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शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

दूसरे दिन वैशाली बड़ी जल्दी जाग गई.. ये देख शीला चोंक गई.. वैशाली को देर तक सोना बेहद पसंद था.. तो आज ये जल्दी क्यों उठ गई होगी?

"गुड मॉर्निंग" कहते हुए मुंह में ब्रश डालकर वैशाली सीधे छत पर चली गई... सुबह के साढ़े छह बजे थे.. बाहर कोई खास चहल पहल नहीं थी.. थोड़ी सी ठंड थी और बड़ा आह्लादक वातावरण था.. निप्पल पर ठंडी हवा का स्पर्श होते ही वैशाली को झुरझुरी सी होने लगी.. सामने की छत पर पीयूष गुलाब के पौधों को पानी दे रहा था.. जिस काम के लिए वो जल्दी जागी थी वो मिशन सफल हो गया.. जो जागत है वो पावत है

वैशाली को देखते ही पीयूष के मन का मोर ताताथैया करने लगा.. उसने हाथ से इशारा करके वैशाली को गुड मॉर्निंग कहा.. वैशाली ने भी हाथ से इशारा किया.. वैशाली के नाइट ड्रेस से उभरकर नजर आ रहे बड़े बड़े स्तन देखकर पीयूष के लंड में झटका लगा.. क्या माल लग रही है यार !! पहले तो इतनी सुंदर नहीं थी ये.. शादी के बाद लंड के धक्के खा खा कर इसका रूप ही निखर गया है.. कविता भी चुद चुद कर कैसी खिल गई है.. जिस दिन ना चोदो उस दिन मुरझाई सी रहती है.. स्त्री का सबसे बेस्ट मेकअप है लंड.. रोज लंड मिले तो हर स्त्री सुंदर और खिली खिली ही रहेगी.. पीयूष वैशाली को ऐसे तांक रहा था जैसे वो नंगी खड़ी हो..

इन दोनों का नैन-मटक्का चल रहा था तभी कविता भी छत पर आई.. पीयूष की पतंग आसमान में उड़ने से पहले ही कट गई.. वैशाली भी ऐसे अस्वस्थ हो गई जैसे रंगेहाथों पकड़ी गई हो.. कविता की तरफ देखे बगैर ही वो सीढ़ियाँ उतर गई..

"आज तो बड़ी देर लगा दी तूने.. बहोत पानी पीला दिया क्या पौधों को?" कविता ने एसीपी प्रधयुमन की तरह पूछताछ शुरू की

"मैं.. नहीं वो.. वो तो जरा.. बात दरअसल ये है की.. " पीयूष बॉखला गया "तू समझ रही है ऐसा कुछ भी नहीं है.. मैं तो पौधों को पानी दे रहा था" पीयूष के शब्दों में सिमेन्ट कम और रेत ज्यादा थी..

कविता: "पर मैंने कब कहा की तू वैशाली को देख रहा था???? पर अच्छा हुआ जो तेरे दिल में था वो होंठों पर आ ही गया.. कर ले एक बार वैशाली के साथ.. तुझे भी चैन मिलेगा और वैशाली को भी !!" पीयूष की कमर पर चिमटी काटते हुए हंस रही थी कविता

"क्या सच में? क्या बात कर रही है तू?" पीयूष को समझ नहीं आया की वह क्या बोले.. बोलने के बाद उसे एहसास हुआ की "क्या सच में?" बोलकर उसने कितनी बड़ी गलती कर दी थी.. वो कविता को धमकाने लगा

"क्या तू भी.. कुछ भी बोलती रहती है.. तुझे तो मुझ पर विश्वास ही नहीं है.. जब देखों तब शक करती रहती है" मर्दों का ये हथियार है.. जब भी वो गलत हो तब पत्नी को धमका कर चुप करा देना.. !!

कविता भी कुछ कम नहीं थी.. उसे इस बात का गुस्सा आया की रंगे हाथों पकड़े जाने के बावजूद पीयूष उसे धमका रहा था

"अब रहने भी दे पीयूष.. ज्यादा शरीफ मत बन समझा.. सालों पहले तूने और वैशाली ने क्या गुल खिलाए थे मुझे सब पता है"

अरे बाप रे.. पीयूष की गांड ऐसे फटी की सिलवाने के लिए दर्जी भी काम न आए

"क्या कुछ भी बकवास कर रही है.. कोई काम-धाम है नहीं बस पूरे दिन बातें करा लो.. मुझे ऑफिस जाने में देर हो रही है.. टिफिन तैयार किया या नहीं? बड़ी मुश्किल से मिली है ये नौकरी.. तू ये भी छुड़वा देगी " गुस्से से पैर पटकते हुए पीयूष ने कहा.. कविता को लगा की आज के लिए इतना डोज़ काफी था.. पर जाते जाते उसने सिक्सर लगा दी

"हाँ हाँ टिफिन तो कब से तैयार है.. ये तो तुझे आने में इतनी देर हुई इसलिए मैं ऊपर देखने चली आई.. तुम्हें डिस्टर्ब करने का मेरा कोई इरादा नहीं था.. तुम शांति से पौधों को जितना मर्जी पानी पिलाते रहो.. सारे पौधे तृप्त हो जाए बाद में नीचे चले आना" कविता गुस्से से सीढ़ियाँ उतर गई

"ये कविता साली मुझे आराम से देखने भी नहीं देती.. तो चोदने कैसे देगी? भेनचोद ये पत्नीयों को कैसे समझाए? पति थोड़ा बहुत फ्लर्ट करें तो इसमें कौनसा पहाड़ टूट पड़ता है ये समझ नहीं आता.. कोई कदर ही नहीं है कविता को मेरी.. बहोत गुस्सा आया उसे कविता पर.. लेकिन देश के अन्य मर्दों की तरह वो भी अपनी पत्नी के सामने लाचार था.. जीरो पर आउट होकर पेवेलियन में जिस तरह बेट्समेन नीची मुंडी करके लौटता है वैसे ही पीयूष सिर नीचे झुकाकर सीढ़ियाँ उतारने लगा

कविता को आज पीयूष की फिरकी लेने का मस्त मौका मिला था.. और कोई भी पत्नी ऐसे मौके को छोड़ती नहीं है। पीयूष को सीढ़ियाँ उतरते देख कविता ने कहा "नीचे ध्यान से देखकर उतरना.. कहीं गिर गया तो तेरी देखभाल करने कोई पड़ोसन नहीं आएगी.. वो तो मुझे ही करना होगा इतना याद रखना तुम"

पीयूष चुपचाप टिफिन लेकर ऑफिस के लिए रवाना हो गया.. वो गली के नुक्कड़ तक पहुंचा ही था की तभी उसने रिक्शा में बैठी वैशाली को देखा.. रोता हुआ बच्चा चॉकलेट को देखकर जैसे चुप हो जाता है.. वैसे ही वैशाली को देखकर पीयूष के मन का सारा गुस्सा भांप बनकर उड़ गया..वैशाली ने पीयूष को ऑटो में बैठने को कहा और ऑटोवाले से बोली की यहाँ से निकलकर ऑटो को आगे खड़ा करें.. ताकि इस इलाके से बाहर निकालकर आगे की योजना के बारे में सोच सकें।

"अब बता पीयूष.. किस तरफ लेने के लिए कहू?" वैशाली ने सीधे सीधे पूछ लिया.. पीयूष ने अपनी ऑफिस का पता बताया

"ऑफिस की बात नहीं कर रही.. अरे बेवकूफ तुझे नादान और नासमझ नहीं बनना है?? " वैशाली ने आँखें नचाते हुए नटखट आवाज में कहा

पीयूष हक्का बक्का रह गया.. अपनी माँ पर ही गई है ये लड़की.. बात को घुमाये बगैर सीधा सीधा बोलने की आदत दोनों को है.. पीयूष को ऑफिस में आज बेहद जरूरी काम था.. दूसरी तरफ वैशाली नाम का जेकपोट हाथ में आया था उसे भी जाने नहीं दे सकता था.. पीयूष उलझन में पड़ गया

स्किनटाइट जीन्स और व्हाइट केप्रि पहने बैठी वैशाली ने अपना एक हाथ पीयूष के कंधे पर रख दिया.. उसी के साथ वैशाली का एक तरफ के स्तन की झलक पीयूष को दिख गई.. ओह्ह। वैशाली ने एक ही पल में पीयूष के दिमाग को एक ही पल में बंद कर दिया

"अब जल्दी भोंक.. कहाँ जाना है?? ऑटोवाले भैया कब से पूछ रहे है"

"मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है वैशाली.. तू ही बता "

वैशाली को थोड़ा गुस्सा आया.. साथ ही साथ पीयूष के भोलेपन पर हंसी भी आई.. अभी भी ये पहले जैसा ही है.. लड़की को लेकर कहाँ जाते है वो तक पता नहीं है इसे..

"भैया.. अम्बर सिनेमा पर ऑटो ले लीजिए.. " ऑटो उस तरफ चलने लगी

"नहीं नहीं.. वहाँ नहीं.. उस सिनेमा की बिल्कुल बगल में मेरे दोस्त का घर है.. उसने देख लिया तो आफत आ जाएगी.. "

"तो फिर? कहाँ जाएंगे?" वैशाली सोचने लगी

"साहब, अगर आप लोगों को कोई सुमसान जगह की तलाश है तो मैं आपको ले जा सकता हूँ " ऑटो वाले ने कहा

"कहाँ पर?" वैशाली और पीयूष दोनों एक साथ बोले

"शहर के बाहर मेरा घर बन रहा है.. वहाँ कोई नहीं होता.. काम भी बंद है अभी.. मुझे जो ऊपर का खुशी से देना चाहते हो देना.. मेरी बीवी बीमार है.. मेरी भी थोड़ी मदद हो जाएगी.. " ऑटो वाले ने कहा

"ठीक है.. वहीं पर ले लो.. " वैशाली ने तुरंत फैसला सुना दिया..

लगभग पंद्रह मिनट में रिक्शा एक सुमसान खंडहर जैसी जगह पर आकर रुकी.. दीवारें थी पर प्लास्टर बाकी था.. अंदर कोई नहीं था.. आजूबाजू भी दूर दूर तक किसी का नामोनिशान नहीं नजर आ रहा था..

"आप वापिस कैसे जाओगे साहब? यहाँ ऑटो नहीं मिलेगी आपको.. "

"तुम दो घंटे बाद हमें लेने वापिस आना.. " वैशाली ने कहा

"मेरा नंबर सेव कर लीजिए.. फोन करेंगे तो १० मिनट में पहुँच जाऊंगा" ऑटो स्टार्ट कर वो निकल गया

वैशाली और पीयूष खंडहर के अंदर गए.. रेत के एक बड़े से ढेर पर वैशाली बैठ गई.. बिना अपने कपड़ों की परवाह कीये.. थोड़े संकोच के साथ पीयूष भी वैशाली के पास बैठ गया

काफी देर तक दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला। थक कर आखिर वैशाली ने शुरुआत की

"पीयूष, २० मिनट से ज्यादा गुजर चुके है.. ऐसा ना हो की मुझे तुझ से जबरदस्ती करनी पड़े"

सुनते ही पीयूष ठहाका मारकर हंसने लगा.. "क्या यार वैशाली.. कुछ भी बोलती है... छोटी थी तब भी तू ऐसी ही नटखट थी"

"छोटी थी तब की बात है वो.. अब मैं बड़ी हो चुकी हूँ पीयूष.. मेरी पसंद.. मेरा टेस्ट अब बदल चुका है"

"मतलब?? " पीयूष को समझ नहीं आया

रेत के ढेर पर बैठे पीयूष को धक्का देकर सुला दिया वैशाली ने.. और उसके होंठों पर अपने होंठ लगाते हुए उसके लंड को पेंट के ऊपर से दबाने लगी और बोली "छोटी थी तब मुझे लोलिपोप चूसना बहुत पसंद था.. अब मुझे ये चूसना पसंद है"

माय गॉड.. वैशाली के इस कामुक रूप को देखकर पीयूष हक्का बक्का रह गया.. ये लड़की तो एटमबॉम्ब से भी ज्यादा स्फोटक है.. !!

इतना कहते ही वैशाली, पीयूष के लाल होंठों को चूमते हुए उसके लंड को मुठ्ठी में मसलने लगी..

"बड़ा भी हुआ है या उतना ही है जितना आखिरी बार देखा था??" कहते हुए वैशाली ने पेंट की चैन खोलकर अन्डरवेर में से लंड पकड़कर बाहर निकाला.. लंड की साइज़ देखकर उसने "वाऊ.. " कहा..

"पीयूष.. अब ज्यादा वक्त बर्बाद मत कर.. ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा.. आज तुझे कलकत्ता का माल मिला है मजे करने के लिए.. ये देख मेरी रत्नागिरी आफुस.." भारी स्तनों वाली छाती को उभारते हुए दिखाकर वैशाली ने पीयूष को पागल बना दिया.. पीयूष बावरा होकर वैशाली के स्तनों को दबाने लगा.. "ओह्ह वैशाली.. पता है उस दिन जब हम होटल गए थे.. ये तेरे बड़े बड़े बबलों में ही मेरी जान अटक कर रह गई थी उस दिन.. जब हमने साथ में पहली बार किया तब तेरे कितने छोटे छोटे थे.. और जब बड़े हुए तब तू चली गई.. तुझे वो सब बातें याद भी है या भूल गई?"


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"पीयूष, कोई भी लड़की अपना पहला किस कभी भूल नहीं सकती.. मुझे सब कुछ याद है.. तू बहोत पसंद था मुझे.. पर तू उस पिंकी के साथ ज्यादा खेलता था तब बड़ा गुस्सा आता था मुझे.. "

"कौन सी पिंकी यार??"

"एक नंबर का भुलक्कड़ है तू.. पीछे वाली गली में रहती थी.. रमणकाका की बेटी"

"अरे हाँ.. वो.. वो तो मुझे जरा भी पसंद नहीं थी.. पता नहीं यार तुझे उस समय क्यों ऐसा लगा की पिंकी मुझे पसंद थी.. मैं उस समय भी तुझसे बहोत प्यार करता था.. " दोनों बातें करते हुए एक दूसरे के अंगों से खेल रहे थे.. थोड़ी थोड़ी देर पर वैशाली घड़ी पर नजर डाल लेती थी..

वैशाली किसी परपुरुष के साथ ऐसा कभी न करती.. पर जब से उसे संजय के अवैध संबंधों के बारे में पता चला.. उसका दिमाग फट रहा था.. वो मादरचोद वहाँ मस्ती करे और मैं यहाँ गांड मराऊ ?? मैं भी बेशरम बन सकती हूँ.. और संजय के ऊपर आए गुस्से के कारण ही आज वो पीयूष का लंड पकड़कर रेत में लेटी थी..

"पीयूष.. ऐसे धीरे धीरे नहीं.. जरा जोर से दबा.. " वैशाली ने बड़ी ही धीमी कामुक आवाज में कहा। पीयूष वैशाली के गाल, गर्दन और कान को चूमते हुए उसके विशाल स्तनों को दबा रहा था.. वैशाली के टाइट टीशर्ट के ऊपर के बटन निकालकर उसने खजाना खोल दिया.. ब्रा के अंदर कैद दो खरबूजों के बीच की गोरी चीट्टी खाई.. आहहाहहाहहा.. ब्रा के ऊपर से उभर कर आए स्तनों के ऊपरी हिस्सों को वो चूमते हुए वैशाली के पेंट की चैन को खोलने लगा.. वैशाली की पेन्टी.. चुत का रस रिसने से पूरी तरह भीग चुकी थी

"ओह पीयूष.. बहुत खुजली हो रही है यार अंदर.. अपने हाथ से थोड़ा सहला उसे.. " लंड के ऊपर अपनी पकड़ को मजबूत करते हुए वैशाली ने कहा.. इतनी मजबूती से कभी कविता ने भी नहीं पकड़ा था पीयूष का.. कविता से हजार गुना ज्यादा हवस थी वैशाली में ..

"ओह्ह वैशाली.. मुझे एक बार तेरे ये दोनों बबले खोल कर देखने है यार.. " वैशाली ने टीशर्ट के बाकी बटन खोल दिए.. और ब्रा की कटोरियों में से दोनों मांस के पिंड को बाहर निकाला.. दूध जैसे गोरे भारी भरकम स्तनों को देखकर पीयूष कि आँखें फटी की फटी ही रह गई..

"कितने मस्त है यार तेरे बबले.. " दोनों लचकते स्तनों को हाथ में पकड़कर पीयूष दबाने मसलने लगा..

"तेरा स्पर्श मुझे पागल बना रहा है पीयूष.. मज़ा आ रहा है.. जोर से दबा.. क्रश इट.. ओ येह.. ओ गॉड.. आह्ह" अपने पति की बेवफाई का बदला लेने के लिए वैशाली पीयूष के शरीर फिर हाथ फेर रही थी.. वैशाली के खिले हुए गुलाब जैसे जिस्म को पीयूष रौंदने लगा..

"वैशाली.. तुझे कैसा लगा मेरा.. ??" अपने लंड की ओर इशारा करते हुए पीयूष ने वैशाली की जीन्स केप्रि को खींच कर उसके घुटनों तक ला दिया

"मस्त है तेरा पीयूष.. मज़ा आएगा"

"तेरे पति से बड़ा है ना !!!" संजय का जिक्र होते ही वैशाली के दिमाग के कुकर की सीटी बज गई..

"तू नाम मत ले उस भड़वे का.. मेरा मूड खराब हो जाएगा" वैशाली ने नीचे झुक कर पीयूष का पूरा लंड मुंह में लिया और चूसने लगी.. और बड़ी ही तीव्र गति से चूसने लगी..

"आह्ह वैशाली.. जरा धीरे धीरे.. निकल जाएगा मेरा" पीयूष के आँड़ों से खेलते हुए वैशाली बड़ी मस्ती से चूस रही थी


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वैशाली की टाइट केप्रि को बार बार खींचने पर भी जब नहीं निकाल पाया पीयूष तब उसने परेशान होकर वैशाली से कहा

"अरे यार.. ये तेरी चुत के चारों तरफ जो किलेबंदी है उसे हटा.. मुझसे तो निकल ही नहीं रहा है.. कितना टाइट पहनती है तू?"

"मेरे पीयूष राजा.. ऐसे टाइट पेंट में ही हिप्स उभर कर बाहर दिखते है.. और में हॉट लगती हूँ.. समझा.. !!" वैशाली ने आँख मारते हुए कहा

"वो तो ठीक है मेरी रानी.. पर इसे खोलने में कितना वक्त बर्बाद होता है!! इससे तो देसी घाघरा ही अच्छा.. जो पहनने के भी काम आए और वक्त आने पर बिछाने के भी.. अब नखरे छोड़ और उतार ये तेरी केप्रि" अपने ठुमकते लोड़े को काबू में करने के लिए पीयूष ने उसे हाथ से पकड़ कर रखा था..

वैशाली रेत के ढेर से खड़ी हुई.. उसकी पीठ पर रेत लग गई थी.. वैशाली ने केप्रि और साथ में अपनी पेन्टी भी उतार दी.. और कमर से नीचे पूरी नंगी हो गई..

वैशाली की मोटी मोटी जांघें देख पीयूष उत्तेजित होकर उन्हे चूमने लगा.. हल्के झांटों वाली चुत पर हाथ फेरते हुए उसने चुत का प्रवेश द्वार ढूंढ निकाला.. और अपनी उंगलियों से उसकी क्लिटोरिस से जैसे ही उसने खेलना शुरू किया.. वैशाली सिहर उठी.. उसने पीयूष के सिर को पकड़ कर अपनी दो जांघों के बीच में दबा दिया.. सिसकियाँ लेते हुए वो अपने पैरों से पीयूष के लंड को रगड़ने लगी..

"ओह पीयूष.. चाट मेरी यार.. " तड़प रही थी वैशाली.. उसके स्तन फूल कर सख्त हो गए थे.. निप्पल उभर आई थी.. अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था उससे.. वो अपनी झांटों वाली चुत को पीयूष के चेहरे पर रगड़ने लगी.. लेकिन पीयूष अब भी सिर्फ चूम ही रहा था.. अपनी जीभ उसने वैशाली की चुत में नहीं डाली थी

चुत की खुजली से परेशान वैशाली ने पीयूष को धक्का देकर रेत के ढेर पर गिरा दिया.. और उसके चेहरे पर सवार हो गई.. दोनों तरफ अपने पैर जमाकर मदमस्त होकर अपनी चूचियाँ मसलते हुए वो आगे पीछे होने लगी.. वैशाली के जिस्म का वज़न आ जाने से पीयूष का चेहरा रेत में धंस गया.. उसने वैशाली की चुत की परतों के बीच अपनी जीभ फेरनी शुरू कर दी.. दोनों उत्तेजनावश वासना के महासागर में गोते खाने लगे.. हवस की आग में झुलस रही वैशाली पीयूष के सर के बाल पकड़कर अपनी चुत का दबाव बनाने लगी.. पीयूष ने अपने नाखून वैशाली के कोमल चूतड़ों में गाड़ दिए.. चुत का रस पीयूष के पूरे चेहरे पर सना हुआ था..


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एक घंटा हो गया.. इन दोनों का फोरपले अब भी चल रहा था.. वैशाली पीयूष के स्पर्श की एक एक पल बड़े मजे से महसूस कर रही थी.. पीयूष की जीभ.. चुत के अंदर तक घुस चुकी थी और वैशाली को स्वर्ग की सैर करवा रही थी.. पीयूष ने अपने लंड को मुठ्ठी में पकड़कर हिलाना शुरू कर दिया.. उसे लंड हिलाता देख वैशाली ने उसका हाथ छुड़ाकर खुद हिलाना शुरू कर दिया

"हाये पीयूष.. ये तेरा खुरदरा लंड जब मेरी चुत की दीवारों पर घिसेगा तब कितना मज़ा आएगा यार.. !!" अब वैशाली को लंड लेने की इच्छा होने लगी.. वैशाली ने अपनी कमर को थोड़ा सा उठाया.. पीयूष अब रिसती हुई चुत को साफ देख पाया.. उसने अपनी जीभ को वैशाली के गांड के छेद से लेकर क्लिटोरिस तक चाटा.. और अंगूठे से क्लिटोरिस को कुरेदने लगा..


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दो दो संवेदनशील जगहों पर जीभ का स्पर्श होते ही वैशाली बेहद उत्तेजित हुई.. और वो खुद झड़ जाए उससे पहले पीयूष के लंड के ऊपर बैठ गई.. जिस प्रकार से लंड घिसकर अंदर गया उससे वैशाली को यकीन हो गया की हिम्मत के लंड के मुकाबले पीयूष के लंड में ज्यादा मज़ा आएगा..

"आह्ह पीयूष.. ओह माँ.. फक मी.. येस.. ओह गॉड.. फक मी हार्ड.. " कराह रही थी वैशाली.. पीयूष भी नीचे से दमदार धक्के लगाए जा रहा था..

"ओह्ह वैशाली.. मेरा निकलने की तैयारी में है.. !! कितनी टाइट है तेरी चुत.. आह्ह.. !! लगता है काफी दिनों से बिना चुदे कोरी पड़ी है तेरी चुत.. "

"ओह्ह.. जोर से धक्के मार पीयूष.. स्पीड बढ़ा.. फाड़ दे मेरी चुत को.. बहुत भूखी हूँ.. ओह ओह्ह.. " पागलों की तरह कूद रही थी वैशाली.. खंडहर की दीवारों के बीच "फ़च फ़च" की आवाज़ें गूंज रही थी.. "पीयूष.. पानी अंदर मत निकालना.. नहीं तो भसड़ हो जाएगी.. पिछले एक साल से उस कमीने के साथ मैंने कुछ नहीं किया है"

"ओह्ह पीयूष.. आह्ह.. उईई माँ.. बहोत मस्त चोद रहा है यार.. आह्ह मैं गईईईई" कहते हुए वैशाली थरथराने लगी और झड़ गई.. झड़ते ही वो उसी अवस्था में पीयूष की छाती के ऊपर लेट गई.. पीयूष ने अपना लंड बाहर निकाल और वैशाली की गांड के इर्दगिर्द अपनी पिचकारी दे मारी.. गांड के छेद पर गरम गरम वीर्य का स्पर्श होती है वैशाली ने कहा "कितना गरम है यार.. पीछे जलने लगा मुझे.. "


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वैशाली पीयूष के शरीर से उतर गई.. और बेफिक्र होकर उसके बगल में रेत पर लेट गई.. दोनों पसीने से सन चुके थे.. और पूरे शरीर पर रेत लग गई थी.. वासना का तूफान शांत हो गया था.. और दोनों धीरे धीरे वास्तविकता की दुनिया में कदम रख रहे थे.. पीयूष अब भी लेटे लेटे वैशाली के स्तनों को दबा रहा था

वैशाली: "तुझे इतने पसंद है मेरे स्तन?"

पीयूष: "हाँ डार्लिंग.. इन्हे देखते ही मैं बेकाबू हो जाता हूँ"

वैशाली: "मुझे भी तेरे साथ इत्मीनान से करवाने का बड़ा ही मन था.. इतना मज़ा आया है मुझे आज की क्या कहूँ.. आई वॉन्ट टू फ़ील दिस अगैन..वापिस कब मिलेगा मुझे?"

"तू यहाँ और कितने दिनों के लिए है?"

"कम से कम एक हफ्ते के लिए.. " पीयूष के नरम लंड से खेलते हुए वैशाली ने कहा

पीयूष: "तेरे शरीर इतना आकर्षक है की अगर दिन रात करता रहु तो भी मेरा मन नहीं भरेगा.. अगर तू तैयार हो तो अभी एक और बार करते है"

वैशाली मुस्कुराई और बोली "यहाँ इस अनजान जगह में खुले में करने में जो मज़ा आया.. मेरा भी दिल कर रहा है एक बार और करने के लिए... पर जल्दी करना पड़ेगा.. वक्त बहुत ही काम है.. और कल वापिस तू कुछ सेटिंग करना.. जहां बुलाएगा मैं आ जाऊँगी.. बहोत सह लिया संजय के साथ.. अब मैं ज़िंदगी का पूरा मज़ा लूँगी"

पीयूष ने करवट लेकर पास लेटी वैशाली के स्तन की निप्पल को चूसना शुरू किया.. इसी के साथ वैशाली की चुत में करंट दौड़ने लगा.. पीयूष का लंड भी जागृत हो गया.. वैशाली पीयूष के लंड पर अपनी छातियाँ रगड़कर उसे और सख्त करने लगी.. स्तनों के गरम नरम स्पर्श से लंड का सुपाड़ा खिल उठा..

पीयूष ने वैशाली को लंड से दूर किया और उसे रेत में उल्टा लेटा दिया.. और उसपर सवार होकर अपने लंड को उसके चूतड़ों पर चाबुक की तरह मारने लगा.. गोरे कूल्हे लाल लाल हो गए.. रेत के अंदर वैशाली के चुचे अंदर धंस गए.. गीली रेत की ठंडक अपने स्तनों पर महसूस कर रही थी वैशाली।

बगल में साइलेंट मोड पर रखा हुआ पीयूष का मोबाइल अविरत बजे जा रहा था.. उसके बॉस राजेश और सेक्रेटरी पिंटू के अनगिनत मिसकॉल थे स्क्रीन पर.. उतना ही नहीं.. कविता और शीला के भी मिसकॉल आए थे.. पर इस हवस के सागर में डूबे हुए जोड़े को दुनिया की परवाह न थी

वैशाली के भव्य चूतड़ों को चौड़ा कर पीयूष ने गांड के छेद पर अपनी जीभ फेरकर वैशाली को झकझोर दिया.. "माय गॉड पीयूष.. कहाँ जीभ फेर दी तूने.. तुझे घिन नहीं आई?"

"तुझे नहीं पसंद तो नहीं करूंगा डीयर.. "

"पसंद नापसंद की बात नहीं है यार.. नीचे जीभ से कोई चाटे तो मज़ा तो आता ही है.. मेरे कहने का ये मतलब था की ऐसी गंदी जगह तू कैसे चाट सकता है!!" वैशाली को जरा भी अंदाजा नहीं था की इस जगह भी कितना आनंद छुपा हो सकता है

"पीयूष प्लीज.. चाटना बंद कर.. मैं मर जाऊँगी.. "वैशाली से बर्दाश्त नहीं हो रहा था.. पीयूष चाट पीछे रहा था और आग लग रही थी वैशाली की चुत में.. जब रहा नहीं गया तब वैशाली ने रेत के ढेर में हाथ डालकर खुद ही अपनी चुत को ढूंढ निकाला.. और क्लिटोरिस को पकड़कर दबा दिया.. तब उसे चैन आया.. चुत की खुजली थोड़ी शांत होने पर अब वह आराम से गांड चटाई का मज़ा ले पा रही थी

पीयूष अब उठा और दोनों हाथों से वैशाली को जांघों से पकड़कर खिंचकार थोड़ा सा ऊपर कर दिया.. और अपने सुपाड़े को गांड के छेद पर रख दिया.. वैशाली को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसके छेद पर किसी ने कोयले का अंगारा रख दिया हो.. इतना गरम लग रहा था पर मज़ा भी आ रहा था.. गर्मी का एहसास होते ही उसकी गांड का वाल्व सिकुड़कर बंद हो गया। पर पीयूष बेहद उत्तेजित था.. या यूं कहो की निरंकुश सा हो चुका था.. उसने अपने लंड को जोर से अंदर धकेला.. वैशाली तो यही सोच रही थी की पीयूष उसकी गांड के साथ बस छेड़छाड़ कर रहा था.. लेकिन उस अत्यंत कोमल और संकरी गांड के मुकाबले काफी बड़े सुपाड़े के अंदर घुसते ही उसकी चीख निकल गई

"ओओईईई माँ.. मर गई मैं.. नालायक.. क्या किया तूने? निकाल बाहर.. " पीयूष वैशाली की चीखो को अनसुना करते हुए अंदर धकेलता गया. उसका आधा लंड अंदर घुस गया.. वैशाली को चक्कर आने लगे.. आँखों के सामने अंधेरा छा गया.. पीयूष की पकड़ से छूटने के लिए वो उछलने लगी.. पर जरा सी भी हलचल करने पर उसे तीव्र पीड़ा हो रही थी.. इसलिए उसने प्रतिकार या विरोध करना बंद कर दिया

टाइट गांड के अंदर पीयूष के लंड की चमड़ी भी छील गई थी.. उसे भी जल रहा था.. बहोत टाइट था वैशाली की गयंद का छिद्र

थोड़ी देर तक बिना हिलेडुले पीयूष स्थिर पड़ा रहा.. वैशाली की जान में जान आई "प्लीज पीयूष.. बाहर निकाल दे यार.. किसी और दिन ट्राय करेंगे.. अभी मैं इसके लिए तैयार नहीं हूँ.. " दर्द से कराहते हुए वैशाली ने कहा

पीयूष ने बड़े ही प्यार से वैशाली की गर्दन को चूमते हुए कहा "वैशाली.. "

उसने जवाब नहीं दिया

पीयूष ने फिर से कहा "सुन रही हो डीयर??"

"हाँ बॉल.. क्या है?"

"तूने पहले कभी पीछे करवाया है? मतलब किसी गांड मरवाई है क्या कभी?"

"नहीं.. कभी नहीं.. बहोत दर्द होता है.. तू कभी अंदर लेगा तो पता चलेगा तुझे"

"मैं क्या होमो लगता हूँ तुझे.. जो किसी की अंदर लूँगा??" गुस्से से पीयूष ने लंड को फिर से दबाया.. वैशाली के कंठ से दबी हुई चीख निकल गई.. "बस कर यार.. मुझसे अब बर्दाश्त नहीं होता"

पीयूष: "वैशाली.. जीवन में हर तरह के अनुभव करने चाहिए.. ये अनुभव भी जरूरी है"

"भेनचोद.. चूल मची है चुत में.. और तू गांड के पीछे पड़ा है?" वैशाली अब गुस्सा हो गई.. भोसड़े की खुजली बर्दाश्त नहीं हो रही थी उससे.. पीयूष ने लंड को बाहर खींचा.. वैशाली को राहत मिली.. "गुड बॉय.. अब मैं घूम जाती हूँ.. फक मी इन द फ्रंट"

पीयूष ने फिर लंड को दबाया.. "उईई माँ.. क्या कर रहा है तू? मुझे बहोत दर्द हो रहा है यार.. कब से बॉल रही हूँ समझता क्यों नहीं?"

पीयूष ने धीरे से लंड बाहर निकाल लिया... गांड आजाद होते ही वैशाली की जान में जान आई.. वो पलट गई और बोली "बहोत वक्त जाया किया है तूने.. अब जल्दी कर.. " वैशाली ने पीयूष का लंड पकड़कर खुद ही अपनी चुत में डाल दिया.. और अपनी कमर उठा ली.. शताब्दी एक्स्प्रेस की गति से पीयूष ने चुत चुदाई शुरू कर दी.. वैशाली भी चूतड़ उछालकर उसके धक्कों का माकूल जवाब दे रही थी

कुछ ही मिनटों की चुदाई के बाद वैशाली झड़ गई.. पीयूष ने भी लंड बाहर निकालकर वैशाली के गद्देदार पेट पर वीर्य की पिचकारी छोड़ दी.. दोनों अब शांत हो गए.. वैशाली पूरी तरह से तृप्त हो चुकी थी.. रेत से घिसकर उसने अपने पेट पर लगा वीर्या साफ कर लिया.. दोनों इतने गंदे हो चुके थे जैसे मजदूरी करके वापिस लौटे हो.. वैशाली की चुत तो शांत हो गई पर उस मादरचोद ने जो गांड में लंड डाला था.. वहाँ जलन हो रही थी और दर्द भी..

