मैं ब्रश कर ही राह था.इतने में सोई रोज़ का चेहरा देखा.बदल गाराज़ रहे थे..एक बार मैंने ब्रश रोकते हुए सोचा क्यों ना रोज़ा का मुखहोटा उतारके देखा जाए आख़िर वो है कौन? लेकिन मेरे ज़मीर ने मुझे इस बात की गवाह नहीं किया.और मैं फिर अपने काम में मलिन हो गया
सुबह 6 बजते बजते ही.जेल से जावेद हूसेन को निकाला गया उसे आज कलकत्ता के सेंट्रल जेल में शिफ्ट किया जा रहा था.साथ में पुलिस की दो जीप थी.जेल के पास वाले जंगलों के पादो के सबसे बारे लत्टड पे निशानेबाज़ मुस्कराए चड़ा हुआ था.ऊसने बाइनाक्युलर से जावेद हूसेन और बाकी पुलिस कर्मियो को देखा की उसे वन पे सवार किया जा रहा है निशानेबाज़ ने फौरन खलनायक को कॉल किया
खलनायक सिगरेट सुलगता हुआ फोन उठता है
निशानेबाज़ : वो निकल रहा है
खलनायक : काम तमाम कर दो उसका
निशानेबाज़ : इसे सर (इतना कहते हुए निशानेबाज़ अपनी तीर को आईं पे लेता है ऊस्की एक ही निगाह से वो जावेद हूसेन को घूर्रते हुए मुस्कुराकर देखता है और फिर अपना तीर चोद देता )
स्ररर स्ररर करता हुआ तीर सीधे हवा में उड़ते हुए सीधे जावेद हूसेन के सीने के आर पार घुस जाती है.."उग्घ"..साँस खींचने तक का वक्त मिलता जावेद हूसेन को और वही धायर हो जाता है पुलिस में हड़कंप मच जाती है.पुलिस इधर उधर देखने लगती है लेकिन हमला करीब 50 में दूरी से हुआ था..इसका अंदाज़ा तक पुलिस नहीं लगा पति
जल्द ही पेड़ की टहनियो से कूदते हुए निशानेबाज़ फौरन अपनी बाइक पे बैठ जाता है..लेकिन तभी पुलिस की कर्मियो की निगाहों में वो आ जाता है पुलिस का एक झुंड उसके पीछे लग जाता है.निशानेबाज़ अभी बाइक को फुरती से निकल ही पता इतनें आइन काला लंड वहां पहुंच जाता है और अपनी ट्रक से पुलिस की जीप को ढलान के ऊपर से टक्कर मर के गिरा देता है जीप धमाके के साथ उड़ जाती है और पुलिस का झुंड मौके पे ही मारा जाता है
रात का तूफान कब का थाम चुका था? और सुबह का सूरज भी निकल चुका था.सुबह 10 बज चुके थे.त्रिंग्ग त्रिंग्ग करके मेरा फोन बज उठा.फिर एक बार रिंग हुई नींद इतनी गहरी थी की उठ ही नहीं पा रहा था.एक बार उठके अपने से लिपटी रोज़ को देखा जिसके बाल बिखरे हुए थे सूरज के चाव में कैसी चमक रही थ्िवो उसके आंखें बंद.ऊस्की गहरी सांसों की आवाज़.उसका एक हाथ मेरे पेंट पे..मैंने उसे हल्के से हटाया और हमारे ऊपर की सफेद चादर हटाई.मैं नंगा ही उठ बैठा.वक्त 10 बज चुका था.जल्दी से पास रखी बजती फोन को उठाया
कमिशनर : इंस्पेक्टर देवश कहाँ हो तुम?
देवश : सो..र्रयी सर वो कल रात की गश्त ज्यादा लगा ली जिसे वजह से नींद नहीं आई बस अभी उठा हूँ सर कहिए
कमिशनर : मैं तुम्हारे शहर आया हूँ तुम्हारी गैर मौज़ूदगी देखकर मुझे बहुत बुरा लगा जल्द से जल्द पे.से पहुंचे.फौरन जावेद हूसेन को किसी ने मर डाला है
मेरी मीठी नींद और यादें एक पल में टूट गयी जब मैं एकदम से जागा सर की बात सुनकर.मैंने फौरन हामी भरते हुए फोन रखा.अफ रोज़ अब भी गहरी नींद की आगोश में थी उसे उठना संभव नहीं था मैंने फौरन जैसे तैसे तैयार होकर अपनी वर्दी पहनी और रोज़ के लिए एक खत लिख दिया.और उसके माथे को छू के बिस्तर पे ही खत रखते हुए जल्दी से ख़ुफ़िया घर से बाहर निकाला..जीप स्टार्ट की और फौरन थाने की ओर रवाना हुआ
थाने में पहुंचते ही.पता चला कमिशनर साहेब सर्क्यूट हाउस में तहरे है.वही मुझे बुलाया है दोपहर में.तो साले ने अभी क्यों हड़बड़ा दिया? थोड़ा सा नाश्ता किया और फिर उसी वक्त ही सर्क्यूट हाउस पहुंचा.बागान में कमिशनर एक आदमी के साथ बैठा हुआ था जो ब्ड के वर्दी में दिख रहा था.दोनों चाय की चुस्किया ले रहे थे मुझे आवाज़ दी और अपने पास बुलाया.बगीचे के दूसरी गुलबो में माली पानी डाल रहा था.ऊसने मेरी ओर एक बार नज़र फहीराई
देवश : सर (मैंने सल्यूट मारी और फिर उनके इजाज़त से बैठा)
कमिशनर : आओ आओ इनसे मिलो ये है बांग्लादेश के सुपेरटीएँडेंट ऑफ पुलिस उस्मान ख़ान.ये हमारे शहर आए हुए है एक बहुत ही जरूरी खबर देने इंटररपोल से पता लगाया गया की आज ही जावेद हुस्सियान को मर दिया किसी ने
देवश : ओह नो सर मैंने तो उसे अभी हाल ही में अरेस्ट !
कमिशनर : जी हाँ उसी आदमी का कत्ल हुआ
इससे पहले कमिशनर कुछ और बोलता.वो सुपेरिटेंडेंट उस्मान बोलने लगा.
उस्मान : जी सही फरमाया आपने जावेद हूसेन ब्ड का मोस्ट वांटेड क्रिमिनल था जिसे आप लोगों ने गेरफ़्तार किया उसे सेंट्रल जेल से हमारे देश में ले जा रहा था.और उसे मारने वाला कोई और नहीं खलनायक है
देवश : ख..अल्नायककक ये कौन्ण है?
कमिशनर : दरअसल बांग्लादेश दुबई पाकिस्तान में ड्रग्स की अगर कोई सबसे ज्यादा तस्करी करता है तो वॉ ये खलनायक है इसकी आजतक कोई पिक्चर पुलिस के पास नहीं है बारे से बारे ख़ुफ़िया एजेन्सी इसके पीछे लगे हुए है जो भी इसके टे तक पहुंचा उसे मर गिराया.आज सुबह करीब 6:20 के लगभग जावेद हूसेन को इसी के आदमी ने जान से मर गिराया..हमने उसका पीछा किया तो हमारी पूरी एक पुलिस फौज जीप के साथ खाई से नीचे गिरके धमाके के साथ उड़ गयी
देवश : ओह माइ गॉड ये केस तो बहुत सीरीयस है पर ये खलनायक यहां?
कमिशनर : जाहिर है इसने जावेद हुस्सियान के लिए यहां पाओ रखा है..लेकिन खबरियो से पता चला की इनकी बारे बारे माफिया से दो दिन पहले रात को मीटिंग हुई थी.वहां से भी हुम्हें जावेद हूसेन के लोगों की तीन लाशें मिली.उसका माल पकड़ा गया है और वो काफी गुस्से में नहीं
उस्मान : इट'से बिग ऑपर्चुनिटी आप इंडियन्स के लिए अगर आप लोगों ने उसे गेरफ़्तार कर लिया तो सोच लीजिए की आपने ब्ड के सबसे खतरनाक साँप को पकड़ लिया है.वैसे हमसे जितना होगा हम आपकी मदद करेंगे ये खलनायक नक़ाबपोश है इसके काम में इसके दो आदमी इसके साथ कॉपेरते और ऑपरेट दोनों करते है इन ल्गू के नाम भी अज़ीब है एक सनकी की पूरी गान्ड है इसमें काला लंड और निशानेबाज़ जिसने जावेद हूसेन को मारा शामिल है इनसे उलझना मौत को दावत देने के बराबर है
देवश : थॅंक्स फॉर थे इन्फार्मेशन सर अब आप फिक्र ना करे मैं उसे अरेस्ट करने की पूरी कोशिश करूँगा
कमिशनर : ओके देन (कॉँमससिओनेर उठके उस्मान से हाथ मिलता है और उस्मान फिर अपनी मॅटॅडोर में बैठ जाता है इधर कमिशनर मुझे फिर ज़ोर देने लगते है की जल्द से जल्द रोज़ वाला केस निपताओ और इन तीनों को अरेस्ट करो)
मादरचोद एक के बाद एक केस हाथ में दे देता है.अभी रोज़ से प्यार भी नहीं हुआ और फर्ज की लरआई में कूदना पारह रहा है.रोज़ के वजह से ही तो जावेद हूसेन को पकड़ा गया.लेकिन कमिशनर है की रोज़ को ही गलत तेहरा रहा है.जो भी रहे इस खलनायक से मिलना बेहद जरूरी था
जल्द ही काम धाम निपटाके दोपहर को वापिस ख़ुफ़िया घर में पहुंचा.रोज़ का नाम पुकारा.लेकिन वो जा चुकी थी.बिस्तर पे मेरा खत नहीं था.अचानक एक खत मिला टेबल पे उसे पढ़ा..रोज़ ने छोडा था मेरे लिए "तुम्हारे साथ एक एक पल जैसे लगा मानो की एक ख्वाब हो इट'से जस्ट लाइक हेयर ओन ड्रीम ई विल मीट यू टुनाइट आस अभी"..मैंने मुस्कुराकर दिल-ए-हाल रोज़ का जाना..खैर उसे ज्यादा खतरे में डालूँगा नहीं कहीं वो इस खलनायक के पीछे ना लग जाए.क्योंकि मैं अब रोज़ को खोना नहीं चाहता था.इस केस को खुद मुझे कवर करना था.
जल्दी से हाथ मुँह धोया और फिर अपने घर आया..कल रात करीब तीन घाटे ही सोया हुआ था बाकी घंटे तो सेक्स करने में ही उलझा हुआ था.इस वजह से नींद अब भी गहरी लग रही थी.इतने में फोन किया.दिव्या ने झल्लाके कहा मिल गयी फुर्सत काम से उसे मानने में भी दस घंटे लगे कह दिया साफ साफ की मेरे घर आकर मुझसे मिल ले मेरे हाथ में एक केस है जिसके लिए मैं उलझा हुआ हूँ..ऊसने कुछ नहीं कहा बस फोन रख दिया आना तो था ही साली को
जल्दी से पेशाब करने टॉयलेट में घुस्सके निकाला था.की फिर घंटी बाजी इतने जल्दी कौन आ गया?.शायद काकी होगी.मैंने दरवाजा खोला लेकिन शॅक्स अंजना था पर कहीं ना कहीं जाना पहचाना सा लगा.जैसे दरवाजा खोला सामने खड़े 25 साल के चश्मा लगाए लड़के ने अपना चश्मा उतरा और मेरे गले लग गया
"आस हूओ मेर्रेर्र भी मेररीए यार कैस्सा हाीइ तू?"...ये कोई और नहीं मेरा कज़िन मेरे दूर का भाई मामुन था.असल में मामुन मेरे दादी के घर से तालूक़ रखता है.लेकिन मैं उससे बचपन में ही मिला था..आज ऐसे मिलना हो जाएगा सोचा नहीं था
देवश : अरे भैईई तू तो काफी बड़ा हो गया यार
मामुन : तेरे से कुछ ही साल तो बड़ा हूँ यार तू एकदम नौजवान हो गया
देवश : अरे आना बैठ.(उसे बैठते हुए मैंने कोल्ड्रींक्स निकाली हम दोनों कोल्ड ड्रिंक्स पीने लगे)
देवश : और बता आज इतने सालों बाद इतर में कैसे? तू तो लग रहा है बड़ा आदमी बन गया सुना था तू कलकत्ता में कोई बड़ा बूससिनएस्स्मन बन गया
मामुन : हां हां हां हां सब दुर्गा मां की कृपा है.दरअसल मैं यहां तुझे तो पता ही है सोचा एक बार परिवार के पास जौउ तो वहां देखा की वो जगह किसी ने खरीद ली है.
