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Kamukta kahani - गुजारिश 2

#41

"क्या सुना था तूने " मैंने कहा

मीता- यही की संध्या इस शादी से खुश नहीं थी , शादी के बाद फिर कभी वो रुद्रपुर नहीं गई .

मेरे मन में वो ख्याल आया जब चाची चाचा से कह रही थी की तुमसे होता ही नहीं, शायद इसी बात से वो खुश नहीं थी

मीता- कहाँ खो गए.

मैं- कोई तो डोर है जिससे ये सब लोग बंधे है बस वो डोर मुझे दिखाई नहीं दे रही .

मीता- लगता है मेह फिर आएगा. मुझे चलना चाहिए, इस बार सावन बड़ा तेज बरस रहा है

मैं- ऐसे कैसे जाएगी. एक बारिश भी तेरे साथ देखि नही मैंने. ठहर जरा, बरसने दे इस घटा को .

मीता- तू ऐसा कैसे है

मैं- ऐसा कैसे

मीता- मतलब इतना सरल कैसे हो सकता है कोई

मैं- छोड़ न तू भी क्या, ये बता रुद्रपुर में क्या चल रहा है

मीता- शांत है , सन्नाटा पसरा है फिज़ाओ में और यही सन्नाटा सच कहूँ तो खाए जा रहा है , जैसे कह रहा हो की कोई तूफ़ान आने को है .

मैं- जानता हूँ , जो हुआ नहीं होना चाहिए था

मीता- उस लड़की को इतना चाहता है न तू

मैं - नहीं रे, बस दोस्त है वो मेरी बचपन से, जब कोई नहीं था मेरे साथ वो थी .

मीता- मुझसे झूठ बोल सकता है तू खुद से नहीं , इतना जूनून , कोई इस हद तक आ जाये की अपनी सांसो की परवाह भी नहीं करे, ये तो प्यारे बस इश्क में ही हो सकता है .

मैं- तूने ही तो कहा था मेरे हाथ की लकीरों में कुछ नहीं सिवाय बर्बादी के तो फिर मोहब्बत कैसे होगी.

मीता- मोहब्बत अपना रस्ता खुद तय कर लेती है . नियति ने तेरी तक़दीर में सुख का पन्ना भी लिखा होगा.

मैं- नियति ने मुझे तुझसे भी तो मिलाया है न

मीता- तेरे मेरे रिश्ते में एक शर्त है दोस्ती की . हमने एक रेखा खींची है

मैं- नियति अगर उस रेखा को नहीं माने तो

मीता- मुझे पाना ऐसा है जैसे की एक मुट्ठी रेत को हथेली पर रख कर फूंक मार देना. और अगर तेरी बात मान भी लू तो एक दिन आयेगा जब तुझे चुनाव करना होगा. तब क्या करेगा तू. मुझे तेरे और उस लड़की के रिश्ते से कोई परेशानी नहीं है क्योंकि तुझ पर पहला हक़ उसका है . और मैं बंधी हूँ अपनी हदों के दायरे में . पर मैं तुझसे इतना कहूँगी की आशिकी इम्तेहान लेती है , नंगे पैर तलवार पर चलने जैसा होता है मोहब्बत करना , पाँव के घाव सह सके तो करना मोहब्बत.

मैंने मीता का हाथ अपने हाथ में लिया और बोला- सब कुछ रब्ब के हाथ में छोड़ दिया है, उसके हाथ में डोरी है .

मीता- अब जाने दे मुझे .

मैं- मुझे शिवाले की कहानी जाननी है

मीता- तुझे पता है

मैं- तू बता

मीता- मुझे बस इतना पता है की शिवाले का मतलब मंदिर नहीं होता, शिवाले का मतलब होता है वो भूमि जहाँ शिव का धुना होता है ,

मीता ने बड़ी गहरी बात कही थी जिसे समझने में कुछ थोड़ी देर लगी.

मैं- इसका मतलब ,

मीता- हाँ उसका वही मतलब है . अब जाती हूँ मैं

मैं- चलता हूँ थोड़ी दूर तेरे संग

मीता- नहीं बिलकुल नहीं

मैं- बस थोडा सा दूर

मीता-ये जिद किस काम की

मैं उठ खड़ा हुआ और हम दोनों हौले हौले जमीन को पार करते हुए रुद्रपुर की तरफ चल दिए. उसकी पायजेब की झंकार, दूर कही कूकती कोयल की आवाज को ताल दे रही थी . माथे पर पड़ती हलकी बूंदे उसके सांवले चेहरे पर गजब लग रही थी .

"ऐसे क्या देख रहा है " पूछा उसने

मैं- बस तुम्हे

मीता- इतनी भी सुन्दर नहीं मैं

मैं- मेरी नजर से देख कभी खुद को

मीता ने अपनी उंगलिया मेरी उंगलियों से अलग की और बोली- बस , यहाँ से आगे मैं अकेले जाउंगी.मैंने उसका हाथ छोड़ दिया. शाम को मैं गाँव में आया तो मालूम हुआ की सुनार वापिस गाँव में लौट आया है .बेशक मेरा उस से छत्तीस का आंकड़ा था पर , ये मेरी गरज थी तो मैं उसके घर चला गया उस से मिलने के लिए.

लाला की हालत कोई खास बढ़िया नहीं थी , उसका एक साइड का शरीर जैसे सूख गया था .मुझे देख कर उसकी आँखों में नफरत आ गयी पर वो कुछ नहीं बोला.

मैं- कैसे हो लाला , तबियत कैसी है तुम्हारी

लाला चुप रहा .

मैं- अब बोल भी दे लाला.क्या मालूम कब जिन्दगी की शाम हो जाये, आत्मा पर इतना बोझ लेकर तू कैसे जायेगा. वैसे भी मैंने हमला करवाया नहीं था तुझ पर.

लाला- तेरी औकात भी नहीं इतनी

मैं- जे बात लाला. देख, माना की अपनी दुश्मनी है पर हजार नालायक दोस्तों से एक सच्चा दुश्मन भला होता है , हैं न, तो हम आपस में सौदा कर सकते है

लाला- कैसा सौदा

मैं- मेरे कुछ सवाल है उनका जवाब दे, बदले मैं तुझे थोडा सोना दूंगा

लाला- क्या सवाल है तेरे

मैं- उस बक्से में ऐसा क्या था जिसकी हिफाजत तूने सोलह साल तक की.

लाला- तूने खोल कर देख तो लिया ही होगा न

मैं- उस धागे में ऐसी क्या खास बात है लाला

लाला- तू जा यहाँ से

मैं- मुझे बता दे लाला. तू कहे तो मैं अभी के अभी सारा सोना तुझे लाकर देता हूँ

लाला- माँ चुदाने गया सोना, भोसड़ी के तू अभी के अभी निकल जा यहाँ से और दुबारा दिखना मत मुझे. वर्ना तेरा ऐसा हाल करूँगा की तूने सोचा नहीं होगा.

मैं- लोडू लाला मेरे सब्र का इम्तिहान मत ले,मैं क्या कर सकता हूँ इसकी खबर तुझे हो तो गयी ही होगी .

कुछ तो ऐसा राज था लाला के सीने में दफ़न जो लाला मरने को तैयार था पर बताने को नहीं. मैं घर आया तो देखा की चाची अकेली थी घर पर.

"कुछ बना दू तुम्हारे लिए " उसने पूछा मेरे से

मुझे थोडा अजीब सा लगा फिर मैंने मना किया. और चोबारे में चला गया कुछ देर बाद चाची भी वहां पर आ गयी .

"अबकी बार झड़ी अच्छी लगी है , पानी रुक ही नहीं रहा है " उसने कहा

मैं- हाँ, ऐसा सावन मैंने देखा नहीं कभी पहले. मैं कुछ दिनों के लिए कही बाहर जाना चाहता हूँ

चाची- कहाँ

मैं- वो सोचा नहीं है पर यहाँ से दूर

चाची- अब क्या खुराफात आई मन में

मैं- इसमें क्या खुराफात होगी भला.

चाची- जैसे मैं तो जानती ही नहीं न तुझे,

मैं- काश तुम मुझे जान पाती.

चाची ने एक गहरी साँस ली और खिड़की के पार देखने लगी. उसकी पीठ मेरी तरफ थी, ब्लाउज से झांकती पीठ पर जो निशान था उसने मेरा ध्यान खींचा.

"ये तुम्हारी पीठ पर कैसा निशान है चाची " मैंने कहा

"दर्द का रुसवाई का " अचानक से उसके मुह से निकल गया .
 
संध्या चाची के सीने में बहुत दर्द दबे हुए हैं । सोलह साल पहले की लड़ाई का प्रमुख वजह वो हो सकती है । अर्जुन सिंह से उनका रिश्ता जेठ और देवरानी से भी उपर कुछ हो सकता है । शायद वही वजह होगी जिसके कारण रूद्रपुर में , समाज में उनकी रूसवाई हुई ।
कुछ तो बहुत बुरा हुआ था उनके साथ ।

संध्या की बातें सोलहों आने सच है पर मैं अभी भी उनके उस बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या हासिल होगा । मैंने पहले भी कहा कि नौजवानों को अपने परिवार की हिस्ट्री जानने का पुरा हक है । उन्हें पता होना चाहिए कि वो अपने पुर्वजों पर गर्व महसूस करें या शर्मिंदगी ।

मनीष और मीता के बातों के दौरान मनीष का पुछा गया सवाल " ऐसा क्या बोझ है जिसे हम अंगूठी , चैन , पाजेब आदि में रख सकें " से तात्पर्य वही चिठ्ठी था जिसमें लिखा हुआ था कि " जो इसका बोझ उठा सकता है वही इसे धारण करें " ।

औरत की इज्जत ही उनका सबसे बड़ा आभूषण होता है । जो व्यक्ति औरत की इज्जत की रखवाली नहीं कर सकता उसे औरत व्याहनि ही नहीं चाहिए ।
मुझे विश्वास है वो पत्र अर्जुन सिंह ने ही लिखा होगा ।

खैर , जो भी हो , पर संध्या का चरित्र काफी उलझनें पैदा करने वाला है । जिस तरीके से उन्होंने मनीष की परवरिश की , वह भी कई सवाल पैदा कर रहा है । यह कैसा प्यार ! दिल में ममता और दिखावा सौतेली मां जैसी !

