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Incest मर्द का बच्चा

काका हलवाई को बोल दिए आज से आने को और ग्लास प्लेट का भी ऑर्डर कर दिए. वो गाँव का ही था तो रात को घर आते वक्त वो लेते आएगा.

काका वहाँ से फिर दालान पर चले गये.

दोनो बुआ और सोनम दी भी लल्लू से मोबाइल नंबर एक्सचेंज किए.

फिर लल्लू सब से इजाज़त ले कर अपने कमरे में थोड़ी देर आराम करने आ गया.

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अभी क्षितिज पर सूर्या की लाली फैल ही रही थी. सूर्या देव अभी उदय नही हुए थे. चारो और अंधेरे का परत अब हॅट गया था और उजाला अपना पंख फैलाना शुरू कर दिया था.

त्रियम्ब्केश्वर नासिक…..

गोदावरी नदी किनारे एक एकांत स्थान, जहा परिंदे और नदी के अवीराल धाराके अलावा और वहाँ कोई नही था.

सो सॉरी….

वहाँ कोई और भी था…

ओहूँ आज ये हो क्या रहा है.

वहाँ कोई और भी था… नही बल्कि थी…

एक कमसिन, अल्हड़, जवानी से लबरेज काले वस्त्र पहने लड़की.

गोदावरी नदी में एक नाके ऊपर अकेली योग मुद्रा में काफ़ी देर से एक ही आसन में स्थिर थी.

वो नटराज मुद्रा में पूर्वा की ओर अपना चेहरा कर के बाए पैर पर खड़ी हो कर दाहिने पैर को पीछे सर की सीध में मोड़ कर दोनो हाथ को सरके ऊपर से पीछे ले जा कर दाहिने पैरके उंगलियो को पकड़े हुए थी.

सूर्या की बहुत हल्की किरणें उसके सलोने मुखड़े पर पड़ रहा था.

बड़ा ही मनमोहक दृश्य था ये.

सूर्य की तीक्षण किरणें जब उसके पूरे बदन में समाने लगा तब जा कर कहीं वो अपने इस नटराज मुद्रा से बाहर आई.

वहाँ से नाव खेती हुई वो लड़की गोदावरी नदी किनारे पहुचि और फिर नाव को एक किनारे लगा कर उस में से उतर गई.

एक बार नदी को प्रणाम कर वापस चल पड़ी.

थोड़ी देर बाद वो त्रियम्ब्केश्वरके योग विद्या पीठ आश्रम में पहुचि.

वहाँ जा कर वो एके कमरे में चली गई. जो शायद उसका ही था.

वहाँ फ्रेश होने के बाद वो बाहर निकल कर आई.

तभी उस आश्रम के आचार्य दिखे जो वहाँ के बच्चों को शिक्षा दे रहे थे.

इशारे से उन्होने उस लड़की को अपने पास बुलाए.

आचार्या- कहाँ गई थी तुम पुत्री.

लड़की- बाबा में तो गोदावरी नदी किनारे योग कर रही थी.

आचार्या- बेटा गायत्री. कम से कम किसी को बता कर तो जाया करो.

वो लड़की जिसका नाम गायत्री था.

गायत्री- क्षमा करे बाबा. आगे से बता कर जाउन्गी.

फिर आचार्या बच्चो को पढ़ाने लगे और गायत्री वहाँ आश्रमके पशु पक्षियो को उनका खाने के लिए दाना और चारा देने लगी.

वहाँ आश्रम में एक ओर कुछ मोर कोयल कबूतर इधर उधर घूम कर गायत्री द्वारा डाले गये दाने को चुग रहे थे तो एक ओर बँधी हुई गाय घास खा रही थी.

गायत्री उन्हे ख़ाता देख कर बहुत खुश हो रही थी.

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लल्लू बेड पर लेटा शादी ब्याह के कामों से काम रह गये है उसके बारे में सोच रहा था.

अभी वो कल पूरे दिन यहाँ नही था और अभी दोपहर के बाद आया है.

उसे पता भी नही था की क्या काम शेष है और क्या हो गया है.

उसे काका से पूछना पड़ेगा की क्या सब काम शेष रह गया है ताकि जल्दी से उन कामो को निपटाया जा सके.

इधर मा और ऋतु काकी का व्यवहार भी कुछ ठीक नही लग रहा.

लगता है अभी भी नाराज़ है.

समझ नही आ रहा था की क्या करे. कैसे मनाए उन्हे. क्या कहे मा को.

लगता है मा ऋतु काकी के बारे में जान गई है. अब कैसे उन्हे समझाऊं.

उधर वो ऋतु काकी है की वो अलग मूह फुलाए बैठी है.

अब इतनी बड़ी गान्ड बना कर मटकती हुई घूमेगी तो फिर इस में मेरा क्या कसूर है.

अब मुझ से नही रहा गया तो में क्या करू.

क्यू इन सब के बारे में सोचता हूँ में.

मुझे अपनी जान के बारे में सोचना चाहिए.

जब से आया हूँ ठीक ढंग से बात भी नही हुई है.

वैसे आज वो कितनी खूबसूरत लग रही थी ग्रीन सूट में.

मा कहर ढा रही थी.

मेरा बस चले तो अभी में उन्हे भाग कर कहीं दूर देश जाऊ. जहा में और मेरी जान हो और हर पल प्यार भरी बाते करता रहूँ.:

लल्लू यू ही उत्पटांग बाते सोचता हुआ सो गया.

" लल्लू बेटा कितना सोता है. रात को क्या करेगा. अब उठ जा नही तो रात में नींद नही आएगी.

आवाज़ सुन कर लल्लू की आँख खुल गई.

देखा तो छोटी बुआ झुक कर उसे उठा रही थी

झुकने के कारण छोटी बुआ की सूटके गले से बुआ की गोरी बड़ी बड़ी दो पहाड़ काली ब्रा में कसे हुए आधा बाहर निकल झाँक रहे थे.

लल्लू का तो मन किया की अभी इन दूध से भरे टंकी को निचोर निचोर कर पी जाये.

छोटी बुआ जब लल्लू को यू अपनी और घुरती देखी तो समझ ही नही पाई की ये ऐसे क्यू घूर रहा है बड़ी बड़ी आँखे कर के.

