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Adultery ' गाँव का टेलर '

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Adultery उड़ान सीमा पार की

फ्रेंड्स इस थ्रेड मे छोटी छोटी सेक्सी कहानियाँ होंगी जो आपको बेहद पसंद आएँगी

1- उड़ान सीमा पार की

2- वर्जित सुख '

3- गाँव का टेलर Running

4-दबी हुई हसरतें coming soon'

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8-

9-

10-
 
उड़ान सीमा पार की

मरीन लाइन से सटा हुआ तारापुर एक्वेरियम बहुतों के आकर्षण का केंद्र है। अनेक प्रकार और रंग-बिरंगी मछलियों का पानी के जार में तैरना बहुत ही मनमोहक नज़र आता है।

पूरा एक्वेरियम घूमते-घूमते डैनी थक भी चुका था और उसे अब कुछ आराम की इच्छा भी हो रही थी। वह सीधा रोड क्रॉस करके समंदर की ओर आ गया, वहाँ थोड़ी-थोड़ी दूर पर आगे-पीछे करके बेंचें रखी हुई थीं, जहाँ कुछ लोग रोड साइड की ओर बैठकर आती-जाती कारों का नज़ारा लेना पसंद करते थे तो कुछ लोग उसी से सटी दूसरी तरफ़ की बेंच पर बैठकर सामने अरब सागर की लहराती लहरों का आनंद ले रहे थे।

चर्च गेट के किनारे से लेकर बाबुलनाथ तक का पूरा समुद्री किनारा लवर्स पॉइंट के नाम से भी जाना जाता है। बाबुलनाथ से ही रास्ता ऊपर की ओर हैंगिंग गार्डन और बूट हाउस तक भी पहुँचता है, शाम होते-होते तमाम नए जोड़े प्रेमी प्रेमिकाएँ यहाँ मन बहलाने आ जाते हैं और घंटों बैठे-बैठे अपने दिल के जज़्बात आपस में बाँटते रहते हैं, कुछ बच्चे खेलते, भागते-दौड़ते नज़र आते हैं तो कुछ बच्चे रेत की मूर्तियाँ, मंदिर, गुफा आदि बनाने में तोड़ने में मशगूल नज़र आते हैं।

डैनी, जिसका असली नाम दिनेश था लेकिन ख़ुद को डैनी कहलाए जाना ही उसे पसंद था और सभी उसे पहचानते भी डैनी के नाम से ही थे। वह सीधा एक बेंच की ओर बढ़ गया, थोड़ी दूर से ही सागर की ओर की बेंच पर बैठा उसे अल्ताफ़ दिखाई दे गया उसे वह पर्सनली मिला तो नहीं था लेकिन जानता पहचानता था। उसे मालूम था कि वह पक्का इश्क़बाज़ है लड़कियों का रसिया है वह, अभी भी कहीं खोया हुआ था शायद कोई लड़की उसकी गोद में लेटी थी और वह उसके चेहरे की और झुका हुआ था।

डैनी समझ गया कि आज भी कोई लड़की उसकी जाल में है। बिना आहट किए वह भी सड़क की ओर मुँह करके थोड़ा झुककर इस क़दर बैठ गया कि अल्ताफ़ उसको पूरा ना देख सके।

बेंच के पीछे से परफ्यूम की महक और साँसों के गर्माहट भी डैनी तक पहुँच रही थी, वह भी उन्हीं में खो जाना चाहता था। नसों में ख़ून तेज़ी से दौड़ने लगा, बैठा हुआ एक्वेरियम की तरफ़ मुँह करके था लेकिन अब वह अल्ताफ़ और उसे लड़की के बीच में ही ख़ुद को महसूस करने लगा था।

उनकी कुछ फुफुसाहट भी बीच-बीच में सुनाई दे जा रही थी लेकिन स्पष्ट नहीं थी, एक बार तो जैसे आकाश उर्फ़ अल्ताफ़ ने जरा ज़ोर से कह दिया ‘ओके, बेबी, संडे को, अक्शा बीच, गोल्डन नेस्ट कॉटेज, दोपहर तक।’

और... शायद लड़की ने सिर हिला दिया होगा, लेकिन वह जान गया था कि उनका प्रोग्राम संडे को गोल्डन नेस्ट कॉटेज में था।

धीरे-धीरे वह धीरे से उठा और ख़ुद के मुँह को छुपाए आगे बढ़ गया, कोई उसे पहचान नहीं पाया। थोड़ा आगे जाकर उसने पैंट की जेब से फ़ोन निकाला और किसी का नंबर लगाकर धीरे-धीरे उसे कुछ समझने लगा।

डैनी के पिता कमल किशोर, जिसे लोग केके नाम से ही जानते-पहचानते थे, का बहुत सारा काम फैला हुआ था। मामूली से परिवार से ताल्लुक़ रखते हुए आज उनकी बराबरी का उनकी बिरादरी में कोई नहीं था। मुंबई से नासिक तक के बीच में तीन पेट्रोल पंप, कई बड़ी होटलों में भागीदारी और शेयर मार्केट के किंग कहे जाने वालों में से एक थे। लाखों से फैला कारोबार करोड़ों में फैल चुका था। दादर के पास ही वर्ली-सी लिंक के पास और रुस्तम अपार्टमेंट की सत्रहवीं मंज़िल पर उनका थ्री बीएचके फ्लैट था। एकदम-सी व्यू की तरफ़, इसे इन्होंने अपनी पसंद से अधिक पैसा देकर ख़रीदा था। उनकी दूसरी और कमसिन पत्नी, ट्रिल्बो, जिसे वे प्यार से तितली ही कहा करते थे, की पसंद पर।

केके, पहली पत्नी जिसे एक लड़का भी था चार साल का तभी गुज़र चुकी थी। केके को अपना बिजनेस सँभालना और लड़के को भी देखना बहुत मुश्किल हो रहा था। ऐसे में एक छोटी-सी डोमेस्टिक पार्टी में उनकी मुलाक़ात ट्रिल्बो से हो गई। ट्रिल्बो खुले ख़यालात की महिला थी, बहुत जल्द ही जाम से जाम टकराए और ट्रिल्बो केके के गोद में मचलने लगी।