इन कुछ अपडेट्स से यह क्लियर हो गया है कि मनीष रीना से बेपनाह मोहब्बत करता है । पर मीता के लिए भी उसके दिल में खास जगह है । शायद " राधा " जैसी ।

सभी अपडेट्स बहुत ही खूबसूरत थे मनीष भाई ।
आउटस्टैंडिंग एंड अमेजिंग एंड ब्रिलिएंट ।
 
#42

"कैसा दर्द , कैसी रुसवाई चाची " मैंने कहा

चाची ने मुड कर मुझे देखा और बोली- कुछ चीजो पर जमी धुल को हटाना नहीं चाहिए, हम सबकी जिन्दगी में कुछ पल ऐसे होते है जो निजी होते है , हमें उन लम्हों की कद्र करनी चाहिए. मैं तेरी सोच पर पहरा नहीं लगा सकती तू चाहे जो सोच सकता है मेरे और जेठ जी के बारे में और मुझे फर्क भी नहीं पड़ेगा. पर कुछ रिश्ते बस होते है उनका कोई नाम नहीं होता जैसे की तेरा और रीना का . दुनिया चाहे कुछ भी कहेगी पर तुम दोनों एक दुसरे के लिए जो हो वो हमेशा रहोगे.

मैं- अगर आप पिताजी से प्रेम करती थी तो फिर चाचा से शादी क्यों की

चाची- उफ़ तेरे ख्याल भी तेरे जैसे न लायक ही है. पर तेरे ख्याल अगर ऐसे है तो तू लाख कोशिश कर ले अर्जुन को कभी समझ नहीं पायेगा. वो एक दिया थे उन्हें समझने के लिए तुझे बाती बनना होगा.

मैं- इन निशानों के बारे में बता सकती हो तुम मुझे

चाची- ये घाव मुझे लगाव भी है इनसे और नाराजगी भी है इनसे.

मैं- तुम चाचा केसाथ खुश नहीं हो, मैंने सुना था आप दोनों की बातचीत

चाची- वो मेरा और उसका मसला है , तुम्हे जानने की जरुरत नहीं . ख़ुशी गमी बस हमारे नजरिये की बात है . खैर बाते बहुत हुई मुझे और भी काम है .

चाची मुझे छोड़ कर चली गयी . मैं खिड़की के पास खड़ा रहा . पर इतना तो मुझे मालूम हो ही गया की ताई और चाची गहरी जुडी थी मेरे पिता से. पर क्या राज़ थे इनके , क्या मेरे पिता का सम्बन्ध भी चुदाई वाला था इनसे, क्या ताई मुझसे इसलिए चुद गयी की वो मुझमे मेरे पिता का अक्स देखती हो. पर दोनों ने ही इस बात को नकारा था . अब मुझे बस ये ही मालूम करना था किसी भी हाल में.

मैं फिर ताई के घर चला गया तो देखा की ताऊ आज घर आया हुआ था. मैं उसके पास ही बैठ गया बाते करने लगा.

मैं- ताऊ मुझे तुमसे कुछ बात करनी है

ताऊ- हां

मैं-ताऊ, मुझे नहीं मालूम की ये सही समय है या नहीं पर मैं ये जानना चाहता हूँ की ऐसी कौन सी बात है जिसकी वजह से तुम ताई को हमेशा गाली बकते हो .

ताऊ- छोड़ न क्या उस का जिक्र करता है

मैं- ताऊ, आज तुम्हे बताना ही होगा.

ताऊ- उस कुलटा से ही जाकर पूछ लेना तू.

मैं- कहते की एक न एक दिन ऐसा आता है जब आदमी ओ अपने दिल के बोझ को हल्का कर लेना चाहिए, मैं तेरा बेटा हु . मेरे सामने अपना दिल खोल सकता है तू

ताऊ- मेरे दिल में कुछ नहीं

मैं- फिर भी

ताऊ- सुनना चाहता है तो सुन, ये हरामजादी ऐसी नागिन है जो किसी को भी डस जाये. ये किसी की नहीं हो सकती, अब मैं तुझसे क्या कहूँ पर इतना समझ ले घर बसाने लायक नहीं है ये.

मैं- इस बात का कोई सबूत है तुम्हारे पास या फिर किसी ने कान भरे है तुम्हारे.

ताऊ- मुझे सबूत की क्या जरुरत , मैंने तो खुद उसे ..........

ताऊ ने बात अधूरी छोड़ दी.

मैं- उसे क्या ताऊ

ताऊ- कुछ नहीं, कुछ नहीं तू जा बाहर खेल . मुझे वापिस शहर जाना है

मैं- ताऊ क्या तुमने ताई को मेरे पिता के साथ देखा था .

ताउ- मैंने कहा न तू जा यहां से

मैं- मुझे समझ आ गया वो मेरे पिता के साथ ही थी .

ताऊ- मैंने कहा न चला जा यहाँ से . अभी तू इतना बड़ा नहीं हुआ है जितना तू समझ रहा है .

मैं घर से बाहर आकर नीम के पेड़ के निचे बैठ गया और विचार करने लगा. मेरी बात सच होने की पूरी सम्भावना लग रही थी मुझे, ताई जब ठेकेदार से चुद सकती है , मुझसे चुद सकती है तो अर्जुन चौधरी से क्यों नहीं चुद सकती. क्या मेरे पिता अपनी भाभी और छोटे भाई की पत्नी को रगड़ रहे थे . क्या यही वो वजह थी की ताऊ ने उन्हें ताई के साथ देख लिया हो तो वो घर छोड़ गये.

पर यहाँ आकार मेरा अनुमान गड़बड़ा रहा था , घर छोड़ना जम नहीं रहा था . घर छोड़ने की वजह ये नहीं हो सकती . मैंने सोचा इस घर की औरते इतनी शातिर है तो मर्दों का कहना ही क्या होगा. इन सवालो के जवाब किसी के पास थे तो वो थे चौधरी अर्जुन सिंह और अब समय आ गया था मेरा उनसे मिलने का.

अगले दिन सुबह सुबह ही मैंने अपना बैग लिया और शहर के लिए बस पकड़ ली.शाम तक मैं उस भर्ती सेंटर पर पहुँच गया जिसका पता मुझे रीना की मामी ने लाकर दिया था . वहां जाकर मालूम हुआ की वहां पर नए फौजियों को कुछ समय के लिए ही रखते है फिर ट्रेनिंग के लिए भेज देते है . मैंने उस फौजी को अपनी व्यथा बताई तो उसका दिल पसीज गया वो मुझे अपने साथ बड़े अफसर के पास ले गया . मैंने अफसर को पूरी कहानी बताई.

अफसर- देखो बेटे, मैं तुम्हारे जज्बात समझता हूँ और जितना हो सके मैं तुम्हारी मदद करूँगा. मैं रिकॉर्ड की जांच करवाता हूँ . थोडा समय लगेगा पर तुम्हारा काम मैं आज ही करूँगा.

मैंने हाथ जोड़ कर उसका धन्यवाद किया.

करीब दो घंटे बाद अफसर ने मुझे बुलाया और बोला- अर्जुन सिंह नाम का बन्दा भर्ती तो यही से हुआ था पर उसकी ट्रेनिंग अलवर में हुई थी. तुम्हे वहां जाना होगा. मैं वहां के लिए एक ख़त लिख देता हूँ तुम्हे आसानी होगी .

अफसर ने मुझे एक चिट्ठी दी और बोला की वहां किसी को भी दिखा देना . मैंने तुरंत अलवर के लिए बस पकड़ी और अगली शाम पहुँच गया . वहां के आर्मी सेंटर पर जाकर मैंने चिट्ठी दिखाई और फिर जो मुझे मालूम हुआ मैं हैरान रह गया .............................
 
#43

बोझिल कदमो से वापिस लौटते हुए मेरा एक एक कदम भारी हो रहा था. मेरा दिमाग भन्नाया हुआ था , अपने आप से जूझते हुए मैं नहर की पुलिया पर थोड़ी देर बैठ गया की तभी दिलेर सिंह आ गया . उसे देख कर मेरा माथा और ठनक गया .

"तुझे मेरे साथ थाणे चलना होगा " उसने कहा

मैं- दिलेर सिंह मेरा दिमाग बहुत ज्यादा ख़राब है , मुझे तंग मत कर. गुस्से में मैं कुछ कह दूंगा तुझे

दिलेर- मैंने कहा न चुपचाप जीप में बैठ,

दिलेर ने मेरा कालर पकड़ लिया .

"लाला ने रपट लिखवाई है तेरे खिलाफ " उसने गुर्राते हुए कहा .

मैं- देख दिलेर, मैं तुझसे फिर कहता हूँ मेरा दिमाग भन्नाया हुआ है . तू लौट जा ये गुस्ताखी तेरी मैं माफ़ करता हूँ

दिलेर- रपट है तेरे खिलाफ कार्यवाही करनी ही पड़ेगी. मैंने तुझसे कहा था न की मौका मिलते ही तेरी गर्दन पकड़ लूँगा.

मैं- मेरे सब्र का इम्तिहान मत ले ,

दिलेर- तू बैठ जीप में

जिस दिन से रुद्रपुर वाला काण्ड हुआ था मैं ऐसा वैसा कुछ नहीं करना चाहता था पर ये चूतिये जानबूझ कर पड़ी लकड़ी उठाने में लगे थे. मैंने दिलेर की गांड पर लात मारी और उसको उल्टा कर दिया जीप के बोनट पर .

