(Maja Aur Saja)
मैं पुलिस स्टेशन से बाहर आया और अपनी मोटर साईकल उठा कर सीधे सुधीर के घर आ गया। अभी सवेरे के साढ़े आठ ही बजे थे.हमेशा की तरह सुधीर घर पर नहीं था। उसे शायद यह मालूम नहीं था कि आज उसका इस घर में अन्तिम दिन है। घर में सरोज नहीं थी.दिव्या ही मिली।
'आज तो जल्दी आ गये. क्या हुआ रात को नींद नहीं आई क्या.?' उसकी चुलबुली हरकत मेरे मन को बहुत अच्छी लगी।
'दिव्या.बस रात को तो मैं तुम्हारे ही सपने देखता रहा. तुम्हारे जैसी कमसिन और जवान लड़की जिसे मिल जाये.उसकी तो किस्मत ही खुल जाये.' मेरी बात सुन कर वो और इठलाने लगी।
'अब अन्दर भी चलो. ' मुझे वो धक्का देते हुए बोली.'बोलो अब क्या इरादा है.!'
'बस एक मीठा सा चुम्मा.' मैंने शरारत से कहा।
'है हिम्मत तो ले लो.!' उसने हंस कर कहा।
'ऐसे नहीं. पहले अपनी आँखें बंद करो.फिर देखो मेरा कमाल.'
उसने अपनी आँखें बन्द कर ली और अपना गोरा और चिकना चेहरा आगे कर दिया. मैंने उसके होंठ पर अपने होंठ रख दिये. उसके कांपते होंठो का स्पर्श मुझे रोमांचित कर गया। एकदम नरम होंठ.गुलाब की पंखुड़ियों की तरह. हम दोनों एक दूसरे के होंठो को चूसने लगे. दोनों ही मदहोश होने लगे। कुछ देर बाद अलग हुए तो दोनों के चेहरे की रंगत बदली हुई थी। मेरा लण्ड खड़ा हो चुका था। उसकी आंखों में भी गुलाबी डोरे खिंच चुके थे।
दिव्या ने थोड़ा सा शर्माते हुए और फिर से आँखें बन्द करके कहा,'जो.मेरी छातियों को पकड़ लो.हाय. मसल डालो.' उसने अपनी छाती आगे को उभार दी, उसके तने हुए उरोज बाहर को उभर आये। मैंने उसकी चूंचियो पर अपना हाथ रख दिया। और हौले हौले से दबाने लगा। उसके मुख से सिसकारी निकलने लगी। वो भी मेरे हाथों पर ज्यादा दबाने के लिये और दबाव डालने लगी।
मैंने उसकी कमर में हाथ डाल कर एक हाथ से उसके उभारों को मसलना शुरू कर दिया और अब मेरी कमर वाला हाथ चूतड़ों के ऊपर आ कर थम गया। मेरे हाथ उसके बोबे और चूतड़ दबा रहे थे और दिव्या अपने जिस्म को मेरे जिस्म से बल खा कर रगड़ रही थी। उसके मुँह से आह. हाय. मां री. जैसी सिसकारियाँ निकल रही थी। मैंने उसे दीवार से सटा कर उसकी चूत को पकड़ कर दबा दी। वो चिहुंक उठी.
'हाय छोड़ दे जोऽऽऽ. मैं मर गई.' वो मदहोश सी झूम गई। मैंने उसकी चूत नहीं छोड़ी. स्कर्ट के बाहर से ही उसकी चूत मसलता रहा. उसकी चूत पानी छोड़ रही थी. मेरे हाथ को गीलापन लगने लगा था।
वो मस्ती में झुकने लगी. पर उसने मेरा हाथ नहीं छुड़ाया. 'क्या कर रहे हो जोऽऽऽ. मुझे मार डालोगे क्या???. अब बस अब.नहीं रहा जा रहा है.' उसकी उत्तेजना बहुत बढ़ गई थी. बेहाल हुई जा रही थी.
मैंने उसे अपनी बाहों में उठाया और प्यार से उसे बिस्तर पर लेटा दिया। उसकी आँखें बंद थी। मैंने उसका स्कर्ट ऊपर कर दिया. उसकी पानी छोड़ती हुई गीली चूत सामने थी। गुलाबी रंग. हल्की भूरी भूरी झांटे. चूत के दोनों लब फ़ड़फ़ड़ा रहे थे. मैंने अपनी पैन्ट उतार दी. और अपना मोटा और तन्नाया हुआ लण्ड उसकी पनीली चूत पर रख दिया। चिकनापन इतना था कि रखते ही सुपाड़ा अन्दर घुस पड़ा और छेद में उतर गया।
'घुसा दे रे. हाय. जरा जोर लगा दे.जो.' उसकी बैचेनी बढ़ रही थी. पूरा लण्ड लेने को उतावली हो रही थी. मैं उस पर झुक पड़ा. और जोर लगा कर लण्ड अन्दर सरकाने लगा। वो भी अपनी चूत का पूरा जोर लगा रही थी। जब दोनों और बेकरारी बराबर हो तब भला तेजी को कौन रोक सकता था। वो भरपूर जवान. खिलती हुई कली. पूरा जोश. नतीजा ये कि धक्का पर धक्का. गजब की तेजी. चूत का उछाल. लण्ड को सटासट चला रहा था। मैंने उसके बोबे भींच लिये.
