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Guest
मम्मी--ठीक है नीरा तुम अपनी बहनो को लेकर भाभी के पास ले जाओ अगर ये आराम करना चाहे तो अपने साथ रूम में ले जाना.
नीरा--मेरे पास पहले तंग करने के लिए बस एक बड़ी बहन ही थी अब तो मेरे पास 2 बड़ी बहन है तंग करने के लिए और एक छोटी बहन भी आ गयी.... और फिर वो दोनो का हाथ पकड़कर किचन के अंदर ले जाती है..
मम्मी--बताइए रजत भैया गाँव के हाल कैसे है में तो कभी आ नही पाई गाव आप लोगो को यहाँ देख कर सच में दिल खुश होगया..
रजत--भाभी गाव में सब बढ़िया है मुझे दो दिन से भाई साहब की बहुत याद आरहि थी इसीलिए मैने आज यहाँ आ गया और इन लोगो को भी यहाँ ले आया ...
मम्मी--अब आप यहाँ आगये होंठो अब कुछ दिन जाने का नाम मत लेना मुझे थोड़ी तो सेवा करवाने दो अपनी देवरानी से...आपने तो कभी भाभी का ध्यान रखा नही ...
रजत--नही नही भाभी आप सब तो हम लोगों के दिल में हमेशा रहते हो.....
घर में बड़ी खुशी फैली हुई थी....मम्मी अपनी देवरानी से मिलकर फूली नही समा रही थी...
मम्मी नीरा के बर्तडे का फोटो आल्बम उन्हे दिखाते हुए सब के बारे में बता रही थी....
एक चेहरे पर रजनी की नज़र टिक गयी....
रजनी--भाभी ये लड़का कौन है....ये आपकी लगभग सभी तस्वीरों में है...
मम्मी--ओहूऊ में भी कितनी पागल हूँ....ये जय है मेरा बेटा और आपका भतीजा...
रजनी--ये कहाँ है अभी ....बाहर रहता है क्या.
मम्मी--नही बाहर नही उसके किसी दोस्त का आक्सिडेंट हो गया है तो वो वहाँ गया हुआ है...
रजनी--ओह्ह्ह कब तक आएगा मेरा बड़ा मन कर रहा है अपने भतीजे को गले से लगाने का..
तभी....घर की बेल बजती है..
मम्मी उठ कर दरवाजा खोलने के लिए जाती है जैसे ही सामने देखती है...
वहाँ वही ड्राइवर खड़ा होता है जो उन्हे और उनकी गाड़ी को घर तक छोड़ने आता है...
मम्मी--अरे ड्राइवर साहब आप....आप अभी तक उदयपूर में ही हो????आप गये नही वापस..कोई परेशानी है क्या.??
ड्राइवर--मेडम ये चिट्ठी देनी थी आपको इसीलिए यही रुका हुआ था...
मम्मी--कैसी चिट्ठी....?? किसकी है ये चिट्ठि...??
ड्राइवर-- ये मुझे रिजोर्ट वालो ने दी थी आपको देने के लिए....अब में चलता हूँ मेरी ज़िम्मेदारी अब ख्तम हो गयी है...
उसके बाद वो ड्राइवर वहाँ से चला जाता है..
और मम्मी दरवाजा बंद करके जैसे ही उस लेटर को पढ़ने लगती है...उनकी आँखो से आँसुओ की धारा निकलने लगती है जैसे जैसे वो उस लेटर में आगे पढ़ती जाती है...वैसे वैसे उनकी आँखे बस फैलती ही चली जाती है.
तभी अचानक मम्मी लहरा कर ज़मीन पर गिर जाती है...उनको गिरता देखा रजनी और रजत भाग कर उनको संभाल ने पहुँच जाते है
रजनी--भाभी क्या हुआ आँखे खोलो अपनी...नेहा....रूहीी....नीराअ...वो ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगती है सभी वहाँ भागकर पहुँच जाते है सभी लोग मम्मी को घेर कर खड़े होते है....नीरा मम्मी के हाथ में से वो लेटर निकाल कर उसे पढ़ने लगती है....
और ज़ोर ज़ोर से रोते हुए सब को उस लेटर की सच्चाई बता देती है...
नेहा ज़ोर ज़ोर से चीखने लग जाती है वो नीरा से वो लेटर छीन कर नीरा को एक थप्पड़ तक मार देती है...और नीरा नेहा से चिपक्कर रोने रोने लग जाती है...
नेहा को तो जैसे कोई होश ही नही रहता वो एक पत्थर की तरह हो जाती है उस लेटर को पढ़ने के बाद...
