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Kamukta kahani - गुजारिश 2

#31

"आह " गोरी तनी हुई चुचियो को मसलते ही ताई के होंठो से आह फूट पड़ी. मैं दूसरा हाथ थोडा निचे ले गया और ताई के हलके फुले हुए पेट को सहलाने लगा. उफ्फ्फ कितना मुलायम था वो . गहरी नाभि , मैंने पास रखी साबुन उठाई और ताई के उभारो पर लगाने लगा. जल्दी ही झाग ने ताई के उपरी हिस्से को ढक लिया.

झाग की चिकनी पर मेरे हाथ फिसलने लगे थे . मैंने अपने कपडे जल्दी से उतार कर फेंके और अपने लिंग को ताई के मांसल नितम्बो पर सटा दिया. ताई भी पूरी खेली खाई थी . और हम दोनों जानते थे की ये जो भी हो रहा है होकर ही रहेगा. ताई अपना हाथ पीछे ले गयी और मेरे लिंग को अपनी मुट्ठी में जकड लिया.

कुछ देर बाद ताई पलटी और हमारे होंठ एक हो गए. ताई को चुमते हुए मैं उसकी पीठ को सहलाते हुए नितम्बो तक आ पहुंचा था , ताई ने अपनी जीभ मेरे मुह में डाल दी और मेरी जीभ को चूसने लगी. कसम में ऐसा जबरदस्त अहसास था की मैं क्या ही बताऊ, मध्यम आकार के तरबूजो जैसे ताई के मदमस्त नितम्ब जिन्हें मैं लगातार मसल रहा था .

चूमते चूमते ताई ने मेरे कपडे उतारने शुरू किये और पल भर में ही मैं उसकी बाहों में नंगा था. मेरा झूलता लंड ताई की चूत पर दस्तक दे रहा था .

साबुन के चिकने झाग से लथपथ हमारे गर्म बदन एक दुसरे से रगड़ खाते हुए आज उत्तेजना की हर हद को तोड़ देना चाहते थे . ताई ने नलके को चालु किया और हम भीगने लगे, पानी की ठंडी बूंदों ने जिस्म की आग के शोलो को और भड़का दिया.

"कर ले तेरी मनचाही " ताई ने शरमाते हुए कहा.

ये उसका खुला निमंत्रण था की आज की रात मैं दबा कर उसे चोदु. ३४-३५ साल की एक खूबसूरत गदराई औरत मेरी बाँहों में पिघल रही थी . मैंने ताई की गीली कच्छी की एलास्टिक में अपनी उंगलिया फंसाई और उस को उतार कर बाथरूम में ही फेंक दिया.

गहरे काले बालो से भरी ताई की हलकी गुलाबी रंगत लिए चूत जिसे देख कर मैं हद से जायदा पागल हो गया था . मैंने ताई को अपनी गोद में उठाया और बाथरूम से कमरे में ले आया. .

मैंने ताई को बिस्तर पर पटका और उसे ऊपर चढ़ गया.

"कितनी खूबसूरत है तू " मैंने उसके गाल चुमते हुए कहा तो वो शर्मा गयी.

जल्दी ही मैं उसकी छातियो को चूसते हुए उसकी चूत से खेल रहा था . मैंने अपनी ऊँगली उस गर्म तपती चूत के काम रस से भीगे छेद पर रखी और अन्दर सरका दिया. उफ्फ्फ्फ़, क्या गजब था मेरी ताई का हुस्न. मैंने उसके गुदा द्वार को छुआ तो उसके बदन में हलचल मच गयी. गदराई जांघो को चुमते हुए मैं चूत के करीब आ गया था , इतना करीब की उसकी गर्मी मेरी नाक से होते हुए जिस्म में उतरने लगी थी.

मैंने ताई के पैरो को अच्छे से फैलाया और चूत की फांको को फैलाते हुए अपने प्यासे होंठो को चूत पर रख दिया.

""""""सीईईईई " यकीं मानिये उस पल हम दोनों के मुह से एक साथ वो आह निकली थी . "पुच " मैंने ताई की चूत को हलके से चूमा और बहते रस को जीभ से चाट लिया. ताई ने मस्ती के मारे अपने पैरो को इधर उधर पटका पर मेरी पकड़ मजबूत थी खुरदुरी जीभ से मैं उस नाजुक अंग को चाटता रहा .

आहे भरते हुए वो हुस्न की परी कभी मेरे सर को सहलाती कभी चूतड ऊपर उठा कर चूत को चुसवाती अब मेरे लिए भी बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा था पर इस से पहले की मैं कुछ और कर पाता ताई ने मुझे पलट दिया अब मैं निचे और वो ऊपर आ गयी थी . ताई ने मेरे लंड को पकड़ा और चूत पर लगा कर उस पर बैठने लगी. मैंने चूत के छेद को फैलते हुए देखा .

धीरे धीरे मेरा पूरा लंड ताई की प्यासी चूत में गायब हो गया था . ताई ने मेरे सीने पर अपने हाथ रखे और उपर निचे होने लगी. जब वो अपने मादक नितम्बो को जोर जोर से पटकती तो मैं ब्यान नहीं कर सकता की कितना मजा मिल रहा था मुझे. कुछ देर बाद वो मेरे चेहरे पर झुक गयी और मेरे होंठो को चूमने लगी. अपने से आधी उम्र के लड़के को ताई वो सुख प्रदान कर रही थी जिसे कुछ भाग्यशाली ही उस उम्र में प्राप्त करते है .

मैं लगातार ताई की पीठ कंधो को सहला रहा था , कुछ देर और बीती ही थी की वो धडाम से मेरे ऊपर ढेर हो गयी. ताई की लम्बी गहरी साँसे मेरे गालो पर पड़ रही थी, कुछ पलो के लिए उसकी हालत ऐसी हो गयी की जैसे वो कितना थकी हुई थी .

"मेरे ऊपर आजा और जैसा मैंने किया वैसा ही कर " ताई ने पीठ के बल लेटते हुए कहा.

मैंने एक बार फिर से लंड उसकी चूत में पेला और उसने टांगो को मेरी कमर पर लपेट लिया. जैसे जैसे मेरी नसों में दौड़ रहा था , मेरे धक्को में तेजी आ रही थी . कुछ देर तक ये धक्क्म्पेली चलती रही और फिर वो सुखद अहसास मैंने महसूस किया . मेरे लंड से कुछ गरम गरम निकल कर ताई की चूत में गिरने लगा. उस अहसास से मेरा तन इतना कांप रहा था की मैं क्या बताऊ,

और जब ये सैलाब थमा तो पसीने से लथपथ मैं और ताई एक दुसरे की बाँहों में पड़े थे. क्या मालूम हम थोड़ी देर के लिए सो ही गए हो. पर जब आँख खुली तो ताई मेरे बगल में लेटी मुझे ही देख रही थी .

"कैसा लगा " उसने पूछा

मैं- बहुत अच्छा.

"अब ये रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा , सब बदल जायेगा " ताई ने कहा

मैं- परवाह नहीं, तुम भी तो मुझसे प्यार करती हो न .

ताई- अपने बेटे के साथ सोना, दुनिया इसे प्यार नहीं कहेगी.

मैं- दुनिया से अपने को क्या लेना देना .

ताई- पर ये बाते छुपती भी नहीं, ये भी नहीं छुप सकेगा

मैं- क्या तुम्हे परवाह होगी .

ताई- नहीं

मैं- तो फिर मत सोच इस बारे में .

उस रात एक बार और हमने सेक्स किया. अगली सुबह न जाने क्यों मुझे बड़ी खुशगवार लग रही थी . सुबह ही मुझे रीना की मामी मिली और मुझे एक ऐसी जानकारी दी जिसकी मुझे सख्त जरुरत थी . मेरा दिल बेचैन था मीता से मिलने के लिए. मैं पैदल ही मीता से मिलने के लिए निकल गया , नहर को पार किया ही था की तभी एक गाडी मेरे सामने आकर रुकी और उस से जो उतरा .........
 
#32

मैंने नहर को पार किया ही था की तभी एक गाड़ी मेरे सामने आकर रुकी और उस से जो उतरा, उसकी वहां होने की कोई भी उम्मीद नहीं थी मुझे. खाकी वर्दी पहने वो पुलिसवाला मुझे देखे और मैं उसे देखू.

"मनीष चौधरी तेरा ही नाम है क्या छोरे " उसने पूछा

मैं-ये बात तो तू भी जानता ही है फिर क्यों पूछता है

पुलिसवाला- मेरा नाम दिलेर सिंह है , इस इलाके का थानेदार हूँ मैं

मैं- मुझे क्यों बता रहा है , मेरे पास तेरे लिए एक मिनट का भी समय नहीं है , मेरे रस्ते से हट

दिलेर- रस्ते तो अब टकराते ही रहेंगे हमारे- तुम्हारे, सुना है आजकल बहुत उड़ रहे हो तुम, हमने ऐसी उडती चिड़िया के पंख बहुत काटे है .

मैं- सुन थानेदार, पहली बात तो ये है की तेरा मेरा कोई लेना देना है नहीं, दूसरी बात ये की मैं चिड़िया नहीं बाज़ हूँ, मेरी आजमाइश मत करना और सब से महत्वपूर्ण बात की तू अपनी मर्जी से तो आया नहीं है किसी न किसी ने टुकड़े फेंके होंगे तेरे आगे , तू अपना देख लेना कही टुकड़े महंगे न पड़ जाये.

दिलेर- बित्ती भर का छोकरा है तू और घमंड आसमान तक का पुलिस के दो डंडे तेरा सारा जोश ठंडा कर देंगे.

मैं- तू दुआ कर की काश वो दिन आये जिस दिन तुझे ये मौका मिले.

दिलेर- मैं देख रहा हूँ मामले को मुझे जरा भी लगा की सुनार पर हुए हमले में तेरा हाथ है तो तू दुआ करना अपने लिए.

मैं- माँ चुदाये सुनार

दिलेर- एक बार वो होश में आ जाये.

मैं- सुनार की जाने दे, मैं मेले के बाद सीधा जब्बर की गर्दन पकडूँगा मेरी जमीन जो उसने कब्जाई है छुड़ाने जाऊँगा, तेरा जोर हो तो रोक लेना

दिलेर- जब्बर मेरा बहनोई है बात फिर पर्सनल हो जाएगी

मैं- बात पर्सनल हो चुकीहै , शुरू उसने की थी ख़तम मैं करूँगा. पर तू मेरे पास आया है तो मैं तुझे खाली हाथ नहीं जाने दूंगा, मैं तुझसे वादा करता हूँ मेरी जमीन शांति से मुझे वापिस दिला दे, मैं भी जबान देता हूँ जब्बर से कोई लेना देना नहीं रखूँगा,

दिलेर-जानता भी है तू क्या कह रहा है

मैं- जब्बर जानता है मैंने उस से क्या कहा था , अगर वो नहीं जानता तो तुझे मेरे पास नहीं भेजता.

मैंने बिना उसके जवाब का इंतज़ार किये अपने कदम आगे बढ़ा दिए. आज मैं हर हाल में मीता से मिलना चाहता था, मैं चाहता था की एक बार फिर से वो मेरे सितारों को पढ़े, उनसे मेरे सवालो के जवाब पूछे. पर मेरी किस्मत भी न ,एक बार फिर उसके घर पर ताला लगा था . ऐसा लगा की जैसे ये ताला ही इस जहाँ में मेरा सबसे बड़ा दुश्मन था . अब मैं कहाः तलाश करूँ उसकी.

बहुत देर उसके दरवाजे पर ही इंतज़ार किया उसका पर वो ना आई, हार कर मैंने फिर शिवाले की राह पकड़ी. वहां पर भी वो न मिली . मेले की तैयारिया बदस्तूर जारी थी . एक आदमी प्राचीर बाँध रहा था मुझे देख कर वो मेरे पास आया.

मैंने उसे मीता का हुलिया बताया और पूछा की ऐसी कोई लड़की आई थी क्या उसने मुझे मना किया .

"आप तो यहाँ तक़रीबन ही आते जाते रहते होंगे बाबा " मैंने कहा

वो- तक़रीबन तो नहीं पर कभी कभार इधर से आ निकलता हूँ , सोलह साल से ये जगह खामोश थी, वक्त से बिछड़ी हुई अभी मेले की वजह से थोड़ी रौनक हुई है .

