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Adultery ' गाँव का टेलर '

वह वापस बिस्तर पर आई और प्रताप के बगल में लेट गई। प्रताप अभी भी खर्राटे ले रहा था। लेकिन अब कामिनी को प्रताप की बदबू परेशान नहीं कर रही थी। उसकी नाक में, उसके दिमाग में अभी भी वह दृश्य बसा हुआ था—पसीना, तेल, मांसपेशियां और वह भीगी हुई लंगोट का उभार।

उस रात, अपनी सुहागरात पर, कामिनी एक नामर्द पति के बगल में लेटी थी, लेकिन उसके सपनों में... उसके सपनों में विला का बड़ा ठाकुर उसे अपनी मजबूत, पसीने से भीगी बांहों में जकड़ रहा था। उसे पता नहीं था कि यह सिर्फ एक सपना नहीं, बल्कि आने वाले तूफ़ान की पहली आहट थी।

विला की चारदीवारी के अंदर, मर्यादा का चीरहरण शुरू हो चुका था। और उसकी शुरुआत कामिनी की उस 'प्यास' से हुई थी जो अब किसी मामूली पानी से नहीं बुझने वाली थी।

◆◆◆
 
शादी को एक हफ्ता बीत चुका था। अज़ानगढ़ की उस विशाल विला में दिन तो किसी तरह कट जाते थे, लेकिन रातें... रातें कामिनी के लिए किसी सजा से कम नहीं थीं।

हर रात वही पुरानी, घिसी-पिटी कहानी दोहराई जाती। प्रताप देर रात को शराब पीकर लड़खड़ाता हुआ कमरे में आता। वह थोड़ी देर कामिनी के जिस्म के साथ जबरदस्ती करने की भद्दी कोशिश करता, उसे नोचता, काटता, और जब उसका 'औजार' साथ नहीं देता, तो वह अपनी नामर्दी का गुस्सा कामिनी पर उतारते हुए गालियां बकता और सो जाता।

कामिनी हर सुबह अपने बदन पर प्रताप के नाखूनों के निशान और अपनी आत्मा पर एक कुंवारी औरत होने का बोझ लेकर उठती। उसकी प्यास बढ़ती जा रही थी, एक ऐसी प्यास जो पानी से नहीं बुझने वाली थी।

दोपहर के 2 बज रहे थे। राजस्थान का सूरज आग बरसा रहा था। विला के मर्द—राज सिंह (बड़े ठाकुर) और मुनीम—बाहर कचहरी या खेतों के काम से गए हुए थे। प्रताप अपने कमरे में एसी चलाकर नशे में धुत होकर घोड़े बेचकर सो रहा था। नौकर अपनी कोठरियों में आराम कर रहे थे।

पूरी विला में एक अजीब सा, भारी सन्नाटा था, सिवाय रसोई के।

कामिनी रसोई में अकेली थी। विला की रसोई बहुत बड़ी थी, पुरानी शैली की, जहाँ आज भी एक कोने में मिट्टी का चूल्हा था और दूसरे कोने में आधुनिक गैस स्टोव। दोपहर का खाना बन चुका था, लेकिन बर्तनों का ढेर लगा हुआ था।

विला का पुराना रसोइया (महाराज) आज बीमार था, इसलिए आज यह काम नई बहू के सिर आ गया था। सास ने हुक्म दिया था कि बहू को घर के काम आने चाहिए, चाहे वह कितने भी बड़े घर की क्यों न हो।

कामिनी सिंक के पास खड़ी बर्तन धो रही थी। रसोई में पंखा तो था, लेकिन चूल्हे की गर्मी और बाहर की लू ने वहां का तापमान बहुत बढ़ा दिया था।

उसने घर पहनने वाली एक हल्की पीली, सूती की प्रिंटेड साड़ी पहनी थी। यह साड़ी देखने में साधारण थी, लेकिन इस वक्त पसीने ने इसे जिस्म की दूसरी त्वचा बना दिया था। रसोई की गर्मी और शारीरिक मेहनत की वजह से कामिनी पसीने में तर-बतर थी।

उसका ब्लाउज, जो पीठ से गहरा कटा हुआ था, पूरी तरह भीग चुका था। पसीने की वजह से ब्लाउज का पतला कपड़ा उसकी गोरी पीठ से चिपक गया था, जिससे उसकी रीढ़ की हड्डी की लकीर और ब्रा की पट्टी का हुक साफ उभर रहा था। उसकी कमर पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं।

कामिनी ने अपने माथे से पसीना पोंछने के लिए हाथ उठाया। उसकी साड़ी का पल्लू उसके कंधे से सरक कर नीचे लटक गया। उसे ठीक करने का होश उसे नहीं था, या शायद गर्मी इतनी थी कि वह चाहती थी कि हवा उसके बदन को छुए।

उसकी गर्दन से पसीने की एक नमकीन बूंद लुढ़की। वह बूंद उसकी कॉलर-बोन से होती हुई, उसके ब्लाउज के गले के अंदर रेंगती चली गई। कामिनी को एक गुदगुदी हुई। वह बूंद उसके दोनों स्तनों के बीच की संकरी और गहरी घाटी में जाकर रुक गई।

कामिनी ने एक गहरी सांस ली। उसका सीना जोर-जोर से ऊपर-नीचे हुआ। ब्लाउज तंग था। प्रताप भले ही नामर्द था, लेकिन उसने सुहागरात पर और उसके बाद की रातों में अपनी कुंठा निकालने के लिए कामिनी के स्तनों को इतनी जोर से मसला था कि वे अभी भी दुख रहे थे और थोड़े सूजे हुए थे। कपड़े की रगड़ से उसके निप्पल संवेदनशील हो गए थे और ब्लाउज के अंदर तन रहे थे।

"हे भगवान... यह ज़िंदगी..." कामिनी बड़बड़ाई। उसने एक भारी पीतल के बर्तन को उठाया और उसे जोर-जोर से रगड़ने लगी, अपना सारा गुस्सा और हताशा उस बर्तन पर निकाल रही थी। उसे अपनी जवानी बर्बाद होती दिख रही थी। उसे एक मर्द चाहिए था। एक ऐसा मर्द जो उसे बांहों में भरे तो उसकी हड्डियों में दर्द न हो, बल्कि एक सुकून मिले। एक ऐसा मर्द जो उसे पूरा कर सके।

