अभ्युदय जी मुझे लेकर रूम पर आ गए थे।
"रास्ते भर बक-बक करके भी थकी नहीं तुम?"
"क्यों? अब बातें इतनी सारी हैं तो क्या करूँ?"
"जाओ जाकर तैयार होकर आओ।"
"तैयार क्यों?मंदिर जाना है क्या?"
"तुम जाओ ना।तैयार होकर आओ।मैं आधे घंटे में आता हूँ।"
"ओके।"
मैं रूम पर आ गई,एक पैर टूटा हो तो नहाना बड़ा मुश्किल होता है।पर जैसे तैसे नहाया गया और मैं रेडी हो गई।
भगवान जी को अगरबत्ती लगाई और अपनी गणेश,दुर्गा चालीसा पढ़ ली।भगवान से सब कुछ ठीक कर देने के लिए भी थैंक्यू कहा।
फोन बजा जानती थी किसका होगा।
लेकिन माँ का फोन था।
"हाँ माँ।"
"निशु कैसी हो?"
"क्या माँ, रोज एक ही सवाल?एक दिन में क्या अच्छी, क्या बुरा होना है?"
"दर्द कैसा है अब पैर में?"
"मैं ठीक हूँ।आपको पता रिया की शादी ही गई अच्छे से।अब जल्दी अंकल लोग मिलकर करवा देंगे।"
"अरे वाह मान गए सब?"
"आपको पता है क्या माँ?"
"हाँ बेटा पता है।"
"पंकज या रिया?"
"अभ्यु,अभ्यु ने बताया हमें?"
"क्या अभ्युदय जी ने?क्यों?"
"क्यों क्या होता है?हम बड़े है। पता होना चाहिए इसलिए।लेकिन रिया के पापा गलत कर रहे थे।इसलिए हमने भी कुछ नही कहा।"
"हम्म..अब सब ठीक हो जाएगा।पापा भैय्यू?"
"अभी आये नही ट्यूशन और आफिस से।"
"ठीक है माँ।"
"निशु,तुझे कोई पसन्द है शादी के लिए?"
"माँ,टाइम आने पर बता दूंगी।"
"हम्म..पर मैं बता दूँ मुझे पसन्द है वो।"
"बाय माँ।"
"शरमा गई?बाय।"
क्या ये माँ भी न? लेकिन माँ को पसंद कौन है? अभ्युदय जी या पंकज?
माँ तो हर समय पंकज-पकंज ही बोल रही थीं।कंही ऐसा तो नही के पंकज पसन्द है माँ को और वो सोच रही हैं कि मुझे भी पंकज ही नही ऐसा होना तो नही चाहिए।बाहर गाड़ी का हॉर्न बजा और मैं उठकर खड़ी हुई।
"तू तैयार है?"
"रिया, वाओ क्या लग रही है।"
रिया साड़ी पहन कर ऊपर से नीचे सज-धज कर खड़ी थी।हाथ मे एक मिठाई का डिब्बा भी था।
"चलें?"
"जाना कंहा है?"
"पहले तो भाभी को मिठाई दे दूं।फिर बताती हूँ।तू तब तक लॉक लगा।"
रिया चली गई।मैं ताला चाबी उठाकर दरवाजे तक आई।
"बू।"
"आउच।"
पीछे पलटी तो पंकज था।
"कमीने,जान लेनी है क्या?"
"दे दे यार।जान ही सही।"
"सुधरोगे नही न?"
"नही, कभी भी नहीं।तू हट मैं लगाता हूँ ताला। "
"ले पकड़।"
"चाबी के साथ हाथ भी दे दे।"
"हाँ जी क्यों नही।ख्यालों में सपनो में"
"भग जा।"
"किसके साथ?"
"मेरे..औऱ किसके?"
"चलोगे दोनो?या यंही रात करनी है?"
रिया चिल्लाई।रिया के साथ ऑन्टी भी बाहर आई थीं।
रिया ने आकर मेरा हाथ पकड़ लिया और बाहर गाड़ी तक ले आई।
"भाभी ये हैं रवीश।रवीश ये भाभी हैं,निशी की लैंडलॉर्ड।"
"नमस्ते भाभी।"
"बहुत सुंदर जोड़ी है।बहुत खुश रहिये आप दोनों।congratulation आपको।"
"थैंक्यू।"
मैं अब तक बैठ चुकी थी।लेकिन आज कार में ड्राइवर भैया नही थे।पीछे मैं रिया और रवीश थे सामने अभ्युदय जी और गाड़ी चला रहा था, हमारा नौटँकी पंकज।
"हम जा कंहा रहे हैं?" गाड़ी अभ्युदय जी की घर की तरफ ही जा रही थी पर मेडिकल पहुँचते तक मैंने पूछ ही लिया।
"आधा किलो सेब और लौंग पहले ही ले लो,वरना वंहा मिले नही तो दिक्कत हो जाएगी।"
"आपको भी पता है अभ्युदय जी?इसके दिमाग का स्क्रू न ढीला है।"
"माता रानी के दर्शन को?रवीश ये कुछ भी कहती है,त्रिपुर सुंदरी माँ से मिलकर आपको भी बहुत अच्छा लगेगा।"
गाड़ी रोककर सेब और लौंग ले ली गई, थी।हम सभी भुट्टे खाते और गप्पे मारते मन्दिर पहुँच गए थे।
"आप नहीं चलेंगे आज भी?"