देवश : तू चाचा चाची वाले घर गया था.दादी वाले घर
मामुन : हाँ हाँ वही खैर तू बुरा मत मान मुझे लाग तू शायद वही होगा पर तुझे इस हालत में देखकर सच पूछ तो इन 22 सालों में इतना कुछ बदल गया और मैं वापिस आ भी नहीं पाया अगर मैं होता तो तेरे साथ हुए दगाबाजी का बदला जरूर लेता मैंने सब सुना गावंवालो से
देवश : भाई जाने दे जो बीत गया सो बीत गया ऊन कामीनो को उनकी मौत मीलगई किसी ने ऊँका कत्ल किया
मामुन : हाँ यार खैर तो मैं जब वहां पहुंचा ना तो ! (मामुन अभय ईकेः ही रहा था इतने में दिव्या घर में दाखिल हुई)
दिव्या मुझे और मामुन को देखकर हड़बड़ा गयी.उसी पल मामुन भी उसे हैरानी भाव से देखने लगा "आ..रही हाँ भैईई यहीी यहीी लड़की बोल रही थी इसी का घर है जाओ यहां से"....दिव्या भी मामुन को देखते हुए मेरे पास आकर बोली
दिव्या : हाँ ये आज मेरे यहां आए थे ये आपके क्या लगते है?
देवश : उम्म मेरे भैईई है तुम एक काम करो तुम हमारे लिए खाना बनाओ अरे भाई ये दिव्या है मेरी असिस्टेंट
दिव्या को बुरा तो लगा पर मेरे पास हमारे रीलेशन को छुपाने का कोई रास्ता नहीं था..दिव्या सदा हुआ मुँह लेकर किचन में चली गयी.मामुन मुझे अनख् मारने लगा "क्या भैईई कोई सेट्टींज्ग??"..मामुन को मैंने हल्का सा तापी मारा "चलो भाई क्या मज़ाक कर रहे हो नहीं बस ऐसे ही कमिशनर ने रखवाई है"...मामुन मुझसे मजे लेने लगा..फिर उसके बाद वो फ्रेश होने बाथरूम चला गया.मैं दिव्या के पास आया वो चावल बना रही थी
देवश : दिव्या मांफ कर दो.मुझे
दिव्या : क्यों मांफ कर दम तुम्हें ? एक तो बिना बताए तुम आए नहीं दो दिन से कहाँ थे? और अब कह रहे हो काम का इतना भोज अब ये कौन है? (दिव्या सही में चिड़चिड़ा गयी थी एक तो उसे बात करना था मुझसे खुलके और एकदम से मेहमान को देख उसका मुँह बंद गया)
देवश : देखो मामुन यहां ज्यादा दिन नहीं रुकेगा चला जाएगा समझा करो आज्वो इतने सालों बाद आया है
दिव्या : कालतक तो तुम्हारा कोई परिवार नहीं था
देवश : आजएक्द्ूम से खोजते हुए आया है ये कलकत्ता में रहता है इसको मेरा अड्रेस नहीं पता था.आज खोज बिन करके आया है चला जाएगा तुम प्ल्स माहौल को शांत रखो उसे अंजान रखना जरूरी हाीइ ठीक हे
दिव्या : ओकायी
देवश : मैं तुमसे बात करूँगा अभी मैं बहुत तक भी गया और हूँ केस को लेकर उलझा हूँ सब शांत हो जाएगा फिर बताता हूँ
दिव्या : ठीक हे तुम जाओ मैं खाना लगती हूँ
इतना कहकर दिव्या पतीले के पानी को छानने लगी..बाहर आते ही मामुन मुस्करा रहा था ऊसने बैग से मेरे लिए एक सोने की घारी निकाली "अरे ये क्या? बाप रे तू कहाँ से ले आया ये सब?"..."कैसी है इंपोर्टेड है? तुम्हारे फ्रॅन्स से है"...मैंने घारी को देखते हुए मामुन की बात सुनी
देवश : भाई लेकिन इट'से वेरी कॉस्ट्ली
मामुन : अरे चढ़ ना ये सब तो चलता है तू तो भैईई है
देवश : तो यहां कबतक का दौड़ है?
मामुन : बस 2 दिन
देवश : क्यूउ? आजकल क्या कर रहा हे तू ? और घर में सब कैसे है? काकी काका
मामुन : काकी अच्छी है और काका एक्सपाइर हो गये 8 साल पहले ही
देवश : ओह माइ गॉड ई आम सॉरी वैसे भी हम तो लास्ट टाइम बच्चे थे जब एक दूसरे से मिले थे उसके बाद तो
मामुन : जाने दे यार जो बीत गया सो बीत गया मुझे देख मैं अब कितने पैसों में जी रहा हूँ एंजाय कर लड़कियां पता यही जिंदगी है वैसे अभी तक शादी!
देवश : नहीं भैईई मिली नहीं
मामुन : अच्छा ग इतनी सेक्सी सेक्सी लड़कियों के साथ घूमता होगा इंस्पेक्टर मिया (तब्टलाक़ दिव्या खाने लेकर आ गयी और बिना कुछ बोले सैंडल पहनने लगी)
मामुन : कहाँ जा रही हो मैडम आइये आप भी खाना कहा लीजिए?
दिव्या : नहीं मैं कहा लौंगी बाद में उम्म देवश जी मैं जा रही हूँ (ऊस्की इशारो को समझा मामुन के प्रेसेंसें आइन वो कुछ कह नहीं पा रही थी..उसके बाद वो वापिस मेरे नये घर चली गई)
मामुन मजे लेटराहा.मुझे दिव्या के नाम से फ़्लर्ट करता रहा.फिर हमारे बीच के हँसी मज़ाक के बाद ऊसने बताया की उसका चंदे का बिज़्नेस है.और वो काम के सिसीले में यहां आया है.फिर कलकत्ता चला जाएगा.मैंने उसे घर में ही स्टे करने को कहा.फिर थाने के लिए रवाना हो गया.मैंने सोचा वही से दिव्या से मिल लूँगा
सूरज की दोपहरी शाम में ढाल गयी..खलनायक सिगर्रेते को सुलगाए.चेयर पे बैठा.टीवी पे चल रही ब्लूएफील्म को देख रहा था.तभी निशानेबाज़ ने खबर सुनाई की पुलिस से भारी जीप खाई में गिरके ब्लास्ट हो गयी पर ब्ड का सुपेरिटेंडेंट उस्मान यहां आया था..ऊसने हमारे पीछे पुलिस फौज लगवाई है इंडिया की.ज़िंदा या मुर्दा की घोषणा की है
खलनायक : हां हां हां आजतक कोई पकड़ सका जो पकड़ लेगा हुम्हें
निशानेबाज़ : कहे तो उनके दिल पे ही सीधे निशाना लगा दम
खलनायक : जो भी अपनी मौत के लिए हमारे पास आ रहे है आने दो फिर लगा लेना..वैसे पता चला माल किस पुलिस ऑफिसर ने पकड़वाया था
निशानेबाज़ : आदमियों ने बताया की यही का इंस्पेक्टर है.और एक हेरोईएन बनी फिर रही है इस शहर की रोज़ उसी ने हमारे माल को पकड़वाया ये रही ऊस्की तस्वीर इसे बड़ी मुश्किल से खबरियो से लिया गया ऊन्होने ही उसके पीछा करके तस्वीर ली
खलनायक ऊस खूबसूरत मुखहोते पहनी लड़की रोज़ की तरफ देखकर मुस्कराया "रोज़ उफ़फ्फ़ क्या ये गुलाब की तरह महेकत्ि भी है"....खलनायक के मुखहोते अंदर मुस्कुराहट साफ झलक रही थी."ये तो इसके पंखुड़ी को तोधने के बाद ही पता चलेगा"...निशानेबाज़ ने मुस्कराया
जल्द ही खलनायक ऊस काले कमरे में आया खूब ज़ोर ज़ोर से काला लंड कसरत करते रहा था उसके हाथों में उठी रिंग ऊपर नीचे हो रही थी.जिसका वज़न 40 किलो था."20 22 26″...इतने में खलनायक की आहट सुन ऊसने धढ़ से वज़न से लगी बारबेल रिंग को एक तरफ फैक दिया फिर मुदके खलनायक की तरफ देखा
काला लंड के सामने खलनायक ने ऊस तस्वीर को पेश किया.काला लंड ऊस लड़की को देखते हुए तस्वीर पे उंगली फहीराने लगा "है बहुत कमसिन खिलती किसी गुलाब की काली की तरह इसी ने माल पकड़ाया था नाम है इसका रोज़"...खलनायक ने काला लंड के मन में उबलते शैतानी सोच को महसूस करते हुए बोला
काला लंड : हां हां हां हां काफी दीनों बाद कोई कमसिन पर रफ लड़की मिली है वरना आजतक तो सिर्फ़ एक ही सांस में दम तोड़ी है
खलनायक : जनता हूँ टेढ़ी है यह और तुम टेढ़ी चीज़ कितना पसंद करते हो इसलिए ये काम तुमपे छोडा.
काला लंड : ये मिलेगी कहाँ?
खलनायक : शहर का गश्त लगती है रोज़ रात..इसके रात के आजके हुंसफर बन जाना
काला लंड : आखिरी रात का हुंसफर हाहाहा
इसके बाद काला लंड अपनी जबान रोज़ के तस्वीर पे फहीराता है और उसे घूर्रने लगता है.खलनायक बस शैतानी हँसी निकाले कमरे से बाहर निकल जाता है..
"दिव्या मेररी बात तो सुनू"...दिव्या कुछ सुनाने की मूंड़ में नहीं थी एक तरफ मुँह फहीराए बैठी थी
मैंने उसके सामने जब हुआ तो वो दूसरी ओर हो गयी."प्ल्स दिव्या मेरी बात तो सुन लो"..मैंने मिन्नत करते हुए कहा उसे समझाना बेहद जरूरी था."मैं कुछ सुनना नहीं चाहती"...दिव्या गुस्से से मेरी ओर नहीं देखते हुए कह रही थी
देवश : मैंने अकाहिर ऐसा क्या कह दिया? जिससे तुम मुझसे इतना नाराज़ हो मेरी इस छोटे से गलती की इतनी बड़ी सजा मत दो
दिव्या : मैंने कोई सजा नहीं दे रही लेकिन देख रही हूँ तुम्हें तुम आजकल मुझसे दूर रही रहे हो.घर से लेट से आते हो और मुझसे बात नहीं करते ढंग से बस जब प्यार करना होता है कर लेते हो
देवश : बस करो दिव्या मैं तुम्हें कोई इग्नोर नहीं कर रहा ये तुम्हारी सोच है..देखो मैं अभी एक बहुत बारे केस में फ़सा हुआ हूँ
दिव्या : किस केस में फंसे हो तुम? तुमने काला साया से खुद को क्यों अलग किया इसी लिए ना की हम एक खुशाल जिंदगी जी सके..लेकिन तुम अब भी अपने फर्ज के चक्कर में मुझसे दूर हो रहे हो
देवश : देखो दिव्या फर्ज अपनी जगह है और प्यार अपनी जगह मेरी जिंदगी में मेरा फर्ज यक़ीनन इंपॉर्टेंट है पर तुम भी हो क्या काला साया का कोई राज़ जनता था तुम ही थी तुमने मुझे ऊस वक्त इतना सपोर्ट किया और अब तुम मुझसे कफा हो रही हो महेज़ मैं तुम्हारे सात हनःी रहता इसलिए
दिव्या का गुस्सा कहीं हड़त्ाक शायद जायेज़ था..पर शायद कहीं ना कहीं गलती मैं भी कर रहा था.एक तरफ देवश की दिव्या और दूसरी तरफ उसी के दूसरे रूप काला साया की अक्स जैसी रोज़..जिसकी तरफ मैं कुछ ज्यादा झुकाव देने लगा उसके आक्राशण में ऐसा खोया की दिव्या को भूल गया लेकिन यक़ीनन मज़बूरी मैं दिव्या को सहारा दिया था पर क्या मैं उससे प्यार भी करने लगा था नहीं बस उसके साथ दुश्मनों तालूक़ रखे थे एक दूसरे की प्यास भुज़ाई यक़ीनन रोज़ अगर जिंदगी में ना आती तो मैं दिव्या से ही शादी करता लेकिन अब सिचुयेशन बदल चुकी थी.
