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शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

रेणुका: "मुझसे तो अब रहा ही नहीं जाता शीला.. आधी रात न हो चुकी होती तो में तब के तब यहाँ तेरे पास आ जाती.. कितना सहती रहूँ? हफ्ते बाद लौटूँगा कहकर वो तो निकल पड़े.. पर पूरा हफ्ता मैं कैसे निकालूँ?? कितनी तकलीफ होती है हम बीवियों को.. मर्दों को इसका अंदाजा तक नहीं है"

रेणुका के शब्दों में अपने दर्द की झलक नजर आई अनुमौसी को.. शीला अब सही मौके के इंतज़ार में थी.. पर वो हर कदम फूँक फूँक कर रखना चाहती थी.. ताकि कोई गड़बड़ न हो.. अपने मन में वो सेक्स की शतरंज बिछा रही थी..

अनुमौसी: "अरे शीला.. आज रसिक नहीं आया दूध देने.. तेरे घर आया था क्या?"

तभी शीला को ये एहसास हुआ की आज रसिक नजर ही नहीं आया..

तभी दरवाजे की घंटी बजी..

"कौन होगा?? मैं देखती हूँ.. " कहते हुए शीला ने उठकर दरवाजा खोला.. इस आशा में की रसिक होगा.. पर रसिक के बदले उसकी पत्नी रूखी थी..

शीला: "रूखी तू यहाँ? तेरा मरद कहाँ मर गया है आज?? आठ बज गए पर दूध का कोई ठिकाना ही नहीं.. " रूखी के मदमस्त चुचे देखते हुए शीला ने कहा


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रूखी बिंदास दूध लेकर बरामदे में बैठ गई.. उसे ये पता नहीं था की अंदर दो औरतें बैठी हुई थी..

रूखी: "सुनिए तो सही भाभी.. मैं सब जगह दूध देकर आखिर में आपके घर आई हूँ.. ताकि दो घंटे बैठ सकूँ.. और हाँ भाभी.. जीवा अभी आता ही होगा थोड़ी देर में.. "

शीला: "क्यों रसिक.. मतलब की तेरा पति.. घर पर नहीं है क्या??"

रूखी: "वो मेरे सास ससुर को लेकर दूसरे शहर गया है दो दिन के लिए.. इसलिए कल रात को मैंने जीवा को अपने घर बुला लिया था.. पूरी रात सोने नहीं दिया कमीने ने मुझे.. "

रेणुका और अनुमौसी ये सारी बातें सुन रही थी.. पर शीला को इसकी कोई परवाह न थी.. उसने अपनी बातें जारी रखी..

शीला: "रात को तूने निपट लिया है ना.. फिर उसे यहाँ क्यों बुलाया??" रूखी के स्तनों पर हाथ फेरते हुए उसने कहा

रूखी: "भाभी.. मैं मिल बांटकर खाने में मानती हूँ.. मुझे सबसे पहले आपकी याद आई.. आपका दुख मुझसे देखा नहीं जाता.. मैंने जीवा को यहाँ आने के लिए कहा.. तो उसने मुझे ही यहाँ भेज दिया और कहा की वो नौ बजे आएगा"

जीवा का नाम सुनते ही शीला के भोसड़े में.. ऐसी सुरसुरी होने लगा.. जैसे मिर्ची-बम जलाने पर उसकी मुछ जलकर आवाज करती है.. रूखी ने शीला को अपनी बाहों में लेकर दबा दिया.. दोनों के माउंट एवरेस्ट जैसे उत्तुंग स्तनों आपस में भीड़ गए.. शीला ने रूखी की विशाल मांसल पीठ पर हाथ फेरते हुए उसके होंठों को चूम लिया.. और रूखी के मुंह में अपनी जीभ डालकर जीवहा-चोदन करने लगी.. रूखी शीला के उत्तेजक स्पर्श से मदमस्त होने लगी..

दो मिनट के इस सॉफ्ट रोमांस के बाद शीला ने रूखी को मुक्त कर दिया.. और फिर घर में हाजिर दोनों औरतों के बारे में रूखी को सबकुछ बता दिया.. पहले तो रूखी थोड़ी सी हिचकिचा रही थी.. पर शीला ने उसे मना ही लिया

शीला रूखी को अंदर ड्रॉइंगरूम में ले आई.. अनुमौसी को देखकर रूखी थोड़ी डर गई पर शीला ने रूखी की पहचान रेणुका से करवाते हुए.. रूखी के पल्लू को खींचकर हटा दिया.. और उसके बड़े बड़े दूध भरे स्तनों को उजागर कर दिया..


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"मौसी, इसका ढाई महीने का बच्चा है.. डिलीवरी के बाद देखो इसका रूप कैसे खिल गया है!!" शीला ने कहा

ब्लाउस के अंदर मुश्किल से दबाए हुए उन दूध भरे स्तनों को अनुमौसी और रेणुका स्तब्ध होकर देखते ही रहे.. और ब्लाउस की दोनों नोक पर सूखे हुए दूध के निशान देखकर.. दोनों की सिसकियाँ निकल गई..

सबसे पहले अनुमौसी खड़ी हुई.. रूखी के एक स्तन को अपने हाथ में पकड़कर बोली "रूखी, कैसा है बच्चा तेरा? ठीक तो है ना?? तू दूध तो ठीक से पिलाती है ना उसे? कितना दूध आता है तेरा? ज्यादा ही आता होगा.. इसलिए इतने भारी भारी है तेरे.. मेरी कविता को तकलीफ होगी जब उसे बच्चा होगा तब.. इतने छोटे छोटे है उसके"

रूखी के दूध भरे स्तन को पकड़कर अनुमौसी ने अपनी इच्छा जाहीर कर दी थी.. पर अभी भी वो खुलकर कुछ बोल नहीं रही थी इसलिए शीला और रेणुका द्विधा में थे.. शीला से अब और रहा न गया..

शीला: "मौसी, रूखी के बबले आपके जीतने ही बड़े है.. है ना!!" शीला ने बेझिझक अनुमौसी के अनुभवी स्तनों को पकड़ लिया..

अनुमौसी: "अरे मरी बेशरम.. क्या कर रही है तू??"

शीला: "सीधी बात है मौसी.. या तो आप हम सब के साथ जुड़ जाइए.. या फिर यहाँ से चले जाइए.. हम सब यहाँ एक ही मंजिल के लिए इकठठे हुए है.. मैं और रेणुका तो बिना पति के तड़प रहे है इसलिए ये सब करना पड़ रहा है.. अभी ये रूखी का दोस्त जीवा यहाँ आएगा.. और हम सब बारी बारी से उसके साथ करेंगे.. आपको भी करवाना हो तो हमें कोई दिक्कत नहीं है.. पर अगर ये सब आपको नहीं पसंद तो प्लीज आप जा सकते हैं.. हमें हमारी ज़िंदगी जीने के लिए छोड़ दीजिए.." बड़े ही सख्त शब्दों में शीला ने अनुमौसी की क्लास ले ली.. इस दौरान शीला का हाथ अनुमौसी के ब्लाउस के अंदर उनकी गेंदों को मसल रहा था..


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अनुमौसी स्तब्ध होकर शीला को सुनती रही.. शीला का इशारा मिलते ही रेणुका ने आकर अनुमौसी के दूसरे स्तन को पकड़ लिया और मौसी का हाथ पकड़कर बड़े ही कामुक अंदाज में बोली "मौसी, मेरे भी दबाइए ना!!"

इस दोहरे आक्रमण ने अनुमौसी को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया.. उन्होंने भी रेणुका के स्तन दबाने शुरू कर दिए.. और साथ ही साथ एक हाथ शीला के मस्त खरबूजों पर रख दिया.. इसी के साथ अनुमौसी भी हवस बुझाओ अभियान में आधिकारिक तौर पर जुड़ गई..

शीला ने खुश होकर अनुमौसी को अपनी बाहों में भर लिया.. रेणुका मौसी की साड़ी खींचकर उतारने लगी.. मौसी की आँखें शर्म से बंद हो गई.. रूखी अब हौले से मौसी के करीब आई और अपना ब्लाउस उतार कर फेंक दिया.. इन चारों औरतों में केवल रूखी ही कमर के ऊपर से नंगी खड़ी थी.. उसके दो मटकियों जैसे बड़े स्तन देखकर तीनों की आँखें फटी की फटी रह गई..

रूखी ने मौसी के घाघरे के नाड़ा खींच निकाला.. और मौसी को नीचे से नंगा कर दिया.. शर्म से पानी पानी हो रही अनुमौसी अब कुछ विरोध नहीं कर सकी क्योंकी उन्होंने खुद ही सहमति दी थी। शीला और रेणुका ने रूखी का एक एक स्तन आपस में बाँट लिया और निप्पल चूसने लगी.. चूसते हुए उन्होंने रूखी का घाघरा उतारकर उसे पूरा नंगा कर दिया.. पूरा कमरा सिसकियों से गूंज रहा था..

तभी डोरबेल बजने की आवाज आई.. शीला ने तीनों को चुपके से बेडरूम में घुस जाने को कहा.. अपने कपड़े ठीक किए और दरवाजे के की-होल में से बाहर देखने लगी.. एक हाथ से ब्लाउस के हुक बंद करते हुए उसने देखा तो बाहर जीवा और रघु खड़े थे.. शीला ने तुरंत दरवाजा खोल दिया और दोनों को अंदर खींचकर तुरंत बंद कर दिया। जीवा और रघु दोनों को बारी बारी बाहों में लेकर शीला ने उन्हे चूमते हुए उनके लंड दबा लिए..

"कहाँ मर गए थे तुम दोनों?? कितना याद करती थी मैं तुम्हें?" जीवा और रघु शीला के स्तनों को ऊपर से मसल रहे थे

जीवा: "अरे भाभी.. आपको तो रोज याद करते हुए मैं लंड हिलाता हूँ.. हम इंतज़ार में थी की आप कब बुलाती हो.. पर आपने तो कभी कॉल ही नहीं किया.. इसलिए फिर मैंने रूखी से बोलकर यहाँ आपके घर मिलने का तय किया"

"चलो कोई बात नही.. आज पूरा दिन आराम से यहीं रहना है तुम दोनों को.. और मेरी सहेलियों को भी चोदना है.. बहुत गरम हो रही है सब की सब.. मेरी तरह.. तुम दोनों आज बेझिझक मजे करो यहाँ.. और हाँ.. उन सहेलियों में.. एक अनुमौसी नाम की बूढ़ी रांड भी है.. उसे बहुत खुजली है लोडा लेने की.. आज उसके बूढ़े भोसड़े की धज्जियां उड़ा देनी है.. समझे.. !!!"

रघु: "अरे भाभी.. बुढ़िया को क्यों बुलाया.. कोई कडक जवान माल हो तो बताओ.. बुढ़िया के ढीले भोसड़े में भला क्या मज़ा आएगा??"

शीला: "अबे भोसडी के.. जितना कहा गया है उतना कर.. ज्यादा ज्ञान मत चोद.. समझा.. वरना गांड पर लात मारकर घर के बाहर फेंक दूँगी.. और सुन.. आज के दिन अगर तेरा लंड मुरझाया.. तो समझ लेना.. तेरी मर्दानगी की नीलामी करवा दूँगी.. " कहते हुए शीला ने दोनों की चैन खोलकर उनके लंड बाहर निकाले.. बाम्बू की तरह सख्त डंडे शीला को सलामी देने लगे..

दो दो तगड़े लंड देखते ही शीला के तो मजे हो गई.. वह घुटनों के बाल बैठी गई और एक के बाद एक दोनों लंड को प्यार से चूसने लगी.. अपनी लार से लसलसित कर दोनों लंड को ऐसे लाचार कर दिया जैसे महीने के आखिरी दिनों में तनख्वाह की प्रतीक्षा करता कर्मचारी लाचार होता है। उन दोनों ने शीला को मादरजात नंगा कर दिया और उसके बबले दबाने लगे.. कामातुर शीला खड़ी हो गई.. जीवा और रघु के लंड को हाथों से पकड़कर खींचते हुए बेडरूम तक ले गई.. दो अनजान नंगे मर्दों को देखकर.. अनुमौसी को फिरसे शर्म का अटैक आ गया..

रेणुका जीवा के मजबूत और विशाल लंड को ललचाई नज़रों से देख रही थी.. वाह.. क्या लंड है यार!! मेरे पति के लंड से तीन गुना लंबा और मोटा है.. इतना बड़ा मेरी चुत के अंदर कैसे जाएगा भला.. !!

रूखी के स्तनों को सहलाते हुए मौसी ने अपनी चुत पर भी हाथ फेरना शुरू कर दिया था.. शीला जब बाहर के कमरे में जीवा और रघु के लंड की चुसाई करते हुए तैयार कर रही थी.. उस दौरान बेडरूम में रेणुका और रूखी ने अनुमौसी को चूम चाटकर बेहद गरम कर दिया था। रेणुका ने मौसी की झांटों भरी भोस पर जीभ फेरते हुए मौसी की वासना को तीव्रता से भड़का दिया था..

जीवा अनुमौसी के पास गया और उनको कंधों से पकड़कर नीचे बिठाया.. अपना मुसलदार लंड मौसी के मुंह के आगे झुलाने लगा.. इतना विकराल लंड देखकर अनुमौसी को एक पल के लिए चक्कर सा आ गया.. रूखी ने रघु का लंड मुठ्ठी में भर लिया.. और उसका लाल सुपाड़ा रेणुका ने मुंह में ले लिया.. रूखी के स्तनों से दूध टपकने लगा था.. जीवा ने जबरदस्ती अनुमौसी का मुंह खुलवाया और अपना लंड अंदर घुसाने लगा.. मौसी भी पूर्ण तरीके से उत्तेजित हो चुकी थी.. और समझ भी गई थी की अगर वो शरमाती रही तो उनका ही भोसड़ा भूखा रह जाएगा.. भाड़ में जाएँ सारी शर्म.. इधर भोस में आग लगी हो तब काहे की शर्म!!

अनुमौसी ने जीवा के लंड का अपने मुंह में स्वागत किया और लगातार २० मिनट तक चूसती ही रही.. इतना रसीला लंड उन्होंने पूरी ज़िंदगी में नहीं देखा था.. बहोत भूखी थी बेचारी.. जीवा को तो मज़ा ही आ गया.. तभी रघु भी वहाँ आ गया और अनुमौसी के गाल पर अपना लंड थपथपाने लगा.. उफ्फ़.. एक साथ दो दो लंड सामने आ जाने से मौसी ने अपनी गांड उचक कर जांघों को भींच दिया.. जीवा का लंड मुंह से बाहर निकाला.. और बोली "उफ्फ़ शीला.. अब कुछ कर मेरा.. नीचे आग लग गई है.. रहा नहीं जाता.. उईई माँ.. ऐसे लंड मैंने जीवन में पहली बार देखे है.. हाय... आह्ह!! ऊपर वाला भला करे तेरा शीला.. के तूने मुझे आज.. " आगे के शब्द निकले ही नहीं मौसी के मुंह से

शीला ने पास पड़ा प्लास्टिक का झाड़ू उठाया और उसका हेंडल पीछे से अनुमौसी की भोस में घुसेड़ दिया..

"ऊहह माँ.. क्या डाल दिया तूने अंदर.. घोड़े के लंड जितना मोटा है ये तो.. पर अच्छा लग रहा है.. कुछ तो गया अंदर.. उस कमीने चिमनलाल के तीली जैसे लंड के मुकाबले लाख गुना अच्छा है.. आहह.. डाल जोर से शीला.. और जोर से आहह.. आह्ह.. आहह.. " रेणुका की चुत में तीन उँगलियाँ डालकर अंदर बाहर करते हुए, अनुमौसी अपने भोसड़े में घुसे झाड़ू का पूरा आनंद लेने लगी.. रेणुका भी इस अंगुली-चोदन से मस्त हो गई.. और जीवा के आँड मुठ्ठी में पकड़कर दबाते हुए झुकी.. और अनुमौसी के दाने को चूम लिया.. "आह्ह रेणुका.. मज़ा आ गया.. ऐसा मज़ा तो ५० वर्ष के जीवन में पहली बार आया.. ओहहह!!"

जीवा ने अनुमौसी को बिस्तर पर सुला दिया.. उनके भोसड़े से झाड़ू निकाला.. उनके दोनों पैर अपने कंधों पर ले लिए.. और उनके ढीले भोसड़े के सुराख पर अपना तगड़ा लंड का सुपाड़ा रखकर एक जबरदस्त धक्का दिया.. मौसी का पूरा भोसड़ा एक ही पल में जीवा के लंड से भर गया.. जैसे बोतल के छेद में ढक्कन घुसेड़कर बंद कर दिया हो.. मौसी की बूढ़ी चुत ने पहली बार इतना बड़ा आकार अपने अंदर महसूस किया था..


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"ओ माँ.. शीला.. इसे बोल की बाहर निकाल दे.. बाप रे.. मुझे नहीं करवाना है.. छोड़ दो मुझे.. हाय मर गई मैं तो.. मेरा दिमाग खराब हो गया था जो मैं इधर आई.. छोड़ दे मुझे हरामी.. " पर जीवा कहाँ सुनने वाला था.. !! अनुमौसी की उसने एक ना सुनी.. और तेज गति से लंड के धक्के लगाने लगा..

दूसरी तरफ रघु रेणुका को घोड़ी बनाकर पीछे से शॉट लगा रहा था.. रेणुका ऐसे ही मजबूत लंड को तरस रही थी.. रघु के लंड से चौड़ी हो चुकी उसकी चुत के खुशी का कोई ठिकाना न था.. उसके मस्त बोबले, लंड के धक्कों के साथ, लयबद्ध तरीके से हवा में झूल रहे थे.. इस दौरान शीला और रूखी 69 पोज़िशन में एक दूसरे की चुत चाट रहे थे.. दूसरी तरफ जीवा अनुमौसी की घमासान चुदाई करते हुए उनके लटके हुए स्तनों को आटे की तरह गूँद रहा था.. अद्भुत काम महोत्सव चल रहा था शीला के बेडरूम में.. रूखी के विशाल स्तनों से दूध की धराएं शीला के पेट पर टपक रही थी.. वही दूध शीला की चुत की फांक से गुजरकर बिस्तर पर पड रही थी

अपने यार जीवा द्वारा की जा रही जबरदस्त चुदाई को देखकर रूखी खुश हो गई.. जीवा के देसी विकराल लंड की ताकत पर ये शहरी औरतें आफ़रीन हो गई थी.. कुतिया बनकर रघु से चुदवा रही रेणुका को देखकर.. जीवा से चुद रही मौसी और गरम हो रही थी.. रेणुका की गीली पुच्ची में रघु का लंड ऐसे अंदर बाहर हो रहा था जैसे ऑइल लगे इंजन में पिस्टन आसानी से अंदर बाहर होता है.. इतना अवर्णनीय आनंद रेणुका ने पहली बार महसूस किया था.. उसका भोसड़ा तृप्त होता जा रहा था.. जीवा मौसी के भोसड़े में इतनी तेजी से अंदर बाहर कर रहा था की लगता था कभी चिंगारियाँ निकालने लगेगी..


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शीला के मुंह से अपनी चुत झड़वाकर रूखी खड़ी हो गई.. और रघु से घोड़ी बनकर चुद रही रेणुका के मुंह में बारी बारी से दोनों निप्पल देकर.. अपना दूध मुफ़्त में पिलाने लगी.. और अपने स्तनों का भार हल्का करने लगी.. शीला अपनी क्लीनशेव चुत को रूखी के पुरातत्व खाते के किसी अपेक्षित अवशेष जैसी.. काले झांटों से भरपूर भोसड़े पर रगड़ने लगी.. दोनों की क्लिटोरिस एक दूसरे से रगड़ खाते हुए जबरदस्त आनंद दे रही थी.. साथ ही साथ शीला अपने अंगूठे से रूखी की क्लिटोरिस को घिस रही थी..

शीला की गुलाबी निप्पल को मुंह में लेकर काटते हुए रूखी ने अपनी असह्य उत्तेजना की घोषणा कर दी.. पूर्ण उत्तेजित स्त्री को देखना.. अपने आप में एक बड़ा अवसर है.. अनुमौसी ने पहली बार दो स्त्रियों को इस तरह संभोगरत देखा था.. अब तक वो यही सोचती थी की चुत की आग या तो लंड से बुझती है या फिर मूठ लगाने से.. !! दो स्त्री आपस में भी अपनी आग बुझा सकती है इसका उन्हे पता ही नहीं था.. सालों से एक ही भजन आलाप रही अनुमौसी को आज एक नया राग मिल गया..

मौसी दो बार झड़ चुकी थी.. उनकी विनती पर जीवा ने अपना लंड बाहर निकाला.. वो अबतक झड़ा नहीं था.. चुदकर तृप्त हो चुकी मौसी ने शर्म त्याग कर रूखी के नंगे स्तन को पकड़कर दबाया.. रूखी ने मौसी के हाथ को और जोर से अपने स्तन के साथ रगड़कर उनका दूसरा हाथ अपनी चुत पर रखवा दिया.. रूखी का "अत्यंत ज्वलनशील" भोसड़ा.. चुत की गंध वाला प्रवाही छोड़ने लगा था.. अनुमौसी की चुत ठंडी हो चुकी थी.. वो गरम सांसें छोड़ते हुए अपना भूतकाल याद कर रही थी.. इतने लंबे वैवाहिक जीवन में, चिमनलाल ने कभी उन्हे ऐसे तृप्त नहीं किया था.. चिमनलाल से वो इस कदर परेशान थी की मन ही मन नफरत करने लगी थी.. तंग आ गई थी..

जीवा और रघु ने अब रेणुका को रिमांड पर ले रखा था.. नए बॉलर को जिस तरह निशाने पे रखकर बल्लेबाज छक्के लगाता है.. उसी तरह जीवा और रघु ने रेणुका को इतनी बेरहमी से चोदा की रेणुका पस्त हो गई.. मदमस्त हो गई.. जीवा के प्रत्येक धक्के से रेणुका सातवे आसमान पर उड़ने लगती थी.. उसके गोरे गोरे बोब्बे को अपने खुरदरे मर्दाना हाथों से रघु मसल रहा था.. उस दौरान जीवा अपने गन्ने जैसे लंड से रेणुका की चुत का भोसड़ा बना रहा था.. शीला और रूखी, जीव और रघु के दमदार लंड को बड़े ही अहोभाव से देख रही थी.. वह दोनों एक दूसरे के आलिंगन में लिपटकर अपनी चुत खुजा रही थी..


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जीवा के दमदार धक्कों से रेणुका अनगिनत बार स्खलित हो गई थी.. जितनी बार वो स्खलित होती तब वह अपनी कमर को बिस्तर से एक फुट ऊपर उठा लेती.. और तभी जीवा रेणुका की कमर को मजबूती से पकड़कर बिस्तर पर फिर से पटक देता और चोदना जारी रखता.. अपनी मर्दानगी का पूर्ण प्रदर्शन करते हुए.. जीवा अपने अजगर जैसे लंड को रेणुका की चुत में अंदर बाहर करते ही जा रहा था.. रेणुका की चुत और जीवा का लंड ऐसे उलझ गए थे जैसे प्रकृति ने उनका निर्माण एक दूसरे के लिए ही किया हो.. रेणुका की कराहें और सिसकियाँ पूरे कमरे में गूंज रही थी.. मदमस्त होकर रेणुका जीवन के सबसे बेहतरीन आनंद को महसूस कर रही थी.. उसकी हरेक सिसक कामुकता से भरपूर थी..

रेणुका: "ओह्ह जीवा.. मर गई मैं तो.. मज़ा आ गया.. लगा धक्के.. आह्ह उहहह.. ऊई माँ.. ओह्ह शीला.. आज तो मैं धन्य हो गई.. यार.. कितने सालों से मैं ऐसा ही कुछ ढूंढ रही थी.. जबरदस्त है तेरा लंड जीवा.. अंदर तक ठोकर मार रहा है.. उहह उहह.. "

रघु के लंड को लोलिपोप की तरह चूस रही थी मौसी.. शीला और रूखी अपने बलबूते पर ही दो-तीन बार झड़ चुकी थी.. चुद रही रेणुका खुद ही अपने स्तनों को ऐसे मरोड़ रही थी जैसे उन्हे जिस्म से अलग कर देना चाहती हो.. जीवा "पच्च पच्च" की आवाज के साथ कातिल धक्के लगाता जा रहा था.. रेणुका फिर से किनारे पर पहुँचने वाली थी.. अब तो उससे स्खलन भी बर्दाश्त नहीं हो रहा था.. अपने हाथ फैलाकर उसने जीवा के कंधों को पकड़कर अपनी ओर खींच लिया और उसे चूमने लगी.. रेणुका के होंठ चूसते हुए जीवा ने अपनी मजबूत बाहों में भरकर रेणुका को बिस्तर से उठा लिया.. चुत को लंड में घुसाये रखा

जीवा का ये बाहुबली प्रदर्शन देखकर.. रूखी, अनुमौसी और शीला की आह्ह निकल गई..

अनुमौसी: "बाप रे.. देख तो शीला.. इसने तो रेणुका को उठा लिया.. और खड़े खड़े नीचे से पेल रहा है.. इसका लंड तो जिसे मिल जाए उसका जीवन सार्थक बन जाएँ.. सांड जैसी ताकत है इसमें.. देखकर मुझे फिरसे नीचे खुली होने लगी है"


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रेणुका ने अपने दोनों पैरों को जीवा की कमर के इर्दगिर्द लपेट लिया.. चौड़ी चुत में जीवा का लंड अंदर बाहर हो रहा था.. जीवा का आधा लंड अंदर और आधा बाहर था.. जीवा ने रेणुका के कूल्हों को मजबूती से पकड़कर संतुलन बनाए रखा था.. रेणुका की चुत इतनी फैल चुकी थी की हाथ की मुठ्ठी भी आसानी से अंदर चली जाएँ.. जीवा के हर धक्के के साथ रेणुका की चुत का रस जमीन पर टपक रहा था... रेणुका ने अपने दोनों हाथ जीवा की गर्दन पर लपेट लिए थे.. और जीवा के होंठ कामुक अंदाज में चूसते हुए नीचे लग रहे धक्कों का आनंद ले रही थी.. जीवा की छाती से दबकर उसके दोनों स्तनों बगल से झाँकने लगे थे.. जीवा के इस रौद्र स्वरूप को देखकर उत्तेजित हो चुकी शीला और रूखी ने अनुमौसी के भोसड़े पर हमला कर दिया..

रेणुका को उठाकर चोदते हुए जीवा पूरे कमरे में यहाँ वहाँ घूम रहा था.. इतना ही नहीं.. वो चलते चलते किचन में आया.. और मटके से लोटा भरकर पानी निकालकर पीने लगा.. ये सबकुछ वो रेणुका को चोदते हुए ही कर रहा था.. किचन के प्लेटफ़ॉर्म पर पड़ी सब्जियों की टोकरी से जीवा ने एक खीरा उठाया.. और उसे रेणुका की गांड के छेद पर रगड़ने लगा.. रेणुका के दोनों चूतड़ पूरे फैल चुके थे.. खीरा गांड के छेद पर रगड़ते हुए जीवा रेणुका को लेकर वापस बेडरूम में आ गया.. शीला, रूखी और मौसी.. इस रोमांचक फाइनल मेच को देख रहे थे.. जीवा जिस तरह से रेणुका को उठाकर चोद रहा था.. ये अनुमौसी को बेहद पसंद आ गया.. एक बार जीवा से इसी तरह चुदवाने का मन बना बैठी वो..

अनुमौसी खड़े खड़े एकटक जीवा-रेणुका की चुदाई देख रही थी.. तभी रघु चुपके से उनके पीछे गया..उनके चूतड़ फैलाये और अपनी जीभ उनके छेद पर फेर दी..

"उईई माँ.. " मौसी और कुछ नहीं बोली.. रघु ने उनकी गांड से लेकर चुत तक चाटना शुरू कर दिया.. अनुमौसी का शरीर इस चटाई से कांपने लगा था.. रघु आसानी से चाट सके इसलिए वो थोड़ा सा झुक गई.. इसी के साथ रघु की जीभ ने मौसी की गांड में एंट्री मार दी.. जीभ के कुरेदने से मौसी को खुजली होने लगी.. और उन्होंने अपनी तीन उँगलियाँ अपनी चुत में रगड़ना शुरू कर दिया..


