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Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

गाण्ड मारे सैंया हमारो

मैंने आपको अपनी पिछली कहानी

हुई चौड़ी चने के खेत में

जो कई भागों में है, में बताया था कि अपनी जोधपुर यात्रा के दौरान मैंने जगन के साथ उन चार दिनों में अपनी जवानी का भरपूर मज़ा लिया और दिया था लेकिन अब उन चार दिन की चाँदनी के बाद तो फिर से मेरी जिंदगी में अंधेरी रातें ही थी, मेरे दिल में एक कसक रह गई थी कि जगन के लाख मिन्नतें करने के बाद भी मैंने उससे अपनी गाण्ड क्यों नहीं मरवाई !

सूरत लौट आने के बाद मैंने गणेश के साथ कई बार कोशिश की पर आप तो जानते ही हैं वो ढंग से मेरी चूत ही नहीं मार सकता तो भला गाण्ड क्या मारता !

जगन के मोटे और लंबे लौड़े से चुदने के बाद तो अब रात में गणेश के साथ चुदाई के दौरान मुझे अपनी चूत में एक ख़ालीपन सा ही महसूस होता रहता और कोई उत्तेजना भी महसूस नहीं होती थी। मेरे मन में दिन रात किसी मोटे और तगड़े लण्ड से गाण्ड चुदाई का ख्याल उमड़ता ही रहता था।

हमारा घर दो मंज़िला है, नीचे के भाग में सास-ससुर रहते हैं और हमारा शयनकक्ष ऊपर के माले पर है, हमारे शयनकक्ष की पिछली खिड़की बाहर गली की ओर खुलती है जिसके साथ एक पार्क है, पार्क के साथ ही एक खाली प्लॉट है जहाँ अभी मकान नहीं बना है, लोग वहाँ कूड़ा करकट भी डाल देते हैं और कई बार तो लोग सू सू भी करते रहते हैं।

उस दिन मैं सुबह जब उठी तो तो मेरी नज़र खिड़की के बाहर पार्क के साथ लगती दीवार की ओर चली गई. मैंने देखा एक 18-19 साल का लड़का दीवाल के पास खड़ा सू सू कर रहा है, वो अपने लण्ड को हाथ में पकड़े उसे गोल गोल घुमाते हुए सू सू कर रहा है।

मैंने पहले तो ध्यान नहीं दिया पर बाद में मैंने देखा कि उस जगह पर दिल का निशान बना है और उसके अंदर पिंकी नाम लिखा है।

मेरी हँसी निकल गई। शायद वा उस लड़के की कोई प्रेमिका होगी। मुझे उसकी इस हरकत पर बड़ा गुस्सा और मैं उसे डाँटने को हुई पर बाद में मेरी नज़र उसके लण्ड पर पड़ी तो मैं तो उसे देखती ही रह गई, हालाँकि उसका लण्ड अभी पूर्ण उत्तेजित तो नहीं था पर मेरा अन्दाज़ा था कि अगर यह पूरा खड़ा हो तो कम से कम 8-9 इंच का तो ज़रूर होगा और मोटाई भी जगन के लण्ड से कम नहीं होगी।

अब तो रोज़ सुबह-सुबह उसका यह क्रम ही बन गया था।

सच कहूँ तो मैं भी सुबह सुबह इतने लंबे और मोटे लण्ड के दर्शन करके धन्य हो जाया करती थी।

कई बार रब्ब भी कुछ लोगों पर खास मेहरबान होता है और उन्हें इतना लंबा और मोटा हथियार दे देता है !

काश मेरी किस्मत में भी ऐसा ही लण्ड होता तो मैं रोज़ उसे अपने तीनों छेदों में लेकर धन्य हो जाती।

पर पिछले 2-3 दिनों से पता नहीं वो लड़का दिखाई नहीं दे रहा था। वैसे तो वो हमारे पड़ोस में ही रहता था पर ज़्यादा जान-पहचान नहीं थी। मैं तो उसके लण्ड के दर्शनों के लिए मरी ही जा रही थी।

उस दिन दोपहर के कोई दो बजे होंगे, सास-ससुर जी तो मुरारी बापू के प्रवचन सुनने चले गये थे और गणेश के दुकान जाने के बाद काम करने वाली बाई भी सफाई आदि करके चली गई थी और मैं घर पर अकेली थी। कई दिनों से मैंने अपनी झाँटें साफ नहीं की थी, पिछली रात को गणेश मेरी चूत चूस रहा था तो उसने उलाहना दिया था कि मैं अपनी झाँटें सॉफ रखा करूँ !

नहाने से पहले मैंने अपनी झाँटें सॉफ करके अपनी लाडो को चकाचक बनाया, उसके मोटे होंठों को देख कर मुझे उस पर तरस आ गया और मैंने तसल्ली से उसमें अंगुली करके उसे ठंडा किया और फिर बाथटब में खूब नहाई।

गर्मी ज़्यादा थी, मैंने अपने गीले बालों को तौलिए से लपेट कर एक पतली सी नाइटी पहन ली। मेरा मूड पेंटी और ब्रा पहनने का नहीं हो रहा था। बार-बार उस छोकरे का मोटा लण्ड ही मेरे दिमाग़ में घूम रहा था। ड्रेसिंग टेबल के सामने शीशे में मैंने झीनी नाइटी के अंदर से ही अपने नितंबों और उरोज़ों को निहारा तो मैं तो उन्हें देख कर खुद ही शरमा गई।

मैं अभी अपनी चूत की गोरी गोरी फांकों पर क्रीम लगा ही रही थी कि अचानक दरवाज़े की घण्टी बजी। मुझे हैरानी हुई कि इस समय कौन आ सकता है?

मैंने दरवाज़ा खोला तो देखा कि सामने वही लड़का खड़ा था। उसने हाथ में एक झोला सा पकड़ रखा था। मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था। मैं तो मुँह बाए उसे देखती ही रह गई थी, वो भी मुझे हैरानी से देखने लगा।

“वो…. मुझे गणेश भाई ने भेजा है !”

“क.. क्यों .. ?”

“वो बता रहे थे कि शयनकक्ष का ए सी खराब है उसे ठीक करना है !”

“ओह.. हाँ आओ.. अंदर आ जाओ !”

मैं तो कुछ और ही समझ बैठी थी, हमारे शयनकक्ष का ए सी कुछ दिनों से खराब था, इस साल गर्मी बहुत ज़्यादा पड़ रही थी, गणेश तो मुझे ठंडा कर नहीं पाता था पर ए सी खराब होने के कारण मेरा तो और भी बुरा हाल था।

मैं उसे अपने शयनकक्ष में ले आई और उसे ए सी दिखा दिया। वो तो अपने काम में लग गया पर मेरे मन में तो बार बार उसके काले और मोटे तगड़े लण्ड का ही ख़याल आ रहा था।

“तुम्हारा नाम क्या है?” मैंने पूछा।

“जस्सी… जसमीत नाम है जी मेरा !”

“नाम से तो तुम पंजाबी लगते हो?”

“हाँ जी…”

“तुम तो वही हो ना जो रोज़ सुबह सुबह उस दीवाल पर सू सू करते हो?”

“वो.. वो.. दर असल….!!” इस अप्रत्याशित सवाल से वो सकपका सा गया।

“तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसे पेशाब करते हुए?”

“सॉरी मेडम… मैं आगे से ध्यान रखूँगा !”

“कोई जवान औरत ऐसे देख ले तो?”



वो जी बात यह है कि हमारे घर में एक ही बाथरूम है तो सभी को सुबह सुबह जल्दी रहती है !” उसने अपनी मुंडी नीची किए हुए ही जवाब दिया।

“हम्म… तुम यह काम कब से कर रहे हो?”

“बस 3-4 दिन से ही…..!”

उसकी बात सुनकर मेरी हँसी निकल गई, मैंने कहा,”पागल मैं सू सू की नहीं, ए सी ठीक करने की बात कर रही हूँ।”

“ओह… दो साल से यही काम कर रहा हूँ।”

“हम्म…? तुम्हें सू सू करते किसी और ने तो नहीं देखा?”

“प… पता नहीं !”

“यह पिंकी कौन है?”

“वो.. वो.. कौन पिंकी?”

“वही जिसके नाम के ऊपर तुम अपना वो पकड़ कर गोल गोल घुमाते हुए सू सू करते रहते हो?”

वो बिना बोले सिर नीचा किए खड़ा रहा।

“कहीं तुम्हारी प्रेमिका-व्रेमिका तो नहीं?”

“न… नहीं तो !”

“शरमाओ नहीं …. चलो सच बताओ ?” मैंने हँसते हुए कहा।

“वो … वो.. दर असल मेरे साथ पढ़ती थी !”

“फिर?”

“मैंने पढ़ाई छोड़ दी !”

“हम्म !!”

“अब वो मेरे साथ बात नहीं करती !”

“तुम्हारी इस हरकत का उसे पता चल गया तो और भी नाराज़ होगी !”

“उसे कैसे पता चलेगा?”

“क्या तुम्हें उसके नाम लिखी जगह पर सू सू करने में मज़ा आता है?”

“हाँ… ओह.. नही…. तो मैं तो बस… ऐसे ही?”

“हम्म… पर मैंने देखा था कि तुम तो अपने उसको पकड़ कर ज़ोर ज़ोर से हिलाते भी हो?”

“वो.. वो…?” वो बेचारा तो कुछ बोल ही नहीं पा रहा था।

“अच्छा तुमने उस पिंकी के साथ कुछ किया भी था या नहीं?”

“नहीं कुछ नहीं किया !”

“क्यों?”

“वो मानती ही नहीं थी !”

“हम्म… चुम्मा भी नहीं लिया?”

“वो कहती है कि वो एक शरीफ लड़की है और शादी से पहले यह सब ठीक नहीं मानती !”

“अच्छा… चलो अगर वो मान जाती तो क्या करते?”

“तो पकड़ कर ठोक देता !”

“हाय रब्बा …. बड़े बेशर्म हो तुम तो?”

“प्यार में शर्म का क्या काम है जी?” अब उसका भी हौसला बढ़ गया था।

“क्या कोई और नहीं मिली?”