केके की चाहत भी जवान थी और ज़रूरत भी बहुत थी, इसीलिए अपना ध्यान भी ट्रिल्बो की ओर घुमा दिए। वह विधवा थी, दो साल की बच्ची की माँ, लेकिन उसके नयन नक्श और शारीरिक गठन को देखते हुए उसके बाँकपन में रत्ती भर भी फ़र्क़ नहीं आया था। वह बच्ची को आया के पास छोड़कर अपने ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिए ही किटी पार्टी और दोस्तों के संगत में कुछ देर के लिए आ जाया करती थी, विधवा थी तो क्या हुआ हसरतें तो अभी जवानी के चरम पर थी।

केके से दो-चार मुलाक़ात के बाद ही वह बच्चे को लेकर केके घर आ गई और दोनों की रातें रंगीन होने लगीं।

हालाँकि सुशी का शालिनी बुलाया जाना ट्रिल्बो को पसंद नहीं था, फिर भी केके की पसंद पर ख़ुद को तितली कहा जाना जब मान लिया था, तो उसी तरह सुशी को भी शालिनी मान लिया था। शालिनी को सभी शालू बुलाते थे।
 
शालू अच्छे क़द-काठी, छरहरे बदन की और तीखे नैन-नक्श की युवती थी। तेइस चौबीस साल की शालिनी, जिस किसी की भी नज़रों के सामने से गुज़रती, वो वहीं एक पल ठिठककर उसको देखता ही रह जाता था। ग़ज़ब की ख़ूबसूरती लिए उसका पूरा बदन मानो कुदरत ने विशेष साँचे में ढलकर बनाया था। मद माता यौवन, चाल में मादकता, थोड़े हल्के घुँघराले बाल कुछ भूरापन लिए हुए, होंठ रसीले, मानो अभी छलक उठेंगे, आँखें शराब के जाम की तरह छलकती हुई थीं। अगर किसी को देखकर हल्के से मुस्कुरा दे तो हृदय के धमनियों की गतिविधि तेज़ हो जाए। लोग तो सोचते थे कि कोई मरा हुआ व्यक्ति भी देख ले तो उसके शरीर में हलचल की तरंगे दौड़ जाएँ। ऐसी थी शालिनी उर्फ़ शालू की बेमिसाल सुंदरता, आवाज़ में भी वह मिठास की मानो कोयल की कुहुक उठी हो। गदराये बदन की शालू कइयों के जीने की उम्मीद थी, कईयों के मर जाने का मयखाना भी।

अचानक से ही यह बदलाव उसके बचपन से ही उसमें आने लगे थे, घर का माहौल भी मदभरा ही था।

केके पैसे वाले तो थे ही और ट्रिल्बो भी अपने बदन की कामुकता से भरी मालामाल ही थी। उस के नशीली आँखों में भी ग़ज़ब की शोखी थी, वह जब भी केके को पलकें उठा कर देखती और हल्के से मुस्कुराकर इशारा भर कर देती तो केके पिघलकर पानी-पानी हो जाते और फिर समय कोई भी हो कुछ देर के लिए कमरे के भीतर से हल्की-हल्की सिसकारी की आवाज़ आने लगती।

घर में कोई ज़्यादा लोग थे नहीं, केवल डैनी, शालू और मम्मी डैडी, चार लोग ही। डैनी बाहर गया होता तो शालू को अकेला किसी काम में उलझाकर दिन में भी केके और तितली जम जाते दोनों।

शालू भी लगभग तेरह चौदह साल की हो चुकी थी, थोड़ी-बहुत तो दुनियादारी से भी वाक़िफ़ हो ही चुकी थी। अधिकतर टीवी के चैनलों ने ही उसे बहुत कुछ बता दिया था और अब तो वह धीरे-धीरे अपनी मम्मी-डैडी के प्रेम प्रसंग से भी और समझदार होती जा रही थी। सामने बेटी है या बेटा इससे उन्हे कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता था, बस मामूली से झिझक का ही परदा था, वरना तो केके पैंसठ के आस-पास और उनकी तितली भी पचास की सीमा रेखा के बीच थी, लेकिन उन दोनों के हाव-भाव पैंतीस-चालीस की उम्र वालों को भी मात दे रहे थे। घर का वातावरण पारिवारिक कम, कामुक ज़्यादा नज़र आता था और इसका असर सीधा शालू और डैनी पर भी पढ़ रहा था।

समय को पंख लगाकर उड़ते देर नहीं लगती। शालू ने मम्मी डैडी के रूम में एक छोटा-सा खुफिया छेंद ढूँढ लिया था, जिस पर किसी और की नज़र नहीं पड़ी थी, जैसे ही केके और उनकी प्यारी तितली कमरे के भीतर जाते, वह झट से छुपकर उस छेंद पर नज़र गड़ा देती। देखकर तब उसे बड़ा आनंद आता, अब तक वह कई काम कलाओं को मन-ही-मन सीख चुकी थी।

पंद्रह वर्ष की होते-होते उसने अपना एक बॉयफ्रेंड भी बना लिया था जो उम्र में इक्कीस साल का था, दूसरा उसका साथी बना जब अट्ठारह साल की हुई और बाइस की होते-होते तो वह कईयों के साथ बिस्तर पर सलवटें डाल चुकी थी। अब यह सब उसके लिए आसान हो चुका था और इसमें उसकी ख़ूबसूरती और गदराए ये बदन की मादकता और भी जवानी में चार चाँद लगा रहे थे।

आज केके और तितली कहीं बाहर गए हुए थे देर रात तक आने के संभावना थी। अक्सर जब वे कहकर जाते कि देर से आना होगा तो रात के दो तीन का बज जाना आम बात थी। उनके जाने से घर में केवल डैनी और शालू ही बचे थे। डैनी तो कहीं जाने के मूड में नहीं था लेकिन शालू अपने मेकअप में तैयार हो रही थी, किसी का अपॉइंटमेंट होगा, डैनी इस बात को समझ रहा था लेकिन अभी ख़ामोश था और सोफ़े पर बैठा बेवजह की टीवी ऑन करके समय बिता रहा था। बीच-बीच में उसके होठों पर मंद मंद मुस्कान भी तैर जाती थी, उसे शायद इंतज़ार था शालू के तैयार होकर हाॅल में आने का।

धीरे से कमरे का दरवाज़ा खुला, शालू के हाल में क़दम रखते ही परफ्यूम का हल्का-सा झोंका फैल गया। मुस्कुराती हुई डैनी के पास आई, ग़ज़ब की लग रही थी, आज हाफ़ स्कर्ट और टॉप में उसके मदभरे यौवन से होठों की मधुर मुस्कान और एक हाथ में छोटा-सा लटकता हुआ पर्श, ऊँचे हिल की सैंडल, बिजलियाँ गिरा रहे थे। बड़े गौर से उसे नीचे से ऊपर तक डैनी ने देखा और फिर मुस्कुराते हुए बोला– “कम ऑन शालू, बहुत ख़ूबसूरत लग रही हो आज तो तुम!”