तभी घर के बाहर आंब्युलेन्स की आवाज़ गूंजने लग जाती है और चाचा जी और नीरा और रूही भाग कर घर का दरवाजा खोल कर बाहर आजाते है ...उस आंब्युलेन्स में से जय को निकलता देख सब की रुलाई फूट जाती है...
में अपने आँसू किसी तरह संभाले हुए वो दोनो ताबूत घर के अंदर रखवा देता हूँ...उसके बाद नीरा मेरे सीने से लग कर रोने लग जाती है....और अपने हाथो से मेरे सीने पर मारने लग जाती है....
नीरा--ये क्या हो गया भैया....सब कुछ ख्तम हो गया भैया....अब कैसे जियेंगे हम सभी...और बेसूध होकर मेरी बाहो में झूल जाती है ....
अंदर भाभी अभी भी वैसे ही खड़ी थी...उनके हाथो ने अभी भी मेरा लिखा हुआ लेटर पकड़ रखा था...उधर रूही उन दोनो ताबूतो को खोल चुकी थी और वो कभी भैया से कभी पापा की बॉडी से लिपट लिपट के रोने लग गयी थी...
एक औरत रोते रोते अभी माँ को संभालने की कोशिश कर रही थी.
और वहाँ खड़ा एक आदमी रूही को उन ताबूतो से दूर हटाने की कोशिश करते करते खुद भी रोने लग गया था......
घर का महॉल पूरी तरह से बदल चुका था...जहाँ थोड़ी देर पहले पूरा घर खुशियो से भरा हुआ था....वहाँ अब मातम का सन्नाटा छाया हुआ था....कोई किसी से कुछ नही कह पा रहा था...कोई किसी के आँसू पोछ नही पा रहा था....ये कैसी मनहूसियत सी छाइ है मेरे घर के उपर...कैसे में सब का दर्द बाटू...कैसे में संभालू अपने आप को....कैसे सम्भालू...अपने परिवार को...
वो आदमी मेरे पास आकर बोलता है.
रजत--जय बेटा में तेरा चाचा हूँ...देख ना किसकी नज़र लग गयी मेरे भाई को ...और राज तो अभी बच्चा था....कैसे जिएगी नेहा उसके बिना...
उनके मुँह से चाचा शब्द सुनते ही में उनके गले लग कर रोने लगता हूँ अपने सारे बाँध में उनसे गले लगने के बाद तोड़ देता हूँ...वो खुद भी मेरे साथ रोए जा रहे थे...और कहे जा रहे थे...
चाचा--बेटा अपनी माँ और भाभी को संभाल...उनको दूसरे कमरे में लेकर जा और होश में लाने की कोशिश कर ...जब तक में इन दोनो की अंतिम यात्रा की तैयारी करता हूँ...
में--चाचा जी कुछ देर मुझे अपने सीने से लग कर रोने दो इन दो दिनो में दिल खोल कर रोना चाहता था लेकिन मुझे सहारा देने वाला कोई कंधा मुझे नही मिला जहाँ में सिर रख के रो सकूँ...
चाचा--बेटा हम मर्द है...और हम लोगो की ये बदक़िस्मती है कि हम अपनो के जाने पर रो भी नही सकते...क्योकि पूरे परिवार का ध्यान हमे ही रखना होता है...कुदरत ने इसीलिए आदमी का दिल सख़्त बनाया है और औरत का दिल इतना नाज़ुक क्योकि वो औरत भी हमारे दिल के आँसू अपनी आँखो से बहा देती है...
में--पर चाचा में कैसे संभालू इन सब को कैसे दे पाउन्गा में इन लोगो को वो खुशिया जो सिर्फ़ पापा और भैया ही दे सकते थे.
चाचा--बेटा अब तुम घर के सब से बड़े मर्द हो यानी इस परिवार के मुखिया...और परिवार के मुखिया का बस एक ही फ़र्ज़ होता है...अपने परिवार को हमेशा हँसता खेलता वो रख पाए...अब अपने आँसू पोछो और सम्भालो उन सभी को जिन्हे तुम्हारे पापा और भाई तुम्हारे भरोसे छोड़ कर गये है...
इतना कह कर वो घर से बाहर अपनी गाड़ी लेकर निकल जाते है...अब कुछ पड़ोसी भी हमारे घर में आ चुके थे जो मम्मी भाभी और रूही को संभाल रहे थे....तभी अचानक....नीराअ कहाँ गयी...
ये सोचते ही मेरा कलेजा धाड़ धाड़ बजने लगता है...में पूरे घर में बदहवासों की तरह उसे भागते हुए ढूँढने लग जाता हूँ..किसी को उसके बारे में कुछ पता नही होता.....
