भी विराज अंदर से न आया तो निधि के चेहरे पर चिंता व परेशानी के भाव गर्दिश करने लगे। उसे अपने भाई के लिए चिन्ता होने लगी और उसका दिलो दिमाग बेचैन हो उठा। वह तुरंत ही अंदर की तरफ बढ़ गई। समुंदर में उठती हुई लहरों के बीच तैरता हुआ शिप बढ़ता ही जा रहा था। निधि जब अंदर पहुॅची तो शिप में मौजूद गाइड करने वाला आदमी बाहर की ही तरफ आता दिखाई दिया। निधि ने उससे विराज के बारे में पूछा तो उसने हाथ के इशारे से एक तरफ संकेत किया और बाहर निकल गया। जबकि निधि उसकी बताई हुई दिशा की तरफ बढ़ गई। एक कमरे में दाखिल होते ही उसकी नज़र जैसे ही अपने भाई पर पड़ी तो उसे झटका सा लगा। उसके पाॅव वहीं पर ठिठक गए। उसकी आॅखों से बड़े तेज़ प्रवाह से आॅसू बहने लगे। उसका दिल बुरी तरह हाहाकार कर उठा था।

अब आगे,,,,,,

कमरे के दरवाजे पर अपनी आॅखों से डबडबाते आॅसू के साथ खड़ी निधि अपने भाई विराज को देखे जा रही थी जो अपने दाहिने हाॅथ में मॅहगी शराब की बोतल को मुॅह से लगाए गटागट पिये जा रहा था। देखते ही देखते सारी बोतल खाली हो गई। विराज ने खाली बोतल को बार काउंटर पर पटका और फिर से एक बोतल उठा ली उसने।

निधि को जैसे होश आया, वह बिजली की सी तेज़ी से कमरे के अंदर विराज के पास पहुॅची और हाॅथ बढ़ा कर एक झटके से विराज के हाॅथ से बोतल खींच ली।

"ये क्या पागलपन है भइया?" निधि ने रोते हुए किन्तु चीख कर कहा__"आप शराब को हाॅथ कैसे लगा सकते हैं? क्या उसका ग़म इतना बड़ा है कि उसके ग़म को भुलाने और मिटाने के लिए आपको इस शराब का सहारा लेना पड़ रहा है? क्यों भइया क्यों...क्यों उसको याद करके घुट घुट के जी रहे हैं? एक ऐसी बेवफा के लिए जिसको आपके सच्चे प्यार की कोई कद्र ही न थी। जिसने आपकी गुरबत को देख कर आपका साथ देने की बजाय आपका साथ छोंड़ दिया। क्यों भइया....क्यों ऐसे इंसान को याद करना? क्यों ऐसे इंसान की यादों में तड़पना जिसको प्यार और मोहब्बत के मायने ही पता नहीं?"

विराज ख़ामोश खड़ा था। उसका चेहरा आॅसुओं से तर था। चेहरे पर ज़माने भर का दर्द जैसे तांडव कर रहा था। आॅखें शराब के नशे में लाल सुर्ख हो चली थीं। निधि क्या बोल रही थी उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। जबकि निधि ने उसे पकड़ कर आराम से वहीं रखे एक सोफे पर बिठाया और खुद भी उसके पास ही बैठ गई।

"तु तुझे ये सब कैसे पता चला गुड़िया?" फिर विराज ने लरजते हुए स्वर में कहा।
"आप सारी दुनियाॅ को बहला सकते हैं भइया,लेकिन अपनी गुड़िया को नहीं।" निधि ने कहा__"मुझे इस बात का आभास तो पहले से ही था कि आप जो हम सबको दिखा रहे हैं वैसा असल में है नहीं। मैंने अक्सर रातों में आपको रोते हुए देखा था। एक दिन जब आप किसी काम से बाहर गए हुए थे तो मैंने आपके कमरे की तलाशी ली। उस समय मैं खुद नहीं जानती थी कि आपके कमरे में मैं क्या तलाश कर रही थी? किन्तु इतना ज़रूर जानती थी कि कुछ तो मिलेगा ही ऐसा जिससे ये पता चल सके कि आप अक्सर रातों में क्यों रोते हैं? काफी तलाश करने के बाद जो चीज़ मुझे मिली उसने अपनी आस्तीन में छुपाई हुई सारी दास्तां को मेरे सामने रख दिया। मेरे हाॅथ आपकी डायरी लग गई थी....उसी से मुझे सारी बातें पता चलीं। डायरी में आपके द्वारा लिखा गया एक एक हर्फ़ ऐसा था जिसने मुझे और मेरी अंतर्आत्मा तक को झकझोर कर रख दिया था भइया। अच्छा हुआ कि वो डायरी मुझे मिल गई थी वर्ना भला मैं कैसे जान पाती कि आप अपने सीने में कितना बड़ा दर्द छुपा कर हम सबके सामने हॅसते बोलते रहते हैं?"

"ये सब माॅ से मत बताना गुड़िया।" विराज ने बुझे स्वर में कहा__"वर्ना माॅ को बहुत दुख होगा। उन्होंने बहुत दुख सहे हैं, मैं उन्हें अब किसी भी तरह दुखी नहीं देख सकता।"

"और मुझे???" निधि ने विराज की आॅखों में बड़ी मासूमियत से देखते हुए कहा__"क्या मुझे दुखी सकते है आप??"

"नहीं, हर्गिज़ नहीं गुड़िया।" विराज ने कहने के साथ ही निधि के चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों के बीच लिया__"तू तो मेरी जान है रे। तेरी तरफ तो दुख की परछाई को भी न फटकने दूॅ।"

"अगर ऐसी बात है तो क्यों खुद को इतनी तकलीफ़ देते हैं आप?" निधि ने रुआॅसे स्वर में कहा__"आप भी तो मेरी जान हैं, और मैं भला अपनी जान को दुख में देख कर कैसे खुश रह सकती हूॅ, कभी सोचा है आपने? आप तो हमेशा उसी की याद में दुखी रहते हैं, उसी के बारे में सोचते रहते हैं। आपको इस बात का ख़याल ही नहीं रहता कि जो सचमुच आपसे प्यार करते हैं वो आपको इस तरह दुखी देख कर कैसे खुश रह सकते हैं?"

विराज कुछ न बोला। सोफे की पिछली पुश्त से पीठ टिका लिया उसने और अपनी आॅखें बंद कर ली। उस पर अब नशा हावी हो गया था। दुख दर्द जब असहनीय हो जाता है तो वह कुछ भी कर गुज़रने पर उतारू हो जाता है। आज तक उसने शराब को हाथ भी न लगाया था। अपने इस दर्द को किसी से बयां भी न किया था, किन्तु आज अपनी ये सच्चाई जब निधि के मुख से सुनी तो उसे जाने क्या हुआ कि उसके जज्बात हद से ज्यादा मचल गए और उसने शराब पी। हलाकि वह अंदर इस लिए आया था क्योंकि वह निधि के सामने खुद को इस हाल में नहीं दिखा सकता था। जब वह कमरे में आया तो नज़र कमरे में ही एक तरफ लगे बार काउंटर पर पड़ी। अपनी हालत को छुपाने के लिए उसने पहली बार शराब की तरफ अपना रुख किया था। जुनून के हवाले हो चुके उसने शराब की बोतल ही मुख से लगा ली और सारी बोतल डकार गया। किन्तु अब उस पर शराब का नशा तारी हो चुका था।

निधि कोई बच्ची नहीं थी बल्कि सब समझती थी। उसे एहसास था कि शराब ने उसके भाई पर अपना असर दिखा दिया है। क्या सोच कर आए थे दोनो यहाॅ लेकिन क्या हो गया था। निधि को अपने भाई की इस हालत पर बड़ा दुख हो रहा था। वह आॅखे बंद किये अपने भाई को ही देखे जा रही थी। उसने उसे झकझोर कर पुकारा, तो विराज हड़बड़ा कर उठा। इधर उधर देखा फिर नज़र निधि पर पड़ी तो एकाएक ही वह चौंका। उसे निधि के चेहरे पर किसी और का ही चेहरा नज़र आ रहा था। वह एकटक देखे जा रहा था उसे। फिर एकाएक ही उसके चेहरे के भाव बदल गए।

"अब यहाॅ क्या देखने आई हो विधि?" विराज भावावेश में कह रहा था__"देख लो तुमने जो ग़म दिये थे वो थोड़ा कम पड़ गए वर्ना आज मैं ज़िंदा नहीं रहता बल्कि कब का मर गया होता या फिर पागल हो गया होता। लेकिन चिन्ता मत करो, क्योंकि ज़िन्दा भी कहाॅ हूॅ मैं? हर पल घुट घुट कर जीता हूॅ मैं। इससे अच्छा तो ये होता कि तुम मुझे ज़हर दे देती। कम से कम एक बार में ही मर जाता।"

इधर विराज जाने क्या बोले जा रहा था जबकि उधर निधि पहले तो बुरी तरह चौंकी थी फिर जब उसे सब कुछ समझ आया तो उसका दिल तड़प उठा। उसने कुछ कहा नहीं बल्कि अपने भाई को बोलने दिया ये सोच कर कि ये उसके अंदर का गुबार है। इस गुबार का निकलना भी बहुत ज़रूरी है। उसे जाने क्या सूझी कि उसने इस सबके लिए खुद विधि का रोल प्ले करने का सोच लिया।

"क्यों किया ऐसा विधि?" विराज भर्राए गले से कह रहा था__"क्या यही प्यार था? क्या तुम्हें मेरे धन दौलत से प्यार था? और जब तुमने देखा कि मेरे अपनों ने मुझे मेरी माॅ बहन सहित हर चीज़ से बेदखल कर दिया है तो तुमने भी मुझे दुत्कार दिया? क्यों किया ऐसा विधि....?"

"प्यार व्यार ये सब फालतू की बाते हैं मिस्टर विराज।" विधि का रोल कर रही निधि ने अजीब भाव से कहा__"समझदार आदमी इनके चक्करों में पड़ कर अपना समय बर्बाद नहीं करता। मैने तुमसे प्यार किया था क्योंकि तुम उस समय अमीर थे। तुम्हारे पास धन था दौलत थी। उस समय तुम मेरे लिए कुछ भी खरीद कर दे सकते थे। तुमसे शादी करती तो सारी ज़िन्दगी ऐश करती। मगर तुम तो अपनों के द्वारा दर दर का भिखारी बना दिये गए। भला कोई भिखारी मेरी ज़रूरतों को कैसे पूरा कर पाता? इस लिए मैंने समझदारी से काम लिया और तुमसे जो प्यार का चक्कर चलाया था उसे खत्म कर दिया। हर ब्यक्ति अपने सुख और हित के बारे में सोचता है। मैं ने भी तो यही सोचा था, इसमें भला मेरी क्या ग़लती?"

"कितनी आसानी से ये सब कह दिया तुमने?" विराज के अंदर जैसे कोई हूक सी उठी थी, बोला__"क्या एक पल के लिए भी तुम्हारे मन में ये ख़याल नहीं आया कि तुम्हारे इस तरह के कठोर बर्ताव से मुझ पर क्या गुज़री रही होगी? क्या तुम्हें एक पल के लिए भी नहीं लगा कि तुम ये जो कुछ कर रही हो वह कितना ग़लत है? क्या तुझे एक पल के लिए भी नहीं लगा था कि तेरे इस तरह दुत्कार देने से सारी ऊम्र मैं सुकून से जी नहीं पाऊॅगा? बता बेवफा....बता बेहया लड़की?"

विराज एकाएक ही बुरी तरह चीखने चिल्लाने लगा था। जुनून और पागलपन सा सवार हो गया था उस पर। उसने एक झटके में निधि की गर्दन को अपने दोनो हाॅथों से दबोच लिया। निधि को इस सबकी उम्मीद नहीं थी। इस लिए जैसे ही विराज ने अपने दोनो हाॅथों से उसकी गर्दन दबोची वैसे ही वह बुरी तरह घबरा गई। जबकि विराज जुनूनी हो चुका। इस वक्त उसके चेहरे पर नफरत घृड़ा और गुस्सा जैसे कत्थक करने लगा था। आॅखें तो नशे में वैसे ही लाल सुर्ख हो गई थी पहले से अब चेहरा भी सुर्ख पड़ गया था।

निधि ने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि ऐसा भी हो सकता है। विराज ने उसकी गर्दन को शख्ती से दबोचा हुआ था। निधि बुरी तरह सहम गई थी। डर और भय के चलते उसका चेहरा निस्तेज़ का हो गया था। जबकि.....

"अब बोलती क्यों नहीं खुदगर्ज़ लड़की? बोल क्यों किया मेरे दिल के साथ इतना बड़ा खिलवाड़?" विराज भभकते स्वर में बोले जा रहा था__"बोल क्यों मेरी पाक भावनाओं को पैरों तले रौंदा था? बोल कितनी धन दौलत चाहिए तुझे? आज तो मैं फिर से अमीर हो गया हूॅ....मेरे पास आज इतनी दौलत है कि तेरे जैसी जाने कितनी लड़कियों को एक साथ उस दौलत से तौल दूॅ। कहीं ऐसा तो नहीं कि तुझे पता चल गया हो कि मैं फिर से धन दौलत वाला हो गया हूॅ और इस लिए तू फिर से अपना फरेबी प्यार मेरे आगे परोसने आ गई? नहीं नहीं...अब मुझे तेरे इस घिनौने प्यार की ज़रूरत नहीं है। बल्कि अब तो मैं तेरे जैसी लड़कियों को अपनी उसी दौलत से दो कौड़ी के दामों में खरीद कर अपने नीचे सुलाऊॅगा और रात दिन रगड़ूॅगा उन्हें समझी तू???"

"भ भइया...ये क् क्या हो गया है आ आपको?" निधि बड़ी मुश्किल से बोल पा रही थी__"मैं वि विधी नहीं बल्कि मैं आ आपकी गुड़िया हूॅ भइयाऽऽ।"

विराज इस तरह रुक गया जैसे स्टैचू में तब्दील हो गया हो। कानों में सिर्फ एक यही वाक्य गूॅज रहा था 'मैं वि विधी नहीं बल्कि मैं आ आपकी गुड़िया हूॅ भइयाऽऽ।' बार बार यही वाक्य कानों में गूॅज रहा था। एक झटके से विराज ने निधि की गर्दन से अपने हाॅथ खींचे। एक पल में ही उसकी बड़ी अजीब सी हालत हो गई। आॅखें फाड़ कर निधि को देखा उसने। और फिर फूट फूट कर रो पड़ा वह। निधि को अपने सीने से छुपका लिया उसने।

"मुझे माफ कर दे...माफ कर दे मुझे।" विराज ने निधि को अपने सीने से अलग करके अपने दोनो हाथ जोड़ कर कहा__"ये मैं क्या कर रहा था गुड़िया? अपने इन्हीं हाॅथों से अपनी जान से भी ज्यादा प्यारी अपनी गुड़िया का गला दबा रहा था मैं। मुझे माफ कर दे गुड़िया, मुझसे कितना नीच काम हो गया...तू तू मुझे इस सबके लिए कठोर से भी कठोर सज़ा दे गुड़िया।"

"भइयाऽऽ।" निधि का दिल हाहाकार कर उठा, उसने एक झटके से विराज को खुद से चिपका लिया। बुरी तरह रोये जा रही थी वह। वह जानती थी कि ये जो कुछ भी हुआ उसमें विराज की कहीं कोई ग़लती नहीं थी। वो तो बस एक गुबार था, जो इस प्रकार से निधि को ही विधी समझ कर उसके अंदर से फट पड़ा था।

जाने कितनी ही देर तक यही आलम रहा। निधि अपने भाई को शान्त कराती रही। शराब के नशे में विराज वहीं निधि की गोंद में सिर रख कर सो गया था। निधि बड़े प्यार से उसके सिर के बालों पर उॅगलियाॅ फेरती जा रही थी। उसकी नज़रें अपने भाई के उस चेहरे पर जमी हुई थी जिस चेहरे पर इस वक्त संसार भर की मासूमियत विद्यमान थी।

'आप चिन्ता मत कीजिए भइया, आपकी ये गुड़िया आपको इतना प्यार करेगी कि आप संसार के सारे दुख सारे ग़म भूल जाएॅगे। आप मेरी जान हैं और मैं आपकी जान हूॅ। इस लिए आज से आपकी खुशी के लिए मैं वो सब कुछ करूॅगी जिससे आपको खुशी मिले। ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,
 
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट....... 《 26 》

अब तक,,,,,,,,

"शायद इसी लिए राज।" निधि ने कहीं खोए हुए कहा था। उसे इस बात का आभास ही नहीं था कि वह अपने बड़े भाई को उसके नाम से संबोधित कर ये कहा था। जबकि...

