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Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

वो पलटकर पीठ के बल हो गयी और फिर बोली “प्रेम … बस एक बार मुझे गर्भवती हो जाने दो फिर चाहे तुम रोज पीछे से कर लिया करना.”

“मधुर! देखो डॉक्टर ने बताया तो है कि …”

वह मेरी बात को बीच में ही काटते हुए बोली- अरे छोड़ो जी … डॉक्टरों को क्या पता … मुझे अपने कान्हाजी और लिंग देव पर पूरा विश्वास है, मेरी मनोकामना जरूर पूरी होगी.”

मैं मन ही मन हंसने लगा। लिंग देव कुछ नहीं करेंगे ये लंड देव जरूर कुछ कर सकता है।

पर मैंने उसे समझाते हुए कहा- मधुर, हम कोई बच्चा गोद भी तो ले सकते हैं?

“नहीं प्रेम, मैं तुम्हारे अंश से ही अपनी कोख भरना चाहती हूँ.”

“आजकल IVF, IUI, सैरोगेसी जैसी बहुत सी तकनीकें और साधन हैं तो फिर ..????”

“नहीं मुझे इस झमेले में नहीं पड़ना … ” मधुर कुछ उदास सी हो गयी थी।

“प्रेम???”

“हाँ”

“बोलो ना मेरी मनोकामना पूरी होगी ना? तुम क्या कहते हो?”

अब मैं क्या बोलता? डॉक्टर्स ने तो साफ मना कर दिया है कि मधुर अब कभी दुबारा माँ नहीं बन सकेगी। पर मैं उसका नाजुक दिल नहीं तोड़ सकता था। पिछली बार उसकी माहवारी 3-4 दिन आगे सरक गयी थी तो वो कितना खुश थी। पर जैसे ही माहवारी आई वो बहुत रोई थी। मैंने उसका मन रखने के लिए तसल्ली देते हुए कहा- हाँ मधुर, कई बार चमत्कार भी हो जाते हैं … हाँ हाँ तुम्हारी मनोकामना जरूर पूरी होगी.

“ओह … थैंक यू!” कहते हुए मधुर ने हाथों से मेरा सिर पकड़कर मेरे होठों को जोर से चूम लिया।

प्यारे पाठको और पाठिकाओ! क्या आप ‘आमीन!’ भी नहीं बोलेंगे?

मैंने अपने और मधुर के दुश्मनों को (अरे भाई कपड़ों को) परे हटा दिया और उसे बांहों में दबोच लिया। अब मधुर ने अपनी जांघें खोल दी और पप्पू को अपने हाथों से पकड़कर अपनी मुनिया के छेद पर रगड़ने लगी। मैंने एक जोर का धक्का मारकर उसका काम आसान कर दिया।

चूत तो वैसे ही प्रेमरस में भीगी हुई थी पप्पू महाराज गच्च से अंदर दाखिल हो गये। हम दोनों के होंठ आपस में चिपक गये। मुनिया के रसीले होंठों ने पप्पू को जोर से भींच लिया। मधुर आज पूरे शबाब और मधुर रंग में लग रही थी। आज तो वो मुझे हर तरह (सिवाय गांड के) खुश के देना चाहती थी।

मैंने उसके उरोजों को भींचते हुए उसके होंठों को चूमना शुरू कर दिया। आह … उंह और फच्च-फच्च का मधुर प्रेम संगीत सितार की तरह बजने लगा। मधुर हौले हौले अपने नितंबों को उठाकर मेरे धक्कों की ताल में अपना सुर और लय मिलाने लगी और फिर उसने अपने दोनों पैर ऊपर उठाकर मेरी कमर पर कस लिए।

चुदवाने के मामले में मधुर का कोई जवाब नहीं है। वह मर्द को कैसे रिझाया जाता है, बखूबी जानती है। उसकी चूत की अदाएँ, दीवारों को सिकोड़ना और मरोड़ना चुदाई के आनंद को दुगना कर देता है। आज भी उसकी चूत किसी 20-22 साल की नवयुवती की तरह ही है।

अन्दर बाहर होते मेरे लंड को जिस प्रकार वह अपनी चूत में भींच रही थी, मुझे लगता था कि मैं आज जल्दी झड़ जाऊँगा पर मैं ऐसा कतई नहीं चाहता था। मैं आज मधुर को लंबे समय तक रगड़ने के मूड में था।

मेरे सपनों में तो जैसे कामिनी ही बसी थी। सुबह जब मैंने उसकी बुर को हाथ में पकड़ा था तो मोटे मोटे पपोटों का थोड़ा अंदाज़ा तो हो ही गया था। उसकी केश राशि को देखकर तो कोई अनाड़ी भी अंदाज़ा लगा सकता है कि उसकी चूत पर किस प्रकार की मुलायम घुंघराली केशर क्यारी उगी होगी और बुर के दोनों फलक तो बिल्कुल गुलाबी संतरे की फाँकों के मानिंद होंगे।

बुर के ऊपर की मदनमणि (दाना) तो किशमिश के दाने के जितनी होगी और कामरस में डूबी उसकी बुर की फाँकों और पत्तियों के अंदर का नज़ारा देखकर तो आदमी के लिए अपने होश कायम रख पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा। काश कभी ऐसा हो जाए कि यह हसीन मुजसम्मा मेरी बांहों में आ जाए तो मैं इसके लिए पूरी कायनात ही लूटा दूँ।

मेरी यह खूबसूरत कल्पना मुझे मदहोश किए जा रही थी। कई बार मुझे एक शंका भी होती है इतनी खूबसूरत लड़की अपने कौमार्य को कैसे बचाकर रख पाई होगी? कहीं किसी ने रगड़ तो नहीं दिया होगा?

क्या पता कोई प्रेमगुरु फैज़ाबाद में ही … ओह … नो …

अचानक मधुर ने अपने दाँतों से मेरे होंठों को जोर से काटा तो मैं अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर आया। और फिर मैंने दना-दन 5-7 धक्के जोर-जोर से लगा दिए।

मधुर आह … उइईईई ईईईईई … करने लगी। उसे लगा मैं अब अपना रस निकालने के मूड में हूँ।

“ओहो … थोड़ा धीरे करो … ओह … प्लीज … रुको … मत … मेरी जान … मेरे प्रेम!” उसने मेरे होंठों को एक बार फिर चूम लिया।

“प्रेम एक बार रुको प्लीज … ओह …”

“क्या हुआ?”

“एक बार बाहर निकालो, प्लीज जल्दी!”

मैं चाहता तो नहीं था पर मैं उसके ऊपर से हट गया। मधुर जल्दी से डॉगी स्टाइल में हो गयी। आप तो जानते ही हैं मुझे यह आसन कितना पसंद है। मधुर इस प्रकार से बहुत कम करवाती है पर इन दिनों में तो वह झड़ने के समय इसी आसान में रहना पसंद करती है। अब मैं भी उसके पीछे घुटनों के बल खड़ा होकर उसके गोल-गोल नितम्बों पर हाथ फिराने लगा।

मैंने थोड़ा नीचे होकर उसके नितंबों पर एक करारा चुंबन लिया तो मधुर के मुँह से सीत्कार सी निकल गयी। अब मैंने उसकी चूत की पंखुड़ियों को थोड़ा चौड़ा किया तो ज़ीरो वॉट के नाइट लैंप की रोशनी में उसकी चूत का कामरस में डूबा गुलाबी चीरा ऐसा लग रहा था जैसे किसी पहाड़ी से कोई बलखाती शहद की नदी निकल रही हो।

मैंने उसके मूलबंद (पेरिनियम- गुदा और चूत के बीच का 2-3 से.मी. का भाग) पर अपनी जीभ फिराई। औरतों का यह भाग बहुत संवेदनशील होता है।

मधुर की तो मीठी चीख सी निकल गयी ‘ईईई ईईईई ईईईईई ईई’

“जल्दी से डालो ना प्लीज?” कामोत्तेजना के शिखर पर पहुँची मधुर अपने नितंबों को थिरकाने लगी थी। उसने एक हाथ पीछे करके मेरे पप्पू पकड़कर मसलना चालू कर दिया।

अब देर करना तो ठीक नहीं था। मैं थोड़ा आगे सरककर अपने तातार (तन्नाया) लंड को उसकी चूत के मुहाने पर रख दिया और एक जोर के झटके के साथ पूरा लंड उसकी पनियाई चूत में फिर से ठोक दिया।

“उईईईईई माआआ आआआ … ओहो … थोड़ा धीरे प्लीज?”

मैं अब कुछ सुनने के मूड में नहीं था। मैंने उसकी कमर कसकर पकड़ ली और दना-दन 5-6 धक्के लगा दिए। मधुर पहले तो थोड़ा हिनहिनाई फिर उसने अपना सिर तकिए पर रख दिया और अपनी जांघों को ढीला कर दिया और अपनी कमर और नितंबों को मेरे धक्कों के साथ आगे पीछे करने लगी।

सच कहूँ तो शादी के 8-10 साल बाद भी मधुर की चूत और गांड की लज्जत अभी भी बरकरार है। मैं मन ही मन कामिनी और मधुर के नितंबों की तुलना कर रहा था। कामिनी और मधुर के नितंबों में 19-20 का ही फर्क रहा होगा। पर कामिनी के नितम्ब कसे हुए ज्यादा लगते हैं।

काश कभी ऐसा हो जाए कि कामिनी के नग्न नितम्ब मेरी आँखों के सामने हों और मैं उनको जोर जोर से दबाकर मसलकर छूकर और चूम कर देख सकूँ। पहले उसके नितंबों पर 4-5 थप्पड़ लगाऊँ और फिर उसकी बुर और गांड के छेद पर अपनी जीभ फिरा दूँ तो उसकी दोनों ही सहेलियाँ (बुर और उसकी पड़ोसन) ईसस्स्स स्स्स्स्स कर उठे।

“क्या हुआ?”