"ये कपड़े तो देख और हमारा हाल देख.. ऐसे कैसे घर जाएंगे हम दोनों??" वैशाली को चिंता होने लगी..

पीयूष भी सोच में पड़ गया.. कहीं थोड़ा पानी मिल जाएँ तो सफाई हो सकती है.. पीयूष ढूँढने लगा.. मकान का काम चल रहा था मतलब कहीं न कहीं टंकी जरूर होगी.. पीछे की तरफ टंकी नजर आई.. पर उसमें बहोत दिने से भरा हुआ गंदा पानी था..

"ऐसे गंदे पानी में मैं अपने पैर नहीं साफ करूंगी" वैशाली ने मना कर दिया

"कोई बात नहीं महारानी.. अभी तेरे पापा विदेश से मिनरल वॉटर भेजेंगे.. उससे साफ कर लेना.. ठीक है !! नखरे छोड़ और साफ कर" वैशाली ने जैसे तैसे अपने कपड़े साफ किए और शरीर पर लगी रेत को झटक दिया

"अब जल्दी करते है पीयूष.. एक घंटे के लिए सहेली को मिलने के बहाने निकली थी.. घर से निकले हुए साढ़े तीन घंटे हो गए है.. मम्मी चिंता कर रही होगी.. अब भागना पड़ेगा"

अब पीयूष की भी फटी.. ऑफिस का काम छोड़कर आया था.. कितनी जरूरी डिलीवरी करनी थी आज.. राजेश सर क्या सोचेंगे.. बिना कहे ही छूटी मार दी!! पर कोई फोन ही कहाँ आया है किसी का.. फिर तो कोई टेंशन नहीं है..

तभी अचानक उसे याद आया की चुदाई शुरू करने से पहले उसने फोन को साइलन्ट मोड पर रख दिया था.. रेत के ढेर से थोड़े दूर उसने मोबाइल रखा हुआ था.. फोन हाथ में लेते ही उसके होश उड़ गए.. उसके चेहरे पर शिकन आ गई

"क्या हुआ??" चिंतित पीयूष को देखकर वैशाली ने पूछा

"अरे यार.. मेरे बॉस के दस मिसकॉल आ गए है.. घर से कविता के और तेरी मम्मी के मिसकॉल भी है.. कहीं बॉस ने घर पर तो फोन नहीं किया होगा?? घर पर फोन किया होगा तो कविता ने तो यही कहा होगा की मैं ऑफिस के लिए निकल चुका हूँ!! बाप रे !!"

वैशाली को भी याद आया.. उसका फोन भी पर्स के अंदर था.. पर्स से फोन निकालकर उसने देखा तो मम्मी के बीस मिसकॉल थे और संजय के भी काफी कॉल आकर चले गए थे.. इस मादरचोद को भी आज ही मेरी याद आनी थी!! जैसे इतना काफी नहीं था.. वैशाली को कविता का मेसेज भी आया था "कहाँ है तू? कहीं पीयूष के साथ तो नहीं है.. प्लीज कॉल अरजेंट" इसका मतलब तो ये हुआ की दोनों के घर पर प आता चल चुका था.. कोई भी समस्या हो कविता सब से पहले शीला को बताती थी ये बात पीयूष को पता थी

दोनों के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी.. वैशाली खड़ी हुई और बोली "कुछ भी हो जाएँ पीयूष.. पर हमें इसी बात पर अड़े रहना है की हम साथ नहीं थे.. हम दोनों को साथ जाते हुए किसी ने देखा तो नहीं होगा ना??"

पीयूष के पास इसका कोई जवाब नहीं था.. दोनों सिर पकड़कर खड़े रहे.. "बुला लूँ ऑटो वाले को?" पीयूष ने कहा

"नहीं.. मुझे सोचने दे कुछ.. अब जो भी होगा देखा जाएगा.. " वैशाली ने कहा

"हम जब सोसायटी के नुक्कड़ से ऑटो में बैठे तब किसी न किसी ने हमे देखा ही होगा.. " पीयूष की गांड फट कर फ्लावर हो गई

"अब मजे किए है तो थोड़ा भुगतना भी पड़ेगा.. हम ये कहेंगे की हम ऑटो में साथ निकले औ मैंने तुम्हें बस स्टेंड पर छोड़ दिया था" वैशाली का दिमाग काम पर लग गया

"मैं बॉस को फोन करता हूँ.. पर क्या कहूँगा उनसे?"

"अरे यार.. बोल देना की रास्ते में एक बाइक वाले का एक्सीडेंट हुआ था तो तू उसे लेकर अस्पताल गया था.. इसलिए ऑफिस नहीं आ सका"180

"यार तू कितनी आसानी से जूठ बोल सकती है.. मुझसे तो बोला ही नहीं जाता.. एक काम कर.. तू ही बात कर ले मेरे बॉस से"

"ठीक है.. फोन लगाकर दे.. मैं बात करती हूँ"

पीयूष ने राजेश सर को फोन लगाकर वैशाली को दिया। राजेश बहोत गुस्से में था.. पर सामने पीयूष के बजाए किसी लड़की की आवाज सुन कर वो भी ठंडा हो गया.. वैशाली ने पट्टी पढ़ाकर राजेश को चोदू बना दिया..

"हो गया प्रॉब्लेम सॉल्व? अब तू कविता को फोन लगा" वैशाली ने पीयूष से कहा

"कविता को? पर क्यों?"

"तुझे जो कहा वो कर.. लगा फोन" वैशाली ने कहा

"अरे पर फोन मिलाकर क्या बात करू?"

"अभी तेरे बॉस को एक्सीडेंट वाला बहाना दिया ना हमने.. तो घर पर भी वही कहना है.. इतना भी नहीं समजता तू बेवकूफ?"

पीयूष ने कविता को फोन किया और जो बात वैशाली ने राजेश से कही थी वही बात उसने कविता को बोल दी.. फिर रिक्शा वाले को फोन करके बुलाया.. और ऑटो में अपने घर के एरिया तक पहुँच गए.. वैशाली ने अपने पर्स से 500 का एक नोट निकालकर ऑटो वाले को दे दिया... वो खुश होकर चला गया

"तू भी यार.. इतने पैसे भी कोई देता है क्या??" पीयूष को ५०० रुपये बहोत ज्यादा लगे.. उसके हिसाब २००-२५० में काम बन जाता

वैशाली: "यार.. तूने आज मुझे जो ऑर्गजम दिए है.. उसके सामने ५०० रुपये की कोई कीमत नहीं है.. और देख.. जब गैरकानूनी हरकतें कर रहे हो तब रिश्वत देने में कभी कंजूसी नहीं करनी चाहिए.. " गुरुमंत्र दिया पीयूष को वैशाली ने

"तू फिर कब मिलेगा मुझे??" वैशाली ने पूछा

"तू मुझे मोबाइल कर देना.. जहां कहेगी मैं आ जाऊंगा.. " ऐसे व्यभिचारी मामलों में जगह की व्यवस्था करना पुरुष की जिम्मेदारी होती है.. पीयूष में इतनी हिम्मत नहीं थी इसलिए परोक्ष रूप से उसने वैशाली पर ही वो जिम्मेदारी डाल दी

वैशाली: "ठीक है.. लेकिन जब बुलाऊ.. जहां बुलाऊ.. पहुँच जाना वरना तू जहां भी होगा पहुँच जाऊँगी और वहीं खड़े खड़े चोद दूँगी.. समझा!!"

इतनी रंगीन धमकी सुनकर पीयूष पानी पानी हो गया.. उसने चुपके से वैशाली के हाथ को दबा दिया.. और दोनों अलग अलग रास्ते चल निकले

पीयूष के लिए तुरंत घर जाना मुमकिन नहीं था.. अगर दोनों एक साथ ही सोसायटी में प्रवेश करते तो जिस बात का सब को शक था वो यकीन में बदल जाता..

शीला अपने घर चिंता से पागल हुई जा रही थी.. जवान लड़की देर तक घर ना लौटे.. फोन पर कॉन्टेक्ट न हो पाए.. कोई अता-पता न हो.. तो कोई भी माँ का चिंतित होना काफी स्वाभाविक है..

वैशाली को देखते ही शीला मशीनगन की तरह फायरिंग करने लगी "कहाँ थी तू? एक घंटे का बोलकर गई थी अभी चार चार घंटे हो गए और तेरा कुछ पता ही नहीं.. !! एक फोन तक नहीं कर सकती थी?? कितनी चिंता हो रही थी मुझे.. कहाँ गई थी तू?"

वैशाली: "मेरी बात तो सुनो मम्मी.. वो मेरी फ्रेंड है ना.. सुमन.. ?? उसके घर गई थी.. उसके घर मेहमान आए हुए थे.. और वो बेचारी अकेली थी.. सब के लिए खाना बनाना था तो मैं उसे मदद कर रही थी.. अब उसे भला कैसे मना करती? थोड़ी देर में काम खतम कर के निकल जाऊँगी ऐसा सोचते सोचते इतना टाइम निकल गया.. फोन मेरा पर्स के अंदर था.. और वो मेहमान ऊंची आवाज पर टीवी देख रहे थे इसलिए मैं फोन की रिंग सुन नहीं पाई.. तूने खाना खाया की नहीं?"

शीला: "मैंने तो खाना कहा लिया.. पर तेरे कपड़ों पर इतनी रेत क्यों लगी है?" शीला की शातिर आँखों से कुछ भी बच नहीं सकता

"मम्मी.. ऑटो से उतरकर मैं चलते चलते सुमन के घर की तरफ जा रही थी.. तभी मेरे आगे एक रेत से भरा ट्रेक्टर जा रहा था.. आगे एक खड्डा आया और ट्रेक्टर से रेत उछल कर आजू बाजू चल रहे सब के ऊपर गिरी.. मैं नहाने जाती हूँ" शीला ओर कोई प्रश्न पूछती उससे पहले वैशाली भागकर बाथरूम में घुस गई.. शावर लेने के बाद उसे एहसास हुआ की साफ कपड़े तो लेना भूल ही गई थी.. अपने स्तनों को ऊपर तोलिया बांधकर वो बाहर निकली और बेडरूम के अंदर अपने कपड़े लेने के लिए उसने दरवाजा खोलने की कोशिश की..

दरवाजा अंदर से लोक था.. वैशाली ने शीला को आवाज दी.. "मम्मी.. ये बेडरूम को लोक क्यों लगाया है?? मुझे मेरे कपड़े लेने है"

शीला भागकर आई और अपने होंठ पर उंगली रखते हुए वैशाली को चुप रहने के लिए कहा "अंदर संजयकुमार सो रहे है.. धीरे से बोल वरना जाग जाएंगे.. बहोत थक कर आए है.. मुझे कह रहे थे की कोई उन्हे डिस्टर्ब न करे.. इसलिए मैंने बाहर से दरवाजा लोक कर दिया... थोड़ी देर पहले वो कविता और मौसी ने आकर भूचाल मचा दिया था.. "

वैशाली: "क्यों? कविता और मौसी को क्या हुआ?"

शीला: "अरे हुआ कुछ नहीं.. पीयूष ऑफिस जाने के लिए निकला और समय पर पहुंचा नहीं.. उसके बॉस ने कविता को फोन किया इसलिए सब चिंता करने लगे.. मौसी ने तो ५ दिए जलाने की मन्नत भी मांग ली.. अब पीयूष कोई छोटा बच्चा है जो कहीं खो जाएगा !!! मैंने उसे समझाया की थोड़ी देर शांति रखें.. पीयूष का पता चल ही जाएगा.. और पीयूष कितना सुशील और संस्कारी लड़का है !! वो बिना बताए या घर वालों से छुपाकर कहीं जाने वालों में से नहीं है.. उलझ गया होगा बेचारा किसी काम में.. पर मेरी बात सुनता कौन!! तभी फोन आया की पीयूष का पता चल गया.. मौसी की जान में जान आई.. कविता तो रोने ही लग गई.. मैंने उनसे कहा की वो खोया ही नहीं था.. तुम लोग बेकार में टेंशन ले रहे थे.. अब इन सब शोर-शराबे से संजय की नींद खराब न हो इसलिए मैंने ही बाहर से ताला लगा दिया.. ये ले चाबी.. अंदर जाकर कपड़े बदल ले.. और हाँ.. वापिस वो अधनंगे कपड़े मत पहनना.. दामाद जी को बुरा लगेगा.. वो सोचेंगे की मायके में आकर तू आउट ऑफ कंट्रोल हो गई है.. जा अंदर.. और ब्लू कलर की साड़ी पहन कर आना.. मैंने तुझे दी थी न वो वाली.. बहुत जचेगी तुझ पर.. !!"

संजय का नाम सुनते ही वैशाली के मूड का सत्यानाश हो गया.. पीयूष के संग की चुदाई का जो भी नशा था वो एक ही पल में उतर गया.. संजय से वो अब नफरत करती थी.. आखिर एक औरत कब तक बर्दाश्त करेगी? मुंह बिगाड़कर वैशाली ने कहा "उसे जो सोचना हो सोचे.. मुझे कोई फरक नहीं पड़ता.. उसने मेरे कौन सी चिंता की है जो मैं उसकी परवाह करू? भाड़ में जाए संजय.. मैं तो आज मेरी पसंद के कपड़े ही पहनूँगी.. "
 
संजय का नाम सुनते ही वैशाली के मूड का सत्यानाश हो गया.. पीयूष के संग की चुदाई का जो भी नशा था वो एक ही पल में उतर गया.. संजय से वो अब नफरत करती थी.. आखिर एक औरत कब तक बर्दाश्त करेगी? मुंह बिगाड़कर वैशाली ने कहा "उसे जो सोचना हो सोचे.. मुझे कोई फरक नहीं पड़ता.. उसने मेरे कौन सी चिंता की है जो मैं उसकी परवाह करू? भाड़ में जाए संजय.. मैं तो आज मेरी पसंद के कपड़े ही पहनूँगी.. "

शीला बेबस हो गई.. आजकल की पीढ़ी को कुछ भी समझाना बड़ा ही कठिन है.. वो ओर कुछ कहती उससे पहले वैशाली ने दरवाजा खोल दिया.. अंदर गई.. और धड़ाम से दरवाजा बंद कर दिया..

शीला घबरा गई.. उसे यकीन था की दरवाजे की आवाज से संजय जाग जाएगा और दोनों के बीच झगड़ा होगा.. अब क्या करू? पति पत्नी के झगड़े के बीच में पड़ना भी ठीक नहीं होगा.. अरे, पति पत्नी के बीच तो मनमुटाव होता रहता है.. वैशाली बेकार में इतना गुस्सा कर रही है.. इतने दिनों के बाद आया है संजय.. पर वैशाली के चेहरे पर कोई खुशी ही नहीं थी..

काफी देर तक शीला बाहर सोच में डूबी खड़ी रही.. उसे आश्चर्य हुआ की अब तक वैशाली बाहर क्यों नहीं आई?? कुछ हुआ होगा क्या? कहीं संजय ने वैशाली पर हाथ तो नहीं उठाया होगा?? शीला कांप गई.. क्या करू!! अंदर जाऊ की नहीं?? शीला ने दरवाजे पर कान लगाकर सुनने का प्रयत्न किया लेकिन अंदर से कोई आवाज नहीं आई.. बहोत दिनों के बाद मिले है.. तो कुछ कर तो नहीं रहे होंगे? पर वैशाली तो कह रही थी की उसे संजय की परवाह ही नहीं है.. शीला का दिमाग तेजी से चल रहा था

तभी बाहर के दरवाजे पर दस्तक हुई.. शीला ने दरवाजा खोला तो उसकी सहेली चेतना खड़ी थी.. शीला का चिंतित चेहरा देखकर चेतना सकपका गई.. उसे लगा की शायद वो गलत वक्त पर आ गई.. शीला ने उसे अंदर तो बुलाया पर बिना किसी उत्साह के..

"क्या हुआ शीला?? तेरा चेहरा क्यों उतरा हुआ है?"

शीला: "अरे कुछ खास नहीं.. तू बता.. अचानक कैसे आना हुआ?"

चेतना: "यहाँ से गुजर रही थी.. सोचा तुझसे मिल लूँ.. "

शीला: "अच्छा किया.. आ बैठ.. मेरी बेटी वैशाली और दामाद आए हुए है एक हफ्ते से"

चेतना: "अच्छा!! कहाँ है वैशाली? बहोत सालों पहले देखा था.. तब तो वो छोटी सी थी.. अब तो मैं उसे पहचान भी नहीं पाऊँगी"

शीला: "अंदर रूम में है.. कपड़े बदल रही है.. अभी आएगी.. तू बता.. और सब ठीक ठाक? घर पर सब कैसे है?"

चेतना और शीला बातें कर रहे थे तभी बेडरूम के अंदर से वैशाली और संजय की जोर जोर से आवाज़ें आने लगी.. शीला समझ गई की दोनों के बीच झगड़ा हुआ था.. तभी वैशाली पैर पटकते बाहर आई.. वैशाली ने चेतना को पहचाना नहीं.. शीला ने उसकी पहचान करवाई "अरे बेटा.. याद है ये चेतना आंटी? हमारे बगल में रहते थे?"

वैशाली ने औपचारिकता से नमस्ते कहते हुए हाथ जोड़े और वहाँ से चली गई

शीला: "लगता है दोनों के बीच कोई कहा-सुनी हो गई है.. तू बुरा मत मानना चेतना.. "

चेतना: "कोई बात नहीं शीला.. बच्चे है.. ये सब तो चलता रहता है.. तू चिंता मत कर.. पति पत्नी का झगड़ा, रात होते ही बेडरूम में जाकर शांत हो ही जाता है.. " दिलासा देते हुए चेतना ने कहा

चेतना की बात सुनकर शीला को अच्छा लगा.. थोड़ी देर के बाद संजय बाहर के कमरे में आया.. और इन दोनों के सामने देखे बगैर ही बिना कुछ कहें वो भी घर के बाहर चला गया

चेतना: "शीला, ये है तेरे दामाद??"

चेतना के चेहरे के विचित्र हावभाव देखकर शीला घबरा गई "हाँ ये ही है.. क्यों क्या हुआ??"

चेतना: "नहीं नहीं.. कुछ नहीं.. नाम क्या है इनका??"

"संजय"

चेतना: "शीला, पता नहीं मैं सही हूँ या गलत.. पर इनको तो मैं रोज देखती हूँ" अपने दिमाग पर जोर डालते हुए उसने कहा

चिंतित चेहरे के साथ शीला चेतना को देखती रही..

शीला: "क्या?? क्या बात कर रही है तू? कहाँ देखा है इन्हें?"

चेतना: "सुबह मैं जब दूध लेने निकलती हूँ तब हमारे घर के सामने जो गेस्ट-हाउस हैं उसकी बालकनी में खड़े खड़े सिगरेट फूंकते हुए रोज देखती हूँ मैं.. पर यकीन नहीं हो रहा ये तेरा दामाद है !!"

शीला: "पक्का तू कुछ छुपा रही है.. क्या बात है चेतना?"

चेतना: "कुछ खास नहीं यार.. छोड़ ना.. बेकार में तेरा टेंशन बढ़ेगा.. "

शीला: "बता न यार.. तुझे मेरी कसम है"

चेतना सोच में पड़ गई.. फिर थोड़ी सी हिचक के साथ बोली "यार बुरा मत मानना.. पर इस आदमी की नजर ठीक नहीं है.. बहोत ही चालू किस्म का आदमी है ये"

शीला: "उसमें कोई नई बात नहीं है.. जो आदमी अपनी माँ समान सास की छातियों को बुरी नजर से तांकता हो.. वो और क्या नहीं कर सकता !!"

चेतना: "क्या सच में? मतलब उसने तुझे भी नहीं छोड़ा?"

शीला: "तुझे भी.. यानि तेरे साथ भी उसने.. !!"

चेतना: "रोज सुबह जब दूध लेने निकलती हूँ तब पूरा रोड सुमसान होता है.. तभी ये आदमी मुझे देखकर गंदे गंदे इशारे करता रहता है... कभी कभी तो उसके साथ एक औरत भी होती है.. उसकी रखैल होगी.. मेरे सामने ही वो उस औरत के बबले दबाता है और चुम्मा-चाटी भी करता है"

शीला: "इसी बात को लेकर मैं टेंशन में हूँ चेतना.. वैशाली और संजय की जरा भी नहीं बनती.. पूरा दिन दोनों झगड़ते रहते है.. लेकिन मुझे ये अंदाजा नहीं था संजय की ज़िंदगी में कोई ओर लड़की भी है !!"

चेतना: "देख शीला.. मैं ये दावे के साथ तो नहीं कह सकती की जो लड़की उसके साथ थी वो उसकी रखैल ही होगी.. पर जिस तरह का वो गेस्ट-हाउस है.. वहाँ शरीफ लोग नहीं जाते है.. सिर्फ ऐसे ही लफंगे लफड़ेबाज लोग जाते है.. उसी आधार पर मैं अंदाजा लगा रही हूँ"

शीला: "सही बोल रही है तू.. आज कल हॉटेलों और गेस्टहाउस में यही सब तो चलता है.. यार चेतना.. तू मेरा एक काम करेगी?"

चेतना: "हाँ हाँ बोल ना.. "

शीला: "तू मेरे दामाद के बारे में और जानकारी हासिल कर सकती है क्या? वो कितने दिनों से गेस्टहाउस में है.. वो लड़की कौन है... उसका संजय से क्या ताल्लुक है वगैरह वगैरह.. "

चेतना: "पर ये सब जानकार तू क्या करेगी शीला?"

शीला: "मुझे यकीन है की वैशाली को इसके बारे में सब पता है पर वो मुझे बता नहीं रही.. ये सब बातें जानना जरूरी है.. बता ना.. मेरी मदद करेगी ना?"

चेतना: "मदद तो करूंगी.. पर देखना यार.. कहीं मैं फंस न जाऊ.. मैं आई थी किस काम से और ये सब क्या हो रहा है"

शीला: "कुछ नहीं होगा.. तुझ पर आंच भी नहीं आने दूँगी.. ठीक है ना !! और तू किस काम से आई थी ये तो बता"

चेतना: "क्या बताऊ शीला.. !! उस दिन पिंटू के साथ प्रोग्राम करने के बाद मैं कोरी की कोरी ही हूँ.. मेरा पति मेरी एक नहीं सुनता.. खाना खाके सो ही जाता है.. अब इस सावन में मैं बिना भीगे तड़प रही हूँ.. कुछ सेटिंग कर यार.. पिंटू को वापिस बुला"

शीला: "अरे पगली.. पिंटू तो कविता का प्रेमी है.. वो ऐसे हमारे बुलाने से थोड़े ही आएगा.. !! उस दिन तो हमने उसे चुदाई सिखाने के बहाने चुदवा लिया था.. अब बार थोड़े ही बुला सकते है.. !!"

चेतन निराश हो गई.. "तो अब क्या करें?"

शीला: "देख यार चेतना.. मुझसे अगर कुछ बन पड़ता तो मैं जरूर करती.. पर तू देख रही है ना.. वैशाली की मौजूदगी में किसी को घर पर बुला नहीं सकती"

चेतना: "यहाँ न सही.. मेरे घर पर तो किसी को भेजना का कुछ सेटिंग करवा दे"

शीला हंस पड़ी.. कुहनी से चेतना की कमर पर धक्का लगाकर बोली "नालायक.. मैं कोई दल्ली हूँ जो तू मुझसे ऐसा पूछ रही है?"

चेतना: "शीला, मुझे पक्का यकीन है.. की तू ऐसे दो-तीन को तो जानती ही होगी.. तेरा स्वभाव पहले से ऐसा ही रहा है.. तू किसी एक के भरोसे कभी नहीं होती.. तेरे पास विकल्प होते ही है"

शीला ने जवाब नहीं दिया.. चेतना की बात भी सही थी.. शीला के भोसड़े के रजिस्टर में पिंटू के बाद और कितने नए नाम जुड़ चुके थे.. !! पीयूष, रसिक, जीवा और रघु..

शीला: "एक बात बता.. तेरे घर के आसपास का माहोल कैसा है? मतलब अगर किसी को भेजूँ तो कोई रिस्क तो नहीं है ना ??"

चेतना: "वैसे रिस्क तो कोई नहीं है.. पर हाँ अगर कोई अनजान आदमी अकेला आएगा तो अड़ोस पड़ोस वाले जरूर देखेंगे.. उससे अच्छा अगर तू भी साथ आए तो देखना वाला यही सोचेगा की कोई पति-पत्नी मिलने आए है.. फिर किसी को शक नहीं होगा"

चेतना की चुदने की इस तड़प को देखकर शीला को दया आ गई.. उसकी मदद तो करनी ही होगी.. पर वैशाली का क्या करू? चेतना के घर ही पूरा दिन निकाल जाएगा.. और अभी वैशाली और संजय के बीच जो हुआ उसके बाद उसे वैशाली को अकेला छोड़कर जाना ठीक नहीं लग रहा था.. ऊपर से पिछली बार जब वैशाली को अकेला छोड़ा था तब उसने हिम्मत को घर बुला लिया था

शीला चुपचाप ये सब सोचते हुए चेतना को देखती रही.. चेतना बड़ी ही बेसब्री से शीला के जवाब की प्रतीक्षा कर रही थी.. शीला उसके गोरे गोरे मम्मों को ब्लाउस के अंदर से ऊपर नीचे होते हुए देखती रही..

शीला: "ठीक है.. मैं कुछ जुगाड़ करती हूँ.. इतने दिन इंतज़ार किया है तो कुछ दिन ओर सही.. सब्र का फल मीठा होता है.. मुझे कुछ प्लान बनाने में वक्त लगेगा.. मैं कल तुझे फोन करती हूँ.. एक आदमी है मेरी नजर में.. तुझे मस्त कर देगा"

चेतना: "पर शीला तू भी साथ आना.. अकेले में मुझे बहुत डर लगेगा किसी अनजान मर्द के साथ"

शीला: "मैं जब भी उसे लेकर तेरे घर आऊँगी उसके 2 घंटे पहले तुझे फोन कर के बता दूँगी.. ठीक है!!"

चेतना: "ठीक है.. वैसे तो शाम तक रुकना था तेरे साथ.. पर वैशाली की मौजूदगी में कुछ हो नहीं पाएगा.. "

शीला: "और हाँ.. ये ले पिंटू का मोबाइल नंबर.. जब तक में कुछ सेटिंग करू तब तक तू फोन पर उसके साथ टाइमपास करना.. !!" कागज के एक छोटे से टुकड़े पर शीला ने पिंटू का नंबर लिखकर दिया.. चेतना ने कागज पर्स के अंदर रखा और खड़ी हो गई

शीला: "तेरा काम तो हो जाएगा.. पर तू मेरा काम मत भूलना"

चेतना: "कौन सा काम? अच्छा.. वो दामाद वाला.. हाँ हाँ नहीं भूलूँगी.. तू चिंता मत कर.. काम हो जाएगा"

चेतना के जाते ही शीला का दिमाग चलने लगा.. कहाँ गई होगी वैशाली?? संजय का उसके साथ किस बात को लेकर झगड़ा चल रहा होगा? चेतना ने जिस लड़की को संजय के साथ देखा है.. कौन होगी वो? प्रेमिका या रखैल? आज कल के मर्दों का कोई भरोसा नहीं.. हो सकता है कोई वेश्या हो.. यहाँ अपना ससुराल होने के बावजूद गेस्टहाउस में रहने का क्या मतलब? सब कुछ पता करने के बाद ही में कुछ कदम उठा सकूँगी..
 
वैशाली कविता के घर पहुँच गई थी... और संजय नुक्कड़ की टपरी पर खड़ा होकर सिगरेट फूँक रहा था

शीला के घर से निकालने के बाद जैसे ही चेतना टपरी के करीब से गुजरी.. तब उसने संजय को देखा.. वो ओर तेजी से चलते हुए आगे निकल गई.. संजय भी उसके पीछे पीछे चलने लगा था.. सीटी बस-स्टेंड पर खड़े खड़े चेतना १२४ नंबर की बस के इंतज़ार में थी..

बस आते ही वो अंदर बैठ गई.. संजय भी बस में चढ़ गया और चेतना की बगल की सीट पर बैठ गया.. चेतना को बड़ा आश्चर्या हुआ.. संजय का कंधा उसके कंधे से छूते ही चेतना के भूखे शरीर में करंट सा दौड़ गया.. वो कुछ बोली नहीं.. कंडक्टर के आते ही संजय ने दोनों की टिकट ले ली..

चेतना: "आपने मेरा टिकट क्यों लिया? मैं तू आपको जानती तक नहीं..!!"

संजय: "पर मैं तो आपको जानता हूँ.. रोज सुबह देखता हूँ आपको जब आप दूध लेने जाती हो"

चेतना: "मेरे जाते वक्त कौन मुझे देखता है उससे मुझे क्या लेना देना?"

संजय ने जवाब नहीं दिया.. दोनों चुपचाप बैठे रहे.. तभी चेतना का स्टेंड आ गया

संजय: "आपको एतराज न हो तो गेस्टहाउस पर मेरे कमरे पर चलिए.. थोड़ी देर बैठ कर बातें करेंगे"

चेतना: "तुम पागल हो क्या? मेरे घर के एरिया में अगर मुझे कोई गेस्टहाउस में जाते हुए देखेगा तो कोई क्या सोचेगा?"

संजय समझ गया.. चेतना को आने में दिक्कत नहीं थी.. उसे डर था तो किसी के देख लेने का

संजय ने हाथ दिखा कर एक रिक्शा को खड़ा रखा..

संजय: "आपको गेस्टहाउस में आने से ही दिक्कत है ना !! अगर में आपको किसी ओर जगह ले चलू तो.. ??"

चेतना शर्म से पानी पानी हो गई.. यहाँ बाहर जितनी देर वो खड़ी रहती.. किसी के देख लेने का जोखिम उतना ही बढ़ जाता.. बिना कुछ सोचे चेतना रिक्शा में बैठ गई.. उसका दिल धकधक कर रहा था..

संजय ने रिक्शा वाले से कुछ कहा.. और रिक्शा चल पड़ी.. साथ ही साथ चेतना का दिमाग भी चलने लगा

चेतना शीला को फोन करना चाहती थी पर संजय के साथ होने के कारण यह मुमकिन न था.. बारिश के कारण टूटे हुए रास्तों पर रिक्शा उछल रही थी.. और चेतना का कंधा और जांघ संजय के शरीर के साथ रगड़ रहे थे.. चेतना सोच रही थी.. ३५ दिन गुजर चुके थे.. और उसकी चुत को लंड नसीब नहीं हुआ था.. आखिर कोई कब तक बर्दाश्त करे? संजय के हर स्पर्श के साथ चेतना की चुत में सुरसुरी हो रही थी

रिक्शा एक गेस्टहाउस के पास जाकर रुकी.. यह एरिया चेतना के घर से काफी दूर था.. संजय के पीछे पीछे चेतना तेजी से अंदर घुस गई.. संजय रीसेप्शन पर बात कर रहा था और चेतना का दिल तेजी से धडक रहा था। थोड़ी देर में वेटर चाबी लेकर आया और एक कमरा खोलकर चला गया.. चेतना अंदर जाकर बिस्तर पर बैठी।

रजिस्ट्रेशन निपटाकर संजय कमरे के अंदर आया और दरवाजा बंद कर दिया। उसने पूछा "क्या नाम है आपका?"

"चेतना .. "

"मस्त नाम है आपका.. मेरा नाम संजय है.. वो तो आपको मेरी सास ने आपको बता ही दिया होगा"

"नहीं नहीं.. मैं तो उन्हे जानती नहीं हूँ.. मैं तो सिलाई का काम करती हूँ.. उनका ब्लाउस देने गई थी" चेतना ने खुद को और शीला को बचाने के लिए झूठ बोला.. संजय को भी यह सुनकर राहत हुई.. उसे डर था की कहीं इसने शीला को उसके और प्रेमिला के बारे में बता न दिया हो

चेतना के स्तनों को ललचाई नजर से देखते हुए संजय के अंदर का पुरुष और खामोश न रह पाया.. ऐसे मौकों पर समय हमेशा कम होता है.. जितना जल्दी मुद्दे पर आया जाएँ.. उतना समय ज्यादा मिलता है काम निपटाने के लिए.. पर कभी कभी जल्दी करने में बात बिगड़ भी जाती है.. और चेतना के पास कितना समय था ये वो जानता नहीं था

चेतना भी घबराहट के मारे सोच रही थी.. यहाँ न आई होती तो अच्छा होता.. किसी ने देख लिया होगा तो? अगर मेरे पति को पता चल गया तो? अगर शीला या वैशाली को पता चल गया तो? इन संभावनाओ को सोचकर ही वो कांपने लगी

एक तरफ डर था.. तो दूसरी तरफ जिस्म की भूख थी.. कुछ तय नहीं कर पा रही थी वो.. एक विचार ये भी आया की ये अच्छा मौका था संजय के बारे में जानकारी हासिल करने का.. उसने शीला को वादा जो किया था.. अगर शीला को पता चल भी गया तो वो ये बोल देगी की संजय के बारे में जानने के लिए उसे उसके साथ गेस्टहाउस आना पड़ा.. भूखी चुत चेतना को वकील की तरह बहस करना सीखा रही थी

चेतना ने अब तय कर लिया था.. जो भी होगा देखा जाएगा.. वैसे भी बंद कमरे के अंदर क्या हो रहा है वो किसको पता चलेगा? पर ये कमीना कुछ कर क्यों नहीं रहा?? बैठे-बैठे सिगरेट चूस रहा है.. जो चूसना चाहिए वो तो चूस नहीं रहा.. चेतना के दिमाग में अनगिनत विचार चल रहे थे

फूँक फूँक कर कदम रख रहा संजय... बुझी हुई सिगरेट को एश-ट्रे में डालकर बोला "मैं स्मोक करू तो आपको दिक्कत तो नहीं है ना!!"

