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Kamukta kahani - गुजारिश 2

#50


जब मैं सुनार के घर पहुंचा तो मैंने देखा की वहां पर भीड़ जमा थी, जिसे चीरते हुए मैं आँगन पार करते हुए सुनार के कमरे में पहुंचा तो देखा की सुनार का शरीर पंखे वाले कड़े से लटका हुआ था .पूरा बदन अजीब तरह से काला पड़ गया था , जैसे की कोयला हो. मुझे उसकी मौत का दुःख नहीं था बल्कि हताशा इस बात की थी की इस कड़ी को भी तोड़ दिया गया था .

उसके बदन का एक हिस्सा खोल दिया गया था , और जब मैंने गौर से देखा तो पाया की हत्यारे ने उसके कलेजे को निकाल लिया था . मारने वाले की बड़ी दुश्मनी रही होगी सुनार से. माथा पीटते हुए मैं सुनार के घर से वापिस मुड गया . दिल में मलाल लिए की मैं उस धागे का राज़ उगलवा नहीं सका उस से.

घर जाकर देखा की ताई बड़ी गहरी सोच-विचार में डूबी थी . मैंउसके पास जाकर बैठ गया .

मैं- ताई, क्या सोच रही हो.

ताई- यही की कितनी बुरी तरह से लाला को मारा गया है

मैं- अच्छा ही हुआ साले ने गाँव का जीनाहराम किया हुआ था .

ताई- वो तो है पर गाँव में मौतों जा जैसे मौसम चल रहा है, हर दुसरे तीसरे दिन लाशे मिल रही है

मैं- पर वो लाशे गाँव वालो की नहीं है , लाला और जब्बर के आदमियों की लाशे है वो

ताई- यही बात तो मुझे खाए जा रही है .जब्बर पूरा जोर लगाये हुए है कातिल को पकड़ने के लिए , मुझे डर है कहीं खुनी खेल फिर से चालू न हो जाये

मैं- कैसा खुनी खेल

ताई- इस आग में न जाने कितने निर्दोष गाँव वाले पिस जायेंगे.

हम बात कर ही रहे थे की रीना आ गयी . ताई रसोई में चली गयी . रीना मेरे पास बैठ गयी .

मैं- कहाँ, गायब है तू आजकल ऐसा लगता है की तुझे देखे हुए ज़माने बीत गए.

रीना- अच्छा जी, तो आजकल कातिल कहने लगे की क़त्ल भी हो जाओ और उफ़ भी न करो. मुझसे पूछते हो तुम, जबकि जानना मैं चाहती हूँ की ये दिन ये राते कहाँ बीत रही है तुम्हारी.

मैं- तेरे बिना कैसे दिन कैसी राते.

रीना- और मैं ही नहीं हूँ उन दिन उन रातो में

मैं- तेरी नाराजगी जायज है , जो सजा देना चाहे मंजूर है

रीना- वो दिन कभी ना आये की मुझे तुझे सजा देनी पड़े.

हम बात कर ही रहे थे की तभी ताई आई और बोली- मैं बाहर जा रही हूँ, तुम जब जाओ तो दरवाजे को बंद करते जाना .

हमने हाँ में सर हिलाया. ताई के जाते ही मैंने रीना को अपनी बाँहों में भर लिया

रीना- गुस्ताखिया ज्यादा हो गयी है तुम्हारी आजकल.

मैं- ये हक़ है मेरा

रीना ने मेरे गाल को चूमा और बोली- इस हक़ को पाने में जमीन असमान एक करना पड़ेगा तुम्हे .

मैं- तू साथ है तो क्या ये जमीन क्या ये आसमान.

रीना ने मेरे गालो को चूमा

मैं- बड़ा प्यार आ रहा है आज

रीना- ये मौसम की अंगड़ाई, ये मेरी दिल्ग्गी, ये रुत है प्यार करने की , सावन आया है अपने संग मोहब्बत लाया है पर मैं कहू तो क्या कहूँ , तुम्हे फुर्सत ही नहीं है , इस बार झुला भी नहीं डाला तूने मेरे लिए.

मैं-ये तो मुझे याद ही नहीं रहा , पर मैं आज ही झूला डाल दूंगा.

रीना- झूला भूल गया कोई बात नहीं, बस मुझे मत भुला देना.

मैं- ये सोचा भी कैसे तूने

रीना- कभी कभी मेरा दिल कहता है की कोई डोर तुझे मुझसे दूर खींच रही है

मैं- तो कहदे अपने दिल से ऐसी कोई डोर बनी ही नहीं .

रीना ने अपनी आँखे घुमाई और बोली- मुझे कुछ करने का मन होता है

मैं- कर डाल जो तुझे करना है

रीना- पूछ तो सही क्या करना चाहता है मेरा दिल .

मैं- बता फिर क्या चाहता है तेरा दिल

रीना- एक अजीब सी तलब लगी है मुझे. मेरा दिल मुझसे कहता है की रुद्रपुर के शिवाले चल.

मैं- हाँ, तो क्या दिक्कत है हो आना वहां पर

रीना- एक बार गयी थी , गाँव जल उठा था .

मैं- जलने दे

रीना- कुछ तो हुआ है मेरे वहां से आने के बाद. रातो को जाग जाती हूँ, ख्यालो में डूब जाती हूँ . और मेरे सपने

मैं- कैसे है तेरे सपने .

रीना- मेरे सपनो में मैं तुझे मारते हुए दिखती हूँ .

मैं- ये तो बढ़िया हैं न तूने घायल तो किया ही हुआ है क़त्ल भी कर दे तो क्या बात हो .

रीना- तू समझता क्यों नहीं .मुझे कुछ हो रहा है

मैं- कभी कभी होता है ऐसा, खैर तू बीते दिनों में किसी ऐसे लोगो से तो नहीं मिली न जो संदिग्ध हो या उनसे अपना उठाना बैठना हो . समझ रही है न तू मेरी बात .

रीना- ऐसा तो कुछ खास नहीं हुआ पर जब तू हॉस्पिटल में था तो एक आदमी रोज़ तुझे देखने आता था , मुझसे बात करता था और चला जाता था .

मैं- कौन आदमी , क्या कहता था वो

रीना- बस यही पूछता था की अब कैसा है मनीष. और चला जाता था .

मैं- बस इतना ही

रीना- एक मिनट, उसने मुझसे एक अजीब सी बात और कही थी

मैं- क्या , क्या बात

रीना- जब वो मुझे अंतिम बार मिला था तो उसने कहा था की शिवाला फिर से जाग गया है . नाहरवीर आ गए है , तू भी आना .

मैं- कौन नाहरवीर

रीना- मुझे क्या पता .

मैं- और क्या कहा उस आदमी ने

रीना- कुछ नहीं , जिस दिन तुझे होश आया उसके बाद वो दिखा नहीं मुझे.

मैने रीना को अपनी गोद से उतारा और पानी लाने को कहा. गले को तर करने के बाद मैंने उसको बताया की कैसे मुझे ये धागे मिले थे, ये हीरा मिला था और इनके मिलने से ये लाकेट बना जो उसके गले में पड़ा था .मैंने रीना को हर एक बात बताई सिवाय मीता के जिक्र के .

रीना- तो तुझे लगता है की इस लाकेट में कोई जादू, कोई शक्ति है .

मैं- हाँ मेरी जान

रीना- तो फिर तूने ये मुझे क्यों दिया.

मैं- इसने चुना है तुझे, मैंने इसे अपने गले में पहनने की बहुत कोशिश की पर इसने मेरा गला घोंटा, ये अपना नहीं रहा था मुझे, और उस रात रुद्रपुर में इसने तुझे पहचाना, अपनाया तुझे. पर क्यों, क्या रिश्ता है तेरा इससे ये सवाल मुझे खाए जा रहा है .

रीना- क्या इसी लाकेट की वजह से मुझे ये सपने आ रहे है , मैं इसे अभी उतार कर फेंक देती हु.

रीना ने लाकेट को पकड़ा और गले से बाहर करने की कोशिश की पर वो नाकाम रही .

मैं- क्या हुआ

रीना- बहुत भारी है , उठा नहीं पा रही मैं इसे.

मैं- पहने रह, तेरा कवच है ये एक तरह से .

रीना- पर क्यों .

मैं- इसी सवाल का जवाब मैं तलाश रहा हूँ. और मेरी बात सुन किसी भी हालत में तू रुद्रपुर अकेले मत जाना, मुझे लेकर चलना तू. और किसी भी अजनबी पर विश्वास मत करना कोई तुझे कुछ भी दे लेना नहीं .

रीना- मैं कुछ दिनों के लिए मेरे गाँव जा रही हु

मैं- उसमे क्या है जा

कुछ देर और हमने बाते की फिर वो चली गयी , मुझे उलझा कर . दोपहर हो गयी थी मैं भी ताई के घर से बाहर आया. सुनार के अंतिम संस्कार की तयारी हो रही थी , मैंने जब्बर को भी देखा वहां पर. जैसे ही सुनार को फूंकने के लिए ले गए . मौका देख कर मैं उसके घर में घुस गया . ये जो थोडा सा समय मिला था मैं सुनार के कमरे को अच्छी तरह से जांचना चाहता था.


वहां पर मुझे ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिससे मैं कोई कड़ी जोड़ सकू . हताश मन से मैं वहां से निकल ही रहा था की तभी.......................
 
#

मेरी नजर उस तस्वीर पर पड़ी जो किसी ज़माने में बड़ी जिंदादिल रही होगी. अर्जुन सिंह, सुनार और जब्बर एक दुसरे के कंधो पर हाथ रखे,हँसते -खिलखिलाते हुए . तस्वीर को देख कर मैं न जाने क्यों मुस्कुरा पड़ा. लोगो का कहना सच ही था की दोस्ती बड़ी गहरी थी इन तीनो की , और मेरे सवाल बड़े गहरे थे , क्योंकि मैं जानता था की जब इतनी गहरी दोस्ती नफरत में बदलती है तो उसकी वजह मामूली नहीं हो सकती .

