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Hindi Antarvasna एक अनोखा बंधन - पुन: प्रारंभ


[color=rgb(255,]अंतिम अध्याय: प्रतिकाष्ठा[/color]
[color=rgb(51,]भाग - 5[/color]

[color=rgb(97,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

अगली सुबह बच्चों के स्कूल जाने के बाद मिश्रा अंकल जी का फ़ोन आया और उन्होंने माँ को सपरिवार शाम को अपने फार्महाउस पर रखी पार्टी में आमंत्रित किया| माँ को पार्टी में जाने का अधिक चाव नहीं था इसलिए वो जाने से मना करने लगीं, तब फ़ोन मिश्रा आंटी जी ने सँभाला और माँ को पार्टी में आने के लिए विवश कर ही दिया|

गौर करने वाली बात ये है की मैंने अभी तक अपने परिवार को परसों रात हुए काण्ड के बारे में नहीं बताया था और इसे ले कर बवाल होना तय था!


[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]

शाम
को हम सभी अच्छे से तैयार हो कर मिश्रा अंकल जी के फार्महाउस पहुँचे| मिश्रा अंकल जी के फार्महाउस के बाहर गाड़ियों का ताँता लगा हुआ था, एक से बढ़कर एक महँगी गाडी वहाँ खड़ी थी| ऐसा लगता था मानो किसी फ़िल्मी सितारे की पार्टी हो! दरअसल इस पार्टी में मिश्रा अंकल जी के पूंजीपति दोस्त तथा अन्य बिल्डर आये थे|

खैर, हमें देखते ही मिश्रा अंकल जी, मिश्रा आंटी जी, उनकी बेटी और दामाद मुकुल, सभी आगे आये तथा हाथ जोड़ कर हमारा स्वागत किया| हमारा यूँ स्वागत किया जाने से माँ थोड़ा हैरान थीं, हमें आज तवज्जो ऐसे दी जा रहे थी मानो हम मुख्य-अथिति हों! हम अभी सोच में थे की अंकल जी ने एकदम से मुझे अपने गले लगा लिया| माँ और संगीता को मिश्रा अंकल जी का ये व्यवहार अजीब लग रहा था और उनके मन में सवाल तैयार हो गया था मगर माँ कुछ पूछें उससे पहले मिश्रा अंकल जी ही बोल पड़े; "बहन जी, अगर परओं रात मानु ना होवत, तो आज हम हियाँ ज़िंदा नाहीं ठाड़ होइथ!" मिश्रा अंकल जी थोड़ा भावुक होते हुए बोले| मिश्रा अंकल जी की बात सुन मेरी माँ, संगीता और दोनों बच्चे सन्न रह गए! "परओं रतिया हम आपन साइट पर अकेल रहन की तभायें तीन ठो गुंडा हमसे पैसा लिए खतिर आ धमके! हम निहथ्था रहन तो हम पाहिले आपन समधी (मिश्रा अंकल जी के दामाद मुकुल के चाचा) का फ़ोन किहिन मगर ऊ ससुर आपन पीठ दिखाए के भाग खड़ा भवा! हम सोचेन की हो न हो मुन्ना (मैं) आपन साइट पर होइ, एहि से हम ऊ का फोन करि के बुलायेंन| हमार एक फ़ोन पाई के, मुन्ना तुरंते दौड़ा आवा और जब तलक ऊ तीनों गुंडा पइसवा गिन के चले नाहीं गए, तब तलक मानु हमरे लगे ठाड़ रहा| अगर मानु नाहीं आवा होवत तो ऊ तीनों हमार पैसवाओ लूट लेत और हमका कहीं मारी के गाड़ देत!" मिश्रा अंकल जी ने सारा किस्सा सुनाया मगर शुक्र है की उन्होंने मेरे उनके तमंचे को हाथ में ले कर लपरवाह होने का जिक्र नहीं किया|

मिश्रा अंकल जी की बात सुन माँ, संगीता, आयुष और नेहा हैरान थे की मैंने इतनी बड़ी बात उनसे छुपाई| एक बस स्तुति थी जो की मेरे कंधे पर अपना सर रखे चुपचाप आस-पास की चका-चौंध देखने में व्यस्त थी! सारी बात जानकार मेरी माँ के चेहरे पर गुस्से, गर्व और हैरानी से मिश्रित भाव उमड़ आये थे| माँ ने अपने हाव-भाव ठीक किये और नकली मुस्कान हँसते हुए मेरी पीठ थपथपाने लगी| जब माँ ने नक़ली मुस्कान का मुखौटा ओढ़ा तो संगीता भी नक़ली मुस्कान लिए मुझे देखने लगी| आयुष मामले की गंभीरता नहीं समझता था इसलिए वो पहले की तरह ख़ुशी से चहकने लगा था| एक केवल मेरी बिटिया नेहा थी जिसके हाव-भाव नहीं बदले थे, उसके चेहरे पर मुझे ले कर चिंता की लकीरें उमड़ आई थीं| मैंने सबकी नज़र बचाते हुए नेहा के कँधे पर हाथ रख उसे शांत रहने का मूक इशारा किया|

"हमार मुन्ना लाखों में एक है और ऊ ससुर (मुकुल का चाचा) हमार मुन्ना का ईमानदारी पर बकवास करत रहा!" मिश्रा आंटी जी अपने ही समधी को खरी-खोटी सुनाने लगीं और मेरे सर पर हाथ रख मुझे आशीर्वाद देने लगीं| मिश्रा आंटी जी को मुझ पर गर्व हो रहा था और उधर मेरी माँ को मेरी लपरवाही कर दिलेरी दिखाने की कहानी सुन कर गुस्सा आ रहा था!

"अरे अब का सभाएं हियाँ ठाड़े रहिओ, चलो सब का अंदर लेइ के जाओ|" मिश्रा अंकल जी ने अपनी पत्नी को माँ, संगीता और बच्चों को अपने साथ ले जाने को कहा| मिश्रा अंकल जी की बात सुन उनकी बेटी आगे आई और मेरी गोदी से स्तुति को लेने लगी, लेकिन जैसे ही स्तुति ने देखा की कोई अनजान उसे मुझसे दूर कर रहा है, वैसे ही मेरी बिटिया ने छटपटाते हुए झूठ-मूठ का रोना शुरू कर दिया| मेरा मन स्तुति से दूर जाने का नहीं था मगर मिश्रा अंकल जी ने मेरे कँधे पर हाथ रख मुझे अपने साथ चलने को कह दिया| हम बाप-बेटी की इस समय वैसी हालत थी जैसे नब्बे (90s) के दशक में हीरो-हेरोइन को दुनिया वाले अलग कर देते थे! स्तुति तो छटपटाते हुए "पपई...पपई" की रट लगा कर रो सकती थी मगर मैं उसे देखते हुए भी कुछ नहीं कह सकता था|

मिश्रा अंकल जी के फार्महाउस के भीतरी हिस्से में महिलाओं और बच्चों की महफ़िल जमा थी, उनके लिए शानदार बूफे लगा था तथा बच्चे उसी बूफे के इर्द-गिर्द खेल-कूद रहे थे| फार्महाउस के बहरी हिस्से में सभी आदमियों की महफ़िल जमा थी, हमारे खाने के लिए समान भीतर से वेटरों द्वारा लाया जा रहा था| अब मर्दों की महफ़िल सोमरस के बिना अधूरी है इसलिए मिश्रा अंकल जी ने एक टेबल भरकर दारु रखवाई थी| समस्या ये थी की शराब का ब्रांड रॉयल स्टैग से शुरू हो कर ब्लैक डॉग पर खत्म हो रहा था, bourbon या scotch तो थी ही नहीं यहाँ पर! 'इतने अमीर आदमियों को बुलाया और पीने के लिए बस ब्लैक डॉग? मिश्रा अंकल जी इतने कंजूस हैं क्या?' मैं मन ही मन बुदबुदाया|

इधर मिश्रा अंकल जी मेरे कँधे पर हाथ रखे हुए मुझे कुछ लोगों से मिलवाने लगे| यहाँ मौजूद सभी लोग बहुत अमीर आदमी थे, किसी ने सोने की मोटी चैन पहनी थी, तो किसी ने सोने की महँगी घड़ी, किसी के पास सबसे महँगा फ़ोन था, तो किसी ने महँगे कपड़े पहने थे! इन सभी अमीर लोगों के बीच में खुद को छोटा महसूस करने लगा था|

"ई लिहो मुन्ना, हमरे संगे एक ठो लगाओ!" ये कहते हुए मिश्रा अंकल जी ने एक जाम उठा कर मेरी ओर बढ़ाया| पीना तो मैं चाहता था मगर अपने बच्चों की मौजूदगी में पीना मतलब अपने ही बच्चों की नज़र में गिर जाना| "नहीं अंकल जी, शुक्रिया!" मैंने मुस्कुराते हुए न में गर्दन हिलाते हुए पीने से मना किया|

"अरे पी लिहो मुन्ना, तोहार पिताजी बतावत रहे की एक बार तू आपन जन्मदिन पर पीये रहेओ! एहि से तू आज ई नाहीं कही सकत हो की तू पीयत नाहीं हो!" मिश्रा अंकल जी मुस्कुराते हुए बोले| अब चूँकि मिश्रा अंकल जी मेरे पीने के बारे में जानते थे तो मैं उन्हें ये नहीं कह सकता था की मैं शराब नहीं पीता| तभी मिश्रा अंकल जी को लगा की शायद मैं अपनी माँ के डर से नहीं पी रहा इसलिए वो मुस्कुराते हुए बोले; "हियाँ तोहार माँ नाहीं है, चुपये से एक घूँट खींच जाओ!"मिश्रा अंकल जी मुझे चने के झाड़ पर चढ़ाते हुए बोले|

"नहीं अंकल जी, ऐसी बात नहीं है| दरअसल मैं अपने बच्चों की मौजूदगी में नहीं पीता|" मैंने नक़ली मुस्कान के साथ कहा| मेरी ये बात अंकल जी को पसंद आई की कैसे मैं अपने बच्चों पर अच्छा प्रभाव डालने के लिए पीने से मना कर रहा हूँ|

"अरे तो यहाँ कौन से तुम्हारे बच्चे खड़े हैं! चुपचाप एक पेग खींच लो! पापा जी (मिश्रा अंकल जी) की मन पसंद है...ब्लैक डॉग!" मिश्रा अंकल जी का दमाद मुकुल बीच में बोला| उसकी बातों में उसकी चिढ और मेरे प्रति द्वेष साफ़ नज़र आ रहा था|

दरअसल, परसों रात के काण्ड होने के बाद से, मिश्रा अंकल जी ने मुकुल के चाचा को ले कर कई बार सबके सामने बुरा भला कहा था| ऊपर से अंकल जी अपने ही दमाद के आगे मेरी बड़ाई करते नहीं थक रही थे इसलिए जाहिर है की इसका बुरा उनके 'दामाद जी' को लगना ही था, यही कारण है की इस समय मुकुल मुझसे चिढ़ा हुआ था|

"आदमी का ज़मीर भी कुछ होता है न मुकुल जी? यदि इंसान उसे ही मार ले तो फिर अपने बीवी-बच्चों की नज़र में तो वो वैसे ही गिर जायेगा! फिर काहे और किसके लिए इतनी जान-मारी कर के पैसे कमाना?" मैंने बड़ी सादगी से अपनी बात कही थी मगर मेरी बात में जो वज़न था, सब उसकी सरहाना कर रहे थे, जबकि मुकुल का मुँह बन गया था! साला (मुकुल) ब्लैक डॉग का नाम तो ऐसे ले रहा था मानो Chivas हो, उस साले को क्या पता की मैंने इतने महँगे ब्रांड पी रखे हैं जिसका उसने नाम भी नहीं सुना होगा| लेकिन इस बारे में मैं कुछ कह कर मिश्रा अंकल जी की तौहीन नहीं करना चाहता था इसलिए मैंने इस मुद्दे पर मुकुल की खिंचाई नहीं की!

इधर नेहा मुझसे बात करने के इरादे से मुझे ढूँढती हुई आई थी मगर मेरी नज़र नेहा पर पड़ी नहीं और उसने हमारी पीने-पाने की सारी बातें सुन ली| नेहा नहीं जानती थी की मैं शराब पीता हूँ इसलिए उसे ये बातें सुन कर धक्का लगा था| नेहा मुझसे मेरे पीने के बारे में बात पूछना चाहती थी मगर न तो ये समय ठीक था और न ही जगह अच्छी थी जहाँ हम बाप-बेटी बात कर सकें| नेहा ने किसी को कुछ नहीं कहा और चुपचाप वापस आ गई|

वहीं चूँकि मेरा हाथ खाली था इसलिए मिश्रा अंकल जी ने मेरे लिए कोल्ड ड्रिंक मँगवाई और साथ में खाने के लिए चिकन भी मँगवाया| इधर मेरे प्रति जो मुकुल के दिल में द्वेष भरा हुआ था उसे ध्यान में रखते हुए उसने मुझे छोटा दिखाने के लिए एक और चाल चल दी; "पापा जी, कल आपका जन्मदिन है लेकिन मैं आपके लिए तोहफा आज ही लाया हूँ|" ये कहते हुए मिश्रा अंकल जी के दमाद ने लकड़ी का नक्काशी किया हुआ एक सुन्दर सा डिब्बा मिश्रा अंकल जी के सामने रख दिया| मिश्रा अंकल जी ने ख़ुशी-ख़ुशी उस डिब्बे को खोला तो उसमें बड़ी ही सुन्दर पिस्तौल रखी थी| मिश्रा अंकल जी ने पिस्तौल डिब्बे से निकाली तो पता चला की ये तो 32 बोर (bore) की रिवाल्वर है! ये रिवाल्वर दिखने में इतनी छोटी थी की की हथेली में आ जाए, उसपर लकड़ी का छोटा सा दस्ता जिसे की हाथों से पोलिश किया था, रिवाल्वर का चमचमाता हुआ बैरल और गोली भरने वाला चैम्बर देख मेरी नजरें जैसे इस लोहे के खिलोने से चिपक सी गई थीं!

एक अजब सी चुंबकीय शक्ति थी जो मुझे उस रिवाल्वर की तरफ खींच रही थी| मन जैसे बावरा सा हो गया था, न मुझे परसों रात की घटना याद आ रही थी और न ही अपने जीवन की जिम्मेदारियाँ महसूस हो रही थीं! मन कर रहा था की उस रिवाल्वर को हाथ में उठा कर देखूँ, लेकिन वो रिवाल्वर इस वक़्त थी मिश्रा अंकल जी के हाथ में!

मिश्रा अंकल जी अपनी नई रिवाल्वर को पा कर बहुत खुश थे और उनकी ऊँगली रिवाल्वर के ट्रिगर पर पहुँच चुकीं थीं की तभी उनका दमाद घबराते हुए बोला; "सँभाल कर पापा जी, भरी हुई है!" अपने दमाद की बात मानते हुए मिश्रा अंकल जी ने अपनी उँगलियाँ ट्रिगर पर से हटा ली और अपने दमाद की पीठ थपथपाते हुए बोले; "शाब्बाश!"

