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Adultery ' गाँव का टेलर '

राज उसे चूस रहे थे, काट रहे थे। उनका अनुभव बोल रहा था। वे जानते थे कि एक औरत को कैसे उत्तेजित किया जाता है। उनकी जीभ निप्पल के चारों तरफ घूम रही थी। कामिनी की योनि से पानी बह निकला। उसने अपनी टांगें अनजाने में राज की कमर पर लपेट लीं।

राज का सख्त लिंग अब कामिनी की साड़ी और पेटीकोट के ऊपर से उसकी योनि पर दबाव डाल रहा था। वह वहां एक सख्त रगड़ पैदा कर रहा था।

"साड़ी हटा," राज ने हुक्म दिया, अपना मुंह उसके स्तन से हटाते हुए। उनका मुंह लार से गीला था।

कामिनी ने कांपते हाथों से मना किया। "नहीं... प्लीज..."

राज ने खुद ही हाथ नीचे डाला और पेटीकोट की डोरी तोड़ दी। उन्होंने साड़ी को खींचकर कामिनी की टांगों से अलग कर दिया और फर्श पर फेंक दिया।

अब कामिनी पूरी तरह नंगी थी, सिर्फ गले में मंगलसूत्र था। राज ने उसे देखा। ऊपर से नीचे तक।

"सोना... खरा सोना..." राज ने उसकी जांघों को फैलाया। "और यह खजाना उस शराबी के लिए बेकार पड़ा था।"

कामिनी की योनि गुलाबी, साफ और गीली थी। वह कांप रही थी। राज ने अपनी उंगलियों पर कटोरी से बचा हुआ तेल लगाया।

"आज सिर्फ शुरुआत है," राज ने कहा, कामिनी की आंखों में देखते हुए। "आज मैं तुझे तोडूंगा नहीं। आज सिर्फ तैयार करूँगा। तेरी सील को थोड़ा ढीला करूँगा।"

उन्होंने अपनी दो उंगलियां कामिनी की कुंवारी योनि के मुहाने पर रखीं। कामिनी ने चादर भींच ली।

राज ने धीरे से, लेकिन मजबूती से एक उंगली अंदर डाली।

"आह! दर्द!" कामिनी सिसकी। वह बहुत तंग थी।

"सहो इसे," राज ने झुककर उसे चूमा। "दर्द ही मज़ा है।"

उन्होंने उंगली को अंदर-बाहर करना शुरू किया। तेल की वजह से फिसलन थी। कामिनी की सिसकियाँ अब आहों में बदलने लगी थीं। राज की उंगलियां उसके अंदर खेल रही थीं, उसे चौड़ा कर रही थीं, उसे आने वाले दिनों के लिए तैयार कर रही थीं।

राज ने अपना अंगूठा उसके 'दाने' पर रगड़ना शुरू किया। कामिनी का शरीर कांपने लगा। उसे एक ऐसा सुख मिल रहा था जो उसने कभी सोचा भी नहीं था। बिजली के झटके लग रहे थे।

"बाबूजी... मैं... मैं कुछ हो रहा है... मैं मर जाऊंगी..."

"होने दे," राज ने रफ़्तार तेज़ कर दी। "मर जा मेरी बांहों में।"

अचानक, कामिनी का शरीर अकड़ गया। उसने राज के कंधों पर दांत गड़ा दिए। एक ज़ोरदार झटके के साथ, उसने अपनी ज़िंदगी का पहला 'चरम सुख' महसूस किया। उसका पानी राज की उंगलियों पर बह निकला। उसकी योनि ने राज की उंगलियों को जकड़ लिया।

वह निढाल होकर गिर गई, हांफते हुए। पसीने से लथपथ।

राज उसके ऊपर झुके। उन्होंने अपनी उंगलियों पर लगा कामिनी का रस देखा और उसे चखा।

"मीठा है," राज ने मुस्कुराते हुए कहा। "बहुत मीठा।"

उन्होंने अपना लिंग उठाया, जो अभी भी पत्थर जैसा सख्त था। उन्होंने उसे कामिनी की गीली जांघों के बीच रगड़ा, उसकी योनि के होठों पर फेरा, लेकिन अंदर नहीं डाला।

"आज के लिए इतना ही," राज ने कहा, खुद पर काबू पाते हुए। "मैं नहीं चाहता कि तू कल लंगड़ा कर चले और सबको शक हो जाए। असली काम... हम अस्तबल में करेंगे। जब बारिश होगी। तब तेरी चीखें कोई नहीं सुनेगा।"

कामिनी अभी भी होश में नहीं थी। राज ने उसे उठाया।

"कपड़े पहन और भाग जा," राज ने कहा। "इससे पहले कि प्रताप जागे। और यह सब... हमारे बीच का राज़ है।"

कामिनी ने लड़खड़ाते हुए अपनी फटी हुई चोली और साड़ी उठाई और लपेटी। उसका शरीर अभी भी झनझना रहा था। जब वह दरवाजे तक पहुँची, तो उसने मुड़कर देखा।

राज बिस्तर पर बैठे थे, नंगे, तेल में चमकते हुए, अपने लिंग को सहलाते हुए जो अभी भी शांत नहीं हुआ था। वे किसी विजयी राजा जैसे लग रहे थे जिसने नया किला फतह किया हो।

"दरवाजा बंद करती जाना," राज ने कहा। "और कल... कल फिर तैयार रहना।"

कामिनी बाहर निकली। ठंडी हवा उसे छू रही थी, लेकिन उसके अंदर जो आग राज ने लगाई थी, वह अब बुझने वाली नहीं थी।

वह जानती थी कि वह अब उस नामर्द प्रताप की पत्नी नहीं, बल्कि बड़े ठाकुर की 'रखैल' बन चुकी है। और शर्मनाक बात यह थी कि उसे यह पद... पत्नी होने से ज्यादा पसंद आ रहा था। वह अपने कमरे में गई, प्रताप के बगल में लेटी, और राज के सपनों में खो गई।

◆◆◆
 
मर्यादा का चीरहरण

अगली सुबह जब कामिनी की आंख खुली, तो विला के रोशनदानों से धूप छनकर कमरे में आ रही थी। प्रताप के खर्राटे बंद हो चुके थे; वह शायद पहले ही उठकर जा चुका था—अपनी नामर्दी के गम को धुएं या चाय में उड़ाने।

कामिनी बिस्तर पर लेटी छत की पुरानी लकड़ियों को घूर रही थी। बीती रात की यादें किसी धुंधली फिल्म की तरह नहीं, बल्कि एक ज्वलंत सच्चाई की तरह उसकी आंखों के सामने घूम रही थीं। उसे अभी भी अपनी हथेलियों में सरसों के तेल की चिपचिपाहट महसूस हो रही थी, हालांकि उसने रात को ही हाथ धो लिए थे।

उसे अपनी जांघों के बीच राज की खुरदरी उंगलियों का वो स्पर्श याद आ रहा था, जिसने उसे पहली बार एक औरत होने का, एक जीवित मांस होने का अहसास कराया था।

"हे भगवान... मैंने क्या किया?" कामिनी ने अपना चेहरा तकिए में छिपा लिया।

तकिए से प्रताप के तेल की बास आ रही थी। "मैं अपने जेठ के कमरे में गई... मैंने उन्हें छुआ... उन्होंने मुझे... और मुझे अच्छा लगा।"

गिल्ट और हवस के बीच एक भयानक जंग चल रही थी। उसका संस्कारी मन उसे धिक्कार रहा था, कह रहा था कि वह कुलच्छनी है, पापिनी है। लेकिन उसका जवान शरीर... वह अभी भी उस स्पर्श के लिए तड़प रहा था। उसे राज के उस विशाल लिंग का दृश्य याद आ रहा था जो उसने तौलिये के गिरने पर देखा था। वह दृश्य उसकी आंखों में छप गया था।

