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Incest कैसे कैसे परिवार

पहला घर: अदिति और अजीत बजाज.

अध्याय १.३

भाग ३

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गोकुल: “चिंता न कर मैं जल्दी ही लौट आऊंगा.”

दोनों एक दूसरे की बाँहों में खोये हुए कुछ देर में सो गए.

अब आगे..

एक नया दिन

अगला दिन सबके लिए एक नयी तरंग लाया था. शालिनी की गांड की खुजली मिटी या बढ़ी ये कहना अभी संभव नहीं था. परन्तु ये निश्चित था कि गौरव को उसकी गांड की यात्रा के अब अनगिनत अवसर मिलने थे. गौरव शालिनी के कमरे से बाहर आया तो सामने उसे अनन्या अपने कमरे में जाती हुई दिखी. अनन्या भी उसे देखकर ठहर गई.

दोनों भाई बहन एक दूसरे को देखते रहे फिर लगभग एक ही साथ पूछ पड़े, “कैसी रही रात?

गौतम: “अकल्पनीय, दादी में आज भी वही मादकता और भूख है जो उनकी जवानी में रही होगी. हालाँकि कल उन्होंने कुछ कोमल चुदाई की इच्छा की थी, पर मुझे लगता है कि आगे से ऐसा कम ही होगा. तुम्हारा कैसा रहा?”

अनन्या: “मॉम तो सो गयी थीं जल्दी ही, ये दवाइयाँ सच में उन्हें बहुत सुस्त बना रही हैं. पापा उन्हें कल डॉक्टर के पास ले जायेंगे. कह तो रही हैं कि अब वे अंदर से ठीक अनुभव कर रही हैं और आशा कर रही हैं कि डॉक्टर उन्हें चुदाई की आज्ञा दे देंगे. वैसे कल उन्होंने और पापा ने मुझे चूत चाटना भी सिखाया. और मुझे अच्छा भी लगा. मुझे लगता है कि ये भी अब हमारे सामान्य जीवन का अंग बन जायेगा. फिर पापा ने मुझे फिर उतने ही प्यार से चोदा। मेरा मन तो नहीं भरा पर ये समझना होगा कि वे मुझे धीरे धीरे आगे ले जाना चाहते हैं. अब मैं तुम्हारे जितनी अनुभवी तो हूँ नहीं.”

गौतम: “तुम अधिक भाग्यशाली हो जो कि हर गुर अपनों से ही सीखोगी। मुझे जिन्होंने सिखाया है, उसमे केवल वासना और व्यभिचार था. प्रेम का एक अंश भी नहीं था.”

अनन्या: “ये सच है. चलाओ नहा धोकर मिलते हैं.”

उधर अजीत और अदिति भी तैयार होकर बैठक में पहुँचते हैं. अदिति चाय बनती है और अजीत पेपर पढ़ते हुए टीवी चलकर अदिति के साथ चाय पीता है.

गोकुल का सामान लगा हुआ था. उसकी नौ बजे की बस थी और उसे जल्दी ही निकलना था. गोकुल और राधा तड़के सुबह ही उठकर एक बार और चुदाई कर चुके थे. गोकुल और राधा बंगले में गए और गोकुल को अजीत ने बुलाकर एक लिफाफा दिया.

अजीत: “इसमें मैंने दस हजार रूपये रखे हैं. अगर तुम्हें रहने का प्रबंध ठीक न लगे तो अपने मन का प्रबंध कर लेना. हालाँकि, मुझे नहीं लगता कि इसकी आवश्यकता पड़ेगी. ये पूरा तुम्हारा है, खर्चो या बचाओ, मुझे लौटना मत. अगर उन्हें तुम्हारा काम पसंद आया तो सम्भव है कि आगे भी बुलाएँ और इससे तुम्हारी कमाई बढ़ेगी. वो जो देंगे, यहाँ के वेतन के अतिरिक्त होगा. अब जाओ और अच्छे से रहना.”

गोकुल ने अजीत और अदिति के पाँव चुकार आशीर्वाद लिया और फिर राधा के साथ बाहर चला गया.

अजीत: “रुको दो मिनट, मैं गौतम को कहता हूँ, तुम्हें छोड़ आएगा.” ये कहकर अजीत ने गौतम को फोन लगाया.

गोकुल: “इसकी कोई आवश्यकता नहीं, बाबूजी.”

अजीत: “कोई बात नहीं. बस दो मिनट रुको, गौतम आ ही गया.”

गौतम आया और कार की चाभी लेकर राधा और गोकुल के साथ चला गया. आधे घंटे में वो राधा के साथ लौट आया. अदिति ने राधा के चेहरे पर आंसुओं की दाग देखे तो उसे पास बुलाकर अपने गले से लगा लिया.

“चिंता न कर, इनके अच्छे मित्र हैं, गोकुल को अपने जैसे ही रखेंगे. और तेरा ध्यान हम सब रखेंगे. १० ही तो दिन हैं, यूँ निकल जायेंगे. और जैसा माँ जी ने कहा है, तुझे अकेले नहीं रहना है, उनके साथ ही रहना है. समझी? अब दुखी मत हो और मुंह धोकर खुश हो जा कि गोकुल को इतने महत्वपूर्ण कार्य के लिए चुना गया है.”

राधा बाथरूम में गयी और फिर बाहर निकलकर किचन में चली गयी.

अदिति ने उसे देखा तो बोल पड़ी, “यहाँ क्या करने आयी है. माँ जी तेरी राह देख रही होंगी.”

राधा के मन में तितलियाँ उड़ने लगीं. अब उसे पता तो था ही कल रात क्या हुआ था, सो वो उत्तेजित मन और पैरों से शालिनी के कमरे में चली गई. अब चूँकि घर में पूर्ण उन्मुक्त वातावरण बन ही चुका था तो शालिनी ने कोई कपड़ा नहीं डाला था और वो भी राधा की ही प्रतीक्षा कर रही थी. राधा के ध्यान के बिना भी उसे उपयुक्त प्रेम मिल रहा था, पर आज ये राधा को उस राह पर ले जाने के लिए आवश्यक था जिससे उसका लौटना असम्भव हो.

“बड़ी देर कर दी आने में आज, क्या कर रही थी?”

“माँ जी, इन्हें बस अड्डे तक छोड़ने गई थी. इसीलिए.”

“ये अच्छा किया. कुछ सुबह भी किया गोकुल के साथ या बेचारे को यूँ ही सूखा भेज दिया?”

राधा शर्मा गई.

“एक बाद चुदाई करके गए हैं.”

“ये ठीक किया, अब उसका तो उपवास आरम्भ हो गया. पर तेरी दावत होने वाली है हर रात।”

राधा फिर से शर्मायी पर उसका मन ख़ुशी से उछलने लगा.”

शालिनी ने अपने पांव फैलाये और उसे अपनी चूत दिखाकर बोली, “बड़ी देर से ये तेरी ही राह देख रही है. अब देर न कर, फिर मुझे भी नीचे जाना है.”

राधा ने शालिनी के पांवों के बीच अपना स्थान लिया और उसकी चूत में अपना मुंह डालकर चाटने में व्यस्त हो गयी.

“आज तेरे लिए मैंने अपनी गांड में कुछ बचाकर रखा है. उसका ही स्वाद ले ले.”

राधा जानती थी कि वो गौतम के रस के बारे में कह रही हैं. पर उसने अनिभिज्ञता दर्शाई और अपना मुंह शालिनी की गांड में डालकर चूसने लगी. गौतम के वीर्य का पान करके उसे एक विशिष्ट उत्तेजना हुई. गोकुल ने कभी उसकी गांड को छुआ भी नहीं था. पर उसे शालिनी की गांड में से निकले रस का स्वाद कुछ ऐसा भय कि उसने तय किया कि वो अपनी गांड में से भी इसका स्वाद लेगी.

“कैसा लग रहा है ये नया स्वाद?” शालिनी ने छेड़ते हुए पूछा.

“बहुत अच्छा लग रहा है माँ जी. क्या है ये?”

“मेरे पोते का रस. कल रात में गौतम ने मेरी गांड मारी थी और तेरे लिए मैंने उसका रस संभलकर रखा था. कैसा लगा?”

राधा कुछ नहीं बोली.

“मैं सोच रही थी कि तुझे भी ये रस पिलाऊँ, पर इस बार तेरी गांड से निकालकर। और ये तो कुछ बासी सा है, जब ताज़ा पीयेगी तो इसकी दीवानी हो जाएगी.” शालिनी बोलती रही.

“माँ जी, क्या आपने भी ये पिया है कभी? “

“बिलकुल, जब अजीत मेरी गांड मारता था तो मैं अपनी गांड से निकाल कर पीती थी. कुछ कठिनाई होती है, पर हो जाता है. अब जब तू करेगी तब जानेगी.”

राधा ने शालिनी की गांड को पूरा साफ कर दिया तो शालिनी ने उसे हटने को कहा.

“बाकी आज रात में करेंगे. तू आज से मेरे ही साथ सोयेगी. चल अब नीचे भी जाना है.”

ये कहते हुए शालिनी उठी और कपड़े डालकर राधा को लेकर किचन में चली गयी.

अदिति ने राधा को छेड़ते हुए पूछा, “चाय पीयेगी या मुंह का स्वाद नहीं बदलना चाहती. कैसा लगा तुझे नया स्वाद?”

राधा शरमाते हुए बोली: “अच्छा लगा, दीदी.”

अदिति: “मेरे बेटे का था, तुझे पता है न?”

राधा: “जी. माँ जी ने बताया.”

अदिति कुछ गंभीर होकर: “देख राधा, तू इस घर में हमारे परिवार जैसी है, ये तुझे अच्छे से पता है. बच्चे तुझे मौसी और तू मुझे दीदी कहती है. तुझे हम सबकी कसम कभी ये बात बाहर नहीं जाये.”

राधा: “दीदी, मैं सुगंध कहती हूँ, कभी ऐसा नहीं होगा. पर मुझे इनके (गोकुल) के बारे में भी कुछ सोचना होगा. उन्हें अगर कुछ शक हुआ तो मैं कुछ भी नहीं कर पाऊंगी.”

अदिति: “इसके बारे में भी इन्होने (अजीत) ने कुछ सोचा हुआ है. दो तीन दिन रुक, फिर बताती हूँ, वो कुछ तय कर लें उसके बाद.”

राधा: “जी दीदी. पर उन्हें कोई परेशानी न हो.”

अदिति: “कैसी बात करती है, तेरा पति ही तो मेरा भी कुछ हुआ न? चिंता छोड़. सबके जाने का समय हो रहा है. हम बाद में भी बातें कर सकती हैं.”

तीनों महिलाएं अपने काम में व्यस्त हो गयीं. जब नाश्ता लगा तो राधा गौतम से आंख नहीं मिला पा रही थी.

गौतम: “मौसी, मुझसे कोई गलती हो गयी क्या? मुझसे नाराज़ लग रही हो.”

राधा हड़बड़ा गई: “नहीं नहीं, ऐसा कुछ नहीं. बस इनके बारे में सोच रही थी. कैसे रहेंगे इतने दिन मेरे बिना.”

अजीत: “मेरा अच्छा मित्र है जहां भेजा है और उसे कह भी दिया है कि मेरे परिवार का ही सदस्य है गोकुल. निश्चिन्त रह, वो मुझसे भी अधिक ध्यान रखेगा उसका.”

राधा ने सिर हिलाकर स्वीकृति दी और अपने काम में लग गयी.

अजीत ने गौतम और अनन्या को सम्बोधित करते हुए कहा: “देखो, मौसी का ध्यान रखना. उसे अकेलापन नहीं लगना चाहिए बिलकुल भी.”

दोनों बच्चों ने उन्हें विश्वास दिलाया और नाश्ता करके वे तीनों अपने अपने गंतव्य की ओर निकल गए.

शालिनी और अदिति के बीच आँखों से कुछ संकेत हुआ और वे मुस्कुराकर बैठक में चली गयीं.

बैठने के बाद शालिनी ने अदिति से पूछा, “क्या सोचा है अजीत ने?”

अदिति: “माँ जी, मुझे अभी बताया नहीं कुछ. पर ये जो काम दिलाया है, इसमें गोकुल को हर महीने १० दिन के लिए जाना होगा. पैसा भी उसे अच्छा मिलेगा. पर इससे अधिक कुछ भी नहीं बताया.”

शालिनी: “इसकी आज चुदाई तो हो ही जानी है. और फिर इसे लंड के बिना रहा नहीं जायेगा. गोकुल इसे पूरा संतुष्ट नहीं कर पाता है. पर मैं सोच रही थी कि क्यों न हम भी इसकी चूत का स्वाद लें?”

अदिति: “मुझे कोई आपत्ति नहीं. आज रात आप शुभारम्भ करो फिर मैं भी बाद में किसी दिन चख लूंगी।”

फिर दिनचर्या और अन्य बातों में समय निकल गया. दोपहर को अपने नियत कार्यक्रम के अनुसार अदिति और शालिनी ने एक दूसरे की चूत और गांड चाटी और कुछ देर के लिए सो गयीं. ५ बजे से परिवार के सदस्य लौटने लगे. और ७ बजे तक समय निकल गया जब अजीत लौटा. अजीत नहाने के बाद आया और उसके हाथ में अदिति ने ड्रिंक दी. शालिनी को भी एक ड्रिंक थमा दी गयी. बाहर की बातों में समय व्यतीत हो गया. अदिति ने बताया की समर्थ और जॉय के बच्चों का सम्बन्ध पक्का हो गया है और सगाई अगले महीने है. ये बात सुनकर सब अनन्या के विषय में सोचने लगे पर अजीत ने कहा कि अभी उसके विवाह की आयु नहीं है. अगर कोई विशेष ही बात हो जाये तो अलग, अन्यथा अगले वर्ष ही वो इस विषय में कुछ सोचेगा.

आठ बजे खाना खाने के समय राधा की ऑंखें अजीत से हट नहीं रही बार उसे अजीत का तना खड़ा हुआ मूसल जैसा लंड याद आ रहा था. अगर उसने गलत नहीं सोचा था तो आज की रात उसकी खुदाई होनी थी. शालिनी ये सब देखकर मन ही मन मुस्कुरा रही थी. खाने के बाद शालिनी ने राधा से कहा कि वो अपने कुछ कपड़े लेकर नौ बजे उसके कमरे में आ जाये. बार बार कपड़ों के लिए घर जाने की आवश्यकता नहीं होगी. उधर अदिति ने अनन्या को आज अपने ही कमरे में सोने को कहा क्योंकि उन्हें सुबह ही डॉक्टर के पास जाना था. चूँकि उनके डॉक्टर को कहीं जाना था तो उसने उन्हें सुबह जल्दी बुलाया था सात बजे तक. अनन्या मन मसोस कर अपने कमरे में चली गयी. शालिनी ने गौतम को बुलाया और उसे कुछ समझाया और उसे भी उसके कमरे में भेज दिया.

नौ बजने में देर नहीं लगी और राधा अपने हाथ में एक छोटा सा बैग लेकर शालिनी के कमरे में जा पहुंची

शालिनी ने उसे देखा तो बाँहों में ले लिया.

फिर पूछा, “ बड़ी अच्छी खुशबु आ रही है, नहा कर आयी है?”

राधा ने शर्माकर हामी भरी.

“ये अच्छा किया. अब आ जा. तेरे नए जीवन की नयी रात है. और अब जो तू मेरे साथ ही रहेगी कुछ दिन तो हम सखियों जैसे ही रहेंगी.”

राधा ने फिर केवल हामी ही भरी. उसका मन तेज गति से धड़क रहा था और वो देख रही थी कि अभी तक अजीत नहीं आये थे. तभी शालिनी ने उसका चेहरा ऊपर किया और उसके होंठ चूम लिए.

“जिसकी राह देख रही है, वो भी आएगा. पर कुछ ठहर कर. तब तक हम अपना खेल खेलते हैं. अब तू भी कपड़े उतार दे, देखूं तो सही कैसी लगती है नंगी होने के बाद.”

अब चूँकि राधा कभी शालिनी के सामने निर्वस्त्र नहीं हुई थी तो थोड़ी झिझकी.

शालिनी ने उसे समझाया, “जिस खेल जो खेलने वाली है, उसमे शर्म और झिझक का कोई स्थान नहीं होता. अगर इसका सुख लेना है, तो अपने आपको बिलकुल निर्लज्ज बनाकर खेल, नहीं तो न मन संतुष्ट होगा न ही तन.”

राधा भी समझ तो चुकी ही थी, सो वो कुछ ही देर में नंगी हो गयी. शालिनी ने उसे भरपूर दृष्टि से निहारा और उसने जो देखा वो सच में सुंदर था. हाँ राधा का रंग अवश्य थोड़ा सांवला था पर उसमे जो आकर्षण था वो कई गोरी स्त्रियों में भी नहीं होता. और तो और उसका शरीर बेहद सुडौल और भरा हुआ था. अंग प्रत्यंग बिलकुल सांचे में ढाले गए हों जैसे.

शालिनी: “अरे राधा, तू तो सच में बहुत सुन्दर है. क्यों छुपाती है अपनी ये सुंदरता?” ये कहते हुए शालिनी ने अपने भी वस्त्र उतारे और राधा को खींच कर उसके होंठ चूमने लगी. राधा के शरीर में मानो आग सी लग गयी. शालिनी उसे यूँ ही चूमते हुए बिस्तर पर ले गयी और उसे लिटा दिया.

शालिनी: “ हर दिन तू मेरी चूत चाटती है न, आज मुझे तेरा स्वाद लेने दे.”

ये कहते हुए उसने राधा के पांव फिलाये और अपना मुंह राधा की चूत में डाल दिया. राधा चिहुंक पड़ी. उसकी चूत में कभी किसी ने मुंह नहीं लगाया था. गोकुल हर बार उसे इसके लिए मना कर देता था. पर आज उसे इसका भी अनुभव होना निश्चित था. उसने अपना शरीर ढीला किया और अपने आपको शालिनी के वश में छोड़ दिया.

शालिनी की अनुभवी जीभ और मुंह के पराक्रम से राधा अधिक देर अपने आप को न रोक सकीय. कल रात ही से वो एक उत्तजेना में थी जिसे शालिनी के स्पर्श ने एक बांध के समान तोड़ दिया था. शालिनी ने बिना रुके राधा के रस का सेवन किया. उसे इस बात का कोई क्लेश नहीं था कि राधा उनकी नौकरानी थी. उसे उन्होंने सदैव ही अपने परिवार का ही जो समझा था. जब राधा का ज्वर उतरा तो वो एकदम से निढाल हो गयी.

“माँ जी. ऐसा तो मेरे साथ कभी नहीं हुआ.”

“क्यों गोकुल के साथ ऐसे नहीं झड़ती है क्या?”

“नहीं माँ जी. मजा तो बहुत आता है, पर ऐसा कभी नहीं हुआ.”

“अभी तूने जीवन में कुछ देखा नहीं है मेरी बन्नो. असली सुख तो तुझे अब मिलने वाला है. अब मैं तेरे मुंह पर बैठूंगी और तू मेरी चूत चाटना। ”

ये कहते हुए शालिनी उठी और राधा के मुंह पर अपनी चूत लगा दी. इस कार्य में अभ्यस्त राधा चूत केंद्र तक चाटने लगी. तभी उसे ऐसा लगा जैसे कोई दरवाजा खुला और बंद हुआ. पर ये तो बाथरूम की ओर से ध्वनि आयी थी. राधा ने इसे अपनी कल्पना समझा और शालिनी की चूत में मुंह गढ़ाए रही. फिर उसे अपने दोनों पांव किसी के द्वारा फ़ैलाने का आभास हुआ. और फिर एक मुंह उसकी चूत पर लगा और उसे चूसने लगा. राधा समझ गयी की अजीत आ चुके हैं और आज उसकी भरपूर चुदाई होगी.

उसकी पानी छोड़ती हुई चूत भी इस बात का संकेत दे रही थी कि उसकी प्रतीक्षा समापन पर है. शालिनी ने राधा से कहा कि जब तक वो न कहे अपने ऑंखें बंद ही रखे, नहीं तो कार्यक्रम बंद कर दिया जायेगा. ये बताते हुए वो राधा के मुंह से हट गयी और बंद आँखों से राधा ने अनुभव किया कि उसकी चूत पर से मुंह हटा और फिर दोबारा लगा. ये मुंह मुलायम था अर्थात अजीत ने शालिनी को स्थान दे दिया था. फिर उसने अपने सिर के पास कुछ हलचल का आभास किया. और उसके मुंह से कुछ छुआ. उसकी सांसों ने ये भान कर लिया कि ये किसी का लंड ही है क्योंकि उसके नथुनों में उसकी गंध घर कर गयी. पर डर के मारे उसने ऑंखें बंद ही रखी पर उसकी साँसे अब तीव्र गति से चलने लगीं और मन उसी गति से धड़कने लगा.

उसे शालिनी की पुकार कहीं दूर से आती हुई सुनाई दी, “ आँख खोल ले बन्नो और अपने आज के दूल्हे का स्वागत कर.”

राधा ने धीरे से अपनी आंखे खोलीं और अपने आँखों के सामने एक मोटे बड़े लम्बे लंड को झूलता हुआ पाया. उसने अपनी आँखें ऊपर उठाकर अजीत की ओर देखा तो वो हतप्रभ रह गयी. ये अजीत नहीं, बल्कि गौतम था. और कल उसने दूर से जो लंड देखा था अगर वो बड़ा था तो पास से देखने पर ये लंड तो भयावह लग रहा था. उसकी साँस रुक सी गयीं, क्या ये लंड मेरी चूत में जायेगा? वो ये सोच ही रही थी कि उसे किसी ने बुलाया.

“मौसी, क्या इसको प्यार नहीं करोगी?” ये गौतम था और उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट थी.

“ गौतम बेटा तुम? मैं तो समझी थी कि ..’”

“पापा होंगे. वो भी आएंगे मौसी, पर आज नहीं. दादी ने आज आपको खुश करने का कार्य मुझे सौंपा है. और इसके लिए आपको मेरे लंड को प्यार से तैयार करना होगा.”
 
राधा ने जीभ निकालकर गौतम के लंड पर थिरक रही मदन रस की बूंदो को चाट लिया. उधर कामिनी ने अपनी जीभ राधा की चूत की गहराइयों में गुमा दी. राधा अपनी कामवासना में इतनी खो चुकी थी कि उसे गौतम से छुड़वाने में भी कोई आपत्ति नहीं थी. बाप न सही बेटा ही चोद दे उसे. उसकी उबलती हुई चूत की प्यास मिटाना ही अब उसका उद्देश्य था. माँ जी भी उसकी चूत को जिस प्रकार से चाट रही थीं, उसे नहीं लगता था कि वो अधिक देर ठहर पायेगी. गौतम ने अपने लंड को उसके मुंह पर लगाया.

गौतम: “मौसी, देखो न, तुम्हारे प्यार के लिए कैसा लालायित है. इसे चूसोगी नहीं?”

राधा ने अपना मुंह खोला और लंड मुंह में ले लिया. पर इसका आकर गोकुल से कहीं बड़ा था.

सुपाड़ा ही दो इंच से अधिक बड़ा और मोटा रहा होगा. पर एक कहावत है कि खाने का निवाला और लौड़े का सुपाड़ा मुंह में जगह बना ही लेते हैं. तो राधा ने भी जब लंड निगला तो सुपाड़े ने अपने पीछे चल रहे लंड के लिए भी स्थान बना ही लिया. पर अब समस्या थी चूसने की, तो गौतम ने राधा की कठिनाई को समझते हुए ये काम भी अपने हिस्से में लिया और लंड को धीरे धीरे उसके मुंह में चलाने लगा. जब राधा कुछ अभ्यस्त हुई तो भी अपने गालों और जीभ से लंड पर अपना खेल खेलने लगी. ये देखकर गौतम रुक गया और उसने राधा के ही ऊपर ये कार्यभार सौंप दिया. राधा ने भी अपने समर्थ्य के अनुसार लंड को चूसा. पर अब गौतम उसकी चूत का आनंद लेना चाहता था.

“दादी, मौसी की चूत का क्या हाल है.”

“मैं तो सोच रहेगी कि तू पूछेगा ही नहीं. बन्नो की चूत अपने सैंया के लौड़े के लिए बहे जा रही है. इतना पानी छोड़ रही है कि मेरी तो प्यास ही मिट गयी.”

फिर उसने राधा की चूत से मुंह निकाला और उसकी आँखों में ऑंखें डालकर बोली, “ क्यों रे मेरी बन्नो, तेरा आज का दूल्हा अब तेरी सवारी के लिए आ रहा है. तेरी चूत की तो आज खैर नहीं है. पर अगर उससे विनती करेगी तो वो इतने प्यार से चोदेगा कि तेरी आत्मा तृप्त कर देगा. तो क्या चाहती है उसे बता दे.”

राधा ने गुहार लगाई, “गौतम बेटा, आज अपनी मौसी न समझना बल्कि अपनी दुल्हन समझ कर मेरी चूत को खोल दे. तेरा लौड़ा बहुत बड़ा है, तो मुझे प्यार से चोदना नहीं तो तेरी ये दुल्हन मर ही न जाये. फिर न तुझे दुल्हन मिलेगी न मौसी.”

गौतम: “अरे मौसी, तुम बस आज रात भर की ही दुल्हन हो. सुबह होते होते तुम मेरी मौसी ही बन जाओगी. तो मेरी राधा रानी, अब मैं तुम्हारी चूत को अपना बनाने वाला हूँ.”

शालिनी हटकर राधा की बगल में बैठ गयी और उसका एक हाथ अपने हाथ में थाम लिया. गौतम ने राधा की टांगों के बीच में बैठकर अपने टनटनाये लौड़े को राधा की अनवरत बहती हुई चूत के मुहाने पर रखा.

राधा ने अंतिम अनुरोध किया, “बेटा, धीरे और प्यार से करना.”

गौतम ने दबाव बनाते हुए लंड को चूत में अंदर डाला, सुपाड़े के अंदर जाते ही राधा झड़ गयी और इसका लाभ उठाते हुए गौतम ने निर्विघ्न होकर ४-५ इंच लंड अंदर उतार दिया. अब वो उस स्थान पर पहुंचा था जहाँ तक राधा का रास्ता गोकुल ने खोला हुआ था. आगे की राह संकीर्ण और कठिन अवश्य थी पर गौतम जैसे योद्धा के लिए अजेय तो थी नहीं. पर उस दुर्ग को भेदने के पूर्व गौतम राधा को सामान्य होने का समय दे रहा था.

राधा को अधिक समय नहीं लगा, क्योंकि वो इस गहराई तक की चुदाई की अभ्यस्त थी, पर उसे ये भी पता था कि अभी गौतम का आधा ही लंड उसकी चूत में गया है. डर और रोमांच ने उसकी चूत को फिर ढ़ेर सारा पानी छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया. गौतम ने जब अपने लंड पर नए जलपात का अनुभव किया तो उसने दादी की ओर देखा जो समझ गयी कि अब किला गिरने के लिए आक्रमण करने का समय आ गया है.

