अगले दस मिनट में शीला रूखी के घर के बाहर खड़ी थी.. उसने धीरे से दरवाजा खोला.. रूखी का मिसकोल अभी आया नहीं था.. पर शीला से रहा ही नहीं जा रहा था.. मुख्य कमरे से गुजरते हुए वह दूसरे कमरे के दरवाजे के पीछे सटकर अंदर का नजारा देखने की कोशिश करने लगी.. अंदर का द्रश्य देखकर शीला के भोसड़े में १०००० वॉल्ट का झटका लगा..
रूखी का ससुर और रूखी दोनों ही खटिया पर नंगे थे.. वो बूढ़ा रूखी के मदमस्त बबले पकड़कर दबाते हुए रूखी से कुछ बात कर रहा था.. रूखी धोती के ऊपर से अपने ससुर के लंड से खेल रही थी.. दोनों सारी लाज-शर्म त्याग चुके थे.. रूखी ने ससुर को अपने ऊपर खींच लिया और बाहों में दबा दिया..
ससुर: "अरे बहु.. दरवाजा तो ठीक से बंद कर लेती.. बड़ी जल्दी है तुझे तो.. रुक.. मुझे दरवाजा बंद करने दे.. " वो उठकर दरवाजा बंद करने आया.. शीला साइड में छुप गई.. उसी वक्त रूखी ने शीला को मिसकोल किया.. शीला को यकीन था की जैसे ही बूढ़ा खटिया पर लेटेगा, रूखी किसी न किसी बहाने से दरवाजा खोल ही देगी..
रूखी: "बाबूजी, मैं जरा पानी पीकर आती हूँ" पानी पीने के बहाने वो उठी और उसने दरवाजे की कुंडी खोल दी.. और फिर ससुर के साथ खटिया में लेट गई..
रूखी: "बाबूजी, दरवाजे की कुंडी खराब हो गई है.. ठीक से बंद ही नहीं होती.. कोई जोर से धक्का दे तो भी खुल जाती है.. उसे ठीक करवा दीजिए"
रूखी के ५-५ किलो को चुचे दबाते हुए बूढ़ा बोला "अरे जो होगा देखा जाएगा बेटा.. अभी यहाँ कौन आने वाला है.. आह्ह रूखी बेटा.. ये तेरा जोबन.. वाहह.. देख तो.. कितना कडक हो गया मेरा.. जवानी में भी ऐसा सख्त नहीं होता था.. क्या जादू है तेरे जोबन का मेरी बहुरानी.. !!"
काले नाग की तरह खड़ा होकर फुँकार रहा था बूढ़े का लंड.. रूखी ने अपने हाथों से भेस के थन की तरह ससुर का लंड पकड़ा.. उसे ऐसा लगा मानों लोहे का गरम सरिया हाथ में ले लिया हो.. शीला को अब तक दरवाजा खोलकर अंदर आ जाना चाहिए था पर वह भी इस बूढ़े का लंड देखती ही रह गई..
ससुर: "बहु.. तू बड़ा मस्त चूसती है.. चल मुंह में लेकर चूस दे.. " रूखी ने ससुर के लंड का सुपाड़ा मुँह में लिया ही था की तभी..
"रूखी घर में है???" शीला बाहर से चिल्लाई.. और दरवाजे को धक्का देकर अंदर चली आई
"अरे बाप रे.. !!" ससुर ने बस इतना ही कहा.. वह आजू बाजू चादर ढूँढने लगा.. पर रूखी का आयोजन एकदम सटीक था..सारे कपड़े उसने दूर रख दिए था.. थोड़ी सी दूरी से शीला को बूढ़े का झांटों से भरा हुआ खूँटे जैसा लंड दिखने लगा.. शीला ने शर्माने की एक्टिंग की और बोली
शीला: "हाय माँ.. ये क्या कर रही है तू रूखी?? कुछ शर्म हया है या नहीं तुझे?? अपने सगे ससुर के साथ ही..!!!! "
रूखी: "अरे भाभी.. आप यहाँ? फोन करके आना चाहिए था आपको.. "
बूढ़े के हाथ अभी भी रूखी के स्तनों पर ही थे.. उसका दिमाग काम ही नहीं कर रहा था.. वह स्तब्ध होकर शीला की ओर देख रहा था.. रूखी तो एक्टिंग कर रही थी.. पर बूढ़े की गांड फटकार दरवाजा हो गई थी..
शीला: "हाँ.. अब तो मुझे भी लगता है की फोन करके ही आना चाहिए था.. आप लोगों के रंग में भंग तो नहीं पड़ता.. !!"
रूखी: "भाभी आप रसोईघर में जाइए.. मैं आती हूँ अभी"
शीला: "नहीं रूखी.. मैं अब यहाँ एक पल भी नहीं रुकने वाली" शीला वापिस चलने लगी
ससुर: "अरे एक मिनट.. मेरी बात तो सुनिए आप.. !!" शीला रुक गई तो ससुर आगे बोला "आप कृपा करके किसीको ये बात मत बताना.. वरना हमारी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी" दो हाथ जोड़कर नंगे खड़े ससुर ने शीला से विनती की.. शीला शर्मा गई.. आँखें झुकाकर शीला उस बूढ़े के लटक रहे लंबे लंड को निहार रही थी.. पहले के मुकाबले लंड सिकुड़ चुका था.. डर के कारण.. रूखी का नंगा जिस्म इतना सेक्सी लग रहा था की देखते ही शीला को कुछ होने लगा.. बेचारे ससुर का क्या दोष?
शीला को अपने लंड को तांकते देख बूढ़ा दौड़कर अपनी धोती ले आया.. और कमर पर जैसे तैसे बांध ली.. खटिया पर बैठकर उसने रूखी की ओर देखा और बोला
ससुर: "बहु, तुम अपनी सहेली को जरा समझाओ.. ये अगर किसी को बता देगी तो हम किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं बचेंगे"
रूखी ने इशारा कर अपने ससुर को चुप रहने के लिए बताया.. फिर वो शीला के पास आई और उसे कोने में ले जाकर बोली
रूखी: "भाभी अब क्या करना है.. ? आपने जैसा कहा था वैसा ही मैंने किया.. "
शीला ने रूखी के कान में कहा "तेरे ससुर को समझा की अगर ईसे चुप करवाना हो तो किसी भी तरह हमारे साथ शामिल करना पड़ेगा.. मैं मना करती रहूँगी.. पर तुम दोनों अड़े रहना.. "
रूखी अपने ससुर के पास आई और शीला सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गई.. रूखी ने अपने ससुर को वैसे ही समझाया.. ससुर थोड़ा सा झिझक रहा था पर मानने के अलावा ओर कोई चारा भी तो नहीं था.. आखिर इज्जत का सवाल था.. एक बुरे काम को छुपाने के लिए ओर दस बुरे काम करने पड़ते है..
बूढ़ा खड़ा हुआ.. और कुर्सी के पीछे जाकर शीला से लिपट कर उसके स्तन मसलने लग गया
शीला घबराने का अभिनय करते हुए "अरे ये क्या कर रहे है आप?? आपकी बेटी की उम्र की हूँ मैं.. कुछ शर्म है की नहीं आपको.. रूखी जरा समझा इनको"
ससुर ने शीला की निप्पलों को ब्लाउस के ऊपर से ही मरोड़ते हुए कहा " बाप जैसा हूँ.. पर बाप तो नहीं हूँ ना.. तू भी एक बार चुदवा ले.. फिर देख.. रोज मेरे पास आएगी.. तू भी रूखी से कम नहीं है.. आह्ह" शीला के दोनों पपीतों को हथेलियों से सहलाते हुए बूढ़ा बोला
शीला: "छोड़ दीजिए मुझे वरना मैं चिल्लाऊँगी" शीला ने अपने आप को छुड़वाने की नाकाम कोशिश की
अब रूखी करीब आई और उसने शीला का पल्लू हटा लिया और बोली
रूखी: "उन्हे कर लेने दीजिए भाभी.. आपके छेद में थोड़ा सा अंदर बाहर कर लेंगे उसमें आपका क्या बिगड़ जाएगा?? वैसे भी आपके पति है नहीं.. आपको भी थोड़ा सा मज़ा मिल जाएगा.. बाबूजी आप कीजिए.. मैं भी देखती हूँ कैसे मना करती है ये"
छूटने के लिए शीला जानबूझकर कमजोर प्रयास कर रही थी.. और रूखी का ससुर शीला पर टूट पड़ा.. पर हुआ यह की इस सारी घटना के कारण बुढ़ऊ का लंड खड़ा ही नहीं हो पा रहा था.. अपने ससुर का मुरझाया लंड देखकर रूखी बोली
"ईसे खड़ा तो कीजिए बाबूजी.. !!! वरना आप भाभी को कैसे चोदोगे?"
ससुर: "तुझे पता तो है बहु.. बिना चूसे ये खड़ा ही नहीं होता.. और इन्हे देखकर ये शर्मा गया है.. इनसे कहो की ये ही कुछ करे ईसे जगाने के लिए"
शीला का हाथ पकड़कर रूखी ने बूढ़े ससुर के लंड पर रख दिया.. शीला शर्माने का नाटक करने लगी.. "ये सब ठीक नहीं हो रहा रूखी.. किसी को पता चल गया तो?"
रूखी ने शीला के ब्लाउस के हुक खोल दिए और ब्रा ऊपर कर दी.. दोनों पपीते बाहर झूलने लगे.. शीला के मदमस्त चुचे देखते ही बूढ़े के लंड में जान आने लगी.. थोड़ी ही देर में उस सुस्त लंड ने घातक स्वरूप धारण कर लिया
रूखी घुटनों के बल बैठ गई और शीला के हाथ से लंड ले लिया.. और चटकारे लेकर चूसने लगी.. बूढ़ा शीला के स्तनों को मसले जा रहा था.. थोड़ी देर लंड चूसकर रूखी खड़ी हो गई.. और बोली "बाबूजी, भाभी की चुत चाटिए.. तो वो जल्दी मान जाएगी.. जैसे मेरी चाटते हो बिल्कुल वैसे ही चाटना.. " शीला के घाघरे का नाड़ा खींच लिया रूखी ने
ससुर: "अच्छा ऐसी बात है.. तो अभी मना लेता हूँ ईसे.. "
घाघरा उतरते ही मदमस्त हथनी जैसी जांघों के बीच बिना बालों वाली रसीली चूत को एकटक देखने लगा बूढ़ा.. रूखी ने शीला के भोसड़े के दोनों होंठ अपनी उंगलियों से चौड़े कीये.. और अंदर का गुलाब सौन्दर्य दिखाने लगी अपने ससुर को.. रूखी का ससुर उकड़ूँ बैठकर शीला की चूत के करीब आया.. पहले तो उसने चूत को प्यार से चूमा.. शीला की सिसकी निकल गई.. "आआआआह्ह.. !!!"
रूखी ने हस्तक्षेप किया.. शीला का हाथ पकड़कर उसे खटिया पर लिटा दिया.. ससुर भी कूदकर शीला की दोनों जांघों के बीच बैठ गया.. रूखी ने शीला की कमर के नीचे एक तकिया लगा दिया.. बूढ़े ने शीला के भोसड़े को अब बड़ी ही मस्ती से चाटना शुरू कर दिया..
अब रूखी और शीला दोनों निश्चिंत हो गए.. सब कुछ प्लान के मुताबिक हो रहा था.. शीला ने बूढ़े का सर अपने दोनों हाथों से पकड़कर चूत पर दबा दिया..
रूखी अपने दोनों पैर शीला के चेहरे के इर्दगिर्द जमाकर बैठ गई और अपनी झांटेदायर चुत को शीला के नाके के साथ रगड़ने लगी..
शीला: "उफ्फ़ रूखी.. तू ये बाल साफ क्यों नहीं करती? जंगल जैसा हो गया है पूरा"
शीला के स्तनों को अपने कूल्हों से रगड़ते हुए रूखी ने कहा "भाभी, बाबूजी को झांटों वाली पसंद है इसलिए.. "
बूढ़ा चाटते हुए बोला "वैसे बिना बालों वाली भी बहोत सुंदर लगती है.. " वो फिर से शीला के भोसड़े की गहराइयों में खो गया.. उसका लंड अभी भी लटक रहा था.. शीला ने आखिर रूखी की लकीर में अपनी जीभ घुसा ही दी.. साथ ही साथ वो रूखी के मटके जैसे बड़े स्तनों को दबा रही थी.. बूढ़े की जीभ उसके भोसड़े में ऐसा कहर ढा रही थी.. शीला उत्तेजित होकर रूखी की चूत चाट रही थी.. काफी देर तक ये सिलसिला चलता रहा
फिर रूखी शीला के ऊपर से उतर गई.. और अपने ससुर के सर के बाल खींचकर उन्हे शीला की चूत से अलग किया
रूखी: "क्या बाबूजी.. आपको नई वाली मिल गई तो मुझे भूल गए? मेरी भी चाटिए ना.. "
ससुर: "अरे बहु.. तुम्हारी तो रोज चाटता हूँ.. आज मेहमान आए है तो पहले उन्हे तो खुश करने दो.. " रूखी ने एक ना सुनी और ससुर का चेहरा खींचकर अपनी चूत पर लगा दिया.. शीला उठकर बूढ़े के लंड को सहलाने लगी.. रूखी की चुत थोड़ी देर चूसकर वह बूढ़ा फिर से शीला की ओर बढ़ा.. शीला की गोरी लचकदार चूचियों के ऊपर टूट पड़ा.. उन मदमस्त उरोजों को वह दोनों हाथों से मसलने लगा.. शीला उस बूढ़े के खड़े लंड की चमड़ी आगे पीछे कर रही थी.. बूढ़े ने उंगली और अंगूठे के बीच शीला की निप्पल को दबा दिया.. शीला की चीख निकल गई.. उसने बूढ़े को धक्का देकर खटिया पर सुला दिया और उसके लंड को मस्ती से चूसने लग गई
रूखी अपने ससुर के मुंह पर सवार हो गई.. ससुर अपनी बहु की चुत चाट रहा था और शीला उसका लंड चूस रही थी.. शीला का चेहरा उत्तेजना से लाल हो गया था.. थोड़ा सा चूसने के बाद शीला से ओर रहा नहीं गया.. उसने अपने चूत के होंठ फैलाए और बूढ़े के लंड के ऊपर बैठ गई..
ऊपर नीचे करते हुए उसने गति बढ़ाई.. बूढ़े के मुंह पर रूखी की चूत थी और लंड पर शीला चढ़ी हुई थी.. थोड़ी देर कूदने पर ही शीला की चूत ने पानी छोड़ दिया.. भोसड़ा एकदम सिकुड़ गया.. और उसके अंदर फंसे लंड का गला घोंट दिया.. बूढ़ा ससुर भी आनंद से कराहने लगा..
शीला: "बहोत मज़ा आ रहा है आह्ह आह्ह आह्ह" अपने स्तन दबाते हुए वह अब अभी आखिरी धक्के लगा रही थी
रूखी के चुत ने भी रस छोड़ दिया.. अपनी जीभ और लंड से उस बूढ़े ससुर ने दो दो औरतों को एक साथ तृप्त कर दिया था.. सिसकियाँ भरते हुए रूखी अपनी चुत के होंठ ससुर के मुंह पर रगड़े जा रही थी.. स्खलित होते हुए वह कराह रही थी.. उसके ससुर ने रूखी के स्तनों को इतनी जोर से दबाया की दूध की पिचकारी से उनका पूरा सर गीला हो गया.. शीला ठंडी होकर नीचे उतर गई.. बूढ़े ने अब रूखी को लेटाया और उसपर सवार होकर धक्के लगाने लगा.. थोड़े ही धक्कों के बाद बूढ़ा आउट हो गया.. पर आउट होने से पहले उसने रूखी की चुत से एक बार ओर पानी निकाल दिया.. ध्वस्त होकर वो रूखी के बड़े बड़े स्तनों के बीच गिर गया.. और वहीं पड़ा रहा
थोड़ी देर वैसे ही खटिया में पड़े रहने के बाद सबसे पहले शीला खड़ी हुई.. बूढ़े ससुर के लंड पर आभार-सूचक किस करते हुए उसके लाल टोपे पर अपनी जीभ फेर दी.. सुपाड़े की नोक पर लगी वीर्य की बूंद को भी चख लिया.. लंड ने एक बार ठुमक कर शीला को सलामी दी..
अपनी बहु के स्तनों से खेलते हुए बूढ़े ने कहा "मज़ा आया तुम दोनों को?"
रूखी: "मुझे तो बहोत मज़ा आया.. आप शीला भाभी से पूछिए.. " रूखी उठकर ब्लाउस पहनने लगी.. उस दौरान शीला अपने कपड़े पहन चूकी थी..
रूखी: "आप साड़ी में कितनी खूबसूरत लगती हो भाभी!!! कितना मस्त शरीर है आपका.. एकदम भरा हुआ.. ठीक कहा न मैंने बाबूजी" आखिरी हुक को बड़ी ही मुश्किल से बंद करते हुए रूखी ने कहा.. शीला रूखी के बड़े स्तनों को बस देखती ही रही.. उसकी चूत में नए सिरे से चुनचुनी होने लगी..
शीला: "रुखी, मुझसे तो कहीं ज्यादा तुम सुंदर हो.. तुझे पता नहीं है.. अगर फेशनेबल कपड़े पहनकर बाहर निकले तो लोग मूठ मार मारकर मार जाए.. अब मुझे चलना चाहिए.. काफी देर हो गई.. चलिए बाबूजी, मैं चलती हूँ.. फिर कभी आऊँगी.. मुझे भी अपनी बहु ही समझिए आप.. सिर्फ रूखी बहु का ही नहीं.. अब से आपको शीला बहु का भी ध्यान रखना होगा"
ससुर: "हाँ हाँ बहु रानी.. जब मन करें तब चली आना.. मैं तैयार हो आपको खुश करने के लिए"
शीला: "रूखी, तू मेरे घर पर आकर मुझे मिल.. मेरे पति कुछ दिनों में वापिस लौट आएंगे.. उससे पहले मिलने आ जाना"
रूखी: "हाँ भाभी.. जरूर आऊँगी"
अपना भोसड़ा ठंडा कर शीला वहाँ से घर की ओर निकल गई.. उसके चेहरे पर संतोष और तृप्तता के भाव थे.. घर पहुँचने की उसे कोई जल्दी नहीं थी.. इसलिए रिक्शा लेने के बजाए वह चलने लगी..
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अपने कूल्हें मटकाते हुई शीला रास्ते पर चलती जा रही थी.. बड़े बड़े स्तन, गदराया बदन, कमर से नीचे पहनी हुई साड़ी और मटकों जैसे चूतड़.. ऐसी कोई स्त्री चलते हुए जा रही हो तो स्वाभाविक तौर पर सब की नजर उस पर चिपक जाएगी.. क्या जवान और क्या बूढ़े.. जो भी देखता था.. देखकर ही अपने लंड एडजस्ट करने लगता था.. कुछ साहसी तो मन ही मन मूठ मारने लगे थे.. जिन बूढ़ों से कुछ हो नहीं पा रहा था वह चक्षु-चोदन का आनंद ले रहे थे..
घर पहुंचकर शीला बिस्तर पर पड़ी.. सोच रही थी "मदन के आने के बाद ये सब बंद कर देना पड़ेगा.. वैसे मदन के लौटने के बाद इन सब के जरूरत भी नहीं रहेगी.. पर एक बार बाहर का खाने का चस्का लग जाएँ फिर याद तो आएगी ही.. जो होगा देख लेंगे.. जब मौका मिले तब चौका लगा देना ही गनीमत है.. बाकी फिर मदन तो है ही.. !! और इस तरह रूखी के घर जाकर अपना कार्यकरम निपटा लूँ तो मदन को भी पता नहीं चलेगा.. हाँ रूखी की सास का प्रॉब्लेम है.. पर वो बुढ़िया और कितना जिएगी.. ?? जल्दी मर जाएँ तो अच्छा.. झंझट खतम हो.. "
तभी डोरबेल बजने की आवाज आई.. आईने में खुद को ठीक करके शीला बाहर आई और दरवाजा खोला
संजय आया हुआ था..
संजय: "चलिए मम्मी जी, मैं आपको लेने आया हूँ"
शीला आश्चर्य से "लेने आए हो? पर कहाँ जाना है?"
संजय: "आप घर पर अकेली हो.. वैशाली भी चार दिनों बाद लौटेगी.. यहाँ बैठे रहने से तो अच्छा है की आप मेरे साथ चलिए.. मुझे भी कंपनी मिलेगी"
शीला: "लेकिन जाना कहाँ है??" शीला असमंजस में थी
संजय: "आप तीन दिन के कपड़े पैक कर लो.. कहाँ जाना है ये मैं बाद में बताता हूँ.. आप के लिए सरप्राइज़ है.. अभी नहीं बताऊँगा"
शीला: "नहीं.. ऐसे मैं घर छोड़कर नहीं चल सकती.. "
संजय: "मम्मी जी, आपको वैशाली की कसम.. किस बात का डर है आपको?"
शीला: "डर नहीं है बेटा.. पर सोचना तो पड़ता है ना.. !!"
संजय: "अपने दामाद के साथ चलने में क्या सोचना?? चलिए एक घंटे में निकलना है.. आप कपड़े पेक कीजिए.. अभी गाड़ी आती ही होगी"
शीला: "अरे पर मुझे ये तो बताओ की जाना कहाँ है?"
संजय: "आपको मुझ पर भरोसा नहीं है? "
शीला मन में सोचने लगी.. "भरोसा तो पूरा है तुझ पर मादरचोद.. की तू एक नंबर का कमीना है.. इसीलिए तो इतना सोचना पड़ रहा है" शीला को पता नहीं चल रहा था की वो क्या करें
माउंट आबू पहुंचते ही वहाँ के मदहोश वातावरण को देखकर सब रोमेन्टीक होने लगे.. वैशाली बार बार पीयूष की ओर देख रही थी.. वो सोच रही थी की एक बार अगर आधा घंटा पीयूष के साथ कहीं बाहर निकलने का मौका मिले तो मज़ा आ जाए.. जी भर कर पीयूष के साथ मजे करूंगी अगर ऐसा हुआ तो.. उस दिन रेत के ढेर में पीयूष ने जिस तरह उसके जिस्म को रौंदा था.. आह.. याद करते ही मज़ा आ गया.. वातावरण और विचारों के संगम से वैशाली की चुत में झटके लगने लगे थे.. दूसरी तरफ मौसम के कडक स्तनों को देखकर ठंडी आहें भर रही थी वैशाली.. अभी तक किसी मर्द का हाथ नहीं लगा है.. इसलिए मस्त टाइट है.. एक बार किसी का हाथ लगते ही आकार बिगड़ जाएगा.. वैशाली अपने खुद का भूतकाल याद करने लगी..
शुरुआत के समय में जब संजय के साथ सब ठीक चल रहा था तब संजय को उसके स्तन कितने पसंद थे!! जितनी बार वो दोनों अकेले पड़ते थे तब सब से पहले संजय उसके स्तन चूसता था.. कभी कभी किचन में वो काम कर रही हो.. सास ससुर बाहर बैठे हो.. तब भी संजय चुपके से आकर.. उसका टॉप ऊपर करके उसके बबले चूसकर भाग जाता.. वैशाली लाख मना करती पर वो मानता ही नहीं था.. वैशाली सोचती की उसका पति उसे कितना प्यार करता था.. !!! जब कोई अपने पीछे पागल हो तो कितना अच्छा लगता है.. !! वैसा ही वैशाली को महसूस होता था.. तकलीफ तो तब होती थी जब घर पर मेहमान आए हुए हो.. पूरा घर भरा हुआ हो तब संजय को अपनी चुची चुसवा पाना बेहद कठिन हो जाता था.. पर संजय इतना जिद्दी था की उसके बॉल चूसे बगैर हटता ही नहीं था..एक बार तो ज्यादा मेहमान होने की वजह से संजय-वैशाली के बेडरूम में भी ४ लोग सोये हुए थे.. तब भी संजय चादर के नीचे घुसकर वैशाली की निप्पलों को चूसने के बाद ही सोता था.. अपने दांत निप्पल में ऐसे गाड़ देता की दूसरे दिन वैशाली को दर्द होता रहता.. कितने सुहाने दिन थे वोह..!!!
पर वो वक्त जल्दी ही खतम हो गया.. संजय अपनी असलियत पर आ गया.. और फिर जो दुख के दिन शुरू हुए वो अब तक चल रहे थे.. संजय की याद आते ही वैशाली के चेहरे पर विषाद के भाव आ गए
कविता भी पीयूष को देख रही थी.. पर पीयूष जैसे उसे जानता ही न हो वैसे खिड़की से बाहर.. पहाड़ों के टेढ़े मेढ़े रास्तों को.. और दूर दिख रहे उत्तुंग शिखरों को देखने में व्यस्त था.. ये मर्द हमारे दिल का दर्द कब समझेंगे? पीयूष हमेशा अपने एंगल से ही सोचता है.. कभी उसने मेरे दृष्टिकोण को समझने का प्रयास ही नहीं किया.. मुझे इसीलिए तो पिंटू इतना पसंद है.. पिंटू की बात ही निराली थी.. जब साथ पढ़ाई करते थे तब एक बार पिंटू के मुंह से प्याज की बदबू आ रही थी.. कविता ने उसे टोका.. उसके बाद पिंटू ने कभी प्याज नहीं खाया.. इतना महत्व देता है वो मुझे.. सारे मर्द अगर ऐसे ही हमारी भावनाओं को समझे तो औरत अपना सबकुछ समर्पित कर दे उसे..
ऐसा नहीं था की कविता को पीयूष से प्यार नहीं था.. बस ऐसी ही छोटी छोटी बातों को लेकर असंतोष था.. पर ऐसी बातों पर अगर वक्त पर ध्यान न दिया जाएँ तो आगे जाकर यही बातें भयानक स्वरूप धारण कर लेती है..
माउंट आबू के नज़ारों का अगर कोई सब से ज्यादा आनंद ले रहा था तो वोह थे.. राजेश, रेणुका, फाल्गुनी और सब की आँखों का तारा.. मौसम !!
मौसम के कच्चे कुँवारे बदन को देखकर राजेश का लंड पेंट के अंदर.. सेंसेक्स और निफ्टी की तरह ऊपर उठ रहा था.. मौसम के गालों के डिम्पल देखकर राजेश की हवस जलने लगती थी.. गोरी सुंदर मौसम के टाइट ड्रेस के अंदर छुपे हुए अमरूद साइज़ के स्तन देखकर राजेश के पूरे बदन में घंटियाँ बजने लगती थी.. वो सोच रहा था "कुछ भी करके ईसे पटाना होगा.. " मन ही मन.. मौसम के जोबन को लूटने के ख्वाब देखते हुए राजेश ने रेणुका से पूछा
राजेश: "ये मौसम कहाँ तक पढ़ी है? अगर उसे कंप्युटर चलाना आता हो हमारी ऑफिस में एक जगह खाली है.. तू पूछकर देखना अगर वह नौकरी करना चाहती हो तो "
रेणुका के दिमाग की बत्ती जल गई.. औरतों के पास एक खास छठी इंद्रिय होती है.. जो उन्हे अपने आसपास के मर्दों की नजर के बारे में आगाह कर देती है.. ५० फिट दूर खड़े पुरुष की नजर कहाँ है वह औरतें एक पल में जान लेती है.. कुदरत ने जब औरतों को रूप दिया तो उसको संभालने के लिए ये शक्ति भी साथ ही दी..
रेणुका: "तुम चिंता मत करो राजेश.. मैं बात कर लूँगी.. तू एक बार पीयूष को पूछ ले.. मैं मौसम से डाइरेक्ट बात करती हूँ" रेणुका ने एक कुटिल मुस्कान के साथ राजेश को कहा.. राजेश को इस मुस्कुराहट का अर्थ समझ में नहीं आया.. वैसे मर्दों को औरतों की आधी बातें समझ में ही कहाँ आती है !!!
इन सब बातों से बेखबर पीयूष.. खिड़की से बाहर नजर आते अप्रतिम कुदरती नज़ारों का आनंद ले रहा था.. चारों तरफ पहाड़ ही पहाड़.. हरे घने जंगल.. पतली सी घुमावदार सड़क.. बादलों से बातें करते हुए शिखर.. आहाहाहा.. देखकर ही मन प्रफुल्लित हो जाता था.. नशा सा हो जाता था देखकर.. अगर इंसान को पीना आता हो.. तो ऐसी कौन सी चीज है जो शराब नहीं है.. !!!
"दोस्तों, दस मिनट में हम माउंट के ऊपर पहुँच जाएंगे.. आपकी पर्सनल शॉपिंग के अलावा जो भी खर्च होगा वो मैडम ही देगी.. इन्जॉय योरसेल्फ पर थोड़ा कंट्रोल भी रखना" हँसते हुए राजेश ने घोषणा की..राजेश का इशारा किस तरफ था वो सब समझ गए.. गुजरात से अधिकतर लोग माउंट आबू शराब पीने ही आते है.. पीने वालों के लिए यह जगह स्वर्ग से कम नहीं है.. सब का दिल कर रहा था की कब होटल पहुंचे और शराब की महफ़िल जमाए.. राजेश की घोषणा का सबने तालियों से स्वागत किया.. साथ ही सब अपना समान इकठ्ठा करने लगे
जैसे ही बस रुकी.. सब धीरे धीरे नीचे उतरे.. पहाड़ की तलहटी पर एक सुंदर आलीशान होटल थी.. माउंट आबू का वातावरण वाकई बेहद उत्तेजक था.. फेशनेबल छोटे छोटे कपड़े पहनी लड़कियां.. अपने टाइट टॉप के ऊपर से आधे स्तन बाहर दिखाती हुई चले जा रही थी.. कुछ फिरंगी टुरिस्ट भी नजर आ रहे थे.. पास ही से गुजर रही एक फिरंगी लड़की की लो-नेक टॉप से नजर आ रही क्लीवेज को देखकर अपना लंड खुजा रहे पिंटू को गुस्से देख रही थी कविता.. वह सोच रही थी.. इन मर्दों को सारी औरतों की छातियों में ऐसा क्या दिख जाता है जो वहीं देखते रहते है.. !! सब के सब साले नालायक!!
रेणुका के कहने पर, मौसम और फाल्गुनी को एक अलग कमरा दे दिया गया.. होटल के तीसरे माले पर सुंदर बालकनी वाला कमरा उन दोनों को देखते ही पसंद आ गया.. फाल्गुनी ने इंटरकॉम पर फोन लगाकर एक कडक कॉफी का ऑर्डर दिया.. मौसम ने अपने लिए चाय बोली.. पहले तो दोनों ने अपने तंग कपड़े उतार दिए और आरामदायक टीशर्ट और शॉर्ट्स पहन लिए.. बाहर बालकनी में खड़े रहकर बादलों को गुजरते देखा जा सकता था उतनी ऊंचाई पर थी होटल.. दोनों लड़कियां खुश होकर बादलों संग खेलने लगी..
माउंट आबू का वातावरण इतना अद्भुत है की अगर कोई बीमार यहाँ आकर रहें तो कुछ ही दिनों में ठीक होकर वापिस लौटे.. बालकनी में टेबल पर पैर जमाकर दोनों सहेलियाँ चाय और कॉफी की चुस्की लेने लगी.. मौसम के माउंट आबू पर प्रवेश करते ही जैसे पूरे पर्वत की सुंदरता दोगुनी हो गई थी.. उसे गोरे गालों में पड़ते खड्डों के सामने नक्की लेक की सुंदरता भी फीकी लग रही थी.. उसके मस्त स्तनों के आगे पहाड़ों की उछाइयाँ भी कम पड़ती नजर आ रही थी
बालकनी में बैठे दोनों कुंवारी अल्हड़ लड़कियां.. दुनियादारी से बेफिक्र होकर मजे लूट रही थी.. फाल्गुनी अक्सर शांत रहती.. पर अकेले में अपनी सहेली के साथ वह भी खुल गई थी.. उसके चेहरे पर निर्दोषता के साथ साथ एक अजीब सा डर और घबराहट छुपे हुए थे..
दोनों सहेलियाँ अपनी दुनिया में मस्त थी तभी वहाँ पीयूष आया.. पीयूष ने मौसम का चाय का कप उठाया और पीने लगा..
पीयूष: "क्यों साली साहेबा!! सब कुछ ठीक है ना!!"
मौसम: "अरे जीजू आप मेरी झूठी चाय क्यों पी रहे हो.. कहते है की किसी का झूठा खाएं या पिए तो उनके जैसे बन जाते है"
पीयूष: "हा हा हा.. मौसम अगर मैं तेरे जैसा बन गया तो सब से पहले राजेश सर को ही पागल कर दूंगा.. जिससे की मेरी तनख्वाह बढ़ जाए.. "
फाल्गुनी ने हँसते हुए कहा.. "इसका मतलब ये हुआ की मौसम ने राजेश सर को पागल बना दिया है.. सही कहा न मैंने?"
पीयूष: "हाँ यार.. बस में वो मौसम को ही देखें जा रहे थे.. मेरे खयाल से वो मौसम पर लाइन मार रहे थे"
मौसम: "क्या जीजू आप भी!! कुछ भी उल्टा सीधा बोलते हो.. " कृत्रिम क्रोध के साथ मौसम ने कहा
फाल्गुनी बैठे बैठे साली और बहनोई की शरारती बातों का मज़ा ले रही थी..
"क्या बात है पीयूष? अपनी साली को मेरे खिलाफ क्यों भड़का रहा है?" राजेश सर की एंट्री हुई..
पीयूष: "अरे सर.. आइए आइए.. हम आप की ही बात कर रहे थे.. मेरी साली तो आपकी तारीफ करते हुए थक ही नहीं रही.. कहती है की जीजू आपके बॉस कितने अच्छे इंसान है.. स्टाफ का कितना खयाल रखते है !!"
