S
StoryPublisher
Guest
होली का रंग
फाल्गुन का महीना था। राजस्थान की गर्म हवाओं में अब टेसू के फूलों की महक और होली की मस्ती घुल चुकी थी। अज़ानगढ़ की विला में होली का त्यौहार हमेशा से ही शान-ओ-शौकत के लिए जाना जाता था, लेकिन इस बार... इस बार विला की दीवारों के भीतर एक अलग ही आग सुलग रही थी।
सुबह के 10 बज रहे थे। विला के बड़े आंगन में ढोल-नगाड़े बज रहे थे। गांव के लोग, आसामी और नौकर-चाकर ठाकुरों को बधाई देने आ रहे थे। हवा में लाल, हरा और गुलाबी गुलाल उड़ रहा था, जिससे पूरा माहौल धुंधला और नशीला हो गया था।
कामिनी अपने कमरे में तैयार हो रही थी। आज होली थी, इसलिए रिवाज के मुताबिक उसे सफेद कपड़े पहनने थे। उसने अपनी अलमारी से सबसे बारीक, मलमल की सफेद साड़ी निकाली। यह साड़ी इतनी झीनी थी कि हवा के झोंके से भी उड़ जाती थी। उसने नीचे जो ब्लाउज पहना, वह भी सफेद था, बिना अस्तर का। उसे पता था कि जब यह भीगेगा, तो यह उसके शरीर पर होने या न होने के बराबर होगा।
उसने अपने पूरे बदन पर—गर्दन, बांहों, कमर और जांघों पर—खूब सारा नारियल का तेल लगाया। कहने को तो यह रंग छुड़ाने के लिए था, लेकिन हकीकत में यह उसे और भी चिकना और फिसलन भरा बनाने के लिए था।
प्रताप सुबह से ही अपने दोस्तों के साथ भांग की ठंडाई पीने में व्यस्त था। वह आंगन के एक कोने में एक चारपाई पर पड़ा था, नशे में धुत, अपनी ही दुनिया में मस्त। उसे खबर भी नहीं थी कि उसकी पत्नी के साथ आज क्या होने वाला है।
कामिनी ने आईने में खुद को देखा। उसकी आंखों में डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी उत्सुकता थी। आज उसे राज और रमन... दोनों का सामना करना था। एक साथ।
वह नीचे उतरी। आंगन में रंगों का कोहराम मचा था।
राज सिंह विला के चबूतरे पर एक बड़े सिंहासन जैसी कुर्सी पर बैठे थे। उन्होंने सफेद कुर्ता-पायजामा पहना था, जो अब रंगों से सराबोर हो चुका था। उनकी आंखें लाल थीं—शायद भांग की वजह से, या शायद कामिनी के इंतज़ार में। वे एक शेर की तरह भीड़ को देख रहे थे।
उनके ठीक पीछे, एक वफादार और खूंखार साये की तरह रमन खड़ा था। रमन ने आज कोई वर्दी नहीं पहनी थी। वह सिर्फ एक सफेद धोती और एक तंग बनियान में था। उसका गठीला, काला और पसीने से भीगा शरीर तेल में चमक रहा था। उसकी मज़बूत बांहों पर हरा और लाल रंग लगा था। वह किसी रक्षक से ज्यादा किसी शिकारी जैसा लग रहा था।
जैसे ही कामिनी आंगन में आई, सबकी नज़रें उस पर टिक गईं। सफेद साड़ी में, खुले बालों के साथ वह किसी अप्सरा जैसी लग रही थी।
राज की नज़रें उस पर जम गईं। उन्होंने अपनी मूंछों पर हाथ फेरा। रमन ने अपनी जीभ से होठों को गीला किया।
राज उठे। वे भीड़ को चीरते हुए धीरे-धीरे कामिनी की तरफ बढ़े। उनके हाथ में लाल गुलाल की थाली थी। पूरा आंगन शांत हो गया। बड़े ठाकुर अपनी बहू को रंगने जा रहे थे।
"होली मुबारक हो, बहू," राज ने सबकी मौजूदगी में अपनी भारी आवाज़ में कहा।
"मुबारक हो बाबूजी," कामिनी ने झुककर उनके पैर छुए।
राज ने एक चुटकी गहरा लाल गुलाल लिया। उन्होंने उसे कामिनी के गालों पर नहीं लगाया। उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया और अपनी गुलाल से सनी उंगलियां कामिनी की गोरी गर्दन पर, ठीक वहां फेरीं जहाँ उन्होंने उसे काटा था। उनका अंगूठा उसकी कॉलर बोन पर रगड़ खाया।
"आज का दिन खास है कामिनी," राज ने बहुत धीरे से कहा, ताकि सिर्फ वही सुन सके। "आज सारे भेद मिट जाएंगे। आज विला के दरवाजे बंद होंगे और मर्यादा के कपड़े उतरेंगे।"
कामिनी कांप गई। राज का स्पर्श उसके पूरे बदन में बिजली दौड़ा गया।
तभी रमन आगे आया। उसके हाथ में एक बड़ी स्टील की बाल्टी थी—जिसमें केसरिया रंग का पानी भरा था।
"मालिक," रमन ने राज से अनुमति मांगी, लेकिन उसकी आंखों में कामिनी के लिए भूख थी। "छोटी मालकिन को रंगना है। शगुन का पानी।"
राज ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। "नेकी और पूछ-पूछ? नहला दे इसे।"
रमन ने एक शैतानी मुस्कान के साथ बाल्टी उठाई और बिना किसी चेतावनी के पूरा पानी कामिनी के ऊपर उंडेल दिया।
"छपाक!"
