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Fantasy मोहिनी

हम दोनों एक-दूसरे से छेड़छाड़ करते हुए रास्ता तय कर रहे थे। फिर उसी समय चौंककर अलग हुए जब टैक्सी एक झटके के साथ रुकी। मैंने बाहर देखा तो पता चला कि एक पुलिस चौकी के आगे खड़ी है। इससे पहले कि मैं टैक्सी ड्राइवर से कुछ पूछता, वह खुद पलट पड़ा। कड़े स्वर में बोला-

“तुम साला दुनिया की आँख में धूल झोंकना माँगता। अभी तुमको पता चल जाएगा कि यह छोकरी कौन है।”

टैक्सी ड्राइवर ने अंतिम शब्द शकुन्तला की ओर इशारा करते हुए कहा था। इससे पहले कि मैं स्थिति को समझ पाता टैक्सी ड्राइवर नीचे उतर गया। पुलिस चौकी के अंदर जाने से पहले उसने गेट पर खड़े संतरी से कुछ बात की थी लेकिन दूरी के कारण मैं उन दोनों की बातें सुन न सका।

शकुन्तला ने संतरी को टैक्सी की ओर आते देखा तो घबरा कर बोली- “राज, अब क्या होगा ?”

“तुम चुप रहो। जो कुछ होगा देखा जाएगा।”

पुलिस चौकी के ड्यूटी आफिसर ने शकुन्तला को पहली ही नज़र में पहचान लिया। फिर जब उसने बताया कि तमाम पुलिस चौकियों को शकुन्तला के फरार होने की खबर मिल चुकी है तो मेरे पैरों तले की ज़मीन निकल गयी।

फिर भी मैंने स्वयं पर क़ाबू पाते हुए ड्यूटी ऑफिसर को संबोधित किया- “शकुन्तला बालिग़ है और अपनी इच्छा से मेरे साथ जा रही है। हमने कोई अपराध नहीं किया।”

“क्यों देवी जी, क्या यह टूण्टा सही कह रहा है ?” ड्यूटी ऑफ़िसर ने मुझे घूरते हुए शकुन्तला से पूछा।

वह अचानक फूट-फूटकर रोने लगी और उस मक्कार औरत ने हिचकियाँ लेते हुए कहा– “ऑफ़िसर, यही वह कमीना है जो मुझे ज़बरदस्ती अपहरण करके न जाने कहाँ ले जा रहा है। इसने मुझे धमकी दी थी यदि मैंने शोर मचाया तो यह मुझे जान से मार देगा। मुझे मेरे डैडी के पास पहुँचा दो ऑफ़िसर।”

शकुन्तला का बयान मुझे फँसा देने के लिये बहुत काफ़ी था। मैंने अपने बचाव के लिये ड्यूटी ऑफ़िसर से अपनी बेगुनाही साबित करने की बहुत चेष्टा की परंतु मुझे बुरी तरह मारकर लोहे के सलाख़ों के पीछे धकेल दिया गया।

अदालत में पेशी हुई तो वहाँ भी मेरी कोई सुनवाई नहीं हुई। शकुन्तला का बयान और उसके पिता की शोहरत ने मेरी रही-सही आशाओं पर भी पानी फेर दिया। दूसरी पेशी पर मजिस्ट्रेट ने मुझे चार महीने बामुशक्कत की सजा सुना दी।

पूना जेल में चार माह तक मुझे जिन पीड़ादायक यातनाओं का सामना करना पड़ा उसे बयान करना मेरे वश की बात नहीं। शकुन्तला के बाप ने इस बात की पूरी कोशिश की थी कि जेल की भीतर ही सजा पूरी होने से पहले मुझे मार डाला जाए लेकिन मेरी किस्मत में चूँकि दर-दर कर की ठोकरें खाना लिखा था इसलिए मैं ज़िंदा रहा।

चार माह की मुसीबतें सहने के बाद जब मुझे रिहाई मिली तो मेरी हालत इतनी बदतर थी कि अगर मेरा बाप भी मुझे देखता तो शायद न पहचान पाता। मेरा एक-एक जोड़ फोड़े के मानिंद दुख रहा था। मेरी दाढ़ी बेतहाशा बड़ी हुई थी। जेल में संतरी चूँकि मुझे दो वक्त का खाना नहीं देते थे इसलिए मैं बेहद कमज़ोर हो गया था। मेरे जिस्म पर चार माह के जमे हुए मैल से शायद बदबू फूट रही थीं। रिहाई के वक्त वह मुझे पंद्रह रुपये भी वापस नहीं दिए गए जो गिरफ्तारी के वक्त मेरे ज़ेब से बरामद हुए थे। चुनांचे अब मेरे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं था कि मैं लोगों के आगे हाथ फैलाकर भीख माँगू और अपना पेट भरूँ।

भीख माँगने से बेहतर है कि खुदकुशी कर ली जाए। मैं एक फ़ुटपाथ पर बैठे यह सोच रहा था। भूख से मेरी हालत ख़राब थी। मेरी अंतड़ियाँ बाहर निकलने को थीं। मैंने स्वयं को मौत के लिये अमादा कर लिया था। मगर उसी क्षण एक राहगीर मेरे पास आया और मेरी खस्ता हालत पर तरस खाकर मेरे सामने एक चवन्नी डालकर चलता बना।

इस चवन्नी को देखकर मेरा जी मचलाने लगा। मैंने उसे देर तक नहीं उठाया। काश! मैं उसे न उठाता और मर जाता। मगर मेरे पेट ने मेरे जमीर के विरुद्ध फ़ैसला सुना दिया। मैंने वह चार आने उठाये और दौड़कर क़रीब ही चने वाले के थैले पर जा पहुँचा। फिर भीख माँगना मेरे लिये कोई मसला नहीं रहा।

मैं दस-बारह रोज़ तक निरंतर पूना की सड़कों पर भटकता रहा। एक-दो रुपये मिल जाते तो पेट भर रोटी खाता। और जहाँ रात होती वहीं किसी पेड़ के साये में या फ़ुटपाथ पर लेटे रहता।

और यह सब तबाहियाँ मेरे ऊपर उसी रोज़ से नाजिल होनी शुरू हो गईं थी जब मोहिनी मुझसे रुखसत हुई थी। मेरी मोहिनी। काश! त्रिवेणी मुझे मिल जाए। मैं सोचता रहा।

मेरे हालात बद से बदतर होते जा रहे थे। लेकिन मैं स्वयं को इस उम्मीद में ज़िंदा रखे हुए था कि हो सकता है कि मैं मोहिनी को दोबारा हासिल करने में सफल हो जाऊँ जिसका सीधा रास्ता त्रिवेणी की मौत थी। लेकिन त्रिवेणी मोहिनी को लेकर न जाने कहाँ ग़ायब हो गया था।

एक दिन मैं भीख माँगता हुआ पूना के रेसकोर्स तक चला गया जहाँ मेरे अलावा और भी बहुत से भिखारी मौजूद थे और सेठ-साहूकारों को रेस जीतने की दुआएँ दे-देकर उनके आगे हाथ फैला रहे थे। मैं भी उन भिखारियों में शामिल हो गया।

रेस शुरू होने में चूँकि एक घंटा बाकी था इसलिए रेसकोर्स के बाहर भी लोगों का खासा हूजुम था। मैं भीड़ से परे हटकर उस जगह आ गया जहाँ गाड़ियाँ आकर ठहरती थी। जैसे ही कोई गाड़ी आकर रुकती, मैं लपककर आगे बढ़ता और गाड़ी से उतरने वाले सेठ के सामने हाथ फैला देता। अगर किसी को मेरी हालत पर तरस आता तो वह मेरे हाथ पर आठ आने या रुपया रख देता। किसी को मेरी सूरत पर घिन आती तो वह मुझे दो-चार गालियाँ सुनाकर आगे बढ़ जाता।

मैं अपने धंधे में लगा हुआ था कि एक लम्बी सी कार आकर गेट के सामने रुकी। ड्राइवर ने उतरकर पिछली सीट का दरवाज़ा खोला तो कार से एक लम्बे कद और घुटे हुए शरीर का खूबसूरत व्यक्ति बाहर निकला फिर उसके पीछे एक जवान औरत बाहर निकली जिसकी सुंदर सूरत अय्याशी का मुखौटा लगती थी।
 
मैंने जल्दी से आगे बढ़कर गिड़गिड़ाते हुए हाथ फैला दिए।

लम्बे कद वाले आदमी ने एक बार तो मुझे नफ़रत से देखा फिर एक पल के लिये वह रहस्यपूर्ण अंदाज़ में मुस्कुराया और मेरे अनुमान के विरुद्ध उसने दस रुपये का नोट मेरी तरफ़ बढ़ाया तो मैंने उसे यूँ झपट लिया जैसे कारून का ख़ज़ाना मेरे हाथ आ गया हो।

मैंने धन्यवाद की दृष्टि से दुआएँ देते हुए उस दयालु व्यक्ति को देखा तो वह त्यौरी पर बल डालकर बोला- “दफ़ा हो जा मेरे सामने से। जो कुछ मैंने तुझे दान दिया है, वह मेरी औकात से बहुत ज़्यादा है।”