"र राज..???" विराज बुरी तरह चौंका था। उसने निधि को खुद से अलग कर उसके चेहरे की तरफ हैरानी से देखा।
"क क्या हुआ भइया??" निधि चौंकी, उसको कुछ समझ न आया कि उसके भाई ने अचानक उसे खुद से अलग क्यों किया।

"क्या बताऊॅ??" विराज ने अजीब भाव से उसे देखते हुए कहा__"सुना है इश्क़ जब किसी के सर चढ़ जाता है तो उस ब्यक्ति को कुछ ख़याल ही नहीं रह जाता कि वह किससे क्या बोल बैठता है?"

"आप ये क्या कह रहे हैं?" निधि ने उलझन में कहा__"मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा?"
"अरे पागल तूने अभी अभी मुझे मेरा नाम लेकर पुकारा है।" विराज ने कहा__"हाय मेरी बहन प्रेम में कैसी बावली और बेशर्म हो गई है कि अब वो अपने बड़े भाई का नाम भी लेने लगी।"

"क क्याऽऽ????" निधि बुरी तरह उछल पड़ी। हैरत और अविश्वास से उसका मुॅह खुला का खुला रह गया। फिर सहसा उसे एहसास हुआ कि उसके भाई ने अभी क्या कहा है। उसका चेहरा लाज और शर्म से लाल सुर्ख पड़ता चला गया। नज़रें फर्स पर गड़ गईं उसकी। छुईमुई सी नज़र आने लगी वह। उसे इस तरह खड़े न रहा गया। कहीं और मुह छुपाने को न मिला तो पुनः वह विराज से छुपक कर उसके सीने में चेहरा छुपा लिया अपना। विराज को ये अजीब तो लगा किन्तु अपनी बहन की इस अदा पर उसे बड़ा प्यार आया। जीवन में पहली बार वह अपनी बहन को इस तरह और इतना शर्माते देखा था।

अब आगे,,,,,,,

विराज अपनी बहन को अभी इस तरह शर्माते देख ही रहा था कि उसकी पैन्ट की पाॅकेट में पड़ा मोबाइल बज उठा। दोनो ही मोबाइल की रिंगटोन सुन कर चौंके।

"आपका मोबाइल भी न।" निधि ने बुरा सा मुह बना कर कहा__"ग़लत समय पर ही बजता है।"
"अरे! ऐसा क्यों कह रही है तू?" विराज ने पाॅकेट से मोबाइल निकालते हुए कहा था।

"अब जाने दीजिए।" निधि विराज से अलग होकर बोली__"आप देखिये, जाने कौन कबाब में हड्डी बन गया है, हाॅ नहीं तो।"

विराज उसकी बात पर मुस्कुराया और मोबाइल की स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे नाम को देख तनिक चौंका फिर मुस्कुरा कर काॅल को रिसीव कर कानों से लगा लिया।

".................।" उधर से जाने क्या कहा गया जिसे सुन कर विराज बुरी तरह चौंका।
"ये क्या कह रहे हो तुम?" विराज ने हैरानी से कहा था।
"...............।" उधर से फिर कुछ कहा गया।
"भाई तूने बहुत अच्छी ख़बर दी है।" विराज खुश होकर बोला__"चल ठीक है मैं देख लूॅगा।"
"..............।"
"ओह तो ये बात है।" विराज ने सहसा सपाट भाव से कहा__"चल कोई बात नहीं भाई। देख लेंगे सबको। और हाॅ...सुन, मैने तेरा काम कर दिया है ठीक है न? चल रख फोन।"

"किससे बात कर रहे थे आप?" निधि ने उत्सुकतावश पूछा।
"अपना ही एक आदमी था गुड़िया।" विराज ने कहा__"उसने फोन करके बहुत अच्छी ख़बर सुनाई है। हमें अब इस टूर को यहीं खत्म करना होगा। क्योंकि बहुत ज़रूरी काम से मुझे कहीं जाना है।"

"क्या मुझे नहीं बताएॅगे?" निधि ने तिरछी नज़र से देखते हुए किन्तु इक अदा से कहा__"कि ऐसी क्या ख़बर सुनाई आपके उस आदमी ने जिसकी वजह से आपको अब जल्दी यहाॅ से निकलना होगा??"

"अरे पागल तुझसे भला क्यों कोई बात छुपाऊॅगा मैं?" विराज हॅसा__"चल रास्ते में बताता हूॅ सब कुछ।"

इसके बाद दोनो भाई बहन शिप के पायलट को सूचित कर शिप को वापस लौटने के लिए कह दिया। लगभग आधे घंटे बाद वो समुंदर के किनारे पर पहुॅचे। इस बीच विराज ने निधि को फोन पर हुई बातों के बारे में बता दिया था जिसे सुन कर वह भी खुश हो गई थी।

शिप से बाहर आकर विराज उस जगह निधि को लेकर गया जहाॅ पर उसकी कार पार्क की हुई थी। दोनो कार में बैठ कर घर की तरफ तेज़ी से बढ़ गए थे। इस बीच विराज ने फोन लगा कर किसी से बातें भी की थी।

शाम होने से पहले ही जब दोनो घर के अंदर पहुॅचे तो माॅ गौरी को ड्राइंगरूम में एक तरफ की दीवार पर लगी बड़ी सी एल ई डी टीवी पर सीरियल देखते पाया। गौरी ने जब अपने बच्चों को देखा तो पहले तो वो चौंकी फिर मुस्करा कर बोली__"आ गए तुम दोनो? चलो अच्छा किया जो जल्दी ही आ गए। जाओ दोनो खुद को साफ सुथरा कर लो तब तक मैं चाय बना कर लाती हूॅ।"

निधि और विराज दोनो अपने अपने कमरे की तरफ बढ़ गए। कुछ ही देर में दोनो फ्रेस होकर आए और सोफों पर बैठ गए। तभी गौरी हाथ में ट्रे लिए आई और दोनो को चाय दी और खुद भी एक कप चाय लेकर वहीं सोफे पर बैठ गई।

"माॅ चाचा जी आ रहे हैं आज।" विराज ने चाय की एक चुश्की लेकर कहा__"और मुझे जल्द ही रेलवे स्टेशन जाना होगा उन्हें रिसीव करने के लिए।"

"क्या कह रहा है तू......अभय आ रहा है???" गौरी बुरी तरह चौंकी थी, बोली__"पर तुझे कैसे पता इसका?"
"गाॅव के एक दोस्त ने मुझे फोन पर इस बात की सूचना दी है माॅ।" विराज ने सहसा गंभीर होकर कहा__"उसने बताया कि अभय चाचा चुपचाप ही हमसे मिलने के लिए गाॅव से निकले हैं। उसने ये भी बताया कि पिछले दिन हवेली में कोई बातचीत हो गई थी और अभय चाचा बहुत गुस्से में भी थे।"

"ऐसी क्या बातचीत हुई होगी?" गौरी ने मानो खुद से ही सवाल किया था, फिर तुरंत ही बोली__"और क्या बताया तेरे उस दोस्त ने?"
"मुझे तो ऐसा लगता है माॅ कि कोई गंभीर बात है।" विराज ने कहा__"मेरा दोस्त कह रहा था कि बड़े पापा ने अभय चाचा के पीछे अपने आदमियों को लगाया हुआ है। इससे तो यही लगता है कि वो अभय चाचा के द्वारा हम तक पहुॅचना चाहते हैं।"

"ठीक कहता है तू।" गौरी ने कहा__"ऐसा ही होगा। और अगर कोई बात हो गई है तो उससे अभय और उसके बीवी बच्चों पर ख़तरा भी होगा। उन्हें पता नहीं है कि उनका बड़ा भाई कितना बड़ा कमीना है।"

"इसी लिए तो मैं उन्हें लेने जा रहा हूॅ माॅ।" विराज ने कहा__"चाचा जी को तो शायद इस बात का अंदेशा भी न होगा कि उनके पीछे उनके बड़े भाई साहब ने अपने आदमी लगा रखे हैं।"

"अगर ये सच है कि अभय के पीछे तेरे बड़े पापा ने अपने आदमी लगा रखे हैं तो तू कैसे अभय को उन आदमियों की नज़रों से बचा कर लाएगा?" गौरी ने कहा__"तुझे तो पता भी नहीं है कि वहाॅ पर किन जगहों पर वो आदमी मौजूद होकर अभय पर नज़र रखे हुए हैं?"

"आप फिक्र मत कीजिए माॅ।" विराज ने कहा__"मैं चाचा जी को सुरक्षित वहाॅ से ले आऊॅगा और उन आदमियों को इसकी भनक भी नहीं लगेगी।"
"ठीक है बेटे।" गौरी ने सहसा फिक्रमंद हो कर कहा__"सम्हल कर जाना और अपने चाचा को सुरक्षित लेकर आना।"

"ऐसा ही होगा माॅ।" विराज ने कहा__"आप बिलकुल भी फिक्र मत कीजिए। मैं उन्हें सुरक्षित ही लेकर आऊॅगा।"

ये कह विराज सोफे से उठ कर बाहर की तरफ चला गया। कुछ ही देर में उसकी कार हवा से बातें कर रही थी। लगभग पन्द्रह मिनट बाद उसकी कार मेन रोड से उतर कर एक तरफ को मुड़ गई। कुछ दूर जाने के बाद विराज ने कार को सड़क के किनारे लगा कर उसे बंद कर दिया और बाॅई कलाई पर बॅधी रिस्टवाच पर ज़रा बेचैनी से नज़र डाली। उसके बाद राइट साइड की तरफ बनी हुई सड़क की तरफ देखने लगा। उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे किसी के आने का इन्तज़ार कर रहा हो।

कुछ ही देर में उस सड़क से उसे चार आदमी आते हुए दिखे। उन चारो आदमियों में एक की वेशभूसा सामान्य थी किन्तु बाॅकी के तीनों आदमियों के जिस्म पर कुली की पोशाक थी। थोड़ी ही देर बाद वो चारो विराज की कार के ड्राइविंग डोर के पास आकर खड़े हो गए।

"आने में इतना समय क्यों लगा दिया तुम लोगों ने?" विराज ने कहा__"मैने तुम लोगों को फोन पर बोला था न कि मुझे एकदम तैयार होकर यहीं पर मिलना।"

"साहब वो रामू की बेटी की तबियत बहुत ख़राब थी।" एक आदमी ने कहा__"इस लिए उसे अस्पताल लेकर जाना पड़ गया था। उसके पास पैसे नहीं थे तो हम सबने पैसों की ब्यवस्था की फिर उसे अस्पताल ले गए। उसी में समय लग गया साहब।"

"क्या हुआ उसकी बेटी को?" विराज ने चौंकते हुए पूछा था।
"पता नहीं साहब।" उस ब्यक्ति ने कहा__"एक हप्ते से बुखार थी उसे। थोड़ी बहुत गोली दवाई करवाई थी रामू ने। लेकिन आज दोपहर उसकी तबीयत कुछ ज्यादा ही बिगड़ गई इस लिए उसे अस्पताल लेकर जाना पड़ गया।"

"चलो कोई बात नहीं।" विराज ने कहा__"रामू को बोलो कि पैसों की चिन्ता न करे। उसकी बेटी के इलाज में जो भी पैसा लगेगा उसे हमारी कंपनी देगी। उसको बोलो कि वो अपनी बेटी का इलाज बेहतर तरीके से करवाए।"

"जी साहब।" उस आदमी ने खुश होकर कहा__"मैं अभी उसे बोलता हूॅ।"

कहने के साथ ही उस आदमी ने अपनी सर्ट की पाॅकेट से एक छोटा सा कीपैड वाला फोन निकाला और उस पर रामू का नम्बर देख उसे लगा दिया। उसने रामू को सारी बात बताई। उसके बाद उसने फोन बंद कर दिया।

विराज ने कार की डैसबोर्ड पर रखा एक लिफाफा उठाया। उसमे से उसने जो चीज़ें निकाली वो कोई फोटोग्राफ्स थे।

"इनमें से एक एक फोटोग्राफ्स तुम चारो अपने पास रखो।" विराज ने कहा__"इस फोटो में जो आदमी है उसे अच्छी तरह देख लो। क्योंकि इस आदमी को बड़ी सावधानी से रेलवे स्टेशन के बाहर लाना है तुम लोगों को।"

"पर साहब इतनी भीड़ में हम उन्हें खोजेंगे कैसे?" एक आदमी ने कहा__"दूसरी बात क्या पता कौन से डिब्बे में होंगे वो?"
"वो जनरल डिब्बे में ही हैं।" विराज ने कहा__"इस लिए तुम लोग सिर्फ जनरल डिब्बे में ही उन्हें खोजोगे। कहीं और खोजने की ज़रूरत नहीं है। बाॅकी तो सब कुछ तुम्हें फोन पर समझा ही दिया था मैने।"

"ठीक है साहब।" दूसरे आदमी ने कहा__"हम सब इस बात का ख़याल रखेंगे कि उनके पीछे लगे हुए उन आदमियों को पता न चल सके कि वो जिनका पीछा कर रहे हैं वो उनकी आॅखों के सामने से कैसे गायब हो गया??"