राजेश: "तुम चाहो तो.. मतलब अगर मिस मौसम चाहे तो वो भी इस स्टाफ का हिस्सा बन सकती है.. शर्त सिर्फ इतनी है की उसे कंप्युटर चलना आना चाहिए.. हमारी ऑफिस में वैसे भी एक कंप्युटर ऑपरेटर की जरूरत है.. और उस स्थान के लिए मौसम बिलकूल परफेक्ट है"
स्लीवलेसस टीशर्ट पहन कर बैठी मौसम के उरोजों को एकदम करीब से देखकर पागल हो रहा था राजेश.. स्लीवलेस टीशर्ट इतनी ढीली थी की मौसम के हाथ ऊपर करने पर साइड से उसका आधा खुला स्तन नजर आ जाता था.. संगेमरमर जैसी चिकनी काँखों को देखकर पीयूष का लंड भी सलामी देने लगा.. राजेश का लंड तो पेंट के अंदर मुजरा करने लगा था.. मौसम के कातिल हुस्न ने एक ही बॉल में दो विकेट गिरा दी थी.. टेबल पर पैर रखकर बैठी फाल्गुनी की शॉर्ट्स से उसकी गोरी मस्त जांघें बड़ी खतरनाक लग रही थी.. राजेश द्विधा में था.. मौसम को देखूँ या फाल्गुनी को?
मौसम और फाल्गुनी की कच्ची जवानी ने जैसे समय को बांध दिया था.. राजेश किस काम के लिए यहाँ आया था वोही भूल गया.. संस्कारी घर की लड़कियां वैसे तो नादान थी.. पर दो जवान हेंडसम मर्दों की उपस्थिति और माउंट आबू के मदमस्त वातावरण का असर उन दोनों पर भी हो रहा था.. जिस तरह मौसम और फाल्गुनी के हुस्न को देखकर पीयूष और राजेश की हालत खराब थी.. वैसे ही उन दोनों लड़कियों की चुत में भए सुरसुराहट हो रही थी.. जवानी का करंट उन दोनों को भी लग चुका था.. बातें करते करते राजेश और पीयूष मौसम के स्तनों को देखते हुए पिघल रहे थे..
राजेश: "अरे पीयूष.. मैं जो बात करने आया था वो तो भूल ही गया.. रात को हम मैडम के बर्थडे के लिए फ़ंक्शन रखने वाले है.. मैं उन्हे कोई अच्छा सा मस्त गिफ्ट देना चाहता हूँ.. मैं चाहता हूँ की तुम और कविता किसी दुकान से अच्छी सी गिफ्ट लेकर आओ.. !!"
कविता का नाम सुनते ही पीयूष का मूड खराब हो गया.. "कविता को गिफ्ट लेने में कुछ पता नहीं चलेगा.. वो तो शॉपिंग करते वक्त भी मुझे साथ लेकर चलती है.. एक काम करता हूँ.. मैं और मौसम गिफ्ट लेने चले जाते है.. मौसम, चलोगी न मेरे साथ?"
मौसम: "हाँ हाँ.. क्यों नहीं.. फाल्गुनी को भी साथ ले लेंगे"
"कबाब में हड्डी" पीयूष मन ही मन बोला
फाल्गुनी: "नहीं.. मैं कबाब में हड्डी बनना नहीं चाहती.. मैं नहीं आऊँगी" चोंक गया पीयूष.. !!! ये फाल्गुनी ने उसके मन की बात कैसे जान ली.. !!! और वो भी उन्ही शब्दों में जैसा उसने मन में सोचा था !!! बचकर रहना पड़ेगा इस कबूतरी से.. कहीं इसने मेरे दिमाग में रेणुका के लिए जो खयाल है वो पढ़ लिए तो गजब हो जाएगा.. !!!
राजेश ने वॉलेट से १०,००० रुपये निकालकर देते हुए कहा "ये लो पीयूष दस हजार है.. तुम्हें और मौसम को जो गिफ्ट पसंद आए वो ले आना.. लेडिज की पसंद का पता दूसरी लेडिज को ही ज्यादा होता है.. कुछ कन्फ्यूजन हो तो फोन करना"
पीयूष: "ठीक है सर.. "
साली-जीजू की जोड़ी माउंट आबू के बाजार की तरफ निकल गई.. बाजार में दोनों तरफ दुकानों की लंबी कतार थी.. बीच का रास्ता काफी संकरा था और पार्क कीये हुए वाहनों के कारण और भी छोटा हो गया था.. थोड़ी भीड़ भी थी.. इसी कारण चलते वक्त मौसम के स्तन कई बार पीयूष के हाथों पर और पीठ पर छु जाते.. पीयूष सोच रहा था.. हाय रे मेरी किस्मत.. कविता की जगह अगर इसके साथ मेरा ब्याह हुआ होता तो तो पूरी ज़िंदगी जन्नत बन जाती.. पत्नी और मोबाइल दोनों किस्सों में यही होता है.. अपना वाला ले लो उसके बाद ही मार्केट में नए बढ़िया पीस आने लगते है.. जैसी मेरी किस्मत.. !! काश ये नए कंचे जैसा टंच माल एक बार इस्तेमाल करने के लिए मिल जाए !!
ये पहली बार था की मौसम और पीयूष अकेले मिले हो.. वैसे मौसम को पीयूष की कंपनी बेहद पसंद थी.. और उसे यह भी अंदेशा था की बाकी सारे जीजाजीओ की तरह.. उसके जीजू की नजर भी उसपर थी.. वैसे साली-जीजू के संबंध में थोड़ी बहोत शरारत तो चलती है.. ऐसा मौसम का मानना था.. मौसम पर माउंट आबू के दिलकश वातावरण का सुरूर धीरे धीरे छा रहा था..
एक गिफ्ट शॉप का बोर्ड देखकर दोनों अंदर घुसे.. रीसेप्शन पर खड़ी सुंदर लड़की ने उनका स्वागत किया.. मौसम ने पूरी दुकान पर नजर दौड़ा दी पर उसे कुछ खास पसंद नहीं आया.. उसने पीयूष को इस बारे में इशारा किया और वो दोनों दुकान से बाहर निकलने ही वाले थे तभी.. एक ४५ वर्ष के करीब की उम्र का पुरुष उनके पास आया और बोला
"May I help you gentleman and lady? If your choice is not hear..don't be disappointed. We have another part of this store, where you can get what you want. I am sure you will like something there.. Because that part of our shop is secret and safe. New couples like you love the items over there.. Would you like to visit?"
(आपकी पसंद की चीज यहाँ न मिली हो तो निराश होने की जरूरत नहीं है.. हमारी शॉप का एक दूसरा हिस्सा भी है जहां पर आप जो चाहो वो मिल जाएगा.. मुझे यकीन है की वहाँ पर आपको कुछ न कुछ जरूर पसंद आ जाएगा.. शॉप का वह दूसरा हिस्सा गोपनीय और सलामत है और सिर्फ खास लोगों के लिए है.. आप जैसे नवविवाहित जोड़ों की पसंद की बहोत सी चीजें है वहाँ.. आप चलोगे?)
मौसम: "हाँ हाँ.. क्यों नहीं.. लेट्स गो"
आदमी: "ठीक है.. आप उस कोने से बायीं तरफ मुड़ जाना.. वहाँ एक दरवाजा होगा.. तीन बार खटखटाइएगा.. तो दरवाजा खुल जाएगा"
अंदर क्या होगा इस अपेक्षा में रोमांचित होकर दोनों उस दरवाजे तक गए.. तीन बार दस्तक देने पर दरवाजा खुला.. बाहर से देखने पर वो दरवाजे जैसा लगता भी नहीं था.. पीयूष को थोड़ी सी घबराहट हो रही थी.. अनजान जगह पर मौसम ले कर जाने में उसे डर लग रहा था.. लेकिन मौसम ने उसका हाथ पकड़कर खींच लिया और अंदर ले गई..
आगे छोटा सा पेसेज पार किया तो दूसरा दरवाजा आया.. ऐसे तीन और विचित्र दरवाजों को पार करने के बाद एक बड़ा सा हॉल दिखा.. काफी अंधेरा था.. एसी की तेज हवा से अंदर काफी ठंडक थी.. भव्य सुशोभन भी किया हुआ था..
"वेलकम सर एंड मैडम.. " कहीं से एक सुरीली आवाज ने उनका स्वागत किया.. दोनों ने आवाज की दिशा में देखा तो एक सुंदर स्त्री खड़ी थी और उन्हे पास बुला रही थी.. दोनों धीरे धीरे चलते हुए उसके पास गए
मौसम: "यहाँ इतना अंधेरा क्यों है?"
सेल्सगर्ल: "इसलिए की आपको शर्म न आए मैडम.. जो मैं दिखाना चाहती हूँ उसके लिए तैयार हो जाइए" कहते ही उसने लाइट ऑन की.. शोकैस में ढेर सारी चीजें रखी हुई थी जो अब नजर आ रही थी.. मौसम को तो ज्यादा कुछ पता नहीं चला पर पीयूष की देखकर ही गांड फट गई.. उससे भी ज्यादा झटका तब लगा जब रोशनी में उस सेल्सगर्ल को वो ठीक से देख पाया.. वो लड़की टॉपलेस थी !!! पूरी दुकान में लड़कियों और औरतों के मूठ मारने के लिए विविध उपकरण भरे हुए थे.. इलेक्ट्रॉनिक और मकैनिकल.. उत्तेजक परफ़्यूमस.. पॉर्न डीवीडी.. नंगे पोस्टर्स.. सजे हुए थे.. एक पोस्टर पर लंबे मोटे लंड वाले कल्लू को देखकर मौसम के होश उड़ गए.. शर्म से उसकी आँखें झुक गई
मौसम: "छी छी छी.. ये सब क्या है जीजू?" शॉप में रखी सारी चीजों के अलावा उस अधनंगी सेल्सगर्ल को देखकर चोंक उठी मौसम
अपने स्तनों को मटकाते हुए वह सेल्सगर्ल बोली "मैडम, आजकल लैटस्ट यही चल रहा है गिफ्ट देने के लिए.. पुराना ज़माना गया.. ये देखिए.. ये डिल्डो.. मेईड इन जर्मनी.. फुली ऑटोमैटिक.. आपके पति की गैरमौजूदगी में ये आपको पूरा संतोष देगा.. स्पीड ज्यादा कम कर सकते है.. वॉटरप्रूफ है.. बाथरूम में भी इस्तेमाल कर सकते है.. और ये बटन दबाते ही अंडर डिस्चार्ज भी होगा.. है ना मजे की चीज? सिर्फ ६००० का है.. पूरा सिलिकॉन से बना है.. एकदम अरिजनल वाली फिल आएगी जब अंदर डालोगी तब.. ट्राय करके देखिए एक बार" वह लगातार बोले जा रही थी
मौसम का शरीर कांप रहा था.. पीयूष की स्थिति ऐसी थी की वह कुछ बोल ही नहीं पा रहा था..
सेल्सगर्ल: "एक बात बताइए मैडम.. आपके हसबंड हफ्ते में कितनी बार आपसे सेक्स करते है?"
मौसम शरमाकर नीचे देखने लगी
आखिर में पीयूष बोला.. "मैडम, ये मेरी पत्नी नहीं है.. मेरी साली है.. और अभी कुंवारी है"
सेल्सगर्ल: "ओह्ह सॉरी.. यहाँ आने वाले अधिकतर लोग शादीशुदा होते है.. इसलिए मुझे गलतफहमी हो गई.. इनको शर्म आना स्वाभाविक है.. पर मैडम जीने का मज़ा तभी आता है जब आप शर्म छोड़ देगी.. जब आपकी शादी हो जाए तब यहाँ जरूर आना मैडम.. आपको नई नई चीजें देखने को मिलेगी.. और सर आप अपनी वाइफ को लेकर आइए.. उनका दिल खुश कर दूँगी"
बिना कुछ कहे मौसम और पीयूष दुकान के बाहर निकल गए.. थोड़े दूर जाने तक दोनों ने एक दूसरे से कुछ नहीं कहा..
आखिर मौसम ने मौन तोड़ा "अच्छा हुआ हम वहाँ से निकाल गए, जीजू.."
पीयूष: "जो भी हुआ अनजाने में हुआ.. हमें थोड़े ही पता था की अंदर ऐसा सब होगा? चलो तुझे कुछ नया जानने को तो मिला.. अपने पति को लेकर आना इधर.. वैसे मैं कविता को शाम को यहाँ लेकर आने की सोच रहा हूँ"
मौसम: "हाँ हाँ जरूर लेकर आना" मौसम ये सोच रही थी की जीजू दीदी को यहाँ क्यों लेकर आना चाहते है? खैर, वो उन दोनों की पर्सनल बात है मैं जानकर क्या करूंगी.. !!!
मौसम: जीजू, एक घंटा बीत गया.. अभी गिफ्ट लेना बाकी है.. जल्दी कीजिए वरना दीदी शक करेगी.. की कहीं हम दोनों साथ भाग तो नहीं गए?"
पीयूष: "अरे ऐसे मेरे नसीब कहाँ.. !!! तू भागने के लिए राजी हो तो मैं तैयार हूँ.. वैसे भी साली तो आधी घरवाली होती है.. उस हिसाब से तेरी कमर के ऊपर के हिस्से पर तो मेरा हक है ही.. और अगर तू कमर के नीचे का हिस्सा देने को तैयार हो तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है !!"
गुस्से का अभिनय करते हुए मौसम ने कहा "हाँ हाँ.. दीदी को पूछकर आपको बता दूँगी.. अब हम गिफ्ट लेने का काम निपटा दे?" कविता का नाम सुनते ही पीयूष सपनों के आसमान से वास्तविकता की धरती पर आ गिरा
पीयूष ने मौसम का हाथ पकड़ लिया.. मौसम ने कोई विरोध नहीं किया.. कैसे करती.. अभी थोड़ी देर पहले जो जीजू के साथ अलग अलग तरह के नकली लंड देखने के बाद वो भी थोड़ी सी उत्तेजित हो गई थी
एक बड़ी दुकान के अंदर वो दोनों गए.. अंदर जाते ही सब से पहले उसने दुकान वाले को बोल दिया.. "हम दोनों पति पत्नी नहीं है.. रिलेटिव है ठीक है!!" दुकान वाले को पता नहीं चला की यह मैडम ने आते ही ऐसी बात क्यों की
पीयूष भी यह सुनकर हंसने लगा..
मौसम: "फिर से उस दुकान में हुआ वैसा कोई लोचा हो उससे अच्छा पहले ही बता दिया"
पीयूष ने मौसम के कान में कहा "वैसे वहाँ जो चीजें थी वो बड़ी जबरदस्त थी.. तुझे कैसी लगी थी?"
"चुप्पपपपप.. " कहते हुए हल्की सी थप्पड़ लगाई मौसम ने पीयूष के गालों पर
पीयूष: "ओह्ह मौसम.. तू कितनी क्यूट है यार.. तुझे देखते ही मेरी नियत खराब हो जाती है.. एक किस करने का मन हो रहा है मुझे"
मौसम: "क्या जीजू आप भी!!! कोई देखेगा तो क्या सोचेगा हमारे बारे में?"
पीयूष: "अरे यार.. यहाँ हमें जानता ही कौन है !! अभी तूने बताया न होता तो इस दुकान वाले को थोड़े ही पता चलता की हम पति पत्नी नहीं है.. वैसे भी तू मेरी पत्नी जैसी ही लगती है.. एक किस तो कर ही सकता हूँ.. "
मौसम पीयूष के होंठों को देखती रही.. इस डर से की कहीं सब के सामने ही जीजू कुछ उल्टा सीधा कर न दे.. पर पीयूष से अब ओर रहा नहीं जा रहा था.. शॉप के एक हिस्से में बहोत सारे लेडिज ड्रेस लटके हुए थे.. पीयूष मौसम का हाथ पकड़कर उन ड्रेस के पीछे ले गया.. यहाँ से उन्हे कोई देख नहीं पा रहा था.. पीयूष ने मौसम को अपने आगोश में भर लिया और एक जबरदस्त किस कर दी.. "ओह मौसम.. आई लव यू.. यू आर सो हॉट मेरी जान" कहते हुए एक और बार उसने मौसम के गुलाबी होंठों को चूम लिया
"आह्ह जीजू.. इशशशश.. " शर्म से लाल लाल हो गई मौसम.. मौसम के जिस्म से एक अजीब उत्तेजक खुश्बू आ रही थी.. पीयूष सोचने लगा.. कहीं उत्तेजित मौसम की चुनमुनिया की खुश्बू तो नहीं है वो.. पीयूष के पतलून में माउंट आबू से भी ऊंचा उभार आ गया.. जो उसके पेंट की चैन तोड़ देने की धमकी दे रहा था
मौसम स्तब्ध होकर मूर्ति सी खड़ी रह गई.. उसके जीवन की ये प्रथम किस.. आह्ह.. जैसे मौसम की पहली बारिश.. जैसे सरसराती हवा.. जैसे ताज़ा खिला हुआ गुलाब.. जैसे पहाड़ों से बहता हुआ झरना.. जैसे जीवन का पहला ऑर्गैज़म.. !!! रोमांच से थर थर कांप रही थी मौसम.. जिंदगी में पहली बार किसी मर्द ने इस तरह छुआ था उसे.. यह स्पर्श इतना मधुर लगेगा उसका अंदाजा नहीं था मौसम को.. उसकी दोनों जांघों के बीच कुछ अजीब सी अनुभूति हो रही थी.. जो वह समझ नहीं पा रही थी..
मौसम के हावभाव देखकर पीयूष को इतना तो यकीन हो गया की उसे अच्छा लगा था.. उस दुकान से उन्होंने एक अच्छा सा ड्रेस पेक करवाया और दोनों दुकान से बाहर निकल गए.. मौसम तेज कदमों से आगे चल रही थी और पीयूष उसके पीछे पीछे.. पीयूष ने और एक साहस कर दिया.. अपने मध्यम कद के कूल्हे मटकाते चल रही मौसम के एक चूतड़ को अपनी हथेली से दबा दिया..
मौसम रुककर पीछे देखने लगी और बोली "बस जीजू.. बहोत हो गया.. "
पीयूष हँसकर उसके करीब आया और उसकी कमर में हाथ डालकर उसके साथ ही चलने लगा..
पीयूष ने चलते चलते धीरे से उसके कानों में कहा "मौसम, आई लव यू.. टेल मे यू ऑलसो लव मी.. प्लीज मौसम प्लीज.. !!"
मौसम के हुस्न ने पीयूष को अंधा बना दिया था.. वह अभी अपना सबकुछ मौसम को समर्पित करने के लिए तैयार था.. बदले में सिर्फ मौसम का दिल चाहता था.. आज मिले इस मौके का वह भरपूर फायदा उठाना चाहता था.. जीवन की प्रथम किस के नशे ने मौसम को ऐसा भ्रमित कर दिया था की उसे ये भी खयाल नहीं आया की पीयूष उसकी बहन का पति था
मौसम: "आई लव यू टू, जीजू.. पर किसी को ये पता नहीं चलना चाहिए.. वरना आफत आ जाएगी.. मुझे आपके साथ बहोत अच्छा लगता है"
मौसम की कमर पर ओर जोर से पकड़ बनाई पीयूष ने.. और अपनी ओर खींच लिया.. वह ऐसा महसूस कर रहा था जैसे उसका जीवन सफल हो गया हो
पीयूष: "मौसम.. चल यार.. वो वाली दुकान पर वापिस चलते है"
मौसम: "नहीं जीजू.. हम उस लड़की को बता चुके है की हम पति पत्नी नहीं है.. अब वापिस जाएंगे तो वो लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे?"
एक दुकान के बार बैठक पर मौसम बैठ गई
पीयूष: "क्या हुआ? थक गई ?"
मौसम: "नहीं जीजू.. मुझे आपके साथ बैठकर बातें करनी है.. ढेर सारी.. बैठिए ना.. वापिस लौटकर दीदी की मौजूदगी में हम थोड़े ही बात कर पाएंगे.. !!"
पीयूष समझ गया.. इस आजादी और एकांत का फायदा उठाने का मन कर रहा है मौसम को.. पर यहाँ काफी लोग है आजूबाजू.. कहीं खोपचे में ले जाकर इसके संतरे दबाने की तीव्र इच्छा हो रही है.. क्या करू? ऐसी कटिली चीज है की देखते ही लंड बेकाबू हो जाए.. जिस मौसम को में पाना चाहता था वह इतनी आसानी से मेरी झोली में आ गिरेगी इसका अंदाजा नहीं था मुझे.. आग दोनों तरफ बराबर जली हुई है.. पर हाय रे किस्मत.. यहाँ खुली सड़क पर कुछ भी कर पाना नामुमकिन था..
सड़क के किनारे एक कुत्ता.. किसी कुत्तिया की पूत्ती सूंघ रहा था.. देखकर पीयूष को गुस्सा आया.. हम से तो अच्छे ये जानवर है.. जहां मर्जी चोदना शुरू कर सकते है.. ये समाज की हदें और इज्जत की बकचोदी.. बहोत गुस्सा आ रहा था पीयूष को.. उसका लंड उसे बार बार आपे से बाहर जाने की धमकी दे रहा था
मौसम ने पीयूष का हाथ अपनी जांघ पर रख दिया था.. और उस पर उंगलियों से "आई लव यू" लिख रही थी.. इस हरकत से पीयूष अब गुर्राए सांड की तरह हांफने लगा.. अपनी कुहनी से हल्के हल्के मौसम के स्तन को छु रहा था वो..
"जरा धीरे से करो जीजू.. दर्द हो रहा है मुझे" मौसम ने पीयूष के कान में कहा.. वैसे भी बेचारी मौसम को स्तन मसलवाने का अनुभव तो था नहीं.. उसे भला कहाँ पता था की आगे जाकर उसके स्तनों के साथ क्या क्या होने वाला था.. !!
"कितने मस्त है यार तेरे.. अंदर हाथ डालकर दबाने का मन कर रहा है मुझे" पीयूष ने कहा
मौसम ने तुरंत अपना टीशर्ट ठीक कर लिया "नहीं जीजू"
पीयूष: "अगर रात को चांस मिले तो होटल से कहीं जाना है?"
मौसम: "नो जीजू.. रात को कहीं भी जाएंगे तो दीदी को पक्का डाउट जाएगा.. यहाँ से वापिस लौट जाने के बाद हम कुछ भी ऐसा वैसा नहीं करेंगे.. चलिए अब चलते है यहाँ से.. " गिफ्ट की थैली हाथ में पकड़कर मौसम खड़ी हो गई.. सड़क पर चलते चलते एक सुमसान नाके पर पीयूष ने मौसम को पकड़कर एक जोरदार किस कर दी.. किस करते वक्त पीयूष के हाथ मौसम की चूचियों पर चले गए और उसने मजबूती से उसके नरम संतरे जैसे स्तनों को दबा दिया..
"ओ माँ.. कितनी जोर से दबाया आपने जीजू.. !!! ऐसे भी कोई दबाता है क्या?" टीशर्ट के बाहर निकली हुई ब्रा की पट्टी को अंदर डालते हुए मौसम ने कहा.. पर्स से छोटा सा आईना निकालकर मौसम ने अपना हुलिया चेक किया.. और दो बार किस करने से निकल चुकी लिपस्टिक को फिर से लगा दिया..
दोनों होटल पर पहुंचे.. और सीधे राजेश के रूम की तरफ गए.. रूम का दरवाजा सिर्फ अटकाया हुआ था पर लोक नहीं था.. हल्का सा धक्का देने पर दरवाजा खुल गया.. कमरे में सन्नाटा था और कोई था भी नही अंदर.. पर बाथरूम से कुछ आवाज़ें आ रही थी.. बाथरूम का दरवाजा भी हल्का सा खुला हुआ था.. शायद राजेश बंद करना भूल गया था
होंठों पर उंगली रखकर पीयूष ने मौसम का "शशशशश" का इशारा किया.. अंदर हो रही बातें बाहर सुनाई दे रही थी
राजेश की सिसकियाँ सुनकर मौसम कमरे से बाहर जाने लगी तो पीयूष ने उसका हाथ पकड़ लिया.. और उसके होंठों को फिर से चूमकर मौसम के कान में कहा "मैडम और सर का प्रोग्राम चल रहा है अंदर.. अभी ये लोग बाहर नही निकलेंगे थोड़ी देर.. ध्यान से सुनना.. "
मौसम डर के मारे कांपने लगी.. अंदर से आ रही कामुक कराहों से ये स्पष्ट पता चल रहा था की रेणुका राजेश का लंड चूस रही थी.. क्योंकि राजेश की आवाज तो आ रही थी पर रेणुका की नही..
"ओह्ह रेणु.. सक ईट.. आह्ह.. ओह गॉड.. बहोत मज़ा आ रहा है.. और जोर से चूस मेरी जान.. पूरा अंदर ले तो ओर मज़ा आएगा.. जितना चुसेगी इतना कडक होगा और तुझे ज्यादा मज़ा देगा अंदर.. आह्ह.. कैसा लग रहा है मेरा लोडा चूसने में जान? आह्ह चूस.. जल्दी जल्दी.. यार तेरे बबले बड़े कमाल के है यार.. आह्ह आह्ह रेणु.. मेरा निकालने ही वाला है तेरे मुंह में.. सारा माल चूस लेना.. बर्थडे केक का क्रीम समझकर.. "
गीले लंड के चूसने का "बच बच" आवाज सुनाई पड़ रहा था.. अब तो मौसम भी समझ गई की अंदर क्या हो रहा था.. आज जीवन में पहली बार उस एडल्ट शॉप में चित्र-विचित्र वस्तुएं देख ली.. फिर तीन बार पीयूष ने उसे किस किया.. स्तन भी दबा दिए.. और अब राजेश और रेणुका की काम लीला को सुनते हुए मौसम की कच्ची कुंवारी चुत में जबरदस्त खुजली होने लगी थी.. इस नई अनुभूति से वह अनजान थी.. इस खुजली को कैसे शांत किया जाए इसका कोई ज्ञान नही था.. वह केवल पीयूष को पकड़कर उससे लिपट गई.. इतनी जोर से तो कभी कविता ने भी गले नही लगाया था पीयूष को.. मौसम की पकड़ के जोर में उसकी हवस शामिल थी..
मौसम के सख्त स्तनों के दबने से पीयूष पागल सा हो गया.. मौसम ने पीयूष के होंठों पर अपने होंठ दबा दिए..और असह्य उत्तेजना से वह पीयूष के गालों को चाटने लगी.. मौके का फायदा उठाकर पीयूष ने मौसम के टीशर्ट के अंदर हाथ डालकर ब्रा के ऊपर से ही उसके स्तनों को मसल दिया.. मौसम को यह स्पर्श इतना अच्छा लगा की उसने पीयूष के हाथ को अपनी ब्रा के कटोरी के अंदर ही डाल दिया.. अब तक उसके स्तन और पीयूष के हाथों के बीच ब्रा का आवरण था.. पर अब.. आह्हह.. मौसम के नंगे उरोजों का प्रत्यक्ष स्पर्श करते हुए पीयूष की हथेलियाँ धन्य हो गई.. उसके स्तन नरम होते हुए भी सख्त थे.. ठंडे थे और गरम भी.. वाह.. !!! मौसम की निप्पल को हल्के से मसलते ही वह सिहर उठी.. पीयूष का लंड मौसम की दोनों जांघों के बीच टकरा रहा था.. दोनों अपने होश खो चुके थे.. मौसम अपनी चुत को कपड़े के ऊपर से पीयूष के लंड पर रगड़ रही थी.. उसे पता नही चल रहा था की ऐसा करना उसे किसने सिखाया.. पर उसे बहोत मज़ा आ रहा था.. थोड़ी ही देर में मौसम झड़ गई.. एक लंबी सिसकी लेकर वह शांत हो गई..
उत्तेजना शांत होते ही दोनों को वास्तविकता का ज्ञान हुआ.. साथ ही साथ ये भी एहसास हुआ की वह दोनों किस जगह खड़े थे.. पीयूष तुरंत मौसम का हाथ पकड़कर उसे राजेश के रूम से बाहर ले गया.. मौसम को उसके कमरे में छोड़कर वो उसके और कविता के कमरे की तरफ आया.. दरवाजा बंद था.. काफी देर तक दस्तक देने के बाद कविता ने नींद से जागकर दरवाजा खोला.. उसके कपड़े और बाल अस्तव्यस्त थे.. देखकर पीयूष समझ गया की वह सो रही थी..
कविता ने उससे पूछा तक नही की वो अब तक कहाँ था... किसके साथ था.. क्या कर रहा था.. वह बस अपनी आँखें मलते हुए बिस्तर पर बैठी रही.. तभी उनके दरवाजे पर दस्तक पड़ी.. पीयूष ने दरवाजा खोला.. सामने पिंटू खड़ा था.. पिंटू को देखते ही कविता का उतरा हुआ चेहरा खिल उठा
पिंटू: "पीयूष, राजेश सर ने कहा है की जो गिफ्ट तुम मैडम के लिए लाए हो वह अपने पास ही रखना.. रात की पार्टी में केक-कटिंग के बाद सर उन्हे देंगे.. वैसे सर ने आपको काफी बार फोन किया पर नो-रीप्लाई ही जा रहा था.. इसलिए मुझे यहाँ आना पड़ा.. अगर आप दोनों के रंग में भंग पड़ा हो तो आई एम सॉरी"
पीयूष: "अरे ऐसा कुछ नही है यार पिंटू.. कविता तो मुझसे रूठी हुई है.. इसलिए मेरे तो उपवास ही चल रहे है. "
पिंटू: "अरे ऐसा क्या हो गया?" पिंटू ने चिंता व्यक्त करते हुए पूछा "इतनी रंगीन जगह पर आने के बाद कोई रूठता है क्या भला!! यहाँ के नज़ारे तो देखो एक बार.. अनजान लोग भी दोस्त बन जाते है ऐसा माहोल है यहाँ.. और तुम दोनों पति पत्नी होकर झगड़ रहे हो.. !! अरे भाई, घर वापिस जाकर यही सब तो करना है.. अब इतनी बढ़िया जगह पर आए हो तो इसका पूरा आनंद लो.. "
पीयूष: "भाई, मैं तो ये सब जानता ही हूँ.. तू अपनी भाभी को समझा.. मैं तो थक गया हु इससे"
कविता बिस्तर पर खामोश ही बैठी रही.. उसके चेहरे से उदासी साफ नजर आ रही थी.. ऐसी हालत में भी पीयूष के चेहरे पर चमक थी.. क्यों न हो.. मौसम ने तो उसके दिल के मौसम को बाग बाग जो कर दिया था..
पिंटू: "अरे भाभी.. झगड़ा छोड़ दीजिए.. छोटी सी तो ज़िंदगी है चार पल की.. वो भी झगड़ने रूठने में बर्बाद कर दोगी तो फिर बचेगा क्या? गुस्सा थूक दीजिए और पीयूष को माफ कर दीजिए.. आप दोनों के बीच क्या हुआ है ये तो मुझे नही पता.. और मुझे जानना भी नही है.. पर जो कुछ भी हो.. अभी सुलझा दीजिए.. प्लीज"
"कितनी चिंता है मेरे पिंटू को मेरी" कविता सोच रही थी.. "मेरी उदासी दूर करने के लिए कितनी मिन्नते कर रहा है.. आई लव यू पिंटू" भावुक हो गई कविता और उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे
अपने आँसू पोंछ कर कविता ने पीयूष से कहा "पीयूष, मुझसे कोई गलती हुई हो तो मुझे माफ कर देना.. आई एम सॉरी"
कविता को जवाब दिए बगैर ही पीयूष कमरे के बाहर चला गया.. और जाते जाते पटककर दरवाजा बंद करता गया.. उसके दिमाग पर तो मौसम का सुरूर छाया हुआ था.. कविता और पिंटू स्तब्ध होकर उसे कमरे से जाता देखते ही रहे.. आखिर जब कविता माफी मांग रही थी तो ये पीयूष बेकार में क्यों इतना भाव खा रहा था ?? ऐसा तो कौन सा गुनाह कर दिया था कविता ने ? पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया..
बंद कमरे में कविता पिंटू से लिपट कर फुटफूट कर रोने लगी.. पिंटू डर गया.. अगर पीयूष वापिस लौटकर उन्हे इस स्थिति में देख लेगा तो गजब हो जाएगा.. पर अपनी रोती हुई प्रेमिका को दूर करने की हिम्मत नही थी उसमें.. जो होगा देखा जाएगा.. पिंटू कविता की पीठ सहलाकर उसे शांत करने लगा.. तब तक करता रहा जब तक की उसका रोना बंद नही हुआ.. अपने प्रेमी की बाहों में गजब की शांति मिली कविता को.. वो रीलैक्स हो गई.. पिंटू से अलग होकर वह बोली "थेंक यू पिंटू.. "
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"संजयकुमार.. आप मुझे बताएंगे भी की कहाँ लेकर जा रहे है?" शीला परेशान होकर बार बार पूछ रही थी संजय से.. पर संजय बता ही नही रहा था.. शीला चुपछाप अपनी बेग में कपड़े भर रही थी.. उसकी ओर देखकर संजय मुस्कुरा रहा था.. झुककर कपड़े भर रही शीला के गोलमटोल चूतड़ों को देखकर संजय के लंड में झटका लग गया.. सासुमाँ के उन मस्त कूल्हों को दबाने की तीव्र इच्छा को बड़ी मुश्किल से रोका उसने
थोड़ी ही देर में इनोवा गाड़ी शीला के घर के बाहर खड़ी हो गई.. शीला ने घर को ताला लगाया और संजय के साथ पीछे की सीट पर बैठ गई.. ड्राइवर ने सामान गाड़ी में रख दिया.. शीला को घबराहट हो रही थी.. पर अब पीछे हटने का कोई रास्ता ही नही था.. चलो जो होगा देखा जाएगा.. घबराहट के कारण शीला पसीने से तर हो गई थी.. उसके पसीने की मादक गंध सूंघते हुए संजय ने कहा
संजय: "हम गोवा जा रहे है मम्मी जी.. मज़ा आएगा.. मेरी कंपनी की मीटिंग है वहाँ.. मैं मीटिंग अटेन्ड करूंगा तब तक आप आराम से घूमना.. गोवा का माहोल बड़ा ही मस्त होता है..आपको बहोत मज़ा आएगा"
गोवा का नाम सुनकर शीला के जिस्म में एक सरसराहट सी होने लगी.. वो एक बार मदन के साथ गोवा जा चुकी थी.. वहाँ बीच पर अधनंगी लड़कियों को देखकर वह शर्म से पानी पानी हो गई थी.. पर तब तो साथ में पति था तो ठीक था.. अभी तो ये दामाद के साथ.... क्या होगा वहाँ जाकर?? दामाद के साथ भला कौन गोवा जाता है? वो भी अकेले?? पर अब क्या हो सकता था.. कुछ भी नही !!