फिर वह मुझे घूरता औरत का हाथ थामे आगे बढ़ गया।

न जाने क्यूँ मुझे ऐसा लगा जैसे इस व्यक्ति को मैंने पहले भी कहीं देखा है। उसकी बड़ी-बड़ी सुर्ख आँखें मुझे कुछ जानी-पहचानी सी लग रही थीं। मैंने अपने ज़हन को कुरेदना शुरू किया। लेकिन प्रथम इसके कि मैं किसी नतीजे पर पहुँचता एक लंगड़ा भिखारी मेरे निकट आकर बोला- “तुम भाग्य के धनी हो मेरे भाई, जो बाबा त्रिवेणी ने तुम्हें दस का नोट दान दिया। वरना यह तो हम जैसे फकीरों को ठोकर मारना भी गँवारा नहीं करता।

“जानते हो यह कौन है ? एक जमाने में साला पंडित था। अब लाला त्रिवेणी दास बन गया है।”

त्रिवेणी का नाम सुनकर मेरे दिल की धड़कने तेज हो गईं। मुझे याद आ गया कि मैंने उसे पहले कहीं देखा था। पहली नज़र में मैंने उसे नहीं पहचाना था। उसने अपनी दाढ़ी-मूँछें साफ़ कर ली थी लेकिन लंगड़े फकीर ने मुझे उसका नाम बता कर सब कुछ याद दिला दिया था।

मेरे जख्मों पर इतनी निर्दयता से नमक छिड़का था कि मैं तड़प उठा। मुट्ठी में दबा हुआ नोट अब मुझे यों लग रहा था जैसे वह कोई जहरीला साँप हो। जो मेरे अस्तित्व को किसी भी पल डस लेगा।

मैंने क्रोधित स्थिति में दस का नोट देखा। फिर उसे इतनी बार फाड़ा कि नोट पुरजा-पुरजा हो गया। मेरी रगों में बिजलियाँ सी कौंध रही थीं। मेरे सीने में बदले की आग किसी ख़तरनाक ज्वालामुखी की तरह फट पड़ने को बेचैन थी।

मैंने लंगड़े फकीर को भी खा जाने वाली नज़रों से देखा। फिर भीड़ से दूर हटकर एक तरफ़ जा खड़ा हुआ। मेरी निगाहें अब रेसकोर्स के दरवाज़े पर स्थिर थीं। मेरा खून पिघले हुए लावे की मानिंद उबल रहा था।

मुझे त्रिवेणी की वापसी का इंतज़ार था।

ज्यों-ज्यों समय बीतता जा रहा था मेरे सीने में दबी चिंगारी और भी तेजी से भड़कती जाती। मैं बहुत बेचैन था। रेसकोर्स के बाहर टैक्सी और स्कूटर वालों का एक हजूम सा इकट्ठा था। हर तरफ़ चहल-पहल थी। लोग घोड़ों के जीतने और हारने पर आंकड़े फिट कर रहे थे। उनके बीच गरमा-गरम बहस हो रही थी। परंतु मैं इन तमाम बातों और हंगामों से बेख़बर इस बात के लिये प्रतिक्षारत था कि कब मुझे त्रिवेणी नज़र आता और मैं उसे क़त्ल करके उसके खून से अपने प्रतिशोध की आग ठंडी करता।

ठीक पाँच बजे आख़िरी रेस छूटी तो रेस के गेट पर टैक्सी और प्राइवेट कारों के हॉर्न बजने लगे। मैं अवसर ताड़कर एक वजनी और तिकोना पत्थर उठा लिया और सरकता हुआ दरवाज़े के समीप आ गया। मुझे पूरी आशा थी कि त्रिवेणी को ठिकाने लगाने में सफल हो जाऊँगा और फिर मोहिनी दोबारा मेरे सिर पर आ जाएगी और जब मोहिनी आ जाएगी तो मैं बड़ी आसानी से स्वयं को कानून के गिरफ्त से बचा भी लूँगा।

मोहिनी की तस्वीर मेरे ज़हन में उभरी तो मुझे गुजरी हुई बातें याद आ गयी और यादों के झरोखे से हसीन डॉली का चेहरा भी मेरे सामने उभरता चला गया। मेरा दिल तड़प उठा और मेरे ज़ख़्म दोबारा हरे हो गए।

मेरी मोहिनी मुझसे बिछड़ गयी थी। मोहिनी क्या गयी सब कुछ चला गया। मुझे महसूस हो रहा था कि मैं कुछ नहीं था। जो भी था मोहिनी के कारण था। मोहिनी मेरी आदत बन चुकी थी और अब वह मुझसे बहुत क़रीब थी। मगर कितनी दूर। मैंने अतीत की उन तड़पा देने वाली यादों को ज़हन से झटकना चाहा और गेट पर नज़रें जमा दी। जहाँ से अब लोगों का रेला आना शुरू हो गया था।

हँसते-मुस्कराते, रोते-बिखलते चेहरे, एक के बाद एक मेरे सामने से गुजरते रहें। मेरे साथी भिखारियों ने लोगों के आगे हाथ फैलाने शुरू कर दिए लेकिन मुझे भीख से अधिक उस वक्त त्रिवेणी की तलाश थी। अतः बड़े गौर से बाहर आने वाले एक-एक व्यक्ति को देखता रहा।

तिकोने वजनी पत्थर पर मेरी गिरफ्त सख़्ती के साथ जमी थी। मैं बड़ी बेचैनी से त्रिवेणी की प्रतीक्षा कर रहा था फिर...

फिर अचानक मेरी निगाहें चमक उठीं। त्रिवेणी मुझे भीड़ में नज़र आया। वह अपनी औरत का हाथ थामे मुस्कराता हुआ दरवाज़े के क़रीब आ रहा था।

मैं धीरे-धीरे खिसकता दरवाज़े के और क़रीब आ गया। मेरे और दरवाज़े के मध्य अब बामुश्किल आठ-नौ गज का फासला रह गया था। मेरी दृष्टि बराबर त्रिवेणी के चेहरे पर जमी थी। फिर वह जैसे ही गेट के बाहर निकला मैंने अपना पत्थर वाला हाथ बुलंद किया और पूरी ताक़त से नुकीले पत्थर को त्रिवेणी के सिर का निशाना बनाकर खींच मारा।

फासला इतना कम था कि मेरा निशाना चूक जाने का कोई सवाल ही पैदा न होता था। लेकिन मेरा निशाना न सिर्फ़ आश्चर्यजनक रूप से चूक गया बल्कि त्रिवेणी के बजाय उसके पीछे वाले पादरी के सिर से टकरा गया और खून की धार उबलने लगी।

पादरी कराह कर ज़मीन पर गिर पड़ा तो जान बचाने को ख़ातिर भागने के इरादे से मैं पलटा। मगर दो-चार आदमियों ने जिन्होंने मुझे पत्थर मारते हुए देख लिया था मुझे लपक कर थाम लिया।

“यही है साला टुण्टा। मारो साले को।” एक व्यक्ति ने नफ़रत से कहा।

“साला सूरत से पक्का हरामी दिखाई पड़ता है।” दूसरे ने हांक लगाई।

“कलजुग है, कलजुग!” एक धोती वाले साहब बोले– “अगर भिक्षा न दो तो यह भिखारी मरने-मारने पर उतर आते हैं।”

जितनी जुबानें मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगल सकती थीं, उगलती रहीं। कुछ लोगों ने मुझपर लात और घूसों की बारिश शुरू कर दी। मैं अपनी बचाव में ज़मीन पर पड़ा इधर से उधर कलाबाजियाँ खाता रहा और मेरे ऊपर ठोकरों की धूल उड़ती रही। फिर पुलिस लोगों को उठाकर मेरे पास आ गयी। मैं एक बार फिर पुलिस के चंगुल में फँस गया। उस वक्त मेरी हालत यह थी कि मार के कारण मेरे लिये साँस लेना भी कठिन हो रहा था।
 
पुलिस वालों ने मुझे धक्के मारकर रही सही कसर भी पूरी कर दी। उसके बाद मुझे पुलिस लारी में ठूँस दिया गया। लारी रवाना हुई तो मैंने मजमे पर नज़र डाली परंतु त्रिवेणी तथा उसकी साथी औरत कहीं नज़र नहीं आए। मैं खून का घूँट पीकर रह गया। इसके सिवाय मैं और कुछ कर भी क्या सकता था।

पुलिस चौकी पर ले जाकर मेरी जो दुर्गति बनाई गयी वह मेरा दिल ही जानता है। पुलिस वाले जब कूट-पीटकर थक गए तो मुझे हवालात में बंद कर दिया गया।

रात को मुझे रूखी-सूखी खाने को मिली तो मैंने बड़ी मुश्किल से एक-दो निवाले ज़हर मार के खाए और एक घूँट पानी पीकर लेटा रहा। सुबह जब उठा तो मेरे बदन में टीस सी उभर रही थी। मुझे हल्का-हल्का बुखार भी महसूस हो रहा था। लेकिन कोई मेरा हमदर्द न था। मैं आँखें बंद किए लेटा-कराहता रहा कि देखें किस्मत क्या गुल खिलाती है।

कुछ देर बाद बाहरी फाटक खुलने की आवाज़ सुनाई दी तो मैंने आँखें खोल दी। एक रायफलधारी सिपाही ने अंदर प्रविष्ट होकर मुझे नफ़रत भरी नज़रों से देखा फिर एक भरपूर ठोकर मेरे कमर पर रशीद कर दी।

“चल उठ! थानेदार साहब तुझे बुला रहे हैं।”

मैं साहस बटोरकर उठा और सिपाही के साथ अंदर कमरे में आ गया। लेकिन कमरे में दाख़िल होते ही मेरे कदम अचानक रुक गए। थानेदार के साथ त्रिवेणी बैठा हुआ था।

त्रिवेणी को देखते ही मेरा खून फिर खौलने लगा। किंतु परिस्थिति देखते हुए मैं दिल ही दिल में ताव खाकर रह गया और त्रिवेणी से नजरें हटाते हुए थानेदार को देखने लगा।

“तुम्हारा नाम राज है, क्यों ?” थानेदार ने मुझे घूरते हुए पूछा तो मैंने सहमतिसूचक अंदाज़ में सिर हिलाया।

“पहले क्या काम करते थे ?” थानेदार ने दूसरा प्रश्न किया।

“पहले...!” मैं सिर्फ़ इतना ही कह पाया था कि त्रिवेणी बीच में ही बोल पड़ा– “मैं इसे बहुत अरसे से जानता हूँ।” त्रिवेणी ने थानेदार को मुखातिब किया– “मुझे विश्वास है कि रिहाई मिल जाने के बाद यह अभागा फिर ऐसी हरकत नहीं करेगा।”

“क्या आप इसकी ज़मानत लेने को तैयार हैं ?”

