सुगंधा की जवानी बेलगाम होती जा रही थी सुगंधा का उसके मन पर और उसके तन पर,,, बिल्कुल भी काबू नहीं रह गया था तीन प्रतिदिन उसकी इच्छा अपने बेटे के सामने अपने अंगों का प्रदर्शन करने की बढ़ती जा रही थी जिसके चलते वह दो बार इस तरह की हरकत को अंजाम दे चुकी थी और दोनों बार खुद तो पानी पानी हुई थी अपने बेटे को भी उत्तेजित कर चुकी थी एक तो किचन में बालों के लटो को ठीक करवाते समय और दूसरी बार सर दर्द का बहाना देकर सर की मालिश करवाते समय वह अपनी भारी भरकम खरबूजे जैसी चुचियों का प्रदर्शन कर चुकी थी जिसके चलते वह अपने बेटे की उत्तेजना को ठीक अपने सर पर महसूस कर चुकी थी,,, और यह एहसास कर चुकी थी कि उसके बेटे का लंड बेहद दमदार है,,, जिसके चलते हैं वहां मालिश करवाने के बाद तुरंत बाथरूम में नहाने के बहाने चली गई थी और वहां अपनी उंगली का सहारा लेकर अपनी मलाई को अपनी बुर में से बाहर निकाल दी थी,,,।
अपनी मां की मस्त-मस्त कर देने वाली चूचियों को देखकर और अपने लंड को उसके सर पर महसूस करके अंकित उत्तेजना के परम शिखर पर पहुंच चुका था वह इतना ज्यादा उत्तेजना अपने बदन में महसूस कर रहा था कि उसके लंड में दर्द होने लगा था हालांकि इस समस्या से निजात पाने के लिए उसे हस्तमैथुन करना नहीं आता था और ना ही इस बारे में वह जानता था अगर जानता तो अब तक न जाने कितनी बार अपने हाथ से हिलाकर वह अपने लंड के दर्द से छुटकारा पा लिया होता,,,।
अपनी मां की खूबसूरत चूचियों की प्रति उसका आकर्षण बढ़ता जा रहा था और उसे इस बात का एहसास भी होने लगा था कि वाकई में उसकी मां बहुत ज्यादा खूबसूरत है लेकिन फिर भी इस तरह के ख्याल बने आते ही वह अपनी भावनाओं को अपने मन में दबाकर इन खयालों से अपने ध्यान को दूसरी तरफ करने की कोशिश करता था लेकिन नाकाम हो जाता था,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी मां को किस नजरिए से देखें क्योंकि अब तो वह चोर नजरों से अपनी मां की तरफ देखने लगा था उसकी खूबसूरती के रस को अपनी आंखों से पीने लगा था उसके नितंबों के घेराव और कसावपन को देख कर अंदर ही अंदर मस्त होने लगा था,,,। इन सबके बावजूद भी वह इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि जो कुछ भी वह कर रहा है वह गलत है क्योंकि उसे ऐसा लग रहा था कि जो कुछ भी हो रहा है वह अनजाने में हो रहा है उसकी मां जानबूझकर अपनी छाती पर से साड़ी के पल्लू को थोड़ी हटाई थी उसे यह थोड़ी मालूम था की छाती पर से साड़ी का पल्लू है जाने पर मैं उसे घूर-घूर कर देखूंगा या फिर बालों को ठीक करते समय मेरी नजर उसकी छाती पर चली जाएगी यह सब तो अनजाने में हो रहा था और इस बात का दोष वह अपने ही आपको दे रहा था कि उसकी नजर में ही गड़बड़ है,,,, उसके खुद के देखने का नजरिया बदल गया है जिससे वह निजात पाना जाता था,,,, और इस समस्या से निजात पाने के लिए वह अपने मन में अपनी ही मां की कसम खाकर आइंदा इस तरह से वह कभी अपनी मां को नहीं देखेगा,,,, ऐसा मन में कसम लेकर वह सहज होने की कोशिश करने लगा,,, और धीरे-धीरे इसमें कामयाब भी होने लगा,,,।
