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Adultery मस्त पड़ोसन (पड़ोसन को दुल्हन बनाया )

पुजारी सेठी साहब को मंदिर में ले गया और सेठी साहब को कुछ भी उलाहना ना देते हुए बड़ी शान्ति और सौम्यता से सेठी साहब के हाथ में माँ का प्रसाद देकर उनसे सिर्फ एक ही बात कही। पुजारी ने कहा, “तुम्हारी जिंदगी अनमोल है। उसे इस तरह नष्ट मत करो। उसे समाज की और माँ की सेवा में लगाओ। तुम्हारी सारी समस्या माँ सुलझा देगी। तुम माँ की शरण में जाओ।

यहां से पूरब दिशा में गंजाम जिले में चिलिका और बालुगाओं गाँव के नजदीक एक नारायणी माँ की शक्ति पीठ है। वहाँ के गुरुदेव की सेवा करो और कुछ समय वहाँ रह कर माँ का भजन करो। गुरुदेव बड़े ही कृपालु हैं। उनसे कुछ भी मत मांगो। वह अन्तर्यामी हैं। उनकी कृपा अपने आप ही हो जायेगी। तुम्हारे सारे प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे।”

सेठी साहब ने तय कर लिया की वह घर नहीं जाएंगे। घर जाएंगे तो माँ बाप उनकी शादी की बात करने लगेंगे और सेठी साहब को उन्हें बताना पडेगा की वह नपुंशक हैं। आत्महत्या नहीं की तो अब दुसरा रास्ता वही है जो पुजारीजी ने उन्हें बताया। और कुछ नहीं हुआ तो वह लोगों की सेवा करने में ही अपना जीवन बिता देंगे। सेठी साहब ने पुजारी को दंडवत प्रणाम किया और वहाँ से निकल पड़े।

जाते जाते उन्होंने पुजारी से कहा, “माँ पिताजी को कहना की मैं कुछ देर के लिए माँ की शरण में जा रहा हूँ और कुछ ही समय में वापस आ जाऊंगा। मेरी चिंता ना करें।”

यह कह कर सेठी साहब माँ नारायणी दुर्गा देवी के मंदिर जाने के लिए पैदल ही निकल पड़े। करीब २०० किलोमीटर का रास्ता उन्होंने चल कर तय किया। रास्ते में जहां मौक़ा मिला सो जाते। कुआं, नलका या नदी देखि तो नहा लेते और गीले कपड़ों में ही चल देते। जो कुछ रास्ते में मिला खा लेते। अक्सर उन्हें भूखों रहना पड़ता।

वह रास्ते में कोई भी मंदिर या गुरुद्वारा होता वहाँ जा कर किसी ना किसी तरह एक जून खाना जुटा लेते। एक हफ्ते के सफर के बाद वह अपने गंतव्य स्थान नारायणी मंदिर पहुंचे। वहाँ पहुँच कर वह बाबा से मिले। वहाँ जा कर सेठी साहब ने बाबा से कहा उन्हें कुछ सेवा देदो। ना सेठी साहब ने अपनी समस्या बतायी ना बाबा ने कुछ पूछा।

बाबा के कहने पर सेठी साहब वहाँ के रसोई घर में अपनी सेवा देते रहे। करीब एक महीना गुजर ने के बाद बाबा ने सेठी साहब को बुलाया। बाबा सेठी साहब को माँ के मंदिर में ले गए, माँ को दण्डवत प्रणाम करने को कहा और खुद माँ के दर्शन करते हुए कुछ आँखें मूँद कर देर मौन ध्यान करते हुए खड़े रहे। उसके बाद उन्होंने सेठी साहब के हाथ में कुछ रुपये दिए और माँ का प्रसाद दिया।

फिर उन्होंने सेठी साहब को आशीर्वाद देते हुए घर वापस जाने को और कोई अच्छी लड़की देख कर शादी करने को कहा और आदेश दिया की जिंदगी भर माँ की पूजा सेवा करना और जितना हो सके लोगों का और समाज का भला करने की कोशिश करना। किसी का बुरा मत करना।

सेठी साहब के वापस आने पर तो उनका का सितारा बुलंद होने लगा। उनको एक से बढ़ कर एक कम्पनियों से जॉब के ऑफर आने लगे। कई कंपनियों में तो उनको बहुत अच्छी पोजीशन पर नौकरी का ऑफर हुआ। सेठी साहब के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब जो लड़की ने उन्हें इतना जबरदस्त ताना मारा था की वह नपुंशक है, वह नामर्द है वही लड़की उन्हें मिलने आयी।

वह लड़की सेठी साहब से हाथ जोड़ कर बड़ी ही विनम्रता से माफ़ी मांगने लगी और बोली की उससे बड़ी भारी गलती हो गयी की सेठी साहब को उसने उतने कड़वे शब्द बोले। उसने कहा की सेठी साहब जैसे भी हैं वह उनसे शादी करना चाहती है। जब सेठी साहब ने उस लड़की से चुदाई करने के बारे में पूछा तो वह सोच में पड़ गयी, पर उसने हाँ कह दी। सेठी साहब ने उस लड़की को वहीँ पर पलंग पर लिटा कर इतना चोदा की वह लड़की सेठी साहब को चुदाई ख़त्म करने के लिए मिन्नतें करने लगी।

जब सेठी साहब ने उसे चुदाई से फारिग किया तब उस लड़की ने सेठी साहब के पाँव छू कर दुबारा माफ़ी मांगी। उस लड़की ने ना सिर्फ माफ़ी मांग कर शादी करने की इच्छा जताई, बल्कि उसने कहा की उसने अपने माता और पिताजी से भी बात कर ली थी और वह भी इस शादी हो सके तो खुश हैं। सेठी साहब ने फ़ौरन शादी के लिए हाँ कह दी। डॉली ने जब मुझे कहा, “वह लड़की मैं ही हूँ।” तब मैं भौंचक्का सा डॉली जी को देखता ही रह गया।

डॉली और सेठी साहब की यह कहानी सुन कर मेरा सर चकरा गया। मैंने डॉली जी से कुछ दुरी बनाते हुए उनको प्रणाम करते हुए कहा, “डॉली जी, तुम्हारी और सेठी साहब की यह कहानी सुनकर मैं अपने आपको दोषी महसूस कर रहा हूँ। तुम्हारा और सेठी साहब का संबंध अटूट और अनूठा है। यह माँ के आशीर्वाद से बना है।

मरे मन में इस को लेकर दो बातें उठ रहीं हैं। पहली बात तो यह है की मुझे लगता है जैसे मैं इसमें कहीं ना कहीं विलेन का पात्र निभा रहा हूँ। मैं कबाब में हड्डी नहीं बनना चाहता। मेरा दूसरा सवाल यह है की जब तुम्हारा और सेठी साहब का मिलन माँ की दैवी शक्ति से हुआ है तो फिर यह बच्चे की समस्या क्यों?”

डॉली ने मुझे अपने करीब खींचा और वह मेरी बाँहों में आ गयी और मेरी नज़रों से नजरें मिलाकर एक प्यार भरी मुस्कान दी और बोली, “तुम्हारे सवाल में ही तुम्हारा जवाब है। तुम मेरे और सेठी साहब के संबंधों में कबाब में हड्डी नहीं तुम्हीं हमारे लिए कबाब हो।

तुम हमारे बीच विलेन नहीं हीरो बन कर आये हो। तुम हमारे बच्चे की समस्या का समाधान हो। भला यह नारायणी माँ की इच्छा के बगैर कैसे हो सकता है की तुम हमारी जिंदगी में ऐसे आये जैसे तुम्हें माँ ने हमारी समस्या का समाधान करने के लिए ही भेजा हो? और दूसरी बात कोई भी औरत या मर्द, क्या अपने बच्चे को किसी और को देने के लिए कभी राजी हो सकता है क्या भला? ज्योति ने तो मुझे बगैर मांगे ही वचन दे दिया की चाहे सेठी साहब से ज्योति को बच्चा हो या आपसे मुझे बच्चा हो, वह एक बच्चा मुझे देगी।

विधाता का लिखा हुआ माँ नारायणी भले ही खारिज नहीं करती पर अपने भक्तों के लिए उसका समाधान जरूर करती है। हमने जो चुदाई की या जो चुदाई हम करने जा रहे हैं वह यह समझो की माँ की मर्जी से ही हो रही है। इसमें माँ का दैवी संकेत है।”

मैं यहां पाठकों को और ख़ास कर महिला पाठकों को यह सन्देश देना चाहता हूँ की चुदाई को पाप के रूप में ना लें। अगर चुदाई किसी का दिल दुखा कर नहीं हो रही और स्त्री और पुरुष की सहमति और प्यार से हो रही है तो वह पवित्र है। एक पति अपनी पत्नी को किसी और मर्द से चुदवाना चाहता है और अगर पत्नी को पति पर भरोसा है और वह दुसरा मर्द पत्नी को स्वीकार्य है तो पत्नी को उसका विरोध नहीं करना चाहिए। पति चाहता है की पत्नी भी दूसरे मर्द से चुदाई करवा कर दूसरे लण्ड का आनंद ले।

पर हाँ, यह ध्यान रहे की इस चक्कर में पति पत्नी एक दूसरे से दूर ना हों। यह हो सकता है की पहले सम्भोग के बाद पत्नी किसी और मर्द से भी चुदवाना चाहे। या यह भी हो सकता है की पत्नी उसी मर्द से दुबारा तिबारा चुदवाना चाहे। अगर पति को उसमें कोई जबरदस्त आपत्ति ना हो तो पत्नी को दूसरे मर्द से भी चुदवाने देना चाहिए। अक्सर ऐसी चुदाई करने से पति और पत्नी में प्यार बढ़ता ही है। पर यह जरुरी भी नहीं। यह पति, पत्नी और तीसरे मर्द की मानसिकता पर आधारित है।

आजकल यह आम हो गया है की पत्नियां पति के अलावा दूसरे मर्दों से चुदवातीं हैं। ज्यादा तर मामलों में यह चोरी छुपी होता है। कई मामलों में यह पति की इच्छा से होता है और कई मामलों में पति की परोक्ष रूप से इजाजत होती है। मतलब पति इजाजत नहीं देता पर उसे पता होता है की पत्नी दूसरे मर्द से चुदवा रही है पर वह इस बात का बतंगड़ नहीं बनाता।

डॉली की कहानी सुन कर मैं सेठी साहब के कमरे में रखी माँ की तस्वीर को सिर झुकाये बगैर रह नहीं पाया। डॉली ने मेरी और डॉली की चुदाई को पवित्र करार दिया यह सुन कर मुझे अच्छा लगा। आखिर चुदाई हम सब करते ही हैं। माँ बाप की चुदाई के बगैर हम थोड़े ही पैदा होते? हर रात हर घर में चुदाई होती है।

चुदाई का सामाजिक अधिकार पाने के लिए ही स्त्री और पुरुष शादी करते हैं। तो फिर चुदाई को ऐसे हीन दृष्टि से क्यों देखना चाहिए? चुदाई भी हमारे जीवन का एक आम हिस्सा है, जैसे खाना, सोना, पैसे कमाना इत्यादि।

दूसरी बात यह है की जब स्त्री और पुरुष चुदाई करते हैं तब ख़ास कर स्त्रियां चोदना, चुदाई, लण्ड, चूत ऐसे शब्द बोलने से कतराती हैं। कई महिलायें अगर बोलती भी हैं तो फ़क, कॉक, कंट ऐसे इंग्लिश शब्दों का प्रयोग करती हैं। ऐसा क्यों?

अपने देसी शब्दों का उपयोग करने में हीनता का भाव क्यों? हम लण्ड, चूत, चोदना आदि शब्दों को गंदा क्यों गिनते हैं? हमें हमारी भाषा का भी सम्मान करना चाहिए और ख़ास कर हम जब चुदाई कर रहे हों या चुदाई की बात कर रहे हों तो इन शब्दों के उपयोग को असभ्य नहीं मानना चाहिए।
 
डॉली के कहने पर डॉली के पाँव को छोड़ डॉली के हाथों को मैंने चूमना शुरू किया। डॉली की कलाइयां एकदम चिकनी गोरी चिट्टी थीं। हाथों में शादी का चूड़ा पहने हुए डॉली की कलाइयां बड़ी ही सेक्सी लग रहीं थीं। मैं डॉली की कलाइयां चूमते हुए ऊपर की और खिसक ने लगा। जैसे जैसे मैं आगे बढ़ता गया डॉली के बदन में वैसे वैसे ही कम्पन बढ़ता ही चला गया।

डॉली नयी नवेली दुल्हन की सुहाग रात मेरे साथ मना रही थी। उस के जहन में था की वह मुझे सुहागरात का तोहफा पेश करेगी। हालांकि पिछली रात को मैं सहमा को चोद चुका था पर वह सब एक़दम बिना कोई तैयारी के सुनियोजित तरीके से नहीं हुआ था। जैसे अनाड़ी लड़के किसी लड़की के साथ मौक़ा पाते ही कोई देख ना ले उस डर के साथ आधे कपडे निकाले आधे बदन पर ही रह गए ऐसे अकेले में आननफानन में चुदाई करते हैं वैसे ही कुछ हद तक हुआ था।

हमने यह तय नहीं किया था की हम कैसे एन्जॉय करेंगे, कैसे प्यार करेंगे। पर उस दूसरी शाम को तो डॉली ने बड़े ही सुनियोजित तरीके से बढ़िया सा शादी का जोड़ा और शादी का चूड़ा पहन कर शादी के बाद सुहागरात में जैसे नईनवेली दुल्हन सोने की जरी वाली भारी साडी पहन कर पति का इंतजार कर रही हो वैसे मेरे आने का इंतजार कर रही थी। जब मैंने उसकी कलाइयों से चूमने शुरुआत की तब डॉली के पुरे बदन कम्पन आना स्वाभाविक था।

मैंने डॉली की कलाइयों से एक के बाद एक भारी भरखम चूड़ा निकाला। पता नहीं औरतें इतना भारी चूड़ा शादी के समय और उसके फ़ौरन बाद क्यों पहनतीं हैं? इसका जरूर कोई सामाजिक महत्व होगा। डॉली की गोरी गोरी कलाइयों से बढ़ता हुआ मैं उसकी बगल में जा कर उसकी गर्दन को चूमने लगा।