"वैरी गुड शंकर।" विराज ने कहा__"अभी ट्रेन के आने में समय है। तब तक मैं तुम्हें एक किराए की टैक्सी का इन्तजाम भी कर देता हूॅ। तुम उन्हें रेलवे स्टेशन से बाहर लाओगे, एक आदमी बाहर टैक्सी में बैठा तुम लोगों का इन्तज़ार करेगा। जैसा कि अभी तुम में से एक आदमी को छोंड़ कर बाकी तीनो कुली के वेश में हो इस लिए तुम तीनो में से जिसे भी वो मिलें तो उनके पास जाकर बड़ी सावधानी से सिर्फ वही कहना जो फोन पर समझाया था।"

"ऐसा ही होगा साहब।" एक अन्य आदमी ने कहा__"आप बेफिक्र रहिए।"
"अच्छी बात है।" विराज ने कहा__"चलो बैठो सब, हमें निकलना भी है अब।"

विराज के कहने पर चारो आदमी खुशी से बैठ गए जबकि विराज ने कार को स्टार्ट कर आगे बढ़ा दिया।
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मुम्बई जाने वाली ट्रेन के उस जनरल कोच में भीड़ तो इतनी नहीं थी किन्तु नाम तो जनरल ही था। कोई किसी को भी बैठने के लिए सीट देने को तैयार नहीं था। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो ज़बरदस्ती लड़ झगड़ कर अपने बैठने के लिए सीट का जुगाड़ कर ही लेते हैं। यहाॅ प्यार इज्जत या अनुनय विनय करने वाले को कोई सीट नहीं देता और ना ही सीट के ज़रा से भी हिस्से में कोई बैठने देता है। जनरल कोच में तो ऐसा है कि अगर आप गाली गलौच या लड़ना जानते हैं या फिर तुरंत ही किसी भी ब्यक्ति पर हावी हो जाना जानते हैं तो बेहतर है। क्योंकि उससे आपको जल्द ही कहीं न कहीं सीट मिल जाती है बैठने के लिए। लेकिन उसमें भी शर्त ये होती है कि आपके पास अपनी सुरक्षा के लिए अपने साथ कुछ लोगों का बैकप होना ज़रूरी है वरना अगर आप अकेले हैं और अकेले ही तोपसिंह बनने की कोशिश कर रहे हैं तो समझिये आपका बुरी तरह पिट जाना तय है।

अभय सिंह गरम मिज़ाज का आदमी था। उसे कब किस बात पर क्रोध आ जाए ये बात वो खुद ही आज तक जान नहीं पाया था। मगर आज उस पर कोई क्रोध हावी न हुआ था। उसने सीट के लिए किसी से कुछ नहीं कहा था, बल्कि हाॅथ में एक छोटा सा थैला लिए वह दरवाजे के पास ही एक तरफ कभी खड़ा हो जाता तो कभी वहीं पर बैठ जाता। सारी रात ऐसे ही निकल गई थी उसकी।

ट्रेन अपने नियमित समय से चार घंटे लेट थी। ये तो भारतीय रेलवे की कोई नई बात नहीं थी किन्तु इस सबसे यात्रियों को जो परेशानी होती है उसका कोई कुछ नहीं कर सकता, ये एक सबसे बड़ी समस्या है। यद्यपि अभय को समय का आभास ही इतना नहीं हुआ था क्योंकि वो तो अपने परिवार और अपने बीवी बच्चों के बारे में ही सोचता रहा था। रह रह कर उसके मन में ये विचार उठता कि उसने अपनी देवी समान भाभी के साथ अच्छा नहीं किया। उसे अपने भतीजे का भी ख़याल आता कि कैसे वह उसे हमेशा इज्जत व सम्मान देता था। परिवार में वही एक लड़का था जिस पर संस्कार और शिष्टाचार कूट कूट कर भरे हुए थे। उसे अपने इस भतीजे पर बड़ा स्नेह और फक्र भी होता था। उसकी भतीजी निधि उसकी लाडली थी। वह परिवार में सबसे ज्यादा निधि को ही प्यार और स्नेह देता था। सब जानते थे कि अभय गुस्सैल स्वभाव का था किन्तु उसका गुस्सा कपूर की तरह उस वक्त काफूर हो जाता जब उसकी लाडली भतीजी अपनी चंचल व नटखट बातों से उसे पहले तो मनाती फिर खुद ही रूठ जाती उससे। उसका अपनी किसी भी बात के अंत में 'हाॅ नहीं तो' जोड़ देना इतना मधुर और हृदय को छू लेने वाला होता कि अभय का सारा गुस्सा पल में दूर हो जाता और वह अपनी लाडली भतीजी को खूब प्यार करता। परिवार की बाॅकी दो भतीजियाॅ उसके पास नहीं आती थी, क्यों कि वो सब उससे डरती थी।

अभय का दिलो दिमाग़ गुज़री हुई बातों को सोच सोच कर बुरी तरह दुखी होता और उसकी आॅखें भर आतीं। वह अपने मन में कई तरह के संकल्प लेता हुआ खुद के मन को हल्का करने की कोशिश करता रहा था।

आख़िर वह समय भी आ ही गया जब ट्रेन मुम्बई के कुर्ला स्टेशन पर पहुॅची। अभय अपनी सोचों के अथाह समुद्र से बाहर आया और उठ कर गेट की तरफ चल दिया। काफी भीड़ थी अंदर, लोग जल्द से जल्द नीचे उतरने के लिए जैसे मरे जा रहे थे। अभय खुद भी लोगों के बीच धक्के खाते हुए गेट की तरफ आ रहा था। हलाॅकि खड़ा वह गेट के थोड़ा पास ही था किन्तु वह इसका क्या करता कि पीछे से आॅधी तूफान बन कर आते हुए लोग बार बार उसे पीछे धकेल कर खुद आगे निकल जाते थे। वह बेचारा बेज़ुबान सा हो गया था। कदाचित् उसकी मानसिक स्थित उस वक्त ऐसी नहीं थी कि वह लोगों के द्वारा खुद को बार बार पीछे धकेल दिये जाने पर कोई प्रतिक्रिया कर सके।

कुछ देर बाद आख़िर वह गेट के पास पहुॅचा और ट्रेन से नीचे उतर गया। प्लेटफार्म पर आदमी ही आदमी नज़र आए उसे। उसे समझ न आया कि किस तरफ जाए? इतने बड़े मुम्बई शहर में वह अपनी भाभी व उनके दोनो बच्चों को कहाॅ और कैसे ढूॅढ़ेगा? उसका तो खुद का कहीं ठिकाना नहीं था। उसे अब महसूस हुआ कि वो कितना असहाय और थका हुआ लग रहा है। भूख और प्यास ने जैसे उस पर अब अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। वह अपने साथ खाने पीने की कोई चीज़ लेकर नहीं चला था। कल अपने दोस्त के घर से खाकर ही चला था। हलाॅकि इतने बड़े सफर के लिए उसके दोस्त की बीवी ने खाने का एक टिफिन तैयार कर दिया था किन्तु अभय ने जाने क्या सोच कर मना कर दिया था।

ट्रेन से उतर कर अभय ने उसी तरफ चलने के लिए अपने कदम बढ़ाए जिस तरफ सारे लोग जा रहे थे। अभी वह कुछ कदम ही चला था कि एक कुली उसके पास आया और उसके अत्यंत निकट आकर बड़े ही रहस्यमय किन्तु संतुलित स्वर में बोला__"साहब जी! आपके भतीजे विराज जी आपको लाने के लिए हमें भेजे हैं। कृपया आप मेरे साथ जल्दी चलें।"

अभय सिंह को पहले तो कुछ समझ न आया फिर जब उसके विवेक ने काम किया तो कुली की इस बात को समझ कर वह बुरी तरह चौंका। उसके चेहरे पर अविश्वास के भाव नाच उठे। उसके मुख से हैरत में डूबा हुआ स्वर निकला__"क् कौन हो तुम? और कहाॅ है मेरा भतीजा?"

"साहब जी अभी आप ज्यादा कुछ न बोलिए।" उस कुली ने कहा__"बस मेरे साथ चलिए और अपना ये बैग मुझे दीजिए। और हाॅ, आप चेहरे से ऐसा ही दर्शाइये जैसे आप अपना सामान कुली को देकर उसके साथ बाहर जा रहे हैं। इधर उधर कहीं मत देखिएगा।"

"अरे...ऐसे कैसे भाई?" अभय को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है उसके साथ__"कौन हो तुम और ये सब क्या है?"
"ओह साहब जी समझने की कोशिश कीजिए।" कुली ने चिन्तित स्वर में कहा__"यहाॅ पर ख़तरा है आपके लिए। इस लिए जल्दी से चलिए मेरे साथ। स्टेशन से बाहर आपके भतीजे विराज जी आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।"

अभय के दिलो दिमाग़ में झनाका सा हुआ। एकाएक ही उसके दिमाग़ की बत्ती जल उठी। उसके मन में विचार उठा कि ये आदमी मुझे जानता है और मेरे लिए ही आया है, वरना दूसरे किसी आदमी को ये सब भला कैसे पता होता? दूसरी बात ये विराज का नाम ले रहा है और कह रहा है कि मेरा भतीजा स्टेशन से बाहर मेरी प्रतीक्षा कर रहा है। लेकिन ख़तरा किस बात का है यहाॅ??

अभय को पूरा मामला तो समझ न आया किन्तु उसने इतना अवश्य किया कि अपना बैग उस कुली को दे दिया। कुली उसका बैग लेकर तुरंत ही पलटा और स्टेशन के बाहर की तरफ चल दिया। उसके पीछे पीछे अभय भी चल दिया। दिमाग़ में कई तरह के विचारों का अंधड़ सा मचा हुआ था उसके।

स्टेशन से बाहर आकर वो कुली अभय को लिए एक टेक्सी के पास पहुॅचा। टैक्सी के अंदर बैग रख कर कुली ने अभय को टैक्सी के अंदर बैठने को कहा। लेकिन अभय न बैठा, उसने सशंक भाव से देखा कुली की तरफ। तब कुली ने एक तरफ हाॅथ का इशारा किया। अभय ने उस तरफ देखा तो चौंक गया, क्योंकि जिस तरफ कुली ने इशारा किया था उस तरफ उसका भतीजा विराज खड़ा था। विराज ने दूर से ही टैक्सी में बैठ जाने के लिए इशारा किया।

अभय अपने भतीजे को देख खुश हो गया और उसने राहत की सास भी ली। वह जल्द ही टैक्सी में बैठ गया। टैक्सी के अंदर चार आदमी थे। अभय के बैठते ही टैक्सी तुरंत आगे बढ़ गई। अभय को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे ये सब पहले से ही प्लान बनाया हुआ था। किन्तु उसे ये समझ न आया कि इस सबकी क्या ज़रूरत थी? आख़िर ये क्या चक्कर है?

"तुम सब लोग कौन हो भाई?" टैक्सी के कुछ दूर जाते ही अभय ने पूछा__"और ये सब क्या चक्कर है? मेरा मतलब है कि मुझे इस तरह रहस्यमय तरीके से क्यों ले जाया जा रहा है?"

"साहब जी ये तो हम भी नहीं जानते कि क्या चक्कर है?" कुली बने शंकर ने कहा__"हम तो वही कर रहे हैं जो करने के लिए विराज साहब ने हमे आदेश दिया था।"

अभय ये सुन कर मन ही मन चौंका कि ये विराज को साहब क्यों कह रहा है? किन्तु फिर प्रत्यक्ष में बोला__"ओह, तो अभी हम कहाॅ चल रहे हैं? और मेरा भतीजा विराज कहाॅ गया? वो इस टैक्सी में क्यों नहीं आया?"

"वो अपनी कार में हैं साहब जी।" शंकर ने कहा__"वो हमें आगे एक जगह मिलेंगे।"
"अ अपनी..क..कार में?" अभय लगभग उछल ही पड़ा था। उसे इस बात ने उछाल दिया कि उसके भतीजे के पास कार कहाॅ से आ गई? वह तो खुद भी यही समझ रहा था कि विराज कोई मामूली सा काम करता होगा यहाॅ।

"जी साहब जी।" उधर अभय के मनोभावों से अंजान शंकर ने कहा__"आगे एक जगह पर हमें विराज साहब मिल जाएॅगे। फिर आपको उनके साथ उनकी कार में बैठा कर हम इस टैक्सी को वापस कर देंगे जहाॅ से लाए थे।"

"क्या मतलब?" अभय चौंका, झटके पर झटके खाते हुए पूछा__"कहाॅ से लाए थे इसे? क्या ये टैक्सी तुम्हारी नहीं है?"
"नहीं साहब जी, ये टैक्सी तो हमने किराए पर ली थी।" शंकर ने कहा__"विराज साहब ने ऐसा ही कहा था। बाॅकी सारी बातें वही बताएॅगे आपको।"

अभय उसकी बात सुनकर चुप रह गया। उसे समझ में आ चुका था कि सारी बातें विराज से ही पता चलेंगी। क्योंकि इन्हें ज्यादा कुछ पता नहीं है। शायद विराज ने इन्हें नहीं बताया था। पर ये लोग विराज को साहब क्यों कह रहे हैं? क्या वो इन लोगों का साहब है? अभय का दिमाग़ जैसे जाम सा हो गया था।

अभय को ये बात हजम नहीं हो रही थी। लेकिन उसने फिर कुछ न कहा। टैक्सी तेज़ रफ्तार से कई सारे रास्तों में इधर उधर चलती रही। कुछ ही देर में टैक्सी एक जगह पहुॅच कर रुक गई। टैक्सी के रुकते ही शंकर नीचे उतरा और पीछे का गेट खोल कर अभय को उतरने का संकेत दिया। अभय उसके संकेत पर टैक्सी से उतर आया। अभी वह टैक्सी से उतर कर ज़मीन पर खड़ा ही हुआ था कि तभी।

"प्रणाम चाचा जी।" अभय के उतरते ही एक तरफ से आकर विराज ने अभय के पैर छूकर कहा__"माफ़ कीजिएगा आपको इस तरह यहाॅ लाना पड़ा।"

"अरे राज तुम?? सदा ही खुश रहो।" अभय ने कहा और एकाएक ही भावना में बह कर उसने विराज को अपने गले से लगा लिया, फिर बोला__"आ मेरे गले लग जा मेरा शेर पुत्तर। कदाचित् मेरे दिल को ठंडक मिल जाए।"

अभय की आॅखों में आॅसू छलक आए थे। उसने बड़े ज़ोर से विराज को भींच लिया था। विराज को भी आज अपने चाचा जी के इस तरह गले लगने से बड़ा सुकून मिल रहा था। आज मुद्दतों बाद कोई अपना इस तरह मिला था। शिकवे गिले तो बहुत थे लेकिन सब कुछ भूल गया था विराज। कुछ देर ऐसे ही दोनो गले मिले रहे। फिर अलग हुए। अभय अपने दोनो हाॅथों से विराज का सुंदर सा चेहरा सहला कर उसके शरीर के बाॅकी हिस्सों को देखने लगा।

"कितना दुबला हो गया है मेरा बेटा।" अभय ने भर्राए स्वर में कहा__"पगले अपना ठीक से ख़याल क्यों नहीं रखता है तू? और भ भाभी कैसी हैं...और...और वो मेरी लाडली गुड़िया कैसी है..बता मुझे??"

