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Vasna Story मिस्टर & मिसेस पटेल (माँ-बेटा:-एक सच्ची घटना)

मुझे अंदर ही अंदर यह मेहसुस हुआ की में सच में बहुत खुश नसीब हु.
मुझे ऐसी एक लड़की मेरी बीवी के रूप में मिलि,
जो मुझे बचपन से आज तक इतना प्यार करती आयी, और आज भी इतना प्यार कर रही है,
और में जानता हु की ज़िन्दगी भर मुझे इतना ही प्यार करते रहेगी.
बचपन से वह मुझे हमेशा ज़ादा प्यार करती थी सिंगल परेंट्स के वजह से.
उनके दिल में हमेशा में रहता था.
उनके सारे सुख दुःख मुझे लेकर और मेरे चारों तरफ घुमते थे.
और आज नसीब ने हमे ज़िन्दगी के इस मोड़ पे लाया की जहाँ हम माँ बेटा होने पर भी हम दोनों को दुनियाका सबसे मजबुत और महत्पूर्ण एक बंधन में बांध दिया.

हमारे माँ बेटे का जो बंधन था उस मजबुत बंधन में तोह हम पहले से ही जुड़े है.
लेकिन आज इस नये रिश्ते का नये बंधन में अचानक हम दोनों और भी बहुत ज़ादा मजबूती से एक दूसरे से जुड़ गये मेरी माँ के प्रति जो प्यार है,
उसके साथ बीवी के लिए प्यार भी दिलसे निचोड़के सब उनको ही दे दिया.
और वह भी उनके ज़िन्दगी का जमा हुआ सारा प्यार उनके पति के लिए दे दिया.
अपने बेटे के लिए जो प्यार था, उसके साथ एक पत्नी का प्यार मिलाकर उनका दिल अपने बेटे के पास ओपन कर दिया.
और वह अपने दिल को आज एक मजबुत बंधन से उनके बेटे के दिल के साथ बाँध लिये.
और वह खुद को पूरी तरह, अपना तन्न मन सब कुछ अपने बेटे के पास,
अपने पति के पास समर्पण कर दिया. मुझे सब कुछ मेहसुस होने लगा उनके सामने खड़े होकर उनके आँखों में देखते हुए.
कुछ पल हम ऐसे नज़र मिलाकर हमारे दिल की बहुत सारी बातें उस भीड़ भरे प्लेटफार्म के विचित्र आवाज़ के बीच खड़े होकर एक दूसरे को जताने लगे.
माँ बस अपनी स्माइल बरक़रार रखके अचानक कुछ याद करके मेरे हाथ में उनकी ग्रिप ढीला कर लिया और शर्मा के मेरा हाथ छोड़के अपने हाथ खीच लिये.

फिर अपने नज़र प्लेटफार्म के दूसरी तरफ घुमाके देखने लगी.
मैं तभी भी उनको देख रहा था.
माँ को आज बहुत खुश देख रहा था.
उनके अंदर एक नवजवान लड़की की अनुभुति वापस आगयी. उनके होठो पे जो मुस्कान लगी हुई है,
वह में ज़िन्दगी भर देखने के लिए कुछ भी कर सकता हु.
मैं हमेशा उनको इसी तरह खुश देखना चाहता हु, खुश रखना चाहता हु.
हम टैक्सी में हमारा लगेज लोड करके मेरे घर की तरफ, जो आज से हमारा घर होगा, उस तरफ जाने लगा.
प्लेटफार्म में माँ जो मेरा हाथ छोडा,
उसके बाद और मेरा हाथ पकड़ी नहि.
मैं दिल से चाह रहा था की वह मेरे बाजु पकड़के मेरे एकदम पास रहके चले.
पर वह बस मेरे पास तो थि, लेकिन मेरे स्पर्श से दूर रह रही थी.
शायद उनके मन में भी मेरे जैसी एक अनुभुति हो रही होगी.
मेरे जैसी एक चाहत उनके भी शरीर में तूफ़ान लायी होगी.
एक अध्भुत सुख, जो न में कभी पाया और जो वह पाकर भी उसका आनंद ज़िन्दगी में ठीक से ले नहीं पाई, वह आनंद,
वह सुख पाने के लिए उनका भी शरीर तरस रहा होगा.
और शायद इसी लिए वह भी खुद को अपने क़ाबू में रख रही है मेरे से दूर रहकर टैक्सी के पीछे बैठे थे हम्.
माँ खिड़की के पास बैठके बाहर की तरफ देख रही है.
नयी जगह और नयी ज़िन्दगी में खुद को मिला के नये रिश्ते को और भी अपने दिल में मजबूती से बसा रही है.
मैं रस्ते में जाते जाते बताते रहा की हम को कितना दूर जाना है,
वहां से मार्किट किस तरफ है,
मेरा ऑफिस किधर से जाना पडता है वगेरा वग़ैरा.
वह बस बीच बीच में मेरे तरफ एक स्माइल लेकर देखति है और फिर बाहर नज़र घुमा लेती है.
खिड़की के तरफ उनके लेफ्ट हैंड उनके गोद में रखा हुआ है और राईट हैंड मेरे और उनके बीच में जो गप है वहां सीट के ऊपर रखा हुआ है.
मुझे बहुत मन कर रहा था की में उनका वह हाथ मेरे हाथ में लु.
बातों बातों में मन में यह सोच तो रहा था पर कर नहीं पा रहा था.
हम अब पति पत्नी है, फिर भी एक संकोच अंदर अभी भी काम कर रहा है.
इतने दिन जिस औरत को मेरी माँ की नज़र से देखा और छुआ,
आज उनको मेरी बीवी के रूप में देख रहा हु लेकिन छुने में वह संकोच आ रहा है.
शायद उनके अंदर भी उनके बेटे को अब पति के रूप में छूने में शर्म आ रही होगी.
अब मुझे महसुस हो रहा है की पिछले ६ साल से मन की कल्पना में उनके साथ मिलन का जो सपना देखता था,
आज असली ज़िन्दगी के इस मोड़ में आकर सब कुछ उस जैसा करना इतना सहज और आसान नहीं हो रहा है.

माँ जितनी बार मेरी तरफ देख रही थी , उतनी बार मेरे छाती के अंदर एक झनझन आवाज़ सी होने लगी.
खिड़की से हवा आने के वजह से वह अब मेरी तरफ देखति है तब उनकी वह सुन्दर आँखें थोडी छोटी हो रही है.
फिर भी उनके चेहरे पे मुस्कान के साथ आँखों में एक गहरा प्यार साफ़ साफ़ झलक दे रहा था.
मैं मन ही मन थोड़ा हिम्मत जुटाके सामने की तरफ देखते हुए मेरा लेफ्ट हैंड बढा के उनके राईट हैंड के ऊपर रखा.
मेरी उँगलियाँ बस उनकी उँगलियाँ को छु रही थीं.
तभी माँ बाहर देखते हुए उनके हाथ को थोड़ा अपनी तरफ खीच लि.
मैं वैसे ही बैठे बैठे फिर हाथ को आगे बढाके उनकी उँगलियाँ पकड़ी.
अब वह हाथ हटायी नहीं लेकिन उँगलियाँ को मुठ्ठी करके मेरे स्पर्श से दूर जाना चाह रही है.
मेरे मन में एक जिद्द आया की हम्मारे बीच में पति पत्नी बनने के बाद जो संकोच चल रहा है वह अभी ख़तम हो जाए.
मैं अब मेरे हाथ को उनके हाथ के ऊपर रख के बस मेरी ग्रिप से उनका हाथ पकड़ लिया.
वह धीरे से छुडाने की कोशिश की पर छुडा के लेकर नहीं गई मैं घूमके उनकी तरफ देखा.
वह बस होठो पे स्माइल लेकर बाहर देख रही है. मैं धीरे धीरे उनकी उँगलियाँ में मेरी उँगलियाँ इंटरटवीनेड करने लगा. वह तभी मेरी तरफ देखि और चेहरे पे एक शरम, एक्ससिटेमेंट और चाहत लेकर मुझे आँखों से इशारा करके ड्राइवर की तरफ दिखाया.

फिर एक फेक ग़ुस्से का चेहरा बनाके जैसे की वह यह कहना चाहती है की "क्य कर रहे हो आप. आगे ड्राइवर है. मिरर में देख रहा होगा. छोडिये मुझे शर्म आरही है".
मुझे उनके इस तरह शर्मा जाने में मुझे मज़ा आने लगा.
मैं उनका हाथ तो छोड़ा नहि, ऊपर से मेरा ग्रिप और स्ट्रांग करके उनकी उँगलियाँ को मुठ्ठी करके पक़डा.
 
