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Incest मैं अपने परिवार का दीवाना

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अपडेट 189

दिलीप- जब मैं ठाकुर के घर आया तो सब ठीक था

रात का खाना ख़ाके मैं रूम में आके लेट गया

तभी कोई गेट नॉक करने लगा

मैं जाके गेट खोला तो देखा वँया खड़ी थी

दिलीप- कुछ चाहिए आपको

वँया- नही मैं तो यह पूछने आई थी कि कल गाओं चलोगे ना

दिलीप- किस लिए

वँया- भूल गये कल हमारा रिज़ल्ट है

दिलीप- चलूँगा

[मेरी बात सुनके वँया चली गयी]

और मैं बेड पे लेट गया

सुबह ठाकुर और उसकी फॅमिली गाओं की तरफ चल पड़े

दोपहर तक हम लोग गाओं पहुँच गये

गाओं बहुत सुंदर था

मैं यानी शक्ति गाओं घूमने लगा

ऐसे ही यह दिन भी बीत गया

जब मैं ठाकुर के घर आया तो देखा वँया एक जगह अकेली बैठी हुई है

मैं उसके पास गया

लेकिन वो उठ गयी और जाने लगी

मैं उसका हाथ पकड़ लिया

वो मूड कर मेरे गाल पे थप्पड़ मार दी

इससे पहले कि वो मुझे दूसरा थप्पड़ मारती मैं उस्केव अपनी बाहो में खींच लिया

मेरी बाहो में आते ही वो शांत हो गयी

वँया- तुम सच मे सब कुछ भूल गये हो

दिलीप- [मेरी तो कुछ समझ में नही आया कि वँया क्या बोल रही है

वैसे पिछले 2 सालो में मेरे साथ क्या हुआ मुझे खुद कुछ याद नही है

वँया- यह तुम्हारा सर्टिफिकेट तुम अपने क्लास में फर्स्ट आए हो

[मैं वो सर्टिफिकेट ले लिया

फिर वँया चली गयी मैं रूम में आके सोचने लगा कि क्या सच में पिच्छले 2 साल से इनके साथ हूँ

[उधर वँया रो रही थी

वँया- देखो ना मैं तुम्हारे लिए पूरे स्कूल में फर्स्ट आई हूँ और तुम्हे कुछ याद ही नही है

उधर विद्या दी तुम्हारी वजह से इतनी परेशान हैं

प्लीज़ जल्दी से ठीक हो जाओ

देखो अगर तुम ठीक हो जाओगे तो सब खुश रहेंगे मैं तुम्हारी हर बात मानूँगी

प्लीज़ ठीक हो जाओ

[इधर मैं लेटा हुआ था तभी कोई गेट नॉक करने लगा

मैं गेट खोला तो देखा सामने ठाकुर खड़ा है

ठाकुर अंदर आ गया और अलमारी के पास अपना हाथ पीछे ले गया

तभी अलमारी साइड हो गयी

और उसकी जगह एक ख़ुफ़िया रास्ता आ गया

फिर ठाकुर मेरे पास आ गया

बड़े मामा- अंदर जाओ अंदर जाके तुम्हे एक रूम दिखेगा जिसपे वीर प्रताप सिंग लिखा है उस रूम में जाना तुम्हारे हर सवाल का जवाब तुमको मिल जाएगा

[मैं बिना ठाकुर की बात का जवाब दिए अंदर चला गया आगे बढ़ते हुए मुझे वो रूम दिखा मैं उस रूम में घुस गया रूम में