वो हैरानी से मेरी ओर देखने लगा, अब तक उसे मेरी मनसा और नीयत थोड़ा अंदाज़ा तो हो ही गया था।

“क्या करूँ कोई मिलती ही नहीं !”

“तुम्हारी कोई भाभी या आस पड़ोस में कोई नहीं है क्या?”

“एक भरजाई (भाभी) तो है पर है पर वो भी बड़े भाव खाती है !”

“वो क्या कहती है?”

“वो भी चूमा-चाटी से आगे नहीं बढ़ने देती !”

“क्यों?”

“कहती है तुम्हारा हथियार बहुत बड़ा और मोटा है मेरी फट जाएगी !”

“हम्म…साली नखरे करती है ?”

“हां और वो साली सुनीता भी ऐसे ही नखरे करती रहती है !”

“कौन? वो काम वाली बाई?”

“हाँ हाँ ! … वही !”

“उसे क्या हुआ?”

“वो भी चूत तो मरवा लेती है पर … !”
 
‘हाँ और वो साली सुनीता भी ऐसे ही नखरे करती रहती है !’

‘कौन? वो काम वाली बाई?’

‘हाँ हाँ !… वही !’

‘उसे क्या हुआ?’

‘वो भी चूत तो मरवा लेती है पर… ! गाण्ड नहीं मारने देती… !’

‘हाय रब्बा… कीहोजी गल्लां कर्दा ए?’

‘सच कहता हूँ साली अपनी गाण्ड को ऐसे मटका कर चलती है जैसे सारी सड़क उसके पियो (बाप) दी ऐ !’

मेरी चूत तो उसकी बातों से पानी पानी हो चली थी, मैंने अपनी नाइटी के ऊपर से ही अपनी चूत की फांकों को मसलना चालू कर दिया।

वो कनखियों से मेरी ओर देख रहा था।

‘हम्म…?’

‘उसकी मटकती गाण्ड बहुत ही जानमारू है… !’

‘हम्म…?’

‘वैसे एक बात बताओ?’

‘हम्म…?’

‘मैं सच कहता हूँ आप भी बहुत खूबसूरत हैं !’

‘कैसे?’

‘आपकी फिगर तो कमाल की है !’

‘हम्म…और क्या-क्या कमाल का है?’ मैं उसका हौसला बढ़ाना चाहती थी, मेरी चूत में तो गंगा-जमना बहने लगी थी, मैं सोच रही थी कि अब फज़ूल बातों को छोड़ कर सीधे मुद्दे की बात करनी चाहिए।

‘वो .. वो आपके चूतड़… मेरा मतलब कमर बहुत पतली है!’

‘कमर पतली होने से क्या होता है?’

‘वो.. जी आपके चूतड़ बहुत गोल-मटोल और कातिलाना हैं !’

‘अच्छा? और?’

‘आपके चूचे भी बहुत खूबसूरत हैं !’

‘तुम्हें पसंद हैं?’

‘हाँ जी… मैं तो आपको रोज़ देखता रहता हूँ?’

‘ओह.. कैसे..?’

‘छत पर जब आप कपड़े सुखाने आती हैं तो मैं रोज़ देखता हूँ !’

‘तुम बड़े बदमाश हो…?’

‘जी… आप इतनी खूबसूरत हैं… तो बार बार देखने का मन करता है !’

‘हम्म… तो पहले क्यों नहीं बताया?’

‘मैं डर रहा था !’

‘क्यों?’

‘कहीं आप बुरा ना मान जाएँ?’

‘अगर बुरा ना मानू तो?’

‘तो… तो…?’

उसका गला सूखने लगा था, उसकी कनपटियों से पसीना आने लगा था, मैंने देखा उसकी पैंट में उभार सा बनने लगा था।

मैंने भी अपनी नाइटी के ऊपर से ही अपनी लाडो को फिर से मसलना चालू कर दिया, मेरी चूत में बिच्छू काटने लगे थे, बार-बार उसके लण्ड के ख़याल से ही मेरी लाडो पानी पानी हो गई थी, मेरा मन कर रहा था कि झट से इसकी पैंट की ज़िप खोल कर उसके लण्ड को निकाल कर अपनी चूत में डाल लूँ !

‘क्या तुम इन खूबसूरत चूचों को देखना चाहोगे?’

‘ओह.. हाँ नेकी और पूछ पूछ?’

‘पर बस देखने ही दूँगी… और कुछ नहीं करने दूँगी?’

अब वो इतना भी फुद्दू भी नहीं था कि मेरा खुला इशारा ना समझता !

‘कोई गल नई मेरी सोह्नयो !’ कहते हुए उसने झट से मुझे अपनी बाहों में भर लिया और ज़ोर ज़ोर से मेरे होंठों को चूमने लगा।

मैंने अपना एक हाथ नीचे करके पैंट के ऊपर से ही उसके खड़े लण्ड को पकड़ लिया और उसे मसलने लगी, उसने अपने एक हाथ से मेरे स्तन दबाने चालू कर दिए और दूसरा हाथ मेरे नितंबों की खाई में फिराने लगा।

मेरी लाडो से रस निकल कर मेरी जांघों को भिगोने लगा था, मुझे लगा कि चूमा-चाटी के इन फज़ूल कामों को छोड़ कर सीधा ही ठोका-ठुकाई कर लेनी चाहिए।

मैंने उसे पास पड़े सोफे पर धकेल दिया और उसकी पैंट की जीप खोल दी, फिर कच्छे के अंदर हाथ डाल कर उसका लण्ड बाहर निकाल लिया।

मेरे अंदाज़े के मुताबिक उसका काले रंग का लण्ड 8 इंच लंबा और 2 इंच मोटा था. मैंने उसके टोपे की चमड़ी को नीचे किया तो उसका गुलाबी सुपारा ऐसे चमकने लगा जैसे कोई मशरूम हो !

मैंने झट से उसका सुपारा अपने मुँह में भर लिया, मैं उकड़ू बैठ गई और ज़ोर ज़ोर से उसके लण्ड को चूसने लगी।

वो तो आ.. ओह… ब… भरजाई जी… एक मिनट… ओह… करता ही रह गया !

अब उसे भी मज़ा आने लगा था, उसने मेरा सिर अपने हाथों में पकड़ लिया और उसे अपने लण्ड की ओर दबाने लगा। मैं कभी उसके लण्ड का सुपारा चूसती, कभी अंदर तक उसके लण्ड को निगलने की कोशिश करती पर वो तो आधा ही मेरे मुँह में जा पाता।

फिर उसने अपनी कूल्हों को थोड़ा सा ऊपर करते हुए अपनी पैंट और अंडरवीयर नीचे खिसका दिया। मैंने एक हाथ से उसके लण्ड को पकड़ रखा था और अब दूसरे हाथ से उसके टट्टे भी पकड़ कर मसलने चालू कर दिए। एक दो बार मैंने उसके लटकते टट्टों को भी अपने मुँह में भर कर चूसा। मैंने उसके मशरूम जैसे सुपारे को अपने दाँतों के बीच दबा सा दिया तो वो कुनमुनाने लगा।

“ब… भरजाई जी…. ओह… मेरा… निकल जाएगा….!”

पर मैं कहाँ मानने वाली थी ! कितने दिनों से मैं उस ताज़ा और गाढ़ी मलाई को खाने के लिए तरस रही थी। मैंने अपनी चुस्कियाँ तेज़ कर दी।

अब उसे भी लगने लगा था कि मैं उसके लण्ड को छोड़ने वाली नहीं हूँ तो उसने भी मेरे सिर को अपने हाथों में पकड़ कर लिया और खड़ा हो गया। मैं अपने पंजों के बल हो गई। अब वो मेरा सिर पकड़े ले बढ़िया तरीके से अपने लण्ड को मेरे मुँह में अंदर-बाहर करने लगा जैसे यह मुँह ना होकर चूत हो।

वा आँखें बंद किए आ… उन्ह… या… करने लगा था।
 
कोई 4-5 मिनट की चूसाई के बाद मुझे लगा मेरा गला दर्द करने लगा है, मैंने अपना मुँह हटाने का मन बनाया ही था पर उसने मेरा सिर ज़ोर से अपने हाथों में पकड़ लिया और बोला,”भरजाई.. जी आ.. अब रूको मत… मेरा … निकालने वाला है जी इईईईईईईईईई ईईईईई ”

और उसके साथ ही मेरा मुँह अपनी गर्म, गाढ़ी मलाई से भरता चला गया। मैं उसकी पिचकारियों से निकलते उस रस को गटागट पीती चली गई, वो आ… उन्ह… या… करता ही रह गया।

“आ… मेरी सोनियो… मेरी जान…!”

मैंने उसके वीर्य की अंतिम बूँद तक निचोड़ कर ही उसके लण्ड को अपने मुँह से बाहर आने दिया था, लण्ड थोड़ा सिकुड़ गया था पर अब भी वो बेल पर लटकी किसी तोरी की तरह ही लग रहा था।

“मज़ा आया ?” मैंने पूछा।

“ओह.. भरजाई जी आज ते मज़ा ई आ गिया ? बड़े दिन्नां बाद पानी निकल्या !”

“ओये होये मेरे मिट्ठू !”

“एक बार चूत मार लेने दो ना प्लीज़…?”

“ना बाबा ना … तुम्हारा बहुत मोटा है, मेरी तो फट ही जाएगी !”

“अरे नहीं मेरी बुलबुल ! ऐसा कुछ नहीं होगा !”

“चलो ठीक है… तुम बिस्तर पर चलो, मैं अभी आती हूँ !”

दरअसल मैं उसे कुछ समय देना चाहती थी, अभी अभी मैंने उसका रस निचोड़ा था, मैं चाहती थी कि थोड़ी देर उसे आराम मिल जाए तो फिर मैं तसल्ली से अपने दोनों छेदों का कल्याण करवाऊँ !