फिर जब वो लल्लू की आँखो का पीछा की यह जानने के लिए तब उन्हे अहसास हुआ की ये लल्लू उल्लू की तरह क्यू तक रहा है.

वो झट से सीधी हो कर अपने सूट को सही करती लल्लू को एक बार गौर से देख कमरे से बाहर निकल गई.

लल्लू सर पीट लिया अपना.

ये क्या कर दिया. क्या सोचेंगी मेरे बारे में.

लल्लू शर्मिंदा शर्मिंदा सा उठा और फ्रेश हो कर आँगन में आ गया.

आज आँगन में जमघट लगा था.

वैसे भी उसके घर में ही काफ़ी मेंबर है लेकिन दोनो बुआ उनके दो बच्चे और अब दो मामी.

बहुत अच्छा लग रहा था.

सब बहुत खुश थे.

लल्लू खाट पर बैठा सब के चेहरे को निहार रहा था.

जब वो नज़र घुमाता सोनम की ओर देखा तो वो भी लल्लू को ही देख रही थी.

सोनम आँखो के इशारे से लल्लू से पूछो की क्या हुआ क्या देख रहा है वो.

लल्लू भी इशारे में ही बता दिया कि कोई बात नही है बस यू ही वो सब को ताड़ रहा था की इन सब के चेहरे पर खुशिया कैसे चमक रही है.

लल्लू- दीदिओ कोई चाय पिलाएगा क्या.

बड़ी मामी- बाबू क्या तू डेली ऐसे ही सोया रहता है इतनी देर.

ऋतु- तो और क्या. करने को कुछ होता नही है. तो सोया ही रहेगा.

बड़ी मामी- ललिता ये में क्या सुन रही हूँ.

लल्लू मुस्कुराने लगा. फिर उठ कर मामी के पास गया और उनको पकड़ कर बैठ गया उनके पास

लल्लू- आप को क्या लगता है.

छोटी मामी- दीदी, बाबू थक गया होगा. जब हम कार में बैठे बैठे थक गये थे तो ये तो इतनी देर ड्राइव कर के आया है.

सभी काकी एक साथ- क्या…. लल्लू ड्राइव कर के आया है…

इसने कैसे कार चला लिया.

बड़ी मामी- क्या मतलब…. कैसे कार चला लिया. जैसे चलाया जाता है वैसे ही तो चलाएगा ना.

काजल- नही. नही. हमारा मतलब था की इसने कब सिख लिया कार चलाना. इसे तो बुलेट चलाना भी नही आता.

दोनो मामी- क्या…..

फिर दोनो मामी लल्लू को देखने लगी.

लल्लू- लल्लू नाम है मेरा.

बड़ी मामी- कौन कहता है तुम्हे लल्लू. अगर आज के बाद किसी के मूह से ये लल्लू बल्लू सुन्न्ं लिया तो मुझ से बुरा कोई नही होगा.

सब अचानक चुप्प..

लल्लू- शांत मामी शांत… वो सब प्यार से बोलते है. ऐसा कुछ नही है.

बड़ी मामी- नही मुझे ये पसंद नही कोई तुम्हे लल्लू कहे. अरे इतना अच्छा नाम है ललित. सब ये कहनेके बदले लल्लू उल्लू ऐसे भी कोई अपने बेटे को भाई को कहता है क्या.

लल्लू छोटी मामी को इशारा किया.

तब छोटी मामी आगे बढ़ कर बड़ी मामी को शांत किए.

बड़ी मामी उठ कर कमरे में चली गई.

पीछे छोटी मामी भी चली गई.

लल्लू उठ कर मम्मी के कमरों की ओर उन्हे मनाने चला गया.
 
बड़ी बुआ- वैसे भाबी, बात तो सही है. अब इतने मेहमान होंगे घर में वहाँ उसे सब लल्लू लल्लू कर के पुकारेंगे क्या ये अच्छा लगेगा आप लोगो को.

रागिनी- नही.

छोटी बुआ- फिर आप लोग ये सब बाते पहले क्यू नही सोचे.

रागिनी- अब तो आदत हो गया है लल्लू बोलने का.

छोटी बुआ- वैसे आप सब उसे लल्लू क्यू कहते है.

काजल- क्या बताए दीदी. ये जब पढ़ाई कर रहा था शायद तब 8 में था स्कूल में सीढ़ी से लुढ़कता हुआ नीचे आ गया जिस कारण इसके सर में चोट लग गया था. चोट तो सही हो गया लेकिन कभी कभी ये उस चोट के कारण पागल जैसा हो जाता है. इसकी हरकते बच्चो वाली हो जाती है.

इसी लिए सब इसे लल्लू कहने लगे. क्योंकि इसे सही ग़लत सच झूठ कुछ भी पता नही होता है.

बड़ी बुआ- अभी देख कर तो ये घर में सब से समझदार लग रहा है. बिल्कुल पिताजी की तरह.

छोटी बुआ- सही कहा दीदी. जब से हम लोग आए है तब से तो सच में ये घर का सब से समझदार लगता है. और सुनील भैया से बाते करता देख कर तो यही लग रहा था जैसे आप लोग ही लल्लू हो या वो जान बुझ कर आप सब को लल्लू बना रहा है.

सोनम- वैसे आप ने सही कहा बुआ. भाई कही से भी वैसा नही लगता है. वैसे भी हम तो उसे हमेशा भाई ही कह कर बुलाए है.

बड़ी बुआ- तुम लोगो की माए ही सब की है. यही उसे लल्लू लल्लू करती रहती होंगी.

छोटी बुआ- वैसे बड़ी भाबी जी आप की भाबी क्यू इतना गुस्सा हो गई.

ऋतु- वो दरसल बात ये है की वो लल्लू को…..

सोनम- मा….अभी अभी इतना बोला है सब ने फिर भी आप बाज नही आ रही.

सोनम गुस्से में ऋतु को बोली.

ऋतु समझ नही पाई.

ऋतु- क्या हुआ. मैने क्या कर दिया अब.

कोमल- काकी. आप अब भी भाई को लल्लू कह रही है.

ऋतु- ऊहह. ये आदत हो गया है. बातों बातों में मूह से निकल जाता है. धीरे धीरे ही ये चूतेगा.

