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Guest
काका हलवाई को बोल दिए आज से आने को और ग्लास प्लेट का भी ऑर्डर कर दिए. वो गाँव का ही था तो रात को घर आते वक्त वो लेते आएगा.
काका वहाँ से फिर दालान पर चले गये.
दोनो बुआ और सोनम दी भी लल्लू से मोबाइल नंबर एक्सचेंज किए.
फिर लल्लू सब से इजाज़त ले कर अपने कमरे में थोड़ी देर आराम करने आ गया.
........................................
अभी क्षितिज पर सूर्या की लाली फैल ही रही थी. सूर्या देव अभी उदय नही हुए थे. चारो और अंधेरे का परत अब हॅट गया था और उजाला अपना पंख फैलाना शुरू कर दिया था.
त्रियम्ब्केश्वर नासिक…..
गोदावरी नदी किनारे एक एकांत स्थान, जहा परिंदे और नदी के अवीराल धाराके अलावा और वहाँ कोई नही था.
सो सॉरी….
वहाँ कोई और भी था…
ओहूँ आज ये हो क्या रहा है.
वहाँ कोई और भी था… नही बल्कि थी…
एक कमसिन, अल्हड़, जवानी से लबरेज काले वस्त्र पहने लड़की.
गोदावरी नदी में एक नाके ऊपर अकेली योग मुद्रा में काफ़ी देर से एक ही आसन में स्थिर थी.
वो नटराज मुद्रा में पूर्वा की ओर अपना चेहरा कर के बाए पैर पर खड़ी हो कर दाहिने पैर को पीछे सर की सीध में मोड़ कर दोनो हाथ को सरके ऊपर से पीछे ले जा कर दाहिने पैरके उंगलियो को पकड़े हुए थी.
सूर्या की बहुत हल्की किरणें उसके सलोने मुखड़े पर पड़ रहा था.
बड़ा ही मनमोहक दृश्य था ये.
सूर्य की तीक्षण किरणें जब उसके पूरे बदन में समाने लगा तब जा कर कहीं वो अपने इस नटराज मुद्रा से बाहर आई.
वहाँ से नाव खेती हुई वो लड़की गोदावरी नदी किनारे पहुचि और फिर नाव को एक किनारे लगा कर उस में से उतर गई.
एक बार नदी को प्रणाम कर वापस चल पड़ी.
थोड़ी देर बाद वो त्रियम्ब्केश्वरके योग विद्या पीठ आश्रम में पहुचि.
वहाँ जा कर वो एके कमरे में चली गई. जो शायद उसका ही था.
वहाँ फ्रेश होने के बाद वो बाहर निकल कर आई.
तभी उस आश्रम के आचार्य दिखे जो वहाँ के बच्चों को शिक्षा दे रहे थे.
इशारे से उन्होने उस लड़की को अपने पास बुलाए.
आचार्या- कहाँ गई थी तुम पुत्री.
लड़की- बाबा में तो गोदावरी नदी किनारे योग कर रही थी.
आचार्या- बेटा गायत्री. कम से कम किसी को बता कर तो जाया करो.
वो लड़की जिसका नाम गायत्री था.
गायत्री- क्षमा करे बाबा. आगे से बता कर जाउन्गी.
फिर आचार्या बच्चो को पढ़ाने लगे और गायत्री वहाँ आश्रमके पशु पक्षियो को उनका खाने के लिए दाना और चारा देने लगी.
वहाँ आश्रम में एक ओर कुछ मोर कोयल कबूतर इधर उधर घूम कर गायत्री द्वारा डाले गये दाने को चुग रहे थे तो एक ओर बँधी हुई गाय घास खा रही थी.
गायत्री उन्हे ख़ाता देख कर बहुत खुश हो रही थी.
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काका वहाँ से फिर दालान पर चले गये.
दोनो बुआ और सोनम दी भी लल्लू से मोबाइल नंबर एक्सचेंज किए.
फिर लल्लू सब से इजाज़त ले कर अपने कमरे में थोड़ी देर आराम करने आ गया.
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अभी क्षितिज पर सूर्या की लाली फैल ही रही थी. सूर्या देव अभी उदय नही हुए थे. चारो और अंधेरे का परत अब हॅट गया था और उजाला अपना पंख फैलाना शुरू कर दिया था.
त्रियम्ब्केश्वर नासिक…..
गोदावरी नदी किनारे एक एकांत स्थान, जहा परिंदे और नदी के अवीराल धाराके अलावा और वहाँ कोई नही था.
सो सॉरी….
वहाँ कोई और भी था…
ओहूँ आज ये हो क्या रहा है.
वहाँ कोई और भी था… नही बल्कि थी…
एक कमसिन, अल्हड़, जवानी से लबरेज काले वस्त्र पहने लड़की.
गोदावरी नदी में एक नाके ऊपर अकेली योग मुद्रा में काफ़ी देर से एक ही आसन में स्थिर थी.
वो नटराज मुद्रा में पूर्वा की ओर अपना चेहरा कर के बाए पैर पर खड़ी हो कर दाहिने पैर को पीछे सर की सीध में मोड़ कर दोनो हाथ को सरके ऊपर से पीछे ले जा कर दाहिने पैरके उंगलियो को पकड़े हुए थी.
सूर्या की बहुत हल्की किरणें उसके सलोने मुखड़े पर पड़ रहा था.
बड़ा ही मनमोहक दृश्य था ये.
सूर्य की तीक्षण किरणें जब उसके पूरे बदन में समाने लगा तब जा कर कहीं वो अपने इस नटराज मुद्रा से बाहर आई.
वहाँ से नाव खेती हुई वो लड़की गोदावरी नदी किनारे पहुचि और फिर नाव को एक किनारे लगा कर उस में से उतर गई.
एक बार नदी को प्रणाम कर वापस चल पड़ी.
थोड़ी देर बाद वो त्रियम्ब्केश्वरके योग विद्या पीठ आश्रम में पहुचि.
वहाँ जा कर वो एके कमरे में चली गई. जो शायद उसका ही था.
वहाँ फ्रेश होने के बाद वो बाहर निकल कर आई.
तभी उस आश्रम के आचार्य दिखे जो वहाँ के बच्चों को शिक्षा दे रहे थे.
इशारे से उन्होने उस लड़की को अपने पास बुलाए.
आचार्या- कहाँ गई थी तुम पुत्री.
लड़की- बाबा में तो गोदावरी नदी किनारे योग कर रही थी.
आचार्या- बेटा गायत्री. कम से कम किसी को बता कर तो जाया करो.
वो लड़की जिसका नाम गायत्री था.
गायत्री- क्षमा करे बाबा. आगे से बता कर जाउन्गी.
फिर आचार्या बच्चो को पढ़ाने लगे और गायत्री वहाँ आश्रमके पशु पक्षियो को उनका खाने के लिए दाना और चारा देने लगी.
वहाँ आश्रम में एक ओर कुछ मोर कोयल कबूतर इधर उधर घूम कर गायत्री द्वारा डाले गये दाने को चुग रहे थे तो एक ओर बँधी हुई गाय घास खा रही थी.
गायत्री उन्हे ख़ाता देख कर बहुत खुश हो रही थी.
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