दिव्या को समझाने में मुझे बहुत वक्त लग गया.केस को भी भूल उसी को मानने में लग गया.आख़िरकार दिव्या सुबकते हुए मेरी ओर देखकर मुझसे उक्चि आवाज़ में बात करने के लिए माँफी मागने लगी.मैंने उसे अपने गले लगा लिया.मैं जनता था दिव्या शायद ऊन चिपकू औरतों में से नहीं बस वो प्यार चाहती है.शायद अपने औकवाद के चलते वो ये सोचती है की मैं उससे शादी नहीं करूँगा..लेकिन उसे समझाना बेहद जरूरी था की मैं उससे क्यों नहीं शादी कर सकता? फिलहाल वो वजह मैं बोल ना सका क्योंकि दिव्या मेरे जिस्म पे हाथ फेरने लगी और उसके मन में क्या चल रहा था ? ये मैं जनता था..दिव्या भी गरम लड़की थी इसमें कोई शक नहीं और ऊस वक्त बिना ऊस्की चुदाई के दिल नहीं मना
मैंने दिव्या को बाहों में भरा और उसके होठों को चूमने लगा..दिव्या भी मेरे बालों पे हाथ फिराती मुझे चूमने लगी..ऊस वक्त अगर रोज़ होती तो जाहिर है मुझे जान से मर देती.पर इन लड़कियों को इनके ही जगह रखना ठीक है.मैंने दिव्या को बहुत ज़ोर से किस किया.और ऊसने भी मुझे पागलों की तरह चुम्मना शुरू कर दिया.मेरे हाथ उसके छातियो पे चलने लगे और कपड़े को ऊपर से ही ऊस्की छातियो को दबाने लगा..दिव्या ने फौरन मुझे धकेला और अपना पजामा नीचे खिसका लिया.मैंने भी अपने कपड़े उतार फ़ैक्हे
दिव्या मेरे सीने पे चढ़के मेरे छाती को चूमते हुए मेरे निपल्स पे ज़बानफहिराने लगी मैंने उसके चेहरे को उठाया हाथों में लिया और उसे अपनी बाहों में खींच लिया.दिव्या की चुत में लंड अंदर बाहर हो रहा था.ऊस्की टाँगें मेरे कंधों पे थी और मैं कभी ऊपर तो कभी नीचे होता.ऊस्की चुत के मुआने पे उंगली करता हुआ लंड को बहुत फुरती से उसके चुत में रगड़ रगदके घुसाता.धक्के पेलता..दिव्या आंखें मुंडें मीठी मीठी सिसकियां ले रही थी
दिव्या ने मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया.और मैंने भी धक्के ज़ोर से देने शुरू कर दिए..लंड चुत से अंदर बाहर होने लगा..और मेरे हाथ उसके बिखरी ज़ुल्फो को समिटाने लगे वो मेरे होठों को चुस्सने लगी..हम दोनों पसीने पसीने होकर भीगने लगे.दिव्या की चुत से मैंने लंड बाहर खींचा..और उसके पेंट पे ही झधने लगा.धायर सारा रस उसके पेंट और नाभी पे भरने लगा..
दिव्या निढल पड़ी मुझे अपनी ऊपर खींच लेती है.मैं उसे अपने सीने से लगाकर बाहों में भर लेता हूँ..कब शाम का ढलता सूरज ढाल गया पता ही नहीं चला.
रोज़ जल्द ही बाइक से उतरके ख़ुफ़िया घर में प्रवेश करती है फिर चारों तरफ देखते हुए अनॅलिसिस रूम की लाइट्स ऑन करती है."अरे देवश अभीतक नहीं है यहां"..वो चारों ओर देखते हुए मेरा नाम पुकारती है पर मैं उसे किसी जगह नहीं मिलता."यक़ीनन पे.से में होगा"..अचानक ऊस्की निगाह मेरी इंतजार में ही ठहरी थी इतने में.उसका ध्यान ऑन परे पीसी पे परता है
उसे ऑन करते ही उसका दिमाग तनकता है.स्क्रीन पे खलनायक और उसके शागीर्दो का चेहरा दिखता है उनकी डीटेल्स जो मैंने पुलिस स्टेशन से लेकर रखी थी और ऊस केस पे मैं काम कर रहा था वो सब पढ़ लेती है.उसके चेहरे पे मुस्कान उमाध उठती है..और वो फिर अपने ग्लव्स और हेलमेट को पहने वापिस बाइक पे सवार होकर ख़ुफ़िया दरवाजे से बाहर निकल जाती है.
"इस लौंडिया को देखा है?"..काला लंड वन के अंदर ही ऊस खबरी को पूछता है.पहले तो वो खबरी रोज़ के तस्वीर को देखकर मुस्कुराता है और फिर बताता है की वो इस रास्ते से गश्त लगते हुए जंगल के रास्ते की ओर निकल जाती है..काला लंड खुश होता है.और उसके आंखों में शैतनपान दिखता है
बाइक को फुरती से चलते हुए रोज़ देखती है की उसके सामने दो वन खड़ी है.वो वन से फौरन उठ खड़ी होती है..वन से निकलते हॉकी का डंडा और चैन लिए खलनायक के गुंडे उसी को देखकर तहाका लगाकर हस्सने लगते है.और फिर धीरे धीरे रोज़ को घैर लेते है."श तो ऊस कुत्ते के पलुए हो तुम लोग".....रोज़ चारों ओर ऐसे निगाहों से देखती है मानो उसके लिए ये कोई छोटी बात हो
फौरन कुत्ता शब्द सुनकर ऊसपे हमला बोल देते है गुंडे.रोज़ फुरती से अपनी बेक किक सामने से आते गुंडे पे मारते हुए दूसरे गुंडे पे बाअई किक मारती है.इस बार उसके मुक्के ऊन गुंडों पे बरसते है..ऊस्की फुरतिदार..पार्कौुर करते हुए करतब लगते हुए.लातों घुसो की बरसात करते हुए हरक़तो को देख..काला लंड अपनी वन से बाहर आता है.वो लोग रोज़ को जकड़ लेते है.पर काला साया के दिए ट्रेनिंग और अपने हुनर से वो दोनों टाँग सामने के गुंडों पे मारते हुए चैन को पकड़कर सीधे ऊस गुंडे को ही जकड़ लेती है जो उसे पकड़ा हुआ होता है..
वो गुंडा वही दम तोड़ देता है.दूसरा गुंडा जैसे ऊसपे हावी होता रोज़ ने उसके मुँह को पकड़कर अपने घुटने से दे मारा उसके मुँह से खून निकल गया वो अपना चेहरा पकड़ा गिर गया.रोज़ ने अपना हॉकी का डंडा पकड़ा..और ऊन गुंडे पे बरसाना शुरू कर दिया.ऊनमें से कोई भी ऊसपे हावी नहीं हो पा रहा था..काला लंड मुस्कुराकर बस देखें जा रहा था
रोज़ आख़िर ऊन आखिरी बचे गुंडों को भी दरशाही कर देती है.इतने में उसके सर पर प्रहार होता है.रोज़ अपना सर पकड़े दूसरी ओर देखती है जिसके हाथ में पीपे होता है काला लंड उसके सामने खड़ा है.अपने सामने इतने भयनकर ख़ूँख़ार हिंसक काले नक़ाबपोश शॅक्स को देख रोज़ थोड़ी ठिठक जाती है पर वो लरआई नहीं छोढ़ती..रोज़ ऊसपे बरस पार्टी है.और उसके भाई डाई बेक मंकी सारी किक्स उसके चेहरे पे उतार देती है.काला लंड जितना उसे कक्चा समझ रहा था वो उतनी थी नहीं
ऊसने फौरन पीपे उसके मुँह पे दे मारा..रोज़ भौक्लाके गिर पड़ी उसके होठों से खून निकल गया..पर रोज़ झुकी नहीं और सीधे ही काला लंड से भीढ़ गयी.काला लंड उसे उठा उठाकर पटकने की कोशिश करने लगा पर हर पटकी से पहले ही रोज़ करतब करके उछाल फहानाद के ज़मीन पे स्त्री होकर कूद पड़ती.रोज़ को ये लरआई भारी लग रही थी पर हार मना उससे स्वीकार नहीं
अचानक से देवश की घंटी बज उठी.देवश ने टाइम देखा.."श में गोद रात हो गयी शितत्त"..उसे याद आया की रोज़ के गश्त लगाने का वक्त है यह.वो जैसे तैसे अपनी बेवकूफी भरे दिमाग को कोसता हुआ ख़ुफ़िया घर पहुंचा "र्रोस्से रोस्से"..रोज़ वहां नहीं थी.अचानक से देवश ने फौरन नॅविगेशन सिस्टम ऑन किया जिसमें ट्रेसिंग डिवाइस था रोज़ की बाइक पे हरपल होता है वो.ताकि देवश उसे बॅकप दे सके.अचानक से रोज़ की ट्रेस में उसे अपना ख़ुफ़िया कमरा दिखता है..रोज़ लर्र रही है एक काले नक़बपसो के साथ और चारों ओर गुंडे गिरे परे है..."शितत्त"...देवश फौरन भाग निकलता है
उधर चक्कर महसूस होते ही गश खाके घायल रोज़ फौरन ज़मीन पे गिर पार्टी है..काला साया उसके गले से उसे उठाकर फौरन उसके सर को वन के दीवार पे पटकता है.रोज़ दर्द से सिसकते हुए वापिस ज़मीन पे देह जाती है.अब उससे ये लरआई लरना संभव नहीं था.अपने कटे होंठ से खून को पोंछते हुए काला लंड उसके बालों से उसे उठता है और अपने बाए पॉकेट से खैची निकालता है..वो पागलों की तरह उसके लहू लुहन चेहरे पे हाथ फेरते हुए उसका खून चखता है..और फिर कैची उसके बालों में जैसे ही फंसाने को होता है
इतने में जीप पे बैठा देवश फुरती से ऊस जीप को काला लंड के पास ले आता है काला लंड रोज़ को चोद जीप को घूर्रता है और हिंसक की तरह उसके सामने दौधता है.देवश भी गुस्से में जीप को तेजी से काला लंड के ऊपर चढ़ाने वाला ही होता है की इतनें आइन काला लंड खुद ही बैलेन्स बिगड़ते ही जीप के ऊपर से टकराते हुए दूसरी ओर जा गिरता है.देवश जल्दी से निकलकर गोली ऊसपे डाँगता है
गोली दो बार काला लंड के बाज़ूयो में लगती है और वो वही गिर परता है.."ओह नो रोस्से रोस्से"...देवश बाए साइड में गिरी रोज़ को उठाते हुए कहता है."आहह ससस्स बहुत मारा कमीने ने"...रोज़ के होठों पे गाली को सुन देवश को चैन आया की वो ज़िंदा है.ऊसने गुस्से भारी निगाहों से काला लंड की ओर देखा और उसे उठते देख हैरान हो गया..काला लंड उठके एकदम से गुस्से में जीप को उठाने लगता है उसके ऐसी असीम ताक़त कोदेख देवश घबरा जाता है
"ओह माइ गॉड ये इंसाना है की मॉन्स्टर"...इतने देर में काला लंड जीप ऊन दोनों के ऊपर लुड़का देता है.देवश फौरन रोज़ को खींच लेता है..और दोनों दूसरी ओर गिर पारट है और ऊस ओर जीप गिर पार्टी है.काला लंड उसके करीब आता है "ओह माइ गॉड इस पे तो गोली का कोई असर नहीं हुआ"....डीओॉश हड़बाहात में गोली सड़क पे चोद देता है और फौरन अपने काला साया पैट्रो से ऊसपे हमला करता है पर वो डीओॉश को दूर उछाल फैक्टा है.डीओॉश बैलेन्स बनकर उठ खड़ा होता है और फिर जीप पे देखते हुए ऊस ओर खड़ा हो जाता है "आबे ओह मादरचोद"...काला लंड का गुस्सा दहेक उठता है रोज़ के पास जाने के बजाय देवश की ओर भागता है.देवश मुस्कुराकर अपनी जेब से निकलते लाइटर को जीप पे फ़ेक देता है जिसका पेट्रोल लीक कर रहा था