“बन्नो, एक बात बता, अगर तुझे चोट लगी हो और उस पर बैंडऐड लगाया हो, तो निकालने के लिए क्या करेगी? धीरे धीरे निकालेगी जिसमे अधिक देर कष्ट होगा या एक ही बार में जिससे कि दर्द हो भी पर जल्दी ही दूर भी हो जाये?”

राधा ने इस बात का अर्थ इस परिपेक्ष में समझा नहीं और वो समझी की माँ जी उसका ध्यान बाँटने के लिए बात कर रही हैं. तो उसने भी अनिभिज्ञता से उत्तर दिया, “माँ जी, एक ही बार का कष्ट ठीक है, वैसे भी मैं ऐसा ही करती हूँ.” जिस समय वो उत्तर दे रही थी गौतम अपने लौड़े को बाहर की ओर निकाल रहा था जिससे की आक्रमण के समय लम्बाई और गहराई एक साथ जल्दी तय हो सकें.

शालिनी: “तो मेरी बन्नो, आज तेरा दूल्हा भी तुझे अधिक देर तक न तड़पाते हुए एक ही बार का कष्ट देगा.”

राधा को जब अर्थ समझ आया तो वो न नुकुर करते हुए शालिनी का हाथ छोड़कर अपनी कमर पीछे करने का प्रयास करने लगी. पर दादी और पोता दोनों उसकी इस प्रतिक्रिया के लिए तैयार थे. शालिनी ने हाथ नहीं छोड़ने दिया और आगे झुकते हुए अपने होंठों से राधा का मुंह बंद कर दिया. पर राधा की चीखें निकलने लगी थीं. गौतम ने एक लब्बी तगड़े झटके के साथ अपना तीन चौथाई लंड राधा की चूत में उतर दिया था. राधा तड़प रही थी और किसी प्रकार से मुक्त होने का प्रयास कर रही थी. पर गौतम का बलिष्ठ शरीर और शालिनी के उसे चुप करते हुए होंठ उसे असमर्थ कर दे रहे थे.

राधा ने अपनी चूत में से गौतम के लंड को बाहर निकलते हुए अनुभव किया तो थोड़ा आश्वस्त हुई कि शायद गौतम को उस पर दया आ गयी है. पर ये विचार किंचित गलत सिद्ध हुआ जब बाहर निकलते हुए लंड ने तेजी के साथ उसकी चूत में एक और धक्का मारा और इस बार गौतम के पुरे लंड ने अपना लक्ष्य पा लिया. राधा इस तीव्र दर्द से निढाल हो गयी. उसकी आँखों से आंसू बहने लगे. गौतम ने शालिनी की पीठ पर थप्पी देकर उसे संकेत किया कि किला धराशायी हो गया है. शालिनी ने अपना चेहरा उठाकर राधा के बहते हुए आँसू चूम लिए और उसे सांत्वना देने लगी.

“बस मेर बन्नो, हो गया. आज तू पूरी औरत बन गयी. आज तेरी चूत की पूरी गहराई को खँगालने वाले लंड ने तुझे एक नया जीवन दिया है. और जिसे तू अभी दर्द समझ रही है, वो तेरे इस नए जीवन का नया द्वार है जिसके खुलने से तुझे आनंद का एक नया मार्ग दिखेगा. बस कुछ देर ठहर, फिर देख मैं सच कह रही हूँ.”

राधा ने गौतम से पूछा: “मैंने आपसे कहा था कि प्यार से करना, मौसी हूँ मैं तेरी. मुझ पर थोड़ी भी दया नहीं आयी तुझे?’

गौतम: “मौसी, बस कुछ ही देर रुको फिर आप यही कहोगी कि मैंने सही किया. बस कुछ और देर.” गौतम बहुत हल्के हल्के अपने लंड को राधा की चूत में चलाते हुए उसे समझाने लगा.

राधा की चूत से उठता दर्द उसे कुछ भी न समझने के लिए विवश कर रहा था. गौतम उसकी चूत में उसी गति से लंड चलाता जा रहा था. शालिनी उसके होंठ और मम्मे चूम और चाट रही थी. राधा की चूत ने ही इस समस्या का निदान किया और अपने रस से उस सुरंग को जलमग्न कर दिया. छप छप की ध्वनि से ये विदित हो गया कि अब राधा की चूत उस लौड़े की उपस्थिति को स्वीकार कर चुकी है और संभवतः कुछ अधिक की इच्छा रखती है. राधा को अचानक ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उसका दर्द कम होने लगा हो. और इस पीड़ा के साथ उसके एक नया आनंद भी आने लगा. पीड़ा और सुख का ये अद्भुत समागम उसने केवल कहानियों में ही पढ़ा था. पर आज उसका शरीर इसे स्वयं अनुभव कर रहा था.

राधा ने अपने कूल्हे हिलाकर अपने आनंद को बढ़ाने का प्रयास किया तो गौतम ने भी उसका साथ देते हुए अपनी गति बढ़ाई। शालिनी वस्तुस्थिति भांपते हुए राधा के मम्मों को मसलने लगी जिसके कारण राधा एक बार फिर से अपने चरम की ओर बढ़ चली. शालिनी ने अब अपने मुंह और हाथों से राधा के मम्मों पर वार करना शुरू किया और नीचे से गौतम ने भी अपनी गति कुछ और बढ़ाई। राधा का मस्तिष्क एक नए उल्लास में लीन हो गया और उसे एक ऐसा आनंद आने लगा जिसमे वो अपना सब कुछ भूल गयी.

“चोद दे मुझे, और अच्छे से चोद। माँ जी अपने मुझे पहले ये सब क्यों नहीं दिया. आप बहुत बुरी हैं माँ जी. आअह, क्या हो रहा है मुझे. माँ जी! मेरी चूत में क्या हो रहा है.” राधा का अकड़ता बिखरता शरीर अब छटपटा रहा था. पर इस छटपटाहट में एक मुक्ति थी. उसके कूल्हे अचानक ही ऊपर की ओर हुए और काँपते हुए वो निश्चल हो गयी. उसकी चूत ने एक धार फेंकी जो गौतम के लंड से बंद होने के कारण बाहर न निकल पायी पर चलते हुए लंड के साथ कुछ कुछ मात्रा में बाहर रिसने लगी. फिर उसके कूल्हे एक थाप के साथ बिस्तर पर गिर गए पर उसका कम्पन अभी भी रुका नहीं. और इस पूरे प्रकरण के समय गौतम ने एक भी ताल छूटने नहीं दी. जब राधा अपने शीर्ष से उत्तरी तो वो शालिनी का चेहरा हाथ में लेकर उन्हें बेतहाशा चूमने लगी.

शालिनी हँसते हुए बोली, “ क्यों मेरी बन्नो, कैसी लगी चुदाई तुझे, अब दर्द है?”

राधा: “जी माँ जी, दर्द तो है, पर मीठा मीठा. और सच में ऐसे तो मेरी कभी चुदाई हुई ही नहीं.”

“तो अब मेरे पोते को अपने ढंग से चोदने दे.”

“जी माँ जी.”

ये सुनकर गौतम ने अपने धक्कों को और तेज कर दिया.

गौतम के बढ़ते और तेज होते हुए धक्कों की थाप पुरे कमरे में गूंज रही थी. और इसमें मिले हुई थीं राधा की सिसकारियां और आनंदकारी चीत्कारें. गौतम के मोटे लम्बे लंड ने राधा की चूत को ऐसे पैक किया हुआ था कि उसे जीवन का अलग हैअनुभव हो रहा था. चूत अब तक हाथ डाल चुकी थी. कितना झड़ती आखिर. लगातार पानी के स्त्राव से सुख सी गयी थी. और इसी कारण अब गौतम के लंड को अधिक घर्षण मिल रहा था और वो स्वयं भी आनंद के महासागर में गोते लगा रहा था. शालिनी के मन में न जाने क्या आया उसने अपना हाथ बढाकर राधा के भग्नाशे को मसलना शुरू कर दिया. अब राधा के लिए एक नया आयाम था. उसे इस बात का आभास भी नहीं था कि उसके शरीर का कोई ऐसा अंग भी है जो उसे आनंद के शिखर पर मात्र मसलने से ले जा सकता है.

सूखती चूत में एक नया ज्वार सा उठा और और इस बार फिर राधा का शरीर अकड़कर काँपने लगा. परन्तु शालिनी ने भग्नाशे की छोड़ा नहीं, बल्कि और अधिक तीव्रता से उसे मसलने लगी. राधा के मस्तिष्क में मानो रक्त का संचालन रुक गया. वो अपने हाथ पैर इधर उधर फेंकने लगी और उसकी चूत फिर से जलमग्न हो गयी. अब गौतम को भी रुकना सम्भव नहीं लग रहा था और उसने भी स्वयं को छोड़ दिया और उसके लंड से निकलती हुई तेज धाराओं ने राधा की चूत को तृप्त कर दिया. उसने अपने अकड़े हुए लंड को इसी अवस्था में बाहर खींचा तो न जाने कितना पानी राधा की चूत ले बाहर बहने लगा.

शालिनी अब तक राधा के भग्नाशे को रगड़ती हुई पास आ चुकी थी. उसने तुरंत अपना मुंह राधा की चूत पर लगाया और उस धार को पीने का प्रयास किया. पर पानी इतनी तेजी से बहा था कि शालिनी के इस प्रयत्न के बाद भी उसे केवल कुछ ही रस पीने को मिला. पर वो ऐसे हार मानने वालों में तो थी नहीं. उसने गौतम के लंड को लपक कर अपने मुंह में डाला और उस मिश्रण को चाटकर अपनी प्यास बुझा ही ली. इसके बाद उसने फिर राधा की चूत पर धावा बोला और इस बार चूस कर उसे पूरा खाली कर दिया.

राधा बेसुध सी लेटी दादी पोते के इन क्रियाकलापों को केवल देखती ही रही. पर उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट थी. एक असीम संतुष्टि से उसका चेहरा खिला हुआ था.

“कैसी है मेरी बन्नो?” शालिनी ने पूछा.

राधा ने थकी मगर ख़ुशी से भरे स्वर में उत्तर दिया, “एकदम मस्त, माँ जी.”

फिर कुछ देर रुकी और बोली, “माँ जी, अब दोबारा कब करेंगे?”

“आज की रात अपनी ही है. पहले मैं भी तो अपने अपनी चूत और गांड की सिकाई करवा लूँ। “

गौतम: “दादी. पहले आपकी चूत , फिर मौसी की चुदाई, फिर आपकी गांड, फिर मौसी की चुदाई.”

राधा और शालिनी उसके इस उतावलेपन पर हंस पड़ीं. और रात भर गौतम ने उन दोनों की जी भर कर चुदाई की और सुबह तक तीनों संतुष्ट होकर सो गए.

*****
 
उधर अदिति और अजीत सुबह डॉक्टर से मिलने के लिए निकल गए. अनन्या उठी तो देखा घर शांत है. पापा और मॉम तो चलो डॉक्टर के पास थे पर दादी, राधा और गौतम ही नहीं दिखे तो वो गौतम के कमरे में झाँकने गई तो उसे खाली पाया. उसने दादी के कमरे का दरवाजा खोला तो उसे कपड़े बिखरे हुए दिखे. आगे बढ़कर उसने दादी के बिस्तर को देखा तो उसे तीनों सोते हुए दिखे. उसकी आँखों ने गौतम के लंड को देखा और उसे अपने पापा के लंड की याद आ गयी. गौतम का लंड उनके लंड से बीस ही लग रहा था. उसने हल्के पैरों से आगे बढ़कर गौतम के लंड को देखा और अनायास ही झुकते हुए उसे अपने मुंह में ले लिया.

चूत और वीर्य का स्वाद तो वो जानती थी, पर कुछ एक अलग स्वाद भी था. उसकी आंख अपनी सोती हुई दादी की ओर गयी जिनकी पीठ उसकी ओर थी. उसने देखा की दादी की गांड का छेद कुछ खुला हुआ था और उसमे से कोई सफेद रंग का द्रव्य बाहर बहा हुआ था. अनन्या को समझ आ गया कि उस नए स्वाद का क्या कारण है. उसने एक बार फिर गौतम के लंड को चाटा और लौटने के लिए मुड़ी.

“कैसा लगा अपने भाई के लंड का स्वाद, अनन्या बिटिया?” ये राधा मौसी का स्वर था.

अनन्या चौंककर मुड़ी तो देखा मौसी बैठ चुकी थी. उनके स्तन लाल थे, लगता था रात में अच्छे से मसले गए थे.

“बहुत अच्छा मौसी. तुम्हारा भी तो स्वाद मिला हुआ है न इसमें.”

“हाँ, और अब वो दिन दूर नहीं जब इस लौड़े पर से तुम भी अपना स्वाद चाटोगी अपनी माँ के साथ.”

अनन्या उस आने वाले दिन के बारे में सोचती हुई कमरे से निकली और अपनी चूत सहलाने के लिए अपने कमरे में चली गई.

*****

दिन के ११ बजे के आसपास अदिति और अजीत भी लौट आये. अदिति के चेहरे पर एक चमक थी और पांव मानो जमीं नहीं छू रहे थे. उसने आते ही शालिनी को बाँहों में भर लिया.

“बताओ माँ जी, डॉक्टर ने क्या कहा?”

“तेरी ख़ुशी तो यही बता रही है, कि चुदाई की अनुमति मिल गयी है.”

“बिलकुल सही. माँ जी मैं आज बहुत खुश हूँ.”

“तो जा और अजीत को काम पर लगा दे. पर सुन. ध्यान रख. अधिक अधीरता मत दिखाना. नयी नयी सिलाई है, उधेड़ मत देना।”

“जी माँ जी. डॉक्टर ने भी यही कहा है. अगले दस दिन सीमा के अंदर ही सम्भोग करें. नहीं तो समस्या हो सकती है.”

“अब जा, और अपने पति को समर्पित कर दे तेरी ये नयी चूत.”

अदिति उड़ती हुई अपने कमरे में गयी जहाँ अजीत पहले ही जा चूका था. और उसने कमरा बंद किया और पीछे मुड़ी तो अजीत को नंगा खड़ा पाया.

“वापसी पर स्वागत है.” अजीत ने अपने लंड को हाथ से हिलाते हुए मुस्कुराकर कहा. “तुमने कुछ कपड़े अधिक नहीं पहने हुए हैं?”

अदिति ने आनन फानन कपड़े फेंके और जाकर अजीत से लिपट गयी.

*****

बाहर इतना शोर सुनकर अनन्या और गौतम भी आ गए. पर देखा कि दादी अकेली है.

“कुछ शोर सुनाई दिया था, क्या था?”

“तेरी माँ को चुदवाने की अनुमति मिल गयी है. अब अंदर है अजीत के साथ.”

अनन्या और गौतम के चेहरे पर ख़ुशी छा गयी. पर दोनों की ख़ुशी के कारण अलग थे.

क्रमशः

अगले परिवार की ओर अग्रसर
 
दूसरा घर: सुनीति और आशीष राणा

अध्याय २.३

भाग १

*********

सुनीति के घर:

दो दिन बाद

शाम के समय जब आशीष घर पहुंचा तो देखा कि घर पर किसी की गाड़ी खड़ी थी. उसे आश्चर्य हुआ कि सुनीति ने उसे बताया नहीं कि घर पर अथिति आये हैं. उसने अपना चेहरा और बाल ठीक किये और अपना ब्रीफ़केस लेकर घर में गया. पर उसे आश्चर्य इस बात का हुआ कि बैठक में कोई नहीं था. हाँ सुनीति अवश्य सलोनी के साथ किचन में कुछ कर रही थी. उसने सुनीति को पास बुलाया तो उसने कहा कि वो मुंह हाथ धो ले फिर बात करेगी. आशीष असमंजस की स्थिति में अपने कमरे में गया और मुंह हाथ धोकर, कपड़े बदल कर १५ मिनट में बैठक में आ गया. सुनीति ने उसके हाथ में उसकी पसंद की ड्रिंक दी और सामने बैठ गयी.

आशीष ने पूछा: “कौन आया है?”

सुनीति: “असीम के लिए रिश्ता आया है.”

आशीष भौचक्का रह गया.

“ये कब हुआ, कैसे.”

“समुदाय के द्वारा. लड़की हमने देखी हुई है.”

आशीष को कुछ समझ नहीं पड़ रहा था.

“कौन लड़की?”

“महक, विक्रम और स्मिता की बेटी, आठ नंबर वाले.”

“ओके, पर ये गाड़ी किसकी है? पापा और अन्य सब कहाँ गए? सुनीति, थोड़ा खुलकर बताओ, ये तुम्हारा सस्पेंस मुझे डरा रहा है.”

सुनीति मुस्क़ुरा कार बोली, “आपमें थोड़ा भी संयम नहीं है. ठीक है.” उसने बात आगे बढ़ाते हुए बताया.

“समुदाय के नियम के अनुसार वर वधू दोनों समुदाय के ही होने चाहिए, ये तो आपको पता ही है. पर विवाह योग्य लड़की का परिवार समुदाय में अपनी बेटी के लिए आवेदन लगता है. ये केवल लड़की वालों को ही अनुमति है. समुदाय की समिति योग्य लड़कों के देखकर, ये निश्चित करती है, कि क्या ये संबंध सम्भव है. असीम के सिवाय दो और लड़कों का भी इसके लिए चयन हुआ है. हालाँकि, हमारा संयोग अधिक है, क्योंकि हम एक दूसरे के परिवारों से पहले से ही परिचित हैं.”

“तो गाड़ी….” आशीष की बात पूरी न सुनकर सुनीति ने उसे रोका और आगे बताने लगी.

“मधु जी, जो कि समिति की मुखिया हैं, वही आयी हैं इस प्रस्ताव को लेकर. इसमें समिति, शेट्टी परिवार और हमारे परिवार में से कोई भी इसके लिए मना कर सकता है. उनका उद्देश्य ये होता है कि वे अपने चयन को लड़की के परिवार को बताएं और फिर दोनों परिवार ही ये निर्णय लेंगे कि आगे बढ़ना है या नहीं।”

सुनीति ने आशीष की बात का अब उत्तर देना आरम्भ किया. "मधु जी, समिति के एक और महिला और अपनी बहू के साथ आयी हुई हैं. असीम और कुमार पिताजी के कमरे में अपनी परीक्षा दे रहे हैं. महिलाओं का ये दायित्व है कि वे लड़कों की सेक्स की अनुकूलता की जाँच करें. पिता जी ने अपना पत्ता फेंका और कहा कि वे भी इसमें सम्मिलित होकर महिलाओं की अनुकूलता जांचेंगे.”

“ब्लडी हैल!” आशीष के मुंह से निकला. “पापा को चूत से दूर रखना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. और इन समिति वाली औरतों की तो चांदी है. कितने ऐसे जाँच के अवसर इन्हें प्राप्त होते होंगे.”

सुनीति हंसने लगी, “ये तो है, पर समिति में मधु जी के सिवाय कोई भी स्थाई नहीं है, तो सबसे अधिक मजा वही लेती हैं.”

आशीष ने हंस कर पूछा, “क्या मैं इस जाँच के योग्य नहीं हूँ.”

सुनीति उठी और आशीष की गोद में बैठी और उसे चूमकर बोली, “घर की महिलाओं को ये अधिकार है कि वो अपने परिवार के पुरुषों को प्रमाणित कर सकती हैं. मैंने आपको कर दिया है. और मैं आपकी जाँच के हेतु आपको कमरे में लेकर जाऊंगी, एक बार ये सब लौट तो आएँ.”

फिर आशीष के कान में फुसफुसाकर बोली, “मधु जी ने परसों हम दोनों, केवल हम दोनों के अपने घर आमंत्रित किया है. रात में वहीँ रुकना भी है. अब एक बार उनकी बहू को देख लो फिर बताना कि मैं स्वीकार करूँ या रहने दूँ.”

आशीष की ड्रिंक समाप्त हो चुकी थी, तो सुमति ने सलोनी ने एक और ड्रिंक लाने के लिए कहा, दोनों के लिए. और फिर ऑफिस और काम की बातों में व्यस्त हो गए.

*******

जीवन का कमरा

आशीष का विश्लेषण अब समाप्ति पर था. समिति की अस्थाई सदस्य श्रीमती बालू सोफे पर बैठी सामने चल रही गतिविधि पर पैनी दृष्टि रखे हुए थीं. वो विश्लेषक थीं. उनका कार्य ये था कि चलने वाले समागम पर अपनी राय देना और ये देखना कि जिस लड़के का विश्लेषण हो रहा है वो इसमें उत्तीर्ण होगा या नहीं. उन्हें इस समागम में स्वयं हिस्सा लेने की अनुमति नहीं थी. इस प्रकार के आयोजन में अधिकतर एक महिला सदस्य और होती थी. अर्थात मधुजी, एक विश्लेषिका और एक अन्य सदस्या। विश्लेषेका और अन्य स्त्री बदल जाती थीं. इस बार जिस स्त्री का चयन हुआ था वो मधुजी की लाड़ली बहू चारु थी. ४५ वर्ष की इस आकर्षक और अनुभवी स्त्री की सेक्स की भूख अनंत थी. उसे देखकर कोई ये नहीं मान सकता था कि उसने तीन बच्चों को जन्म दिया है. और वे तीनों भी अपने पिता के साथ अपनी माँ की भूख मिटाने में कई बार अक्षम होते थे.

उन्हें इस खेल में लिप्त हुए लगभग एक घंटे से अधिक हो चुका था. और इस पूरे आकलन में असीम अभी तक पूर्णतया सटीक बैठा था. उसका उत्तीर्ण होना तय था. श्रीमती बालू जिनका नाम सुनंदा था तमिल थीं पर इतने वर्ष यहाँ रहकर अब अच्छे से घुल मिल गयीं थीं. उनकी हिंदी पर पकड़ अच्छी थी, हालाँकि कुछ दक्षिणी पुट था जो सबको बड़ा सुहाता था. उन्हें विश्लेषिका के कार्य में विशेष आनंद आता था, क्योंकि उत्तीर्ण होने वाले लड़के पर समुदाय में पहला अधिकार उनका ही होता था. फिर इस प्रकार के आयोजन से उनकी कामोत्तेजना को शांत करने के लिए उनके दोनों पुत्र उनकी सहायता करते थे. उन्हें इस बात का अवश्य ही दुःख था कि उनके घर कोई पुत्री नहीं हुई, परन्तु उनकी दोनों बहुएं उन्हें माँ के ही रूप में देखती थीं और वे भी उन्हें उसी प्रकार से मानती थीं. इस प्रकार के आयोजन से उन्हें कई बार नए आसन भी देखने को मिलते थे जिनका उनके घरेलू चुदाई समारोह में उपयोग किया जाता था.

इस समय वो मधुजी की शक्ति और सहनशीलता पर आश्चर्य कर रही थीं. कुमार जो लड़के का छोटा भाई था, नीचे लेटा था और मधुजी उसके लम्बे तगड़े लौड़े को अपनी चूत में लिए हुए थीं. पीछे से उनके ऊपर असीम चढ़ा हुआ था और ये सर्वविदित था कि उसका लंड उनकी गांड में था. दोनों भाइयों की समकालिक जुगलबंदी भी देखने और अध्ययन का विषय थी. उसे विश्वास था कि आज के वीडियो को देखकर उसके पति और पुत्र उसे भी इसी प्रकार से चोदने के लिए तत्पर होंगे.

पर दोनों भाइयों की असीमित शक्ति के सामने हार न मानने के लिए मधु जी को श्रेय जाता था. जिस तरह से दोनों भाइयों के विशाल लंड उनके दो छेदों को चोद रहे थे, केवल विलक्षण प्रतिभा वाली कोई स्त्री ही इसमें भी आनंद ले सकती थी. और मधु जी की आनंदकारी चीखें और अधिक जोर से चोदने की गुहार सच में इनकी इस प्रतिभा को उजागर कर रही थी. अब ऐसा नहीं था कि उनकी बहू चारु व्यस्त नहीं थी. अपनी कोहनियों और घुटनों के बल घोड़ी के आसन में वो जीवन के लंड से अपनी गांड मरवाने में व्यस्त थी. और जीवन भी इस नयी गांड का भरपूर आनंद ले रहा था.

अगर समय का अभाव न होता तो संभवतः चारु भी दोनों भाइयों से अपनी सास की तरह ही चुदवाती, पर नियम के अनुसार समय की सीमा थी और उसे अपनी केवल गांड मरवाकर ही संतोष करना पड़ रहा था. इसके पहले वो दोनों भाइयों से एक एक बार अपनी चूत की धज्जियाँ उड़वा चुकी थी. पर एक अत्यंत काम पिपासु स्त्री होने के कारण उसे कभी भी पूर्ण शांति नहीं मिलती थी. उसकी गांड में अब जीवन का लंड तनके फूलने लगा था. और चारु की विदित हो गया था कि अब उसकी गांड में सिंचाई होने ही वाली है. उसने अपनी गांड की मांसपेशियों को कुछ सिकोड़ा जिससे कि उन दोनों के आनंद में कुछ वृध्दि हो. पर अब जीवन रुक नहीं प् रहा था और उसने अपने रस की फुहार से चारु को गांड भर दी और उसके ऊपर ढह गया.

कुछ देर यूँ ही पड़े रहने के बाद चारु और जीवन ने अपने बगल में चल रहे काम युद्ध को देखा तो वहां भी समापन निकट था. मधु जी की चीखें अब धीमी पड़ चुकी थीं और असीम के धक्के भी अब कुछ ठहर से गए थे. उन्हें ये देखकर आश्चर्य नहीं हुआ जब असीम ने अपने लम्बे लंड को मधुजी की गांड से बाहर निकाला। उससे बहता हुआ रस मधु जी की गांड पर फ़ैल गया. वो खड़ा हुआ तो चारु ने उसे बुलाया और उसके लौड़े को चाटकर साफ कर दिया. जीवन ने अपने लंड की ओर संकेत किया तो चारु ने अपनी सास की ओर देखकर बताया कि ये उनका अधिकार है. सास बहू के ऐसे पावन प्रेम से जीवन का मन प्रसन्न हो गया.

कुमार भी अब झड़ चूका था और मधु जी तो न जाने कितनी बार आकाश को छूकर लौटी थीं. वो कुमार के लंड से उतरीं और एक ओर निढाल होकर लेट गयीं. चारु ने कुमार को बुलाकर उसके लंड को भी चाटकर साफ कर दिया. फिर जीवन को मधु जी की ओर धक्का सा दिया. जीवन ने अपने लंड को मधुजी के सामने किया तो उन्होंने उसे बड़े प्रेम से चाटा और साफ कर दिया. सब कुछ समय के लिए सुस्ताने लगे. सुनंदा ने रिकॉर्डिंग बंद कर दी और फोन को पर्स में रख लिया. उसकी चूत में आग लगी थी, पर अभी भी घर पहुँचने में समय था.

कुछ देर के बाद सबने उठकर कपड़े पहने और फिर बैठक की ओर चल पड़े. बैठक में उनका स्वागत आशीष ने किया. मधुजी ने उसके गले मिलकर उनके होंठ चूमे. फिर चारु ने भी यही किया. चारु का विलक्षण सौंदर्य देखकर आशीष का मन मचल उठा. उसने सबको बैठने का आवेदन किया.