'और जोर से भींचो. मेरे राजा. चोद दो आज मुझे.!' उसकी वासना बढ़ती जा रही थी. मेरा लण्ड पूरी गहराई तक पहुंच रहा था. उसकी चूत जवान थी.कोई भी लण्ड पूरा ले सकती थी। मेरा लण्ड भी मानो कम लम्बा लग रहा था।
अचानक मेरे चूतड़ पीछे से किसी ने दबा दिये. मैंने देखा तो सरोज थी.चुदाई के जोश में वो कब आई पता ही नहीं चला। उसने मुझे इशारा किया। मैंने समझ गया. मैंने तुरन्त ही दिव्या के बोबे जोर जोर से मसलने और खींचने लगा। उसने भी मेरे चूतड़ दबाना चालू रखा।
'जो मत करो. मैं झड जाऊंगी. हाऽऽऽय ना करो.' पर मैंने बेरहमी से दिव्या के बोबे मसलना जारी रखा. और धक्के चूत में गड़ा कर मारने लगा। उसे जबर्दस्त चुदाई चाहिये थी।
'मैं मर गई. राम रे. चुद गई. मेरी फ़ाड़ डाल जो. हाय मैं गई.' उसके जिस्म में उबाल आ गया था। उसे नहीं पता था कि उसकी मां उसके पास खड़ी है। मेरी उत्तेजना भी बहुत बढ़ गई थी. पर अब दिव्या का शरीर ऐंठने लग गया था। वो मुझे अपनी ओर जोर से खींचने लगी थी। अचानक उसने पूरी ताकत से मुझे चिपका लिया और उसकी चूत लहरा उठी।
वो झड़ने लगी थी।
सरोज ने दिव्या का जिस्म जोर जोर से सहलाना शुरु कर दिया था। उसकी चूत का कसना और ढीला होना.उसका पानी छोड़ना मुझे बहुत सुहाना लग रहा था। सरोज बराबर उसका जिस्म सहलाये जा रही थी।
'झड़ जा बेटी. निकाल दे पूरा पानी.' सरोज उसे प्यार से कह रही थी।
'मांऽऽऽ. हाय मेरी मां ऽऽऽ. तेरी बेटी तो चुद गई. जो ने तो मेरा दम निकाल दिया.' दिव्या हांफ़ते हुए बोली। मैंने अपना लण्ड दिव्या की चूत से बाहर निकाल दिया।
'लेकिन मेरा लण्ड तो देखो ना.अभी तक ये फ़ुफ़कार रहा है. सरोज तुम ही शान्त कर दो.' मैंने अपनी बात भी कही. दिव्या भी अब बिस्तर से उठ चुकी थी।
'जो.मम्मी की गाण्ड मार दो. मां की गाण्ड बहुत नरम है.!' अचानक दिव्या ने मुझे सुझाया।
सरोज ने शरम से अपना मुख छिपा लिया। मैंने सरोज को तुरन्त घोड़ी बना दिया। और साड़ी खींच दी। सरोज की गोरे गोरे चूतड़ों की दोनों फ़ांके सामने आ गई। सरोज ने अपनी दोनों टांगें फ़ैला कर अपने गाण्ड का छेद खोल दिया। फिर मुझसे शर्माते हुए बोली,'हाय. मत करो जो. मैं मर जाऊंगी.' फिर दिव्या की तरफ़ देखा -' दिव्या तू जा ना यहाँ से.'
'मां, मेरे सामने ही गाण्ड चुदवा लो ना.! मुझे भी तो एक इसका एक्स्पीरीएन्स चाहिये ना.!'
'चल हट. बेशरम. तेरे सामने चुदूंगी तो शरम नहीं आयेगी?'
'मैं भी तो आपके सामने चुदी थी ना. जो लग जाओ ना अब.' दिव्या ने पास पड़ी तेल की शीशी से तेल मां की गाण्ड में लगा दिया. 'अब चोद दो मां की गाण्ड को.!'
मुझे लगा कि बस स्वर्ग है तो यहीं है. मां बेटी मुझसे इतने उत्साह से चुदवा रही थी.मैं तो सातवें आसमान पर पहुंच गया। मैंने अपना लण्ड सरोज की गाण्ड के छेद पर लगा दिया और जोर लगाया, छेद में तेल भरा हुआ था मेरा सुपाड़ा फ़क की आवाज करता हुआ छेद में फ़ंस गया।
'उईऽऽ.मां. हाय रे.घुस गया.!' सरोज सिसक उठी। दिव्या अपनी मां के बोबे पकड़ कर धीरे धीरे मलने लगी और प्यार करने लगी।
'जो. मेरी प्यारी मां को तबियत से चोदो. मां को आनन्द से भर दो. देखो ना मां को कितना अच्छा लग रहा है.' दिव्या मां की ओर प्यार से देख रही थी। सरोज ने अपनी आँखें बन्द कर ली थी।
मैं अब अपना लण्ड जोर लगा कर अन्दर सरकाने लगा। मेरे लण्ड को छोटे से छेद में घुसने के कारण तेज मीठा सा सा मजा आने लगा। पर सरोज ने अपने दांत भींच लिये। उसे हल्का सा दर्द हो रहा था।
दिव्या मां को मजा देने के लिये उसके बोबे मसल रही थी। मेरा लण्ड गाण्ड में पूरा घुस चुका था। सरोज ने मुझे मुड़ कर देखा और आंख मार दी.
