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राज मंत्रमुग्ध सा देखता रहा। उसका गला पूरी तरह सूख चुका था। उसने अपना हाथ बढ़ाया। उसने टेप से नहीं, अपनी तर्जनी उंगली से डॉली की नाभि के ठीक नीचे एक बिंदु को छुआ।
"यहाँ तक?" राज ने पूछा। उसकी उंगली डॉली की मखमली त्वचा पर कांप रही थी।
"आह..." डॉली ने अपना सिर पीछे कर लिया और दीवार का सहारा लिया। राज का स्पर्श उसकी नाभि के रास्ते सीधे उसकी आंतों तक उतर गया था।
"और नीचे..." डॉली ने भारी आवाज़ में कहा, जो किसी नशे में डूबी हुई लग रही थी। "इतनी छोटी बनाओ कि मेरी नाभि हमेशा दिखती रहे। मुझे... मुझे हवा चाहिए।"
राज ने अब दोनों हाथ डॉली की कमर पर रख दिए। वह नाप नहीं ले रहा था। वह उस बदन को अपनी हथेलियों में भर रहा था। उसने अपने अंगूठे डॉली के कूल्हों की हड्डी पर गड़ा दिए।
"मैडम," राज ने ऊपर देखते हुए कहा, उसकी आँखों में अब कोई पर्दा नहीं था, सिर्फ भूख थी। "शहर में दर्जी कपड़े को नहीं, बदन की ज़रूरतों को समझते हैं। अगर नाप सही लेना है, तो मुझे इस बदन को याद करना होगा। अपनी उंगलियों से।"
डॉली की टांगें कांपने लगीं। उसने नीचे देखा—राज का चेहरा उसके पेट के इतना करीब था कि उसकी गर्म साँसें डॉली की नाभि पर लग रही थीं। यह हदों को पार करना था। यह सामाजिक मर्यादाओं का चीरहरण था। लेकिन डॉली को यही चाहिए था। वह इसी अपमानजनक सुख की भूखी थी।
उसने अपना हाथ नीचे बढ़ाया और राज के बालों में अपनी उंगलियां फंसा दीं। उसने राज के सिर को पीछे नहीं धकेला, बल्कि उसे अपनी कमर की तरफ और दबा दिया।
"तो याद कर लो शर्मा जी," डॉली फुसफुसाई, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी तड़प थी। "इंच-इंच याद कर लो। ऐसा नाप लो कि जब मैं यह ब्लाउज पहनूँ, तो मुझे लगे कि तुम्हारे हाथ मुझे कस रहे हैं। मुझे ढील पसंद नहीं है। मुझे कसाव चाहिए। दम घुटने वाला कसाव।"
यह डॉली की तरफ से हरी झंडी थी।
राज ने अपना चेहरा आगे बढ़ाया और अपने सूखे होंठ डॉली की पसीने से भीगी, नमकीन नाभि पर रख दिए।
एक हल्का सा, चोर-चुंबन।
डॉली के मुँह से एक दबी हुई चीख निकली। उसने राज के बालों को मुट्ठी में भींच लिया।
"राज..." उसने पहली बार उसका नाम लिया, 'शर्मा जी' नहीं।
राज ने अपनी जीभ की नोक से उसकी नाभि में जमा पसीने की एक बूंद को चाट लिया। स्वाद खारा था, लेकिन किसी भी मीठे शरबत से ज़्यादा नशीला।
फिर वह धीरे-धीरे खड़ा हुआ। उसका चेहरा अब डॉली के चेहरे के सामने था।
दोनों की साँसें उखड़ी हुई थीं। दोनों के बीच कोई दूरी नहीं थी। राज का शरीर डॉली के शरीर से पूरी तरह सटा हुआ था। उसे डॉली के स्तनों का दबाव अपनी छाती पर और उसकी जांघों की गर्मी अपने पैरों पर महसूस हो रही थी।
"परसों..." राज ने डॉली की आँखों में देखते हुए कहा। "परसों शाम को आना। ट्रायल के लिए। जब बाज़ार बंद हो रहा हो। और..." उसने डॉली के पल्लू को उठाया और बहुत धीमे से, बहुत नज़ाकत से वापस उसके कंधे पर रख दिया,
"...और तब कोई जल्दबाज़ी नहीं होगी। तब मैं तसल्ली से देखूँगा कि फिटिंग सही आई है या नहीं।"
डॉली की आँखों में अब शर्म नहीं, एक खुला निमंत्रण था। एक वादा था।
"आऊंगी," डॉली ने कहा, और अपनी साड़ी को ठीक किया। लेकिन उसकी चाल में अब एक लचक आ गई थी।
"और अगर फिटिंग सही नहीं हुई, राज... तो तुम्हें फिर से नाप लेना होगा। पूरी रात।"
वह मुड़ी और दुकान से बाहर निकल गई।
राज वहीं खड़ा रहा, डॉली की छोड़ी हुई खुशबू के बीच। उसने देखा कि डॉली का लाल रेशमी कपड़ा काउंटर पर पड़ा था। उसने उस कपड़े को उठाया और अपने चेहरे से लगा लिया। कपड़े में अभी भी डॉली के हाथों की गर्मी थी।
उसने दुकान का शटर आधा गिरा दिया। उसने अपनी पतलून के उस उभार को देखा जो अब दर्द कर रहा था।