मधु जी: “सुनीति ने आपको मेरे आने का उद्देश्य बताया होगा. श्रीमती बालू बताएंगी कि उनका परीक्षण कैसा रहा.”

इस बार आशीष का ध्यान श्रीमती बालू पर गया और उसे आश्चर्य हुआ कि उन्होंने उसके साथ मिलन क्यों नहीं किया.

श्रीमती बालू, “मैं इस आयोजन की पर्यवेक्षिका हूँ और मुझे किसी भी प्रकार के सेक्स सम्बन्ध की अनुमति नहीं है. पर हम आज के बाद अवश्य ही मिल सकते हैं. पर वो बाद में देखेंगे. मैं ये सूचित करना चाहती हूँ की आपका पुत्र असीम अपनी परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया है. दोनों भाई सेक्स में पारंगत हैं पर ये केवल असीम का ही अनुमोचन है. इसका अर्थ ये है कि महक के लिए असीम को हम अपनी ओर से अनुमोदित करते हैं. इसके बाद आप दोनों के परिवारों पर इसके आगे का निर्णय होगा. पर मैं ये भी बताना चाहती हूँ कि एक और लड़के को भी हमने प्रस्तावित किया है. तो अब महक के परिवार को ही ये निर्णय लेना होगा कि वे किसे चुनेंगे.”

“इस सम्बन्ध की अगले ३ महीने में आपको पुष्टि करनी होगी. अन्यथा ये समाप्त हो जायेगा. आगे मधु जी बताएंगी.”

“नियम के अनुसार महक की माँ स्मिता को ये अधिकार है कि वो हमारे बताये हुए दोनों लड़कों को अपने मानकों के अनुसार तोले। इसमें किसी और का कोई भी योगदान नहीं होगा. पर मुझे लगता है कि असीम उसे भी संतुष्ट करने में सफल होगा.”

“धन्यवाद, आप लोग क्या पीना चाहेंगे?”

इसके बाद सब ने अपनी पसंद का पेय लिया और फिर तीनों स्त्रियों ने जाने की अनुमति चाही. जाने के पहले मधुजी ने आशीष को कहा कि सुनीति और वो परसों उनके घर पर आमंत्रित हैं और रात भी वहीँ ठहरेंगे.

जाते जाते चारु ने आशीष की ओर देखकर कहा, “आइयेगा अवश्य. मैं प्रतीक्षा करुँगी.”

सुनीति और आशीष ने उन्हें आने का आश्वासन दिया और फिर अथिति चले गए.

*******
 
बैठक में सुनीति और आशीष बातें कर रहे थे. अन्य परिवारजन अपने कार्यों में व्यस्त थे. जीवन बलवंत से फोन पर बात कर रहा था.

आशीष: “सुनीति, हमने समुदाय में प्रवेश तो किया है, पर मुझे लगता है कि हमें उसके पूरे नियम पता नहीं हैं. परसों जब हम मधु जी के घर जायेंगे तो हमें इसके बारे में बात करना और समझना आवश्यक है. हम अनजाने में ऐसा कुछ न कर बैठें जिससे कि हमारी सदस्य्ता समाप्त कर दी जाये.”

सुनीति: “आपकी बात ठीक है, पर मुझे आज मधु और सुनंदा से बात करने पर ये आभास भी हुआ कि वे नए सदस्यों को कुछ ढील देते हैं. अन्यथा समुदाय की सफलता और बढ़ोत्तरी सम्भव नहीं है. मेरा कहना है कि जब तक हम ऐसा कुछ न करें जो उन नियमों का उल्लंघन हो जो हमें समझाये गए हैं, कोई भी कठिनाई नहीं होगी. और मुझे जो बात सबसे अधिक भाई है वो ये कि परिवार की स्त्रियों को पुरुषों से अधिक अधिकार हैं. जो कि अपने आप में एक अनूठी परम्परा है.”

आशीष हँसते हुए बोला: “हमारे परिवार में तो तुम्हारी ही तूती बोलती है. हम सब तो बस काठ की कठपुतली हैं मैडम के सामने.”

सुनीति भी उसके साथ हँसते हुए बोली: “हाँ हाँ, जैसे आप मेरी हर बात मानते ही जाते हो.”

आशीष: “ऐसी कौन सी बात है तुम्हारी जो नहीं मानी गयी है. आने दो तुम्हारे मम्मी पापा को, उनसे भी ये सिद्ध करा दूंगा कि तुम ही घर की असली मालकिन हो.”

सुनीति: “अगर ऐसा है, तो इधर आइये और मेरी चूत को चाटकर शांत करिये. जब से ये तीनों आयी हैं, बहुत अधीर हो रही है.”

आशीष: “ जैसी मैडम की आज्ञा.”

ये कहकर वो सुनीति के सामने बैठा और उसकी साड़ी और पेटीकोट उठाकर उसकी चूत में अपना मुंह डाल दिया.

“तुम लोग ये सब अपने कमरे में नहीं कर सकते क्या?” जीवन के कर्कश स्वर ने उनका ध्यान बंटाया.

आशीष कुछ बोलता, इससे पहले ही सुनीति बोल पड़ी, “पिता जी, आप ने तो अपना मजा ले लिया पर मुझे क्यों रोक रहे हैं?”

जीवन ने ठिठोली करते हुए बोला, “क्योंकि, किसी ने चुदाई के बाद मेरे लंड को ठीक से नहीं चाटा, बस औपचारिकता ही पूरी की.”

सुनीति: “तो मैं किस दिन काम आऊंगी, आइये, मैं आपके लंड को चूस लेती हूँ.”

जीवन ने अपनी पैंट सरकाई और अपने लंड को सुनीति के मुंह में दे दिया. और यही वो क्षण था जब अग्रिमा ने घर में प्रवेश किया.

“ओह, तो मजा किया जा रहा है.” ये कहते हुए वो अपने कमरे में चली गई जैसे ये कोई साधारण बात हो.

********

मधु जी का घर:

दो दिन बाद आशीष और सुमति मधुजी के आमंत्रण के अनुसार हम के सात बजे उनके घर पहुँच गए. मधु जी ने उनका स्वागत किया और अपने पति से परिचय कराया. उनके पति को देखकर आशीष और सुमति को कुछ आश्चर्य हुआ क्योंकि वे बहुत कमजोर और थके हुए दिख रहे थे. मधु जी की आँखों के संकेत को देखकर उन्होंने इस बारे में कुछ नहीं कहा. मधु जी ने बताया कि उनका बेटा परख, बहू चारु और उनके बच्चे बाहर गए हैं और कुछ ही समय में लौट आएंगे. जब वो सब बैठ गए तो मधुजी ने अपने पति से सबके लिए कुछ पीने के लिए लाने का आग्रह किया. कुछ ही देर में वे बैठकर अपनी ड्रिंक्स की चुस्कियां के रहे थे.

तभी मधु जी ने अपने पति से कहा, “सुनिए, आपकी दवाई लेने का समय हो गया है. आप दवाई लेकर कुछ समय के लिए लेट लीजिये, फिर लौट आइयेगा।”

उनके पति बिना कुछ कहे उठकर चले गए.

आशीष ने ये समय समुदाय के नियम समझने के लिए उपयुक्त समझा. मधु जी ने उन्हें कुछ अन्य नियम बताये. सक्षिप्त में सार ये था कि समुदाय के अस्तित्व के बारे में कभी भी किसी को नहीं बताना था. जो सदस्य ५ वर्ष से अधिक से सदस्य थे केवल वहीँ नए सदस्यों के लिए आवेदन कर सकते थे. समुदाय अपने अंदर ही विवाह को बढ़ावा देता था, परन्तु अगर कोई बाहर विवाह करना चाहे तो १ वर्ष के लिए उसे समुदाय से निकाल दिया जाता था. इस समय में वे नए सम्बन्धियों को समुदाय के लिए तैयार कर सकते थे. अभी तक किसी का भी सम्पूर्ण निष्काशन नहीं हुआ था.

सुमति ने पूछा, “मधु जी, मेरे माता पिता इस महें के अंत तक आने वाले हैं. हम सब वर्षों से घरेलु सम्भोग में लग्न हैं. मेरे और आशीष के परिवार में ये सम्बन्ध हमारे जन्म के पूर्व से है. वे कम से कम तीन महीने यहाँ रहेंगे. इस समय हमें क्या सावधानी रखनी होगी.”

मधुजी: “क्योंकि वे समुदाय में नहीं हैं, तो वे हमारे किसी भी कार्यक्रम में नहीं आ सकते. वे किसी समुदाय वाले के घर जब हमारी कोई पार्टी या गोष्ठी हो, नहीं जा सकते. अगर आपके घर कोई आता है और आप उन्हें सम्मिलित करते हो तो कोई आपत्ति नहीं है. पर ये ध्यान रहे कि उन्हें भी समुदाय की गोपनीयता का ध्यान रखना होगा, अन्यथा आपकी सदस्य्ता समाप्त की जा सकती है.”

सुमति: “क्या वो सदस्य बन सकते हैं?”

मधुजी: “अगर वे यहाँ के निवासी बन जाएँ तो छह महीने के बाद आप की गारंटी पर ये संभव है. पर अगर वे यहाँ के निवासी नहीं हैं तो मुझे आपको मना करना होगा.”

इसके बाद मधुजी ने वो बताया जो उनके मन में प्रश्नचिन्ह किये हुए था.

“आप अपितु मेरे पति को देखकर कुछ असमंजस में हैं. उनका स्वास्थ्य कुछ वर्षों से उनका साथ नहीं दे रहा. और उनका लंड भी अब खड़ा नहीं होता. पर नियम के अनुसार हम उन्हें समुदाय के मिलान में जाने से नहीं रोक सकते. मुझे कई महिलाओं की ज्ञाति मिली है जिन्होंने उनके साथ को अपर्याप्त बताया है. पर मैं इस विषय में कुछ नहीं कर सकती क्योंकि कोई भी ये नियम नहीं बदल सकता. है, अगर वे चाहें तो जाने से मना कर सकते हैं. पर हम उन्हें ये कहने के लिए असमर्थ हैं क्योंकि ये नियमों का उल्लंघन होगा.”

आशीष और सुमति को समझ आ गया कि समुदाय अपने नियमों का कितना आदर करता है, की उसकी मुखिया भी उन्हें नहीं तिरस्कृत कर सकती.

मधु जी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “मेरे पति अब अलग कमरे में सोते हैं. मैं अपने बेटे, बहू और पोते पोती के साथ उनके कमरे में सोती हूँ. ये व्यवस्था उनके आग्रह पर ही की गयी है. हमारे कमरे कांच की दिवार से अलग किये हुए हैं और कई बार वे भी हमारे खेल में सम्मिलित होते हैं. परन्तु वे अपने मुंह और उँगलियों का ही उपयोग कर पाते हैं.”

मधुजी बताती रहीं, “और कभी कभी वे किसी विशिष्ट कार्य के लिए भी बुलाये जाते हैं. आज रात आपको इसके बारे में भी ज्ञान होगा.”

तभी घर का दरवाजा खुला और ५ लोगों ने प्रवेश किया. चारु से तो आशीष और सुनीति मिल चुके थे. उसके साथ तीन छह फुट से भी लम्बे तीन पुरुष थे. इसमें से एक तो चारु का पति प्रतीत होता था और दो उसके पुत्र. एक बहुत ही सरल और भोली सी लड़की उनके साथ थी. हालाँकि कद काठी में वो भी कम नहीं थी, पर उसके चेहरे का भोलापन उसे उन सब से अलग कर रहा था.

मधु जी उन्हें देखते ही अत्यंत खुश हो गयीं. लड़की के हाथ में एक बड़ा सा थैला था.

“दादी! देखो हम खाने के लिए क्या लाये हैं!” वो मधुजी के पास आकर बोली.

तब तक अन्य लोग भी बैठक में आ गए और सबका परिचय हुआ.

मधु जी के बेटे लोकेश का अपना होटल की शृंखला थी जो अभी चार शहरों में थे. कुल आठ होटल थे और बहुत सफल भी थे. उसने अपने एक बेटे परेश को अपने साथ ही काम पर लगा लिया था. दूसरा बेटा कुणाल अभी होटल मॅनॅग्मेंट की पढाई कर रहा था. अगले वर्ष वो भी अपने पिता के साथ ही होटल के काम देखेगा. उनकी एक मात्र बेटी मान्या थी जो अभी कॉलेज में एम कॉम की पढ़ाई कर रही थी और CA की तैयारी भी. अंत में वो भी पिता के ही साथ काम करना चाहती थी.

इसके बाद आशीष और सुनीति ने भी अपना परिचय दिया। मान्या अपने दादाजी के पास चली गयी और वहां से कुछ देर में लौटी और अपने पिता की गोद में जा बैठी.

उसने आशीष की ओर देखकर कहा, “अंकल, आप अपने पापा से मेरे दादाजी को मिलवाओ. देखो आपके पापा अभी भी कितने स्वस्थ और सक्रिय हैं. पता नहीं मेरे दादाजी क्यों अब ऐसे हो गए हैं. हो सकता है उनसे मिलने के बाद इन्हें भी कुछ स्वास्थ्य लाभ हो.”

आशीष ने उत्तर दिया, “हाँ हाँ बिलकुल. मैं कल ही पापा से कहूंगा कि वे सर को मिलने आएं और उनसे मित्रता करें. मुझे विश्वास है कि सर को अवश्य लाभ होगा. वैसे सुनीति के पिताजी भी कुछ ही दिनों में आ रहे हैं और वे भी इसमें साथ देंगे. और मुझे इस बात की बहुत ख़ुशी है कि तुम अपने दादाजी का इतना ध्यान रखती हो. पर तुमने मेरे पापा को कब देखा?”

“समुदाय में जब आपको प्रवेश दिया जा रहा था.”

आशीष हक्का बक्का रह गया, उसे लगा था कि ये १७-१८ वर्ष की सीधी सादी लड़की थी, पर अगर वो मिलन में थी तो अवश्य २० वर्ष से अधिक की है और चुदवाने में भी अनुभवी होगी. उसकी इस बौखलाहट को लोकेश ने समझ लिया.

“आशीष भाई, मान्या को समुदाय में सम्मिलित हुए ७ महीने हो चुके हैं. इसे देखकर सब इसे छोटा ही समझते हैं, पर इसके भोलेपन के पीछे बहुत ही चतुर और चुड़क्कड़ लड़की है.”

“पापा! आप मेरी प्रशंसा कर रहे हैं या बुराई?”

“मैंने कब तेरी बुराई की? क्यों माँ ये चतुर है कि नहीं?

“बिलकुल. और चुड़क्कड़ भी है.” मधु जी ने उत्तर दिया.

“दादी, आप भी! ठीक है आज मैं आपकी चूत नहीं चाटूँगी.” उसने अल्हड़पन में कहा.

दादी कहाँ पीछे रहने वाली थी. उसने आह सी भरकर कहा, “ठीक है. मैंने तो सोचा था की सुमति आंटी से तेरी चूत चटवाऊँगी, पर अब तू मना कर रही है तो ठीक है.”

“ए दादी! मैंने उन्हें चाटने के लिए मना थोड़े ही किया है.”

लोकेश ने उन दोनों को रोका. “चलो ठीक है. मैं अपनी गलती मानता हूँ, तुम लोग मत शुरू हो जाओ.”

“देखा अंकल, मेरे पापा कितने अच्छे है.”

ये कहकर उसने लोकेश के होंठों पर एक लम्बा चुंबन दिया. फिर उठी और अपनी दादी के पास बैठ गई.

“वैसे आंटी मेरी दादी भी बुरी नहीं है, बहुत प्यारी है.” और इस बार मधुजी को उसका चुंबन प्राप्त हुआ.

“और मैं?” चारु बोली.

“मम्मा, आप दुनिया की सबसे अच्छी मम्मा हो.” और चारु के भी होठ चूम लिए.

लोकेश बोला, “कुणाल, जाकर अपने दादाजी को ले आओ, तब तक हम खाना लगाते हैं.”

कुणाल चला गया और मधुजी, चारु और मान्या किचन में जाकर खाना परोसने लगे. लोकेश ने आशीष से पूछा कि क्या वो कुछ पीना पसंद करेगा, तो आशीष ने उसे मना कर दिया. कुछ ही देर में मधु जी के पति भी आ गए और तीनों बैठे बातें करते रहे. कुणाल और परेश अपने मोबाइल पर ही व्यस्त थे. खाना परोसने के बाद उन्हें बुलाया गया और सबने बहुत चाव से भोजन किया. पता चला कि खाना लोकेश के ही एक होटल से मंगाया गया था. पूछने पर लोकेश ने उन्हें होम डिलीवरी का नंबर दिया और उन्हें बताया कि कल तक वो उन्हें कूपन देंगे जिसपर उन्हें २०% की छूट भी मिलेगी. लोकेश के पिता को आशीष ने बताया कि उसके पिता उन्हें कल मिलने आएंगे और ये सुनकर उनका चेहरा खिल उठा. सम्भवतः, सबके व्यस्त होने के कारण वे अकेलेपन से भी बीमार हो रहे होंगे.

खाने के बाद कुणाल अपने दादा को उनके कमरे में ले गया. फिर सामान समेटने के बाद सब लोग आज रात के कार्यक्रम के लिए मधुजी के कमरे में चले गए. कमरा देखकर आशीष और सुनीत ठगे से रह गए. ये कोई सामान्य कमरा नहीं था. पहले तले पर ये कमरा कोई तीन सामान्य शयनकक्षों के बराबर रहा होगा. ये समझिये कि एक हॉल था. उसके बीचों बीच जो बिस्तर था उसकी बनावट भी भिन्न थी. चार बड़े पलंग पलंग इस प्रकार से लगे हुए थे कि उनके बीच का स्थान खाली था. चूँकि राजसी पलंग थे तो उनके बीच बहुत स्थान रिक्त था. वहां पर एक टेबल और २ कुर्सियां रखी हुई थीं. आशीष और सुनीति एक दूसरे को अचरज से देख रहे थे. उन्हें मधु जी के अपने पास आकर खड़े होने का आभास हुआ.

“पहले यहाँ चार कमरे थे. पर जब हमें लगा कि हमें साथ ही रहना है तो हमने दो कमरे हटाकर उन्हें भी इसमें ही जोड़ लिया. लोकेश के होटल का अनुभव काम आया और हमने इसे अपने खेलने और सोने का स्थान बना लिया.” मधु जी ने समझाया.

“पर अगर कोई सम्बन्धी देखेगा तो…?”

“हम किसी को यहाँ नहीं आने देते. जैसा आप देख रहे हो, की इसके तीनों दरवाजे अभी भी वैसे ही हैं जैसे कमरे मिलाने के पहले थे. सब अलग दरवाजों से अंदर आते हैं और सब पर नंबर वाला टाला है, तो कोई ताकने झाँकने के लिए नहीं आता. वैसे अतिथियों के कमरे इसके ऊपर वाले तल्ले पर हैं और एक कमरा नीचे भी है. अभी तक किसी प्रकार की समस्या नहीं आयी. समुदाय वाले अवश्य इसके बारे में जानते हैं, पर वे ईर्ष्या ही करते हैं.” मधु जी ने बताया.

तभी चारु आगे आयी और आशीष का हाथ पकड़कर उसे एक ओर ले गयी. एक दरवाजा खोला तो देखा कि बाथरूम था.

“आप तैयार हो जाइये, बाथ रोब वहीँ हैं, उसे पहन लीजियेगा. उसके सिवाय आपको किसी और वस्त्र की आवश्यकता नहीं पड़ेगी.” एक मीठी सी मुस्कराहट से साथ चारु ये कहकर चली गयी. अंदर जाते हुए उसने देखा कि लोकेश सुनीति को भी एक दूसरे दरवाजे की ओर ले जा रहा है.

नहाने के बाद आशीष ने वहां लटका हुआ रोब पहन लिया और कमरे में लौट आया. कमरे की भव्यता उसे अभी भी आष्चर्यचकित कर रही थी. कुछ ही समय में एक और दरवाजा खुला और लोकेश बाहर निकला. एक एक करके सभी लोग बाहर ए और सब ने उसी प्रकार के तौलिये के रोब पहने हुए थे. तभी आशीष ने उस ओर देखा जहां से मधुजी निकली थीं. वस्तुतः एक और भी कमरा था और उन दोनों के बीच कवल कांच की ही दीवार थी. कमरे में प्रकाश था और उसे उसमें कोई बैठा हुआ दिख रहा था. अचानक से वो आदमी खड़ा हुआ और आशीष ने उन्हें पहचान लिया। वे मधु जी के पति थे. उनके अलग कमरे में होने पर उसे आश्चर्य हुआ, पर उनकी तबियत के कारण उन्हें अलग कमरा दिया गया था.

“अब बताओ, किसे क्या पीना है.” लोकेश ने एक कांच की अलमारी खोलकर पूछा, उसमे एक से एक मंहगी शराब की बोतलें थीं और एक छोटा फ्रिज भी था.

मधु जी और चारु ने वाइन पीने की इच्छा की तो सुनीति ने भी वही चुना. लोकेश और आशीष ने एक मंहगी स्कॉच ली और परेश, कुणाल और मान्या ने बियर ली. सब वहीँ बैठे बातें करने लगे. फिर मान्या ने एक बियर ली और कमरे से निकल गई. कुछ देर में उसे अहल कमरे में अपने दादाजी को बियर देते हुए देखा और फिर वो लौट आयी.

पर इस बार वो लौट कर लोकेश की नहीं बल्कि आशीष की गोदी में बैठी. और उसे एक गहरा चुंबन देकर बोली, “अंकल, उस दिन आपकी चुदाई देखकर मुझे बहुत मजा आया था. तो आज की पाकी पहली चुदाई मेरी ही होनी चाहिए.”

चारु ने आपत्ति की, “अरे नहीं, मेरा नंबर पहले आएगा.”

लोकेश ने उसे समझाया, “क्यों बच्ची का दिल तोड़ रही हो. उसे चुदवा लेने दो पहले, तुम फिर आशीष से गांड मरवा लेना, उसके पहले तुम्हारी गांड को हम से से कोई नहीं छुएगा.”

चारु बेमन से मन गयी, पर उसने सोचा कि ये समझौता भी ठीक ही है.”

पर मान्या ने भी अपना तर्क रखा: “मॉम, आप पहले ही अंकल के पापा और उनके लड़कों से चुदवा चुकी हो. प्लीज, मेरी बात का बुरा मत मानो।”

चारु ने उसके पास आकर उसके सिर को चूमा और कहा कि उसे कोई भी आपत्ति नहीं है, वो चाहे तो अंकल से गांड भी मरवा सकती है. आशीष के मन में लड्डू फूट रहे थे कि इतनी सुंदर और कमसिन लड़की की चुदाई का उसे अवसर म्मिल रहा था. उसने सुनीति की ओर देखा तो परेश को उसकी बगल में बैठा हुआ पाया और दोनों प्रगाढ़ चुंबन में लीन थे. लोकेश अपनी माँ को चूम रहा था और वहीँ कुणाल ने भी अपनी माँ चारु को जकड रखा था. चारु को देखकर आशीष के मन में एक क्षण के लिए ईर्ष्या हुई, पर मान्या ने उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया.

मान्या उसकी गोद से उतरी और उसके रोब को खोलते हुए उसके लंड से खेलने लगी. इतनी कमसिन लड़की को गोद में बैठाने से आशीष का लंड खड़ा तो हो ही चुका था और उसे अधिक प्रलोभन की आवश्यकता नहीं थी. परन्तु मान्या का ऐसा मानना नहीं था. उसने आषीषे के सामने बैठते हुए उसके लम्बे मोटे लंड को अपने मुंह में लिया और उसे चूसने में व्यस्त हो गयी.

“मुझे आपके जैसे मोटे लंड बहुत अच्छे लगते हैं अंकल. और मम्मा ने तो मुझे इसे अपनी गांड में लेने की भी अनुमति दे दी है. आज मुझे बहुत मजा आने वाला है.” मान्या अपना मुंह लंड पर से हटाकर बोली.

“तुझे कब चुदवाने में मजा नहीं आता छुटकी ?” ये कुणाल था जिसने अपनी माँ के मोटे चुचों पर से अपने मुंह को हटाकर ये व्यंग्य किया था.

“आप जैसे अच्छे भाई हों तो चुदाई में मजा तो आएगा ही. आप क्यों जल रहे हो? आपको तो मम्मा मिली हुई हैं न?” ये कहकर मान्या ने दोबारा आशीष के लंड को निगल लिया. आशीष ने अपने चारों ओर चल रहे खेल को देखा। कुणाल अब चारु के रोब को हटा चूका था और चारु के मोटे मोटे स्तन लाल हो गए थे. लगता है बेटे ने माँ को अच्छे से दुहा था. और अब उसकी चूत में मुंह डाले उसे खाने का प्रयास कर रहा था. चारु उसके बालों को सहला रही थी और उसका उत्साह भी बढ़ा रही थी.

“खा ले मेरी चूत कुणाल. सुबह से इसका किसी ने इसका ध्यान नहीं रखा. अच्छे से चाट और खा जा इसे.”

कुणाल बिना कुछ कहे अपने कार्य में लगा रहा. आशीष ने फिर मधुजी की ओर देखा तो उनका भी रोब उतरा हुआ था और उसे इस आयु में भी उनके इतने गठे शरीर को देखकर कुछ अचरज हुआ. सम्भवतः उनकी दिनचर्या में चुदाई का इतना अधिक योगदान था कि उनका शरीर बुढ़ापे को धोखा दे रहा था. आशीष को उसकी सास गीता की याद आ गयी. मधु जी और वो लगभग एक ही आयु की थीं और दोनों अभी भी किसी भी जवान लड़की को ईर्ष्या करवा सकती थीं. और जवान लौंडे अभी भी उन्हें देखकर आहें भरते थे. इस मामले में मधु जी आगे थीं, क्योंकि उन्हें नए और जवान लंड आसानी से प्राप्त थे जबकि गीता को ऐसा अवसर प्राप्त नहीं था. पर उनके यहाँ आने के बाद ये स्थिति बदलने वाली थी.

मधु जी भी अपने बेटे लोकेश के लंड को चूस रही थीं और जैसा आशीष का अनुमान था वो भी एक अच्छा तगड़ा लंड था. सुनीति की चूत में अब परेश मुंह घुसाए पड़ा था और सुनीति अपनी प्रवृत्ति के अनुसार ऑंखें बंद करके उसके इस पराक्रम का आनंद ले रही थी. उसका लंड कुछ तनके छिटका तो उसका ध्यान वापिस मान्या की ओर आया. लड़की की लंड चूसने की प्रतिभा विलक्षण थी. मान्या ने उठकर अपना रोब निकाला और फिर आशीष को भी नंगा कर दिया. फिर उसने कांच की दीवार को देखकर हाथ हिलाया और अपनी चूत को आशीष के लंड पर रखा और एक ही झटके में पूरा अंदर उतार लिया. आशीष ने कांच की ओर देखा तो मधु जी के पति वहां खड़े हुए कमरे में चल रहे संग्राम को देख रहे थे, उन्होंने भी अपने कपड़े निकाले हुए थे और उन्हें देखकर लगता था कि इस समय वे अपने लंड को मुठ मार रहे थे.

