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लगभग 2 साल से मैं मीनल के लिए तड़प रहा था, गुस्सा भी था लेकिन चाहता था कि वो मिल जाये. आज मीनल मिली भी तो किस रूप में. जब मैं चाह कर भी उसे गले नहीं लगा सकता था; उस से दूर रहना मेरी मजबूरी भी थी. आखिर कैसे उसे किसी और के साथ देख लेता; उस से अच्छा अंधा होना पसंद करूँगा।
मैं कार ले कर आगे बढ़ गया. कार के शीशे में देखा तो मीनल वहीं खड़ी थी. जैसे मुझे देख कर सदमा लग गया हो; मुझे मीनल के साथ घूमने जाने वाली घटना याद आ गयी, जब मैंने मीनल को कार से उतारा था. कितनी ग्लानि हुई थी उस दिन मुझे; काश आज भी ऐसा होता मीनल मेरे साथ उसी तरह होती;
बहती आंखों के साथ कार चलाना मुश्किल हो रहा था तो रुमाल से आंख अच्छे से पोछी. थोड़ा आगे बढ़ा ही था कि कौस्तुभ का फ़ोन आ गया;
फोन उठाने के साथ मैंने कार के शीशे में मीनल को अपने पती के पास जाकर कुछ बात करते देखा. फिर दोंनो को मेरी आगे बढ़ती हुई कार को देखते हुए पाया;
"कुछ पता चला. " कौस्तुभ ने बिना हाई हेलो के सीधा सवाल किया।
"मीनल की सोसाइटी के बाहर से ही गुज़र रहा हूँ.…. उस ने देख लिया मुझे.."
"क्या. !! क्या बोली वो फिर; शादी क्यों की उसने. माफी मांगी या नहीं. तुझे छोड़ के क्यों गई. कुछ पूछा या रोता ही रह मिल कर।"
"ऐसी बात नहीं कौस्तुभ" कह के मैने संक्षेप में उसे समझाया. धयान मेरा अब भी कार के शीशे पर था लेकिन अब मीनल दिखनी बंद हो गयी थी.
"तू उसे देख के ऐसे ही भाग आया. क्या ज़रूरत थी. उस से पूछता तो सही कि तेरे साथ ऐसा क्यों किया उसने आखिर. अच्छा खासा मौका गवां दिया तूने. " कौस्तुभ ने मुझे डांटा।
"क्या करूँ यार. उसका सामना करने की हिम्मत नहीं रही अब; उस के सामने मैं खुद को कमज़ोर नहीं दिखाना चाहता. मैं नहीं चाहता कि उसे भनक भी लगे कि ये 2 साल मैंने कैसे काटे ," मैं भरे हुए गले से बोला।
"एक बार वापस जा. मेरी बात मान. उस से एक जवाब मांग; अगर नहीं मांग सकता तो बिल्कुल सामान्य बन कर हाल चाल ही पूछ लें; बाकी बातें खुद ब खुद होने लगेंगी ,हो सकता है जो भी उसने किया उस के पीछे कोई मजबूरी रही हो. " कौस्तुभ ने मुझे समझाया।
"नहीं यार. मेरी हिम्मत नहीं. " मैं हारा हुआ बोला।
"तो ठीक है. मैं आ के पूछता हूँ उस से , तू कहीं कोने में पड़ के अपनी किस्मत का रोना रो. सिगरेट के साथ दारू भी शुरू कर दे ," कौस्तुभ चिल्लाया और मैं घबरा गया.
कौस्तुभ बहुत कम ही गुस्सा करता है, लेकिन जब भी करता है मैं भी चुप हो जाता हूँ। वो मेरी तरह नहीं कि हर दूसरे मिनट में गुस्सा हो जाये।
"अब भी ड्रामा करना है या कुछ और कि जा रहा है मीनल के पास. "
"ह्म्म्म. कार मोड़ रहा हूँ. " मैंने कहा।
कौस्तुभ ने बात होने के बाद उसे फ़ोन करने के लिए कहा और मैं घबराया हुआ मीनल के घर की तरफ चल दिया।
इस समय मेरे न जाने कितने मन पैदा हो गए थे और सारे ही अलग अलग सुझाव दे रहे थे. लेकिन मुझे कोई सुझाव जंच नहीं रह था. मैं तो बस कौस्तुभ का मान रखने के लिए जा रहा था;
जब उसकी सोसाइटी के गेट दिखना शुरू हुआ तो मेरे पेट मे अजीब सा दर्द उठने लगा. उसका पति अगर कुछ पूछे तो क्या कहूंगा, मीनल ने अगर पती के सामने मुझे पहचानने से इनकार कर दिया तो? . ऐसे कैसे करेगी. मैं उसकी फोटो दिखा दूंगा. मैं खुद को खुद से समझा रहा था।
गेट के पास पहुँचा तो मीनल नहीं दिखी. मैं कार किनारे पे लगा कर उतरा.. और गेट की तरफ बढ़ने लगा; हर कदम के साथ धड़कने भी बढ़ रही थी. हिम्मत कर के मैंने गेट के अंदर देखा. मीनल का कहीं अता पता नहीं था.
"उसे क्या फर्क पड़ा. हुह!! . मैं वापस आ कर खोज रहा हूँ उसे लेकिन मीनल से मेरा दो मिनेट इंतेज़ार भी नहीं हुआ. होगा भी क्यों. अब मैं हूँ ही कौन उसका. " मैं बुदबुदा रहा था।
"ऐ!! कौन हो तुम??;कल से यहां चक्कर काट रहे हो. !!" मेरे कानों में आवाज़ पड़ी तो मैंने डर के इधर उधर देखा, एक गार्ड मेरी तरफ ही चला आ रहा था।
मुझे एक पल को ऐसा लगा कि मैंने बैंक लूटा हो और पुलिस ने मुझे उसी वक़्त पकड़ लिया हो; न रुपये हाथ लगे और न बच के भाग सका। घबराहट में मेरे पैर कांप रहे थे. कहीं मुझे चोर उचक्का समझ के पोलिस न बुला ली हो. मेरी सारी इज़्ज़त दांव पे लग गयी।
"वो मैं;" मैंने खांसते हुए शुरुआत की। " मैं मुम्बई घूमने आया हूँ तो बस ऐसे ही;" मैंने जो कहा उसका क्या मतलब था मुझे ही समझ नही आया तो गार्ड क्या समझता।
"घूमने आए हो तो घूमो. वो मेमसाब के पीछे क्यों आ रहे हो; चलो भागो यहां से. वर्ना ऐसी धुनाई होगी न. घूमना भूल जाओगे;"
आज मीनल के कारण मैं एक गार्ड से बेइज़्ज़त हो रहा था. जहां किसी की हिम्मत नहीं होती थी मुझसे ऊंची आवाज़ में बात करने की. वही आज मैं सड़क पे खड़े हो कर फटकार सुन रहा था।
"एई. जाता है या बुलाऊं पोलिस. !!" वो फिर चिल्लाया और मैं वापस कार में आ कर बैठ गया. कुछ देर बहुत रोया. । आज पापा की याद आयी।
"पापा आज देखा कितनी बेइजती हुई मेरी. लोग मुझे मवाली समझ रहे हैं. मैं कुछ नहीं कह पाया पापा. "
अब किस मुह से रुकता वहां. सच कहूँ तो कहीं जा के डूब मरने का मन होने लगा था। बहुत देर तक मैं कार में बैठा अपनी पिछली ज़िन्दगी के बारे में सोचता रहा; मैं क्या था और आज क्या हूँ. लड़कियों को कभी अपने आगे कुछ नहीं समझा. ऐसा नहीं कि मैं उनकी बेइज़्ज़त्ति करता था, मेरे संस्कार ऐसे नहीं थे. लेकिन उनकी भावनाओं को मैं शायद समझा नहीं; समझता भी कैसे. मैं ऐसा था भी नहीं कि लड़कियों को हमेशा अपने आस पास चाहूं।।
इन सब पचड़ों से परे मेरी एक नौकरी भी थी, जो मुझे प्यारी थी। मुझे पुणे वापस निकलना होगा अब. अब मुम्बई कभी नहीं आऊंगा;
"मीनल ये मेरा आखिरी प्रयास था. अब और नहीं, मैं अपने माता पिता , अपने दोस्तों और अपने साथ खिलवाड़ नहीं कर सकता;आज से तुम मुक्त;जहां चाहे रहो या जाओ।
तुम अपनी ज़िंदगी मे सुखी हो बहुत कुछ हासिल कर चुकी हो. तुम्हें भी अपने फैसले लेने का हक़ है;मैं होता कौन हूँ आखिर!!. "
मैंने कार स्टार्ट की और निकल पड़ा, अपनी उसी ज़िन्दगी को चुनने जिस से भागता रहा केवल मीनल के लिए।
मैंने रास्ते से ही कौस्तुभ को फ़ोन किया
"बोल जल्दी, हुई बात. क्या बोली वो. " मुझ से ज्यादा जल्दी तो कौस्तुभ को थी।
मैं झूठी हंसी हंसा;" अरे मोटू. कितना बेचैन रहता है तू. अच्छा सुन, मैं पहुँच जाऊंगा साढ़े 10 या 11 बजे तक,
तू मीरा से कहना कि इंतेज़ार करे, साथ ही खाएंगे. "
कौस्तुभ मेरी आवाज और बोलने के तरीके से असमंजस में पड़ गया "तू ठीक तो है ना??"