मेरे हाथ डॉली की पीठ पर डॉली के ब्लाउज के बटन पर मंडरा रहे थे। गालों को चूमते हुए नाक और कान को भी चूमता गया। मैंने जान बुझ कर होठों को नहीं छेड़ा। पिछली रात के अनुभव से मैं जानता था की डॉली को होंठों पर प्रगाढ़ चुम्बन कितना प्यारा था और उसे चूमते ही डॉली की टांगें अपने आप खुल जातीं थीं।

डॉली मेरे होँठों से होंठ मिलाने की प्रतीक्षा में बैठी रही पर जब मैंने ऐसा कुछ नहीं किया तब डॉली ने घूम कर मुझे पकड़ कर मेरे होंठ अपने होँठों पर चिपकाते हुए बोलने लगी, “राज, मेरे होंठ चूमो। मुझे तगड़ी किस करो।” और उसके फ़ौरन बाद डॉली के मुंह में से सिर्फ, “उम्…. ऍम…..” के अलावा कुछ भी आवाज नहीं निकल रही थी। निकलती भी कैसे? उसके होंठ मेरे होठ से कस कर चिपके हुए थे और मेरी जीभ उसके मुंह में उसके रस का पान कर रही थी। डॉली मेरे मुंह से लार चूस रही थी और मैं उसके मुंह से लार निगल रहा था।

डॉली को किस करने का मतलब था उसकी चुदाई का दरवाजा खोल देना। मेरे हाथ जो डॉली के ब्लाउज के बटन पर मंडरा रहे था जिन्हे अपना बदन इधर उधर हिला कर डॉली खोलने की इजाजत नहीं दे रही थी अब डॉली चाहती थी की मैं उन्हें खोलूं और डॉली के अल्लड़ स्तनोँ को ब्लाउज और ब्रा के बंधन से आजाद करूँ। मैंने बिना समय गँवाए डॉली के ब्लाउज़ के बटनों को एक के बाद एक खोल दिए और ब्रा के हुक को भी खोल कर डॉली के फूल रहे मस्त स्तनोँ को बंधन से मुक्ति दिलाई।

जैसे ही मैंने डॉली के अल्लड़ स्तनोँ को अपने हाथों में लिए तो मैंने डॉली की निप्पलों को फूल कर एकदम सख्त आकर लेकर डॉली के एरोला के बीच में शिखर की तरह उन्नत मस्तक रखे हुए पाया जो डॉली की चुदाई करवाने की इच्छा प्रगट कर रहा था। स्त्रियों के स्तनोँ के हालात से उसकी चुदाई करवाने के इच्छा का अनुमान लगाया जा सकता है।

अगर आपने स्त्रियों की चूँचियों पर कब्जा कर लिया और उसे दक्षता से सहलाने और मसलने की कला का इस्तेमाल किया तो समझो आपने उस स्त्रीको चुदाई के लिए आधी तो राजी कर लिया। होंठों पर चुम्बन स्त्रियों की कामुकता की सीढ़ी का पहला सोपान है। स्त्रियों को कामुक करने की सीढ़ी का दुसरा सोपान है स्त्रियों के स्तनोँ को काबिलियत से मसलना, चूमना काटना इत्यादि।

अब डॉली के लिए चुदाई के लिए मुझे पूरी तरह स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नहीं था। अब डॉली मुझे रंग में लाना चाहती थी। मैथुन या सम्भोग या चुदाई कहो यह स्त्री पुरुषों का एक दूर को तैयार कर उनको ज्यादा से ज्यादा आनंद देने का खेल है।

इस खेल में अगर पुरुष या स्त्री सिर्फ अपने ही आनंद को अनुभव कर दूसरे की कामुकता को नजरअंदाज करते हैं तो वह चुदाई अधूरी है या यूँ कहिये की एक तरफा है। उसे स्वार्थपूर्ण भी कह सकते हैं। अक्सर इस बात को पुरुष नहीं समझते। खुद झड़ जाने के बाद पुरुष लोग चुदाई को समाप्त कर देते हैं।

यह आपके पार्टनर के प्रति अन्याय है। पुरुष को चाहिए की स्त्री भी सम्भोग की क्रिया का पूरा आनंद उठाये। स्त्रियों के झड़ने प्रक्रिया अत्यंत ही जटिल अथवा पेचीदा है। कई बार जब मन चाहे पुरुष से वह चुदवातीं हैं तो उस सम्भोग में वह बार बार झड़ती रहतीं हैं। पर अपने पति से अथवा कोई ज्यादा पसंद ना हो ऐसे पुरुष से चुदवाते समय वह आसानी से झड़ती नहीं।

डॉली ने मेरी टांगों के बीच में हाथ डाल कर मुझे इंगित किया की मैं भी खुद को निर्वस्त्र करूँ। डॉली ने मेरे पाजामे के नाड़े को खोलने की कोशिश की। मैंने फ़ौरन नाड़े का छोर खिंच गाँठ खोल दी। डॉली ने खुद निक्कर को नीचे धकेल कर मेरे लण्ड को आजाद किया। डॉली के इंतजार में मेरा लण्ड पहले से ही सख्त और खड़ा तैयार था।

डॉली ने उसे हाथ में लेकर प्यार से मेरी और देखा। मेरा लण्ड काफी मोटा है। खैर उसका मुकाबला सेठी साहब के लण्ड से ना किया जाए। सेठी साहब का लण्ड एक अलग ही बात है। डॉली ने कुछ देर मेरे लण्ड को अपने हथेलियों में प्यार से सहलाया और फिर फर्श पर बैठ कर उसे अपने मुंह में लिया।

डॉली लण्ड चूसने की कला में बड़ी ही माहिर है। अगर चुसवाने वाला ध्यान ना रखे तो लंड चुसवाते हुए वह डॉली के मुंह में ही झड़ सकता है। मुझे इस बात का भलीभांति पता था। मैं जानता था की डॉली को कहाँ रोकना है।

डॉली की एक खासियत थी। वह लण्ड को भी मुंह से इतना बढ़िया तरीके से प्यार देती थी की अच्छे से अच्छा लण्ड चुसवाते हुए अपने आपको झड़ ने से रोक नहीं पाए। मैंने डॉली को पीछे हटाया और अपना लण्ड डॉली के मुंह से निकाला। मैंने डॉली को गोल गोल घुमाते हुए उस की भारीभरखम साडी को कुछ मशक्क्त के बाद निकाला। डॉली घाघरे में इतनी खूबसूरत लग रही थी। पर मैं भी कोई चित्रकार तो था नहीं जो डॉली का चित्र बना रहा हो। मुझे तो डॉली को नंगी कर उसे खूब चोदना था।

घाघरा भी मेरे लक्ष्य में बाधा रूप था। घाघरे का नाडा खोल मैंने डॉली को घाघरे के आवरण से भी मुक्त किया। मेरी रानी डॉली मेरे हर क्रिया कलाप को बिना कुछ बोले मुस्कुराती हुई कुछ लज्जा से देखती ही रही। अब एक छोटी पैंटी ही डॉली के प्यार के छिद्र को ढके हुए थी। उसे डॉली ने ही मीचे खिसका कर हटा दिया और मेरी प्यारी मेरी नज़रों के सामने ही नंगी खड़ी हो गयी। जब एक औरत एकदम फिट रहते हुए अपनी कमर और पेट को नियंत्रण में रखती है तो उसका नग्न रूप देखते ही बनता है।

डॉली ने अपने आपको सुनियोजित तरीके से फिट रखा हुआ था। खाने पिने में संयम और शरीर की कैलोरीज को जलाते रहने से आप अपने बदन को फिट रख सकते हो। हालांकि यह मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं। डॉली यह जानती थी की शादी के बाद अक्सर औरतें मोटी हो जातीं हैं। डॉली ने इसके लिए जो भी जरुरी नियम थे उनका सख्ती से पालन कर अपने आप को फिट रखा हुआ था।

हालांकि डॉली उस समय चुदवाने के लिए शत प्रतिशत तैयार थी फिर भी मुझे डॉली को चुदवाने के लिए मुझे मिन्नतें करे उस हाल में लाना था। मैंने पहले लिखा था की स्त्रियों को चुदवाने के लिए राजी करने के सौपान में दुसरा सौपान था उनकी चूँचियों को मसलना और चूमना काटना इत्यादि। स्त्रियों को चुदवाने के लिए तैयार करने का तीसरा सौपान है उनकी चूत को चुमना और चाटना। पुरुषों की जीभ का चूत के स्पर्श से अच्छी से अच्छी स्त्रियां मचल जातीं हैं। अगर पुरुष चूमने में माहिर हो तो फिर कहना ही क्या? स्त्रियां पुरुष की जीभ को चूमने से पागल सी हो जातीं हैं।

चौथा और आखिरी सौपान है स्त्रियों की चूत की पंखुड़ियों को सहलाते हुए उनकी चूत का उंगली चोदन। स्त्रियों की चूत को चाटने के बाद स्त्रियां जब चुदवाने के लिए बेताब हो जातीं हैं तब उनकी चुदासी के हालात को एक और ऊंचाई पर ले जाने का काम उंगली चोदन से होता है। जब पुरुष यहां तक पहुँच जाता है तब स्त्री अपने आप ही पुरुष को हाथ जोड़ कर चोदने के लिए बिनती करती है।

पर यहां ध्यान रहे की यह काम अत्यंत नाजुक और कोमलता से करना चाहिए। हमारे हाथों के नाख़ून अक्सर स्त्रियों के चूत की कोमल त्वचा को आहत कर सकते हैं। उंगली चोदन के पहले अपने नाखूनों को काटकर ऐसा कर दीजिये की हमारे पार्टनर को कोई तकलीफ ना हो।

जब मैंने डॉली को ऊपर बतायी ही सारी प्रक्रियाएं करने के बाद डॉली को उँगलियों से चोदना शुरू किया तो वह मेरी मिन्नतें करने लगी की मैं फ़ौरन मेरा लण्ड उसकी चूत में डालकर उसे चोदूँ। मैं कौनसा औपचारिक आमंत्रण का इंतजार कर रहा था? मेरा लण्ड तो डॉली की चूत में दाखिल हो कर उसे चोदने के लिए वैसे ही बेताब था। डॉली के मिन्नतें करने पर मैंने डॉली को पलंग पर ठीक से लिटाया और उसकी टांगों को कंधे पर चढ़ा कर मेरा लण्ड डॉली की चूत पर रखा।

डॉली की चूत वैसे ही अपने स्त्री रस से गीली हो चुकी थी। मेरा लण्ड भी कभी से डॉली की चूत में जाने के इंतजार में अपना रस रिस रहा था। मेरे लण्ड के इर्दगिर्द काफी चिकनाहट जमा थी जिससे बाहर से कोई अतिरिक्त चिकनाहट से उसे चिकना करने की जरुरत नहीं थी।

फिर भी डॉली ने मेरे लण्ड को अपनी चूत की पंखुड़ियों की सतह पर कुछ देर रगड़ा ताकि वह उसकी चूत में प्रवेश करने में ज्यादा कष्टदायी ना हो। यह एक स्त्री सुलभ सावधानी के रूप में था। फिर जब डॉली ने मेरे लण्ड को अपनी चूत में दाखिल करने का मुझे इशारा किया तब मैंने मेरे लण्ड को एक धक्का मार कर डॉली की चूत में प्रवेश दिलाया। कुछ रुकावट जरूर हुई उसके कारण शायद डॉली को कुछ परेशानी जरूर हुई होगी। पर डॉली के मुंह से कोई आवाज नहीं निकली।

मैं अपने ही लण्ड को डॉली की चूत में दाखिल होने की प्रक्रिया देखना चाहता था। मैंने कभी एक लण्ड को चूत में दाखिल होते हुए और चूत को चोदते हुए नहीं देखा था। मेरा बड़ा मन कर रहा था की कभी मैं भी डॉली को या ज्योति को किसी और लण्ड से चुद्ता हुआ देखूं।

पता नहीं यह अजीबोगरीब ख़याल मेरे मन में क्यों आया। मेरे मन में ख़याल आया की कभी ना कभी मैं ज्योति या डॉली को मेरे सामने किसी और मर्द या फिर सेठी साहब से ही चुदवा कर देखूं। पर सेठी साहब के साथ में ऐसा करना तो संभव ही नहीं था क्यूंकि एक बार जिसे सेठी साहब ने चोद दिया फिर वह औरत उस समय किसी और से चुदवाने के काबिल ही नहीं रहती। मैंने कुछ झुक कर मेरे ही लण्ड को डॉली की चूत में चोदते हुए देखना चाहा। पर एकड़ झलक के सिवाय उसे साफ़ साफ़ देख नहीं पा रहा था।

डॉली के बेड पर मचलने से मैं यह समझ पा रहा था की डॉली मेरे लण्ड से चुदने से काफी उत्तेजित लग रही थी। मेरे चुदाई के धक्के से डॉली का पूरा बदन हिलने लगा था। डॉली की चूँचियाँ अपनी उद्दंडता को भूल कर इधर उधर फ़ैल कर जैसे उड़ रहीं थीं। मैंने मेरे हाथ से उनको पकड़ कर सम्भाला।

मुझे चुदाई करते हुए मेरे पार्टनर की चूँचियाँ मसलने में बड़ा ही उत्तेजना का अनुभव होता है। मैंने भी जो मेरे नीचे लेट कर चुद रहीं थीं उन महिलाओं से भी सूना था की उन्हें भी चुदाई होते समय अपनी चूँचियाँ सेहलवाने, मसलवाने में बड़ी ही उत्तेजना का अनुभव होता है। मैं डॉली की चूत में एक के बाद एक धक्के मार कर अपना लण्ड पेले जा रहा था।

डॉली इस लण्ड के धक्कों को खाने के लिए पता नहीं कितने महीनों से इंतजार में थी। कल की हमारी चुदाई से लगता था डॉली को पूरी तरह संतुष्टि नहीं हुई थी। आज भी चुदाई में डॉली उतनी ही या यूँ कहिये की और भी आक्रमक नजर आ रही थी। मेरे पुरे बदन में चुदाई करने के कारण जो वीर्य रस दौड़ रहा था उसका वर्णन करना मुश्किल था।