मैं चौंका … शायद कामिनी के ख्यालों में मैंने धक्के लगाने बंद कर दिए थे। मैंने उसके दोनों नितंबों पर एक-एक थप्पड़ सा लगाया और एक जोर का धक्का फिर से लगाना चालू कर दिया।

“आह … उईईई … याआआ … आह …” करते हुए मधुर ने अपनी चूत की फाँकों को जोर से कसना चालू कर दिया। अब मैं 5-6 हल्के धक्कों के बाद एक धक्का जोर से लगा रहा था। मधुर मीठी सीत्कार कर रही थी और उसने अपनी चूत का संकोचन भी शुरू कर दिया था।

मुझे लगा वो अब झड़ने के करीब है।

मधुर के नितंबों की खाई के बीच बना वो जानलेवा छेद जैसे खुल और बंद हो रहा था। हालांकि अब यह छेद गुलाबी की जगह काला तो नहीं पड़ा पर थोड़ा सांवला जरूर हो गया है। पर उसकी कसावट वैसी की वैसी ही है।

मैंने अपने अंगूठे पर अपना थूक लगाकर उस छेद पर फिराना चालू कर दिया। मेरा मन तो उस छेड़ में अपना अंगूठा डालने का कर रहा था पर मैंने बड़ी मुश्किल से अपने आप को रोक रखा था। मैं मधुर को नाराज़ नहीं करना चाहता था।

मैं एक हाथ से उसके एक उरोज की घुंडी को पकड़ कर मसलने और दूसरे हाथ से उसके नितंबों पर थपकी सी लगाने लगा। मधुर अपने नितंबों को मेरे धक्कों के साथ जोर-जोर से आगे पीछे करने लगी थी। वह आह … उईईई … या … की आवाज़ें निकालने लगी थी और अपनी चूत का संकोचन करने लगी थी।

मैंने उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ लिया और कसकर दो धक्के लगाए। उईईई ईईई माआअ … मधुर की रोमांच भरी सीत्कार निकली और उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया। अब वो कुछ ढीली पड़ने गयी। उसने अपने सिर को तकिए से लगा लिया। ऐसा करने से उसके नितम्ब और खुल गये। वह जोर जोर से सांस लेने लगी।

मैं थोड़ी देर रूक गया।

“प्रेम निकाल दो … प्लीज अब रुको मत … मेरी तो कमर दर्द करने लग गयी.”

मुझे लगा 20-25 मिनट के इस घमासान से वह थक गयी है।

मेरा मूड और लंबा खींचने का था पर मधुर की हालत देखकर मैंने जोर जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए और अगले 2 मिनट में मेरा भी कामरस उसकी चूत में निकलने लगा।

1 … 2 … 3 … 4 … पता नहीं कितनी फुहारें मेरे लंड ने छोड़ी. मुझे उनको गिनने की सुध कहाँ थी। हम दोनों तो आँखें बंद किये प्रकृति के इस अनूठे, अनमोल और नैसर्गिक आनंद को भोग कर जैसे मोक्ष को प्राप्त हो रहे थे।
 
मधुर ने अपनी मुनिया को जोर से सिकोड़ते हुए मेरे कामरस को जैसे चूसना शुरू कर दिया। मैं वीर्य स्खलन के बाद भी अपने लंड को उसकी चूत में डाले रहा। थोड़ी देर बाद मेरा लंड उसकी चूत से फिसलकर बाहर आ गया। मधुर थोड़ी देर उसी पॉज़ में अपने नितंबों को ऊपर किए रही।

वो मानती है कि ऐसा करने से वीर्य उसके गर्भाशय में चला जाएगा और उसके गर्भवती होने की संभावना बढ़ जाएगी।

आमीन … (तथास्तु)

मैं जब बाथरूम में अपने लंड को धोकर कमरे में वापस आया तो मधुर सीधी होकर लेट चुकी थी। मैंने उसे एक बार फिर से बांहों में भर लिया और एक चुंबन उसके होंठों पर ले लिया।

“थैंक यू मधुर इतनी प्यारी चुदाई के लिए!”

“छी … !! कितना गंदा बोलते हो तुम?”

“अरे मेरी बुलबुल अब चुदाई को तो चुदाई ही बोलेंगे ना?”

“क्यों और नाम नहीं है क्या?”

“चलो तुम बता दो?”

“स … संभोग बोल सकते हो, प्रेम मिलन बोल सकते हो, रति क्रिया … संगम … बहुत से सुंदर नाम … हैं?”

“मेरी जान चुदाई में गंदा-गंदा बोलने का भी अपना ही मज़ा है.”

उसने तिरछी निगाहों से मुझे देखा।

“ओके कोई बात नहीं अब से चुदाई बोलना बंद … कसम से … पक्का!” मैंने हँसते हुए कहा।

“हुंह … हटो परे गंदे कहीं के …”

मैने हँसकर उसके उरोजों के बीच अपना सिर रख दिया। मधुर को अपने बूब्स चुसवाना बहुत पसंद है। स्त्री के जो अंग ज्यादा खूबसूरत होते हैं उनमें स्त्री की कामुकता छिपी होती है। मधुर के तो उरोज और नितम्ब बहुत ही कामुक और खूबसूरत हैं। मैं अक्सर चुदाई से पहले और चुदाई के दौरान भी उसके उरोजों को चूसता रहता हूँ पर इन दिनों में डॉगी स्टाइल के चक्कर में यह कम नहीं हो पाता है।

मैंने उसके एक उरोज को मुँह में भर लिया। मधुर एक हाथ की अंगुलियाँ मेरे सिर के बालों में फिराने लगी।

“ओह … दांत से मत काटो प्लीज!” मैं बीच बीच में उसके पूरे उरोज को मुँह में भरकर चूस रहा था कभी कभी उसके निप्पल को दाँतों से थोड़ा दबा भी रहा था। निप्पल तो फूलकर अब अंगूर के दाने जैसे हो चले थे।

“प्रेम बुरा ना मानो तो एक बात पूछूँ?”

“हाँ …”

“ये कामिनी है ना?”

मैं चौंका … ??? हे भगवान क्या कामिनी ने मधुर को कहीं सब कुछ बता तो नहीं दिया? मुझे यही डर सता रहा था। मैं तो सोच रहा था बात आई गयी हो गई होगी पर … मेरी किस्मत इतनी सिकंदर कैसे हो सकती है? लग गये लौड़े!!!

“ओह … दरअसल वो … वो …” मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था क्या बोलूं? मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था। बस अब तो जैसे बम विस्फोट होने ही वाला है।

“प्रेम मैं चाहती हूँ क्यों ना हम कामिनी को अपने यहाँ ही रख लें?”

“क … क्या मतलब??? … ओह मेरा मतलब … वो … ?” मैं हकला सा रहा था। मुझे तो उसकी बातों पर जैसे यकीन ही नहीं हो रहा था।

“देखो … उसके यहाँ रहने से मुझे और तुम्हें कितना आराम हो जाएगा। मैं चाहती हूँ वो कुछ पढ़ लिख भी ले। वह 5-4 क्लास तक तो पढ़ी है, बहुत इंटेलिजेंट भी है और आगे पढ़ना भी चाहती है पर उसके घरवाले सभी निपट मूर्ख हैं। जल्दी ही किसी दिन कोई ऊंट, बैल या मोटा बकरा देखकर उसे किसी निरीह पशु की तरह उसके खूंटे से बाँध देंगे। मैं चाहती हूँ वह किसी तरह 10वीं क्लास पास कर ले। उसके बाद कोई भला लड़का देखकर उसकी शादी करवा देंगे। तुम क्या कहते हो?”

“ओह …”

“क्या हुआ?”

“म … म … मेरा मतलब है यह तो बहुत खूब … बहुत ही अच्छी बात है.”

“हाँ … अनार की तरह इस बेचारी का जीवन तो खराब नहीं होगा.”

“हाँ जान तुम बिलकुल सही कह रही हो।”

इस मधुर की बच्ची ने तो मुझे डरा ही दिया था। इन औरतों को किसी बात को घुमा फिराकर बताने में पता नहीं क्या मज़ा आता है?

अचानक मुझे लगा मेरी सारी चिंताएँ एक ही झटके में अपने आप दूर हो गयी हैं।

मैंने एक बार फिर से मधुर को अपनी बांहों में जकड़ लिया … अलबत्ता मेरे ख्यालों में फिर से कामिनी का कमसिन बदन, सख्त उरोज और नितम्ब ही घूम रहे थे.

इस भयंकर प्रेमयुद्ध के बाद सुबह उठने में देर तो होनी ही थी। मधुर ने चाय बनाकर मुझे जगाया और खुद बाथरूम में घुस गयी। आज उसे अपनी मुनिया की सफाई करनी थी सो उसे पूरा एक घंटा लगने वाला था।

मैं बाहर हाल में बैठकर चाय की चुस्कियाँ लेते हुए अखबार पढ़ रहा था। आज कामिनी नज़र नहीं आ रही थी अलबत्ता एक थोड़े साँवले से रंग की लड़की रसोई से सफाई की बाल्टी और झाड़ू पौंछा लेकर आती दिखाई दी।

ओह … यह तो गुलाबो की दूसरी लड़की थी। मुझे फिर कुछ आशंका सी हुई? कामिनी क्यों नहीं आई? क्या बात हो सकती है? पता नहीं कल के वाक़ये (घटनाक्रम) के बाद उसने फ़ैसला कर लिया हो कि अब उसे यहाँ काम नहीं करना? पर मधुर तो उसे यहाँ स्थायी तौर पर ही रखने का कह रही थी … फिर क्या बात हो सकती है?

हे लिंग देव कहीं तकदीर में फिर से लौड़े तो नहीं लग गये?