“जी हाँ!” त्रिवेणी मुझे नफ़रत भरी दृष्टि से देखता हुआ बोला– “अगर मैंने इसकी मदद न की तो यह बेचारा तमाम जीवन जेल में एड़ियाँ रगड़ता रहेगा।”

“अगर आप ज़मानत ले रहे हैं तो मुझे कोई एतराज़ नहीं है।” थानेदार ने गंभीरता से कहा और फिर रजिस्टर खोलने लगा तो त्रिवेणी ने उससे संबोधित करते हुए कहा, “क्या यह संभव नहीं कि इसका केस अदालत तक जाने की बजाय यहीं खत्म हो जाए ?”

“यह जरा मुश्किल है त्रिवेणी जी। अगर बैराम जी के ऊपर शिकायत कर दी तो मुझे अपनी नौकरी बचानी भी मुश्किल हो जाएगी।” थानेदार ने जवाब दिया, “उसके सिर पर खासा गहरा ज़ख़्म आया है।”

“आप बैराम जी की फ़िक्र न करें। वह इस सिलसिले में कुछ न करेगा।”

“वह तो ठीक है त्रिवेणी जी लेकिन...”

थानेदार इसके आगे कुछ न बोल सका और बोलता भी कैसे जबकि त्रिवेणी ने एक मोटी सी नोटों की गड्डी निकालकर खामोशी से उसकी गोद में डाल दी थी। थानेदार ने एक नज़र त्रिवेणी पर डाली फिर जल्दी में नोटों की वजनी गड्डी सँभालकर मेज़ की दराज में डाली और नर्म होकर बोला- “आप इसे अपने साथ ले जा सकते हैं त्रिवेणी जी। लेकिन बैराम जी को सँभालना भी आपका ही काम है।”

“आप बिल्कुल निश्चिंत रहे श्रीमान जी!”

मैं अपनी जगह खड़ा-खड़ा ताव खाता रहा। त्रिवेणी मेरी ज़मानत लेगा मैं यह कभी सपने में भी नहीं सोच सकता था। इसमें भी अवश्य ही उसकी चाल रही होगी। मैंने एक पल के लिये सोचा कि त्रिवेणी की ज़मानत पर रिहा होने से इंकार कर दूँ। लेकिन दूसरे ही पल मैंने परिस्थिति देखकर अपना इरादा बदल दिया। त्रिवेणी के निकट रहकर मैं उसे आसानी से ठिकाने लगा सकता था।

अतः जब त्रिवेणी ने मुझे साथ चलने को कहा तो मैं एक जरखरीब ग़ुलाम की तरह उसके साथ चल पड़ा। बाहर उसकी झिलमिलाती हुई गाड़ी मौजूद थी। ड्राइवर ने त्रिवेणी को देखते ही जल्दी से सलाम किया फिर गाड़ी का पिछला दरवाज़ा खोल दिया। त्रिवेणी ने खा जाने वाली दृष्टि से मुझे देखा फिर पिछली सीट पर बैठ गया।

मैं गाड़ी के पास ही खड़ा रहा तो त्रिवेणी ने मुझे संबोधित किया- “तुम आगे ड्राइवर के साथ बैठ जाओ।”

जवाब में मैंने एक दृष्टि त्रिवेणी पर डाली फिर खामोशी के साथ अगली सीट पर ड्राइवर के बराबर में जा बैठा। गाड़ी मेरे बैठते ही हरकत में आ गयी।

मैं चुपचाप बैठा त्रिवेणी को खत्म करने की योजना बना रहा था। कुछ देर बाद गाड़ी एक आलीशान कोठी के अहाते में दाखिल होकर पोर्टिकों में रुकी तो ड्राइवर ने जल्दी से नीचे उतरकर पिछली सीट का दरवाज़ा खोला। त्रिवेणी बड़ी शान के साथ नीचे उतर गया। फिर नफ़रत भरी दृष्टि मेरे ऊपर डालकर ड्राइवर से बोला- “श्याल लाल से कहो कि इसे नौकरों वाले क्वाटरों में से एक कमरा दे दे।”

“उचित है साहब!” ड्राइवर ने सिर झुकाकर कहा।

“मुंशी से कहो कि इसके लिये नए कपड़ों का प्रबंध कर दे।”

“जी हुजूर!” ड्राइवर ने दोबारा हाथ जोड़ते हुए कहा।

“एक बात का विशेष ध्यान रहे...” इस बार त्रिवेणी ने बड़े खुश्क स्वर में कहा, “मेरी इच्छा के बिना इसे कोठी से बाहर न निकलने दिया जाए। अगर ऐसा हुआ तो मैं तुम सबको नरक में झोंक दूँगा। क्या समझे ?”

“समझ गया सरकार।” ड्राइवर ने भयभीत स्वर में उत्तर दिया।
 
त्रिवेणी के हिदायत के अनुसार मुझे कोठी के पश्चिमी हिस्से में बने हुए नौकरों के क्वाटरों का एक कमरा दे दिया गया। मेरे लिये नए कपड़े भी बाजार से आ गए। मुझे खाने-पीने की भी कोई तकलीफ़ न थी। लेकिन मैं अपने कमरे से अधिक दूर नहीं जा सकता था। त्रिवेणी का विशेष नौकर सुंदरलाल हर समय मेरी चौकीदारी के लिये तैनात रहता था। मुझे आश्चर्य था कि त्रिवेणी ने मुझे ज़मानत पर क्यों रिहा कराया था। अब वह मुझे हर तरह का आराम देने के बावजूद मुझ पर इतना सख़्त पहरा क्यों बिठाए हुए था। अगर वह मेरी तरफ़ से कोई ख़तरा महसूस कर रहा था तो बड़ी आसानी से मुझे ठिकाने लगा सकता था। एक टुण्टे भिखारी की मौत यों भी पुलिस वालों के लिये विशेष दिलचस्पी का कारण न बनती।

मैं एक सप्ताह तक एक गुत्थी को सुलझाने की कोशिश करता रहा। फिर थक-हारकर मैंने इस मसले पर गौर करना ही छोड़ दिया। बहरहाल मैंने यह तय कर लिया था कि जब भी मुझे अवसर मिलेगा त्रिवेणी से अपना बदला ज़रूर लूँगा। आठवें रोज़ मुझे एक खूबसूरत अवसर मिल गया।

उस रात मैं अपने कमरे में सोया सपनों की दुनिया में विचर रहा था कि सुंदर लाल ने मुझे झिंझोरकर जगा दिया। मैं बौखला कर उठा तो सुंदर लाल बोला- “उठो लाट साहब की औलाद, बड़े सरकार ने तुम्हें बुलाया है।”

उस वक्त रात का कोई एक बजा था। मैंने उठकर बाल्टी के पानी से मुँह पर एक छपाका मारा। फिर तौलिये से मुँह साफ़ करके बाहर आ गया। सुंदरलाल मेरे साथ था। मैं कोठी के सदर दरवाज़े की तरफ़ जाने लगा तो सुंदरलाल ने दाँत पीसकर कहा- “उधर कहाँ जा रहा है बे ? बाहर चल, बड़े सरकार गाड़ी में बैठे हैं।”

मैं खामोशी से फाटक की तरफ़ कदम बढ़ाने लगा। बाहर त्रिवेणी की लम्बी कार मौजूद थी। त्रिवेणी किसी लड़की के साथ पिछली सीट पर बैठा था। सुंदरलाल ने क़रीब जाकर त्रिवेणी से कुछ बात की फिर मुझे अगली सीट पर बैठा दिया गया। गाड़ी मेरे बैठते ही हरकत में आ गयी। कुछ देर तक पिछली सीट पर खामोशी छाई रही। फिर एक सुरीली आवाज़ उभरी।

“डार्लिंग, तुम वाकई ग्रेट हो! डियर ग्रेट।”

“मेरी सुंदर कली, तुम मुझसे ऐसी बातें न किया करो।” त्रिवेणी के स्वर में बेहद प्यार था, “मैं तो तुम्हारा एक साधारण सेवक हूँ।”

“मुझे उल्लू बना रहे हो! क्यों ?” लड़की ने बनावटी ग़ुस्सा दिखाते हुए कहा। फिर वह दोनों कहकहा लगाने लगे। कुछ देर बाद लड़की ने पूछा- “यह तुम मुझे कहाँ ले जा रहे हो डार्लिंग ?”