गाड़ी ने १२० की स्पीड पकड़ ली थी.. शहर से बाहर निकलते ही संजय ने ड्राइवर से एलसीडी ऑन करने को कहा..
संजय: "कोई मस्त मूवी लगा दे.. !!" इनोवा की छत पर लगा एलसीडी खुलकर सामने आ गया.. शीला की नजर स्क्रीन पर थी पर उसका दिमाग काम नही कर रहा था.. संजय ने सिगरेट जलाई.. धुएं की गंध से शीला को रघु और जीवा के साथ की हुई चुदाई याद आ गई.. पता नही क्यों पर आज शीला को भी सिगरेट फूंकने की इच्छा हो रही थी.. स्वतंत्रता बहोत बुरी चीज है.. इंसान को बुरी से बुरी हरकत करने पर मजबूर कर देती है..
पीछे के सीट पर दो लोगों के लिए काफी जगह थी.. पर साथ में शीला बैठी हो तब संजय कहाँ शांत रहने वाला था.. !!!!
संजय: "मम्मी जी.. यू आर लूकिंग वेरी ब्यूटीफुल" शुरुआत हो गई थी
शीला ने संकोच के साथ कहा "थेंक यू बेटा.. "
संजय ने अपनी टांगें इस तरह चौड़ी कर दी की उसकी जांघ शीला की जांघों से स्पर्श करें.. ज्यादा नही.. पर जरा सा.. छूते ही शीला को पिछली रात बागीचे में हुए स्पर्श की याद ताज़ा हो गई.. यह स्पर्श भी बिल्कुल वैसा ही था.. नही रे नही.. केवल स्पर्श से कैसे किसी इंसान को पहचाना जा सकता है!! तीरछी नज़रों से शीला ने संजय के पेंट में बने उभार को देख लिया.. अब शीला कोई कच्ची कुंवारी या नादान तो थी नही जो उसे पता न चले की वो उभार किस वजह से था !!! साले ये कमीने संजय को अभी किस बात का इरेक्शन हुआ है!! मेरा पैर हल्का सा छु गया इसलिए.. छी छी छी.. मैं भी क्या गंदा गंदा सोच रही हूँ.. मर्दों को तो किसी भी वक्त इरेक्शन हो सकता है.. कभी कभी जोर की पेशाब लगने पर भी ऐसा होता है..
शीला.. शीला.. शीला.. ये तू क्या सोच रही है.. !! अपने दामाद के लंड के बारे में भी भला कोई सास सोचती है कभी!!! अपना ध्यान बँटाने के लिए वो स्क्रीन पर देखने लगी.. अगर कोई ऐसा सॉफ्टवेर होता जिससे किसी व्यक्ति के विचारों का पता लग सके तो क्या होता.. !! शादी की पहली रात को अपने पति का लंड पकड़कर हिला रही लड़की, अपने प्रेमी को याद कर रही हो और अगर उसके पति को अपनी बीवी के विचारों की भनक लग जाए तो कैसा गजब होगा !!! बाथरूम में नहाने गए जवान लड़के को कोने में पड़ी अपनी माँ या बहन की ब्रा और पेन्टी देखकर जो विचार आते है.. उन विचारों के बारे में बाहर बैठी उसकी माँ या बहन को पता चल जाएँ तो!!!
माय गॉड.. शीला.. तेरा दिमाग क्या क्या सोच रहा है.. पर अगर ऐसा सॉफ्टवेयर मिल जाएँ तो तू किस पर इस्तेमाल करेगी? ऑफ कोर्स मदन पर.. उसके दिमाग में झांककर देखती की वहाँ विदेश में उसने कितनी गोरी रंडियों के भोसड़े गरम कीये है.. और वही सॉफ्टवेयर अगर मदन को मिल जाए तो क्या होगा.. !!! रसिक, रूखी, उसका ससुर, जीवा, रघु, पीयूष, पिंटू, चेतना, रेणुका, अनुमौसी, कविता.. बाप रे बाप.. मेरी तो शामत ही आ जाए.. और मदन बेचारा हार्ट अटेक से मर जाए.. अपनी सोच पर खुद ही हंसने लगी शीला
शीला को हँसते हुए देखकर संजय ने पूछा "किस बात पर हंस रही हो मम्मीजी?"
शीला: ऐसे ही.. कोई पुराना जोक याद आ गया था मुझे"
संजय: "मुझे भी तो सुनाओ वो जोक"
शीला: "तुम्हें सुनाने लायक नही है"
संजय शेतानी मुस्कान के साथ बोला "हम्म.. समझ गया मैं"
अभी १०० किलोमीटर का सफर भी तय नही हुआ था और संजय खुल के बात करने लगा था.. कमबख्त उस ड्राइवर ने भी कोई मलयालम गानों की डीवीडी लगाई थी.. भरे भरे स्तनों वाली एक साँवली अधनंगी हिरोइन उत्तेजक डांस कर रही थी.. उसका गदराया जिस्म देखकर शीला के भोसड़े में आग लग गई.. संजय एकटक उस हीरोइन के बॉल देख रहा था.. शीला ने एक बार मदन को शिकायत भी की थी.. की उनके दामाद की नजर ठीक नही थी.. जब भी आता था शीला की छाती को ही टकटकी लगाकर देखता रहता था.. तब बेशर्म मदन ने क्या कहा था वो शीला को आज भी याद था.. मदन ने कहा था.. अरे जानेमन, तेरे बबले है ही इतने कमाल के.. मुझे पक्का यकीन है.. संजय सिर्फ देखता ही नही है.. उन्हे याद करते हुए मूठ भी लगाता होगा
मदन की वो बात याद आते ही शीला शरमा गई.. क्या संजय अभी भी उसी नजर से देखता होगा मुझे? अब तो मेरी उम्र भी हो चली है.. और वैशाली के भी काफी बड़े बड़े है.. शायद इसलिए अब संजय को पहले जितनी दिलचस्पी न रही हो मेरी छातियों में.. उसे दिलचस्पी हो या न हो.. मुझे उससे क्या? मैं क्यों यह सब बेकार की बातों के बारे में सोचकर दिमाग खराब कर रही हूँ?
झुककर अपनी क्लीवेज दिखाते हुए नाच रही उस साउथ की हीरोइन के मदमस्त उरोजों को देखकर संजय की सिसकी निकल गई.. जो शीला ने भी सुनी.. अभी भी ये बेवकूफ पराई औरतों की छातियों में ही उलझा हुआ है.. मुझे भी मेरी छातियों को संभालकर रखना होगा.. कहीं ये चूतिया मौका देखकर दबा न दे.. इन सारे विचारों से शीला की पेन्टी गीली हो रही थी
शीला के मन मस्तिष्क और जिस्म पर हवस का सुरूर चढ़ रहा था लेकिन दामाद के साथ होने से कंट्रोल रखना भी जरूरी था.. संजय के अंदर शीला को दामाद नही.. पर एक जवान लंड नजर आने लगा.. वैसे भी संजय दामाद की तरह कहाँ पेश आ रहा था.. उसके हाव भाव और बोलने से तो यही लग रहा था जैसे वो शीला को चोदने के लिए गोवा ले जा रहा हो..
शीला के मन मस्तिष्क और जिस्म पर हवस का सुरूर चढ़ रहा था लेकिन दामाद के साथ होने से कंट्रोल रखना भी जरूरी था.. संजय के अंदर, शीला को दामाद नही.. पर एक जवान लंड नजर आने लगा.. वैसे भी संजय दामाद की तरह कहाँ पेश आ रहा था.. उसके हाव भाव और बोलने से तो यही लग रहा था जैसे वो शीला को चोदने के लिए गोवा ले जा रहा हो..
संजय के पेंट में लंड वाला हिस्सा फूलकर कचौड़ी जैसा हो गया था.. जिस पर शीला की नजर बार बार चली जाती थी.. पेंट और अंडरवेर के आरपार शीला ने संजय के तने हुए सख्त लंड की मन में कल्पना भी कर ली थी..
शीला की हवस अब तूफान का स्वरूप धारण कर चुकी थी.. एलसीडी के छोटे से स्क्रीन पर चल रहे द्रश्य इस तूफान को ओर हवा दे रहे थे.. और इस तूफान में, सास और दामाद के संबंधों की पवित्रता धीरे धीरे हवा बनकर उड़ जा रही थी.. जोर जोर से भारी सांसें लेने के कारण सील की छातियाँ ऊपर नीचे हो रही थी.. संजय की नजरें स्तनों की हलचल का रसपान कर रहे थे और अपने दामाद की कामुक नज़रों से शीला के संयम का बांध टूटता जा रहा था..
संजय ने धीरे से शीला की जांघ पर हाथ रख दिया.. शीला कांप गई.. ये जो कुछ भी हो रहा था वो गलत था ये जानते हुए भी शीला उसे रोक नही पाई.. वासना ने उसके हाथ बांध दिए थे.. उसका मन तो कर रहा था की संजय का हाथ हटा दे और गाड़ी से उतर जाए पर उसका शरीर उसे ऐसा करने से रोक रहा था..
थोड़ी देर तक जांघ पर हाथ रखने पर भी जब शीला ने कोई विरोध नही किया तब संजय को जैसे ग्रीन सिग्नल मिल गया.. हिम्मत करके उसने शीला का हाथ पकड़ लिया और उसे चूम लिया.. शीला के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई.. बेबस होकर वो संजय की हरकतों को देखती ही रही.. शीला की छोटी उंगली को संजय अपने मुंह में लेकर चूसने लगा.. उसकी जीभ के गरम स्पर्श से शीला ने कामुक होकर अपनी आँखें बंद कर दी.. और बंद आँखों में उसे आगे होने वाले द्रश्य दिखाई देने लगे..
काफी देर तक संजय शीला के हाथों से खेलता रहा.. कोई जल्दी तो थी नही क्योंकि सफर लंबा था.. शीला की गोरी नाजुक कोमल हथेली के बीच अपनी जीभ ऐसे फेरने लगा जैसे शीला का भोसड़ा चाट रहा हो.. शीला मन ही मन सोच रही थी.. ये आदमी कितना खतरनाक है.. कितनी कामुक हरकतें कर रहा है.. !! कोई भी औरत चाहे कितनी भी चारित्रवान क्यों न हो.. ऐसे स्पर्श का आगे कितनी देर तक संयम रख सकती थी.. !! शीला की चुत में जबरदस्त झटके लग रहे थे.. सिर्फ उसकी हथेली से खेलते हुए संजय ने उसे बेहद गरम कर दिया था.. शीला तब चोंक गई जब संजय ने उसकी हथेली अपने लंड पर रख दी..
शीला के शरीर में हाहाकार मच गया.. दोनों के बीच जो पतली सी रेखा बची थी वो भी जैसे मिट चुकी थी.. शीला का पल्लू अपनेआप सरक कर नीचे गिर गया.. क्या उत्तेजना के कारण पल्लू गिर गया? शीला के स्तन इतने कडक हो गए की उसे डर लगने लगा.. कहीं ब्रा के हुक टूट न जाए.. !! शीला के अंग अंग में उत्तेजना का जहर फैलने लगा था.. अपने सगे दामाद के लंड पर रखा हुआ हाथ.. पेंट के अंदर छुपे हुए उस विकराल लंड के झटकों के साथ ऊपर नीचे हो रहा था.. लंड की गर्मी शीला की हथेली से होते हुए उसकी चूत तक पहुँच रही थी..
हथेली में महसूस हो रही गर्मी को अपनी भोस के वर्टीकल होंठों के अंदर अनुभवित करने के लिए ऊपर नीचे हो रही थी शीला.. अनजाने में उसने संजय के लंड के उभार को दबा दिया.. संजय की आँखों में जोरदार चमक आ गई.. पल्लू सरकने के बाद, हिमालय के उत्तुंग शिखरों जैसे उसके बड़े बड़े स्तनों की गोलाइओ को छूने का बड़ा मन कर रहा था संजय को.. लेकिन वह जल्दबाजी करना नही चाहता था.. इस तरफ शीला सोच रही थी की लंड पकड़ लिया है.. पर अब तक संजय उसके स्तनों को क्यों नही छु रहा है !!
संजय के लंड पर शीला की पकड़ धीरे धीरे मजबूत होती जा रही थी.. शरीर की आग इतनी भड़क गई की शीला ने खुद ही संजय का हाथ पकड़कर अपने स्तनों पर रख दिया.. पुरुष के हाथों का स्पर्श.. स्तनों पर कितना अच्छा लगता है यह केवल स्त्री ही जानती है..
फट.. एक आवाज हुई और शीला के ब्लाउस का एक हुक टूट गया.. टाइट स्तनों के कारण ही हुक टूट गया था.. हुक टूट जाने से स्तनों पर दबाव थोड़ा सा कम हो गया.. संजय ने शीला की ओर देखा.. और वो शरमा गई.. शर्म आनी स्वाभाविक भी थी.. सास का हाथ दामाद के लंड पर हो और उसका हाथ सास के स्तनों पर.. संजय थोड़ा सा करीब आ गया शीला के.. ड्राइवर और पेसेन्जर के बीच एक काला पर्दा था.. जो संजय ने खींचकर आधा बंद कर दिया
पर्दा थोड़ा सा बंद होते ही पता नही शीला को क्या हो गया.. उसने संजय के लंड को अपनी मुठ्ठी में मसल दिया.. और उतने ही जोर से संजय ने शीला के स्तनों को ब्लाउस के ऊपर से दबा दिया.. दोनों सीट के कोने में, परदे के पीछे ऐसे सट गए थे की ड्राइवर को कुछ भी नजर न आए.. संजय ने शीला के चेहरे को पकड़कर अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए.. शीला संजय से भी अधिक आक्रामक होकर उसे चूमने लगी..
संजय: "मम्मी जी, प्लीज जल्दी जल्दी अपने ब्लाउस के हुक खोलकर आपके स्तन बाहर निकालो.. कितने सालों से अपने मन में ही उन्हे नंगे देख रहा हूँ.. आज मेरा वो सपना साकार कर ही दो.. प्लीज.. !!"
शीला: "यहाँ नही.. ड्राइवर देख लेगा तो ??"
संजय: "अरे मम्मी जी.. ड्राइवर रोड देखेगा या पीछे देखेगा..!! जल्दी करो मम्मीजी.. मुझसे रहा नही जा रहा" कहते हुए संजय ने बेरहमी से शीला की चूचियाँ मसल दी.. शीला के कंठ से धीमी चीख निकल गई..
शीला: "क्या कर रहे हो? मुझे दर्द होने लगा.. ऐसे भी कोई करता है क्या !!!"
संजय: "मम्मी जी प्लीज.. अभी के अभी अगर आपने हुक नही खोले तो मेरी जान निकल जाएगी.. मैं अब एक पल के लिए भी सब्र नही कर सकता.. "
उस दौरान शीला ने पेंट की चैन खोलकर अंदर हाथ डाल दिया था.. पेंट की मोटी परत दूर होते ही शीला बस एक कदम दूर थी उस नंगे लंड को अपने हाथों में पकड़ने के.. संजय ने फिर से शीला को खींचकर उसके होंठों को चूस लिया.. जवाबी हमले में शीला ने संजय के अंडरवेर में हाथ डालकर उसका लंड पकड़ लिया और बोली "आह्ह संजय बेटा.. कितना टाइट हो गया है !!"
दोनों उत्तेजना की नई सीमाएं पार करते जा रहे थे.. संजय ने शीला के ब्लाउस के दो हुक जबरदस्त खुलवा दिए.. उसके दूध जैसे गोरे मदमस्त स्तन की आधे से ज्यादा गोलाई बाहर झलकने लगी.. ऐसा लग रहा था जैसे बादलों से चाँद बाहर झांक रहा हो.. संजय के लंड पर शीला की पकड़ मजबूत होती जा रही थी.. शीला की सारी शर्म, वासना की आग में जलकर खाक हो चुकी थी..
शीला के आदर्श भारतीय नारी के चोले के नीचे एक अति कामुक और थोड़ी सी विकृत स्त्री छुपी हुई थी.. जो बेहद वासना युक्त.. बार बार उत्तेजित होने वाली निम्फोमैनीऐक थी.. हमेशा चुदने के लिए तैयार.. दिन में न जाने कितनी बार उसकी चूत उत्तेजित हो जाती थी.. वासना के कारण शीला को इतने गंदे गंदे विचार आते थे की बात ही मत पूछो
संजय के कठोर लंड को बाहर निकालकर शीला ने मन भरकर देखा.. गोरा गुलाबी लंड था उसके दामाद का.. लाल लाल सुपाड़ा और लंड पर उभरी हुई मोटी नसें.. शीला के हाथों में थिरक रहा था संजय का लंड.. रसिक या जीवा के मुकाबले कद में छोटा पर अच्छा खासा मोटा था उसका लंड.. ऐसे कड़े लंड को देखते ही शीला बेकाबू हो गई.. मुठ्ठी में पकड़कर उत्तेजनापूर्वक वह लंड की त्वचा को आगे पीछे करने लगी.. और ड्राइवर न सुन सके ऐसी धीमी आवाज में संजय के कान में बोली.. "देखने के बाद अब रहा नही जा रहा.. चूसने का मन कर रहा है बेटा"
"तो देर किस बात की है मम्मी जी.. ले लीजिए मुंह में और मेरी बरसों की तमन्ना को आज पूरा कर दीजिए.. वैसे कैसा लगा ये आपको?"
"अरे मस्त है बेटा.. थोड़ा सा छोटा है पर मोटा है.. मज़ा आएगा.. अभी इतनी छोटी सी जगह में चूसने में मज़ा नही आएगा.. फिर मौका मिलें तब देखेंगे"
आधे बाहर लटक रहे स्तनों को संजय पूरी उत्तेजना से मसल रहा था.. शीला की छाती.. उफ्फ़ उसके मदमस्त चूचियाँ.. कितना तड़प रहा था वो इन्हे नंगा देखने के लिए.. सासुमाँ के नग्न स्तनों को देखने के लिए उसने एक बार बाथरूम में झाँकने की कोशिश की थी पर वैशाली ने उसे पकड़ लिया था.. उसके बाद कितने दिनों तक वैशाली ने उससे बात तक नही की थी..
शीला: "संजय बेटा.. तेरा हाथ बहोत गरम लग रहा है मुझे.. उफ्फ़.. मुझे कुछ कुछ हो रहा है.. आह्ह !!"
संजय: "मम्मी जी, आप बहोत मस्त हो.. आपको देखकर मेरा लंड झटके खा रहा है.. आपके हाथ में ये जितना सख्त हो गया है उतना तो आज से पहले कभी नही हुआ.. क्या कयामत है आपकी चूचियाँ.. वाह !!! दिल करता है की पूरा दिन बस इनसे खेलता ही रहूँ.. उफ्फ़ मम्मी जी.. मुझे इन्हें चूसने का बहोत मन कर रहा है.. आप पूरे बाहर निकाल दीजिए.. दोनों बाहर न निकले तो न सही.. एक तरफ का ही निकाल दो.. मैं एक को चूस लूँगा.. बस थोड़ी ही देर के लिए मम्मीजी.. प्लीज.. !!"
शीला: "ओह्ह संजय बेटा.. खुले रोड पर ऐसा करना खतरनाक हो सकता है.. कोई देख लेगा तो मुसीबत हो जाएगी"
संजय: "इतनी तेज चल रही है कार.. कौन देख लेगा.. चलती हुई गाड़ी में ऐसा करने में बहोत मज़ा आएगा आपको भी.. देखो तो मेरा लंड पागल सा हो रहा है.. एक तरफ मुझे बेटा बेटा कहकर बुलाती हो.. और आपका दूध तो चूसने नही दे रही.. ऐसा कैसे चलेगा!!" शीला के स्तनों को दोनों हाथों से दबाते हुए संजय ने कहा
शीला ने चारों तरफ देखकर सब-सलामत की तसल्ली कर ली.. और ब्लाउस की एक तरफ की कटोरी को ऊंचा कर के.. अपनी ४८ के साइज़ की एक चुची बाहर निकाली.. पूर्णिमा के चाँद जैसा उसका स्तन चमकने लगा.. संजय के दिल की धड़कने जैसे रुक सी गई.. थोड़ी देर के लिए वह शीला के अनमोल स्तन को देखता ही रह गया.. शीला और मजबूती से संजय का लंड हिलाने लगी..
"ओह्ह बेटा.. अब ईसे देखता ही रहेगा या कुछ करेगा भी.. !!! देख ना.. मेरी निप्पल कितनी सख्त हो गई है.. चूस ले जल्दी जल्दी"
शीला के इतना कहते ही "ओह्ह मम्मी जी" कहते हुए संजय ने अपने वीर्य की पिचकारी छोड़ दी.. उसकी उत्तेजना देखकर हतप्रभ हो गई शीला.. बिना चूसे या चूत में घुसे ही लंड पिचकारी छोड़ देगा ऐसा अंदाजा नहीं था शीला को.. अपने लंड की इस हरकत से संजय शरमाकर रह गया.. जैसे उसकी मर्दानगी पर दाग लग गया हो.. वो भी क्या करता.. शीला के नंगे चुचे का जादू ही कुछ ऐसा था.. अच्छे अच्छों का देखते ही पानी निकाल दे !!
शीला संजय की परिस्थिति समझ रही थी.. उसने संजय का हाथ अपने खुले स्तन पर रखते हुए कहा "संजय, तेरे लंड में कितना वीर्य भरा हुआ है?? अभी से छलकने लगा "
संजय झुककर शीला की गोद में सर रखकर लेट गया.. और छोटे बच्चे की तरह बच-बच आवाज करते हुए शीला की निप्पल चूसने लगा.. जितना वो चूसता गया उतना उसका लंड खड़ा होता गया.. जैसे वो शीला की निप्पल से एनर्जी ड्रिंक चूस रहा हो.. लंड फिर से खड़ा हो गया.. नए सिरे से सख्त हुए लंड को देखकर शीला के भोसड़े को चुदने की आशा जगी..
फिर से टाइट होकर उछल रहे लंड को पकड़ कर शीला झुकी और एक किस कर दिया उसने लाल टोपे पर.. शीला के होंठों का स्पर्श होते ही संजय का लंड ओर खिल उठा.. और ज्यादा सख्त होकर अप-डाउन करने लगा.. शीला के स्तन भी टाइट होकर लाल हो चुके थे.. वह झुककर लंड को चूस रही थी और उसका बाहर लटक रहा स्तन संजय की जांघ पर रगड़ रहा था.. नरम नरम स्तन को अपनी जांघ पर घिसता देख संजय सातवे आसमान पर उड़ने लगा.. हाथ नीचे डालकर वह शीला के स्तन को मींजने लगा॥
शीला आँखें बंद कर अपने दामाद का लंड कुल्फी की तरह चूस रही थी.. मुंह से ढेर सारी लार निकालते हुए जब काफी देर तक चूसने के बाद उसने लंड को मुंह से बाहर निकाला तब उसका गोरा लंड ऐसा लग रहा था जैसे अभी नहाकर बच्चा बाथरूम से बाहर भीगा हुआ निकला हो.. इतना सुंदर लग रहा था वह टाइट लंड.. शीला को देखते ही प्यार आ गया.. वह फिर से चूसने लगी.. आधा घंटा होने को आया लेकिन शीला लंड को छोड़ने का नाम ही नही ले रही थी.. संजय बड़े ही ताज्जुब से अपनी सास की हवस को देखता रहा.. उसे आश्चर्य हो रहा था.. कितनी देर से मम्मी जी लंड चूस रही है? थक ही नही रही.. !!! गज़क की पागल है ये तो मेरे लोडे के लिए.. बाकी सारी लड़कियां और औरतें तो एक मिनट के लिए मुंह में लेने में भी कितने नखरे करती है!!! पर ये तो बिना कहे बस चूसती ही जा रही है..
आखिर शीला थक गई पर फिर भी उसने लंड मुंह से बाहर नही निकला.. मुंह में लंड रखकर ही वह पड़ी रही.. थोड़ी मिनटों के लिए रीलैक्स होकर वह वापिस चूसना चालू कर देती.. दोनों में से कोई कुछ भी नही बोल रहा था.. क्या बोलते? और क्यों बोलते? जब लंड और चूत बात कर रहे हो तब शब्दों की जरूरत ही कहाँ पड़ती है.. !!
अपनी उत्तेजना को किसी भी किंमत पर शांत करने के मनसूबे से शीला लंड को थन की तरह चूस रही थी.. संजय नीचे हाथ डालकर शीला के बाएं स्तन को जोर जोर से दबा रहा था.. शीला अपनी जीभ का ऐसा कमाल दिखा रही थी की संजय कराह उठता और जोर से शीला का स्तन दबा देता.. संजय को आश्चर्य इस बात का था की इतनी जोर जोर से चुची दबाने पर भी शीला के मुंह से एक उफ्फ़ तक नही निकलती थी.. क्या मम्मी जी को दर्द नही होता??
शीला को दर्द हो रहा हो या ना हो.. पर संजय का लंड अब दुखने लगा था.. एक बार झड़ने के बाद फिर से सख्त हुए लंड को अब ४५ मिनट से शीला चूसे जा रही थी.. थकने का नाम ही नहीं ले रही थी.. संजय अब तक शीला की चूत तक पहुँच नही पाया था.. उसने एक दो बार घाघरे में हाथ डालने की कोशिश तो की थी पर शीला ने उसे रोकते हुए समझाया था की अभी फिलहाल गाड़ी के अंदर वह उसका लंड चूत में नही ले पाएगी.. शीला इसलिए भी मना कर रही थी क्योंकि उसे पता था की एक बार अगर संजय ने उसके भोसड़े को छु लिया.. फिर वह आपे से बाहर हो जाएगी..
शीला को इतनी कामुकता से लंड चूसते देखकर संजय हतप्रभ था.. कौन किसको इस्तेमाल कर रहा है इसका पता ही नही चल रहा था.. सामान्यतः पुरुष ही स्त्री को अपनी इच्छा अनुसार भोगता है.. पर यहाँ तो शीला ही संजय के लंड के भोग का मज़ा ले रही थी.. मस्ती में चूस रही शीला कभी कभी इतनी उत्तेजित हो जाती की अपने दांतों से संजय के सुपाड़े को हल्के से काट लेती.. संजय डर गया.. कहीं हवस के मारे वह उसका लंड खा न जाए.. अगर ऐसा हुआ तो अखबार में कैसी हेडलाइन्स छपेगी.. !! "हवस में अंध सास ने अपने दामाद का ही गुप्तांग काट खाया"
संजय: "मम्मी जी, प्लीज.. अब बस भी कीजिए.. मेरा फिर से निकल जाएगा॥" पर संजय की यह बात शीला के कानों पर जैसे पड़ी ही नही थी.. उसने संजय की तरफ देखा तक नही.. ऊपर से अपनी मुठ्ठी में आँड़ों को ऐसे दबा दिया की संजय दर्द के मारे सीट के ऊपर १ फुट उछल गया.. संजय के ऊपर होते ही शीला ने एक हाथ नीचे डाला और संजय की गांड में अपना अंगूठा घोंप दिया..
"मम्मी जी.. ओह्ह गॉड.. " कहते हुए संजय के लंड से गरम चिपचिपा वीर्य शीला के मुंह में रिसने लगा.. शीला इतनी जोश में थी की पिचकारी निकलते ही पी जाती.. लंड ने तीन से चार पिचकारियाँ छोड़ी और शीला ने एक बूंद भी नही छोड़ी.. लाल टोपे को चाट चाट कर शीला ने साफ कर दिया.. बिना मुंह बिगाड़े या किसी घिन के वीर्य को चाट रही अपनी सास को देखकर संजय हक्का-बक्का रह गया.. उसने आज तक कितनी लड़कियों और औरतों के साथ बिस्तर गरम किया था.. लेकिन इतनी कामुक औरत का सामना आज तक उसे कभी नही हुआ था..
आखिर जब शीला ने लंड को मुंह से निकाला तब वह बेजान मुर्दे की तरह गिर गया.. शीला के चेहरे पर विजय की मुस्कान थी.. और संजय के चेहरे पर तृप्तता के भाव थे.. दोनों कुछ देर तक वैसे ही बैठे रहे.. शीला का बायाँ स्तन अभी भी बाहर था.. और संजय का लंड बेजान होकर सो रहा था.. शीला ने झुककर एक आखिरी बार उस निर्जीव लंड को चूमा.. और उसे पेंट के अंदर डालकर चैन बंद कर दी.. संजय ने अपने शर्ट के बटन बंद कीये और अपने बाल भी ठीक कर लिये.. शीला ने भी अपना घाघरा ठीक करते हुए अपनी चुत को सहलाया.. कामरस से गीली चुत में दो उँगलियाँ डालकर वह उँगलियाँ संजय के नाक के पास ले गई.. अपने भोसड़े की गंध सुँघाते हुए वह धीमे से बोली "सूंघ कर बताओ बेटा.. किसके जैसी गंध आ रही है? वैशाली जैसी या फिर.... चेतना जैसी ???"
चेतना का नाम सुनते ही संजय के होश उड़ गए.. साला ये NEET की तरह मेरा पेपर किसने लीक कर दिया? जरूर चेतना ने ही बताया होगा.. संजय को सोच में पड़ा हुआ देख.. शीला ने अपनी गीली उंगलियों को संजय के गालों पर और होंठों पर रगड़कर उसके मुंह में डाल दिया.. और बोली "अभी तुम चाट तो नही पाओगे.. पर स्वाद तो चख लो.. "
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शीला के इस अद्भुत और पागल कर देने वाले मुखमैथुन से पूर्ण संतुष्ट होकर संजय आराम से बैठा था
अपने खुले स्तन को दबाकर ब्लाउस के अंदर घुसाते हुए शीला ने कहा "तुम्हें मज़ा आया बेटा??"
संजय: "क्या कहूँ मम्मीजी.. !! मेरे पास बयान करने के लिए शब्द नही है.. आपने तो मुझे पागल बना दिया.. वैशाली को हाथ जोड़कर विनती करता हूँ तब कहीं जाकर एकाध मिनट के लिए मुंह में लेती है.. और वो भी इतनी घिन के साथ की चुसाई का कोई मज़ा ही नही आता.. पर जिस उत्तेजना से आपने आज चूसा.. भई वाह.. !! मज़ा ही आ गया.. !!"
संजय की जांघ पर हाथ फेरते हुए शीला ने कहा "बेटा.. मैं अपने साथी को आनंद देने के लिए नही चूसती.. बल्कि इसलिए चूसती हूँ क्योंकि मुझे मज़ा आता है.. चूसना मुझे बेहद पसंद है.. खड़ा लंड देखने के बाद मैं अपने आप को रोक ही नही पाती.. तुम्हारा लंड चूसने में मुझे बहोत मज़ा आया.. गोरा लंड काफी कम देखने को मिलता है.. तुम्हारे पापा जी का भी काला है.. ब्लू फिल्मों में जब मैं गोरा लंड देखती हूँ तब इतना मन करता था की कभी ऐसा लंड चुसूँ.. आज मेरी दिली तमन्ना पूरी हो गई.. "
संजय: "मम्मी जी, जैसे आपको मेरे लंड का रंग पसंद है.. वैसे ही मुझे आपकी मदमस्त छातियाँ पागल बनाती है.. आप जब दबाकर अपना स्तन ब्लाउस में डाल रही थी तब मेरे लंड में फिर से झटका लग गया.. मेरी एक रीक्वेस्ट है आप से.. मानोगी?"
शीला: "हाँ हाँ.. बोलो ना बेटा.. "
संजय: "अब हम इतने खुल ही चुके है.. तो मैं चाहता हूँ की आप अपना एक स्तन बाहर खुला ही रखिए.. ताकि मैं जब चाहूँ आपकी गुलाबी निप्पल को चूस सकु और स्तन को दबा सकूँ.. आपके नंगे स्तन की त्वचा को छूना बहोत अच्छा लगता है.. जैसे आपको मेरा गोरा लंड चूसने की इच्छा होती है वैसे ही मैं आपके स्तन को घंटों तक चूसना चाहता हूँ.. मैं जब कहूँ आप अपने स्तन के दर्शन खोलकर करवाना मुझे.. प्लीज.. अभी हमारे पास मौका है.. घर जाकर तो पता नही कब ऐसा मौका फिर मिलेगा.. !!!
अपने दामाद के मुंह से स्तनों की तारीफ सुनकर खुश हो गई शीला.. वैसे अपने स्तनों की तारीफ सुनना उसके लिए कोई नई बात नही थी.. जिस किसी ने भी उसके स्तन खुले देखे थे वह उसका दीवाना हो गया था..
शीला: "तुम चिंता मत करो.. वो सब मैं मेनेज कर लूँगी.. तुम्हें तुम्हारी पसंदीदा चीज के लिए तड़पना नही पड़ेगा ये वादा है मेरा.. पर मुझे भी जब मेरी पसंदीदा चीज को देखने या चूसने का मन करें तब तुम्हें भी मेरा खयाल रखना पड़ेगा"
संजय: "आप निश्चिंत रहिए मम्मी जी.. आप जब कहोगी मैं लंड खोलकर दे दूंगा आपको.. "
जवाब में शीला ने संजय के कंधे पर हाथ रख दिया और उसके शर्ट का पहला बटन खोलकर अपना हाथ अंदर डाल दिया.. बालों वाली छाती पर हाथ फेरते हुए उसने दूसरा बटन भी खोल दिया.. इसके साथ ही संजय की आधी छाती खुली हो गई.. उसकी मजबूत छाती देखकर शीला की सिसकी निकल गई.. उस मर्दाना छाती पर शीला ने अपना सर रख दिया.. जैसे प्रेमिका अपने प्रेमी की छाती पर रखती है.. अपने कोमल गालों को संजय की छाती के बालों पर रगड़ते हुए उसने संजय की निप्पल पर अपनी जीभ फेर दी.. एक ही सेकंड में संजय उत्तेजित हो गया..
संजय: "ओह्ह मम्मी जी, ये क्या कर दिया आपने?"