अब मेरी नज़र उस लड़की पर पड़ी। वो नीचे बैठकर पौंछा लगा रही थी। उसने हल्के आसमानी रंग की कुर्ती और जांघिया पहन रखा था। पौंछा लगाते समय वो घुटनों के बल होकर आगे झुक रही थी। झुकने के कारण उसके छोटे-छोटे चीकुओं की झलक कभी-कभी दिख रही थी। गेहुंए रंग के दो बड़े से चीकू हों जैसे। एरोला ऊपर से फूला हुआ शायद निप्पल अभी पूरी तरह नहीं बने थे। ऐसे लग रहे थे जैसे चीकू पर जामुन का मोटा सा दाना रख दिया हो।

हे भगवान … क्या रसगुल्ले हैं। उसकी छाती का उठान भरपूर लग रहा था। बायाँ उरोज थोड़ा सा बड़ा लग रहा था। अभी उसे ब्रा पहनने की सुध कहाँ होगी। मुझे लगा मेरा लंड अंगड़ाई सी लेने लगा है।

जब से सुहाना को देखा है उसके टेनिस की बॉल जैसे उरोजों को नग्न देखने की मेरी कितनी तीव्र इच्छा होती होगी आप अंदाज़ा लगा सकते हैं।

मैं भला यह मौका हाथ से कैसे निकल जाने देता। मैं टकटकी लगाए उसके उन नन्हे परिंदों को ही देख रहा था। काश वक़्त थम जाए और यह इसी तरह थोड़ी झुकी हुई रहे और मैं इस दृश्य को निहारता रहूँ।

मुझे अचानक ख्याल आया अगर मैं इसे बातों में लगा लूँ तो वो जिस प्रकार पौंछा लगा रही है बहुत देर तक उसके इन नन्हे परिंदों की हिलजुल देखकर अपनी आँखों को तृप्त कर सकता हूँ।

“अंकल आप अपने पैल थोड़े ऊपल कल लो.” अचानक एक मीठी सी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।

लगता है यह भी कामिनी की तरह ‘र’ को ‘ल’ बोलती है।

“ओह … हाँ …” हालांकि मुझे उसका अंकल संबोधन अच्छा तो नहीं लगा पर मैंने चुपचाप अपने पैर ऊपर सोफे पर रख लिए. अलबत्ता मेरी नज़रें उसकी झीनी कुर्ती के अंदर ही लगी रही।

“क्या नाम है तुम्हारा?”

“मेला नाम?” उसने हैरानी से इधर उधर देखते हुए पूछा जैसे उसे यह उम्मीद नहीं थी कि मैं उस से बात करूंगा।

हे भगवान इसकी काली आँखें तो सुहाना (मेरी बंगाली पड़ोसन की युवा बेटी) से भी ज्यादा बड़ी और खूबसूरत हैं।

“हाँ तुम्हारा ही तो पूछ रहा हूँ?”

“मेला नाम सानिया मिलजा है” (सानिया मिर्ज़ा)

मुझे नाम कुछ अज़ीब सा लगा पर मैंने मुस्कुराते हुए कहा- बहुत खूबसूरत नाम है.

वह हैरान हुई मेरी ओर देखने लगी।

उसे लगा होगा उसका अज़ीब सा नाम सुनकर मैं शायद कोई अन्यथा टिप्पणी करूंगा। मुझे थोड़ा-थोड़ा याद पड़ता है एक दो बार अनार या अंगूर ने इसका जिक्र तो किया था पर उन्होंने तो इसका नाम मीठी बाई बताया था. मधुर ने एक बार हँसते हुए बताया था कि जिस दिन यह पैदा हुई थी, सानिया मिर्ज़ा ने टेनिस में शायद कोई बड़ा खिताब जीता था तो गुलाबो ने इस नये कॅलेंडर का नाम सानिया मिर्ज़ा ही रख दिया था।

खैर नाम जो भी हो इसके चीकू तो कमाल के हैं।

मैं उसे बातों में लगाए रखना चाहता था- वो आज कामिनी क्यों नहीं आई?

“कौन गौली?” उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।

“अरे वो तुम्हारी बड़ी बहन है ना?”

“ओह … अच्छा … तोते दीदी?”

“हाँ हाँ!”
 
कामिनी ‘क’ और ‘र’ का उच्चारण ठीक से नहीं कर पाती इसीलिए घर वालों ने शायद उसे ‘तोते’ नाम से बुलाना शुरू कर दिया होगा। कई बार बचपन में अंगूठा चूसने वाले बच्चों के साथ या अनचाहे बच्चे जिनकी परवरिश ठीक से ना हुई हो उनके साथ अक्सर ऐसा होता है। यह एक प्रकार का मेंटल डिस-ऑर्डर (दिमागी असंतुलन) होता है या फिर कई बार जीभ में लचीलापन कम होने की वजह से भी ऐसा होता है।

ओह … मैं भी क्या बेहूदा बातें ले बैठा।

“उस पल आज छिपकली गिल गई.”

“छिपकली? कमाल है छिपकली कैसे गिर गई?”

“मुझे क्या मालूम?”

“ओह!”

“उस पल तो हल महीने गिलती है?”

ओह … मैं भी निरा उल्लू ही हूँ। यह तो माहवारी का जिक्र कर रही थी। मुझे थोड़ी हंसी सी आ गई। एक बार तो मेरे मन में आया उसे भी पूछ लूँ कि कभी उस पर छिपकली गिरी या नहीं? पर ऐसा करना ठीक नहीं था।

सानिया मेरे से कोई एक कदम की दूरी पर उकड़ू सी बैठी थी। अब मेरी नज़र उसकी जांघों के बीच चली गयी। पट्टेदार जांघिया उसकी पिक्की के बीच की लकीर में धंसा हुआ सा था। याल्लाह … !!! उसके पपोटे तो किसी जवान लड़की की तरह लग रहे थे।

उसकी जांघों का ऊपरी हिस्सा अन्य हिस्सों के बजाए कुछ गोरा नज़र आ रहा था। उम्र के हिसाब से उसकी जांघें भी थोड़ी भारी लग रही थी। नितम्ब भी गोल गोल खरबूजे जैसे ही तो थे। बस कुछ समय बाद तो यह मीठी बाई छप्पन छुरी बन जाएगी।

मैं मन्त्र मुग्ध हुआ इस नज़ारे को अपनी आंकों में कैद कर लेना चाहता था। काश वक़्त थम जाए और मैं इस मीठी कचोरी को ऐसे ही देखता रहूँ।

“तुम किस क्लास में पढ़ती हो?”

“मैं?” उसे बड़ा आश्चर्य हो रहा था कि मैं इतना बड़ा आदमी (उसकी नज़र में) उस से इस प्रकार घुलमिल कर बात कर रहा हूँ।

“मम्मी स्कूल भेजती ही नहीं?”

“ओह … क्या तुम पढ़ना चाहती हो?” मैंने पूछा।

“हाँ मैं तो बहुत पढ़ना चाहती हूँ औल बड़ी होकल पुलिस बनाना चाहती हूँ?”

“अरे वाह! ठीक है मैं तुम्हारी मधुर दीदी से बोलूँगा तुम्हारी मम्मी को समझाएगी और तुम्हें पढ़ने स्कूल जरूर भेजेगी।

“सच्ची में?” उसे शायद मेरी बातों का यकीन ही नहीं हो रहा था।

“हाँ पक्का! अच्छा तुम्हारा जन्मदिन कब आता है?”

“पता नहीं? … क्यों?” उसने हैरान होते पूछा।

“क्या घरवाले तुम्हारा जन्मदिन नहीं मनाते?

“किच्च … कभी नहीं मनाया.” उसने बड़े उदास स्वर में कहा।

“ओह … चलो कोई बात नहीं … तुम्हें मधुर के जन्मदिन पर बढ़िया गिफ़्ट दिलवाएँगे.”

“अच्छा?” उसकी आँखों की चमक तो ऐसे थी जैसे किसी अंधे को आँखें मिलने वाली हो।

“तुमने आज नाश्ते में क्या खाया?”

“कुछ नहीं.” उसने अपनी मुंडी नीचे कर ली।

हे भगवान कैसे माँ-बाप हैं बेचारी को बिना खिलाये पिलाए ही काम पर भेज दिया।

“चलो तुम भी चाय और बिस्किट ले लो.” मैंने कहा.

“ना … दीदी गुस्सा होंगी, उनसे पूछ कल ही लूँगी.” उसने बड़ी मासूमियत से कहा।

साली यह मधुर भी एकता कपूर की तरह पूरी हिटलर-तानाशाह बनी रहती है। मज़ाल है उसकी मर्ज़ी के बिना कोई चूं भी कर दे।

खैर मैं तो उसे बातों में उलझाए जून महीने के अन्तिम दिनों की गर्मी में पसीने में भीगे उसके कमसिन और मासूम सौंदर्य का रसास्वादन कर रहा था कि अचानक बेडरूम का दरवाजा खुलने की आवाज़ आई।

मधुर नहाकर आ गई थी; मैंने फिर से अखबार में अपनी आँखें गड़ा दी।

आप सोच रहे होंगे कि किसी कमसिन लड़की के बारे में ऐसे ख्याल रखना तो मेरे जैसे पढ़े लिखे और तथाकथित सामाजिक प्राणी के लिए और वैसे भी अगर नैतिक दृष्टि से भी देखा जाए तो कतई शोभा नहीं देता। ठीक है! मैं आपसे पूछता हूँ मैंने किया क्या है? मैंने तो एक कुशल भंवरे की तरह अपने बावरे नयनों से केवल इस नाज़ुक कली के अछूते सौंदर्य का दीदार या उसके कमसिन बदन की थोड़ी सी खुशबू अपने नथुनों में भर ली है और वो भी बिना उसकी कोमल भावनाओं को कोई ठेश पहुँचाए। आप बेवजह हो हल्ला मचा रहे हैं।

दोस्तो, आप कुछ भी कहें या सोचें मैं अपने अंदर के रावण को तो मार सकता हूँ पर अपने अंदर के इमरान हाशमी को कभी मरने नहीं दूंगा।

कामिनी 4 दिनों के बाद के बाद आज सुबह आई है। कहने को तो बस 4 दिन थे पर मेरे लिए यह इंतज़ार जैसे 4 वर्षों के समान था। कामिनी अपने साथ कुछ कपड़े लत्ते और छोटा-मोटा सामान भी लेकर आई है। लगता अब तो यह परमानेंट यही रहेगी। मधुर ने उसके लिए स्टडी रूम में एक फोल्डिंग बेड लगा दिया है। मधुर ने उसे शायद कपड़े भी पहनने के लिए दे दिए हैं। पटियाला सलवार और कुर्ती पहने कामिनी किसी पंजाबी मुटियार से कम नहीं लग रही है। इसे देख कर तो बस मुँह से यही निकलेगा … ओए होये … क्या पटियाला पैग है।

ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद आज से मधुर का स्कूल जाना शुरू हो गया है। उसे सुबह 8 बजे से पहले ही स्कूल जाना होता है। कामिनी ने उसके लिए नाश्ता बना दिया था। मैं हॉल में सोफे पर बैठे हुए अखबार पढ़ने का नाटक कर रहा था अलबत्ता मेरे कान रसोई में ही लगे थे।

कामिनी रसोई घर के दरवाजे के पास खड़ी थी। मधुर जरा जल्दी में थी और उसे समझा रही थी- साहब ने चाय तो पी ली है. उनके लिए नाश्ते में पोहे बना देना और लंच का तुम्हें बता ही दिया है। तू भी खा पी लेना और हाँ … मिर्चें कम डालना.