अंधेरा था मैं लाइट का स्विच ढूँढने लगा

मुझे लाइट का स्विच मिल गया मैं लाइट ऑन किया और रूम को अच्छी तरह से देखने लगा

4 टेबल पे बहुत सारे बुक्स रखे हुए थे

मैं दीवार पे देखने लगा मेरी नज़र एक फोटो पे पड़ी तो मेरा दिमाग़ घूम गया

एक फोटो में मेरी माँ और दूसरा आदमी मतलब वो मेरे पापा नही थे

वो कोई और था

रूम में एक अलमारी भी था

मैं उस अलमारी के पास गया

अलमारी खोला तो एक बड़ी सी डाइयरी और एक वीडियो कॅमरा था

डाइयरी के उपर एक लेटर भी था

मैं वो लेटर खोला

लेटर में लिखा था

पहले पूरी डाइयरी पढ़ लो फिर वीडियो कॅमरा ऑन करना

आपको माँ की कसम

मैं सोच में पड़ गया कि लिखने वाले को जैसे पता था कि मैं डाइयरी पढ़ने आउन्गा

मेरी जिंदगी में ऐसा दिन भी आना था

जब मैं 3 साल का था तब मेरे पापा मुझे इटली ले गये वो बचपन से मुझे कहते आए कि मेरी माँ की मौत का ज़िम्मेदार

ठाकुर धर्मेश वीर प्रताप सिंग है

मेरी माँ का भाई....

 


फ्लॅशबॅक 190

यह कहानी शुरू हुई 2 राजकुमार जो बहुत ही दुखी इंसान थे

वीर प्रताप सिंग और धुरेन्द्र सिंग

वीर प्रताप सिंग के पिता जो कि एक आक्सिडेंट में मारे गये

छोटी सी उम्र में ही वीर प्रताप सिंग और धुरेन्द्र सिंग अनाथ हो गये

लेकिन थे दोनो राजकुमार जल्द ही सम्भल गये

और अपनी जिंदगी एक नये सिरे से जीने लगे

वीर प्रताप सिंग जो कि प्रताप सिंग की जायज़ संतान थे

और धुरेन्द्र सिंग जो प्रताप सिंग की नाजायज़ संतान

पर दोनो भाई थे

इसी लिए दोनो एक दूसरे से बहुत प्रेम करते थे

एक दिन धुरेन्द्र और वीर खेल रहे थे

खेलते खेलते वीर एक कुँए में गिर गये और रोने लगे

कुँए में पानी नही था

जिससे वीर के हाथ में चोट लग गयी

तब धुरेन्द्र एक काम किए

कुँए के उपर एक बाल्टी थी

वो बाल्टी धुरेन्द्र कुँए में फेंक दिए

धुरेन्द्र- वीर इस बाल्टी में बैठ जाओ

[वीर धुरेन्द्र के कहे अनुसार बाल्टी में बैठ गये

लाख कोशिश करने के बाद भी धुरेन्द्र वीर को उपर नही खींच पाए

वीर का दर्द धुरेन्द्र सहेन नही कर पा रहे थे

वीर के बड़े भाई जो थे

तभी बाल्टी में लगी हुई रस्सी जिसको धुरेन्द्र खींच रहे थे

वो रस्सी धुरेन्द्र अपनी कमर में बाँध कर कुँए में कूद गये

धुरेन्द्र के कुँए में कूदने से वीर जिस बाल्टी में बैठे थे

वो बाल्टी पूरी उपर पहुँच गयी

और वीर बाल्टी से उतर गये

लेकिन समस्या अब यह थी कि धुरेन्द्रा कैसे कुँए से बाहर आएँगे

वीर- भैया अब आप कुँए से बाहर कैसे आएँगे

धुरेन्द्र- जाओ और कुछ सेवक को बुला कर ले आओ

[वीर दौड़ते हुए महल में गये और सेवकों को बुला कर ले आए सेवकों ने धुरेन्द्र को बाहर निकाला दोनो भाई की मलम पट्टी की गयी

