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शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

एक घंटे के भीषण एनकाउंटर के बाद.. कमरे में सन्नाटा छा गया था.. जॉन और संजय लाश की तरह बिस्तर की एक तरफ पड़े हुए थे.. चार्ली नाम की चिड़िया.. शीला की पुख्त भुजाओं में सिमटकर छोटे बच्चे की तरह आराम से सो रही थी.. शीला की गांड में जलन हो रही थी.. नजदीक पड़े सिगार का पैकेट खोला तो वह खाली था.. शीला ने.. अकेले ही.. अपने बलबूते पर.. जॉन, संजय, चार्ली और सिगार.. सब को खाली कर दिया था.. आराम करते हुए एकाध घंटा और बीत गया..

रात के लगभग साढ़े आठ बज चुके थे.. शीला की सुस्ती अब भी कम नही हो रही थी.. संजय कपड़े पहन कर अपनी पसंद की सिगरेट लेने बाहर गया.. और जॉन बाथरूम में नहाने चला गया था.. चार्ली नंगे बदन सो रही थी.. उसकी साँसों के साथ स्तन ऊपर नीचे हो रहे थे.. देखते ही शीला को अपनी जवानी के दिनों की याद आ गई.. तब उसके स्तन भी ऐसी मध्यम कद के और सख्त थे.. निप्पल तो जैसे थी ही नही.. कुंवारी लड़कियों के स्तन बड़े नाजुक होते है.. मर्द का हाथ पड़ते ही उसका आकार बदलने लगता है..

मदन के साथ जब उसकी सगाई हुई.. उससे पहले शीला के स्तन बिल्कुल अनछुए थे.. जब वह स्कूल में पढ़ती थी तब उसके स्तन सब से बड़े थे.. सारे लड़के टकटकी लगाकर देखते तब उसे बहोत शर्म आती थी.. अपने स्तनों की सुंदरता से आज तक उसने कई मर्दों को अपनी उंगलियों पर नचाया था.. शीला के स्कूल के शिक्षक भी मौका मिलते ही शीला के कुँवारे उरोजों को तांकते रहते.. ये सब बातें याद आते ही मुस्कुराने लगी शीला..

तभी चार्ली ने आँखें खोली.. शीला के नग्न नरम उभारों पर हाथ फेरते हुए उसने शीला की गर्दन पर किस कर दी.. शीला ने भी चार्ली के स्तनों को मसल दिया.. दोनों एक दूसरे के साथ खेलते हुए खड़े हुए.. तभी जॉन बाथरूम से नहाकर नंगा बाहर निकला.. उसके पिचके हुए नरम लंड को तिरस्कार भरी नज़रों से देख रही थी शीला.. शीला को सिर्फ सख्त लंड पसंद थे..

चार्ली ने जॉन से पूछा.. "Honey..did you enjoy it or not? I loved fucking with Sanjay.. I like Indian cocks.. They are quite hard and strong..much harder than your cock..!!"

"Yeah darling.. Indian pussy is also too hot to handle definately.. This has been the most memorable fucking experience, I ever had"

तभी हाथ में सिगरेट का पैकेट लिए हुए संजय कमरे के अंदर आया.. सिगरेट के साथ साथ वह वोड्का की बोतल भी साथ ले आया था.. साथ में बाइटिंग के लिए कुछ सामान भी था.. उसने फोन करके ४ ग्लास मँगवाए.. और सब का लाइट पेग बनाया.. चारों लोग आराम से पीने लगे और उस पेग को खतम किया.. अब अलग होने का समय आ चुका था.. शीला ने अपने कपड़े पहने.. और बड़े प्यार से उसने जॉन और चार्ली को एक किस करते हुए अलविदा कहा..

होटल से बाहर निकलकर चलते चलते वह दोनों अपने होटल के कमरे में पहुंचे.. थककर संजय ने अपना पेंट उतारा और बिस्तर पर बैठ गया और शीला उसकी गोद में..


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शीला: "राजा.. आज तो तेरी सुहागरात है.. अपनी सास के संग इस रात को यादगार बना देना.. मुझे इतना चोद.. इतना चोद की मेरी जन्मों की प्यास बुझ जाएँ.. मैं बहोत तरसी हूँ बेटा..!!"

संजय: "मम्मी जी, आपकी प्यास का तो मुझे उसी दिन पता चल गया था जिस दिन मैंने आपको पेड़ के तने से चूत रगड़ते हुए देखा था.. तभी में समझ गया था की पापा जी की गैर मौजूदगी में आप कितना तड़प रही थी"

शीला ने चोंककर कहा "अच्छा.. !! अब समझी!! तो उस रात वो तुम ही थे.. जिस ने मुझे अंधेरे में पीछे से चोद दिया था.. मुझे शक तो था ही.. की ऐसा काम तुम्हारे अलावा और कोई नही कर सकता.. पर इतना बड़ा रिस्क तूने कैसे लिया संजय? तुझे डर नही लगा था क्या?"

संजय: "अरे मम्मी जी, आपकी हालत तब इतनी खराब थी की पीछे से कोई कुत्ता आकर चोद जाता तो भी आप मना नही करती.. बहोत उत्तेजित थी आप.. इसीलिए तो मैंने मौका देखकर अपना लंड घुसा दिया सीधा.. पर सच बताना.. कैसा लगा था आपको उस रात?"

शीला: "मुझे तो बहोत मज़ा आया था.. लंड के लिए तड़प रही थी तभी चूत में लंड घुस गया.. उससे ज्यादा क्या चाहिए!! संजय.. अच्छा हुआ जो तू मुझे गोवा लेकर आया.. हम साथ में मजे तो करेंगे ही.. पर यहाँ आने से उन दो फिरंगियों के साथ मज़ा करने का जबरदस्त मौका मिल गया "

संजय: "मम्मी जी, उस चार्ली की चूत बड़ी ही टाइट थी.. वैशाली को पहली बार चोदा था उससे भी टाइट.. !! मुझे लगता है की जॉन ने उसे ज्यादा रगड़ा नही होगा अब तक"

शीला: "मुझे तो ऐसा नही लगता.. जॉन के साथ चार्ली यहाँ गोवा तक आई है तो चुदाई में तो कोई कसर नही छोड़ी होगी दोनों ने.. मेरे हिसाब से तो चार्ली भी एक नंबर की चुदक्कड़ ही थी.. हाँ.. उसकी चुत बेशक काफी मुलायम और टाइट थी.." साथ लेकर आए बोतल से संजय को घूंट पिलाते हुए शीला ने नीचे हाथ डालकर संजय के लंड से खेलना शुरू कर दिया था.. संजय का लंड एकदम गन्ने जैसा सख्त हो गया था.. गोद में बैठी शीला के स्तन हल्के हल्के मसल रहा था संजय..

संजय के हाथ में सिगरेट थी.. शीला ने सिगरेट उसके हाथ से लेकर एक कश लगाया.. धुआँ छोड़ते हुए उसने संजय के लंड को पकड़कर उससे पूछा "तैयार हो गया क्या, बेटा..?"

संजय-शीला के रूम की बालकनी से समंदर का किनारा नजर आ रहा था.. वोड्का का हल्का नशा दोनों के जिस्मों को गरम कर रहा था..

संजय: "तुम्हारा हाथ पड़े और ये तैयार न हो ऐसा कभी हो सकता है क्या!!" शीला की मांसल जांघों पर हाथ फेरते हुए उसने उसकी गर्दन को काट लीया "अगर तुम मेरी सास न होती तो तो मैं तुम्हें भगाकर ले जाता.. तुम्हारे जैसा गदराया माल मैंने आज तक नही देखा.. एक दो बार चोद कर मन नही भरेगा मेरा.. दिल करता है की एक हफ्ते तक तुम्हें बिस्तर पर लेकर पड़ा रहूँ तब जाकर मेरे लंड को तसल्ली मिलेगी" कहते हुए संजय ने शीला के दोनों बबलों को रगड़ दिया

शीला: "चार्ली के साथ अनुभव कैसा रहा?"

संजय: " अरे गजब का अनुभव था.. साली इतना कडक माल थी.. मेरा तो जी करता है की आज की पूरी रात अगर उन दोनों के साथ बिताने का मौका मिलता तो मज़ा आ जाता.. सच सच बताना..तुम्हें भी जॉन के गोरे लंड की याद आ रही है ना ??"

शीला: "हाँ बेटा.. जॉन के लंड को याद करते हुए अभी भी मेरे दो पैरों के बीच की परी‍♀️ पागल हो जाती है.. एक बात तो है बेटा.. चुदाई के लिए जब कोई नया साथी मिले तब मज़ा और उत्तेजना दोनों दोगुने हो जाते है.. इसका क्या कारण होगा?"

संजय: "तुम्हारी बात बिल्कुल सही है.. नए साथी के संग चुदाई करने का मज़ा ही कुछ अलग होता है.. चार्ली के छेद में घुसाने का बड़ा मज़ा आया मुझे.. साली फिर से मिल जाएँ तो जीवन सार्थक हो जाए मेरा.. "

शीला संजय के लंड को पकड़कर खींचते हुए बोली "संजय, जॉन और चार्ली को बुला कर ला.. होटल तो उनका नजदीक ही है.. वो लोग वहीं होंगे.. फिर से हम चारों मिलकर चुदाई करते है"

संजय: "अभी तो मैं तुम्हें मन भरकर चोदना चाहता हूँ.. घर लौटने के बाद तो वापिस तुम्हें "आप" कहना पड़ेगा.. इतनी आसानी से तुम मिलोगी भी नही मुझे.. प्लीज.. अब और कोई हम दोनों के बीच नही आएगा.. जो भी करना है हम दोनों ही करेंगे.. " संजय ने शीला को बेड पर लैटा दिया.. बगल में पड़ा वोड्का का खाली ग्लास गिर गया.. जो गिने चुने कपड़े उन दोनों ने पहन रखे थे वो उतार दिए..

संजय के फुँकारते नाग जैसे लंड को शीला ने बड़े ही प्यार से हाथ में पकड़कर चूम लिया "घर लौटने के बाद इसकी बहोत याद आएगी मुझे.. मैंने कभी सपने भी नही सोचा था की अपने दामाद के साथ करने का मौका मिलेगा मुझे.. औरतों को पटाने में तू मास्टर है.. सच सच बता.. चेतना को कितनी बार चोदा है तूने? "शीला का दिमाग पुरानी बातें भुला नही था

शीला की बात सुनकर संजय चोंक पड़ा..

"कौन चेतना, मम्मी जी?"

"भोसड़ी के.. ज्यादा शाणा मत बन.. वही चेतना.. जिसने तुझे उस दिन शाम को पाँच बजे अपने घर बुलाने का मेसेज भेजा था.. मेरे साथ चालाकी मत कर संजय, और सब सच बता दे.. वैसे चेतना ने तो मुझे सब बता ही दिया है.. " संजय के पास अपना बचाव करने के लिए कुछ भी नही बचा था.. मन ही मन वो चेतना को गालियां दे रहा था.. हरामखोर ने शीला को सब बता दिया!!! इन औरतों के पेट में एक बात नही टिकती.. कितना भी समझाओ, वक्त आने पर तोते की तरह बोलने लगती है..

अब शीला के शरण में आए बगैर संजय के पास ओर कोई चारा नही था.. सरेंडर होकर उसने सारी बातें कुबूल कर ली.. उसकी सारे बातें सुनते हुए शीला संजय का लंड सहला रही थी

शीला: "संजु बेटा.. तू कहीं भी मुंह मार.. कितने भी मजे कर.. मुझे कोई आपत्ति नही है.. पर तू मेरी बेटी वैशाली को दुख देगा तो वो मैं नही सहूँगी.. मैं क्या कोई भी माँ ये बर्दाश्त नही करेगी.. अब तू मुझे बता.. वैशाली के साथ आगे की ज़िंदगी बिताने का क्या प्लान है तेरा? मैंने सुना है की प्रमिला के साथ साथ किसी रोजी नाम की लड़की के साथ भी तेरा चक्कर है !! तू उसके साथ दिन रात गेस्टहाउस में पड़ा रहेगा तो मेरी वैशाली का क्या होगा??? अगर वो कहीं किसी ओर की तरफ मुड़ गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे तुझे"

संजय सुनते सुनते हौले हौले शीला के स्तनों को मसल रहा था.. वोड्का के हल्के नशे में वह बोला: "मम्मी जी, वैशाली काफी टाइम से मुझे चोदने नही देती.. जब पत्नी ही आपकी इच्छाओं को पूरा ना करे तो पति आखिर क्या करेगा!! मेरे इस लंड को लेकर में कहाँ जाऊ?? आप ही बताइए.. मुझे दिन में कम से कम एक बार तो सेक्स चाहिए ही चाहिए.. जब तक एक बार वीर्य छूट न जाएँ मुझे नींद ही नही आती.. मैं थोड़ा ज्यादा ही एक्टिव हूँ इस बारे में.. ये तुम भी जान गई हो.. वैशाली मुझे जरा सा भी सहयोग नही देती.. मैं उसके स्तन दबाने जाता हूँ तो बोलती है - मुझसे तो ज्यादा रोजी के बड़े है.. जा उसके जाकर दबा - अब तुम ही बताओ.. ये सब बोलकर वो क्या साबित करना चाहती है.. अरे तुम नही दबाने देती तभी तो मुझे रोजी के पास जाना पड़ा.. इसलिए फिर मैंने भी उस पर ध्यान देना छोड़ ही दिया.. "

संजय ने अपना दुखड़ा तो सुना दिया पर ये नही बताया की वह कुछ काम धंधा नही करता और पूरे दिन चोदने की फिराक में ही रहता है इसलिए वैशाली उसे सहयोग नही देती.. शीला का मन तो किया की वह उसे ये भी बताएं पर वह हर कदम फूँक फूँक कर रखना चाहती थी..

शीला: "संजु बेटा.. अगर मैं वैशाली को समझाकर मना लूँ.. तो क्या तुम रोजी को छोड़ दोगे?"

संजय: "मम्मी जी, रोजी को तो मैं अब छोड़ नही सकता!!"

शीला: "क्यों? कहीं तुम दोनों ने छुपकर शादी तो नही कर ली!!"

संजय: "नही मम्मी जी.. बात दरअसल यह है की.. मैंने रोजी के पापा से ४ लाख रुपये ब्याज पर लिए है.. जब तक वो पैसे न लौटा दूँ मैं रोजी को नही छोड़ सकता.. !!"

शीला: "अच्छा?? मतलब ४ लाख के ब्याज के बदले वो तुझसे चुदवा रही है.. पर बेटा तू ये भी तो सोच.. तू रोजी को बाहों में भरकर दिन रात चोदता-चाटता रहेगा तो पैसे कैसे लौटाएगा? पैसे कमाने के लिए बिस्तर से उठकर कोई काम धंधा भी करना पड़ेगा ना.. !!"

संजय: "मम्मी जी, मैं बस इसी जुगाड़ में हूँ.. इसीलिए तो पंद्रह दिनों से यहाँ पड़ा हुआ हूँ.. "

शीला: "यहाँ आने के बाद तूने काम कम किया और चुदाई ज्यादा की है.. ये बहानेबाजी बहोत हुई.. कुछ ढंग का काम करना शुरू कर नही तो तेरे वैवाहिक जीवन को बर्बाद होने से कोई नही बचा पाएगा.. और वहाँ कलकत्ता में बैठकर कुछ नही होने वाला तेरा.. वहाँ तेरे लफंगे दोस्तों की संगत में तू कुछ नही कर पाएगा.. इससे अच्छा यही होगा की तुम लोग यहीं शिफ्ट हो जाओ"

संजय: "शिफ्ट तो मैं अभी हो जाऊँ.. पर फिर मेरे माँ-बाप का ध्यान कौन रखेगा!! इस बुढ़ापे में मैं उन्हे अकेला नही छोड़ सकता"

संजय की गोद में ठीक से बैठते हुए उसके लंड को अपनी चूत के सुराख पर सेट कर दिया.. कडक लोड़े को गरम चिपचिपा छेद मिलते ही वो लपक कर अंदर घुस गया.. जैसे सांप अपने बिल में घुस जाता है.. पूरा लंड हजम करने के बाद शीला अपनी गांड हिलाते और रगड़ते हुए बात को आगे बढ़ाने लगी


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"ये बात तो तेरी सही है बेटा.. लेकिन अगर उनकी इतनी चिंता है तो उन्हे भी यहाँ साथ ले आ.. हम सब मिलकर तेरे और वैशाली के लीये कुछ सोचेंगे और तुम्हारी ज़िंदगी को वापिस पटरी पर लाने की कोशिश करेंगे.. माँ-बाप की चिंता होना स्वाभाविक है.. पर क्या तूने कभी ये सोचा है की इस उम्र में तेरी इस आवारागर्दी के चलते उन्हे तुम्हारी कितनी फिक्र हो रही होगी?? पंद्रह दिनों से तुम और वैशाली यहाँ हो.. तो उनका ध्यान कौन रख रहा होगा? तू महीनों तक बाहर घूमता रहता है.. घर पर फूटी कौड़ी तक नही देता.. तो तेरी सारी कमाई जाती कहाँ है? और ऐसा तू क्या करता है जो लोगों से ब्याज पर उधार पैसे लेने की जरूरत पड़ती है??"

शीला की सीधी बात सुनकर संजय चुप हो गया.. फिलहाल जिस स्थिति में वह दोनों थे.. वह ऐसी गंभीर चर्चा के लिए अनुकूल नही थी.. लेकिन शीला की बात का न जाने क्या असर हुआ संजय पर.. उसने अपना लंड शीला के भोसड़े के बाहर निकाला और शीला को खड़ी करते हुए खुद भी खड़ा हो गया.. अपने कपड़े पहन कर वह बोला "मैं थोड़ी देर में आता हूँ, मम्मी जी" और निकल गया

रात को नौ बज चुके थे.. शीला को बड़ी जोर की भूख लगी थी.. वोड्का का नशा भी काफी चढ़ चुका था.. शीला ने खड़े होने का प्रयास किया लेकिन उसके कदम नशे के कारण डगमगा रहे थे.. वो सोच में पड़ गई.. कहाँ गया होगा संजय? कहीं उसे मेरी बातों का बुरा तो नही लगा होगा? नाराज होकर अगर वो मुझे यहीं छोड़कर चला गया तो मैं वापिस कैसे लौटूँगी? मदन को लौटने में अब ज्यादा दिन नही बचे थे.. उसके आने के बाद संजय कुछ हंगामा न कर दे.. बाप रे.. मैं क्यों इस संजय के साथ इतने दूर चली आई? शीला मन ही मन कांप उठी..

कुछ भी करके संजय को मनाना पड़ेगा.. एक बार घर पहुँच कर भी तो ये सारी बातें की जा सकती थी.. !!

शीला ने खड़ी होकर.. संजय ने दिलाया था वह छोटा सा टॉप पहन लिया.. बिना पेन्टी के उसने वह छोटी सी शॉर्ट्स भी पहन ली..


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वो कमरे से बाहर निकली और सीढ़ियाँ उतरते हुए उसने देखा की संजय ड्राइवर के साथ कुछ बात करके निकल गया..

बहकती चाल से चलते हुए वह गाड़ी तक आई.. बिना ब्रा के उछल रहे उसके स्तनों को लॉबी में खड़े सारे मर्द देख रहे थे.. शीला ड्राइवर के पास आई

शीला: "क्या नाम है तुम्हारा? और कहाँ गए तुम्हारे साहब? "

ड्राइवर: "जी, मेरा नाम हाफ़िज़ है.. और संजय साहब अभी आ रहें है.. जब तक वो न लौटे तब तक आपका खयाल रखने को कहा है मुझे.. मैडम आप अभी नशे में है.. लोग देख रहे है.. चलिए मैं आपको आपके कमरे तक पहुंचा दु.. " शीला को कंधे से सहारा देते हुए हाफ़िज़ उसे कमरे तक जाने में मदद करने लगा.. "आपका कमरा कहाँ है मैडम?"

नशे की हालत में शीला ने कहा "ऊपर के माले पर कोने वाला कमरा है" उसके कदम लड़खड़ा रहे थे.. वह हाफ़िज़ के जिस्म पर लगभग लटक ही रही थी..

कमरा खोलकर हाफ़िज़ ने शीला को सहारा देते हुए बेड पर लैटाया.. शीला को छोटा सा टॉप ऊपर चढ़ गया था.. और स्तनों का निचला हिस्सा टॉप के बाहर झलक रहा था.. शीला की छोटी सी शॉर्ट्स इतनी तंग थी की उसकी दोनों जांघें ऊपर तक खुली हुई थी.. हाफ़िज़ बस उसे देखता ही रहा
 
कमरा खोलकर हाफ़िज़ ने शीला को सहारा देते हुए बेड पर लैटाया.. शीला को छोटा सा टॉप ऊपर चढ़ गया था.. और स्तनों का निचला हिस्सा टॉप के बाहर झलक रहा था.. शीला की छोटी सी शॉर्ट्स इतनी तंग थी की उसकी दोनों जांघें ऊपर तक खुली हुई थी.. हाफ़िज़ बस उसे देखता ही रहा

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हाफ़िज़ ने अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा "क्या गदराया जिस्म है आपका मैडम.. !! आपको ऐसे देखकर मेरा भी मन कर रहा है.. संजय साहब के आने से पहले मुझे भी चांस दीजिए.. " कहते हुए हाफ़िज ने शीला के टॉप के नीचे से हाथ डालकर दोनों स्तनों को दबाकर मसल दिया..

"एयय.. छोड़ मुझे.. रासकल.. छोड़.. साले तेरी औकात ही क्या है मुझे हाथ लगाने की.. !!" शराब का नशा अब शीला के सर चढ़कर बोलने लगा था.. लहराती आवाज में उसने बोलकर हाफ़िज़ के हाथों से खुदको छुड़ाते हुए शीला ने कहा "जा.. जाकर अपनी माँ के दबा.. "

सुनकर हाफ़िज़ गुस्से से तिलमिलाने लगा.. शीला के ऊपर वो सवार हो गया और बोला "भेनचोद.. मेरी औकात की बात करती है.. अभी तुझे दिखाता हूँ मेरी औकात.. तेरी माँ को चोदू, हरामजादी.. अपने दामाद का लोडा गाड़ी में चूसते वक्त तुझे तेरी औकात याद नही आई थी क्या.. साली रांड!!" कहते हुए गुस्से से उसने अपने दोनों हाथों से शीला का टॉप फाड़ दिया.. शीला के गोरे गोरे स्तन खुले हो गए..

हाफ़िज़ शीला के ऊपर अपना सारा वज़न डालकर चढ़ गया और उसके होंठों को चाटने लगा.. शीला छूटने के लिए छटपटाने लगी.. पर हाफ़िज़ की मजबूत पकड़ के आगे वो लाचार थी.. ऊपर से वो नशे में भी थी.. शीला चिल्लाने लगी.. हाफ़िज़ ने उसके गाल पर दो कडक तमाचे रसीद करते हुए उसे चुप करा दिया..

"साली रंडी.. अगर फिर से चिल्लाई तो तेरे घरवालों को सब बता दूंगा..घर तो तेरा मैंने देख ही रखा है.. किसी को मुंह दिखाने के लायक नही छोड़ूँगा तुझे.. याद रखना.. अब चुपचाप मुझे जो करना है वो कर लेने दे.. समझी!!" सुनकर शीला की गांड ही फट गई.. अपने हथियार डालकर उसने आँखें बंद कर ली.. और अपने बदन को ढीला छोड़ दिया..

हाफ़िज़ ने शीला की चड्डी उतारकर उसकी चूत पर हाथ फेरते हुए कहा "साली.. बहोत गरम चीज है तू" कहते हुए हाफ़िज़ ने अपने पेंट की चैन खोल दी.. आँखें बंद कर पड़ी हुई शीला ने चैन खुलने की आवाज सुनी.. अनजाने में ही उससे आँखें खुल गई.. पेंट उतार रहे हाफ़िज़ के लंड को देखने की लालच वह रोक नही पाई.. पेंट उतरते ही उसने देखा की हाफ़िज़ के अंडरवेर में इतना बड़ा उभार था.. डंडे जैसा !!! वह फुला हुआ हिस्सा देखककर शीला मन ही मन हिल गई..

अपने लंड वाला हिस्सा शीला के करीब ले जाकर बोला "ले मादरचोद.. निकाल बाहर अपने बाप का लंड.. और देख.. की यह तेरे भोसड़े के परखच्चे उड़ाने के काबिल है भी या नही.. !!" शीला ने अब विरोध करना छोड़ ही दिया था.. हाफ़िज़ की धमकी सुनने के बाद उस में हिम्मत ही नही बची थी.. कहीं ये कमीना आकर मदन को सब कुछ बता देगा तो क्या हाल होगा!!!

चुपचाप शीला ने हाफ़िज़ के अंडरवेर में बने उभार पर हाथ रख दिया.. "तुरंत बाहर मत निकाल ईसे मेरी जान.. पहले थोड़ा हाथों से सहला.. ताकि ये और भी सख्त हो जाए.. फिर बाहर निकालना.. समझ गई!!" शीला की निप्पलों को खींचते हुए हाफ़िज़ ने कहा "कसम से.. गजब का माल है तू.. " शीला की नाभि के अंदर उंगली करने के बाद उसने झुककर उसके भोसड़े में तीन उँगलियाँ एक साथ डाल दी.. और शीला की काँखों को चाटने लगा..


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४४० वॉल्ट का करंट लगा शीला को.. हाफ़िज़ उसकी काँख को ऐसे चाट रहा था जैसे चूत चाट रहा हो.. उत्तेजित होकर भारी सांसें लेते हुए उसने हाफ़िज़ के लंड को अंडरवेर के ऊपर से ही दबाया..

शीला के मन में ही संवाद चलने लगा.. "तू क्या कर रही है उसका पता भी है तुझे?? "लेकिन वोड्का का नशा और चूत की खुजली.. दोनों ने मिलकर शीला के होश छीन लिए थे.. इच्छा न होने के बावजूद वह हाफ़िज़ के लंड को बाहर से ही सहलाते हुए सिसक रही थी.. जांघिये के अंदर लंड ने तंबू बना दिया था.. उसे उतारकर शीला ने लंड बाहर खींचा.. स्प्रिंग की तरह उछल कर बाहर निकला हाफ़िज़ का लोडा.. एकदम काला.. ब्लेक कोब्रा जैसा.. और इतना मोटा.. शीला को जीवा के लंड की याद आ गई.. हाफ़िज़ ने अपना झूलता हुआ लंड शीला के मुंह के आगे रख दिया.. शीला ने एक आखिरी बार शर्माने का नाटक किया.. और अपनी नजरें फेर ली..

हाफ़िज़ ने खींचकर एक तमाचा लगा दिया शीला के गाल पर.. और उसे धमकाते हुए कहा "मादरचोद.. नजर क्यों फेर ली? टाइम खराब मत कर.. पकड़ ईसे और मुंह में ले चल.. जैसे अपना दामाद का लिया था.. " हाफ़िज़ के मुंह से गालियां सुनकर.. पता नही क्यों पर शीला को अच्छा लगा.. उसकी चूत ने रस की एक धारा छोड़ दी.. हाफ़िज़ नीचे झुककर शीला के गुब्बारों को चूसने लगा..

शीला हाफ़िज़ के विकराल लंड को हाथ में लेकर खेलने लगी.. उसके शरीर में वासना का भूत नाचने लगा.. उसके भोसड़े ने कडक लंड की गंध परख ली थी.. और वो बेसब्र हो रहा था.. हाफ़िज़ ने शीला की काँखों के बीच लंड को दो बार अंदर बाहर किया... गदराई काँखों में लंड घुसते ही उत्तेजना से हाफ़िज़ का थोड़ा सा वीर्य छूट गया और शीला के बबलों पर जा गिरा


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"साली रंडी.. तेरी बगल भी भोसड़े जैसी गरम है.. क्या बात है.. कहाँ से सीखा ये सब.. जरा मुझे भी बता.. !!" शीला ने जवाब नही दिया.. वह उसके आँड़ों को सहलाती रही.. शीला की काँख से लंड निकालकर वापिस अंदर डाला हाफ़िज़ ने.. और उसकी काँख को ही चोदने लगा.. हाफ़िज़ की इस हरकत ने शीला को पागल कर दिया.. अपनी काँख से लंड निकालकर उसने मुंह में ले लिया.. और अपनी लार से गीला करते हुए चूसने लगी.. मुंह के अंदर उसने लंड पर इतना दबाव बनाया की उसे डर लगने लगा की कहीं हाफ़िज़ उसके मुंह में ही वीर्यस्त्राव न कर बैठे.. !!

हाफ़िज़ जोर से चिल्लाया "अरे मादरचोद.. खा जाएगी क्या मेरा लंड?? छोड़ दे भेनचोद.. तेरे बाप का पानी छूट जाएगा" शीला के मुंह से हाफ़िज़ ने लंड बाहर खींच लिया..


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शराब के नशे में शीला ने कहा "साले.. चूसने दे ना.. क्यों मेरा मज़ा खराब कर रहा है? पानी गिरता तो मेरे मुंह में गिरता उसमें तेरे बाप का क्या जा रहा था.. भोसड़ी के चूतिये!!" हाफ़िज़ अब शीला के स्तनों पर अपने लंड से थपकियाँ लगाने लगा.. सख्त लंड की थपकियों से शीला को दर्द हो रहा था.. लंड की मोटाई देखकर शीला मन ही मन रघु और जीवा को याद कर रही थी.. घर जाने के बाद एक बार उन दोनों से चुदवाने का मन बना लिया उसने..


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हाफ़िज़: "शीला तेरी जवानी तो बड़ी ही कातिल है मेरी जान.. चल.. मेरा लंड अपनी चूत में लेने के लिए तैयार हो जा.. कुत्तिया बनाकर चोदूँगा.. चार पैर पर हो जा.. " कहते हुए उसने शीला की जांघ पर काट लिया..

शीला: "आह्ह साले.. क्या कर रहा है? भड़वे अपनी माँ को भी कुत्तिया बनाकर चोदता है क्या? और तमीज़ से बात कर.. मैं तेरी मालकिन हूँ.. कोई रंडी नही.. ड्राइवर है तू.. मेरा शोहर नही.. जो करने आया है वो कर और निकल यहाँ से.. ले डाल अपना लोडा.. और देख.. भूल कर भी पीछे के छेद में डालने की कोशिश मत करना.. वरना चिल्ला चिल्लाकर माँ चोद दूँगी तेरी.. समझा.. !!! आगे के छेद में जितना मर्जी डाल ले.. "

शीला घोड़ी बनकर हाफ़िज़ का लंड अपने भोसड़े में लेने के लिए तैयार हो गई.. उत्तेजना इतनी प्रबल थी की उसके दिलोदिमाग पर सुरूर सा छा गया था.. शराब से कई ज्यादा नशा सेक्स में होता है.. और शीला के सर पर फिलहाल दोनों नशे हावी हो चुके थे.. उसका शरीर वासना से तप रहा था..

लंड का सुपाड़ा अंदर जाते ही शीला ने कहा "जरा धीरे से हाफ़िज़.. दर्द हो रहा है.. " हाफ़िज़ का लंड कुछ ज्यादा ही मोटा था.. लेकिन शीला का भोसड़ा भी कुछ कम नही था.. दो दमदार धक्कों में ही हाफ़िज़ का लंड निगल लिया उस भोसड़े ने.. इतना मोटा था की शीला का पूरा भोसड़ा भर गया.. मज़ा आ गया शीला को.. खुजली से तिलमिलाती चूत में एक अजीब सी ठंडक मिली..


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हाफ़िज़ आनन-फानन में धक्के लगाने लगा.. शीला गांड उछाल उछाल कर चुदने लगी... इस युद्ध में कौन जीतेगा ये कहना बड़ा ही मुश्किल था..

"ओह्ह भेनचोद.. क्या लोडा है तेरा!! मज़ा आ गया.. चोद दे.. चोद दे अपनी मैया की चूत.. ठोक जोर से.. हाफ़िज़.. हाँ और जोर से.. लगा धक्के साले.. आह्ह आह्ह आह्ह अहह.. ऐसे ही.. यस्स.. क्या ताकत है तुझ में भोसड़ी के.. सच में असली मर्द है तू.. साले.. लगा दम.. दिखा अपना जोर.. कोई कसर मत छोड़ना.. अपने गधे जैसे लंड से फाड़ दे मेरा भोसड़ा..आह्ह.. !!" हाफ़िज़ के पसीने छूट गए.. शीला की कमर और कूल्हों पर तमाचे लगाते हुए वह लगातार धक्के लगा रहा था.. "आह्ह आह्ह ओह्ह ओह्ह" की आवाजों से पूरा कमरा गूंज उठा था.. शीला ने अपनी चूत की मांसपेशियों से कसकर पकड़ रखा था हाफ़िज़ का लंड.. उसके दोनों वर्टिकल होंठों के बीच फंस चुका था हाफ़िज़ का लंड.. धक्के खा खा कर लाल हो गई थी शीला की चूत..



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पूरे पंद्रह मिनट की भीषण चुदाई के बाद शीला का जबरदस्त ऑर्गजम हो गया.. हाफ़िज़ के जानदार लोड़े की वो कायल हो गई.. शीला के कूल्हों को थप्पड़ लगाते हुए हाफ़िज़ ने अपने लंड से पावरफूल पिचकारी दे मारी.. गरम गरम वीर्य की बौछार होते ही शीला का भोसड़ा तृप्त हो रहा था..

थककर हाफ़िज़ ने अपना लंड बाहर निकाला और बिस्तर पर लेट गया.. हाफ़िज़ की विशाल छाती पर शीला भी लाश की तरह ढेर हो गई.. उसके मदमस्त बॉल हाफ़िज़ की छाती से दबकर चपटे हो गए थे.. उसकी दाढ़ी पर अपने कोमल गालों को रगड़ते हुए शीला उसे चूमने लगी.. नशा उसका सर पर इस कदर सवार था की उसे यह भी एहसास नही हो रहा था की वो किसी मामूली से ड्राइवर से चुदकर लेटी हुई थी.. हाफ़िज़ के खुरदरे हाथ शीला की चिकनी गोरी पीठ को सहला रहे थे.. पीठ से होते हुए उसके हाथ शीला के कूल्हों तक जा पहुंचे.. और अपनी उंगली से वो शीला की गांड के छेद को कुरेदने लगा.. गांड पर स्पर्श होते ही शीला को संजय की याद आ गई.. कहाँ गया होगा वो चूतिया? मुझे यूं अकेले छोड़कर न गया होता तो मुझे इस कमबख्त हाफ़िज़ से चुदना न पड़ता.. खैर जो भी हुआ अच्छा ही हुआ.. मज़ा तो बहोत आया.. और संजय को कहाँ पता चलने वाला था की मैंने हाफ़िज़ से चुदवाया है!! लेकिन संजय के आने से पहले मुझे इस भड़वे को रवाना करना होगा.. वैसे भी ये मादरचोद गांड का मुआयना कर रहा है.. उसकी नियत बिगड़े उससे पहले ही इससे छुटकारा पाना होगा.. ये मेरी गांड में डालेगा तो यही गोवा में मेरी लाश गिर जाएगी..

शीला ने तुरंत हाफ़िज़ के गाल को थपथपाकर उसे जगाया "हाफ़िज़.. तू अब निकल.. तेरे साहब आ जाएंगे तो मुसीबत हो जाएगी.. और हाँ.. गलती से भी उन्हे मत बताना.. हमारे बीच जो कुछ भी हुआ उसके बारे में.. "

हाफ़िज़ ने शीला को अपनी बाहों की गिरफ्त से मुक्त किया.. "नही पता चलेगा.. फिकर मत कीजिए.. आप के साथ जो मज़ा आया न मैडम.. वो आज से पहले कभी नही आया.. यहाँ तक की मेरी बीवी के साथ भी इतना मज़ा नही लूटा था मैंने.. वो तो आप से उम्र में भी आधी है.. और उसकी चूत भी आपसे काफी टाइट है.. लेकिन पता नही क्यों आपकी चूत ने जिस तरह मेरा लंड को जकड़ा था.. वो उसकी चूत नही कर पाती.. और आपका सीना भी कितना गजब है.. ये बड़े बड़े है आपके.. मैं तो आज का दिन जिंदगी भर नही भूलूँगा.. दोबारा कभी मौका मिला तो करने दोगी ना.. !!"