“क्या मस्त लंड है अंकल आपका, बिलकुल चीरकर अंदर गया है. मजा आएगा आज चुदाई में.” मान्या ने सीत्कार लेकर बोला तो आशीष का सीना फूल गया.

“बेटा कुणाल, अब बहुत खा लिया तूने मेरी चूत को, अब पेल भी से अपना लंड, सुबह से प्यासी हूँ. कुणाल को अपनी माँ की इस लालसा का पता था. उन्हें दिन में न जाने कितनी बार चुदने की इच्छा होती थी. अगर उनका बस चलता तो वो लाइन में लोगों को लगाकर चुदवाती. चारु की इस बात से आशीष ध्यान उस ओर गया था और उसने कुणाल को चारु की चूत पर अपने लंड को रखते हुए देखा. उसे एक बार फिर न जाने क्यों कुणाल से ईर्ष्या हुई. पर उसके लंड पर भी चारु की बेटी जो उठक बैठक कर रही थी उसके कारण वो अधिक देर तक उस ओर न देख पाया और उसने मान्या के मम्मों को पकड़ा और उन्हें मसलने लगा.

“हाँ अंकल, ऐसे ही दबाओ, काटो, काटो भी.” इतनी सीधी दिखने वाली लड़की की ऐसी इच्छा से आशीष ने फिर आश्चर्य किया और अपने दातों में लेकर एक निपल को हल्के से काटा और फिर दूसरे को. उछलती हुई मान्या का शरीर थरथराने लगा. आशीष के अपने लंड और जांघों पर कुछ तरल सा बहता हुआ अनुभव हुआ तो वो जान गया कि मान्या की चूत रस छोड़ रही है. अब तक स्थिर रहकर वो मान्या को ही पूरी मेहनत करने दे रहा था, पर अब उसे लगा कि उसका भी कोई कर्तव्य है.

वो अपने शक्तिशाली कूल्हे उठाकर मान्या की चूत में लंड को गहराई तक धकेलने लगा. एक ओर से मान्या नीचे आती तो आशीष उसकी चूत में लंड पेलकर उसे ऊपर उछाल देता. मान्या की इन्द्रियां शिथिल होने लगीं. उसके पिता और भाई भी उसे मस्ती से चोदते थे, पर वो नए लंड के लिए सदैव उतावली रहती थी. और आशीष ने जिस प्रकार से अब धक्के आरम्भ किये थे, मान्या की मन की इच्छा पूरी हो रही थी. उसकी कसी चूत को आशीष का लंड बहुत अच्छे से चोद रहा था. उसकी चूत से बहता हुआ पानी आशीष की जांघों पर फ़ैल रहा था. अचानक ही उछलते हुए उसका शरीर अकड़ा और कांपने लगा. इस बार वो फिर से झड़ रही थी और कुछ निढाल सी हो गई. उसने उछलते रहने का प्रयास तो किया पर उसकी शक्ति क्षीण हो चली थी.

आशीष ने उसकी दुविधा को समझा और अपने लंड को बाहर निकाले बिना ही उसे अपनी भों में लिया और पलट कर लिटा दिया और उसके ऊपर चढ़ाई करते हुए द्रुत गति से उसे छोड़ने लगा. मान्या की ऑंखें बाहर निकल पड़ीं, पर उसने आशीष को और जोर से चोदने के लिए कहा. आशीष ऐसे अवसर को खोने वालों में नहीं था, और उसने लम्बे सटीक धक्कों से मान्या की चूत का बैंड बजाना आरम्भ कर दिया. इसके कारण जब तक आशीष झड़ा जो लगभग दस मिनट रहे होंगे, मान्या दो या तीन बार और झड़ गयी. अंत में आशीष ने एक चिंघाड़ के साथ मान्या की चूत में अपना रस छोड़ दिया और उसके ऊपर लेट गया.

जब उसे कुछ समय का ज्ञान हुआ तो उसने अपने आसपास देखा. कुणाल अपनी माँ चारु की चुदाई में व्यस्त था और जवान होने के कारण अभी तक उसे चोद रहा था. सुनीति अब घोड़ी बनी हुई थी और परेश अपने विशाल लौड़े से उसे पीछे खड़ा होकर चोद रहा था. मधु जी भी लेटकर चुदवा रही थीं और लोकेश की गति से लगता था कि वो भी अब झड़ने के निकट था. और आशीष के देखते ही देखते लोकेश ने भी अपनी माँ की चूत को लबालब कर दिया. अपने लंड को बाहर निकालकर उसने मधुजी को प्रस्तुत किया और उन्होंने चाटकर उसे साफ किया और फिर अपनी चूत में उँगलियाँ डालकर उसमे से रस निकाला और अपने चेहरे पर मल लिया.

कुणाल ने अपनी माँ के सामने हाथ डाल दिए और चारु की चीत्कारों ने उसे अपने शिकार पर लेकर नीचे धकेल दिया. उसके रस से चारु की चूत पूरी भर गई. अंत में परेश ने सुनीति की चूत को अनुग्रहित किया और उसमे अपना कामरस छोड़ दिया. सभी पुरुष बैठकर हांफने लगे और महिलाएं अपनी चुदाई के सुख में लीन एक मुस्कराहट के साथ लेटी रहीं. सब अधिक आयु की होने के बाद भी सबसे पहले मधु जी ही उठीं और आकर मान्या की चूत के सामने बैठीं और उसे चाटने लगी. फिर उन्होंने अपनी जीभ से उसकी चूत से आशीष का रस खींचा और मुंह से निकालकर अपने चेहरे और वक्ष पर मल लिया. यही कार्य उन्होंने सुनीति और चारु की चूत के साथ भी किया. फिर चारु ने उनकी चूत से रस पिया और अपने चेहरे पर मला.

“मम्मी जी की जवानी का यही रहस्य है, वो इस रस को कभी व्यर्थ नहीं जाने देतीं.” चारु ने अपनी सास के होंठ चूमकर सुनीति को ज्ञान दिया.

“चलो, एक ड्रिंक और लेते हैं फिर इस बार साथी बदलकर गांड मारने का कार्यक्रम करेंगे.”

“पापा, नहीं, मम्मा ने मुझे अंकल से गांड मरवाने की अनुमति दी है. आप बदलो साथी, मेरे लिए तो इस बार अंकल ही रहेंगे. मैं अगली बार बदलूंगी.”

“यार ये लड़की.” लोकेश ने सिर हिलाया. “चल ठीक है. हम बदल लेंगे.”

कुणाल और परेश उठकर ड्रिंक बनाने लगे. मान्या ने एक बियर ली और अपने दादाजी को देने नंगी ही चली गई.

.......भाग दो में आगे
 
दूसरा घर: सुनीति और आशीष राणा

अध्याय २.३

भाग २

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मधु जी का घर:

“चलो, एक ड्रिंक और लेते हैं फिर इस बार साथी बदलकर गांड मारने का कार्यक्रम करेंगे.”

“पापा, नहीं, मम्मा ने मुझे अंकल से गांड मरवाने की अनुमति दी है. आप बदलो साथी, मेरे लिए तो इस बार अंकल ही रहेंगे. मैं अगली बार बदलूंगी.”

“यार ये लड़की.” लोकेश ने सिर हिलाया. “चल ठीक है. हम बदल लेंगे.”

कुणाल और परेश उठकर ड्रिंक बनाने लगे. मान्या ने एक बियर ली और अपने दादाजी को देने नंगी ही चली गई.

अब आगे.....

मान्या ने आने में कुछ अधिक ही समय लगा दिया था. न जाने क्यों आशीष उसकी राह देख रहा था. सुनीति उसके पास आकर बैठी और उसके कान में फुसफुसाते हुए बोली, “बहुत देर लगा रही है तुम्हारी मान्या.”

आशीष झेंप गया. पर उसने सुनीति को भी छेड़ते हुए कहा, “तुम्हें भी तो नए नए लंड मिल रहे हैं, तो किस बात की शिकायत कर रही हो.”

सुनीति: “हाँ, अब देखें मेरी गांड के लिए किसे चुनती हैं मधु जी. जो भी हो, इन सबके भी लंड हमारे घर वालों से कम नहीं हैं.”

आशीष: “वो तो मैंने भी देखा.”

तभी मान्या उछलती हुई कमरे में आई. उसे देखकर ही पता चल गया कि उसे देर क्यों हुई थी. उसके होंठों के कोने पर सफेद द्रव्य था जो अवश्य ही वीर्य था. वो मधुजी के पास गई और उन्हें भी दिखाया.

मधुजी: “वाह रे मेरी गुड़िया रानी. दादाजी का रस पीकर आयी है. वैसे वो कैसे हैं ये सब देखकर?”

“दादी, आज तो दादाजी ने कमाल कर दिया. पुरे दस मिनट लगाए झड़ने में. मुझे लगता है, कि वो पुराने वाले दादाजी लौटने ही वाले हैं.”

मधुजी ने आशीष और सुनीति की ओर देखकर कहा, “मान्या का उद्घाटन उन्होंने ही किया था. हालाँकि लोकेश की बड़ी इच्छा थी, पर मान्या ने उन्हें ही चुना था. पिछले साल से न जाने क्यों वे बहुत कमजोर से हो गए हैं. पर मान्या आज भी उनके लंड से रस निकाल ही लेती है, जो मैं और चारु चाहकर भी नहीं कर पाते।”

आशीष ने अब दृढ निश्चय किया कि वो जीवन से उनके खोये हुए स्वास्थ्य के लिए उचित व्यवस्था करने का आग्रह करेगा. मान्या ने जाकर अपनी माँ को चूमकर उसे दादाजी का रस पीला दिया और आकर आशीष की गोद में बैठ गयी.

“आंटीजी, दादी अब आपको बताएंगी कि आगे क्या करना है, पर मेरा तो अंकल से गांड मरवाना तय है.” सुनीति ने मधुजी की ओर देखा तो वो मुस्कुरा रही थीं.

“मैं चाहूंगी कि इस बार परेश अपनी माँ की गांड मरे, और कुणाल मेरी. और मेरा बेटा लोकेश जो इतनी देर से सुनीति के लिए लार टपका रहा है, उसे सुनीति को गांड मारने का अवसर दिया जाये. किसी को कोई आपत्ति?”

भला आपत्ति का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था. लोकेश ने आकर सुनीति का हाथ पकड़ा और उसे दूसरे बिस्तर पर ले गया. परेश चारु और कुणाल मधुजी के बिस्तर पर जाकर उनके सामने खड़े हो गए. आशीष ने एक दृष्टि साथ वाले कमरे पर डाली तो वहां अँधेरा हो चुका था.

मान्या उठी और एक ओर चली गयी, लौटी तो उसके हाथ में जैल की तीन ट्यूब थीं. उसने एक एक ट्यूब अपने पापा लोकेश और भाई परेश को पकड़ाईं और एक अपने हाथ में लिया आशीष के पास आ गयी.

“अंकल, आपका लंड बहुत मोटा है, बिना इसके मेरी गांड फाड़ देगा.” उसने आशीष से कहा.

आशीष ने उसके चेहरे को अपनी ओर खींचा और उसे एक गहरा चुम्बन दिया, “ऐसा मैं कभी नहीं होने दूंगा. और इसका प्रयोग मुझे अच्छे से आता है.”

“ये मम्मा ने समझाया है मुझे.” मान्या ने बड़े गर्व से बताया. वो आज तक बिना जैल के किसी को अपनी गांड में नहीं घुसने देतीं. पापा को भी नहीं.”

चारु ने बताया: “ ओह हो हो! जैसे मेरी हर बात मानती है ये.”

इससे पहले कि माँ बेटी का एक और वाक्युद्ध प्रारम्भ हो, लोकेश ने कहा, “इस विषय में हम बाद में बात करेंगे. अभी तो सुनीति जी की गांड का स्वाद लेना है.” ये कहते हुए लोकेश ने सुनीति, जो कि घोड़ी का आसन ग्रहण कर चुकी थी, के नितम्ब फैलाये और उसके बीच में भूरे खुरदुरे छेद को खुलने का अवसर दिया. गांड के छेद में अपनी लार की एक धार छोड़ते हुए लोकेश ने उसने अपना मुंह घुसा दिया और उसे चाटने में व्यस्त हो गया.

“मेरे पापा इतनी अच्छी गांड चाटते हैं अंकल कि आंटी सब कुछ भूल जाएँगी.”

“हम्म, तो मैं भी तो देखूं कि तुम्हारी गांड का कैसा स्वाद है.” आशीष ने उसे छेड़कर कहा.

“अंकल, मेरी जैसी गांड आपको दुनिया में नहीं मिलेगी. एकदम कसी हुई और हमेशा लौड़े के लिए तत्पर.”

“हम्म्म, तुम्हारी बात सुनकर मुझे अपनी बेटी अग्रिमा की याद आ गयी. उसे भी अपनी गांड पर इतना ही गर्व है.”

“अगली बार मैं आपके घर आउंगी उससे मिलने, फिर हम आपको दोनों का अंतर बताने का अवसर देंगे. पर अभी तो आप मेरी गांड पर ध्यान लगाइये.” मान्या ये कहकर घोड़ी के आसन में आ गयी और आशीष को मुस्कुराकर पीछे मुड़कर देखने लगी. आशीष को इससे अधिक आमंत्रण की आवश्यकता नहीं थी. उसने मान्या की गांड फैलाई और अपनी जीभ उसमे घुसा दी और उसे अंदर घुमाने लगा.

मधु जी ने कुणाल के लंड को अपने मुंह में लिया और चूसने में व्यस्त हो गयीं.

“ओह, दादी. तुम जैसा लंड चूसने वाली आज तक नहीं मिली.” कुणाल ने उनसे कहा.

“अभी अगर तेरी माँ चूसेगी, तब तू उसे भी यही कहेगा. और जब भी कोई समुदाय की औरत चूसती है, तब भी यही कहता है. झूठ उतना कह जितना पकड़ा न जाये.”

“अरे दादी, आप कहाँ बात पकड़कर बैठ गयीं. मुझे लंड चूसने वाली हर औरत प्यारी लगती है. इसमें मेरा क्या दोष?”

आशीष ने धीमे स्वर में मान्या से पूछा, “तुमने सबके लिए जैल की ट्यूब लायी, अपनी दादी के लिए क्यों नहीं?”

“उन्हें पसंद नहीं. उनकी गांड वैसे भी इतने लौड़े खाकर बिलुकल खुल गयी है. जैल लगाने से उन्हें बिलकुल भी मजा नहीं आता। अभी देखना जब आप उनकी गांड मरोगे तब आपको पता लग जायेगा.” ये सुनकर आशीष का लंड बल्लियों उछाल मारने लगा.”

“और तुम्हारी मम्मा की गांड मिलेगी आज?” कुछ उत्सुकता से आशीष पूछ ही बैठा.

“ये तो आप के ऊपर निर्भर है, मम्मा तो सुबह से इसी आस में थीं. मैंने उनका नंबर काट दिया. पर आपका नंबर जरूर लगेगा. पर पहले मेरी गांड का तो मजा ले लो अंकल.”

आशीष अपनी जीभ फिर से मान्या की गांड में घुमाने लगा. और मान्या भी अपनी गांड उछाल उछाल कर इसका आनंद लेने लगी. सुनीति की गांड को अब तक लोकेश भली प्रकार से चाटकर चिकना कर चुका था. उसने इस बार गांड खोली और ट्यूब से भरपूर मात्रा से सुनीति की गांड भर दी. सुनीति ने अपनी गांड को सिमटाया और खोला जिसके कारण जैल अच्छे से गांड में चला गया. लोकेश ने अपने लंड को सुनीति के मुंह के आगे किया तो सुनीति ने निसंकोच उन मुंह में लेकर चाटना शुरू कर दिया. जल्दी ही लोकेश का लंड अपने पुरे आवेश में आ चुका था.

परेश ने अपने लंड को चारु के मुंह से निकला और उसे भी घोड़ी का आसन लेने के लिए कहा. फिर उसकी गांड फैलाकर ट्यूब में से जैल अंदर डाला और बिना किसी और विचार के अपने लंड को चारु की गांड पर लगाया और एक शक्तिशाली धक्के के साथ एक ही बार में अंदर पेल दिया. धक्के की तीव्रता से चारु थोड़ा आगे की ओर ढुलक गयी पर उसने तुरंत अपने आप को संभाल भी लिया. वो इस प्रकार की चुदाई की आदी थी और जानती थी कि अब उसकी गांड बड़ी ही निर्ममता के साथ मारी जानी है. पर उसे ऐसी ही चुदाई में सुख मिलता था.

“वाह रे मेरे लाल, तूने कर दिया कमाल। मार मेरी गांड अच्छे से, खोल कर रख दे इसे आज फिर. दो दिन से किसी ने इसकी ओर देखा भी नहीं. और तेजी से चोद.” चारु की इस चिल्लाहट ने सबका ध्यान उसकी ओर खींच लिया. बगल के कमरे की भी बत्ती जली और मधु जी के पति कांच के उस ओर से कमरे में चल रहे व्यभिचार को एकटक देखने लगे.

लोकेश ने अपनी पत्नी की चीख का उत्तर देने के लिए सुनीति की गांड पर अपने लंड को रखकर उतना ही भीषण धक्का मारा. सुनीति भी इस प्रहार के लिए अपने आपको तैयार किये बैठी थी और उसे लगा की अगर वो भी चारु के समान चीखेगी और चिल्लायेगी तो वातावरण में कुछ और आनंद व्याप्त होगा. तो उसने भी लोकेश को चीख चीखकर गांड फाड़ने का अनुरोध किया. लोकेश इसके लिए तैयार नहीं था, उसे तो लगा था की इस झटके से सुनीति डर जाएगी और दया की याचना करेगी. पर उसे क्या ज्ञान था की सुनीति के बेटे उसे किस प्रकार से चोदते थे. उसने सुनीति की गांड में तेजी से लंड से हमला करना शुरू कर दिया.

“अंकल, अब मेरा नंबर लगा ही दो, नहीं तो दादी शुरू हुई तो हमारी कोई सुनेगा ही नहीं.” मान्या ने आशीष को समझाया. आशीष ने अपने लंड को मान्या की छरहरी काया के बीच में लुपलुपाते हुए गांड के संकरे छेद पर लंड लगाया और बड़ी शालीनता और प्रेम से उसे अंदर डाल दिया. धीमी गति से कुछ ही समय में आशीष का लंड मान्या की तंग गांड में जाकर खो गया. आशीष अपने लंड को उस गर्म गुफा में चलाने लगा और कुछ ही समय में एक अच्छी गति पकड़ ली. इस पूरे समय मान्या ऐसी चीखें निकाल रही थी मानो ये उसकी गांड में पहली बार लौड़ा गया हो. आशीष को उसका ये खेल जल्दी ही समझ आ गया और उसने बिना संकोच अपनी पूरी शक्ति से उस कसी गांड की अपने लंड से मालिश करना चालू रखा.

मान्या का अपनी दादी के बारे में विचार भी आशीष को पता चल गए जब मधुजी की चीखों ने उन सबको दबा दिया. वो इस प्रकार से चिल्ला किल्ला का कुणाल को अपनी गांड मारने के लिए उत्साहित कर रही थीं कि और कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था. इस आयु में उनके इतने तीव्र स्वर में चुदाई करवाना सच में अचरज था. पर कुणाल ने भी अपनी ओर से कोई पराक्रम नहीं छोड़ा. बिना तेल या जैल के केवल थूक सी गीली की गई गांड उसके उतना ही सुख दे रही थी जितना उसकी माँ और बहन की गांड देती थीं.

कमरे में अब घोड़ी के आसन में चार औरतों की गांड की जोरदार चुदाई चल रही थी. अलग अलग स्वर में चीखती और अधिक तेजी से गांड मारने का आव्हान करने के स्वर कमरे में गूंज रहे थे.

“अंकल, मेरी गांड फाड़ दो. मेरी भाई और पापा भी फाड़ते है, पर हर दिन नहीं. दादाजी, पहले रोज मारते थे मेरी गांड, पर अब नहीं मारते। प्लीज अच्छे से मारो न.”

इसी प्रकार के स्वरों से कमरे का वातावरण अश्लील और वीभत्स हो चुका था. बगल के कमरे की बत्ती फिर बंद हो गई. पर इस कमरे में चुदाई का कार्यक्रम अनवरत चलता रहा. कोई दस से पंद्रह मिनट के अंतराल के बाद एक एक करके लौड़े अपने रस को गांड भरने लगे. आशीष के हिस्से में सबसे कसी गांड आयी थी और उसका रस भी सबसे पहले ही छूटा. लोकेश ने सुनीति की गांड को भरा और फिर परेश ने अपनी माँ चारु की गांड में अपना पानी छोड़ दिया. मधुजी की गांड में पानी सबसे अंत में कुणाल ने छोड़ा. फिर सारे पुरुष एक ओर बैठ गए. परन्तु महिलाएं अपने आसन में बनी रहीं. इसका कारण जब समझ आया तो सुनीति और आशीष के होश ही उड़ गए. कमरे का दरवाजा खुला और मधुजी के पति ने नंगे ही प्रवेश किया. इस समय उनका लंड तना हुआ था और जता रहा था कि वे किसी भी मायने में इस क्षेत्र में उन्नीस नहीं थे.

उन्होंने आगे बढ़ते हुए मधुजी की गांड पर मुंह लगाया और उसे चाटकर साफ किया और मुंह में भरा हुआ वीर्य का मिश्रण लेकर मधुजी के मुंह में छोड़ दिया. मधुजी ने उन्हें एक गहरा चुम्बन देकर रस को ग्रहण किया. फिर वे चारु के पास गए और उसकी गांड में से माल निकलकर चारु के मुंह में डाला और उसने भी उन्हें पूरे जोश से चूमकर रस ग्रहण किया. अगला नंबर मान्या का आया और मान्या को भी वही प्रसाद प्राप्त हुआ. अंत में उन्होंने सुनीति की गांड में से रस निकाला और संकेत में सुनीति से पूछा तो उसने मुंह खोलकर आने हिस्से का रस ग्रहण किया और उन्हें अन्य महिलाओं के समान एक गहरा चुम्बन दिया.

मधु जी के पति अब बैठ गए और मान्या उनके लंड को चूसने लगी. फिर मधु जी और चारु भी इसमें सम्मिलित हो गए. सुनीति कहाँ पीछे रहने वाली थी उसने भी इसमें अपनी भूमिका खेली. पर अथिति होने के कारण उनके लंड से निकला वीर्य का सेवन करने का सौभाग्य सुनीति को ही प्रदान किया गया. इसके बाद कुछ देर बैठे और फिर खड़े होकर अपने कमरे में जाने लगे.

“अच्छा लगा आशीष तुम्हारा साथ हम लोगों को. अब तुम लोग और मजा करो. मधु का ध्यान रखना और इसे अच्छे से चोदे बिना मत जाना.” ये कहकर उन्होंने फ्रिज में से एक बियर निकाली और अपने कमरे में चले गए.

*******

आशीष अभी भी अचम्भे में था. जिस प्रकार मधुजी के पति ने उन सबकी गांड में से वीर्य निकाल कर पिलाया था, वो कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था. उसने अपने सामने मधुजी को खड़ा पाया तो उनकी ओर देखा.

“उन्होंने ये सब तब आरम्भ किया जब उनकी शक्ति क्षीण होने लगी थी. पर इसमें भी उनका प्यार छलकता है. वे हम सबको गांड के रस को पिलाते हैं. हम में से किसी को भी ये पसंद नहीं है, और सम्भवतः ये उनका हमारे प्रति आक्रोश दिखाता है. परन्तु हम उनकी खोई हुई शक्ति को वापिस नहीं ला पा रहे हैं. जिस दिन ऐसा कुछ हुआ, तो वे बदल जायेंगे. मुझे इस बात का अत्यंत दुःख है कि वे हमारे खेल में सम्मिलित नहीं हो सकते. पर सच कहूँ तो उनकी चुदाई के आगे सारी दुनिया से चुदाई भी कम है.”

आशीष: “मैं अपने पिता से अवश्य इसके लिए सहायता लूंगा. न जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि वो सर के पुराने दिन लौटा सकते हैं.”

इतने में ही कुणाल ने पूछा: “दादी, अब क्या सोचा है?”

मधुजी ने उसकी ओर एक आहत दृष्टि से देखा और कहा: “मैं तो आज के लिए तृप्त हो गयी, अब सुबह इनके जाने के पहले एक बार और चुदवा लूंगी। पर आज नहीं.”

मान्या जो अपने दादाजी से अत्यधिक प्रेम करती थी उसने भी आज के लिए मना कर दिया. इस पर मधु जी ने सुझाव दिया.

“अब केवल सुनीति और चारु ही हैं जो आगे चुदवाने की इच्छा रखती हैं तो क्यों न तुम चारों बदल बदल कर इन दोनों की ही डबल चुदाई करो. वैसे भी चारु को अपनी चूत और गांड में एक साथ लौड़े लेने में बहुत आनंद आता है.”

आशीष: “सुनीति का भी यही मन पसंद खेल है. उसे तो अपनी चूत में एक साथ दो लंड लेने में भी मजा आता है.”

मधु जी: “हाँ, मैं इसे अपने लिए कल सुबह के लिए आरक्षित करती हूँ. चारु अपने लिए बताये.”

चारु: “मुझे तो अभी से दो दो लंड मेरी चूत में जायेंगे यही सोचकर मजा आने लगा है. पर मुझे एक चूत और एक गांड में अवश्य ही चाहिए.”

सुनीति ने उसे आश्वासन दिया, “चिंता न करो, तुम्हारी दोनों इच्छाएं पूरी हो सकती हैं. पर पहले चूत में दो लंड ले कर देखो, फिर आगे देखना. वैसे भी हम चारों को बदल बदल कर चोदने वाली हैं, तो हर लंड गांड भी मारेगा और चूत को भी सुख देगा.”

चारों पुरुष इस बात से अत्यंत प्रसन्न हो गए. और अपनी आगे की रणनीति पर विचार करने लगे.

परन्तु सुनीति ने चारु को पास बुलाकर कान में कहा, “चूत में अगर दो लंड लेने हैं, तो अपने बेटों के लेना. वही तुझे शांत कर पाएंगे और उनकी ताल भी मिली रहेगी. मैंने इसके साथ और अपने बेटे के साथ एक बार प्रयास किया था पर इन दोनों की ताल न मिलने से कठिनाई ही हुई थी. मैं इन दोनों को संभाल लूंगी।”

चारु ने बात समझ कर सिर हिला दिया. चारु ने बताया की कैसे जोड़ियां बन रही हैं.

“चूत में दो लंड के लिए मेरे साथ परेश और कुणाल रहेंगे और सुनीति के साथ आशीष जी और आप.” लोकेश को देखकर उसने बताया. “चूत और गांड के लिए जिसे जो स्थान मिले वहीँ लग जाये. मेरे विचार से गांड में मेरे लिए पहले आशीष जी रहेंगे, और स्मिता जी अपने साथी को चुन लें. इसके बाद जिसे अवसर मिलेगा वो लग जाये.”