"अभी ही तो ठीक हुआ हूँ कौस्तुभ, जो मेरा नहीं, जो मेरी किस्मत में नहीं उसे पकड़ने के लिए दौड़ता रहा लेकिन आज सब समझ गया हूँ;अब मैं भी आगे बढ़ जाना चाहता हूँ"
मैं गंभीर हो कर बोला।
"तू जल्दी से घर आजा परफेक्ट. तेरी बहुत याद आ रही है. आज खूब मज़े करेंगे" कौस्तुभ भावुक हो कर बोला।
मैंने फ़ोन काट कर कार की गति बढ़ा ली।
जीवन में एक सितारा था,माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो,कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे,जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर,कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई
कितनी सुंदर बात कही गयी है ना!! लेकिन कुछ बातें जो कहने में बेहद आसान होती हैं अमल करने में उतनी ही कठिन।
मीनल को मैं भूल जाऊंगा ये संभव नहीं था,लेकिन आने वाले वक्त को गले लगा कर आगे बढ़ने से कुछ समय में उसकी याद धुंधली ज़रूर हो जाएगी, प्यार खत्म नहीं होगा लेकिन उसकी तीव्रता ज़रूर कम हो जाएगी।
मैंने रास्ते मे वो सारे गाने सुने जो मीनल के साथ बिताए वक़्त में सुने थे। आज मैं ना रोया न ही मीनल को पाने की कोई चेष्टा की.
पुणे पहुँचते ही कौस्तुभ को फ़ोन किया कि खाने की तैयारी रखे। घर पहुँच के हम तीनों ने साथ खाया खूब हंसे बोले। कौस्तुभ और मीरा ने डांस दिखाया. मुझे मीनल की याद आयी लेकिन मैंने खुद को नियंत्रित कर लिया।
हम शायद रात भर वहीं बैठे रह जाते अगर मोटू अपनी बेसुरी आवाज़ में गाना न गाता।
मैं तो भागा ही साथ मे मीरा ने भी कान बंद कर लिए, मैं उन्ही के घर रहा रात को। सुबह अपने फ्लैट पे आ कर तैयार हुआ और ऑफिस निकल गया।
पिछले कुछ सालों की उठा पटक में मैं ज़िन्दगी से बहुत कुछ सीख चुका था।
दिन में खाने की लिए सीट से उठा तो अपनी ही धुन में जाता हुआ एक लड़की से टकरा गया।
"ओह्ह. सॉरी सॉरी. " मैंने हड़बड़ा के कहा लेकिन जब उसका चेहरा देखा तो मुस्कुरा उठा।
"व्हाट!! कभी सुंदर लड़की देखी नहीं क्या. " लड़की भी पूरे एटिट्यूड में थी. मुझे पुराना निशांत यानी कि मैं ही याद आ गया।
मैंने बत्तीसी दिखा दी और कहा "नहीं बिल्कुल नहीं.. और अपने आंखों से ले कर गाल तक काजल लगाने वाली सुंदर लड़की तो पहली ही बार देखी।"
"व्हाट डू यु मीन" वो तुनक कर बोली तो मैंने उसे मोबाइल के कैमरे में उसकि शकल दिखाई, मुझसे टकराने के कारण उसका काजल फैल गया था।
पहले वो घबरायी, फिर मेरे साथ हंसने लगी; मैंने हाथ आगे कर के कहा "हाई आई एम निशांत. "
"गकतफहमी में मत रहना, बॉयफ्रेंड है मेरा. " उसने भाव खाते हुए कहा.
न जाने क्यों उस से बात करते हुए लग रहा था कि खुद, से ही बात कर रहा हूँ।
"बॉयफ्रेंड तो मेरा भी है;तो तुम भी गकतफहमी में मत रहना.." मैंने हंसी रोकते हुए कहा।
वो खुले मुह से मुझे देखने लगी. " क्या हुआ.. अगर मेरे दोस्त एक लड़का है तो बॉय फ्रेंड ही हुआ न!!"
"व्हाटएवर.." उसने कहा और बाल झटक के चली गई।
मैं भी तो ऐसा था बिंदास बिल्कुल. कोई फिक्र नहीं, खुल के जीने वाला; और आज जैसे मेरे हंसने पर भी टैक्स लगता हो।
मैं आगे बढ़ना चाहता था लेकिन ज़िन्दगी ने मेरे लिए क्या संजो रखा था कोई भी नहीं जानता था।
खैर!! मैं भी खाने चला गया, बैठा ही था कि वो लड़की भी मेरे बगल में आ कर बैठ गयी तो मैं उसे देखने लगा.