"बहन के लंड, कब से कह रहा हूँ, बात को मत बढ़ा. मत बढ़ा. पर दरोगा की गांड में चुल मची हुई है .साले लंड पर रखता हु मैं तेरे जैसो को .देखना चाहता है मेरी दुश्मनी को तो देख.." मैंने उसको मारते हुए कहा.

"पुलिसवाले पर हाथ उठाता है, साले तू तो गया " जब्बर ने मुझे धक्का देते हुए कहा और मेरी पसलियों पर वार किया. यही वो कमजोर जगह थी . मैं गिर पड़ा और जब संभला तो मैं थाने में था. हालत ख़राब थी .

"दिलेर सिंह, ये तूने ठीक नहीं किया. मेरा वादा है तुझसे , मेरे पैर पकड़ कर रहम की भीख मांगेगा तू " मैंने कहा

दिलेर- अरे वो हवालदार, जरा और सुताई कर इस लौंडे की. पुलिस के डंडे का जोर दिखा इसे.

दो पुलिस वालो ने मुझ को पकड़ कर लिटाया और एक ने मेरे पैरो के तलवो पर डंडे मारना शुरू किया . हवालात में मेरी चीखे गूंजने लगी.

"पता नहीं जीजा क्यों घबराया हुआ है इस बित्ते भर के छोकरे से , जीजा को जब मालूम होगा की मैंने गांड तोड़ी है इसकी तो बड़ा खुश होगा वो " दिलेर अपने आप से बोला.

मैं- जितना जोर दिखाना है दिखा ले भोसड़ी के. पर मेरी बात याद रखना मैं मारूंगा तीन गिनूंगा एक

दिलेर- हवालदार , इसकी चीखे पुरे थाणे में आणि चाहिए.

एक एक वार भारी पड़ रहा था मुझ पर . पर फिर मैं चीखा नहीं. अपनी भी जिद थी . और जिद दिलेर सिंह की भी थी . मुझे नहीं मालूम की उस समय क्या समय रहा होगा. रात कितनी बीती थी .जब सारे थाने में सन्नाटा पसरा हुआ था उस पायल की आवाज बड़ी जोर से गूंजी थी .

"थानेदार, मनीष को छोड़ दे " आवाज में कुछ तल्खी सी थी .

दिलेर- ओह हो. ये बताने तू इतनी रात में चली आई अकेले. वैसे तू है छमिया.

""तू बस इतना समझ ले ,अगर मैं खुद चल कर थाने आई हूँ तो कोई तो हूँ ही, मनीष को तुरंत छोड़ दे ." उसने कहा

दिलेर- छोड़ दूंगा. अभी छोड़ देता हूँ. पर तुझे मेरा एक काम करना होगा. आज की रात तू मेरे पास रुक जा . सुबह सुबह ही छोड़ दूंगा इसे. वैसे भी अकेले राते कटती नहीं है मुझसे .

"दिलेर सिंह, अपनी जुबान को लगाम दे हरामजादे." मैंने गुस्से से कहा

दिलेर- साले. तू देख मैं क्या करता हूँ , इस छमिया की यही लेता हूँ तेरे सामने, तुझे भी मजा आयेगा.

"तू मेरी लेगा. तू हाथ लगा कर दिखा मुझे एक बार तुझे मलाल रहेगा की तूने जन्म भी क्यों लिया " मीता ने शांत स्वर में कहा .

दिलेर- वाह भाई वाह, ऐसा तो बस फिल्मो में देखा था पर क्या मालूम था की इसी थाने में ये महफ़िल लगेगी. प्रेमी के सामने प्रेमिका की लेने में मजा ही आ जायेगा.

मुझे खुद की बेबसी पर गुस्सा आ रहा था पर वो मीता थी , मरजानी . जैसे ही दिलेर उसकी तरफ बढ़ा उसने उसके पैर में अडंगी डाली और दिलेर के गिरते ही उसने अपने झोले से एक कटार निकाल कर दिलेर के पैर में घोंप दी .

"आह " चीखा वो . और मैंने पहली बार मीता की आंखो में कुछ अलग सा देखा. जैसे ही हवालदार मीता को पकड़ने उसकी तरफ भागा उसने पास में पड़ी कुर्सी उसके सर पर दे मारी और उसकी चमड़े की बेल्ट से उसकी खाल उधेड़ने लगी.

"मेरी लेगा तू , चल खड़ा हो हरामजादे " मीता ने दिलेर को उठाया और कटार से उसकी बाह चीर दी. इसी आपा धापी में सिपाही जो मेरे साथ अन्दर था वो बाहर की तरफ भागा . और मैं उसके पीछे मैंने उसका सर सलाखों में दे मारा. वो वही ढेर हुआ . मैं चलते हुए दिलेर सिंह के पास गया .

"मैंने तुझसे कहा था न, आग से मत खेल .पर तेरी गांड में तो चुल मची थी . मैंने बार बार तुझसे कहा था , मत खेल मुझसे अब बुला ले तेरे जीजा को , वो साला भी देख लेगा तेरा क्या हाल होता है " मैंने कहा

मीता- मनीष पीछे हट, इस को मैं दिखाउंगी की मुझसे बदतमीजी करने का क्या नतीजा होता है देख ले थानेदार , तेरा थाना है , तेरी सरकार, तू है और मैं हूँ और तेरी कही बात है .उठ आ जरा , दिखा तेरा जोर मुझे,

मीता ने एक लात दिलेर को मारी .

दिलेर- माफ़ कर दो मुझे, गलती हो गयी मुझसे

मीता- गलती सुधार दूंगी मैं . तेरी औकात ही क्या जो मेरे होते हुए तू मेरे अजीज को हाथ लगाये. जितने जख्म तूने इसे दिए है तेरी खाल उतार लुंगी मैं. गौर से देख मुझे , मेरी आँखों को देख . और समझ मेरा नाम मितलेश है . मितलेश ठकुराइन और ये नाम तुझे मरते दम तक याद रहेगा.

मीता ने दिलेर की वर्दी फाड़ी और टेबल पर पटक कर उसकी पीठ को काटने लगी कटार से. दिलेर सिंह की चीखे थाने में गूंजने लगी. इतनी नफासत ने कसाई भी बकरे को नहीं काटता जितनी सफाई से मीता उसकी पीठ को काटते हुए उसकी हड्डिया खींच रही थी .

मीता का ऐसा रूप देख कर एक पल को मेरी रूह भी कांप गयी .दिलेर की सांसे कब की थम गयी थी पर मीता का गुस्सा नहीं थमा था , उसका पूरा चेहरा खून से सना हुआ था . कोई कमजोर दिल का उसे ऐसे हाल में देख लेता तो बेहोश हो जाता.

"इसके जीजा के पास भेज देना इसे " मीता ने हवालदार से कहा जिसने अपनी पेंट में मूता हुआ था . मीता ने मेरा हाथ पकड़ा और बाहर आई अचानक ही वो रुक गयी .

मैं- क्या हुआ

वो- रुक जरा .

मीता ने पुलिस जीप की टंकी उखाड़ ली और थाने में आग लगा दी.

"अब ठीक है " उसने कहा और पास की टंकी पर हाथ मुह धोने लगी. उसके बाद हम दोनों हमारी जमीन पर आ गए.

मीता- हुलिया ठीक कर ले तेरा.किसी को पता नहीं चलना चाहिए तुझे और चोट लगी है ,

मैं- तुझे वहां नहीं आना चाहिए था . तू दुनिया की नजरो में आ जाएगी. मेरा तो जो होगा वो होगा पर अब मुझे तेरी चिंता भी लगी रहेगी.

मीता- किसकी मजाल जो मेरी तरफ आँख उठा कर देखे.

मैं- पर तुझे कैसे मालूम हुआ की मुझे दिलेर थाने ले गया है .

मीता- तुझे तो मालूम ही है की मेरा चाचा हॉस्पिटल में दाखिल है , मैं उसकी दवाई लेने जिस दूकान पर गयी थी वो थाने के पास ही है, वहीँ पर चाय की दूकान पर दो सिपाही बात कर रहे थे की थानेदार ऐसे ऐसे किसी को उठा कर लाया है और मैं समझ गयी .

मैं- पर तुझे मेरी मुसीबत अपने सर नहीं लेनी चाहिए थी .

मीता- दोस्ती की है तुझसे, निभानी तो पड़ेगी . चल अब थोड़ी देर आराम हो जाये.

मीता ने बिस्तर लगाया और कुछ देर के लिए हमने आँखे मूँद ली. सुबह चाय की चुस्कियो के साथ मैंने मीता को बताया की कैसे मैं फौज में मालूमात करने गया था और वहां से मुझे क्या जानकारी मिली. मेरी बात सुनकर मीता भी हैरान हो गयी .

मीता- अब क्या करेगा तू .

मैं- तू ही बता क्या करू.

मीता- समस्या अब गहरी हो गयी है.

मैं- हर रास्ता थोड़ी दूर जाकर बंद हो जाता है.

मीता- अभी मुझे जाना होगा. वापिस आउंगी तो हम कुछ अनुमान लगायेंगे

मीता के जाने के बाद मैं भी घर की तरफ चल दिया. पर रस्ते में ताई मिल गयी मुझे

ताई- मैं तुझे ही तलाश रही थी कहाँ था तू

मैं- बस यही था क्या हुआ


ताई ने फिर जो मुझे बताया मेरा दिमाग ही घूम गया
 
#44

"चाचा ऐसा कैसे कर सकता है " मैंने ताई से पूछा

ताई- मैं भला तुझसे झूठ क्यों बोलूंगी.

मैं- ये बात और किस किस को मालूम है

ताई- औरो का तो मुझे मालूम नहीं पर मुझे और तुझे तो मालूम है ही

मैं- रीना को पता चलेगा तो उसे कैसा लगेगा .

ताई - नहीं पता चलना चाहिए

मैं- ये जिन्दगी साली मुझे ऐसे जकड़ रही है जैसे सांप अपने शिकार को , रीना तो टूट ही जाएगी जब उसे मालूम होगा की उसकी मम्मी और चाचा के बीच नाजायज रिश्ता है .