"सब लोग एकदम ठीक हैं चाचा जी।" विराज ने कहा__"चलिए हम वहीं चलते हैं।"
"हाॅ हाॅ चल राज।" अभय ने तुरंत ही कहा__"मुझे जल्दी से ले चल उनके पास। मुझे भाभी के पास ले चल...मुझे उनसे....।"

वाक्य अधूरा रह गया अभय सिंह का..क्यों कि दिलो दिमाग़ में एकाएक ही तीब्रता से जज्बातों का उबाल सा आ गया था। जिसकी वजह से उसका गला भारी हो गया और उसके मुख से अल्फाज़ न निकल सके।

विराज अपने साथ अभय को लिए कुछ ही दूरी पर खड़ी अपनी कार के पास पहुॅचा। फिर उसने कार का दूसरी तरफ वाला गेट खोल कर अंदर अभय को बैठाया। इस बीच शंकर ने अभय का बैग विराज की कार के अंदर रख दिया था। विराज खुद ड्राइविंग डोर खोल कर ड्राइविंग शीट पर बैठ गया। खिड़की के पास आ गए शंकर से उसने कहा__"उस टैक्सी को वापस कर देना। और ये पैसे रामू को दे देना, और ये तुम सब के लिए।"

विराज ने कार में ही रखे एक छोटे से ब्रीफकेस को खोल कर उसमे से दो हज़ार के नोटों की एक गड्डी शंकर को पकड़ाया था जो रामू की बेटी के इलाज़ के लिए था बाॅकी अलग से दो सौ के नोटों की एक गड्डी उन चारों के लिए। पैसे लेकर चारो ही खुशी खुशी वहाॅ से चले गए।

विराज ने कार स्टार्ट की और आगे चल दिया। अभय ये सब देख कर हैरान भी था और खुश भी।

"ये सब क्या चक्कर था राज?" अभय ने पूछा__"उन लोगों ने बताया कि ये सब करने के लिए उन्हें तुमने कहा था, लेकिन इस सबकी क्या ज़रूरत थी भला?"

"ऐसा करना ज़रूरी था चाचा जी।" विराज ने ड्राइविंग करते हुए कहा__"क्योंकि आपके पीछे कुछ ऐसे आदमी लगे थे जो आपकी निगरानी के लिए लगाए गए थे, बड़े पापा जी के द्वारा।"

"क क्या मतलब??" अभय बुरी तरह चौंका था, बोला__"बड़े भइया ने अपने आदमी मेरे पीछे लगा रखे थे? लेकिन क्यों और कैसे? और...और तुझे कैसे पता ये सब?"

"मुझे सबका पता रहता है चाचा जी।" विराज ने कहा__"वक्त और हालात ने सब कुछ सिखा दिया है आपके इस बेटे को। कल जब आप गाॅव से चले थे तब आपके वहाॅ से चलने की सूचना मुझे मेरे एक दोस्त ने फोन पर दी थी। उसने बताया था कि हवेली में कुछ बातचीत हो गई थी और आप हम लोगों से मिलने के लिए मुम्बई निकल चुके हैं। उसने ये भी बताया कि आपके पीछे बड़े पापा ने अपने आदमी भी लगा दिये हैं जो यहीं मुम्बई में हमारी खोज में न जाने कब से मौजूद थे।"

"ओह तो भइया ने ऐसा भी कर दिया मेरे पीछे?" अभय का चेहरा एकाएक सुलगता सा प्रतीत हुआ__"खैर कोई बात नहीं, उनसे उम्मींद भी क्या की जा सकती है? ख़ैर, तो तुम्हें इस सबकी जानकारी तुम्हारे दोस्त ने दी थी फोन के माध्यम से?"

"जी चाचा जी।" विराज ने कहा__"मुझे लगा कहीं आप पर किसी प्रकार का कोई ख़तरा न हो इस लिए मैने ऐसा किया। मैं खुद स्टेशन के अंदर नहीं गया क्योंकि संभव है बड़े पापा के आदमियों की नज़र मुझ पर पड़ जाती, उसके बाद उनके लिए हर काम आसान हो जाता। इस लिए मैंने उन सबसे बचने का ये उपाय किया। कुली के वेश में मेरे आदमी आपको सुरक्षित स्टेशन से बाहर ले आएॅगे। उसके बाद आपको टैक्सी में बैठा कर मेरे आदमी शहर में तब तक इधर उधर सड़कों में घूमते जब तक कि उन्हें ये एहसास न हो जाए कि किसी के द्वारा उनका पीछा अब नहीं किया जा रहा है। कहने का मतलब ये कि अगर बड़े पापा के आदमी किसी तरह आपको देख लिये हों और आपका पीछा करने लगे हों तो मेरे आदमी टैक्सी को तेज़ रफ्तार में इधर उधर घुमा कर उन आदमियों को गोली दे देंगे। उसके बाद मेरे आदमी सीधा वहाॅ आ जाते जहाॅ पर मैंने उन्हें अपने पास आने को बोला था। यहाॅ से मैं आपको अपनी कार में बैठा कर ले जाता। बड़े पापा के आदमी ढूॅढ़ते ही रह जाते उस टैक्सी को।"

"ओह तो ये प्लान था तुम्हारा?" अभय ये सोच सोच कर हैरान था कि उसका इतना संस्कारी और भोला भाला भतीजा आज इतना कुछ सोचने लगा है, बोला__"बहुत अच्छा किया तुमने राज। मैं तुम्हारी इस समझदारी से बहुत खुश हूॅ।" अभय कुछ पल रुका और फिर एकाएक ही उसके चेहरे पर दुख के भाव आ गए, बोला__" कितना ग़लत था मैं....अपने क्रोध और अविवेक के कारण कभी नहीं सोच सका कि वास्तव में क्या सही था क्या ग़लत? अपने देवता जैसे विजय भइया और देवी जैसी अपनी गौरी भाभी पर शक किया और उनसे ये भी न जानने की कोशिश की कभी कि उन पर लगाए गए आरोप सच भी हैं या ये सब आरोप किसी साजिश के तहत उन पर थोपे गए थे? राज बेटे, अपने देवी देवता जैसे भईया भाभी के साथ मैने ये अच्छा नहीं किया। भगवान मुझे इस सबके लिए कभी माफ़ नहीं करेगा।"

ये कहने के साथ ही अभय की आवाज़ भर्रा गई। उसका चेहरा दुख और ग्लानिवश बिगड़ गया। उसकी आॅखों से आॅसू बह चले। विराज अपने चाचा जी के इस रूप को देख कर खुद भी दुखी हो गया था। वह जानता था कि उसके चाचा चाची का कहीं कोई दोष नहीं था। उनका अपराध तो सिर्फ इतना था कि उन्हें जो कुछ बताया और दिखाया गया था उसी को उन्होंने सच मान लिया था। अपने क्रोध की वजह से चाचा ने कभी ये जानने की कोशिश ही नहीं की थी कि सच्चाई वास्तव में क्या थी?

खैर कुछ ही समय में विराज अपने घर पहुॅच गया। एक बड़े से मेन गेट पर दो गार्ड खड़े थे। विराज की कार देखते ही दोनो गार्ड्स ने मेन गेट खोला। उसके बाद विराज ने कार को अंदर की तरफ बढ़ा दिया। लम्बे चौड़े लान से चलते हुए उसकी कार पोर्च में आकर खड़ी हो गई। दोनो चाचा भतीजा अपनी अपनी तरफ का गुट खोल कर नीचे उतरे। अभय की नज़र जब सामने बड़े से बॅगला टाइप घर पर पड़ी तो वह आश्चर्यचकित सा होकर देखने लगा उसे। इधर उधर दृष्टि घुमा कर देखने लगा हर चीज़ों को।

"राज बेटा ये कहाॅ आ गए हम?" अभय ने अजीब भाव से पूॅछा__"ये तो किसी बहुत ही बड़े आदमी का बॅगला लगता है।"
"आपने बिलकुल सही कहा चाचा जी ये किसी बहुत बड़े आदमी का ही बॅगला है लेकिन।" विराज ने कहा__"लेकिन अब ये बॅगला और ये सब प्रापर्टी आपके इस राज बेटे की ही है।"

"क् क्याऽऽ?????" अभय बुरी तरह चौंका था। आश्चर्य और अविश्वास से उसका मुह खुला का खुला रह गया, बोला__"ये ये सब तेरा है?? लेकिन ये सब तेरा कैसे हो गया राज? क्या तू सच कह रहा है?"

"चलिए अंदर चलते हैं।" विराज ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा__" माॅ और गुड़िया आपका इन्तज़ार कर रही हैं।"

अभय विराज की इस बात पर उसके साथ बॅगले के अंदर की तरफ बढ़ा ही था कि कोई तेज़ी से आया और एक झटके से उससे लिपट गया। अभय इस सबसे पहले तो हड़बड़ाया फिर जब उसकी नज़र लिपटने वाले पर पड़ी तो अनायास ही मुस्कुरा उठा वह।

"अरे ये तो मेरी लाडली गुड़िया है।" अभय ने निधि के सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए कहा__"राज, ये मेरी गुड़िया है, ये...।"

अभय का गला भर आया, उसके जज्बात उसके काबू में न रहे। उसने निधि को अपने से छुपका लिया और रो पड़ा वह। उसे इस ख़याल ने बुरी तरह रुला दिया कि आज मुद्दतों के बाद उसने अपनी गुड़िया पर अपना प्यार लुटाने को मिला है। इसके पहले तो वह जैसे पत्थर का बन गया था। उसके दिलो दिमाग़ में इन सबके लिए क्रोध और घृणा भर दी गई थी। पहले जब उसकी भाभी और गुड़िया खेतों पर बने मकान के एक कमरे में रहती थीं तो वह किसी किसी दिन जाता था लेकिन फिर जैसे ही उसे उस सबका ख़याल आता वैसे ही उसका मन क्रोध और गुस्से से भर जाता और वह पत्थर का बन कर वापस चला आता। अपनी लाडली को प्यार व स्नेह देने के लिए वह तड़प जाता लेकिन आगे बढ़ने से हमेशा ही खुद को रोंक लेता था वह।

"आप आ गए न चाचू" निधि ने रोते हुए कहा__"मैं जानती थी कि आप मेरे बिना ज्यादा दिन नहीं रह सकेंगे वहाॅ पर। लेकिन आने में इतनी देर क्यों कर दी आपने? जाइये आपसे बात नहीं करना मुझे, हाॅ नहीं तो।"

ये कह कर निधि अपने चाचू से अलग हो गई और रूठ कर एक तरफ को मुह कर लिया। अभय को लगा कि उसका हृदय फट जाएगा। अपनी गुड़िया के मुख से बस यही सुनने के लिए तो तरस गया था वह। 'हाॅ नहीं तो' जाने इन शब्दों में ऐसा क्या था कि सुन कर अभय को लगा कि इन शब्दों को सुनने के बाद इस वक्त अगर उसे मृत्यु भी आ जाए तो उसे कोई ग़म न होगा।

"तू रूठ जाएगी तो मैं समझूॅगा कि मुझसे ये सारा संसार रूठ गया मेरी बच्ची।" अभय ने तड़प कर कहा__"यहाॅ तक कि वो ईश्वर भी। और फिर उसके बाद मेरे लिए एक पल भी जीने का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।"

"न नहीं चाचू नहीं।" निधि तुरंत ही अभय से लिपट गई। उसकी आॅखों से आॅसू बह चले। रोते हुए बोली__"प्लीज ऐसा मत कहिए। आप तो मेरे सबसे अच्छे चाचू हैं। मैं आपसे नाराज़ नहीं हूॅ। और हाॅ आज के बाद ऐसा कभी मत बोलियेगा नहीं तो सच में मैं आपसे बात नहीं करूॅगी, हाॅ नहीं तो।"

जाने कितनी ही देर तक अभय अपनी लाडली को स्नेह और प्यार के वशीभूत हुए खुद से छुपकाए रहा। उसके सिर पर प्यार से हाॅथ फेरता रहा। विराज ये सब नम आॅखों से देखता रहा।

"अगर अपनी लाडली भतीजी से मिलना जुलना हो गया हो तो अपनी भाभी से भी मिल लो अभय।" सहसा गौरी की ये आवाज़ गूॅजी थी वहाॅ। वह काफी देर से बॅगले के मुख्य दरवाजे पर खड़ी ये सब देख रही थी। उसकी आॅखों में भी आॅसू थे।

गौरी की इस आवाज़ को सुन कर अभय और निधि एक दूसरे से अलग हुए। अभय ने पलट कर गौरी की तरफ देखा। जो उसी की तरफ करुण भाव से देख रही थी। उसकी आॅखों में अपने लिए वही आदर वही स्नेह देख कर अभय का दिलो दिमाग़ अपराध बोझ से भर गया। उसे खुद पर इतनी शर्म और ग्लानी महसूस हुई कि उसे लगा ये धरती फटे और वह उसमें रसातल तक समाता चला जाए। दिलो दिमाग़ में भावनाओं का तेज़ तूफान चलने लगा। हृदय की गति तीब्र हो गई। उसे अपनी जगह पर खड़े रहना मुश्किल सा प्रतीत होने लगा।

बड़ी मुश्किल से उसने खुद को सम्हाला और नयनों में नीर भरे वह तेज़ी से गौरी की तरफ बढ़ा। गौरी के पास पहुॅचते ही वह अपनी देवी समान भाभी के पैरों में लगभग लोट सा गया। उसके जज्बात उसके काबू से बाहर हो गए। फूट फूट कर रो पड़ा वह। मुह से कोई वाक्य नहीं निकल रहे थे उसके।

अपने पुत्र समान देवर को इस तरह बच्चों की तरह रोते देख गौरी का हृदय हाहाकार कर उठा। वह जल्दी से नीचे झुकी और अभय को उसके दोनो कंधों से पकड़ कर बड़ी मुश्किल से उठाया उसने। अभय उससे नज़र नहीं मिला पा रहा था। उसका समूचा चेहरा आॅसुओं से तर था।

"अरे ऐसे क्यों रहे हो पागल?" गौरी खुद भी रोते हुए बोली__"चुप हो जाओ। तुम जानते हो कि मैने हमेशा तुम्हें अपने बेटे की तरह समझा है। इस लिए तुम्हें इस तरह रोते हुए नहीं देख सकती। चुप हो जाओ अभय। अब बिलकुल भी नहीं रोना।"

ये कह कर गौरी ने अभय को अपने सीने से लगा लिया। अपनी भाभी की ममता भरी इन बातों से अभय और भी सिसक सिसक कर रो पड़ा। उसकी आत्मा चीख चीख कर जैसे उससे कह रही थी 'देख ले अभय जिस देवी समान भाभी पर तूने शक किया था और उनके ऊपर लगाए गए आरोपों को सच समझ कर उनसे मुह मोड़ लिया था, आज वही देवी समान भाभी तुझे अपने बेटे की तरह प्यार व स्नेह देकर अपने सीने से लगा रखी है। उसके मन में लेश मात्र भी ये ख़याल नहीं है कि तुमने उनके और उनके बच्चों से किस तरह मुह मोड़ लिया था?'

अभय अपनी आत्मा की इन बातों से बहुत ज्यादा दुखी हो गया। उसे खुद से बेहद घृणा सी होने लगी थी।

"मुझे इस प्रकार अपने ममता के आचल में मत छुपाइये भाभी।" अभय गौरी से अलग होकर बोला__"मैं इस लायक नहीं हूॅ। मैं तो वो पापी हूॅ जिसके अपराधों के लिए कोई क्षमा नहीं है। अगर कुछ है तो सिर्फ सज़ा। हाॅ भाभी....मुझे सज़ा दीजिए। मैं आप सबका गुनहगार हूॅ।"

"ये कैसी पागलपन भरी बातें कर रहे हो अभय?" गौरी ने दोनो हाॅथों के बीच अभय का चेहरा लेकर कहा__"किसने कहा तुमसे कि तुमने कोई अपराध किया है? अरे पगले, मैंने तो कभी ये समझा ही नहीं कि तुमने कोई अपराध किया है। और जब मैने ऐसा कुछ समझा ही नहीं तो क्षमा किस बात के लिए? हाॅ ये दुख अवश्य होता था कि जिस अभय को मैं अपने बेटे की तरह मानती थी वह जाने क्यों अपनी भाभी माॅ से अब मिलने नहीं आता? क्या उसकी भाभी माॅ इतनी बुरी बन गई थी कि वो अब मुझसे बात करने की तो बात ही दूर बल्कि नज़र भी ना मिलाए?"