मैं-बाबा, आपकी तो उम्र बीती है इस शिवाले को देखते हुए,मेरे मन में एक दो बाते है क्या आप बता सकते हो

बाबा- बेटा, मैं इस गाँव का नहीं हूँ, पर इस शिवाले से मेरा नाता है, जब जब मेला लगा है मेरे काबिले के लोगो ने ही इसे सजाया है , किसी ज़माने में हमारा बहुत मान था यहाँ पर , यहां से खूब इनाम-बक्शीश लेकर जाते थे हम लोग, पर फिर वक्त बदला. सोलह साल बाद फिर से हमें बुलावा भेजा गया . काबिले से तो लोगो ने आने से मना कर दिया , पर मैं जिदंगी के उस पड़ाव पर हूँ जहाँ न जाने कब डोर कट जाये तो सोचा की एक आखिरी बार देवता के दर्शन कर लू तो आ गया.

मैं- बाबा इस शिवाले की क्या कहानी है बताओ मुझे.

बाबा- बस इतनी कहानी की जो भी यहाँ पर आया इसका होकर रह गया. इसकी लगन जो लगी फिर सब प्रीत छुटी .कोई खाली हाथ नहीं गया यहाँ से . ऐसी कोई दुआ नहीं जो यहाँ कबूल नहीं हुई. पर फिर सब रूठ गया . सब टूट गया.

मैं- क्या हुआ था बाबा ऐसा

बाबा- वो मेला , वो मेला , उस मेले में कुछ ऐसा हुआ था की जो अच्छा भी था और बुरा भी , मेले में बरसो से रीत चली आ रही थी की दोनों गाँव से एक एक लोग जोर करते थे और हारने वाले के सर को देवता को अर्पित किया जाता था, वो चौधरी अर्जुन थे जिन्होंने इस खुनी प्रथा को रोका था . उन्होंने समाज को समझाया था की देवता कभी खुश नहीं होंगे रक्त से. और उनकी बात का मान रखा भी दोनों ही गाँवो के लोगो ने, प्रथा बंद की गयी, मिठाई बांटी गयी. चारो तरफ हर्ष था उल्लास था, पर उसी रात चौधरी अर्जुन ने अपने ही वचन को तोड़ दिया. जिस चुनोती को उन्होंने दिन में नकार दिया था उसी रात उन्होंने एक दो नहीं बल्कि पुरे ग्यारह लोगो से जोर किया और उनके सर देवता को अर्पित किये.

मैंने वो नर संहार अपनी आँखों से देखा था . उस रात सावन शुरू हुआ था , पूरा रुद्रपुर रोया था , चौधरी अर्जुन रोये थे , ऐसा विलाप उनका की धरती फट जाए, मैं नहीं जानता उस रात बरसा सावन किसके लिए रोया था , चौधरी के लिए , उन ग्यारह लोगो के लिए या फिर देवता के लिए पर जो भी था वो ठीक नहीं था .

मैं- आप के कबीले वालो ने इस बार आने से मना क्यों कर दिया.

बाबा- जैसा मैंने बताया मेले की तयारी से लेकर देवता के श्रृंगार तक की जिम्मेवारी हमारी रही है, उस दिन क्या मालूम क्या हुआ, देवता का श्रृंगार चोरी हो गया , मेरे कबीले के कुछ लोगो को शक के बिनाह पर मार दिया गया .

मैं- पर मैंने सुना की काफी सामान मिल गया था वापिस, अभी भी तो देवता के कमरे में पड़ा है कितना सारा हीरा-जवाहरात

मेरी बात सुनकर उस बाबा के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी .

मैं- क्या हुआ बाबा क्या कुछ गलत कहा मैंने

बाबा- देवता को भला इन चीजों का क्या मोह

मैं- तो क्या ये चीजे श्रृंगार का हिस्सा नहीं थी .

बाबा- तुमने देवता को देखा ही नहीं है फिर

मैं- तुम दिखा दो फिर बाबा.

बाबा- अर्जुन के बेटे ने कपाट खोले है , देवता की मर्जी होगी तो मिलेंगे उस से .

मैं- बाबा आप अर्जुन सिंह को जानते थे न,

बाबा- उनको सब जानते थे

मैं- कैसे थे वो क्रूर, अहंकारी , घमंडी जमींदार

बाबा- उसके बारे में पूछना है तो मुझसे मत पूछ उनसे पूछ जिनका बेटा था वो. उन किसानो से पूछ जिनके बैल बीमार होने पर खुद के कंधो से हल जोता था उसने. उसके बारे में मुझसे मत पूछ इन हवाओ से पूछ ये तुझे यहाँ तक ले आई है तो उसके किस्से भी बता देंगे.

मैं- बाबा क्बाया नाम बताया था आपने अपने कबीले का

बाबा- यहाँ से उत्तर में पन्द्रह कोस दूर , कानबेलियो का डेरा है हमारा

मैं-अलख के बारे में कुछ जानते है क्या आप

बाबा ने घुर कर मुझे देखा और बोले- काम बहुत बाकी है मेरा , समय रहते निपटाना है मुझे

मैं- किसी ने मुझसे कहा है की वो मुझे अलख के पार मिलेगी.

बाबा- अलख देवता की आग है जो बरसो पहले बुझा दी गयी .

मैं- किसने बुझाई

बाबा- चौधरी अर्जुन ने

मैं वहां से उठा और अपने रस्ते पर चल दिया, कुछ दूर चला ही था की मैं पलटा और कहा- ......................................
 
"मैं उसी अर्जुन का बेटा हूँ बाबा " मैंने कहा

उस बुजुर्ग ने कुछ नहीं कहा पर उसकी आँखों के चमक बहुत कुछ कह रही थी. रुद्रपुर से मैं सीधा अपनी बंजर जमीन पर आया, बावड़ी की सीढियों की मरम्मत हो चुकी थी , अन्दर से सफाई हो चुकी थी बस अब इसे पानी से भरना था . बरसात गिर पड़ती तो मैं उसके बाद इस जमीन पर ट्रक्टर चलाना चाहता था . दिमाग में लाखो ख्याल थे,पर मैं थका था मैंने पेड़ो के निचे चारपाई लगाई और कुछ देर के लिए सो गया.

मेरी नींद टूटी तो हल्का हल्का अँधेरा हुआ पड़ा था . टूटे बदन को सँभालते मैंने आँखे खोली की सामने देख कर आँखों को एक बार जैसे यकीन ही नहीं हुआ. मेरे सामने मिटटी के डोले पर मीता बैठी हुई थी.

"कहाँ थी तू, कहाँ कहाँ नहीं ढूंढा तुझे और वहां मिटटी में क्यों बैठी है " मैंने कहा

मीता- अब तूने याद ही इतनी शिद्दत से किया की मुझे आना पड़ा और ये मिटटी , जो सुख इसकी पनाह में है वो और कहाँ भला.

मैं- बात तो सही कही पर तू थी कहाँ कितने दिन हुए तुझे देखे हुए,

मीता- और भला कहाँ जाना , कभी इधर कभी उधर. चाचा की तबियत ख़राब थी उसे शहर में हॉस्पिटल में दाखिल करवाया था तो वहीँ रुकना पड़ा.

मैं- मुझे तो बता सकती थी न .

मीता- तुझे परेशानी होती.

मैं- परेशानी वो भी तुझसे , हद करती है तू भी .

मीता- और बता क्या चल रहा है

मैं- कुछ नहीं बस तेरी याद आ रही थी .

मीता- यादो का क्या है, यादे तो आणि जानी है

मैं- और तू

मीता- मैं भी यादो जैसी ही हूँ. मैंने तुझे मना किया था न रुद्रपुर में धक्के मत खाना

मैं- मेरी नियति मुझे वहां बार बार ले जाती है

वो- वहां तुझे कुछ नहीं मिलेगा.

मैं- तू तो मिली न

वो- मेरा मिलना न मिलना एक सा ही है

मैं- अभी तो मिली न मुझे तू

मीता ने झोले से एक डिब्बा निकाला और मुझे दिया.

मैं- क्या है इसमें

वो- शहर से लायी हूँ तेरे लिए.

मैने डिब्बा खोला उसमे जलेबिया थी .

"तुझे पसंद है न " उसने कहा

मैं- तुझे कैसे मालूम

वो- उस दिन हलवाई की दूकान पर तूने जलेबी ही तो खिलाई थी .

मैं मुस्कुरा दिया और जलेबी खाने लगा.

"तेरे बिना सब सूना सूना सा लगता है " मैंने कहा

वो- अभी तेरे साथ हूँ कौन सा बहारे आ गयी

मैं- काश तुझे बता सकता .

वो- बताने की जरुरत नहीं

मैं- तेरे गाँव में मेला लगने वाला है , मिलेगी न वहां पर

वो- तू आएगा वहां

मैं- मुझे तो आना ही है , इसी बहाने तेरे साथ वक्त गुजारने का मौका मिलेगा

वो- बड़ी हिम्मत है तुम्हारी, मेरे गाँव में मेरा हाथ पकड़ कर घूमना चाहता है

मैं- इतना तो हक़ है मेरा और फिर क्या तेरा क्या मेरा

मीता- इस दोस्ती की शर्ते भूल गया क्या तू

मैं- वो दोस्ती ही क्या जिसमे शर्ते हो

वो मुस्कुरा पड़ी. अँधेरा थोडा और घना होने लगा.

मैं- सावन शुरू हो जाए तो फिर कुछ करे इधर

मीता- दिन तो पुरे हो गए है , देखो कब झड़ी लगती है

मैं- दिल कहता है ये सावन अनोखा होगा. तू बता तेरे सितारे क्या कहते है

मीता- सितारों की क्या बात करनी, बात तो तेरी मेरी चल रही है .

मैं- तो ये बता हमारे सितारे क्या कहते है .

मीता- क्या ही कहना है कुछ दुःख तेरे, कुछ दर्द मेरे

मैं- किसी ने मुझसे कहा की दो बर्बाद मिलकर एक आबाद दुनिया बसा सकते है .

मीता- इतना आगे की क्या सोचना, आज की बात कर

मैं- मेरा आज मेरी आँखों के सामने बैठा है .

मीता- चल मैं चलती हूँ,

मैं- थोड़ी देर तो रुक , बड़े दिनों बाद तो मिली है

मीता- रात काली हो रही है

मैं- होने दे. या तो तू वादा कर की रोज मिलेगी या आज यही रुक जा

मीता-वादा तोड़ कर ही तो आई हूँ तेरे पास

मैं- रुक जा न , क्या मुझ पर भरोसा नहीं

मीता- भरोसा है तभी तो आई. खैर अब मैं जो बात पुछू तू सच बताना मुझे

मैं- तुझसे झूठ बोला क्या कभी

मीता- दादा ठाकुर से क्या पंगा हुआ तेरा

मैं- सच कहूँ तो कुछ नहीं , मतलब पंगा गाँव के लडको से हुआ था , दद्दा से एक दो बार मुलाकात हुई मेरी.

मैंने उसे शिवाले वाली घटना बताई.

मीता- ददा ठाकुर बड़ा मीठा है , तू इसके झांसे में बिलकुल मत आना, कब तेरे साथ खेल कर जायेगा तुझे मालूम भी नहीं होगा.

मैं- पर कुछ तो ऐसा है जो वो अपने कलेजे में दबाये बैठा है

मीता- सब के मन में कुछ न कुछ राज़ तो होते ही है.

मैं-तू मेरी मदद करेगी क्या मेरे सवालो के जवाब तलाश करने में

मीता- मुझे कहाँ उलझा रहा है तू.

मैं- एक तू ही तो है जिससे अपने मन की बात कर सकता हूँ मैं

मीता- ये मन बावला होता है मनीष , मन की मत सुनियो

मैं- तो किसकी सुनु

मीता- छोड़ अब ये सब, यही रुकना है तो दो चार ईंटे उठा ले, और कुछ लकडिया मैं चूल्हा सुलगाती हूँ .

मैं- कमरे में कुछ रखा होगा खाने पिने का देखते है

मैंने कमरे का दरवाजा खोला वहां पर मजदूरो के खाना बना ने का सामान था , मैंने ईंटे उठाई तब तक मीता ने कुछ लकडिया तोड़ ली.

वो- वैसे तुझे खाने में क्या पसंद है

मैं- सच कहूँ तो मीट और उसकी तरी में भीगी हुई रोटिया , खाने पीने का बहुत शौक रहा पर हालात ऐसे थे की मन को समझाना पड़ा

मीता- कोई न अबकी बार तू घर आएगा तो तेरी ये इच्छा मैं पूरी करुँगी. अभी तो इन्ही आलू से काम चला ले.

