(UPDATE-51)
रेस्ट हाउस तक पहुंच जाए. पर उसने ऐसा ना करने की बजाए कही और चला गया. पर क्यों???" परवेज़ अब भी सवालों के घेरे में घिरा हुआ था.
"हो सकता है सरकार, की इस जानवर को मारने के बाद उन्हें कोई और जानवर दिख गया हो या फिर वो उन्हें मारने की कोशिश कर रहा हो. और वो उसी से बचते बचाते हुए कही दूर निकल गये होंगे." भीमा ने शंका जाहिर की.
"हम..मुझे भी कुछ ऐसा ही लग रहा है. खैर यहां खड़े रहने से और बातें करने से कोई फायदा नहीं होगा. बल्कि हमें आगे बढ़ना चाहिए. मेरे ख्याल से हमें इस खाई की और आगे बढ़ना चाहिए जहाँ से इसकी ढलान कम होती होगी. हो सकता है रोहन यही सोच कर आगे बढ़ा होगा की ढलान अगर कम हो जाए तो रोड पर जाकर किसी की मदद माँग लेगा."
"ठीक है जैसा तुम ठीक समझो" परवेज़ ने कहा.
फिर वो तीनों उसी दिशा की और बढ़ने लगे. अभी वो कुछ देर ही आगे तरफ पाए थे की तभी, भीमा को अपने डायन और की झाड़ियों में जैसे कुछ सुरसूराहट सी आवाज़ आने लगी. पहले तो उसने अपना वहाँ समझ कर कोई ध्यान नहीं दिया. लेकिन कुछ दूर और आगे बढ़ने पर उसे फिर वही सुरसूराहट दोबारा सुनाई दी तो हूँ ठिठक कर रुक गया. और उस झाड़ियों की और देखने लगा.
"क्या हुआ भीमा?" भीमा को अपने पीछे ना आता हुआ देख कर परवेज़ ने उससे पूछा.
"स्शह.." भीमा अपनी उंगली से परवेज़ को खँसो रहने के लिए कहा और अपने हाथ के इशारे से बताने लगा की वहां पर कुछ है. सुशांत भी देख लिया था की भीमा रुक गया है और उस झाड़ियों की और देख कर किसी के होने का इशारा कर रहा है. भीमा के इशारा करने पर सुशांत और परवेज़ अपनी अपनी गुण संभाल लिए और उसी झाड़ियों की तरफ बढ़ने लगे. अभी वो तीनों कुछ ही दूर गये थे की तभी उन्हें कुछ लाल सी रोशनी सा दिखा. यह देख कर वो रुके और सोचने लगे की यह क्या चीज़ है. वो अभी कुछ समझ पाते की इससे पहले हूँ लाल रोशनी आगे की और बढ़ने लगी. जब हूँ लाल रोशनी उनके कुछ करीब आई तो उन्हें पता चला की वो कोई लाल रोशनी नहीं थी बल्कि वो लावे से भारी हुई आँखें थी. और उस आँखों का मालिक कोई और नहीं वैसा ही एक दरिन्दा था जिसे उन्होंने वहां पर मारा हुआ पाया था. उन्हें उस वक्त वो दरिन्दा मारा हुआ जितना भयानक लग रहा था उससे कही ज्यादा उन्हें वो वहशी, ज़िंदा रहते हुए लग रहा था. वो दरिन्दा अब उन्हीं की और तरफ रहा था उन्हें अपना अगला शिकार बनाना के लिए. उसे अपनी तरफ बढ़ता देख भीमा की चीख निकल गयी.