जब मैं घर आया तो देखा की चाची आँगन में ही थी , मुझे देख कर वो मेरे पास आयी ,

चाची- कहाँ था तू

मैं- बस यही था .

चाची-एक बेहद गंभीर मुद्दे पर मुझे बात करनी है तुमसे

मैं- कहो जो कहना है

चाची- मुझे लगता है की तुझे अब रीना से मेल-जोल थोडा कम करना चाहिए

मैं ये सुनकर थोडा हैरान हो गया

चाची- अब तुम लोग बड़े हो रहे हो. मैं जानती हूँ तुम लोग बचपन से साथ रहे हो पर इसका मतलब ये नहीं की .

"क्या मतलब नहीं चाची " मैंने चाची की बात काटते हुए कहा .

चाची- मतलब ये की मैं चाहती हूँ तुम रीना से दुरिया बनाओ

मैं- ये सोचा भी कैसे तुमने

चाची- मुझे हक़ है ये कहने का

मैं- किस हक़ से ये हक़ है तुमको

चाची- मेरी बात को समझने की कोशिश कर , मैं समझती हूँ की तेरी दोस्त है वो , पर कहीं ऐसा न हो की वो दोस्त से आगे बढ़ जाए.

मैं- साफ़ साफ क्यों नहीं कहती तुम

चाची- मुझे लगता है की तेरा और रीना का चक्कर चल रहा है , और मैं चाहती हूँ की तेरे मन में ऐसा कोई भी विचार है तो उसे मन से निकाल देना. रिश्तेदारों की अमानत है वो, हमने उसे बेटी का हक़ दिया है ,

मैं- मैं और रीना देख लेंगे

चाची- तुम नहीं देख पाओगे, तुम समझो इस बात को . मैं जानती हूँ तुम दोनों का रिश्ता दोस्ती से बहुत आगे बढ़ चूका है , मैं ही नहीं पुरे गाँव में चर्चा होने लगी है , रीना के लिए तुमने रुद्रपुर में जो किया . तब से गाँव वालो की जुबान थम ही नहीं रही है .

मैं- रीना की जगह कोई और होती तो भी मैं अड़ जाता उसकी आबरू के लिए और गाँव कुछ भी कहे मुझे फर्क नहीं पड़ता .

चाची- पर उस को पड़ेगा. एक लड़की के दामन पर दुनिया हज़ार इलाज्म लगा देती है

मैं- उसका मेरा साथ नहीं छूटेगा, इस रिश्ते को कैसे निभाना है हम दोनों ही सोचेंगे.

चाची- मैं जानती हूँ तुम दोनों प्रेम करने लगे हो. किसी से भी छिपी नहीं है ये बात, रीना की माँ उसे जल्दी ही साथ ले जाएगी, रुद्रपुर वाले काण्ड के बाद से उसका मन बुझा हुआ है

मैं- पहले मेरे हिस्से की हर एक ख़ुशी छीन ली गयी, मेरी हर हसरत को टूटते देखा है मैंने, जब जब मैं टूटता मुझे थामने वाली अगर कोई थी तो वो रीना, बचपन से आजतक जिसे देख कर मुझे हौंसला मिला वो थी रीना, और तुम कहती हो उस से दूर हो जाऊ, तुमने मोहब्बत की बात की है तो सुनो, जिस दिन उसने मुझसे कहा की मेरा हाथ थाम ले, अगर ये सारा जहाँ भी जोर लगा लेगा तो मैं रुकुंगा नहीं .

चाची- तो तू मेरी बात नहीं मानेगा.

मैं- मैं रीना का साथ नहीं छोडूंगा. मरते दम तक नहीं छोडूंगा.

चाची- ये प्रेम, मोहब्बते सब फ़िल्मी बाते है , ये गाँव समाज इनके कुछ नियम कायदे होते है जिनसे हम सब बंधे है .

मैं- हमने भी प्रीत की डोर बाँधी है , चाची

चाची- ठीक है फिर, तुझे तो जलना ही है , मेरी फ़िक्र उस मासूम के लिए है , तेरी ये जिद ही नाश करेगी

मैं- जिद होती तो छोड़ देता, मोहब्बत है थाम कर रखूँगा.

चाची- तू जाने और तेरा भाग्य जाने,

एक तो मेरा दिमाग सुनार की मौत की वजह से ख़राब था ऊपर से चाची ने रीना से दूर होने का कह कर उसे और ख़राब कर दिया था. इस बात पर मैंने बहुत विचार किया, जो बात मुझे परेशां कर रही थी वो ये की जब रीना को मीता के बारे में मालूम होता तो क्या होगा. बेशक मीता और मेरे रिश्ते को बस हम ही समझते थे, पर एक म्यान में दो तलवारे न पहले कभी रही थी ना आगे रहने वाली थी .

चाची ने ठीक ही कहा था इस आग में मेरे साथ रीना भी जलेगी. जीवन जैसा भी था जी रहे थे अगर उस दिन मैंने सुनार से वो सुनहरा बक्सा नहीं चुराया होता तो इस पहेली में मैं उलझा नहीं होता. दूसरा मेरी चिंता थी की रीना कहीं अकेले शिवाले में न चली जाए, कही कोई रुद्रपुर वाला उस से उलझ न जाये, उसे चोट न पहुंचा दे.

दिन ढलते ढलते हलकी हलकी बूंदा-बांदी हो गयी थी जिसने पवन को और सुहानी बना दिया था . उस रात मैंने निर्णय लिया की शिवाले चला जाए, क्योंकि इन सब घटनाओ की जड वही पर थी ये तो अब तय ही था .

हलकी सी ठंडी रात में , बूंदों संग लहराती हुई राहो पर चलते हुए मैं रुद्रपुर की तरफ चला जा रहा था , रस्ते में वो ग्यारह पीपल शान से खड़े थे . मैंने देखा उनके निचे एक एक करके पुरे ग्यारह दिए जा रहे थे, जो इन हवाओ में भी शांत थे. शिवाले की सीढ़ी पर मैंने सर को टिका कर नमन किया और अन्दर दाखिल हो गया. बरसाती रात में सब कुछ किसी आबनूस का स्याह था. चूँकि मैं यहाँ पर पहले आ चूका था इसलिए अंदाजे से मैं बस चले जा रहा था ,

मैंने बस यूँ ही उस बावड़ी में हाथ डाला और मेरे हाथ में रेत आई, आज वहां पर पानी नहीं था . मैं आगे बढ़ गया . मैं देवता के कक्ष की तरफ गया. तो देखा की वहां पर आग जल रही थी , कक्ष में इधर उधर राख बिखरी पड़ी थी . देवता की मूर्ति अब पानी के निचे नहीं थी बल्कि एक पुराने से पत्थर पर रखी थी .उस आग से ऐसी आवाज आ रही थी की जैसे कुछ भुना जा रहा हो . मैंने गौर से देखा तो ये , ये तो किसी का दिल था . जो आहिस्ता आहिस्ता से जल रहा था . मुझे एक मिनट में समझ आ गया की ये किसका दिल था , ये सुनार का दिल था क्योंकि उसकी लाश से इसी हिस्से को निकाला गया था .

डर क्या होता है मैंने उस दिन महसूस किया . ये तो शुक्र था की मैंने मूत नहीं दिया खौफ के मारे. मेरे सामने एक इन्सान का दिल जल रहा था पर सवाल वही था किसलिए. मैं उलटे पाँव वापिस मुड गया पर तभी इतना जोर का शोर हुआ की उस आवाज से मेरे कान के परदे जैसे फट ही गए थे , किसी ने बड़े जोर से घंटे को बजा दिया था . मेरे सिवा कोई और भी था वहां पर .

मैं उस आवाज की दिशा में दौड़ा और वहां जाकर देखा तो वहां पर जैसे दिन निकला हुआ था . क्या खूब नजारा था , हजारो दिए जैसे एक साथ जल रहे थे वहां पर , उस खाली मैदान में . पर मेरी दिलचस्पी उस शख्स में थी जो वहां पर खड़ी थी . और जब वो पलटी तो दियो की रौशनी में मैंने उसके चेहरे को देखा,,,,,,,,,,, और देखता ही रह गया.
 
#52

मैं अकेला ही नहीं था मेरे साथ संध्या चाची भी थी इस जगह पर जो न जाने क्या कर रही थी . चाची ने अपने ब्लाउज को उतारा और मैंने दियो की रौशनी में हुस्न के उस गजब नज़ारे को देखा , जिसे कोई और देखता तो अब तक संध्या के उभारो को अपने हाथो में थाम चूका होता. पर उसे परवाह नहीं थी .

चाची ने धरती पर पड़े कोड़े को उठाया और अपनी पीठ पर जोर जोर से मारने लगी. उसके चेहरे की शिकन बता रही थी की दर्द तो बहुत हो रहा है उसे . पर वो खुद को मारती रही कोड़े से जब तक की उसकी पीठ पर बने घावो से रक्त की धारा नहीं बहने लगी. कोई और देखता तो उसे पागल समझ लेता पर मुझे तो उसका प्रयोजन देखना था इसलिए शांत रहा मैं.

चाची की पीठ से रिश्ता खून बूंदे बनकर धरती को भिगो रहा था . बहुत देर तक ऐसा ही चलता रहा , अपने होंठो से वो कुछ बुदबुदा रही थी पर एक समय के बाद चाची हताश होने लगी अचानक से मुझे लगा की धरती हिल रही हो . क्या ये कोई भूकंप था . क्योंकि मेरे पैरो को लडखडाते हुए महसूस किया मैंने. बस कुछ ही देर जैसे की धरती में दरार पड़ गयी हो .

पर बस कुछ पलो के लिए , फिर सब थम गया और मैंने देखा की जहाँ पर चाची खड़ी थी वहां पर ढेर सारा सोना-चांदी बिखर गया था . ये मेरे लिए किसी अचम्भे से कम नहीं था .

"ये लालच, ये प्रलोभन नहीं चाहिए मुझे , सुना तुमने नहीं चाहिए ये मुझे इसके लिए नहीं आती मैं यहाँ " रुआंसी आवाज में चीख पड़ी चाची.