“हओ.”

“और सुन आज कपड़े धोकर प्रेस कर लेना दिन में। मैं दो बजे तक आ जाऊँगी आज से तुम्हारी नियमित रूप से पढ़ाई शुरू करनी है बहुत छुट्टी मार ली तुमने!”

“हओ.” कामिनी ने चिर परिचित अंदाज़ में अपनी मुंडी हाँ में हिलाई।

मधुर ने बाहर जाते समय मेरे ऊपर एक उड़ती सी नज़र सी डाली तो मैंने अखबार की ओट से उसे एक हवाई किस दे दिया। मधुर मुस्कुराते हुए चली गयी। कसकर बाँधी हुई साड़ी में उसके नितम्ब आज बहुत कातिल लग रहे थे।
 
मैं अभी अपने आगे के प्लान के बारे में सोच ही रहा था कि कामिनी रसोई से बाहर आई और थोड़ी दूर से ही उसने पूछा- आपते लिए नाश्ता बना दूँ?

“ना … अभी नहीं, मैं नहा लेता हूँ फिर नाश्ता करूंगा … अभी तो बस एक कप कड़क कॉफी पिला दो.”

कामिनी अपने चिर परिचित अंदाज़ में ‘हओ’ बोलते हुए वापस रसोई में चली गयी।

मैं सोफे पर बैठा उसी के बारे में सोचने लगा। दिल के किसी कोने से फिर आवाज़ आई गुरु देर मत करो कामिनी फ़तेह अभियान शुरू कर दो। लंड फिर से ठुमकने लगा था।

थोड़ी देर में कामिनी ट्रे में कॉफी का कप लेकर आ गयी।

“सल तोफी” (सर कॉफी) कामिनी ने कॉफी का कप टेबल पर रखते हुए कहा। उसने अपनी मुंडी नीचे ही कर रखी थी। मधुर ने शायद उसे मेरे लिए ‘सर’ और अपने लिए ‘मैडम’ का संबोधन कामिनी को बताया होगा तभी उसने ‘सर’ कहा था।

“थैंक यू कामिनी” मैंने मुस्कुराते हुए उसकी ओर देखा।

वह खाली ट्रे उठाकर रसोई में वापस जाने के लिए मुड़ने ही वाली थी कि मैंने पूछा- कामिनी, मुझे तुमसे एक जरूरी बात करनी है.

“अब मैंने त्या तिया?” उसने हैरानी से डरते हुए मेरी ओर देखा.

“अरे बाबा तुमने कुछ नहीं किया … मुझे तुमसे माफी मांगनी है.”

“तीस बात ते लिए?”

“ओह … वो उस दिन मैंने तुम्हें गलती से पकड़ लिया था ना?”

“तोई बात नहीं.”

“ना … ऐसे नहीं”

“तो?” उसने सवालिया निगाहों से मेरी ओर देखा।

“तुम्हें बाकायदा मुझे माफ करना होगा.”

“हओ … माफ तल दिया”

“ना ऐसे नहीं?”

“तो फिल तैसे?”

“तुम्हें बोलना होगा कि मैंने आपको माफ कर दिया”

कामिनी कुछ सोचने लगी और फिर उसने रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा- मैंने आपतो माफ तल दिया.” कामिनी के होंठों पर मुस्कान फ़ैल गयी और मेरी भी हंसी निकल गयी।

“थैंक यू कामिनी.”

“वो दरअसल मुझे लगा मधुर होगी? इसलिए सब गड़बड़ हो गयी.”

“तोई इतना जोल से दबाता है त्या? पता है आपने तितना जोर से दबा दिया था मेले तो 3-4 दिन दल्द होता लहा?” उसने उलाहना देते हुए अपने हाथों से अपने दोनों कबूतरों को सहलाते हुए कहा।

“सॉरी … यार … गलती हो गयी। अब देखो मैं इसलिए तो तुमसे माफी माँग रहा हूँ ना?’

“ठीत है.”

“मैं तो डर रहा था कहीं तुम यह बात मधुर को ना बता दो?”

“हट!!! ऐसी बातें तीसी तो बताई थोड़े ही जाती हैं, मुझे शलम नहीं आती त्या?”

उसने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे मैं कोई चिड़िमार हूँ। हाए मेरी तोते जान परी मैं मर जावां …

“वैसे कामिनी एक बात तो है?”

“त्या?”

“तुम ब्यूटी विद ब्रेन हो.”

“मतलब?” उसने हैरानी से मेरी ओर देखा। उसे शायद इसका अर्थ समझ नहीं आया होगा।

“इसका मतलब है तुम खूबसूरत ही नहीं साथ में बहुत अक्लमंद (समझदार) भी हो. इसे सुंदरता और समझदारी का संगम कहते हैं”

मैं तो आज पूरा 100 ग्राम मक्खन लगाने के मूड में था।

“हूँ.” कामिनी मंद-मंद मुस्कुरा रही थी, उसे अपनी तारीफ अच्छी लगी थी।

“अक्सर खूबसूरत लड़कियाँ दिमाग से पैदल ही होती हैं पर तुम्हारे मामले में उल्टा है। लगता है भगवान ने झोली भरकर तुम्हें खूबसूरती और समझदारी दी है। जैसे खूबसूरती के खजाने के सारे ताले तोड़ कर तुम्हें हुश्न से नवाजा है। क्यों सच कहा ना मैंने?”

“हा … हा …” कामिनी अब जोर जोर से हंसने लगी थी।

वैसे मेरे प्रेमजाल की भूमिका ठीक से शुरू हो गयी थी और अब आगे की रूपरेखा तो शीशे की तरह मेरे दिमाग में बिल्कुल साफ थी। चिड़िया के उड़ जाने का अब कोई खतरा और डर नहीं था। अब तो इसे मेरे प्रेमजाल में फंसाना ही होगा।

“अरे हाँ कामिनी … तुमने मूव या आयोडेक्स वगेरह कुछ लगाया था या नहीं?”

“किच्च?” उसने अपनी जीभ से किच्च की आवाज़ निकालकर मना किया। हे भगवान ये जब मना करने के अंदाज़ में ‘किच्च’ की आवाज़ निकालती है तो इसके गालों में पड़ने वाले डिंपल तो दिल में धमाल नहीं दंगल ही मचा देते हैं।

“कहो तो मैं लगा देता हूँ?”

“हट …” अब तो उसकी मुस्कान जानलेवा ही लगने लगी थी।

मैंने अब कॉफी के कप पर नज़र डालते हुए कहा- कामिनी! तुमने अपने लिए भी कॉफी नहीं बनाई या नहीं?

“किच्च”

“क्यों?”

“मैं तो तोफी पीती ही नहीं”

“अरे??? वो क्यों?”

“वो … वो म … मौसी मना तलती है.”

“कमाल है मौसी मना क्यों करती है भला?”

“वो तहती है यह बहुत गलम होती है.”

“हाँ ठीक ही तो है कॉफी का मज़ा तो गर्म-गर्म ही पीने में आता है?”

“अले आप समझे नहीं?”

“क्या?”

“वो … वो …” कामिनी कुछ बोलते हुए शर्मा सी रही थी।

“वो … वो क्या? प्लीज साफ बोलो ना?”

“वो … मुझे शलम आती है?”

“कमाल है कॉफी पीने में शर्म की क्या बात है?”

“ओहो … पीने में नहीं?”

“तो फिर?”

“वो मौसी तहती हैं तुवारी लड़तियों तो तोफी नहीं पीनी चाहिए.” उसने शर्माकर अपनी मुंडी नीचे कर ली।

“अरे … ??? वो क्यों? इसमें क्या बुराई है?”

“नहीं … मुझे बताते शलम आ रही है.” कामिनी की शक्ल अब देखने लायक थी।

“प्लीज बोलो ना?”

“वो … वो..” उसने अपना गला साफ करते हुए बड़ी मुश्किल से मरियल सी आवाज़ में कहा- तोफी पीने से सु-सु में जलन होने लगती है.

मारे शर्म के कामिनी तो दोहरी ही हो गयी।

ईसस्स् स्स्स्स… हाए मैं मर जावां।
 
उसका पूरा चेहरा सुर्ख (लाल) सा हो गया था और अधर जैसे कंपकपाने लगे थे। उसके माथे और कनपटी पर जैसे पसीना सा झलकने लगा था। अब मुझे समझ आया वो मेरे सामने सु-सु का नाम लेने में शर्मा रही थी। मैं मन में सोच रहा था साली अब भी इसे सु-सु ही बोलती है। अब तो यह पूरी भोस (बुर) बन चुकी होगी। इसे तो पूरे लंड की मलाई भी घोंट जाने में जलन नहीं हो सकती यह तो कॉफी है।

“अरे यह सब बकचोदी (बकवास) है?” मेरे मुंह से अचानक निकल गया।

कामिनी ने मेरी ओर हैरानी से देखा। उसे बकचोदी शब्द शायद अटपटा लगा होगा। पर मैं चाहता था वह इन लफ्जों को सुनने की आदि हो जाए और उसे झिझक या शर्म महसूस ना हो।

“ऐसा कुछ नहीं होता … निरी बकवास और चुतियापे वाली बात है यह!” मैंने उसे समझाते हुए कहा- देखो! मैं और मधुर तो अक्सर साथ-साथ कॉफी पीते हैं उसे तो कभी सु-सु में जलन नहीं हुई.

“पल मैंने तो पहले तभी नहीं पी.”