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"आह्ह.. ओह्ह.. हाँ रघु.. वही पर.. जरा दाईं तरफ.. हाँ वही.. उईई.. चाट मेरी.. आह्ह रघु.. " रघु उनके चूतड़ों को और फैलाकर जितना हो सकता था उतने अंदर अपनी जीभ घुसाता गया.. उत्तेजीत मौसी ने अपने शरीर को थोड़ा सा और झुकाया.. आज का दिन मौसी के लिए सबसे यादगार दिन बन रहा था..

रेणुका को अपने अलग अंदाज में उछाल उछालकर चोद रहे जीवा ने लंड की साइज़ का खीरा रेणुका की गांड के अंदर घुसाने की कोशिश की.. और बेरहमी से आधा खीरा अंदर घुसा दिया.. रेणुका को इतना दर्द हुआ की वो चिल्लाने लगी.. उसकी चीख को रोकने के लिए जीवा ने उसके होंठों पर अपने होंठ दबाकर उसे चुप करा दिया.. और इशारे से अपनी प्रेमीका रूखी को करीब बुलाया.. अपने स्तन और कूल्हें मटकाती हुई बड़ी ही मादक चाल से चलती रूखी जीवा के करीब आई और रेणुका तथा जीवा दोनों के कूल्हों को सहलाने लगी..

जीवा: "यार रूखी..तू इसकी गांड में उंगली करते हुए मेरे आँड चूस दे.. तेरी मदद के बगैर मेरा लंड झड़ने नहीं वाला.. " वो फिरसे रेणुका के होंठ चूसने लगा

अचानक अनुमौसी चीखने लगी "नहीं नहीं.. मर गई दर्द से मैं तो.. आहह शीला.. तू बोल ना इसे की मेरी गांड से निकाल ले.. मुझे पीछे नहीं करवाना.. बहोत दर्द होता है मुझे.. " सबकी नजर अनुमौसी की ओर गई.. रघु ने झुककर खड़ी मौसी की गांड में एक ही धक्के में अपना लंड घुसा दिया था.. मौसी को दिन में तारे नजर आने लगे.. रघु ने मौसी का जुड़ा खोल दिया और उनके लंबे बालों को खींचकर उन्हे पकड़ रखा था.. मौसी हिल भी नहीं पा रही थी.. रघु ने जोर से बालों के ऐसे खींचा की अनुमौसी की गर्दन ऊपर हो गई और उनकी चीख गले में ही अटक गई.. मौसी अब पूरी तरह से रघु की गिरफ्त में थी.. घोड़ी कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो.. लगाम खींचते ही काबू में आ ही जाती है.. अनुमौसी को पता चल गया था की रघु अपनी मनमानी करके ही रहेगा..

मौसी गिड़गिड़ाने लगी.. "रघु.. प्लीज.. निकाल दे बाहर.. दर्द से मरी जा रही हूँ.. हाथ जोड़ती हूँ तुझे.. आगे के छेद में जितना मर्जी डाल ले तू.. पर पीछे मत कर.. जलन हो रही है.. दया कर मुझ पर.. "


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मौसी का ये हाल देखकर शीला उनके करीब आकार नीचे बैठ गई.. पहले उसने मौसी के होंठ चूम लिए.. और उनके लटक रहे नारियल जैसे स्तनों को दबाने लगी.. ग्लाइकोड़ींन पीने से जैसे खांसी बंद हो जाती है.. वैसे ही शीला की हरकतों से मौसी शांत हो गई.. शीला ने मौसी की ऐसी खास जगहों पर स्पर्श किया की मौसी सिहरने लगी.. रघु मौसी की गांड में लंड घुसेड़कर ठुमक रहा था.. धक्कों से मौसी की गांड चौड़ी हो गई थी.. अब उनका दर्द काम होने लगा..

मौसी: "शीला.. मेरी चूचियाँ भी चूस दे थोड़ी सी" शीला को मौसी के पिचके हुए स्तन चूसने का बिल्कुल मन नहीं था.. बिना रस के आम कौन चूसेगा भला!! फिर भी शीला ने उनकी निप्पलों को मुंह में लेकर "बच बच" की आवाज के साथ चूसना शुरू कर दिया..

रूखी अपने प्रेमी के खूंखार लंड से चुद रही रेणुका की भोस को बड़े ही गर्व से देख रही थी.. जीवा के आँड को चूसते हुए.. रसिक के लंड से मोटे खीरे को रेणुका की गांड में डालती जा रही थी.. रूखी को रेणुका की गांड मारने में बड़ा ही मज़ा आ रहा था.. उसने खीरे को एक बार अपनी चुत पर भी रगड़कर देख लिया.. बहोत मज़ा आया.. आज घर जाकर ये प्रयोग जरूर करूंगी.. रूखी ने शीला को अपने पास बुलाया.. और रेणुका की गांड से निकली हुई ककड़ी उसकी चुत में दे मारी..

अनुमौसी की गांड फाड़ कर थक चुका रघु.. अपना लंड खींचकर.. रूखी की चुत पर टूट पड़ा.. मौसी बेचारी अपनी गांड बचाकर दूर भाग गई.. बड़ी मुश्किल से लँगड़ाते हुए चल आ रही थी मौसी... वो कपड़े पहनकर दूर बैठी ये चुदाई का भव्य खेल देखने लगी.. उनकी चुत और गांड दोनों ठंडे हो चुके थे.. और इस उत्सव से उन्होंने इस्तीफा देते हुए वी.आर.एस ले लिया था..

दर्शक बनकर बैठी मौसी.. बाकी बचे बल्लेबाजों के फटके देख रही थी.. उनकी सांस अब भी फुली हुई थी.. बेचारी मौसी!!! लेकिन शीला की मदद से उनके चुदाई जीवन को चार चाँद लग गए थे इसमें कोई दो राई नहीं थी..

रेणुका की हालत देखकर मौसी सोच रही थी.. "कितनी गर्मी है साली की चुत में!! इस जालिम जीवा के खूंखार लंड से चुद रही है फिर भी थकने का नाम नहीं ले रही.. वैसे रघु का लंड भी कुछ कम नहीं है" सभी प्रतिभागियों की क्षमता का पृथक्करण कर रही थी मौसी.. जीवा और रघु के लंड पर तो वो अब निबंध लिख सकती थी.. एक पल के लिए उन्हे ऐसा विचार आया की अगर जीवा और रघु को वियाग्रा की गोली खिला दी जाए और उनके लंड पर जापानी तेल की मालिश की जाएँ.. तो क्या होगा? बिना किसी मदद के भी उन्होंने मेरी गांड फाड़ दी.. अगर इन्हे गोली खिलाकर तेल लगाकर चुदवाएं तो ये दोनों माँ चोद देंगे मेरे भोसड़े की.. सीधा एम्बुलेंस से अस्पताल जाने की नोबत आ जाएँ.. गांड और चुत को टाँकें लगाकर सिलवाना पड़ जाएँ.."

रेणुका का काम तमाम हो गया.. आखिरी कुछ धक्कों ने तो उसे लगभग रुला दिया था.. रेणुका की चुत पर ऐसे भयानक प्रहार पहली बार हुए थे.. जीवा को ऐसी टाइट कडक चुत मिलने पर वो भी दोहरे जोर से धक्के लगा रहा था.. जब तक रेणुका उत्तेजित थी तब तक उसे मज़ा आ रहा था.. पर अब ५-६ बार स्खलित हो जाने के बाद उसे दर्द होने लगा था.. चुत भी जल रही थी.. पेट भर जाने के कोई जबरदस्ती खिलाएं और जो हाल होता है वही हाल रेणुका का हो रहा था.. जीवा के लंड के प्राहर अब उसे आनंद के बजाए पीड़ा दे रहे थे


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"ओहह ओहह आह्ह मर गई.. बस बहोत हुआ जीवा.. मेरा हो गया.. अब निकाल ले बाहर.. बस अब ओर नहीं.. मेरे पेट में दर्द होने लगा है.. मैं झड़ चुकी हूँ.. धीरे धीरे.. ओ माँ.. स्टॉप ईट जीवा.. शीला.. इससे कहों के बाहर निकाले.. " रेणुका की हालत बद से बदतर होती जा रही थी.. जीवा किसी खूंखार जंगली जानवर की तरह रेणुका की सारी बातें अनसुनी कर बेरहमी से चोदता ही गया.. रेणुका का नंगा बदन चुदते चुदते पसीने से तरबतर हो गया था..

अनगिनत बार झड़ जाने के बाद भी रेणुका को जीवा ने नहीं छोड़ा.. अंत में उसे बिस्तर पर पटक दिया और अपना मूसल लंड बाहर खींच लिया.. खतरनाक धक्के खा खा कर रेणुका की हालत खराब हो गई.. थोड़ी देर आराम करने के बाद उसकी सांसें ठीक हुई.. वासना का तूफान शांत हो गया.. रेणुका अब चुपचाप मौसी के पास आकर बैठ गई.. अब रूखी-शीला और जीवा-रघु के बीच घमासान चल रहा था

शीला और रूखी की हवस तो मौसी और रेणुका के मुकाबले कई ज्यादा थी.. रघु शीला को उलटी लिटाकर उनकी चुत को धमाधम चोदते हुए पावन कर रहा था.. इस दौरान अनुमौसी चुपके से अपने घर चली गई..

शीला और रूखी की हवस को देखकर रेणुका स्तब्ध हो गई.. रूखी का देसी कसरती शरीर का सौन्दर्य उसे प्रभावित कर गया.. तो दूसरी तरफ शीला की गोरे खंबे जैसी जांघें.. पुष्ट पयोधर मदमस्त स्तन.. सपाट गोरी और दागरहित पीठ.. लचकदार कमर.. और मटके जैसे कूल्हें..

रेणुका ने नीचे हाथ फेरकर अपनी चुत के हालचाल चेक किए.. कहीं ज्यादा नुकसान तो नहीं हुआ ना!! जीवा ने तो आज हद ही कर दी.. ऐसे भी भला कोई चोदता है.. !! रूखी अब जीवा का काले सांप जैसा लंड चूस रही थी.. देखकर ही रेणुका के पसीने छूट गए.. बाप रे.. इतना बड़ा लिया था क्या मैंने !!!

शीला रघु के लंड से फूल स्पीड में चुद रही थी.. "आह्ह रघु.. बहोत मज़ा आ रहा है.. और जोर से.. शाबबास.. वाह मेरे राजा.. क्या ताकत है तेरी.. मस्त धक्के लगा रहा है.. ओह.. फाड़ दे मेरी चुत.. आहह आहह.. ओर जोर से ठोक.. उहह उहह.. और तेज.. जल्दी जल्दी.. हाँ हाँ.. वैसे ही.. आहह आह्ह.. मैं झड़नेवाली हूँ.. रुकना मत.. आह्हहह आह्ह आईईईईईई.. !!!!" शीला झड गई

शीला: "मेरा पानी निकल गया और तू अब तक नहीं झड़ा रघु??"

रघु: "भाभी.. आज गांड नहीं मारने दोगी क्या??" कहते हुए रघु ने शीला की गांड में उंगली डालकर हिलाया

शीला: "नहीं रघु.. आज नहीं.. आज तो भोस को ही तृप्त करना है.. गांड मरवाने का मूड नहीं है मेरा"

"रघु.. तुम मेरी गांड मार लो" जीवा का लंड चूसते हुए रूखी ने कहा

रघु शीला के शरीर से उतरकर रूखी के पास गया.. घोड़ी बनकर जीवा का लंड चूस रही रूखी के चूतड़ों को हाथ से चौड़ा किया.. रूखी के सुंदर अंजीर जैसे गांड के छेद पर अपना गरम सुपाड़ा रख दिया.. रूखी ने एक पल के लिए जीवा का लंड मुंह से निकालकर कहा "आहह.. कितना गरम है तेरा लंड रघु.. अंगारे जितना गरम लग रहा है पीछे.. थोड़ा सा थूक लगाकर डालना.. सुख मत पेल देना.. मैं जानती हूँ तेरी आदत.. गांड को देखकर ही गुर्राए सांड की तरह टूट पड़ता है तू.. मरवाने वाली के बारे में सोचता तक नहीं.." रूखी ने फिरसे जीवा का लंड मुंह में ले लिया..

एक ही दिन में शीला और रेणुका एकदम खास सहेलियाँ बन गई.. रात को दोनों ने ब्लू फिल्म की डीवीडी देखते हुए लेसबियन सेक्स का मज़ा लिया.. फिर एक ही बिस्तर पर नंगी होकर दोनों पड़ी रही.. एक दूसरे के अंगों से खेलते हुए देर तक बातें करती रही.. समाज की.. घर की.. पति की.. पड़ोसियों की.. बातें करते करते एक दूसरे की बाहों में कब सो गई दोनों को पता ही नहीं चला..
 
एक ही दिन में शीला और रेणुका एकदम खास सहेलियाँ बन गई.. रात को दोनों ने ब्लू फिल्म की डीवीडी देखते हुए लेस्बियन सेक्स का मज़ा लिया.. फिर एक ही बिस्तर पर नंगी होकर दोनों पड़ी रही.. एक दूसरे के अंगों से खेलते हुए देर तक बातें करती रही.. समाज की.. घर की.. पति की.. पड़ोसियों की.. बातें करते करते एक दूसरे की बाहों में कब सो गई दोनों को पता ही नहीं चला..

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सुबह पाँच बजे जब रसिक दूध देने आया तब शीला की आँख खुली.. नंगे बदन पर फटाफट गाउन पहनकर शीला दूध लेने बाहर आई.. रसिक शीला को देखकर हमेशा तुरंत उत्तेजित हो जाता.. उसने शीला के स्तनों को छेड़ते हुए दबा दिया और बोला "आज बहोत मन कर रहा है करने का भाभी.. क्या माल लग रही हो आप आज तो!!" शीला के गाउन के अंदर हाथ डालकर उसके स्तन मसलते हुए उसने कहा "अंदर आ जाऊ भाभी?"

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शीला: "आज नहीं रसिक.. आज घर में मेहमान आए हुए है.. "

रसिक: "आप भी ना भाभी.. कभी कभी ही आपसे करने के लिए बोलता हूँ और आप मना कर रही हो"

शीला: "धीरे बॉल रसिक.. मेहमान अंदर सो रहे है.. जाग जाएंगे तो मुसीबत आन पड़ेगी.. वरना मैंने तुझे कभी मना किया है कभी.. ?? आज नहीं हो पाएगा.. तू निकल जल्दी से"

रसिक उदास होकर शीला के स्तन दबाता रहा.. उसका लंड खड़ा हो गया था.. वो चुपचाप खड़ा रहा पर उसने शीला के स्तन नहीं छोड़े..

शीला: "ठीक है.. तू रुक यहाँ " शीला बेडरूम में जाकर देख आई.. रेणुका गहरी नींद में सो रही थी। वो दबे पाँव वापिस आई

शीला: "देख रसिक.. अंदर डालने का सेटिंग तो नहीं हो पाएगा.. मैं तेरा हिला देती हूँ"

शीला ने रसिक की धोती में हाथ डालकर उसका लंड बाहर निकाल लिया.. लोहे के सरिये जैसा सख्त लंड हाथ में लेकर शीला हिलाने लगी.. रसिक शीला के गाउन को उठाकर उसकी चुत में उंगली घिसने लगा.. एक ही मिनट तक ये खेल चला और रसिक के लंड ने पिचकारी छोड़ दी.. शीला की चुत रसिक की उंगली के स्पर्श से पानी पानी हो गई थी.. शीला ने झुककर रसिक के झड़े हुए लंड को चूम लिया और उसे धोती के अंदर रख दिया.. रसिक चला गया


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शीला दूध की पतीली को गेस पर गरम करने रखकर रेणुका की बगल में लेट गई.. उसने गहरी नींद सो रही रेणुका की नंगी चूचियों को ध्यान से देखा.. उसकी हर सांस के साथ चूचियाँ ऊपर नीचे हो रही थी.. शीला ने उन सुंदर स्तनों को हाथ में लिया.. रसिक के स्पर्श से गीली हो चुकी चुत को सहलाते हुए वो रेणुका के स्तनों को मींजने लगी.. तीन उँगलियाँ अपनी भोस में डालकर रसिक मे मर्दाना लंड को याद करते हुए शीला झड़ गई.. रेणुका अब भी नींद में थी.. ऑर्गैज़म का सुख प्राप्त करते ही शीला की आँख लग गई.. जब वो जागी तब रेणुका बिस्तर पर नहीं थी.. शीला ने सोचा की रेणुका बाथरूम में गई होगी.. तभी उसे याद आया.. अरे बाप रे.. दूध गरम करने रखा था वो तो भूल ही गई.. !!! वो भागकर किचन में आई.. रेणुका वहीं खड़ी थी.. चाय बना रही थी.. चाय को छान रही रेणुका को पीछे से बाहों में भर लिया शीला ने और कहा "गुड मॉर्निंग रेणुका.. !!"

पीछे झुककर शीला के स्तनों को दबाकर रेणुका ने भी गुड मॉर्निंग कहा.. "तुम सो रही थी इसलिए मैंने जगाया नहीं.. किचन में आकर देखा तो दूध उबल रहा था.. थोड़ी ओर देर हो जाती तो सारे दूध का सत्यानाश हो जाता.. "

रेणुका के स्तनों को हाथों से मलते हुए शीला ने कहा "थैंक्स रेणुका.. तुझे नींद तो ठीक से आ गई थी ना ??"

रेणुका: "हाँ हाँ.. एकदम घर जैसी नींद आ गई थी मुझे तो.. " चाय छान कर किटली में भरते हुए कहा

दोनों ने ब्रश किया और चाय पीकर एकदम आराम से बैठ गई.. सिर्फ एक ही दिन में शीला का सारा अकेलापन दूर हो गया.. नहा-धो कर दोनों फ्रेश हो गई और बातें करने लगी.. शीला ने रेणुका को चेतना के बारे में बताया.. रेणुका ने भी दिल खोलकर अपनी सारी बातें शीला को बताई

रेणुका: "शीला.. मेरे पड़ोस में एक आदमी रहता है.. वो मुझे रोज ताड़ता है.. मैं जब तक बाहर कपड़े सुखाती हूँ.. वो घर के बाहर खड़ा मुझे देखतय ही रहता है.. मेरे घर के अंदर जाने के बाद ही वो हटता है.. उसका देखना मुझे अच्छा भी लगता है.. इस उम्र में भी कोई हमें देखता है ये जानकर दिल खुश हो जाता है.. "

शीला: "वो तो है.. वैसे तेरी उम्र इतनी ज्यादा भी नहीं है.. उम्र तो अब मेरी हो चली है.. "

रेणुका: "फिर भी इस उम्र में आप सेक्स में इतनी एक्टिव हो ये ताज्जुब की बात है.. वरना आप के उम्र की औरतें भजन कीर्तन करते हुए मरने के इंतज़ार में बैठी रहती है.. सच में.. आपकी फुर्ती और एनर्जी की दाद देनी पड़ेगी.. "

शीला: "देख रेणुका.. मैं और मेरा पति बड़ी ही स्वस्थ विचारधारा रखते है.. वो कहते है की हमारा शरीर बूढ़ा हो जाएँ वो प्रकृति का नियम है.. पर हम मन से चाहे तब तक जवान रह सकते है.. और जहां तक मन से जवान है तब तक संभोग का पूरा आनंद लेते रहना चाहिए.. "

शीला की बातें बड़े ध्यान से सुन रही थी रेणुका.. उसे ये तो अंदाजा लग ही गया था की शीला कोई साधारण स्त्री नहीं थी.. उसके अंदर कुछ ऐसी विशेषता थी जो अपने संग जुड़े सब को जवान बनाए रखने के लिए काबिल थी..

रेणुका: "तेरी बात बिल्कुल सही है शीला.. हम मन से कितने भी जवान क्यों न हो.. हमारा पार्टनर भी सहयोग देना चाहिए ना!! मेरी जिंदगी तो मेले के चक्कर जैसी है.. मेरा पति और मैं कभी साथ होते ही नहीं है.. !! क्या करू मैं??"

शीला: "रेणुका, मर्द को तैयार करना ये हमारा बाएं हाथ का खेल है.. तुझे पता है.. १००० साल की विश्वामित्र की तपस्या का भंग रंभा ने कैसे किया था?? पति को उत्तेजित करने के लिए जो भी करना पड़े वो सब करना है.. पूरे इन्टरेस्ट के साथ.. पति थका हुआ हो सकता है.. लेकिन उसका लंड तो तैयार कर ही सकते है ना!! और हमें तो उसका ही काम है.."

रेणुका: "अब क्या बताऊँ तुम्हें.. मैं उनका सहलाती हूँ.. तो उनका लंड खड़ा तो हो जाता है.. पर तब तक तो उनके खर्राटें शुरू हो जाते है.. फिर क्या मतलब सारी मेहनत का!!"

शीला हँसते हुए: "बड़ा आसान है.. समस्या तो तब आती है जब पति जाग रहा हो और लंड खर्राटे लेकर सो रहा हो.. वो भले ही सो गए हो.. तू ऊपर चढ़कर चुदवा ले.. हमें तो लंड से मतलब है ना!! वो हमें सामने से मिले या हम खुद ही ले ले.. क्या फरक पड़ता है!! अपनी आग बुझाने से हमें मतलब है.. बाकी दुनिया जाएँ भाड़ में.. !!"

दोनों बातों में उलझी हुई थी तभी शीला के घर कविता आई..

कविता: "कैसे हो भाभी? आप तो जैसे मुझे भूल ही गए.. कहीं मेरी सास ने तो मना नहीं किया है ना आपको?"

शीला: "ओहह कविता.. बैठ ना.. " शीला ने रेणुका से परिचय करवाया कविता का.. "महिला मण्डल से खींचकर लाई हूँ इसे.. अपने मण्डल में शामिल करने को.. अच्छा किया ना मैंने!!"

कविता: "हाई रेणुका.. कैसी हो आप?"

कविता की जवान छाती.. और स्टार्च की हुई चादर जैसी कडक कोरी जवानी को रेणुका अहोभाव से देखती रही.. कविता भी रेणुका के भरे हुए जोबन को ललचाई नजर से देखते हुए सोफ़े पर बैठ गई..

शीला: "कैसे आना हुआ कविता??"

कविता: "कुछ नहीं भाभी.. घर का काम निपटा लिया था.. बैठे बैठे बोर हो रही थी.. सोचा आप से मिल लूँ.. आप तो मुझे भूल गई पर मैं आपको भूलने थोड़े ही दूँगी" वह खिलखिलाकर हंसने लगी..

रेणुका इस प्यारी सी कोमल नाजुक कन्या को देखती रही.. जब कविता झुकती थी तब उसके टॉप में से छोटे छोटे दो स्तनों के बीच की सुंदर लकीर रेणुका के मन को भा गई.. लकीर कोई भी हो.. दो स्तनों के बीच.. कमर की चर्बी के बीच या फिर दो पैरों के बीच.. हमेशा आकर्षित करती है.. स्त्री का सौन्दर्य ढंका हुआ रखकर ज्यादा आनंद देता है.. रेणुका तो कविता के बात करने के लहजे से खुश हो गई..मंदिर की घंटी जैसी सुमधुर आवाज थी कविता की.. रेणुका कविता से अब तक खुलकर बात नहीं कर रही थी.. बस उसका निरीक्षण कर रही थी.. उसे भला ये कहाँ मालूम था की शीला ने इस कविता को भी अपनी जाल में लपेट रखा है!! वैसे कविता और शीला तो खुलकर बातें कर रही थी पर रेणुका की मौजूदगी से कविता भी थोड़ी सी झिझक महसूस कर रही थी.. और वो स्वाभाविक था क्योंकी वह दोनों पहली बार मिल रही थी..


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पिछली रात शीला और रेणुका ने मस्त लेस्बियन सेक्स का आनंद लिया हुआ था इसलिए दोनों शांत बैठी थी.. और दो दिन पहले कविता ने भी बड़े मजे किए थे.. कविता और शीला एक डाल के पंछी थे.. और उसी डाल पर अब रेणुका नाम का पंछी बैठने जा रहा था..

कविता ने शीला से कहा: "मैं आपसे एक बात करने आई हूँ"

शीला: "हाँ बोल ना.. क्या बात है?"

कविता: "भाभी.. पीयूष जहां नौकरी करता है वहाँ से उसे निकाल दिया गया है.. वो बहोत उदास है.. सुबह से कुछ खाया भी नहीं है उसने.. आप पीयूष को कुछ समझाइए ना प्लीज.. मम्मीजी ने भी कहलवाया है.. चिंता हो रही है उसे इस तरह देख कर.. " उसके खूबसूरत चेहरे पर चिंता की रेखाएं स्पष्ट नजर आ रही थी

शीला: "टेंशन क्यों ले रही है पगली.. !! एक नौकरी गई तो दूसरी मिल जाएगी.. चिंता मत कर.. सब ठीक हो जाएगा.. तेरा पीयूष लाखों में एक है.. ऐसे होनहार लड़के को दूसरी नौकरी मिलने में देर नहीं लगेगी"

रेणुका इन दोनों की बातों के बीच में टोकना नहीं चाहती थी इसलिए चुप रही.. पर उसके मन में स्त्री सहज सहानुभूति जागृत हुई कविता के लिए

कविता: "मैं भी वहीं बोल रही हूँ पीयूष को पर मानता ही नहीं है.. बिना खाएं पियें कमरे में पड़ा हुआ है"

शीला: "अभी कहाँ है वोह?"

कविता: "कहीं बाहर निकला अभी.. इसीलिए मैं आपके पास आई.. भाभी, आप उसे फोन कीजिए ना!!"

शीला: "तू चिंता म यात कर.. जहां भी गया होगा वापिस आ जाएगा.. रेणुका, जरा मुझे वहाँ पड़ा कॉर्डलेस फोन तो देना!!"
कविता से नंबर पूछकर शीला ने फोन लगाया

कविता: भाभी आप फोन स्पीकर पर रखिए ताकि मैं भी सुन सकूँ" शीला ने स्पीकर ओन कर दिया

दस बारह रिंग के बाद पीयूष ने फोन उठाया

"हैलो कौन?"

"मैं शीला भाभी.. आपकी पड़ोसन बोल रही हूँ पीयूष जी.. आप कहाँ हो?" शीला इस तरह औपचारिकता से इसलिए बात कर रही थी ताकि पीयूष को अंदाजा लगे की उसके साथ कोई ओर भी है जो सुन रहा है

पीयूष: "अरे शीला भाभी आप? कैसी है? मैं यहीं बाजार में आया हूँ"

शीला: "तुम अभी यहाँ आ सकते हो मेरे घर?"

पीयूष: "पर भाभी.. अभी दिन के समय.. कहीं मम्मी या कविता ने देख लिया तो? ऐसा करता हूँ.. रात को जब कविता सो जाएँ उसके बाद चला आऊँगा.. ठीक है?"

कविता और रेणुका पीयूष की बात सुनकर चौंक गई.. शीला के भी पसीने छूटने लगे

शीला: "अरे पर तुम मेरी बात तो सुन लो पूरी"

शीला की बात को आधे में ही काटकर पीयूष ने कहा "कोई बात नहीं भाभी.. आपने कहा तो मैं अभी आ जाता हूँ आपके घर.. आप तैयार रहना.. भाभी मैं एक बार आपके साथ तसल्ली से करना चाहता हूँ.. पर लगता है ऐसा आराम से करने का मौका मिले ना मिले.. क्या करें.. अब पड़ोस में ही रहते है तो ये सारी तकलीफ तो उठानी ही पड़ेगी. मैं आ रहा हूँ.. आप फोन चालू रखिए"

कविता और रेणुका का चेहरा देखने लायक था.. शीला को इतनी शर्म आई की बात ही मत पूछो.. वो पीयूष का मन शांत करने के लिए बात करने बुला रही थी और वो बेवकूफ ये समझा की शीला उसे चोदने के लिए बुला रही है..