'लण्ड है या लोहा. मेरी तो फ़ाड़ के रख दी. अब मारो ना जोर से गाण्ड को.'
मैंने हरी झण्डी पाते ही स्पीड बढ़ा दी। वो सिसक उठी। मजे में उसकी फिर आँखें बन्द होने लगी।
'चोद दे मेरी मां को. प्यार से भर दो मां को. मेरी प्यारी मां.' अब दिव्या सरोज को चूमने लगी थी। बोबे पर तो दिव्या ने कब्जा जमा रखा था। मैंने कमर में हाथ डाल कर उसकी चूत में अपनी अंगुली डाल दी। और डबल चुदाई करने लगा। उसका दाना मसलने लगा। उसे तेज मजा आने लगा।
'हाय रे छोड़ दे अब रे. लगा.जोर से लगा. मेरी मांऽऽऽ. मार दी रे मेरी.' सरोज ना जाने क्या क्या कहती रही। उसकी गाण्ड अब मक्खन की तरह चिकनी हो गई थी। लण्ड सटासट चल रहा था। अति उत्तेजना से उसका दाना अचानक ही फ़ड़फ़ड़ा उठा और सरोज झड़ने लगी। ये देख कर कर दिव्या ने भी मां को कस लिया।
मैंने भी झड़ने के चक्कर में स्पीड बढ़ा दी। मेरा सुपाड़ा फ़ूल कर कुप्पा हो रहा था। सहनशीलता सीमाएं पार करती जा रही थी और आखिर अन्तिम पड़ाव आ ही गया। मैंने तुरन्त अपना लण्ड बाहर निकाल लिया। दिव्या ने देखते ही देखते मेरे लण्ड को मुठ्ठी में भर लिया और कस कर दबा कर मुठ मार दिया। मेरे लण्ड ने पिचकारी लम्बी और दूर तक उछाल दी।
'हाय मम्मी. देखो तो. माल तो फ़व्वारे की तरह निकल रहा है.'
सरोज ने बिना समय गवांये झट से मेरा लण्ड मुख में भर लिया. अब वीर्य सरोज के मुख में भर रहा था. और वो उसे एक ही घूंट में पी गई। अब वह बचे खुचे वीर्य को भी निचोड़ रही थी. दिव्या अपनी मां की इस हरकत को ध्यान से देख रही थी.
'मम्मी. ये क्या गन्दापना कर रही हो. इसे भी कोई पीता है क्या?'
मैंने दिव्या को समझाया कि ये तो पौष्टिक होता है और आनन्ददायक होता है. दिव्या ने कपड़े से मां की गाण्ड का तेल पोंछ दिया फिर मेरा लण्ड भी साफ़ कर दिया। सरोज ने दिव्या को गले लगा लिया। और चूमने लगी.
'देखा जो.माँ को तुमने मस्त कर दिया. मुझे बहुत अच्छा लगा.मेरी प्यारी मांऽऽ.' कह कर सरोज से अलग हो गई।
मैंने सरोज से बात पलटते हुए कहा- 'आज सुधीर नहीं दिख रहा है.?'
'वो चारों आज शाम को गांव जा रहे हैं न. देर से आयेगा.' सुनते ही मैं चौकन्ना हो गया।
'अब तो वो तुम दोनों को पीटता तो नहीं है ना.'