पानी की एक तेज़ धार कामिनी के सिर से लेकर पांव तक गिर गई। ठंडा पानी और रंग उसके बदन पर चिपक गया।
और जैसा कि तय था, वह सफेद मलमल की साड़ी उसके शरीर से दूसरी त्वचा की तरह चिपक गई।
नज़ारा देखने लायक था। साड़ी इतनी पारदर्शी हो गई कि कामिनी के भारी स्तनों का उभार, उसके गहरे भूरे रंग के बड़े निप्पल, उसकी नाभि का गड्ढा और उसकी जांघों का आकार... सब कुछ दुनिया के सामने नंगा हो गया। उसके गीले बाल उसकी पीठ पर चिपक गए। पानी की बूंदें उसके स्तनों से टपक रही थीं।
भीड़ में सन्नाटा छा गया। लोग अपनी बहू-बेटियों की इज़्ज़त बचाने के लिए नज़रें झुका लेते हैं, लेकिन यहाँ हर मर्द की नज़र कामिनी के भीगे बदन पर थी।
कोने में पड़ा प्रताप नशे में ताली बजा रहा था। "वाह! मेरी बीवी तो फिल्म की हीरोइन लग रही है! क्या फिगर है!"
लेकिन राज और रमन की आंखों में वासना का नंगा नाच था। राज ने कामिनी के भीगे हुए स्तनों को घूरा। उन्होंने मुनीम जी को इशारा किया।
"उत्सव खत्म," राज ने कड़क आवाज़ में आदेश दिया। "बाहर वालों को विदा करो। विला के दरवाजे बंद करो। अब हम आराम करेंगे।"
दोपहर के 2 बज चुके थे। बाहरी मेहमान जा चुके थे। प्रताप को नौकरों ने टांगकर उसके कमरे में फेंक दिया था, जहाँ वह बेहोश हो गया। विला के मुख्य द्वार बंद हो चुके थे। नौकर अपने क्वार्टर में चले गए थे।
विला के अंदर एक भारी सन्नाटा था।
राज ने कामिनी को संदेश भिजवाया नहीं, बल्कि खुद उसका हाथ पकड़कर उसे सीढ़ियों की तरफ ले गए। रमन उनके पीछे-पीछे चल रहा था, जैसे कोई वफादार कुत्ता अपने हिस्से के मांस का इंतज़ार कर रहा हो।
कामिनी, जो अभी भी भीगी हुई साड़ी में थी और ठंड से कांप रही थी, राज के कमरे में लाई गई।
कमरे में एसी चल रहा था, जिससे ठंड और बढ़ गई। कामिनी के निप्पल ठंड से पत्थर जैसे सख्त हो गए थे और ब्लाउज के गीले कपड़े को चीर रहे थे।
कमरे के बीच में एक मेज पर चांदी के बड़े-बड़े गिलास रखे थे। यह खास 'शाही ठंडाई' थी, जिसमें बादाम, केसर, गुलाब की पत्तियां और बहुत सारी, बहुत सारी भांग मिली हुई थी।
"दरवाजा बंद करो रमन," राज ने कहा। उन्होंने अपना भीगा हुआ, रंगीन कुर्ता उतार फेंका था। वे सिर्फ गीली धोती में थे, जिसके नीचे उनका पौरुष साफ दिख रहा था।
रमन ने दरवाजा बंद किया और भारी लोहे की सिटकनी लगा दी। उसने भी अपनी बनियान उतार दी। उसका काला, गठीला बदन अब आज़ाद था।
"पी लो," राज ने ठंडाई का एक बड़ा गिलास कामिनी के होंठों से लगा दिया। "यह तुम्हें गर्म कर देगा। और तुम्हारे दिमाग के ताले खोल देगा।"
कामिनी ने एक घूंट पिया। स्वाद मीठा, गाढ़ा और नशीला था। राज ने उसे पूरा गिलास एक सांस में पिलवा दिया।
"गुड गर्ल," राज ने उसके भीगे बालों को पीछे किया।
फाल्गुन का महीना था। राजस्थान की गर्म हवाओं में अब टेसू के फूलों की महक और होली की मस्ती घुल चुकी थी। अज़ानगढ़ की विला में होली का त्यौहार हमेशा से ही शान-ओ-शौकत के लिए जाना जाता था, लेकिन इस बार... इस बार विला की दीवारों के भीतर एक अलग ही आग सुलग रही थी।
सुबह के 10 बज रहे थे। विला के बड़े आंगन में ढोल-नगाड़े बज रहे थे। गांव के लोग, आसामी और नौकर-चाकर ठाकुरों को बधाई देने आ रहे थे। हवा में लाल, हरा और गुलाबी गुलाल उड़ रहा था, जिससे पूरा माहौल धुंधला और नशीला हो गया था।