“कोई बात नहीं आज तुम भी पहली बार पीकर तो देखो … कई चीजें जिंदगी में पहली बार करने में बड़ा मज़ा आता है.” मैंने हँसते हुए कहा।

उसने कुछ कहा तो नहीं लेकिन मैं उसके मन में चल रही उथल-पुथल का अनुमान अच्छी तरह लगा सकता था।

“अरे भई मैंने कहा ना डरो मत … कुछ नहीं होगा. और अगर सु-सु में जलन हुई भी तो उसमें कोल्ड क्रीम लगा लेना … बस.” मैंने उसे यकीन दिलवाने की कोशिश की।

मैंने उसकी उलझन खत्म करने के लिहाज़ से कहा- अरे … यह कॉफी तो बातों-बातों में ठंडी हो गयी, अब तुम फटाफट दो कप कड़क कॉफी और बना लाओ फिर साथ साथ पीते हैं.

उसे कॉफी का कप पकड़ाते हुए मैंने कहा।

अब उस बेचारी के पास कॉफी बनाकर लाने के अलावा और कोई रास्ता कहाँ बचा था।

वह कॉफी का कप उठाकर धीरे धीरे रसोई की ओर जाने लगी।

हे भगवान इसके नितम्ब तो कमाल के लग रहे हैं। जब यह चलती है तो जिस अंदाज़ में ये गोल गोल घूमते हैं दिल पर जैसे छुर्रियाँ ही चलने लगती हैं। दिल तो कहता है गुरु इसने तो मुझे हलाल ही कर दिया। पता नहीं कब इनको करीब से नग्न देखने और मसलने का मौका मिलेगा। मेरा तो मन करता है इसे घोड़ी बनाकर इसके नितंबों पर जोर जोर से थप्पड़ लगाकर लाल कर दूँ और फिर प्यार से इन पर अपनी जीभ फिराऊँ और फिर अपने पप्पू पर थूक लगाकर उसे गहराई तक इसकी मखमली गांड में उतार दूँ और फिर आधे घंटे तक हमारा यह घमासान दंगल चलता रहे।

मैं इन ख्यालों में डूबा हुआ था कि कामिनी कॉफी बनाकर ले आई। मेरे लिए उसने मग में कॉफी डाली थी और अपने लिए गिलास में। उसने कॉफी का कप मुझे पकड़ा दिया और खुद गिलास लेकर नीचे फर्श पर बैठने लगी तो मैंने उसे कहा- अरे नीचे क्यों बैठती हो, चलो उस टी टेबल पर बैठ जाओ.

मैंने सोफे और सेंट्रल टेबल के पास रखी स्टूल (टी टेबल) की ओर इशारा करते हुए कहा।

मेरा मन तो कर रहा था इसे अपने पास सोफे पर नहीं बल्कि अपनी गोद में ही बैठा लूँ पर वक़्त की नज़ाकत थी अभी यह सब बोलने का या करने का माकूल समय नहीं आया था।

कामिनी एक हाथ से उस स्टूल को थोड़ा सा खिसकाकर उस पर बैठ गयी। उसके गोल-गोल नितम्ब शायद उस स्टूल पर पूरे नहीं आ रहे होंगे तो सुविधा के लिए उसने अपनी एक टांग दूसरे पर रख ली। ऐसा करने से उसकी मांसल पुष्ट जांघें और उनके बीच पहनी पैंटी की आउटलाइन्स साफ दिखने लगी थी।

हे भगवान! उसकी सु-सु तो बस एक बिलांद के फ़ासले पर ही होगी। पता नहीं उसे देखने का मौका मेरे नसीब में कब आएगा।

मुझे लगता है उसकी बुर पर हल्के मुलायम बालों का पहरा होगा। बीच की दरार तो रस से भरी होगी और उसकी भीनी भीनी खुशबू तो दिलफरेब ही होगी।

मैं टकटकी लगाए उसकी जांघों के संधि स्थल को ही निहार रहा था। कामिनी ने मुझे ऐसे करते हुए शायद देख लिया था तो उसने अपनी कुर्ती को थोड़ा सा खींचकर अपनी जांघों पर कर लिया। भेनचोद ये लड़कियाँ भी आदमी की नज़रों को कितनी जल्दी पकड़ लेती हैं? काश मेरे मन की बात भी समझ जाए!

मुझे अब कॉफी की याद आई। मैंने एक चुस्की ली। कॉफी ठीक ठाक ही बनी थी पर मुझे तो कामिनी को इंप्रेस (प्रभावित) करना था। कॉफी की तारीफ करना तो बहुत लाज़मी बन गया था अब। और यह सब तो मेरे प्लान का ही हिस्सा था।

“वाह …” मेरे मुँह से निकाला।

कामिनी ने चौंककर मेरी ओर देखा।

“वाह … कामिनी तुमने तो बहुत बढ़िया कॉफी बनाई है?”

“अच्छी बनी है?” उसने आश्चर्य मिश्रित खुशी के साथ पूछा।

“अरे अच्छी नहीं … लाजवाब कहो बहुत ही मस्त बनी है.”

कामिनी मंद मंद मुस्कुराने लगी थी।

“कामिनी तुम्हारे हाथों में तो जादू है यार … बहुत ही मस्त कॉफी बनाती हो.” इस बार मैंने ‘मस्त’ शब्द पर ज्यादा ही जोर दिया था।

अब बेचारी कामिनी क्या बोलती अपनी तारीफ सुनकर उसके पास सिवाय मुस्कुराने के क्या बचा था। मेरी कोशिश थी मैं उसके दिमाग में यह बैठा दूँ कि वह बहुत ही खास (स्पेशल) है और साथ ही उसे यह अहसास भी करवा दूँ कि वह बहुत ही खूबसूरत भी है।

उसे रंगीन सपने दिखाना बहुत ही जरूरी था। मैं चाहता था कि उसकी कल्पनाओं को पंख लग जाएँ और वह ख्वाबों की हसीन दुनिया में उड़ना सीख ले तो मेरा काम अपने आप बन जाएगा।

“मेरा तो मन करता है कामिनी तुम्हारे इन हाथों को ही चूम लूं?” मैंने हँसते हुए कहा।

“अले ना बाबा … ना?” कामिनी ने थोड़ा सा डरने और पीछे हटने का नाटक सा किया।

“मैं सच कह रहा हूँ?”
 
“ना आपता तोई भलोशा नहीं है? त्या पता छूते-छूते मेली अंगुलियाँ ही खा जाओ?” कहकर उसने तिरछी नज़रों से मुझे देखा और हँसने लगी।

“अरे मैं तो मज़ाक कर रहा हूँ” मैंने हँसते हुए कहा।

“अरे तुम भी पीओ ना?”

“हओ” कामिनी ने कुछ झिझकते हुए कॉफी का गिलास हाथ में पकड़ लिया।

“आप दीदी तो नहीं बताओगे ना?”

“क्या?”

“तोफी पीने ते बारे में?”

“प्रॉमिस … पक्का … देखो तुमने भी तो हमारी वो बात मधुर को नहीं बताई तो भला मैं कैसे बता सकता हूँ?”

“ठीत है.” अब उसने एक चुस्की सी लगाई, उसने थोड़ा सा मुँह बनाया शायद कॉफी कुछ कड़वी लगी होगी।

“क्यों है ना मस्त?”

“थोड़ी तड़वी सी है?”

“अरे तुम पहली बार पी रही हो ना इसलिए ऐसा लग रहा है। जब इसकी आदत पड़ जाएगी तो बहुत मज़ा आएगा.”

“अच्छा?”

मैंने मन में कहा- हाँ मेरी जान पहली बार बहुत सी चीजें कड़वी और कष्टदायक लगती है बाद में मज़ा देती हैं। आगे आगे देखती जाओ तुम्हें तो मेरे साथ और भी बहुत सी चीजें पहली बार ही करनी हैं।

बाहर रिमझिम बारिश हो रही थी और मेरे तन-मन में शीतल फुहार सी बहने लगी थी। बेकाबू होती अल्हड़ और अंग अंग से फूटती जवानी का बोझ उठाना शायद अब कामिनी के लिए बहुत मुश्किल होगा। मेरे आगोश में आने के लिए अब इसकी बेताब जवानी मचलने ही वाली है। बस थोड़ा सा इंतज़ार …

बातें तो और बहुत हो सकती थी पर मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही थी। हम दोनों ने कॉफी खत्म कर ली थी।

“थैंक यू कामिनी इतनी मजेदार कॉफी के लिए!”

कामिनी कॉफी के कप उठाकर रसोई में चली गयी और मैं बाथरूम में। कामिनी फ़तेह अभियान का पहला सबक सफलता पूर्वक पूरा हो चुका था अब मंजिल-ए-मक़सूद ज्यादा मुश्किल और दूर तो नहीं लगती है।

लिंग देव तेरी जय हो!

ये साली नौकरी भी जिन्दगी के लिए फजीता ही है। यह अजित नारायण (मेरा बॉस) भोंसले नहीं भोसड़ीवाला लगता है। साला एक नंबर का हरामी है। पिछले 4 सालों से कोई पदोन्नति (प्रमोशन) ही नहीं कर रहा है। आज मैं इससे हिसाब चुकता कर ही लेता हूँ। मैं इंतज़ार कर रहा था कि कब वह आए और मैं उसे बात करूँ।

आज भोंसले ऑफिस में थोड़ी देरी से आया था। मैं उसके कॅबिन में जाने की सोच ही रहा था कि चपरासी ने आकर बताया कि बॉस बुला रहे हैं।

“गुड मॉर्निंग सर!” मैंने कॅबिन में घुसते हुए कहा।

“आओ प्रेम बैठो, तुमसे कुछ बात करनी है.”

बात तो मुझे भी करनी थी पर चलो पहले इसकी सुन लेते हैं मैंने कहा- जी बोलें?

“प्रेम एक खुशखबर है?”

“क … क्या?”

“प्रेम मेरा ट्रांसफर पुणे हो रहा है। दरअसल मैंने ही इसके लिए HRD से रिक्वेस्ट की थी।”

“हूं …”

भोंसले आज बड़ा खुश नज़र आ रहा था वरना तो हर समय उसके चेहरा राऊडी राठोड़ ही बना रहता है।

“वो दरअसल पारू को पुणे में मेडिकल में सीट मिल गयी है.” वह अपनी लड़की (पारुल) के बारे में बात कर रहा था। पारो नाम की यह फुलझड़ी पता नहीं कैसी होगी पर उसका नाम सुनकर तो मुझे लगा मैं इसके लिए देवदास बन जाऊँ तो मज़ा आ जाए।

मुझे विचारों में खोया देखकर भोंसले बोला- क्या सोचने लगे प्रेम?मेरी बीवी ने घर में एक नयी कामवाली रखी.