चेतना को गुस्सा आया.. साला सिगरेट फूँक लेने के बाद पूछ रहा है.. उसने कोई जवाब नहीं दिया

संजय ने अपने पत्ते बिछाने शुरू कीये "चेतना, जब भी आपको सुबह सुबह देखता हूँ तब मुझे कुछ कुछ होने लगता है.. आपके अंदर कोई ऐसा आकर्षण है जो मुझे आपके करीब खींचता जा रहा है.. अपने मन को कंट्रोल करने की बहोत कोशिश करता हूँ पर पूरा दिन आप ही मेरे दिलों दिमाग पर छाई रहती हो.. आज तक किसी लड़की या औरत के लिए मुझे ऐसा कभी नहीं हुआ.. फिर आपको देखकर ही ऐसा क्यों हुआ होगा??"

अपनी तारीफ सुनकर किसी भी स्त्री के दिमाग को वश में किया जा सकता है.. ऐसा संजय का मानना था.. तारीफ सुनकर चेतना शर्म से लाल हो गई.. अपने जिस्म को लुटाने के लिए बेताब हो गई.. "ऐसा तो क्या देख लिया आपने मुझ में ? और आपके साथ तो वो सुंदर लड़की हमेशा रहती ही है ना ?"

संजय उठकर चेतना के पास बैठ गया और उसके कंधे पर अपना हाथ रख दिया.. चेतना इस स्पर्श से सिहर उठी.. आगे जो होने वाला था उसकी अपेक्षा में उसका शरीर डोलने लगा.. उसकी हवस अंगड़ाई लेकर जाग गई.. बिना फोरप्ले के.. केवल स्पर्श से ही चेतना की गीली हो गई

संजय चेतना के गालों के सहलाने लगा और उसके साथ ही चेतना ने अपना पल्लू गिरा दिया.. उसकी बड़ी छातियाँ हर सांस के साथ ऊपर नीचे हो रही थी.. ब्लाउस में कैद उसका मदमस्त जोबन, वी-नेक गले से बाहर झाँक रहा था.. दो स्तनों के बीच की कातिल खाई को देखकर संजय का लंड झटके से खड़ा हो गया..

संजय ने फिर से सिगरेट जलाई.. और उस सिगरेट को चेतना के होंठों पर रखकर कहा "एक दम खींचकर देखो.. मज़ा आ जाएगा" चेतना को सिगरेट की गंध से बड़ी ही नफरत थी.. और सिगरेट कैसे फूंकते है उसका उसे पता न था.. उसने अपना मुंह फेर लिया..

संजय चेतना की गर्दन के पीछे के हिस्से को सहलाने लगा.. इस हरकत से चेतना की आँखें बंद हो गई.. संजय के गरम हाथ का स्पर्श उस उकसा रहा था.. संजय ने सिगरेट चेतना के हाथों में थमा दी और अपनी पेंट की चैन खोलने लगा.. सिगरेट पकड़ना बड़ा ही अटपटा सा लग रहा था चेतना को.. पर संजय का लंड देखा तो वो सब कुछ भूल ही गई.. लंड की गंध और सिगरेट की बू का संमिश्रण ने चेतना के लिए वियाग्रा का काम किया.. उसकी चूत से भांप निकालने लगी थी.. संजय को खड़े लंड को देखकर उसके स्तन सख्त हो गए.. जैसे अभी ब्लाउस फाड़कर बाहर निकाल आएंगे.. अपने लंड को चेतना के उभारों पर और चेहरे पर रगड़ते हुए संजय ने एक हाथ उसके स्तन पर रख दिया.. उभारों पर गरम सुपाड़े का स्पर्श होते ही चेतना बेकाबू होने लगी..


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शर्म की सारी सीमाएं तोड़कर चेतना ने संजय का लंड पकड़ लिया.. चेतना की मुठ्ठी में लंड दबते ही संजय जैसे उसका ग़ुलाम बन गया.. और चेतना मस्त हो गई.. लंड की तलाश में ही तो वो शीला के घर आई थी.. वह अब खड़ी हुई और अपने ब्लाउस के सारे हुक खोलकर संजय के होश उड़ाने के लिए तैयार हो गई.. ब्रा निकालकर वो संजय के ऊपर भूखी शेरनी की तरह टूट पड़ी..

संजय के जिस्म को हर जगह पागलों की तरह चूमते हुए उसने उसका शर्ट और बनियान उतरवा दिए.. उतना ही नहीं.. पेंट की क्लिप खोलकर, अंडरवेर के साथ वो भी उतार दिया.. संजय अब पूरा नंगा था.. उसका पूरा शरीर बालों से ढंका हुआ था.. सारा संचालन अपने हाथ में ही रखना चाह रही चेतना घुटनों के बल बैठ गई.. संजय के फुँकारते लंड को चूम लिया और फिर आँखें बंद करके पूरा लंड मुंह में लिया और चूसने लगी..

बेबस संजय.. लाचार होकर चेतना को अपना लंड चूसते देखता ही रहा.. दोनों हाथों से चेतना का सर पकड़कर वोह धक्के लगाते हुए.. उसके मुंह को ही चूत समझकर चोदने लगा.. जिस तरह चेतना बिना किसी विरोध के चुदवाने के लिए आसानी से तैयार हो गई ये देखकर संजय को आश्चर्य हुआ। वरना औरतों को लंड मुंह में लेने के लिए कितनी मिन्नते करनी पड़ती है वो संजय जानता था.. प्रेमिला को तो नया ड्रेस खरीद कर देने का वादा करो तभी मुंह में लेती थी.. और वो भी सिर्फ थोड़ी देर के लिए..

चेतना की हवस देखकर संजय को मज़ा ही आ गया.. वह उसके मुंह में धनाधन धक्के लगाता जा रहा था.. चेतना भी संजय के कड़े लंड को चूसकर धन्य हो गई थी.. उसने संजय को धक्का देकर बिस्तर पर गिरा दिया.. बालों से ढंका हुआ संजय डरावने भालू जैसा लग रहा था पर चेतना को इससे कोई फरक नहीं पड़ता था क्योंकि उसकी नजर केवल उसके लंड पर थी। संजय के जिस्म पर सवार होते हुए चेतना ने अपनी ब्रा, साड़ी और घाघरा उतार दिया और मादरजात नंगी हो गई..

चेतना के मादक गदराए जिस्म को देखकर संजय मंत्रमुग्ध हो गया और उसका लंड ठुमकने लगा.. संजय के फुँकारते लंड को देखकर चेतना से ओर रहा न गया.. अपनी दोनों जांघों को फैलाते हुए वो संजय के मुख पर अपनी चूत के होंठों को रखकर बैठ गई और झुककर उसके लंड को फिरसे मुंह में लेकर चूसने लगी.. एक दो मिनट तक उसके लंड को मुंह के अंदर पीपरमिंट की तरह घुमाने के बाद उसने लंड बाहर निकाला और नीचे हो रही चूत चटाई का आनंद लेने लगी.. असह्य उत्तेजना से बेकाबू होकर वो अपनी चूत को संजय के मुंह के ऊपर दबा देती.. संजय का दम घुटने लगा.. चेतना की इस आक्रामकता ने उसे झकझोर दिया..


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चेतना की क्लिटोरिस को अपने दोनों होंठों के बीच दबाकर चूसते हुए संजय, चूत के कामरस को भी चाट रहा था.. चेतना अब संजय के लंड को मन भरकर निहारने लगी.. लंड की लंबाई, परिघ.. मोटाई.. सुपाड़े का रंग.. खून के भरावे से फुली हुई नसें.. खूंखार था उसका लंड.. चेतना की मुठ्ठी में बस आधा लंड ही समाता था.. उस पर से उसने लंड की लंबाई का अंदाजा लगा लिया.. मस्त और अद्भुत!!

चेतना ने अब संजय के अंडकोशों को पकड़कर दबाते हुए लंड के मूल से लेकर टोपे तक चाटकर गीला कर दिया.. संजय दो पल के लिए चूत चाटना छोड़कर इस चुसाई का मज़ा लेते हुए पागल सा होने लगा.. अद्भुत भारी और बड़े बड़े.. सांड जैसे अंडकोश.. पुष्ट वीर्य से भरपूर.. !! चेतना ने लंड को पकड़कर ऐसे खींचा की संजय बिस्तर से एक फुट ऊपर उछल पड़ा.. चेतना को जो चाहिए था वो मिल गया.. झांटों से भरपूर आँड उसके मुंह के बिल्कुल सामने थे जिसे उसने गप्प से मुंह में भर लिया.. ऐसे चूसने लगी जैसे गोलगप्पा मुंह में डाला हो..

चेतना की इस अदा का दीवाना हो गया संजय!! इस कामुक मुख मैथुन का भरपूर मज़ा उठाते हुए वो सिसकने लगा..

संजय: "आह्ह चेतना.. यू आर मेकिंग मी क्रेजी.. आई लव यू.. ओह्ह.. यू आर सकीन्ग लाइक अ बीच.. ओह यस.. !!"

चेतना ओर उत्तेजित हॉक दोगुने जोश के साथ संजय के लंड और आँड को चाटने लगी.. अपने मुंह से वैक्यूम क्लीनर की तरह वो लंड को चूस रही थी.. "ओह्ह नो.. ओह नो.. !!" कहते हुए संजय उछला और उसके साथ ही लंड ने पिचकारी छोड़ दी.. चेतना के सर के ऊपर बालों तक वीर्य की धार जाके लगी.. उसके सारे बाल वीर्य से मिश्रित होकर चिपचिपे हो गए.. मुठ्ठी भी वीर्य से भर गई.. गजब का फ़्लो था संजय के लंड का.. बड़े ही अहोभाव सो वो ठुमकते हुए लंड की तड़प को देख रही थी.. वो सोचने लगी.. ऐसा तो क्या होता होगा वीर्य स्त्राव के वक्त जो लंड इतना ठुमकता होगा??


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अब चेतना की चूत में गजब की चुनचुनी हो रही थी.. जो अब किसी भी हाल में वह सह नहीं पा रही थी.. उसने अपनी मांसल जांघों के बीच संजय के सर को दबा दिया.. संजय की मुछ पर अपनी क्लिटोरिस को रगड़ते हुए वो बेतहाशा उछल रही थी.. संजय अपनी जीभ से क्लिटोरिस को उकसाते हुए दबा रहा था.. थोड़ी ही देर में चेतना ने अपनी चूत को उठाके पटक दिया और अपने अमृत की धारा सनज के मुंह में छोड़ दी.. हवस की आंधी थम जाने से संजय ने चैन की सांस ली.. अब चेतना की जांघों से उसे मुक्ति मिलने की आशा थी.. चेतना ने भी अपना शरीर ढीला छोड़ दिया.. और संजय के शरीर पर गिर गई.. बिना योनि प्रवेश के दोनों झड़ गए थे..

दोनों एक दूसरे के जिस्मों को सहलाते हुए थकान उतारने लगे.. ऑर्गैज़म की थकान भी कितनी मीठी लगती है!! चेतना संजय के हारे हुए सैनिक जैसे ढल चुके लंड पर हाथ पसार रही थी.. उसके स्तन संजय की छाती से दबकर चपटे हो गए.. संजय उसके नग्न कूल्हों को सहला रहा था और उसकी गांड की लकीर में उँगलियाँ फेरते हुए छिद्र को गुदगुदा रहा था.. चेतना को अंदाजा लग गया की उसके पीछे के छेद को क्यों टटोला जा रहा था.. उसने तुरंत कमर हिलाकर संजय की उंगलियों से अपने छेद को दूर हटा दिया.. संजय ने गांड को छोड़ कर उसकी चूत पर ध्यान केंद्रित किया.. चूत पर स्पर्श होते ही चेतना के जिस्म में नए सिरे से चुदवाने की भूख जागृत हो गई.. तो दूसरी तरफ चेतना के जिस्म की गर्मी से संजय का लंड भी अंगड़ाई लेकर जाग गया..

लंड को हरकत करता देख चेतना की आँखों में चमक आ गई.. अपने कामुक हाथों में उस अर्ध-जागृत यंग को लेकर उसने दबाकर देखा.. अभी तक लंड की सख्ती चूत में घुसाने लायक नहीं हुई थी.. पर संजय अब फिर से चेतना की चूत पर पहुंचकर फिर से चाटने लगा था.. दोनों 69 की पज़िशन में सेट हो गए थे.. चेतना अपनी उंगलियों से लंड की चमड़ी को पीछे करने लगी.. जैसे बादल छटते ही पूर्णिमा का सुंदर चाँद बाहर निकलता है.. वैसे ही चमड़ी पीछे सरकाते ही सुंदर सुपाड़ा बाहर निकला.. उसे देखते ही चेतना को बेहद प्यार आया.. अपनी चिपचिपी चूत को वो संजय के मुंह पर रगड़ रही थी..


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संजय का लंड अब तैयार होकर यहाँ वहाँ झूलने लगा था.. उस मस्त लोड़े को चूम कर चेतना चूसने लगी.. उसकी उत्तेजना को परखकर संजय ने चाटते हुए अपनी एक उंगली अंदर घुसेड़ दी..

चेतना: "बहोत मज़ा आ रहा है.. ओह्ह संजय.. फक यार.. आह्ह"

चूत में उंगली अंदर बाहर होते ही चेतना एकदम मस्त हो गई.. संजय जान चुका था की लोहा अब गरम हो चुका था.. उसने अपनी दूसरी उंगली चेतना की गांड के छेद पर दबा दी.. चूत के रस से भीगी हुई उंगली ने गांड के छेद को भिगोकर रेशम जैसा मुलायम कर दिया.. इस बार चेतना ने कोई विरोध नहीं किया.. क्योंकि वह खुद भी बेहद उत्तेजित थी.. संजय की उंगली गांड के अंदर पूरी घुस चुकी होने के बावजूद उसे दर्द का एहसास नहीं हो रहा था.. या फिर अगर हो भी रहा था तो वो दर्द के चूत में उंगली घुसने से मिल रहे आनंद के तले दबकर रह गया था

संजय ने बड़ी मुश्किल से अपने वीर्य को स्खलित होने से रोक रखा था.. जिस तरह चेतना उसके सुपाड़े से खेल रही थी उसका लंड पिचकारी मारने के लिए उतावला हुए जा रहा था.. चेतना अब पूर्ण रूप से उत्तेजित होकर बेकाबू सी होने लगी थी.. काफी समय से बिना लंड के रहने की वजह से उसकी ये दशा हो गई थी.. उसकी आक्रामकता का एक कारण यह भी था की वह इस मौके का पूरा फायदा उठाना चाहती थी.. फिर ये जाम-ए-मोहब्बत मिले ना मिले!! वह आज संजय के लंड से तृप्त होना चाहती थी..

संजय चेतना के दोनों मस्त बबलों को मसल रहा था.. चेतना भी अब पूरी तरह संजय के लंड पर टूट पड़ी.. संजय को आश्चर्य हो रहा था की ७ इंच लंबा लंड वह कितनी आसानी से निगल रही थी..

"ओह्ह चेतना.. बस भी कर अब.. कितना चुसेगी? तेरा तों मन ही नहीं भरता.. पता है तुझे.. कितना कंट्रोल करना पड़ रहा है!! अभी निकल जाता मेरा.. आह्ह.. "

चेतना अब पलंग पर लेट गई.. बिना चूत की चुदाई के अगर संजय का लंड झड़ गया तो वो प्यासी ही रह जाएगी.. संजय के लंड के स्वागत के लिए उसने अपनी दोनों टांगें चौड़ी कर दी.. संजय चेतना की छाती पर सवार हो गया.. उसने चेतना के दोनों स्तनों को दबाकर एक किया और बीच में अपना लंड घुसेड़कर चोदने लगा.. चेतना को अपने दोनों स्तनों के बीच से आगे पीछे होता हुआ संजय का विकराल सुपाड़ा नजर या रहा था.. उसने अपनी गर्दन थोड़ी सी ऊपर की ताकि वो आगे पीछे होते हुए सुपाड़े को आसानी से चाट सकें.. लंड के इर्दगिर्द चरबीदार स्तनों का दबाव.. और टोपे पर चेतना के कामुक होंठ और जीभ के स्पर्श से ही संजय को ऐसा महसूस होने लगा की वो झड़ जाएगा.. वह तुरंत उसकी छाती से उतर गया..


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अब उसने चेतना की चौड़ी टांगों को अपने हाथों से और चौड़ा किया.. और अपने कंधों पर ले लिया.. आहाहाहाहा.. क्या सीन था!! केले के पेड़ के तने जैसी गोरी चिकनी मस्त जांघें.. और उन जांघों के बीच लसलसित बुर की फांक.. मुलायम जांघों पर हाथ फेरते ही.. प्रेमिला और वैशाली दोनों को भूल गया संजय.. उसने अपना सुपाड़ा चेतना की चुत के दरवाजे पर रखा.. गोली छूटने के बाद बंदूक की नली जितनी गरम होती है.. उतना ही गरम महसूस हुआ उस सुपाड़े का स्पर्श चेतना को..

संजय ने अब चेतना को तड़पाना शुरू कर दिया.. अपने टोपे को वो चेतना की क्लिटोरिस पर रगड़ते हुए उसे चूमने लगा.. संजय के इस दोहरे हमले से चेतना के होश उड़ गए.. संजय की लाल आँखें उसे डरा रही थी.. बेकाबू सांड जैसा लग रहा था संजय.. !! चेतना के दोनों हाथों को बिस्तर पर दबाकर लगभग ५ मिनट तक वह उसके होंठ चूसता रहा.. उस दौरान संजय का लंड चेतना की बुर की लकीर पर ऊपर से नीचे तक घिस रही थी.. चेतना के गाल, गर्दन और होंठों को काटते हुए तहस नहस कर दिया उसे संजय ने..

इतनी आक्रामकता के लिए चेतना तैयार नहीं थी.. हालांकि उसकी जिस्म की आग ऐसे रौंदे जाने से बेहद उत्तेजित था.. संजय के हमले के जवाब में चेतना ने भी अपने नाखून इतनी जोर से संजय की पीठ पर गाड़ दिए की उसकी पीठ पर खून के निशान बन गए..

गुस्साए संजय ने खींचकर एक तमाचा रसीद कर दिया चेतना के गोरे गालों पर "मादरचोद.. नाखून मारती है.. !! तेरी माँ को चोदू" कहते ही संजय ने चेतना को बालों से पकड़कर खड़ा कर दिया.. संजय के तेज-तर्रार चाटे से चेतना के कानों में सीटी बजने लगी.. चक्कर आ गया उसे.. दोनों वासना में इतने बेकाबू होकर क्या कर रहे थे उन्हे खुद पता नहीं था.. चेतना की आँखों में आँसू चमकने लगे.. उसने भी गुस्से में आकर संजय के लंड को पकड़कर इतनी जोर से खींचा की वह अपना संतुलन खो बैठा.. संजय को जरा भी अंदाजा नहीं था की चेतना जवाबी हमला करेगी.. उसका लंड दर्द करने लगा.. गुस्से में आकर उसने एक साथ दो उँगलियाँ चेतना की गांड में डाल दी..

चेतना ने अपनी चीख को बड़े ही मुश्किल से रोक रखा.. वह मजबूर थी.. ऐसे अनजाने गेस्टहाउस में उसकी चीख सुनकर अगर लोग इकठ्ठा हो गए तो उसकी ही बदनामी होती.. लेकिन जिस्म का दर्द ऐसी किसी भी मजबूरी के परे होता है.. वह थोड़ी समझता है?? दबाने के बावजूद हल्की सी चीख तो निकल ही गई.. संजय अब चेतना के स्तनों को ऐसे बेरहमी से मसल रहा था जैसे उसमें जान ही न हो..

चेतना की नजर संजय के सख्त खड़े लंड पर गई.. देखते ही उसकी चूत में चुनचुनी होने लगी.. कितने दिनों से उसकी भूखी चूत.. चुदने के लिए बेताब होकर आँसू बहा रही थी.. संजय ने चेतना को पकड़कर उल्टा कर दिया.. उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़कर ऊपर कर दिया.. चेतना अब कुत्तिया की तरह चार पैरों पर हो गई.. संजय ने चेतना के गोरे चूतड़ों पर धड़ाधड़ तमाचे लगाकर उन्हे लाल कर दिया.. चूत के छेद पर सुपाड़ा टीकाकार उसने एक जबरदस्त धक्का लगाया.. चेतना जोर से कराही.. उसकी चूत की दीवारें फाड़कर संजय का आधा लंड अंदर घुस गया.. दूसरा दमदार धक्का लगते ही चेतना की चूत की किल्ला फतेह हो गया..


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भख भख धक्के लगाते हुए संजय ने अपनी लय प्राप्त कर ली.. दोनों हाथों से मस्त कूल्हों को चौड़ा कर गांड के छेद में उंगली करते हुए वह बेरहमी से चोदने लगा.. चेतना भी अब बेहद उत्तेजित हो चुकी थी.. लंड के प्रत्येक धक्के से उसे इतना मज़ा आ रहा था की गांड के दर्द को उसने नजरअंदाज कर दिया.. इस तरह चुदवाने में चेतना को बहोत मज़ा आ रहा था.. संजय भी चेतना की टाइट चूत को बड़ी मस्ती से चोद रहा था.. उसकी जांघें चेतना के भव्य कूल्हों से टकराकर एक विशिष्ट प्रकार की ध्वनि उत्पन्न कर रही थी.. पूरा कमरा फ़च फ़च की आवाज से गूंज रहा था..

चेतना ने अपनी चूत की दीवारों को भींच लिया.. लंड पर अधिक दबाव महसूस होते ही संजय को धक्के लगाने में मज़ा आ गया.. करीब १० मिनट तक धक्कों का दौर यूँही चलता रहा.. चेतना की महीनों पुरानी भूख आज मिट रही थी.. एक हल्की सी कराह के साथ संजय के लंड ने इस्तीफा दे दिया.. उसके गरम वीर्य की बौछार से चेतना की बंजर चूत में बहार सी छा गई.. सुखी धरती पर बारिश की प्रथम बूंद के साथ जैसे धरती तृप्त हो जाती है वैसे ही चेतना तृप्त हो गई..

दो मिनट तक संजय का ठुमकता लंड चूत के अंदर पानी छोड़ता रहा और फिर दोनों बेड पर हांफते हुए गिर गए.. संजय का एक हाथ चेतना के मस्त उरोज पर था.. हल्के हाथों से वह उसका मर्दन कर रहा था.. करीब पंद्रह मिनट तक यूँही निष्क्रिय पड़े रहने के बाद दोनों सामान्य हो गए.. चेतना ने संजय के गाल पर किस किया

चेतना: "संजय, आज का दिन मैं कभी नहीं भूलूँगी.. दोबारा कब मिलेंगे ये तो बता नहीं सकती.. पर हाँ.. तू अपना मोबाइल नंबर मुझे दे देना.. मौका मिलते ही मैं तुझे कॉल करूंगी.. "

संजय ने चेतना को बाहों में भरकर एक झकझोर देने वाला आलिंगन दिया.. फिर वह उठ खड़ा हुआ और बाथरूम में चला गया.. चेतना भी उसके पीछे बाथरूम में गई और कमोड पर बैठकर मूतते हुए वो पेशाब कर रहे संजय के लंड को देखती रही.. देखकर ही उसे इतना प्यार आया की उसने मूत रहे लंड को अपनी मुठ्ठी में भर लिया.. और उस मूत्र को संजय के लंड और आँड़ों पर मल दिया.. चेतना की मुठ्ठी से अपना लंड छुड़ाकर संजय ने अपनी पेशाब की धार का निशाना उसके स्तनों पर लगाया.. गरम गरम पेशाब से चेतना के दोनों स्तन भीग गए.. वह सारा मूत्र स्तनों से गुजरकर नाभि पर होते हुए चेतना की क्लिटोरिस से टपक कर कमोड में गिरने लगा..

लंड की चमड़ी को पीछे कर अपने सुपाड़े को दबाते हुए संजय अटक अटक के पेशाब कर रहा था.. चेतना का हाथ पकड़कर उसने खड़ा किया और उल्टा मोड दिया.. हल्का सा धक्का देने पर चेतना नीचे झुक गई.. अपने मूत रहे लंड को संजय ने चेतना की गीली चूत में आधा घुसा दिया और चूत में ही मूतने लगा.. इस विचित्र और विकृत हरकत से चेतना भी मस्त हो गई.. मूत्र की आखिरी गरम पिचकारी अपनी बच्चेदानी पर महसूस होते ही चेतना को इतना मज़ा आया की वह सिसकने लगी..

अपने अर्ध जागृत लंड को चूत से निकालकर उसने गांड के छेद पर रगड़ना शुरू कर दिया.. इस हरकत से चेतना पागल सी हो गई.. अपना हाथ पीछे ले जाकर उसने खुद ही गांड के छेद को थोड़ा सा चौड़ा किया.. गांड का खुला हुआ छेद लंड को अंदर आने का आमंत्रण दे रहा था.. संजय ने छेद पर सुपाड़ा दबाया.. लेकिन उस सँकरे छेद में आधा मुरझाया लंड घुस नहीं पाया.. संजय को अपने लंड पर गुस्सा आया.. जब औरत सामने से गांड मरवाने के लिए उत्सुक हो तब लंड साथ न दे तब गुस्सा आना स्वाभाविक है..

चेतना: "मज़ा आ रहा है संजय.. थोड़ा सा और अंदर डाल.. मैंने आज तक पीछे नहीं करवाया है.. पता नहीं आज पीछे क्यों खुजली हो रही है!!"

संजय लाचार था.. जब उसका लंड तैयार था तब चेतना तैयार नहीं थी.. अब जब वह सामने से तैयार थी तब लंड साथ देने से इनकार कर रहा था.. बड़ी ही विडंबना थी..

संजय: "नहीं घुस रहा है यार.. तेरा छेद बहोत टाइट है.. दबाता हूँ तो मुड़ जाता है मेरा"

चेतना: "अरे यार.. एन मौके पर ही काम नहीं कर रहा तेरा हथियार.. एक काम कर.. उंगली डाल दे.. खुजली हो रही है मीठी सी"

लंड को बाहर खींचकर संजय ने अपना अंगूठा डाल दिया और रगड़ने लगा

चेतना: "आह्ह.. आह्ह.. मज़ा आ रहा है यार.. मस्त खुजा रहा है.. देख ना अगर तेरा लंड खड़ा हो तो.. उसमें ज्यादा मज़ा आएगा मुझे"

दो बार डिस्चार्ज हो चुका लंड खड़ा होने का नाम ही नहीं ले रहा था.. एक घंटे में दो बार स्खलित होने के बाद लंड का न उठना स्वाभाविक था

चेतना: "संजय, प्लीज मेरी एक इच्छा पूरी करेगा?"

संजय: "हाँ बोल ना डार्लिंग"

चेतना: "पीछे के छेद पर एक किस कर दे.. मुझे वहाँ पप्पी करवानी है"

संजय को बड़ी ही घिन आ रही थी पर वो चेतना जैसे मस्त माल को निराश करना नहीं चाहता था.. वैसे भी वो प्रेमिला के नखरों से तंग आ चुका था.. और मोनिका कुछ भी करने के पैसे लेती थी..

संजय ने बिना कुछ कहे झुककर चेतना की गांड पर हल्के से किस किया.. "कर दिया.. अब खुश ??"


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चेतना: "ऐसे नहीं यार.. तूने कब किस की मुझे तो पता भी नहीं चला.. ठीक से कर.. होंठों पर जैसे किस करता है तू बिल्कुल वैसे ही"

संजय सोच रहा था "क्या मुसीबत है यार!!! गांड पर लिप-किस ??" गुस्सा तो बहोत आया उसे पर फिर भी उसने कूल्हों को चौड़ा कर बादामी रंग के उस छेद पर अपने होंठ रख दिए

चेतना: "हाँ हाँ.. बिल्कुल वैसे ही.. ईशशशश.. ओह संजय.. आई लव यू यार.. बरसों पुरानी इच्छा पूरी कर दी तूने.. आह्ह.. अपनी जीभ थोड़ी सी अंदर डाल.. ऊँहह.. ओह गॉड..यस.. संजु मेरी जान.. " संजय ने अपनी नापसंद को दरकिनार करके अपनी जीभ अंदर डाली.. खेल की शुरुआत भले ही संजय ने की थी पर अब अंत का संचालन चेतना ही कर रही थी.. पालतू कुत्ते की तरह वो चेतना के हर आदेश को मान रहा था.. एक चूत के लिए आदमी को क्या क्या करना पड़ता है !!

उत्तेजित होकर चेतना मन ही मन में सोच रही थी "चाट मेरी गांड भड़वे.. तूने मुझ पर हाथ उठाया था ना!! उसी का बदला है ये.. अब चाट मेरी गांड साले"

संजय परेशान होकर चाट रहा था.. उससे बदबू बर्दाश्त नहीं हो रही थी.. चेतना की गांड पर हो रही इस हरकत का असर उसकी चूत पर पड़ा.. अंदर से कामरस बहते हुए बाहर रिसने लगा.. पूरे बाथरूम में एक मस्की सी गंध फैल गई.. इस गंध को सूंघते ही संजय का लंड ताव में आने लगा.. झुककर गांड चटवा रही चेतना ने नीचे से संजय का उठा हुआ लंड देखा और घबरा गई "अरे बाप रे.. अगर अभी इस लंड को नरम नहीं किया तो गांड में घुसकर उसे फ्लावर बना देगा.. बाप रे.. इतना बड़ा अंदर जाएगा तो मेरी गांड फट जाएगी.. ईसे बचाने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा"

चेतना तुरंत घूम गई.. "बस बस संजय.. अब मुझे तेरा लंड चूसने दे.. यार मज़ा आ गया आज तो.. तेरे जैसा मर्द मैंने आजतक नहीं देखा.. " कहते हुए वह घुटनों के बल बैठ गई.. और संजय का डंडा मुंह में लेकर चूसने लगी.. दो बार स्खलित हो चुके लंड को फिर से झड़ाने में चेतना को समय तो लगा.. पर जब गांड पर रॉकेट तना हुआ हो तब कोई भी काम मुश्किल नहीं लगता.. वह चूसते चूसते थक गई.. उसके गाल और जबड़े दर्द करने लगे.. पर फिर भी वह चूसती ही रही.. आखिर उसकी मेहनत रंग लाई.. और संजय के लंड का वीर्यस्त्राव हो ही गया.. जब तक वीर्य की सारी बूंदें उसने चाट न ली.. तब तक लंड मुंह से बाहर नहीं निकाला चेतना ने.. संजय उसे बस देखता ही रह गया.. अब भी चेतना लंड को चूसे जा रही थी.. संजय की गांड फट गई "कहीं ये चेतना मेरे लंड को एक बार और तैयार करने के फिराक में तो नहीं है?" कांप उठा संजय.. तीन तीन बार झड़ने के बाद उसमें और एक बार करने की ताकत नहीं बची थी..


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चेतना ने तब तक चूसना जारी रखा जब तक की संजय का लंड पूरी तरह से मुरझा नहीं गया.. पूरी तरह से तसल्ली होने के बाद उसने लंड बाहर निकाला और निकालते वक्त सुपाड़े को एक बार ओर चाटकर ये चेक भी कर लिया की कहीं उसमें अब भी जान बच तो नहीं गई थी!! निश्चिंत होने के बाद उसने लंड को बाइज्जत बरी किया

संजय मन में सोच रहा था "लंड बच गया मेरा" चेतना सोच रही थी "गांड बची सो लाखों पाएं"

दोनों ने कपड़े पहने और अपना हुलिया ठीकठाक किया.. औ गेस्टहाउस से बाहर निकले.. सड़क पर आकर दोनों ने रिक्शा ली और चेतना की घर के तरफ निकले.. रास्ते में दोनों ने एक दूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए.. और दूसरी बार मिलने का वादा भी किया

चेतना: "मेरा घर अब नजदीक ही है.. मैं यहीं उतर जाती हूँ.. वरना कोई देख लेगा.. "

संजय: "एक काम करते है.. मैं यहाँ उतर जाता हूँ.. तुम ऑटो लेकर घर चली जाना.. वैसे भी मुझे बाजार में थोड़ा काम है.. वो निपटाकर गेस्टहाउस चला जाऊंगा"

चेतना: "तेरा ससुराल यहीं शहर में ही है फिर क्यों गेस्टहाउस में रहता है तू?"