ताई- और ये रिश्ता कोई नया नहीं है जिस तरह से उनकी बाते, हाव भाव थी मुझे लगता है इश्क पुराना है .

मैं- उनकी जिन्दगी है वो जैसे मर्जी जिए उनको अधिकार है बस रीना की जिन्दगी पर असर नहीं पड़ना चाहिए.

रोज़ एक नयी हकीकत से मेरा सामना होता था, पर मैं इतना जरुर जान गया था की इन्सान के लिए किसी रिश्ते की सबसे ज्यादा अहमियत अगर है तो वो है जिस्मो के रिश्ते की .

ताई- कहाँ खो गया तू

मैं- कही नहीं , बस थोड़ी देर सोना चाहता हूँ

घर आने के बाद मैं सो गया , जागा तो बदन में बुखार सा था और रात हो गयी थी . मैंने उठ कर एक दो गोली ली और घर से बाहर आया . रात भीगी हुई थी और मैं जल रहा था . मेरे दिमाग में बस एक ही बात घूम रही थी और उसका जवाब पाने के लिए मैंने वो करने का सोचा जो बहुत खतरनाक था .पर कभी कभी बड़ी कामयाबी के लिए बड़ा रिस्क लेना पड़ता है .

और वो बड़ा रिस्क था सुनार का अपहरण, क्योंकि वो उस धागे के रहस्य को जानता था . वो ही था जो मेरी उलझन सुलझा सकता था . लठ के जोर पर उसे उठाना न मुमकिन था . और चूँकि उसका इलाज चल रहा था इसलिए वो घर से बाहर निकलता नहीं था . कैसे किया जाये ये काम सोचते सोचते मैं चबूतरे पर लेट गया . मुझे दो बाते परेशां कर रही थी एक तो संध्या चाची की पीठ के वो निशान दूसरा उस धागे का मामूली नहीं होना.

जब्बर अभी तक शांत बैठा था , मुझसे हुए पंगे के बाद वो सुनार से नहीं मिला था और ना ही सुनार अपने घर से बाहर निकल रहा था .दो तीन दिन मैंने गुज़ार दिए योजना बनाने के लिए की कैसे सुनार को उठाया जाये पर बात बन नहीं रही थी . मुझे अब खुद पर गुस्सा आने लगा था .

उस दिन मैं मंदिर की सीढियों पर बैठा इसी उधेड़बुन में उलझा था की मैंने सुनार की बीवी को मंदिर में आते देखा. वो मुझे देख कर मुस्कुराई. मैं भी मुस्कुरा दिया.

"और कैसे हो " उसने पूछा मुझसे.

मैं- सच कहूँ तो हालात ठीक नहीं है , ऊपर से तुम्हारे पति ने जीना मुश्किल किया हुआ है

काकी- उसमे नया क्या है, सारे गाँव की यही शिकायत है , एक तुम्हारी और सही

मैं- तुम समझाती क्यों नहीं उसे

काकी- जो खुद से बेगाने हो जाते है फिर वो ऐसे ही हो जाते है .तुम बताओ तुम्हारा क्या झगडा है उनसे

मैं- मेरे चाचा ने तुमको नहीं बताया क्या

काकी- भला वो क्यों बताने लगा मुझे

मैं- तो इतनी रात को शमशान के पार तुम क्या करने गयी थी उसके साथ

काकी के चेहरे के भाव बदल गए एकदम से

काकी- बड़े तेज हो तुम ,

मैं- क्या करे. सबके चेहरे पर नकाब है हम ही नंगे है बस , तो कब से चल रहा है ये चक्कर तुम्हारा

काकी- कोई चक्कर नहीं है बस एक डोर है जो हम दोनों को जोडती है

मैं- कितना आसान है न इन बातो को छिपाना

काकी- तेरी मर्जी है जो समझ,

मैं- लाला के सीने में ऐसा कौन सा राज दफ़न है ये बताओ मुझे

काकी- तुम्हे क्या लगता है

मैं- मुझे लगता है की लाला मुझसे कोई सौदा करना चाहता है

काकी- उसे खजाने की तलाश है ,

मैं- किस खजाने की तलाश है उसे

काकी- तुम इतने नादाँ भी नहीं

मैं- नादाँ तो तुम भी नहीं जो चाचा के साथ सेट हुई पड़ी हो .

काकी- तेरे चाचा से ही पूछ लेना तसल्ली से बता देगा वो

मैं- क्या वो तुमसे प्यार करता है

काकी- इस दुनिया में कोई किसी से प्यार नहीं करता, सब के अपने अपने मतलब होते है .

मैं- तुम्हारा और चाचा का क्या मतलब है फिर

काकी- उसका अहसान है मुझ पर

मैं- कैसा अहसान

काकी- बता दिया तो अहसान, अहसान कहाँ रहेगा फिर . पर मैं तुझसे इतना कहूँगी की तू इन सब से दूर रहना मेरे पति की जिन्दगी गुजर गयी उस चीज के पीछे भागते भागते जो कभी मिल नहीं सकती . तू भी मत भागना उसके पीछे

मैं- किसके पीछे

काकी- अंधेरो के

इतना कह कर वो ऊपर मंदिर में चली गयी. मैं सीढियों पर ही रह गया . मुझे कोई ऐसा चाहिए था जो चाचा की जासूसी कर सके. मेरे लिए चाचा की असलियत तलाश करना अब जरुरी था. सुनार की बीवी और रीना की माँ दोनों को फ़साये हुए था वो. जितना भोला वो दीखता था उतना था नहीं .

अँधेरा घिरने लगा था घर जाने की बजाय मैं खेतो की तरफ चला गया . चारपाई बिछाई और ठंडी हवा को महसूस करते हुए मैं लेट गया . मध्दम चलती पवन लहराते हुए पेड़ , क्या खूब नजारा था .

"आराम करने के बजाय तुझे अब मेहनत करने के बारे में सोचना चाहिए " ये मीता थी जो अपना झोला खूँटी पर लटका रही थी .

मैं- कल से पक्का

मीता- ये सावन बड़ी जोर से बरस रहा है इस बार , किस्मत मेहरबान है तुझ पर , आगे तेरी मर्जी . मेहनत के पसीने से सींच दे इस धरा को , इसकी प्यास तेरा पसीना ही बुझाएगा.

मैं- जो हुकुम सरकार.

मीता- संध्या आजकल रुद्रपुर के बहुत चक्कर लगा रही है

मैं- किस से मिलती है वो

मीता- किसी से भी नहीं

मैं- किसी से भी नहीं

मीता- हाँ किसी से भी नहीं, घंटो बैठी रहती है , न जाने किसे ताकती है वो

मैं- पर वो तो कह रही थी की सोलह साल से वो रुद्रपुर नहीं गयी .

मीता- सच है ये भी पर आजकल वो बस शिवाले में बैठी रहती है

मैं- ये शिवाला न हुआ जी का जंजाल हो गया .

मीता- खाना खायेगा

मैं- भूख नहीं है

मीता- तेरी मर्जी , चल थोडा परे सरक .पैर दुःख रहे है मेरे जरा कमर सीढ़ी कर लू

मैं थोडा सा सरका . वो मेरे पास लेट गयी. आज से पहले वो मेरे इतना पास कभी नहीं आई थी . उसके बदन की खुसबू मेरे जिस्म में समाने लगी.

मैं- बता कुछ अपने बारे में

मीता- क्या बताऊ, तुझसे क्या छिपा है

मैं- मैं मीता के बारे में नहीं मितलेस ठकुराईन के बारे में जानना चाहता हूँ

मीता-मितलेस वो दास्ताँ है जिसे भुला दिया गया.
 
#45


"तो दुनिया को याद दिलाते है एक भूली हुई कहानी को " मैंने मीता के हाथ को अपने हाथ में लेते हुए कहा .

मीता- कोई जरुरत नहीं है, वैसे भी दुनिया को अंधेरो से ज्यादा उजाले अच्छे लगते है .

मैं- पर दुनिया कहाँ जानती है अंधेरो की कहानिया.

मीता- तू साथ है ये भला कम है मेरे लिए

मैं - पर तेरी आँखों का सूनापन विचलित करता है मुझे, तेरी वो हसरत जिसे सबसे छुपाया है तूने मैं जानना चाहता हूँ . मैं अपनी मीता को पहचानना चाहता हूँ

मीता- तेरी मीता तेरे सामने है कर ले जो तहकीकात करनी है

मैंने उसका हाथ अपने सीने पर रखा और बोला- काश कुछ ऐसा इंतजाम हो जाये, जुबान पे बस तेरा नाम हो जाये.

मीता- ये दोस्ती बस दोस्ती तक ही रहे तो ठीक है, इसे आशिकी में मत बदल. आशिकी इम्तिहान लेती है .

मैं- तू डरती है क्या दुनिया से , इन फसानो से

मीता- मैं खुद से डरती हूँ .

मैं- तू चाहे लाख इंकार कर पर तेरा मेरा मिलना तकदीरो में लिखा था .

मीता- तेरी तक़दीर में क्या लिखा है मैं बता चुकी हूँ तुझे

मैं- तो क्या तू भी छोड़ जाएगी मुझे

मीता- तू जाने तेरा भाग्य जाने.

उसने दूसरी तरफ करवट ली और सो गयी. मैंने उसके पेट पर हाथ रखा और आँखे बंद कर ली. अगले दिन सुबह से दोपहर तक मैंने जमीन समतल करने के लिए खूब काम किया. पसीने से लथपथ , थकन से चूर पर मुझे ये करना ही था क्योंकि मुझे यही रहना था इसे ही घर बनाना था . पसलियों का दर्द जब काबू से बाहर हो गया तो मैं पानी की होदी में उतर गया . थोडा सकून सा मिला मुझे. पर दिल में एक आग जल रही थी .

