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Incest ये प्यास है कि बुझती ही नही

मल्होत्रा जी ने बेटी की शादी का इंतज़ाम सेक्टर के ही एक बड़े कम्यूनिटी सेंटर मे किया था. ये एक सुविधा संपन्न जगह थी जहा अंदर 2 बड़े हॉल और बाहर खुले मे आधे एकर के लगभग सफाई से कटी घास के समतल मैदान पर बड़ा सा टेंट और पंडाल लगाया गया था. अंदर की बिल्डिंग मे कुल 10 वातानुकूलित कमरे भी थे जिनमे से 8 कमरो को खोल दिया गया था वर-वधू के तयार होने और ज़रूरी मेहमानो की खातिर डारी के लिए. संगीत, हल्के खाने पीने के स्टॉल, जूस-कोला के काउंटर बाहर के पंडाल मे लगाए गये थे. जहा कोई 300 कुरीसया और पँखो की व्यवस्था भी की गई थी.

अंदर के हॉल मे प्रीति भोज और फेरो की व्यवस्था की हुई थी. खुले-आम शराब का प्रचलन कम था इसलिए एक हाल के पीछे की तरफ छोटा सा काउंटर वहाँ लगवाया हुआ था. घर के कुछ पुरुष वहाँ की व्यवस्था देख रहे थे. तकरीबन 8 बजे तक उनका परिवार भी वहाँ आ गया था क्योंकि शादी के कार्ड पर समय यही था.

पलक दीदी के साथ घर की कुछ औरते और लड़किया उनको वहाँ दिए कमरे मे थी. और 3 कमरो मे भी उनके घर परिवार के ज़रूरी लोग आ गये थे. उनसे अगले गलियारे मे लड़को वालो के लिए 4 कमरे थे और वहाँ भी पंडाल से आने-जाने का रास्ता था.

रामेश्वर जी के परिवार के लोग संजीव और कॉल साहब के साथ 2 कार से निकले थे. लड़किया और रामेश्वर जी तो कॉल साहब की कार मे चल दिए थे और संजीव भैया के साथ उनकी मा, दादीजी, चाची और माधुरी दीदी थे. कॉल साहब की टाटा शेरा गाड़ी अच्छी ख़ासी बड़ी थी लगभग 9 लोग उसमे ज़रूरत के समय बैठ सकते थे तो प्रीति, कोमल, अलका और ऋतु को कोई परेशानी नही हुई वहाँ. इधर संजीव भैया जो मारुति एस्टीम चला रहे थे वो भी 5 लोगो के

लिए आरामदायक थी. भैया ने अर्जुन से साथ चलने को कहा था लेकिन उसने अकेले आने का कह कर उन्हे भेज दिया था. वैसे भी अर्जुन भीड़-भाड़ से थोड़ा अलग रहता था और शादी मे तो जाहिर सी बात थी की भीड़ और हल्ला-गुल्ला होना ही था. उधर पाँचों लड़किया आज सब पर बिजली गिरने वाली थी.

कार से शादी की जगह 10-12 मिनिट की दूरी पर थी तो वो लोग आराम से पहुच गये. दोनो परिवार एक साथ ही अंदर गये और रामेश्वर जी कॉल साहब के साथ गेट पर रुक कर मल्होत्रा जी के साथ लोगो से मिलने लगे और कौशल्या देवी अपनी बहूँ बेटियों को लेकर कामिनी जी से मिलकर पंडाल मे लगी कुर्सियो पर आ गई. जहा उनके परिचित लोग थे तो वो उनके साथ हल्के फुल्के खाने बतियाने लगे.

पलक दीदी तो आज दुल्हन के रूप मे कामदेवी लग रही थी. उनकी कुछ सहेलिया और मधुरी दीदी, कोमल दीदी उसके साथ बातें -हँसी मज़ाक करने लगी.

अलका/ऋतु दीदी प्रीति को अपने साथ लेकर शादी की जगह को देखते हुए यहा वहाँ घूमने मे लगी थी. ज़्यादातर लड़को की निगाह इन हसीनाओ पर थी लेकिन इस दौर की एक और बात थी की लोग जो भी सोचते-करते थे सिर्फ़ मन मे या दोस्तो मे. ऐसी जगह कोई हंगामा नही करता था. ज़्यादा से ज़्यादा भीड़भाड़ के समय किसी पर हाथ फेर देना या कोई ताना कस् देना, इतना ही चलता था.

लड़के वाले जब समारोह जगह के गेट पर आए तो रिब्बन काटने की रसम होने लगी. गेट पर लड़कियो का हुजूम सा जमा हो गया था. यहा सालिया अपने होने वाले जीजा से अंदर आने से पहले पैसो की डिमांड करती है और लड़के की होने वाली सास/बड़ी बहूँ तिलक करके आरती उतारती है फिर वो बारात के साथ अंदर प्रवेश करते है.

बड़ा ही शोर हो रहा था उस जगह . बाहर सड़क पर दूल्हे के दोस्त आतिशबाज़ी छुड़ा रहे थे, गाड़ी-ऑर्केस्ट्रा पर उँचा संगीत गूँज रहा था जिसपर वर-पक्ष के लड़के लड़किया ठुमके लगा रहे थे. अर्जुन बाहर अंधेरे मे स्कूटर पर बैठा बस ये सब होते देख रहा था. ये जगह एक बड़ी पार्किंग थी जहा ब्याह-शादी के समय अतिरिक्त गाड़िया, वहाँ खड़े करने की सुविधा थी. रिब्बन कटवाने के समय कुछ पुरुष भी थे थोड़ा सुरक्षा की हिसाब से.

कोमल-अलका भी रिब्बन के सामने खड़ी थी मल्होत्रा जी की बेटी और संबंधियो की 2-4 लड़कियो के साथ.

"ऐसे तो अंदर आने से रहे जीजा जी. दीदी से मिलना है तो 5100/- से एक रुपया कम ना लगेगा." ऋतु ने ये बात कही और उर्मिला, अलका और 2 लड़कियो ने सुर मे सुर मिलाया.

"हम तो 2 बार 5100 देने के लिए तयार है भाभी के साथ तुम भी चलो हमारे घर." दूल्हे का छोटा भाई जो घोड़ी के साथ खड़ा था तो उसने मज़ाक किया और उसके दोस्तो ने भी शोर मचाया. थोड़ी देर ऐसे ही मस्ती-मज़ाक चलता रहा. लड़किया पैसे कम करने को मान नही रही थी कामिनी जी के और लड़के के पिता के कहने पर उन्होने 3100 रुपये थमा कर अंदर प्रवेश करने का लाइसेन्स लिया. फिर आरती और शगुन के गीत गाये जाने लगे. लोग तो जैसे एक दूसरे पर गिर से रहे थे. ये लड़की वालो की साइड पर हो रहा था पहले तो ऋतु को कुछ अजीब ना लगा लेकिन जब किसी ने उसके उभार पर हाथ रखा तो वो थोड़ा भड़क सी गई. पीछे मुड़कर देखा तो उसके पीछे से राजन अंदर जाता दिखा बाकी तो सब लड़किया या औरते ही उसके पीछे थी.
 
ऋतु ने अभी इस बात को नज़र अंदाज कर दिया. वहाँ से सब लोग पंडाल की तरफ चल दिए और बाराती चाय-नाश्ता करने लगे. लड़को वालो की तरफ से एक बात सभी मे समान थी, नौजवान बेशक जोशीले थे लेकिन कोई भी अभद्र व्यवहार नही करता दिखा. कुछ लड़के और आदमी अपने मतलब की जगह ढूँढ वही अंधेरे मे चल दिया. वर पक्ष के लोग भी अपने आप को ठीक करने मल्होत्रा जी और कपिल के साथ उनके लिए आरक्षित किए कमरो मे चले गये थे.

संजीव भैया ने कार भी चलानी थी तो आज वो बस दोस्तो के साथ बातें करते हल्का फूलका जूस-कोला ही लेते दिखे.