शीला: "तुम मेरी बात सुनो ठीक से.. बिना मेरी बात सुने कुछ भी मत बोलो.. कविता यहाँ मेरे बगल में बैठी है.. तुम यहाँ आओ तुम्हारी नौकरी के बारे में बात करनी है"

पीयूष: "कहीं उसने हमारी बात सुन तो नहीं ली भाभी? अरे हाँ.. मैं तो भूल ही गया.. आप ने लेंडलाइन से फोन किया है.. उसमें कहाँ स्पीकर होता है!! और सुन भी लिया होगा तो क्या हर्ज है.. मैंने भी उसे मूवी के दौरान उसके बगल में बैठे अनजान लड़के के साथ मस्ती करते हुए देखा था.. पर मैं जानबूझकर कुछ नहीं बोला था" पीयूष ने सारे भंडे एक साथ फोड़ दिए आज तो.. कविता को ये सुनकर चक्कर सा आने लगा

शीला: "किसी ने भी कुछ नहीं सुना.. तुम यहाँ आ जाओ बस.. मैं फोन काट रहीं हूँ" शीला ने फोन रख दिया.. रेणुका उसके सामने विचित्र ढंग से देख रही थी.. पीयूष की बात सुनकर उसे इतना तो पता चल ही गया की शीला और पीयूष के बीच कोई खिचड़ी जरूर पक रही थी

थोड़ी देर में पीयूष शीला के घर आ पहुंचा.. वहाँ कविता और रेणुका को देखकर वो सकपका सा गया.. उसने मन ही मन माथा पीट लिया.. क्या सोचकर आया था और क्या निकला!! कहीं कविता ने उनकी बातें सुन ली होगी तो? सुनी हो तो भी क्या?? उसे पता ही है की मुझे शीला भाभी कितने पसंद है !!

शीला: "पीयूष, मैंने सुना की तुम्हारी नौकरी छूट गई है.. सुनकर दुख हुआ पर तुम चिंता मत करना.. दूसरी मिल जाएगी.. कहीं और बात की है तुमने नौकरी के लिए?"

पीयूष: "चल तो रही है.. उसी सिलसिले में बाहर था अभी.. "

रेणुका: "पीयूष, तुम किस तरह का कामकाज जानते हो?"

पीयूष: "मैं कंप्यूटर एकाउंटिंग का काम जानता हूँ" पीयूष इस अनजान औरत को देखता रहा

रेणुका: "मेरे पति का बड़ा बिजनेस है और उन्हे इस तरह के आदमी की जरूरत भी है.. फिलहाल अगर तुम्हारे पास को नौकरी न हो तो मैं उनसे तुम्हारी बात कर सकती हूँ.. अगर बात जम जाएँ तो प्रॉब्लेम सॉल्व हो जाएगा.. "

कविता: "पीयूष, ये रेणुकाजी है.. शीला भाभी की सहेली.. रेणुका जी.. ये मेरे पति है पीयूष" कविता ने दोनों का परिचय करवाया

दोनों ने एक दूसरे का नमस्ते से अभिवादन किया

शीला: "रेणुका तू अपने पति से इस बारे में बात ही कर ले अभी"

रेणुका ने अपने ब्लाउस से मोबाइल निकाला.. निकालते वक्त उसके एक स्तन का उभार दिख गया.. पीयूष ने सूचक नजर से शीला को देखा.. शीला ने उसे आँख मारी.. पीयूष मुस्कुराकर नीचे देखने लगा

रेणुका: "हैलो.. कहाँ हो आप?"

सामने रेणुका का पति राजेश था

राजेश: "मैं अभी जरूरी मीटिंग में हूँ.. जल्दी बता क्या काम था?" राजेश ने थोड़े से क्रोध के साथ कहा

रेणुका ने उसे पीयूष के बारे में बताया

राजेश: "ठीक है.. तुम उन्हे कल या परसों अपनी ऑफिस पर दोपहर के समय भेज देना.. और कुछ?"

रेणुका: "और तो कुछ नहीं.. सब ठीक है.. पर तुम जल्दी वापिस आ जाओ.. मैं अकेले बोर हो रही थी तो २ दिन के लिए अपनी सहेली शीला के घर रहने आई हूँ.. तुम आज शाम को तो लौट आओगे ना?"

राजेश: "सोच तो रहा हूँ की लौट आउ.. आज रात को शायद निकलूँगा तो आते आते देर हो जाएगी.. तू आराम से अपनी सहेली के घर रुक.. और मजे कर.. और हाँ.. अपनी सहेली के पति के साथ फ़्लर्ट करना शुरू मत कर देना.. तेरी आदत मैं जानता हूँ.. हा हा हा हा.. !!"

रेणुका ने कृत्रिम क्रोध के साथ कहा "क्या कुछ भी बोल रहे हो!!! मैंने कब किसी के साथ फ़्लर्ट किया है कभी !! तुम जैसा मेरी मम्मी के साथ फ़्लर्ट करते हो वैसा तो मैंने कभी किसी के साथ नहीं किया.. छोड़ो वो सब.. और जल्दी घर आ जाओ.. बात फ्लर्टिंग से आगे बढ़ जाए उसके पहले"

रेणुका ने फोन रख दिया और कविता के पास बैठकर कहा "मेरी बात हो गई है.. पीयूष तुम परसों इस पते पर पहुँच जाना और मेरे पति राजेश से मिल लेना.. सब ठीक हो जाएगा.. चिंता करने की कोई बात नहीं है"

कविता: "सच !! आप कितनी अच्छी हो रेणुका जी... पीयूष चल अब.. खाना कहा ले.. तेरे भूखे रहने से कुछ नहीं होने वाला"

शीला: "कविता, तू और पीयूष आज यहीं हमारे साथ खाना खाने आओ.. मैं बना दूँगी.. मैं तेरी सास को बता देती हूँ.. तब तक तू किचन में जाके सब्जी काट.. फिर हम साथ में बाकी काम निपटाएंगे.. तब तक मैं और रेणुका तेरी सास को बोलकर आते है."

रेणुका और शीला अनुमौसी से मिलने गए.. पीयूष और कविता अब अकेले थे.. कविता से पीयूष का दुखी चेहरा देखा नहीं जा रहा था.. उसने पीयूष को अपनी बाहों में कसकर पकड़ लिया.. वो किसी भी तरह पीयूष को मूड में लाना चाहती थी.. अपने सुंदर होंठों से पीयूष को चूमते हुए उसने उसका लंड पकड़ लिया

पीयूष: "क्या कर रही है ये तू?? अभी वो रेणुका भाभी और शीला भाभी आती होगी"

कविता ने शरारत करते हुए कहा "ओहो.. रेणुका भाभी.. वो तेरी भाभी कब से बन गई?? अभी वो ब्लाउस से मोबाइल निकाल रही थी तब तू कैसे उनकी छाती को देख रहा था !!"

पीयूष: "वो.. वो.. वो तो मैं वहाँ नहीं देख रहा था" पीयूष की चोरी पकड़ी गई

कविता: "तो और किसकी छातियाँ देख रहे थे ? शीला भाभी की ? अरे हाँ.. मैं तो भूल ही गई.. शीला भाभी के होते हुए तू किसी और की तरफ कभी देखता ही कहाँ है !!"

पीयूष: "तू मेरी बात का गलत मतलब निकाल रही है.. " पीयूष आगे कुछ बोलत उससे पहले कविता ने अपने स्तनों को पीयूष की छाती से रगड़ दिया.. पीयूष का लंड सख्त हो गया..

कविता: "सच सच बता.. तुझे ये रेणुका भाभी कैसी लगी? मेरा तो ठीक है.. मैं तो काम्पिटिशन में ही नहीं हूँ.. पर शीला भाभी और रेणुका भाभी में से तुझे कौन ज्यादा पसंद आया?"

पीयूष: "वो तो बिना देखे कैसे पता लगेगा मुझे !!"

कविता: "साले हलकट.. अपनी बीवी के सामने दूसरी के बबले देखने की बात कर रहा है !! तेरी तो मैं.. " कविता हँसते हुए पीयूष का हाथ मरोड़ने लगी.. पीयूष अपना हाथ छुड़ाकर घर के बाहर निकल गया और दीवार फांदकर अपने घर में घुसा.. कविता शीला के किचन में खाना बनाने पहुंची

पीयूष जब अपने घर पहुंचा तब उसे कुछ विचित्र आवाज़ें सुनाई दी.. अनुमौसी का कमरा बंद था.. पर जिस प्रकार की आवाज़ें आ रही थी वो सुनकर पीयूष चोंक गया

पीयूष घर के बाहर बरामदे से.. अनुमौसी के कमरे की पीछे की तरफ जा पहुंचा.. खिड़की बंद थी पर अंदर की बातें यहाँ से सुनाई पड़ रही थी.. वो चुपके से उनकी बातें सुनने लगा.. जैसे जैसे वो सुनता गया उसका आश्चर्य और बढ़ता गया

अनुमौसी: "शीला हरामी.. उस दिन पिक्चर देख के आने के बाद तू मेरे पीयूष के साथ क्या कर रही थी ? मैंने खिड़की से सबकुछ देखा था..

शीला: "क्या मौसी कुछ भी बोल रही हो !! पीयूष तो मेरे देवर समान है.. आप सोच रही हो ऐसा कुछ भी नहीं था.. "

अनुमौसी: "तू मुझे मत सिख.. समझी ना.. !! ये बाल मैंने धूप में सफेद नहीं किए है.. सब जानती हूँ मैं"

रेणुका: "मौसी अभी पीयूष शीला के घर आया तब.. कैसे कहूँ मैं.. शर्म आती है.. शीला की छातियों को ऐसे घूर रहा था वो !! दाल में कुछ काला तो जरूर है "

अनुमौसी: "शीला, तू मेरे बेटे के संसार में आग मत लगाना.. तेरे रूप का जलवा ही कुछ ऐसा है.. उस दिन जब तू मेरे घर खाना खाकर गई उसके बाद मेरे वो.. उनका ऐसा खड़ा हो गया था की पूछ ही मत.. सच बता.. कहीं मेरे उनके साथ भी तूने कुछ किया तो नहीं था ना !!"

शीला: "मौसी, कब से आप कुछ भी बके जा रही हो.. मैं क्या दोनों बाप बेटे के साथ फ्लर्ट करूंगी?? पीयूष तो जवान है.. पर चिमनलाल तो मेरे बाप के उम्र के है"

अनुमौसी: "शीला, तू हकीकत में क्या चीज है ये मेरे मुंह से मत बुलवा.. मुझे भी भगवान ने आँखें दी है.. सब दिखता है मुझे.. समझी.. रोज सुबह उस रसिक से दूध लेते समय क्या क्या करती है.. वो सब मालूम है मुझे.. साला वो रसिक तेरी जाल में कैसे फंस गया ? मेरे सामने तो कभी देखता तक नहीं है"

शीला: "तो उसे दिखाकर आपको करना क्या है.. मौसी आपकी उमर हो चली है .. शांति से बैठकर भजन कीर्तन कीजिए"

अनुमौसी: "सच कहूँ शीला.. वैसे तो मेरा मन ही उठ गया था इन सब बातों से.. पर तेरे और रसिक के बीच उस सुबह जो कुछ भी देखा उसके बाद मेरे अंदर नए अरमान जाग गए.. वरना मेरे पति का तो १० सालों से खड़ा भी नहीं होता.. तूने ही मेरे अंदर ये सारी हवस जागा दी ही.. आज कल कविता भी बहोत खुश नजर आती है.. सच सच बताना.. कहीं तूने उसे भी रसिक या जीवा के साथ तो नहीं मिलवा दिया ना !! तेरा कोई भरोसा नहीं है.. तू कुछ भी कर सकती है"

सुनकर पीयूष का दिमाग चकराने लगा.. माय गॉड !! मेरी कविता किसी और के साथ !!!! नहीं नहीं.. ऐसा नहीं ओ सकता.. वरना इस बात का मुझे जरूर पता चलता..

अनुमौसी: "देख शीला.. अब तुझसे क्या छुपाना !! तूने मेरे जीवन में नए उमंग जागा दिए है.. मेरे पति ने कभी अपने शरीर का ध्यान नहीं रखा.. पहले उनमें कितना जोश और ताकत थी.. मुझे याद है.. शादी के दूसरे ही साल जब हम महाबलेश्वर गए थे.. !!" मौसी ने दीर्घ सांस छोड़कर बात वहीं पर अटका दी.. रेणुका की मौजूदगी के कारण वह थोड़ी झिझक रही थी.. रेणुका समझदार थी.. उसे महसूस हुआ की उसकी वजह से मौसी अपना दिल हल्का नहीं कर पा रही है.. थोड़ी देर सोचने के बाद उन्होंने तय किया की वो शीला के घर जाकर कविता को खाना बनाने में मदद करेगी..

रेणुका: "आप दोनों बातें कीजिए.. मैं कविता की मदद करने जा रही हूँ.. जब खाना तैयार हो जाएगा तब बुला लूँगी.. " कमरे का दरवाजा खोलकर वो बाहर निकली तब उसे खयाल आया.. शीला के घर तो पीयूष और कविता अकेले होंगे और न जाने क्या कर रहे होंगे.. !! क्यों बेकार में उनके कबाब में हड्डी बनना.. !! ये सोचकर वो शीला के घर नहीं गई.. अब क्या करें?? सोचा यहाँ अनुमौसी के कंपाउंड और बरामदे में चल लिया जाए.. थोड़ी सी वॉक हो जाएगी.. घर का चक्कर लगाते हुए उसने पीछे से पीयूष को खिड़की पर कान लगाकर सुनते हुए देखा.. अरे बाप रे!! ये यहाँ क्या कर रहा है!! रेणुका के पसीने छूट गए.. कहीं वो हम सब की बातें तो छुपकर नहीं सुन रहा !! मर गए.. !! पीयूष ने अब तक रेणुका को नहीं देखा था क्योंकी वो उसकी पीठ के तरफ थी..

अंदर चल रही बातें सुनकर पीयूष गरम हो गया था और उत्तेजना के मारे अपना लंड सहला रहा था.. ये देखकर रेणुका की चुत में झटका लगा.. दोपहर का समय था और रविवार का दिन था.. सब अपने घरों में आराम करते हुए छुट्टी का लुत्फ उठा रहे थे.. इसलिए आजू बाजू कोई भी नहीं था.. कंपाउंड की दीवार भी काफी ऊंची थी इसलिए बाहर गुजर रहे व्यक्ति को अंदर का द्रश्य दिखाई नहीं पड़ता था.. रेणुका को अब ये जानने में दिलचस्पी थी की पीयूष आगे क्या करता है !! इस पर से अंदाजा लग जाएगा की अंदर कैसी बातें हो रही है.. और पता नहीं भी चलेगा तो आखिर शीला तो बाद में बता ही देगी .. !!

पीयूष की हरकतें देखकर रेणुका को इतना पता तो चल ही गया की अंदर कुछ जबरदस्त गरम बातें हो रही थी.. रेणुका वापिस घर के अंदर आ गई.. और जिस कमरे में शीला और अनुमौसी बैठे थे उसके दरवाजे पर कान लगाकर सुनने लगी.. रेणुका को अनुमौसी की सिसकियाँ सुनाई पड़ रही थी

अनुमौसी: "ओहह शीला.. ये तूने क्या कर दिया.. आह्ह.. ऐसा मज़ा तो पहले कभी नहीं आया मुझे.. आहह आहह शीला.. जल्दी कर.. कहीं वो रेणुका वापिस आ गई तो मेरा अधूरा रह जाएगा.. ओह्ह मर गई.. आईईई.. !!"

रेणुका समझ गई की अंदर शीला और मौसी के बीच जबरदस्त लेस्बियन सेक्स चल रहा है.. अब वो वापिस दौड़कर पीयूष जहां था वहाँ चली गई.. वो देखना चाहती थी की पीयूष अब क्या कर रहा है!! पीयूष का लंड अभी अभी वीर्य की पिचकारी मारकर ठुमक रहा था.. नीचे टाइल्स पर उसके वीर्य की बूंदें पड़ी हुई थी.. पीयूष की शर्ट के दो बटन खुले थे.. और उसके जीन्स की चैन भी.. और दीवार का सहारा लेकर.. आँखें बंद कर वो हांफ रहा था.. उसका पतला पर सख्त लंड झटके खाते हुए हिल रहा था.. दोपहर की धूप में उसका लाल सुपाड़ा और वीर्य की बूंदें चमक रही थी..


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पीयूष को इस अवस्था में देखकर रेणुका अपने आप को रोक न पाई और पीयूष के सामने आकर खड़ी हो गई.. बंद आँखों के आगे अंधेरा महसूस होते ही पीयूष ने आँखें खोल दी.. सामने खड़ी रेणुका उसे देखकर मुस्कुरा रही थी.. पीयूष पसीने से तरबतर हो गया था.. रेणुका ने पल्लू से उसके चेहरे के पसीने को पोंछ लिया.. पल्लू हटाते ही रेणुका के गुलाबी ब्लाउस के अंदर छुपे टाइट सुंदर स्तनों को देखकर.. अभी अभी झड़ा हुआ पीयूष का लंड फिरसे अंगड़ाई लेकर जाग गया.. रेणुका ने उसका लंड अपनी मुठ्ठी में पकड़ लिया.. और नीचे झुक के जितना हो सकता था उतना अंदर अपने मुंह में ले लिया..

स्तब्ध होकर पीयूष.. ऐसा महसूस कर रहा था जैसे दोपहर में सपना देख रहा हो.. इस अवर्णनीय पल को पूरे आनंद के साथ महसूस कर रहा था.. रेणुका ने पीयूष का हाथ पकड़कर अपने स्तन पर रख दिया.. झुककर लंड चूस रही रेणुका के पल्लू के आरपार वी-नेक ब्लाउस से उभर कर बाहर दिख रही.. सफेद दूध जैसी दो चूचियों के बीच की गहरी लकीर देखकर पीयूष पागल सा हो गया.. उसने अपने हाथों से दोनों स्तन दबाए.. सिर्फ ४५ सेकंड में.. बिना लंड को ज्यादा अंदर बाहर किए.. केवल रेणुका के मुंह की गर्मी और उसकी नटखट कारीगरी के कारण.. पीयूष के लंड ने उलटी कर दी.. मुंह में वीर्य छोड़ते वक्त उसने स्तनों को इतने जोर से दबाया की रेणुका को दर्द होने लगा..

पीयूष का लंड जब रेणुका के मुंह से बाहर निकला तब पतला तीन इंच का ही रह गया था.. एक मिनट पहले फटने को तैयार एटमबॉम्ब को रेणुका ने डिफ्यूज़ कर दिया था.. अपने पल्लू से पीयूष के लंड को पोंछकर साफ करते हुए रेणुका ने उसे वापस पीयूष की पतलून के अंदर रख दिया.. और फिर पेंट की चैन बंद कर दी..

रेणुका की इस अदा पर पीयूष फिदा हो गया.. इतना ही नहीं.. पल्लू के जिस हिस्से से उसने लंड को पोंछा था उस हिस्से को सूंघकर रेणुका ने अपना चेहरा पोंछा.. पीयूष तो कायल हो गया रेणुका पर.. !!

उसने रेणुका को अपनी बाहों में लेकर एक जबरदस्त किस कर दी.. दोनों आपस में काफी देर तक एक दूसरे के होंठों को चूसते रहे.. संतुष्ट होने के बाद पीयूष ने कहा "भाभी.. मुझे आपके स्तनों को चूसना है.. "

"अभी नहीं पीयूष.. पता है ना तेरी मम्मी और शीला अंदर बैठे है? फिर कभी.. " कहते हुए रेणुका जाने लगी.. पर पीयूष ने उसका हाथ पकड़ लिया

"प्लीज भाभी.. मेरा बहुत मन कर रहा है.. पता नहीं फिर कभी मौका मिले ना मिले... सिर्फ एक बार चूसने दो मुझे"

"जिद मत कर पीयूष.. मैं तुझे पक्का चूसने का मौका दूँगी.. पर अभी नहीं"

"नहीं भाभी.. अभी करने दो ना प्लीज.. जल्दी से एक बाजू का बॉल बाहर निकाल लो.. मैं दो मिनट से ज्यादा वक्त नहीं लूँगा.. बहुत मन कर रहा है मेरा.. जब शीला भाभी के घर आपने ब्लाउस से मोबाइल निकाला था तब से मैं आपके बबलों का दीवाना हो गया हूँ "

रेणुका सोचकर बोली "अभी मुमकिन नहीं है पीयूष.. मैं घर जाने से पहले कुछ सेटिंग जरूर करूंगी.. पर अभी नहीं.. बहोत रिस्क है तू समझ.. " कहते हुए रेणुका ने अपना पल्लू ठीक किया और जाने लगी.. जाते जाते रेणुका ने पीयूष को गाल को प्यार से सहलाया और पीयूष ने रेणुका के चूतड़ को थपथपाया..

रेणुका के जाने के बाद पीयूष ने अपने कपड़े ठीक किए और शीला के घर गया जहां कविता किचन में बीजी थी.. पीयूष ने सोफ़े पर बैठकर टीवी ओन किया.. पर किसी भी चेनल पर कुछ देखने लायक नहीं था.. टीवी बंद कर वो किचन में आया और कविता से शीला के बारे में अलग अलग तरीकों से पूछताछ करने लगा.. कविता भी शीला की पक्की शिष्या थी.. उसने पीयूष को कुछ भी खास नहीं बताया.. पर उसे संदेह जरूर हुआ की अचानक पीयूष शीला के बारे में ये सब क्यों पूछ रहा था !! आज से पहले तो उसे कभी ऐसी जिज्ञासा नहीं हुई थी.. कहीं शीला भाभी ने सब कुछ बता तो नहीं दिया पीयूष को !! नहीं नहीं.. शीला भाभी ऐसा कभी नहीं कर सकती.. पर फिर भी कुछ बोल नहीं सकते.. कविता के नार्को टेस्ट में पीयूष को कुछ खास पता नहीं चला

तभी अनुमौसी, शीला और रेणुका.. तीनों घर पहुंचे.. पीयूष अपनी माँ का बहुत सम्मान करता था पर आज उसे उनका एक नया ही रूप देखने को मिला.. या यूं कहिए की सुनने को मिला.. आधे घंटे पहले.. जिस तरह उसकी माँ सिसक रही थी.. वह अब भी उसके कानों में गूंज रही थी.. पीयूष ने इंटरनेट पर लेस्बियन सेक्स के अनगिनत फ़ोटो और विडिओ देखे हुए थे.. पर वो सोचता था की ऐसा सब पश्चिमी देशों में होता होगा.. लेकिन आज उसने जो सुना उसके बाद पीयूष की सोच ही बदल गई..

मेरी मम्मी लेस्बियन कैसे हो सकती है!! क्या पापा के साथ उनकी पटती नहीं होगी ? अगर ऐसा होता तो मम्मी किसी अन्य पुरुष के साथ भी सेक्स कर सकती थी.. अगर मम्मी पापा से संतुष्ट नहीं थी तो शीला भाभी के पास जाने का क्या मतलब? मदन भाई की गैरमौजूदगी में भाभी को चुदाई के लिए साथी की जरूरत हो सकती है.. तो फिर खिड़की से शीला भाभी की सिसकियाँ क्यों नहीं सुनाई दी ? आवाज तो सिर्फ मम्मी की ही आ रही थी.. तो क्या शीला भाभी मम्मी की चुत चाट रही होगी? छी छी.. मैं भी क्यों ऐसा गलत सोच रहा हूँ मम्मी के बारे में !!

पीयूष अनुमौसी से आँख तक नहीं मिला पाया.. वैसे देखा जाएँ तो इस घटना में वो प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी तरह से जुड़ा नहीं था.. फिर भी उसे अफसोस हो रहा था की उसने अपनी ही माँ की जातीय ज़िंदगी में दाखल दी.. वह अपनी मर्जी की मालिक थी.. और अपनी इच्छा अनुसार कुछ भी कर सकती थी..

पीयूष को एक ही चिंता थी.. अभी तो मामला शीला भाभी तक सीमित था इसलिए कोई समस्या नहीं थी.. कल जब मदन भाई लौट आएंगे और शीला भाभी उनके साथ व्यस्त हो जाएगी तब मम्मी का क्या होगा? कहीं अपनी आग बुझाने के चक्कर में वो किसी लोफ़र लफंगे मर्द के चंगुल में फंस गई तो !! पर मैं इस बारे में और कर भी क्या सकता हूँ !! पीयूष बड़ी ही असमंजस में फंस गया था

पीयूष के मन में अब भी संवाद चल रहा था .. तू क्यों इसमें कुछ नहीं कर सकता..? और तू नहीं करेगा तो और कौन ध्यान रखेगा? किसी को कानों कान खबर हुई तो पूरे खानदान की इज्जत की माँ चुद जाएगी.. नहीं नहीं.. मम्मी का ध्यान तो रखना ही पड़ेगा.. मुझे लगता है की मम्मी पहले ऐसी नहीं थी.. शीला भाभी के संग ज्यादा घुलमिल जाने के बाद ही ज्यादा एक्टिव हो गई थी.. मम्मी तो ठीक पर कविता भी आज कल शीला भाभी के साथ ज्यादा संपर्क में रहती है.. कहीं कविता भी शीला भाभी के साथ लेस्बियन....!!!! माय गॉड.. शीला भाभी इतनी खूबसूरत और एक्टिव है.. मदन भाई के बगैर.. दो सालों से बिना सेक्स के वो कैसे रह पाती होगी... !! जरूर उन्हों ने कोई न कोई लंड का जुगाड़ किया ही होगा अपनी प्यास बुझाने के लिए.. कहीं कविता भी भाभी के संग किसी और मर्द के साथ तो नहीं चुदवा रही होगी.. नहीं नहीं.. मेरी कविता ऐसा नहीं कर सकती.. पर कहीं कविता और मेरी मम्मी ही एक दूसरे के साथ तो...... !!!!!

अनुमौसी: "क्या सोच रहा है पीयूष? नौकरी गई तो गई.. इसमें इतना क्या चिंता करना.. !! और वैसे भी.. रेणुका के पति से तेरी बात हो गई है ना!! तू चिंता मत किया कर बेटा" पीयूष के सर को सहलाते हुए मौसी ने कहा "चल अब खाना खा ले" पीयूष का हाथ पकड़कर उसे डाइनिंग टेबल पर बैठा दिया मौसी ने

पीयूष मशीन की तरह बैठ गया और बिना कुछ बोले खाना खाने लगा.. थाली में सब्जी परोसते वक्त अनुमौसी का पल्लू नीचे गिर गया.. पीयूष ने अपनी नजर फेर ली.. छी छी.. ऐसे गंदे विचार मुझे क्यों आ रहे है आज!! वह खाना खाने लगा और फिर अपने घर चला गया.. कल रेणुका भाभी के पति राजेश से मिलने जाना है.. पीयूष घर पहुंचकर अपने सारे कागज ठीक करने लगा..

पीयूष के जाने के बाद कविता, शीला और मौसी टेबल पर बैठकर खाने लगे। रेणुका ने सबसे पहले खाना खतम कर लिया

शीला: "तूने कुछ खाया क्यों नहीं रेणुका? इतनी हड़बड़ी में खतम किया.. आराम से खाना था.. "

रेणुका: "मुझे जितनी भूख थी उतना खा लिया है मैंने.. तू चिंता मत कर" कहते हुए रेणुका उठकर जाने लगी

अनुमौसी: "कहाँ जा रही है तू रेणुका?"

रेणुका: "आप शांति से खाना खाइए.. मैं अभी आती हूँ" कहते हुए रेणुका भागकर अनुमौसी के घर पहुंची.. और पीयूष के कमरे में गई.. पीयूष कागज बिछाकर फ़ाइल कर रहा था.. रेणुका ने कमरे का दरवाजा बंद किया और ब्लाउस के दो हुक खोलकर अपना बायाँ स्तन बाहर निकालकर बोली

"जल्दी कर पीयूष.. वो तीनों खाना खा रहे है इसलिए बड़ी मुश्किल से बचकर आई हूँ.. मैंने तुझे वादा किया था इसलिए पूरा कर रही हूँ.. जल्दी जल्दी कर.. उनके आने से पहले मुझे भागना पड़ेगा.. "
 
रेणुका: "आप शांति से खाना खाइए.. मैं अभी आती हूँ" कहते हुए रेणुका भागकर अनुमौसी के घर पहुंची.. और पीयूष के कमरे में गई.. पीयूष कागज बिछाकर फ़ाइल कर रहा था.. रेणुका ने कमरे का दरवाजा बंद किया और ब्लाउस के दो हुक खोलकर अपना बायाँ स्तन बाहर निकालकर बोली

"जल्दी कर पीयूष.. वो तीनों खाना खा रहे है इसलिए बड़ी मुश्किल से बचकर आई हूँ.. मैंने तुझे वादा किया था इसलिए पूरा कर रही हूँ.. जल्दी जल्दी कर.. उनके आने से पहले मुझे भागना पड़ेगा.. "

पीयूष स्तब्ध होकर रेणुका के पुष्ट पयोधर स्तनों के सौन्दर्य को देखता ही रहा.. क्या अद्भुत रूप था उन चूचियों का.. आहाहाहा.. स्त्री के स्तनों में ऐसा कौनसा जादू होता है.. जो देखता है बस देखता ही रह जाता है.. "


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"देख क्या रहा है.. जल्दी कर.. मुझे वापिस जाना है"

"भाभी.. आप क्या मस्त लग रही हो.. पर एक ही क्यों खोला? मुझे दोनों स्तन एक साथ नंगे देखने है"

"क्या मुसीबत है यार.. पीयूष तू समझता क्यों नहीं.. अभी तेरी ममी या कविता आ गए तो आफत आ जाएगी.. जिद मत कर.. पूरा भोजन करने की जिद में प्रसाद भी हाथ से जाएगा.. इसलिए बोल रही हूँ.. जल्दी से चूस ले" कहते हुए रेणुका ने अपने स्तन को पीयूष के मुंह के आगे कर दिया..