शीला अब संजय की छाती पर जगह जगह चाटने लगी.. संजय ने भी अपना हाथ शीला की क्लीवेज में डाल दिया और उसके स्तनों को दबाने लगा.. दबाते दबाते उसने शीला के ब्लाउस के दो बटन खोल दिए.. और हाथ को और अंदर धकेलने गया पर वहाँ पर ब्रा की किलेबंदी थी.. हाथ अंदर डालने का प्रयास निष्फल हो गया.. बस उंगलियों से ब्रा के ऊपर से स्तनों को दबाते हुए संजय को देख शीला को हंसी आ गई.. उसने खुद ही एक स्तन को ब्रा से बाहर निकालकर संजय के सामने पेश कर दिया..
अद्भुत कलाबाज थी शीला.. उसकी एक एक हरकत में मर्द को पागाल बना देने की क्षमता थी.. दोनों मस्ती में मस्त थे तभी ड्राइवर ने रंग में भंग डाल दिया.. परदे के पीछे से उसने कहा "साहब, चाय पानी के लिए आगे गाड़ी रोकनी पड़ेगी.."
संजय: "ठीक है.. कोई अच्छी सी होटल देखकर गाड़ी रोक देना.. मुझे भी फ्रेश होना है " शीला के सामने देखकर उसने आँख मारी.. शीला शरमा गई..
एक होटल के बाहर इनोवा खड़ी हो गई.. संजय और शीला नीचे उतरे.. आसमानी रंग की पारदर्शक पतली साड़ी का पल्लू शीला ने ठीक किया.. अपने बाल और ब्लाउस भी ठीक कीये.. अपने दोनों उरोजों को पल्लू से ढँक दिया..
संजय: "मम्मी जी, एक तरफ की कटोरी तो खुली रखो.. यहाँ हमारी जान पहचान का तो कोई है नही.. !!"
शीला: "पागल.. ये कोई सबको दिखाने वाली चीज थोड़े ही है.. सिर्फ चुनिंदा लोगों को ही इसके दर्शन मिलते है" हँसते हुए उसने कहा
संजय: "पर मेरे लिए तो खुले रखिए.. प्लीज मम्मी जी.. मुझे ऐसे ब्लाउस के ऊपर से देखने में भी बहोत मज़ा आता है"
शीला: "जिद मत करो बेटा.. यहाँ कितने सारे लोग है.. वो क्या सोचेंगे? कार में बैठकर फिर तुम्हें खेलने दूँगी.. ठीक है !!!"
संजय: "नही मम्मी जी.. मुझे खुलेआम दिखाइए.. ऊपर ऊपर से.. ऐसा मौका हमें दोबारा नही मिलने वाला.. "
ड्राइवर गाड़ी से उतरकर चला गया था.. संजय और शीला अकेले थे.. कार की आड़ में संजय ने शीला का पल्लू हटाकर एक स्तन खुला कर दिया.. हालांकि स्तन ब्लाउस के तो अंदर ही था.. "बस ऐसे ही रहने दीजिए.. जबरदस्त लग रहा है" संजय ने कहा
शाम के साढ़े छह बज रहे थे.. होटल में २०-२५ के करीब लोग बैठे थे.. सब अपनी मस्ती में मस्त थे.. पर शीला ने जैसे ही होटल में एंट्री ली.. नाश्ता कर रहे लोगों का निवाला गले में अटक गया.. पारदर्शक साड़ी पहनी हुई शीला का गोरा मांसल पेट और उसके बीचोंबीच गहरी सेक्सी नाभि.. आह्ह.. देखने वालों के होश उड़ाने के लिए काफी थे.. उस गोल नाभि को देखकर किसी का भी मन कर जाएँ अंदर लंड डालने को.. सब की नजर शीला के गोलाईदार जिस्म पर चिपक गई थी.. जब तक शीला कुर्सी पर बैठ न गई तब तक सारे देखने वाले उसके शरीर को अपनी आँखों से चोदते रहे.. जानते हुए भी अनजान होकर शीला बड़ी ही बेफिक्री से अपने दामाद के हाथों में हाथ डालकर मस्ती से बैठी थी..
शीला यह जानती थी की पल्लू हटने के बाद नजर आ रही एक तरफ की ब्लाउस की कटोरी को ही तांक रहे थे सारे लोग.. पर अपने दामाद की खुशी के लिए उसने उस हिस्से को ढंका नही.. सब दंग हो गए थे शीला की खूबसूरती को देखकर.. शीला संजय की हथेली को अपने हाथ में लेकर सहला रही थी.. और झुककर उसे अपनी क्लीवेज के दर्शन भी दे रही थी.. उनके अगल बगल के टेबल खाली थे इसलिए उनकी बात किसी को भी सुनाई नही दे रही थी
संजय: "मम्मी जी, आपने जबरदस्त ओरल सेक्स किया आज तो.. अभी तक लंड दर्द कर रहा है.. बिना लंड चुत में डाले दो बार ठंडा कर दिया आपने.. ऐसा मेरे साथ पहली बार हुआ है"
शीला मुसकुराती रही.. और अपनी तारीफ सुनती रही.. वेटर आकर बिस्किट और चाय रखकर चला गया.. एक कप संजय को देते हुए शीला ने पूछा "कितने बजे पहुंचेंगे हम? देर रात तक पहुँच जाएंगे?"
संजय: "नही मम्मी जी, रात तो हमें किसी होटल में ही गुज़ारनी होगी.. कल दोपहर से पहले पहुँच जाएंगे.. एक रात गोवा में रुकेंगे.. फिर निकल जाएंगे.. वैशाली के लौटने से पहले हम घर पहुँच चुके होंगे" अपने दामाद की प्लैनिंग पर गर्व हुआ शीला को
दोनों चाय की चुसकियाँ लेते रहे.. संजय की नजर शीला की गोल चुची पर अब भी चिपकी हुई थी "आहह मम्मी जी, दिल करता है की यहीं खोलकर चूस लूँ.. "
शीला हँसते हुए चाय पीती रही और बोली "तुम इसकी झलक तो देख पा रहे हो.. मेरे नसीब में तो अभी वो भी नही है.. अभी अगर मुझे तेरा गोरा गोरा देखने का मन हो तो मैं क्या करू?"
संजय: "मम्मी जी, कार में खोलकर दे दूंगा आपको.. जितना मर्जी खेल लेना.. "
शीला ने टेबल के नीचे से अपना पैर उठाकर संजय के लंड पर रख दिया.. पैर के अंगूठे से लंड की खबर लेकर शीला ने कहा "ये तो फिर से तैयार हो गया.. !!! क्या बात है बेटा !! इतने समय में ही तीसरी बार........!!!!!"
संजय: "मम्मी जी.. मैं तो आखिर मर्द हूँ.. आप के साथ अगर कोई किन्नर भी होता तो उसे भी उत्तेजित कर देती आप.. "
शीला ने अपने पैरों से ही संजय का लंड दबा दिया..
शीला: "जल्दी जल्दी चाय पी ली बेटा.. अब मुझे ईसे चूसना ही पड़ेगा.. और नही रुक सकती मैं.. " चाय खतम कर शीला खड़ी हो गई.. और कार की तरफ चलने लगी.. आखिरी घूंट खतम कर संजय भी तुरंत शीला के पीछे भागा
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अपनी प्रेमिका कविता की पीठ पर हाथ सहलाते हुए उसे शांत कर रहा था पिंटू.. पीयूष के ऐसे बर्ताव से कविता के दिल को गहरी ठेस पहुंची थी.. ..पिंटू जल्दी से जल्दी बाहर निकल जाना चाहता था क्यों की उसे डर था किसी के आ जाने का.. लेकिन कविता ने उसे रोक लिया और अपने बाहुपाश में जकड़ कर किस कर लिया.. और बोली "पिंटू.. पीयूष मेरे साथ हमेशा ऐसा ही बर्ताव करते हुए मेरा दिल तोड़ देता है.. मुझे पता नही चल रहा की मैं क्या करू? इस कठिन समय में तू मेरे साथ रहना.. प्लीज!!"
पिंटू: "तू चिंता मत कर कविता.. मैं उसे समझाऊँगा.. ठीक है !! " कविता को अपनी बाहों में कसकर पकड़ते हुए उसने कहा "कविता.. मेरा यहाँ ज्यादा देर तक रुकना ठीक नही होगा.. पीयूष को अगर जरा सी भी भनक लग गई तो गजब हो जाएगा.. मैं जा रहा हूँ.. पर तुम तैयार होकर रात की पार्टी में जरूर आना.. मैं इंतज़ार करूंगा तेरा.. ऐसे तैयार होकर आना की देखने वाले देखते ही रह जाएँ.. !! दूर से ही सही.. मैं तुझे देख तो पाऊँगा.. " कविता को एक आखिरी किस करके पिंटू बिस्तर से खड़ा हो गया.. और कमरे से बाहर निकल गया
बालकनी में खड़ी हुई वैशाली ने देखा की पीयूष और मौसम हाथ में गिफ्ट लिए हुए आ रहे थे.. मौसम के साथ पीयूष को इतना खुश देखकर वैशाली के दिल पर आरी चल गई.. बहोत गुस्सा आया उसे मौसम पर.. पूरा दिन जीजू जीजू करती रहती है कमीनी.. पीयूष भी अपनी साली पर लट्टू हो कर उसके आगे पीछे घूमता रहता है.. क्या कहें इन मर्दों को?? इन सब से अच्छा तो मेरा हिम्मत है.. किसी को आँख उठाकर भी नही देखता.. मौसम और पीयूष के बीच कैसे संबंध होंगे? साली और जीजा के संबंधों के बारे में तो बहोत कुछ कहा गया है.. आज कल की लड़कियों को अपने चारित्र से उतना लगाव होता नही है.. वो शादी से पहले के सेक्स को नेट-प्रेक्टिस मानती है.. वैशाली को अपनी कॉलेज की सहेली मोनिका की याद आ गई.. वैशाली और उनकी सारी सहेलियाँ मोनिका के एन्गैज्मन्ट पर गई थी.. उसके बाद जब भी वो मिलती तब सारी लड़कियां उसे घेर लेती.. ये पूछने के लिए की उसका होने वाला पति.. जतिन.. उसका कैसा खयाल रखता है? कितनी बार फोन करता है? और खास कर ये की.. उसके साथ अकेले में क्या क्या करता है.. !!!! दो ही महीनों में उनकी सगाई टूट गई.. उसे पूछने पर यह पता चला की.. इतनी बार मिलने के बावजूद जतिन उसके साथ कुछ करता ही नही था.. सिर्फ बातें करता था.. मौसम भी वैसी लड़कियों जैसी ही लगती थी वैशाली को.. मुझे यकीन है की मौसम अपने स्तन तो किसी न किसी से दबवाती ही होगी.. वरना बगैर किसी के दबाए.. उसके स्तन इतने मस्त कैसे हो सकते है?? जरा से भी ढीले-ढाले नही है.. जिस तरह से वो और पीयूष हंस हंस कर बात करते है.. मुझे पक्का दाल में कुछ काला लग रहा है..
कितना शंकाशील होता है स्त्री का मन.. !!! पीयूष के संग अपनी जिस्म की आग ठंडी करने की आशा से वैशाली यहाँ आई थी पर अब उसे लगने लगा था की कविता और मौसम दोनों के रहते हुए उसका पीयूष से मिलन नामुमकिन सा था.. पीयूष और मौसम को वह जाते हुए देखती ही रही.. उसके विचारों में भंग तब पड़ा जब किसी ने पीछे से उसकी आँखों पर हथेलियाँ दबा दी.. और उसकी गर्दन को चूम लिया.. इतनी हिम्मत कौन कर सकता है?? पीयूष का स्पर्श तो वो जानती थी.. और वैसे भी उसने अभी अभी पीयूष को मौसम के साथ जाते हुए देखा था.. फिर यह कौन था ??
"कौन है??" कहते हुए वैशाली ने अपनी आँखों से हाथ हटाने की कोशिश की पर पीयूष ने एक हाथ उसकी आँख पर दबा रखा था और दूसरे हाथों से वह उसकी चूचियाँ रगड़ने लगा.. मर्द के स्पर्श के लिए तड़प रही वैशाली.. स्तनों पर स्पर्श होते ही बेचारी चुप हो गई.. पीयूष ने उसकी आँखों से हाथ हटा लिया.. वैशाली पीयूष की ओर मुड़ी.. उसे देखते ही वैशाली के चेहरे की चाँदनी खिल उठी.. दो मिनट पहले मौसम के साथ देखकर पीयूष को वो गालियां दे रही थी.. पर पीयूष का एक स्पर्श होते ही उसका सारा गुस्सा मोम की तरह पिघल गया..
वैशाली: "नालायक.. कुछ शर्म नाम की चीज है की नही!!! ऐसे खुले में मेरे बॉल दबा रहा है.. अगर तेरी कविता ने देख लिया तो यहाँ माउंट आबू में ही तुझे तलाक दे देगी.. " उसने पीयूष को झाड दिया.. बात भी सही थी.. होटल की गॅलरी में कोई भी देख लेता.. पर गनीमत थी की किसी ने देखा नही था..
पीयूष: "ये बात है!!! तब तो मैं जरूर करूंगा.. " कहते हुए पीयूष ने वैशाली को बाहों में भरते हुए किस कर लिया.. उतना ही नहीं.. वैशाली के टीशर्ट में हाथ डालकर उसके दोनों बेचैन बबलों को जोर से मसल दिए.. निप्पलों पर मर्दाना स्पर्श होते ही वैशाली की चुत ने विद्रोह कर दिया.. वह पीयूष का हाथ पकड़कर अपने कमरे में ले गई और खिड़की का पर्दा बंद करके पीयूष के गले लग गई.. पीयूष की गर्दन पकड़कर अपनी ओर खींचते हुए वह उसके होंठों को चूसती ही रही.. हतप्रभ होकर पीयूष वैशाली के इस आक्रमण का आनंद ले रहा था.. वैशाली ने खुद ही अपना टीशर्ट ऊपर कर लिया और साथ में ब्रा भी.. मक्खन के गोलों जैसी चूचियाँ खुली हो गई.. गोलमटोल मस्त चूचियों को देखते ही पीयूष का लंड ९० डिग्री का कोण बनाते हुए खड़ा हो गया.. उसने झुककर एक स्तन की निप्पल मुंह में भर ली.. ऐसे चूसने लगा जैसे सदियों से भूखा हो.. दूसरे खाली हाथ से वह उस तरफ के स्तन को पकड़कर उसकी निप्पल को मरोड़ता रहा.. कभी वह इस स्तन को चूसता तो कभी उस स्तन को..
पीयूष जब बबले चूस रहा था तब वैशाली.. अनुभवी चुदक्कड़ की तरह पीयूष के पेंट में हाथ डालकर लंड की सख्ती नाप रही थी.. और चेक कर रही थी की क्या वह उसकी चूत में घुसने के लिए तैयार था या नही !!! मौसम बाथरूम में जीजू के स्पर्श को याद करते हुए अपनी क्लिटोरिस को रगड़ रही थी.. वह झड़कर पार्टी में जाने के लिए तैयार होना चाहती थी
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पीयूष को सबक सिखाने के लिए और पिंटू को खुश करने के लिए.. कविता ने जबरदस्त ड्रेस पहन लिया था.. नीले कलर के पतले से कपड़े से बना टॉप और नीचे एकदम छोटी सी टाइट शॉर्ट्स.. वेक्स करवाए हुए गोरे दूध जैसे उसके पैर और जांघें देखकर अच्छे अच्छों का पानी निकल जाएँ.. एक तो वो एकदम स्लिम थी.. रंग गोरा था.. चेहरे एकदम क्यूट था.. और उसके पतले बदन के मुकाबले स्तन थोड़े से बड़े थे.. पिंटू ने गिफ्ट किया हुआ महंगा परफ्यूम छिड़क कर वह महकने लगी.. परफ्यूम की खुशबू से उसे ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे पिंटू उसके आसपास ही था..
अभी एक घंटे की देर थी पार्टी शुरू होने में.. कविता ने नीला टॉप उतार दिया.. और पिंटू का पसंदीदा गुलाबी स्लीवलेस टॉप पहनने के लिए बाहर निकाला.. अभी वह केवल ब्रा और शॉर्ट्स पहने हुए थी.. इसी अवस्था में कविता झुककर पुराने कपड़े बेग में रख रही थी तभी उसके कमरे का दरवाजा खुला.. !!! और राजेश ने अंदर प्रवेश किया.. !!! पिंटू के जाने के बाद दरवाजा बंद करना याद ही नही आया था कविता को.. !!! एक पल के लिए तो कविता को पता नहीं चला की क्या छुपायें.. पर राजेश ने उसकी परेशानी समझते ही "ओह्ह आई एम सॉरी.. मैं पीयूष से मिलने आया था" कहते हुए मुड़ गया और कमरे से बाहर निकल गया.. किसी पराए मर्द के सामने अपने जिस्म की नुमाइश होने से कविता अपसेट हो गई..
उसने वापिस अपने ड्रेसिंग पर ध्यान देने का सोचा.. पिंटू की अपेक्षा पर खरा उतरना चाहती थी वो.. अपना हाथ पीछे ले जाते हुए उसने ब्रा के हुक खोले.. और सोचती रही.. ऐसा क्या पहनूँ जिससे सब के होश उड़ जाएँ?? आज तो सारे बंधन तोड़कर ऐसे तैयार होना है की सब चोंक जाएँ.. ससुराल में तो ढेर सारी पाबंदियाँ रहती है.. पर यहाँ वो खुलकर जीना चाहती थी.. वह आज पिंटू को खुश कर देना चाहती थी.. ज्यादा उत्तेजक कपड़े पहनने पर पीयूष को बुरा लग सकता था.. पर पीयूष के बारे में वे ज्यादा सोचना नही चाहती थी.. जब से आया तब से किसी न किसी के अंदर घुसा ही रहता था वो.. कविता के सामने देखने का वक्त ही कहाँ था उसके पास.. !! कविता सोचने लगी.. मैं वहीं पहनूँगी जो मुझे पसंद आए और खासकर पिंटू को पसंद आयें.. बेचारा कितना खयाल रखता है मेरा.. पीयूष को मेरी कदर ही नही है.. घर की मुर्गी दाल बराबर.. !! उदास हो गई कविता.. पर पिंटू की याद आते ही वह फिर से आईने में अपने नग्न सौन्दर्य को देखकर आहें भरने लगी.. काश मेरी शादी पिंटू से हुई होती!!!
कविता आज पीयूष को सबक सिखाना चाहती थी.. उसने एक क्रान्तिकारी निर्णय लिया.. बिना ब्रा पहने ही उसने पिंटू का पसंदीदा गुलाबी टॉप चढ़ा लिया.. माय गॉड.. बिना ब्रा के टॉप पहनकर वह खुद ही शरमा रही थी.. उसकी इस हरकत पर सबका ध्यान जाने वाला था ये तो तय था.. नही नही कविता.. इस तरह लोगों के सामने नही जा सकते.. कविता वापिस टॉप उतारकर ब्रा पहनने ही वाली थी तब वापिस पीयूष की याद आ गई.. उस कड़वाहट ने उसे बिना ब्रा के ही टॉप पहनने के लिए राजी कर लिया..
पतले कपड़े वाले टॉप से उसके उरोज दबाकर देखे.. पत्थर जैसी सख्त चूचियाँ थी.. कुछ दिनों से उनका कोई उपयोग भी तो नही हुआ था.. !! कविता ने अपने बाल सँवारे.. और बालों की एक लट को कान के पीछे दबा दिया.. कातिल लग रही थी कविता.. बिना ब्रा के उसके स्तन.. ज्यादा बड़े नही.. और छोटे भी नही.. गुलाबी टॉप में बेहद सुंदर लग रहे थे.. कविता ने कमरे के अंदर चलकर देखा.. की कैसा लग रहा है.. अपने स्तनों को थिरकते देख वह खुद ही शरमा गई.. आज तो देखने वालों के होश ही उड़ जाने वाले थे.. पेंट की चैन टूट जाएगी सब की..
कविता तैयार होकर मौसम और फाल्गुनी के कमरे की तरफ जाने लगी..
दूसरी तरफ पीयूष का लंड घुटनों के बल बैठकर चूस रही थी वैशाली.. थोड़ी देर चूसते ही सख्त गन्ने जैसा हो गया पीयूष का लंड..
"मस्त हो गया है पीयूष.. चल डाल दे अंदर.. !!" कहते हुए वैशाली मुड़कर झुक गई.. पीयूष ने उसका स्कर्ट ऊपर किया और पेन्टी को घुटनों तक सरका दिया.. उसके गोरे कूल्हों पर एक थप्पड़ लगाकर वह अपनी उंगलियों से चूत का छेद ढूँढने लगा.. छेद पर सुपाड़ा रखकर उसने एक धक्के में ही पूरा लंड अंदर डाल दिया.. वैशाली के मुंह से आनंद भरी चीखी निकल गई..
"ओह्ह.. मर गई पीयूष.. आह्ह.. जल्दी जल्दी कर.. " पीयूष फूल स्पीड में धक्के लगाने लगा.. वैशाली की कमर को कसकर पकड़कर वो धक्के लगाए जा रहा था.. ए.सी. ऑन था फिर भी दोनों पसीने से तरबतर हो गए.. थोड़ी ही देर में वैशाली चुदकर ठंडी हो गई और पीयूष ने बेज़ीन में अपना वीर्य गिरा दिया.. वैशाली ने तुरंत कपड़े पहने और पीयूष को बाहर धकेला ताकि कोई देख न ले.. अपना काम हो गया अब तू जल्दी से निकल
"पार्टी मे मिलते है.. बाय" पीयूष चला गया..
पीयूष अब मौसम और फाल्गुनी के कमरे में गया.. मौसम नहा रही थी और फाल्गुनी कोई इंग्लिश मूवी देख रही थी.. फाल्गुनी की जांघ पर हल्की सी चपत लगाते हुए उसने पूछा "मौसम कहाँ है ?"
"वो नहा रही है जीजू.. पता नही बहोत देर लगा दी आज उसने.. " तभी फाल्गुनी की नजर पीयूष के लंड वाले हिस्से पर गई "जीजू, आप की पोस्ट ऑफिस खुली हुई है" कहते हुए वह हंसने लगी.. पीयूष को पता नही चला की वो क्या कहना चाहती थी
"क्या पागलों की तरह हंस रही है?" पीयूष ने कहा.. तभी फाल्गुनी ने उंगली से पेंट की तरफ इशारा किया.. हड़बड़ाहट में चैन बंद करना भूल गया था पीयूष.. उसका लंड अब भी थोड़ा सख्त था इसलिए अंदर उभार भी नजर आ रहा था.. पीयूष ने शरमाकर अपनी चैन बंद करने की कोशिश की.. पर लंड सख्त होने की वजह से बंद करने में दिक्कत आ रही थी.. अभी थोड़ी देर पहले ही वैशाली की चूत से बाहर निकला था.. उसका नशा उतरा नही था लंड का.. आधी चैन बंद करके ही पीयूष को संतोष लेना पड़ा.. फाल्गुनी की नजर बार बार उसके उभार पर जा कर अटक जाती थी.. पीयूष का वो उभरा हुआ हिस्सा फाल्गुनी के नादान मन मे अजीब सी गुदगुदी पैदा कर रहा था..
तभी टीवी पर चल रहे मूवी मे हीरो और हीरोइन एक दूसरे को किस करने लगे.. फाल्गुनी शरमा गई और चैनल बदलने के लिए रीमोट ढूँढने लगी.. वैसे उसने इंग्लिश मूवी लगाई ही इसलिए थी ताकि ऐसे सीन देख सके वरना वो आस्था चैनल न लगाती!!! पर किसी पुरुष के सामने ये सीन चल जाने पर वह शर्म से पानी पानी हो गई.. आधे घंटे से मूवी मे कोई सीन नही आया.. और पीयूष की हाजरी मे ही सब शुरू हो गया.. मौसम की बात अलग थी.. वो पीयूष की साली थी.. लेकिन पीयूष के सामने फाल्गुनी अपनी मर्यादा मे ही रहती.. जब मौसम और पीयूष किसी नॉनवेज जोक पर हँसते तब फाल्गुनी शरमाकर चुप ही रहती.. मौसम हमेशा उसे टोकती की वह सब के साथ ज्यादा बात नही करती.. पर पता नही क्यों.. सेक्स को लेकर कोई बात आते ही फाल्गुनी के पसीने छूट जाते.. और वो थरथर कांपने लगती.. सेक्स के प्रति इस अभिगम के बारे मे मौसम ने कई बार फाल्गुनी से पूछा पर उसने कभी कुछ बताया नही.. मौसम को ऐसा लगता था जैसे फाल्गुनी कुछ कहना तो चाहती थी पर कह नही पाती थी
पीयूष बेफिक्र होकर सोफ़े पर बैठकर टीवी देखने लगा.. अभी अभी खतम हुए किसिंग सीन को लेकर फाल्गुनी काफी अपसेट थी.. पर पीयूष को इससे कोई फरक नही पड़ा.. वो तो बस मौसम को देखने आया था.. उस कच्ची कली को नंगी करके उसका सील तोड़ने का मौका मिल जाए तो पूरा जीवन सफल हो जाएँ.. टीवी देखते देखते ये सोच रहा था पीयूष.. अभी मौका था.. आबू के मदमस्त वातावरण मे साली को गरम कर दिया हो तो वापिस घर जाकर कोई न कोई मौका जरूर मिल जाएगा.. ऐसा कुछ करना था यहाँ की मौसम पूरा दिन उसी के नाम की माला जपती रहे.. जो भी करना था यहीं करना था.. एक बार घर चले गए फिर घंटा कुछ होना था.. !!! माउंट आबू में सिर्फ प्रोजेक्ट मौसम की प्राथमिकता रहेगी.. प्रोजेक्ट रेणुका, प्रोजेक्ट वैशाली और प्रोजेक्ट शीला को घर जाकर देख लेंगे..
इन सारी बातों से बेखबर मौसम बाथरूम के अंदर साबुन के झाग को अपने स्तनों पर रगड़ते हुए.. जीजू के साथ आज दोपहर को जो हुआ था.. उसे याद कर रही थी.. मदहोश कर देने वाली किस.. और स्तन मर्दन.. आह्ह.. मौसम ने बेसिन से टूथब्रश उठाया और अपनी चूत पर रगड़ दिया.. आह्ह.. शावर से गिर रहा गरम पानी.. उस गर्माहट की याद दिलाने लगा जो उसने तब महसूस की थी जब पीयूष ने उसके स्तन दबा दिए थे.. आज से पहले कभी भी मौसम इतना उत्तेजित नही हुई थी.. वो अपने मनपसंद हीरो को याद कर अपनी चूत मे उंगली तो पहले भी करती थी.. पर आज प्रत्यक्ष अनुभवों को याद करते हुए वह हस्तमैथुन कर रही थी.. और उसे बड़ा ही अनोखा मज़ा मिल रहा था.. पीयूष ने जिस तरह उसकी निप्पल को मसला था.. ओह्ह.. कितना मज़ा आया था यार.. !!! हाययय.. मौसम का मन कर रहा था की ऐसे ही नंगी होकर वो बाहर निकले और पीयूष से लिपट जाए.. पीयूष को याद करते हुए उसने आधा टूथब्रश अपनी चूत मे डाल दिया.. अब असली लंड को अंदर घुसाने का समय आ चुका था
लंड की याद में आज पहली बार ऑर्गजम मिला था मौसम को.. अद्भुत.. अवर्णनीय सुख का अनुभव हुआ उसे.. सारा जिस्म हल्का हल्का सा महसूस हो रहा था.. जवानी की दहलीज पर खड़ी लड़की तभी खिलती है जब किसी प्रेमी का स्पर्श होता है..
ब्रा के हुक बंद करते हुए.. मौसम अपने जीजू के साथ संसर्ग से खिल उठे अपने स्तनों को संभालकर ब्रा में फिट करते हुए हंस पड़ी.. जैसे किसी महत्वपूर्ण डॉक्यूमेन्ट को लॉकर में रख रही हो उतना संभालकर उसने अपने स्तनों को ब्रा के अंदर बांध लिया.. पेन्टी पहनकर उसने तौलिया छाती पर लपेट लिया और बाहर निकली.. भीगे बाल.. अर्धनग्न जिस्म पर तौलिया लपेटा हुआ जवान जिस्म.. मौसम का रूप किसी एटम-बॉम्ब से कम नही था.. और इस बॉम्ब की झपेट में जो सबसे पहले आया.. वो था पीयूष.. !!
मौसम का यह रूप देखकर पीयूष चोंक उठाया.. मौसम को भी यह कल्पना नही थी की जीजू अभी उसके कमरे में ही उपस्थित होंगे.. वो तो आराम से बाथरूम के बाहर निकली.. पर सामने सोफ़े पर पीयूष को बैठा देखकर शरमा गई.. और बेड पर पड़े अपने कपड़े लेकर तुरंत बाथरूम में चली गई.. जाते हुए पीछे से उसकी गीली पीठ और घुटनों को देखकर पीयूष का लंड उसकी पतलून के अंदर ही भारत-नाट्यम करने लगा..
बाथरूम का दरवाजा बंद करते वक्त मौसम ने पीयूष की तरफ देखा.. दोनों की नजर एक हुई.. और पीयूष उस कातिल नज़रों से घायल हो गया.. इस पूरे तमाशे को फाल्गुनी देख रही थी.. पर उसके चेहरे के हावभाव में कोई बदलाव नही आया.. छेड़छाड़.. रोमांस.. शारीरिक आकर्षण.. यह सारे विषय उसके लिए सिलेबस में फिलहाल कहीं मौजूद ही नही थे..
करीब दस मिनटों के बाद मौसम कपड़े पहनकर बाहर आई.. कमरे में सन्नाटा था.. मौसम का हुस्न इतना कातिल था की ट्यूबलाइट की रोशनी भी उसके सामने फीकी लग रही थी.. जैसे ही मौसम बाहर निकली.. फाल्गुनी अपने कपड़े लेकर अंदर नहाने के लिए चली गई.. पीयूष और मौसम कमरे में अकेले थे.. एकांत मिलते ही पीयूष के अंदर का बंदर उछलकूद करने लगा.. उसने मौसम को आँख मारी.. मौसम शरमा गई.. वो अब आईने मेइन देखकर मेकअप करते हुए बार बार पीयूष को कनखियों से देख रही थी.. पीयूष पीछे से उसके कूल्हें देखकर अपने लंड को बार बार सहला रहा था..
पीयूष से अब ओर रहा नही गया.. इस मौके का फायदा उठाने के इरादे से वह खड़ा होकर मौसम के पास गया और उसे बाहों में भर लिया.. फाल्गुनी बाथरूम में थी इसलिए मौसम ने विरोध नही किया.. पीयूष ने झुककर उसकी गर्दन के पिछले हिस्से को चूम लिया.. अपने जीजू की इस प्रेमभरी हरकत से मौसम को इतना मज़ा आया की उसकी आँखें बंद हो गई..
अपना हाथ पीछे ले जाकर वो पीयूष के बालों में अपनी उँगलियाँ फेरने लगी.. हाथ ऊपर होते ही उसके दोनों स्तन उभरकर बाहर आ गए.. आईने में उन स्तनों का प्रतिबिंब देखकर पीयूष बावरा होकर उनपर टूट पड़ा.. कच्ची कुंवारी छाती पर मर्द का स्पर्श अनुभवित कर मौसम मस्त होकर जैसे स्वर्ग में पहुँच गई.. पीयूष का खड़ा लंड उत्तेजना पूर्वक मौसम की पीठ पर वार कर रहा था.. मौसम को पीयूष का लंड अपनी पीठ पर चुभता हुआ महसूस हो रहा था.. अनजाने में ही वह अपनी पीठ को उनके लंड पर रगड़ने लगी..
पीयूष ने अपना हाथ मौसम के ड्रेस के अंदर डालकर उसकी चूचियों को दबोच लीया.. मौसम ने अपना चेहरा घुमाया और दोनों के होंठ एक हो गए.. कामाग्नि से दोनों के बदन तपने लगे.. एक दूसरे के जिस्म को भोगने की चाह तीव्र होने लगी.. पर मौसम को ये मालूम नही था की इस भूख को जितना तृप्त करो उतना ही बढ़ती जाती है.. !! अपने जिस्म पर पीयूष के स्पर्श से बेकाबू हो रही मौसम को ये भी अंदाजा नही रहा की जिसके साथ वो ये खतरनाक खेल खेल रही है.. वह उसकी बड़ी बहन का सुहाग था.. वाकई वासना इंसान को अंधा बना देती है
"मौसम, आई वॉन्ट टू सक यॉर निप्पल.. !!!" पीयूष ने मौसम के कान में कहा
मौसम इस प्रपोज़ल को सुनकर कामुक हो उठी.. लेकिन औरत कितनी भी उत्तेजित क्यों न हो.. अपने आसपास की परिस्थितियों का पूरा ध्यान रखती है..
"जीजू, फाल्गुनी किसी भी वक्त बाहर आ सकती है.. अभी नही, प्लीज.. अब आप जाइए, वो थोड़ी ही देर में बाहर निकलेगी.. " मौसम ने समझाया
"नही मौसम.. मुझसे रहा नही जाता.. कुछ भी कर.. मुझे तेरा बॉल चूसना है अभी.. प्लीज"
"ओह्ह जीजू.. आप समझते क्यों नही.. अभी ये पॉसिबल नही है.. प्लीज ट्राय टू अन्डर्स्टैन्ड.. !!"
"आई लव यू, मौसम" पीयूष उसके कान में फुसफुसाया और उसके दोनों स्तनों को मसल दिए.. मौसम ने भी अपनी पीठ से पीयूष के लंड को दबा दिया..
पीयूष के मुंह से "आई लव यू" सुनकर मौसम को बहोत अच्छा लगा.. वह अपने जीजू से बार बार यह सुनना चाहती थी.. पर ऐसा करने से उसकी बहन के संसार को बड़ा खतरा था ये अब ज्ञात हुआ मौसम को.. वैसे वो कुछ बोले या न बोले उससे क्या फरक पड़ता था? वो जो कुछ भी कर रही थी वह अपने जीजू के प्रेम का स्वीकार नही था तो और क्या था? मौसम पीयूष की बाहों में समा गई.. जीजू की बाहों में उसे अद्भुत सलामती और प्रेम की संवेदना महसूस होती थी.. उसने पीयूष को चूमा.. पीयूष ने उसकी जीभ चूस ली.. मौसम भी अब बेहद उत्तेजित हो चुकी थी..