"मैं जानती हूँ तुम यही पर हो , और तुम मुझे यूँ नहीं बहला पाओगे, तुम्हे आना होगा , तुम्हे आना होगा क्योंकि संध्या बुला रही है तुम्हे, तुम्हारे वचन को निभाना होगा तुम्हे, समय आ गया है तुम्हे आना होगा. लौट कर आना होगा तुम्हे " चाची चीखती रही . न जाने किसे बुला रही थी वो पर शायद उसकी सुनने वाला कोई नहीं था , मेरे सिवाय.

रुद्रपुर की ये धरती अपने में न जाने क्या समेटे हुई थी , इस जगह में कोई तो खास बात थी, कुछ अलोकिक, कुछ रहस्यमयी पर क्या इसका जवाब मुझे चाची से ही लेना था . चाची ने बिना अपने ज़ख्मो की परवाह किये ब्लाउज पहना और वापिस चल पड़ी. दिए बुझने लगे पर उसकी पायल की झंकार मुझे दिशा दिखाती रही .

"तुम्हे क्या लगता है तुम उसे रोक पाओगे, न तुम तब रोक पाए थे न तुम अब रोक पाओगे. मैं ले आउंगी उसे , उसे लेकर आउंगी मैं " चाची ने देवता की मूर्ति को कहा

उसके जाने के बाद वहां पर गहरी ख़ामोशी ने पैर जमा लिए. अँधेरा जैसे खाए जा रहा था मुझे, कांपते हुए मैं भी अपने खेतो की तरफ चल दिया. डर इस कदर मुझ पर था की सन सन करती हवा भी दुश्मन लगने लगी थी . जब मैं अपने खेतो पर आ पहुंचा तो चैन मिला मुझे . वो रात बस आँखों आँखों में कट गयी. मुझे इंतज़ार था सुबह का .

भोर होते ही मैं सीधा घर पहुँच गया , चाची आँगन में झाड़ू निकाल रही थी . मुझे देख कर वो रसोई में चली गयी और चाय का कप ले आई.

मैं- तुमसे बेहद जरुरी बात करनी है मुझे.

चाची- चाची मुझे भी तुमसे कुछ कहना था , हलवाई के यहाँ जाकर कुछ मिठाइयाँ ले आना और ये मैंने पर्ची बनाई है बनिए से ये सामान ले आना.

मैं- आज मिठाई किसलिए क्या है आज.

चाची - आज रक्षा बंधन है , जैसा हमारे बीच तय हुआ था तुम मेरे साथ रुद्रपुर चलोगे.

मैं- वो सब बाद में मुझे अभी कुछ बात करनी है

चाची- क्या बात

मैं- कल रात के बारे में , कल रात मैंने तुम्हे देखा था शिवाले में.

चाची की आँखों ने घुरा मुझे और बोली- सपने में देखा होगा. मैं तो यही थी

मैं- ये सच-झूठ का खेल मेरे साथ मत खेलो चाची . हम दोनों जानते है की हम क्या किस बारे में बात कर रहे है .तुम झूठ बोल सकती हो पर तुम्हारी पीठ के जख्म नहीं , मुझे तुम्हारी पीठ देखने दो अभी दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा.

चाची- ठीक है जैसी तेरी मर्ज़ी

चाची ने अपनी पीठ मेरी तरह की और मुझे जैसे काठ मार गया. चाची की पीठ पर एक भी ताज़ा निशान नहीं था , अगर कुछ था तो चिकनी पीठ और वही पुराने निशाँ.

चाची-अगर तसल्ली हो गयी हो तो अब बनिए की दूकान पर जा

मैं- जाता हूँ पर तुम लाख कोशिश कर लो मैं उस वजह को ढूंढ ही लूँगा

चाची- मुझे पूरा विश्वास है तुम्हे कामयाबी जरुर मिलेगी.

मैं- सुनार के दिल की आहुति तुमने ही दी थी , शिवाले में . तो मैं मानता हूँ की इन तमाम हत्याओ में तुम्हारा ही हाथ है

चाची- विशुद्ध चूतिये हो तुम. अगर मुझे ये सब करना होता तो मैं कभी का कर चुकी होती, मुझे रोकने की शक्ति किस्मे है भला.

मैं- अगर ये बात है तो इस नकाब को हटा कर अपनी असलियत क्यों नहीं बता देती.

चाची- फिर तुम्हारी आजमाइश कैसे होगी. और जैसा तुमने कहा तुम तलाश कर लोग तो कर लो किसने रोका है तुम्हे. ये कहानी जिसे तुम अपनी समझते हो , तुम उसके बस एक किरदार हो . ये कहानी न पहले तुम्हारी थी न आज ना आगे होगी. भूलना मत दोपहर बाद तुम्हे मेरे साथ रुद्रपुर चलना है .

दोपहर बाद मैं चाची के साथ गाड़ी में बैठ कर रुद्रपुर जा रहा था . मेरी धड़कने बढ़ी हुई थी , मैं बार बार चाची की तरफ देख रहा था .

चाची- घबराने की जरुरत नहीं है , तुम्हे वहां कोई कुछ नहीं कहेगा.

मैं- वो बात नहीं है , मैं बस सोच रहा हूँ, की इतने सालो बाद आखिर तुम क्यों जा रही हो अपने पीहर.

चाची- टूटे बन्धनों के बावजूद मैं बंधी हूँ कुछ नातो से, इतने सालो बाद मेरे भतीजे ने मुझसे कुछ माँगा है , इतना तो हक़ बनता है उसका .

मैं-हक़ तो उन माँ बाप का भी रहा होगा जिनसे नाता तोड़ आई थी तुम,

चाची- वो तुम्हारी समम्स्या नहीं है

मैं- इतना तो समझता हूँ की तुम भतीजे की वजह से नहीं जा रही , तुम्हारा भी कुछ न कुछ स्वार्थ है

चाची- ये सारी दुनिया ही स्वार्थी है . अपने आप से पूछ कर देखो .

ऐसे ही बाते करते हुए हम लोग रुद्रपुर की हवेली पहुँच गए. संध्या के नाम से ही वहां पर हलचल मची हुई थी दद्दा ठाकुर की बेटी इतने साल बाद पीहर आई थी . सबने बड़े सलीके, आदरभाव से हमारा स्वागत किया, दद्दा ठाकुर और मेरी नजरे मिली पर उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं दर्शाया की हमारे बीच कड़वाहट, ताजा दुश्मनी है . चाची मुझे लोगो से रूबरू करवा रही थी, की तभी मैंने उसे देखा .....................................
 
#53

मैंने उसे देखा, मैंने पृथ्वी को देखा सीढियों से उतर कर हमारी तरफ आते हुए. जैसी हवेली की चकाचौंध थी वैसा ही रुतबा पृथ्वी का था . उसने एक बार भी मेरी तरफ नहीं देखा, जैसे मेरी कोई अहमियत नहीं थी उसकी नजरो में . वो बस अपनी बुआ से लिपट गया . उसके पाँव छुए और राखी बंधवाई की रस्म पूरी की . मैं समझता इस रिश्ते की अहमियत को तो मैंने ये ख्याल दिल से निकाल दिया.

दद्दा ठाकुर का पूरा परिवार संध्या चाची के इर्दगिर्द था, पुराणी बाते याद की जा रही थी . सब लोगो को जैसे चाव चढ़ गया था और हो भी क्यों न इस घर की बेटी सोलह साल बाद जो घर आई थी . कुछ ही देर में हम लोगो के लिए खाना लगा दिया गया. हंसी मजाक करते हुए हम सब खाना खा रहे थे , मैंने दो चार निवाले लिए ही थे की

"जी भर कर खाना, मनीष , ऐसा लजीज खाना किस्मत वालो को ही खाने को मिलता है " पृथ्वी ने अचानक से मुझ पर कटाक्ष किया. रोटी का अगला निवाला निगलना भारी हो गया मेरे लिए.

चाची- पृथ्वी, ये क्या बदतमीजी है

पृथ्वी- माफ़ करना बुआ, मुझे किसी ने बताया था की इसके खाने के लाले पड़े हुए थे , ये तुम्हारे टुकडो पर पलता है . मैं तो बस खाने की तारीफ कर रहा था .

चाची- ये मत भूलो की ये मेरा बेटा है , ये यहाँ आया है मेरे आग्रह पर , इसका निरादर मेरा अपमान है , पृथ्वी मैं तुम्हारी वजह से इस घर में आई की इतने बरसो बाद मेरे भतीजे ने मुझसे कुछ माँगा है , ये राखी जो तेरी कलाई पर मैंने बाँधी है इसका मोल बहुत बड़ा है . पर ये ओछी हरकत करके तूने मेरा दिल दुखाया है ,

पृथ्वी- ऐसा न कहो बुआ, मैं माफ़ी मांगता हु.

मैं- माफ़ी की जरुरत नहीं है , वैसे भी मुझे फर्क नहीं पड़ता और मैं बिलकुल नहीं चाहता की मेरी वजह से आज का दिन ख़राब हो . कोई बात नहीं चाची, और फिर बड़े लोग कुछ न कुछ तो कहते ही रहते है प्रजा के बारे में .

मैंने होंठो पर मुस्कान लाते हुए कहा. मैंने माहौल को हल्का बनाने की कोशिश की तो थी पर मैं इतना जरुर समझगया था की ये पृथ्वी साला काइयां इन्सान है , इसके मन में मेरे प्रति कड़वाहट है . और हमको घंटा फर्क नहीं पड़ता था . मेरे लिए वो रोटी गले से नीचे उतारना बड़ा भारी हो गया था पर संध्या चाची की वजह से मैं चुप रहा .

खाने के बाद चाची अपनी माँ के पास चली गयी . पृथ्वी मेरे पास आया और बोला- आओ तुम्हे हवेली दिखाता हूँ

मैं बेमन से उसके साथ चला गया . वो मुझे ऊपर ले आया. संगमरमर की ये ईमारत अपने आप में एक कहानी थी , दद्दा ठाकुर की अमीरी हर कदम पर झलकती थी .

पृथ्वी- वैसे तुम्हे अचरज हो रहा होगा, ऐसे ठाठ बाट कभी देखे नहीं होंगे तुमने.