नहा-धोकर जब वह भारी कदमों से नीचे हॉल में आई, तो वहां नाश्ते की मेज लग चुकी थी। ससुर जी अखबार पढ़ रहे थे, सास नौकरों को डांट रही थीं, प्रताप टोस्ट चबा रहा था और राज... राज अपनी कुर्सी पर एक राजा की तरह बैठे चाय पी रहे थे।

कामिनी ने लंबा घूंघट काढ़ रखा था। उसने झुककर सबके पैर छुए। जब वह राज के पास पहुंची, तो उसके पैर कांपने लगे। उसे लगा जैसे राज की नज़रें उसके कपड़ों को भेदकर उसके नंगे बदन को देख रही हैं।

"खुश रहो बहू," राज की भारी और गूंजती आवाज़ उसके कानों में पड़ी।

कामिनी ने कनखियों से देखा। राज आज फिर उसी रोबदार, गंभीर अवतार में थे। सफेद कड़क कुर्ता, माथे पर लाल तिलक और ताव दी हुई मूंछें। कोई कह नहीं सकता था कि रात को यही आदमी अपनी बहू के सामने नंगा लेटा था, उसे अपनी जांघों के बीच दबाए हुए था और उसे कामुकता का पाठ पढ़ा रहा था।

कामिनी रसोई में गई और चाय की केतली लेकर आई। जब उसने राज के कप में चाय डाली, तो उसका हाथ हिल गया। थोड़ी चाय तश्तरी में गिर गई।

राज ने कप उठाया। ऐसा करते हुए उनकी उंगलियां कामिनी की उंगलियों से टकरा गईं।

एक ज़बरदस्त करंट दौड़ा। कामिनी ने हाथ खींचना चाहा, लेकिन राज ने पल भर के लिए कप के बहाने उसकी उंगलियों को दबा दिया। उन्होंने अपनी खुरदरी उंगली कामिनी की हथेली के बीच में (जहां पसीना आता है) रगड़ दी। यह बहुत सूक्ष्म इशारा था, लेकिन कामिनी के लिए किसी बम धमाके जैसा था।

"चाय अच्छी है," राज ने कप होठों से लगाते हुए कहा। उनकी नज़रें घूंघट के पार कामिनी की आंखों में थीं। "लेकिन रात वाली 'सेवा' ज्यादा अच्छी थी। मेरी कमर का दर्द बिल्कुल गायब हो गया।"

कामिनी का चेहरा टमाटर जैसा लाल हो गया। उसका दिल गले में आ गया। शुक्र है कि घूंघट था। बाकी लोग अपनी बातों में व्यस्त थे, किसी ने राज का यह द्विअर्थी वाक्य नहीं समझा। लेकिन कामिनी समझ गई थी। वह उसे याद दिला रहे थे कि अब वह उनकी है।

प्रताप ने मुंह पोंछते हुए कहा, "भाईसाहब, आज मुझे शहर जाना है। कुछ काम है। और शायद दोस्तों के साथ रुकना पड़े। मैं कल सुबह तक लौटूंगा।"

राज के होठों पर एक बारीक, क्रूर मुस्कान आ गई। उन्होंने प्रताप को देखा, फिर कामिनी को।

"जाओ छोटे," राज ने कहा। "काम जरूरी है। घर की चिंता मत करो। मैं हूँ ना... विला और 'बहू' की देखभाल करने के लिए।"

'देखभाल' शब्द पर उन्होंने जो ज़ोर दिया, उससे कामिनी की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। प्रताप जा रहा था। आज रात विला में उसका पति नहीं होगा। आज रात वह पूरी तरह से असुरक्षित थी... या शायद पूरी तरह से स्वतंत्र।

प्रताप के जाने के बाद विला फिर शांत हो गई। दोपहर की धूप तीखी हो गई थी। सास अपनी सहेलियों के साथ पास के मंदिर में कीर्तन के लिए चली गईं। ससुर अपनी अफीम की पिनक में अपने कमरे में सो गए। नौकर बाहर बरामदे में सुस्ता रहे थे।

कामिनी अपने कमरे में थी, अलमारी में कपड़े तह कर रही थी। उसका दिमाग कहीं और था। उसे पता था कि राज उसे छोड़ेंगे नहीं।

तभी दरवाजा खुला। बिना खटखटाए।

राज अंदर आए।

उन्होंने पीछे मुड़कर दरवाजा बंद किया और इत्मीनान से कुंडी लगा दी।

कामिनी के हाथ से कपड़े गिर गए। वह पीछे हटी। "बाबूजी... आप? यहाँ? यह मेरा कमरा है। कोई देख लेगा।"

"यह विला मेरी है कामिनी," राज ने धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ते हुए कहा। उनकी चाल में एक शिकारी जैसी खामोशी थी। "हर कमरा, हर दीवार, हर ईंट... और इस विला में रहने वाला हर इंसान... मेरा है।"

वे कामिनी के पास आए और उसे दीवार से सटा दिया। कामिनी की पीठ ठंडी दीवार से लग गई और सामने राज का विशाल, कुर्ता पहने हुए सीना था। उसे उनकी गर्मी और वही मर्दाना गंध—तंबाकू और पसीने की—महसूस हुई।

"डर रही हो?" राज ने अपना हाथ बढ़ाया और उसके घूंघट को उठाकर पीछे कर दिया। अब उनका चेहरा आमने-सामने था।

"जी... यह गलत है," कामिनी ने नजरें झुका लीं, अपनी छाती पर पल्लू कसते हुए।

"क्या गलत है?" राज ने उसकी ठुड्डी पकड़कर उसका चेहरा जबरदस्ती ऊपर किया। "एक प्यासी औरत को पानी देना गलत है? या एक नामर्द के साथ पूरी जिंदगी घुट-घुट कर सड़ना सही है?"

"प्रताप मेरे पति हैं... मेरी इज़्ज़त हैं..."

"पति?" राज ने एक कड़वी, हिकारत भरी हंसी हंसी। उन्होंने कामिनी का बायां हाथ पकड़ा और उसकी चूड़ियों को खनकाया। "पति वो होता है जो अपनी पत्नी को संतुष्ट करे। जो उसकी सेज गीली करे और उसकी कोख भरे। प्रताप क्या है? एक शराबी। एक बोझ। उसने तुझे क्या दिया? सिर्फ आंसू और कुंठा?"

राज ने अपना शरीर कामिनी से सटा दिया। उन्होंने अपनी मज़बूत जांघ कामिनी की दोनों जांघों के बीच घुसा दी और दबाव बनाया। कामिनी की योनि पर एक सख्त रगड़ लगी।
 
"सच बता," राज ने उसकी आंखों में झांका। "क्या तू माँ नहीं बनना चाहती? क्या तुझे अपनी गोद में बच्चा नहीं चाहिए? इस विला को वारिस नहीं चाहिए?"