“क्यों ? क्या तुम्हें डर लग रहा है ?” त्रिवेणी ने प्यार से पूछा।

“डर की बात नहीं है डार्लिंग!” लड़की बोली, “रात कुछ ज़्यादा हो गयी है। अगर डैडी को शक हो गया तो वह मुझे गोली मार देंगे।”

“घबराओ नहीं मेरी जान, सिर्फ़ आधा घंटा और। इसके बाद मैं तुम्हें छोड़ दूँगा।”

इतना तो मैं बखूबी समझ रहा था कि इस लड़की का त्रिवेणी से क्या संबंध होगा लेकिन यह बात मेरी समझ में न आ सकी कि इतनी रात गए त्रिवेणी ने मुझे किस उद्देश्य से अपने साथ लिया है।

मैं इसी उलझन में फँसा हुआ था कि गाड़ी एक वीरान सुनसान सड़क कर जाकर रुक गयी। ड्राइवर ने हैड लाइट बुझा दी थी लेकिन गाड़ी का इंजन बंद न किया था।

प्रथम इसके कि मैं गाड़ी रुकने की वजह जान सकता त्रिवेणी पिछली सीट का दरवाज़ा खोलकर नीचे उतरा फिर उसने मुझे भी नीचे उतर आने का हुक्म दिया और स्वयं गाड़ी से दस-पंद्रह कदम दूर जाकर खड़ा हो गया। मैं विचारों में गुमसुम सा कदम बढ़ाता त्रिवेणी के समीप पहुँचा तो अचानक मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। मेरा दिल मौत की कल्पना से काँप उठा।

त्रिवेणी के हाथ में रिवॉल्वर देखकर मुझे झुरझुरी सी आ गयी। तुरंत मुझे एक ही विचार आया कि त्रिवेणी मुझे मौत की घाट उतारने के लिये इस वीरान जगह लाया है। कुछ देर बाद वह मेरी अकड़ी हुई लाश को सड़क के किनारे फेंककर लौट जाएगा। मेरा दिल भय के कारण जोर-ज़ोर से धड़कने लगा तो त्रिवेणी किसी जहरीले नाग की तरह फुँकारा।

“राज, क्या तुम जानते हो कि मैं तुम्हें इस समय यहाँ किसी उद्देश्य से लाया हूँ ?”

“हाँ!'” मैंने थूक निगलते हुए कहा। फिर अपनी घबराहट पर क़ाबू पाते हुए बोला, “मैं तुम्हारा उद्देश्य भाँप चुका हूँ। लेकिन क्या तुम रिवॉल्वर को बीच से हटाकर कोई आख़िरी फ़ैसला नहीं कर सकते हो ?”

“बकवास बंद करो!” त्रिवेणी गुर्राया, “अगर मुझे तुम्हें मारना ही होता तो इसके लिये अपने किसी नौकर को भी संकेत कर सकता था।”

“फिर इस वक्त मुझे यहाँ लाने का तुम्हारा क्या उद्देश्य हो सकता है ?”

“बकवास नहीं! जो कुछ मैं तुमसे कह रहा हूँ उसे गौर से सुनो। गाड़ी में जो लड़की बैठी है, मैं उसे आवाज़ देकर यहाँ बुलाता हूँ। तुम्हें उसे गोली मारनी होगी। यह मेरी आज्ञा है, समझे ?”

“समझ गया!” मैंने धड़कते हुए दिल से कहा– “तो तुम मोहिनी के अस्तित्व को ज़िंदा रखने के लिये इस लड़की की बलि देना चाहते हो ?”

“हाँ! और इसी सेवा के लिये मैंने तुम्हें अपनी कोठी में शरण दी है। अब बात तुम्हारी समझ में आई कुँवर साहब।”

एक नया विचार अचानक ही मेरे मस्तिष्क से टकराया और मैंने त्रिवेणी से कहा-

“त्रिवेणी दास, अगर तुमने मुझे मोहिनी के लिये पनाह दी है तो मैं उसकी सेवा अवश्य करूँगा।”

जवाब में त्रिवेणी ने मुझे खा जाने वाली दृष्टि से घूरकर देखा। मैं घबरा गया। मुझे डर था कि कहीं वह मेरा इरादा न भाँप ले। उस सूरत में मेरा सारा उद्देश्य खाक में मिल जाता। मैं इसी सोच में था कि अचानक त्रिवेणी की गाड़ी का दरवाज़ा खुला और त्रिवेणी की प्रेमिका नीचे उतर कर हमारे क़रीब आने लगी। मैंने पहली ही दृष्टि में भाँप लिया कि वह इस वक्त शराब के नशे में है। उसकी चाल में मामूली सी लड़खड़ाहट थी।

“क्या बात है डार्लिंग ? तुम यहाँ क्यूँ खड़े हो ?”

“एक बहुत ज़रूरी काम को अंजाम देना है।” लड़की के पास आते ही उसने बड़ी सफ़ाई से रिवॉल्वर वाला हाथ अपनी ज़ेब में डाल दिया।

मेरे दिल की धड़कनें हर क्षण तेज होती जा रही थीं। उसी क्षण त्रिवेणी मेरे क़रीब सरकते हुए फुसफुसाया।

“अगर तुमने अपने काम में जरा भी गड़बड़ी से काम लिया तो मोहिनी के लिये इस लड़की के बजाय तुम्हारा खून भेंट में चढ़ाना पड़ जाएगा।” फिर उसने रिवॉल्वर मेरे हवाले कर दिया।

“इसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी त्रिवेणी। मैं खूब जानता हूँ कि मुझे क्या करना है।” मैंने रिवॉल्वर के दस्ते पर अपनी गिरफ़्त जमा दी।

रिवॉल्वर हाथ में आते ही मेरी रगों में खून की बजाय बिजली दौड़ने लगी। अपना वाक्य पूरा करके मैं दो कदम पीछे हटा और फिर तेजी के साथ अपना फ़र्ज़ पूरा करने के लिये रिवॉल्वर उठाकर एक के बाद एक चार फायर त्रिवेणी के सीने पर झोंक मारे।

रिवॉल्वर की रेंज से त्रिवेणी की दूरी कठिनाई से तीन गज रही होगी। रिवॉल्वर का प्रयोग मैं कई बार कर चुका था और मेरा निशाना इतना बेकार भी न था बल्कि ऐसी परिस्थिति में तो किसी अनाड़ी का भी वार खाली नहीं जा सकता। लेकिन मेरा वार खाली गया।

मैंने त्रिवेणी को उसी जगह बड़े इत्मीनान से खड़े पाया। अब तक लड़की फायरिंग की आवाज़ सुनकर ज़रूर सिटपिटा गयी थी। यह क्या हुआ, मैं सोचने लगा मगर इसमें सोचने की कौन सी बात थी। यक़ीनन त्रिवेणी ने मुझे आजमाने के लिये उसकी रिवॉल्वर की जगह डमी रख दी थी। अगर उसने वास्तव में ऐसा किया था तो मैं पूरी तरह जाल में फँस गया था। यह मैंने बहुत बुरा किया। इस कदर जल्दबाज़ी ठीक नहीं थी।

एक क्षण यह बातें सोचीं फिर मेरी नज़र लड़की पर पड़ी जो पलटकर गाड़ी की तरफ़ भागना चाहती थी। मैंने तुरंत ही रिवॉल्वर का रुख़ उसकी तरफ़ करके लिबलिबी दबा दी। मैं इस बात की जाँच करना चाहता था कि त्रिवेणी ने मुझे फँसाने के लीए क्या जाल फैलाया है। लेकिन मेरा अनुमान ग़लत साबित हुआ। धमाके की आवाज़ के साथ ही मैंने लड़की को बड़ी दर्दनाक चीख मारकर गिरते देखा।

निश्चय ही वह मोहिनी की रहस्यमय शक्ति का ही करिश्मा था कि त्रिवेणी मेरे हाथ से बच गया। मोहिनी के रहस्यमय आश्चर्यजनक शक्तियों का तमाशा मैं देख चुका था। वह रिवॉल्वर की गोलियों को तो क्या तोप की दिशा भी बदल सकती थी।

मैं स्तंभ सा खड़ा हालात की नज़ाकत पर गौर करता रहा। मेरा मस्तिष्क चकराने लगा था। मेरी दृष्टि उस लड़की पर जमकर रह गयी थी जो सड़क पर पड़ी मौत और ज़िंदगी की दूसरी दूरी तय कर रही थी। फिर मैं उस वक्त चौंका जब त्रिवेणी ने रिवॉल्वर मेरे हाथ से झटक लिया। और बड़ी खूंखार आवाज़ में बोला- “मैं तुम्हें पागल कुत्तों से बेहतर ज़िंदगी दूँगा कुँवर राज।”

मुझे मालूम था कि त्रिवेणी जो कुछ कह रहा है उसे कर गुजरने की शक्ति रखता है अतः मैंने तुरंत तौर पर फ़ैसला कर डाला कि जब मरना ही है तो क्यों न आख़िरी वक्त पर त्रिवेणी से दो-दो हाथ कर लूँ और दिल की थोड़ी हसरत निकाल लूँ। इस विचार के अन्तर्गत मैंने कुछ सोचे-समझे बग़ैर त्रिवेणी पर छलांग लगा दी। लेकिन त्रिवेणी बड़ी फूर्ती से एक तरफ़ हट गया। फिर उसने पीछे से रिवॉल्वर के दस्ते की चोट मेरे सिर पर रशीद की कि मेरी आँखों के सामने तारें नाचने लगे। मैं अपने डूबते हुए ज़हन को सँभालने का भरपूर प्रयास किया लेकिन मैं लड़खड़ाया और फिर शायद बेहोश होकर गिर पड़ा।
 
सुबह हुई तो मैंने स्वयं को सर्वेंट क्वार्टर में पाया। सूरज की रोशनी ने मेरे कमरे को रोशन कर दिया था। आँख खुलते ही मैंने जिस व्यक्ति को देखा वह सुंदरलाल था। जिसे त्रिवेणी ने मेरी चौकीदारी पर तैनात कर रखा था। मेरे सामने सीना ताने वह मुझे बड़ी ख़तरनाक दृष्टि से घूर रहा था।

“पानी!” मैंने सुंदरलाल के ख़तरनाक तेवर को अनदेखा करते हुए पानी माँगा।

“तूने मालिक के साथ गद्दारी की थी। क्या यह सच है ?”