'वो जंगली है. कल देखो मुझे कितना मारा. दिव्या के तो बोबे तक नोच डाले. साला मरता भी तो नहीं है.हमारी जिन्दगी नर्क बना रखी है' कह कर सरोज ने मेरे सीने पर सर रख दिया। दिव्या भी मां की पीठ से चिपक कर रोने लगी। तो सच में वो इतना निर्दयी और क्रूर है।
मैंने उन्हें अलग करते हुए कहा.'मुझे अब चलना चाहिये.शाम को आऊंगा।' मैं मुड़ कर बाहर आ गया। वो दोनों मुझे प्यार से निहारते रही।
मैं तुरन्त पुलिस स्टेशन गया और अंकल से मिला. उन्हें सब कुछ बताया. कि वो सभी गांव जाने की तैयारी में है।
'शायद उन्हें भनक लग गई है. चलो.' उन्होंने जीप तैयार की और सभी सिपाहियो को आज्ञा दी। मैंने अपनी बाईक उठाई और उनके आगे आगे चला। पान-वाले की दुकान पर पहला छापा मारा।
मैंने भाग कर टूसीटर पर बैठे मौन्टी और सुरजीत को जा दबोचा। मौन्टी ने मुझे पीछे धक्का दे दिया और मौके की नजाकत देख कर भागने लगा। मैंने उछल कर एक फ़्लाईंग किक मार कर उसे गिरा दिया।
इतने में दो पुलिस वालों ने उन्हें धर दबोचा। हैप्पी का पीछ करके अंकल ने उसे हथकड़ी पहना दी। पान की दुकान को सील कर दी। जीप वहां से कॉलेज पहुंची। मुझे सुधीर पर नजर रखने को कहा और साथ में दो पुलिस वालों को भी हिदायत दी। अंकल प्रिन्सिपल से मिलने ओफ़िस में चले गये। कुछ ही समय में अंकल और प्रिन्सिपल सुधीर की क्लास के सामने थे।
सुधीर देखते ही समझ गया और खिड़की से कूद कर भागने लगा। पर खिड़की के बाहर मुझे देखते ही उसके होश उड गये। उसे हथकड़ी डाल दी गई। समय पर पूरा अभियान निपट गया। चारों दोस्तों को और पान वाले को हवालात में बंद कर दिया गया। अब चला तलाशी अभियान ।
पुलिस मेरे साथ सबसे पहले सुधीर के यहाँ पहुंची। सुधीर भी साथ था। दिव्या और सरोज ने मुझे और सुधीर को पुलिस के साथ देखा तो घबरा गई।
'साब इसने कुछ नहीं किया. जो तो अच्छा लड़का है.' अंकल ने मेरी तरफ़ देखा।
'क्या बात है जो. बड़ी तरफ़दारी हो रही है. ये लो. अब इसका ध्यान रखना वरना साले की थाने में इसकी टांगें तोड दूंगा.' अंकल में मेरी तरफ़ गुस्से में देखा और मुझे सरोज की तरफ़ धक्का दे दिया।
'जी. जी. मैं ध्यान रखूंगी.' घबराई सी सरोज मेरा हाथ पकड़ कर खड़ी हो गई।
'साली. हरामजादी. जो के साथ खड़ी है. आने तो दे मुझे. तुम दोनों मां बेटी के हाथ पांव ना तोड़े तो देखना !'
मैंने सुधीर के कान में कहा.'तू फ़िकर मत कर यार. मैं तेरी मां और बहन को रोज़ चोदूंगा. मस्त चीज़ें है दोनों.'
'भड़वे. तेरी तो मैं. ' उसी समय अंकल का एक हाथ उसके मुँह पर पड़ा. उसके होंठो से खून छलक पड़ा।
मैंने सुधीर की तरफ़ मुस्करा कर देखा. 'तू क्या समझा था. कामिनी के साथ तूने जो किया था. वो चुपचाप बैठती.' अब उसकी नजरें ऊपर उठी. वो समझ चुका था. कि ये सब क्यों हुआ है. उसका सर एक बार फिर झुक गया।
'आगे से अगर ये जो. सुधीर के साथ दिखा तो साला जेल जायेगा.' अंकल अपने डायलोग बोले जा रहे थे। सरोज और दिव्या को अब भी कुछ समझ में नहीं आया। उनकी नजर में बस सुधीर एक अपराधी था।
कामिनी का बदला उन दोनों के समझ में नहीं आया था। इतने में पुलिस वाले सारे घर की तलाशी ले कर कुछ समान ले कर आ गये। उसे वहीं पर सील कर दिया और हम तीनों के उस पर हस्ताक्षर करवा लिये।
वो मुझे छोड़ कर आगे तलाशी अभियान में निकल गये। मैं अंकल की अदाओं पर मुसकरा उठा। सरोज और दिव्या मुझसे प्यार करके लिपट कर रोने लगे। मैंने उन्हें समझाया
'मैं कोई चोर थोड़े ही हूँ. मुझे तो बस इन्होंने यहां से निकलते देखा तो पकड़ लिया. हां सुधीर ड्रग्स बेचने के चक्कर में पकड़ा गया है जाने कितने सालों के लिये अन्दर जायेगा।
उन दोनों ने सुधीर से पीछा छूटने पर चैन की सांस ली. उनकी नजर में मैं पुलिस से बच गया और मुझे प्यार से बिस्तर पर सुला दिया। दोनों एक एक करके मुझे प्यार करने लगी. अचानक मुझे कामिनी का ख्याल आया।
'मैं शाम को आऊंगा. रात भर मजे करेंगे. बाय.' मैं सीधा वहां से कामिनी के पास आया। उसे सारी बात बताई. कामिनी खुश थी. उसने मुझे प्यार से चूम लिया.
'बात कहां तक पहुंची. कार्यक्रम चालू है.?' कामिनी और नेहा ने मुस्करा कर पूछा्।
'दोनों ही बहुत सेक्सी है. खूब मजा आता है और अब तो दोनों ही मेरी फ़ेन है. क्यों जल गई ना.' मैंने शरारत की नजरो से देखा।
दोनों ने मुझे पकड़ लिया और मेरी पिटाई शुरू कर दी.