मैं- ये कोसिस बेकार है पृथ्वी, तेरी दौलत तेरे काम आएगी. मुझसे क्या मतलब इन सब बातो का

पृथ्वी- हाँ, तुमसे क्या मतलब . मैं बस तुम्हे तुम्हारा और मेरा फर्क दिखाना चाह रहा था , की मैं आसमान हु और तू जमीन

मैं- तो फिर इस फर्क को भी समझ ले, जमीन का मोल जान , ये फर्क अपने आप मालूम हो जायेगा तुझे, मैं नहीं जानता तेरी खुन्नस किस लिए है पर वो तेरी समस्या है

पृथ्वी- तूने मेले वाले दिन जो भी किया उसकी कीमत चुकानी होगी तुझे.

मैं- ओह, तो ये समस्या है तेरी.

पृथ्वी- जोरावर मेरा दोस्त था, तूने दद्दा ठाकुर पर वार किया ये गलती की तूने .

मैं- तो छोटे ठाकुर को बदला लेना है, अबे चूतिये, दोस्ती का बदला लेना चाहता है तू, उस दिन कहाँ गया था तू जब मैंने तेरे दोस्त जोरावर की गांड तोड़ी थी , देख मेरे हाथो को इन्ही हाथो से मैंने जोरावर की एक एक हड्डी तोड़ी थी , इन्ही उंगलियों से मैंने उसकी आँखे फोड़ी थी . कसम से मुझे बड़ा मजा आया था और तेरे दद्दा ठाकुर की तो किस्मत बढ़िया थी वर्ना आज उसकी फोटो भी इधर ही टंगी होती.

मेरी बात सुनकर पृथ्वी के चेहरे पर तिलमिलाहट आ गयी .

पृथ्वी- मुझे अफ़सोस है उस दिन का की मैं रुद्रपुर में नहीं था . वर्ना मर्द से टकराना किसे कहते है मैं अच्छे से समझा देता.

मै- जो मर्द होते है न वो अपने घर बुला कर मेहमानों की बेईजज्ती नहीं करते है , तुझे जोर आजमाइश का शौक है न , ठीक है , कर देता हूँ तेरी इच्छा पूरी . चुन ले तेरी मौत का दिन , जगह तेरी पसंद की होगी , समय तेरी पसंद का होगा. तू भी क्या याद करेगा किस दिलदार को दुश्मन बनाया है तूने . पर मैंने भी आदमी ही पढ़े है , मुझसे दुश्मनी का कारण दद्दा ठाकुर या फिर जोरावर नहीं है तेरे लिए .

पृथ्वी- तुझे मारूंगा मैं ये मेरा वादा है , पर तेरी मौत आसान नहीं होगी, मैं तुझे पल पल तडपाना चाहता हूँ मैं तेरा सब कुछ छीन लूँगा. तू मौत की भीख मांगेगा मुझसे .

मैं- मेरे पास है ही क्या जो तू छीन लेगा. ख़ुशी से , यारी से तू जान भी मांग लेता तो क्या मालूम मैं तेरा भला कर देता पर चलो ठीक है , तेरी दुश्मनी को भी सलाम

"अरे, तुम लोग यहाँ हो मैं तुम्हे सब कही देख आई " चाची ने हमारी तरफ आते हुए कहा.

चाची- और क्या बाते हो रही है दोनों के बीच

मैं- पृथ्वी कह रहा है की हम दोनों की खूब जमने वाली है , तगड़ा याराना होगा .

मेरी बात सुन कर चाची के चेहरे पर शंका सी आई पर वो बोली- ये तो अच्छी बात है

पृथ्वी- हाँ बुआ , मनीष से बढ़िया दोस्त कौन मिलेगा मुझे.

मैं बस मुस्कुरा दिया.

चाची- तो अब चले , शाम ढल गयी है थोड़ी देर में रात हो जाएगी.

मैं- मुझे बाथरूम इस्तेमाल करना है

चाची- पृथ्वी इसे ले जाओ ,मैं निचे इंतज़ार कर रही हूँ

बाथरूम से फारिग होकर मैं निकला ही था की मेरी नजर सामने गलियारे में लगी उस आदमकद तस्वीर पर पड़ी, और मैं बस उसे देखता ही रह गया . सोने की फ्रेम जड़ी वो तस्वीर क्या गजब लग रही थी , जी किया बस उसे देखता ही रहूँ. पर मेरा सकूं पल भर था था. वापसी में सीढिया उतरते हुए मेरे पाँव भारी हो गए थे.

हम अपने गाँव की तरफ चल पड़े. गाडी जब हमारी जमीन के पास पहुंची तो मैंने चाची से कहा की मुझे यही पर उतार दो.

चाची- क्या हुआ तुम्हे.

मैं- सर थोडा भारी हो रहा है . खेतो पर रहूँगा थोड़ी देर.

चाची- पृथ्वी ने जो किया उसके लिए मैं शर्मिंदा हूँ

मैं- वो बात नहीं है चाची, मैं थोड़ी देर में घर आ जाऊंगा.

चाची के जाने के बाद मैं वही पर एक पेड़ के निचे कमर लगा कर बैठ गया और सोचने लगा. पर मेरे सोचने का कोई भी फायदा नहीं था . थोडा थोडा अँधेरा घिर आया था , पर हम जैसे बदनसीबो के लिए क्या उजाला क्या अँधेरा, पृथ्वी के मन में किस बात की नफरत थी ये जानना जरुरी था मेरे लिए. पेड़ो के झुरमुट से होते हुए मैं बावड़ी की तरफ चल रहा था की मैंने एक साए को रुद्रपुर की तरफ जाते देखा. और जब वो पास से गुजरा तो मैंने देखा ये ताई थी जो तेज तेज कदमो से रुद्रपुर की तरफ जा रही थी पर क्यों किसलिए क्या मकसद था ताई का उस तरफ जाने का वो भी इस समय..............................
 
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निश्चित दुरी बनाये हुए मैं ताई के पीछे पीछे शिवाले तक पहुँच गया . हर रास्ता मुझे शिवाले तक लाकर छोड़ देता था, ऐसा क्या था इस जगह में , किस तरह का मोह था ये . सोचते हुए मैं ताई की हरकतों को देख रहा था . पर ताई देवता के पास नहीं गयी न वो उस जगह गयी जहाँ पर संध्या चाची गयी थी . ताई शीशम के निचे बने चबूतरे पर बैठ गयी. जैसे उसे किसी का इंतज़ार था .

रात रोशन होने लगी थी , गहराती जा रही थी पर ताई के चेहरे पर कोई भाव नहीं था . चबूतरे पर बैठी वो बस आसमान को ताक रही थी . मैं उसे टोक सकता था पर मेरी दिलचस्पी इस बात में थी की इसका यहाँ आने का क्या प्रायोजन था .

"वो नहीं आएगा , नहीं आने वाला वो " अचानक से आई इस आवाज ने ताई के साथ साथ मेरा भी ध्यान खींच लिया . मैंने देखा ये जब्बर था जो पैदल चलते हुए ताई के पास जा रहा था .

"ये हरामखोर यहाँ क्या कर रहा है " मैंने मन ही मन कहा.

"सोलह बरस बीत गए , वक्त के साथ उसने भी हम सबको भुला दिया है " जब्बर ने कहा .

ताई उठ खड़ी हुई . जब्बर का यहाँ होना मुझे ठीक नहीं लगा पर उसने ताई के पास जाते ही ताई के पैरो को छुआ और चबूतरे पर बैठ गया .

ताई- मेरा मन नहीं मानता, हर पल ऐसा लगता है की वो बस आस पास ही है .

जब्बर- जहाँ तक ढूंढ सकता था उसकी तलाश की फौज तक में गया पर वहां जाकर मालूम हुआ की यहाँ से तो वो गया था पर ड्यूटी पर पहुंचा ही नहीं .

जब्बर ने वो बात कह दी थी जिसे मैं छिपाए फिर रहा था . जब मैं फौज से आया था तो इसी सवाल का बोझ अपने कंधो पर लाया था .

ताई की आँखों से आंसू गिर पड़े.

"जब शिवाले के कपाट खुले थे तो मैंने सोचा की अर्जुन लौट आया है , " ताई ने कहा .

जब्बर- मैंने भी ऐसा ही सोचा था . इस दुश्मनी का भार गला घोंटने लगा है मेरा .

ताई- कब तक सीने में रहेगी ये फांस

जब्बर- मरते दम तक भाभी, दिल कहता है की जब अर्जुन मिलेगा तो दौड़ कर गले लगा लूँगा उसको और फर्ज कहता है की जब वो मिलेगा तो गर्दन उतार दू उसकी .

ताई- कैसा फ़साना है ये , प्यार भी उस से और नफरत भी उसी से.

जब्बर- तू तो सब जानती हो भाभी . तुमसे क्या छिपा है .

ताई- तुम्हारा दर्द समझती हूँ,

जब्बर- तुम कम से कम उस पागल लड़के को तो समझा ही सकती हो न , जिस राह पर वो चल रहा है ठीक नहीं है

ताई- मुझे भी फ़िक्र है उसकी

जब्बर- वो बहुत दुःख दे रहा है मुझे , हर बार मैं रोक लेता हूँ खुद को

ताई- तुम्हारा स्नेह है उसके प्रति

जब्बर- नफरत है मुझे उस से

ताई- नफरत भी तो एक तरह का प्रेम ही है न .

जब्बर- तुम उस से कहो की वो मुझे उस लड़की का नाम पता बता दे .

ताई- वो प्रेम करता है उस से ,

जब्बर- तब तो और बेहतर होगा.

ताई- क्या तुम्हे लगता है की वक्त फिर से दोहरा रहा है खुद को

जब्बर- शायद हाँ , शायद न. कपाट खुले थे तो मुझे लगा था की वक्त की धारा मुड गयी है पर वो वहम ही निकला ,

ताई------- पर अर्जुन के सिवा कपाट कोई और नहीं खोल सकता .