"इसी लिए तो कह रहा हूॅ भाभी।" अभय रो पड़ा__"इसी लिए तो....कि मैं अपराधी हूॅ। मेरा ये अपराध क्षमा के लायक नहीं है। मुझे इसके लिए सज़ा दीजिए।"

"मैंने तुम्हें हमेशा अपना बेटा ही समझा है अभय।" गौरी ने अभय की आॅखों से आॅसू पोंछते हुए कहा__"इस लिए माॅ अपने बेटे की किसी ग़लती को ग़लती नहीं मानती। बल्कि वह तो उसे नादान समझ कर प्यार व स्नेह ही करने लगती है। चलो, अब अंदर चलो।"

गौरी ने ये कह अभय को उसके कंधों से पकड़ कर अंदर की तरफ चल दी। उसके पीछे विराज और निधि भी अपनी अपनी आॅखों से आॅसू पोंछ कर चल दिये।
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"तुम लोग सब के सब एक नम्बर के निकम्मे हो।" उधर हवेली में अजय सिंह फोन पर दहाड़ते हुए कह रहा था__"किसी काम के नहीं हो तुम लोग। पिछले एक महीने से तुम लोग वहाॅ पर केवल मेरे रुपयों पर ऐश फरमा रहे हो। एक अदना सा काम सौंपा था तुम लोगों को और वह भी तुम लोगों से नहीं हुआ। हर बार अपनी नाकामी की दास्तान सुना देते हो तुम लोग।"
"......................।" उधर से कुछ कहा गया।
"कोई ज़रूरत नहीं है।" अजय सिंह गस्से में गरजते हुए बोला__"तुम लोगों के बस का कुछ नहीं है। इस लिए फौरन चले आओ वहाॅ से।"

ये कह कर अजय सिंह ने मारे गुस्से के लैंड लाइन फोन के रिसीवर को केड्रिल पर लगभग पटक सा दिया था। उसके बाद ड्राइंगरूम के फर्स पर बिछे कीमती कालीन को रौंदते हुए आकर वह वहीं सोफे पर धम्म से बैठ गया।

सामने के सोफे पर बैठी प्रतिमा क्रोध और गुस्से में उबलते अपने पति को एकटक देखती रही। इस वक्त कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं हुई थी उसमे। जबकि अजय सिंह का चेहरा गुस्से में तमतमाया हुआ लाल सुर्ख पड़ गया था। कुछ पल शून्य में घूरते हुए वह लम्बी लम्बी साॅसें लेता रहा। उसके बाद उसने कोट की जेब से सिगारकेस निकाला और उससे एक सिगार निकाल कर होठों के बीच दबा कर उसे लाइटर से सुलगाया। दो चार लम्बे लम्बे कश लेने के बाद उसने उसके गाढ़े से धुएॅ को अपने नाक और मुह से निकाला।

"तुझे तो कुत्ते से भी बदतर मौत दूॅगा हरामज़ादे।" सहसा वह दाॅत पीसते हुए कह उठा__"बस एक बार मेरे हाॅथ लग जा तू। उसके बाद देख कि क्या हस्र करता हूॅ तेरा?"

"क्या बात है अजय?" प्रतिमा ने सहसा मौके की नज़ाक़त को देखकर पूछा__"फोन पर क्या बातें बताई तुम्हारे आदमियों ने?"

"सबके सब हरामज़ादे निकम्मे हैं।" अजय सिंह कुढ़ते हुए बोला__"आने दो सालों को एक लाइन से खड़ा करके गोली मारूॅगा मैं"

"अरे पर बात क्या हुई अजय?" प्रतिमा चौंकी थी__"तुम इतना गुस्से में क्यों पगलाए जा रहे हो?"
"तो क्या करूॅ मैं?" अजय सिंह जैसे बिफर ही पड़ा, बोला__"अपने आदमियों की एक और नाकामी की बात सुन कर क्या मैं कत्थक करने लग जाऊॅ?"

"एक और नाकामी???" प्रतिमा उछल सी पड़ी थी, बोली__"ये क्या कह रहे हो तुम?"
"हाॅ प्रतिमा।" अजय सिंह बोला__"फोन पर मेरे आदमियों ने बताया कि अभय उन्हें गच्चा दे गया।"

"गच्चा दे गया??" प्रतिमा ने ना समझने वाले भाव से कहा__"इसका क्या मतलब हुआ?"
"मेरे आदमियों के अनुसार।" अजय सिंह ने कहा__"अभय उन्हें ट्रेन से उतरते हुए दिखा। उसके बाद वह किसी कुली को अपना बैग देकर उसके साथ स्टेशन के बाहर चला गया। बाहर आकर वह एक टैक्सी में बैठा और वहाॅ से आगे बढ़ गया। मेरे आदमी भी उस टैक्सी के पीछे लग गए। लेकिन उसके बाद वो टैक्सी अचानक ही कहीं गायब हो गई। मेरे उन आदमियों ने उस टैक्सी को बहुत ढूॅढ़ा मगर कहीं उसका पता नहीं चल सका।"

"ये तो बड़ी ही अजीब बात है।" प्रतिमा ने हैरानी से कहा__"कहीं ऐसा तो नहीं कि अभय को इस बात का शक़ हो गया हो कि कोई उसका पीछा कर रहा है और उसने टैक्सी वाले से कहा हो कि वह पीछा करने वालों को गच्चा दे दे।"

"हो सकता है।" अजय सिंह ने सोचने वाले भाव से कहा__"मेरे आदमी ने बताया कि अभय के पास जब कुली आया तो उनके बीच पता नहीं क्या बातें हुईं थी जिसकी वजह से अभय के चेहरे पर चौंकने वाले भाव उभरे थे। ऐसा लगा जैसे वह किसी बात पर चौका हो और वह उस कुली के साथ जाने के लिए तैयार न हुआ था। लेकिन फिर बाद में वह आसानी से अपना बैग कुली को दे दिया और चुपचाप उसके पीछे पीछे चल भी दिया था। चलते समय भी उसके चेहरे पर गहन सोच व उलझन के भाव थे।"

"हाॅ तो इसमें इतना विचार करने की क्या बात है भला?" प्रतिमा ने कहा__"ऐसा तो होता ही है कि आम तौर पर कुलियों की बात पर यात्री लोग इतनी आसानी से आते नहीं हैं। दूसरी बात अभय की उस समय की मानसिक स्थित भी ऐसी नहीं रही होगी कि वह इस तरह किसी कुली के साथ कहीं चल दे।"

"हो सकता है कि तुम्हारी बात ठीक हो लेकिन।" अजय सिंह बोला__"लेकिन इसमें भी सोचने वाली बात तो है ही कि कुली ने ऐसा क्या कहा कि सुनकर अभय बुरी तरह चौंका था और फिर बाद में रहस्यमय तरीके से उस कुली के साथ चल दिया था? कहने का मतलब ये कि उसकी हर एक्टीविटी रहस्यमय लगी थी।"

"अगर ऐसा है भी तो इसमें हम क्या कर सकते हैं?" प्रतिमा ने कहा__"क्योंकि अभय नाम का पंछी तो आपके आदमियों की आॅखों के सामने से गायब ही हो चुका है अब।"

"ये सब मेरे उन हरामज़ादे आदमियों की वजह से ही हुआ है प्रतिमा। खैर छोड़ो ये सब।" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेकर कहा__"ये बताओ कि तुमने अपना काम कहाॅ तक पहुॅचाया?"

"अ अपना काम??" प्रतिमा ने ना समझने वाले भाव से कहा__"कौन से काम की बात कर रहे हो तुम?"
"तुम अच्छी तरह जानती हो प्रतिमा कि मैं किस काम के बारे में पूछ रहा हूॅ तुमसे?" अजय सिंह का लहजा सहसा पत्थर की तरह कठोर हो गया__"और अगर तुम इस काम में सीरियस नहीं हो तो बता दो मुझे
[color=rgb(0,] अपने तरीके से शिकार करना भली भाॅति आता है मुझे।"[/color]

"ओह तो तुम उस काम के बारे में पूछ रहे हो?" प्रतिमा को जैसे ख़याल आया__"यार तुम तो जानते हो कि ये करना इतना आसान नहीं है। भला मैं कैसे अपनी बेटी से ये कह सकूॅगी कि बेटी अपने बाप के पास जा और उनके नीचे लेट जा। ताकि तेरे मदमस्त यौवन का तेरा बाप भोग कर सके।"

"अच्छी बात है प्रतिमा।" अजय सिंह ने ठंडे स्वर में कहा__"अब तुम कुछ नहीं करोगी। जो भी करुॅगा अब मैं ही करूॅगा।"
"न नहीं नहीं अजय।" प्रतिमा बुरी तरह घबरा गई, बोली__"तुम खुद से कुछ नहीं करोगे। मैं अतिसीघ्र ही अपनी बेटी को तुम्हारे नीचे सुलाने के लिए तैयार कर लूॅगी।"

"अब तुम्हारी इन बातों पर ज़रा भी यकीन नहीं है मुझे।" अजय ने कहा__"बहुत देख ली तुम्हारी कोशिशें। तुमने करुणा के बारे में भी यही कहा था और अब अपनी बेटी के लिए भी यही कह रही हो। तुम्हारी कोशिशों का क्या नतीजा निकलता है ये मैं देख चुका हूॅ। इस लिए अब मैं खुद ये काम करूॅगा और तुम मुझे रोंकने की कोशिश नहीं करोगी।"

"पर अजय ये तुम ठीक...।" प्रतिमा का वाक्य बीच में ही रह गया।
"बस प्रतिमा, अब कुछ नहीं सुनना चाहता हूॅ मैं।" अजय सिंह कह उठा__"अब तुम सिर्फ देखो और उसका मज़ा लो।"

प्रतिमा देखती रह गई अजय को। उसका दिल बुरी तरह घबराहट के कारण धड़कने लगा था। चेहरा अनायास ही किसी भय के कारण पीला पड़ गया था उसका। मन ही मन ईश्वर को याद कर उसने अपनी बेटी की सलामती की दुवा की।


अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,
 
♡ एक नया संसार ♡
अपडेट.........《 27 》

अब तक,,,,,,,

"अच्छी बात है प्रतिमा।" अजय सिंह ने ठंडे स्वर में कहा__"अब तुम कुछ नहीं करोगी। जो भी करुॅगा अब मैं ही करूॅगा।"
"न नहीं नहीं अजय।" प्रतिमा बुरी तरह घबरा गई, बोली__"तुम खुद से कुछ नहीं करोगे। मैं अतिसीघ्र ही अपनी बेटी को तुम्हारे नीचे सुलाने के लिए तैयार कर लूॅगी।"

"अब तुम्हारी इन बातों पर ज़रा भी यकीन नहीं है मुझे।" अजय ने कहा__"बहुत देख ली तुम्हारी कोशिशें। तुमने करुणा के बारे में भी यही कहा था और अब अपनी बेटी के लिए भी यही कह रही हो। तुम्हारी कोशिशों का क्या नतीजा निकलता है ये मैं देख चुका हूॅ। इस लिए अब मैं खुद ये काम करूॅगा और तुम मुझे रोंकने की कोशिश नहीं करोगी।"

"पर अजय ये तुम ठीक...।" प्रतिमा का वाक्य बीच में ही रह गया।
"बस प्रतिमा, अब कुछ नहीं सुनना चाहता हूॅ मैं।" अजय सिंह कह उठा__"अब तुम सिर्फ देखो और उसका मज़ा लो।"

प्रतिमा देखती रह गई अजय को। उसका दिल बुरी तरह घबराहट के कारण धड़कने लगा था। चेहरा अनायास ही किसी भय के कारण पीला पड़ गया था उसका। मन ही मन ईश्वर को याद कर उसने अपनी बेटी की सलामती की दुवा की।
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अब आगे,,,,,,,,

अभय को अपने साथ लिए गौरी ड्राइंग रूम में दाखिल हुई, उसके पीछे पीछे विराज और निधि भी थे। गौरी ने अभय को सोफे पर बैठाया और खुद भी उसी सोफे पर उसके पास बैठ गई। विराज और निधि सामने वाले सोफे पर एक साथ ही बैठ गये।

अभय सिंह का मन बहुत भारी था। उसका सिर अभी भी अपराध बोझ से झुका हुआ था। गौरी इस बात को बखूबी समझती थी, कदाचित इसी लिए उसने बड़े प्यार से अपने एक हाथ से अभय का चेहरा ठुड्डी से पकड़ कर अपनी तरफ किया।

"ये क्या है अभय?" फिर गौरी ने अधीरता से कहा__"इस तरह सिर झुका कर बैठने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम अपने दिलो दिमाग़ से ऐसे विचार निकाल दो जिसकी वजह से तुम्हें ऐसा लगता है कि तुमने कोई अपराध किया है। तुम्हारी जगह कोई दूसरा होता तो वह भी वही करता जो उन हालातों में तुमने किया। इस लिए मैं ये समझती ही नहीं कि तुमने कोई ग़लती की है या कोई अपराध किया है। इस लिए अपने मन से ये ख़याल निकाल दो अभय और अपने दिल का ये बोझ हल्का करो, जो बोझ अपराध बोझ बन कर तुम्हें शान्ति और सुकून नहीं दे पा रहा है।"

"भाभी आप तो महान हैं इस लिए इस सबसे आप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।" अभय ने भारी स्वर में कहा__"किन्तु मैं आप जैसा महान नहीं हूॅ और ना ही मेरा हृदय इतना विशाल है कि उसमें किसी तरह के दुख सहजता से जज़्ब हो सकें। मैं तो बहुत ही छोटी बुद्धि और विचारों वाला हूॅ जिसे कोई भी ब्यक्ति जब चाहे और जैसे भी चाहे अपनी उॅगलियों पर नचा देता है। शायद इसी लिए तो....इसी लिए तो मैं समझ ही नहीं पाया कि कभी कभी जो दिखता है या जो सुनाई देता है वह सिरे से ग़लत भी हो सकता है।"

"ये तुम कैसी बातें कर रहे हो अभय?" गौरी ने दुखी भाव से कहा__"भगवान के लिए ऐसा कुछ मत कहो। अपने अंदर ऐसी ग्लानी मत पैदा करो और ना ही इन सबसे खुद को इस तरह दुखी करो।"

"मुझे कहने दीजिए भाभी।" अभय ने करुण भाव से कहा__"शायद ये सब कहने से मेरे अंदर की पीड़ा में कुछ इज़ाफा हो। आप तो मुझे सज़ा नहीं दे रही हैं तो कम से कम मैं खुद तो अपने आपको सज़ा और तकलीफ़ दे लूॅ। मुझे भी तो इसका एहसास होना चाहिए न भाभी कि जब हृदय को पीड़ा मिलती है तो कैसा लगता है? हमारे अपने जब अपनों को ही ऐसी तक़लीफ़ देते हैं तो उससे हमारी अंतर्आत्मा किस हद तक तड़पती है?"