मेरे बदन का एक एक स्नायु सख्ती से खींचा हुआ था। डॉली की चूत हमारे रस से पूरी लबालब चिकनाहट से परिपूर्ण हो चुकी थी। मेरे लण्ड पेलने से “फच्च…. फच्च…” की आवाज हमारे दिमाग को घुमा रही थी।

मैंने डॉली को चोदते हुए उसके गाँड़ के गालों को चूँटी भरना शुरू किया। डॉली बार बार अपनी गाँड़ पलंग ऊपर से उत्तेजना की दशा में हिला रही थी। जब भी में एक तगड़ी तीखी चूँटी भरता तो डॉली के मुंह से “आह….. ” निकल जाती। वैसे भी डॉली अपने मुंह से हर एक धक्के बाद “आह…. ओह….. है…..” करती रहती थी।

डॉली को चोद ने की मेरी बहुत महीनों से छिपी हुई अभिलाषा था जिसके कारण उसको चोदते हुए मेरा पूरा बदन उत्तेजना से सख्त हो रहा था। मेरे अंडकोष में मेरा वीर्य फुंफकार रहा था।

मने अपने लण्ड को डॉली की चूत में टेढ़ा मेढ़ा करना शुरू किया। इससे डॉली को और तेज उत्तेजना का अनुभव होने लगा। साथ ही साथ में मैंने सहमा की चूँचियों को इतने जोर से दबाया की डॉली कराहने लगी। मैंने फिर डॉली की गाँड़ के गालों में भी फिर से जोर से तीखी चूँटी भरना शुरू किया। एक साथ यह तीनों काम से डॉली काफी उन्मादक अवस्था में आ गयी। मैंने जब चुदाई की रफ़्तार और तेज कर दी तो डॉली उसे झेल ना सकी और कुछ ही पलों में वह झड़ गयी। डॉली के झड़ जाने पर मैंने उसको चोदने की रफ़्तार कम की।

झड़ ने के बाद भी डॉली का चुदाई का जोश बिलकुल कम हुआ हो ऐसा लग नहीं रहा था। मैं जैसे डॉली की चूत में दुबारा से अपना लण्ड पेल रहा था तो डॉली उससे दुगुने जोश से मेरे पेलने के जवाब में अपनी कमर और उसके नीचे का बदन उछाल कर उसी मात्रा में जवाब दे रही थी। हमारी जुगल बंदी कुछ समय चली।

अब झड़ ने की बारी मेरी थी। पुरुष और स्त्री के झड़ ने में एक बहुत बड़ा फर्क है। पुरुष अगर झड़ जाए तो अंडकोष में भरा उसके वीर्य का भण्डार भी खाली हो जाता है। अक्सर पुरुष के लण्ड का जोश उसके वीर्य की मात्रा से ही होता है। हाँ कई पुरुष कम मात्रा में वीर्य होने के बावजूद भी काफी तगड़ा चोदने की क्षमता रखते हैं।

बल्कि कई बार उनके चोदने की क्षमता झड़ने के बाद बढ़ जाती है। पर ज्यादातर मर्द लोग झड़ने के बाद ढेर हो कर गिर पड़ते हैं और फिर बाद में ना तो उनमें चोदने की क्षमता रहती है ना ही इच्छाशक्ति। मैं भी उनमें से एक था।

मैं जानता था की जैसे ही मैं झड़ गया, उसके बाद मैं डॉली को चोदने की क्षमता नहीं जुटा पाउँगा। तो मुझे ब्रेक लगाना ही पडेगा ताकि मैं अभी ना झडूं, अगर मुझे डॉली को ज्यादा देर चोदना है तो। शायद डॉली को भी इस का अंदाज था। तो मैंने जैसे हीडॉली को चोदना रोक दिया तो डॉली समझ गयी की मैं झड़ ने के कगार पर हूँ और अभी झड़ना नहीं चाहता।

डॉली ने कहा, “चालु रखो राज साहब, झड़ना है तो झड़ जाओ मेरी चूतमें। रुको मत। बेशक दुसरा सेशन हो या ना हो पर मैं तो यही कहूँगी की हमारा पहला सेशन झकास रहा।”

डॉली की बात सुन कर मैं ने अपने अंडकोष पर लगाया हुआ प्रतिबन्ध खोल दिया और मेरे वीर्य का नलका खुल गया। जैसे ही मैंने दो तीन धक्के पेले, मेरे लण्ड के छिद्र में से वीर्य का फव्वारा डॉली की चूत में सब तरह फैलने लगा।

मुझे और डॉली को भी मेरे वीर्य का उष्ण तापमान डॉली की चूत की सुरंगों में महसूस हुआ। डॉली मेरे वीर्य को उसकी चूत के सुरंगों में बहता महसूस कर मुझसे लिपट गयी और मेरी आँखों में आँखें डालकर पूछने लगी, “सच बताओ राज, क्या तुम्हारे वीर्य के शुक्राणु मेरे अण्डों को फलीभूत कर पाएंगे? क्या मैं तुम्हारे वीर्य से माँ बन पाउंगी?”
 
मैंने डॉली को दिलासा देते हुए उसके नंगे बदन पर हाथ फिराते हुए कहा, “डॉली , ज्योति मुझे कभी कंडोम के बगैर चोदने नहीं देती। जब जब भी पहले हम ने ज्योति के पीरियड के टाइम टेबल के अनुसार सलामत समय देख कर बगैर कंडोम के चुदाई की तब तब ज्योति विपरीत टाइम होने पर भी फटाक से गर्भवती हो गयी और हमें फ़ौरन बिना देर लिए उसका गर्भ निवारण करना पड़ा। डॉली यही कहती है की मेरा वीर्य फटाक से स्त्री के अण्डों को पकड़ लेता है।

इसी लिए वह कई बार मुझे मजाक में कहती है की मैं अगर किसी और स्त्री को चोदूँ तो खबरदार, कंडोम लगा कर ही चोदूँ, वरना वह बेचारी के बारह बज जाएंगे और अगर वह शादीशुदा हुई तो अपने पति को और अगर कंवारी हुई तो अपने रिश्तेदारों को जवाब देने लायक नहीं रहेगी। तुम निश्चिन्त रहो तुम मुझ से माँ बनने वाली हो। यह हमारी चुदाई बेकार नहीं जायेगी।”

डॉली को हर हालात में माँ बनना था। और मेरे वीर्य से ही माँ बनना था। यह उसने अपने मन में तय कर रखा था। उसके लिए मुझसे उसको चाहे जितनी चुदाई करवानी पड़े वह तैयार थी। मुझे उससे कोई शिकायत नहीं थी। उस रात मैं दुसरा सेशन करने के मूड़ में या यूँ कहिये की जोश में नहीं था।

एक बार मेरे वीर्य का भण्डार खाली होने के बाद मुझमें वह क्षमता नहीं रही थी की मैं दुसरा सेशन कर सकूँ। पर डॉली थोड़ी ही मानने वाली थी? डॉली ने मेरे लण्ड को मुंह में ले कर इतनी दक्षता और प्यार से इतना चूसा की मेरा लण्ड खड़ा हो गया।

पाठक मानेंगे नहीं पर दूसरे सेशन में मैंने डॉली को घोड़ी बनाकर इतना तगड़ा चोदा की शायद उसे उस बार सेठी साहब की याद आयी होगी। यह मेरा मानना है। डॉली चुदवाते जिस तरह सिसकारियां मार रही थी, मुहे कोई शक नहीं था की वह मेरी चुदाई को पूरी तरह से एन्जॉय कर रही थी।

जब हम चुदाई से फारिग हुए तब डॉली फ्रेश होने के लिए वाशरूम में गयी। कुछ देर डॉली के निकलने का इंतजार कर डॉली के निकलने के बाद मैं भी वाशरूम गया और कुछ स्वस्थ होकर पलंग के पास पहुंचा। मेरे पलंग पर पहुँच कर तकिये के सहारे बैठने पर डॉली सिमट कर मेरी बाँहों में आ कर मुझसे छोटी बच्ची की तरह लिपट गयी और बोली, “कैसा रहा राज साहब? क्या मैं आपकी उम्मीद के मुकाबले ठीक रही की नहीं?”

मैंने कुछ खिसियाने स्वर में कहा, “यह सवाल तो मुझे तुमसे पूछना चाहिए।”

डॉली ने कुछ शरारती अंदाज में जवाब देते हुए कहा, “अगर आप पूछ ही रहे हो तो मैं यह कहूँगी की सेशन ठीक ही रहा।अब देखिये मैं सेठी साहब की बीबी हूँ और उनकी चुदाई की आदि हो चुकी हूँ, तो जाहिर है की कुछ तो कमी महसूस होगी। पर खैर अगर मैं तुमसे माँ ही बन गयी तो मेरा मकसद पूरा हो जाएगा।”

मैंने जिद करते हुए पूछा, “खैर मैं मानता हूँ की मैं सेठी साहब के मुकाबले खरा नहीं उतर सकता। पर तुम्हें खुश होने के लिए मेरे जैसे आम आदमी से तुम्हें क्या चाहिए? यह तो बताओ?”

डॉली ने कुछ झिझक के साथ कहा, “कैसे बताऊँ राजजी? मुझे चुदाई में कुछ नयापन चाहिए। ऐसा कुछ जो आजतक हमने किया ना हो।”

मैंने सर खुजलाते हुए पूछा, “चुदाई में हर तरह का नयापन तो हमने किया। और हम क्या कर सकते थे? कोई काले बड़े ही तगड़े लण्ड से चुदवाना चाहती हो? वह तो तुम्हारे घरमें ही है। और क्या कर सकते हैं? क्या दो मर्दों से चुदवाना है? यह हमने नहीं किया।”

डॉली मेरी बात सुनकर एकदम खिल उठी और बोली, “क्या यह हो सकता है?”

मैंने कहा, “क्यों नहीं हो सकता? मैं और सेठी साहब तुम्हें चोद सकते हैं।”

डॉली ने कहा, “बापरे बाप! सेठी साहब खुद तीन मर्दों के बराबर हैं। ऊपर से तुम। जब चार मर्दों से चुदवाना होगा तब सोचूंगी। अभी तो दो मर्द ही ठीक रहेंगे।”

डॉली की बात सुनकर मेरा माथा ठनक गया। इन औरतों का दिमाग तो भगवान ही जाने उन्होंने कैसा बनाया है। सेठी साहब की चुदाई बहुत ज्यादा तगड़ी लगती है। मेरी चुदाई उतनी तगड़ी नहीं लगी डॉली को शायद। अब वह शायद सोच रही है दो मर्दों से चुदवाए। अब यह दुसरा मर्द कहाँ से लाऊँ?

खैर, रात क करीब एक बजे मैं डॉली से इजाजत ले कर अपने घर चला गया।

मुझे पक्का भरोसा था की दो दिन की चुदाई से डॉली की मेरे वीर्य माँ बनने की प्रमुख जरुरत तो पक्की पूरी होगी। पर अब माँ बनने से भी आगे डॉली को कुछ नयापन लाना था चुदाई में।

मुझे भरोसा था की मैं जिस किसी मर्द को पसंद कर लूंगा तो शायद डॉली उससे चुदवा लेगी। डॉली को मुझे पर इस बात के लिए तो पूरा यकीन था। पर ऐसे वैसे इंसान को ऐसे निजी मामले में कैसे पसंद किया जाए? इंसान भरोसे का होना चाहिए। ऐसा भी ना हो जो बाद में वह आदमी डॉली को चुदाई के लिए या फिर पैसों के लिए परेशान करता रहे। उसे ब्लैक मेल करे।

आखिर में डॉली से अलग होते हुए मैंने डॉली को जब पूछा, “क्या तुम्हें सिर्फ नयापन ही चाहिए या मैं रात को आऊं?”

तब डॉली ने नाराज होते हुए कहा, “अरे नयापन की बात तो मैंने वैसे ही कह दी थी। सेठी साहब और ज्योति ने हमें तीन दिन दिए हैं। तीन दिन तो हम मिल कर तगड़ी चुदाई करेंगे यह तो पक्की बात है। इसमें नयेपन की बात कहाँ से आयी? कहीं तुम मुझसे बोर तो नहीं हो गए?”

मैंने कुछ रक्षात्मक ढंग में कहा, “नहीं यह बात नहीं। मुझे लगा तुम नयेपन पर कुछ ज्यादा ही जोर दे रही थी।”

डॉली ने मेरे गाल पर हलकी सी टपली मार कर कहा, “अरे नहीं, मेरे भोले राजा। शामको आ जाना मैं तुम्हारा इंतजार करुँगी।”

डॉली की यह बात सुनकर मैंने राहत की साँस ली। दो मर्दों से चुदवाना डॉली के लिए भी मुश्किल होगा और किसी और अनजान पराये मर्द के सामने अपने आप को नंगा करना मेरे लिए भी अजीब होगा। आखिर समाज में मेरा अपना भी एक स्टेटस था। डॉली और मेरे पास बस एक ही शाम तो बची थी। अगले दिन ज्योति और सेठी साहब वापस आ जायेंगे। एक शाम तो हम चुदाई में निकाल देंगे। फिर देखते हैं क्या कुछ हो सकता है।

हालांकि मैं ऑफिस में काफी काम में उलझा हुआ था पर बार बार मेरे मन में डॉली की वह नएपन की बात जाती नहीं थी। खैर जैसे तैसे मैंने वह दिन निकाला और शाम को मैं पहले अपने घर जाकर जो कुछ काम घरमें करना था किया और फ्रेश हो कर मैं डॉली के घर पहुंचा।

मैंने दरवाजे की घंटी बजायी। जब दरवाजा खुला तो मुझे लगा जैसे मेरे पाँव के नीचे से जमीन खिसकने लगी थी। मेरी आँखें शायद ठीक से देख नहीं पा रहीं थीं। क्यूंकि मेरे सामने मेरे साले साहब खड़े थे। मुझे यह समझ में नहीं आया की साले साहब कब आये और डॉली के घर कैसे पहुंचे? कुछ झिझकती हुई आवाज में मैंने पूछा, “साले साहब, आप यहां? आप तो कहीं टूर पर गए थे ना?”