माँ और में क़रीब, बहुत करीब रह रहे थे. दोनों ही शायद प्लेटफार्म की इस विचित्र आवाज़ के बीच भी एक दूसरे की दिल की धड़कनें सुन पा रहे थे, फिर भी हम एक दूरि में रह गये मैं थोडे टाइम बाद माँ को देखते हुए पुछा" पानी पियोगी?"मा बस मुझे एक नज़र देखकर फिर नज़र दूसरी तरफ घुमाके सर हिलके हाँ कहा. वह बस सारे पुराने रिश्तों को भूल क़र, मेरी बीवी की जगह लेकर खुद को मेरे साथ सहज करने की कोशिश कर रही है. मैं भी माँ को अपने बीवी की नज़र से पूरी तरह ग्रहण करने की कोशिश मन ही मन करते जा रहा हु. इस लिए दोनों ही आज एक असहज सिचुएशन में एक दूसरे के साथ रहके भी, एक दूसरे से मिल घुल ने में वक़्त ले रहे है. मैं उठकर जाकर सामने वाले स्टाल से पानी लेकर माँ को बोतल खोलके पीने दिया. वह मेरे हाथ से बोतल लेली, पर पीने में झिझक रही है, क्यों की बोतल पूरा भरा था. पीने जायेंगे तो कपड़े में पानी गिरके कपड़े गीला कर देगी. सो में हसके उनसे बोतल लेकर मुह लगाके थोड़ा पाणी पी लिया. फिर में उनको बोतल दिया तो वह मुझे एक स्माइल देकर बोतल में मुह लगाके धीरे धीरे पानी पीने लगी. आज तक हमारे अहमदाबाद घर में बचपन से देख के आरहा हु की कोई किसीका जूठा पाणी नहीं पिता. पर आज माँ मेरा जूठा पाणी पीने में कोई दुविधा नहीं रखि. मैं उनके गले में मंगलसूत्र और मांग में सिन्दूर और हाथ में मेहँदी लेकर नयी दुल्हन की तरह शर्मा के मेरे सामने उनके इस तरह परिवर्तन को दिल से मेहसुस करने लगा. और उनको मेरे दिल की सारी जगह देणे में कोई कसर नहीं छोड़ी .मै एक दो बार उठके इधर उधर जा रहा था. मुझे भी थोड़ा असहज फील हो रहा था. बस सिचुएशन को सहज करने के लिए खुद पहले सहज होने की कोशिश कर रहा था. और जब में थोड़ा इधर उधर घूमके वापस माँ के पास आता था तब माँ केवल मेरे आने का इंतज़ार लेकर वहां बैठे रहती थी. और में वापस अने के बाद मुझे शर्म लगा एक स्माइल देकर नज़र झुका लेती थी. उनकी उस स्माइल में एक राहत की फीलिंग्स दिखाइ देता था. मैं बस कुछ पलों के लिए उनसे दूर होते ही वह मेरे लिए ऐसे सोच्ने लग गई मेरे लौटने के इंतज़ार में ऑखों में एक चाहत लेकर बैठि रहती थी. ट्रेन का टाइम हो गया था. प्लेटफार्म में अब भीड़ थोड़ा बढ़ गयी है. मैं और माँ खड़े हुए है. मैं मेरा सामान उठाने के लिए एक कुलि को ढूंढ रहा था. मैं बस वहां से आगे जाकर देखने के लिए जैसे ही कदम बढाया तोह माँ पीछे से बोली" सुनिये ना....."मै माँ की आवाज़ सुनतेही दिल में एक ख़ुशी की लहर के साथ पीछे मुड़के देखा. वह बस नज़रों से मुझे देखे जा रही है. मैं उनके पास आकर उनको देखते हुए मेरा शरीर की भाषा से पुछने लगा की क्या हुआ है. वह बस मेरि आँखों में देखते हुए धीरे धीरे बोली" आप मेरे पास रहिये"ओर फिर नज़र झुका के उनके हाथों से धीरे धीरे मेरा बाजु पकड़के मेरे और करीब आने लगी. और वैसे ही नज़र झुकि रखके एक दम फिसफिसा के बोली" मुझे डर लगता है"बोलकर उनके सर को मेरे हाथ से टच करवायी. मेरे अंदर बस प्यार का धारा बहने लगी. मैं एक अन्जानी ख़ुशी से चुप होकर बस वहां खड़े खड़े उनके वह टच और प्यार को मेहसुस करने लगा सामान वगेरा लेकर कुली के साथ नीचे उतर गया. फिर माँ पीछे आके दरवाजे के सामने खड़ी होकर उतरने जा रही थी. मैं दौड के जाकर उनके हाथ पकड़ के उनको उतरने में हेल्प करने के लिए उनके पास पहुंचा. मांग में सिन्दूर और गले में मंगलसूत्र के साथ माँ एक दम नयी नवेली दुल्हन की तरह लग रही है जिसकी पहली बार शादी हुई है. मैं उनकी तरफ देख के दिल में प्यार और चेहरे पे स्माइल लेकर मेरा लेफ्ट हैंड बढा दिया उनकी तरफ. वह मेरी तरफ देखके स्माइल करके उनके चेहरे पे एक प्यारी मुस्कान और आँखों में नयी शादी हुई लड़की के जैसे उसके पति के लिए बहुत सारा प्यार लेकर मेरी तरफ एक बार देखा. और ब्लश करके स्माइल थोड़ी चौड़ी करके नज़र घुमा लिया और उनके मेहँदी किया हुआ राईट हैंड बढाके मेरा हाथ पकड़ लिया. फिर उनके लेफ्ट हैंड से उनकी साड़ी को थोड़ा ऊपर की तरफ पकड़ के ट्रैन से नीचे उतरने लगी. वह एक मध्यम हील वाली स्लिपर पहनी हुई थी. वह जैसे ही उतरने गयी, उनके मेहँदी लगा हुये पैर का कुछ हिस्सा साड़ी के नीचे से मुझे दिखाइ दिया. गोरी गोरी और गोल गोल मुलायम स्किन वाला पैर. उसमे पहनी हुई पायल उनके सुन्दर गुलाबी ऐड़ी को और खूबसूरत और सेक्सी बना दिया है. मुझे एक झलक यह देख के मेरे अंदर अचानक एक ओर्गिनेस्स आगया. अचानक मेरे शरीर में खून दौडने लगा और मेरे पेनिस के अंदर जाकर भरने लगा. माँ के नरम हाथ का स्पर्श में आज एक नयी तरह अनुभुति शरीर में मेहसुस करने लगा. उनके मेहँदी किया हुआ सेक्सी पैर और नयी दुल्हन की तरह शर्माना--सब कुछ मिलाकर मेरे अंदर एक तूफ़ान चलने लगा. और मेरा पेनिस अचानक एक अद्भुत सुखानुभूति से उछल के सख्त होने लगा. मैं बस मेरी अनुभुति को मन ही मन क़ाबू करके उनको उतरने में पूरी मदत किया और फिर वह उतरनेके बाद मेरी तरफ नज़र उठाके देखि. मुझे उस नज़रों में मेरे लिए उनका जो लव और लॉयलटी, मेरे ऊपर उनकी जो डेपेंडेंसी, मेरे पास उनकी जो कम्पलीट सरेंडर , मेरे प्रति उनकी जो केयरिंग भाव और मेरे लिए उनके दिल में जो चाहत नज़र आया वह देख के उस्सी पल में मेरा दिल उस प्लेटफार्म पे खड़े खड़े बस पिघलने लगा.
 