"भाई आज तुम भी व्रत पर हो क्या?" ये राजन ने संजीव भैया को शरारत से कहा था.

"ऐसी कोई बात नही है. मा और दादी साथ है उनको लेके जाना है वापिस. वैसे भी कल ही तो पी थी."उन्होने इतना ही बोला था कि मर्क्युरी लाइट मे उनको राजन के चेहरे पर लगे निशान दिखे.

"तेरे तो शायद चोट लगी है. कैसे लगी ये?" उन्होने थोड़ी परवाह से पूछा था.

पीछे से आते हुए कपिल ने कहा, "2 बियर पीने के बाद सीढ़ियों से गिर जाते है जनाब और सबको जाम टकराने को बोलते है." वहाँ खड़े सभी 25-26 लोगो ने ठहाका लगा दिया जिनमे कुछ लड़को वालो की तरफ से थे. राजन बस खून का घूँट पीकर रह गया था. उसका एक दोस्त, जो शायद आज ही शादी के लिए देल्ही से ही आया था उसने कान मे कुछ कहा तो राजन ने एक साँस पे गिलास खाली कर दिया और उसको फिर कुछ बोल कर वो वही सभी लोगो के साथ लगे रहे.

"सफेद कमीज़ जिसके बटन आसमानी थे, उसपर आसमानी रंग का कॉटन का पतला सूट और एक आसमानी रंग की ही पैंट मे अर्जुन किसी हीरो सा लग रहा था.

चमड़े के भूरे चमकदार लंबी नोक के जूते और वैसे ही बेल्ट कमर पर. उसका व्यक्तित्व देख कर पंडाल की हर लड़की उसकी तरफ सम्मोहित सी दिखी.

चलता हुआ वो सबसे पहले कॉल साहब और रामेश्वर जी के पास पहुँचा.

"आज तो पूरा आसमान ही चलता हुआ आ रहा है भाई." कर्नल पुरी अर्जुन को प्रशंशा भरी निगाहो से देखते बोले. "इस आसमान को कहो की संभाल कर रहे. ऐसे लड़के नसीब से मिलते है."

मल्होत्रा जी भी इधर आ चुके थे 3-4 और दोस्तो के साथ.

अर्जुन ने सबको नमस्कार किया और कॉल साहब और रामेश्वर जी के पीछे खड़ा हो गया.

"मल्होत्रा जी ये मेरा आसमान है तो इसपर तो सितारे मरना तय है. लेकिन चाँद एक ही होगा." कर्नल पुरी मज़ाक भी करते थे और उन्होने वैसे ही उनको जवाब दिया.

रामेश्वर जी ने पोते के सर पर स्नेह से हाथ फेरा और बोले, "चल अब खुद भी अपने साथ वालो के साथ मेलजोल बढ़ा."

उनकी बात सुनकर वो वहाँ से पंडाल मे वापिस आ गया.

"यू आसमान मे भी सितारे कई होंगे, दुआ किसी एक के टूटने से कबुल होती है."

जन्नत की हूँर सी प्रीति हाथो मे कंगन-चूड़ियाँ-मेहंदी लिए खूबसूरत लहंगे की खूबसूरती और बढ़ा रही थी. अर्जुन ने उसकी तरफ देखा और दोनो की नज़रे कुछ पल एक दूसरे को देखती रही. अपनी मा के वही होने का अहसास कर उसने उनकी तरफ ही कदम लिए.

"ये है मेरा पोता , देख लो जी." कौशल्या जी ने अपने साथ बैठी ओरतो की मंडली का इशारा पास खड़े अर्जुन की तरफ किया. सभी ने दुआए दी और उसकी तारीफ करी. कुछ देर बाद ही वहाँ अलका दीदी और ऋतु दीदी आ गये और अपने भाई को मंत्रमुग्ध से देखने लगी.

"वो क्या है ना बचपन मे भी शायद इसकी गोपियाँ थी." प्रीति ने उन दोनो को कहा तो दोनो झेंप सी गई.

"हा तो सबकुछ वैसा ही तो है." अलका ने इतरा कर कहा तो प्रीति ने बस उनकी आँखों मे वही देखा शायद जो वो खुद की आँखों मे देखती थी अर्जुन के लिए. लेकिन दिल मे कोई जलन या द्वेष नही था. खुश थी वो के कुछ बदला नही है बस थोड़े बड़े ही हुए है.

"तू यहा लॅडीस मे क्या कर रहा है." ऋतु ने इतना कहा तो अर्जुन बगले झाँकने लगा.

"मैं तो किसीऔर को जानता नही यहा." उसने इतना ही कहा था कि संजीव भैया के साथ 2 सभ्य से दिखते युवक आए और थोड़ी दूर से ही भैया ने उसको अपने पास बुलाया. "ये है मेरा छोटा भाई अर्जुन और इनसे मिलो ये दूल्हे के भाई अमित और उनके दोस्त सुरेश है."

दोनो युवक भी नज़रो से ही तारीफ कर रहे थे अर्जुन की. "ये अभी छोटा है क्या संजीव भाई?" अमित की बात से तीनो हँसने लगे और अर्जुन शर्मा सा गया. उसको लेकर तीनो इधर उधर घूमते हुए खाने पीने लगे. दुल्हन पलक दीदी को भी अब वहाँ लाया गया, माधुरी दीदी और कोमल दीदी भी उनके साथ थी कुछ और लड़कियो के साथ. उनको स्टेज पर दूल्हे के साथ बिठाया गया. फिर वही से दोनो दीदी भी परिवार मे शामिल हो गई. कौशल्या जी ने सबको खाने के लिए कहा तो अलका/ऋतु दीदी और प्रीति को छोड़कर सभी खाना खाने लगे. कॉल साहब भी वर पक्ष के बडो के साथ पेग ले रहे थे एक कमरे मे और रामेश्वर जी सिर्फ़ बातें सुन या कर रहे थे. थोड़ी देर मे दोनो दोस्तो के लिए वही खाना लगाया गया तो खाना खा कर थोड़ी और बातें कर रामेश्वर जी ने संजीव भैया को हिदायत दी की वो और कॉल सहाब घर की महिलाओं के साथ जा रहे है वो भी समय से सबको ले आए.

"दादा जी अभी तो 11 बजे है. हम 1 घंटे बाद आ जाएँगे प्लीज़. मेरे इम्तिहान की पूरी तैयारी हो चुकी है." ऋतु ने प्यार से दादाजी को कहा तो कॉल साहब ने ही कह दिया, "ठीक है बेटा और प्रीति भी वही सो जाएगी आज. तुम लोग अपना ख़याल रखना."

"और हमारे बर्खुरदार कैसे आएँगे?" अर्जुन के लिए रामेश्वर जी ने पूछा तो संजीव भैया ने ही कहा के वो स्कूटर लेकर आया है. संतुष्ट हो कर कॉल साहब के साथ रामेश्वर जी, कौशल्या जी, ललिता और रेखा जी निकल लिए.
 
"ऋतु तुम या कोई एक जन अर्जुन के साथ चलना. एक तो कार मे जगह उतनी नही है उपर से वो अकेला जाएगा."

"ठीक है भैया." इतना बोलकर वो हिरनी सी मचलती पंडाल की तरफ उड चली.

"अब करो मस्ती." ये बात उसने प्रीति और अपनी तीनो बहनो को कही. पाँचो लड़कियो के साथ उर्मिला और एक लड़की भी थी. प्रीति बस अलका और ऋतु के ही साथ घूम रही थी. जब दूल्हा दुल्हन नाचने के लिए आए तो मल्होत्रा जी के कहने पर घर की लड़किया भी वहाँ नाचने लगी. सब बस मज़े के लिए ही नाच रहे थे कोई अपना हुनर नही दिखा रहा था. भारी कपड़े, गहने और शरीर की गर्मी से पसीना भी आने लगा था.