"हाँ हाँ.. करने दूँगी.. मगर अब तू यहाँ से निकल मेरे बाप.. " हाफ़िज़ के मुरझाए लंड को प्यार से थपकी लगाते हुए शीला ने कहा

"अरे मैडम.. क्यों फिर से जगाती हो उसे? फिर से करना पड़ेगा !!" हाफ़िज़ ने शीला को अपनी बाहों में दबा लिया.. "ओह्ह आपके ये रसीले होंठ.. ये सेक्सी बदन.. भेनचोद जी करता है की एक बार फिर से पटक कर चोद दूँ"

शीला घबरा गई.. मैंने क्यों इस हरामी के लंड को छेड दिया.. !!! कहीं संजय आ टपका तो गजब हो जाएगा.. कैसे भगाऊ ईसे.. एक बार चोद लिया फिर भी मन नही भरा इस चूतिये का..

शीला: "देख हाफ़िज़.. मुझे भी तेरा तगड़ा लंड बहोत पसंद आया.. मेरे दामाद के लंड से भी बेहतर है तेरा.. मैं भी इससे बार बार चुदवाना चाहती हूँ.. एक बार से तो मेरा मन भी नही भरता.. मगर इस वक्त तू यहाँ से निकल जा.. घर जाने के बाद मैं तुझे बुलाऊँगी.. और तुझे अपनी मनमानी करने दूँगी.. ठीक है.. !!!" कहते हुए शीला ने उसे प्यार से चूमा और रवाना कर दिया

शीला का दिमाग अब कुछ शांत हुआ और विचार चलने लगे.. मैंने एक ड्राइवर के साथ!! शीला तो इतनी गिरी हुई कब से हो गई? कितनी संस्कारी थी तू और अब देखो? तभी उसकी नजर अपने टॉप पर पड़ी.. जो हाफिज ने खींचकर फाड़ दिया था.. बाप रे!! अब क्या करूँ?? साड़ी के अलावा और कोई कपड़े तो है नही.. संजय ये देखकर पूछेगा तो क्या जवाब दूँगी.. ??


तभी डोरबेल बजने की आवाज आई.. शीला ने जल्दी जल्दी बेग से काली नेट वाली ब्रा निकालकर पहन ली.. और नीचे संजय ने दिलाई शॉर्ट्स चढ़ा दी.. फिर दरवाजा खोला.. वो संजय ही था.. उसके हाथ में किंग एडवर्ड सिगार का पैकेट था.. देखते ही शीला खुश हो गई.. जॉन और चार्ली की याद आ गई उसे.. खासकर जॉन का गोरा लंड और गुलाबी सुपाड़ा.. !!

नशे में लहराती आवाज में शीला ने कहा "ये बड़ा अच्छा काम किया तूने बेटा.. ये सिगार मुझे बहोत पसंद आ गई है.. अब खाने का कुछ करें!!! जोरों की भूख लगी है मुझे.. "

"हाँ मम्मी जी.. चलिए बाहर जाकर कुछ खाते है.. यहाँ आने के बाद हम बाहर घूमे ही नही है !! कितने घंटों से हम बस कमरे में ही बंद बैठे है "

"कोई बात नही.. वैसे गोवा हो या गुवाहाटी.. बाजार सब जगह एक जैसा ही होता है.. हमे उन अंग्रेजों से मजे करने का मौका मिल गया वो क्या कम था!!"

"हाँ वो तो है मम्मी जी.. चार्ली की चूत का स्वाद अब भी मेरी जुबान पर है.. क्या चीज थी वो.. !! मम्मी जी उसकी गांड का छेद गुलाब जैसे कोमल और लाल था.. देखकर मन हो रहा था की बस उसे चाटता ही रहूँ.. " शॉर्ट्स के ऊपर से अपने लंड को दबाते हुए संजय ने कहा

शीला समझ गई की उसके दामाद का लंड भी भूखा था.. अगर उसे खिलाने गई तो वह भूखी रह जाएगी..

शीला: "संजय बेटा.. पहले बाहर जाकर खाना खा लेते है.. थोड़ी देर और रुके तो तेरे इसको शांत करने में और एक घंटा निकल जाएगा" हँसकर संजय के लंड की ओर इशारा करते हुए उसने कहा

दोनों आजाद पंछी की तरह हाथ में हाथ डालकर गोवा की गलियों में घूमने लगे.. देखकर किसी को भी अंदाजा न हो की दोनों सास-दामाद थे.. नव-विवाहित कपल की तरह दोनों एक दूसरे से लिपटे हुए चल रहे थे.. चलते चलते एक रेस्टोरेंट पसंद आई.. दोनों अंदर गए और खाना खाते वक्त एक दूसरे को छेड़ते रहे.. शीला अपनी काली ब्रा पहन कर ही बाहर आई थी.. रेस्टोरेंट में बैठे सारे लोग उसे घूर रहे थे.. सब के आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी शीला.. और स्वाभाविक भी था.. इतने बड़े बड़े गदराए स्तनों की मालकिन.. सिर्फ नेट वाली ब्रा पहन कर बाहर निकले तो लोगों की नजर पड़ना जायज थी.. शीला की निप्पल की आकृति भी ब्रा से साफ नजर आ रही थी..

दोनों खाना खाने में मगन थे तभी केमेरे की फ्लेश ने उन्हे चोंका दिया.. एक शख्स उनके बगल वाले टेबल पर बैठकर शीला की तस्वीरे ले रहा था

"अबे ओय.. क्या कर रहा है तू??" संजय उठ खड़ा हुआ..

उस आदमी ने अपनी जेब से आई-कार्ड निकालकर दिखाते हुए कहा "मैं जर्नलिस्ट हूँ सर.. गोवा को कवर करने आया हूँ.. आप फिकर मत कीजिए.. मैं तो फ्रंट पेज पर डालने के लिए किसी आकर्षक सुंदरी की तलाश में था.. आप लोग मुझे परफेक्ट कपल लगे इसलिए तस्वीर ले रहा हूँ.. फ्रंट पेज पर छपेगी.. आप फेमस हो जाओगे"

"अरे हमें नही आना तेरे फ्रंट पेज पर.. समझा.. !! चल डिलीट कर अभी के अभी.. " संजय ने उसे धमकाते हुए कहा.. मन ही मन वो और शीला दोनों डर गए थे.. शीला ने उसके हाथ से केमेरा छिन लिया.. उसे आता नही था फिर भी जो मन में आए वो स्विच दबाने लगी.. संजय से ज्यादा चिंता शीला को थी.. संजय को क्यों ज्यादा फिक्र होती.. नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या..!!! लेकिन शीला के लिए ये बड़ा खतरा था.. जब चारित्र की बात आती है तब लोग मर्द से ज्यादा औरत पर ही उंगली उठाते है.. इसी कारण से तो औरतें मर्दों जितनी बिंदास होकर मजे नही करती.. !!

संजय ने उस फोटोग्राफर का गिरहबान पकड़ लिया.. और उसे एक घुसा मारते हुए कहा "बिना इजाजत हमारी तस्वीर लेने की तेरी हिम्मत कैसे हुई बे, मादरचोद?? " संजय इतनी जोर से गाली बोला की मेनेजर दौड़ते हुए उनके पास आ गया..

मेनेजर: "ओ मिस्टर.. अपनी जबान पर लगाम दीजिए.. आप लोगों का जो भी झगड़ा है वो बाहर जाकर निपटाइए.. चलिए.. गेट आउट.. !! वरना मैं अभी पुलिस को फोन करके बुलाता हूँ.. !!"

बात को बिगड़ते देख शीला ने मेनेजर से सॉरी कहा.. अपनी पलकें झपकाकर इतने प्यार से उसने माफी मांगी की मेनेजर भी पिघल गया.. यही तो होता है चूत और स्तनों का प्रभाव.. !! शीला की ब्लेक नेट वाली ब्रा.. उभरते हुए स्तन.. नजर आ रही गुलाबी निप्पल.. गोरा पेट.. सुंदर चेहरा और ऊपर से वोड्का का नशा.. देखने वालों की नजर को एक पल में कैद कर देती थी शीला..

शीला: "देखिए मेनेजर साहब.. आदमी गुस्सा तभी करता है जब उसके साथ कुछ गलत होता है.. आप मेरे पार्टनर को क्यों धमका रहे हो? आप को उस आदमी को धमकाना चाहिए जो बिना इजाजत आपके कस्टमरों की तस्वीरें खींच रहा है.. " शीला के प्रभावशाली आवाज और अद्भुत सुंदरता से खींचकर वहाँ बैठे और मर्द भी इकट्ठा हो गए.. इस अबला नारी के बचाव के लिए.. कुछ तो बस शीला के स्तनों को नजदीक से देखने के लिए ही आए थे..

सब ने साथ में कहा "ऐसे कैसे बिना पर्मिशन के कोई तस्वीर ले सकता है?? और वो भी लेडिज की.. ये तो गलत है.. कम से कम पूछ तो लेना चाहिए था.." संजय कुछ बोलने गया पर शीला ने उसे इशारे से चुप रहने को कहा.. साले संजय तू चुप मर अभी.. एक गाली बक दी तो बीस लोग इकट्ठा हो गए.. और कुछ बोला और पुलिस आ गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे.. !! संजय ने सिगरेट जलाई और कोने में खड़े होकर फूंकने लगा.. और बीस लोगों के बीच खड़ी शीला.. ब्रा और छोटी सी शॉर्ट्स पहने अपने जिस्म की नुमाइश करते हुए इस समस्या का समाधान लाने की कोशिश कर रही थी.. किसी भी हाल में वो ऐसा कोई सबूत छोड़ना नही चाहती थी.. आसपास खड़े लोगों के सहयोग से शीला ने केमेरे की सारी तस्वीरें डिलीट करवा दी.. तब जाके उसे तसल्ली हुई..

सारा मामला निपटाकर उसने आवाज देकर संजय को बुलाया.. फटाफट बिल देकर वो दोनों बाहर निकल गए.. और तेजी से चलते हुए अपने रूम पर पहुँच गए.. शीला काफी डर गई थी "संजय.. यहाँ रुकने में भी मुझे तो डर लग रहा है.. हमे अब गोवा छोड़ देना चाहिए.. इससे पहले की कोई ओर मुसीबत आ जाए.. तू चेकआउट करने की तैयारी कर.. "

"ठीक है मम्मी जी.. जैसा आप कहें.. हम चले जाएंगे.. लेकिन जाने से पहले एक जबरदस्त चुदाई तो बनती है " अपनी शॉर्ट्स की साइड से लंड बाहर निकालकर दिखाते हुए संजय ने कहा.. "ईसे आपके स्तनों के बीच रगड़ने की ख्वाहिश भी तो पूरी करनी है.. देखिए ये बेचारा कितना उदास है !!"
 
सारा मामला निपटाकर उसने आवाज देकर संजय को बुलाया.. फटाफट बिल देकर वो दोनों बाहर निकल गए.. और तेजी से चलते हुए अपने रूम पर पहुँच गए.. शीला काफी डर गई थी "संजय.. यहाँ रुकने में भी मुझे तो डर लग रहा है.. हमे अब गोवा छोड़ देना चाहिए.. इससे पहले की कोई ओर मुसीबत आ जाए.. तू चेकआउट करने की तैयारी कर.. "

"ठीक है मम्मी जी.. जैसा आप कहें.. हम चले जाएंगे.. लेकिन जाने से पहले एक जबरदस्त चुदाई तो बनती है " अपनी शॉर्ट्स की साइड से लंड बाहर निकालकर दिखाते हुए संजय ने कहा.. "ईसे आपके स्तनों के बीच रगड़ने की ख्वाहिश भी तो पूरी करनी है.. देखिए ये बेचारा कितना उदास है !!"


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अपने दामाद का नरम लंड पकड़ते हुए शीला ने कहा "बेटा.. बिना चुदे तो मैं भी जाना नही चाहती.. दिल भरकर तेरे धक्के खाने है.. मेरी चूत को तेरे लंड से पावन करने के बाद ही हम गोवा छोड़ेंगे.. !! अब देर मत कर.. और अपनी मम्मी जी की चूत चाटने की सेवा शुरू कर दे.. "

"आह्ह मम्मी जी.. आपकी तो बातें सुनकर ही मेरा लंड कहीं पिचकारी न छोड़ दे.. " कहते हुए संजय ने शीला को अपनी बाहों में भर लियाया.. छोटे बच्चे की तरह वो शीला के स्तन से चिपक गया.. और नेट वाली ब्रा से एक स्तन को बाहर निकालकर चूसने लगा..

"आह्ह बेटा.. मज़ा आ रहा है.. तेरी जीभ की गर्मी मेरी निप्पल से होते हुए पूरे शरीर में फैल रही है.. देख.. तेरा लंड भी सख्त होकर तैयार हो गया.. इतने सुंदर लंड से चुदने के लिए वैशाली क्यों राजी नही होती ये मुझे समझ में नही आता.. इसे खड़ा हुआ देखकर भी वो कोई रिस्पॉन्स नही देती?"

"रिस्पॉन्स देती है ना.. क्यों नही देती.. मेरे लंड को देखकर ही वो करवट बदल कर सो जाती है"

"पागल है मेरी बेटी.. " कहते हुए शीला घुटनों पर बैठ गई और संजय के गन्ने जैसे सख्त लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी.. शॉर्ट्स की साइड से लंड को चूसने में मज़ा नही आ रहा था.. इसलिए उसने खींचकर संजय की शॉर्ट्स जिस्म से अलग कर दी.. और अपनी ब्रा और चड्डी उतारकर फिर से एक बार स्खलित होने के लिए तैयार हो गई.. उसके चेहरे पर उत्तेजना साफ साफ छलक रही थी..


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दोनों नंगे होकर एक दूसरे को चूमने और चाटने में व्यस्त हो गए.. संजय ने शीला की चूत पर अपना हाथ जमा दिया और शीला ने संजय के लंड को गिरफ्त में ले लिया..

"मम्मी जी.. अब मुझे अपने दोनों स्तनों के बीच में लंड घुसेड़ने दो.. "

"हाँ हाँ.. घुसा दे.. मैंने कब मना किया तुझे!! आज ये आखिरी चुदाई होगी हमारी.. जो मन करे तेरा.. वो कर ले.. मैं कुछ नही बोलूँगी"

"मम्मी जी.. आपके मन में भी ऐसी कोई विकृत इच्छा हो तो बता दीजिए... गोवा की ट्रिप यादगार बनानी है हमें.. !!"


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वैशाली और राजेश सर माउंट आबू में.. रेणुका की बर्थडे पार्टी में बियर की चुसकियाँ लेते हुए सिगरेट पर सिगरेट फूँक रहे थे.. राजेश के स्वभाव और पर्सनैलिटी से वैशाली बेहद आकर्षित हो गई थी.. उसने शारीरिक संबंधों के लिए पहले ही मना कर दिया था पर फिर भी राजेश ने बुरा नही माना था.. वैशाली को ये बात बहोत अच्छी लगी राजेश की..

लगभग ग्यारह बज रहे थे.. हर कोई नशे में चूर होकर ट्रिप के मजे ले रहा था.. वैशाली की आँखें भी बियर के नशे में सुरूर से भर रही थी.. इतनी बियर पीने के बाद उसे बड़ी जोर से पेशाब लगी थी.. आखिर जब बात बर्दाश्त से पार हो गई तब वह उठी और राजेश से कहा "एक्स्क्यूज़ मी.. मुझे जाना होगा.. फ्रेश होकर आती हूँ.. आप मेरा वैट करना.. "

"जाना तो मुझे भी है.. चलो मैं भी साथ चलता हूँ.. कहीं तुम्हारे कदम लड़खड़ा गए तो कोई तो चाहिए सहारा देने वाला.. " राजेश ने कहा.. वैशाली शरमा गई.. और नीचे देखने लगी..

"अरे घबराइए नही.. मैं तो जेन्ट्स टॉइलेट में ही जाऊंगा.. तुम्हारे साथ थोड़े ही आने वाला हूँ" हँसते हँसते राजेश ने कहा

"वो तो मुझे भी पता है सर की आप मेरे साथ टॉइलेट में नही आओगे.. चलिए चलते है" वैशाली आगे चाय और राजेश उसके पीछे पीछे.. वैशाली की मटकती गांड को देखकर राजेश की नियत में खोट आने लगी थी.. राजेश की नशीली आँखों में वैशाली की गांड का नशा अलग से जुड़ गया..

पेसेज के आखिर में लेडिज और जेन्ट्स के टॉइलेट अगल बगल में ही थे.. चलते चलते वैशाली के कदम डगमगा गए.. और उसे संभालने के चक्कर में राजेश भी लड़खड़ा गया.. एक दूसरे को संभालते हुए दोनों दीवार का सहारा लेकर खड़े हो गए.. वैशाली के स्तन एक पल के लिए राजेश के हाथों से दब गए.. दोनों एक दूसरे को सॉरी कहने लगे.. और हंस पड़े..

टॉइलेट के पेसेज में दोनों अकेले थे.. हल्की सी रोशनी थी..

"वैशाली, यू आर सो हॉट.. प्लीज एलाऊ मी टू टच योर बूब्स.. सिर्फ एक बार.. मेरी रीक्वेस्ट है.. प्लीज"

"नही सर.. आई कांट डू धिस.. सॉरी.. " वैशाली ने नशे की हालत में भी अपना संयम नही छोड़ा था.. वह दरवाजा खोलकर लेडिज टॉइलेट में घुस गई.. राजेश भी जेन्ट्स टॉइलेट में चला गया.. वह पेशाब करके बाहर निकला और लेडिज टॉइलेट के दरवाजे के बाहर वैशाली का इंतज़ार करने लगा.. तभी लेडिज टॉइलेट का दरवाजा खुला.. एक हाथ बाहर आया और उसने राजेश को अंदर खींच लिया.. एक सेकंड में ही ये सब हो गया..

राजेश कुछ समझ या सोच सके उससे पहले ही वैशाली ने उसे चूम लिया.. उसके मदमस्त उरोज राजेश की छाती से रगड़ रहे थे.. वैशाली इतनी उत्तेजित हो गई थी की राजेश कुछ करे उससे पहले ही उसने हाथ नीचे डालकर उसका लंड पकड़ लिया और धीमे से कान में बोली

"कुछ मत बोलीये.. किसी को पता नही चलना चाहिए की इस क्यूबिकल में हम दोनों है.. एकदम शांत रहिए" वैशाली ने अपना टीशर्ट ऊपर कर दिया और अपने दोनों खिलौने राजेश को खेलने के लिए दे दिए.. मर्द का हाथ उसके स्तनों को स्पर्शते ही वैशाली के चेहरे पर खुमार छाने लगा.. बियर का नशा अपना काम कर रहा था और राजेश का हाथ भी..


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राजेश का हाथ वैशाली की गीली पुच्ची तक कब पहुँच गया इसका दोनों को पता ही नही चला.. टॉइलेट की संकरी जगह में वैशाली और राजेश सर दोनों को तकलीफ हो रही थी.. पर दोनों इतने उत्तेजित थे.. जैसे एक दूसरे के जिस्मों को नोच खाना चाहते हो.. राजेश को कब से ललचा रहे वैशाली के बड़े बड़े तंदुरुस्त उरोज.. राजेश ने दोनों हाथों से पकड़कर अनगिनत बार चूम, चाट और काट लिए.. वैशाली को दर्द हो रहा था फिर भी वह चुप थी क्यों की जरा सी भी आवाज उनका भांडा फोड़ सकती थी.. दोनों फटाफट अपनी वासना को तृप्त करने की फिराक में एक छोटा पर रसीला प्रोग्राम कर देना चाहते थे.. जल्द से जल्द हॉल में पहुँचना भी जरूरी थी.. वरना लोगों को शक होने की गुंजाइश थी..

वैशाली ने तुरंत ही अपनी पेन्टी को घुटनों तक सरकाते हुए स्कर्ट ऊपर चढ़ा दिया और फिर उलटी होकर बोली "प्लीज सर.. जल्दी कीजिए.. डाल दीजिए फटाफट" हल्की रोशनी में जगमगाते हुए वैशाली के चरबीदार कूल्हों पर थपकी लगाते हुए राजेश ने उन नितंबों को चौड़ा किया..

"सर वक्त बहोत कम है.. वो सब आराम से बाद में देख लेना.. " उत्तेजनावश अपनी गांड को गोल गोल घुमाते हुए राजेश को आमंत्रित कर रही थी.. राजेश ने वैशाली की कमर को पकड़ा और अपने कड़े लंड को दोनों कूल्हों के बीच में लगाया..

"ईशशश.. सर.. वहाँ नही.. थोड़ा सा नीचे" अपने गांड के छेद पर राजेश के लंड के सुपाड़े का स्पर्श होते ही वैशाली ने सहम गई

"अरे यार.. इतना अंधेरा है.. कुछ दिखना भी तो चाहिए.. " राजेश ने परेशान होते हुए कहा

"सर, आप एक बार जीभ से चाटिए ना.. मुझे बिना चटवाए मज़ा ही नही आता" वैशाली की विनती को सन्मान देते हुए राजेश झुककर नीचे बैठ गया और उसके दोनों चूतड़ों को फैलाकर पहेले गांड और फिर चूत को चाटने लगा.. वैशाली उत्तेजित होकर गांड उछालने लगी.. राजेश तुरंत खड़ा हो गया और वैशाली की चूत में एक धक्के में ही अपना पूरा लंड डाल दिया.. वैशाली सिसकने लगी.. राजेश ने धीरे धीरे धक्के लगाना शुरू किया और फिर स्पीड पकड़ ली..


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वैशाली के कूल्हों से राजेश की जांघों के टकराने की वजह से आवाज आ रही थी.. जब वो आवाज काफी ऊंची हो गई तब दोनों ने घबराकर गति धीमे कर दी.. और फिर से अपनी लय प्राप्त कर ली.. डरते डरते सेक्स करने का मज़ा ही अलग होता है.. करीब दो मिनट तक ऐसे ही धक्के लगाने के बाद राजेश ने अपने सख्त लंड से आखिर के तीन चार धक्के इतने जोर से लगाए की वैशाली की आँखों में पानी आ गया.. उसेके पेट में दर्द होने लगा.. और साथ ही साथ उसकी चूत भी ठंडी हो गई.. राजेश ने भी चूत को अपने वीर्य से सराबोर कर दिया..

अंधेरे माहोल की इस चुदाई के बाद वैशाली घूम गई और राजेश के लंड के प्रति आभार प्रकट करते हुए उसे झुककर चूमने लगी.. राजेश ने उसे बाहों में भर लिया और उसके होंठों को चूम लिया.. राजेश के लंड से खेलते हुए वैशाली ने एकदम धीमी आवाज में उसके कान में कहा "ये रात मुझे ज़िंदगी भर याद रहेगी.. आशा है की आपको भी मज़ा आया होगा.. अगर किस्मत रही तो फिर मिलेंगे.. मैं आपके साथ शांति से समय बिताना चाहती हूँ.. आपका स्वभाव मुझे बहोत पसंद आया.. आशा है की आप मेरी मित्रता का स्वीकार करेंगे.. हमारा शरीर संबंध तो बड़ा ही अनोखा रहा.. लेकिन लौटने के बाद क्या मैं आप से बिना किसी जिस्मानी संबंधों की मित्रता की अपेक्षा रख सकती हूँ ?"

राजेश वैशाली के सुंदर स्तनों को अपने दोनों हाथों से दबाते हुए बोला "वैशाली, हम बड़े अच्छे मित्र बनेंगे.. शरीर का संबंध बने या न बने.. उससे मुझे फरक नही पड़ता.. पर तेरे ये सुंदर स्तनों ने मुझे आज पागल ही कर दिया.. इन्हे दबाने की आशा तो मैं हमेशा रखूँगा ही.. लेकिन ये वादा है मेरा.. की जो भी होगा वो तुम्हारी इच्छा और स्वीकृति से ही होगा.. एक विनती करना चाहूँगा.. तुम्हें कभी भी फिर से ये दोहराने की इच्छा हो तो बेझिझक मेरे पास चली आना.. तुम्हारे जिस्म को पाने के लिए मैं हमेशा बेताब रहूँगा.. और कुछ पाए या न हो पाएं.. एक हल्की सी किस.. थोड़ा सा स्पर्श.. इतना भी मेरे लिए काफी होगा !!"

"ठीक है सर" हँसते हुए वैशाली ने राजेश के होंठों को चूम लिया.. "सर, पहले मैं बाहर देख लूँ.. पेसेज में कोई है तो नही.. मैं इशारा करूँ उसके बाद ही आप निकलना " राजेश अब भी वैशाली के स्तनों को छोड़ नही रहा था.. दबाए ही जा रहा था

"सर अब आप मुझे छोड़ेंगे तो मैं बाहर निकलूँ" वैशाली ने हसनते हुए कहा

"असल में तेरी ब्रेस्ट इतनी आकर्षक है की मुझसे रहा नही जाता.. अब तुमने बिना जिस्मानी संबंधों वाली मित्रता की बात की है.. तो मैं ये सोच रहा हूँ की इन स्तनों दोबारा न जाने कब देखने को मिले.. " राजेश ने कहा

"हम्म.. ओके सर.. ये लीजिए मेरी तरफ से माउंट आबू की ये आखिरी भेंट" कहते हुए उसने राजेश का चेहरा पकड़कर अपने स्तनों पर दबा दिया और उसके लंड को पकड़कर मसल दिया.. फिर वैशाली ने अपने आप को राजेश की गिरफ्त से मुक्त किया और धीरे से दरवाजा खोला.. पेसेज में कोई नही था.. उसने हाथ पकड़कर राजेश को बाहर खींचा.. "सर आप पहले जाइए.. कोई पूछे तो कहना वैशाली टॉइलेट गई है"

"ओह वैशाली.. " कहते हुए राजेश ने एक बार फिर वैशाली के स्तनों को वस्त्रों के ऊपर से ही पकड़कर दबा दिया और फिर न चाहते हुए भी मुड़कर चलने लगा.. वैशाली फिर से अंदर गई.. और नल से पानी लेकर अपनी चूत को धोने लगी.. राजेश के लंड का सारा वीर्य उसने ठीक से साफ किया.. साफ करते करते उसकी मुनिया फिर से चुनमुनाने लगी.. उंगली से क्लिटोरिस को रगड़कर फिर से उसे शांत किया.. अपने स्तनों को ठीक से ब्रा के अंदर दबा दिए.. और अपने बाल ठीक कर दस मिनट बाद बाहर निकली..

जैसे ही वो अपने क्यूबिकल से बाहर निकली.. थोड़े से दूर बने क्यूबिकल का दरवाजा खुला और उसमें से पीयूष बाहर निकला.. पीयूष की नजर वैशाली पर नही थी.. वो तुरंत दरवाजा खोलकर बाहर की ओर भागा.. लेडिज टॉइलेट में पीयूष???? जरूर कुछ खिचड़ी पक रही थी.. पीयूष अंदर किसी के साथ ही घुसा होगा.. साथ जो भी था.. हो सकता है की वो वैशाली के निकलने से पहले ही चला गया हो.. या फिर अभी भए क्यूबिकल के अंदर ही हो? पता करने का बस एक ही तरीका था.. वैशाली बेज़ीन के पीछे लगे बड़े पत्थर के पीछे छुपकर इंतज़ार करने लगी

थोड़ी ही देर में दरवाजा खुलने की आवाज आई.. वैशाली का दिल जोरों से धड़कने लगा.. कौन होगा? कविता? नही नही.. उन दोनों के बीच तो झगड़ा चल रहा है.. जरूर वो रांड मौसम होगी.. वही कब से मेरे और पीयूष के बीच हड्डी बनकर बैठी हुई है.. पीयूष भी कमीना अपनी साली के पीछे लट्टू होकर घूमता रहता है.. उसकी कच्ची कुंवारी चूत को एकबार चोदकर ही दम लेगा वो.. जैसी जिसकी किस्मत.. नुकसान तो कविता को ही होगा.. कविता भी बेवकूफ है.. उसे इतना भी पता नही चलता की जवान कुंवारी बहन को अपने रोमियो पति के साथ घूमने देना ही नही चाहिए उसे.. और मौसम भी एक नंबर की मादरचोद है.. अपने कच्चे बबले दिखा दिखा कर पीयूष को पागल बना देती है.. जैसे स्तन सिर्फ उसके पास ही है.. मेरे मुकाबले में मौसम के छोटे स्तनों की कोई औकात ही नही है..

वैशाली के दिमाग में ये सारे विचार चल रहे थे तभी पेसेज में किसी के आने की चहलकदमी सुनाई दी.. और वो जो भी थी वह फिर से क्यूबिकल के अंदर चली गई और अंदर से दरवाजा बंद कर दिया.. वैशाली के लिए ज्यादा देर तक छुपे रहना मुमकिन नही था.. क्यों की लेडिज टॉइलेट के दरवाजे से अंदर आते हुए वह साफ दिख रही थी..

वैशाली बाहर निकल गई और चलते हुए हॉल में आ पहुंची.. वह आकर राजेश सर के बाजू में बैठ गई.. पर यहाँ से उसे टॉइलेट वाला पेसेज नजर नही आ रहा था.. उसने राजेश से कहा "सर आपको एतराज न हो तो क्या आप मेरी कुर्सी पर आ सकते है.. यहाँ एसी की ठंडी हवा सीधे मेरे सर पर लग रही है"

"ओ स्योर.. " कहते हुए राजेश खड़ा होकर वैशाली की चैर पर बैठ गया और वैशाली राजेश की चैर पर.. अब यहाँ से पेसेज बिल्कुल साफ नजर आ रहा था.. वैशाली थोड़ी थोड़ी देर पर.. राजेश से बातें करते हुए.. नजरें चुराकर पेसेज की ओर देख लेती..

राजेश ने धीमे से वैशाली के कान में कहा "यार वैशाली.. तेरी तो बहोत टाइट थी.. मज़ा आ गया यार.. "

"थेंक यू सर" वैशाली ने शरमाते हुए नजरे झुका ली

वैशाली बेचैन नज़रों से पेसेज की ओर देख रही थी.. उसके यहाँ बैठने के बाद कोई अंदर गया भी नही था और बाहर आया भी नही था.. उसने पीयूष की ओर देखा.. वो तो आराम से म्यूज़िक के ताल पर झूमते हुए बियर पी रहा था.. वैशाली ने ये भी नोटिस किया की पीयूष भी बार बार पेसेज की ओर देख रहा था.. बहोत खुश लग रहा था पीयूष..

ना चाहते हुए भी राजेश की बातों को सुन रही थी वैशाली.. उसका सारा ध्यान पेसेज पर ही था.. वो कौन थी जो उसके पीयूष को अपनी जाल में फंसा रही थी? तभी पेसेज से एक परछाई आती हुई नजर आई.. धीरे धीरे वह परछाई हॉल की तरफ आते देख वैशाली टकटकी लगाकर पहचानने की कोशिश करने लगी..

चेहरा स्पष्ट दिखते ही वैशाली के पैरों तले से जमीन खिसक गई!!! अपनी आँखों पर विश्वास नही हो रहा था उसे.. !!! नालायक पीयूष.. ये क्या किया तूने? कब से लगा हुआ है इनके साथ? रेणुका और पीयूष?? ओह माय गॉड.. ये मैं क्या देख रही हूँ?? साला ये पीयूष तो खिलाड़ी निकला.. हरामी.. मादरचोद.. एक साथ कितनों को लपेटें रखा है उसने!! कभी मेरे साथ.. कभी मौसम के साथ.. और अब रेणुका के साथ भी.. !!!
 
चेहरा स्पष्ट दिखते ही वैशाली के पैरों तले से जमीन खिसक गई!!! अपनी आँखों पर विश्वास नही हो रहा था उसे.. !!! नालायक पीयूष.. ये क्या किया तूने? कब से लगा हुआ है इनके साथ? रेणुका और पीयूष?? ओह माय गॉड.. ये मैं क्या देख रही हूँ?? साला ये पीयूष तो खिलाड़ी निकला.. हरामी.. मादरचोद.. एक साथ कितनों को लपेटें रखा है उसने!! कभी मेरे साथ.. कभी मौसम के साथ.. और अब रेणुका के साथ भी.. !!!

"कब से क्या देख रही हो वैशाली? रेणुका को आज से पहले देखा नही क्या तुमने?" हँसते हुए राजेश ने कहा.. वो कब से वैशाली को रेणुका को देखते हुए देख रहा था.. परदे के पीछे क्या खेल चल रहे थे उसका राजेश को कोई इल्म नही था

वैशाली को एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे उसे रंगेहाथों किसी ने पकड़ लिया हो.. बात को घुमाते हुए उसने कहा "अरे सर.. मुझे रेणुका जी की साड़ी बहोत पसंद आ गई.. इसलिए कब से उन्हें देख रही हूँ.. कितनी खूबसूरत लगती है वो.. कोई नही कहेगा की उनकी उम्र ४० के करीब है.. तीस साल से जरा भी ज्यादा की नही लगती.. लगता है आपकी संगत का असर है " आँखें लड़ाते हुए उसने राजेश से कहा

"हाँ वो तो है.. हम दोनों खूब इन्जॉय करते है.. लेकिन बिजनेस के चलते काफी समय से मैं उसे वक्त नही दे पा रहा.. अब यहाँ आकर कुछ वक्त साथ बिताने का मौका मिला है.. उसी की चमक है रेणुका के चेहरे पर.. इसके लिए मुझे पीयूष का भी आभार प्रकट करना चाहिए.. उसके आने के बाद ही मुझे ऑफिस से थोड़ा सा वक्त मिल पा रहा है.. और वही वक्त मैं रेणुका के साथ बीताता हूँ.. वरना पिछले तीन सालों में हम मुश्किल से तीन महीने ही साथ रहे है.. आई एम प्राउड ऑफ माय वाइफ.. मेरे इतने बीजी शिड्यूल के बावजूद उसने मुझे कभी एक लबज़ तक नही कहा.. अगर पीयूष मुझे न मिला होता तो हमारा संसार टूटने की कगार पर ही था.. ये तो अच्छा हुआ की रेणुका की एक सहेली शीला जी की सिफारिस पर मैंने पीयूष को इंटरव्यू के लिए बुलाया और सिलेक्ट कर लिया.. पीयूष उनका पड़ोसी है.. " राजेश ने एक सांस में ही पूरी कथा सुना दी

वैशाली के दिमाग में विचारों की शृंखला सी चल पड़ी ...अच्छा.. मतलब मम्मी ने ही रेणुका जी से बात करके पीयूष को नौकरी पर लगवाया है.. लेकिन पीयूष और रेणुका का सेटिंग हुआ कैसे होगा? इस सवाल का जवाब ढूँढना बेहद जरूरी था..

वैशाली: "शीला जी मेरी मम्मी है.. और पीयूष हमारा पड़ोसी है.. हम बचपन में साथ खेलकर बड़े हुए है.. और मैं उसे बहोत अच्छी तरह जानती हूँ.. बहोत ही होनहार लड़का है पीयूष" यह कहते हुए वैशाली मन में सोच रही थी.. जिस तरह उस दिन रेत के ढेर में मुझे रगड़कर चोदा था.. पीयूष होनहार तो है ही..

वैशाली: "कितना वक्त हुआ पीयूष को आपकी कंपनी जॉइन कीये हुए?"

राजेश: "ज्यादा नही.. बस दो महीने हुए है.. पर इतने समय में ही उसने जिस तरह काम किया है.. काबिल-ए-तारीफ है.. लड़का बहोत आगे जाएगा.. !!"

वैशाली सोचने लगी.. कुछ तो बात थी.. सिर्फ दो महीनों में ही पीयूष और रेणुका इतने करीब कैसे आ गए? कहीं नौकरी लगने से पहले ही दोनों का चक्कर चल रहा होगा क्या? और रेणुका मम्मी को कैसे जानती है? कहीं उन दोनों के बीच तो कहीं.. नही नही.. मुझे मम्मी के बारे में इतना गंदा नही सोचना चाहिए..

वैशाली जब विचारों में खोई हुई थी तब सिगरेट के धुएं के छल्ले उड़ाते हुए वैशाली के स्तनों को तांक रहा था.. अभी कुछ वक्त पहले ही इन्हे दबाए थे.. आहाहा.. कितना मज़ा आया था.. गले में पहने मंगलसूत्र के नीचे दिख रही दो स्तनों के बीच की खाई देखकर ही अंदर हाथ डालने का मन होने लगा राजेश को.. !! कितनी नाजुक और मदमस्त है.. !! एक पुरुष को जो चाहिए वह सब था वैशाली में..