और उनके हाथ धीरे धीरे मेरे बाजु को ठीक से पकड़ने लगे. मेरे मन में यह भावनाएं आयी की माँ अब तक उनके मम्मी पापा के संग जी रही थी. और वह लोग उनकी बेटी की अच्छी तरह से देखभाल करके अपना कर्त्तव्य सही तरीके से पालन कर रहे थे. लेकिन अब से माँ मेरे संग मेरी पत्नी बनके जीने जा रही है. और मुझे मेरी पत्नी की रक्षा करके उनकी हर तरहा से देखभाल करनी है. शायद वह उनके अनजाने में मेरा बाजु पकड़ के मुझे मेरा कर्त्तव्य याद दिलाने लगी. शादी के टाइम में कसम खाकर यह कहा की में पूरी ज़िन्दगी उनके ख्याल रख़कर, उनकी हर इच्छा को पूरा करके, उनकी हर तरह की चाहत , मेरा प्यार, केअर, लॉयलटी, आनेस्टी देकर उनको हर झंझट से बचाकर मेरी बाँहों में सुकून की नींद लेने दूंगा. और इस वक़्त से मेरा वह कर्त्तव्य पालन करना सुरु हो गया है.
मै उनकी तरफ देख रहा था. और मेरे मन में एक नये तरह की अनुभुति और प्यार आया माँ के उपर. एक पति का उसकी पत्नी के ऊपर जो प्यार आता है, में पहली बार माँ के साथ हमारे नये रिश्ते में कदम रख के, इसी प्लेटफार्म में खड़े होकर वह प्यार महसुस करने लगा. मुझे इस तरह प्यार और भावनाएं पहले कभी मेहसुस नहीं हुई थी. तभी माँ अपना सर उठाके मेरी तरफ देखि. उनकी उस नम्म आँखों में अपनों से दूर जाने के ग़म के साथ साथ एक अद्भुत ख़ुशी भी झलक दे रहा है. वह अपने मम्मी पापा से दूर रहके भी अपने दिल से जुड़े हुए किसी के साथ, आपने बेटे के साथ, जो अब उनके पति है, उनके साथ जीवन बिताने जा रही है. उस की ख़ुशी और एक एक्ससाइटमेंट उनके मन में जो मिश्र अनुभुति कर रहा है, वह उनकी आँखों में मुझे दिख रहा है. मेरे साथ नज़र मिलाकर ऐसे ही हम दोनों उस भीड़ भरे प्लेटफार्म पे कुछ पल खड़े रहे, फिर माँ के अंदर एक शर्म खेल गया और वह अपने आँखे झुका ली . और शर्म के साथ उनके हाथ मेरे बाजु को छोड़ के अपने तरफ खीच ली. लेकिन वह उनके होठ पे एक मुस्कान लेकर मुझे यह संमझा दी की कितना भी ग़म और कितना भी कस्ट आये क्यूं,न आये वह मेरे साथ, मेरे पास , मेरे दिल में रहके अपने सारे ग़मों को भूलके चेहरे पे हसि लेके जी सकती है. मैं बस अपने ज़िन्दगी का एक नया अध्याय में प्रवेश करके मेरी माँ को साथ में लेके एक नये रस्ते में चलना सुरु किया. जहाँ केवल में और मेरी माँ यानि की मेरी बीवी है.
नाना नानी शाम की ट्रैन लेकर चले गये वह लोग बस सुबह होने से पहले ही घर पहुच जाएंगे. लेकिन हम लोगों को एमपी पहुँचते पहुचते कल शाम हो जाएगा. हम बांद्रा से छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पे पहुच गये हमारे साथ तीन सूटकेस है. हम एक कुलि लेके सामान उसको देके में और माँ मुंबई की उस भीड़ में चल्ने लगे एक दूसरे के साथ , एकदम पास रह्के. माँने और मेरा हाथ नहीं पक़डा. वह बस एक नयी दुल्हन की तरह उनके पति के साथ धीरे कदमों से चलते आरही है. मैं उनके साथ उनके कदमों से अपने कदम मिलाकर चलने लगा. मुझे पूरी ज़िन्दगी बस उनको ऐसे ही साथ देना है. और में यह चाहता भी हु मन से, दिल से. चलते वक़्त भीड़ में कभी कभी माँ का बाजु मेरे बाजु से, और माँ का कन्धा मेरे कंधो से टच हो रहा है. और हर बार मुझे एक नरम और कोमल स्पर्श मेहसुस हो रहा है. माँ कितनी कोमल और नरम है हमारे शादी से पहले उसकी एक झलक मुझे मिली थी. और अब उन कोमल और नरम शरीर के स्पर्श से मेरे अंदर एक कंपकपी आने लगी. माँ के एक दम पास रहने के लिए मुझे उनके शरीर से एक खुशबू भी मिल रही थी . उनके बालों की वह मीठी महक में मेहसुस कर रहा हु. इतनी भीड़ में भी मुझे बस उनको मेरी बाँहों में लेने का मन किया. पर में चाहके भी उनके हाथ पकड़ नहीं पाया. न जाने क्यों शादी के बाद मेरे अंदर भी एक तरह की शर्म आगई. मैं कितना कुछ सोचके रखा था. पर आज माँ को एक अन्जान जगह पे हमारे परिचित समाज के बाहर अकेली पाकर भी , इस प्लेटफार्म की भीड़ की अंदर भी उनको छु नहीं पा रहा हु. माँ भी शायद मेरे जैसा इमोशन और सोच के थ्रू गुजर रही है. वह न मुझे देख रही है आँख उठाकर, न मेरे से सहज होकर बात कर रही है, न मुझे छु पा रही है. बस हम मन ही मन एक दूसरे को चाहकर भी इतना करीब रहके भी , कोई पहला कदम उठा नहीं पा रहे है.
हमारी ट्रैन आने में थोड़ा टाइम है. हम प्लेटफार्म के एक कोने वाले बेंच में बैठे है. हमारा लगेज सामने रखा हुआ है.
 
पहले से किये हुये प्लान के मुताबिक नाना नानी अभी अहमदाबाद चले जाएंगे. और में माँ को लेकर एमपी चला जाऊंगा. टिकट भी ऐसे ही बुक किया था मैने. इस्स लिए शादी के बाद हम सब लंच करके अपने अपने कॉटेज में पहुच गये थे. हमे शादी का जोड़ा वगेरा खोल के तैयार होना था. माँ नानीजी के रूम में ही चले गई. उनके सारा सामान वहि रखा हुआ था. और में नानाजी के रूम में आगया था मैं आपनी शेरवानी खोल के बाथरूम में जाकर मुह हाथ पैर धोने लगा. सर पे घी चंदन और गुलाल की लगी हुई सारी तिलक को साबून से साफ़ करके फ्रेश होने लगा. फिर आके मेरे सूटकेस से एक जीन्स और पोलो टी शर्ट निकाल के पहन लिया. मैंने सोचा की सूटकेस में रखा एक नया कुरता और पाजामा है तोह वह पहन लू. पर फिर लगा की वह पहन ने में एक दम नया दूल्हा टाइप लगुंगा. और शर्म अने लगी. तब मैंने यह जीन्स पहन के क्यजुअल होने की कोशिश करने लगा. माँ और मेरी शादी हो गई. फिर भी दोनों के अंदर नाना नानी के सामने एक शर्म अभी भी है. मैं मेरे बाकि कपड़े और सामान पैक करने लगा. नानाजी रूम में आये और वह भी अपने कपड़े बदल ने के लिए बाथरूम में चलेगये हम दो लोग तो फ़टाफ़ट तैयार हो गये पर वहां दूसरे कॉटेज में वह दो लोग हमारे जैसे नार्मल बन्ने में टाइम लेगी. नानीजी तो बस अपने साड़ी चेंज कर लेंगी पर माँ दुल्हन का लेहेंगा चोली चेंज करेंगी, फिर अपने चेहरे से सारा मेक अप साफ़ करके मांग में भरी सिन्दूर को ठीक तरीके से लगाएगी उसमे टाइम तो जाएगा ऐसे करके पूरा दो घंटा लग गया और फिर जब हम अपने अपने कॉटेज से अपना सामान लेकर निकले तब में माँ को इसी ड्रेस और इसी रूप में तब पहली बार देखा था. उनके हाथ की मेहंदी, हाथों का बँगलेस देख के सब समझ जायेंगे की उनकी नयी नयी शादी हुई है.उनको इस रूप में देख कर, मेरे अंदर ही अंदर उनके लिए एक तीब्र चाहत होने लगी और में बहुत हॉर्नी फील करने लगा. मेरे शरीर के अंदर एक अनुभुति दौड रहा है. मैं माँ की तरफ जब भी देख रहा हु, तभी उनके जिस्म के हर कोने कोने में मेरे प्यार भरे गरम होठो का स्पर्श देकर उनको प्यार करने के लिए मेरा मन पागल हो रहा था. वह मेरी माँ है. मैं उनको बहुत ज़ादा प्यार करता हु. उनको दिल से चाहता हु. वह अब मेरी बीवी है. मेरी जीवन साथि है. उनके साथ ज़िन्दगी का हर पल जीना चाहता हु. ज़िन्दगी का हर सांस उनके साथ ही लेना चाहता हु. मेरे प्यार से उनकी ज़िन्दगी का अब तक का सारा ग़म, सारा कष्ट, सारी क़ुर्बानि, बहुत सारी चीज़ें न पाने का दुःख --सब सब कुछ भुला देना चाहता हु और ज़िन्दगी भर बहुत सारी ख़ुशी और आनंद के साथ उनको मेरे बाँहों में भरके संभालके रखना चाहता हु.
माँ ने कॉटेज से निकल नेके बाद से अब तक एक भी बार मुझे नहीं देखा है. मैं बहुत बार कोशिश कर रहा हु. पर नज़र नहीं मिला. वह और नानी बस एक साथ एकदूसरे को पकड़के सारे रास्ते टैक्सी में आई. आज सब थोड़ा अपने अपने में मग्न थे. ज़ादा बात नहीं कर रहे थे. नाना नानी अपने बेटि, जो आज तक उनके साथ ही रहती थी उसको अब जाने देना पड़ रहा है. उसी ग़म में सब कम बोल रहे थे. फिर भी बात चित होने लगी. और बीच बीच में कोई मज़ाकिया बातों से सब हस रहे थे. पर फिर भी वह पहले दिन जैसे नहीं रहे. बात कम होने के कारन में बार बार पीछे मुड नहीं पा रहा था और माँ को देख नहीं पा रहा था. फिर भी इतना नज़्दीक रहकर , में उनको मेरे दिल के अंदर और शरीर में मेहसुस कर पा रहा था. मेरी इसी तरह की फीलिंग्स के लिए मेरा पेनिस बार बार सख्त होता रहां. वह अब केवल सुहागरात के इंतज़ार में ही है. फिर भी में अभी भी माँ को देख रहा हु, हर बार उनकी खुबसुरती और सुंदरता देखके में खुद को भाग्यवाण समझ रहा था. ऐसी एक प्यारी लड़की मेरी बीवी बनेगी में सोचा नहीं था. पर आज वैसे ही एक लडकि, जो मेरी माँ है, आज मेरी पत्नी बन गयी है. जो अब मेरे नाम का सिन्दूर लगा के मेरे सामने, उनके मम्मी पापा के साथ बैठि हुई है.
नाना नानी ट्रैन में चड़ने से पहले मुझे और माँ को बार बार गले लगा ते रहे. मैं और माँ एक साथ झुक के पति पत्नी का कपल बन के नाना और नानी का पैर छू के उनके अशीर्वाद लेने लगे. नानाजी मुझे एक बार अलग से गले लगाये और कुछ टाइम पकड़ के रखा. वह जैसे की यह कह रहे है की मेरे घर की लक्ष्मी में तुमको दिया बेटा. अब तुम ही इसका ध्यान रखो फिर नानाजी माँ को गले लगाके चेहरे पे एक मायूसीपन लेकर एक स्माइल दिया. नानी माँ को फिर से गले लगायी और उनके चेहरा दोनों हाथ से थामकर उनकी आँखों में देखि और उनकी गीली आँखों से स्माइल करके माँ को बोली" सदा सुहागन रहो बेटि". नाना नानी के आँखों में साफ़ साफ़ दिख रहा है जैसे की वह लोग अपने बेटी को विदाई दे रहे है. इस समय में और माँ एकसाथ रहकर केवल उनलोगों को ठीक से , अपना ख़याल ठीक से रखने के लिए कहने लगे.
आज तक माँ थी साथ मे. पर अब वह दोनों बिलकुल अकेले हो जाएंगे. यह सोचके मेरा मन थोड़ा भारी भी हो गया था. पर क्या करे. ज़िन्दगी का असली रंग ही ऐसा है.मै और माँ एक साथ आस पास प्लेटफार्म पे खड़े है. ट्रेन चलने लगी. नाना नानी खिड़की से हमे देख के हाथ हिलाई. और दोनों ही परम ममता और प्यार से हमे एक स्माइल देकर अपनापन जताने लगे. ट्रेन रफ़्तार पकड़ने लगी और माँ की आँख गिला होने लगी. ट्रेन धीरे धीरे प्लेटफार्म छोड़कर दूर जाने लगी. और तभी में मेहसुस किया की मेरे एकदम नजदीक खड़ी माँ उनके दोनों हाथ उठाके मेरा बाजु पकड़ रही है. मैं घूमके उनको देखा. वह तभी भी जाते हुई ट्रैन की तरफ नज़र रख के गीली आँखों से उसी तरफ देखे जा रही है.
 