“क … कुछ नहीं सर … आपको बहुत-बहुत बधाई हो सर!”

“थैंक यू प्रेम!”

“सर, यहाँ अब कौन आएगा?”

“यह तो पता नहीं … पर प्रेम मैंने तुम्हारे नाम की सिफारिश कर दी है। प्रमोशन के साथ इनक्रिमेंट भी मिलेगा। मुझे लगता है 2-3 दिन में कन्फर्मेशन का मेल आ जाएगा.”

“थैंक यू सर!”

“प्रेम! लेकिन तुम्हें 3 महीने की ट्रेनिंग पर पहले बंगलूरू हो जाना होगा.”

“ओह?”

“क्या हुआ? कोई दिक्कत?”

“नो सर! ऐसी कोई बात नहीं है पर ट्रेनिंग पर जाना कब होगा?”
 
“देखो अगर अभी प्लान कर सकते हो तो हफ्ते दस दिन में प्लान कर लो, वरना दीपावली के बाद जा सकते हो। मैं सोचता हूँ अभी आगे त्योहारों का सीज़न आ रहा है तुम्हें अपने टार्गेट्स बहुत अच्छे से पूरे कर लेने चाहिएं। मेरे ख्याल से दीपावली के आसपास ठीक रहेगा?”

“ठीक है सर!”

“प्रेम अभी स्टाफ से इस बारे में कोई बात मत करना। कल सन्डे है तुम घर पर आ जाना वहीं डिटेल डिस्कस करेंगे.”

“ओके सर.”

“ओके गुडलक!”

मैं कॅबिन से बाहर आ गया। भेनचोद यह किस्मत भी जैसे लौड़े हाथ में ही लिए फिरती है। एक हाथ से कुछ देती है दूसरे हाथ से छीन लेती है। एक तरफ प्रमोशन की खुशी है दूसरी तरफ तीन महीने के लिए बाहर जाना होगा। कामिनी को किसी तरह अपने जाल में फंसाने के लिए पूरा प्लान बनाया था। चिड़िया दाना चुगने के लिए छटपटाने लगी है और अब अगर ऐसे में बंगलूरू जाना पड़ा तो सब किया धरा गुड़ गोबर हो जाएगा। लग गये लौड़े!!!

शाम को घर जाते समय मैं यह सोच रहा था कि मधुर को इस बारे में कैसे बताऊँ?

जब घर पहुँचा तो कामिनी ने दरवाजा खोला। मधुर कहीं दिखाई नहीं दे रही थी।

मैं सोफे पर बैठ गया; कामिनी पानी लेकर आ गयी।

आज कामिनी ने हल्के सलेटी रंग का पाजामा और टॉप पहन रखा था। लगता है उसने आज फिर से अंदर ब्रा नहीं पहनी है। मेरी नज़र उसके गोल-गोल रस भरे सिंदूरी आमों के निप्पल पर पड़ी जो मटर के दाने जितने तो जरूर होंगे।

“वो मधुर नहीं दिख रही?”

“मैडम पड़ोस में गुप्ताजी ते यहाँ गयी हैं.”

“कुछ बताकर गयी?”

“हओ … गुप्ताजी ती बेटी ती सगाई हुई है तो उनते यहाँ लेडीज संगीत में गई हैं.”

“ओह … कब तक लौटेंगी?”

“एत घंटे ता बोला है.”

“हम्म” मैं सोच रहा था मधुर तो गीत और डांस का आज कोई मौका नहीं छोड़ने वाली।

“आपते लिए चाय बनाऊँ?”

“ना … थोड़ी देर रूककर पीते हैं.”

‘हओ’ कहकर कामिनी रसोई में जाने लगी।

उसका टॉप उसके नितंबों से थोड़ा सा ऊपर था। पाजामा थोड़ा तंग था इसलिए उन कसी हुई दोनों गोलाइयों के बीच की दरार में धंसा हुआ सा था। इसे देखकर तो मेरा लंड फड़फड़ाने ही लगा।

आइलाआआआ …

उसने शायद अंदर पैंटी भी नहीं पहनी थी। इसे किसी तरह बहाने से बातों में लगाकर पास बैठा लूँ तो सु-सु की पूरी रूपरेखा बड़े आराम से देखी जा सकती है।

मैंने उसे टोका- वो तुम्हारी पढ़ाई लिखाई कैसी चल रही है?

“ठीत है.”

“हूँ! आज क्या पढ़ाया मैडम ने?” पढ़ाई करते समय कामिनी मधुर को मैडम ही बोलती है तो मैंने भी मधुर के लिए मैडम ही बोला था।

“आज तो मैडम ने मैथ्स पढ़ाया.”

“समझ आया या नहीं?” मैंने हँसते हुए पूछा।

“किच्च …”

“क्यों?”

“बड़ा मुश्तिल लगता है?”

“अरे दिल लगाकर करो तो कोई काम मुश्किल नहीं लगता?”

“मुझे टेबल याद नहीं लहते तो दीदी बड़ा गुस्सा होती हैं.”

“तो एक काम किया कर?”

“त्या?”

“तुम रोज़ कॉफी पिया करो” मैंने कुछ संजीदा (गंभीर) लहजे में कहा।

“उससे त्या होगा?”

“इससे तुम्हारी याददास्त बहुत तेज हो जाएगी.”

“अच्छा?” उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा कहीं मैं उसे ऊल्लू तो नहीं बना रहा।

“हाँ भई सच में। अच्छा वो सुबह कॉफी पीने के बाद तुम्हारी सु-सु में कोई जलन तो नहीं हुई ना?” मैंने हँसते हुए पूछा।

“हट … तैसी बात तलते हो?” कामिनी तो अब गुलज़ार ही हो गयी।

इस्स्स … उसके शर्माने की अदा तो मेरे कलेजे का जैसे चीरहरण ही कर लिया।

मुझे लगा कामिनी शर्माकर रसोई में भाग जाएगी। वह वहीं खड़ी रही। उसे मेरी इन बातों का उसे कतई बुरा नहीं लग रहा था और मैं भी तो उसे बातों में लगाए रखना चाहता था। मैंने बात का विषय बदलने के लिहाज़ से पूछा- कामिनी तुमने तो बताया ही नहीं?

“हट!”

“क्या हट?”

“मुझे ऐसी बातों से शलम आती है?”

“अरे बाबा मैं तुम्हारी सु-सु की नहीं … कोई और बात पूछ रहा हूँ?”

“त्या?” उसने आश्चर्य से मेरी और देखा।

“वो मधुर के साथ तुम उस दिन बाज़ार गयी थी तो क्या-क्या खरीदा?”

“ओह … अच्छा वो …?”

“हाँ?

“तपड़े और तिताबें खरीदे” (कपड़े और किताबें खरीदे)

“क्या-क्या लिया पूरी बात बताओ ना?”

“दो सूट, एक जीन पैंट-टॉप, जूते, चप्पल औल दो जुलाब जोड़ी, त्लीम, बैंगल्स, एत लंगीन चश्मा औल एत पायल ती जोड़ी।

कमाल है? मुझे बड़ी हैरानी हो रही थी साली कंजूस मधुमक्खी एक पुराना फटा कपड़ा किसी को नहीं देती कामिनी के ऊपर इस तरह मेहरबान कैसे हो गयी है?
 
“अरे वाह! तुम्हारे तो मज़े हो गये? लगता है मधु तुम्हारे ऊपर बहुत ही मेहरबान हो गयी है?”

“हाँ, दीदी मुझे बहुत प्याल तलती हैं.” कामिनी हँसने लगी थी।

“हाँ, यह तो मुझे भी मालूम है.”

“पता है दीदी त्या बोलती है?” उसने अपनी आँखें चौड़ी करते हुए कहा।

“क्या?” मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

“वो बोलती हैं : मेरा बस चले तो जिंदगी भर तुम्हें यहीं रख लूँ.”

मैं तो इस फ़िकरे का मतलब कई देर तक ही नहीं अलबत्ता कई दिनों तक बाद में भी सोचता रहा।

“कामिनी देखो मधुर ने तुम्हें इतने चीजें और कपड़े दिलवाए और तुमने तो हमें पहनकर भी नहीं दिखाए?” मैंने उलाहना देते हुए कहा।

“वो सब मैं दीदी ते जनम दिन पल पहनूँगी.”

“ओह … पर उसमें तो एक महीना बाकी है.”

“हओ”

“कामिनी वैसे जीन पैंट और टॉप में तुम बहुत खूबसूरत लगोगी.” कामिनी के चहरे पर लंबी मुस्कान फ़ैल गयी।

“तुम ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ देखती हो ना?”

“हओ … वो तो मैं तभी मिस नहीं कलती हूँ? आपने त्यों पूछा?”

“उसमें भिड़े की जो लड़की है ना? पता नहीं क्या नाम है?”

“उसता नाम सोनू है.” कामिनी जल्दी से बोल पड़ी।

“पता है उसे देखकर मेरा मन क्या करता है?”

“त्या?”

“इसको खूँटी से लटकाकर इसकी टांगें पकड़कर खींच कर लम्बा थोड़ा लम्बा कर दूं?”

“हा.. हा … हा … वो बेचाली तो मल ही जायेगी?”

“अरे नहीं यह थोड़ी लम्बी होकर बिल्कुल तुम्हारी तरह बहुत ही खूबसूरत लगेगी.”

सोनू के साथ अपनी तुलना सुनकर कामिनी को शायद अच्छा लगा रहा था इसीलिए वो मंद मंद मुस्कुरा रही थी।

“एक बात और भी है?”

कामिनी अपनी सुन्दरता के ख्यालों मे डूबी हुयी थी। वह कुछ बोली तो नहीं पर उसने रसीली मुस्कान के साथ मेरी ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देखा।

“कामिनी सच कहता हूँ तुम अगर जीन पैंट पहन लो तो बिल्कुल वैसी ही खूबसूरत लगोगी.”

ईसस्स्स … अब तो कामिनी जैसे रूपगर्विता ही बन गयी थी वह मंद-मंद मुस्कुराए जा रही थी। उसके चहरे पर जैसे लाली सी बिखर गयी थी। उसकी तेज होती साँसों के साथ उसके ऊपर नीचे होते उरोजों को देख कर उसके दिल की धड़कन का अंदाज़ा बखूबी लगाया जा सकता था।

उसने कुछ सोचते हुए कहा- आपतो एत बात बताऊं?