जब्बर- तो फिर कौन , मनीष ने चाहे अनजाने में ही रक्तपात किया हो यहाँ पर वो रक्त को देवता तक ले गया. भोग तो लग ही गया .

ताई- सहमत हूँ पर ये ख़ामोशी कलेजे का पानी सुखाये हुए है .

जब्बर- कातिल लाला का कलेजा निकाल कर ले गया .

ताई- तब से मुझे भी कोतुहल है .

ताई ने जब्बर से बाते करते हुए चबूतरे पर एक दिया जलाया और बोली- ये दिया उसे बता देगा की मैं आई थी .

जब्बर- कभी कभी सोचता हूँ की गुजरा ज़माना कितना हसीं था

ताई- बीता हुआ दौर बस याद आता है , वैसे इस शिवाले के लिए तुम चाहते तो बहुत कुछ कर सकते थे , आखिर गुनाह में तुम भी तो शामिल थे . जितना लिया उसका थोडा भी लौटा दिया होता तो इस बियाबान में हलचल, रौनक रहती .

जब्बर- तुम भी कह लो भाभी, दुनिया तो कहती ही है तुम्हारे ताने भी सर माथे पर . खैर मैं चलता हूँ , तुम भी आओ छोड़ देता हूँ तुम्हे भी .

ताई ने एक नजर जलते दिए पर डाली और फिर जब्बर के साथ चली गयी. मैं रिश्तो के इस अजीब भंवर में उलझ गया था . क्या दोस्ती थी क्या दुश्मनी कौन थे ये लोग और कौन था मैं सोचते सोचते मेरा सर दुखने लगा. आज का दिन बहुत भारी हो गया था . मैं भी वहां से चल कर अपनी जमीन की तरफ आ गया .

दूर से जलती लौ को देख कर मैं समझ गया था की मीता होगी वहां पर. पर शायद ये पहली बार था जब मीता के जिक्र पर मुझे ख़ुशी नहीं हुई. ढीले कदमो से चलते हुए मैं पहुंचा तो देखा की अलाव जल रहा था , न जाने क्यों उसे ये आग पसंद थी . मैंने कपडे उतारे और हौदी में उतर गया.

ठंडा पानी मेरे तन को तो आराम दे सकता था पर मेरे मन को नहीं . गर्दन तक पानी में डूबे हुए मैं बस आज के बारे में सोच रहा था, आज के दिन क्यों ताई को लगता था की मेरे पिता आयेंगे, पृथ्वी ने मुझे चुनोती दी थी और सबसे बड़ा झटका तो मुझे उस तस्वीर ने दिया था जो मेरी आँखों में बसी थी .

"देर तक पानी में रहना ठीक नहीं है तुम्हारे लिए " सर पर रखे लकडियो के गट्ठर को पटकते हुए मीता ने मुझसे कहा .

मैं- सच कहूँ तो कुछ भी ठीक नहीं है मेरे लिए.

मीता हौदी की मुंडेर पर बैठ गयी और बोली- ये उदासी की क्या वजह हुई भला

मैं- तुमसे बेहतर कौन जानता है भला.

मीता- सो तो है पर हुआ क्या बताओ तो सही, ये ठीक है की सभी बाते बताते नहीं है पर दोस्तों से कुछ भी छिपाते नहीं है .

"बहुत खूब, क्या बात कही " मैंने कहा

मीता- आजा फिर, चाय चढ़ाती हूँ

मैं- तू चल मैं आता हूँ

मीता- आज से पहले तो कभी नहीं कहा ऐसा

मैं- आज से पहले ऐसा दस्तूर भी तो नहीं था ...... न ...............

 
#55

मीता- तेरे मन में जो है वो कह दे फिर ,

मैं- मेरे सीने पर हाथ रख कर कह , मुझसे झूठ नहीं बोलेगी तू

मीता - तेरे सर की कसम, तेरे मेरे रिश्ते की कसम जो तुझसे झूठ बोलू

मैं- तेरा हवेली से क्या रिश्ता है

मीता- बस इतनी सी बात के लिए परेशां है तू, अधूरी हसरतो का और मन की उमंगो का रिश्ता है मेरा हवेली से. बिखरती रेत और उमड़ते बादल सा रिश्ता है मेरा हवेली से. जितना तुझे ये तेरे खेत प्यारे है , उतनी ही प्यारी मुझे हवेली है . मेरा घर है वो हवेली.

मैं-तो दद्दा ठाकुर की पोती, तू मुझे ये बता तो सकती थी न .

मीता- काश दद्दा ठाकुर ने हक़ दिया होता पोती बनने का .

मैं- ऐसा क्यों कहा

मीता- क्योंकि इस दुनिया में सिर्फ तेरी ही कहानी में दुःख नही है, आँखे खोल कर देख ये दुनिया ही दुखी फिरती है, उस हवेली के दरवाजे बरसों पहले बंद हो गए थे मेरे लिए. दद्दा ठाकुर नहीं चाहते थे की उनके कुल में कोई लड़की रहे, मुझे हवेली से बाहर फिंकवा दिया गया. दद्दा को बस ये जानकारी है की बरसो पहले मुझे मरवा दिया गया .

मैं- तेरी तस्वीर का वहां होना ही बताता है की दद्दा को जानकारी है तेरे वजूद की .

मीता- असंभव , अगर ऐसा होता तो मैं यहाँ खड़ी नहीं होती.

मैं- क्या करू कुछ समझ नही आ रहा है

मीता- मैं समझती हूँ तेरे हालात

मैं- नहीं, तू नहीं समझती. मेरी आँखों के सामने वो मंजर आ रहा है जब हम सब उन रास्तो पर खड़े होंगे जहाँ से मंजिल किधर जाएगी कौन जाने. तू पृथ्वी की बहन है , तू लाख इंकार कर पर एक दिन आएगा जब तुझे उसमे और मुझमे से एक का चुनाव करना होगा. इस हकीकत से न तू मुह मोड़ पायेगी न मैं.

मीता- मनीष, मैं जानती थी तू अर्जुन सिंह का बेटा है, मैं ये भी जानती थी की एक दिन तू मेरे सामने अपने सवाल लेकर खड़ा होगा. मैं ये भी जानती थी की तेरी दोस्ती पल पल मेरा इम्तिहान लेगी पर फिर भी मैंने तुझसे दोस्ती की , तुझे हाँ कहाँ. वो दो चार मुलाकाते मुझे भुलाये नहीं भूली, मुझे अहसास करवा गयी की जैसे बरसो से तू मेरा साथी हो. और फिर तेरी मेरी जिन्दगी एक जैसी ही तो है, तू भी धक्के खा रहा मैं भी . ये जो लम्हे हमने साथ जिए है, मुझे अब बताने की जरुरत नहीं की उस दोराहे पर मैं किसे चुनुंगी. रोटी बनाने जा रही हूँ , भूख लगे तो आ जाना

मीता के जाने के बाद मैं भी पानी से निकला और कपडे बदल कर उसके पास चला गया. चूल्हे की आंच में उसके चेहरे की रौनक क्या खूब लगती थी .

"क्या देख रहा है " पूछा उसने

मैं- कही चूम न लू तुझे.

मीता- अच्छा जी

मैं- तेरा दिल नहीं करता क्या

मीता- दिल का क्या है ,दिल तो न जाने क्या चाहेगा, अब हर हसरत कहाँ पूरी होती है .

मैं- तू मेरी कौन सी हसरत है

मीता- मैं तेरी हसरत नहीं , तेरी तक़दीर बनना पसंद करुँगी.

मैं- वो तो तू अभी भी है

मीता- अभी तो नहीं हूँ पर एक न एक दिन जरुर

खाना खाने के बाद हम दोनों एक दुसरे के बगल में लेट गए. मीता ने मेरी बांह पर अपना सर रखा और बोली- क्या सोच रहा है .

मैं- न जाने मेरे पिता कहाँ पर होंगे.

मीता- मुझे विश्वास है वो तुझे जल्दी ही मिल जायेंगे.

मैं- मेरा विश्वास कमजोर हो रहा है अब . वो फ़ौज में नहीं गए तो गए कहाँ , सोलह साल थोडा समय नहीं होता कहाँ बिताया होगा उन्होंने ये समय , आखिर क्या वजह थी जो अपने परिवार को छोड़ गए वो .

मीता- कुछ तो वजह जरुर रही होगी.

हम बाते कर ही रहे थे की एकदम से मौसम बदलने लगा.

मीता- लगता है आंधी आएगी.

मैं- आने दे

आसमान में बादल सितारों को ढकने लगे थे, हवा की रफ़्तार बढ़ने लगी थी, हमारे आस पास के पेड़ झूलने लगे थे, हवा सन सनाते हुए दौड़ रही थी .

मीता- बिस्तर अन्दर कमरे में बिछा ले.

मैं- रहने दे, बारिश हुई तो देखेंगे वैसे भी धुल नहीं है ठंडी हवा अच्छी लग रही है .

मीता- कभी कभी सोचती हूँ मैं सबके सितारे पढने वाली, मेरे भाग्य में क्या है

मैं- काश मैं तुझे बता सकता , तू नहीं जानती मुझे किस हद ता तेरी फ़िक्र है

मीता- पर किसलिए

मैं- जब्बर तुझे ढूंढ रहा है और मैं जानता हूँ उसकी तलाश बस दिलेर सिंह के कातिल की ही नहीं है , उसका प्रयोजन कुछ और है .

मीता- मुझे परवाह नहीं उसकी

मैं- पर मुझे तेरी है,

मीता- क्या तुझे सच में लगता है वो मुझ पर हाथ डाल पायेगा.

मैं- मुझसे दुश्मनी के लिए वो किसी भी हद तक जायेगा ये जानता हूँ मैं ,

हम दोनों उस आंधी भरी रात में एक दुसरे से लिपटे हुए इस जहाँ से दूर अपनी बाते कर रहे थे की तभी कुछ ऐसा हुआ जिससे मेरे कानो की चूले हिल गयी. न जाने कैसी अजीब सी आवाज थी ये .

मीता- कुछ सुना तूने क्या था ये ..

"अजीब सी आवाज " मैंने बिस्तर से उठ कर अपने कान मसलते हुए कहा .