सुनीति ने अपना चयन बताया, “ कुणाल. कुणाल को पहला अवसर मेरी गांड में, बाद में जैसा चारु ने कहा.”

चारु: “मम्मी जी, आप और मान्या जाने के पहले इनमे से दो लंड चाटकर खड़े करते जाओ.”

मधुजी ने आशीष के लंड मुंह में लिया तो मान्या अपने पापा के लंड पर मुंह लगाकर चाटने लगी. सुनीति ने कुणाल और चारु ने परेश के लौडों को खड़ा करने का दायित्व उठाया. अब दो बार झड़े लंड इतनी सरलता से तो खड़े होने वाले थे नहीं, हालाँकि परेश और कुणाल के लौड़े जल्दी ही पूरे आक्रोश में आ गए. सुनीति ने चारु से कहा कि वो चारु को इस आसन के लिए सहायता करेगी जिससे उसे कोई चोट न लगे.

ये कहते हुए उसने परेश को नीचे लेटने के लिए कहा और उसके लेटने के बाद सुनीति ने ट्यूब लेकर बहुत सारा जैल चारु की चूत में अपनी उँगलियों से लगा दिया. फिर उसे परेश के लंड पर बैठकर अपने अनुसार चूत में लेने को कहा. उसने ये भी कहा कि इस आसन में उसकी पीठ परेश की ओर रहना चाहिए. चारु ने सामान्य रूप से परेश के लंड को अपनी चूत में समा लिया और ठहर गयी.

ये देखकर अब लोकेश और आशीष के भी लंड तन गए. लोकेश विशेषकर इस पूरे वृत्तांत को ध्यान से देख रहा था. जब मधुजी ने देखा कि उनका कार्य सम्पन्न हो गया है तो उन्होंने मान्या को लिया और अपने पति के कमरे में चली गयीं.

अब सुनीति ने कुणाल को संकेत किया कि वो अपने लंड को अपने भाई के लंड के बगल से अपनी माँ चारु की चूत में डाले, पर उसे ये भी समझाया की अधिक जल्दी न करे अन्यथा लंड या चूत के छिलने की संभावना रहेगी. और इसीलिए जैल का प्रयोग किया है कि कठिनाई न हो. कुणाल ने एक सधी हुई धीमी गति से अपने लंड को चारु की चूत पर लगाया और उसे भीतर धकेलने लगा. आशीष ये खेल कई बार देख चुका था सुमति के साथ पर उसे आज भी स्त्री की चूत की बनावट पर अचरज होता था जो इस प्रकार से फ़ैल जाती है. और लोकेश! वो तो किंकर्तव्यविमूढ़ था, उसकी ऑंखें आश्चर्य ने फैली हुई थीं और मुंह खुला हुआ था. धीरे धीरे कुणाल ने भी अपने लंड को चारु की चूत में परेश के लंड के बगल में डाल ही दिया.

चारु आज अपनी चूत को जितना भरा हुआ अनुभव कर रही थी, उसका कोई पर्याय नहीं था. सुनीति ने अब दोनों लड़कों को आगे की प्रणाली समझाई। पहली बात ये थी कि उन्हें एक ही साथ दोनों लौडों को अंदर और बाहर करना था, अन्यथा छिलने की संभावना थी. उसने समझाया की चूत और गांड एक साथ मारने और चूत को दो लौडों से चोदने में यही वस्तुतः मुख्य अंतर है. और इसका ध्यान चाहे कितना भी जोश हो पूरे समय रखना होता है. दूसरा ये कि गति दोनों को एक ही रखनी होगी, और इसीलिए बहुत तीव्र गति सम्भव नहीं होती है, बिना समुचित अनुभव के. पर आनंद की ऊंचाई ऐसी होगी जो आज तक इन तीनों ने नापी नहीं होगी. फिर उसने उन्हें ये भी समझाया कि जब वो बताये तब वे रुक जाएँ क्योंकि पहली बार के बाद इसमें चोटिल होने की संभावना बहुत रहती है.

ये कहकर सुनीति ने उसे अपने कार्यक्रम को आरम्भ करने की आज्ञा दी. उसने देखा तो उसके दोनों ओर लोकेश और आशीष आकर खड़े हो चुके थे.

“बस कुछ समय दो, एक बार ये चुदाई ठीक प्रकार से करने लगें, फिर आप दोनों का ही नम्बर है मेरी चूत में.”

पर दोनों भाई का समीकरण अच्छा था और उन्होंने एक मध्यम लय में अपने लौडों से एक साथ चारु की चुदाई करने में सफलता पाई. सुनीति ने आशीष को लेटने के लिए कहा और उसके लंड पर अपनी चूत लगाकर अंदर ले लिया. फिर उसने लोकेश को संकेत दिया और लोकेश ने जिस प्रकार से देखा था, उसी प्रकार अपने लंड को भी सुनीति की चूत में उतार दिया.

“अब दोनों मुझे चोदो पर ध्यान रहे जो मैंने कहा है.” लोकेश और आशीष ने भी एक तय लय पकड़ ली और सुनीति की चुदाई शुरू हो गई. चारु ने जीवन में इस प्रकार के सुख की कल्पना नहीं की था. अद्भुत, अकल्पनीय आनंद के वो वशीभूत थी. उसके मुंह से केवल आहें और सिसकारियां ही निकल रही थीं. पर उसे सुनीति द्वारा दी गई निर्देशों का अर्थ भी समझा में आया. अगर उसके दोनों पुत्र इससे अधिक गति से चुदाई करते तो ये तय था कि उसे कठिनाई भी होती और चूत भी छिल जाती.

मंथर गति से ये दोनों तिकड़ी कुछ साथ आठ मिनट और इसी आसन में चुदाई करते रहे. इसके बाद सुनीति ने कहा कि अब आसन बदलना होगा नहीं तो चारु की चूत चरमरा जाएगी. आशीष और कुणाल ने अपने लंड बाहर निकाल लिए और फिर चारु और सुनीति ने आसन बदला और इस बार उनका मुंह नीचे लेटे हुए चोदू की ओर कर लिया. आगे झुकते हुए उन्होंने अपनी गांड को अगले आक्रमण के लिए प्रस्तुत किया.

आशीष ने अपने लंड को चारु की गांड पर लगाकर बड़े प्रेम से उसकी गांड में उतार दिया. अब उसका और परेश के लंड के बीच केवल चूत की एक पतली सी झिल्ली ही थी. परेश आशीष के लंड के अंदर जाने तक रुका रहा और फिर आशीष और परेश ने एक साथ तालमेल बैठते हुए चारु की चूत और गांड दोनों में लंड पेलना आरम्भ कर दिया. चारु को इस प्रकार से चुदवाने में बहुत मजा मिलता था और आज भी उसे वही आनंद प्राप्त हो रहा था. सुनीति की गांड में कुणाल ने अपना लंड पेला हुआ था और अपने पिता के साथ सुनीति को डबल चुदाई का आनंद दे रहा था. सुनीति और चारु की आनंदकारी चीखों ने कमरे को हिला रखा था. दोनों अधिक गहराई और तीव्रता से चोदने के लिए उत्साहित कर रही थीं. और पुरुष गण अपने सामर्थ्य के अनुसार उनकी ये इच्छा पूरी भी कर रहे थे.

कुछ मिनट के बाद साथी बदलने का कार्य हुआ और इस बार परेश ने सुनीति की गांड मारी तो आशीष ने चारु की चूत. वहीँ लोकेश ने अपनी पत्नी चारु की गांड में लंड पेला और सुनीति की चूत में कुणाल पिल गया. कोई दस मिनट की इस भीषण हृदयविदारक चुदाई के बाद सब थकने लगे और एक एक करके सबने अपना रस छोड़ दिया. हफ्ते हुए तक चूर पुरुष एक एक करके ढेर हो गए. वहीँ चारु और सुनीति एक संतुष्ट मुस्कान के साथ बिस्तर पर ही लुढ़क गयी.

आठ दस मिनट तक अपने आपको समान्य करने के बाद कुणाल और परेश उठे और उनके बाद आशीष और लोकेश भी खड़े हो गए. समय देखा तो रात के दो बज रहे थे. लोकेश ने अपने और आशीष के लिए स्कॉच और अन्य सबके लिए बियर प्रस्तुत की. बातों के साथ ड्रिंक समाप्त करके बत्ती बुझाकर सब वहीँ लेट गए और धीरे धीरे निद्रा की गोद में चले गए.

*********

देर से सोने के कारण सुबह सब देर से उठे. सुनीति और आशीष सबके साथ निचे गए तो देखा कि मधुजी, उनके पति और मान्या पहले ही वहां नाश्ते के लिए बैठे हैं. सबने बैठ कर नाश्ता किया. आशीष ने मधु जी के पति से कहा कि उसके पिता जीवन उनसे आज बात करेंगे और उनसे उनका फोन नंबर ले लिया. नाश्ते के बाद सुनीति ने घर लौटने की अनुमति चाही. उसे लगा कि मधुजी की इच्छा न होते हुए भी उन्होंने स्वीकृति दे दी.

सुनीति उनके पास गई और उनसे बोली, “आप इस विषय में अधिक चिंतन न करें. आप जब चाहें हमें बुला लें, या स्वयं चली आएं. देर से उठने के कारण आपकी सेवा का अवसर नहीं मिल पा रहा है. आप कृपया समझें.”

मधु जी ने सुनीति को गले से लगा लिया और फिर आशीष को. सब एक दूसरे से ऐसे मिले जैसे न जाने कितने वर्षों की पहचान हो. इसके बाद सुनीति और आशीष अपने घर के लिए निकल पड़े.

रास्ते में बात करते हुए आशीष ने कहा, “मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि जिस परिवार से हम पहली बार मिले हैं, वो इतनी मिठास और अंतरंग रूप से मिला है. ऐसा लगा ही नहीं कि हम इससे पहले अपरिचित थे.”

सुनीति: “ये बात मुझे भी बहुत आश्चर्यजनक लगी, परन्तु हो सकता है कि समुदाय की मुखिया होने के कारण ये व्यव्हार हो. अन्य परिवारों से मिलने के बाद ही कुछ सोचना उचित होगा. वैसे तुमने मधु जी के पति के बारे में क्या सोचा है.”

“हालाँकि ये दूसरे के घर का मामला है, पर मुझे लगता है की एकाकीपन उन्हें चुभ रहा है. मधुजी समुदाय के कार्यों में व्यस्त, अन्य सभी अपने कार्यों में. उनका जब स्वास्थ्य गड़बड़ाया होगा, तब भी किसी ने उन पर विशेष ध्यान नहीं दिया. मुझे लगता है कि अगर उन्हें दो तीन सप्ताह के लिए वहां से निकाल लिया जाये तो न केवल उन्हें स्वास्थ्य लाभ होगा, बल्कि घर के अन्य सदयों को भी उनकी अनुपस्थिति और कमी का अनुभव होगा। ये भविष्य के लिए अच्छा होगा.”

सुनीति ने विचार किया तो उसे ये ठीक लगा. इतने में वे घर पहुँच गए. घर पर सबने उनके कल के अनुभव के बारे में पूछा तो आशीष ने सुनीति ने संक्षेप में पूरा वृत्तांत सुनाया. जीवन से आशीष ने बात की और उन्हें सर का नाम और नंबर दिया. फिर उसने अपने विचार रखे और जीवन से कहा कि वो जैसा उचित समझें, वैसा ही करें. जीवन आशीष की इस योग्यता को भली भांति जानता था. उसने जीवन को ये बता दिया था कि वो स्वयं क्या चाहता है पर निर्णय जीवन पर छोड़ा था.

सुनीति का घर :

जीवन अपने कमरे में गया और फोन लगाया, “हैलो, गिरिधारी लाल जी? मैं आशीष का पिता जीवन बात कर रहा हूँ. नमस्कार.”

......भाग तीन में आगे है.
 
दूसरा घर: सुनीति और आशीष राणा

अध्याय २.३

भाग ३

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सुनीति का घर :

जीवन अपने कमरे में गया और फोन लगाया, “हैलो, गिरिधारी लाल जी? मैं आशीष का पिता जीवन बात कर रहा हूँ. नमस्कार.”

जीवन ने गिरिधारी लाल जी से कुछ दस मिनट बात की और इतने में ही वे उन्हें गिरि के नाम से सम्बोधित करने लगे. दोनों नए मित्रों में कुछ बात हुई और जीवन ने उनसे कहा कि वे शाम को मिलने आएंगे और आगे का कार्यक्रम तभी तय करते हुए अन्य परिवारजनों को भी बता देंगे. फिर उन्होंने एक और फोन मिलाया और वहां भी कोई दस मिनट बात की.

नीचे लौटे तो देखा कि सलोनी काम कर रही थी और भाग्य उसका हाथ बँटा रही थी. भाग्या का पेट अब निकलने लगा था और उसे कुछ कठिनाई भी अनुभव होने लगी थी. इसीलिए सलोनी उसे अब अधिक कुछ भी करने नहीं देती थी. सुनीति ने भाग्या की सास से बात की थी और उन्हें समझाया था कि प्रसव तक वो भाग्या को उसकी माँ के ही साथ रहने दे जैसा कि अधिकतर परिवारों में परम्परा है. उसे ये भी बताया कि सूरज जब भी चाहे यहाँ रह सकता है और उसका यथोचित सत्कार और ध्यान रखा जायेगा. साथ ही सुनीति ने भाग्या की सास को भी वहीँ निमंत्रण दिया. अब भाग्या आनंद से अपने माँ बाप के साथ रह रही थी.

मधु जी का घर:

शाम के पाँच बजे जीवन मधु जी के घर के लिए निकले और साढ़े पांच बजे पहुंचे. इस समय गिरि अकेले थे पर छह बजते बजते लोकेश और चारु के सिवाय सब आ चुके थे. मान्या ने चाय पिलाई और फिर उन दोनों को बैठक में बैठा कर सब अपने काम में व्यस्त हो गए. जीवन ने अपना कार्यक्रम गिरि को बताया और गिरि उस पर सहर्ष ही तैयार हो गए. उन्होंने फिर मधु जी को बुलाया और बताया।

मधुजी, “तो आप इन्हें अपने साथ अपने पैतृक गांव ले जाना चाहते हैं?”

जीवन: “जी हाँ. मुझे जाना ही है, तो मैंने सोचा कि इनका साथ होगा तो दोनों का मन लगा रहेगा.” जीवन ने कुछ झूठ बोलते हुए कहा. वो अभी ही तो लौट कर आया था, पर उसे इसमें कोई संकोच नहीं हुआ.

मधुजी: “आप कितने दिनों के लिए जा रहे हैं? कब लौटेंगे?”

जीवन: “पांच छह दिन के लिए. सम्भव है कि लौटते हुए सुनीति के माता पिता भी साथ ही आ जाएँ. चिंता न करें, चालक हमारे विश्वास का है, और गाड़ी भी हम दूसरी लेकर जायेंगे जो इस यात्रा के लिए अनुकूल रहेगी. पर इसके सिवाय भी मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ.”

मधुजी: “अवश्य. आप तो हमारे समुदाय के सदस्य हैं तो मुझे आप पर विश्वास है.”

जीवन: “मैं चाहता था कि अगर आप अनुमति दें तो लौटने के पश्चात् मैं गिरिधारी जी को एक और सप्ताह के लिए हमारे ही साथ रहने के लिए निवेदन कर रहा था. क्या हैं कि हम कुछ इस आयु के मित्रों का एक क्लब बनाये हैं, जिसमे आने से इनका भी कुछ मन बहलेगा और स्वास्थ्य लाभ भी होगा. मुझे विश्वास है की इनकी पताका पहले जैसे ही फिर से फहराने लगेगी.” जीवन ने द्विअर्थी संवाद से मधुजी को सत्य से पहचान करा दी. मधुजी इस कारण के विरुद्ध कुछ भी न कह पायीं.

मधु जी: “अगर इन्हें कोई समस्या नहीं है तो मुझे भी कोई आपत्ति नहीं. और इस कारण हमें भी आपके घर आने का अतिरिक्त कारण मिलेगा.”

गिरि इस बात को सुनकर बहुत प्रसन्न हो गए.

मधुजी: “आप लोग कब निकलना चाहेंगे?”

जीवन: “कल सुबह, ५ बजे.”

मधुजी: “ठीक है, मैं इनके एक सप्ताह के लिए बैग लगा देती हूँ. कुणाल से इनकी दवाइयां भी मंगवा देती हूँ. लेटने पर मैं इन्हें एक और सप्ताह के कपड़े आप के घर पर देने आ जाऊँगी.”

इस के बाद जीवन अपने घर के लिए निकल गए.

सुनीति का घर:

घर पर उन्होंने मिशन की सफलता की घोषणा की और बताया कि कल सुबह पाँच बजे निकलेंगे. आशीष ने अपने ड्राइवर करतार सिंह से कहा कि कल उन्हें जाना है और वो गाड़ी में डीज़ल और आयल इत्यादि जाँच ले. करतार गाड़ी ले कर निकल गया. शाम को सबने आगे आने वाले समय के बारे में बात की. सुनीति ने अपनी माँ से बात की और उन्हें इस बार साथ ही आने की विनती की. गीता ने भी इस बार साथ आने के लिए अपनी सहमति दी. सब लोग एक प्रसन्नता के साथ सोने चले गए.

जीवन का गाँव:

अगले दिन सुबह जीवन घर से रास्ते के लिए नाश्ता एवं खाना बंधवाकर कुछ हल्का सा खाने के बाद पाँच बजे निकले और गिरि को साथ लिया. मधुजी ने गिरि और जीवन दोनों को गले लगाकर सावधानी रखने के लिए कहते हुए यात्रा की शुभकामना दी. उन्होंने ने भी खाने का बहुत सारा सामान दिया। इसके बाद वो यात्रा पर निकल पड़े.

हँसते बोलते, कहते पीते जब वे जीवन के गाँव से पहले पड़ने वाले एक शहर पहुंचे तो करतार ने गाड़ी उनकी पहचान की शराब की दुकान पर रोक दी. जीवन ने करतार को पैसे दिए और कुछ ही देर में करतार ने एक महंगी शराब की दो पेटियां गाड़ी में रख लीं.

“इतनी?” गिरि ने आश्चर्य किया.

“मैं जब पाँच दिन के लिए जाता हूँ तो एक पेटी लेकर जाता हूँ. ये केवल पीने के लिए नहीं बल्कि देने के लिए भी हैं. और इस बार आप भी साथ हो, तो कुछ अतिरिक्त तो लेना बनता ही है.” जीवन ने बताया.

करतार फिर गाड़ी दौड़ने लगा और लगभग तीन बजे वे बलवंत के घर पहुंच गए. बलवंत और गीता ने अत्यंत प्रसन्नता से उन दोनों का स्वागत किया और सभी एक दूसरे के गले मिले. गीता जिस प्रकार से जीवन से मिली उसे देखकर गिरि के मन में ईर्ष्या हुई, पर जब गीता ने वही आलिंगन उन्हें दिया तो उनकी शिकायत दूर हो गई. उन्हें न जाने क्यों ऐसा लगा कि गीता ने हटने के पहले उनके लंड को सहलाया हो. पर उन्होंने इसे निरी कल्पना मानकर भुला दिया. सब घर के अंदर गए. और उन दोनों की आवभगत आरम्भ हो गयी. उनके आने के कुछ ही देर में उनके अन्य तीन मित्रों की पत्नियां भी आ गयीं और चारों मिलकर बतियाते हुए खाने का प्रबंध करने में व्यस्त हो गयीं.

जीवन और गिरि कुछ देर सोने के लिए अपने लिए निर्धारित कमरे में चले गए और पाँच बजे उठकर तैयार होकर बाहर आ गए. अब तक उन सबके बैठने का घर के अंदर के ही आंगन में प्रबंध हो चुका था. पुराने घरों में जैसा होता था, एक ओर प्रवेश था, फिर बड़ा सा आंगन। एक ओर रसोई और अन्न घर इत्यादि. और दो ओर कमरे थे. दो तले के घर में ऊपर तीन कमरे थे तो नीचे एक बैठक और एक कमरा. पिछली बार नीचे के कमरे में चले सम्भोग की याद करके जीवन का लंड अकड़ने लगा. पर उन्हें उनके यहाँ आने का मुख्य प्रयोजन याद आया और उन्होंने गिरि की ओर देखा जो घर का निरखशान कर रहे थे.

“मेरा बचपन इसी प्रकार के घर में पल बढ़ के निकला था. न जाने समय कहाँ चला गया.”

जीवन ने उनकी बात समझ कर कहा, “मैं इसीलिए आपको यहाँ लाया हूँ. आपको अपने बचपन और जवानी में लौटने के लिए. अब बस हमारे खेल में साथ रहिये, आप मस्त हो जायेंगे. आपको कोई दवाई तो नहीं लेनी.”

“मैं कोई दवाई लाया ही नहीं. मुझे ऐसी कोई बीमारी नहीं जिसके लिए मुझे कोई दवाई नितदिन लेनी पड़े. मैं उन सबको वहीँ छोड़ आया हूँ. नाम हैं मेरे पास, अगर अत्यधिक आवश्यकता हुई, तो यहाँ से ले लेंगे.”

जीवन: “ये हुई न बात. थोड़ी देर में मेरे बचपन के साथी भी आने वाले हैं. आप उन्हें बिलकुल अपना भी दोस्त समझें, अगर कोई बात बुरी लगे तो मुझे संकेत कर दें, मैं संभाल लूंगा. पर अब आप पूरा खुल के एन्जॉय कीजिये. समझिये कि आप २० - २२ साल के हैं.”

गिरि के मुंह से निकली उन्मुक्त हंसी ने जीवन का मन जित लिया और उसे विश्वास हो गया कि आशीष और उसकी योजना सफल होगी.

*********

कुछ ही देर में जीवन के अन्य मित्र भी आ गए और सभी लोग एक दूसरे के गले लगकर मिले.

“क्यों बेटीचोद जीवन, इस बार बड़ी जल्दी लौट आया. लगता है गीता भाभी की याद खींच लायी तुझे.” कँवल ने कहा.

जीवन हंस के बोला, “बेटी होती तो तेरी बात सही बैठती. सच बोलूं तो तेरी बीवी की याद ले आयी, पिछली बार बच जो गयी थी मुझसे.”

इतने में कँवल की पत्नी बबिता पकोड़े लेकर आयी. “मैं तो बड़ी आस से आपकी राह देख रही थी, पर आप न जाने किसकी याद में गम थे जो मेरे पास फटके भी नहीं.”

“तो आज की रात आ जाऊँगा, तेरे पति से तो तेरी चुदाई होती नहीं है ठीक से.”

“अरे नहीं भाईसाहब, आज भी हर रात मेरी हड्डियां चटखा देते हैं. पर क्या है न कि आपके दोनों के साथ कुछ अलग ही आनंद है.”

गिरि समझ गए कि ये सब भी सामूहिक चुदाई के पक्षधर हैं. पर इतना खुलेपन की उन्होंने गांव में अपेक्षा नहीं की थी. उनके अन्य मित्र सुशील ने तब तक एक बोतल में से सबके लिए पेग बनाये और एक बोतल पत्नियों को दे दी. उसे लेकर बबिता चली गयी. सबने चियर्स करते हुए अपने पेग से पीना शुरू किया.

“गिरि मेरे मित्र हैं. इन्हें कुछ स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियां हो गयीं थीं. तो मैंने सोचा कि सबसे अच्छे डॉक्टर तो मेरे ये जिगरी ही हैं. तो इन्हें भी साथ ले आया. और ये भी जान लो, कि इन्होने भी अपने परिवार की हर महिला को चोदा हुआ है. न केवल उन्हें बल्कि और न जाने कितनी औरतों की चुदाई की है. स्वास्थ्य के कारण कुछ कमी आ गयी है, तो मुझे आशा है कि तुम सबकी पत्नियां उस समस्या को दूर कर देंगी.”

गिरि को कुछ असहजता लगी कि उनके बारे में ऐसा बताया, पर फिर सोचा कि अगर उनकी सेक्स की इच्छा और शक्ति लौट आयी तो इसमें कोई भी आपत्ति नहीं होने चाहिए. इतने में महिलाएं, अपने ग्लास में पेग बनाकर कुछ मुर्गा और मीट के खाने का भी सामान ले आयीं और अपने अपने पति के साथ बैठ गयीं. गांव के बारे में बातें होने लगीं और गिरि को जैसे अपने जवानी के दिन याद आ गए.

दूसरा पेग जल्दी ही बना लिया गया.

दूसरे पेग का घूंट लेते हुए जीवन ने कहा, “अब गिरि अपने घरेलू चुदाई के बारे में बताएँगे.”

सब चुप हो गए.

गिरि: “मैं और मेरी पत्नी बचपन से ही साथ थे. हम पडोसी थे और कभी भी किसी के मन में ये विचार ही नहीं आया कि हमारा विवाह नहीं होगा. मैं मधु से दो वर्ष बड़ा था. जब मैं अठारह वर्ष का हुआ तो मधु की माँ ने मुझे एक दिन अपने घर पर बुलाया. तब तक मुझे सेक्स के विषय में अधिक ज्ञान नहीं था. हम सब जानते हैं की उस समय इसके बारे में बात भी करना अनुचित समझा जाता था. मुझे मेरी माँ ने ही बताया की आंटी ने किसी कार्य के लिए मुझे बुलाया है. मुझे आज भी उनकी वो मुस्कराहट नहीं भूलती, जब वो मुझे ये कह रही थीं. तो मैं बिना किसी सोच के उनके घर चला गया.”

निर्मला (सुशील की पत्नी) बोल उठी: “तो भेद को शेरनी की मांद में भेज दिया.”

गिरि: “जी, कुछ ऐसा ही था. जब मैं वहां पहुंचा तो पूछा कि क्या काम था. तो आंटी जिन्हे मैं बाद में माँ ही बोलने लगा था, बोलीं कि काम है भी और नहीं भी. मुझे कुछ समझ नहीं आया. तब उन्होंने कहा कि क्या मैं मधु से विवाह करना चाहता हूँ? तो मैंने कहा कि इस प्रश्न का कोई औचित्य ही नहीं है क्योंकि ऐसा तो वर्षों से निर्धारित है.”

“उन्होंने पूछा कि क्या मैं विवाह के बाद मधु को संतुष्ट करने में सक्षम हूँ. मुझे अभी भी ज्ञात नहीं था कि हो क्या रहा था तो मैंने सहजता से कहा कि अवश्य. इस पर उन्होंने कहा कि मुझे इसका प्रमाण देना होगा. मैंने कहा कि कहिये क्या करना होगा? इस पर वो कुछ मुस्करायीं और कहा कि मैं अंदर कमरे में जा रही हूँ, और जब बुलाऊँ तब मैं भी पहुँच जाऊं. कोई दस मिनट बाद उन्होंने मुझे पुकारा तो मैं उनके कमरे में गया. तो देखा कि वे बिस्तर पर नंगी लेटी थीं. उन्होंने कहा कि सफल विवाह के लिए सेक्स में पारंगत होना आवश्यक है. और मैं देखना चाहती हूँ कि तुम इसमें किस स्तर पर हो.”