और ऊस ओर से जैसे कूड़ता है.काला लंड जीप से दौड़ते हुए टकराता है और तभी बूओं एक धमाका होता है.जीप के चीटड़े उड़ जाते है.और आग की लपतो में काला लंड चिल्लाते हुए जंगल में कूद जाता है.डीओॉश हालत को समझते हुए रोज़ को कंधे से उठता है और किसी तरह रोज़ की बाइक पे सवार होकर उसके सामने निढल रोज़ को बिता देता है और जितनी हो सके उतनी रफ्तार से बाइक दौड़ा देता है
काला लंड आग की लपतो को भुजाते हुए रास्ते के सामने खड़ा होकर दूर जाते देवश और रोज़ की तरफ देखता है और ज़ोर से दहधाता हाईईईई.देवश निढल रोज़ के सर को अपने सीने पे रख देता है और उसके चेहरे को चूमते हुए बाइक फुरती से दौधने लगता है
जल्दी ख़ुफ़िया घर पहुंचकर.बाइक को किसी तरह अनॅलिसिस ऑफिस वाले घर में लाकर.मैं जल्दी से बाइक रोककर रोज़ को अपने बाहों में भरके उठता हूँ.और उसे लाके सोफे पे लेटा देता हूँ.रोज़ अब भी निढल थी
पहले तो उसके कपड़े जैसे तैसे उतारे और सिर्फ़ उसे ब्रा और कक़ची में रखा..ताकि उसके पूरे बदन का मुआना करूं अफ कितने चोटें थी लाल लाल निशानो की कुछ तरफ खरोचें थी.बाल भी बिखरे हुए थे..आज तो ऊस जल्लाद ने मेरी रोज़ को मर ही दिया होता..मैंने मुआना किया और एक एक अंगों को चेक किया.शुक्र है की हड्डी सलामत कोई अंग नहीं टूटा.असल में जब काला साया के वक्त भी ऐसे गुंडों से टकराने पे खुद को घायल महसूस करता था.तो अपने काबिल डॉक्टर से सीखी कुछ स्किल्स की मदद से खुद को चेक कर लेता था.मेरे हाथ में अब भी ऐसा स्प्रेन है जो अभीतक ठीक नहीं हुआ और ये मेरी एक बेहद दर्दनाक कमज़ोरी है
खैर मैंने ऊपर वाले का धनञयवाद करते हुए..फौरन इलाज के लिए फर्स्ट ाईड बॉक्स और कुछ पत्तियां ले आया..पहले बाल्टी भर वॉर्म वॉटर से रोज़ के जिस्म को स्पंज बात करने लगा.उससे उसका हाथ मुँह धोया.चेहरे और नाक से निकल रहे खून को पोंछा..और फिर उसके बदन को फिर जहां जहां उसे दर्द था वहां वहां पत्तियां कर दी.उसके बाए आर्म के शोल्डर पे पट्टी बाँधी और फिर एक जाँघ के निचले हिस्से पे.रोज़ अब काफी बेहतर महसूस कर रही थी
रोज़ को जल्द ही होश आ गया.."रोज़ अरे यू ऑलराइट? सब ठीक तो है ना"..उसके चेहरे को थपथपाते हुए मैंने बोला..ऊसने जैसे मेरी ओर धुंधली निगाहों से देखा वो मुस्कुराते हुए मेरे गले लग गयी.कुछ देर तक हम वैसे ही बैठे रहे
रोज़ : आहह आज तो ऊस कमीने ने मर ही दिया होता
देवश : हां हां हां और जाए अकेले जंग में कूदने के लिए.क्या जरूरत थी? मुझे तुमने एक फोन तक नहीं किया
रोआए : मुझे लगा तुम खुद बिज़ी हो.बेक उप तो थे ही तुम
देवश : हाँ और कब फोन करती बेक उप के लिए जब तुम ऊपर चली जाती तब.फिर मेरा क्या होता? सोचा है इन ज़ालिमो के अंदर रहें नाम की चीज़ नहीं खैर ये शॅक्स काला लंड तुम्हें कहाँ मिला था?
रोज़ : इसने मेरे रास्ते को घैर लिया.इसका टारगेट मैं ही थी हो ना हो इसकी मेरे से कोई दुश्मनी है (रोज़ अभी कशमकश में खोई सी थी इतने में कमिशनर और ब्ड के ऑफिसर उस्मान की बात दिमाग में घूम गयी और एक ही नाम सामने आया खलनायक)
फिर मैंने तफ़सील से रोज़ की ओर देखते हुए उसे बताया की खलनायक एक शातिर माफिया है और इसके गान्ड में दो खतरनाक गुंडे है जो इसके पलूए है और अब शायद इनके निशाने में तुम इसलिए हो क्योंकि तुमने खलनायक के ड्रग्स और उसके आदमियों को मर गिराया जावेद हुस्सियान उसी का आदमी था
रोज़ : ओह ई से (रोज़ फिर गहरी सोच में दुबई फिर ऊसने मुझे ऊन्हें एलिमिनेट करने का कोई रास्ता पूछा)
देवश : नहीं रोज़ मैं तुम्हें और खतरे में नहीं डालूँगा तुम ऊन ल्गो से दूर रहो
रोज़ : ऐसे कैसे कह सकते हो तुम? मैं एक सूपरहीरो हूँ और मैंने अक्चाई से लार्न के लिए वचन लिया
देवश : अचाई क्या जिंदगी से बढ़के है तुम्हारे? मेरी पुलिस फोर्स है ऊन लूग के पीछे अब तुम्हें अकेले मौत के मुँह में दावत देने नहीं चोदूंगा समझी तुम
मेरे परवाह और आंखों में अपने लिए डर को देख..रोज़ मुस्कराई ऊसने ऐसे कई ख़तरो से खेला था.पर आज ऊस्की कोई परवाह करने वाला सामने बैठा था..रोज़ ने हल्के से मुस्कराया लेकिन वो फीरसे सोफे पे लाइट गयी उसे थोड़ा दर्द था बदन में "तुम आराम करो मैं निकलता हूँ"....देवश उठने ही वाला था की रोज़ ने उसके हाथ को क़ास्सके पकड़ लिया
रोज़ : मुझे छोढ़के आज कहीं मत जाओ ना (ऊस्की आंखों में अपने लिए जो प्यार उमड़ते देखा उससे साला मेरे पाओ जम गये)
बात भी ठीक ही थी उसे अकेला छोढ़ने का मेरा भी कोई मन नहीं था.पर दिव्या वो भी तो अकेले थी.लेकिन रोज़ पे जानलेवा हमला मतलब अब खलनायक उसे टारगेट कर रहा है कहीं ना कहींशायद मुझे भी करेगा.और ऐसी हालत में दूर रहना ठीक बात नहीं.मैंने फौरन घर पे फोन किया हाल जाना..दिव्या आज गुस्सा नहीं हुई उसे मुझपर यकीन नहीं था.मैंने फोन कट कर दिया..तभी मामुन का भी फोन आ गया.ऊनसे बताया की वो अपने यार के यहां तेहरा है आज घर नहीं आएगा वहां पार्टी है.मैंने कहा मैं कौन सा घर में हूँ जहाँ मर्जी वहां तहेर? आज वैसे भी मैं घर नहीं आने वाला बिज़ी हूँ काम पे.उससे भी बात करके फोन कट कर दिया
फिर अपने शर्ट और जीन्स को उतारके वैसे ही चड्डी पहने.रोज़ के बगल में आकर उसे लिपटके लाइट गया.रोज़ ने हम दोनों के ऊपर चादर ओढ़ ली और मेरे सीने पे मुँह लगाए मेरे पीठ पे हाथ फेरते हुए आराम करने लगी मैं बस उसके ज़ुल्फो के साथ खेलने लगा.आज सेक्स करने का मूंड़ नहीं था ऊससकी हालत ठीक नहीं थी मैं बस उसके साथ वैसे ही लिपटे आनंद ले रहा था और कब मेरी भी आँख भारी होने लगी मुझे पता नहीं
"य्ाआआआआआ"..धड़धस धड़धस्स करके चीज़ों को पटकते हुए काला लंड गुस्से से तमतमाए जा रहा था...खलनायक बस चुपचाप अपने आदमियों के सामने खड़ा उसके गुस्से को घूर्र रहा था..काला लंड के सर पे खून सवार था.आज ऊसने सबसे बड़ी हार वॉ भी महीज़ एक पुलिस ऑफिसर से पाई थी और एक लड़की से."ऊस कमीने के वजाहह से मेरा सारा मूंड़ खराब हो गया ऊसने मेरे बदन पे आग लगाइइ कमीने को चोदूंगा नहीं मैं मां चोद दूँगा ऊस्की"...काला लंड गारज़ते हुए पास कहरे आदमी का गला दबोच देता है
निशानेबाज़ सिर्फ़ मुस्कुराता है.गला चोदते ही वो आदमी फर्श पे गिरके मर जाता है..खलनायक अपने आदमियों को ऊस्की लाश ठिकाने लगाकर कहकर पास आत है
खलनायक : जानता हूँ मैं तुम्हारे गुस्से को लेकिन फिहल तुम्हें आराम की सख्त जरूरत है.तुम्हारे ज़ख़्म्म्म
काला लंड : ये ज़ख़्म्म्म तब शांत होंगे जब मैं ऊस रंडी की बच्ची को अपने हाथों से नंगा करके टॉर्चर करूँगा मुझे वो इंस्पेक्टर चाहिईए बॅस (काला लंड के पागलपन और गुस्से को खलनायक जनता था..वो मुस्कुराकर हामी भरके बाहर आ गया साथ में निशानेबाज़ भी)
निशानेबाज़ : अब क्या करे? जो काम आपने इसे दिया था ये ऊसपे खड़ा नहीं उतरा
खलनायक : बिना मारें काला लंड शांत नहीं होगा देखा नहीं कैसे ऊस आदमी को मर डाला जबतक किसी का खून ना बहा दे तबतक शांत नहीं होता यह (काला लंड दीवार पे घुस्से मर रहा था जिसकियवाज़ बाहर सबको सहेमा दे रही थी)
खलनायक : बाकी के गुंडे कहाँ है? कौन था वो शॅक्स जिसने ऊस रोज़ को बचाया?
निशानेबाज़ : सर बाकी गुंडे या तो हॉस्पिटल में साँसें गीं रहे है या कुछ तो मर चुके फिलहाल तो पुलिस के आदमी पे हमला हुआ है ये बात आग की तरह फैल गयी होंगी हुम्हें कुछ दिन तक तो काला लंड का गुस्सा और खुद को अंडरग्राउंड रखान भी जरूरी है
खलनायक : खलनायक कोई चूहा नहीं जो अंडरग्राउंड हो जाए.पता करो वो इंस्पेक्टर कौन है?
स्साहीब साहेब.एक गुंडा आया जिसके हाथ पाओ पट्टी से बँधे थे.ऊसने बताया की ऊसने ऊस इंस्पेक्टर का पिक लिया जैसे उसे होश आय फौरन हॉस्पिटल से यहां चला आया "उम्म्म इसका मतलब साफ है की वो लड़की रोज़ और वो लड़का एक दूसरे को अच्छे से जानते है और काफी हुनरबाज़ भी है तभी तो हमारी फौज पे ही वो भारी पड़े"....खलनायक का शातिर दिमाग टांका
खलनायक ने वो मोबाइल पिक्चर ड्केही.दो तीन पिक थे कुछ तो ज्यादा ब्लर हो गये थे पर एक पिक साफ थी."हम क्या नाम है इसका? शकल थोड़ी थोड़ी पहचान में नहीं आ पा रही साफ नहीं है"...खलनायक ने गुस्से से गुंडे को देखते हुए बोला."साहेब ये पिक भी तो चुपके लिया था.वैसे उसका नाम इंस्पेक्टर हाँ इंस्पेक्टर देवश चटर्जी है"...खलनायक का दिमाग ठनक गया.."क्या? अच्छा अच्छा"...तो इसका मतलब इस देवश मिया के अंदर कोई रहस्य है उसे रोज़ के लिए जाओ ले आओ उसे यहां मैं उसे 24 घंटों के अंदर यहां पेश चाहता हूओ"...खलनायक के आर्डर को फॉलो करते हुए गुंडा निकल गया
खलनायक : और हाँ एक काम और करो? एक कमसिन लौंडिया को पेश करो.आज काला लंड के भूख वही शांत कर सकती है.वरना उसे आउट ऑफ कंट्रोल होने से कोई नहीं बच्चा पाएगा
खलनायक के सनकी हँसी को सुनते हुए निशानेबाज़ भी तहाका लगाकर हस्सता है.जल्द ही कमरे के भेतर एक लड़की को फैक दिया जाता है.उसे देखते ही काला लंड घुर्राने लगता है.लड़की एकदम ज़ोर से उसे देखकर सहेंटे हुए पीछे होने लगतीई है.और फिर उसके बाद काला लंड उसके बालों से उसे पकड़कर उसके होठों पे दाँत बिताके कांट लेता है.दर्दनाक बेरहेमी का यह तमाशा खलनायक गौर से देखते हुए बस तहाका लगाकर हस्सता है.