अर्जुन कुछ देर ये आनंद लेता रहा फिर अमित के बुलाने पर उसके साथ बाहर कार की तरफ चला गया. वहाँ से उन्हे कुछ समान लाना था जो शायद फेरो के समय काम आना था. पंडित अंदर हॉल मे तैयारी मे लगे थे. इस समय तक ज़्यादातर लोग जा चुके थे सिर्फ़ घर के और रिश्तेदार ही थे अब वहाँ.

"दीदी आप एक बार मेरे साथ वॉशरूम चलॉगी? मैं अकेली कैसे जाऊ वहाँ थोड़ा अँधेरा है" उर्मिला ने ये बात नाचते हुए ऋतु दीदी से कही थी. प्रीति और अलका दीदी कुछ दूर पर थे क्योंकि बिल्कुल बीच मे तो दूल्हा दुल्हन धीमे धीमे नाच रहे थे. बिना कुछ सोचे ही ऋतु दीदी ने भी कह दिया, "हा चल यार मुझे भी फ्रेश होना है और मूह भी सॉफ कर लूँगी." पूरा चेहरा पसीने से सना था. इन दोनो पर किसी और की भी निगाह थी जो इनके वहाँ से निकलते ही हट गया था.

महिलाओ के लिए एक बाथरूम तो कमरो के आगे ही बना था लेकिन वहाँ भीड़ का बहाना कर उर्मिला ऋतु दीदी को सामने से घुमा कर पिछले हिस्से की तरफ ले गई जो शराब पीने वालो की जगह से बिल्कुल ही विपरीत दिशा मे थी.

"यहा कहा जा रहे है यार.कितना अँधेरा है?" ऋतु दीदी ने चलते हुए ही कहा.

"दीदी, उस तरफ तो शराबी ही थे सब तो अच्छा नही लगता ना." बात घुमाती सी वो उन्हे ले कर बाथरूम तक आ गई. ये गलियारा बिल्कुल अलग थलग था शायद बिल्डिंग के उपर बने कमरो को यही रास्ता जाता था.

"पहले मैं चली जाऊ दीदी?" उर्मिला ने कहा तो ऋतु ने सर हिला दिया, "जल्दी आना" और वो इंतजार करने लगी. बाथरूम भी सिंगल ही था. कुछ ही देर मे उर्मिला बाहर आ गई अपना मूह रुमाल से सॉफ करती हुई.

"मैं भी बस 5 मिनिट तक आती हूँ. यही रहना." और अंदर जा कर ऋतु दीदी ने चितकनी लगा दी.

"चल तू निकल यहा से." राजन ने धीमे शब्दो मे उर्मिला को कहा और बाजू से पकड़ बाहर की ऒर धकेल दिया. उर्मिला भी डरी सहमी से निकल गई. राजन और उसके साथ उसका वही दोस्त था जो पहले शराब पीते समय कानो मे बात कह रहा था. हट्टा कट्टा

था ये लड़का भी. बाहर गलियारे की लाइट राजन ने बुझा दी और उपर जाने वाले सीडीयों के अंत मे बने दरवाजे को उस लड़के ने धकेल कर खोल दिया. गाना गुनगुनाती ऋतु दीदी बाहर आई तो अंधेरा देख और उर्मिला को वहाँ ना पा कर उनका मन शंका से भर गया और अगले ही पल सीढ़ियो पर खड़े लड़के ने पीछे से उनका मूह दबा कर छाती को दूसरे हाथ से जकड़ लिया. ऋतु के कुछ सोचने से पहले हे राजन ने उसके दोनो पैर हवा मे उठा लिए. दोनो लड़के फुर्ती से

उपर चढ़ गये.
 
उर्मिला भारी सांसो से जैसे ही अंधेरे से निकल कर बिल्डिंग की सामने की तरफ आई तो अर्जुन उसके सामने खड़ा था. उर्मिला की जान ही निकल गई उसको देख कर.

"मैं नही जानती ऋतु कहा है?" अर्जुन के बिना कुछ पूछे ही उसके मूह से ये बात निकल गई. शायद उसको भी पता लग चुका था की उसका भाई बहुत ग़लत काम कर रहा है और यही उसको ज़्यादा डरा रहा था.

"दीदी कहा है?" अगले पल मे अर्जुन की आवाज़ सर्द हो गई थी और उसकी हथेली उर्मिला की गर्दन पर कस गई थी...

"वो राजन भाई ने कहा था. वो और उनका दोस्त उन्हे उपर लेके गये है."काँपती आवाज़ मे उसने हाथ के इशारे से अंधेरे की तरफ इशारा किया तो अर्जुन बिजली की रफ़्ता से उधर दौड़ गया. बाथरूम की लाइट जल रही थी लेकिन गलियारे मे अंधेरा था.

उपर सीढ़ियो का दरवाजा खुला देख वो अगले ही पल छत पर जा पहुचा. 5-6 कमरे जो पंडाल से उल्टी डिश मे थे उनमे से आख़िरी वाले मे रोशनी थी. अगले ही पल उसकी लात पूरे ज़ोर से दरवाजे पर पड़ी.

ऋतु दीदी को पीछे से राजन के दोस्त ने पकड़ रखा था और मूह पर एक रुमाल बाँध रखा था. उसके ज़ोर लगाने पर भी पीछे वाला उसको हिलने तक नही दे रहा था. राजन उनकी सलवार खोल चुका था और कमीज़ उपर उठाने लगा था.

"कमीने." दरवाजे खोलने के बाद का दृश्य देखते ही अर्जुन की आँखों मे खून उतर आया था और अगले ही पल उसकी लात सीधा राजन के जबड़ो पर लगी और उसका सर फर्श पर.. " धडाम " दूसरे की तरफ देखे बिना ही वो राजन को कपड़े की तरह धोने लगा. अपने दोस्त की चीखें सुनकर उस लड़के ने ऋतु दीदी को सामने बिस्तर पर फेंका जिसपर वो धम्म से गिरी और माथा दीवार से लगा.

"साले बहनचोद मेरे दोस्त पे हाथ उठाता है." इतना बोलकर एक पानी

से भरी काँच की बॉटल अर्जुन के सर पर दे मारी. अर्जुन बिना कुछ ही कहे मुड़ा और उस लड़के की गर्दन पकड़ कर दरवाजे के साथ वाली दीवार पर उसका सर दे मारा. ज़मीन पर राजन किसी कटे पेड़ की तरह पड़ा तड़फ़ रहा था. मूह और नाक से खून निकल रहा था उसकी, जो फर्श पर भी गिर रहा था.

दूसरा लड़का जिसने बॉटल फोड़ी थी अर्जुन के सर पर अब उसकी भी आँखें उबल रही थी बाहर की तरफ.

"छोड़ दे इन्हे अर्जुन. ये क्या कर रहा है तू?"

संजीव भैया के साथ कपिल और मल्होत्रा जी भी उपर आ गये थे. मल्होत्रा जी ने तो बेडशीट ही ऋतु दीदी की टाँगो पर पलट दी थी. वो समझ गये थे की यहा क्या होने जा रहा था.

"इसने मेरी बेहन के जिस्म पर हाथ डाल दिया और आप कहते हो छोड़ दूं?"

उसकी बात सुनकर संजीव भैया पीछे हट गये. कपिल तो ज़मीन पर पड़े राजन को उठा उसके थप्पड़ मारने लगा था. "साले निकल जा यहा से अभी की अभी. मार देंगे तुझे अगर हाथ भी लग गया तो." कपिल ने इतना बोला था कि मल्होत्रा जी तो जूता निकाल पिल पड़े उसपर, "हरामी साले तुझे तो मैं पोलीस मे देता हूँ. कुत्ते."

इधर कपिल ने देखा की दूसरे लड़के की हालत खड़े होने लायक नही बची है तो उन्होने अर्जुन को पीछे से पकड़ लिया और संजीव भैया ने सामने से अपने बाहे भर ली अपने भाई की कमर पर.