" सीट नहीं मिली इएलिये यहां हूँ. ज्यादा खुश मत होना. " उसने कहा और मैं हंसने लगा तो उसने अपनी भौहें उचका के देखना शुरू कर दिया, मुझे मीनल याद आ गयी और मैं बिल्कुल गंभीर हो गया।
वो कुछ कहती उस के पहले ही मेरा फोन बज उठा कोई अनजान नंबर था तो मैंने उठाया नहीं; और अपने खाने पे ध्यान देने लगा। खाना आधा ही खाया था कि फ़ोन फिर बजा।
" उठा लो, गर्लफ्रैंड से बात करनी है तो मैं चली जाती हूं" उस लड़की ने कहा और मैं उसकी शक्ल देखने लगा।
"दिमाग है नहीं इतना या इस्तेमाल ही नहीं करती. " अब की मैंने उसे चिढ़ के देखा, इतने में फ़ोन भी कट गया।
"तुम लड़के तो जैसे दिमाग की फैक्ट्री लगा कि बैठे हो. तुम सब का दिमाग सिर्फ एक जगह होता है;बात ही करना बेकार है तुमसे तो;" वो बड़बड़ करते हुए वहां से चली गयी।
"मैं भी न बिना बात के गुस्सा हो गया" मैंने सोचा और कहा कर अपनी सीट पे आ गया।
मौका मिलते ही मैंने उस से सॉरी कहा " कुछ परेशान हूँ इसलिए ऐसा बोल दिया "
"इट्स ओके. मैंने भी ज्यादा गुस्सा कर लिया.." वो बोली
"बाई द वे. आई एम प्रिया;" वो मुस्कुरायी।
"हाई. मैं तुम्हारे पीछे नहीं हूँ. गलतफहमी में मत रहना.." मैंने भी मुअकुराया।
न जाने क्यों प्रिया से मिल कर मुझे अच्छा लगा. वो अल्हड़पन जो कहीं खो गया था, उसमे दिखा।
शाम को मैं सीधे अपने फ्लैट पे गया, दो दिन की थकान थी इस लिए लेट गया लेकिन मीनल पीछा नहीं छोड़ रही थी। मुम्बई में उस से मिलना, उसका अपने पती की तारीफ़ करना सब दिमाग मे घूम रहा था।
तभी मेरा फ़ोन बजा. फिर कोई अनजान नम्बर था, इस बार मैंने उठा लिया।
कई बार हेलो बोलने पर भी आवाज़ नहीं आयी तो मैंने फोन काट दिया। फिर 3-4 बार फोन आया और हर बार मैं हेलो ही करता राह गया, मुझे अब गुस्सा भी आने लगा था इतने में फ़ोन फिर बजा और मैं उठाते ही चिल्ला पड़ा।
"बोलना नहीं तो फ़ोन क्यों करते हो, मेरे पास फालतू वक़्त नही ऐसे मज़ाक के लिए समझे तुम. !!..आइंदा फ़ोन किया तो ठीक नहीं होगा. " इतना कह कर मैं फ़ोन काट ही रहा था कि आवाज़ आयी।
"भाई!! क्या हुआ..मैं जिग्नेश हूँ; आपने बोलने का मौका ही नहीं दिया;"
मैंने हैरानी से फ़ोन देखा तो जिगनेश का ही नंबर था गुस्से में मैंने आखिरी फ़ोन का नंबर देखा ही नहीं।
"सॉरी जिग्नेश. पता नहीं किस की कॉल आ रही थी बार बार. तो गुस्से में आ गया।" मैंने सफाई दी।
"कोई बात नहीं; अभी कहाँ हो?.."
"घर पे, क्यों क्या हुआ जिग्नेश. "
"भाई वो; दरअसल. " न जाने जिगनेश ऐसे घबराया हुआ, क्यों था।
"क्या बात है जिग्नेश. सब ठीक है ना.." मैंने चिंता जताई।
"भाई; मीनल आयी है. " मैंने इतना सुना ही था कि मोबाइल छूट कर नीचे गिर गया।
"हेलो भाई सुन रहे हो न.. हेलो हेलो. जिग्नेश बोल रहा था. " मैंने झट से फ़ोन उठाया और बोला "अब क्यों आयी है वो यहां. "
"आपसे मिलना चाहती है. "
"अच्छा,;लोन चुकाने;हुह!!;" मेरा खून खौल रहा था।
"नहीं भाई वो. "
लेकिन मैंने उसकी बात बीच मे काट दी " जितना भी ख़र्चा हमने उसपे किया है. फिर चाहे वो उसे मुम्बई प्रतियोगिता में ले जाने का ही क्यों न हो; सब जोड़ो और उस पर 8 प्रतिशत के हिसाब से ब्याज लगा कर उसे बता दो. "
"भाई आप कैसी बात कर रहे हो;एक बार;"
"और हांन जिग्नेश. " मैंने फिर उस की बात काट दी. " ये लोन का पैसा एक महीने के अंदर अंदर मुझे मिल जाना चाहिए; उसे ये बात अच्छे से समझा दो. " इतना कह कर मैंने फ़ोन काट दिया।
मैं जब भी सोचता हूँ कि अब नहीं रोऊंगा , मेरी ज़िंदगी नया तमाशा खड़ा कर देती है।
मैं अपने फ्लैट में चिल्ला कर मीनल से सवाल कर रहा था.
" बताओ क्यों आयी हो. मैं बताता हूँ;इस लिए क्योंकि मैंने तुम्हें रंगे हाथों पकड़ लिया;है ना. !!"
"अगर कल तुम मुझे नहीं देखती तो अपने परिवार के साथ मज़े कर रही होती. नफरत करता हूँ मैं तुमसे मीनल;
सुना तुमने;"इतना कहते ही मैंने मीनल और अपनी दीवार में टंगी फ़ोटो उठा के ज़मीन पे फेंक दी;उसका कांच चूर चूर हो गए.
"ऐसे ही तुमने मेरे सारे सपनों, अरमानों को चूर चूर कर, दिया मीनल; कभी माफ नहीं करूंगा तुम्हे. " मैं रोते हुए चिल्ला रहा था।
जिग्नेश का फोन दो बार और आ चुका था तीसरी बार मे मैंने उठा ही लिया।
अपने आप को संयमित कर के मैंने हेलो कहा..
"मैं तुमसे मिलना चाहती हूं निशांत;" ये मीनल की आवाज़ थी. इतने वक़्त के बाद उसके मुँह से अपना नाम सुनते ही मेरे सीने में फिऱ वो ही टीस हुई जो शुरुआत में होती थी.
मैंने कोई जवाब नहीं दिया..मैं जानता था कि बोलूंगा तो ज़ुबान लड़खड़ा जाएगी, शायद मैं कमज़ोर पड़ जाऊं और मीनल के सामने मैं खुद को कमज़ोर साबित नहीं कर सकता था।
मेरे लिए उसका होना न होना अब कोई महत्व नहीं रखता, मैं केवल ये जताना चाहता था;
मैं कभी प्यार में आ जाता, कभी नाराज़ सा
मुँह बनाता तो कभी गुस्से में मुट्ठी भींच लेता; कुछ ही पलों में न जाने कितने भाव , कितने विचार में चेहरे और मस्तिष्क से गुज़र गए. मैं जड़वत खुद को सम्हाले खड़ा रहा।
"निशांत;!!" मीनल की घबरायी आवाज़ फिर आयी।
कितनी आसानी से ढोंग कर लेती है ये मासूमियत का; अभी की आवाज़ देखो और कल परसों की चहक देखो. कितना फर्क है. मेरे अंदर से आवाज़ आयी।
नही ऐसा नहीं इतने समय बाद तुझ से बात कर रही है इसलिए ऐसा होगा. मैंने मीनल का बचाव किया।
तभी मीनल ने फिर कहा.." प्लीज निशांत. !!" और मेरे सामने मीनल के साथ गुज़री आखिरी रात घूम गयी।
"सिर्फ एक बार मिल लो;" उस ने याचना की।
"मेरे पास मतलबी लोगों से मिलने का वक़्त नहीं. " कह कर मैंने फ़ोन काट दिया और बिस्तर पे फ़ोन फेंक दिया।
फ़ोन फिर आता रहा लेकिन मैंने नहीं उठाया, मैं चकनाचूर हुए कांच के पीछे से झांकती मीनल और अपनी तस्वीर देखता रहा।