मैं पुलिस स्टेशन से बाहर आया और अपनी मोटर साईकल उठा कर सीधे सुधीर के घर आ गया। अभी सवेरे के साढ़े आठ ही बजे थे.हमेशा की तरह सुधीर घर पर नहीं था। उसे शायद यह मालूम नहीं था कि आज उसका इस घर में अन्तिम दिन है। घर में सरोज नहीं थी.दिव्या ही मिली।
'आज तो जल्दी आ गये. क्या हुआ रात को नींद नहीं आई क्या.?' उसकी चुलबुली हरकत मेरे मन को बहुत अच्छी लगी।
'दिव्या.बस रात को तो मैं तुम्हारे ही सपने देखता रहा. तुम्हारे जैसी कमसिन और जवान लड़की जिसे मिल जाये.उसकी तो किस्मत ही खुल जाये.' मेरी बात सुन कर वो और इठलाने लगी।
'अब अन्दर भी चलो. ' मुझे वो धक्का देते हुए बोली.'बोलो अब क्या इरादा है.!'
'बस एक मीठा सा चुम्मा.' मैंने शरारत से कहा।
'है हिम्मत तो ले लो.!' उसने हंस कर कहा।
'ऐसे नहीं. पहले अपनी आँखें बंद करो.फिर देखो मेरा कमाल.'
उसने अपनी आँखें बन्द कर ली और अपना गोरा और चिकना चेहरा आगे कर दिया. मैंने उसके होंठ पर अपने होंठ रख दिये. उसके कांपते होंठो का स्पर्श मुझे रोमांचित कर गया। एकदम नरम होंठ.गुलाब की पंखुड़ियों की तरह. हम दोनों एक दूसरे के होंठो को चूसने लगे. दोनों ही मदहोश होने लगे। कुछ देर बाद अलग हुए तो दोनों के चेहरे की रंगत बदली हुई थी। मेरा लण्ड खड़ा हो चुका था। उसकी आंखों में भी गुलाबी डोरे खिंच चुके थे।
दिव्या ने थोड़ा सा शर्माते हुए और फिर से आँखें बन्द करके कहा,'जो.मेरी छातियों को पकड़ लो.हाय. मसल डालो.' उसने अपनी छाती आगे को उभार दी, उसके तने हुए उरोज बाहर को उभर आये। मैंने उसकी चूंचियो पर अपना हाथ रख दिया। और हौले हौले से दबाने लगा। उसके मुख से सिसकारी निकलने लगी। वो भी मेरे हाथों पर ज्यादा दबाने के लिये और दबाव डालने लगी।
मैंने उसकी कमर में हाथ डाल कर एक हाथ से उसके उभारों को मसलना शुरू कर दिया और अब मेरी कमर वाला हाथ चूतड़ों के ऊपर आ कर थम गया। मेरे हाथ उसके बोबे और चूतड़ दबा रहे थे और दिव्या अपने जिस्म को मेरे जिस्म से बल खा कर रगड़ रही थी। उसके मुँह से आह. हाय. मां री. जैसी सिसकारियाँ निकल रही थी। मैंने उसे दीवार से सटा कर उसकी चूत को पकड़ कर दबा दी। वो चिहुंक उठी.
'हाय छोड़ दे जोऽऽऽ. मैं मर गई.' वो मदहोश सी झूम गई। मैंने उसकी चूत नहीं छोड़ी. स्कर्ट के बाहर से ही उसकी चूत मसलता रहा. उसकी चूत पानी छोड़ रही थी. मेरे हाथ को गीलापन लगने लगा था।
वो मस्ती में झुकने लगी. पर उसने मेरा हाथ नहीं छुड़ाया. 'क्या कर रहे हो जोऽऽऽ. मुझे मार डालोगे क्या???. अब बस अब.नहीं रहा जा रहा है.' उसकी उत्तेजना बहुत बढ़ गई थी. बेहाल हुई जा रही थी.
मैंने उसे अपनी बाहों में उठाया और प्यार से उसे बिस्तर पर लेटा दिया। उसकी आँखें बंद थी। मैंने उसका स्कर्ट ऊपर कर दिया. उसकी पानी छोड़ती हुई गीली चूत सामने थी। गुलाबी रंग. हल्की भूरी भूरी झांटे. चूत के दोनों लब फ़ड़फ़ड़ा रहे थे. मैंने अपनी पैन्ट उतार दी. और अपना मोटा और तन्नाया हुआ लण्ड उसकी पनीली चूत पर रख दिया। चिकनापन इतना था कि रखते ही सुपाड़ा अन्दर घुस पड़ा और छेद में उतर गया।
'घुसा दे रे. हाय. जरा जोर लगा दे.जो.' उसकी बैचेनी बढ़ रही थी. पूरा लण्ड लेने को उतावली हो रही थी. मैं उस पर झुक पड़ा. और जोर लगा कर लण्ड अन्दर सरकाने लगा। वो भी अपनी चूत का पूरा जोर लगा रही थी। जब दोनों और बेकरारी बराबर हो तब भला तेजी को कौन रोक सकता था। वो भरपूर जवान. खिलती हुई कली. पूरा जोश. नतीजा ये कि धक्का पर धक्का. गजब की तेजी. चूत का उछाल. लण्ड को सटासट चला रहा था। मैंने उसके बोबे भींच लिये.