मैंने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया और फिर अपने नितंबों को थिरकाते हुए बड़ी अदा से बाथरूम में आ गई।

बाथरूम में मैंने अपनी लाडो पर खूब सारी क्रीम लगाई और फिर ट्यूब में बची बाकी की क्रीम अपनी अपनी महारानी के छेद में पिचका दी।

मैं अपनी कमर लचकाती हुई अब बाथरूम से बाहर आ गई। जस्सी बिस्तर पर बैठा अपने टनाटन लण्ड को हाथ में पकड़े सहला रहा था।

साले ये 18-19 साल के लौंडे कितनी जल्दी दुबारा तैयार हो जाते हैं !

एक गणेश है बस एक बार पानी निकाल देने के बाद तो मेरे लाख कोशिश करने पर भी उसका दुबारा खड़ा नहीं होता।

मुझे आते देख कर वह जल्दी से खड़ा हो गया और मुझे बाहों में भर कर नीचे पटकने लगा।

“ओह.. रूको.. मैं नाइटी तो उतार दूँ ?”

मैंने अपनी नाइटी निकाल फैंकी। वह तो पहले से ही नंग-धड़ंग था, उसने झट से मुझे अपनी बाहों में भर लिया। वो मेरे मम्मों को चूसने लगा और अपना एक हाथ मेरी लाडो पर फिराने लगा। मैं अभी उसका लण्ड अपनी लाडो में लेने के मूड में नहीं थी।

आप हैरान हो रहे हैं ना ?

ओह.. मैं अपनी लाडो को एक बार जमकर चुसवाना चाहती थी ! आपको तो पता ही होगा कि खूबसूरत और सेक्सी औरत की चूत का रस बहुत मीठा होता है, एक बार उसका स्वाद चख लिया जाए तो बार बार उसे चूसने-चाटने का मन करता है। मैं उसे इस रस से परिचित करवाना चाहती थी।

मैंने उसे कहा,”अबे मादरचोद क्या मम्मे ही चूसता रहेगा या कुछ और भी चूसेगा?”

“होर की चूसणा ऐ जी?”

“मेरी फुद्दी क्या तेरा बाप चूसेगा?”

“ओह…?”

मैंने कहीं पढ़ा था कि जब औरत मर्द को गाली देती है या सेक्सी (चुड़दकड़) बातें करती है तो मर्द ज़्यादा भड़कता है और फिर वो जोश में आकर चुदाई बहुत ही तसल्लीबक्श करता है।

अब उसने मेरे मम्मों को चूसना छोड़ दिया और मेरी जांघों के बीच आकर मेरी चूत की फांकों को मुँह में भर कर चूसने लगा।

मैंने अपनी जांघें चौड़ी कर दी और अपना ख़ज़ाना पूरा खोल दिया।

उसका जोश तो अब देखने लायक था ! मैं तो चाहती थी कि वो मेरी चूत की उभरी फांकों को पूरा मुँह में भर कर ज़ोर ज़ोर से चूसे ! हालाँकि लौंडा नौसीखिया ही था पर कमाल की चुसाई कर रहा था। कभी अपनी जीभ अंदर डालता, कभी चुस्की लगता कभी अंदरूनी फांकों (लीबिया) को होंठों से पकड़ कर दबाता तो मेरी सीत्कार ही निकल जाती।

उसने एक हाथ बढ़ा कर मेरे चूचों को पकड़ लिया उन्हें दबाने लगा। मैंने अपने पैर उठा कर अपनी जांघें उसके गले पर लपेट ली तो उसने अपने दूसरे हाथ से मेरे नितंबों को सहलाना चालू कर दिया। जैसे ही उसकी अंगुली मेरी गाण्ड के छेद से टकराई, मैंने उस छेद को अंदर सिकोड़ा तो उसकी अंगुली पर उस छल्ले का दबाव महसूस हुआ। मैंने 3-4 बार फिर उसका संकोचन किया। दर असल मैं उसे ललचाना चाहती थी।

बीच बीच में वो मेरे किशमिश के दाने (मदनमणि) को भी दाँतों से दबा देता था। मैं तो उस समय जैसे सातवें आसमान पर थी। 8-10 मिनट की लंबी चुसाई के बाद मुझे लगा कि मैं झरने वाली हूँ तो मैंने कस कर उसका सिर अपनी चूत पर दबा लिया।

“मेरे राजा ! और ज़ोर से.. आ… रूको मत.. ……..”

और फिर मेरी लाडो ने प्रेम रस बहा दिया वो मस्त हुआ उसे पीता चला गया।

अब मुझसे और बर्दाश्त नहीं हो रहा था, शायद उसका भी गला और मुँह दुखने लगा था। वो चूत छोड़ कर मेरे ऊपर आ गया। अब मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठों को चूमने लगी, अपना एक हाथ नीचे करके उसके लण्ड को अपनी मुट्ठी में पकड़ कर दबाने लगी। वो तो अब झटके ही खाने लगा था। मैंने उसे अपनी चूत की फांकों के बीच रगड़ना चालू कर दिया।

वो धक्के लगाने लगा था। मुझे लगा यह अभी अनाड़ी ही है, मैं कुछ देर उसे तड़फ़ाना चाहती थी पर मेरी लाडो कहाँ मानने वाली थी ! इस विशाल लण्ड ने पता नहीं मेरी कितनी रातों की नींद हराम की थी।

अचानक उसके लण्ड का सुपारा मेरी लाडो के कोमल छेद पर आया तो उसी समय उसने एक ज़ोर का धक्का लगाया, आधा लण्ड चूत में समा गया। एक तो धक्का इतना जबरदस्त था और लण्ड इतना मोटा था की मेरी ना चाहते हुए भी हल्की चीख निकल गई। मुझे लगा कोई मूसल मेरी लाडो रानी में चला गया है।

आज दो महीने के बाद फिर मेरी लाडो हरी-भरी हो गई थी। अब उसने 2-3 धक्के और लगा दिए, पूरा लण्ड अंदर चला गया। मुझे तो लगा यह मेरे हलक़ तक आ जाएगा।

अब वो धक्के भी लगा रहा था और साथ साथ मेरे मम्मों को भी मसलता और होंठों को भी चूसता जा रहा था। मैं आँखें बंद किए अनोखे आनन्द में डूबी जा रही थी !

काश यह वक़्त रुक जाए और यह चुदाई अविरत ऐसे ही चलती जाए !

“मेरी जान… मेरे मिट्ठू.. आ….. बहुत मज़ा आ रहा है और ज़ोर से.. आ…”

“ले मेरी रानी… और ले…” अब तो उसे पूरा जोश आ गया था. वा कस कस कर धक्के लगाने लगा।

मेरी लाडो से रस निकल कर मेरी फूलकुमारी (गाण्ड) को भिगोने लगा था. हालाँकि उसका लण्ड बहुत मोटा था पर मेरा मन करने लगा था कि एक बार इस मोटे लण्ड से महारानी की सेवा भी करवा लूँ !

मैंने अपने पैर ऊपर उठा दिए और अपना एक हाथ उसके नितंबों पर फिराना चालू कर दिया। अब मैंने उसकी गाण्ड का छेद टटोला और अपनी एक अंगुली उसकी गाण्ड में डालने लगी।

“ओह… भरजाई जी की कर्दे ओ?”
 
दरअसल मैं उसका ध्यान अपनी गाण्ड की ओर ले जाना चाहती थी, अब उसने भी अपना एक हाथ मेरे नितंबों की खाई में फिराना चालू कर दिया। मेरी फूल कुमारी तो पहले से ही गीली थी, उसने भी अपनी अंगुली मेरी फूलकुमारी के छेद पर रगड़नी चालू कर दी।

“भरजाई जी कद्दे तुस्सी एस छेद दा मज़ा लिता ज्या नई?”

“हाई रब्बा… कीहो जी गॅलाँ करदा ए..?”

“सॅच्ची ! बोत मज़ा आएगा.. एक वारी करवा लओ !”

“ना.. बाबा.. तुम्हारा बहुत मोटा है… मैं तो मर जावाँगी !”

“मेरी सोह्नियो ! कुछ नी हुन्दा !”

“पर धीरे धीरे करना प्लीज़..!”

अब वो मेरे ऊपर हट गया तो मैं झट से चौपाया बन गई। अब वो मेरे पीछे आ गया और पहले तो उसने मेरे कूल्हों को चूमा और फिर उन पर थपकी सी लगाई जैसे किसी घोड़ी की सवारी करने से पहले लगाई जाती है।

मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा था, मेरी महारानी तो कब की उसके मोटे लण्ड को अंदर लेने के लिए तरस रही थी। मैं डर भी रही थी पर मेरे मन में गुदगुदी और रोमांच दोनो हो रहे थे।

उसने मेरी फूलकुमारी के छेद पर एक करारा सा चुंबन लिया तो मेरी तो सीत्कार ही निकल गई। उसने पास पड़ी मेज पर रखी क्रीम की डब्बी उठाई और पहले तो मेरी फूल कुमारी के छल्ले पर लगाई और फिर अपने लण्ड पर ढेर सारी क्रीम लगा ली और फिर उसने अपना लण्ड मेरी फूल कुमारी के छेद पर लगा दिया।

अंजाने भय और कौतुक से मेरे सारे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई।

मैंने अपनी फूलकुमारी के छेद को ढीला छोड़ दिया और अपनी आँखें बंद कर ली।

“जस्सी .. प्लीज़ धीरे धीरे करना… मुझे बहुत डर लग रहा है ..!”

“भरजाई जी ! तुस्सी चिंता ना करो जी… मैं पता नहीं कितने दिनों से तुम्हारे इस गदराए बदन और मटकती गाण्ड को देख कर मुट्ठ मार रहा था। आज इस नाज़ुक छेद में अपना लण्ड डाल कर तुम्हें भी धन्य कर दूँगा मेरी बिल्लो रानी !”

अब उसने मेरी कमर पकड़ ली और एक धक्का लगाया। मशरूम जैसे आकार का सुपारा एक ही घस्से में अंदर चला गया, मेरी चीख निकल गई।

“अबे… साले…! मादर चोद.. ओह.. मर गई ईईईईईईईई !”