पीयूष ने पहले अपने हाथ से स्तन को छुआ.. गोरे गोरे मस्त पपीते जैसे.. नरम नरम स्तन.. उसने हल्के से दबाया..

"क्या कर रहा है पागल? ये कोई सुहागरात है जो धीरे धीरे कर रहा है?? जल्दी खतम कर" रेणुका पीयूष से तंग आ गई। उसने पीयूष का सिर पकड़कर अपने बॉल पर दबा दिया.. पीयूष भी असली खिलाड़ी था.. उसने निप्पल को छोड़कर.. आसपास के गोलाकार पर जीभ फेरने लगा.. रेणुका इंतज़ार में थी की कब वो निप्पल को मुंह में लेकर चूसे.. पर ये तो निप्पल के इर्दगिर्द चाटता ही जा रहा था.. निप्पल को नजरअंदाज करते हुए

रेणुका इंतज़ार करते हुए थक गई और ब्लाउस का हुक बंद करने गई.. तब पीयूष ने उसका हाथ पकड़कर अपने लंड पर रख दिया.. जैसे हाथ में अंगारा पकड़ लिया हो वैसे रेणुका ने अपना हाथ झटके से खींच लिया

"दिमाग खराब हो गया है क्या तेरा !! कबसे समझा रही हूँ पर तू समझता ही नहीं है !!" कहते हुए उसने पीयूष को अपने स्तन से दूर किया.. बड़ी मुश्किल से उस टाइट स्तन को ब्लाउस के अंदर दबोचा और हुक बंद कर दिए। पीयूष उसे देखता ही रह गया रेणुका की इस हरकत को

"भाभी.. आपने चूसने ही नहीं दिया.. मैंने अभी ठीक से देखा तक नहीं है.. पता नहीं फिर कब मौका मिले" कहते हुए नाराज होने की एक्टिंग करने लगा पीयूष

रेणुका ने उसे बाहों में भरकर चूम लिया "कितना क्यूट है रे तू!! ऐसे बातें करेगा तो मुझे प्यार हो जाएगा.. चल अब मुझे जाने दे.. बहोत देर हो गई है.. और हाँ कल टाइम पर राजेश की ऑफिस पहुँच जाना.. मैं राजेश से बात कर लूँगी.. ये मेरा मोबाइल नंबर नोट कर ले.. और जब मर्जी आए तब फोन मत करना.. वरना मेरे पति को शक हो गया तो तेरी नौकरी का एबॉर्शन हो जाएगा.. समझा.. !!"

पीयूष ने अपने नंबर से रेणुका को मिसकॉल किया "मेरा नंबर भी सेव कर लेना भाभी"

"हाँ कर लूँगी.. अब चलती हूँ.. बाय" पीयूष उसे जाते हुए देखता ही रहा

रेणुका जब मौसी के घर से बाहर निकल रही थी तभी मौसी अंदर घुस रहे थे.. दोनों की नजरें मिली.. और रेणुका मुस्कुराकर चली गई। मौसी को कुछ शक तो हुआ पर तब तक रेणुका जा चुकी थी। शीला के घर कुछ देर रुक कर वो अपने घर वापिस लौट गई।

रेणुका के जाते ही शीला फिर से अकेली हो गई.. कितनी चंचल थी रेणुका!! उसकी उपस्थिति से पूरा घर जीवंत लगता था.. उसके जाते ही सब सुना सुना लगने लगा.. शीला को अपनी बेटी वैशाली की याद आ गई.. काफी दिनों से उसके साथ बात नहीं हुई थी.. शीला ने मोबाइल उठाकर तुरंत उसे फोन लगाया

"कैसी हो बेटा ?? तू तो कभी फोन ही नहीं करती मुझे? तेरे पापा भी घर नहीं है.. कम से कम मेरा हाल जानने के लिए तो फोन किया कर !! कितना अकेलापन महसूस कर रही हूँ.. पता है तुझे !!" बेटी के आगे शीला ने अपनी भड़ास निकाली

"मम्मी, मैं काफी दिनों से आपको याद कर रही थी.. पर टाइम ही नहीं मिला.. कैसी हो तुम? पता है.. हम अगले हफ्ते आने वाले है तुमसे मिलने.. !!"

"क्या बात है?" शीला उछल पड़ी

"हाँ मम्मी.. उनको ऑफिस का कुछ काम है तो मुझे भी साथ चलने को कहा.. चार पाँच दिन का काम है.. वो अपना काम निपटाएंगे और हम माँ बेटी साथ में ऐश करेंगे.. "

"बहोत अच्छा.. जल्दी जल्दी आ जा.. मैं अकेले अकेल बोर हो रही हूँ.. तेरे पापा थे तब सब दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलना होता था.. अब तो सब फोन पर ही हाल चाल पूछ लेते है.. कोई मिलने भी नहीं आता.. "

"बस मम्मी.. अब मैं आ जाऊँगी तो तेरा दिल लगा रहेगा.. अगले हफ्ते आएंगे.. आने से पहले मैं फोन करूंगी"

"ओके बेटा.. अपना खयाल रखना.. और संजय कुमार को मेरी याद देना"

"ठीक है मम्मी.. रखती हूँ"

शीला भावुक हो गई.. बेटी को विदा करने के बाद उनका घर सुना हो गया था.. उस दिन कितना रोए थे मैं और मदन?? मदन तो रात में नींद से जागकर वैशाली को याद करते हुए रोता था..

शीला ने केलेंडर में देखा.. अभी डेढ़ महीने की देरी थी मदन के लौटने में.. अब की बार तो मैं उसे वापिस जाने ही नहीं दूँगी.. क्या रखा है परदेश में? यहाँ पत्नी बिस्तर पर करवटें ले रही हो और पति परदेश में मजदूरी कर रहा हो.. ये भी भला कोई ज़िंदगी है !! शीला को बड़ी ही तीव्रता से मदन की याद आने लगी.. आज रात उसका फोन आना चाहिए.. जल्दी आजाओ मदन..

छत पर खड़े खड़े किसी से फोन पर बातें करते हुए पीयूष को बगल के घर में शीला भाभी अपने कमरे के सोफ़े पर बैठी हुई नजर आ रही थी.. उसकी नजर शीला से मिलते ही दोनों की आँखें चमक उठी.. शीला के उभारों को देखते हुए पीयूष को रेणुका के बबलों की याद आ गई.. शीला भाभी के बॉल बड़े थे पर रेणुका के स्तन कसे हुए थे.. पर अगर शीला भाभी को एक बार भोगने के लीये मिल जाएँ तो मैं रेणुका भाभी की तरफ देखूँ भी नहीं.. आह्ह.. पीयूष के लंड में एक झटका लगा.. यार.. ये शीला भाभी की नाभि कितनी सेक्सी है !! बिल्कुल कयामत सी.. एक बार चांस मिल जाएँ तो उनकी नाभि को चोदना है.. इतनी मस्त गहरी नाभि है की आधा लंड समा जाएँ अंदर..

पीयूष के दिमाग से शीला भाभी हट ही नहीं रही थी.. ज्यादातर रूप और कामुकता एक साथ एक व्यक्ति में कम ही नजर आते है.. शीला भाभी के पास उन दोनों का जादुई मिश्रण था.. कातिल हुस्न.. आलीशान व्यक्तित्व.. और चुंबकीय स्वभाव.. पीयूष दीवाना हो चुका था उनका.. दूसरी तरफ कविता ऐसा महसूस कर रही थी की पीयूष का उसके तरफ ध्यान कम होता जा रहा था.. वो सोच रही थी की शायद मैं पिंटू की तरफ ढलती जा रही हूँ उस वजह से तो शायद ऐसा लग रहा हो.. कविता ये जानती थी की शादी के बाद उसे पिंटू से नाता तोड़ लेना चाहिए था.. पर कमबख्त दिल का क्या करें.. कितनी कोशिशों के बाद भी वह अपने पहले प्रेम को दिल से निकाल नहीं पा रही थी

दूसरे दिन पीयूष फोन करके राजेश की ऑफिस पहुँच गया.. राजेश ने इंटरव्यू लेकर उसे एक हफ्ते के लिए अपॉइन्ट किया.. और उसे अपनी ऑफिस के मेनेजर महेंद्र के नीचे नियुक्त कर दिया.. पीयूष ने बाहर निकलकर सब से पहले रेणुका भाभी को फोन कर ये समाचार दिए.. बाद में कविता को और अंत में शीला भाभी को फोन किया और अपनी नौकरी लगने की खुशखबरी दी.. राजेश ने पीयूष को एक हफ्ते के लिए उसका काम देखकर नौकरी पक्की करने और तनख्वाह तय करने का वादा किया.. अपनी योग्यता और मेहनत पर पीयूष को पूरा भरोसा था. उसने तय किया की वह पूरे दिल से मेहनत करेगा और राजेश को शिकायत का एक भी मौका नहीं देगा..

पीयूष की नौकरी शुरू हो गई.. तीसरे ही दिन.. मेनेजर महेंद्र ने पीयूष के हाथों में एक बंद कवर रखा और कहा की ये कवर वो अपनी पत्नी को दें.. ये पीयूष की पत्नी के लिए था.. पीयूष अचंभित होकर सोचता रहा की कवर में ऐसा क्या था !!

शाम को घर आकार उसने कविता के हाथ में कवर रख दिया

कविता: "क्या है ये?"

पीयूष: "कवर तेरे हाथों में ही.. तू ही खोलकर बता.. मेरी ऑफिस से दिया है.. और कहा है की तेरे लिए है"

कविता: "मुझे भला कोई क्यूँ कवर भेजेगा तेरी ऑफिस से? नौकरी मैं कर रही हूँ या तुम?"

पीयूष: "अरे यार.. तू वो सब छोड़.. और कवर खोल.. मुझसे अब और इंतज़ार नहीं हो रहा"

कविता ने कवर खोला.. एक एग्रीमेन्ट था जिसमें पीयूष की नौकरी को स्थायी कर दिया गया था और साथ ही उसकी तनख्वाह २५००० तय की गई थी.. और साथ में एक चिट्ठी थी जिसमें लिखा था

"प्रिय पीयूष,

तुम्हें मेरी कंपनी में पर्मनन्ट नौकरी देते हुए मुझे खुशी हो रही है.. मेरी कंपनी को तुम्हारे जैसे होनहार कर्मचारी की जरूरत थी। एक हफ्ते के काम को तीन ही दिन में खतम कर तुमने अपनी योग्यता सिद्ध कर दी है.. मैं अपने स्टाफ को कभी नौकर नहीं समझता.. अपने परिवार का हिस्सा ही समझता हूँ.. इसलिए शनिवार रात को तुम्हें और तुम्हारी पत्नी को मेरे साथ डिनर पर आने का न्योता दे रहा हूँ.. मेरे परिवार में तुम्हारा स्वागत है.. धन्यवाद और अभिनंदन.. शनिवार शाम को ७:४५ को तुम्हें अपनी पत्नी के साथ होटल मनमन्दिर में आना है.. हमारी ऑफिस का अन्य स्टाफ भी साथ डिनर करेगा.. हर महीने के आखिरी शनिवार को हमारी कंपनी डिनर के लिए मिलते है ताकि पूरा स्टाफ और उनके परिवारजन आपस में मिल सकें.. स्टाफ के साथ पहचान बढ़ाने का तुम्हारे लिए ये अच्छा अवसर रहेगा..

शुभेच्छा सह

राजेश"

ये पढ़कर कविता उछल पड़ी और पीयूष से लिपट गई.. पीयूष और कविता दोनों ही बेहद खुश थे.. पीयूष ने भी कविता के स्तनों को दबाते हुए उसे चूम लिया.. दोनों बेडरूम के अंदर ही थे.. पति और पत्नी एक दूसरे को उत्तेजना प्रदान करने लगे.. और साथ ही साथ एक दूसरे के वस्त्रों को भी उतारने लगे.. दोनों जिस्म नंगे होते ही पीयूष भूखे भेड़िये की तरह कविता पर टूट पड़ा.. कविता भी पीयूष के लंड को मुट्ठी में दबाते हुए अपने संतरों जैसे स्तनों को पीयूष की छाती से रगड़ने लगी.. पीयूष का शरीर उत्तेजना से तप रहा था.. उसका लंड कविता के हाथों में ठुमक रहा था.. पीयूष ने ऊपर उठकर अपना लंड कविता के मुंह में दे दिया.. कविता बड़े प्यार से पीयूष के सुपाड़े को चूसते हुए उसके आँड़ों को सहलाने लगी.. पीछे की तरफ झुककर पीयूष ने कविता की छोटी सी क्लिटोरिस को मसलकर उसे उत्तेजना से पागल कर दिया..


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"आह्ह कविता.. और जोर से चूस.. बहोत मज़ा आ रहा है यार.. " पीयूष तेजी से कविता की क्लिटोरिस को रगड़ रहा था। दूसरे हाथ से उसने कविता के एक स्तन को मरोड़ दिया.. पीयूष ने अपना लंड अब कविता के मुंह से बाहर निकाला और वो कविता की प्यारी पुच्ची को चाटने लगा.. सिहर रही कविता आँखें बंद कर ये सोच रही थी की ऑफिस से आए खत में जो लिखाई थी.. वो पिंटू से काफी मिलती झूलती क्यों लग रही थी? स्कूल में वो पिंटू को पास बैठकर ही पढ़ती थी इसलिए उसकी लिखाई से वो परिचित थी..

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दिमाग में पिंटू का खयाल आते ही कविता में एक अनोखा जोश आ गया.. अपनी चुत चाट रहे पीयूष को बिस्तर पर पटक कर वो उस पर सवार हो गई.. उंगलियों के बीच उसके लंड को पकड़कर अपनी चुत के छेद को उसपर रख दिया और धीरे धीरे बैठ गई.. लंड अंदर घुसते ही उसने बेतहाशा कूदना शुरू कर दिया.. पीयूष लाचार होकर कविता के प्रहारों को लेटे लेटे झेल रहा था.. उछलते हुए कविता ने अपने बाल खोल दिए.. और मदहोश होकर आँखें बंद कर ऊपर नीचे करती ही रही.. खुले हुए बाल.. जंगली जानवर जैसी उत्तेजना..लाल चेहरा.. बंद आँखें.. पीयूष एक पल के लिए उसे देखकर डर सा गया.. बेरहमी से कविता पीयूष पर कूदती ही रही.. उसके कड़े स्तन.. और उत्तेजना के कारण बंदूक की तरह तनी हुई उसकी निप्पलें.. पीयूष ने मसलना शुरू कर दिया.. पागलों की तरह कूद रही कविता जैसे ही अपनी मंजिल पर पहुंची तब "ओह माय गॉड" कहते हुए लंड से उतार गई और बिस्तर पर लेटकर हांफने लगी..


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अब बारी पीयूष की थी.. उसने हांफ रही कविता की जांघें चौड़ी की.. और उसकी गीली मुनिया में एक ही झटके में अपना लंड घुसेड़ दिया.. उसके हर धक्के के साथ कविता कराह रही थी.. कुछ ही धक्कों के बाद पीयूष ने अपना व्हाइट ज्यूस कविता की तंग चुत में दे मारा.. और उसकी छाती पर गिर गया.. लंड को चुत की अंदर ही रखे हुए.. वो दोनों गहरी नींद में.. उसी अवस्था में सो गए..
 
रोज की तरह कविता जल्दी जाग गई.. सो रहे पीयूष को अपने शरीर से धकेलते ही "पुचच.. " की आवाज के साथ उसका लंड चुत से बाहर निकला.. पीयूष को सहलाकर वो खड़ी हुई और गाउन पहनकर दूध लेने अपने कंपाउंड में आई..

कविता ने शीला के घर की तरफ नजर डाली.. अंदर लाइट जल रही थी.. ये देख कविता सोचने लगी.. लगता है अभी अभी जागी है शीला भाभी.. पता नहीं खाली बिस्तर के साथ कैसे रात बिताती होंगी बेचारी.. !! दो साल से अकेली रहती है.. रसिक अभी आया नहीं था.. कविता ने सोचा की तब तक नहाने के लिए पानी गरम करने गैस पर रख दूँ

गैस पर गरम पानी का पतीला चढ़ाकर वो अपने मोबाइल पर मेसेज चेक कर रही थी तभी रसिक की साइकल की घंटी सुनाई दी.. अपना मोबाइल प्लेटफ़ॉर्म पर रखकर उसने पतीली उठाई और दूध लेने के लिए बाहर आई..

अंधेरे में बाहर जो द्रश्य उसे दिखा उससे कविता के पैरों तले से जमीन खिसक गई.. रसिक ने शीला भाभी को जकड़कर रखा था.. वो चिल्लाने ही वाली थी की तब उसे ये एहसास हुआ की रसिक जबरदस्ती नहीं कर रहा था.. बल्कि शीला भाभी अपनी मर्जी से उससे लिपटी हुई थी.. कविता को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था.. शीला भाभी जैसी सुशील संस्कारी स्त्री.. दूधवाले के साथ?? छी छी छी.. घिन आ गई कविता को शीला भाभी पर

शीला का ये रोज का खेल था.. रसिक जब भी दूध देने आए तब अंधेरे का फायदा उठाकर मजे कर लेती थी.. शीला के बोझिल जीवन में इससे रस बना रहता था.. और रसिक को भी मज़ा आता था.. शीला और रसिक किसी ने भी कविता को देखा नहीं था.. दोनों अपनी ही मस्ती में मस्त थे.. थोड़ी ही देर के बाद रसिक ने शीला को दूध दिया.. और उसके साथ जो भी दे सकता था वो देकर अनुमौसी के दरवाजे की तरफ आया.. हाथ में पतीली लिए कविता तैयार खड़ी थी..

"कैसी हो भाभी? आज आप दूध लेने आई? मौसी सो रही है क्या?"

कविता ने नफरत भरे सुर के साथ कहा "तुम अपने काम से काम रखो.. मैं दूध लेने आउ या मम्मी आए.. तुम्हें क्या फरक पड़ता है? तुम बस दूध दो और चलते बनो"

"इतना गुस्सा क्यों कर रही हो भाभी.. मैंने तो बस ऐसे ही पूछ लिया.. "

"क्यों? दूध देने के अलावा मौसी का और कुछ भी काम था तुम्हें?"

सुनकर रसिक चोंक गया "अरे भाभी.. मुझे बस दूध का हिसाब लेना था उनसे.. और कोई काम नहीं था.. " दूध देकर रसिक चला गया।

कविता का शक और भी दृढ़ होने लगा.. कहीं मेरी सास भी शीला भाभी के साथ इन गुलछर्रों में शामिल तो नहीं हो गई !! कुछ कहा नहीं जा सकता

दोपहर को काम निपटाकर कविता शीला भाभी के घर आई.. वो जानना चाहती थी की भाभी उससे और क्या क्या छुपा रही थी

बातों ही बातों में उसने पूछ लिया "भाभी.. आपने मदन भाई के अलावा और किसी के साथ सेक्स किया है कभी??"

शीला चोंक गई.. अचानक कविता ने आज ये सवाल क्यों पूछा !!

"देख कविता.. अपना पाप हम खुद ही जानते है.. ये केवल माँ ही जानती है की उसका बेटा किसकी पैदाइश है.. इशारों को अगर समझो.. राज को राज रहने दो.. " शीला गीत गुनगुनाकर कविता को आँख मार दी.. संकेत साफ था.. वो कविता और पिंटू के संबंधों की ओर इशारा कर रही थी

कवित सोच में पड़ गई.. भाभी ने तो मुझे ही शक के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया..

"आप ऐसे बात मत बदलिए.. सच सच बताइए ना.. "

शीला: "देख कविता.. गोल गोल मत घुमा.. तेरे दिमाग में क्या चल रहा है मुझे बात दे.. "

शीला और कविता के बीच जिस तरह से लेस्बियन संबंध विकसित हो चुके थे उसके बाद एक दूसरे से शर्माने की कोई आवश्यकता नहीं थी

कविता: "भाभी, मैंने आज सुबह आपको और रसिक को एक साथ देखा.. आप को और कोई नहीं मिला जो एक दूधवाले के साथ.. छी छी.. मुझे तो बोलने में भी शर्म आती है"

अपने चेहरे पर जरा से भी शिकन लाए बगैर शीला ने शांत चित्त से कविता की जांघ पर हाथ रखकर कहा

शीला: "तेरी बात सही है कविता.. पर मेरी तरह अगर तू ८५५ रातें बिना पति के गुजार कर फिर ये बात बोल रही होती तो तेरी बात का वज़न भी पड़ता.. " कविता स्तब्ध हो गई

कविता: "भाभी.. मैं सिर्फ इतना कह रही थी की कहाँ वो रसिक और कहाँ आप?? कोई तुलना ही नहीं है.. "

शीला: "कविता, एक ५५ साल की.. ढलती जवानी से गुजर रही स्त्री.. किस मुंह से किसी अच्छे घर के लड़के को प्रपोज करेगी.. ये सोचा है तूने कभी? तू अगर पिंटू के साथ पकड़ी भी जाए तो लोग ये समझकर माफ कर देंगे की बच्चे है.. गलती हो जाती है.. पर अगर इस उम्र में लोगों को मेरे बारे में कुछ पता चले तो पूरा समाज थू थू करेगा.. मेरी परेशानी को समझ"

कविता ने कुछ जवाब नहीं दिया.. शीला भाभी की मनोदशा उसे धीरे धीरे समज आने लगी

शीला ने अपनी बात आगे चलाई "एक तरफ लोगों की भूखी नज़रों को मैं नजर अंदाज करती रहती हूँ.. दूसरी तरफ खुद अपने जिस्म की आग से झुलस रही हूँ.. कोई कब तक बर्दाश्त करें !! मैं भी आखिर एक इंसान हूँ.. मेरी भी जरूरतें है.. ८५५ रात कम नहीं होती कविता.. मुझे रसिक के पास वो सुख मिला जो मेरे पति के पास कभी नहीं मिला था.. "

कविता: "मतलब? कौन सा सुख?"

शीला: "वो तू अभी समझ नहीं पाएगी.. जब तेरी उम्र होगी.. तू मेनोपोज़ से गुजरेगी.. तब तुझे समझ आएगा"

कविता: "नहीं भाभी.. मुझे समझाइए ना.. प्लीज। आज नहीं तो कल.. मैं भी उस अवस्था से गुजरूँगी.. आपका मार्गदर्शन तब काम आएगा"

शीला ने एक गहरी सांस ली और अपनी बात शुरू की

शीला: "ऐसा है कविता... एक-दो डिलीवरी के बाद.. स्त्री के गुप्तांग में ढीलापन आ जाता है.. और मेनोपोज़ के बाद शरीर के अंदर विशिष्ट तब्दीलियाँ होती है.. सेक्स की इच्छा तीव्र हो जाती है.. दूसरी तरफ बढ़ती उम्र के कारण पति के लंड में पहले जैसी सख्ती नहीं रहती.. उत्तेजित होने में भी समय लगता है.. और उत्तेजित हो भी जाएँ तो तुरंत वीर्य स्खलित हो जाता है.. ऐसी सूरत में स्त्री को एक अजीब सा खालीपन महसूस होता है.. एक तो योनि के शिथिल होने से संभोग में ठीक से मज़ा नहीं आता.. और ऊपर से पति दो तीन धक्कों में ही झड़ जाता है.. इसलिए संतोष ही नहीं मिल पाता.. "

कविता ध्यानपूर्वक शीला भाभी की बातें सुन रही थी..

कविता: "अच्छा.. इसीलिए बड़ी उम्र की स्त्रीओं को जवान लड़के ज्यादा पसंद आते है.. हैं ना!!"

शीला: "कोई कोई पसंद आ जाता है.. पर हर बार ऐसा नहीं होता.. दूसरी बात.. तू आज रात घर पर जाकर.. पीयूष के लंड से ज्यादा मोटी चीज अपनी चुत में डालकर देखना.. और फिर बताना की मज़ा आया की नहीं!!"

कविता: "क्यों? मतलब मैं समझी नहीं"

शीला: "मतलब.. मेरे पति के मुकाबले रसिक का लंड ज्यादा मोटा है.. और मोटे लंड से चुदवाने में हमेशा मज़ा आता है.. ढीले ढाले भोसड़े की अंदरूनी दीवारों के साथ जब मोटे लंड का घर्षण होता है तब इतना मज़ा आता है.. मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती"

कविता: "रसिक का लंड मोटा है मतलब....आपने उसके साथ.. !!!"

शीला: "बड़ा ही मस्त है रसिक का.. तू तो ले भी नहीं पाएगी उसका.. चीखें मारकर मर जाएगी अगर लेने की कोशिश भी करेगी तो.. !!" रसिक का लंड याद आते ही शीला का भोंसड़ा पनियाने लगा.. ये विवरण सुनकर कविता भी सकपकाने लगी

कविता: "माय गॉड.. इतना मोटा है रसिक का?"

शीला: "कुछ ज्यादा ही मोटा.. नॉर्मल लंड से दोगुना मोटा"

कविता: "कितना मोटा होगा? वो मूसल जितना?" किचन में प्लेटफ़ॉर्म पर पड़े मूसल की तरफ इशारा करते हुए कविता ने कहा। उस दौरान उसने मन ही मन पीयूष और पिंटू के लंड की तुलना उस मूसल से कर ली थी.. मूसल काफी मोटा था

शीला: "ये तो कुछ भी नहीं है.. " कहते हुए शीला ने कविता के सामने ही अपना घाघरा ऊपर कर लिया और चुत खुजाते हुए मुठ लगाने लगी.. अपनी चार उंगलियों को एक साथ अंदर बाहर करते हुए उसने कविता से कहा "देख तू.. कितनी ढीली हो गई है.. अब ऐसे में पतला लंड कहाँ से मज़ा देगा मुझे?? तेरी चुत में मुश्किल से दो उँगलियाँ जाती होगी"

कविता भी गरम होने लगी थी "हाँ भाभी.. दो उँगलियाँ डालती हूँ तो भी बहुत दर्द होता है" उसकी तेज सांसें बता रही थी की वह कितनी उत्तेजित हो गई थी.. मोटे लंड के बारे में बातें करते ही उसकी चुत में हलचल होना शुरू हो गया था

कविता: "अब ये सारी बातें सुनकर मुझे मोटा लंड देखने का बड़ा मन कर रहा है भाभी"

शीला: "कैसी बातें कर रही है तू !! लंड को गाजर मुली थोड़ी न है जो फ्रिज से निकाला और तुझे दिखा दिया !!" ठहाका लगाकर हँसते हुए बोली

कविता इस जोक पर जरा भी नहीं हंसी.. वह इतनी उत्तेजित हो चुकी थी की सोफ़े पर ही अपनी चुत रगड़ने लगी.. जब शीला उसके सामने धड़ल्ले से नंगे भोंसड़े में उँगलियाँ पेल रही थी तो वो भी इतनी छूट तो ले ही सकती थी..

शीला: "अंदर इतनी चूल मची है तो फिर ऊपर ऊपर से क्यों कर रही है !! खोल दे और डाल अपनी उँगलियाँ अंदर"

कविता: "ओहह भाभी.. आपने ये सारी नंगी बातें कर मुझे इतना गरम कर दिया.. मुझसे रहा नहीं जा रहा अब.. भाभी.. आप मेरी चुत में आज तीन उँगलियाँ डालिए.. देखते है क्या होता है"

शीला समझ गई की कविता मोटे लंड जैसा असर महसूस करना चाहती थी

शीला: "दर्द तो नहीं होगा ना तुझे ??"

कविता: "होने दो दर्द अगर होता है तो.. प्लीज डालिए" कहते हुए कविता ने अपना स्कर्ट ऊपर कर दिया और पेन्टी को घुटनों से सरकाते हुए उतार दी..

