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Romance स्वप्न सुंदरी (नई जिंदगी की ओर)

मुझे इंतेज़ार था आज रात का. टाइम कम ही था लेकिन जब कुछ ज़रूरी काम हो यो घड़ी अचानक से ही धीमी पड़ जाती है।

टाइम काटने के लिए मैने कुछ देर सोने का निश्चय किया और लेट गया, लेकिन बड़ी अजीब बात थी मैं सो नहीं पा रहा था। फिर उठ के खिड़की से बाहर मीनल के घर की तरफ देखने लगा।मुझे खुद में आये इस बदलाव का एहसास तक नहीं था।

खैर!! जैसे तैसे वक़्त गुज़रा. घर मे पूजा के बाद हम बाहर इकट्ठा हुए। मैंने आज महरून कुर्ता पजामा और उस पे हलके सुनहरे रंग का नेहरू जैकेट डाला। मौसी और मम्मी ने बाहर निकलने से पहले तक ना जाने कितनी बार मेरी बलाएं ली, मेरे कान के पीछे काजल भी लगा दिया, ओह गॉड!!

मेरी नज़रें आज सिर्फ और सिर्फ मीनल को खोज रही थीं, ऐसी बेचैनी सी होने लगी जी पहले कभी महसूस नहीं हुई थी; मैं अच्छी तरह समझ गया कि मेरी तबियत ठीक नहीं।

" पीछे की तरफ सब चेक करने गयी है, अभी आती ही होगी" पापा ने अचानक से मेरे पीछे खड़े हो कर बोला।

" क्या पापा डरा दिया आपने. " मैं चिढ़ कर बोला;" और आप किस की बात कर रहे हैं. " मैं सच मे नही जानता था कि पापा क्या कहना चाह रहे थे।

" मीनल. !!. अभी आ जायेगी"

अपनी पूरी ज़िंदगी मे इतना हैरान परेशान मैं कभी नहीं हुआ, जितना आज पापा की बात सुन कर हुआ।

" पापा. आपको कैसे पता??"

पापा मुस्कुराये और मेरा गाल छुआ " तेरा बाप हूँ मैं बेटा"

" पापा मुझे न कुछ अच्छा नहीं लग रहा, मुझे लगता है मेरी तबियत खराब हो रही है, बार बार चेस्ट की तरफ पेन से फील हो रहा है"

पापा ये सुन कर हंसने लगे;" मेरी तबियत खराब है और आप हंस रहे हैं. दिस इज़ नॉट फेयर!!"

"बेटा अभी आराम हो जाएगा खुद से बस दो मिनेट इंतेज़ार करो" इतना कह कर पापा अपने ग्रुप के साथ गप्पें मारने चले गए।

" मैं इधर उधर देखता रहा. लेकिन न तबियत ठीक हुई न मीनल, दिखी।" तभी आरती के लिए घोषणा हुई और मेरी नज़र स्टेज की तरफ चली गयी, देखा तो मीनल पण्डित जी के बगल में खड़ी थी हाथ में आरती की थाली सजा के पंडित जी को पकड़ा कर नीचे आ गई।

मेरे मन को एक सुकून मिला, और पापा की बात सच हुई, मेरी तबीयत भी ठीक लगने लगी अचानक ही, सीने में दर्द भी नहीं था।

मुझसे कुछ दूरी पर वो खड़ी हो कि आरती गया रही थी और मैं उसे देख रहा था, मीनल ने एक बार भी मेरी तरफ नहीं देखा तो मैं उदास हो गया।

कुछ आवाज़ मेरे कानों में पड़ी तो ध्यान दिया " हाय कितना हैंडसम है, "

"तमीज़ से बात कर तेरे जीजू हैं"

"आये हए बड़ी आयी जिज्जु. हुह!!"

मेरा पारा चढ़ चुका था, कैसी लड़कियां हैं पूजा करने आई हैं या अपनी शादी करने . बेशर्म. एक मीनल है, कितनी अच्छी है . मैं सब की तुलना मीनल से करने लगा था, सच तो ये था कि आज मेरा मन भी आरती में नहीं था।

आरती के बाद गरबा शुरू हुआ मैं कल की ही तरह एक कोने ओर बैठ गया, जहां से मीनल बैठी दिखे।

नव्या मेरे पास आ कर गरबे के लिए बोली, आज भी वो गज़ब की सुंदर लग रही थी, लेकिन मुझे उस मे कोई इंटरेस्ट नहीं रह गया था।

"सॉरी आई डोंट डांस"

"प्लीज;मेरे लिए. एक बार. "

" सॉरी नव्या. मैं अपने लिए भी नहीं करता डांस तो किसी और के लिए कैसे कर लूं.." वो उदास सी चली गयी।

और मैं मीनल को देखने लगा. आज वो थोड़ा तैयार हुई थी, मैं ये नहीं कहूंगा कि बहुत अच्छे से तैयार थी लेकिन शायद उस के हिसाब से वो अच्छी बन के आयी थी।

वो चारों तरफ सिर घुमा घुमा के गरबे करने वाले लोगों को देख रही थी, मैं उसे देख के मुसकुरा रहा था; कितना अच्छा था सब! अचानक उसकी नज़रे मुझ से टकराई और वो कुछ सेकण्ड्स के लिए देखती रही जैसे ये समझना चाह रही हो कि मैं किसे देख रहा हूँ। मैं अपने दांत दिखा के मुस्कुराया तो वो समझ गयी और गर्दन घूमा ली।

, स्टेज में आज कुछ परफॉर्मन्स शुरू हुई। बच्चे बड़े कुछ न कुछ टैलेंट दिखा रहे थे, हर परफॉरमेंस के बाद वो बहुत खुश हो कर ताली बजाती, और मुझे उसके आगे झुक कर ताली बजाने की स्टाइल पर हंसी आ जाती । एक परफॉरमेंस के बाद ताली बजाते हुए उस उसने मुझे देखा और मुझे खुद पर हँसता पाया तो अपनी भौहों को उठाने के साथ अपना मुंह भी टेढ़ा कर के बैठ गयी। मैं जोर से हंस पड़ा।

"निशांत मल्होत्रा, निशांत मल्होत्रा!!; मुझे गूंजती सी आवाज़ आयी, इतने में नव्या आ कर बोली आपका नाम अनाउंस हो रहा है जाइये।

मेरा नाम. मैं हैरान परेशान सा स्टेज की तरफ़ गया।

"निशांत जहां कहीं भी हो स्टेज पे आएं और अपनी मधुर आवाज में गाना सुनाए।"

मेरे पहुचने तक एक बार और नाम बोला जा चुका था। मैंने स्टेज पे पहुँचते ही गुस्से में पूछा

" किसने दिया मेरा नाम??"

"पहले गाना गा लो न भइया फिर ये सब करना", एक लड़का बोला।

"रुको सोचने दो कौन सा गाउँ" तब तक लड़कियां चिल्ला कर ताली बजाने लगी, मैंने भीड़ में मीनल को देखा जो बिना भाव के स्टेज निहार रही थी।

मेरे मुह से गाने के बोल खुद ही फुट पड़े

सुन ज़ालिमा

मेरे सानु कोई डर ना

की समझेगा ज़माना

ओह तू वि सी कमली, मैं वि सा कमला

इश्क दा रोग सयाना ,

सुन मेरे हमसफ़र क्या तुझे इतनी सी भी खबर

की तेरी साँसे चलती जिधर रहूँगा बस वही उम्र भर

जितनी हसीं ये मुलाकातें हैं उनसे भी प्यारी तेरी बातें हैं

बातों में तेरी जो खो जाते हैं आऊँ ना होश में मैं कभी

बाहों में है तेरी ज़िन्दगी हाय

नहीं था पता के तुझे मान लूँगा खुदा

की तेरी गललियों में इस कदर आऊंगा हर पहर

सुन मेरे हमसफ़र क्या तुझे इतनी सी भी खबर की तेरी साँसे चलती जिधर रहूँगा बस वही उम्र भर रहूँगा बस वही उम्र भर हाय .

मुझे पता भी नहीं चला कि ये गाना मैंने क्यों गाया, या शायद दिल की आवाज़ समझ नहीं पा रहा था , दिमाग पे परफेक्शन का भूत जो सवार था।

जब तालियां बजी तो याद आया कि मैं स्टेज पे अपना गाना गा चुका हूँ, तेज़ी से उतर के मैं मेन गेट के बाहर भागा। पता नहीं किसी से नज़रें मिलने का मन नहीं था, मीनल से भी नहीं पूरा गाना उसे ही देख कर जो गाया।

क्या सोच रही होगी वो मेरे बारे में; खुद पे गुस्सा आने लगा था। सिगरेट ली और टहलने लगा, नज़र फ़िर गेट की तरफ़ गयी मीनल के आने का भी वक़्त हो चला था।

बिस्कुट लिए वो आती दिखी, इस बार उसे देखने के बाद सीने में बीच की तरफ एक टीस सी उठी और नीचे की तरफ़ जा के पेट मे हल्की गुदगुदी की। मैं परेशान हो गया और सिगरेट फेंक कर पेट पे हाथ रखा और सोचा कि डॉक्टर को दिखा लूंगा एक बार जाने से पहले।

मुझे सिगरेट फेंकते हुए मीनल ने देख लिया, और मुस्कुराने लगी लेकिन मैं ना जाने क्यों आज नहीं मुस्कुरा पाया, न ही आज उस के पास जा के कुत्तों वाली बातें सुनी। बस दूर खड़ा उसे देखता रहा बिना किसी भाव के।

मीनल ने हाथ से इशारा कर के बुलाया तो मैंने गर्दन घुमा के मना कर दिया। उस ने आओ न कहते हुए फिर बुलाया. और मैं किसी रोबोट की तरह उस के पास चला गया।