"परसों," उसने खुद से वादा किया। "परसों यह ट्रायल रूम सिर्फ कपड़े बदलने के लिए नहीं होगा।"
"यहाँ तक?" राज ने पूछा। उसकी उंगली डॉली की मखमली त्वचा पर कांप रही थी।
"आह..." डॉली ने अपना सिर पीछे कर लिया और दीवार का सहारा लिया। राज का स्पर्श उसकी नाभि के रास्ते सीधे उसकी आंतों तक उतर गया था।
"और नीचे..." डॉली ने भारी आवाज़ में कहा, जो किसी नशे में डूबी हुई लग रही थी। "इतनी छोटी बनाओ कि मेरी नाभि हमेशा दिखती रहे। मुझे... मुझे हवा चाहिए।"
राज ने अब दोनों हाथ डॉली की कमर पर रख दिए। वह नाप नहीं ले रहा था। वह उस बदन को अपनी हथेलियों में भर रहा था। उसने अपने अंगूठे डॉली के कूल्हों की हड्डी पर गड़ा दिए।
"मैडम," राज ने ऊपर देखते हुए कहा, उसकी आँखों में अब कोई पर्दा नहीं था, सिर्फ भूख थी। "शहर में दर्जी कपड़े को नहीं, बदन की ज़रूरतों को समझते हैं। अगर नाप सही लेना है, तो मुझे इस बदन को याद करना होगा। अपनी उंगलियों से।"
डॉली की टांगें कांपने लगीं। उसने नीचे देखा—राज का चेहरा उसके पेट के इतना करीब था कि उसकी गर्म साँसें डॉली की नाभि पर लग रही थीं। यह हदों को पार करना था। यह सामाजिक मर्यादाओं का चीरहरण था। लेकिन डॉली को यही चाहिए था। वह इसी अपमानजनक सुख की भूखी थी।
उसने अपना हाथ नीचे बढ़ाया और राज के बालों में अपनी उंगलियां फंसा दीं। उसने राज के सिर को पीछे नहीं धकेला, बल्कि उसे अपनी कमर की तरफ और दबा दिया।
"तो याद कर लो शर्मा जी," डॉली फुसफुसाई, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी तड़प थी। "इंच-इंच याद कर लो। ऐसा नाप लो कि जब मैं यह ब्लाउज पहनूँ, तो मुझे लगे कि तुम्हारे हाथ मुझे कस रहे हैं। मुझे ढील पसंद नहीं है। मुझे कसाव चाहिए। दम घुटने वाला कसाव।"
यह डॉली की तरफ से हरी झंडी थी।
राज ने अपना चेहरा आगे बढ़ाया और अपने सूखे होंठ डॉली की पसीने से भीगी, नमकीन नाभि पर रख दिए।
एक हल्का सा, चोर-चुंबन।
डॉली के मुँह से एक दबी हुई चीख निकली। उसने राज के बालों को मुट्ठी में भींच लिया।
"राज..." उसने पहली बार उसका नाम लिया, 'शर्मा जी' नहीं।
राज ने अपनी जीभ की नोक से उसकी नाभि में जमा पसीने की एक बूंद को चाट लिया। स्वाद खारा था, लेकिन किसी भी मीठे शरबत से ज़्यादा नशीला।
फिर वह धीरे-धीरे खड़ा हुआ। उसका चेहरा अब डॉली के चेहरे के सामने था।
दोनों की साँसें उखड़ी हुई थीं। दोनों के बीच कोई दूरी नहीं थी। राज का शरीर डॉली के शरीर से पूरी तरह सटा हुआ था। उसे डॉली के स्तनों का दबाव अपनी छाती पर और उसकी जांघों की गर्मी अपने पैरों पर महसूस हो रही थी।
"परसों..." राज ने डॉली की आँखों में देखते हुए कहा। "परसों शाम को आना। ट्रायल के लिए। जब बाज़ार बंद हो रहा हो। और..." उसने डॉली के पल्लू को उठाया और बहुत धीमे से, बहुत नज़ाकत से वापस उसके कंधे पर रख दिया,
"...और तब कोई जल्दबाज़ी नहीं होगी। तब मैं तसल्ली से देखूँगा कि फिटिंग सही आई है या नहीं।"
डॉली की आँखों में अब शर्म नहीं, एक खुला निमंत्रण था। एक वादा था।
"आऊंगी," डॉली ने कहा, और अपनी साड़ी को ठीक किया। लेकिन उसकी चाल में अब एक लचक आ गई थी।
"और अगर फिटिंग सही नहीं हुई, राज... तो तुम्हें फिर से नाप लेना होगा। पूरी रात।"
वह मुड़ी और दुकान से बाहर निकल गई।
राज वहीं खड़ा रहा, डॉली की छोड़ी हुई खुशबू के बीच। उसने देखा कि डॉली का लाल रेशमी कपड़ा काउंटर पर पड़ा था। उसने उस कपड़े को उठाया और अपने चेहरे से लगा लिया। कपड़े में अभी भी डॉली के हाथों की गर्मी थी।
उसने दुकान का शटर आधा गिरा दिया। उसने अपनी पतलून के उस उभार को देखा जो अब दर्द कर रहा था।
"परसों," उसने खुद से वादा किया। "परसों यह ट्रायल रूम सिर्फ कपड़े बदलने के लिए नहीं होगा।"