मिश्रा अंकल जी ने अपनी नई रिवाल्वर सभी को देखने के लिए दी, सभी ने रिवाल्वर को बहुत सराहा और मिश्रा अंकल जी के दमाद की तारीफ करने लगे| जब सभी लोग उस रिवाल्वर को देख रहे थे उन कुछ पलों में मेरे अंतर्मन ने मेरे भीतर के जिम्मेदार बेटे को जगा दिया और रिवाल्वर के प्रति आकर्षण में बहने से रोक लिया| मुझे परसों रात की अपनी गैरज़िम्मेदाराना हरकत याद आई और मन में ग्लानि भरने लगी| मैंने फौरन रिवाल्वर से नजरें फेर ली और खाने-पीने में ध्यान लगाने लगा|

मिश्रा अंकल जी के दमाद ने मुझे रिवाल्वर से नजरें फेरते हुए देख लिया था इसलिए उसे लगने लगा की मैं रिवाल्वर से डरता हूँ| अब मुझे नीचे दिखाने, मेरी किरकिरी करने का एक सुनेहरा मौका मुकुल कैसे जाने देता?! जैसे ही सभी ने बारी-बारी से रिवाल्वर देख कर रिवाल्वर मिश्रा अंकल जी को लौटाई, वैसे ही मिश्रा अंकल जी का दमाद मुझे सुनाते हुए बोला; "मानु यार, क्या इतना डरते हो! एक बार रिवाल्वर हाथ में ले कर तो देखो!" मुकुल मुझे उकसाते हुए बोला| इस समय मेरा मन मेरे काबू में था इसलिए मैंने नक़ली हँसी के साथ मिश्रा अंकल जी के दामाद की बात को टाल दिया|

लेकिन उस ससुर को मेरी फ़ज़ीहत करनी थी इसलिए मुकुल मेरी मर्दानगी को ललकारने लगा; "चलो रहने दो मानु! इसे उठाने के लिए कलेजा चाहिए होता है, अब तुम ठहरे सीधे-साधे घर-गृहस्ती वाले आदमी, तुम कहाँ इसे (रिवाल्वर को) उठाने की हिम्मत कर पाओगे|" मुकुल चेहरे पर एक घिनौनी मुस्कान लिए मुझसे बोला| उसकी ये मुस्कान देख मुझे चन्दर की याद आ गई और मैं ताव में आ गया|

एक मर्द को जब कोई ललकारता है तो उसकी बुद्धि काम नहीं करती और अपने अहंकार में चूर वो आदमी बस वही करता है जो उसका घमंड कहता है|

मैंने टेबल पर रखी वो रिवाल्वर उठाई तथा फार्महाउस की दिवार के पास रखे गमले की तरफ तान दी और फिर बिना कुछ सोचे-समझे मैंने रिवाल्वर का ट्रिगर दबा दिया! "धायें!!!" की आवाज़ के साथ गोली रिवाल्वर से छूटी और जा कर गमले में धँस गई! मुझे बंदूक चलाने की आदत नहीं थी इसलिए ट्रिगर दबाते ही मुझे थोड़ा झटका लगा, लेकिन शुक्र है की मैं इस झटके के लिए पहले ही तत्पर था इसलिए मुझे कोई दर्द या तकलीफ नहीं हुई| मैं कोई निशानची नहीं था, वो तो गमले का आकार बड़ा था इसलिए मेरा निशाना लग गया था| संक्षेप में कहूँ तो तुक्के से मेरा निशाना लगा था!

मेरे इस तरह बिना सोचे-समझे गोली चलाने से वहाँ मौजूद सभी मर्दों के सामने मेरा लोहा साबित हो चूका था| सभी मेरे निशाने की तारीफ करते हुए मेरी पीठ थपथपाने लगे थे और मुकुल की अच्छी-खासी किरकिरी हो गई थी, जो थोड़ी बहुत कसर रह भी गई थी वो कसर मैंने मुकुल को सुनाते हुए पूरी कर दी; "सीधा-साधा व्यक्ति अगर चुप है तो इसका मतलब ये नहीं की वो कुछ कर नहीं सकता| इसका मतलब ये होता है की वो किसी को अपनी अकड़ नहीं दिखाना चाहता| लेकिन जब बात अपनी जान बचाने पर आती है तो यही सीधा-साधा आदमी हथियार उठाने से नहीं चूकता!" मेरी कही इस बात का पूरा मतलब केवल मिश्रा अंकल जी जानते थे| मैंने गाँव अपनी जीवन में पहलीबार अपनी और अपने परिवार की आत्मरक्षा के लिए हथियार उठाने के लिए ये बात कही थी|

बहरहाल, गोली चलने की आवाज़ सुन सभी महिलायें हैरान-परेशान हो गई थीं तथा गोली की आवाज़ का पीछा करते हुए जहाँ मर्दों की महफ़िल लगी थी उस तरफ इकठ्ठा होने लगी थीं| सबसे ज्यादा चिंतित संगीता थी इसलिए वो बिजली की रफ्तार से सबसे पहले दौड़ती हुई आई और उसने मेरे हाथ में रिवाल्वर देख ली थी, जिससे उसे पता चल गया था की ये गोली मैंने ही चलाई है!

इधर मुकुल को सुनाने के बाद मैंने वो रिवाल्वर वापस टेबल पर रख दी| मैंने जब गर्दन घुमा कर देखा तो पाया की संगीता आँखें फाड़े चिंतित हो कर मुझे देख रही है| संगीता को देख मैं समझ गया की उसे सब पता चल गया है इसलिए मैं थोड़ा डरा हुआ था|

हम मियाँ-बीवी के बीच लगभग 30 कदम का फासला था और मैं ये फासला तय कर उसे कुछ समझाता उससे पहले ही मिश्रा अंकल जी की नज़र इकठ्ठा हुई महिलाओं पर पड़ी और उन्होंने बात को तूल न देते हुए कहा; "अरे कछु नाहीं भवा, ऊ जनरेटरवा फट गवा रहा!" महिलाओं ने भी बात को ज्यादा नहीं खींचा और आपस में बातें करती हुई लौट गईं| एक बस संगीता अकेली खड़ी थी, उसने गोली चलने की वाज़ पहले भी सुनी थी ऊपर से उसने मेरे हाथ में रिवाल्वर भी देख ली थी इसलिए वो मुझसे बात करने को खड़ी थी|

मैं संगीता से बात करने के लिए उसकी तरफ बढ़ता उससे पहले ही मिश्रा अंकल जी मेरे कँधे पर हाथ रखते हुए अपने दामाद से बोले; "मुन्ना शांत रहत है ई का मतलब ई नाहीं की ऊ केहू से डरात है! पराओं रतिया मुन्ना हमार एक फ़ोन पाई के दौड़ी आवा और हमार पिस्तौल का डर दिखाए के ऊ तीनों गुंडा का अकेल काबू में रखिस| मुन्ना अगर ऊ टाइम तनिको डराए जात तो आज हम तोहरे लगे नाहीं ठाड़ होइत!" मिश्रा अंकल जी ने कटु शब्दों का इस्तेमाल किये बिना अपने दामाद को परसों रात की घटना सभी के सामने फिर से कह सुनाई| एक ससुर अपने ही दामाद को सबके सामने इतना सुना थोड़े ही सकता था!

मेरा ध्यान मिश्रा अंकल जी की बातों में नहीं था, मुझे तो चिंता हो रही थी की मैं संगीता को कैसे समझाऊँगा?! मिश्रा अंकल जी की बात पूरी हुई तो मैं बाथरूम जाने का बहाना कर निकला ताकि अपनी प्रियतमा को समझा-बुझा कर उसका मूड ठीक कर सकूँ| मैं संगीता को ढूँढता हुआ महिलाओं की महफ़िल में पहुँचा तो मैंने थोड़ी दूर से ही देखा की संगीता माँ के साथ बैठी है| दोनों सास-पतुआ को आपस में बात करते देख मेरी फट के चार हो गई! 'संगीता ने कहीं माँ को सब बता तो नहीं दिया?' मेरे दिमाग में सवाल कौंधा और मैं डर के मारे बाथरूम में घुस गया|

मैं बाथरूम से हाथ धो कर निकला ही था की तभी आयुष मेरे सामने प्रकट हो गया! आयुष की गोदी में थी स्तुति जो की मेरी गोदी में आने को छटपटा रही थी| दरअसल, स्तुति को देख सभी महिलायें मोहित हो गई थीं और सभी हाथ धो कर बेचारी नन्ही सी जान स्तुति के पीछे पड़ गई थीं| स्तुति को गोदी में ले कर सभी स्तुति के गोल-मटोल गालों को चूम-चूम कर गीला कर रहीं थीं| मेरी बिटिया को यूँ बिना उसकी इजाजत जबरदस्ती पप्पी लिया जाना पसंद नहीं था इसलिए स्तुति सबकी गोदी में छटपटा रही थी और खुद को बचाने के लिए कभी किसी का मुँह नोचने की कोशिश करती तो कभी जोर-जोर से चिल्लाने लगती| इस जबरदस्ती के लाड-दुलार से मेरी बिटिया विचलित हो गई थी और मेरे पास आने को बेचैन हो रही थी|

"आ जा मेरा बच्चा!" ये कहते हुए मैंने स्तुति को अपनी गोदी में लिया और उसे लाड कर बहलाने लगा| स्तुति को उन महिलाओं पर गुस्सा आ रहा था इसलिए मेरी गोदी में आते ही स्तुति ने सभी महिलाओं की तरफ ऊँगली से इशारा करते हुए उनकी शिकायत अपनी बोली भाषा में कर दी| "मेरी बिटिया को सब ने तंग किया?" मेरे पूछे सवाल के जवाब में स्तुति अपना निचला होंठ फुला कर सर हाँ में हिलाने लगी| "उन सबकी ऐसी की तैसी! चलो हम बाप-बेटा-बेटी गुलाब जामुन खाते हैं|" ये कहते हुए मैंने स्तुति का ध्यान खाने-पीने की तरफ लगाया| गुलाब-जामुन का नाम सुन स्तुति का चेहरा खिल गया और वो ख़ुशी से खिलखिलाने लगी|

हम तीनों बाप-बेटा-बेटी एक खाली टेबल पर बैठ गए, आयुष ने पहल करते हुए गप्प से अपना गुलाब जामुन का पीस एक ही बार में खा लिया! आयुष का ये बालपन देख मुझे और स्तुति को हँसी आ गई, गुलाब जामुन खा आयुष दूसरे बच्चों के साथ मस्ती करने के लिए भाग गया और इधर मैं स्तुति को गुलाब जामुन के छोटे- छोटे निवाले खिलाने लगा| स्तुति को गुलाब जामुन का स्वाद बहुत पसंद आया था और वो अपने हाथ से गुलाब जामुन उठा कर खाना चाहती थी; "नहीं बेटा, आप अपने हाथ से खाओगे तो अपने सारे कपड़े गंदे कर लोगे|" मैंने स्तुति को प्यार से समझाया| मैं बुद्धू ये नहीं जानता था की स्तुति गुलाब जामुन खुद नहीं बल्कि मुझे खिलाना चाहती थी| "पपई...पपई" कहते हुए स्तुति ने इशारे से मुझे गुलाब जामुन खाने को कहा| स्तुति के इशारे समझ मैंने स्तुति को चम्मच पकड़ना सिखाया और उसी के हाथों मैंने गुलाब जामुन खाया|

हम बाप-बेटी सब कुछ भूल कर मजे से गुलाब जामुन का लुत्फ़ उठा रहे थे की तभी वहाँ मिश्रा अंकल जी की बेटी आ गई; "अरे मानु, आप यहाँ स्तुति के साथ क्यों बैठे हो? ओह्ह...अच्छा तो बेटी को गुलाब जामुन खिलाया जा रहा है?!" मिश्रा अंकल जी की बेटी हँसते हुए बोली और मैंने भी मुस्कुराते हुए सर हाँ में हिला दिया| "वैसे मुझे आपको थैंक यू कहना था, आपने कल पापा जी की रक्षा की..." इसके आगे वो कुछ कहती उससे पहले ही मैं बोल पड़ा; "अरे थैंक यू कैसा? मिश्रा अंकल जी कोई पराये थोड़े ही हैं?" इसके आगे मैं कुछ कहता उसके पहले ही मुकुल वहाँ आ गया और अपनी पत्नी से अकड़ते हुए बोला; "तुम यहाँ क्या कर रही हो? चलो मेरे साथ!" इतना कहते हुए मुकुल अपनी पत्नी का हाथ पकड़ उसे जबरदस्ती अपने साथ ले गया| मुकुल के मन में मेरे लिए जो कड़वाहट थी वो खुल कर बाहर आ चुकी थी| लेकिन मुझे क्या, मैं तो अपनी बिटिया को गुलाब-जामुन खिलाने में व्यस्त हो गया!

घड़ी में साढ़े दस बजे तो आयुष मुझे बुलाने आया; "पापा जी, दादी जी ने कहा है की अब घर चलते हैं|" आयुष की बात सुन मुझे डर लग रहा था की कहीं मैं माँ के पास जाऊँ और वो मुझे परसों रात तथा अभी हुए काण्ड के लिए झाड़ न दें इसलिए मैंने अपनी चपलता दिखाते हुए कहा; "बेटा, आप जा कर अपनी मम्मी, दादी जी और नेहा को ले कर गेट पर आओ तबतक मैं गाडी निकालता हूँ|" मैं गाडी ले कर गेट पर पहुँचा ही था की मैंने देखा की मिश्रा अंकल जी का सारा परिवार माँ, संगीता, नेहा और आयुष को बाहर छोड़ने आया है| अब मजबूरन मैं भी गाडी से बाहर निकला तथा हाथ जोड़ कर सभी से चलने की अनुमति ली, मिश्रा आंटी जी और मिश्रा अंकल जी ने मुझे आशीर्वाद सहित विदा किया|

गाडी चलाते हुए मैंने कनखी नजरों से माँ को देखा तो पाया की उनके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं है| माँ को शांत देख मैं समझ गया की माँ को परसों रात के पूरे काण्ड और आज के रिवाल्वर काण्ड के बारे में कुछ नहीं पता| 'बेटा, डाँट तो तुझे पड़ेगी मगर थोड़ी!' मेरा डरा हुआ मन बोला| माँ की थोड़ी बहुत डाँट सुनने का मैं आदि था इसलिए मैं अब माँ की डाँट को ले कर चिंता मुक्त हो चूका था|

मैंने गाडी के रियर-व्यू मिरर (rear-view mirror) में देखा तो पाया की संगीता मुँह फुलाये गाड़ी के बाहर देख रही है| संगीता को मुँह फुलाये देख मैं समझ गया की घर जाते ही संगीता मेरे ऊपर रासन-पानी ले कर चढ़ जाएगी! 'चल बेटा, आज तो तेरी क्लास लगनी तय है!' मेरा डरा हुआ मन बोला| फिर मेरी नज़र पड़ी नेहा पर, वो भी एकदम से गुमसुम हो कर खिड़की से बाहर देख रही थी| नेहा को मेरी चिंता हो रही थी मगर मेरे लिए उसे मनाना आसान था|

हम घर पहुँचे और माँ ने सभी को सोने का आदेश देते हुए कहा; "अब कोई मस्ती नहीं करेगा! रात बहुत हो गई है सब सो जाओ!" माँ का आदेश सुनते ही आयुष फट से कपड़े बदल अपनी दादी जी के पलंग पर कब्ज़ा कर के लेट गया| इधर स्तुति सो चुकी थी इसलिए मैंने उसे हमारे पलंग के बीचों-बीच लिटा दिया| हम दोनों मियाँ-बीवी ने अपने कपड़े बदले लेकिन इस दौरान न तो संगीता मुझसे कुछ बोली और न ही मैंने बात शुरू करने की पहल की| अब जब बीवी से डाँट पड़नी ही है तो पहले कुछ बोल कर क्यों डाँट खाऊँ?! संगीता खुद से ही मुझे डाँटना शुरू करे वो ही अच्छा! कपड़े बदलकर मैं बिस्तर में घुसने वाला था की तभी नेहा अपने कपड़े बदलकर आ गई| "चुप-चाप जा कर अपनी दादी जी के पास सो जा!" संगीता ने नेहा को देखते ही झिड़क दिया|

"मैं पापा जी के पास सोऊँगी!" नेहा सर झुकाये हुए डरते हुए बोली| अपनी मम्मी के इस गुस्सैल रूप से नेहा डरती थी, मैं उसे लाड कर बहलाना चाहता था मगर संगीता ने उसे फिर से डाँट कर भगा दिया; "तुझे एक बार में कही बात समझ में नहीं आती? जा यहाँ से!" संगीता की झिड़की सुन नेहा सर झुकाये हुए ही कमरे से बाहर चली गई| अभी नेहा कमरे के बाहर पहुँची ही थी की संगीता फिर से उस पर गरज पड़ी; "और चुप-चाप सो जाइयो! खबरदार जो दिवार से कान लगा कर बातें सुनी तो, टाँगें तोड़ दूँगी तेरी!" अपनी बात को पुख्ता करने के लिए संगीता ने खुद एक बार कमरे के बाहर झाँक कर देखा की नेहा कहीं छुप कर खड़ी हो कर बातें सुनने तो नहीं लगी है न?! शुक्र है की संगीता को नेहा नहीं दिखी वरना आज नेहा को मार पड़ ही जाती!

संगीता ने कमरे का दरवाजा बंद किया और आँखों में अंगारे लिए मुझे देखते हुए बोली; "मैं आपसे बस एक बार पूछूँगी और अगर आपने झूठ बोला तो मैं आपसे बात करना बंद कर दूँगी!" संगीता ने मुझे खुली चेतावनी दे दी थी, अब वो क्या जाने की मैं उससे झूठ बोलता ही नहीं!