वो न जाने क्या क्या बोलती रही मैं कुछ सुन ही न सका, उसे देखता रहा;
 
" तुम ठीक हो?" उसने मुझे झकझोरते हुए पूछा. तो मैं होश में आया। " क्या हो गया?? अच्छा गाना तो गाया. बस एक दो जगह ही मिस्टेक हुई, उतना चलता है. "

"नहीं. मैं ठीक हूँ , चलो अंदर चलें. खाना खाते हैं फिर मैं सोने जाऊंगा।" कह के मैं आगे बढ़ गया वो पीछे पीछे आयी। स्टेज के पास पहुँचे ही थे कि मौसी की अनाउंसमेंट शुरू हो गयी। अच्छा हुआ हम टाइम पे पहुँच गए वरना कल का सारा प्लान आज की तबियत के कारण खराब हो जाता।

" तुम मॉडल बनोगी इसकी. "

" नहीं. मुझे ये सब, पसंद नहीं.." उसने मुह बनाया।

"तुमसे पूछ नहीं रहा हूँ मैं समझी!! बता रहा हूँ.." मैंने गुस्से में उसे आंखें दिखाई तो वो डर से मुझे देखने लगी।

"कल टाइम पे तैयार रहना, मुझे लेट लतीफ लोग पसंद नहीं. समझी" वो घबरायी सी मुझे देखे जा रही थी जैसे मैं कोई अजूबा हूँ।

" समझ मे आया कि नहीं" मैं गुर्राया। मेरी इस बेकार सी हरकत पे उसकी आवाज़ बंद पड़ गयी उसने हां बोलना चाहा लेकिन मुँह से सिर्फ़ फूंक ही बाहर आयी तो उसने सिर हिला कर ही जवाब दे दिया।

"गुड अब चलो वहां बैठो मैं खाना लाता हूँ; " मैने दीवार की तरफ़ इशारा करते हुए उसे कहा और वो बिना वक़्त गवाए वहां से चली गयी।

मैं खुद नहीं जानता था कि ऐसी हरकतें क्यों कर रहा हूँ, मेरी नज़र में मेरी तबियत खराब थी जिस कारण मैं चिढचिढा हो गया था।

मैं खाना लाया, मीनल के लिए 2 चम्मच रखना नहीं भूला, कुछ एक्स्ट्रा टिश्यू पेपर, पानी भी लिया। सारा सामान साथ ही ले लिया क्यों के उसका भरोसा नहीं था कब क्या गिरा दे , और मैं खराब तबियत के साथ बार बार खाना लाने की हिम्मत नहीं कर सकता था।

उसके पास जाते समय मैंने दूर से उसे अपने आंखों के कोने पोछते हुए देखा, मैं समझ गया था कि मेरे बर्ताव से दुखी है।

तो पास जा के उसे सॉरी कहा और बताया कि तबियत के कारण चिढचिढा हो गया हूँ।

लेकिन वहां मेरे परिवार की 3 जोड़ी पारखी आंखें मेरी खराब तबियत और चिढ़चिढ़ेपन की वजह अच्छे से समझ रहे थे और आपस मे गुटरगूं कर के मुस्कुरा रहे थे।

इन सब से अनजान मैं मीनल के आगे खाने की थाली, पानी का गिलास और टिश्यू पेपर सजा रहा था।

खाना खत्म करते तक हमारे बीच कोई बात नहीं हुई, दूर नव्या ने मुझे देखा तो शायद मेरा यहां होना पसंद नहीं आया।

" आप यहां क्या कर रहे हैं "

" खाना खा रहा हूँ देख सकती हो" इतने गंदे जवाब की उसे उम्मीद नहीं थी।

" सॉरी आप बुरा मान गए।; आइये ना हम लोगों के साथ खाइये"

"नव्या मेरी तबियत थोड़ी ठीक नहीं, सॉरी मैं नहीं आ पाउँगा, तुम एन्जॉय करो" इस बार मैंने थोड़ी तमीज़ दिखाई।

"क्या हुआ, बुखार तो नहीं दिखाइए" इतना कह कर उसने मेरे माथे पे हाथ रखने की कोशिश की लेकिन उस के पहले ही मैंने उसकी कलाई पकड़ ली और बोला आई एम फाइन नव्या. तुम जाओ मेरे कारण अपनी पार्टी ख़राब मत करो, और हाँ मेरा नाम गाने के लिए तुमने ही दिया था ना। मैने उसे घूरते हुए पूछा तो वो डर से बगलें झांकने लगी।

"वो. वो. आप. "

"इट्स ओके नव्या.. आगे से ध्यान रखना। मेरी लाइफ में मुझे मेरी मर्ज़ी के बिना किसी का भी इंटरफेयरेस नहीं पसंद. आई थिंक यु अंडरस्टुड नाउ"

नाव्या ने मुह नीचे कर के हां में गर्दन हिलायी और मुँह लटका के चली गयी।

" तुम हमे देखना छोड़ के मुँह बंद करो मीनल और खाना खाओ" मैंने बिना उसे देखे ही बोला।

मीनल को शायद पता नहीं था कि मैं भले ही बात नाव्या से कर रहा था ,ध्यान मेरा उसी पे ही था। उसने जब खा लिया तो मैंने पूछा कि क्या वो और लेगी तो उसने न में गर्दन घुमायी। मैं हम दोनों की प्लेट वापस रख के आया और मीनल से कहा " अब तुम जाओ आराम करो, सुबह से काम कर रही हो. कितना थक गई होगी।" पता नहीं मेरी बात सुन कर उसे क्या लगा और उसकि आंखें भर आयी , मेरे सीने में फिर एक टीस उठी तो मैं भी घर जाने के लिए उठा। फ़िर मीनल को आवाज़ दी, उसने पलट के देखा " कल तैयार रहना. मैं मुस्कुराया और घर की तरफ मुड़ गया।
 
मैंने पंडाल में मीनल की मदद की, और सीमा मौसी को मैंने मीनल को तैयार करने के लिए मनाया, रात को स्टेज पे गाना गाया, अपनी तबियत ठीक न लगने पे घर आ गया।

मैं घर आया और कमरे में जा के पर्दे के पास खड़ा हो गया, मीनल नहीं दिखी लेकिन उसकी दादी खाना ठूसते हुए दिख गयी। पता नहीं क्यों उन्हें देख के मैंने अपनी मुट्ठी भींच ली और आ कर कपड़े बदल के लेट गया।

समझ ही नहीं आ रहा था कि मेरी तबियत खराब क्यों हुई , बुखार भी नहीं था; ये सब यहां का खाना खा के हुआ है मेरे दिमाग ने निर्णल लिया।

मैं किचन में गया eno पिया और आ कर लेट गया, दिन भर की सब बातें दिमाग में घूम रही थी, कभी मैं मुस्कुरा उठता कभी उदास हो जाता। ख़यालो में खोया करवट बदल रहा था कि पापा ने आ के सिर पे अपना हाथ रखा।

" नहीं पापा बुखार नहीं है, ये सब हैवी खाने से हुआ है. मैने ईनो पिया है अब ठीक हो जाएगा।"

पापा मेरी मासूमियत कहूँ या बेवकूफी जो भी थी;उस पे ठहाके लगा के हंस पड़े।

फिर बोले " तू मेरा बहुत अच्छा बेटा है, हमेशा ऐसा ही रहना"

अपनी तारीफ पे मेरी बीमारी आधी ठीक हो गयी और मैं कूद के बैठा और दोनों गालो पे अपने हाथ रख के बोल पड़ा "पापा मैं हूँ न पर्फेक्ट"

"बिल्कुल. " पापा ने फिर से मेरे सिर पे हाथ फेरा । " कल की क्या प्लानिंग है तेरी हम्म. मौसी बता रही थी. "

"कुछ नहीं पापा. बस मौसी को चैलेंज किया है"

"केवल इतना ध्यान रखना बेटा की मीनल को कोई ठेस न पहुँचे. वो मेरे कलेजे का टुकड़ा है "

" डोंट वरी पापा. मैं कुछ भी गलत नहीं करूंगा. पापा वो . उसकी दादी ना!! मुझे बिल्कुल पसंद नही"

"ऐसा नहीं कहते बेटे. तुम ये सब छोड़ो और आराम करो कल फिर जल्दी उठ के जॉगिंग पे जाओगे"

"हम्म पापा.. गुड नाईट"

जैसे तैसे मैं सो ही गया, सुबह अपने टाइम पे जॉगिंग के लिए निकल लिया। आज मैंने क्रीम और आसमानी रंग का ट्रैक सूट पहना साथ मे वोही हेड फोन और वाच। जॉगिंग करते हुए अपने आस पास कुछ और भी साये महसूस हुए. पीछे देखने के बाद मुझे कहीं जा के सिर पटक-पटक के जान दे देने का मन हुआ।

नव्या और उसकी दो चमचियाँ भी जॉगिंग कर रही थीं. ये तो मेरे पीछे हाथ धो के पड़ गयी हैं।

"हाई निशांत"

"हाई. " मैंने भागते रहने में भलाई समझी।

"आप रोज इतनी स्पीड से दौड़ते हैं" वो लगभग हांफते हुए बोली।

"हम्म्म्म ऑलवेज"

"आप से कुछ बात करनी थी", अबकी एक चमची बोली "प्लीज दो मिनेट रुकिए न "

मैं रुक के पलटा और कहा " हांजी कहिये" पीछे देखा तो नव्या अपने हाथों को कुरेद रही थी, कुछ डरी सी लग रही थी।

" क्या हुआ नव्या..? यू ओके??"