वीर यह बात समझ नही पा रहे थे

कि धुरेन्द्र भी सेवक को बुला कर उन्हे कुँए से निकलवा सकते थे

लेकिन वो कुँए में कूद गये

जब वीर सोचके थक गये तो वो धुरेन्द्र के पास गये

वीर- भैया आप भी तो सेवक को बुला कर हमे कुँए से निकलवा सकते थे

लेकिन आप तो नही गये

धुरेन्द्र- अब आपकी तबीयत कैसी है

वीर- ठीक है

धुरेन्द्र- आप जब कुँए में गिरे तब आप कैसा महसूस कर रहे थे

वीर- कितना दर्द हो रहा था हाथ में

धुरेन्द्र- आप इतनी तकलीफ़ में थे और हम आपको छोड़के चले जाते

वीर- आपके भी तो पैर में दर्द था

फिर भी मैं आपको छोड़के चला गया

धुरेन्द्र- आप के लिए एक गिफ्ट है

वीर- आप हमेशा ऐसा ही करते हैं बात बदल देते हैं

[फिर समय का चक्र ऐसा घमा की दोनो भाई जवान हो चुके थे

और आज दोनो अपने लिए लड़की भी देखने जा रहे थे

वीर एक दम तय्यार होके अपने बड़े भाई के रूम में पहुँचे

जहाँ धुरेन्द्र भी तय्यार हुए बैठे थे

दोनो भाई एक दूसरे को देख कर मुस्कुराने लगे

और निकल पड़े बग्घी पे

कार भी थी दोनो भाई के पास

लेकिन राजकुमार हमेशा घोड़े पे सवार रहते हैं

दोनो भाई का स्वागत बड़ी धूम धाम से किया लड़की वालो ने

अब बारी थी लड़की देखने की

दोनो भाई नज़रें ज़मीन में गढ़ाए इंतेज़ार कर रहे थे अपनी होने वाली दुल्हनो का

लेकिन उनकी होने वाली दुल्हन थी कि आ ही नही रही थी

लेकिन जब दोनो आई तो एक ऐसा तूफान लाई

हुआ यह कि दोनो के हाथ में चाइ की ट्रे थी और दोनो अपने होने वाले पति के पास ही जा रही थी

वीर- भैया इसमें मेरी वाली कौनसी है

धुरेन्द्र- मेरे प्यार छोटे भाई अपनी नज़र संभाल ना कही ऐसा ना हो कि अपनी भाभी पे ही दिल आजाए...

 


फ्लॅशबॅक 191

धुरेन्द्र- मेरे प्यारे छोटे भाई अपनी नज़र संभाल ना कही ऐसा ना हो कि अपनी भाभी पे ही दिल आजाए

कहने को तो धुरेन्द्र यह बात मज़ाक में कह गये लेकिन जब वीर की नज़र आशा पे पड़ी अभी तक तो दोनो बहनो को मुँह पे

घूँघट था

लेकिन जब घूँघट हटा तो वीर सच में उसके सुंदर से चेहरे में खो गये

लेकिन जब वीर को पता चला कि वो लड़की जिससे वो प्यार करते हैं

वो उनकी होने वाली भाभी है तो वो टूट से गये

वीर की माँ ने दोनो भाई की शादी दोनो बहनो से तय कर दी थी

जब धुरेन्द्र अपनी उस माँ जिसने उसे जन्म नही दिया

उसके वचन के लिए वो बिना देखे शादी के लिए मान गये

तो फिर वीर अपनी माँ की अंतिम इच्छा कैसे नही पूरी करते

धुरेन्द्र की आशा से

और वीर की संगीता से

आशा बड़ी बहेन थी और संगीता छोटी

दोनो भाई की शादी भी हो गयी

आशा बड़ी बहू होने के नाते घर संभालने लगी

और संगीता उसकी मदद करने लगी

वीर चुपके चुपके आशा को देखते रहते

वीर के दिल में कोई हवस नही थी

लेकिन प्यार ज़रूर था

वीर आशा को ही अपना प्यार मानता था

इसी लिए शादी को एक महीने हो चुका था

वीर संगीता को छुए तक नही थे

वीर बहुत जल्दी में इधर से उधर घूम रहे थे

उन्हे कही से पता लग गया

कि धुरेन्द्र किसी के घर रुकते हैं

हर रविवार को

और कल रविवार था

तो वीर धुरेन्द्र का पीछा करने का सोचता है

अगला दिन भी आ गया और शाम भी हो गयी

धुरेन्द्र काम का कहके निकल गये

और वीर उनका पीछा करने लगे

2 घंटे तक वीर धुरेन्द्र का पीछा करते रहे

बीच में उनकी गाड़ी खराब हो गयी

और धुरेन्द्र आगे निकल गये

थोड़ी देर बाद धुरेन्द्र को ढूँढते हुए वीर उस जगह पहुँचे जहाँ उनकी गाड़ी खड़ी थी

यह एक छोटा सा घर था

लेकिन जैसे ही वीर की नज़र घर के अंदर पड़ी वीर के पैरो तले ज़मीन खिसक गयी

धुरेन्द्र एक बच्चे को अपनी गोद में बिठा कर उसको खाना खिला रहे थे

यहाँ तक तो ठीक था

लेकिन जब वीर की नज़र एक लड़की पे पड़ी जिसकी माँग में सिंदूर भरा हुआ था

और हर मर्द एक लड़की की आँखो में देख कर बोल सकता है कि वो सामने वाले मर्द को किस नज़र से देख रही है