"तू फिर दूर चला जाएगा छोटे. रुक जा"

उनकी इस बात ने अर्जुन को बरफ कर दिया. उसके सर से बहता खून उसके चेहरे को भिगो चुका था. किसी राक्षस सा दिख रहा था अर्जुन.

"सब बाहर जाओ." उसने सख्ती से कहा तो कपिल उस लड़के को घसीट कर और संजीव को लेकर बाहर आ गया.

"दीदी, ये पहनो ज़रा." उनकी सलवार बिना ऋतु दीदी की तरफ देखे उनकी ओर कर दी.

ऋतु के ज़्यादा चोट नही लगी थी लेकिन उसकी आत्मा पर वॉर हुआ था. अपने भाई का खून से सना चेहरा और अपने लिए प्यार देख चुपचाप अपनी सलवार पहनी और उठकर बाहर आ गई. जहा उर्मिला एक तरफ रो रही थी और मल्होत्रा जी तो संजीव भैया के पाव मे ही गिरे थे.

"बेटा रामेश्वर जी को पता लगा तो मेरा दोस्त तो जाएगा ही मेरा परिवार भी उजड़ जाएगा."

"आपकी कोई ग़लती नही है. आप निश्चिंत रहे अंकल लेकिन उन दोनो मे से कोई भी नज़र आया यहा तो.." अर्जुन ने जवाब दिया संजीव भैया की जगह.

"अंकल आप नीचे जाइए. कपिल तू भी जा भाई. दीदी की शादी है तो सब होंगे. हम आते है" संजीव भैया की बात पर मल्होत्रा अंकल उनसे गले लग बोलते गये, "बेटा जो भी हुआ उसमे मेरा कोई दोष नही था. समझना इस बात को. मैं तुम्हे भी कपिल के बराबर ही मानता हूँ लेकिन आज मेरी इज़्ज़त पे जो दाग लगा है कोशिश करना वो मेरे दोस्त तक ना जाए." एक बार फिर हाथ जोड़कर उन्होने भैया, ऋतु दीदी और अर्जुन की तरफ देखा.

"अंकल आप भी मेरे दादाजी के समान है. लेकिन किस घर मे राक्षस रहता हो ये कोई बता नही सकता. आप इसके लिए खुद को दोष मत दीजिए. मेरा घाव, ये मंज़र सब भर जाएँगे. अपने दिल से बोझ ख़तम कर आप ये शादी की तरफ ध्यान दीजिए बस."

फिर वो अपने बेटे को लेके नीचे चल दिए, नम् आँखो से.

"ऋतु मुझे माफ़ कर दे. मुझे डरा कर ही राजन ने ये काम करवाया. उसने कल रात भी मुझे मारा था और आज भी उसने बोला था कि अगर मैं तुम्हे बाथरूम तक नही लाई तो फिर वो दोनो मेरे साथ ये सब करेंगे. मेरे से ग़लती हो गई." उर्मिला जो इतनी देर से रो रही थी फफक कर ऋतु दीदी के पाव मे पड गई.

"तुम यहा से जा सकती है. जब तुम्हारा दिल तुम्हे माफ़ कर दे तो समझ लेना मैने भी माफ़ कर दिया." ऋतु ने बात बिल्कुल आराम से कही थी लेकिन सख़्त.
 
संजीव भैया ने दोनो के हाथ पकड़े और नीचे आ गये. "चल ये इसका कोट पकड़ ऋतु." बाथरूम के बाहर उन्होने अर्जुन का कोट ऋतु को थमाया और पानी के नीचे अर्जुन का सर कर दिया.

घाव कुछ ज़्यादा गहरा नही था. बस काँच की वजा से और सर की चोट थी तो खून ज़्यादा आया लेकिन सर के बीच मे सिर्फ़ एक सेंटीमीटर का कट था.

"बिल्कुल ठीक है तू मेरे शेर. उन्होने अपने रुमाल से उसके जाख को दबाया एक बार और फिर चेहरा सॉफ करने लगे. चलो ऋतु तुम भी चेहरा ठीक कर लो." दोनो कुछ देर बाहर खड़े रहे फिर ऋतु बाहर आकर उनके साथ ही गेट की तरफ चल दी जहा अब तक सभी खड़े थे.

"मैं भाई के साथ आती हूँ." ऋतु ने ये बात संजीव भैया को कही तो उन्होने हामी भर दी. एक बार अंकल आंटी को दूर से नमस्ते कर भैया और दीदी लोग प्रीति को साथ लेकर निकल गये.

इधर ऋतु दीदी अर्जुन का हाथ पकड़ कर उसके साथ स्कूटर तक आ गई. दोनो चुप थे लेकिन मन मे तूफान मचा था. स्कूटर पर दीदी बिठा कर कर वो चल दिया वहाँ से. ये रास्ता थोड़ा घूम कर घर की तरफ जाता था. कोई 2 मिनिट का ही फ़र्क था इस साइड से.

"भाई रुक एक बार." ऋतु के इतना बोलते ही सुनसान सड़क पर ब्रेक दबाने से टायर की रगड़ की आवाज़ फैल गई. अर्जुन अगले ही पल स्कूटर स्टॅंड पर लगा अपनी बेहन को बाहो मे लिए बीच सड़क पर खड़ा था. ऋतु फफक सी पड़ी थी और खुद को और ज़ोर से अर्जुन से चिपका लिया था.

"दीदी जब तक मैं हूँ तो आपके उपर आँच भी नही आने दूँगा. वो साला अगर आज जिंदा बचा तो सिर्फ़ इसलिए के समय, मौका और जगह सब ग़लत थे."

"मैं जानती हूँ भाई के तू मेरे से कितना प्यार करता है. और आज के बाद मेरी हर साँस पर सिर्फ़ तेरा ही नाम होगा." कुछ देर ऐसे खड़े रहने के बाद दोनो वापिस चल दिए.

दादा जी के सामने इस बात का जीकर मत करना मुन्ना. देख मैं बिल्कुल ठीक हूँ और बात होने पर वो सिर्फ़ बढ़ेगी हे." nअर्जुन को समझते हुए कहा.

"दीदी मैं इतना ना-समझ नही हूँ. मल्होत्रा अंकल अच्छे इंसान है. आंटी भी सबका ख़याल रखने वाली अच्छी औरत है. बस 1-2 ग़लत लोगो की वजह से सबके रिश्ते खराब नही होने दूँगा."

अर्जुन अब संभल चुका था लेकिन आज उसने कुछ सीखा भी था. ऐसे ही वो घर तक पहुचे तो बाहर ही सब खड़े थे.

"आ गये तुम दोनो? यहा कब से इंतजार हो रहा है तुम्हारा." अलका दीदी ने ऋतु का हाथ पकड़ा और अंदर चल दिए सब. प्रीति भी अलका और ऋतु दीदी के साथ उनकेकमरे मे चली गई.

"तू चल मेरे साथ छोटे." वो गली मे ले चले अर्जुन को अपने संग जो अब अंधकार मे डूबी थी. दूर दूर बस स्ट्रीट लाइट थी. "आज जो भी हुआ वो ग़लत हुआ भाई. तेरी जगह मैं भी यही करता लेकिन इस बात को यही ख़तम कर देना. शंकर चाचा को इस बात की भनक लगी तो तू खुद भी नही जानता की मल्होत्रा जी के परिवार का क्या होगा. ऋतु उनकी जान है और उसका सिर्फ़ गला खराब होने पर सबके सामने रेखा चाची पर हाथ उठाने वाले इंसान के बारे मे तू कुछ सोच भी नही सकता. लेकिन तू आज बिल्कुल वैसा ही लग रहा था जैसा एक बार उनको मैने देखा था बचपन मे कोई 20 साल पहले,
 
जलती जवानी

"ऋतु दीदी, ये आपके चेहरे पर चोट का सा निशान कैसा है?" कमरे मे बिस्तर पर लाइत्न्े से पहले प्रीति के सवाल ने अलका की नज़र भी ऋतु की तरफ कर दी थी.