"नहीं वो थोड़ा परेशान है एक्चुअली" दूसरी चमची ने सफाई दी।

अब मुझे खीझ होने लगी, " बताओगी तभी तो पता चलेगा न"

"बोल न नव्या!!" एक उसे कन्धे से हल्का धक्का दे कर बोली।

"वो; मैं .. एक्चुअली. " वो बोल कम रही थी हकला ज्यादा रही थी।

"काम डाउन नव्या. " मैंने उसके कन्धे पे हाथ रख कर बोला " बोलो क्या हो गया. क्या हेल्प कर सकता हूँ मै" मेरे ऐसा करते ही बाकी दोनों अलग ही खुश होने लगी लेकिन नव्या मैडम के मुँह से शब्द न फूटे।

"तुम लोग आपस मे डिस्कस कर लो. जब लगें तब बता देना.. मैं अभी जॉगिंग करता हूँ" मैंने अपने दोनों हाथों में अपने बालों पे हाथ फेरते हुए कहा।

पता नहीं मैं कुछ भी करता हूँ ये तीनों मुझे ऐसे क्यों घूरने लगती हैं।

"व्हाट नाउ" मैंने भौहें उचका के कहा और फ़िर खुद पे ही हँस दिया।

हे भगवान !! अब तीनों का मुंह खुला का खुला रह गया। मतलब कभी लड़के देखे नहीं क्या. ऐसे तो कोई भी नहीं करता. अपनी इज़्ज़त लुटती सी लगी मुझे।

" देखो!! तुम लोग प्लीज ऐसे देखना बंद करो. आई एम नॉट फीलिंग कंफर्टेबल" मैं इस बार उनसे नज़रें नही मिला पाया. ये मेरी पूरी ज़िंदगी मे पहली बार हुआ कि लड़कियों के आगे ऐसे शर्मिन्दा हुआ।

"आप हैं ही इतने प्यारे जीजाजी. क्या करें हम" एक पूरी बेशर्मी से बोली।

"व्हाट..व्हाट. व्हाट डीड यु से राइट नाउ??. दिमाग ठीक है!! क्या बकवास किये जा रही हो;कौन जीजा किसका जीजा" मैं अपनी उंगली दिखा के उसे धमकाते हुए बोला तो वो डर के नव्या के पीछे खड़ी हो गयी।

"आई लाइक यु" नव्या एकदम से बोली और अपनी आंखें मीच के खड़ी हो गयी।

मैं अपने सिर पे हाथ रख के इधर उधर चक्कर काटने लगा, वो तीनो सहमी से मेरे इस विकराल रूप को देख के कांप रही थीं।

"नव्या इधर आओ. इधर मेरे पास" लेकिन वो एक इंच भी नहीं सरकी और सड़क को देखती रही।

"नव्या; नव्या !! जस्ट रिलैक्स. खा नहीं जाऊंगा तुम्हे मैं. " इस बार उसे एक चमची ने हल्का धक्का दिया तो वो 3..4 कदम तक आ कर सम्हली।

" देखो नव्या. "इस बार मेरे दोनों हाथों ने उसके कंधों को किसी अच्छे गुरु की तरह पकड़ा था, लेकिन उसे कुछ और ही फीलिंग आ रही थी, इतना मैं अब तक समझ गया था।

"पहले शान्त हो जाओ और मेरी बात ध्यान से सुनो. देखो नव्या, दो दिन का मिलना और प्यार हो जाना, ऐसा कुछ नहीं होता. तुम सच मे बहुत ब्यूटीफुल हो. तुम्हे एक से एक लड़के मिल जाएंगे. मेरे लिए या किसी के लिए खुद को मत बदलो, तुम जो हो जैसी हो अपने आप मे बेस्ट हो"

नव्या थोड़ा शरमाई ये सुन के. मैंने कहना जारी रखा.

" मेरे लिए जॉगिंग पे आ कर, मेरे घर आ कर कुछ हासिल नहीं होगा नव्या;तुम मेरे टाइप की नहीं;" इस के आगे मैं कुछ कह न सका. मीनल को जो देख लिया हाथ में थाली ले जाते हुए. उसने भी हमको देखा, फ़िर मेरे हाथों को नव्या के कंधो पे गौर से देखा और नज़रें सीधी कर के चलती बनी जैसे हम उसे दिखे ही नहीं। मुझे उस पे पता नहीं क्यों गुस्सा आ गया. लेकिन कुछ कर नहीं सकता था।

" वो भी तो आपके टाइप की नहीं; " नव्या धीरे से बोली, उसकी आँखों मे आँसू थे. मैं पिघल गया उसे देख के.

" तुम बिल्कुल गलत समझ रही हो नव्या. मैं उस से बात कर लेता हूँ ,तुमसे भी कर लेता हूँ इसका मतलब ये नहीं कि सब को पसंद कर के शादी कर लूं; प्लीज तुम रोओ मत.. "

मैं उस के आंसू पोछते हुए बोला। " 3..4 दिन में मैं वापस चला जाऊंगा तो खुश हो के जाना चाहता हूँ न कि किसी गिल्ट में. तुम वाकई मुझे पसंद करती हो तो खुश रहो और एन्जॉय करो. "

उसने हाँ में सिर हिलाया. " चलो अब घर जाओ. शाम को मिलते हैं; और हाँ. हैप्पी दीवाली" मैं मुस्कुराया ।

वो तीनो वापस लौट गई और मैं गेट की तरफ भागा।
 
मीनल चुप थी आज कहीं खोयी सी ,कहीं हमे देख कर कुछ गलत तो नहीं समझ बैठी मैंने सोचा।

मैं उस के पास जा के खड़ा हो गया, उसने देख के भी अनदेखा किया और गाय को रोटी खिलाती रही। उसका छोटा कुत्ता अब भी उस के पैरों वे कूद रहा था।

" कैसी हो मीनल. आज इतनी चुप क्यों हो"

"कुछ काम था? उसने सीधे पूछ लिया।

"बिना काम हम किसी से बात नहीं कर सकते क्या;"

वो बिना जवाब दिए कुत्ते को खिलाने लगी;

"वो जो तुमने देखा ऐसा कुछ नही हैं, तुम गलत समझ बैठी शायद" मैंने उसके एक कंधे पे हाथ रख के कहा, उसने मेरा हाथ देखा और बोली " हाथ हटाइये अपना अभी!!" मैं झेंप गया और हाथ हटा के खड़ा हो गया।

उसने मुझे एक नज़र देखा फिर वापस कुत्ते को खिलाती हुई बोली " आप क्या करते हैं, किस से रिश्ता रखते हैं . इस से मुझे क्या लेना देना, मैं कोई आपकी फैमिली तो हूँ नहीं जो मुँह फुला लूँ"

" तुम नाराज़ क्यों हो फिर मुझसे; बोलो न मीनल मैं कल रात के लिए फिर से माफी मांगता हूं, ज्यादा बोल गया शायद मैं तुमसे. यकीन मानो मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही कल से इस लिए ऐसा हो गया।" मीनल का मुझसे ठीक से बात न करना बहुत ज्यादा कष्ट दे रहा था।

"प्लीज मीनल. " उसकी आंख से एक आँसू नीचे लुढ़क गया. मैंने उसे पकड़ने के लिए आगे हाथ बढ़ाया लेकिन उसे पसंद नहीं ये सोच के पीछे कर लिए।।"

उसने खुद अपने आंसू पोछे फिर एक लंबी सांस ले के बोली " मैं तुमसे नाराज़ नहीं. तुम तो अच्छे इंसान हो..तुमसे क्या नाराज़गी. "

वो बनावटी सा मुस्कुरायी, इस मुस्कान को देख के मेरी आँखों मे दर्द उतर आया।

"मैं अगर अच्छा इंसान हूँ तो क्या मुझसे अपनी परेशानी नहीं बता सकती. तुम्हे मैं इस हालत में नहीं देख सकता मीनल. " मैं हिम्मत बटोर के बोला, पता नहीं क्यों बोलने में तकलीफ हो रही थी।

वो आगे बढ़ के मेरे बहुत पास आई, मैं कुछ समझ पाता इस के पहले ही उसने अपने पैरों को उचका के मेरी आँखें अपने हाथों से पोछि, तब जा के मुझे पता चला कि मैं रो रहा था।

मैंने इसकी पुष्टी के लिए अपनी आंखों को हाथ से छुआ तो एक बूंद आँसू की मेरी उँगली पे आ गयी। मैं अपने रोने पे हैरान था।

" मेरी लाइफ में ये सब रोज का है. तुम क्यों बच्चों की तरह रोते हो.." मैं बहुत बुरी तरह से झेंप गया था, कुछ समझ नही आया तो अपना सिर खुजाने लगा।

"तुम डिंपल वाले ही अच्छे हो. ये मोटे मोटे आंसुओ वाले नहीं" अब की वो सच मे मुस्कुरायी तो मैं शरमा गया और अपना चेहरा छुपा लिया, इस पे वो खिलखिला के हंस पड़ी । मैंने उसे कभी हंसते हुए नहीं देखा था , कितनी प्यारी लग रही थी वो एक छोटे बच्चे के जैसे, छल कपट से दूर, ईश्वर का ही प्रतिरूप। मैं भी उसे देखते हुए हँसने लगा।

"सच में प्यारे हैं" वो बोली।

"क्या" मैंने पूछा

" तुम्हारे डिंपल" और फिर खिलखिला पड़ी, मैं सिर खुजाते उसे देखता रहा।

" अब चलो मुझे बहुत काम हैं. "

" तुम्हे नहीं. हम दोनों को. तुम सारा क्रेडिट खुद ले जाना चाहती हो ना. मैं ऐसा होने नहीं दूंगा" मैं बत्तीसी दिखा के आगे बढ़ा और वो मुस्कुराते हुए पीछे आने लगी।

" तुम बुला लेना मुझे जब भी आओ यहां. ओके..!" मैं उसे समझाते हुए बोला।

" ओके अब जाओ, और मेरे साथ मत चलो अंदर. "