मैं- चूल्हे की आंच में बड़ी खूबसूरत दिखती है , जी करता है उम्र भर तुझे यूँ देखता रहू. हौले से जुल्फों को संवारना गजब है तेरा.

मीता- ये तारीफों के डोरे तू मुझ पर नहीं डाल पायेगा

मैं- उसकी जरुरत नहीं मुझे

मीता- थाली आगे कर रोटी परोस दू तुझे

मैं- तू बना ले फिर साथ ही खायेंगे, ये मौके फिर मिले न मिले.

मीता- जब तेरा दिल करे , तू मेरे घर आजा खाने के लिए

मैं- मेरा दुश्मन वो ताला हुआ है जो दरवाजे पर लगा है

मीता- ठीक है बाबा , आगे से कहीं भी जाउंगी तो ताला नहीं लगा कर जाउंगी पर मेरा कुछ भी सामान चोरी हुआ तो तुझ से पैसे लुंगी उसके

मैं- मेरा तो सब कुछ तेरा ही है.

बाते करते हुए हम दोनों ने खाना खाया और फिर एक दुसरे के किनारे चारपाई लगा ली . अपनी अपनी चारपाई पर लेटे हुए सितारों को देखते हुए हम हसीं रात का लुत्फ़ ले रहे थे की अचानक आई उस चीख ने हम दोनों के रोंगटे खड़े कर दिए..............................
 
#34

हम दोनों के होश उड़ गए उस चीख को सुनकर, अब किसने अपनी माँ चुदवा ली थी, मैंने मन ही मन कहा. बड़ी मुश्किल से ये घडी आई थी जब मैं मीता के इतने करीब था, किस ने मेरी हसीं रात ख़राब की थी .

मीता- चल देखते है , क्या मालूम कोई मुसीबत में है

मैं - तू इधर ही रुक मैं देखता हूँ

मीता- मैं भी चलूंगी साथ

हम दोनों दौड़ कर खेतो की परली तरफ गए. मैंने टोर्च जला ली थी. और टोर्च की रौशनी में मैंने देखा की एक आदमी खून से लथपथ धरती पर पड़ा है और पास में चाची खड़ी थी . मीता ने उस आदमी को टटोल कर देखा और बोली- निकल लिया ये तो

मैं- चाची, तुझे क्या जरुरत थी इसे मारने की

चाची- मैंने इसे नहीं मारा, भला मैं क्यों करुँगी ऐसा काम

मैं- ये धरती पर पड़ा है और इसके पास तू है , इतने बेवकूफ तो हम भी नहीं है .

चाची ने एक नजर मीता पर डाली और बोली-चाहे मेरा यकीन करो या न करो मैंने इसे नहीं मारा. ये बस संयोग की बात है इसका मरना और मेरा यहाँ होना

मिता - अजीब संयोग है

चाची ने खा जाने वाली नजरो से मीता को देखा और बोली- तुझे क्या लेना देना है , मनीष कौन है ये लड़की

मैं- मेरी दोस्त है और क्या गलत पूछा है इसने तुम इतनी रात को इस संयोग में क्या कर रही थी .

चाची- तेरे चाचा को तलाश करने आई थी , पिछले कई दिनों से वो घर पर नहीं आये है

मैं- ये बात मुझे क्यों नहीं बताई

चाची- तू घर पर रहता ही कब है ,

मीता- चलो मान लेते है पर अभी इस लाश का क्या करना है , सुबह ये तुम्हारे खेतो पर ही पड़ा मिलेगा तो तुम्हारे लिए मुसीबत होगी वैसे भी दिलेर सिंह तो ताक में ही है .

चाची- कौन दिलेर सिंह

मैं- चाची तू थोड़ी देर शांत रह और मुझे कुछ सोचने दे. मैं समझ रहा हटा की हो न हो ये जब्बर का आदमी ही होगा.

पर क्या ये मेरी जासूसी कर रहा था ,हालाँकि मुझे चाची की बात पर जरा भी विश्वास नहीं था क्योंकि उस रात जिस तरह से उसने मुझे दिखाया था मुझे लगा था की ये औरत आर पार है . पर अभी मैं कुछ कहने की हालत में नहीं था . मीता की बात में वजन था , दिलेर सिंह को ऐसे ही मौके की तलाश थी मेरी रेल बनाने के लिए.

मैं- चाची तू घर जा , हम थोड़ी देर में आयेंगे इसका कुछ करके

पर उस औरत ने अकेले जाने से मना कर दिया. थोड़ी देर विचार करने के बाद मैंने और मीता ने मिलकर गड्ढा खोदा और उसमे लाश पाट दी.

मीता- अब क्या

मैं- फिलहाल ये जगह सुरक्षित नहीं है , क्या मालूम ये आदमी कब से हमारे पीछे हो . मेरी वजह से तुझे कोई दिक्कत हो ये मुझे मंजूर नहीं

मीता- तू फ़िक्र न कर, इतनी कमजोर नहीं मैं

मैं- हम अभी घर चलेंगे.

मीता- ठीक है तुम जाओ मैं भी जाती हूँ

मैं- पागल हुई है क्या , तुझे अकेले जाने दूंगा क्या मैं तू भी मेरे घर चलेगी,

मीता- पर मैं कैसे, मेरा मतलब

मैं- कुछ मतलब नहीं, वो भी तेरा ही घर है

मैंने चाची की तरफ देखा, उसने कुछ नहीं कहा. हम तीनो घर के लिए चल पड़े. घर आने के बाद हमने हाथ मुह धोये और बैठ गए, मीता मेरे घर को देखने लगी, चाची चाय बना लाई. पर एक बात जो मुझे बेचैन कर रही थी वो ये थी की थोड़ी देर पहले एक आदमी मरा था , चाची का व्यवहार ऐसा था की जैसे उसे कुछ फर्क पड़ा ही नहीं था . ऐसा कैसे हो सकता था .

मैं-चाची, क्या कोई ई बात है जो मुझसे छुपाई जा रही है .

चची- मुझे कुछ नहीं छुपाना

मैं- तो बताओ वो आदमी वहां पर क्या कर रहा था

चाची - मैं क्या जानू, हो सकता है वो कोई चोर हो

मैं- वहां कौन सा खजाना गडा है

मीता- क्या आप उस आदमी को पहले से जानती थी , हो सकता है की आप उस आदमी से मिलने ही गयी हो वहां पर

चाची- ये लड़की अपनी हद में रह. तू सीधा सीधा मुझ पर लांछन लगा रही है

मैं- मीता का वो मतलब नहीं था

चाची- इसका जो भी मतलब है इसे कह दे अपनी हद में रहे, और वैसे ये है कौन .

मैं- फिलहाल तो यूँ समझ लो की ये घर जितना मेरा है उतना ही इसका .

चाची- तो मैं तुझे कैसे विश्वास दिलाऊ की मैं बस तेरे चाचा को तलाशने गयी थी वहां पर

मैं- वहीँ पर क्यों

चाची- क्योंकि ना जाने तुम लोगो को उस जमीन से क्या लगाव है जब कहीं नहीं मिलते तो वहीं पर मिलते है .

न जाने क्यों चाची की बाते मुझे जम नहीं रही थी पर फिलहाल मैंने उसे कुछ और नहीं कहा और मीता को अपने चौबारे में ले आया.

"बस यही है मेरी दुनिया. " मैंने बिखरे कपड़ो को एक तरफ रखते हुए कहा

उसने अलमारी में पड़ी कैसेट के ढेर को देखा और बोली- तो ये शौक भी है तुमको

मैं- जब से तुमसे मिला हूँ , इन पर ध्यान गया ही नहीं मेरा.

"और ये किताबे," उसने कहा

मैं- बस कभी कभी पढता हूँ

वो खिड़की के पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी

मीता- कभी सोचा नहीं था ऐसे अचानक से तेरे घर यूँ आना होगा.

मैं- तू जब चाहे यहाँ आ सकती है

मीता- क्या करुँगी मैं यहाँ आकर

मैं- क्या पता तेरे नसीब में हमेशा यही की होकर रहना हुआ तो .

मीता- मेरा नसीब इतना बुरा भी नहीं है .

मैं- रात बहुत हुई तू आराम कर सो जा यहाँ मैं बाहर हूँ, किसी चीज़ की जरुरत हो तो आवाज दे न

मीता- तू यही रह मुझे कोई दिक्कत नहीं है .

कितनी सादगी थी इस लड़की में, इसे फर्क ही नहीं पड़ता था , इसका और मेरा एक जैसा ही था , उसे देखते हुए न जाने कब नींद ने मुझे आगोश में ले लिया.

सुबह मेरी आँख खुली तो मीता नहीं थी . मैं निचे आया तो चाची ने कहा की वो सुबह सुबह ही चली गयी . उसका यूँ जाना अच्छा तो नहीं लगा पर वो ऐसी ही थी . मैं सीधा ताई के पास गया .

मैं- मुझे कुछ पूछना था तुमसे

ताई- हाँ

मैं- चाची के बारे में तुम जो भी जानती हो सब का सब बताना मुझे.

ताई-अब क्या बात हो गयी

मैं- बस यूँ ही

ताई- यूँ ही कुछ नहीं होता

मैं- मुझे वो ठीक नहीं लगती, मुझे लगता है की वो किसी से सेट है , किसी से चक्कर चल रहा है उसका.

इस से पहले की मेरी बात होती ताई का थप्पड़ मेरे गाल पर पड़ा और मैं हैरत से उसे देखता रह गया.
 
#35

"तेरी हिम्मत कैसे हुई उसके बारे में ऐसी बात बोलने की, वो ही है जिसने इन बिखरी डोरियो को थामा हुआ है , इस घर को उसने ही घर बनाया है वो वहां पर क्या कर रही थी मैं नहीं जानती पर उसके बारे में उल्टा सीधा नहीं सुनने वाली मैं " ताई ने गुस्से से कहा.

मैं- पर उसका वहां होना मेरे लिए मुसीबत कड़ी कर सकता था

ताई- मैंने तो तुझे भी कहा है की अपनी आने वाली जिन्दगी पर ध्यान दे, पर तुझे तो पड़ी लकड़ी उठानी है ,तेरी ख़ुशी के लिए मैंने वो भी किया जो होना ही नहीं चाहिए था पर तुझे हमारी, हम सब की परवाह कहाँ है . क्यों उलझा है तू उन बातो में जिसका कोई अंत नहीं .

मैं- पर मैं क्या करू ,

ताई- तू समझता क्यों नहीं अर्जुन बीता हुआ कल है, और जो बीत गया वो वापिस कभी नहीं आता, तुझे संवारने के लिए हमने न जाने क्या क्या किया है , पर तू समझता नहीं, मैं शुरू से खिलाफ हूँ तेरे रुद्रपुर जाने के पर तू मानता नहीं , जो आग बुझ चुकी है उसकी दबी राख को क्यों सुलगा रहा है तू

मैं- मेरा नसीब जाने उसने क्या लिखा है मेरे लिए

ताई- नसीब को बनाना पड़ता है मेहनत से.

इस से पहले की मैं और कुछ कह पाता मैंने देखा रीना हमारी तरफ ही चली आ रही थी तो मैंने बात ख़तम कर दी.

ताई- कैसे आई रीना.

रीना- आप कब से ऐसे पूछने लगी मुझसे .

ताई- मेरा वो मतलब नहीं था बेटी. तेरा ही तो घर है , तुम बाते करो मैं चाय लाती हूँ तुम्हारे लिए.

रीना- कल का याद है न तुझे

मैं- क्या है कल

रीना- अरे तू भीना आजकल बिलकुल बुद्धू हो गया है खुद ही वादा करता है खुद ही भूल जाता है

मैं- सीधे सीधे बता भी दे न यार

रीना- तूने ही तो कहा था न की मुझे मेले में ले चलेगा अभी जान बुझ कर टाल रहा है, तेरी होशियारी खूब समझती हूँ मैं

रीना की बात सुनकर अचानक ही मेरी धड़कने तेज हो गयी .

मैं- ये कैसे भूल सकता हूँ मैं , कल खूब मजा आएगा.

रीना- तुझे बता नहीं सकती कितनी उत्सुक हूँ मैं .

मैं- तेरी खुशी में ही मेरी ख़ुशी है .