थोड़ी ही देर में दरवाजे की घंटी बजी तो मैं डर गया. वो इस हालत में मुझे देखेगा तो नाराज़ होगा.. क्या करूँ.. मैं भाग के बाथरूम गया और हल्का सा मुह धोया ,फिर कमरे दरवाज़ा बंद कर के बाहर आया और दरवाज़ा खोला।
कौस्तुभ अंदर आ कर कुछ बोलता पूछता उस के पहले ही मैंने नाटक शुरू कर दिया।
"देख ना मोटू. मेरी आँख में कुछ चला गया है , अच्छा हुआ तू आ गया. चेक कर ज़रा;"
कौस्तुभ कुछ नहीं बोला तो मैंने हल्की आंख खोल कर देखा, वो मुझे देख रहा था।
"क्या हुआ. ! मैं थोड़ा डरा कि उसे मेरे रोने का अंदाज़ा तो नहीं हो गया। "देख न आंखों में जलन हो रही है;" मैंने फिर कोशिश की।
"कैसे कर लेता है तू ऐसा;" वो बोला।
"मतलब.." मेरा डर बढ़ रहा था।
"एक बार मिल ले. क्या पता सब सही हो जाये तेरी ज़िन्दगी में.. और ये नाटक करने की ज़रूरत ही न पड़ें;" वो भावुक हो कर बोला और मैं उस के गले लग के रोने लगा।
"कैसे मिलु ये जान कर कि वो मेरी नहीं; मुझसे नहीं होगा अब. अगर उसे सच मे मिलना होता तो पहले आती, लेकिन वो सिर्फ़ इएलिये आयी है क्योंकि कल उसने मुझे देख लिया;"
काश की वो पहले आयी होती तो मुझे इतनी तकलीफ न होती. मेरा मन कुछ भी समझने को तैयार नहीं था।
"एक बार मिल ले उस से. मैंने उसे बुला लिया है; मैं चाहता हूँ कि तू सच का सामना करे और आगे बढ़े;" कौस्तुभ मुझे ज्ञान दे रहा था।
"नहीँ;! ऐसे नहीं. मैं उसे इतनी आसानी से नहीं मिलूंगा. मैं भी देखूं मुझसे मिलने की कितनी बेताबी है उसे;"
इतना कह के मैं कौस्तुभ से अलग हो गया।
मेरे चेहरे पे दबी हुई खुशी के ऊपर पसरी हुई नफरत साफ झलक रही थी, कौस्तुभ ने मेरे कंधों पर हाथ रख दिया।
अजीब कशमकश थी ये ज़िन्दगी की, एक तरफ मीनल के मिल जाने की खुशी, एक तरफ उस के शादीशुदा होने का दुःख और एक तरफ उसका मुझे धोखा देने की नफरत; इनमे से कोई भी कम या ज्यादा नहीं था;
मैं ना चाहते हुए भी फिर कौस्तुभ के सामने आँसूं बहाता खड़ा था. कौस्तुभ को किस ने बताया अचानक मेरे दिमाग मे ये सवाल कौंधा।
"जिग्नेश का फ़ोन तेरे पास भी आया था क्या. " मैंने धीमी आवाज़ में पूछा. वैसे भी इतना रोने चिल्लाने के बाद ताकत और आवाज़ दोनो ही मंद पड़ चुके थे।
"ह्म्म्म. तू बात नहीं कर रहा था. बताया उसने. " कौस्तुभ भी शांत ही था।
मेरे पास पूछने को बहुत कुछ था. लेकिन अब मन नहीं था. कौस्तुभ ने मुझे बिठाया और पानी पिलाया। अंदर के कमरे का बंद दरवाज़ा देख कर उसे शक हुआ. तो उसने खोल कर देखा.
मैं झेंप गया. भले ही वो फ़ोटो मेरी और मीनल की थी लेकिन गिफ्ट तो कौस्तुभ ने ही की थी। वो कुछ देर दरवाज़े से ही अंदर देखता रहा, फिर मुझे देखा तो मैंने नज़रें झुका ली।
वो वापस मेरे पास आया और मेरे कंधे पे हाथ रखा, "तेरे साथ बहुत बुरा हो चुका निशांत; अब सब सही होने का वक़्त है. मीनल से मिल कर सब क्लियर कर लेना;" और फ़िर सब पीछे छोड़ के आगे बढ़ना. "
मैंने कौस्तुभ के हाथ के ऊपर अपना हाथ रख दिया; "तू सही कहता है. जब वो चली ही गयी तो मैं क्यों उसी जगह रुका रहूँ;"
"तू बैठ अभी यहां, मैं कमरे से कांच साफ कर दूं. " कौस्तुभ झाड़ू लेने जाते हुए बोला।
जब वो कमरे में गया तो मैं भी पीछे चला गया, कौस्तुभ मुस्कुराया;" तेरी मीनल की फ़ोटो खराब नहीं करूंगा. परेशान मत हो. "
मैं फिर झेंप गया; कौस्तुभ बहुत अच्छे से जानता था कि मेरी भावनाएं मीनल के लिए कभी खत्म नहीं हो सकती। उसने मुझे बिस्तर पे बिठा दिया; मैं किसी बच्चे की तरह पालथी मार के बैठ गया और उसे कांच साफ करता देखने लगा.
उसने बिना फ्रेम के ही फ़ोटो दीवार पे टांग दी , और मैं लाल हो चुकी आंखों से फिर से फ़ोटो निहारने लगा. हालांकि मेरी आँखें अब जलने लगी थी।
मैं उसी तरह बिस्तर पे झुक गया. थकान और और दर्द अब बहुत बढ़ गया था। कौस्तुभ ने सब साफ कर के,अपने घर से मेरे लिए खाना ले कर आया. और अपने हाथों से मुझे खिलाने लगा.
मैं उसी तरह लेटा हुआ खाने लगा, मन नहीं था लेकिन कौस्तुभ को नाराज़ नहीं कर सकता था. कौस्तुभ और मेरा रिश्ता भी अलग ही था , वो मां बन कर मेरा ख्याल रखता, दोस्त बन कर साथ निभाता, भाई बन कर लड़ता, पिता बन कर मुझे बिना जताए न जाने क्या क्या कर जाता. .
मेरी हालत समझ कर उसने मुझे दवा खिला दी.. और बहुत देर मेरे साथ बैठा स्कूल के दिनों की बातें याद कर के मुझे गुदगुदाता रहा।
"मोटू !!काश हम अब भी स्कूल में होते, कितना अच्छा होता न. मुझे सिर्फ़ टॉप करने की फिक्र होती. और तुझे मुझसे ज्यादा नंबर लाने की. "
कौस्तुभ मेरा सिर सहलाते हुए बोला " जिंदगी अपने ही हिसाब से चल ले तो दुनिया नहीं चल पाएगी मेरे दोस्त. "
फिर वो मुझे कुछ न कुछ बताता रहा और मैं किसी शून्य में खोए खोए वैसे ही सो गया।
दूर तक फैला रेगिस्तान है, मैं भटक रहा हूँ. गर्मी ही गर्मी है.
मैं तड़प के भागता हूँ लेकिन कोई रास्ता नहीं मिलता. लगता है अंतिम समय आ गया. मैं गिर जाता हूँ, आंखें बंद हो जाती है;सूखे होठों पर जमी पपड़ी के कारण कुछ बोल पाने मेंक भी असमर्थ हूँ ..
अचानक से कुछ पानी की बूंदें मेरे चेहरे पे गिरती हैं. मैं पूरी ताकत लगा के आंख खोल के देखता हूँ. मीनल मेरे सामने है, मुस्कुराती हुई; मेरी बेचैनी खत्म हो जाती है; तपती धूप में ठंडी बयार बहने लगती है, और मुझमे ऊर्जा का संचार सा होने लगता है।।
मीनल!! मैं लड़खड़ाते आवाज़ में कहता हूँ. "मेरा बहुत इंतेज़ार किया ना;" मीनल नीचे बैठ के मेरे करीब झुक के कहती है, मेरी आवाज नहीं निकलती आंखों के कोनो से दो बूंदे लुढ़क कर रेत में गिर जाती हैं।
मीनल कुछ नहीं कहती झुक के मेरे होंठो को अपने होठों से छू लेती है.