"परसों रात को क्या-क्या हुआ, वो मुझे सब विस्तार से बताओ?" संगीता ने सीधा सवाल दागा| सवाल सीधा था इसलिए मैंने भी संगीता को सारी बात शुरू से ले कर अंत तक बता दी, अगर झूठ बोलता या बात बनाता तो संगीता मुझे तुरंत पकड़ लेती और फिर उसे मिनट नहीं लगता बखेड़ा खड़ा करने में!

इधर जैसे-जैसे मैं बात बताता जा रहा था, वैसे-वैसे संगीता का चेहरा गुस्से से तमतमाता जा रहा था| मैंने गौर किया तो पाया की बाकी दिन तो संगीता मेरी पूरी बात सुने बिना ही मुझ पर रासन-पानी ले कर चढ़ जाती थी लेकिन आज संगीता ने मेरी पूरी बात सुनी, असल में संगीता अपने मन-मस्तिष्क में मुझे बोले जाने वाले कटु शब्दों को चुनने में लगी थी!

"आपकी हिम्मत कैसे हुई मुझसे इतनी बड़ी बात छुपाने की? और ये आपके दिमाग में अकक्ल-वक्क्ल है या सब ठेकेदारी करते हुए खर्च कर दी! आपके मिश्रा अंकल ने एक फ़ोन क्या कर दिया, आप पहुँच गए अपनी जान हथेली पर ले कर? आपने एक पल के लिए भी सोचा की अगर आपको कुछ हो जाता तो हम सब का क्या होता? ये कैसा पागलपन सवार हो गया था आपके सर पर जो आपको किसी का ख्याल तक नहीं आया? यहाँ तक की अपने बच्चों का, जिनसे आप इतना प्यारक रटे हो उनका तक ख्याल नहीं आया?!

खुद को क्या हीरो समझते हो जो बंदूक हाथ में लेते ही जनाब हवा में उड़ने लगे?! मैं कहती हूँ, अगर यही गुंडागर्दी और आवारागर्दी करनी थी तो क्यों किया मुझसे प्यार? क्यों बने बाप? यही सब ऊल-जुलूल करते रहते!" संगीता की बात ज़रा भी गलत नहीं थी इसलिए मुझे उसके कटु शब्द सुनकर भी गुस्सा नहीं आ रहा था, हो रहा था तो केवल पछतावा की मैं इतना लापरवाह हूँ!

"ये तो किया सो किया, आज किसकी मदद करने को बंदूक चलाई आपने? किसको खुश करना चाह रहे थे आप? और तो और मिश्रा अंकल भी आपको समझाने के बजाए आप ही की गलती पर पर्दा डाल रहे थे की ये गोली चलने की आवाज़ नहीं जनरेटर फटने की आवाज़ है! मैं क्या इतनी बड़ी बेवकूफ हूँ जो गोली चलने की आवाज़ और जनरेटर फटने की आवाज़ न समझूँ? यही संगत है आपकी? ऐसे खतरनाक लोगों के साथ आप काम करते हो?" संगीता ने मेरे रिवाल्वर चलाने को ले कर सवाल पुछा था इसलिए मैंने उसे वो घटना भी सच-सच ब्यान कर दी|

"तो मतलब आपको कोई भी उकसायेगा...कोई भी चढ़ाएगा और आप कुछ भी करने को तैयार हो जाओगे? कल को कोई कहेगा की कुएँ में कूद के दिखाओ तो आप कुएँ में कूद जाओगे? कोई कहेगा की ज़हर खा कर दिखाओ तो आप ज़हर भी खा लोगे? आपको हमारी...अपने परिवार की ज़रा भी चिंता नहीं? हमारी तरफ आपकी कोई ज़िम्मेदारी है की नहीं?

इतना सोच-विचार के काम करने वाले अक्लमंद आदमी को इतना समझ में नहीं आया की वो मुकुल आपसे दुश्मनी निकाल रहा था! उसके चाचा जी के कारण उसकी इतनी बदनामी हुई तो उसे तो आपसे दुश्मनी निकालनी ही थी! लेकिन आप इतने बुद्धू कैसे हो सकते हो जो उसकी बातों में आ गए!" संगीता मुझे झाड़ते हुए बोली| उसकी बात सही थी, मैं अपने मर्द होने के घमंड में कुछ ज्यादा ही उड़ रहा था तभी तो बिना सोचे-समझे मैंने यूँ भरी महफ़िल में रिवाल्वर उठा कर चला दी थी!

खैर, संगीता के मुझे झाड़ने का मैंने ज़रा भी बुरा नहीं लगाया, बल्कि मैंने तो उसकी झाड़ सर झुका कर सुनी| मुझे यूँ सर झुकाये देख संगीता ने अपनी झाड़ पर लगाम लगाई और गुस्से में तमतमाती हुई बिस्तर पर लेट गई| मैं भी सर झुकाये बिस्तर की तरफ बढ़ने लगा तो संगीता मुझ पर गरजते हुए बोली; "यहाँ नहीं सोओगे आप, जा कर अकेले बच्चों के मरे में सोओ! बहुत शौक है न हीरो बनने का!" संगीता मुझे ताना मरते हुए बोली और फिर दूसरी तरफ मुँह कर के सो गई| संगीता इस वक़्त गुस्से से तपी हुई थी और ऐसे में मैं उसे और गुस्सा नहीं दिलाना चाहता था इसलिए मैं बिना कुछ कहे सर झुकाये कमरे से बाहर आ गया|

[color=rgb(65,]जारी रहेगा भाग - 6 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]अंतिम अध्याय: प्रतिकाष्ठा[/color]
[color=rgb(51,]भाग - 6[/color]

[color=rgb(97,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

खैर, संगीता के मुझे झाड़ने का मैंने ज़रा भी बुरा नहीं लगाया, बल्कि मैंने तो उसकी झाड़ सर झुका कर सुनी| मुझे यूँ सर झुकाये देख संगीता ने अपनी झाड़ पर लगाम लगाई और गुस्से में तमतमाती हुई बिस्तर पर लेट गई| मैं भी सर झुकाये बिस्तर की तरफ बढ़ने लगा तो संगीता मुझ पर गरजते हुए बोली; "यहाँ नहीं सोओगे आप, जा कर अकेले बच्चों के मरे में सोओ! बहुत शौक है न हीरो बनने का!" संगीता मुझे ताना मरते हुए बोली और फिर दूसरी तरफ मुँह कर के सो गई| संगीता इस वक़्त गुस्से से तपी हुई थी और ऐसे में मैं उसे और गुस्सा नहीं दिलाना चाहता था इसलिए मैं बिना कुछ कहे सर झुकाये कमरे से बाहर आ गया|


[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]

अपनी
ही परिणीता द्वारा देर रात को कमरे से निकाला गया था, ऊपर से नींद भी आ रही थी इसलिए मैं बच्चों के कमरे में सोने चल दिया| जैसे ही मैंने कमरे की लाइट जलाई मैंने देखा की नेहा पलंग पर लेटी हुई सिसक रही है! "मेरा बच्चा!" कहते हुए मैंने नेहा को पुकारा तो नेहा बिजली की फुर्ती से उठी और मेरे सीने से लग कर रोने लगी! "बस मेरा बच्चा, बस! रोते नहीं! आपकी मम्मी ने तो बस यूँ ही आपको थोड़ा डाँट दिया था!" मैंने संगीता के डाँटने को नेहा के रोने का कारण समझा था, जबकि मेरी बिटिया मुझे ले कर चिंतित थी|

नेहा को लाड-प्यार कर मैंने चुप कराया तथा अपने सीने से लगाए लेट गया| कुछ पल बाद जब नेहा का रोना थमा तो उसने मुझसे बात शुरू की;

नेहा: पापा जी, आप बड़े दादा जी (मिश्रा अंकल जी) की मदद के लिए गए तब क्या हुआ था? आपने उनकी जान कैसे बचाई?

नेहा का सवाल सुन मैं उसे सारा सच नहीं बताना चाहता था क्योंकि सच जानकार मेरी बिटिया घबरा जाती इसलिए मैंने सचाई काट-पीट कर बताई;

मैं: बेटा, मिश्रा अंकल जी ने किसी को पैसे देने थे लेकिन पैसे लेने के लिए तीन गुंडे आ गए| अब अंकल जी थे अकेले, ऊपर से रात का समय इसलिए उन्होंने मुझे फ़ोन कर मुझसे मदद माँगी| मैं चूँकि साइट पर ही था इसलिए मैं उनकी मदद के लिए चला गया| मेरी उपस्थिति में उन गुंडों की हिम्मत नहीं पड़ी की वो अंकल जी को कुछ कर सकें, बस इसी के लिए मिश्रा अंकल जी मेरे शुक्रगुज़ार थे|

मैंने जितना हो सके उतनी बात को हलके में लेते हुए कहा था मगर मेरी बिटिया रानी इतना सुनते ही चिंतित हो गई थी| अगर मैंने उसे सारी बात बताई होती तो नेहा इतना डर जाती की वो मुझे कहीं अकेले जाने ही नहीं देती!

नेहा: आपने इतना बड़ा रिस्क (risk) क्यों लिया पापा जी? आप अकेले क्यों गए? आपको चोट लग जाती तो? और आपने मुझे ये बात क्यों नहीं बताई?

संगीता के मुक़ाबले नेहा ने शांत हो कर मुझसे अपने सवाल पूछे थे और मुझे अपनी बिटिया का ये शांत स्वभाव देख कर उस पर गर्व हो रहा था| मेरी चिंता सबसे ज्यादा नेहा करती थी और मेरे कारनामे को सुन उसे गुस्सा आना चाहिए था मगर मेरे प्रति नेहा का मोह उसे गुस्सा नहीं होने दे रहा था, बल्कि नेहा मुझसे अपने सवाल पूछ कर सारी बात जानने को इच्छुक थी|

मैं: बेटा, जैसे आप बच्चे गलतियाँ करते हो और अपनी गलतियों से सीखते हो, वैसे ही हम बड़े भी गलतियाँ कर के अपनी गलतियों से सीखते हैं| यूँ बिना सोचे-समझे एकदम से मिश्रा अंकल जी की मदद के लिए दौड़ जाना मेरी मूर्खता थी और मैंने अपनी इस मूर्खता से सबक सीख लिया है| किसी की भी मदद करने के लिए अपनी या अपने परिवार की जान-जोखम में नहीं डालनी चाहिए, मैंने ये सबक अच्छे से सीख लिया है!

आपको मैं इसलिए कुछ नहीं बता पाया क्योंकि ये सब सुन कर आप दुखी हो जाते, मुझे ले कर चिंता करने लगते और मैं अपनी लाड़ली बिटिया रानी को परेशान या दुखी थोड़े ही देख सकता हूँ? लेकिन मैं ये वादा करता हूँ की आगे से मैं आपको सब बात बताऊँगा|

मेरा हमेशा नेहा को सब बात बताने का आश्वासन पा कर मेरी बिटिया के दिल को चैन मिला| लेकिन मेरा अपनी बिटिया से यूँ वादा करना मेरे लिए थोड़ा कष्टदाई साबित हुआ;

नेहा: पापा जी, मैं एक बात पूछूँ?

नेहा ने झिझकते हुए कहा और मैंने भी अपना सर हाँ में हिला कर नेहा को अपनी स्वीकृति दे दी|

नेहा: पापा जी, आप ड्रिंक करते हो?

नेहा का सवाल सुन मैं सन्न रह गया! मुझे समझ नहीं आ रहा था की भला उसे किसने मेरे पीने के बारे में बता दिया? मेरे चेहरे पर उमड़े सवाल को समझ नेहा बोली;

नेहा: आज पार्टी में मैं आपसे बात करने आई थी, तब मैंने आपकी सारी बात सुनी|

नेहा ने मेरे मन में उमड़े सवाल का जवाब दे दिया था और अब मेरी बारी थी उसके सवाल का जवाब देने की;

मैं: बेटा, जब मैं आपको और आपकी मम्मी को गॉंव में छोड कर आया था तब मैं आपको याद कर के बहुत परेशान होता था| रात-रात भर मैं तकिये को खुद से लिपटाये रहता था ताकि किसी तरह आपकी कमी पूरी कर सकूँ लेकिन मेरी सारी कोशिशें बर्बाद जाती थीं, जिस कारण मैं ठीक से सो नहीं पाता था| आपकी मम्मी की किये गलत फैसले के कारण मैं आपसे दूर हुआ था इसलिए उस बात का गुस्सा मेरे दिल में भरने लगा था| आपको याद कर-कर के मैं बहुत रोया, लेकिन मेरा दुःख कभी कम नहीं हुआ बल्कि और बढ़ता गया!

अपने इसी दुःख को कम करने के लिए मैंने अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती की और आपके दादा जी की घर पर रखी शराब की बोतल से छुपके थोड़ी-थोड़ी शराब पीनी शुरू कर दी| मैं नशे में धुत्त होने के लिए नहीं पीता था, मैं बस इसलिए पीता था ताकि नशे के कारण मुझे नींद आ जाये| मैं जानता था की शराब बुरी चीज़ है इसलिए मैंने शराब पीने की आदत नहीं लगाई, मैं सिर्फ तभी पीता था जब मेरा मन बहुत दुखी होता था| फिर जब मैं बड़ा होने लगा तो ऑफिस की पार्टी में थोड़ी बहुत पीने लगा, लेकिन मैंने पीने के बाद कभी किसी से कोई बदतमीज़ी नहीं की. कभी किसी से मार-पीट नहीं की| शराब पी कर मैं चुपचाप घर आ कर सो जाता था|

फिर एक दिन मुझे आपकी मम्मी का फ़ोन आया और उन्होंने कहा की आप दिल्ली आ रहे हो| अपनी लाड़ली बिटिया को पाने की लालसा में मैंने पीना छोड़ दिया क्योंकि मेरी सबसे बड़ी ख़ुशी मुझे मिलने वाले थी, ऐसे में मुझे शराब पीने की जर्रूरत ही नहीं थी! मैं आपको अपनी गोदी में ले कर लाड करने को तरस रहा था, लेकिन जब आप आये तो आप मुझसे नाराज़ थे और मेरा ये नाज़ुक सा दिल अपनी बिटिया की नाराज़गी बर्दश्त नहीं कर पाया नतीजन मैं फिर से टूट गया! आपके गुस्से से मैं इतना डरा हुआ था की मुझे लगा की अब आप कभी मुझसे बात नहीं करोगे.और मैंने आपको हमेशा के लिए खो दिया ये सोच कर उस दिन मैंने फिर शराब पी! लेकिन फिर कुछ दिन बीते और आपने मुझे माफ़ कर दिया तथा आपको पा कर मेरा मन ख़ुशी से भर गया|

फिर मेरा जन्मदिन आया और उस दिन आपके दिषु के साथ बैठ कर मैंने कुछ ज्यादा पी ली! ये बात आपके दादा जी और दादी जी को पता चल गई और उन्होंने मुझे बहुत डाँटा, मैंने उनसे उस दिन वादा किया की मैं अब कभी नहीं पीयूँगा! आपके दादाजी से किया वो वादा मैं आज तक निभा रहा हूँ, मैं आपकी कसम खा कर कहता हूँ बेटा की मैंने उस दिन से ले कर आजतक कभी शराब नहीं पी!

नेहा ने मेरी सारी बात बड़े इत्मीनान से सुनी| हम बाप-बेटी के बिछोह और नेहा के गुस्सा होने वाली बात से नेहा का दिल दुख था मगर जब मैंने कहा की मैंने आज तक शराब नहीं पी तो मेरी बिटिया के चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान खिल आई|

नेहा: पापा जी, आपका मन करता है ड्रिंक करने का?