दोनों चुपचाप एक दूसरे को देख रहे थे.. वैशाली सोच रही थी.. मम्मी और रेणुका के बीच कैसे संबंध होंगे? पापा काफी समय से विदेश है और रेणुका का पति भी ज्यादातर बाहर ही रहता है.. ऐसी स्थिति में कहीं दोनों ने मिलकर पीयूष के साथ ही.. ?? बाप रे.. क्या ऐसा हो सकता है?? हो तो सकता है.. पापा के बगैर दो साल मम्मी बिना सेक्स के तो रही नही होगी.. मैं खुद तीन-चार दिन से अधिक बिना सेक्स के पागल सी हो जाती हूँ.. संजय के बिना मुझे भी कितनी तकलीफ होती है!! कितनी रातें मैंने करवटें बदल कर और उँगलियाँ घिस घिसकर काटी है.. लेकिन उंगली में वो मज़ा कहाँ!! पुरुष का वो खास अंग जब अंदर स्पर्श करता है तब जो रियल टच की अनुभूति होती है.. वो उंगली में कभी नही मिल सकती.. अगर थोड़े दिन बिना सेक्स के रहना पड़े तो मेरी यह दशा होती है.. तो मम्मी और रेणुका को तकलीफ होना भी जायज था.. आखिर वह दोनों भी इंसान है और उनकी अपनी जरूरतें होंगी ही.. और यही इच्छा जब बेकाबू बनी होगी तभी रेणुका और पीयूष का संबंध बना होगा.. पर इन सब में मम्मी बीच में कहाँ से आई? क्या वो भी पीयूष के साथ करती होगी? हो सकता है.. शायद कोई ओर मर्द भी हो मम्मी के जीवन में.. जितना सोचती जा रही थी उतना ही उलझ रही थी वैशाली..

राजेश: "एक बात पूछूँ वैशाली?"

वैशाली: "हाँ पूछिए न, सर.. !!" पीयूष, रेणुका और मम्मी को अपने दिमाग से निकालकर सामने बैठे राजेश पर उसने ध्यान केंद्रित किया

"अभी थोड़ी देर पहले मैंने तुझे काफी रीक्वेस्ट की थी.. किस और स्पर्श के लिए.. तब तो तुमने साफ साफ मना कर दिया था.. फिर अचानक ऐसा क्या हुआ जो तुमने मुझे टॉइलेट के अंदर खींच लिया? इस बात का ताज्जुब हो रहा है मुझे"

"आपकी बात और सोच बिल्कुल सही है सर.. मैंने पहले तो आपको मना किया था.. पर जैसे जैसे हम बात करते गए.. मुझे आपकी कंपनी में बहोत मज़ा आने लगा.. और माउंट आबू के इस रंगीन आजाद माहोल में.. बियर के नशे में.. मैंने कंट्रोल खो दिया सर.. !!"

"अच्छा.. मतलब तुम कंट्रोल खोकर मुझसे लिपट जाओ तो कोई प्रॉब्लेम नही.. और अगर मैं कंट्रोल खो कर सिर्फ एक किस मांग लूँ तो मेरी प्रपोज़ल रिजेक्ट?? ऐसा क्यों?"

वैशाली हंस पड़ी "सर, जो आउट ऑफ कंट्रोल होते है वो कभी प्रपोज नही करते.. सीधा पकड़ ही लेते है.. !! आपने प्रपोज किया क्यों की आप कंट्रोल में थे.. अगर आप आउट ऑफ कंट्रोल होते तो सीधा पकड़कर किस कर लेते.. पूछते नही !!"

"वो तो मैं कर ही सकता था.. पर फिर तुम मेरे बारे में क्या सोचती.. !! यहाँ इस वक्त तुम मेरी मेहमान हो.. तुम्हारी मर्जी के खिलाफ मैं कैसे कुछ कर सकता था?"

वैशाली: "बात तो आपकी सोलह आने सच है सर.. देखिए.. अगर हम चार धाम की यात्रा के दौरान ऐसा कुछ करते तो गलत होता.. पर यहाँ माउंट आबू का वातावरण ही अलग है.. रात का माहोल.. हाथ में बियर का ग्लास.. और ऐसे उत्तेजक कपड़ों में लड़कियां आस पास मंडरा रही हो.. तब थोड़ा सा ऊपर नीचे हो जाए तो हर किसी को थोड़ा समझना चाहिए.. अब ईसे देखो.. पीयूष की वाइफ कविता को.. जिस तरह के कपड़े उसने पहने है.. देखकर कितने मर्दों को इरेक्शन हो गया होगा.. !!"

राजेश: "कहीं तुम्हारे कहने का मतलब ये तो नही है न की ऐसा कुछ न करके मैंने गलती कर दी?? अगर ऐसा है तो मैं अपनी उस गलती को अभी सुधार लेने को तैयार हूँ"

"मतलब??" वैशाली रोमांचित हो गई राजेश की बात सुनकर.. "अरे मैं तो बस मज़ाक कर रही हूँ.. " कहते हुए उसने बात को वहीं रोकने की कोशिश की.. पर राजेश इस बात का अंत लाने को तैयार नही था

"वैशाली, तेरी छाती पर ये जो मंगलसूत्र के बीच की लकीर दिख रही है ना.. वहाँ किस करने का बहोत मन कर रहा है.. अब अगर मैं इजाजत माँगता हूँ तो तुम कहोगी की मैं कंट्रोल में हूँ.. और अगर सीधे सीधे किस कर लेता हूँ तो तुम्हें लगेगा की मैंने तुमसे जबरदस्ती की.. अब बोलो.. मैं क्या करूँ?"

वैशाली एकदम ही शरमा गई.. आसपास करीब ४० लोग थे और उसमे से काफी लोग पहचान के भी थे.. अगर बियर के नशे में राजेश ने सब के बीच कोई उलटी सीधी हरकत कर दी तो.. बाप रे!!

"सर, आप भी ना.. बड़े वो हो.. !!"

राजेश: "क्यों?? मैंने पूछकर कुछ गलत किया क्या?"

वैशाली: "अरे नही नही.. मेरे कहने का ये मतलब था की पहले हमने जो कुछ भी किया वो चार दीवारों के बीच सब की नज़रों से दूर किया था.. और अभी आप मुझे सब के सामने छाती पर किस करना चाहते हो.. अगर रेणुका मैडम ने देख लिया तो आपको माउंट के ऊपर से ही धक्का दे देगी.. अगर आसपास कोई नही होता तो बात अलग थी.. "

"अच्छा? ये बात है? तो चलो वापिस टॉइलेट में चलते है" राजेश ने वैशाली को चोंका दिया..

वैशाली सोच में पड़ गई.. अब क्या करें? बार बार टॉइलेट में थोड़े ही जा सकते है? कोई देख लेगा तो शक हो जाएगा..

"सोच क्या रही हो? ये लो.. एक दो दम लगाओ.. तो कुछ दिमाग काम करेगा" सिगरेट देते हुए राजेश ने कहा

वैशाली ने एक दम लगाते हुए कहा "सर, अभी थोड़ी देर पहले ही आपने खोलकर दबाए है.. चूसे भी है.. अभी एक छोटी सी लकीर के लिए इतनी जिद क्यों कर रहे हो? भरपेट खाना खा लेने के बाद.. सौंफ और मिस्री के पीछे पड़े हो.. !!"

"बात तो तुम्हारी सही है.. लेकिन कभी कभी खुली छाती देखकर भी इतनी उत्तेजना नही होती जो छोटी सी लकीर को देखकर होती है"

वैशाली ने आसपास देखा.. सब अपनी मस्ती में खोए हुए थे.. उसने टेबल पर झुककर अपने दोनों स्तनों को टीका दिया.. उसके साथ ही उसके स्तन उभरकर बाहर निकले.. और बीच की खाई काफी गहरी नजर आने लगी.. यौवन के शिखरों जैसे स्तनों को दिखाकर वैशाली ने कहा "फिलहाल तो आप बस देखकर ही काम चला लीजिए.. अगर मौका मिलें तो मैं खुद ही आपसे दबवा लूँगी.. ठीक है!! असल में.. मैं खुद भी दबवाना चाहती हूँ"

वैशाली के उभरते उरोजों को देखकर राजेश बेकाबू हो गया.. और वैशाली की कामुक बातों ने उसे ओर उत्तेजित कर दिया

राजेश: "वैशाली, मुझसे तो अब रहा नही जाता.. कुछ भी कर.. पर मुझे इन्हे चूसने दे प्लीज.. आह्ह.. थोड़ी और पास आ तो मैं इन्हें छु सकूँ.. दूर क्यों भाग रही हो यार?? या तो फिर चल मेरे साथ टॉइलेट में.. " राजेश अपना आपा खो रहा था.. और साथ ही साथ उसकी बातें सुनकर वैशाली की पुच्ची भी फुदक रही थी..

"नही सर.. आप प्लीज समझने की कोशिश कीजिए.. ये तो मैंने आपको शांत करने के लिए दिखाए.. बाकी आप देख ही सकते है.. आसपास कितने सारे लोग है!!"

"मैं तेरी बात समझ रहा हूँ.. पर तू भी जरा टेबल के नीचे जाकर मेरी हालत देख?" राजेश ने कहा

जानबूझ कर हाथ से चम्मच गिराते हुए वैशाली ने टेबल के नीचे देखा "अरे बाप रे!! ये क्या कर रहे है आप सर? अंदर रख दीजिए.. किसी ने देख लिया तो आफत आ जाएगी.. " टेबल के नीचे राजेश ने अपने पेंट की चैन खोलकर अपना फनफनाता हथियार हाथ में पकड़ा हुआ था.. वैशाली का चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल हो गया.. वो भी गरम हो गई.. खुलेआम लंड देखने का यह पहला मौका था वैशाली के लिए..


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वैशाली ने आसपास नजर डाली.. कहीं कोई सलामत जगह मिल जाएँ तो चुदाई का दूसरा राउंड कर लेने के लिए.. पर हॉल के अंदर ऐसी कोई जगह नही दिखी जहां वो राजेश के लंड और अपनी चूत को ठंडी कर सकें..

"प्लीज वैशाली.. अगर तुम मुझे अपनी क्लीवेज पर किस नही करने दोगी तो ये बैठेगा ही नही.. और जब तक ये बैठेगा नही तब तक मैं उसे पेंट के अंदर नही डाल पाऊँगा" राजेश ने विनती की

खुले वातावरण में लंड देखकर वैशाली की नियत भी डगमगा गई थी पर यहाँ पर कुछ भी करना मुमकिन नही था.. क्या करूँ? एक तरफ चूत में हो रही खुजली.. तो दूसरी तरफ प्राइवसी की तकलीफ.. खुले में थोड़े ही ये सब हो सकता है?

अचानक वैशाली को एक आइडिया सुझा.. हॉल के इस भाग की दीवार पर.. करीब चार फुट ऊपर एक कांच का कपबोर्ड बना था.. जिसके अंदर किताबें रखी थी

वैशाली: "सर, एक काम करते है.. मैं उस कपबोर्ड से किताब लेने खड़ी हो जाती हूँ.. सब लोगों की तरह मेरी पीठ होगी।। जब तक मैं किताब को निकालूँ उस दौरान आपको जो करना है कर लीजिए.. ठीक है!! पर आस पास देखते रहना.. और कहीं कुछ रिस्क लगे तो मुझे इशारा कर देना.." कहते हुए वैशाली ने खड़े होकर आसपास एक नजर दौड़ाई.. किसी की नजर उन पर नही थी.. पर खड़े होने के कारण उसके उभरे हुए स्तन वापिस ब्रा के अंदर चले गए.. लेकिन राजेश अब पीछे हटने के मूड में नही था.. जैसे ही वैशाली कपबोर्ड का कांच का दरवाजा खोलने के लिए झुकी.. उसके स्तन राजेश के मुंह के बिल्कुल ही करीब आ गए.. राजेश ने वैशाली की गदराई क्लीवेज पर अपनी जीभ फेर दी.. और एक स्तन भी दबा लिया.. वैशाली किताब को ढूँढने में वक्त लगा रही थी.. और काफी देर तक वह ढूंढती रही और राजेश का ज्यादा से ज्यादा मौका देती रही.. दोनों पेट्रोल से आग बुझाने की कोशिश कर रहे थे.. ऐसी हरकतों से कभी आग नही बुझती.. उल्टा और भड़क जाती है.. राजेश ने हिम्मत करके वैशाली के टॉप में हाथ डालकर उसके स्तनों को मसल लिया.. वैशाली को भी राजेश का लंड हाथ में पकड़ने की तीव्र इच्छा हो रही थी


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"कोई देख तो नही रहा??" वैशाली ने एकदम धीमी आवाज में पूछा.. "अगर कोई देख रहा हो तो मैं एक किताब बाहर निकालूँ.. वरना ऐसे ही बैठ जाती हूँ"

"नही, कोई नही देख रहा.. तुम बैठ जाओ"

वैशाली ने कपबोर्ड बंद किया और बैठ गई..

"अब मिल गई आपको ठंडक?" वैशाली ने कहा

"हाँ यार.. वैशाली.. तेरे जिस्म में कुछ तो ऐसी खास बात है.. किसी स्त्री को देखकर इतना उत्तेजित मैं कभी नही हुआ पहले" राजेश के हाथ की हलचल देखते हुए वैशाली को साफ पता चल रहा था की वो टेबल की नीचे मूठ लगा रहे थे.. उसके स्तनों को देखकर !!

"यार वैशाली.. वापिस टेबल पर झुक जा.. तेरे बॉल छलक कर बाहर दिखेंगे तो मेरा जल्दी छूट जाएगा.. !!" राजेश बेचैन चेहरे से अपने लंड की ओर देख रहा था

"नही सर.. अभी आप छोड़ मत देना.. मुझे भी खेलना है उसके साथ.. आपका काम तो हो गया.. अब मेरी बारी.. " कहते हुए वो टेबल के नीचे घुस गई और एक ही सेकंड में राजेश का लंड उसके मुंह में था.. !! फटाफट उसने सात आठ बार लंड को मुंह में अंदर बाहर किया और तुरंत वापिस चैर पर बैठ गई.. "बस सर.. अब इससे ज्यादा कुछ नही हो सकता.. आप अपना पानी निकाल लो.. और मैं अपना निकालती हूँ.. " कहते ही वैशाली ने अपने स्कर्ट के अंदर हाथ डालकर चुत को रगड़ना शुरू कर दिया.. अचानक वैशाली को अपनी कलाई पर कुछ गरम एहसास हुआ.. पर अपनी चूत रगड़ते हुए उसे ये देखने का समय नही था.. दो तीन मिनटों तक चूत की भरसक रगड़ाई करने के बाद.. वो भारी सांसें लेते हुए झड़ गई.. अब उसने अपनी कलाई पर नजर डाली.. उस पर राजेश का वीर्य लगा हुआ था.. हँसते हुए वैशाली ने उन बूंदों को अपनी कलाई से चाट लीया.. और फिर अपनी जिन उंगलियों से उसने अपनी चुत को रगड़ा था.. उन गीली उंगलियों को राजेश के बियर भरे ग्लास में डुबोते हुए बोली "अब बियर का असली स्वाद मिलेगा.. ये आज का आखिरी ग्लास मेरा..!!"



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"हाँ यार.. मुझे भी कुछ ज्यादा ही चढ़ गई आज.. " वैशाली की बात से सहमत होकर राजेश ने कहा

दोनों ने बियर का ग्लास खतम किया और सिगरेट सुलगा कर पार्टी में जुड़ गए.. सब लोग नशे में धुत थे और मस्ती से झूम रहे थे.. डांस करते हुए सब जान बूझकर कविता के जिस्म और बोब्बों से टकरा रहे थे.. कविता भी शायद बियर के नशे में थी.. वो भी पागलों की तरह झूम रही थी.. पीयूष मौसम के कंधे पर हाथ रखकर कुछ गुफ्तगू कर रहा था.. और पिंटू फाल्गुनी को कंपनी दे रहा था.. पूरी पार्टी में सिर्फ पीयूष, मौसम और फाल्गुनी ही ऐसे थे जिन्हों ने शराब नही पी थी..

रेणुका की बर्थडे पार्टी और आबू की ट्रिप अपने अंत की ओर बढ़ रही थी.. पीयूष अभी अभी रेणुका को चोदकर आया था.. फिर भी मौसम के कंधों पर हाथ रखकर बार बार उसके उभारों को छु रहा था.. वैशाली ये सब देखकर गुस्से से आग बबूला हो रही थी.. पर वो कर भी क्या कर सकती थी!! हाँ.. कविता जरूर कुछ कर सकती थी.. लेकिन उसे फिलहाल पीयूष की पड़ी नही थी.. और अपनी मस्ती में ही मस्त थी.. पीयूष का हाथ बार बार मौसम के उभारों पर होते हुए उसकी निप्पल पर चले जाते तब मौसम उसका हाथ हटा देती..

लेकिन पीयूष के सर पर तो हवस का भूत सवार था.. थोड़ी देर शांत रहकर वह वापिस अपनी हरकतें शुरू कर देता.. आखिर बगल में मौसम जैसी कच्ची कली खड़ी हो.. और अपने आकर्षक उभार दिखा रही हो.. और सब कुछ करने को राजी भी हो.. तब कोई कैसे खुद को कंट्रोल करें!! गलती पीयूष की नही थी.. पर मौसम की जवानी ही कुछ ऐसी कातिल थी.. की उसके चक्कर में पीयूष सब को भूल चुका था.. वैशाली, शीला, रेणुका.. अरे अपनी कविता को भी भूल चुका था.. सौन्दर्य का जादू अक्सर जानलेवा होता है.. मौसम तो अपने जिस्म पर पुरुष का स्पर्श पाकर अपनी ट्रिप को यादगार बना चुकी थी.. जीवन की पहली किस भी उसे यही मिली थी.. वो जितना पीयूष से दूर जाने की कोशिश करती.. उतना ही ज्यादा आकर्षित हो रही थी.. अपने आप से वो बार बार पूछ रही थी.. वो क्या बात थी जो उसे पीयूष की ओर खींचती जा रही थी? इतनी कोशिशों के बावजूद भी? अपनी बहन के पति के साथ ये सब करने का परिणाम कितना भयानक हो सकता है ये जानने के बावजूद भी वह खुद को क्यों नही रोक पा रही थी इस बात का उसे भी आश्चर्य हो रहा था.. मौसम को इन सब में मज़ा भी आ रहा था और डर भी लग रहा था..

मौसम के कंधों पर हाथ रखे हुए पीयूष रेणुका को कुछ इशारे कर रहा था.. ये वैशाली ने देख लिया.. वैशाली पीयूष के पास आकर गाना गुनगुनाने लगी.. "कहीं पे निगाहें.. कहीं पे निशाना" वैशाली के कदम लड़खड़ा रहे थे.. जैसे मौसम और पीयूष के बीच हड्डी बनने के लीये आई हो.. वैसे वैशाली ने पीयूष के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा "क्या यार पीयूष? तू तो कविता को भूल ही गया!! जब से आया है तब से मौसम के साथ ही घूम रहा है!!"

मौसम का मुंह यह सुनकर इतना सा हो गया.. जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो.. उसने झटके से अपने कंधे से पीयूष का हाथ हटा दिया.. और शरमाकर एक कोने में खड़ी हो गई..

वैशाली ने ये देखकर हँसते हुए कहा "अरे अरे.. टेक इट ईजी.. मैं तो बस मज़ाक कर रही थी.. " वैशाली को जो कहना था वो कह दिया और फिर बात को वापिस घुमा भी दिया.. स्त्रीओं को इस कला में महारथ हासिल होती है.. लेकिन मौसम अब डर गई थी.. झूठ-मूठ हँसते हुए उसने वैशाली से कहा "इट्स ओके.. मुझे बुरा नही लगा.." तभी नशे में झूमती हुई कविता वहाँ आ पहुंची.. उसके कपड़े देखकर पीयूष को शर्म आ रही थी.. पर अभी सब के सामने उसे कुछ भी कह पाना मुमकिन नही था.. नशे की हालत में कविता बात का बतंगड़ बना देती.. पीयूष सब के बीच कोई तमाशा खड़ा करना नही चाहता था.. ऐसी कोई हरकत करके वो रेणुका को भी गंवाना नही चाहता था.. उसने मन में गांठ बांध ली थी.. कविता को जो कुछ भी कहना है वो घर पर जाकर कहेगा..

मौसम और वैशाली के बीच खड़े पीयूष को देखकर कविता ने उसकी उंगली की "अरे वाह पीयूष.. तेरे तो चारों तरफ गोपियाँ मंडरा रही है!! बाकी है तू पक्का रोमियो.. मैं ये सोच रही थी की तेरी जोड़ी किसके साथ ज्यादा जाचेगी? वैशाली के साथ या मौसम के साथ? किससे पूछूँ? एक काम करते है.. रेणुका जी से ही पूछ लेते है.. चल.. !!"

वैशाली और मौसम को सिट्टी पीट्टी गूम हो गई.. बाप रे!! आज कविता जरूर तमाशा खड़ा करेगी.. बात को घुमाते हुए वैशाली ने कहा

वैशाली: "पीयूष की जोड़ी तो सिर्फ कविता के साथ ही अच्छी लगती है.. आखिर दोनों पति पत्नी है.. पीयूष.. तू कविता के साथ खड़ा हो जा.. मैं अपने मोबाइल में तुम दोनों की तस्वीर लेकर दिखाती हूँ.. कितने अच्छे लगते हो साथ में तुम दोनों.. !! अगर तुम्हारी जोड़ी अच्छी नही लगी तो फिर हम रेणुका जी से पूछेंगे.. ठीक है?" नशे के असर में लड़खड़ाती हुई कविता ने कपड़े तो उत्तेजक पहने ही थे.. पर नाच नाचकर वह कपड़े अस्तव्यस्त भी हो गए थे.. टॉप के साइड से उसकी आधे से ज्यादा चूचियाँ नजर आ रही थी.. उसके कपड़ों से सुंदरता का कम और नग्नता का प्रदर्शन ज्यादा हो रहा था.. ऊपर से उसमें मिला शराब का नशा.. नशा चढ़ते ही कविता बेफिक्र होकर किसी की परवाह कीये बिना झूम रही थी.. और आस पास मंडराते भँवरे.. मौका मिलते ही इस फूल का रस चूसने में कसर नही छोड़ते थे..

पीयूष को कविता के बगल में खड़ा रखकर वैशाली ने जबरदस्ती फ़ोटो खींच ली.. और सब को दिखाने लगी.. अब देखने वाले ये तो नही कहेंगे की जोड़ी अच्छी नही लगती.. !! सब ने यही कहा.. की जोड़ी अच्छी है और पीयूष के मुकाबले कविता ज्यादा सुंदर लगती है.. अपने गुणगान और पीयूष का अपमान सुनकर बड़े ही आत्मसंतोष के साथ खुश होकर कविता पहले से भी ज्यादा उन्मुक्त होकर महफ़िल के मजे लेने लगी.. पीयूष ने जो बर्ताव उसके साथ किया था उसका दिल से बदला ले लिया था कविता ने और इसी बात का जश्न मना रही थी वो.. !!!

कविता के जाते ही मौसम और वैशाली ने चैन की सांस ली..

"आज बहोत बातें कर रही थी तू राजेश सर के साथ?" पीयूष ने पूछताछ शुरू कर दी वैशाली से

"हाँ पीयूष.. मैं अकेली थी.. तू तो मौसम के साथ ही चिपका हुआ था.. कविता तो अपनी मस्ती में थी.. और तुझे मौसम के अलावा और कोई दिख ही नही रहा.. मैं अकेली बोर हो रही थी.. अच्छा हुआ की राजेश सर ने अपना समय दिया.. और मेरी उदासी कम हुई.. बाकी जिसके साथ मस्ती करने के इरादे से मैं यहाँ आई थी.. उसे तो मेरी पड़ी ही नही है!!"

"अरे यार वैशाली.. तुझे बुरा लगा हो तो आई एम सॉरी.. मैं सामने से तुझे फोर्स करके यहाँ लाया था. तू बोर ना हो ये देखने की जिम्मेदारी मेरी है.. पर मौसम और फाल्गुनी थे इसलिए मैंने सोचा की तुझे कंपनी मिल जाएगी.. बाकी तू सोच रही है ऐसा कुछ नही है.. मेरा ध्यान हमेशा से तेरे ऊपर था.. "
 
पार्टी खत्म होने की कगार पर थी.. रेणुका ने सब को आखिरी बार संबोधित करते हुए कहा

"प्यारे परिवारजन, मेरे जन्मदिन को आप से सब ने अपनी उपस्थिति से यादगार बना दिया.. आप सब भविष्य में भी हमारे साथ जुड़े रहेंगे ऐसी अपेक्षा और विश्वास है.. अगली बर्थडे मैं बेंगकॉक में मनाना चाहती हूँ.. आप सब के साथ.. थेंक यू राजेश फॉर गीविंग मी सच अ मेमोरेबल पार्टी एंड थेंक यू एवरीबड़ी.. अगर किसी को भी कुछ तकलीफ हुई हो तो क्षमा चाहती हूँ.. इसके साथ ही आज की शानदार रात को यहीं खतम करते है.. आप सब अपने कमरे में जाकर आराम कीजिए.. कल सुबह साइट-सीइंग की लिए चलेंगे.. और दोपहर के बाद हम वापिस लौटने का सफर शुरू करेंगे.. गुड नाइट एंड स्वीट ड्रीम्स!!"

सब ने तालियों से पार्टी का समापन किया.. एक के बाद एक सब अपने कमरे की और जाने लगे.. सब के साथ कोई न कोई था.. सिर्फ वैशाली ही अकेली थी.. अपनी इस स्थिति से काफी व्यथित हो गई वैशाली.. सब के साथ कोई न कोई साथी था.. और वो यहाँ अकेली थी जब की संजय वहाँ किसी रांड की बाहों में पड़ा होगा..

साली कैसी कमबख्त ज़िंदगी है ये!!! आज संजय और मेरे बीच सब सही होता तो हम भी हाथ में हाथ डालकर डांस कर रहे होते.. पार्टी का अलग ही मज़ा आता.. बाकी कपल्स की तरह रूम में जाकर जबरदस्त चुदाई भी करते.. ऐसे खुले वातावरण में कितनी सारी इच्छाएं उठती है मन में!! पीयूष के साथ उतावला सेक्स और राजेश सर के साथ टॉइलेट में चुदाई ना करवानी पड़ती आज.. आराम से ए.सी. रूम में मुलायम बेड पर टांगें फैलाकर चुदवाती..!! सब निकल रहे थे और वैशाली इन खयालों के कारण उदास खड़ी हुई थी

"आप अभी भी यही खड़ी हो?? कमरे में चलना नही है क्या? सब चले गए.. " फाल्गुनी ने वैशाली का हाथ पकड़कर खींचा तब वैशाली अपने विचारों से बाहर आई.. वैशाली की आँखों के कोने में चमक रहें आंसुओं को देखकर वह समझ गई की कुछ तो गड़बड़ थी.. वरना इतनी शानदार पार्टी के बाद भला कोई उदास क्यों होगा!!

"इतनी उदास क्यों हो दीदी?" फाल्गुनी ने पूछा

"कुछ नही.. बस मेरे पति की याद आ गई थी.. "

"ओह्ह इतनी सी बात.. उदास क्यों हो रही हो.. फोन उठाओ और बात कर लो.. " नादान फाल्गुनी ने कहा

"नही फाल्गुनी.. मेरी समस्या गंभीर है.. तू नही समझेगी.. ज़िंदगी ने ऐसे अजीब मोड पर लाकर खड़ा कर दिया है की मुझे खुद ही नही पता आगे क्या होगा!!"

फाल्गुनी: "आपके हसबंड और आपके बीच झगड़ा हुआ है?" बड़ी ही निर्दोषता से उसने पूछा

"झगड़ा नही हुआ है.. जिंदगी ही खतम हो गई है.. पिछले दो सालों से हमारे बीच मनमुटाव है.. काफी समय से हम एक दूसरे से ठीक से बात भी नही करते.. यहाँ सब कपल्स को इन्जॉय करते देख मेरा दिल भर आया... दुख होना स्वाभाविक है!!"

पूरे हॉल में बस फाल्गुनी और वैशाली अकेले बचे थे..

"मैडम जी, अगर आपको यहाँ रुकना हो तो मैं हॉल बंद करने बाद में आऊँ?" मेनेजर ने उनसे पूछा

"अरे नही.. आप बंद कर दीजिए.. हम बस जा ही रहे है.. " वैशाली और फाल्गुनी बाहर निकल गए..

होटल के तीसरे माले पर कमरे की बालकनी में खड़े होकर आसमान में टिमटिमाते तारों को देखने लगी..

"अगर तुझे नींद आ रही हो तो सो जा.. मैं थोड़ी देर यहीं रुकूँगी.. " वैशाली ने फाल्गुनी से कहा.. मौसम, फाल्गुनी और वैशाली एक ही कमरे में रुके थे.. मौसम नाइटी पहनकर बेड पर लेटे हुए इन दोनों की बातें सुन रही थी.. उसे थोड़ी नींद आ रही थी इसलिए वो वहीं लेटी रही..

फाल्गुनी ने मौसम को सोते हुए देखकर कहा "बाहर बालकनी में चल.. दीदी के साथ बैठते है.. वापिस घर जाकर फिर सोना ही तो है.. यहाँ दोबारा कब आना होगा कीसे पता.. !!" फाल्गुनी ने बालकनी में दो कुर्सियाँ लगाते हुए कहा

"क्यों नही आएंगे वापिस?? शादी के बाद पति के साथ हनीमून पर यहीं तो आएंगे " फाल्गुनी को अपनी ओर खींचते हुए मौसम ने कहा

"तू आराम से सो जा.. और सपने में हनीमून मना ले.. हमे शांति से बैठने दे" कहते हुए फाल्गुनी खड़ी हो गई

"कोई बात नही.. तुझे हनीमून पर न जाना हो तो मुझे बता देना.. तेरे पति के साथ मैं चली जाऊँगी... और तू घर पर बैठे बैठे बातें करते रहना" खिलखिलाकर हँसते हुए मौसम ने कहा

इन दोनों की हंसी-ठिठोली सुनकर वैशाली की उदासी के बादल भी छट गए..

वैशाली: "तुम दोनों कब से हनीमून हनीमून लगे हुए है.. पर उसमें क्या होता है ये पता भी है?? हनीमून में क्या करते है ये जानती हो?"

"वो तो जब मौका मिलेगा तब सीख लेंगे.. आप भी तो जब गई होगी तब नई नई ही होंगी.. जैसे आप ने सीख लिया वैसे हम भी सीख लेंगे"

"नई नई थी या नही वो तुम्हें क्या पता??" वैशाली ने शरारती आंखो से कहा और हंस पड़ी "अपना पाप तो हम खुद ही जानते है.. वो तो हमारे पति को भी पता नही होता की जिस बच्चे को वो गोदी में लेकर खेल रहा है वो असल में उसका है भी या नही.. सिर्फ माँ ही जानती है.. मेरा बेटा, मेरा बेटा कहते हुए उछल रहे पति की आवाज सुनकर किचन में उसकी पत्नी मन ही मन मुस्कुरा रही होती है की जिसे तू अपनी औलाद समझ रहा है वह असल में मेरे पुराने प्रेमी की निशानी है.. " वैशाली ने जीवन के कटु सत्य को फाल्गुनी और मौसम के सामने उजागर किया..

तीनों बातों में मशरूफ़ थे.. वैशाली और फाल्गुनी कुर्सी पर बैठे हुए अपने पैर बालकनी की दीवार पर टिकाए हुए थे.. मौसम बेड पर पड़े पड़े तकिये को अपनी बाहों में लेकर बातें कर रही थी.. वैशाली ने भी कपड़े बदलकर छोटी सी नाइटी पहन ली थी.. पैर दीवार पर रखे होने के कारण उसकी छोटी सी नाइटी उसकी जांघों तक सरक गई थी.. और उसकी गोरी गदराई जांघें साफ नजर आ रही थी.. वैसे कमरे में तीनों लड़कियां ही थी इसलिए वह बेफिक्र थी.. अब मौसम भी उठकर तीसरी कुर्सी पर उन दोनों के साथ बैठ गई

मौसम: "आप दोनों को नींद नही आ रही? बारह बज रहे है.. बातें कर कर के मेरी भी नींद उड़ा दी आप लोगों ने..

वैशाली: "तू आराम से सो जा.. तुझे कौन रोक रहा है.. तेरे पति के साथ हनीमून पर आबू आएगी तब सोने को नसीब ही नही होगा.. याद रखना!!"

मौसम: "तभी तो कह रही हूँ.. उस वक्त जागना पड़ेगा इसलिए सो जाते है"

वैशाली: "तू चिंता मत कर.. उस समय अगर तुझे नींद आ भी गई तो तेरा पति छातियाँ दबाकर तुझे जगा देगा.. "

वैशाली की यह खुल्लमखुल्ला बातचीत से मौसम और फाल्गुनी.. दोनों के जिस्मों में सुरसुरी होने लगी.. वैसे मौसम ने कुछ घंटों पहले ही अपने जीजू से छातियाँ दबवाई थी.. इसलिए उसके शरीर में जो स्पंदन जग रहे थे वह वासना के थे.. फाल्गुनी के मन में वासना का भाव कम और जिज्ञासा का भाव ज्यादा था..

मौसम: "एक बात मुझे समझ नही आती वैशाली.. जब पुरुष का हाथ हमारी छाती को छूता है तब बहोत मज़ा आता है क्या?" जान कर भी अनजान बन रही थी मौसम..

वैशाली: "क्यों? तुझे अब तक ऐसा कोई अनुभव नही हुआ क्या??? सच सच बता.. बगैर दबवाये ही तेरे इतने बड़े हो गए क्या?? मुझे तो पक्का डाउट है.. किसी की मदद लिए बगैर इतने आकर्षक और परफेक्ट शेप में ये रह ही नही सकते.. और मौसम.. तेरे बबलों की ताजगी देखकर यही लगता है की तू जरूर किसी से दबवाती होगी.. !!"

फाल्गुनी: "सही बात है दीदी.. ये साली बड़ी छुपी रुस्तम है.. किसी को पता भी न चले वैसे मजे करने वाली.. मैं अच्छे से जानती हूँ ईसे"

मौसम: "साली.. मुझे क्यों बदनाम करती है.. !! पूरा दिन तो मैं तेरे साथ होती हूँ.. फिर मैं कहाँ किसी से ऐसा करवाने जा सकती हूँ? थोड़ा तो विश्वास रख मुझ पर"

वैशाली: "विश्वास? हा हा हा हा हा.. आज के जमाने में विश्वास सगे भाई पर भी नही रख सकते.. तू अखबारों में पढ़ती होगी.. जवान लड़की पर उसका भाई या बाप ही रेप करता है कई जगह.. "

मौसम: "वैशाली, तुम जो कह रही हो उसे बलात्कार कहते है.. अपनी मर्जी से दबवाने में और बलात्कार में जमीन आसमान का फरक है.. क्या तुम यह कहना चाहती हो की जबरदस्ती होने पर भी लड़की को मज़ा आता होगा?"

फाल्गुनी का चेहरा एकदम पीला पड़ गया "नही ऐसा कभी नही हो सकता.. किसी भी लड़की के लिए जबरदस्ती सहना बेहद यातनामय होता है" बोलकर फाल्गुनी एकदम चुप हो गई.. पर उसे एहसास हुआ की उसने बहोत बड़ी गलती कर दी ये बोलकर.. उसके कहने का मतलब ना समझ सके ऐसे मूर्ख नही थे वैशाली और मौसम

मौसम: "फाल्गुनी? तुझे पता भी है क्या बोल रही है? ये सब तुझे कैसे पता? क्या तेरे साथ कभी ऐसा कुछ??"

फाल्गुनी ने जवाब नही दिया

वैशाली ने बड़े ही प्यार और वात्सल्य से जांघ पर हाथ फेरते हुए कहा "मौसम की बात का जवाब दे फाल्गुनी"

फाल्गुनी: "नही यार ऐसा कुछ खास नही है"

फाल्गुनी की आवाज बदल गई.. उसकी आवाज में एक अजीब प्रकार का डर झलक रहा था.. वह नीचे देखते हुए बैठी रही

वैशाली: "सच सच बता फाल्गुनी.. मैं कल से देख रही हूँ.. इतने खुले और आजाद वातावरण में भी तुम किसी भी पुरुष के साथ ज्यादा बात नही करती.. मैं ये जानना चाहती हूँ की तू इतनी चुप चुप क्यों रहती है? प्लीज हमें बता"

मौसम: "बिल्कुल सही कहा तुमने वैशाली.. इस बात को तो मैंने भी नोटिस किया है.. सेक्स के बारे में जब भी बात होती है तब तू दूर ही भागती है.. कॉलेज में भी तू लड़कों से दूर रहती है.. मैं काफी समय से पूछना चाहती थी.. अच्छा हुआ आज ये बात निकली"

वैशाली: "देख फाल्गुनी, यहाँ पर हमारे अलावा और कोई नही है.. और हम दोनों तुझे वचन देते है की हम किसी को भी नही बताएंगे.. बता.. क्या हुआ था तेरे साथ?"