तभी, रसोई के दरवाजे पर एक लंबी और चौड़ी परछाई पड़ी। किसी के भारी, रोबदार कदमों की आहट हुई।

कामिनी चौंक गई। उसके हाथ से साबुन छूट गया। उसने मुड़कर देखा।

दरवाजे पर राज सिंह खड़े थे।

वे अभी-अभी खेतों का मुआयना करके लौटे थे। उन्होंने एक सफेद मलमल का कुर्ता और धोती पहनी थी। धूप और धूल की वजह से उनका चेहरा लाल था, जो उनके पौरुष को और बढ़ा रहा था।

कुर्ते के ऊपर के तीन बटन छाती तक खुले थे, जिससे उनका पसीने से भीगा हुआ, घने काले बालों से भरा चौड़ा सीना दिख रहा था। उनकी आस्तीनें कोहनियों तक ऊपर मुड़ी हुई थीं, और उनकी मज़बूत कलाइयों पर नसें रस्सियों की तरह उभरी हुई थीं।

कामिनी घबरा गई। उसका पल्लू नीचे गिरा हुआ था और ब्लाउज पसीने से लगभग पारदर्शी हो रहा था। उसने जल्दी से अपने गीले और साबुन से सने हाथों से पल्लू उठाया और अपनी छाती को ढकने की कोशिश की, लेकिन इसमें हड़बड़ी ज्यादा थी।

"बा... बाबूजी..." कामिनी ने हकलाते हुए कहा (वह जेठ को बाबूजी कहती थी, राजस्थानी रिवाज के अनुसार। "आप? अभी? मुझे लगा आप कचहरी गए हैं।"

राज ने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया। उनकी शेर जैसी गहरी और काली आंखें सीधे कामिनी पर गड़ी थीं। उन्होंने देखा कि कैसे वह घबराई हुई है, कैसे उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही है।

उन्होंने देखा कि पसीने ने उसके ब्लाउज को उसकी छाती से चिपका दिया है, जिससे उसके भारी और कड़े स्तनों का गोल आकार साफ पता चल रहा है। उन्होंने देखा कि उसकी कमर पर साड़ी पसीने से गीली होकर उसकी त्वचा से चिपक गई है, उसके कर्व्स को उभार रही है।
 
"प्यास लगी है," राज ने अपनी भारी, गूंजती आवाज़ में कहा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन था, जो सिर्फ पानी की प्यास नहीं लग रही थी। "बहुत ज़ोर की।"

"मैं... मैं पानी लाती हूँ। फ्रिज से ठंडी बोतल..." कामिनी ने वहां से हटने के लिए कदम बढ़ाया।

"रहने दो," राज ने हाथ उठाया। "फ्रिज का पानी नहीं, मटके का चाहिए। और तुम अपना काम करो।"

राज रसोई के अंदर आ गए।

रसोई काफी बड़ी थी, लेकिन राज के अंदर आते ही वह अचानक बहुत छोटी और तंग लगने लगी। उनके विशाल शरीर और उनकी मर्दाना गंध—पसीना, खेत की मिट्टी, तंबाकू और कड़ी धूप की गंध—ने वहां की हवा को भर दिया।

कामिनी उस गंध से मदहोश होने लगी। यह प्रताप की सड़ी हुई शराब की बदबू नहीं थी, यह एक असली, मेहनतकश मर्द की गंध थी जो किसी भी औरत के हारमोंस को जगा सकती थी।

राज सीधे उस बड़े मिट्टी के मटके के पास गए जो सिंक के बिल्कुल बगल में रखा था। कामिनी वहीं खड़ी थी। राज उसके इतने पास से गुज़रे कि उनका कुर्ता कामिनी की गीली साड़ी से हल्का सा रगड़ खा गया।

कामिनी की सांस हलक में अटक गई। वह पीछे हटने की जगह नहीं पा रही थी। पीछे सिंक था और आगे राज का विशाल शरीर।

राज ने मटके से तांबे का लोटा भरा। उन्होंने गिलास नहीं लिया। उन्होंने लोटा ऊपर उठाया और राजस्थानी अंदाज़ में, मुंह लगाकर नहीं, बल्कि ऊपर से धार बनाकर पानी पीने लगे।

"गट... गट... गट..."

कामिनी उन्हें मंत्रमुग्ध होकर देख रही थी। पानी की मोटी धार उनके मुंह में जा रही थी, लेकिन चूंकि वे बहुत प्यासे थे, कुछ पानी उनके मुंह के कोनों से बहकर उनकी घनी दाढ़ी, उनकी मजबूत गर्दन और फिर उनके खुले हुए कुर्ते के अंदर उनकी छाती पर गिर रहा था। पानी की बूंदें उनके छाती के बालों में उलझ रही थीं और नीचे उनके पेट की तरफ, उनकी धोती की तरफ बह रही थीं।

कामिनी का गला सूख गया। उसे लगा जैसे वह पानी राज के गले से नहीं, बल्कि उसकी अपनी प्यास बुझा रहा हो। वह सम्मोहित सी उनके गले की उस हड्डी को ऊपर-नीचे होते देख रही थी। उसे ख्याल आया कि अगर वह अपनी जीभ वहां रखे, तो कैसा लगेगा।

राज ने पूरा लोटा एक सांस में खाली कर दिया और एक लंबी, संतुष्ट आवाज़ निकाली। "आह..."