कामिनी अपने कमरे में तैयार हो रही थी। आज होली थी, इसलिए रिवाज के मुताबिक उसे सफेद कपड़े पहनने थे। उसने अपनी अलमारी से सबसे बारीक, मलमल की सफेद साड़ी निकाली। यह साड़ी इतनी झीनी थी कि हवा के झोंके से भी उड़ जाती थी। उसने नीचे जो ब्लाउज पहना, वह भी सफेद था, बिना अस्तर का। उसे पता था कि जब यह भीगेगा, तो यह उसके शरीर पर होने या न होने के बराबर होगा।
उसने अपने पूरे बदन पर—गर्दन, बांहों, कमर और जांघों पर—खूब सारा नारियल का तेल लगाया। कहने को तो यह रंग छुड़ाने के लिए था, लेकिन हकीकत में यह उसे और भी चिकना और फिसलन भरा बनाने के लिए था।
प्रताप सुबह से ही अपने दोस्तों के साथ भांग की ठंडाई पीने में व्यस्त था। वह आंगन के एक कोने में एक चारपाई पर पड़ा था, नशे में धुत, अपनी ही दुनिया में मस्त। उसे खबर भी नहीं थी कि उसकी पत्नी के साथ आज क्या होने वाला है।
कामिनी ने आईने में खुद को देखा। उसकी आंखों में डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी उत्सुकता थी। आज उसे राज और रमन... दोनों का सामना करना था। एक साथ।
वह नीचे उतरी। आंगन में रंगों का कोहराम मचा था।
राज सिंह विला के चबूतरे पर एक बड़े सिंहासन जैसी कुर्सी पर बैठे थे। उन्होंने सफेद कुर्ता-पायजामा पहना था, जो अब रंगों से सराबोर हो चुका था। उनकी आंखें लाल थीं—शायद भांग की वजह से, या शायद कामिनी के इंतज़ार में। वे एक शेर की तरह भीड़ को देख रहे थे।
उनके ठीक पीछे, एक वफादार और खूंखार साये की तरह रमन खड़ा था। रमन ने आज कोई वर्दी नहीं पहनी थी। वह सिर्फ एक सफेद धोती और एक तंग बनियान में था। उसका गठीला, काला और पसीने से भीगा शरीर तेल में चमक रहा था। उसकी मज़बूत बांहों पर हरा और लाल रंग लगा था। वह किसी रक्षक से ज्यादा किसी शिकारी जैसा लग रहा था।
जैसे ही कामिनी आंगन में आई, सबकी नज़रें उस पर टिक गईं। सफेद साड़ी में, खुले बालों के साथ वह किसी अप्सरा जैसी लग रही थी।
राज की नज़रें उस पर जम गईं। उन्होंने अपनी मूंछों पर हाथ फेरा। रमन ने अपनी जीभ से होठों को गीला किया।
राज उठे। वे भीड़ को चीरते हुए धीरे-धीरे कामिनी की तरफ बढ़े। उनके हाथ में लाल गुलाल की थाली थी। पूरा आंगन शांत हो गया। बड़े ठाकुर अपनी बहू को रंगने जा रहे थे।
"होली मुबारक हो, बहू," राज ने सबकी मौजूदगी में अपनी भारी आवाज़ में कहा।
"मुबारक हो बाबूजी," कामिनी ने झुककर उनके पैर छुए।
राज ने एक चुटकी गहरा लाल गुलाल लिया। उन्होंने उसे कामिनी के गालों पर नहीं लगाया। उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया और अपनी गुलाल से सनी उंगलियां कामिनी की गोरी गर्दन पर, ठीक वहां फेरीं जहाँ उन्होंने उसे काटा था। उनका अंगूठा उसकी कॉलर बोन पर रगड़ खाया।
"आज का दिन खास है कामिनी," राज ने बहुत धीरे से कहा, ताकि सिर्फ वही सुन सके। "आज सारे भेद मिट जाएंगे। आज विला के दरवाजे बंद होंगे और मर्यादा के कपड़े उतरेंगे।"
कामिनी कांप गई। राज का स्पर्श उसके पूरे बदन में बिजली दौड़ा गया।
तभी रमन आगे आया। उसके हाथ में एक बड़ी स्टील की बाल्टी थी—जिसमें केसरिया रंग का पानी भरा था।
"मालिक," रमन ने राज से अनुमति मांगी, लेकिन उसकी आंखों में कामिनी के लिए भूख थी। "छोटी मालकिन को रंगना है। शगुन का पानी।"
राज ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। "नेकी और पूछ-पूछ? नहला दे इसे।"
रमन ने एक शैतानी मुस्कान के साथ बाल्टी उठाई और बिना किसी चेतावनी के पूरा पानी कामिनी के ऊपर उंडेल दिया।
"छपाक!"