लेकिन दूसरी तरफ सुगंधा की बुर की खुजली बढ़ती जा रही थी,,,, उसकी हालत जल बिन मछली की तरह हो रही थी,,,, वह अपनी जवानी की आग बुझाने में नाकाम साबित हो रही थी अगर उसकी जगह कोई और औरत होती तो शायद अब तक किसी मर्द का सहारा लेकर अपनी बुर की प्यास को बुझा ली होती लेकिन सुगंधा दूसरी औरतों की तरह बिल्कुल भी नहीं थी एक औरत होने के साथ-साथ वह एक शिक्षिका भी थी और उसे अपनी इज्जत मान मर्यादा का अच्छी तरह से भान था,,,, इतना तो वह जानती ही थी कि उसकी प्यास बुझाने वाला उसके घर में ही मौजूद है लेकिन कैसे इस बात को वो भी नहीं जानती थी लेकिन इतना विश्वास था कि एक ना एक दिन लह जरुर कामयाबी हासिल करेगी,,, इसीलिए वह अपने प्रयास में लगी हुई थी,,,।
दूसरी तरफ सुमन अपने गोल-गोल नितंबों पर अंकित के मोटे तगड़े तंबू का चुभन महसूस करके मदहोश हो चुकी थी तृप्ति और सुमन की उम्र एक जैसी ही थी लेकिन जहां एक तरफ तृप्ति मर्यादा में रहती थी वहीं दूसरी तरफ सुमन अपनी जवानी की आग को संभाल नहीं पा रही थी इसीलिए वह दो-तीन लड़कों के साथ शारीरिक संबंध भी बन चुकी थी और उन लड़कों के साथ बनाए संबंध के अनुभव के जरिए ही उसे इस बात का एहसास हुआ था कि अंकित का लंड बेहद दमदार है,,,,,,, अंकित को ऐसा लगता था कि सुमन के कमरे के दरवाजे पर जब वह खड़ा था तो सुमन को इस बात का अहसास तक नहीं था बल्कि सुमन अलमारी के आईने में सब कुछ देख चुकी थी और इसीलिए जानबूझकर ही अपने तौलियों को नीचे गिराकर एकदम नग्न अवस्था में हो चुकी थी,,, अंकित के चेहरे के भाव को पढ़कर वह अंदर ही अंदर बहुत प्रसन्न भी हो रही थी और जिस तरह से रसोई में आकर वह नीचे झुकी थी और उसकी गांड पर अंकित का लंड एकदम से ठोकर खा गया था उसे अभी तक वह अपनी गांड पर महसूस कर पा रही थी जिसके चलते उसकी बुर से पानी निकल जाता था,,, वैसे तो सुमन भी अंकित से ज्यादा बातचीत नहीं करती थी कभी कभार ही आमने-सामने आ जाने पर बातचीत हो जाती थी लेकिन अब ऐसा लग रहा था कि सुमन के मन में कुछ और चलने लगा था,,,, वह भी मौका देखकर अंकित पर अपनी जवानी के डोरे डालने के लिए तैयार हो चुकी थी,,,।
ऐसे ही सभी लोग अपने-अपने तरीके से लगे हुए थे देखते ही देखते दिन गुजर रहे थे लेकिन कोई भी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पा रहा था,,, तनख्वाह का दिन था,,, तनख्वाह लेकर शाम को लौटते समय सुगंधा सब्जी मार्केट में सब्जी और बच्चों के लिए नाश्ता लेने के लिए चली गई,,,, घर पर सब्जी बनाने के लिए करेला कद्दू और पटर खरीद चुकी थी,,, लेकिन तभी उसकी नजर बैगन पर गई जो की काफी लंबे और मोटे थे,,,, बैगन पर नजर पढ़ते ही और उसकी लंबाई और मोटाई को देखकर सबसे पहले सुगंधा के मन में अपने बेटे के दोनों टांगों के बीच लटकते हुए लंड का ख्याल आ गया,,,, और उसके बदन में सुरसुराहट सी दौड़ने लगी वैसे उसे बैगन नहीं खरीदना था लेकिन उसकी लंबाई और मोटाई उसे अपनी तरफ आकर्षित कर रही थी,,, और वह उसे ठेले के पास जाने से अपने आप को रोक नहीं पाई और हाथ में थैला लिए वह उस ठेले के पास पहुंच गई,,,।