मैंने इतना तो समझ लिया था की चाची, ताई और चाचा इन तीनो में से मैं किसी पर भी भरोसा नहीं कर सकता था . ये तीनो ही गुरु घंटाल थे. चाचा दो औरतो को पटाये हुए था, ताई न जाने किन किन का लंड ले चुकी थी और चाची अपने आप में उलझी थी. क्या ये मुमकिन था की ये तीनो मुझे चारे की तरह इस्तेमाल कर रहे थे, कितनी आसानी से ताई ने अपनी चूत मरवा ली थी मुझसे, क्या वो किसी के इशारे पर कर रही थी ये सब.

कहीं न कहीं ये ख़ामोशी मुझसे कह रही थी की कोई तूफ़ान आने वाला है . मेरा कमजोर दिल घबरा रहा था. दिलेर को मारने के बाद भी जब्बर की ख़ामोशी मुझे बेचैन कर रही थी . सुनार भी बहन का लोडा घर से नहीं निकल रहा था . खेतो से निकल कर मैं सीधा बैंक में गया और लाकर को दुबारा खोला.

मुझे उम्मीद थी की गहनों की गहन जांच करनी चाहिए, क्या मालूम मुझसे कुछ छूट गया हो. कहीं न कहीं मुझे महसूस होता था की ये शिवाले के श्रृंगार का लूटा हुआ हिस्सा है . और अगर ये सच था तो अर्जुन सिंह को इस पाप के लिए सजा मिलनी ही चाहिए थी. मैं समझ नही पा रहा था की मुझे अपने बाप से नफरत है ये आदर . सब कुछ छान मारा पर कुछ नहीं मिला. हताशा से भरा हुआ मैं घर की तरफ लौटा.

मैंने देखा की एक चमचमाती गाडी,हमारे घर से निकली .उसमे एक लड़का बैठा था , मेरी ही उम्र का या फिर मुझसे थोडा बड़ा. हमारी नजरे आपस में मिली , उसने मुझे मैंने उसे देखा और फिर उसने गाडी आगे बढ़ा दी. दरवाजे पर खड़ी संध्या चाची उसे जाते हुए देखती रही जब तक की गाडी नजरो से ओझल नहीं हो गयी.

"कौन था वो " मैंने चाची से पूछा

चाची- मेरा भतीजा पृथ्वी .

मैं- पहले कभी देखा नहीं उसे,

चाची- कुछ महीने पहले ही विलायत से आया है

मैं- तो सोलह साल बाद संध्या ने दुबारा से पीहर वालो से रिश्ता जोड़ ही लिया

चाची ने घूर कर देखा मुझे और बोली- उसकी बुआ हूँ मैं उसका हक़ है मुझसे मिलना .

मैं- हक़ तो तुम्हारा भी है जो आजकल रोज ही रुद्रपुर के चक्कर लगये जा रहे है . मुझे समझ नहीं आता फिर ये झूठ का ड्रामा किसलिए करती हो.

चाची- कोई ड्रामा नहीं है

मैं- तो फिर ऐसी क्या वजह हो गयी जो अचानक से ही पीहर से इतनी मोहब्बत हो गयी तुम्हारी, क्या है उस शिवाले में और अब ये पृथ्वी जो पहले कभी नहीं आया अब अचानक से बुआ की याद आ गयी .

चाची- रक्षा बंधन आने वाला है वो चाहता है की मैं राखी बाँधने जाऊ

उफ़ ये रिश्ते नाते , ये बंधन मैं चाह कर भी चाची से इस मामले में कुछ नहीं कह सकता था ये बुआ और भतीजे के हक़ की बात थी. और कहने को तो ये धागा था पर इसकी कीमत बहुत बड़ी थी .

मैं- तुम्हे जाना चाहिए चाची,

चाची के होंठो पर एक फीकी मुस्कराहट आई और वो बोली- मैंने पृथ्वी को मना कर दिया है , मैं जीते जी उस घर में अपने पैर नहीं रखूंगी जिसे मैं ज़माने पहले छोड़ आई.

मैं- मेरी बुआ या बहन होती तो मुझे भी चाव होता इस दिन का . मेरी कलाई भी राखी से भरी होती.

मैंने अपनी कलाई देखते हुए कहा. दरसल ये वो पल था जिसमे भावनाए जोर तो मार रही थी पर उन्हें दबाये रखा था .

"मैं जानता हूँ तुम्हारे मन को. सोलह साल पहले न जाने क्या परिस्तिथिया रही होंगी जो तुमने ये निर्णय लिया पर मैं जानता हूँ अपनों की यादे जब आती है तो दिल पर क्या बीत ती है. मैंने तो बचपन में ही अपने माँ-बाप को खो दिया . तुम्हारा भतीजा आया है और फिर एक मामूली धागे की ही तो बात है न , कितनी तीज-त्यौहार, होली-दिवाली गयी मैंने दुनिया को देखा खुश होते हुए, काश मेरी माँ होती तो मैं भी "

"मैं भी तेरी माँ ही " चाची ने अपनी बात अधूरी छोड़ी और मुझे अपने सीने से लगा लिया. ना जाने क्यों मेरे आंशुओ से उसके आँचल को भिगो दिया. ये वो लम्हा था जिसमे मैं टूट गया था . मैंने कभी कहा नहीं था पर जिन्दगी के हर कदम पर मुझे माँ बाप की कितनी कमी महसूस होती थी बस मैं ही जानता था.

"कभी भी ये मत सोचना की तेरा कोई नहीं है , बल्कि तू तो खुशनसीब है तेरे पास तो दो दो माँ है " ताई ने मेरे पास आते हुए कहा.

मैं चाची से अलग हुआ.

ताई- और हम सब को विश्वास है अर्जुन एक न एक दिन जरुर लौट आएगा.

ताई ने मेरे माथे को चूमा. सालो से सीने में दबे दर्द को मैंने आंसू बन कर बहने दिया.
 
#46

दोपहर बाद खेत में जमीन को खोदते हुए मेरे दिमाग में बस ये ही चल रहा था की पृथ्वी का अचानक संध्या चाची से मिलने आना, केवल बुआ-भतीजे का स्नेह नहीं हो सकता. बरसों से टूटी हुई रिश्तेदारी को अचानक से दुबारा जोड़ने की कोशिश में स्वार्थ न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता. हो सकता था की ये बस मेरी कल्पना हो पर दिल गवाही नहीं दे रहा था.

कुदाल छोड़ कर मैंने जमीन का एक चक्कर लगाया और बावड़ी की तरफ जा निकला. मैंने बावड़ी की रहबरी पर पीठ लगाई और लेट गया. पसलियों में दर्द सा हो रहा था , सारे जख्म भर गए थे पर ये दर्द जा ही नहीं रहा था . मैंने एक नजर आसमान पर डाली, जिसमे काली घटाए लहरा रही थी . अच्छा ही था जो बारिश हो जाती. मुझे नहाने का भी मन था . मैंने शर्ट उतारी और बावड़ी में कूदने ही जा रहा था की ,

मैंने एक गाडी मेरी तरफ आते देखि तो मैं रुक गया. गाड़ी मेरे से थोड़ी दुरी पर रुक गयी और गाड़ी से उतरा जब्बर .

"ये साला इधर क्यों आया " मैंने सोचा .

जब्बर मेरे पास आया .

मैं- मेरे दर पर कैसे

जब्बर- तुझे एक आखिरी बार समझाने आया हूँ की बुझे हुए तंदूर के शोलो को मत सुलगा वर्ना उसी तंदूर में भुना जायेगा तू.

मैं- ये फ़िल्मी डायलोग तेरे. मेरे कान पक गए है

जब्बर- मैं जानता हूँ दिलेर को तूने मारा है

मैं- तो फिर ये भी जानता होगा की क्यों मारा उसे

जब्बर- जानता हूँ, इसीलिए थाने के मामले को दबा दिया मैंने ताकि तुझे भी जला सकू. चाहू तो तुझे एक मिनट में मसल दू, पर नहीं तुझे तडपाना है , इतना की तू खुद भीख मांगे मौत की . उस रात चौपाल पर मैंने सब्र का घूँट इसलिए पी लिया की बरसो बाद एक काबिल दुश्मन मिला है , और दुश्मनी का मजा झटके में नहीं हलाल में है . तुझे झटके में मारने में वो मजा कहाँ , मैं तलाश कर रहा हूँ उसको जो थाने में तेरे साथ थी,

मैं- मैंने तुझसे कहा था दुश्मनी तेरे मेरे बीच है , पर अगर तेरी यही इच्छा है तो ये भी कर के देख ले तू. पर इतना याद रखना परिवार तो तेरा भी है , मेरे किसी भी चाहने वाले के एक खरोंच भी आई तो तेरे परिवार का ख्याल कर लेना तू पर मैं तुझे माफ़ कर सकता हूँ अगर तू मुझे ये बता दे की उस सुनहरे बक्से का क्या झोल है

जब्बर - तू बस इतना समझ ले वो किसी की अमानत है और वो अपने आप तलाश लेगी उसे.

मैं- उस धागे में ऐसा क्या खास है .

जब्बर- अगर तू पैर पकड़ कर गिदगिड़ाये , तो मैं शायद तुझे बता भी दू.

मैं- पैर तो तू मेरे पकड़ेगा, जिस दिन मैं अपनी जमीन छुड़ाने आऊंगा .

जब्बर- तेरी ये बेबाकी, ये गुस्ताखियाँ तेरी मौत बनेगी जब तू मरेगा तो तुझे आभास होगा की जिन्दगी का मोल क्या होता है .

मैं- मौत तो आनी जानी है ,

जब्बर- बस देखना है तेरी कब आएगी.

मैं- बता भी दे, कुछ तो बात है वर्ना सोलह साल तक तूने और सुनार ने चुतड लाल नहीं करवाए उस बक्से के पीछे . . चल एक सौदा करते है तू मुझे बता ये राज और मैं तुझे सोना दूंगा.

जब्बर- गांड में डाल ले अपने सोने को . अगर तू उस लड़की को मुझे सौंप दे तो मैं कुछ कहूँ इस बारे में

जब्बर की बात सुन कर मुझे गुस्सा आ गया - जुबान संभाल कर बोल जब्बर, खींच दी जायेगी ये जुबान.