शाम होने जा रही है. हम चार लोग मुंबई में बांद्रा टर्मिनस पे एक प्लेटफार्म बेंच में बैठे हुए है. नानाजी बेंच के एक दम एन्ड में बैठे है, उनके बाद नानीजि, नानीजी की बगल में माँ और में दूसरी एन्ड पे बैठा हु. नानी माँ को अपने पास ही पकड़के बैठि है. हम कुछ टाइम कोई कुछ भी नहीं बोल रहे है. मुंबई सिटी की ब्यस्तता के अंदर हम चारो लोग एक अलग परिस्थिति लेकर बैठे हुए है. सब लोग बहुत ब्यस्त है चारो तरफ. सब अपना अपना सुख, दुख, खुशी, ग़म, आनंद, हसि, रोना लेकर चले जा रहे है अपनी अपनी शान्ति की जगह पर. सब के मन में कुछ न कुछ पैशन, इमोशन का खेल चल रहा है. लेकिन फिर भी कोई किसी दूसरे की उस भावना को छु नहीं पा रहा है. सब अलग अलग आइलैंड जैसे जीते है यहाँ. जीवन संग्राम में यह लोग खुद ही अपना पैशन , इमोशन को ठीक से ब्यक्त करने का तरीका ही शायद भूल गये है. हमारे सामने से कितने सारे लोग चले जा रहे है. पर किसी को भी यह पता नहीं है, शायद पता करने की जरुरत भी नहीं पड़ रहा है की हम अब किस इमोशनल बेन्डिंग के थ्रू गुजर रहे है. हमारे मन में अब क्या चल रहा है. एक माँ उनका एक लौती बेटी को अपने ही पोते के हाथ में उनको सोंप दिया है. अपने ही पोते को आज दामाद बनाकर अपनी बेटी और पोते की खुश हॉल ज़िन्दगी की उम्मीद करके ऊपरवाले से प्रार्थना कर रही है मन ही मन. एक पिता अपने परिवार की सबकी भलाई के लिए आज खुद के पोते के ससुर बन गये. और वह इस नये रिश्ते को जी जान से मान ने भी लगे है. एक माँ अपनी ज़िन्दगी का अब तक का प्यार और ममता देकर जिस को पाला, बड़ा किया, माँ का स्नेह दि, आज खुद को उसकी पत्नी बनके अपना तन मन सोंप दि और उसको अपने पति का अधिकार दे दि. एक बेटा जो बचपन से अपने नाना नानी के साथ रहकर, उनका प्यर, स्नेह, ममता पाकर उनके छत्र छाया में बड़ा हुआ है, आज उन्ही नाना नानी को अपना साँस और ससुर मान लीया मन से जिस औरत के ममता भरे प्यार और देखभाल में बड़ा हुआ, जिसको दुनियामे सबसे ज़ादा प्यार करते आया, जिसको अपने दिल के हर कोने में उनका ही चित्रण करके रखते आया, उस औरत को शास्त्र सम्मत तरीके से अपनि धरम पत्नी, अपनी जीवनसाथी, अपनी प्यारी बीवी बनाकर आज सारे रिश्तों को दोबारा नये तरह से लिख दिया. ऐसी जटिल परिस्थिति के अंदर सब रह रहा है, फिर भी बाहर वालों को कुछ भी भनक नहि. समाज आज यह सब कुछ नहीं जान पाया. इस लिए सब अपनी अपनी रेस्पेक्ट से हम चारो को देख रहे है. और हम हमारे आनेवाले कल के बारे में सोच रहे है. हमे पूरी ज़िन्दगी ऐसे ही रहना पडेगा. हमारा पुराने रिश्ते को भूल कर, सब के सामने इस नये रिश्ते को ही अपनाकर रखना पडेगा. शायद हमे अपनी पुराणी पहचान, पुराणी जगह से हमेशा दूर रहना पड़ेगा हमारे सब के भलाई के लिये. जितना टाइम जाने लगा, नानी की आँख उतनाही गिला होने लगा माँ भी उनके साथ, उनके स्पर्श में रहकर थोड़ा उदास होने लगी. थोड़ी देर बाद अहमदाबाद जाने का ट्रैन लगनेवाली है. नाना नानी अपनी बेटी को पहली बार घर से दूर भेज रहे है. पहली बार अपनी बेटी को उनके पति के साथ ज़िन्दगी बिताने के लिए अपनों से दूर जाने दे रहे है. नाना नानी का मन भारी हो रहा है यह में महसुस कर पा रहा हु. उनके मन में यह भी है की उनका बेटी अब जिसके साथ रहने जा रही है, वह उसको दुनियाका सारा प्यार, सारी खुशी, सारा आनंद देगा. पर अपनी एकलौती बेटी को इतने दिन बाद अपनों से दूर करने का दर्द में मेहसुस कर सकता हु.
मा नानी के पास चिपक के बैठि है. उनके हाथ में नानी का एक हाथ पकड़कर रखी है. माँ बेटी का प्यार साफ़ दिखाइ दे रहा है. माँ को नाना नानी से दूर जानेका दर्द तो है, पर उनके मन में उससे ज़ादा ख़ुशी है. क्यूँ की वह अपने बेटे के साथ , जो अब उनका पति है, उसके साथ नयी ज़िन्दगी बिताने जा रही है. उनको यह भी मालूम है की दुनियामे कुछ भी हो जाए, पर उनका बेटा, उनका पति कभी भी किसी भी हालत में उनका हाथ नहीं छोड़ेगा, और नाहीं उनको कभी कुछ कस्ट होने देगा. वह अपने पति के प्यार को अब धीरे धीरे महसुस कर सकती है. उनकी आँख में गीलापन तो है, फिर भी होठो पे एक ख़ुशी की आभा दिखाइ देती है. और वह देख के नाना नानी भी चैन की सांस ले पा रहे है. माँ के गले में मंगलसूत्र है. मांग में सिन्दूर है. माथे पे एक लाल बिन्दी. हाथ पैर में मेहँदी लगी है. दोनों हाथ में कुछ बँगलस के साथ और भी कुछ सिंपल ज्वेल्लरी में माँ एक नयी दुल्हन ही लग रही है. पहली बार शादी के बाद एक जवान कुंवारी लड़की जैसे दीखती है, माँ वैसे लगने लगी. उनकी स्लिम बॉडी में आज एक अलग सा आभा लगी हुई है. एक मरुण, ग्रीन और येलो कलर के रंग से सुन्दर डिजाइन और मीनाकारी कि हुई एक साड़ी पहनी हुई है. साथ में मैच किआ हुआ ब्लाउस. उनके गोरे रंग और मख़्खन जैसे मुलायम स्किन में वह कपडा उनको बहुत जच रहा है. यह सब चीज़ों से उनकी उम्र अब २० साल के जैसे लग रही है. मैं वहां से उठकर थोड़ा आगे जाकर साइड में खड़े होकर रिलैक्स जैसा करने लगा. नानी माँ से कुछ बातें कर रही है. नाना जी भी वहां नानी और माँ को कुछ बोल रहे है. अब उनके अंदर का दुःख और मायुस भाव धीरे धीरे कम हो रहा है. मैं बस चारो तरफ नज़र फिरा ते फिराते सबसे ज़ादा केवल माँ को ही देख रहा हु. आज इस रूप में माँ को वास्तव में देख के मुझे एह्सास हुआ की कल्पना कभी कभी वास्तव से भी हार मान लेती है. माँ को पिछले दो हप्ते से मेरी पत्नी के रूप में कैसे दिखेगी, वह कल्पना करते आया. वह है तो खूबसूरत. नयी दुल्हन बन्ने के बाद और खूबसूरत हो जायेगी यह सोचकर उनकी एक तस्वीर मन के अंदर कल्पना किया था. पर आज मेरे सामने बैठि उनको देख के मेहसुस किया की इस अपरूप सुंदरता के वास्तवीक छोरको कभी देख नहीं पाऊंगा. और अभी इस पल वह दिदार करके मेरे मन में एक अनिर्बाचनीय ख़ुशी और संतुष्टि का भाव छाने लगा. मैं सच मुच उनको बीवी के रूप में पाकर अब एक सैटिस्फाइड मैन जैसा फील कर रहा हु. उनकी यह सुंदरता , यह खुबसुरति, यह रूप में ज़िन्दगी भर अपना करके पाऊंगा.
 