“कब नहीं लगती!” उसने भी उसी अंदाज़ में जवाब दिया।

“आओ बैठो, कहाँ गिरेगी यह ख़ूबसूरती!” कहते हुए डैनी ने शालू की कलाई पकड़कर अपने बगल ही सोफ़े की ओर खींच लिया।

“क्या बात है आज भाई भी किसी मूड में है शायद।”

“अब ऐसी अदा सामने हो तो मूड बन ही जाता है, सच, बहुत दिनों से उतर चुकी हो दिल में शालू, लेकिन कभी कह नहीं पाया। आज शाम भी है मौक़ा भी है, क्यों नहीं यहीं ठहर जाओ, मेरे पास!”

“व्हॉट? क्या बोल रहा है? तेरी नियत ठीक नहीं लग रही, किससे बात कर रहा है! कहाँ है तू?”

“यही हूँ डार्लिंग, तेरे बगल, अपने हाल में और तेरी जवानी के साथ। देख नहीं रही क्या तू?”

“क्या बोल रहा है, मैं तेरी बहन हूँ!”

“अमाँ छोड़ न बहन-वहन की बातें, आज तो अपनी ही है रातें। आजा मेरी बाहों में आज, फिर देख तुझे कैसा एहसास दिलाता हूँ, भूल जाएगी सभी को। जानता हूँ तेरे दोस्तों को और किसके साथ कहाँ टाइम पास करती है।” कहता हुआ डैनी शालू के और क़रीब हो गया, साँसों की गर्मी उसकी बढ़ने लगी थी, अब तो शालू भी ख़ुद के भीतर की गर्मी को महसूस करने लगी थी, फिर भी पीछा छुड़ाने के लिए बोली– “चुप बैठ, आज तू होश में नहीं है, कुछ भी बक रहा है।”

डैनी समझ चुका था कि शालू अब ज़्यादा दूर नहीं है।
 
उसने धीरे से अपना मोबाइल ऑन किया और एक वीडियो शालू की ओर कर दिया। एक मिनट में ही ख़ुद को निर्वस्त्र आकाश उर्फ़ अल्ताफ़ के साथ ख़ुद को देखकर अवाक रह गई और डैनी के हाथ से मोबाइल छिनने लगी। डैनी की पकड़ मज़बूत थी उसने उसे ऑफ किया और फिर से जेब में डाल लिया। शालू ठंडी हो चुकी थी।

“यह! यह! तुझे कहाँ से मिला?”

“मरीन लाइंस के समंदर किनारे जिसकी गोद में सोकर अक्सा बीच के गोल्डन कॉटेज का प्लान बना रही थी, मैं भी वहीं था तुम्हारे पीछे।”

“ओह्ह!”

“चल छोड़ मज़ाक़ मत कर चलते हैं बेडरूम में।”

“नहीं डैनी, तू मेरा...”

“पगली, क्या फ़र्क़ पड़ता है, और फिर हम ही कौन से सगे हैं! तेरा बाप दूसरा, मेरी माँ दूसरी, आख़िर वे दोनों भी तो मज़े ले रहे हैं न, फिर हम क्यों प्यासे रहें? और तू भी कहाँ गंगाजल-सी पवित्र है! छोड़ सब, आ चलते हैं बेडरूम में।”

डैनी बेडरूम की ओर चल दिया। शालू भी खिंचती चली गई। आज एक और पार्टनर उसे मिल चुका था।

एक बार ही शर्म की दीवार को टूटने में वक़्त लगता है, एक बार टूट जाने पर फिर दरवाज़ा खुला का खुला ही रह जाता है। फिर तो चाहे जब आओ चाहे जब जाओ।

अब डैनी और शालू के लिए वह रोज़मर्रा का खेल हो चुका था। उसी से शालू को यह भी पता चला कि डैनी के संबंध उसी से ही नहीं, बल्कि उसकी माँ से भी हैं, कभी-कभी डैडी बाहर चले गए तो दो-तीन दिन उनका आना नहीं होता और तब मम्मी और डैनी ही एक-दूसरे के पार्टनर होते हैं। इसीलिए उसकी तरफ़ भी बढ़ने की उसकी हिम्मत भी हुई। शालू यह भी जानती है कि कभी-कभी सतीश अंकल भी आते हैं मम्मी से मिलने। पहले वह दोनों ही एक-दूसरे के लवर थे, कई बार वह ख़ुद छेद में से उन दोनों के बीच को भीतर देख चुकी है और जब भी देखी है उसका भी दिल अंकल से मिलने को हुआ है लेकिन मम्मी की वजह से वह ख़ामोश ही रही। उसने कई बार अंकल को भी अपनी और प्यासी नज़रों से देखते हुए देखा था लेकिन उन्हें ज़ाहिर नहीं होने दी थी।

डैनी के साथ भी दो साल का समय गुज़र चुका था। वह चौबीस की उम्र पार कर रही थी, उम्र के साथ-ही-साथ उससे दुगनी उसकी कामवासना बढ़ रही थी। धीरे-धीरे वह सेक्स एडिक्ट होती जा रही थी। रोज़-रोज़ उसको ज़रूरत रहने लगी प्यास बुझाने की, अब वह साधारण लड़की नहीं रही थी। घर से मिली खुली छूट, घर का वातावरण और पैसों की मनमानी ने उसे बहुत दूर तक धकेल दिया था। वह इस रास्ते से लाख चाहकर भी अब लौट नहीं सकती थी।

कभी कोई पार्टनर के न मिलने पर, वह ख़ुद भी अकेले डांस क्लब में चली जाया करती थी और वहीं किसी को अपने शिकंजे में लेकर क्लब रूम में ही चली जाती थी और घंटे दो घंटे बाद वह फ्रेश मूड में कमरे से बाहर निकलती और अपने फ्लैट पर आती।