जब्बर- सौदे की शर्त यही रहेगी, मुझे वो लड़की ला दे, मैं तुझे सब कुछ बता दूंगा.

मैं- वो लड़की मेरी सरपरस्ती में है जब्बर. तू भूलना मत इस बात को . इस वक्त तू मेरी जमीन पर खड़ा है और मैं इसे गन्दी नहीं करना चता वर्ना इस गुस्ताखी के लिए तेरा सर काट देता मैं.

जब्बर- मेरा वादा है तेरी इसी जमीन पर दिलेर की मौत का बदला लिया जायेगा.

मैं- इंतजार रहेगा उस दिन का

जब्बर ने सर हिलाया और अपनी जीप की तरफ चल पड़ा. मेरे आसपास एक बिसात बिछाई जा रही थी , एक साजिश रची जा रही थी कौन अपना था कौन पराया ये कहना मुश्किल था . पर जब्बर की धमकी से मैं थोडा विचलित हो गया था , रीना के साथ हुई घटना ने मुझे झकझोर दिया था. मीता की सुरक्षा के लिए मुझे कुछ न कुछ करना ही था . सोचते सोचते मैं घर आया तब तक बारिश शुरू हो गयी थी.

हल्का सा भीगते हुए मैं चोबारे में गया तो देखा की चाची खिड़की के पास कुर्सी डाले बैठी थी और उसके हाथ में वो सुनहरा बक्सा था . जिस पर वो उंगलिया फेर रही थी .

"ये मेरा है " मैंने चाची से कहा

चाची- झूठ , ये तुम्हारा नहीं है ,

मैं- तुम इस पर अपना अधिकार नहीं जाता सकती , मुझे वापिस दो ये

चाची- मैंने कब कहा ये मेरा है , मैंने कहा की ये तुम्हारा नहीं है

मैं- तो बताओ किसका है ये

चाची-ये तो तुम्हे बताना चाहिए मुझे, इतना महंगा सोने का बक्सा तुम्हारे पास कहाँ से आया, क्या तुमने चोरी की है .

मैं थोडा विचलित हो गया , एक पल को मुझे लगा की वो जानती है उसके बारे में

मैं- ये मुझे जंगल में पड़ा मिला था . मैं इसे यहाँ ले आया. तुम इसे वापिस वही रख दो जहाँ से इसे लिया था .

चाची कुछ कहती इस से पहले ही मेरे सीने के निचे मरोड़ शुरू हो गई . मैं दर्द से दोहरा हो गया . और बिस्तर पर गिर पड़ा.

चाची- क्या हुआ मनीष

मैं- दर्द, मेरी पसलिया फट रही है.

मैंने पसलियों पर हाथ रख लिया और दर्द को सहने की कोशिश करने लगा पर वो अचानक से इतना बढ़ गया था , की आँखों में आंसू निकलने लगे .

चाची-- मुझे देखने दे

चाची ने मेरी शर्ट के बटन खोले और मेरे जख्म को देखा जिसमे से खून रिसने लगा था .

चाची- टांका फट गया है, क्या किया था तुमने

मैं- कुछ नहीं किया आह्ह्ह्ह मैं मरा

चाची ने टेबल से रुई उठाई और जख्म पर रखते हुए बोली- दबा के रख इसे मैं वैध को बुला कर लाती हूँ .

चाची दौड़ पड़ी निचे को और मैं तड़पने लगा. ये जख्म अचानक से कैसे खुल गया था . इसी बीच मैं बिस्तर से निचे गिर पड़ा. मैं टेबल का सहारा लेकर उठ ही रहा था की खून से सने मेरे हाथ उस बक्से पर पड़े और वो जलने लगा. मुझे हैरत हुई पर मेरी हालत उस हैरत पर भारी पड़ रही थी .

"मनीष क्या हुआ तुझे " मैंने देखा चीखते हुए रीना मेरे पास दौड़ते हुए आई और मुझे आगोश में भर लिया. मैं रीना की बाँहों में था और मेरे हाथ में वो जलता हुआ बक्सा जैसे ही मेरा हाथ रीना के बदन से टकराया धप्प की आवाज हुई और हम दोनों के बदन रेत से नहा गए.
 
#47

"क्या था ये " रीना ने अपने कपडे झाड़ते हुए कहा

मैं- जल्दी ही जान जाएगी तू

मैंने अपने जख्म पर रीना की चुन्नी को बाँध लिया पर दर्द बढ़ते ही जा रहा था. तभी चाची बैध को ले आई उसने तुरंत अपनी कार्यवाही की और जख्म को साफ़ करके सिल दिया.

"कच्चे जख्मो संग जोर आजमाइश नहीं करना चाहिए, ये तो शुक्र की अन्दर मवाद नहीं पड़ी वर्ना परेशानी की बात होती , और ये दवाई दे रहा हूँ दर्द से राहत मिलेगी. " वैध ने कहा .

"ये रेत कैसे फैली यहाँ पर " चाची ने कहा

मैं- बाद में बताता हूँ

चाची ने वैध को पैसे दिए और छोड़ने चली गयी . रह गए हम दोनों . रीना ने सारी रेत को परात में डाला और बाहर फेंक आई . मैंने थोडा पानी पिया और लेट गया . थोड़ी देर बाद वो भी आ गयी .

रीना- मैं जो पुछू सच सच बताना तू

मैं- तुझसे कभी कुछ छिपाया है क्या

रीना- ये क्या चक्कर है , ये रेत कैसे निकली उस बक्से से .

मैं- नहीं जानता पर मालूम कर लूँगा.

रीना-जब से मैं रुदृपुर के मेले से लौटी हूँ ऐसा लगता है की जैसे मैं मैं नहीं रही

मैं- तुझे सदमा लगा है , थोड़े दिन में असर कम हो जायेगा

रीना- वो बात नहीं है

मैं- तो क्या बात है .

रीना- मुझे हर पल ये डर रहता है की तुझे कुछ हो न जाये, जिन लोगो से तूने दुश्मनी ली है वो बहुत खतरनाक है तुझे कुछ हो गया तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाउंगी.

मैं- पगली, ऐसा क्यों सोचती है तू . जब तक तेरी दुआए मेरे साथ है इस दुनियाको जुती की नोक पर रखु मैं.

रीना- तुझे जब दर्द में तडपते देखती हूँ तो मेरा दिल रोता है

मैं- नादान है तेरा दिल .

बाते करते करते न जाने कब मुझ पर दवाई का असर हो गया और मैं नींद के आगोश में चला गया . पर जब आँख खुली तो मैंने देखा रीना कुर्सी पर बैठे बैठे ही सो रही थी . मैंने उसके गले में झूलते हुए हीरे को देखा जिसमे अब सुनहरा और चांदी का रंग आपस में घुल गया था . उत्सुकता के कारण मैंने उसे छूना चाहा और मुझे ऐसा तेज झटका लगा की मैंने किसी बिजली के नंगे तार को छू लिया हो.

आखिर ऐसी क्या बात थी जो ये रीना से इतना घुलमिल गया था . इसने मुझे नहीं स्वीकार किया था और उस मासूम के गले में शान से पड़ा था . ये बात मुझे बहुत खाए जा रही थी अन्दर ही अंदर. सुबह मैं चाची के साथ बैठा था ,चाची और मेरे बीच एक ख़ामोशी थी पर हम दोनों जानते थे की हमें एक दुसरे से क्या अपेक्षा थी .

चाची- प्रथ्वी चाहता है की मैं राखी बाँधने रुद्रपुर आऊ

मैं- ये तुम्हारा निजी मामला है बुआ-भतीजे को जो ठीक लगे वो करे.

चाची-मैं बरसों पहले उस बंधन को तोड़ चुकी

मैं- तो मुझसे क्यों पूछती हो. वैसे मेरी दिलचस्पी ये जानने में जरुर है की तुमने अपने पीहर से नाता क्यों तोडा .

चाची- अतीत में झाँकने का क्या फायदा

मैं- तो फिर भविष्य का हाथ थाम लो. तुम्हारे भतीजे से बुलाया है तो तुम्हे जाना चाहिए

चाची- तुम चलोगे मेरे साथ

मैं- तुम जानती हो मेरा वहां जाना माहौल में तल्खी पैदा कर देगा.

चाची- तल्खी तो मेरे साथ भी रहेगी

मैं- ठीक है मैं चलूँगा पर अगर तुम मुझे ये बताओगी की तुमने पीहर से नाता क्यों तोडा

चाची- ठीक है , पर वापसी में

मैं- मंजूर.

चाची- तो तुम्हारी तलाश कहाँ तक पहुंची

मैं- कहीं तक नहीं , पर मैं अपने पिता को जरुर तलाश कर लूँगा.

चाची- मुझे उम्मीद है

मैं- मुझे नहीं पता तुमसे ये बात कहनी चाहिए या नहीं पर मुझे लगता है की चाचा तुमको धोखा दे रहा है .

चाची- और तुम्हे ऐसा क्यों लगता है

मैं- बस ऐसे ही

चाची- तो फिर इस ख्याल को दिल से निकाल दो

मैं- तुम जानो . मैं चला बाहर

चाची- जख्म हरा है तुम्हारा, आराम करो

मैं- किसे परवाह है

मैं सीधा ताई के घर गया और जाकर उसे अपनी बाँहों में भर लिया

ताई- क्या बात है

मैं- बस तुम्हे प्यार करने का दिल कर रहा है

ताई- ये झूठी बातो से न बहला मुझे

मैं- मुझ पर शक कर रही हो

ताई- मैं देख रही हूँ आजकल मेरी तारफ ध्यान नहीं है तेरा.

मैं- ये बनावटी बाते क्यों करती हो हम दोनों जानते है इनका कोई मोल नहीं

मैंने ताई के चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया और ताई के गुलाबी होंठो को चूमने लगा. एक बेहतरीन किस के बाद मैंने ताई को छोड़ दिया.