“इसके बाद उन्होंने मुझे लगभग हर दिन बुलाकर चुदाई के कई गुर सिखाये. जब उन्होंने मुझे उत्तीर्ण किया तो कहा कि कल तुझे अपनी माँ को ये सिद्ध करना हैं कि तू सच में विवाह के योग्य है. इस प्रकार मेरे चुदाई जीवन का आरम्भ हुआ. बाद में मुझे पता लगा कि इसी परीक्षा से मधु भी निकली थी और इसमें मेरे और उसके पिता का योगदान था. हमारे वैवाहिक जीवन में कभी कोई भी कठिनाई नहीं आयी. बच्चे आने के बाद भी कोई विशेष कमी नहीं हुई. जब मेरा पुत्र अठारह वर्ष का हुआ तब मेरी सास, जो तब जीवित थीं, ने उसे भी प्रवीण करने का बीड़ा उठाया, पर इस बार उन्होंने अपने साथ मधु और मेरी माँ को भी लिया. लोकेश ने अपनी शिक्षा उत्तम प्रकार से पूरी की और आठ वर्ष बाद उसका विवाह चारु से हुआ.”

“मेरी सास को कैसे ये पता था कि चारु के परिवार में भी हमारी शैली है, ये तो मुझे नहीं पता, पर विवाह के बाद चारु की चुदाई का अवसर मुझे सुहागरात के अगले दिन ही मिल गया. जीवन अनवरत चलता रहा. फिर मधु और चारु की माँ ने हमारे जैसे परिवारों का एक समुदाय बनाने का निर्णय लिया और बारह वर्ष पहले इसको नींव रखी गई. जीवन और उनका परिवार उस समुदाय के नवीनतम सदस्य हैं. ये भी बता दूँ की मेरी पोती की चूत और गांड दोनों की सील मैंने ही तोड़ी थी. और पिछले वर्ष मेरे कठिन समय में वह एक है जो सदैव मेरे साथ खड़ी रही है.”

उनकी संक्षिप्त कथा सुनते हुए दूसरा पेग भी समाप्त हो चूका था, महिलाएं भी अपने लिए नया पेग बना चुकी थीं. तीसरा पेग लगाया गया. पर इस बार सब खुल के बात कर रहे थे. जीवन की मंडली में तो ये सामान्य बात थी पर गिरि को इस परवाह में आने में समय लगा. पर अब वो अपने आपको मुक्त अनुभव कर रहे थे.

इसके पहले कि हम आगे बढ़ें, जीवन के मित्रों का परिचय हो जाये:

बलवंत और उसकी पत्नी गीता. ये सुनीति की माता पिता हैं.

कँवल और उसी पत्नी बबिता.

सुशील और उसकी पत्नी निर्मला.

जस्सी (जसवंत) और उसकी पत्नी पूनम.

ये सभी एक साथ पले बढे और बचपन के साथी हैं. जवानी में गाँव की न जाने कितनी विवाहित और कुंवारी औरतों ने इनके लंड का आनंद लिया। पर विवाह के बाद इन्होने केवल अपने ही मित्र मंडल में अपनी चुदाई को सीमित रखा था. कभी कभार ऐसा हुआ कि अलग स्वाद लेने का अवसर मिला, परन्तु उनमे से कोई भी इस गांव का नहीं था. इस गाँव में इतने वर्ष बाद भी किसी को इनके अंदरूनी रहस्य की भनक भी नहीं थी. इसका कारण ये था कि वे कभी भी ऐसा विदित ही नहीं करते थे कि कुछ अलग है. एक दूसरे के घर जाना और वहीँ रुक जाना बचपन से चल रहा था तो किसी को इस बात पर कोई शक नहीं था. वैसे भी इनके घर इतने बड़े थे कि बाहर से अंदर की गतिविधियों के बारे में जानना असम्भव था.

तीसरे पेग की समाप्ति के बाद खाने का कार्यक्रम चला. भोजन इतना था कि सबने भरपेट खाया.

फिर बलवंत ने कहा, “यारों, आज अलग होने का मन नहीं कर रहा है. क्यों न अंदर ही बैठें और बातें करें. फिर यहीं सो जाना आज रात।”

ऐसे आवेदन को आज तक बही भी नकारा नहीं गया था. इसका अर्थ भी सबको विदित था. तो दोनों बोतल, ग्लास इत्यादि के साथ सब पहले तल्ले पर बने हॉल में चले गए.

“लोग कहते हैं की खाने के बाद पीना नहीं चाहिए, पर हमें तो आज तक इससे कोई परेशानी नहीं हुई.”

ये कहकर अगले पेग की बात चली तो इस बार पूनम ने आगे बढ़कर सबके लिए पेग बना दिए. बबिता और गीता ने खाने के लिए कुछ और चिकन और मीट के व्यंजन ले आये. बबिता ने जब प्लेट तबल पर रखी तो जीवन ने उसे अपनी गोद में खींच लिया और उसके मम्मे दबाते हुए बोला, “आज तो आप मेरे साथ रहने वाली थीं न क्या हुआ?”

बबिता: “अगर मैं आपके साथ रहूंगी तो आपके नए मित्र का ध्यान कौन रखेगा?”

जीवन: “अरे भाभी, आज से पहले तो तुमने दो को एक साथ छोड़ने से कभी दूरी नहीं की, फिर आज क्या हुआ? बुढ़ापा आने लगा है तेरे ऊपर.”

बबिता: “अच्छा जी, मेरे बुढ़ापे में भी इतने इतना दम है, की आप सबको एक साथ निपटा कर खेतों पर काम करने जा सकती हूँ.”

निर्मला ने इस बात पर ताली बजाकर कहा, “क्या बात कही बबिता. बुढऊ की बोलती बंद कर दी.”

जीवन: “हाथ कंगन को आरसी क्या. आज ही इसका भी निर्णय कर लेंगे कि बबिता खेतों में जाएगी या नहीं.”

निर्मला उठकर कँवल की गोद में जा बैठी और उसके गले में बहन डालकर बोली, “ भाई साहब, लगता है कि आपकी पत्नी आज जीवन भाई साहब और गिरि भाईसाहब को निचोड़ने के लिए तत्पर है. तो आपको अगर अपने कसबल निकालने हैं तो मैं आपका साथ दे सकती हूँ.”

कँवल ने उसे चूमकर कहा, “है भाभी, आप न होती तो न जाने आज रात मेरा क्या होता?”

ये सुनकर सब हंस पड़े. गीता जाकर जस्सी की गोद में समा गयी और पूनम ने बलवंत की गोद में शरण ली. बबिता फिर जीवन की गोद से उठी और उसने गिरि की गोद में बैठकर उन्हें चूमना आरम्भ कर दिया.

“भाई साहब, हम सब हर चीज़ मिलकर कहते हैं. तो हम चारों औरतें आपसे भी चुदवाएंगी। अब जब तक आप हम चारों की चुदाई नहीं कर लेते गाँव से नहीं जा सकते.”

कमरे में वातावरण गर्माने लगा था.

गिरि कुछ असहज हो रहे थे. उन्हें विश्वास नहीं था कि वे इनमे से किसी भी स्त्री को संतुष्ट कर पाएंगे. बबिता ने अपने होंठ उनके कान के पास लाये और फुसफुसाकर बोली, “जीवन भाईसाहब ने हमें बताया आपके बारे में. उधर आप मेरे पति को देख रहे हैं न, वही जो निर्मला के थन निचोड़ रहा है. चार साल पहले जब हमारी फसल खराब हो गयी थी तो ये बहुत तनाव में थे. तीन चार महीने तक तो इनका लंड खड़ा ही नहीं होता था.”

गिरि ने कंवल कि ओर देखा तो उसने निर्मला की साड़ी और ब्लाउज़ निकाल दिए थे. ब्रा ये महिलाएं पहनती नहीं थीं और वो निर्मला के मम्मे मुंह में लेकर चूस रहा था.

बबिता ने अपनी बात आगे बताई, “एक बार मैंने चुदाई के प्रयास के बाद इन्हें बाथरूम में रोते हुए सुना. मेरा दिल टूट गया. फिर जब जीवन भाईसाहब आये तो मैंने सबको इनको समस्या बताई. भाईसाहब ने बैंक में जाकर इनका कर्जा चुकता कर दिया। फिर रात में सबने इन्हे विश्वास दिलाया कि ये दिन भी निकल जायेंगे. फिर भाईसाहब इन्हें अपने साथ ले गए, जैसे आपको यहां लाये हैं. जब दस दिन बाद ये लौटे और बैंक गए तो पता चला कि कर्ज समाप्त हो चुका था. ये बात हमें बाद में पता चली कि भाईसाहब ने न केवल कर्ज चुकाया था, बल्कि इनके कहते में १ लाख भी जमा कर दिए थे. मेनेजर से पूछने पर उसने कहा कि एक लॉटरी में इनका नाम आया था तो कर्जा भी चुक गया और पैसे भी बच गए. इन्हें इस बात पर विश्वास नहीं हुआ.”

“पर इसका ये प्रभाव हुआ कि जैसे इनमे नयी शक्ति आ गयी. और हम चारों औरतों ने एक रात इनसे इतना चुदवाया कि उसके बाद से इन्हें कभी समस्या नहीं हुई.”

इसके बाद बबिता ने उनकी आँखों में ऑंखें डालीं, “आपको भी किसी बात से तनाव है. और ये आपको अंदर से ग्रस रहा है. जो कुछ भी है, अगर आप उसकी ओर ध्यान नहीं देकर उसकी उपेक्षा करेंगे तो ये समस्या नहीं रहेगी. आप जितना इस विषय में सोचेंगे, उतना ही डूबेंगे. अगर वो कोई मनुष्य है, तो आप सच मानें अगर वो आपको चाहता है तो इसीलिए नहीं कि आप चोदने में प्रवीण है, बल्कि अन्य हजारों कारणों से. क्या उसे कोई ऐसी बीमारी हो जाती जिसके कारण वो नहीं चुदवा पाती तो क्या आप उसे प्रेम नहीं करते?”

गिरि के मस्तिष्क को एक तीव्र झटका लगा. गांव की एक कम पढ़ी स्त्री ने उन्हें उनकी समस्या और उसका हल कुछ ही शब्दों में बता दिया था. मधु की ठीक से चुदाई न करने के कारण ही उन्हें कुंठा थी. पर क्या मधु उनसे प्यार नहीं करती? ये मानना असम्भव था. जो है, सो है. चुदाई कर पाऊँ तो ठीक नहीं तो माँ चुदाये दुनिया. इस विचार के मन में आते ही उन्हें अपने लंड में संवेदना अनुभव हुई जिससे वे बहुत दिनों से अनिभिज्ञ थे. बबिता उन्हें ध्यान से देख रही थी.

“आपको मेरी बात बुरी तो नहीं लगी न?”

उसे अपनी बाँहों में भरकर उसके होंठ चूमकर गिरि ने कहा, “नहीं, बल्कि तुमने मेरी समस्या को सुलझा दिया है.” और ये कहते हुए अन्य जोड़ों के समान उन्होंने भी बबिता के साड़ी ब्लाउज़ उतार फेंके.

गिरि ने अन्य सबकी ओर देखा तो पाया कि वे सभी उसकी ही ओर देख रहे थे. जीवन इस समय निर्मला के सामने खड़े थे और मुस्कुराते हुए गिरि को देख रहे थे. सबने उन्हें थम्ब्स अप का संकेत दिया. गिरि ने भी उनको उसी संकेत के साथ उत्तर दिया और अपने मुंह को बबिता के मम्मों के बीच डालकर उन्हें चूसने लगे. उनका लंड धीरे धीरे अपने आक्रोश में आ रहा था. उन्होंने देखा कि गीता और निर्मला ने अपनी साड़ी पूरी उतार दी और फिर पेटीकोट भी उतार फेंके. फिर निर्मला ने पूनम और बबिता को देखा.

“तुम किसकी प्रतीक्षा कर रही हो. सारे लौड़े तैयार हैं और तुम अभी भी आधे कपड़े डाले हुए हो.”

“हम तेरे जैसी बेशर्म नहीं हैं. पर अब कहती है तो ये लो.” बस आंख झपकते ही बबिता और पूनम भी नंगी कड़ी हो गयीं.

“गांव में तुम चारों जैसी कोई और नहीं है, न सुंदरता में न चुदाई में.” जस्सी ने कहा.

“कितनो को चोदा है तुमने.” उसकी पत्नी ने पूछा.

“चोदा तो नहीं जबसे शादी हुई है, पर मुझे विश्वास अवश्य है कि तुम जितनी चुड़क्कड़ कोई और नहीं होगी गाँव में.”

अब तक गिरि के सिवाय अन्य सभी आदमी अपने ऊपर के कपड़े उतार चुके थे. गिरि ने उनके बलिष्ठ शरीर देखे तो उसे गाँव की मेहनत का लाभ समझ आया. बबिता ने उनकी ओर बढ़कर उनकी शर्ट उतार दी और खड़ा होने के लिए कहा. उनके साथ बाकी चार पुरुष भी खड़े हो गए. चारों पत्नियों ने सबके पाजामे उतारे और उसमे से सबके उफनते हुए लौड़े छिटक कर खड़े हो गए. केवल गिरि ने कच्छा पहना था जिसे अधिक देर तक शरीर पर ठहरने नहीं दिया गया. जैसे ही उनका लंड बाहर निकला तो चारों महिलाओं की आह निकल गयी.

जीवन ने भी जब गिरि के लंड को देखा तो बोल पड़े, “मैं समझ सकता हूँ कि ऐसे हथियार के होते हुए भी अगर आप चुदाई नहीं कर पते थे तो तनाव होना सुनिश्चित था. पर अब आप चिंता छोड़कर इन सुंदरियों का जी भर कर भोग करें इन छुट्टियों में. इनके जिस छेद में जब मन चाहे लंड पेल देना. यहाँ आपको हर प्रकार से सुख दिया जायेगा. मुझे नहीं लगता कि लौटने के बाद आपके लंड को चूतों की कमी पड़ेगी.”

गिरि आश्चर्य और कृतग्नता से उनकी ओर देख रहे थे, “आप सच में बहुत भले आदमी हैं. मुझे आज वो सारी संवेदना अनुभव हो रही हैं जो मुझे मेरी बीमारी के पहले होती थी. आपका ये परोपकार मैं जीवनपर्यन्त नहीं भूलूंगा.”

“इसकी कोई आवश्यकता नहीं है. अगर मित्र ही मित्र के काम न आये तो बेकार है. अब मजा करो और बिलकुल टेंशन मत लो.”

बबिता ने झुककर घुटने टेके और उनके लंड को मुंह में ले लिया.

गिरि ने बबिता से पूछा, “भाईसाहब किसे चोदेगे?”

बबिता, “उनकी चिंता न करो, जिस छेद में मन करेगा वहां लौड़ा टिका देंगे. वैसे हम में से एक की गांड की आज शामत आने वाली है.”

ये सुनकर गिरि के लंड ने झटका लिया.

“मुझे भी गांड मारने का बहुत शौक है.”

“वो भी मिलेगी, जिसकी चाहोगे. पर पहले मेरी चूत की आग बुझा दीजिये.” ये कहते हुए बबिता उनके लंड को अपने गले की गहराई तक ले जाकर चूसने लगी.

गिरि अपने लंड पर चल रहे उस आघात से ऑंखें बंद करने ही लगे थे कि उन्हें लगा कि आसपास की गतिविधि भी देख ली जाये. कंवल के लंड को निर्मला चूस रही थी और जस्सी के लंड को गीता. पूनम ने बलवंत के लंड को अपने मुंह में लिया हुआ था. जीवन एक ओर खड़े होकर अपना पेग लगा रहे थे. पर उन्होंने भी अपने कपड़े त्याग दिए थे और उनका लंड भी अपने पूरे यौवन पर था. गिरि ने ऑंखें बंद करके बबिता के लंड चूसने के आनंद में अपने आपको झोंक दिया. कुछ ही देर में बबिता ने उनके लंड को मुंह से निकाला।

“भाईसाहब, अब थोड़ा मेरी चूत को भी चाट दो.”

गिरि ने आव देखा न ताव और बबिता को एक ही झटके में नीचे किया और उसकी चूत में मुंह लगाकर ऐसे चाटने लगे जैसे कि रसमलाई खा रहे हों. बबिता भी उन्हें उत्साहित कर रही थी. अन्य जोड़े भी अब इसी प्रकार से चूत चाटने के कार्यक्रम में व्यस्त हो गए. गिरि ने ये आभास किया कि बबिता की आहें दब गयी हैं और उसने ऊपर देखा तो जीवन ने अपने लंड को बबिता के मुंह में डाल रखा था और इसी कारण बबिता कुछ कह नहीं पा रही थी. उन्होंने अपना ध्यान वापिस बबिता की बहती हुई चूत पर लगाया और उसे चाटते हुए जीभ से कुरेदने लगे. बबिता की सिसकियाँ सुनकर उन्हें ज्ञान हो गया कि जीवन अगले जोड़े को ओर जा चुके थे.

और यही हुआ भी, जब तक महिलाओं ने अपना पहला पानी अपने साथी के मुंह में छोड़ा तब तक जीवन अपने लंड को उन सबसे चुसवाने में सफल रहे थे. बबिता ने गिरि को बिस्तर पर लिटाया और उसके लंड को पकड़ते हुए अपनी चूत को उसपर रखा और एक ही बार में पूरे लंड को अंदर ले लिया. गिरि को ये आनंद बहुत समय के पश्चात मिला था. पहले उन्हें ये डर लगा कि कहीं वे जल्दी न झड़ जाएँ, फिर उन्होंने इस विचार को त्यागा और बबिता की चूत में अपनी ओर से भी धक्के लगाने लगे.

कमरे में अब यही दृश्य था, हर महिला अपने साथी के लंड पर चढ़कर चुदवा रही थी. आहों, सीत्कारों और कराहों से कमरा गूंज रहा था. गिरि को आभास हुआ कि बबिता कुछ अधिक ही आगे झुक गयी है. उसने अपनी आँखें खोलीं तो बबिता का चेहरा दिखा और उसके पीछे जीवन का. जीवन ने उन्हें आंख मारी और फिर उन्हें अपने लंड पर एक नए दबाव का आभास हुआ. जीवन अपने लंड को बबिता की गांड में डाल रहे थे. और फिर दोनों लौड़े एक दूसरे से एक पतली झिल्ली के माध्यम से पृथक थे पर एक दूसरे की उपस्थिति को अनुभव कर सकते थे.

“मेरे विचार से मधु को भी ऐसे ही चुदवाने में आनंद आता होगा. वापिस लौटने पर हम दोनों उसकी ऐसे ही चुदाई करेंगे. ठीक है न?” ये कहते हुए जीवन अपने पूरे लंड को बबिता की गांड में डालकर चलाने लगे.

“भाईसाहब, गांड तुम मादरचोद मेरी मार रहे हो और सपने इनकी पत्नी के देख रहे हो. क्या कमीने आदमी हो.”

“मैं तुझे बताता हूँ बबिता भाभी कि मैं कितना कमीना हूँ. गिरि भाई, थोड़ा तेज चलाओ अपने लंड को. मेरी भाभी को दिखाना है कमीनापन किसे कहते हैं.” इतना कहना था कि जीवन बबिता की गांड में अपने मूसल को तेजी से अंदर बाहर करने लगे. अपने नए मित्र को निराश न करने की इच्छा से गिरि ने भी अपने पूरे सामर्थ्य से बबिता कि चूत की धज्जियाँ उड़ाने का प्रयास किया. बबिता की हृदय विदारक चीखें उसके आनंद की साक्षी थीं. अन्य स्त्रियां उसके इस आनंद से ईर्ष्या करने लगीं. उन्हें सबको जीवन से गांड मरवाने में जो सुख मिलता था वो अद्वितीय था. पर आज बबिता जीती थी. उन्हें विश्वास था कि आने वाले दिनों में उनकी गांड भी उस लंड की भेंट चढ़ेगी.

कोई दस मिनट की इस तीखी डबल चुदाई के बाद जब गिरि को लगने लगा कि वे झड़ने वाले हैं तो उन्हें अपने लंड पर दबाव कम होता हुआ अनुभव हुआ तो उन्होंने पाया कि जीवन ने अपने लंड को निकाल लिया है और वो अब पूनम की ओर जा रहे थे. उन्होंने अपने लंड से बबिता की चूत की चुदाई चालू रखी और देखा कि इस बार जीवन ने अपने लौड़े को पूनम की गांड में जड़ दिया। पूनम की चीख ने कमरे को फिर से हिला दिया, पर बलवंत और जीवन ने उसकी चुदाई में कोई कमी नहीं की. बलवंत और जीवन का ये सबसे प्रिय खेल और आसन था. वो दोनों न जाने कितनी बार इस कमरे में चुद रही स्त्रियों की ऐसी डबल चुदाई कर चुके थे. और जब जीवन की पत्नी जीवित थीं तो उन्हें भी इन दोनों से यूँ चुदवाने में बहुत आनंद आता था.

गिरि अब दोबारे झड़ने के निकट थे. और उन्होंने अपने माल को बबिता की चूत में भरने के बाद ही साँस ली.

झड़ने के तुरंत ही बाद बबिता उनके लंड पर से उतरी और उनकें लंड को मुंह में लेकर रस को पीकर लम्स साफ कर दिया. इसके बाद ही गीगी को ये आभास हुआ कि लगभग एक वर्ष के बाद किसी चूत में स्खलित हुए हैं. उनकी पोती कई बार उन्हें चूसकर झडा दिया करती थी, पर चूत में जाकर इतनी देर तक चोदना उन्होंने एक समय से सम्पन्न नहीं किया था. इस विचार से उनकी आँखों से आंसू बहने लगे. पर चूँकि सब अपने खेल में व्यस्त थे तो किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया. अपितु, बबिता ने ये देख लिया था पर चुप्पी साधे रखी. वो इस प्रकार की भावनाओं को समझते थी.

जब उसने चोरी से देखा कि गिरि समान्य हो गए हैं तो वो उठी और गिरि के पास बैठ गयी.

“मैंने कहा था न, आपको कुछ नहीं हुआ है, आपके मन में एक मानसिक ग्रंथि थी जिसने आपको इस समस्या में डुबाये रखा. अब आप इसी प्रकार से खुश और आश्वस्त रहिये. आपके लिए यहां चार चूत और गांड हमेशा चुदवाने के लिए उपलब्ध हैं.”

गिरि ने खुश होकर बबिता को चूम लिया. जीवन अपने लंड को अब पूनम की गांड से निकाल रहे थे. पर आज के लिए अन्य जोड़े झड़ चुके थे और इसी कारण उन्होंने अपने लंड की मलाई को पूनम की ही गांड में छोड़ दिया था. सब संतुष्टि से एक दूसरे को देखते हुए हंस रहे थे. बलवंत ने उठकर सबके लिए फिर पेग बनाये और सब यूँ ही हँसते बोलते और चुहल करते हुए उन्होंने अपनी ड्रिंक समाप्त की और वहीँ सो गए.

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सुनीति का घर :

जब तक जीवन अपने गाँव पहुंचे, सुनीति के पास स्मिता (शेट्टी महक की माँ विला ८ वाली) का फोन आया. स्मिता ने कल उसे और असीम को और केवल उन दोनों को साढ़े दस बजे अपने घर पर चाय के लिए बुलाया था. उन्होंने ये भी बता दिया था कि असीम को उनके ही पास रुकना होगा. सुनीति ने स्वीकृति दी और असीम को बताया कि वो कल किसी और स्थान पर न जाये. असीम ने भी सहर्ष स्वीकार कर लिया.

अगले दिन, जीवन का गाँव:

सभी तड़के सुबह उठ गए और पुरुष अपने व्यायाम में व्यस्त हो गए और महिलाएं खाने और अन्य घरेलु कार्यों में. ये पहले ही निश्चित कर लिया था कि जीवन के इस पूरे समय सब एक ही घर में रहेंगे, चाहे जिसका भी हो. आज बलवंत के ही रुकना श्रेयस्कर था. सुबह के कार्य समाप्त करने के बाद सब बैठ कर सामान्य बातें करते रहे और अपने बच्चों के बारे में सूचना साझा की. सभी के बच्चे और नाती पोते अच्छे से अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे. हालाँकि, सभी उतने सफल नहीं थे जितना कि आशीष पर संतुष्ट थे और खुश थे.

जीवन ने ये सुझाया कि अगर हो सके तो सबको एक ही समय गाँव में बुलाया जाये. उनके बच्चों को एक दूसरे से मिले एक लम्बा समय निकल चुका था. और नाती पोते तो एक दूसरे को पहचानते भी नहीं थे ठीक से. सबने इस बात के लिए स्वीकृति दी और अपने बच्चों से बात करने का आश्वासन दिया. जीवन के लौटने के पहले समय निर्धारित करने का विश्वास दिलाया.

गिरि ने फोन पर मधु से बात की तो मधु ने पूछा कि वे अपनी दवाइयां क्यों नहीं ले गए. गिरि के पूछने पर कि उन्हें कैसे पता, मधु ने कहा कि वो कल उनके ही कमरे में सोई थी. और जब तक वे नहीं लौटते वहीँ रहेगी. गीगी को बबिता की बात सही सिद्ध होती लगी. पर उन्होंने मधु को ये नहीं बताया कि उन्होंने कल रात सफलता पूर्वक चुदाई की थी और आगे की करने वाले हैं. हालाँकि इस बात से उनके सम्बंधिन में कोई अंतर् नहीं आता पर वे मधु को चकित करना चाहते थे.

अगले दिन, स्मिता का घर:

निर्धारित समय पर सुनीति और असीम आठ नंबर विला में स्मिता से मिलने के लिए पहुंचे. आज सुबह मधीजी का फोन आया था और उन्होंने इस मिलन का उद्देश्य समझाया था. उन्होंने दो लड़को के नाम स्मिता को दिए थे. जिसमे से एक से वो कल मिल चुकी थी और आज असीम से मिलना था. महक भी उस लड़के से मिली थी और असिमसे भी मिलेगी. परन्तु मधु जी ने ये भी चेताया कि जिस भी लड़के को स्मिता और महक पसंद करेंगी, वो लड़का विवाह के पहले महक से किसी प्रकार का शारीरिक संबंध नहीं रख सकेगा. परिवार के अन्य लोगों के लिए बाध्यता नहीं थी.

स्मिता ने उनका स्वागत किया और फिर महक और असीम को दूसरे कमरे में भेज दिया बातचीत करने के लिए. ये बातचीत स्वाभाविक थी और इसमें चुदाई का लेशमात्र भी पुट नहीं था. दोनों एक दूसरे के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे और एक दूसरे की पसंद और नापसंद को भी समझना चाहते थे. एक घंटे की गहन बातचीत से असीम को लगा कि महक उसके लिए एक उत्तम पत्नी सिद्ध हो सकती है. हालाँकि वो ये नहीं जानता था कि महक के भी उसके किये यही विचार थे. असीम को इसके बारे में समुदाय के माध्यम से ही पता लगना था.