पण्डितजी उनके एक आदमी को कुछ बोले और वह आदमी हमारे पास आगया. और मेरे पास आतेहि वह वहां बैठके वहां रखा हुआ एक डिब्बा खोला और एक मेटल के कॉइन से डिब्बे से थोड़ा सिन्दूर उठाके मेरे हाथ में थमा दिया. मैं बस शादी की आखरी रस्म पूरी करके माँ को अपनी पत्नी के रूप में पूरी तरह ग्रहण करने जारहा हु. मैं नानी को देखा , वह बस आँखों में ख़ुशी लेकर एक इशारा कि. और में पण्डितजी का मंत्र उच्चारण के बीच ही वह सिन्दूर धीरे धीरे माँ के सर के पास ले गया. फिर वह लेडी माँ के सर के घूँघट को थोड़ा हटाकर, मांग से सोने का बिंदी साइड करके मुझे हेल्प करने लगी. फिर मेंने मेरा एक हाथ माँ के सर के पीछे छु क़र, दूसरे हाथ से उनकी मांग में सिन्दूर भर दिया. मेरा एक हाथ उनको छूकर रखा है, उसमे से पता चला सिन्दूर डालते टाइम माँ थोड़ा काँप उठि और में भी अंदर से एक कम्पन मेहसुस करने लगा. अब हम शास्त्र सम्मति से पति पत्नी बन गये हमारा एक नया रिश्ता जुड़ गया. आज से हम दोनों माँ बेटा नहीं रहे. पति पत्नी के पवित्र बंधन में बंध गये माँ के गले में मंगलसूत्र और मांग में सिन्दूर के साथ उनका एक अलग रूप निकल के आया. साथ ही साथ वह अब इतनी प्यारी और खूबसूरत लगने लगी की में यह कभी कल्पना नहीं किया था. मैं बस अगले सात जनम तक इस खूबसूरत और प्यारी लड़की को, मेरी माँ को अपनी पत्नी के रूप में पाना चाहता हु. शादी की रस्म पूरी हो गयी. और तब सात मैरिड लेडी माँ के पास आकर उनके कान में फिस्फीसाके गुड विशेस देणे लगी. माँ का चेहरा ख़ुशी से झलक उठ रहा है. माँ तभी भी अपनी नज़र उठायी नहि. पण्डितजीने अब हम दूल्हा दुल्हन को उठके अपने अपने बढो को प्रणाम करके अशीर्वाद लेने को कहा. मैं माँ के साथ ताल मिलाके धीरे धीरे उठा और एक साथ नानाजी के पास आकर उनका पैर छुआ. वह बस उनके दोनों हाथ मेरे और माँ के सर पर रख के हमे अशीर्वाद देणे लगे. फिर हम नानी के पास जाकर उनके पैर छुये. नानीजी हमे अशीर्वाद दी और हम खड़े होतेहि हम दोनों को वह एक साथ गले में मिला लिये. नाना नानी के आँख थोड़ा गिला हो रहा था. जैसे की उनका लड़की शादी करके दूसरे एक घर पर, अपने पति के घर पे जा रही है. पर अब तो माँ का माइका और ससुराल एक ही है. हमने पण्डितजी को प्रणाम किया और वहां के बाकि सबसे शुभकामनायें और गुड विशेस ग्रहण करते रहे
.दूसरे एक हॉल में रिसोर्ट वालों ने शादी में प्रेजेंट सब का लंच का इन्तेज़ाम करके रखा है. हम सब वहां गये. सब लोग बुफे सिस्टम से लंच करने लगे. में, माँ और नाना नानी एक टेबल पे बैठे. मैनेजर साहब हमारे लंच का देखभाल कर रहे है. हमारे टेबल पे दोनों आदमी लंच सर्व करने लगे. नाना और नानी का अलग अलग प्लेट है पर मेरी और माँ की एक ही प्लेट है. शादी के रस्म के अनुसार नये नये शादी शुदा दूल्हा दुल्हन को पहला खाना एक ही प्लेट में शेयर करके खाना है. सो में और माँ आस पास चेयर में नज़्दीक बैठे है. वह अभी भी सीधे तरीके से मुझे नहीं देख रही है. एक दो बार हमारी चुपके से नज़र मिल चुकी है. अब उनके अंदर भी एक शर्म है और मेरे अंदर भी. वह हम दोनों मेहसुस कर रहे थे. इसलिए हम एक दूसरे को स्ट्रैट नज़र मिलाके देख नहीं पा रहे है. पर उनको इस नयी दुल्हन के रूप में देखने के लिए मेरा मन हर पल उनकी तरफ जा रहा है. हम एक ही प्लेट से पहले एक दूसरे को खिलाने के बाद, धीरे धीरे हम खाने लगे. हमारा हाथ प्लेट के ऊपर टच हो रहा है. हमारे कंधे एक दूसरे से टकरा रहे है. एक दूसरे के शरीर की गर्मी आस पास रहकर भी केवल हम दोनों ही मेहसुस कर रहे है. उससे मेरा पूरा बदन माँ की तरह बीच बीच में ख़ुशी और एक्ससिटेमेंट के वजह से काँप रहा है. सब के बीच बैठे बैठे भी में केवल मेरी दुल्हन रुपी माँ को , जो अब मेरी धरम पत्नी भी है, उनको देखे जा रहा था और मन ही मन में उनको एकांत में मेरी बाँहों में पाने के वक़्त का इंतज़ार करने लगा
 