संजय: "लंबी कहानी है.. कभी इत्मीनान से बात करेंगे.. अरे भैया, ऑटो यहीं रोक दीजिए" संजय ने उतरकर पैसे चुकाये और चेतना के गाल पर हाथ सहलाकर चल दिया.. चेतना मुस्कुराकर उसे जाते हुए देखती रही.. अपने पर्स से छोटा सा मिरर निकालकर अपना चेहरा चेक किया उसने.. कहीं कोई निशानी तो नहीं रह गई.. !! तसल्ली करने के बाद वह अपने घर के बाहर उतर गई..
 
"दीदीईईईईई................!!!" किसी लड़की की शरारती चीख ने अनुमौसी के घर पर सब को चोंका दिया.. खाना पका रही कविता ने उस परिचित आवाज को पहचान लिया.. वह भागकर बाहर आई

"अरे.. क्या बात है !! मौसम तू यहाँ कैसे?? किसके साथ आई है? आने से पहले फोन तो किया होता, मैं तुझे लेने आ जाती" कविता की खुशी का कोई ठिकाना न रहा.. मौसम कविता की छोटी बहन थी

"अगर फोन करती तो तुम्हें सरप्राइज़ कैसे दे पाती?"

कविता हाथ पकड़कर अपनी छोटी बहन को घर के अंदर ले गई

अनुमौसी: "अरे, बेटा मौसम.. कैसी हो? परीक्षा खतम हो गई तेरी?"

मौसम: "ठीक हूँ आंटी.. ये बोर्ड की परीक्षा ने परेशान कर रखा था.. बाप रे.. पढ़ पढ़कर जान निकल गई मेरी.. और दुनिया भर की पाबंदियाँ.. टीवी मत देखो.. सहेलियों से मिलने मत जाओ.. मूवी देखने मत जो.. बस पूरा दिन पढ़ते ही रहो.. मैंने तय किया था की परीक्षा खतम होते ही मैं आप सब को मिलने आऊँगी"

अनुमौसी: "हाँ भई.. अब तो पढ़ाई लिखाई का ही जमाना है.. हमारे जमाने में तो लड़कियों को लिखना पढ़ना सिखाकर ब्याह देते थे.. तू अब यहाँ आराम से रहना और अपनी थकान उतारना"

मौसम: "हाँ आंटी.. दीदी के हाथ का बना बोर्नवीटा वाला दूध पीऊँगी तो मेरी सारी थकान उतर जाएगी" खिलखिलाकर हँसती हुई मौसम ने मंदिर की घंटी जैसी सुरीली आवाज में कहा

मौसम.. मौसम.. मौसम.. बारिश की पहली बूंद जैसी.. छोटी हिरनी जैसी.. मोती चुनते राजहंस जैसी..चहचहाती चिड़िया जैसी..

कविता मौसम को देखकर बेहद खुश हो गई.. मायके की हर चीज लड़की को प्यारी होती है.. और ये तो उसकी सगी छोटी बहन थी.. देखने में कविता जैसी ही.. पर थोड़ी सी ज्यादा सुंदर.. अठारह की हो चुकी थी मौसम.. बिंदास और शरारती स्वभाव की मौसम को देखते ही जो बात सबसे ज्यादा ध्यान खींचती थी.. वो थी उसकी मुस्कुराहट.. जब वो हँसती थी तब उसके गाल के डिम्पल इतने प्यारे लगते थे की देखने वाले की नजर ही न हटे.. उसके सहपाठी लड़के मॉसम के गालों के गड्ढों को देखने के लिए तरसते रहते.. सुराहीदार गर्दन.. मोम की पुतली जैसा जिस्म.. मीठी आवाज.. मौसम को देखने में ही सब ऐसे खो गए की उसके साथ आई लड़की का स्वागत करना ही भूल गए.. उस लड़की पर अनुमौसी का ध्यान गया

"अरे मौसम का स्वागत करने में हम सब इस लड़की को तो भूल ही गए.. !!" अनुमौसी ने कविता से कहा.. लगभग मौसम की उम्र की लड़की की पीठ सहलाते हुए उन्हों ने पूछा "क्या नाम है तेरा बेटा ?"

"जी नमस्ते आंटी जी, मेरा नाम फाल्गुनी है"

"मम्मी जी, हमारे पड़ोस में रहते सुधीरअंकल की बेटी है फाल्गुनी.. इसके और मौसम के बीच ऐसी गहरी दोस्ती है की दोनों कभी अलग होती ही नहीं है.. मैंने ही कहा था मौसम से.. की जब भी यहाँ आए तब फाल्गुनी को साथ लेते आए.. वो भी बेचारी थोड़ी फ्रेश हो जाएगी.. क्यों सही कहा ना मैंने फाल्गुनी?" हँसते हुए कविता ने कहा

फाल्गुनी: "हाँ दीदी, बड़ी मुश्किल से तो वेकेशन मिलता है.. और तभी ये पगली यहाँ दौड़ आती है.. फिर मैं अकेली वहाँ क्या करू? बोर हो जाती मैं.. इसलिए यहाँ इसके साथ ही आ गई.. अब पूरा एक महिना आपका दिमाग खाऊँगी.. " फाल्गुनी का स्वभाव ही ऐसा था की आते ही सब के साथ घुलमिल गई

फाल्गुनी.... बोलने के समय बोलती थी पर वैसे काफी शांत.. थोड़ी सी गंभीर.. गोरी और कद में ऊंची थी.. उसे देखते ही सब से पहली जो चीज नजर आती थी वो थे उसके घने लंबे बाल.. उसकी चोटी घुटनों तक लंबी थी.. बरसात के बादलों जैसे काले बाल!!

इन दोनों चिड़ियाओं की चहचहाट से अनुमौसी के पूरे घर में जान आ गई.. दोनों हरदम इतनी बातें कर रही थी.. थकती ही नहीं थी.. कविता किचन में खाना बनाने गई.. साथ में ये दोनों भी उसकी मदद करने गए.. अनुमौसी बाहर निकली.. थोड़ा सा चलने के लिए.. रास्ते में ही उन्हे शीला मिल गई.. जो सब्जी लेकर आ रही थी

शीला और मौसी काफी दिन बाद मिले थे.. दोनों बातों में मशरूफ़ हो गई.. बातों ही बातों में शीला ने मौसी को वैशाली के वैवाहिक जीवन की परेशानी के बारे में बताया.. अपने दामाद संजय के बारे में भी कहा.. कैसे वो कुछ काम नहीं करता और उधार लेकर गुलछर्रे उड़ाता रहता है.. अनुभवी अनुमौसी से शीला को मार्गदर्शन की अपेक्षा थी इसीलिए वह अपनी बेटी के निजी जीवन की सारी बातें बता रही थी

एक लंबी सांस लेकर अनुमौसी ने कहा "अब ऐसी स्थिति में क्या कर सकते है ? बेचारी वैशाली के पास बर्दाश्त करने के अलावा ओर कोई चारा नहीं है.. अगर वो अलग होना चाहती है अभी सही वक्त होगा ऐसा करने के लिए.. जैसे जैसे समय बीतता जाएगा, समस्या ओर गंभीर बन जाएगी"

शीला: "आपने कहा अभी सही वक्त है, मतलब? मैं समझी नहीं.."

अनुमौसी: "देख शीला.. पति-पत्नी के झगड़े अक्सर रात को बिस्तर पर जाते ही थम जाते है.. भगवान न करें कहीं वैशाली प्रेग्नन्ट हो गई तो?? बच्चे के आने के बाद तलाक काफी कठिन और मुश्किल हो जाएगा.. ये था मेरे कहने का मतलब!!"

शीला डर गई "मौसी.. कहीं वैशाली पहले से प्रेग्नन्ट तो नहीं होगी ना.. !!"

अनुमौसी: "तू उसकी माँ है.. सीधा पूछ ही ले.. जो होगा वो बता देगी तुझे.. और अगर हुई भी तो बिना किसी शोर-शराबे के बच्चे को गिरा दे.. अगर तेरे दामाद के सुधरने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे है तो.. और हाँ.. उस कमीने को भनक नहीं लगनी चाहिए अगर वैशाली प्रेग्नन्ट हुई तो.. वरना वो कमीना उसे ब्लेकमेल कर सकता है" अपने सालों के अनुभव को सांझा किया मौसी ने

ये सुनकर मन ही मन कांप उठी शीला.. पर वो भी हार मानने वालों में से नहीं थी.. संजय को तो सबक सिखाना ही पड़ेगा.. ऐसे कैसे वो किसी लड़की का जीवन तबाह करके ऐशोआराम की जिंदगी बीता सकता है!! वैशाली से बात करने का निश्चय करके शीला घर लौटी

रात का खाना खाकर जब दोनों माँ-बेटी झूले पर बैठे थे तब शीला ने वैशाली से सब कुछ पूछ लिया.. बातों बातों में उसने संजय और वैशाली के बेडरूम के जीवन के बारे में भी पूछ लिया.. जब शीला ने ये जाना की वैशाली भरी जवानी में शारीरिक भूख से तड़प रही थी तब उसका दिल ही बैठ गया.. इस उम्र में मुझसे रहा नहीं जाता तो ये बेचारी कैसे गुजारा करती होगी !!! इस बारे में मैं भी क्या कर सकती हूँ?? वाकई बिना पति के रहना बेहद कठिन है.. वैशाली के वैवाहिक जीवन को कैसे बचाया जाए ये सोचते हुए उसने वैशाली से संजय की कमजोरियों के बारे में पूछ लिया.. आखिर उन दोनों के बीच के झगड़े की जड़ तक जाना जरूरी था.. वो क्या कारण था की जिसके कारण दोनों के बीच अनबन शुरू हुई? इस बारे में सब कुछ जानना जरूरी था पर कुछ बातें ऐसी थी जो वो वैशाली से सीधे पूछ नहीं सकती थी.. इसके लिए शीला ने कविता की मदद लेने का तय किया.. दोनों माँ बेटी साथ में बिस्तर पर बातें करते हुए सो गई

सुबह शीला ने कविता को फोन किया.. अपनी छोटी बहन और उसकी सहेली की मौजूदगी के चलते कविता ने आने में असमर्थता जताई.. पर वादा किया की समय मिलते ही वह तुरंत मिलने आएगी..

शीला ने अब चेतना को फोन किया.. यह जानने की संजय के बारे में जानकारी प्राप्त करने का जो काम उसने चेतना को दिया था उस में कुछ जानने मिला भी या नहीं !!

चेतना: "सच कहूँ शीला.. दो दिन से मैं कुछ न कुछ काम में ऐसी उलझी रही की तेरे दामाद के बारे में पता करने का वक्त ही नहीं मिला.. हाँ सुबह सुबह गेस्टहाउस की बालकनी में वो खड़ा जरूर होता है.. बाकी कुछ नया जानने को मिलेगा तो में तुरंत तुझे बताऊँगी" चेतना ने अपनी जूठी कहानी सुनाई

फोन रखकर शीला सोच में पड़ गई.. आज ये चेतना की आवाज में झिझक क्यों महसूस हो रही थी!! हर बार की तरह बात नहीं कर रही थी वो.. जैसे कुछ छुपा रही हो.. !!

क्या करू? किस से कहू? शीला ने वैशाली की किसी सहेली की मदद लेने का सोचा.. काफी देर तक सोचते रहने के बाद उसे फोरम की याद आई.. वैशाली की कॉलेज की सहेली.. थोड़ी दिन पहले ही मंडी में फोरम की मम्मी शीला को मिल गई थी..फोरम ने प्रेम विवाह किया था और वो इसी शहर में रहती थी.. पर वो कहाँ रहती थी ये पता नहीं था..

शीला सोचती रही.. सोचती रही.. सोचती रही.. फिर उसे याद आया की टेलीफोन डायरी में उसका नंबर लिखा होगा.. वैशाली कहीं बाहर गई थी.. शीला ने डायरी निकाली और फोरम के घर का लेंडलाइन नंबर ढूंढकर फोन लगाया.. किसी पुरुष ने फोन उठाया

शीला ने नम्र आवाज में पूछा "जी आप कौन?"

"जी मैं मणिलाल ठक्कर.. आपको किसका काम है?"

"आप, फोरम के पापा हो ना.. !!"

"जी हाँ.. पर आप कौन बोल रही है?"

"जी नमस्ते, मेरा नाम शीला है.. मेरी बेटी वैशाली और फोरम दोनों सहेलियाँ है"

"ओह नमस्ते शीला बहन.. कैसे है आप? वैशाली को अच्छे से जानता हूँ मैं.. वह अक्सर मेरे घर आती रहती थी.. कहिए क्या काम था?"

"जी मुझे फोरम का काम था.. "

"वो तो अपने ससुराल है.. कुछ अर्जेंट काम हो तो आप उसके मोबाइल पर कॉल कर सकती है.. मैं नंबर देता हूँ"

"हाँ हाँ.. नंबर दीजिए प्लीज.. काम तो वैसे कुछ खास नहीं है.. वैशाली मायके आई हुई है.. वो फोरम को याद कर रही थी.. तो सोचा उसे फोन कर दु"

शीला ने चालाकी से फोरम का नंबर जान लिया.. और फोरम को फोन किया.. फोरम को संक्षिप्त में सारी बात समझकर उसे इस बारे में जानकारी प्राप्त करके मदद करने के लिए कहा

फोरम: "आंटी, आप चिंता मत कीजिए.. मैं सब कुछ जान लूँगी"

शीला: "मैंने तुझे फोन किया है इस बारे में वैशाली को पता नहीं चलना चाहिए"

फोरम: "मैं उसे कुछ नहीं बताऊँगी.. आप इत्मीनान रखिए.. मैं ऐसे आ टपकूँगी और उससे सारी बातें पूछ लूँगी"

शीला: "ठीक है बेटा.. मुझे बहोत चिंता हो रही है.. तू सब कुछ जान ले फिर आगे क्या करना वो पता चले मुझे"

शाम को शीला और वैशाली खाना खा रहे थे तभी डोरबेल बजी.. वैशाली ने उठकर दरवाजा खोला और अचंभित हो गई

"अरे.. फोरम तू.. !!!! तुझे कैसे पता चला की मैं यहाँ हूँ" वैशाली ने फोरम को गले से लगा लिया..

फोरम: "कुछ दिन पहले मेरी मम्मी आंटी से बाजार में मिली थी.. तभी उन्होंने बताया था की तू आई है.. तो आ गई मैं तुझे सप्राइज़ देने.. तू बता यार.. कैसा चल रहा है सब कुछ? तो तो यार मस्त गोरी हो गई कलकता जा कर.. "

शीला: "आओ बेटा फोरम.. वैशाली खाना ठंडा हो रहा है.. पहले खाना खतम कर.. फिर दोनों आराम से बातें करना.. फोरम, तू भी आजा.. थोड़ा सा खा ले.. "

फोरम: "नहीं आंटी, मैं खाना खाकर ही आई हूँ.. " कहते हुए वो डाइनिंग टेबल पर वैशाली के साथ बैठ गई..

शीला ने खाना जल्दी खतम किया और खड़ी हो गई "आप दोनों आराम से बात करो.. मुझे थोड़ा काम है" दोनों को अकेले बात करने का मौका देने के लिए शीला चली गई

फोरम ने बातों बातों में वैशाली से जान लिया की संजय और उसके बीच क्या तकलीफ थी.. उन दोनों के संबंध काफी खराब हो चुके थे.. दोनों बहोत ही खास सहेलियाँ थी इसलिए वैशाली सब कुछ बेझिझक फोरम को बताया.. सब कुछ.. यहाँ तक की बेडरूम लाइफ के बारे में भी

वैशाली और फोरम को प्राइवसी देने के लिए शीला अनुमौसी के घर चली आई.. कविता और पीयूष दोनों शीला को देखकर खुश हो गए.. शीला जब मौसी से बात कर रही थी तब चिमनलाल सोफ़े पर हिप्पो की तरह लेटे हुए आई.पी.एल के मेच देख रहा था.. तीरछी नज़रों से वो शीला के स्तनों को देख रहा था इस बात का पता था शीला को.. किसी भी एंगल से लाइन मारने योग्य नहीं था चिमनलाल.. इसलिए उसकी नजर शीला को चुभ रही थी.. ऊपर से पीयूष जिस तरह से मौसम के कंधे पर हाथ रखकर हंस हँसकर बात कर रहा था ये देखकर शीला थोड़ी ओर अस्वस्थ हो गई.. इस हरामी पीयूष को जवान साली क्या मिल गई.. मेरे सामने तो देख भी नहीं रहा!! उस रात मूवी देखते वक्त तो मेरे बबलों पर टूट पड़ा था कमीना..

मौसम की छाती पर नजर फेरते ही शीला को पता चल गया की माल एकदम कोरा था.. अभी तक किसी का हाथ नहीं पड़ा था उसके सख्त और विकसित हो रहे स्तनों पर..


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उसके स्तन जवान थे तो शीला के स्तनों में बड़े आकार का जादू था.. पीयूष का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए शीला ने अपना पल्लू गिरा दिया.. उसकी एक तरफ की ब्लाउस की कटोरी खुली होते ही पीयूष एल.बी.डब्ल्यू हो गया.. अब वो बार बार शीला के उरोज को देख रहा था ये बात कविता के ध्यान में भी थी


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मौसम और फाल्गुनी इन नज़रों के खेल से अनजान थी क्योंकि वो दोनों शीला के बगल में बैठी थी.. कविता पीयूष के पास बैठी थी.. शीला के मदमस्त उरोजों को देखकर वो भी मन ही मन आहें भर रही थी.. सोच रही थी.. एक लड़की होकर भी मेरी नजर शीला के स्तनों पर चिपक जाती है.. तो बेचारे पीयूष का क्या दोष? अनुमौसी भी इन सब से अनजान तो नहीं थे पर रीटायर हो चुके खिलाड़ी की तरह वह सबकुछ देखते हुए शीला से बातें कर रही थी

मौसम: "जीजू, आप कल हमें घुमाने लेकर चलेंगे ना !! "

पीयूष: "कल तो मुश्किल होगा मौसम.. ऑफिस में बहोत काम है.. तू कविता को ही बोल.. वो तुझे ले जाएगी घुमाने"

शीला: "जहां भी जाओ.. वैशाली को साथ लेकर ही जाना.. वो बेचारी अकेले अकेले बोर हो जाती है"

वैशाली का जिक्र होते ही पीयूष की आँखें चमक उठी.. ये बात शीला की नज़रों से छिपी नहीं थी.. वो सोच में पड़ गई.. कहीं वैशाली और पीयूष के बीच भी कुछ.. ??? ये मादरभगत माँ और बेटी दोनों को घुमा रहा है शायद..

शीला: "मैं चलती हु अब.. साढ़े दस बज गए.. "

कविता: "बैठिए ना भाभी.. वैसे वैशाली कहाँ है? दिखी ही नहीं.. उस दिन संजयकुमार को भी देखा था मैंने.. कहीं बाहर तो नहीं गए वो दोनों?"

संजय का नाम सुनते ही पीयूष का दिमाग खराब हो गया.. उसने कुछ सोचकर कहा "मैं देखता हूँ.. अगर राजेश सर मुझे छुट्टी देते है तो मैं परसों गुरुवार और शुक्रवार दो दिन की छुट्टी ले लूँगा.. शनिवार और रविवार को वैसे भी छुट्टी है.. चार दिन कहीं जाने का प्रोग्राम बनाते है.. शीला भाभी और वैशाली को भी साथ ले लेंगे.. मज़ा आएगा"

ये सुनते ही मौसम उछल पड़ी और पीयूष को गले लगाकर बोली "थेंकयू जिजू.." मौसम के इस बर्ताव से किसी को ताज्जुब नहीं हुआ पर शीला की नजर मौसम के कच्चे अमरूद जैसी चूचियों पर गई जो पीयूष के शरीर से दबकर चपटी हो गई थी..

"आप चलोगे ना भाभी?" पीयूष ने आँख मारते हुए शीला से पूछा

"देखते है.. अगर वैशाली राजी हो गई तो चलूँगी.. उसे अकेला छोड़कर कैसे आ सकती हूँ? और अगर संजयकुमार अचानक घर पर आ गए तो? मुझे सब देखना पड़ता है " शीला ने पोलिटिकल जवाब दीया

"अरे वैशाली को तो मैं मना लूँगा.. वो भी बेचारी.. कितने सालों के बाद मायके आई है.. वो भी थोड़ा सा इन्जॉय कर ले" पीयूष ने कहा

कविता ने अपनी कुहनी पीयूष की कमर पर मारते हुए कहा "क्या बात है.. वैशाली की बड़ी फिक्र हो रही है तुझे.. !! कहीं उसके साथ तेरा.. !!" कविता ने बात अधूरी छोड़ दी

पीयूष सकपका गया.. जैसे रंगेहाथों पकड़ा गया हो.. वो कुछ नहीं बोला और नजरें झुकाकर बैठा ही रहा

"मैं देखती हूँ.. जो भी होगा कल बताऊँगी" कहते हुए शीला उठकर अपने घर चल दी

शीला जब घर पहुंची तब वैशाली किसी के साथ मोबाइल पर बात कर रही थी.. फोरम जा चुकी थी.. शीला ने देखा की उसके आते ही वैशाली ने फोन कट कर दिया.. होगी कोई उसकी पर्सनल बात.. वो भी अब शादीशुदा है और बड़ी हो गई है.. हर बात पर पूछना या टोकना ठीक नहीं होगा.. हो सकता है की संजय से ही बात कर रही हो !! लेकिन संजय का फोन होता तो इस तरह काट नहीं देती.. हिम्मत से बात कर रही होगी?? क्या पता !!

अपनी एकलौती बेटी का संसार उझड़ता हुआ देखकर शीला को बहोत दुख हो रहा था.. पर उससे भी ज्यादा दुख इस बात का था की उसका पति मदन अभी मौजूद नहीं था.. अगर वो होता तो संजय को ठीक कर देता.. अभी और १८ दिन बाकी थे मदन के लौटने में..

अपने पति को याद करते हुए शीला सो गई और उसके बगल में वैशाली भी.. सुबह ४ बजे के करीब वैशाली को पेट में बहोत दर्द होने लगा.. पर वो बिस्तर में पड़ी रही.. बेकार में मम्मी की नींद खराब होगी ये सोचकर.. थोड़ी देर यूंही पड़े रहने के बाद वह बाथरूम जाने के लिए उठने ही वाली थी तब डोरबेल बजी.. शीला तुरंत उठ गई.. मम्मी शायद दूध लेकर बाथरूम जाएगी तो उनके लौटने के बाद मैं जाऊँगी ये सोचकर वैशाली बिस्तर में पड़ी रही..

शीला ने दरवाजा खोला.. सामने रसिक था.. रसिक को देखते ही वह उससे लिपट पड़ी.. अपनी छाती को रसिक के जिस्म से रगड़ते हुए वह बोली

शीला: "ओह्ह रसिक.. बहोत मन कर रहा है यार.. पर क्या करू.. वैशाली के आने के बाद कोई सेटिंग हो ही नहीं पा रहा.. तेरा "ये" मुझे बहोत याद आता है.. कहीं ले चल मुझे यार.. अंदर ऐसी आग लगी है की तुझे क्या बताऊँ!!" कहते हुए शीला ने रसिक के पाजामे के ऊपर से ही उसका लंड पकड़ लिया

बेडरूम के दरवाजे के पीछे छुपकर देख रही वैशाली को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था.. ये क्या हो रहा है? मम्मी एक दूधवाले के साथ?? छी छी.. एक पल के लिए तो वो अपने पेट का दर्द भी भूल गई.. अपनी माँ का ये नया ही रूप देखा था उसने..

रसिक अपने मजबूत हाथों से शीला की पीठ और कूल्हों को गाउन के ऊपर से ही मसलते हुए शीला के होंठ चूस रहा था.. चूसते चूसते आहें भी भर रहा था

"आवाज मत कर पागल.. वो जाग गई तो आफत आ जाएगी" शीला ने कहा

रसिक का सख्त मूसल जैसा लंड मुठ्ठी में पकड़कर आगे पीछे करते हुए शीला का भोसड़ा चुदवाने के लिए तड़पने लगा.. उससे रहा नहीं जा रहा था लेकिन वैशाली की मौजूदगी में ऐसा कुछ भी कर पाना असंभव था.. हररोज केवल वो रसिक का लंड चूसकर ठंडा करती पर उसकी चूत की प्यास अधूरी ही रह जाती, ये बात बड़ी खल रही थी शीला को..

"ओह्ह भाभी.. रोज की तरह आज भी मेरा चूसकर सारा जहर बाहर निकाल दो.. तो मैं जाऊँ.. ये नरम नहीं होगा तबतक मैं किसी के घर जा नहीं पाऊँगा.. देखो तो सही.. कितना बड़ा उभार हो गया है पजामे में??" शीला के गाउन में हाथ डालकर जोर से मसल दिए उसके स्तन रसिक ने.. निप्पलों पर रसिक की खुरदरी उँगलियाँ रगड़ते ही शीला की वासना उफान पर चढ़ने लगी.. वो रसिक के लंड को तेजी से आगे पीछे करने लगी.. अचंभित होकर वैशाली अपनी माँ की सारी करतूतें देखती ही रही.. शीला और रसिक की सारी बातें ठीक से सुनाई तो नहीं दे रही थी पर उनकी हरकतें देखने के बाद, बातें सुनने की जरूरत भी नहीं थी..

यह सारी कामलीला देखकर वैशाली की चूचियाँ भी सख्त और लाल हो गई.. वैशाली को एक पल के लिए नफरत हो गई अपनी माँ से.. फिर उसने सोचा.. दो साल से पापा विदेश थे.. मर्द की जरूरत हर औरत को पड़ती है.. तो उसमें गलत क्या है !! पर मम्मी को थोड़ा लेवल का भी ध्यान रखना चाहिए ना!! वैशाली ने देखा की थोड़ी सी आनाकानी के बाद उसकी माँ घुटनों पर बैठ गई.. कम रोशनी के कारण उसे रसिक का लंड नजर नहीं आ रहा था.. थोड़ी देर के बाद रसिक चला गया.. और शीला अपने मुंह में भरे वीर्य को थूकने के लिए वॉशबेसिन पर आई.. ये देख वैशाली को घिन आने लगी.. माय गॉड.. मम्मी के मुंह में उसने पिचकारी मार दी.. !!!!!!!


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शीला को बेडरूम की ओर आता देख वैशाली तुरंत बिस्तर पर लेट गई और करवट लेकर गहरी नींद में होने का नाटक करने लगी.. शीला ने वैशाली की ओर देखा.. उसे गहरी नींद में देख शीला का मन शांत हुआ.. अच्छा है ये सो रही है.. ये साला रसिक भी.. उसका लंड पकड़ते ही मेरी चूत में झटके लगने लगते है.. रहा ही नहीं जाता.. कितना टाइट है उसका.. हाय.. अंदर लेने का मन करने लगता है.. क्या करू यार.. बिना चुदे रहा नहीं जाता मुझसे अब.. कुछ सेटिंग तो करना ही पड़ेगा.. पर कहाँ करू? रसिक को चेतना के घर बुला लूँ?? आइडिया तो अच्छा है पर उस रंडी चेतना का कोई भरोसा नहीं.. एक बार उसने अगर रसिक का देख लिया तो बिना चुदवाए नहीं रहेगी.. और एक बार उससे चुद गई तो उसे अपना बना ही लेगी वो कमीनी.. नहीं नहीं.. ऐसा जोखिम नहीं उठाना..

शीला घर के काम में मशरूफ़ हो गई और उसका मन चुदवाने के बंदोबस्त के बारे में सोचने लगा.. करीब साढ़े आठ के करीब वैशाली जाग गई.. वह नहा-धोकर तैयार हो गई और कविता के साथ बाजार चली गई.. रास्ते में कविता ने वैशाली को चार दिन बाहर जाने के प्रोग्राम के बारे में बताया.. अपनी बहन मौसम और उसकी सहेली फाल्गुनी के बारे में भी कहा..

कविता: "तू आएगी ना साथ.. पीयूष कह रहा था की तुझे तो वो जरूर लेके चलेगा.. तेरे लिए कुछ ज्यादा ही जज्बाती है पीयूष.. और क्यों न हो.. तुम दोनों के बीच वो वाला खास रिश्ता जो है!!" शरारत करते हुए कविता ने कहा

वैशाली: "कुछ भी मत बोल.. उस समय जो होना था वो हो चुका.. बीत गई सो बात गई.. एक भूल हुई थी जो ईमानदारी से मैंने तेरे सामने कुबूल भी कर ली.. तू तो ऐसे बोल रही है जैसे मैं रोज पीयूष से करवाती हूँ"

कविता: "अरे यार मज़ाक कर रही हूँ.. क्या तू भी !! तू साथ चलेगी तो बहोत मज़ा आएगा.. यार वैशाली.. भूख लग रही है.. चल पानी पूरी खाते है.. तू ही बता.. यहाँ कौन सब से अच्छे गोलगप्पे खिलाता है?"

वैशाली: "चल तुझे ऐसी जगह नाश्ता करवाती हूँ की याद रखेगी.. थोड़ा दूर है पर मज़ा आएगा"

हाथ दिखाकर वैशाली ने रिक्शा को रोका और दोनों अंदर बैठ गए.. वैशाली ने पता बताया और ऑटो वाला उस ओर चलाने लगा..

रास्ते में कविता ने रसिक के साथ उस दिन हुई द्विअर्थी बातों के बारे में बताया.. रसिक का नाम सुनते ही वैशाली के कान खड़े हो गए.. वह कविता से और जानकारी प्राप्त करने के मकसद से घूम फिराकर पूछने लगी.. कविता को भी आश्चर्य हुआ की रसिक के बारे में इतना सब क्यों पूछ रही थी वैशाली !! दोनों ने उस जगह पहुंचकर नाश्ता किया और घर वापिस आए

घर आते ही शीला ने वैशाली को बताया "कविता और पीयूष, घर आए मेहमानों को लेकर ४ दिन कहीं घूमने जाने का प्रोग्राम बना रहे है.. मुझे पूछ रहे थे अगर हम दोनों भी साथ चलना चाहे तो.. "

वैशाली: "मुझे मूड नहीं है जाने का मम्मी.. तुम्हें जाना है तो जाओ"

शीला: "अगर तू नहीं चलेगी तो मैं भी जाकर क्या करूंगी !!"

वैशाली: "मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा मम्मी.. संजय को लेकर मैं बहोत परेशान हूँ.. इसलिए नहीं जाना चाहती.. पर तू तो चली जा.. दो सालों से तुम कहीं नहीं गई.. थोड़ा माहोल बदलेगा तो तुझे भी अच्छा लगेगा.. "

शीला ने जवाब नहीं दिया.. वैसे वैशाली की बात तो सही थी.. २ साल हो गए थे मदन को गए.. दो सालों से वो कहीं नहीं गई थी.. बस एक बार अनुमौसी और महिला मण्डल पर एक दिन की यात्रा पर गई थी उसके अलावा कहीं भी नहीं.. वैशाली काफी उदास रहती थी.. और उसके कारण पूरा घर एकदम शांत और गंभीर लगता था.. बेटी की उदासी देखकर माँ को चिंता होना स्वाभाविक था
 
दोपहर को कविता, मौसम और फाल्गुनी वैशाली से मिलने आए.. लड़कियां आपस में आराम से बात कर सके इसलिए शीला वहाँ से निकल गई.. वह चाहती थी की तीनों हंसी खुशी बातें करे और वैशाली का मन कुछ हल्का हो जाए.. शीला को कविता पर पूरा भरोसा था की वो किसी भी तरह वैशाली को संजय के विचारों से मुक्त करेगी.. वैशाली भी मौसम और फाल्गुनी से मिलकर खुश हो गई.. जवान लड़कियों के पास बातें करने के हजार टोपिक होते है.. उनकी बातें कभी खतम ही नहीं होती.. पढ़ाई की.. कॉलेज की.. बॉयफ्रेंड की.. उन्हे लाइन मारते लड़कों की.. नॉन-वेज जोक्स और उससे उत्पन्न होते हंसी ठहाकों से पूरा घर भर गया..

फाल्गुनी थोड़ा कम बोलती थी.. उसके चेहरे के गंभीर भाव से वो बेहद सुंदर लगती थी.. पर अनुभवी आँखें उसे देखकर ये जरूर भांप लेगी की उसकी गंभीरता के पीछे गहरी उदासी छुपी हुई थी.. पर बाकी लड़कियां ये देख पाने में असमर्थ थी इसलिए कभी उसे इस बारे में पूछा नहीं था.. सब हंसी-मज़ाक कर रहे थे.. तब फाल्गुनी सिर्फ औपचारिकता से हंस रही थी..

इस तरफ शीला अनुमौसी के घर पहुँच गई.. घूम फिरकर उनकी बात वैशाली की समस्या पर आकर अटक गई थी.. अनुमौसी अपने अनुभव के अनुसार सलाह दे रही थी

शीला के घर तीनों लड़कियां बातें कर रही थी.. तभी टेबल पर रखा हुआ शीला का मोबाइल बजा.. शीला अपना फोन साथ ले जाना भूल गई थी.. वैशाली ने फोन उठाया

वैशाली: "हैलो.. "

"हैलो भाभी.. आप तो मुझे भूल ही गए.. मुझे भी कभी याद कर लीया कीजिए.. " सामने से किसी लड़के की आवाज थी.. वैशाली को पता नहीं चला की कौन बोल रहा था

"अरे भाभी.. पहचाना नहीं? मैं पिंटू.. मिले हुए बहुत वक्त हो गया इसलियी शायद भूल गई.. "

"जी मैं शीलाजी की बेटी बोल रही हूँ.. आप रुकिए मैं उन्हे फोन देती हूँ" वैशाली उठकर अनुमौसी के घर गई और फोन देकर वापस लौटी

कविता: "तेरे पापा का फोन था क्या? कब आ रहे है वो?"