हा तो में क्या कह रही थी.

छोटी बुआ- आप अपनी भाबी और ललित के बारे में बता रही थी.

ऋतु- हा. मेरी भाभी लल्लू...ललित को अपने बेटे की तरह मनती है. जब लल्ललित को चोट लग गया था तो मेरे भैया को भी पता चला तो वो देखने आए थे.

फिर वो लल्ललित को अपने साथ ले कर चले गये थे. ललित वहाँ के ई साल रहा है.

छोटी बुआ- अच्छा तो ये बात है. इसी लिए वो ललित को इतना चाहती है.

सब यू ही बाते कर रहे थे यहाँ.

ऊपर लल्लू बड़ी मामी के कमरे में गया तो बड़ी मामी रो रही थी और छोटी मामी उन्हे चुप करा रही थी.

लल्लू कमरे में जा कर बड़ी मामी के सामने बैठ गया अपना कान पकड़ कर.

लल्लू- प्लीज़ मामी आप चुप हो जाइए. ये सब मेरी ही ग़लती है. प्लीज़ आप मत रोइए. नही तो में भी रोने लगूंगा.

बड़ी मामी अपने आँखो से बहते आँखो को हाथो से साफ कर लल्लू को उठा कर गले से लगा लिया.

बड़ी मामी- फिर मुझे ऐसे रुलाया तो में तुझ से कभी बात नही करूँगी

लल्लू मामी के गले लगे हुए गर्दन हिला दिया.

फिर तीनो वही बैठे बाते करने लगे.

थोड़ी देर में सोनम इन सब को नीचे चलने को बुलाने आई.

बड़ी मामी- बेटा एक काम कर. हम जो शॉपिंग किए है ना उस में से चार पॅकेट नीचे करवा दे.

छोटी मामी वो चार पॅकेट लल्लू को दिखा दी जो नीचे लाना था.

लल्लू एक एक कर चारो पॅकेट ले जा कर नीचे जहा सब आँगन में बैठे थे वहाँ रख दिया.

तब तक चाय बन गई थी.

सब चाय पीने लगे.

छोटी मामी एक एक पॅकेट खोल कर उस में से सब को उनका कपड़ा बाँट दिए.

ऋतु- भाभी ये क्या है. इतना सब क्यू किया आप. आप लोग यहाँ आए हमारे लिए यही बहुत है.
 
बड़ी मामी- आती कैसे नही. हमारा बेटा जो गया था बुलाने.

और ये सब छोटा सा उपहार मेरे बेटे की तरफ से.

सोनम- मामी हम सब को तो दे दिए लेकिन आप का लाड़ला बेटा ही रह गया. उसे कुछ मिला ही नही.

लल्लू- मुझे भी मिला है दी.

सोनम और कोमल - क्या मिला दिखाओ.

लल्लू- दालानके बाहर खड़ा है ना लाल रंग का.

लल्लू मुस्कुराता हुआ बोला.

रोमा- बाहर लाल रंग का तो कार है जो भैया को उपहार में उनके ससुर ने दिया है.

लल्लू- मेरी प्यारी बहन वहाँ रेड कलर का एक नही दो कार है.

मीनू- भाई, जिस से मामी आई है.

लल्लू- हा, वो मेरा ही है. जो में वही मामा के पास छोड़ दिया था पिच्छली बार.

गौरी- वाउ भाई. वो तो ऑडी है. बहुत सुंदर है.

लल्लू गौरी को पकड़ कर अपने पास बैठाता हुआ.

लल्लू- वो मेरे साथ साथ मेरी सभी बहनो का भी है.

रानी- थैंक यु भाई.

लल्लू- भाई को थैंक यु नही कहते. ये बड़े बुज़ुर्गो ने कहा है.

सभी हँसने लगे.

फिर लल्लू सब को वहाँ छोड़ दालान पर आ गया पूछने की कोई काम तो नही बचा है.

फिर लल्लू वही सब के साथ बैठा रहा जब तक खाना ना तैयार हो गया रात का.

सुनील काका हलवाई को बुला लिए थे तो अब से हलवाई ही खाना बना रहा था.

घर की सभी महिलाए अब फ्री थी.

परसो सगुण का रस्म था.
 
हलवाई खाना बना दिया था.

सब लोग आँगन आ कर खाना पीना से निपट गये.

फिर अपने अपने कमरे में जा कर सो गये.

लल्लू दिन में काफ़ी देर तक सोया था तो अभी उसे नींद नही आ रहा था.

लल्लू उठ कर छत पर चला गया.

वहाँ छोटी बुआ पहले से ही मोबाइल पर बात कर रही थी.

लल्लू उनको बात करता देखा तो थोड़ा दूर ही रुक गया. छोटी बुआ अभी फूफा जी से बात कर रही थी तो उसे अभी बुआ के पास जाना अच्छा नही लगा.

थोड़ी देर में बुआ बात कर के जब फ्री हो गई तो लल्लू के पास आ कर खड़ी हो गई.

बुआ- क्यू बच्चे नींद नही आ रहा है क्या.

लल्लू- हा बुआ अभी नींद नही आ रहा था.

बुआ- सही बात है. दिन में ही इतनी देर सो गये थे.

लल्लू- आप क्यू जाग रही है बुआ. मुझे तो नींद नही आ रहा लेकिन आप तो नही सोई थी फिर….

बुआ- मुझे भी अभी नींद नही आ रहा था. अभी ये नया जगह है ना.

लल्लू- क्या लाइफ होती है लड़कियो की. पिता का घर जहा वो पैदा होती है. छोटे से बच्चे से जवान होती है. फिर शादी कर एक पराए घर चली जाती है जिस घर के बारे में उसे कुछ भी पता नही होता. घर नया, वहाँ के लोग नये, माहौल नया. और देखो अब, वापस पिताके घर आने के बाद यहाँ सुकून नही.

बुआ- वाउ, ललित. बेटा तू तो बहुत बड़ी बड़ी बातें करने लगा है. कहाँ से सीखा है ये सब.

लल्लू- वक्त. बुआ वक्त से बड़ा टीचर कौन हो सकता है. वक्त सब सीखा देता है.

बुआ- इम्परेस्सीव. तुम ने तो दिल जीत लिया मेरा. अच्छा अब ये सब छोड़ और ये बता की कभी हमारे यहाँ क्यू नही आया.