उन्होंने लोटा वापस रखा और मुड़े। अब वे और कामिनी बिल्कुल आमने-सामने थे। बीच में मुश्किल से एक फुट की दूरी थी। राज की गर्म सांसें कामिनी के चेहरे पर लग रही थीं।

"अकेली हो?" राज ने पूछा। उनकी नज़रें कामिनी की आंखों में नहीं, बल्कि उसके भीगे हुए ब्लाउज पर थीं, जहां पसीने और पानी की वजह से कपड़ा त्वचा से चिपक गया था।

"जी...," कामिनी ने नज़रें झुका लीं, लेकिन उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

"और प्रताप?" राज ने पूछा। इस सवाल में भाई वाला प्यार नहीं, बल्कि एक मर्द वाला ताना था।

"वो... सो रहे हैं," कामिनी की आवाज़ धीमी हो गई।

"सो रहा है," राज ने एक कड़वी, मज़ाकिया हंसी हंसी। "दोपहर में सोता है, रात को पीता है। और करता कुछ नहीं। नामर्द कहीं का।"
 
कामिनी सन्न रह गई। उसके जेठ ने उसके पति को नामर्द कहा? और वह भी उसके सामने? यह मर्यादा के खिलाफ था, लेकिन... यह कड़वा सच भी था। और राज की आवाज़ में जो गुस्सा और अधिकार था, वह कामिनी को कहीं न कहीं अच्छा लगा। उसे लगा जैसे कोई तो है जो उसका दर्द समझता है।

"लाओ, मैं मदद कर देता हूँ," राज ने अचानक कहा, सिंक में पड़े बर्तनों की तरफ देखते हुए।

"नहीं नहीं बाबूजी!" कामिनी घबरा गई। उसका पल्लू फिर गिर गया। "यह औरतों का काम है। आप क्यों... आप बड़े ठाकुर हैं।"

"विला का काम है," राज ने एक कदम और आगे बढ़ाया। अब उनके और कामिनी के बीच सिर्फ इंच भर का फासला था। कामिनी को राज के शरीर की गर्मी अपनी त्वचा पर महसूस हो रही थी।

राज ने सिंक की तरफ हाथ बढ़ाया, शायद एक भारी पतीले को उठाने के लिए। ऐसा करते हुए, उनकी कोहनी 'गलती से' या 'जानबूझकर' कामिनी के सीने से टकरा गई।

कामिनी के स्तन पर एक सख्त, हड्डी वाला स्पर्श हुआ। उसे करंट जैसा झटका लगा। वह घबराकर पीछे हटी, लेकिन पीछे सिंक का किनारा था। उसका हाथ सिंक की मुंडेर पर रखे पानी से भरे दूसरे लोटे पर लगा।

"छपाक!"

लोटा गिर गया और उसका सारा पानी कामिनी के ऊपर आ गिरा।

"आह!" कामिनी चीखी।

पानी ने उसकी साड़ी के पल्लू और उसके ब्लाउज के सामने वाले हिस्से को पूरी तरह भिगो दिया। पीली सूती साड़ी अब एकदम कांच की तरह पारदर्शी हो गई थी। उसके अंदर का ब्लाउज, उसकी त्वचा का दूधिया रंग, और उसके भारी स्तनों का उभार... सब कुछ राज की भूखी आंखों के सामने नंगा हो गया था।

गीला कपड़ा उसके निप्पल से बुरी तरह चिपक गया था। ठंडे पानी और राज की नज़दीकी की वजह से उसके निप्पल पत्थर जैसे सख्त होकर तन गए थे और कपड़े के बाहर से साफ दिखाई दे रहे थे।

कामिनी शर्म से पानी-पानी हो गई। उसने अपने दोनों हाथ अपनी छाती पर रख लिए। "हे भगवान... मैं..."

राज हटे नहीं। वे उसे घूरते रहे। उनकी आंखों में हवस का एक नंगा नाच था। उन्होंने अपनी नज़रें वहां से नहीं हटाईं।

"भीग गई तुम," राज ने बहुत धीमे, फिसलते हुए स्वर में कहा। उनकी आवाज़ अब भारी और रफ हो चुकी थी। "पूरी तरह।"

उन्होंने अपनी धोती की जेब से अपना बड़ा सा मलमल का रुमाल निकाला।

"लाओ, पोंछ दूँ," राज ने कहा।

इससे पहले कि कामिनी मना करती या पीछे हटती, राज ने अपना रुमाल कामिनी की छाती पर रख दिया। उन्होंने उसके दाहिने स्तन के ऊपर, जहाँ पानी टपक रहा था, रुमाल रखा और हल्के हाथ से दबाया।

कामिनी की सांस रुक गई। उसके जेठ का हाथ... उसके स्तन पर। यह महापाप था। यह अधर्म था। लेकिन उसने उन्हें रोका नहीं। उसका शरीर जम गया था, या शायद वह चाहती थी कि यह स्पर्श न रुके।

राज का हाथ बड़ा और खुरदरा था। रुमाल के बहाने, उन्होंने कामिनी के नरम मांस को अपनी हथेली में महसूस किया। उन्होंने थोड़ा दबाव डाला, अपनी उंगलियों को गड़ाया।

"प्रताप ने कभी ऐसे छुआ है?" राज ने अचानक पूछा। उनकी उंगलियां अब कामिनी के सख्त निप्पल को रुमाल के ऊपर से रगड़ रही थीं। "क्या उसने कभी तुम्हें महसूस किया है?"

कामिनी की आंखों में आंसू आ गए। शर्म, लाचारी और दबी हुई हवस के आंसू। उसने ना में सिर हिलाया।
 
"मुझे पता था," राज ने कहा। "वो हिजड़ा है। उसे नहीं पता कि असली सोने को कैसे पिघलाया जाता है।"

राज ने अपना हाथ हटाया नहीं, बल्कि उसे धीरे-धीरे नीचे की तरफ सरकाया। रुमाल अब कामिनी के पेट पर था। गीली साड़ी में कामिनी की नाभि एक गहरे कुएं की तरह दिख रही थी। राज ने अपनी उंगली उस नाभि पर रखी और गोल घुमाई।

"तुम कांप रही हो, बहू," राज ने उसके कान के पास झुककर फुसफुसाया। "ठंड लग रही है? या... कुछ और?"