मीता भी उठ खड़ी हुई.

"क्या कही कोई शिकार कर रहा है " मीता ने पूछा

मैं-क्या मालूम

आंधी के चक्रवात ने वो आवाज बहुत जोरो से गूँज रही थी , मैंने मीता का हाथ पकड़ा और हम लोग उस तरफ चल दिए जहाँ से आवाज आ रही थी ,

मीता- कहाँ जा रहे है हम

मैं -शिवाले पर

मीता- पर क्यों

मैं- तू चल तो सही .

अचानक ही मुझे याद आ गया था की ये आवाज मैंने कहाँ पर सुनी थी , जब संध्या चाची ने अपनी जिस्म का मांस उस जमीन पर फेंका था तो भी हु ब हु ये ही आवाज सुनी थी मैंने. तेज हवाओ से टकराते हुए मैं और मीता शिवाले पर पहुँच गए और जब हमने वहां जाकर देखा तो कसम से खुद की आँखों ने जैसे धोखा दे दिया हो . शिवाला जाग्रत हो गया था . दूर दूर तक दिए झिलमिला रहे थे हैरत ये थी की उस तेज आंधी में भी .

ये शिवाला वैसा बिलकुल नहीं था जैसा की हम उसे देखते आये थे , ये ऐसे सजा था जैसे की कोई उत्सव हो.

मीता-असंभव

मैं- संभव हो गया है , जो कुछ है तेरी आँखों के सामने ही है

मीता- यही तो असंभव है मनीष

मीता ने मेरा हाथ पकड़ा और लगभग दौड़ते हुए मुझे ले चली

मैं- कहा

मीता- आ तो सही .

मीता और मैं दौड़ते हुए उस स्थान पर पहुंचे जहाँ पर मैंने चाची को देखा था पर आज इस तूफानी रात में वहां पर चाची नहीं बल्कि कोई और था , जिसके वहां होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी . .................... वो सात और वो एक ........ हाथो में रक्तरंजित तलवारे ,,,, आँखों में कुछ कर जाने का जूनून और बदन से टपकता रक्त .............. ये रात बड़ी भारी होने वाली थी ............
 
" मीता- बस इतनी सी बात के लिए परेशां है तू, अधूरी हसरतो का और मन की उमंगो का रिश्ता है मेरा हवेली से. बिखरती रेत और उमड़ते बादल सा रिश्ता है मेरा हवेली से. जितना तुझे ये तेरे खेत प्यारे है , उतनी ही प्यारी मुझे हवेली है . मेरा घर है वो हवेली. "

यही तो खासियत है हमारे फौजी भाई में , खुबसूरत अलंकारों से कहानी में चार चांद लगा देते हैं । यह कहानी मुझे बिहारी के सतसई दोहों की याद दिला देता है जिनके हर दोहे में बहुत गहरी चीजें छुपी रहती थी । यहां भी हर अपडेट्स कुछ न कुछ गहरी राज लिए हुए प्रतीत है ।


संध्या चाची ने बिल्कुल सही कहा , यह फसाना मनीष का नहीं , किसी और का है । जिस कहानी की बुनियाद सोलह साल पहले लिखी गई थी उस का नायक एक बीस साल का लड़का कैसे हो सकता है !

मैंने पहले भी कहा था कि इस कहानी का असल नायक मनीष के पिता जी और नायिका उसकी मम्मी एवं चाची संध्या हैं ।
जहां मनीष के डैड एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते थे वहीं उसकी चाची धनाढ्य परिवार से । और मुझे शक है उसकी मां भी दद्दा ठाकुर के परिवार से ही विलोंग करती होंगी ।

सोलह साल पहले कुछ ऐसा हुआ जिसमें दद्दा ठाकुर के पुत्र सहित कई लोग मनीष के पिता जी के हाथों मारे गए और उस पुरे मामले में संध्या भी कहीं न कहीं से गुनाहगार थी । अगर ऐसा नहीं होता तो संध्या चाची खुद के नंगे बदन पर कोड़े बरसा कर प्रायश्चित नहीं करती !
पर उन दिनों हुआ क्या था , यह सस्पेंस अभी तक बना हुआ है ।

मनीष के पिता जी सोलह सालों तक अज्ञातवास की जीवनी क्यों गुजार रहे हैं ? सोलह साल तक अपने एकलौते पुत्र से मिलने की चाहत क्यों नहीं पनपी ? आखिर ऐसा क्या कारण है जो बनवासी की जीवन गुजार रहे हैं ?

पृथ्वी और मनीष के दरम्यान जो गर्माहट देखने को मिला उससे यही लगता है इतिहास की फिर से पुनरावृत्ति होगी । और यह महाभारत एक बार फिर से अपनों के बीच ही लड़ा जायेगा ।

सभी अपडेट्स बेहद ही खूबसूरत थे फौजी भाई ।
आउटस्टैंडिंग एंड अमेजिंग एंड ब्रिलिएंट ।
 
#56

सात अश्व मानव और रीना अकेली . दियो की टिमटिमाती रौशनी ने उस मैदान में प्राण फूंक दिए थे. सारी बाते एक तरफ पर रीना का यहाँ होना अपने आप में कहानी थी, उसने मुझे कई बार ही तो बताया था की कुछ तो है जो उसे रुद्रपुर की तरफ खींच रहा है पर इस द्रश्य ने मेरी रूह को बताया की मामला वैसा नहीं था जैसे की मैं देख रहा था .

बिजली की तेजी से रीना उन अजीब से अश्व मनवो का मुकाबला कर रही थी , और मैं बस हैरान था की ऐसी भी कोई चीज होती है या ये सब मेरा वहम था .

"चली जा वापिस लौट जा " उनमे से सबसे बुजुर्ग अश्व मानव ने रीना से कहा .

रीना- जाना होता तो आती ही नहीं

अश्व मानव- तू जो करने का सोच रही है वो असंभव है , तेरे दुस्साहस की प्रशंशा करता हूँ पर साथ ही मैं फिर से चेतावनी भी देता हूँ की मेरे सब्र का पैमाना छलक रहा है , कहीं ऐसा न हो की तेरे प्राण भी रिहाई की भीख मांगे .

रीना- मेरी आँखों में देख और फिर सोच क्या मुझे परवाह है तेरी या फिर किसी और की

अश्व मानव- तू जानती नहीं तू क्या कर रही है . तुझसे पहले कितने आये कितने गए , कितने तो हम तक भी नहीं पहुँच पाई, बता तुझे क्या चाहिए सोना चांदी या फिर तेरी कोई मनचाही

रीना- मेरी मनचाही में तो तू रोड़ा बना हुआ है .

रीना आगे बढ़ी और उस बुजुर्ग अश्व मानव पर वार किया पर वो तेज था, चपल था . उसके खुरो ने रीना की पीठ पर लात मारी पर वो गिरी नहीं . हवाओ ने जैसे आज ठान ली थी की सारा जोर यही पर लगा देंगी. रीना के होंठो पर कुटिल मुस्कान अ गयी और फिर अगले ही पल वो किसी बिजली के जैसे कौंधी और उस बुजुर्ग अश्व मानव के बीच से होती हुई उसकी तलवार ने उसे दो हिस्सों में बाँट दिया.

मासूम, फूल सी नाजुक रीना ने अभी अभी एक क़त्ल कर दिया था हमारी आँखों के सामने, बाकि बचे अश्व-मनवो ने अपने साथी के हश्र पर रुदन करना शुरू कर दिया , पर कुछ पालो के लिए क्योंकि अब उन्होंने व्यूहरचना बना दी थी . तीन तलवारों ने एक झटके में ही रीना के कुरते को तार तार करते हुए उसकी पीठ को चीर दिया था . रीना चीखी और , और तेजी से उनसे लड़ने लगी.

"मुझे तुम तो क्या नहारवीर भी नहीं रोक पाएंगे , "रीना ने कहा .

अश्वमानव- तेरी खुशकिस्मती नहीं की तू उन महान वीरो को देख पाए, तेरे भाग्य में हमारे हाथो से ही मरना है .

उनमे से एक अश्वमानव की कटार रीना की पिंडी को चीर गयी , वो धरती पर गिर गयी,

"बस बहुत हुआ " मीता ने मुझसे हाथ छुड़ाया और उस घेरे की तरफ दौड़ पड़ी.

मेरी जिन्दगी में ये दो लडकिया आई थी और आज दोनों के ही अलग रूप देख रहा था मैं. मीता ने एक अश्वमानव की पीठ पर लात मारी और घेरे में प्रवेश कर गयी.

मीता- सितारों के रक्षको को मेरा प्रणाम , मैं नहीं जानती की आपका यहाँ होने का क्या प्रयोजन है ,पर यदि ये श्रेष्ट सुरक्षा पंक्ति के दर्शन मुझे हुए है तो मेरा सौभाग्य है साथ ही मेरा निवेदन है इस लड़की को बक्शा जाए.

अश्वमानव- अब देर हो चुकी है , शिवाले की धरती अब या तो इसके रक्त से सींची जाएगी या हमारे रक्त से . बीच का कोई रास्ता है ही नहीं .

मीता- आखिर ऐसा क्या है जिसकी वजह से इस पवित्र स्थान पर ये रक्तपात हो रहा है .

अश्वमानव- सितारों को पढने वाली, तू ये तो जानती होगी न की हम मर्जी के मालिक है , बिना मतलब के कुछ नहीं बताते. तू अपनी राह पकड़

मीता- इसे लिए बिना नहीं जाउंगी

अश्वमानव- तो फिर तेरे प्राण भी हरे जायेंगे.

मीता- ये बात मुझे पसंद नहीं आई,

मीता ने पास पड़ी उस बुजुर्ग अश्वमानव की तलवार उठा ली और बोली- चलो फिर देखते है व्यूह की पहली कतार कितना प्रतिकार कर पाती है .

मीता के चेहरे पर जो कशिश थी ठीक वही मैंने उस दिन थाने में महसूस की थी जब उसने दिलेर को मारा था . तब तक रीना भी खड़ी हो चुकी थी . मीता ने मुझे देखा और इशारा किया की मैं अपनी जगह से हिलू भी नहीं .