'और जोर से भींचो. मेरे राजा. चोद दो आज मुझे.!' उसकी वासना बढ़ती जा रही थी. मेरा लण्ड पूरी गहराई तक पहुंच रहा था. उसकी चूत जवान थी.कोई भी लण्ड पूरा ले सकती थी। मेरा लण्ड भी मानो कम लम्बा लग रहा था।
अचानक मेरे चूतड़ पीछे से किसी ने दबा दिये. मैंने देखा तो सरोज थी.चुदाई के जोश में वो कब आई पता ही नहीं चला। उसने मुझे इशारा किया। मैंने समझ गया. मैंने तुरन्त ही दिव्या के बोबे जोर जोर से मसलने और खींचने लगा। उसने भी मेरे चूतड़ दबाना चालू रखा।
'जो मत करो. मैं झड जाऊंगी. हाऽऽऽय ना करो.' पर मैंने बेरहमी से दिव्या के बोबे मसलना जारी रखा. और धक्के चूत में गड़ा कर मारने लगा। उसे जबर्दस्त चुदाई चाहिये थी।
'मैं मर गई. राम रे. चुद गई. मेरी फ़ाड़ डाल जो. हाय मैं गई.' उसके जिस्म में उबाल आ गया था। उसे नहीं पता था कि उसकी मां उसके पास खड़ी है। मेरी उत्तेजना भी बहुत बढ़ गई थी. पर अब दिव्या का शरीर ऐंठने लग गया था। वो मुझे अपनी ओर जोर से खींचने लगी थी। अचानक उसने पूरी ताकत से मुझे चिपका लिया और उसकी चूत लहरा उठी।
वो झड़ने लगी थी।
सरोज ने दिव्या का जिस्म जोर जोर से सहलाना शुरु कर दिया था। उसकी चूत का कसना और ढीला होना.उसका पानी छोड़ना मुझे बहुत सुहाना लग रहा था। सरोज बराबर उसका जिस्म सहलाये जा रही थी।
'झड़ जा बेटी. निकाल दे पूरा पानी.' सरोज उसे प्यार से कह रही थी।
'मांऽऽऽ. हाय मेरी मां ऽऽऽ. तेरी बेटी तो चुद गई. जो ने तो मेरा दम निकाल दिया.' दिव्या हांफ़ते हुए बोली। मैंने अपना लण्ड दिव्या की चूत से बाहर निकाल दिया।
'लेकिन मेरा लण्ड तो देखो ना.अभी तक ये फ़ुफ़कार रहा है. सरोज तुम ही शान्त कर दो.' मैंने अपनी बात भी कही. दिव्या भी अब बिस्तर से उठ चुकी थी।
'जो.मम्मी की गाण्ड मार दो. मां की गाण्ड बहुत नरम है.!' अचानक दिव्या ने मुझे सुझाया।
सरोज ने शरम से अपना मुख छिपा लिया। मैंने सरोज को तुरन्त घोड़ी बना दिया। और साड़ी खींच दी। सरोज की गोरे गोरे चूतड़ों की दोनों फ़ांके सामने आ गई। सरोज ने अपनी दोनों टांगें फ़ैला कर अपने गाण्ड का छेद खोल दिया। फिर मुझसे शर्माते हुए बोली,'हाय. मत करो जो. मैं मर जाऊंगी.' फिर दिव्या की तरफ़ देखा -' दिव्या तू जा ना यहाँ से.'
'मां, मेरे सामने ही गाण्ड चुदवा लो ना.! मुझे भी तो एक इसका एक्स्पीरीएन्स चाहिये ना.!'
'चल हट. बेशरम. तेरे सामने चुदूंगी तो शरम नहीं आयेगी?'
'मैं भी तो आपके सामने चुदी थी ना. जो लग जाओ ना अब.' दिव्या ने पास पड़ी तेल की शीशी से तेल मां की गाण्ड में लगा दिया. 'अब चोद दो मां की गाण्ड को.!'
मुझे लगा कि बस स्वर्ग है तो यहीं है. मां बेटी मुझसे इतने उत्साह से चुदवा रही थी.मैं तो सातवें आसमान पर पहुंच गया। मैंने अपना लण्ड सरोज की गाण्ड के छेद पर लगा दिया और जोर लगाया, छेद में तेल भरा हुआ था मेरा सुपाड़ा फ़क की आवाज करता हुआ छेद में फ़ंस गया।
'उईऽऽ.मां. हाय रे.घुस गया.!' सरोज सिसक उठी। दिव्या अपनी मां के बोबे पकड़ कर धीरे धीरे मलने लगी और प्यार करने लगी।
'जो. मेरी प्यारी मां को तबियत से चोदो. मां को आनन्द से भर दो. देखो ना मां को कितना अच्छा लग रहा है.' दिव्या मां की ओर प्यार से देख रही थी। सरोज ने अपनी आँखें बन्द कर ली थी।
मैं अब अपना लण्ड जोर लगा कर अन्दर सरकाने लगा। मेरे लण्ड को छोटे से छेद में घुसने के कारण तेज मीठा सा सा मजा आने लगा। पर सरोज ने अपने दांत भींच लिये। उसे हल्का सा दर्द हो रहा था।
दिव्या मां को मजा देने के लिये उसके बोबे मसल रही थी। मेरा लण्ड गाण्ड में पूरा घुस चुका था। सरोज ने मुझे मुड़ कर देखा और आंख मार दी.