"नहीं अभय नहीं।" गौरी ने रोते हुए अभय को एक बार फिर से खींच कर खुद से छुपका लिया, बोली__"ऐसी बातें मत करो। मैं नहीं सुन सकती तुम्हारी ये करुण बातें। मैंने तुम्हें अपने बेटे की तरह हमेशा स्नेह दिया है। भला, मैं अपने बेटे को कैसे इस तरह तड़पते हुए देख सकती हूॅ? हर्गिज़ नहीं....।"

देवर भाभी का ये प्यार ये स्नेह ये अपनापन आज ढूॅढ़ने से भी शायद कहीं न मिले। विराज और निधि आॅखों में नीर भरे उन्हें देखे जा रहे थे। कितनी ही देर तक गौरी अभय को खुद से छुपकाए रही। सचमुच इस वक्त ऐसा लग रहा था जैसे अभय दो दो बच्चों का बाप नहीं बल्कि कोई छोटा सा अबोध बालक हो।

"राज।" सहसा गौरी ने विराज की तरफ देख कर कहा__"तुम अपने चाचा जी को उनके रूम में ले जाओ। लम्बे सफर की थकान बहुत होगी। नहा धो कर फ्रेस हो जाएॅगे तो मन हल्का हो जाएगा।"

"जी माॅ।" विराज तुरंत ही सोफे से उठ कर अभय के पास पहुॅच गया। गौरी के ज़ोर देने पर अभय को विराज के साथ कमरे में जाना ही पड़ा। जबकि अभय और विराज के जाने के बाद गौरी उठी और अपनी आॅखों से बहते हुए आॅसुओं को पोंछते हुए किचेन की तरफ बढ़ गई।
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हवेली में डोर बेल की आवाज़ सुनकर प्रतिमा ने जाकर दरवाजा खोला। दरवाजे के बाहर खड़े जिस चेहरे पर उसकी नज़र पड़ी उसे देख कर वह बुरी तरह चौंकी।

"अरे नैना तुम??" प्रतिमा का हैरत में डूबा हुआ स्वर__"आओ आओ अंदर आओ। आज इतने महीनों बाद तुम्हें देख कर मुझे बेहद खुशी हुई।"

दोस्तो ये नैना है....आप सबको तो बताया ही जा चुका है परिवार के सभी सदस्यों के बारे में। फिर भी अगर आप भूल गए हैं तो आप एक बार इस कहानी का पहला अपडेट चेक कर सकते हैं। पहले अपडेट में आपको पता चल जाएगा कि नैना कौन है?

नैना जैसे ही दरवाजे के अंदर आई प्रतिमा ने उसे अपने गले से लगा लिया। प्रतिमा ने महसूस किया कि नैना के हाव भाव बदले हुए हैं। प्रतिमा की बात का उसने मुख से कोई जवाब नहीं दिया था बल्कि वह सिर्फ हल्का सा मुस्कुराई थी। उसकी मुस्कान भी शायद बनावटी ही थी। क्योंकि चेहरे के भाव उसकी मुस्कान से बिलकुल अलग थे।

"दामाद जी कहाॅ हैं?" नैना से अलग होकर प्रतिमा ने दरवाजे के बाहर झाॅकने के बाद पूछा था।
"मैं अकेली ही आई हूॅ भाभी।" नैना ने अजीब भाव से कहा__"सब कुछ छोंड़ कर।"

"क्याऽऽ???" नैना की बात सुनकर प्रतिमा ने चौंकते हुए कहा__"सब कुछ छोंड़ कर से क्या मतलब है तुम्हारा??
"मैंने आदित्य को तलाक दे दिया है।" नैना ने कठोरता से कहा__"अब उससे और उसके घर वालों से मेरा कोई रिश्ता नहीं रहा।"

"त तलाऽऽक????" प्रतिमा बुरी तरह उछल पड़ी__"ये क्या कह रही हो तुम?"
"हाॅ भाभी।" नैना ने कहा__"मैने उस बेवफा को तलाक दे दिया है, और उससे सारे रिश्ते नाते तोड़ कर वापस अपने माॅ बाप व भइया भाभी के पास आ गई हूॅ।"

प्रतिमा की अजीब हालत हो गई उसकी बातें सुनकर। हैरत व अविश्वास से मुह फाड़े वह अपनी छोटी ननद नैना को अपलक देखे जा रही थी। फिर सहसा उसकी तंद्रा तब भंग हुई जब उसके कानों में अंदर से आई उसके पति अजय की आवाज़ गूॅजी। अंदर से अजय सिंह ने आवाज़ लगा कर पूछा था कि कौन आया है बाहर?

अजय सिंह की आवाज़ से प्रतिमा को होश आया जबकि नैना अपने हाॅथ में पकड़ा हुआ बड़ा सा बैग वहीं छोंड़ कर अंदर की तरफ भागी। नैना को इस तरह भागते देख प्रतिमा चौंकी फिर पलट कर पहले दरवाजे को बंद किया उसके बाद नैना के बैग को उठा अंदर की तरफ बढ़ गई।

उधर भागते हुए नैना ड्राइंग रूम में पहुॅची। उसी समय अजय सिंह भी अपने कमरे से इधर ही आता दिखा। नैना अपने बड़े भाई को देख एक पल को ठिठकी फिर तेज़ी से दौड़ती हुई जा कर अजय सिंह से लिपट गई।

"भइयाऽऽ।" नैना अजय से लिपट कर बुरी तरह रोने लगी थी। अजय सिंह उसे इस तरह देख पहले तो चौंका फिर उसे अपनी बाॅहों में ले प्यार व स्नेह से उसके सिर व पीठ पर हाॅथ फेरने लगा।

"अरे क्या हुआ तुझे?" अजय सिंह उसकी पीठ को सहलाते हुए बोला__"इस तरह क्यों रोये जा रही है तू?"

अजय सिंह के इस सवाल का नैना ने कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि वह ज़ार ज़ार वैसी ही रोती रही। नैना अपने भाई के सीने से कस के लगी हुई थी। ऐसा लगता था जैसे उसे इस बात का अंदेशा था कि अगर वह अपने भाई से अलग हो जाएगी तो कयामत आ जाएगी।

प्रतिमा भी तब तक पहुॅच गई थी। अपने भाई से लिपटी अपनी ननद को इस तरह रोते देख उसकी आॅखों में भी पानी आ गया। काफी देर तक यही आलम रहा। अजय सिंह ने उसे बड़ी मुश्किल से चुप कराया। फिर उसे उसके कंधे से पकड़ कर चलते हुए आया और उसे सोफे पर आराम से बैठा कर खुद भी उसके पास ही बैठ गया।

"प्रतिमा दामाद जी कहाॅ हैं?" फिर अजय ने प्रतिमा की तरफ देखते हुए पूछा__"उन्हें अपने साथ अंदर क्यों नहीं लाई तुम?"
"दामाद जी नहीं आए अजय।" प्रतिमा ने गंभीरता से कहा__"नैना अकेली ही आई है।"

"क्या???" अजय चौंका__"लेकिन क्यों? दामाद जी साथ क्यों नहीं आए? मेरी फूल जैसी बहन को अकेली कैसे आने दिया उन्होंने? रुको मैं अभी बात करता हू उनसे।"

"अब फोन करने की कोई ज़रूरत नहीं है अजय।" प्रतिमा ने कहा__"नैना अब हमारे पास ही रहेगी....।"
"हमारे पास ही रहेगी??" अजय चकराया, बोला__"इसका क्या मतलब हुआ भला?"

"वो...वो नैना ने दामाद जी को तलाक दे दिया है।" प्रतिमा ने धड़कते दिल के साथ कहा__"इस लिए अब ये यहीं रहेंगी।"
"व्हाऽऽट???" अजय सिंह सोफे पर बैठा हुआ इस तरह उछल पड़ा था जैसे उसके पिछवाड़े के नीचे सोफे का वह हिस्सा अचानक ही किसी बड़ी सी नोंकदार सुई में बदल गया हो, बोला__"ये सब क्या...ये तुम क्या कह रही हो प्रतिमा? नैना ने दामाद जी को तलाक दे दिया है? अरे लेकिन क्यों??"

प्रतिमा के कुछ बोलने से पहले ही नैना एक झटके से उठी और रोते हुए अंदर की तरफ भाग गई। अजय सिंह मूर्खों की तरह उसे जाते देखता रहा।

"प्रतिमा सच सच बताओ।" फिर अजय ने उद्दिग्नता से कहा__"आख़िर ऐसी क्या बात हो गई है जिसकी वजह से नैना ने दामाद जी को तलाक दे दिया है?"

"सारी बातें मुझे भी नहीं पता अजय।" प्रतिमा ने कहा__"नैना ने अभी कुछ भी नहीं बताया है इस बारे में।"
"उससे पूछो प्रतिमा।" अजय सिंह ने कहा__"उससे पूछो कि क्या मैटर है? उसने अपने पति को किस बात पर तलाक दे दिया है?"

"ठीक है मैं बात करती हूॅ उससे।" प्रतिमा कहने के साथ ही उठ कर उस दिशा की तरफ बढ़ गई जिधर नैना गई थी। जबकि अजय सिंह किसी गहरी सोच में डूबा नज़र आने लगा था।
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"मिस्टर चौहान।" हास्पिटल की गैलरी पर दीवार से सटी बेंच पर बैठे एक ऐसे शख्स के कानों से ये वाक्य टकराया जिसके चेहरे पर इस वक्त गहन परेशानी व दुख के भाव थे। उसने सिर उठा कर देखा। उसके सामने एक डाक्टर खड़ा उसी की तरफ संजीदगी से देख रहा था।

"मिस्टर चौहान।" डाक्टर ने कहा__"प्लीज आप मेरे साथ आइए। मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बातें करनी है।"
"डाक्टर मेरी बेटी कैसी है अब?" बेन्च से एक ही झटके में उठते हुए उस शख्स ने हड़बड़ाहट से पूछा था__"वो अब ठीक तो है ना?"

"अब वो बिलकुल ठीक है मिस्टर चौहान लेकिन।" डाक्टर का वाक्य अधूरा रह गया।
"ल लेकिन क्या डाक्टर?" शख्स ने असमंजस से पूछा।

"आप प्लीज़ मेरे साथ आइए।" डाक्टर ने ज़ोर देकर कहा__"मुझे आपसे अकेले में बात करनी है। प्लीज़ कम हेयर...।"

कहने के साथ ही डाक्टर एक तरफ बढ़ गया। उसे जाते देख वो शख्स भी तेज़ी से उसके पीछे लपका। चेहरे पर हज़ारों तरह के भाव एक पल में ही गर्दिश करते नज़र आने लगे थे उसके। कुछ ही देर में डाक्टर के पीछे पीछे वह उसके केबिन में पहुॅचा।

"मिस्टर चौहान।" डाक्टर अपनी चेयर के पास पहुॅच कर तथा अपने सामने बड़ी सी टेबल के पार रखीं चेयर की तरफ हाथ के इशारे के साथ कहा__"हैव ए सीट प्लीज़।"

डाक्टर के कहने पर वो शख्स जिसे डाक्टर उसके सर नेम से संबोधित कर रहा था किसी यंत्रचालित सा आगे बढ़ा और एक हाथ से चेयर को पीछे कर उसमें बैठ गया। उसके बैठ जाने के बाद केबिन में दोनो के बीच कुछ देर के लिए ख़ामोशी छाई रही।

"कहो डाक्टर।" फिर खामोशी को चीरते हुए उस शख्स ने भारी स्वर में कहा__"क्या ज़रूरी बातें करनी थी आपको?"
"मिस्टर चौहान।" डाक्टर ने भूमिका बनाते हुए किन्तु संतुलित लहजे में कहा__"मैं चाहता हूॅ कि आप मेरी बातों को शान्ती और बड़े धैर्य के साथ सुनें।"

"आख़िर बात क्या है डाक्टर?" शख्स ने सहसा अंजाने भय से घबरा कर कहा था, बोला__"मुझे पता है कि मेरी बेटी के साथ किसी ने रेप किया है जिसकी वजह से उसकी आज ये हालत है। मैं धरती आसमान एक कर दूॅगा उस हरामज़ादे को ढूढ़ने में जिसने मेरी बेटी को आज इस हालत में पहुॅचाया है। उसे ऐसी मौत दूॅगा कि फरिश्ते भी देख कर थर थर काॅपेंगे।"

"प्लीज़ कंट्रोल योरसेल्फ मिस्टर चौहान प्लीज।" डाक्टर ने कहा__"आपको इसके आगे जो भी करना हो आप करते रहियेगा, लेकिन उसके पहले शान्ती और धैर्य के साथ आप मेरी बातें सुन लीजिए।"

"ठीक है कहिए।" उस शख्स ने गहरी साॅस ली।
"ये तो आप जानते ही हैं कि आपकी बेटी के साथ क्या हुआ है।" डाक्टर ने कहा__"पर ये आधा सच है।"
"क्या मतलब?" चौहान चौंका।

"आपकी बेटी के साथ एक से ज्यादा लोगों ने रेप की वारदात को अंजाम दिया है?" डाक्टर ने संजीदगी से कहा__"उसने खुद शराब पी थी या फिर उसे पिलाई गई थी। ऐसी शराब जिसमें ड्रग्स मिला हुआ था। इससे यही साबित होता है कि ये सब जिन लोगों ने भी किया है पहले से ही सोच समझकर किया है।"

"ये आप क्या कह रहे हैं डाक्टर?" चौहान की हालत खराब थी, बोला__"मेरी बेटी के साथ इतना कुछ किया उन हरामज़ादों ने।"
"ये सब तो कुछ भी नहीं है।" डाक्टर ने गंभीरता से कहा__"बल्कि अब जो बात मैं आपको बताना चाहता हूॅ वो बहुत ही गंभीर बात है। मैं चाहता हूॅ कि आप मेरी उस बात को सुनकर अपना धैर्य नहीं खोएंगे।"

"आख़िर ऐसी क्या बात है डाक्टर?" चौहान हतोत्साहित सा बोला__"क्या कहना चाहते हैं आप? साफ साफ बताओ क्या बात है?"

"आपकी बेटी प्रेग्नेन्ट है।" डाक्टर ने मानो धमाका सा किया था__"वह भी दो महीने की।"
"क्याऽऽ????" चेयर पर बैठा चौहान ये सुन कर उछल पड़ा था, बोला__"ये आप क्या कह रहे हैं डाक्टर? ऐसा कैसे हो सकता है?"