मौसम के वी-नेक गले वाले ड्रेस के अंदर हाथ डालकर पीयूष ने उसका एक स्तन बाहर खींचने की कोशिश की.. पर ड्रेस इतना टाइट था की वह उसे बाहर निकाल नही पाया.. लेकिन स्तन का ५० प्रतिशत हिस्सा बाहर निकल गया था.. उस आधे दिख रहे स्तन की गोरी गोलाई को उसे चूमकर ही संतोष लेना पड़ा.. आक्रामक होकर उसने अपने दांत गाड़ते हुए उसके स्तन को काट लिया.. अपने उभार को वापस ब्रा के अंदर डालते हुए मौसम ने देखा की पीयूष के काटने से उसके स्तन पर लाल निशान बन गया था.. मौसम के जीवन का प्रथम लव-बाइट.. !!
तभी बाथरूम का दरवाजा खुलने की आवाज आई.. दोनों एकदम से अलग हो गए.. और पीयूष कमरे से बाहर चला गया
पौने आठ बज चुके थे.. और आठ बजे तो सबको डाइनिंग रूम में इकठ्ठा होना था.. सब से पहले मौसम और फाल्गुनी पहुँच गए.. मौसम के चेहरे पर उत्तेजना का नशा अब भी दिख रहा था.. एक के बाद एक.. सब समय पर डाइनिंग हॉल में आने लगे..कविता और पीयूष भी अलग अलग आए थे.. कविता का ड्रेसिंग देखकर सबकी सांस गले में ही अटक गई..
सबसे पहले रेणुका ने कविता की तारीफ की "Wow..!! Kavita, you are looking absolutely gorgeous..!!कितनी जवान और खूबसूरत लग रही है तू इस ड्रेस में.. कौन कहेगा की तू शादी शुदा है !! अठारह से ऊपर एक साल की नही लग रही तू.. " उसकी कमर पर चिमटी काटते हुए उसने कहा .. अपनी तारीफ सुनकर कविता खुश हो गई
मौसम और फाल्गुनी भी कविता का ड्रेसिंग देखकर चकित रह गए "दीदी, गजब लग रही हो आप इस ड्रेस में.. एकदम कयामत!!" फाल्गुनी ने शरमाते हुए कहा "दीदी आप तो नोरा फतेही से भी ज्यादा हॉट लग रही हो!!" फिर नजदीक जाकर फाल्गुनी ने कविता के कान में कहा "अरे दीदी, आपने ब्रा क्यों नही पहनी?? आप जब चलती हो तो सब उछलता है"
फाल्गुनी की बात सुनकर कविता ने हँसकर उसे प्यार से गाल पर हल्की चपत लगाई और कहा "उछलने दे.. उछलने से क्या होता है.. !! बाहर तो नही निकल रहे है ना.. !!" कहते हुए वह बिंदास पीयूष के पास जाकर खड़ी हो गई.. पीयूष वैशाली के साथ बातों में उलझा हुआ था.. कविता को देखकर वैशाली के होश उड़ गए.. पीयूष ने एक नजर कविता की तरफ देखा.. और उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कविता ने ऐसे कपड़े पहनकर खानदान की इज्जत की माँ चोद दी हो..
गुस्से में पीयूष ने कहा "इससे अच्छा तो तू बिना कपड़ों के ही चली आती.. !!! लोगों को दिखाने का शौक हो तो पूरा ही दिखा दे एक बार में .. !! इतना भी छुपाकर क्यों रखा? मेरी इज्जत को डुबोने बैठी है तू.. !!"
"कोई कपड़ों से अपनी इज्जत की धज्जियां उड़ाता है तो कोई अपने बर्ताव से.. !!" कविता ने बेफिक्री से जवाब दिया..
लंबे डाइनिंग टेबल पर सब बैठने लगे.. कविता के साथ बैठने के बजाए पीयूष, पिंटू के साथ जाकर बैठा.. यह बात राजेश ने नोटिस की.. राजेश भी कविता के पिंक टॉप में से बिना ब्रा की दिख रही गोलाइयों को ताड़ रहा था.. सिर्फ राजेश ही नही.. हॉल में बैठे सभी मर्दों की नजर बार बार कविता पर चली जाती थी.. गुलाबी रंग के स्लीवलेस पतले टॉप के अंदर परफेक्ट साइज़ के स्तनों ने हाहाकार मचा दिया था..
खाना परोसा जाने लगा.. एक के बाद एक नई नई डिश आने लगी.. कविता तीरछी नज़रों से पीयूष का निरीक्षण कर रही थी.. की वो कितनी बार वैशाली की तरफ देखता है..
सब के सामने राजेश ने पीयूष से कहा "पीयूष, तेरे जितना मूर्ख आदमी इस पार्टी में और कोई नही है"
"क्यों? क्या हुआ सर?"
राजेश: "अरे भई, इतनी सुंदर.. मोम की पुतली जैसी पत्नी को छोड़कर तू पिंटू के साथ बैठ गया.. !!! ये तो अच्छा हुआ की कविता के बगल में मौसम बैठी है.. वरना उसके पास बैठने वालों की लाइन लग जाती.. "
कविता गर्व से पीयूष की ओर देख रही थी.. पीयूष नीचे देखने लगा.. मन ही मन वो कविता को.. इस स्थिति के लिए कोस रहा था..
राजेश: "जाओ पीयूष.. अपनी पत्नी के पास जाकर बैठो"
पीयूष: "नहीं.. मैं यहीं ठीक हूँ.. " राजेश की राय को ठुकराते हुए उसने कहा
"कोई बात नही सर.. अगर वो मेरे पास आकर नही बैठता.. तो मैं ही उसके पास चली जाती हूँ" कहते हुए कविता खड़ी हुई.. हाई हील के सैन्डल पहनकर अपने स्तनों को मटकाते हुए वो पिंटू और पीयूष के पास आई और बोली "पिंटू सर.. आप प्लीज जरा बगल वाली कुर्सी में शिफ्ट हो जाएंगे.. ??
पिंटू की तो जैसे लॉटरी ही लग गई.. "स्योर मैडम.. " कहते हुए एक कुर्सी छोड़कर बैठ गया.. और कविता, पीयूष और पिंटू के बीच में बैठ गई.. कविता के मन की मुराद भी पूरी हो गई.. एक तरफ पति था और दूसरी तरफ उसका प्रेमी.. बीच में कविता.. बैठते वक्त उसने पीयूष के पैरों पर जान बूझकर लात मारी और सब सुन सके ऐसी आवाज में कहा "हाई पीयूष.. कैसे हो? "जैसे वह किसी अनजान से बात कर रही हो.. हद तो तब हुई जब कविता ने बाउल से सब से पहले पिंटू की थाली में परोसा और फिर बची कूची सब्जी पीयूष के प्लेट में डाली.. पीयूष की इज्जत का कचरा कर दिया कविता ने.. डाइनिंग टेबल पर बैठे सब को यकीन हो गया की कविता और पीयूष के बीच कुछ अनबन थी..
मौसम को कविता का पीयूष के प्रति ये कठोर बर्ताव बिल्कुल अच्छा नही लगा.. पीयूष के लिए उसे बुरा लग रहा था.. पर वो कुछ कर नही सकती थी..इसलिए उसने अपना ध्यान खाना खाने पर केंद्रित किया.. सिल्क की भारी साड़ी में सजी हुई रेणुका खाना खाते हुए बार बार पीयूष की ओर देख रही थी और सोच रही थी की आखिर कविता ऐसा क्यों कर रही है ?? कविता ने खुद ही उसे अपने और पिंटू के प्रेम प्रकरण के बारे में बताया था.. अपने प्रेमी के संग डिनर कर रही कविता को देखकर रेणुका को भी पीयूष के साथ बैठने का दिल करने लगा था..
काफी देर तक डिनर चलता रहा.. उसके बाद राजेश अपने स्थान से उठा और सबको संबोधित करते हुए कहा
राजेश: "सबका डिनर हो चुका है.. हम सब एक घंटे के लिए रीलैक्स होंगे और फिर ग्रांड पार्टी के लिए दस बजे यहीं मिलेंगे.. आप सभी के रेणुका मैडम की बर्थडे मनाने.. !!" सब ने तालियों से इस बात का स्वागत किया.. धीरे धीरे सब खड़े होकर अपने कमरे की ओर जाने लगे.. मौसम और फाल्गुनी कोने में बैठकर बातें कर रही थी.. रेणुका और वैशाली.. पीयूष की दोनों प्रेमिकाएं आपस में कुछ गुफ्तगू कर रही थी.. पीयूष मौसम के खयालों में खोया हुआ था.. कविता और पिंटू बातें कर रहे थे.. राजेश ने जाते जाते कविता के पिंक टॉप से दिख रही गोलाइयों पर एक कामुक नजर डाली..
संबंधों की जटिलता बड़ी ही संकीर्ण होती है.. माउंट आबू की एक वैभवशाली आलीशान होटल के तीसरे माले पर बने विशाल डाइनिंग हॉल में खड़े पच्चीस लोग अपने दिल और दिमाग से सोच रहे थे.. वैशाली को अपने पति संजय की याद नही आ रही थी और पीयूष कविता को भूल चुका था.. सब को दूसरे की थाली में घी ज्यादा नजर आ रहा था.. कविता पिंटू में अपने जीवन का सुख ढूंढ रही थी.. और रेणुका पीयूष में.. ऐसा क्यों होता है की अपने सुख के लिए इंसान हमेशा दूसरों पर ही निर्भर होता है?? क्या हम अकेले ही सुखी नही हो सकते??.. जवाब है.. नही हो सकते.. हकीकत में इंसान अकेले रहने के लिए बना ही नही है.. उसका सुख और दुख.. दूसरे इंसानों की बदौलत ही होता है.. यही सब से बड़ी मुसीबत है..
अपनी तरफ देख रहे राजेश सर की ओर कविता ने पहली बार ध्यान से देखा.. राजेश की आँखों की हवस को उसने परख लिया.. राजेश रेणुका से बात करते हुए बार बार कविता की छातियों की ओर देख रहा था.. लेकिन कविता को इस बात का जरा भी बुरा नही लग रहा था.. उल्टा वो तो इस बात से खुश हो रही थी
पीयूष मौसम को पटाने और चोदने की तरकीबें सोच रहा था.. पर फाल्गुनी हमेशा मौसम के साथ ही होती थी.. ऐसी सूरत में मौसम से अकेले मिल पाना मुमकिन नही था.. अनजाने में ही फाल्गुनी कबाब में हड्डी बनी हुई थी.. शायद इसीलिए यह अंग्रेजी कहावत बनी होगी Two is a company but three is a crowd...
डेढ़ घंटे पहले पीयूष के साथ शॉर्ट इनिंग्स खेलकर फ्रेश हो चुकी वैशाली अकेले बैठी थी फिर भी उसके चेहरे पर अनोखा नूर था.. चुदाई की तृप्तता की चमक थी.. पीयूष की किस्मत बड़ी ही तगड़ी थी.. उसके पीछे वैशाली, रेणुका और मौसम.. तीन तीन चूतें पड़ी हुई थी.. और कविता पिंटू के पीछे पड़ी हुई थी.. कविता ये सोच रही थी की पीयूष के साथ ऐसा कब तक चलेगा? छोटी सी बात का उसने बतंगड बना दिया..?? क्या कभी समझौता होगा? पिंटू की तरफ देखकर उसने एक भारी सांस ली.. वो चलकर पिंटू के पास आई और बोली "क्यों अकेला खड़ा है? क्या सोच रहा है?"
"अकेला हूँ इसलिए अकेला खड़ा हूँ.. सब कपल में हैं और में सिंगल हूँ.. बिना कंपनी के बोर हो रहा हूँ.. और तुझे तो पता है.. मुझे भीड़भाड़ ज्यादा पसंद नही है.. वैसे इस ड्रेस में तू ग़ज़ब लग रही है कविता.. यार.. ऐसे दिखा दिखाकर क्यों तड़पा रही है!! मेरा हाल उस भक्त जैसा है जो भगवान को चढ़ाएं प्रसाद को सिर्फ देख सकता है.. चख नही सकता.. " पीयूष ने कहा
"तो चख ले ना.. रोक कौन रहा है तुझे.. और ये मंदिर का प्रसाद नही है.. तेरी थाली में परोसे जाने के लिए तैयार भोजन है" कविता ने झुककर अपने स्तनों के बीच की खाई दिखाकर पिंटू को उकसाया की इस खाई में कूदकर अपनी जान दे दें.. "पिंटू, तुझे मेरे स्तन बहोत पसंद है ना.. इसीलिए तो मैंने ऐसे कपड़े पहने है.. और खास तेरा पसंदीदा पिंक टॉप भी इसीलिए पहना आज.. आई लव यू पिंटू.. " पिंटू के कान में फुसफुसाई कविता
"आई लव यू टू कवि.. सच कहा तूने तेरे बबले मुझे बहोत पसंद है.. देखकर ही उन्हे मसलने का मन कर रहा है मुझे.. पिछली बार जब हम मिले थे तब याद है तुझे.. कितने दबाए थे मैंने!!!"
"हाँ यार.. मुझे भी अपनी आखिरी मीटिंग बहोत याद आ रही है.. यार पिंटू.. ऐसी जगह पर हम दोनों अकेले आए तो कितना मज़ा आएगा.. हैं ना.. !!" कविता खुली आँखों से सपना देख रही थी..
प्रेमिओ की दुनिया सपने में ही जन्म लेती है और सपनों में ही बिखर जाती है..
"कविता, हम दोनों नदी के दो किनारे है.. जो साथ साथ हजारों किलोमीटर तक सफर करते है.. सदियों तक साथ रहते है.. पर कभी एक नही हो सकते.. तू तेरे ससुराल में पीयूष के साथ खुश हो तो मैं तुझे देखकर ही खुश हो जाऊंगा.. मैं तो बस दूर बैठे तुझे देखता रहूँगा.. और तेरा ध्यान रखूँगा.. मरते दम तक.. !!" पिंटू भावुक हो गया
"उदास मत हो यार.. मैं शीला भाभी को बोलूँगी तो वो हम दोनों का यहाँ अकेले आने का कुछ न कुछ सेटिंग जरूर कर देगी.. शीला भाभी पर मुझे पूरा भरोसा है.. वो कोई तरकीब लगाकर हमारी ये ख्वाहिश पूरी करेगी.. शीला भाभी कुछ भी कर सकती है.. तुझे याद है न पिंटू.. कितनी चालाकी से उन्होंने उस दिन मूवी देखते वक्त हम दोनों का सेटिंग करवाया था??" कविता ने कहा
"हाँ कविता.. वो भी पीयूष की मौजूदगी में.. " उस यादगार लम्हे को याद करते हुए पिंटू खुश हो गया.. उसका उदास चेहरा खिल उठा..
अपने प्रेमी को खुश देखकर कविता धीमे से बोली "देख पिंटू.. आशा अमर है.. निराश मत हो.. अभी हम आबू में ही है.. तू पीयूष से मिलकर बात कर.. वो कहीं बाहर जाने वाला हो.. तो हम मिल सकते है.. मुझसे तो वो बात करता नही है.. पर मैं भी अपनी तरफ से कोशिश करती हूँ.. "
"लेकिन में पीयूष को ऐसा कैसे पूछूँ की वो कहाँ जाने वाला है और क्या करने वाला है?? उसे शक नही होगा?" पिंटू ने कहा
"देख पिंटू.. तुझे अगर मेरे बॉल दबाने है तो जोखिम उठाना पड़ेगा.. " कविता ने पिंटू के अंदर के मर्द को जगाने की कोशिश की
"ठीक है.. मैं कुछ करता हूँ.. " पिंटू वहाँ से चला गया..
कविता भी चलते चलते राजेश सर और रेणुका मैडम के पास गई..
मौसम से बात कर रहे पीयूष ने कहा "मौसम, देख तो.. कविता कैसे अपनी ब्रेस्ट सब को दिखाती फिर रही है??"
मौसम: "सब को दिखाने के लिए नही जीजू.. आपको दिखाने के लिए दीदी ने ऐसा ड्रेस पहना है.. नजदीक जाकर देखिए तो सही!!"
पीयूष: "मुझे उस में कुछ नही देखना.. मुझे जो देखना है वो तो मैं देख ही रहा हूँ.. " मौसम के उन्नत स्तनों की तरफ देखते हुए पीयूष बोला.. मौसम शरमाकर नीचे देखने लगी..
पीयूष: "जब तू शरमाती है तब और भी सेक्सी लगती है "
फाल्गुनी: "मर्दों को तो हर स्त्री या लड़की सेक्सी ही लगती है.. " फाल्गुनी ने पीयूष की पतंग हाथ में ही काट दी..
पीयूष: "ऐसा नही है फाल्गुनी.. सब का देखने का नजरिया अलग अलग लगता है.. पर हाँ.. वैसे तू भी मुझे बड़ी सेक्सी लगती है" पीयूष ने फाल्गुनी को भी दाने डाले
"जीजू, आपको मैं सेक्सी लगती हूँ या मौसम?" फाल्गुनी ने पूछा
"मुझे तो दोनों सेक्सी लगती हो" पीयूष ने कहा
मौसम: "ज्यादा सेक्सी कौन लगता है?" कठिन सवाल था पीयूष के लिए.. पीयूष उलझ गया
"मुझे तो दोनों सेक्सी लगती हो.. ज्यादा कम का मुझे पता नही है.. आप दोनों ऐसे सवाल करके मुझे कन्फ्यूज़ मत करो.. फाल्गुनी, तू मेरे साथ डेट पर चलेगी?" पीयूष ने सीधे सीधे पूछ लिया..
पीयूष के इस अचानक सवाल से एक पल के लिए तो स्तब्ध रह गई फाल्गुनी.. "आप पागल हो गए हो क्या, जीजू? मैं आपके साथ डेट पर गई तो कविता दीदी जान से मार देगी मुझे.. कितना प्यार करती है वो आपसे.. पता है!!"
फाल्गुनी ने अनजाने में कहे इस वाक्य ने मौसम के अंदर से हिला कर रख दिया.. कांप उठी मौसम.. मन ही मन वो सोच रही थी की ऐसा क्या कारण था जो उसे पीयूष की ओर खींचा जा रहा था?? मौसम के चेहरे का नूर उड़ गया.. अकथ्य पीड़ा से उसका मुख मुरझा गया.. कहीं उसके इस आकर्षण का पता कविता दीदी को चल गया तो क्या होगा.. इस बात की कल्पना करने से भी डर रही थी मौसम.. उसने निश्चय किया.. कुछ भी हो जाए.. अब जीजू से ज्यादा क्लोज नही होना है.. अपनी पसंदीदा व्यक्ति से दूर भागने की कोशिश करनी थी उसे.. पर प्रेम और आकर्षण ऐसी चीज है जो कभी किसी को चैन से जीने ही नही देती
पीयूष: "अरे, मैं तो मज़ाक कर रहा था फाल्गुनी.. चलो मैं चलता हूँ अपने दोस्तों के पास.. बाद में पार्टी में मिलेंगे" कहते हुए पीयूष ने मौसम की पीठ को सहलाया और चल दिया
अब मौसम और फाल्गुनी अकेले थे.. फाल्गुनी मौसम को चिढ़ने लगी
"मौसम, देख न.. दीदी ने आज कैसी ड्रेस पहनी है.. कितनी मस्त लग रही है वो!! मैं तो कहती हूँ तू भी ऐसा ड्रेस ट्राय कर एक बार"
मौसम: "क्या तू भी.. मैं ऐसा ड्रेस पहनूँगी तो सब टूट पड़ेंगे मेरे ऊपर.. रेप हो जाएगा मेरा!!"
फाल्गुनी: "बकवास मत कर.. ऐसे कोई कैसे रेप कर देगा.. !! पर हाँ.. कविता दीदी का ड्रेस कुछ ज्यादा ही एक्सपोज कर रहा है.. शायद जीजू को भी ये बात पसंद नही आई"
मौसम: "हाँ थोड़ा बोल्ड तो जरूर है.. पर दीदी बेचारी घर पर ऐसा ड्रेस पहन नही सकती.. ऐसे मौकों पर ही ट्राय कर सकती है.. लेकिन तेरे बात से मैं सहमत हूँ.. ड्रेस में से कुछ ज्यादा ही नजर आ रहा है.. फाल्गुनी, तूने एक बात नोटिस की? राजेश सर बार बार दीदी की छाती को ही देख रहे थे.. उनकी पत्नी बगल में खड़ी थी फिर भी वह देखते ही जा रहे थे.. उनको शर्म नही आती होगी ऐसा देखने में ?? अपनी पत्नी की मौजूदगी में कोई कैसे किसी ओर को गंदी नजर से देख सकता है!!"
फाल्गुनी: "सही बात है तेरी.. इन सारे मर्दों को बस एक ही चीज में इन्टरेस्ट होता है"
पीयूष अपने कमरे में आया और कपड़े बदलकर वापस ऊपर कान्फ्रन्स रूम में पहुँच गया.. सब लोगों अलग अलग तीन-चार के ग्रुप में खड़े खड़े गप्पे लड़ा रहे थे.. हॉल में शराब, सिगरेट और महंगे परफ्यूम के मिश्रण की गंध फैली हुई थी..
गुलाबी स्लीवलेस टॉप में अपनी तंदूरस्त जवानी को उछालते हुए कविता बातें कीये जा रही थी.. और सब का ध्यान अपनी ओर खींच रही थी.. वो बार बार अलग ग्रुप में जाकर बातें कर रही थी.. अनजाने लोगों से भी हाई-हैलो कर रही थी.. वो जिस ग्रुप की ओर जाती उस ग्रुप के सारे मर्द उसे आते देख चुप हो जाते.. बस उसकी उन्नत छातियों को ताड़ते रहते.. सागर की लहरों की तरह उछल रहे उसके स्तनों की गोलाई, पतले से टॉप में इतनी आसानी से नजर आ रही थी की सब की नजर वहीं चिपकी रहती.. कोन्फ्रन्स हॉल का एसी थोड़ा सा तेज था.. वातावरण में फैली ठंडक के कारण कविता की निप्पल सख्त होकर टॉप के कपड़ों में अपना आकार बना रही थी.. एक दो पुरुष तो कविता को देखते ही अपना लंड ऐडजस्ट करने लगे.. कुछ मर्द टॉइलेट जाने का बहाना बनाकर अपना लंड हिलाकर लौटे..
राजेश सर कोने में किसी के साथ फोन पर बात कर रहे थे.. उन्हें भी जाकर हाई बोलकर आई कविता.. फिर वो चलते चलते रेणुका और वैशाली के पास आकर खड़ी हो गई..
"हाय मैडम, हैप्पी बर्थडे.. ढेर सारी शुभकामनाएं और विशिज.. ईश्वर आपको लंबी उम्र दे"
"ओह शुक्रिया कविता.. वैसे तू आज कमाल लग रही है.. क्या गजब का बोल्ड ड्रेस है तेरा.. राजेश तुझे देखने के बाद आज मेरी हालत खराब कर देगा!!"
सब कुछ जानते हुए भी कविता ने पूछा "अरे ऐसी भी क्या बात है रेणुका?"
रेणुका: "अरे, तेरे इस गरमागरम डिस्प्ले को देखकर राजेश मुझे बोल रहा था की चल रूम में चलते है"
कविता: "हाँ तो दिक्कत क्या है!!! जाकर आइए.. हम सब आपका वेइट करेंगे.. " हँसते हुए उसने कहा
वैशाली: "नही रे नही.. ऐसा थोड़े ही चलता है!! हम यहाँ बाहर खड़े खड़े तड़पे और आप अंदर मजे करो.. मैं नही जाने दूँगी आपको" मज़ाक करते हुए वैशाली ने कहा
रेणुका: "तो तू भी चल मेरे साथ अंदर.. मुझे कोई दिक्कत नही है.. राजेश हम दोनों को एक साथ बिस्तर में संभालने के लिए काफी है.. हा हा हा हा हा.. !!"
वैशाली: "नही रे बाबा.. मैं कबाब में हड्डी बनना नही चाहती.. आप कविता को ले जाइए अगर उसकी इच्छा हो तो.." तभी मौसम ने वैशाली को आवाज दी.. "मैं अभी आती हूँ.. एक्स्क्यूज़ मी" कहते हुए वैशाली मौसम और फाल्गुनी की ओर चल पड़ी
रेणुका ने आँख मारते हुए कविता से कहा "क्यों कविता.. क्या खयाल है? चलना है अंदर मेरे साथ?"
कविता: "ना बाबा ना.. ऑफकोर्स मेरी इच्छा तो है पर वो आपके पति के साथ नही.. मेरी पसंद के पुरुष के साथ"
रेणुका: "तो बोल न.. तेरी पसंद के साथी के साथ मजे करने हो तो मैं अभी कुछ मेनेज कर दूँगी.. कौन पसंद है तुझे बता मुझे.. पर राजेश को छोड़कर"
कविता: "मेरी पसंद तो तुम्हें पता है ही.. दरअसल मैं तुम से वही कहने आई थी.. माउंट आबू के इस रोमेन्टीक माहोल में मैं पिंटू के साथ थोड़ा वक्त बिताने की बहोत इच्छा हो रही है.. पर चांस ही नही मिलता.. !! क्या करू? तुम मेरी कुछ मदद करो ना प्लीज!!"
रेणुका सोचने लगी.. फिर उसने कहा "चिंता मत कर.. मैं कुछ करती हूँ.. मेरे बर्थडे के दिन कोई उदास हो, ऐसा कैसे हो सकता है !!"
कविता: "पर ध्यान रखना.. पीयूष को पता नही लगना चाहिए.. वरना लेने के देने पड़ जाएंगे"
रेणुका: "डॉन्ट वरी.. मैं जब तुझे फोन करू तब तू आ जाना.. " कविता को आश्वासन देते हुए उसने कहा
अपने प्रेमी को अकेले में मिलने को बेकरार कविता के दिल को ठंडक मिली.. "और हाँ.. वैशाली को भी कुछ मत बताना.." वैशाली को अपनी ओर आते देख कविता ने रेणुका से कहा
रेणुका: "ओके बेबी डन.. और कविता.. हमारी ऑफिस में कंप्युटर ऑपरेटर की नौकरी के लिए तेरा नाम तय है.. बोल कब से जॉइन करेगी?" जबरदस्त आत्मविश्वास के साथ रेणुका ने कहा.. उसका कहने का मतलब साफ था.. अगर कविता पिंटू से अकेले मिलना चाहती हो तो उसे रेणुका की बात माननी होगी..
कविता: "मुझे एक बार पीयूष से इस बारे में बात करनी होगी.. बाकी मुझे आप की कंपनी में जॉब करने में कोई आपत्ति नही है"
रेणुका: "वो सब तू मुझ पर छोड़ दे.. पीयूष को मैं मना लूँगी.. " तब तक वैशाली उनके करीब आ चुकी थी और रेणुका का आखिरी वाक्य उसने सुन लिया था.. उस वाक्य का दूसरा अर्थ भी निकलता था जो वैशाली समझ गई.. पर फिलहाल वो कुछ नही बोली.. समय आने पर ही बोलने में विश्वास रखती थी वैशाली..
नौकरी की ऑफर के बारे में गंभीरता से सोच रही थी कविता.. अगर वो हाँ कर दे तो पिंटू के साथ रहने का मौका मिल जाएगा.. वो रोज उसे कम से कम आठ घंटों के लिए देख पाएगी.. मिल पाएगी.. बात कर पाएगी.. और कंपनी का मालिक और उनकी पत्नी के साथ अब घर जैसे संबंध बन चुके थे.. कविता के दिल में.. उसके स्तन के साइज़ के लड्डू फूटने लगे.. समस्या बस एक ही थी.. पीयूष और अपने सास ससुर से नौकरी करने के लिए इजाजत लेनी थी.. अगर वह नही माने तो उसका सपना एक पल में चूर हो जाने वाला था.. कविता सोच रही थी की इस समस्या का समाधान कैसे करे.. !!
जब भी कविता का दिमाग काम करना बंद करे तब उसे शीला भाभी की याद आ जाती थी.. शीला के पास सारी समस्याओं का हल मिल जाता था.. घर जाते ही शीला भाभी को इस के बारे में बताती हूँ.. वो कुछ न कुछ तरीका ढूंढ निकालेगी.. मन में गांठ मार ली कविता ने
सब धीरे धीरे कोन्फ्रन्स रूम में इकठ्ठा होने लगे थे.. मौसम और फाल्गुनी.. दोनों चिड़िया की तरह चहचहा रही थी.. सब का ध्यान बार बार उनकी ओर चला जाता था.. चंचल परवाने जैसी मौसम और शांत गंभीर फाल्गुनी.. दोनों दिखने में बेहद सुंदर और आकर्षक..
"लेडिज एंड जेन्टलमेन.. माउंट आबू की इन हसीन वादियों में मेरी प्रियतमा पत्नी के ३५वे जन्मदिन की पार्टी में.. मैं और रेणुका आप सब का स्वागत करते है.. " माइक पर बोल रहे राजेश की आवाज पूरे हॉल में गूंज उठी.. सब ने तालियों से सराहा.. शराब के नशे में काफी लोग मस्त थे.. मुक्त और मस्त वातावरण था.. और इस वातावरण का असर मौसम और फाल्गुनी पर भी धीरे धीरे होता जा रहा था
रेणुका केक काटने ही वाली थी तब राजेश ने उसे एक मिनट के लिए रोक लिया.. और पीयूष को आवाज लगाई..
"यस सर.. " पीयूष राजेश के करीब आया.. राजेश ने पीयूष के कान में गिफ्ट के बारे में पूछा.. "वो तो मेरे कमरे में है" पीयूष ने कहा
"अरे भई.. तो लेकर आओ जल्दी.. " राजेश ने कहा.. पीयूष अपने कमरे की ओर भागा
तभी रेणुका ने पिंटू को अपने पास बुलाया और उसके कान में कुछ कहा.. पिंटू ने जवाब में "स्योर मैडम" कहा और वो भी हॉल के बाहर चला गया.. अब रेणुका ने कविता को बुलाया.. और सब सुन सके उस तरह कहा "अरे कविता.. मेरा पर्स रूम पर भूल आई हूँ.. जरा लेकर आएगी प्लीज.. टेबल पर ही पड़ा है"
"अभी लेकर आती हूँ" अपने बॉल उछालते हुए कविता रेणुका के कमरे की तरफ दौड़ी
जाते जाते कविता को याद आया की वह कमरे की चाबी लेना तो भूल ही गई थी.. पर तब तक वो कमरे तक पहुँच गई थी.. उसने देखा की कमरा तो पहले से ही खुला हुआ था.. दरवाजा खोलकर उसने प्रवेश किया.. बेग के अंदर कुछ ढूंढ रहे पिंटू की पीठ देखकर वह चोंक उठी.. तभी कविता के मोबाइल की रिंग बजी.. पिंटू ने घबराकर पीछे देखा और आश्चर्य से पूछा "अरे कविता? तुम यहाँ? क्या बात है?"
पिंटू को बोलने से रोकने के लिए कविता ने अपने होंठ पर उंगली रखते हुए इशारा किया और फोन रिसीव किया "हैलो.. !!"
"ओके मैडम" एक ही सेकंड में उसने फोन काट दिया
कविता ने दरवाजा अंदर से लॉक कर दिया और पिंटू को अपनी बाहों में भरकर.. रेणुका-राजेश के बिस्तर पर गिरा दिया
पिंटू घबरा गया "ये क्या कर रही है पगली??" उसने कविता को धक्का देकर अपने आप को उससे दूर किया
"अरे पिंटू मेरी जान.. रेणुका मैडम ने जान बूझकर हम दोनों को यहाँ भेजा है.. अभी उनका ही फोन था.. डरने की कोई बात नही है.. हम एकदम सेफ है यहाँ.. आई लव यू पिंटू" कहते हुए वह पिंटू से लिपट पड़ी..
उसी वक्त.. पूरे माउंट आबू में एक साथ लाइट चली गई.. कहीं किसी ट्रैन्स्फॉर्मर में एक जबरदस्त धमाके की आवाज सब ने सुनी.. अंधेरा होते ही पीयूष का हाथ कविता के पतले टॉप के अंदर घुस गया और वह उसके दसहरी आम का रस निकालने लगा.. कविता के अद्भुत कामुक स्तनों को वो मसलने लगा.. कविता का हाथ सीधा पीयूष के लंड पर पहुँच गया.. पेंट के ऊपर से लंड को मालते हुए उसने अपने लिपस्टिक लगे होंठ पीयूष के होंठों पर रख दिए..
कविता के बिना ब्रा वाले स्तनों को हाथ में पकड़ते ही पिंटू की आह निकल गई.. कविता ने तुरंत अपना टॉप ऊपर कर लिया और पिंटू का चेहरा अपने दोनों स्तनों पर दबा दिया.. दोनों एक दूसरे में ऐसे खो गए.. जैसे धरती पर वो दो आखिरी इंसान हो.. पिंटू से ज्यादा भूख कविता की थी इसलिए वह काफी आक्रामक थी.. पीयूष की अवहेलना से परेशान कविता अपने प्रेमी के आगोश में आते ही उत्तेजित हो गई.. उसका जिस्म किसी मर्द को चाहता था.. क्योंकि पिछले काफी दिनों से पीयूष ने उसे हाथ भी नही लगाया था.. ऊपर से माउंट आबू आने के बाद उसकी इच्छाएं और उछलने लगी थी.. पिछले दो घंटों में.. अनगिनत मर्दों की भूखी नज़रों को अपने स्तन पर पड़ती हुई महसूस कर वह तड़पने लगी थी..
पिंटू भी अपने पहले प्यार को पा कर खुश हो गया था.. कविता के स्तनों की गर्माहट का मज़ा लेते हुए वह उसकी जांघों को सहलाने लगा.. जैसे जैसे पिंटू का हाथ उसकी जांघों पर आगे बढ़ता जा रहा था वैसे वैसे कविता अपनी टांगें चौड़ी करते हुए अपना राजद्वार खोल रही थी..पिंटू के हाथ के स्पर्श से वह सिहरते हुए उसने अपनी आँखें बंद कर ली.. चिकनी जांघों को सहलाते हुए पिंटू को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे संगेमरमर पर हाथ फेर रहा हो.. कविता का सहकार भी ऐसा मिल रहा था की कुछ ही सेकंड में पिंटू का हाथ उसकी चूत तक पहुँच गया..