कामिनी की दुखती रग दब गई। हर औरत माँ बनना चाहती है। और प्रताप के साथ यह नामुमकिन था। उसकी आंखों में आंसू आ गए।

"मैं मजबूर हूँ बाबूजी," कामिनी सिसकी।

"तू मजबूर नहीं, तू प्यासी है," राज ने अपना चेहरा उसके गर्दन के पास ले जाकर सूंघा। "और तेरी खुशबू बता रही है कि तू मुझे चाहती है। कल रात जब तूने मेरे लिंग को छुआ था... तो तेरी सांसें कैसे चल रही थीं, मैं जानता हूँ।"

राज ने अपने दोनों हाथ कामिनी की कमर पर रखे और उसे अपनी तरफ जोर से खींचा। कामिनी का पेट राज के पेट से सट गया। उसे साफ महसूस हुआ कि राज का लिंग धोती के अंदर जाग चुका है। एक सख्त मूसल जैसा उभार उसे चुभ रहा था।

"आज रात," राज ने कहा। "आज रात प्रताप नहीं है। आज कोई बहाना नहीं चलेगा। आज कोई मालिश नहीं होगी।"

"लेकिन कहाँ?" कामिनी ने कांपते हुए पूछा। "कमरे में सास-ससुर सुन लेंगे। आवाज़ बाहर जाएगी।"

"कमरे में नहीं," राज की आंखों में एक जंगली, आदिम चमक थी। "आज विला के पीछे वाले हिस्से में। अस्तबल के पास जो पुरानी कोठरी है, वहां। वहां हमारी आवाज़ें कोई नहीं सुनेगा। वहां तू जितना चाहे चिल्ला सकती है। वहां हम जानवरों की तरह करेंगे।"

कामिनी कांप गई। अस्तबल? भूसा, धूल और घोड़ों की गंध? यह किसी रईस की सेज नहीं, एक जंगली मिलन का न्यौता था।

"तैयार रहना," राज ने अपना अंगूठा उसके होंठों पर रगड़ा, जैसे उसे सील कर रहे हों। "रात के 10 बजे। और सुन... साड़ी मत पहनना। घाघरा पहनना। और नीचे कुछ मत पहनना। मुझे खोलने में वक्त बर्बाद करना पसंद नहीं।"

राज के जाने के बाद कामिनी सुन्न खड़ी रही। अस्तबल। बिना कपड़ों के।

लेकिन जैसे-जैसे शाम ढलने लगी, उसका डर एक अजीब सी, बीमार उत्तेजना में बदलने लगा। उसे पता था कि आज रात उसका 'कौमार्य' भंग होने वाला है। वह चीज़ जो उसका पति रस्मों-रिवाजों के बाद भी नहीं ले पाया, आज उसका जेठ, एक लुटेरे की तरह छीन लेगा। और उसका शरीर... उसका शरीर इसके लिए तैयार हो रहा था।

रात के 10 बजे। विला सो चुकी थी। कुत्ते भौंक रहे थे।

कामिनी ने राज के आदेश का पालन किया। उसने साड़ी नहीं पहनी। उसने अपना सबसे पुराना, लाल रंग का घाघरा-चोली पहना। घाघरा भारी था, लेकिन उसके नीचे उसने पेटीकोट या पैंटी नहीं पहनी। नंगी जांघों पर घाघरे का खुरदरा कपड़ा रगड़ खा रहा था, जिससे उसे हर कदम पर अपनी नग्नता का अहसास हो रहा था। उसने एक बड़ी काली शॉल ओढ़ ली ताकि कोई देख न ले।

वह पिछले दरवाजे से, रसोई के रास्ते बाहर निकली। ठंडी हवा चल रही थी। अस्तबल की तरफ से घोड़ों के हिनहिनाने और टापों की आवाज़ आ रही थी। हवा में गोबर और सूखी घास की गंध थी।

वह पुरानी कोठरी के पास पहुंची। यह जगह अनाज और पुराने औजार रखने के लिए थी। वहां एक लालटेन जल रही थी, जिसकी मद्धम रोशनी दरवाजे की दरारों से बाहर आ रही थी। दरवाजा अधखुला था।

अंदर राज इंतज़ार कर रहे थे।
 
कोठरी में फर्श पर ताज़ा, सुनहरी भूसा बिछाया गया था। उसके ऊपर एक मोटी, पुरानी दरी और कुछ तकिए रखे थे।

लालटेन की रोशनी दीवारों पर बड़ी-बड़ी परछाइयां बना रही थी। यह किसी सुहागरात का कमरा नहीं, बल्कि एक शिकारी की मांद लग रही थी।

राज वहां खड़े थे। उन्होंने अपनी धोती उतार दी थी। वे सिर्फ एक लंगोट (या छोटा कच्छा) पहने हुए थे। उनका पूरा शरीर तेल में चमक रहा था। वे उस कोठरी में किसी प्राचीन योद्धा या राक्षस जैसे लग रहे थे।

"आ गई," राज ने मुस्कुराते हुए कहा। उनकी मुस्कान में प्यार नहीं, भूख थी। उन्होंने अपना विशाल हाथ बढ़ाया और कामिनी को अंदर खींच लिया।

दरवाजा बंद कर दिया गया और भारी लोहे की सांकल चढ़ा दी गई। अब बाहर की दुनिया खत्म हो चुकी थी।

कामिनी ने अपनी शॉल कसकर पकड़ रखी थी। वह कांप रही थी। ठंड से नहीं, बल्कि उस माहौल से।

"शॉल हटाओ," राज ने हुक्म दिया।

कामिनी ने मना किया। "बाबूजी... मुझे शर्म आ रही है। यहाँ बहुत रोशनी है।"

राज पास आए। उन्होंने एक झटके में शॉल खींच ली और कोने में फेंक दी।

कामिनी सिर्फ घाघरा-चोली में थी। उसकी गोरी कमर, नाभि और पेट का हिस्सा खुला था। लालटेन की रोशनी में उसकी त्वचा सोने जैसी चमक रही थी।

"शर्म तो गहना है बहू," राज ने अपना खुरदरा हाथ उसकी नंगी कमर पर रखा और उसे अपनी ओर खींचा। "लेकिन बिस्तर पर... या भूसे पर... यह गहना उतार देना चाहिए।"

राज ने कामिनी की चोली की डोरी पीठ के पीछे से खींच दी। एक ही झटके में चोली ढीली हो गई।

"इसे उतारो," राज ने कहा।

कामिनी ने अपने हाथों से चोली को छाती पर पकड़े रखा। "नहीं... बाबूजी..."

"कामिनी!" राज की आवाज़ सख्त हो गई, चाबुक जैसी। "मैंने क्या कहा था? हुक्म मानो। मैं दोबारा नहीं बोलूंगा।"

कामिनी की आंखों में आंसू आ गए। उसने धीरे-धीरे, कांपते हाथों से अपने हाथ हटाए। चोली नीचे सरक गई और फर्श पर गिर गई।

कामिनी के युवा, कड़े और सुडौल स्तन लालटेन की रोशनी में नंगे हो गए। वे ठंड और डर से अकड़े हुए थे। निप्पल डार्क ब्राउन और नुकीले थे, जो सीधे राज की तरफ देख रहे थे।

"सुंदर..." राज ने एक गहरी सांस ली। "बहुत सुंदर। प्रताप अंधा है।"

उन्होंने अपने दोनों बड़े हाथों से कामिनी के स्तनों को पकड़ लिया। उन्होंने उन्हें वैसे ही तौला जैसे कोई व्यापारी बाज़ार में कीमती फल तौलता है। फिर उन्होंने उन्हें जोर से दबाया, मसला।

"आह!" कामिनी के मुंह से चीख निकल गई। दर्द हुआ, लेकिन साथ ही उसकी योनि में एक बिजली सी दौड़ गई।

"प्रताप ने इन्हें कभी ऐसे नहीं छुआ होगा," राज ने कहा और झुककर कामिनी के बाएं निप्पल को अपने मुंह में भर लिया।

कामिनी ने राज के बालों को पकड़ लिया। राज उसे चूस रहे थे, काट रहे थे। उनकी जीभ और दांतों का खेल कामिनी को पागल कर रहा था। उसकी टांगें कांपने लगीं। उसके जांघों के बीच रस बहने लगा और उसकी टांगों पर रेंगने लगा।