"इस बारे में भला मैं कैसे बता सकता हूॅ मिस्टर चौहान?" डाक्टर ने कहा__"ये तो आपकी बेटी को ही पता होगा। मैंने तो आपको वही बताया है जो आपकी बेटी की जाॅच से हमें पता चला है।"

चौहान भौचक्का सा डाक्टर को देखता रह गया था। उसके दिलो दिमाग़ में अभी तक धमाके हो रहे थे। असहाय अवस्था में बैठा रह गया था वह।

तभी केबिन का गेट खुला और एक नर्स अंदर दाखिल हुई।
"सर वो पुलिस बाहर आपका इन्तज़ार कर रही है।" नर्स ने डाक्टर की तरफ देख कर कहा था।

"ठीक है हम आते हैं।" डाक्टर ने उससे कहा फिर चौहान की तरफ देख कर कहा__"मिस्टर चौहान आइए चलते हैं।"

उसके बाद दोनो केबिन के बाहर आ गए। चौहान के चेहरे से ही लग रहा था कि वह दुखी है, किन्तु अपने इस दुख को वह जज़्ब करने की कोशिश कर रहा था।

बाहर गैलरी में आते ही डाक्टर को पुलिस के कुछ शिपाही दिखाई दिये। वह चौहान के साथ चलता हुआ रिसेशन पर पहुॅचा। जहाॅ पर इंस्पेक्टर की वर्दी में रितू खड़ी थी। सिर पर पी-कैप व दाहिने हाॅथ में पुलिसिया रुल था जिसे वह कुछ पलों के अन्तराल में अपनी बाॅई हथेली पर हल्के से मार रही थी।

"हैलो इंस्पेक्टर।" डाक्टर रितू के पास पहुॅचते ही बोला था।
"क्या उस लड़की को होश आ गया डाक्टर?" रितू ने पुलिसिया अंदाज़ में पूछा__"मुझे उसका स्टेटमेन्ट लेना है।"

"मिस रितू।" डाक्टर ने कहा__"बस कुछ ही समय में उसे होश आ जाएगा फिर आप उसका बयान ले सकती हैं।" डाक्टर ने कहने के साथ ही चौहान की तरफ इशारा करते हुए कहा__"ये उस लड़की के पिता हैं। मिस्टर शैलेन्द्र चौहान।"

"ओह आई सी।" रितू ने चौहान की तरफ देखते हुए कहा__"मुझे दुख है अंकल कि आपकी बेटी के साथ ऐसा हादसा हुआ?"
"सब भाग्य की बातें हैं बेटा।" चौहान ने हारे हुए खिलाड़ी की तरह बोला__"हम चाहे सारी ऊम्र सबके साथ अच्छा करते रहें और सबका अच्छा भला सोचते रहें लेकिन हमें हमारे भाग्य से जो मिलना होता है वो मिल ही जाता है।"

"हाॅ ये तो है अंकल।" रितू ने कहा__"ख़ैर, आपकी बेटी का ये केस फाइल हो चुका है, बस आपके साइन की ज़रूरत है। लड़की के बयान के बाद पुलिस इस केस को अच्छी तरह देख लेगी। जिसने भी इस घिनौने काम को अंजाम दिया है उसको बहुत जल्द जेल की सलाखों के पीछे अधमरी अवस्था में पाएंगे आप।"

"उससे क्या होगा बेटी?" चौहान ने गंभीरता से कहा__"क्या वो सब वापस हो जाएगा जो लुट गया या बरबाद हो गया है?"
"आप ये कैसी बातें कर रहे हैं अंकल?" रितू ने हैरत से कहा__"क्या आप नहीं चाहते कि जिसने भी आपकी बेटी के साथ ये किया है उसे कानून के द्वारा शख्त से शख्त सज़ा मिले?"

"उसे कानून नहीं।" चौहान के चेहरे पर अचानक ही हाहाकारी भाव उभरे__"उसे मैं खुद अपने हाथों से सज़ा दूॅगा। तभी मेरी और मेरी बेटी की आत्मा को शान्ती मिलेगी।"

"तो क्या आप कानून को हाथ में लेंगे?" रितू ने कहा__"नहीं अंकल, ये पुलिस केस है और उसे कानूनन ही सज़ा प्राप्त होगी।"
"तुम अपना काम करो बेटी।" चौहान ने कहा__"और मुझे मेरा काम अपने तरीके से करना है।"

तभी वहाॅ पर एक नर्स आई। उसने बताया कि उस लड़की को होश आ गया है और उसे दूसरे रूम में शिफ्ट कर दिया गया है। नर्स की बात सुनकर डाक्टर ने रितू को उससे बयान लेने की परमीशन दी किन्तु ये भी कहा कि पेशेन्ट को ज्यादा किसी बात के लिए मजबूर न करें। चौहान साथ में जाना चाहता था किन्तु रितू ने ये कह कर उसे रोंक लिया कि ये पुलिस केस है इस लिए पहले पुलिस उससे मिलेगी और उसका बयान लेगी।

इंस्पेक्टर रितू अपने साथ एक महिला शिपाही को लिए उस कमरे में पहुॅची जिस कमरे में उस लड़की को शिफ्ट किया गया था। डाक्टर खुद भी साथ आया था। किन्तु फिर एक नर्स को कमरे में छोंड़ कर वह बाहर चला गया था।

हास्पिटल वाले बेड पर लेटी वह लड़की आॅखें बंद किये लेटी थी। ये अलग बात है कि उसकी बंद आॅखों की कोरों से आॅसूॅ की धार सी बहती दिख रही थी। उसके शरीर का गले से नीचे का सारा हिस्सा एक चादर से ढ्का हुआ था। कमरे में कुछ लोगों के आने की आहट से भी उसने अपनी आॅखें नहीं खोली थी। बल्कि उसी तरह पुर्वत् लेटी रही थी वह।

"अब कैसी तबियत है तुम्हारी?" रितू उसके करीब ही एक स्टूल पर बैठती हुई बोली थी। उसके इस प्रकार पूॅछने पर लड़की ने अपनी आॅखें खोली और रितू की तरफ चेहरा मोड़ कर देखा उसे। रितू पर नज़र पड़ते ही उसकी आॅखों में हैरत के भाव उभरे। ये बात रितू ने भी महसूस की थी।

"अब कैसा फील कर रही हो?" रितु ने पुनः उसकी तरफ देख कर किन्तु इस बार हल्के से मुस्कुराते हुए पूछा__"अगर अच्छा फील कर रही हो तो अच्छी बात है। मुझे तुमसे इस वारदात के बारे में कुछ पूछताॅछ करनी है। लेकिन उससे पहले मैं तुम्हें ये बता दूॅ कि तुम्हें मुझसे भयभीत होने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं भी तुम्हारी तरह एक लड़की ही हूॅ और हाॅ तुम मुझे अपनी दोस्त समझ सकती हो, ठीक है ना?"

लड़की के चेहरे पर कई सारे भाव आए और चले भी गए। उसने रितू की बातों का अपनी पलकों को झपका कर जवाब दिया।

"ओके, तो अब तुम मुझे सबसे पहले अपना नाम बताओ।" रितू ने मुस्कुरा कर कहा।
"वि वि...विधी।" उस लड़की के थरथराते होठों से आवाज़ आई।

उसका नाम सुन कर रितू को झटका सा लगा। मस्तिष्क में जैसे बम्ब सा फटा था। चेहरे पर एक ही पल में कई तरह के भाव आए और फिर लुप्त हो गए। रितू ने सीघ्र ही खुद को नार्मल कर लिया।

"ओह....कितना खूबसूरत सा नाम है तुम्हारा।" रितू ने कहा। उसके दिमाग़ में कुछ और ही ख़याल था, बोली__"विधी...विधी चौहान, राइट?"

लड़की की आॅखों में एक बार पुनः चौंकने के भाव आए थे। एकाएक ही उसका चेहरा सफेद फक्क सा पड़ गया था। चेहरे पर घबराहट के चिन्ह नज़र आए। उसने अपनी गर्दन को दूसरी तरफ मोड़ लिया।

"तो विधी।" रितू ने कहा__"अब तुम मुझे बेझिझक बताओ कि क्या हुआ था तुम्हारे साथ?"

रितू की बात पर विधी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वह दूसरी तरफ मुह किये लेटी रही। जबकि उसकी ख़ामोशी को देख कर रितू ने कहा__"देखो ये ग़लत बात है विधी। अगर तुम कुछ बताओगी नहीं तो मैं कैसे उस अपराधी को सज़ा दिला पाऊॅगी जिसने तुम्हारी यानी मेरी दोस्त की ऐसी हालत की है? इस लिए बताओ मुझे....सारी बातें विस्तार से बताओ कि क्या और कैसे हुआ था?"

"मु मुझे कुछ नहीं पता।" विधी ने दूसरी तरफ मुह किये हुए ही कहा__"मैं नहीं जानती कि किसने कब कैसे मेरे साथ ये सब किया?"
"तुम झूॅठ बोल रही विधी।" रितू की आवाज़ सहसा तेज़ हो गई__"भला ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम्हारे साथ इतना कुछ हुआ और तुम्हें इस सबके बारे में थोड़ा सा भी पता न हुआ हो?"

"भला मैं झूॅठ क्यों बोलूॅगी आपसे?" विधी ने इस बार रितू की तरफ पलट कर कहा था।
"हाॅ लेकिन सच भी तो नहीं बोल रही हो तुम?" रितू ने कहा__"आख़िर वो सब बताने में परेशानी क्या है? देखो अगर तुम नहीं बताओगी तो सच जानने के लिए पुलिस के पास और भी तरीके हैं। कहने का मतलब ये कि, हम ये पता लगा ही लेंगे कि तुम्हारे साथ ये सब किसने किया है?"

बेड पर लेटी विधी के चेहरे पर असमंजस व बेचैनी के भाव उभरे। कदाचित् समझ नहीं पा रही थी कि वह रितू की बातों का क्या और कैसे जवाब दे?

"तुम्हारे चेहरे के भाव बता रहे हैं विधी कि तुम मेरे सवालों से बेचैन हो गई हो।" रितू ने कहा__"तुम जानती हो कि तुम्हारे साथ ये सब किसने किया है। लेकिन बताने में शायद डर रही हो या फिर हिचकिचा रही हो।"

विधी ने कमरे में मौजूद लेडी शिपाही व नर्स की तरफ एक एक दृष्टि डाली फिर वापस रितू की तरफ दयनीय भाव से देखने लगी। रितू को उसका आशय समझते देर न लगी। उसने तुरंत ही लेडी शिपाही व नर्स को बाहर जाने का इशारा किया। नर्स ने बाहर जाते हुए इतना ही कहा कि पेशेन्ट को किसी बात के लिए ज्यादा मजबूर मत कीजिएगा क्योंकि इससे उसके दिलो दिमाग़ पर बुरा असर पड़ सकता है। नर्स तथा लेडी शिपाही के बाहर जाने के बाद रितू ने पलट कर विधी की तरफ देखा।

"देखो विधी, अब इस कमरे में हम दोनो के सिवा दूसरा कोई नहीं है।" रितू ने प्यार भरे लहजे से कहा__"अब तुम मुझे यानी अपनी दोस्त को बता सकती हो कि ये सब तुम्हारे साथ कब और किसने किया है?"

"क..क कल मैं अपने एक दोस्त की बर्थडे पार्टी में गई थी।" विधी ने मानो कहना शुरू किया, उसकी आवाज़ में लड़खड़ाहट थी__"वहाॅ पर हमारे काॅलेज की कुछ और लड़कियाॅ थी जो हमारे ही ग्रुप की फ्रैण्ड्स थी और साथ में कुछ लड़के भी। पार्टी में सब एंज्वाय कर रहे थे। मेरी दोस्त परिधि ने मनोरंजन का सारा एरेन्जमेन्ट किया हुआ था। जिसमें बियर और शराब भी थी। दोस्त के ज़ोर देने पर मैंने थोड़ा बहुत बियर पिया था। लेकिन मुझे याद है कि उस बियर से मैने अपना होश नहीं खोया था। हम सब डान्स कर रहे थे, तभी मेरी एक फ्रैण्ड ने मेरे हाॅथ में काॅच का प्याला पकड़ाया और मस्ती के ही मूड में मुझे पीने का इशारा किया। मैंने भी मुस्कुरा कर उसके दिये हुए प्याले को अपने मुह से लगा लिया और उसे धीरे धीरे करके पीने लगी। किन्तु इस बार इसका टेस्ट पहले वाले से अलग था। फिर भी मैंने उसे पी लिया। कुछ ही देर बाद मेरा सर भारी होने लगा। वहाॅ की हर चीज़ मुझे धुंधली सी दिखने लगी थी। उसके बाद मुझे नहीं पता कि किसने मेरे साथ क्या किया? हाॅ बेहोशी में मुझे असह पीड़ा का एहसास ज़रूर हो रहा था, इसके सिवा कुछ नहीं। जब मुझे होश आया तो मैंने अपने आपको यहाॅ हास्पिटल में पाया। मुझे नहीं पता कि यहाॅ पर मैं कैसे आई? लेकिन इतना जान चुकी हूॅ कि मेरा सबकुछ लुट चुका है, मैं किसी को मुह दिखाने के काबिल नहीं रही।"

इतना सब कहने के साथ ही विधी बेड पर पड़े ही ज़ार ज़ार रोने लगी थी। उसकी आॅखों से आॅसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। इंस्पेक्टर रितू उसकी बात सुनकर पहले तो हैरान रही फिर उसने उसे बड़ी मुश्किल से शान्त कराया।

"तुम्हें यहाॅ पर मैं लेकर आई थी विधी।" रितू ने गंभीरता से कहा__"पुलिस थाने में किसी अंजान ब्यक्ति ने फोन करके हमें सूचित कर बताया कि शहर से बाहर मेन सड़क के नीचे कुछ दूरी पर एक लड़की बहुत ही गंभीर हालत में पड़ी है। वो जगह हल्दीपुर की अंतिम सीमा के पास थी, जहाॅ से हम तुम्हें उठा कर यहाॅ हास्पिटल लाए थे।"

"ये आपने अच्छा नहीं किया।" विधी ने सिसकते हुए कहा__"उस हालत में मुझे वहीं पर मर जाने दिया होता। कम से कम उस सूरत में मुझे किसी के सामने अपना मुह तो न दिखाना पड़ता। मेरे घर वाले, मेरे माता पिता को मुझे देख कर शर्म से अपना चेहरा तो न झुका लेना पड़ता।"

"देखो विधी।" रितू ने समझाने वाले भाव से कहा__"इस सबमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है और ये बात तुम्हारे पैरेन्ट्स भी जानते और समझते हैं। ग़लती जिनकी है उन्हें इस सबकी शख्त से शख्त सज़ा मिलेगी। तुम्हारे साथ ये अत्याचार करने वालों को मैं कानून की सलाखों के पीछे जल्द ही पहुचाऊॅगी।"

विधी कुछ न बोली। वह बस अपनी आॅखों में नीर भरे देखती रही रितू को। जबकि,,

"अच्छा ये बताओ कि तुम्हारी दोस्त की पार्टी में उस वक्त कौन कौन मौजूद था जिनके बारे में तुम जानती हो?" रितू ने पूछा__"साथ ही ये भी बताओ कि तुम्हें उनमें से किन पर ये शक़ है कि उन्होने तुम्हारे साथ ऐसा किया हो सकता है? तुम बेझिझक होकर मुझे उन सबका नाम पता बताओ।"

विधी कुछ देर सोचती रही फिर उसने पार्टी में मौजूद कुछ लड़के लड़कियों के बारे में रितू को बता दिया। रितू ने एक काग़ज पर उन सबका नाम पता लिख लिया। उसके बाद कुछ और पूछताछ करने के बाद रितू कमरे से बाहर आ गई।

रितू को डाक्टर ने बताया कि वो लड़की दो महीने की प्रैग्नेन्ट है। ये सुन कर रितू बुरी तरह चौंकी थी। हलाॅकि मिस्टर चौहान ने डाक्टर को मना किया था कि ये बात वह किसी को न बताए। किन्तु डाक्टर ने अपना फर्ज़ समझ कर पुलिस के रूप में रितू को बता दिया था।

रितू ने मिस्टर चौहान को एक बार थाने में आने का कह कर हास्पिटल से निकल गई थी। उसके मस्तिष्क में एक ही ख़याल उछल कूद मचा रहा था कि 'क्या ये वही विधी है जिसे विराज प्यार करता था'???? रितू ने कभी विधी को देखा नहीं था, और नाही उसके बारे में उसके भाई विराज ने कभी बताया था। उसे तो बस कहीं से ये पता चला था कि उसका भाई विराज किसी विधी नाम की लड़की से प्यार करता है। इस लिए आज जब उसने उस लड़की के मुख से उसका नाम विधी सुना तो उसके दिमाग़ में तुरंत ही उस विधी का ख़याल आ गया जिस विधी नाम की लड़की से उसका भाई प्यार करता है। रितु के मन में पहले ये विचार ज़रूर आया कि वह एक बार उससे ये जानने की कोशिश करे कि क्या वह विराज को जानती है? लेकिन फिर उसने तुरंत ही अपने मन में आए इस विचार के तहत उससे इस बारे में पूछने का ख़याल निकाल दिया। उसे लगा ये वक्त अभी इसके लिए सही नहीं है।
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रात में डिनर करने के बाद एक बार फिर से सब ड्राइंग रूम में एकत्रित हुए। अभय किसी सोच में डूबा हुआ था। गौरी ने उसे सोच में डूबा देख कर कहा__"करुणा और बच्चे कैसे हैं अभय?"