मैं घबरा के उठ गया. सच मे होठ सूखे थे प्यास लगी थी।बगल में ध्यान दिया तो कौस्तुभ बैठे बैठे सोया था. कितना प्यार करते हैं सब मुझे. और मैं मीनल के लिए सब भूल सा गया।
मैंने उसे ठीक से सुलाया और पानी पी के लेट गया. लेकिन अब नींद नदारद थी तो मोबाइल में मीनल की तस्वीर देखने लगा। मैं मीनल को चाह कर भी खुद से अलग नहीं कर पा रहा था।
वास्तव में देखा जाए तो बहुत ही काम वक़्त था जो हमने साथ बिताया था, दीवाली की 5, दिन की छुट्टियों में ही मीनल मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन गयी, इस के पीछे क्या कारण है मैं खुद भी नहीं जानता।
लगभग 2 साल से मैं मीनल के लिए तड़प रहा था, गुस्सा भी था लेकिन चाहता था कि वो मिल जाये. आज मीनल मिली भी तो किस रूप में. जब मैं चाह कर भी उसे गले नहीं लगा सकता था; उस से दूर रहना मेरी मजबूरी भी थी. आखिर कैसे उसे किसी और के साथ देख लेता; उस से अच्छा अंधा होना पसंद करूँगा।
मैं कार ले कर आगे बढ़ गया. कार के शीशे में देखा तो मीनल वहीं खड़ी थी. जैसे मुझे देख कर सदमा लग गया हो; मुझे मीनल के साथ घूमने जाने वाली घटना याद आ गयी, जब मैंने मीनल को कार से उतारा था. कितनी ग्लानि हुई थी उस दिन मुझे; काश आज भी ऐसा होता मीनल मेरे साथ उसी तरह होती;
बहती आंखों के साथ कार चलाना मुश्किल हो रहा था तो रुमाल से आंख अच्छे से पोछी. थोड़ा आगे बढ़ा ही था कि कौस्तुभ का फ़ोन आ गया;
फोन उठाने के साथ मैंने कार के शीशे में मीनल को अपने पती के पास जाकर कुछ बात करते देखा. फिर दोंनो को मेरी आगे बढ़ती हुई कार को देखते हुए पाया;
"कुछ पता चला. " कौस्तुभ ने बिना हाई हेलो के सीधा सवाल किया।
"मीनल की सोसाइटी के बाहर से ही गुज़र रहा हूँ.…. उस ने देख लिया मुझे.."
"क्या. !! क्या बोली वो फिर; शादी क्यों की उसने. माफी मांगी या नहीं. तुझे छोड़ के क्यों गई. कुछ पूछा या रोता ही रह मिल कर।"
"ऐसी बात नहीं कौस्तुभ" कह के मैने संक्षेप में उसे समझाया. धयान मेरा अब भी कार के शीशे पर था लेकिन अब मीनल दिखनी बंद हो गयी थी.
"तू उसे देख के ऐसे ही भाग आया. क्या ज़रूरत थी. उस से पूछता तो सही कि तेरे साथ ऐसा क्यों किया उसने आखिर. अच्छा खासा मौका गवां दिया तूने. " कौस्तुभ ने मुझे डांटा।
"क्या करूँ यार. उसका सामना करने की हिम्मत नहीं रही अब; उस के सामने मैं खुद को कमज़ोर नहीं दिखाना चाहता. मैं नहीं चाहता कि उसे भनक भी लगे कि ये 2 साल मैंने कैसे काटे ," मैं भरे हुए गले से बोला।
"एक बार वापस जा. मेरी बात मान. उस से एक जवाब मांग; अगर नहीं मांग सकता तो बिल्कुल सामान्य बन कर हाल चाल ही पूछ लें; बाकी बातें खुद ब खुद होने लगेंगी ,हो सकता है जो भी उसने किया उस के पीछे कोई मजबूरी रही हो. " कौस्तुभ ने मुझे समझाया।
"नहीं यार. मेरी हिम्मत नहीं. " मैं हारा हुआ बोला।
"तो ठीक है. मैं आ के पूछता हूँ उस से , तू कहीं कोने में पड़ के अपनी किस्मत का रोना रो. सिगरेट के साथ दारू भी शुरू कर दे ," कौस्तुभ चिल्लाया और मैं घबरा गया.
कौस्तुभ बहुत कम ही गुस्सा करता है, लेकिन जब भी करता है मैं भी चुप हो जाता हूँ। वो मेरी तरह नहीं कि हर दूसरे मिनट में गुस्सा हो जाये।
"अब भी ड्रामा करना है या कुछ और कि जा रहा है मीनल के पास. "
"ह्म्म्म. कार मोड़ रहा हूँ. " मैंने कहा।
कौस्तुभ ने बात होने के बाद उसे फ़ोन करने के लिए कहा और मैं घबराया हुआ मीनल के घर की तरफ चल दिया।
इस समय मेरे न जाने कितने मन पैदा हो गए थे और सारे ही अलग अलग सुझाव दे रहे थे. लेकिन मुझे कोई सुझाव जंच नहीं रह था. मैं तो बस कौस्तुभ का मान रखने के लिए जा रहा था;
जब उसकी सोसाइटी के गेट दिखना शुरू हुआ तो मेरे पेट मे अजीब सा दर्द उठने लगा. उसका पति अगर कुछ पूछे तो क्या कहूंगा, मीनल ने अगर पती के सामने मुझे पहचानने से इनकार कर दिया तो? . ऐसे कैसे करेगी. मैं उसकी फोटो दिखा दूंगा. मैं खुद को खुद से समझा रहा था।
गेट के पास पहुँचा तो मीनल नहीं दिखी. मैं कार किनारे पे लगा कर उतरा.. और गेट की तरफ बढ़ने लगा; हर कदम के साथ धड़कने भी बढ़ रही थी. हिम्मत कर के मैंने गेट के अंदर देखा. मीनल का कहीं अता पता नहीं था.
"उसे क्या फर्क पड़ा. हुह!! . मैं वापस आ कर खोज रहा हूँ उसे लेकिन मीनल से मेरा दो मिनेट इंतेज़ार भी नहीं हुआ. होगा भी क्यों. अब मैं हूँ ही कौन उसका. " मैं बुदबुदा रहा था।
"ऐ!! कौन हो तुम??;कल से यहां चक्कर काट रहे हो. !!" मेरे कानों में आवाज़ पड़ी तो मैंने डर के इधर उधर देखा, एक गार्ड मेरी तरफ ही चला आ रहा था।
मुझे एक पल को ऐसा लगा कि मैंने बैंक लूटा हो और पुलिस ने मुझे उसी वक़्त पकड़ लिया हो; न रुपये हाथ लगे और न बच के भाग सका। घबराहट में मेरे पैर कांप रहे थे. कहीं मुझे चोर उचक्का समझ के पोलिस न बुला ली हो. मेरी सारी इज़्ज़त दांव पे लग गयी।
"वो मैं;" मैंने खांसते हुए शुरुआत की। " मैं मुम्बई घूमने आया हूँ तो बस ऐसे ही;" मैंने जो कहा उसका क्या मतलब था मुझे ही समझ नही आया तो गार्ड क्या समझता।
"घूमने आए हो तो घूमो. वो मेमसाब के पीछे क्यों आ रहे हो; चलो भागो यहां से. वर्ना ऐसी धुनाई होगी न. घूमना भूल जाओगे;"
आज मीनल के कारण मैं एक गार्ड से बेइज़्ज़त हो रहा था. जहां किसी की हिम्मत नहीं होती थी मुझसे ऊंची आवाज़ में बात करने की. वही आज मैं सड़क पे खड़े हो कर फटकार सुन रहा था।
"एई. जाता है या बुलाऊं पोलिस. !!" वो फिर चिल्लाया और मैं वापस कार में आ कर बैठ गया. कुछ देर बहुत रोया. । आज पापा की याद आयी।
"पापा आज देखा कितनी बेइजती हुई मेरी. लोग मुझे मवाली समझ रहे हैं. मैं कुछ नहीं कह पाया पापा. "
अब किस मुह से रुकता वहां. सच कहूँ तो कहीं जा के डूब मरने का मन होने लगा था। बहुत देर तक मैं कार में बैठा अपनी पिछली ज़िन्दगी के बारे में सोचता रहा; मैं क्या था और आज क्या हूँ. लड़कियों को कभी अपने आगे कुछ नहीं समझा. ऐसा नहीं कि मैं उनकी बेइज़्ज़त्ति करता था, मेरे संस्कार ऐसे नहीं थे. लेकिन उनकी भावनाओं को मैं शायद समझा नहीं; समझता भी कैसे. मैं ऐसा था भी नहीं कि लड़कियों को हमेशा अपने आस पास चाहूं।।
इन सब पचड़ों से परे मेरी एक नौकरी भी थी, जो मुझे प्यारी थी। मुझे पुणे वापस निकलना होगा अब. अब मुम्बई कभी नहीं आऊंगा;
"मीनल ये मेरा आखिरी प्रयास था. अब और नहीं, मैं अपने माता पिता , अपने दोस्तों और अपने साथ खिलवाड़ नहीं कर सकता;आज से तुम मुक्त;जहां चाहे रहो या जाओ।
तुम अपनी ज़िंदगी मे सुखी हो बहुत कुछ हासिल कर चुकी हो. तुम्हें भी अपने फैसले लेने का हक़ है;मैं होता कौन हूँ आखिर!!. "
मैंने कार स्टार्ट की और निकल पड़ा, अपनी उसी ज़िन्दगी को चुनने जिस से भागता रहा केवल मीनल के लिए।
मैंने रास्ते से ही कौस्तुभ को फ़ोन किया
"बोल जल्दी, हुई बात. क्या बोली वो. " मुझ से ज्यादा जल्दी तो कौस्तुभ को थी।
मैं झूठी हंसी हंसा;" अरे मोटू. कितना बेचैन रहता है तू. अच्छा सुन, मैं पहुँच जाऊंगा साढ़े 10 या 11 बजे तक,
तू मीरा से कहना कि इंतेज़ार करे, साथ ही खाएंगे. "
कौस्तुभ मेरी आवाज और बोलने के तरीके से असमंजस में पड़ गया "तू ठीक तो है ना??"