"हा बता ना ऋतु, ये तो सच मे सूज गया है. तुझे मेरी कसम है?" ऋतु कुछ देर चुप रही फिर उसने सारी बात शुरू से अंत तक बता दी जिसको सुनकर दोनो ही सकते मे आ गई थी. इतना कुछ हुआ और किसी को भनक भी नही थी.

"मेरी कसम है तुम दोनो ये बात किसी को नही कहोगी."ऋतु ने दोनो को ऐसे देख कहा.

"कल भी कुछ ऐसा होने ही लगा था की अर्जुन सही टाइम पर उपर आ गया था वहाँ." प्रीति की बात ने दोनो को चौंका दिया था. और प्रीति ने अपनी कलाई उनकी तरफ कर दी जहा चूड़ियों के नीचे 2 बॅंडिड लगी थी. "शायद कल की बात के ही लिए उस लड़के ने ये सब आज किया. क्योंकि जब वो मेरे पास आ रहा था तो आपने ही उसको भगा दिया था."

"कल अर्जुन ने उसको मारा था?" अलका को दिन की खाने पर हुई बात याद आ गई.

"नही दीदी इतना नही मारा था जैसे आज ऋतु दीदी ने बताया है. मैं उसको खींच कर ले आई थी अपनी कसम दे कर." थोड़ी देर तक तीनो खामोश थी

ये खामोशी भी प्रीति ने ही भंग की. "मैं जानती हूँ आप दोनो भी उसको उतना हे प्यार करती हो जितना मैं. और वो भी, मैने ये देखा है. और मुझे ये अच्छा भी लगा देख कर."

"क्या मतलब?"ऋतु ने ये बात कही तो अलका दीदी का भी चेहरा प्रीति को ही देखने लगा.

"जैसे वो एक दिल है वैसे ही उसकी धड़कन हम तीनो है. और मैं चाहती हूँ के ये सब कभी ना बदले." प्रीति की बात सुनकर अलका और ऋतु ने उसको दोनो तरफ से गले लगा लिया. "वैसे आप दोनो के भी सख़्त ही है." इतना बोलकर प्रीति ने जल्दी से अपने उपर चद्दर ओढ़ ली और लेट गई.

"रुक तेरे तो मैं नरम करती हूँ अभी प्रीति की बच्ची." ऋतु दीदी ने उसको लेते हुए ही बाहों मे ले लिया और अलका दीदी भी आराम से पीछे बिस्तर पर पसर गई. प्रीति की बातों ने महॉल को हल्का कर दिया था.

"ऋतु अब सो भी जा. कल पेपर है तेरा." अलका ने अपनी बाह प्रीति के उपर रख कर सोने से पहले कहा

कुछ ही देर मे कमरे मे शांति छा गई.

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"चल आजा आज मेरे साथ सो जा. मैं भी थोड़ा अकेला फील कर रहा हूँ." अर्जुन को अपने कमरे मे लेकर आए संजीव भैया ने कहा.

कपड़े बदल कर दोनो भाई हे बेड पर लेट गये. "देख अब ज़्यादा मत सोच और इस बात को भूल जा. वो देल्ही का था और अब कभी फिर दिखाई देने वाला नही.

ऋतु भी ठीक है बिल्कुल."

"हाँ भैया. मैने बुरी बातें याद रखना छोड़ दिया है अब. जो भी हुआ वो किसी काम का नही. लेकिन आज एक असलियत तो पता लग गई की सब लोग शराफ़त के पीछे एक जैसे नही होते."

"सही कह रहा है छोटे. दुनिया हमारी सोच से कही अलग है. बस इतना याद रख जो तेरी परवाह करते है तू उनकी कर और बाकी सब सिर्फ़ अपने प्यार वालो से दूर रख. इसमे ही बेहतरी है." संजीव भैया ने इतना बोलकर करवट बदल ली. अर्जुन भी आँखें बंद कर सोचता सा लेट गया.

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उधर ललिता जी का दिल आज भारी सा था तो उन्होने रेखा को अपने कमरे मे सुला लिया. दोनो अपने रात के परिधान मे ही लेटी बातें कर रही थी.

"देख तो रेखा तू अभी तक जवान पड़ी है. माधुरी की उमर के लड़के भी तुझको देख रहे थे वहाँ." मन को हल्का करने की जिरह से उन्होने अपनी देवरानी को छेड़ा.

"क्या दीदी. आप भी मज़ाक करने लगी हो. 20-21 साल की 2 बेटियाँ है मेरी अब तो." रेखा जी ने थोड़ी शरम से कहा. कमरे मे ज़ीरो का बल्ब जल रहा था.

"वैसे इतनी खूबसूरत है तू, शरीर भी ऐसा दिया है की किसी का भी मन डोल जाए. फिर तू अकेले कैसे रातें काट लेती है री?"

ललिता जी अपनी देवरानी से लगभग सभी बातें कर ही लेती थी. रेखा जी भी उनमे अपनी बड़ी बेहन देखती थी तो एक वो ही थी घर मे जिन से खुलकर अकेले मे वो दिल का हाल बया कर लेती थी.

"क्या दीदी. आपको तो पता ही है जब ये आते है तो कुछ काम कहाँ करने देते है."

"वो सब तो ठीक है लेकिन रेखा महीने मे 3 दिन या कभी 4 दिन से पूरा गर्मी तो ठंडा नही हो जाता.?" ललिता जी कही इस बात ने रेखा जी को अपने पति की याद दिला दी. वैसे तो शंकर जी अच्छे से ख़याल रखते थे और प्यार भी करते थे अपनी पत्नी को लेकिन उनके और भी कई सच थे जिन्हे कुछ उन्होने देखा था और कुछ उन्हे पता लगे थे. लेकिन नारी का तो काम ही सिर्फ़ अपना फर्ज़ पूरा करना है.

"ऐसा कुछ नही है दीदी. वो मेरी प्यास बुझा देते है जो महीने भर नही भड़कती." कुछ सोच कर कही गई इस बात पर ललिता जी ने बस हल्के से रेखा जी के उभार पर हाथ रखा और कुछ पल बाद हटा लिया.

"अगर अच्छे से ख़याल रखता ना शंकर तेरा तो ये पहाड़ अब तक ढीले हो जाते. ये तो ऐसे खड़े है जैसे आज भी दूध निकल आए इनमे से."

रेखा जी ने उनकी बात सुनकर करवट सीधी कर ली. उनके चेहरे पर तो शरम छाइ थी लेकिन दिल मे टीस सी हो रही थी. एक बात तो उनकी जेठानी की बिल्कुल ठीक थी की अच्छे से ख़याल रखा होता.

"मुझे पता है सबकुछ. मैं इस घर मे तेरे से 5 साल पहले आई थी. शंकर कैसा है ये पता है मुझे और वो क्यो महीने मे एक बार आता है ये भी. तेरे आने से पहले भी मैने कई होली दीवाली देखी है इस घर की. तब ये घर नही था सिर्फ़ 2 कमरे और गाए बँधी होती थी यहा. सब तो पहले वही रहते थे ना पुराने घर जहा तू ब्याह कर आई थी."

ललिता जी बातें अब रेखा जी के दिल मे उतर रही थी. उन्हे तो लगता था कि जो कुछ उसने देखा था वो कोई नही जानता होगा लेकिन जेठानी की बातें सुनकर वो सुन्न थी.