रीना- पता नहीं क्यों आजकल रात दिन बस तेरा ही ख्याल रहता है मेरे दिल में

मैं- ऐसा क्यों भला

रीना- यही उलझन तो सुलझ नहीं रही .

मैं- मुझे भी तुझे देखे बिना कहाँ चैन आता है

तभी ताई चाय ले आई. हमने अपना अपना कप लिया . कुछ देर बाद रीना चली गयी . ताई भी जाने लगी तो मैंने उसका हाथ पकड़ लिया.

ताई- हाथ छोड़ मेरा

मैं- नाराज मत हो

ताई- तो क्या करू,

मैं ताई को अपनी बाँहों में भरते हुए - प्यार कर मुझसे .

ताई- ये प्यार भी तेरा बहाना है, मेरी सुनता ही कहाँ है तू

मैं- तेरी ही तो सुनता हूँ.

मैंने ताई के गालो पर पप्पी ली. ताई मेरी बाँहों में कसमसाने लगी . ताई के मादक नितम्बो को सहलाने लगा मैं.

ताई- छोड़ न , अभी वक्त नहीं है ये सब करने का

मैं- यही तो वक्त है ये करने का

ताई- मैंने कहा न अभी नहीं

मैं- बस एक बार

मैंने ताई के लहंगे में हाथ डाल दिया और उसकी चूत को मसलने लगा. कितना गजब अहसास था एक मदमस्त औरत की चूत को मसलने का.

ताई- छोड़ मुझे मैंने कहा न अभी नहीं रात को करुँगी तेरी इच्छा पूरी

हार कर मैंने ताई को छोड़ दिया. ताई ने एक नजर मेरे तने हुए हथियार पर डाली और फिर कमरे से बाहर चली गयी.

मेरे पास भी कुछ खास नहीं था करने को बाहर आकर देखा की चाचा की गाड़ी खड़ी थी गली में .मतलब वो लौट आया था .मैं उसके पास गया .

चाचा- तेरी चाची ने सब बताया मुझे , मैं कुछ न कुछ करूँगा तुम सब की सुरक्षा के लिए , साथ ही जब्बर से भी बात करूँगा तुम्हारा जो भी पंगा है ख़तम करवा दूंगा मैं

मैं- उसकी जरुरत नहीं है चाचा

चाचा- जरुरत है , मैं नहीं चाहता की तुम किसी भी चीज़ में उलझो जिस से तुम्हारा कोई वास्ता नहीं हो.

मैं- आप कहाँ गए थे इतने दिन से

चाचा- कुछ काम से गया था पर अभी लौट आया हूँ.

चाची- मेरी तो सुनता ही नहीं है ये , दुश्मन समझता है मुझे तो

चाचा- तुम भी थोडा काबू में रहा करो, अब ये बच्चा नहीं रहा .

मैं- मुझे जब्बर से जरा भी डर नहीं है , मेरा वो कुछ नहीं बिगाड़ सकता

चाचा- दुश्मन को कमजोर मानना हार की तरफ पहला कदम होती है

मैं- समझता हूँ.

चूँकि उस दिन चाचा घर पर ही था तो मैं भी घर पर ही रहा पर मेरा टाइम पास नहीं हो रहा था . चोबारे में लेटे लेटे मैं कभी उस सुनहरे बक्से को देखता तो कभी उस हीरे को जिसमे अब लाल और काला धागा आपस में एक हो गए थे . मैंने एक बार फिर उसे अपने गले में पहनने को कोशिश करी पर हाल पहले जैसा ही था , वो धागा मेरा दम घोंटने पर उतारू हो गया. ये मुझे पहचान नहीं रहा था .

इस बात का मतलब ये था की ये मेरे पिता का भी नहीं था , और उस कागज पर भी लिखा था की इसका बोझ उठाना आसान नहीं है. किस तरह का बोझ था ये , उस हीरे की तपिश , आखिर क्या राज था उसका . और ये मेरे पिता का नहीं था तो किसका था ये.

लाला, जब्बर, दद्दा ठाकुर और मेरे पिता ये सब आपस में किसी न किसी तरह से जुड़े हुए थे . पर वो कड़ी थी क्या. चाचा का जब्बर से दबना एक अलग पहेली थी . सोचते सोचते मेरा गला सूखने लगा था तो मैं निचे आया पानी पिने के लिए , चाचा-चाची अपने कमरे में बात कर रहे थे एक बार मैंने फिर से कान लगा दिए.

", मुझसे नहीं होता ये नाटक, कब तक मैं उसके आगे बुरी बनी रहूंगी. "चाची कह रही थी

चाचा- तुम्हारा यही कठोर व्यवहार उसे मजबूत बना रहा है.

चाची- पर मेरे और उसके रिश्ते को कमजोर कर रहा है .और मैं बता दे रही हूँ जब्बर से कहो की अपने परो को काबू में रखे वो , मनीष को अगर जरा भी आंच आई न तो मैं भूल जाउंगी की मैं कौन हूँ मेरे हाथो ने हथियार छोड़े जरुर है चलाना नहीं भूले है

चाचा- धीरे बोल कहीं मनीष न सुन ले.

चाची- अब हम चाह कर भी उसे रोक नहीं पायेंगे , उसकी आँखों में मैंने आग देखि है .

चाचा- काश वो समझ पाता

चाची- समझना तो तुम्हे भी चाहिए, कितने दिन बीत गए है,हमें एक हुए,

चाचा- तुम तो जानती ही हो न .....

न जाने क्यों चाचा ने बात अधूरी छोड़ दी..
 
#36

इस बातचीत ने मेरे मन में हलचल मचा दी, चाची की बातो से लग रहा था की वो वैसी नहीं है जैसा दिखती है, और उसकी क्या कहानी है अब मुझे ये मालूम करना था . दूसरी बात मुझे ये पता चली थी चाचा कर नहीं पा रहा है उसके साथ , शायद इसी बात से वो दबता था चाची से. जी भर कर पानी पीने के बाद मैं घर से निकला ही था की रीना की मामी मिल गयी.

"अरे मनीष, वो तेरा काम हुआ के नहीं " उसने कहा

मैं- जल्दी ही हो जायेगा काकी.

काकी- अच्छा ही है

मैं- रीना कहा है

काकी- घर पर ही है .

मैं रीना के घर गया तो वो चबूतरे पर बैठी कपडे धो रही थी . मैं उसके पास ही बैठ गया .

रीना- आजकल कुछ जायदा ही मुलाकाते हो रही है ऐसा लोग कहने लगे है अब

मैं- कुछ तो लोग कहेंगे

रीना- कल मैं क्या पहनू

मैं- नीला सूट

रीना- तुझे मैं नीले में अच्छी लगती हूँ क्या

मैं- मेरी नजर से देख कभी खुद को समझ जायेगी.

रीना- इसी लिए तो नहीं देखती .और बता

मैं- अभी तो कुछ नहीं है बताने को

रीना- तेरी बाते सर के ऊपर से जाती है .

मैं - आजकल बस ऐसा ही चल रहा है .

रीना- ये सुहानी हवा, ये ढलती शाम कितने दिन हुए पनघट किनारे हम बैठे नहीं

मैं- बस कुछ दिनों की बात है , फिर पनघट भी मेरी और तू भी मेरी.

रीना ने आँखे मटकाई और आसपास देखते हुए बड़ी शोखियो से अपनी जुल्फे संवारी और बोली- कुछ भी बोलता है .

मैं- तू कहे तो न बोलू

रीना- एक नइ कसेट लायी हु गानों की ले जा , तुझे पसंद आएगी.

मैं - ताई के पास रख जाना , चल मिलता हूँ फिर.

आँखों में रंग थे,सपने थे कल मैं रीना के साथ मेले में जाने वाला था . मैं उस से वो सब कहना चाहता था जिसे सुनने को वो बेताब थी. मैं उसका हाथ पकड़ना चाहता था. उसके साथ घूमना चाहता था . उसकी जुल्फों के साये तले जीना चाहता था . ढलती शाम में मैं ताई के साथ बावड़ी पर बैठा था . वो मुझे देख रहा था मैं उसे .

ताई- क्या देखता है इस तरह से

मैं- तू जानती है मेरी नजर को फिर क्यों पूछती है

ताई- बस यूँ ही . आजकल तू कुछ खोया खोया सा रहता है , मुझे देवरानी ने बताया की कल रात तू खेत में किसी लड़की के साथ था , मैं तुझसे ये नहीं पूछूंगी की वो कौन थी पर इतना जरुर कहूँगी जिसका भी तू हाथ थामे , थाम कर रखना

मैं- वैसे तो चाची तुम्हे फूटी आँख नहीं सुहाती और वैसे बड़ी निजी जानकारिया बांटी जा रही है .

ताई- हैं तो मेरी देवरानी ही और फिर छोटी मोटी बाते किस घर में नहीं होती.

मैं- मुझे तो समझ नहीं आता

ताई- उसकी जरुरत भी नहीं .

मैं- ये हवा, ये मौसम कुछ कहता है

ताई- क्या कहता है

मैं- तुमसे प्यार करने को

ताई- मैं तुझे इतनी अच्छी लगती हूँ क्या , या तेरा प्यार बस उस चीज़ तक ही है

मैं- तुझे क्या लगता है, मुझे उस चीज की हसरत होती तो मेरे पास मौका था न , पर मैंने तुम्हे तब पाया जब तुम्हारे दिल ने कहा , वर्ना मेरी क्या औकात थी जो तुमसे जबरदस्ती कर सकता. क्या मैंने कभी तुमसे पूछा की कितने लोगो के साथ ..........

मैंने जान बुझ कर बात अधूरी छोड़ दी.

ताई- तुझे हक़ है जानने का ,

मैं- पर मुझे नहीं जानना

ताई- मेरी बात सुन, तेरी जो भी दोस्त है उसका ध्यान रखना, अब तूने इतने लोगो से दुश्मनी पाल ली है , तो ये बात हमेशा याद रखना की तेरी वजह से उसकी सुरक्षा से कोई समझोता न हो. अपनों को खोने का गम सहन करना आसन नहीं होता. दुश्मनी का पहला नियम यही होता है की लोग सबसे खास को ही नुक्सान पहुंचाते है .

मैं- , उसे मेरी जरुरत नहीं उस मामले में

ताई- वो तू जाने,

मैंने ताई की जांघ पर हाथ रखा और सहलाने लगा. उसके बदन की संदली खुशबु मुझे पागल कर रही थी . मैंने ताई के हाथ को धीरे से अपने लंड पर रख दिया. वो उसे सहलाने लगी. कुछ देर बात उसने हाथ अंदर पायजामे में डाल दिया और मैं क्या बताऊ मैं उस मजे के अहसास में डूबने लगा.

"ताऊ तुमसे नफरत क्यों करता है " मैंने कहा

ताई- उसके पास पर्याप्त कारण है

मैं- उसने भी तुम्हे देख लिया था न किसी के साथ

ताई- उसकी नफरत जायज है , मैंने स्वीकार कर लिया है उसकी नफरत को

मैं- किसके साथ देखा था तुम्हे उसने

ताई- तुम्हे जरुरत नहीं जानने की .

मैंने ताई को खींच कर अपनी गोद में बिठा लिया और उसके गालो को चुमते हुए बोला- मुझे हर वो बात जाननी है जो मुझसे छिपी है.

ताई-कुछ चीज़े छिपी रहे तो ही बेहतर होती है .

मैंने अपने हाथ ताई की चुचियो पर रखा और उन्हें दबाते हुए बोला- ठीक है नहीं पूछता पर ये राज़ फिर किसी भी तरह से मेरे सामने नहीं आना चाहिए

ताई- वो मेरी जिंदगी है , उसे कैसे जिया मैंने वो मेरी मर्जी थी , जरुरी नहीं की दुनिया की नजर से देखा जाए, दुनिया की नजरो में ये गलत हो सकता है पर अगर मैं टांगे खोल दू तो क्या सबसे पहले ये समाज ही नहीं चढ़ जायेगा मुझे पर. मैंने तुझे दी , पर इसका मतलब ये नहीं था की मेरी कोई मज़बूरी थी , उसमे मेरी मर्जी थी . बेशक वो गलत था , पर उस छोटे से लम्हे ने मुझे ख़ुशी दी.

मैं- मैं बस चाहता हूँ की तुम खुश रहो , तुम्हारे दामन में दुनिया भर की खुशिया रहे .