पता नही.. ऐसा कौनसा जादू होता है स्त्री की योनि में..जिसे देखते ही पुरुष बेकाबु होकर जानवर की तरह टूट पड़ता है.. कविता ने अब पेंट की अंदर हाथ डालकर पिंटू का लंड पकड़ लिया था..
"कितना सख्त हो गया है यार" कविता को उसके लंड की गर्मी अपनी हथेली पर महसूस हो रही थी
"तुझे इस तरह देखने के बाद.. किसी का भी सख्त हो जाए.. क्या लग रही है तू कविता.. आह्ह.. " कविता की छाती को चूम चाटकर मदहोश कर दिया उसे पिंटू ने ..
उत्तेजनावश पिंटू के लंड पर कविता के हाथों की पकड़ और सख्त हो गई.. अपने स्तनों को और सख्ती से दबा दिया पिंटू के मुंह पर..
"अब मुझसे रहा नहीं जाता पिंटू.. कुछ कर ना जल्दी.. "
"ओह्ह कविता.. मेरी जान.. " कहते हुए पिंटू ने अपने पेंट की चैन खोलकर लंड बाहर निकाल लिया.. कविता बेचैन होकर पिंटू के लंड के टोपे को चूसने लगी.. कविता की इस हरकत से पिंटू भी अपना आपा खो बैठा.. कभी वो कविता की नंगी पीठ को सहलाता.. कभी उसके बालों में उँगलियाँ फेरता.. तो कभी उसके स्तन को दबाता
"जल्दी करना होगा कविता.. सब हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे.. तू जल्दी उलटी लेट जा.. हमारी फेवरिट पोजीशन में करेंगे.. " पिंटू ने कहा
"नही यार.. मेरी बिना चाटे मैं तुझे छोड़ने वाली नही हूँ आज.. कितना वक्त हो गया.. आखिरी बार जब मेरे घर के पीछे की अंधेरी गली में मिले थे तब तूने चाटी थी मेरी.. वो रात मुझे बहोत याद आती है.. तेरी जीभ जब अंदर गई थी तब.. आह्ह इतना मज़ा आया था की क्या बताऊ.. प्लीज यार.. आज अपनी जीभ अंदर तक घुसेड़कर चाट दे एक बार"
"जो भी करवाना है जरा जल्दी कर यार" पिंटू ने कहा..
कविता ने तुरंत अपनी छोटी सी शॉर्ट्स और पेन्टी एक साथ उतार फेंकी.. पिंटू कविता की जांघों को चाटने लगा.. वो भी गरम हो चुका था.. कविता ने उसका सर पकड़ा और उसके मुंह को अपनी चिपचिपी बुर पर लगा दिया.. पिंटू की जीभ का अपनी चूत पर स्पर्श प्राप्त होते ही कविता स्वर्ग में पहुँच गई.. पिंटू के कामुक चुंबनों का असर इतनी तीव्रता से हुआ की एक ही पल में उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया.. उसके स्तन सख्त हो गए और निप्पल बंदूक की गोली जैसी टाइट हो गई.. पिंटू जैसे जैसे चाटता गया.. कविता की सिसकियों का वॉल्यूम बढ़ता गया.. अपने पसंदीदा पात्र के साथ संभोग करने से बेहतर मज़ा ओर कोई नही है..
पिंटू की जीभ ने कविता को उसके सारे गम भुला दिए.. कमर को उचक उचक कर वह अपनी चूत को पिंटू के मुंह से घिस रही थी.. कराहते हुए कविता का जिस्म एकदम सख्त और सीधा हो गया.. वह थरथराने लगी.. और एक छोटी सी चीख के साथ पिंटू के मुंह में झड़ गई.. स्खलित होते ही कविता का जिस्म एकदम हल्का हो गया.. दिमाग शांत हो गया.. मन तृप्त हो गया.. अपना काम खतम होते ही उसे वास्तविकता का ज्ञान हुआ..
अब लाइट भी आ चुकी थी
"अब हमे चलना चाहिए पिंटू.. बहोत देर हो गई" कविता ने कहा
"अच्छा?? तो फिर इस सख्त लोडे का क्या करू? ये अब ढीला होने नही वाला.. अब ईसे वापिस पेंट में डालना भी मुमकिन नही है.. क्या करू? तू बता" पिंटू ने थोड़े गुस्से से कहा..
कविता उठकर पिंटू के लंड को तेज गति से हिलाने लग गई.. पिंटू कविता के बॉल को पागलों की तरह दबाने लगा.. पिंटू को बिस्तर पर सुलाते हुए कविता उसके ऊपर चढ़ बैठी.. और अपने हाथ को नीचे ले गई.. पिंटू के कड़े लंड को अपनी चूत के सेंटर पर रखकर उसने दबाया.. पर लंड अंदर गया नही.. कविता ने अपनी हथेली पर थोड़ा सा थूक लेकर नीचे लंड पर लगाया.. और ऊपर वज़न देने लगी..
"उफ्फ़ पिंटू.. तेरा ज्यादा मोटा हो गया है क्या.. !! अंदर जा ही नही रहा.. दर्द हो रहा है मुझे.. ऊईई माँ.. !!" धीरे धीरे कविता की चूत लंड निगलती रही.. अपने प्रेमी को खुश करने के लिए कविता ऊपर नीचे होते हुए धक्के लगाने लगी..
अपना ऑर्गजम हो जाने के बावजूद.. अपने प्रेमी को खुश करने के लिए.. अपनी कामुक अदाओं से वह पिंटू को रिझाने लगी.. कविता की चूत के एकदम टाइट वर्टिकल होंठों की पकड़ इतनी मजबूत थी की पिंटू नीचे लैटे लैटे स्वर्ग का आनंद ले रहा था.. ऊपर नीचे करते हुए लय बनाकर कविता अपने स्तनों को उछाल रही थी.. अपनी चूत की गहराई में अंदर तक उसे लंड की गर्माहट का एहसास हो रहा था.. गति बढ़ाते हुए कविता चाहती थी पिंटू जल्दी से जल्दी झड़ जाए..
अपने स्तनों पर पिंटू की टाइट पकड़ महसूस करते हुए कविता को पता चल गया की पिंटू अब झड़ने के करीब था.. उसने अपनी उछलने की गति दोगुनी कर दी..
"ओह्ह गॉड.. फक मी.. लव यू मेरी जान.. बहोत मज़ा आ रहा है मुझे.. कितनी टाइट है तेरी चूत.. पीयूष डालता भी है या नही अंदर.. ओह्ह ओह!!" कविता की कमर पकड़कर उसे धक्के लगाने में मदद कर रहा था पिंटू
लंड के घर्षण से अभी अभी स्खलित हुई कविता फिर से गरम होने लगी.. अपनी चूत की मांसपेशियों को उसने इतना टाइट कर दिया जैसे पिंटू के लंड का गला घोंट देना चाहती हो.. लंड और चूत की लड़ाई में हम मानते है की आखिर में लंड जीता या चूत जीती.. पर हकीकत में चूत कभी हारती नही.. हार हमेशा लंड की ही होती है.. कभी चूत से बाहर निकले लंड के हाल देखें है!!! कोल्हू से निकले हुए गन्ने जैसी हालत होती है लंड की..
लंड पर दबाव बढ़ते ही पिंटू के लंड ने पिचकारी मार दी.. दोनों प्रेमी एक दूसरे से लिपट गए..
कुछ सेकंडों तक लिपटे रहने के बाद रीलैक्स होकर पिंटू के होंठों को चूमते हुए कविता ने कहा.. "अब मुझे जाना होगा पिंटू.. जाने का मन तो नही है पर क्या करें.. !! काश हम दोनों को साथ में एक रात गुजारने का मौका मिल जाएँ "
"फिलहाल तो ऐसा मौका मिलना मुमकिन नही है.. तू अब कुंवारी नही है.. पीयूष की पत्नी है तू.. चल अब तू जल्दी जा.. मैं थोड़ी देर में आता हूँ वरना किसी को शक हो जाएगा"
"नही.. तू पहले निकल.. मैं यह बेड की चादर और मेरा मेकअप ठीक करके आती हूँ" पिंटू का चेहरा उसने अपने रुमाल से पोंछ कर उसके बाल ठीक कर दिए और उसे एक आखिर किस देकर जाने दिया.. उसके जाने के बाद कविता ने आईने में देखकर अपना मेकअप ठीक किया.. लिपस्टिक फिर से लगाई.. ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी रेणुका की डार्क ब्राउन शेड की लिपस्टिक होंठों पर लगाते हुए उसे पिंटू के सुपाड़े की याद आ गई.. कविता हंस पड़ी.. सोचने लगी.. दुनिया की सर्वश्रेष्ठ लिपस्टिक तो लंड ही है.. उससे होंठ गीले करने में जो मज़ा है वो बेजान लिपस्टिक में कहाँ!!! शायद इसी कारण सारी कंपनियां लिपस्टिक को लंड के आकार की ही बनाते है..
कविता ने फटाफट अपने बाल ठीक कीये.. बेड की चादर की सिलवटें दूर की.. और सब कुछ एक आखिरी बार चेक करते हुए रूम से बाहर निकली। हॉल में पहुंचते ही उसने देखा की सब पार्टी इन्जॉय कर रहे थे.. कविता के उछलते स्तनों की गैरमौजूदगी में सारा वातावरण शांत सा था.. पर जैसे आंधी आते ही सब अस्तव्यस्त हो जाता है.. वैसे ही कविता की पायलों की झंकार सुनते ही सब अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए उसे देखने लगे.. अपने हाथ के ग्लास में पड़ी दारू को भूलकर कविता के जोबन को पीने लगे.. मर्द तो मर्द.. सारी औरतें भी कविता के स्तन युग्म को देखती ही रह गई.. सब कविता को देख रहे थे.. एक पीयूष को छोड़कर.. पीयूष नाम का भँवरा.. मौसम नाम के ताजे खिले फूल का रस चूसने के लिए यहाँ वहाँ मंडरा रहा था..
रेणुका ने केक काटकर सेलीब्रेशन की शुरुआत की.. सब ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ रेणुका को विश किया.. रेणुका ने राजेश और बाद में सब को केक का छोटा छोटा पीस अपने हाथों से खिलाया.. जब वो केक का टुकड़ा पीयूष को खिलाने गई तब दोनों की आँखें एक हुई.. उस दिन रेणुका के घर जब पीयूष पैसे लेने गया था तब दोनों के बीच जो हुआ उसकी यादें ताज़ा हो गई..
रेणुका के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान खिल उठी.. उसका पल्लू हल्का सा सरक गया और तंग ब्लाउस में कैद उसका रूप.. पीयूष को दिखने लगा.. रेणुका ने तुरंत ही अपना पल्लू ठीक कर लिया.. और पीयूष के मुंह में केक का टुकड़ा डालते हुए.. बिल्कुल धीरे से उसके कानों के पास बोली "हमारा सेलीब्रेशन बाकी रहेगा.. तू मेरे घर आना फिर उसे पूरा करेंगे" कहते हुए वह चली गई.. रेणुका के कूल्हों को देखकर एक पल के लिए पीयूष मौसम को भी भूल गया
दूर कोने में खड़ी वैशाली यह सारा तमाशा देख रही थी.. पीयूष के साथ कुछ घंटों पहले हुए झटपट सेक्स का नशा अब उतर गया था और वैशाली नए सिरे से उत्तेजित हो गई थी.. अब वो पीयूष के साथ.. एकदम आराम से.. पूरा वक्त लेकर भरपूर चुदाई करने का प्रोग्राम मन ही मन बनाने लगी.. वह सोच रही थी की तसल्ली के साथ चुदवाने के लिए कम से कम डेढ़ घंटे का समय चाहिए.. पर उतनी देर तक अगर वो और पीयूष गायब रहें तो कविता को पक्का शक हो जाएगा.. क्या किया जाए !!! पीयूष के आसपास इतनी गोपियाँ मंडरा रही है की डेढ़ घंटा तो क्या.. डेढ़ मिनट के लिए भी उससे अकेले मिल पाना मुश्किल था..
पीयूष के लंड को याद करते ही वैशाली की चूत में सुरसुरी होने लगी.. इतना मज़ा तो उसे हिम्मत या संजय के साथ भी कभी नही आया था.. आखिर ऐसी कौन सी बात थी पीयूष में.. जो उससे चुदवाने में इतना मज़ा आता था? क्या वो चूत चाटता था इसलिए?? पर वो तो संजय भी चाटता था.. संजय तो एक घंटे तक उसकी चूत चाटता ही रहता था.. पर फिर भी उसके साथ वो मज़ा नही आता था जो पीयूष के संग आता था.. ओह पीयूष.. तेरे बिना जीना अब खाली खाली सा लगता है.. संजय के बर्ताव से जो खलिश उसके दिल में उठ खड़ी हुई थी.. उसे सिर्फ पीयूष ही भर सकता है
संजय.. क्या कर रहा होगा संजय अभी?? एक सेकंड के लिए वैशाली को संजय की याद आ गई.. और क्या कर रहा होगा वो? पक्का किसी रांड को गेस्टहाउस में ले जाकर अपना लंड चुसवा रहा होगा.. और क्या !! संजय की याद आते ही वैशाली का मुंह कड़वा हो गया.. जिंदगी की माँ चोद दी थी संजय ने.. ना ही वो मेरे जज़्बातों को समझ पाया और ना ही मुझे.. एक पत्नी की हमेशा यह मनोकामना होती है की उसका पति उसे समझे.. !! संजय तो जब देखो तब चूत, चुदाई और सेक्स.. बस इन्ही विचारों में डूबा रहता था.. ढेले भर की कमाई नही.. बस सारा दिन पड़े रहो और मौका मिलते ही लंड घुसा दो.. पर जो भी कहो.. संजय चुदाई जबरदस्त करता था.. एक ही बार में शरीर के अंजर-पंजर ढीले कर देता था.. वैशाली की सोच का सिलसिला यूं ही चलता रहा
होटल के मेनेजर ने राजेश से आकर ये कहा की पावर तो अभी भी ऑफ था.. इन्वर्टर से होटल में कनेक्शन दिया गया है.. अगर अगले ४५ मिनट तक बिजली नही आई तो इन्वर्टर भी बंद हो जाएगा.. इसलिए जितनी जल्दी हो सके पार्टी को निपटा लिया जाएँ ताकि किसी को अंधेरे के कारण दिक्कत ना हो..
राजेश ने सब के सामने अनाउन्स किया "हमारी पार्टी चालू रहेगी.. अगर इन्वर्टर की बेटरी डाउन हो जाए तो हम अंधेरे में पार्टी जारी रखेंगे.. सब से विनती है की अंधेरे का गलत उपयोग न करें.. "हँसते हुए उसने कहा "और जिन पर सबकी निगाहें चिपकी हुई है.. वह अपना ध्यान जरूर रखें" कविता के स्तन और मौसम के गालों के डिम्पल की ओर देखते हुए राजेश ने कहा..
सब ने हँसते हँसते तालियों से इस घोषणा का स्वागत किया.. कविता और मौसम शरमा गए.. वैशाली और फाल्गुनी साथ खड़े थे.. वैशाली के हातों में ज्यूस का खाली ग्लास था.. वहाँ से गुजर रहे राजेश ने ये देखा और बोला "मैडम, क्या बात है ?? खाली ग्लास पकड़े पार्टी इन्जॉय कर रही हो? सच सच बताना.. आपके पति को मिस कर रही हो ना.. ??"
वैसे वैशाली संजय को ही याद कर रही थी.. पर उसे मिस करना नही कहा जा सकता.. संजय के प्रति उसके मन में कितनी कड़वाहट थी ये राजेश को बताने का कोई मतलब नही था.. ऐसा समझकर वैशाली ने अपने चेहरे पर नकली मुस्कान धारण कर ली.. और कहा "जी सर.. यहाँ ज्यादातर कपल्स है.. उन्हे देखने के बाद.. जाहीर सी बात है"
राजेश: "ऑफ कोर्स.. ये तो जाहीर सी बात है.. अब आप एक काम कीजिए.. उनके हिस्से का ज्यूस आप पी लीजिए.. वेटर.. मैडम को एक ग्लास दो, प्लीज"
वैशाली: "अरे नही नही सर.. मैं दो ग्लास पहले ही पी चुकी हूँ.. "
राजेश: "अरे.. ये शराब थोड़े ही है.. सिर्फ ज्यूस है.. एक ओर ग्लास तो आराम से पी सकती है आप.. वैसे ज्यूस पीकर कोई कैसे इन्जॉय कर सकता है मेरी तो समझ में नही आ रहा"
वैशाली: "मैं शराब नही पीती सर.. "
राजेश: "और बीयर??"
वैशाली: "कभी कभी.. पर आज मन नही है"
राजेश: "इतनी अच्छी पार्टी चल रही है.. तो आपका मन क्यों नही है?"
वैशाली: "बात वो नही है.. पर बिना कंपनी पीने में मज़ा नही आता मुझे "
राजेश: "हम्म.. तो ये बात है.. क्या आप मेरे साथ बियर पीना चाहोगी? वैसे एक बात बता दूँ.. मैंने आज से पहले कभी बियर नही पी है.. पर आज आप के साथ शुरुआत करने का मन कर रहा है"
वैसे भी वैशाली अकेले अकेले बोर हो रही थी.. क्या पता.. राजेश के साथ बातें कर के थोड़ा अच्छा लगे.. !! राजेश भी वैशाली के उभरे हुए स्तनों को देख रहा था.. पूरी तरह से ढंके हुए स्तन थे.. पर उभार और आकार को वस्त्रों की परतें कहाँ छुपा सकती है!! इतर को ढँककर रखो फिर भी उसकी खुशबू तो आ ही जाती है.. स्त्रीओं के अंग ढंके हुए हो या खुले.. पुरुषों को दोनों ही स्थिति में देखने में मज़ा तो आता ही है.. बस सुंदर साथ होना चाहिए और विचारों में तालमेल होना चाहिए.. फिर ढंके हुए वस्त्रों को उतरने में कहाँ देर लगती है.. !! सिर्फ किसी के पहल करने के ही देर होती है..
वैशाली सोच में पड़ गई.. क्या करू? हाँ कहूँ या मना कर दु? वैसे मुझे पीयूष की कंपनी चाहिए पर वो तो अभी मुमकिन नही है.. वैसे भी अकेले अकेले खड़े रहने का क्या मतलब?? वैशाली को गहरी सोच में डूबा देख.. राजेश इंतज़ार करता रहा.. उसे यकीन था की वैशाली मना नही करेगी
वैशाली ने बीच का रास्ता निकाला.. "सर, क्यों न हम रेणुका जी को भी हमारे साथ शामिल कर ले?"
राजेश: "हाँ जरूर कर सकते है.. पर फिर आपको मज़ा नही आएगा"
राजेश का कहने का मतलब समझकर शरमा गई वैशाली.. उनके कहने के दो मतलब निकलते थे.. कौन सा मतलब निकालना वो वैशाली पर निर्भर करता था..
वैशाली: "वैसे आप कभी शराब पीते नही है.. और यहाँ मेरे साथ पीते हुए देखकर कहीं रेणुका जी कुछ उल्टा-सीधा न सोच लें.. "
राजेश: "उसकी चिंता आप छोड़ दीजिए.. उसके पास अभी भी कुछ भी सोचने का समय नही है.. देखो ना.. कितने सारे लोगों से घिरी हुई है वो!! मुझे तो डाउट है की रात को भी मुझ से मिल पाएगी या नही.. हा हा हा हा.. अब दो ग्लास मँगवा लूँ??"
रोमांचित होकर वैशाली ने हाँ कहते हुए सिर हिलाया.. जैसे बिना पिए ही उसे नशा सा हो रहा था.. वैशाली और राजेश बातें करने में मशरूफ़ थे तभी रेणुका खुद चलकर उनके पास आकर खड़ी हो गई.. और बोली.. "वैशाली डिअर.. तू बियर पीती है ये मुझे कविता से जानने को मिला.. चलो बढ़िया है.. "
वैशाली ने शरमाते हुए कहा " आप कंपनी दो तो जरूर पियूँगी.. आप को पता नही है.. बिना कंपनी ईसे पीओ तो दूसरे दिन हेंगओवर होता है"
रेणुका: "अच्छा ऐसा है? तब तो राजेश ही तुम्हें कंपनी देगा.. मेरा जन्मदिन है आज इसलिए होश में रहना जरूरी है.. लेकिन वादा करती हूँ.. नेक्स्ट टाइम जरूर कंपनी दूँगी.. वैसे मुझे आश्चर्य इस बात का हो रहा है की राजेश पीने के लिए मान कैसे गया? तुझे तो इसकी गंध पसंद नही थी.. खैर जो भी हो.. आप दोनों इन्जॉय करो.. " रेणुका ने जाते जाते राजेश का नाक खींचा.. जवाब में राजेश ने रेणुका को अपनी ओर खींच लिया.. राजेश की छाती से रेणुका के स्तन दब गए.. देखकर वैशाली की आह निकल गई..
दोनों को अकेला छोड़कर रेणुका दूसरे लोगों से मिलने चली गई..
वैशाली को राजेश का सीधा स्वभाव पसंद आ गया... घुमा-फिराकर बात करने वालों में से नही था वो.. इतना अमीर होने के बावजूद जरा सा भी घमंड नही था.. उसका पति संजय.. जेब में ५०० का नोट हो तो भी ऐसे घूमता था जैसे कोई सुल्तान हो..
इस तरफ कविता और पीयूष अब भी एक दूसरे की तरफ देख नही रहे थे.. ऐसे बर्ताव कर रहे थे जैसे एक दूसरे का अस्तित्व ही न हो.. कविता भी बेफिक्र हो कर पीयूष को इग्नोर कर रही थी.. बाहर से खुश दिख रही कविता अंदर ही अंदर घूंट रही थी.. सिर्फ पिंटू ही था जो कविता को ठीक से समझता था.. आखिर प्रेमी था वो कविता का.. और एक सच्चा प्रेमी अपने साथी के मन की हालत बिना बताए ही जान जाता है
राजेश से बातें करते हुए वैशाली धीरे धीरे खुलती जा रही थी
राजेश: "आपके पति क्या करते है? जॉब या बिजनेस?"
वैशाली थोड़ी देर सोचती रही की क्या जवाब दे.. फिर उसने असलियत बता ही दी..
वैशाली: "वो कुछ काम नही करते.. बल्कि ऐसा कह सकते है की वो किसी काम के है ही नही.. पूरा दिन भटकते रहते है.. मुझ में या मेरे जीवन में उन्हे कोई इन्टरेस्ट ही नही है.. हमारा वैवाहिक जीवन एक दुखद वास्तविकता बनकर रह गया है.. इन शॉर्ट, मैं अपनी जिंदगी से.. और अपने पति से बिल्कुल खुश नही हूँ.. " एक ही सांस में अपने जीवन का दुखड़ा सुनाते हुए वैशाली ने ग्लास खतम कर दिया और बोली "एक और ग्लास मँगवा लीजिए सर.. "
वैशाली की आँखों से बहते हुए आंसुओं को देखकर राजेश घबरा गया.. वो सोचने लगा की यह सवाल नही पूछा होता तो अच्छा होता.. !!
राजेश: "अरे वैशाली.. आप तो सीरीअस हो गई.. मुझे लगता है की यह पूछकर मैंने आपको दुखी कर दिया.. आई एम सॉरी.. अब यह मेरी जिम्मेदारी है की मैं आपको खुश करूँ.. क्योंकि आपको दुखी भी मैंने किया है.. " राजेश ने दो ओर ग्लास मँगवाए और एक ग्लास वैशाली को दिया.. दोनों अब पास पड़े एक टेबल और कुर्सी पर बैठ गए.. वेटर ने तले हुए काजू का एक बाउल उनके बीच रख दिया.. दोनों पीते गए और बातें करते गए.. खास कर वैशाली ने ही अपनी बातें बताई.. राजेश बिल्कुल चुपचाप सुनते रहे.. वैशाली को आज तक अपनी बातें इतने इत्मीनान से सुनने वाला कोई नही मिला था..
किसी के कहने पर मौसम ने एक सुरीला गाना छेड़ दिया.. पूरे हॉल में गजब का माहोल छा गया.. शराब, सिगरेट, सौन्दर्य, सेक्स और संगीत का अनोखा मिश्रण जम चुका था.. सब मुग्ध होकर मौसम की ओर देख रहे थे.. आँखें बंद कर गाती हुई मौसम संगीतमय हो चुकी थी.. उसका ध्यान गाने के आराह-अवरोह पर था..
"अजीब दास्तान है ये.. कहाँ शुरू कहाँ खतम.. ये मंज़िलें है कौन सी.. न वोह समझ सकें न हम.. "
गाना सुनने की आड़ में पीयूष मौसम की छातियाँ ताड़ रहा था.. गायकी कितनी मुश्किल चीज है.. बिना इस बात को समझे.. पीयूष बस मौसम के उभारों को और अंगों को नापने में मशरूफ़ था.. मौसम के गाने के बोल सुनते सुनते कविता पिंटू की तरफ देख रही थी.. और दोनों एक दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुरा रहे थे..
पीयूष चलते चलते वैशाली और राजेश सर के पास आया.. अपना सिगरेट का पैकेट खोलकर दोनों को सामने रखा और बोला "बस इसी की कमी है सर.. लीजिए"
राजेश पीयूष की इस पेशकश से थोड़ा सा गुस्सा हो गया.. पीयूष के आते ही वैशाली चुप हो गई
राजेश: "क्या तुझे ये पता नही की आई डॉन्ट स्मोक??"
पीयूष: "सर, वैसे तो आप पीते भी नही हो.. लेकिन आपके हाथ में आज ग्लास भी है.. तो सोचा ये भी ट्राय कर लिया जाएँ.. जो भी है बस आज ही है.. कल किसने देखा है सर.. !!"
राजेश और पीयूष के आश्चर्य के बीच वैशाली ने पैकेट से दो सिगरेट खींच ली.. और उसमें से एक राजेश को देते हुए बोली.. "पी लीजिए सर.. वरना पीयूष बुरा मान जाएगा.. और पीयूष.. बदले में तुझे हमारे साथ बैठकर बियर पीनी पड़ेगी"
"बियर क्या.. तुम कहो तो मैं जहर पीने के लिए भी राजी हूँ.. " हँसते हँसते पीयूष ने पास पड़ी एक कुर्सी खींच ली और इन दोनों के साथ बैठ गया
तीनों बियर और सिगरेट पीने लगे.. तभी मौसम का गाना पूरा हुआ.. वैशाली खड़ी होकर मौसम के पास गई
वैशाली: "अरे वाह.. सुपर्ब.. मेरी एक फरमाइश है.. प्लीज ईसे गा दो.. !!" मौसम और वैशाली के बीच मीठी नोक-झोंक चल रही थी जो राजेश और पीयूष को सुनाई नही दे रही थी.. थोड़ी ही देर में वैशाली वापस लौटी और बोली "अब मौसम मेरी पसंद का गीत पेश करेगी"
मौसम के सुरीले कंठ ने एक और नगमा छेड़ दिया
"जाने क्यों लोग मोहब्बत.. किया करते है.. !! दिल के बदले दर्द-ए-दिल.. लिया करते है"
इतना सुरीला गा रही थी मौसम की सब उसकी आवाज में खो गए.. गीत के हर अंतरे को सुनते हुए वैशाली सिगरेट के कश पर कश लगा रही थी.. जैसे बाहर निकलते धुएं के साथ साथ अपने गम को भी धुआँ कर रही हो..
कविता की फरमाइश पर मौसम ने तीसरा गीत गया
"छोड़ दे.. सारी दुनिया किसी के लिए.. ये मुनासिब नही आदमी के लिए.. प्यार से भी जरूरी कई काम है.. प्यार सब कुछ नही ज़िंदगी के लिए"
यह नगमा पूरा होने तक वैशाली की आँखों से आँसू टपकने लगे.. रो रही वैशाली को कैसे शांत किया जाए ये सोचते हुए एक दूसरे की ओर देख रहे थे पीयूष और राजेश.. आखिर कविता की उन पर नजर पड़ते वो उनके पास आई.. वैशाली की पीठ को सहलाते हुए उसे कहने लगी "शांत हो जा वैशाली.. प्लीज" वैशाली कविता से लिपटकर फुट-फुटकर रोने लगी.. काफी देर तक ऐसे ही रोते रहने के बाद वह चुप हो गई.. रोने से उसका दिल भी हल्का हो गया.. मौसम के गीत के बोल ने वैशाली को रुला दिया था..
वैशाली: "कविता, तू इन्जॉय कर.. अब मैं ठीक हूँ.. पीयूष.. तू भी कविता को कंपनी दे.. कब से वो अकेले घूम रही है.. " वैशाली के कहने पर पीयूष को न चाहते हुए भी कविता के साथ जाना पड़ा..
वैशाली और राजेश फिर से अकेले पड़ गए.. वैशाली के दुखी दिल को डाईवर्ट करने के लिए राजेश अन्य विषयों पर बात करने लगे.. राजेश ने अपने बिजनेस के बारे में.. रेणुका की बारे में.. कई बातें की.. वैशाली अब धीरे धीरे मूड में आने लगी थी.. जैसे जैसे दोनों बातें करते गए.. वैसे वैसे ही उन दोनों के बीच की शर्म और संकोच कम हो रहे थे.. राजेश की बातों में एक अपनापन था.. जो वैशाली को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था.. बियर के सिप लेते और सिगरेट के कश लगाते हुए वह दोनों कई अलग अलग विषयों पर बातें कर रहे थे
तभी मेनेजर ने आकर ये घोषणा की.. पावर आ चुका था.. अब वो लोग जब तक चाहें पार्टी कर सकते थे..
राजेश और वैशाली के ग्लास खतम होते ही.. बिना राजेश से पूछे.. वैशाली ने और दो ग्लास मँगवा लिए.. पहली बार पी रहे राजेश का दिमाग धीरे धीरे नशे की असर में आने लगा था.. राजेश ने वैशाली के करीब आकर पूछा
राजेश: "एक बात पूछूँ वैशाली.. अगर तुम बुरा न मानो तो.. शराब और सिगरेट पीती स्त्री बड़ी ही सुंदर लगती है"
वैशाली: "उसमें कोई बड़ी बात नही है.. आप तो विदेश घूमते रहते है.. वहाँ पर तो ये काफी आम बात है"
राजेश: "ऑफ कोर्स.. पर उन फिरंगी औरतों को ऐसा करता देख कुछ खास महसूस नही होता.. पर पता नही क्यों.. भारतीय स्त्री के हाथों में शराब और सिगरेट देखकर एक अलग ही कीक मिलती है.. "
वैशाली के सर पर भी शराब का सुरूर छा रहा था.. उसकी आवाज भी अब लहराने लगी थी.. बियर का ग्लास आते ही वैशाली ने एक बड़ा घूंट भर लिया.. और नई सिगरेट जलाई.. दोनों पर अब सोमरस का प्रभाव हो रहा था
वैशाली: "सर, आपने तो जीवन में पहली बार शराब पी है.. कैसा रहा ये पहला अनुभव?"
राजेश: "शराब का नशा तो कुछ खास नही है.. हाँ.. तेरी कंपनी का नशा जबरदस्त हो रहा है" नशे में राजेश "आप" से "तू" पर कब आ गया ये पता ही नही चला !!!
वैशाली शरमाते हुए बोली "मैंने कभी सोचा भी नही था की कभी किसी पराए मर्द के साथ बैठकर शराब पीऊँगी.. आज तक मैंने मेरे पति के अलावा किसी के साथ शराब नही पी है.. !!"
राजेश ने हँसते हुए कहा "मैंने तो किसी के भी साथ आज तक नही पी है.. शायद ये हमारे दोनों के बीच एक खास संबंध की शुरुआत हो सकती है"
वैशाली: "मतलब? मैं समझी नही!!!"
राजेश: "वैशाली.. तुम वयस्क हो.. और अभी अभी तुमने बताया की तुम्हारे पति के साथ तुम्हारी ट्यूनिंग कुछ खास नही है.. तुम्हारा पति तुम्हें जो नही दे पा रहा है.. वो देने का मौका मुझे दे सकती हो??"
वैशाली: "सर, मुझे लगता है आपको शराब चढ़ गई है.. " नशे में होने के बावजूद वैशाली सतर्क हो गई..
वैशाली का हाथ पकड़कर राजेश ने कहा "हाँ, मुझे चढ़ गई है वैशाली.. यहाँ सब इन्जॉय कर रहे है.. तो फिर हम भी क्यों इन्जॉय न करें??"
वैशाली: "आप जरूर इन्जॉय कर सकते है.. पर वो रेणुका जी के साथ.. मेरे साथ नही.. ओके??"
राजेश के स्पर्श से वैशाली के पूरे जिस्म में झनझनाहट होने लगी थी.. वैशाली जवान थी.. खूबसूरत थी.. सेक्सी थी.. और माउंट आबू के मदहोश वातावरण में शराब का नशा अपना असर दिखाएं.. फिर कोई कैसे अपने आप को कंट्रोल करेगा!!!
राजेश का हाथ अपने हाथ पर से हटा नही पाई वैशाली.. वैशाली ने सिगरेट जलाने के लिए अपना हाथ खींच लिया तब राजेश ने कहा "वैशाली, जब हम एक ही ब्रांड की सिगरेट पी रहे हो.. तो फिर दो अलग अलग जलाने की क्या जरूरत है? एक सिगरेट से ही पीते है ना.. !!"
वैशाली: "वैसे तो हम बियर भी एक ही ब्रांड की पी रहे है" हँसते हुए उसने कहा
राजेश: "अरे हाँ.. फिर दूसरे ग्लास की जरूरत ही नही है" कहते हुए उसने अपने हाथ का ग्लास छोड़ दिया.. ग्लास जमीन पर जा टकराया और चूर चूर हो गया.. सब की नजर उन दोनों की ओर गई.. उस दौरान रेणुका पीयूष की ओर देखकर मुस्कुरा रही थी.. कविता ये देखकर खुश थी की आखिर वैशाली पीयूष को छोड़ किसी और मर्द से उलझ चुकी थी.. हाँ पीयूष ये देखकर थोड़ा दुखी जरूर था.. पर उसका ज्यादा ध्यान मौसम की ओर था.. एक बार वो हाथ लग जाए फिर वैशाली की क्या जरूरत.. !!!