आठ तलवारों का शोर आसमान में गूँज रहा था . एक समय ऐसा भी आया की मैंने हवा में बस रक्त के छींटे उड़ते देखे. हवाओ ने उनके चारो तरफ जैसे कोई दिवार बना दी थी . कभी उनकी तो कभी मीता-रीना की चीखो को सुनकर मैं विचलित हो रहा था . ऐसा मंजर कोई कमजोर दिल का देख लेता तो कब का दौरा पड़ जाता उसे. और फिर एकाएक सब कुछ शांत हो गया जितने भी दिए वहां पर रोशन थे एक एक करके सब बुझ गए. शिवाला अपने अंधकार में डूब गया .

मैंने देखा मीता अपने कंधे पर बेहोश रीना को लादे मेरी तरफ आ रही थी . मैं दौड़ कर उसके पास गया और रीना को अपनी बाँहों में ले लिया.

मीता- आग लगा दी है तेरी मोहब्बत ने .

हम रीना को लेकर कुवे पर आये. मैंने लालटेन जलाई और रीना को बिस्तर पर लिटा दी. मीता उसके घावो को देखने लगी. रीना की नंगी पीठ पूरी कटी हुई थी . पैरो में अलग से घाव थे , मैंने देखा की उसकी एक पसली पर भी कट था .

मीता- इसे चादर ओढा दे.

मैं- इसे डाक्टर की जरुरत है

मीता- मैंने कहा न इसे चादर ओढा दे.

मीता ने अपनी चोटों पर मिटटी मलनी शुरू की .

मैं-ये क्या कर रही है तू

मीता- ये मिटटी सबकी माँ है , इसकी पनाह में गए तो हर दर्द को खींच लेगी ये.

मैं- क्या था वो सब और रीना वहां क्या कर रही थी .

मीता- कल बात करेंगे हम इस सब के बारे में . मुझे जरा बैठने दे दो पल . तेरी रीना ने आज मरवा ही दिया था . इसके होश में आते ही दो थप्पड़ लगाने वाली हु इसके.

मैं- रीना अपने बस में नहीं है, कोई तो है , इसने मुझे पहले भी बताया था की कोई डोर जैसे इसे खींच रही है शिवाले की तरफ.

मीता- मौत बुला रही है इसे और कुछ नहीं . अश्व्मनावो का आह्वान कर बैठी ये नादाँ, तंत्र में बहुत सशक्त होता है उनका स्थान, ये तो बस आज दिन ठीक था . पर आगे हालत बहुत बुरी होगी मनीष , सितारों के रक्षक होते है वो उनकी हत्या हुई है आज. ये बात दूर तक जाएगी. तुझे कैसे भी करके संध्या से जानकारी निकलवानी होगी. वो एक दक्ष साधिका है , नाहरविर जल्दी ही आयेंगे हमें संध्या की जरुरत पड़ेगी.

मीता ने मेरी गोद में अपना सर रखा और अपनी आँखों को मूँद लिया. रह गया मैं अकेला ये सोचते हुए की आने वाला कल अपने साथ क्या लेकर आएगा.
 
#57

भोर से कुछ पहले मीता हमें छोड़ कर चली गयी. रहे गए मैं और रीना. पूरी रात बस एक मैं ही था जो एक पल भी नहीं सोया था ये सोचकर की आज की ये रात इतनी भयानक है तो आगे और न जाने क्या देखने को मिलेगा. कुछ देर बाद रीना भी उठ गयी .

रीना- मैं यहाँ कैसे

मैं- ये सवाल तो मैं तुझसे पूछता हूँ

रीना की आँखों में कशमकश थी जिसका मतलब ये था की उसे कल रात की घटना याद नहीं थी .

मैं- कल तू मुझसे मिलने आई थी और फिर यही रुक गयी .

रीना- और मेरे बदन पर ये तेरी शर्ट क्या कर रही है , रात को कुछ हुआ था क्या तेरे मेरे बीच .

मैं- क्या बात कर रही है तु, आजतक मैंने कभी ऐसा वैसा कुछ किया है क्या तेरे साथ .

रीना- तो फिर क्या छिपा रहा है तू

मैं-कुछ नहीं छिपा रहा तुझसे मेरी जान, सच ये है की कल रात तू मुझे रुद्रपुर के शिवाले में बेहोश मिली थी , मैं तुझे उठा कर यहाँ ले आया. सोचा की तू होश में आएगी तो तुझसे बात करूँगा.

रीना- मुझे याद नहीं मैं कब गयी वहां पर.

मैं- रीना मेरी बात ध्यान से सुन, मुझे तेरी हद से ज्यादा परवाह है तुझे अगर कुछ भी हुआ तो मैं सह नहीं पाउँगा. आज के बाद तू घर से बिना बताये कही भी नहीं आयेगी-जाएगी. मुझे चाहे लाख काम हो पर मैं हर कदम तेरे साथ रहूँगा.

रीना- मैं समझती हूँ

मैं- तो वादा कर , आज के बाद चाहे कुछ भी हो जाये तू रुद्रपुर की तरफ देखेगी भी नहीं .

रीना- ठीक है

मैं- क्या तुझे कुछ भी याद नहीं कल रात के बारे में

रीना - तेरी कसम

मेरे लिए ये अजीब स्तिथि हो गयी थी . रीना कल मरते मरते बची थी और उसे कुछ भी याद नहीं था . उसके जख्म् भी गायब थे .

मैं- तू चल मेरे साथ

रीना- कहाँ

मैं- संध्या चाची के पास.

मैं रीना को लेकर संध्या चाची के पास गया .

मैं- चाची मैं गोल मोल बात नहीं करूँगा पर कल रात सात अश्व्मान्वो की हत्या हो गयी है .

मेरी बात सुनकर चाची के चेहरे का रंग उड़ गया.

चाची- असंभव

मैं- तुम खुद जाकर पड़ताल कर लो रुद्रपुर में

संध्या- ऐसा कौन माई का लाल पैदा हो गया जिसने मृत्यु का वरन करने की ठान ली है .

मैं- वो कोई भी हो . पर अब मुझे तुम्हारी मदद की जरुरत है . तुम ही हो जो नहारविरो को काबू में कर सकती हो .

मेरी बात सुनकर चाची की आँखों की पुतलिया फ़ैल गयी .

चाची- किसने कहा तुमसे की मैं ऐसा कर सकती हूँ

मैं- किसी अपने ने , पर मैं तुमसे मदद की भीख मांगता हूँ

चाची- तूने सिर्फ नाहरविरो का जिक्र सुना है उनके बारे में तू जानता नहीं है

मैं- तुम बताओ

चाची- इस दुनिया में दो तरह के सच होते है एक जो सामने होता है दूसरा जो सामने होकर भी अनजान होता है . दुनिया में पूजा पाठ है तो तंत्र-मन्त्र भी है . कुछ लोग किताबी ज्ञान प्राप्त करते है , कुछ लोग दुनिया के अनसुने, अनसुलझे ज्ञान की तलाश करते है , भटकते रहते है बिना किसी बात के पर वो ही जानते है की वो बात क्या है . तो नाहरविरो की कहानी ये है की वो ऐसे रक्षक है जो सिर्फ साधने वाले या फिर साधक के बताये प्रमाण को ही पहचानते है , साधक उन्हें अपनी किसी खास चीज की सुरक्षा के लिए वचन घेरे में ले सकता है . एक नाहार्वीर ही बहुत होता है अपने आप में .

मैं- उन्हें कैसे साधा जाता है

चाची- तंत्र में कुछ मुमकिन है कुछ नहीं, साधक की जिजीविषा देखि जाती है

मैं- तुमने कैसे साधा था उन्हें.

चाची- मेरे गुरु का सामर्थ्य और मेरा हठ

मैं- जिसने सात अश्व मानवो को ढेर कर दिया उसका सामर्थ्य कितना होगा

चाची- मैं भी यही सोच रही हूँ, मेरी लालसा है उस से मिलने की

मैं- रीना ने कल ये काम किया है

जैसे ही मैंने ये कहा चाची ने अपने मुह पर हाथ रख लिया , उसे जरा भी यकीन नहीं था.

चाची-जो मैं कह रही हूँ रीना उसे ध्यान से समझना ये जो भी हुआ है , या नहीं हुआ है मुझे मतलब नहीं है पर अगर तू जिन्दा रहना चाहती है तो रुद्रपुर से दूर रहना . मैंने इन आँखों से बहुत कुछ देखा है, इतना कुछ देखा है की तू सोच भी नहीं सकती. इन हाथो से एक और चिता का बोझ नहीं उठाया जायेगा. वहां पर मौत है , और सबसे पहले उस तपिश में तू ही झुलसेगी. आगे तेरी मर्जी है , किस्मत हर दफा साथ नहीं देगी. जो चिंगारी बरसो पहले बुझ गयी उसे सुलगाने की गलती मत करना.

मैं- तुम बताती क्यों नहीं आखिर ऐसा क्या हुआ था बरसो पहले.

चाची- काश मैं जानती , काश मैं जानती तो आज हालात बेहतर होते. और तुम रीना मेरी बात पर विचार करना

चाची उठ कर चली गयी .रह गए हम दोनों.

मैं- सब मेरी गलती है मैं वो धागा तुझे नहीं देता तो ये सब होता ही नहीं

रीना- शायद यही नियति है .

मैं- बदल दूंगा मैं इस नियति को . अगर मौत भी तेरी तरफ आई तो उसे मुझसे पार पाना ही होगा.

रीना- अगर मैं मर भी गयी तो तेरी बाँहों में जान निकले मेरी

मैं- पागल हुई है क्या ये क्या बोल रही है तू तुझे जीना है मेरे साथ जीना है . तू अभी उतार फेंक उस धागे को

रीना- नहीं कर सकती

मैं- क्यों

रीना- क्योंकि वो मेरे गले में नहीं है , मुझे लगता है की वो मेरे अन्दर है .

रीना की बात सुनकर मैं और चिंतित हो गया .