फाल्गुनी: "ऐसा भी कुछ नही हुआ था.. पर जब भी मैं सेक्स के बारे में सोचती हूँ.. मन में अजीब सा डर लगने लगता है.. पता नही क्यों.. रात को नींद में जब मैं उत्तेजित हो जाती हूँ तब सपने में एक भयानक चेहरा आँखों के सामने आ जाता है ओर वो मेरे साथ.. जबरदस्ती करने लगता है.. !!"

वैशाली और मौसम स्तब्ध होकर सुनते रहे..

वैशाली: "जबरदस्ती करने लगता है.. मतलब क्या करता है?"

फाल्गुनी: "प्लीज दीदी.. आगे मत पूछिए.. मुझे तो बताने में भी शर्म आती है" थरथर कांपती फाल्गुनी ने अपनी खुली हुई जांघें अचानक बंद कर दी..

थोड़ी देर के लिए तीनों चुप बैठे रहे

अब वैशाली कुर्सी से खड़ी होकर बोली "यहाँ आओ फाल्गुनी.. मेरे पास.. मौसम तू भी" मौसम तुरंत उठी और वैशाली के पास जाकर खड़ी हो गई.. लेकिन फाल्गुनी कुर्सी पर अब भी बैठी ही रही..

मौसम का हाथ पकड़कर वैशाली ने उसे अपनी ओर खींचा और उसके होंठों पर एक मस्त लेस्बियन किस कर दी.. मौसम इस हरकत के लिए तैयार नही थी.. उसे बड़ा अचरज हुआ.. पर वैशाली ने इस आश्चर्य को उत्तेजना में बदलते हुए मौसम के स्तनों को.. फाल्गुनी की नज़रों के सामने ही.. दबाना शुरू कर दिया..


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ये देखते ही फाल्गुनी ऐसे थरथराने लगी जैसे उसने भूत देख लिया हो.. उसे इस तरह कांपते हुए देख वैशाली ने यह अंदाजा लगाया की जरूर कोई ऐसी घटना घाटी थी फाल्गुनी के साथ जिसके कारण उसके कोमल मन पर गंभीर असर किया था.. या तो फिर उसने कोई ऐसा खतरनाक मंज़र देखा था.. कुछ तो था जिसके कारण फाल्गुनी सेक्स से जुड़ी बातों से इतना डर रही थी..

वैशाली सोच रही थी की ऐसा क्या करूँ जिससे उसका यह डर गायब हो जाएँ.. !!

मौसम के स्तनों पर वैशाली का हाथ, ना उसने हटाने की कोशिश की और ना ही फाल्गुनी की नजर उसके स्तनों से..

वैशाली: "कैसा महसूस हो रहा है तुझे मौसम? सच सच बताना.. "

मौसम: "ओह वैशाली.. मज़ा ही आएगा ना.. जाहीर सी बात है!!"

वैशाली: "देख फाल्गुनी.. मौसम को कितना मज़ा आ रहा है.. देखा तूने!!" मौसम के स्तनों को मसलते हुए वैशाली ने फाल्गुनी की ओर देखकर कहा "तू बेकार ही डर रही है फाल्गुनी.. एक औरत होते हुए अगर मेरा स्पर्श मौसम को इतना मज़ा दे रहा हो.. तो सोच.. जब किसी पुरुष का मर्दाना हाथ पड़ेगा तब कितना जबरदस्त मज़ा आएगा!! सच कह रही हूँ फाल्गुनी.. तू अपने मन से सेक्स के प्रति घृणा और डर निकाल दे.. ये तो जीवन का सब से श्रेष्ठ आनंद है.. " वैशाली मौसम के अद्भुत वक्षों को धीरे धीरे मसलते हुए फाल्गुनी के डर को दूर करने की कोशिश कर रही थी.. मौसम भी वैशाली के इस प्रयास में पूर्ण सहयोग दे रही थी.. और उसे मज़ा भी आ रहा था.. जो की साइड इफेक्ट था..!!

मौसम की कुंवारी छाती पुरुष के मर्दाना स्पर्श को एक बार चख चुकी थी.. जैसे आदमखोर शेर एक बार इंसान का खून चख ले फिर उसे चैन नही पड़ता वैसे ही कुछ हाल मौसम का भी था.. जिन स्तनों को देखकर लड़के मूठ लगाते थे वही स्तनों को अभी दबाने वाले पुरुष की तलाश थी.. काफी सुंदर द्रश्य था.. माउंट आबू की शांत रात्री के माहोल में शराब पीकर सब सो रहे थे.. तब रात के साढ़े बारह बजे.. यह तीन लड़कियां एक दूसरे के अंगों को पुरुष से दबवाने के बारे में सोच रहे थे..

सीनियर शिक्षिका की तरह वैशाली अपना रोल बखूबी निभा रही थी.. आज के ही दिन वैशाली ने पीयूष और राजेश सर दोनों से अपनी मरवाई हुई थी.. अलग अलग लंड से चुदकर काफी बार जानदार ऑर्गजम का आनंद और चमक उसके चेहरे पर साफ छलक रही थी..

वैशाली: "फाल्गुनी.. एक समय था जब मैं भी सेक्स के मामले में तेरी तरह ही गंवार थी.. मुझे तो ये ही पता नही चल रहा था की कुदरत ने लड़कियों की छाती पर ये बबले आखिर बनाए क्यों थे!! इतनी ही समझ थी की आगे जाकर होने वाले बच्चे को दूध पिलाने की लिए ही इस व्यवस्था को बनाया गया होगा.. पर एक बार जब ये स्तन दबे.. तब मुझे एहसास हुआ की दूध पिलाने के लिए तो इसका उपयोग बाद में होगा.. इसका असली काम तो दबवाकर मजे लूटने का था.. तू मानेगी नही मौसम.. मुझे हमेशा ताज्जुब होता था की लड़के आखिर मेरी छातियों को हमेशा क्यों तांकते होंगे? मुझे भी सब कुछ संजय के साथ शादी करने के बाद ही पता चला.. शादी की पहली रात जब संजय ने मेरी छातियों को दबाया और चूसा.. तब मुझे पता चला की जीवन का असली मज़ा छाती को ब्रा के अंदर छुपाने में नही.. पर किसी के हाथों में सौंपने में था.. !!"

वैशाली की इस असखलित प्रवाह वाला लेक्चर फाल्गुनी बड़े ध्यान से सुन रही थी.. वैशाली दोनों के चेहरों की तरफ देख रही थी.. उसे लगा की दोनों को उसकी बातों में गहरी दिलचस्पी थी..

वैशाली: "फाल्गुनी.. एक बात पूछूँ.. तुम दोनों सच सच बताना.. !! मैं प्रोमिस करती हूँ की इस बात को मैं राज ही रखूंगी.. तू यहाँ आ फाल्गुनी मेरे पास.. घबरा मत.. यहाँ आ" फाल्गुनी धीरे से उठकर उन दोनों के पास गई.. तीनों इतने करीब खड़ी थी की अगर थोड़ा सा भी और नजदीक आती तो उनके स्तन आपसे में दब जाते..

फाल्गुनी के गोरे गालों पर वैशाली ने हल्के से हाथ फेर लिया.. और बड़े प्रेम से उसका हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा "फाल्गुनी, तूने कभी लिप किस की ही?" फाल्गुनी की हथेली कांप रही थी "बता न फाल्गुनी?.. मौसम तूने कभी.. ??" फाल्गुनी के साथ मौसम को भी घेरे में लिया वैशाली ने..

मौसम: "मैंने तो नही की.. " पर इतना बोलते ही मौसम को पीयूष के संग बिताएं वो हसीन पल याद आने लगे.. हल्की सी मुस्कान के साथ उसने कहा "वैशाली मुझे लिप किस अच्छी नही लगती यार.. एक दूसरे के मुंह में मुंह डालना मुझे नही पसंद.. घिन आती है.. "

फाल्गुनी ने धीमी आवाज में कहा "मैंने एक इंग्लिश मूवी में देखा तो है.. पर ट्राय नही किया कभी"

वैशाली: "ओके.. अब अगर तुम दोनों को दिक्कत न हो.. तो क्या हम एक दूसरे को किस करें? जब तुम्हारी शादी होगी और पति लिप किस करेगा तब तुम दोनों को यह अनुभव बहोत काम आएगा.. पर तुम्हारी इच्छा हो तो ही.. लिप किस भी एक कला है.. सीखना बहोत जरूरी है"

मौसम: "हाँ मुझे सिखाओ.. मैं सीखना चाहती हूँ" फाल्गुनी कुछ बोलने जा ही रही थी पर उससे पहले मौसम शुरू हो गई इसलिए वह चुप रही.. वैशाली ने फाल्गुनी का हाथ पकड़कर अपने एकदम नजदीक खींचते हुए कहा "मौसम.. पहले मैं फाल्गुनी को किस करूंगी.. फिर हम दोनों करेंगे.. ठीक है!!"

मौसम: "ओके डन.. पहले तुम दोनों करो.. मैं देखूँगी और सीखूँगी"

वैशाली: "फाल्गुनी, आर यू रेडी?"

डरी हुई फाल्गुनी कुछ बोल न पाई.. वैशाली ने फाल्गुनी की हथेली पकड़कर अपने स्तन पर रखते हुए दूसरा सवाल किया "कभी किसी ओर लड़की की ब्रेस्ट को दबाया है?" फाल्गुनी ने सर दायें बाएं हिलाकर "ना" कहा.. दोनों की हरकतें देखकर मौसम का हाथ अनजाने में ही खुद के स्तनों पर चला गया..

वैशाली ने फाल्गुनी की हथेली में अपना स्तन दे दिया.. और कहा "जरा जोर से दबा.. और देख कितना मज़ा आता है!!"


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सहमी हुई फाल्गुनी मशीन की तरह वैशाली के स्तन को दबा रही थी.. ना ऊष्मा थी और ना ही वासना

वैशाली: "सहला क्या रही है.. जरा जोर से दबा.. तभी तो मज़ा आएगा" फाल्गुनी के गले में अपना हाथ डालकर अपने होंठों को उसके नाक तक लेकर वैशाली ने धीरे से चाट लिया.. फाल्गुनी ने ना ही विरोध किया और ना ही कुछ बोली.. अब वैशाली ने फाल्गुनी के स्तनों को अपने हाथों से बड़े जोर से मसल दिया

फाल्गुनी: "आह्ह.. दीदी.. धीरे से.. दर्द हो रहा है"

वैशाली: "अरे यार.. मैं तो ये कह रही हूँ की इस तरह दबा मेरे.. समझी.. जरा जोर से.. तेरे बॉल अभी अनछुए और कोरे है.. इसलिए दर्द हो रहा है.. मेरे तो अब अनुभवी हो गए है.. धीरे धीरे दबाने से मेरे स्तनों को कुछ महसूस ही नही होता इसलिए कह रही हूँ की जरा ताकत लगाकर दबा" इतना कहकर वैशाली ने फाल्गुनी के गालों को चूम लिया.. चूमने के बाद उसने अपनी जीभ बाहर निकालकर उसके गाल को चाट लिया.. पूरा गीला कर दिया.. वैशाली को पता था की फाल्गुनी को इसमें मज़ा नही आ रहा था पर शुरुआत में ऐसा होना स्वाभाविक था..

अब वैशाली ने फाल्गुनी की हथेली को अपनी नाइटी के अंदर डालकर अपने नंगे चुचे का स्पर्श करवाया.. "आह्ह.. " यह द्रश्य देखकर ही मौसम की सिसकी निकल गई.. और वो दोनों हथेलियों से अपने स्तन दबाने लगी..

कुदरत के बक्शे हुए इन सुंदर यौवन कलशों को अब तक अनगिनत बार आईने में देखकर मसल चुकी मौसम.. फाल्गुनी के स्तनों को कभी छुआ नही था उसने.. हाँ कभी कभार अनजाने में हल्का सा स्पर्श जरूर हो जाता.. या फिर स्तन दब जाते तब एक दूसरे को हँसकर "सॉरी" बोल देते थे.. उस हंसी का मतलब ये होता था की भले ही गलती से दब गए हो.. पर स्तन का दबना ही उसका भविष्य होता है.. और दबने में ही स्तनों के अस्तित्व की सार्थकता थी..

लेकिन इन दोनों नादान लड़कियों का दिमाग इतना ज्यादा भी कलुषित नही हुआ था.. कभी कभार टीवी पर दिख जाती कोंडोम की एड.. या फिर किसी मूवी का उत्तेजक गाना या सीन.. देखकर उत्तेजित होती दोनों इतनी मासूम भी नही थी.. पर अन्य फॉरवर्ड और मॉडर्न लड़कियों के मुकाबले मौसम और फाल्गुनी सेक्स के मामले में बिल्कुल अनुभवहीन थे.. अब तक सेंकड़ों बार वो दोनों खुद के स्तनों को छु चुके थे पर आज तक कभी ऐसा एहसास नही हुआ था.. फाल्गुनी का पूरा शरीर वैशाली के स्तन का स्पर्श होते ही कांपने लगा.. वो ऐसे पेश आ रही थी जैसे काफी डरी हुई हो.. पर बिना इसकी परवाह कीये.. वैशाली ने फाल्गुनी के कान में कहा "कैसे लगे मेरे स्तन तुझे, फाल्गुनी?"

"ओह्ह प्लीज दीदी.. " फाल्गुनी सिर्फ इतना ही बोल पाई.. बालकनी के अंधेरे में अपना पूरा स्तन ही नाइटी से बाहर निकाल दिया वैशाली ने.. और फाल्गुनी के हाथ में थमाते हुए दबवाने लगी.. "और ये देख मेरी निप्पल.. कैसी लगी तुझे फाल्गुनी?" वैशाली के एक के बाद एक कामुक सवालों से फाल्गुनी के जवान कुँवारे जिस्म में बिजली सी दौड़ रही थी.. उसका कांपना अभी बंद नही हुआ था.. वैशाली अपने स्तनों पर चल रही ठंडी हवा को महसूस करते हुए सिहर रही थी.. उसने मौसम से कहा "अपनी नाइटी ऊपर कर के देख.. स्तनों पर जब ठंडी ठंडी हवा टकराती है तब कितना मज़ा आता है.. !!"

मौसम शरमा गई.. और बोली "मुझे लगता है.. की तुम काफी एक्साइटेड हो गई हो वैशाली"

"तो उसमें गलत भी क्या है मौसम? यहाँ होटल में हर कोई अपने पति या बॉयफ्रेंड को अपने बाहों में भरके उनके मस्त लंड से चुदवा रही होगी.. और यहाँ मैँ.. शादीशुदा होते हुए भी तड़प रही हूँ.. आप दोनों ने तो वो मज़ा लिया नहीं है इसलिए नही समझ पाओगे.. पर एक बार स्त्री पुरुष के स्पर्श को प्राप्त कर ले फिर वो उसकी जरूरत बन जाता है.. जब तक सिर्फ उंगलियों से मास्टरबेट ही किया हो तब तक असली पेनिस से करवाने के मजे के बारे में पता नही चलता.. बस ऐसा ही लगता है की उंगलियों में ही सारा सुख छुपा हुआ है.. पर एक बार जब छेद के अंदर मर्द का अंग घुसता है और अंदर बाहर होता है.. और उसकी सख्ती से रोम रोम जीवंत हो जाता है.. ओह्ह फाल्गुनी.. अब तुझे कैसे समझाऊँ.. अभी मुझे लंड की सख्ती बड़ी याद आ रही है.. मुझे ऐसा एहसास हो रहा है जैसे नीचे हजारों चींटियाँ एक साथ काट रही हो.. ऐसी खुजली हो रही है की मैं बता नही सकती.. मैं तो वो स्वाद काफी बार चख चुकी हूँ.. इसीलिए आधी रात को ऐसे मादक माहोल में मुझे याद आ रही है.. इसमे मेरी कोई गलती नही है"

कहते हुए वैशाली ने फाल्गुनी को अपनी बाहों में भर लिया और उसके कुँवारे होंठों पर अपने होंठ रखकर फाल्गुनी को उसके जीवन की पहली लिप किस भेंट कर दी.. थरथर कांपती फाल्गुनी ने मुंह फेरते हुए इनकार करने की कोशिश की.. पर वह इनकार से ज्यादा इजहार का संकेत था.. वैशाली की उत्तेजना उसके शरीर को फाल्गुनी से भी ज्यादा बल दे रही थी.. एक तरफ फाल्गुनी की नादान उम्र और चढ़ती जवानी की चाह उसे शरण में आने की लिए मजबूर कर रही थी.. "दीदी प्लीज.... " अभी भी वो अशक्त विरोध कर रही थी.. लेकिन दूसरी तरफ वैशाली की चूत लंड मांग रही थी.. और लंड की अनुपस्थिति में वह सारी कसर फाल्गुनी पर निकाल रही थी..

जब वैशाली ने फाल्गुनी को बाहों में भर लिया तब फाल्गुनी के कडक स्तन वैशाली की छातियों पर चुभने लगे थे.. अब फाल्गुनी भी इन हरकतों से मजे लेने लगी थी..

वैशाली: "यार फाल्गुनी.. तेरी ब्रेस्ट कितनी कडक है.. !! मेरे बॉल पर तेरी दोनों निप्पल चुभ रही है मुझे!!"


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यह गरमागरम सीन देखकर मौसम की जांघों के बीच में चुनचुनी होने लगी.. पीयूष ने उसके स्तन जिस तरह मसले थे.. उसे वो सीन याद आ गया.. उसने वैशाली के कंधे पर हाथ रखकर उसे दबाया.. अंधेरे में वैशाली को उसके हावभाव तो दिखे नही पर वो समझ गई की मौसम फाल्गुनी से भी अधिक उत्तेजित हो चुकी थी.. पर मौसम ने तो किसी और काम के लिए हाथ रखा था

मौसम: 'वैशाली.. वहाँ देखो.. !!"

मौसम ने वैशाली और फाल्गुनी के रोमांस के रंग में भंग करते हुए दोनों को सामने की तरफ के गेस्टहाउस के चौथे मजले के एक कमरे की आधी खुली खिड़की से दिख रहे द्रश्य की ओर निर्देश किया.. एक कपल की हरकतें खिड़की से साफ नजर आ रही थी.. तीनों की नजर वहीं चिपक गई..

वैशाली: "तुम दोनों देखती रहो.. अब इनका कार्यक्रम शुरू होगा"

खिड़की से दिख रहा था.. एक पुरुष और स्त्री आपस में चुम्मा-चाटी कर रहे थे..

"मैं अभी आई.. " कहते हुए वैशाली भागकर कमरे में गई और अपनी बेग से दूरबीन लेकर वापिस लौटी.. दूरबीन से से देखकर उसने फाल्गुनी को देते हुए कहा.. "तू थोड़ी देर देख फिर मौसम को देना और फिर वापिस मुझे.. सब मिलकर देखते है"

मौसम: "दूरबीन तो मैं भी लाई हूँ.. "

वैशाली: "तो जल्दी लेकर आ.. मुफ़्त में बी.पी. देखने का मौका मिला है.. जा जल्दी"

दूरबीन से देखते हुए फाल्गुनी ने कहा "वैशाली.. वो दोनों किस कर रहे है.. एकदम साफ साफ दिख रहा है यार.. " फाल्गुनी को अब मज़ा आ रहा था

"ला मुझे भी देखने दे.. " वैशाली ने कहा

"नही.. मुझे देखने दे पहले" फाल्गुनी ने दूरबीन नही दिया

दूरबीन से उस बेखबर और बिंदास कपल के हरकतों को देख रही फाल्गुनी के स्तनों पर हाथ रखकर वैशाली दूसरे हाथ से अपनी चूत को रगड़ने लगी.. तभी मौसम भी अपना दूरबीन ले आई.. और वैशाली के पीछे खड़े होकर देखने लगी.. मौसम के स्तन वैशाली की पीठ पर छु रहे थे..

मौसम: "देख देख फाल्गुनी.. वो आदमी बॉल दबा रहा है उस औरत के" रोमांचित होकर उसने फाल्गुनी से कहा

वैशाली फाल्गुनी के स्तनों को हल्के हल्के मसलते हुए अपनी क्लिटोरिस से खेल रही थी.. उसे उस कपल की हरकतें देखने में कोई दिलचस्पी नही थी क्योंकि उसके लिए ये कोई नई बात तो थी नही.. लेकिन फाल्गुनी और मौसम के लिए ये पहली बार था.. सेक्स का लाइव टेलीकास्ट देखने का मौका.. दोनों कुंवारी लड़कियां ये देखने के लिए आतुर थी की आगे ओर क्या होगा.. !! फाल्गुनी को ये सब देखने में पता ही नही चला की कब वैशाली ने उसकी नाइटी के सारे हुक खोल दीये और उसके दोनों उरोजों को बाहर निकालकर दबाने लगी.. मौसम भी उत्तेजित होकर अपने स्तनों को वैशाली की पीठ पर रगड़ने लगी थी

मौसम बालकनी के उस कामुक सीन को दूरबीन से देखते हुए.. कुछ घंटों पहले अपने जीजू के संग हुए संसर्ग को याद करते हुए गीली हो रही थी.. फाल्गुनी अभी नादान थी.. वो तो ये द्रश्य देखकर हतप्रभ से हो गई थी.. सामने दिख रहा सीन कुछ ऐसा था.. वह औरत खिड़की पकड़े खड़ी हुई थी और उसका पार्टनर पीछे से गर्दन और पीठ को चूम रहा था.. बाहर घनघोर अंधेरा था और कमरे की लाइट चालू थी इसलिए इन तीनों को वहाँ का नजर एकदम साफ साफ नजर आ रहा था..

कब से मौसम और फाल्गुनी दूरबीन पर ऐसे चिपकी थी जैसे गुड पर मक्खी.. अब वैशाली को भी इच्छा हो गई उस कपल की हरकतें देखने की.. किसी जोड़े को संभोग करते हुए देखना अपने आप में ही बड़ा अनोखा अनुभव होता है.. किसी कपल की विकृत काम हरकतों को देखकर वैसी ही प्रबल उत्तेजना होती है जो वास्तविक संभोग के दौरान होती है..

मौसम के हाथ से दूरबीन छीनते हुए वैशाली ने कहा "मुझे तो देखने दे.. !! तू तो कब से ऐसे देख रही है जैसे तुझे इस बारे में परीक्षा देनी हो और उसकी तैयारी कर रही हो.. " अब बिना दूरबीन के मौसम को साफ नजर तो नही आ रहा था.. फिर भी आँखें खींचकर वो देखने की कोशिश कर रही थी.. इस बात से बेखबर की उसके स्तन वैशाली की पीठ से दबकर बिल्कुल ही चपटे हो गए थे.. या तो फिर हो सकता है की उसे पता हो और उत्तेजना के मारे जान बूझकर उसने ही अपने स्तन वैशाली की पीठ से दबा दिए हो.. !!

"तुम दोनों में से किसी ने भी मर्द का पेनिस देखा है कभी?" वैशाली के इस बोल्ड और बिंदास प्रश्न से मौसम और फाल्गुनी की हालत खराब हो गई..

फाल्गुनी: "नही दीदी.. कभी नही.. "

मौसम ने कुछ जवाब नही दिया.. वो सोच रही थी की जीजू का लंड आज दिख ही जाने वाला था अगर वो थोड़ी सी और हिम्मत करती तो.. पर खुले बाजार के बीच वो ऐसा कैसे करती?

"कैसा होता है.. वैशाली?" मौसम ने अपने स्तन पीठ पर रगड़ते हुए वैशाली को पूछा

"देख.. देख.. वो औरत उस मर्द का चूस रही है" वैशाली ने मौसम के हाथों में दूरबीन थमाते हुए कहा.. मौसम ने दूरबीन लिया और वैशाली के पीछे से हटकर वो अब फाल्गुनी के पीछे खड़ी हो गई और देखने लगी..


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वैशाली ने मौसम की गर्दन के पीछे एक हल्की सी किस कर दी और बोली "बहोत ही मस्त होता है यार.. मर्द का हथियार.. अब तुम दोनों को क्या बताऊँ.. !! हाथ में पकड़े तो छोड़ने का मन ही नही करता.. देखो वो कितने मजे से चूस रही है? देखा.. ??" वैशाली अब काफी उत्तेजित हो गई थी और उसके हाथ की हलचल इस बात का सबूत दे रहा था क्योंकि उसने फाल्गुनी के स्तनों को नाइटी के बाहर निकाल ही दिया था और अब वो मौसम के स्तनों से खेल रही थी..

मौसम की काँख के नीचे से दोनों हाथ अंदर डालकर वैशाली ने मौसम के दूरबीन पकड़े हाथों को पकड़ लिया.. अब उसने मौसम की नाइटी के अंदर हाथ डालकर जोर से उसके उरोजों को दबाया.. मौसम की हल्की चीख निकल गई.. "क्या कर रही हो यार? जरा धीरे धीरे दबा न.. ज्यादा गर्मी चढ़ रही हो तो चली जा सामने वाले उस कमरे में.. वो तैयार ही बैठा है "

वैशाली ने अपने दोनों स्तन बाहर निकालकर मौसम की पीठ से घिसते हुए उसकी चुत पर उंगली फेरी.. सीधा अपने प्राइवेट पार्ट पर वैशाली के हाथ का स्पर्श महसूस होते ही मौसम सहम गई और अपनी जांघें भींच ली.. "छी छी.. वैशाली.. इन दोनों को तो देख.. कैसा गंदा गंदा कर रहे है!! मुझे तो देखकर ही घिन आती है.. देख तो सही !!"

दूरबीन हाथ में लेकर वैशाली ने देखा.. वह पुरुष उस स्त्री की चूत के होंठों को फैलाकर चाट रहा था.. उस स्त्री की एक टांग खिड़की पर टिकी हुई थी और उसका पार्टनर अपनी जीभ अंदर तक फेर रहा था.. वैशाली ने हँसकर मौसम को अपनी ओर मोडाल और गले लगाते हुए कहा "यार यही तो सब से सर्वोत्तम सुख होता है.. जितना मज़ा लंड से चुदवाने में आता है.. उतना ही मज़ा अपनी चटवाने में भी आता है.. एक बार जीभ का स्पर्श नीचे चूत पर हो तब ऐसे झटके लगते है अंदर.. की तुम्हें क्या बताऊँ.. !!"


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वैशाली के मुंह से "लंड" और "चूत" जैसे शब्द सुनकर फाल्गुनी और मौसम शर्म से लाल हो गए..

मौसम: "वैशाली.. तुमने अभी बताया ना की मर्द का पेनिस देखने लायक होता है.. !! तो मुझे वो देखना है.. !!"

वैशाली ने अन दोनों हाथ नाइटी के अंदर डालकर मौसम के दोनों जवान चुचे हाथ में पकड़ लिए और दबाने लगी..

वैशाली: "तू पागल है क्या मौसम!! मेरे पास लंड कहाँ है जो मैं तुम्हें दिखाऊँ.. !! मेरे पास तो बस तेरे जैसी चूत ही है.. देखना तो मुझे भी है पर अभी इस वक्त लंड कहाँ से लाऊँ??"

फाल्गुनी चुपचाप मौसम और वैशाली की कामुक बातें सुनते हुए दूरबीन से उस कपल की एक एक हरकत को बड़े ध्यान से देख रही थी..

वैशाली: "मौसम, तू एक हाथ से दूरबीन पकड़ और दूसरे हाथ से फाल्गुनी की चुची दबा.. तो उसे भी मज़ा आए.. "

मौसम ने तुरंत ही फाल्गुनी के मासूम स्तनों को दोनों हाथों से दबाते हुए उसके गाल पर पप्पी कर दी.. और एक बार उसके गाल को चाट भी लिया.. गाल पर मौसम की जीभ का स्पर्श होते ही फाल्गुनी उत्तेजना से कराहने लगी.. तभी अचानक वो सामने दिख रहे कपल ने अपनी खिड़की बंद कर दी

फाल्गुनी निराश हो गई "खेल खतम और पैसा हजम"
 
मौसम ने तुरंत ही फाल्गुनी के मासूम स्तनों को दोनों हाथों से दबाते हुए उसके गाल पर पप्पी कर दी.. और एक बार उसके गाल को चाट भी लिया.. गाल पर मौसम की जीभ का स्पर्श होते ही फाल्गुनी उत्तेजना से कराहने लगी.. तभी अचानक वो सामने दिख रहे कपल ने अपनी खिड़की बंद कर दी

फाल्गुनी निराश हो गई "खेल खतम और पैसा हजम"

मौसम ने कहा "अरे यार बहोत जल्दी बंद कर दी खिड़की.. थोड़ी देर और खुली रखी होती तो कितना मज़ा आता देखने का.. !!"

वैशाली: "कोई बात नही मौसम.. खिड़की बंद हो गई तो क्या हुआ.. हम तीनों तो एक दूसरे को मजे दे ही सकते है.. चलो बेड पर.. मैं सिखाऊँगी.. बहोत मज़ा आएगा.. " दोनों को कमरे के अंदर लेते हुए वैशाली ने बालकनी का दरवाजा बंद कर दिया.. बिना किसी शर्म या संकोच के वैशाली ने अपने सारे कपड़े उतार दिए और नंगी होकर बिस्तर पर लेट गई.. और फाल्गुनी से कहा "कम ऑन बेबी.. तू भी अपने कपड़े उतार और मेरे बगल में लेट जा.. चल जल्दी"

फाल्गुनी बहोत शरमा गई और बोली "नही यार.. तू भी क्या कर रही है.. शर्म नाम की कोई चीज है की नही? नंगी होकर लेट गई.. !!"

वैशाली: "अरे ओ डेढ़-सयानी..तेरे बबले तो कब से खुले लटक रहे है.. अब सिर्फ नीचे की लकीर ही तो दिखानी है.. उसमें क्या इतना शर्माना!! चल अब नाटक बंद कर और आजा मेरे पास"

"नही, पहले लाइट बंद करो.. तभी मैं आऊँगी" फाल्गुनी ने आधी सहमति दे दी

मौसम ने तुरंत ही लाइट ऑफ कर दी और उसका रास्ता आसान कर दिया.. अब अंधेरे में भला क्या शर्म?? मौसम और फाल्गुनी अंधेरे का सहारा लेकर पूरी नंगी हो गई और बेड पर वैशाली के साथ लेट गई.. वैशाली अब दोनों कुंवारी चूतों को चुदाई के पाठ सिखाने लगी..


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वैशाली की एक तरफ मौसम और दूसरी तरफ फाल्गुनी लेटी हुई थी और वैशाली कभी मौसम की चूत को तो कभी फाल्गुनी के स्तनों को सहलाते हुए अपनी उत्तेजना सांझा कर रही थी.. फाल्गुनी की चूत पर हाथ फेरते वैशाली को लगा की वो कच्ची कुंवारी तो नही थी.. भले ही वो सेक्स की बात करते हुए डरती हो और ऐसी बातों से दूर ही रहती हो.. पर उसकी चूत का ढीलापन इस बात की गँवाही दे रहा था फाल्गुनी कुंवारी तो नहीं थी..

अचानक वैशाली ने बेड के साइड में पड़ा टेबल-लैम्प ऑन कर दिया.. पूरे कमरे में उजाला छा गया.. अब तक तो अंधेरे में एक दूसरे से नजर बचाते हुए अपनी शर्म को छुपा रहे थे.. पर लाइट चालू होते ही तीनों की नग्नता एक दूसरे के सामने उजागर हो जाने पर मौसम और फाल्गुनी थोड़ी सी सहम गई.. संकोच थोड़ा सा ही हुआ.. क्योंकि थोड़ी देर पहले देखे द्रश्य और वैशाली की हरकतों के कारण फाल्गुनी और मौसम पहले से ही काफी उत्तेजित थी..

कुछ पलों के संकोच के बाद तीनों स्वाभाविक और सामान्य हो गई..

वैशाली ने फाल्गुनी की चूत में अपनी दो उँगलियाँ डालकर अंदर बाहर करते हुए देखा की फाल्गुनी ने न कोई विरोध किया और ना ही कोई पीड़ा का एहसास दिखाया


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वैशाली ने फाल्गुनी से कहा "तू माने या न माने.. जितनी तू लगती है उतनी मासूम तू है नही.. मेरा अंदाजा तो यह कहता है की तू लंड का स्वाद पहले ही चख चुकी है.. "

मौसम तो ये सुनते ही स्तब्ध हो गई "माय गॉड.. वैशाली.. क्या बात कर रही है यार!! फाल्गुनी और सेक्स?? ये लड़की तो किताब में सेक्स शब्द पढ़कर भी थरथर कांपने लगती है.. और तेरा कहना है की उसने सेक्स किया हुआ है?" मौसम ने अपनी सहेली का पक्ष लेते हुए कहा.. आखिर वो उसकी दस साल पुरानी सहेली थी.. दोनों साथ खेल कर बड़ी हुई थी.. एक दूसरे की सभी बातें शेर करती थी.. इसलिए स्वाभाविक था की मौसम फाल्गुनी की साइड लेती

"अरे यार मौसम, तू आजकल की लड़कियों को जानती नही है.. मेरे ससुराल के पड़ोस में एक फॅमिली रहता है.. अठारह साल की उनकी लड़की के सेक्स संबंध उसके सगे बाप के साथ है.. और पिछले आठ साल से दोनों के बीच ये चल रहा है.. खुद वो लड़की ने ही मुझे ये बताया..!!"

वैशाली की बात सुनकर मौसम और फाल्गुनी दोनों बुरी तरह चोंक गए.. "क्या बात कर रही है वैशाली? ऐसा भी कभी होता है क्या? "

वैशाली: "तुम यकीन नही करोगी पर ये हकीकत है.. अभी इतनी रात न हुई होती तो मैं मोबाइल पर तुम दोनों की बात करवाती उस लड़की के साथ" वैशाली ने फाल्गुनी की चूत में उंगली डालते हुए कहा "मुझे भी शोक लगा था जब पहली बार उसके मुंह से ये बात सुनी थी.. और जब मैंने उसकी ये बात को नही माना.. तब उस लड़की ने मुझे रूबरू उन दोनों का सेक्स दिखाया.. !! फिर तो मेरे पास यकीन करने के अलावा और कोई रास्ता ही नही था.. पहले तो उसने अपने बाप के साथ सेक्स करते वक्त वॉइस-रेकॉर्डिंग करके मुझे सुनाया था.. पर उनकी बंगाली भाषा में मुझे कुछ समझ में नही आया.. इसलिए मैंने विश्वास नही किया.. फिर उसने मुझे उन दोनों की चुदाई दिखाई.. तब से मैं ये मानने लगी हूँ की सेक्स में कुछ भी मुमकिन हो सकता है.. ऐसा कभी नही समझना चाहिए की सेक्स में कोई सीमा-रेखा होती है.. मैं फाल्गुनी पर कोई आरोप लगाना नही चाहती पर.. तू खुद ही देख मेरी चुदी हुई चूत को.. !!"

कहते ही वैशाली ने अपने दोनों पैर खोल दिए और अपनी बिना झांटों वाली क्लीन शेव चूत दिखाई..

"ठीक से दिखाई नही दे रहा है.. मैं ट्यूबलाइट ऑन करती हूँ" मौसम ने बड़ी लाइट ऑन कर दी.. पूरा कमरा रोशनी से झगमगा उठा.. और उसके साथ ही तीनों नंगे जिस्मों की उत्तेजना दोगुनी हो गई

वैशाली के मुंह से गंदी और कामुक बातें सुनकर फाल्गुनी ने अपनी गांड ऊपर उठाते हुए एक सिसकी भर ली..

मौसम: "वैशाली, तेरी छातियाँ तो कितनी बड़ी है.. तुझे इसका वज़न नही लगता? कितने बड़े है यार.. !! कम से कम ४० का साइज़ होगा"

हँसते हुए वैशाली ने फाल्गुनी की चूत से उंगली निकाली.. और उंगली पर लगे चूत के गिलेपन को अपने स्तन पर रगड़ दिया.. और अपनी निप्पल खींचते हुए बोली "खुद के ही जिस्म के हिस्सों का वज़न थोड़े ही लगता है कभी!!"

मौसम: "अरे फाल्गुनी.. कुछ दिन पहले कॉलेज से आते हुए याद है हमने क्या देखा था?"