हो गया। मैं वापस जा ही रहा था की उसी समय मुझे अंजू का फ़ोन आया और उसने मुझे सेठी साहब और ज्योति के बारे में और आप और डॉली जी के बारे में काफी विस्तार से बताया।

मुझे सारे समाचार सुन कर बड़ी ख़ुशी हुई। अंजू ने मुझे कहा की बेहतर होगा की मैं दिल्ली आपके पास पहुंचूं। डॉली जी से तो मेरी बात होती ही रहती है। ज्योति कल आ जायेगी तो मैं उससे भी कल मिल लूंगा। जब मैं यहां यहां पहुंचा तो आप का घर बंद पाया। मैंने फिर डॉली जी के घर का दरवाजा खटखटाया। सुबह से मैं यहीं हूँ। मैंने सोचा की आपको फ़ोन करूँ। पर डॉली जी ने मना किया। उन्होंने कहा की शामको आपको सरप्राइज देंगे।”

मेरे साले साहब सरकारी दफ्तर में अच्छी खासी पोजीशन पर थे। दिखने में बड़े ही हैंडसम वह काफी फिट थे। वह हमारे घर जब भी आते थे सेठी साहब को मिलने जरूर जाया करते थे।

सेठी साहब के घरमें डॉली जी से तो उनकी मुलाक़ात हुआ ही करती थी। जो भला डॉली जी को एक बार मिल जाए उनको कैसे नजरअंदाज कर सकता है? साले साहब भी डॉली जी से बड़े ही प्रभावित थे और वापस जाने पर भी फ़ोन से उनके संपर्क में रहते थे। हालांकि मामूली छेड़छाड़ और कभी कभी एक दूसरे की टांग खींचने को छोड़ उनकी बातचीत ज्यादातर औपचारिकता की सीमा में ही होती थी। एक दूसरे की सकुशलता और जन्म दिवस पर बधाई इत्यादि तक सिमित रहती थी।

वाकई में साले साहब का आना मेरे लिए एक सरप्राइज़ नहीं शॉक था। आश्चर्य नहीं एक झटका था जिसे मैं झेल ने की कोशिश कर रहा था। मेरे चेहरे के भाव देख कर साले साहब बोल पड़े, “लगता है जीजूजी मेरे आने से ज्यादा खुश नहीं लग रहे। जिजुजी अगर आपको मेरा आना ठीक नहीं लगा तो मैं वापस चला जाता हूँ।”

उतनी ही देर में डॉली पीछे से दिखाई दीं। डॉली ने मेरा बचाव करते हुए कहा, “जय जी (मेरे साले साहब का नाम जय था उसे प्यार से सब जय कह कर बुलाते थे) राजजी आपके आने से बड़े ही खुश हैं। साले साहब के आने से कोई नाखुश हो सकता है भला? दरअसल राजजी हमारे सरप्राइज को हजम करने की कोशिश कर रहे हैं।”

डॉली फिर आ कर ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठी और मुझे और साले साहब को अपने दोनों तरफ बैठने को कहा। डॉली के दायीं तरफ मैं और बांयी तरफ साले साहब बैठे। डॉली ने जब कहा की “हमारा सरप्राइज” तब मैं समझ गया की डॉली को साले साहब के आने से कोई ख़ास शिकायत नहीं थी। यह मेरे लिए बड़े ही आश्चर्य की बात थी।
 
आजकी रात हमारी आखरी और चरम रात थी। और अब यह तय था की साले साहब हमारे रंग में भंग जरूर करेंगे। खैर जैसा भी हो मुझे अब इस बारे में कुछ भी नकारात्मक प्रक्रिया देना कोई फायदेमंद नहीं लगा। मैं चुपचाप रहा और डॉली क्या कहेगी यह सुनने के लिए अपने आप को तैयार करने लगा। डॉली ने मेरी और और जय की और बारी बारी से देखते हुए जो बातें कहीं वह मेरे लिए आजतक एक अँधेरे में दिप जलाने के बराबर थीं।

डॉली ने कहा, “राजजी, आप संजयजी के आने का ओछा मत लिजीयेगा। आज पुरे दिन मैंने और संजयजी ने बैठ कर उनके जीवन का वह अजीबोगरीब पन्ना खोला और समझा है जिसे सुन कर आपभी करुणा, उत्साह और उत्तेजना से अभिभूत हो जाएंगे।

विधाता हमारी जिंदगी में कैसे कैसे मोड़ लाती है और हम इंसान उन मोड़ों और घुमावों को किस नजरिये से देखते हैं और उन्हें कैसे पार करते हैं उससे यह तय होता है की हम जिंदगी में खुश रहेंगे या फिर जिंदगी से शिकायत ही करते रहेंगे।

संजयजी ने वह मोड़ और घुमाव पार किये हैं और आज उनका आना इस लिए है की जब मैं और सेठी साहब इस अजीबोगरीब मोड़ पर खड़े थे तब संजयजी ही थे जिन्होंने हमें अपने ही अनुभव से मार्गदर्शन दिया और अँधेरे में एक दिप जलाकर आगे का रास्ता दिखाया।”

डॉली की बात मेरे लिए कोई पहेली से कम नहीं थी। मैं डॉली से कुछ पूछने ने के बजाय डॉली की और जिज्ञासापूर्ण नजरों से आगे बोल कर बात को समझाने के इंतजार में चुप रहा।

डॉली ने कहा, “जब हम बच्चे के बारे में बड़ी ही जद्दोजहद में उलझे हुए थे उसी अर्से में एक दिन मुझे संजयजी का फ़ोन आया। बातों बातों में संजयजी ने ताड़ लिया की मैं कुछ चिंतित थी।

उनके बार बार पूछने पर भी जब मैं टालती रही तब उन्होंने मुझे सीधा पूछ लिया की क्या बात आपको बच्चा नहीं हो रहा उसको ले कर तो नहीं है? जब मैं उनकी बात का प्रत्युत्तर नहीं दे पायी तब वह समझ गए की वही बात थी।

उन्होंने मुझे साफ़ साफ़ अपनी समस्या बिना छिपाए बता ने के लिए कहा। उन्होंने बिना कोई लागलपेट के कहा की उनके जीवन में भी बिलकुल ऐसा ही मोड़ आया था और फिर उन्होंने मुझे बताया की उसे उन्होंने कैसे सुलझाया।

मतलब, पहले उन्होंने अपनी लम्बी कहानी कही जिसमें उन्होंने अपनी ही यह समस्या कैसे सुलझायी वह बताया। जब मैंने संजयजी को अपनी समस्या के बारे में बताया तब वह सोच में पड़ गए। उसके बाद उन्होंने कहा की वह सोच कर मुझे बताएँगे की उनका इस मामले में क्या सोचना है।”

अब मेरी जिज्ञासा हद के बाहर हो रही थी। मुझसे डॉली से पूछे बिना रहा नहीं गया, “फिर उन्होंने क्या बताया?”

डॉली ने कहा, “उन्होंने वही बताया जो हमने अमल किया है। आप और ज्योति के साथ मेरे और सेठी साहब के कितने अच्छे नजदीकी सम्बन्ध हैं वह तो संजयजी जानते ही थे।

उन्होंने मुझसे पूछा की अगर हम दोनों कपल के एक दूसरे की पति अथवा पत्नि के साथ सेक्सुअल सम्बन्ध हों तो इससे क्या किसीको कोई तकलीफ होगी? तब मैं उनकी बात सुनकर चौंक गयी। मेरा माथा ठनक गया। यह संजयजी क्या बात कर रहे थे? मेरी समझ में नहीं आ रहा था।

पहले तो मैं उनकी बात सुनकर काफी नाराज हुई की ऐसी उलटपुलट बात संजयजी क्यों कह रहे थे? पर फिर उनकी बातों में गंभीरता देखते हुए उसके बारे में सोचने लगी।“

डॉली ने फिर मेरी और मुड़ कर मुझे देखा और बोली, “यह तब की बात है जब सेठी साहब ज्योति को हंसी मजाक में छेड़ते रहते थे पर तुम वहाँ होने के बावजूद भी उसे बुरा नहीं मानते थे।

मैंने सोचा की शायद कहीं ना कहीं तुम सेठी साहब को ज्योति को और छेड़ने के लिए प्रोत्साहन दे रहे थे। तुम उसी समय मुझ पर लाइन मार रहे थे यह तो हम दोनों जानते ही हैं। मैंने एक और एक दो किये और मैं समझ गयी की तुम ज्योति को सेठी साहब के करीब जाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हो ताकि सेठी साहब तुम्हें मेरे करीब आने से ना रोकें।

मेरे दिमाग में यह आया की अगर ऐसा कुछ है तो जो संजयजी कह रहे थे वह हो सकता था। मैंने संजयजी को कहा की इस बारे में हमने सोचा नहीं है। मैं तो सेठी साहब के ज्योति से सेक्सुअल सम्बन्ध को स्वीकार कर सकती हूँ। सेठी साहब भी शायद मेरे और राज के सेक्सुअल सम्बन्ध स्वीकार कर सकते हैं। पर यह बात हम दोनों को आपस में बैठ कर करनी पड़ेगी।”

मैं हैरान रह गया की मेरे पीछे इतनी बड़ी योजना बन रही थी और मैं उसमें सिर्फ एक मोहरा बन कर अपना रोल निभा रहा था। खैर मेरी जिज्ञासा मेरी इस शिकायत से ज्यादा मजबूत थी। मैंने डॉली से ऐसे कहा जैसे एक बच्चा माँ से बड़ी ही रसीली कहानी सुन कर पूछता है। मैंने पूछा, “फिर क्या हुआ?”

डॉली से अपनी मुस्कान छिपाई नहीं गयी। डॉली ने मंद मुस्कान के साथ अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “उसी समय ज्योति मेरे पास आयी सेठी साहब की शिकायत ले कर। उसी समय आपने सेठी साहब को बिना कपडे पहने हुए देखा और उसके बारे में आपने ज्योति से भी बात की।”

साले साहब ने बीच में दखल देते हुए डॉली से कहा, “डॉली जी अब हम आपस में एक हो गए हैं। हमें अब एक दूसरे से कुछ भी छिपाना नहीं है। हमें एक दूसरे से साफ़ साफ़ बात करनी चाहिए। अब आप को जो भी कहना है खुल कर कहिये। यह बिना कपडे की बजाय नंगे देखा यह कहोगे तो बेहतर रहेगा। और सेठी साहब का तगड़ा लण्ड देख कर उसके बारे में जीजू ने ज्योति दी से बात की यह बोलिये प्लीज।”

डॉली ने मेरी तरफ देखा और साले साहब से कहा, “हाँ जरूर मैं साफ़ साफ़ बात करुँगी, अगर आप मुझे डॉली जी कह कर ना बुलाएं।”

साले साहब ने मेरी और देख कर कहा, “ठीक है।”

डॉली ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “हाँ तो मैं कह रही थी की उसी टाइम राज ने सेठी साहब का तगड़ा लण्ड अकस्मात ही देख लिया था और ज्योति को उसके बारे में बता कर ज्योति की भी उसे देखने की स्त्री सहज लोलुपता को जागृत कर दिया था। जब ज्योति ने कहा की मसाज करवाते हुए सेठी साहब का लण्ड ज्योति के बदन को छू रहा था और मसाज करते हुए सेठी साहब के हाथ ज्योति के स्तनोँ को छू रहे थे तब ज्योति को उसकी चूत में बड़ी ही अजीब सी हलचल महसूस हो रही थी तब राज ने ज्योति को यह कह दिया की अगर मसाज करते हुए सेठी साहब कोई सेक्सुअल हरकत करते हैं तो वह उन्हें ना रोके।

बल्कि अगर सेठी साहब ज्योति को चोदना भी चाहें तो ज्योति अगर उनसे चुदवा भी लेती है तो राज को कोई आपत्ति नहीं होगी बल्कि ख़ुशी होगी। ज्योति के लिए तो यह बात आग में घी डालने जैसी थी। यह सब बातें ज्योति ने मुझे बतायीं।”

जब ज्योति ने मुझे वह सारी बातें बतायीं तब मैंने भी ज्योति को कहा की मुझे उसके सेठी साहब से चुदवाने से कोई आपत्ति नहीं है। पहले तो ज्योति मेरी बात को सुन कर दंग रह गयी। मैंने ज्योति को मेरी बच्चे को लेकर समस्या को विस्तार से बताया।

जब जय ने मुझे हम दो कपल के बीच में सेक्सुअल संबंधो के बारे में सुझाव दिए तब मुझे लगा की जिस तरह हमारे सम्बन्ध विकसित हो रहे थे तो यह मुमकिन था। ज्योति से मैंने सारी बातें खुल कर की। मैंने कुछ भी नहीं छिपाया। ज्योति ने मेरी बात को बड़ी ही सकारात्मक रूप में लिया और मुझे वचन दिया की अगर उसे सेठी साहब से बच्चा हुआ और अगर मुझे राज से बच्चा ना हुआ तो वह अपना बच्चा मुझे गोद में दे देगी।”

“आज मैं जब ज्योति के उस वचन को याद करती हूँ तो मेरी आँखें नम हो जाती हैं। ज्योति अपने कहे को निभाएगी उस पर मेरा पूरा विश्वास है क्यूंकि उसका सेठी साहब से चुदवाने का मुख्य कारण भी यही है की उसे सेठी साहब से बच्चा हो जिसे वह जनम दे कर मुझे दे सके।” यह कहते हुए डॉली का गला भर आया।

डॉली की आँखों में पानी छलकने लगा। डॉली ने जय से लिपट कर कहा, “यह सब तुम्हारे कहने से हुआ की हम आज एक दूसरे से चुदाई करके इतने खुश हैं। सेठी साहब और ज्योति की चुदाई भी इन्हीं के सुझाव से प्रेरित है। मुझे या ज्योति को या हम दोनों को अगर बच्चा होगा तो यह जय के सुझाव के कारण ही होगा। मैं जय का जितना भी एहसान मानु कम है।”