"व्हातत्त नॉन्ससेंसी?"..कमिशनर गिलास का पनई पीट हुए देवश की ओर्देखते हुए कहते है "तुम्हारी जान ऊस रोज़ ने बचाई ऊस चोर ने"...कमिशनर ने देवश की सारी बातों को सुनते हुए कहा
देवश : सर मैं सच कह रहा हूँ मुझपर जानलेवा हमला हुआ है.और इसमें हाथ खलनायक का है.और रोज़ नहीं होती तो मुझे कोई नहीं बच्चा पाता
कमिशनर : देखो देवश हर बात की एक हद होती है तुम ऊसें एर सामने उकचा दिखाने की कोशिश कर रहे हो पर कानून के निगहाओ में वो सिर्फ़ एक महेज़ मुज़रिम है.तुमपे आहेसां होंगे उसके पर मेरेल इए वो महेज़ खलायक के भट्टी एक मुज़रिम है
देवश : आप समझना चाहते क्यों नहीं है सर? अगर मैं उसे बचाता नहीं तो रोज़ को कुछ हो जाता
कमिशनर : तो फिर तुमने उसे अरेस्ट क्यों नहीं किया? काला लंड को क्यों नहीं पकड़ पाए जिसके तुमने बारे बारे दावे किए थे
देवश : ई आम सॉरी सर वहां से भागना बेहद जरूरी था वरना ऊस ताकतवर शैतान से बचना मुश्किल ही था मुझे आपसे उसके लिए चुत अट साइट का आर्डर चाहिए
कमिशनर : देखो देवश पहले ही तुमने ऊसपे गोली चलाई ठीक वो मारा नहीं इट;से फॉर डिफेन्स लेकिन उसके लिए चुत अट साइट का मैं आर्डर तुम्हें काटतायी नहीं देने वाला बिकॉज़ मैं ऊन तीनों को ज़िंदा पकड़ना चाहता हूँ इट'से अबौट और कंट्री'से रेप्युटेशन
देवश : वाहह सर सिर्फ़ एक रेप्युटेशन के लिए यू आर बिकमिंग सो सडिस्टिक कोई मारे या बचे इट डोएस्न;त मॅटर तो यू वेट्स रॉंग विड यू सर? प्ल्स सर अगर उसे रोका नहीं गया तो वो और मासूमों की जानें लगा हे इस गोडड़मान ब्लडी साइको
कमिशनर : और यू अरे आ ब्लडी अडमेंट (देवश खून खौले आंखों से कमिशनर की ओर देखने लगा) ठीक है है सर आप मुझे आर्डर नहीं देंगे ना सही लेकिन अगर आगे छलके कोई मासूम मारा तो उसके ज़िमीडार आप होंगे.मुझे अपनी प्रमोशन की परवाह नहीं.ऐसे ही तो आपने काला साया के लिए एन्कौतेर लिख डाला.जबकि ऊसने नायक काम किया जिस मुज़रिम से आपको बेनेफिट है उसे मारना मतलब क्रोरो का नुकसान
अगर पुलिस ही नुकसान और प्रॉफिट की बात सोचे वो भी मुर्ज़िमो से तो फिर कानून के तरज़ू में सिर्फ़ प्रॉफिट और करप्षन ही मुझे दीखेगा
कमिशनर : गेट आउट देवश और डोंट आर्ग्यू विड में मैं जनता हूँ मैंने क्या किया और ई हॅव डन एवेरितिंग राइट..गो नाउ राइट नाउ
देवश : जा रहा हूँ सर ये याद रखिएगा आज काला साया का होना कितना जरूरी था.कल रोज़ भी मारी जाएगी.फिर हमारा कानून ऊन मुर्ज़िमो को पकड़ पाए या ना पाए पर ऊन लोगों के लिए हिज़ाड़ो की तरह ताली जरूर बजाएगा
इस बार देवश का गुस्सा सर चढ़के बोला..और वो तमतमते हुए थाने से निकल गया..पीछे कमिशनर बस गुलाबी निगाहें लिए टेबल पे मर के बैठ गया.
देवश पूरे रास्ते गुस्से से जीप को चला रहा था.कमिशनर की एक एक काँटे डर चुबती बातें उसके दिमाग को जैसे कांटें जा रही थी.जल्द ही वो इतर पहुंचा.और फिर अपने घर ऊसने गाड़ी रोकी और गुस्से में टमतमाते हुए दरवाजे की ओर देखा.ये क्या? लगता है मामुन अभीतक आया नहीं
देवश ने अकेले ही दरवाजा खोला और फिर बिस्तर पे जाकर लाइट गया.आज उसका मूंड़ बेहद खराब था एक तो काला लंड से भीढात के साथ ही उसे भी थोड़ी चोटें आई थी.ऊपर से कमिशनर चुत अट साइट के आर्डर को भी रेफ्यूज़ कर रहा था वो जनता नहीं की ये तीन बदमाश कितने खतरनाक है.लेकिन ऊपर के कुर्सी में बैठे लोगों को कैसे समझाए???
देवश सर पे हाथ रखकर अभी बैठा ही था इतने मेंडरवाजे पे दस्तक हुई..देवश ने दरवाजा खोला."अरे ये क्या काकी मां आप?"...देवश के चेहरे पे थोड़ा मुस्कान आया
अपर्णा काकी : हाँ और नहीं तो क्या? बेटा ज़रा एक गिलास पानी पीला दे बहुत दूर से छलके आई हूँ
देवश ने अपर्णा काकी के सारी से आ रही पसीने की महक को महसूस किया.और जल्दी से फटाफट पानी के बजाय ग्लूकों-द काकी को दी.काकी ने मुस्कुराकर ग्लूकों-द को एक ही साँस में पी लिया."अब जाकर राहत मिली"...अपर्णा काकी ने धीमी साँस लेते हुए कहा
देवश : आप कहाँ से आ रही हो इतना छलके?
अपर्णा : अरे बेटा तेरी शीतल के लिए रिश्ता पक्का हुआ है
देवश : क्या? वाहह ये बहुत खुशी की बात आपको भी मुबारकबाद कब कैसे?
अपर्णा : अरे बेटा एक लड़का शीतल को कुछ दीनों से पीछा कर रहा था.खेतों से लेकर घर तक मुझे लगा कहीं लड़का गलत तो नहीं लेकिन फिर मैंने उसके बारे में पूछताछ की तो पाया की वो लड़का फ़ौजी में वो क्या नक्शा बनाते है वो कमा करता है.डाल में रहके और बर्दमान में रहता है
देवश : अच्छा लड़का लेकिन ठीक तो है ना
अपर्णा : हाँ बेटा मुझे तो बहुत अच्छा लगा उसे शीतल बहुत पसंद है.बोलता है की मैं इसके बिना किसी से शादी नहीं करूँगा वो दहेज की भी डीमाड नहीं कर रहा.अब ऐसा लड़का हमें कहाँ मिलेगा तू ही बता? ये कामकल तो समझती नहीं
देवश : क्यों शीतल राजी नहीं है?
अपर्णा : बेटा मैं तो उसे समझते समझते तक गयी बस रोने लगती है बोलती है की मैं आपको और देवश भैया को छोढ़के कहीं नहीं जाना चाहती अब तू ही बता ऐसे थोड़ी ना होता है
देवश : होगा काकी मां शीतल राजी होगी
अपर्णा : वो कैसे बेटा?
देवश : वो आप मुझपर चोद दीजिए मैं एक बार ऊस लड़के से मिल लू जिंदगी का सवाल है देख भी लूँगा उसका खंडन कैसा है? क्या वो मेरी शीतल को खुश भी रख पाएगा
अपर्णा : हाँ बेटा ये काम तो तू ही कर सकता है बस किसी तरह शीतल को मना ले बहुत ही अच्छा लड़का है हाथ से निकल गया तो चिराग लेकर भी नहीं मिलेगा
देवश : ठीक है मुझे टाइम दीजिए (मैंने फौरन अपर्णा काकी से ऊस लड़के का नाम पूछा ऊन्होने बताया रामलाल है मैंने उसे फोन किया और उससे मुलाकात करने को कहा पहले तो वो झिझक गया फिर वो मान गया)
अपर्णा काकी खुश हो गयी.."बेटा सोच रही हूँ अगले महीने ही शीतल की शादी करवा दम वो के है ना? लड़का फिर चला भी जाएगा वापिस वो बोल रहा है वहां क्वार्टर में उसे रखेगा"....मेरे लिए ये बात सुनकर बहुत ही अच्छा महसूस हुआ.मैं भी चाहता था की शीतल अब मुझसे थोड़ी दूरिया बनाए ताकि वो अपना नया ग्रहस्ति जीवन जी सके.एक बार दूसरे मर्द की आदत पढ़ जाएगी खुद पे खुद वो ऊस की हो जाएगी..ये सब सोचते हुए मैं खुश हुआ
अपर्णा काकी ने मेरे उदासी को समझा की आज मेरा मूंड़ ज्यादा क्यों नहीं ठीक है?.."केस के मामले में थोड़ा बिज़ी हूँ काकी मां और ऊपर से बढ़ते काम का भोज".....अपर्णा काकी ने मुस्कुराकर बोला.."तू भी शादी कर ले बेटा एक बार औरत आ गयी तो फिर तेरी टेन्शन दूर हो जाएगी "...मैंने मुस्कुराकर अपर्णा काकी की बात को सुना
देवश : क्या काकी मां? तुम भी ना मुझे कोई और लड़की झेल भी सकेगी आप तो मेरे राग राग से वाक़िफ़ हो
अपर्णा : हाँ हाँ तू अपने इस पेंट के भीतर छुपे ऊस राक्षस की बात कर रहा है ना जो एक बार हमारी बिल में घुस्सके खुद दर्द पहुंचता है
देवश : हाँ काकी मां बस वही बात है
अपर्णा : तब तो तेरे लिए औरत खोजनी पड़ेगी 40-35 की जो तुझे झेल सके
देवश : क्या काकी मां?