नीरा--मेरे पास पहले तंग करने के लिए बस एक बड़ी बहन ही थी अब तो मेरे पास 2 बड़ी बहन है तंग करने के लिए और एक छोटी बहन भी आ गयी.... और फिर वो दोनो का हाथ पकड़कर किचन के अंदर ले जाती है..
मम्मी--बताइए रजत भैया गाँव के हाल कैसे है में तो कभी आ नही पाई गाव आप लोगो को यहाँ देख कर सच में दिल खुश होगया..
रजत--भाभी गाव में सब बढ़िया है मुझे दो दिन से भाई साहब की बहुत याद आरहि थी इसीलिए मैने आज यहाँ आ गया और इन लोगो को भी यहाँ ले आया ...
मम्मी--अब आप यहाँ आगये होंठो अब कुछ दिन जाने का नाम मत लेना मुझे थोड़ी तो सेवा करवाने दो अपनी देवरानी से...आपने तो कभी भाभी का ध्यान रखा नही ...
रजत--नही नही भाभी आप सब तो हम लोगों के दिल में हमेशा रहते हो.....
घर में बड़ी खुशी फैली हुई थी....मम्मी अपनी देवरानी से मिलकर फूली नही समा रही थी...
मम्मी नीरा के बर्तडे का फोटो आल्बम उन्हे दिखाते हुए सब के बारे में बता रही थी....
एक चेहरे पर रजनी की नज़र टिक गयी....
रजनी--भाभी ये लड़का कौन है....ये आपकी लगभग सभी तस्वीरों में है...
मम्मी--ओहूऊ में भी कितनी पागल हूँ....ये जय है मेरा बेटा और आपका भतीजा...
रजनी--ये कहाँ है अभी ....बाहर रहता है क्या.
मम्मी--नही बाहर नही उसके किसी दोस्त का आक्सिडेंट हो गया है तो वो वहाँ गया हुआ है...
रजनी--ओह्ह्ह कब तक आएगा मेरा बड़ा मन कर रहा है अपने भतीजे को गले से लगाने का..
तभी....घर की बेल बजती है..
मम्मी उठ कर दरवाजा खोलने के लिए जाती है जैसे ही सामने देखती है...
वहाँ वही ड्राइवर खड़ा होता है जो उन्हे और उनकी गाड़ी को घर तक छोड़ने आता है...
मम्मी--अरे ड्राइवर साहब आप....आप अभी तक उदयपूर में ही हो????आप गये नही वापस..कोई परेशानी है क्या.??
ड्राइवर--मेडम ये चिट्ठी देनी थी आपको इसीलिए यही रुका हुआ था...
मम्मी--कैसी चिट्ठी....?? किसकी है ये चिट्ठि...??
ड्राइवर-- ये मुझे रिजोर्ट वालो ने दी थी आपको देने के लिए....अब में चलता हूँ मेरी ज़िम्मेदारी अब ख्तम हो गयी है...
उसके बाद वो ड्राइवर वहाँ से चला जाता है..
और मम्मी दरवाजा बंद करके जैसे ही उस लेटर को पढ़ने लगती है...उनकी आँखो से आँसुओ की धारा निकलने लगती है जैसे जैसे वो उस लेटर में आगे पढ़ती जाती है...वैसे वैसे उनकी आँखे बस फैलती ही चली जाती है.
तभी अचानक मम्मी लहरा कर ज़मीन पर गिर जाती है...उनको गिरता देखा रजनी और रजत भाग कर उनको संभाल ने पहुँच जाते है
रजनी--भाभी क्या हुआ आँखे खोलो अपनी...नेहा....रूहीी....नीराअ...वो ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगती है सभी वहाँ भागकर पहुँच जाते है सभी लोग मम्मी को घेर कर खड़े होते है....नीरा मम्मी के हाथ में से वो लेटर निकाल कर उसे पढ़ने लगती है....
और ज़ोर ज़ोर से रोते हुए सब को उस लेटर की सच्चाई बता देती है...
नेहा ज़ोर ज़ोर से चीखने लग जाती है वो नीरा से वो लेटर छीन कर नीरा को एक थप्पड़ तक मार देती है...और नीरा नेहा से चिपक्कर रोने रोने लग जाती है...
नेहा को तो जैसे कोई होश ही नही रहता वो एक पत्थर की तरह हो जाती है उस लेटर को पढ़ने के बाद...