नेहा को यक़ीन हो गया था की मैं चन्दर की तरह शराब पी कर किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करता था इसलिए उसके मन में ये भोला सा सवाल उठा|

मैं: बेटा, जैसे आपका मन कभी-कभी पिज़्ज़ा खाने का करता है वैसे ही मेरा भी कभी-कभी मन करता है| लेकिन मैं शराब पी कर आपने बच्चों के सामने नहीं आना चाहता इसीलिए मैं शराब नहीं पीता|

मेरी बात सुन मेरी बिटिया एक पल के लिए गंभीर हो गई लेकिन फिर अगले ही पल मेरी बिटिया के चेहरे पर मुस्कान आ गई| नेहा ने मेरे दोनों गालों पर अपना हाथ रखा और मेरी आँखों में देखते हुए बोली;

नेहा: पापा जी, आप कहते हो की कभी-कभार बाहर से कुछ खाने-पीने से कुछ नहीं होता इसलिए आज से मैं आपको इजाजत देती हूँ की जब भी आपका मन करे तो आप थोड़ी सी पी सकते हो|

जिस प्रकार मैं नेहा को कभी तरसाना नहीं चाहता था, उसी प्रकार नेहा भी मुझे किसी चीज़ के लिए तरसाना नहीं चाहती थी| उसके भोले मन ने आज मुझे पीने की इजाजत ख़ुशी-ख़ुशी दे दी थी और अपनी बिटिया की परवानगी पा कर मुझे आज अपनी बिटिया पर बहुत गर्व हो रहा था|

मैं: थैंक यू बेटा जी! लेकिन मैं फिर भी नहीं पीयूँगा क्योंकि मेरे पीने से मेरे बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा और मैं नहीं चाहता की मेरे बच्चे अपने पापा जी से कोई गन्दी आदत सीखें|

मैंने नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए उसे समझाया मगर मेरी बिटिया थोड़ी सी ज़िद्दी थी इसलिए वो मुझसे तर्क-वितर्क करने लगी;

नेहा: लेकिन पापा जी, आपने ही हमें सिखाया है की हमें अपनी इच्छाओं को नहीं मारना चाहिए!

नेहा का तर्क सुन मैं मुस्कुरा दिया| जब अपने ही बच्चे आपकी सिखाई हुई बातों को तर्क के रूप में इस्तेमाल कर आपको समझते हैं तो माँ-बाप को अपने बच्चों पर बड़ा गर्व होता है, उसी तरह मुझे भी अपनी लाड़ली बिटिया पर गर्व हो रहा था|

मैं: बेटा जी, बच्चों को अपना मन नहीं मारना चाहिए| लेकिन, माँ-बाप का जीवन त्याग का जीवन होता है, उन्हें हमेशा अपने बच्चों के लिए छोटे-मोटे त्याग करने पड़ते हैं|

मैंने नेहा को माँ-बाप के दायित्वों के बारे में समझाते हुए कहा|

अब इसे विधि की विडंबना ही कहिये की जो आदमी परसों रात को अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारियों से लापरवाह हो गया था, कुछ देर पहले जो अपनी मर्दानगी साबित करने के लिए बंदूक तक चला चूका था वो अपनी ही बिटिया को माँ-बाप की जिम्मेदारियाँ समझा रहा था|

खैर, मेरा तर्क सुन मेरी बिटिया सोच में पड़ गई थी| फिर अचानक से नेहा को एक तर्क सूझा;

नेहा: पापा जी, जब आपका मन अपने बच्चों को किसी चीज़ के लिए तरसते हुए देख कर दुखता है तो बच्चों का मन अपने माता-पता को तरसते हुए देख नहीं दुखेगा?

नेहा का तर्क सुन कर मैं निरुत्तर हो गया था, मुझे निरुत्तर देख मेरी बिटिया अपने ही पापा जी को समझाते हुए बोली;

नेहा: आपने अभी बताया की आप कभी जर्रूरत से ज्यादा नहीं पीते और आपका मन रोज़-रोज़ पीने का भी नहीं करता तो कभी-कभार पीने में क्या बुराई है? हाँ मैं आपकी ये बता मानती हूँ की आप पी कर हम बच्चों के सामने नहीं आना चाहते, तो ठीक है पापा जी आप जब भी कभी पार्टी कर के आओ तो वो रात मैं आयुष और स्तुति को आपके पास नहीं जाने दूँगी| अगली सुबह आप नहा-धो कर हमें फिर से गोदी में ले कर प्यार करना|

नेहा मेरे अपराध बोध को अच्छे से समझती थी इसीलिए उसने मुझे नहा-धो कर बच्चों को स्पर्श करने की बात कही थी| अपनी बिटिया के मुख से इतनी बड़ी बात सुन मेरा मन प्रसन्नता से भर गया था इसलिए मैंने नेहा के चेहरे को अपने हाथों में लिया और मुस्कुराते हुए बोला;

मैं: मेरा बच्चा इतना स्याना...इतना समझदार हो गया की अपने पापा जी की ख़ुशी के लिए उपाए सोचने लगा है?! आई ऍम सो प्राउड ऑफ़ यू बेटा!

ये कहते हुए मैंने नेहा के मस्तक को चूमा और उसे अपने सीने से लगा लिया| मैंने नेहा की बात का जवाब नहीं दिया था क्योंकि मेरा मन अब भी पीने के लिए गवाही नहीं दे रहा था इसलिए मैंने नेहा को अपनी बातों में बहला कर बात का रुख ही मोड़ दिया

अगली सुबह संगीता सबसे पहले जगी और नहा धो कर माँ के पास मेरी शिकायत ले कर पहुँच गई| संगीता ने माँ को सारी बात कह सुनाई और माँ के दिल में उनके ही बेटे के खिलाफ आग लगा दी| अपनी बहु की सारी बात सुन माँ भी गुस्से में तमतमा गईं, लेकिन उन्होंने बच्चों के सामने मुझ पर अपना ये गुस्सा निकालना ठीक नहीं समझा|

माँ को गुस्से में तपा कर संगीता बच्चों वाले कमरे में आई, जब उसने देखा की हम बाप-बेटी इत्मीनान से सो रहे हैं तो संगीता को मिर्ची लग गई| उसने नेहा का हाथ पकड़ उसे झकझोड़ कर उठाया और उस पर गरज पड़ी; "तेरे दिमाग में एक बार कही हुई बात घुसती नहीं है न? तुझे कहा था न की दादी जी के पास सोइयो और तू यहाँ आ कर सो गई!"

अब ज़रा कल्पना कीजिये, आप बड़ी अच्छी नींद सो रहे हैं और कोई एकदम से आपको झकझोड़ कर उठा कर बिठा दे, फिर आप ही पर चिल्लाये तो आपको कैसा लगेगा? यदि आप उस व्यक्ति से उम्र में बड़े हो तो उस पर हाथ उठा दोगे या गाली-गलौज करोगे, यदि आप उस व्यक्ति से छोटे हो तो आप रोने लगोगे|

यही हुआ नेहा के साथ, बेचारी को उसी की मम्मी ने एकदम से झकझोड़ कर उठाया था, ऊपर से उस पर बिना किसी गलती के संगीता गुस्से से चिल्ला भी रही थी इसलिए मेरी बिटिया एकदम से घबरा कर रोने लगी! संगीता के गरजने से मेरी नींद खुल गई थी लेकिन जब मैंने नेहा का रोना सुना तो मैं एकदम से उठ बैठा और नेहा को अपने गले लगा कर संगीता पर चिल्लाया; "Enough संगीता! मैंने तुम्हें पहले भी कहा था की मेरे ऊपर आया गुस्सा मुझ पर निकालो, मेरे बच्चों पर नहीं!" अब संगीता की नज़र में मैं पहले ही कसूरवार था, ऊपर से मैंने उसे उसी की बेटी के सामने झिड़क दिया था इसलिए संगीता गुस्से से तमतमा गई और मुझे घूर कर देखने लगी| हम दोनों मियाँ-बीवी के बीच तू-तू मैं-मैं शुरू होती उससे पहले ही माँ उठ कर आ गईं और संगीता से बोलीं; "बहु, चल मेरे साथ!" माँ की बात सुन संगीता चुप-चाप चली गई और इधर मैं नेहा को लाड कर बहलाने लगा; "बस मेरा बच्चा! बस...रोते नहीं वरना सुबह-सुबह रोने से सारा दिन खराब जाता है|" ये कहते हुए मैंने नेहा को लाड करना शुरू किया| इतने में आयुष कमरे में आ गया और अपनी दीदी का रो-रो कर बेहाल हुआ चेहरा देख कर चिंतित हो गया| "पापा जी, दीदी क्यों रो रही है?" आयुष को घर में हो रही घटनाओं के बारे में कुछ नहीं पता था इसलिए मैंने आयुष से झूठ कहा; "कुछ नहीं बेटा, आपकी दीदी स्कूल जाने के लिए उठी नहीं न इसलिए आपकी मम्मी ने डाँटा|" सुबह जल्दी न उठने के लिए आजतक केवल आयुष को डाँट पड़ती थी इसलिए आयुष अपनी दीदी का दुःख समझ अपनी दीदी को सांत्वना देने लगा; "दीदी, मम्मी की डाँट का बुरा नहीं लगाते| अब मुझे भी तो वो रोज़ डाँटती हैं, मैं थोड़े ही रोने लगता हूँ|" आयुष की बात सुन मैं मुस्कुरा दिया और उसे भी नेहा के साथ गले लगा लिया| "मेरा बहादुर बच्चा!" मैंने आयुष की तारीफ करते हुए उसके सर को चूमा| सुबह-सुबह अपनी तारीफ सुन आयुष बड़ा खुश हुआ और ख़ुशी-ख़ुशी स्कूल के लिए तैयार होने भाग गया|

दोनों बच्चों को आज मैंने स्कूल के लिए तैयार किया और उन्हें उनकी स्कूल वैन में बिठाने भी गया| जब मैं लौटा तो माँ ने गुस्से में मुझे पुकारा तथा अपने कमरे में बुला अपने सामने बैठने को कहा| माँ का गुस्सा देख मैं समझ गया था की संगीता ने घर में आग लगाने का काम कर दिया है और अब मेरी शामत है!

"सबसे पहले तो तू ये बता की तूने मुझसे इतनी बड़ी बात क्यों छुपाई?" माँ ने गुस्से से चिल्लाते हुए अपना पहला सवाल दागा|

"मुझे माफ़ कर दीजिये माँ, लेकिन मैं आपसे ये बात छुपाना नहीं चाहता था| दो दिन पहले जब मैं रात को लौटा तो आप सो चुके थे, फिर मुझे संगीता ने बताया की स्तुति मुझसे नाराज़ है इसलिए स्तुति को लाड करने के चक्कर में मैं ये बात किसी को नहीं बता पाया| अगली सुबह जब मैं उठा तो अपने मुझे मेरे देर रात घर आने को ले कर डाँटा और फिर आप संगीता के साथ सब्जी लेने चले गए| आपके जाने के बाद मैंने रात हुए काण्ड के बारे में सोचा और खुद को बहुत लताड़ा भी की मैं इतना गैरजिम्मेदार आदमी हूँ की मैंने अपने परिवार तक की नहीं सोची! लेकिन फिर स्तुति अचानक से अपने दोनों पॉंव पर चलने लगी और मेरा ध्यान इस बात पर से हट गया| जब आप दोनों सब्जी ले कर लौटे उस वक़्त तक मैं स्तुति के अपने पॉंव पर खड़े होने और खुद चलने को ले कर इस कदर खुश था की मैं ये बात आपको बताना फिर भूल गया| उसके बाद जब हम मिश्रा अंकल जी की पार्टी में पहुँचे तो वहाँ आपको ये सच उनसे सुनने को मिला|" मैंने अपनी सफाई दी जो की दोनों सास-पतुआ को पसंद न आई!

"तो बच्चों को लाड-प्यार करने के चक्कर में तू सब भूल गया? ये ही कहना चाहता है न? इसका मतलब की बच्चे दोषी हुए?" माँ गुस्से में मुझ पर गरज पड़ीं| अब माँ के इस सवाल का जवाब देना मतलब माँ से मार खाना इसलिए मैंने चुप रहकर गर्दन झुकाने में ही अपनी भलाई समझी|

"अभी तक बातें छुपाता था, अब बहाने भी मारने लगा है!" माँ मुझे सुनाते हुए बोलीं| तीन बच्चों का बाप होने के बावजूद भी मैं अपनी माँ के डर के मारे सर झुकाये बैठा था| इधर माँ ने जब मुझे यूँ सर झुकाये देखा तो उनका गुस्सा कम होने के बजाए और बढ़ गया;

"क्यों गया था तू उनकी (मिश्रा अंकल जी की) मदद करने के लिए? एक फ़ोन पा कर तू एकदम से दौड़ गया, ये भी नहीं सोचा की तेरी माँ का क्या होगा? मैं पूछती हूँ की अगर तुझे कुछ हो जाता तो मेरा क्या होता? मुझ बुढ़िया की देख-भाल कौन करता? वो सब (मिश्रा अंकल जी का परिवार) आते यहाँ मेरी देख भाल को? तुझे कितनी बार समझाया है की दूसरों के लड़ाई-झगड़े में मत पड़ा कर मगर तेरी अक्ल में ये बात घुसती ही नहीं!" माँ की कही बात सही थी, मैं मिश्रा अंकल जी की मदद करने के लिए उतावला हो गया था, लेकिन अगर उनकी जगह मुझे ये मदद चाहिए होती तो वो नहीं आते!

इस वक़्त माँ केवल खुद को सामने रख कर सवाल-जवाब कर रहीं थीं, दरअसल वो मुझे एक बेटे के बिना माँ की क्या हालत होती है उस पीड़ा से अवगत करवाना चाहती थीं|

"तेरे पिताजी ने आज तक किसी से एक पैसे का एहसान नहीं लिया| ख़ास तौर पर मिश्रा भाईसाहब से तो बिलकुल नहीं क्योंकि तेरे पिताजी जानते थे की उनका एहसान हम चूका नहीं पाएंगे इसलिए तुझे भी उन पर कोई एहसान करने की जर्रूरत नहीं थी!" माँ को लग रहा था की मैं मिश्रा अंकल जी की मदद करने के लिए कोई एहसान चुकाने गया हूँगा इसीलिए वो मुझे ये नसीहत दे रहीं थीं, परन्तु मेरे मन में ऐसा कोई ख्याल नहीं आया था| मेरा मिश्रा अंकल जी की मदद करने जाने का सिर्फ एक कारण था और वो थी पिस्तौल! अब ये कारण मैं माँ को बताता तो माँ चप्पल से पीटती मुझे!

"और ये बताइयो ज़रा मुझे, ये पिस्तौल चलाने का शौक कहाँ से चढ़ा तुझे? अब क्या तूने चंबल का डाकू बनना है जो ये पिस्तौल चलाने का शौक पाल लिया तूने?" माँ गुस्से से फिर गरज पड़ीं|

जब माँ ने चंबल का नाम लिया तो मुझे हँसी आ रही थी, क्योंकि मैंने खुद को डाकू की पोशाक पहने घोड़े पर बैठा हुए कल्पना कर ली थी| इधर मेरे चेहरे पर हँसी के निशान देख माँ का गुस्सा भड़क गया और वो मुझ पर गुस्से से चीख पड़ीं; "बद्तमीज़ लड़के, दाँत दिखा कर हँस रहा है! अपनी गलती का एहसास भी है तुझे?" माँ के गुस्से को देख कर मेरी फट के आठ हो गई और मैं सर झुकाये हुए ही धीरे से बुदबुदाया; "माफ़ कर दो माँ!"