अपर्णा : और नहीं तो क्या तेरे इस मोटे मूसल को तो गड्ढा चाहिए छेद थोड़ी ही
देवश : अच्छा ग मेरे साथ रही रहके आप भी खुल गयी हो
अपर्णा काकी हंस पड़ी.ऊँका पल्लू थोड़ा नीचे सरक गया और उनके भारी छातियो के कटाव को देखकर मैं खुद पे खुद उनके चेहरे के करीब आने लगा.काकी भी मेरे नज़दीक आने लगी.हम अभी एक दूसरे के होठों से होंठ सताके चुमन्ने ही लगे थे की मेरा सख्त आइरन रोड की तरह खड़ा हो गया.मेरे हाथ काकी मां के ब्लाउज के फ़िटे पे और उनकी न्नगी पीठ को सहलाने लगे हम दोनों एक दूसरे से लिपट गये.एक दूसरे के होठों को पागलों की तरह चूम ही रहे थे इतने में दरवाजे की घंटी बज उठी मैं दरवाजे की ओर रुख करने लगा.पर काकी मां मेरे चेहरे को पाखारे अपने होठों से सताने लगी.ऊन्हें तारक चढ़ चुकी थी..फिर फोन बज उठा.मैंने फुआरन काकी मां को धकेल दिया और दरवाजा खोलने के लिए हम दोनों गहरी गहरी साँसें चोद रहे थे काकी मां ने अपना पल्लू अपने छातियो के ऊपर रख लिया.जैसे दरवाजा खोला मामुन आ चुका था
काकी मां को देखकर एकटक उसके मदमस्त जवानी को निहारने लगा.मैंने उसे झिंजोधा "क्या देख रहा है आबे"..मामुन कुछ नहीं बोला बस मुझे अनख् मर दी "ये वैसी औरत नहीं है"..मैंने धीमे आवाज़ में कहा.काकी मां बर्तन ढोने चली गई.उसे भी मम्मून को देखकर थोड़ा आश्चर्य हुआ.कुछ देर बाद मैं किचन आया माँफी माँगी काकी मां से मामुन के रवैये के लिए.ऊन्होने कुछ नहीं कहा बस मुस्कराया..और बोली की ये कौन है?.मैंने ऊन्हें बताया तो ऊन्हें याद आ गया ऊन्होने बोला ये यहां कैसे? मैंने बताया की वो मुझे ढूँढते हुए आया है.काकी मां ने उसे संभलके रहने को कहा और पूछा की कबतक रहेगा? मैंने बताया की बस चला जाएगा कल परसों तक.तो ऊन्होने फिर कुछ नहीं कहा फिर मुझसे रिकवेस्ट की रामलाल से मिल लू आज शाम.मैंने हामी भारी और ऊन्होने जल्द ही विदा कर दिया मामुन के सामने उनके साथ कुछ करना ठीक नहीं.क्योंकि मैं अपनी औरतों को दूसरों के सामने पेश नहीं करता
फिर मामुन से बातचीत में बातें काट गयी.मेरा गुस्सा कहीं हड़त्ाक शांत हो चुका था.मैं दोपहर तक दिव्या और मेरे दूसरे घर पहुंचा.घर में ताला लगा हुआ था.यक़ीनन सब्ज़ी मंदी गयी होंगी..मैं फिर वहां से रामलाल को फोन मिलाए उससे मिलने गया
रामलाल नुक्कड़ पे ही चाय पी रहा था.मुझे देखते ही वो उठ खड़ा हुआ.रामलाल देखने में गबरू जवान था 25 साल का और काफी देखखे ही डिसेंट लग रहा था.मैंने गाड़ी रोकी और उससे हाथ मिलाया.वो भी मुझसे मेरे बार्िएन में पूछने लगा एक अफ़सर एक फ़ौजी से आज मिला था.फिर हमने कुछ देर चाय पी एक दूसरे का परिचय लिया और खेतों की तरफ निकल लिए
देवश : देखो रामलाल मुझे तुमसे कुछ बातें कहनी है इसी लिए तुम्हें बुलाया है?
रामलला : हाँ कहिए ना भैया
देवश : देखो उमर में तो हुमुमर ही हो तुम मेरे.लेकिन रही बात ज़िम्मेदारियो की वो तुम्हें संभालनी होगी मेरी बहन है शीतल खून का रिश्ता तो नहीं पर खून के रिश्तो से भी बढ़के है.तुम मेरी बहन का पीछा करते थे मैंने सुना
रामलाल हकला गया."दररो नहीं तुम मुझसे एकदम खुलके कह सकते हो क्या तुम्हें शीतल पसंद है?"..वो शर्मा गया फिर ऊसने हाँ कहा."उम्म देखो एक दूसरे के साथ जबतक फ्रेंक नहीं होंगे बात आगे नहीं बढ़ेगी मैं यही चाहता हूँ की तुम शीतल की खूबसूरती के साथ साथ ऊस्की इक्चाओ को समझो मेरी बहन पे सभियो की नज़र है कोई भी उसे गंदा ही करना चाहेगा फ्रॅंक्ली बोल रहा हूँ तुम्हें कहना नहीं"...मैंने उसे समझते ही कहा और वो सुनता रहा हाँ हाँ में जवाब देता रहा
रामलाल : हाँ भैया मुझे शीतल पसंद है पर वो मुझसे राजी नहीं हो रही क्या मैं इतना बुरा हूँ? मैं उसे दुनिया की सारी खुशिया दूँगा मेरे घर में सिर्फ़ मेरी एक बीमार मां है जो मेरे बाबा के साथ यहां रहती है मेरी पोस्टिंग बर्दमान में है 22000 की टंकवह है और सरकारी फेसिलिटी अलग से
देवश : देखो रामलाल मेरी बहन ने बहुत तक़लीफें देखी है ऊसने बहुत गरीबी और दर्द सहा है वो मेहनती है और कोई लालची नहीं पैसों की इसी लिए तुम ये भूल जाओ की वो तुम्हारी पोस्टिंग के लियेटुँसे शादी करेगी असल सुख तब उसे दोगे जब औरत को तुम उसका असली गहना दोगे उसे खुश रखोगे उसे वो वाला प्यार दोगे
रामलाल पहले तो कुछ समझा नहीं फिर वो जब समझा की मैं किस टॉपिक की बात कर रहा हूँ तो मुस्कुराकर शरमाते लगा .."बोलो मेरी बहन को तुम ऊन सबतरह की सुख दे पाओगे"..रामलाल ने मेरे हाथ को पकड़ा और बोला "सच पूछिए तो बिलकुल मेरी एक गर्लफ्रेंड थी इससे पहले मैं झूठ नहीं बोलूँगा उससे मेरे काफी अच्छे संबंध थे पर वो मुझे धोखा दे गयी अगर आपको ये बात बुरा ना लगे इसलिए मैंने ये बात कहीं".....मैंने रामलाल के कंधे पे हाथ रखकर ऊस्की बातों को गौर से सुना
देवश : तुम ने सारी बातें दिल से कहीं है पर मेरी बहन कुँवारी है लेकिन काकी मां ने मुझे बताया की शीतल भी बहुत ज्यादा जवान खून है समझ रहे हो ना अगर उसे तुम खुश रख पाओगे तो मैं इस रिश्ते को हाँ कहूँगा ये हम मर्दों की बीच की बात है तुम्हें ध्यान से समझना होगा इसमें कोई बुराई नहीं ना ही मेरी बहन कोई ठरकी है पर फिर भी औरत का असली गहना उसका मर्द होता है और उसका सुख
रामलाल कुछ दायरटक सोचता है मुझे लगा मैंने कुछ ज्यादा कह डाला क्या? लेकिन ऊसने मुस्कुराकर बोला उसे ये रिश्ता मंजूर है पर वो शीतल को मनाए कैसे?...मैंने मुस्कुराकर उसे बहुत ही राज़ की बात कहीं की उसे कैसे बहलाना है और कैसे प्यार करना है? वो खुद पे खुद ऊसपे नीचावर हो जाएगी रामलाल बहुत ही हैरान हुआ की वो कैसे घर में शादी करने जा रहा है लेकिन आक्साइड तो बंदा था ही जो औरत से दूर रहे वो आक्साइड तो होगा ही फिर ऊसने तरक़ीब को समझा और मुझसे विदा लेकर चला गया
मैं बहुत खुश था अब जल्द ही रामलाल शीतल को पता लेगा और उससे शादी भी कर लेगा..रामलाल भी यही चाहता था उसे भी कोई शर्म नहीं हुई.फिर मैं जीप पे सवार हुआ तभी विरेसलेशस से सूचना मिली थाने आने को
मैंने फौरन जीप थाने की ओर रुख की.देखता हूँ की काफी भीढ़ है.और एक औरत की लाश के ओसफेद कफ़न से धक्का हुआ है जो ऊपर से पाओ तक शायद नंगी ढकी हुई है (ये वही लाश थी जो खलनायक ने अपने काल लंड के संतुष्टि के लिए किडनॅप की थी और उसे परोसा था बेरहें साइको के सामने).मैं उसके करीब गया एक तरफ कुछ औरतों के झूंड रो रहे थे शायद वो ऊस्की मां थी.जो कलेजा पीँत रही थी.हवलदार ने सूचित किया की ऊस्की बेटी की लाश को यहां खलनायक के गुंडों ने चोद दिया और ऊस लड़की के साथ बलात्कार हुआ है और उसे बेरेहमी से मर डाला है और जानभुजके थाने पे ऊस्की लास हचोढ़ दी
मैं उसके करीब जाकर उसका जैसे काप्रा हटाया तो मेरी आँखें शर्म से बंद गयी.जल्दी से काप्रा धक्का उसका शरीर नंगा था प्रेससवाले ऊस्की तस्वीर खींचें जा रहे थे."आप लोगों की वजहह से मेरी बेट्तिी को मर डाला ऊन हरामज़दाओ आख़िर कैसे पुलिसवाले हो आप लोग जिसने मेरी फूल जैसी बची को बच्चा ना पाया ऊन कामीनो को पकड़ ना सके "..ऊस्की मां रो रोके मुझे और मेरे अफ़सर्स को गालिया दी जा रही थी मैं बहुत खुद को बेबस महसूस कर रहा था
हवलदार ने बताया की लड़की को कल रात अगवा किया गया था खलनायक के गुंडों ने जब वो ट्यूशन से आ रही थी और फिर सुबह ही ऊस्क इलाश दिन दहाड़े के थाने के पास फ़ेक दी मुआना किया तो दिल शहर गया लड़की के चुत से खून बंद ही नहीं हुआ और उसके बदन पे इर्द गिर्द बेरेहमी से खरॉच दाँत काटने के चोटों के निशान है उसके चेहरे को इतनी बुरी तरीके से किसी चीज़ पे पटका है की पहचान करना भी थोड़ा मुश्किल था.पता नहीं किस जालिम ने इतनी बेदर्दी से ऐसी मासूम को अपने होश का शिकार बनाया मेरा तो खून खौल उठा थानेक एब ईछो बीच खलनायक ने ऊस लड़की को नंगा करके ऊस्की लाश फैक दी.इसका एक ही परिणाम है की वो मेरी मर्दानगी को ललकार रहा है..मेरा गुस्सा सातनवे आसमान पे चढ़ गया
सबके जुबान पे था काश काला साया होता ना जाने वो कहाँ गायब हो गया? वो लड़की जो खुद को इस शहर की बचाव कहती है वो रोज़ कहाँ है? सबके जुबान पे रोज़ और खुद के नाम को सुन सच में आज मेरी मर्दानगी को जैसे ललकार मिला था मैं शर्म के मार्िएन लाश को जल्द से जल्द मॉर्ग के लिए रवाना कर डाला.और वहां मैं खड़ा नहीं रही पाया थाने के अंदर घुस गया
थाने में बैठा बैठा बस चुपचाप डेस्क टेबल के बॉल को घुमा रहा था.इतने में बाहर का शोर्र सुनाई दिया..पुलिस के नाम की हाय्ी हाय्ी हो रही थी.प्रेस वालो किसी तरह हवलदार रोकें जा रहे थे इतना बड़ा घटना घाट गया इतनी शरामणाक हत्या हुई थी एक मासूम लड़की की.पब्लिक के साथ साथ न्यूज वालो का भी गुस्सा उबाल रहा था हर कोई जवाबा चाहता था आख़िर क्यों नहीं पुलिस काला साया की तरह काम करती..