" क्यों क्या हुआ. " मैं उसे देख के बोला।

" जितना कहा उतना करो, बाद में बताऊंगी" तो मैं जॉगिंग करता करता घर आ गया। फ़िर नहा धो के नव्या के घर गया उस के भाई को पढ़ाने। नव्या ने मौका देख कर आज जो कुछ भी हुआ उस के लिए माफी मांगी ,मैंने भी उसे सब भूल जाने के लिए कहा।

घर आ के मैं थोड़ी देर आराम करने चला गया तो नींद आ गयी और तब खुली जब मम्मी मुझे जगाने आयी।

" उठ जा पुत्तर देख मीनल बुलाने आयी है" और मैं कूद के उठा "मीनल आयी है, कहाँ है. चलता हूँ" मेरी खुशी ओवरफ्लो हो चली थी। मम्मी मुस्कुरायी " मैं तो उसे ही भेज रही थी लेकिन उसने मना कर दिया तो मुझे ही आना पड़ा जगाने।
 
मैं फिर सोचने लगा एक तरफ नव्या थी कमरे से बाहर रहने को कहने के बावजूद बाहर नहीं गयी, और एक तरफ मीनल; कहने के बावजूद नहीं आयी।

"क्या सोच रहा है, जल्दी नीचे आ मैं खाना लगा रही हूँ दोनों खा के ही जाना"

जल्दी से नीचे पहुँचा तो मीनल को सिमटी, शरमाई सी डाइनिंग चेयर पे बैठा पाया।

मम्मी ने दोनों को खाना परोसा, खाना वो बहुत खुश हो के खा रही थी जैसे के अच्छा खाना नसीब न होता हो।

मम्मी भी उसे ढेर सारा खाना खिलाने के चक्कर मे दिखी, इस के पीछे भी कोई बात होगी ऐसा कुछ मैंने नहीं सोचा।

खाने के कुछ देर बाद हम पांडाल में गए, और स्टेज के पास की जगह साफ की।

मीनल ने मुझे साफ हिदायत दी कि मैं अपना दिमाग न लगाऊं बस जो वो मांगे देता रहूँ।

दिमाग़ की बात कर कौन रहा था देखो, लड़कियों पे दिमाग वाली बातें मुझे जंचती ही नहीं। मैंने भी सोचा कि देखूँ अपने दिमाग से क्या तीर मारती है।

उसने सफेद रंग मांगा, मैंने उसे पैकेट थमा दिया। वो अपनी मुट्ठी में रंग भर के अंगूठे और बगल की दो अंगुलियों के सहारे आड़े तिरछे डिज़ाइन बनाने लगी।

इस के बाद वो अलग अलग रंग मांगती रही ,मैं थमाता गया. रंग भरने में पता नहीं कैसे कैसे चहरे बना रही थी. कभी होठों के एक तरफ जीभ बाहर निकाल लेती, कभी होठ गोल कर लेती, कभी मुह टेढ़ा करने लगती; मेरे लिए अपनी हंसी रोक पाना मुश्किल हो गया था।

वैसे तो ये गलत काम था फिर भी मुझसे रहा नहीं गया तो भगवान से एडवांस में माफी मांगी और चुपके से उस्की वीडियो बना ली।

एक तरफ रंग भर के जब वो दूसरी तरफ गयी तो उसके मुह पे सीधे धूप लगने लगी, तो वो नाक और आंखें सिकोड़ के रंग भरने की कोशिश में लग गयी, मेरी कोशिश के बाद भी धूप उसे परेशान कर रही थी तो मेरे दिमाग मे एक खुराफाती तरकीब आयी। मैं पंडाल में सजावट के लिए लगा एक कपड़ा ले आया और अपने गले मे बांध लिया।

मुझे कोई भी झटके से देख लेता तो सुपरमैन सुपरमैन चिल्लाने लगता।

धूप से राहत मिली तो मीनल ने एक नज़र उपर कर के देखा, मुझे देख के पहले तो उसे झटका लगा लेकिन दूसरे ही पल वो जोर से हंसने लगी, मुझे भी मौका मिला और मैं भी खुल के हँस पड़ा, काफी देर तक हम ऐसे ही हंसते रहे।

उधर घर मे पापा मम्मी हमे देख के मुस्कुरा रहे थे लेकिन उनके अलावा भी कुछ नज़रें थीं जो हम पे जमी थीं।

वैसे भी भारत मे गृहणियों में सीसीटीवी के सारे गुण मौजूद हैं। खुद के घर मे होने वाले कारनामे को छोड़कर अगल बगल की छींक तक का हिसाब रखती हैं।

इस सब से अनजान ,हम दोनों ने रंगोली के बाद फूलों की सजावट की और घर जाने लगे। मैंने उसे 4 बजे तक तैयार हो कि मौसी के घर जाने को कहा।

उसने टालना चाहा लेकिन मेरा आदेश अटल था।

घर आया तो मम्मी ने हंसते हुए पूछ लिया " क्या कर रहा था तू पुत्तर"

"मम्मी!! मीनल सुबह बहुत परेशान थी, पूछने पर बताया भी नहीं, शायद रोई भी थी।इसीलिये मैं बस उसे हंसा रहा था।"

" बेचारी? माँ बाप क्या गए उसकी हंसी खुशी सपने सब लेते गए" माँ गंभीर हो गयी। फिर कहा "हम तो चाहते हैं कि वो हमेशा हँसती खेलती रहे। चल तू अब परेशान मत हो ज्यादा. जा के आराम कर, शाम को तेरे पापा मीनल को मौसी के पास ले जाएंगे।"

"मैं लेते जाऊंगा मम्मी, कोई नहीं"

"नहीं पुत्तर,. हम समाज मे रहते हैं तो उस के कायदे कानून भी मानने पड़ते हैं और उस के हिसाब से भी चलना पड़ता है। समझ रहा है ना मैं क्या कहना चाहती हूं"

" मम्मी मैं कुछ भी ऐसा नहीं करूंगा कि आप लोगों का सिर नीचा हो" मैं उनकी गोदी में सिर रखते हुए बोला और मम्मी मेरे बाल सहलाते हुए बोली। " हमारी किसी भी बात से बिन माँ बाप की बच्ची पे कोई उंगली उठाये, ये ना मुझे बर्दाश्त होगा न तेरे पापा को; "

"ओके मम्मी ;मैं उनकी बात को समझते हुए कमरे में आ के लेट गया।

थोड़ी देर बाद पापा मीनल को ले जाने लगे तो मैं अपने कमरे की खिड़की से ही सब देखता रहा, पापा ने उसे कार का दरवाजा खोल के आगे बिठाया, मीनल की दादी लालची नज़रों के साथ पापा से उनकी पोती के ख्याल रखने को कह रही थी। बदले में पापा ने सिर्फ अपने हाथ जोड़े और ड्राइविंग सीट पे आ गए।

जैसे जैसे गाड़ी आगे बढ़ती जा रही थी मुझे सीने में दर्द होने लगा। आज ही पापा से डॉक्टर को दिखाने की बात कहूंगा सोच के मैं लेट गया, ऐसी बेचैनी थी जिसे बर्दाश्त कर पाना मुश्किल था।
 
थोड़ी देर आराम कर के मैं तैयार होने लगा। आज मैंने पीले रंग का सिल्क का कुर्ता पहना साथ मे क्रीम रंग का जैकेट हाथ मे घड़ी और पैरों में जूतियां. मम्मी भी आज कुछ देर मुझे देखती रह गयीं।

हम दोनों ने मिल कर घर की पूजा की तैयारी की, लेकिन मेरी बेचैनी खत्म नहीं हो पा रही थी. खैर इंतेज़ार की घड़ियां खत्म हुई और घर के दरवाज़े पे कार रुकी। मम्मी की बात मुझे याद थी इस लिए मैं बाहर नहीं गया, नीचे कमरे में खिड़की से ही देखने लगा। पापा उतरे और पीछे की सीट से सीमा मौसी, लेकिन मैं तो किसी और को खोज रहा था. धड़कने ऐसी तेज़ दौड़ लगा रही थीं जैसे बोर्ड का रिजल्ट आ रहा हो।

पापा ने दूसरी तरफ जा के कार का दरवाजा खोला और मीनल को हाथ से सहारा दे कर उतारा, अब जा कर मुझे उस का चेहरा दिखा. सीने में फिर एक टीस उठी और मैं छाती पे हाथ रख के उसे देखने लगा।

सलीके से बाल बांध कर जुड़ा बनाया गया था, कानों मे झुमके झूल रहे थे, माथे पे छोटी सी चमचमाती बिंदी, होठों पे हल्की लिपस्टिक, आंखों में सिर्फ काजल. आज उस की भौहें बनी हुई थी। कुल मिला के मेरे लिए वो कोई अप्सरा थी. बाकी की राय से मुझे क्या लेना देना। एक ही कमी जो मुझे लगी वो थी मीनल के चेहरे पे खुशी, वो सकुचाई सी आगे की तरफ आयी तो उसके चेहरे के तनाव की वजह भी कांच की तरफ साफ हो गयी।

जैसे जैसे मेरी नज़रें उसके चेहरे से नीचे की तरफ बढ़ती जा रही थी वैसे वैसे मेरे गुस्से का पारा ऊपर बढ़ रहा था। और मैंने अपनी मुट्ठी भींच ली।
 
मैंने उसके चेहरे से नीचे की तरफ नज़र डाली तो देखा कि ठीक ठाक से गले की चोली , कमर से थोड़ा ऊपर लहंगा जिस से थोड़ा सा पेट झांक रहा था, दुपट्टे को सलीके से प्लेट्स बना के एक कंधे के साइड में लटकाया था। आगे से ढका ना होने के कारण मीनल असहज सी दिखी और अपने दोनों हाथों को इस तरह बांधा था कि पेट छुप जाए।

उसे इस हालत में देख के मैं आग बबूला हुए जा रहा था, पापा और बुआ से ऐसी उम्मीद नहीं थी। मौसी के कुछ कहने पे जब वो पलटी तो थोड़े डीप गले में उसकी झांकती पीठ दिखी, मैंने क्रोध में जलती अपनी आंखें बंद कर ली और उनके घर मे घुसने का इंतेज़ार करने लगा।

तीनो ने जैसे ही अंदर प्रवेश किया मेरी जलती आंखों से उनका सामना हुआ लेकिन वो मेरी बदली हुई सोच का कुछ अंदेशा न लगा पाए।

इतने में मम्मी किचन से बाहर आयी " मीनल. कितनी प्यारी लग रही है. मेरी बच्ची. किसी की नज़र न लगे"

प्यारी!! इतने अंग प्रदर्शन कर के कोई कैसे प्यारा लगेगा, मम्मी भी बिना दिमाग की बात करने लगी .