मुझे लगा जैसे कोई मूसल मेरी फूलकुमारी के अंदर चला गया है, मुझे लगा ज़रूर मेरी फूलकुमारी का छेद बुरी तरह छिल गया है और उसमें जलन और चुनमुनाहट सी भी महसूस होने लगी थी। मुझे तो लगा कि यह फट ही गई है। मैं उसे परे हटाना चाहती थी पर उसने एक ज़ोर का धक्का और लगा दिया।

“मेरी जान….!”

मैं दर्द के मारे कसमसाने लगी थी पर वो मेरी कमर पकड़े रहा और 2-3 धक्के और लगा दिए।

मैं तो बिलबिलाती ही रह गई !

आधा लण्ड अंदर चला गया था। उसने मुझे कस कर पकड़े रखा।

“ओह… जस्सी बहुत दर्द हो रहा है.. ओह.. भेनचोद छोड़ ! बाहर निकाल … मैं मार जावाँगी… उईईईईईईई !”

दर्द के मारे मेरा पूरा बदन ऐंठने लगा था, ऐसा लग रहा था जैसे कोई गर्म लोहे की सलाख मेरी गाण्ड में डाल दी हो।

मुझे लगा जैसे कोई मूसल मेरी फूलकुमारी के अंदर चला गया है, मुझे लगा ज़रूर मेरी फूलकुमारी का छेद बुरी तरह छिल गया है और उसमें जलन और चुनमुनाहट सी भी महसूस होने लगी थी। मुझे तो लगा कि यह फट ही गई है। मैं उसे परे हटाना चाहती थी पर उसने एक ज़ोर का धक्का और लगा दिया।

“मेरी जान….!”

मैं दर्द के मारे कसमसाने लगी थी पर वो मेरी कमर पकड़े रहा और 2-3 धक्के और लगा दिए।

मैं तो बिलबिलाती ही रह गई !

आधा लण्ड अंदर चला गया था। उसने मुझे कस कर पकड़े रखा।

“ओह… जस्सी बहुत दर्द हो रहा है.. ओह.. भेनचोद छोड़ ! बाहर निकाल … मैं मार जावाँगी… उईईईईईईई !”

दर्द के मारे मेरा पूरा बदन ऐंठने लगा था, ऐसा लग रहा था जैसे कोई गर्म लोहे की सलाख मेरी गाण्ड में डाल दी हो।

“मेरी बुलबुल ! कुछ नहीं होगा…. थोड़ी देर रूको, बहुत मज़ा आने वाला है …!”

उसने एक हाथ से मेरी कमर पकड़े रखी और दूसरे हाथ से मेरे नितंबों को सहलाने लगा। फिर उसने मेरी पीठ पर एक चुम्मा ले लिया। जब दर्द वाली जगह पर सहलाया जाए तो बहुत अच्छा लगता है, मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा था, हालाँकि लौंडा अनाड़ी था पर लग रहा था कि थोड़े दिनों में सब कुछ सीख जाएगा।

अब उसके लण्ड ने अंदर अपनी जगह बना ली थी, मेरी फूलकुमारी का छल्ला कुछ सुन्न सा हो गया था।

“नीरू रानी ! अब तो दर्द नहीं हो रहा ना ?”

“साले भोसड़ी के … अपना मूसल गाण्ड में डाल कर पूछ रहा है कि दर्द तो नहीं हो रहा ….?”

“नखरे करने की तो हसीनो की फ़ितरत होती है… !”

“मेरी तो जान ही निकाल दी थी तुमने !”

“अब देखना ! मज़ा भी तो आएगा !”
 
“अरे मेरे राज़ा, तकलीफ़ तो हो रही है पर अब मज़ा भी आने लगा है ! सच कहती हूँ, मैंने कई लण्ड खाए हैं पर तुम्हारे जैसा मुझे अभी तक नहीं मिला… आ…”

अब उसने अपना लण्ड थोड़ा सा बाहर किया और फिर से एक धक्का लगाया। अब तो पूरा का पूरा लण्ड अंदर चला गया था। मुझे लगा यह मेरी नाभि तक आ गया है। हालाँकि मुझे थोड़ा दर्द तो अब भी हो रहा था पर उस मीठे दर्द और चुनमुनाहट में अनोखा आनन्द भी आने लगा था।

जस्सी हौले-हौले धक्के लगाने लगा। अब तो लण्ड अंदर-बाहर होने में ज़रा भी दिक्कत नहीं थी। मैंने अपनी मुण्डी पीछे करके उसका लण्ड देखना चाहा पर उसका लण्ड कैसे नज़र आता?

वह आँखें बंद किए सीत्कार किए जा रहा था और मेरी कमर पकड़े धक्के लगा रहा था। मैंने अपनी जांघें थोड़ी और चौड़ी कर ली। उसके मोटे-मोटे टट्टे मेरी लाडो से टकराने लगे थे। मैंने एक हाथ से उन्हें पकड़ लिया और मसलने लगी।

यह चुदाई भी भगवान ने बड़ी कमाल की चीज़ बनाई है, जिंदगी भर किए जाओ पर यही लगता है इसके लिए जिंदगी कम ही रही है।

आज पहली बार इस गाण्ड चुदाई का अनूठा आनंद तो किसी स्वर्ग के आनन्द से कतई कम नहीं था, कितना मज़ा आ रहा था !

जस्सी का लण्ड फंस-फंस कर मेरी फूलकुमारी के अंदर-बाहर हो रहा था। ग़ालिब ने सच ही इसी दूसरी जन्नत का नाम दिया है :

ग़ालिब गाण्ड चुदाई का यही वक़्त सही है

गाण्ड में दम है तो लूट ले इस जन्नत को !

जस्सी को तो भगवान ने छप्पर फाड़ कर मुझ जैसी हसीना की जवानी का मज़ा लूटने का मौका दे दिया था पर मेरे लिए भी यह किसी नेमत से कम नहीं था। स्त्री और पुरुष के शरीर के मिलने पर काम-सुख तो दोनों को ही मिलता है।

अब उसने अपना एक हाथ नीचे किया और मेरी लाडो की फांकों को मसलने लगा। मैं तो इस दोहरे आनन्द से एक बार झड़ गई।

उसे अपनी अंगुलियों पर मेरा लिसलिसा रस महसूस हुआ तो उसने अपनी तर्जनी अंगुली मेरी लाडो में डाल दी और अंदर-बाहर करने लगा।

मैं तो इस दोहरे आनन्द के सागर में ही डूब गई थी ! भगवान से औरत को दो छेद तो दे दिए पर आदमी को दो लण्ड दे देता तो कितना अच्छा होता !

मैंने सुना था कि अगर जांघें भींच ली जाएँ तो गाण्ड चुदाई का आनंद दुगना हो जाता है पर इतने मोटे लण्ड के साथ ऐसा करना संभव नहीं था। मैंने अपनी जांघें चौड़ी कर ली और अपनी गाण्ड के छल्ले का अंदर संकुचन करने लगी।

जस्सी के धक्के अब भी चालू थे ! वो तो झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था। मैंने अपनी फूल कुमारी का संकोचन करना चालू रखा, ऐसा करने से उसका जोश फिर बढ़ने लगा और उसने जल्दी जल्दी धक्के लगाने चालू कर दिए। मैं तो इतनी उत्तेजित हो गई थी कि उसके धक्कों के साथ मैंने अपने नितंब आगे-पीछे करने चालू कर दिए थे।

मेरी कामुक सीत्कार कमरे में गूंजने लगी थी। काश ! यह चुदाई कभी ख़त्म ही ना हो और हम दोनो इसी तरह आनन्द लेते रहें !

अब तो हालत यह थी कि जैसे ही वो धक्का लगता तो मेरे मम्मे हिलने लगते और गकच की आवाज़ के साथ नितंब भी थिरक उठते।

मैंने अपना सिर तकिये पर लगा लिया और अपने मम्मों को दबाने लगी। मैंने अपना एक हाथ पीछे करके अपनी महारानी के छेद को टटोला। छेद के बाहर गीलापन सा था और ऐसे लग रहा था जैसे कोई मूसल अंदर फंसा हो।

मुझे हैरानी हो रही थी कि इतने छोटे से छेद में इतना मोटा मूसल कैसे अंदर जड़ तक समा गया है?

या रब्बा…! तेरी कुदरत भी अपरम्पार ही है।

“आ.. मेरी सोणिये…. मेरा तोता उड़ने वाला ई …”

“कोई गल नई मेरे मिट्ठू… मेरी फूलकुमारी भी तुम्हारे अमृत के लिए तरस रही है ! अंदर ही उस रस की फुहार छोड़ दे.. आ….”

“मेरी जान…. ईईईईईईईईईई !”

उसने 4-5 धक्के ज़ोर ज़ोर से लगाए और फिर मेरी गाण्ड के अंदर ही उसकी पिचकारियाँ फूटने लगी. वो मेरी कमर पकड़े अपना लण्ड जड़ तक अंदर ठोके खड़ा रहा। उसने धक्के लगाने बंद कर दिए पर मेरी फूलकुमारी अपना संकोचन करती जा रही थी जैसे उसकी अंतिम बूँद तक अंदर चूस लेना चाहती हो।

थोड़ी देर बाद उसका लण्ड फिसल कर बाहर आ गया तो वो परे हट गया और मैं पेट के बल लेटी रही, गाण्ड का छल्ला सिकुड़ने लगा, उसमें से धीरे धीरे रस बाहर आने लगा था और मेरी जांघों को भिगोने लगा था। मुझे गुदगुदी और रोमांच दोनो हो रहे थे।

जस्सी ने मेरे नितंबों को एक बार फिर से चूम लिया।

मैं भी उठ गई और उसे अपनी बाहों में भर कर एक बार फिर से चूम लिया।

“भरजाई जी ..!”

“हम्म…. ?”

“ए सी ठीक हो गया ना ?”

“ओह.. तुमने तो ए सी और डी सी दोनो ही सही कर दिए… पर हवा-पानी बदलने के लिए कल फिर आना पड़ेगा !”

“कोई गल नई जी, मैं कल फेर आ के ठीक कर जावाँगा जी !”