"तुम जानती हो न निशी।फिर भी?मैं नहीं जाना चाहता अभी।"
"ठीक है।हम सब चलें?अभ्युदय जी नहीं जाएंगे।आप गाड़ी में ही बैठेंगे?या अंदर बेंच पर?"
"नहीं मैं यंही ठीक हूँ आज।ठंडक है आज बाहर।"
हम चारों प्रसाद लेकर अंदर चले गए।लाइन में लगकर ज्यादा देर नही लगी।आज मन्दिर में भीड़ कम ही थी।पंडित जो ने रिया रवीश को माला दी पहनने।रिया को प्रसाद में चूड़ियां और सिंदूर भी दिया।उन दोनों से अच्छे से पूजन करवाया।अब मैं और पंकज खड़े थे तो न जाने पंडित जी ने क्या सोच की उन्होंने मुझे भी प्रसाद में मंगलसूत्र और सिंदूर दे दिया।
"पंडित जी।सिर्फ प्रसाद।"
"नहीं बेटी। मेरी नही,माँ की मर्जी है।वो चाहती हैं तुम दोनों हमेशा खुश रहो साथ-साथ।"
"पंडित जी लेकिन?"
"माँ की मर्जी के आगे किसी की मर्जी नही चलती बेटी।आगे आ जाओ बेटा, टिका लगवाओ।तुम जल्दी ठीक हो जाओगी।पैर भी ठीक होगा जल्दी।"
पंकज ने सिर पर हाथ रख कर टिका लगवाया और कलावा भी बंधवाया।
पंडित जी के पैर छुए और प्रसाद के लिए हाथ बढ़ाया।
"चालीसा पूरी हो गई?"
"जी पंडित जी।लेकिन आपको कैसे पता कि मैं चालीसा पढ़ रहा हूँ?"
"बेटा माँ की आंखों में देखकर कोई बहुत देर तक कुछ नही मांगता और तुम्हे तो मिल गया है जो तुम माँ से मांगते हो?"
"कंहा पंडित जी?अभी कुछ नही मिला,न उम्मीद है।"
"बेटा माँ मुरादे पूरी करती हैं।ये बात एक दिन जरूर मानोगे।आना जरूर जब मुराद पूरी हो जाए।"
"जरूर पंडित जी।"
पंकज फिर एक तक माँ को देखता रहा।
"मैं जो चाहता हूँ वो तो आप जानती हो माँ।लेकिन वो भी किसी को चाहती है।कोशिश करना बिना दिल टूटे ही सब ठीक हो जाए।लेकिन निशी मेरी है माँ।सिर्फ मेरी।"
"हाँ जरूर होगी।चलो अब आगे बढ़ो और भक्तों को आने दो।"
पंडित जी ने पंकज को आगे सरका दिया।पीछे से निकल कर परिक्रमा करके पंकज भी हमारे पास आकर बैठ गया।
"बहुत शांति है यंहा।"
"हाँ रवीश,निशी भी हर खुशी, दुख, तकलीफ में माँ के पास आती है।मैंने सोचा तुम्हे भी दर्शन करवा दिए जाएं।"
"बढ़िया किया।आज तो मैं भी धन्य हो गया माँ के दर्शन कर के।"
"हमारे साथ रहोगे तो धन्य ही रहोगे।समझे?"
"हाँ नई नवेली दुल्हन जी।मैं सब समझ गया।"
मैं उठकर चलने को हुई तो पंकज आ गया।
"चल,गिर मत जाना।हाथ पकड़ ले।"
"गिर गई तो क्या होगा?"
"ज्यादा कुछ नही तेरी दूसरी टांग भी टूट सकती है बस।"
"तू न नालायक है एक नम्बर का।"
हम सभी गाड़ी में आ गए।मैंने अपने हाथ की अनामिका से अभ्युदय जी को टिका लगाया,प्रसाद देकर हम सभी गाड़ी में बैठ गए।रिया रवीश तो एक दूसरे की आंखों में ही डूबे जा रहे थे।मुझे पीछे बैठना असहज लग रहा था।
रास्ते मे एक-एक कप चाय और मंगोड़ी हरे धनिये की चटनी के साथ खाकर हम सभी अभ्युदय जी के घर आये।
"चलो अब अंदर भी।माँ से मिल लो।"
"जी दादा आज नही। कल।"
"क्यों?"
"दादा, रवीश का कहना है कि मिठाई बिना लिए नही।तो कल पकक्का।"
"कोई फॉर्मेलिटी की बात नही है रवीश।चलो आ जाओ।"
"समझा करिए न दादा।कल पक्का।"
"ठीक है।चलो निशी।"
"तू अभी यंही रुकेगी?"
"मशीन लगानी है न?"
"हम्म ठीक है कल मिलते हैं बाय।"
"बाय बाय।"