"माफ़ कर दूँ?...कोई भी आएगा और तुझे उकसायेगा और तू कुछ भी कर देगा?...सब मेरी ही गलती है, न मैं तुझे छूट देती न तू यूँ हवा में उड़ने लगता! कैसे-कैसे गुंडों के साथ काम करता फिरता है, हमें क्या पता? यही गुंडे-मवालियों की संगत है तेरी?...'संगत से गुण आवत हैं, संगत से गुण जावत हैं!' तेरे पिताजी की सिखाई ये बात तुझे याद भी है की नहीं? ऐसे गंदे लोगों के साथ काम करता है तू? तेरे पिताजी ने आज तक किसी गलत इंसान के साथ काम नहीं किया और तू ऐसी महफ़िलों में जाने लगा है जहाँ पिस्तौल, तमंचे, चाक़ू सब हाथ में ले कर देखते हैं! आज से तेरा ऐसे लोगों के साथ उठना-बैठना बंद! तू मिश्रा भाईसाहब या उनके परिवार से कोई तालुक्कात नहीं रखेगा!" माँ ने मेरे रिवाल्वर चलाने को ले कर बहुत सुनाया और अंत में मुझे आदेश भी दे दिया की मैं मिश्रा अंकल जी से सारे तलुकाकत खत्म कर लूँ|

मेरा मन पहले ही ठेकेदारी से उठ चूका था, उसपर माँ का आदेश हुआ तो मेरी तो जैसे लाटरी निकल गई! मैंने माँ के सामने ही संतोष को फ़ोन किया और उसे बात करने के लिए घर बुलाया| फ़ोन रख मैं माँ से बोला; "माँ, संतोष अभी थोड़ी देर में आएगा और मैं मिश्रा अंकल जी का सारा काम उसके सुपुर्द कर दूँगा|" मेरी बात सुन माँ ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, बल्कि वो बिना कुछ कहे उठ कर चली गईं|

मेरी माँ जब भी मुझसे नाराज़ होती थीं तो वो मुझसे बात करना बंद कर देती थीं| माँ के इस बर्ताव से मेरे मन बहुत दुखता था और मैं उनसे कुछ बुलवाने को तड़पता रहता था| जबतक स्तुति नहीं उठी तबतक मैं माँ से कुछ न कुछ बात करने की कोशिश करता रहा मगर मेरी माँ के मुख से कोई बोल नहीं फूटे! अपने प्रति माँ के इस रूखे व्यवहार से मैं बहुत दुखी था, मुझे पछतावा हो रहा था की मैंने अपनी माँ का दिल इस कदर दुखाया की वो मुझसे बात तक नहीं कर रहीं|

मैं बैठक में बैठ कर मिश्रा अंकल जी की साइट का बजट बना रहा था जब मेरी बिटिया रानी उठ गई और बिना किसी की मदद के बिस्तर से उतर कर मेरे पास आ गई| अपने दोनों हाथों-पॉंव पर चलते हुए स्तुति आई और मेरी टाँग से लिपट गई| "अरे मेरा बच्चा, अपने आप उठ गया?" मैंने स्तुति को गोदी में उठाते हुए उसे लाड-प्यार किया तथा स्तुति ने भी मुझे मेरी सुबह की प्यारी-प्यारी पप्पी दी! "बेटू, आप खेलो तबतक पापा जी को थोड़ा हिसाब करना है|" मैंने स्तुति प्यार से समझते हुए गोदी से नीचे उतारा और उसे खेलने के लिए उसके कुछ खिलोने दे दिए| स्तुति खेलने में व्यस्त हो गई तो मैं अपने काम में लग गया| स्तुति ने जब देखा की मेरा ध्यान काम पर है तो वो नाराज़ हो गई और मेरा ध्यान अपने ऊपर खींचने के लिए स्तुति मेरे पास आ गई| "पपई...पपई?" कहते हुए स्तुति मुझे पुकारने लगी, दरअसल वो चाहती थी की मैं अपना काम छोड़कर उसके साथ खेलूँ मगर मेरा हिसाब-किताब करना जर्रूरी था इसलिए मैंने स्तुति को फिर प्यार से समझाया; "बेटू, जर्रूरी काम है| आप खेलो मैं थोड़ी देर में आता हूँ|" स्तुति को यूँ मेरे द्वारा नज़रअंदाज़ किया जाना पसंद नहीं आया और वो मेरी शिकायत ले कर अपनी दादी जी के पास पहुँच गई; "दाई...पपई!" स्तुति मुँह फुलाये मेरी ओर ऊँगली से इशारा करते हुए बोली| माँ अपनी पोती की शिकायत सुन मुस्कुराईं और उसके सर को चूमते हुए बोलीं; "तेरे बाप के पर निकल आये हैं इसलिए मैं उसे सीधा कर रही हूँ!" पता नहीं स्तुति को अपनी दादी जी की बात समझ आई या नहीं मगर वो मुस्कुराने लगी| इधर मैं दादी-पोती की बातों से अनजान अपना हिसाब-किताब करने में लगा हुआ था!

कुछ देर बाद संतोष घर आया और हम दोनों माँ के सामने बैठक में बैठ कर बातें करने लगे; "संतोष, मैं आज तुझे मिश्रा अंकल जी की साइट का सारा काम सौंप रहा हूँ इसलिए इस साइट से जितना मुनाफ़ा होगा वो सिर्फ और सिर्फ तेरा होगा!" मेरी बात सुन संतोष एकदम से घबरा गया| उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रहीं थीं, दरअसल वो बेचारा इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाने के लिए खुद अक्षम समझ रहा था| "देख यार, घबराने की जर्रूरत नहीं है| मैं हूँ तेरे साथ, तुझे हर कदम में मैं दिशानिर्देश देता रहूँगा| सबसे जर्रूरी होता है पैसे का लेन-देन करना, उसमें मैं तेरी पूरी मदद करूँगा| मिश्रा अंकल जी सारे पैसे मुझे ही देंगे तो वो पैसे कैसे इस्तेमाल करने हैं ये मैं तुझे अच्छे से सीखा दूँगा| मेरी दी जा रही इस ट्रेनिंग से भविष्य में तू अकेले ठेके उठा सकेगा|" मैंने संतोष को आश्वस्त करना चाहा मगर उसके दिमाग में मेरे बर्ताव में अचानक आये बदलाव को जानने की जिज्ञासा पैदा हो गई थी| "लेकिन भैया, आप अचानक सारा काम मुझे क्यों दे रहे हो?" संतोष ने झिझकते हुए सवाल पुछा|

"यार, ये रात-रात भर काम करने से मैं घर पर समय नहीं दे पाता, जिस कारण पूरा घर मुझसे नाराज़ है| अब मैं बस अपनी साइट वाले काम को पूरा करने पर ध्यान दूँगा| एक बार साइट पूरी तैयार हो गई, मैंने पार्टियों को कब्ज़ा दे दिया तो मैं कुछ समय के लिए छुट्टी ले लूँगा| अब मैं तो छुट्टी मना सकता हूँ, लेकिन तू थोड़ी ही खाली बैठेगा? तेरे पास भी तेरी जिम्मेदारियाँ हैं इसलिए मैं तुझे धीरे-धीरे ठेकेदारी का काम सीखा रहा हूँ ताकि मेरे चक्कर में तुझे खाली न बैठना पड़े|

वैसे भी इतने साल साथ काम करने से तू काफी काम सीख चूका है और अब समय है की तू थोड़ा सा रिस्क उठाये और अपना काम फैलाये| अभी मैं तेरे साथ खड़ा हूँ तेरी मदद करने को इसलिए तुझे ज़रा भी डरने की जर्रूरत नहीं|" थोड़ा समय लगा परन्तु संतोष मेरी बात मान गया, अब बात आई मुनाफे की और संतोष चाहता था की मिश्रा अंकल जी के साइट का मुनाफ़ा हम दोनों आधा-आधा बांटें| "देख यार, इस मुनाफे में मेरा कोई हक़ नहीं लेकिन फिर भी तेरी बात का मान रखते हुए मैं बस 10% लूँगा|" मैंने मुस्कुराते हुए कहा|

"भैया, आप मेरे मालिक हो और मैं आपको 10% दूँगा? ये तो कमीशन वाली बात हुई जो की आपको सख्त नपसंद है!" संतोष थोड़ा जिद्द करते हुए बोला| उसकी बात सही थी, मुझे कमीशन लेने या देना पसंद नहीं था| संतोष अपनी ओर से तर्क देते हुए मुझे मुनाफे का आधा हिस्सा देना चाहता था मगर मैं इसके लिए मान नहीं रहा था|

आखिर माँ जो अभी तक चुप-चाप बैठीं थीं वो ही बीच में बोलीं; "देख बेटा संतोष, जब मेहनत तेरी है तो तेरी मेहनत के मुनाफे में आधा हिस्सा मानु कैसे ले सकता है? तेरी बात का मान रखते हुए मानु 20% हिस्सा लेगा, लेकिन इससे ज्यादा बिलकुल नहीं!" माँ का फैसला अंतिम था जिसके आगे न मैं बोल सकता था और न ही संतोष| "ठीक है माँ जी|" संतोष मुस्कुराते हुए बोला| संतोष ने मुझे मेरी साइट का हिसाब दिया और मिश्रा अंकल जी की साइट का काम शुरू करने के लिए क्या-क्या माल मँगवाना है उसकी लिस्ट ले कर चला गया|

मैंने माँ की बता मानते हुए मिश्रा अंकल जी के परिवार से अपने तालुक्कात तोड़ने की दिशा में कदम बढ़ाया तो माँ के दिल को सुकून मिला| इधर नाश्ता बनने लगा और उस पूरे दौरान मैंने किसी न किसी बहाने से माँ से बात करनी चाही मगर माँ ने कोई जवाब नहीं दिया, वो तो मुँह मोड टी.वी. देखने में लगी थीं| जब नाश्ता बना तो संगीता ने सब का नाश्ता माँ के कमरे में परोस दिया| स्तुति को मैंने सुबह से लाड-प्यार कम किया था इसलिए मैं स्तुति को अपने सामने बिठा कर सेरेलक्स खिलाने लगा, सेरेलक्स खाते हुए स्तुति बहुत खुश थी मगर मेरे चेहरे पर ख़ुशी का नामोनिशान न था| माँ के मुझसे बात न करने के कारण मैं गुम-सुम था| मेरी उदासी सबसे पहले मेरी बिटिया ने पकड़ी और मुझे हँसाने-बुलाने के लिए स्तुति ने अपने दोनों हाथ सेरेलक्स में लबेडे और अपना पूरा चेहरा पोत लिया! स्तुति को ऐसा करते देख माँ को बहुत हँसी आई! माँ को यूँ हँसते देख दो पल के लिए मेरे चेहरे पर भी मुस्कान आ गई|

नाश्ता कर मैं स्तुति को गोदी में लिए कंप्यूटर पर काम कर रहा था जब स्तुति ने मेरा ध्यान अपने ऊपर खींचना शुरू किया| स्तुति को जानना था की आखिर क्यों मैं सुबह से उसे लाड-प्यार नहीं कर रहा, क्यों उसके साथ खेल नहीं खेल रहा, क्यों उससे हँसते हुए बात नहीं कर रहा| अपनी बिटिया के मन में उठे इन सवालों को महसूस कर मैं स्तुति को समझाते हुए बोला; "बेटा, आपकी दादी जी यानी मेरी माँ मुझसे नाराज़ हैं और मुझसे बात नहीं कर रहीं इसलिए मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा|" मेरी बात सुन स्तुति जैसे सब समझ गई और एकदम से मेरी ओर ऊँगली से इशारा करते हुए बोली; "मम (यानी मेरी माँ) no...no" लेकिन मुझे स्तुति की ये बात समझ नहीं आई, मेरा मन पहले ही उचाट था इसलिए मैंने अपना ध्यान काम में लगा दिया|

अब स्तुति हो रही थी बोर इसलिए वो मेरी गोदी से नीचे उतरने को छटपटाई, मैंने स्तुति को नीचे उतारा तो वो सीधा अपनी दादी जी के पास खदबद-खदबद दौड़ गई| "दाई...दाई...पपई...पपई...मम..मम..no...no...no" स्तुति ने अपनी दादी जी का ध्यान अपने ऊपर केंद्रित करते हुए इशारों से अपनी बात कहनी शुरू की| स्तुति की बात का असली मतलब था की; 'दादी जी आप पापा जी से बात क्यों नहीं कर रहे?' स्तुति बहुत गंभीर होते हुए अपनी बात दोहरा रही थी इसलिए माँ को उसकी बात का अर्थ समझने में थोड़ा समय लगा| जब माँ को अपनी पोती की सारी बात समझ आई तो उन्होंने मुझे बड़े प्यार से आवाज़ लगाई; "ओ मेरी शूगी के पपई?" माँ के इस प्रकार प्यार से बुलाने पर मैं सारा काम छोड़ कर उनके सामने हाज़िर हो गया| जैसे ही मैंने माँ के चेहरे पर मुस्कान देखि मेरे दिल ने चैन की साँस ली| माँ ने मुझे अपनी बगल में बैठने का इशारा किया, मेरे बैठते ही स्तुति मेरी गोदी में आ गई और मेरे सीने से लिपट गई| ऐसा लगता था मानो मेरी बिटिया कह रही हो की; 'पापा जी, मैंने अपना काम कर दिया| दादी जी अब आपसे नाराज़ नहीं हैं!'

माँ ने संगीता को आवाज़ दे कर बुलाया और अपने सामने बिठा कर मुझसे बोलीं; "बेटा, तू अब बड़ा हो गया है...समझदार हो गया है...तुझ पर सब जिम्मेदारियाँ आ गई हैं इसलिए अब तेरे यूँ किसी दूसरे के लिए अपनी जान खतरे में डालना सही बात नहीं| तू अपनी जिंदगी के फैसले सोच-समझ कर लेता आया है ऐसे में ये बंदूक और ये गंदी संगत से दूर रह ताकि तू इनके चक्करों में पड़ कर कोई गलत कदम न उठा ले|" माँ ने बड़े आराम से मुझे बात समझाई|

अब चूँकि माँ शांत थीं तो मेरा मन उनसे और संगीता से माफ़ी माँगने का था; "माँ, मैंने जो किया उसके लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूँ| मुझे कुछ भी करने से पहले अपने परिवार के बारे में सोचना चाहिए था| मेरा परिवार जिसका मेरे सिवा और कोई नहीं है उस परिवार की जिम्मेदारी उठाना मेरा ही कर्तव्य है| मैं जानता हूँ की जो मैंने किया वो माफ़ी के काबिल नहीं है लेकिन माँ मुझे आप बस एक मौका दे दीजिये ताकि मैं अपनी गलती सुधार सकूँ| आज के बाद मैं ऐसा कोई काम नहीं करूँगा जिससे मेरी या मेरे परिवार की जान पर बात बन पड़े!" मेरी पूरी बात सुन माँ ने तो मुझे माफ़ कर दिया मगर संगीता के हाव-भाव अब भी वैसे थे जैसे कल रात थे, उसका गुस्सा शांत होने का नाम ही नहीं ले रहा था|

इंसान एक समय में जंग के एक ही मोर्चे पर जीत हासिल कर सकता था इसीलिए मैंने केवल माँ को मनाने पर ध्यान केंद्रित किया तथा उन्हें अपने आगे के भविष्य के बारे में बताने लगा| "माँ आपको याद है मैं और संगीता आगरा गए थे?" मेरे अचानक पूछे इस सवाल से माँ के चेहरे पर शिकन की लकीरें उभर आईं| उधर संगीता को आगरा में की गई उसकी मस्ती याद आ गई जिस कारन संगीता के चेहरे पर शरारती मुस्कान की एक झलक उभर आई थी!

"दरअसल आगरा जाने का एक ख़ास कारण था और वो था की मैं अपना अलग काम शुरू करना चाहता था| मेरा मन पिताजी के साथ ठेकेदारी में नहीं लगता था और मैं अपना अलग काम शुरू करने की सोच रहा था इसीलिए मैं जानकारी लेने हेतु आगरा गया था| लेकिन फिर अचानक संगीता के पिताजी की मृत्यु हो गई, पिताजी हमें छोड़कर अपने भाई-भाभी के पास रहने लगे और मुझ पर सारे काम की जिम्मेदारी आ गई, जिस कारण मैंने अपने इस नए बिज़नेस के प्लान के ऊपर काम करना बंद कर दिया|" मेरी बात सुन माँ और संगीता के साथ-साथ स्तुति का मुख भी खुला का खुला रह गया! मैंने एक गहरी साँस ली और माँ को अपनी अभी तक बनाई गई योजना सुनाने लगा; "माँ, आजकल ऑनलाइन (online)...मतलब इंटरनेट पर लोग सामान बेचने लगे हैं| इस काम में मुनाफ़ा बहुत है और लागत भी कम है| मैंने सोचा है की मैं अपना खुद का ब्रांड बना कर, पुरुषों के लिए असली चमड़े के जूते बनवाकर ऑनलाइन बेचूँगा|" माँ को इस विषय के बारे में जानकारी नहीं थी इसलिए मैंने उन्हें माल खरीदने से लेकर बेचने तक की सारी जानकारी बड़े विस्तार से दी| दोनों सास-पतुआ ने मेरी बात बड़े गौर से सुनी थीं, लेकिन सबसे गौर से बातें केवल स्तुति ने सुनी!


अगर ये शार्क टैंक का एपिसोड होता तो स्तुति भी अमन गुप्ता की तरह बोलती; "आप चिंता मत करो, फंड्स मैं दूँगी!"