तभी घर के बाहर आंब्युलेन्स की आवाज़ गूंजने लग जाती है और चाचा जी और नीरा और रूही भाग कर घर का दरवाजा खोल कर बाहर आजाते है ...उस आंब्युलेन्स में से जय को निकलता देख सब की रुलाई फूट जाती है...
में अपने आँसू किसी तरह संभाले हुए वो दोनो ताबूत घर के अंदर रखवा देता हूँ...उसके बाद नीरा मेरे सीने से लग कर रोने लग जाती है....और अपने हाथो से मेरे सीने पर मारने लग जाती है....
नीरा--ये क्या हो गया भैया....सब कुछ ख्तम हो गया भैया....अब कैसे जियेंगे हम सभी...और बेसूध होकर मेरी बाहो में झूल जाती है ....
अंदर भाभी अभी भी वैसे ही खड़ी थी...उनके हाथो ने अभी भी मेरा लिखा हुआ लेटर पकड़ रखा था...उधर रूही उन दोनो ताबूतो को खोल चुकी थी और वो कभी भैया से कभी पापा की बॉडी से लिपट लिपट के रोने लग गयी थी...
एक औरत रोते रोते अभी माँ को संभालने की कोशिश कर रही थी.
और वहाँ खड़ा एक आदमी रूही को उन ताबूतो से दूर हटाने की कोशिश करते करते खुद भी रोने लग गया था......
घर का महॉल पूरी तरह से बदल चुका था...जहाँ थोड़ी देर पहले पूरा घर खुशियो से भरा हुआ था....वहाँ अब मातम का सन्नाटा छाया हुआ था....कोई किसी से कुछ नही कह पा रहा था...कोई किसी के आँसू पोछ नही पा रहा था....ये कैसी मनहूसियत सी छाइ है मेरे घर के उपर...कैसे में सब का दर्द बाटू...कैसे में संभालू अपने आप को....कैसे सम्भालू...अपने परिवार को...
वो आदमी मेरे पास आकर बोलता है.
रजत--जय बेटा में तेरा चाचा हूँ...देख ना किसकी नज़र लग गयी मेरे भाई को ...और राज तो अभी बच्चा था....कैसे जिएगी नेहा उसके बिना...
उनके मुँह से चाचा शब्द सुनते ही में उनके गले लग कर रोने लगता हूँ अपने सारे बाँध में उनसे गले लगने के बाद तोड़ देता हूँ...वो खुद भी मेरे साथ रोए जा रहे थे...और कहे जा रहे थे...
चाचा--बेटा अपनी माँ और भाभी को संभाल...उनको दूसरे कमरे में लेकर जा और होश में लाने की कोशिश कर ...जब तक में इन दोनो की अंतिम यात्रा की तैयारी करता हूँ...
में--चाचा जी कुछ देर मुझे अपने सीने से लग कर रोने दो इन दो दिनो में दिल खोल कर रोना चाहता था लेकिन मुझे सहारा देने वाला कोई कंधा मुझे नही मिला जहाँ में सिर रख के रो सकूँ...
चाचा--बेटा हम मर्द है...और हम लोगो की ये बदक़िस्मती है कि हम अपनो के जाने पर रो भी नही सकते...क्योकि पूरे परिवार का ध्यान हमे ही रखना होता है...कुदरत ने इसीलिए आदमी का दिल सख़्त बनाया है और औरत का दिल इतना नाज़ुक क्योकि वो औरत भी हमारे दिल के आँसू अपनी आँखो से बहा देती है...
में--पर चाचा में कैसे संभालू इन सब को कैसे दे पाउन्गा में इन लोगो को वो खुशिया जो सिर्फ़ पापा और भैया ही दे सकते थे.
चाचा--बेटा अब तुम घर के सब से बड़े मर्द हो यानी इस परिवार के मुखिया...और परिवार के मुखिया का बस एक ही फ़र्ज़ होता है...अपने परिवार को हमेशा हँसता खेलता वो रख पाए...अब अपने आँसू पोछो और सम्भालो उन सभी को जिन्हे तुम्हारे पापा और भाई तुम्हारे भरोसे छोड़ कर गये है...
इतना कह कर वो घर से बाहर अपनी गाड़ी लेकर निकल जाते है...अब कुछ पड़ोसी भी हमारे घर में आ चुके थे जो मम्मी भाभी और रूही को संभाल रहे थे....तभी अचानक....नीराअ कहाँ गयी...
ये सोचते ही मेरा कलेजा धाड़ धाड़ बजने लगता है...में पूरे घर में बदहवासों की तरह उसे भागते हुए ढूँढने लग जाता हूँ..किसी को उसके बारे में कुछ पता नही होता.....