वैशाली: "पापा का नहीं था.. किसी पिंटू नाम के आदमी का था.. होगा कोई मम्मी की पहचान वाला" वैशाली के मन में विचार चलने लगे.. कितना भी चाह कर वो अपनी मम्मी के बारे में बुरे खयाल नहीं सोच सकती थी.. और शीला ने भी अपने चारित्र का पूरा ध्यान रखा था अब तक.. ये तो मदन के जाने के बाद उसकी चूत ने उसे फिसलने पर मजबूर कर दिया था.. शरीर की भूख सब को सताती है.. कुछ लोग इसलिए शरीफ रह पाते है क्योंकि उन्हे योग्य मौका नहीं मिलता.. शीला वैसे तो व्यभिचारी नहीं थी.. उसका पति उसे अलग अलग आसनों में चोदकर बेहद खुश रखता था.. शीला को अलग अलग तरीकों से चुदवाने में बेहद आनंद आता था और मदन उसे चौड़ी कर ठोंकने में कोई कसर नहीं छोड़ता था.. मदन के जाने के बाद संभोग के सुख को शीला इतना मिस कर रही थी की जैसे ही रसिक से संपर्क हुआ, उसका सब्र का बांध टूट गया.. हवस के झलझले ने उसके चारित्र को तबाह कर दिया

पिंटू का नाम सुनकर कविता के होश उड़ गई.. पिंटू और शीला भाभी?? उसे भला क्या जरूरत आन पड़ी भाभी की ? मैं और पिंटू जब भाभी के घर मिले थे तब कहीं मेरे जाने के बाद..........!!! नहीं नहीं.. शीला भाभी ऐसा क्यों करेगी? मेरे प्रेमी को पटाने जैसा हलकट काम शीला भाभी नहीं कर सकती.. और उन्होंने तो पहले से रसिक को जुगाड़ रखा है.. रोज सुबह उसका लोडा भी चूसती है.. फिर वो पिंटू पर नजर क्यों डालेगी भला!!! लेकिन प्रेमियों में असुरक्षितता का भाव होना काफी स्वाभाविक है.. आप जितना किसीको चाहते हो उतना ही उसे खोने का डर लगा रहता है..

कविता से रहा नहीं गया.. वह उठकर बोली "अरे मैं भी अपना मोबाइल घर भूल आई हूँ.. पीयूष का फोन आने वाला है.. उठाऊँगी नहीं तो गुस्सा करेगा.. " वैसे मोबाइल तो उसकी ब्रा के अंदर सुरक्षित था फिर भी वो बहाना बनाकर निकल गई.. वह तुरंत अपने घर नहीं गई.. वह सोच रही थी "अगर पिंटू का फोन होगा तो शीला भाभी मम्मीजी के सामने बात नहीं करेगी.. बरामदे में भी नहीं खड़ी होगी क्योंकि वैशाली की नजर पड़ने का खतरा था.. पक्का वो घर के पीछे की तरफ गई होगी.. " कविता चुपके से घर के पिछवाड़े की तरफ गई.. उसका अंदाजा बिल्कुल सही था.. पीछे मुड़कर शीला फोन पर बात कर रही थी.. शीला की पीठ की तरफ खड़ी कविता उसे नजर नहीं आ रही थी

शीला और पिंटू के बीच फोन पर हो रही बातें सुनकर कविता के पैरों तले से धरती खिसक गई.. उसे विश्वास नहीं हो रहा था की पिंटू और शीला भाभी उसके साथ इतना बड़े धोखा करेंगे.. उनकी बातें सुनकर कविता की सांसें थम गई..

शीला: "अरे तू पागल मत बन.. थोड़ा धीरज धर.. पीयूष अपनी साली और कविता को लेकर ४ दिन के लीये घूमने जा रहा है.. मैं कोई भी बहाना करके घर पर ही रहूँगी.. सब बाहर होंगे तब हम आराम से मजे करेंगे.. मेरी बेटी घर आई हुई है इसलिए मेरे भी सब कुछ बंद है.. मुझसे भी रहा नहीं जाता.. बस एक दिन की ही बात है"

उदास कविता की आँखों से आँसू बहने लगे.. प्रेम के नाम पर इतना बड़ा धोखा दिया पिंटू ने ?? एक ही पल में उसे अपना प्यार का महल ध्वस्त होता नजर आया.. कविता को बहोत गुस्सा आ रहा था.. हम लोग वैशाली को लेकर घूमने जाए.. और हमारे पीछे शीला भाभी मेरे ही प्रेमी के साथ रंगरेलियाँ मनाने का प्लान बनाकर बैठी है.. पर मैं भी उनका प्लान सफल नहीं होने दूँगी.. कुछ भी हो जाए.. ऐसा जुगाड़ लगाऊँगी की इन दोनों का मिलना मुमकिन ही न हो

कितनी भी बड़ी विपदा क्यों न हो.. अपने आप को संभाल लेने का कौशल सारी स्त्रीओं में जन्मजात होता है.. शीला को पता न चले उस तरह चुपके से कविता वहाँ से निकल गई और वैशाली के साथ वापिस बातें करने में ऐसे मशरूफ़ हो गई जैसे कुछ हुआ ही न हो !! मौसम, फाल्गुनी और वैशाली मिलकर अंताक्षरी खेल रहे थे

मौसम बड़े ही सुरीले अंदाज में गाना गा रही थी "अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का.. यार ने ही लूट लिया घर यार का.. " बहोत अच्छा गा रही थी मौसम.. पर गाने के बोल सुनकर कविता के टूटे हुए दिल को ठेस पहुंची.. गुमसुम होकर वो मौसम का गाना सुनती रही पर उसका दिमाग फिर से पिंटू के खयालों में खो गया.. वह सोच रही थी की ऐसा क्या किया जाएँ की शीला भाभी और पिंटू को मिलने से रोका जा सके !!

अंताक्षरी में चल रहे गानों की वजह से वो ठीक से सोच नहीं पा रही थी.. "मैं अभी आई.. " कहते हुए वह बाहर निकल गई..

घर तो जाना नहीं था क्योंकि वहाँ शीला भाभी मौजूद थी.. चलते चलते वो गली के बाहर सब्जी की रेहड़ी पर धनिया मिर्च लेने के लिए रुक गई

कविता: "साथ में १० रुपये के नींबू भी दे देना भैया.. " प्लास्टिक की थैली अपने हाथ में लाइ हुए वह कोने में पड़ी बैठक पर बैठ गई

उसका दिमाग १०० की स्पीड पर भाग रहा था.. क्या करू? जाऊ की न जाऊ?? नहीं जाऊँगी तो बेचारी मौसम और फाल्गुनी का दिल टूट जाएगा.. एक बार तय किया है तो जाकर ही आते है.. शीला भाभी कोई बहाना करके छटक जाएगी और वैशाली को हमारे साथ भेज देगी.. अगर वैशाली आने से मना करेगी तो मेरा हरामखोर पति उसे कैसे भी मना लेगा.. साला पीयूष, वैशाली के बबलों का दीवाना है.. उसके बड़े बड़े जो है.. कैसी विडंबना है.. मेरा प्रेमी शीला भाभी के साथ मजे करेगा और उसकी बेटी मेरे पति के साथ गुलछर्रे उड़ाने साथ चलेगी.. अब क्या करू मैं? ये माँ और बेटी दोनों मिलकर मेरी सारी दुनिया ही उझाड़ देंगे.. नहीं नहीं.. मैं ऐसा हरगिज होने नहीं दे सकती..

तभी कविता के मोबाइल का मेसेज टोन बजा.. रेणुका का मेसेज था.. कोई नॉन-वेज जोक भेजा था उसने जिसे पढ़ने का अभी बिल्कुल मूड नहीं था कविता का.. पर रेणुका का नाम देखकर उसे विचार आया.. पिंटू भी पीयूष के साथ रेणुका के पति की कंपनी में ही जॉब करता था.. क्या रेणुका किसी तरह उसकी मदद कर सकती है इस बारे में? पर रेणुका से कहू कैसे? पिंटू और शीला भाभी की बात मैं उनसे कैसे कहू??

कविता ने रेणुका को सीधे फोन ही लगा दिया..

"हाई कविता.. कैसी है तू?" रेणुका ने बड़े प्यार से कहा

"मैं अभी तुम्हें ही याद कर रही थी रेणुका.. और तभी तेरा मेसेज आया.. ईसे संयोग ही कह सकते है"

"हाँ यार.. बता.. क्यों याद कर रही थी मुझे?"

कविता सोच में पड़ गई.. कैसे बात करू !!!

रेणुका: "इतने दिनों से कहाँ थी तू? घर पर सब कैसे है? उस दिन होटल में मिले उसके बाद तू कभी दिखी ही नहीं.. वैसे उस दिन तू बड़ी हॉट लग रही थी.. "

कविता: "थेंक्स फॉर ध कोंपलीमेन्ट.. हाहाहा.. " झूठी हंसी हँसते हुए उसने कहा और बात आगे बढ़ाई "घर पर सब ठीक है.. मम्मी जी भी तुम्हें याद करती रहती है.. वो कहती है की पूरी महिला मंडली में तुम सब से जवान हो.. वैसे उनके मण्डल में सब बूढ़ी औरतें ही है.. तुम उनके साथ कैसे जुड़ गई भला? इतनी जल्दी रीटायरमेन्ट ले लिया क्या राजेश भाई ने?"

रेणुका: "नहीं नहीं.. ऐसा कुछ नहीं है.. वो काम के सिलसिले में बाहर ज्यादा रहते है.. मैं घर पर अकेले बोर हो जाती थी.. टाइम पास करने के लिए ही तेरी सास और उनके महिला मण्डल के साथ जुड़ गई.. वैसे अब पीयूष के आ जाने से राजेश का बोझ थोड़ा कम हो गया है.. बहोत होशिया है पीयूष.. तुम खुशकिस्मत हो जो तुम्हें पीयूष जैसा लड़का मिला.. दोनों की जोड़ी भी बड़ी जचती है.. लैला मजनू की तरह.. आई हॉप की बेडरूम में भी तुम दोनों उतने ही मजे करते होंगे"

कविता: "हाँ रेणुका.. वैसे हमारी ज़िंदगी तो खुशहाल ही है.. पर तकलीफें तो आती ही रहती है.. कभी कभी मियां-बीवी के बीच जब को तीसरा आ जाएँ तब संबंधों में दरार आने का खतरा बना रहता है.. "

रेणुका: "हाँ वो तो है.. पर तुम दोनों के बीच तीसरा कौन आ गया??" घबराहट के सुर में रेणुका ने पूछा.. वह डर गई.. उस दिन उसने पीयूष से अपना स्तन चुसवाया था कहीं उसका पता तो नहीं लग गया कविता को ?? बाप रे !!!

कविता: "वही बात करने के लिए फोन किया था मैंने.. पर मोबाइल पर ऐसी बात करना ठीक नहीं रहेगा.. जब मिलेंगे तब बात करेंगे.. "

रेणुका: "तो तू अभी मेरे घर क्यों नहीं आ जाती? मैं घर पर अकेली ही हूँ"

कविता: "मैंने इसी लिए फोन किया क्योंकि मैं एक मुसीबत में फंस गई हूँ.. दोपहर के बाद आती हूँ तेरे घर"

रेणुका: "जरूर.. मैं कुछ नाश्ता बनाकर रखती हूँ.. और हाँ.. तुम आ ही रही हो तो शीला को भी साथ लेते आना"

कविता: "नहीं रेणुका.. फिलहाल तो मैं अकेली ही आने वाली हूँ"

रेणुका: "ठीक है.. मैं तेरा इंतज़ार करूंगी.. "

कविता: "ओके.. बाय रेणुका" कविता ने फोन काट दिया

कविता का फोन काटते ही राजेश का फोन आ गया रेणुका पर

राजेश: "रेणुका, मैं पीयूष को घर भेज रहा हूँ.. अलमारी से ५० हजार रुपये उसे दे देना.. जल्दी भेजना उसे.. मुझे अर्जेंट पेमेंट करना है.. पार्टी ऑफिस पर आकर बैठी है"

"ठीक है" कहते हुए रेणुका ने फोन रख दिया.. वो सोचने लगी.. पीयूष घर आ रहा है.. तब कहीं कविता भी पहुँच गई तो वो मेरे बारे में कुछ गलत ना सोच ले.. देखा जाएगा जो भी होगा वो.. आईने के सामने अपने खूबसूरत जिस्म और चेहरे पर हाथ सहलाते हुए उसने अपना मेकअप चेक किया.. कितना कसा हुआ जिस्म है मेरा.. स्तनों में अभी भी ढीलापन नहीं आया.. उस रात पीयूष को कमरे में निप्पल चुसवाई थी वो घटना याद आ गई उसे.. ऐसे अचानक मिले मौके कितना अनोखा आनंद दे जाते है !! और पीयूष भी पागलों की तरह मेरे मम्मे पर टूट पड़ा था.. निप्पल को चूस चूसकर लाल कर दिया था.. याद करते ही रेणुका गरम होने लगी..

तभी डोरबेल बजी.. दरवाजे पर आकर उसने की-होल से देखा.. पीयूष को देखते ही उसकी धड़कन थम गई.. वह उसे देखती ही रही.. पीयूष ने रुमाल से अपने चेहरे का पसीना पोंछा और फिर पेंट की ऊपर से ही अपने लंड को सेट किया.. दरवाजा न खुलने पर पीयूष ने फिर से बेल बजाई

अपना पल्लू ठीक करते हुए रेणुका ने दरवाजा खोला..

"आओ पीयूष.. " कातिल मुस्कान देते हुए उसने पीयूष का स्वागत किया.. मुड़कर चलते हुए अपने कूल्हों को उसने ऐसा मटकाया की देखकर ही पीयूष सरेन्डर हो गया.. जितना नशा रेणुका की मुस्कान में था उससे कई गुना ज्यादा नशा उसके मादक चूतड़ों में था.. जैसे व मटक मटक कर पीयूष को आमंत्रण दे रहे थे..

रेणुका: "मैं पानी लेकर आती हूँ" मुसकुराते हुए रेणुका किचन से पानी लेकर आई.. पानी का गिलास देते हुए दोनों के हाथ छु गए.. दोनों रोमांचित हो उठे..

रेणुका: "चाय लोगे या कॉफी?" सरक रहे पल्लू को ठीक करते हुए रेणुका ने पीयूष से पूछा

पीयूष: "आपको तो पता ही है भाभी.. मुझे चाय या कॉफी नहीं.. सिर्फ दूध ही पसंद है.. अगर ताज़ा दूध मिल जाता तो.. " रेणुका से आँखें लड़ाते हुए पीयूष ने कहा.. रेणुका ने शरमाकर अपनी आँखें झुका ली..

रेणुका: "राजेश तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है.. पार्टी पैसों के लिए बैठी हुई है"

पीयूष: "कोई पैसे लेने अभी नहीं आया है.. पार्टी तो शाम को ६ बजे पैसे लेने आने वाली है.. ये तो आपके जैसी खूबसूरत बीवी से मुझे दूर रखने के लिए सर ने ऐसा कहा होगा.. फिर भी अगर आप कहती हो तो मैं पैसे लेकर निकल जाता हूँ" मुंह फुलाकर पीयूष ने कहा

रेणुका सोचने लगी.. फिलहाल पीयूष और उसके अलावा घर पर कोई नहीं थी.. दोनों अकेले थे.. उस दिन पीयूष के घर इतना जोखिम होने के बावजूद उससे स्तन चुसवाया था.. तो अब यहाँ अकेले में क्या डरना?? मौका मिला है तो क्यों न फायदा उठाया जाए.. लंड के लिए तरस रही उसकी चूत ने रेणुका के दिमाग को झकझोर दिया था

"क्या सोच रही हो भाभी? जल्दी पैसे दीजिए.. तो मैं निकलूँ "

"क्यों? मेरे साथ बैठना अच्छा नहीं लगता क्या तुम्हें? "

"ऐसी बात नहीं है भाभी.. सच कहूँ तो आपको देखने के बाद मैं भी अपने आप को बड़ी मुश्किल से काबू में रख पा रहा हूँ.. उस दिन तो मैंने जिद करके आपका ब्लाउस खुलवाकर.................................... पता तो है आपको.. ऐसा कुछ फिर से न हो जाए इसलिए मैं चला जाना चाहता हूँ"

जब से रेणुका ने पीयूष को देखा था.. वो उसकी नज़रों में बस गया था.. उस दिन होटल की पार्टी में पीयूष को देखकर उसके पूरे जिस्म में सुरसुरी होने लगी थी.. जाने कितने विचार एक साथ आ रहे थे रेणुका के दिमाग में.. मौका तो बढ़िया है पर कविता कभी भी आती होती.. वो खतरा भी है.. लेकिन पीयूष चला गया तो ऐसा मौका दोबारा कब मिलेगा क्या पता !! राजेश तो अभी ऑफिस में है इसलिए उसके यहाँ आ जाने का कोई डर नहीं है.. कविता भी दोपहर के बाद ही आने वाली थी.. पीयूष भी गरम हो चुका है.. अंदर बेडरूम में मस्त नरम बिस्तर है.. नरम स्तनों जैसे तकिये है.. तो ऐसा मौका गंवाना नहीं चाहिए.. जब कुदरत ने सामने से ऐसा सेटिंग कर दिया है तब तू क्यों ज्यादा सोच रही है!! लोहा गरम है.. मरवा ले हथोड़ा !! देख देख.. पीयूष भी कैसी भूखी नज़रों से तेरे स्तनों को तांक रहा है..

पीयूष और रेणुका काफी देर तक एक दूसरे की तरफ देखते रहे.. पचास हजार का बंडल लेने आया पीयूष.. रेणुका के अनमोल खजाने जैसे स्तनों को देखकर होश खो चुका था.. तो दूसरी तरफ रेणुका की चूत भी हेंडसम पीयूष को देखकर पनियाने लगी थी.. दोनों चुपछाप खड़े थे.. वातावरण काफी भारी महसूस हो रहा था.. रेणुका की सांसें तेज चल रही थी और उसके बबले ऊपर नीचे हो रहे थे.. पीयूष के अंदर का मर्द तो कब का जाग चुका था.. पर उसे डर था.. मुश्किल से मिली इतनी अच्छी नौकरी गंवा देने का.. इसलिए वो भी संभलकर आगे बढ़ना चाहता था

रेणुका का दिल भी धडक रहा था.. वो सोच रही थी की अब जो होने वाला है वो ना हो तो अच्छा है.. और हो जाए तो ओर भी अच्छा है.. स्त्री हमेशा अपने इच्छाओं को बोलकर व्यक्त नहीं करती है.. वो सिर्फ अपनी आँखों के हावभाव से अपनी बात करती है..

पीयूष को रेणुका में रति के दर्शन हो रहे थे.. उसका लंड पेंट के अंदर एकदम सख्त हो चुका था.. एकांत हमेशा काम की भावनाओ को भड़का देता है.. और जब एक जवान पुरुष और स्त्री अकेले हो तब प्रकृति अपना प्रभाव जरूर दिखाती है..

रेणुका नीचे टाइल्स की तरफ देखते हुए सोफ़े पर बैठी हुई थी.. और सामने पीयूष, पचास हजार का बंडल हाथ में लिए हुए खड़ा था.. वो चाहता तो अभी चला जा सकता था.. लेकिन रेणुका के जिस्म ने उसे चुंबक की तरह पकड़ रखा था..

रेणुका अब नर्वस होकर अपने नाखून चबा रही थी.. वो चाहकर भी पीयूष की ओर देख नहीं पा रही थी.. स्त्री के चेहरे पर शर्म और उत्तेजना के मिश्रित भाव.. उसे अत्यंत सुंदर बना देते है.. उसी समय एक दूसरा भूकंप आया.. रेणुका का पल्लू सरककर नीचे गिर गया.. उफ्फ़.. राउंड नेक वाले ब्लाउस की दाईं कटोरी खुलकर सामने दिख रही थी.. पीयूष घबराहट के मारे दरवाजे की ओर चल दिया.. नॉब घुमाकर दरवाजा खोलने ही जा रहा था की तभी रेणुका ने दौड़कर उसका हाथ प अकड़ लिया..

बिखरे हुए बाल.. सरक चुके पल्लू के नीचे नजर आते उन्नत उरोज.. उत्तेजना से कांपता हुआ उसका शरीर.. ओह्ह.. !!! पीयूष धीरे से रेणुका के करीब गया.. "भाभी.. आपकी छातियाँ मुझे पागल बना रही है.. या तो आप मुझे जाने दो या फिर..........!!!"

रेणुका ने उसे आगे बोलने का मौका नहीं दिया.. वो पीयूष से लिपट पड़ी.. और उसका मदमस्त जोबन पीयूष की छाती से दबकर रह गया.. दबान इतना ज्यादा था की रेणुका की आँख से आँसू निकल गए.. रेणुका का चेहरा पकड़कर पीयूष ने उसकी सामने देखा.. रेणुका की पलके ऐसे झुकी थी जैसे उसने ढेर सारी शराब पी रखी हो.. उन पलकों पर पीयूष ने हल्के से एक किस किया.. रेणुका की खुली पीठ पर पीयूष का मर्दाना हाथ घूमने लगा.. उसका दूसरा हाथ रेणुका के पेटीकोट के अंदर घुस गया.. और उसके कूल्हों को सहलाने लगा.. रेणुका सिहर उठी
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घर के बाहर से रिक्शा में बैठकर कविता अकेली कहीं जाने को निकली ये शीला और वैशाली ने देखा.. शीला सोच में पड़ गई.. भरी दोपहर में ये कविता कहाँ गई होगी !!

इस तरफ रेणुका और पीयूष एक दूसरे के जिस्मों को सहला रहे थे.. रौंद रहे थे.. रेणुका ने पतलून के ऊपर से ही पीयूष के लंड की सख्ती को नाप लिया था.. बेहद कडक हो चुका था उसका लंड.. ऊपर से ही पकड़कर वो लंड को मुठ्ठी में लेकर मसलने लगी.. पीयूष भी आक्रामक होकर रेणुका को जगह जगह चूमे जा रहा था..

पेंट की चैन खोलकर रेणुका ने पीयूष का लंड बाहर निकाला.. रेणुका उस खड़े सिपाही जैसे लंड के लाल टोपे को देखती ही रह गई.. लंड की त्वचा को आगे पीछे करते हुए रेणुका ने कहा "ओह्ह पीयूष.. आज मसल दे मुझे.. रगड़ दे पूरी की पूरी.. !!"


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"ओहह भाभी..आपकी छातियाँ..इतनी जबरदस्त लग रही है..मन कर रहा है की दबा दबाकर फोड़ दूँ.. "

"आह्ह पीयूष.. "

"अब खोल भी दो भाभी.. बाहर निकालो इन्हे.. मुझे चूसने है.. आह्ह!!"

"ले पीयूष.. कर ले अपनी मनमानी.. काफी दिनों से दबे नहीं है इसलिए सख्त हो गए है.. आज मसल मसल कर ढीले कर दे इन्हे.. " अपना ब्लाउस खोलकर दोनों स्तनों को पीयूष के सामने पेश करते हुए रेणुका ने कहा


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"आह्ह भाभी.. कितने मस्त पपीते जैसे स्तन है आपके.. " कहते हुए पीयूष झुककर रेणुका के स्तनों को दबाते हुए निप्पल चूसने लगा

पीयूष के जवान लंड को सहलाते हुए रेणुका मन ही मन उसकी तुलना अपने पति राजेश के लंड के साथ करने लगी.. पीयूष ने निप्पल चूसते हुए रेणुका का ब्लाउस उतार फेंका.. और हाथ पीछे ले जाकर ब्रा के हुक भी खोल दिए.. रेणुका अब टॉपलेस हो गई.. हरे नारियल जैसे उसके बड़े बड़े स्तन मसलते हुए पीयूष कराह रहा था.. रेणुका ने भी पीयूष का पेंट उतरवा दिया.. अपना शर्ट उतारकर पीयूष रेणुका पर चढ़ गया..

उसके मर्दाना स्पर्श से सिहरते हुए रेणुका अपने खुले बदन का ऊपरी हिस्सा पीयूष की छाती के साथ रगड़ने लगी.. रेणुका के पेटीकोट का नाड़ा खोलने का प्रयास विफल रहने के बाद रेणुका ने खुद ही गांठ खोल दी.. अब वह सिर्फ पेन्टी पहने थी.. जबरदस्त हुस्न था रेणुका का.. दोनों एक दूसरे से लिपटकर चूमने चाटने लगे..

ऐसा नहीं था की रेणुका अपने पति से खुश नहीं थी.. पर जितनी मात्रा में वह संभोग करना चाहती थी उतना उसे मिल नहीं रहा था.. इस लिए आज शांत नदी अपने किनारे फांदकर पागलों की तरह बहने लगी..

पीयूष के लंड को सहलाते हुए रेणुका बोली "पीयूष.. जब से तुझे देखा था तब से इस पल की राह देख रही थी मैं.. मुझे आशा नहीं थी की इतनी जल्दी हमे ये मौका नसीब होगा.. "

"ओह भाभी.. आपका ये मदमस्त शरीर देखकर.. मैंने कई बार मूठ मारी है.. नौकरी खोने के डर से मैं आगे बढ़ नहीं रहा था.. भाभी.. प्लीज आप ये ध्यान रखना.. मेरी नौकरी को आंच नहीं आनी चाहिए.. "

"तू चिंता मत कर.. राजेश ऑफिस के काम से अक्सर बाहर जाता रहता है.. ऐसे में तू जब चाहे घर आ सकता है.. किसी को शक नहीं होगा.. और अगर तू ऐसे ही मुझे खुश करता रहा तो मैं राजेश को बोलकर तेरी तनख्वाह भी बढ़वा दूँगी.. राजेश की गैरमौजूदगी में तू मेरी आग बुझाते रहना.. बदले में तू जो मांगे मैं दूँगी तुझे.. कभी पैसों की जरूरत हो तो भी झिझकना मत.. !!"

पीयूष की छाती पर अपने स्तन रगड़ते हुए उसके जिस्म का सौदा कर लिया रेणुका ने.. फिर उसके लंड को चुंबनों से नहला दिया.. अद्भुत उत्तेजना से रेणुका पीयूष का लंड चूसने लगी.. ये देखकर पीयूष ने रेणुका की गीली हो चुकी चुत में दो उँगलियाँ डाल दी.. अपनी योनि में मर्द की उँगलियाँ जाते ही रेणुका कामातुर हो गई.. अपने चूतड़ उठाते हुए बोली "पीयूष.. मेरी भोस चाट दे यार.. अंदर जबरदस्त खुजली हो रही है.. रहा नहीं जाता.. " कहते हुए अनुभवी रंडी की तरह लंड चूसने लगी.. जिस प्रकार से वह अपने मुंह और जीभ का उपयोग कर लंड चूस रही थी.. उस पर से पीयूष को रेणुका की उत्तेजना का अंदाजा लग चुका था


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रेणुका के उरोजों पर पीयूष फ़ीदा था.. एक स्तन को पूरा पकड़ने के लिए पीयूष को अपनी दोनों हथेलियों का उपयोग करना पड़ता था.. एक हाथ से दबाए ही नहीं जाते थे.. दोनों हाथों से स्तनों को मसलते हुए निप्पल मुंह में लेकर वह पुच पुच की आवाज करते हुए चूसने लगा.. अपनी निप्पल पर पीयूष की जीभ का स्पर्श होते ही रेणुका जैसे आसमान में उड़ने लगी थी.. उसकी चुत से कामरस का झरना बहने लगा..

"अब चाट भी ले मेरी.. आह्ह प्लीज पीयूष.. " पीयूष का सर अपनी चुत के ओर ले जाते हुए रेणुका ने कहा.. रेणुका के स्तनों को अच्छे से चूसने और चाटने के बाद पीयूष ने नीचे के हिस्से की ओर ध्यान केंद्रित किया.. पहले रेणुका की नाभि के अंदर अपनी जीभ को डालकर उसने गहराई नापि.. रेणुका को गुदगुदी सी होने लगी..

"ऊईई माँ.. क्या कर रहा है पागल? गुदगुदी हो रही है मुझे.. वहाँ छोड़.. और जहां चाटना चाहिए वहाँ चाट न चूतिये.. !!"

रेणुका की संगेमरमरी जांघों पर जीभ फेरते हुए, लोकल ट्रेन की गति से धीरे धीरे वह चूत के मुख्य स्टेशन पर पहुंचा.. पर तब तक तो रेणुका की तड़प तड़प कर जान ही निकल गई.. जैसे ही पीयूष की जीभ का स्पर्श उसकी क्लिटोरिस पर हुआ.. रेणुका पूर्ण रूप से बेकाबू हो गई.. उसने पीयूष के अंडकोश को मुठ्ठी में जकड़ कर लंड पर हल्ला बोल दिया.. पीयूष भी चूत के इर्दगिर्द चाट कर रेणुका की कसौटी लेने लगा.. आखिर उसने अपने हाथों से चूत के होंठों को चौड़ा किया.. अंदर दिख रहे लाल गरम भाग को सूंघकर उसने अपना नाक उस हिस्से पर रगड़ दिया.. पीयूष की इन हरकतों से पागल होते हुए रेणुका अपनी गांड ऊपर उठाकर पीयूष के चेहरे पर अपनी भोस गोल गोल रगड़ने लगी.. बिना किसी भी जल्दी के.. पीयूष ने आखिर अपनी जीभ का रेणुका की चूत में गृहप्रवेश करवाया..


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चटकारे लेते हुए.. भरपूर लार का उपयोग कर पीयूष जिस तरह रेणुका की चूत को चाट रहा था.. उस सुखद अनुभूति का वर्णन करने के लिए रेणुका के पास शब्द नहीं थे.. दोनों हाथ नीचे की तरफ डालकर पीयूष ने रेणुका के दोनों कूल्हों को पकड़कर उसे अपनी ओर खींचा.. अब तक तो पीयूष अपने चेहरे को आगे पीछे करते हुए चाट रहा था.. लेकिन अब उसने अपना चेहरा स्थिर ही रखा और रेणुका के चूतड़ों को आगे पीछे करते हुए रेणुका की रसीली चुत का रस पीना शुरू कर दिया

जिस तरह पीयूष चुत चाट रहा था वो देखकर ऐसा बिल्कुल भी नहीं लग रहा था की वो रेणुका के आनंद के लिए चाट रहा हो.. बल्कि वो जैसे निजानंद में चुत चाटते हुए किसी अलौकिक दुनिया में खो सा गया था.. लंड का काम अपनी जीभ से लेते हुए बड़ी मस्ती से पीयूष रेणुका की चुत के अंदरूनी हिस्सों को कुरेद कुरेद कर रसपान कर रहा था.. पीयूष को इतनी दिलचस्पी और उत्साह से चुत चाटते देख रेणुका अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ आनंद का मज़ा ले रही थी

"आह्ह पीयूष.. तू तो गजब है यार.. और जोर से चाट.. बहोत मज़ा आ रहा है.. हाय.. ओह पीयूष.. !!" रेणुका के मुख से उत्तेजना से भरे शब्द सरक गए और उसके साथ ही उसका पूरा जिस्म थरथराने लगा.. उस आखिरी पलों में उसने पीयूष के चेहरे को अपनी दोनों जांघों के बीच इतनी जोर से दबाया की पीयूष को सांस लेने में तकलीफ होने लगी.. चार से पाँच सेकंड तक उसने अपनी चुत का सारा रस पीयूष के मुँहे में छोड़ती रही.. उसके स्तन बेहद टाइट हो कर उभर गए थे.. पूरा शरीर कामसुख के ताप से तप रहा था.. अभी भी वो कांप रही थी.. जैसे बुखार चढ़ा हो..

पीयूष का लंड अब नब्बे डिग्री° का कोण बनाकर सख्त खड़ा हो गया था.. उसने रेणुका को सीधा लिटा दिया और उसकी जांघों को चौड़ी कर.. बीच में जगह बनाकर बैठ गया.. अपना लाल गरम सुपाड़ा.. रेणुका की चुत के होंठों के बीच रखकर जैसे ही उसने हल्का धक्का दिया.. उसका पूरा ६ इंच का लंड एक झटके में उस गीली रसदार चुत में अंदर धंस गया.. दोनों जिस्म अब एक हो गए.. समय भी जैसे थम सा गया.. रेणुका को अपनी चुत में जलन महसूस हो रही थी.. चुत को जोर से चाटते वक्त जहां जहां पीयूष के दांत घिसे थे.. उन्ही स्थानों पर अब लंड के घिसते ही उसे जलने लगा था.. पीड़ा के बावजूद रेणुका फिर से उत्तेजित हो रही थी.. आह्ह.. ऐसा दर्द सहे हुए भी कितने साल हो गए !! शादी के बाद सुहागरात को ऐसा मीठा मीठा दर्द हुआ था.. जीवन में फिरसे वैसा ही दर्द महसूस करने का मौका मिलेगा यह सोचा नहीं था रेणुका ने..