"अभी ही तो ठीक हुआ हूँ कौस्तुभ, जो मेरा नहीं, जो मेरी किस्मत में नहीं उसे पकड़ने के लिए दौड़ता रहा लेकिन आज सब समझ गया हूँ;अब मैं भी आगे बढ़ जाना चाहता हूँ"
मैं गंभीर हो कर बोला।
"तू जल्दी से घर आजा परफेक्ट. तेरी बहुत याद आ रही है. आज खूब मज़े करेंगे" कौस्तुभ भावुक हो कर बोला।
मैंने फ़ोन काट कर कार की गति बढ़ा ली।
जीवन में एक सितारा था,माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो,कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे,जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर,कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई
कितनी सुंदर बात कही गयी है ना!! लेकिन कुछ बातें जो कहने में बेहद आसान होती हैं अमल करने में उतनी ही कठिन।
मीनल को मैं भूल जाऊंगा ये संभव नहीं था,लेकिन आने वाले वक्त को गले लगा कर आगे बढ़ने से कुछ समय में उसकी याद धुंधली ज़रूर हो जाएगी, प्यार खत्म नहीं होगा लेकिन उसकी तीव्रता ज़रूर कम हो जाएगी।
मैंने रास्ते मे वो सारे गाने सुने जो मीनल के साथ बिताए वक़्त में सुने थे। आज मैं ना रोया न ही मीनल को पाने की कोई चेष्टा की.
पुणे पहुँचते ही कौस्तुभ को फ़ोन किया कि खाने की तैयारी रखे। घर पहुँच के हम तीनों ने साथ खाया खूब हंसे बोले। कौस्तुभ और मीरा ने डांस दिखाया. मुझे मीनल की याद आयी लेकिन मैंने खुद को नियंत्रित कर लिया।
हम शायद रात भर वहीं बैठे रह जाते अगर मोटू अपनी बेसुरी आवाज़ में गाना न गाता।
मैं तो भागा ही साथ मे मीरा ने भी कान बंद कर लिए, मैं उन्ही के घर रहा रात को। सुबह अपने फ्लैट पे आ कर तैयार हुआ और ऑफिस निकल गया।
पिछले कुछ सालों की उठा पटक में मैं ज़िन्दगी से बहुत कुछ सीख चुका था।
दिन में खाने की लिए सीट से उठा तो अपनी ही धुन में जाता हुआ एक लड़की से टकरा गया।
"ओह्ह. सॉरी सॉरी. " मैंने हड़बड़ा के कहा लेकिन जब उसका चेहरा देखा तो मुस्कुरा उठा।
"व्हाट!! कभी सुंदर लड़की देखी नहीं क्या. " लड़की भी पूरे एटिट्यूड में थी. मुझे पुराना निशांत यानी कि मैं ही याद आ गया।
मैंने बत्तीसी दिखा दी और कहा "नहीं बिल्कुल नहीं.. और अपने आंखों से ले कर गाल तक काजल लगाने वाली सुंदर लड़की तो पहली ही बार देखी।"
"व्हाट डू यु मीन" वो तुनक कर बोली तो मैंने उसे मोबाइल के कैमरे में उसकि शकल दिखाई, मुझसे टकराने के कारण उसका काजल फैल गया था।
पहले वो घबरायी, फिर मेरे साथ हंसने लगी; मैंने हाथ आगे कर के कहा "हाई आई एम निशांत. "
"गकतफहमी में मत रहना, बॉयफ्रेंड है मेरा. " उसने भाव खाते हुए कहा.
न जाने क्यों उस से बात करते हुए लग रहा था कि खुद, से ही बात कर रहा हूँ।
"बॉयफ्रेंड तो मेरा भी है;तो तुम भी गकतफहमी में मत रहना.." मैंने हंसी रोकते हुए कहा।
वो खुले मुह से मुझे देखने लगी. " क्या हुआ.. अगर मेरे दोस्त एक लड़का है तो बॉय फ्रेंड ही हुआ न!!"
"व्हाटएवर.." उसने कहा और बाल झटक के चली गई।
मैं भी तो ऐसा था बिंदास बिल्कुल. कोई फिक्र नहीं, खुल के जीने वाला; और आज जैसे मेरे हंसने पर भी टैक्स लगता हो।
मैं आगे बढ़ना चाहता था लेकिन ज़िन्दगी ने मेरे लिए क्या संजो रखा था कोई भी नहीं जानता था।
खैर!! मैं भी खाने चला गया, बैठा ही था कि वो लड़की भी मेरे बगल में आ कर बैठ गयी तो मैं उसे देखने लगा.