मैं ख़ुशी और थोड़ी शर्म से नानी जी को देखा. वह बस मुस्कुराके उनके मन की ख़ुशी ज़ाहिर कर रही है. तभी नाना जीने मेरी पीठ पे हाथ रखा. मैं उनकी तरफ देखते ही वह ममतामई नजर से मुझे आस्वासन देणे लगे. सब के सामने, पूजा और मंत्र के बीच, पवित्र अग्नि के सामने में और माँ एक दूसरे को वरमाला पहनाकर इस पवित्र रिश्ते में हम दोनों की सम्मति जताया. पण्डितजी हमे बैठने को कहा. मैं मेरे आसन में बैठ गया. माँ धीरे धीरे मेरी बगल में रखे हुये आसन पे बैठने के लिए मेरे पास आयी. मैं बैठे बैठे उनकी तरफ थोड़ा नीचे मेरी नज़र घुमाया. वह बस बैठने के लिए अपने कदम बढायी और तभी मुझे उनके लेहेंगा के नीचे से उनकी मेहँदी किया हुआ सुन्दर मुलायम छोटी छोटी सेक्सी गुलाबी पैर नज़र आया. उनके पैर में भी रेड नेल पोलिश लगी हुई है. जिससे उनके पैर और सेक्सी लगने लगे और मुझे बस वहि झुक के उनके वह पैरों को अपने होठो से चूमने का मन करने लगा. फिर मुझे नज़र आया की वह आज उनके पैरों में पायल भी पहनी हुई है. मैं उनके वह सुन्दर गोल गोल पैर में पायल पहनाने के लिए एक पायल खरीद के अलमारी में रख के आया. पर वह मेरे मन की मुराद पूरी करके आज दुल्हन के भेष के साथ पायल भी पहनली. मैं मेहसुस करने लगा की बस यह सुन्दर, खूबसूरत सेक्सी लड़की बस आज से मेरी ही हो गयी. मेरा मन एक गेहराई में डूबने लगा और अंदर से उनको पाने की चाहत बढ़ते गया.
और सब कुछ मिलके एक सिरसिरानी अनुभुति मेरे स्पाइन कपड़े के नीचे की तरफ जाने लगा और मेरे कुर्ते के अंदर पेनिस में उसका असर पड़ रहा है. मेरा पेनिस सख्त होने लगा. मैं बस इस माहोल में मेरे ओर्गिनेस्स को दबा रखकर बाकि चीज़ों में ध्यान देणे लगा. नानाजी जाकर माँ के पास आसन में बैठे और नानीजी आकर मेरे पास वाले आसन में बैठि. पण्डितजी पूजा शुरू किया फिर से. शादी की रसम अब चालू होगई. नानाजी पण्डितजी के साथ मिलकर मंत्र पढकर सारे रस्म और रीवाज़ के अनुसार अपना कर्त्तव्य करने लगे. वह उनकी बेटी का कन्या दान करने लगे. माँ वहां बैठकर सर झुका के रखी है नयी दुल्हन की तरह. नज़र नीचे करके रखी है. मैं सब कुछ के बीच रहकर भी एक एक बार माँ को चुराके देखने लगा दुल्हन के पिता का फ़र्ज़ नानाजी पालन कर रहे है. वह शाश्त्र सम्मत तरीकेसे उनकी बेटी को उनके होनेवाले दामाद के पास कन्या दान करके उनके घर की लक्ष्मी को उनके दामाद के पास सोंप दी. इस्स बीच में नानाजी मेरी तरफ एक बार देखे. मैं उनके साथ नज़र मिलाकर उनको देखा. उनकी आँखों में उनकी बेटी रुपी घर की लक्ष्मी को मेरे पास समर्पण करके, उनकी बेटी को प्यार से सम्भालके रखने की बिनती साफ़ झलक आई. मैं भी अपनी आँखों की भाषा और होठो की स्माइल से उनको वह भरोसा दिया की में उनकी बेटी को ज़िन्दगी भर बहुत सारा प्यार और ख़ुशी देकर संभालके रखुंगा.
तभी पण्डितजी का एक आदमी आके मेरी शेरवानी के स्कार्फ़ के साथ माँ के दुपट्टे का कोना बांध दिये. और साथ साथ पण्डितजी मंत्र पढ़कर पूजा कर रहे है. वहाँ के सारे लोग उस मंत्र उच्चारण के बीच मेरे और माँ के ऊपर गुलाब की पंखुड़िया और राइस की वर्षाव करके अपना अशीर्वाद और शुभकामनायें देते रहे. फिर पण्डितजी हमे ऐसे ही दोनों का कपडा बंदा रख के वहां शादी स्थल में उस अग्नि के चारो तरफ परिक्रमा लगाने को कहे. मैं खड़ा होने लगा तो देखा की में अगर पहले जल्दी से खड़ा हो जाउँगा तो माँ की चुनरी उनके सर के घूँघट को हिला देगि, इस लिए में झुक के धीरे धीरे खड़ा होते गया , ताकि माँ को वक़्त मिले मेरे साथ एक साथ खड़ा होने को. मैं ऐसे झुक के थोड़ा टाइम रहा और फिर माँ खडी हो गयी. इस्स बीच में हमारी यह अनकंफर्टबिलिटी को देख के वहां की सारी लेडीज हस पडी और आपस में बातें करने लगी. मैं और माँ दोनों अब खडे हो गये. पण्डितजी मंत्र पड़ते रहे और हम चक्कर लगाने के लिए कदम उठाये. उस अग्नि के चारो तरफ चक्कर लगाके हम अपनी आगे के जीवन को एक साथ जीने की सारी कसम खानी सुरु कि. तभी फिर से चारों तरफ से गुलाब की पंखुड़ियों और राइस की बारिश फिर से होने लगी मेरे और माँ के उपर. मैं आगे आगे चलने लगा और माँ मेरे पीछे धीरे धीरे मुझे फॉलो करती रहि. ऐसे फूलों की और राइस की बारिश के अंदर हम उस पवित्र अग्नि परिक्रमा करते रहे. मुझे माँ का चेहरा दिखाइ नहीं दे रहा है. वह बस सर झुकाके मुझे फॉलो करती जा रही है. मुझे अपना पति मानकर मन और तन सोंप के मुझे पति का अधिकार देकर ज़िन्दगी ख़ुशी और आनंद से जीने की कसम खाते रहि. मेरी नाना और नानी से एक बार नज़र मिली. वह लोग बस अपनी एक लौती प्यारी बेटी को मुझे सौंप कर एक चैन की नज़र से हमारी जोड़ी को देख रहे है और अशीर्वाद दे रहे है हमारे ऊपर फूल और राइस फ़ेक के.
अग्नि परिक्रमा ख़तम होते ही पण्डितजी का कहा मान के में और माँ फिर से अपनेअपने आसन के ऊपर बैठ गये. हमारे कपड़े बंधे होने के कारन अब मुझे और माँ को एक दूसरे का साथ देके चलना पड़ रहा है, जिस तरह अब से हमे एक दूसरे का साथ देके ज़िन्दगी की राहों में चलना पडेगा. एक दूसरे की ज़िन्दगी का ख्याल रख के हर पल एक साथ रहना है. पण्डितजी का पूजा और हवन अभी भी चल रहा है. तभी उन्होंने नानीजी से धीरे से कुछ पूछा तो नानी जी उनको जबाब दिया बहुत धीरे से. पण्डितजी वहां पूजा के पास रखी हुई एक थाली से मंगलसूत्र उठाये और मुझे देदिये. मैं अपना हाथ निकाल के उनसे वह लिया. अब मंगल सूत्र पकड़ के भी मेरा हाथ थोड़ा थोड़ा काँप ना सुरु किया. मन के अंदर की खुशी, एक्ससिटेमेंट और न जाने क्या एक अद्भुत अनुभुति से मेरा मन पागल होने लगा. मैं माँ की तरफ देखा. वह बस अपने होटों पे मुस्कराहट बरक़रार रख़कर, अपनी नज़र झुका के बैठि है. पण्डितजीने मंत्र पड़ना सुरु किया और मुझे अपनी हाथ के इशारे से वह मंगलसूत्र दुल्हन के गले में बाँधने को कहे. मैं थोड़ा घूम के माँ के तरफ हो गया. मैं धीरे धीरे अपने दोनों हाथ में पकड़ी हुई मंगलसूत्र को माँ की गले के पास लेकर गया. मैं बस और कहीं न देख के केवल माँ को देख रहा हु. मेरे हाथ उनकी गले के पास जाते ही वह समझ गयी और वह अपनी झुकि हुई नज़र के साथ अपनी सर को मेरे तरफ थोड़ा घुमायी, मुझे मंगलसूत्र बाँधने में असां हो इस लिये. मैं धीरे धीरे उनके गले में मंगलसूत्र डालकर पीछे दोनों हाथ ले गया बाँधने के लिये. तभी एक लेडी माँ का दुपट्टा को थोड़ा गर्दन के पास से उठाके मुझे उनकी गले में मंगलसूत्र पहनाने में मदत करने लगी. मैं मेरा हाथ माँ की गर्दन के पास एक साथ होने के बाद धीरे धीरे बाँधने लगा. मेरा हाथ थोड़ा थोड़ा उनको टच कर रहा है. मेरी बॉडी एकदम उनके बॉडी के पास है. मेरे मन में अब जो अनुभुति खेल रहा है, शायद माँ के मन में भी शेम अनुभुति दौड रहा होगा. मंत्र पड़ने के बीच में मंगलसूत्र बांध के मेरा हाथ खीच लिया, और में फिर से सीधा बैठ गया. माँ भी अपने सर को घुमाके पहले जैसे बैठ गयी.उनके गले में मंगलसूत्र कैसे लगता है, यह पहली बार देख रहा हु. उनको साइड से देखते देखते उनकी लिए मेरे अंदर एक प्यार जागने लगा.
 