मैंने ताई के पैरो को फैलाया और अपने उपर चढ़ा लिया ताई ने मेरे लंड को अपनी चूत पर लगाया और उस पर बैठती चली गयी . ताई की चूत की गर्मी का क्या कहना . वो धीरे धीरे ऊपर निचे होने लगी. घुप्प अँधेरे में बस हमारी साँसे ही चल रही थी. न वो कुछ बोल रही थी न मैं पर हमारे जिस्म एक दुसरे से कह रहे थे वो बात जो बस उन्हें ही मालूम थी .

चुदाई के बाद वो मेरे ऊपर से उठी और पास में बैठ कर ही मूतने लगी. अँधेरी रात में उसकी चूत से टपकते मूत की आवाज सुनना भी एक अजब ही सुख था .

"घर चले अब " ताई ने कहा

मैंने उसका हाथ पकड़ा और कहा- क्या तुम मुझमे पिताजी को देखती हो .

ताई ने मेरी बाहं मरोड़ी और बोली- मेरा इम्तिहान मत ले तू , अर्जुन और मेरा रिश्ता जो था उसे समझने के काबिल नहीं है तू. बस इतना समझ ले मैं काशी का घाट हूँ , मेरे और अर्जुन के रिश्ते को समझने के लिए तुझे गंगा होना पड़ेगा. .......................
 
#37

"ये जीवन अजीब होता है , इन रिश्तो को भूल भुलैया को समझने के लिए सीने में धडकता दिल होना चाहिए , अब देख ले न तेरे मेरे दरमियान जो भी है, उस से मेरी ममता कम नहीं हो जाती, मेरे आँचल की छाँव हमेशा तेरे सर पर छत बन कर रहेगी. " ताई ने मुझे धक्का सा दिया और चल पड़ी घर की तरफ.

ये औरत भी न अपने आप में अजीब थी, छोटे से दिल में न जाने क्या क्या समेटे हुए थी . घर आने के बाद ताई खाना बनाने लगी मैं उसके पास ही बैठ गया .

ताई- ऐसे खामोश क्यों बैठा है

मैं- कुछ नहीं बस , कल के बारे में सोच रहा हूँ

ताई- कल कभी नहीं आता ,

मैं- मेरा कल आएगा जरुर आएगा.

ताई- और क्या होगा उस कल में

मैं- एक घर होगा मेरा घर .

खाना खाने के बाद मैंने आँगन में ही बिस्तर लगाया और सितारों को देखते हुए सोचने लगा. पिछले कुछ दिनों में जो कुछ भी हुआ था मेरी जिन्दगी की चलती फिल्म जैसी हो गयी थी , एक दम से इतने बदलाव आ गए थे की समझना मुश्किल हो रहा था . मेरे पास रीना थी, मीता आ गयी थी मेरी जिन्दगी में . एक मेरी भोर का उजाला थी तो दूसरी मेरे अंधेरो की साथी . बार बार मुझे मीता की कही बात याद आ रही थी की , कुछ नहीं है सिवाय बर्बादी के.

मैं चाचा- चाची के बारे में सोचने लगा. मैंने दो बार उनकी बाते सुनी थी दोनों बार ही उन्होंने हैरत में डाला था मुझे, मुझे ये भी मालूम हुआ था की चाची की ले नहीं पाता चाचा . क्या वो भी ताई के जैसे किसी और संग चुदाई करती होगी. ऐसे तमाम सवालो ने मेरे सर में दर्द कर दिया था . पास रखे जग को मैंने मुह से लगाया और पानी पीने लगा. मेरी निगाह ऊपर चाँद की तरफ थी जो मुझे ही देख रहा था .

सुबह जब मैं उठा तो मौसम कुछ जुदा जुदा था , आसमान में बादल घुमड़ आये थे , करने को कुछ ख़ास नहीं था पर दिल में उमंग थी , आज मेले के बहाने मैं रीना से अपने दिल की बात कह देना चाहता था . दोपहर होते होते वो भी आ गयी. वादे के अनुसार उसने नीला सूट पहना था , क्या गजब लग रही थी वो आज

"ऐसे क्या देख रहा है " उसने कहा

मैं- बड़ी प्यारी लग रही है आज, काला टीका लगा ले, कहीं नजर न लग जाये तुझे

रीना- तू साथ है न फिर क्या फ़िक्र. चल अब और देर मत कर , यही पर दोपहर कर दी तूने.

मैं- सुबह से तू गायब थी और बिल मुझ पर फाड़ रही है .

आपस में हंसी मजाक करते हुए हम और गाँव वालो संग रुद्रपुर के लिए चल पड़े. हवाओ में आज कुछ शोखिया सी थी. जब हवा बार बार रीना के झुमको को चूमती तो न जाने क्यों मुझे जलन होती. ऊँट गाड़ी पर हिचकोले खाते हुए चले जा रहे थे . आँखों के इशारे सीधे दिल तक जा रहे थे . और फिर वो घडी भी आ गयी जब हम मेले से कुछ ही दूर थे. उन ग्यारह पीपलो से थोडा पहले गाड़ी वाले ने हमें उतारा.

रंग बिरंगे खेल तमाशे , जगह जगह छोटी छोटी दुकाने लगी थी , झूले लगे थे.

"वादा याद है न " रीना ने मेरे कान में कहा

मैं- तू भी याद है वादा भी .

मैंने उसका हाथ पकड़ा. और हम मेले में चल दिए.

"आजकल तू न जाने किस निगाह से देखता है मुझे " उसने कहा

मैं- तू ही बता क्या दोष है मेरी निगाहों का

रीना- ये सीधा मेरे दिल में उतरती है .

मैं- पर वो दिल तेरा कहाँ , वो तो मेरा हो चूका

मेरी बात सुनकर रीना का चेहरा गुलाबी हो गया.

रीना- ऐसी बाते ना किया कर, कुछ कुछ होता है

मैं- बता फिर क्या होता है .

रीना- जान कर रोका है बताने को ,

मैं- तेरी मर्जी.

मैंने थोड़ी नमकीन खरीदी और खाते हुए रीना के साथ इधर उधर घुमने लगा. कुल्फी खाने के बाद हम लोग झूला झूलने गए. आज का दिन मेरे जीवन का सबसे बढ़िया दिन था , कम से कम उस वक्त तक तो मुझे ऐसा ही लग रहा था . घूमते-खरीदारी करते हुए समय न जाने कब ढलने लगा था .

रीना- देवता के दर्शन तो कर लेते है

मैं- हाँ चलते है .

हम शिवाले की तरफ जा ही रहे थे की तभी एक दूकान पर मेरी नजर पड़ी.

मैं- आ जरा मेरे साथ .

रीना- अब कहा ले जा रहा है .

मैं- आ तो सही .

मैं रीना को उस दूकान पर ले गया जहाँ पर पायल बिक रही थी .

मैं- काकी, सबसे सुन्दर पायल दिखा जरा.

एक पतली सी डोर वाली पायल पसंद आई मुझे.

काकी- चांदी की है .

मैं- रीना पैर उठा तेरा जरा .

जैसे ही उसने पैर उठाया मैंने पायल पहना दी उसे. वो कुछ कहना चाहती थी पर मैंने उसे रोका.

"एक दिन तूने मेरे लिए अपनी पायल बेचने की बात कही थी , आज मैंने तेरे लिए पायल खरीदी है , " मैंने कहा

रीना- एक लड़की को पायल पहनाने का मतलब समझता है तू

मैं- मुझे समझने की जरुरत नहीं , चल आ दर्शन करने चलते है .

हम शिवाले से थोड़ी दूर ही थे की रीना बोली- "मनीष, बड़ी प्यास लगी है, पानी पीना है "

"तू सीढियों पर बैठ, मैं अभी पानी लेकर आता हूँ " मैंने उस से कहा और पानी लेने चल दिया. मैंने इधर उधर देखा पानी का जुगाड़ दिखा नहीं मुझे, मैं टंकी पर गया पर वो भी सूखी थी. कुछ देर भटकने के बाद मुझे प्याऊ दिखी, मैंने एक लोटा पानी भरा और रीना की तरफ चल पड़ा. जब मैं वहां पहुंचा तो मेरा दिल धक् से रह गया. मैंने देखा .........

मैंने देखा की रीना को चार पांच लडको ने घेर रखा है और एक लड़का जिसकी पीठ मेरी तरफ थी उसके हाथ में रीना की चुन्नी थी . जिसे वो लहरा रहा था एक लड़के ने रीना की बाहं पकड़ रखी थी . उस पल मुझे जो अफ़सोस हुआ , मुझे उन लडको से ज्यादा खुद पर गुस्सा था की मैं उसे छोड़ कर गया ही क्यों. मेरे हाथ से लोटा छूट गया .

"रीना " चीखते हुए मैं उसकी तरफ भागा. रीना ने मेरी तरफ देखा उसका आंसुओ से भरा चेहरा मेरे कलेजे को चीर गया . जिस लड़के के हाथ में रीना की चुन्नी थी उसने मुझे देखा पलट कर वो जोरावर था . मेरे सीने में उसने वो आग जला दी थी जो बुझना मुमकिन थी .

"हरामजादे तेरी ये हिम्मत तू जानता है तूने क्या किया है " मैंने कहा

जोरावर- चोट वही सबसे ज्यादा असर करती है जहाँ पर सही वार किया जाये. जब से मुझे मालूम हुआ तू अर्जुन का बेटा है , मैं जल रहा था , तेरे बाप ने मेरे बाप को मारा था आज मैं अपना बदला पूरा करूँगा.

"तेरी शिकायत मैं हस्ते हस्ते दूर कर देता पर तूने इस लड़की पर हाथ नहीं डाला, तूने मेरे गुरुर को ललकारा है , तेरी हर खता माफ़ थी , पर आज तू भी तेरे बाप के पास जायेगा. " मैंने कहा और जोरावर की तरफ लपका. तभी उनमे से एक लड़के ने मेरे पैर में अडंगी लगा दी मैं गिर गया और गिरते ही जोरावर ने मेरी पीठ पर लात मारी.

"पीठ पर मारा है , सीने पर खायेगा. " मैंने उठते हुए कहा.

दुसरे लड़के ने रीना की बाहं मरोड़ी. मैंने पास की एक गन्ने की रेहड़ी पर से फरसा उठाया और उस लड़के की तरफ फेंका जो सीधा उसके कंधे पर जा लगा. खून का फव्वारा छूट पड़ा. जैसे ही उसकी पकड़ ढीली हुई, रीना दौड़ पड़ी मेरी तरफ और अकार मेरे सीने से लग गयी.

"तुझे रोने की जरुरत नहीं , तेरे आंसू सूखने से पहले मैं आग लगा दूंगा इनको मेरा वादा है तुझसे " मैंने रीना को पीछे किया. तब तक उन लोगो ने हथियार निकाल लिए थी .

मैंने उनमे से एक लड़के की लाठी रोकी और उसकी गोटियो पर लात जमा दी, पर मुझे इन चुतियो की परवाह नहीं थी मुझे बस जोरावर दिख रहा था . उस लड़के के हाथ से लाठी गिरते ही मैंने लाठी उठाई और उसके सर पर दे मारी , सर फूट गया पर मुझे कहाँ परवाह थी एक के बाद एक उसके सर पर वार करते ही गया मैं जब तक की लाठी टूट नहीं गयी. आस पास लोग इकठ्ठा होने लगे थे पर कोई भी बीच में नहीं आ रहा था .

जोरावर ने मेरी तरफ एक पत्थर फेक कर मारा जिसे मैंने बचाया और उसकी गर्दन पकड़ ली.

"मेरी आँखों में देख , तू तो न जाने किस आग में जल रहा था पर मैं तुझे आज इसी जगह पर जला दूंगा. और मुझे विश्वास है की तेरी सांसे इतनी कमजोर नहीं होगी, तू चीखेगा " मैंने उसका गला दबाते हुए कहा. मेरे नाखून उसके गले की नसों को चीर देना चाहते थे . उसकी आँखे बाहर निकलने को मचलने लगी थी . की तभी पीछे से कीसी ने मेरे सर पर कुछ दे मारा. एक पल को मेरा सर चकरा गया . सर से टपकते लहू ने चीख कर कहा की सर फूट गया है मेरा. मेरी पकड़ जोरावर से ढीली हो गयी . मैं पीछे को पलटा ही था की मेरी पसलियों में दर्द भर गया . जिसने मेरा सर फोड़ा था उसने चक्कू घोप दिया था मेरी कमर के ऊपर .