मैं- मुझे एक बात खटक रही है की चाची के पीहर वाले इतनी सालो बाद उस पर मेहरबान क्यों हो रहे है

ताई- बात तो मुझे भी खटक रही है पर क्या कहूँ

मैं-आज लेने का मन है मेरा

ताई- जब तेरी हालत बिलकुल ठीक हो जाएगी तब करुँगी तेरी मनचाही

मैं- बस एक बार करने दो

ताई- नहीं, बिलकुल नहीं

मैं- ताई, एक बात पूछना चाहता हूँ सच बताएगी न

ताई- तुझसे कभी कुछ छुपाया है मैंने

मैं- ताऊ ने तुझे किसके साथ देखा था जो तुझसे इतना दूर हो गया .

ताई- हमारा वो मसला नहीं है

मैं- इतना नादाँ मैं भी नहीं जो समझ ना सकू , मैं कोशिश कर रहा हूँ की ताऊ तुझे फिर से अपनाले और तुम दोनों एक हो जाओ. मेरा थोडा तो साथ दे.

ताई- तो फिर हमें जैसे है वैसे ही रहने दे. गड़े मुर्दे उखड़े तो कुछ हासिल नहीं होगा सिवाय दुर्गन्ध के.

मैंने ताई पर ज्यादा जोर नहीं दिया . शाम ढले मैं अपनी जमीन की तरफ चल दिया. दिन में बारिश हुई थी तो अँधेरा थोडा जल्दी हो गया था . जब मैं वहां पहुंचा तो देखा की एक आदमी मेरी जमीन पर इधर उधर घूम रहा था फिर वो बैठ गया .

"कौन है वहां , क्या कर रहे हो तुम मेरी जमीन पर " मैंने चिल्ला कर पूछा. जब से जब्बर के आदमी की लाश इधर मिली थी , तब से मैं अतिरिक्त सावधान हो गया था .

"कौन हो तुम और यहाँ क्या कर रहे हो " मैंने उसके पास जाकर पूछा.
 
#48


"इधर से गुजर रहा था, पानी की हौदी देखि तो सोचा प्यास बुझाता चलू, ठंडी पवन चल रही थी दो घडी बैठ गया सुस्ताने को " उसने कहा

मैं- पहले कभी देखा नहीं इस तरफ

आदमी- व्यापारी आदमी हूँ,एक गाँव से दुसरे गाँव घूमता फिरता रहता हूँ.

मैं- किस चीज़ का व्यापर करते हो तुम

आदमी- किसानी का काम है मेरा जमीने जोतता हूँ .

मुझे ये था की कहीं ये जब्बर का आदमी तो नहीं , क्योंकि आजकल अंजानो पर भरोसा करना उचित नहीं था खासकर इन हालातो में. मैं उस से खोद खोद कर पूछ रहा था .

"मैं भी कोशिश कर रहा हूँ इस जमीन को उपजाऊ बनाने की पर बंजर जमीन जिद पर अड़ गयी है . रोज़ मेहनत करता हूँ पर फायदा नहीं होता " मैंने कहा

आदमी- जमीन बुजुर्गो सी होती है, उन्हें मानना पड़ता है .

मैं- तुम्हे तो बड़ा अनुभव रहा होगा किसानी का तुम देखो जरा

मेरे इशारे पर वो आदमी खड़ा हुआ और उस जगह जाकर खड़ा हो गया जहाँ पर मैंने खुदाई चालू की थी. मिटटी के ढेलो को उसने अपने हाथो में लिया और देखने लगा . कुछ देर बाद वो मेरे पास आ गया.

आदमी- काफी पुराणी पकड़ है मिटटी की. आसान नहीं है इसे उपजाऊ करना

मैं- ये तो मैं भी जानता हूँ नया बताओ कुछ .

आदमी- खूब भीगने को इस धरा को , उम्मीद का अंकुर जरुर फूटेगा. अच्छा मैं चलता हूँ देर हुई तो अपनी मंजिल पर नहीं पहुँच पाउँगा आपका आभार , आपका पानी पिया है , इश्वर की कृपा बनी रहे आप पर.

उसने मेरे सामने हाथ जोड़े और अपने रस्ते बढ़ गया . मैंने अपने कपडे उतारे और हौदी में कूद गया. बहती पवन संग नहाना बड़ा सुख दे रहा था . थोड़ी देर में मीता भी आ पहुंची.

मीता-वाह क्या बात है

मैं- बड़ा मजा आ रहा है इस मौसम में ठन्डे पानी का,

मीता- कहीं तबियत ख़राब ना हो जाये तेरी.

तबियत से मेरा ध्यान जख्म पर गया और मैं तुरंत पानी से बाहर निकल कर तौलिये से कच्चे टांको को साफ़ करने लगा.

मीता- क्या हुआ ये

मैंने उसे पूरी बात बताई

मीता- तुझे जिन्दगी से जरा भी प्यार नहीं है . हैं न

मैं- मैं क्या बताऊ तुझे क्या है मेरे हालत

मीता- सब को अपना दुःख कम ही लगता है .

मैं- चल बाबा माफ़ कर दे अब .

मीता- आजा फिर, आज मुर्गा बना कर लायी हूँ तेरे लिए

मैं- अरे गजब,

मीता- परोस दू

मैं- बैठते है थोड़ी देर. कितने दिन हुए बाते नहीं की हमने

मीता- हुन्म्म, कल परसों तो मिले ही थे हम लोग.

मैं- मेरा बस चले तो तुझे जाने ही ना दू. यही पर रख लू

मीता- ये मुमकिन नहीं तू भी जानता है

मैं- तू जाने तेरे सितारे जाने.

मैंने मीता के काँधे पर सर टिकाया और उसके हाथ को पकड़ लिया.

मैं- ये चाँद देख रही है न, तेरी मुलाकातों का गवाह है ये

मीता- कभी सोचा नहीं था तू मेरी जिन्दगी में आएगा. और ऐसे आएगा.

मैं- पर मैं हमेशा से चाहता था की कोई आये, कोई ऐसा जो मुझे, मुझसे ज्यादा समझे, कोई ऐसा आये जिसके साथ मैं दो कदम चल सकू. जब तू चूल्हे पर रोटी सेंकती है तो आग की तपिश में तुझे देखना मेरे लिए किसी कबूल हुई दुआ से कम नहीं है . तुझे दूर से आते हुए देखना ऐसा है जिसे की आसमान से गिरी बूँद को ताकती है ये धरती .

मीता- मैं इस तारीफ लायक नहीं

मैं- सच कहना कोई गुनाह तो नहीं .

मीता- सच उस झूठ से भी बड़ा रोचक और खतरनाक होता जिसे बार बार कहा गया हो

मैं- क्या तुझे मुझ पर यकीन नहीं

मीता- मुझे मेरे नसीब पर यकीन नहीं है, अब बाते कम कर आ खाना परोसती हूँ

मैं - तू भी आ साथ ही खाते है .

मीता ने एक ही थाली में खाना लगा दिया. चांदनी रात में हम दोनों एक दुसरे के साथ बस वक्त बिता ही नहीं रहे थे हम दोनों उस वक्त को जी रहे थे .

मैं- मेरी इच्छा है की मैं तुझे चुडिया ला दू

मीता- तेरी इच्छा है तू जाने

मैं- जल्दी ही घर बनाना शुरू करूँगा इधर, तू बता तुझे कैसा घर चाहिए.

मीता- तेरा घर तू जाने मुझसे क्या पूछता है

मैं- तेरे होने से ही तो घर , घर होगा मेरा. ,

मीता- मत कर ये सब , इन सपनो का कोई मिल नहीं मेरे दोस्त, जब ये सपने टूटते है तो फिर दर्द बड़ा होता है

मैं- जब तक तूने मुझे थामा हुआ है मुझे परवाह नहीं

मीता खामोश रही .

मैं- एक बात पुछू

मीता- हाँ

मैं- तेरे गाँव के शिवाले में उस पानी वाली रेत का क्या रहस्य है तू तो जानती ही होगी न

मीता-किस्सा है या कहानी है , लोग कहते है की एक प्यासे आदमी का श्राप है बरसो पहले वो बावड़ी हर आने जाने वाले की प्यास बुझाती थी , पर फिर उसका पानी छलावा हो गया . तुम हथेली भर के पियो और वो रेत हो जाता .

मैं- ये कोई किस्सा , कहानी नहीं सच है . और सच है तो इसकी कोई वजह भी रही होगी.

मीता- तुझे क्या दिलचस्पी है इन सब में

मैं- तेरे आने से पहले एक आदमी मिला था उसने कहा मुझसे की उसने मेरा पानी पिया है .

मीता ने हाथ में लिया रोटी का टुकड़ा वापिस थाली में रखा और बोली- हौदी में न जाने कितने आदमी, पशु पानी पीते है ये इत्तेफाक भी हो सकता है .

मैं- मुझे जो लगा तुझे बताया. पर मीता तू चाहे मुझसे छुपा पर मैं जानता हूँ तू और मैं एक ही सिक्के के दो पहलु है . मैं अपनी पीढ़ी के अतीत को तलाश कर रहा हूँ तू भी कुछ तलाश रही है .

मीता- तू मुझसे क्या जानना चाहता है

मैं- यही की तेरी मेरी कहानी का अंजाम क्या होगा

मीता- ये सवाल तो आगाज़ से पहले पूछना था .

मैं- मेरे दिल पर एक बोझ है मैं जोरावर और उन बाकि लडको के परिवारों के लिए कुछ करना चाहता हूँ, मेरी वजह से उन्होंने अपने बेटे खोये है . अगर मैं उनके लिए कुछ कर पाया तो .......

मीता- फालतू का बोझ है ये. उनको अपने कर्मो का फल मिला

मैं- पर उनके माँ बाप का क्या दोष

मीता- सब समय का चक्र है , नसीब में दुःख है तो भोगना पड़े. सुख है तो भी भोगना पड़े.