कामिनी सचमुच कांप रही थी। उसके पेट में, उसकी बच्चेदानी में एक मीठा दर्द उठ रहा था। राज का स्पर्श... वह कितना अधिकार भरा था। ऐसा लग रहा था जैसे वह उसका मालिक हो, जेठ नहीं।

"बाबूजी... प्लीज... कोई आ जाएगा..." कामिनी ने सिसकते हुए कहा। यह विरोध बहुत कमजोर था, जैसे वह भीख मांग रही हो कि वे रुकें नहीं।

"कोई नहीं आएगा," राज ने एक कदम और आगे बढ़ाया। अब उनका विशाल शरीर कामिनी को सिंक से दबा रहा था। राज की एक मज़बूत जांघ कामिनी की दोनों जांघों के बीच घुस गई।

कामिनी को महसूस हुआ कि राज की धोती के नीचे कुछ बहुत सख्त, गर्म और बड़ा है जो उसकी जांघों और पेट को दबा रहा है। वह उनका लिंग था। वह पूरी तरह जाग चुका था और अपनी मौजूदगी का एलान कर रहा था।

रसोई की हवा भारी हो गई थी।

दाल-सब्जी की महक अब पीछे छूट गई थी, अब वहां सिर्फ मर्द और औरत की गंध थी।

राज ने अपना दूसरा हाथ उठाया और कामिनी के भीगे हुए, पसीने से चिपके बालों की एक लट को उसके चेहरे से हटाया। उनकी उंगलियां कामिनी के गाल और गर्दन को छू गईं।

"तुम बहुत सुंदर हो कामिनी," राज ने कहा। "इस विला के लिए बहुत कीमती। प्रताप तुम्हें डिजर्व नहीं करता।"

उन्होंने अपना चेहरा नीचे झुकाया।

कामिनी को लगा वे उसे किस करेंगे। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं, अपनी मुट्ठी भींच ली। वह तैयार थी। उसका शरीर चीख रहा था कि उसे ले लिया जाए।

लेकिन राज ने उसे किस नहीं किया। वे उसके कान के पास गए। उनकी घनी मूंछें कामिनी के गाल और कान को गुदगुदा रही थीं, जिससे कामिनी के रोंगटे खड़े हो गए।

"आज रात..." राज ने उसके कान में फुसफुसाया, अपनी गर्म सांसें उसके कान के अंदर छोड़ते हुए। "आज रात मैं अपने कमरे में अकेला हूँ। मेरी कमर में बहुत दर्द है। मुझे तेल मालिश चाहिए।"

कामिनी ने अपनी आंखें खोलीं। वह समझ नहीं पाई। क्या वे उसे बुला रहे थे?

"क्या तुम आओगी?" राज ने पूछा। यह सवाल नहीं, हुक्म था। "नौकर के हाथ बहुत सख्त हैं। मुझे तुम्हारे ये नरम हाथ चाहिए।"

उन्होंने कामिनी की कलाई पकड़ी और उसके हाथ को उठाया। उन्होंने उसके हाथ को अपनी छाती पर, अपने कुर्ते के खुले बटन के अंदर रख दिया।

कामिनी की छोटी हथेली राज के बालों वाले, पसीने से भीगे और पत्थर जैसे सीने को छू रही थी। उसे उनके दिल की तेज़ धड़कन अपनी उंगलियों में महसूस हुई। वहां एक ज्वालामुखी धधक रहा था।

"महसूस करो," राज ने कहा, कामिनी के हाथ को अपनी छाती पर दबाते हुए।

"इसके अंदर आग लगी है। और इसे सिर्फ तुम बुझा सकती हो।"

कामिनी की उंगलियां अनजाने में उनके सीने के बालों में उलझ गईं। उसे मज़ा आ रहा था।

उन्होंने कामिनी का हाथ छोड़ा और एक कदम पीछे हट गए।

"रात को 11 बजे," राज ने जाते-जाते कहा, अपनी धोती ठीक करते हुए, जिसमें उनका उभार साफ दिख रहा था।

"प्रताप के सो जाने के बाद। मेरा दरवाजा खुला रहेगा। इंतज़ार मत करवाना।"

राज मुड़े और भारी कदमों से रसोई से बाहर निकल गए।
 
उनके जाने के बाद भी वहां उनकी गंध, उनकी गर्मी और उनके शरीर का वह दबाव रह गया था जो कामिनी अभी भी अपनी जांघों के बीच महसूस कर रही थी।

कामिनी वहीं सिंक के सहारे खड़ी रह गई, कांपती हुई। उसकी साड़ी गीली थी, उसका ब्लाउज पारदर्शी था, और उसका शरीर... उसका शरीर जल रहा था।

उसने अपने हाथ को देखा, जिसने अभी राज की छाती को छुआ था। उसने उस हाथ को अपने चेहरे पर लगाया और राज की गंध को सूंघा—पसीना और तंबाकू।

यह गलत था। यह पाप था। नरक में भी जगह नहीं मिलेगी। लेकिन कामिनी जानती थी कि आज रात वह उस दरवाजे से ज़रूर गुज़रेगी। क्योंकि उसका नामर्द पति उसे वो कभी नहीं दे सकता था, जो उसे राज की भूखी आंखों में बमुश्किल 5 मिनट में दिख गया था। वह सुरक्षा, वह ताकत, वह अधिकार।

उसका पल्लू अभी भी गीला था, लेकिन उसकी योनि... वह उससे भी ज्यादा गीली हो चुकी थी। उसका रस उसकी जांघों पर बहने को तैयार था। विला की रसोई में आज मर्यादा का पहला और सबसे मज़बूत धागा टूट चुका था, और आज रात... शायद पूरा पर्दा ही गिरने वाला था।

◆◆◆
 
विला की पुरानी दीवार घड़ी ने अपनी भारी और गूंजती आवाज़ में रात के 11 बजाए। "टन... टन... टन..."

हर घंटा कामिनी के दिल पर किसी हथौड़े की तरह बज रहा था। वह अपने कमरे में, अपने सुहाग के बिस्तर के किनारे बैठी थी। उसके बगल में उसका पति, प्रताप, बेसुध होकर सो रहा था। उसका मुंह खुला था और लार तकिए पर बह रही थी।

कमरे में एसी की ठंडक के बावजूद शराब की सड़ी हुई बदबू फैली थी, जिसने कामिनी का दम घोट रखा था। प्रताप ने आज भी कोशिश की थी, और आज भी वह असफल रहा था। अपनी नामर्दी की खीझ उसने कामिनी को दो-चार गालियां देकर और सो जाने में निकाली थी।

कामिनी की आंखों में नींद नहीं थी। उसके शरीर का पोर-पोर जाग रहा था। उसे दोपहर की वह बात याद आ रही थी जो राज सिंह ने रसोई में कही थी—"रात को 11 बजे। मेरा दरवाजा खुला रहेगा। मुझे तुम्हारे नरम हाथ चाहिए।"

कामिनी ने अपनी साड़ी के पल्लू को मुट्ठी में भींचा। क्या उसे जाना चाहिए? यह गलत था। यह पाप था। वह इस घर की इज़्ज़त थी, और राज उसके जेठ थे। पिता समान। लेकिन... क्या पिता समान व्यक्ति अपनी बहू के स्तनों को उस तरह घूरता है? क्या वह अपनी बहू का हाथ अपने नंगे सीने पर रखता है?