लल्लू- बुआ कल पहली बार मुझे अकेला कही जाने दिया गया है. नही तो में एक हरह से एक लक्ष्मण रेखा में क़ैद था. मेरा सरहद लक्ष्मण रेखा का ये गाँव की हदें थी. में इस गाँव से बाहर नही जा सकता था. सब के लिए तो में आज भी उनका बच्चा ही हूँ. इसी लिए आप के पास क्या किसी के पास नही जा सका.

लेकिन अब वादा है आप से. अब में आप के पास महीने में एक बार ज़रूर आया करूँगा.

बुआ- थॅंक्स बेटा.

लल्लू- क्या बुआ, बेटा भी कहती हो और थॅंक्स भी. बेटे को कोई मा थॅंक्स कहा कहता है.

बुआ- ऊओह मेरा बच्चा.

बुआ लल्लू को पकड़ कर अपने सीने से लगा ली.

लल्लू भी बुआके गले लगा हुआ उनका प्यार फील कर रहा था.

साथ ही बड़े बड़े चुचे भी.

बुआ को अचानक लल्लू का वो सोते हुए से उठ कर अपने दूध को घूर्ना याद आ गया.

अभी लल्लू को वो अपने उसी दूध पर दबाए हुए है. ऐसा दिमाग़ में बात घूमते ही उन्हे कुछ होने लगा.

आज तक छोटी बुआ कभी ऐसा फील नही की थी. उन्हे गिल्टी फील हो रहा था तो वो लल्लू से अलग हो कर हट कर खड़ी हो गई.

लल्लू चाँदनी रात में ऊपर आसमान में निकले चाँद को देखता बुआ से बोला.

लल्लू- बुआ, आप कभी क्यू नही आई यहाँ. अभी शादी था और पापा गये तब आए आप और बड़ी बुआ भी.

बुआ- बेटा कभी घर परिवार से फुरसत ही नही मिला.

लल्लू- बुआ ये भी आप का ही परिवार है.

बुआ- हा बेटा. ये भी मेरा ही परिवार है. लेकिन अपनी जिंदगी में इतना उलझी होती हूँ की फिर यहाँ आने का मौका नही मिला.

लल्लू- बुआ काफ़ी रात हो गया है तो अब जा के आप सो जाइए.

बुआ- तू भी जा सो जा अब.

फिर लल्लू और बुआ दोनो नीचे आ गये.

लल्लू- बुआ आप कहाँ सोएंगे.

बुआ- तेरी मा के पास , क्यू.

लल्लू- नही ऐसे ही पूछा था.

फिर लल्लू अपने कमरे में चला गया.

वहाँ जा कर बेड पर लेट गया लल्लू.

नींद नही आ रहा था. लेकिन कर भी क्या सकते है. उठ कर आँगन में आ गया लल्लू और खटिया पर लेट गया.

रात कितनी बीती थी पता नही.

किसी के कराहने से लल्लू की नींद खुल गया.

पहले सोचा की ये उसका वहाँ है लेकिन चाँद सेकेंड बाद फिर से कराहने की आवाज़ आई.

लल्लू तेज़ी से खटिया से उठा. आवाज़ नलका की तरफ से आ रहा था.

लल्लू दौड़ कर नलका पर गया. देखा कोई औरत वहाँ गिरी है. लगता है अंधेरे में पैर स्लीप हो गया है.

लल्लू जल्दी से उस औरत को उठा कर अपने कमरे में ले गया. वहाँ जब लाइट जला कर देखा तो छोटी बुआ थी.

बुआ दर्द से कराह रही थी.

लल्लू- बुआ में मा को बुआ कर लाता हूँ.

बुआ- नही नही. प्लीज़ किसी को मत बुलाओ.

लल्लू- बुआ आप को चोट लगा है. कहा लगा है. मा को तो बुलाने दो. और किसी को नही उठाउँगा.

बुआ चुप रह गई.

सही बात था. बुआ को पीछे के मार से नीचे चोट लगा था तो वो लल्लू को क्या कहती.

लल्लू जल्दी से काजल के कमरे में पहुचा.

लल्लू काजल को हिला कर नींद से जगाया.

काजल- क्या है. तू यहाँ क्या कर रहा है.

काजल गुस्से से बोली.

लल्लू- मा, छोटी बुआ अभी अभी नलका पर फिसल गई है. इन्हे पता नही कहा कितना चोट आया है. आप प्लीज़ ज़रा चल कर देखो.

काजल- तुरंत उठ गई. कहा है दीदी.

लल्लू- मेरे कमरे में.

बस फिर क्या था. मेरे कमरे में सुनते ही काजल का हाथ उठा और सीधा लल्लू के गाल पर अपने पाँचो उंगली को चिपका दिया.
 
काजल- तुम्हे ज़रा भी शरम नही आई. अपने बुआ के साथ ये करते हुए.

कैसा हैवान हो गया है तू. पहले में फिर बड़ी दीदी और अब अपने बुआ को भी नही छोड़ा.

लल्लू- आप जो सोच रही है ऐसा कुछ नही है. वो बहुत ज़्यादा परेशान है. अगर आप को नही जाना तो आप लेटी रहो में किसी और को उठाता हूँ.

काजल फिर एक थप्पड़ लगा दी.

काजल- अब क्या सारे घर को जनवाएगा नालयक. इस शादी तक तू यहाँ रहेगा उसके बाद तू अब इस घर में नही रहेगा. यहाँ इतनी लड़किया है. तेरे जैसे हैवान का भरोशा नही कुछ भी कर सकता है तू.

लल्लू अवाक सा काजल का चेहरा देखे जा रहा था.

लल्लू-( मुस्कुराता हुआ) तुम अभी जा कर बुआ को देखो क्या हुआ है. बाकी में शादी तक का अब इंतजार नही कर सकता. में अभी ये घर छोड़ कर जा रहा हूँ.

लल्लू वहाँ से निकल कर अपने कमरे में आ गया. वहाँ बुआ अभी भी परेशान थी.

लल्लू तुरंत एक बॅग में अपना एक सेट कपड़ा डाला और अपना वॉलेट और गाड़ी की चाभी ले कर घर से बाहर आ गया.