'लण्ड है या लोहा. मेरी तो फ़ाड़ के रख दी. अब मारो ना जोर से गाण्ड को.'
मैंने हरी झण्डी पाते ही स्पीड बढ़ा दी। वो सिसक उठी। मजे में उसकी फिर आँखें बन्द होने लगी।
'चोद दे मेरी मां को. प्यार से भर दो मां को. मेरी प्यारी मां.' अब दिव्या सरोज को चूमने लगी थी। बोबे पर तो दिव्या ने कब्जा जमा रखा था। मैंने कमर में हाथ डाल कर उसकी चूत में अपनी अंगुली डाल दी। और डबल चुदाई करने लगा। उसका दाना मसलने लगा। उसे तेज मजा आने लगा।
'हाय रे छोड़ दे अब रे. लगा.जोर से लगा. मेरी मांऽऽऽ. मार दी रे मेरी.' सरोज ना जाने क्या क्या कहती रही। उसकी गाण्ड अब मक्खन की तरह चिकनी हो गई थी। लण्ड सटासट चल रहा था। अति उत्तेजना से उसका दाना अचानक ही फ़ड़फ़ड़ा उठा और सरोज झड़ने लगी। ये देख कर कर दिव्या ने भी मां को कस लिया।
मैंने भी झड़ने के चक्कर में स्पीड बढ़ा दी। मेरा सुपाड़ा फ़ूल कर कुप्पा हो रहा था। सहनशीलता सीमाएं पार करती जा रही थी और आखिर अन्तिम पड़ाव आ ही गया। मैंने तुरन्त अपना लण्ड बाहर निकाल लिया। दिव्या ने देखते ही देखते मेरे लण्ड को मुठ्ठी में भर लिया और कस कर दबा कर मुठ मार दिया। मेरे लण्ड ने पिचकारी लम्बी और दूर तक उछाल दी।
'हाय मम्मी. देखो तो. माल तो फ़व्वारे की तरह निकल रहा है.'
सरोज ने बिना समय गवांये झट से मेरा लण्ड मुख में भर लिया. अब वीर्य सरोज के मुख में भर रहा था. और वो उसे एक ही घूंट में पी गई। अब वह बचे खुचे वीर्य को भी निचोड़ रही थी. दिव्या अपनी मां की इस हरकत को ध्यान से देख रही थी.
'मम्मी. ये क्या गन्दापना कर रही हो. इसे भी कोई पीता है क्या?'
मैंने दिव्या को समझाया कि ये तो पौष्टिक होता है और आनन्ददायक होता है. दिव्या ने कपड़े से मां की गाण्ड का तेल पोंछ दिया फिर मेरा लण्ड भी साफ़ कर दिया। सरोज ने दिव्या को गले लगा लिया। और चूमने लगी.
'देखा जो.माँ को तुमने मस्त कर दिया. मुझे बहुत अच्छा लगा.मेरी प्यारी मांऽऽ.' कह कर सरोज से अलग हो गई।
मैंने सरोज से बात पलटते हुए कहा- 'आज सुधीर नहीं दिख रहा है.?'
'वो चारों आज शाम को गांव जा रहे हैं न. देर से आयेगा.' सुनते ही मैं चौकन्ना हो गया।
'अब तो वो तुम दोनों को पीटता तो नहीं है ना.'