शीला: "एक बार अगर तू रसिक का लंड देखेगी ना.. तो भूल जाएगी की वो एक दूधवाला है.. ओह.. उसे याद करते ही मेरा पानी निकलने लगा.. "अंदर डाली हुई चार गीली उंगलियों को बाहर निकालकर उसने कविता को दिखाया

कविता सिसकने लगी.. "कुछ कीजिए ना भाभी.. मुझे अंदर जोर की खुजली मची है.. वो किचन में मूसल पड़ा है वही डाल दीजिए"

शीला: "अरे पागल.. उस मूसल से मैंने सुबह ही लहसुन कुटा था.. गलती से भी चुत को छु गया तो नीचे आग लग जाएगी.. " शीला ने झुककर कविता की चुत की एक चुम्मी ले ली.. और अपनी जीभ को क्लिटोरिस पर रगड़ दिया.. साथ ही साथ अपनी उँगलियाँ अंदर डालने लगी

कविता: "उईईई माँ.. डाल दी तीनों उँगलियाँ अंदर?"

शीला: "नही.. अभी केवल दो उँगलियाँ ही गई है अंदर.. " शीला ने कविता की नारंगी दबा दी


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"तीन तो अंदर नहीं ले पाऊँगी.. जल रहा है अंदर"

"तो फिर रसिक का लंड देखने की जिद ही छोड़ दे.. क्यों की उसका लंड एक बार देख लिया तो उससे बिना चुदे रह नहीं पाएगी.. और अगर चुदवाने की कोशिश भी की.. तो दर्जी से सिलवाने पड़ेगी तेरी.. "

"ओह्ह भाभी.. प्लीज.. मुझे एक बार.. बस एक बार देखना है.. आप बुलाइए ना रसिक को.. प्लीज प्लीज प्लीज भाभी"

शीला के मुंह से रसिक के लंड का विवरण सुनकर पिघल गई थी कविता.. उसने भाभी को पटाने के लिए उनके भोसड़े में अपनी उँगलियाँ घोंप दी..

"आह्ह.. कविता.. !!"

"प्लीज भाभी.. मुझे रसिक का एक बार देखना है.. कुछ करो न प्लीज" कविता गिड़गिड़ाने लगी

शीला के भोसड़े से रस का झरना बहने लगा.. "ओह कविता.. तू अभी मुझे उसकी याद मत दिला यार.. " कविता की उंगलियों पर अपने भोसड़े को ऊपर नीचे करते हुए शीला ने कहा.. कविता शीला के उत्तुंग शिखरों जैसे स्तनों को चूमने लगी.. दोनों के बीच उम्र का काफी अंतर था पर उसके बावजूद एक ऐसा संबंध स्थापित हो चुका था जो बड़ा ही अनोखा था।

कविता को इस बात से ताज्जुब हो रहा था की जो उत्तेजना उसे शीला भाभी के जिस्म से खेलने पर प्राप्त होती है.. वैसा उसे पीयूष के साथ कभी महसूस नहीं हुआ था.. पता नहीं ऐसा कौनसा जादू था शीला भाभी में?

शीला ने अब कविता की टांगें चौड़ी कर दी... उसने अपनी उंगलियों से गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठों को सहलाया और उसकी गुलाबी क्लिटोरिस को दो उँगलीयों के बीच दबा दिया

"उईई.. आह्ह.. मर गई.. " शीला ने अब चाटना भी शुरू कर दिया "आह्ह भाभी.. इस तरह तो कभी पीयूष भी नहीं चाटता मेरी.. " कविता की कचौड़ी जैसी फुली हुई चुत की दोनों फाँकों को बारी बारी चाट रही थी शीला.. साथ ही साथ वह कविता के अमरूद जैसे स्तनों को मसलती जा रही थी..


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एक दूसरे के अंगों से खेलते हुए दोनों दो बार स्खलित हो गए.. थोड़ी देर वैसी ही अवस्था में पड़े रहने के बाद कविता शीला के पास आई और उन्हे बाहों में जकड़कर लिपट पड़ी.. बड़े ही प्रेम से उनके होंठों पर गरमागरम चुंबन करते हुए बोली

"शुक्रिया भाभी.. आपके पास आकर जिंदगी के सारे गम भूल जाती हूँ मैं.. आपसे मिलकर ही मुझे पता चला की असली मज़ा किसे कहते है.. और हाँ भाभी.. हम शनिवार को रेणुका भाभी के साथ डिनर पर जाने वाले है.. कंपनी का गेट-टूगेथर है.. उनके पति राजेश जी की कंपनी में पीयूष की नौकरी जो पक्की हो गई है"

"अरे वाह.. ये तो बहोत बड़ी खुशखबरी है.. कविता.. !! देखा.. पीयूष बेकार ही टेंशन कर रहा था.. काबिल और महेनती लोगों को काम मिल ही जाता है.. "

"अब मैं चलूँ भाभी? रात का खाना बनाना है"

"हाँ ठीक है.. मैं भी सोच रही थी मार्केट हो आऊँ.. काफी दिन हो गए है बाजार गए.. कुछ चीजें लानी है"

कविता के जाने के बाद शीला मार्केट से जरूरी सामान ले आई और अपने अस्त व्यस्त घर को ठीक करने में लग गई
 
शनिवार को शाम ७ बजे, कविता और पीयूष तैयार होकर होटल मनमंदिर पर जाने के लिए निकले.. अच्छी नौकरी मिलने से पीयूष खुश था.. कविता किसी अलग कारण से उत्साहित थी.. समय का पाबंद पीयूष ७:४५ को होटल के प्रांगण में पहुँच गया..

"आओ पीयूष.. आइए भाभी जी" राजेश ने उन दोनों का स्वागत किया

पूरा कॉनफरन्स रूम भरा हुआ था.. कविता यहाँ किसी को नहीं जानती थी.. पीयूष को अभी तीन दिन ही हुए थे.. पर वो कुछ कुछ लोगों को जानता था.. इसलिए उनसे बातों में व्यस्त हो गया

कविता अकेले ही पूरे हॉल में घूमने लगी.. उसके दिमाग में एक ही बात चल रही थी "मेरा अंदाजा गलत नहीं हो सकता.. पिंटू की लिखाई को मैं बराबर जानती हूँ.. ऑफिस से आया हुआ वो खत पिंटू ने लिखा था इसका मुझे यकीन है.. " उसकी आँखें यहाँ वहाँ एक ही इंसान को ढूंढ रही थी

"मे आई हेल्प यू?" पीछे से आवाज आई.. सुनकर कविता का रोम रोम पुलकित हो उठा। उसने पीछे मुड़कर देखा

"अरे पिंटू तू?? यहाँ.. ??" उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था

"कवि.. तू यहाँ कैसे?" पिंटू आश्चर्यचकित था..

"मेरे पति ने अभी अभी ये कंपनी जॉइन की है.. देख वो सामने खड़ा है.. पीयूष है उसका नाम"

"हाँ नाम तो मुझे पता था.. पर आज देखा पहली बार.. हेंडसम है तेरा पति.. और तू भी आज कितनी सेक्सी लग रही है यार.. आई लव यू जान" पिंटू ने कहा

शर्म से कविता की आँखें झुक गई.. उसके रूप और सौन्दर्य के सामने हॉल की सारी महिलायें फिक्की लग रही थी.. सब अपने अपने ग्रुप में मशरूफ़ थे इसलिए पिंटू की कही बात किसी के कानों पर नहीं पड़ी.. नहीं तो मुसीबत हो जाती

"हेंडसम तो तू भी बहोत लग रहा है आज.. मन तो ऐसा कर रहा है मेरा की अभी तुझे चूम लू.. कितने दिन हो गए.. साले तू कभी फोन या मेसेज क्यों नहीं करता?" कविता में छुपी प्रेमीका ने शिकायत की

"कवि.. ये सारी बातें यहाँ नहीं हो सकती.. मैं राजेश सर का पर्सनल सेक्रेटरी हूँ.. उनसे जुड़ी ऑफिस की सारी बातें मैं ही संभालता हूँ.. सुन कविता.. यहाँ हमे ऐसे ही बर्ताव करना है जैसे हम अनजान है.. नहीं तो किसी को शक हो जाएगा.. मैं अब चलता हूँ.. सर मुझे ढूंढ रहे होंगे"

उतने में पीयूष राजेश के साथ कविता के पास आया

"नमस्ते मैडम.. इस पूरे हॉल में सब से ज्यादा खूबसूरत आप लग रही हो.. इन सारे वेस्टर्न ड्रेस पहनी स्त्रीओं में आपकी साड़ी सब से अलग और आकर्षक लग रही है" राजेश ने कहा

पराए पुरुष से अपनी तारीफ सुनकर कविता शर्माने लगी.. ये सब उसे काफी नया नया लग रहा था। थोड़ी ही देर में सब डिनर टेबल पर बैठ गए और स्टेज पर माइक लिए खड़े पिंटू ने बोलना शुरू किया

"मेरे प्यारे मित्रों..

सारे उपस्थित स्टाफ और उनके परिवार का मैं दिल से स्वागत करता हूँ। मुझे ये बताते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है की हमारे परिवार में एक और कपल जुडने जा रहा है.. सब लोग तालियों के साथ स्वागत कीजिए.. मिस्टर पीयूष और मिसिस कविता.. !!"

अपने टेबल से खड़े होकर पीयूष और कविता ने सब का इस्तकबाल किया.. और वापिस चैर पर बैठ गए।

कविता का फिगर और खूबसूरती देखकर सब दंग रह गए.. सबके आकर्षण का केंद्र बन गई कविता !! उसके सेक्सी फिगर को लोग बार बार देख रहे थे.. कविता को थोड़ा सा विचित्र महसूस हो रहा था.. स्टेज पर से कंपनी के नए प्रोजेक्ट्स के बारे में जानकारी दी जा रही थी और सारा स्टाफ अब खाने में व्यस्त हो रहा था। कविता को खाने से ज्यादा पिंटू की आवाज सुनने में ज्यादा दिलचस्पी थी.. पिंटू यहाँ कैसे और कबसे नौकरी पर लगा होगा?? कविता तिरछी नज़रों से पिंटू को देख रही थी.. राजेश भी स्टेज पर बैठे बैठे पिंटू को सुन रहा था।

एकाध घंटे में खाना खतम हो गया.. सब एक के बाद एक जाने लगे.. जाने से पहले कविता एक बार और पिंटू से मिलना चाहती थी.. पर पीयूष के साथ होने के कारण ऐसा हो नहीं पाया.. अपनी पत्नी की इतनी तारीफ सुनने के बाद पीयूष थोड़ा सा असुरक्षित महसूस कर रहा था और इसलिए वो कविता का पल्लू छोड़ ही नहीं रहा था। वापिस लौटते वक्त पीयूष ने कंपनी के बारे में बहोत सारी बातें कही.. पर ना ही उसने पिंटू के बारे में जिक्र किया और ना ही कविता ने उसके बारे में कुछ पूछा..

दूसरे ही दिन से पीयूष नौकरी पर लग गया.. रोज रात को कविता पीयूष से कंपनी में हुई पूरे दिन की घटनाओं के बारे में पूछती.. इस आशा में की कहीं पिंटू की बात निकले पर उसे रोज निराश ही होना पड़ता था
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एक सुबह ५ बजे कविता दूध लेने के लिए बाहर निकली तभी एक टैक्सी शीला भाभी के घर के आगे आकर रुकी.. करीब २७-२८ साल की लड़की सूट्कैस निकाल रही थी गाड़ी से.. और तभी रसिक दूधवाला भी आ पहुंचा

शीला ने दरवाजा खोला और वो लड़की अंदर चली गई.. रसिक से दूध लेकर शीला ने दरवाजा बंद कर दिया..

रसिक अब कविता के घर पर दूध देने पहुंचा.. दूध देते हुए उसने कहा

"उनकी बेटी आई है कलकत्ता से.. अच्छा है.. अब उनका अकेलापन दूर हो जाएगा"

कविता अंधेरे में नीचे देखकर रसिक के मोटे लंड का उभार ढूंढ रही थी..

कविता: "हाँ वो तो है रसिक.. अकेले रहना बड़ा मुश्किल होता है.. " कविता को अपने साथ बात करता देख रसिक को आश्चर्य हुआ.. आज तक कभी भी उसने बात करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी..

रसिक के पजामे से उभार तो नजर आ रहा था जो उस मोटे लंड के होने का सबूत दे रहा था.. देखते ही कविता की पुच्ची में चुनचुनी होने लगी.. पर कहें कैसे रसिक को !! वह सोच में पड़ गई.. रसिक को आज शीला भाभी के साथ भी खेलना नसीब नहीं हुआ था.. वरना हररोज वो शीला के स्तनों को तो दबा ही लेता.. और अगर शीला हरी झंडी दिखाती.. तो उसका घाघरा उठाकर अपना एक किलो का लंड पेलकर धमाधम चोद भी लेता.. या तो फिर शीला उसका लंड हिलाकर उसके आँड़ों का मक्खन बाहर निकलवाने में मदद करती.. और फिर रसिक का पूरा दिन अच्छा जाता.. पर आज उनकी बेटी के आ जाने से कुछ भी नहीं हो पाया. अगर वह थोड़ी देर से आया होता तो शीला की बेटी अंदर चली गई होती और उसे कम से कम शीला के रसदार भारी स्तनों को दबाने का मौका तो मिलता..

रसिक ने कविता की नाजुक कमर और पतले शरीर को देखा.. और लगा की वह उसके किसी काम की नहीं थी.. रसिक के एक धक्के में ही उसका काम तमाम हो जाता.. कितनी संकरी होगी इसकी चुत ? रसिक देखते देखते सोच रहा था.. अगर इसके अंदर मेरा लोडा डालूँ तो ये लहू लुहान हो जाएगी.. अरे इसका तो पेशाब ही बंद हो जाएगा.. और मुझे ही उठाकर अस्पताल ले जाना पड़ेगा !!


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"क्या सोच रहे हो रसिक? दूध डालो पतीली में !!" रसिक की कामुक नजर.. सुबह का एकांत और अंधेरा.. शीला भाभी की बातों में सुने वर्णन के आधार पर रसिक के लंड की कल्पना करते हुए कविता पागल हो रही थी.. रसिक की चौड़ी छाती और पहलवान जैसा शरीर देखकर कविता की पेन्टी गीली होने लगी..

वो सोच रही थी "इतना बड़ा पहाड़ सा इंसान मेरे ऊपर चढ़ेगा तो मेरा क्या हश्र होगा !! बाप रे.. कम से कम १०० किलो वजन होगा इसका.. मेरे ऊपर तो पीयूष चढ़ता है तब भी मेरी सांस अटक जाती है.. पीयूष तो है भी पतला सा फिर भी.. ये तो हाथी जैसा है.. नहीं रे नहीं.. " कांप उठी थी कविता

दोनों अपना समय बर्बाद कर रहे थे.. चार पाँच मिनट बीत गई.. अभी भी रसिक ने पतीली में दूध नहीं डाला था.. कविता की छोटी छातियाँ.. सुराहीदार गर्दन.. कान में छोटी छोटी बालियाँ.. रसिक मुग्ध होकर कुदरत की बनाई इस खूबसूरत मास्टरपीस को देख रहा था.. यार, ये लड़की अभी मेरा पानी निकलवा देगी.. मुझे ये दूध का धंधा ही बंद कर देना चाहिए.. रोज सुबह इन खूबसूरत बलाओं के बबले देखकर हालत खराब हो जाती है मेरी..

"तुम दूध दे रहे हो या मैं जाऊ?" कविता ने कहा

"दे रहा हूँ.. दे रहा हूँ.. रुकिए जरा.. " रसिक के हाथों में दूध का केन था.. केन का ढक्कन खोलने के लिए जो चाकू था वो साइकिल के हेंडल में फंसा हुआ था.. "जरा वो चाकू निकाल दीजिए ना भाभी.. फंस गया है.. "

रसिक के मुंह से फंस जाने की बात सुनकर कविता को अपनी संकरी चुत में उसका लंड फँसने की कल्पना मन में दौड़ने लगी.. अपने आप पर ही हंसने लगी कविता.. मन भी अजीब है.. कहाँ कहाँ विचार पहुँच जाते है !!

"हंस क्यों रही हो भाभी?" रसिक ने पूछा

"इतना फिट क्यों घुसा रखा है चाकू?"

"ओर कहीं रखने की जगह ही कहाँ है साइकिल में.. !! यहाँ रखता हूँ तो फिट हो जाता है साला.. रोज तो शीला भाभी खींचकर एक झटके में निकाल देती है.. पर आपको तकलीफ होगी.. शीला भाभी अनुभवी जो ठहरी.. पहली बार करो तब सबको तकलीफ होती ही है.. क्यों सच कहा ना मैंने भाभी?" रसिक द्विअर्थी भाषा में बातें करने लगा

"पहली बार तो शीला भाभी को भी तकलीफ हुई होगी.. कोई ऊपर से सीखकर थोड़े ही आता है.. धीरे धीरे कोशिश करें तो सब आने लगता है"

"ये क्या सुबह सुबह रसिक के साथ माथा फोड़ रही है तू.. चल अंदर.. खाना बनाने की तैयारी कर" पीछे से अनुमौसी की आवाज आई

अपनी सास की आवाज सुनते ही कविता ने तेजी से रसिक के हाथों से दूध का पतीला लिया.. और ऐसा करते वक्त दोनों के हाथों का स्पर्श हो गया..

"मम्मी, मैं तो कब से लेने के लिए तैयार खड़ी हूँ.. ये रसिक ही कमबख्त मुझे दे नहीं रहा" कविता ने भी द्विअर्थी संवादों का दौर जारी रखा.. कविता के मुख से ऐसी सांकेतिक भाषा सुनकर रसिक खुश हो गया

कविता दूध लेकर अंदर चली गई और रसिक आगे निकल गया
 
वैशाली को देखकर शीला खुश हो गई.. उसके आने से ही पूरा घर भरा भरा सा लगने लगा.. २७ साल की फेशनेबल, भरे भरे जिस्म वाली, एकदम गोरी और बॉब कट हेयर स्टाइल वाली वैशाली.. एकदम बातुनी लड़की थी.. वो और शीला दोनों बातें करने लगे.. वैशाली ने अपने पापा के बारे में पूछा और शीला ने उसे उसके पति संजय और ससुराल के बारे में बातें की

बातों ही बातों में वैशाली ने शीला को बताया की वो ससुराल में बिल्कुल भी खुश नहीं थी.. उसका पति संजय अपने काम पर ध्यान ही नहीं देता था और बार बार नौकरियों से निकाल दिया जाता था.. पूरा दिन सिगरेट फूंकता रहता था.. शराब पीता था.. दोस्तों से ब्याज पर पैसे उधार लेता था और जब लौटा न पाएं तब शहर छोड़कर भाग जाता था.. पूरा दिन घर पर कोई न कोई वसूली करने आ पहुंचता था.. वैशाली उसे टोकती तो वो अनाब शनाब बोलकर उसे हड़का देता.. उसके सास-ससुर भी संजय की इस स्थिति के लिए वैशाली को जिम्मेदार ठहराते.. ससुर के पेंशन से घर आराम से चल तो रहा था पर उसकी सास बात पर उसे ताने मारती रहती थी। अपनी स्थिति के बारे में बताते हुए वैशाली फुट फुट कर रोने लगी.. शीला ने उसकी पीठ पर हाथ सहलाकर उसे शांत किया.. अपनी माँ के साथ दुख बांटकर वह काफी हल्का महसूस करने लगी।

शीला: "तू चिंता मत कर बेटा.. मेरे होते हुए.. मैं सब कुछ ठीक कर दूँगी"

शीला की बात सुनकर वैशाली के दिल को थोड़ी तसल्ली मिली.. वैशाली का मूड ठीक करने के लिए शीला ने कहा "तू आराम से टीवी देख.. मैं तेरी पसंद का कुछ अच्छा खाने के लिए बना देती हूँ"

शीला किचन में गई और वैशाली पैर पर पैर चढ़ाकर आराम से टीवी देखने लगी.. मायके में आकर बेटियों को एक अनोखी शांति का एहसास होता है.. दोपहर में माँ बेटी ने खाना खाया और फिर से बातें करने लगी.. शाम के साढ़े पाँच कब बज गए पता ही नहीं चला..

शीला ने फोन करके कविता को घर बुलाया और उसकी पहचान वैशाली से करवाई..

शीला: "कविता, तू और वैशाली एक ही हमउम्र हो.. तू इसे कंपनी देना.. वैशाली, ये कविता है.. अपने अनुमौसी के बेटे पीयूष की पत्नी.. बहोत ही अच्छा स्वभाव है इसका.. तुम दोनों की साथ में अच्छी पटेगी.. "

दोनों लड़कियों की दोस्ती होने में समय नहीं लगा.. एक दिन में तो दोनों एकदम खास सहेलियाँ बन चुकी थी.. दोनों देर रात तक साथ बैठती और बातें करती रहती.. रोज रात को खाना खाने के बाद दोनों वॉक पर जाने लगी.. इन दोनों की दोस्ती से अनुमौसी और पीयूष भी बड़े खुश थे।

रात को वॉक पर जाते वक्त, वैशाली टाइट टीशर्ट और छोटी सी शॉर्ट्स पहनकर निकलती.. टीशर्ट के अंदर ब्रा भी नहीं होती थी.. चलते चलते हर कदम के साथ उसके उछलते हुए वक्ष देखकर कविता को अपने मायके की याद आ जाती.. लड़की अपने मायके में बिना किसी बंधन के कितने आराम से रहती है !! ससुराल में तो पूरा दिन "ये करो.. ये मत करो.. ऐसे मत बैठो.. ऐसे कपड़े मत पहनो" ऐसी रोकटोक में ही जीवन निकल जाता है..

वैशाली के ठुमकते जोबन को नुक्कड़ पर खड़े लड़के घूर घूरकर ताड़ते रहते.. वैशाली को उन लड़कों की नजर से कोई फरक पड़ता नहीं दिखा.. वो तो गर्व से अपना सीना तानकर उनके बगल से निकल गई.. उन लड़कों की लफंगी नज़रों से कविता शर्म से लाल हो गई

कविता: "यार वैशाली, लोग कैसी गंदी गंदी नज़रों से देख रहे है.. "

वैशाली: "देखने दे.. मुझे घंटा फरक नहीं पड़ता.. "

कविता: "पता नहीं यार.. ये लोग हमेशा हमारे बूब्स को देखकर क्या सोचते होंगे??"

वैशाली: "यहीं की एक बार टीशर्ट के अंदर हाथ डालकर दबाने मिल जाए तो मज़ा आ जाए.. हा हा हा हा.. "

वैशाली बोलने में एकदम बिंदास लड़की थी.. और स्वभाव से कामुक भी थी.. आखिर थी तो वो शीला की ही बेटी.. कोई हेंडसम लड़का दिख जाएँ तब वो भी उसे ऊपर से नीचे तक स्कैन कर लेती.. वैशाली बार बार कविता को उसकी सेक्स लाइफ के बारे में पूछती रहती.. इतना ही नहीं.. वो पीयूष के बारे में भी अलग अलग प्रश्न पूछती रहती कविता से.. वो सिर्फ पूछती ही नहीं थी.. अपने बारे में बताती भी थी

शुरू शुरू में ऐसी बातें करने में कविता को झिझक होती थी.. जब वैशाली "लंड" "चुत" और "बबलों" जैसे शब्दों का खुलकर उपयोग करती.. धीरे धीरे कविता भी वैशाली के आगे खुलने लगी..

एक बार वैशाली ने कविता से बेधड़क पूछ लिया "तूने कभी शादी से पहले किसी के साथ सेक्स किया था?"

कविता: "नहीं रे नहीं.. मैंने तो सब से पहले पीयूष के साथ ही किया था.. वैशाली तू ने किया था क्या?"

वैशाली: "हाँ किया था.. अब ये मत पूछना की किसके साथ.. क्योंकी वो मैं बता नहीं सकती.. " वैशाली ने कविता को अगला प्रश्न पूछने से रोक लिया

कविता सोचने लगी.. सब कुछ खुलकर बता रही है तो ये बताने में भला क्या हर्ज !!

कविता की ओर देखकर वैशाली ने कहा "तुझ जैसी सुंदर छुईमुई को किसी ने शादी से पहले लाइन न मारी हो ऐसा हो तो नहीं सकता.. पक्का तू मुझसे कुछ छुपा रही है"

कविता: "ऐसा कुछ भी नहीं है.. जब तू मुझे इतना सब खुलकर सब बता रही है तो फिर मुझे बताने में क्या दिक्कत होती !!!" कविता शीला की पक्की शिष्य थी.. अपने राज को कैसे दबाकर रखना वो बखूबी सीख चुकी थी। दूसरे के राज कैसे उगलवाना उसका मंत्र भी उसने शीला से ही सीखा था।

कविता ने धीरे से वैशाली से पूछा "बड़ी होशियार है तू वैशाली.. शादी से पहले ही सेक्स किया तो तुझे तेरे माँ-बाप को पता चल जाने का डर नहीं लगा था? मेरी तो ऊपर ऊपर से करवाने में ही डर के मारे जान निकल गई थी"

वैशाली ने चुटकी बजाते हुए कहा "मतलब तू जब ब्याह कर आई तब थोड़ा बहोत कर ही चुकी थी.. ऊपर ऊपर से मतलब? लंड अंदर नहीं लिया था क्या ??"

कविता: "मेरे मायके में एक लड़का था पिंटू.. मुझे बहोत पसंद था.. अभी भी मैं उसके साथ.. पर शादी से पहले मैंने कुछ नहीं किया था"

वैशाली: "ऐसा कैसे हो सकता है !! कोई भी लड़का तेरे जैसा कोरा माल बिना चोदे कैसे छोड़ देगा भला ??"

कविता: "वही तो.. मैंने काफी बार उसे मुझे चोदने के लिए कहा.. पर उसका कहना था की जब तक शादी न हो जाए तब तक वो कुछ नहीं करेगा"

वैशाली: "बड़ा आया सत्यवादी हरीशचंद्र.. इसका मतलब ये हुआ की पीयूष को सुहागरात पर सील-पेक माल ही मिला था.. पर तुझे सील-पेक माल नहीं मिला.. तुझे क्या पता की पीयूष इससे पहले किसी के साथ कर चुका है या नहीं"

कविता चोंक उठी "सच सच बता वैशाली"

वैशाली ने ठहाका लगाते हुए कहा "अरे यार बीती बातें भूल जा.. पीयूष ने सब से पहली बार मेरे साथ ही किया था.. " कविता के पैरों तले से धरती हिल गई.. चक्कर सा आने लगा उसे.. !!!!

उदास हो गई कविता और उसका चेहरा भी लटक गया.. फिर उसने सोचा की वो भी कहाँ दूध से धुली थी !! प्रत्येक परिणित स्त्री का एक भूतकाल होता ही है.. वैसे वैशाली और पीयूष का भी था.. और पीयूष की बातों ऐसा कभी प्रतीत भी नहीं हुआ की उसे वैशाली की कभी याद भी आई थी

लेकिन स्त्री-सहज ईर्ष्या होना तो स्वाभाविक था.. कविता की असमंजस को वैशाली ने परख लिया

वैशाली: "तू उदास क्यों हो गई?? टेंशन मत ले.. मेरे और पीयूष के बीच जो कुछ भी हुआ था वो पुरानी बात है.. और वह एक भूल ही थी.. जो नादान उम्र के बच्चे अक्सर करते है.. और तेरा भी ऐसा ही भूतकाल पिंटू के साथ भी रहा ही है ना.. !! १७ से २२ की उम्र ही ऐसी होती है.. शरीर विकसित हो जाता है.. अन्तःस्त्राव शुरू हो जाते है.. दिल पंछी की तरह उड़कर अलग अलग डाल पर बैठने लगता है.. विजातीय आकर्षण होने लगता है.. मायके में दिल के अंदर बसे प्रियतम को भूलकर वह अन्य व्यक्ति के साथ अपने जीवन की शुरुआत करते ही सब कुछ भूल जाती है.. "

कविता को वैशाली की बात ठीक लगी.. "सच बॉल रही है तू वैशाली.. मैं भी जवान हुई तभी पिंटू के साथ प्रेम विकसित हुआ था.. मुझे ये बता.. शादी के बाद तुझे किसी के लिए आकर्षण हुआ है कभी??"