वीर बहुत गुस्से में आ गए और घर के अंदर घुस गये

धुरेन्द्र की नज़र जब वीर पे पड़ी तब भी वो एक दम शांत होके बैठे थे

वीर जो कि बहुत गुस्से में थे

वो बिना कुछ बोले घर से बाहर आ गए

और गाड़ी में बैठके निकल पड़े

धुरेन्द्रा वीर को आवाज़ देते रह गये

धुरेन्द्र भी गाड़ी में बैठके वीर के पीछे चल पड़े

वीर को कुछ समझ नही आ रहा था कि अब वो अपनी भाभी का सामना कैसे करेंगे

लेकिन धुरेन्द्र की किस्मत में तो कुछ और ही लिखा था

धुरेन्द्र की तरफ सामने से बड़ी तेज़ी में एक गाड़ी आरहि थी

धुरेन्द्र गाड़ी की स्पीड कम करने के लिए जैसे ही ब्रेक पे अपने पैर रखे

ब्रेक लग ही नही रहा था

ब्रेक फैल था

और ब्रेक फैल नही था ब्रेक फैल किया गया था

गाड़ी कंट्रोल नही हो पाई और सामने वाली गाड़ी से टकरा गयी

दोनो गाड़ी के छितरे उड़ गये

उस दिन एक मौत नही हुई थी

उस दिन तीन मौते हुई थी

एक धुरेन्द्र की

जब धुरेन्द्र की मौत की खबर उनकी पहली पत्नी को मिली

तो वो गले में फंदा डालके अपनी जान दे दी

बच गया वो बच्चा रोता बिलखता अपनी माँ की मौत अपने बाप की मौत उसने अपनी आँखो से सब देखा था

वो इतना छोटा भी नही था...

 
फ्लॅशबॅक 191आ

वो इतना छोटा भी नही था

उसने देखा कि कैसे एक आदमी उनके घर आया

वो गुस्से में घर से बाहर चला गया

उसके पीछे उसके पिताजी घर से बाहर गये

सुबह में एक आदमी आया और उसने उसके पिता की मौत की खबर उसकी माँ को दी

और उसकी माँ यह सहेन नही कर पाई और अपनी जान दे दी

वो बच्चा अपनी माँ की लाश को देख कर रो रहा था

तब वही आदमी आया

जो सुबह उसकी माँ को उसके पिता के मरने की खबर देने आया था

और वो आदमी उस बच्चे को अपने साथ ले गया

उस दिन तीसरी मौत उस बच्चे की नही उस बच्चे के दिल की हुई थी

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वीर को जब खबर मिली कि उसके भाई इस दुनिया में नही रहे

तो सबसे ज़्यादा दुख वीर को हुआ

पता है क्यूँ एक तरफ धुरेन्द्र ही वीर के लिए सब कुछ थे

दूसरी तरफ धुरेन्द्र उस लड़की के पति जिससे वीर बे इंतेहा प्रेम करते थे

आशा को जब अपने पति के मौत की खबर मिली तो वो क्या करे कुछ समझ ही नही पा रही थी

इतनी छोटी सी उमर में शादी और शादी के एक महीने बाद विधवा हो जाना

धुरेन्द्र का अंतिम संस्कार हो गया

आशा सबसे अलग रहने लगी

अपने आप को अपने पति के रूम में बंद कर ली

आशा के माता पिता जब आशा से मिलने आए तब वो अपने कमरे से बाहर ही नही निकली

ऐसे ही एक साल बीत गया

इसी बीच वीर को पता चला कि 6 साल पहले धुरेन्द्र की गाड़ी से एक आदमी की टक्कर हुई थी