जब दोनों बाहर आये तो स्मिता और सुनीति भी गहन वार्तालाप में लीन थीं. स्मिता ने महक की ओर देखा तो उसने बहुत हल्के से सर हिलाकर सकारात्मक उत्तर दिया. इसका अर्थ था कि अब असीम के चयन पूरे रूप से स्मिता के ही हाथ में था. कल वाले लड़के ने अपनी चुदाई से स्मिता को बहुत संतुष्ट किया था, परन्तु महक को वो लड़का अपने लिए उपयुक्त नहीं लगा था. अगर असीम भी चुदाई में पारंगत हुआ तो ये सम्बन्ध पक्का होने की संभावना बहुत अच्छी थी.

सुनीति ने उठकर दोनों को गले से लगाया और महक के माथे को चूमकर उसे आशीर्वाद दिया. इसके बाद महक अपने काम से निकल गयी. सुनीति ने भी स्मिता से प्रस्थान की अनुमति ली और फिर असीम को वहीँ छोड़कर अपने घर लौट गयी.

सुनीति का घर :

सुनीति घर पहुंची तो उसे ये देखकर आश्चर्य हुआ कि कुमार घर पर ही है.

“क्या हुआ, तुम गए नहीं?”

“माँ, मैंने सोचा कि जब आज सब लोग बाहर हैं, तो क्यों न हम मिलकर कुछ मजा करें. आपका क्या सोचना है?”

सुनीति ने कुछ नहीं कहा, और अपने कमरे की ओर बढ़ गयी. कुमार बहिन खिसियाया सा खड़ा रह गया.

कमरे में जाने से पहले सुनीति ने कुमार की ओर देखा और फिर मुस्कुराकर बोली, “वैसे आइडिया बुरा नहीं है.”

ये कहते हुए उसने अपनी गांड मटकायी और कमरे में घुस गयी. कुमार दौड़ता हुआ उसके पीछे गया और अंदर जाकर कमरा लॉक कर लिया. सुनीति को अपनी बाँहों में लेकर चुम्बनों की झड़ी लगा दी.

“बड़ा उतावला हो रहा है.” सुनीति बोली.

“चार दिन हो गए मॉम, उतावला तो होना ही है.”

“चल तू कपडे उतार मैं बाथरूम से अभी आयी.”

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स्मिता का घर:

स्मिता ने पैनी दृष्टि से असीम को देखा जो अभी भी खड़ा ही हुआ था.

“बैठो.”

असीम के बैठने के बाद स्मिता ने उससे कई प्रश्न किये जो किसी भी लड़की की माँ उस लड़के से करती है जिसके साथ उसके विवाह की संभावना हो. असीम के उत्तरों से वो संतुष्ट प्रतीत हो रही थी.

“क्या तुम जानते हो कि आज तुम्हारे यहाँ आने का क्या प्रयोजन है?”

“जी, मुझे अपनी संभावित पत्नी की माँ के मापदंड पर खरा उतरने का प्रयास करना है.”

“और ये मापदंड क्या हैं? तुम खुल के बात कर सकते हो, हम सब एक ऐसे समुदाय के सदस्य हैं जहां कसी भी प्रकार की भाषा अवैध नहीं है.”

असीम ने मुस्कुराकर कहा, “मुझे आपकी ऐसी चुदाई करनी है जससे आपको ये विश्वास हो जाये कि आपकी बेटी महक किसी भी प्रकार के सुख से वंचित नहीं रहेगी.”

स्मिता उसके इस उत्तर पर हंस पड़ी, “और तुम्हे लगता है कि तुम इसमें सक्षम हो?”

असीम: “मुझे विश्वास है कि आपको हर मापदंड पर मैं उच्च ही सिद्ध होकर दिखाऊंगा.”

स्मिता: “समुदाय में तुम्हारी आयु के कई लड़के हैं जिन्होंने मुझे चोदा है, पर उनमे से कम ही हैं जो इस शरीर पूर्ण रूप से तृप्त कर पाए.”

असीम: “जो कर पाए, आज उनमे आप मुझे भी जोड़ सकेंगी. पर क्या हम बातें ही चोदते रहेंगे या फिर कुछ असली में भी करना है.”

स्मिता खिलखिला पड़ी, “आई लाइक इट. आई लाइक इट ए लॉट. चलो मेरे बेडरूम में चलते हैं.”

स्मिता अपने कमरे की ओर चल पड़ी और असीम उसके पीछे हो लिया.

स्मिता ने असीम के अंदर आने के बाद कमरा बंद किया.

स्मिता: “क्या पीना चाहोगे?”

असीम: “आपके होठों का रस और आपकी चूत का रस.”

स्मिता खिलखिला पड़ी, “आई लाइक इट. आई लाइक इट ए लॉट. तो फिर देर किस बात की है?”

असीम ने आगे बढ़कर स्मिता को बाँहों में लिए और अपने होंठ उसके होंठों से मिलकर उसका चुंबन लिया तो स्मिता का शरीर झन्ना गया. उसने सोचा कि अगर ये लड़का चुदाई भी वैसे करेगा जैसे चुम रहा है तो दामाद बनना तय ही है. असीम अपने शरीर को स्मिता के शरीर में मानो मिला देना चाहता हो. उसके हाथ पीछे पीठ पर गए और उसने सधे हाथों से स्मिता का ब्लाउज़ खोल दिया और उसे उसे निकाल फेंका. उसने वीर बिना चुंबन को तोड़े हुए ब्रा को भी अलग किया और अपने होंठ स्मिता के होंठों से हटाकर उसके मम्मों पर रख दिए. चुंबन इतना गहरा था की स्मिता अभी भी साँस संयत करने का प्रयास कर रही थी.

एक मम्मे को मुंहे से चूसते हुए दूसरे पर असीम ने अपने हाथ जमाये और उन्हें मसलने लगा. स्मिता का शरीर इतनी जल्दी से इस आक्रमण के लिए तैयार नहीं था और उसके पैर कांपने लगे.

“मेरे विचार से हमें बिस्तर पर ही चलना चाहिए.” असीम ने खा तो स्मिता शांति से बिस्तर पर जाकर बैठने ही वाली थी कि असीम ने उसे रोका।

“आप के कपड़े अनावश्यक ही बढ़ा उतपन्न करेंगे, इन्हें भी निकाल ही दें तो ठीक होगा.” और उसने स्मिता के उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही उसके पेटीकोट का नाड़ा खोला और पेटीकोट सरकते हुए नीचे गिर गया. फिर उसने स्मिता के सामने घुटनों के बल बैठकर उसकी पैंटी भी निकाल दी. स्मिता कमरे में आने के कुछ ही मिनट में असीम के सामने नंगी खड़ी थी.

“तुम्हारे कपड़े ?”

“आपको नहीं लगता कि ये कार्य आपको करना चाहिए?” असीम ने छेड़ते हुए कहा.

स्मिता: “आई लाइक इट. आई लाइक इट ए लॉट.”

ये कहकर स्मिता अपने कार्य में जुट गयी और चंद ही सेकंड में असीम भी उसके सामने नंगा खड़ा था. उसका लंड अब तक तक आधा खड़ा हो चूका था और उसे देखकर स्मिता की चूत पनिया गयी. उसे विश्वास हो चला था कि आज उसकी भरपूर चुदाई होने वाली है.

स्मिता, “आई लाइक इट. आई लाइक इट ए लॉट.”

असीम: “लगता है ये आपका प्रिय वाक्य है. अब क्यों न आप लेट जातीं जिससे कि मैं आपकी इस चमचमाती चूत के रस से अपनी प्यास मिटा लूँ.”

स्मिता पैर फैलाकर बिस्तर पर लेट गयी और असीम ने अपना चेहरा उसकी चूत में डाल दिया.

असीम जब चूत चाटने लगा तो स्मिता की शरीर में कंपकपी दौड़ गयी. इस लड़के को पता है की चूत चाटने का गुर, लगता है माँ ने इसे अच्छी शिक्षा दी है. असीम की लपलपाती जीभ अब स्मिता की बहती चूत में नर्तन कर रही थी. स्मिता ने सोचा कि ये लड़का अभी दस मिनट पहले ही कमरे में आया है और आआआह मुझे एक बार झाड़ भी दिया. कल वाला लड़का चुदाई में तो निपुण था पर चूत चूसने में इतना गुणी नहीं था. असीम स्मिता की चूत में इतना खोया हुआ था कि उसे ये विदित नहीं हुआ कि स्मिता ने उसे अपना दामाद मान लिया है, बस अगर वो उसे अच्छे से चोद पाए तो.

स्मिता जब दो बार झड़ गयी तो उसने असीम के लंड को चूसने की इच्छा की. असीम ने बेमन से अपना मुंह स्मिता की चूत से निकाला और अपने लंड को स्मिता के लिए प्रस्तुत कर दिया. स्मिता ने बैठते हुए उसे अपने मुंह में लिया और ऐसे चूसा कि असीम की नसें हिल गयीं. उसकी माँ इस कला की पारखी थी पर स्मिता के लंड चूसने की कला एकदम अलग थी. वो अपने गले से उसके लंड की मुठ मार रही थी जो असीम के जीवन का पहला अनुभव था. कुछ ही देर में उसका लंड अपने विकराल रूप में आ गया. और स्मिता ने उसे अपने मुंह से निकाला।

“मेरे विचार से अब इसकी असली परीक्षा मेरी चूत ही लेगी.” स्मिता बोली.

“क्यों क्या आपकी गांड इतने बड़े लंड को लेने की सक्षम नहीं है?”

स्मिता: “मेरे अर्थ ये नहीं था, अवश्य ही गांड में भीलूंगी , पर परीक्षा में उत्तीर्ण मेरी चूत ही करेगी.”

असीम: :जैसा आप उचित समझें।”

स्मिता ने अपने पैर दोबारा फैलाये और लेट गयी. असीम जानता था कि ये बहुत चुदी हुई है और इसीलिए उसने समय व्यर्थ न करते हुए अपने लंड को लक्ष्य पर लगाया और एक ही बार में पूरा अंदर उतार दिया. स्मिता कुछ चिहुँकि पर उसने किसी प्रकार का प्रतिरोध नहीं किया. असीम ने अपने पूरे सामर्थ्य और शक्ति से स्मिता की चूत के छक्के छुड़ाने आरम्भ किये. स्मिता भी आनंद के सागर में गोते लगाते हुए इस तेज और निर्मम चुदाई का आनंद ले रही थी. उसे पता था की सम्बन्ध होने के पश्चात उन्हें प्यार और संयम से चुदाई के अनेक अवसर मिलेंगे. आज केवल ट्रेलर था, पिक्चर आनी अभी शेष थी.

असीम ने तेज और गहरी चुदाई करते हुए स्मिता को दो या तीन बार और स्खलित किया, पर जब उसके लंड से रस निकलने ही वाला था तो स्मिता की एक लम्बी चीख ने उसे चौंका दिया. स्मिता के काँपते तड़पते हुए शरीर को छटपटाते हुए देख वो समझ गया कि वो परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया है. स्मिता जब इस ऊंचाई से उतरने लगी तो असीम के लंड की पिचकारियों ने उसकी चूत को जैसे ही सींचना शुरू किया तो वो लौट कर उस ऊंचाई को फिर छूने लगी. जब दोनों शांत हुए तो एक गहरे चुंबन में बंध गए.

स्मिता: “सुनीति ने तुम्हे बहुत अच्छा सिखाया है. वो बहुत भाग्यशाली है.”

असीम: “धन्यवाद. उनके जैसी माँ सबको मिले.”

दोनों एक दूसरे की बाँहों में यूँ ही लेटे हुए एक दूसरे को चूमते रहे. पर असीम अधीर हो रहा था. उसे पता था कि परीक्षा समय बद्ध होती है. और वो स्मिता की गांड की यात्रा के बिना लौटना नहीं चाहता था.

“तो अब ये भी देख लें कि आपकी गांड मेरे लंड को ले पाएगी या नहीं.”

“इसमें कोई भी शक नहीं, तुम्हारा लंड मेरे बेटे के लंड से बहुत बड़ा नहीं है, तो ये मत सोचना कि गांड नहीं ले पायेगी. पर ये अवश्य है कि मैं गांड मरवाये बिना तुम्हें छोड़ने वाली भी नहीं.”

“पर परीक्षा की कोई समय सीमा नहीं है क्या?”

“है, पर उसमे अभी भी बहुत समय शेष है. चलो तुम्हें अपनी गांड चाटने का अवसर देती हूँ. और फिर उसे चोदने का भी मिलेगा.”

स्मिता ने घोड़ी का आसन लिया और असीम की ओर आशा से देखा. असीम को कोई निमंत्रण नहीं चाहिए था. उसने स्मिता की सुंदर सुडोल गांड के पाटों पर दृष्टि डाली तो उसके मुंह में स्वयं ही पानी आ गया. स्मिता की गांड भी उसकी माँ के समान बिलकुल गोलाकार थी. उसके उसके बीच में लुपलुपता हुआ भूरा छेद उसे अपनी ओर स्वतः ही खींच रहा था. स्मिता ने असीम की आँखों में वो देखा जिससे कि उसका मन प्रफुल्लित हो गया. असीम ने झुकते हुए स्मिता के दोनों नितम्बों को चूमा और फिर उनपर जीभ से थूक की रेखा खींचते हुए उसकी गांड के बहरी खुरदुरे छेद पर जीभ चलाने लगा. स्मिता एक बार फिर सिहर उठी. चाटते हुए असीम उसके दोनों नितम्बों को जोर जोर से मसल रहा था. फिर उसने इसा कुछ किया जो अप्रत्याशित था.

असीम ने स्मिता की गांड को चाटते हुए उसके दोनों नितम्बों पर थप्पड़ लगाने आरम्भ कर दिए. हालाँकि इसकी तीव्रता नगण्य के बराबर थी, पर इस आकस्मक आक्रमण ने स्मिता की वासना को कई गुना बढ़ा दिया. नितम्बों पर हल्के हल्के थप्पड़ लगते हुए असीम ने स्मिता की खुलती हुई गांड में अपनी जीभ डाली और उसके अंदर विचरण करने लगा. वो रुक रुक कर स्मिता की गांड को फैलता और स्थान मिलते ही जीभ को और अंदर डाल देता. स्मिता अब आपे से बाहर हो रही थी. उसकी चूत फिर नदी के समान बहने लगी थी. और अब उसे अपनी गांड में कुछ मोटा और लम्बा हथियार चाहिए था.

स्मिता: “अब और मत तड़पा, मेरी गांड में पेल दे अपना लौड़ा और फाड़ दे इसे. इसकी खुजली अब रुकने वाली नहीं तेरे लंड को खाये बिना.”

असीम उसकी इस प्रतिक्रिया के लिए तैयार था. उसकी माँ भी आज तक उसके इस पराक्रम के आगे विवश थी तो स्मिता तो क्या थी?

उसने अपने तने लंड को स्मिता की गांड की छेद पर रखा. और स्मिता ने उसे पीछे मुड़ते हुए कामांध दृष्टि से देखा. असीम ने एक प्यारी सी मुस्कुराहट दी जिसे देखते हुए स्मिता भी मुस्कुरा उठी. पर तत्क्षण उसके चेहरे के भाव बदल गए. असीम ने एक ही तगड़े झटके में स्मिता की अनन्य बार चौड़ी की गयी गांड में अपना लौड़ा पेल दिया. स्मिता के भाव बदल कर कुछ क्षण के लिए पीड़ा के हुए पर उसे जब अपनी गांड पूरी पैक हुई अनुभव हुई तो आनंद ने उसे अपने वशीभूत कर लिया. असीम समय का सदुपयोग करना चाह रहा था और उसे विश्वास था कि आज की चुदाई के बाद वो इस घर का दामाद बनेगा और इस गांड में कई बार उसके लंड को प्यार से जाने का अवसर मिलेगा. पर आज इसे फाड़कर सारे कसबल निकालने का समय था.

स्मिता को भी गांड तेज और कर्कश तरीके से ही मरवाना पसंद था. गांड मरवाना ही हो तो ऐसे मरवाओ कि दो दिन तक याद रहे. ये उसके जीवन का सार था. चूत चाहे प्यार से चोदो पर गांड पर दया नहीं करनी चाहिए. असीम उसकी इस इच्छा से अनिभिज्ञ अपने ही अंदाज में स्मिता की गांड को जैसे फाड़ने के लिए ही चोद रहा था. उसके भीषण लम्बे और तीव्र धक्के स्मिता जैसी खेली खिलाई स्त्री ही झेल सकती थी. और तो और स्मिता अब उसे उकसाते हुए और भी तेज और गहराई तक लंड पेलने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी.

स्मिता की चूत से रस की धार ने बिस्तर को इतना गीला कर दिया था की अब उसके घुटने फिसलने लगे थे. पर असीम अनियंत्रित अबाधित गति से उसकी गांड में लौड़ा पेले जा रहा था. आठ दस मिनट की इस वीभत्स चुदाई के बाद स्मिता ने हार मान ली और उसकी चूत ने एक अंतिम धार फेंकी और उसे निश्चल कर दिया. असीम भी अब अपने लक्ष्य को पा चुका था. उसने स्मिता के मरणासन्न शरीर को अपने बलिष्ठ हाथों से पकड़कर अंतिम धक्कों के साथ स्मिता की गांड में अपनी मलाई डाल दी और फिर उसके ऊपर हाँफते हुए गिर पड़ा.

स्मिता और असीम कुछ देर के लिए जैसे अचेत थे. जब दोनों अपनी मूर्छा से निकले तो एक दूसरे को चूमने में व्यस्त हो गए.

स्मिता: “तुम सच में चुदाई में निपुण हो. हालाँकि मुझे ये बताने का अधिकार नहीं है, पर मैंतुम्हेँ दामाद के रूप में स्वीकार करती हूँ. पर ये बात तुम्हे समुदाय के माध्यम से ही पता लगेगी. इसीलिए, कृपा करके इसे हम दोनों के सिवाय किसी और को न पता लगे इसका आश्वासन देना होगा. वैसे, कल तक तुम्हारी माँ को इसके बारे में सूचना दे दी जाएगी. और अब से महक तुम्हारे लिए अछूत है. जब तक विवाह सम्पन्न नहीं होता तुम दोनों एक दूसरे के साथ चुदाई नहीं कर सकते. घूमो फिरो , सब मान्य है, पर चुदाई किसी भी स्थिति में नहीं होनी चाहिए. मैं महक को भी ये समझा दूंगी.”

इसके बाद स्मिता और असीम एक दूसरे को न जाने कितनी देर तक चूमते रहे. फिर घर लौटने के पहले असीम ने स्मिता की एक बार प्यार से चुदाई की, जिसके कारण वो उसकी और भी प्रशंसक बन गयी.

चार बजे के लगभग असीम अपने घर लौट गया.

सुनीति का घर :

सुनीति और कुमार एक दूसरे के आलिंगन में बद्ध क्रमशः बिस्तर की ओर चल पड़े.

......भाग चार में शेष कथा
 
दूसरा घर: सुनीति और आशीष राणा

अध्याय २.३

भाग ४

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सुनीति का घर :

सुनीति और कुमार एक दूसरे के आलिंगन में बद्ध क्रमशः बिस्तर की ओर चल पड़े.

जीवन का गाँव:

गिरि को घर पर ही छोड़कर जीवन और उसके मित्र बलवंत के खेत पर चले गए. जीवन ने अपने मैनेजर को भी बुला लिया था और उसे बलवंत के खेतों का दायित्व भी दिया जा रहा था. चूँकि उनका मैनेजर एक बहुत ही शालीन और सुलझी बुद्धि का मध्यम आयु का आदमी था, तो जाते हुए जीवन ने कँवल, जस्सी और सुशिल से कहा कि क्यों न वे भी उसे अपने खेतों के रख रखाव का दायित्व दे देते.

जीवन: “उसकी मंडियों और अन्य बाजारों में अच्छी पहचान और पहुँच है. मेरे विचार से वो तुम सबको अबसे अच्छा दाम दिलवा पायेगा. और उसके वेतन की तुम सब चिंता न करो. मैं जो उसे देता हूँ, उसमे ही बढ़ोत्तरी कर दूंगा. और इसमें कोई आपत्ति मत करना. तुम लोगों के सिवाय मेरा कोई अभिन्न मित्र नहीं है. तुम सब अपने घर, परिवार पर ध्यान दो. अपने बच्चों के पास जाओ और खुश रहो.”

जीवन की बात को नकारने का कोई औचित्य नहीं था. सब उसकी बात मान गए. और फिर पूरे दिन वे सब अपने अपने खेतों पर जाकर नए मेनेजर को उसका काम सौंपने में व्यस्त रहे. चूँकि अब मैनेजर का काम बढ़ गया था तो जीवन से उससे बात करके उसे हर खेत के लिए उसके वेतन का ३५% अतिरिक्त देना का वचन दिया. चार खेत और मिल जाने से उसे अब अपनी पुरानी कमाई से १४०% अधिक मिलने लगा. वो बहुत खुश हो गया और उसने जीवन का दिल से धन्यवाद किया. जीवन ने उसे एक नया ट्रेक्टर और मोटर साइकिल भी बुक करने के लिए कहा और बोला कि उसका पैसा वो ही दे देगा, और ट्रेक्टर उसके तीन मित्रों की पत्नियों के नाम से लिया जायेगा। मोटरसाइकिल वो बलवंत के नाम से ले ले. क्योंकि बाइक अगले दिन ही मिल सकती थी तो बलवंत के जाने से पहले ये कार्य सम्पन्न हो सकेगा.

सब कार्य अच्छे से सम्पन्न करने के बाद पाँचों मित्र बलवंत के घर लौट आये जहाँ उनका खाने की मनमोहक सुगंध ने स्वागत किया. नहाने के बाद सब यार फिर से आंगन में बैठे और शराब की बोतल फिर खुल गयी. सुशील ने महिलाओं को खेतों के आगे के प्रबंध के बारे में बताया तो सबने जीवन के गले लगकर उसका धन्यवाद किया. गिरि ने भी जीवन को गले से लगाकर उसे धन्यवाद किया. उसे इस आदमी के बड़प्पन पर विश्वास नहीं हो रहा था. कितने निश्छल मन से वो सबके भले के लिए प्रयत्न करता है.

जीवन ने गिरी से पूछा: “फिर क्या किया आज दिन भर.”

इसके पहले कि गिरी उत्तर देता गीता बोल पड़ी, “आज सच में भाई साहब ने इतना मजा करवाया कि कभी नहीं भूल पाएंगे.”

“ऐसा क्या किया, भाई.”

गीता ने कहा, “मैं बताती हूँ.”

गिरी को छोड़कर सब चले गए तो उन्हें घर में चार महिलाओं के साथ अकेले रहना कुछ खेलने लगा. घर में टीवी भी नहीं था. जीवन के किसी भी मित्र ने अपने घर में टीवी नहीं लगवाया था. उनका मानना था कि ऐसा करने से एक दूसरे से सम्पर्क टूट जाता है. और जब संगी साथी हों तो टीवी का क्या काम. कुछ देर समाचार पत्र पढ़ने के बाद गिरी ऊबने से लगे. तभी गीता उनके पास आयी और उनके पास बैठ गयी.

गीता: “आपको ऊब हो रही है न? पर हम भी अपने काम में व्यस्त होने के कारण आप की ओर ध्यान नहीं दे पाए.”

गिरी: “नहीं, ऐसा कुछ नहीं है.”

गीता: “शर्माइये नहीं भाईसाहब. हम भी समझते हैं. पर अब हम अपने काम समाप्त कर चुकी हैं और आपके कमरे में निर्मला आपकी राह देख रही है. बहुत अधीर हो रही है वो आपसे चुदने के लिए. तो अब मन मत मसोसिये और जाकर उसे अच्छे से रगड़िये। कल बेचारी की गांड अनचुदी रह गयी थी तो बहुत खुजला रही है. पहले वहीँ लगाना पहले दाँव। वैसे आपको गाँव के बारे में और कुछ भी पता लग जायेगा उसके पास जाने पर.”

गिरी का लंड ये सुनकर अकड़ गया और वे उठे और अपने कमरे में चल दिए.

“गीता, पूनम कहाँ है?” बबिता ने पूछा.

“भाईसाहब को गाँव के बारे में समझने के लिए निर्मला के ही साथ है.”

‘गीता, तुम बहुत हरामी हो.”

“वो तो है. चल हम झरोखे से उनकी मस्ती का खेल देखते हैं.”

ये कहकर दोनों गिरी के कमरे के झरोखे से अंदर के दृश्य का अवलोकन करने लगीं.

गिरी जब कमरे में पहुंचे तो देखा कि वहां कोई नहीं दिखा. फिर पायल की छम चम सुनाई दी तो देखा कि निर्मला एक कोने में झाड़ू लगा रही है.

“किसी को ढूंढ रहें हैं क्या भाई साहब.” ये पूनम थी जो कमरे के दूसरी ओर झाड़ू लगा रहे थी.

गिरी को कुछ सुझा नहीं, “वो गीता भाभी ने भेजा था कि अपने मुझे बुलाया है.” निर्मला को देखकर वो बोले.

निर्मला: “अब भला आपके कमरे में मैं आपको क्यों बुलाऊंगी भला.” उसने ऑंखें मटकाकर पूछा.

पूनम: “अरे दीदी, क्या पता किसी काम से भेजा हो आपके पास. क्या कहा था गीता दीदी ने आपसे?”

अब गिरी को काटो तो खून नहीं.

“वो वो वो.. मेरे सुनने में ही कुछ गलती हो गयी होगी. मैं चलता हूँ.”

पर अब तक निर्मला और पूनम उनके बहुत निकट आ चुकी थीं.

निर्मला: “गलत तो नहीं सुना भाई साहब, हमने भी यहां से उनकी बात पूउउउउउरि सुन ली थी.”

पूनम: “अब क्या है न भाई साहब, न अपने गलत सुना न दीदी ने गलत कहा.” फिर अपने चेहरे को गिरी के बिलकुल समीप लेकर कामुक स्वर में बोली, “खुजली ही तो है, और आपके पास वो हथियार भी जो उसे मिटा सके. तो आप कहाँ जाने की सोचने लगे.” पूनम ने गिरी के पीछे जाकर दरवाजा बंद कर दिया।

फिर दोनों जोर जोर से खिलखिला कर हंस पड़ीं.

“आपसे चुहल करने में बहुत मजा आया. आप सच में ये समझे न की गीता ने आपको बुद्धू बनाया है.”

गिरी ने हामी भरी और फिर वो भी उनकी हंसी में सम्मिलित हो गए.

दूर झरोखे से झांकती हुई गीता और बबिता अपनी साड़ी के मुंह में ठूंस कर हंसी दबाने का प्रयास कर रही थीं.

निर्मला: “भाई साहब, हम गाँव वाले भी हंसी मजाक करना जानते हैं.”

गिरी: “सच भाभी, आप लोगों ने तो मेरे तोते ही उड़ा दिए थे. मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि हुआ क्या?”

निर्मला: “भाईसाहब तोते को उड़ने मत देना, उसे कहीं की खुजली मिटानी है.” और पूनम और निर्मला फिर से खिलखिलाने लगीं.

अब तक गिरी भी अपने आपको संयत कर चुके थे.