वैशाली बोलने में बिंदास थी.. "जिंदगी बिताने के लिए पति और प्रेमी दोनों की आवश्यकता होती है.. वरना जीने में मज़ा ही नहीं आता.. पति जब हमारा दिल दुखाएं तब सहारे के लिए एक कंधा तो चाहिए ना !! अपना दर्द बांटने के लिए कोई होना तो चाहिए.. मेरे तो पर्सनल प्रॉब्लेम इतने है की अगर मेरा प्रेमी नहीं होता तो अब तक पंखे से लटक गई होती"

इंसान जब अपने जीवन के दर्द भरे पन्ने किसी के सामने खोलता है तब दुख और दर्द उसकी इंतहाँ पर होते है.. वैशाली अपनी दास्तां सुनाती गई

"शादी के बाद मम्मी पापा का घर छोड़ा.. उसके साथ ही खुशी और सुख क्या होते है.. मैं तो जैसे भूल ही गई.. पापा के घर मुझे एक भी काम नहीं करना पड़ता था.. पापा अक्सर मुझे टोकते.. कहते की कामकाज सिख ले वरना ससुराल में बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ेगा.. आज उनकी कही सारी बातें याद आ रही है.. संजय से शादी के पहले पाँच साल तो बड़े ही शानदार तरीके से बीते.. पहला झटका तब लगा जब मुझे संजय के अफेर के बारे में पता चला.. मैं आज तक समझ नहीं पाई.. मैंने उसे हर तरह से खुश रखा था.. ऐसी कौन सी कमी थी मुझ में जो संजय को किसी और के पास जाना पड़ा !!! उसे जो चाहिए था मैंने सब कुछ दिया.. किसी बात के लिए कभी जिद नहीं की.. उसकी हर बात मानती थी मैं.. अरे शुरुआत के दिनों में उसे पूरा दिन सेक्स की चूल मची रहती.. एक रात में चार चार बार.. कभी कभी पाँच बार सेक्स करते.. मैंने कभी मना नहीं किया.. बिना सोये पूरी रात चुदवाने के बावजूद में सुबह जल्दी उठ जाती.. तुझे पता है ना.. की चुदाई के बाद कैसी नींद आती है!! संजय तो हल्का होकर देर तक सोते हुए अपनी थकान उतारता.. पर मैं घर के सारे काम में व्यस्त हो जाती.. दोपहर को जब थोड़ा सा आराम करने बिस्तर पर लेटती.. संजय फिर से तैयार हो जाता.. और कम से कम दो बार सेक्स करने के बाद ही दम लेता.. मैं ये सोचकर सब कुछ बर्दाश्त करती की आखिर पति है वो मेरा.. उसे हक है मेरे शरीर को भोगने का.. पर इतना सब करने के बाद भी जब वो किसी और के साथ मुंह मारने लगा.. " वैशाली आगे बोल नहीं पाई

"कौन थी वो? नाम क्या था उसका? तूने उसे सबक सिखाया की नहीं?" कविता ने पूछा

वैशाली ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा "यार.. जब अपना सिक्का ही खोटा हो तो गैरों को बोलकर क्या फायदा !! संजय कुछ कमाता तो था नहीं. बस दिन भर बिस्तर पर पड़ा रहता और मौका मिलते ही मेरी टांगें चौड़ी करके मेरे छेद में घुसा देता.. उसे २४ घंटे चुदाई के अलावा और कुछ सूझता ही नहीं थी.. तंग आ गई थी मैं उस ज़िंदगी से.. जब पति ही ऐसा हो तो कैसे कटेगी पूरी ज़िंदगी उसके साथ !! तभी मैंने दूसरा साथी तलाश लिया.. लाखों में एक है वो कविता.. अपने एरिया में ही रहता ही.. अब तक हम सिर्फ बातें ही करते है.. मेरा ससुराल नजदीक होता तो हम मिल भी पाते.. पर कलकत्ता में रहते हुए ये मुमकिन हो न सका.. तुझे पता है कविता.. एक तरफ मेरा पति है जिसके दिमाग में हर वक्त औरतों को भोगने का जुनून सवार रहता है.. स्त्री को हमेशा एक साधन की तरह ही इस्तेमाल करता है.. जब देखो तब मुझे कहता रहता है "अरे वो देख वो लड़की की गांड कितनी मस्त है.. आह्ह वो वाली की चूचियाँ" मुझे तो बोलने में भी शर्म आती है.. कभी कभी तो मेरी मम्मी के बारे में भी गंदी गंदी बातें करता है.. दूसरी तरह मेरा प्रेमी.. जो इतने दूर रहकर भी मुझे शब्दों से सहारा देता है.. मेरी हिम्मत बढ़ाता है.. मेरी बात सुनता है.. मेरे दर्द बांटता है.. और इसके बदले उसने कभी मुझसे कुछ भी नहीं मांगा.. हिम्मत है उसका नाम.. आई लव हिम्मत" वैशाली भावुक हो गई

कविता: "ऐसे हरामजादे मर्दों को तो गोली मार देनी चाहिए.."

वैशाली: "नसीब की बलिहारी तो देख कविता.. हिम्मत की पत्नी का चार महीने पहले ही देहांत हो गया.. सिर्फ ८ साल में ही उसका गृहस्थ जीवन समाप्त हो गया.. फिर भी इस नाजुक वक्त पर में उसे सहारा न दे पाई.. "

कविता: "इतनी छोटी उम्र में ही हिम्मत की पत्नी चल बसी?? क्या हुआ था उसे?"

वैशाली: "हिम्मत की बीवी को गर्भाशय का केन्सर था.. अकेला पड़ गया है बेचारा.. अच्छे लोगों के साथ ही ऐसा क्यों होता है? तू मानेगी नहीं.. हिम्मत अपनी बीवी की मौजूदगी में मुझसे बातें करता.. अब बता.. कोई पत्नी ऐसा बर्दाश्त कर सकती है भला?? पर संध्या ने कभी एतराज नहीं जताया.. बहोत ही अच्छी थी संध्या.. हिम्मत संध्या से कभी कुछ भी छुपाता नहीं था.. कभी कभार संध्या भी मुझसे बात करती और मेरा होसला बढ़ाती.. संजय जब घर पर नहीं होता था तब मैं घंटों हिम्मत से बात करती थी.. सिर्फ उसी की बदौलत मैं अब तक संजय के साथ टीक पाई हूँ.. आज मैं हिम्मत से भी ज्यादा संध्या को मिस कर रही हूँ" वैशाली की आँखों से आँसू टपकने लगे

वैशाली ने बात आगे बढ़ाई "शादी से पहले के इस प्यार को हम दोनों ने मेरी शादी के बाद दफना दिया था.. कभी उसने मुझे आई लव यू तक नहीं कहा.. बस दोस्ती का रिश्ता ही रखा था.. संध्या ने एक बार मुझे कहा था की उनकी शादी से पहले ही हिम्मत ने उसे मेरे बारे में बता दिया था। ऐसा ईमानदार इंसान अब कहाँ मिलेगा!! " वैशाली के शब्दों के दर्द ने कविता को भी हिला दिया

कविता: "तू चार दिन से आई है.. फोन किया की नहीं?"

वैशाली: "नहीं यार.. उसकी पत्नी को मरे कुछ ही महीने हुए है.. मैं अकेली उसके घर जाऊँगी तो लोगों को बातें बनाने का मौका मिल जाएगा.. मम्मी को लेकर तो जा नहीं सकती.. कोई साथ हो तो ठीक है.. पर अकेले जाने में लोग तरह तरह की बातें करेंगे और बेकार में हिम्मत परेशान हो जाएगा"

कविता: "तुझे एतराज न हो तो मैं तेरे साथ चलूँ?"

वैशाली: "मुझे क्यों एतराज होगा भला.. और अगर होता तो मैं ये सब बातें तुझे क्यों बताती !! पर सिर्फ हम दो लड़कियां उस अकेले मर्द के घर जाएगी तो अच्छा नहीं लगेगा.. कोई मर्द साथ होता तो फिर किसी के मन में कोई शक ही पैदा नहीं होगा. पर किसे लेकर जाएँ यही प्रॉब्लेम है.. खैर मेरे प्रॉब्लेम तो चलते ही रहेंगे.. तू अपनी बता.. पिंटू के साथ तेरे संबंध कैसे थे?"

कविता ने अथ से इति तक सब कुछ बताया पिंटू के बारे में.. बात करते करते वो शर्म के मारी लाल लाल हो गई

वैशाली: "बड़ी किस्मत वाली है तू.. कम से कम तेरा प्रेमी नजदीक तो है.. जब चाहे उसे देख सकती है तू.. पर ये बता की शादी के बाद तूने उससे संबंध कैसे बनाए रखे?? तेरे घर पर सास ससुर हमेशा रहते है.. तुम लोग कैसे मिलते हो फिर?"

कविता: "यार हम लोग कभी कभार तेरे घर पर ही मिलते है.. तेरी मम्मी को सब कुछ पता है इसके बारे में... "

वैशाली चकित हो गई "मम्मी ऐसी बातों में तुझे सपोर्ट कर रही है ये ताज्जुब की बात है.. वैसे मम्मी बड़ी स्ट्रिक्ट है.. "

कविता: "बहोत दिन हो गए है यार उसे मिले हुए.. अब रहा नहीं जाता "

वैशाली: "मतलब तुम दोनों जब भी मिलते हो तब सेक्स भी करते हो?"

कविता ने जवाब नहीं दिया बस "हाँ" कहते हुए गर्दन हिलाई फिर धीरे से बोली "अकेले में मिलना होता है तब करते है.. बहोत मज़ा आता है उसके साथ.. वैसा मज़ा तो मुझे पीयूष के साथ भी नहीं आता कभी"

वैशाली: "वैसा ही होता है.. घर की मुर्गी दाल बराबर"

कविता: "मुझे एक आइडिया आया है वैशाली"

वैशाली: "तो बता ना.. "

कविता: "तु हिम्मत को मिलने के लिए अपने घर ही बुला ले.. मैं शीला भाभी को २ घंटों के लिए कहीं बाहर ले जाऊँगी"

वैशाली सोच में पड़ गई.. "वो तो ठीक है यार.. पर मुझे डर लगता है"

कविता: "डरने वाली कौन सी बात है? तेरी मम्मी तो मेरे साथ ही होगी"

सुनते ही वैशाली की आँखें चमकने लगी.. संजय से वो इतनी नफरत करती थी की हिम्मत से अकेले में मिलने के खयाल मात्र से उसकी पेन्टी गीली होने लगी.. "यार ऐसा कुछ सेटिंग हो तो मज़ा आ जाएगा.. हिम्मत को और मुझे एकांत की सख्त जरूरत है.. मैं कुछ करती हूँ"

दोनों बातें करते करते घर पहुंचे और अपने अपने घर चले गए। वैशाली जब दरवाजा खोलकर अंदर आ रही थी तब उसने खिड़की से देखा की मम्मी किसी से फोन पर हंस हँसकर बात कर रही थी.. वैशाली को देखते ही उसने फोन काट दिया.. पर यह बात वैशाली के दिमाग मे नोट हो गई थी

"काफी दोस्ती हो गई है तेरी और कविता की.. हैं ना.. !! मैंने कहा था ना तुझे.. बहुत अच्छी लड़की है.. मेरे साथ भी उसकी अच्छी पटती है.. " अपने मोबाइल पर नजर रखे हुए शीला ने कहा

वैशाली: "हाँ मम्मी.. कविता बहोत ही अच्छी लड़की है"
 
दूसरे दिन कविता शीला भाभी के घर आई.. और बातों बातों में कहा "भाभी, शहर के उस कोने पर एक बाबा आए है.. मैंने उनकी मन्नत रखी थी... तो मुझे उनके दर्शन करने जाना है.. आप चलोगी मेरे साथ??"

शीला: "हाँ हाँ.. क्यों नहीं.. पर किस बात की मन्नत रखी थी तूने?कोई गुड न्यूज़ है क्या??" आँख मारकर उसने कहा

कविता: "क्या भाभी आप भी!! ऐसा कुछ नहीं है.. मैंने तो पीयूष की नौकरी के लिए मन्नत रखी थी.. अब नौकरी मिल गई है तो मुझे दर्शन करने जाना है ताकि मन्नत पूरी हो सके। "

शीला: "बहोत बढ़िया.. वैशाली, तू भी चल हमारे साथ दर्शन के लिए"

वैशाली: "नहीं मम्मी.. मेरे पिरियड्स चल रहे है.. " वैशाली ने गोली दी

शीला: "कोई बात नहीं.. तू घर पर आराम कर.. हम दो-तीन घंटों में वापिस लौट आएंगे"

वैशाली: "हाँ.. आप दोनों दर्शन के लिए हो आइए.. और कविता.. जा रही हो तो तुम गुड न्यूज़ वाली मन्नत भी मांग ही लेना बाबा से"

कविता शरमाकर चली गई

दोपहर के तीन बजे चाय पीने के बाद शीला और कविता बाबा के धर्मस्थान पर जाने के लिए निकले..

शीला: "बाप रे.. कितनी गर्मी है!! चल ऑटो ले लेते है"

जाते हुए कविता ने वैशाली को आँखों ही आँखों में इशारा कर दिया.. चालाक शीला ने कनखियों से कविता की इस हरकत को देख ही लिया

कविता: "इतनी धूप भी नहीं है भाभी.. चल कर ही जाते है.. बेकार में ऑटो वाला १०० रुपये ले लेगा" कविता चलकर जाना इसलिए चाहती थी ताकि वैशाली को ज्यादा से ज्यादा वक्त मिले

शीला का शातिर दिमाग ये सोच रहा था की आखिर कविता ने वो इशारा क्यों किया? क्या जान बूझकर वैशाली नहीं आई? घर पर रहने के पीछे क्या कारण होगा वैशाली का?
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कविता और शीला चलते चलते जैसे ही नुक्कड़ से बाहर निकले, वैशाली ने हिम्मत को फोन किया.. और उससे कहा की दो घंटों का वक्त था मिलने के लिए और वो उससे मिलना चाहती थी..

हिम्मत तुरंत ही वैशाली के घर आने के लिए निकला.. उसके घर की गली में घुसते ही पुरानी यादें ताज़ा हो गई.. जब वो कॉलेज में था तब वैशाली की एक झलक पाने के लिए रोज इस गली से गुज़रता था.. वैशाली उसे देखकर बड़ी प्यारी सी मुस्कान देती.. पूरा दिन अच्छा जाता था हिम्मत का.. कितना खुश था वो जब वैशाली ने उसकी मित्रता का स्वीकार किया था.. हिम्मत की मोटरसाइकिल ७० की स्पीड से चल रहा था फिर भी उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वक्त थम सा गया था..

हिम्मत का दिल जोरों से धड़कने लगा था.. अपनी प्रेमीका को ८ साल में पहली बार देखने वाला था.. आठ सालों में ज़िंदगी कितने उतार चढ़ावों से गुजर गई.. वैशाली की शादी के बाद हिम्मत अकेला पड़ गया था..

सुशील और संस्कारी हिम्मत बड़े ही अच्छे स्वभाव का था.. उसके संपर्क में आने के बाद वैशाली उससे बेहद प्रभावित हुई थी.. हमेशा खुशमिजाज में रहने वाला और सकरात्मकता सोच से भरा हुआ हिम्मत वैशाली को बहोत पसंद था.. वो देखने में खास नहीं था और सीधा साधा था इसलिए उसकी कोई गर्लफ्रेंड नहीं थी.. कॉलेज के बाकी लड़कों के मुकाबले हिम्मत कभी भी लड़कियों को इम्प्रेस करने की कोशिश नहीं करता था.. सामान्य दिखावे वाले हिम्मत के साथ खूबसूरत वैशाली को देखकर कॉलेज के लड़के ठंडी आहें भरते रहते थे

घर की डोरबेल दबाते वक्त भी हिम्मत के हाथ कांप रहे थे.. आठ सालों के बाद अपनी प्रेमीका को मिलने और देखने का मौका मिल रहा था.. अपने रुमाल से उसने आँखें पोंछ ली।

हिम्मत को वो दिन याद आ गया जब वैशाली और वो आखिरी बार मिले थे.. फुट फुट कर रो रही थी वैशाली.. उसकी पीठ सहलाते हुए उसने कहा था "मत रो यार.. हमारे यहाँ कोई भी लड़की कभी प्रेमीका नहीं हो सकती.. केवल मजबूर हो सकती है.. सदियों से चलता आया है ये.. कौन सी नई बात है !!"

आखिर हिम्मत ने डोरबेल बजा ही दी.. दरवाजा खुलते ही वैशाली ने उसका स्वागत किया.. पराई पराई सी लग रही थी उसे.. वो नजर भी नहीं मिला पाया

वो यंत्रवत सोफ़े पर बैठ गया और वैशाली उसके लिए पानी का ग्लास लेकर आई.. हिम्मत को देखते ही वैशाली अपनी सुध-बुध खो चुकी थी

"कैसी हो वैशु.. आई मीन.. वैशाली.. ?" पानी का ग्लास लौटाते हुए हिम्मत ने कहा

"अगर तू मुझे औपचारिकता से मिलने आया है तो अभी चला जा यहाँ से.. सालों से कान तरस रहे है मेरे.. तेरे मुंह से "वैशु" सुनने के लिए.. " इतना बोलते बोलते वैशाली थक गई

हिम्मत का ये स्वभाव था की वो गंभीर से गंभीर वातावरण को अपनी हल्की फुलकी बातों से निखार सकता था.. उसकी मृत पत्नी संध्या को ये बात जरा भी पसंद नहीं थी.. वो हमेशा कहती की हिम्मत किसी बात को लेकर सिरियस होता ही नहीं है.. जवाब में हिम्मत ये कहता की ज़िंदगी हल्की फुलकी होनी चाहिए.. वरना जीना मुश्किल हो जाएगा

हिम्मत: "एक बात बता वैशाली"

वैशाली: "नहीं बताऊँगी और जवाब भी नहीं दूँगी जब तक तू मुझे वैशु कहकर नहीं पुकारेगा.. "

हिम्मत: "ठीक है बाबा.. वैशु.. तू कलकत्ता जाकर इतनी बदसूरत कैसे हो गई? मैंने तुझे जब विदा किया था तब गुड़िया जैसी सुंदर थी तू.. मैं तुझे वैशु कहकर इसलिए नहीं पुकार रहा था क्योंकी तू पुरानी वाली वैशु जैसी लग ही नहीं रही है"

हिम्मत की बात का बुरा मानने की बजाए वैशाली को अच्छा लगा

वैशाली: "तुझ से जुड़ा होने के बाद.. जिस्म की तो छोड़.. जिंदगी में भी किसी प्रकार की सुंदरता नहीं बची.. " ग्लास को टेबल पर रखते हुए बोली

हिम्मत वैशाली के गदराए जिस्म को देखता ही रहा.. शादी के बाद लड़की के शरीर में कितने परिवर्तन आ जाते है !!!

हिम्मत: "मोटी हो गई है तू वैशु"

वैशाली: "पराई औरत को इस तरह घूर घूर कर नहीं देखते.. कहाँ गाहे तेरे वो संस्कार??" मज़ाक करते हुए वैशाली ने कहा। हालांकि हिम्मत के वही विचारों के कारण वो उससे आकर्षित हुई थी.. इसकी बदौलत ही वो बाकी लड़कों से अलग लगता था.. कॉलेंज में कभी मस्ती मस्ती में वो हिम्मत को ऐसी तैसी जगह पर छु भी ले तो हिम्मत उसे बड़ा लेक्चर सुना देता था.. और तब वैशाली का मन करता था की वो बोलत ही रहे और वो सुनती रहे..

हिम्मत को चिढ़ाने के लिए वो कभी कभार ऐसे बैठती थी की उसके स्तन हिम्मत को छु जाएँ.. तब हिम्मत उसे कहता "तू बात करने आई है या मेरी मर्दानगी की परीक्षा लेने?" हिम्मत उसे टोक कर दूरी बना लेता

पर वो पुराना समय चला गया था.. हिम्मत और वैशाली के जीवन में काफी परिवर्तन आ चुके थे। वैशाली के जीवन को संजय नाम की सूनामी ने तहस नहस कर दिया था और हिम्मत की जीवनसंगिनी की आकस्मिक मृत्यु ने उसके जीवन में भूकंप सा ला दिया था

वैशाली ने हिम्मत को दायें हाथ की हथेली को अपने हाथ में लेकर कहा "मैं अब भी तुम से बहोत प्यार करती हूँ हिम्मत" मौका मिलते ही स्त्री अपने प्रेम का इजहार जरूर करती है.. हिम्मत ने जवाब नहीं दिया

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद हिम्मत ने कहा "वैशाली, मुझे लगता है की मुझे यहाँ ज्यादा देर रुकना नहीं चाहिए"

हिम्मत सोफ़े से खड़ा हो गया..

वैशाली: "क्यों क्या हुआ? यहाँ कोई रिस्क नहीं है.. तू आराम से बैठ"

हिम्मत: "बात दरअसल ऐसी है की.. पिछले दो सालों से मैं शरीरसुख से वंचित रहा हूँ.. संध्या का केन्सर डिटेक्ट होने के बाद से लेकर उसकी मृत्यु तक.. हमारे बीच पति पत्नी वाले जिस्मानी तालुककात नहीं थे ये जाहीर सी बात है.. आज तुझे देखने के बाद मुझे कुछ कुछ होने लगा है.. इससे पहले की मुझसे कोई भूल हो जाएँ.. मुझे चले जाना चाहिए"

वैशाली: "हमारे बीच ऐसा पर्दा कब से आने लगा हिम्मत? मेरे इजहार के बाद.. मेरी हर सांस पर तेरा अधिकार हो गया था.. तूने उसका फायदा नहीं उठाया था वो तेरी सज्जनता थी.. पर अगर कुछ किया भी होता तो गलत नहीं होता.. आज भी मेरे जिस्म पर तेरा उतना ही अधिकार है, हिम्मत.. सच्चाई तो ये है की संजय के साथ सेक्स करते वक्त भी में अपने मन मैं तुझे ही याद करती हूँ.. अगर ऐसा न करती तो मैं संजय का कभी स्वीकार ही नहीं कर पाती.. आ जा हिम्मत.. और स्वीकार कर ले मेरे जिस्म का" एक ही सांस में सारी बात बोलकर वैशाली ने अपनी छाती से दुपट्टा हटाकर फेंक दिया.. उसकी भारी छातियाँ ऊपर नीचे हो रही थी.. देखकर उत्तेजित ना हो ऐसा नामर्द भी नहीं था हिम्मत


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उसने वैशाली को बाहों में भर लिया.. और काफी देर तक जकड़ कर लिपटा ही रहा.. वैशाली के भरे भरे स्तन हिम्मत की छाती से दबकर चपटे हो गए.. अपने प्रेमी की पीठ को सहलाते हुए वो उसे उसकी पत्नी संध्या की मृत्यु का आश्वासन दे रही थी.. कंधे पर गरम गरम स्पर्श होने पर वैशाली ने हिम्मत को अपनी बाहों से अलग किया.. और देखा तो वो रो रहा था.. हिम्मत के इस रूप को उसने पहली बार देखा था

वैशाली: "शांत हो जा हिम्मत... जीवन के कठिन से कठिन प्रश्न का चुटकी में हल ढूंढ लेने वाले को रोना शोभा नहीं देता.. " धड़कते दिल के साथ अपने प्रेमी को सांत्वना देने के लिए वैशाली ने अपने होंठ हिम्मत के होंठों पर रख दिए..

दोनों की आँखों से सावन-भादों बरस रहे थे.. हिम्मत वैशाली के होंठ चूसते हुए अपनी उत्तेजना को ज्यादा देर तक छुपा नहीं पाया.. वैशाली को अपनी जांघों के बीच हिम्मत के कड़े लंड के उभार का स्पर्श महसूस होने लगा

वैशाली अपना हाथ नीचे ले गई और पेंट के ऊपर से उसके लंड को सहलाया.. वस्त्र के ऊपर से भी उसे लंड की गर्मी महसूस हो रही थी.. "ओहह वैशाली.. आज क्यों मुझे ऐसा हो रहा है? मैं अपने आप पर नियंत्रण क्यों नहीं रख पा रहा हूँ?"


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वैशाली: "नियंत्रण रखने की कोई जरूरत भी नहीं है.. कुदरत के नियमों को भला कौन नियंत्रित कर पाया है.. !! इस सुख के लिए मैं सालों से तड़प रही हूँ.. आह.. प्लीज हिम्मत.. आज मुझे संतुष्ट कर दे.. तृप्त कर दे.. बहोत तरस रही हूँ मैं.. आज प्लीज अपनी सारी मर्यादा त्याग दे.. और मुझे अपने अंदर समा ले"

तब तक तो वैशाली हिम्मत के पेंट से उसके लंड को बाहर निकाल चुकी थी.. हिम्मत के लंड का कद देखकर वैशाली की उत्तेजना दोगुनी हो गई.. अद्भुत सख्ती वाला लंड वैशाली के हाथों के स्पर्श से और कठोर हो गया.. मुठ्ठी में पकड़कर लंड हिलाते हुए वैशाली हिम्मत के होंठों को चूम रही थी.. हिम्मत भी अब कामदेव के प्रभाव में आ चुका था.. उसने वैशाली के टॉप के अंदर हाथ डालकर उसके गोल मटोल स्तनों को पकड़ लिया.. दोनों एक दूसरे को नग्न कर चोद लेने की जल्दी में थे..


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दुनिया से बेखबर ये दोनों प्रेमी.. आठ सालों के बाद एक हुए थे.. वैशाली कपड़े उतारने में थोड़ी सी झिझक रही थी.. पर हिम्मत ने उसकी पेन्टी खींच कर उतार दी और नीचे बैठकर उसकी चुत को चूमने लगा.. आखिर जब उसने चुत की लकीर के बीच अपनी जीभ फेरी तब वैशाली के मुंह से "ओह्ह हिम्मत.. मर गई.. " की आवाज निकल गई..

वैशाली के स्तन उत्तेजना के मारे फूल कर गुब्बारे जैसे बन गई.. उसकी निप्पल सख्त हो गई.. हिम्मत ने वैशाली की चुत के अंदरूनी हिस्सों को चाट चाट कर कामरस से भिगो दिया.. वैशाली हिम्मत का लंड पकड़ना चाहती थी पर हिम्मत उसकी चुत को छोड़ ही नहीं रहा था.. बेहद उत्तेजित होकर वैशाली सोफ़े पर ढल गई.. और गिरते ही वो झड़ गई.. जीवन में पहली बार वो इतनी जल्दी स्खलित हुई थी.. हिम्मत के प्रेम का ऐसा प्रभाव था..

चरमोत्कर्ष पर पहुंचते ही मदमस्त हो उठी वैशाली.. थोड़ी देर तक उसकी साँसे फुली हुई रही.. बाद में वो उठी और हिम्मत को फर्श पर लिटा दिया.. हिम्मत का लंड छत की तरफ तांक रहा था.. उसके भारी अंडकोशों को मुठ्ठी में दबाकर खेलते हुए उसने हिम्मत का लंड मुंह में ले लिया.. वैसे वैशाली को लंड चूसना बिल्कुल भी पसंद नहीं था.. अपने पति से नफरत होने की एक वजह ये भी थी की संजय उससे जबरदस्ती लंड चुसवाता था.. पर हिम्मत के लिए उसके दिल से प्रेम की जो भावना जाग उठी थी उसने उसे लंड चूसने पर मजबूर सा कर दिया.. उसे जैसा मालूम था वैसे चूसने लगी.. चूसने में परफेक्शन भले ही नहीं था पर प्यार बेशुमार था.. वैशाली की चुसाई के कारण हिम्मत पागल सा हो गया..

"ओह्ह वैशु.. प्लीज स्टॉप.. आह्ह आह्ह वैशु.. ज्यादा मत कर.. तेरा मुंह गंदा हो जाएगा.. निकाल दे बाहर.. " पर वैशाली ने अपने प्रेमी का वीर्य स्त्राव अपने मुंह के अंदर ही हो जाने दिया.. प्रेमी के इस प्रसाद को बिना किसी घिन के निगल गई.. इतना विचित्र स्वाद उसने कभी नहीं चखा था पर फिर भी अपनी नापसंद को प्रेम के आगोश में छुपा लिया..