गाड़ी का गेट खोल उस में बॅग फेक दिया एक ओर.

गाड़ी स्टार्ट कर वो गाड़ी को सड़क पर ला कर गाँव से बाहरके रास्ते पर चल दिया.

अब उसे समझ नही आ रहा था की कहाँ जाये. वहाँ मा को तो कह दिया कि अभी चला जायगा.

गाड़ी अंधेरे रात में सुनसान सड़क पे दौड़ा चला जा रहा था.

पता नही कब तक गाड़ी चला ता रहा. कहाँ जा रहा है ये भी उसे कुछ पता नही. बस गाड़ी आगे दौड़ती जा रही थी.

तभी अचानक कोई लल्लू के गाड़ी के आगे आ गया.

लल्लू का तो ऐसे ही दिमाग़ घुमा हुआ था. मारे टेंशन उसका सर फटा जा रहा था ऊपर से ये अचानक किसी का यू बीच रोड पर गाड़ी के आगे आ जाना.

लल्लू का झान्ट का बाल ब्राउन हो गया.

लल्लू ब्रेक लगा कर जैसे तैसे रोका गाड़ी. फिर भी रुकते रुकते भी वो उसे हल्का टक्कर मार ही दिया.

लल्लू का तो वैसे ही अभी भेजा फ्राइ हुआ पड़ा था. झट से गाड़ीके दरवाजा खोल कर निकला बाहर और जिसे धक्का लगा था उसे उठा कर एक कस के चिपका दिया.

लेकिन थप्पड़ मारते उसे लगा जैसे ये कोई महिला है.

लल्लू झट से उसे पलट कर देखा तो सही में वो तो एक महिला नही बल्कि लड़की थी.

लल्लू- हे भगवान. क्या कर रहा है ये. कोई मरने भी आया गाड़ी के आगे तो एक लड़की.

उसे उठा कर गाड़ी में डाला और फिर गाड़ी को आस पास नज़र दौड़ता हुआ किसी हॉस्पिटल क्लिनिक को ढूँढने लगा.

तभी उसे बाहर एक प्याऊ नज़र आया.

लल्लू गाड़ी रोक कर वहाँ प्याऊ से चुल्लू में पानी ला कर उस लड़की के चेहरे पर दो बार डाला.

तब जा कर वो लड़की थोड़ी कुन्मुनाई..

लल्लू आशा भरी नज़र से उस लड़की को देखने लगा.

लल्लू- भगवान जी. बचा लेना इसे ज़्यादा चोट ना लगी हो.

लल्लू गाड़ी में आ के बैठ गया.

लल्लू उस लड़की की ओर देखा.

लल्लू- कौन है आप. मरने का इतना ही शौक था तो ट्रेन के नीचे जाना था. या किसी औरके गाड़ी के नीचे जाती. मेरे से क्या दुश्मनी है जो मेरे गाड़ी से टकराने आ गई.

लड़की-......

लल्लू- कुछ बोलॉगी. या गूंगी हो. कही बाहरी ना हो ये. मेरी बात ही ना सुनी हो.

लड़की-......

लल्लू- अरे कुछ बोल भी दो अब. कौन हो. क्यू आ गई अचानक गाड़ी के आगे.

लड़की- उूओ….. उूओ..

लल्लू- ये क्या है. ओ मोहतरमा मुझे ऐसा कोई भासा बोलना और समझना नही आता. प्लीज़ देखो में खुद बहुत परेशान हूँ. अब और परेशान ना करो.

लड़की- मे..रा ना..म एल..अक्स..श्मी है. मेरे चा.. चा ने मेरे मा... बाप..उ को मरररर कर हमारे सारे ज़मीन जा.यदाद्दद्ड हड़प लिया है औररर अब उसका ब्ब्ब्बेटा मेरे साथ गगगांदाअ कााअँ कर..ना छा..पता है.

वो लड़की लक्ष्मी रोती हुई लल्लू को अपनी आप बीती बताई.

लल्लू- कब की बात है ये.

लक्ष्मी- आज सुबह की.

लल्लू- कहाँ रहती हो आप.

लक्ष्मी- उज्जैन. सूरज नगर.

लल्लू- यहाँ से कितना दूर है. यहाँ तक कैसे आए.

लक्ष्मी- एक ट्रक में छुप कर.

लल्लू- अब ये भी बता दो की मेरे गाड़ी के आगे क्यू आ गये अचानक.

लक्ष्मी- क्या करू फिर कहाँ जाऊ. हर और तो जिस्मके भूखे भेरिए घूम रहे है.

लल्लू- अब क्या चाहती हो आप.

लक्ष्मी - मेरे चाहने से क्या होता है.

लल्लू- फिर भी कुछ तो मन में होगा.

लक्ष्मी- में तो चाहती हूँ की जैसे मेरे चाचा ने मेरे मा और बापू को मारा है वैसे ही उसे भी भगवान महाकाल सज़ा दे. लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है.

लल्लू- सही बात है. वैसे आप गाड़ी से टकराई थी. आप को ज़्यादा चोट तो नही आया है.

लक्ष्मी- नही इसी बात का तो रोना है. बच गई में. मरी ही नही.

लल्लू- कैसी बाते करती है आप. मारे आप का दुश्मन. चलिए देखे आप के चाचा को. क्या सूरमा है वो.

लल्लू गाड़ी चलाता हुआ उज्जैन के सूरज नगर को चल दिया.

अब सूरज निकलने वाला था. चारो और उजाला फैल गया था.

लल्लू की ऑडी तेज़ी से उज्जैनके सूरज नगर की ओर बढ़ रहा था.
 
इधर घर में.

काजल गुस्से से बड़बड़ाती हुई बैठी थी कमरे में.

उसे अभी भी यही लग रहा था की लल्लू ने जैसे ऋतु के साथ किया है वैसे ही अपने बुआ के साथ भी किया है.

थोड़ी देर में सोच कर वो उसके कमरे की ओर चल दी. ताकि किसी और को पता चलने से पहले ही वो अपने इस ननद को जहा तक हो सके उपचार कर दे जिस से सुबह किसी और को पता ना चले.

कमरे में आई तो काजल देखती है की दीक्षा अपने गान्ड उठाए कराह रही है.