फाल्गुनी: "कब की बात कर रही है? मुझे तो कुछ याद नही आ रहा" वैशाली की उंगली चूत से बाहर निकल जाने की वजह से थोड़ी सी अप्रसन्न थी फाल्गुनी जो उसकी आवाज से साफ झलक रहा था

मौसम: "अरे भूल गई.. !! उस दिन जब हम घर लौट रहे थे तब रोड पर गधा खड़ा था जिसका बड़ा सा पेनिस बाहर लटक रहा था.. !!!"

फाल्गुनी: "हाँ हाँ.. याद आया.. बाप रे.. कितना मोटा और लंबा था !! आते जाते सारे लोग उसे देख रहे थे.. "

मौसम: "उस दिन मैं यही सोच रही थी.. इतना बड़ा पेनिस.. ??"

वैशाली ने मौसम की चूत पर हल्की सी चपत लगाते हुए उसकी बात आधी काट दी और बोली "भेनचोद.. क्या कब से पेनिस पेनिस लगा रखा है!! उसे लंड बोल.. लोडा बोल.. पूरी नंगी होकर मेरे सामने पड़ी है फिर भी बोलने में शरमा रही है.. चल बोलकर दिखा.. "लंड.. !!"

मौसम: "तू जा न यार.. मुझे ये बुलवाकर तुझे क्या काम है?"

फाल्गुनी अब खुद ही अपनी चूत को मसल रही थी.. उसने कहा "मौसम, एक बार बोल ना.. मुझे भी तेरे मुंह से वो शब्द सुनना है.. एक बार तू बोलकर दिखा फिर मैं भी बोलूँगी"

मौसम: "अरे यार तुम दोनों तो बस पीछे ही पड़ गई.. चलो बोल ही देती हूँ.. लंड.. अब खुश?" और फिर शरमाते हुए मौसम ने अपने दोनों हाथों से पूनम के चाँद जैसा सुंदर मुखड़ा छुपा लिया

वैशाली: "अरी मादरचोद.. अपना चेहरा नही.. चूत को ढँक.. चेहरा दिखे तो शर्म की बात नही होती.. पर खुलेआम इस तरह चूत का प्रदर्शन करना ये तो बड़ी शर्मिंदगी वाली बात है.. " मौसम को छेड़ते हुए वैशाली ने उसके स्तन पर चिमटी काट ली और कहा "आज तो तू लंड शब्द बोलने में भी शरमा रही है.. पर एक बार तेरी शादी हो जाएगी और अपने पति के साथ हनीमून पर जाएगी तब इसी लंड को एक सेकंड के लिए भी अपने हाथ से जाने नही देगी.. चल फाल्गुनी.. तेरी बारी.. अब तू बोलकर दिखा"

फाल्गुनी ने तुरंत ही बोल दिया "लंड.. !!" पर बोलते वक्त उसका चेहरा ऐसा हो गया मानों सच में उसके हाथ में असली लंड आ गया हो

शाबाश.. !! हाँ फाल्गुनी.. तू क्या कह रही थी.. गधे के लंड के बारे में??"

फाल्गुनी: "मौसम ने भी उस दिन मुझसे यही सवाल किया था.. इतने बड़े लंड का वज़न नही लगता होगा उसे !! और आज तुम्हारी छातियों के बारे में भी उसने यही बात कही"

"मौसम, तू सिख फाल्गुनी से.. देख कितने आराम से लंड बोल रही है.. !!" वैशाली ने हँसते हुए कहा

मौसम: "वो सब बातें छोड़.. तू अभी यहाँ क्या दिखा रही थी? " मौसम ने वैशाली की चूत की ओर इशारा करते हुए कहा

वैशाली: "ईसे चूत कहते है.. भोस भी कहते है.. बहोत ढीला, बड़ा या ज्यादा चुदा हुआ हो तो भोसड़ा कहते है.. समझी!!" और एक नया पाठ सिखाया वैशाली ने

मौसम: "हाँ बाबा.. चूत.. तो तू क्या दिखा रही थी अपनी चूत में?" अब मौसम ने भी वैशाली के आग्रह से खुली भाषा का स्वीकार कर लिया

वैशाली: "हाँ.. तो मैं ये कहना चाहती थी की चुदी हुई चूत और कच्ची कुंवारी चूत में कितना अंतर होता है तू खुद ही देख.. कितना फरक है तेरी और मेरी चूत में मौसम.. !! और अब फाल्गुनी की चूत देख.. !!"

नंगी उत्तेजक बातें और बीभत्स भाषा के प्रयोग से वैशाली ने मौसम और फाल्गुनी की वासना को इस हद तक भड़का दिया था की दोनों नादान लड़कियां अपनी उत्तेजना को दबाने में असमर्थ हो गई थी.. अपने स्तनों पर वैशाली के हाथों का सुहाना दबाव महसूस करते हुए मौसम बेबस होकर बोली "तू बड़ा मस्त दबाती है वैशाली.. मैं खुद दबाती हूँ तब इतना मज़ा नही आता.. ऐसा क्यों?"

वैशाली: "मुझे क्या पता.. !! पर मुझे लगता है की किसी और का हाथ पड़े तब ज्यादा मज़ा आता है.. अब तू मेरे दबा कर देख.. देखती हूँ कैसा मज़ा आता है" वैशाली जान बूझकर ये खेल खेल रही थी इन लड़कियों के साथ ताकि वह दोनों एकदम खुल जाएँ

वैशाली के पपीते जैसे स्तन मौसम के मुंह के आगे आ गए.. दो घड़ी के लिए मौसम वैशाली के इन तंदूरस्त उरोजों को देखती ही रही और सोच रही थी "बाप रे.. कितने बड़े बड़े है !!"

"देख क्या रही है? दबा ना.. !!" वैशाली ने मौसम को कहा और अपने स्तन को उसके मुंह पर दबा दिया.. "ले.. दबाने का मन ना हो तो चूस ले.. छोटी थी तब अपनी मम्मी की निप्पल चूसती थी ना.. !! वैसे ही चूस.. सच कहूँ मौसम.. जब एक मर्द आपकी निप्पल चूसें तब जो आनंद आता है वो मैं बयान भी नही कर सकती.. उनके स्पर्श में ऐसा जादू होता है.. हम खुद कितना भी मसले या रगड़ें.. पर मर्द के हाथों जैसा मज़ा तो आता ही नही है"

मौसम से पहले फाल्गुनी ने वैशाली का एक स्तन पकड़ लिया और उसके नरम हिस्से को चूम लिया.. फिर वैशाली की गुलाबी निप्पल पर अपनी जीभ फेरी.. और चाटकर बोली "कुछ स्वाद नही आता यार.. ईसे चूसकर क्या फायदा? अगर दूध आता होता तो मज़ा आता"


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वैशाली हंस पड़ी और फाल्गुनी की चूत को सहलाते हुए बोली "मेरी जान.. उसके लिए तो पहले इस चूत में लंड डालकर अच्छे से ठुकवाना पड़ता है.. कितनी रातों तक पैर चौड़े करके अंदर शॉट लगवाने पड़ते है.. मर्द के वीर्य से अपनी चूत भिगोनी पड़ती है.. तब जाकर इन चूचियों में दूध भरता है.. समझी.. !! उँगलियाँ डालने से कुछ नही होता.. असली लंड अंदर घुसता है तब इतना मज़ा आता है की मैं क्या बताऊँ.. मुझे तो अभी अंदर डलवाने का इतना मन हो रहा है की अभी कोई अनजान आदमी भी आकर खड़ा हो जाएँ तो मैं खुशी खुशी अपनी टांगें चौड़ी कर के नीचे लेट जाऊँ"

मौसम भी अब फाल्गुनी की तरह वैशाली का एक स्तन दबाकर चाट रही थी.. और दूसरे स्तन को चूस रही फाल्गुनी के गालों को सहला रही थी.. दोनों लड़कियों को कोई अनुभव नही था.. चुदाई के मामले में उन्हे ट्रेन करने के लिए वैशाली अलग अलग नुस्खे आजमा रही थी.. और ऐसा करने में उसे मज़ा आ रहा था वो अलग..

उसका स्तन चूस रही फाल्गुनी के बालों में हाथ फेरते हुए वैशाली ने पूछा "तुझे लिप किस करना आता है?"

मुंह से निप्पल निकालकर फाल्गुनी ने ऊपर देखा और बोली "थोड़ा थोड़ा आता है"

"ठीक है.. तो अब तू मौसम के होंठों पर किस कर के दिखा.. फिर मैं तुम दोनों को सिखाऊँगी.. ऐसा सिखाऊँगी की तुम्हारे होने वाले पति ऐसा ही समझेंगे की तुम दोनों अनुभवी हो"

"ना बाबा ना.. मुझे नही सीखना.. शादी की शुरुआत में ही हमारे पति हम पर शक करने लगे.. ऐसा नही सीखना मुझे" मौसम घबरा गई

वैशाली: "अरे बेवकूफ.. शादी के पहले मैं अपने मायके में ही चुदकर ससुराल गई थी फिर भी आजतक संजय को पता नही चला.. तू सिर्फ किस करने से घबरा रही है.. !! मर्दों के पास ऐसा कोई मीटर या सेंसर थोड़ी न होता है जिससे उसे पता चलें की शादी के पहले तुमने क्या क्या किया है!! पति को पता ना चले इसलिए कैसे नखरे करने है वो मैं तुम दोनों को सिखाती हूँ"

फाल्गुनी ने आश्चर्य से पूछा "मतलब?? क्या करना है?"

वैशाली ने अब फाल्गुनी की तरफ ध्यान केंद्रित करते हुए कहा "मैं तुझे क्यों सिखाऊँ? तू अपनी निजी बातें मुझे बता नही रही.. फिर मैं तुझे क्यों सिखाऊँ?"

मौसम: "हाँ वैशाली.. सही बात है.. ये कमीनी बहोत कुछ छुपाती है"

फाल्गुनी: "अरे यार.. ऐसा कुछ नही है.. मैंने कब तुझसे कुछ छुपाय है?"

वैशाली: "तो फिर अभी के अभी बता.. तूने किससे चुदवाया है और कितनी बार?"

"सात से आठ बार" आँखें झुकाकर फाल्गुनी ने कहा और फिर खामोश हो गई

सुनते ही मौसम के मुंह से वैशाली की निप्पल छूट गई और वो चोंक कर खड़ी हो गई.. "सात आठ बार?? किसके साथ? कहाँ? मुझे तो विश्वास ही नही हो रहा.. आज तक मुझे पता कैसे नही चला?? पूरा टाइम या तो तू मेरे साथ कॉलेज होती है या फिर अपने घर पर.."

वैशाली: "मैंने कहा था ना.. फाल्गुनी कुंवारी नही है वो तो मैं उसकी चूत देखकर ही समझ गई थी.. जितनी आसानी से उसकी चूत में मेरी दोनों उँगलियाँ चली गई.. कुंवारी होती तो कितना चिल्लाई होती.. तभी मुझे शक हो गया था.. दो दो उँगलियाँ लेकर भी हमे कहती थी की मैं कुंवारी हूँ.. "

मौसम की गीली हो चुकी चूत में एक उंगली डालते हुए वैशाली ने कहा "मौसम, तू ही बता.. एक उंगली अंदर बाहर करने में भी तुझे दर्द होता है ना.. सोच पूरा का पूरा लोडा अंदर घुस जाएँ तो क्या हाल होगा? औसतन इतना मोटा होता है लंड" ड्रेसिंग टेबल पर पड़े हेंडब्रश का हैन्डल दिखाते हुए वैशाली ने कहा

मौसम: "बाप रे.. इतना मोटा.. मैं तो मर ही जाऊँ अगर कोई इतना बड़ा मेरे छेद में डालेगा तो.. मैंने सिर्फ एक बार पतली सी मोमबत्ती अंदर डालने की कोशिश की थी पर इतना दर्द हुआ था की वापिस निकाल लिया.. वैशाली, तू अपनी चूत में आराम से लंड ले पाती है?"

वैशाली: "हाँ हाँ.. क्यों नही.. अरे इस हैन्डल से भी मोटा है मेरे पति का.. और लंबा भी"

मौसम बार बार उस ब्रश के हैन्डल को देखकर कल्पना करते हुए घबरा रही थी.. वो बिस्तर से खड़ी हुई और हेंडब्रश ले आई.. हाथ में उसका हैन्डल पकड़ते हुए बोली "इससे भी मोटा?? मुझे तो यकीन नही होता.. तुझे डलवाते हुए दर्द नही होता??"

"वो बात बाद में.. पहले तू इस मादरचोद रांड से पूछ.. की किसका लोडा ले रही है? हम दोनों भी उससे चुदवाएंगे.. वैसे भी मुझे लंड की सख्त जरूरत है.. तुझे तो पता है.. मेरे और संजय के बीच की अनबन के बारे में.. "

फाल्गुनी बोल उठी "प्लीज यार.. नाम जानने की जिद ना ही करो तो अच्छा है.. मैं नाम नही बता पाऊँगी.. अगर बता दिया तो बड़ा भूकंप आ जाएगा मेरे जीवन में"

मौसम के हाथ से हेंडब्रश लेकर वैशाली ने उसे फाल्गुनी के स्तन पर हल्के से मारते हुए कहा "क्यों?? नाम बताने में क्या प्रॉब्लेम है तुझे? कहीं कोई बड़ा कांड तो नही कर रही तू? सच सच बता.. मुझे तो कोई बड़ा गंभीर लोचा लगता है.. तू लगती है उतनी भोली और मासूम तू है नही!!"

मौसम: "हाँ हाँ.. बता भी दे हरामखोर.. अब तो नाम जाने बगैर हम तुझे छोड़ेंगे नही.. चल वैशाली.. इस रांड पर टूट पड़ते है.. " मौसम फाल्गुनी के ऊपर लेट गई और उसे अपने शरीर के वज़न तले दबाते हुए उसके दोनों स्तन को मसल दिया.. मौसम और फाल्गुनी दोनों की चूत के हिस्से एक दूसरे से छु रहे थे..


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वैशाली ने अपने होंठ फाल्गुनी के होंठों पर रखकर उन्हें चूसना शुरू कर दिया.. दो दो शरीरों के कामुक स्पर्श से फाल्गुनी बेहद उत्तेजित हो गई.. और वैशाली को किस कने में सहयोग देते हुए मौसम की नंगी पीठ को अपने नाखूनों से कुरेदने लगी

मौसम और फाल्गुनी एक दूसरे को बाहों में भरकर रोमांस कर रहे थे और वैशाली फाल्गुनी के होंठ गीले करने के काम में जुटी हुई थी.. फाल्गुनी अब दोनों को अच्छे से रिस्पॉन्स दे रही थी.. वैसे लिप किस करने के मामले में वो अनाड़ी थी पर फिर भी उस बेचारी को जितना आता था उतना कर रही थी..

वैशाली जब झुककर किस कर रही थी तब उसके स्तन मौसम के कंधों से टकरा रहे थे.. तीनों लड़कियां कामदेव के जादू तले बराबर आ चुकी थी.. वैशाली के होंठ चूसने के कारण फाल्गुनी मौसम से भी अधिक उत्तेजित थी.. और वो अपने ऊपर चढ़ी मौसम की पीठ पर नाखून से वार करती जा रही थी.. मौसम के मन में लगातार एक ही प्रश्न मंडरा रहा था.. सात-आठ बार फाल्गुनी ने किससे करवाया होगा? सुबह से लेकर दोपहर तक कॉलेज में वो मेरे साथ होती है.. घर जाने के बाद तीं बजे हम ट्यूशन जाते है और ७ बजे लौटकर घर जाते है.. तो फाल्गुनी ने किस वक्त ये सब करवाया होगा?? बड़ी शातिर है फाल्गुनी..

मौसम को अपनी चूत पर अनोखे गीले स्पर्श का एहसास हुआ और वो नीचे देखने लगी.. अरे बाप रे.. !! वैशाली उसकी चूत चाटने लगी थी.. ओह नो.. वैशाली ये क्या कर दिया तूने? ऐसा तो मुझे कभी महसूस नही हुआ पहले.. आह्ह आह्ह आह्ह.. मौसम फाल्गुनी की ऊपर चढ़ी हुई थी और उसी अवस्था में कमर ऊपर नीचे करते हुए बोली "माय गॉड.. वैशाली.. चाट यार.. अपनी जीभ डाल अंदर.. बहोत मज़ा आ रहा है यार.. इतना मज़ा पहले कभी नही आया मुझे.. ओह्ह!!"



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मौसम की कुंवारी.. थोड़ी सी झांटों वाली चूत काम रस से गीली होकर रिस रही थी.. वैशाली को भी आज लेस्बियन सेक्स में बहोत मज़ा आ रहा था.. दो दो कुंवारी चूत उसकी पक्कड़ में आ चुकी थी.. मौसम और फाल्गुनी दोनों वैशाली की एक एक हरकत पर आफ़रीन हो रही थी.. उसकी हर बात को आदेश के तौर पर मान रही थी वो दोनों..

तीनों लड़कियां एक दूसरे के साथ बिल्कुल ही खुल गई थी.. वैसे वैशाली की कविता के साथ भी गहरी दोस्ती थी लेकिन उनका संबंध जिस्मानी नही था.. जब की इन दोनों लड़कियों ने इस मामले में कविता को भी पीछे छोड़ दिया था.. जो कुछ भी हो रहा था वो संयोग से ही हो रहा था.. मौसम दोपहर को अपने जीजू के साथ हुए रोमांस को याद करते हुए जबरदस्त उत्तेजना महसूस कर रही थी.. और अब फाल्गुनी और वैशाली के साथ उस उत्तेजना को अपने अंजाम तक पहुंचाने वाली थी..

वैशाली मौसम की चूत चाटने में इतनी मशरूफ़ थी की मौसम की सिसकियों को नजरअंदाज करते हुए वह उसकी गांड के नीचे दोनों हाथ डालकर उसके कडक कूल्हों को अपने अंगूठों से चौड़ा करते हुए अपनी जीभ अंदर तक डाल रही थी.. मौसम के लिए ये प्रथम अनुभव था.. पेशाब करने और पिरियड्स निकालने के छेद में इतना मज़ा छुपा हुआ होगा उसका उसे अंदाजा ही नही था.. मौसम को इस बात का ताज्जुब था की चूत शब्द बोलते ही क्यों उसके चूत में झटके लगने लगते थे !! अब तक रास्ते पर चलते.. पान की या चाय की टपरी पर बैठे लोफ़रों के मुंह से यह गंदा शब्द काफी बार सुना था और तब उसे इस शब्द से ही नफरत थी.. आज उसी शब्द को सुनकर उसे बहोत मज़ा आ रहा था..


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फाल्गुनी के स्तनों को दबाते हुए उसने उसके कानों में कहा "मज़ा आ रहा है ना फाल्गुनी?"

"हाँ यार.. मुझे तो बहोत मज़ा आ रहा है.. और तुझे?"

"अरे मुझे तो इतना मज़ा आ रहा है वैशाली के चाटने से की क्या बताऊँ.. !! तूने कभी अपनी चूत चटवाई है फाल्गुनी?"

ये सुनते ही फाल्गुनी की मुनिया में आग लग गई.. "मौसम प्लीज.. तू भी मेरी चूत में अपनी जीभ डाल यार.. !!" फाल्गुनी उत्तेजना से मौसम के कोमल नाजुक बदन को मसलते हुए बोली

मौसम: "नही यार.. मुझे ये सब नही आता.. मैंने कभी किया भी नही है ऐसा.. " दोनों की बातें सुनते हुए वैशाली मौसम की पुच्ची को चाट रही थी

मौसम: "तूने मेरी बात का जवाब नही दिया फाल्गुनी?"

फाल्गुनी: "कौनसी बात का?"

मौसम: "इससे पहले तूने कभी अपनी चूत चटवाई है?"

फाल्गुनी खामोश रही.. बदले में उसने मौसम के गाल को चूसा और अपना हाथ नीचे ले जाकर अपनी और मौसम की चूत को सहलाने लगी.. सहलाते हुए कभी उसकी उंगली वैशाली की जीभ का स्पर्श करती तो वैशाली उसकी उंगली को भी चाट लेती.. फाल्गुनी की उंगली को गीला करके वैशाली ने उस उंगली को मौसम की चूत के अंदर डाल दिया

"आह्ह.. " फाल्गुनी की उंगली अंदर घुसते ही मौसम की सिसकी निकल गई..

"कितनी गरम गरम है तेरी चूत तो यार.. !!" फाल्गुनी ने कहा.. और तेजी से अपनी उंगली अंदर बाहर करने लगी..

"आह्ह.. मर गई.. ऊईई.. माँ" मौसम चिल्लाई.. फाल्गुनी ने तुरंत अपने होंठ उसके होंठों पर दबाकर और उसके स्खलित होने से निकली चीख को रोक दिया.. मौसम का पूरा शरीर अकड़ कर बिस्तर से ऊपर उठ गया.. दो सेकंड के लिए उसी अवस्था में थरथराने के बाद वह धम्म से बिस्तर पर गिरी.. तेज सांसें भरते हुए.. ए.सी. कमरे में भी उसे पसीने छूट गए.. फाल्गुनी की उंगली और वैशाली की जीभ, दोनों ने मिलकर मौसम की मुनिया को एक जानदार ऑर्गजम दिया था..

अब वैशाली ने अपनी जीभ से फाल्गुनी की चूत पर हमला कर दिया.. उसकी चूत को चाटते हुए वैशाली एक पल के लिए रुकी और उसने मौसम से कहा "मौसम, अब तेरी बारी.. चल मेरी चूत चाट जल्दी से.. "

अपनी साँसों को नियंत्रित करते हुए मौसम ने कहा "यार, मुझसे नही होगा ये.. !!"

"क्यों? मादरचोद.. चटवाते वक्त तो तुझसे सब कुछ हो रहा था.. अब चाटने की बारी आई तो नखरे कर रही है? चुपचाप चाटना शुरू कर वरना ये हेरब्रश का हेंडल तेरी चूत में घुसेड़कर गुफा बना दूँगी" वैशाली ने गुर्रा कर कहा

"यार, मैंने पहले कभी चाटी नही है वैशाली"

"साली रंडी.. आजा.. तुझे सब सीखा दूँगी.. " कहते हुए वैशाली अपने विशाल स्तनों को खुद ही दबाते हुए खड़ी हुई और मौसम को धक्का देकर बेड पर लिटा दिया.. वैशाली मौसम के स्तनों पर सवार हो गई और अपनी गुलाबों को दोनों होंठ उंगलियों से चौड़े करके मौसम के होंठों पर रगड़ने लगी.. न चाहते हुए भी मौसम उसकी चुत पर जीभ फेरने के लिए मजबूर हो गई.. यह देख उत्तेजित होकर फाल्गुनी अपनी चूत पर हेरब्रश तेजी से घिसने लगी..


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वैशाली की बेकाबू जवानी हिलोरे ले रही थी.. अनुभवहीन मौसम की जीभ को ट्रेन करते हुए उसने मौसम के सर के नीचे दोनों हाथ डालकर उसे कानों से पकड़ते हुए अपनी चूत से दबाए रखा था.. और अपनी चूत चटवाएं जा रही थी.. मौसम को शुरू शुरू में चूत और उसके पानी की गंध बड़ी ही विचित्र लगी.. पर वैशाली ने उसे ऐसे पकड़ रखा था की छूटना मुश्किल था.. आखिर अपने हथियार डालकर उसने अपनी जीभ को वैशाली के सुराख के अंदर बाहर करना शुरू कर दिया.. थोड़ी ही देर में वह सीख गई.. वैशाली चुत चटवाते हुए अपनी गदराई गांड मौसम के स्तनों पर रगड़ रही थी.. जिससे मौसम नए सिरे से सिहर रही थी.. वैशाली ने मौसम के स्तनों पर घोड़े की तरह सवारी करते हुए अपनी लय प्राप्त कर रही थी.. आगे पीछे हो रही वैशाली के दोनों खरबूजे बड़ी ही अद्भुत तरीके से हिल रहे थे.. दोनों के नरम नरम अंग एक दूसरे से रगड़ खा रहे थे..

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मौसम की चूत में फिर से खुजली होने लगी.. वो अभी थोड़ी देर पहले ही झड़ी थी.. पर वैशाली की चूत की मादक गंध और बबलों की मजबूत रगड़ाई के कारण उसकी चुनमुनिया फुदकने लगी.. तीन चार मिनट तक चाटते रहने के बाद अब मौसम को भी वैशाली की पनियाई चूत के अंदर जीभ डालने में मज़ा आने लगा था.. उसकी रसीली कामुक चिपचिपी चूत के वर्टिकल होंठ और क्लिटोरिस को अपने मुंह में भरकर वो मस्ती से चूस रही थी.. बगल में लेटी फाल्गुनी हेरब्रश के हेंडल को अपनी चूत पर रगड़े जा रही थी..

तीनों लड़कियां अपनी हवस शांत करने के लिए अलग अलग क्रियाएं करने में व्यस्त थी.. लेकिन उनकी वासना शांत होने के बदले और भड़क रही थी.. रात के डेढ़ बजे का समय हो रहा था.. पर तीनों में से किसी की भी आँखों में नींद का नामोनिशान नही था.. थी तो बस नारी की हवस..


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तीनों लड़कियां अपनी हवस शांत करने के लिए अलग अलग क्रियाएं करने में व्यस्त थी.. लेकिन उनकी वासना शांत होने के बदले और भड़क रही थी.. रात के डेढ़ बजे का समय हो रहा था.. पर तीनों में से किसी की भी आँखों में नींद का नामोनिशान नही था.. थी तो बस नारी की हवस..

आज फाल्गुनी का बिल्कुल नया ही स्वरूप देख रहे थे मौसम और वैशाली.. अचानक वैशाली ने अपनी आगे पीछे होने की गति बधाई.. वो बड़ी ही आक्रामकता से अपनी चूत को मौसम के चेहरे के साथ रगड़ने लगी.. वैशाली के प्रहारों से मौसम बिलबिलाने लगी.. लेकिन वैशाली के जोर के सामने वो ज्यादा कुछ नही कर पाई.. अब मौसम थक चुकी थी.. खुले बालों के साथ हाँफ रही वैशाली का पूरा चेहरा लाल हो गया था.. पसीने से तरबतर हो गई थी उसकी गर्दन.. उसका पसीना दोनों स्तनों के बीच से गुज़रता हुआ उसकी चूत से होकर मौसम के चेहरे पर टपकने लगा था.. फाल्गुनी यह द्रश्य और वैशाली का कामुक स्वरूप देखकर ही झड़ गई.. हेरब्रश का डंडा चूत में डालने की जरूरत ही नही पड़ी..

"ओह्ह ओह्ह ओह्ह आह्ह मर गई.. चाट जल्दी.. डाल जीभ अंदर.. ऊईई आह्ह.. ओह गॉड.. उफ्फ़.. !!!!" की कामुक आवाजों के साथ वैशाली झड़ गई.. जैसे भूकंप आने से बहुमंजिला इमारत ढह जाती है.. संध्या होते ही दो पर्वतों के बीच सूरज ढल जाता है.. वैसे ही वैशाली भी पस्त होकर गिर पड़ी.. फाल्गुनी की चूत ने झड़ने के बाद काफी पानी निकाला था.. बेड के चद्दर पर बड़ा सा धब्बा हो गया था चूत के रिसे हुए पानी से.. फाल्गुनी और वैशाली दोनों ठंडी हो चुकी थी.. पर मौसम अब फिरसे उत्तेजित हो गई थी.. अब समस्या यह थी की वैशाली या फाल्गुनी दोनों में से कोई भी उसका साथ देने के लिए फिलहाल तैयार नही थे..


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मौसम खड़ी हो गई.. और बालकनी की दीवार के पास खड़ी होकर अपनी चूत को खुजाने लगी.. चारों तरफ अंधकार था.. ठंडी सरसराती हवाएं उसके नंगे बदन को चूमते हुए निकल रही थी.. मौसम की पुच्ची में खुजली का जोर बढ़ता जा रहा था.. उसे अपने पीयूष जीजू की याद आ रही थी.. पीयूष ने कैसे उसके होंठों पर उसके जीवन का प्रथम चुंबन दिया था.. उसके ड्रेस में हाथ डालकर उरोजों को पकड़कर दबाया था.. आह्ह.. !!

मौसम ने पीछे मुड़कर बिस्तर की तरफ देखा.. वैशाली और फाल्गुनी.. एक दूसरे की बाहों में बाहें डालकर.. नवविवाहित जोड़ें की तरह पड़े हुए थे.. फाल्गुनी वैशाली के होंठों पर अपनी जीभ फेर रही थी.. और हेरब्रश का हेंडल वैशाली की चुत के अंदर डाल रही थी.. लगभग ६ इंच लंबा हेंडल कैसे वैशाली की चूत के अंदर चला गया ये देखना चाहती थी मौसम.. !! वह वापिस बेड पर आई.. वैशाली के दोनों पैरों को चौड़ा किया और फाल्गुनी के हाथ से हेरब्रश ले लिया..

मौसम: "मुझे सच सच बता.. फाल्गुनी.. तूने जो लंड लिया वो इतना ही लंबा था?"

फाल्गुनी: "इतना लंबा तो नही था"

मौसम: "तो इससे आधा ??"

वैशाली: "मौसम, लगता है तुझे लंड देखने की बड़ी चूल मची है.. एक काम कर.. यहाँ हमारे ग्रुप में से किसी भी एक मर्द को पसंद कर और चुदवा ले.. यहाँ कौन देखने वाला है तुझे!! घर वापिस लौटकर चुदवाना तो छोड़.. लंड देखना भी नसीब नही होगा !!"

फाल्गुनी: "मन तो मेरा भी कर रहा है.. पर किसी को भी कैसे राजी करें? सीधा जाकर ऐसा तो नही बोल सकते की चलो चोदते है!!"

वैशाली: "तुम दोनों मुझे एक बात बताओ.. अगर तुम्हें एक रात के लिए किसी एक मर्द के साथ बिताने का मौका मिले.. तो हमारे ग्रुप में से कीसे चुनोगी?"

सवाल बड़ा ही रोमांचक था.. मौसम और फाल्गुनी दोनों शरमा गई.. नग्न स्त्री या लड़की को शरमाते देखना बड़ा ही मनोहर द्रश्य होता है

मौसम: "पहले तू बता वैशाली.. तुझे कौन पसंद है?"

वैशाली: "मुझे तो सब पसंद है.. अगर मौका मिले तो मैं एक ही रात में सभी मर्दों से चुदवा लूँ.. पर अभी बात मेरी नही, तुम दोनों की हो रही है.. तो बताओ मुझे.. हो सकता है की तुम्हारी पसंद के मर्द के साथ रात गुजारने का मैं ही तुम दोनों के लिए सेटिंग कर दूँ....

फाल्गुनी: "माय गॉड.. तुम तो दलाल जैसी बात कर रही हो.. !!"

मौसम: "यार फाल्गुनी.. मुझे तो लगता है की वैशाली ने इस ग्रुप के किसी मर्द के साथ ऑलरेडी सेक्स कर लिया है.. मुझे तो यकीन है!!"

फाल्गुनी: "अच्छा? तो तेरे हिसाब से वैशाली ने किसके साथ किया होगा? कौन हो सकता है?"

थोड़ी देर सोचने के बाद मौसम ने कहा "हम्म.. एक तो राजेश सर के साथ और दूसरा.. !!"

वैशाली रोमांची होकर बोली "हाँ हाँ बोल ना.. कौन हो सकता है दूसरा!!" वो देखना चाहती थी की मौसम अपने मुंह से पीयूष का नाम लेती है या नही

मौसम: "दूसरा कौन हो सकता है.. ये मुझे पता नही.. फाल्गुनी, तू बता.. तू किसके साथ रात गुजारना चाहेगी?"

फाल्गुनी के स्तन टाइट हो गए.. रात बिताने की कल्पना से ही.. !!

उसने शरमाते हुए कहा "पिंटू के साथ, मौसम। मुझे वो बहोत ही पसंद है.. कितना क्यूट है यार!! कल से उसकी तरफ देखकर लाइन दे रही हूँ.. पर वो कमीना मेरे सामने नजर उठाकर देखता तक नही है!! मुझे लगता है की उसे किसी ओर लड़की में इन्टरेस्ट होगा.. !!"

मौसम अपनी बहन कविता के राज के बारे में थोड़ा बहोत जानती थी.. फाल्गुनी के मुंह से पिंटू का नाम सुनकर वो चोंक गई.. कहीं पिंटू और कविता के बीच अब भी कुछ??? बाप रे.. !! जिस कंपनी में पिंटू जॉब करता हैं, वहीं पर जीजू भी है.. ये कड़ियाँ कहीं न कहीं तो जुड़ ही रही होगी.. मौसम चुपचाप सोचती रही..

फाल्गुनी: "अब तेरी बारी है मौसम.. तू बता"

मौसम उलझन में पड़ गई.. कैसे कहूँ की मैं अपने जीजू पीयूष के साथ रात बिताना चाहती हूँ!!

पीयूष जीजू की याद आते ही मौसम बेचैन हो गई.. जीजू के संग बिताएं वो दो घंटों का सुहाना समय.. उसके जीवन का एक अविस्मरणीय पन्ना था.. पीयूष के साथ बिताएं उन पलों के बाद.. मौसम ज्यादातर उत्तेजित रहती और उसे बार बार अपनी गीली मुनिया में उंगली करने को दिल कर रहा था.. आज से पहले उसे कभी ऐसा एहसास नही हुआ था.. अब तक तो वो दो हफ्तों में.. कभी कभी महीने में एकाध बाद चूत में उंगली करती या टूथब्रश घुसाकर सो जाती.. पर माउंट आबू के इस मदहोश वातावरण में.. पीयूष के संग बिताई उस दोपहर के बाद.. और खास कर उस सेक्स शॉप में हुए अनुभव के बाद.. जैसे उसकी कामुकता को रोके रखने वाला दरवाजा ही टूट गया.. हाय रे जवानी.. !! बालकनी में नंगी खड़ी मौसम.. अपने कुँवारे स्तनों पर लग रही ठंडी ठंडी हवा के स्पर्श का मज़ा लेते हुए पीयूष की लिप किस को याद कर रही थी.. उसने हल्के से अपनी छाती पर हाथ रखा और बालकनी की दीवार पर एक पैर टीकाकर.. मजबूत लंड के धक्के कखाने को बेकरार.. उसकी गुलाबी चूत को सहलाने लगी.. जैसे अपनी चूत को मना रही हो.. उसे ताज्जुब इस बात का हो रहा था की कैसे वैशाली, फाल्गुनी और पीयूष के हाथ उसके जिस्म पर सरककर निकल गए!! वो माउंट आबू की हसीन वादियों का मज़ा लेने आई तब निर्दोष मासूम बच्ची थी.. एक ही दिन में जिंदगी ने ऐसी करवट ली.. की उसकी पूरी सोच ही बदल गई.. उसने कभी सपने में भी नही सोचा था की उसकी कुंवारी जवानी की धरती पर.. पीयूष नाम का बादल यूं बरस पड़ेगा.. !!

स्तन मर्दन करते हुए उसकी जवानी की भूख इतनी बेकाबू हो चली.. की बार बार उसकी चूत फड़फड़ा उठती.. अपने दिल को उसने बार बार समझाया की शादी के बाद ही ये सारी चीजें हो सकती है.. पर कमबख्त दिल था की मानता ही नही था.. !! क्या करूँ? कैसे समझाऊँ अपने जिस्म को? ये तो अच्छा हुआ की ऐसे वक्त पर मुझे वैशाली और फाल्गुनी का साथ मिल गया.. नहीं तो जरूर मैं कुछ गलती कर बैठती.. !! उसने एक नजर बेड पर लेटी अपनी नंगी सहेलियों की ओर देखा.. एक दूसरे के गले में बाहें डालकर बेफिक्र होकर दोनों लेटी हुई थी..


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मौसम धीरे से बेड की तरफ आई.. ट्यूबलाइट के सफेद प्रकाश में वैशाली की मदमस्त छाती इतनी गदराई और तंदूरस्त नजर आ रही थी.. देखते ही अच्छे अच्छों की नियत खराब हो जाएँ.. मौसम ने फाल्गुनी के स्तनों की ओर देखा.. देखकर पता चलता था की भले ही वैशाली जीतने दबे नही थे पर फाल्गुनी अनछुई भी नही थी.. और अब तो उसने खुद ही इस बात का एकरार कर लिया था.. !! वो खुद ही बता चुकी थी की वो सात से आठ बार चुद चुकी थी.. पर पहली बार जब उसने अपनी नाजुक सी फुद्दी में लंड लिया होगा तब उसे कैसा अनुभव हुआ होगा?? लंड.. लंड.. लंड.. !! बाप रे.. ये शब्द सोचते ही चूत में ४४० वॉल्ट का झटका लग जाता था.. पता नही चूत के अंदर लेते वक्त क्या होता होगा..!!