" सीट नहीं मिली इएलिये यहां हूँ. ज्यादा खुश मत होना. " उसने कहा और मैं हंसने लगा तो उसने अपनी भौहें उचका के देखना शुरू कर दिया, मुझे मीनल याद आ गयी और मैं बिल्कुल गंभीर हो गया।
वो कुछ कहती उस के पहले ही मेरा फोन बज उठा कोई अनजान नंबर था तो मैंने उठाया नहीं; और अपने खाने पे ध्यान देने लगा। खाना आधा ही खाया था कि फ़ोन फिर बजा।
" उठा लो, गर्लफ्रैंड से बात करनी है तो मैं चली जाती हूं" उस लड़की ने कहा और मैं उसकी शक्ल देखने लगा।
"दिमाग है नहीं इतना या इस्तेमाल ही नहीं करती. " अब की मैंने उसे चिढ़ के देखा, इतने में फ़ोन भी कट गया।
"तुम लड़के तो जैसे दिमाग की फैक्ट्री लगा कि बैठे हो. तुम सब का दिमाग सिर्फ एक जगह होता है;बात ही करना बेकार है तुमसे तो;" वो बड़बड़ करते हुए वहां से चली गयी।
"मैं भी न बिना बात के गुस्सा हो गया" मैंने सोचा और कहा कर अपनी सीट पे आ गया।
मौका मिलते ही मैंने उस से सॉरी कहा " कुछ परेशान हूँ इसलिए ऐसा बोल दिया "
"इट्स ओके. मैंने भी ज्यादा गुस्सा कर लिया.." वो बोली
"बाई द वे. आई एम प्रिया;" वो मुस्कुरायी।
"हाई. मैं तुम्हारे पीछे नहीं हूँ. गलतफहमी में मत रहना.." मैंने भी मुअकुराया।
न जाने क्यों प्रिया से मिल कर मुझे अच्छा लगा. वो अल्हड़पन जो कहीं खो गया था, उसमे दिखा।
शाम को मैं सीधे अपने फ्लैट पे गया, दो दिन की थकान थी इस लिए लेट गया लेकिन मीनल पीछा नहीं छोड़ रही थी। मुम्बई में उस से मिलना, उसका अपने पती की तारीफ़ करना सब दिमाग मे घूम रहा था।
तभी मेरा फ़ोन बजा. फिर कोई अनजान नम्बर था, इस बार मैंने उठा लिया।
कई बार हेलो बोलने पर भी आवाज़ नहीं आयी तो मैंने फोन काट दिया। फिर 3-4 बार फोन आया और हर बार मैं हेलो ही करता राह गया, मुझे अब गुस्सा भी आने लगा था इतने में फ़ोन फिर बजा और मैं उठाते ही चिल्ला पड़ा।
"बोलना नहीं तो फ़ोन क्यों करते हो, मेरे पास फालतू वक़्त नही ऐसे मज़ाक के लिए समझे तुम. !!..आइंदा फ़ोन किया तो ठीक नहीं होगा. " इतना कह कर मैं फ़ोन काट ही रहा था कि आवाज़ आयी।
"भाई!! क्या हुआ..मैं जिग्नेश हूँ; आपने बोलने का मौका ही नहीं दिया;"
मैंने हैरानी से फ़ोन देखा तो जिगनेश का ही नंबर था गुस्से में मैंने आखिरी फ़ोन का नंबर देखा ही नहीं।
"सॉरी जिग्नेश. पता नहीं किस की कॉल आ रही थी बार बार. तो गुस्से में आ गया।" मैंने सफाई दी।
"कोई बात नहीं; अभी कहाँ हो?.."
"घर पे, क्यों क्या हुआ जिग्नेश. "
"भाई वो; दरअसल. " न जाने जिगनेश ऐसे घबराया हुआ, क्यों था।
"क्या बात है जिग्नेश. सब ठीक है ना.." मैंने चिंता जताई।
"भाई; मीनल आयी है. " मैंने इतना सुना ही था कि मोबाइल छूट कर नीचे गिर गया।
"हेलो भाई सुन रहे हो न.. हेलो हेलो. जिग्नेश बोल रहा था. " मैंने झट से फ़ोन उठाया और बोला "अब क्यों आयी है वो यहां. "
"आपसे मिलना चाहती है. "
"अच्छा,;लोन चुकाने;हुह!!;" मेरा खून खौल रहा था।
"नहीं भाई वो. "
लेकिन मैंने उसकी बात बीच मे काट दी " जितना भी ख़र्चा हमने उसपे किया है. फिर चाहे वो उसे मुम्बई प्रतियोगिता में ले जाने का ही क्यों न हो; सब जोड़ो और उस पर 8 प्रतिशत के हिसाब से ब्याज लगा कर उसे बता दो. "
"भाई आप कैसी बात कर रहे हो;एक बार;"
"और हांन जिग्नेश. " मैंने फिर उस की बात काट दी. " ये लोन का पैसा एक महीने के अंदर अंदर मुझे मिल जाना चाहिए; उसे ये बात अच्छे से समझा दो. " इतना कह कर मैंने फ़ोन काट दिया।
मैं जब भी सोचता हूँ कि अब नहीं रोऊंगा , मेरी ज़िंदगी नया तमाशा खड़ा कर देती है।
मैं अपने फ्लैट में चिल्ला कर मीनल से सवाल कर रहा था.
" बताओ क्यों आयी हो. मैं बताता हूँ;इस लिए क्योंकि मैंने तुम्हें रंगे हाथों पकड़ लिया;है ना. !!"
"अगर कल तुम मुझे नहीं देखती तो अपने परिवार के साथ मज़े कर रही होती. नफरत करता हूँ मैं तुमसे मीनल;
सुना तुमने;"इतना कहते ही मैंने मीनल और अपनी दीवार में टंगी फ़ोटो उठा के ज़मीन पे फेंक दी;उसका कांच चूर चूर हो गए.
"ऐसे ही तुमने मेरे सारे सपनों, अरमानों को चूर चूर कर, दिया मीनल; कभी माफ नहीं करूंगा तुम्हे. " मैं रोते हुए चिल्ला रहा था।
जिग्नेश का फोन दो बार और आ चुका था तीसरी बार मे मैंने उठा ही लिया।
अपने आप को संयमित कर के मैंने हेलो कहा..
"मैं तुमसे मिलना चाहती हूं निशांत;" ये मीनल की आवाज़ थी. इतने वक़्त के बाद उसके मुँह से अपना नाम सुनते ही मेरे सीने में फिऱ वो ही टीस हुई जो शुरुआत में होती थी.
मैंने कोई जवाब नहीं दिया..मैं जानता था कि बोलूंगा तो ज़ुबान लड़खड़ा जाएगी, शायद मैं कमज़ोर पड़ जाऊं और मीनल के सामने मैं खुद को कमज़ोर साबित नहीं कर सकता था।
मेरे लिए उसका होना न होना अब कोई महत्व नहीं रखता, मैं केवल ये जताना चाहता था;
मैं कभी प्यार में आ जाता, कभी नाराज़ सा
मुँह बनाता तो कभी गुस्से में मुट्ठी भींच लेता; कुछ ही पलों में न जाने कितने भाव , कितने विचार में चेहरे और मस्तिष्क से गुज़र गए. मैं जड़वत खुद को सम्हाले खड़ा रहा।
"निशांत;!!" मीनल की घबरायी आवाज़ फिर आयी।
कितनी आसानी से ढोंग कर लेती है ये मासूमियत का; अभी की आवाज़ देखो और कल परसों की चहक देखो. कितना फर्क है. मेरे अंदर से आवाज़ आयी।
नही ऐसा नहीं इतने समय बाद तुझ से बात कर रही है इसलिए ऐसा होगा. मैंने मीनल का बचाव किया।
तभी मीनल ने फिर कहा.." प्लीज निशांत. !!" और मेरे सामने मीनल के साथ गुज़री आखिरी रात घूम गयी।
"सिर्फ एक बार मिल लो;" उस ने याचना की।
"मेरे पास मतलबी लोगों से मिलने का वक़्त नहीं. " कह कर मैंने फ़ोन काट दिया और बिस्तर पे फ़ोन फेंक दिया।
फ़ोन फिर आता रहा लेकिन मैंने नहीं उठाया, मैं चकनाचूर हुए कांच के पीछे से झांकती मीनल और अपनी तस्वीर देखता रहा।
थोड़ी ही देर में दरवाजे की घंटी बजी तो मैं डर गया. वो इस हालत में मुझे देखेगा तो नाराज़ होगा.. क्या करूँ.. मैं भाग के बाथरूम गया और हल्का सा मुह धोया ,फिर कमरे दरवाज़ा बंद कर के बाहर आया और दरवाज़ा खोला।