“मेरा कंठ जल रहा है और हलक सूख रहा है। सुंदरलाल, मुझे दो घूँट पानी पिला दो फिर तुम्हें सब कुछ बता दूँगा।”

“पानी के बच्चे, मैं तेरे हलक में पेशाब की बूँद भी नहीं टपकाऊँगा।” सुंदरलाल तड़क कर बोला फिर उसने कमर बँधी पेटी से अपना खंजर निकाल लिया।

“नहीं, नहीं!” मैं आने वाले क्षणों की कल्पना मात्र से काँप उठा– “मुझे मत मारो, मैं वायदा करता हूँ कि फिर कभी त्रिवेणी से धोखा नहीं करूँगा।”

सुंदरलाल मेरी बात का उत्तर देने की बजाय अपनी सुर्ख-सुर्ख आँखों से मुझे घूरता रहा। उसके साथ ही खंजर वाला हाथ इस तरह ताकता रहा जैसे मुझे एक ही वार में खत्म कर देना चाहती तो। उसकी आँखों की सुर्खी हर पल लाल होती जा रही थी। मैं फटी-फटी आँखों से अपनी मौत को सिर पर मंडराता देखता रहा। अचानक सुंदरलाल ने पैंतरा बदला और मुझ पर खंजर का भरपूर वार कर दिया।

मुझे केवल इतना याद है कि मैंने अपनी दाईं रान पर तेज जलन महसूस की थी। फिर चीख की आवाज़ मेरे कंठ में ही घूँटकर रह गयी थी।

पंद्रह-बीस रोज़ तक मैं जिन यातनाओं के दौर से गुजरता रहा उसका ज़िक्र भी नहीं किया जा सकता। वह कुछ ऐसी यातनाएँ थी जिन्हें शब्दों में भी बयान नहीं किया जा सकता था। सुंदरलाल किसी अंधे-बहरे जल्लाद की तरह मुझे पीड़ादायक यातनाएँ पहुँचाता रहता। मैं हर पल अपने लिये मौत की दुआएँ माँगता। माँगे मौत भी न मिली।

बीस रोज़ बाद मैं ज़िंदगी और मौत की कश्मकश में पड़ा अपने कमरे में कराह रहा था कि त्रिवेणी वहाँ आया। मुझे उस दुर्दशा में देखकर उसके गंदे होंठों पर ख़ामोश मुस्कराहट तैर गयी। चंद क्षणों तक वह मेरी हालत देखकर ख़ामोश खड़ा रहा फिर जहरीले स्वर में बोला-

“अब तुम्हारा क्या हाल है कुँवर साहब ? मिज़ाज दुरुस्त हो गए ?”

“त्रिवेणी!” मैंने रुँधी आवाज़ में कहा, “क्या तुम मुझपर इतनी दया नहीं कर सकते कि एक ही बार में जान से मार डालो ?”

“यह तुम कह रहे हो ? तुम ?” त्रिवेणी ने सर्द स्वर में कहा, “सुनो कुँवर साहब, मैं तुम्हें एक और अवसर देता हूँ। अगर तुम पालतू कुत्तों की तरह मेरे संकेत पर चलते रहे तो ठीक है। वरना तुम्हारा जो अंजाम होगा, तुम सोच भी नहीं सकते।”

“मैं वादा करता हूँ कि तुम जो कहोगे वही करूँगा।”

“मुझे तुमसे इस उत्तर की आशा थी।” त्रिवेणी की आँखों में शैतानी चमक उभरी। मैं सुंदरलाल से कह देता हूँ कि अब वह तुम्हारे साथ नरमी का बर्ताव करे।”

त्रिवेणी की हिदायत पर सुंदरलाल ने अपने अत्याचार बंद कर दिए। मेरे ज़ख़्म भरने में लगभग एक माह गुज़र गया फिर धीरे-धीरे मेरी हालत ठीक ओ गयी। अब मैं आज़ादी के साथ कोठी के अहाते में घूम-फिर सकता था। लेकिन कोठी से बाहर जाने की आज्ञा नहीं थी। सुंदरलाल ने अब मेरी चौकीदारी में भी कुछ नरमी बरतनी शुरू कर दी थी।

मेरे लिये अब सिवाय इसके कोई रास्ता न था कि हर कदम देख-भालकर उठाऊँ। मैं समझ रहा था कि त्रिवेणी ने जो दया मुझ पर दिखाई है उसके पीछे निश्चित ही कोई योजना होगी। यूँ तो मैंने हालात से समझौता कर लिया था परंतु मेरे सीने में त्रिवेणी के प्रति नफ़रत की आग कभी ठंड नहीं हुई। मैं हर समय इस चिंता में डूबा रहता कि किसी तरह त्रिवेणी को खत्म करके मोहिनी को दोबारा प्राप्त कर लूँ।

एक दिन अचानक मेरे दिल में नफ़रत की यह चिंगारी जोरों से भड़कने लगी। उस दिन मैंने सुबह से ही सुंदरलाल को नहीं देखा था। एक दूसरे नौकर से मालूम करने पर पता चला कि त्रिवेणी के किसी कारणवश उसे नौकरी से हटा दिया है। इससे यह आभास होता था कि त्रिवेणी को मुझ पर विश्वास हो गया है। जो सुंदरलाल की चौकीदारी की आवश्यकता नहीं समझता। अतः मेरे सीने में दबी चिंगारी अपने मंसूबे मनाने लगी।

एक रात मैं अपने विचारों में लीन कमरे में लेटा था कि एक नौकर ने मुझे बताया कि त्रिवेणी ने मुझे कमरे में बुलाया है। मैं बोझिल सा उठा और कमरे की ओर चल पड़ा। कोठी में प्रविष्ट होने का मेरा पहला दिन था। इसलिए मैं नौकर के मार्गदर्शन में आगे बढ़ता रहा। कुछ देर बाद नौकर मुझे एक कमरे के बाहर छोड़कर चला गया। उसने मुझे हिदायत दी थी कि मैं आवाज़ देकर अंदर चला जाऊँ।

नौकर के आने के बाद मैं चंद क्षणों तक मैं दरवाज़े के बाहर खड़ा रहा। फिर मैंने अपने दिल की धड़कनों पर क़ाबू करके दरवाज़े पर दस्तक दी।

“कौन ?” अंदर से त्रिवेणी की आवाज़ उभरी।

“मैं राज हूँ!” मैंने ऊँची आवाज़ में उत्तर दिया।

“अंदर आ जाओ।”

मैं दरवाज़ा खोलकर अंदर प्रविष्ट हुआ तो देखा त्रिवेणी नाइट गाउन पहने शराब पीने में व्यस्त था।

“आपने मुझे याद किया ?” मैंने दिल पर पत्थर रखकर एक ग़ुलाम की तरह अदब से पूछा।

“खूब, हम तो तुम अपनी औकात पहचानते जा रहे हो।”

मैं जवाब देने की बजाय ख़ामोश रहा तो त्रिवेणी ने गंभीरतापूर्वक कहा- “शकुंतला याद है तुम्हें ? वही बम्बई वाली, जो भागकर तुम्हारे साथ पूना आई थी। इन दिनों फिर पूना में है।”

“अच्छा, उसी मक्कार की वजह से मुझे इस मुसीबत में फँसना पड़ा।” मैं भावुक बन गया, “मगर आपको मेरे और उसके संबंधों का कैसे पता है ?”
 