मेरा पारा चढ़ गया..अगर कॉन्स्टेबल नहीं रोकता तो मैं बाहर निकल जाता.लेकिन हालत काबू से बाहर नहीं थे सारे आम पुलिस पे कीचड़ उछाला जा रहा था.पुलिस की बेज़्ज़ती हो रही थी.कुछ पुलिस अफसरों ने लाठी चार्ज करने तक को कह डाला पर मैंने मना किया क्योंकि कहीं ना कहीं कुसूरवार तो हम थे ही.जो एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अफसरों ने काला साया को मर गिराया था मतलब ऊन्हें लगता था वो भी आज सर झुकाए अफ़सोस कर रहे थे उनके झुके चेहरों को देख मेरे अंदर की ज्वाला कमिशनर और ऊस खलनायक पे निकल रही थी
किसी तरह बाहर आया धारणा शाम तक चल रही था.सबने मुझसे पूछताछ स्टार्ट कर दी."दीखिई बात सुनिईए मेरी बाट्ट सुनिईए"....मैंने गारज़ते हुए कहा सब चुप हो गये.."मानता हूँ हमने बहुत बड़ी ग़लतिया की पर इस गलती को सुधारने का मुझे मौका चाहिए आप लोग जैसा सोच रहे है वैसा नहीं है"...मैंने अभी कहा ही था की एक आदमी ने चिल्लाके कहा की उनकी बेटी के सात हहुआ वो क्या अच्छा था? जबसे काला साया गायब हुआ है तबसे वारदातें बढ़ी जा रही है फिर से हाय्ी हाय की बोल श्रुऊ हो गयी."शुतत्त उप"..इस बार मैं भड़क उठा
देवश : आप लोगों को मैं समझाए जा रहा हूँ पर आप लोग कुछ समझने के लिए राजी ही नहीं है.आज एक खून हुआ कलकत्ता जाए दिल्ली जाए हिन्दुस्तान के हर कोने में जाए क्या क्राइम रुकता है नहीं ना क्राइम आप हम जैसे लोगों से पनपता है.हम पुलिस वाले तो सिर्फ़ उसे रोकने की कोशिश करते है पर हमारे हाथ बँधे है अपने ही हथकड़ियों से जी हाँ हम कोई भी एक्शन लेंगे ऊपर से हुंपे दबाव आता है बड़ी बड़ी पहुंच होती है भ्रष्ट पॉलिटिशियन्स का पहरा होता है तो क्या हम लोग जानभुज्के मुर्ज़िमो को सजा नहीं देना चाहते ज़रा सोचिए
काला साया आज हमारी ही बदौलत इस दुनिया में नहीं है.ये बात सुनते ही सब शॉक्ड हो गये सब खामोश थे जैसे क़ब्रुस्तन में सन्नाटा छा जाता है.."काला साया जरूर आता अगर ऊस्की साँसें चलती तो.काला साया को मर दिया गया है.महानन्दा नदी में अपनी बचाव और एनकाउंटर से बचने के लिए ऊसने खूड़खुशी कर ली"....ये सुनते ही सब भड़क उठे
देवश : आप चाहते है ना की हमने गलती की तो ज़रा सोचिए हम तो छोटे मुलाज़िम है असली सरकार तो वहां ऊपर बैठी है क्यों नहीं उससे सवाल करते क्यों नहीं जवाब माँगते लेकिन मैं वचन देता हूओ खलनायक और उसके बढ़ते अपराध को मैं रोकुंगा चाहे इसमें मेरी जान क्यों ना चली जाए? आपको जो सवाल पूछना है वो सारे जवाब मैं दे चुका यक़ीनन मैं आपकी बेटी को वापिस नहीं ला पाऊँगा मुझमें वो ताक़त नहीं लेकिन कसम देता हूँ की मैं इंसाफ जरूर करूँगा
प्रेस रिपोर्टर्स मेरी बातों को ध्यान से सुन रहे थे मेरे आंखों से निकलते आँसुयो को पढ़ रहे थे.मेरी चेहरे पे फ्लॅशलाइट्स हो रही थी.न्यूज चॅनेल में मेरा इंटरव्यू यक़ीनन कमिशनर देखकर हक्का बक्का हो गया था..ऊस्की तो जैसे गान्ड फटने लगी थी.और धीरे धीरे उसे हर जगहों से कॉल आने लगा.काला साया जो पब्लिक का देवता था उसका एनकाउंटर किसने कराया? कोँमिसिओनेर ने क्यों आर्डर दिया?.खलनायक भी इस इंटरव्यू को सुनकर बस तहाका लगाकर हंस रहा था..
जल्द ही लोग धीरे धीरे गुस्से की आग में जाने लगे उनके पास सवाल तो थे गुस्सा भी पुलिसवालो पे लेकिन उनके हर सवाल का जवाब उपरी लोगों के पास था.ऊन लोगों ने तायी किया की अब वो कलकत्ता पुलिस हेक़ुआर्तेर जाकर ये जवाब माँगेंगे..मैं केबिन में बैठा हवलदार और सब मुस्करा रहे थे और ऊन्होने मुझे पानी दिया शांत होने को कहा.मेरी हालत ठीक नहीं थी मैं फौरन जीप पे सवार होकर घर के लिए रवाना हो गया
"फ्फूककक थींम फुक्कक तेमम्म अल्ल्ल बस्टर्द्ड़स"..रोज़ इधर से उधर तहेलते हुए लंगड़ाके मेरी ओर देख रही थी मैं एकदम गुमसूँ चुपचाप मुँह पे हाथ रखकर गहरी सोच में डूबा हुआ था
रोज़ : क्या सोच रहे हो? काश मैं ऊन बॅस्टर्ड्स को सबक सीखा पति काश मेरी ये कमज़ोर हाथों में कुछ और दम होता
देवश : गलती तुम्हारी नहीं है रोज़ तुम इंजूर्ड थी वरना ये वारदात कभी नहीं होती
रोज़ : ऊन हरामजादो ने अपना रेज निकालने के लिए एक लड़की पे अपना गुस्सा निकाला हमारा.ऊस काले नक़ाबपोश को मैं ज़िंदा नहीं छोढ़ूंगी
देवश : तुम कुछ नहीं करने वाली कुछ भी नहीं
रोज़ : वॉट अरे यू आउट ऑफ और माइंड? इतना कुछ हो गया और तूमम्म?
देवश : बिलकुल वो लोग बहुत ताकतवर है हमें ऊओनेहीं हराना होगा हम पिचें आयी हटेंगे पर कभी कभी जंग में कूदना आसान नहीं होता..
रोज़ : तो तुम कहना क्या चाहते हो? हम ऊन्हें कैसे रोकेंगे?
देवश : मेरे आर्डर आने तक तुम कही नहीं जाओगिइइइ
रोज़ : देवस्शह प्लीज़ ऐसा मत करो
देवश : ई साइड नो मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता और रही बात लोगों की ई विल गुड ताकि केर ऑफ तात्ट प्लीज़ इस बार मान जाओ
रोज़ : फिनने मैं जा रही हो
देवश : रोस्सी रोस्सईए (रोज़ बाइक पे सवार होकर निकल गयी यक़ीनन वो अब क्राइम-फाइटिंग तो नहीं करेगी लेकिन उसके दिल में मेरी बात कही चुभ गयी थी)
मैं अपने चेहरे पे हाथ रखकर वही बैठ गया.जब दूसरी ओर निगाह पड़ी.तो शीशे में बंद काला साया के कपड़े और उसका मास्क मेरे सामने था..मेरे आंखों में अंगार सी छा गयी आज खुद को अकेला महसूस कर रहा था.एक तो रोज़ बिना कुछ कहें निकल चुकी थी और इधर मैं कशमकश में कहीं खोया हुआ था सबकी बातें दिमाग में जैसे गूंज रही थी अगर काला साया होता? अगर वो होता? तो क्या वो रोक सकता?
मैं आज हार गया हूँ दिव्या"...दिव्या के गाओड़ी में सर रखकर मेरे आंखों से आँसू बह रहे थे
"तुम ऐसा क्यों सोच रहे हो? देवश.मानती हूँ अपराध को रोका नहीं जा सकता तो क्या तुम ऐसे घूंत्त घूँट के कबतक जियोगे अगर आज काल साया ना होता तो क्या ये लोग सुरक्षित रही सकते थे..तुम एक महेज़ इंसान हो कोई देवता नहीं हर इंसान को अपनी बचाव खुद करनी पढ़ती है अगर कल तुम मुसीबत में फासे तो कौन बचाएगा"...मैं दिव्या के बातों को सुन रहा था उसके हाथों को अपने बालों को सहलाते महसूस कर रहा था
देवश : तुम सही हो दिव्या बहुत सही हो आज मेरा मूंड़ नहीं हे मैं थोड़ा गश्त लगाकर आता हूँ
देवश : तुम हो ना साथ मेरे (दिव्या के माथे को चूमते हुए मैं निकल गया)
जीप को फुरती से 60 की बढ़ता में चला रहा था.सड़क एकदम सुनसान थी..जगह जगह सड़क के कुत्ते भौंक रहे थे कहीं रो रहे थे कोई शराबी कचदे के धायर पे सोया हुआ है.कहीं कोई ग़रेबे सड़क पे चादर बिछाए सो रहा है..रात का 1 बज रहा था.आंखों से आँसुयो को रोक नहीं पाया.साला ये जिंदगी की भी अज़ीब है कहाँ से श्रुऊ किया था? कहाँ चल रहा है? एक वक्त था बदले की भावना में जी रहा था और आज ऐसे मोड़ पे हूँ की जिस गलियों को छोडा जिस भैईस को चोदा आज ऊस्की इतनी जरूरत महसूस हो रही है.कमिशनर की मां तो चुद रही होगी बारे बारे उक्चे लोग पब्लिक सब ऊसपे क्वेस्चन की बरसात कर रही होगी हम और होना भी च्चाईए ऊस जैसे मतलबी इंसान को क्या समझा आए की काला साया की क्या जरूरत थी?...अचानक देखता हूँ की किसी ने मेरी जीप को ओवर्टेक किया
पुलिस की जीप को ओवर्टेक..मैं जीप रोककर फौरन उतरा."आए कौन्ण है?"...वन से कुछ गुंडे बाहर निकले..और दूसरी ओर निशानेबाज़ मज़ूद था.जो सिगरेट फहुंककर मुझे देख रहा था मुस्करा रहा था.."तो तू है वो इंस्पेक्टर जिसने रोज़ को बचाया हरमजादे"....एक गुंडे ने बताया वाइर्ले पे अभी हाथ रखने ही वाला था
की इतने में हॉकी का एकदांडा हाथ पे पड़ते पड़ते बच्चा.आ..मैंने फ़ौरना उसके चेहरे पे एक घुसा मर के उसे गिरा डाला..पीछे से चैन मेरी गर्दन पे.और गुंडे के लात घुषो की बौछार मुजपे.आज इतना बेबस हो जाऊंगा सोचा नहीं था.ऊन्होने फुरती से एक लात मर के मुझे गिरा डाला."शितत मोबाइल भी दूर जाकर गिरी अब ना तो रोज़ को कॉल कर सकता था और ना ही पुलिस को सूचना दे सकता था.आज बेबस हो गया त मैं"...तभी एक हॉकी का डंडा सीधे मेरे सर पे पारा..आहह.मैं दूसरी ओर गिर पड़ा
हाहहाहा.ऊन लोगों की तहाका लगती हँसी मेरे अंदर के खून को खौला रही थी.."बड़ा आया इंस्पेक्टर साले उठ हाहाहा खलनायक भाई से पंगा लेगा कांट दो साले के हाथ पाओ हड्डी तोड़ दो इसकी"....निशानेबाज़ ऊन गुंडों की बातेयसुनके उठ बैठा
"आबे ओह जान से मत मर देना मर के खलनायक भाई के पास लेकर भी जाना है"...ऊस्की बात को सुनकर गुंडे ने हाँ में सर हिलाया मेरी ओर हिंसक निगाहों से आगे आए.मुझे उठाते ही फिर मेरे पेंट और मुँह पे हॉकी का बल्ला पड़ा.बहुत क़ास्सके दर्द उठा.लेकिन तीसरे वार जैसे ही मुझपर होता ऊस हॉकी के बल्ले को हाथ से रोक डाला.काला साया यक़ीनन नहिता पर दानव पैच तो थे ही बरक़रार
फौरन जंग की शुरूवात की और भाई किक सामने हॉकी का बल्ला पकड़े शॅक्स के मुँह पे.वो लोग मुझपर भीढ़ गये.अब मैं अपने फॉर्म में आ गया और अपनी मंकी किक सामने वाले के सीने पे उतार डाली वो वन पे जा गिरा.शीशा खनक से टूटा और उसके पीठ पे धंस गया..दूसरी आईडी की चोट एक गुंडे की गर्दन पे.मैंने फुरती से अपनी पेंट के पीछे से नानचाकू निकाला.और ऐसे करतबो से चलाने लगा..की वो लोग सहम गये
"आओ सुवार की औलादो क्या हुआ? रांड़ की पैदाइश हो क्या?"...ऊन्होने मेरे गाली को सुनते ही आक्रमण कर डाला.मैंने नानचाकू को बारे फुरती से ऊँपे चला डाला.किसी का सर किसी का टाँग किसी की गर्दन किसी का मुँह.किसी की अँड सबपे नानचाकू बरसाने लगा.ऊन लोगों की टूटती हड्डिया और बिबीलते स्वरो से वही धैरहोणे लगे.."पुलिसवाले के पास नानचाकू स्ट्रेंज"..निशानेबाज़ जो सोच रहा था की ऊस्की पलूए इस पुलिस को मर गिराएँगे डर्सल चूतिया था उसे क्या पता? की जिस शेयर को वो लोग पुलिसवाला समझ रहे है वो असल में कौन है?