जस्सी अगले दिन फ़िर आने का वादा करके चला गया और मैं एक बार फिर से बाथरूम में चली गई।

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तीन पत्ती गुलाब

प्यारे पाठको और पाठिकाओ! इस कथानक की नायिका नाम है कामिनी। और जिसका नाम कामिनी हो भला उसकी खूबसूरती के बारे में कोई शक़-शुबहा कैसे किया जा सकता है। पता नहीं गुलाबो ने क्या खाकर या सोच कर कामिनी का नाम रखा होगा, पर उसकी खूबसूरती ठीक उसके नाम के मुताबिक ही है।

कामिनी हमारी घरेलू नौकरानी गुलाबो की तीसरे नंबर की बेटी है। उम्र करीब 18 वर्ष, दरमियाना कद, घुंघराले बाल, गोरा रंग, मोटी मोटी काली आँखें, गोल चेहरा, सुराहीदार गर्दन, चिकनी लंबी बांहें, शहद भरी पंखुड़ियों जैसे एक जोड़ी होंठ और सख्त कसे हुए दो सिंदूरी आम।

हुस्न के मामले में तो जैसे भगवान ने उसे अपने हाथों से फुरसत में ही तराशा होगा और लगता है उसके लिए ख़ूबसूरती के खजाने के सारे ताले तोड़ डाले होंगे। उसकी मोटी-मोटी काली नरगिसी आँखें देखकर तो कोई भी दीवाना हो जाए और गलियों में गाता फिरे

“इन आँखों की मस्ती के दीवाने हज़ारों हैं।”

अगर आपने ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ में भिड़े की लौंडिया सोनू देखी हो तो आपको कामिनी की खूबसूरती का अंदाज़ा हो जाएगा। गोल चेहरा और गोरे गालों पर पड़ने वाले डिंपल देख कर तो दिल यही चाहेगा कि लंड को तो बस उसके मुखश्री में ही डाल दिया जाए।

उसकी सबसे बड़ी दौलत है उसकी एक जोड़ी पतली मखमली केले के तने जैसी सुतवाँ टांगें और 23-24 इंच की पतली कमर के नीचे दो गोल खरबूजे जैसे चिकने तराशे हुए थिरकते नितम्ब। या खुदा! अगर शोले वाला गब्बर इन्हें देख लेता तो बस यही कहता

‘ये गांड मुझे दे दे कामिनी!’

मेरा दावा है अगर वो जीन पैंट और टॉप पहनकर सड़क पर निकल जाए तो लोग गश खाकर गिर पड़ें। उसकी ठोड़ी पर बना वो छोटा सा तिल तो किसी गाँव की कामिनी की याद ताज़ा करवा देता है। ऊपर से नीचे तक बस कयामत! वाह … खुदा कसम क्या साँचे में ढला मुजसम्मा तराशा है? कोई भी बस एक निगाह भर देख ले तो या अल्लाह की जगह ईलू ईलू कर उठे।

पिछले 2-3 सालों में मैंने पलक को भुलाने की बहुत कोशिश की थी पर कामिनी को देखकर फिर से पलक बार-बार मेरे दिल-ओ-दिमाग में दस्तक सी दिए जाती रहती है। पलक के जाने के बाद मैंने कसम खाई थी कि अब किसी नादान, नटखट, चुलबुली, अबोध, कमसिन, परी जैसी मासूम लड़की से प्रेम नहीं करूंगा। पर लगता है कामिनी तो मेरी इस कसम को तुड़वाकर ही दम लेगी। मैं क्या करूँ उसके कसे हुए नितम्ब देखकर तो कोई भी अपना ईमान और तौबा दोनों ही तोड़ डाले, मेरी क्या बिसात है। हे लिंगदेव! अब तो बस तेरा ही आसरा है।

गुलाबो आजकल बीमार रहती है। उसकी जगह कामिनी को काम पर आते हुए अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं। कामिनी सुबह जल्दी काम पर आ जाती है और दिन में सारा काम करती है और फिर शाम को ही अपने घर वापस जाती है।

इन 5-7 दिनों में वह मधुर से इस तरह घुल मिल गयी है जैसे वर्षों की जान-पहचान हो। उसके आने से मधुर को बहुत आराम हो गया है। उसने रसोई, बर्तन, कपड़े, सफाई आदि सारा काम सलीके से संभाल लिया है।

मेरे पुराने पाठक तो जानते हैं कि मधुर स्कूल में पढ़ाती भी है पर अभी गर्मियों की छुट्टियाँ चल रही हैं; बस थोड़े दिनों में स्कूल शुरू हो जाएंगे। आजकल उसके सिर पर घर की सफाई का फितूर चढ़ा है इसलिए सारे दिन कामिनी के साथ लगी ही रहती है। कामिनी 5-4 क्लास तक स्कूल गई है बाद में उसने पढ़ाई छोड़ दी। मधुर उसे आजकल शामम को पढ़ाती भी है। वैसे मधुर शाम को बच्चों की ट्यूशन करती थी पर आजकल उसने बच्चों की ट्यूशन करना बंद कर रखा है।

कामिनी का हमारे यहाँ आने का भी एक दिलचस्प किस्सा है। मैंने कामिनी को पहले कभी देखा नहीं था। पता नहीं गुलाबो ने इस हीरे की कणि को इतने दिनों तक कहाँ छुपाकर रखा था।

मधुर ने बताया था कि कामिनी अपनी मौसी के यहाँ फैज़ाबाद में रहती थी. अब 6-8 महीने पहले ही कालू (गुलाबो का बड़ा बेटा) की शादी में यहाँ आई थी और उसके बाद घर वालों ने उसे वापस नहीं भेजा।

मधुर कुछ बातें जानबूझकर भी छिपा जाती है। असली कारण मुझे बाद में पता चला था। दरअसल उसकी मौसी का लड़का कामिनी के ऊपर लट्टू हो गया था और वह किसी भी तरह कामिनी को रग़ड़ देना चाहता था।

भई सच ही है इतने खूबसूरत खजाने के लिए तो सभी की जीभ और लंड दोनों की लार टपकने लगें उस बेचारे की क्या गलती है। रही सही कसर कामिनी के बाप ने पूरी कर डाली थी। कालू की शादी के बाद जैसे नंदू (गुलाबो का पति) पर तो नई जवानी ही चढ़ आई थी।

गुलाबो आजकल बीमार रहती है और पति की रोज-रोज की शारीरिक सम्बन्धों की माँग पूरी नहीं कर पाती तो वह यहाँ वहाँ मुँह मारता फिरता है। इसी चक्कर में उसने दारू के नशे में एक रात कामिनी को ही पकड़ लिया था। बेचारी गुलाबो ने किसी तरह उसे छुड़ाया था।

जब गुलाबो ने मधुर को सारी बातें बताई तो मधुर ने इसे हमारे यहाँ रख लेने का निश्चय कर लिया। खैर कारण जो भी रहा हो मेरे लिए तो जैसे जीने का नया मक़सद ही मिल गया था।

हमारे सामने वाले घर में जहाँ पहले

अभी ना जाओ चोदकर

हुई चौड़ी चने के खेत में

वाली नीरू बेन रहती थी, आजकल नये किरायेदार आए हैं। बंगाली परिवार है और घर में फकत 3 जीव हैं। पति पत्नी और एक लड़की। आदमी का नाम सुजोय बनर्जी है जो किसी सरकारी दफ्तर में काम करता है। वह खुद तो मरियल सा है पर संजया बनर्जी उर्फ संजीवनी बूटी तो पटाका नहीं पूरा एटम बम है।

वैसे भी बंगाली औरतों की आँखें और बाल बहुत ही खूबसूरत होते हैं। साँवरी देह में नरगिसी आँखें विधाता बंग सुंदरी को ही देता है। पतली कमर, गोल कसे हुए नितम्ब और गहरी नाभि का छेद तो मृत्यु शैया पर पड़े आदमी को भी संजीवनी दे दे।
 
उम्र कोई 40-42 के लपेटे में होगी पर दिखने में 35-36 से ज्यादा नहीं लगती। सुडौल बदन की मल्लिका, गदराया सा बदन देखते ही मन करे किसी मंजरी (लता) की तरह उससे लिपट जाए। कभी नाभि दर्शना साड़ी में, कभी जीन पैंट और टॉप में कभी ट्रैक सूट में पूरे मोहल्ले में छमक-छल्लो बनी फिरती है। इसलिए लौंडे लपाड़े उसके आगे पीछे घूमते रहते हैं।

वो शायद किसी प्राइवेट कंपनी में जॉब भी करती है और सुबह शाम कई बार शॉर्ट्स में या ट्रैक सूट में अपनी लड़की सुहाना या झबरे बालों वाले कुत्ते के साथ पार्क में घूमने जाती है।

मधुर ने भी एक दो बार इसका जिक्र तो जरूर किया था पर मैंने उस वक़्त ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। वैसे भी मधुर उसे कम ही पसंद करती है. कारण आप अच्छी तरह समझ सकते हैं।

कल सुबह-सुबह मैंने उसे सुहाना के साथ हाथ में टेनिस रॅकेट पकड़े स्टेडियम ग्राउंड जाते देखा था। आप को बता दूँ कि मैं भी टेनिस का बहुत अच्छा खिलाड़ी रहा हूँ. पर सिमरन (काली टोपी लाल रुमाल) के जाने के बाद मैंने टेनिस खेलना बंद कर दिया था। पर सोचता हूँ टेनिस क्लब फिर से ज्वाइन कर लूँ। काश … मैं फिर से 18 साल का लड़का बन जाऊं फिर तो माँ और बेटी दोनों के साथ टेनिस मैच खेल लूं, पर ऐसा कहाँ सम्भव है?