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रेणुका को शीला के घर हुआ समूह चोदन याद आ गया.. जहां उस दोनों गाँव के नौजवानों ने शीला, अनुमौसी और रेणुका को अपने विकराल लंडों से बराबर पेल दिया था.. जीवा और रघु के लंड की उस भीषण चुदाई को याद करते हुए वह पीयूष के लंड का अपनी बुर की दीवारों के साथ हो रहे घर्षण से मंत्रमुग्ध हो रही थी.. पीयूष के नंगे कूल्हों को हाथ से पकड़कर अपने जिस्म को इतनी जोर से भींच लिया की लंड का टोपा उसके बच्चेदानी पर जाकर टकराया..

दोनों जिस्म अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ आनंद का मज़ा लेने में इतने मशरूफ़ हो गई के कुछ पलों के लिए ये भी भूल गए की वह दोनों शादी शुदा थे और उनका अलग अलग साथी भी है..

रेणुका नीचे से उछल उछल कर पीयूष के लंड को अपनी गहराइयों में अंदर तक समाने लगी.. पीयूष भी पागलों की तरह रेणुका के चरबीदार जिस्म की सिलवटों को रौंदे जा रहा था.. काफी देर तक एक दूसरे के विविध अंगों को पूर्णता से सहलाने और मसलने के बाद.. पीयूष ने रेणुका की भोस में दमदार धक्के लगाते हुए उसे झकझोरते आखिरी चार पाँच धक्के इतने जोर से लगाए की अनुभवी रेणुका की आँखों से आँसू टपक गए.. और साथ ही पीयूष के लंड से वीर्य भी

पीड़ा और आनंद के मिश्रण के साथ रेणुका का किल्ला भी फतह हो गया.. पीयूष ने जब उसकी बुर से अपना लंड बाहर खींचा तब वह किसी अहंकारी योद्धा की अदा से उसके दोनों पैरों के बीच लटकने लगा.. अर्ध-जागृत अवस्था में वीर्य-स्त्राव के पश्चात लटक रहे लंड का एक अलग ही सौन्दर्य होता है.. रेणुका बिस्तर पर नंगी पड़ी हुई थी.. उसकी बुर से पीयूष के वीर्य की धार बहते हुए चादर को गीला कर रही थी.. हवस शांत हो जाने पर रेणुका की आँखें ढल गई थी.. उसकी छाती पर कुदरत के दिए हुए दो पहाड़.. भारी साँसों के चलते ऊपर नीचे हो रहे थे..


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"बाथरूम कहाँ है?" पीयूष ने पूछा.. रेणुका ने उंगली से इशारा करते हुए उसे बाथरूम की दिशा दिखाई.. लगभग पाँच मिनट के अंदर पीयूष पूर्ण कपड़े पहनकर तैयार होकर बाहर निकला.. ५० हजार का बंडल संभालकर जेब में रखते हुए उसने आईने में अपने आप को देखकर सब ठीक होने की तसल्ली कर ली.. ताकि राजेश सर को शक न हो जाए..

पीयूष को बेडरूम से जाता देख.. नंगी रेणुका खड़ी हुई और पीयूष को पीछे से लिपट गई.. "तुझे छोड़ने का मन ही नहीं कर रहा पीयूष.. पता नहीं क्यों.. तेरे अंदर ऐसा क्या है जो मुझे तेरी तरफ खींचती ही जा रहा है.. तुझे आज मज़ा आया? मैं तुझे संतुष्ट तो कर सकी ना ?? अगली बार मैं इससे भी ज्यादा मज़ा दूँगी तुझे.. फिर कब मिलेगा मुझे? जब मैं बुलाऊ तब आ तो जाएगा न तू? " सुई की नोक जैसी तीखी निप्पल पीयूष की पीठ पर चुभ रही थी..

"ये तो मुझे भी नहीं पता भाभी.. की दोबारा कब मिलेंगे.. पर आप ध्यान रखना.. मेरी बीवी या राजेश सर को कुछ भी पता न चले.. वरना मेरी नौकरी भी जाएगी और पत्नी भी.. !!"

"और मेरा संसार भी ऊझड़ जाएगा उसका क्या?" रेणुका ने थोड़ी सी नाराजगी से कहा

"मेरे कहने का वो मतलब नहीं था भाभी.. आप तो सब कुछ समझती हो.. मुझे भी ये सब पसंद है.. पर डर भी लगता है.. बाकी आज जिस तरह आपने मुझे ओरल-सेक्स का मज़ा दिया ऐसे सुख के लिए मैं तरस रहा था.. मेरी पत्नी ने मुझे आज तक ऐसा मज़ा नहीं दिया मुझे.. मैं इतना ही बोल रहा हूँ की जो कुछ भी करो संभल कर करना भाभी.. "

"हम्म.. इसके लिए.. जैसा मैं कह रही हूँ वैसा करते रहना तो कोई तकलीफ या दिक्कत नहीं होगी कभी.. सुन.. तू कभी भी मुझे सामने से कॉल नहीं करेगा.. नेवर.. जब जरूरत होगी मैं सामने से कॉन्टेक्ट करूंगी तुझे.. और उससे पहले मैं व्हाट्सप्प पर फोरवार्डेड मेसेज भेजूँगी.. उस पर से तू समझ जाना की मैं तुझे कॉल करने वाली हूँ"

"ठीक है भाभी.. मैं वैसा ही करूंगा" पीयूष ने घूमकर रेणुका के दोनों बॉल एक बार फिर मसलकर उसे बाहों में भरकर लबज़ों को चूम लिया.. काफी देर तक चूमते रहने के बाद दोनों अलग हुए.. लेकिन उससे पहले रेणुका ने एक बार जोर से पीयूष के लंड को दबा दिया..

पीयूष ऑफिस पहुंचा.. राजेश को पैसे दिए.. राजेश ने उसे बिठाया और काफी देर तक चर्चा की.. पीयूष को तसल्ली हो गई की राजेश सर को जरा भी शक नहीं हुआ था.. उसकी घबराहट चली गई.. काफी देर गुफ्तगू के बाद राजेश सर ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया
 
इस तरफ.. शीला अभी भी सोच में डूबी हुई थी.. भरी दोपहर में.. घर पर आई हुई छोटी बहन और उसकी सहेली को छोड़कर.. कविता कहाँ गई? शीला की ये आदत थी.. एक बार उसे किसी बात पर शक हो जाए फिर वह बात की जड़ तक पहुंचे बीना उसे छोड़ती नहीं थी.. वह अनुमौसी के घर पहुँच गई.. वहाँ उसे जो जानने मिला वो बिल्कुल झूठ था ये समझ गई शीला.. अनुमौसी ने कहा की कविता दर्जी की दुकान पर अपने ड्रेस का नाप देने गई थी..

शीला वापिस अपने घर लौट आई.. सोफ़े पर बैठे बैठे वह अपना दिमाग दौड़ा रही थी.. "ड्रेस का नाप देने इतनी दोपहर में कौन जाता है भला? और वो भी बिना मौसम या फाल्गुनी को साथ लिए हुए ? कविता जरूर कुछ खिचड़ी पका रही थी.. !! पर उसने मुझे भी नहीं बताया.. वैसे तो वह अपनी हर बात मुझे बताती है.. कहीं उसे मेरे और पिंटू के बारे में तो पता नहीं चल गया !! पर वैसे उसके पति पीयूष ने भी उसकी हाज़री में मेरे स्तन दबाए थे.. तब तो उसे कोई तकलीफ नहीं हुई थी.. तो भला ओर क्या बात हो सकती है !!"

शीला से ये सारी असमंजस बर्दाश्त नहीं हुई.. उसने सीधा कविता को फोन लगाया.. पर कविता ने फोन नहीं उठाया.. उसे शीला भाभी पर बहोत गुस्सा आ रहा था.. भाभी ने पिंटू और मेरे साथ ऐसा क्यों किया? मेरा प्रेमी के साथ फोन पर गुटरगु करने का क्या मतलब हुआ? अगर कहीं मैं उनके पति मदन के साथ ऐसे फोन पर बातें करूंगी तो क्या वो बर्दाश्त करेगी? एक तरफ वैशाली पीयूष के पीछे पड़ी है.. दूसरी तरफ शीला भाभी मेरे पिंटू के पीछे.. मैं क्या करू? कविता का गुस्सा सातवे आसमान पर था.. उसके दिल को जबरदस्त ठेस पहुंची थी..

रेणुका के घर पहुंचकर कविता चुपचाप बैठी रही.. पानी का गिलास भी उसने बिना पिए छोड़ दिया..

रेणुका: "क्या बात है कविता? बिना झिझक बता मुझे.. अब तो हमारे बीच रिश्ता भी बन गया है.. आप दोनों हमारी कंपनी के परिवार का हिस्सा हो.. और हम तो सहेलियों जैसी है.. बिना किसी संकोच के सारी बात बता.. मैं किसी से इस बारे में बात नहीं करूंगी.. तू चिंता मत कर"

रेणुका की बात सुनकर कविता को बहोत अच्छा महसूस हुआ.. उसने सारी बात उसे बताई.. पीयूष और वैशाली के बारे में.. शीला भाभी और पिंटू के बारे में भी.. रेणुका को पिंटू और कविता के संबंधों के बारे में जानकार ताज्जुब हुआ.. काफी सालों से पिंटू राजेश का सेक्रेटरी था.. पर आज तक उसने पिंटू से कभी बात नहीं की थी..

रेणुका: "देख कविता.. मेरा यह मानना है की किसी के संबंधों में दरार आई हो तो आमने सामने बैठ कर बात को खतम करना चाहिए.. वरना बात का बतंगड़ बनने में देर नहीं लगती.. शीला को मैं अच्छे से जानती हूँ.. वो ऐसा कुछ नहीं कर सकती.. भरोसा रख.. और देख.. तू भी पढ़ी लिखी है.. तुझे इतना संकुचित मन नहीं रखना चाहिए.. विचारों को थोड़ा सा खुला रख.. पिंटू ने एक दो बार बात कर ली.. इसमे कौनसा पहाड़ टूट पड़ा!! और अगर वो तुझे सच में चाहता है तो तेरे पास ही आएगा.. अपने प्रेमी को संभालने अपने ही हाथ में होता है, समझी !! मर्द की अपनी जरूरते होती है.. पूरा दिन घर के काम से थककर कभी कभी हम सीधे सो जाते है.. और यह भूल जाते है की हमारे पति की भी जरूरतें होती है.. इस बारे में हम सोचते ही नहीं.. "

कविता: "ऐसा नहीं है रेणुका जी, मैं पीयूष को सब कुछ देती हूँ जो वो चाहता है.. तो फिर उसे क्या जरूरत पड़ी वैशाली की ओर देखने की?" अपने दिल का दर्द सुनाया उसने

रेणुका: "ऐसा भी तो हो सकता है की जो तू दे रही है वो पीयूष के लिए काफी न हो.. और देख.. मर्दों की तो आदत होती है यहाँ वहाँ मुंह मारने की.. मेरे ही पति की बात ले ले.. बिजनेस टूर पर वह विदेश जाते है.. तब वो भी तो मुंह मारते होंगे.. मैं खुद ही पेकिंग करते वक्त उसकी बेग में कोंडोम का पैकेट रख देती हूँ.. जब मर्द दस पंद्रह दिन के लिए बाहर जाए तब वो अपनी रात की जरूरतों के लिए कुछ कर ले तो उसमें बुरा मानने वाली कौन सी बात है !! ऐसी बातों को मैं अनदेखा कर ही देती हूँ.. तभी संसार आराम से चलता है.. और विश्वास ही सभी संबंधों का स्तम्भ होता है.. जब विश्वास ही डगमगा जाए तब पूरी इमारत ही ढह जाती है.. इसलिए तू ज्यादा मत सोच और पिंटू को मिलकर सारी बातें खुलकर बता.. जो भी बातों पर तुझे शक हो.. या फिर नापसंद हो उसके बारे में बात कर.. तेरे पति को भी तू ओरल-सेक्स का पूरा मज़ा दे.. नहीं तो वो कहीं बाहर ढूंढ लेगा तो गलती तेरी ही होगी.. मेरी बात पर गौर कर और सोचकर कदम उठाना.. बाकी तो तू काफी समझदार है.. अपने पति से ईमानदारी की उम्मीद रख रही है पर तू भी कहाँ दूध की धुली है? क्या तूने पिंटू के साथ अपने संबंधों के बारे में कभी पीयूष को बताया?? नहीं ना !! जीवन में कभी न कभी सभी लोग थोड़ी बहोत बेवफाई तो कर ही लेते है.. और जो बातें प्रतिबंधित होती है उन्ही में सबसे ज्यादा मज़ा भी आता है.. बाकी तो.. ये जीवन एक ही बार मिलता है.. ये याद रखकर.. जहां और जब भी मजे करने का मौका मिले तब चूकना नहीं चाहिए.. "

थोड़ी देर पहले ही पीयूष ने ओरल-सेक्स के बारे में असंतुष्टता जाहीर की थी.. बातों बातों में उसके बारे में भी उसने कविता को बोल ही दिया

कविता ने बड़े ध्यान से रेणुका की बात सुनी.. और अपनी गलती का एहसास होने लगा.. पीयूष जब भी उससे मुंह में लेने के लिए कहता तब वह बड़े ही घिन से वो काम करती.. और वो भी पीयूष की काफी मिन्नतों के बाद.. हो सकता है पीयूष वैशाली की ओर इसलिए भी आकर्षित हुआ हो.. अगर यही बात थी तो फिर आज से वो पीयूष को ये सुख भी पूरे मन से देगी.. पीयूष को और पिंटू दोनों को.. अब पिंटू से भी मीटिंग करनी होगी.. पर कहाँ करू? शीला भाभी के घर एक बार प्रोग्राम बनाया उसमें भाभी ने पिंटू को ही हड़प लिया.. रेणुका जी से ही इस बारे में पूछ कर देखूँ?? पर फिर कहीं ऐसा ना हो की रेणुका ही पिंटू को पटाने की फिराक में लग जाए.. और पिंटू तो उनकी कंपनी में नौकरी भी करता है.. कविता की चिंता ओर बढ़ गई

कविता सोच में डूबी हुई थी तब तक रेणुका ज्यूस को दो ग्लास लेकर आई.. एक ग्लास कविता के हाथ में देकर वह उसके बगल में बैठ गई..

रेणुका: "मेरे हिसाब से तो तुम्हें जल्दी से जल्दी पिंटू से मिलकर सारी बातें क्लीयर कर लेनी चाहिए.. अब तेरे घर मिलना तो मुमकिन नहीं होगा.. अगर तुझे प्रॉब्लेम न हो तो आप दोनों मेरे घर पर मिल सकते है.. वैसे भी राजेश एक बार ऑफिस के लिए निकल जाए फिर रात से पहले वापिस नहीं आता..

पिंटू को फिरसे मिलने के कल्पना मात्र से कविता का चेहरा खिल उठा..

कविता: "रेणुकाजी, वैसे तो हम एकाध बार शीला भाभी के घर पर मिल चुके है.. पर वैशाली के आने के बाद वहाँ मिल पाना भी मुमकिन नहीं है अब.. आप अगर आपके घर हमे मिलने देने के लिए राजी हो तो बड़ी ही मेहरबानी होगी.. हमारा मिलना अब बहुत जरूरी है"

रेणुका: "तो उसे कल ही बुला ले.. मुझे कोई प्रॉब्लेम नहीं है.. मैं तो सामने से कह रही हूँ तुझे"

कविता: "शुक्रिया आपका.. पर मैं आपसे एक और बात करना चाहती हूँ.. असल में, मैं यहीं बात करने यहाँ आई थी"

रेणुका: "हाँ बता ना.. क्या बात है ?"

कविता: "जी बात दरअसल ऐसी है की मेरी छोटी बहन मौसम और उसकी फ्रेंड वेकेशन में मेरे घर आई हुई है.. उन दोनों को लेकर, मैं और पीयूष कहीं बाहर जाने का प्रोग्राम बना रहे है.. अब वैशाली भी साथ आने वाली है.. मैं वैशाली को ले जाने के लिए मना करती हूँ तो पीयूष नाराज हो जाएगा क्योंकि उसे वैशाली पसंद है.. वो जिद करके भी वैशाली को साथ लेगा ही लेगा.. मैं अगर खुलकर मना करूंगी तो शीला भाभी बुरा मान जाएगी.. अब शीला भाभी हमारे साथ आने से मना कर रही है.. मुझे डर है, कहीं मेरी गैर-मौजूदगी में वो पिंटू के घर बुला लेगी.. यहाँ पिंटू शीला भाभी के साथ और वहाँ वैशाली पीयूष के साथ .. मेरी हालत आप समझ सकती हो!!"

रेणुका: "हम्म.. समस्या तो गंभीर है.. पर इसमे मैं क्या कर सकती हूँ?"

कविता: "मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है.. इसलिए आपकी मदद मांगने आई हूँ.. रेणुकाजी, आप मुझे कुछ ऐसा तरीका या तरकीब बताइए जिससे मैं पीयूष और पिंटू दोनों को उन माँ-बेटी से बच सकूँ"

कविता के घबराहट के मारे ऊपर नीचे होते हुए कच्चे अमरूद जैसे स्तनों को रेणुका देखती ही रही.. और अपनी जीभ न चाहते हुए भी होंठों पर फेर दी.. मन में आए उस विचार को रेणुका ने दिमाग से निकाल दिया.. फिलहाल ऐसे विचारों के लिए योग्य वक्त नहीं था

रेणुका: "सोचना पड़ेगा.. रास्ता ढूँढने में और सोचने में थोड़ा वक्त तो लगेगा"

कविता: "वक्त ही तो नहीं है मेरे पास.. आज सोमवार है.. गुरुवार और शुक्रवार को छुट्टी लेकर चार दिन घूमने जाने का प्लान है.. कोई तरीका सोचे भी तो उसके अमल के लिए समय तो चाहिए ना"

रेणुका: "तू एक काम कर.. बीमारी का बहाना बनाकर पूरी ट्रिप ही केन्सल कर दे"

कविता: "नहीं नहीं रेणुकाजी, मेरी बहन और उसकी सहेली का बड़ा मन है घूमने जाने का.. उनका दिल टूट जाएगा"

रेणुका: "देख कविता.. तू पिंटू और पीयूष के बारे में डरना छोड़ दे.. अगर वह दोनों सच में तेरे है तो कहीं नहीं जाएंगे.. और जाएंगे भी तो वापिस लौट आएंगे.. अगर नहीं आते तो समझ लेना की वो कभी तेरे थे ही नहीं.. प्यार एक बंधन है.. मन से स्वीकार किया हुआ बंधन.. कोई कैद नहीं.. दूसरी बात.. तू पिंटू के साथ जो कुछ भी करती है.. उस वक्त तुझे पीयूष की याद नहीं आती या कोई अपराधभाव महसूस नहीं होता?? तू पीयूष से ईमानदारी की अपेक्षा तो रखती है पर खुद उस पर अमल तो कर नहीं रही !!!"

यह सुनकर कविता का मुंह इतना सा हो गया..

कविता: "सच कहूँ रेणुकाजी.. पीयूष का खयाल तो मन में बहोत आता है.. पर जब भी मैं पिंटू के साथ होती हूँ तब मेरा दिमाग काम करना बंद कर देता है.. विवश हो जाती हूँ मैं.. अच्छे-बुरे का फरक भी समझ नहीं आता.. और उसके एक बार बुलाने पर दौडी चली जाती हूँ.. पर पिंटू को मिलने के बाद जब घर लौटकर पीयूष का सामना करती हूँ तब जरूर गिल्टी फ़ील होता है.. बुरा लगता है.. और सोचती हूँ की फिर कभी पिंटू से मिलने नहीं जाऊँगी.. पीयूष को धोखा नहीं दूँगी.. पर जैसे ही हफ्ता-दस दिन का समय बीतता है.. दिल फिर से फुदकने लगता है.. ऐसा लगने लगता है की मेरे पास सिर्फ मेरा शरीर है.. आत्मा तो पिंटू के कब्जे में है.. उसके बिना मुझे मेरा जीवन ही अधूरा सा लगता है.. आपको पता नहीं है.. ये प्यार मुझे कितना रुलाता है.. क्या आपने कभी किसी से ऐसा प्यार किया है?"

बड़ा पर्सनल सवाल पूछ लिया कविता ने और फिर उसके मन में आया की उसे ये सवाल पूछना नहीं चाहिए था..

रेणुका: "नहीं.. मैंने कभी किसी से इस तरह प्रेम नहीं किया.. कभी जरूरत ही नहीं पड़ी.. ये तो पिछले एक साल से अकेलेपन से जुज़ रही थी.. सिर्फ जिस्म की जरूरत नहीं है.. राजेश और मैं काफी बातों पर सहमत नहीं है.. काफी बहस होती रहती है हम दोनों के बीच.. मुझे संगीत, ग़ज़ल और डांस का शोख है तो राजेश पूरा औरंगजेब है.. मुझे अपने साथी के साथ आराम से बैठकर प्यार भरी जज्बाती बातें करना बहोत पसंद है.. लेकिन राजेश खाना खाकर अपना लेपटॉप लेकर बैठ जाता है.. उसकी ऐसी अवहेलना को झेलकर मैं बेडरूम में जाकर सो जाती हूँ.. तो वो साढ़े दस बजे मुझे जगाने आ जाता है.. और कहता है की 'तुम औरतों को सोने के अलावा ओर कोई काम ही नहीं है.. मेरे साथ सेक्स करने का तुझे मन ही नहीं करता '

रेणुका लगातार बोलकर अपने दिल की भड़ास निकाल रही थी

रेणुका: "ये मर्द लोग भी हमारा दर्द न जाने कब समझेंगे? हमें क्या चाहिए या फिर क्या पसंद है.. किस बात को लेकर तड़प रहे है.. उन्हे तो बस बिस्तर पर पड़ते ही कपड़े उतारने में दिलचस्पी होती है.. पिछले कुछ वक्त से राजेश लगभग सेक्स-मेनीयाक बन गया है.. मेरे साथ जबरदस्ती भी करने लगा है"

कविता: "जबरदस्ती??? क्या कोई पति अपनी पत्नी के साथ जबरदस्ती कर सकता है? जरूरत ही क्या है? सेक्स करने के लिए तो पति पत्नी को समाज ने ही तो अनुमति दी हुई है.. दोनों जो चाहे वो कर सकते है इसमे जबरदस्ती की बात कहाँ से आई?"

रेणुका: "मेरी बात को अच्छे से समझ.. हमारा मुड़ रोज एक जैसा तो होता नहीं है.. कभी कभी हम शरीर से.. कभी मन से.. कभी सामाजिक जिम्मेदारियों से थके हुए होते है.. कभी किसी बात से डिस्टर्ब भी हो सकते है.. तब सेक्स का मन नहीं करता.. पर अगर मैं मना करू तो राजेश मेरे ऊपर टूट पड़ता है.. मेरे जिस्म पर काटता है.. अरे कभी कभी तो पिरियड्स के दिनों में भी जिद करता है.. और में मना करू तो कहता है की मुंह में लेकर डिस्चार्ज करवा दे.. ये बिजनेस टूर पर विदेशों में घूम घूम कर ज्यादा जिद्दी हो गया है.. वहाँ की फिरंगी वेश्याओं को तो पैसे मिलते है ये सब करने के.. पर राजेश वहाँ से ये सब उल्टा सीधा सीखकर आते है और मुझपर जबरदस्ती करते है.. " रेणुका जज्बाती हो गई

उसका दर्द समझ सकती थी कविता.. रेणुका के दिल में एक अजीब सी खलिश थी.. जो प्यार और दुलार चाहती थी

रेणुका ने बात आगे चलाई "अब मैंने भी बहस करना छोड़ ही दिया है.. वो जैसे चाहते है वैसा मैं करती हूँ.. पर ऐसी ज़िंदगी से मैं ऊब चुकी हूँ.. इसलिए मुझे किसी ऐसे साथी की तलाश है जो मुझे समझ सके.. तू किस्मत वाली है.. दिल का दुखड़ा सुनाने के लिए तेरे पास पिंटू जो है.. जो है तेरे पास उससे खुश रहना सीख और उसे संभाल कर रख.. मैं तेरी और पिंटू की मीटिंग का बंदोबस्त करती हूँ.. अब खुश !!"

कविता के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई.. और पूरा कमरा उस मुस्कान से झगमगा उठा और एक ही पल में वह फिर से उदास हो गई

कविता: "मतलब मैं घूमने जाऊ और वैशाली पीयूष को लाइन मारे यह बर्दाश्त करती रहू.. ?? "

रेणुका: "नहीं.. उसके लिए मैं एक मास्टर प्लान बना रही हूँ.. तू चिंता मत कर.. जिन चार दिन की तू बात कर रही है.. उन चार दिनों में, मैं खुद ही अपनी कंपनी की टूर का आयोजन करूंगी.. हम सब साथ ही जाएंगे.. पिंटू, पीयूष और मैं.. हम सब साथ में ही होंगे.. अगर पीयूष और वैशाली कुछ उल्टा सीधा करे तो तू भी पिंटू के साथ शुरू हो जाना.. कम से कम दोनों तेरी नजर के सामने तो रहेंगे.. !! और शीला के बारे में डरना छोड़ दे.. तू मान रही है उतनी बुरी शीला नहीं है.. मैं उसे अच्छी तरह जानती हूँ.. तुझे पता है.. शीला का तो पहले से ही कहीं और चक्कर चल रहा है?"

कविता के मन के समाधान के लिए रेणुका ने एक ही पल में शीला का राज खोल दिया "वो तुम्हारे यहाँ दूध देने आता है उसका क्या नाम है?"

"रसिक.. " कविता ने जवाब दिया

"हाँ रसिक.. उसके साथ ही शीला का चक्कर चल रहा है.. अब एक औरत कितने चक्कर चलाएगी? इसलिए तू अपने पति और पिंटू की चिंता छोड़ दे.. अगर शीला उनसे बात करती है.. थोड़ा बहोत फ्लर्ट करती है.. तो उसमें हर्ज ही क्या है? इतना तो चलता है यार.. मॉडर्न ज़माना है.. थोड़ा अपनी सोच को खोलना सीख.. और शीला तेरे प्रेमी को छीन लेगी ये मैं नहीं मानती.. और मान ले अगर ऐसा कर भी लिया तो कितने दिन कर पाएगी? कुछ ही दिनों में उसका पति लौटने वाला है.. एक बार मदन के लौटने के बाद शीला को थोड़े ही ऐसे मौके मिलेंगे?"

रेणुका की बातों से कविता की हिम्मत बढ़ गई.. उसे विश्वास हो गया की पिंटू सुरक्षित था। शीला भाभी के पति कुछ ही दिनों में वापिस आने वाले थे उसके बाद तो भाभी कुछ कर ही नहीं पाएगी.. और वैसे भी भाभी ने मेरे लिए बहुत कुछ किया है.. अपने घर पर मेरे और पिंटू के मिलने का सेटिंग किया था.. उस दिन मूवी थीयेटर में भी पिंटू के साथ मजे करने का जुगाड़ सेट किया था.. मुझे उनका उपकार भूलकर उनपर शक नहीं करना चाहिए..

शीला के प्रति जो कड़वाहट कविता के मन में थी वो अब भांप बनकर गायब हो चुकी थी

कविता: "ठीक है रेणुकाजी, मैं अब चलती हूँ.. आपने ये कंपनी ट्रिप की बात करके मेरा मन हल्का कर दिया.. अब हम सब साथ में मजे करेंगे"

रेणुका: "साथ में कहाँ.. तू तो पिंटू के साथ मजे करेगी.. " कविता को चिढ़ाते हुए रेणुका ने कहा

दोनों हंस पड़े..

अब कविता वहाँ से निकल गई और फटाफट ऑटो पकड़कर घर पहुंची.. शीला ने उसे रिक्शा से उतरते हुए देखा पर कुछ पूछा नहीं.. पर उसकी पारखी नजर ने तुरंत भाप लिया.. कविता जरूर कुछ गुल खिलाने गई थी.. ज्यादा से ज्यादा पिंटू के साथ कहीं चुदवाने गई होगी.. और क्या !!! घर पर उसकी बहन है.. और मेरे घर पर वैशाली आई हुई है.. बेचारी और कर भी क्या सकती है.. !! शीला घर के काम में मशरूफ़ हो गई.. काम करते करते उसकी नजर केलेंडर पर पड़ी.. अभी और ८ दिन बचे थे मदन को लौटने में.. मदन की जुदाई में एक एक दिन भारी पड़ रहा था शीला को.. एक ही प्रकार के इस जीवन से अब ऊब चुकी थी शीला.. वैशाली कहीं बाहर गई हुई थी.. अपनी सहेली फोरम के साथ.. आज बड़े दिनों बाद शीला घर पर अकेली थी.. अकेलेपन में सेक्स के विचार दिमाग पर हावी हो जाते थे..
 
शीला के दिमाग में अलग अलग द्रश्य चलचित्र की तरह चलने लगे.. रूखी के दूध से भरे हुए बड़े बड़े स्तन.. जीवा के दमदार धक्के.. रघु के मजबूत हाथ.. उस रात दारू पीकर उन दोनों ने जिस प्रकार उसकी चुदाई की थी.. आहाहाहा.. मज़ा आ गया था.. पिछले एक महीने में कितना कुछ हो गया था.. चेतना और पिंटू के साथ वो रसभरी चुदाई..!! रेणुका और अनुमौसी के साथ हुआ ग्रुप सेक्स.. और सुबह सुबह रसिक के साथ लिए हुए मजे..!! वाह..!!

अनजाने में ही शीला के हाथ उसके स्तनों को मसलने लगे.. उसने अपनी जांघें जोड़ ली.. उसका दिमाग रसिक के मूसल लंड को याद करने लगा.. एक बार मौका मिले तो मदन के आने से पहले रसिक और जीवा के साथ एक यादगार प्रोग्राम करने की तीव्र इच्छा हो रही थी.. पर वैशाली की मौजूदगी में यह मुमकिन न था.. शीला को रसिक से भी ज्यादा जीवा के साथ मज़ा आया था.. रूखी का जोबन रसिक की वजह से नहीं.. पर जीवा के धक्के खा खाकर ही खिल उठा था.. रूखी के घर पर भी कुछ हो नहीं सकता था.. क्या करें!!!

अपने मुंह में उंगली डालकर गीली करते हुए शीला ने घाघरे के अंदर हाथ डाला और अपनी जामुन जैसी क्लिटोरिस को रगड़ने लगी.. दूसरे हाथ से उसने अपनी निप्पल को पकड़कर खींचा.. और सिसकने लगी.. गरम होकर उसने मुठ्ठी में अपनी चुत पकड़कर मसल दी.. कामुक होकर वह अपने चूतड़ ऊपर नीचे करते हुए कराह रही थी.. पर ऐसा करने से तो उसकी भूख और भड़क गई..

वह उठ खड़ी हुई.. और घर में बेबस होकर घूमने लगी.. उसके भोसड़े में जबरदस्त खुजली होने लगी थी.. जो एक दमदार लंड से ही शांत हो सकती थी.. बाहर काफी अंधेरा हो चुका था.. वैशाली का अब तक कोई पता न था.. शीला अपने बरामदे में बने बागीचे में आई और वहाँ रखी कुर्सी पर बैठ गई.. पर उसे कहीं भी चैन नहीं मिल रहा था.. वह खड़ी हो गई.. और बावरी होकर बागीचे में यहाँ वहाँ घूमने लगी.. जांघों के बीच चुत में आग लगी हुई थी.. और उस आग ने शीला को बेकाबू बना दिया था.. कोने में बरगद का पेड़ था.. उसके खुरदरे मोटे तने के साथ शीला अपना जिस्म रगड़ने लगी.. वो उस पेड़ के तने से लिपट गई.. अपने भरे हुए स्तनों को उसने ब्लाउस के दो हुक खोलकर बाहर निकाल दिए.. और फिर से पेड़ को लिपट गई..

शीला की हवस अब उफान पर चढ़ी थी.. पेड़ से अपने स्तनों को घिसते हुए शीला को ठंडक और जलन का एहसास हो रहा था.. तने को और जोर से लिपट कर शीला ने एक लंबी सांस छोड़ी.. "ओह मदन.. तू जल्दी आजा.. अब नहीं रहा जाता मुझसे"

शीला ने अपना घाघरा उठा लिया.. और घाघरे का कोना कमर में फंसा दिया.. घर पर वो अक्सर पेन्टी नहीं पहनती थी.. उसका नंगा भोसड़ा कामरस से गीला हो चुका था.. अपनी चुत को उसने पेड़ के तने पर घिसना शुरू कर दिया.. सिसकते हुए शीला ने अपने एक पैर को पेड़ के तने के ऊपर चढ़ा दिया जैसे पेड़ की सवारी कर रही हो.. जिससे चुत को पेड़ से ज्यादा नजदीकी मिले.. घिसते हुए एक अजीब सा एहसास हो रहा था उसे.. नीचे हाथ डालकर उसने अपनी चुत के दोनों होंठों को चौड़ा किया.. और पेड़ से चिपका दी अपनी चुत..