मैं- मेरे नसीब में क्या है

मीता- तू जानता है

मै- जानता ही तो नहीं

मीता- आज की रात मैं तेरे पास ही रुकुंगी, फिर मैं रक्षा बंधन के बाद ही आउंगी तुझसे मिलने

मैं- और इस दुरी की क्या वजह भला

मीता- बस ऐसे ही .

वो बर्तन धोने चली गयी मैं इधर उधर टहलने चला गया . मेरे वापिस आने तक मीता अपना काम निबटा चुकी थी .

"बिस्तर लगा ले और दो चादर रखना , आज की रात ठंडी होगी. मैं तब तक नहा कर आती हूँ " उसने कहा

मैं- ठीक है

मैं बिस्तर लगाने लगा, सोचा की वो नहाकर आये इतने लेट जाता हूँ पर कमर टिकाई ही थी चारपाई से की मीता की चीख ने मेरे कानो के परदे सुन्न कर दिए..................................
 
#49

मैं दौड़ कर मीता के पास गया और देखा की वो पानी की हौदी में खड़ी थी , पर हौदी में पानी की जगह रेत भरी हुई थी , और मीता के हाथ में एक छोटी हांडी थी जिस पर लाल कपडा बंधा हुआ था .

"रुक मैं मिटटी हटाता हूँ " मैंने उस से कहा और कस्सी ले आया. पर ये रात आज न जाने हमें क्या क्या दिखाने वाली थी . जैसे ही मैं रेत को कस्सी में भर से बाहर फेंकता वो पानी बन जाती . न मुझे कुछ न मीता को सूझ रहा था , मैंने जैसे ही उसके हाथ से वो हांडी ली , हौदी की रेत पानी में बदल गयी . और मीता हौदी से बाहर आ गयी .

"क्या हो रहा है ये " उखड़ी सांसो को दुरुर्स्त करते हुए उसने मुझसे पूछा .

मैं- तू ठीक है न

मीता- हाँ, जैसे ही मैंने हौदी में दुबकी लगाई मेरे हाथो से ये हांडी टकराई मैंने इसे ऊपर खींचा और पानी रेत बन गया .

दिमाग भन्ना गया था और कहने को कुछ नहीं था . पर फिर भी मैंने कहा.

"मीता ये जो कुछ भी हो रहा है , इसकी शुरुआत उस दिन से हुई जब मैं पहली बार शिवाले में गया था ,वहां के पानी का भी ऐसे ही रेत बनना ये सबूत है की इस जमीन और शिवाले का गहरा सम्बन्ध है और हमें हर हाल में ये मालूम करना होगा. " मैंने कहा

मीता- सही कहा तुमने

मैं- बस एक बार इस उलझी डोर का किनारा मेरे हाथ में आ जाये. पर अगर ये घटना तेरे साथ हुई है तो तू भी इस डोर में उलझी है मीता ,चल खोल कर देखते है इस हांडी को .

मीता कुछ कहती उस से पहले मैंने हांडी का लाल कपडा खोल दिया.

"भक्क " से हांडी से काला सा धुंआ निकला और हमने देखा की हांडी के अन्दर कुछ अस्थिया पड़ी थी, जिनकी हालत देख कर लगता था की वो बहुत ज्यादा ही पुरानी होंगी.

मीता- इसका क्या मतलब

मैं-कोई चाहता था की ये हमें मिले. एक मिनट वो आदमी , वो आदमी जो इधर था, वो आदमी जो इधर बैठा था शायद उसने ही ये माया रची हो. हमें तलाश करनी होगी उस आदमी की . वो हाथ लगा तो ये गुत्थी सुलझ जाएगी.

मीता- कहाँ तलाश करेंगे उसकी

मैं- यही, यही पर फिर आएगा वो . एक बार आया है तो बार बार आएगा हमें इंतजार करना होगा उसका.

मीता- मुझे लगता है की शिवाले में गहन तहकीकात करके देखे.

मैं- ये मुमकिन नहीं, मेरे रुद्रपुर जाते ही हंगामा हो जायेगा. और मैं कोई लफड़ा नहीं चाहता वहां पर

मीता- तू कहे तो रात को करे ये काम अस्थियो की हांडी अपशकुन है , मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा है

मैं- अपशकुन या फिर कुछ अधुरा

मीता- हम अभी के अभी शिवाले पर चलते है

मैं- अभी नहीं , मैं तेरे साथ वहां पर चलूँगा जरुर पर पहले मुझे एक जरुरी काम करना है . तू भी अब कपडे साफ़ कर ले, हौदी में फिर से पानी हो गया है, नहा ले .कब तक यूँ रेत में सनी रहेगी.

मीता नहाने लगी और मैं उस आदमी के बारे में सोचने लगा. और एक सवाल अब ये था की वो काली अस्थिया किसकी थी . उन्हें अब तक सुरक्षित रखने का क्या प्रयोजन था , और अगर वो सुरक्षित थी तो ऐसे हमें क्यों सौंपा गया .

मीता आकर चारपाई पर लेट गयी. मैं भी अपनी चारपाई पर लेट गया .

मैं- तेरे सितारे क्या कहते है

मीता- किस बारे में

मैं- हम दोनों के नसीब के बारे में

मीता- हम तीनो के बारे में क्यों नहीं पूछता तू , बात अब तेरी मेरी नहीं रही बात अब हम तीनो की है . इस उलझन को तू कैसे सुलझा पायेगा. क्या मालूम किसी दिन तू दोराहे पर खड़ा हो एक तरफ वो एक तरफ मैं हुई तो क्या करेगा तू . है कोई जवाब तेरे पास.

मैं-मेरे पास कोई जवाब नहीं है

मीता- तो मत कर ये सवाल. मैं तेरी दोस्त हूँ दोस्त ही रहने दे. दोस्ती उम्र भर रहेगी, मोहब्बत हुई तो दिल का दर्द सहना मुश्किल होगा.

मैं- बड़ी सायानी है तू तो .

मीता- क्या करे साहिब, ये फ़साने बड़े अजीब है जिन्दगी के , इन अंधेरो में न जाने कब तुमसे मुलाकात हो गयी , होते ही गयी.कुछ मेरी तन्हाई कुछ तेरी दोनों को इतने पास ले आई की अब मुड़ना मुश्किल है , तू तेरे सितारों से सवाल करता है , मैं मेरे सितारों से जवाब मांगती हूँ . वैसे तू बता तो सही किसी दिन रीना और मुझमे से एक को चुनेगा तो तेरी पसंद क्या होगी.

मैं- मेरे लिए तुम दोनों ही एक सामान हो . मेरा हिस्सा हो और अपने हिस्से से पसंद - नापसंद नहीं होती. एक मेरे दिन का उजाला है एक मेरी रातो का जलता दिया मैं चाहूँगा वो दिन कभी न आये.

मीता- ये तो अपने नसीब से भागना हुआ . और भागने वालो को दुनिया कायर कहती है

मैं- तू ऐसा ही समझ ले मेरी सरकार.

मीता- ठीक है सो जा फिर , रात बहुत हुई

मैं- सो जाऊंगा, पहले जरा ठीक से देख तो लू इस चाँद को जो मेरे सामने है .

मीता- ये किताबी बाते. ये तेरी मेरी मुलाकाते हाँ पर इतना जरुर है जब तू साथ नहीं होता , तेरी याद साथ होती है .

मैं- फिलहाल तो हम दोनों साथ है .

मीता- किस्मत की बात है वैसे तेरी दुश्मनी जब्बर से बढती जा रही है तू सावधान रहना और मुझे समझ नहीं आता की तेरी उस से दुश्मनी क्यों है आखिर जब की वो ...

मैं- जब की क्या

मीता- जब की , जब की वो चौधरी अर्जुन सिंह का दोस्त हुआ करता था किसी ज़माने में

मीता की बात ने जैसे विस्फोट सा कर दिया था .

मैं- तू जानती है क्या कह रही है तू , जब्बर और मेरे पिता की दोस्ती हो ही नहीं सकती,

मीता- क्यों नहीं हो सकता , इस दुनिया में सब कुछ हो सकता है

मैं- अगर ऐसा था भी तो जब्बर ने मुझसे ये क्यों कहा था की बाप का बदला वो बेटे से लेगा.

मीता- दोस्ती जब टूटती है तो ऐसे घाव देती है जो जिन्दगी भर नहीं भर पाते. तुझे मालूम करना होगा की आखिर वो कौन सी वजह रही होगी. और फिर तूने ही तो बताया था की तेरा चाचा इतना सब होने के बाद भी जब्बर से दबता है तो तू सोच आखिर क्या वजह रही होगी. दिलेर सिंह के मरने के बाद भी जब्बर चुप है वर्ना तू सोच वो क्या नहीं कर सकता . तेरा चाचा और जब्बर एक ही थाली के चट्टे बट्टे है .

मीता की बात में दम था मुझे तस्दीक करनी चाहिए थी .

मैं- तेरी बात सही है मीता, और मैं इस बारे में विचार करूँगा पर कल सुबह होते ही सबसे पहले इस पुरे इलाके की तार बंदी करनी है मुझे, ताकि आज जो हुई, ऐसी हरकत फिर न हो पाए.

मीता- अगर कोई हमें नुकसान पहुँचाना चाहता है तो वो नुकसान करके रहेगा, तार क्या रोक पाएंगे उसे.

मैं- तो क्या करू. मैं किसी को खोना नहीं चाहता, मेरे किसी अपने को कुछ हुआ तो मैं सह नहीं पाऊंगा.

मीता - अब सो भी जा,

मीता सो गयी पर मेरी आँखों में नींद नहीं थी , लेटे लेटे मैंने सोच लिया था की इस बात को कैसे सुलझाना है मुझे और अगले दिन मैं सीधा सुनार के घर गया , क्योंकि सुनार ही वो चाबी था जो उस धागे के रहस्य को खोल सकता था , जब मैं सुनार के घर पहुंचा तो मैंने जो देखा ,,,,,,, ...............
 
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