ठेले पर पहुंचते ही उसने एक मोटे तगड़े लंबे बैगन को अपने हाथ में उठाकर उसे गोल-गोल घुमा कर देखने लगी और उसकी इस प्रक्रिया का उसके चेहरे पर अद्भुत प्रभाव पड़ रहा था ऐसा लग रहा था कि मानो जैसे वहां बैगन को नहीं बल्कि अपने ही बेटे के लंड को अपने हाथ में लेकर खेल रही हो,,,,, वह उसे बैगन को लेकर कल्पना की दुनिया में इतना खो गई कि उसे इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि वह कब अपने एक हाथ की उंगली और अंगूठे को मिलकर उसका गोल छल्ला बना ली और उसे गोल छल्ले में से उसे बैगन को अंदर प्रवेश करा कर दो-तीन बार उसे अपने हाथ के गले में से अंदर बाहर करने लगी और उसकी यह हरकत ठेले वाले ने देख लिया और एकदम से मुस्कुराते हुए अपने चेहरे पर अश्लील भाव लाते हुए बोला,,,।
बहुत मोटा और लंबा है मैडम जी बहुत मजा आएगा,,,
(उसे ठेले वाले की बात सुनते ही सुगंधा को जैसे एकदम से होश आया हो वह एकदम से हड़बड़ा कर उस ठेले वाले की तरफ देखने लगी,,, और अपने दोनों हाथ की तरफ देखी तो एकदम शर्म से पानी पानी हो गई क्योंकि उसका एक हाथ में अभी भी उंगली और अंगूठे को सटकर गोल छल्ला बना हुआ था और उसके बीचो-बीच तक बैगन घुसा हुआ था मानों जैसे किसी औरत की बुर में लंड घुसा हो,,,, अपनी स्थिति का भान होते ही सुगंधा एकदम शर्म से पानी पानी होते हुए अपने चारों तरफ देखने लगी लेकिन उसकी किस्मत अच्छी थी कि उसे समय उस ठेले पर सिवाय ठेले वाले के ओर कोई नहीं था,,,,)
कककककक,,, कैसे दिए बैगन,,,,(हड़बड़ाहट और घबराहट भरे स्वर में सुगंधा बोली,,,)
अब आपसे क्या मेलजोल करना मैडम₹15 किलो है,,,, तुम 10 रुपया दे देना,,,,,,(कुटिल मुस्कान अपने चेहरे पर लाते हुए वह ठेला वाला बोला,,, सुगंधा को अपने मन में उस पर बहुत गुस्सा आ रहा था लेकिन इस समय एकदम लाचार नजर आ रही थी क्योंकि उसकी हरकत को वह अपनी आंखों से देख लिया था,, इसलिए उसकी बात सुनकर वह धीरे से बोली,,,)
ठीक है 1 किलो कर दो,,,(और इतना कहने के साथ ही सुगंधा बैगन को अपने हाथों से बिन कर निकालने लगी तभी वह ठेला वाला खुद बैगन के देर में से नीचे से एक मोटा तगड़ा और लंबा बैगन निकाल कर सुगंधा की तरफ दिखाते हुए बोला,,,)
यह वाला दीजिए मैडम तुम्हारे लिए एकदम फिट बैठेगा ,,,,,
(उसे ठेले वाले की बात सुनकर सुगंधा गुस्से से लाल पीली हुई जा रही थी लेकिन उसे कुछ कहने की उसमें हिम्मत बिल्कुल भी नहीं थी,,, सुगंधा उसे ठेले वाले के खाने के मतलब को एकदम सीधा,, समझ रही थी वह जानती थी कि वह किस सुर में बात कर रहा है,,, इसलिए सुगंधा उसे ठेले वाले की बात काटते हुए बोली,,,,)
कोई जरूरत नहीं है मैं ले रही हूं ना,,,
मैं तो तुम्हारी मदद कर रहा था मैडम इसे ले लेती तो और अच्छा होता तुम्हारे लिए ही अच्छा होता है एकदम मेरी तरह है,,,
क्या मतलब,,,!(एकदम गुस्से से उस ठेले वाले को आंख दिखाते हुए बोली,,,)
कुछ नहीं मैडम जी मैं तो अच्छा देख कर दे रहा था,,,
कोई जरूरत नहीं है मैं ले लूंगी,,,
कोई बात नहीं मैडम जैसी आपकी मर्जी आपका समान है जैसा ठीक लगे वैसा ही लेना,,,(वह ठेले वाला एकदम धीमे स्वर में बोला तो सुगंधा फिर से गुस्से से उसकी तरफ देखते हुए बोली क्योंकि भले ही वह धीरे से बोला था लेकिन सुगंधा ने उसकी बात को सुन ली थी,,,)
क्या बड़बड़ा रहे हो शांति से बैठ नहीं सकते क्या,,!