माँ मेरे नजदीक आतेहि पण्डितजी ने मुझे इंस्ट्रक्शन दिया कि आगे के कार्यक्रम के लिये. उनके कहे मुताबिक में पूरी तरह माँ की तरफ घूम गया. अब माँ मेरे नजदीक खडी है दुल्हन के भेष में, और में देख नहीं पा रहा हु, यह चीज़ मुझे बहुत तड़पा रही थी. मैं उनकी तरफ देखतेहि, पण्डितजी के एक आदमीने मुझे एक फूलों का हार थमा दिया और पण्डितजी वरमाला एक्सचेंज करने का निर्देश दिया. तभी वह दो आदमी धीरे धीरे वह पर्दा हटाया, जो मेरे और माँ के बीच में दृष्टि रोक रखा था. अब जैसे ही वह नीचे जाने लगा तभी सभी औरतें जोर जोर से हर्षा ध्वनि देणे लगी. नानी अपने चेहरे पे ख़ुशी की हसि लेकर माँ को एकदम नज़्दीक पकङी. और में माँ का चेहरा दिदार कर पाने लगा. उनके सर के ऊपर चुनरी घूँघट बनकर रखा हुआ है. बालों को एक अच्छी तरह डिज़ाइन करके पीछे बांधा हुआ है. सर पे सोने की बिंदिया मांग के ऊपर है. चेहरे पे नयी दुल्हन का मेक उप. माँ की स्किन हमेशा से मख़्खन जैसी मुलायम और गोरी है. पर आज वह इस साज में एकदम कोई अप्सरा जैसी लग रही है. वह बस एक २० साल की जवान लड़की लगने लगी. शादी के स्पर्श से जिसका रूप और निखरने लगा है. दोनों ऑय ब्रोव्स के बीच एक लाल बिंदी है. आँख झुकाके रखी है पर उनकी आखों में काजल और हलकी सी एक मेक अप किया हुआ है. नाक में सोने का नोज रिंग उनके चेहरे को पहले से एकदम अलग बना दिया है. शादी की ख़ुशी का अनुभव, शर्म और एक अनजानी उत्तेजना के कारन उनका नाक का अगला भाग सांस के साथ साथ थोड़ा थोड़ा काँप रहा है. और मेरे अंदर का वह अन्जान अनुभव बढ़कर चरम सीमा पे गया जब में उनके दो पतले गुलाबी होंठो को देखा. उनके दो नरम होठ ऐसे ही गुलाबी है , उसके ऊपर लिपस्टिक लगने के कारन वह और भी लोभनीय बन गयी है. मुझे इतने नज़्दीक से वह दो होठो को देख के लगा की वह रस में भरा हुआ संत्रा का दो मीठा फांके है. उन होठो में एक ख़ुशी की मुस्कराहट लगी हुई है. मुझे बस मेरे अंदर वह दोनों होठो को अपने होठो से मिलाके उसके अंदर भरा हुआ रस पीने का मन करने लगा. मैं अंदर ही अंदर काँप ने लगा. में माँ को बचपन से जानता हु, बचपन से उनको हर रूप में देखते आ रहा हु. इस लिए शायद मेरे अंदर शादी के टेंशन से ज़ादा उनको पाने की चाहत मेरे अंदर ज़ादा दौड़ने लगी. उनके साथ मिलन का इंतज़ार में इतना साल कटा है मैंने. आज बस मेरा मन उनको पूरी तरह से मेरी बाँहों में चाहने लगा. मैं उनकी तरफ कुछ पल ऐसे देख के खुद सब के सामने शर्मा गया. मेरी नज़र हट ते ही नानी से नज़र मीली. वह बस एक ख़ुशी और ममता भरी निग़ाहों से मुझे देखने लगी. वह चाहती है आज उनकी बेटी को अपनी हाथो से अपने ही पोते के हाथ में समर्पण करके उनकी बेटी और पोते को एक नये रिश्ते में जोड दे और वह हम सब को लेकर बाकि ज़िन्दगी ख़ुशी और शान्ति से जी पाये. पर्दा पूरा हटा लिया गया है. माँ मेरे सामने सर को थोड़ा झुका क़, नज़र नीचे करके कड़ी है. उनके हाथ में भी मेरे जैसे एक फूलों की वरमाला है. उनके दोनों मेहँदी किये हुये हाथ उनके दुल्हन रूप को खुबसुरती से बढा दिया है, उनकी गले में सोने का डिज़ाइन किया हुआ चौड़ा नेकलेस और कान में सोने का सुन्दर झूमका है. हाथों में सोने का अलग अलग डिज़ाइन का बँगलस. उनकी रंगीन शादी का जोड़ा उनकी मन को भी पहली बार इतने सालों बाद आज रंगीन बना दिया है, और वह उनकी पूरी शरीर के भाषा से पता चल रहा है. वह आज मन से अपने बेटे को अपने पति का अधिकार देणे के लिए दुल्हन के भेष में मेरे सामने शर्मा के खड़ी है. सब औरते एक ख़ुशी और आनंद का माहौल बनाकर रखी है. मेरे पास नानाजी और माँ के पास नानीजी खड़ी होकर हमे अपने बच्चों की तरह पूरी तरह से सहयोग देणे लगी है. हवन की पवित्र आग के सामने हम माँ बेटे खड़े होकर पण्डितजी के मंत्र उच्चारण के बीच हम एक दूसरे को पहली बार सब के सामने नज़र उठाकर हमारी चारों आँखें एक करने लगे. मैं माँ को देख रहा हु. वह बस अपनी नज़र थोड़ा थोड़ा उठाकर फिर झुका रही है. मुझे मालूम है वह एक कुवारी दुल्हन के जैसे मेहसुस कर रही है. उनकी आखों की पलके बस ऊपर आरही है और फिर नीचे ले जाकर मेरी से नज़र मिलाने में शर्मा रही है अपनी मम्मी पापा के सामने. पण्डितजी का मंत्र चल रहा है. पवित्र आग की आभा ने उनके गालों को और लाल कर दिया है. और तभी माँ अपनी नज़र उठाकर मेरे साथ नज़र मिलाया. सभी लोग क्लैप करके और ख़ुशी की आवाज़ से इस मुहूर्त को एक खास मुहूर्त बनाने लगे. माँ की नज़र में मेरे प्रति उनका प्यार, केअर, खुद को मेरे पास सोंपने की चाहत ..सब कुछ झलक रहा था. उनके चेहरे पे आज जो भावनाओं का साया छाया हुआ है, वह बस एक पत्नी का होता है अपने पति के लिये. हम एक दूसरे को देखकर अपनी आँखों की भाषा से, ख़ामोशी की भाषा से कसम खा लिया उस पवित्र अग्नि के सामने उसी कुछ पलों मे. वह पल हमारे ज़िन्दगी का सब से अहम पल था. पण्डितजी वरमाला बदल ने का निर्देश डीये. और तभी माँने अपनी नज़र झुका लि. मैं अपनी माला ऊपर ले गया धीरे धीरे , मेरा हाथ थोड़ा थोड़ा काँप रहा था. मैं मेरी माला बस उनके सर के ऊपर उनकी घूँघट के ऊपर से डालकर उनके गले में पहना दिया. और में हाथ नीचे कर लिया. फिर माँ भी अपने हाथ को ऊपर करके मेरे गले में मला ड़ालने के लिए लेकर आई. मैं हाइट में माँ से ज़ादा हु, इस लिए उनको हाथ को बहुत ऊपर करके ड़ालना पड़ेगा, इस लिए में माँ को हेल्प करने के लिए मेरा सर थोड़ा झुका के उनके हाथ के पास लाया. तभी माँ धीरे धीरे मेरे गले में वह माला डाल दि अपनी नजर झुकि रख के. मुझे अब बस जो मेहसुस होने लगा यह दुनियाका कोई भाषा से ब्यक्त नहीं कर सकता. केवल जो इस को मेहसुस किया कभी, केवल वहि समझ सकता है. मेरा मन माँ के प्रति प्यार से भारी होने लगा.
 