अच्छा!! जब अपनी सहकर्मियों का साथ पब, और डिस्को जाता है तब उनके छोटे कपडे तो तुझे बहुत स्मार्ट लगते हैं. मेरे अंदर की आवाज़ ने मुझे धिक्कारा।

उनकी बात अलग है, मीनल को मैं ऐसे नहीं देख सकता; इस तरह के कपड़ों में लोग कैसी नज़रें डालेंगे उस पे, सोचा है कभी, कोई उसे गलत तरीके से देखेगा तो मैं बर्दाश्त नहीं करूंगा; मैनें खुद से ही खुद का बचाव किया।

पहले खुद की नजरें देख न!! ये कह न कि तुझे जलन होगी कोई और उसे निहार लेगा अगर, जैसे तूने निहारा. आया बड़ा.

शट अप!! जस्ट शट अप!! मैं जोर से चीखा; कमरे में मौजूद हर शख्स अचानक से की गई मेरी इस हरकत से सकते में आ गया।

मेरे चीखने का ये आलम था कि इस बार मम्मी ने मीनल के सामान गिराने वाली प्रथा को आगे बढ़ाते हुए पानी के गिलास वाली पूरी ट्रे ही नीचे गिरा दी।

ट्रे गिरने के बाद मुझे होश आया कि मैं खुद से बात करते करते चिल्ला पड़ा, अब मेरे दिमाग मे क्या खिचड़ी पक रही थी ये तो कोई जानता नहीं था, सिवाय इस के की मैंने गुस्से में उन लोगो से शट अप कहा. अब जो होने वाला था उस के लिए मैं तैयार भी हो गया।

" ये नालायक!!, सारा पानी गिर गया इस के कारण. बंगलोर जा के सारी तमीज़ भूल गया है. अब हमें भी डाँटेगा ये, अपनी औलाद से गाली खाना ही बाकी रह गया था;"

मम्मी का टेप रिकॉर्डर चालू हो गया. पापा और मौसी मुझे अभी भी घूर रहे थे कि मैंने ऐसी हरकत क्यों की.

मीनल;हम्म्म्म. उसकी हालत के क्या कहने , वो पापा के पीछे छुपी हुई थोड़ी से गर्दन आगे कर के मुझे देख रही थी। उस के चेहरे के भाव उस वक़्त बिल्कुल ऐसे थे जैसे किसी राक्षस से सामना हो गया हो। जब उसकी नज़रें मुझसे टकराई तो वो पूरी तरह पापा के पीछे छुप गयी।

हे भगवान!! कल से तबियत खराब, और अब खुद से बातें; मुझे अब मानसिक चिकित्सक की ज़रूरत भी महसूस होने लगी थी।

मैं अब भीगी बिल्ली की तरह हाथ जोड़ कर मौसी और पापा से इशारे में मिन्नतें करने लगा। कान भी पकड़े; फिर दोबारा हाथ जोड़ कर इशारे से ही मम्मी को ,जो मेरी बची खुची इज़्ज़त मिट्टी में मिलाने पे आमादा थी, चुप करने को कहा;

नीता बेबी, रहने दो न त्योहार के दिन. निशांत फोन पर किसी को डांट रहा था। तुमने ध्यान नहीं दिया; पापा ने बेतुका से झूठ बोला, इतने में मीनल ने फिर पापा के पीछे से मुझे झांक कर देखा।

" आप रहने दीजिए; इस के हाथ में फोन नहीं था, मुझे सब पता है.."

अब मुझे ही अपने बचाव में आगे आ के आधा सच उगलना पड़ा।

" मम्मी. पापा सॉरी. मैं शर्मिंदा हूँ. लेकिन मैं सच मे आप लोगों से ऐसे नहीं कह रहा था. वो. मैं खुद से बात कर रहा था. तो;"

"लैह!! पुत्तर ये आदत कब से पाल ली तूने. ऐसी हरकतें करेगा तो लोग डर, जाएंगे" मौसी ने जहर उगला।

"मौसी मुझे नहीं पता. ऐसा कभी नहीं हुआ. मैं 2-3 दिन से अच्छा फील नहीं कर रहा, शायद तबियत ठीक नहीं, पापा को भी बताया था " मेरी आँखें नीची हो गयी इतना कहते।

" नीशू की तबियत खराब है और आपने मुझे बताया भी नहीं. " अब के मम्मी पापा पे चिल्लाई। " मेरा बच्चा. दिखा तो बुखार है क्या" मम्मी ने मेरा माथा ,गला सब टटोल लिया. लेकिन मेरा तो रोग ही अलग था।

पापा अब तक सारा माजरा समझ चुके थे , और मुस्कुरा कर मुझे देखने लगे। " नीता बेबी, सीमा इस बात को अभी बंद कीजिए आप लोग, मैं आप दोनों को खुशखबरी दूंगा अब सीधे। अभी पूजा करते हैं, फिर दिये जला कर सोसाइटी में चलेंगे. मैं मीनल को उस के घर छोड़ के आता हूँ।

जिस कारण इतना बड़ा तमाशा हुआ था उस वजह को बिना ठीक किये कैसे रह पाता मैं भला.

" पापा एक मिनट. मीनल को ऐसे तैयार क्यों किया. कितनी असहज है वो"

" पुत्तर वो पहली बार तैयार हुई है इस लिए. तू नही समझेगा" मौसी ने मुझे समझाया।

" मौसी आप लोग नहीं समझ रहे. इस हाल में वो बाहर जाएगी तो कैसा लगेगा. " अब वो तीनो मुझे घूरने लगे कि मैं किस हाल की बात कर रहा हूँ।

" मेरा मतलब. ऐसे ठीक नहीं लगता;" मैं पूरी कोशिश कर के भी ठीक से नहीं समझा पा रहा था कि उसका दिखता बदन मुझे नहीं जंच रहा था।

आज पहली बार मुझे बहन की कमी खली. दुनिया के सारे भाई अपनी बहनों के कपड़ों और मेकअप की बुराई कर के इतने परिपक्व हो जाते हैं कि किसी को भी समझा सकते हैं।

चुड़ैल लग रही है, कहाँ जा रही है मोटी, ओए सरसों का खेत. छि भूतनी लग रही है, ये कैसे कपडे पहने हैं तूने इत्यादि इत्यादि।.

"आप लोग समझ नहीं रहे,. मीनल ने ऐसे कपडे नहीं पहने. मेरा मतलब . इस तरह से. " मैं अपना एक हाथ कमर पे रख कर एक हाथ से अपना माथा खुजलाते हुए बोलने की कोशिश कर रहा था। मीनल बेचारी की शक्ल देखने लायक थी, वो बस मौका देख के भाग जाना चाहती थी।

" तू साफ साफ बोलेगा कुछ. मम्मी चिढ़ के बोली।. तुझे जलन तो नहीं हो रही कि वो ज्यादा अच्छी लग रही है सच बता"

"मम्मी आप भी न. क्या सोचती रहती हैं. ". मैं चुप हो कर सोचने लगा और बाकी मुझे घूरते हुए मेरे बोलने का इंतेज़ार करने लगे. ।

"मीनल चलो" मैं बोला. और सारे एक साथ बोले "कहां!!"

" आप लोग यहां वेट कीजिये, और भरोसा रखिये. " मैंने मीनल का हाथ पकड़ा और अपने कमरे की तरफ बढ़ने लगा. मीनल ने बेचारगी से पापा को देखा तो पापा ने आंखों से ही उसे आश्वस्त किया।
 
मीनल कांपती हुई मेरे पीछे चली आ रही थी, मैंने उसका हाथ जब पकड़ा तो सीने के दर्द में आराम हो चला, और मन मे सुकून आ गया. मैं इसे बस एक इत्तेफाक मान कर उसे अपने साथ ले आया।

"मीनल घबराओ मत. मुझे कहना नहीं आ रहा था नीचे; तुम मुझे गलत तो नहीं समझ रही न! " छत देख कर बात कर रहा था , वहीं मीनल ने ज़मीन को निहारते हुए न में सिर हिलाया।

"मीनल. " अब जो मैं कहने जा रहा था वो सोच कर ही कालेज मुँह को आने लगा, लेकिन वक़्त कम था हिम्मत ज़रूरी थी। "वो. अपना दुपट्टा ठीक कर लो ना;" मैंने कांपती आवाज़ में उसे देख कर कहा।

मेरा इतना कहना था कि वो मुझे ऐसे देखने लगी जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया, मैंने शायद उसके दिल की बात कह दी थी या शायद हम दोनों के दिल की आवाज़ एक ही थी.