कभी-कभी उसका मूड कुछ अलग से करने को होता तो गाड़ी उठाती और पहुँच जाती बांद्रा के बैंड स्टैंड पर, समुद्र के किनारे जगह जगह बैठे जिगोलो पर नज़र घुमाती और जो बंदा हट्टा-कट्टा नज़र आता उस पुरुष वेश्या को इशारा कर बुला लेती और गाड़ी में बैठकर पहुँच जाती किसी पॉश होटल के कमरे में।

वासना में डूबी शालू केवल सेक्स एडिक्ट तक ही सीमित नहीं रही बल्कि वासना के मेरी और दोस्तों के संगत में अब वह ब्राउन शुगर, कोकीन, चरस आदि के नशे की ओर भी बढ़ चुकी थी। कामोत्तेजक ड्रग्स भी लेना शुरू कर दिया था। उसका पूरा शरीर, पूरी सोच, पूरी पसंद सब कुछ हवस के जाम में घुल चुके थे। महँगी से महँगी कोई शराब या कोई दूसरी नशे की ऐसी चीज़ नहीं जिसका स्वाद उसने चखा न हो।

ऐसा भी नहीं कि शालू की यह सारी हरकतें केके या ट्रिल्बो के नज़र में ना आई हो। केके मामूली आदमी नहीं थे, यहाँ तक का सफ़र उन्होंने ऐसे ही हासिल नहीं कर लिया था लेकिन काम की अधिकता और पैसों के जादू ने उन्हें इतना मौक़ा ही नहीं दिया कि समय के रहते अपने बीवी बच्चों पर नज़र रख सकें, ध्यान दे सकें। तितली भी उन्हें दूसरी तरफ़ ध्यान देने नहीं दे रही थी। आज भी उसके संगी साथी आते-जाते थे। लेकिन यह सब वह इतनी होशियारी से करती थी कि केके को अधिक सोचने का समय ना मिले। हालाँकि केके भी अपनी गैर मौजूदगी में होने वाले तितली के खेल से वाक़िफ़ थे, लेकिन उनकी भी अपनी मजबूरी यही थी की उम्र हो जाने के बाद तितली को संतुष्ट कर पाना उनके वश में नहीं था, और इसीलिए जानकर भी अंजान बने रहना उनकी विवशता भी थी।

कई बार केके और ट्रिल्बो ने कोशिश भी किया कि शालू की शादी हो जाए, शालू से उन्होंने इस विषय में चर्चा भी किया कि कोई लड़का पसंद हो तो बताएँ, लेकिन शालू क्या कहती किसका नाम लेती उसे तो रोज़ एक नए-नए बेड पार्टनर की चाहत थी। अब किसी एक के साथ बंधकर वाइफ बनना उसे पसंद नहीं था। जो हर बंधन से आज़ाद और बदलती थाली का भोजन पसंद करने लगे, उसे शाकाहारी चीज़ पसंद नहीं आती। शालू डेली चेंज की आदी हो चुकी थी और वह साफ़ मना कर देती थी कि उसे शादी नहीं करना है।

केके और तितली भी सब समझ रहे थे लेकिन ज़ोर-जबरदस्ती भी नहीं कर सकते थे। पानी बहुत आगे तक बह चुका था उसे इकट्ठा नहीं किया जा सकता था। वह दोनों ही समझाते और ख़ामोश हो जाते।
 
इसी तरह समय और बीतता रहा शालू भी तीस के क़रीब पहुँच चुकी थी और आधुनिकता के चकाचौंध में बहुत आगे तक निकल चुकी थी अब लौट पाने की स्थिति वह भी नहीं थी। इस बात को वह भी जानती-समझती थी लेकिन कोई पर्याय नहीं रह गया था।

ऐसे ही एक दिन तो तब शालू का माथा ठनका जब आधे नशे और आधे होश में उसके दोस्तों ने जब उसे स्क्रीन पर एक क्लिप दिखाए। उसने उसमें देखा कि वह अकेले ही निर्वस्त्र नहीं थी बल्कि चार-पाँच लोग भी वस्त्रहीन थे और सभी उसके जिस्म से खेल रहे थे। वह सभी के हाथों की कठपुतली बनी हुई थी। यह देखकर वह ख़ुद पसीने-पसीने हो गई, समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या देख रही थी, क्या हो रहा था और जो हो रहा था क्या वह ख़ुद उसके साथ ही हो रहा था! वह काँपने लगी थर थर, पूरा बदन पसीने से भीग गया, अवाक! बेहोश होते-होते बची। स्क्रीन पर उभरता दृष्य बंद हो गया। एक ने पानी का ग्लास उसकी और बढ़ाया और बोला– “कम ऑन बेबी, लो पानी पियो, इतना टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं। यह तो खेल है खेला जाता रहेगा, नॉर्मल हो जाओ, घबरा क्यों रही है, तुझे ज़्यादा कुछ नहीं करना होगा।”

शालू ने काँपते हाथों से पानी का गिलास लिया और एक ही झटके में ख़त्म कर ग्लास टेबल पर रखते हुए सवाल या नज़रों से उसे देखने लगी।

“देख शालू, तुझे तो पता है कि हमारे घर का दरवाज़ा एक ही नहीं होता अलग-अलग घर अलग-अलग दरवाज़े। तू बहुत बड़े घर की बेटी है इसीलिए तुझे खुली छूट है लेकिन हम भी मजबूर हैं। ऊपर से दबाव आ रहा है कई दिनों से हमने लड़कियों की सप्लाई नहीं दिए। लड़कियाँ जाएगी नहीं तो हमारा खर्च कैसे चलेगा! अब तुझे भी हमारा काम करना होगा। तुझे कुछ ऑफ़िस और एक दो कॉलेज के पते दे दिए जाएँगे, वहाँ के हमारे लोगों का परिचय भी तुझे मिल जाएगा। तुझे उनसे मिलकर कुछ लड़के-लड़कियों को ये ड्रग्स भी देने होंगे और यहाँ तक ख़ूबसूरत कन्याओं को लाना भी होगा। तेरी बहार भी बरकरार रहेगी और हमारा भी काम चलता रहेगा। और हाँ, तूने तो ख़ुद को देख ही लिया है आगे क्या हो सकता है यह तू ख़ुद समझ सकती है। जा अब अपने घर, घर वाले तेरा इंतज़ार करते होंगे और हम भी करेंगे।”

शालू भीतर से घबराई हुई होने के बावजूद मुस्कुराई और ढंग का इशारा करते हुए खड़ी हो गई। मानो इस काम को उसने मंज़ूरी दे दी हो। गले मिली और सीधा नीचे आकर अपनी गाड़ी में बैठ गई। गाड़ी सड़क पर उतरते ही कब ज़ीरो से एक सौ बीस की स्पीड में पहुँच गई उसे पता ही नहीं चला। उसकी पसलियाँ आपस में टकराकर धाड़-धाड़ बज रही थीं, धड़कन इतनी बढ़ गई थी के मुँह से सिस्कारी-सी बजने लगी थी। हाँफती हुई ही गाड़ी चला रही थी, उसे इस समय ख़ुद नहीं पता कि वह गाड़ी में बैठी गाड़ी चला रही है। एक सौ बीस से आगे की ओर बढ़ता स्पीड काँटा एक सौ तीस, एक सौ चालीस! एक सौ पचास! और... और... फिर अचानक धड़ाम!