राज ने उसे धक्का दिया। कामिनी भूसे के ढेर पर बिछी दरी पर गिर गई। भूसा दरी के नीचे से चुभ रहा था, लेकिन यह चुभन उसे और उत्तेजित कर रही थी।

राज ने उसका घाघरा पकड़ा और उसे कमर तक ऊपर खींच लिया। कामिनी ने कोई पैंटी नहीं पहनी थी। उसका पूरा 'खजाना'—उसके गोरे जांघों के बीच वह काला त्रिकोण और गुलाबी योनि—राज के सामने था।

"आज तू पूरी तरह मेरी होगी," राज ने अपना लंगोट नीचे कर दिया।

उनका विशाल, काला और तना हुआ लिंग बाहर आ गया। कामिनी ने उसे कल रात देखा था, लेकिन आज... आज वह और भी बड़ा, और भी भूखा लग रहा था। वह हवा में झूल रहा था।

राज कामिनी के ऊपर आ गए। उनका भारी शरीर कामिनी को भूसे में दबा रहा था। उन्होंने अपने घुटनों से कामिनी की टांगों को जबरदस्ती चौड़ा कर दिया।
 
"देख कामिनी," राज ने उसकी आंखों में झांका। उनका चेहरा पसीने से तर था। "यह दर्द देगा। बहुत दर्द। क्योंकि तू तंग है। तू सील-पैक है। और मैं... मैं बड़ा हूँ। मैं रहम नहीं करूँगा।"

कामिनी ने सिर हिलाया। वह तैयार थी। उसे दर्द चाहिए था। उसे वह सब चाहिए था जो उसे एक औरत होने का अहसास दिलाए, चाहे वह चीखना ही क्यों न हो।

राज ने अपने लिंग के मोटे टोपे को कामिनी की सूखी (अब डर और हवस से थोड़ी गीली) योनि के मुहाने पर रखा।

उन्होंने थोड़ा दबाव दिया।

"आह... नहीं... बहुत बड़ा है..." कामिनी पीछे खिसकने लगी। दर्द शुरू हो गया था। उसे लगा जैसे वह फट जाएगी।

"भागो मत," राज ने उसकी कमर को अपने मज़बूत हाथों से जकड़ लिया और उसे अपनी तरफ खींचा। "इसे अंदर लो। पूरा।"

उन्होंने एक और धक्का मारा। लिंग थोड़ा और अंदर गया। कामिनी की सील तन गई थी। वह टूटने की कगार पर थी।

"बाबूजी... फट जाएगा... प्लीज... निकाल लीजिए..." कामिनी रोने लगी। वह हाथ-पैर मार रही थी।

राज ने उसे चूमना शुरू किया, जंगली तरीके से। उन्होंने अपना एक हाथ नीचे ले जाकर कामिनी के 'दाने' को जोर से रगड़ा ताकि वह और गीली हो जाए।

"बस एक झटका," राज ने उसके कान में कहा। "सांस रोको।"

कामिनी ने सांस रोकी। राज ने अपनी कमर को थोड़ा पीछे खींचा, निशाना साधा और फिर…

"खचाक!"

उन्होंने अपनी पूरी राजपुताना ताकत से एक ही बार में खुद को अंदर धकेल दिया।

"आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!"

कामिनी की गगनभेदी चीख कोठरी में गूंज गई। वह चीख इतनी तेज़ थी कि अगर राज ने उसका मुंह अपने हाथ से न ढका होता, तो शायद अस्तबल के घोड़े बिदक जाते।

उसकी सील टूट चुकी थी। एक झटके में। खून निकल आया था। राज का मोटा लिंग उसकी तंग, कुंवारी गुफा को जबरदस्ती, बेरहमी से खोलता हुआ अंदर घुस गया था।

कामिनी तड़प रही थी। उसे लगा जैसे उसके अंदर कोई गरम लोहे की रॉड डाल दी गई हो। उसका शरीर ऐंठ रहा था। आंसू उसके गालों पर बह रहे थे।

"शश्श... हो गया... हो गया... मेरी रानी..." राज उसके ऊपर स्थिर हो गए। वे उसे हिलने का मौका दे रहे थे ताकि उसका शरीर उनके आकार को स्वीकार कर सके। वे अंदर थे, जड़ तक।

राज ने महसूस किया कि कामिनी की योनि की दीवारें उनके लिंग को कितनी मजबूती से जकड़े हुए हैं। वह स्पंदन कर रही थी। यह अहसास उन्हें पागल कर रहा था। एक कुंवारी कली को तोड़ने का नशा किसी भी शराब से ज्यादा था।

"अब मज़ा आएगा," राज ने धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। वह थोड़ा बाहर निकले और फिर वापस अंदर गए।

दर्द अब एक अजीब सी मीठी जलन में बदल रहा था। राज के हर धक्के के साथ कामिनी को महसूस हो रहा था कि वह भरी जा रही है। पूरी तरह। खालीपन खत्म हो रहा था।

"हिलाओ अपनी कमर," राज ने आदेश दिया। "मर्दों की तरह लो।"
 
कामिनी ने दर्द के बावजूद, अनजाने में अपनी कमर ऊपर उठानी शुरू की। वह राज के धक्कों का जवाब दे रही थी। उसका शरीर मांग रहा था।

राज की रफ़्तार बढ़ती गई। भूसे की सरसराहट और जिस्मों के टकराने की "थप-थप" आवाज़ कोठरी में गूंजने लगी।

"बोल," राज ने कामिनी के स्तनों को मसलते हुए कहा। "बोल तू किसकी है?"

"आपकी..." कामिनी सिसक रही थी, अपनी उंगलियां राज की पीठ में गड़ाते हुए। "मैं आपकी हूँ बड़े ठाकुर... पूरी तरह..."

"प्रताप क्या है?"

"कुछ नहीं... वो कुछ नहीं है... वो नामर्द है..."

यह सुनकर राज का पौरुष और बढ़ गया। राज ने उसे जानवरों की तरह रगड़ना शुरू किया। वह अपनी बरसों की प्यास, अपनी पत्नी के जाने का गम, और इस बात का घमंड कि उसने अपने भाई की पत्नी को अपना बना लिया, सब कुछ कामिनी के अंदर उतार रहे थे।

अंत में, राज ने एक शेर जैसी दहाड़ मारी। उनका शरीर अकड़ गया। उन्होंने अपना सारा गर्म, गाढ़ा वीर्य कामिनी की कोख में, बहुत गहराई में भर दिया। वह इतनी गहराई तक गए कि कामिनी की सांस रुक गई। उसे लगा जैसे गर्म लावा उसके अंदर भर रहा है।

वे दोनों भूसे के ढेर पर निढाल पड़े रहे।

पसीने से लथपथ। कामिनी के पैरों के बीच खून और वीर्य का मिश्रण बह रहा था।

वह अब 'अछूती' नहीं थी। वह अब 'पवित्र' नहीं थी। वह अब 'बड़े ठाकुर की नई बहू' नहीं, बल्कि 'बड़े ठाकुर की औरत' बन चुकी थी।

राज ने करवट ली और कामिनी को अपनी पसीने से भीगी छाती से लगा लिया। उन्होंने उसके माथे को चूमा।

"अब तू असली औरत बनी है," राज ने भारी आवाज़ में कहा। "और यह बच्चा... जो शायद आज रात ठहर गया हो... वो इस विला का असली वारिस होगा।"

कामिनी ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना सिर उनकी चौड़ी छाती पर रख दिया और उनकी धड़कनें सुनने लगी।

मर्यादा का चीरहरण हो चुका था, और अजीब बात यह थी कि उसे अपनी फटी हुई चोली, खून से सने घाघरे और दर्द से भरे शरीर पर शर्म नहीं, बल्कि एक अजीब सा गर्व महसूस हो रहा था। उसने अपनी मालकिन को पा लिया था।