उसने प्रताप की तरफ देखा। एक कमजोर, शराबी और अक्षम पति। फिर उसे राज का वह रूप याद आया—अखाड़े में पसीने से तर बदन, वह भीगी हुई लंगोट जिसमें उनका पौरुष साफ दिख रहा था, और रसोई में उनकी वह गर्म सांसें। उसका शरीर अपने आप प्रतिक्रिया देने लगा। उसकी योनि में एक अजीब सी टीस उठी, एक गीलापन जो उसे बेचैन कर रहा था।

उसने फैसला कर लिया। वह जाएगी। सिर्फ मालिश करने के बहाने ही सही, लेकिन उसे उस मर्द के पास जाना था। उसे उस ताकत को महसूस करना था।

कामिनी उठी। उसने अपनी भारी रेशमी साड़ी उतार दी। मालिश करने के लिए भारी कपड़े ठीक नहीं थे, और शायद... शायद उसके अवचेतन मन में यह चाहत थी कि राज उसे देखें। उसने अपनी अलमारी से एक बहुत ही पुरानी, हल्की और झीनी सूती की आसमानी रंग की साड़ी निकाली।

यह साड़ी इतनी पतली थी कि रोशनी में इसके आर-पार देखा जा सकता था। उसने उसके नीचे जो ब्लाउज पहना, वह भी सूती था और बिना अस्तर का था।

उसने आईने में खुद को देखा। उसने अपनी मांग में सिंदूर गहरा किया और होठों पर हल्की लाली लगाई। उसने अपने बालों को खोला और फिर एक ढीले जूड़े में बांधा, ताकि काम करते वक्त कुछ लटें उसकी गर्दन पर गिरती रहें। उसने अपनी कलाइयों में सिर्फ कांच की दो-दो चूड़ियाँ रहने दीं, बाकी सोने के कंगन उतार दिए ताकि आवाज़ न हो।

वह दबे पांव कमरे से निकली। प्रताप ने करवट ली और बड़बड़ाया, लेकिन जागा नहीं। कामिनी ने राहत की सांस ली।

विला के गलियारे में अंधेरा था, सिर्फ कुछ मद्धम 'जीरो वॉट' के पीले बल्ब जल रहे थे जो परछाइयों को और लंबा और डरावना बना रहे थे। हर तरफ सन्नाटा था। नौकर-चाकर सब नीचे वाले हिस्से में सो चुके थे।

वह राज के कमरे की तरफ बढ़ी, जो गलियारे के दूसरे छोर पर था। यह रास्ता उसे बहुत लंबा लग रहा था। हर कदम के साथ उसकी पायल की 'छन-छन' उसे डरा रही थी। उसने झुककर अपनी पायल उतार दी और हाथ में ले ली। अब वह नंगे पैर थी। ठंडे फर्श का स्पर्श उसके तलवों से होता हुआ सीधे उसके पेट में गुदगुदी कर रहा था।

राज के कमरे का भारी शीशम का दरवाजा थोड़ा सा खुला था, जैसा उन्होंने कहा था। अंदर से पीली रोशनी की एक लकीर बाहर आ रही थी।
 
कामिनी दरवाजे पर रुकी। उसका गला सूख गया था। उसके हाथ पसीने से गीले थे। उसने धीरे से, बहुत धीरे से दरवाजे को धक्का दिया।

"चर्र..."

पुराने कब्ज़ों ने एक हल्की सी आवाज़ की और दरवाजा खुल गया।

अंदर का नज़ारा देखकर कामिनी की सांसें थम गईं।

यह कमरा प्रताप के कमरे से दोगुना बड़ा था। दीवारों पर राजपुताना शान की निशानियाँ थीं—पुरानी तलवारें, ढाल और एक राइफल। फर्श पर कालीन बिछा था। हवा में एक बहुत ही मर्दाना गंध थी—महंगे इत्र, पाइप के तंबाकू और गर्म सरसों के तेल की मिली-जुली गंध।

कमरे के बीच में एक विशाल, राजा-महाराजाओं वाला पलंग था। और उस पर राज लेटे थे।

वे पेट के बल लेटे थे। उन्होंने अपने कपड़े उतार रखे थे। उनके शरीर पर सिर्फ एक छोटा सा, सफेद रंग का तौलिया था जो उनकी कमर के नीचे बंधा था, उनके नितंबों को आधा ढकते हुए।

उनका बाकी शरीर नंगा था। उनकी चौड़ी, सांवली पीठ पर मांसपेशियों का पहाड़ था। रीढ़ की हड्डी एक गहरी खाई की तरह दिख रही थी जो गर्दन से शुरू होकर तौलिये के अंदर गायब हो रही थी। उनके कंधे इतने चौड़े थे कि पूरा बिस्तर भर गया था। उनकी बांहें किसी पेड़ की जड़ों की तरह बिस्तर पर फैली थीं।

"आ गई?" राज की भारी, नींद में डूबी हुई आवाज़ आई। उन्होंने मुड़कर नहीं देखा। उन्हें पता था कि वह आएगी।

"जी... बाबूजी," कामिनी ने बहुत धीरे से कहा, जैसे उसकी आवाज़ गले में ही फंस गई हो। उसने दरवाजा बंद किया और कांपते हाथों से सिटकनी लगा दी। अब वह कैद थी। अपनी मर्जी से।

"पास आओ," राज ने कहा। "तेल मेज पर रखा है।"