एक ज़ोर की आवाज़ के साथ गाड़ी सड़क पर खड़े टैंकर से टकराई! ज़ोर का धमाका हुआ, झटका इतना जबरदस्त था कि गाड़ी पूरी तरह पिचक गई थी, उसमें कोई था भी कि नहीं, यही पता लगाना मुश्किल हो रहा था। सिर्फ़ फैलता जा रहा ख़ून था और पिचकी हुई गाड़ी!

उड़ान, एकाएक रुक गई थी, ज़िंदगी सदा-सदा के लिए शांत होकर, न गिने जा सकने वाले टुकड़ों में सिमट गई थी।

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वर्जित सुख

'वर्जित सुख' जिसे समाज पाप कहता है, लेकिन बंद कमरों में हर कोई उसे जीने की ख्वाहिश रखता है।

राजस्थान के जोधपुर जिले का वह छोटा सा गाँव 'अज़ानगढ़' आज अपनी सबसे पुरानी और रईस विला की रोशनी में नहाया हुआ था। विला के हर कोने से शहनाइयों की गूंज अब थम चुकी थी।

मेहमानों की गाड़ियां धूल उड़ाती हुई वापस जा चुकी थीं। विला के विशाल दरवाजों को बंद कर दिया गया था और अब वहां सिर्फ रात के सन्नाटे और थके हुए नौकरों की फुसफुसाहट का राज था।

लेकिन विला की दूसरी मंजिल पर, पश्चिम दिशा वाले उस बड़े कमरे में, एक दिल ज़ोरों से धड़क रहा था।

यह 'सुहाग-कक्ष' था। कमरे को दुल्हन की तरह सजाया गया था। मोगरे और गुलाब की ताज़ा फूलों की लड़ियाँ बिस्तर के चारों तरफ लटकी थीं, जिनकी मादक और भारी खुशबू कमरे की हवा में ऐसे घुली हुई थी कि सांस लेने पर नशा सा चढ़ता था। कमरे के बीचों-बीच सागवान की लकड़ी का एक विशाल पलंग था, जिस पर लाल रंग की मखमली चादर बिछी थी और बीच में फूलों की सेज सजाई गई थी।

और उस पलंग के बीचों-बीच, अपने घुटनों को छाती से लगाए, सिमटी हुई बैठी थी—कामिनी।

22 साल की कामिनी। उसकी खूबसूरती ऐसी थी कि अगर वह घूंघट उठा दे तो कमरे के दीये फीके पड़ जाएं। उसका रंग दूधिया गोरा था, जो राजस्थानी गर्मी में तपे बिना, विला की छांव में पला-बढ़ा था। उसने लाल रंग का भारी-भरकम, सोने की तारों से कढा हुआ लहंगा पहना था। उसका वजन इतना था कि कामिनी को हिलने में भी मशक्कत करनी पड़ रही थी।

उसने अपने चेहरे को एक लंबे, पारदर्शी घूंघट में छिपा रखा था, लेकिन घूंघट के अंदर उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखें डर, संकोच और एक अनजानी उम्मीद से भरी थीं।

कामिनी ने अपनी हथेलियों को देखा, जिन पर गहरी मेहंदी रची थी। मेहंदी की गंध और मोगरे की गंध मिलकर उसे एक अजीब सी बेचैनी दे रही थी। उसने अपनी सहेलियों और चाचियों से सुना था कि सुहागरात एक लड़की की ज़िंदगी की वह रात होती है जब वह 'लड़की' से 'औरत' बनती है। उसे बताया गया था कि आज रात उसका पति, प्रताप सिंह, उसके जिस्म का मालिक बनेगा।

कामिनी के शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। वह अभी तक पूरी तरह से 'अछूती' थी। किसी भी मर्द ने आज तक उसकी उंगली भी नहीं पकड़ी थी। उसका शरीर एक बंद कली की तरह था, जो खिलने के लिए तैयार तो था, लेकिन डरा हुआ भी था।

कमरे में एसी नहीं था, सिर्फ पुरानी विला की मोटी दीवारें और छत का पंखा था जो धीरे-धीरे चल रहा था। भारी कपड़ों और गहनों की वजह से उसे पसीना आ रहा था। पसीने की एक बूंद उसकी कनपटी से लुढ़कती हुई, उसके गाल से होती हुई, उसके भारी सोने के हार के नीचे से गुज़री और उसके चोली की गहरी घाटी में समा गई।

कामिनी ने अपनी सांस रोकी। उसकी चोली बहुत तंग थी। दर्जी ने उसे जानबूझकर इतना कसा हुआ बनाया था कि कामिनी का यौवन उभर कर दिखे। उसके युवा, 21 साल के सख्त और सुडौल स्तन उस कपड़े में बुरी तरह कसे हुए थे। हर सांस के साथ उसे अपनी छाती पर दबाव महसूस हो रहा था, जैसे उसके स्तन उस कैद से आज़ाद होना चाहते हों। उसे अपने स्तनाग्र पर कपड़े की रगड़ महसूस हो रही थी, जो डर और उत्तेजना के मिश्रित भाव से सख्त हो गए थे।

उसने अपनी कमर को थोड़ा हिलाया। भारी लहंगे के नीचे उसके गोल और भरे हुए नितंब गद्दे में धंसे हुए थे। उसे अपने जांघों के बीच, अपनी योनि में एक अजीब सी मीठी टीस, एक भारीपन महसूस हो रहा था। यह डर था या प्यास? वह नहीं जानती थी, क्योंकि उसने कभी इस प्यास को बुझाने का अनुभव नहीं किया था।
 
दीवार घड़ी ने टन-टन करके 12 बजाए। आवाज़ सन्नाटे में गूंज गई।

"खट... खट... खट..."