"शंकर दिल का बुरा नही मेरी बेहन. बस ये समझ ले की वो सबसे थोड़ा अलग है. बाप जब घर से दूर हो, घर की देखभाल सिर्फ़ एक मा करती हो और रुपये पैसे की कमी ना हो तो कोई एक बच्चा थोड़ा खुलकर जीने लगता है. शंकर भी वैसा था. जब घर मे ब्याह कर आई थी तो तेरे जेठ जी हर रात अपने दोनो भाइयो की बातें करते थे. नरेन्दर तो शंकर की परछाइ था, उसकी कोई दुनिया या मकसद नही था. जैसा शंकर ने कहा या किया वो बस अपने भाई का साथ देता था. तेरे जेठ की नौकरी लग गई थी तो उन्हे तो कभी फ़ुर्सत ना मिली ये सब देखने की. शंकर को कॉलेज मे जिस लड़की से प्यार था वो तो ब्याह कर के चली गई थी किसी और के घर. डाक्टरी की पढ़ाई मे उसने सिर्फ़ लड़ाई-झगड़ा, शराब और लड़किया ही समझी. दिमाग़ का धनी था तो सास-ससुर तो कुछ बोल नही पाते थे. और आज भी देख सांड़ जैसा है लेकिन तब बिगड़ैल सांड़ था पूरा. नरेन्दर तो पंजाब चला गया था नौकरी के लिए तो शंकर भी ट्रैनिंग ख़तम कर के सिविल हस्पताल मे काम पे लग गया. सब आदत बदल गई थी बड़ा आदमी बन-ने के चक्कर मे, उसको सबसे अच्छा डॉक्टर बन-ने का जुनून था लेकिन एक आदत ना जा सकी बल्कि वो तो हॉस्पिटल मे नौकरी के बाद बढ़ती चली गई. सुंदर था, हट्टा कट्टा था

और उपर से डॉक्टर. पता नही कितनी लड़कियों, नर्सो के उपर से गुजरा होगा. यही आता था लेके कइयो को तो, मैने खुद कई बार देखा. फिर ससुर जी ने तुझे कही देखा तो उसके लिए पसंद कर लिया. उन्हे लगा के अच्छी पढ़ी लिखी पत्नी होगी तो शंकर अब सिर्फ़ काम पे ध्यान देगा. लेकिन अब तू खुद ही बता के कितना ध्यान दिया? तूने बहुत मेहनत की उसको खुद से बाँधने की. सबकुछ किया जो उसने कहा, चर्बी तक ना आने दी शरीर पर बच्चे पैदा करने के बाद लेकिन वो तो फिर वही मूऊए गुलाटी और सांगवान के साथ शबाब और शराब के मज़े मारता फिरता है. तेरे जेठ को भी ये आदत लगा दी. होली पे खुद देखी मैने इनके लंड पर लिपीसटिक्क देखी जब टुन्न हो के सोए पड़े थे." एक ही साँस मे उन्होने सारी राम-कथा सुना दी, हल्का गुस्सा भी था उनके लहजे मे.

"आपको सब पता था तो भी कुछ ना कर पाई दीदी आप?" रेखा जो सब सुनते हुए भावुक हो चुकी थी नम्म आँखों से ललिता जो को बोली.

"अर्रे इनके तो मा-बाप ना कुछ कर पाए मैं-और तू क्या कर लेती? अब तेरे जेठ को ही देख कैसे चहकते रहते है भाई के आने पर. मेरे साथ तो ठीक से खड़ा नही होता वहाँ से अपना सूजा के लाते है. नये शरीर का चस्का है ना या तो अब मज़ा आता नही क्योंकि बच्चों की फॅक्टरी थी जो पहले खूब चला ली अब मन भर गया."

अपनी जेठानी की ऐसे बात सुनकर ना चाहते हुए भी रेखा जी की दुखी चेहरे पर हँसी आ गई.

"तू भी हंसले क्यो की तुझे तो आदत है. लेकिन मैने भी ना कुटवाई किसी तगड़े मूसल से तो मेरा नाम भी ललिता नही." कितना विद्रोह सा मचा हुआ था ललिता जी के दिल मे. एक तरफ रेखा थी जो सब जानते हुए भी बस चुप चाप गुज़ारा कर रही थी और दूसरी तरफ ललिता, जो अपने पति की बेवफ़ाई का बदला ही लेने पर थी. एक तरह तो उन्होने इसकी शुरुआत कर ही दी थी अपने भतीजे से चुदवाकर. लेकिन एक मा को तो वो ये बताने से रही.

"ये आप क्या बोल रही है दीदी? आप ऐसा सोच भी कैसे सकती है.?" रेखा के चेहरे पर गंभीरता और परेशानी तैर गई थी सुनकर.

"वो इतने साल कर सकते है सबकुछ और मैं बस देखती ही रहूं. मेरे भी आग लगती है अंदर, मुझे भी कोई चाहिए जो प्यार करे और मेरी इज़्ज़त करे. लेकिन 5 साल से ज़्यादा हो गया है ये सब सहते. मैं तेरी तरह अंधेरे मे खुद पर ठंडा पानी डाल कर नही सोने वाली. जो होगा देखा जाएगा और कॉन्सा मैं इस बात की सुनवाई शहर मे करूँगी." उन्होने तो जैसा अपना आदेश ही सुना दिया था.

रेखा बस एकटक उनकी बातों को सोचती उनको देखती पड़ी रही. जेठानी को ये भी पता था कि वो सुबह अंधेरे मे अपनी आग कैसे ठंडी करती है.

"और आपकी इज़्ज़त पर बात आई तो?"

रेखा की बात सुनकर ललिता जी मुस्कुराइ. "मैं कोई रंडी तो नही ना. मैने कहा है कोई ऐसा जो मेरी इज़्ज़त करे, प्यार करे और मुझे औरत होने का सुख दे. ये नही कहा के सड़क पर पाव पसार कर हर कुत्ते को खुद पर चढ़ा लूँगी."

उनकी बातें रेखा को हँसी भी दे रही थी और बेचैन भी कर रही थी. ना चाहते हुए भी उनका खुद का हाथ एक बार चूत को सहला गया जो बुरी तरह तप रही थी.
 
उनकी बातें रेखा को हँसी भी दे रही थी और बेचैन भी कर रही थी. ना चाहते हुए भी उनका खुद का हाथ एक बार चूत को सहला गया जो बुरी तरह तप रही थी.

"अगर कोई तुझे ऐसा कभी मिले जो तेरी इज़्ज़त करे, तुझे सम्मान दे और तेरा ख़याल रखे तो मेरी लाडो उसको आज़माकर ज़रूर देख लिओ. करना या ना करना फिर तेरे हाथ मे. ओर चल अब सो जा फिर तू मूह अंधेरे मे चूत पर पानी गिरने जाएगी. " ललिता जी आख़िरी बात जो थोड़ी उन्होने खुल कर कह दी थी को सुनकर उनकी बाजू पर हल्की सी चपत लगा कर रेखा जी भी आँखें बंद कर लेट गई.

आँखों मे दूर दूर तक नींद ना थी. खुली आँखों से वो अपनी जेठानी की कही हर बात ध्यान से सोच रही थी. एक शर्मीली सी लड़की जो ब्याह कर इस घर मे आई थी तो उसके पति ने शराब के नशे मे कैसे उसको रौंद दिया था. फिर उसको वो सब सिखाया जिसकी कल्पना भी कभी रेखा ने ना की थी. कभी कभी तो दर्द के निशान से बुखार भी हो जाता था उसको लेकिन पलट कर पूछा नही. एक बाप के तौर पर उनका पति सही था कुछ हद तक लेकिन पति के तौर पर शायद वो कभी भी उनकी आत्मा तक ना पहुच पाया. 2 साल पहले जब वो खुद उनके साथ सिविल हॉस्पिटल गई थी तो अपनी आखों से डॉक्टर गुलाटी और अपने पति को नर्स के साथ लगे हुए देखा था. ऑपरेशन का बहाना करके अच्छा ऑपरेशन कर रहे थे दोनो एक 20-21 साल की लड़की का और वो लड़की भी मज़े से उनका साथ दे रही थी. इन सब बातों को याद करके उनका दिल दोराहे पर था. ऐसे ही उन्हे नींद ने आ घेरा.