इस के आगे मुझे कहना नहीं आया तो मैंने इशारे से ही दुपट्टे को दूसरे कंधे की तरफ ले जा के खुद को ढकने को कहा. वो बुरी तरह से झेंप रही थी और पलट के मेरी तरफ पीठ कर के अपना दुपट्टा ठीक करने लगी।

अब मेरी नज़र उसकी चोली के गले पे गयी, सच कहूँ तो वो मीनल पे बहुत अच्छी लग रही थी. इतनी देर में मैंने उस के लहंगे पे ठीक से ध्यान नहीं दिया था। पीले रंग का लहंगा, जिस पे सुनहरे और गहरे गुलाबी रंग के तार से फूलों की कढ़ाई की हुई थी. उसी गुलाबी रंग की चोली, जिस पे सुनहरे तार की बूटियां, पीले रंग का झीना से दुपट्टा जिसमें गुलाबी गोटा लगा था; ये पसंद पापा के सिवा किसी की हो ही नहीं सकती।

इतने में मीनल पीछे पलटी लेकिन मैं होश में कहां था आज कल. मैं जानता भी नहीं था कि उसे घूर रहा हूँ।

" क. क्या हुआ. निशांत; निशांत.. अब भी ठीक नहीं क्या; निशांत. " मीनल मुझे देख के परेशान हो चली थी। उसने आगे बढ़ के मेरे हाथ पे अपना हाथ रखा और दोबारा मुझे आवाज़ दे कर पूछा। उस के छूते ही मुझे एक सिहरन हुई. " ठीक तो हो न तुम " उसने चिंता जाहिर की।

" हम्म . मैं उसे अपलक देखते हुए बोला।

" अब चलें. मुझे घर भी जाना है" वो बोली और फिर दरवाज़े की तरफ जाने को हुई; मुझे न जाने क्या हुआ.. मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला " अभी नहीं मीनल. " और उस के पास जा के उसका जुड़ा खोल दिया।

अब उस के बालों से उस की पीठ ढक चुकी थी, मैंने महसूस किया की मीनल की सांसें तेज़ चल रही थी और वो कांप रही थी।

मैंने उसे अपनी तरफ पलट के बोला " तुम मुझे ढकी ही पसंद हो मीनल. और तुम खुश भी वैसे ही हो, है ना.!!.." इस बार मैं मुस्कुराया।

मीनल ने कुछ नहीं कहा और अचानक मेरे सीने से लग गयी, मैंने महसूस किया कि जितनी तेज़ धड़कने मेरी चल रही थी उतनी ही उस की भी चल रही थी।

इतना सकून मुझे न जाने क्यों मिल रहा था, जी कर रहा था कि मैं भी उसे पकड़ लू और ऐसे ही ज़िन्दगी कट जाए. लेकिन मेरे कुछ उसूल हैं जिन्हें मैं कभी नहीं तोड़ता. भावनाओं के आगे उसूलों की जीत हुई और मैंने उसे खुद से अलग किया।

" चलो " मैं बोला. फिर कहा " नहीं एक मिनट. " वो बहुत असहज होने लगी थी अपनी हरकत पे शायद.

" मीनल प्लीज एक सेल्फी. !! उसने चुप रह के हामी भरी. मैंने झट से फ़ोन निकाला और एक सेल्फी ली, मीनल की नज़र फ़ोन के कैमरे में ही मुझसे टकराई और उसने नज़रें झुका ली, मैंने मौके का फायदा उठा के एक और सेल्फी ले ली।

मैंने इस तरह की खुशी आज तक महसूस नहीं की थी. काश वक़्त रुक जाता. कुछ देर के लिए ही सही. सिर्फ मीनल और मैं रहते दुनिया मे. बिल्कुल मुक्त, स्वच्छंद से . बिना किसी डर , लिहाज के. उफ्फ. सोच कर ही पेट मे गुदगुदी सी हो उठी.

मैंने मोबाइल रख के, मीनल की आंखों के किनारे से थोड़ा काजल लिया और उसके कान के पीछे लगा दिया।

" जब कोई बहुत अच्छा लगता है ना तो ऐसे ही करते हैं, मम्मी भी ऐसा करती हैं , मैंने उसे समझाया"।

वो खुद में सिमटी सी कांप रही थी. "चलो अब चलते हैं कह के मैं आगे निकला और पीछे से वो चली आयी।

नींचे पापा ,मौसी और मम्मी धीरे धीरे पता नहीं क्या खिचड़ी पका रहे थे। हमें नीचे आते हुए देख कर तीनो की नजरें हम पे टिक गई। सब उत्सुक थे ये जानने के लिए कि मुझे क्या अच्छा नहीं लगा था मीनल के पहनावे में। सबने मेरे पीछे आती मीनल को अच्छे से घूर के देखा फिर मुझे घूरने लगे, मेरी अचानक दकियानूसी हुई सोच पे सब आश्चर्यचकित थे।

" हाय जिज्जी. ये निशू की सोच इतनी घटिया कब से हो गयी" मौसी ने मेरी इज़्ज़त की धज्जियां उड़ाई।

"देख रही हूँ मैं; जो जो कहता था . ये मेरे टाइप के नही, वो मेरे टाइप का नहीं. अब सारे वो ही कर्म कर रहा है" मम्मी ताना मारते हुए बोली और पापा हंस पड़े।

मीनल नज़रें नीचे किए हुए पापा से उसे घर छोड़ने को बोली,

"रुक बेटा. काला टीका लगा दूं तुझे बहुत सुंदर लग रही है"

मम्मी के कहते ही मीनल ने मुझे देखा. कुछ ही क्षण में मेरी चोरी पकड़े जाने वाली थी, मुझे लगा कि अब हार्ट अटैक आ जायेगा, आज बैंड बजने वाली है.

मम्मी ने अपनी आंखों का काजल निकाला और उसके कान के पीछे लगाने को हुई उस के पहले ही मौसी ने मेरा भांडा फोड़ दिया.

"रहने दो जिज्जी अब कोई ज़रूरत नहीं. "

"क्यों क्या हो गया अब.." मम्मी बोली।

" आपके दकियानूसी साहेबजादे , लगा चुके हैं पहले ही.." मौसी ने मूझे घूरते हुए कहा।

और पापा मम्मी भी मुझे अपनी आंखें सिकोड़ कर घूरने लगे. मैं बगलें झांकने लगा।

मीनल सिर झुकाए खुद के इस घर मे होने पे पछता रही थी।

"अरे मीनल जाओ न तुमने देर हो रही है, हमे भी पूजा करनी है. हैं ना पापा.." मैं पूजा रूम की तरफ भागा।

और सबके ठहाकों की आवाज़ मेरे कानों को चीरने लगे।

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अपनी अच्छी खासी बेइज़्ज़ती के बाद मेरा मन पूजा में कहाँ लगना था।

तीनों लोग आरती के बीच बीच मे मुझे घूर लेते एक एक बार, मैं बिना देखे ही सबकी नजरें भांप ले रहा था। पूजा के बाद दिए जला के हम सारे घर को रौशन करने लगे।

दुनिया मे बिजली का अविष्कार भले ही हो गया हो लेकिन दिए कि रौशनी जब जगमग करती है तो बाकी सारी रौशनी फीकी पड़ जाती है।

हर कमरे में एक एक दिया, घर की दीवार पे दिए और चौखट पे दिए सजाने के बाद मैं छत पे गया. ध्यान मेरा दियों पे था और नज़रें मीनल के घर की तरफ, ऐसा क्यों था ये बात मुझे छोड़ के सब जान चुके थे अब तक।

मेरी भगवान ने सुन भी ली. घर के दरवाज़े पे दिए रखती मीनल दिखी, दिए की रैशनी में वो किसी बड़े चित्रकार की रचना सी लगी मुझे, उस के झुमके के नग जब चमकते तो उनकी झिलमिलाती रैशनी में उस का चेहरा किसी दैवीय प्रतिमा सा लगने लगता। शब्दों में इस सुंदरता को उकेर पाना शायद संभव न हो। मेरे सारे शरीर मे सिहरन थी, जब के सीने और पेट के अंदर उथल मची हुई थी।

मेरी नज़रों से अनजान वो दियों को देख मुस्कुराती रही और दिए जला के अंदर चली गयी और मैं बर्फ की तरह वहीं जम गया, जब तक पापा ने मुझे आवाज़ दे कर नीचे नहीं बुलाया।

बाहर पांडाल में आरती शुरू हुई, मीनल का ध्यान भगवान पर ,मेरा मीनल पर, मम्मी पापा और मौसी का मुझ पर था।

बाकी कुछ और नज़रें थी जिनका ध्यान हम सब पे था और उन नज़रों में तारीफ या खुशी नहीं जलन और चिढ़ थी।

ये समाज हर किसी को खुश देख कर खूश नहीं रह पाता, कितनी अजीब सी बात है ना!! हम सब मिल कर एक समाज बनाते हैं और उसी समाज की दुहाई दे कर दूसरे की खुशियों में आग लगा देते हैं। मुझ जैसे अनजान और मीनल जैसे हालात के सताए हुए मासूम इस आग की भेंट चढ़ जाते हैं।

आरती खत्म होते ही कौस्तुभ, मेरे दोस्त, का फ़ोन आ गया।

हेलो

"ओए मिस्टर परफैक्ट;हैप्पी दीवाली!!", वो चिल्ला के बोला।

" सेम टू यु मोटू. और ये क्या…. आज भी जगजीत सिंह के रोते हुए गाने सुन रहा है" मैंने भी बहुत शोर होने के कारण चिल्ला के जवाब दिया।

कौस्तुभ ग़ज़ल का फैन था, और मेरे हिसाब से दुनिया का सब से बोरिंग बंदा;

"अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हम हैं, रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं। ". फ़ोन में ये ग़ज़ल अपना दुख चीख चीख के बता रही थी।

" देखना रिशू, एक दिन तू भी इन गज़लों को समझेगा . "