"यययययएह..कयययया.हाीइ.हे भगवान. बचाऊओ.." चिल्लाता हुआ भीमा अपनी उल्टी दिशा में भागने लगा लेकिन, उसे भागने का कोई मौका ही नहीं मिला क्योंकि, वो वहशी दरिन्दा अपने मुंह से एक भयानक दहाड़ निकालते हुए भीमा को अपने तेज नाखूनओ वाले पंजे से पकड़ा और झट से उसकी गर्दन उसके धड़ से आज़ाद कर दिया. भीमा को तो अपनी मौत का मातम करने का भी समय नहीं मिला. परवेज़ और सुशांत तो मानो एकदम सुन्न से हो गये थे, जैसे उनके बदन में कोई खून ही ना हो. अभी वो दरिन्दा भीमा को चियर फाड़ ही रहा था की सुशांत को जैसे होश आ गया की उसने अभी अभी क्या देखा है और भीमा के साथ क्या हुआ है. उसे ख्याल आया की अगर हूँ ऐसे ही खड़ा रहा तो यह हैवान उन्हें भी नीवाला बना देगा. उसने जल्दी से अपनी गुण उस दरिंदे की और तानी और निशाने लेते हुए उस दरिंदे के दिमाग में गोलियाँ दागने लगा. वो जब तक गोलियाँ चलता रहा जब तक वो दरिन्दा मर नहीं गया. कुछ देर जब उसे लगा की यह मर गया है तो वो गोलियाँ चलना बंद कर दिया. दहशत के मारे परवेज़ और सुशांत के मुंह से कोई आवाज़ ही नहीं निकल रही थी. वो दोनों एक दूसरे की और देख रहे थे. मानो पूंछ रहे हो की यह एकदम से क्या हो गया.अभी उन्हें संभालने का वक्त भी नहीं मिला था की तभी परवेज़ ने देखा की सुशांत से थोड़ी दूरी पर दो वही वहशी दरिंदे दहाड़ते हुए आ रहे है. सुशांत भी उनकी दहाड़ सुनकर पलटकर देखने लगा उन हैवानो को. एक पल के लिए वो फिर से वही जम सा गया की तभी..परवेज़ ने चिल्लाकर कहा.
"सुशांत भागो..जल्दी.हम उनका मुकाबला अपनी बंदूक से नहीं कर पाएँगे. जितनी जल्दी हो सके भागो यहां से.." परवेज़ की आवाज़ सुशांत के कानों में पढ़ते ही जैसे उसके पैर में जान आई हो और फिर वो भी परवेज़ के साथ में भागने लगा. वो दोनों इतनी तेजी से भाग रहे थे जैसे वो मॅरतॉन दौड़ रहे हो. जैसे उन्हें अव्वल आना हो. कुछ देर तक ऐसे ही भागते भागते जब उन्हें इस बात का एहसास हुआ की अब वो खूनी दरिंदे उनके पीछे नहीं है तो दोनों रुके और अपनी अपनी साँसें बेहाल करने लगे.
"यह क्या..
रेस्ट हाउस तक पहुंच जाए. पर उसने ऐसा ना करने की बजाए कही और चला गया. पर क्यों???" परवेज़ अब भी सवालों के घेरे में घिरा हुआ था.
"हो सकता है सरकार, की इस जानवर को मारने के बाद उन्हें कोई और जानवर दिख गया हो या फिर वो उन्हें मारने की कोशिश कर रहा हो. और वो उसी से बचते बचाते हुए कही दूर निकल गये होंगे." भीमा ने शंका जाहिर की.
"हम..मुझे भी कुछ ऐसा ही लग रहा है. खैर यहां खड़े रहने से और बातें करने से कोई फायदा नहीं होगा. बल्कि हमें आगे बढ़ना चाहिए. मेरे ख्याल से हमें इस खाई की और आगे बढ़ना चाहिए जहाँ से इसकी ढलान कम होती होगी. हो सकता है रोहन यही सोच कर आगे बढ़ा होगा की ढलान अगर कम हो जाए तो रोड पर जाकर किसी की मदद माँग लेगा."
"ठीक है जैसा तुम ठीक समझो" परवेज़ ने कहा.
फिर वो तीनों उसी दिशा की और बढ़ने लगे. अभी वो कुछ देर ही आगे तरफ पाए थे की तभी, भीमा को अपने डायन और की झाड़ियों में जैसे कुछ सुरसूराहट सी आवाज़ आने लगी. पहले तो उसने अपना वहाँ समझ कर कोई ध्यान नहीं दिया. लेकिन कुछ दूर और आगे बढ़ने पर उसे फिर वही सुरसूराहट दोबारा सुनाई दी तो हूँ ठिठक कर रुक गया. और उस झाड़ियों की और देखने लगा.
"क्या हुआ भीमा?" भीमा को अपने पीछे ना आता हुआ देख कर परवेज़ ने उससे पूछा.