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अर्जुन अपने वक्त से ही उठ गया था और फिर बाथरूम से फ्रेश हो कर जैसे ही बाहर आया तो अपने भैया को भी तयार होते पाया. "आप इस वक्त तयार होकर कहा जा रहे है?"

"मैं तो तेरे उठने से पहले ही तयार हो चुका था. बस अभी उपर आ कर जूते पहन रहा हूँ. आज एक मीटिंग है बाहर शहर तो बस निकल रहा हूँ. याद से ऋतु को पेपर दिलवाने ले जाना. और मैं अब गुरुवार तक ही वापिस आउन्गा." संजीव भैया ने खड़े होते हुए कहा और अपना बैग उठा लिया. दोनो भाई नीचे चल दिए.

"अच्छा एक कीजिए, आप मुझे भी ये अगले पार्क मे छोड़ दीजिए." भैया को कार निकाल ते देख उसने कहा और कार मे बैठ गया.

"ये कौन सी दौड़ करने चला है तू." भैया ने हंसते हुए कहा और कार बाहर निकल कर वापिस गेट बंद कर चल दिए.

"बस एक बात करनी थी भैया. क्या मुझे फिर से बाहर भेज देंगे पापा?" अर्जुन शायद कुछ महसूस कर रहा था.

"देख अभी तो तू कही नही जा रहा. हा शायद कॉलेज के लिए तुझे जाना पड़े. और उसमे कुछ बुरा भी तो नही हफ्ते मे 2 दिन तो तू घर आएगा ही."

अर्जुन को थोड़ा आराम मिला ये बात सुनकर. "वैसे कल जैसा हंगामा किया शायद पहले .... और भैया पार्क के पास कार रोक कर खड़े हो गये.

"छोटे तू अपने फैंसले खुद भी ले सकता है. अब तू बड़ा हो रहा है. लेकिन जो लोग तुझे उकसाए तो अपनी शांति भंग मत होने देना. यहा बहुत से गरम खून मिलेंगे जो शायद तुझे लड़ने तक उकसा दे. बस उनसे मुकाबला नही करना. और मैं निकलता हूँ तू घर का ख़याल रखना."

पार्क के अंदर आकर कुछ देर तो अर्जुन टहलता रहा फिर 2 चक्कर दौड़ लगाने के बाद घास पर बैठ कर ध्यान लगाने लगा. इतनी अच्छी हवा मे ऐसे लंबी साँसे लेना उसको बहुत भा रहा था और उसका मन भी हल्का हो रहा था. फिर फूल पत्तों को देखता कुछ देर घूमने के बाद घर की ओर चल दिया.

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"ये लड़कियाँ जाने कब बड़ी होंगी? मुन्ना देख ज़रा अभी तक कोई उठा क्यो नही." अर्जुन घर मे बैठा दूध पी रहा था और मा आँगन की सफाई कर रही थी. झुक कर गीले फर्श पर जब वो टिल्ले वाले झाड़ू से पानी बुहारती तो उनके दोनो उरोज ब्लाउज मे हिलते. 6 बजे पूरा आँगन रोशन था तो उसको सब दिख रहा था. घूमती तो उनकी साड़ी मे कसे कूल्हे नज़र आते.

अपने बेटे को बैठे देख एक बार उसकी तरफ नज़र डाली फिर खुद को देखता पाया तो रेखा जी का दिल धड़क गया. उनकी मोटी छातिया नुमाया हो रही थी और अर्जुन बस वही घूर रहा था. गिलास तो जैसे उसके मूह पर चिपका हुआ था.

उन्होने सीधे होते हुए फिर कहा, "मुन्ना, दूध ख़तम कर और अपनी दीदी को जगा दे बेटा." आज उन्हे अपने बेटे का देखना बुरा नही लगा था लेकिन नारी सुलभ मन. बस इसलिए उन्होने उसका ध्यान हटाया.

"जी मा. "

अर्जुन ने माधुरी दीदी का दरवाजा बजाया तो वो अंदर से बंद था लेकिन एक ही बार दस्तक देने पर कोमल दीदी की आवाज़ आ गई. "उठ गये है." फिर उसने ऋतु दीदी के कमरे के दरवाजे पर हाथ रखा तो वो सिर्फ़ भिड़ा हुआ था. उसका एक पट खुल गया तो अर्जुन ने देखा अलका दीदी प्रीति से पीछे से चिपकी थी और उनके कूल्हे बाहर की तरफ निकले थे. प्रीति सीधी लेटी हुई बड़ी सुंदर लग रही थी. चेहरे से नीचे एक चादर से लिपटी थी. उधर सबसे आख़िर मे ऋतु दीदी जिनका हाथ प्रीति की छाती के पास और कमर से उपर था और मूह उसके गले के पास. टीशर्ट तो उनकी कमर से उपर चढ़ि थी.

अर्जुन मुस्कुराता हुआ अंदर गया और अलका दीदी के उपर से प्रीति के गाल थपथपाने लगा. उसकी नीली-हरी आँखे जैसे शतेरे की तरह आराम से उपर हुई और एक चेहरा बिल्कुल उन आँखों मे खोया सा नज़र आया. प्रीति को ऐसी तो कोई उम्मीद ही ना थी के एक सुबह ऐसी भी होगी. वो इन्ही पलों मे खोई थी की उसके होंठो पर तपते हुए होंठ आ लगे और फिर वापिस उठ गये. बस एक पल मे जो हुआ उसकी धड़कन दिल से बाहर निकलती लगी.

"उठ जाइए मेंमसाब्" बहुत धीमे से अर्जुन ने कहा और पीछे को सरक गया. खुली आँखों से सपनो मे खोई प्रीति शर्मा कर ऋतु दीदी से लिपट गई.

"सारी रात चिपक कर दिल नही भरा क्या तेरा? मैं अर्जुन नही हूँ. चल सोने दे." ऋतु दीदी ने नींद मे इतना कहा और खुद भी प्रीति को बाहों मे कस लिया.

"दीदी, उठ जाओ आज आपका पेपर है." अर्जुन ने ऋतु दीदी की हरकत देख मुस्कुराते हुए अलका दीदी को हिलाया. प्रीति ने एक बार पलट कर देखा फिर वापिस नज़र घुमा ली.

"उठ गई रे मैं तू चल." अलका दीदी ने अंगड़ाई ली तो उनके कबूतर भी हिल गये, शायद अंदर उनका पिंजरा उन्होने रात मे ही खोल दिया था. अर्जुन को अपनी तरफ देखता पा कर अलका दीदी लाल हो गई और मुस्कुरा कर बोली, "ऐसे लड़कियों के कमरे मे नही आते मिस्टर. अब चलो बाहर निकलो."

"तू ऐसे मेरे से चिपक कर क्यो मुस्कुरा रही है." यहा ऋतु दीदी भी उठ गई तो प्रीति को अपनी तरफ मुस्कुराते देख बिना सोचे समझे बोल उठी. "ओये निकल तू बाहर. अलका ये कब आया यहा पे?" अर्जुन को नखरे से डाँट ती ऋतु ने कहा तो अलका दीदी ने अपने कंधे उचका दिए और अर्जुन बाहर भाग गया.
 
"ये शर्मा रही है तू मुस्कुरा रही है. चल क्या रहा था यहा पे?" ऋतु दीदी बिस्तर से निकलते हुए बोली और अपने बाल पीछे कर रब्बर लगाने लगी.

"मुझे क्या पता. मैं जब उठी तो अर्जुन मेरे पास खड़ा था और जगा रहा था. अब प्रीति और इसने क्या किया मुझे नही पता." अलका ने प्रीति की चद्दर हटाते हुए कहा और वो भी कपड़े ठीक करने लगी.

"चलो महारानी जी आप भी उठ जाओ. यहा चाय बिस्तर मे नही मिलती सबके साथ पीनी पड़ती है. और अब बस भी कर ये मुस्कुराना." अलका ने ये बात कही तो प्रीति ने भी अंगड़ाई ली लेकिन अब तो उन दोनो की आँखें भी फैल गई उसकी तरफ नज़र करते ही.