"आं..हाॅ सब ठीक हैं भाभी।" अभय ने चौंकते हुए कहा था।
"शगुन कैसा है?" गौरी ने पूछा__"क्या अभी भी वैसी ही शरारतें करता है वह? करुणा तो उसकी शरारतों से परेशान हो जाती होगी न? और...और मेरी बेटी दिव्या कैसी है...उसकी पढ़ाई कैसी चल रही है?"

"सब अच्छे हैं भाभी।" अभय ने नज़रें चुराते हुए कहा__"दिव्या की पढ़ाई भी अच्छी चल रही है।"
"क्या बात है?" गौरी उसे नज़रें चुराते देख चौंकी__"तुम मुझसे क्या छुपा रहे हो अभय? घर में सब ठीक तो हैं ना? मुझे बताओ अभय....मेरा दिल घबराने लगा है।"

"कोई ठीक नहीं है भाभी कोई भी।" अभय के अंदर से मानो गुबार फट पड़ा__"हवेली में कोई भी ठीक नहीं हैं। करुणा और बच्चों को मैं करुणा के मायके भेज कर ही यहाॅ आया हूॅ। इस समय घर के हालात बहुत ख़राब हैं भाभी। किसी पर भरोसा करने लायक नहीं रहा अब।"

"आख़िर हुआ क्या है अभय?" गौरी के चेहरे पर चिन्ता के भाव उभर आए__"साफ साफ बताते क्यों नहीं?"

सामने सोफे पर बैठे विराज और निधि भी परेशान हो उठे थे। दिल किसी अंजानी आशंकाओं से धड़कने लगा था उनका।

"क्या बताऊॅ भाभी?" अभय ने असहज भाव से कहा__"मुझे तो बताने में भी आपसे शरम आती है।"
"क्या मतलब?" गौरी ही नहीं बल्कि अभय की इस बात से विराज और निधि भी बुरी तरह चौंके थे।

"एक दिन की बात है।" फिर अभय कहता चला गया। उसने वो सारी बातें बताई जो शिवा ने किया था। उसने बताया कि कैसे शिवा उसके न रहने पर उसके घर आया था और अपनी चाची को बाथरूम में नहाते देखने की कोशिश कर रहा था। इस सबके बाद कैसे करुणा ने आत्म हत्या करने की कोशिश की थी। अभय ये सब बताए जा रहा था और बाॅकी सब आश्चर्य से मुह फाड़े सुनते जा रहे थे।

"हे भगवान।" गौरी ने रोते हुए कहा__"ये सब क्या हो गया? मेरी फूल सी बहन को भी नहीं बक्शा उस नासपीटे ने।"
"ये तो कुछ भी नहीं है भाभी।" अभय ने भारी स्वर में कहा__"उस हरामज़ादे ने तो आपकी बेटी दिव्या पर भी अपनी गंदी नज़रें डालने में कोई संकोच नहीं किया।"

"क्या?????" गौरी उछल पड़ी।
"हाॅ भाभी।" अभय ने कहा__"ये बात खुद दिव्या ने मुझे बताई थी।"
"जैसे माॅ बाप हैं वैसा ही तो बेटा होगा।" गौरी ने कहा__"माॅ बाप खुद ही अपने बेटे को इस राह पर चलने की शह दे रहे हैं अभय।"

"क्या मतलब?" इस बार बुरी तरह उछलने की बारी अभय की थी, बोला__"ये आप क्या कह रही हैं?"
"यही सच है अभय।" गौरी ने गंभीरता से कहा__"आपके बड़े भाई साहब और भाभी बहुत ही शातिर और घटिया किस्म के हैं। तुम उनके बारे में कुछ नहीं जानते। लेकिन मैं और माॅ बाबू जी उनके बारे में अच्छी तरह जानते हैं। तुम्हें तो वही बताया और दिखाया गया जो उन्होंने गढ़ कर तुम्हें दिखाना था। ताकि तुम उनके खिलाफ न जा सको।"

"उस हादसे के बाद से मुझे भी ऐसा ही कुछ लगने लगा है भाभी।" अभय ने बुझे स्वर में कहा__"उस हादसे ने मेरी आॅखें खोल दी। तथा मुझे इस सबके बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। इसी लिए तो मैं सारी बातों को जानने के लिए आप सबके पास आया हूॅ। मुझे दुख है कि मैंने सारी बातें पहले ही आप सबसे जानने की कोशिश क्यों नहीं की? अगर ये सब मैने पहले ही पता कर लिया होता तो आप सबको इतनी तक़लीफ़ें नहीं सहनी पड़ती। मैं आप सबके लिए बड़े भइया भाभी से लड़ता और उन्हें उनके इस कृत्य की सज़ा भी देता।"

"तुम उनका कुछ भी न कर पाते अभय।" गौरी ने कहा__"बल्कि अगर तुम उनके रास्ते का काॅटा बनने की कोशिश करते तो वो तुम्हें भी उसी तरह अपने रास्ते से हमेशा हमेशा के लिए हटा देते जैसे उन्होंने राज के पिता को हटा दिया था।"

"क्या???????" अभय बुरी तरह उछला था, बोला__"मॅझले भइया को.....???"
"हाॅ अभय।" गौरी की आॅखें छलक पड़ी__"तुम सब यही समझते हो कि तुम्हारे मॅझले भइया की मौत खेतों में सर्प के काटने से हुई थी। ये सच है लेकिन ये सब सोच समझ कर किया गया था। वरना ये बताओ कि खेत पर बने मकान के कमरे में कोई सर्प कहाॅ से आ जाता और उन्हें डस कर मौत दे देता? सच तो ये है कि कमरे में लेटे तुम्हारे भइया को सर्प से कटाया गया और जब वो मृत्यु को प्राप्त हो गए तो उन्हें कमरे से उठा कर खेतों के बीच उस जगह डाल दिया गया जिस जगह खेत में पानी लगाया जा रहा था। ये सब इस लिए किया गया ताकि सबको यही लगे कि खेतों में पानी लगाते समय ही तुम्हारे भइया को किसी ज़हरीले सर्प ने काटा और वहीं पर उनकी मृत्यु हो गई।"

"हे भगवान।" अभय अपने दोनो हाथों को सिर पर रख कर रो पड़ा__"मेरे देवता जैसे भाई को इन अधर्मियों ने इस तरह मार दिया था। नहीं छोंड़ूॅगा....ज़िंदा नहीं छोड़ूॅगा उन लोगों को मैं।"

"नहीं अभय।" गौरी ने कहा__"उन्हें उनके कुकर्मों की सज़ा ज़रूर मिलेगी।"
"पर ये सब आपको कैसे पता भाभी कि मॅझले भइया को इन लोगों ने ही सर्प से कटवा कर मारा था?" अभय ने पूछा__"और वो सब भी बताइए भाभी जो इन लोगों ने आपके साथ किया है? मैं जानना चाहता हूॅ कि इन लोगों ने मेरे देवी देवता जैसे भइया भाभी पर क्या क्या अनाचार किये हैं? मैं जानना चाहता हूॅ कि शेर की खाल ओढ़े इन भेड़ियों का सच क्या है?"

"मैं जानती हूॅ कि तुम जाने बग़ैर रहोगे नहीं अभय।" गौरी ने गहरी साॅस ली__"और तुम्हें जानना भी चाहिए। आख़िर हक़ है तुम्हारा।"
"तो फिर बताइए भाभी।" अभय ने उत्सुकता से कहा__"मुझे इन लोगों का घिनौना सच सुनना है।"

अभय की बात सुन कर गौरी ने एक गहरी साॅस ली। उसके चेहरे पर अनायास ही ऐसे भाव उभर आए थे जैसे अपने आपको इस परिस्थिति के लिए तैयार कर रही हो।
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प्रतिमा हवेली में ऊपरी हिस्से पर बने उस कमरे में पहुॅची जिस कमरे के बेड पर इस वक्त नैना औंधी पड़ी सिसकियाॅ ले लेकर रोये जा रही थी। प्रतिमा उसे इस तरह रोते देख उसके पास पहुॅची और बेड के एक साइड बैठ कर उसे उसके कंधों से पकड़ अपनी तरफ खींच कर पलटाया। नैना ने पलटने के बाद जैसे ही अपनी भाभी को देखा तो झटके से उठ कर उससे लिपट कर रोने लगी। प्रतिमा ने किसी तरह उसे चुप कराया।

"शान्त हो जाओ नैना।" प्रतिमा ने गंभीरता से कहा__"और मुझे बताओ कि आख़िर ऐसा क्या हुआ है जिसकी वजह से तुमने दामाद जी को तलाक दे दिया है? देखो पति पत्नी के बीच थोड़ी बहुत अनबन तो होती ही रहती है। इस लिए इसमें तलाक दे देना कोई समझदारी नहीं है। बल्कि हर बात को तसल्ली से और समझदारी से सुलझाना चाहिए।"

"भाभी इसमे मेरी कहीं भी कोई ग़लती नहीं है।" नैना ने दुखी भाव से कहा__"मैं तो हमेशा ही आदित्य को दिलो जान से प्यार करती रही थी। सब कुछ ठीक ठाक ही था लेकिन पिछले छः महीने से हमारे बीच संबंध ठीक नहीं थे। इसकी वजह ये थी आदित्य किसी दूसरी लड़की से संबंध रखने लगे थे। जब मुझे इस बात का पता चला और मैंने उनसे इस बारे में बात की तो वो मुझ पर भड़क गए। कहने लगे कि मैं बाॅझ हूॅ इस लिए अब वो मुझसे कोई मतलब नहीं रखना चाहते हैं। मैने उनसे हज़ारो बार कहा कि अगर मैं बाॅझ हूॅ तो मुझे एक बार डाक्टर को दिखा दीजिए। पर वो मेरी सुनने को तैयार ही नहीं थे। तब मैने खुद एक दिन डाक्टर से चेक अप करवाया। बाद में डाक्टर ने कहा कि मैं बिलकुल ठीक हूॅ यानी बाॅझ नहीं हूॅ। मैंने डाक्टर की वो रिपोर्ट लाकर उन्हें दिखाया और कहा कि मैं बाॅझ नहीं हूॅ। बल्कि बच्चे पैदा कर सकती हूॅ। इस लिए एक बार आप भी अपना चेक अप करवा लीजिए। मेरी इस बात से वो गुस्सा हो गए और मुझे गालियाॅ देने लगे। कहने लगे कि तू क्या कहना चाहती है कि मैं ही नामर्द हूॅ? बस भाभी इसके बाद तो पिछले छः महीने से यही झगड़ा चलता रहा हमारे बीच। इस सबका पता जब मेरे सास ससुर को चला तो वो भी अपने बेटे के पक्ष में ही बोलने लगे और मुझे उल्टा सीधा बोलने लगे। अब आप ही बताइए भाभी मैं क्या करती? ऐसे पति और ससुराल वालों के पास मैं कैसे रह सकती थी? इस लिए जब मुझमें ज़ुल्म सहने की सहन शक्ति न रही तो तंग आकर एक दिन मैने उन्हें तलाक दे दिया।"

नैना की सारी बातें सुनने के बाद प्रतिमा भौचक्की सी उसे देखती रह गई। काफी देर तक कोई कुछ न बोला।

"ये तो सच में बहुत ही गंभीर बात हो गई नैना।" फिर प्रतिमा ने गहरी साॅस लेकर कहा__"तो क्या आदित्य ने तलाक के पेपर्स पर अपने साइन कर दिये?"

"पहले तो नहीं कर रहा था।" नैना ने अधीरता से कहा__"फिर जब मैंने ये कहा कि मेरे भइया भाभी खुद भी एक वकील हैं और वो जब आपको कोर्ट में घसीट कर ले जाएॅगे तब पता चलेगा उन्हें। कोर्ट में सबके सामने मैं चीख चीख कर बताऊॅगी कि आदित्य सिंह नामर्द है और बच्चा पैदा नहीं कर सकता तब तुम्हारी इज्जत दो कौड़ी की भी नहीं रह जाएगी। बस मेरे इस तरह धमकाने से उसने फिर तलाक के पेपर्स पर अपने साइन किये थे।"

"लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आ रहा कि तुम्हें इस बात का पता पहले क्यों नहीं चला कि आदित्य नामर्द है?" प्रतिमा ने उलझन में कहा__"बल्कि ये सब अब क्यों हुआ? क्या आदित्य का पेनिस बहुत छोटा है या फिर उसके पेनिस में इरेक्शन नहीं होता? आख़िर प्राब्लेम क्या है उसमें?"

"और सबकुछ ठीक है भाभी।" नैना ने सिर झुकाते हुए कहा__"लेकिन मुझे लगता है कि उसके स्पर्म में कमी है। जिसकी वजह से बच्चा नहीं हो पा रहा है। मैंने बहुत कहा कि एक बार वो डाक्टर से चेक अप करवा लें लेकिन वो इस बात को मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं।"

"ओह, चलो कोई बात नहीं।" प्रतिमा ने उसके चेहरे को सहलाते हुए कहा__"अब तुम फ्रेश हो जाओ तब तक मैं तुम्हारे लिए गरमा गरम खाना तैयार कर देती हूॅ।"

नैना ने सिर को हिला कर हामी भरी। जबकि प्रतिमा उठ कर कमरे से बाहर निकल गई। बाहर आते ही वह चौंकी क्योंकि अजय सिंह दरवाजे की बाहरी साइड दीवार से चिपका हुआ खड़ा था। प्रतिमा को देख कर वह अजीब ढंग से मुस्कुराया और फिर प्रतिमा के साथ ही नीचे चला गया।

अपडेट हाज़िर है दोस्तो,,,,,,
 
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