और वो आदमी मर गया

वो आदमी मरते वक़्त धुरेन्द्र को कह गया

कि तुम्हारी वजह से मैं मर रहा हूँ

कोई बात नही मैं तुम्हे माफ़ करता हूँ

लेकिन मेरे सिवा मेरी बेटी का कोई नही है

और अब वो अनाथ हो जाएगी

अगर तुम में इंसानियत है तो तुम मेरी बेटी से विवाह करोगे और उसे हमेशा खुश रखोगे

वीर को जब यह बात पता चली तो वो अपनी पहली भाभी को बहुत ढूँढा

आज धुरेन्द्र की मौत को 1 साल हो चुका था

तभी हवेली के बाहर किसी की गाड़ी आके रुकी

उसमें से एक आदमी निकला एक लड़का

जब वो हवेली के अंदर आया तो संगीता उसे भैया भैया कहते हुए गले लग गयी

विदेश से अपनी पढ़ाई पूरी करके आया था

जब आशा और संगीता की शादी हुई थी तब वो पढ़ रहा था

और उसे कुछ पता भी नही था

क्यूंकी आशा के माता पिता को पता था कि अगर उनके बेटे को पता चला कि इतनी कम उम्र उसकी दोनो बहेनॉ की शादी हो रही है

तो वो कभी नही मानता

विजय नाम था आशा के भाई का

विजय संगीता को चुप करके

उपर अपनी बहेन के रूम में पहुँचा

विजय ने आशा को कई बार आवाज़ दिया लेकिन आशा गेट नही खोली

जब विजय बोला कि उसकी दोनो आँखें आक्सिडेंट में चली गयी

तो फॅट से आशा गेट खोल दी

जब विजय ने आशा की हालत देखी तो उसकी आँखो से आँसू बहने लगे

उसकी फूल सी कोमल सी नाज़ुक सी बहेन ऐसी हालत में

सुख के काँटा हो गयी थी आशा

रो रो के उसकी आँखें सूज गयी थी

आशा जब देखी कि उसके बड़े भाई की आँखें ठीक है तो वो विजय के गले लग गयी और रोने लगी

बहुत देर लगी विजय को आशा को चुप कराने में

विजय आशा को रूम में ले गया

विजय- यह तूने अपनी क्या हालत बना ली है

क्या किसी के चले जाने से जिंदगी रुक जाती है

आशा- भैया आप यह बात माँ और पिताजी को समझाइये मेरी उम्र ही क्या थी

अगर मेरी शादी कुछ साल बाद होती तो क्या जाता किसी का

मैं कभी नही मना की कि मैं इनसे शादी नही करूँगी

देखिए अब मैं तड़पति रहूंगी एक विधवा बनके

[विजय आशा की बात सुनके एक फ़ैसला किया

विजय आशा का हाथ पकड़ा

विजय- तू अब यहाँ नही रहेगी किसी के जाने से किसी की जिंदगी रुक नही जाती

तू चल मेरे साथ

[आशा कुछ बोलना चाहती थी

लेकिन विजय उसे अपनी कसम दे देता है

और सीढ़ियो से नीचे आजाता है

और विजय अपनी बहेन आशा का हाथ पकड़ कर जैसे ही आगे बढ़ता है

वीर हवेली के अंदर आजाता है...

 
फ्लॅशबॅक 191बी

जब वीर देखता है कि आशा का हाथ कोई गैर मर्द पकड़े हुए है

तो वीर इतने गुस्से में आजाता है कि वो बढ़के विजय को एक थप्पड़ मार देता है

तभी आशा के मुँह से निकलता है- भैया

[जब वीर आशा के मुँह से भैया सुनता है तो उसका गुस्सा हवा में उड़ जाता है

और विजय के पैर छु के उसका आशीर्वाद लेता है

विजय- मैं अपनी बहेन को लेके जा रहा हूँ यहाँ से

वीर- कहाँ

विजय- अपने घर और अब वो यहाँ कभी नही आएगी

वीर- यह मेरे भाई की पत्नी है और यह यही रहेंगी

विजय- यह तुम्हारे भाई की विधवा है

और उससे पहले यह मेरी छ्होटी बहेन है

वीर- आप इनके बड़े भाई हैं और आपको पूरा हक़ है कि आप अपनी बहेन से कभी भी मिल सकते हैं