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अगली सुबह। अज़ानगढ़ की विला में भोर की आरती की घंटी बज रही थी। मंदिर से शंख की आवाज़ आ रही थी। लेकिन कामिनी की नींद आरती से नहीं, बल्कि अपने शरीर के निचले हिस्से में हो रहे एक मीठे, तीखे और लगातार बने हुए दर्द से खुली।

वह अपने कमरे में थी। प्रताप कल शहर गया था, इसलिए बिस्तर का दूसरा हिस्सा खाली था। कामिनी ने एक गहरी सांस ली और करवट लेने की कोशिश की।

"आह..." उसके मुंह से एक दबी हुई सिसकी निकल गई।

उसकी कमर के नीचे का पूरा हिस्सा जाम हो गया था। उसकी जांघों के अंदरूनी हिस्से ऐसे दुख रहे थे जैसे उसने मीलों दौड़ लगाई हो। और उसकी योनि... वह जगह जो कल दोपहर तक बंद और अछूती थी, अब सूजी हुई, संवेदनशील और खुली हुई महसूस हो रही थी।

उसे अभी भी, जागने के बाद भी, राज के उस विशाल, मोटे और सख्त लिंग का अहसास अपने अंदर महसूस हो रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे वह अभी भी उसके अंदर है, उसे फैला रहा है।

कामिनी ने चादर के नीचे हाथ डाला। उसने अपनी उंगलियों से अपनी योनि को छूकर देखा। वह बहुत नाज़ुक हो गई थी। वहां हल्का सा सूखा खून और चिपचिपापन था—राज का वीर्य जो रात भर उसके अंदर रहा था।

कामिनी को घिन नहीं आई। उसे एक अजीब सा गर्व महसूस हुआ। यह गंदगी नहीं थी, यह उसके लिए एक 'तमगा' था। एक निशानी थी कि विला के बड़े ठाकुर, उस शेर जैसे मर्द ने उसे अपना बना लिया है। उसे जीत लिया है।

वह मुश्किल से बिस्तर से उठी। जब उसने पहला कदम ज़मीन पर रखा, तो उसके पैरों के बीच एक टीस उठी। उसे अपने पैरों को थोड़ा चौड़ा करके चलना पड़ा। उसकी चाल बदल गई थी। वह थोड़ा लंगड़ा कर चल रही थी, या यूँ कहें कि उसकी चाल में एक औरत वाला भारीपन और 'लचक' आ गई थी। जब एक कली पूरी तरह खिल जाती है, तो वह भारी हो जाती है; कामिनी के साथ वही हुआ था।

वह बाथरूम में गई। उसने अपने कपड़े उतारे और आदमकद आईने के सामने नंगी खड़ी हो गई।

उसने अपनी गर्दन देखी। वहां राज के दांतों का एक हल्का नीला निशान था, जिसे उन्होंने रात के अंधेरे में जोश में दिया था। उसने अपनी छाती देखी। उसके गोरे और सुडौल स्तन, जो कल रात राज के बड़े हाथों में बुरी तरह मसले गए थे, थोड़े लाल और सूजे हुए लग रहे थे। निप्पल अभी भी खड़े थे, डार्क हो गए थे, जैसे राज के खुरदरे स्पर्श का इंतज़ार कर रहे हों।

उसने शावर चलाया। गुनगुना पानी जब उसके बदन पर गिरा, तो उसे कल रात की कोठरी की याद आ गई। भूसे की चुभन, राज का पसीना, उनकी भारी सांसें, उनका वहशीपन और वो पल जब उन्होंने उसे 'भरा' था।

कामिनी ने अपनी आंखें बंद कर लीं। उसने साबुन लगाया और अपनी उंगलियां अपनी सूजी हुई योनि पर फेरीं। दर्द हुआ, लेकिन साथ ही एक बिजली सी दौड़ गई।

"मैं उनकी हूँ..." कामिनी ने शीशे में अपनी छवि से कहा। उसकी आंखों में एक नई चमक थी—एक राज़दार चमक। "प्रताप की पत्नी सिर्फ कागज पर हूँ, दुनिया के लिए हूँ... लेकिन हकीकत में... जिस्म और रूह से मैं बड़े ठाकुर की औरत हूँ।"

नहाने के बाद उसने अपनी मांग में गहरा सिंदूर भरा। दुनिया के लिए यह प्रताप के नाम का था, लेकिन कामिनी के दिल में यह उस लाल खून का प्रतीक था जो कल रात राज ने बहाया था।

कामिनी तैयार होकर नीचे आई। आज उसने जानबूझकर एक गहरी गुलाबी रंग की शिफॉन साड़ी पहनी थी। साड़ी बहुत ही महीन और पारदर्शी थी, जो उसके शरीर से चिपकी हुई थी। उसने ब्लाउज थोड़ा डीप पहना था, ताकि अगर पल्लू थोड़ा सरके, तो राज उसकी गर्दन का वह निशान देख सकें। वह चाहती थी कि राज देखें कि उन्होंने क्या किया है।

वह जब सीढ़ियों से उतर रही थी, तो उसे बहुत संभलकर चलना पड़ रहा था। उसकी जांघें आपस में रगड़ खा रही थीं और योनि का दर्द हर कदम पर उसे याद दिला रहा था कि वह अब खाली नहीं है।

हॉल में राज बैठे थे। अकेले। प्रताप शहर गया हुआ था, सास पूजा में थीं और ससुर बाहर बरामदे में थे। राज सफेद कुर्ता-पायजामा पहने अखबार पढ़ रहे थे। वे बिल्कुल शांत थे, जैसे कल रात कुछ हुआ ही न हो।

कामिनी की पायल की आवाज़ सुनकर राज ने अखबार नीचे किया।

कामिनी उनके पास गई। उसका दिल जोर से धड़क रहा था।

"पांव लागी बाबूजी," उसने झुककर कहा।

झुकते वक्त उसने जानबूझकर पल्लू को ढीला छोड़ दिया। उसका पल्लू थोड़ा सरक गया। राज की नज़रें अखबार से हटीं और सीधे उसके ब्लाउज की घाटी और गर्दन के उस नीले निशान पर गईं।

उनकी आंखों में एक चमक आ गई। एक मालिक की चमक।

"जीती रहो," राज ने कहा। उनकी आवाज़ में एक अलग ही अधिकार था, एक भारीपन था। "तबीयत कैसी है बहू? चाल थोड़ी... 'भारी' लग रही है। पैर ठीक से नहीं पड़ रहे?"

कामिनी का चेहरा लाल हो गया। राज सबके सामने (हालांकि अभी कोई नहीं था) उसे छेड़ रहे थे, लेकिन इतने सभ्य शब्दों में कि अगर कोई सुन भी ले तो शक नहीं कर सकता।

"जी... बस थोड़ी थकान है," कामिनी ने नज़रें झुका लीं, लेकिन उसके होठों पर एक बारीक मुस्कान थी।

"होनी भी चाहिए," राज ने अखबार मोड़कर रख दिया। वे उठे और कामिनी के पास आए। "विला की जिम्मेदारियां उठाना आसान नहीं है। खासकर जब 'काम' इतना भारी हो।"

राज ने अपना हाथ बढ़ाया और कामिनी की साड़ी के पल्लू को ठीक करने के बहाने उसके स्तन के निचले हिस्से को अपनी उंगलियों से छू दिया।

"प्रताप आज रात भी नहीं आएगा," राज ने धीरे से कहा। "फोन आया था उसका।"

कामिनी ने ऊपर देखा। उनकी आंखों में सवाल था।

"तो?" राज ने पूछा। "क्या विला की नई बहू आज रात फिर 'सेवा' करेगी? या कल की थकान अभी उतरी नहीं?"