वैशाली और फाल्गुनी के बीच पड़ा हेरब्रश मौसम ने उठाया.. और उसे चूम लिया.. पता नही चल रहा था की वो ऐसा क्यों कर रही थी!! एक निर्जीव लकड़ी से बने ब्रश को चूमने पर इतना मज़ा क्यों आ रहा था भला.. !! मौसम को वो रात याद आ गई जब उसके गाने से खुश होकर संजय ने उसे ५०० रुपये दिए थे.. वैशाली का कहना था की उसका पति संजय बहोत ही लोफ़र और दिलफेंक किस्म का आदमी था.. कहीं ५०० रुपये देकर संजय मुझे पटाना तो नही चाहता था.. !!! उस वक्त तो ऐसा कुछ नही लगा था.. और उस वक्त के बाद संजय से मिलना भी तो नही हुआ था.. वैसे संजय दिखने में बड़ा हेंडसम है.. तो फिर वैशाली को उससे इतनी भी क्या दिक्कत होगी??

हेरब्रश को अपनी छाती से रगड़ते हुए मौसम ये सब सोच रही थी.. सारे विचारों को अपने दिमाग से हटाकर मौसम ने फाल्गुनी की नंगी जांघों पर हेरब्रश का डंडा हल्के से रगड़ दिया.. कहीं फाल्गुनी को संजय ने तो नही चोद दिया होगा?? नही नही.. संजय और फाल्गुनी मिले ही एक बार है.. ऐसा होना असंभव था.. गहरी नींद में सो रही फाल्गुनी को अपने शरीर पर किसी चीज का स्पर्श महसूस नही हुआ.. मौसम की नजर फाल्गुनी की चूत पर पड़ी.. उसकी चूत भी जैसे गहरी नींद सो रही थी.. वैशाली द्वारा चटवाने के बाद शांत पड़ी चूत काफी सुस्त लग रही थी.. वैशाली की टांगें थोड़ी सी चौड़ी करके हेरब्रश का डंडा उसकी चुत पर रगड़ा.. वैशाली का सुराख थोड़ा सा चौड़ा था.. पर मेरी चूत तो अब भी कितनी टाइट और कसी हुई है!! शायद इसी वजह से वैशाली को फाल्गुनी पर शक हुआ था की उसका सील टूटा हुआ था.. सील टूटते वक्त कैसा महसूस होता होगा?? अब मौसम वापिस फाल्गुनी की चूत पर हेरब्रश रगड़ने लगी.. सोचते सोचते अनजाने में ही मौसम ने हेरब्रश का हेंडल फाल्गुनी की चूत के अंदर धकेल दिया..

"आह्ह.. !!" फाल्गुनी की आँख एकदम से खुल गई.. उसने बगल में बैठी नग्न मौसम को चूत के अंदर डंडा डालते देख वह अपनी आँखें मलते हुए खड़ी हो गई.. "तू अभी भी जाग रही है.. !! नींद नही आ रही क्या?"

मौसम को हाथ में हेरब्रश पकड़े देखकर उसने आगे पूछा "क्या बात है मौसम? तू क्या करने वाली थी? सच सच बता मुझे"

मौसम: "कुछ नही यार.. मैं ये सोच सोचकर परेशान हो रही हूँ की आखिर तूने इतनी सारी बार सेक्स किया किसके साथ? मैंने दिमाग पर जोर डालकर बहोत सोचा पर कोई नाम नही सुझा मुझे.. मुझे बता न यार!! जब तक मैं ये जान नही लूँगी तब तक मेरे मन को चैन नही पड़ेगा.. तेरा उस व्यक्ति का संपर्क कैसे हुआ था? पहचान कैसे हुई थी? मुझे तूने क्यों कुछ नही बताया? मुझसे छुपाने का क्या कारण था?? इस बात का मुझे दुख हो रहा है ये जाहीर सी बात है.. मैंने आज तक तुझसे मेरी कोई बात नही छुपाई फिर तूने मेरे साथ आखिर ऐसा किया ही क्यों?"

एक ही सांस में मौसम ने कई सवाल दाग दिए फाल्गुनी की ओर.. पूछते पूछते उसने हेरब्रश का चार इंच जितना हिस्सा फाल्गुनी की चूत में डाल दिया था.. और वो उसे हिलाते हुए आगे पीछे भी कर रही थी.. फाल्गुनी को मज़ा आना शुरू हो गया था इसका पता चल रहा था क्योंकि वो मौसम के हाथों की हलचल के साथ तालमेल मिलाते हुए अपने चूतड़ भी हिला रही थी.. !! उसकी कमर और गांड की हलचल से ये साफ प्रतीत हो रहा था की उसकी चूत में भी खुजली हो रही थी..


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मौसम: "बोल ना फाल्गुनी.. मुझसे क्यों छुपा रही है? क्या तू मुझे अपना नही मानती? ठीक है.. नही बताना है तो मत बता" कहते हुए नाराज होकर उसने हेरब्रश चूत से बाहर निकाल लिया और नाराज होकर फाल्गुनी की बगल में लेट गई

फाल्गुनी: "मौसम, तू समझती क्यों नही है यार!!! मैं नाम नही बता सकती.. अगर बता सकती तो तुझसे छुपाती ही क्यों? अगर मैंने नाम बता दिया तो हाहाकार मच जाएगा.. प्लीज यार.. मुझे नाम बताने के लिए ओर फोर्स मत कर"

नाराज मौसम को देखकर फाल्गुनी सोच में डूब गई.. इस मामले को सुलझाएं कैसे? किसी भी सूरत में अपना ये सीक्रेट मौसम को नही बता सकती थी ये बात तो पक्की थी.. मौसम नाराज होकर करवट बदलकर फाल्गुनी से विरुद्ध दिशा में सो गई.. मौसम की चूत में जबरदस्त खुजली हो रही थी पर साथ ही साथ उसका दिमाग ये सोच रहा था की यही सही वक्त था फाल्गुनी से वो राज उगलवाने का.. अगर वो आज जान नही पाई तो ये राज हमेशा राज बनकर ही रह जाएगा..

मौसम को कंधे से पकड़कर फाल्गुनी ने अपनी और खींचा और बोली "नाराज हो गई यार!! मैंने आज तक तुझसे कोई बात कभी छुपाई है क्या!! वो हरीश मुझे लाइन मारता था वो भी बता दिया था मैंने तुझे!!"

मौसम: "हाँ फाल्गुनी.. तुझे जो लड़का लाइन मार रहा था उसके बारे में तो सब बता दिया था तूने.. पर जो तुझे चोद गया उसके बारे में मुझे कुछ भी नही बता रही.. एक बार को तो ऐसा भी विचार आया मुझे की कहीं उस लफंगे हरीश के साथ तो तूने नही चुदवाया ना?? हो सकता है.. क्यों नही हो सकता.. जो लड़की अपनी सब से खास सहेली से इतनी बड़ी बात छुपा सकती है.. वो कुछ भी कर सकती है"

फाल्गुनी अब बराबर फंस चुकी थी.. उसने एकदम धीमी आवाज में कहा "तूने ऐसा क्यों नही सोचा की मेरे लिए बताना मुमकिन नही होगा तभी नही बताया होगा... वरना मैं क्यों तुझसे कुछ भी छुपाऊँ?? और तुझसे छुपाकर मुझे क्या फायदा?"

मौसम: "क्या फायदा ये तो छुपानेवाला ही बता सकता है.. कुछ तो होगा कारण.. हो सकता है की तुझे लगता हो की अगर मुझे बताएगी तो मैं भी तेरे साथी में हिस्सा मांगूँगी.. !!"

फाल्गुनी: "पागलों जैसी बात मत कर, मौसम!!"

मौसम: "तुझे ये भी विचार नही आया की सात आठ बार मजे लूट लेने के बाद तू मुझे भी मौका देती..!! मुझे पता नही था की तू इतनी स्वार्थी होगी.. अब तक तो हम एकदम खास सहेलियाँ थी.. पर शायद अब तुझे अकेले अकेले ही खाने में मज़ा आने लगा है.. जा.. अब से तेरी कट्टी"

पहाड़ टूट पड़ा फाल्गुनी पर.. मौसम रूठ जाएँ तो कैसे चलेगा.. !! फाल्गुनी अपने माँ बाप के बगैर रह सकती थी पर मौसम के बगैर उसे एक पल नही चलता था.. इतनी गहरी दोस्ती थी दोनों की.. फाल्गुनी को भी मन ही मन गुस्सा आ रहा था.. की मौसम ऐसी बात के लिए उससे रूठ गई!! पर मैं भी क्या करूँ? अगर मौसम को सब सच बता दूँ तो कयामत आ जाएगी.. और नही बताती तो दोस्ती टूट जाएगी.. ओह्ह क्या करूँ?

रात के साढ़े तीन बज रहे थे पर मौसम या फाल्गुनी.. दोनों की नींद उड़ चुकी थी.. वैशाली घोड़े बेचकर सो रही थी.. अपनी चूत शांत करके.. अब वो सच में सो रही थी या ढोंग कर रही थी वो तो उसे पता.. !! पर मौसम और फाल्गुनी के संबंध ऐसे चौराहे पर आकर खड़े हो गई थे की अगर फाल्गुनी सच नही बताती तो दोनों की दोस्ती वहीं खतम होने वाली थी

बहोत उदास हो गई फाल्गुनी.. जिंदगी ऐसे कठिन मोड पर लाकर खड़ा कर देगी ऐसा उसने कभी नही सोचा था.. सोचते सोचते कब दोनों की आँख लग गई उन्हे पता ही नही चला..
 
बहोत उदास हो गई फाल्गुनी.. जिंदगी ऐसे कठिन मोड पर लाकर खड़ा कर देगी ऐसा उसने कभी नही सोचा था.. सोचते सोचते कब दोनों की आँख लग गई उन्हे पता ही नही चला..

सुबह साढ़े छह बजे एलार्म बजते ही सब से पहले वैशाली की आँख खुली.. उसने धक्का देकर मौसम को जगाया.. अपने नंगे जिस्म को देखकर.. वैशाली को पिछली रात की रंगीन घटनाएं याद आ गई.. मन ही मन मुस्कुराते हुए उसने मौसम को हाथ से सहारा देकर उठाया और गुड मॉर्निंग कहते हुए उसे गले से लगा लिया.. स्तन से स्तन मिलें.. और स्तनों ने भी आपस में सुप्रभातम कर लिया..

"अब इस चुड़ैल को भी जगा..फिर हम तीनों बाथरूम में एक साथ नहायेंगे.. सब के सामने तैयार होकर जाने से पहले.. एक एक ऑर्गैज़म हो जाए.. फिर किसी की ओर आकर्षण होने का कोई खतरा नही.. वरना इस छुपी रुस्तम फाल्गुनी का कुछ कह नही सकते.. माउंट आबू में ही किसी को ढूंढकर उसके नीचे लेट जाएगी.. और फिर हम से कहेगी.. सात-आठ बार नही पर नौ बार चुदवाया है.. अभी भी साली मादरचोद ने उसका नाम नही बताया.. और ये भी नही बताया की सात-आठ बार एक ही लंड लिया था या हर बार अलग अलग था.. !!"

सुबह-सुबह वैशाली के मुंह से यह नंग-धड़ंग बातें सुनकर मौसम की चूत में कुछ कुछ होने लगा.. मौसम खड़ी हुई और वैशाली को उसकी निप्पल से खींचते हुए बाथरूम के अंदर ले गई.. और इंग्लिश कमोड पर बैठकर पेशाब करने लगी.. उसने निप्पल पकड़े रखी थी.. वैशाली ने कहा "क्या कर रही है यार तू? दर्द हो रहा है.. ऐसे भी भला कोई निप्पल खींचता है क्या!! दिमाग-विमाग है या नही? नहाना मुझे भी है.. ऐसे ही थोड़े बिना नहाए साइट सीइंग के लिए निकल पड़ूँगी!! अब जल्दी खतम कर और खड़ी हो जा.. मुझे भी बड़ी जोर से लगी है" मौसम के हाथ से अपनी निप्पल छुड़वाते हुए वैशाली ने थोड़े गुस्से से कहा

पर मौसम ने उसकी एक न सुनी.. और आराम से कमोड पर ही बैठकर मुस्कुराते रही.. आखिर थककर वैशाली बाथरूम के फर्श पर ही उकड़ूँ बैठ गई और मूतने लगी.. दोनों की पेशाब की धार की आवाज पूरे बाथरूम में गूंज रही थी..

वैशाली: "वो रांड अब तक जागी क्यों नही? रात को कहीं किसी वेटर के साथ चुदवाने तो नही गई थी ना.. !! उसका कुछ कह नही सकते" मौसम के गले में अपने बाहों का हार डालकर उसकी नाक से अपनी नाक रगड़ते हुए उसने कहा

मौसम ने झुककर अपना हाथ वैशाली की मूत रही चूत पर लगाया और पेशाब की धार से अपनी हथेली गीली करके खुद की चूत पर मल दिया और आँखें बंद कर किसी दूसरी दुनिया में ही पहुँच गई और बोली "आहाहाहा.. वैशाली कितना गुनगुना और गरम लग रहा है यार!! मन कर रही है की टांगें चौड़ी करके यहीं नीचे लेट जाऊँ.. और तेरे पेशाब की धार सीधी अपने चूत में लूँ.. "


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मौसम के सुंदर स्तनों को दबाते हुए वैशाली ने कहा "अरे यार.. पहली बता देती.. चूत में क्यों.. तेरे मुंह में ही मेरी धार मार देती.. ऐसा मस्त नमकीन स्वाद तुझे और कहीं चखने को नही मिलेगा.. "

मौसम को घिन आ गई "छी छी यार.. मुंह में भी कभी कोई मुतता है क्या!!!"

वैशाली: "यार मौसम.. ये फाल्गुनी हमे उस चोदनेवाला का नाम क्यों नही बता रही? कोई बहोत बड़ा राज है क्या?"

मौसम: "रात को हम दोनों के बीच इस बारे में काफी कहा सुनी हुई थी.. तू सो गई उसके बाद.. मैंने कितनी बार पूछा पर उसने बताया ही नही.. इतना बुरा लगा मुझे.. दोस्ती में ऐसा भी क्या छुपाना!!! अगर मुझे बता देती तो मैँ कौन सा उसके लवर को छीन लेने वाली थी..!!"

वैशाली: "हाँ यार.. उस बात का मुझे भी बुरा लगा था.. जब हम तीनों इतना खुल चुके थे तब उसे बताने में भला क्या दिक्कत थी?? अब उसे बताना ही ना हो फिर पूछकर क्या काम.. !!"

मौसम: "हमें काम तो कुछ नही पर जानना जरूरी है.. कहीं वो किसी उलटे सीधे मर्द के साथ फंस गई हो तो हम उसकी मदद कर सकते है "

वैशाली सोचने लगी.. मौसम की बात तो सही थी.. एक तरफ फाल्गुनी सेक्स से इतना परहेज करती है.. और फिर भी सात-आठ बार कर चुकी है.. ऐसा कैसे हो सकता है? कहीं किसी के चंगुल में तो नही फंस गई? या फिर कोई ब्लैकमेल कर रहा हो.. ??

वैशाली: "तेरी बात बिल्कुल सही है मौसम.. कुछ तो बड़ा लोचा है.. हमें कुछ करना ही होगा" वैशाली वैसे ही नंगी कमरे में चली गई और फाल्गुनी को जगाकर बाथरूम में खींच लाई..

फाल्गुनी को अंदर लाकर वैशाली ने शावर चालू कर दिया और तीनों एक दूसरे पर पानी उड़ाते हुए खेलने लगी.. पानी का जादू ही कुछ ऐसा होता है की बूढ़े से बूढ़ा आदमी भी उसके संसर्ग में आकर बच्चे जैसा बन जाता है.. गीजर के गरम गुनगुने पानी को एक दूसरे पर उछालते हुए वैशाली दोनों के साथ बातें कर रही थी.. पर मौसम और फाल्गुनी एक दूसरे से नजरें चुरा रही थी.. दोनों बात भी नही कर रही थी.. फाल्गुनी से मौसम का ये बदला बदला सा रूप बर्दाश्त नही हो रहा था.. उसने मौसम पर पानी उड़ाकर उसे मनाने की कोशिश तो की.. पर मौसम तौलिया लेकर बिना कुछ कहें कमरे में चली गई..


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वैशाली समझ गई की दोनों के बीच अनबन हुई थी.. मौसम के बाहर जाते ही मौके का फायदा उठाकर वैशाली ने दरवाजा बंद कर लिया और फाल्गुनी को अपनी बाहों में दबा दिया.. फाल्गुनी ने वैशाली के होंठों पर किस करते हुए कहा "देख वैशाली.. जैसे तूने सिखाया था वैसे ही किस करना अब आ गया मुझे"

वैशाली: "अब वो तो होना ही था.. क्यों नही आता भला.. !! आखिर गुरु कौन है तेरी!!! हा हा हा हा.. पर मुझे ऐसी शेखी नही मारनी चाहिए की मैंने ही तुझे किस करना सिखाया" वैशाली ने परोक्ष तरीके से बात छेड ही दी.. फाल्गुनी के स्तनों पर साबुन मलते हुए दूसरा साबुन उसने उसके हाथ में दे दिया.. फाल्गुनी समझ गई और वो भी वैशाली के भरे भरे स्तनों पर साबुन लगाते हुए बोली "मतलब? तू कहना क्या चाहती है?"


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वैशाली: "मेरे कहने का ये मतलब है की तूने सात-आठ बार जिसका भी लंड अपनी चूत में दलवाया.. उसने सीधे सीधे तो लंड अंदर नही डाला होगा न.. पहले बूब्स दबाएं होंगे.. चूसे होंगे.. चूत चाटी होगी.. और लिप किस भी की होगी.. फिर मैं ये कैसे कह सकती हूँ की मैंने तुझे सिखाया?"

"वो तो उन्होंने की थी.. मैंने थोड़े ही की थी? जिसने की हो वही जाने.. उनके करने से मुझे किस करना कैसे आ जाता.. !! पर ये बता दूँ.. की तुझे और मौसम को किस करने में जो मज़ा आया था वैसा मज़ा उनके साथ नही आया था यार.. !!"

फाल्गुनी के बोलते ही वैशाली ने नोटिस किया "उन्होंने.. उनके.. " शब्द प्रयोग का अर्थ यह था की फाल्गुनी को चोदने वाला कोई उसकी उम्र का या उसकी आसपास की उम्र का नही था.. कोई बड़ी उम्र का या बुजुर्ग ही हो सकता है.. अब नाम जानने के लिए फाल्गुनी को फुसलाना जरूरी था.. वैशाली का दिमाग भी उसकी माँ शीला जैसा तेज था.. उसने एक तरकीब सोची..

फाल्गुनी की चूत पर साबुन रगड़ते हुए वैशाली ने अपनी एक उंगली अंदर डाली और उसके होंठों पर एक लंबी किस कर दी.. दोनों के साबुन लगे स्तन एक दूसरे के संग दब गए.. चूत में उंगली करते हुए उसने फाल्गुनी से कहा "फाल्गुनी, मेरी एक रीक्वेस्ट है.. "


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फाल्गुनी: "हाँ हाँ बोल ना.. !!"

वैशाली: "यार, बात दरअसल यह है की तुझे शायद नही पता होगा.. मेरे और मेरे पति संजय के बीच जरा भी नही बनती.. पिछले काफी समय से हम एक दूसरे से ठीक से बात तक नही करते.. तुझे पता है फाल्गुनी, मर्द तो घूमते रहते है और अपनी जरूरतें बाहर कहीं भी पूरी कर लेते है.. लेकिन हम लड़कियां ऐसा नही कर सकती.. मर्दों को अपनी हवस बुझाने के लिए बाजार में ढेरों लड़कियां मौजूद है जो पैसे लेकर अपने शरीर का सौदा कर लेती है.. पर हम लड़कियों के लिए वो सुविधा भी आसानी से उपलब्ध नही होती.. यार फाल्गुनी, तू अभी कुंवारी है इसलिए शायद मेरी बात समझ में नही आएगी.. पर एक बार हमारी चूत को लंड की आदत पड़ जाती है ना.. फिर उसे वो चाहिए ही चाहिए.. संजय तो अब मुझे छूता तक नही.. या यूं कह लो की मैं उस मादरचोद को हाथ लगाने नही देती.. किसी रांड की चूत में घुसा हुआ लंड मैं क्यों अपने मुंह में लूँ.. ??" वैशाली ऐसे ऐसे शब्दों का प्रयोग कर रही थी जिन्हे सुनकर फाल्गुनी की चूत गरम भांप छोड़ने लगी..

बाथरूम से बाहर आकर मौसम ने कपड़े पहन लिए.. मेकअप भी कर लिया.. लेकिन वैशाली और फाल्गुनी अभी तक बाथरूम में ही घुसी हुई थी.. क्या कर रही होगी वो दोनों अंदर? दरवाजा भी बंद है.. जरूर रात जैसा है कोई कार्यक्रम शुरू किया होगा दोनों ने.. मैं भी अंदर रहती तो मज़ा आता.. वैशाली के साथ वैसे तो बहोत मज़ा आता ही है.. बोल्ड और ब्यूटीफुल है वो.. पर इन दोनों ने दरवाजा अंदर से बंद क्यों कर रखा है? मौसम को ज्यादा विचार करने की जरूरत नही पड़ी क्योंकि दरवाजे के करीब खड़े रहकर उसे वैशाली की बातें स्पष्ट सुनाई दे रही थी.. अब मौसम कान लगाकर उनकी बातें बाहर से सुन रही है उसका पता वैशाली और फाल्गुनी को कैसे चलता.. !!



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वैशाली: "मुझे तो हर रात को इतनी इच्छा होती है.. रोज रात होते ही मेरी भूख जाग जाती है और मुझसे बर्दाश्त नही होती.. संजय तो अपनी मस्ती में कहीं पड़ा रहता है.. और मैं यहाँ मर्द के स्पर्श को तरसती और तड़पती रहती हूँ.. फाल्गुनी, मैं भी जवान हूँ.. मेरे भी अरमान है.. जरूरतें है.. ज्यादा से ज्यादा तीन दिनों तक अपनी भूख को सहन कर लेती हूँ.. चौथे दिन तो ऐसा मन करता है की कहीं भाग जाऊँ.. अलग अलग प्रयोग करके खुद को संतुष करने की कोशिश करती हूँ.. पर कितने दिनों तक?? ओरीजीनल लेने में कितना मज़ा आता है.. तुझे तो पता ही है.. !!"

फाल्गुनी: "हाँ यार वैशाली.. तेरी बात बिल्कुल सही हैं.. मैं कितनी भी कोशिश करूँ मुझसे गलती हो ही जाती है.. साला कंट्रोल ही नही रहता.. पर तू मुझसे क्या चाहती है, ये तो बता.. !!"

वैशाली: "बुरा मत मानना फाल्गुनी, तेरा जो भी पार्टनर हो उसे मैं छिनना नही चाहती.. पर एक बार मुझे भी उनसे मिलवा दे.. मुझे बहोत मन कर रहा है यार.. इस चूत में असली लंड गए हुए एक साल से ऊपर हो गया है.. मुझे तो लगता है की मैं पागल हो जाऊँगी.. "

फाल्गुनी: "जो तू कह रही है वो मुमकिन नही हो सकता.. कोई चांस ही नही है:

वैशाली: "मैं समझ सकती हूँ यार.. पर अगर तेरे पार्टनर के साथ मुमकिन न हो तो उसके कोई दोस्त से सेटिंग करवा दे.. हम दोनों मिलकर मजे करेंगे"

फाल्गुनी: "यार वैशाली, मैं तुझे कैसे समझाऊँ? ये पोसीबल ही नहीं ये.. वो मौसम भी यही बात को लेकर मुझसे रूठी हुई है.. उसे भी नाम जानना है.. अगर मैं उसे नाम बता दूँगी तो उसकी क्या हालत होगी वो नही जानती.. और तुम भी कल रात से इसी जिद पर अडी हुई हो..!!"

मौसम दरवाजे पर कान चिपकाकर ये सारी बातें बड़े ध्यान से सुन रही थी.. उसकी सांसें गले में अटक गई थी.. कहीं कोई बात सुनने में रह न जाए इसलिए वो एकटक अपना ध्यान अंदर की बातों पर केंद्रित कर सुन रही थी.. उसे वैशाली की बात सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ.. एक स्त्री होकर कैसे वो अपनी दोस्त का पार्टनर मांग रही थी!!!! वो भी सेक्स करने के लिए ?? माय गॉड.. एक नंबर की बेशर्म है साली.. !!"

फाल्गुनी: "वैशाली, जैसा तूने कहा की मर्दों को पैसे देकर लड़कियां मिल जाती है.. तो क्या संजय भी ऐसी लड़कियों के साथ संबंध रखता है ??"

वैशाली की उंगलियों का जादुई असर अब फाल्गुनी पर हो रहा था.. उत्तेजित होकर वो विचित्र सवाल पूछ रही थी जिनका जवाब भी उत्तेजना और अश्लीलता से भरपूर ही होने वाला था


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वैशाली: "हाँ यार.. दो दो महिना बाहर रहकर जब वो घर आता है.. तब इतने आराम से मेरे बगल में लेटे हुए बिना कुछ कीये पड़ा रहता है.. देखकर ही पता चल जाता है की वो अपनी आग कहीं और बुझाकर आया है.. बाकी ऐसा कौन सा पति होगा जो दो महीने तक अपनी पत्नी से दूर रहकर वापिस आयें और अपनी पत्नी को हाथ भी ना लगाएं.. !!!"

फाल्गुनी: "सही बात है.. मर्द लोग तो कुछ भी कर सकते है.. ना जगह देखते है.. न समय देखते है.. जब मन करे तब छेड़ने लगते है.. हम लोगों तो कितनी शर्म आती है पर उन्हें तो कोई शर्म ही नही होती.. !!"

वैशाली: "जैसे पुरुषों के लिए लड़कियों और औरतों का बाजार होता है वैसे ही हम लड़कियों के लिए भी लड़कों/मर्दों का बाजार होता तो कितना अच्छा होता.. !! मेरी जैसी भूखी लड़कियां.. विधवा.. तलाकशुदा औरतें.. वहाँ जाकर अपनी पसंद के लड़के से चुदकर हवस को शांत कर पाती.. ये भूख अब सही नही जाती.. तू मानेगी नही.. इतना मन करता है की तुझे क्या बताऊँ?? कल रात तुम दोनों ने देखा था न.. कितनी गरम हो गई थी मैं!! ये जानते हुए की मेरी खुजली शांत कर सकें ऐसा लंड हाजिर नहीं है फिर भी कैसे मैंने मेरी चूत को तेरे और मौसम के चेहरे पर चिपका दिया था!! अब तुझसे क्या छुपाना.. संजय की उपेक्षा से मैं तंग आकर मैं यहाँ अपनी मम्मी के पास आ गई.. और सेक्स की इतनी तीव्र इच्छा हो रही थी की मैंने मम्मी की गैरमौजूदगी में अपने कॉलेज के पुराने फ्रेंड को घर बुलाकर चुदवा लिया.. तब जाके नीचे थोड़ी ठंडक मिली.. पर मुसीबत ये है की एक बार करने पर भूख थोड़े समय के लिए शांत तो हो जाती है.. पर दो-तीन बितते है वापिस अंदाई लेकर भूख जाग जाती है.. कभी कभी तो पुरुषों को देखकर इतने गंदे गंदे विचार आने लगते है मन में की क्या बताऊँ? मन करता है की उनको वहीं धर दबोचूँ और अपनी चूत में उनका लंड ले लूँ.. अब ऐसे मैं कहीं मुझसे कोई बड़ी गलती हो गई तो?? इसीलिए मैंने तुझसे कहा.. की तू जिसके साथ मजे करती है उसके साथ मेरी भी सेटिंग करवा दे.. तू बुरा मत मानना.. पर तू तो कुछ दिनों में चली जाएगी.. फिर मुझे ऐसा चांस दोबारा नही मिलेगा.. मुझे एक बार तो मजे कर लेने दे यार.. तुझे क्या दिक्कत है?? पर जब तू नाम भी नही बता रही तो करने देने का कोई सवाल ही नही उठता.. " एक भारी सांस छोड़ते हुए वैशाली ने कहा

फाल्गुनी: वैशाली, तू मेरे पार्टनर के साथ सेक्स करें उसमें मुझे कोई प्रॉब्लेम नही है.. पर मैं उलझन में हूँ.. अगर मैं वो नाम बता दूँगी तो तू मेरे बारे में क्या सोचेगी!!! और मौसम को पता चलेगा तो उसके सर पर आसमान टूट पड़ेगा.. !!"

वैशाली: 'मैं प्रोमिस करती हूँ.. ये बात मौसम को कभी पता नही चलेगी.. तुझे मुझपर इतना भरोसा तो होना चाहिए.. और वैसे भी मैं कुछ दिनों में वापिस कलकत्ता चली जाऊँगी.. तेरा राज मेरे सीने में महफूज रहेगा.. "

फाल्गुनी: "बात तो तेरी ठीक है.. पर कहते हुए मेरी जबान नही चलती.. प्लीज यार.. !!"

वैशाली: "फाल्गुनी, तू नाम देने में जितना शरमा रही है.. उतनी ही मेरी बेसब्री बढ़ते जा रही है.. अगर तूने मुझे नाम बता दिया.. तो मैं मौसम से तेरी दोस्ती फिर से करवा दूँगी.. बिना उसे कुछ बताएं.. ये मेरा वादा है.. " वैशाली ने फाल्गुनी के दोनों स्तनों को दबाकर उसे उत्तेजित कर दिया.. शावर का गरम पानी उसकी चूत से होकर टपकते हुए उसे बेहद आनंद दे रहा था

फाल्गुनी: "ये कैसे मुमकिन होगा वैशाली? बिना नाम जाने मौसम नही मानेगी.. और मैं किसी भी सूरत में उसे नाम नही बता पाऊँगी.. नाम बता दूँगी तो भी हम दोनों की दोस्ती हमेशा हमेशा के लिए टूटने वाली है फिर मैं क्यों बेकार में उसके पापा का नाम बदनाम करूँ???"

वैशाली की सिट्टी-पीट्टी गुम हो गई.. उसके मुंह से चीख निकल गई "मतलब तू मौसम के पापा के साथ..............!!!!!!!!!!!!!!!!" वहीं चीख दरवाजे से होते हुए मौसम के कानों तक पहुँच गई और फिर हवा में ओजल हो गई..

फाल्गुनी: "धीरे बोल वैशाली.. कहीं मौसम ने सुन लिया तो गजब हो जाएगा.. वो तो जान से मार देगी मुझे.. "

वैशाली: "फाल्गुनी, मौसम के पापा के साथ तेरा संपर्क कैसे हुआ? कैसे शुरू हुआ ये सब? कुछ विस्तार से बता तो पता चले मुझे" वैशाली ने एक मिशन तो पार कर लिया था अब दूसरे की तैयारी करने लगी..

फाल्गुनी: "वो सब बाद में बताऊँगी वैशाली.. हम लोग कब से बाथरूम के अंदर घुसकर बैठे है.. सब नीचे साइट-सीइंग के लिए हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे.. मौसम भी क्या सोचेगी हमारे बारे में.. !! और हाँ.. तू मेरी और उसकी दोस्ती करवा दे फिर मैं अपनी कहानी सुनाऊँगी!!"

वैशाली: "उसका हल तो काफी सिम्पल सा है.. तू ऐसे ही किसी का भी नाम बता दे मौसम को.. ऐसे व्यक्ति का नाम बता दे जिसे मौसम जानती तो हो पर उससे कन्फर्म करने ना जा सके "

फाल्गुनी: "ऐसे कैसे किसी का भी नाम ले लूँ?"

वैशाली: "दिमाग पर थोड़ा जोर लगा और सोच.. कोई तो नाम होगा.. कोई बुजुर्ग.. या पड़ोसी या कोई रिश्तेदार.. !!"

"नही यार.. ऐसा कोई नही है जिसका नाम ले सकूँ" फाल्गुनी सोचते हुए बोली

"तुम्हारे कॉलेज का कोई प्रोफेसर? " वैशाली उसे नाम सोचने में मदद करने लगी

"प्रोफेसर तो सारे जवान है.. हाँ प्रिंसिपल सर बूढ़े है.. उनका नाम बता दूँ?" फाल्गुनी खुश हो गई.. अपनी समस्या का हल मिलने पर चमक आ गई उसके चेहरे पर..

"हाँ.. बढ़िया रहेगा.. मौसम तुम्हारे प्रिंसिपल से ये पूछने तो जाएगी नही की.. सर, क्या आप मेरी फ्रेंड को चोदते हो?.. " वैशाली ने कहा

फाल्गुनी: "पूछने जाने का तो सवाल ही नही है.. बहोत ही स्ट्रिक्ट है प्रिंसिपल सर.. चल अब हम दोनों निकलते है बाहर"

वैशाली: "और सुन.. बाहर जाकर.. जैसा मैं कहूँ वैसे ही मौसम से बात करना.. ठीक है"

"ओके.. " कहते हुए फाल्गुनी अपने और वैशाली के गीले जिस्म को तौलिए से पोंछने लगी..

बाहर मौसम की पूरी दुनिया गोल गोल घूम रही थी.. वो बेड पर अपना सर पकड़कर बैठी हुई थी.. पापा?? मेरे पापा?? ऐसा कैसे कर सकते है? फाल्गुनी के साथ सेक्स? मौसम के लिए उन दोनों के बाहर आने से पहले नॉर्मल हो जाना काफी जरूरी था.. नहीं तो उनको पता चल जाता की मौसम ये बात जान चुकी थी.. उसने आईने में देखकर अपना मेकअप ठीक कर लिया और लिपस्टिक लगाते हुए गीत गुनगुनाने लगी..

वैशाली और फाल्गुनी बाथरूम से बाहर निकले.. मौसम को मेकअप में व्यस्त देखकर दोनों के दिल को राहत मिली.. खास कर फाल्गुनी को.. क्यों की उसे डर था की जब वैशाली ने चीखकर उसके पापा का नाम लिया तब शायद मौसम ने सुन लिया हो.. !! डरते डरते उसने तिरछी नज़रों से मौसम की ओर देखा.. मौसम तो बेफिक्री से बैठी हुई थी..

वैशाली: "मौसम.. मैंने इस रंडी से उसके पार्टनर का नाम उगलवा लिया"

मौसम: "वैशाली, तू उसकी खास सहेली है.. इसलिए तुझे तो वो सब बताएगी.. दिक्कत तो उसे सिर्फ मुझे बताने में है.."

फाल्गुनी की आँखों में आँसू आ गए "ऐसा नही है मौसम.. तू मुझे गलत समझ रही है यार.. प्लीज ऐसा मत बोल"

मौसम को जैसे फाल्गुनी के आँसू या उसकी बातों से कोई फरक ही नही पड़ा हो वैसे उसने कहा "चलो अब नीचे चलें.. !! सब लोग हमारा वैट कर रहे होंगे"

फाल्गुनी के उदास चेहरे के सामने वैशाली ने देखा..

वैशाली: "मौसम, इतना भी क्या गुस्सा करना? ऐसा गुस्सा अक्सर दोस्ती के लिए खतरनाक साबित होता है.. डोर को कभी इतना भी मत खींचो की वो टूट जाएँ.. !!"

मौसम: "मैंने कहाँ कुछ किया या कहा है? जो भी किया है फाल्गुनी ने किया.. हम दोनों बचपन से साथ है.. एक दूसरे को हर छोटी बड़ी बात बताते है.. पर आज उसने इतनी बड़ी बात मुझसे छुपाई और तुझे बता दी.. अब तू ही बता.. मुझे दुख तो होगा ना.. !!"

फाल्गुनी ने नजरें झुकाते हुए कहा "यार, वो हमारे कॉलेज के प्रिंसिपल सर है.. इसलिए उनका नाम लेने में मुझे शर्म आ रही थी.. !!"

मौसम को दूसरा सदमा पहुंचा.. दोस्ती में एक और झूठ???