कामिनी ने बिस्तर के पास रखी मेज पर देखा। वहां एक पीतल की कटोरी में सरसों का तेल रखा था। उसमें लहसुन की कलियां और मेथी दाने काले पड़ चुके थे—तेल को पकाया गया था। उसमें से भाप निकल रही थी।

कामिनी ने कटोरी उठाई। वह गुनगुनी गर्म थी। वह बिस्तर के पास आई।

नज़दीक से देखने पर राज का शरीर और भी विशाल और डरावना लग रहा था। कामिनी को लगा जैसे वह किसी सोए हुए शेर के पास खड़ी है जो किसी भी वक्त जागकर उसे दबोच सकता है।

"खड़ी क्यों हो?" राज ने तकिए में मुंह गड़ाए हुए कहा। "शुरू करो। पीठ बहुत दुख रही है। और गर्दन भी।"

कामिनी ने अपनी हथेली पर तेल लिया। तेल गाढ़ा और गर्म था। उसने अपनी दोनों हथेलियां रगड़ीं ताकि तेल शरीर के तापमान पर आ जाए। फिर उसने कांपते हुए अपने दोनों हाथ राज की चौड़ी पीठ पर रख दिए।

जैसे ही उसके नरम, ठंडे और नाजुक हाथों ने राज की गर्म, सख्त और पसीने से हल्की नम त्वचा को छुआ, दोनों के शरीर में करंट दौड़ गया। राज की पीठ की मांसपेशियां एक पल के लिए कस गईं।

कामिनी ने मालिश शुरू की। उसने उनकी गर्दन से शुरुआत की। उसके छोटे हाथ राज के मोटे, गठीले कंधों पर चल रहे थे। वहां की मांसपेशियां पत्थर जैसी सख्त थीं। उसे बहुत जोर लगाना पड़ रहा था।

"जोर से," राज ने गुर्राते हुए कहा।

"तुम्हारे हाथ बहुत हल्के हैं, बहू। थोड़ा दम लगाओ। मैं कांच का नहीं बना हूँ।"

कामिनी ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। उसने अपनी चूड़ियाँ ऊपर चढ़ाईं और अपनी उंगलियों को उनके मांस में गड़ाने लगी। तेल की वजह से उसके हाथ आसानी से फिसल रहे थे।

"चुप-चुप..."

तेल की आवाज़ सन्नाटे में गूंज रही थी।

कामिनी का ब्लाउज, जो झुकने की वजह से थोड़ा नीचे हो गया था, राज की पीठ के करीब था। उसकी साड़ी का पल्लू बार-बार गिर रहा था, और अब उसने उसे संभालने की कोशिश छोड़ दी थी। वह अपनी कमर पर खोस लिया था।

कामिनी धीरे-धीरे नीचे बढ़ी। वह राज की रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ अपनी हथेलियां चला रही थी। राज की पीठ पर काले बालों की एक लकीर थी जो गर्दन से शुरू होकर नीचे तौलिये के अंदर गायब हो रही थी।

कामिनी की उंगलियां उन बालों में उलझ रही थीं। यह स्पर्श उसे अजीब सा सुकून दे रहा था। प्रताप की छाती एकदम चिकनी थी, लड़कियों जैसी। लेकिन यह... यह एक मर्द की पीठ थी।

"आह... हाँ... वहीं..." राज ने एक लंबी कराह भरी। "कमर के पास। वहां दर्द है। उस गांठ को खोलो।"

कामिनी और नीचे झुकी। अब वह बिस्तर के किनारे खड़ी थी और झुककर मालिश कर रही थी। इस पोज़िशन में उसके स्तन गुरुत्वाकर्षण की वजह से ब्लाउज में लटक रहे थे।

राज की कमर बहुत चौड़ी थी। कामिनी ने वहां तेल डाला और अपने अंगूठों से दबाना शुरू किया।

"ऐसे नहीं बनेगा," राज ने तकिए से सिर उठाए बिना कहा। "बिस्तर पर चढ़ जाओ। ऊपर बैठकर करो। ताकत नहीं लग रही।"

कामिनी का दिल धक से रह गया। "बिस्तर पर? बाबूजी... यह ठीक नहीं..."

"चढ़ो," राज ने सख्ती से कहा। "नखरे मत करो। दर्द से जान निकल रही है। और तुम मेरी बहू हो, कोई गैर नहीं।"

कामिनी के पास कोई चारा नहीं था। उसने अपनी चप्पलें उतारीं और बिस्तर पर चढ़ी। गद्दा बहुत नरम था, उसके पैर धंस गए।

"मेरी कमर पर बैठ जाओ," राज ने निर्देश दिया।

कामिनी ने अपनी टांगें राज के दोनों तरफ कर लीं और उनकी कमर पर घुटनों के बल बैठ गई। उसने अपना वजन अपनी एड़ियों पर रखा ताकि पूरा भार राज पर न पड़े।

अब वह पूरी तरह राज के ऊपर थी। उसकी जांघों के अंदरूनी हिस्से राज की पसलियों को छू रहे थे। उसकी साड़ी घुटनों तक ऊपर उठ गई थी।

इस स्थिति में मालिश करना आसान था, लेकिन यह स्थिति बहुत खतरनाक थी। कामिनी को राज के शरीर की पूरी गर्मी अपनी जांघों के बीच, अपनी योनि के पास महसूस हो रही थी।

उसने फिर से तेल लिया और अब अपने पूरे शरीर का वजन डालकर मालिश करने लगी। वह आगे-पीछे हो रही थी। जब वह आगे झुकती, तो उसका पेट राज की पीठ से सट जाता। उसके स्तन राज की पीठ को लगभग छू रहे थे।

"हाँ... अब ठीक है," राज ने कहा। "तुम्हारी जांघें... गर्म हैं।"

कामिनी शर्म से लाल हो गई, लेकिन उसने मालिश नहीं रोकी। वह एक लय में आ गई थी। उसके हाथ राज के कंधों से लेकर कमर तक फिसल रहे थे।

मालिश के दौरान, राज का तौलिया थोड़ा और नीचे खिसक गया।
 
कामिनी की नज़र वहां गई। तौलिये के खिसकने से राज के नितंबों की शुरुआत दिख रही थी। वहां भी काले बाल थे। कामिनी ने अपनी नज़रें फेरने की कोशिश की, लेकिन एक अजीब सी जिज्ञासा और हवस उसे रोके हुए थी।

"नीचे भी," राज ने आदेश दिया।

"क... कहाँ?" कामिनी की आवाज़ कांप गई।

"कूल्हों पर," राज ने कहा। "दर्द वहां तक जाता है। नसों को खोलो।"

कामिनी के हाथ हवा में रुक गए। जेठ के नितंबों की मालिश?