मैंने अपना बिज़नेस आईडिया पिच (business idea pitch) कर दिया था, अब बस माँ की मंज़ूरी चाहिए थी| मेरी नज़रों में माँ की हाँ सुनने की ललक थी और मेरी उत्सुकता देख माँ मुस्कुराई और बोलीं; "ठीक है बेटा, इस काम में तेरी अपनी मेहनत होगी| शाबाश!" माँ ने मेरी पीठ थपथपाते हुए मुझे आशीर्वाद दिया तो मुझे ऐसा लगा मानो मेरे इस नए व्यपार के लिए माँ ने मुझे पूँजी (capital) दे दी हो!

इधर मैंने जब संगीता की तरफ देखा तो उसके चेहरे पर ख़ुशी की मुस्कान थी जिसका मतलब था की संगीता को मेरा ये बिज़नेस आईडिया बहुत पसंद आया है मगर जैसे ही हमारी नजरें मिलीं, संगीता के चेहरे पर पुनः मेरे प्रति गुस्से के भाव आ गए| दरअसल संगीता को मनाना समय लगाने वाला काम था, ये काम इत्मीनान से किया जाए तो ही अच्छा था जल्दबाज़ी में सारी बाज़ी उलटी पड़ सकती थी!

इधर मेरा नया बिज़नेस आईडिया सुन और माँ द्वारा मिली आज्ञा से सबसे ज्यादा स्तुति खुश थी| स्तुति अपने मसूड़े दिखा कर हँस रही थी और ख़ुशी की किलकारियाँ मारने में व्यस्त थी| माँ ने जब स्तुति को यूँ खुश देखा तो वो स्तुति की नाक पकड़ते हुए बोलीं; "नानी, तू बड़ी खुश है? तूने भी अपने पापा के साथ बिज़नेस करना है?" माँ के पूछे इस मज़ाकिया सवाल का जवाब स्तुति ने ख़ुशी-ख़ुशी अपना सर हाँ में हिलाते हुए दिया| स्तुति की हाँ सुन कर हम सभी को हँसी आ गई और स्तुति भी हमारे साथ खिलखिला कर हँसने लगी|

"मेरी लाड़ली इसलिए खुश है क्योंकि उसे आज रसमलाई खाने को मिलेगी!" मैंने स्तुति के मन की बात कही तो स्तुति फौरन अपना सर हाँ में हिलाने लगी|

[color=rgb(65,]जारी रहेगा भाग - 7 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]अंतिम अध्याय: प्रतिकाष्ठा[/color]
[color=rgb(51,]भाग - 7[/color]

[color=rgb(26,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

इधर मेरा नया बिज़नेस आईडिया सुन और माँ द्वारा मिली आज्ञा से सबसे ज्यादा स्तुति खुश थी| स्तुति अपने मसूड़े दिखा कर हँस रही थी और ख़ुशी की किलकारियाँ मारने में व्यस्त थी| माँ ने जब स्तुति को यूँ खुश देखा तो वो स्तुति की नाक पकड़ते हुए बोलीं; "नानी, तू बड़ी खुश है? तूने भी अपने पापा के साथ बिज़नेस करना है?" माँ के पूछे इस मज़ाकिया सवाल का जवाब स्तुति ने ख़ुशी-ख़ुशी अपना सर हाँ में हिलाते हुए दिया| स्तुति की हाँ सुन कर हम सभी को हँसी आ गई और स्तुति भी हमारे साथ खिलखिला कर हँसने लगी|

"मेरी लाड़ली इसलिए खुश है क्योंकि उसे आज रसमलाई खाने को मिलेगी!" मैंने स्तुति के मन की बात कही तो स्तुति फौरन अपना सर हाँ में हिलाने लगी|

[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]

आज
मेरी बिटिया ने हम माँ-बेटे के बीच पैदा हुए गुस्से को खत्म करने का महान काम किया था इसलिए आज मेरा मन मेरी लाड़ली को कुछ ख़ास खिलाने का था| मैं स्तुति को लिए हुए घर से निकला और उसे फ्रूट संडे (fruit sundae) खिलाया, इस डिश में से मैंने स्तुति को चुन-चुन कर सरे फ्रूट्स खिलाये जिसमें स्तुति को बहुत मज़ा आया| खा-पी कर हम दोनों बाप-बेटी रस-मलाई पैक करवा कर घर पहुँचे|

दोपहर को बच्चे स्कूल से लौटे तो मैंने उन्हें मेरे नए बिज़नेस शुरू करने की खबर सुनाई| आयुष को ऑनलाइन शॉपिंग के बारे में ज्यादा पता नहीं था लेकिन इससे उसका उत्साह कम नहीं हुआ था, वो तो मेरे नया काम शुरू करने के नाम से इतना खुश था की ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा था| अपनी ख़ुशी व्यक्त करने के लिए उसने और स्तुति ने बैठे-बैठे एक दूसरे को देखते हुए हवा में हाथ उठा कर नाचना शुरू कर दिया था| इधर नेहा को ऑनलाइन शॉपिंग के बारे में जानकारी थी इसलिए वो पूरी बात समझते हुए बहुत खुश थी और उसने अपनी ये ख़ुशी मेरे गले लग कर मुझे बधाई देते हुए प्रकट की|

अब ख़ुशी की बात चल ही रही थी तो अब बारी थी मुँह मीठा करने की, जब संगीता ने सबके लिए रसमलाई परोसी तो नेहा ख़ुशी के मारे कूदने लगी| वहीं स्तुति ने जब अपनी दिद्दा को ख़ुशी से कूदते हुए देखा तो उसने भी कूदने की इच्छा प्रकट की; "पपई...पपई...दिद्दा!" स्तुति ने अपनी दीदी की तरफ इशारा करते हुए मुझे कहा तो मैंने स्तुति के दोनों हाथ पकड़ उसे खड़े होने में सहायता की, स्तुति जैसे ही खड़ी हुई उसने धीरे-धीरे थिरकना शुरू कर दिया! माँ ने जब अपनी पोती को थिरकते देखा तो वो तालियाँ बजाते हुए स्तुति का उत्साह बढ़ाने लगीं जिस कारन स्तुति के मुख से ख़ुशी की किलकारियाँ गूँजने लगीं!

वो दोस्ती ही क्या जिसमें आपने कभी साथ बिज़नेस करने की न सोची हो? यही कारण था की मैंने अपने बिज़नेस से जुड़ने के लिए दिषु को पुछा| साथ बिज़नेस करने का सुन दिषु उतावला हो गया और शाम को मिलने आने को बोला|

इधर खाना खा कर हम सब आराम कर रहे थे, संगीता मुझसे नाराज़ थी इसलिए वो माँ के पास थी| जबकि मेरे तीनों बच्चे मुझसे लिपट कर लेटे हुए खिलखिला रहे थे| अचानक ही मौसम बदला और बारिश शुरू हो गई, बादलों की गर्जन सुन स्तुति का मन बाहर छत पर जाने को कर रहा था और वो बार-बार मुझे पुकार कर छत पर जाने को कह रही थी| मैं दबे पॉंव स्तुति को ले कर उठा और छत पर आ गया तथा स्तुति को दूर से बारिश होते हुए दिखाने लगा| जिस प्रकार बारिश मुझे अपनी ओर खींचती थी उसी प्रकार मेरी बिटिया रानी भी बरखा रानी की तरफ खींची जा रही थी| स्तुति एकदम से मेरी गोदी से नीचे उतरने को छटपटाने लगी; "बेटू, आप बारिश में भीगोगे तो बीमार हो जाओगे|" मैंने स्तुति को समझना चाहा मगर मेरी बिटिया नहीं मानी और झूठ-मूठ रोना शुरू करने लगी| "बस एक मिनट के लिए चलेंगे?" मैं स्तुति से बोला तो स्तुति एकदम से खुश हो गई| गर्मी का मौसम था इसलिए मैं स्तुति को ले कर बारिश में भीगने आ गया| बरखा की बूँदें जब हम बाप-बेटी पर पड़ी तो स्तुति ने खुशी से चिल्लाना शुरू कर दिया| तभी मेरी मासूम बिटिया का मन बारिश की बूंदों को अपनी मुठ्ठी में कैद करने का था मगर बारिश की बूँदें स्तुति की छोटी सी हथेली में कैद होना नहीं चाहती थी, परन्तु इससे स्तुति का उत्साह कम नहीं हुआ बल्कि उसका उत्साह तो बेकाबू होने लगा था!

"पपई...पपई" कहते हुए स्तुति ने मेरी गोदी से नीचे उतरने के लिए छटपटाना शुरू कर दिया| मैंने सोचा की अब तो बारिश में भीग ही चुके हैं तो क्यों न हम बाप-बेटी नहा ही लें?! अतः मैं स्तुति को गोदी में लिए हुए नीचे बह रहे बारिश के पानी पर बैठ गया| बारिश हो रही थी और पानी नाली की ओर बह रहा था| स्तुति के पॉंव जब बारिश के पानी से स्पर्श हुए तो उसने ज़मीन पर बैठने की जिद्द की| जैसे ही मैंने स्तुति को ज़मीन पर बिठाया, स्तुति ने फट से छप-छप कर पानी मेरे ऊपर उछालना शरू कर दिया! "ब्माश!" मैं मुस्कुराते हुए बोला और स्तुति पर धीरे-धीरे पानी उड़ाने लगा| हम बाप-बेटी के यूँ एक दूसरे पर पानी उड़ाने में स्तुति को बहुत मज़ा आ रहा था और उसने खिलखिलाकर हँसना शुरू कर दिया था|

अभी बस कुछ मिनट हुए थे की मेरे दोनों बच्चे आयुष और नेहा भी जाग गए और मुझे ढूँढ़ते हुए छत पर आ पहुँचे| आयुष तो पहले ही बारिश में नहाने को उत्साहित रहता था इसलिए वो दौड़ता हुआ छत पर आ गया, वहीं मेरी बिटिया नेहा को भी आज अपने पापा जी के साथ बारिश में भीगना था इसलिए नेहा भी छत पर दौड़ आई|

हम तीनों ने स्तुति को घेर लिया और एक गोल धारा बना कर बैठ गए| स्तुति बीच में थी इसलिए उसने छप-छप कर हम सभी पर पानी उड़ाना शुरू कर दिया| इधर हम तीनों (मैंने, नेहा और आयुष) ने मिलकर स्तुति पर पानी उड़ाना शुरू कर दिया| बारिश में इस कदर भीगते हुए मस्ती करने में हम चारों को बहुत मज़ा आ रहा था और हम चारों सब कुछ भूल-भाल कर हँसी-ठहाका लगाने में व्यस्त थे! हमने ये भी नहीं सोचा की हमारे इस हँसी-ठाहके की आवाज़ घर के भीतर जाएगी और जब दोनों सास-पतुआ हम चारों को यूँ बारिश में नहाते हुए देखेंगी तो बहुत गुस्सा होंगी!

उधर, हमारी ये हँसी-ठहाका सुन माँ और संगीता छत पर आये तथा हम चारों को बारिश में मस्ती करते हुए चुप-चाप देखने लगे| मेरा बचपना देख माँ का मन मुझे डाँटने का नहीं था इसलिए वो कुछ पल बाद संगीता को ले कर वापस अंदर चली गईं|

एक जगह बैठ कर पानी उड़ाकर स्तुति ऊब गई थी इसलिए वो अपने दोनों हाथों-पॉंव पर चलने लगी| स्तुति को यूँ चलते देख हम तीनों भी रेल के डिब्बों की तरह स्तुति के पीछे-पीछे अपने दोनों हाथों-पॉंव पर चलने लगे| स्तुति को यूँ रेलगाड़ी का इंजन बनना पसंद था इसलिए वो खदबद-खदबद कर आगे दौड़ने लगी तथा हम तीनों भी स्तुति की गति से उसके पीछे चलने लगे| पूरी छत का चक्कर लगा कर स्तुति फिर छत के बीचों-बीच बैठ गई और फिरसे हम पर पानी उड़ाने लगी|

हमें बारिश में मस्ती करते हुए लगभग 15 मिनट हो गए थे इसलिए मैंने हमारी इस मस्ती की रेलगाडी पर रोक लगाई और तीनों बच्चों से बोला; "बस बेटा, अब सब अंदर चलो वरना आपकी दादी जी और आपकी मम्मी हम चारों को डाटेंगी!" अपनी दादी जी और मम्मी की डाँट का नाम सुन आयुष और नेहा तो अंदर जाने को तैयार हो गए मगर स्तुति 'न' में सर हिलाते हुए बोली; "no...no...no"!!!

"ओ पिद्दा! मम्मी मारेगी, चल अंदर!" नेहा ने स्तुति को प्यारभरी डाँट लगाई तब भी स्तुति नहीं मानी और फिर से छत पर खदबद- खदबद कर दौड़ने लगी| अब हमें स्तुति को पकड़ कर अंदर ले जाना था इसलिए हम स्तुति को पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ने लगे| दो मिनट तक स्तुति ने हमको अच्छे से दौड़ाया, कभी वो टेबल के नीचे छुप जाती तो कभी कुर्सी के पीछे! तब हमें नहीं पता था की स्तुति जानबूझ कर हमें अपने पीछे भगा रही है क्योंकि उसके लिए ये बस एक खेल ही तो था!

"बेटू, रस मलाई खाओगे?" मैंने जैसे ही रसमलाई का नाम लिया, वैसे ही मीठा खाने की लालची मेरी बिटिया जहाँ थी वहीं बैठ गई और मेरी गोदी में आने के लिए अपने दोनों हाथ खोल दिए! मैंने स्तुति को गोदी में उठाया तो नेहा ने उसके कूल्हों पर प्यार से चपत लगाई और बोली; "बिलकुल अपने आयुष भैया पर गई है, खाने का नाम लिया नहीं की फट से मान गई!" वैसे बात तो सही थी, आयुष की ही तरह स्तुति को मीठा खाने का चस्का था!

खैर, हम चारो दबे पॉंव अंदर आये क्योंकि हमें लग रहा था की हमारी इस मस्ती के बारे में माँ को नहीं पता है| अंदर आ कर बारी-बारी से सबने कपड़े बदले और फिर से बिस्तर पर लेट गए तथा ऐसा दिखाने लगे मानो हमने कोई शैतानी की ही न हो! शाम 6 बजे माँ हम चारों को उठाने आईं; "मेरे प्यारे-प्यारे शैतानों, उठ जाओ!" माँ ने प्यार से आवाज़ लगा कर हमें जगाया| हम चारों एक कतरार में उठ कर बैठ गए, चूँकि मैं माँ के नज़दीक था इसलिए माँ ने मेरा कान पकड़ कर उमेठ दिया; "तुम चारों ने बारिश में बड़ी मस्ती की न?" माँ के पूछे सवाल से हम चारों सन्न थे! आयुष और नेहा को लग रहा था की अब उन्हें डाँट पड़ने वाली है मगर स्तुति ने जब माँ को मेरा कान उमेठते हुए देखा तो उसे बड़ा मज़ा आया और उसने खिलखिलाकर हँसना शुरू कर दिया|

हम तीनों को फँसा कर स्तुति को बहुत मज़ा आ रहा था, वहीं माँ ने जब स्तुति को यूँ हँसते देखा तो उनकी भी हँसी छूट गई! जब दोनों बच्चों ने अपनी दादी जी को हँसते हुए देखा तो उनकी जान में जान आई| अब नेहा को मेरा कान माँ की पकड़ से छुड़ाना था इसलिए नेहा पलंग पर खड़ी हुई और माँ के गले लग गई| माँ नेहा को चलाकी जान गई थीं इसलिए उन्होंने नेहा के कूल्हों पर प्यार भरी चपत लगाई और बोलीं; "पापा की चमची! हमेशा अपने पापा जी को बचाने आगे आ जाती है!" जब माँ ने नेहा के कूल्हों पर प्यारी सी चपत लगाई तो स्तुति को इसमें भी बहुत मज़ा आया और उसने खिलखिलाकर हँसना शुरू कर दिया!