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अचानक शीला को किसी ने पीछे से पकड़ लिया.. !!! शीला कुछ समझ या बोल पाती उससे पहले उस शख्स ने शीला को पेड़ से दबाकर उसके चूतड़ चौड़े कीये और उसकी गांड में एक उंगली डाल दी.. दर्द के मारे शीला के गले से एक धीमी चीख समग्र वातावरण में फैल कर शांत हो गई.. उस व्यक्ति ने अपना हाथ आगे डालकर शीला की चूत पकड़ ली.. और उसी के साथ शीला का विरोध खतम हो गया..

"कौन हो तुम ????" शीला ने धीमे से पूछा.. जो काम करते वो खुद पकड़ी गई थी ऐसी सूरत में चिल्ला कर कोई फायदा नहीं था.. बदनामी उसी की होती.. उस व्यक्ति ने जवाब देने के बदले शीला को घूमकर अपनी ओर किया और उसके होंठ पर अपने होंठ दबा दिए.. शीला के खुले स्तन उसकी मर्दाना छाती से दबकर चपटे हो गए..

जरा भी वक्त गँवाए बिना उस शख्स ने शीला को उत्तेजित करना जारी रखा.. शीला डर गई थी.. उसके गले से आवाज ही नहीं निकल पा रही थी.. उस आदमी ने शीला को पूरी ताकत से अपनी बाहों में जकड़ रखा था.. घबराई हुई शीला अभी भी उसकी बाहों से छूटने की भरसक कोशिश कर रही थी..

वह आदमी शीला को मस्ती से चूमते हुए उसके स्तनों को मसल रहा था.. शीला के मांसल चूचकों को अपनी उंगली और अंगूठे के बीच दबा रहा था.. स्त्री कितनी भी सीधी क्यों न हो.. उसके स्तन पर मर्द के हाथ फिरते ही वह निःसहाय बन जाती है.. पके हुए पपीतों जैसे शीला के उरोजों को काफी देर तक मसलते रहने के बाद शीला अब विरोध कर पाने की स्थिति में नहीं थी..

चारों तरफ घनघोर अंधेरा था.. आज स्ट्रीट लाइट भी बंद थी.. इतना अंधेरा था की खुद की हथेली को भी देख पाना संभव नहीं था.. ऐसी सूरत में.. उस आदमी को शीला चाहकर भी देख नहीं पा रही थी.. जैसे ही शीला का विरोध शांत हुआ उस आदमी ने अगला कदम लिया.. अपने पेंट की चैन फटाफट खोलकर अंदर से निकला गरमागरम कडक लोडा शीला के हाथों में थमा दिया..

अब शीला कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं थी.. उसकी पसंदीदा चीज उसके हाथों में आ चुकी थी.. जिसके लिए वह पिछले एक घंटे से तड़प रही थी.. पर उसके मन को एक ही प्रश्न अब भी सता रहा था.. कौन है यह व्यक्ति? रसिक.. ?? पिंटू.. ?? पीयूष.. ?? रघु.. या फिर जीवा.. ?? नहीं नहीं.. इन सब में से कोई नहीं था.. क्योंकि इन सभी के स्पर्श से वह भलीभाँति वाकिफ थी.. यह बिल्कुल नया ही स्पर्श था.. अंधेरे में वह उस शख्स के चेहरे को देखने की कोशिश करती ही रही

उस आदमी के मुंह से शराब की गंध आ रही थी.. दिमाग पर पूरा जोर लगाने के बावजूद वह कौन था ये पहचान न पी शीला.. उस आदमी ने शीला को फिर से मोड़कर उल्टा कर दिया और पेड़ के तने पर झुकाकर पीछे से शीला के भोसड़े में अपना लंड एक धक्के में पेल दिया.. शीला के बालों को पकड़कर वह ऐसे धक्के लगाने लगा जैसे लगाम पकड़कर घोड़ी की सवारी कर रहा हो..


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शीला इस योनिप्रवेश से इतनी उत्तेजित हो गई की उसने विरोध करना ही छोड़ दिया.. और उस दमदार ठुकाई का आनंद लेने लगी.. जिस तरह से वह शक्ष बाल खींच रहा था उससे शीला को दर्द हो रहा था पर भोसड़े में खिली बहार के आगे इस दर्द का कोई मुकाबला नहीं था.. शीला को अब एक ही बात जाननी थी.. की ये कौन चूतिया है? लेकिन वो शख्स शीला को घूमने ही नहीं दे रहा था.. साले ने दस मिनट तक लगातार धनाधन धक्के लगाकर शीला के भोसड़े की माँ चोद डाली..

शीला की चूत से ऑर्गैज़म के रूप में जल-वर्षा होने लगी.. उसकी चिपचिपी चुत में लंड अंदर बाहर होने की वजह से पुच-पुच की आवाज़ें आ रही थी.. शीला की चुत ने कब का पानी छोड़ दिया था पर वह आदमी और १०-१२ धक्के लगाकर अंदर चोट लगाए जा रहा था.. फिर अचानक एक जोर का धक्का लगाकर वह स्थिर हो गया.. शीला के भोसड़े की सिंचाई होने लगी.. लंड के वीर्य की धार बच्चेदानी के द्वार पर गरम लावारस की तरह छूटने लगा..


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उस आदमी का आवेश शांत होने पर उसने एक आखिरी जोर का झटका लगाया.. शीला अपना संतुलन खो बैठी और पेड़ के तने से फिसलकर जमीन पर गिर गई.. एक पल के लिए उसे चक्कर सा आ गया.. अपने आप को संभालकर वह खड़ी हुई तब तक तो वो आदमी भाग गया था.. शीला हतप्रभ सी उसी अवस्था में कुछ देर बैठी रही.. फिर उसे अपनी स्थिति का अंदाजा हुआ.. उसका ब्लाउस पेट तक चला गया था.. दोनों बबले बाहर झूल रहे थे.. घाघरा कमर तक चढ़ा हुआ था.. और बगीचे की घास, उसकी वीर्य टपकाती चुत पर गुदगुदी कर रहा था..

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शीला तुरंत खड़ी हुई और भागकर घर के अंदर आई.. वैशाली के आने से पहले उसे अपना हुलिया ठीक करना था.. उसने फटाफट एक शावर लिया और कपड़े ठीकठाक कर लिए.. बरामदे की लाइट चालू करके वो मुआयना करने लगी.. कहीं कोई निशानी मिल जाए की कौन था वो मादरचोद जो मेरे ही घर में, मेरा ही बलात्कार करके चला गया?? अब इस घटना की शिकायत भी किससे करें? कौन यकीन करेगा? एक पल के लिए तो शीला को हंसी भी आ गई..

वैसे इस घटना में उसका कोई नुकसान तो हुआ नहीं था.. भूखे को रोटी मिल गई थी.. भले ही जबरदस्ती मिली थी पर फिलहाल पेट तो भर गया.. !!! शीला ने अपनी चुत के अंदर तक उंगली डालकर उस आदमी का वीर्य निकालकर सूंघा.. जीभ की नोक पर लगाकर उसका स्वाद भी चख लिया.. बस अपने मन की विकृति को शांत करने के लिए.. वैसे उसे भी पता था की ऐसे चाटकर या सूंघकर कोई डी.एन.ए टेस्ट तो होने नहीं वाला था की जिससे पता चल जाता की वोह शख्स कौन था.. !!! पर मज़ा आ गया शीला को.. इस अनोखी चुदाई में.. लंड के लिए तरस रही थी और लंड मिल ही गया.. भले ही जबरदस्ती मिला हो.. ये चुत शांत रहेगी तो दिमाग काम करेगा..

वैसे भी मदन के आने से पहले उसे एक रात जीवा, रघु या रसिक के साथ बिताने की तीव्र इच्छा थी.. पर वैशाली के रहते ये मुमकिन नहीं था.. इसी लिए तो उसने कविता के सामने वैशाली को घूमने ले जाने का प्रस्ताव रखा था.. ताकि वो उन चार दिनों में रंगरेलियाँ मना सके.. शीला अभी भी बागीचे में घूमते हुए सोच रही थी.. आखिर कौन था वोह? कहीं वो संजय तो नहीं था?? अरे बाप रे.. ऐसा कैसे हो सकता है? हम्म.. हो क्यों नहीं सकता? शीला के दो कानों के बीच बैठा जेठमलानी उसके दिमाग में ही बहस करने लगा..

संजय हो सकता है.. उसकी गंदी नजर से शीला वाकिफ थी.. एक नंबर का चुदक्कड़ है साला.. जब भी मिलता था तब बेशर्मों की तरह मेरी चूचियों को ही देखता रहता था.. बात तो सही है.. पर आखिर वो मेरा दामाद है.. वो ऐसा नहीं कर सकता.. और वैसे स्तन तो वैशाली के भी मस्त बड़े बड़े है.. तो फिर वो कमीना मेरी छातियों के पीछे ही क्यों पड़ा रहता है.. !! बेशर्म हरामजादा.. शायद वही था.. और हाँ.. जब उसने होंठ चूमे तब सिगरेट और दारू की बदबू आ रही थी.. हो न हो.. वहीं मादरचोद ठोक गया तुझे शीला.. !!! शीला कितनी भी हवसखोर क्यों न हो.. आखिर थी वो भारतीय नारी.. शीला शर्म से पानी पानी हो गई.. बाप रे.. मेरे सगे दामाद ने मुझे चोद दिया.. !!!

"अरे मम्मी.. वहाँ अंधेरे में क्या कर रही हो? मैं कब से पूरे घर में ढूंढ रही थी तुम्हें.. " वैशाली ने बागीचे में आकर शीला से पूछा तब शीला की विचारधारा टूटी..

"घर में गर्मी लग रही थी.. तो सोचा बाहर खुले में थोड़ा सा टहल लिया जाए.. घर के काम भी सारे निपट गए इसलिए खाली बैठी थी.. वैसे संजय कुमार के क्या समाचार है? "

वैशाली: "मैं वही बताने वाली थी.. मैं और फोरम बाहर थे तब संजय का फोन आया था.. उसने रात का खाना बनाने के लिए कहा है.. अब वो एक हफ्ता यहीं रुकेगा.. कंपनी का जो काम था वो खतम हो गया ऐसा बोल रहा था वोह.. मम्मी, फ्रिज में काफी सब्जियां पड़ी हुई है.. भिंडी की सब्जी बना दु?"

शीला: "हाँ बना दे.. मुझे तो सब चलेगा.. तेरे राजकुमार को जो भी पसंद हो वो बना दे"

वैशाली: "उसे तो दहीं-भिंडी बहोत पसंद है.. वही बना देती हूँ"

वैशाली घर के अंदर चली गई.. शीला अकेले अकेले सोच रही थी.. पूरी तसल्ली करने के लिए क्या करू.. जानना तो पड़ेगा.. अभी संजय आएगा तो उसके चेहरे के हावभाव देखकर सब पता चल जाएगा..
 
वैशाली घर के अंदर चली गई.. शीला अकेले अकेले सोच रही थी.. पूरी तसल्ली करने के लिए क्या करू.. जानना तो पड़ेगा.. अभी संजय आएगा तो उसके चेहरे के हावभाव देखकर सब पता चल जाएगा..

आधे घंटे के बाद रिक्शा से संजय उतरा.. उसे देखते ही शीला की धड़कनें तेज हो गई.. आज से पहले शीला ने कभी भी संजय को इतना ध्यान से नहीं देखा था.. पर आज देखना बेहद जरूरी था..

शीला: "आइए आइए.. कहाँ थे इतने दिन?" शीला ने फर्जी प्यार जताया

वैशाली पानी का ग्लास लेकर आई.. पानी पीते वक्त संजय और शीला की आँखें दो बार टकराई.. शीला संजय की आँखों के भाव को नापना चाहती थी.. एकटक देखती रही वो.. संजय के हावभाव देखकर बिल्कुल भी ऐसा नहीं लग रहा था की आधे घंटे पहले वो ऐसा कांड करके गया हो.. शीला सोच में पड़ गई.. कुछ सोचकर वह बोली

"संजय कुमार.. आप मेरे साथ गली के नुक्कड़ तक चलोगे? मुझे दर्जी की दुकान से अपना ब्लाउस लेने जाना है"

संजय: "हाँ बिल्कुल.. क्यों नहीं.. !! वैसे भी मैं फ्री ही बैठा हुआ हूँ"

संजय की इस सौम्य भाषा को सुनकर वैशाली और शीला दोनों को काफी ताज्जुब हुआ.. ऐसा परिवर्तन संजय में आया कैसे? कहीं ये कोई नया नाटक तो नहीं? वैशाली को चिंता होने लगी।

जैसे ही शीला और संजय घर के बाहर निकले, वैशाली ने पीयूष को फोन किया.. और पीयूष के संग प्रेमभरी बातें कर ही रही थी तभी उसके घर पर कविता को आता देख उसने फोन काट दिया.. वैशाली को हड़बड़ाहट में फोन काटते हुए कविता ने देख लिया.. पर वह कुछ बोली नहीं.. वो तो बस थोड़ा सा दहीं मांगने आई थी.. लेकर चली गई

अब शीला ने संजय को अपनी गिरफ्त में लिया.. बिना किसी संदर्भ के ही उसने बात शुरू कर दी

शीला "गुनहगार कितना भी होशियार क्यों न हो.. वह घटनास्थल पर कोई न कोई सुराख जरूर छोड़ जाता है"

संजय चोंक गया.. लेकिन वो भी शातिर था

संजय: "मम्मी जी, किसी भी गुनहगार को ऐसा नहीं लगता की वो गुनाह कर रहा है.. किसी के पास कोई चीज नहीं होती और वो कहीं से ले लेता है तो कायदे के हिसाब से उसे चोरी कहते है और उस व्यक्ति गुनहगार घोषित कर दिया जाता है.. लेकिन उस व्यक्ति के नजरिए से देखें तो वो बस उसकी जरूरत थी.. ठीक कहा ना मैंने !!!"

शीला: "बात तो आपकी सही है दामदजी.. पर इसका मतलब ये तो नहीं की दूसरों की थाली में हाथ डालकर खा ले?"

संजय: "अरे मम्मी जी, जिसकी थाली में से खाए अगर उसको खिलाने में मज़ा आ रहा हो तो फिर क्या दिक्कत है?"

शीला: "मतलब? कहना क्या चाहते हो?"

संजय: "कुछ नहीं.. बस ऐसे ही.. मैं तो जमाने के बारे में बात कर रहा था.. डॉन्ट माइंड.. !!"

शीला: "हम्म.. संजय कुमार, आपसे एक बात पूछूँ तो बुरा तो नहीं मानोगे?"

संजय: "हाँ पूछिए"

शीला: "आज रात ८ से ९ के बीच आप कहाँ थे?"

संजय ने जवाब देने के बजाए जेब से सिगरेट का पैकेट निकालकर एक सिगरेट जलाई और हवा में धुआँ छोड़ दिया.. शीला को इस सिगरेट की गंध जानी पहचानी सी मालूम हुई..

संजय: "मैं बस यही था.. बाजार में.. क्यों क्या हुआ?"

शीला: "नहीं बस.. मैं तो ऐसे ही पूछ रही थी.. " शीला ने बात को वहीं काट दिया.. उसने देखा की संजय तीरछी नज़रों से उसके ब्लाउस में छिपे स्तनों को देख रहा था

शीला मन ही मन सोचने लगी.. "थोड़ी देर पहले तो मसल चुका है.. फिर भी क्या देख रहा है?? एक नंबर का भड़वा है साला.. दामाद होकर अपनी सास को गंदी नज़रों से देखता है"

एक आश्चर्य की बात ये हुई की सिगरेट के धुएं की गंध से शीला को एक विचित्र सी अनुभूति होने लगी.. जो उसे अच्छी लग रही थी.. पता नहीं क्यों पर उसे सिगरेट की गंध बेहद उत्तेजित कर देती थी.. उसे अपना मर्द सिगरेट फूंकते हुए उसे चोदे ऐसा बहोत पसंद था.. वैसे मदन ने उसकी ये इच्छा भी पूरी की थी.. लेकिन एक बार करने से खतम हो जाए वह इच्छा ही कैसी !! ये भूख है ही ऐसी.. जितना उसको संतुष्ट करो उतना ही ओर भड़कती है..

अपने आप पर कंट्रोल करते हुए शीला ने संजय को दुकान के बाहर खड़ा रखा और खुद अंदर जाकर अपना ब्लाउस लेकर आई.. शीला को ब्लाउस लेकर वापिस आता देख संजय ने चौक मार दिया

संजय: "अजीब है न मम्मी जी!! औरतों को एक दर्जी सेट हो गया फिर बार बार उसी के पास जाती है.. कहती है की उनका फिटिंग अच्छा है.. अरे भाई.. ब्लाउस थोड़ा सा लूस हो या टाइट.. क्या फरक पड़ता है!!! पर नहीं.. औरते दस दस बार ट्रायल लेती है.. वैशाली तो थोड़ा सा भी फिटिंग इधर उधर होने पर अपने दर्जी को झाड देती है.. "

स्तनों को संभालने वाले वस्त्र के बारे में अपने दामाद से चर्चा करना शीला को उचित नहीं लगा.. पर संजय के कहने का मतलब क्या था वो शीला समझ गई..

शीला: "ऐसा है दामदजी, एक बार किसी का फिटिंग सेट हो गया फिर वोही पसंद आता है.. बाकी दूसरों से करवाने में मज़ा ही नहीं आता.. " शीला ने भी चौके के सामने सिक्सर लगा दी

शीला को डबल मीनिंग बातें करते देख संजय जोश में आ गया

संजय: "मम्मी जी, मुझे फ्री माइंड वाले लोग बहोत पसंद है.. उनके साथ मेरी अच्छी जमती है.. ज्यादा सीधे और दकियानूसी लोगों को देखकर मुझे बड़ा गुस्सा आता है.. मैं तो वैशाली से कभी नहीं पूछता की कहाँ जा रही हो.. किससे बात कर रही हो.. वो अपनी मर्जी की मालिक है और मैं अपनी मर्जी का.. हम दोनों एक दूसरे की लाइफ में टांग नहीं अड़ाते"

शीला ध्यानपूर्वक सुनती रही.. मन में सोचती रही.. "तूने वैशाली को आजादी दी तो साथ में अपने माँ-बाप की जिम्मेदारी भी तो थोप दी.. पूरा दिन वो वैशाली के सर पर मधुमक्खी की तरह मंडराते रहते है.. तो वह बेचारी उस आजादी का क्या अचार डालेगी? तुम तो घर से निकलते ही आजाद पंछी बन जाते हो.. जो करना है बेझिझक कर सकते हो.. स्त्री को ऐसी पराधीनता भरी स्वतंत्रता देने का क्या अर्थ? हाथ काटकर फिर पतवार थमा देते हो तो वो बेचारी नाव कैसे चलाएगी?.." शीला को गुस्सा आ गया

दोनों चलते चलते शीला के घर की तरफ आ रहे थे.. रास्ते पर केनाल की छोटी सी दीवार पर बैठते हुए संजय ने कहा

संजय: "बहोत गर्मी लग रही है.. थोड़ी देर यहाँ खुली हवा में बैठते है"

बिना कुछ कहे संजय की बगल में बैठ गई शीला.. थोड़ी देर यूं ही बैठे रहने के बाद संजय ने कहा "मम्मी जी आइसक्रीम खाते है.. वैसे भी अभी खाना तैयार नहीं हुआ होगा.. घर जाकर क्या करेंगे?"

शीला: "हाँ चलिए.. खाते है आइसक्रीम" शीला समझ गई की संजय उसके साथ अकेले में ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना चाहता है.. शीला भी इसलिए मान गई क्योंकि वह थोड़ा और वक्त जांच करना चाहती थी.. अभी तक वो ठीक से तय नहीं कर पाई थी की उसे पीछे से चोदकर भाग जाना वाला आदमी संजय ही था या कोई ओर??

"आप बैठिए.. मैं सामने की दुकान से आइसक्रीम लेकर आता हूँ" संजय आसक्रीम लेने गया पर मोबाइल वहाँ दीवार पर ही छोड़ गया.. शीला बैठी थी तभी मेसेज का टोन बजाय.. अपने आप को लाख रोकने के बावजूद शीला ने फोन उठाकर मेसेज पढ़ लिया.. वह मेसेज जिस नंबर से आया था वो चेतना के नाम से स्टोर किया था.. शीला ने नंबर चेक किया तो वह वाकई उसकी सहेली चेतना का ही था.. मेसेज पढ़कर शीला की आँखें फट गई

मेसेज में लिखा था..

"डिअर संजय.. तेरे साथ गेस्टहाउस में बिताया समय भूले नहीं भुलाता.. तेरे जैसा मर्द आज तक मेरे बिस्तर पर नहीं आया.. कल मैं अकेली हूँ.. तू शाम के पाँच बजे मेरे घर पर आ जाना.. खूब मजे करेंगे.. बाय"

माय गॉड.. चेतना को मैंने संजय की जानकारी हासिल करने का काम सौंपा था तो ये रंडी उसी के साथ चालू हो गई.. शीला ने मेसेज डिलीट कर दिया.. सामने से आइसक्रीम के दो कोन हाथ में लिए आते संजय को देखकर उसने मोबाइल रख दिया.. लेकिन मोबाइल की डिस्प्ले की लाइट ऑन देखकर संजय को लगा की किसी का फोन आया होगा.. शीला ने अपने चेहरे के हाव भाव बिल्कुल ऐसे ही रखे जैसे उसे कुछ पता ही नहीं था..

आइसक्रीम का कोन चाटती हुई औरत हमेशा आकर्षक लगती है.. शीला को कोन चूसते हुए संजय देखता रहा.. वह ऐसे चूस रही थी जैसे लंड चूस रही हो

संजय: "कैसा लगा मम्मी जी?"

शीला: "हम्म.. अच्छा है" शीला का दिमाग पहले से घुमा हुआ था ऊपर से चेतना का मेसेज पढ़कर और खराब हो गया.. दोनों पहली बार मिले और चुदाई भी कर ली?? कुछ घंटों पहले हुई घटना को याद करते शीला सोचने लगी.. हो सकता है की संजय ने चेतना के साथ भी जबरदस्ती की हो !! नहीं नहीं.. तो फिर चेतना ऐसा मेसेज क्यों करती?? जो भी हुआ था वह चेतना की मर्जी से ही हुआ था.. कल उस चेतना को रिमांड पर लेती हूँ.. कल पाँच बजे मिलने वाले है चेतना और संजय.. तभी मैं चेतना के घर पहुँच जाऊँगी.. तो सब पता चल जाएगा.. पर अब तक ये पता नहीं चला की बागीचे में उसे संजय ने ही चोदा था या किसी ओर ने??

घर आकर संजय ने चेक किया तो कॉल रजिस्टर में चेतना का नाम दिख रहा था पर इनबॉक्स में उसका कोई मेसेज क्यों नहीं दिख रहा था !!!!

शीला और संजय डाइनिंग टेबल पर बैठ गए और वैशाली उन्हे गरम गरम रोटियाँ परोसने लगी.. सासुमाँ के उरोजों को बीच दिख रही लकीर पर बार बार संजय की नजर पड़ जाती थी.. शीला इस नजर को काफी सालों से जानती थी.. वैसे जब से वह जवान हुई तब से उसे मर्दों की इस नजर की आदत सी हो चुकी थी.. अठारह की उम्मर में ही उसके स्तन संतरों से बड़े हो चुके थे.. भीड़ में.. बाजार में.. सब्जी मंडी में.. लोग जान बूझकर उससे टकरा जाते थे वह कोई संयोग नहीं था.. जैसे पतंगा शमा की ओर आकर्षित हो जाता है वैसे ही संजय की नजर बार बार शीला के ब्लाउस के आरपार देखती रहती.. शीला अभी भी असमंजस में थी.. अंधेरे में उसका गेम बजाने वाला वो कौन था??

अचानक शीला को महसूस हुआ की संजय का पैर उसके पैर को छु रहा है.. उसने हल्की नजर से देखा और यकीन हो गया की संजय का पैर ही था.. शीला का शक धीरे धीरे यकीन में बदलता जा रहा था..

संजय: "सब्जी बड़ी अच्छी बनी है.. है ना मम्मी जी?"

शीला: "हाँ.. मेरी वैशाली खाना तो बहोत बढ़िया बनाती है" सारा क्रेडिट उसने वैशाली को दे दिया

संजय: "मुझे भी एक बार आपकी चखनी है.. मतलब.. आप के हाथ की बनी सब्जी.. "

शीला के जिस्म से करंट पास हो गया.. "आपकी चखनी है कहने का क्या मतलब ??"

शीला: "संजय कुमार, वैशाली थोड़े दिनों के लिए अपनी सहेलियों के साथ घूमने जाए तो आपको कोई हर्ज तो नहीं है ना ?? मायके आई है तो थोड़ा घूम फिर भी ले.. ससुराल जाकर वो बेचारी वापिस पिंजरे में बंद हो जाएगी"

संजय: "ऐसी बात भी नहीं है मम्मी जी, मैं उसे घूमने ले जाता हूँ.. पूछिए वैशाली से.. पर फिर भी अगर वो जाना चाहती है तो मुझे कोई प्रॉब्लेम नहीं है"

शीला और संजय की बातों से अनजान वैशाली.. किचन में पीयूष और हिम्मत को याद कर रही थी.. संजय के लिए उसके मन में इतनी नफरत बन गई थी की वह उसका चेहरा भी देखना नहीं चाहती थी.. इसका ये मतलब भी नहीं था की वैशाली को गुलछर्रे उड़ाने थे.. पर इतने साल के वैवाहिक जीवन में संजय ने उसे इतने धोखे दिए थे की वह माफ करते करते थक चुकी थी.. आखिर उसने ऐसे ही अपना जीवन व्यतीत करने का मन बना लिया था.. कभी शिकायत भी नहीं करती थी.. वो कहते है ना "दर्द का हद से गुजर जाना.. दवा हो जाना.. " वैसा ही हुआ था वैशाली के साथ.. अब नो तो किसी बात की खुशी थी न ही किसी बात का गम

ऐसी स्थिति में पीयूष और हिम्मत के साथ बिताए कुछ पल.. वैशाली के जीने की वजह बन गए थे.. वरना वैशाली और संजय के बीच इतनी कड़वाहट आ गई थी की वैशाली को उसे दिखते ही घिन आ जाती.. संजय के साथ बैठना ना पड़े इसीलिए वो किचन से बाहर नहीं आ रही थी

संजय की हरकत का शीला ने कोई रिस्पॉन्स नहीं दिया.. अब संजय अपने पैर के अंगूठे को शीला के पैर से रगड़ने लगा.. शीला कितनी भी हवसखोर क्यों न हो.. उसने अपनी बेटी के पति को कभी उस नजर से नहीं देखा था.. उसने अपना पैर दूर हटा लिया.. संजय उसके सामने देखकर शातिर तरीके से हंसने लगा.. ए

संजय: "क्यों मज़ा नहीं आया, मम्मी जी ?? मेरे कहने का मतलब है की सब्जी में मज़ा नहीं आया आपको?"

संजय का इशारा क्या था वो शीला समझ रही थी.. लेकिन बिना कुछ उत्तर दिए वह खाना खाती रही.. अपने दामाद की इस हरकत पर उसे बड़ा गुस्सा आया.. पर अगर वह कुछ बोलती तो संजय को बात का बतंगड़ बनाने का मौका मिल जाता.. इसलिए वह बिना कुछ कहे खाना खाती रही..

खाना खतम कर शीला बाहर बरामदे में बैठ गई.. संजय भी आकर उसके बगल में बैठ गया.. तभी वहाँ पीयूष आया.. रात के दस बज रहे थे.. पीयूष के पीछे पीछे कविता, मौसम और फाल्गुनी भी आए.. पूरा घर भर गया.. इन सब के आने से शीला को बहोत अच्छा लगा.. इन सब की मौजूदगी में संजय कुछ भी उल्टा सीधा नहीं कर पाएगा.. दूसरी तरफ संजय अफसोस कर रहा था.. हाथ में आया हुआ गोल्डन चांस चला गया..
 
खाना खतम कर शीला बाहर बरामदे में बैठ गई.. संजय भी आकर उसके बगल में बैठ गया.. तभी वहाँ पीयूष आया.. रात के दस बज रहे थे.. पीयूष के पीछे पीछे कविता, मौसम और फाल्गुनी भी आए.. पूरा घर भर गया.. इन सब के आने से शीला को बहोत अच्छा लगा.. इन सब की मौजूदगी में संजय कुछ भी उल्टा सीधा नहीं कर पाएगा.. दूसरी तरफ संजय अफसोस कर रहा था.. हाथ में आया हुआ गोल्डन चांस चला गया..

पीयूष को देखते ही वैशाली के चेहरे पर चमक आ गई.. पीयूष शीला भाभी की बगल में बैठ गया और वैशाली उसके बाजू में.. कविता को ये बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा.. पर वो कर भी क्या सकती थी !! पीयूष की दोनों तरफ उसकी दोनों पसंदीदा प्रेमिकाएं बैठी थी.. दोनों पर वो हाथ साफ कर चुका था.. दोनों के स्तनों की साइज़ जरूर अलग अलग थी पर उत्तेजना एक सी ही थी.. उस दिन मूवी देखकर लौटने के बाद जब वो चाबी देने आया तब शीला ने जिस हवस का प्रदर्शन किया था.. और वहाँ खंडहर में रेत के ढेर पर वैशाली जिस तरह उस पर सवार हो गई थी.. माँ और बेटी दोनों की वासना एक बराबर थी.. पीयूष के दोनों हाथों में लड्डू थे..

पीयूष को दोनों के बीच बैठ देखकर कविता जल कर खाक हो गई.. रेणुका से बात करने के बाद शीला भाभी की जो अच्छी छवि उसके मन में बनी थी वह एक ही पल में ध्वस्त हो गई.. अपने पति के पास बैठकर हंस हँसकर बातें कर रही शीला को देखकर बहोत गुस्सा आया उसे.. बातों बातों म एन वैशाली ने हँसकर पीयूष के हाथ पर ताली दी.. कविता के मन में जल रही आग में जैसे किसी ने पेट्रोल डाल दिया.. कविता की शक्ल रोने जैसी हो गई.. पर वैशाली या शीला.. दोनों में से किसी ने भी कविता की तरफ ध्यान नहीं दिया.. सब अपनी ही मस्ती में मस्त थे.. संजय कोने में बैठकर सिगरेट फूँकते हुए मौसम के नाइट ड्रेस से दिख रही ब्रा की पट्टी को देख रहा था..

कविता को इतना गुस्सा आया की उसका बस चलता तो अभी पीयूष को खींचकर घर ले जाती.. पर वो क्या कर सकती थी!!! और हकीकत तो यह थी की शीला उसके बगल में आकर नहीं बैठी थी.. खुद पीयूष ही जाकर उनके पास बैठ गया था.. जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो दूसरों को क्या दोष देना ? कुछ समय से बहोत बिगड़ गया है ये पीयूष.. वैशाली के आने के बाद कुछ ज्यादा ही नखरे बढ़ गए है इसके.. कविता का दिमाग घूम रहा था.. जब दिमाग में शक का कीड़ा एक बार घुस गया तो उसे बाहर निकालना बहोत कठिन हो जाता है.. कविता की मानसिक स्थिति बिल्कुल ठीक नहीं थी.. लेकिन तभी पीयूष ने कुछ ऐसा कहा जिससे कविता का रोम रोम पुलकित हो उठा.. उदास कविता के मन में जो मुकेश के दर्द भरे नगमे चल रहे थे.. उसके स्थान पर मनहर उधास की रोमेन्टीक ग़ज़ल बजने लगी..

पीयूष ने कहा की राजेश सर की वाइफ का बर्थडे आ रहा था और वोह कंपनी के पूरे स्टाफ को टूर पर ले जाना चाहते थे..

पीयूष: "मैंने उनसे गुरुवार और शुक्रवार की छुट्टी मांगी तो उन्होंने इस टूर के बारे में बताया और कहा की मैं मौसम और फाल्गुनी को भी साथ ले लूँ.. मैंने हाँ बोल दिया है.. तो हम कल सुबह सात बजे ऑफिस के बाहर मिलने वाले है.. तू साथ चलेगी ना वैशाली?"