'वो जंगली है. कल देखो मुझे कितना मारा. दिव्या के तो बोबे तक नोच डाले. साला मरता भी तो नहीं है.हमारी जिन्दगी नर्क बना रखी है' कह कर सरोज ने मेरे सीने पर सर रख दिया। दिव्या भी मां की पीठ से चिपक कर रोने लगी। तो सच में वो इतना निर्दयी और क्रूर है।
मैंने उन्हें अलग करते हुए कहा.'मुझे अब चलना चाहिये.शाम को आऊंगा।' मैं मुड़ कर बाहर आ गया। वो दोनों मुझे प्यार से निहारते रही।
मैं तुरन्त पुलिस स्टेशन गया और अंकल से मिला. उन्हें सब कुछ बताया. कि वो सभी गांव जाने की तैयारी में है।
'शायद उन्हें भनक लग गई है. चलो.' उन्होंने जीप तैयार की और सभी सिपाहियो को आज्ञा दी। मैंने अपनी बाईक उठाई और उनके आगे आगे चला। पान-वाले की दुकान पर पहला छापा मारा।
मैंने भाग कर टूसीटर पर बैठे मौन्टी और सुरजीत को जा दबोचा। मौन्टी ने मुझे पीछे धक्का दे दिया और मौके की नजाकत देख कर भागने लगा। मैंने उछल कर एक फ़्लाईंग किक मार कर उसे गिरा दिया।
इतने में दो पुलिस वालों ने उन्हें धर दबोचा। हैप्पी का पीछ करके अंकल ने उसे हथकड़ी पहना दी। पान की दुकान को सील कर दी। जीप वहां से कॉलेज पहुंची। मुझे सुधीर पर नजर रखने को कहा और साथ में दो पुलिस वालों को भी हिदायत दी। अंकल प्रिन्सिपल से मिलने ओफ़िस में चले गये। कुछ ही समय में अंकल और प्रिन्सिपल सुधीर की क्लास के सामने थे।
सुधीर देखते ही समझ गया और खिड़की से कूद कर भागने लगा। पर खिड़की के बाहर मुझे देखते ही उसके होश उड गये। उसे हथकड़ी डाल दी गई। समय पर पूरा अभियान निपट गया। चारों दोस्तों को और पान वाले को हवालात में बंद कर दिया गया। अब चला तलाशी अभियान ।
पुलिस मेरे साथ सबसे पहले सुधीर के यहाँ पहुंची। सुधीर भी साथ था। दिव्या और सरोज ने मुझे और सुधीर को पुलिस के साथ देखा तो घबरा गई।
'साब इसने कुछ नहीं किया. जो तो अच्छा लड़का है.' अंकल ने मेरी तरफ़ देखा।
'क्या बात है जो. बड़ी तरफ़दारी हो रही है. ये लो. अब इसका ध्यान रखना वरना साले की थाने में इसकी टांगें तोड दूंगा.' अंकल में मेरी तरफ़ गुस्से में देखा और मुझे सरोज की तरफ़ धक्का दे दिया।
'जी. जी. मैं ध्यान रखूंगी.' घबराई सी सरोज मेरा हाथ पकड़ कर खड़ी हो गई।
'साली. हरामजादी. जो के साथ खड़ी है. आने तो दे मुझे. तुम दोनों मां बेटी के हाथ पांव ना तोड़े तो देखना !'
मैंने सुधीर के कान में कहा.'तू फ़िकर मत कर यार. मैं तेरी मां और बहन को रोज़ चोदूंगा. मस्त चीज़ें है दोनों.'
'भड़वे. तेरी तो मैं. ' उसी समय अंकल का एक हाथ उसके मुँह पर पड़ा. उसके होंठो से खून छलक पड़ा।
मैंने सुधीर की तरफ़ मुस्करा कर देखा. 'तू क्या समझा था. कामिनी के साथ तूने जो किया था. वो चुपचाप बैठती.' अब उसकी नजरें ऊपर उठी. वो समझ चुका था. कि ये सब क्यों हुआ है. उसका सर एक बार फिर झुक गया।
'आगे से अगर ये जो. सुधीर के साथ दिखा तो साला जेल जायेगा.' अंकल अपने डायलोग बोले जा रहे थे। सरोज और दिव्या को अब भी कुछ समझ में नहीं आया। उनकी नजर में बस सुधीर एक अपराधी था।
कामिनी का बदला उन दोनों के समझ में नहीं आया था। इतने में पुलिस वाले सारे घर की तलाशी ले कर कुछ समान ले कर आ गये। उसे वहीं पर सील कर दिया और हम तीनों के उस पर हस्ताक्षर करवा लिये।
वो मुझे छोड़ कर आगे तलाशी अभियान में निकल गये। मैं अंकल की अदाओं पर मुसकरा उठा। सरोज और दिव्या मुझसे प्यार करके लिपट कर रोने लगे। मैंने उन्हें समझाया
'मैं कोई चोर थोड़े ही हूँ. मुझे तो बस इन्होंने यहां से निकलते देखा तो पकड़ लिया. हां सुधीर ड्रग्स बेचने के चक्कर में पकड़ा गया है जाने कितने सालों के लिये अन्दर जायेगा।
उन दोनों ने सुधीर से पीछा छूटने पर चैन की सांस ली. उनकी नजर में मैं पुलिस से बच गया और मुझे प्यार से बिस्तर पर सुला दिया। दोनों एक एक करके मुझे प्यार करने लगी. अचानक मुझे कामिनी का ख्याल आया।
'मैं शाम को आऊंगा. रात भर मजे करेंगे. बाय.' मैं सीधा वहां से कामिनी के पास आया। उसे सारी बात बताई. कामिनी खुश थी. उसने मुझे प्यार से चूम लिया.
'बात कहां तक पहुंची. कार्यक्रम चालू है.?' कामिनी और नेहा ने मुस्करा कर पूछा्।
'दोनों ही बहुत सेक्सी है. खूब मजा आता है और अब तो दोनों ही मेरी फ़ेन है. क्यों जल गई ना.' मैंने शरारत की नजरो से देखा।
दोनों ने मुझे पकड़ लिया और मेरी पिटाई शुरू कर दी.