"आह"दर्द से बिलबिला पड़ा मैं . तभी जोरावर ने लात मारी मुझे मैं गिर गया . वो चार लोग टूट पड़े मुझ पर लात पे पड़ती लात ने मुझे दोहरा कर दिया.

"तुझे क्या लगा था , तू मुझे हरा देगा. मैं इंतज़ार में कितना तदपा हु , तू नहीं समझ सकता कुत्ते, आज तेरे लहू से देवता को नहला कर मुझे चैन आएगा. " उसने मुझे मारते हुए कहा .

मैंने अपने हाथ धरती पर टिकाये और खड़ा होते हुए कहा - तू भी झूठा , तेरा देवता भी झूठा. जिस देवता के दरबार में एक मासूम की इज्जत पर कोई भी हाथ डाल दे उस देवता को नहीं मानता मैं. और आज के बाद कोई मानेगा भी नहीं .

खड़े होते हुए मैंने उनमे से एक लड़के को धक्का दिया वो थोडा दूर हो गया और अपने आप को संभालते हुए, मैंने एक की गर्दन मरोड़ दी. पल भर में ही वो धरती पर गिर गया उसके प्राण साथ छोड़ गए उसका. झुकते हुए मैंने वो फरसा उठा लिया और एक और लड़के की पीठ पर वार किया वो चीख पड़ा. ये फरसा मेरे हाथ में होना एक मौका था जिसे मैं चूक नाही सकता था .मैंने बिना सोचे की कहाँ कहाँ लग रही है उसके, वार करने चालु किये और जैसे कसाई किसी बकरे को काटता है वैसे ही उसके टुकड़े करने शुरू कर दिए. मैं पूरी तरह खून में सन गया था .

उनमे से एक लड़का भाग गया और एक के कंधे पर पहले फरसा लगा था वो एक तरफ पड़ा था . रह गए मैं और जोरावर. मैंने फरसा साइड में फेंक दिया.

"आ जोरावर, तुझे मारने के लिए मुझे हथियार की जरुरत नहीं , " मैंने चीखते हुए कहा . एक बार फिर हम दोनों गुत्थमगुत्था हो गए. उसने मेरे सर पर मारा और एक घूँसा मेरी पसली पर जहाँ चक्कू था . मैं दोहरा हो गया . पर यही तो मजा था इस खेल का , खून का नशा क्या होता है उस ढलती शाम को जाना था मैंने . आसमान में बादल कडकने लगे थे . सूरज को अपनी ओट में ले लिया था बादलो ने . कभी वो मुझ पर भारी कभी मैं उस पर . उसने मुझे घुटने पर मारा पर मैं एक पल झुका और तुरंत ही उसे अपने कंधो पर उठाते हुए दूर फेंक दिया. वो पत्थर की सीढियों पर जाकर गिरा. और मैंने उसके सर को सीढ़ी के कोने पर दे मारा . वो डकारा मैंने उसकी बाहं को पीछे किया, कड़क की आवाज आई और जोरावर की चीख गूंजने लगी.

"इसी हाथ से तूने मेरी रीना की चुन्नी को उतारा था न , मैं इस हाथ को ही उखाड़ दूंगा. " मैंने कहा और अपना पैर उसकी बगल पर लगते हुए पूरा जोर लगा कर बाहं उखाड़ दी उसकी. हलाल होते बकरे की तरह मिमियाने लगा जोरावर और उसकी चीख ने जो मुझे सकूं दिया था न मैं लिख नहीं सकता .

"रीना, इधर आ. " मैंने रीना को बुलाया.

"इसी हाथ से इसने तेरा आंचल खींचा था मैंने ये हाथ ही उखाड़ दिया रीना " मैंने कहा

रीना- घर चल मनीष, घर चल

मैं- चलेंगे , पर अभी नहीं अभी तो जोरावर को ये देखना है की मौत कैसी होती है .

रीना- छोड़ दे इसे, तेरी हालत ठीक नहीं है ,

मैं- किसे परवाह है ,

रीना- मैंने माफ़ किया इसे ,

मैं - पर मैंने नहीं .

मैंने जोरावर की दूसरी बाहं पकड़ी और उसे घिसटते हुए देवता की तरफ ले चला.

"तेरे कमजोर देवता को भी तो मालूम हो की अभी इस दुनिया में ऐसे लोग भी है जिन्हें उसके रहमो कर्म की जरुरत नहीं अगर देवता के आँगन में ही ये पाप होने लगे तो मैं उस आँगन को ही मिटा दूंगा " जोरावर के बदन से रिश्ते खून से फर्श लाल होने लगा था .

"आखिरी बार देख ले इस दुनिया को इस देवता को " मैंने कहा और जोरावर की आँख फोड़ दी. उसकी चीखे गूंजने लगी . जितना वो चीखता उतना उन्माद मुझ पर छाता .

"अर्जुन के लड़के छोड़ दे जोरावर को " पीछे से किसे ने कहा

मैंने पलट कर देखा , दद्दा ठाकुर और उसके पीछे न जाने कितने लोग खड़े थे .

मैं- तेरी गांड में दम है तो छुड़ा ले इसे.

ददा- मुझे मजबूर मत कर. तूने शिवाले में खून बहा कर अनर्थ किया है .

मैं- अनर्थ तो तू देखेगा अभी .

दो चार गाँव वाले मेरी तरफ भागे. मैंने तुरंत वो फरसा उठा लिया और जोरावर की पीठ पर वार किया. वो लोग रुक गए .

"आज चाहे सरे रुद्रपुर में आग लगानी पड़े, लाशो के ढेर लग जाये, जोरावर को तो मारूंगा ही मारूंगा और जो कोई भी मादरचोद बीच में आया वो भी मरेगा. " मैंने कहा .

दद्दा- मेरा सबर टूट रहा है

मैं- माँ की चूत तेरी और तेरे सबर की .

वो कहते है न की कभी कभी इंसान जोस में होश खो देता है मेरी जिन्दगी में ये वो लम्हा था , मैंने दद्दा के अहंकार को चोट मार दी थी . पल भर में स्तिथिया बदल गयी थी . मैं अकेला और वो नजाने कितने पर मैने भी सोच लिया था मरना है तो सबको साथ लेकर मरेंगे. एक हाथ से मैं उनसे टक्कर ले रहा था दुसरे से जोरावर को थामा हुआ था , उसे छोड़ देता तो हमारी इज्जत क्या रह जाती.

मेरे वार उन पर हो रहे थे , उनके घाव मुझ पर , बदन से न जाने कहाँ कहाँ से खून बह रहा था , हालत ये थी की या तो मर जाऊ या मार दू. मैं जोरावर को तदपा तडपा कर मारना चाहता था और ये मुमकिन होता नहीं लग रहा था तो मैंने पुरे जोर से उसकी गर्दन पर वार किया और उसकी गर्दन फर्श पर लुढ़क गयी . एक पल के लिए सब कुछ जैसे जाम हो गया .

"जिसे जोरावर चाहिए था वो इस सर को ले जाये " मैंने कहा

ददा- तुझे ये नहीं करना था, नहीं करना था

दद्दा ने तलवार मेरी तरफ फेंकी जो सीधा मेरी जांघ में घुस गयी. और वो सब लोग टूट पड़े मुझ पर . मेरी आँखे खुल नहीं रही थी , आंसू और खून से भीगी थी वो . हर जगह मुझे अँधेरा अंधेरा ही दिख रहा था . तभी किसी ने मुझे पकड़ा और घसीट कर ले गया .

"तुझे क्या लगा था तू जिन्दा यहाँ से चला जायेगा , अब तू भी देख मौत कैसी होती है " ददा ने मुझे खड़ा करते हुए कहा.

"मौत तो आणि जानी है दद्दा ठाकुर, पर मैं ऐसे नहीं मरूँगा ,"मैंने कहा .

ददा ने मुझे लात मारी मैं दूर जाकर गिरा. मैंने हाथ में तलवार लेकर आते देखा उसे मेरी तरफ ............. पर तभी धांय धांय गोलियों की आवाजे आने लगी और सब लोग एक तरफ हो गए.

"बस ददा बहुत हुआ, अब किसी ने भी अगर इसकी तरफ आँख भी उठाई तो मैं मारूंगी दस गिनुंगी एक , " डूबती आँखों से मैंने देखा वो चाची थी जो हाथो में बन्दूक लिए मेरी तरफ चली आ रही थी .

"तो तू भी आ गयी , "ददा ने चाची की तरफ देखते हुए कहा

चाची- कसम खाके गयी थी की मरना मंजूर है पर रुद्रपुर में पैर नहीं रखूंगी, मुझे कसम तोड़ने पर मजबूर होना पड़ा. और ये लड़का जो वहां पड़ा है मेरा बेटा है , बेटे पर आंच आई तो माँ को तो आना पड़ेगा न , और माँ का कलेजा फटा न तो फिर ये गाँव क्या माँ दुनिया जला दे. किसी की भी नसों में ये गुमान जोर खा रहा हो की वो मनीष को नुक्सान पहुंचा देगा , मेरे सामने आये .

ऐसी ख़ामोशी छाई थी वहां पर जैसे कोई हो ही न, आसमान से बूंदे बरसने लगी थी . बरसात की बूंदों ने मेरे चेहरे को धोया तो मैंने साफ साफ देखा .

ददा- गलती कर रही है तू संध्या , तू पहले भी गलत थी तू आज भी गलत है .

चाची- मुझे तब भी फक्र था आज भी फक्र है

ददा- काश तू मेरी बेटी न होती

चाची- मैं तेरी बेटी कभी नहीं थी .....

चाची मेरे पास आई उसने रीना से मुझे उठाने को कहा और मुझे वहां से ले चली. मेरी आंखो में आंसू थे, रीना की आँखों में आंसू थे, आसमान रो रहा था .

"सोलह साल पहले आसमान भी रोया था , " मेरे कानो में उस काबिले वाले बाबा के शब्द गूँज रहे थे . .....................
 
#38

बरसात की बूंदों से लिपटे मेरे खून को प्यासी धरती अपने होंठो से लगा कर पी रही थी . मेरी बाहं को थामे चाची मुझे अपने साथ लेकर शिवाले से बाहर आई . पर कुछ तो था जो मेरे कदमो को रोक रहा था, ऐसा क्या था मेरा उस जगह पर जो मेरे पैर उसे छोड़ने को तैयार नहीं थे. मैंने अपना हाथ झटका चाची के हाथ से .

"हॉस्पिटल लेके चल रहे है तुझे " चाची ने कहा .

मैं- तुम जाओ.

चाची- तुम्हे लेके जाउंगी, हालत देखो अपनी, तुंरत चिकित्सा की जरुरत है तुम्हे.

मैं- मैंने कहा न तुम जाओ. रीना को ले जाओ अपने साथ . उसकी सुरक्षा जरुरी है .

चाची- सुरक्षित है वो . और तुम भी

मेरा बदन टूट रहा था , बेहोशी छा रही थी, मैं अपने अंतर्मन से लड़ रहा था . मैं वही एक दुकान के पाइप का सहारा लेकर बैठ गया .

रीना मेरे पास आई- मनीष, घर चल, मेरा कहा मान , घर चल मेरे लिए चल , तेरी हालत ठीक नहीं है , डॉक्टर के पास चल, तुझे कुछ हुआ ना तो फिर देखना

मैंने उसका हाथ पकड़ा और काह- चल चलते है, सहारा दे जरा

उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपनी तरफ खींचा जैसे ही उसकी बाँहों का सहारा मिला फिर और कुछ याद नहीं रहा . क्या हुआ क्या नहीं कुछ खबर नहीं . बाहें फैलाये अँधेरा तैयार खड़ा था मुझे अपने आगोश में पनाह देने को . पर इस साले दिल ने भी जिद की हुई थी .

इक तरफ आसमान बरस रहा था एक तरफ दिल जल रहा था . मैं न जाने क्या कर देना चाहता था . पर हालात मेरे बस में नहीं थे, मुझे रीना की , चाची की आवाजे सुन तो रही थी पर वो क्या कह रहे थे क्या मालूम. मैं डूब रहा था ,

जब मुझे होश आया तो मैंने खुद को बिस्तर पर पाया. मेरे बदन को पट्टियों ने ढक रखा था , सर में दर्द सा था , हथेलियों ने नलकिया लगी थी . कमरे में पीला बल्ब जल रहा था , शायद ये रात का वक्त था . मैंने इधर उधर नजरे घुमाई , पास में एक दो बेड खाली थे, मैं किसी हॉस्पिटल में था . आसपास कोई दिख नहीं रहा था , मैंने उठने की कोशिश की पर शरीर साथ नहीं दे रहा था .