"बाबूजी... मैं चल भी नहीं पा रही," कामिनी ने सच कहा। "बहुत दर्द है।"

"दवा मेरे पास है," राज ने उसकी कमर को एक पल के लिए भींचा और छोड़ दिया। "मालिश। आज रात। मेरे कमरे में। और आज... आज भूसा नहीं होगा। आज मखमली गद्दा होगा।"

तभी सास के आने की आवाज़ आई। राज तुरंत पीछे हट गए और दोबारा अखबार पढ़ने लगे।
 
कामिनी रसोई की तरफ भाग गई। उसका चेहरा तप रहा था। दर्द था, लेकिन उस दर्द में एक नशा था। उसे आज रात का इंतज़ार होने लगा।

दिन रेंग-रेंग कर बीत रहा था। कामिनी को हर पल रात के 11 बजने का इंतज़ार था। उसने दिन भर घर का काम किया, लेकिन उसका दिमाग राज के कमरे में था।

रात के 11 बजे। विला फिर से शांत हो गई।

कामिनी ने इस बार कोई गलती नहीं की। उसने पहले ही स्नान कर लिया था। उसने अपने शरीर के हर हिस्से पर गुलाब का इत्र लगाया—गर्दन पर, स्तनों के बीच, जांघों पर। उसने अपनी सबसे नरम और फिसलने वाली रेशमी साड़ी पहनी।

उसके नीचे उसने कुछ नहीं पहना था।

राज ने कल कहा था कि उन्हें कपड़े खोलने में वक्त बर्बाद करना पसंद नहीं। वह उनकी पसंद का ख्याल रख रही थी।

वह दबे पांव राज के कमरे की तरफ बढ़ी। उसकी चाल में लचक थी, जो उसके दर्द और उसकी बेशर्मी दोनों को दिखा रही थी।

दरवाजा हल्का सा खुला था।

कामिनी अंदर गई।

आज कमरा अलग लग रहा था। रोशनी बहुत कम थी, सिर्फ एक लैंप जल रहा था। बिस्तर के पास एक छोटी मेज पर विदेशी शराब की बोतल, सोडा और दो गिलास रखे थे। और साथ में... वही सरसों के तेल की कटोरी।

राज एक बड़ी आराम कुर्सी पर बैठे थे। उन्होंने आज कुर्ता नहीं पहना था। उन्होंने सिर्फ एक गहरा नीला रेशमी रोब पहना था जो सामने से खुला था। उनका चौड़ा, बालों वाला सीना, पेट के एब्स और मज़बूत, बालों वाली जांघें दिख रही थीं। वे नंगे पैर थे।

"दरवाजा बंद करो," राज ने आदेश दिया, अपने हाथ में जाम घुमाते हुए। उन्होंने कामिनी की तरफ देखा भी नहीं।

कामिनी ने कुंडी लगाई और मुड़ी।

"पास आओ," राज ने कहा।

कामिनी उनके पास गई।

"घूंघट हटाओ," राज ने कहा। "और पल्लू भी। मुझे रुकावटें पसंद नहीं।"

कामिनी ने अपना पल्लू गिरा दिया। उसका तंग ब्लाउज, गहरी घाटी और सुडौल कमर राज के सामने थी।

"मेरी गोद में बैठो," राज ने अपनी जांघ थपथपाई।

कामिनी झिझकी। "कुर्सी पर? बाबूजी... मैं भारी हूँ।"

"मैं भार उठा सकता हूँ," राज ने उसकी कलाई पकड़ी और उसे खींच लिया। "बैठो। मेरी तरफ मुंह करके।"

कामिनी ने अपनी साड़ी उठाई और राज की गोद में, उनके आमने-सामने बैठ गई। उसकी नंगी, कोमल जांघें राज की सख्त, बालों वाली जांघों से सट गईं।

राज के रोब का कपड़ा उनकी त्वचा के बीच से हट गया।

कामिनी को महसूस हुआ कि राज के रोब के नीचे कुछ नहीं है। उनका लिंग उनकी जांघों के बीच दबा हुआ था, सख्त और गर्म।

राज ने अपना गिलास कामिनी के होठों से लगा दिया।

"पियो," उन्होंने कहा।

"शराब?" कामिनी ने मुंह फेर लिया। "मैं नहीं पीती।"

"आज पियोगी," राज ने कहा। "यह दर्द कम करेगी और शर्म खत्म करेगी। अगर तुम्हें मेरे साथ चलना है, तो मेरी तरह बनना होगा। पियो।"

कामिनी ने एक छोटा घूंट भरा। कड़वा तरल उसके गले को जलाता हुआ नीचे उतरा। उसे खांसी आ गई।

"गुड गर्ल," राज ने उसकी नंगी कमर को सहलाया। "एक घूंट और।"

दो-तीन घूंट के बाद, कामिनी के सिर में हल्का सुरूर चढ़ गया। उसका शरीर गर्म हो गया। शर्म का पर्दा हटने लगा। राज का चेहरा उसे और भी आकर्षक लगने लगा।

राज ने अपना एक हाथ कामिनी की साड़ी के अंदर, पीछे से डाला। उन्होंने सीधे उसके नितंबों को पकड़ लिया। कामिनी ने कोई पैंटी नहीं पहनी थी। राज की खुरदरी हथेली सीधे उसके नंगे, ठंडे मांस पर थी।

"तैयार होकर आई है," राज ने मुस्कुराते हुए कहा। उन्होंने अपनी उंगली उसकी नितंबों की दरार में फिराई। "मेरी रंडी। मेरी चालाक बहू।"

यह शब्द सुनकर कामिनी को बुरा नहीं लगा, बल्कि उत्तेजना हुई। शराब ने उसे बेपरवाह बना दिया था।

"बाबूजी... कल बहुत दर्द हुआ था," कामिनी ने उनके सीने पर अपना सिर रख दिया। उनके सीने के बाल उसके गाल को चुभ रहे थे।

"आज नहीं होगा," राज ने उसके बालों को चूमते हुए कहा। "आज मैं तुझे प्यार करूँगा। लेकिन मेरे तरीके से। आज मैं तुझे तैयार करूँगा।"

राज ने कामिनी को गोद में उठाए-उठाए ही खड़े हो गए। वे उसे लेकर बिस्तर तक गए और उसे लिटा दिया।

"आज तुझे कुछ नहीं करना है," राज ने कहा। "बस लेटे रहो। आज मैं तुझे दिखाऊंगा कि जीभ का क्या काम होता है। जो प्रताप कभी नहीं कर पाया, वो मैं करूँगा।"

राज ने कामिनी की साड़ी को पूरी तरह ऊपर कर दिया। उन्होंने उसकी टांगें उठाईं और उन्हें चौड़ा कर दिया। कमरे की मद्धम रोशनी में कामिनी का 'नारीत्व' साफ दिख रहा था। वह अभी भी थोड़ा सूजा हुआ और लाल था, जो कल रात की गवाही दे रहा था।

"सुंदर..." राज ने कहा। "गुलाब की पंखुड़ी जैसी।"

उन्होंने तेल लिया और कामिनी की जांघों और योनि के आसपास मला।

फिर, विला का वह बड़ा ठाकुर, जिसके सामने पूरा गाँव सिर झुकाता था, अपनी बहू के पैरों के बीच झुक गया।

कामिनी की सांस अटक गई। "बाबूजी! क्या कर रहे हैं! यह गंदा है! वहां से... वहां से हम पेशाब करते हैं..."

"चुप," राज ने उसकी जांघों को कसकर पकड़ लिया। "मर्दों और औरतों के बीच बिस्तर पर कुछ गंदा नहीं होता। यह अमृत है।"

राज ने अपनी जीभ निकाली और कामिनी की योनि के होठों को नीचे से ऊपर तक चाटना शुरू किया।

"स्लप..."