डॉली की बात सुन कर हम तीनों की आँखें नम हो गयीं। डॉली को बच्चे की ललक कितनी तगड़ी थी वह मैं जानता था। साले साहब के कारण ही आज हम आगे चल कर बच्चों को पा सकेंगे यह सोच कर मेर मन में भी साले साहब के लिए जो कड़वाहट थी उसकी जगह एक अजीब से अपनेपन ने ले ली। अब मेरे साले साहब सिर्फ मेरे लिए ही नहीं हम दोनों के लिए बल्कि अगर ज्योति और सेठी साहब को भी शामिल करें तो हम चारों के लिए एक आशीर्वाद के समान थे।
 
डॉली की बात सुन कर हम तीनों की आँखें नम हो गयीं। डॉली को बच्चे की ललक कितनी तगड़ी थी वह मैं जानता था। साले साहब के कारण ही आज हम आगे चल कर बच्चों को पा सकेंगे यह सोच कर मेर मन में भी साले साहब के लिए जो कड़वाहट थी उसकी जगह एक अजीब से अपनेपन ने ले ली। अब मेरे साले साहब सिर्फ मेरे लिए ही नहीं हम दोनों के लिए बल्कि अगर ज्योति और सेठी साहब को भी शामिल करें तो हम चारों के लिए एक आशीर्वाद के समान थे।

मैं साले साहब को धन्यवाद देने की बात सोच रहा था पर डॉली ने मुझे रोकते हुए कहा, “राज, अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई है। आज जब जय मेरे घर आये तो मेर मन में जो तुमने एम.एम.ऍफ़. की बात डाली थी वह उजागर हो गयी। पर मेरी उलझन यह थी की मैं सिर्फ तुम्हारे वीर्य से ही अपना बच्चा चाहती थी। और किसी के वीर्य से नहीं।

जय मेरा बहुत अच्छा दोस्त है पर मैं उसके वीर्य को भी शामिल नहीं करना चाहती थी। आज वह प्रश्न भी जय ने हल कर दिया। जय ने मुझे कहा की उसके वीर्य में बच्चे पैदा करने वाले शुक्राणु है ही नहीं। इसी के कारण तो उनको सारे हथकंडे अपनाने पड़े। उन्होंने वह हथकंडे अपनाये जिसको वह जिंदगी के मोड़ और घुमाव कह रहे हैं।”

डॉली की बात सुन कर मैंने डॉली से पूछा, “तो फिर आज रात जय क्या करेंगे?”

डॉली ने कहा, “क्या करेंगे मतलब? जय वह सब करेंगे जो तुम करोगे। मतलब वह मुझे चोदेंगे। जय कहते हैं बच्चे पैदा नहीं कर सकते इसका मतलब यह नहीं है की वह किसी औरत को संतुष्टि नहीं दे सकते।”

मैंने पूछा, “क्या मतलब? ऐसा कभी होता है क्या?”

मेरे यह सवाल पूछते ही डॉली ने जय को इशारा किया। जय ने फ़ौरन अपना पजामा उतारा और निक्कर हटा कर उसके लण्ड को हमारे सामने प्रस्तुत किया।

जय का लण्ड देखते ही मेरी बोलती बंद हो गयी। जय का लण्ड मेरे लण्ड से लंबा और मोटा था. उसके लण्ड पर उसका वीर्य उसकी धमनियों में दौड़ रहा था। सारी चुदाई की बातें सुन कर उसका लण्ड लोहे की छड़ के जैसे सख्त हो गया था।

डॉली ने जय के लण्ड को अपने हाथ की हथेली में लिया और उसे सहलाते हुए बोली, “हो गयी संतुष्टि? जय का लण्ड काटने पर जहर भले ही उगलता ना हो (मतलब बच्चा भले ही पैदा कर पाता ना हो) पर काटने में किसी से भी कम नहीं (मतलब चोदने में ज़रा भी कम नहीं)।”

मैंने डॉली से जब यह सुना तब मेरी सारी चिंता गायब हो गयी। साले साहब के रूप में हमें एक बड़ा ही संजीदा अपना चुदाई का साथीदार मिल गया था जिस पर हम ना सिर्फ भरोसा कर सकते थे बल्कि जो आगे चलकर हमारे सुखदुख में भी भागीदार बन सकता था। एक बात और साबित हो गयी।

डॉली जी के लिए जय मतलब मेरे साले साहब एक सच्चे साथी और चुदाई के पार्टनर के अलावा ज्यादा कुछ नहीं थे। मेरा और डॉली का जो आत्मा का मिलन हुआ था उसमें उनका कोई रोल नहीं था।

यह मेरे लिए एक अच्छी बात थी क्यूंकि हालांकि डॉली सेठी साहब की पत्नी थी और ज्योति से मेरी शादी हुई थी, पर फिर भी मैं कहीं ना कहीं डॉली को दिलसे चाहने लगा था। इसका एक कारण शायद यह भी था की डॉली बार बार यह कहने से न चुकती थी की वह सिर्फ मुझसे बच्चा चाहती थी किसी और से नहीं।

अब मुझे साले साहब के साथ मिलकर डॉली की चुदाई करने में कोई परहेज नहीं था। मुझे यकीन हो गया की अब डॉली की जम कर चुदाई होगी और डॉली भी एम.एम.एफ. का आनंद ले पाएगी। सेक्स, मैथुन या चुदाई का मजा तब तक नहीं आता जब तक उसमें महिला और पुरुष दोनों एक दूसरे को सुख देने का प्रयास ना करें।

चुदाई दीर्घ कालीन अथवा तात्कालीन शारीरिक आकर्षण भरे प्यार की स्वर्णिम मिसाल है। दीर्घ कालीन से मेरा मतलब है जो लम्बे समय का है। जैसे पति पत्नी का प्यार। तत्कालीन शारीरिक आकर्षण भरा प्यार से मेरा मतलब है जो हमेशा के लिए ना भी हो।

जो तात्कालीन मतलब कुछ ही समय की; कुछ ही दिनों या घंटों की पहचान और पसंदगी होने पर भी चुदाई आनंद दायी हो सकती है। आकर्षण में स्त्री की सुंदरता, आकार, या सेक्सीपना और पुरुष की आकर्षकता मतलब लम्बाई, बॉडी, लण्ड बातचीत करने का लहजा इत्यादि कारण हो सकते हैं। दोनों ही अवस्था में चुदाई तभी आनंददायी होती है जब कोशिश दूसरे को आनंद देने की हो।

मैं और साले साहब दोनों ही चाहते थे की चुदाई के दरम्यान डॉली को जितना ज्यादा आनंद दे सकें उतना देने की कोशिश करें। वैसे ही डॉली की भी मनोइच्छा यही होगी की चुदाई के दरम्यान वह हम दोनों को जितना ज्यादा आनंद दे सके उतना ज्यादा आनंद देने की कोशिश करे। जब ऐसा समीकरण हो तो चुदाई का आनंद तो बढ़िया होगा ही।

साले साहब भी हमारे सर्किल में शामिल हो चुके थे। यह मुझे भी यकीन हो चुका था की साले साहब के साथ डॉली से चुदाई में हमें कोई झिझक या किसी तरह की अजीबोगरीब फीलिंग नहीं होगी जो की साधारणतः किसी भी रिश्तेदार के ऐसे गोपनीय कामों में शामिल होने से होती है। मुझे यहां डॉली की समझ की दाद देनी होगी की डॉली ने साले साहब को एम.एम.एफ़. के लिए पसंद किया हालांकि मैं शायद साले साहब को इस तरह ऐसे काम के लिए पसंद करने में झिझकता। मुझे अब उसमें कोई आपत्ति नहीं थी।

मैंने उस शाम पहली बार साले साहब से सच्चे प्यार भरे दिल से हाथ मिलाया। बिन बोले मैं साले साहब की आँखों में आँखें मिला कर बड़ा ही निजीपन का एहसास कर रहा था। साले साहब की आँखों में भी मेरे लिए वह प्यार की झलक थी जो साधारणतः औपचारिक रिश्तों में नहीं होती।

पहले जब भी मैं साले साहब को मिलता था तब वही औपचारिकता और ऊपरी प्रेम का ही प्रदर्शन करता था। पर आज मैं साले साहब की आँखों में आँखें डालकर जैसे कह रहा था, “साले साहब, आज हम अपनी जीजा साले की रिश्तेदारी छोड़ कर अंत्यंत निजी दोस्त या यूँ कहिये की अंतरंग भागीदार बन गए हैं।

कभी साले जीजा ने एक दूसरे को अपना लण्ड दिखाया होगा? पर आज वह हम दिखाएँगे। कभी साले जीजा ने मिलकर किसी औरत को चोदा होगा? पर आज हम डॉली को चोदने वाले थे। तो आज हम हमारी प्यारी डॉली को मिल कर चोदेंगे और हम डॉली की ऐसी चुदाई करेंगे की वह इससे पहले हुई उसकी सारी चुदाई भूल जाए।

हम दोनों मिलकर उसे ऐसा चोदें की वह कुछ समय के लिए ही सही, पर डॉली अपने तगड़े लण्ड वाले पति सेठी साहब की चुदाई को भी भूल जाए।”

मेरी आँखों का इशारा शायद साले साहब समझ गए थे। अपना सर हिला कर जैसे मेरे इशारे का समर्थन करते हुए साले साहब ने डॉली को बड़े ही प्यार से पलभर में जैसे डॉली कोई हल्काफुल्का बच्चा हो, अपनी बाँहों में उठा लिया और मुझे इशारा किया की मैं आगे आ कर डॉली के होंठों को चूमूँ।

डॉली ने आजकल जो फैशन चला है ऐसी स्टोन वाश जीन्स की फटी पतलून पहन रखी थी और ऊपर हल्का सा कॉटन का टॉप डाल रखा था जो डॉली के स्तनोँ के ऊपर से उनको ढक ही रखता था। पर उसमें डॉली स्तनोँ का क्लीवेज काफी हद तक दिख रहा था।

डॉली ने साले साहब और मेरी और मुस्कुराते हुए देखा और बड़े ही हलके और मीठे स्वर में बोली, “मुझे पता नहीं था की मेरी दो मर्दों से चुदने की ख्वाहिश इतनी जल्दी और इतनी बढ़िया तरीके से पूरी हो जायेगी। अगर मेरे पति वहाँ आप दोनों की पत्नियों को चोद रहे हैं तो मैं भी कोई कम नहीं हूँ। मैं भी यहां उन दोनों पत्नियों के पति से आज चुदवाउंगी।“

फिर डॉली ने साले साहब की और देख कर पूछा, “संजु मैं अगर आपसे एक बात पूछूं तो तुम कहीं बुरा तो नहीं मान जाओगे?”

साले साहब ने अपना सर हिला कर कहा, “नहीं। बिलकुल बुरा नहीं मानूंगा। पूछो।”

डॉली ने साले साहब की और देख कर जो पूछा उसे सुन कर मैं स्तब्ध हो गया। डॉली ने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया। मुझसे एक बच्चे की तरह डॉली लिपट गयी। उसकी आँखों में वही बच्चे वाली सरलता और भोलापन नजर आ रहा था।

मेरे हाथों को चूमते हुए डॉली ने साले साहब से पूछा, “जय , देखो यह तुम्हारे जिजु, मेरी जान हैं। मेरे पति के अलावा मैं इनसे सच्चे दिल से दिलोजान से प्यार करती हूँ। आज तुम्हें यह तुम्हारे जीजू ने मुझे चोदने की परमिशन दे दी है। तुम यह समझना की यह बहुत बड़ी बात है।

किसी भी मर्द के लिए उसकी माशूका को किसी और से चुदवाना सहज नहीं होता। और तुम तो उनके साले, उनकी बीबी के सगे भाई हो। तुम को तो वह मुझे चोदने की इजाजत हरगिज़ नहीं देते। इस मामले में अगर वह ज़रा भी नाराजगी जताते या उनके मन में थोड़ी सी भी रंजिश होती तो मैं तुम्हें मुझे हाथ भी लगाने नहीं देती। सबसे पहले तो तुम उनका उसके लिए शुक्रिया अदा करो। फिर तुम मुझसे आज इसी वक्त यह वादा करो की जब भी मौक़ा मिलेगा, तुम जीजू से तुम्हारी पत्नी अंजू को चुदवाओगे।”
 
डॉली की यह बात सुनकर मैं सकपकाया सा डॉली की और देखता ही रहा। यह कैसी औरत है? वह मुझसे प्यार करते हुए भी मुझे दूसरी औरत को चोदने के लिए अपनी और से इंतजाम कर रही है। डॉली की बात सुन कर साले साहब के चेहरे पर मैंने हलकी सी मुस्कुराहट की छाया देखि। शायद इस बात को ले कर उन्होंने पहले से ही कुछ सोच रखा होगा ऐसा मुझे लगा।

उन्होंने डॉली की और मुस्कुराते हुए देख कर कहा, “डॉली , अब मेरे जीजू से मेरा सम्बन्ध सिर्फ साले जिजु का ही नहीं। अब वह मेरे और अंजू के हमदम हो गए हैं। इस वक्त अंजू भले ही हम से दूर है, पर मैं मेरी अंजू को भली भाँती जानता हूँ।

उसका दिल हमारे पास है। वह मुझसे अपने मन की हर बात बताती है। जब हमने तय किया की अंजू सेठी साहब से चुदवायेगी, तब हमारा वह निर्णय सिर्फ चुदवाने के लिए ही नहीं था। वह निर्णय मेरे और अंजू के आप सब से संवेदना पूर्ण सम्बन्ध बाँधने और जुड़ने के हेतु भी था।

अंजू ने मुझे बताया भी की ज्योति और सेठी साहब ने मेरी अंजू को पहले मिलन में ही अपना लिया है। अंजू मेरी पत्नी मात्र नहीं है। वह मेरी अंतरंग मित्र और जीवन साथी है। इसी लिए हम दोनों एक दूसरे के आनंदित होने पर स्वयं बहुत आनंद पाते हैं। अंजू ने सेठी साहब से बड़े प्यार और बड़े जोश खरोश के साथ चुदवाया यह जान कर मुझे जो आनंद का अनुभव हुआ, उसे मैं कह नहीं सकता।