काजल- क्या हुआ. कैसे हुआ ये.

मन में तो यही कह रही थी की लल्लू ने इसका भी गान्ड फाड़ दिया है जैसे ऋतु का फाड़ दिया था.

दीक्षा- पेशाब करने नलका पर गई थी. वही पैर फिसल गया और उस के चबूतरे पर गिर गई. वही किनारी पीछे लग गया है जो बहुत दर्द कर रहा है.

काजल- लाओ दिखाओ ज़रा. कहा लगा है. कही माँस तो नही फटा है.

मन में तो कुछ और ही चल रहा था.

( कितनी झूठ बोल रही है. फड़वा ली है मेरे बेटे के मुषल से अपना ये मटका और अब बहाने बना रही है की गिर गई थी. रुक अभी देखती हूँ कितना चौड़ा किया है उसके लौडे ने इसके पहले से चौड़ी गान्ड को.)

काजल दीक्षाके गान्ड से सारी पेटिकोट उठा कर देखा. एक पतली सी पेंटी पहने हुए थी दीक्षा.

जब काजल को दीक्षाके गान्ड पर लल्लू के कारनामो का कोई सुराग नही मिला तो काजल फिर सोचने लगी की कही सही में तो नही गिर गई थी.

फिर काजल नज़र उठा के दीक्षाके गान्ड का मुआयना करने लगी.

तब काजल को अहसास हुआ की सही में ये गिर गई है क्योंकि गिरने से जो चोट लगा था वहाँ काला हो गया था और सूज भी गया था.

काजल- आहा सूज गया है और काला भी हो गया है. में तेल गर्म कर के लाती हूँ.

फिर काजल जा कर ऋतु को भी उठा कर उसे सारी बात बता दी और उसे दीक्षा के पास भेज कर खुद तेल गर्म करने चली गई.

सुबह तक ये लोग दीक्षा के साथ ही लगी रही.

अब दीक्षा का दर्द कम था और सूजन भी कम हो गया था.

सुबह उठने के बाद सब अपने प्रति दिनके कामो में मसरूफ़ हो गये.

लल्लू का किसी को कोई ख़याल नही था.

खानेके समय दोपहर को खाना ख़ाता हुआ सुनील लल्लू का खोज किया.

सुनील- अरे भाई अपने नवाब साहब कहा है. आज तो उनका चेहरा भी नही देखा है.

राघव- सही कहा चाचा. सुबह से मैने भी नही देखा है. में तो समझ रहा था की आप कहीं भेजे होंगे.

सुनील- मैने नही भेजा है कही.

दादू- फिर कहाँ जायगा. बिना बताए तो कही जाता भी नही.

पापा- तो क्या उसे किसी ने भी नही देखा है सुबह से. ना ही किसी ने काम से बाहर भेजा है.

सब मना कर दिए.

काजल को अभी भी अहसास नही था की क्या नतीजा निकला है रात की घटना का.

सुनील- सब से लास्ट में किस ने देखा है उसे.

सब चुप. कोई कुछ नही बोल रहे थे.

बड़ी मामी- ऐसे चुप मत रहो सब. बताओ रात में सब से लास्ट में किस ने देखा है.

छोटी बुआ- मैने. हम दोनो छत पर काफ़ी देर तक बात कर रहे थे. दोनो को ही नींद नही आ रहा था तो. फिर दोनो नीचे आ गये. यहाँ ललित बेटा अपने कमरे में चला गया और में छोटी भाभी के कमरे में सोने चली गई.

सुनील- उसके बाद किसी ने देखा है.

अब सभी खाना छोड़ दिए थे. टेंशन से सब का हाथ रुक गया था.

छोटी बुआ- आधी रात को में पानी पीने नलका पर गई थी तो वहाँ स्लिप कर गई थी जिस के कारण में गिर गई.

मेरे गिरने की आवाज़ सुन कर ललित बेटा आया था. वही उठा कर फिर अपने कमरे में ले गया मुझे. फिर उसने बड़ी भाभी और छोटी भाभी को उठाया था. उसके बाद में नही मिली हूँ.

पापा- क्या तुम गिर गई थी रात में. अब अभी बता रही हो.

तुम लोग क्या करती रहती हो. ये पानी पीने अकेले कैसे चली गई थी. साथ क्यू नही गये कोई.

बड़ी मामी वहाँ से उठ कर बाहर को चल दी.

सुनील- आप कहाँ जा रहे हो.आप यही रहो में देखता हूँ.

फिर बाकीके काका भी उठ गये. सब बाहर तक आए बात करते हुए.

राघव- यहाँ कार भी नही है. जिस से लल्लू दोनो मामी को ले कर आया था.

अब सभी और भी ज़्यादा परेशान हो गये.

क्या हुआ है. कहा गया कार ले कर. कही कोई आक्सिडेंट तो नही हो गया.

सब तरह तरह की अनुमान लगा रहे थे.

पापा- उसे गाड़ी चलाना भी नही आता था. अभी अभी तो वो बुलेट चलाना सीखा था. उस पर सब उसे कार चलाने को दे दिए.

सब उसे सर पर चढ़ा रहे है. आज उसी का नतीजा है ये की वो बिगड़ गया है. किसी की सुनता नही है.

बड़ी मामी का तो अब बीपी बढ़ने लगा था.

अब काजल को रात की वाकीया याद आता है.

जो काजल ने किया और कहा था और उसके जवाब में जो कुछ लल्लू ने कहा था.

काजल के हाथ पैर सुन्न हो गये.

वो कहे तो किसे कहे.
 
इधर लल्लू उज्जैन पहुच कर एक सस्ते होटेल में रूम ले कर मज़े से खाना पीना खा कर सो रहा था. लक्ष्मी साथ में बैठी हुई थी.
 
क्या हुआ मिला मेरा बेटा.

बड़ी मामी बेहाल हो कर दालान पर बैठी थी.

अभी अभी अनिल काका आए थे आस पास गाँव में ढूँढ कर जिस से बड़ी मामी पूछ रही थी.

अनिल काका अपना सर इनकार में हिला दिए.

बेड पर बैठे दादू भी बहुत गमगीन लग रहे थे.

बहनो का तो क्या हाल था ये पूछो ही मत.