थोड़ी मेहनत करके मैं बैठा हुआ. हाथ से नलकी निकाली और अपने पैरो को निचे फर्श पर रखा. गैलरी में आकर देखा की बाहर बरसात हो रही थी . मैं वहीँ पर एक बेंच पर बैठ गया और बारिश देखने लगा. रात की बरसात का भी अपना ही सुख होता है , गीली मिटटी की सौंधी खुसबू मेरे मन को महका रही थी .

"ये बरसाते भी न " उसनें मेरे पास बैठते हुए कहा.

मीता को देखते ही मैं खुश हो गया.

"तुम " मैंने कहा

"और कौन होगा भला " उसने चाय की चुस्की लेते हुए कहा .

मैं मुस्कुरा दिया.

मीता- इतना बड़ा काण्ड करके मुस्कुरा रहे हो. और क्या जरुरत थी वो सब करने की अभी हालत देखो खुद की जानते हो कितनी मुश्किल से जान बची है तुम्हारी. मैं बहुत नाराज हूँ तुमसे

मैं- तेरी नाराजगी सर आँखों पर .

मीता- जब मुझे मालूम हुआ तो दिल धक् से रह गया , तुम्हे कुछ हो जाता तो .

मैं- जब तू साथ है तो मुझे क्या हो सकता है

मीता- दिल करता है एक थप्पड़ लगाऊ तुझे, जिन्दगी है ये , कोई फिल्म नहीं जो तू बहला देगा मुझे.

मैं- थोड़ी चाय दे मुझे

मीता- रुक मैं लाती हूँ

मैं- ये कप ही दे दे, ऐसा लगता है की बरसो से कुछ खाया पिया नहीं है .

मीता- झूठा है ये कप मेरा

"क्या झूठा , क्या तेरा मेरा " मैंने उसके हाथ से कप लेते हुए कहा .

वो बस मुझे देखती रही .

मैंने चाय की चुस्की ली.

"बरसात रुकते ही घर चलेंगे." मैंने कहा

मीता- पागल हुआ है क्या चोदह दिन में तो आज आँखे खोली है , और होस आते ही ये चुतियापे चालू.

मैं- इतने दिन बीते

मीता- और नहीं तो क्या जब तक तू पूरी तरह ठीक नहीं हो जाता इधर ही रहेगा. तू आराम कर मैं जरा मंदिर होकर आती हूँ, मन्नत मांगी थी तेरे होश में आते ही परसाद चढाने जाउंगी.

मैं- इतनी बरसात में कहाँ जायेगी, और फिर ये काम कल भी तो हो सकता है .

मीता- इस बरसात का क्या, कौन जाने कब थमेगी .ये जरुरी है क्या पता कल कोई दुआ कबूल हो न हो.

मैं- ठीक है , पर ये बता फिर कब मिलेगी.

मीता- तू हर बार ये बात क्यों पूछता है ,

मैं- ठीक है नहीं पूछता.

तभी मैंने सामने से ताई को आते देखा, उसके हाथ में कुछ पैकेट थे. उसने जैसे ही मुझे बैठे देखा लगभग दौड़ ही पड़ी हो . बस मुझे देखती रही वो कुछ न बोली, उसकी आँखों में पानी था.

मीता- ताईजी आप ही संभालो इसे, मैं चलती हूँ

"खाना लाई हूँ खाकर जाना बेटी " ताई ने कहा

मीता- अभी मंदिर जाना है बाकि काम बाद में .

मीता के जाने के बाद ताई मेरे पास बैठ गयी .

मैं- नाराज है क्या .

ताई-मुझे क्यों नाराजगी होगी, तू अपनी मर्जी का मालिक है तुझे जो करना है वो करके ही रहेगा.

मैं- समझता हूँ तेरे जज्बातों को पर जो हुआ उसमे मेरा दोष नहीं

ताई- छोड़ उस बात को , आराम कर, बेड पर चल, ऐसे क्यों उठा तू और वो हरामजादी नर्स कहाँ गयी , तुझे अकेला छोड़ के उसकी खबर लेती हूँ मैं .

मैं- शांत हो जा. मेरे सर पर तेरा आँचल है , तबियत का क्या है आज नहीं तो कल ठीक हो ही जानी है .

ताई- पर जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था . अगर संध्या ठीक समय पर नहीं पहुँचती तो न जाने क्या अनर्थ हो जाता.

मैं- मेरी जान इतनी सस्ती नहीं की कोई ऐरा गैर ले ले.

ताई- पूरा गाँव था वहां पर, गाँव के आगे किसका जोर चलता है

मैं- चाची का जोर तो चला न

ताई- तू आराम कर. मैं डॉक्टर को बुला कर लाती हूँ

मैं- बात को मत बदलो. मुझे मालूम हो गया है की चाची दादा ठाकुर की बेटी है .

ताई- इस बात से कुछ खास फर्क नहीं पड़ता. फर्क पड़ता है इस बात से की तूने दुश्मनी की आग भड़का दी है . दोनों गाँवो में एक दुसरे के यहाँ आने जाने की मनाही हो गयी है , तेरी इस हरकत का खामियाजा दोनों तरफ के लोग भुगतेंगे.

मैं- कैसी मनाही मीता तो अभी थी ही न इधर.

ताई- छुप कर आती है वो. मैंने मना किया उसे पर वो भी तेरी ही साथी है , तू सुने तो वो सुने. तेरे साथ साथ उसकी फ़िक्र भी होने लगी है मुझे अब.

मैं- रीना कैसी है

ताई- ठीक है, उस दिन से गुमसुम सी रहती है , उसकी हंसी न जाने कहाँ खो गयी है .

मैं- कल लाना तू साथ उसे.

ताई- रोज ही आती है वो .

मैं- उसकी सुरक्षा का इंतजाम करो

ताई- मैंने कर दिया है पहले ही .

हम दोनों बात कर ही रहे थे की तभी मुझे ऐसा लगा की थोड़ी दूर एक शक्श कम्बल ओढ़े खड़ा हमें ही घुर रहा हो. हो सकता था की ये मेरा वहम हो. पर इस मौसम में कम्बल ओढना थोडा अजीब था. एक पल को मेरी आँखे उसकी आँखों से मिली और वो दूसरी तरफ मुड कर जाने लगा. मेरा शक यकीन में बदल गया .


"कम्बल वाले रुक जरा " मैंने कहा और उसकी तरफ भागा पर मैं ये भूल गया था की............................................
 
#39

पर मैं ये भूल गया था की अभी मेरी हालत ठीक नहीं है , ये तो शुक्र है की ताई ने वक्त पर थाम लिया मुझे वर्ना और चोट लग जानी थी .

"क्या कर रहा है तू, " ताई ने मुझे डांटा और वापिस बेड पर ला पटका. ताई के तानो से ज्यादा मेरा ध्यान उस आदमी पर था , वो भागा क्यों. रात भर मैं ये ही सोचता रहा .

सुबह नर्स पट्टी बदलने आई तो मुझे मालूम हुआ की सर पर बारह टाँके आये थे और पसलियों को बहुत जायदा नुक्सान हुआ था , जिसकी भरपाई ना जाने कब तक होगी, होगी या नहीं होगी. मैं रीना का इंतज़ार करता रहा पर वो आई नहीं, शाम होने को आई थी , मीता भी नहीं आई. कुछ दिन ऐसे ही बीते , हालत में थोडा सुधार महसूस होने लगा था . इस बीच मैंने नोटिस किया की चाची मुझे देखने नहीं आई थी , सिर्फ ताई ही थी जो दिन रात मेरे पास रहती थी . मैं रीना के बारे में पूछता पर वो ये ही कहती की वो ठीक है , जल्दी ही आयेगी.

मैं बस बरसते सावन को देखता रहता था, मैंने सोचा तो था की इस बार का सावन अनोखा होगा, जिसमे मोहब्बत की बारिश होगी और भेगेंगे मैं और रीना . बेशक मेरी हालत ठीक नहीं थी पर अब मुझे कोफ़्त होने लगी थी इस हॉस्पिटल के कमरे से . और एक ऐसी ही रात, मैंने पाया की ताई गहरी नींद में पड़ी थी, पास की कुर्सी पर चाचा ऊंघ रहा था. मैं हौले से उठा और दोनों को चेक किया. मैंने टेबल से चाचा की गाड़ी की चाबी उठाई और धीरे धीरे कमरे से बाहर खिसक गया. भोर का समय नजदीक था पर बारिश घनघोर थी .

कमजोर कदमो से चलते हुए मैं खुद को बारिश से बचाते हुए मैं चाचा की गाड़ी तक आया और उसे उड़ा ले चला. मैं बस उस चेहरे का दीदार करना चाहता था जिसके बिना मैं कुछ नहीं था . भोर की पहली किरण और चमकती बरसात अपने आप में गजब ढा रही थी . मैंने गाड़ी रोकी , और सर पर हाथ रखते हुए , मनदिर की सीढिया चढ़ने लगा.

बाबा के आगे दिया जलाये , शांत बैठी थी वो. इतनी शांत की दिल किया ये वक्त थम जाये उसके और मेरे लिए. अम्रता प्रीतम ने कहा था की उसे देखा ऐसा जैसे कोई मजदुर के हाथ में उसकी रोज़ी रख दे. मेरा हाल भी कुछ वैसा ही था .

"कैसी है ,मेरी सरकार " मैंने हौले से उसे पुकारा.

आहिस्ता से उसने अपनी आँखे खोली. नजरो से नजरे मिली. उसकी आँखों से जो आंसू टपके वो धरती पर नहीं सीधा मेरे कलेजे पर आकर गिरे.

"आ गया मैं " मैंने उस से कहा.

वो मरजानी कुछ नहीं बोली, बस आकार चुपचाप मेरे सीने से लग गई. मेरे माथे पर चुम्बन अंकित किया उसने.

"बस कर, ये आंसू बड़े कीमती है इन्हें मुझ जैसे के लिए बर्बाद मत कर." मैंने उस से कहा.

रीना- मेरा सब कुछ तुझसे है . तेरे बिना ये दिन कैसे बीते है मुझ पर मैं जानती हूँ या मेरा रब जानता है.

मैं- और मेरा क्या, कितना इंतज़ार किया था तेरा मैंने .

रीना- संध्या मामी ने मना किया था हॉस्पिटल आने को, बोली की तुझे उस हालत में देख नहीं पाउंगी. और मेरे दिल पर भी बोझ था

मैं-कैसा बोझ

रीना- सब मेरी गलती है , मैं वहां नहीं जाती तो ये सब होता ही नहीं

मैं- तेरी कोई गलती नहीं थी उसमे, तू मेरा मान है , मेरे होते किसकी मजाल जो आँख भी उठा सके मेरी सरकार की तरफ

रीना- तुझे कुछ हो जाता तो.

मैं- कुछ हुआ तो नहीं न . थोड़ी बहुत चोट है देर सबेर ठीक हो ही जानी है . और अब से तू अकेले कहीं नहीं आयेगी-जाएगी तेरी सुरक्षा की व्यवस्था मैं जल्दी ही करूँगा.

रीना- उस दिन के बाद से हमेशा कोई न कोई होता है मेरे साथ .

मैं- पर अभी तू अकेली ही थी न यहाँ पर

रीना- अभी नहीं हूँ अकेली.

मैंने देखा दिन निकल आया था बारिश थोड़ी मंद पड़ने लगी थी . मैंने रीना को साथ लिया और घर आ गए. चाची ने मुझे देखा और खूब गुस्सा किया, उसके अनुसार मुझे हॉस्पिटल से ऐसे ही नहीं आना चाहिए था . मैं सुनता रहा उसकी .

"चाची तुमने कभी बताया नहीं तुम दद्दा ठाकुर की बेटी हो " मैंने कहा

चाची- हर कोई किसी न किसी की बेटी होती ही हैं ये कोई विशेष बात नहीं

मैं- मुझे तुमसे कुछ बात करनी है

चाची ने एक नजर रीना की तरफ डाली और बोली- अभी नहीं , तुम लोग बैठो, मैं मिलती हूँ बाद में .

उसका यूँ जाना मुझे ठीक नहीं लगा. मैं बिस्तर पर लेट गया . रीना मेरे पास बैठ गयी .

मैं- बोल कुछ ऐसे खामोश क्यों है.