गलियारे में भारी कदमों की आहट हुई। कामिनी का दिल गले में आ गया। धड़कनें इतनी तेज़ हो गईं कि उसे लगा उसका ब्लाउज फट जाएगा। उसने अपना घूंघट और नीचे खींच लिया और अपनी मुट्ठी भींच ली, जिससे उसकी चूड़ियाँ खनक गईं।

प्रताप आ रहा था। उसका पति। वह आदमी जिसे उसने फोटो में देखा था और जयमाला के वक्त एक झलक। वह आदमी जो आज रात उसके नाज़ुक शरीर को तोड़ेगा।

कामिनी ने मन ही मन अपनी माँ की विदाई के वक्त कही बातें दोहराईं—"बेटी, पति परमेश्वर होता है। वो जैसा चाहे, जो चाहे, उसे करने देना। यह उसका हक़ है। थोड़ा दर्द होगा, खून भी निकलेगा, पर उफ मत करना। यही रीत है।"

दरवाजे की कुंडी हिली। दरवाजा खुला और फिर जोर से बंद हुआ। अंदर से सिटकनी लगाने की आवाज़ आई।

कमरे में एक और गंध फैल गई, जो मोगरे और गुलाब की खुशबू को चीरती हुई कामिनी की नाक तक पहुँची—एक तीखी, कड़वी और सड़ी हुई गंध।

शराब की गंध।

कामिनी ने घूंघट की झीनी आड़ से अपनी नज़रें झुकाए हुए नीचे देखा। उसे काले रंग के चमड़े के जूते दिखाई दिए जो थोड़े लड़खड़ा रहे थे। प्रताप सीधा नहीं चल पा रहा था।

"अरे... मेरी रानी..." प्रताप की आवाज़ आई। वह आवाज़ भारी थी, लड़खड़ाती हुई और उसमें वह रोब नहीं था जो एक ठाकुर में होना चाहिए। उसमें एक लाचारी और नशा था।

प्रताप बिस्तर के पास आया और धड़ाम से बैठ गया। गद्दे पर इतना ज़ोरदार उछाल आया कि कामिनी का संतुलन बिगड़ गया और वह एक तरफ झुक गई।

"घूंघट... उठाओ..." प्रताप ने आदेश दिया। उसकी आवाज़ में कामुकता कम और ज़िद ज्यादा थी।

कामिनी के हाथ कांप रहे थे। उसने धीरे-धीरे, कांपते हाथों से अपना भारी घूंघट उठाया। उसने अपनी पलकें ऊपर कीं।

सामने प्रताप बैठा था। उसकी आंखें लाल थीं और सूजी हुई थीं। वह पसीने में तर था और उसने अपनी शेरवानी के ऊपर के तीन बटन खोल रखे थे, जिससे उसकी पतली और बाल रहित छाती दिख रही थी। वह देखने में बुरा नहीं था—गोरा चिट्टा था—लेकिन उसका शरीर ढीला-ढाला था।

उसकी छाती पतली थी और पेट थोड़ा बाहर निकला हुआ था। वह विला का छोटा ठाकुर था, जिसे ऐशो-आराम और मुफ्त की दौलत ने अंदर से खोखला और कमजोर बना दिया था।

"वाह..." प्रताप ने कामिनी के चेहरे को देखा, फिर उसकी गर्दन को, और फिर उसकी चोली में कैद उफनते हुए स्तनों को। "तुम तो... तुम तो फोटो से भी ज्यादा माल हो।"

वह आगे झुका। उसके मुंह से व्हिस्की और प्याज की इतनी तेज़ बदबू आई कि कामिनी ने अपनी नाक सिकोड़ ली और चेहरा पीछे कर लिया। लेकिन प्रताप ने उसे देखा नहीं, या शायद उसे परवाह नहीं थी।

उसने अपने दोनों हाथ कामिनी के नंगे कंधों पर रख दिए। उसके हाथ गीले, ठंडे और चिपचिपे थे। कामिनी की गर्म त्वचा पर वह स्पर्श किसी मरे हुए जानवर जैसा लगा।

"आज रात... तुम मेरी हो," प्रताप ने कहा और कामिनी को एक झटके से अपनी तरफ खींचा।

कामिनी का चेहरा प्रताप की शेरवानी से टकराया। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं। उसे वह जादुई, रोमांटिक अहसास नहीं हो रहा था जिसके बारे में उसने सहेलियों से सुना था। उसे बस एक शराबी, पसीने से बदबूदार आदमी का बोझ महसूस हो रहा था।

"लेट जाओ," प्रताप ने उसे धक्का दिया।

कामिनी बिस्तर पर चित गिर गई। उसका भारी लहंगा फैल गया। प्रताप उसके ऊपर चढ़ गया। उसका पूरा वजन कामिनी के नाजुक शरीर को दबा रहा था। उसकी हड्डियों में दर्द होने लगा।

"चलो... शुरू करते हैं... बहुत पैसे खर्च किए हैं शादी में," प्रताप ने बेताबी में कामिनी की चोली पर हाथ मारा। वह हुक खोलने की कोशिश कर रहा था, लेकिन नशे की वजह से उसकी उंगलियां काम नहीं कर रही थीं। वह हुक में उलझ रहा था।

"प्रताप जी... प्लीज... धीरे..." कामिनी ने डरते हुए कहा। उसकी आवाज़ रुंध गई थी।

"चुप रहो," प्रताप ने झुंझलाकर चोली के कपड़े को ही खींच दिया।

"चर्र..."