ठीक है मैडम मैं कुछ कहां बोल रहा हूं,,,, और जल्दी करिए दूसरे ग्राहक को भी आने दीजिए,,,।
मैं रोक कर रखी हूं क्या,,,,
(इतना कहते हुए सुगंधा बैगन को तराजू में रखने लगी जब थोड़ा बहुत बैगन किलो में कम पड़ने लगा तो वह ठेले वाला इस बेगन को वापस तराजू में डाल दिया जिसे वह खुद चुनकर निकाला था इस बार सुगंधा इनकार नहीं कर पाई क्योंकि सुगंधा की नजरों ने उसे बैंगन की मोटाई और लंबाई को भांप ली थी,,, और बैगन को अपने थैले में लेकर वह अपने पर्स में से 10 का नोट निकाल कर उस ठेले वालों को थमा दी,,, और वहां से चलने लगी लेकिन उसे ठेले वाले से रहा नहीं गया और अपने मन की बात अपने होठों पर लाते हुए धीरे से बोला,,,)
ससहहह हाय क्या मस्त गांड है इसकी मिल जाती तो उसकी बुर में बेगन नहीं मैं अपना लंड डालकर चोदता,,,, ।
(उसके धीरे से कहीं हुई बात को सुगंधा सुन ली थी और अंदर ही अंदर बहुत क्रोधी भी हो रही थी लेकिन मुड़कर जवाब देने की हिम्मत उसमें बिल्कुल भी नहीं थी क्योंकि वह जानती थी कि ऐसे लोग से मुंह लगने का मतलब है कि अपनी ही इज्जत खराब करना ,, लेकिन इस बात से उसके बदन में सिहरन सी दौड़ गई थी कि वह खुले शब्दों में उसे चोदने की बात कर रहा था और उसे इस बात का मलाल था कि सड़क पर चलते हुए जितने भी मर्दों की नजर उसके खूबसूरत बदन पर उसकी चूचियों पर उसकी बड़ी-बड़ी गांड पर जाती थी वह लोग उसे चोदने का मन बना लेते थे और मन ही मन में उसके बारे में गंदे ख्याल भी करके मस्त हो जाते थे लेकिन एक उसका लड़का ही था जो घर में साथ होने के बावजूद भी उसके मन की बात को समझ नहीं पा रहा था,,,।
सुगंधा को उसे ठेले वाले की बात पर गुस्सा भी आ रहा था और हंसी भी आ रही थी साथ में उत्तेजना का अनुभव भी हो रहा था और अपने आप को वह दोषी भी ठहरा रही थी क्योंकि उसकी हरकत की वजह से ही उसे इतनी हिम्मत हुई थी बोलने की,,, सुगंधा अपने आप से ही बात करते हुए बोली मैं भी कितनी बुद्धू हूं कहीं भी कल्पना करने लगती हूं बैगन को देखते ही मुझे मेरे बेटे का लंड याद आने लगा भले ही मैं उसे देखी नहीं हूं लेकिन पेंट में जिस तरह का तंबू बना होता है उसे समझ में तो आता ही है कि कितना बड़ा और मोटा होगा,,,। बाप रे में कभी सोच भी नहीं सकती थी कि मैं इस तरह की हरकत करूंगी कैसे अपने हाथ का गोल छल्ला बनाकर उसमें बैगन डाल रही थी निकल रही थी ऐसा लग रहा था कि जैसे बुर में लंड घुस रहा हो,,,, अपने आप से ही इस तरह की मन में बात करते हुए सुगंधा के बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगी और उसकी बुर गीली होने लगी,,,,,।
अपनी उलझन में से बाहर निकलने की कोशिश करते हुए वह सब्जी मार्केट में ही स्थित एक समोसे और जलेबी नाश्ते की दुकान पर पहुंच गई और वहां पर गरमा गरम समोसे के साथ-साथ जलेबी भी पैक करवाने लगी कि तभी उसकी नजर उसे समोसे की दुकान के ठीक सामने ठेले पर गई,,, वहां पर एक औरत खड़ी थी जिसे पीछे से भी वह पहचान गई थी वह उसकी सा अध्यापिका नूपुर थी,,, वह कोई सब्जी खरीद रही थी,, नूपुर को देखते ही सुगंधा