7 बजे दिषु घर आया और हम दोनों दोस्त मेरे कमरे में बैठ, कंप्यूटर पर हमारे नए बिज़नेस से जुडी मेरे द्वारा बनाई हुई PPT देख रहे थे| इतने में स्तुति अपने हाथों-पॉंव पर खदबद-खदबद कर आ पहुँची, मैंने स्तुति को गोदी में लिया तो स्तुति ने टेबल के ऊपर बैठने की पेशकश की| स्तुति को मैंने कंप्यूटर स्क्रीन की बगल में बिठा दिया तो स्तुति बड़ी गौर से PPT देखने लगी| "बेटा, आप भी अपने पापा जी की सेल्स पिच (sales pitch) देखोगे?" दिषु ने मज़ाक करते हुए स्तुति से पुछा तो स्तुति ने फौरन अपनी गर्दन हाँ में हिला दी| स्तुति की इस प्रतिक्रिया पर दिषु को बहुत जोर से हँसी आई और ठहाका लगा कर हँसने लगा|

"हाँ भैया, ये नानी ही तो आपकी इन्वेस्टर (investor) है!" संगीता ने दिषु की बात सुन ली थी इसलिए वो पीछे से आ कर बोली, इधर संगीता के किये इस मज़ाक पर हम दोनों दोस्त हँसने लगे|

खैर, मैं दिषु को PPT दिखाते हुए सब समझा रहा था और इस दौरान स्तुति बड़े गौर से मेरी बातें सुन रही थी| जब PPT में एनिमेशन्स (animations) आती तो स्तुति बहुत खुश होती, इतनी ख़ुशी की वो ख़ुशी से चिल्लाने लगती| इतने में संगीता चाय ले आई और जबरदस्ती स्तुति को गोदी में उठा कर ले जाने लगी, अब स्तुति को PPT देखने में आ रहा था मज़ा इसलिए वो संगीता की गोदी में छटपटाने लगी| "तेरे पल्ले कुछ पड़ भी रहा है की यहाँ क्या बातें हो रही हैं? बड़ी आई अम्बानी की चाची!" संगीता मुँह टेढ़ा करते हुए बोली और स्तुति को अपने साथ ले गई|

जब से दिषु आया था उसने संगीता के बर्ताव में आये बदलाव को भाँप लिया था| बाकी दिन जब दिषु घर आता था तो संगीता उससे बड़े प्यार से बात करती थी, लेकिन आज वो अधिक बात करने के मूड में नहीं थी| जब संगीता हम दोनों की चाय दे कर गई तो दिषु ने मुझसे सारी बात पूछी| जब मैंने उसे सारी बात बताई तो दिषु अवाक हो कर मुझे देखने लगा! "भोसड़ीके तुझे बड़ी चर्बी चढ़ी है? बहनचोद तूने रिवॉल्वर चलाई? बहनचोद तेरी तो डंडे से गांड तोड़ी जानी चाहिए!" दिषु मुझे गाली देते हुए गुस्से से बोला|

"भाई, मेरी मति मारी गई थी जो मैंने किसी के 'चढ़ाने' पर रिवॉल्वर उठाई!" मैं अपना सर पीटते हुए बोला| अब जैसा की होता है, संगीता ने हमारी सारी बातें सुन ली थीं इसलिए वो एकदम से कमरे में आ गई ताकि दिषु को मेरे खिलाफ और भड़का सके; "आपसे बातें तो छुपाते ही थे, अब तो हम सब से भी बातें छुपाने लगे हैं!" संगीता मुँह टेढ़ा करते हुए बोली|

"ये ऐसे नहीं सुधरेगा भाभी जी, ज़रा एक डंडा लाइए मैं इसे अभी कूट-पीट कर सीधा करता हूँ! बड़ी चर्बी चढ़ी है साले को, न मैंने इसकी सारी चर्बी पिघला दी तो कहना!" दिषु अपनी कमीज के स्लीव मोड़ते हुए बोला| शुक्र है की घर में डंडा नहीं था वरना अगर संगीता उसे डंडा दे देती तो ये ससुर मुझे आज सच में कूट देता!

"यार मैं अपने किये पर बहुत शर्मिंदा हूँ! मैंने जो बेवकूफी की उसके लिए मैं हाथ जोड़कर माफ़ी माँगता हूँ|" मैंने अपनी जान बचाने के लिए नम्रता से हाथ जोड़े, लेकिन बजाए नरम पड़ने के दिषु मुझे सुनाने लग गया; "मेरी भाभी जी सीधी-साधी हैं इसलिए तुझे बस कमरे से बाहर सुलाया, अगर कोई और होती न तो घर से बाहर निकाल देती तुझे! चल पॉंव-पड़ भाभी जी के!" दिषु मुझे आदेश देते हुए बोला| अब मुझे चाहिए थी संगीता की माफ़ी और इसके लिए मैं उसके पॉंव छूने को भी तैयार था| मैंने जैसे ही आगे बढ़ कर संगीता के पॉंव छूने चाहे, वैसे ही संगीता डर के मारे भाग खड़ी हुई! संगीता के एकदम से भागने पर दिषु हँस पड़ा और बोला; "अरे भाभी जी, कहाँ भाग रही हो? इसे (मुझे) माफ़ी तो माँगने दो!"

दिषु की बात सुन संगीता कमरे के बाहर जा कर रुकी और बोली; "प्यार करती हूँ इनसे और इनसे अपने पॉंव स्पर्श करवाऊँगी तो नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी मुझे! आप इन्हें कूट-पीट कर सही कर दो, मैं ये सब देख नहीं पाऊँगी इसलिए मैं चली!" कल रात से जा कर अब संगीता के मुख से प्यारभरे बोल फूटे थे जिससे मेरा मन प्रसन्न हो गया था| अब संगीता पिघल रही थी तो उसे मनाना आसान था|

संगीता के जाने के बाद दिषु ने मुझे आराम से समझाया की मैं इस तरह बेवकूफी भरा काम न किया करूँ तथा मैंने भी दिषु की बात मानते हुए कहा; "भाई ये आखरी गलती थी मेरी, आगे से फिर कभी ऐसा नहीं करूँगा|" मैंने ऐसा बोल तो दिया लेकिन फिर आगे चल कर कुछ ऐसा घटित हुआ जिस कारण मेरा गुस्सा खुल कर सामने आया और मैं अपनी बात पर क़ायम न रह सका!

जाते-जाते दिषु संगीता से मज़ाक करते हुए बोला; "भाभी जी, मैंने इसे अच्छे से कूट दिया है| आगे फिर ये कोई बेवकूफी करे तो मुझे उसी वक़्त फ़ोन कर देना, मैं तभी दौड़ा चला आऊँगा और इसे पीट-पाट के चला जाऊँगा| अगर मैं दिल्ली में न भी हुआ न तो फ्लाइट से आऊँगा और फ्लाइट के पैसे इसी से भरवाऊँगा!" दिषु के किये मज़ाक पर संगीता की हँसी छूट गई और अपनी परिणीता को हँसते देख मेरा दिल एक बार फिर प्रसन्नता से भर गया|

दिषु के जाने के बाद, नेहा का मन मुझे अपनी मम्मी से माफ़ी दिलवाने का था इसलिए उसने मोर्चा सँभाला! मैं कमरे में बैठा कंप्यूटर पर काम कर रहा था और संगीता उसी वक़्त कमरे में कपड़े तहाने आई थी, ठीक तभी नेहा फुदकती हुई कमरे में आई| "मम्मी जी...मुझे न आपसे बात करनी है!" नेहा अपनी मम्मी को मक्खन लगाते हुए बोली|

"ज्यादा मक्खन लगाने की जर्रूरत नहीं है, सीधा मुद्दे पर आ!" संगीता मुँह टेढ़ा करते हुए बोली| संगीता जानती थी की नेहा उसे मेरे लिए मख्खन लगाने आई है इसीलिए संगीता सीधे मुँह नेहा से बात नहीं कर रही थी|

"मम्मी जी, गलती तो सब से होती है लेकिन हमें इंसान को उसकी गलती सुधारने का एक मौका देना चाहिए न?" नेहा अपनी मम्मी से तर्क करते हुए बोली| नेहा तर्क करने में बहुत तेज़ थी और उसके इस तर्क का जवाब देने में मैं भी फ़ैल हो जाता था| मैं जब नेहा के आगे तर्क में हारने लगता तो मैं बात बनाते हुए उसे लाड-प्यार कर बहला लेता था, लेकिन संगीता थी गर्म दिमाग की इसलिए वो नेहा के तर्क के आगे हारने पर उसे ही डाँट देती थी!

"तुझे पूरी बात पता भी है? आ गई यहाँ पैरवी करने!" संगीता ने नेहा को झिड़कते हुए कहा|

"हाँ जी मम्मी, मुझे सब बात पता है|" नेहा बड़े आत्मविश्वास से बोली| नेहा का आत्मविश्वास देख संगीता हैरान हो गई! संगीता को लगा मैंने नेहा को मेरे रिवाल्वर उठाने की बात भी बता दी है इसलिए संगीता अपनी आँखें फाड़े मुझे देखने लगी! नेहा जब मेरी पैरवी कर रही थी तो मैं अपना काम छोड़ दोनों माँ-बेटी की बात सुनने में व्यस्त हो गया था| जब हम मियाँ-बीवी की नज़रें आपस में टकराई तो संगीता आँखों ही आँखों में मुझसे पूछने लगी की क्या मैंने नेहा को सब बता दिया? जिसके जवाब में मैंने नेहा की चोरी, अपनी गर्दन न में हिला दी| संगीता को इत्मीनान हुआ की मैंने नेहा को सारी बात नहीं बताई इसलिए संगीता ने नेहा को छिड़कते हुए चुप करा दिया; "जा कर पढ़ाई कर अपनी! बड़ी आई वकील बनने!" नेहा को झिड़क कर संगीता रसोई में चली गई|

संगीता के जाने के बाद नेहा आ कर मेरे गले लग गई और बोली; "सॉरी पापा जी, मैं फ़ैल हो गई?" नेहा के फ़ैल होने का मतलब था की वो मुझे अपनी मम्मी से माफ़ी नहीं दिलवा पाई| पिछलीबार जब मैं संगीता से नाराज़ था तो उसी ने अपनी मम्मी को मुझसे माफ़ी दिलवाई थी, नेहा को लगा की वो इस काम में उस्ताद है इसीलिए वो मुझे अपनी मम्मी से माफ़ी दिलवाना चाहती थी| नेहा को इस कदर हार मानते देख मुझे लगा कहीं मेरी बिटिया के मन में कोई डर न बैठ जाए इसलिए मैं नेहा को हिम्मत देते हुए बोला; "बेटा, अभी आपकी मम्मी गुस्सा हैं इसलिए वो अभी इतनी जल्दी नहीं मानेंगी| एक बार आपकी मम्मी का गुस्सा शांत हो जाए तो उन्हें मनाना|" मेरी बात से नेहा को हिम्मत मिली और उसने तुरंत एक तरकीब सोच ली|

नेहा ने अपने दोनों भाई-बहन को साथ लिया और अपनी मम्मी को मनाने के लिए रसोई में जा पहुँची| ये दृश्य ऐसा ही था जैसे मेरी सत्ता बचाने के लिए मेरे तीनों विधायक गृह मंत्री के पास पहुँचे हों|

नेहा ने फट से स्तुति को आगे किया और अपनी मम्मी से बोली; "मम्मी जी, देखो स्तुति आपसे क्या कहना चाहती है|" नेहा ने जैसे ही स्तुति को आगे किया स्तुति फौरन अपनी मम्मी की गोदी में चली गई और अपनी मम्मी को मस्का लगाने के लिए अपनी मम्मी के दोनों गालों पर पप्पी करते हुए बोली; "मम-मम....पपई...उम्मा" ये कहेत हुए स्तुति ने अपनी मम्मी के गाल पर फिर से पप्पी की| स्तुति का मतलब था की; 'मम्मी, पापा जी को माफ़ कर दो और उन्हें मेरी तरह पप्पी दो!' संगीता अपनी बेटी की बात का मतलब समझ गई थी परन्तु वो अनजान बनने की बेजोड़ कोशिश कर रही थी| नेहा ने जब देखा की उसका एक पासा पिट रहा है तो नेहा ने अपना दूसरा पासा फेंका; "मम्मी, आयुष को भी कुछ कहना है|" ये कहते हुए नेहा ने आयुष को इशारा किया| आयुष आज अच्छे से रट्टा मार कर आया था इसलिए आयुष ने अपना निचला होंठ फुलाया और अपनी मम्मी से बोला; "मम्मी जीईईईईईईई.....! आप कितने अच्छे हो, हमारे लिए इतना अच्छा खाना बनाते हो, हमारे सब काम करते हो इसके लिए मैं आपको थैंक यू कहना चाहता हूँ|" आयुष ने बाल्टी भर मक्खन संगीता के ऊपर उड़ेल दिया था जिससे संगीता धीरे-धीरे पिघलने लगी थी! "मम्मी जी...आप हमारे लिए...अपने तीन प्यारे-प्यारे बच्चों के लिए, पापा जी को माफ़ कर दो न? बदले में आप जो कहोगे हम वो करेंगे, मस्ती बिलकुल नहीं करेंगे| आपकी हर बात मानेंगे अगर हम ने ज़रा सी भी मस्ती की न तो आप हमें कूट देना!" आयुष कहीं कुछ भूल न जाए इसलिए वो एक साँस में सब बोल गया| आयुष की अंत में कूटने की बात सुन संगीता के चेहरे पर इतनी देर से रोकी हुई हँसी छलक ही आई! "तुम तीनों शैतान बिलकुल अपने पापा जी पर गए हो! कैसे न कैसे कर के मुझे हँसा ही देते हो! लेकिन माफ़ी तो फिर भी नहीं मिलेगी!" संगीता हँसते हुए बोली और जा कर माँ को सारा किस्सा कह सुनाया|

"नानी! आज तूने दिनभर बहुत शैतानी की है!" ये कहते हुए माँ ने स्तुति को अपनी गोदी में लिया और उसकी नाक पकड़ कर खींचते हुए बोलीं; "तेरी सारी शैतानियाँ जानती हूँ मैं!" माँ आखिर माँ होती हैं इसलिए वो स्तुति की सारी होशियारी समझ रही थीं| नेहा की इस प्यारी सी कोशिश ने उसकी मम्मी को हँसा दिया था मगर मेरे लिए माफ़ी मुझे खुद संगीता से माँगनी थी|

रात को खाना खा कर सोने का समय हुआ तो संगीता ने चतुराई दिखाते हुए तीनों बच्चों को हमारे कमरे में भेज दिया और खुद बच्चों के कमरे में अकेली सोई| संगीता ने कल रात से मुझसे प्यार से बात नहीं की थी और मेरा मन उससे बात किये बिना चैन नहीं पा रहा था इसलिए बच्चों को जल्दी सुला मैं बच्चों के कमरे में पहुँचा|

संगीता अपनी छाती पर हाथ रखे हुए पीठ के बल लेटी थी, ऐसा लगता था मानो वो मेरा ही इंतज़ार कर रही हो! परन्तु जैसे ही संगीता ने मुझे कमरे के दरवाजे पर खड़ा देखा उसने फट से अपनी आँखें मूँद ली और ऐसा दिखाने लगी मानो वो सो रही हो!

"जान...मैं जानता हूँ तुम सोई नहीं हो! मैं तुमसे बात करने आया हूँ...माफ़ी माँगने आया हूँ!" मैंने संगीता को पुकारते हुए कहा| मेरी बात सुन संगीता ने आँख खोल ली और उठ कर बैठ गई| संगीता का मुझे मेरी बात कहना का मौका देना ये दर्शाता था की उसका गुस्सा अब शांत हो रहा है|

"जान, मैंने जो गलती की वो माफ़ी के लायक तो नहीं है मगर एक बार मेरे दिल की बात सुन लो. मैंने उस दिन क्या महसूस किया था ये सुन लो!

उस रात जब मिश्रा अंकल जी ने मुझे फ़ोन कर बुलाया तो मैं केवल और केवल उनकी मदद करने के लिए गया था मगर जब मैंने मिश्रा अंकल जी की गाडी में पिस्तौल देखि तो न जाने मेरे भीतर कैसी कसक उठी की मैंने बिना कुछ सोचे-समझे वो पिस्तौल उठाने के लिए अपने हाथ बढ़ा दिए| उस पिस्तौल में मानो कोई चुंबकीय शक्ति थी जो मुझे अपनी ओर खींच रही थी और वो चाहती थी की मैं उसे उठा लूँ| जैसे ही मैंने वो पिस्तौल उठाई तो पता नहीं मेरे ऊपर क्या सनक चढ़ी की मैं बावरा सा हो गया! उस पिस्तौल का वजन मेरा हाथ नहीं मेरी आत्मा महसूस कर रही थी और मेरे भीतर जर्रूरत से ज्यादा आत्मविश्वास फूँक रही थी| मैंने कभी घमंड नहीं किया था मगर इस पिस्तौल ने मुझे एक पल में घमंडी बना दिया था... वो भी ऐसा घमंडी जिसे न अपनी जान की परवाह थी और ना ही अपने परिवार की!