वैसे ही जब मैं अंजू से कहूंगा की मैंने डॉली को बड़े प्यार से चोदा है, तो उसकी ख़ुशी की कोई सीमा नहीं रहेगी। मैं समझता हूँ यह मेरे जीवन की उपलब्धि है और मैं बड़ा ही खुशनसीब हूँ की मुझे अंजू जैसी जीवनसाथी मिली। अब मैं, अंजू, सेठी साहब, जीजू और ज्योति सब तुम्हारे साथ एक अनूठे रिश्ते से जुड़ चुके हैं। इसमें दिक्कत सिर्फ ज्योति और मेरी है। ज्योति और मेरे बीच में खून का रिश्ता है।

हम रिश्ते में सगे भाई बहन हैं। मैं इस रिश्ते को साफ़ रखना चाहता हूँ। इस लिए हम एक दूसरे से सेक्स नहीं करेंगे, पर एक दूसरे के लिए सेक्स का पूरा सपोर्ट करेंगे। हम एक दूसरे की चुदाई भी देख सकते हैं। मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है ज्योति कभी भी किसी से भी चुदवाये। और मुझे कोई आपत्ति नहीं है अगर अंजू भी जीजू से या सेठी साहब से जब चाहे, जितनी बार चाहे चुदवाये।”

साले साहब ने डॉली को अपनी बाँहों में वहीँ खड़े रह कर उठाये रखा ताकि मैं डॉली के होँठों को प्यार से चुम सकूँ। मैंने डॉली का सिर अपने हाथों में पकड़ कर मेरे होँठ डॉली के होँठों पर चिपका दिए और एक प्रगाढ़ चुम्बन करते हुए मैंने डॉली के मुंहमें अपनी जीभ दे दी जिसे वह चूसे।

डॉली ने मेरी जीभ को चूसना शुरू किया और मेरे मुंह में से निकल रही सारी लार पिने लगी। साथ साथ में डॉली मेरी जीभ को चाटती रही। मैंने मेरी जीभ डॉली के मुँह में से अंदर बाहर करते हुए जैसे मैं डॉली का मुंह चोद रहा हूँ ऐसा किया जिसे डॉली एक बच्ची की तरह खिलखिलाती हंसती हुई अपने मुंह को मेरी जीभ से चुदवाती रही।

कुछ देर बाद जब मैंने अपना मुँह डॉली के मुंह से हटाया तो डॉली के मुंह पर उसके होँठों पर लाल निशान पड़ गए थे। डॉली उन्हें देख नहीं सकती थी पर साले साहब ने उसे देख कर मुझे एक मुस्कान दे कर वाहवाही दी। साले साहब ने फिर डॉली को बैडरूम में ले जाकर हलके से पलंग पर लिटा दिया।

डॉली के एक तरफ मैं लेट गया और दूसरी तरफ साले साहब। जैसे ही डॉली को साले साहब ने पलंग पर लिटाया की डॉली ने अपनी बाँहें फैला कर मुझे अपने ऊपर सवार हो कर अपनी बाँहों में लेने का इशारा किया।

मैंने डॉली की टाँगे चौड़ी कर डॉली के ऊपर सवार हो कर डॉली के होंठों से अपने होँठ चिपका कर दुबारा डॉली को प्रगाढ़ चुम्बन करने में व्यस्त हो गया। मेरे पाजामें में मेरा खड़ा लण्ड डॉली की टांगों के बीच उसकी पतलून में छिपी उसकी चूत पर निशाना लगाए हुए था। मुझे डॉली के होंठों का रस बड़ा ही स्वादिष्ट लग रहा था।

डॉली ने मेरे कान में मुंह लगा कर कहा, “राज, तुम तुम्हारे साले साहब के आने से नाराज तो नहीं ना?”

मैंने कहा, “नहीं डॉली , तुम्हारी यह इच्छा थी तुम दो मर्दों से चुदाई को एन्जॉय करो। तो आज ऊपर वाले ने यह मौक़ा भी दे दिया। भला इसके लिए साले साहब से बढ़िया कौन मिल सकता था? मैं तुम्हारी पसंद की दाद देता हूँ। मैं शुरू में थोड़ा चिंतित था क्यूंकि वह मेरे रिश्ते में हैं।”

शायद डॉली मेरे जवाब से कुछ हद तक सतुष्ट दिखी। डॉली ने कहा, “यह शेर तुमने शायद सूना नहीं। सुनो:

जब हवस दिमाग पे हावी हो रिश्तों का जोर नहीं होता, बस लण्ड और चूत ही होती है, बाकी कुछ और नहीं होता। लण्ड तगड़ा हो चूत हो राजी दिन रात चुदाई होती है, चूत सूज जाए चलते ना बने उस पर कोई गौर नहीं होता।

जनाब जब चुदाई का हवस दिमाग पर हावी होता है तो रिश्ते पीछे रह जाते हैं। वैसे भी साले साहब से तुम्हारा कोई खून का रिश्ता तो है नहीं। तो इतनी चिंता मत करो। मैंने भी यही सब सोच कर साले साहब को पसंद किया था।“

मैंने कहा, “डॉली , तुम्हारे ही शेर की आखिरी लाइन तुमको याद दिलाता हूँ। चूत सूज जाए, चलते ना बने इस पर कोई गौर नहीं होता। अगर तुम्हारा वही हाल हुआ जो सेठी साहब करते हैं तो तुम शिकायत मत करना।”

डॉली शरारत भरी हंसी दे कर बोली, “कर देना मेरा वही हाल। मैं भी देखूं की मेरे दो मर्दों में कितना दम है। मैं फिर मेरे पति को कह तो सकती हूँ ना की देखो तुम्हारी बीबी का दो मर्दों ने मिल कर चोद चोद कर क्या हाल कर दिया है।

पर राज एक बात कहूं? मेरी तगड़ी चुदाई तो सेठी साहब करते ही रहते हैं। उनसे हलकी फुलकी चुदाई नहीं होती। मेरी तगड़ी चुदाई तो तुम करना ही, पर मुझे सच्चा एम.एम.एफ. का आनंद देने के लिए क्या करोगे? मुझे इतने बढ़िया प्यार करने वाले साथीदार मिले हैं तो क्यों ना हम आज वास्तव में जिसे एम.एम.एफ. कहते हैं वह एन्जॉय करें?”

मैं कुछ देर डॉली की तरफ देखता ही रहा। मेरी समझ में नहीं आ रहा था की डॉली क्या कह रही थी। मैंने कुछ आश्चर्य से डॉली की और देखा और पूछा, “वास्तव में एम.एम.एफ. से तुम्हारा क्या मतलब है? कहीं तुम वही तो नहीं सोच रही हो जो मैं सोच रहा हूँ?”

डॉली ने मेरी और शरारत भरी नज़रों से दखा और पूछा, “तुम क्या सोच रहे हो?”

मैंने कहा, “ठीक है, जो मैं सोच रहा हूँ वह हम करेंगे, अगर तुम्हारी वही इच्छा है तो।”

डॉली ने कहा, “तुम ठीक समझे हो। ओके।”

फिर मेरा और साले साहब का हाथ थाम कर डॉली बोली, “पर देखो मैं एक बात और कहना चाहती हूँ। मेरे माताजी और पिताजी संगीत के बड़े शौक़ीन थे। वह बड़े ही इमोशनल भी थे। मैंने बचपन से ही देखा था की कई बार संगीत सुनते, बजाते या गाते दोनों बड़े ही भावावेश में आ जाते और उनकी आँखों में से आंसूं बहने लगते।

वह दोनों एक दूसरे को गले लगाते हुए संगीत की लय में डूब जाते और मैं अगर साथ में बैठी होती थी तो मुझे अपनी बाँहों में ले कर कहते, संगीत में डूब जाने में जो आनंद है वह अद्भुत है। संगीत, प्रेम और भक्ति यह हमें इस दुनिया से किसी और दुनिया में ले जाते हैं। मेरे पिताजी मेरी माँ से बहुत प्यार करते थे।

मैंने बचपन में मेरी माँ को मेरे पिताजी से संगीत सुनते हुए चुदवाते हुए देखा था। शादी से पहले मेरी माताजी को जिन्होंने पहली बार संगीत की शिक्षा दी थी उस शिक्षक से माताजी प्यार करने लगी थी और कुछ ऐसा हुआ की उनके साथ माँ के शारीरिक सम्बन्ध हो गए। शायद शादी से पहले माँ ने कई बार उनसे चुदवाया भी था।“
 
डॉली की इस तरह अपनी माँ के बारे में बात सुन कर हम दोनों हतप्रभ रह गए। डॉली ने हमारी और देखा। वह समझ गयी की हम इस बात को हजम नहीं कर पा रहे थे। डॉली ने हमें दिलासा देते हुए कहा, “माँ उनसे शादी करना चाहती थी। पर उस शिक्षक की माली हालत और उनका सामजिक स्तर भी हमारे से निचा था इस कारण मेरे नाना और नानी उस शादी के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे।

माँ की शादी मेरे पिताजी से हो गयी। बाद में पिताजी को माँ से ही सारी बात का पता चला और यह भी पता चला की वह शिक्षक का तबादला संजोग से मेरे पिता के गाँव में ही हुआ था। जब पिताजी को यह सब पता चला तो नाराज होने की बजाय पिताजी ने उस शिक्षक को हमारे घर बुलाया।

उस समय मैं छोटी थी पर मैंने उन को देखा है। पिताजी ने उनके साथ अपने रिश्तेदार की तरह सम्बन्ध रखे, उनको बड़े सम्मान पूर्वक हमारे घर बुलाया और माँ को आग्रह कर कहा की माँ उनसे शारीरिक सम्बन्ध तोड़े नहीं बल्कि जारी रखे। पहले माँ ने साफ मना किया पर पिताजी के आग्रह के आगे माँ को झुकना पड़ा।

मैंने कई बार उन शिक्षक को प्यार से माँ की चुदाई करते हुए छिप कर देखा था। पिता जी ने मुझसे भी उन शिक्षक से अपने पिता की तरह ही प्यार भरा व्यवहार करने का आग्रह किया था जो मैंने किया भी। अफ़सोस वह शिक्षक का कम उम्र में ही देहांत हो गया।” यह कहते हुए डॉली की आँखें नम हो गयीं।

मैंने डॉली को बाँहों में भर लिया और कहा, “डॉली यह जिंदगी बड़ी ही विचित्र है। जिंदगी कई बार कहानियों से भी ज्यादा रोमांचक और अजीब मोड़ लेती हैं। जीवन में कई अजीबोगरीब मोड़ और घुमाव आते हैं।

हमें चाहिए की उन मोड़ों से हम बड़ी ही संवेदनशीलता से और समझदारी से गुजरें और गुजरते हुए हमें या किसी और को किसी तरह की चोट या वेदना ना पहुंचे और कोई हमारे वर्तन के कारण आहत ना हो। हो सके तो हम हमारे और दूसरों के जीवन में मिठास और खुशियां बांटने की कोशिश करें। यही आपके पिताजी ने किया। यह आपके लिए गर्व का विषय है।”

मेरी बात सुन कर डॉली और भी भावुक हो गयी और बोली, “राजजी, आप सच कह रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ की मेरी माँ की नजर में मेरे पिताजी के लिए इतना सम्मान बढ़ गया की माँ पिताजी को अनहद प्यार करने लगी और दोनों आज भी एक दूसरे के बगैर पल भर रह नहीं सकते।

हालांकि मैंने देखा नहीं पर मुझे पूरा यकीन है की पिताजी और उस शिक्षकजी ने मिल कर माँ को कई बार साथ में चोदा होगा। मुझे लगता है मेरे पिताजी ने उस जमाने में भी उन शिक्षकजी से मिल कर माँ की एम.एम.एफ. चुदाई की होगी।”

मैंने गंभीर माहौल को हल्का करने की कोशिश करते हुए मुस्कुराते हुए कहा, “ओह… अच्छा। इसी लिए आज मोहतरमा का एम.एम.एफ. चुदाई करने का मूड हुआ है!”

डॉली ने मुझे कोहनी से धक्का मारते हुए कहा, “अरे छोडो, अब वह ज़माना गुजर गया। अब मेरी बारी है। मुझे यकीन है की उन्होंने एम.एम.एफ. चुदाई जरूर की होगी क्यूंकि हालांकि मैंने उसे अपनी नज़रों से नहीं देखा पर जल्दी सुबह कई बार शिक्षक अंकल को पिताजी और माँ के बैडरूम से कपडे पहनते हुए निकलते मैंने देखा था जब पिता जी भी उसी बैडरूम में सोये हुए थे।

मेरे पिताजी माँ को इतना चाहते थे, और मैं जानती हूँ की वह जब भी मौक़ा मिले माँ को चोदने के लिए इतने पागल रहते थे और उनकी चुदाई करने में हमेशा तैयार रहते थे की अगर शिक्षक अंकल माँ को पिताजी के सामने चोद रहे हों तो मेरे पापा के लिए यह नामुमकिन था की वह भी माँ को चोदे बगैर रह सकें।”

मैंने कभी सोचा नहीं था की कोई हिंदुस्तानी महिला चुदाई के बारे में इस तरह खुल कर बिंदास बात कर सकती है। ख़ास कर डॉली को तो कतई नहीं। डॉली मुझसे इतनी बेबाकी से बात करती देख मुझे बहुत अच्छा लगा। अक्सर दो तरह के मर्द होते हैं। एक टाइप के मर्दों को शर्मीली, अपने कपडे उतार ने में हिचकिचाती हुई, चुदवाते हुए भी नजरें नीची रखे, जो चुदवाते हुए कुछ ना बोलें ऐसी औरतें पसंद होतीं हैं।

पर दूसरी टाइप के मर्दों को वह औरतें पसंद हैं जो नंगी होकर बड़े प्यार से अपनी चूत चुसवाएं, बेझिझक मर्दों का लण्ड चूसें, मर्दों के साथ खुल्लम खुल्ला लण्ड, चूत, चुदाई ऐसे शब्द बोलें ऐसी औरतें पसंद होतीं हैं जो शर्माती नहीं और सामने चल कर मर्दों को चोदने के लिए उकसातीं हैं।