शराब और राजेश के स्पर्श का ऐसा असर हो रहा था वैशाली पर.. की वो खुद तय नही कर पा रही थी की उसके शरीर के अंदर ये अजीब सी सुरसुरी क्यों हो रही थी.. !! आज तक जीतने मर्दों के संपर्क में वह आई थी वो सामान्य लोग थे.. पहली बार उसे किसी अमीर और सफल बीजनेसमेन से संपर्क करने का मौका मिला था.. वैशाली सोचने लगी "काश संजय भी ऐसा होता" वैसे उसे बड़ी गाड़ी या बंगले की चाह नही थी.. वह तो सिर्फ इतना चाहती थी की संजय सीधी राह पर चलें.. और दोनों खुशी खुशी अपनी ज़िंदगी व्यतीत करें.. पर संजय के लक्षण देखते हुए यह मुमकिन नही लग रहा था..
वैशाली: "आप से एक बात पूछूँ सर?"
राजेश: "अरे वैशाली.. इतनी देर तक साथ बैठने के बाद तू अभी भी मुझे पराया मान रही है?? मैंने तो तुझे अपना समझकर अभी ओफर भी कर दी.. लेकिन तूने ध्यान नही दिया.. हा हा हा हा.. कोई बात नही.. पूछ जो भी पूछना हो"
वैशाली: "मेरा पति संजय जीतने भी बिजनेस करता है उन सब में निष्फल ही रहता है.. बिजनेस की बात छोडो.. किसी नौकरी में भी वो दो महीनों से ज्यादा नही टिकता.. और जब देखों तब वह अपनी निष्फलताओं के लिए दूसरों की ही जिम्मेदार ठहराता है.. ऐसा क्यों? क्या आप मेरी इसमें कोई मदद कर सकते है?"
राजेश के अंदर का बिजनेसमेन सोचने लगा " ऐसा है वैशाली.. तेरी बातों से मुझे ये लगता है की तेरा पति गलत संगत में पड़ गया है.. उसे लाइन पर लाने के लिए सब से पहले उसे उसके नालायक दोस्तों से अलग करना जरूरी है.. उसके बाद ही कुछ सोच सकते है.. अगर तुम चाहो तो मैं उसे अपनी कंपनी में ले सकता हूँ.. पर फिर उसे मेरे स्ट्रिक्ट स्वभाव को झेलना होगा.. मैं काम में कोताही जरा भी बर्दाश्त नही करता हूँ.. और हाँ.. उसके लिए तुम दोनों को कलकता छोड़कर यहाँ शिफ्ट भी होना पड़ेगा.. अगर तुम कलकत्ता रहोगी और वो यहाँ अकेला नौकरी करेगा तो फिर से अपने उलटे धंधे शुरू कर देगा "
राजेश सर की बातें बड़ी ही ध्यान से सुन रही थी वैशाली.. अपनी ज़िंदगी की गाड़ी को फिर से पटरी पर लाने के लिए कुछ करना जरूरी था.. राजेश सर जैसे अच्छे व्यक्ति की संगत में अगर संजय सुधार जाएँ तो पूरा जीवन सुखमय हो जाएगा.. ऐसा सोच रही वैशाली के स्तनों को देखते हुए राजेश मन ही मन उन्हे दबाने की सोच रहा था.. वैसे राजेश हर औरत को ऐसी नजर से देखने वालों में से नही था.. पर वो काफी खुले विचारों वाला था.. बार बार विदेश जाते हुए लोगों को कुछ कुछ बातों के लिए खुली सोच रखना बेहद जरूरी हो जाता है..
राजेश की भूखी नजराओं को अपनी छाती पर महसूस किया वैशाली ने.. अब कुदरत ने भरभरकर सौन्दर्य दिया है तो लोग देखेंगे ही ना!!! और उसने कौन सा अपने स्तनों को खुला रखा था!! कपड़ों से ढंके हुए तो थे उसके स्तन.. अब इससे ज्यादा उन्हे कैसे छुपाती.. !! जवान लड़कियों को शुरू शुरू में अपनी छातियों पर गंदी नजर डालने वालों से सख्त नफरत होती है.. गुस्सा भी बहोत आता है.. शर्म भी!! फिर धीरे धीरे आदत पड़ जाती है.. और काफी को तो वो नजरें अच्छी भी लगने लगती है..
अपने स्तनों को तांक रहे राजेश सर की नज़रों को इग्नोर कर उनकी वाणी और वर्तन पर फोकस कर रही थी वैशाली
"देखो वैशाली.. मेरी बात पर गौर करके देखना.. आपके सास और ससुर से भी डिस्कस कर लेना.. मोम-डेड से भी.. अगर सबको ठीक लगे तो तुम मेरी कंपनी जॉइन कर लो.. इसी बहाने तुम्हारे साथ रहने का मौका भी मिलेगा मुझे.. फ्रेंकली कहूँ तो आई लाइक यॉर कंपनी.. "
वैशाली: "आई लाइक यॉर कंपनी टू.. मैं जरूर इस बारे में सोचूँगी"
राजेश: "वैशाली.. माउंट आबू में हमारी इस मुलाकात को यादगार बनाने के लिए.. हमारी दोस्ती के पहले कदम की ओर जाते हुए.. क्या तुम मुझे एक किस दे सकती हो?"
वैसे तो वैशाली को ऐसा कोई परहेज नही था पर राजेश के साथ वह हर कदम फूँक फूँक कर रखना चाहती थी.. बहोत सी बातें जुड़ी थी राजेश के साथ..
राजेश: "वैशाली.. माउंट आबू में हमारी इस मुलाकात को यादगार बनाने के लिए.. हमारी दोस्ती के पहले कदम की ओर जाते हुए.. क्या तुम मुझे एक किस दे सकती हो?"
वैसे तो वैशाली को ऐसा कोई परहेज नही था पर राजेश के साथ वह हर कदम फूँक फूँक कर रखना चाहती थी.. बहोत सी बातें जुड़ी थी राजेश के साथ..
वैशाली: "नो सर.. माफ कीजिए पर आप जो चाहते है वो मैं आपको नहीं दे पाऊँगी.. सॉरी"
राजेश: "कोई बात नहीं.. अगर तुम्हारा मन हो तो ही.. जबरदस्ती तो मैंने आज तक रेणुका से नही की.. डॉन्ट वरी.. कब से अकेले पी रही हो.. क्या तुम भूल गई की हम दोनों एक ही ग्लास से पी रहे है?"
वैशाली: "ओह.. सॉरी सर.. बातों बातों में भूल ही गई.. ये लीजिए ग्लास.. " वैशाली ने जब ग्लास देने के लिए अपना हाथ आगे किया.. तब राजेश ने उसकी हथेली को दबाते हुए कहा "बुरा मत मानना वैशाली.. पर अगर शराब का इतना भी असर न हो तो फिर पीना ही बेकार है.. तुम बहोत सेक्सी हो यार.. मैं अपने आप पर कंट्रोल नही रख पा रहा हूँ.. "
वैशाली को जिस बात का डर था वहीं हो रहा था.. राजेश सर उसकी ओर फिसलते जा रहे थे.. क्या करूँ?? खड़ी होकर चली जाऊँ?? तो उन्हे बुरा लगेगा.. उनकी कंपनी की पार्टी में.. उनके खर्चे पर यहाँ आई हूँ.. सिर्फ हाथ ही तो पकड़ा है.. चलता है.. !!
वैशाली: ओह्ह सर.. मेरे खयालात उतने पुराने भी नही है की आप मेरा हाथ न पकड़ सको.. मुझे भी अच्छा लगा"
दोनों के बीच अब तक ४ ग्लास बियर खतम हो चुकी थी.. और सिगरेट का पूरा एक पैकेट खतम हो चुका था.. और उस दरमियान राजेश वैशाली के हाथ तक पहुँच गया था.. वैशाली के गोरे कोमल हाथ को सहलाते हुए राजेश उसकी आँखों में आँखें डालकर देख रहा था.. वैशाली और ज्यादा देर तक उसका सामना नही कर पाई.. बार बार वह अपनी नजरें झुका लेती थी.. एक अजीब प्रकार का आकर्षण दिख रहा था उसे राजेश की आँखों में..
राजेश: "वाकई वैशाली.. तू बहोत सुंदर है.. तेरा फिगर भी जबरदस्त है.. जो भी देखें वो पागल हो जाएँ.. मैं भी आखिर एक मर्द हूँ.. ऊपर से माउंट आबू का ये मदहोश आलम.. साथ में शराब का नशा.. आज अगर रात को तेरा साथ मिल जाएँ तो हम दोनों की रात रंगीन हो जाएगी"
बियर के नशे में धुत होकर राजेश वैशाली को मना रहा था.. कविता पार्टी में अब भी अपने स्तनों की नुमाइश करते हुए यहाँ वहाँ घूम रही थी.. पीयूष और मौसम के नैन लड़ रहे थे.. फाल्गुनी और रेणुका किसी विषय पर गंभीर चर्चा कर रहे थे..
अपने फिगर की तारीफ सुनकर वैशाली फुली न समाई.. और वो भी किसी ऐरे गैरे इंसान से नही.. राजेश जैसे सफल और अमीर व्यक्ति के मुंह से..
पार्टी अपने पूरे रंग में थी.. हर कोई अपने अपने ढंगे से मजे कर रहा था..
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होटल से निकलकर इनोवा में बैठे ही संजय ने शीला को अपनी बाहों में भर लिया.. और उसके अंगों को अपने हाथों से रौंदने लगा.. शीला के मदमस्त स्तनों पर.. उसकी जांघों पर.. वो जगह जगह अपने हाथ फेर रहा था.. जैसे एक ही बार में वो शीला का पूरा जिस्म भोग लेना चाहता हो..
संजय: "मम्मी जी, यू आर सो हॉट.. आई लव योर सेक्सी बूब्स.. बस गोवा पहुँचने की देरी है.. मैं पूरी दुनिया को अपनी सास के उभार दिखाना चाहता हूँ.. "
शीला ने अपने दामाद के लंड को अपनी मुठ्ठी में पकड़ लिया.. और उत्तेजना पूर्वक मसल दिया.. एक ही झटके में उसने पेंट के अंदर से लंड बाहर निकाला और नीचे झुककर चूसने लगी.. संजय के बड़े अंडकोशों को अपनी मुठ्ठी में दबाकर वह उससे खेलती रही और कराहती रही.. ड्राइवर को गाड़ी के करीब आता हुआ देख दोनों ने अपने अंग छुपा लिए और चुपचाप बैठ गए.. और गाड़ी तेजी से गोवा की तरफ जाने लगी
गोवा की सरहद पर पहुंचते ही शीला रोमांचित हो गई.. एक आलीशान होटल में रहने का इंतेजाम किया था संजय ने.. उनके कमरे की बालकनी समंदर के किनारे पर थी.. होटल का अपना प्राइवेट बीच था.. देखती ही शीला का दिल खुश हो गया
संजय: "मम्मी जी, यहाँ हम दोनों अकेले है.. और यहाँ हमे कोई जानता भी नही है.. मैं आपको जबरदस्त आनंद और भरपूर रोमांच का अनुभव करवाना चाहता हूँ.. बस यह सब इन्जॉय करने के लिए आपको थोड़ा सा बिंदास होने की जरूरत है.. तभी आप यहाँ का पूरा आनंद ले पाएगी.. देखिए.. वो सामने खड़ी स्त्री कितनी बिंदास खड़ी है?"
शीला ने उस स्त्री की ओर देखा.. करीब ४० के उम्र की वह स्त्री.. लगभग नंगी सी थी.. उसकी बिकीनी इतनी छोटी थी.. जो केवल उसकी दोनों निप्पल और चूत की लकीर को ही छुपा रही थी.. बाकी सब देखने वालों के लाभ के लिए खुला छोड़ दिया गया था.. उसके हाथ में बियर की बोतल थी.. उसके स्तन की सम्पूर्ण गोलाई खुली नजर आ रही थी.. जैसे पूरी दुनिया को अपने नग्न अंग दिखाने के इरादे से ही उसने वैसी बिकीनी पहनी थी..
शीला बालकनी से जब उस स्त्री को एकटक देख रही थी तभी संजय ने उसे अपने आगोश में खींच लिया और पास की एक कुर्सी पर बैठ गया.. शीला को अपनी गोद में बैठा लिया.. शीला के स्तनों के उभारों पर हाथ फेरते हुए संजय उत्तेजित हो गया.. उसका लंड शीला की गांड पर चुभने लगा.. शीला की काँखों के अंदर से हाथ डालकर संजय ने दोनों स्तनों को मसल दिया.. और शीला का चेहरा मोड कर उसे किस करते हुए कान में कहने लगा "मम्मी जी.. अब तक आपने आपकी रसीली चूत के दर्शन नही करवाए.. खैर अब यहाँ आ ही गए है तो वो भी हो जाएंगे.. मुझे कोई जल्दी नही है.. अभी आप जल्दी से कपड़े चेंज कर लीजिए ताकि हम बीच पर जाकर मजे कर सके.. "
शीला: "पर बेटा.. मैं समंदर पर पहनने लायक कोई कपड़े लेकर ही नही आई हूँ.. मेरे पास तो सारी साड़ियाँ ही है.. मुझे कहाँ पता था की तुम मुझे गोवा ले जा रहे हो.. !! "
संजय: "अगर मैं आपको पहले बता देता की गोवा ले जा रहा हूँ.. तो क्या आप चलते मेरे साथ?" संजय ने अपने पेंट की चैन खोलकर लंड बाहर निकाला.. गोरे सख्त लंड को देखकर शीला के अंदर वासना का बवंडर उठ गया.. शीला संजय की गोद से खड़ी हो गई और बोली
शीला: "अब मैं क्या पहनु? साड़ी ही पहन लेती हूँ.. "
संजय: "साड़ी पहन कर भी कोई कभी बीच पर जाता है क्या!!! चलिए.. पास किसी स्टोर से आपको मस्त कपड़े दिलवाता हूँ"
दोनों बालकनी से चलते चलते समंदर किनारे बने एक छोटे से मार्केट पहुंचे.. चलते हुए शीला संजय से ऐसे चिपकी हुई थी जैसे हनीमून पर आई हो.. ऐसा करने में उसे कोई झिझक भी नही हुई.. आसपास का वातावरण ही कुछ ऐसा था.. अद्भुत और उन्मादक.. कई कपल्स ऐसी ऐसी हरकतें खुले में कर रहे थे.. की शीला काफी खुला खुला महसूस करने लगी.. कोई किस कर रहा था.. तो कोई खुलेआम स्तन दबा रहा था.. एक पेड़ के तने के पीछे खुलेआम लंड चुसाई चल रही थी.. !!!
एक स्टोर से संजय ने शीला के लिए एक मस्त पतला सा लो-कट टॉप और जीन्स की शॉर्ट्स खरीदी.. शॉर्ट्स तो इतनी छोटी थी की शीला की पूरी जांघ ही खुली नजर आयें.. और उसके आधे से ज्यादा चूतड़ बाहर ही लटकते रहे.. इतनी छोटी.. !!
शीला ने कृत्रिम क्रोध के साथ कहा "कैसे कपड़े लिए है बेटा.. ?? मैं क्या ऐसे कपड़े पहनूँगी? शर्म भी नही आती?"
संजय ने हँसते हुए कहा.. "मेरी जान.. तुझे तो मैं पूरे गोवा में नंगा घुमाना चाहता हूँ.. अब तय कर लो.. वैसे घूमना है या ये कपड़े पहनने है??"
शीला के बदन में कामुकता और हवस का बुखार सा चढ़ने लगा.. संजय भी जिस तरह "आप" से "तू" पर आ गया था.. शीला की चूत में अजीब सी चुनचुनी होने लगी थी.. उसके स्तन सख्त होकर तन गए थे.. कान लाल हो गए थे..
संजय: "तू अभी ट्रायलरूम में जाकर ये कपड़े पहन कर आ" उसने शीला को आदेश दिया
थोड़ी सी हिचकिचाहट के बाद शीला को आखिर मानना ही पड़ा.. वह जब ट्रायलरूम के बाहर आई तब देखने लायक द्रश्य था.. गोरा गदराया मांसल चरबीदार जिस्म.. पतला सा टॉप.. जिस में बिना ब्रा के खरबूजे जैसे स्तन साफ साफ दिख रहे थे.. टॉप इतना टाइट था की शीला डर रही थी की उसके स्तन कहीं टॉप को फाड़ न दे.. निप्पल भी उभरकर अपना आकार दिखा रही थी.. स्टोर में और जीतने भी लोग थे सब की नजर शीला पर चुंबक की तरह चिपक गई..
संजय ने काउन्टर पर बिल के पैसे चुकाये और शीला का हाथ पकड़कर बाहर निकला.. इतने उत्तेजक कपड़े पहनकर शीला आज पहली बार बाहर निकली थी.. उसके मदमस्त बड़े बबले बार बार साथ चल रहे संजय की कुहनी से टकराते हुए उसे उत्तेजित कर रहे थे..
किसी भी प्रकार के मेकअप के बगाई शीला अपने दामाद के साथ चलती जा रही थी.. दोनों की उम्र में करीब २५ वर्ष का फरक था.. देखने वाले सब आश्चर्य से इस जोड़ी को देख रहे थे.. सब सोच रहे थे की यह आखिर किस तरह की जोड़ी है?? अब तक शीला ने भी मन में यह तय कर लिया था की वह अपने दामाद के साथ खुल कर जिएगी.. और गोवा में मिली इस स्वतंत्रता का पूरा आनंद लेगी
शीला: "संजय बेटा.. एक सिगरेट जला कर दो मुझे" एक बंद दुकान के बाहर बैठते हुए उसने संजय से कहा.. शीला के उठते या बैठते उसके स्तन उछल-कूद कर रहे थे.. यह देखकर सामने खड़े एक अंग्रेज ने कहा "ओह वाऊ.. अमैज़िंग.. !!" हाथ में सिगार लिए वह शॉर्ट्स और लूज टीशर्ट पहने अपनी गर्लफ्रेंड के साथ खड़ा था.. दोनों के जिस्म काफी कसे हुए थे.. और ६ फिट से ज्यादा की लंबाई थी.. २८ के आसपास की उम्र.. शीला और संजय दोनों उनके तरफ देखने लगे.. उसकी फिरंगी गर्लफ्रेंड भी जबरदस्त सेक्सी थी..
"कितना गोरा है वो फिरंगी.. !!" शीला ने कहा..
"हाँ मम्मी जी.. तुम्हारे उछलते बॉल देखकर पागल हो गया.. साथ में जो लड़की है वो कितनी हॉट है.. देखो तो सही.. एकदम कच्चे कुँवारे स्तन है उसके.. कमर भी कितनी पतली है.. साली की चूत में एक धक्के में लंड डाल दु तो जान निकल जाए उसकी.. "
शीला: "बेटा.. उसके हाथ में जो सिगरेट है वो कितनी अलग है.. !!! मोटी सी"
संजय: "वो सिगरेट नही.. सिगार है.. विदेश में लोग ज्यादातर यही पीते है.. "
शीला: "यहाँ कहीं मिलेगी ऐसी सिगार? मुझे ट्राय करनी है"
संजय: "आपको सिगार ट्राय करनी है.. तो मुझे उस लड़की की चूत ट्राय करनी है.. किसी गोरी को एक बार दबाकर चोदने का बहोत मन है मुझे.. " संजय अपने लंड को दबाने लगा.. वह दोनों भी शीला की ओर देख रहे थे.. संजय का लंड उस गोरी के स्तन देखकर सख्त हो चुका था..
शीला: "लगता है की तुम्हारा खड़ा हो गया है.. इतनी पसंद आ गई तुम्हें? जो ओर किसी को ही देखना था तो मुझे साथ क्यों लाया?" शीला को स्त्री सहज ईर्षा होने लगी..
संजय: "आपको तो मैं होटल में ले जाकर अपने अनोखे अंदाज में चोदूँगा.. वो गोरा तुम्हारी चूचियों को देखकर कैसा पागल हो रहा है"
शीला: "यही तो मेरा मुख्य शस्त्र है बेटा.. मर्दों को इन स्तनों से कैसे पागल बनाना मुझे अच्छी तरह आता है.. तुम्हें उस रांड को देखकर जैसी उत्तेजना हो रही है वैसी ही कुछ उस गोरे को मेरे स्तन देखकर हो रही होगी.. अरे देखो.. वो दोनों हमारी तरफ ही आ रहे है.. कितना हेंडसम है ये लड़का.. इसका लंड कितना गोरा होगा.. हाय.. !!! मुझे तो उससे चुदवाने का मन कर रहा है संजु" शीला ने संजय के कंधे पर अपना सर रख दिया..
शीला और संजय दोनों बातें कर रहे थे तब वह जोड़ा उनके पास आ गया..
उस गोरे ने कहा "Hi.. I am John and this is my baby, Charlie.. We are from France.. You both are a nice looking couple.. and madam you are looking gorgeous" जॉन ने शीला के बॉल को नजदीक से देखते हुए अपने होंठ पर जीभ फेरते हुए कहा..
संजय तो चार्ली की कमर को देखकर बावरा हो गया.. पेड़ की पतली शाख जैसी कमर.. छोटे छोटे कूल्हें.. और पतले शरीर के मुकाबले बड़े स्तन.. बनियान जैसा कुछ पहन रखा था चार्ली ने.. साइड से उसके आधे स्तन तो बिना किसी प्रयत्न के ही दिख रहे थे..
संजय ने चार्ली से हाथ मिलाते हुए कहा "Nice to meet you Charlie.. I am Sanjay and this is Shila..She is neither my wife nor my girlfriend..so please don't ask about our relationship.. We are here to enjoy..Would you like to join us?"
चार्ली अपने दोस्त जॉन के सामने देखने लगी.. जॉन की आँखें तो शीला के स्तनों को देखते ही चकाचौंध हो चुकी थी
चार्ली ने जॉन से कहा "John, you remember? I told you about my fantasy!! I think this is a golden chance for me.. I don't want to miss this..Please help me to fulfill it darling..do something!!"
शीला और संजय स्तब्ध होकर उनकी बातें सुनते रहे.. शीला की चूत तो पानी छोड़ने लगी थी जॉन को देखकर.. वह दोनों किस बारे में बात कर रहे थे यह समझने में देर नही लगी संजय को.. पर उनकी अजीब अंग्रेजी को समझने में दिक्कत आ रही थी..
तभी दुकान के पास खड़ा एक आदमी चलते हुए उनके पास आया "साहब.. इनकी अंग्रेजी समझने में हेल्प करूँ आपकी? १०० रुपये लूँगा"
संजय ने तुरंत अपने वॉलेट से १०० का नोट निकालकर उसके हाथ में थमा दिया..
उस आदमी ने उन दोनों के साथ कुछ बात की और फिर कहा "सर, ये कपल आप लोगों के साथ वक्त गुजारना चाहता है.. और चार्ली मैडम का कहना ही की वह एक बार किसी इंडियन आदमी के साथ डेट पर जाना चाहती है.. अगर आप दोनों को एतराज न हो तो ये दोनों आप के साथ एक रात गुजारना चाहते है!!"
संजय को ऐसा लग रहा था जैसे स्वर्ग उतरकर धरती पर आ गया हो
संजय" मम्मी जी.. आप इस गोरे को लपेटना चाहती हो.. और मैं चार्ली को.. मेरा भी जबरदस्त मन कर रहा है विदेशी चूत को चोदने का.. "
शीला सोचने लगी.. ऐसे किसी अनजान आदमी के साथ कैसे चली जाऊँ?? कुछ ऊपर नीचे हो गया तो? मदन को क्या मुंह दिखाऊँगी? एक साथ कई विचार उसके दिमाग में एक साथ चल रहे थे..
तब जॉन उस आदमी से और कुछ बात करने लगा.. उसकी बात सुनकर वह आदमी संजय और शीला के पास आया और बोल
आदमी: "ये जॉन साहब ने मुझे जो कहा वोही मैं आपको बता रहा हूँ.. आप गुस्सा मत करना.. प्लीज.. ये तो मेरा काम है.. "
संजय: "हम बुरा नही मानेंगे.. "
आदमी ने शीला की ओर देखते हुए कहा "ये साहब कह रहे है की अगर आप उसके साथ एक रात गुजारेगी तो वो आपको १००० डॉलर देने के लिए तैयार है"
स्तब्ध हो गई शीला.. उसने संजय से कहा "बेटा.. तू इस लड़की के साथ जा.. मैं इसके साथ जाती हूँ.. ऐसा मौका दोबारा हमें कभी नही मिलेगा"
खुश होकर संजय ने जॉन के सामने ही चार्ली के गालों को सहलाया.. और उसका हाथ पकड़कर कहा "Let's go baby..!!
जॉन शीला के करीब आया.. अपनी सिगार शीला को देते हुए कहा : "Do you smoke?"
शीला ने मुस्कुराकर सिगार अपने हाथ में ली और एक बड़ा सा कश लगाया.. सिगार के धुएं के साथ दोनों ओजल हो गए.. जाते जाते शीला ने मुड़कर देखा.. उसका दामाद बीच बाजार में उस चिड़िया को चूमते हुए उसके स्तन दबा रहा था.. शीला को थोड़ी बहोत अंग्रेजी आती थी.. जॉन ने शीला का हाथ पकड़कर अपनी बगल में खींच लिया.. और चलने लगा.. शीला की गदराई कमर पर हाथ रखकर वह चल रहा था..
शीला और जॉन बारी बारी सिगार फूँक रहे थे.. जॉन शीला की कमर की चर्बी हाथ में पकड़कर उसे उकसा रहा था.. शीला के जिस्म एक अजीब प्रकार का रोमांच और उत्तेजना दौड़ने लगी.. दोनों केवल संभोग करने के इरादे से ही मिले थे.. इसलिए शीला ने सीधा बोल दिया..
शीला: "I don't want to waste time on the road.. so let's go to your room..I want you to take me there"
जॉन: "Oh really!!! You are so fucking hot bitch..!! Let's go honey.. I want to suck your pussy.. I want to taste Indian cunt too"
शीला: "I also want to taste white lund"
जॉन: "What did you say? Lund? What does it mean?"
शीला: "Lund means this...!!" कहते हुए शीला ने जॉन के लंड पर धीरे से चपत लगाई और हंसने लगी
जॉन: "Ohh you mean my dick..that is great.. Your smile is also fucking killer baby.." सिगार शीला के हाथ में थमाते हुए जॉन ने उसे अपने आगोश में खींचा.. चलते चलते वह दोनों एक खाली सड़क पर पहुँच गए.. आसपास कोई था नही.. जो एकाध थे वो कपल में थे और अपनी दुनिया में मस्त थे..
जॉन ने शीला के कंधों पर हाथ रखकर उसके टॉप के अंडर डाल दिया.. पहली बार उसने शीला की नंगी चूचियों का स्पर्श किया.. अंदर ब्रा तो थी नही.. जॉन के हाथ में शीला का अनमोल स्तन आ गया.. जॉन की आह्ह निकल गई.. स्तनों को दबाते हुए उसने कहा
जॉन: "My god..!! You Indians have such sexy boobies..I like your fucking huge titties..Shila.." अपने टिपिकल अंग्रेजी में वह बोला
शीला खुश हो गई.. सिगार का दम खींचते हुए वह बोली "John.. press my boobs hard..I like your hard touch on my boobs" कहते हुए शीला ने जॉन के अंदर घुसे हाथ को ऊपर से ही दबा दिया.. और बोली "John.. I want to see your cock right now..right here!!"
जॉन: "You mean my lund?"
शीला: "Yes..yes john.. I want to see your lund right here..so please show me now" एक सुमसान गली के कोने में वह जॉन को खींचकर ले गई.. जाते जाते उसने शॉर्ट्स के ऊपर से ही जॉन का लंड पकड़ लिया.. उसने महसूस किया की शॉर्ट्स के अंदर उसने कुछ नही पहना था.. उसका लंड खुला ही लटक रहा था.. शीला के हाथ में सीधा जॉन का डंडा आ गया.. शीला पकड़कर हिलाने लगी
जॉन: "Ohhh Shila.. you fucking bitch.. You are so hot..aahhhh!!"
उसके सख्त फिरंगी लंड को चड्डी के ऊपर से ही हिलाते हुए शीला इतनी उत्तेजित हो गई की वह ये भी भूल गई की वो लोग बाहर खड़े थे.. उसने चड्डी के अंदर हाथ डालकर जॉन के लंड की नोक पकड़ ली.. और उस फुले हुए सुपाड़े को उंगली से दबा दिया..
जॉन ने शीला को अपनी बाहों में दबोच कर एक जबरदस्त फ्रेंच किस कर दी.. उसकी चूमने की स्टाइल पर शीला फ़ीदा हो गई.. उस अंग्रेज ने बड़े ही आराम से शीला के निचले होंठ को चूसना जारी रखा.. शीला का जोबन अब सिहरने लगा था.. ब्लू फिल्मों को देखकर शीला हमेशा यह सपना देखती थी की कभी कोई गोरा उसे दबोच कर नंगी करके धमाधम चोद दे..आज उसका वो सपना साकार हो रहा था.. जॉन का लंड जबरदस्त सख्त हो गया था.. शीला उत्तेजित होकर उसकी चड्डी में हाथ डालकर उससे खेल रही थी.. शीला ने अब उसके अंडकोशों को भी मुठ्ठी में पकड़कर देखा.. मस्त गोलगप्पे जैसे थे उसके आँड..
"प्लीज जॉन.. बाहर निकालकर मुझे दिखा न.. !!" हिन्दी में बोली शीला.. जॉन को कुछ समझ में नही आया
किस तोड़कर जॉन ने पूछा "What??"
शीला को तब एहसास हुआ की उसे अंग्रेजी में बोलना था "Please, show me your big cock!!"
जॉन: "hey..not here..let's go to my room dear..let's go" हाथ पकड़कर उसने शीला को खींचा
"No John, I can wait anymore..Show me here and now" कहते हुए शीला घुटनों के बल बैठ गई और जॉन की चड्डी की मोरी से लंड को बाहर खींचने लगी.. जैसे बिल से चूहा बाहर निकलता है बिल्कुल वैसे ही जॉन के लंड का सुपाड़ा बाहर निकला.. जॉन की जांघों के बालों को चूमते हुए शीला ने उस सुपाड़े पर अपनी जीभ का स्पर्श किया..
"Ohh.. Shila, please don't do it here.. I can't control anymore" चड्डी के नीचे से हाथ डालकर उसके गोटों को मसल रही शीला से जॉन ने कहा.. पर शीला की हवस की आग इतनी तेज थी की वह अब बेकाबू हो चली थी.. उसने जॉन की बातों को इग्नोर करते हुए चड्डी को थोड़ा सा ओर ऊपर किया.. लगभग साढ़े तीन इंच जितना लंड बाहर निकल आया और बिना एक सेकंड गँवाए शीला ने लंड मुंह में ले लिया.. पीछे से हाथ डालकर उसने जॉन के कूल्हों को भी सहलाना शुरू कर दिया.. कूल्हों पर दबाव बनते ही जॉन शीला की ओर करीब आ गया.. और लंड थोड़ा सा और बाहर निकला.. वह हिस्सा भी शीला ने अपने मुंह के आगोश में भर लिया..
"Ohh..you fucking bitch..please stop!! Let's go to my room" पर शीला कहाँ सुनने वाली थी!!! जॉन के गोरे कूल्हों और जांघों पर हाथ फेरते हुए वह बदहवास होकर लंड चूस रही थी.. वह उत्तेजना से इतनी बेकाबू हो गई थी की चूसते चूसते एक बार तो उसने लंड पर आपने दांत गाड़ दिए.. जॉन ने अपने जीवन में आज तक इतनी कामुक स्त्री को नहीं देखा था.. वो बावरा होकर इस हिंसक शेरनी जैसी शीला का शिकार बनता रहा.. दंग रह गया वोह.. भारतीय स्त्री इतनी कामुक और उत्तेजित हो सकती है वो उसने सपने में भी नही सोचा था..
जॉन ने शीला को कंधे से पकड़कर खड़ा किया और अपने लंड को उसके मुंह के चूँगाल से छुड़ाया..शीला ने तुरंत अपना टॉप ऊपर करते हुए अपने अद्भुत स्तनों को जॉन की आँखों के सामने उजागर कर दिया.. और जॉन का चेहरा अपने स्तनों पर दबा दिया..
जॉन शीला के स्तनों की गोलाइयों में ऐसा खो गया की फ्रांस भी भूल गया.. दोनों स्तनों के बीच शीला ने ताकत से जॉन को दबोचे रखा था.. सांस लेने के लिए भी तड़पने लगा जॉन.. उसका लंड शीला के जिस्म की गर्मी के कारण अप-डाउन हो रहा था.. जैसे पानी से बाहर निकाली मछली फुदक रही हो.. शीला ने उसके फुदकते लंड को अपनी मुठ्ठी में पकड़ लिया और लंड की त्वचा को पीछे सरकाया.. उसका लाल गुलाबी सुपाड़ा बाहर दिखाई देने लगा.. शीला उस सुपाड़े को अपनी जांघों पर रगड़ने लगी.. जॉन लगातार शीला की निप्पलों को चूस रहा था.. इतनी मस्ती से चूस रहा था जैसे उनमें से दूध निकल रहा हो.. उसके लंड की सख्ती ये बता रही थी की उसे शीला की हर हरकत बेहद अच्छी लग रही थी.. शीला जो कुछ भी कर रही थी वह उसके अंदाजे और कल्पना के बाहर था..
अब शीला की चूत में जबरदस्त खुजली होने लगी.. उसकी सहनशक्ति जवाब देने लगी.. दोनों इतने उत्तेजित होकर एक दूसरे पर टूट पड़े थे जैसे खा जाना चाहते हो.. जॉन से कई ज्यादा आक्रामक शीला थी.. एक दीवार की आड़ में खड़े दोनों पूरे खुमार पर थे.. दीवार का सहारा लेकर शीला खड़ी हो गई और जॉन का चेहरा अपने जिस्म पर दबाते हुए बोली
शीला: "Ohh John dear..please suck my choot..I can't bear yaar" "चूत" शब्द का अर्थ तो जॉन नही समझ पाया पर उसे इतना पता चल गया की वह क्या कहना चाहती थी.. वह फिरंगी तुरंत अपने घुटनों के बल बैठ गया और शीला की छोटी सी चड्डी जैसी शॉर्ट्स को नीचे उतारकर उसकी चूत पर अपनी जीभ फेरने लगा.. चूत के दोनों होंठों को अपने होंठों के बीच दबाकर चूसने लगा..