“मुझे मालूम रहता है इसलिए मैं चाहता हूँ कि शकुंतला से तुम्हारा बदला...” त्रिवेणी ने गिलास में बची शराब को एक ही घूँट में हलक में उतारते हुए कहा, “आज की रात मैं उसी के साथ गुजारना चाहता हूँ। तुम उसे मेरे पास लाओगे।”

“मैं... ?” मैंने चौंककर पूछा।

“घबराओ नहीं! मैंने शकुंतला को अपने आदमियों से उठवाकर एक और जगह पहुँचवा दिया है। वहाँ से तुम उसे लेकर आओगे।” त्रिवेणी ने कहा।

काश, मेरे दोनों हाथ सलामत होते और मुझे मोहिनी के रहस्यमय ताकतों से ख़तरा न होता तो शायद मैं उसी वक्त त्रिवेणी की साँसें बंद कर देता। अपनी या उसकी जान एक कर देता। लेकिन परिस्थितियों ने मेरे हाथ-पाँव इस कदर जंजीरों में जकड़ लिये थे कि यदि त्रिवेणी मुझसे इससे भी घटिया काम लेता तो भी मैं इंकार न करता।

फिर मैं त्रिवेणी की आज्ञा पर ड्राइवर के साथ उस जगह पहुँचा जहाँ त्रिवेणी के जरखरीद गुंडों ने शकुंतला को क़ैद कर रखा था। मैं उसे गाड़ी में बिठाकर त्रिवेणी के शयनकक्ष में गया। रास्ते में शकुंतला ने मेरे सामने बड़े हाथ-पाँव जोड़े। लेकिन मैंने उसकी आवाज़ों की तरफ़ से अपने कानों को बंद कर रखे थे। शायद इसलिए कि उसने मुझे एक बार मेरी हमदर्दी के बावजूद पुलिस के हवाले कर दिया था।

त्रिवेणी ने शकुंतला को देखा तो मुस्कुरा दिया। कुछ देर तक वह शकुंतला के शारीरिक बनावट को किसी माहिर शिकारी की तरह देखता रहा। फिर मुझे संबोधित करके बोला- “मिस्टर राज, मुझे ख़ुशी है कि तुम अब सही रास्ते पर आते जा रहे हो।”

मैं चुप रहा तो त्रिवेणी ने फिर कहा- “अब इस छोकरी को शराब भी तुम पिलाओगे। जब नशे में मस्त हो जाए तो तुम कमरे से चले जाओगे और बाहर दरवाज़े पर खड़े होकर चौकीदारी करोगे। क्या समझे ?”

जो हुक्म मुझे दिए गए थे, उन्हें पूरा करना मेरे लिये मुश्किल था परंतु हालात के सामने मजबूर था। जिस तरह सुंदरलाल मेरे लिये जल्लाद साबित हुआ था, उसी तरह मैं शकुंतला का जल्लाद बन गया। पहले उसने हाथ-पाँव मारे फिर चीखने-चिल्लाने की कोशिश की। परंतु जब मैंने उसे बेहरमी से उसे मारा और अपने इकलौते हाथ का फंदा बनाकर उसका गला घोंटना चाहा तो वह सब कुछ करने के लिये तैयार हो गयी। मेरा जमीर मुझे धिक्कारता रहा। मेरे सीने में इंतकाम का जज़्बा मचलता रहा लेकिन मैं स्वयं को क़ाबू में किए रहा। जितनी देर तक शकुंतला नशे में धुत्त न हुई मैं वहाँ उपस्थित रहा। फिर जब मैंने देखा कि वह नशे में बहकी हुई त्रिवेणी की बाँहें याद कर रही है तो मैं उठ खड़ा हुआ।

“राज, तुम बाहर ही रहोगे। मुझे तुम्हारी आवश्यकता पड़ सकती है।”

“ठीक है!” मैंने दरवाज़े की तरफ़ बढ़ते हुए कहा। जाते समय शकुंतला की आवाज़ पिघले हुए शीशे की तरह मेरे सीने में उतरती रही। उसने त्रिवेणी से कहा-

“डार्लिंग, यह टुण्टा एक नम्बर का हरामी है। एक बार इसने मेरी इज़्ज़त पर डाका डालना चाहा। मगर भगवान ने मुझे बचा लिया।”

जवाब में त्रिवेणी ने क्या कहा मैं ठीक तौर पर न सुन सका। मेरे तन-बदन में आग लग रही थी। मैं तेज-तेज कदम उठाता बाहर आया और दरवाज़ा बंद करके राहदारी में टहलने लगा।

वक्त जैसे-जैसे गुजरता जाता मेरी आग उसी तरह भड़कती जाती। मुझे राहदारी में टहलते हुए डेढ़ घंटे से अधिक गुज़र चुका था। मेरा ज़हन चूने की भट्टी की तरह पक रहा था। और फिर बेकाबू होकर मैं तेजी के साथ पलटकर त्रिवेणी के शयनकक्ष के सामने आ गया। घुटनों के बल झुककर मैं चाबी वाले सुराख से अंदर झाँकने लगा।

अंदर वही खेल जारी था जो एक जमाने में मेरा भी सबसे दिलचस्प खेल रह चुका था। शकुंतला और त्रिवेणी दोनों औंधे हो रहे थे। मैंने धड़कते हुए दिल से पंजों के बल खड़े होकर दरवाज़े को अंदर की ओर धकेला और दबे कदम अंदर प्रविष्ट हुआ।

दाईं तरफ़ दीवार पर तलवारों का एक जोड़ा लटका हुआ था जिसे मैं पहले ही देख चुका था। मैंने धीरे से एक तलवार म्यान से खींच ली। घूमकर पंजों के बल त्रिवेणी की तरफ़ बढ़ने लगा। जो मेरी तरफ़ पीठ किए भूखे दरिंदे की तरह अपने शिकार पर टूट पड़ रहा था। शकुंतला आँखें बंद किए नशे में डूबी उसे दाद दे रही थी।

मैं एक-एक कदम फूँककर उठा रहा था। मुझे डर था कि कहीं त्रिवेणी को आने वाली जरा सी आहट भी सचेत न कर दे। त्रिवेणी और मेरे बीच का फासला हर क्षण कम होते जा रहा था और कम...कम...और कम।

और फिर मैं त्रिवेणी के ऊपर रुक गया। मैंने बड़ी फूर्ती से तलवार बुलंद की लेकिन दूसरे ही पल मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरे सिर पर जल्दी से कोई नश्तर चुभा रहा हो। तकलीफ़ इतनी तेज थी कि मैं तड़प उठा। मेरा ज़हन किसी अंधेरे में गोते लगाने लगा फिर मेरे कानों से एक सुरीली आवाज़ टकराई- “कमरे से बाहर निकलो नहीं तो मैं पलक झपकते ही तुम्हें खत्म कर दूँगी।”
 
‘मोहिनी, मेरी मोहिनी! यह तुम हो। क्या सच में तुम हो ?’ मैंने दिल में सोचा तो ख़ुशी से झूमता तेजी से बाहर निकल गया। तलवार इतनी खामोशी से म्यान में रखी जितनी खामोशी से उतरी थी।

अब मुझे त्रिवेणी की ज़िंदगी और मौत से कोई सरोकार नहीं था। मुझे मेरी मोहिनी, मेरी छिपकली वापस मिल गयी थी। वह उस वक्त मेरे सिर पर मौजूद थी। मैं उसके पंजों की जानी-पहचानी चुभन लगातार महसूस कर रहा था।

‘मोहिनी, मोहिनी! मेरी प्यारी मोहिनी।’ मैं उसे अपने सिर पर देख रहा था लेकिन क्या वह मेरी ही मोहिनी थी या वह त्रिवेणी की मोहिनी थी ? यह सब, यह सब मैं फिलहाल बयान नहीं कर सकता।

‘मोहिनी, मेरी मोहिनी! यह तुम हो ? क्या वाकई में तुम हो ?’ मैंने दिल में सोचा और अत्यधिक प्रसन्नता से बाहर आ गया।

तलवार को इतनी ही खामोशी से दोबारा म्यान में रख दिया जितनी खामोशी से निकाला। अब मुझे त्रिवेणी की ज़िंदगी और मौत से कोई सरोकार नहीं था। मुझे मेरी मोहिनी मिल गयी थी। वह मेरे सिर पर मौजूद थी। मैं उसके पंजों की जानी-पहचानी चुभन लगातार अपने सिर पर महसूस कर रहा था।

बाहर कारीडोर में आकर मैंने धीरे से दरवाज़ा बंद किया और त्रिवेणी के बेडरूम से बाहर निकल आया। फिर मैंने कल्पनाओं के संसार में दृष्टि दौड़ाई तो मोहिनी वहाँ मौजूद थी। वही मोहिनी जिसने मुझे सारे जहान की ख़ुशियों से भर डाला था और डॉली जैसी कभी न मिलने वाली चीज़ को मेरी झोली में डाला था। वही मेरी ज़िंदगी को तन्हा छोड़कर मुझसे रुखसत हो गयी थी और अब फिर वही मोहिनी मेरे सिर पर मौजूद थी परंतु मैं यह देखकर चकित रह गया था कि मोहिनी की आँखों में मेरे लिये प्रेम न था। लगाव का कोई भाव न था। वह क्रोधित स्थिति में खड़ी भयानक गजबनाक अंदाज में मुझे घूर रही थी। उसके पंजे अभी तक मेरी त्वचा में पेवस्त थे। मैं अवाक सा रह गया था।

फिर इससे पहले कि मैं उसे संबोधित करता मोहिनी ने बिखरे हुए स्वर में अजनबियों की तरह कहा- “कुँवर राज, तुमने मेरे आका पर आक्रमण करने का साहस कैसे किया ?”

“मोहिनी!” मैंने बड़े भावुक स्वर में कहा, “मैंने तुम्हें प्राप्त करने के लिये मोहिनी। यह मैं हूँ राज। यह तुम कैसी बातें कर रही हो ?”