मुझे दोनों की मिक्स टाइप की औरतें पसंद हैं। ऐसी औरतें जो शर्मीली हैं, पर एक बार शर्म का पर्दा हट जाए फिर एक मर्द दोस्त की तरह खुल्लमखुल्ला बात करे। फिर चुदाई के बारे में बोलने में परहेज ना करे। और जो फिर बड़े प्यार से अपनी चूत चूसवाये लण्ड चूसे, और चुदाई में जो कुछ भी होता है वह खुले दिल से करे और करने दे।

डॉली बिलकुल जैसी मेरी पसंद थी वैसी ही थी। जब तक एक औपचारिक सम्बन्ध होता है तब तक वह बड़ी ही शालीनता, गंभीरता और मर्यादा का परिचय देती है। पर जैसे उसके ऊपर से मर्यादा और लज्जा का पर्दा हट गया फिर वह बेबाक बिंदास चुदासी हो जाती है और बड़े प्यार से चुदवाती भी है और चोदने वाले मर्द को पूरा सपोर्ट करती है।

मैंने डॉली के होँठों से अपने होंठ हटाते हुए साले साहब की और देखा। साले साहब ने डॉली के सर को चूमना शुरू किया। उन्होंने मुझे इशारा किया की मैं डॉली के पाँव से शुरुआत करूँ। डॉली ने जीन्स की पतलून पहन रखी थी जिसमें उसके कूल्हे बड़े ही आकर्षक दिख रहे थे।

पर वह डॉली के पाँव को पूरा ढके हुए थी। मैंने डॉली के पतलून के बेल्ट के हूकों को खोला। डॉली की पतलून कमर से ढीली हो गयी। डॉली ने पाँव मार कर उसे टांगों से नीचे की और खिसका कर निकाल दिया। अब डॉली नीचे सिर्फ पैंटी पहने हुए थी। डॉली की करारी जांघें बड़ी ही आकर्षक लग रहीं थीं।

साले साहब ने पहली बार डॉली की नंगी जाँघों का दर्शन किया था। वह तो उन्हें दखते ही रह गए। साले साहब ने जरूर कई लड़कियों की नंगी जांघें देखीं होंगीं। मुझे यकीन था की अंजू भाभी की जांघें भी बड़ी ही आकर्षक होंगीं, पर डॉली की जांघें ऐसी लगतीं थीं जैसे कोई सोलह साल की कँवारी एकदम फिट लड़की की पतली सुआकार नंगी जांघें जैसे उन्हें कोई इंजीनियर ने या कलाकार ने फुट रूल से खींच कर सीधी बनायीं हो।

उनमें कहीं भी कोई बल या दाग नहीं था। सीधी जाँघों के मिलन स्थान से निकली हुई जाँघे जैसे कोई एथलीट या दौड़ने वाले की होतीं हैं। पर अक्सर एथलीट की जाँघों में उनके स्नायु बाहर सख्त निकले हुए दीखते हैं। डॉली की जाँघों में एकदम सीधा चिकना आकार था जो मर्दों के दिल को छुरी से काटने की क्षमता रखता था। भला साले साहब का क्या दोष की वह डॉली के पतलून निकाल फेंकने पर डॉली को चूमना भूल कर डॉली की पैंटी के नीचे छिपी हुई चूत की मात्र कल्पना करते हुए उसकी जाँघों को देखते ही रह गए।

उन्हें तब अपने काम का ध्यान आया जब मैंने डॉली के तलवों से शुरुआत कर डॉली की टांगों की पिण्डियों को बारी बारी चूमना और चाटना शुरू किया। डॉली की टांगों पर एक भी बाल का निशान तक नहीं था।

जैसे ही मैं डॉली की जाँघों को चूमता गया वैसे वैसे साले साहब भी डॉली के सर, उसकी गर्दन, उसके कंधे, फिर घुमा कर वह डॉली के होँठों के पास पहुंचे। डॉली ने अपने होँठ साले साहब की गर्दन पकड़ कर उनको अपने ऊपर खिंच कर उनके होँठों से अपने होंठ मिलाकर प्रस्तुत किये।

इस बार डॉली के रसीले होँठों को चूमने, चूसने और काटने की साले साहब की बारी थी। मुझे लगा की मेरे साले साहब इस कला में काफी निपुण लग रहे थे। डॉली के होँठों उन्होंने अलग अलग कोनों से अपने होंठों को घुमाते हुए और अपनी जीभ से डॉली के होँठ, जीभ और मुंह को अंदर बाहर से चाटते हुए वह ऐसे व्यस्त हो गए की उन्हें बाहर की दुनिया का जैसे ध्यान ही नहीं रहा। इस बीच उनका एक हाथ और मेरा एक हाथ डॉली के दोनों अल्लड़ स्तनोँ को उसके टॉप के ऊपर से ही बारी बारी से मसलने में व्यस्त हो गए।
 
डॉली का टॉप और ब्रा हमारे मसलने से वैसे ही इतने अस्तव्यस्त हो गए की डॉली के स्तनोँ की निप्पलेँ बाहर निकल आयीं। पर बटन नहीं खोलने से वह कभी दर्शन देतीं तो कभी ब्लाउज और ब्रा के अंदर छिप जातीं।

मैंने डॉली के टॉप को नीचे से ऊपर की और खींचने की कोशिश की तब डॉली ने मेरी जांघों के बीच में हाथ डालकर मुझे इशारा किया की मैं भी अपने कपडे उतार कर मेर लण्ड के दर्शन दूँ। डॉली का दुसरा हाथ साले साहब की जाँघों के बीच था। हम दोनों को हमारी रानी का बिना कुछ बोले अपने हाथों की हरकतों से आदेश हुआ की हम भी हमारे कपड़ों को उतार कर नंगे हो जाएँ।

हमारे द्वारा डॉली के ब्लाउज को ऊपर सरका ने पर डॉली ने अपने हाँथों को ऊपर कर अपना टॉप ऊपर की और खिसका कर निकाल दिया। डॉली अब सिर्फ ब्रा और छोटी सी पैंटी में थी। तो हमारे साले साहब कौनसे कम थे? उन्होंने भी अपना कुर्ता उतार फेंका।

मैं उनका सपाट पेट, उसके ऊपर पड़े हुए बल और सख्त स्नायु देख कर काफी प्रभावित हुआ तो साफ़ बात है डॉली तो हमारी उस रातकी शय्या भागिनी थी। वह साले साहब के इस तरह के बदन के प्रदर्शन से प्रभावित क्यों नहीं होगी?

डॉली ने साले साहब के पेट पर जो बल पड़े थे उन पर हाथ फिराते हुए कहा, “जय जी भाई वाह मानना पडेगा। आपने आपका शरीर अच्छा खासा फिट रखा है। कोई भी औरत आप पर आसानी से अपना दिल और बदन दे सकती है। यह विधाता का अन्याय है की आप के साथ यह अनुपजाउता या इनफर्टिलिटी का अभिशाप लगा है।”

साले साहब ने डॉली की और देख कर मुस्कुराते हुए कहा, “डॉली यह अभिशाप नहीं वरदान है। हाँ यह ठीक है की मेरी स्वयं की पत्नी के लिए यह अभिशाप है, पर मेरी और महिला शैय्या भागिनीओं के लिए तो यह वरदान है।

उनको मुझसे बच्चा होने का कोई डर ही नहीं। वह मुक्त मन से मेरे साथ बिना कंडोम अभिसार मतलब चुदाई कर सकती है। अक्सर मर्दों को और औरतों को भी अगर मर्द कंडोम पहनते हैं तो वह आनंद नहीं आता जो नंगे लण्ड से मिलता है। मुझे भी कंडोम पहन कर चोदने में मजा नहीं आता।

आज आप के साथ भी मेरा जो मिलन होगा वह बिना कंडोम के अवरोध से इसी कारण हो सकता है, क्यों की मैं शतप्रतिशत इनफर्टाइल हूँ। और शायद इसी लिए आपने भी मुझे आपकी शैया का साथीदार बनाने की अनुमति दी है।”

मैं साले साहब की व्याख्या से बड़ा ही प्रभावित हुआ। उनकी बात सच थी। अक्सर यह होता है की जिस मर्द को इनफर्टिलिटी होती है वह इस के कारण बड़े ही मानसिक तनाव में होते हैं। शायद इसकी वजह से उनका लिंग माने लण्ड भी खड़ा नहीं रह पाता। पर मेरे साले साहब को ऐसी कोई समस्या नहीं थी। वह बड़ी आसानी से यह इजहार कर रहे थे की वह इनफर्टाइल थे। और इसी के कारण उनके लण्ड पर इस बात का कोई भी असर नहीं होता था। वह चोदते हुए अपनी महिला साथीदार को चुदाई का आनंद दे सकने में पूरी तरह सक्षम थे। मेरी भाभी का हमेशा मुस्कुराते रहना इसका सुबूत था।

साले साहब की बात सुनकर डॉली भी काफी खुश हुई। जो मर्द या औरत अपनी कमजोरी को आसानी से स्वीकार कर लेते हैं वह मानसिक तनाव से मुक्त रहते हैं।

डॉली ने साले साहब की बात सुन कर एक प्रश्न किया, “संजयजी फिर यह बताइये की भाभी जी को बच्चा कैसे हुआ?

इसका मतलब की या तो उन्होंने जो आजकल की नयी तकनीक आई वी ऍफ़ है उसका सहारा लिया या फिर किसी गैर मर्द से चुदवाया। जाहिर है आपने आ वी ऍफ़ का सहारा नहीं लिया। क्यूंकि ऐसा होता तो सबको पता लग जाता। तो फिर भाभीजी को किस गैर मर्द से चुदवाया?

मैं जानती हूँ की किसी गैर मर्द से चुदवाना किसी भी औरत और उसके पति के लिए भी आसान नहीं है। फिर यह कैसे हो पाया?”

डॉली का प्रश्न सुन कर साले साहब कुछ देर गंभीर हो गए। साले साहब के चेहरे के भाव देख कर मैं भी सकपका गया। फिर हमारी और देख कर हल्का सा मुस्कुराये और फिर बड़े ही शरारती अंदाज में वह बोले, “डॉली यह एक लम्बी कहानी है। बच्चा पाने के लिए हमें कितने पापड़ बेलने पड़े। हमारी जिंदगी हमारे बच्चे ने बदल डाली। पर वह कुछ भी आज नहीं। फिर कभी मौक़ा मिला तो बताऊंगा।”

मैं मन ही मन मेरे साले साहब को कोसने लगा। मैं जानता था की साधारणतः महिलायें अत्यंत जिज्ञासु होती हैं। ख़ास कर ऐसे मामले में। डॉली भी कोई कम जिज्ञासु नहीं थी। साले साहब डॉली को दुबारा चोदने का मौक़ा ढूंढ रहे थे। डॉली इस कहानी का रहस्य जानने के लिए हो सकता है की साले साहब से दुबारा चुदवाने के लिए राजी हो जाए। शायद यही साले साहब का भी ध्येय था।

डॉली ने साले साहब की निप्पलों पर हाथ फिराकर एक निप्पल को उंगलियों के बीच ले कर दबाते हुए कहा, “अब बता ही दो ना जय जी।”

साले साहब ने मुस्कुराते हुए कहा, “डॉली , मुझे बताने में कोई एतराज नहीं, पर मैं उस कहानी को बताने में सारी रात बर्बाद नहीं करना चाहता।” हालांकि डॉली ने आगे फिर इस बात को नहीं छेड़ा पर शायद वह साले साहब से कुछ नाराज जरूर हुई।

मैंने समय की नजाकत को पहचानते हुए अपना कुर्ता निकालते हुए साले साहब से कहा, “ठीक है, आप अभी नहीं बताओगे पर आज सुबह से पहले बताना तो पडेगा। चलो अगर आप अभी अपना राज़ नहीं बताना चाहते हो तो कोई बात नहीं बाद में बताना, पर अभी अपना लण्ड तो निकाल कर दिखा दो साले साहब।”

साले साहब ने मेरी और देखते हुए कहा, “पहले आप।” मैंने सोचा पहले आप के चक्कर में कहीं गाडी ही न छूट जाए, मैंने अपना पतलून भी निकाल फेंका। मुझे देख साले साहब ने भी अपना पतलून निकाल दिया।

अब हम दोनों मर्द अपनी निक्कर में ही थे। हमारे लण्ड हमारी कामुकता भरी हरकतों से उत्तेजित अवस्था में तन कर कसे हुए अपनी निक्करों में बड़ा सा तम्बू बनाये खड़े हुए थे। यह पूरी बातचीत के दरम्यान मैं और साले साहब डॉली की ब्रा के अंदर अपना हाथ डाल कर डॉली की चूँचियाँ बराबर मसलते रहते थे।
 
डॉली को उसकी टाइट ब्रा में हमारे हाथ घुसने के कारण बड़ी बेचैनी सी हो रही थी। डॉली ने अपने हाथ पीछे कर अपनी ब्रा के हुक खोल दिए। मैंने डॉली की ब्रा को एक हाथ में पकड़ा तो डॉली ने उसको अपने बाजुओं से निकाल कर अपने दूसरे कपड़ों के ढेर के ऊपर फेंक दिया। अब वह ऊपर से टॉपलेस थी।

हमें अब डॉली की मदमस्त चूँचियाँ जो उस हाल में भी नीचे लटकती हुई झूली नहीं थी उन्हें अच्छी तरह से मसलने, चूमने और चूसने की पूरी आजादी मिल गयी थी। डॉली की चूँचियाँ अपने भराव से और सख्त हुई अपनी निप्पलों और थोड़ी सी श्यामल एरोला की गोलाइयों को कामुकता से दिखाती हुई अल्लड़ और उद्दंड सी तन कर बिना झुके सर उठाकर खड़ी हुई थीं। लेटी हुई डॉली की उन सख्त चूँचियाँ गजब की कामुक दिख रहीं थीं।

मुझे लगा की मेरी हाजरी में शायद मेरे साले साहब डॉली से आगे बढ़ने में कुछ कतरा रहे थे। मैंने सोचा उन्हें कुछ मौक़ा देना चाहिए। मैं डॉली और साले साहब को वाशरूम जाने का बहाना कर वहाँ से उठकर वाशरूम गया। वहाँ टॉयलेट की सीट पर बैठ कर मैंने उन्हें थोड़ा समय दिया।