लेकिन अब यह मेरे घर की इज़्ज़त हैं

मेरे बड़े भाई की विधवा

विजय- उससे पहले यह मेरी बहेन है

और यह तुम्हारी कुछ नही लगती है समझे

इसका जो रिश्ता था वो तुम्हारे भाई के साथ था

और अब तुम्हारा भाई इस दुनिया में नही है

तो सामने से हट जाओ

[वीर के पास अब कोई जवाब नही था

लेकिन वीर हमेशा सोचता था कि उसकी वजह उसकी भाभी विधवा हुई है

अगर वो पूरी बात सुन लेता तो उसका भाई आज जिंदा होता

उपर से वो आशा से प्यार करता था

जब से धुरेन्द्र की मौत हुई थी आशा रोज़ सिर्फ़ एक वक़्त खाना खाती थी वो भी संगीता के लिए

लेकिन किसी को भी यह बात पता नही थी कि उसी दिन से वीर भी 1 ही वक़्त खाना ख़ाता था

सिर्फ़ अपनी पत्नी संगीता के लिए

लेकिन आज जब आशा के जाने की बात आई तो वीर और ज़्यादा तड़प उठा

उसका मानना था कि आशा उसके सामने ही सुरक्षित रह सकती है

क्यूंकी हमेशा उसे लगता था कि कोई उसके परिवार के पीछे पड़ा है]

वीर- आप अगर इन्हे यहाँ से ले गये तो आप अपनी दूसरी बहेन को भी विधवा करके जाइए

[वीर की बात सुनके संगीता की जान उसके हलक़ में आ गई]

विजय- वो भी करूँगा अगर तुम सामने से नही हटे

[विजय की बात सुनके वीर दीवार में लटकी तलवार निकालके विजय के हाथ में दे दिया]

वीर- यह लीजिए अब आपको जो करना है कीजिए

विजय- तुम समझ क्यूँ नही रहे हो

यहाँ मेरी बहेन मर जाएगी

तुम ही बताओ अब यह किसके लिए जिएगी

इतनी कम उम्र में विधवा होने का दर्द तुम जानते भी हो

मैं अगर इसे यहाँ रहने भी दूँ

तो यह किस हक़ से यहाँ रहेगी

तुम्हारा भाई की विधवा बनके

क्या पता तुम ही कल इसे बेघर कर दो

हो तो तुम धुरेन्द्र के सौतेले भाई

[विजय की बात सुनके वीर बिना सोचे समझे अपना हाथ तलवार पे रख देता है

अपनी हथेली तलवार की धार पे चला देता है

वीर का हाथ खून से पूरा लाल हो जाता है

वीर अपना खून से सना हुआ हाथ आशा की माँग पे रख देता

आशा की माँग वीर के खून से भर चुकी थी]

वीर- अब यह मेरी पत्नी हैं अब आप इन्हे यहाँ से ले जाके दिखाइए

[वीर की इस हरक़त के बाद संगीता आशा और विजय के पैरो तले ज़मीन खिसक गयी]

विजय- मेरी दोनो बहनो को हमेशा खुश रखना

[विजय यह कहके हवेली सा बाहर चला जाता है

क्यूंकी अब यह वीर आशा और संगीता का निजी मामला है]

विजय के घर से बाहर जाते ही वीर के गाल पे थप्पड़ पड़ता है

यह कोई और नही आशा था

आशा- यह क्या किया तुमने

वीर- और जितना मारना है मार लीजिए

संगीता तुम भी मुझे थप्पड़ मारो

लेकिन अब आप दोनो मेरी पत्नी हैं और इस घर की बहू

आप दोनो अगर इस घर से जाएँगी तो मेरी लाश पे पैर रखके जाना होगा...