"स्शह.." भीमा अपनी उंगली से परवेज़ को खँसो रहने के लिए कहा और अपने हाथ के इशारे से बताने लगा की वहां पर कुछ है. सुशांत भी देख लिया था की भीमा रुक गया है और उस झाड़ियों की और देख कर किसी के होने का इशारा कर रहा है. भीमा के इशारा करने पर सुशांत और परवेज़ अपनी अपनी गुण संभाल लिए और उसी झाड़ियों की तरफ बढ़ने लगे. अभी वो तीनों कुछ ही दूर गये थे की तभी उन्हें कुछ लाल सी रोशनी सा दिखा. यह देख कर वो रुके और सोचने लगे की यह क्या चीज़ है. वो अभी कुछ समझ पाते की इससे पहले हूँ लाल रोशनी आगे की और बढ़ने लगी. जब हूँ लाल रोशनी उनके कुछ करीब आई तो उन्हें पता चला की वो कोई लाल रोशनी नहीं थी बल्कि वो लावे से भारी हुई आँखें थी. और उस आँखों का मालिक कोई और नहीं वैसा ही एक दरिन्दा था जिसे उन्होंने वहां पर मारा हुआ पाया था. उन्हें उस वक्त वो दरिन्दा मारा हुआ जितना भयानक लग रहा था उससे कही ज्यादा उन्हें वो वहशी, ज़िंदा रहते हुए लग रहा था. वो दरिन्दा अब उन्हीं की और तरफ रहा था उन्हें अपना अगला शिकार बनाना के लिए. उसे अपनी तरफ बढ़ता देख भीमा की चीख निकल गयी.
"यययययएह..कयययया.हाीइ.हे भगवान. बचाऊओ.." चिल्लाता हुआ भीमा अपनी उल्टी दिशा में भागने लगा लेकिन, उसे भागने का कोई मौका ही नहीं मिला क्योंकि, वो वहशी दरिन्दा अपने मुंह से एक भयानक दहाड़ निकालते हुए भीमा को अपने तेज नाखूनओ वाले पंजे से पकड़ा और झट से उसकी गर्दन उसके धड़ से आज़ाद कर दिया. भीमा को तो अपनी मौत का मातम करने का भी समय नहीं मिला. परवेज़ और सुशांत तो मानो एकदम सुन्न से हो गये थे, जैसे उनके बदन में कोई खून ही ना हो. अभी वो दरिन्दा भीमा को चियर फाड़ ही रहा था की सुशांत को जैसे होश आ गया की उसने अभी अभी क्या देखा है और भीमा के साथ क्या हुआ है. उसे ख्याल आया की अगर हूँ ऐसे ही खड़ा रहा तो यह हैवान उन्हें भी नीवाला बना देगा. उसने जल्दी से अपनी गुण उस दरिंदे की और तानी और निशाने लेते हुए उस दरिंदे के दिमाग में गोलियाँ दागने लगा. वो जब तक गोलियाँ चलता रहा जब तक वो दरिन्दा मर नहीं गया. कुछ देर जब उसे लगा की यह मर गया है तो वो गोलियाँ चलना बंद कर दिया. दहशत के मारे परवेज़ और सुशांत के मुंह से कोई आवाज़ ही नहीं निकल रही थी. वो दोनों एक दूसरे की और देख रहे थे. मानो पूंछ रहे हो की यह एकदम से क्या हो गया.अभी उन्हें संभालने का वक्त भी नहीं मिला था की तभी परवेज़ ने देखा की सुशांत से थोड़ी दूरी पर दो वही वहशी दरिंदे दहाड़ते हुए आ रहे है. सुशांत भी उनकी दहाड़ सुनकर पलटकर देखने लगा उन हैवानो को. एक पल के लिए वो फिर से वही जम सा गया की तभी..परवेज़ ने चिल्लाकर कहा.
"सुशांत भागो..जल्दी.हम उनका मुकाबला अपनी बंदूक से नहीं कर पाएँगे. जितनी जल्दी हो सके भागो यहां से.." परवेज़ की आवाज़ सुशांत के कानों में पढ़ते ही जैसे उसके पैर में जान आई हो और फिर वो भी परवेज़ के साथ में भागने लगा. वो दोनों इतनी तेजी से भाग रहे थे जैसे वो मॅरतॉन दौड़ रहे हो. जैसे उन्हें अव्वल आना हो. कुछ देर तक ऐसे ही भागते भागते जब उन्हें इस बात का एहसास हुआ की अब वो खूनी दरिंदे उनके पीछे नहीं है तो दोनों रुके और अपनी अपनी साँसें बेहाल करने लगे.
"यह क्या..