“बकवास मत करो!” मोहिनी ने चमक कर कहा– “मैं अपने आका के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं सुन सकती।”

“तो क्या अब तुम्हें मुझसे कोई हमदर्दी नहीं रही ? यह सब कुछ छल था, झूठ था मोहिनी ? मेरी जान, ऐसी अजनबी स्वर में बातें मत करो। मेरी हालत देखो। देखो मैं क्या हो गया हूँ। देखो! संसार ने मुझपर कैसे सितम ढाये है। अब तो मेरे पास कुछ भी नहीं। इतने दिनों की प्रार्थनाओं के बाद तुम आई तो ऐसी बातें कर रही हो जैसे हमारी कभी कोई जान-पहचान न रही हो ?”

“मूर्खता की बातें मत करो राज।” मोहिनी ने तीखे स्वर में जवाब दिया– “तुम जो कुछ थे मुझे उससे कोई सरोकार नहीं। तुम्हारा अतीत झूठा स्वप्न था या वास्तविक, मुझसे उससे कोई मतलब नहीं। मेरा नाम मोहिनी है। मेरे आका ने मुझे प्राप्त किया है और मैं उसकी दासी हूँ। जो बीत गया उसे भूल जाओ और नहीं भूलते तो मत भूलो।”

मोहिनी की इस बेरुखी से मेरी आँखें छलक पड़ी। मेरा काँच जैसा दिल चूर-चूर हो गया। मैंने मोहिनी को हसरत भरी दृष्टि से देखा और कहा- “क्या वास्तव में तुम्हें कुछ याद नहीं आता। तुम जो मेरे लिये रोती थी, क्या तुम मेरी बर्बादी पर ख़ुश हो ?”
 
“सुनो कुँवर राज, अब इस बात को सपना समझकर भूल जाओ। मेरे आका ने भी तुम्हें यही सुधाव दिया था।” मोहिनी ने अत्यंत खुश्क स्वर में बोली, “औरतों के समान रोना-धोना छोड़ो और मर्द बनकर हालात का मुकाबला करो। यह सदा याद रखना कि तुमने मेरे आका की ओर ग़लत दृष्टि से देखा, तो मैं तुम्हें भयानक हालात में फँसा देने से भी पीछे नहीं हटूँगी। मेरी ओर से किसी प्रकार की हमदर्दी का सपना भी मत देखना।”

मेरा मन चाहा कि मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व को पैरों तले कुचल कर सुरमा बना दूँ। कल तक मैं इसी मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व को जीवित रखने की ख़ातिर निर्दोष स्त्री-पुरुष का लहू बहाता रहा और आज वही मोहिनी मुझसे यूँ उखड़ी-उखड़ी बातें कर रही थी मानो हमारे बीच कोई जान-पहचान न रही हो।

मैं दिल ही दिल में ताव खाता रहा कि मोहिनी बोली- “एक बात अच्छी प्रकार से अपने दिमाग़ में रख लो जो आका का आदेश हो, उस पर बिना किसी झिझक का काम करते रहो। मोहिनीरने की चेष्टा की तो मौत भी तुमसे रूठ जाएगी।”

“मोहिनी!” मैंने रोते हुए कहा, “यदि तुम वास्तव में रहस्यमय शक्तियों की मालिक हो तथा ज़िंदगी तुम्हारे वश में है तो मुझपर एक उपकार करो। मुझे मार डालो।”

“यह भी हो सकता है लेकिन इसके लिये मेरे आका का संकेत आवश्यकता है।” मोहिनी ने नफ़रत से उत्तर दिया। फिर कूदकर मेरे सिर से छिपकली की तरह रेंगती हुई उतर गयी।

मेरा दिमाग़ बोझिल हो रहा था। मेरी स्थिति उस समय एक ऐसे जुआरी जैसी थी जो जीतने की तमन्ना में अपनी सारी पूँजी भी हार बैठा हो। मेरे लिये अब केवल एक ही रास्ता था कि मैं मोहिनी के अस्तित्व को और अपने अतीत को शुरू से अंत तक एक सुनहरा सपना समझ कर भूल जाऊँ। परंतु त्रिवेणी, मैं त्रिवेणी को कैसे भूल सकता था जिसने न जाने कौन सा जाप करके मोहिनी के साथ-साथ मेरा सबकुछ मुझसे छीन लिया था। मेरा दिल खून के आँसू रो रहा था। मैं अपनी सोचों में डूबा था कि त्रिवेणी की कठोर आवाज़ मेरे कानों से टकराई।

वह बेडरूम के द्वार पर खड़ा मुझे आवाज़ दे रहा था। मैं किसी ग़ुलाम की तरह उसकी आवाज़ सुनकर उसके निकट पहुँचा तो उसने मुझे क्रोध भरी दृष्टि से घूरते हुए कहा- “मैं देख रहा हूँ कि तुम फिर अपनी औकात भूलते जा रहे हो।”

“मैं क्षमा चाहता हूँ श्रीमान जी।” मैंने होंठ काटते हुए धीरे से उत्तर दिया।

“मैंने शकुंतला का मान खाक में मिला दिया है। अब तुम्हें उसके नापाक अस्तित्व को खाक में मिलाना है। बाहर मेरी गाड़ी मौजूद है। शकुंतला को ड्राइवर के साथ ले जाओगे। उसी जगह तुम्हारी परीक्षा होगी। क्या तुम समझ रहे हो उसके बाद तुम्हें क्या करना होगा ?”

“मैं जानता हूँ।” मैंने मुर्दाने स्वर में कहा, “मुझे पता है श्रीमान जी।”

त्रिवेणी भीतर चला गया। कुछ देर बाद वह शकुंतला को लेकर बाहर आया। शकुंतला के कदम अब भी लड़खड़ा रहे थे। त्रिवेणी ने उसे मेरे साथ जाने को कहा तो वह हिचकी लेकर बोली।

“प्लीज डार्लिंग, मुझे किसी और के साथ भेज दो। मैं इस टुण्टे के साथ नहीं जाऊँगी।”

“अरे नहीं, नहीं!” त्रिवेणी ने मेरी उपस्थिति में शकुंतला को अपने सीने से लगाकर होंठो का चुम्बन लिया फिर बोला, “यह मेरा ग़ुलाम है। यदि इसने कोई ऐसी-वैसी हरकत की तो मैं इसे गोली मार दूँगा।”

शकुंतला ने मेरी ओर देखा और फिर मुस्कुरा दी। त्रिवेणी उसे गाड़ी तक छोड़ने आया। शकुंतला ड्राइवर के साथ अगली सीट पर बैठ गयी तो मैं खामोशी के साथ पिछली सीट पर बैठ गया।

“देखो टुण्टे, यदि तुमने मेरी आज्ञा के विरुद्ध कोई काम किया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।” त्रिवेणी ने मुझे संबोधित करते हुए कहा। फिर शकुंतला का कंधा दबाकर गाड़ी से कुछ दूर हो गया।

गाड़ी त्रिवेणी के दूर हटते ही हरकत में आ गयी। बाहर चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। रात आधी से अधिक गुज़र चुकी थी। शकुंतला अपनी सीट पर टेक लगाए आँखें बंद किए कुछ गुनगुना रही थी। मैं पिछली सीट पर बैठा इस बात का इंतज़ार कर रहा था कि कब गाड़ी रुके और मैं शकुंतला को बाहर घसीट कर मौत के घाट उतार दूँ। यूँ भी मोहिनी के रूठ जाने के बाद मुझे जीवन के हंगामों से कोई रुचि नहीं रह गयी थी।
 
आधे घंटे तक गाड़ी तेज गति से विभिन्न सड़कों पर चकराती रही। फिर एक मैदानी भाग के निकट पहुँचकर रुक गयी। शकुंतला जो अभी तक आँखें बंद किए गुनगुनाने में मग्न थी, गाड़ी रुकते ही आँखें खोल दी। परंतु आसपास नजरें डालकर चौंककर बोली- “इडियट, यह तुम मुझे कहाँ ले आए ?”

इससे पहले कि ड्राइवर कोई उत्तर देता मैं पिछला दरवाज़ा खोलकर तेजी से नीचे उतरा और शकुंतला के सामने आकर खड़ा हो गया। अब वह समय आ गया था जब मैं उस नीच लड़की से अपना इंतकाम ले सकता था।

त्रिवेणी का आदेश भी यही था कि उसे मौत की घाट उतार दूँ ताकि मोहिनी का रहस्यमय अस्तित्व उसके खून से अपना जीवन ज़िंदा रख सके।

“शकुंतला देवी, नीचे उतर आओ! यहीं तुम्हारी मंज़िल है।” मैंने ठंडे स्वर में शकुंतला को संबोधित किया तो वह बड़ी तीव्रता से मेरी ओर पलटकर क्रोध से काँपती हुई बोली-

“टुण्टे, अपनी ख़ाल में रह! अगर त्रिवेणी को पता चल गया तो वह तेरी चमड़ी उधेड़ डालेगा।”

“जो कुछ होगा बाद में होगा। इससे पहले मैं तनिक जी भरकर तुम्हारे दर्शन तो कर लूँ शकुंतला देवी।” मैं क्रोध से होंठ चबाते हुए कहा और फिर दरवाज़ा खोला और फिर शकुंतला का हाथ थामकर उसे घसीट लिया। वह भयभीत आवाज़ में कराहती हुई कार से नीचे आ गिरी। फिर वह तेजी से उठी और बोली।

“मैं त्रिवेणी से तेरी शिकायत ज़रूर करूँगी।”