सभी एक तरफ से रोए जा रही थी. कभी कोमल सोनम के गले लग कर रोती तो कभी सोनम रोमा के गले लग कर. तो कभी गौरी रानीके गले लग कर रोती

ऐसे ही सब परेशान थे.

काजल तो अपने आप को कमरे में क़ैद कर ली थी.

उसे किसी के सामने जाने में डर लग रहा था. कही किसी को पता ना चल जाये की क्यू लल्लू घर से चला गया.

ऋतु अब अलग परेशान थी.

ऋतु- मुआ कहा चला गया. गान्ड मेरी फटी दर्द में झेली हूँ और गुस्सा किया तो घर से भाग गया.

लेकिन अगर मेरे गुस्से से भाग कर जाता तो पहले ही जाता. अब तो में गुस्सा भी नही हूँ उस पर. अब कहा चला गया. घर में शादी है दो दिन में और अब ये गायब है.

हे प्रभु, रक्षा करना उस बुड्दू का. मन में कोई मेल नही है उसके. जो भी कहता करता है सब साफ दिल से ही करता है.

कैसे होगा ये शादी अब. हे भगवान लाज रखना हमारी.

देर रात तक सब ढूँढते रहे लेकिन लल्लू का कोई पता नही चला.

दोनो मामा भी रात में आ गये थे.

जब आस पास नही मिला लल्लू तो छोटी मामी को बोल कर बड़ी मामी ने दोनो मामा को बुलवा लिया यही.

अभी सभी लोग आँगन में बैठे हुए थे.

गज्जू मामा- ललित आस पास के बाज़ार कही नही मिला है.

अब आप लोग बताइए. किसी पर कोई शक या किसी को पता हो की वो कहाँ जा सकता है. किसी से कोई बहस हुआ हो या किसी को बातों बातों में ललित ऐसा कुछ बताया हो की वो कही जाने वाला है.

सब चुप. किसी को कुछ पता नही था और जिस को पता था वो डर गई बोल नही रही थी.

क्योंकि वो जानती थी. जैसे ही वो बताएगी रात क्या हुआ था तो सब से पहले उसे सुनील काट देगा गर्दन. उस से बच गई तो फिर गज्जू मामा उसके. वो काट देंगे.

इसी लिए काजल चुप ही रह गई.

पोलीस में भी कॉम्पलेंट लिखवा दिया था गुमशुदी का.

पोलीस गज्जू मामा के कारण पूरे ज़ोर शोर से ढूँढ रहा था ललित उर्फ लल्लू को.

बड़ी मामी सोनम और कोमल इन तीनो का बहुत बुरा हाल था.

इधर लल्लू आधी रात को उठा सो कर.

लक्ष्मी बेड पर सो रही थी उस समय. लल्लू नीचे चादर बिछा कर सोया था.

उठ कर बाथरूम से फ्रेश हो कर आया. भूख लगी थी तो खाने को पूछा. अभी आधी रात को कुछ नही था. सिर्फ़ चाय और बिस्किट्स मिले. उसी को खा पी कर काम चला लिया.

फिर बालकनी में आ कर थोड़ी देर टहल कर लल्लू कमरे में आया और सोचने लगा की अब क्या करे.

नींद तो अब आएगा नही और रात अभी आधी ही बीती है

लल्लू सोचा क्यू ना ध्यान ही लगा लिया जाये.

सब मंगल है.

लल्लू ध्यान में बैठ गया.

आधी रात का वक्त. सारा जहा सो रहा था. लल्लू को सो रही लक्ष्मीके सासो की आवाज़ सुनाई दे रही थी.

महा कालेश्वरके प्रांगण में या कही किसी साधी की जयघोष उसे सुनाई दे रहा था.

पूरा वातावरण शांत था. लल्लू अपने मन को सब से पहले शांत किया फिर ढूँढने लगा मार्ग साधना का.

धीरे धीरे वो साधना में डूबता चला गया.

पहले लल्लू अपने आप को भूल गया. वो क्या है. कहा है. कुछ है भी वो.

ये सारी चीज़े उसके दिमाग़ से निकल गया.

अपने आप को वो हवा में तैरता हुआ महसूस कर रहा था. जैसे वायुमंडल में घुल मिट्टीके बहुत छोटे कण उड़ते तैरते रहते है हवा में. वैसे ही लल्लू खुद को अनुभब कर रहा था.

लल्लू अभी भी साधना में लीन था. उसे ये अहसास तो था की वो हल्का हो कर हवा में तैर रहा है लेकिन वो अपने ध्यान को भंग नही होने दिए

लल्लू उड़ता हुआ हवा में एक द्वार के पास पहुचा.

लाल रंग का था ये द्वार.

लल्लू थोड़ी देर वही हवा में तैरता रहा फिर उस दरवाजे की ओर चला गया.

वहाँ पहुच कर हल्के से धक्का दिया उस दरवाजे को.

खुलता चला गया वो गेट. अंदर लाल रंग का प्रकाश चारो और फैला हुआ था.

लल्लू उड़ता हुआ उस लाल प्रकाश में कही खो गया.

कभी इधर तो कभी उधर उड़ता तैरता रहा.

फिर लल्लू अपने आप को एक जगह स्थिर कर ऊपर उठता चला गया.

काफ़ी ऊपर आने पर उसे फिर एक दरवाजा दिखा. ये ऑरेंज कलर का था.

लल्लू उस दरवाजे को भी पार कर लिया.

यहाँ चारो और ऑरेंज लाइट्स फैले हुए थे.

लल्लू चारो और देख कर अपने मन को स्थिर करने लगा. फिर वहाँ से ऊपर उठता चला गया.

आगे उसे गेट दिख रहा था.

लल्लू इस ओर चल दिया. अभी लल्लू उस दरवाजे को टच करने वाला ही था की उसका ध्यान भंग हो गया.

आँख खोल कर देखा तो लक्ष्मी बेड पर बैठी लल्लू को घूर रही थी.

लल्लू आँखोंके इशारे से पूछा की क्या हुआ तो लक्ष्मी इनकार में गर्दन हिला दी.

लल्लू अपने बेड से उठ कर खड़ा हो गया.

लल्लू- सो जाइए. अभी बहुत रात बाकी है.

लक्ष्मी- अच्छा. ये किस ने कहा आप से.