एक तरफ तो अपने पापा और फाल्गुनी के संबंधों के बारे में जानकर उसकी रूह कांप गई थी.. ऊपर से प्रिंसिपल के नाम का झूठ सुनकर उसे बड़ा धक्का लगा.. पर उसने अपने चेहरे से ये प्रतीत नही होने दिया.. और नॉर्मल होकर बोली "अरे वो टकलू.. !! तूने क्या देख लिया उस बूढ़े खूसट में? तू चाहती तो एक से बढ़कर एक लड़के तेरी टांगों के बीच आने के लिए तैयार थे.. हरीश है. राज है.. सब लाइन मारते है तुझे.. और तुझे उस बूढ़े माथुर में ऐसा क्या नजर आ गया.. ??"

मौसम को नॉर्मल होकर चर्चा में शामिल होता देख वैशाली खुश हो गई.. चलो आखिर सब ठीक होने लगा था..

वैशाली: "हाँ यार फाल्गुनी.. मौसम की इस बात से तो मैं भी सहमत हूँ.. कोई बांका जवान हेंडसम लड़का होता तो तुझे अपनी छातियाँ मसलवाने में कितना मज़ा आता.. उस बूढ़े में ऐसा क्या दिख गया तुझे? साले का एक पैर कबर में और दूसरा पैर अस्पताल में.. वो तुझे चोद गया.. मुझे तो ये बात हजम नही हो रही" फाल्गुनी ब्रा के हुक बंद करते हुए अपने तंदूरस्त स्तनों को थोड़ा सा उभारने लगी.. ताकि उनका आकार बाहर नजर आयें..


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फाल्गुनी: "मैंने सामने से कहाँ कुछ किया है यार.. आप लोग तो मुझ पर ऐसे टूट पड़े जैसे मैं सामने से माथुर सर की चेम्बर में जाकर नंगी होकर लेट गई.. तुझे याद है मौसम उस दिन हम माथुर सर की चेम्बर में.. उस हरामी हरीश की कंप्लेन करने गए थे?? याद कर.. !!"

मौसम: "हाँ हाँ.. याद आया.. !!" मौसम को ताज्जुब हुआ.. कितनी आसानी से बातों की कड़ियाँ जोड़ रही है ये फाल्गुनी..!!!

फाल्गुनी: "उस दिन फिर तू बाहर पटेल सर से बात करने के लिए रुक गई और जैसे ही मैं माथुर सर के चेम्बर में गई.. तो मैंने देखा की वो पल्लवी मैडम को अपनी गोद में बिठाकर उनके बूब्स दबा रहे थे.. और पल्लवी मैडम उन्हे किस कर रही थी.. दोनों इतने बीजी थे की मैं उनके पास जाकर खड़ी हो गई तब तक उन्हें पता ही नही चला.. मैडम के ब्लाउज में हाथ डालकर वो उनके बूब्स को मसल रहे थे.. मैडम भी उनके पेंट के अंदर हाथ डालकर बैठी थी.. यार मौसम.. मैंने तो पहले कभी ऐसा कुछ देखा ही नही था.. मैं तो बुरी तरह चोंक गई.. क्या करूँ समझ में नही आ रहा था.. तभी अचानक उनकी नजर मेरे ऊपर पड़ी.. मैं भागकर बाहर चली गई.. दूसरे दिन तू कॉलेज नही आई थी.. तब कॉलेज खतम होने के बाद मैडम ने मुझे स्टाफ रूम में बुलाया और दरवाजा अंदर से बंद कर दिया.. फिर उन्होंने जबरदस्ती अपने बूब्स मुझसे दबवाये और कहा की अगर मैं किसी को भी इस बारे में कुछ बताऊँगी तो वो मुझे फैल कर देंगे.. मैं बहोत डर गई थी यार.. इसलिए तुझे बता न सकी.. इस में मेरी क्या गलती? मैंने अपनी मर्जी से तो कुछ किया नही था"

वैशाली: "तूने मैडम के साथ ये सब किया तो माथुर सर बीच में कैसे आ गए फाल्गुनी? मुझे लगता है तू अभी भी कुछ छुपा रही है"

फाल्गुनी: "मैं सब कुछ बताती हूँ.. थोड़ा रुको तो.. !!"

तभी मौसम के मोबाइल पर पीयूष का कॉल आया.. उसने कहा की सब बस में बैठ चुके थे और तीनों की राह देख रहे थे.. जल्दी आओ.. तीनों फटाफट निकले पर निकालने से पहले वैशाली ने मौसम और फाल्गुनी की फिरसे दोस्ती करवा दी और कहा "मौसम, गुस्सा थूक दे.. "और फिर दोनों के स्तनों को बारी बारी दबा दिया.. फिर वैशाली और फाल्गुनी दोनों ने मिलकर मौसम के स्तन एक साथ दबाएं और उसे हंसा दिया.. मौसम फाल्गुनी से गले लग गई.. फाल्गुनी की आँखों से आँसू टपक पड़े.. वो इतना ही बोल पाई "मौसम प्लीज.. दोबारा कभी मेरे साथ ऐसा मत करना.."

मौसम: "तूने मुझसे ये सब छुपाया नही होता तो ये नोबत ही नही आती.. चल.. अब सब भूल जा.. चलते है अब.. देर हो गई है"

वैशाली: "एक मिनट रुको.. कुछ दिनों के बाद मैं वापिस कलकत्ता चली जाऊँगी.. फिर न जाने कब मिले.. एक लास्ट किस तो बनती है" तीनों ने एक दूसरे को किस किया और स्तन दबाएं और खिलखिलाकर हँसते हुए बाहर निकली


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मौसम नॉर्मल होने का दिखावा कर रही थी.. लेकिन उसके दिल और दिमाग में तो आग जल रही थी.. रह रहकर उसे ये विचार आ रहा था की पापा और फाल्गुनी ने ऐसा क्यों किया? कब किया होगा? मम्मी कहाँ थी तब? मैं कहाँ थी? क्या वो दोनों मेरे घर पर ही करते होंगे? या फिर पापा की ऑफिस में?? नही नही ऑफिस में तो नही हो सकता.. तो फिर कहाँ मिलते होंगे वो दोनों.. और एकाध बार नही.. सात आठ बार.. !! जानना तो पड़ेगा ही.. फाल्गुनी पर नजर रखूंगी तो सब पता चल जाएगा.. !!!
 
शीला नंगी होकर अपने दामाद संजय की बाहों में पड़े पड़े गोवा की आखिरी रात को रंगीन बनाने की तैयारी में थी.. दोनों आज अपनी सारी इच्छाओं को पूर्ण करने की फिराक में थे.. क्योंकी ऐसा मौका उन्हें दोबारा नही मिलने वाला था.. दोनों आपस में एकदम खुल चुके थे

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शीला की एक एक सिसकी.. संभोग के समय के हावभाव देखकर संजय पागल हो जाता था.. अब तो नोबत ऐसी आन पड़ी थी शीला के साथ प्रत्येक क्षण वो उत्तेजित ही रहता था.. पूरा समय लंड खड़ा रहने के कारण उसे दर्द होता था.. चार चार बार झड़ने के बाद भी शीला, संजय के गोरे.. वीर्य-विहीन लंड को अपनी मुठ्ठी में पकड़े रखती थी..

शीला: "बेटा.. मैंने कभी सोचा भी नही था की अपने दामाद के साथ ही मुझे ये सब करने का मौका मिलेगा.. जो कुछ भी हो रहा है वो मुझे इतना अच्छा लग रहा है की तुम्हें बता नही सकती.. लेकिन आज ये सब कुछ करने का आखिरी दिन है.. तू एक जानदार मर्द है.. एक औरत होने के नाते मैं इतना तो कह ही सकती हूँ की तू अपनी कामुक हरकतों से किसी भी लड़की या स्त्री को अपनी गुलाम बना सकता है.. संजय बेटा.. तेरी हरेक हरकत ऐसी होती है की तुझसे एक बार चुदने के बाद कोई भी तेरे इस डंडे को कभी भूल नही पाएगा.. और मैं तो पहले से ही सेक्स की काफी शौकीन हूँ.. तेरे ससुर के साथ मैंने इतने खुलकर मजे कीये है की तुझे क्या बताऊँ.. !! तेरे साथ चुदते वक्त.. तेरे दमदार धक्कों को मेरी चूत में लेते वक्त.. मुझे ऐसा ही लगता था जैसे तेरे अंदर मदन घुस गया हो.. ये तेरा सुंदर लंड इतना रसीला है की कोई भी स्त्री उसे देखते ही अपने छेद में लेने के लिए बेबस हो जाएँ.. " शीला ने झुककर संजय के लंड को चूम लिया

संजय: "आहह मम्मीजी.. मुंह में लेकर चुसिए..बहोत मज़ा आ रहा है.. मम्मीजी, मैंने आज तक सेंकड़ों लड़कियों और औरतों को चोदा है.. पर आपके जैसी स्त्री मैंने आजतक नही देखि जो २४ घंटे बस चुदने के लिए ही बेकरार हो.. !!" कहते हुए संजय ने शीला के गदराए स्तनों को बड़ी मस्ती से दबा दिया "मम्मीजी, आप एक बार कलकत्ता आइए.. वहाँ मेरे बहोत सारे दोस्त है.. आपको नए नए लंडों को स्वाद मिलेगा.. !!"

शीला: "बेटा.. इतने दूर सिर्फ लंड लेने के लिए आऊँ?? और मुझे अलग अलग लंड लेने में दिलचस्पी नहीं है.. मुझे तो चाहिए एक ताकतवर लंड जो मेरे जनम जनम की भूख को संतुष्ट कर सकें.. मेरी चूत में जो हर दस मिनट पर चुदवाने की चूल मचती है.. उसे शांत कर सकें.. संजयं, तू यहाँ शिफ्ट हो जा.. फिर हम आराम से एक दूसरे को भोग सकेंगे.. तू मेरा दामाद है इसलिए किसी को शक भी नही होगा.. मेरा दिल अभी तेरा लंड लेकर भरा नही है.. अभी तो मुझे तुझसे बहोत बार चुदवाना है.. इतनी बार करवाना है की दोबारा कभी चुदवाने का मन ही न हो" कहते हुए शीला ने संजय को बिस्तर पर लेटा दिया और उसपर सवार हो गई.. संजय के लंड को अपनी गांड के छेद पर सेट किया और हल्के से दबाया.. आह्ह..

शीला: "तेरे मोटे लंड से जब गांड की दीवारें रगड़ती है तब बड़ी ही तेज खुजली होती है अंदर.. आज इस आखिरी रात को यादगार बनाने के लिए मैं तुझसे अपनी गांड मरवाना चाहती हूँ"

संजय: "ओह्ह ओह्ह आह्ह मम्मीजी.. कितनी टाइट है आपकी गांड आह्ह.. " सिसकियाँ लेते हुए संजय ने अपनी गांड ऊपर कर दी और शीला की कमर को दोनों हाथों से पकड़कर उसकी गांड को ड्रिल करने लगा.. शीला की दर्द से भरी सिसकियाँ.. और संजय की कराहों की गूंज के बीच.. शीला की गांड को चीरता हुआ संजय का तगड़ा लंड अंदर घुस गया.. शीला के परिपक्व और मदमस्त स्तनों को दोनों हाथों से पकड़कर मसलते हुए संजय ने उसे अपनी ओर खींचा.. और उसके रसीले कामुक होंठों पर एक जबरदस्त किस कर दी..


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शीला और उसका दामाद संजय.. एक कपल की तरह नही.. पर पति पत्नी की तरह एक दूसरे में खो गए.. संजय का लंड शीला की गांड में ऐसे फिट हो गया जैसे वो दोनों जनम जनम के साथी हो.. कमर हुचकाते हुए संजय.. अपने लंड को शीला की गांड के अंदर बाहर कर रहा था.. और शीला की गांड ऐसे लंड गटक रही थी जैसे उसका सर्जन ही लंड लेने के लिए हुआ हो.. बड़ी मस्त ठुकाई हो रही थी शीला की गांड की..

संजय: "ओह्ह मम्मी जी.. कितनी टाइट गांड है यार.. मेरे लंड में दर्द होने लगा है.. आह्ह जरा धीरे धीरे.. !!!"

शीला: "आह्ह बेटा.. मेरा तो मन कर रहा है की मैं तेरी रखेल बन जाऊँ.. और तू मुझे पूरा दिन चोदता रहें.. अलग अलग आसनों में..ओह्ह बेटा.. बहोत जोरों की खुजली मची है मेरी गांड में.. लगा जोर से धक्के.. फाड़ दे मेरी गांड.. आह्ह आह्ह ओह्ह ओह्ह.. !!"

संजय के ऊपर हिंसक होकर कूद रही थी शीला.. कैसी जवान लड़की से दोगुना जोर था शीला के धक्कों में.. उसकी गदराई कामुक काया की एक एक अंग भंगिमा.. किसी भी पुरुष को अपने वश में करने के लिए काफी थी.. शीला ने हाथ नीचे डालकर संजय का लंड पकड़ लिया और थोड़ा सा रुककर अपनी गांड से बाहर निकाला.. थोड़ा सा झुकी और एक ही धक्के में अपने भोसड़े में उतार दिया..


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शीला: "आह्ह.. आग तो यहाँ भी लगी हुई है.. जमकर धक्के लगा बेटा.. आग बुझा दे मेरी.. अब और रहा नही जाता संजु बेटा.. !!" शीला ने अपनी रिधम प्राप्त कर लिए थी.. वो संजय के जिस्म पर ऐसे हावी हो गई थी जैसे किसी बड़े मगरमच्छ ने छोटी सी गिलहरी को दबोच रखा हो.. संजय का लंड अब दर्द करने लगा था.. पर अपना बचाव करने की स्थिति में नही था वो.. शीला ने जैसे उसके शरीर, मन और मस्तिष्क पर कब्जा कर लिया था.. बेजान पड़े पड़े वो बस शीला से संचालित हो रहा था.. शीला के इस सुनामी जैसे हमले को देखकर वो स्तब्ध हो गया था.. पड़े रहने के अलावा उसके पास ओर कोई विकल्प नही था.. शीला इतनी हिंसक होकर उसके लंड पर कूद रही थी जैसे उसके लंड को शरीर से अलग कर देना चाहती हो..

संजय अब घबरा रहा था.. कहीं शीला की ये तीव्र सेक्स की भूख उसकी जान न ले ले.. आँखें बंदकर वो प्रार्थना कर रहा था की शीला जल्द से जल्द झड जाए.. करीब १२ मिनट के भीषण धक्कों के शीला ढल पड़ी.. ऐसे लाश होकर संजय की छाती पर गिरी जैसे उसके शरीर की सारी ऊर्जा भांप बनकर उड़ गई हो.. शीला के विराट स्तनों और बदन के वज़न तले संजय दब गया था.. उसका लंड अब वीर्य छोड़ पाने की स्थिति में भी नही रहा था.. और बिना झड़े ही नरम होकर शीला के भोसड़े से बाहर निकल गया था.. और मरे हुए चूहे जैसे लटक रहा था.. दायें तरफ के आँड की ओर लटक रहे मुरझाएं लंड को देखकर ही पता लग रहा था की शीला के भोसड़े के अंदर उस पर क्या बीती होगी.. संजय ने मन ही मन अपने ससुर को सलाम कर दी.. जिन्होंने इतने सालों से इस हवस की महासागर को समेटकर संभाल रखा था.. पता नही ससुरजी कैसे इस शेरनी को काबू में रखते होंगे.. !! संजय सोच रहा था.. मैं इतना बड़ा चुदक्कड़ हूँ फिर भी मम्मी जी ने मेरे झाग निकाल दिए.. कोई सामान्य इंसान होता उसकी तो जान ही निकल जाती मम्मी जी के नीचे.. !!!

रात के साढ़े बारह बजे.. एक जानदार ऑर्गैज़म के बाद.. शीला और संजय बाथरूम में साथ नहाने गए.. नहाते हुए शीला ने फिरसे एकबार संजय को मुख-मैथुन का अलौकिक आनंद दिया.. वह जानती थी की किसी भी मर्द को अगर काबू में करना हो तो मुख-मैथुन से बेहतर ओर कोई दूसरा विकल्प नही है..


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अगर ईमानदारी से सर्वे किया जाए तो कोई कपल ऐसा नही मिलेगा जिसे ओरल सेक्स में मज़ा न आता हो.. मर्द को अपना लंड चुसवाने में.. और औरत को अपनी चुत चटवाने में हमेशा आनंद आता है.. सब के सामने या दोस्तों के बीच.. इस क्रिया को घृणास्पद या गंदा कहने वाले लोग.. बेडरूम की चार दीवारों के बीच बड़े आराम से इसका मज़ा उठाते है.. इतना ही नही.. दुनिया के सारे मर्द यही सोचते है.. की उसके जितनी विकृत हरकतें और कोई नही करता होगा.. उसमें भी जब उसकी बीवी उससे कहें "बाप रे.. क्या कर रहे हो आप? आप को तो कुछ शर्म ही नही है.. एक नंबर के बेशर्म हो.. !!" यह सुनते ही पुरुष का अहंकार पोषित होता है और वो सातवे आसमान पर पहुँच जाता है.. और इसी भ्रामक अहंकार का उपयोग कर औरतें मर्दों से अपने काम निकलवा लेती है.. इंसानों की बात छोड़िए.. जानवर भी तो ऐसा ही करते है.. !!! नर जानवर मादा की योनि की गंध सूंघकर और उसे चाटकर ही उसे संभोग के लिए तैयार करता है.. हाँ, मादा जानवर कभी नर के साथ मुख-मैथुन नही करती.. ये क्रिया केवल मनुष्यों में ही देखी जाती है.. कुदरत ने इस मामले में इंसानों को ज्यादा ही स्वतंत्रता दी है..

शावर लेते हुए जब शीला घुटनों के बल बैठकर अपने दामाद का लंड चूस रही थी तब उसका ध्यान इस बात पर जरा भी नही था की संजय को मज़ा आ रहा है या नही.. वह तो खो चुकी थी अपनी ही मैथुन की अलौकिक दुनिया में.. लंड के लिए उसने अपने मन में जो कुछ भी विकृतियाँ पाल रखी थी वो सब उसने गोवा की इस आलीशान होटल के बाथरूम में ही संतुष्ट करने का मन बना लिया था.. संजय के विकराल लंड को अपने मुख के अंदर बाहर कर रही थी.. उसने अपनी आँखें इसलिए खोली थी ताकि वो दीवार पर लगे आईने में अपनी हरकतें देख सके.. फिर से एक बार पूरे लंड को मुंह से बाहर निकालकर उसने अपनी जीभ से उसे चाट लिया.. एक एक हरकत को आईने में देखकर वो उत्तेजित हो रही थी.. संजय तो शीला के हाथों का एक खिलौना बनकर रह गया था.. वो शीला के स्तनों को बार बार दबाकर.. निप्पलों को खींचकर अपनी सास के स्तनों से खेलने की सालों पुरानी तमन्नाओं को पूरी कर रहा था.. संजय को वो समय याद आ रहा था.. जब जब वो ससुराल आता तब अपनी सास के गदराए जोबन को देखते ही बेचैन हो जाता था.. तब से उसे महसूस होता की इस स्त्री में कुछ ऐसा खास था जो मर्दों को अपनी ओर चुंबक की तरह खींच लेती थी..

जब संजय वैशाली को पहली बार देखने आया था तब से वो अपनी सास के हुस्न का आशिक बन गया था.. जब पहली बार शीला ने झुककर नाश्ते की प्लेट टेबल पर रखी थी और जिस तरह उसके सामने देखा था.. संजय को ऐसा ही लगा था जैसे वो उसके चोदने के लिए आमंत्रित कर रही हो.. वैशाली से कहीं ज्यादा वो शीला के प्यार में पागल था.. शीला के लिए ये कोई नई बात नही थी.. वो अपने दामाद की गंदी नज़रों से काफी समय पहले ही वाकिफ हो चुकी थी.. पहले तो वो ज्यादातर संजय के सामने आती ही नही थी.. ताकि उसकी कामुक नज़रों का सामना न करना पड़ें.. तब से लेकर आज तक.. उनके संबंध कहाँ से कहाँ पहुँच गए!!! शीला के हाथों में अपने दामाद का लंड आ चुका था.. और जिन उन्नत स्तनों को याद करते हुए संजय, वैशाली की चूत का भोसड़ा बना देता था.. वो स्तन भी संजय के हाथों में थे.. आम तौर पर संभोग के दौरान.. पुरुष सक्रिय होते है और स्त्री निष्क्रिय.. पर यहाँ तो सारी सक्रियता का ठेका शीला ने ही ले रखा था.. संजय तो बेचारा बस अपनी सास के आदेशों का पालन ही कर रहा था..

शीला आईने में संजय के लंड को ऐसे देख रही थी जैसी किसी एंटिक पीस को देख रही हो.. बार बार वो संजय के लंड को चूमती.. चाटती.. संजय शीला के इस कामुक स्वरूप को कभी नही जान पाता.. अगर उसे गोवा लेकर नही आता तो..


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शीला खड़ी हो गई और संजय के गले लग गई.. उसके आलिंगन में केवल उत्तेजना नही थी.. पर बेफिक्री से समाज और दुनियादारी के डर से दूर.. ये आखिरी आलिंगन हो रहा था इस भाव से लिपट पड़ी.. अपने दामाद के साथ ये संबंध संयोग से हुआ था.. और इस संबंध को समाज की स्वीकृति मिलना असंभव था.. पर शीला और संजय को एक दूसरे का चस्का लग गया था.. क्या भविष्य होगा इस संबंध का?? घर जाने के बाद दोनों अपने आप को कैसे रोक पाएंगे? वैसे सोचा जाएँ तो.. समाज जिसे स्वीकार नही कर सकता.. ऐसे कितने सारे संबंध हमारे आस पास पनप रहे होंगे.. !!! कीसे पता.. !!!

संजय के लंड की चुभन अपनी चिकनी जांघों पर फ़ील करते हुए शीला उत्तेजित कम और भावुक ज्यादा हो रही थी.. हाफ़िज़ का फोन आ चुका था.. वो वापिस जाने के लिए गाड़ी तैयार कर चुका था.. और दोनों का इंतज़ार कर रहा था.. चेकआउट करने की घड़ी जैसे जैसे नजदीक आती गई.. वैसे वैसे शीला संजय को और जोर से आलिंगन करती रही.. पर आँखें बंद कर देने से तूफान चला तो नही जाता.. !! सिर्फ दिखना बंद होता है

आखिर वो घड़ी आ गई.. दोनों तैयार होकर रीसेप्शन काउन्टर पर पहुँच गए.. शीला जान बूझकर धीरे धीरे तैयार हुई थी ताकि उतना ज्यादा समय संजय के साथ बिताने को मिले.. फिर भी वो क्षण आकर खड़ी हो गई.. संजय पेमेंट और चेकआउट की प्रक्रिया पूर्ण कर रहा था.. वेटर ने उनका सामान उठाकर गाड़ी की डीकी में रख दिया था.. बड़े ही भारी मन के साथ शीला ने गोवा और अपने दामाद के साथ संबंध को अलविदा कहा.. संजय के आने से पहले ही वो गाड़ी में जा बैठी.. हाफ़िज़ ने ए.सी. पहले से ही चला रखा था इसलिए गाड़ी का वातावरण एकदम ठंडा था..

हाफ़िज़: "मैडम, साड़ी में आप बड़ी कातिल लगती हो" बेक-मिरर सेट करके शीला की तरफ देखकर उसने कहा

शीला: "साड़ी के अंदर का सब कुछ तो देख रखा है तुमने.. अब भी मन नही भरा क्या??"

हाफ़िज़: "कसम से शीला.. तू चीज ही ऐसी है.. एक बार चोदकर मन ही नही भरा.. !!"

शीला: "चुप मर हरामी.. अभी तेरा बाप आ जाएगा और सुनेगा तो नई मुसीबत खड़ी हो जाएगी.. उस दिन वो फ़ोटो वाले से तो मुश्किल से बची थी मैं.. "

हाफ़िज़: "अरे कोई मुसीबत नही होगी यार.. चल मेरे कु एक पप्पी दे" ड्राइवर सीट पर मुड़ते हुए हाफ़िज़ ने विचित्र डिमांड की..

शीला ने गुस्से से कहा "पागल हो गया है क्या?"

हाफ़िज़: "यार शीला.. तू माल ही ऐसी है की अच्छे अच्छे पागल हो जाएँ.. अब यार टाइम जास्ती खोटी मत कर.. उसके आने से पहले एक धमाकेदार पप्पी दे दे.. तो ड्राइविंग में मुझे मज़ा आयें"

शीला: "तू जरा समझ यार.. वो आ जाएगा अभी.. रास्ते में कहीं चांस मिला तो जरूर दूँगी.. ठीक है!!"

हाफ़िज़: "अरे मेरी रानी.. पता नही है पल की.. और बात करे है कल की.. " हाफ़िज़ ने अपनी सीट से उठकर शीला के स्तनों पर हाथ फेर दिया.. संजय के आ जाने के डर से शीला सहम कर बैठी रही.. पर हाफ़िज़ का हाथ उसके उरोजों पर हटाने की उसकी हिम्मत क्यों नही हुई.. क्या पता!! वो कितनी भी कोशिश कर लेती.. पर पुरुष का स्पर्श होते ही अपना कंट्रोल खो बैठती.. उसकी सालों पुरानी बीमारी थी ये.. शीला ने खिड़की से बाहर देखा.. संजय कहीं नजर नही आ रहा था.. अंधेरे का फायदा उठाकर उसने फटाफट अपने ब्लाउस के दो हुक खोल दिए.. और अपने दोनों विशाल स्तनों को बाहर निकालकर हाफ़िज़ के हाथों में थमा दिए..

शीला: "ले.. उसके आने से पहले दबा ले जितना दबाना हो.. उसकी मौजूदगी में अगर ऐसी वैसी बात या हरकत की तो तकलीफ हो जाएगी, मेरे बाप!!"

शीला के मदमस्त बबले मसलते हुए उसकी निप्पलों को दबाते हुए हाफ़िज़ ने कहा "क्या मस्त मम्मे है तेरे शीला मेरी जान.. " उसने दोनों स्तनों को ऐसा मरोड़ा की शीला की चीख निकल गई..


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शीला: "कमीने.. अपनी नजर रखना.. कहीं वो आ न जाएँ.. नहीं तो तेरी गांड फाड़कर रख देगा.. "

हाफ़िज़: "नही आएगा.. मुझे खिड़की से सब नजर आ रहा है.. तू चिंता मत कर, मेरी नजर है.. तू मजे कर और कुछ मत सोच"

शीला फिर से बेबस होकर हाफ़िज़ के मर्दाना हाथों से हो रहे अपने स्तनों के मर्दन का आनंद लेने लगी.. ये कार्यक्रम थोड़ी देर तक चलता रहा और तभी दूर से संजय नजर आया.. दोनों अलग हो गए.. शीला अपनी सीट पर ठीक से बैठ गई और अपने स्तनों को ब्लाउस और ब्रा के अंदर दबाकर डालने लगी.. संजय दरवाजे तक पहुँच गया और शीला एक हुक बंद भी नही कर पाई.. उसने पल्लू से अपने उरोजों को ढँक लिया.. अंदर बैठते ही संजय ने शीला के पल्लू में हाथ डाला.. तब शीला पल्लू के नीचे ही पहले से ही खुले हुक को खोलने का नाटक करती रही और तभी हाफ़िज़ ने गाड़ी को पाँचवे गियर पर लिया.. शीला ने खुद ही खोलकर अपना स्तन संजय के हाथ में रख दिया..


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"पहले से ही खोल रखा था?? क्या बात है मम्मी जी.. "

संजय ने बरमूडा पहन रखा था.. उसकी खुली जांघों पर शीला हाथ फेरते हुए उसके लंड को सहला रही थी

"बेटा.. समय न बिगड़े इसलिए मैं तैयार बैठी थी.. तेरे आते ही.. तेरे पसंदीदा खिलौने से तू खेल सके इसलिए.. !! मुझे पता है तुझे मेरी छातियाँ बहोत पसंद है" इतना कहते ही शीला ने बरमूडा के अंदर हाथ डालकर संजय के मुर्झाएँ लंड को मुठ्ठी में पकड़ लिया.. संजय ने शीला की कमर में हाथ डालकर अपने तरफ खींच लिया.. और दोनों आखिरी रोमांस में व्यस्त हो गए.. शीला की कामुक हरकतें इतनी जंगली हो गई थी.. जैसे इन आखिरी पलों को वो पूरे दिल से उपभोग करना चाहती हो..

जैसे जैसे रास्ता कटता गया और गोवा की ट्रिप अपने अंत की ओर जाने लगी.. शीला अपने हाथों को और तीव्रता से चलाने लगी.. संजय के अंगों के साथ हो रही एक एक छेड़खानी में एक अजीब प्रकार की आतुरता थी.. जिसका मतलब शायद ये भी निकलता था की काश.. !! इस स्वतंत्रता की रात की सुबह जल्दी न हो.. शीला का हाथ चलते ही संजय का लंड चड्डी की साइड से बाहर आकर शीला को उकसाने लगा.. उसके सुपाड़े का स्पर्श होते ही शीला की चूत में जैसे चिनगारी हुई..

"ओह्ह बेटा.. तेरा बम्बू तो फिरसे तैयार हो गया.. " संजय के लंड को मुठ्ठी में दबाते हुए शीला ने कहा

"ओह्ह मम्मीजी.. आप तो गजब हो यार.. !!" संजय इससे ज्यादा कुछ बोल नही पाया.. एक तरफ उसके हाथों में शीला के स्तन थे.. और दूसरी तरफ शीला के हाथों का स्पर्श उसके लंड के टोपे पर इतना आह्लादक और कामुक लग रहा था.. कोई मर्द अपनी उत्तेजना को कैसे कंट्रोल करे!!

हर पल उसके लंड का कद बढ़ता जा रहा था.. शीला के मदमस्त बबले भी जैसे उसके लंड के साथ प्रतियोगिता में शामिल होकर तंग हो रहे थे.. हाफ़िज़ कार चलाते हुए सास-दामाद की कामुक बातों और मादक आवाजों को सुनकर.. अपनी चैन खोलकर लंड बाहर निकालके हिला रहा था.. आगे और पीछे की सीट के बीच एक पतला सा पर्दा था.. जिसके कारण वो पीछे का द्रश्य देख तो नही पा रहा था.. लेकिन उनकी आवाज से पीछे क्या हो रहा था उसकी कल्पना कर वो गाड़ी चलाते चलाते मूठ मार रहा था


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जितनी तेज गति से गाड़ी चल रही थी उतनी ही गति से हाफ़िज़ अपने लंड को हिला रहा था.. शीला के संग बिताई हसीन पलों को याद करते हुए उसे स्खलित होने में ज्यादा वक्त नही लगा.. एक शानदार पिचकारी लगाकर वो ठंडा हो गया.. गाड़ी साफ करने वाले कपड़े से उसने अपना लंड पोंछ लिया..

सेक्स के अलावा कोई खास घटना हुई नही सफर के दौरान.. तेज गति से भागती हुई गाड़ी सुबह पाँच बजे तक एक सुंदर होटल के प्रांगण में आकर रुक गई.. पूरी रात के ड्राइविंग के बाद उसे थोड़े आराम और एक कडक चाय की जरूरत थी.. शीला और संजय के साथ हाफ़िज़ भी गाड़ी के बाहर निकला.. बाहर काफी अंधेरा था.. शीला और संजय होटल की ओर चलते जा रहे थे और पीछे पीछे हाफ़िज़ शीला के पृष्ठ भाग को छेड़ते हुए चल रहा था.. संजय को पता न चले उस तरह वो बार बार शीला के कूल्हों पर हाथ फेर रहा था.. एक बार तो वो शीला के पीछे इतना करीब आ गया की उसने अपना लंड शीला की गांड पर रगड़ लिया..

शीला को हाफ़िज़ की हरकतें अच्छी तो नही लग रही थी क्योंकी अभी फिलहाल वो स्थिति न थी की शीला को मज़ा आयें.. पूरी रात उसने संजय के साथ अटखेलियाँ करते हुए बिताई थी.. संजय की उंगली ने उसके भोसड़े को ३-४ बार स्खलित कर दिया था.. सफर की थकान भी थी.. और संजय को पता चल जाने का डर भी था.. इसलिए वो हाफ़िज़ के स्पर्श का आनंद ले नही पा रही थी..

होटल के करीब पहुंचते ही हाफ़िज़ शीला से दूर चला गया.. उसकी इस समझदारी को देखकर शीला मन ही मन प्रसन्न हुई.. तीनों ने अदरख वाली कडक चाय का लुत्फ उठाया.. संजय ने सिगरेट जलाई.. दो दम मारते ही उसके पेट में उथल-पुथल होने लगी.. जैसा अक्सर सिगरेट पीने वालों के साथ होता है

संजय: "हाफ़िज़, तुम मेमसाब को लेकर गाड़ी में बैठो.. मुझे टॉइलेट जाना पड़ेगा.. मैं १५-२० मिनट में आता हूँ.. "

हाफ़िज़: 'जी साहब.. चलिए मैडम" हाफ़िज़ आगे आगे चल दिया और शीला उसके पीछे.. दोनों गाड़ी के पास पार्किंग में पहुंचे जहां कोई लाइट न होने की वजह से अब भी काफी अंधेरा था.. गाड़ी के पास पहुंचते ही.. अंधेरे का लाभ उठाकर शीला ने हाफ़िज़ को अपनी ओर खींचकर बाहों में भर लिया और एक जबरदस्त किस देकर कहा "मैंने कहा था न.. की रास्ते में मौका मिलेगा तो मैं कुछ करूंगी.. तो अब बिना समय गँवाएं कर ले पीछे से.. मेरा घाघरा उठाकर डाल दे अपना लोडा.. इससे पहले की कोई आ जाएँ.. " कहते ही शीला ने गाड़ी के बोनेट पर अपने दोनों हाथ टीका दिए और अपने चूतड़ को उठाते हुए हाफ़िज़ का लंड लेने के लिए तैयार हो गई.. फटी आँखों से हाफ़िज़ इस हवस की महारानी को देखता ही रहा.. फिर धीरे से उसने शीला का घाघरा ऊपर किया.. और शीला के नंगे चूतड़ों के प्रातः दर्शन कीये.. देखते ही हाफ़िज़ का लंड एक झटके में खड़ा हो गया..

शीला के कूल्हों में ऐसी बरकत थी की हाफ़िज़ का लंड अब बाहर निकलने के लिए तरसने लगा.. हाफ़िज़ ने तुरंत अपनी चैन खोलकर हथियार बाहर निकाला और हमले की तैयारी की.. लंड के टोपे पर थूक लगाकर उसने शीला के गरम सुराख पर टिकाया.. एक जोर के धक्के के साथ शीला की गुफा उस्ताद को निगल गई.. दोनों कूल्हों पर हथेलियाँ रखकर हाफ़िज़ ने जबरदस्त पमपिंग शुरू कर दिया.. शीला इस प्रत्येक पल को अपनी आखिरी क्षण मानते हुए पूरे मजे लेने लगी.. हाफ़िज़ के दमदार धक्कों से पूरी गाड़ी हिल रही थी.. जैसे वो शीला को नही.. गाड़ी को चोद रहा हो!!



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शीला जब बोनेट पर झुककर हाफ़िज़ से ठुकवा रही थी.. तभी.. गाड़ी की पिछली सीट पर पड़ा उसका मोबाइल बजने लगा.. लेकिन वासना के सागर में डूबी हुई शीला को मोबाइल की रिंग कहाँ सुनाई पड़ती!!! सामने टॉइलेट के कमोड पर बैठकर सिगरेट फूँक रहे संजय को वेन्टीलेशन से हाफ़िज़ और अपनी सास के बीच हो रही चुदाई नजर आ रही थी.. अंधेरा छट रहा था.. और द्रश्य इतना साफ नही था.. पर जुवान हाफ़िज़ अपनी सास को चोद रहा है वह साफ पता चल रहा था..

दस मिनट के अद्वितीय संभोग के बाद शीला के भोसड़े का मुर्गा "कुक-डे-कूक" बोल उठा और वोह झड़ गई.. उसी के साथ हाफ़िज़ के ताकतवर लंड ने भी इस्तीफा घोषित कर दिया.. और गोवा के ट्रिप का अंतिम अध्याय समाप्त हुआ.. शीला ने घाघरा नीचे किया और चुपचाप गाड़ी में बैठ गई..धीरे धीरे उजाला हो रहा था.. शीला तो चाहती थी की इस रात की कभी सुबह न हो.. संजय कार के पास आ पहुंचा.. और हाफ़िज़ बाथरूम की ओर चला गया..