रेशमी कपड़ा उसके कंधे के पास से फट गया। कामिनी की गोरी, मलाईदार बांह नंगी हो गई। प्रताप ने वहां अपना मुंह लगा दिया। वह चूस नहीं रहा था, बस अपनी लार वहां गिरा रहा था, चाट रहा था जैसे कोई कुत्ता हड्डी चाटता है।
 
कामिनी को घिन आई। उसका मन हुआ कि उसे धक्का दे दे, लेकिन उसने मुट्ठी भींच ली और छत को देखने लगी। यह मेरा पति है। यह उसका हक़ है।

प्रताप का हाथ नीचे गया। उसने कामिनी के भारी लहंगे को घुटनों से ऊपर खींचना शुरू किया। कामिनी ने शर्म और डर के मारे अपनी टांगें सिकोड़ लीं और घुटने आपस में जोड़ लिए।

"टांगें खोलो," प्रताप ने हुक्म दिया, उसके घुटनों को जबरदस्ती फैलाते हुए। "मुझे जगह चाहिए। मुझे अंदर जाना है।"

कामिनी ने धीरे-धीरे, कांपते हुए अपनी टांगें सीधी कीं। प्रताप ने अपना हाथ उसके पैरों के बीच डाला। वहां कामिनी ने शादी के लिए खरीदी गई महंगी रेशमी पैंटी पहन रखी थी। प्रताप ने उसे टटोला।

"गीली हो?" प्रताप ने बेहूदगी से पूछा।

कामिनी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। वह गीली नहीं थी, वह सूखी थी, रेगिस्तान की तरह। डर ने उसके शरीर के सारे रस सुखा दिए थे।

प्रताप ने अपनी शेरवानी उतारने की कोशिश की, लेकिन वह फंसी रह गई। उसने झुंझलाकर उसे वैसे ही रहने दिया और अपना पायजामा नीचे खींचा।

कामिनी ने अपनी आंखें कसकर बंद कर लीं। वह उस पल का इंतज़ार करने लगी जब दर्द होगा। जब उसका शरीर फटेगा और वह औरत बनेगी। वह तैयार थी उस दर्द के लिए।

प्रताप उसके ऊपर लेटा हुआ था, हांफ रहा था। उसका पसीना कामिनी के चेहरे पर टपक रहा था। वह अपने लिंग को कामिनी की जांघों पर, उसकी पैंटी के ऊपर रगड़ रहा था।

रगड़... और रगड़…

लेकिन कुछ नहीं हुआ।

"अरे यार..." प्रताप बड़बड़ाया। "यह क्या हो गया?"

कामिनी ने एक आंख खोली। प्रताप पसीने से लथपथ था। वह कोशिश कर रहा था। वह अपने लिंग को अपने हाथ से सहला रहा था, उसे हिला रहा था, कामिनी के चिकने पेट पर रगड़ रहा था, लेकिन उसका 'औजार' साथ नहीं दे रहा था।

वह बिल्कुल नरम, छोटा और सोया हुआ था। शराब की अधिकता और शरीर की कमजोरी ने उसे बेजान कर दिया था। वह खड़ा होने का नाम नहीं ले रहा था।
 
अगले बीस मिनट तक उस सजे हुए कमरे में एक अजीब और शर्मनाक संघर्ष चला।

प्रताप ने हर कोशिश की। वह हताश हो चुका था। अपनी नामर्दी को छिपाने के लिए वह और ज्यादा आक्रामक हो गया। उसने कामिनी के कोमल स्तनों को जोर से दबाया, इतनी जोर से कि कामिनी के मुंह से चीख निकल गई। उसने उसके निप्पल को काटा।

कामिनी दर्द से तड़प रही थी, लेकिन उसका शरीर उत्तेजित नहीं हो रहा था। और प्रताप का शरीर... वह तो जैसे मर चुका था।

कामिनी वहां लेटी थी, एक बेजान गुड़िया की तरह। उसका ब्लाउज फटा हुआ था, लहंगा कमर तक उठा हुआ था, उसकी जांघें नंगी थीं, और उसका पति उसके ऊपर पसीने में नहाया हुआ अपनी ही नाकामी से लड़ रहा था।

प्रताप ने उसका हाथ पकड़कर अपने ढीले लिंग पर रख दिया।

"इसे हिलाओ," प्रताप ने आदेश दिया। "इसे खड़ा करो।"

कामिनी ने पहली बार किसी पराये मर्द के अंग को छुआ। वह नरम था, चिपचिपा था। उसने उसे सहलाया, लेकिन उसे घिन आ रही थी। उसे कोई उत्तेजना महसूस नहीं हुई, सिर्फ दया और अजीब सा डर महसूस हुआ।

"साली शराब..." प्रताप ने आखिरकार हार मान ली। "आज ही ज्यादा पी ली। दोस्तों ने पिला दी।"

वह थक गया था। हताशा, शर्मिंदगी और नशे ने उसे घेर लिया। वह कामिनी के ऊपर से लुढ़क कर बगल में गिर गया।

"कल..." प्रताप ने आंखें बंद करते हुए कहा, अपनी आवाज़ में झूठा वादा भरते हुए। "कल करेंगे। कल पक्का। आज... मूड नहीं है। तुम सो जाओ।"

और दो मिनट के अंदर, प्रताप के गहरे, भद्दे खर्राटे गूंजने लगे।

कामिनी सन्न रह गई।

क्या यही थी सुहागरात? क्या इसी पल के लिए उसने इतने सपने देखे थे? क्या इसी के लिए उसने अपनी माँ का घर छोड़ा था?

वह वहां लेटी रही, छत पर घूमते पंखे को घूरते हुए। उसकी आंखों के कोनों से आंसू बह निकले और कानों में समा गए। उसे अपने शरीर पर प्रताप की चिपचिपी लार और पसीने की गंध महसूस हो रही थी, लेकिन उसे वह 'स्पर्श' नहीं मिला था जो उसकी आत्मा को छू सके।

उसका शरीर अभी भी अछूता था। उसकी योनि अभी भी बंद थी, प्यासी थी। उसके स्तन, जिन्हें एक मर्द की मज़बूत पकड़ और प्यार की ज़रूरत थी, वे बस प्रताप की नोच-खसोट की वजह से दुख रहे थे। उसे अपने पेट के निचले हिस्से में एक भारीपन महसूस हो रहा था—एक अधूरी प्यास का भारीपन।

कामिनी उठी। उसने अपने कपड़े ठीक किए। फटा हुआ ब्लाउज उसने एक दुपट्टे से ढक लिया। उसने अपनी पैंटी ठीक की।
 
कमरे में प्रताप के खर्राटों की आवाज़ और शराब की बदबू अब असहनीय हो गई थी। उसे ताजी हवा चाहिए थी। उसका दम घुट रहा था। उसे लगा अगर वह एक पल भी और यहाँ रही, तो वह पागल हो जाएगी।

वह बिस्तर से उतरी। उसके पैरों में भारी चांदी की पायल की 'छन-छन' हुई, लेकिन प्रताप नहीं जागा। वह धीरे-धीरे, दबे पांव कमरे की बड़ी खिड़की की तरफ बढ़ी। यह खिड़की विला के पिछले आंगन में खुलती थी।