“खुजली जहाँ भी हो, जितनी भी भीतर हो, मेरा तोता अपनी चोंच से उसे मिटा देगा. अब आप जरा वैद्य गिरिधारी के सामने बीमार को लेकर आओ। “

ये कहकर गिरी एक कुर्सी पर बैठ गए और ऐसा दिखने लगे जैसे वो कोई वैद्य हैं. पूनम और निर्मला भी इस खेल में मिल गए और गीता और बबिता दूर से इस रोमांचक खेल को देख रहे थे. पूनम निर्मला को सहारा देती हुई उनके पास ले आई। निर्मला ऐसे चल रही थी जैसे लंगड़ा रही हो.

गिरी: “क्या हुआ भाभी, ये लंगड़ा क्यों रही हैं?”

पूनम: “वैद्य जी, इन्हे खुजली हो रही है, बहुत अंदर तक. इसी कारण इनसे ठीक से चला नहीं जा रहा.”

गिरी: “अरे रे रे रे, ये तो बहुत गंभीर बीमारी के लक्षण हैं. इनकी खुजली को अगर तुरंत नहीं मिटाया गया तो इनकी जान पर बन सकती है.”

पूनम और निर्मला ने अपने मुंह पर हाथ रखकर चौंकने का अभिनय किया, “हाय दैया ! वैद्य जी, अब आप ही इनको ठीक कर सकते हो.” पूनम बोली.

निरमा ने हाँ में हाँ मिलायी, “हाँ वैद्य जी, मैं अभी मरना नहीं चाहती. मुझे बचा लीजिये.”

उधर गीता और बबिता खुसुर पुसुर कर रही थीं, “इसकी गांड में खुजली हो रही है या मिर्ची लगी है जो मर जाएगी. वैसे नौटंकी दोनों कमाल की करती हैं.”

गिरी: “नहीं भाभी, जब तक वैद्य गिरिधारी हैं मैं आपको मरने नहीं दूंगा. पूनम भाभी, आप इन्हे बिस्तर पर ले जाइये और जहां खुजली है उस स्थान को खोल दीजिये. इसका तो इलाज मेरा तोता ही कर सकता है.”

पूनम: “उइ माँ, वैद्य जी. दवाई से नहीं जाएगी क्या ये खुजली.”

गिरी: “दवा से ही जाएगी, पर वो दवा तोता अपनी चोंच से डालेगा तब.”

पूनम: “आप बहुत ही उच्च कोटि के वैद्य हैं. हम तो ये सब समझते नहीं. चलो भाभी, दिखाओ तो वैद्य जी को खान खुजली है.”

ये कहकर पूनम ने निर्मला को बिस्तर पर घोड़ी के आसन में किया और एक ही झटके में उसकी साड़ी और पेटीकोट ऊपर करते हुए उसकी गांड को नंगा कर दिया.

फिर निर्मला की गांड के चारों ओर ऊँगली घुमाती हुई बोली, “खुजली अंदर है. पर तोते के जाने के लिए सुरंग को पहले कुछ तैयार करना होगा.”

गिरी, “हम्म्म. समस्या गहरी है, मुझे अपने विशेष तोते की सहायता लेनी होगी. मैं उसे निकलता हूँ. आप ऐसा करो कि अन्य वस्त्र भी निकाल दो, अगर दवा उन पर लगी तो व्यर्थ में ही गंदे हो जायेंगे.”

किसी का भी मन इस खेल से हटने का नहीं था. तो पूनम अपने कपड़े निकालने लगी.

गिरी, “आप क्यों कपड़े उतार रही ही?”

पूनम: “वैद्य जी, आप ऑपरेशन करोगे तो नर्स भी तो लगेगी. और नर्स के कपड़े गंदे करके आप को क्या मिलेगा.”

गिरी, “आप बहुत बुद्धिमान हैं. बिलकुल सही कह रही हैं.”

गिरी अपने कपड़े निकालने लगे और पूनम अपने और फिर निर्मला के कपड़े उतार कर नंगी हो गयीं.

पूनम: “वैद्य जी, अगर आप आज्ञा दें तो मैं खुजली के स्थान को ऑपरेशन के लिए तैयार कर दूँ.” फिर आंखे झपकते हुए, “फिर आपके तोते को कर दूंगी.”

गिरी: “बिलकुल, नर्स को यही करना चाहिए.”

पूनम ने निर्मला को फिर घोड़ी बनाया और उसकी गांड चाटने में व्यस्त हो गयी.

कुछ देर अपनी जीभ और उँगलियों के प्रयोग से निर्मला की गांड को लौड़े के लिए उपयुक्त जानकर पूनम ने गिरी से कहा.

“वैद्य जी, एक बार देखिये क्या अब आपका तोता इसके भीतर जाकर खुजली मिटा पायेगा?”

गिरी किसी अनुभवी डॉक्टर के समान पास गया और निर्मला की गांड का निरीक्षण किया और उसे भी लगा कि गांड अब तैयार है.

“नर्स पूनम, हम तुम्हारे काम से बहुत खुश हैं. पर अब तुम्हें मेरे तोते में वो दवा भरनी है जो इनकी खुजली का अंत कर पाए.”

ये कहते हुए गिरी ने पास पड़े एक ग्लास को लिया और लंड उसमे डालकर ऐसा दर्शाया जैसे इंजेक्शन भर रहे हों.

“अब दवा भर दी गई है.” गिरी ने कहा, “नर्स, अब आप मेरे तोते को अंदर जाने के लिए तैयार करें जिससे कि भाभी को किसी प्रकार की कठिनाई न हो.”

“जी वैद्य जी.” ये कहकर पूनम पूरे मन से गिरी के लंड को चूसने लगी और कुछ ही देर में उसे लोहे के समान कड़ा पाया. “वैद्य जी, आपका तोता ऑपरेशन के लिए तैयार है.”

“ठीक है, नर्स. पर आप भाभीजी को थोड़ा संभालिएगा क्योंकि आरम्भ में तोते के प्रवेश में उन्हें कुछ कष्ट हो सकता है.”

“अवश्य, वैद्यजी.” पूनम ने मुस्कुराकर उत्तर दिया और निर्मला के सामने बैठकर हंसती हुई उसके मुंह को अपनी चूत में दबा दिया. ‘अब आप ऑपरेशन आरम्भ करिये, वैद्य जी. खुजली का निवारण नितांत आवश्यक है.”

गिरी ने अपने लंड को निर्मला की फूली हुई गांड पर रखते हुए एक लम्बे धक्के के साथ पूरे लंड को अंदर डाल दिया. निर्मला कुछ कसमसाई, पर उसे गांड में लेने का लम्बा अनुभव था. पूनम ने गिरी का उत्साह बढ़ाने के लिए कहा, “वैद्य जी, मरीज की प्रतिक्रिया से लग रहा है कि तोते की चोंच सही स्थान पर गयी है. अब आप देर न करें और शीघ्र अति शीघ्र दवा से खुजली मिटायें.”

गिरी भी अब कुछ रुकने की स्थिति में नहीं था. उसने लम्बे और तेज धक्कों से निर्मला की गांड को चरमरा दिया. अगर पूनम से उसका मुंह अपनी छूत में न दबाया होता तो अवश्य वो चीख चीखकर और लौड़े की मांग करती. दस पंद्रह मिनट गांड मारने के बाद गिरी ने अपना रस निर्मला की गांड में छोड़ दिया. निर्मला इस समय में तीन बार झड़ी थी और बिस्तर को समुचित रूप से गीला कर चुकी थी. गांड से लंड निकालने के बाद गिरी ने पूनम की ओर देखा.

“नर्स पूनम, तोते ने दवा अंदर डाल दी है, मुझे लगता है कि इनकी खुजली मिट गयी होगी. आप एक बार देखिये और तोते को फिर से अपने यथावत रूप में करने का कष्ट करें.”

पूनम तुरंत उठी और गिरी के लंड को चाटकर उसे साफ कर दिया. लंड अब मुरझा भी गया था.

“वैद्य जी, तोता अपने सामान्य रूप में जा चुका है. अब आप इसे वापिस पिंजड़े में डाल सकते हैं. तब तक मैं भाभी का निरीक्षण करती हूँ. खुजली आगे के रास्ते पानी के रूप में निकली होने चाहिए.”

ये कहकर उसने हँसते हुए निर्मला को सीधा किया और देखा कि बिस्तर पूरा गीला है. उसने निर्मला की चूत को कुछ देर यूँ ही चाटा और फिर दोनों हँसते हुए बैठ गयीं.

पूनम: “वैद्य जी, खुजली पूरी मिट गयी है, देखिये बिस्तर पर कितना पानी पड़ा है. आपके तोते ने इनको नया जीवन दिया है.”

तीनों हँसते हुए लोटपोट हो गए. झरोखे में खड़ी गीता और बबिता भी हंस हंस कर पागल हो गयीं.

“सच में भाई साहब, इस खेल में अपने चार चाँद लगा दिए. जब ये सब सुनेंगे तो बहुत हँसेंगे”

सबने अपने कपड़े पहने और आंगन में लौट गए. गीता और बबिता भी आंगन में आ गए और सब हँसते खेलते हुए खाने के लिए बैठ गए.

*******

पूरा सुनते सुनते सभी हंस हंस कर लोटपोट हो रहे थे. हँसते हँसते सारे पुरुषों ने आकर गिरी की पीठ थपथपाई.

जीवन: “अरे पूनम, अगर मुझे पता होता कि तुम इतनी अच्छी नर्स हो तो मैं अपनी हर चोट तुम्हें ही दिखाता।”

पूनम: “आपको कभी किसी चोट के लिए मेरी याद ही नहीं आयी. पहले भाभी ….” कहते हुए पूनम ने अपने मुंह पर हाथ रख लिया. “मुझे क्षमा करना भाई साहब, मैंने भाभी का नाम ले लिया.”

जीवन को आघात तो लगा था पर उसे भी ये समझ थी कि पूनम ने ये अबोध मन से कहा था. “कोई बात नहीं, पूनम. उसे गए तो अब वर्षों हो गए. तुम कुछ कह रही थीं न, बोलो.”

पूनम: “मेरा कहना था भाईसाहब कि आपको नर्स की याद तभी आती है जब आपके लंड को इसकी याद आती है.”

जीवन: “नहीं. मैं दिन में अनगिनत बार तुम सबको याद करता हूँ. तभी तो हर बार खिंचा चला आता हूँ.”

सुशील: “तो वैद्यजी, अपने मेरी पत्नी की सही सही चिकित्सा तो की है न? या फिर ऐसी समस्या फिर आ सकती है.?”

गिरी: “समस्या का अस्थायी निदान ही हुआ है. ये ऐसी गंभीर बीमारी है जिसका कोई और इलाज नहीं है. जब भी ऐसी परिस्थिति दोबारा बने तो आपमें से किसी के तोते को इन्हें दवा देने का कार्यभार संभालना होगा. वैसे नर्स पूनम की भी आप सहायता ले सकते हैं. इनके अनुभव का आपको भी अवश्य लाभ होगा.”

सुशील: “ठीक है वैद्यजी. तो क्यों न मैं आज नर्स पूनम का निरीक्षण करूँ और ये निश्चित करूँ कि वे इस कार्य के लये उपयुक्त हैं. जस्सी, तुझे कोई आपत्ति तो नहीं है?”

“अरे मुझे कोई आपत्ति नहीं. मुझे तो बबिता भाभी से समझना है वैद्यजी के गुण जो उन्होंने कल रात जाने होंगे.

जीवन: “मुझे तो लगता है कि निर्मला का ठीक उपचार करने के लिए बलवंत और मैं उसका निरीक्षण करना चाहेंगे.” निर्मला की चूत ये सुनकर बह निकली. वो तुरंत उठकर जीवन के गले लग गयी.

फिर सुशील ने पूनम को साथ लिया, जीवन और बलवंत ने निर्मला को, जस्सी बबिता के साथ तो गिरी गीता के साथ कल वाले कक्ष में चले गए.

******
 
सुनीति का घर :

जब गिरी निर्मला का उपचार कर रहे थे, तब सुनीति के कमरे में सुनीति और कुमार आलिंगनबद्ध थे.

सुनीति: “कुमार बेटा, मेरी एक बात मानेगा?”

कुमार: “बिल्कुल, बोलो तो सही.”

सुनीति: “आज बस मेरी गांड मार ले. कल तेरे पापा और लोकेश भाईसाहब ने मेरी चूत में डबल लंड से चुदाई की थी, तो आज के लिए उसे छोड़ दे.”

कुमार: “अरे मॉम, मुझे तो आपकी गांड मारने में वैसे भी अधिक मजा आता है, तो भला मैं क्यों आपकी बात नहीं मानूंगा.” कुमार ने सुनीति के होंठों को चूमकर उत्तर दिया.

माँ बेटे बिस्तर की ओर बढे और सुनीति ने अपने कपड़े उतारे तो कुमार ने अपने. पलक झपकते ही दोनों एक दूसरे के सामने नंगे खड़े थे.

“मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है कि असीम का विवाह होने की संभावना है. पता नहीं क्या कर रही होगी स्मिता उसके साथ.”

“अरे मॉम, भाई की चिंता छोड़ो. अगर मेरा आकलन सही है, तो आपकी बहू के रूप में महक का घर में आना निश्चित ही है.”

“पर समुदाय के नियम क्या करते हैं, ये भी निर्भर करता है.”

“क्या आपको लगता है कि अपने कोई नियम तोड़ा है? नहीं न. तो भाई आपके लिए बहू लेकर आएंगे. अब उनकी चिंता न करते हुए, स्मिता आंटी की चिंता करो तो फिर भी समझ में आये.”

“तुम दोनों अपने आपको बड़ा महारथी मानते हो न चुदाई में?”

“आप नहीं मानती?”

सुनीति कुमार के पास जाकर उसके होंठों को चूसने लगी. फिर जब अलग हुई तो बोली, “न मानती होती तो तुमसे कभी न चुदवाती.”

“मॉम आप अब घोड़ी बन जाओ. मैं आपकी गांड को चाटकर उसे लंड के लिए खोल देता हूँ.”

सुनीति ने अपेक्षित आसन लिया और अपनी गांड ऊपर उठा दी. कुमार ने भूखी दृष्टि से अपनी माँ की उभरी हुई गांड को देखा और उसके बीच के भरे सितारे को देखकर उसके मुंह में पानी आ गया. अपना आसन बनाया और सुनीति की गांड को चाटने लगा. जीभ से कुरेदते हुए सुनीति का सितारा कुछ देर तक तो अवरोध करता रहा पर जब देखा की आक्रमणकारी नहीं मानेगा तो उसके लिए स्थान बना दिया.

गांड के खुलते छेद में कुमार ने अपनी जीभ को अंदर डाला और पूरी श्रद्धा से सुनीति की गांड का सेवन करने लगा. सुनीति को अपने परिवार के हर सदस्य का गांड चाटने का व्यसन अत्यंत प्रिय था. अगर गांड मारने से पहले कोई उसे इस प्रकार से प्यार करता है, तो वो गांड मारने का सच्चा अधिकार रखता है. कुमार इस विचार को पूर्णतया सिद्ध कर रहा था. जिस प्रेम और अनुराग से वो सुनीति की गांड चाट रहा था, उसे देखकर ही उसका अपनी माँ के प्रति अथाह प्रेम का ज्ञान होता था.

सरपट चलती जीभ ने गांड को अंदर से भी अपने थूक से चिकना कर दिया था. समय था अब किसी मासपिंड से उसके हनन का. पर अगर माँ की चुदाई कल धड़ल्ले से हुई थी तो आज उसकी गांड को प्यार की आवश्यकता थी. कुमार उसे इस प्यार से अवगत कराने का इच्छुक था.

“मॉम, अगर आप कहो तो अंदर डालूं लंड.”

“हाँ, बेटा। अब मार ही ले मेरी गांड. पता नहीं असीम स्मिता की गांड भी मरेगा या यूँ ही भेज देगी वो उसे घर.”

“अरे मॉम, उनकी चिंता आप न करो. भाई ने उनकी गांड बजाए बिना लौटना नहीं है. इस बात की सौ प्रतिशत गारंटी है. आप अपनी गांड की बात करो.”

“कहा तो तुझे, मार मेरी गांड।”

कुमार ने लंड साधा और पहले धक्के में तीन चार इंच अंदर पेल दिया. फिर उसने हल्की गति से बाकी के लंड को अंदर किया और सुनीति की गांड को बहुत प्यार से मारने में व्यस्त हो गया.

ऐसा नहीं था कि कुमार ने सुनीति की गांड को कभी प्यार से नहीं मारा था. पर उसमे काफी समय बीत चुका था. सुनीति भी उसके दोनों बेटों से तीव्र और निर्मम चुदाई की इतनी आदी हो गयी थी कि उसे कुमार का ये रूप बहुत भा रहा था. उसे उनके संसर्ग के आरम्भ के दिन याद आ गए जब दोनों बेटे उसे बहुत प्यार से चोदते थे. पर जब वे बाहर की औरतों को चोदने लगे तो धीरे धीरे उनका अपनी माँ के प्रति भी चुदाई का ढंग बदल गया. ये इतना शनैः शनैः हुआ कि सुनीति को भनक भी न लगी और वो उसे भी ऐसी ही चुदाई की लत लग गयी.

पर आज उसकी गांड में मंथर गति से चलता हुआ लंड उसके रोम रोम को जैसे चूमते हुए चल रहा था. उसे इस प्रकार की चुदाई में आज विशेष ही आनंद आ रहा था.

“कुमार, आज तुम जैसे मेरी गांड मार रहे हो न, समय समय पर ऐसे ही किया करो. तुम दोनों भाई इतना जोर से चोदते हो कि उसमे प्यार अब कम लगता है.”

“मॉम, मैं आपको वचन देता हूँ और भाई को भी समझा दूंगा. आपकी गांड तो हमारे लिए पूज्यनीय है. इसे अवश्य ही हम अब पूरे प्यार से मारा करेंगे. पर दादाजी का कुछ नहीं कर सकते.”

“उनकी छोड़, तुम दोनों ने ही अगर मुझपर दया की तो भी ये परोपकार ही होगा.”

गांड कि इस गति से चुदाई में आनंद से सुनीति की भी तृप्ति हो रही थी. उसने कुमार से कहा कि इसी प्रकार से वो कुछ गति बढ़ाते हुए गांड मारे। कुमार ने उसकी बाप सुनकर अपनी गति कुछ कुछ बधाई, पर इतनी नहीं कि सुनीति को कठिनाई हो. और चूँकि दोनों इसका आनंद ले रहे थे तो कोई बीस मिनट के बाद कुमार ने अपना माल सुनीति की गांड में छोड़ दिया. इसके बाद माँ बेटे वहीँ नंगे एक दूसरे से लिपट कर चूमा चाटी करते रहे और न जाने कब सो भी गए.

शाम को दोनों की आंख तब खुली जब कमरे को किसी ने खटखटाया. पूछने पर सलोनी थी. कुमार ने उठकर नंगे ही कमरा खोला और सलोनी चाय लेकर अंदर आ गयी. उसे माँ बेटे को इस अवस्था में देखकर कोई अचरज नहीं हुआ. उसने चाय को सोफे के पास पड़ी टेबल पर रखा और सुनीति को गांड से निकलते रस को देखकर पूछा कि अगर सुनीति चाहे तो वो उसे साफ कर दे. सुनीति ने स्वीकृति दी तो सलोनी ने उसकी गांड चाटकर स्वच्छ कर दी और बड़ी प्रेम भरी दृष्टि से कुमार के लंड को देखा.

“मौसी, संकोच मत करो. चाट कर अपना मन संतुष्ट कर लो.” कुमार ने हंसकर कहा तो सलोनी ने इस कार्य को भी पूरा किया और कमरा बंद करके चली गयी.

“आज खाना देर से बनेगा.” सुनीति ने उठाते हुए कहा.

“क्यों, क्या हुआ. मॉम.”

“अभी जाकर ये शंकर पर चढ़ेगी. तो फिर खाना तो देर ही से चढ़ायेगी न.”

इस बात पर सुनीति और कुमार हंस पड़े और चाय की चुस्कियां लेने लगे. फिर दोनों ने कपड़े पहने और बैठक में टीवी देखते हुए अन्य परिवार जनों की प्रतीक्षा करने लगे.

*******

सबसे पहले असीम ही आया, और उसके चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान थी. सुनीति को एक क्षण के लिए जलन हुई पर तुरंत ही उसने अपने आप को मनाया.

सुनीति: “क्या हुआ, सब ठीक रहा?”

असीम: “जी मॉम, पूछ रही थी, नहीं बता रही थी कि अपने मुझे बहुत अच्छा सिखाया है.”

सुनीति: “तो तुमने क्या कहा?” सुनीति के स्वर में गर्व छलक रहा था.

असीम: “क्या कहता, बस उन्हें खुश कर दिया.”

सुनीति: “क्या तुम सच में विवाह के लिए तैयार हो? समुदाय के प्रस्ताव के बाद हमें एक अवसर रहेगा मना करने का.”

असीम: “मेरी जो बातें महक से हुई हैं, उनको ध्यान में रखकर मैं कह सकता हूँ, कि मुझे इस विवाह में कोई आपत्ति नहीं है.”

सुनीति: “अगर स्मिता और समुदाय ने स्वीकृति दी तो.”

असीम: “हाँ वो एक अड़चन है, पर देखते हैं क्या होता है.” असीम से स्मिता के कहे अनुसार बात को छुपा लिया.

आशीष के आने के बाद सब बैठक में बैठे और सुनीति ने आशीष को उसकी ड्रिंक दी और अपने भी लिए एक ले ली.

आशीष, “असीम का क्या रहा?”

सुनीता ने बताया और गर्व से ये भी बताया कि स्मिता ने सुनीति की शिक्षा की बधाई दी है.

आशीष, “अरे जानेमन, तुम्हारे सिखाये हुए तो हम सब हैं.”

सुनीति, “धत, मसखरी मत करिये. अपने ही मुझे सब सिखाया है.”

दूसरी ड्रिंक अभी बनी ही थी कि सलोनी आ गयी.

सुनीति ने मसखरी से पूछा, “कुछ देर कर दी, लगता है शंकर तेरी गर्मी निकाल रहा था.”

सलोनी, “जी दीदी, आप दोनों को देखकर आग जो लगी थी.”

आशीष: “भाग्या कैसी है, उसे कोई परेशानी तो नहीं है. डॉक्टर से कब मिलना है?”

सलोनी: “तीन दिन बाद, वैसे अभी तक मुझे कोई समस्या नहीं लग रही.”

सुनीति: “शंकर से कहना थोड़ा प्यार से चुदाई करे, ज्यादा हीरो न बने.”

सलोनी: “नहीं दीदी, वे तो बहुत ध्यान रख रहे हैं, पर भाग्या का ही दिन रात चुदवाने का मन करता है. तो ये और मैं दोनों एक एक बार उसे ठंडा कर देते हैं.”

असीम: “मौसी, कभी हमें भी अवसर दे दीजिये, अगर आप दोनों से नहीं सम्भल रही.”

सलोनी: “आप जानते हैं भैयाजी, उसका विचार इस पर. पर मैं उससे कह अवश्य दूंगी. शायद आपको उसकी चूत मिल ही जाये.”

आशीष: “सलोनी, खाना बना दो, मुझे आज कुछ जल्दी है. कल सुबह बाहर जाना है.”

सुनीति चौंक गयी, “कहाँ जा रहे हो.”

आशीष: “बाद में बताता हूँ.”

तभी अग्रिमा ने घर में प्रवेश किया. उसका चेहरा कुछ तमतमाया हुआ सा था. वो सीधे बार पर गयी और अपने लिए एक ड्रिंक बनाई. उसे एक ही साँस में समाप्त करके एक और ड्रिंक बनाई और इस बार सुनीति के पास आकर बैठ गई. इसके पहले कि कोई कुछ बोल पता, उसने असीम और कुमार की ओर ऊँगली से संकेत किया.

“आप और आप, दोनों, आज रात मेरे साथ रहोगे. और मुझे अच्छे से रगड़कर चोदोगे।”

दोनों भाइयों ने सिर हिलाकर कर हामी भरी और सुनीति से रुका नहीं गया, “क्या हुआ बच्ची, बड़ी गर्मी में है.”

“ओह मॉम, आज मैं मेरी सहेली है न, मोना, उसके साथ उसकी ताई जी के घर गई थी.”

सुनीति: “मैंने तुझे कई बार समझाया है, उस लड़की का साथ छोड़ दे. वो किसी दिन तुझे फँसा देगी. तो क्या हुआ?”

अग्रिमा ने गहरी साँस ली, “मैंने भी यही सोचा है. खैर, जैसा मोना करती है उसने तीन लड़कों को अपनी ताईजी की चुदाई के लिए फँसाया था. और जब उन लड़कों ने ताईजी की चुदाई न करके हम दोनों पर चढ़ने का प्रयास किया तो बहुत हो हल्ला हुआ. मोना ने जब पुलिस बुलाने की धमकी दी तब मामला शांत हुआ और वो लड़के चले गए. उसकी ताईजी ने मुझसे क्षमा मांगी और कहा कि आगे से वो मुझे कभी भी उनके इस षड्यंत्र में नहीं जोड़ेगी. उन्होंने मोना से भी यही कहा.”

सुनीति: “वो तो ठीक है, पर तुझे चुदवाने की इतनी आग कैसे लग गयी, वो भी इन दोनों दुष्टों से?”

असीम: “मॉम, आप हमें दुष्ट कह रही हो?”

सुनीति: “ध्यान रहे, दोनों इसे चोदोगे आज, पर फूल जैसी बच्ची है मेरी, थोड़ा प्यार से चोदना, मेरी चुदाई जैसे करते हो वैसे नहीं.”

असीम: “अरे माँ, हमारी भी बहन ही है, इसे पता भी नहीं लगेगा कि दो दो लौड़े इसकी बजा रहे हैं.”

सुनीति: “हाँ तो ऐसी गर्मी कैसे चढ़ गयी.”

बाद में मोना ने एक बार मुझे चाटने का आग्रह किया. और हम कुछ बड़े ही थे कि उनकी पड़ोसन आ गयी और पूछताछ करने लगी. फिर मैं यूँ ही घर आ गयी. तो अब मेरा मन जम के चुदवाने का है.”

आशीष: “तुम लोग मजे करना. मुझे सुबह जल्दी निकलना है काम के लिए. एक नया अनुबंध होने की संभावना है. पर शाम तक लौट आऊंगा.”

सलोनी ने खाने के लिए सबको पुकारा और सब खाना खाकर साथ न बैठकर अपने कमरों में जाने लगे. सिम ने अग्रिमा से कहा कि वे दोनों आधे घंटे में उसके कमरे में आएंगे. सुनीति आशीष के साथ अपने कमरे में गयी. आशीष ने बताया कि कल उसे उसी रिसोर्ट में नए काम के लिए जाना है. ये अनुबंध मिलने से उन्हें लगभग २० लाख का लाभ होने की संभावना है. पर ये बात पूरा होने तक गुप्त रहनी चाहिए. इसके बाद सुनीति ने आशीष और अपने लिए एक ड्रिंक बनाई और कुछ देर बाद वे सोने चले गए.

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