ओह … मैं इस फुलझड़ी के बारे में तो बताना ही भूल गया … यह तो बस कयामत बनने ही वाली है। पूरी टॉम बॉय लोलिता लगती है। हाय … मेरी सिमरन तुम मुझे बहुत याद आती हो। मोटी काली आँखें जैसे कोई जहर बुझी कटार हों।

नाइकी की टोपी और स्पोर्ट्स शूज पहने जब वो उछलते हुए से चलती है तो उसकी पोनी टेल घोड़ी की पूँछ की तरह हिलती रहती है।

उसके गोल गोल नितम्ब और लंबी मखमली जांघें तो अभी से बिजलियाँ गिरा रही हैं। इसके छोटे-छोटे नीम्बू तो टेनिस की बॉल से थोड़े ही छोटे लगते हैं। जब ये नीम्बू अमृत-कलश बनेंगे तो क्या कयामत आएगी इसका अंदाज़ा अभी से लगाया जा सकता है।

कभी स्कूल जाते समय वैन में चढ़ते हुए स्कर्ट के नीचे से झलकती उसकी मखमली जांघें, कभी ट्यूशन पर जाते समय छाती से चिपकाई किताबों के बोझ से दबे उसके खूबसूरत चीकू, कभी बालकनी में थोड़ी झुककर अपने फ्रेंड्स से बातें करते हुए दिखते उसके नन्हे परिंदे, कभी टेनिस के बल्ले को हाथ से गोल गोल घुमाते समय दिखती उसकी मखमली रोम विहीन स्निग्ध त्वचा वाली कांख, कभी जूतों के फीते बांधते समय दिखती उसकी जांघों के बीच फंसी कच्छी और कभी बाइसिकल चलाते समय झलकती उसकी पैंटी …

देखकर तो बस यही मन करता है काश वक़्त थम जाए और मैं बस सुहाना को जिंदगी भर ऐसे ही कुलांचें भरते, गली में इक्कड़-दुक्कड़, छुपम-छुपाई या लंगड़ी घोड़ी खेलते देखता ही रहूँ।

गुलाबी और हरे रंग की कैपरी में ढकी उसकी जांघें, नितम्ब, पिक्की और चीकू … उफ्फ … कयामत जैसे चार कदम दूर खड़ी हो। याल्लाह … इसकी खूबसूरत पिक्की (बुर) पर तो अभी बाल भी नहीं आए होंगे। मोटे-मोटे पपोटों वाली गंजी पिक्की की पतली झिर्री पर जीभ फिराने का मज़ा तो किसी किस्मत के सिकंदर को ही मिलेगा।

इसे देखकर तो सब कुछ भूल जाने का मन करता है। सुहाना नाम की इस कमसिन फितनाकार कयामत को देखकर किसी दिन मेरा दिल धड़कना भूल गया तो सारा इल्ज़ाम इसी पर आएगा।

पिछले 6 महीनों से मधुर को नयी धुन चढ़ी है। वो अब एक और बच्चा पैदा करना चाहती है। मेरे पुराने पाठक तो जानते हैं हमारा एक बेटा है जिसे मीनल अपने साथ कॅनेडा ले गयी है। (याद करें ‘सावन जो आग लगाए’ और ‘मोसे छल किए जा’ वाली मीनल)

मैंने मधुर को कोई बच्चा गोद लेने के बारे में कई बार समझाया है पर वो है कि मानती ही नहीं। IVF, IUI, सैरोगेसी, कृत्रिम गर्भाधान जैसी बहुत सी नयी विधाएं (तकनीकें) हैं जिनके ज़रिए मातृत्व सुख मिल सकता है।

आप तो जानते हैं कि डॉक्टरों ने मिक्कू के जन्म के समय ही बता दिया था अब मधुर फिर से कभी माँ नहीं बन पाएगी पर मधुर को पक्का यकीन है कि वह प्राकृतिक रूप से गर्भवती जरूर होगी। इस चक्कर में हम लोग लगभग रोज ही रात को भरपूर चुदाई का मज़ा लेते हैं और वो भी मेरी मनपसंद डॉगी स्टाइल में। वीर्यपात होने के बाद भी मधुर देर तक उसी मुद्रा में नितंबों को ऊपर किए रहती है ताकि वीर्य उसके गर्भाशय तक जल्दी पहुँच जाए। इस आसन में उसे देखकर बार-बार मेरा मन उसकी खूबसूरत गांड का मज़ा लेने को करता है पर इसके लिए तो जैसे उसने कसम खा ली है कि जब तक वह गर्भवती नहीं हो जाती गांडबाजी बिल्कुल बंद।

पता नहीं वो कहाँ-कहाँ से देशी नुस्खे और टोटके ढूंढकर लाती है और मुझे कभी शहद के साथ या कभी दूध के साथ खिलाती पिलाती ही रहती है। इसके अलावा मुझे शुक्र और शनि के व्रत भी करवाती है और रोज खुद भी पूजा पाठ के चक्करों में पड़ी रहती है और मुझे भी उलझाए रखती है। हर सोमवार को लिंग देव के दर्शन करने तो जाना ही पड़ता है। आप तो जानते ही हैं कि मेरा इन सब बातों में कितना यकीन होगा।

खैर कोई बात नहीं … आप भी लिंग देव से जरूर प्रार्थना करें कि मधुर की मनोकामना जल्दी से जल्दी पूरी हो जाए क्योंकि इसमें हम सभी का फायदा है। उसे एक और चश्मे चिराग (पुत्र-रत्न) की प्राप्ति होगी और मुझे उसकी खूबसूरत गांड फिर से मारने को मिलेगी और आपको जब मैं गांडबाजी का किस्सा सुनाऊंगा तो आप भी जरूर इसे आज़माने की कोशिश करेंगे और … और … अब आप इतने भी अनाड़ी नहीं है कि सब कुछ ही बताना पड़े!

मधुर की 3-4 दिन से माहवारी चल रही है इसलिए चोदन-भोजन का तो सवाल ही नहीं उठता, मेरे पास अब सिवाय मुट्ठ मारने के कोई रास्ता नहीं बचा है। मेरे जेहन में तो बस कामिनी और सुहाना ही बसी रहती हैं। काश कहीं ऐसा हो जाए कि संजीवनी बूटी खुद इस फुलझड़ी को लेकर हमारे घर आ जाए और मधुर से कहे कि इसे भी थोड़ा ट्यूशन पढ़ा दिया कीजिए। मधुर ने तो आजकल वैसे ट्यूशन पढ़ाना बंद कर रखा है पर यदि मुझे मौका मिल जाए तो मैं तो सारा दिन इसे ट्यूशन के अलावा और भी बहुत कुछ पढ़ाता रहूँ।

मेरा तो मन करता है इस साली नौकरी को लात मारकर किसी लड़कियों के स्कूल में पढ़ाना ही शुरू कर दूँ और दिन भर सुहाना और मिक्की जैसी कमसिन कलियों को बस निहारता ही रहूँ। कसम खुदा की बेमोल बिक जाऊँ इस फितनाकार फुलझड़ी के लिए। ओह … पर यह कहाँ सम्भव है.

खैर चलो लिंग देव ने कामिनी को तो भेज ही दिया है। सुहाना नहीं तो कामिनी ही सही।

कामिनी के साथ मेरा अभी सीधा संवाद नहीं हुआ है। वैसे भी मैंने उसे बोलते हुए बहुत कम देखा और सुना है। सच कहूँ तो मैंने कामिनी को ढंग से (प्रेम गुरु की नज़र से) अभी देखा ही कहाँ है? एक दो बार झुककर झाड़ू लगाते हुए उसके कसे हुए उरोजों की हल्की सी झलक ही दिखी है। पता नहीं कब इन सिंदूरी आमों को देखने, छूने, मसलने और चूसने का मौका मिलेगा?

मेरा अंदाज़ा है उसकी बुर पर हल्के-हल्के बालों का पहरा होगा। गुलाब की पंखुड़ियों जैसे पतले नाजुक पपोटे और गहरे लाल रंग का चीरा तो कहर बरपा होगा। पता नहीं उसके दीदार कब होंगे?

हे भगवान! वो जब सु-सु करती होगी तो कितनी पतली धार निकलती होगी और उसका मधुर संगीत तो पूरे बाथरूम में गूंज उठता होगा।

अनारकली (मेरी अनारकली) और अंगूर (अंगूर का दाना) को तो मैंने बाथरूम में सु-सु करते कई बार बिना किसी हील-हुज्जत (झंझट) देख लिया था पर कामिनी की पिक्की को देखने का सौभाग्य पता नहीं मेरे नसीब में है या नहीं अभी क्या कहा जा सकता है?

अनार और अंगूर दोनों को ही मुझे अपने प्रेमजाल में फंसा लेने में बहुत ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी थी पर इस कामिनी नाम की चंचल हिरनी को काबू में करना वाकई मुश्किल काम लग रहा है। दिमाग ने तो काम करना ही जैसे बंद कर दिया है। क्या किया जाए … अपना तो यही फलसफा है.

कोशिश आखरी सांस तक करनी चाहिये यारो …

मिल गई तो चूत और नहीं मिली तो उसकी माँ की चूत।

मैने अपने सभी साथियों (लंड, आँखें, होंठ-मुँह-जीभ, कान-नाक, हाथ, दिल और दिमाग) की आपातकालीन बैठक (एमर्जेन्सी मीटिंग) बुलाई.

लंड तो 4-5 दिन से जैसे अकड़ा ही बैठा है। मेरी सुनता ही कहाँ है? उसने तो सबसे पहले चेतावनी सी देते हुए कह दिया है कि मुझे तो बस कामिनी की चूत और गांड से कम कुछ भी मंजूर नहीं है।
 
आँखों ने कहा हमें तो बस उसके गोल सिंदूरी आमों और मखमली बुर का दीदार जल्दी से जल्दी करवा दो।

होंठों ने कहा कि उन्हें तो बस उसके भीगे होंठों को चूमने का एक बार मौका दिलवा दो। हाए … उसके ऊपर और नीचे के होंठों का रस कितना मधुर होगा उसे चूसकर तो आदमी का यह मनुष्य जीवन ही धन्य हो जाए। सच कहूँ तो मेरे होंठ तो उसके गालों, उरोजों और बुर को चूम लेने को इतने बेताब हैं कि बार-बार मेरी जीभ अपने आप मेरे होंठों पर आ जाती है।

कान कहते हैं कि उन्हें तो उसकी बुर का मधुर संगीत सुनना है।

नाक कहती है गुरु उसके कमसिन बदन से आती खुशबू तो दूर तक महकती है जब वो तुम्हारे आगोश में आएगी तो उसके बदन से निकलने वाली खुशबू तो तुम्हें अपना दीवाना ही बना देगी, जरा सोचो।

हाथ और अंगुलियाँ कहती हैं गुरु … एक बार उसे अपनी बांहों में जकड़ लो, साली कबूतरी की तरह फड़फड़ा कर अपने आप समर्पण कर देगी। सोचो उसके गालों पर, नाभि के छेद पर, पेट और पेडू पर, नितंबों पर, फूली हुई हल्के बालों वाली बुर और गांड के छेद पर हाथ और अंगुलियाँ फिराने में दिल और दिमाग को कितना सुकून और लज्जत मिलेगी तुम्हें पता ही नहीं?