करीब पांच मिनट के बाद मैं जब वापस बैडरूम में आया तब देखा की दोनों के बदन से कपडे निकल चुके थे। डॉली पूरी नंगी हमेशा की तरह परी जैसी खूबसूरत लग रही थी। साले साहब डॉली के ऊपर सवार हो कर उसके होँठों से अपने होँठ कस कर चिपका कर डॉली के होंठ और मुंह चुम रहे थे।

मेरे डॉली की दूसरी तरफ अपनी पोजीशन लेते ही डॉली ने साले साहब से चुम्मा ख़तम किया और डॉली मेरी और घूम गयी। डॉली ने मुझे हलके से आँख मार कर कहा, “तुम्हारे साले साहब बडा अच्छा चुम्बन करते हैं। लगता है काफी अनुभव हैं उनको।”

मैंने कहा, “अगर वह फर्टाइल होते तो पता नहीं गाँव में कितनी आबादी और बढ़ जाती।”

डॉली ने मेरा कच्छा नीचे की और खिसकाते हुए कहा, “गाँव को छोडो, अपने घर की आबादी तो बढ़ाओ तुम।” मैंने भी अपना कच्छा निकाल फेंका।

मैंने डॉली की चूँचियों पर मुंह रख कर उनको चूसते हुए कुछ मुस्कुरा कर कहा, “तुम्हारी चूँचियाँ कह रहीं है की वह काम तो कल ही होगया। देखो अब इनमें दूध भरने की शुरुआत हो चुकी है।”

डॉली ने अपनी आँखें बंद करते हुए कुछ शरारत भरी मुस्कान देते हुए कहा, “चलो झूठे कहीं के। इनमें इतनी जल्दी थोड़े ही दूध भर जाता है? पर हाँ, हालांकि यह मेरे मन का वहम हो सकता है पर यह तुम्हारी बात मुझे सही लगती है। मेरा दिल यह बार बार कह रहा है जैसे मेरे पेट में तुम्हारा बीज पनपने लगा है।”

डॉली की एक चूँची मेरे मुंह में थी और दूसरी साले साहब के। साले साहब बड़ी शिद्द्त के साथ डॉली की चूँची को चूस रहे थे जैसे उनमे दूध आ ही गया हो।

साले साहब के दोनों हाथ डॉली के गोरे चिकने बदन को ऊपर से नीची तक संवार रहे थे। जब उनका हाथ डॉली की जाँघों के बीच उसकी चूत पर पहुंचता तो वहीँ थम जाता। वह अपने हाथ की उँगलियों से कुछ देर डॉली की एक भी बाल से रहित साफ़ चूत की पंखुड़ियों से खेलते और फिर वहाँ से हट कर ऊपर की तरफ डॉली के बदन के उतार चढ़ाव महसूस करने में खो जाते।

डॉली एक हाथ से मेरा और दूसरे हाथ से साले साहब का लण्ड पकडे हुए हिलाती रहती थी। डॉली के लिए एक साथ दो दो मर्द से प्यार पाना एक बड़ा ही रोमांचक अनुभव था। मैंने महसूस किया की डॉली प्यार की भूखी थी और प्यार पाकर बड़े ही रोमांचक भावावेश में आ जाती थी।

हम दो मर्द उसे इतना प्यार कर रहे थे यह महसूस कर वह बार बार भावावेश में आ कर हमें कहीं भी चूमने लगती थी।

मैंने डॉली से इशारा कर साले साहब से प्यार करने को संकेत दिया। मैंने कहा, “मैं तो तुम्हारे साथ ही हूँ। पर साले साहब चले जाएंगे। साले साहब बेचारे तरस रहे हैं तुम्हारे प्यार के लिए।”

डॉली ने मेरी आँखों में आँखें डालकर का, “राज साहब, मेरे जहन में इतना प्यार है की मेरे पति को मिला कर तुम तीनों मर्दों को मैं प्यार की कोई कमी नहीं महसूस होने दूंगी। तुम देखते जाओ।”

डॉली ने फिर झुक कर साले साहब को अपनी और खिंचा और उनका लण्ड अपने मुंह के पास लिया। कुछ देर तक डॉली साले साहब के लण्ड का गोरा गोरा टोपा चाटती रही और फिर अपनी जीभ लम्बी कर डॉली पुरे लण्ड को प्यार से चाटने लगी। जय डॉली का इस तरह प्यार से लण्ड चाटने पर ख़ुशी से अभिभूत हो कर आँखें बंद कर वह पलों को अपने दिल में जैसे संजो रहा हो ऐसे चेहरे पर भाव लिए उन लम्हों को एन्जॉय करता रहा।

लण्ड चूसते हुए डॉली ने नजरें उठा कर मेरी और देखा। उसे लगा की कहीं मुझे उसके कारण कोई जलन तो नहीं हो रही? मैं बड़े प्यार भरी नज़रों से डॉली को देखता रहा। डॉली को तसल्ली हो गयी की मैं बिलकुल डॉली के साले साहब के लण्ड चूसने से नाराज नहीं हूँ। तब डॉली ने साले साहब के लण्ड को जोश से चूसना शुरू किया।

साले साहब का लण्ड काफी तना हुआ सख्त और लंबा था जिसे डॉली ने पूरा मुंह में भर लिया। साले साहब का लण्ड चूसते हुए डॉली के गाल फूल जाते थे। फिर कभी धीरे धीरे तो कभी कुछ ज्यादा फुर्ती से डॉली उसे अंदर बाहर करते हुए चुस्ती और चाटती रही।

साले साहब डॉली के इस कार्यकलाप से पलंग पर काफी मचल रहे थे। कुछ देर चूसने के बाद डॉली ने उसे मुंह से निकाला और उस पर लगी चिकनी लार के साथ वह साले साहब के लण्ड को अपनी एक हाथ की हथेली में पकड़ उसे हथेली के अंदर बाहर करती हुई हिलाती रही।
 
डॉली ने अपना मुंह फिर मेरे लण्ड की और घुमाया। मेरी और नजर कर डॉली ने मेरे लण्ड का टोपा अपने मुंह में लिया और उसे बड़े प्यार से चाटने लगी। डॉली की जीभ इतनी प्यारी और संवेदनशील थी की उसकी जीभ के मेरे लण्ड को छूते ही मेरा लण्ड फुंफकारने लगा।

मेरे लण्ड की धमनियों में मेरा वीर्य दौड़ने लगा। डॉली की जीभ के मेरे लण्ड के चूसने मात्र से ही मेरा पूरा बदन सख्त हो गया। मुझे दर लगा की कहीं मैं डॉली के मुंह में ही अपना वीर्य छोड़ ना दूँ। डॉली अपना सिर इतनी दक्षता और कलाकारी से हिला कर मेरे लण्ड से अपना मुंह चुदवा रही थी की मैं भी अनायास ही अपना पेंडू हिला कर डॉली के मुंह की गति के अनुसार मेरे लण्ड को डॉली के मुंह के अंदर बाहर करने लगा।

वाकई में डॉली लण्ड चूसने की कला में माहिर हो चुकी थी। पर मैं डॉली से लण्ड चुसवाने के कारण उत्तेजना के मारे सिकारियाँ और आहटें भरता रहता था।

मेरा लण्ड चूसते हुए भी डॉली के हाथ से साले साहब के लण्ड को भी बढ़िया से सहलवाने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा था। डॉली मेरा लण्ड चूसते हुए भी साले साहब के लण्ड को हिलाने में कोई कसर छोड़ नहीं रही थी। साले साहब भी डॉली के लण्ड हिलाने से काफी उत्तेजित दिख रहे थे। उनके मुंह से आह….. ओह….. की आवाजें निकल रहीं थीं और वह वह पलंग पर लेटे हुए उत्तेजना के मारे मचल रहे थे।

जब डॉली मेरे लण्ड चूसने से फारिग हुई तब साले साहब ने पूछा, “डॉली , तुमने कहा था आज की पूरी रात हम संगीतमय वातावरण में प्यार भरी चुदाई करेंगे। तो सबसे पहले तो कुछ संगीत हो जाए।”

डॉली ने यह सुन कर कुछ मुंह बिगाड़ते हुए कहा, “जय , देखो अब हम छः एक दूसरे के हमदम और राज़दार बने हैं। मैं मेरे पति सेठी साहब, राज और ज्योति और तुम और अंजू।

अब हम छह के बीच में कोई गोपनीय राज़ नहीं होने चाहिए। पर तुमने हम सब के लिए एक बड़े राज़ का भंडाफोड़ नहीं किया और यह बात मुझे खाये जा रही है। तुम्हें अंजू ने बच्चा कैसे दिया?

यह तुमने राज़ ही रखा है अभी तक। मैं एक खुले दिल की इंसान हूँ। मैं प्यार के लिए अपना बदन तो क्या अपनी जान तक दे सकती हूँ। मैं आप सब से भी यही उम्मीद करती हूँ की हम सब अपने समाज में अपने अपने अलग अलग किरदार बेशक निभाते हुए भी एक दूसरे से कोई भी गोपनीय राज़ नहीं रखेंगे। मैं आज तुम दोनों से बड़े ही प्यार से चुदवाउंगी पर तुम्हें यह राज़ आज उजागर करना ही पड़ेगा।”

जब साले साहब ने डॉली से यह सूना तो वह गंभीर हो गए। उन्होंने पहले मेरी और और फिर डॉली की और देख कर अपने दोनों हाथ जोड़कर कहा, “जीजू, मेरी आप दोनों से करबद्ध प्रार्थना है की आप दोनों मुझे यह राज़ उजागर करने के लिए मजबूर ना करें।

देखिये मेरे इस राज़ में हमारे संबंधों के बड़े ही नाजुक तानेबाने उलझे हुए हैं। गर हमारे निजी संबंधों के ताने बाने उलझे नहीं होते, तो मुझे यह राज़ उजागर करने में कोई आपत्ति नहीं होती।

देखिये जीजू, ज्योति आपकी पत्नी और मेरी बहन है। मेरे इस राज़ के उजागर होने से मुझे पता नहीं उस पर क्या गुजरेगी। मेरे इस राज़ में ज्योति की भावनाएं भी शामिल है, जो इस राज़ के उजागर होने से आहत हो सकतीं हैं। इस राज़ के बारे में ज्योति को कुछ भी नहीं मालुम। कई बार ‘बंधी मुट्ठी लाखकी और खुली तो प्यारे ख़ाक की’ जो कहावत है वह बड़ी ही सही और कारगर साबित होती है। कई बार राज़ को राज़ रखना ही अक्लमंदी होती है।”

मैंने साले साहब का हाथ थाम कर कहा, “साले साहब, ज्योति बेशक आपकी बहन है, पर आपने उसे इतने सालों में शायद ठीक से पहचाना नहीं। मैं उसके पति और अत्यंत निजी राज़दार होने के नाते यह दावे के साथ छाती ठोक कर कह सकता हूँ की उसे भी गोपनीय से गोपनीय राज़ निभाना आता है। वरना आजकल के जमाने में क्या कोई भी पत्नी डॉली को ज्योति ने जिस तरह का वचन दिया है, दे सकती है क्या?

ज्योति सेठी साहब से चुदवाने के लिए तैयार हुई है उसमें उसके अपने सुःख की इच्छा कम और डॉली और सेठी साहब के सुख की चिंता कुटकुट कर भरी हुई है। अगर ज्योति सारे समाज में हमारी बदनामी हो सकती है इस बात की ज्यादा परवाह ना करते हुए सेठी साहब से इस तरह अपने ही मायके में चुदवा रही है और डॉली और सेठी साहब के साथ हमारे संबंधों के नाजुक तानेबाने को समझने, निभाने और उन्हें सुलझाने में सक्षम दिखती है तो ज्योति अपने मायके के नाजुक तानोंबानों को भी समझने, निभाने और सुलझाने में सक्षम होगी इसमें मुझे कोई शंका नहीं है।”

साले साहब ने मेरी बात बड़ी ही गंभीरता से सुनी। उनके चेहरे पर से गंभीरता के भाव फिर भी जा नहीं पाए थे।

उन्होंने डॉली की और देखा और बोले, “डॉली , ठीक है, मैं भी मानता हूँ की हम सब के बीच में कोई गंभीर गोपनीय राज़ नहीं होने चाहियें। चुदाई के छोटेमोटे राज़ हम एक दूसरे को ना भी बताएं तो चलता है। पर ऐसे राज़ जो निजी संबंधों की नाजुकता को आहत कर सकते हैं हमें गोपनीय नहीं रखने चाहिए।

मैं आपसे वादा करता हूँ की आज रात का सबेरा होने से पहले मैं आपको मेरे उस अति गोपनीय राज का राजदार जरूर बनाऊंगा। पर डॉली की एम.एम.ऍफ़. चुदाई का कार्यक्रम संपन्न होने के बाद। मैं नहीं चाहता की मेरे इस राज़ की गंभीरता का हमारी प्यार भरी चुदाई की रात पर कोई नकारात्मक असर पड़े।”

डॉली यह सुनकर उठ खड़ी हुई और उसने अपने मोबाइल से ब्लूटूथ के साथ एक बहुत मधुर सी धुन बजानी शुरू की। यह हलके फुल्के शास्त्रीय संगीत पर आधारित धुन थी जिसकी लय पर डॉली के पाँव थिरकने लगे। मैंने वैसे भी डॉली को नाचते हुए नहीं देखा था। डॉली ने एक पारदर्शी ओढ़नी अपने नंगे बदन पर डालदी। उस ओढ़नी के डालने से डॉली के बदन की नग्न कामुकता का रूप कम होने के बजाये और निखर उठा।

लगभग नंगी डॉली को संगीत की धुन पर इस तरह लयबद्ध तरीके से थिरकते देखना कोई भाग्य शाली के नसीब में ही होता होगा। पता नहीं सेठी साहब ने भी खूबसूरत डॉली को इतनी कलालारी से इस तरह नग्न नाचते हुए शायद ही देखा हो।

मेरे साले साहब भी कितने भाग्यशाली थे की इतनी खूबसूरत सख्सियत जो इतना सुन्दर नृत्य कर सकती है, उसका सदृश्य लाइव परफॉरमेंस देखने का उन्हें मौक़ा मिला था।
 
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