कामिनी ने चादर को अपनी मुट्ठी में भींच लिया। उसने अपनी एड़ियां गद्दे पर पटक दीं। उसने ऐसा सुख कभी महसूस नहीं किया था। राज की घनी मूंछें उसकी नाज़ुक जांघों और त्वचा को गुदगुदा रही थीं, चुभ रही थीं, और उनकी गर्म, खुरदरी जीभ... वह उसके सबसे संवेदनशील हिस्से पर आग लगा रही थी।

"आह्ह्ह! बाबूजी! आहह ! नहीं... मत रुकिए..." कामिनी का सिर इधर-उधर डोलने लगा। उसका शरीर धनुष की तरह तन गया।

राज उसे पी रहे थे। वे उसका रस, उसका पसीना, उसका सब कुछ चख रहे थे। वे अपनी जीभ को उसके अंदर डाल रहे थे, उसे 'बजा' रहे थे। वे उसे चाट रहे थे जैसे कोई प्यासा जानवर पानी पीता है।
 
कामिनी का नशा और बढ़ गया। वह अब अपनी सुध-बुध खो चुकी थी। उसका हाथ राज के बालों में चला गया और उसने उनका सिर अपनी योनि पर दबा दिया।

"और अंदर... और अंदर..."

जब कामिनी तड़पने लगी और चरम पर पहुँचने वाली थी, तब राज ऊपर आए। उनका चेहरा गीला था।

"अब," उन्होंने कहा। "अब तू तैयार है।"

उन्होंने अपना रोब उतार दिया। उनका लिंग पूरी तरह तना हुआ था। लाल, विशाल और नसों से भरा हुआ। वह तेल और कामिनी के रस से चमक रहा था।

राज ने कामिनी की टांगों को उसके कंधों तक मोड़ दिया। अब रास्ता पूरी तरह खुला और गहरा था।

उन्होंने धीरे से प्रवेश किया। तेल और ओरल सेक्स की वजह से कामिनी अब बहुत गीली थी।

"प्लॉप..."

वह आसानी से, बिना ज्यादा दर्द के, अंदर चले गए।

"आह..." कामिनी ने राहत की सांस ली। "भर गया... पूरा भर गया..."

राज ने उसे पेलना शुरू किया। लेकिन कल की तरह जानवरों वाला नहीं। यह धीमा, गहरा और लयबद्ध था। वे पूरा बाहर निकलते, और फिर एक ही बार में पूरा अंदर जाते। वे हर धक्के के साथ कामिनी की आंखों में देख रहे थे।

"पच-पच-पच..."

कमरे में सिर्फ गीली आवाज़ें और उनकी सांसों का शोर था।

"मेरी आंखों में देख," राज ने कहा, अपनी रफ़्तार बढ़ाते हुए। "मैं कौन हूँ?"

"आप मेरे हैं," कामिनी ने कहा, नशे और हवस में। "मेरे मालिक। मेरे मर्द।"

"और प्रताप?"

"वो कोई नहीं है," कामिनी ने अपना सिर हिलाया। "मुझे सिर्फ आप चाहिए। आपका यह... यह मोटा लंड चाहिए।"

राज खुश हुए। उन्होंने झुककर कामिनी के होंठों को चूस लिया। उनकी जीभ कामिनी के मुंह में थी (जिसमें कामिनी का अपना स्वाद था) और उनका लिंग उसके अंदर। वे उसे दोनों तरफ से भर रहे थे।

राज ने अपनी रफ़्तार बढ़ाई। बिस्तर चरमराने लगा। कामिनी के स्तन हिल रहे थे।

"कामिनी... मैं तुझे अपनी मुहर लगाऊंगा," राज ने कहा। "ऐसी मुहर जो कभी नहीं मिटेगी।"

उन्होंने उसे पलट दिया। अब कामिनी पेट के बल लेटी थी। राज उसके ऊपर थे।

उन्होंने उसे पीछे से पेलना शुरू किया। इस पोज़िशन में कामिनी के गोल, बड़े नितंब राज के पेट से टकरा रहे थे। राज ने उसके बालों को पकड़कर उसका सिर पीछे खींचा।

"देख आईने में," सामने अलमारी का आईना था। "देख हम क्या कर रहे हैं। देख तेरी हालत।"

कामिनी ने धुंधली आंखों से देखा। एक विशाल, काला मर्द उसकी नंगी, गोरी पीठ पर हावी था। उसका चेहरा लाल था, बाल बिखरे थे। यह दृश्य उसे और पागल कर गया। उसे लगा जैसे वह कोई रंडी है, और उसे यह अच्छा लग रहा था।

"मैं आ रहा हूँ कामिनी!" राज की आवाज़ भारी हो गई। उनकी पकड़ सख्त हो गई।

"अंदर छोड़िए!" कामिनी चिल्लाई। "मुझे वारिस चाहिए! एक शेर चाहिए! प्रताप का नहीं, आपका खून चाहिए!"

यह सुनकर राज का संयम टूट गया। उन्होंने एक जोरदार, गहरा धक्का मारा। उन्होंने खुद को कामिनी के अंदर बहुत गहराई तक धंसा दिया और अपना गर्म लावा उसके अंदर छोड़ना शुरू किया।

लहरों पर लहरें। कामिनी को लगा जैसे उसकी कोख में बाढ़ आ गई हो।

राज ने उसे कसकर दबा लिया। कामिनी भी कांप उठी और एक लंबी चीख के साथ चरम सुख को प्राप्त हुई।

वे दोनों वैसे ही लेटे रहे। राज कामिनी के ऊपर थे, उनका भारी शरीर उसे सुरक्षा और स्वामित्व का अहसास दिला रहा था।

काफी देर बाद, राज उसके ऊपर से हटे। उन्होंने कामिनी को सीधा किया और उसे अपनी बांहों में भर लिया।

"आज से," राज ने कामिनी की पसीने से भीगी गर्दन पर किस करते हुए कहा, "एक नियम है। दिन में तुम इस घर की इज्ज़तदार बहू हो। घूंघट में रहोगी, सबकी सेवा करोगी। लेकिन रात में... जैसे ही सूरज ढलेगा... तुम मेरी हो। सिर्फ मेरी। इस कमरे की रानी, और मेरी रखैल।"

कामिनी ने अपनी आंखें बंद कर लीं और मुस्कुराई। उसे अपनी जंजीरें पसंद आ रही थीं। उसने पीछे हाथ बढ़ाकर राज के छाती के बालों को सहलाया।

"जी मालिक," उसने फुसफुसाया।

विला की नई बहू अब पूरी तरह से 'बड़े ठाकुर' की हो चुकी थी। बाहर सन्नाटा था, लेकिन इस कमरे में एक नए वारिस की नींव रखी जा चुकी थी।

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विला में दिनचर्या सामान्य रूप से चल रही थी, लेकिन कामिनी के लिए अब हर दिन एक नया रोमांच और हर रात एक नई कहानी थी। राज के साथ उस दूसरी रात (कमरे में) के बाद, कामिनी के अंदर का डर खत्म हो चुका था। उसकी जगह एक अजीब से आत्मविश्वास और छिपी हुई खुशी ने ले ली थी।

उसे अब यह अहसास हो गया था कि इस बड़ी विला में उसका वजूद सिर्फ काम करने वाली बहू का नहीं है, बल्कि वह उस आदमी की चहेती है जो इस विला का भगवान है।