"चल साले, तू ही समझ. रोना धोना"।

मैंने कौस्तुभ को मीनल के बारे में बताना चाहा, लेकिन क्या बताता, मै तो खुद भी कुछ नहीं जानता था जो भी मेरे मन मे था। सिर्फ़ तारीफ करता तो कौन समझता।

सब फुलझड़ी और पटाखे चलाने में खो गए, मैं एक कोने में मीनल में खोया था..मेरे सामने नव्या मुझमे खोयी थी ये मुझे पता भी नही चला,दूर से वो ये ही समझ रही थी कि मैं उसे देख रहा हूँ।

मीनल की आज सब तारीफ कर रहे थे और वो मुस्कुराते हुए सब का अभिवादन। उसकी नज़र जब मुझ पे पड़ी तो आज उस ने मुँह टेढ़ा नहीं किया बल्कि अपनी भौहें उचका के बिना बोले ही " क्या हुआ" पूछ लिया और मेरे सीने में उठने वाली टीस थोड़ी सी बढ़ गयी।

मैं ना मुस्कुराया ना ही कोई जवाब दिया. मैं तो शायद वहां था ही नहीं. और केवल शरीर क्या जवाब दे पाता भला!!।

मेरा ध्यान तब टूटा जब मीनल मेन गेट की तरफ भागी, हालांकि लहंगे में वो ठीक से भाग नहीं पा रही थी,मैंने चारों तरफ देखा तो बाकी लोग अपने में मस्त दिखे. ओह!! इसका कुत्ता. वो बच्चा है डर रहा होगा आवाज़ से, मैं भी अब उस तरफ तेज़ क़दमों से बढ़ चला. सब लोग पांडाल की तरफ थे तो बाकी सब जगह लगभग सूनसान थी। मीनल कभी भागती, कभी लड़खड़ा जाती तो रुक के हांफती, तो कभी लहंगा पकड़ के तेज चलती; मैं एक ही चाल में चलता हुआ भी उस के करीब पहुँच चुका था।

मुझे केवल एक ही डर था वो था मीनल के गिर जाने का.. मैंने आवाज़ दी "मीनल रुको मैं चल रहा हूँ साथ" उसने भागते हुए ही पीछे देख लिया और कुशल धावक न होने के कारण सम्हल नहीं पायी। वो आगे की तरफ़ गिरने ही वाली थी कि मैंने पीछे से अपने एक हाथ को उस के आगे लगा दिया जिस कारण वो नीचे गिरने के बदले मेरे हाथ पे टिक गई। ये सब इतनी जल्दी हुआ कि मेरा हाथ अनायास ही उस के पेट को छू गया, मेरे सारे शरीर मे एक बिजली सी कौंध गयी जैसे तैसे उसे सीधा कर के मैंने सॉरी कहा। मैं बुरी तरह से कांपने लगा और दोनों हाथों से अपने बालों को पीछे करते हुए पलट के हांफने लगा।

"तुम यहाँ क्यों आये.." मीनल ने प्रश्न किया। उस के पूछने के तरीके से ये बिल्कल नहीं लगा कि उसे कुछ बुरा लगा तो मैंने चैन की सांस ली।

"वो. तुम्हारा कुत्ता है ना. उस के लिए"

" तुम्हें याद था??" वो मुस्कुरायी।

मुझे सिर्फ़ तुम याद हो. मेरे अंदर से आवाज़ आयी।

"नहीं तुम्हे भागते देखा तो समझ गया, और कुछ नहीं"।

"तुम ठीक तो हो न;" मेरी दशा देख कर वो बोली।

"हम्म्म्म. " मैं खुद नहीं जानता था कि ठीक हूँ भी या नहीं तो क्या जवाब देता।

हम उस प्यारे से कुत्ते को अंदर ले के आये और एक कोने में उस सोने के लिए इंतेज़ाम किया साथ मे खाने को भी। वो काफी डरा हुआ था।

इतने दिनों में मैं मीनल से बात कर रहा था लेकिन मुझे उस के बारे में कुछ पता नहीं था, और मेरे दिमाग मे ये बात अब जा के आयी।

"मीनल. तुमने अपने बारे में बताया नहीं कभी. आई मीन क्या करती हो, क्या प्लान है आदि. " मैंने उस से आखिर पूछ लिया।

"कुछ नहीं, जो देख रहे हो. यही सब..इतने में गुजारा हो जाता है" एक फीकी हंसी से वो बोली जो मुझे अच्छी नही लगी।

"मतलब. गुज़ारे से क्या मतलब. मीनल!! सबकी लाइफ का एक सपना, एक लक्ष्य होता है तुम्हारा भी तो होगा कोई?"

"हम्म था;लेकिन सबके सपने पूरे हो जाएं ये ज़रूरी तो नहीं निशांत"

"हो सकते हैं मीनल. जहां चाह वहां राह. "

उसने कुछ नहीं कहा बस आंसू से भरी झिलमिलाती आंखों से मुझे देख के मुस्कुराती रही। इस खामोशी के पीछे एक शोर था, जो चाहता था कि उसे बिना सुने भी समझा जाये। लेकिन मैं इतना परिपक्व अभी नहीं हुआ था, जिंदगी में जब आसानी से हासिल हो जाये तो उस इंसान के दर्द को समझ पाना थोड़ा मुश्किल होता है जिसे चाह के भी कुछ न मिल पाया हो।

"बोलो न मीनल प्लीज. मुझ पे अब तक इतना भी भरोसा नहीं हुआ कि कुछ कह सको?" मैं उन्ही मछली सी आंखों में लगभग डूबता हुआ बोला।

वो कुछ देर मुझे ऐसे ही देखती रही जैसे कि उस के लिये मेरी फिकर उसे सुकून दे रही हो.. फिर सांस छोड़ते हुए बोली।

"मैं डॉक्टर बनना चाहती थी, एग्जाम क्लियर भी कर लिया था. लेकिन. "

"लेकिन क्या मीनल;" मैं उतावला हो चला।

"मेरे पास फीस भरने के पैसे नहीं थे, मम्मी पापा भी छोड़ के नहीं गए कुछ. और अगर कुछ था भी तो मुझे नहीं पता। ये घर था मेरे नाम.. इसे बेच देती तो कहाँ जाती, और दादा दादी को कहां रखती।" उसने नज़रें दूसरी तरफ घुमा के आंसू पोछ लिए।

मेरा मन हुआ कि उसे गले लगा कर कहूँ के मैं हूँ न, तुम्हारे सब सपने पूरे करूँगा, तुम देखने की हिम्मत तो करो. लेकिन मुझे पापा मम्मी की हर बात याद थी तो ऐसा कुछ नहीं किया।

"तुम प्लीज ऐसे रोया मत करो मीनल, तुम्हारा रोना मुझसे सहन नहीं होता;" मैं उदास और लाचार सा बोला।"अब भी तो तुम बहुत कुछ कर सकती हो मीनल चाहो तो. "

"कर ही तो रही हूँ. पता नहीं क्या. लेकिन ठीक है. जो भी है जिंदगी गुज़रने के लिए.."

"ऐसे क्यों कहती हो तुम.. ..अभी तो बहुत ज़िन्दगी है सब अच्छा हो जाएगा. शादी करोगी नई जिंदगी शुरू करोगी तब देखना कितनी खुश रहोगी।"

मीनल शून्य को निहारती रही, फ़िर एक लंबी सांस ले कर बोली. " निशांत!!; मेरी शादी कभी नहीं होगी" और पलट के वापस पांडाल की तरफ चली गयी।

मैं वहीं खड़ा मीनल की इस बात का जवाब खोजता रहा,

अब किसी बम, किसी पटाखे में मेरी रुचि नहीं थी, मैं वहीं बने एक फुटपाथ पे काफी देर बैठा रहा।

मीनल का दर्द मुझे अपना लग रहा था. क्यों नहीं कर सकती वो शादी. उस से तो कोई भी कर लेगा इतनी अच्छी है, मैं हेल्प करूँगा. मैंने सोचा।

" कोई भी से क्या मतलब. तू उसे किसी के भी साथ देख पायेगा" मेरी अंतरात्मा ने मुझे धिक्कारा।

"नहीं, कोई उसे गलत तरीके से देख भी लगा तो मैं जान ले लूंगा उसकी.." मैं मुट्ठी भींच के बुदबुदाया।

" क्यों. क्यों जान ले लेगा. अभी तो कह रहा था कि कोई भी शादी कर लेगा. अब जान लेने लगा.. चाहता क्या है. "अंदर से फिर आवाज़ आयी।

"मीनल को किसी के भी साथ नहीं देख सकता. वो बहुत मासूम है, उसे मेरी ज़रूरत है"।

" उसे तेरी ज़रूरत नही. तुझे उसकी जरूरत है. सोच के देख .. रह सकेगा तू उस के बिना एक दिन भी" मुझे मैंने ही चुनौती दे डाली।

इस सवाल का जवाब मेरे पास नही था,. क्या मैं सच मे उस के बिना नहीं रह सकता??।।।।। नहीं ऐसा कुछ नहीं, मेरा दिमाग फ़ालतू चलने लगा है आज कल। मैंने खुद की ही आवाज़ को समझा बुझा के दबा दिया।

लेकिन भावनाओं को कौन काबू कर सका है, मेरी धड़कन मीनल को सोचते ही एक अलग गति पकड़ लेती, उस से दूरी असहनीय थी। आज जब अनजाने में उसे छुआ तो जो एहसास हुआ वैसा कभी पहले तो नहीं हुआ, जब भी ये बाद दिमाग मे आती मैं सिहर उठता।

मैं पागलों की तरह खुद से बातें करता रहा फिर अपने घुटनों में अपना सिर छुपा के बैठ गया आंसू भी बिना मतलब बहे जा रहे थे।

मेरे कंधों पे किसी ने हाथ रखा तो जल्दी से आंसू पोछ के ऊपर देखा।

"मेरे लिए इतना मत रोओ निशांत. मैंने सब को सिर्फ़ रुलाया है. तुम भी रो दिए तो पाप लगेगा मुझे" मीनल बोलते हुए मेरे सामने आ के बैठ गयी।

"मीनल. !! " मैं उसे देखे जा रहा था और कहने के लिए कुछ था नहीं।

"मुझे खाना नहीं दोगे निशांत. जानते हो न तुम्हारे आने के बाद मैं गिरने गिराने की स्पेशल परफॉरमेंस दे रही हूँ. कुछ गिरा दिया तो. "

मैं हंसने लगा और वो मुझे देख के मुस्कुरा पड़ी. " तुम न डिंपल में जितने प्यारे लगते हो उतने ही बुरे रोते हुए लगते हो।"

मैंने झट से आँसू पोछ लिए. " यहां रो कौन रहा है?"