कौस्तुभ अंदर आ कर कुछ बोलता पूछता उस के पहले ही मैंने नाटक शुरू कर दिया।
"देख ना मोटू. मेरी आँख में कुछ चला गया है , अच्छा हुआ तू आ गया. चेक कर ज़रा;"
कौस्तुभ कुछ नहीं बोला तो मैंने हल्की आंख खोल कर देखा, वो मुझे देख रहा था।
"क्या हुआ. ! मैं थोड़ा डरा कि उसे मेरे रोने का अंदाज़ा तो नहीं हो गया। "देख न आंखों में जलन हो रही है;" मैंने फिर कोशिश की।
"कैसे कर लेता है तू ऐसा;" वो बोला।
"मतलब.." मेरा डर बढ़ रहा था।
"एक बार मिल ले. क्या पता सब सही हो जाये तेरी ज़िन्दगी में.. और ये नाटक करने की ज़रूरत ही न पड़ें;" वो भावुक हो कर बोला और मैं उस के गले लग के रोने लगा।
"कैसे मिलु ये जान कर कि वो मेरी नहीं; मुझसे नहीं होगा अब. अगर उसे सच मे मिलना होता तो पहले आती, लेकिन वो सिर्फ़ इएलिये आयी है क्योंकि कल उसने मुझे देख लिया;"
काश की वो पहले आयी होती तो मुझे इतनी तकलीफ न होती. मेरा मन कुछ भी समझने को तैयार नहीं था।
"एक बार मिल ले उस से. मैंने उसे बुला लिया है; मैं चाहता हूँ कि तू सच का सामना करे और आगे बढ़े;" कौस्तुभ मुझे ज्ञान दे रहा था।
"नहीँ;! ऐसे नहीं. मैं उसे इतनी आसानी से नहीं मिलूंगा. मैं भी देखूं मुझसे मिलने की कितनी बेताबी है उसे;"
इतना कह के मैं कौस्तुभ से अलग हो गया।
मेरे चेहरे पे दबी हुई खुशी के ऊपर पसरी हुई नफरत साफ झलक रही थी, कौस्तुभ ने मेरे कंधों पर हाथ रख दिया।
अजीब कशमकश थी ये ज़िन्दगी की, एक तरफ मीनल के मिल जाने की खुशी, एक तरफ उस के शादीशुदा होने का दुःख और एक तरफ उसका मुझे धोखा देने की नफरत; इनमे से कोई भी कम या ज्यादा नहीं था;
मैं ना चाहते हुए भी फिर कौस्तुभ के सामने आँसूं बहाता खड़ा था. कौस्तुभ को किस ने बताया अचानक मेरे दिमाग मे ये सवाल कौंधा।
"जिग्नेश का फ़ोन तेरे पास भी आया था क्या. " मैंने धीमी आवाज़ में पूछा. वैसे भी इतना रोने चिल्लाने के बाद ताकत और आवाज़ दोनो ही मंद पड़ चुके थे।
"ह्म्म्म. तू बात नहीं कर रहा था. बताया उसने. " कौस्तुभ भी शांत ही था।
मेरे पास पूछने को बहुत कुछ था. लेकिन अब मन नहीं था. कौस्तुभ ने मुझे बिठाया और पानी पिलाया। अंदर के कमरे का बंद दरवाज़ा देख कर उसे शक हुआ. तो उसने खोल कर देखा.
मैं झेंप गया. भले ही वो फ़ोटो मेरी और मीनल की थी लेकिन गिफ्ट तो कौस्तुभ ने ही की थी। वो कुछ देर दरवाज़े से ही अंदर देखता रहा, फिर मुझे देखा तो मैंने नज़रें झुका ली।
वो वापस मेरे पास आया और मेरे कंधे पे हाथ रखा, "तेरे साथ बहुत बुरा हो चुका निशांत; अब सब सही होने का वक़्त है. मीनल से मिल कर सब क्लियर कर लेना;" और फ़िर सब पीछे छोड़ के आगे बढ़ना. "
मैंने कौस्तुभ के हाथ के ऊपर अपना हाथ रख दिया; "तू सही कहता है. जब वो चली ही गयी तो मैं क्यों उसी जगह रुका रहूँ;"
"तू बैठ अभी यहां, मैं कमरे से कांच साफ कर दूं. " कौस्तुभ झाड़ू लेने जाते हुए बोला।
जब वो कमरे में गया तो मैं भी पीछे चला गया, कौस्तुभ मुस्कुराया;" तेरी मीनल की फ़ोटो खराब नहीं करूंगा. परेशान मत हो. "
मैं फिर झेंप गया; कौस्तुभ बहुत अच्छे से जानता था कि मेरी भावनाएं मीनल के लिए कभी खत्म नहीं हो सकती। उसने मुझे बिस्तर पे बिठा दिया; मैं किसी बच्चे की तरह पालथी मार के बैठ गया और उसे कांच साफ करता देखने लगा.
उसने बिना फ्रेम के ही फ़ोटो दीवार पे टांग दी , और मैं लाल हो चुकी आंखों से फिर से फ़ोटो निहारने लगा. हालांकि मेरी आँखें अब जलने लगी थी।
मैं उसी तरह बिस्तर पे झुक गया. थकान और और दर्द अब बहुत बढ़ गया था। कौस्तुभ ने सब साफ कर के,अपने घर से मेरे लिए खाना ले कर आया. और अपने हाथों से मुझे खिलाने लगा.
मैं उसी तरह लेटा हुआ खाने लगा, मन नहीं था लेकिन कौस्तुभ को नाराज़ नहीं कर सकता था. कौस्तुभ और मेरा रिश्ता भी अलग ही था , वो मां बन कर मेरा ख्याल रखता, दोस्त बन कर साथ निभाता, भाई बन कर लड़ता, पिता बन कर मुझे बिना जताए न जाने क्या क्या कर जाता. .
मेरी हालत समझ कर उसने मुझे दवा खिला दी.. और बहुत देर मेरे साथ बैठा स्कूल के दिनों की बातें याद कर के मुझे गुदगुदाता रहा।
"मोटू !!काश हम अब भी स्कूल में होते, कितना अच्छा होता न. मुझे सिर्फ़ टॉप करने की फिक्र होती. और तुझे मुझसे ज्यादा नंबर लाने की. "
कौस्तुभ मेरा सिर सहलाते हुए बोला " जिंदगी अपने ही हिसाब से चल ले तो दुनिया नहीं चल पाएगी मेरे दोस्त. "
फिर वो मुझे कुछ न कुछ बताता रहा और मैं किसी शून्य में खोए खोए वैसे ही सो गया।
दूर तक फैला रेगिस्तान है, मैं भटक रहा हूँ. गर्मी ही गर्मी है.
मैं तड़प के भागता हूँ लेकिन कोई रास्ता नहीं मिलता. लगता है अंतिम समय आ गया. मैं गिर जाता हूँ, आंखें बंद हो जाती है;सूखे होठों पर जमी पपड़ी के कारण कुछ बोल पाने मेंक भी असमर्थ हूँ ..
अचानक से कुछ पानी की बूंदें मेरे चेहरे पे गिरती हैं. मैं पूरी ताकत लगा के आंख खोल के देखता हूँ. मीनल मेरे सामने है, मुस्कुराती हुई; मेरी बेचैनी खत्म हो जाती है; तपती धूप में ठंडी बयार बहने लगती है, और मुझमे ऊर्जा का संचार सा होने लगता है।।
मीनल!! मैं लड़खड़ाते आवाज़ में कहता हूँ. "मेरा बहुत इंतेज़ार किया ना;" मीनल नीचे बैठ के मेरे करीब झुक के कहती है, मेरी आवाज नहीं निकलती आंखों के कोनो से दो बूंदे लुढ़क कर रेत में गिर जाती हैं।
मीनल कुछ नहीं कहती झुक के मेरे होंठो को अपने होठों से छू लेती है.
मैं घबरा के उठ गया. सच मे होठ सूखे थे प्यास लगी थी।बगल में ध्यान दिया तो कौस्तुभ बैठे बैठे सोया था. कितना प्यार करते हैं सब मुझे. और मैं मीनल के लिए सब भूल सा गया।
मैंने उसे ठीक से सुलाया और पानी पी के लेट गया. लेकिन अब नींद नदारद थी तो मोबाइल में मीनल की तस्वीर देखने लगा। मैं मीनल को चाह कर भी खुद से अलग नहीं कर पा रहा था।
वास्तव में देखा जाए तो बहुत ही काम वक़्त था जो हमने साथ बिताया था, दीवाली की 5, दिन की छुट्टियों में ही मीनल मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन गयी, इस के पीछे क्या कारण है मैं खुद भी नहीं जानता।