सुबह के 9 बज रहे थे। कामिनी अपने कमरे में आईने के सामने तैयार हो रही थी। उसने गौर किया कि उसका चेहरा बदल गया है। उसकी त्वचा में एक गुलाबी निखार आ गया था, आंखों में एक नशीली चमक थी और होठों पर एक ऐसी मुस्कान जो बेवजह ही आ जाती थी। यह एक संतुष्ट औरत का चेहरा था—वह औरत जिसे रात भर प्यार किया गया हो, जिसे भरा गया हो।

प्रताप अभी भी बिस्तर पर लेटा अंगड़ाइयां ले रहा था। उसका चेहरा सूजा हुआ था।

"आज बहुत खुश लग रही हो?" प्रताप ने चिढ़ते हुए पूछा। उसे शायद अपनी पत्नी की यह चमक खटक रही थी, क्योंकि वह खुद अंदर से बुझा हुआ महसूस करता था। उसे जलन हो रही थी कि कामिनी इतनी ताज़ा कैसे है जबकि वह खुद थका हुआ है।

कामिनी पलटी। उसने एक गहरे हरे रंग की साड़ी पहनी थी, जिस पर सुनहरे गोटे का काम था। "बस ऐसे ही... मौसम अच्छा है।"

"मौसम?" प्रताप ने नाक सिकोड़ी।

"बाहर लू चल रही है और तुम्हें मौसम अच्छा लग रहा है? तुम औरतों का दिमाग भी ना..."

प्रताप बड़बड़ाता हुआ उठा और बाथरूम की तरफ चला गया। उसने एक बार भी कामिनी को प्यार से नहीं देखा, न ही उसे छूने की कोशिश की। पहले कामिनी को यह बुरा लगता था, लेकिन आज उसे इससे फर्क नहीं पड़ता था। उसे पता था कि असली मर्द कौन है और उसे प्यार (भले ही वह हवस के रूप में हो) कहाँ से मिल रहा है।

कामिनी नीचे हॉल में आई। राज पहले से ही वहां मौजूद थे, मुनीम जी के साथ हिसाब-किताब कर रहे थे।

जैसे ही कामिनी सीढ़ियों से उतरी, राज की नज़रें उस पर गईं। उन्होंने एक पल के लिए काम रोका और उसे ऊपर से नीचे तक देखा। उनकी नज़रों में एक मालिकाना हक था। वे देख रहे थे कि हरी साड़ी में उसका बदन कितना निखर रहा है। कामिनी ने भी अपनी पलकें झुका लीं, लेकिन उसके होठों पर एक बारीक मुस्कान तैर गई। यह उनका गुप्त संवाद था।

"बहू," राज ने मुनीम जी के सामने ही अपनी भारी आवाज़ में पुकारा।

"जी बाबूजी?" कामिनी रुक गई।

"आज दोपहर के खाने में खास इंतज़ाम करना," राज ने कहा। "आज मुनीम जी भी साथ खाएंगे। और प्रताप भी रहेगा। मैं चाहता हूँ कि आज पूरा परिवार साथ बैठकर खाए।"

"जी, जैसा आप कहें," कामिनी ने सिर हिलाया और रसोई की तरफ बढ़ गई।

उसे राज की आंखों में एक शरारत दिखी थी। वह जानती थी कि 'साथ बैठकर खाने' का मतलब सिर्फ खाना नहीं है। राज कोई नया खेल खेलने वाले थे। कोई ऐसा खेल जिसमें खतरा हो।

रसोई में काम करते वक्त कामिनी का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। उसे अपनी जांघों के बीच अभी भी कल रात की टीस महसूस हो रही थी। राज ने उसे बुरी तरह पेला था, लेकिन उस दर्द में उसे अब मज़ा आने लगा था। वह बार-बार अपनी साड़ी ठीक करती, यह सोचकर कि कहीं गर्दन पर कोई निशान तो नहीं दिख रहा।

दोपहर के 1:30 बजे। डाइनिंग टेबल सज चुकी थी। विला की डाइनिंग टेबल बहुत बड़ी और शाही थी, जिस पर मोटा और लंबा मेज़पोश बिछा था जो लगभग फर्श को छूता था।

राज टेबल के मुख्य सिरे पर बैठे। उनके दाईं ओर प्रताप बैठा और बाईं ओर मुनीम जी। सास-ससुर अपने कमरे में खा चुके थे।

"बहू, तुम भी बैठो," राज ने आदेश दिया। "आज तुम परोसोगी नहीं, साथ खाओगी। नौकर परोस देंगे।"

"लेकिन बाबूजी... घर की औरतें बाद में..." कामिनी ने संकोच किया।

"यह मेरा हुक्म है," राज ने उस कुर्सी की तरफ इशारा किया जो प्रताप के ठीक सामने और राज के बिल्कुल बगल में थी। "बैठो।"

कामिनी बैठ गई। अब स्थिति यह थी: राज टेबल के हेड पर थे। उनके दाईं तरफ प्रताप था। और उनके बाईं तरफ, कोने वाली कुर्सी पर कामिनी थी। यानी प्रताप और कामिनी आमने-सामने थे, लेकिन राज और कामिनी अगल-बगल थे।

खाना शुरू हुआ। नौकरों ने थालियां परोसीं।

"आज का मटन बहुत अच्छा बना है," मुनीम जी ने तारीफ की।

"हाँ," राज ने कामिनी की तरफ देखते हुए कहा। "बहू के हाथों में जादू है। जो भी छूती है, उसमें स्वाद आ जाता है। चाहे वो खाना हो... या कुछ और।"

कामिनी ने अपनी थाली में नज़रें गड़ा लीं। उसका दिल धक-धक करने लगा। टेबल के ऊपर सब कुछ सामान्य था—सभ्य बातें, खाने की आवाज़ें। लेकिन टेबल के नीचे... एक अलग दुनिया शुरू होने वाली थी।

राज ने अपना बायां पैर (जो कामिनी की तरफ था) अपनी चमड़े की चप्पल से बाहर निकाला।

कामिनी खाना खा रही थी, तभी उसे अपनी साड़ी के नीचे, अपनी एड़ी पर कुछ महसूस हुआ। एक बड़ा, खुरदरा और गर्म पैर।

वह चौंक गई। उसका निवाला हाथ में ही रह गया। उसने सामने देखा। राज मुनीम जी से फसल के दाम के बारे में बात कर रहे थे। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, वे बिल्कुल गंभीर लग रहे थे।

लेकिन टेबल के नीचे, राज का नंगा पैर धीरे-धीरे ऊपर चढ़ रहा था।

कामिनी ने अपनी टांग पीछे खींचने की कोशिश की, लेकिन मेज के पाये की वजह से जगह कम थी। राज ने अपने पैर से उसकी टांग को ढूंढ लिया। उनका बड़ा अंगूठा कामिनी की साड़ी के किनारे को ऊपर उठा रहा था।

"प्रताप," राज ने सामान्य लहजे में पूछा, "तुम्हारा शहर का काम कैसा चल रहा है?"

"ठीक है भाईसाहब," प्रताप ने चिकन चबाते हुए कहा। "बस थोड़ा समय लगेगा। वो डीलर थोड़ा नखरे कर रहा है।"

"समय लो," राज ने कहा। "जल्दबाजी ठीक नहीं।"

टेबल के नीचे, राज का पैर अब कामिनी की पिंडली तक पहुँच चुका था। उनकी खुरदरी एड़ी कामिनी की कोमल, बिना बाल वाली त्वचा पर रगड़ खा रही थी।

यह स्पर्श बहुत उत्तेजक था। पति सामने बैठा था, मुनीम जी बगल में थे, और विला का मालिक टेबल के नीचे अपनी बहू के साथ खेल रहा था।

राज ने अपने पैर की उंगलियों से कामिनी की साड़ी को घुटने तक ऊपर कर दिया। अब उनका नंगा, गर्म पैर कामिनी की नंगी जांघ को छू रहा था।
 
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