 


फ्लॅशबॅक 192

लेकिन अब आप दोनो मेरी पत्नी हैं और इस घर की बहू

आप दोनो अगर इस घर से जाएँगी तो मेरी लाश पे पैर रखके जाना होगा

[वीर के कहे गये शब्द आशा और संगीता के दिल में किसी तीर की तरह चुभे

वीर यह बात कहके निकल गया

रात के खाने के टाइम वीर वापस आया लड़खड़ाता हुआ

क्यूंकी उसने बहुत पी थी

इतनी बड़ी हवेली और एक भी नौकर नही

क्यूंकी वीर को अब किसी पे विश्वास नही था

जब संगीता वीर को लड़खड़ाते देखती है

तो वो दौड़के वीर के पास जाती है

और वीर को संभालती है

वीर पहले गौर से देखता है कि कौन है

फिर वो लड़खड़ाती आवाज़ में बोलता है

वीर- संगीता इतनी उदास क्यूँ हो

उदास क्यूँ ना होगी

मैं तुम्हे आज तक एक भी खुशी नही दिया

और तो और मैं आज तुम्हे दुनिया का सबसे बड़ा दुख दिया

यह कहते हुए वीर संगीता के होंठो पे अपने होंठ रख देता है और चूम लेता है

वीर- सॉरी तुमसे बिना पूछे एक और दुख

संगीता- मैं दुखी नही हूँ मैं बस परेशान हूँ

वीर- परेशान किस लिए बोलो ना

संगीता- वो दीदी रूम से बाहर नही निकल रही है

वीर- तुम ले चलो ना मुझे उनके पास

[वीर की बात सुनके संगीता उसे आशा के रूम पे ले गयी

वीर- अब तुम जाओ

[संगीता जाने के लिए मूड गयी

वीर- पहले इधर आओ

[संगीता वापस वीर के पास आई

वीर एक बार फिर संगीता के होंठ चूसने लगता है

जब वो अपने होंठ संगीता के होन्ट से हटाता है

तो संगीता शर्माके भाग जाती है

फिर वीर आशा के रूम का गेट नॉक करने लगता है

जब आशा गेट नही खोलती है

वीर- आशा गेट खोलो ना देखो ना संगीता ने मुझे बहुत मारा है

[वीर की बात सुनके आशा झट से गेट खोल दी

और जब वो देखी कि वीर शराब पी के लड़खड़ा रहा है

तो वो आयेज बढ़के वीर का हाथ पकड़ ली

और उसे बेड पे लाके बिठा दी

और उसके सामने खड़ी हो गयी

वीर थोड़ी देर वैसे ही बैठा रहा फिर वो खड़ा हो गया और आशा का हाथ पकड़ कर बिठा लिया

फिर वीर आशा को उपर से नीचे देखने लगा

और लड़खड़ाती आवाज़ में बोला

वीर- यह क्या हाल बना रखा है

सफेद साड़ी मैं मर गया हूँ क्या

[फिर वीर खड़ा हो गया और अलमारी के पास गया

अलमारी खोलके उसमें से एक सार्दी निकालके आशा के हाथ में रख दिया

वीर- जल्दी से यह पहन लो

आशा- मैं नही पहनुँगी

वीर- क्यूँ पहनो वरना मैं खुद पहनाउंगा

और तुम मुझे रोक भी नही पाओगी

[वीर की बात सुनके आशा वीर को आँखे फाड़ फाड़के देखने लगी

और वीर के हाथ से साड़ी लेके बाथरूम में चली गयी

आशा के बाथरूम में जाते ही वीर सीधा खड़ा हो गया

और लंबी लंबी साँसे लेने लगा

वीर- बच गया वरना दोनो मिलके बहुत मारती

दोनो मेरी बीवी हैं

दोनो को खुश रखने के लिए कुछ भी करूँगा

लेकिन अब क्या करूँ दोनो को खाना खिलाउंगा वो भी अपने हाथ से

[थोड़ी देर बाद वीर सबकुछ भूल जब वो आशा को देखा

जो अभी बाथरूम से निकली एक नीली साड़ी पहन के

लेकिन वीर अपने आप को संभालता है और फिरसे लड़खड़ाने लगता है

और आशा के पास जाता है

वीर- खाना खाया

आशा- नही खाऊंगी

वीर- क्यूँ और यह तुम्हारी माँग क्यूँ सूनी है

आशा- आप जाके सो जाइए

वीर- पहले सिंदूर लेके आओ

वरना जख्म अभी भी ताज़ा है...