पानी की एक तेज़ धार कामिनी के सिर से लेकर पांव तक गिर गई। ठंडा पानी और रंग उसके बदन पर चिपक गया।
और जैसा कि तय था, वह सफेद मलमल की साड़ी उसके शरीर से दूसरी त्वचा की तरह चिपक गई।
नज़ारा देखने लायक था। साड़ी इतनी पारदर्शी हो गई कि कामिनी के भारी स्तनों का उभार, उसके गहरे भूरे रंग के बड़े निप्पल, उसकी नाभि का गड्ढा और उसकी जांघों का आकार... सब कुछ दुनिया के सामने नंगा हो गया। उसके गीले बाल उसकी पीठ पर चिपक गए। पानी की बूंदें उसके स्तनों से टपक रही थीं।
भीड़ में सन्नाटा छा गया। लोग अपनी बहू-बेटियों की इज़्ज़त बचाने के लिए नज़रें झुका लेते हैं, लेकिन यहाँ हर मर्द की नज़र कामिनी के भीगे बदन पर थी।
कोने में पड़ा प्रताप नशे में ताली बजा रहा था। "वाह! मेरी बीवी तो फिल्म की हीरोइन लग रही है! क्या फिगर है!"
लेकिन राज और रमन की आंखों में वासना का नंगा नाच था। राज ने कामिनी के भीगे हुए स्तनों को घूरा। उन्होंने मुनीम जी को इशारा किया।
"उत्सव खत्म," राज ने कड़क आवाज़ में आदेश दिया। "बाहर वालों को विदा करो। विला के दरवाजे बंद करो। अब हम आराम करेंगे।"
दोपहर के 2 बज चुके थे। बाहरी मेहमान जा चुके थे। प्रताप को नौकरों ने टांगकर उसके कमरे में फेंक दिया था, जहाँ वह बेहोश हो गया। विला के मुख्य द्वार बंद हो चुके थे। नौकर अपने क्वार्टर में चले गए थे।
विला के अंदर एक भारी सन्नाटा था।
राज ने कामिनी को संदेश भिजवाया नहीं, बल्कि खुद उसका हाथ पकड़कर उसे सीढ़ियों की तरफ ले गए। रमन उनके पीछे-पीछे चल रहा था, जैसे कोई वफादार कुत्ता अपने हिस्से के मांस का इंतज़ार कर रहा हो।
कामिनी, जो अभी भी भीगी हुई साड़ी में थी और ठंड से कांप रही थी, राज के कमरे में लाई गई।
कमरे में एसी चल रहा था, जिससे ठंड और बढ़ गई। कामिनी के निप्पल ठंड से पत्थर जैसे सख्त हो गए थे और ब्लाउज के गीले कपड़े को चीर रहे थे।
कमरे के बीच में एक मेज पर चांदी के बड़े-बड़े गिलास रखे थे। यह खास 'शाही ठंडाई' थी, जिसमें बादाम, केसर, गुलाब की पत्तियां और बहुत सारी, बहुत सारी भांग मिली हुई थी।
"दरवाजा बंद करो रमन," राज ने कहा। उन्होंने अपना भीगा हुआ, रंगीन कुर्ता उतार फेंका था। वे सिर्फ गीली धोती में थे, जिसके नीचे उनका पौरुष साफ दिख रहा था।
रमन ने दरवाजा बंद किया और भारी लोहे की सिटकनी लगा दी। उसने भी अपनी बनियान उतार दी। उसका काला, गठीला बदन अब आज़ाद था।
"पी लो," राज ने ठंडाई का एक बड़ा गिलास कामिनी के होंठों से लगा दिया। "यह तुम्हें गर्म कर देगा। और तुम्हारे दिमाग के ताले खोल देगा।"
कामिनी ने एक घूंट पिया। स्वाद मीठा, गाढ़ा और नशीला था। राज ने उसे पूरा गिलास एक सांस में पिलवा दिया।
"गुड गर्ल," राज ने उसके भीगे बालों को पीछे किया।