अब १५० किलोमीटर का अंतर बाकी था और इन तीनों को यह बाकी का सफर सज्जनता पूर्वक पूर्ण करना था.. थोड़ी बहोत छेड़खानियों के अलावा कुछ ज्यादा कर पाना मुमकिन भी नही था.. डीकी खोलकर संजय ने अपने बेग से पेंट और शर्ट निकाला और शॉर्ट्स के ऊपर ही कपड़े पहन लिए.. तभी हाफ़िज़ बाथरूम से लौटा.. तुरंत गाड़ी ड्राइव करने का आदेश देकर संजय गाड़ी में बैठ गया..

जैसे जैसे समय बीतता गया.. राह कटती गई.. अपना शहर नजदीक आता गया.. शीला के मन को संकोच और शर्म ने घेर लिया.. वो सोचने लगी.. पिछले दो दिनों में क्या क्या नही हुआ.. !!! ऐसी सारी घटनाएं बड़ी सहजता से हो चुकी थी जिनके बारे में उसने कभी सपने में भी नही सोचा था..!! एक विदेशी से चुदवाया.. गोरी के साथ लेस्बियन सेक्स किया.. अपने दामाद से चुदवाया और गांड भी मरवाई.. और अंत में एक मामूली ड्राइवर से भी अपना भोसड़ा मरवा लिया.. !! शीला का गोरा चेहरा शर्म से लाल हो गया.. सुबह की पहली किरण धरती पर पड़ते ही जैसी लालिमा नजर आती है वैसी ही कुछ शीला के चेहरे पर भी लिप्त थी..
 
जैसे जैसे समय बीतता गया.. राह कटती गई.. अपना शहर नजदीक आता गया.. शीला के मन को संकोच और शर्म ने घेर लिया.. वो सोचने लगी.. पिछले दो दिनों में क्या क्या नही हुआ.. !!! ऐसी सारी घटनाएं बड़ी सहजता से हो चुकी थी जिनके बारे में उसने कभी सपने में भी नही सोचा था..!! एक विदेशी से चुदवाया.. गोरी के साथ लेस्बियन सेक्स किया.. अपने दामाद से चुदवाया और गांड भी मरवाई.. और अंत में एक मामूली ड्राइवर से भी अपना भोसड़ा मरवा लिया.. !! शीला का गोरा चेहरा शर्म से लाल हो गया.. सुबह की पहली किरण धरती पर पड़ती है जैसी लालिमा नजर आती है वैसी ही कुछ शीला के चेहरे पर भी लिप्त थी..

गाड़ी तेजी से चलती हुए शहर में घुसी और कुछ ही मिनटों में शीला के घर के बाहर खड़ी हो गई.. सुबह के साढ़े दस बज रहे थे.. शीला को सब से पहले अनुमौसी ने देखा.. जो छत पर कपड़े सूखा रही थी

अनुमौसी: "आ गई शीला ?? कैसा रहा सफर?"

शीला: "अरे मौसी.. आप कैसी हो? घर पर सब कैसे है? कविता और पीयूष की कोई खबर?? कब लौट रहे है वो लोग?"

अनुमौसी: "हाँ, पीयूष का फोन आया था.. वो लोग आज शाम चार या पाँच बजे तक पहुँचने वाले है.. वो रसिक बेचारा रोज मुझे पूछता है की तू कब लौटनेवाली है?? पर तेरे लौटने का मुझे पता नही था इसलिए क्या जवाब देती!! " शीला और अनुमौसी बातों में व्यस्त थे तब संजय घर के अंदर घुस गया..

शीला: "मौसी, मैं आप को बताना ही भूल गई.. मैं अभी रसिक को फोन करती हूँ.. कल से दूध दे जाएँ.. "

अनुमौसी: "अगर अभी चाय वगैरह के लिए जरूरत हो तो मेरे घर से ले जा.. दामाद जी बेचारे थक गए होंगे.. एक काम करो.. तुम दोनों नहाकर मेरे घर पर ही आ जाओ.. मैं चाय तैयार रखूंगी.. और दोपहर का खाना भी मेरे ही घर खा लेना.. तू भी थकी होगी.. कहाँ खाना बनाने बैठेगी तू..!!"

शीला: "अरे नही नही मौसी.. मुझे तो भूख ही नही है.. संजय कुमार से पूछ लेती हूँ.. उन्हें जो भी खाना होगा, मैं बना दूँगी.. आप बस चाय बनाकर रखिए.. हम अभी आते है.. "

अनुमौसी: "ये कपड़े सूखा दु.. फिर चाय बनाती हूँ.. वैसे भी मुझे ग्यारह बजे चाय पीने की आदत हो गई है.. कविता रोज इस समय मुझे चाय बनाकर देती है और हम दोनों सास-बहु साथ में पीते है.. "

शीला: "ठीक है मौसी.. " शीला घर पहुंची और तुरंत अपनी बेग से सारा सामान अलमारी में रख दिया.. ताकि वैशाली को पता न चलें.. सारे कपड़े बिना इस्तेमाल हुए वापिस आए थे.. क्योंकी शीला ने ज्यादातर संजय का दिलाया टॉप और चड्डी पहनी थी.. और बाकी समय तो वो नंगी ही थी.. संजय ने जो टॉप उसे दिलाया था.. जो हाफ़िज़ के खींचने से फट गया था.. उसे शीला ने सीने से लगा लिया "ईसे तो मैं संभालकर रखूंगी.. गोवा की ट्रिप की याद के लिए" उसने सोचा.. अलमारी के एकदम अंदर वाले कोने में उसने वह टॉप छुपा दिया.. बाकी के कपड़े ठीक से लगाकर उसने अलमारी बंद कर दी..


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संजय नहाकर बाथरूम से निकला "गुड मॉर्निंग, शीला.. !!"

खुद का दामाद जब नाम से पुकारें तब कैसा महसूस होता है !! शीला की नजर नीची हो गई..

शीला: "बेटा.. अब हम गोवा में नही है.. मैं बार बार तुम्हें याद नही दिलाऊँगी.. हमें सब कुछ भूल जाना होगा.. जॉन और उसके साथ वो कौन लड़की थी.. ?? सब कुछ भूल जाना पड़ेगा"

संजय ने पीछे से शीला को बाहों में भरते हुए कहा "ओह्ह मम्मी जी.. आप शायद हाफ़िज़ को भूल जाओगी पर मैं चार्ली को कभी नही भूल पाऊँगा.. कितनी टाइट चूत थी इस गोरी की.. आह्ह.. !!"

शीला: "छोड़ दे मुझे बेटा.. अनुमौसी कभी भी आ सकती है.. अगर हम दोनों को इस स्थिति में देख लेगी तो उन्हे अटैक आ जाएगा.. वो चिमनकाका इस उम्र में रंडवा हो जाएगा.. " कहते हुए शीला ने अपने आप को संजय की पकड़ से मुक्त करने की कोशिश करने लगी.. गोवा के वातावरण में बेहद खुली रहने वाली शीला.. घर पहुँचते ही सहमी सहमी सी रहने लगी थी

अपने दोनों स्तनों को ब्लाउस के ऊपर से दबाते हुए संजय को शीला ने कहा "अब तो तुम्हारी इच्छाएं शांत हो जानी चाहिए संजय बेटा.. पिछले दिनों में तूने कितनी बार इन्हें दबाया.. चूसा है.. काटा है.. अब तो छोड़ दे..!! छातियाँ दर्द करने लगी है मेरी "

अपना लंड शीला की गांड की खाई में रगड़ते हुए संजय ने कहा "मम्मी जी.. दर्द तो मेरा लंड भी कर रहा है.. पिछले दो दिनों में आपने ईसे पूरा निचोड़ जो लिया था.. पर आपका ये भरा भरा जिस्म देखते ही ऐसी इच्छा हो रही है.. की पूरा दिन बस आपके शरीर से खेलता रहूँ"



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शीला: "बेटा.. तेरे इस लाडले को मेरे पिछवाड़े से दूर रख.. वरना मौसी के घर चाय ठंडी हो जाएगी.. और तेरा दर्द और बढ़ जाएगा.. मैं भी फिर ज्यादा देर तक शर्म का चोला पहने नही रह पाऊँगी.. मुझे उकसा मत.. !!"

संजय: "मम्मी जी, वैशाली तो शाम को आने वाली है.. तब तक तो मुझे मजे लूटने दीजिए.. !! फिर तो कभी ऐसा मौका मिलने नही वाला.. !!"

शीला: "पहले मौसी के घर जाकर चाय पीते है.. फिर वापिस आकर तुझे जो मर्जी में आए वो करना" शीला ने हथियार डाल दिए

शीला संजय का हाथ पकड़कर दरवाजे की तरफ खींचकर ले गई.. पर दरवाजा खोलने से पहले शीला ने संजय को बाहों में लेकर चूम लिया.. और उसके लंड को मुठ्ठी में दबा दिया..


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चाय पीने के बाद के कार्यक्रम की तैयारी करते हुए शीला संजय को मौसी के घर ले गई.. चिमनलाल घर पर था नही.. मौसी, शीला और संजय ने साथ में चाय पी.. शीला और मौसी बातें करने लगे.. संजय घर वापिस आकर बिस्तर पर पड़े पड़े शीला का इंतज़ार करने लगा..

बिस्तर पर पड़े पड़े संजय सोच रहा था.. जितना वो शीला को करीब से जानता जा रहा था.. उतना ही उसके पीछे पागल होता जा रहा था.. कैसी गजब की स्त्री है मेरी सास.. !! वैसे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में स्त्री हमेशा शरमाती है.. खासकर सेक्स के मामले में.. लेकिन मेरी सास शीला तो एकदम बोल्ड है.. एकदम बिंदास..!! सासु माँ का पूरा व्यक्तित्व जानने के बाद संजय को यकीन हो गया की वो जितनी दिखती थी उतनी शरीफ तो थी नही.. लेकिन फिर भी उसने अपनी सास के किसी लफड़े या अफेर के बारे में कुछ सुना नही था.. संजय मन ही मन जितना इस रहस्यमयी नारी के बारे में सोचता गया.. उतना ही उलझता गया.. हो सकता है की वो इतनी दूर रहता था उस वजह से उसे शीला के व्यभिचार या गुलछर्रों के बारे में कुछ सुना न हो.. वरना इतना तो उसे पक्का यकीन था की मम्मी जी के एक से ज्यादा मर्दों से संबंध होंगे.. कितने मर्दों ने चोदा होगा इस रंडी को.. !!! अपनी सास को रांड शब्द से मन में संबोधित करते ही संजय का लंड ठुमकने लगा.. पेंट के ऊपर से ही उसे सहलाते हुए वो मन में बोला.. "माय डिअर.. थोड़ा धीरज धर.. तेरी पसंद का छेद अभी आता ही होगा.. इतना उतावला मत बन.. जो मज़ा इंतज़ार में है वो मिलन में कहाँ.. !!"

कब उसके पेंट की चैन खुल गई और कब उसका उस्ताद बाहर निकल कर शीला की चूत ढूँढने लगा.. इसका संजय को पता ही नही लगा.. मन में शीला के विचार आते ही लंड बेकाबू हो जाता था.. संजय के पूरे जीवन में ऐसा कभी नही हुआ था की किसी स्त्री या लड़की का विचार करने से ही लंड खड़ा हो जाएँ.. पर उसकी सास ऐसी जबरदस्त थी की बिना चूत में लंड दलवाएं किसी भी मर्द का पानी निकाल दे.. वाह मम्मी जी..

"बेटा संजय.. बिना दरवाजा लॉक कीये ही अंदर आ गया?? कोई घुस गया होता तो.. और तुझे इस तरह मेरे बिस्तर पर नंगा पड़ा हुआ देख लेता तो?? शीला ने थोड़े गुस्से से कहा

"वो सब बातें बाद में.. आप पहले नजदीक आइए.. देखिए तो सही.. ये कैसे तैयार होकर बैठा है आपके इंतज़ार में" संजय ने अपना सख्त लंड दिखाते हुए कहा

शीला: "वो तैयार है तो मैँ भी तैयार हूँ मेरे राजा.. !!" संजय के लंड को सहलाते हुए शीला उसकी छाती पर अपने स्तन दबाकर लेट गई.. शीला के ब्लाउस की टाइट कटोरी में बंद बड़े बड़े स्तन संजय की छाती पर दबाव बना रहे थे.. दो स्तनों के बीच की गहरी खाई देखकर संजय बेताब हो गया.. उसका हाथ अपनी मनपसंद जगह पर पहुँच गया और शीला के पुष्ट पयोधरों को मसलते हुए शीला के कामुक होंठों को चूसने लगा.. शीला ने अपनी मुठ्ठी में संजय का लंड इतना टाइट पकड़कर रखा था की संजय की उत्तेजना दोगुनी हो गई..

सिसकियाँ भरते हुए संजय ने शीला के घाघरे के अंदर हाथ डाला.. "आह्ह संजु बेटा.. " अपनी जांघ पर मर्दाना हाथ फिरते ही शीला के बदन में वासना का भूचाल सा मच गया.. संजय का हाथ शीला की संगेमरमरी गदराई जांघों पर होते हुए ऊपर की तरफ जाने लगा.. सासुमाँ के गोरे घुटनों को वो दो घड़ी देखता ही रहा.. कप में रखे हुए वेनिला आइसक्रीम के स्कूप जैसे गोरे घुटने.. और उससे भी ज्यादा कोमल और नाजुक.. देखते ही संजय का लंड फुदकने लगा..

संजय छलांग लगाकर खड़ा हो गया.. बेड पर जगह होते ही गोल तकिया सटाकर शीला दीवार पर अपनी कमर टेककर बैठ गई.. संजय ने शीला का घाघरा उठाकर उसकी चूत के दर्शन कीये.. घुटनों से पैरों को मोड़ते हुए शीला ने पैर चौड़े कीये.. संजय शीला के घुटनों को चाटते हुए उसकी जांघों की ओर बढ़ने लगा था.. शीला ने आँखें बंद कर ली..

शीला: "आह्ह संजु बेटा.. जहां चाटने की जरूरत है वहाँ चाट.. ये क्या घुटनों और जांघों पर लगा हुआ है तू, इतनी मस्त चूत को छोड़कर!!!"

संजय: 'मम्मी जी.. आपका तो पूरा जिस्म ही चाटने लायक है.. मैं तो आपकी गांड भी चाट सकता हूँ.. आह्ह"

जैसे जैसे संजय का हाथ शीला की मुलायम चूत पर फिरता गया वैसे वैसे उसकी चूत से सावन-भादों की तरह पानी बहने लगा..

"अपनी पेंट उतार दे, संजु" साड़ी के पल्लू को हटाकर अपने ब्लाउस के हुक खोलते हुए शीला ने कहा "ऐसे समय पर कपड़ों पर बहोत गुस्सा आता है.. नीचे आग लगी हो तब ये कपड़े उतारना.. मेरा तो दिमाग तप जाता है"

संजय ने तुरंत उठकर अपनी पेंट और अन्डरवेर उतार फेंकी और मादरजात नंगे होकर.. शीला के पेट पर सवार होते हुए अपना लंड बिल्कुल उसके मुंह के सामने धर दिया.. एफील टावर की तरह नजर आ रहे उस विकराल कडक लंड को देखते ही शीला का मुंह अपने आप खुल गया.. जिससे संजय को मुख-मैथुन की शुरुआत करने में काफी आसानी हो गई.. वो थोड़ा सा आगे खिसका और अपना लंड शीला के होंठों तक ले गया.. दो कदम तुम चलो दो कदम हम चले.. उस हिसाब से शीला ने भी अपना मुंह आगे किया.. लंड और शीला के मुख का मिलन हो गया.. शीला कुल्फी की तरह संजय का लंड चूसने लगी.. और संजय ने शीला के सुंदर स्तनों को ब्रा से आजादी दिलाने का संग्राम शुरू कर दिया..


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दोनों उरोजों को खोलकर उन्हें पागलों की तरह मसलने लगा संजय.. स्तन मर्दन और मुख मैथुन.. दोनों क्रियाओं के मजे साथ लूट रहे थे सास और दामाद.. संजय के कूल्हों को नाखूनों से कुरेदते हुए उसका लंड बड़ी ही मस्ती से चूस रही थी शीला.. उसके हाव भाव से यह स्पष्ट था की उसे बहोत मज़ा आ रहा था.. बीच बीच में वो संजय के अंडकोशों को भी बड़े प्यार से पुचकार लेती.. और एक बार तो उसने दोनों आँड़ों को अपने मुंह में भर लिया..

शीला संजय का लंड चूसने में व्यस्त थी तभी उसके मोबाइल की रिंग बजी.. रंग में भंग हो गया.. मुंह बिगाड़कर उसने लंड मुंह से निकाला और बोली "संजु बेटा.. वो मोबाइल मुझे देना जरा.. !!"

लंड लटकाते हुए संजय खड़ा हुआ और कोने के टेबल पर पड़ा मोबाइल लेने गया.. शीला ने अपनी चूत पर हाथ फेरते हुए दो उँगलियाँ अंदर डाल दी...


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संजय स्क्रीन पर कॉलर का नाम देखकर चोंक उठा.. उसने फोन शीला के हाथ में थमा दिया.. शीला भी स्क्रीन पर दिख रहा नाम देखकर थोड़ा चोंक गई.. लेकिन फिर स्वस्थ होकर उसने फोन रिसीव किया.. फोन उठाते वक्त उसने अपने होंठ पर उंगली रखकर संजय को चुप रहने का इशारा भी किया..

"हैलो.. !!!"

एक हाथ से संजय का लंड हिलाते हुए दूसरे हाथ में फोन पकड़कर शीला ने बात करना शुरू किया

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चकाचक तैयार होकर जैसे ही कविता ने बस में एंट्री ली.. सब का एक साथ तपोभंग हो गया.. पूरी बस में इंपोर्टेड परफ्यूम की महक फैल गई.. कविता जब बस में घुसी तब शेर-शायरी का दौर चल रहा था.. किसी ने अभी अभी कोई शायरी कही थी.. शायरी की दाद देते हुए सब "वाह वाह" कर ही रहे थे के तब कविता ने प्रवेश किया था.. सब की नजर कविता के उछलते हुए स्तनों पर चिपक गई थी.. कविता को ये पता नही चला की लोग "वाह-वाह" शायरी पर बोल रहे थे या उसके उत्तेजक स्तनों को देखकर.. !!


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"गुड मॉर्निंग एवरीबड़ी.. " कोयल जैसी आवाज में कविता ने सबका अभिवादन किया.. पीयूष पहले से ही विंडो सीट पर बैठा हुआ था.. हौले से उसके बगल में बैठते हुए इस बात का ध्यान रखा की पीयूष का हल्का सा भी स्पर्श उसे न हो.. परोक्ष तरीके से उसने पीयूष के साथ अपनी लड़ाई जारी रखी हुई थी.. वैसे कविता और पीयूष की जोड़ी देखने में बिल्कुल परफेक्ट थी.. मामूली से मन-मुटाव के कारण दोनों एक दूसरे से बात नही कर रहे थे.. ऊपर से मौसम के आने से उनके रिश्तों में और तनाव आ गया था.. पीयूष मौसम की जवानी का दीवाना हो चुका था.. उसे मौसम के अलावा ओर कोई नजर नही आता था.. इस बात को तो वैशाली ने भी नोटिस किया था और उसे भी बुरा लग रहा था.. पर वो कर भी क्या सकती थी??

बस चल पड़ी और सब आनंद से चिल्ला उठे.. सब से आगे की सीट पर रेणुका बैठी हुई थी.. बार बार वो मुड़कर पीयूष की तरफ देख लेती थी.. कल रात टॉइलेट में पीयूष ने उसे सबसे बढ़िया बर्थडे गिफ्ट जो दी थी.. !! पीयूष का वो स्पर्श.. और जिस तरह उसने झुककर चूत चाटी थी.. आह्ह.. उसके सामने राजेश की गिफ्ट का कोई मोल नही था.. घर पहुंचकर वो कोई ऐसा प्लान बनाना चाहती थी जिससे वो बिना किसी टेंशन के पीयूष से चुदवा सके.. बहोत ज्यादा बार पीयूष के सामने देखते रहने में खतरा था इसलिए रेणुका संभल गई.. पर पता नही क्यों.. वो अब कविता से नजरें नही मिला पा रही थी..

वैशाली, मौसम और फाल्गुनी.. सब से आखिरी सीट पर बैठी हुई थी.. और बड़े इत्मीनान से बातें कर रही थी.. पिछली रात के कार्यक्रम के बाद तीनों के बीच के सभी परदे हट चुके थे.. जब जिस्म ही नंगे हो चुके थे फिर शब्दों में क्या परहेज करना.. !!

वैशाली: "देख देख फाल्गुनी.. तेरा पिंटू आया.. आज साइट-सीइंग के वक्त मौका मिले तो तू जाकर प्रपोज कर दे.. ऐसा चांस फिर नही मिलेगा !!"

मौसम ने थोड़ा सोचकर कहा "हाँ फाल्गुनी.. अब तो तेरा सेक्स का डर भी चला गया है.. है ना.. !!"

तीनों लड़कियां एकदम धीमी आवाज में बातें कर रही थी.. मौसम सोच में इसलिए पड़ गई क्योंकि पिंटू उसकी बहन कविता का पुराना आशिक था.. फिर उसने सोचा की वो बातें अब पुरानी हो चुकी थी.. इसलिए फाल्गुनी प्रपोज करें भी तो कुछ गलत नही था..

वैशाली: "पिंटू कितना हेंडसम लग रहा है यार.. ब्लू कलर के टीशर्ट में जच रहा है.. मेरे मन को भी भा गया तेरा पिंटू.. अगर मुझे मौका मिले तो मैं डेट पर लेकर जाऊँ पिंटू को.. "

मौसम: "इस बस में बैठे कितने मर्द तुझे पसंद है वैशाली?? राजेश सर तो पसंद है ही.. वो तो सबको पता है.. अब पिंटू पर डोरे डाल रही है.. फिर कल पीयूष जीजू पर नियत बिगाड़ेगी.. सब मर्दों के साथ जो फ्लर्ट करे उसे क्या कहते है.. पता है ना तुझे??"

मौसम की कमर पर चिमटी काटते हुए वैशाली ने कहा "पता है मुझे.. ज्यादा ज्ञान मत दे मुझे.. मैं सोच रही थी.. अभी वक्त है हमारे पास.. फाल्गुनी से उसके किस्से सुनते है.. चल फाल्गुनी.. शुरू हो जा.. और बता की प्रिंसिपल ने कैसे चोदा था तुझे.. पहली बार करवाया तब कैसा महसूस हुआ था.. पल्लवी मैडम को सर की गोद में बैठी देखा उसके बाद क्या क्या हुआ.. सब कुछ डीटेल में बता.. हमें जानना है.. है ना मौसम ??"

"हाँ यार.. जल्दी बता फाल्गुनी.. " मौसम को वैसे भी फाल्गुनी का झूठ खटक रहा था..

फाल्गुनी: "उस दिन शनिवार था.. दोपहर को कॉलेज छूटने के बाद मैं जब लेडिज स्टाफ रूम में गई तब पल्लवी मैडम वहाँ अकेले बैठी थी.. मुझे अंदर बुलाकर उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया.... "

बस धीरे धीरे माउंट आबू की ढलानों पर पानी की धारा की तरह आगे बढ़ रही थी.. खिड़की से नजर आ रहा नजारा अद्भुत था.. खिड़की से आती हवा से लहराती हुई अपनी बालों की लट को ठीक करते हुए फाल्गुनी ने बात आगे बढ़ाई

"मुझे बहोत डर लग रहा था.. पल्लवी मैडम मेरे पास कुर्सी पर बैठ गई और बोली 'फाल्गुनी, दो दिनों पहले तूने माथुर सर की चेम्बर में क्या देखा था?' मैंने कहा.. कुछ नही मैडम.. !! मुझे बहोत शर्म आ रही थी.. और संकोच भी हो रहा था.. उम्र में बड़ी और सन्माननीय मैडम के सामने मैं क्या बोलती.. उन्होंने कहा 'फाल्गुनी, मुझे पता है की तूने सब देख लिया है.. पर स्थिति ही कुछ ऐसी हुई थी.. हमें पता नही था की उस वक्त तू या कोई अंदर आ सकता था.. माथुर सर के चेम्बर में हाफ-डोर है जो लॉक हो नही सकता.. और मेइन डोर को हम लॉक कर नहीं सकते.. इसलिए तूने हमें देख लिया.. असल में फाल्गुनी, मिस्टर माथुर बहोत अच्छे इंसान है.. मुझे नौकरी भी उन्होंने ही दिलाई है.. अब जब तूने सबकुछ देख ही लिया है तो बेकार में लिपापोती करने की कोई जरूरत नही है.. तू कोई छोटी बच्ची तो है नही.. जो इतना न समझ पाएं की एक मर्द की गोद में बैठकर अपनी ब्रेस्ट दबवाने का अर्थ क्या होता है' कहते हुए मैडम ने मेरा हाथ पकड़कर अपनी ब्रेस्ट पर रख दिया.. यार वैशाली.. उस वक्त मेरी जो हालत हुई थी.. क्या बताऊँ.. !! मेरा हाथ उनके स्तन पर दबाते हुए पल्लवी मैडम बोली 'फाल्गुनी, प्लीज तू किसी को कुछ भी मत बतायाना.. मेरे और माथुर सर के बीच अफेर चल रहा है.. मैं अपने पति से जिस्मानी तौर पर बिल्कुल खुश नहीं हूँ.. इसलिए मेरे और सर के बीच संबंध बने.. इस शरीर की जरूरतों के सामने मैं लाचार हूँ.. तुझे भी यहाँ अकेले देखकर मेरी भावनाएं भड़क रही है'" बोलते बोलते फाल्गुनी का गला सुख गया

वैशाली और मौसम, दोनों फाल्गुनी की इस कहानी बुनने की कला को देख रहे थे.. मौसम सोच रही थी.. ये कमीनी फाल्गुनी अगर बॉलीवुड चली जाएँ तो टॉप की स्क्रिप्ट-राइटर बन सकती है.. जो घटना हुई ही नही है.. उसका कितना गजब और बारीक वर्णन कर रही है.. !!!

फाल्गुनी ने बात आगे बढ़ाई "मौसम, पिछली रात हम सब ने जो किया था वैसे ही पल्लवी मैडम ने उसके स्तन मेरे हाथों पर जबरदस्ती रगड़ना शुरू कर दिया.. जीवन में पहली बार मेरे साथ कोई ऐसा कर रहा था.. मैं बहोत डर गई थी.. " थोड़ा सा अटक कर फाल्गुनी ने मौसम की ओर देखा और बोली "तुझे पता है मौसम.. पल्लवी मैडम तेरे बारे में भी पूछ रही थी.. पर मैंने अब तक कोई जवाब नही दिया है" फाल्गुनी ने काल्पनी बम फोड़ते हुए कहा.. मौसम बखूबी जानती थी की ना तो पल्लवी मैडम और फाल्गुनी के बीच कुछ हुआ है.. और ना ही माथुर सर के साथ.. !! फाल्गुनी ने तो मेरे पापा के साथ सेक्स किया है और मुझे उल्लू बना रही है..

फिर भी मौसम ने चौंकने का अभिनय करते हुए कहा "क्या.. ??? क्या बात कर रही है? मतलब.. पल्लवी मैडम मेरा भी प्रोग्राम करवाना चाहती थी माथुर सर के साथ.. !!??"

फाल्गुनी: "अरे हाँ यार.. माथुर सर कह रहे थे की तेरे साथ जो लड़की घूमती है वो एकदम मस्त कोरा माल है.. एक बार मिल जाएँ तो मज़ा आ जाएँ" फाल्गुनी ने झूठ पर झूठ के तीर छोड़ना जारी रखा

वैशाली: "वो सब छोड़.. ये बता की पल्लवी मैडम ने उस दिन तेरे साथ क्या क्या किया??"

फाल्गुनी: "उस दिन तो उन्होंने ज्यादा कुछ किया नही.. पर हाँ.. वो मुझे लिपकिस करने की जिद करने लगी.. मैंने बहोत म अन्य किया पर वो मानी ही नही.. आखिर मुझे उनको किस करने देना पड़ा.. मुझे अच्छा तो बिल्कुल नही लगा मैडम से किस करना"

वैशाली ने उंगली करते हुए कहा "मैडम के साथ अच्छा नही लगा.. तो माथुर सर के साथ किस करने में मज़ा आया, ये कहना चाहती है?"

"नहीं यार.. क्या तू भी.. मुझे तो इतना डर लग रहा था की बात ही मत पूछो.. इनकार करूँ तो रिज़ल्ट खराब होने का डर और दूसरी तरफ.. पल्लवी मैडम और माथुर सर के बीच सेंडविच हो जाने का डर.. !!"

मौसम को अब इस झूठी कहानी सुनने में कोई दिलचस्पी नही थी.. वो बस में बैठे बाकी पेसेन्जर को देखने लगी.. जीजू और कविता दीदी चुपचाप बैठे थे.. उसे एक पल के लिए अपनी दीदी के लिए बुरा लग रहा था.. फिर उसने सोचा की पहल तो जीजू ने की थी.. उसमें उसकी क्या गलती?

इंसान अपने बुरे कर्म को छुपाने के लिए जितना दिमाग इस्तेमाल करता है उससे अगर आधा दिमाग भी अपने काम में लगाएं तो ऐसा कोई कार्य नही है जो नही हो सकता.. कोई कर्म अच्छा या बुरा नही होता.. अच्छा या बुरा तो उसका परिणाम होता है.. खराब परिणाम की अपेक्षा होने के बावजूद जब इंसान उसी कर्म में प्रवृत्त रहता है तब वहीं से उसकी अधोगति का मार्ग शुरू होता है "जानामी धर्मं नयमे प्रवृत्ति.. जानामी अधर्मंम् नयमे निवृत्ति" अर्थात "मुझे धर्म का ज्ञान है, लेकिन मेरी उसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। मुझे अधर्म का भी ज्ञान है, लेकिन मैं अधर्म को छोड़ना नहीं चाहता" अपने अधर्मी कर्म का टोकरा दूसरे के सर पर दे मारना.. इंसान की पुरानी फितरत है..

मौसम ने पिंटू की ओर देखा.. वो अकेला सीट पर बैठे बैठे कुछ पढ़ रहा था.. दुनिया से अलिप्त.. लेकिन मौसम को कहाँ पता था की कविता के अत्यंत आकर्षक रूप को भोग न पाने के दुख को छुपाने के लिए वो किताब में मुंह छुपाकर अपने दुख को भुलाने की कोशिश कर रहा था

मौसम सोचने लगी.. क्या दीदी और पिंटू के बीच अब भी कुछ चल रहा होगा?? वैसे तो काफी समय हो गया था पर फिर भी कुछ कह नही सकते..मौसम के विचार तब थम गए जब बस एक भव्य मंदिर के पास आकर रुकी.. सब नीचे उतरे.. वैशाली और फाल्गुनी के चेहरे उत्तेजना से लाल थे.. क्योंकि पिछले आधे घंटे से उनके बीच फाल्गुनी की काल्पनीक कहानी के बारे में बातें हो रही थी.. दोनों का मानना था की मौसम को इस बारे में कुछ पता नही इसीलिए वह दोनों इस मन-घडन्त कहानी की बातें बड़े चाव से कर रहे थे.. लेकिन मौसम तो सब कुछ जान चुकी थी..

सब ने मंदिर में दर्शन कीये और बस में बैठ गए.. और बस चल दी.. साढ़े बारह का समय हो रहा था.. और तभी अपने पल्लू को ठीक करते हुए रेणुका ने खड़े होकर ये अनाउन्स किया "इसके साथ ही हमारी ट्रिप खतम हुई.. मुझे आशा है की आप सबको बहोत मज़ा आया होगा.. अब बढ़िया सा लंच लेकर हम वापिस लौटने का सफर शुरू करेंगे"

ड्राइवर ने बस को एक बढ़िया होटल के बाहर खड़ा कर दिया.. सब ने मजे से खाना खाया..और वापिस बस में आकर बैठ गए.. बस उनके शहर की ओर चल पड़ी

जैसे जैसे घर नजदीक आ रहा था कविता की उदासी बढ़ती जा रही थी.. क्यों की उसका और पीयूष का टयूनिंग माउंट आबू आने के बाद सुधारने के बजाए और खराब हो गया था..

बस में फिर से मज़ाक मस्ती का दौर शुरू हो गया.. वहीं अंताक्षरी.. नॉन-वेज जोक्स.. और छेड़छाड़ का सिलसिला चल पड़ा.. बातों ही बातों में कब उनकी बस ऑफिस के बाहर आकर कब खड़ी हो गई पता ही नही चला.. शाम के साढ़े सात बज गए पहुंचते पहुंचते.. सब थक चुके थे और घर जाकर खाना बनाने की इच्छा नही थी इसलिए पीयूष, कविता, वैशाली, मौसम और फाल्गुनी ने एक रेस्टोरेंट में डिनर करने का फैसला लिया..

माउंट आबू की इस ट्रिप में पीयूष और मौसम काफी करीब आ गए थे.. ट्रिप से पहले नादान मौसम बड़ी ही निर्दोषता से अपने जीजू को गला लगाती.. जो कहना हो बिंदास कह देती.. वही मौसम ट्रिप खतम होने के बाद जैसे एकदम शांत और परिपक्व हो गई थी.. वो अब पीयूष से ज्यादा बात नही कर रही थी.. पर पीयूष दिननर करते वक्त मौसम के जवान जिस्म को देखकर ये सोच रहा था की घर पहुँचने से पहले एकाध बार मौसम का स्पर्श मिल जाएँ तो मज़ा आ जाएँ.. तो दूसरे तरफ मौसम अपनी जवानी को ऐसे सिकुड़े हुए बैठी थी की स्पर्श तो दूर.. जिस्म का कोई खास हिस्सा दिखाई भी नही दे रहा था..

खाना खाकर उठाते वक्त पीयूष और मौसम की आँखें चार हुई.. मौसम की आँखों से एक अनकहा दर्द छलक पड़ा.. दोनों ने एक दूसरे को एक उदास स्माइल दी.. और घर की तरफ चल पड़े..

घर पहुंचते पहुंचते रात के साढ़े दस बज गए..

वैशाली: "ओके.. कल मिलते है कविता.. सब को गुड नाइट.. गुड नाइट पीयूष.. जवाब तो दे.. कम से कम!!" मौसम के सामने देख रहे पीयूष को गुस्से से कहा

पीयूष: "ओह.. हाँ हाँ.. गुड नाइट वैशाली!!"

वैशाली अपने घर के दरवाजे पर पहुंची और डोरबेल बजाई.. बेचारी मम्मी.. सो चुकी होगी.. थोड़ा जल्दी आ जाते तो अच्छा रहता.. मम्मी की नींद खराब न होती..

"आ रही हूँ.. !!" दरवाजे के पीछे से शीला की बुलंद आवाज सुनाई दी.. वैशाली को राहत हुई.. अब ज्यादा देर बाहर खड़ा रहना नही पड़ेगा.. वो बहोत थक चुकी थी और जल्द से जल्द सो जाना चाहती थी..

शीला ने दरवाजा खोला "आ गई बेटा.. !! " खुश होकर उसने वैशाली को गले लगा लिया.. दोनों घर के अंदर गए और तभी अपनी आँखें मलते हुए संजय बाहर निकला.. उसके आते ही पूरे ड्रॉइंग रूम में शराब की बदबू फैल गई..

संजय: "ओह वैशाली.. तुम आ गई? थोड़ा लेट हो गया तुम्हें आते आते "

संजय की बात को अनसुना कर वैशाली सीधे बेडरूम में चली गई.. शीला के मेइन बेडरूम के बगल में एक दूसरा बेडरूम था जहां वैशाली ने पहुंचकर अपने आप को बिस्तर पर फेंका.. शीला जब उसके कमरे में गई तब वैशाली को बिस्तर पर पैर फैलाएं लेटी हुए देखकर सोचने लगी "ये करती भी नही है और करने देती भी नही है"

अब वैशाली को कहाँ पता था की उसके आगमन से मम्मी और संजय के रंग में कैसा भंग हो गया था.. !! मन में क्रोध दबाकर बड़े ही प्यार से शीला ने वैशाली से कहा "बेटा.. तुझे अपने पति के कमरे में जाना चाहिए.. इतने दिनों बाद मिल रही हो.. पर तेरे चेहरे पर कोई खुशी ही नजर नही आ रही संजय को देखने की.. !! ऐसा कैसे चलेगा और कब तक चलेगा?? इतना भी क्या रूठना.. !! ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन अलग होने की नोबत आ जाएगी.. याद रखना.. !!"
 
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