दिल तो जैसे मुँह फुलाए बैठा है, मेरी सुनता ही नहीं है। उसने तो मुझे जैसे धमकी ही दे डाली है कि अगर कामिनी नहीं मिली तो वो किसी दिन धड़कना ही बंद कर देगा। तुम तो अपने आप को प्रेमगुरु कहते हो, पता नहीं ऐसी कितनी लौंडियों को अपने प्रेमजाल में उलझाया है क्यों नहीं कुछ उपक्रम करते? प्लीज कोई तिगड़म जल्दी भिड़ाओ ना!

और दिमाग का तो जैसे दही ही बन गया है। कुछ सूझता ही नहीं। कहता है कामिनी नाम की इस गुलाब की तीसरी पत्ती को तोड़ना मरोड़ना बिल्कुल नहीं … बंद आँखों से बस धीमी-धीमी सुलगती इस आँच को अपनी अंगुलियों, अपने होंठों, अपनी जीभ और अपने हाथों से महसूस करो। उसके कुँवारे जिस्म से आती मदहोश कर देने वाली खुशबू को सूंघ कर देखो।

पर खबरदार! जल्दबाजी बिल्कुल नहीं! कहीं ऐसा न हो यह चंचल हिरनी गीली मछली की तरह तुम्हारे हाथों से फिसल जाए और फिर तुम जिन्दगी भर के लिए अपना लंड हाथ में लिए आँसू बहाते फिरो। बाकी तुम्हारी मर्ज़ी … ये लंड तो हमेशा बेहूदा हरकतें करता ही रहेगा। अभी इसे बुर चाहिए बाद में गांड माँगेगा और फिर कुछ और। तुम्हें ऐसा फंसाएगा कि कहीं के नहीं रहोगे। इस चूत के लोभी और गांड के रसिया लंड की बातों में बिल्कुल नहीं आना!!!

मेरे प्रिय पाठको और पाठिकाओ। अब आप बताएँ मैं क्या करूँ? दिल और दिमाग दोनों अलग अलग खेमे में खड़े हैं किसकी सुनूँ? किसी ने क्या खूब कहा है कि आदमी का हौसला और औरत का भोसड़ा दुनिया में कुछ भी करवा सकता है। चलो एक शेर मुलाहिजा फरमाएँ :

जो चुदाई की तमन्ना दिल में रखते हैं उन्हें चूतें जरूर मिलती हैं।

अगर आपके हिलाने में सच्चाई है तो उसे हिचकी जरूर आएगी।

हे लिंग देव … पिछले 6 महीने से रोज सोमवार को सर्दियों में सुबह सुबह ठंडे पानी से नहाकर 2 किलोमीटर पैदल चलकर तुम्हारी मूर्ति पर दूध-जल चढ़ाने का कुछ तो सिला (प्रतिफल) मिलना ही चाहिए ना? बस एक बार इसकी गांड मारने को मिल जाए तो मैं जिंदगी में फिर कभी कुछ नहीं माँगूँगा। लगता है मुझे अब यह चौथी कसम खानी ही पड़ेगी.

आज पूरा दिन कामिनी के बारे में सोचते ही बीत गया। उसके चक्कर में मैं आज दफ्तर से थोड़ा जल्दी घर आया था। पर कामिनी नज़र नहीं आ रही थी शायद वह काम निपटाकर चली गयी थी। मधुर ने आज भूरे रंग की पैंट और टॉप पहना था। मधुर के नितम्ब और कमर इन कपड़ों में बहुत कातिलाना लगते हैं।

पैंट में कसे हुए उसके नितम्ब ऐसे लगते हैं जैसे वो कोई 18-20 साल की कॉलेज गर्ल हो। नितंबों के बीच की विभाजक रेखा ने तो आज भी मुझे अपने ऊपर लट्टू बना रखा है। सच कहूँ तो हमारे सुखी और सफल दाम्पत्य जीवन का असली राज ही यही है कि वो मुझे सेक्स के मामले में हर तरह से संतुष्ट कर देती है और किसी भी क्रिया के लिए मना नहीं करती। आप मेरी हालत का अंदाज़ा बखूबी लगा सकते हैं कि आज उसकी गांड मारने की मेरी कितनी प्रबल इच्छा हो रही थी।

मैं यह सोच रहा था अगर कामिनी ऐसे कपड़े पहन ले तो कैसी लगेगी। उसकी बुर और नितंबों का जोग्राफिया तो उस कसी हुयी पैंट में साफ नज़र आ जाएगा। रात में बिस्तर पर जब मैंने मधुर को बांहों में भरना चाहा तो उसने चुदाई के लिए मना कर दिया बहाना वही माहवारी के चौथे दिन का। भेन चुद गयी इस चौथे दिन की। एक बार तो मन किया कि सुहाना और कामिनी को याद करके मुट्ठ ही मार लूँ पर बाद मैंने अपना इरादा बदल दिया। सारी रात कामिनी के हसीन ख्वाबों में ही बीत गई।

शादी के बाद शुरूवाती दिनों में कई बार जब मधुर सुबह-सुबह रसोई घर में काम कर रही होती थी तो मैं चुपके से वहाँ जाकर उसे पीछे से बांहों में दबोच लिया करता था। थोड़ी देर कुनमुनाती थी और फिर हल्की सी ना-नुकर या उलाहने के बाद अहसान सा जताते हुए रसोई में ही चुदाई के लिए मान जाया करती थी। और फिर रसोई के शेल्फ पर उसे थोड़ा सा झुकाकर पीछे से उसकी चूत में लंड पेलने की लज्जत तो आज भी मुझे रोमांच से भर देती है। आप भी कभी इसे आजमाकर जरूर देखें पूरा दिन मधुर स्मृतियों और कल्पनाओं में ही बीत जाएगा।

अभी भी वह सुबह थोड़ा जल्दी उठ जाती है और नित्यक्रिया से निपटकर पहले पूजा पाठ करती है और फिर चाय बनाकर मुझे जगाती है।

पर आज मेरी आँख थोड़ी जल्दी खुल गयी थी। मैं बाथरूम से ब्रश करके जब बाहर आया तो देखा मधुर रसोई में ही है। शायद वह नहा चुकी थी और चाय बना रही थी। पजामे में कसे हुए उसके नितम्ब साफ दिख रहे थे। शायद उसने अंदर पैंटी नहीं पहनी थी। दोनों नितंबों के बीच की खाई तो जैसे मुझे उसे अपनी बांहों में दबोच लेने को उकसा ही रही थी।
 
मुझे अपनी शादी के शुरू के दिन याद आ गये। आज मैं एक बार फिर से उन्हीं लम्हों को दोहरा लेना चाहता था। मधुर अपने ध्यान में मस्त हुई कुछ गुनगुना रही थी। मैंने चुपके से उसके पीछे जाकर एक हाथ से उसके एक उरोज को कसकर पकड़ा और दूसरे हाथ से उसकी बुर को पकड़कर दोनों अंगों को जोर से भींच लिया। मेरा लंड उसके कसे नितंबों की खाई में जा टकराया।

मैंने आँखें बंद करके अपना सिर उसके कंधे पर रखते हुए अपने होंठ उसके गालों से लगा दिए। मेरा अंदाज़ा था मधुर अपने दोनों हाथ पीछे करके मुझे अपने आप से चिपका लेगी और अपने चिर-परिचित अंदाज़ में उलाहना देते हुए कहेगी … हटो परे!

“उईईई ईईईई … ” अचानक एक हल्की सी चीख उसके मुँह से निकल गयी और हाथ में पकड़ा बर्तन नीचे गिर पड़ा।

“ओहो … छ … छोड़ो मुझे … त्या तल लहे हो?” उसने अपने आप को छुड़ाने की कोशिश करते हुए मुझे एक धक्का सा दिया।

मैं इस अप्रत्याशित आवाज़ को सुनकर हड़बड़ा सा गया। आज मधुर को क्या हो गया है? वो मेरी पकड़ से निकल गई और अपनी कुर्ती और पाजामे को ठीक करने लगी। उसका चेहरा सुर्ख हो गया था और साँसें लोहार की धोंकनी की तरह चलने लगी थी।

ओह … यह तो मधुर नहीं कामिनी थी। लग गए लौड़े … !!! और फिर मुझे तो जैसे काठ ही मार गया।

“ओह … आ … आ … ई अम सॉरी … म … म … मुझे लगा … मेरा मतलब है … मैंने सोचा म … मधुर होगी। ओह … स … सॉरी … आ … ई आम रिअली सॉरी, प्लीज!” मैं हकलाता सा बोला। मुझे खुद पता नहीं मैं क्या बोल रहा था। इस अप्रत्याशित स्थिति के लिए मैं कतई तैयार नहीं था। बहुत बड़ी गलती हो गयी थी। हे भगवान … ! ये क्या हो गया??? अगर मधुर को पता चल गया या उसकी चींख सुनकर वो अभी आ गयी तो क्या होगा? सोचकर ही मुझे तो लकवा सा मार गया।

“वो … वो … वो मधु कहाँ है?” बमुश्किल मेरे मुँह से निकाला।

“दीदी सामने पाल्क में गाय तो लोटी डालने गयी है.” उसने मरियल सी आवाज़ में जवाब दिया। उसकी मुंडी झुकी हुई थी और एक हाथ से वह अपनी छाती को सहला रही थी।

“ग … कामिनी … प्लीज … मुझे माफ करना … मुझसे अनजाने में गलती लग गयी प्लीज, आई अम सॉरी.” मैं मिमियाया।

“आप बाहल जातल बैठो मैं चाय लाती हूँ.”