रीना- आजकल ख़ामोशी से दोस्ती सी हो गई है मेरी .

मैं- कहा न तुझसे, उस बात का मलाल मत रख , तुझसे किसी ने कुछ कहा क्या

रीना- नहीं, पर लोगो की नजरे सवाल करती है मुझ से

मैं- लोगो को मैं देख लूँगा.

रीना- मुझे बस तुम्हारी फ़िक्र है .

मैं- और मुझे तेरी . प्यास सी लगी है थोडा पानी पिला जरा

रीना उठी और झुक कर मटके से पानी भरने लगी तभी मेरी नजर उसके गले पर पड़ी, और मैं हैरान रह गया . उसके गले में वो ही हीरे वाला थागा था . हीरे का रंग उसके गेहुंगे रंग में जैसे घुल सा गया था . लाल-काले डोरे में गूंथा हुआ हीरा रीना के गले में बड़ा प्यारा लग रहा था.

"पानी " उसने कहा .

मैंने उसके हाथ से गिलास लिया और घूँट भरे.

रीना- ऐसे क्या देख रहा है .

मैं- ये डोरा अच्छा लग रहा है तुझ पर

रीना- तेरी निशानी, उस दिन बेहोश होने से पहले तूने ही तो इसे मेरे हाथ पर रखा था . रुक अभी उतार कर देती हूँ तुझे

मैं- नहीं रे, पहने रख जंच रहा है तुझ पर .

तभी रीना को किसी ने बाहर से आवाज दी और वो चली गयी . पर मेरे लिए सवाल छोड़ गयी. जिस डोरे को मैं नहीं पहन पाया. उसे बड़ी आसानी से अपने गले में सजा रखा था रीना ने, मेरी आँखों के सामने उस कागज़ पर लिखे शब्द घूम रहे थे जिस पर लिखा था , इसका बोझ उठाना बड़ा मुश्किल है .

पर जो मेरे लिए मुश्किल था वो रीना के लिए आसान कैसे . सोचते सोचते कुछ देर के लिए मेरी आँखे बंद हो गयी.
 
#40

आँख खुली तो दोपहर बाद का समय था ,मैं कमरे से बाहर आया तो देखा की ताई और चाचा भी आ चुके थे , पर उन्होंने मुझे कुछ भी नहीं बोला. शायद चाची ने उन्हें मना किया हो. पर मुझे चैन नहीं था , उस हीरे की गुत्थी ने मुझे जैसे पागल कर दिया था चाची ने मेरी बात को पकड़ लिया और पूछा- क्या परेशानी है तुम्हे

मैं- तुमसे बात करनी है

चाची- मेरे पास तुम्हारे सावालो के जवाब नहीं है

मैं- तो ठीक है फिर, मैं अपने जवाब तलाश कर ही लूँगा.

चाची- ये तेरी जिद है न , तुझे ले डूबेगी एक दिन

मैं- क्या फर्क पड़ता है .तुम दद्दा ठाकुर की बेटी हो तुम छिपा सकती हो , तो मैं भी अपनी जिद संग रह लूँगा

चाची- पुरे गाँव को मालूम है मैं दद्दा ठाकुर की बेटी हूँ अब तुझे ही नहीं मालूम तो मेरा दोष नहीं. और अब ये बीती बात हुई मुझे रुद्रपुर छोड़े एक जमाना हुआ.

मैं- क्यों छोड़ा आपने रुद्रपुर

चाची- कभी कभी मुझे लगता है सारे चूतिये मेरी ही तक़दीर में है, मेरी शादी हुई थी तेरे चाचा से तो रुद्रपुर छोड़ना ही था मुझे .

मैं- मेरी दिलचस्पी उस राज में है की आखिर क्या वो बात थी जिसके कारन मेरे पिता ने वो काण्ड किया.

चाची- तेरी क्या मज़बूरी थी जो तूने जोरावर को मारा, हर दिन कोई न कोई लड़की कहीं न कहीं तो छिड ही रही होती है न. हर कोई जिसे भी मौका मिलता है वो औरत को मसलने के लिए तैयार ही होता है न . इसमें कोई नयी बात नहीं है . और मेरी एक बात को अच्छे से समझ ले कुछ चीजे बस हो जाती है , उन पर किसी का जोर नहीं होता. और गड़े मुर्दे उखाड़ने से कुछ नहीं मिलता सिवाय सड़ांध के

मैं- तुम मेरे पिता के बारे में कुछ जानती थी न

चाची- सारी दुनिया जानती थी जेठ जी के बारे में

मैं- क्या उन्होंने तुमसे ऐसा कुछ कहा था जो तुम्हे ठीक नहीं लगा हो

चाची- हां,

मैं- क्या बताओ मुझे

चाची- यही की मेरा लड़का बड़ा होकर चुतिया बनेगा , तुम्हे इसका चुतियापा ठीक करना है .

मैंने गुस्से से घूरा चाची को .

चाची- और क्या कहूँ फिर , मान ले तुझे अगर मालूम भी हो गया की जेठ जी ने उन लोगो की हत्या क्यों की थी तो तू क्या कर लेगा, क्या तू उन परिवारों के दुखो पर मरहम लगा पायेगा. नहीं, न . बल्कि तूने तो और गहरी खाई खोद दी.

मैं- जोरावर ने रीना पर हाथ डाला था .

चाची- तो क्या दुनिया में एक ही रीना है , और किसी की बहन -बेटी भी रीना जैसी ही होंगी न उनके लिए. क्या मालूम जेठ जी ने भी रुद्रपुर में कोई ओछी हरकत की हो.

मैं- ये नहीं हो सकता

चाची- क्यों नहीं हो सकता, दुनिया भर के मर्दों के पायजामे की गांठे बड़ी कच्ची होती है , तराजू को बराबरी पर लाकर देख दुनिया को . ये दुनिया वैसी नहीं जैसी हम सोचते है .

मैं- मेरे पिता ऐसे नहीं हो सकते

चाची- क्यों नहीं हो सकते,

मैं- क्योंकि मैं कह रहा हूँ

चाची- और कौन है तू. मुझे हैरानी होती है किस घमंड में जी रहा है तू, तेरी खाल उतार लेनी थी दद्दा ठाकुर ने, अगर मैं वहां नहीं पहुँचती तो . बित्ते भर का छोकरा गाँव से पंगा लेगा. अरे देख खुद को , क्या औकात है तेरी , जब देखो अर्जुन का बेटा अर्जुन का बेटा. कोई महानता की बात नहीं है ये, वैसे भी लोग जो अपने बाप का नाम साथ लेकर जीते है कुछ खास कर नहीं पाते जिन्दगी में, तेरे चाचा को ही देख ले. तू मनीष है, मनीष बन कर जी .

चाची की बाते मुझे बड़ी गहरी चोट पहुंचा रही थी .

चाची- मैं तेरी दुश्मन नहीं हूँ, तू चाहे जो भी सोच मेरे बारे में, तुझे कठोरता से पालना मेरी जरुरत थी ताकि तू एक मजबूत इन्सान बने, तू हर उस चीज़ का मोल समझे जो तेरे पास है . बेशक तुझे जनम नहीं दिया पर मेरा खुदा जानता है मेरी ममता की असलियत, इसलिए तुझे बार बार कहती हूँ की गड़े मुर्दे मत उखाड़, आने वाले कल के उजाले को देख.

चाची ने अपना स्टैंड क्लियर कर दिया था . पर मेरे दिमाग में कुछ और ही चल रहा था . न जाने क्यों मेरा मन कह रहा था की चाची पर विशवास करना गलती होगी. ऐसे ही उधेड़बुन में थोडा वक्त और बीता, हर शाम, दोपहर मैं रीना के साथ होता. मेरी हालत में भी काफी सुधार था ज़ख्म भरने लगे थे बस पसलियों को छोड़कर.

इस बीच मीता एक बार भी नहीं आई थी मुझसे मिलने. या शायद उसने घर पर आना उचित नहीं समझा था . पर ऐसी ही तो थी वो अपनी मर्ज़ी की मालिक. हवा के झोंके सी . मैं बार बार रीना के गले में झूलते उस हीरे को देखता , जैसे वो मुझे चिढ़ा रहा हो. इस बीच मुझे उस जमीन का ध्यान आया जिस पर मैं फसल उगाना चाहता था . यही सोच कर मैं उस दोपहर को जमीन की तरफ निकल गया .

बारिस के कारण कीचड फैला हुआ था .गाड़ी से उतरने के बाद मैं आराम से चलते हुए जमीन पर पहुंचा, देखा की वहां पर एक कमरा और बनवा दिया गया था , शायद ये ताई का काम था . ठंडी हवा चल रही थी जिस से गीली मिटटी की खुशबु दूर दूर तक फैली हुई थी . मेरा दिल तो कर रहा था की अभी के अभी रुद्रपुर जाकर मीता से मिल लू. पर फिलहाल इस ख्याल को टाल देना ही ठीक था.घूमते घूमते मैं बावड़ी पर गया . जो पानी से लबालब भरी थी .

मैंने कपडे उतारे और बावड़ी में घुस गया. इतना शीतल अहसास मुझे बरसो बाद ही मिला हो शायद. मैंने दूर झाड़ियो के बीच से मीता को आते हुए देखा.हमेशा के जैसे बगल में झोला टाँके. उसने भी मुझे देख लिया था , चाल में आई तेजी ने बता दिया था मुझे. कुछ ही देर में वो बावड़ी पर थी.

मैं- कितने दिन हुए , तू आई नहीं मिलने.

मीता- अभी आई तो सही.

मैं- घर पर आ सकती थी न

मीता- वैसे ही नहीं आई

मैं- किसी ने कुछ कहा क्या तुझसे

मीता- नहीं तो , ऐसी बात होती तो मै यहाँ रोज थोड़ी न आती .

मैं- रोज़

मीता- यहाँ आकर ऐसा लगता है की जैसे तुझसे मिल लिया हो.थोड़ी बाते तेरी ताई से कर जाती हूँ . जी लगा रहता है.

मैं- कम से कम ताई ही बता देती मुझे.

मीता- मैंने ही मना किया था क्योंकि फिर तू रोज़ यहाँ आने की जिद करता, मैं चाहती थी की पहले तू ठीक हो जाये.

मैं- इतनी फ़िक्र किसलिए

मीता- दोस्ती की है, निभानी तो पड़ेगी न. और तू भी निकल पानी से , जखम अभी भरे नहीं है और हरकते देखो

मैं- तू भी आजा पानी में , पानी में आग लग जाएगी

मीता- कहीं और न लग जाए आग.

मैं- आजा न

मीता- फिर कभी , चाय बनाती हु आजा तब तक.

जब तक मैं पहुंचा मीता ने चूल्हा सिलगा लिया था . मैंने चारपाई बाहर निकाल ली

मैं- तू कहे तो इधर तार बंदी करवा दू.

मीता- खेत-खलिहान खुले ही ठीक लगते है , और फिर हमें भला किसका डर

मैं- बस सुरक्षा के लिए

मीता- जो होना है वो होकर ही रहेगा, नसीब में लिखे को कौन टाल सकता है , और फिर तू साथ है तो कोई फ़िक्र कैसे हो सकती है.

मैं- सो तो है

उसने चाय दी मुझे और बगल में आकर बैठ गयी.उसके बदन की खुशबु मुझे अच्छी लग रही थी .

मैं- मुझे लगता है की संध्या चाची कुछ न कुछ छिपा रही है मुझसे

मीता- क्या भला

मैंने मीता को अपने मन की बात बताई.

मीता- ठीक ही तो कहती है, गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा.

मैं- मीता मुझे तेरी मदद चाहिए. मैं जानता हूँ की तुझे खाली सितारे पढने ही नहीं आते, बल्कि और कुछ भी आता है . मेरी एक मुश्किल आसान कर दे

मीता- क्या

मैं- ऐसा क्या बोझ हो जिसे हम अंगूठी, चेन , पायजेब आदि में रख सके.

मीता- क्या बोला तू

मैंने अपने शब्द फिर से दोहराए.

मीता- बात समझ नही आई पर तूने कही है तो गहरी ही होगी.

मैं- क्या संध्या चाची की वजह से हमारे परिवारों में दुश्मनी हुई थी

मीता- नहीं रे, बल्कि शादी तो बड़ी धूमधाम से हुई थी ऐसा सुना मैंने .पर एक बात और सुनी थी मैंने

मैं- क्या. ..................................
 
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