जवाब में मेरा इकलौता हाथ घूम गया। शकुंतला चीख कर नीचे गिरी थी। मैंने इस बार उसे सँभलने का वक्त नहीं दिया और उछलकर उसकी छाती पर चढ़ बैठा और हाथ की उंगलियाँ उसकी सुराहीदार गर्दन पर जमा दी। शकुंतला का नर्म और नाज़ुक जिस्म मेरे बोझ तले फड़फड़ाने लगा। उसकी नशीली आँखों से अब मौत का भयानक तस्सव्वुर झाँक रहा था। उसने अचानक सहमी हुई आवाज़ में गिड़गिड़ाते हुए कहा।

“मैं त्रिवेणी से कुछ नहीं कहूँगी, तुम जो कुछ चाहते हो ले लो। मेरा वचन है मैं अपनी जुबान बंद रखूँगी। भगवान के लिये मुझे छोड़ दो।”

अगर कोई और अवसर होता तो संभव था मैं एक हसीन औरत की सहमी हुई प्रार्थना को अवश्य ही स्वीकार कर लेता लेकिन इस समय प्रतिशोध की आग मुझे अंधा किए दे रही थी। मैंने अपना पूरा बोझ जो अभी तक अपनी टाँगों पर उठाए हुआ था, शकुंतला के सीने पर डाल दिया। वह जाल में फँसे हुए किसी मासूम और भयभीत पंछी की तरह फड़फड़ाई थी। उसने मुझसे कुछ कहना चाहा लेकिन मैंने इतनी ज़ोर से उसका गला दबाया कि उसके खुले हुए होंठ भिंच कर रह गए। और आँखें पलक झपकते ही उबल कर पलकों से बाहर आ गयी। मेरे नीचे उसके जिस्म ने दो-चार झटके खाए। फिर उसका जिस्म हमेशा के लिये सांकित पड़ गया। शकुंतला को मारने के बाद मैं खामोशी के साथ उठ गया और गाड़ी में आकर बैठ गया।

“क्या तुम्हें इस बात का विश्वास है कि लड़की मर चुकी है ?” ड्राइवर ने जानकारी चाही।

“हाँ!” मैंने ठहरे स्वर में उत्तर दिया। फिर अपने आप को चैन देने के लिये सिर सीट की पुश्त पर टीका दिया। गाड़ी दोबारा हरकत में आ गयी। मैं सीट से सिर टिकाए बेसुध हो गया।

मुझे विश्वास था कि मोहिनी इस समय शकुंतला के खून से अपने अस्तित्व को डुबोए होगी और सुबह जब पुलिस को शकुंतला की लाश मिलेगी तो उसमें खून की एक बूँद भी न होगी।

मैं सोचता रहा फिर एकाएक मैं यों चौंककर उठा जैसे धुप्प अंधेरे में रोशनी की कोई किरण नज़र आई हो। मेरे दिल की धड़कने तेज होने लगीं।

मैं बड़ी गंभीरता से गौर करने लगा कि यदि यह अवसर भी हाथ से निकल गया तो फिर मैं सारी ज़िंदगी सफलता का मुँह नहीं देख सकता।

मुझे इस बात का अच्छी तरह ज्ञान था कि मोहिनी का रहस्यमय अस्तित्व जब इंसानी खून पीने में व्यस्त होता है तो उसे उस समय तक किसी और बात का ध्यान नहीं रहता जब तक वह जी भरकर खून न पी ले। मुझे इस बात अनुभव हो चुका था कि मोहिनी खून पीने में तीन चार घंटा व्यस्त रहती है।

अर्थात मेरे पास तीन घंटे का समय था। इस समय में मैं त्रिवेणी को मौत के घाट उतार कर दोबारा मोहिनी को प्राप्त कर सकता था। मुझे पूरी आशा थी कि त्रिवेणी की मौत के बाद मोहिनी आज़ाद हो जाएगी और दोबारा मुझे मिल जाएगी।

मैं अपनी सीट पर सँभल कर बैठ गया। मेरी रक्त का संचार तेज हो गया। तेज और तेज होता गया।
 
मैं अपनी सीट पर सँभल कर बैठ गया। मेरी रक्त का संचार तेज हो गया। तेज और तेज होता गया।

मेरे पास केवल तीन घंटे का समय था। तीन घंटे मेरी ज़िंदगी का रुख़ पलट सकते थे। सफलता की सूरत में मैं फिर बड़ा आदमी बन सकता था।

मेरा मस्तिष्क बड़ी तेजी से काम कर रहा था। मुझे इस बात का पूरा विश्वास था कि शकुंतला का खून पीने में कम से कम तीन घंटे अवश्य व्यतीत करेगी।

अपनी सीट पर बैठा आने वाली परिस्थितियों के लिये अपने को तैयार कर रहा था। मेरी दृष्टि सामने वीरान सड़क पर जमी थी। त्रिवेणी का ड्राइवर ख़ामोश बैठा था और मैं अपनी योजना के प्रत्येक पहलू को जाँचने में व्यस्त था कि एकाएक ड्राइवर ने गाड़ी को बायीं ओर मोड़ दिया और कुछ दूर जाकर एक चार मंजिला इमारत के सामने रोक दिया।

“क्यो ?” मैंने ड्राइवर को परेशान निगाहों से देखते हुए पूछा– “तुमने गाड़ी यहाँ क्यों रोक दी ?”

“तुम गाड़ी में बैठो। मैं अपनी पत्नी से एक आवश्यक बात करके आता हूँ।”

“क्या तुम इस इमारत में रहते हो ?”

“हाँ!” ड्राइवर ने मुस्कराते हुए कहा और फिर वह गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकलना ही चाहता था कि मैंने उसे बाज़ू से थामकर रोकते हुए कहा-” त्रिवेणी ने हमें तुरंत वापसी का आदेश दिया था। उसे हमारा इंतज़ार होगा। तुम अपनी पत्नी से फिर मिल लेना।”

“चिंता मत करो! मैं दस-पंद्रह मिनट से अधिक नहीं लूँगा।”

“नहीं!” मैंने कठोर स्वर में कहा– “मेरी बात मानो। जो मैं कहता हूँ उसे सुनो। तुम्हें पहले त्रिवेणी की कोठी चलना होगा।”

“क्या मतलब ?” ड्राइवर ने मेरा हाथ बड़ी नफ़रत से झिड़कते हुए कहा, “ख़बरदार जो तूने फिर कभी अपना ग़लत हाथ मेरे शरीर पर लगाया। टुण्टे कहीं के।”

मेरे मस्तिष्क में इस समय केवल एक ही विचार मँडरा रहा था। मुझे शीघ्रताशीघ्र कोठी पहुँचकर त्रिवेणी को ठिकाने लगा देना चाहिए।”

ऐसी सूरत में ड्राइवर का अपनी पत्नी के पास जाना समय नष्ट करना था। मैं इस सुनहरे अवसर को किसी भी मूल्य पर गँवाने के लिये तैयार नहीं था। फिर जिस अंदाज़ में ड्राइवर ने मुझे टुण्टा कहा था वह भी मेरा खून खौलाने के लिये प्रयाप्त था। मैंने बिगड़ते हुए उसे संबोधित किया।

“सुनो, अगर तुम्हें अपना जीवन प्यारा है तो पहले मुझे कोठी पहुँचा दो। उसके बाद तुम जहाँ मर्जी वहाँ जा सकते हो।”

“अबे जा!” ड्राइवर ने मुझे एक गंदी गाली दी। फिर पलटकर गाड़ी से उतरना ही चाहता था कि मैंने झपट कर उसे दबोच लिया। मेरा इकलौता हाथ उसके गले में फाँसी के फंदे की तरह पहुँच गया।

फिर उसका कंठ घुटने लगा। स्पष्ट था कि मैं मोहिनी को दोबारा पाने के लिये सब कुछ कर गुजरने के लिये तैयार था।

“भगवान के लिये मुझे छोड़ दो। तुम जो कहोगे मैं वही करूँगा।”

ड्राइवर के मुख से फँसी-फँसी आवाज़ निकली तो मेरा खून और खौल उठा। मौत को सामने देखकर मैंने बड़े-बड़े शूरमाओं को ज़िंदगी के लिये भीख माँगते देखा था। लेकिन इस समय मैं ज़िंदगी और मौत के फलसफे पर गौर करने से अधिक इस बार की फ़िक्र में था कि जल्द से जल्द ड्राइवर को ठिकाने लगाकर त्रिवेणी के पास पहुँचू। अतः मैंने सारी शक्ति समेटकर अपने शिकंजे को और तंग करना शुरू कर दिया।

ड्राइवर ने छुटकारा पाने के लिये बहुत हाथ-पाँव मारे लेकिन कुछ देर बाद ही वह बेदम होकर मेरे ऊपर झूल गया। मैं नहीं समझ सका कि वह मर गया है या बेहोश हो गया है। मैंने उसे बड़ी फूर्ती से घसीट कर पिछली सीट पर डाल दिया और स्वयं उसकी जगह सँभाल ली। एक हाथ से गाड़ी चलाना बहुत कठिन काम था और गाड़ी चलाते हुए मुझे दिन भी काफ़ी बीत चुके थे। किंतु मैंने उसे समय अपनी तमाम इन्द्रियों को जागृत किया और अपनी सारी कलाएँ दाँव पर लगा दी। स्टेयरिंग को अपने एक हाथ से क़ाबू में लिया। गाड़ी बड़ी तेजी से घूमकर दोबारा उसी सड़क पर आ गयी। जो त्रिवेणी कोठी की ओर जाती थी।
 
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