 


फ्लॅशबॅक 192अ

[आशा बिना कुछ कहे सिंदूर लेके आती है

वीर आशा के हाथ से सिंदूर की डब्बी लेके उसमें से सिंदूर निकालता है

और आशा की माँग भर देता है

आशा- अब आप जाके सो जाइए

[वीर अपने गले से सोने की चैन निकालता है और आशा के गले में पहना देता है

वीर- अब चलो नीचे

[आशा कुछ बोल पाती उससे पहले ही वीर आशा को अपनी गोद में उठा लेता है

जब वीर आशा को लेके नीचे हॉल में पहुँचा तो संगीता वीर की गोद में आशा को देख कर बुत बन गयी

वीर आशा को अपनी गोद से नीचे उतरता है और आशा को डाइनिंग टेबल पे बिठा देता है

फिर वीर संगीता के पास जाता है

और उसे भी अपनी गोद में उठा लेता है और उसे आशा के साथ वाली टेबल पे बिठा देता है

वीर- दोनो यही पे बैठो

[फिर वीर किचन में आता है

और एक प्लेट में खाना निकालता है

और आशा और संगीता के पास लड़खड़ाते हुए पहुँचता है

और दोनो को एक साथ नीवाला बनाके खिलाता है

आशा अपने आप को रोक नही पाती और ज़ोर ज़ोर से रोने लगती है

संगीता समझ जाती है कि एक दिन में यह सब होने से आशा अपने आप को संभाल नही पा रही है

वीर आशा को रोता देख उसके आँसू पोछता है

वीर- कितना रोती हो 1 साल से रो रही हो

अब क्यूँ रो रही हो

मैं क्या मर गया हूँ

संगीता- चुप भी कीजिए

वीर- क्या चुप रहिए मैं तुम दोनो का पति अभी जिंदा हूँ

[यह कहके वीर बेहोश होने का नाटक करता है

आशा और संगीता वीर को जैसे तैसे करके रूम में ले जाती है

और दोनो जैसे ही वीर को बेड पे लिटा ती है

वीर दोनो का हाथ पकड़ कर अपने साथ सुला लेता है

दोनो बेचारी को मजबूरन वीर की बाहो में सोना पड़ता है

जब सुबह होती है तो आशा की आँख खुलती है

तो वो देखती है वीर उसके वक्ष पे सर रखके सोया हुआ है

आशा थोड़ा सा शर्मा जाती है और वो जैसे ही वीर का सर अपने वक्ष पे से हटा ती है वीर और ज़ोर से अपना सर आशा के वक्ष पे दबा देता है

आशा की साँस ही अटक जाती है

वो सोचती है कि अगर संगीता आज मुझे इस हालत में देख ली तो वो क्या सोचेगी

तभी आशा देखती है कि संगीता उठ रही है

आशा जल्दी से अपनी आँखें बंद कर लेती है

संगीता जब वीर का सर आशा के वक्ष पे देखती है तो वो उठके रूम से बाहर चली जाती है

थोड़ी देर बाद वीर की आँख खुलती है

वो उठके बैठ जाता है और आशा को निहारने लगता है

फिर दिन ऐसे ही बीट ते रहते हैं वीर अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा था दोनो को खुश रखने ऐसे ही 1 महीना बीत जाता है

1 दिन वीर बोलके जाता है कि काम से बाहर जा रहा हूँ

शाम तक आउन्गा

वीर भी चला जाता है

शाम भी हो जाती है और रात भी लेकिन वीर नही आता

आशा और संगीता दोनो अपने रूम में सहमी सी बैठी थी की वीर अभी तक आए क्यूँ नही

जब आशा को अपनी बहेन का ख्याल आता है तो वो संगीता के रूम पे जाती है

संगीता आशा को देखते ही उसके गले लग जाती है

और फूट फूट के रोने लगती है

ऐसे ही दोनो बहने बिना खाना खाए सो जाती है

वीर सुबह में प्रकट होता है और जैसे ही रूम में जाता है आशा की आँख खुल जाती है

जैसे ही वीर आशा के पास पहुँचा आशा उसका स्वागत उसके गाल पे थप्पड़ मारके करती है

वीर भोली सी सूरत बनाके अपने गाल पे हाथ रख देता है.,

 
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