“क्या?”

“आप दीदी से तो नहीं तहोगे ना?”

“किच्च …” मैंने भी कामिनी के अंदाज़ में ना करने के अंदाज़ में अपनी जीभ से ‘किच्च’ की आवाज़ निकालते हुए कहा “देखो! तुम भी हमारी सारी बातें मधुर को थोड़े ही बताती तो फिर मैं भला कैसे बता सकता हूँ? बोलो?”

“फिल ठीत है.”

वो थोड़ा सा रुकी और फिर कुछ सोचते हुए बोली- दीदी ने तल मुझे साड़ी पहनना सिखाया था.

कामिनी अब थोड़ा लजा सी रही थी।

“ओए होये … क्या बात है? जरूर लाल रंग की होगी?”

“आपतो तैसे पता? दीदी ने बताया?”

“अरे नहीं! मैंने तो अंदाज़ा ही लगाया है?”

“हूँ”

“कामिनी तुम तो उसमें बहुत ही खूबसूरत लगी होगी?”

“हओ … पता है दीदी ने त्या बोला?”

“क्या?”

वो बोली- ‘तुम तो इस साड़ी में पूरी दुल्हन सी लग रही हो.’ फिर उन्होने मेले गालों पल ताजल ता टीता लगाते हुए तहा ‘कामिनी तुम बहुत ही मासूम और सुंदर हो तिसी ती नज़र ना लग जाए!’

“हाँ कामिनी, यह बात तो सोलह आने सच है। तुम सुंदर ही नहीं बहुत हसीन और खूबसूरत भी हो.” बेचारी कामिनी के पास अब रूपगर्विता मुस्कान के सिवा और क्या बचा था।

मैंने बातों का सिलसिला जारी रखते हुए कहा- कामिनी, तुमने कोई सैल्फी ली या नहीं?

“मेले पास मोबाइल थोड़े ही है तैसे लेती? हाँ दीदी ने अपने साथ मेली 4-5 सैल्फी जलूल ली थी.”

“हूँ” ये साली मधुर भी कई बातें बताती ही नहीं है।

अचानक मेरे दिमाग में एक जबरदस्त आइडिया ऐसे आया जैसे किसी हसीन कन्या को देखकर लंड उछलकर कच्छे में खड़ा हो कर सलाम बोलने लग जाता है। क्यों ना कामिनी को कोई पुराना मोबाइल दे दिया जाए। फिर तो मैं उसे अपनी सैल्फी लेना और वाट्स-एप्प चलाना भी सिखा दूंगा। फिर तो मज़े से वह और भी बहुत कुछ देख और दिखा सकती है। मैंने और मधुर ने पिछले साल 4जी सेट ले लिया था तो पुराने मोबाइल तो बेकार ही पड़े हैं। चलो आज रात को किसी बहाने से मधुर को बोलता हूँ कामिनी को कोई पुराना मोबाइल दे दे।

“कामिनी एक बात तो है?”

“त्या?”

“तुम्हारी शादी जिसके साथ होगी वो कितना भाग्यशाली होगा. लगता है उसने इस जन्म में या पिछले जन्म में जरूर लाख मोती दान किए होंगे.” कहकर मैं हँसने लगा।

अब कामिनी भी जोर-जोर से हँसने लगी थी। मैं यही तो चाहता था कि उसे अपनी खूबसूरती पर नाज़ हो जाए।

कामिनी असमंजस भरी निगाहों से मुझे ताकती रही। उसे कोई जवाब जैसे सूझ ही नहीं रहा था।

“पता नहीं वह भाग्यशाली कौन होगा? काश हमारी भी किस्मत ऐसी होती?”

“तैसी?”

“तुम्हारे जैसी?”

कामिनी कुछ नहीं बोली। वो कुछ सोचने लगी थी। पता नहीं कामिनी को कुछ समझ आया या नहीं पर इतना तो तय है उसे मेरी इन बातों से कतई बुरा नहीं लग रहा था अलबत्ता वो मेरे साथ और बातें करने के लिए बेजार (उत्सुक) नज़र आ रही थी।

“पल दीदी तो खुद इतनी सुन्दल हैं। आप भी तो बड़ी तिस्मत वाले हो? फिल आप ऐसा त्यों बोलते हो?” कामिनी ने अचानक कई सवाल कर दिए थे। साली दिखने में लॉल लगती है पर इन मामलों में पूरी एलीबाई है। कोई बात नहीं देखते हैं।

“हाँ … मधुर भी तुम्हारी तरह सुंदर तो है।”

“दीदी ने आपते बाले में भी एत बात बताई थी.” उसने रहस्यमय ढंग से मुस्कुराते हुए कहा।

जिस अंदाज़ में वो मंद-मंद मुस्कुरा रही थी मुझे लगा कहीं मधुर ने कुछ गड़बड़ तो नहीं कर दी? मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था।

हे भगवान! कहीं फिर से लौड़े तो नहीं लग गये?

“क … क्या बताया?” मैंने हकलाते से पूछा।

मेरी इस हालत पर अब कामिनी मज़े ले रही थी।

इतने में गेट पर मधुर के आने की आहट सुनाई दी। कामिनी दौड़कर रसोई में भाग गयी और मैं जल्दी से कपड़े बदलने बाथरूम में। भेनचोद ये मधुमक्खी (मधुर) भी खलनायक की तरह हमेशा गलत मौके पर ही एंट्री मारती है।

मधुर आज खुश नज़र आ रही थी। मुझे लगता है आज मधुर ने खूब ठुमके लगाए होंगे। खुले बाल और लाल रंग की नाभिदर्शना साड़ी … उफफ्फ … पता नहीं कामिनी को यही साड़ी पहनाई थी या कोई दूसरी पर कुछ भी कहो मधुर इस समय बाजीराव की मस्तानी ही लग रही थी। मधुर रसोई में घुस गयी। वो शायद कामिनी को रात के खाने के बारे में समझा रही थी।

मैं हाथ मुँह धोकर कपड़े बदलकर बाहर आकर टीवी देखने लगा। आज शनिवार था तो ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ तो आने वाला था नहीं मैं कॉमेडी शो देखने लग गया।
 
मधुर आज खुश नज़र आ रही थी। मुझे लगता है आज मधुर ने खूब ठुमके लगाए होंगे। खुले बाल और लाल रंग की नाभिदर्शना साड़ी … उफफ्फ … पता नहीं कामिनी को यही साड़ी पहनाई थी या कोई दूसरी! पर कुछ भी कहो मधुर इस समय बाजीराव की मस्तानी ही लग रही थी।

मधुर रसोई में घुस गयी। वो शायद कामिनी को रात के खाने के बारे में समझा रही थी।

मैं हाथ मुँह धोकर कपड़े बदलकर बाहर आकर टीवी देखने लगा। आज शनिवार था तो ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ तो आने वाला था नहीं … मैं कॉमेडी शो देखने लग गया।

खाना निपटाने के बाद हम अपने कमरे में आ गये। मधुर शीशे के सामने खड़ी होकर अपने आप को निहार रही थी।

“मधुर आज तो गुप्ताजी के यहाँ पार्टी में तुमने खूब रंग जमाया होगा?”

“ना बस थोड़ा सा ही डांस किया.”

“वैसे तुम इस साड़ी में बहुत ही खूबसूरत लगती हो.”

मधुर ने कोई जवाब नहीं दिया वो बाथरूम में घुस गयी।

मैंने अपने पाजामे का नाड़ा खोल दिया था और अपने अंगड़ाई लेते पप्पू को हाथ से सहलाने लगा। कोई 15 मिनट के बाद वो बाथरूम से बाहर आई और फिर बिस्तर पर मेरी ओर करवट लेकर लेट गयी। उसने ढीला सा गाउन पहन रखा था। उसने बालों की चोटी नहीं बनाई थी बाल खुले थे।

अब उसने एक हाथ से मेरे पप्पू को पकड़ लिया और सहलाने लगी। उसने मेरे होठों पर एक चुम्बन लिया और फिर मेरी आँखों में झांकते हुए बोली- प्रेम!

“हूं …” मैं भी उसे अब अपनी बांहों में भर लेना चाहा।

“वो आज गुलाबो फिर आई थी?”

“पर तुमने उसे उस दिन 8-10 हज़ार रुपये दे तो दिए थे? अब और क्या चाहिए उसे?”

“ओहो … तुम्हें तो आजकल कुछ याद ही नहीं रहता? वो मैंने तुम्हें बताया था ना?”

“भई अब मुझे क्या पता तुमने कब और किस बारे में बताया था?” मेरा मूड कुछ उखड़ सा गया था। ये मधुर भी कब की बात कब करती है पता ही नहीं चलता।

“वो दरअसल उन लोगों ने नगर परिषद में ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के अंतर्गत गरीब परिवार वालों को घर में शौचालय (टॉयलेट) बनाने के लिए मिलने वाले अनुदान के लिए अप्लिकेशन लगा रखी है। तुम्हारा वो एक फ्रेंड अकाउंटेंट है ना नगर परिषद में?”

“हाँ तो?”

“वो निर्मल निर्मल करके कोई है ना?”

“हाँ निर्मल कुशवाहा? क्या हुआ उसे?”

“अरे उसे कुछ नहीं हुआ गुलाबो की फाइल उसी के पास पेंडिंग पड़ी है। तुम कहकर बेचारी का यह काम करवा दो ना प्लीज?”

मधुर मेरे ऊपर थोड़ा सा झुक सी गयी थी और उसने मेरे सिर को हाथों में पकड़कर अपने होंठ मेरे होंठों से लगा दिए। उसकी गर्म साँसें मेरे चेहरे से टकराने लगी थी। अब उसने अपनी एक मांसल जांघ मेरे दोनों पैरों के बीच फंसा ली थी। मधुर को जब कोई काम करवाना होता है तो वो इसी प्रकार मेरे ऊपर आ जाती है और फिर हम विपरीत आसन में (जिसमें पुरुष नीचे और स्त्री ऊपर रहती है) खूब चुदाई का मज़ा लेते हैं।

“तो क्या गुलाबो के यहाँ टॉयलेट नहीं है?” मुझे बड़ी हैरानी हो रही थी।

“यही तो बात है? तुम जरा सोचो बेचारों को कितनी बड़ी परेशानी होगी? जवान बहू बेटियों को भी बाहर खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है.”