“ओह … हाँ” कह कर मैं कमरे में आ गया। मैंने अपना सिर पकड़ लिया।

अब मैं आगे का सीन सोच रहा था।

हे भगवान … 2-4 मिनट में जब मधुर आएगी तो क्या होगा? पता नहीं कामिनी क्या और किस प्रकार इस घटना का जिक्र मधुर से करेगी और पता नहीं मधुर क्या समझेगी और क्या प्रतिक्रिया करेगी? आज तो यकीनन लौड़े लग ही गए समझो। हे लिंग देव! रक्षा करना प्रभु … अब तो बस एक तेरा ही आसरा है। मैं इस बार सच्चे मन से तेरा सोमवार का व्रत रखूँगा और दिनभर कुछ नहीं खाऊँगा … कसम से … बस इस बार इज्जत बचा ले मेरे मौला … मेरे दीन दयाल … !!!

कामिनी बिना बोले कमरे में चाय रख गयी। उसने अपनी नज़रें झुका रखी थी। मेरी भी अब उस से आँख मिलाने की हिम्मत कहाँ थी। मैं चाय लेकर बाथरूम में चला आया। इस स्थिति में मैं मधुर का सीधा सामना नहीं कर सकता था। चाय पीने की तो बिल्कुल भी इच्छा नहीं रह गयी थी, मैंने उसे टॉयलेट के हवाले किया और फ्लश चला दिया।

मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मैं आगे के हालात के बारे में सोचने लगा। क्या किया जा सकता है? आगे आने वाली अनचाही स्थिति का सामना कैसे किया जाए? दिमाग में कुछ नहीं सूझ रहा था। अलबत्ता मैंने अपने कान बाहर ही लगाए रखे।

तभी मुझे मधुर के कदमों की हल्की सी आहट सुनाई दी- साहब को चाय दे दी क्या?

“हओ …” यह कामिनी की आवाज़ थी। वा ‘हाँ’ को ‘हओ’ बोलती है।

“आपते लिए बनाऊँ?”

“ना … मेरी इच्छा नहीं है, अभी तू पी ले.” मधुर ने लापरवाह अंदाज़ में कहा।

“अच्छा सुन! आज मार्केट चलेंगे … काम जल्दी से निपटा ले तेरे लिए कुछ ढंग के कपड़े और किताबें आदि लाने हैं.”

“हओ”

हे लिंग देव तेरा लाख-लाख शुक्र है। लगता है अभी तो जान बच गयी। मैंने भगवान का धन्यवाद किया। हालांकि मैं यह जरूर सोच रहा था अगर बाद में कामिनी ने कुछ बता दिया तो क्या होगा? ओहो … गोली मारो … बाद की बाद में देखेंगे फिलहाल तो आने वाला तूफान टल गया है। दिन में अगर कुछ अन्यथा हुआ भी तो कोई बात नहीं, मैं सिर दर्द का बहाना बना लूँगा या फिर ज्यादा काम का बहाना लगाकर आज दफ्तर से देरी से आऊँगा।

मैं भी बेकार में ज्यादा ही डर रहा हूँ … मैंने शॉवर खोलकर उसके नीचे सिर लगा दिया।

आज सुबह के घटनाक्रम के बाद पूरा दिन किसी अनहोनी की आशंका में ही बीता। दिनभर यही डर लगा रहा की अभी मधुर का फोन आया, अभी फोन आया। शाम को मैं थोड़ा देरी से घर पहुँचा। मैं आज मधुर की पसंदीदा आइसक्रीम और पिज़्जा लेकर आया था।

मैंने डरते डरते घर में कदम रखे। क्या पता कोई नयी आफ़त मेरा इंतज़ार कर रही हो? मुझे लगा सब कुछ नॉर्मल सा है, मैं बेकार ही चिंता में मरा जा रहा हूँ।

कामिनी शायद काम निपटाकर अपने घर चली गयी थी। मधुर भी खासे रंगीन मूड में लग रही थी। लगता है लिंग देव ने मेरी सुन ली।

कई बार मधुर जब अच्छे मूड में होती है तो अपने बालों की दो चोटियाँ बनाती है। और फिर उस रात हमारा प्रेमयुद्ध (मधुर को चुदाई, लंड, चूत और गांड जैसे जैसे शब्द पसंद नहीं हैं) बहुत देर रात तक चलता है। रात को अक्सर वह नाइटी ही पहनती है पर आज उसने सफेद रंग का कमीज़-पाजामा पहना था जिन पर काली-काली बिंदियाँ बनी थी। आज उसने दो चोटियाँ भी बनाई थी, मुझे पक्का यकीन था आज मधुर गांड देने के लिए जरूर राज़ी हो जाएगी।

पिछले 4-5 दिन से उसे माहवारी आई हुई थी और आप तो जानते ही हैं इन दिनों में मधुर चुदाई तो छोड़ो मुझे अपने आप को छूने भी नहीं देती।

आज तो खैर 5वाँ दिन … मेरा मतलब रात थी।

रात के कोई दस बजे होंगे। बार-बार सुबह की घटना मेरे दिमाग में घूम रही थी। दिमाग जैसे कह रहा था “मैने चेताया था ना? जल्दबाजी में कोई पंगा मत लेना पर साला लंड तो किसी की मानता नहीं? लग गये ना लौड़े?”

मैं अपने नाराज लेकिन खड़े लंड को पाजामे के ऊपर से ही सहला रहा था। मधुर काम निपटाकर कमरे में आई और ड्रेसिंग टेबल के शीशे के सामने खड़ी होकर अपने आप को देखने लगी। मेरा पूरा ध्यान उसकी इन हरकतों पर ही लगा था। ऐसे मौकों पर मैं अक्सर उसे अपनी बांहों में दबोच लिया करता हूँ पर आज मेरी ऐसा करने के हिम्मत नहीं हो रही थी। मैं आज पूरी तसल्ली कर लेना चाहता था कि आज सुबह वाली बात कामिनी ने उसे बताई है या नहीं।

“प्रेम?”

“हूँ?” मेरा दिल जोर से धड़का।

“मैं कुछ मोटी नहीं होती जा रही?” उसने अपना कुर्ता थोड़ा सा ऊपर उठाकर अपनी कमर की चमड़ी को अपने अंगूठे और तर्जनी अंगुली के बीच दबाकर देखते हुए पूछा।

आप तो जानते ही हैं कि ये सब औरतों के नाज़-ओ-अंदाज़ और नखरे होते हैं। उन्हें अपनी तारीफ बहुत पसंद होती है। मैं आज भला उसकी तारीफ क्योंकर नहीं करता- मेरी जान, तुम बहुत खूबसूरत लगती हो। कहाँ मोटी हो रही हो मुझे तो लगता है तुम कमजोर होती जा रही हो, दिनभर काम में लगी रहती हो अपना ध्यान बिल्कुल नहीं रखती!

“हटो परे … झूठे कहीं के!” उसने अपने बालों की जानबूझ कर छोड़ी गयी पतली सी आवारा लट को पीछे करते हुए अपने चिर-परिचित अंदाज़ में कहा।

“सच … कहता हूँ … तुम आज भी 20-22 की कॉलेज गर्ल ही लगती हो.” मैंने मस्का लगाया।

“देखो ना कितनी चर्बी चढ़ गयी है.” उसने अपनी कमर को दोनों हाथों से घेरा बनाकर पकड़ते हुए मेरी ओर देखा।

वाह … ! क्या कातिलाना अंदाज़ था।

अब तो मेरा उठना और उसे बांहों में भर लेना लाज़मी बन गया था। मैं पलंग से उछला और जाकर पीछे से उसे बांहों में भर लिया। मेरा खड़ा लंड उसके नितंबों से जा लगा और एक हाथ से मैंने उसका एक उरोज और दूसरे हाथ से उसकी मुनिया को पकड़कर धीरे धीरे दबाना चालू कर दिया।

“ओहो … रुको तो सही … लाइट तो बंद करने दो.”

“जानेमन अब रूकना उकना नहीं … जल्दी से मेरे दुश्मनों को परे हटाओ.” मैंने उसके पाजामे का नाड़ा खींचते हुए कहा।

“ओहो … प्रेम तुम से तो 3-4 दिन भी नहीं रुका जा सकता? आज मेरा बिल्कुल भी मूड नहीं है, कल करेंगे प्लीज … आज तो 5वाँ दिन ही है.”

“तुम्हारे 5वें दिन की ऐसी की तैसी! आज मैं तुम्हें नहीं छोड़ने वाला!” मैंने उसे बांहों में भरे हुए ही पलंग पर पटक दिया।

इस आपाधापी में वह पेट के बल गिर पड़ी और मैं ठीक उसके ऊपर आ गया।

“मेरी जान, तुम क्या जानो कि पिछली चार रातें यानि 96 घंटे और 14 मिनट मैंने कैसे बिताए हैं?”

“हुंह … तुम्हें मेरी कोई परवाह ही नहीं है.”

“मधुर तुम बहुत खूबसूरत हो … मेरी जान … बोलो क्या चाहिए तुम्हें?” मैंने उसके कानो के पास चुंबन लेते हुए कहा।

“हटो … परे झूठे कहीं के?” मधुर ने उलाहना देते हुए से कहा।

“सच में मधुर, तुम्हारे नितम्ब बहुत खूबसूरत हैं.” कहते हुए मैंने उसके कानों की लॉब को अपने होंठों में दबा लिया।

“नो … बिल्कुल नहीं …”

“प्लीज मधुर आज कर लेने दो ना … ? देखो ना पूरे 9 महीने और 17 दिन हो गये हैं। आज पीछे से करने का बहुत मन कर रहा है प्लीज मान जाओ।

मैं उसके ऊपर से थोड़ा सा सरक गया और उसके नितंबों पर हाथ फिराने लगा। मेरा लंड तो पाजामें में जैसे उधम ही मचाने लगा था।

“ओहो … रुको … ना …” मधुर कसमसाने सी लगी।

“क्या हुआ?”
 
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