होश आया तो मुझे खुद पे बहुत ग्लानी हुई, ये क्या हो गया मेरे साथ्. माँ क्या सोचेगी मेरे बारे में. अपना उतरा हुआ चेहरा लिए में माँ की बगल में लेट गया. मेरी हिम्मत ही नहीं हो रही थी की में माँ से नजरें मिलाऊं. मुझे सब कुछ धूल में मिलता हुआ नजर आ रहा था
कहा इतनी बड़ी बात करी थी की अपनी माँ को दुनिया की सारी खुशियां दूंगा और आज पहली मिलन की रात को ये क्या हुआ.
अपणा चेहरा दूसरी तरफ कर लिया, अपने आप ही मेरी आँखों से ऑंसू बहने लगे.
पति पत्नी के प्रेम की पहली सीडी में में फ़िसल गया.
'ओह ये क्या हुआ हीतेश को, उतेजना में खुद को संभाल नहीं पाया ... मुझे ही कुछ करना होगा बहुत से लोग पहली बार औरत के संपर्क में आ कर अपनी उतेजना को संभल नहीं पाते, हीतेश के साथ भी ऐसा हो गया लगता है उधर मुंह कर के रो रहे हैं'
'सुनो!'
'अरे सुणो ना'
'उफ़ क्या ये छोटे बच्चों की तरह कर रहे हो हो जाता है इधर मेरी तरफ देखो देखो ऐसा करोगे तो में नाराज हो जाउंगी'
अब मुझे माँ की तरफ चेहरा घूमाना ही पड़ा मेरे चेहरे पे म्रेरे दिल का हाल लिखा हुआ था मेरी आँखें मेरी ग्लानी का प्रतिबिम्ब बनी हुई थी.
माँ ने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया
ओह क्या सकून मिलता है ईनबाँहों में समा कर.
'अपने आप को दोष मत दो
अत्यधिक उत्तेजना में ऐसा हो जाता है
मैने सर उठा कर माँ की आँखों में देखा वहा प्रेम के अलावा कुछ नहीं था वर्ना कोई और औरत होती तो आज मेरी शायद वो हालत हो जाती की जिंदगी में दुबारा सर न उठा पाता.
'परेशन मत होइये, ऐसा हो जाता है इसका मतलब ये नहीं है आप मुझे प्यार नही करते"
'में.....'
'कुछ मत सोचो - बस मेरी बाँहों में सो जाओ'
माँ प्यार से मेरे बालों को सहलाने लगी लेकिन अब नींद कहाँ आती आधी से ज्यादा रात तो बीत ही चुकी थी माँ दुखी न हो इस्लिये अपनी आँखें बंद कर ली और कल का इंतज़ार करने लगा कल मुझे ऑफिस भी जाना था
और यार लोग भी पीछे पडेंगे.
चांद सरकता रहा, रात गुज़रती रही और में माँ की बाँहों में आँखें बंद किये अपनी नकामयाबी पे खुद को कोस्ता रहा
मैंने सपने में भी नहीं सोचा था की माँ के साथ मेरी पहली रात का ये हस्र होगा.
माँ का दिल वाकई में बहुत बड़ा है
एक सिर्फ वो ही है जो मेरे दिल की हर धड़कन को समझती है जो मेरे हर दुःख को पहचान जाती है.
मुझे बोलने की जरुरत नहीं पड़ती वो मेरी आँखों की भाषा को समझ जाती है.
अब मुझे कल का इंतज़ार था कल जो शायद अंदर ही अंदर उसे भी इस बात का अफ़सोस हो रहा होगा
कितने सपने सजा के रखे होंगे माँ ने कितनी शिदत से इंतज़ार किया होगा इस रात का
कितने सालों के बाद आज माँ के तपते जिस्म को शान्ति मिलनि थी सब धरा रह गया
मैं अपने माँ को वो सुख नहीं दे पाया जिसका उसे अधिकार है
जिसको मैंने आग दिखा दी और जलता ही छोड़ दिया
एक डर सा बैठ गया है दिल में कहीं कल फिर आज जैसा न हो.
'ना जाने हीतेश क्या सोच रहा होगा अपने मन में सुहाग रात के कितने अरमान होते हैं कितनी तड़प होती है
कैसे पागलों की तरह मुझे चूम रहा था कैसे मेरे हर एक पोर का रस चुस्ने की कोशिश कर रहा था
आदमी जल्दी हीनभावना का शिकार हो जाता है
में जानती हु वो आज तक किसी और लड़की के पास नहीं गया मुझे उस पर बहुत फक्र है ये आखरी जंग बाकी रह गई है फिर हम दोनों एक हो जायेंगे मन से तो हैं ही तन से भी हो जायेंगे और फिर शुरू होगा हमारा अपना पारिवार
हमारी अपनी गृहस्थी लगता है कल मुझे ही पहल करनी पड़ेगी
अपने लज्जा को कुछ देर के लिए छुपा कर एक प्रियसी का रूप धरण करना पड़ेगा
मुझे ही कल हीतेश को उकसाना होगा कहीं हीनभावना के चक्कर में वो हार न मान जाए
मुझे ही अपने हीतेश को जितना होगा
ये रात बस जल्दी गुजर जाए और कल सूरज हमें नई ऊर्जा दे कर आगे बढ्ने में मदद करे'
 
माँ मेरे मुंह को मेरी जिव्हा को अपनी जिव्हा से सहलाती है . मगर मैने एकदम से उसकी जिव्हा अपने होंठो में दबा ली है और चूसने लगा

"उन्न्न्गग्घ्ह्ह......" माँ मेरे मुंह में सिसकती है और वो अपनी कमर इधर उधर हिलाने लगती है . मैं यह समझकर कि माँ क्या चाहती है अपनी कमर को थोडा सा हिलाता डुलाता हु और फिर हमदोनों एकदम से सिसक उठते हैं . मेरा पेनिस अपनी माँ की योनि पर था और उससे निकल रहा हल्का हल्का रस उसकी योनि को भिगो रहा था . माँ मेरे चेहरे को दबाती है तो मैं उसकी जिव्हा को और भी जोर जोर से चुसने लगा . हम दोनों की कमर हल्की हल्की हिलना शुरु हो गई थी . जिससे मेरा पेनिस अब माँ की योनि को रगड़ रहा था .

"उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़....." माँ आह भरती है जब दोनों के होंठ सांस लेने के लिए जुड़े होते हैं .

"मंजू...." हितेश भी पेनिस पर योनि के स्पर्श से सिसक उठा था .

माँ मेरे चेहरे को झुकाती है और मेरे मुख में अपनी जिव्हा घुसेड़ देती है . मैं फिर से उनकी जिव्हा को चूसने लगता हु . हमदोनों अब एक दुसरे की कमर पर अपनी कमर खूब जोर जोर से रगड़ने लगे . मेरा पेनिस बार बार माँ की योनि को छूता है और उसे सहलाते हुए उस जगह में घूम रहा था . उधर माँ जो अब पूरी तरह गर्म हो चुकी थी इस बार मेरी जिव्हा को अपने होंठो में दबोच कर उसे चूसने लगती है .

"आआह्ह्ह्ह......हाएएएएईएएएएइइइइइ..." अचानक माँ को झटका लगता है और वो सिसक कर अपना चेहरा हटा लेती है .

"मंजू मेरी जान...उफफ्फ्फ्फ़..." मैं भी सिसक उठा . मेरा पेनिस उनकी कमर की रगड़ से अचानक योनि के होंठो को फैलाकर थोडा सा अन्दर घुस गया था . अगर थोड़ा सा जयादा जोर लगा होता तो शायद सुपाड़ा अन्दर चला जाता .

माँ योनि में पेनिस के एहसास को पाकर ठिठक गई थी . वो मेरे चेहरे की और देखती है जो उसी की और देख रहा था . माँ धीरे से हल्के से सर हिलाती है जैसे मेरे किसी सवाल का जवाब दे रही हो . मैं अपनी माँ के इशारे को पाकर वापिस उठ गया और माँ की जाँघों के बीच बैठ जाता हु . मैने माँ की टांगों को ऊपर उठाया तो तो माँ खुद अपनी टांगें घुटनों से मोड़कर खड़ी कर देती है .मैने माँ के घुटनों को पकड़ उन्हें पूरी तरह फैला दिया . उनकी योनि मेरे सामने थी उसका द्वार बंद था दोनो लिप्स अंदर की और थे किसी बच्ची की तरह उनकी योनि थी एकदम नाजुक छोटी सी . मैं अपने सामने अपनी माँ की योनि को देख रहा था . मैंने एक बार फिर से निगाह उठाकर माँ की और देखा . माँ फिर से सर हिलाकर मुझे इशारा करती है . मैने माँ की पतली सी कमर को कस कर थाम लिया और थोडा सा उचककर आगे को बढ़ . मेरा पेनिस योनि के बेहद करीब था .

मैं थोडा सा आगे को होता हु और मेरा पेनिस माँ की योनि के छेद पर फिट हो जाता है .

"ईइइइइइस्सस्ससह्ह्ह्हह्ह......" माँ होंठ काटते हुए आँख बंद करके सिसक पड़ती है .

मैन अपनी मंजू की कमर को थाम अपने अस्स आगे को धकेल दिए . मेरे पेनिस का सुपाड़ा योनि का मुंह हल्का सा खोलता हुआ और ऊपर को फिसल जाता है . हालाँकि पेनिस अन्दर नहीं घुसा था मगर हमदोनों उस स्पर्श मात्र से सिसक उठे थे . मैने फिर से कमर को थामकर पेनिस अन्दर धकेल दिया और इस बार सुपाड़ा योनि के छल्ले को खोलता हुआ हल्का सा अन्दर जाता है और फिर से फिसल कर बाहर आ जाता है . माँ की योनि रस से भीग चुकी थी इसीलिए पेनिस को सीधा रख पाना मुझ को बहुत मुश्किल लग रहा था .

मैने और जोर लगाया . मेरे पेनिस का सुपाड़ा जैसे ही योनि के छल्ले पर और बल डालता है वो खुलती चली जाती है .

माँ का बदन ऐंठने लगता है वो ऊपर को उठती है और अपने नम होंठ मेरे होंठो पर रख देती है .

"मंजू आह आह....."मैं इस प्रहार को सहन नहीं कर पाया और मेरा पेनिस वीर्य की फुहारे छोड़ने लग गया..
 
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