शीला ने अपना दायाँ पैर ऊपर किया और जॉन के कंधे पर रख दिया.. जॉन के बालों को पकड़कर उसके चेहरे को अपनी चूत पर रौंद दिया.. दोनों एक दूसरे को आनंद देने में व्यस्त थे.. तभी संजय और चार्ली वहाँ से गुजरे.. शीला और जॉन को देखकर वह दोनों तुरंत उनके पास आ खड़े हुए..
जॉन की चुटकी लेते हुए चार्ली ने कहा "Hey John..what are you doing?" वह हंसने लगी
अपने स्तनों को खुद ही मसल रही शीला के पास जाकर संजय ने उसके एक स्तन को अपने कब्जे में ले लिया..
"मम्मी जी, आप तो सड़क पे ही शुरू हो गई!! क्या बात है.. अंग्रेज पसंद आ गया आपको.. " शीला संजय को बालों से खींचकर अपने करीब लाई और चूमने लगी.. शीला के खरबूजों जैसे स्तनों के बड़े आकार को देखकर चार्ली की आँखें फटी की फटी रह गई.. "Madam, you have got huge melons" शीला के दूसरे स्तनों पर हाथ फेरते हुए उसने कहा.. शीला की हवस गजब की थी.. उसकी दो जांघों के बीच जॉन चुसकियाँ लेते हुए चूत चाट रहा था.. शीला के भोसड़े से कामरस का अविरत प्रवाह बह रहा था.. चाट चाट कर थक गया था जॉन.. लेकिन शीला की चूत सूखने का नाम ही नही ले रही थी..
आखिर थककर जॉन ने "प्रोजेक्ट चूत सकिंग" अधूरा छोड़ दिया और खड़ा हो गया..
चार्ली को एक प्यारी किस देते हुए वह बोला "Honey, she is a real bitch..very hot lady..Let's go to room.. I can't bear anymore.. Sanjay, do you want to join us? Let's enjoy four-some! Charlie, I am damn sure you will have a great time with Shila too.. just try her once baby.. she is amazing!!"
आखिर थककर जॉन ने "प्रोजेक्ट चूत सकिंग" अधूरा छोड़ दिया और खड़ा हो गया..
चार्ली को एक प्यारी किस देते हुए वह बोला "Honey, she is a real bitch..very hot lady..Let's go to room..I can't bear anymore..Sanjay, do you want to join us? Let's enjoy four-some! Charlie, I am damn sure you will have a great time with Shila too..just try her once baby.. she is amazing!!"
चार्ली जबरदस्त उत्तेजित हो गई "Ohh really..!! Hey Sanjay, lets go and join them.."
कार्यक्रम में मध्यांतर की घोषणा होते ही शीला ने अपनी चड्डी ऊपर की उसकी क्लिप बंद कर दी.. फिर वह जॉन का हाथ पकड़कर चलने लगी.. शीला इतनी उतावली होकर चल रही थी जैसे जॉन के लंड को जल्दी से जल्दी अपनी चूत में गटक लेना चाहती हो.. उसका दामाद संजय और चार्ली पीछे पीछे आ रहे थे..
संजय: "Charlie..just look at her huge hips..It is my wish to bang her with John"
"Ohhh...you mean in both the holes? चार्ली ने हँसते हुए कहा
"Yesss...!!" संजय ने जवाब दिया
"I will fuck her ass the whole night, Charlie!!" शीला के कूल्हों पर थप्पड़ लगाते हुए जॉन ने संजय से कहा
शीला को उनकी बातें ज्यादा समझ नही आ रही थी.. और उससे समझने में दिलचस्पी भी नही थी.. बातें करते हुए.. सिगार फूंकते हुए.. चारों लोग, जॉन और चार्ली की होटल पर पहुंचे.. संजय और शीला की होटल से थोड़ी दूरी पर थी इनकी होटल.. चारों कमरे में गए और दरवाजा अंदर से लोक कर लिया.. दरवाजा बंद होते ही सब की वासना के दरवाजे खुल गए.. चार्ली संजय से लिपट गई और संजय ने बिना वक्त गँवाए उसे तुरंत ही नंगा कर दिया.. शीला चार्ली के स्लिम और दाग रहित गोरे जिस्म को देखती ही रही.. बी.पी. में गोरी लड़कियों की जिस तरह की हरकतें उसने देखी थी वह सब उसकी आँखों के आगे तैरने लगी.. ब्लू फिल्मों में लेस्बियन सीन में चूत चटाई के द्रश्य देखकर अक्सर शीला का मन करता था की वह भी किसी गोरी रांड की चूत को चटकारे लेकर चाटे और अपनी भी उससे चटवाएं.. आज आखिर उस सपने को साकार करने का मौका मिलने वाला था.. शीला ने संजय के कान में कुछ कहा..
"अभी नही मम्मी जी, पहले मुझे ईसे मन भर कर चोद लेने दीजिए.. निवाला मुंह तक आ चुका है अब मैं और इंतज़ार करना नही चाहता.. एक बार तसल्ली से चोद लूँ फिर आप जो चाहो कर लेना इसके साथ" संजय ने कहा
हिन्दी में हो रही बातचीत में जॉन और चार्ली को क्या पता चलता ??? लेकिन तब तक चार्ली ने जॉन की चड्डी उतार दी थी.. जॉन की दोनों जांघों के बीच लटक रहे खूबसूरत फिरंगी गोरे लंड को देखकर शीला जैसे होश ही खो बैठी.. उसके लंड को पहली नजर में देखते ही उसे प्यार हो गया.. !! संजय को छोड़कर वह जॉन की तरफ मुड़ी.. वो जॉन के अर्ध-जागृत लंड को पकड़े इससे पहले चार्ली ने उसे पकड़ लिया.. और मुठ्ठी में पकड़कर हिलाने लगी..
जॉन: "Suck it baby...suck it hard like its your dad's cock.." यह सुनते ही चार्ली नीचे झुक गई और जॉन की आँखों में देखते हुए उसका लंड चूसने लगी.. शीला और संजय आश्चर्यचकित होकर इन दोनों को देखते रहे.. चार्ली ने जॉन के हाथ से सिगार लेकर एक लंबा कश लिया.. फिर बिना धुआँ बाहर निकाले वह लंड चूसने लगी.. थोड़ी ही देर में चार्ली के मुंह से अंदर बाहर निकल रहे लंड के साथ साथ धुआँ भी निकलने लगा.. बड़ा ही अनोखा द्रश्य था.. !!
चार्ली और जॉन की इन कामुक हरकतों को देखकर शीला अपने आपे से बाहर हो रही थी.. वह चार्ली की बगल में बैठ गई और जॉन के अंडकोशों को सहलाने लगी.. गोरे गोरे सुंदर अंडों से खेलते हुए शीला ने चार्ली की ओर देखा.. दोनों की नजरें एक हुई.. चार्ली को शीला की आँखों में एक अजीब सा आमंत्रण नजर आया.. और चुपचाप उस आमंत्रण का स्वीकार करे हुए वह शीला के सुंदर गालों को सहलाने लगी.. उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए वह जॉन के लंड को चूसती रही.. चार्ली के एक हाथ में सिगार थी और दूसरे हाथ से वह शीला के अंगों को सहला रही थी.. शीला का बहोत मन कर रहा था जॉन का लंड चूसने को.. पर ये चार्ली छोड़े तब न!!
शीला की इस तकलीफ को संजय समझ गया.. वह धीरे से चलकर चार्ली के पास आया और अपने लंड से चार्ली का गाल सहलाने लगा.. वैसे संजय का लंड काला तो बिल्कुल नही था.. पर जॉन के लंड के गोरेपन के आगे गेहुआँ नजर आ रहा था.. चार्ली ने तुरंत जॉन का गीला लंड छोड़ दिया और संजय का लंड चूसने लगी.. जॉन के तंदूरस्त गोरे लंड को शीला ने हाथ में लेकर बड़े ध्यान से देखा.. उसके सख्ती की जांच की और फिर उस लोड़े को मुंह में लेकर चूसने लगी.. जब चार्ली चूस रही थी तब जॉन चुपचाप खड़ा था पर शीला ने जैसे ही मुंह में लिया उसकी सिसकारी निकल गई..
"Ohhhh yess..Ahhh..nice..Suck it baby.." जॉन सिसकने लगा.. शीला ने पहले तो आधा ही लंड चूसकर उसे थोड़ा तड़पाया.. फिर धीरे से उसने बाकी आधा लंड मुंह में लेते हुए उसके आँड दबा दिए.. शीला ने अभी अपने कपड़े उतारे नही थे.. लेकिन टाइट कपड़ों से उसके जिस्म का शानदार भूगोल आसानी से नजर आ रहा था.. टॉप से आधे बाहर लटक रहे उसके अद्भुत स्तन.. जॉन और चार्ली को पागल कर रहे थे.. चार्ली संजय के लंड को मस्ती से चूस रही थी..
शीला ने जॉन के लंड को पूरा चूसकर लाल कर दिया था.. आखिर उसने अपने मुंह की कैद से उस लंड को मुक्त किया.. नोक से लेकर मूल तक पूरा लंड शीला की लार से भीग चुका था.. शीला अब खड़ी होकर खुद ही अपने कपड़े उतारने लगी.. और मादरजात नंगी होकर फर्श पर लेट गई अपनी जांघों को चौड़ी करते हुए.. कमर को उठाकर वह अपने भोसड़े को जॉन के सामने प्रस्तुत कर रही थी..
शीला: "संजय बेटा.. मम्मी जी की चूत कौन पहले चाटेगा? मेरा दामाद या जॉन?" अपनी चिपचिपी चूत के दोनों होंठों को उंगलियों से अलग करते हुए अंदर के गुलाबी हिस्से को दिखाते हुए वह दोनों मर्दों को ललचाने लगी.. अपनी जिस्म की नुमाइश कैसे करनी वह शीला से बेहतर कोई नही जानता था.. जॉन यह देखते ही चीते की तरह शीला के भोसड़े पर झपट पड़ा.. बरसों से किसी अंग्रेज से अपनी चूत चटवाने की ख्वाहिश आज पूरी हो रही थी.. जॉन को कानों से पकड़कर शीला ने खींचा और उसके मुंह को अपनी चुत के एकदम करीब ले आई..
जॉन भी कारीगर था.. शीला को खुश करने में उसने कोई कसर नही छोड़ी.. जितनी अंदर घुस सकती थी उतनी अंदर जीभ डालकर उसने शीला की चूत को कुरेद दिया.. कभी वह अपनी हथेली में शीला के सम्पूर्ण भोसड़े को पकड़कर दबाता तो कभी वह उसकी क्लिटोरिस को जीभ और होंठों के बीच दबाकर चूसता.. तरह तरह की आवाज़ें निकालते हुए वह शीला की चिकनी चूत के मजे ले रहा था.. शीला अपनी कमर उठा उठा कर जॉन के मुंह से अपनी चूत रगड़ते जा रही थी.. इतने भारी शरीर वाली शीला की चपलता देखने लायक थी.. बेहद उत्तेजित होकर शीला ने जॉन का हाथ खींचकर उसे अपनी ओर ले लिया.. असंतुलित होकर जॉन शीला के नरम तकिये जैसे स्तनों के ऊपर गिर पड़ा.. शीला ने जॉन को अपनी बाहों में भरकर चूम लिया.. जॉन भी भूखे भेड़िये की तरह शीला पर टूट पड़ा..
शीला ने अपना हाथ नीचे डाला और जॉन का लंड पकड़कर अपनी फड़क रही चुत के सेंटर पर लगा दिया.. जॉन धक्का दे उससे पहले शीला ने ही नीचे से कमर उचक कर जॉन के लंड को अपनी चुत की गहरी गुफा में लापता कर दिया.. और फिर जॉन को अपनी बाहों में भरते हुए उसने पलटी मारी.. अब जॉन नीचे फर्श पर लेट गया और शीला उसपर सवार हो गई.. जॉन पर सवार होकर शीला ऐसे चोदने लगी.. जैसे अंग्रेजों की गुलामी का बदला ले रही हो..
"Ohh..ohhh..stop it you bitch!!" जॉन चिल्लाने लगा.. पर शीला ने शताब्दी एक्स्प्रेस जैसी स्पीड पकड़ ली थी.. चोदते वक्त शीला खूंखार शेरनी का रूप धारण कर लेती थी.. अपना ऑर्गजम पाने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती थी.. जॉन के चिल्लाने पर ध्यान न देते हुए.. शीला लगातार २० से २५ मिनट तक फूल स्पीड में कूदती ही गई.. जॉन के लंड ने तो कब से इस्तीफा दे दिया था.. क्योंकि जब शीला ठंडी होकर जॉन पर से उतरी तब उसकी गहरी गुफा से जॉन का लंड मरी हुई छिपकली की तरह बाहर निकला.. नीचे उतरते ही शीला जॉन के बगल में लेटकर गहरी सांसें भरते हुए अपनी थकान उतार रही थी.. उसके हांफने से ऊपर नीचे होती हुई उसकी छातियों को देखकर स्तब्ध रह गया जॉन.. उसका दिल तो कर रहा था की वह उसकी चूचियों को मसलें.. पर थोड़ी देर पहले ही शीला ने उसे जिस तरह रीमाँड़ पर लिया था वह देखकर उसे फिर से उत्तेजित करने की हिम्मत नही हो रही थी उसकी..
यह द्रश्य देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहा था संजय.. उसे अपनी सेक्सी सास पर गर्व महसूस हो रहा था.. चार्ली को काँखों के नीचे से उठाते हुए संजय ने उसे उठा लिया.. और पूरे कमरे में घूमते हुए उसे किस करने लगा.. जॉन के शॉर्ट्स की जेब से शीला ने किंग एडवर्ड सिगार निकाली और उसे जलाकर एक के ऊपर एक दम लगाने लगी.. नशा सा होने लगा उसे.. अलग ही दुनिया में खो गई वो.. उसकी आँखें बंद हो गई.. उसके हाथ से जब जॉन ने सिगार खींच ली तब उसकी आँखें खुली.. संजय की कमर के इर्दगिर्द अपने पैरों की कुंडली लगाए हुए चार्ली छोटे बच्चे की तरह लटकी हुई थी.. उसकी जांघों के ठीक नीचे.. संजय का आठ इंच लंबा विकराल लंड.. चूत की गंध सूंघते हुए छेद ढूंढ रहा था.. चार्ली के स्तन, संजय की मर्दाना छाती से दबकर समोसे से कचौड़ी बन गए थे..
संजय के गले में बाहें डालकर चार्ली ऐसे झूल रही थी जैसे डाली पर आम लटक रहा हो.. एक दुसरें को कामुक चुम्बन करते हुए वह अलग अलग अंगों को मसल रहे थे.. चार्ली के सुन्दर गोरे कूल्हें संजय के लंड पर ठोकर मार मारकर यह कह रहे थे की जल्दी करो.. अब और सहा नही जाता!!
संजय ने चार्ली को बिस्तर पर पटक दिया.. डनलॉप के नरम गद्दे पर पटकते ही चार्ली एक फिट जितना ऊपर उछली और साथ में उसके स्तन भी!! नजदीक से देख रही शीला ने जॉन को इशारा किया "Let us join them"
"Not now Shila..I will have to take some rest!!" जॉन ने अपनी असमर्थता जाहीर की
शीला अंगड़ाई लेते हुए खड़ी हुई.. फर्श पर लेते हुए जॉन ने शीला के भरे भरे कटहल जैसे स्तनों को देखा और देखता ही रह गया.. शीला के अद्भुत संगेमरमरी कूल्हें.. स्तम्भ जैसी जांघें.. चरबीदार लचकती कमर और चिड़िया घोंसला बना सके वैसी गहरी नाभि.. शीला खतरनाक मूड में लग रही थी.. दोनों जंघाए चौड़ी कर वो जॉन की चेहरे पर बैठ गई..अपनी चूत के होंठों को अलग करते हुए उसने जॉन के होंठों पर उसे लगा दिया.. चाटने के अलावा जॉन के पास कोई चारा नही था.. दो तीन मिनट तक चूत चटवाने के बाद शीला ने एक नजर जॉन के लंड पर डाली.. पोस्टमॉर्टम रूम में पड़ी लावारिस लाश की तरह जॉन का लंड पड़ा हुआ था..
शीला का मुंह बिगड़ गया.. वह उठकर बेड पर चली गई.. जहां चार्ली और संजय दोनों एक दूसरे के संग खेल रहे थे.. चार्ली संजय के लंड को हिला रही थी और संजय चार्ली की संकरी चूत में उंगली डालते हुए उसके मम्मे चूस रहा था.. चूत में उंगली डालकर उसे चौड़ी कर रहा था संजय.. ताकि उसके तगड़े लंड को वो झेल सके.. संकरी चुत में दो उंगली जाते ही चार्ली दर्द से सिसक उठी..
शीला ने पहले दोनों का दूर से ही निरीक्षण किया.. वह जॉइन होना चाहती थी पर मौका देखकर.. धीरे से वह चार्ली की बगल में लेट गई.. और चार्ली के मुंह को अपनी ओर खींचकर और गोरे फिरंगी होंठों पर अपने देसी होंठ लगा दिए.. कामुक चुंबन करते हुए शीला चार्ली के जीभ से अपनी जीभ लड़ा रही थी.. कभी चार्ली की जीभ को लंड की तरह चूस लेती.. तो कभी उसके मुंह के भीतर तक अपनी जीभ घुसा देती.. दोनों अब बेहद गरम हो गई थी.. चार्ली ने अपनी हथेली में शीला के एक स्तन को पकड़ने की नाकाम कोशिश करके देखा.. पर पहाड़ जैसी चुची, हथेली में भला कैसे समाती.. !!! शीला के नरम गुदगुदे मांस के गोलों चार्ली बड़ी ही मस्ती से दबाते हुए दूसरे हाथ से संजय के लंड के साथ खेल रही थी..
"Ohh Shila...suck my cunt, please!!" चार्ली ने शीला से कहा
शीला ने संजय का हाथ चार्ली की चिकनी बालरहित बुर से हटा दिया.. और संजय की उंगली पर लगे चार्ली के चुत के गाढ़े अमृतरस को चाटकर अपने दामाद की उंगलियों को संपूर्णतः सेनीटाइज़ कर दिया.. थोड़ा सा ऊपर उठकर उसने अपने दामाद को होंठों को चूम लिया.. एक गजब की कशिश थी शीला के अंदाज में.. शीला के चुंबन से संजय जबरदस्त गरम हो गया.. और आक्रामकता से चार्ली के स्तनों को आटे की तरह गूँदने लगा..
शीला ने चार्ली की दोनों जांघों को जरूरत के हिसाब से चौड़ा किया.. और इसकी गोरी जांघों को चाटने लगी.. संजय का सख्त लंड देखकर उस खूँटे को अपनी चुत में महसूस करने की अदम्य इच्छा हो रही थी शीला के मन में.. पर संजय के लंड के मजे तो वो जब चाहे ले सकती थी.. उसने चार्ली की चुत का अब करीब से निरीक्षण किया.. उसकी गुलाबी क्लिटोरिस को अपनी उंगली से कुरेदा.. होंठों को अलग किया.. और फिर चार्ली की गांड के नीचे तकिया सटा दिया.. चार्ली की चूत वडापाँव की तरह उभर कर बाहर आ गई..
शीला ने पहले तो चार्ली की पूरी चूत को अपने मुंह में भरकर देखा.. चार्ली की आँखें बंद हो गई और उसकी कमर ऊपर उठ गई..
"Ohhh my...you are sucking so good..suck my cunt very hard, Shila..Ohh yes..ohh no..yeah..right there..yes yess..aaahhh!!" चार्ली की इन आवाजों से पूरा कमरा गूंज उठा.. कमर को उठाकर शीला डोगी स्टाइल में सेट होकर चार्ली की चूत चाटने लगी..
जब वह चाटने में व्यस्त थी तब संजय उठकर शीला के पीछे से आया और उसके गोलमटोल चूतड़ों को चौड़ा कर शीला की गांड और चूत के छेद का निरीक्षण करने लगा.. अपने चूतड़ों पर मर्दाना हाथ का स्पर्श पाते ही शीला की गांड थिरकने लगी.. गोल गोल क्लॉकवाइज़ घुमाने लगी.. अपनी सास के बादामी रंग के गांड के छेद को देखकर संजय को वैशाली के छेद की याद आ गई.. माँ बेटी दोनों के गांड के छेद बिल्कुल एक जैसे ही थे..
वैशाली के विचारों को अपने दिमाग से निकालकर संजय ने शीला की गांड के उस टाइट छेद में.. अपनी गीली उंगली डालने का प्रयास किया.. बेहद टाइट था वो होल.. !! और क्यों न हो!! मदन के जाने के बाद किसी ने शीला के इस छेद को छेड़ा नही था.. !! अपनी गांड में घुसी दामदजी की उंगली आनंद दे रही थी शीला को.. चार्ली से किस कर रही शीला ने उसे मुक्त किया और बोली
"संजय बेटा.. उंगली छोड़.. अंगूठा डाल.. बड़ी तेज खुजली हो रही है अंदर" शीला की इस बात से उत्साहित होकर संजय ने अंगूठा अंदर डाल दिया.. अंगूठा अंदर घुसते ही शीला बेकाबू हो गई और उसने चार्ली की चूत में एक साथ तीन उँगलियाँ डाल दी..
"Ohh my god...it is paining..please remove the fingers, Shila!!" चार्ली की फट गई.. शीला ने उसकी चूत से एक उंगली निकाली और उसकी गांड में डाल दी.. चार्ली की चुत चाटते हुए शीला उसकी नाभि तक पहुँच गई.. और उसके सपाट पेट के गोरे हिस्सों को चाटने लगी.. वह और ऊपर की तरफ आई.. अब दोनों के स्तन एक के ऊपर एक हो गए थे.. निप्पलों के बीच छेड़खानियाँ हो रही थी.. शीला की वासना ज्वार की लहरों की तरह उछलने लगी.. शीला की भरावदार छाती के तले चार्ली के छोटे स्तन दबकर रह गए.. इतना अद्भुत सीन था की देखते ही किसी का भी पानी छूट जाए..
शीला के तंदूरस्त स्तनों का सौन्दर्य.. और चार्ली के जवान सख्त उरोज जब एक हो जाएँ.. तो कितना अनोखा द्रश्य होगा!! संजय ने अब दूसरे हाथ का अंगूठा भी शीला की गांड में डाल दिया था.. दर्द और आनंद के मिश्रण से शीला की गांड गोल गोल घूम रही थी.. शीला फिर से नीचे की ओर आई और अपनी जीभ से चार्ली की नाजुक चुत को टटोलने लगी.. चार्ली की चुत काफी तंग थी.. ज्यादा इस्तेमाल नही हुई थी शायद.. हाथ ऊपर ले जाकर शीला उसके सख्त उरोजों को मसल रही थी.. चार्ली ने भी उत्तेजना से शीला के हाथों को पकड़कर अपने स्तनों आर दबाए रखा था.. संजय अपनी सासुमा के पीछे के छेद को कुरेदने में व्यस्त था.. अपनी सास के इस खास अंग को बड़ी उत्सुकता और उत्तेजना से देखते हुए संजय का लंड झटके कहा रहा था.. इतना सख्त हो चुका था की संजय से रहा नही जा रहा था..
दोनों अंगूठे बाहर निकालकर संजय ने अपने सुपाड़े पर थोड़ा सा थूक लगाया और टोपे को शीला की गांड के छेद पर टीका दिया.. थोड़ी देर तक सुपाड़े से छेद को रगड़ने के बाद उसने बिल्कुल मध्य में रखकर दबाया..
शीला: "आह्ह बेटा.. नही जाएगा अंदर.. !!" संजय ने फिर से थोड़ा सा दबाव दिया.. बड़ी मुसीबत से केवल उसका आधा सुपाड़ा छेद के अंदर जा पाया.. शीला का पूरा बदन कांपने लगा "ओह बेटा.. निकाल दे बाहर.. और आगे डाल दे.. ज्यादा मज़ा आएगा" शीला कराहने लगी
संजय ने एक न सुनी और थोड़ा सा और दबाया.. इस बार उसका टमाटर जैसा सुपाड़ा टाइट छेद के अंदर चला गया
शीला: "संजु.. आह्ह.. मर गई बेटा.. बहोत दर्द हो रहा है मुझे.. प्लीज बाहर निकाल ले"
संजय: "ओहह मम्मी जी.. कितनी टाइट और मस्त है आपकी गांड.. मेरे लंड पर जबरदस्त दबाव बना रहा है आपका छेद.. बहोत मज़ा आ रहा है.. प्लीज एक बार मुझे आपकी गांड मार लेने दीजिए.. जब जब आपके गदराए जिस्म की याद आती थी तब तब मैं वैशाली की गांड मारकर अपनी इच्छा को शांत कर लेता था.. प्लीज आज मना मत करना.. आपकी चूत से ज्यादा तो गांड में गर्मी है मम्मी जी.. ओहहह आह्ह.. " काफी दबाने के बाद मुश्किल से आधा ही लंड घुसा पाया अंदर
शीला को अब जबरदस्त दर्द हो रहा था.. ए.सी. कमरे में भी उसके पसीने छूट रहे थे..उसके दोनों लटकते हुए स्तन चार्ली के घुटनों से टकरा रहे थे.. शीला ने चार्ली की चुत चाटना छोड़कर अपनी गांद के दर्द पर ही ध्यान केंद्रित किया.. चार्ली शीला के नीचे से निकल कर बाहर आई और सीधे जॉन के पास पहुँच गई.. जॉन तो केवल दर्शक बनकर यह सारा खेल देख रहा था.. संजय और शीला की इस असाधारण मुहिम को बड़ी ही दिलचस्पी से देख रहा था.. धीरे धीरे उसका लंड हरकत करने लगा.. आधे-सख्त हुए उस लंड को चार्ली ने पकड़कर कहा "John, fuck me now.. Shila sucked my cunt really good..I enjoyed like never before..Now I need a cock deep in my pussy..please fuck me hard" कहते हुए वह जॉन के लंड को चूसकर पूरा सख्त करने में जुट गई.. दो ही मिनट में जॉन का लंड कडा हो गया..
चार्ली अब नीचे लेट गई और बोली "Don't waste time..now climb on me..and fuck the shit out of my pussy"
जॉन ने चार्ली के पास से हटकर खड़ा हो गया और बिस्तर पर आ गया.. संजय अपना आधा लंड शीला की गांड में डालकर दर्द कम होने का इंतज़ार कर रहा था.. घोड़ी बनी शीला के नीचे जॉन संभलकर घुस गया और शीला के नीचे अपने आपको सेट कर लिया.. धीरे से उसने अपने लंड को नीचे से ही शीला की चूत के छेद पर सेट किया.. और अपनी कमर उठाकर एक धक्का लगाया.. शीला की चूत तो कब से बेकरार थी.. लंड को एक पल में ही निगल गई.. !!!
दो दो लंडों के एक साथ हुए हमले से शीला उत्तेजित हो गई.. सिर्फ ब्लू-फिल्मों में ही देखे इस द्रश्य को आज वह वाकई अनुभावित कर रही थी.. संजय अभी भी स्थिर था.. लेकिन जॉन ने नीचे से हुचक हुचक कर शॉट लगाने शुरू कर दिए थे.. चिपचिपे भोसड़े में लंड का स्पर्श इतना सुहाना लग रहा था की शीला सिहरने लगी.. चार्ली भी अब बेड पर आ गई.. और शीला की पीठ पर सवारी करते हुए वह संजय के बिलकूल सामने आ गई.. और संजय को चूमने लगी.. लिप किस करते हुए संजय चार्ली के स्तनों को भी दबाने लगा था.. दबाते हुए वह इतना गरम हो गया की उसने एक जोरदार धक्का लगाते हुए अपना पूरा लंड शीला की गांड में घुसेड़ दिया !!!
शीला: "ओहह माँ.. मर गई.. फट गई मेरी तो.. बाहर निकाल संजय.. ऊईई माँ.. !!" शीला को एक पल के लिए ऐसा लगा की उसकी जान ही निकल गई थी.. इतना दर्द हो रहा था.. लेकिन संजय और जॉन.. शीला की चीखो को नजर अंदाज करते हुए ऐसे शॉट लगा रहे थे जैसे शीला की इस ट्रिप को यादगार बना देना चाहते हो.. एक साथ दो दो जानदार लंडों से युद्ध खेल रही शीला को शुरुआत में भयंकर दर्द हुआ.. पर धीरे धीरे गांड की मांसपेशियाँ ढीली पड़ने लगी और दर्द काम होते ही उसे मज़ा आने लगा.. नीचे चूत में हो रही अंधाधुन चुदाई से मिल रहे आनंद के कारण भी उसका दर्द कम हो रहा था
दोनों लंड एक साथ अंदर डालना कठिन था.. जब संजय गांड में डालता तब जॉन चूत से बाहर निकालता और जब उसके अंदर डालते ही संजय खींच लेता.. एक अनोखी लय बना ली थी दोनों ने शीला को चोदते हुए.. एक उस्ताद तबलची जैसे दोनों तबलों को लय और सुर में एक साथ बजाता है वैसे ही अनुभवी शीला इन दोनों मर्दों के दमदार हथियारों को अपने दोनों छेदों में लेते हुए मस्त होकर चुद रही थी..
शीला की गांड मारते हुए संजय.. शीला पर घोड़ी बनकर बैठी हुई चार्ली की निप्पलों को चूस रहा था.. चूसचूसकर उन गुलाबी निप्पलों का रंग लाल हो गया था.. चार्ली के स्तनों पर कई जगह संजय के काटने से निशान भी पड़ गए थे.. शीला के नीचे लेटा हुआ जॉन.. आगे पीछे हो रही शीला के हिल रहे मदमस्त चूचों को बस देखता ही जा रहा था.. दोनों हाथों से उन स्तनों को पकड़ना मुमकिन नही था.. इतने गदराए मांसल बड़े बड़े स्तनों को अपने ऊपर झूलता हुआ देख वह वासना की आग में अपने आप को समर्पित कर रहा था
सासुमाँ की चूत चोदने का ख्वाब देख रहे संजय को चुत से पहले उनकी गांड मिल गई.. अपने आप को खुशकिस्मत समझ रहा था वोह.. वैशाली की जब गांड मारने की वह कोशिश करता तब उसे मनाने में ही एक घंटा निकल जाता.. तकिये पर उसका मुंह दबाकर फिर गांड में डालना पड़ता वरना उसकी चीखें सुनकर पूरा मोहल्ला इकठ्ठा हो जाने का डर रहता.. अंदर डालने के बाद एक मिनट से ज्यादा मारने नही देती थी वैशाली.. और एक बार गांड मारने के बाद तीन से चार दिन तक अपने नजदीक भी नही आने देती थी.. और उसकी माँ को देखो.. खुशी खुशी एक साथ गांड और चूत मरवा रही है.. !!
शीला: "अब दर्द एकदम कम हो गया.. जरा जोर से धक्के मार.. आज तो फाड़ ही दे मेरी.. बहोत मज़ा आ रहा है मुझे.. छील रही है मेरी गांड फिर भी मज़ा आ रहा है.. आह्ह ओहह देख क्या रहा है भड़वे.. चोद मेरी गांड.. लगा ताकत!! इतना जल्दी थक गया क्या साले!!" ऑर्गजम करीब आते ही शीला हिंसक होने लगी.. वह ढीले धक्कों को बर्दाश्त नही कर पा रही थी.. नाव को किनारे पर पहुंचना हो तो पतवार तेज लगानी पड़ती है.. थका हुआ माँजी की नाव को किनारे नही लगा सकता..
"ओहह मम्मी जी.. मेरा निकलने को है.. " संजय ने अपना इस्तीफा तैयार कर लिया.. शीला के कूल्हों से संजय की जांघें टकराकर पक्क पक्क की मस्त आवाज़े आ रही थी.. इतना ही नही.. नीचे से धक्के लगा रहे जॉन और संजय के गीले आँड टकराने से भी आवाज आ रही थी.. शीला की गांड में अचानक गरम गरम लावारस छूटा.. संजय ने धक्के लगाना बंद कर दिया.. और एक आखिरी बार जोर लगाते हुए अपने लंड को शीला की गांड की खाई में गाड़ दिया.. संजय ठंडा हो गया.. लेकिन शीला अभी भी पाँवभाजी के तवे की तरह गरम थी..
एक साथ दो तंदूरस्त जानदार लंड के धक्के खाते हुए शीला की हवस उफान पर चढ़ी हुई थी.. उसने कभी नही सोचा था की बी.पी. में देखी हुई हरकतें उसे वाकई अपने जिस्म के साथ करने का मौका मिलेगा.. शीला के भोसड़े की गर्मी से जॉन का लंड ढीला पड़ने लगा था.. उसके धक्कों में अब जान नही बची थी.. गांड में वीर्यस्त्राव हो जाने के बाद वह छेद एकदम लसलसित हो गया था.. संजय अपने आधे मुरझाए लंड से भी आसानी से धक्के लगाए जा रहा था.. शीला भी अपने दामाद के संग गोवा की इस ट्रिप का पूरा लाभ उठा रही थी..
एक घंटे के भीषण एनकाउंटर के बाद.. कमरे में सन्नाटा छा गया था.. जॉन और संजय लाश की तरह बिस्तर की एक तरफ पड़े हुए थे.. चार्ली नाम की चिड़िया.. शीला की पुख्त भुजाओं में सिमटकर छोटे बच्चे की तरह आराम से सो रही थी.. शीला की गांड में जलन हो रही थी.. नजदीक पड़े सिगार का पैकेट खोला तो वह खाली था.. शीला ने.. अकेले ही.. अपने बलबूते पर.. जॉन, संजय, चार्ली और सिगार.. सब को खाली कर दिया था.. आराम करते हुए एकाध घंटा और बीत गया..