पीयूष को वैशाली के प्रति आकर्षित होता देख उसे पीटने का मन कर रहा था कविता का.. पर मन ही मन वो रेणुका को थेंक्स बोल रही थी.. उनके कारण ही यह मुमकिन हो पाया.. और अब पिंटू भी शीला भाभी के चंगुल में नहीं फँसेगा.. सब सही हो रहा था.. रेणुका वाकई बड़े काम की चीज है.. चुतकी बजाते मेरा प्रॉब्लेम सॉल्व कर दिया।।

कविता: "लेकिन पीयूष, बाहर के लोगों के लिए जगह होगी भी?" वैशाली को नीचा दिखाने का मौका मिल गया कविता को.. लेकिन उसके यह बोलने से वैशाली को कुछ फरक नहीं पड़ा

पीयूष ने बड़े उत्साह के साथ कहा.. "अरे, राजेश सर ने बड़ी वाली बस मँगवाई है.. कम से कम १० सीट खाली रहेगी.. अगर शीला भाभी चलना चाहें तो वो भी आ सकती है.. " पीयूष को दोनों हाथों में लड्डू चाहिए थे.. पर कविता भी कम नहीं थी

कविता: "फिर तो हम संजय कुमार को भी साथ ले लेते है.. वह भी हमारे मेहमान है.. हम सब जाएँ और वो यहाँ अकेले रहे तो अच्छा नहीं लगेगा.. " कविता की इस गुगली के आगे सारे बेटसमेन अपनी विकेट बचाने में लग गए। कविता जानती थी की संजय की मौजूदगी में वैशाली या शीला दोनों अपनी हद में रहेंगे.. और उसके पति को उन दोनों से दूर रख पाएगी.. और अगर नजर बचाकर शीला भाभी थोड़ा बहोत कुछ कर भी लेती है तो कोई हर्ज नहीं है.. मैं भी उस दौरान पिंटू के साथ मजे कर लूँगी.. वैसे भी शीला भाभी अब ५-६ दिन की मेहमान थी.. मदन भाई के लौटने के बाद यह खिलाड़ी रिटायर्ड हर्ट होकर पेवेलियन लौट जाने वाला था.. वाह.. खुद की पीठ थपथपाने का मन हो रहा था कविता को

संजय को शामिल करने की बात सुनते ही पीयूष बॉखला गया.. सिर्फ उस आदमी की मौजूदगी से पूरी टूर का सत्यानाश हो जाएगा.. वैशाली और शीला के संग गुलछरों का आनंद लेने का सपना टूटता हुआ दिखा.. वैसे रेणुका भी साथ चलने वाली थी पर राजेश सर के साथ रहते हुए उनके करीब जाने की सोच भी नहीं सकता था पीयूष.. अगले दिन रेणुका की हवस देखकर उतना तो तय था की टूर के दौरान एकाध किस करने या बबले दबाने का मौका तो मिल ही जाएगा उसके साथ..

इन सारे प्रपंचों से अनजान मौसम और फाल्गुनी अंताक्षरी खेल रहे थे..

मौसम अपनी सुरीली आवाज में गा रही थी "ये दिल तुम बिन.. कहीं.. लगता नहीं, हम क्या करें.. !!" वह इतना सुरीला गा रही थी की बाकी बैठे सब चुप होकर उसके गीत को सुनने लगे.. शीला को मदन की याद आ गई.. सब से नजर बचाते हुए उसने अपने गाल से आँसू पोंछ लिए..

सुरीले मुखड़े के बाद मौसम अब अंतरा गा रही थी

"बुझा दो, आग दिल की या उसे खुल कर हवा दे दो.. जो उसका मोल दे पाए, उसे अपनी वफ़ा दे दो..
तुम्हारे दिल में क्या है बस, हमे इतना पता दे दो.. के अब तन्हा सफर कटता नहीं, हम क्या करें.. "

गीत खतम होते ही सब ने तालियों से उसे नवाजा.. "वाह वाह मौसम.. बहोत बढ़िया.. कितना अच्छा गाती हो तुम" अपनी छोटी बहन की तारीफ सुनकर कविता गदगद हो गई.. तभी संजय उठकर मौसम के पास आया और वॉलेट से ५०० का नोट निकालकर मौसम को देते हुए बोला

संजय: "वाह मौसम वाह.. तेरे कंठ में तो साक्षात सरस्वती बिराजमान है.. बुरा मत मानना.. ये कोई बखशीश नहीं है.. बस देवी के चरण में भक्त की भेंट अर्पण कर रहा हूँ.. ऐसी सुंदर गायकी की कदर तो होनी ही चाहिए"

मौसम ने शरमाते हुए कहा "अगर पैसे न लूँ तो आपका अपमान होगा.. लेकिन इस कुदरत की देन का व्यापार करना मुझे ठीक नहीं लगता.. बाकी दीदी जैसा कहेंगी मैं वैसा ही करूंगी"

कविता ने सोचकर कहा "देख मौसम, जीवन की पहली कमाई हम परिवार पर खर्च करते है.. हम भी एक परिवार जैसे ही है.. फाल्गुनी, तू भागकर नुक्कड़ की दुकान पर जा और सबके लिए आइसक्रीम लेकर आ.. इन्ही पैसों से हम सब पार्टी करेंगे.. ठीक है ना !!"

मौसम और फाल्गुनी दोनों आइसक्रीम लेने गए.. कविता और वैशाली बातें करने लगे.. बरामदे की कुर्सियों पर सब झुंड बनाकर बैठे थे.. सब का ध्यान बातों में था तब पीयूष ने अंधेरे का फायदा उठाते हुए शीला का हाथ पकड़ लिया.. शीला मदन को याद करते हुए बेचैन हुए जा रही थी और उसे वैसे भी किसी के सहारे की जरूरत थी.. शीला और पीयूष पीछे की कुर्सी पर बैठे थे और बाकी सबकी पीठ उनके तरफ थी इसलिए किसी ने देखा नहीं था.. शीला के हाथों का नरम गरम स्पर्श मिलते ही पीयूष के मन का मोर नाचने लगा.. शीला को भी मज़ा आ रहा था..

अचानक पीयूष का हाथ छुड़ाकर शीला खड़ी होकर बोली "ये दोनों आइसक्रीम लेकर आती ही होगी.. मैं बाउल लेकर आती हूँ" पीयूष निराश हो गया.. तभी अंदर से शीला की आवाज सुनाई दी.. "अरे पीयूष.. जरा अंदर आना.. ऊपर से बॉक्स उतारना है.. मेरा हाथ नहीं पहुँच रहा"

"आया भाभी.. " कहते हुए पीयूष दौड़कर किचन में पहुँच गया.. बॉक्स तो पहले से ही नीचे उतार चूकी थी शीला.. शीला ने पीयूष को अपनी बाहों में भर लिया.. और आठ-दस किस कर दी उसके चेहरे पर.. पीयूष भी अपने पसंदीदा स्तनों को दबाने लगा.. मात्र ५ सेकंड में ये सारा खेल निपट गया.. पीयूष तुरंत भागकर बाहर आ गया ताकि किसी को शक न हो.. शीला भी कांच के बाउल लेकर बाहर आई तब तक मौसम और फाल्गुनी आइसक्रीम लेकर आ चुके थे

फेमिली पेक को खोलकर पीयूष ने छोटी छोटी स्लाइस काटकर सब के लिए बाउल तैयार कीये.. सब बातें करते हुए आइसक्रीम का लुत्फ उठाने लगे.. बातों बातों में पीयूष ने शीला से पूछा

पीयूष: "आप भी साथ चलोगे न भाभी?" कविता भी कहाँ पीछे रहने वाली थी.. !! उसने संजय को कहा

कविता: "जिजू, आपको तो चलना ही होगा.. आप के बगैर मज़ा नहीं आएगा"

पीयूष को इतना गुस्सा आया कविता पर.. !! ये कविता मेरे सारे प्लान की माँ चोद रही है.. साला ये संजय कौनसा अपना सगा है जो तुझे उसके बगैर मज़ा नहीं आएगा !!!

लेकिन कविता ओर कोई दांव खेल पाती उससे पहले ही शीला ने आने से मना कर दिया और संजय ने भी कह दिया की उसे ऑफिस का काम कभी भी आ सकता था इसलिए वह जुड़ नहीं पाएगा.. वैशाली और पीयूष के चेहरे चाँद की तरह खिल उठे.. कविता भी यह सोचकर खुश हो रही थी की आखिर पीयूष शीला से दूर रहेगा और टूर पर साथ होगा तो कभी न कभी कोई मौका मिल ही जाएगा उसे.. सुबह जल्दी जाना था इसलिए सब अपने घर चले गए

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शीला के घर से लौटने के बाद कविता देर तक पॅकिंग करती रही.. और फिर पीयूष की बगल में लेट गई.. पीयूष अभी सोया नहीं था.. अपने मोबाइल पर पॉर्न क्लिप देखते हुए.. चादर के नीचे मूठ लगा रहा था.. कविता ने अंगड़ाई लेकर अपने स्तन पीयूष की छाती पर लाद दिए.. "तेरे सामने मैं हूँ फिर तुझे हिलाने की क्या जरूरत है? यहाँ मर्सिडीज खड़ी है और तू साइकिल क्यों चला रहा है?"

पीयूष: "तू भले ही अपने आप को मर्सिडीज समझती रहे.. पर शीला भाभी के आगे तेरा कोई मोल नहीं है" कविता ने जिस तरह प्यार से संजय को न्योता दिया था उसका गुस्सा अब भी पीयूष के सर पर सवार था

खुद को महत्व न देते हुए पीयूष ने शीला की जिस तरह तारीफ की.. उससे सुलग गई कविता की.. बेडरूम में पति किसी पराई औरत के गुणगान करे ये कोई पत्नी सहन नहीं करती.. एक सेकंड में कविता के चेहरे का रंग बदल गया.. घूमने जाना हो तब पत्नी कितनी खुश होती है!! मन में ढेर सारे प्लान बन गए होते है.. यहाँ जाएंगे.. वहाँ जाएंगे.. शॉपिंग करेंगे.. फोटोस लेंगे.. अगले तीन चार दिन शायद मौका न मिले इसलिए वो आज पीयूष पर सवारी करके सारी कसर पूरी कर देना चाहती थी.. लेकिन पीयूष के मुंह से यह सुनते ही कविता बेहद गुस्सा हो गई।

कविता: "पीयूष, तू पहले ये तय कर की तुझे शीला भाभी ज्यादा पसंद है या वैशाली? बिना पेंदे के लोटे की तरह कभी माँ को दाने डालता है तो कभी बेटी को.. कितना खराब लगता है जब सब के सामने तू उन माँ-बेटी पर लट्टूगिरी करता है.. एक नंबर का चोदू लगता है"

पीयूष: "हाँ.. तुझे तो अब में चोदू ही लगूँगा ना.. जब से संजय को देखा है, तेरी भी नियत बदल गई है.. पर संजय ने वैशाली की क्या हालत कर दी है ये तुझे पता नहीं है.. एक नंबर का नालायक आदमी है संजय.. सिर्फ दिखने में हेंडसम है.. बाकी उसके लक्षण तो बंदरों जैसे है.. कभी इस डाल पर तो कभी उस डाल पर.. "

कविता: "सभी मर्द यही करते है.. तू भी कौनसा दूध का धुला है?? पहले अपने गिरहबान में झाँककर देख.. फिर दूसरों की बात करना..!!"

संजय: "अरे वाह.. बड़ी वकालत हो रही है संजय की.. कहीं वो भड़वा तुझे पटाने की फिराक में तो नहीं?? मैं पहले ही बता दे रहा हूँ तुझे.. उस संजय से तेरा मेलझोल मुझे जरा भी पसंद नहीं है"

कविता: "आखिर बाहर आ ही गया तेरे अंदर का दकियानूसी मर्द.. पुराने खयालों वाले.. तू शीलाभाभी के साथ जो कुछ भी करता है.. उतना तो मैं संजय के साथ कर ही सकती हूँ"

पीयूष चोंककर : "मैंने ऐसा क्या गलत किया है शीला भाभी के साथ?"

कविता: "पर मैंने कब कहा की तूने कुछ गलत किया भाभी के साथ? मैंने तो बस एक बात कही "

पीयूष डर गया.. कहीं भाभी के साथ छुपा-छुपी खेलने में ऐसा न हो की कविता हाथ से चली जाए.. भाभी तो थोड़े दिनों में अपने पति की बाहों में छुप जाएगी.. मेरी तरफ देखेगी भी नहीं.. फिर कविता ने भी हाथ लगाने नहीं दिया तो ये लंड सिर्फ जड़ीबूटी कूटने के काम आएगा.. लेकिन अभी अगर उसने बात छोड़ दी तो उससे यह साबित हो जाता की उसके और शीला भाभी के बीच कुछ चल रहा है..

गुस्से में पीयूष मूठ लगाता रहा.. कविता भी रूठकर उलटी दिशा में करवट लेकर सो गई.. चार दिनों की कसर पूरी करने के खयाल पर पानी फिर गया.. दोनों अब एक दूसरे से कतराने लगे और बात नहीं कर रहे थे

रोज सुबह एक आदर्श पत्नी के तरह "गुड मॉर्निंग" कहकर वो पीयूष को जगाती.. पर आज तो उसने पीयूष की तरफ देखा तक नही.. साढ़े पाँच बजे उठकर वो अपने सास-ससुर के लिए चाय और खाना बनाने किचन में चली गई.. साढ़े छ बज गए लेकिन पीयूष अब भी सो रहा था। अनुमौसी को गुस्सा आया.. वह बेडरूम में जाकर पीयूष को झाड़ने लगे "जब कहीं बाहर जाना हो तो समय पर उठना सीख.. जल्दी उठ.. सात बजे तुम्हें पहुंचना है और अभी तक तू बिस्तर पर ही पड़ा है? बहु बेचारी कब से जागकर घर का काम निपटा रही है.. और तू यहाँ कुम्भकरण की तरह खर्राटे ले रहा है? "

मुंह बिगाड़कर पीयूष खड़ा हुआ और बाथरूम में घुस गया.. फटाफट तैयार होकर वो दो मिनट में बाहर आया.. उसे इतनी जल्दी बाहर आया देखकर अनुमौसी ने कहा "इतनी जल्दी तैयार भी हो गया? नहाया भी की नहीं? या सिर्फ मुंह धो लिया? ब्रश किया की नहीं ठीक से? हे भगवान.. ये आजकल के नौजवान.. कब सुधरेंगे??"

सबकुछ सुन रही कविता कुछ नहीं बोली.. वो मौसम और फाल्गुनी को कपड़े बेग में भरने में मदद कर रही थी.. उसने पीयूष की तरफ जरा भी ध्यान नहीं दिया.. वैशाली कब से तैयार होकर अपना बेग लिए उनके ड्रॉइंगरूम में बैठी थी

आखिर वह पाँच लोग दो ऑटो में बैठकर ऑफिस पहुंचे.. साढ़े सात बज गए पहुंचते पहुंचते.. आधा घंटा देर हो गई थी.. पूरा स्टाफ बस में बैठ चुका था.. बस उन्ही पाँच का इंतज़ार था.. माउंट आबू जाने के लिए लक्जरी बस रावण हुई.. बस में अब भी ८ सीट खाली थी.. जरा भी भीड़भाड़ नहीं थी.. सब बड़े उत्साह में थे और मज़ाक के मूड में भी..

पिंटू को देखते ही कविता की सांसें थम गई.. पिंटू अपने एक सहकर्मी के साथ बैठा था.. और उसके बाएं तरफ की सीट पर कविता और पीयूष बैठ गए.. राजेश बस के आगे के हिस्से में खड़ा हुआ था.. रेणुका पिंक साड़ी में जबरदस्त लग रही थी.. बार बार वो पीयूष की तरफ देखकर स्माइल करती रही.. मौसम और फाल्गुनी तो बिल्कुल आखिर वाली सीटों पर जा बैठी.. दोनों अपनी ही मस्ती में मस्त थी.. अंदर अंदर बातें करते हुए वह दोनों बार बार हंस पड़ती..

उनकी हंसी की आवाज सुनकर राजेश का ध्यान मौसम की ओर आकर्षित हुआ.. तीरछी नज़रों से वह मौसम के कच्चे सौन्दर्य का लुत्फ उठाने लगा.. मौसम जब हँसती तब उसके गाल पर हसीन डिम्पल पड़ते.. देखकर ही राजेश फ़ीदा हो गया था.. बस जैसे जैसे आगे बढ़ती रही वैसे ही सारे प्रवासी रंग में आते जा रहे थे.. सब हंसी खुशी मज़ाक मस्ती कर रहे थे.. पीयूष और कविता को छोड़कर..
 
कविता जबरदस्ती अपने चेहरे पर मुस्कान लाए बैठी थी लेकिन किसी से बात नहीं कर रही थी.. मन में सोच रही थी "ये चूतिये पीयूष ने सारे मूड का सत्यानाश कर दिया कल रात को.. सब मजे कर रहे है पर मुझे कुछ अच्छा ही नहीं लग रहा" बोर होकर वो खड़ी हो गई और रेणुका के पास जाने लगी.. सीट से उठाते हुए उसका पैर पिंटू के पैर से टकरा गया.. अपने प्रियतम का स्पर्श होते ही वो खिल उठी..

तभी राजेश ने सब का ध्यान अपनी ओर खींचते हुए यह घोषणा की

"साथियों, कल मेरी पत्नी का जन्मदिन है.. इसी खुशी में हम सब माउंट आबू जा रहे है.. कंपनी के सारे परिवारजनों के साथ साथ हमारे साथ तीन नए लोग भी शामिल है.. उनको हमारे साथ पराया न लगे ये सुनिश्चित करना हमारी जिम्मेदारी है.. लेडिज एंड जेन्टलमेन, प्लीज वेलकम मिस वशाली, मिस मौसम एंड मिस फाल्गुनी"

सब ने ताली बजाते हुए उन्हे "हाई" कहा.. तीनों शर्मा गई और खड़ी होकर सबको थेंक्स कहने लगी.. मौसम का खिले गुलाब सा सौन्दर्य देखकर कई देखनेवालों की आहें निकल गई.. पूरी बस में जैसे सुंदरता का भूकंप आ गया जिसका एपीसेंटर थी मौसम.. !!!

सब से पहचान होते ही मौसम और फाल्गुनी अपने असली रंग में आ गई.. दोनों ने हंसी मज़ाक करते हुए पूरी बस में धूम मचा दी.. वैशाली भी अपने प्रॉब्लेम को भूलकर मौसम और फाल्गुनी के साथ जुड़ गई.. संजय की कड़वाहट भरी यादों को दूर हटाते हुए.. वह कुछ दिन आराम से जीना चाहती थी.. राजेश टीशर्ट और जीन्स में बहोत हेंडसम लग रहा था.. तो दूसरी तरफ रेणुका अपने गदराए जिस्म पर साड़ी ओढ़े बेहद सुंदर और परिपक्व लग रही थी..

एक बात वैशाली के ध्यान में आई.. कविता बार बार पिंटू की ओर देख रही थी.. वैसे उसके लिए ये अच्छा ही था.. कविता का ध्यान भटका हुआ रहेगा तभी तो वो पीयूष के साथ फ्लर्ट कर पाएगी.. !!!!

मौसम की कोयल जैसी आवाज से बस में बहार खिल गई थी.. उसकी कच्ची कुंवारी छातियाँ तो बस.. उफ्फ़.. कहर ढा रही थी.. बस में बैठे लोग अक्सर नजर चुराकर उन कच्चे अमरूदों का रसपान कर लेते थे.. पीयूष और पिंटू राजेश के साथ बैठकर आगे के कार्यक्रम के बारे में विचार-विमर्श कर रहे थे.. बड़ा ही मस्त माहोल था बस में.. रोमेन्टीक सा..

रेणुका सीट पर बैठे बैठे खिड़की से बाहर देख रही थी.. उसकी पारदर्शक साड़ी से नजर आती क्लीवेज को देखकर पीयूष ठंडी आहें भर रहा था.. बीच बीच में दोनों की नजर एक हो जाती तब एक प्यारी सी मुस्कान देकर रेणुका उसके और पीयूष के प्रेम सर्टिफिकेट को रीन्यु कर देती थी.. उस दिन पैसे लेने गया तब कितना मज़ा आया था रेणुका के साथ.. आह्ह.. जोरदार गरम चीज है मैडम तो.. !!

तभी पीयूष के मोबाइल पर मिसकोल आया.. वैशाली ने उसका ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए किया था.. पीयूष ने उसकी ओर देखा.. वैशाली के मांसल जिस्म को रेत के ढेर में फैलाकर जिस तरह चोदा था वह याद आते ही पीयूष का उस्ताद हरकत में आ गया..

बस तेज गति से सड़क पर सरपट दौड़ रही थी.. गति और स्मृति के बीच जरूर कोई गहरा संबंध है.. ऐसा क्यों होता है की बस या ट्रेन के सफर में ही सारी गुजरी बातें याद आने लगती है ???

मौसम और फाल्गुनी के साथ बैठकर गप्पे लड़ा रही कविता का सारा ध्यान अपने बंदर जैसे शरारती पति के ऊपर ही था.. वो देख रही थी कैसे पीयूष कभी रेणुका को देखकर मुसकुराता तो कभी वैशाली की गांड को देखकर अपनी लार टपकाता.. बहोत गुस्सा आ रहा था कविता को.. तभी उसने पिंटू को देखा.. गोरे चिट्टे क्लीन शेव पिंटू को देखकर उसके गालों को चूमने का मन कर रहा था कविता को.. काश अगर यहाँ शीला भाभी होती.. तो पिंटू के साथ उसका कुछ न कुछ सेटिंग जरूर करवा देती.. बहोत प्रेक्टिकल थी शीला भाभी.. कविता के ह्रदय में अपनी प्रेमी को लेकर ख्वाहिशें जागने लगी.. काश कभी मुझे और पिंटू को अकेले घूमने जाने का चांस मिल जाएँ .. !! एक सीट पर साथ साथ बैठकर.. हाथों में हाथ डालकर.. उसके कंधे पर सर रखकर सोने की कल्पना करते हुई कविता भारी सांसें लेने लगी.. कितना क्यूट लग रहा था पिंटू..!!

हाइवे पर सरपट दौड़ती बस एक होटल पर आकर रुक गई "हम सब थोड़ी देर रुकेंगे.. जिन्हे फ्रेश होना हो वह जल्दी निपटाए.. हम चाय पीकर तुरंत निकल जाएंगे ताकि पहुँचने में देरी न हो.. आगे थोड़ा सा ट्राफिक भी होगा"

सब फटाफट वॉशरूम में घुस गए.. मौसम और कविता लेडिज टॉइलेट में चले गए.. इन हाइवे हॉटेलों के टॉइलेट में कैसी गंदी गंदी बातें लिखी हुई होती है!!! मौसम पेशाब करते हुए सब पढ़ रही थी.. एक मोबाइल नंबर लिखा हुआ था और उसके नीचे लिखा था "पूरी रात चूत चटवाने के लिए मुझे कॉल करे.. " एक दूसरा वाक्य ऐसा था "मस्त चूत है आपकी.. मेरा लंड लोगी क्या?"

मौसम ने पहली दफा ऐसा सब पढ़ा था.. "लंड" शब्द बार बार पढ़ने का दिल कर रहा था उसका.. पेशाब कर लेने के बाद उसने बाकी सारी लिखाई भी पढ़ ली.. पूरे जिस्म में सुरसुरी चलने लगी उसके.. वो वापिस आकर बस में बैठ गई.. थोड़ी देर बाद फाल्गुनी भी आकर उसके पास बैठ गई.. पूरी बस खाली थी.. बस मौसम और फाल्गुनी ही थे बस में..

फाल्गुनी: "यार, लोगों में तमीज़ नाम की कोई चीज ही नहीं है.. !!"

मौसम: "क्यों? क्या हुआ?"

फाल्गुनी: "अरे बाथरूम गई तो रास्ते में एक आदमी बाहर खड़ा खड़ा ही पेशाब कर रहा था.. छोटा सा रास्ता था, मैं कैसे जाती? यार ये मर्द लोग न.. बिल्कुल बेशर्म होते है"

मौसम: "हाँ यार.. मैं भी अभी बाथरूम गई तब ऐसी गंदी गंदी बातें पढ़ी.. दीवार पर लिखी हुई"

तभी वैशाली आई और बातों में शामिल हो गई

वैशाली: "क्या हुआ? कौनसी गंदी बातों की बात चल रही है?"

मौसम और फाल्गुनी ने अपने अनुभवों के बारे में बताया.. वैशाली हंस पड़ी

वैशाली: "जो शब्द अभी तुम्हें गंदे लगते है.. वहीं शब्द बाद में तुम्हें बहोत रोमेन्टीक लगेंगे.. देखना तुम दोनों.. !! और फाल्गुनी.. तूने उस आदमी का देखा की नहीं?"

फाल्गुनी भोली बनकर बोली: "क्या देखा?"

वैशाली: "अरे उसका लंड यार.. और क्या? मर्दों की दोनों जांघों के बीच और क्या लटकता है?"

फाल्गुनी शर्मा गई "क्या दीदी आप भी.. !!"

गंदी गंदी बातें सुनकर मौसम और फाल्गुनी का चेहरा शर्म से लाल हो गया था.. जीवन में पहली बार ये सब बातें सुन रही थी वह दोनों.. वैशाली ने अपने अनुभव का ज्ञान उन दोनों के बीच बांटा..

वैशाली: "तुम दोनों अभी नादान हो.. पर एक बार लंड के संपर्क में आने के बाद उससे दूर नहीं रह पाओगी"

मौसम: "लगता है दीदी को जीजु की याद आ रही है"

फाल्गुनी हँसते हुए "हाँ दीदी.. अब क्या करोगी?"

वैशाली: "माउंट आबू जाकर कोई नया जीजु ढूंढ लूँगी.. और क्या.. हा हा हा हा हा.. !!"

थोड़ी देर में सब बस में वापिस आने लगे.. सब से पहले पीयूष आया.. उसे देखते ही वैशाली का मन ललचा गया.. उसके पीछे पीछे रेणुका बस में चढ़ी.. बस की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए रेणुका की चूचियाँ पीयूष की पीठ से दबकर रह गई.. पीयूष का दिल बाग बाग हो गया.. औरत के जिस्म का गरम स्पर्श.. और वो भी स्तनों का.. रेणुका ने पीयूष को सृष्टि का सबसे अप्रतिम सुख देकर मालामाल कर दिया था.. बस में बैठे किसी को भी इन दोनों के खेल के बारे में जरा सा भी अंदाजा नहीं था..

कविता पिंटू से बात करने का मौका ढूंढ रही थी.. यह ध्यान रखते हुए की पीयूष को उसके और पिंटू के बारे में भनक न लगे.. आज अगर शीला भाभी साथ होती.. तो अब तक उसकी और पिंटू की कोई न कोई सेटिंग तो करवा ही देती.. क्या करू? पिंटू अकेले घूम रहा है.. और मैं उसके साथ होने के लिए मर रही हूँ.. कल रात पीयूष ने दिमाग खराब कर दिया.. और अब ये समाज की लक्ष्मणरेखा मुझे पिंटू से दूर रखे हुए है.. मैं यहाँ नहीं आई होती तो अच्छा होता.. कम से कम पिंटू को सामने देखकर भी बात न कर पाने का दुख तो नहीं होता!!! प्रेमी के करीब होते हुए भी दूरी बनाए रखने की मजबूरी से बड़ा दुख कोई नहीं होता.. बस में सब मजे कर रहे थे.. सिर्फ कविता को छोड़कर.. पिछली सीट पर बैठे बैठे वैशाली.. मौसम और फाल्गुनी को सेक्स एज्युकेशन दे रही थी..

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शीला घर पर अकेली थी.. एकांत मिलते ही उसके दिल में गुदगुदी सी होने लगती थी.. संजय सुबह ९ बजे तैयार होकर घर से निकला उसके बाद शीला ने सब से पहला फोन जीवा को किया.. पर हाय रे किस्मत.. !! जीवा काम से दूसरे शहर गया हुआ था.. शीला ने दूसरा फोन रूखी को किया.. रूखी शीला की आवाज सुनकर बहोत खुश हो गई..

रूखी: "कितने दिनों के बाद याद किया आपने भाभी.. आप तो जैसे मुझे भूल ही गए"

शीला: "ऐसा नहीं है रूखी.. मैं तो तुझे रोज याद करती हूँ.. पर घर पर सेटिंग भी तो होना चाहिए.. !! रूखी, मेरी हालत बहोत खराब है.. घर में इतने सारे झमेले है की क्या बताऊ!! अभी चार दिन का वक्त मिला है इसलिए तुझे फोन किया.. जीवा तो शहर से बाहर है.. मैं ये मौका गंवाना नहीं चाहती.. कोई दूसरा है तेरे ध्यान में?"

रूखी: "भाभी, अगर आप चाहे तो रसिक के बाबूजी के साथ.. "

शीला चोंक गई "तेरे ससुर के साथ.. ???"

रूखी: "हाँ हाँ.. रसिक का बाप मतलब मेरा ससुर ही.. और कौन!! मेरी और उनकी गाड़ी अब पूरे जोश के साथ निकल पड़ी ही.. जब घर में ही खूंटा मिल जाए तब भला बाहर ढूँढने की क्या जरूरत!!"

शीला: "रूखी नालायक.. एक नंबर की रंडी निकली तू तो.. अपने ससुर के साथ ही शुरू हो गई!! जीवा और रघु के लंड से जी नहीं भरता क्या तेरा??"

रुखी: "एक लोचा हो गया है भाभी.. मेरी सास कुछ दिनों के लिए बाहर गई हुई है.. मेरे ससुर उनके दोस्त के बेटे की शादी में गए हुए थे.. मुझसे रहा नहीं गया और मैंने जीवा को फोन करके बुला लिया.. मैं टांगें खोलकर जीवा के लंड के धक्के ले रही थी तभी बूढ़ा आ टपका और हम दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया उस चूतिये ने.. !!!"

शीला: "फिर क्या हुआ.. ??"

रूखी: "फिर क्या होना था.. जीवा को तो मैंने जैसे तैसे रवाना कर दिया.. पर बूढ़े ने कहा की मुझे चोदने दे.. वरना तेरा भंडा फोड़ दूंगा.. मैंने बहोत मना किया पर वो माना ही नहीं.. पर एक बात कहूँ भाभी.. बाहर के मर्दों को घर बुलाने में खतरा तो है.. आस-पड़ोस वाले देख लेते है.. हजार बातें होती है.. उससे अच्छा तो घर में ही जुगाड़ हो जाए वही बेहतर है.. ससुर बूढ़ा है पर है कमीना ताकतवर.. असली घी के जो बड़ा हुआ है"

शीला का गला सूखने लगा रूखी की बातें सुनकर.. "फिर क्या हुआ? बूढ़े के साथ मज़ा आया तुझे? जीवा जैसा मज़ा तो नहीं आया होगा !!"

रूखी: "भाभी, थोड़ा बहोत ऊपर नीचे चलता है.. पर इसमे पकड़े जाने का कोई डर नहीं.. पूरा दिन घर में जैसे मर्जी, जितनी मर्जी बस चुदवाते रहो.. कल तो मेरे ससुर ने पूरा दिन मुझे कपड़े ही नहीं पहनने दिए.. मुझे कहता है की "रूखी, तुझे नंगी देखना बहोत अच्छा लगता है.. कपड़े तेरे शरीर पर जचते ही नहीं है.. " और तो और भाभी, पूरा दिन जब में घर का काम करता हूँ तब वो यहाँ वहाँ उंगली करता रहता था.. सच कहूँ भाभी.. मुझे तो बहोत मज़ा आया"

शीला: "ये सब अभी के लिए तो ठीक है.. पर जब तेरी सास वापिस आ जाएगी फिर क्या करोगे तुम दोनों?"

रूखी: "अरे मेरी सास तो सुबह २ घंटे मंदिर जाती है तब मैं मेरे ससुर के साथ निपटा लूँगी.. ये सब करने के लिए वक्त चाहिए कितना.. एक घंटा तो बहोत हो गया मेरे लिए"

रूखी की बातें सुनकर शीला की चूत में खुजली होने लगी..

शीला: "यार रूखी, मुझे तो तुम दोनों को चोदते हुए देखना है.. अभी तेरा ससुर घर पर है क्या? मैं देखना चाहती हूँ.. ससुर और बहु के बीच का सेक्स.. करते हुए तुझे शर्म नहीं आई थी क्या?"

रूखी: "भाभी, वो अभी बाहर बीड़ी का बंडल लेने गया है.. आता ही होगा.. बीड़ी पीते पीते अपना लंड मेरे हाथ में दे देगा"

शीला: "मैं एक काम करती हूँ.. अभी तेरे घर पर आती हूँ.. जैसे ही तुम दोनों का कार्यक्रम शुरू हो जाए, तू मुझे मिसकोल कर देना.. और हाँ दरवाजा सिर्फ अटकाकर ही रखना.. कुंडी मत लगाना.. और तेरे ससुर को पूरा नंगा कर देना.. मैं अचानक दरवाजा खोलकर आऊँगी.. और तुम दोनों को रंगेहाथों पकड़ लूँगी.. और फिर शामिल हो जाऊँगी.. जो दांव उसने तेरे और जीवा पर आजमाया वहीं दांव से हम बूढ़े को फँसायाएंगे"

रूखी: "मुझे कोई दिक्कत नहीं है भाभी.. आप आ जाइए"

शीला: "अरे मैंने तो घर को ताला भी लगा दिया.. थोड़ी ही देर में पहुँच जाऊँगी" शीला ने हाथ ऊपर कर रिक्शा को रोका और अंदर बैठ गई.. रिक्शा में बैठे बैठे उसने अपनी सुलगती चूत को घाघरे के ऊपर से ही मुठ्ठी में भरकर दबा दिया.. तब जाकर वह थोड़ी शांत हुई.. इतनी तेज खुजली हो रही थी.. रहा नहीं जा रहा था शीला से..

तभी रूखी का कॉल आया

रूखी: "भाभी, वो आ गए.. फोन रखती हूँ.. मेरा मिसकोल देखते ही आप अंदर चले आना"

अगले दस मिनट में शीला रूखी के घर के बाहर खड़ी थी.. उसने धीरे से दरवाजा खोला.. रूखी का मिसकोल अभी आया नहीं था.. पर शीला से रहा ही नहीं जा रहा था.. मुख्य कमरे से गुजरते हुए वह दूसरे कमरे के दरवाजे के पीछे सटकर अंदर का नजारा देखने की कोशिश करने लगी.. अंदर का द्रश्य देखकर शीला के भोसड़े में १०००० वॉल्ट का झटका लगा..


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