कामिनी ने भारी मखमली परदा हटाया और खिड़की का पल्ला खोला।

बाहर रात का सन्नाटा था। ठंडी हवा का एक झोंका उसके पसीने से भीगे चेहरे और गर्दन पर लगा। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं और हवा को महसूस किया। चाँद पूरा था और उसकी चांदनी आंगन में दूध की तरह बिखरी हुई थी।

कामिनी ने गहरी सांस ली। वह वापस मुड़ने ही वाली थी कि तभी उसे नीचे आंगन में, बाईं तरफ बने अखाड़े में कुछ हरकत दिखाई दी।

उसने ध्यान से देखा।

नीचे, विला के अखाड़े में, एक आदमी कसरत कर रहा था।

वह राज सिंह थे।

बड़े ठाकुर। प्रताप के बड़े भाई और इस विला के असली मालिक, असली वारिस। 45 साल के राज सिंह, जिनकी पत्नी का देहांत 5 साल पहले हो चुका था।

कामिनी ने उन्हें शादी की रस्मों में देखा था, लेकिन हमेशा घूंघट की आड़ से और दूर से। वे हमेशा गंभीर रहते थे, भारी मूंछें, माथे पर तिलक और सफेद कुर्ता-पायजामा। उनकी आवाज़ में एक ऐसा रोब था कि पूरा गाँव कांपता था।

लेकिन इस वक्त... नज़ारा कुछ और ही था।

राज ने अपने कपड़े उतार रखे थे। वह सिर्फ एक छोटी सी, लाल रंग की लंगोट पहने हुए थे। वह लंगोट उनके भारी नितंबों और लिंग के उभार को कसकर थामे हुए थी, और बाकी पूरा शरीर नंगा था।

48 साल की उम्र में भी उनका शरीर किसी 25 साल के पहलवान से ज्यादा गठीला और मजबूत था। 6 फीट 2 इंच का कद। चौड़ा सीना जिस पर काले बालों का घना जंगल था। उनके कंधे इतने चौड़े थे कि लग रहा था वे आसमान का बोझ उठा सकते हैं। उनके डोले किसी बरगद के पेड़ की टहनियों जैसे मोटे और सख्त थे।

वे एक भारी 'मुदगर' को अपने सिर के ऊपर घुमा रहे थे।

"हुम... हुम... हुम..."

हवा को चीरने की आवाज़ आ रही थी।

हर बार जब वे मुदगर घुमाते, उनकी पीठ और बांहों की मांसपेशियों में एक लहर दौड़ जाती। उनका पूरा शरीर पसीने और सरसों के तेल से चमक रहा था। चांदनी में उनकी सांवली त्वचा तांबे जैसी दमक रही थी।

कामिनी की नज़रें उन पर जम गईं। वह चाहकर भी अपनी पलकें नहीं झपका पा रही थी। यह दृश्य किसी जादू जैसा था।

उसने अभी-अभी अपने पति प्रताप को देखा था—ढीला, कमजोर, शराबी और नामर्द। और अब वह राज को देख रही थी—ताकतवर, विशाल, अनुशासित और पौरुष से भरपूर।

राज ने मुदगर रखा और दंड-बैठक लगाने लगे।

"एक... दो... तीन..."

कामिनी उनकी भारी सांसों की आवाज़ सुन सकती थी। वे लय में थे। जब वे नीचे जाते, उनकी पीठ की रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ मांसपेशियां एक गहरा नक्शा बना देतीं। जब वे ऊपर आते, उनके कंधे किसी चट्टान की तरह उभर आते। उनके नितंब लंगोट में कसे हुए थे और पत्थर जैसे सख्त लग रहे थे।

कामिनी को अपनी छाती में एक अजीब सी जकड़न महसूस हुई। उसकी सांसें तेज होने लगीं। उसने अनजाने में अपना हाथ अपने गले पर रखा और फिर उसे नीचे अपने स्तनों की तरफ ले गई। उसके निप्पल, जो प्रताप के छूने पर, काटने पर भी कुछ महसूस नहीं कर रहे थे, अब राज को इतनी दूर से देखकर ही सख्त हो रहे थे। वे उसके ब्लाउज के कपड़े से रगड़ खा रहे थे।

राज ने कसरत खत्म की। वे खड़े हुए। उनका सीना जोर-जोर से ऊपर-नीचे हो रहा था। उन्होंने पास रखी बाल्टी से पानी का मग भरा।

उन्होंने पानी अपने ऊपर उंडेल लिया।

"छपाक!"

पानी उनके बालों से होता हुआ, उनके चौड़े माथे, घनी मूछों, छाती के बालों और फिर पेट के सिक्स-पैक एब्स से होता हुआ नीचे लंगोट तक बह गया।

कामिनी ने अपनी सांस रोक ली।

उसने देखा कि गीली होने के बाद वह लाल लंगोट उनके लिंग से पूरी तरह चिपक गई थी। वहां एक विशाल, भारी और स्पष्ट उभार था। एक ऐसा आकार जो आराम की अवस्था में भी प्रताप के 'जागे' हुए आकार से कहीं ज्यादा बड़ा और मोटा लग रहा था। वह पानी से भीगा हुआ उभार चांदनी में चमक रहा था।

कामिनी का गला सूख गया। उसके पेट के निचले हिस्से में, उसकी जांघों के बीच एक गीलापन रिसने लगा। उसकी योनि, जो प्रताप के साथ सूखी पड़ी थी, अब अपना रस छोड़ रही थी। यह वो 'प्यास' थी जिसके बारे में उसने सुना था, लेकिन आज पहली बार महसूस किया था।

राज ने अपने गीले बालों को झटका और तौलिए से बदन पोंछने लगे। उन्होंने अचानक ऊपर, कामिनी की खिड़की की तरफ देखा।

कामिनी घबरा गई। क्या उन्होंने उसे देख लिया? वह जल्दी से पर्दे के पीछे छिप गई। उसका दिल किसी पक्षी की तरह फड़फड़ा रहा था। उसे डर था कि कहीं बड़े ठाकुर उसकी चोरी न पकड़ लें।

लेकिन राज ने उसे नहीं देखा था। वे बस आसमान को देख रहे थे, गहरी सांस ले रहे थे। एक अकेले, तन्हा शेर की तरह जो अपने इलाके का मुआयना कर रहा हो।

कामिनी ने पर्दे की ओट से एक आखिरी बार उन्हें देखा। राज अपनी धोती पहन रहे थे।
 
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