एक झीनी सी बनियान प्रीति के शरीर पर थी और उसकी टीशर्ट तकिये के पास पड़ी थी. अंगड़ाई लेने के साथ ही वो बनियान बस निप्पल पर आकर ही रुक गई.

"ओये अब सुबह सुबह ये मत दिखा. जल्दी कर और अपने कपड़े पहन,मान लिया की सब सही है तेरा अंदर से और रात चेक भी कर लिया. लेकिन एक पल और ऐसे रही तो तेरी चाय यही गरम हो जाएगी." ऋतु दीदी ने ये बात कही और प्रीति ने जल्दी से टीशर्ट उपर पहन ली.

"आप ना सच मे बड़ी गंदी हो दीदी."

शरमाते हुए प्रीति ने कहा.

"अच्छा मैं गंदी हूँ? रात तो बड़ा मेरे अंदर आ रही थी अब देखो ज़रा कैसे सती सावित्री बन रही है." अलका तो इतना सुनते ही हँसने लग पड़ी पेट पकड़ कर.

"ऋतु बस कर यार. तू बेचारी की जान लेकर मानेगी. वो सोई तो कपड़ो मे थी और देख तूने क्या किया रात भर इसके साथ."

"आज तू सो जा अलका फिर तू भी कहेगी की लड़का होती तो कितना मज़ा आता." और आँख दबा दी.

"ऋतु, अभी तक नही उठी क्या?" रेखा जी की आवाज़ सुनते ही तीनो जैसे बिजली की तरह सब सही कर बाहर आ गई. प्रीति तो बाथरूम मे जाकर मूह धोने लगी और अलका और ऋतु दीदी ने आँगन मे लगे नल पर ही चेहरा सॉफ कर लिया.

"आ मेरी बच्ची इधर मेरे पास आ." कौशल्या जी ने प्रीति को अपने पास बिठा लिया और उनके साथ ही अलका और ऋतु दीदी बैठ गये. अर्जुन बाहर बगीचे मे पानी दे रहा था रामेश्वर जी के कहे अनुसार.

"बेटा नींद तो ठीक से आई ना तुझे यहा? कोई दिक्कत तो नई आई?" उन्होने प्रीति से पूछा था

"इतनी अच्छी नींद तो दादीजी पहले कभी नही आई. वहाँ तो अकेले सोती हूँ और कब आँख लगे ना लगे पता नही रहता. लेकिन ऋतु और अलका दीदी के साथ अच्छा लगा." प्रीति ने चाय का कप उठाते हुए जवाब दिया.

कौशल्या जी उसके बालो मे हाथ फेर रही थी. "चाय पी ले फिर तेरे बालो मे तेल लगा देती हूँ देख तो ज़रा कैसे रूखे हुए है." उनकी बात से प्रीति खुश हो गई.

"हा आज इस अँग्रेजन के सामने हमारी क्या बिसात. दादी को तो बस यही अच्छी लगती

है. याद है ना अलका गली मे कुलफी वाले को घर के अंदर रेहडी के साथ बुला लेती थी दादी इसके लिए कही इसका रंग पक्का ना हो जाए." ऋतु की आदत थी

ऐसे मज़ाक करने की और कौशल्या देवी को उसका यही अंदाज पसंद था. "और उस रेहडी पर बैठकर तो घंटी जैसे मैं बजाती थी? तू खुद ही तो कहती थी गुड़िया को बाहर नही जाना, बाबा ले जाएगा इसको." कौशल्या जी भी अपनी बच्चियों का बचपन याद सा करने लग पड़ी.

"दादी आप अभी भी पकोडे वाली कढ़ी बनाती हो?" प्रीति ने उनकी तरफ देखते हुए ये बात कही तो जवाब अलका ने दिया, "दादी ने आख़िरी बार शायद कुछ 5-6 साल पहले कोई सब्जी बनाई होगी. इनको तो याद भी एक ही बचा रहता है, इनका राजा अर्जुन जिसके लिए अंधेरे मे ही दूध और बादाम पीसती है ये.

तू तो आज ही खा लिओ कढ़ी." अलका का व्यंग सुनकर कौशल्या देवी मुस्कुराइ और फिर बोली, "रेखा-ललिता, रसोईघर खाली कर देना नाश्ते के बाद तुम दोनो. आज दोपहर का खाना मैं बनाउन्गी. सूजी का हलवा, कढ़ी और मिसी रोटी."

उनकी बात सुनकर तो देवरानी-जेठानी भी थोड़ी हैरान हुई लेकिन बोली कुछ नही.

"सूजी का हलवा कोंन बना रहा है?" घर के अंदर आते हुए अर्जुन ने ये बात कही जिसके साथ रामेश्वर जी भी चले आ रहे थे. ऋतु और अर्जुन का पसंदीदा था सूजी का हलवा और कढ़ी तो हरयाणा मे प्रसिद्ध है ही.

"आज तेरी दादी ही बना रही होगी नही तो घर मे दीवाली या दुरगाष्टमी पर ही हलवा बनता है." रामेश्वर जी भी कुर्सी पर बैठ गये ये बोलते हुए.

"ये मेरी जगह पर इसको बिठा लिया दादी?" अर्जुन ने अपनी कुर्सी पर बैठी प्रीति की तरफ़ इशारा करते हुए कौशल्या जी से कहा.

"तेरा नाम लिखा है क्या इस्पे? चल नहा ले उपर जा के आया कुर्सी वाला?" ऋतु ने हीकड़ी दिखाते हुए कहा तो सब हंस दिए और मिट्टी से सना अर्जुन उपर चल दिया. ऐसे ही बातें चल रही थी और नाश्ता तयार होने लगा था. प्रीति दोपहर को आने का बोल कर घर चली गई थी. माधुरी दीदी और कोमल दीदी बाहर अपना रोज वाला काम कर रही थी, कपड़े धोने का.

रेखा जी को पता था कि अर्जुन उपर सुस्ती दिखा रहा होगा और उसको ऋतु को कॉलेज भी लेकर जाना है तो वो उसको बुलाने उपर गई. वो नहा कर निकला था और अपने कमरे मे खड़ा था बिस्तर के किनारे. बेध्यानी मे उसने अपना तौलिया सरकाया और इधर रेखा जी अपने बेटे के कमरे के बाहर थी. उनका मूह खुला रह गया अपने बेटे का हाल देख कर. अर्जुन का लंड हल्के तनाव मे था जो की आम बात थी. लेकिन रेखा जी ने तो अपनी ज़िंदगी मे ऐसा कुछ पहली बार देखा था. होश मे आते ही वो दपे पाव पीछे हट गई और इधर अर्जुन ने अपने बेड पर पड़ा सॉफ कच्छा पहना और उपर बनियान डाल ली.

अब रेखा जी ने हल्के शोर से आवाज़ देते कहा, "मुन्ना तू तयार हो गया.?" और उसके कमरे के बाहर आ गई. अर्जुन ने अपना चेहरा दरवाजे की तरफ करते हुए कहा, "बस मा हो ही गया. वो कमीज़ के बटन लगा रहा था लेकिन रेखा जी चोर नज़रो से अपने बेटे के कच्छा पर बने उभार को देख रही थी.

" तू तो समझदार हो गया जो कमीज़ पैंट पहन ने लगा रे." उन्होने बस ध्यान हटाने के लिए ऐसा कहा था.

"हा मा. संजीव भैया और दादाजी ने कहा के घर पर तो पाजामा टीशर्ट ठीक है लेकिन कही बाहर जाओ तो थोड़ा देख भाल के अच्छे से तैयार हो के जाना चाहिए."

और जैसे जैसे वो जीन्स उपर करता गया रेखा जी भी कुछ संभल गई. उसको आने का बोलकर वो खुद नीचे चली गई और फिर सबके लिए खाना लगाने लगी.
 
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