निशानेबाज़ मेरा एक्शन देखने लगा..ऊन गुंडों को इतनी मर मारा की वो लोग उठ नहीं पाए जल्द ही निशानेबाज़ ने फुरती से मेरे ऊपर तीर चला दी जो मेरे बाए कूल्हे पे लगा."आअहह"..मैं दर्द से बिबिला उठा वो अभी दूसरा हमला करता उसके तीर को मैंने हाथों से लोक लिया.और फिर ऊसपे नानचाकू फ़ैक्हा..उसके चेहरे पे जा लगा..निशानेबाज़ हड़बड़ा गया.मैं उसके पीछे दौरा.ओसोने फिर तिरो का हमला किया इस बार मैं बच ना पाया पीठ और गर्दन पे तीर धंस गया
निशानेबाज़ तहाका लगाकर हस्सने लगा..मैंने पास रखी हॉकी स्टिक उठाई और उसके मुँह पे मारी..वो बच निकाला लेकिन मैंने उसके पाओ को पकड़कर नीचे पटक डाला."टीटी..तू इतना हुनर कैसे जनता है साले"..निशानेबाज़ करते का हमला करने लगा."मैंने उसके दोनों हाथ ओको क़ास्सके दबोच लिया."क्योंकि तू मुझे नहीं जनता मैं कौन हूँ और सीधे उसके मुँह पे एक लात जमा दी
निशानेबाज़ देख सकता था की इतने घायल होने के बाद भी मुझमें कितनी हिम्मत थी खलनायक ने सक़ती से मना किया था की मैं जान से ना मारू..निशानेबाज़ मुझे पाक्ड़ने आया था लेकिन अब वो साँप को कैसे पकड़ पाता.."बिना तीर के तू कुछ नहीं कर सकता कमीने"...मेरी एक लात उसके पीठ पे जम गयी
निशानेबाज़ भागा.मैं भी उसके पीछे तीर को उकाध के अपने कमर और जिस्मो से अलग करके फैक्ने लगा.जल्द ही वो साए की तरह वापिस अपनी गुप्तिए निए गाड़ी में सवार हो गया.मैं उसके पीछे जाता ही लेकिन ऊसने गाड़ी मेरे ऊपर चलानी की सोची मैंने फौरन कूदके उसके रास्ते से हाथ गया और वो बढ़ता में गाड़ी को लेकर कहीन्द और भाग गया.पुलिस को सूचना देना बेकार ही था.वो भाग चुका था.मैं वैसे ही घायल हालत में इधर उधर देखते हुए जीप पे सवार हुआ गुंडे धायर हो चुके थे
एक को उठाकर उससे पूछताछ की तो पाया खलनायक ने मुझे किडनॅप करने के लिए भेजा था.और ऊस्की नज़र मुझपर है क्योंकि मैंने उसका माल और ऊस्की दुश्मन रोज़ को बचाया है..मैंने ऊस अधमरे गुंडे को वही फ़ेक डाला.और अपनी जीप एप सवार हो गया.क्योंकि ठिकाना उसे भी पता नहीं था
किसी तरह जीप को बीच में ही रोकना पड़ा दर्द बहुत ज्यादा बढ़ने लगा.मैंने देखा सामने एक घर है जो जाना पहचाना है वही लंगदाते हुए दरवाजा खटखटने लगा..अचानक दरवाजा खुला और एक साया मेरे सामने खड़ा था
"कोई हे दरवाज़..आ के..होल्ल्लो"..मेरी आवाज़ बुरी तरीके से कनपें जा रही थी.दर्द से बेचैनी हो रही थी.बार बार आंखें बंद होने लगी थी."अरे कोई है आहह"..धधस्स से एकदम से दरवाजा खुल गया.और एक साया सामने अंदर से बल्ब की रोशनी में साफ उसके चेहरे को देखते ही जान में जान आई ये जाना पहचाना साया कंचन का था..
ऊसने मुँह पे हाथ रखकर.मेरी तरफ देखा और मेरे फटे कपड़ों से निकल रहे खून को."अरे साहाबब आप?"...इससे पहले वो कुछ और कह पति.मैंने उससे अंदर आने की इजाज़त माँगी..ऊसने फौरन झट से मुझे घर के अंदर दाखिल करवाया ऊसने क़ास्सके मेरे कंधे को पकड़ा हुआ था.मेरी चलने की हिम्मत नहीं थी.वो तो अच्छा हुआ की कंचन का सहारा मिल गया.ऊस्की बस्ती पास ही में दिख पड़ी.जल्दी से ऊसने दरवाजा बंद करके मुझे खतिए पे लेटा दिया
मैं दर्द से सिसक रहा था.ऊसने फौरन मेरे ज़ख़्मो को देखते हुए बोला "या अल्लाह आपका तो खून बह रहा हाीइ आपको क्या हुआ साहेब?"....मैं कुछ बोल नहीं पा रहा था फिर किसी तरह उठके इस हालत को खुद ही संभालना था
फौरन अपने फटे वर्दी वाले शर्ट को उतार फ़ेक अब मेरे जिस्मो के इर्द लगे तीर के घाव को देखकर कंचन ने मुँह पे हाथ रख दिया और फिर मेरी पीठ पे भी देखा..खून से बनियान थोड़ी लाल हो गयी थी "अल्लाह जख्म बहुत गहरा है अब क्या करे?"..वो सोच में पारह गयी "आ..हे के..आँचनन्न फ़ौरान किसी डॉक्टर को बुला लाओ जो तुम्हारे बस्ती के कहीं पास रहता हो बोल देना आहह दारोगा घायल है प्ल्स जल्दी करो"....कंचन गरीब जरूर थी पर नुस्खे और होशियार चाँद भी थी
ऊसने फौरन मुझे बताया की पास के एक बस्ती में एक डॉक्टर रहता है वो उसे बुला सकती है.वो भागके निकल आ गयी दरवाजा लगाकर मैं वैसे ही पड़ा रहा.जल्दी दो आवा सुनी..कमरे में डॉक्टर बातचीत करते हुए आया और फौरन मेरे ज़ख़्मो को देखते हुए कथिए पे बैठ गया.."ओह माइ गॉड इंस्पेक्टर बाबू आप ठीक है?"...डॉक्टर ने सवाल किया."आहह हान्न्न बस खून बहन जा रहा है प्ल्स आप मेरा यही इलाज़ कर दीजिए हॉस्पिटल जाने की मेरी हिम्मत नहीं है ना ही उठने की अब"..डॉक्टर कुछ देर सोचते हुए मेरे घाव का निरक्षण करते हुए
बक्सा खोलता है अपना.फहरी मुझे एक इंजेक्शन लगता है साथ ही साथ कंचन को एक कटोरा और गरम पानी और कुछ चीज़ें लाने को कहता है.कंचन बेचारी फटाफट अपने छोटे से कोने के रसोईघर से कुछ चीज़ें ले आती है.फिर डॉक्टर मुझे बेहोश कर देता है उसके बाद मुझे नहीं पता की मेरे साथ क्या हुआ सब जलन सी लग रही थी
जब होश आया तो पाया डॉक्टर अपने पसीने को पोंछते हुए मुस्करा रहा था मैं खतिए पे आध नंगा लेटा हुआ था..सिर्फ़ चड्डी में था मेरे पूरे बदन के इर्द गिर्द पत्तियां लगी हुई थी."अफ अब आप सुरक्षित है वो तो अच्छा हुआ तीर ज्यादा गहरा नहीं घुसा वरना जान भी जा सकती थी आपके गर्दन में तीर बुरी तरीके से घुस गया था बहुत मुश्किल से ड्रेसिंग कर पाया हूँ सिलाई भी कर दी है अब आप कुछ देर आराम कीजिए"..बेचारे डॉक्टर ने जो हिम्मत और ईमान दिखाई मेरे प्रति मेरे आंखों में आँसू घुल गये इस गरीब बस्ती में इतना अपनापन है कभी सोचा नहीं था शायद काला साया के वक्त पुणे कमाने का नतीजा था
डॉक्टर : अच्छा इन्हें ये कुछ दवैया दे देना बाकी दवाई दिन में किसी फार्मेसी शॉप से खरीद ले आना
कंचन : अच्छा डॉक्टर बाबू
देवश : आ..हह डॉक्टर प्ल्स आप ये बात बाहर किसी को मत बतायेगा
डॉक्टर : पर आप्पे जनन्लेवा हमला हुआ है इंस्पेक्टर बाबू आपको अपने पुलिस
देवश : एक केस पे काम कर रहा हूँ ना तो उसी के कुछ गुंडों ने मुझे घायल कर दिया बचते बचाते यहां आ गया फिक्र मत करो कंचन वो लोग यहाँ नहीं आ पाएँगे मैंने ऊन्हें अच्छा चकमा दे दिया है बस ये बात इस घर से बाहर ना निकले प्ल्स डॉक्टर बाबू
डॉक्टर : अच्छा ठीक है आप आराम कीजिए
डॉक्टर के जाते ही.कंचन कुछ देर तक खतिए के पास ज़मीन पे तापकरे खून को साफ करने लगी फिर पोंछा मारने के बाद.ऊसने बाल्टी भर के मेरे बदन के इर्द की सफाई भी की.साला कच्चे में भी लेटा हुआ उसके बदन को घूर्रने की आदत नहीं गई थी ऐसे हालत में भी लंड अपनी औकवाद पे आ ही जाता है.पर मुझे कंचन पे बहुत प्यार उमड़ रहा था उसे बेचारी ने मेरे लिए इतना किया और मैंने अपने फायदे के लिए उसे नौकरी से निकाल दिया था
कंचन : बाबू अब आप ठीक हे ?
देवश : बहुत आराम मिल रहा है
कंचन : अब आप जल्दी ठीक हो जाएँगे मैं आपको हल्दी का ढूंढ़ लाके देती हूँ
कंचन ने कुछ देर बाद हल्दी का दूध मुझे दिया.ऊसने मुझे क्सिी तरह अपने हाथों के सहारे से उठाया और बिताके गरम दूध दिया फहुंक फहुंक के ईंे के बाद.10 गाज के घर के चारों ओर देखते हुए मैंने ऊसपे नज़र डाली "और बताओ कैसी हो?"...मेरे मुस्कराने पे वो भी अपने पुराने ही बात विचार में आ गयी
कंचन : हम तो ठीक है बाबू आप सुनाए?
देवश : अरे तुम्हा..रहा पति कहाँ है? और तुम्हारे बच्चे?
कंचन : ऊ सब तो नानी के गाँव गये है और हमरा पति कुछ महीनों पहले ही गुजर गया
देवश : हे भगवान जानके दुख हुआ
कंचन : ना ऊस शराबी निक्कममे के लिए क्या दुख करना बाबू आप आराम कीजिए हम आज नीचे सो जाएँगे
देवश : मेरी वजह से तुमको इतनी दिक्कतें उतनी पड़ी है ना
कंचन : अरे बाबू आपका नमक खाया है? हम तो ए बात से खुश है की आप अपने फर्ज के प्रति कितने जागरूक हो गये है आपको यूँ लधता देख हमें बहुत खुशी मिली हम गरीब से जो जुड़ेगा हम आपके लिए करेंगे पर अभी आपको कहीं जाने ना देंगे
देवश : अरे पगली हां हां हां चलो तुम्हारे अंदर मेरे लिए कोई नफरत तो नहीं है ना मैंने तुम्हें काम से आने पे
कंचन : ना ना बाबू आप बारे लोग है जब चाहे तब रखे जब चाहे तब निकले हम कौन होते है नफरत करने वाले हमारी औकवाद ही क्या?
देवश : अच्छा ग ऐसा नहीं बोलते तुम्हारा दिल तो सोने जैसा है जो अपने बाबू के लिए इतना कुछ की हो
कंचन : इंसानियत है आपका नमक खाया आपके पैसों से रोती खाई है
देवश : अच्छा तुम एक काम करो तुम सो जाओ खामोखाः मेरे वजह से तुम्हारी नींद भी खराब हो गयी
कंचन : ठीक है बाबूजी आप भी सो जाए
कंचन ने पल्लू नहीं उतरा.और वही नीली सारी पहनें चटाई बिछाके बिस्तर बनकर सो गयी..मैं भी दर्द में आराम महसूस करने लगा था आँख भारी हो आई.कंचन को जब काल साया बनकर बचाया था तो उसके बदन की खुशबू आजतक नाथुनो में थी.लेकिन कैसे कहिएं कंचन जी को की हम ही काला साया है हम तो उनके लिए सिर्फ़ उनके मालिक बाबू देवश मिया ही थे