"रुक क्यों गई?" राज ने अपनी गर्दन घुमाकर उसे देखा। उनकी आंखों में लाल डोरे थे और एक नशा था। "करो। मैं हुक्म दे रहा हूँ।"

कामिनी ने कांपते हाथों से कटोरी से और तेल लिया। उसने अपने हाथ राज के तौलिये के ठीक ऊपर रखे। उसने तौलिये को थोड़ा और नीचे खिसका दिया ताकि वह मालिश कर सके। अब राज के नितंब लगभग आधे नंगे थे।

राज के नितंब बहुत सख्त, गोल और मस्कुलर थे। वे किसी घोड़े के पुट्ठों जैसे थे। कामिनी ने उन्हें अपनी मुट्ठी में भरा। वे लोहे के गोलों जैसे थे। उसने उन्हें गूंथना शुरू किया।

"आह्ह्ह! माई री..." राज ने बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठी में भींच लिया।

"तेरी उंगलियों में जादू है कामिनी... जादू... थोड़ा और नीचे..."

कामिनी अब पूरी तरह कामुकता के वश में थी। सरसों के तेल की तीखी गंध, राज की मर्दाना गंध और एक वर्जित पुरुष को छूने का नशा... उसका सिर चकरा रहा था। उसकी योनि गीली हो चुकी थी और साड़ी के अंदर उसकी जांघों पर चिपचिपापन महसूस हो रहा था। वह अनजाने में अपनी योनि को राज की पीठ पर रगड़ने लगी थी।

"बस," राज ने अचानक कहा। उन्होंने एक झटका दिया और कामिनी का संतुलन बिगड़ गया। "अब आगे से।"

"आगे से?" कामिनी संभलते हुए पीछे हटी।

"हाँ," राज घूमे और पीठ के बल लेट गए।

कामिनी जल्दी से बिस्तर से नीचे उतरने लगी, शर्म के मारे। "मैं... मैं चलती हूँ।"

लेकिन राज ने बिजली की फुर्ती से उसका हाथ पकड़ लिया। उनकी पकड़ लोहे जैसी थी।

"कहाँ जा रही हो?" राज ने उसे खींचा। कामिनी उनके ऊपर गिरते-गिरते बची। "बैठी रहो। अभी काम पूरा नहीं हुआ।"

कामिनी अब राज की जांघों के बीच, घुटनों के बल बैठी थी। राज उसके सामने चित लेटे थे।

तौलिया अभी भी उनकी कमर पर था, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल गई थी। तौलिये के बीचों-बीच एक विशालकाय, गगनचुंबी तंबू बना हुआ था। वह उभार इतना ऊँचा, मोटा और सख्त था कि तौलिया उसे छिपा नहीं पा रहा था। वह राज का लिंग था, जो पूरी तरह जाग चुका था और कामिनी की तरफ इशारा कर रहा था।

कामिनी की नज़रें सीधे उस उभार पर टिक गईं। उसने प्रताप का 'सामान' देखा था—छोटा, सिकुड़ा हुआ और ढीला। लेकिन यह... यह तो किसी दानव जैसा लग रहा था। तौलिये के नीचे वह धड़क रहा था।

"तेल लगाओ," राज ने अपनी चौड़ी, बालों वाली छाती की तरफ इशारा किया। "सीने पर।"

कामिनी ने तेल लिया। उसने राज की छाती के बालों में अपनी उंगलियां चलाईं। वहां के बाल बहुत घने और कड़े थे। उसके नीचे राज का दिल तेज़ धड़क रहा था। कामिनी ने उनके निप्पल को छुआ, जो छोटे, भूरे और सख्त थे।

राज उसे देख रहे थे। उनकी नज़रें कामिनी के झुके हुए चेहरे और उसके बिना अस्तर वाले ब्लाउज के डीप-नेक पर थीं। इस पोज़िशन में कामिनी के स्तन राज के चेहरे के सामने लटक रहे थे। राज उनके आकार और गोलाई का अनुमान लगा रहे थे।

"प्रताप तुझे खुश रखता है?" राज ने अचानक पूछा। उनकी आवाज़ बहुत गंभीर थी।

कामिनी का हाथ उनकी छाती पर रुक गया। "जी... वो..."

"झूठ मत बोल," राज ने उसका हाथ पकड़कर अपनी छाती पर जोर से दबाया। "उसकी आंखों में नामर्दी दिखती है। और तेरी आंखों में... प्यास। मैं देख सकता हूँ कि तू सूखी हुई है।"

कामिनी की आंखों में आंसू आ गए। शर्म, अपमान और लाचारी के आंसू। एक आंसू टपका और राज की छाती के बालों में खो गया।

"रो मत," राज ने अपना दूसरा हाथ उठाया और कामिनी के गाल को पोंछा। उनका अंगूठा उसके होंठों पर फिरा। “मैं अभी ज़िंदा है। इस विला की औरतों को प्यासा रहने की आदत नहीं है। मैं हूँ ना।"

राज ने कामिनी का हाथ अपनी छाती से नीचे सरकाया। उन्होंने उसे अपने पेट के एब्स पर ले गए।

"दबाओ इसे," राज ने कहा। "महसूस करो कि मर्द कैसा होता है। पत्थर जैसा।"

कामिनी का हाथ नीचे फिसलता गया। नाभि... और फिर पेड़ों के बाल जो तौलिये के ऊपर दिख रहे थे।

अब उसका हाथ तौलिये के किनारे पर था। उसके ठीक नीचे राज का लिंग धड़क रहा था। उसकी गर्मी कामिनी की हथेली तक पहुँच रही थी।