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हिम्मत का लंड झड़ने के बाद भी सख्त था.. वैशाली ने बिना एक पल गँवाए.. हिम्मत की दोनों तरफ अपनी टांगें जमाई.. कमर को नीचे लाते हुए अपने गरम गुलाबी सुराख को लंड के टोपे पर रख दिया.. हल्के से अपने जिस्म का वज़न रखते ही.. उसकी चुत हिम्मत का लंड निगल गई

"आह्ह हिम्मत.. फक.. बहुत अच्छा लग रहा है मुझे.. उफ्फ़फफ.. !!" वैशाली ने भारी आवाज में कहा

हिम्मत ने कमर उठाकर एक मजबूत धक्का दिया

"उईई माँ.. जरा धीरे से.. बहोत दिनों से कोरी पड़ी है चुत.. इसलिए तंग हो गई है.. धीरे धीरे धक्के लगा हिम्मत" वैशाली ने कहा

हिम्मत एक पल के लिए रुक गया.. और वैशाली के लटक रहे स्तनों को अपने हाथों से मींजने लगा.. स्तनों का मर्दन होते ही वैशाली की चुत ने गीलापन छोड़ना शुरू कर दिया.. दर्द का एहसास काम हुआ.. वो सिहरने लगी.. अब उसने अपनी कमर हिलाते हुए आगे पीछे होकर हिम्मत के लंड को अपनी चुत में मथना शुरू कर दिया.. वैशाली बेहद उत्तेजित होने लगी.. अपने पति से त्रस्त वैशाली को संजय के साथ सेक्स में कभी मज़ा नहीं आता था.. आज अपने प्रेमी के लंड को चुत के अंदर प्राप्त कर वह धन्य हो गई थी

पूरे कमरे में पक् पक् की आवाज़ें आ रही थी.. साथ ही वैशाली की सिसकियाँ भी गूंज रही थी.. टाइट चुत में हिम्मत का सख्त लंड फंस चुका था.. वैशाली की चुत की दीवारों पर जबरदस्त घर्षण होने लगा.. अपनी चुत को कसकर उसने और सख्ती से लंड को अंदर दबोचे रखा था.. और कमर हिलाते हुए पूरा आनंद ले रही थी



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५-६ मिनट की भीषण चुदाई के दरमियान वैशाली की चुत तीन बार झड़ गई.. और उसके बाद हिम्मत ने भी कस कर धक्के लगाना शुरू किया.. वैशाली के बिखरे हुए बालों को हाथ से पकड़कर हिम्मत नीचे से धक्के लगाए जा रहा था.. एक जोरदार धक्का लगाकर हिम्मत ने अपना वीर्य वैशाली की बच्चेदानी के मुख पर छोड़ दिया.. उस गरम गरम प्रवाही का एहसास वैशाली की चुत को बेहद सुकून दे रहा था.. वैशाली निढाल होकर हिम्मत की छाती पर ढल गई..
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बाबा के दर्शन करने के बाद.. शीला और कविता बाहर बनी बैठक पर आराम से बैठे थे। कविता ने देखा की आते जाते सब लोग शीला ने भरे बदन का निरीक्षण करते जा रहे थे.. शीला का गदराया शरीर इतना आकर्षक लग रहा था की देखने वाले की नजर उसके दोनों स्तनों पर.. नीचे चरबीदार पेट और उसके मध्य की गहरी नाभि पर अवश्य थम जाती.. ५५ साल की उम्र में भी शीला का जिस्म इतने लोगों को आकर्षित कर सकता था ये देख कविता अचंभित हो गई

"भाभी.. आप को तो ऊपरवाले ने दोनों हाथों से भर भर कर हुस्न दिया है" कविता ने कहा

"क्यों, क्या हुआ?"

कविता: "सब लोग आप को कैसे घूर रहे है.. " शीला की गोरी कमर पर पड़ते बल को देखकर उसने कहा

शीला: "स्त्री का रूप हमेशा मर्दों के आकर्षण का केंद्र होता है.. खिले हुए सुंदर गुलाब को भला कौन देखना नहीं चाहेगा !!"

कविता: "हाँ वो तो है.. आप हो इतनी हॉट.. !! देखने वाले की क्या गलती!!"

शीला: "कविता.. मेरे दिमाग में एक प्रश्न घूम रहा है.. अगर तू उस प्रश्न का जवाब सच सच देगी तो मैं वादा करती हूँ की तुझे रसिक का मोटा लंड दिखाऊँगी.. ये मेरा प्रोमिस है " शीला ने कविता की दुखती रग पर हाथ रख दिया

कविता: "हाँ पूछिए ना भाभी.. !!"

शीला: "वैशाली का बर्ताव मुझे आज अजीब सा लगा.. मुझे पक्का मालूम है की उसके पिरियड्स नहीं चल रहे है.. फिर उसने हमारे साथ आने से मना क्यों कर दिया?"

कविता सोच में पड़ गई.. की क्या उत्तर दे

कविता: "मुझे क्या पता भाभी.. आप के घर की बात है.. आप ही जानो"

शीला: "मेरे घर की काफी बातें तू जानती है.. रसिक के बारे में भी.. मुझे पक्का यकीन है की तू इसका कारण जानती है"

कविता चुप हो गई.. वो जानती थी की शीला भाभी ने उसे अपने जाल में फंसा लिया था.. अब उसका बचना नामुमकिन था..

शीला: "तू वैशाली की खास सहेली है.. इसलिए तुझे पूछ रही हूँ.. नहीं बताएगी तो भी जानने के मेरे पास और तरीके है.. अभी फोन करके तेरी सास को पूछूँगी तो वो भी देखकर बता देगी की मेरे घर पर अभी क्या चल रहा है.. "

कविता की फट गई.. बाप रे.. अगर शीला ने मेरी सास को अपने घर भेजा तो गजब हो जाएगा.. शीला के सामने वैशाली को आगाह करने का कोई तरीका भी नहीं था.. मेरी सास जाकर देखे और शीला भाभी को बताएं उससे अच्छा मैं ही बता देती हूँ.. रसिक का देखने भी मिल जाएगा

कविता ने वैशाली का पेपर लीक कर दिया

कविता: "भाभी.. वैशाली अपने पति के साथ खुश नहीं है.. वो अपने पुराने दोस्त से अकेले मिलना चाहती थी.. इसलिए मैंने आज दर्शन का बहाना बनाया"

शीला: "कौन है उसका पुराना फ्रेंड?"

झिझकते हुए कविता ने वैशाली के जीवन के निजी पन्नों को खोल तो दिया था पर नाम बताने से घबरा रही थी.. "वो तो मुझे नहीं पता.. " जानते हुए भी अनजान बनी रही कविता

शीला गहरी सोच में पड़ गई.. कौन हो सकता है.. !! राकेश.. विपुल.. अनिकेत.. मनीष.. ??? शीला दिमाग पर जोर डाल रही थी... तभी शीला को अचानक याद आया.. हिम्मत .. !! हाँ वही होना चाहिए.. उस दिन तेज बारिश में वैशाली को नोट्स देने आया था.. पक्का वही होगा

शीला: "कविता.. वैशाली के उस दोस्त को मैं अच्छी तरह जानती हूँ.. हिम्मत नाम है उसका.. कॉलेज के समय उन दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती थी "

कविता के चेहरे के हाव भाव देखकर शीला को यकीन हो गया था की उसका निशान सही जगह लगा था

शीला: "शादी शुदा लड़की को ऐसा जोखिम नहीं उठाना चाहिए.. संजय को पता चल गया तो.. !!"

कविता: "भाभी.. आप और मैं भी तो ये जोखिम उठा ही रहे है ना.. !!"

कविता ने शीला का मुंह बंद कर दिया..

शीला: "चल अब घर चलते है.. " शीला खड़ी हो गई

कविता: "आप प्लीज वैशाली को इस बारे में कुछ मत बोलना.. उसे पता चल जाएगा की मैंने ही आपको बता दिया.. हमारी दोस्ती टूट जाएगी"

शीला: "पागल है क्या? मैं नहीं बताऊँगी.. तू चिंता मत कर"

कविता का टेंशन कम हुआ.. दोनों चलते चलते अपने घर आए.. वैशाली ने पूरा ड्रॉइंगरूम साफ कर सब ठीक ठाक कर दिया था.. उसे झाड़ू लगाते देख शीला को आश्चर्य हुआ.. वैशाली कभी भी घर के कामों में हाथ नहीं बँटाती थी.. इंसान अपने पाप छुपाने के लिए क्या क्या करता है !!

शीला ने बड़े ध्यान से वैशाली की चाल और उसका चेहरा देखा.. उसकी अनुभवी आँखों ने परख लिया.. संभोग के आनंद के बाद जैसी चमक स्त्री के चेहरे पर होती है.. वही वैशाली के चेहरे पर थी.. जिस तेजी और चपलता से वैशाली घर का काम कर रही थी वो देखकर ही प्रतीत हो रहा था की बेटी ने अपने प्रेमी के संग मजे किए थे
 
शीला ने बड़े ध्यान से वैशाली की चाल और उसका चेहरा देखा.. उसकी अनुभवी आँखों ने परख लिया.. संभोग के आनंद के बाद जैसी चमक स्त्री के चेहरे पर होती है.. वही वैशाली के चेहरे पर थी.. जिस तेजी और चपलता से वैशाली घर का काम कर रही थी वो देखकर ही प्रतीत हो रहा था की बेटी ने अपने प्रेमी के संग मजे किए थे

वैशाली: "अरे मम्मी.. आप लोग आ गए? हो गए दर्शन? भीड़ तो नहीं थी ना?" उसने अपनी माँ को पटाना शुरू कर दिया

शीला ने वैशाली के कपड़ों को ध्यान से देखा.. सिलवटें देखकर उसे यकीन हो गया की वैशाली अभी अभी चुदी थी..

शीला: "हाँ बेटा.. आराम से हो गए दर्शन.. भीड़ बिल्कुल नहीं थी..!!"

वैशाली: "अच्छा.. मम्मी.. आज रात को हम डिनर करने होटल चलें?"

शीला: "नहीं बेटा.. मुझे बाहर का खाना राज नहीं आता.. ऐसा करों..तू और कविता चले जाना"

कविता: "हाँ हाँ.. जरूर चलेंगे.. वैसे भी मेरी सास का आज उपवास है और ससुरजी दोस्तों के साथ बाहर गए है.. मैं और पीयूष अकेले ही घर पर खाना खाने वाले थे.. हम तीनों बाहर खाने चलेंगे"

वैशाली ये सुनकर खुश हो गई

कविता अपने घर चली गई और शीला पौधों को पानी देने लगी.. हिम्मत के कामुक स्पर्श और दमदार धक्कों को याद करते हुए वैशाली सोफ़े पर बैठकर टीवी देखने लगी.. कितना मस्त रगड़ा आज हिम्मत ने.. आह्ह.. मज़ा ही आ गया.. जिस तरह उसने ड्रेस में हाथ डाल कर स्तनों को दबाया था.. इशशश.. वैशाली को अपनी दोनों टांगों के बीच गीलापन महसूस होने लगा.. उसने खिड़की से बाहर देखा.. शीला कंपाउंड में बने बगीचे में पानी छिड़क रही थी

वैशाली ने अपनी सलवार के अंदर हाथ डाला और अपनी चुत को सहलाने लगी.. उंगलियों का स्पर्श मिलते ही उसके चुत के होंठ खुल गए.. टीवी पर मस्त सेक्सी गाना चल रहा था.. माहोल सा बन गया.. दो मिनट में ही अपनी क्लिटोरिस को रगड़कर स्खलित हो गई वैशाली.. !! चुत को उंगली करने में व्यस्त वैशाली को ये नहीं पता था की शीला तिरछी नज़रों से उसे देख रही थी.. वैशाली के हाथ और कंधों की हलचल से ये स्पष्ट दिख रहा था की वो अपनी चुत से खेल रही थी.. चेहरे के हावभाव से प्रतीत भी हो गया की वो झड़ रही थी


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शीला मन में सोच रही थी की बेटी मेरे ऊपर ही गई है.. इसकी शरीर की भूख भी बड़ी तेज है.. !!

शाम को कविता और पीयूष तैयार होकर डिनर के लिए वैशाली को बुलाने आए.. पीयूष को देखकर वैशाली ने हाई कहा.. कविता टेढ़ी आँख से उन दोनों का निरीक्षण कर रही थी की कहीं पुरानी यादें तो ताज़ा नहीं करने लगे ये दोनों!! पर उसे ऐसा कुछ भी नजर नहीं आया

दोनों सीटी बस में बैठे.. बस में थोड़ी भीड़ थी.. इसलिए कविता और वैशाली को बैठाकर पीयूष खड़ा रहा.. वैशाली ने पीली टीशर्ट और काला टाइट पेंट पहना था.. खड़े हुए पीयूष को वैशाली के टीशर्ट के अंदर का नजारा साफ दीख रहा था.. वो बार बार उन उछल रहे स्तनों को ताड़ता रहा

पीयूष की नजर के बारे में वैशाली जान चुकी थी.. फिर भी अनदेखा कर वो खिड़की के बाहर ट्राफिक को देखने लगी.. स्टैन्ड आते ही तीनों नीचे उतरे.. उतरते वक्त वैशाली का कंधा पीयूष के कंधे से टकराया.. वह थोड़ी सी असंतुलित हुई.. और बस में चढ़ रहे एक पेसेन्जर के साथ टकरा गई.. उस आदमी की छाती से टकराकर वैशाली के दोनों स्तन चपटे हो गए.. देखकर पीयूष को होश उड़ गए

पीयूष सोच रहा था.. भेनचोद.. जब मैंने इसे चोदा था तब इतने बड़े बड़े होते तो कितना मज़ा आता यार.. !! क्या वैशाली को वो सब पुरानी बातें याद होगी? या भूल चुकी होगी? साली माल लग रही है एकदम.. बबले कितने बड़े बड़े हो गए है.. आखिर अपनी माँ पर ही गई है ये.. पीयूष अब उत्तेजित हो रहा था

पीयूष के इन विचारों से बेखबर कविता और वैशाली एक दूसरे से मज़ाक मस्ती करते हुए आगे चल रहे थे.. पीयूष अपनी पत्नी और वैशाली के थिरकते चूतड़ों को देखते हुए पीछे चला आ रहा था.. अचानक ठोकर लगने से पीयूष का बेलेन्स चला गया.. कविता ने पीछे मुड़कर देखा

कविता: "ध्यान कहाँ है तेरा .. !! जरा देखकर चला कर.. "

पीयूष: "अरे हो जाता है कभी कभी यार.. तू तो ऐसे बात कर रही है जैसे तुझे कभी ठोकर लगी ही नहीं कभी"

कविता: "मुझे भी लगती है.. पर काम करते वक्त.. तेरी तरह नहीं.. जो ना देखने वाली चीजों को ताकने में ठोकर खाते हो!!"

पति पत्नी के इस मीठे झगड़े को देखकर वैशाली हंसने लगी.. वो सोच रही थी.. पीयूष मेरे बॉल को तांक रहा है ये बात कविता ने भी नोटिस तो की होगी.. इसीलिए तो कहीं ताने नहीं मार रही.. !! पक्का ऐसा ही है.. मेरी मटकती गांड को तांकने के चक्कर में उसे ठोकर लग गई.. हा हा हा हा

वो लोग होटल सुरभि के दरवाजे पर पहुंचे तभी पीयूष के मोबाइल पर शीला का फोन आया

पीयूष: "हैलो.. हाँ भाभी.. बताइए!!"

शीला: "पीयूष, तुम तीनों को लौटने में कितना वक्त लगेगा ??

पीयूष: "एक मिनट रुकिए भाभी.. " फिर उसने कविता से पूछा "खाना खाने के बाद कहीं और जाने का प्लान तो नहीं है ना?"

कविता: "खाना खाकर थोड़ी देर गार्डन में बैठेंगे आराम से.. फिर देर से घर जाएंगे.. "

पीयूष ने फोन पर शीला को बताया "भाभी, अभी ८ बज रहे है.. हमे आते आते ११ बज जाएंगे"

शीला: "ठीक है, कोई बात नहीं.. आराम से खाना खाकर आना तुम सब" शीला ने फोन रख दिया

पीयूष, कविता और वैशाली तीनों होटल के टेबल पर बैठे.. वैशाली की पीली टीशर्ट के अंदर ब्रा में कैद बड़े बड़े स्तन टेबल की धार से दबते हुए देख पीयूष का लंड उछलने लगा था.. यार.. वैशाली को पता भी नहीं होगा की मैं उसके बारे में अभी क्या सोच रहा हूँ.. एक बार ये बड़े बड़े पपीते दबाने को मिल जाए तो मज़ा ही आ जाएँ.. कितने बड़े है यार.. इसकी निप्पलें कितनी रसीली होगी.. लंबी लंबी.. गुलाबी गुलाबी


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पीयूष का मन खाने में कम और वैशाली के बबलों में ज्यादा था.. ये परखने में वैशाली को देर नहीं लगी। हर स्त्री की छठी इंद्रिय उन्हे मर्द की नज़रों के प्रति सजाग रखती है.. स्वयं की रक्षा के लिए कुदरत की दी हुई शक्ति है ये.. वैशाली को बस कविता की मौजूदगी खटक रही थी अभी.. पीयूष के साथ तो पहले से ही अच्छी पटती थी उसकी..

कविता मन ही मन सोच रही थी.. ऐसे रोमेन्टीक माहोल में अगर पिंटू साथ होता तो कितना मज़ा आता.. !! काश जीवन में एक बार .. अपने प्रेमी पिंटू के हाथ में हाथ डालकर ऐसी ही किसी होटल में खाना खाने जाने का मौका मिल जाएँ.. बस मज़ा ही आ जाएँ.. ख्वाब देखने तक तो ठीक था पर हकीकत में इस बात को मुमकिन बनाना सिर्फ शीला भाभी के बस की बात थी.. उनके अलावा ये काम और कोई नहीं कर सकता

वैशाली आराम से खाना खा रही थी.. अचानक उसे अपने पैर पर किसी चीज का स्पर्श महसूस हुआ.. उसने नीचे देखा तो पीयूष का पैर उसके पैर से टकराया था.. उसने तुरंत अपना पैर पीछे खींच लिया.. पीयूष ने जान बूझकर पैर लगाया था ? वैशाली ही नहीं.. दुनिया के सारी महिलायें ये जानती है की टेबल के नीचे पुरुष का पैर गलती से कभी नहीं टकराता..

वैशाली और पीयूष की नजर एक होते हुए वैशाली ने एक शरारत भारी मुस्कान दी और नजर फेर ली.. दोनों बचपन से लेकर जवानी तक साथ खेलकर बड़े हुए थे.. पर जैसे ही वैशाली की छातियों पर स्तन उभरने लगे.. शीला सावधान हो गई.. वो पीयूष और वैशाली को कभी अकेले में खेलने नहीं देती थी.. फिर भी जो होना था वो तो होकर ही रहा.. वैशाली की पुरानी यादों का सफर.. दोनों के बीच हुए सेक्स पर आकर रुक गया.. क्या पीयूष भी उसी के बारे में सोच रहा होगा !! याद होगा उसे? पक्का याद होगा.. पहला सेक्स तो हर किसी को याद होता है.. उसकी छोटी सी लुल्ली मेरे हाथ में देकर कैसे आगे पीछे करवाता था वो !! वैशाली के पैर के साथ फिर कुछ टकराया.. इस बार उसने नीचे नहीं देखा.. उसे पता था की वो पीयूष का ही पैर था.. वैशाली के पूरे जिस्म में सनसनी सी फैल गई.. खाने का निवाला गले में ही अटक गया... खाँसते हुए उसने पानी का एक घूंट पीया..

दूसरी तरफ पीयूष वैशाली के स्तन देखकर बावरा स हो गया था.. इस बार वैशाली ने अपना पैर नहीं हटाया.. पीयूष के मन में लड्डू फूटने लगे.. उसने वैशाली के पैर के अंगूठे पर अपना अंगूठा दबा दिया.. वैशाली को दर्द हो रहा था पर वो कुछ नहीं बोली.. नहीं तो कविता को भनक लग जाती..

इन सारी बातों से बेखबर कविता ने अपना खाना खतम किया और बाउल में हाथ धोकर खड़ी हो गई और बोली "मज़ा आ गया आज तो.. अच्छा हुआ वैशाली तूने डिनर का आइडीआ दिया.. घर का खाना खा खा कर मैं बोर हो छुकी थी.. क्यों पीयूष.. सही कहा ना मैंने?"

अचानक उछले इस सवाल से पीयूष हड़बड़ा सा गया.. जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो.. उसने हँसते हुए अपनी मुंडी हिलाई..

कविता: "मैं बाथरूम जाकर आती है.. आप दोनों आराम से खाओ "

कविता टेबल से काफी दूर चली गई और उसने पिंटू को फोन लगाया..

इस तरफ वैशाली और पीयूष अब अकेले रह गए.. पत्नी की गैरमौजूदगी में पीयूष की हिम्मत खुल गई.. ये भँवरा अब वैशाली नाम के फुल पर मंडराने लगा था..

पीयूष: "याद है वैशाली.. जब हम छोटे थे तब साथ में कितनी मस्ती किया करते थे??"

वैशाली: "हाँ .. और मैं तुम्हें बहोत मारती थी.. याद है एक बार मैंने तुम्हें क्रिकेट के बेट से मारा था और तुम्हारा हाथ लाल लाल हो गया था.. !!"

पीयूष: "हम्ममम.. तुझे और कुछ भी याद है की नहीं?"

वैशाली शरमा गई "हट्ट साले बदमाश.. "

पीयूष: "बता न यार.. जब से तुझे देखा है मुझे कुछ कुछ हो रहा है.. मैं जानना चाहता हूँ की क्या तुझे भी ऐसा कुछ हो रहा है या नहीं??"

वैशाली: "पीयूष.. वो सब हमने जवानी की नासमझ में किया था.. तब हम नादान थे पर अब हम बड़े हो चुके है.. ये बात तुझे समझनी चाहिए"

पीयूष नाराज होकर बोला "ठीक है, ठीक है यार.. लेक्चर मत दे" पीयूष चुप हो गया

वैशाली: "अरे पीयूष. ये क्या लड़कियों की तरह रूठ गया तू?? हाँ सब कुछ याद है.. पर अभी उस बात को क्यों याद किया?"

पीयूष: "वैशाली.. अगर हम फिर से पहले जैसे ही नासमझ और नादान बन जाएँ तो कैसा रहेगा??"

वैशाली स्तब्ध हो गई.. दिमाग चकरा गया उसका.. पर पीयूष का इस तरह प्रपोज करने का अंदाज उसे बेहद पसंद आया..

वैशाली: "तू भूल रहा है की मैं अब किसी की पत्नी हूँ.. मैं ऐसा सोच भी नहीं सकती"

पीयूष: "तो मैं भी तुझे कहाँ कुछ गलत करने के लिए बोल रहा हूँ?"

वैशाली को समझ में नहीं आया "तो फिर क्या करना चाहता है तू?"

पीयूष: "मुझे तो बस एक बार.. सिर्फ एक बार.. " बोलते बोलते पीयूष अटक गया पर जिस तरह उसकी ललचाई नजर उसके स्तनों पर चिपकी थी ये देखकर वैशाली समझ गई

वैशाली: "तू खुल कर बता तो कुछ पता चले मुझे"

पर पीयूष चुप रहा

वैशाली: "कविता बाहर हमारा इंतज़ार कर रही होगी.. हमें चलना चाहिए... वरना उसे शक होगा.. बाकी बातें फिर कभी करेंगे.. " वो खड़ी हो गई

पीयूष की नाव किनारा आने से पहले ही डूब गई.. वैशाली के मदमस्त स्तनों को एक बार दबाने की.. छुने की और मौका मिल तो चूसने की इच्छा थी पीयूष की.. अपने आप पर गुस्सा भी आ रहा था उसे.. जब वैशाली ने पूछा तब उसे बता देना चाहिए था.. पर अब पछताए होत क्या.. जब चिड़िया चुद गई खेत में..

दोनों होटल के दरवाजे पर पहुंचे तब उन्हे आते हुए देख कविता ने पिंटू को "बाय" कह कर फोन काट दिया..
 
पीयूष से बात करके शीला ने जान लिया की वो तीनों ११ बजे से पहले आने वाले नहीं थे.. वो जानती थी की जब तक वैशाली यहाँ थी, तब तक रसिक, जीवा या रघु के साथ कुछ नहीं हो पाएगा.. अब क्या करें? इतने सारे दिन बिना चुदे कैसे रहेगी वो? कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा..

शीला ने रसिक को फोन लगाया..

रसिक: "हाँ भाभी बोलिए"

शीला: "मेरे घर पर मेहमान आए हुए है.. और दूध फट गया है.. अभी दो लीटर दूध चाहिए.. मिलेगा ये फिर मैं बाजार जाकर ले आउ?"

रसिक: "ये भी कोई पूछने की बात है.. अभी दूध लेकर आता हूँ.. वैसे भी मुझे अनुमौसी से दूध के पैसे लेने थे.. अभी आता हूँ"

शीला: "सुन रसिक.. मेरी बेटी वैशाली घर पर आई हुई है.. अभी वो बाहर है और दो घंटों तक आने नहीं वाली.. दूध का तो सिर्फ बहाना है.. तू जल्दी घर आजा मेरे"

रसिक: "मैं अभी निकला और आया.. आप तैयार रहो.. मैं पहुँच रहा हूँ"

शीला ने फोन कट कर दिया

पंद्रह मिनट के बाद रसिक दूध का केन लेकर आ पहुंचा.. शीला उसकी राह देख रही थी.. रसिक को घर के अंदर बुलाकर शीला ने कविता के मोबाइल पर फोन किया.. तब कविता खाना खा रही थी..

शीला ने फोन पर कहा : "तू कुछ भी मत बोलना.. सिर्फ मेरी बात सुन... कोई पूछे किसका फोन था तो बोलना की क्रेडिट कार्ड वालों का फोन था.. देख कविता.. जितनी देर तक हो सके सब को रोक कर रखना.. हो सके उतनी देर से वापीस आना. मैंने रसिक को मेरे घर बुलाया है.. तेरी बात करने के लिए.. और सुन.. घर के लिए निकलो तब मुझे मिसकॉल कर देना ताकि मैं उसे यहाँ से रवाना कर सकु" कविता हैलो बोल पाती उससे पहले ही भाभी ने अपनी बात सुना दी.. और फोन काट दिया.. कितने सेटिंग करने पड़ते है चुत की आग बुझाने के लिए.. !!

दरवाजा बंद करते हुए शीला ने रसिक को अपनी बाहों में भरकर चूम लिया.. शीला के गोरे गदराए जिस्म का स्पर्श होते ही रसिक के लंड को ४४० वॉल्ट का झटका लगा.. शीला के दोनों स्तनों को उसने अपनी मजबूत हथेलियों में दबोचकर मसल दिया

रसिक: "इतनी भी क्या जल्दी है भाभी? "

शीला: "बहोत दिन हो गए रसिक.. ये वैशाली के आने के बाद, मैं तो जैसे पिंजरे में कैद हो गई हूँ.. तंग आ गई हूँ.. अब बकवास बंद कर और जल्दी अपना हथियार निकाल.. और ठोक मुझे.. " कहते हुए शीला ने अपने ब्लाउस के अंदर से अपना एक स्तन निकाला..

रसिक ने बड़े आराम से उनके खरबूजे जैसे बड़े स्तन को सहलाते हुए उनके घाघरे का नाड़ा खींचने की कोशिश की.. तब शीला ने उसका हाथ पकड़ लिया..

शीला: "रसिक, अगर वो लोग जल्दी आ गए तो कपड़े पहनने का समय नहीं मिलेगा.. तू घाघरा ऊपर कर और घुसा दे अंदर.. " रसिक ने अपनी खुरदरी हथेलियों से शीला की भोस को सहलाना शुरू कर दिया..

शीला: "कितना भारी और खुरदरा है तेरा हाथ.. !! ऐसा सहला रहा है जैसे लकड़ी छील रहा हो.. ओह्ह आह्ह रसिक.. चार दिन हो गई.. तेरा लंड देखे हुए.. जल्दी जल्दी बाहर निकाल.. " रसिक के पाजामे से उसका गधे जैसा लंड बाहर खींच निकाल शीला ने.. हाथ में लेते ही सिहर उठी शीला.. "हाय.. क्या मस्त मोटा है रे तेरा.. आई लव ईट.. !!" शीला ने मुठ्ठी में दबाकर हिलाना शुरू किया


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रसिक ने अपनी दो उँगलियाँ शीला की गरम मेंदूवडे जैसी भोस के अंदर घुसेड़ दी और झुककर ब्लाउस के बाहर लटक रहे स्तन की निप्पल को मुंह में लेकर चूसने लगा..

चार दिन की भूखी शीला बेहद उत्तेजित होकर रसिक के फुँकारते हुए लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी.. देखते ही देखते रसिक के आधे से ज्यादा लंड को अंदर ले लिया.. रसिक से और रहा नहीं गया.. उसने शीला के मुंह से अपना लंड निकाला.. और उसे उठाकर बिस्तर पर पटक दिया.. फिर खुद ऊपर सवार हो गया..