के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव नजर आने लगे वह उससे मिलना चाहती थी उसे वह आवाज देने ही वाली थी कि उसके पास में खड़ा एक जवान लड़का जो कि अंकित की उम्र का था उसकी हरकत से वह एकदम से चौंक गई उसे लड़के ने अपनी हथेली को नूपुर के गोलाकार नितंबों पर रखकर ऊपर से ही हौले हौले से सहलाने लगा,,, इस दृश्य को देखकर तो उसकी हालत खराब हो गई सुगंधा को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें सब्जी मार्केट के अंदर वह जवान लड़का,,, बेफिक्र होकर नूपुर की गांड पर अपना हाथ रखकर मजे लेता था वह जल्दबाजी में उसकी तरफ जाना चाहती थी लेकिन तभी उसकी आंखों ने जो देखा उसे अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हो रहा था,,, उस जवान लड़के से नूपुर हंस हंस के बातें कर रही थी जबकि बातें करते समय भी उसे लड़के का हाथ नूपुर की गांड पर था,,,, यह नजारा सुगंधा को हैरान कर देने वाला था,,,।
जिस तरह से दोनों हंस हंस के बातें कर रहे थे उसे देखकर सुगंधा समझ गई थी कि दोनों एक दूसरे को जानते हैं लेकिन वह लड़का नूपुर का क्या लगता है यह नहीं मालूम पड़ रहा था,,,। उसे नजारे को देखकर सुगंधा के तन बदन में आग लगने लगी थी उत्तेजना के लहर रखने लगी थी उसकी बुर से पानी निकलना शुरू हो गया था क्योंकि जब वह लड़का नूपुर के साथ इस तरह की हरकत कर सकता है तो वह जरूर उसके साथ हम बिस्तर भी होता होगा उसे मजा देता होगा यह ख्याल उसके मन में आते ही उसके पति का ख्याल आने लगा जो की नूपुर से कई ज्यादा उम्र का था और उसकी उम्र को देखते हुए और नूपुर की जवानी से भरी हुई किया को देखकर सुगंधा अपने मन में तर्क लग रही थी कि जरूर वह अपने पति से बिल्कुल भी खुश नहीं होती होगी इसीलिए तो जवान लड़के से मजा ले रही है,,,,।
सुगंधा का नाश्ता तैयार हो चुका था वह दुकानदार से समोसे और जलेबी या लेकर ठेले में डाल चुकी थी लेकिन वह उसी दुकान पर खड़ी होकर सबसे नजर बचाकर नूपुर की तरफ ही देख रही थी और उसके साथ जो लड़का था वह भी,, बहुत चालाक नजर आ रहा था और वैसे भी वह ठेला भी बड़े से घने पेड़ के नीचे था और शाम का वक्त होने पर धीरे-धीरे अंधेरा भी हो रहा था जब कोई उधर से गुजरता था तो वह लड़का नूपुर की गांड पर से अपने हाथ को हटा दे रहा था नूपुर को भी उस लड़के की हरकत से बहुत मजा आ रहा था और जैसे ही वहां कोई नहीं रहता था फिर से वह उसकी गांड को अपने हाथों से दबाना शुरू कर देता था यह सब अपनी आंखों से देख कर सुगंधा की बुर कचोरी की तरह फूल गई थी,,,,।
सुगंधा तब तक वहां खड़ी रही जब तक कि नूपुर वहां से चली नहीं गई उस जवान लड़के के साथ सुगंधा का मन तो बहुत हो रहा था कि वह जाकर नूपुर से पूछे कि वह लड़का कौन है लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी और वह अपने मन में ही तर्क लगाने लगी थी कि वह लड़का कौन होगा हो सकता है उसका प्रेमी हो या फिर भतीजा हो या फिर कोई रिश्तेदार हो जिसके साथ नुपुर इतना घुल मिल गई है,,,। लेकिन पल भर में ही वह इतना समझ गई कि भले ही वह अपने पति से खुश नहीं है लेकिन उसकी किस्मत से ज्यादा अच्छी है क्योंकि उसकी प्यास बुझाने वाला एक जवान लड़का उसके पास जो है ,, यहां तो हर रात करवट बदल कर ही गुजरती है,,,, नूपुर उसे लड़की के साथ जा चुकी थी और नूपुर उसे लड़के के साथ बहुत खुश भी नजर आ रही थी वरना उसके चेहरे पर हमेशा उदासी छाई रहती थी सुगंधा भी वहां से अपने घर की तरफ निकल गई,,,।