"जांघों की मालिश करो," राज ने अपनी टांगें थोड़ी फैला दीं।
 
कामिनी ने उनकी जांघों पर तेल मला। राज की जांघें किसी पेड़ के तने जैसी मोटी और सख्त थीं। कामिनी के छोटे हाथ उन्हें पूरा घेर भी नहीं पा रहे थे। वह जांघों के अंदरूनी हिस्से की मालिश करने लगी।

यह बहुत संवेदनशील हिस्सा होता है। राज की सांसें भारी हो गईं। उनका पेट ऊपर-नीचे होने लगा।

"और ऊपर..." राज ने फुसफुसाया।

"जड़ तक। वहां नसें खिंची हुई हैं।"

कामिनी का हाथ ऊपर सरका। अब उसकी कलाई राज के लिंग (जो तौलिये के नीचे था) से रगड़ खा रही थी। वह बहुत गर्म था। लोहे जैसा सख्त।

कामिनी का दम घुटने लगा। उसे पता था कि वह आग से खेल रही है।

अचानक, राज ने अपनी कमर उठाई और एक हाथ से तौलिया खींचकर फेंक दिया।

कामिनी की आंखें फटी की फटी रह गईं।

उसके सामने राज का नंगा लिंग खड़ा था। वह काला, बेहद मोटा, नसों से भरा हुआ और बहुत लंबा था। उसका टोपा एक बड़े मशरूम जैसा था, जिस पर तेल की एक बूंद चमक रही थी। वह प्रताप के अंग से कम से कम तीन गुना बड़ा लग रहा था। वह हवा में गर्व से तना हुआ था।

"देख ले," राज ने कहा। "यह है असली मर्द की निशानी। यह है वो चीज़ जो तुझे चाहिए।"

कामिनी ने अपना मुंह दोनों हाथों से ढक लिया। "बाबूजी... यह... प्लीज..."

"इसे 'बाबूजी' मत बोल," राज ने उसका हाथ खींचा और जबरदस्ती अपने लिंग पर रख दिया। कामिनी की उंगलियां उस गर्म मांस से चिपक गईं। "इसे अपना मालिक बोल। पकड़ इसे।"

कामिनी ने पहली बार एक पूर्ण विकसित, उत्तेजित और ताकतवर पुरुष अंग को छुआ। वह बहुत गर्म था। उसने उसे मुट्ठी में भरा। वह उसकी मुट्ठी से बाहर निकल रहा था। उसकी नसों में खून दौड़ रहा था।

"हिला इसे," राज ने आदेश दिया। "तेल लगा और हिला।"

कामिनी ने कांपते हुए तेल की मदद से उसे ऊपर-नीचे करना शुरू किया। उसे डर लग रहा था, लेकिन एक अजीब सा रोमांच भी था। वह एक 'वर्जित' चीज़ के साथ खेल रही थी।

राज ने अपनी आंखें बंद कर लीं। कामिनी के कोमल, छोटे हाथ उनके सख्त लिंग पर जादू कर रहे थे।

"आह... कामिनी... जोर से..." राज के मुंह से उसका नाम निकला।

कामिनी ने अपनी रफ़्तार बढ़ाई। वह सम्मोहित थी। वह देख रही थी कि कैसे उसकी रगड़ से वह और बड़ा और लाल होता जा रहा है। उसमें से प्री-कम की एक बूंद निकली।

राज ने अचानक उठकर बैठने की कोशिश की। उन्होंने कामिनी को बांहों से पकड़ा और उसे एक झटके में अपने ऊपर खींच लिया।

कामिनी का चेहरा राज के चेहरे के पास आ गया। उनके होंठ बस एक इंच दूर थे।

"तू बहुत सुंदर है," राज ने कहा और बिना किसी चेतावनी के अपने होंठ कामिनी के होंठों पर रख दिए।

यह कामिनी का पहला असली किस था। प्रताप ने सिर्फ थूक लगाया था, लेकिन राज... राज उसे खा रहे थे। उनके होंठ सख्त थे, मूंछें चुभ रही थीं। उन्होंने अपनी जीभ कामिनी के मुंह में जबरदस्ती डाल दी। वह उसकी जीभ को ढूंढ रहे थे, चूस रहे थे।

कामिनी ने विरोध करने की कोशिश की, उसने उनकी छाती पर हाथ रखा, लेकिन राज की ताकत के आगे वह बेबस थी। और सच तो यह था कि वह विरोध करना भी नहीं चाहती थी। उसका शरीर पिघल रहा था। उसने अपना मुंह खोल दिया। उनकी जीभें आपस में लड़ने लगीं।

राज का एक हाथ कामिनी की पीठ पर गया। उन्होंने ब्लाउज के हुक टटोलने में समय बर्बाद नहीं किया। उन्होंने अपनी उंगलियां फंसाईं और जोर से खींचा।

"टच-टच-टच!"

हुक टूट गए। ब्लाउज खुल गया। राज ने उसे कंधों से नीचे खींच दिया। कामिनी ने ब्रा नहीं पहनी थी (या शायद वह इतनी पतली थी कि पता नहीं चला)। उसके युवा, कड़े और गोरे स्तन आज़ाद हो गए। वे राज के पसीने से भीगे सीने से दब गए।

"आह्ह्ह!" कामिनी ने अपना मुंह अलग किया। सांस लेने के लिए तड़पते हुए।

"बाबूजी... क्या कर रहे हैं... छोड़िए..."

"वही जो तेरे पति को करना चाहिए था, लेकिन वो नहीं कर पाया," राज ने उसे धक्का देकर बिस्तर पर चित लिटा दिया।

अब राज उसके ऊपर थे। उनका विशाल शरीर कामिनी को पूरी तरह ढक रहा था। कामिनी के स्तन उनके वजन के नीचे दबे हुए थे।

राज ने अपना सिर नीचे किया। उन्होंने कामिनी के बाएं स्तन को देखा। निप्पल सख्त और गुलाबी था। उन्होंने अपना मुंह खोला और पूरा निप्पल अपने मुंह में भर लिया।

कामिनी की पीठ धनुष की तरह मुड़ गई। "उफ्फ! माँ!" उसने राज के बालों को पकड़ लिया।
 
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