शीला: "आह्ह रसिक.. जल्दी घुसा.. वो लोग आते ही होंगे अभी.. आज अगर मेरी चुत को प्यासी छोड़ेगा तो माँ चोद दूँगी तेरी" अपनी उंगली पर थूक लगाकर खुद ही चुत का दाना रगड़ने लगी शीला.. रसिक तुरंत झुककर शीला के भोसड़े पर पहुँच गया.. दो उंगलियों से चुत की फांक चौड़ी करके उसने अपनी जीभ अंदर घुसा दी.. रसिक की भोस चटाई देखकर शीला को मदन की याद आ गई.. माय गॉड.. मदन कभी कभी एक घंटे तक मेरी चुत चाटता था.. कितना शौकीन था वो.. मेरा प्यार मदन..

रसिक चटखारे लगाते हुए शीला की चुत के अंदरूनी हिस्सों को अपनी जीभ से कुरेद रहा था.. शीला दोनों हाथों से अपने सख्त बबलों को दबा रही थी और मुख मैथुन का मज़ा ले रही थी.. शीला की कामुकता ने रसिक को ओर उत्तेजित कर दिया.. वो अपने रफ हाथों से शीला के कोमल चरबीदार शरीर को सहला रहा था..


काफी देर तक जब रसिक शीला की चुत का रस ही चाटता रहा तब शीला से रहा नहीं गया.. "मैं मर जाऊँगी रसिक.. प्लीज.. अब डाल भी दे अंदर.. बहोत तेज खुजली हो रही है मुझे.. भांप निकल रही है मेरे छेद में से.. " रसिक ने शीला की दोनों जांघों को चौड़ा किया और बीच में बैठ गया.. अपना तगड़ा.. गरम अंगारे जैसा लंड उसने शीला के छेद पर रखा.. लंड का स्वागत करने के लिए शीला का भोसड़ा अविरत रस छोड़ रहा था.. रसिक अपना सुपाड़ा शीला की चुत के होंठों पर रगड़ रहा था.. वासना से तपकर शीला का चेहरा सुर्ख लाल हो गया था.. दोनों स्तन ब्लाउस के बाहर लटक रहे थे.. रसिक अपने सुपाड़े से शीला की चुत को छेड़ता ही रहा... शीला की क्लिटोरिस जामुन जैसी बड़ी हो गई थी.. लंड के रगड़ने से उत्तेजित होकर शीला अपने चूतड़ ऊपर नीचे कर रही थी


शीला से अब रसिक की ये छेड़छाड़ और बर्दाश्त नहीं हुई

शीला: "भेनचोद रसिक.. इतना क्यों तड़पा रहा है मुझे? अगर तू ऊपर ऊपर से रगड़ने में ही झड गया तो तेरी गांड में झाड़ू घुसेड़कर मोर बना दूँगी.. जल्दी डाल अंदर.. मस्त सख्त हो गया है "

शीला की बातों को अनसुनी कर रसिक उसके स्तनों को मसल रहा था

शीला: "अबे चूतिये.. डाल अंदर" रसिक ने एक जोर का धक्का लगाया और उसकी चुत को चीरते हुए पूरा लंड अंदर चला गया

शीला: "मर गई मादरचोद.. ऐसे एकदम से कोई डालता है क्या?? पेट में दर्द होने लगा मुझे.. नाभि तक घुस गया तेरा मूसल"


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रसिक: "अरे भाभी.. ऐसे ही चोदने में मजा आता है.. लंड जब अचानक अंदर डालो तब इतना मज़ा आता है मुझे.. " पहाड़ जैसे रसिक की काया शीला के शरीर के ऊपर मंडराने लगी.. उसके मजबूत शरीर से दबकर अजीब सी तृप्ति मिली शीला को..

रसिक के भारी भरकम शरीर के नीचे दबकर मजबूत धक्कों का मज़ा लेती हुई शीला मन ही मन कविता का शुक्रियादा कर रही थी.. उसके कारण ही आज उसकी चुत की भूख मिट रही थी..

शीला: "जोर से धक्के लगा रसिक.. " रसिक शीला के चूतड़ों को अपने नाखूनों से कुरेद रहा था.. उसका काला शरीर, शीला के गोरे बदन पर पटखनिया खा रहा था..

"आह्ह भाभी.. इस उम्र में भी काफी चुस्त है आपके बॉल.. " रसिक जबरदस्त ताकत के साथ शीला की भोस में धक्के लगा रहा था..

"और जोर से रसिक.. जोर लगा.. नाश्ता नहीं किया था क्या.. लगा दम.. आह्ह बहोत मज़ा आ रहा है.. "

रसिक शीला के उरोजों को ब्लाउस के ऊपर से मसलते हुए उसके कोमल सुर्ख होंठों को मस्ती से चूसते हुए धमाधम पेल रहा था.. दोनों ने धक्के लगाने और खाने में अपनी लय हासिल कर ली थी और उत्तेजनावश एक दूसरे के जिस्मों को नोच रहे थे.. रसिक की ऊर्जा देखकर शीला आफ़रीन हो गई.. वाह.. लगा दम.. फाड़ दे मेरी.. रसिक.. वाह क्या लंड है तेरा.. उन लोगों के लौटने से पहले खल्लास कर दे मुझे.. रसिक्ककककक.. !!!


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शीला बेहद कामुक आवाज में उत्तेजक बातें बोल बोल कर उसे संभोग की पराकाष्ठा तक ले गई.. रसिक अप्रतिम तेजी से शीला को चोदे जा रहा था.. उसके आखिरी दस पन्द्रह धक्के तो ऐसे जोर के लगे के शीला की आँखों में पानी आ गया.. शीला का पूरा शरीर अकड़ गया और वो झटके मारते हुए झड़ने लगी.. रसिक के विकराल लंड का अपनी चुत के पानी से अभिषेक करते हुए शीला की सांसें ऐसे फूल चूकी थी जैसी माउंट एवरेस्ट चढ़कर आई हो.. शीला ने अपनी मंजिल प्राप्त कर ली थी लेकिन रसिक का सफर अभी बाकी था

भोस के झड़ जाने के बाद रसिक के धक्कों से शीला को अब दर्द हो रहा था.. अपने शरीर के ऊपर से रसिक को हटाने के लिए वह धक्के मारने लगी.. "बस कर रसिक... बहुत हुआ.. मेरा हो चुका है.. उतर नीचे.. मेरा दम घुट रहा है.. कितना वज़न है तेरा साले.. मर जाऊँगी मैं.. ऊहह आहह बस कर कमीने.. प्लीज छोड़ दे.. हाथ जोड़ती हूँ मैं तेरे" पर रसिक पर शीला की बातों का कोई असर नहीं हुआ.. उसने अविरत स्पीड से शीला की भोस में अपना मूसल घुसाना जारी रखा.. आखिर शीला की भोस की गहरी खाई में.. रसिक की मर्दानगी सिर पटक पटक कर हार गई.. उसके लंड से छूटी वीर्य की पिचकारी के साथ शीला की आँखें फट गई.. डोरे ऊपर चढ़ गए.. रसिक एक पल के लिए डर गए.. कहीं शीला भाभी सिधार तो नहीं गई.. पर उसकी सांसें चलती देख रसिक की जान में जान आई

शीला ने रसिक को तब तक जकड़े रखा जब तक उसके वीर्य की आखिरी बूंद चुत में चूस न ली.. रसिक ने अपना लंड शीला के भोसड़े से बाहर निकाला.. उसके लंड की दशा ऐसी थी जैसे रस निकल जाने के बाद कोल्हू से गन्ना निकला हो.. अपने ही लंड पर रसिक को दया आ गई..


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"मज़ा आ गया भाभी.. जबरदस्त हो आप तो"

"रसिक.. तेरा ये जुल्म तो मैं और रूखी ही बर्दाश्त कर सकते है.. आज कल की जीरो फिगर वाली लड़कियों के ऊपर अगर तू चढ़ें तो एक ही मिनट में उनकी जान निकल जाएँ.. तूने किया है कभी पतली जवान लड़की के साथ?"

"नहीं भाभी.. ऐसी मेरी किस्मत कहाँ !!"

"करना भी मत.. कहीं कोई मरमरा गई तो जैल जाना पड़ेगा"

"भाभी, दिल तो बहोत करता है.. एक बार किसी शहरी फेशनेबल पतली लड़की को जमकर चोदने की.. आप के ध्यान में है कोई? मुझे तो ये पतली कमर वाली.. गॉगल्स पहन कर एक्टिवा चलाती हुई नाजुक परियों को देखकर ही पटककर चोद देने का मन करता है.. उनकी पूत्तियाँ कैसी होगी भाभी.. !! संकरी सी.. छोटी छोटी.. " रसिक अपने मुरझाए लंड को हिलाने लगा

"बहोत हुई बकवास तेरी.. अब निकल यहाँ से इससे पहले की वो लोग आ जाएँ" रसिक के लंड को फिर से उठता देख शीला की गांड फट गई

"भाभी.. मैंने जो कहा वो याद रखना.. आप के ध्यान में अगर ऐसी कोई लड़की आए तो.. " पजामा पहनते हुए रसिक ने कहा

"अगर कोई ध्यान में आए तो बताऊँगी"

"जरूर बताना भाभी.. आधी रात को दौडा चला आऊँगा.. "

"ठीक है.. रूखी को मेरी याद देना.. "

"हाँ भाभी.. वो भी आपको बहोत याद करती है.. आइए कभी मेरे घर !!"

रसिक चला गया.. चुत ठंडी हो जाने पर शीला मस्त होकर बिस्तर पर लेट गई..
 
इस तरफ कविता, वैशाली और पीयूष वापीस आने के लिए निकले.. कविता को चिंता हो रही थी की कहीं शीला भाभी और रसिक का प्रोग्राम अब भी चल रहा होगा तो??"मैंने मिसकॉल तो किया था पर शायद उन्हों ने न सुना हो !! क्या करू? फिर से मिसकॉल करू? नहीं नहीं.. पीयूष और वैशाली को शक हो जाएगा.. कविता ने पीयूष की ओर देखा.. वैशाई के पीले टीशर्ट से उभरकर दिख रहे सूडोल उरोजों को ताड़ रहे पीयूष को देखकर कविता सोचने लगी..

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ये पीयूष को सभी लड़कियों के स्तनों में ही क्यों इतनी दिलचस्पी है!! ये वैशाली भी पक्की चुड़ैल है.. एक तरफ बोलती है की मैं हिम्मत से प्यार करती हूँ.. और दूसरी तरफ मेरे पति के साथ फ्लर्ट कर रही है.. कहीं ये पीयूष से चुदवाने की फिराक में तो नहीं है!! नहीं नहीं.. वैशाली ऐसा नहीं कर सकती..पर कुछ कह नहीं सकते.. वैसे मैं भी कहाँ दूध की धुली हूँ !!

शीला भाभी ने जब रसिक के साथ सेटिंग करने की बात कहीं तब मैं भी कैसे तैयार हो गई थी!! इशशश रसिक की याद आते ही कविता को याद आया की शीला भाभी ने वादा किया था की आज रसिक से उसकी बात करेगी.. तब तो आज भाभी ने बात कर भी ली होगी अब तक.. बाप रे.. कविता.. एक दूधवाले के साथ करेगी?? शर्म भी नहीं आती तुझे? हम्म कोई बात नहीं.. आँखों पर पट्टी बांधकर करवा लूँगी.. पर एक बार मोटे लंड में कैसा मज़ा आता है वो तो अनुभव करना ही है.. बीपी में सब फिरंगी राँडें काले हबसीओ के गधे जैसे लंड से कितनी आराम से चुदती है.. !! शीला भाभी के घर पर ही तो देखा था टीवी पर.. जो होगा देखा जाएगा.. शर्म तो बड़ी आएगी पर मोटे लंड का स्वाद लेने के लिए इतनी शर्म तो निगलनी ही पड़ेगी.. एक बार करवा लेने पर सारी शर्म हवा हो जाएगी

"अब उतरेगी भी या ऑटो वाले के साथ ही जाएगी?? " खयालों में खोई कविता को पीयूष ने टोका.. कविता तंद्रा से बाहर निकली.. "ओह... इतनी देर में घर आ भी गया?"

पीयूष "मैं भी वही सोच रहा था.. इतनी देर में घर आ भी गया?" ऑटो में बैठे तब से पीयूष अपनी कुहनी से वैशाली के स्तनों को छु रहा था... उसने वैशाली की ओर देखा.. उसने शरमाकर नजरें झुका ली.. कविता अपने खयालों में खोई हुई थी इस बात का पीयूष ने पूरा फायदा उठाया था आज


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वैशाली अपने घर के दरवाजे पर पहुंची.. पीयूष उसे अंत तक जाते हुए देखता रहा.. उसे आशा थी की वैशाली पलट कर देखेगी जरूर.. उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा..
"तय होती है मोहब्बत पलट कर देखने से ही.. सिर्फ मिलना ही इश्क का सबूत नहीं होता"

पीयूष के मन का मोर तब नाच उठा जब वैशाली ने अंदर जाने से पहले उसे पलट कर देखा और हाथ हिलाकर गुड नाइट भी कहा.. कितनी माहिर होती है ये लड़कियां.. लड़कों को लट्टू बनाने में!!

शीला ने वैशाली से होटल के बारे में पूछा.. वैशाली ने पीयूष की हरकतों को छोड़.. बाकी सारी बातें बताई..

"मम्मी.. तूने खाना खाया की नहीं?"

शीला ने मन में कहा "बेटा मैं कभी भूखी नहीं रहूँगी.. मेरे पास बहोत रास्ते है अपनी भूख मिटाने के.. "

"हाँ बेटा.. खा लिया" मुस्कुरा कर शीला ने कहा.. वैशाली सोचने लगी.. मम्मी आज बेवजह मुस्कुरा क्यों रही है !!

वैशाली को खुश देखकर शीला के दिल को तसल्ली मिली.. अपने वैवाहिक जीवन से त्रस्त वैशाली को कुछ तो खुशी मिली.. ये संजय भी नजर नहीं आया अब तक.. चार दिन हो गए एक बार भी घर पर नहीं आया और वैशाली को फोन भी नहीं किया उसने.. वैशाली ने भी सामने से फोन नहीं किया.. दोनों के बीच की अनबन काफी गंभीर मालूम होती है..

माँ बेटी ने साथ बैठकर टीवी पर "अनुपमा" की ज़िंदगी की तकलीफें देखी और फिर सो गई।

बिस्तर पर लेटे लेटे वैशाली को हिम्मत के संग की चुदाई याद आ गई.. साथ ही साथ पीयूष की हरकतें भी.. शीला रसिक के मूसल को याद करते हुए गीली होने लगी.. पता नहीं क्यों.. बिस्तर पर लेटते ही शीला के दिमाग की सेक्स फैक्ट्री चालू हो जाती थी.. कमरे में अंधेरा था.. शीला ने चादर ओढ़कर अपने गाउन के अंदर हाथ डाल दिया.. वैशाली की चुत में भी खुजली उठी थी.. उसे पीयूष की कही बात याद आ रही थी "क्यों न हम फिर से पहले की तरह नादान और नासमझ बन जाएँ!!"

पीयूष अब भी उस पर फिदा है ये वैशाली जान छुकी थी.. वैशाली ने मुड़कर शीला की विशाल छातियों को देखा.. मम्मी ने इस उम्र में भी खुद को कैसे मैन्टैन कर रखा है !!

वैशाली की नज़रों से बेखबर शीला अपनी चार उँगलियाँ भोसड़े में डालकर अंदर बाहर कर रही थी.. उस तरह की वैशाली को भनक भी न लगे.. पर उसकी सांसें फूल गई थी और वो तेजी से सांस ले रही थी.. आखिर वैशाली भी एक स्त्री थी.. शीला की चुत जिस तरह रस रिस रही थी.. उसकी गंध भी वैशाली के नथुनों तक पहुँच गई थी... माय गॉड.. मम्मी मास्टरबेट कर रही है!! वैशाली शरमा गई.. हाँ.. वही कर रही है मम्मी.. ध्यान से देखने पर उसे शीला के हाथ की हलचल भी नजर आने लगी.. ये देखकर वैशाली से भी रहा न गया.. उसने अपनी चुत पर हाथ फेरा.. गीली हो गई थी उसकी मुनिया..


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अचानक शीला ने एक लंबी सांस छोड़ी और पलट कर सो गई.. वैशाली भी पीयूष और हिम्मत को याद करते हुए अपनी भड़कती चुत को सहलाने लगी.. उसका दूसरा हाथ स्तनों को मरोड़ रहा था.. उंगलियों से रगड़ते हुए वो भी झड़ गई.. माँ और बेटी एक ही बिस्तर पर मूठ लगाकर सो गई। करवट लेकर सो रही शीला ने भी वैशाली की आहें सुनी और अंदाजा लगा लिया की उसकी पीठ पीछे वो क्या कर रही थी

रात के तीन बजे शीला पानी पीने के लिए उठी.. किचन में जाकर पानी पीने के बाद जब वह लौटी तब उसने देखा की कमरे की खुली खिड़की से चाँद की किरणे वैशाली पर पड़ रही थी। उसने चादर नहीं ओढ़ राखी थी.. गाउन के ऊपर के तीन बटन भी खुले थे.. रात को सोते समय वो ब्रा निकाल देती थी ये शीला जानती थी.. शीला करीब आकर उसके गाउन के बटन बंद करने लगी.. बटन बंद करते हुए बेटी के उभारों को नरम भाग पर उंगली का स्पर्श होते ही शीला सहम गई.. मन में उठ रहे हलकट विचारों को धकेल कर उसने वैशाली का गाउन ठीक किया और उसके बगल में सो गई।

"ये मुझे आज क्या हो रहा है? जिसे भी देखूँ बस सेक्स के विचार ही आते है.. अच्छा हुआ की वैशाली नींद में थी वरना मेरे बारे में क्या सोचती?" शीला को अपने ही विचारों से भय लगने लगा

सुबह पाँच बजे रसिक दूध देने आया.. वैशाली अंदर के कमरे में सो रही थी फिर भी शीला ने रसिक को अपने स्तन चूसने दिए.. उसका लंड हिलाया.. और उसके गाल और होंठ पर एक जबरदस्त किस भी दी.. उसके बाद ही उसे जाने दिया.. ज्यादा कुछ कर पाना मुमकीन नहीं था.. शीला अपने रोज के कामों में व्यस्त हो गई.. वैशाली को उसने देर तक सोने दिया..

थोड़ी देर बाद वैशाली जाग गई.. अंगड़ाई लेते हुए वो बाहर झूले पर बैठे हुए ब्रश पर टूथपेस्ट लगाने लगी.. शीला किचन में मशरूफ़ थी.. वैशाली ने पीयूष के घर की तरफ देखा.. पर वो नजर नहीं आया.. कल भी वो इसी तरह झूले पर बैठी थी पर तब उसे पीयूष के घर की ओर देखना का खयाल नहीं आया था तो अब क्यों आ रहा था !!! ताज्जुब हुआ वैशाली को.. तभी अनुमौसी बाहर आई

अनुमौसी: "कैसी हो बेटा? लगता है अभी अभी जागी हो"

वैशाली: "हाँ मौसी.. बहोत अच्छी नींद आई तो देर तक सोती रही"

अनुमौसी: "यही तो है मायके का सुख.. ना कोई बंधन ना कोई जिम्मेदारी.. जैसे ही ससुरत लौटो की फिर से जैल में कैद.. ये मेरी कविता को ही देख लो.. पीयूष को जल्दी ऑफिस जाना होता है इसलिए वो बेचारी पाँच बजे उठकर खाना बनाती है.. इससे पहले जो नौकरी थी वो अच्छी थी.. ये वाली ऑफिस जरा दूर है इसलिए पीयूष को जल्दी निकलना पड़ता है.. बेचारा मेरा बेटा रात को वापीस लौटते लौटते थक जाता है..बहुत महेनती है मेरा बेटा"

वैशाली: "हाँ मौसी.. पीयूष बहोत ही अच्छा लड़का है" बोलने के बाद खुद को चाटा मारने का मन किया वैशाली को.. क्या बोलने की जरूरत थी मौसी के आगे !!!

मौसी और कुछ पूछती उससे पहले वैशाली ही वहाँ से उठी और सीधी बाथरूम चली गई.. नहा कर और फ्रेश होकर वो अप-टू-डेट फेशनेबल कपड़े पहनकर तैयार हो गई और शीला के पास आई। उसके छोटे तंग वस्त्रों से आधे से ज्यादा जिस्म बाहर झलक रहा था

शीला: "बेटा, तू छोटी नहीं रही.. ऐसे कपड़े पहनना शोभा नहीं देता.. कुंवारी थी तब तक सब ठीक था.. देख तो सही कितने टाइट कपड़े है!! शादी के बाद ऐसे अधनंगे कपड़े पहनकर मैं तुझे बाहर नहीं जाने दूँगी.. शर्म भी नहीं आती तुझे "

जवाब में वैशाली ने शीला के गालों पर हल्के से किस की और हँसते हँसते बेडरूम में चली गई

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मौसी की बातों से वैशाली को पता चल गया की पीयूष सुबह ७ बजे ऑफिस के लिए निकल जाता है.. पूरा दिन नौकरी पर रहता था तो उसे देख पाना मुमकीन नहीं था.. रात को भी वो देर से घर आता और फिर कविता और वैशाली जब वॉक लेने निकलते तभी उसकी झलक वैशाली देख पाती। दूसरी तरफ पीयूष का भी यही हाल था.. वैशाली के दीदार के लिए वो भी तड़पता रहता था.. पर काफी कोशिशों के बाद भी उसे निराशा ही हाथ लगी। दोनों के मन में "नादान और नासमझ" बनने की बड़ी तीव्र चूल उठ रही थी

एक रात को करीब दस बजे.. रोज की तरह कविता और वैशाली वॉक लेकर लौटे और कविता के घर की छत पर ठंडी हवा का आनंद ले रहे थे। घर के अंदर बैठे पीयूष का बड़ा मन कर रहा था की वो भी ऊपर छत पर उन दोनों के साथ बैठे। पर बिन बुलाए मेहमान की तरह जाना उसे पसंद नहीं था। मन तो वैशाली का भी बहुत था की पीयूष ऊपर उनके पास आए..

कविता और वैशाली की दोस्ती इतनी गाढ़ी हो छुकी थी की वो दोनों एक दूसरे को अपनी सारी बातें बताने से हिचकिचाते नहीं थे.. कविता ने अपने और पिंटू के बारे में सारी कथा सुनाई.. वैशाली ने भी अपने जीवन की कुछ ऐसी बातें बताई जो केवल वो ही जानती थी.. रात को देर तक बैठे बैठे वो दोनों दुनिया भर की बातें करती रहती.. उनकी दोस्ती से शीला भाभी या अनुमौसी को कोई हर्ज नहीं था.. आखिर दोनों लड़कियां थी

एक हफ्ता बीत गया पर ना संजय का फोन आया और ना ही वैशाली ने उसे फोन किया.. ये बात शीला को बहुत परेशान कर रही थी.. शीला को यकीन था की अगर वो वैशाली से इस बारे में पूछेगी तो वो सीधे सीधे जवाब नहीं देगी.. उससे असलियत उगलवाने का कोई तरीका ढूँढने लगी शीला

दूसरी रात जब वैशाली और कविता वॉक लेने गए तब शीला ने ही संजय को फोन लगा दिया.. बियर बार में बैठकर अपनी सहकर्मी प्रेमिला के साथ शराब पीते हुए और उसकी जांघों को सहलाता हुआ संजय, फ्लोर पर नाच रही अधनंगी डांसरों के लटके झटके देखकर ठंडी आहें छोड़ रहा था। सुंदर स्तनों को उछलती हुई एक बार डांसर संजय के करीब आई और झुककर अपनी गहरी गली दिखाकर टिप मिलने की आशा में खड़ी रही.. बियर बार की तमाम रस्मों से वाकिफ प्रमिला से संजय के हाथों में १०० का नोट थमा दिया जिसे संजय ने उस लड़की के दो स्तनों के बीच दबा दिया.. उसी वक्त उसका फोन बजा और स्क्रीन पर सासु माँ का नाम देखकर वो चोंक उठा

"एक्सकयुज मी डार्लिंग.. " प्रमिला का गाल को थपथपाकर संजय फोन पर बात करने के लिए बियर बार के कोलाहल से बाहर निकला और फोन उठाया

"हाँ मम्मी जी, कैसी हो आप?"

"मैं ठीक हूँ.. आप कैसे है? घर पर आपके मम्मी पापा की तबीयत कैसी है?"

"सब ठीक है.. आपकी तबीयत कैसी है? काफी दिन हो गए, व्यस्तता के कारण वैशाली को फोन नहीं कर पाया.. अभी फोन करता हूँ उसे" सिगरेट जलाते हुए संजय ने कहा

शीला: "हाँ हाँ कोई बात नहीं.. वैशाली आपको बहुत याद करती है.. कब आ रहे हो घर? वो तो कह रही थी की बस चार दिन का ही काम था.. अभी तक खतम नहीं हुआ?"

संजय: "अरे नहीं मम्मी जी, काम तो चार दिन का ही था पर जिस पार्टी को मुझे मिलना था वो कहीं बीजी है इसलिए अब तक मिलना नहीं हुआ.. और एक दो दिन लग जाएंगे मुझे "

काफी देर हो गई पर संजय लौटा नहीं इसलिए प्रमिला दरवाजा खोलकर बाहर निकली और पीछे से आवाज लगाई "संजु डार्लिंग, कितनी देर लगा रहे हो !! जल्दी आओ ना !!"

संजय ने चोंक कर पीछे देखा और अपने होंठ पर उंगली रखकर शशशशशश करते हुए प्रमिला को चुप रहने का इशारा किया और फिर शीला से बात करने लगा.. पर शीला ने प्रमिला की आवाज को साफ साफ सुन लिया था.. शीला अनुभवी थी.. उसने संजय से उस लड़की के बारे में कुछ भी नहीं पूछा.. संजय को यही प्रतीत हुआ की सासु माँ ने प्रमिला की आवाज नहीं सुनी होगी वरना वो इस बारे में जरूर पूछती..

शीला जानबूझकर यहाँ वहाँ की बातें कर रही थी.. और बेकग्राउंड की आवाज़ें सुनकर अनुमान लगा रही थी की संजय कहाँ होगा.. तभी संजय ने ये कहकर फोन काट दिया की उसका बॉस उसे बुला रहा था इसलिए उसे फोन काटना पड़ेगा। संजय की इस हरकत से शीला का शक यकीन में बदलने लगी.. कौन होगी वो लड़की जो संजय को डार्लिंग कह कर बुला रही थी?

वैशाली ने शीला को बताया था की संजय पैसे उड़ाता है और कुछ कमाता नहीं है.. सब से उधार लेकर गायब हो जाता है ये भी पता था.. लेकिन वैशाली ने कभी किसी पराई औरत के बारे में कभी कुछ नहीं कहा था.. हालांकि संजय की गंदी नजर का अनुभव तो ऐसे सालों पहले हो ही चुका था.. पर उसने ये सोचकर अपने मन को समझा लिया था की सारे मर्दों की नजर ऐसी ही होती है.. उसके पति की नजर भी वैसी ही थी

शीला दामाद को बेटे समान मानती थी.. फिर जिस तरह संजय उसके स्तनों को भूखी नज़रों से ताकता रहता.. शीला अस्वस्थ हो जाती.. इन मर्दों को बस एक ही बात समझ में आती है.. मौका मिलते ही स्त्री को फुसलाओ और उसकी टांगें खोलकर चोद दो.. मन ही मन में वो दुनिया के सारे मर्दों को गालियां दे रही थी.. कौन होगी वो लड़की जिसने संजय को डार्लिंग कहकर पुकारा था??

वो लड़की जो भी हो.. उस लड़की से उलहकर संजय वैशाली का जीवन बर्बाद करें वो शीला बर्दाश्त करने वाली नहीं थी.. साला समझता क्या है अपने आप को? उसका बस चलता तो संजय को दो चाटे लगाकर उसका दिमाग ठिकाने पर ले आती.. पर बात वैशाली के वैवाहिक जीवन की थी.. और उसे बचाने के लिए झगड़ा करना कोई उपाय नहीं था.. एक विचार ऐसा भी आया की कहीं दोष वैशाली का तो नहीं होगा ना !! ये जांच भी करना आवश्यक था। शीला ने वैशाली की सास को कलकत्ता फोन लगाया.. कैसे भी करके वो इस बात के मूल तक पहुंचना चाहती थी
 
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