रात को सब काम से निपट करवा अपने कमरे में गई और ठेले में से लाए हुए उस मोटे तगड़े बैगन को जिसे वह अपने पलंग के नीचे छीपा दी थी उसे धीरे से निकाली और उसे हाथ में लेकर चारों तरफ घूम कर देखने लगी वाकई में उसका आकार एक मोटे तगड़े जानदार लंड से काम नहीं था जिसे देखकर ही उसकी बुर से पानी बहना शुरू हो गया,,,, देखते ही देखते सुगंधा अपने बदन पर से अपनी साड़ी कपड़े उतार कर एकदम नंगी हो गई और अपनी दोनों टांगों को खोलकर वह उसे बैगन के गोल वाले मोटे भाग को अपनी बुर पर रखकर उसे अंदर डालने की कोशिश करने लगी और थोड़ी देर में उसे समझ में आ गया कि उसकी बुर के छेद से बैगन के आगे वाला भाग कुछ ज्यादा मोटा था इस बात को समझते ही वह और ज्यादा उत्तेजित हो गई और जल्दी से अपनी बिस्तर पर से उठकर वहां अलमारी के पास के टेबल के पास गई जहां पर सरसों के तेल की सीसी रखी हुई थी और वह उसमें से तेल को अपनी हथेली में गिराकर वापस सीसी को वही रखती और फिर उसे सरसों के तेल को बैगन पर अच्छी तरह से लगने लगी खास करके आगे वाले भाग पर ताकि चिकनाहट पाकर वह आराम से उसकी बुर में घुस सके,,,।
थोड़ी ही देर में सुगंध तैयार थी उसे बैंगन को अपनी बुर में डालने के लिए आज उसकी उत्तेजना कुछ ज्यादा ही बढ़ चुकी थी क्योंकि उसके मन में सब्जी मार्केट का वही दृश्य याद आ रहा था जब वह जवान लड़का नूपुर की गांड को जोर-जोर से दबा रहा था,,, लेकिन आज उसकी कल्पना में उसका जवान बेटा नहीं बल्कि नूपुर थी और वह जवान लड़का था वह अपने मन में यही सोच रही थी कि वह जवान लड़का कैसे नूपुर के साथ हम बिस्तर होता होगा कैसे उसे चोदता होगा वह अपनी आंखों को बंद करके कल्पना कर रही थी कि वह जवान लड़का नूपुर को अपनी बाहों में लेकर उसके लाल लाल होठों को चुसता हुआ उसे बिस्तर पर लेटा देता होगा और फिर धीरे-धीरे उसके कपड़े उतार कर उसे पूरी तरह से नंगी कर देता होगा,,, और नूपुर भी उसे अपनी छाती से लगाकर उसे अपना दूध पिलाती होगी अपने हाथों से उसकी पेंट उतार कर उसके लंड को मुंह में लेकर चूस रही होगी,,,,।
और धीरे-धीरे वह जवान लड़का नूपुर की दोनों टांगों को खोलकर कुछ देर तक उसकी गुलाबी बुर को अपने होठों से लगाकर चाटता होगा और फिर दोनों टांगों को खोलकर अपने मोटे तगड़े लड को नूपुर की बुर में डालकर उसकी जा की चुदाई करता होगा,,, यही सब कल्पना करते हुए वह मोटा तगड़ा बैगन का उसकी बुर में घुस गया और अंदर बाहर होने लगा उसे खुद को नहीं पता चला लेकिन वह काफी उत्तेजित थी इसलिए जल्द ही उसकी बुर से मदन रस का तेज फवारा फूट पड़ा और वह शांत होकर नग्न अवस्था में ही सो गई,,,।
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