आईलाआआ … ! क्या कामिनी भी खुले में सु-सु करने जाती है?

ओह … उस बेचारी को तो बड़ी शर्म आती होगी?

ईसस्स्स्स … !

वो शर्म के मारे सु-सु करने से पहले इधर उधर जरूर देखती होगी … फिर अपनी आँखें झुकाए हुए धीरे धीरे अपनी पैंटी नीचे करती होगी और उकड़ू बैठ कर अपनी खूबसूरत मखमली बुर से

सु-सु की पतली सी धार निकालती होगी.

याल्ला … इसे देखकर तो लोगों के लंड खड़े हो जाते होंगे … और फिर वो सभी मुट्ठ मारने लग जाते होंगे!

ये तो सरासर गलत बात है जी … बेहूदगी है ये तो … इससे तो हर जगह गंदगी फ़ैल जाएगी और सरकार के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की तो … ?

“क्या हुआ?” मधुर की आवाज़ से मैं चौंका।

“ओह … हाँ बहुत खूबसूरत?”

“क्या बहुत खूबसूरत?” मधुर ने फिर टोका।

मैं तो कामिनी की सु-सु की मधुर आवाज़ की कल्पना में ही में डूबा था मैं बेख्याली में पता नहीं क्या बोल गया।

मैंने बात सँवारी- हाँ … मेरा मतलब था बहुत सुन्दर विचार है मैं उससे बात करूँगा … तुम निश्चिन्त रहो समझो उसका काम हो गया.

“थैंक यू प्रेम!” कहकर मधुर ने मेरे ऊपर आकर अपनी चूत में मेरे लंड को घोंट लिया। और फिर आधे घंटे तक उसने अपनी चूत और नितम्बों से खूब ठुमके लगाए। मुझे आश्चर्य हो रहा था आज मधुर ने डॉगी स्टाइल में करने को क्यों नहीं कहा। आज तो वह खालिश घुड़सवारी के मूड में थी।

काश कभी ऐसा हो कि कामिनी भी इसी तरह मेरे ऊपर आकर घुड़सवारी करने को कहे तो मैं झट से मान जाऊँ। फिर तो उसके नितम्बों पर थपकी लगाता रहूँ और उसकी मस्त गांड के छेद में भी अपनी अंगुली डालकर उसे और भी प्रेमातुर कर दूँ।

इन्हीं ख्यालों में खोया मैं मधुर की पीठ, कमर और बालों में हाथ फिराता रहा। पता नहीं कब हमारा स्खलन हुआ और कब नींद आ गई।

सुबह कोई 8 बजे मधुर ने मुझे जगाया। मधुर नहा कर तैयार हो चुकी थी। मुझे लगा कि वह कहीं जाने वाली है। पर आज तो सन्डे था? फिर मधुर आज इतनी जल्दी कैसे तैयार हो गयी?

“प्रेम! आज मुझे आश्रम जाना है। तुम भी चलोगे क्या?”

ओह … तो मधुर मैडम आज आश्रम जाने वाली हैं। मेरे लिए कामिनी के साथ समय बिताने का बहुत अच्छा मौक़ा था।

मैंने बहाना बनाया- ओह … सॉरी जान! मुझे आज बॉस के घर जाना है, मैं नहीं चल पाऊंगा।

“तुम्हें तो बस कोई ना कोई बहाना ही चाहिए?”

“अरे नहीं यार वो आज भोंसले से प्रमोशन के बारे में बात करनी है उसने ही बुलाया है।”

“ठीक है.” कहकर मधुर रसोई की ओर चली गई और मैं बाथरूम में।

कामिनी चाय बना कर ले आई थी। मधुर और मैं चाय पीने लगे। मैं सोच रहा था ये मधुर भी इन बाबाओं के चक्कर में पड़ी रहती है। चलो धार्मिक होना अपनी जगह अच्छी बात पर है आजकल इन बाबाओं के दिन अच्छे नहीं चल रहे। किसी दिन किसी बाबा राम या रहीम ने ठोक-ठाक कर इस पर सारी कृपा बरसा दी तो यह फिर मधु की जगह हनी (हनीप्रीत) बन जायेगी।

इतने में बाहर गाड़ी के हॉर्न की आवाज आई।

“अच्छा प्रेम मैं जाती हूँ वो मोहल्ले की सारी लेडीज भी आज आश्रम जा रही हैं। आज गुरूजी का जन्मोत्सव है। हम लोग दोपहर तक लौट आयेंगे।”

“अरे कुछ खा-पीकर तो जाओ?”

“नहीं … वहाँ आरती और भजन के बाद नाश्ता-भोजन आदि की सारी व्यवस्था की हुई है। तुम्हारे नाश्ते और लंच के लिए मैंने कामिनी को बता दिया है।”

इतने में फिर हॉर्न की आवाज आई। ओहो … क्या मुसीबत है … ‘आईईईई … ‘ बोलते हुए मधुर बाहर लपकी।

मधुर के जाते ही कामिनी रसोई से बाहर आ गई।
 
आज कामिनी ने गोल गले की टी-शर्ट के नीचे लेगीज पहन रखी थी। काले रंग की लेगीज में कसे हुए नितम्ब देख कर तो मेरा लंड उछलने ही लगा था। किसी तरह उसे पाजामें में सेट किया। साली ये कामिनी भी आजकल इतनी अदा से अपने नितम्बों को जानबूझकर लचकाते हुए चलती है कि इंसान क्या फरिश्ते का भी मन डोल जाए।

“आपते लिए नाश्ते में त्या बनाऊँ?”

“मधुर ने बताया होगा?”

“दीदी ने तो सैंडविच बनाने को बोला है पल आपतो तुछ औल पसंद हो तो वो बना देती हूँ?” रहस्यमई ढंग से मुस्कुराते हुए कामिनी ने पूछा।

मैंने मन में सोचा मेरी जान मेरा मन तो बहुत कुछ खाने पीने और पिलाने का करता है। बस एक बार हाँ कर दो फिर देखो क्या-क्या खाता और खिलाता हूँ।

पर मैंने कहा “नहीं आज सैंडविच ही बना लो। तुम्हें भी तो पसंद हैं ना?”

“हओ.”

“तुम्हें सैंडविच बनाना तो आता है ना?”

“हओ … दीदी ने सिखाया है”

“ठीक है पर जरा कड़क बनाना। कड़क और टाईट चीजों में ज्यादा मज़ा आता है.”

“वो ब्लेड लानी पलेगी.” कामिनी मुस्कुराकर मेरी देखते हुए बोली।

“तुम बाहर मिठाई लाल की दुकान से जाकर ब्रेड ले आओ फिर हम दोनों मिलकर सैंडविच बनाकर खाते हैं।”

कामिनी ब्रेड लाने पड़ोस में बनी दुकान पर चली गयी। जाते समय जिस अंदाज़ से वह अपनी कमर को लचका रही थी मुझे लगता है कल उसके सौंदर्य की जो प्रशंसा की थी यह उसी का असर है।

उसके जाने के बाद मैं बाथरूम में घुस गया। मैं अक्सर सन्डे या छुट्टी के दिन सेव नहीं बनता पर आज मैंने नहाने से पहले शेव भी की और अच्छा परफ्यूम भी लगा लगाया।

जब मैं बाथरूम से बाहर आया तो देखा कामिनी अभी ब्रेड लेकर नहीं आई है। कमाल है ब्रेड लाने में कोई आधा घंटा थोड़े ही लगता है। ये भी कहीं गप्पे लगाने में लग गयी होगी? इतने में कामिनी हाथ में ब्रेड और कुछ सब्जियाँ हाथ पकड़े आ गई।

“कामिनी.. बहुत देर लगा दी? कहाँ रह गयी थी?

“वो … संजीवनी आंटी?”

“कौन संजीवनी?”

“वो … सामने वाली बंगालन आंटी!”

“ओह … क्या हुआ उसे?”

“हुआ तुछ नहीं.”

“तो?”

“उसने मुझे लोक लिया था.”

“क्यों?” मेरी झुंझलाहट बढ़ती जा रही थी।

“वो … वो मुझे घल पल ताम तलने ता पूछ लही थी.”

“फिर?”

“मैंने मना तल दिया.”

“क्यों?”

“अले आपतो पता नहीं वो एत नंबल ती लुच्ची है.”

“लुच्ची? क्या मतलब … कैसे? ऐसा क्या हुआ?” मैंने हकलाते हुए से पूछा।

“आपतो पता है वो … वो … ” कामिनी बोलते बोलते रूक गयी। उसका पूरा चेहरा लाल हो गया और उसने अपनी मोटी-मोटी आँखें ऐसे फैलाई जैसे वो राफेल जैसा कोई बड़ा घोटाला उजागर करने जा रही है। अब आप मेरी उत्सुकता का अंदाज़ा लगा सकते हैं।

“वो … वो क्या … ?? साफ बताओ ना?” मेरे दिल की धड़कन और उत्सुकता दोनों ही प्राइस इंडेक्स की तरह बढ़ती जा रही थी।

“वो … वो … तुत्ते से तलवाती है.”

“तुत्ते … ?? क्या मतलब?? तुत्ते क्या होता है?” मुझे लगा शायद वो डिल्डो (लिंग के आकार का एक सेक्स टॉय) की बात कर रही होगी। फिर भी मैं अनजान बनते हुए हैरानी से उसकी ओर देखता रहा।

“ओहो … आप भी … ना … … वो तुत्ता नहीं होता???” उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा जैसे मैं कोई विलुप्त होने के कगार पर पहुंची प्रजाति का कोई जीव हूँ और फिर उसने दोनों हाथों से इशारा करते हुए कहा- वो … भों … भों …

और फिर हम दोनों की हंसी एक साथ छूट पड़ी।

हाय मेरी तोते जान!!!

मेरी जान तो उसकी इस अदा पर निसार ही हो गयी। उसकी बातें सुनकर मेरा लंड तो खूंटे की तरह खड़ा हो गया था।
 
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