लल्लू चौक कर लक्ष्मी की ओर देखा तो उसे खिड़की से आती सुबह के सूर्य की किर्णो का आभास हुआ.

लल्लू खिड़की खोल कर देखा तो सही में अभी सूर्या देव निकले ही थे .

लल्लू- वाउ सुबह हो गया. में फिर तो काफ़ी देर से ध्यान में बैठा रह गया था और मुझे पता भी नही चला.

ओफफ्फ़ सब मंगल है.

लल्लू- अच्छा लक्ष्मी जी ये बताइए की यहाँ उज्जैन में आप रहती है तो यहाँ जो कुंभ लगता है वो भी पता होगा आप को. यहाँ आप कई बार आई होंगी.

लक्ष्मी- हा यहाँ मेरा घर है. तो यहाँ तो आती ही रही थी में अपने मा बापू के साथ.

लल्लू- में यहाँ महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा करना चाहता हूँ क्या चलेंगी मेरे साथ.

लक्ष्मी- ये भी कोई मना करने वाली बात है.

लल्लू- फिर चलिए. चलते है. वही सिपरा नदी में स्नान कर के पूजा करेंगे.

झट पट दोनो तैयार हो कर चल दिए वहाँ से महाकाल की पूजा के लिए अपनी कार से.

थोड़ी देर में ही ये लोग सिपरा नदी किनारे पहुच गये थे.
 
दोनो नदी में जा कर स्नान किए फिर कपड़े पहन कर चल दिए पूजा करने के लिए.

दोनो वहाँ सब से पहले महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा किए.

फिर उस से ऊपरके फ्लोर पर ही ओंकारेश्वर महादेव है तो दोनो उनकी पूजा किए. उस से ऊपरके फ्लोर पर चंद्र करेश्वर है वहाँ गये पूजा करने.

उसी प्रांगण में बड़े गणेश जी बिरजमान है तो दोनो फिर वहाँ गये उनका पूजा किए उनके पीछे पंचमुखी हनुमान जी है. उनका दर्शन कर वो दोनो आगे हर्सिद्धि देवीके मंदिर चले गये.

वहाँ पूजा करते वक्त लल्लू से एक ग़लती हो गई.

लक्ष्मी अपने साथ देवी पूजा के लिए सभी सामग्री लाई थी जिस में सिंदूर भी था. ग़लती से वो सिंदूर गिर गया लल्लू से वो भी लक्ष्मी में सर में.

लल्लू के हाथ में पूजा का समान था. वो समान पकड़े खड़ा था और लक्ष्मी बैठ कर पूजा कर रही थी. लक्ष्मी पूजा कर के जैसे ही खड़ी होने लगी. लक्ष्मी का सर लल्लू के हाथ में लग गया और बाकी कुछ नही गिरा बस सिंदूर ही गिर कर लक्ष्मी पर फैल गया. वहाँ जो पंडा खड़े थे वो जय घोष करने लगे ये देख कर. फिर जबरन दोनो को फिर से जोड़े में पूजा करवा कर दुबारा लल्लू से लक्ष्मी का माँग उन लोगो ने हर्सिद्धि देवी पर चढ़े सिंदूर से करवा दी.

लक्ष्मी और लल्लू दोनो हतप्रत से रह गये.

किसी के कुछ समझ नही आया और ये कांड हो गया.

फिर दोनो वहाँ से मूह लटकाए उस मंदिर में स्थापित और देवी जैसे मा कालिका, लक्ष्मी सरस्वती इन सब की पूजा कर वापस अपने होटेल आ गये. बाकी जगह गये ही नही पूजा करने.

होटेल आ कर लक्ष्मी फुट फुट कर रोने लगी.

लल्लू कुछ कर भी नही सकता था.

लल्लू उठ कर लक्ष्मी के सामने कान पकड़ कर खड़ा हो गया.

लल्लू- मुझे माफ़ कर दो. ये सब मेरे ग़लती का नतीजा है. ना में तुम्हे वहाँ चलने को कहता ना ये सब होता.

में तुम्हारा गुनहगार हूँ. तुम जो भी सज़ा मुझे देना चाहो दे सकती हो. में अफ तक नही कहूँगा.

लक्ष्मी- में अपने पति को क्या सज़ा दूँगी. अब ये सब तो माता रानीके आशीर्वाद से ही हुआ है. अब तो आप ही मेरे पति है. अब आप जो भी कहेंगे, जैसे भी मुझे रखेंगे. में रहने को तैयार हूँ.

लल्लू- लल्लू तो ये सब सुनना तो उसके कान से धुआ निकलने लगा.

क्या सोचा था और क्या हो गया.

लल्लू चुप चाप जा कर अपने बेड पर बैठ गया

फिर लल्लू उठ कर पहले खाने का ऑर्डर कर दिया.

खाना पीना करने के बाद लल्लू लक्ष्मी को ले कर बाज़ार गया.

वहाँ लल्लू ने लक्ष्मी और अपने लिए कपड़े खरीदे.

फिर वही ट्रायल रूम में जा कर दोनो नये कपड़े पहन लिए.

लल्लू- लक्ष्मी जी अब आप मुझे अपने घर की ओर ले चलिए.

हम दूर से ही आज आपके घर को देखेंगे. अगर आप का चाचा और चाचा का लड़का दिखे तो उसे भी मुझे दिखा दीजिए.

फिर लक्ष्मी डरती हुई लल्लू को ले कर अपने घर को चल दी.

वहाँ पहुच कर लक्ष्मी दूर से ही अपना घर दिखा दिया लल्लू को.

बहुत आलीशान मकान था ये. घर के बाहर अभी कोई नही था.

थोड़ी देर वहाँ आस पास का कार से ही चक्कर लगा कर लल्लू गाड़ी वापस ले लिया. तभी लक्ष्मी किसी को देख कर छिपने लगी.

लल्लू- क्या हुआ लक्ष्मी जी. किस को देख कर छिप रही है आप.

लक्ष्मी- ये सामने की दुकान पर जो दो लोग खड़े है ये मेरे चाचा और उनका लड़का है.

लल्लू दोनो को अच्छी तरह देख कर गाड़ी वापस होटेल की ओर घुमा लिया.
 
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