इस बार वो हंस पड़ी और मैं उसकी हंसी में खो गया।

" चलो अब. मैं हाथ पकड़ के नही ले जाउंगी. तुम आगे चलो मैं आती हूँ"।
 
मैं आज खुश था तो दुखी भी था , दोनों ही वजहें मीनल से जुड़ी थी. उसकी जिंदगी के बारे में जानना बहुत ज़रूरी हो गया था।

आज मैंने मीनल के लिए कुर्सी लगाई ताकि उसे लहंगे में कोई दिक्कत न हो. पापा ने दूर से ही मेरी आँखों को देख के पहचान लिया और इशारे में ही ना रोने के लिए कहा।

"मीनल. ! मेरे साथ घूमने चलोगी? मैं तुम्हे बिल्कुल परेशान नहीं करूंगा. बस तुमसे ढेर सारी बातें करना चाहता हूँ. " मैं उसे निहारते हुए बोला।

" मुझे ऐसे देखना बंद करो पहले, वो खाना खाते हुए बोली.". और मैं झेंप गया। "सॉरी"

" कल तो हम गुजराती लोगों ने नया साल है तो नहीं जा सकती. सॉरी. "

" परसों?? उसके अगले दिन शाम को मेरी फ्लाइट है तो उस दिन नहीं जा सकता कहीं"

मीनल ये सुन के मुझे देखने लगी, उसकी आँखों मे मेरे जाने की उदासी मुझे साफ़ दिखाई दी।

"फिर कब आओगे"

"इस बार तो जाने का ही मन नहीं; तुम मुझे फोन करोगी ना कभी कभी"

इस पर वो चुप रही;

" आई एम सॉरी " मैं उस की खामोशी को इनकार मान बैठा।

"परसों चलते हैं, फ़िर देखते हैं क्या करना है?" वो बहुत सोचने के बाद बोली।

मैं सुनते ही पागलों की तरह मुस्कुराने लगा, चाह के भी मेरी बत्तीसी अंदर नहीं जा पा रही थी।

" कल मेरे घर आना, नए साल में हम एक दूसरे के घर जा के बधाई देते हैं"

" तुम भी मेरे घर आओगी!!" मैं चहक पड़ा और उसे हंसी आ गयी।

" अब मुझे जाने दो; घर पे बहुत काम हैं.. दादाजी को खाना खिलाना है, सुलाना है" मीनल बोली।

" व्हाट डू यु मीन बाई , खिलाना है; वो यहाँ नहीं आते!!"

"वो नहीं आ सकते निशांत" वो अब बहुत गंभीर हो चली।

" उन्हें पसंद नहीं बाहर खाना. क्या बात है मीनल"

" उनके शरीर के कुछ हिस्से में लकवा है, उनका एक हाथ और आधा चेहरा काम नहीं करता" वो आसमान को देखती हुई बोली।

"ओह!!" मैंने अफसोस ज़ाहिर किया. " कैसे हुआ ये. आई मीन कोई तो रीज़न होगा इस के पीछे??"

" रीज़न. हाँ है रीज़न. जानना चाहते हो ?" उस ने खड़े होते हुए कहा।

"हम्म. मैंने सिर हिलाया।

" रीज़न;मैं हूँ निशांत" इतना कहते ही हो आंखों में आंसू लिए भाग के घर चली गयी।

मैं वहीं खड़ा उस के दर्द की थाह लेने की कोशिश करने लगा।

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मैं ये कैसे सहन कर पाता कि कोई मीनल पे इल्ज़ाम लगाए फिर चाहे फिर वो मीनल खुद ही क्यों न हो।

मीनल अपना आधा खाना छोड़ गई थी और मैंने तो शुरू भी नहीं किया था। मेरा पेट भर गया बिना खाये ही, मैंने भी घर जाने में ही भलाई समझी, लेकिन पापा ने हाथ पकड़ लिया।

"अन्न का अपमान नही करते नीशू. दोनों प्लेट का खाना खत्म करो"

"दोनों??" मैं पापा का मुह देखने लग गया, ये तो मीनल की है. मैं!!"

"उसका जूठा भी खाने में परहेज़ है और पूरी ज़िंदगी साथ देने का सोच रहे हो , कैसे करोगे??"

मेरे पापा ऐसे कैसे हैं, मेरे दिल की बात मुझसे पहले उन्हें कैसे पता चल जाता है। अभी तक मुझे अपने प्रेम तक का एहसास नहीं हुआ था और यहाँ पापा को पता था कि पूरे जीवन साथ निभाने की बात होगी।

" एक बात बताओ बेटा, लड़की को किस का रूप कहा गया है?"

" माँ लक्ष्मी "

"हम्म तो लक्ष्मी का जूठन खाने में कैसी शरम; लाओ मैं खा लूं मेरी बेटी का जूठा. कुछ पुण्य मिलेगा"

" नहीं नहीं पापा. ये मैं ही खाऊंगा. " मैंने जल्दी से उसकी प्लेट उठा ली।

पापा मुस्कुरा उठे और बोले " जनता है. हमारा समाज बेटी बेटों में बराबरी की बात करता है , लेकिन जब बात आती है बेटी- बहु की या बेटे- बहु की बराबरी की तो सब की सोच बदल जाती है। कमाल की बात ये है कि हमारे यहां बहु को गृहलक्ष्मी कहा जाता है. लेकिन उसे लक्ष्मी जैसा सम्मान नहीं मिलता। बहु अपने बच्चों और पती सब का जूठा खाये लेकिन अपने पति को जूठा न खिलाये क्योंकि पाप लगता है. अजीब है ना!! लेकिन मैंने ये प्रथा न खुद मानी ना तूझे इसे मनाने के लिए प्रेरित करूँगा।"

पापा ने बहुत बड़ी बात कुछ शब्दों में कह डाली और मुझे मीनल के सम्मान की प्रेरणा भी दे दी.

"पापा एक बात कहूँ. मैं दुनिया का सब से लकी इंसान हूँ जिसे आपके जैसे पापा मिले, मैं नहीं जानता कि मैं परफेक्ट हूँ या नहीं लेकिन मेरे पापा ज़रूर पर्फेक्ट हैं,"मैं एक किनारे से ही पापा के गले लग के बोला।

"चल अब जल्दी खाना खा, कुछ बातें करेंगे आज साथ बैठ के"

खाना खा के मैं पापा के साथ घर आ गया, पापा आज बहुत कुछ समझाने के लिए तैयार थे, वो ही सब जो मैं शायद समझ के भी अनजान था।

पापा ने बोलना शुरू किया. " बेटा, क्या लगता है लव मैरिज अच्छी है या अरेंज?"

"लव मैरिज पापा ..ओबवियसली!! क्योंकि हम एक दूसरे को समझते हैं पहले से; अरेंज मैरिज में रिस्क रहता है ना पापा. कौन कैसा निकले. "

"बिल्कुल सही बात!! . तो मुझे एक बात बता. लव मैरिज के बाद भी तलाक क्यों होता है?"

मेरे पास इस बात का कोई जवाब नहीं था तो मैं उनका मुँह देखने लगा।

" शादी कोई भी हो, सही ही होती है, अच्छी या बुरी उसे निभाने के तरीके पे निर्भर करता है; अरेंज मैरिज में बिना पहले से जान पहचान के भी जीवन भर का साथ हो जाता है, और वहीं जानते पहचानते हुए भी अलग होने की नौबत आ जाती है; जब तक एक दूसरे का सम्मान, भावनाओं की कदर न हो ना, तब तक कोई भी रिश्ता सफल नहीं रह सकेगा।"

"आप सही कह रहे हैं पापा. "

" तुम अपनी शादी के लिए क्या चाहते हो?. तुम भी जानते हो कि हमने देखना शुरु कर दिया है. लेकिन तुम्हे अगर कोई पसंद हो तो बताओ?"

पता नही क्यों मेरे सामने मीनल का चेहरा आ गया, मैने अपना सिर झटका और बोला " पापा आप तो मेरी चॉइस जानते ही हैं; वैसी कोई मुझे मिली नहीं आप ही खोज दीजिये।"

पापा मुस्कुराने लगे और मेरे सिर पे हाथ फेरते हुए बोले. " तेरी चॉइस मुझे तो पता है, लेकिन तुझे ही नहीं पता;या शायद तू खुद से ही भाग रहा है"।

" ये मॉडर्न, प्रोफेशनल, देखने मे बिल्कुल मेरे जैसी, अच्छा फैमिली बैकग्राउंड वगैरह. ये सब धरे के धरे रह जाते हैं, जब ये सब मिलने के बाद भी दिल और सोच नहीं मिल पाती.

तूने अपने लिए रास्ता चुन लिया है ज़रूरी है कि उसे समझे और तब ही आगे बढ़े; अपने दिल से पूछ के तुझे कौन पसंद है जिसके साथ पूरी ज़िंदगी बिता सके बिना किसी डर के. "
 
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