मैं- तू फ़िक्र मत कर, मैं जल्दी ही मेरे पिता को तलाश कर लूँगा. उनके पास कोई समाधान जरुर होगा.

रीना- पर ऐसा कौन सा बोझ है जिसे मैं उठा रही हूँ तू नहीं

मैं- इसका जवाब अब चौधरी अर्जुन ही देंगे. तू बस घर पर ही रहना.

रीना- एक बात और थी

मैं- दो बात पूछ तू

रीना- वो लड़की कौन थी ...........

मैं- कौन लड़की

रीना- मुझे दोहराने की जरुरत नहीं

मैं- ठीक है फिर तू जब उस से मिले तो खुद पूछ लेना

रीना मेरे पास आई, इतना पास की उसकी सांसे मेरे सीने में उतरने लगी.

रीना- मैं कौन हूँ तेरी ये याद रखना हमेशा

मैं- तू मेरी सबकुछ है

रीना को छोड़कर मैं घर से बाहर तो आ गया था पर दिल में ये भी था की हालात ठीक नहीं होंगे जब ये दोनों सामने आएँगी. और मेरे लिए दोनों ही मेरी जिन्दगी थी , ये भी था की चाची जैसी घाघ औरत खुल कर मुझे अपना अतीत कभी नहीं बताएगी. रात को मैं और मीता एक बार फिर से कुवे पर बैठे रीना के लिए सोच रहे थे की मैंने तभी उसे आते हुए देखा..............................
 
#58

सुनार की घरवाली तेज तेज चलते हुए हमारी तरफ ही आ रही थी , पर किसलिए ये देखना था .

काकी- पिछले कुछ दिनों से मैं तुमसे मिलना चाह रही थी .

मैं- कुछ काम था क्या

काकी ने एक नजर डाली मीता पर और बोली- अकेले में बात हो सकती है

मैं- सब अपने ही है खुल कर कहो जो कहना है

काकी- लालाजी के जाने के बाद मैं ऐसे कुछ पुराणी चीजे जो जरुरत की नहीं थी उन्हें देख रही थी की मुझे कुछ ऐसा मिला जिसे मैं समझ नहीं पायी.

मैं- तो इसमें मेरा क्या लेना देना है .

काकी-मुझे एक चिट्ठी मिली जिसमे लिखा है अर्जुन के वारिस को दे देना, वो समझ जायेगा

मैं- क्या समझ जायेगा

काकी- यही तो उलझन है मेरी, चिट्ठी में बस इतना ही लिखा है ये नहीं लिखा की क्या दे देना .

काकी ने चिट्ठी मेरे हाथ पर रख दी. चमड़े के ऊपर लाल स्याही से लिखे गए शब्द थे . मीता ने भी पढ़ा उसे. एक तो जीवन में कम स्यापे थे ऊपर से ये चुतिया सुनार भी मरते मरते एक पहेली छोड़ गया .

मैं- काकी, जब्बर लाला और मेरे पिता किसी ज़माने में बड़े गहरे दोस्त थे पर उनकी दुश्मनी का क्या कारण था .

काकी- इसका जवाब उन तीनो में से ही कोई दे सकता है .

मैं- लालाजी के सामान को मैं देखना चाहूँगा अगर आपको कोई ऐतराज़ न हो तो .

काकी- मुझे भला क्या दिक्कत होगी, बस तुम अपना जो कुछ भी है वो ले जाओ .

मैं- ठीक है रात को आता हूँ मैं

काकी के जाने के बाद मैं और मीता उस चिट्ठी को देखने लगे.

मीता- अजीब सा चमड़ा है . ऐसी खाल मैंने देखि नहीं कभी

मैं- छोड़ अपने को क्या लेना देना. अपन रात को लाला के घर चलेंगे. तू ही जाना मेरा मन नहीं है .

मैं- क्या हुआ तेरे मन को

मीता- तेरी बातो ने उलझन में डाल दिया है मुझे, तूने कहा की रीना को अश्व मानव याद नहीं उसके घाव याद नहीं पर उसे ये याद थी मैं.

मैं- तू रीना पर शक कर रही है

मीता- नहीं, मैं बस सम्भावना तलाश रही हूँ . मुझे भी परवाह है रीना की . मुझे लगता है की वो बार बार रुद्रपुर जाएगी. उसे तलाश है किसी चीज की , उसकी आँखों में अजीब शिद्दत दिखी थी मुझे. मैं नहीं चल पाऊँगी तेरे साथ .

मैं- ठीक है . मैं ही जाऊँगा.

मीता- कल दोपहर को मिलेंगे फिर हम

मैं- कुछ देर तो रुक साथ मेरे

मीता- मुझे आदत होने लगी है तेरी, और ये आदत ठीक नहीं

मैं- मीता और मनीष एक ही तो है

मीता- ये तू कहता है तेरा दिल नहीं , वो किसी और के लिए धडकता है

मैं-इन धडकनों से अब डरने लगा हूँ मैं

मीता- समझा के रख इनको,

मीता ने अपना झोला उठाया और जाने लगी. कुछ कदम उसके साथ चला और फिर बावड़ी पे जाके बैठ गया .ये शाम ये डूबता सूरज . ये तन्हाई और मैं , मीता का कहना बिलकुल सही था मैं दो नावो की सवारी कर रहा था मेरे लिए रीना सबकुछ थी और मीता जिन्दगी थी . मुझे दोनों से बेपनाह प्यार था . ये जानते हुए भी की वो लम्हा मेरी जान ही ले जायेगा जब ये दोनों आमने सामने आएँगी जब किसी एक का साथ पकड़ना होगा , किसी एक का साथ छोड़ना होगा. सीने पर हाथ रखे मैं पत्थर पर लेटे हुए इसी कशमकश में डूबा था की एक आवाज ने मुझे धरातल पर ला पटका .

"चौधरी ओ चौधरी , तेरी मर्जी हो तो थोडा पानी पी लू "

मैंने देखा ये वो ही आदमी था जो उस दिन मुझे कुवे पर मिला था . मैं लगभग दौड़ते हुए उसके पास गया .

मैं- तुम यहाँ

आदमी- इधर से गुजर रहा था प्यास लग आई. और आज मैंने पूछा भी है तुमसे

मैंने आँखों से इशारा किया तो उसने अंजुल भरी हौदी से और पीने लगा. उसकी दाढ़ी, मूंछे भीगने लगी पानी से.

"जी भर गया चौधरी , खूब असीश तुमको " उसने कहा

मैं- जल्दी में नहीं हो तो आओ बैठते है थोड़ी देर.

उसने एक नजर आस पास डाली और बोला- जो तुम्हारी इच्छा चौधरी.

मैं उस से सीधा सीधा नहीं पूछ सकता था मैंने भूमिका बनानी शुरू की .

मैं- तुम किसान हो , मुझे बताओ ये कुवा मीठे पानी का है , पास में नहर है . आसपास का हर खेत फसल उगाता है पर मेरी जमीन ही बंजर क्यों .

आदमी-धरती हमारी माँ होती है चौधरी,और माँ भी संतान को तब तक दूध नहीं पिलाती जब तक की संतान रो रो कर उसे बताती नहीं की भूक्ख लगी है , तुम्हारे पास सब कुछ है , धरती माँ को बताओ की तुम उस पर आश्रित हो अपने पसीने से सींच दो उसके कलेजे को , वो किरपा करेगी तुम पर .

मैं- तुम मेरी मदद करोगे यहाँ खेती करने में, मैं तुम्हे मनचाही रकम दूंगा.

उस आदमी ने मेरी तरफ देख कर मुस्कुराया और बोला- चौधरी, लालच दे रहे हो मुझे, मैंने तुम्हे बताया था की मैं खुद किसान हूँ व्यापारी हूँ मुझे भला किसका मोह, पेट भरने लायक अनाज ये धरती माँ दे देती है .

मैं- उस रात जब तुम यहाँ से गए. इस हौदी का पानी मिटटी हो गया . मेर्रे किसी अपने की जान पर बन आई.

आदमी- खेद की बात है पर मेरा ऐसा कुछ प्रयोजन नहीं था . मैं बस पानी पीने रुका था .

मैं- हैरानी की बात जिस रात ये घटना हुई उसी रात किसी ने मेरे गाँव में एक आदमी को मार कर उसका दिल निकाल लिया और उसे शिवाले में भोग दे आया .

मेरी बात का उस आदमी पर जरा भी फर्क नहीं पड़ा , जरा भी भाव नहीं बदले उसके .

आदमी- मैं देखना चाहता हूँ की तुम कैसे मेहनत करते हो इस जमीन पर हल चला कर दिखाओ जरा .

मैं- मेरे पास बैल कहाँ है .

आदमी- ये भुजाये किसी बल से कम है क्या . उठाओ हल दिखाओ मुझे तुम काबिल बी हो या नहीं.

मैंने हल काँधे पर लगाया और चलाने लगा. बेशक मिटटी ने खूब पानी पीया था पर फिर भी जल्दी ही मेरी हिम्मत जवाब दे गयी. उस आदमी के चेहरे पर मुस्कराहट थी .

उसने हल मेरे काँधे से लेकर खुद पर लगाया और मैं देखता रह गया. कितना शक्तिशाली था वो . धरती ने जैसे खुद रास्ता दे दिया था उसको .. मैंने आगे होकर हल की दूसरी तरफ अपना कन्धा लगा दिया. वो मुस्कुराया. और हल छोड़ दिया.

आदमी- मैंने कहा था न ये धरती हमारी माँ है इसे दिल से पुकारो . माँ संतान के लिए जरुर आती है .

उसने अपना गमछा सही किया और जाने लगा.

मैं- रुको जरा मुझे बहुत बाते करनी है तुमसे

पर वो नहीं रुका, उसने सुना ही नहीं मुझे बस चलता रहा .

"मैं जानता हूँ तुम कौन हो . रुक जाओ मत जाओ " मैंने चिल्ला कर कहा पर उसके कदम नहीं रुके ........................ हलके अँधेरे में मैं उसके पीछे दौड़ा और जब तक मैं मुंडेर पर पहुंचा वहां पर कोई नहीं था कोई भी नहीं था .............
 
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