तुम्हें याद है उस दिन जब मैंने चन्दर पर कट्टा चलाया था?! उस दिन उस कट्टे की आवाज़ से मेरे भीतर बैठा हुआ एक शैतान जागा था, वो तो मेरी अंतरात्मा ने पाप-पुण्य का डर दिखा के इस शैतान को काबू में कर रखा था| लेकिन फिर भी ये शैतान कभी न कभी अपना फन्न फैला ही देता था, बीते एक-डेढ़ साल में जो तुमने मेरा गुस्सा...क्रोध देखा है ये सब उसी शैतान की देन है| जब मैंने मिश्रा अंकल जी की गाडी से पिस्तौल उठाई तो ये शैतान मुझ पर हावी हो गया| फिर मुझे न अपनी सुध थी और न तुम्हारी, मेरा मन तो बस वो पिस्तौल चलाने का था| भगवान जी की कृपा कहो की उस रात हालात नहीं बिगड़े और मेरे हाथों गोली नहीं चली और मैंने केवल अपनी अकड़ उन गुंडों को दिखा कर रह गया वरना क्या पता सच में मैं उन तीनों गुंडों को मौत के घात उतार ही देता|

फिर अगली सुबह, जब तुम माँ के साथ सब्जी लेने गई थी तब मेरा अंतर्मन शांत था और मेरे रात में किये जाहिलपने के लिए मुझे धिक्कार रहा था| मुझे ग्लानि हो रही थी की क्यों मैं इतना गैरजिम्मेदार बन गया? क्यों मैंने बिना कुछ सोचे समझे अपनी जान के साथ ऐसा खिलवाड़ किया? मेरा ये अपराध बोध मेरे मन को कचोटने लगा था और मैं ग्लानि के गढ्ढे में गिरने वाला था...की तभी स्तुति के प्यार ने मुझे थाम लिया| स्तुति की मस्ती देख मैं सब भूल बैठा और उसे लाड-प्यार करने में व्यस्त हो गया|

फिर पार्टी वाली रात, मुकुल मुझे नीचा दिखाने पर तुल गया! उस पार्टी में इतने अमीर आदमियों के बीच मैं पहले ही खुद को बहुत छोटा समझ रहा था उस पर जब मुकुल ने मुझे नीचा दिखाने की कोशिश की तो मेरे भीतर का शैतान फिर जागा|

मुकुल ने मुझे छोटा दिखाने के लिए पहले शराब पीने को उकसाया, जिसका मैंने बड़ी हलीमी से जवाब दे कर पीने से मना कर दिया| लेकिन फिर उसने अपनी अगली चाल चली और मुझे गरीब दिखाने के लिए मिश्रा अंकल जी को एक महँगी रिवॉल्वर गिफ्ट दी| पिछलीबार की तरह इस बार भी उस रिवॉल्वर को देख मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया| उस चमचमाती रिवॉल्वर को देख मैं उसी के वशीभूत हो उसे उठाने को मरा जा रहा था| मेरा दिल कह रहा था की एक बार तो इसे उठा कर देख, इसके वजन को अपने हाथों में महसूस कर के देख! एक बार उस ट्रिगर को अपनी ऊँगली से दबा कर देख! गोली चलने की उस शानदार आवाज़ को सुनने के लिए मेरे कान जैसे तरसने लगे थे! परन्तु किसी तरह मेरी अंतरात्मा जागी और मैंने रिवॉल्वर से नज़रें फेरते हुए अपने बेकाबू मन को शांत करना शुरू किया| बीती रात को याद कर मुझे मेरी बेवकूफी याद आ गई थी और मैं ये बेवकूफी फिर नहीं दोहराना चाहता था|

लेकिन मुकुल ने मुझे रिवॉल्वर से नजरें फेरते हुए पकड़ लिया था और उसे लगा की मैं बुज़दिल हूँ तथा रिवॉल्वर से डरता हूँ इसलिए उसने मुझे नीचा दिखाना शुरू कर दिया| उसने मेरी सादगी को मेरी बुज़दिली कहा और मुझ पर ठीक वैसे ही हँसा जैसे उस दिन चन्दर हँस रहा था| चन्दर की वो घिनौनी हँसी याद आते ही मुझसे रहा नहीं गया और मैंने अपने भीतर बैठे शैतान की बात मानते हुए न केवल रिवॉल्वर उठाई बल्कि चला भी दी! जब मैंने वो रिवॉल्वर चलाई, उन कुछ पलों के लिए मेरे भीतर का शैतान जैसे प्रसन्न हो गया था| जहाँ एक तरफ रिवॉल्वर चलने और उसकी आवाज़ से सब दहल गए थे, वहीं मुझे इसमें असीम आनंद आया था| रिवॉल्वर अपने हाथ में महसूस कर ऐसा लगता था मानो मेरे जिस्म का कोई भाग जो पहले टूट गया था वो अब पूरा हो चूका है| गोली चलने की वो आवाज़ सुन मैं किसी अलग ही दुनिया में खो गया था| उन कुछ पलों के लिए ऐसा लगता था मानो मेरा दिल जो चाहता था उसे मिल गया हो|

इस रिवॉल्वर ने मेरे अंदर घमंड जगा दिया था और इसी घमंड में चूर मैंने मुकुल को सबके सामने अच्छे से सुना दिया| सबके सामने मुकुल को यूँ बेइज्जत कर मेरे दिल को अजीब सी राहत और सुकून मिल रहा था| लेकिन फिर मेरी नज़र पड़ी तुम पर और जितना भी सुख मैंने इन कुछ पलों में महसूस किया था वो सबका सब पल भर में छू मन्त्र हो गया और उसकी जगह मेरे मन में तुम्हारा गुस्सा होने का डर बैठ गया! तुम्हारे चेहरे पर मैंने चिंता और डर की लकीरें देख ली थीं और उसी पल मुझे मेरी बेवकूफी समझ आई| मैं तुमसे माफ़ी माँगने तुम्हें समझाने आना चाहता था मगर मिश्रा अंकल जी ने मेरे कँधे पर हाथ रख मुझे अपनी बातों में लगा लिया, जिस कारण मैं तुम्हारे पास नहीं आ पाया|

जान, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और तुम्हारे मुझसे इस कदर नाराज़ होने से...गुस्सा होने से मैं एकदम से अधूरा हो गया था! सच पूछो तो मैं तुमसे बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, डरता था की कहीं तुम फिर इ मुझ पर बरस पड़ीं तो? मुझे बस एक आखरी मौका दे दो ताकि मैं अपनी गलती सुधार सकूँ!" मैंने संगीता को अपने जज्बातों से अच्छे से अवगत करा दिया था तथा एक आखरी मौक़ा भी माँग लिया था|

वहीं मेरे भीतर एक शैतान मौजूद होने की बात सुन संगीता घबरा गई थी! मेरे भीतर का ये शैतान जो कभी-कभी बाहर आ जाता था उसे हमेशा के लिए खत्म करना था और ये काम केवल संगीता का प्यार कर सकता था, परन्तु उसके लिए पहले संगीता का गुस्सा शांत होना चाहिए था?!

इधर मेरी पूरी बात सुन संगीता के चेहरे पर कोई ख़ास बदलाव नहीं आये थे, उसका चेहरा अब भी फीका पड़ा हुआ था, ऐसा लगता था मानो मेरी बातें सुन उसे कोई फर्क ही न पड़ा हो! संगीता एकदम से उठी और दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी, मुझे लगा की उसका गुस्सा अब भी खत्म नहीं हुआ है और वो कमरे से बाहर जाना चाहती है| मेरी वजह से बेचारी संगीता पहले ही अकेली कमरे में सो रही थी, मैं नहीं चाहता था की वो अब इस कमरे से भी निकल कर बैठक में सोये इसलिए मैंने संगीता को रोकना चाहा; "जान, मैं इस कमरे से चला जाता हूँ...तुम मेरी वजह से सोफे पर मत सोओ!"

मेरी बात पूरी होते-होते संगीता मेरे पास पहुँच चुकी थी, जैसे ही मेरी बात पूरी हुई संगीता एकदम से मेरे गले लग गई| इसके आगे न संगीता को कुछ कहने की जर्रूरत थी न ही मुझे कुछ कहने की| संगीता मेरे गले लगे हुए ही मुझे पलंग तक लाई और हम दोनों मियाँ-बीवी एक दूसरे की बाहों में खो गए|

अगली सुबह, नेहा सबसे पहले उठी और उसने जब अपनी मम्मी-पापा जी को ऐसे सोते हुए देखा तो नेहा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा| नेहा को इस मनोरम दृश्य का रस लेना था इसलिए उसने स्तुति को गोदी में उठाया और मेरी छाती पर लिटा गई, फिर नेहा ने आयुष को जगाया और दोनों भाई-बहन हम दोनों मियाँ-बीवी के बीच जगह बनाते हुए जबरदस्ती घुस गए| बच्चों की इस उधमबाजी से जो चहल-पहल मची उससे हम मियाँ-बीवी जाग चुके थे इसलिए आयुष और नेहा ने खिलखिलाते हुए शोर मचाना शुरू कर दिया! हम दोनों मियाँ-बीवी भी सुबह-सुबह अपने तीनों बच्चों का प्यार पा कर बहुत खुश थे और बच्चों के साथ खिलखिला रहे थे|


पिछले कुछ दिनों से जो घर में दुःख अपना पैर पसार रहा था वो बेचारा आज अपने घर लौट गया था!
[color=rgb(97,]जारी रहेगा भाग - 8 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]अंतिम अध्याय: प्रतिकाष्ठा[/color]
[color=rgb(51,]भाग - 8[/color]

[color=rgb(26,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

अगली सुबह, नेहा सबसे पहले उठी और उसने जब अपनी मम्मी-पापा जी को ऐसे सोते हुए देखा तो नेहा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा| नेहा को इस मनोरम दृश्य का रस लेना था इसलिए उसने स्तुति को गोदी में उठाया और मेरी छाती पर लिटा गई, फिर नेहा ने आयुष को जगाया और दोनों भाई-बहन हम दोनों मियाँ-बीवी के बीच जगह बनाते हुए जबरदस्ती घुस गए| बच्चों की इस उधमबाजी से जो चहल-पहल मची उससे हम मियाँ-बीवी जाग चुके थे इसलिए आयुष और नेहा ने खिलखिलाते हुए शोर मचाना शुरू कर दिया! हम दोनों मियाँ-बीवी भी सुबह-सुबह अपने तीनों बच्चों का प्यार पा कर बहुत खुश थे और बच्चों के साथ खिलखिला रहे थे|

पिछले कुछ दिनों से जो घर में दुःख अपना पैर पसार रहा था वो बेचारा आज अपने घर लौट गया था!

[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]

मेरे
भीतर के शैतान को खत्म करने के लिए संगीता ने मुझे भरपूर प्यार दिया, परन्तु संगीता के इस प्यार को पा कर मेरे भीतर का शैतान मरा तो नहीं अपितु मेरे अंतर्मन के किसी कोने में छुप कर बैठ गया और जब समय आया तो इस शैतान ने कोहराम मचा दिया!

बहरहाल, मेरे तीनों बच्चे धीरे-धीरे बड़े होते जा रहे थे| आयुष और नेहा पढ़ाई के प्रति गंभीर हो रहे थे मगर स्तुति को अपने साथ कोई खेलने वाला चाहिए था| रोज़ सुबह संगीता माँ को बैठक के फर्श पर बिस्तर बिछा कर मालिश करती थी, स्तुति जब अपनी मम्मी को अपनी दादी जी की मालिश करते देखती तो उसे लगता की उसकी मम्मी और दादी जी कोई नया खेल खेलने वाले हैं इसलिए स्तुति खदबद-खदबद कर वहाँ दौड़ आती| शुरू-शुरू में स्तुति अपनी मम्मी को अपनी दादी जी की मालिश करते हुए बड़े गौर से देखती| एकदिन माँ ने जब स्तुति को यूँ अपनी मालिश होते हुए देखता पाया, तो उन्होंने स्तुति को समझाना शुरू कर दिया| अब स्तुति के पल्ले कहाँ कुछ पड़ता, उसके लिए तो ये सब खेल था इसलिए वो हँसते हुए अपनी दादी जी से लिपट गई|

फिर एक दिन स्तुति ने सोचा की क्यों न वो भी ये खेल-खेल कर देखे?! अतः स्तुति ने आव देखा न ताव और सीधा माँ की पिंडली पर अपने दोनों हाथ रख कर बैठ गई| इधर ये दृश्य देख संगीता को लगा की स्तुति उसकी मदद करना चाहती है इसलिए वो स्तुति को मालिश करना सिखाने लगी| अब एक छोटी सी बच्ची को कहाँ मालिश करना आता, वो तो अपने छोटे-छोटे हाथ अपनी दादी जी की पिंडली पर पटकने लगी मानो वो तबला बजा रही हो| अपनी दादी जी के इस प्रकार पैर थपथपा कर स्तुति को लग रहा था की वो मालिश कर रही है इसलिए स्तुति खिलखिला रही थी| वहीं संगीता ने स्तुति को रोकना चाहा क्योंकि उसे लगा की माँ को शायद स्तुति के इस तरह थपथपाने से पीड़ा हो रही होगी, लेकिन माँ ने संगीता को इशारे से रोक दिया और स्तुति का उत्साह बढ़ाते हुए बोली; "शाबाश बेटा! ऐसे ही तबला बजा अपनी दादी जी की टाँग पर!" स्तुति अपनी दादी जी का प्रोत्साहन पा कर बहुत खुश हुई और पूरी शिद्दत से माँ की टाँग को तबला समझ बजाने लगी!

खैर, दोपहर को जब आयुष और नेहा स्कूल से घर लौटते तो स्तुति अपने भैया-दीदी को अपने साथ खेलने को कहती| कभी-कभी आयुष और नेहा अपनी छोटी बहन की ख़ुशी के लिए उसके साथ खेल भी लेते, परन्तु जब उनका होमवर्क ज्यादा होता, या कोई क्लास टेस्ट होता तो दोनों बच्चे स्तुति के साथ खेलने से मना कर देते| अब स्तुति को कहाँ समझ आता की पढ़ाई क्या होती है? उसे तो बस अपने भैया-दीदी के साथ खेलना होता था इसलिए वो अपने भैया-दीदी से साथ खेलने की जिद्द करने लगती|

अब स्तुति का जिद्द करने का ढंग भी निराला था| मेरी शैतान बिटिया बच्चों वाले कमरे की दहलीज़ पर बैठ "दिद्दा-दिद्दा" या 'आइया-आइया" की रट लगाते हुए शोर मचाने लगती| नेहा बड़ी बहन होने के नाते स्तुति को समझाती की उन्हें (आयुष और नेहा को) पढ़ाई करनी है मगर स्तुति बहुत तेज़ थी! उसने फौरन अपने दीदड़ और भैया को इमोशनल ब्लैकमेल करने के लिए फौरन अपना निचला होंठ फुला कर अपने दोनों हाथ खोल खुद को गोदी लेने का इशारा किया| अपनी छोटी बहन के इस मासूम चेहरे को देख नेहा और आयुष एकदम से पिघल जाते तथा अपनी छोटी बहन की ख़ुशी के लिए उसके साथ खेलने लगते|

लेकिन जल्द ही नेहा ने स्तुति की ये चलाकी पकड़ ली थी! अगलीबार जब स्तुति ने अपने होंठ फुला कर अपने भैया-दीदी को इमोशनल ब्लैकमेल करने की कोशिश की तो नेहा बोली; "बस-बस! ज्यादा होशियारी मत झाड़! सब समझती हूँ तेरी ये चलाकी...चंट लड़की! अब जा कर अकेले खेल, हमारा कल क्लास टेस्ट है और हमें पढ़ना है!" ये कहते हुए नेहा ने स्तुति को कमरे के बाहर खदेड़ दिया और दरवाजा स्तुति के मुँह पर बंद कर दिया! स्तुति को अपनी दिद्दा द्वारा इस तरह से खदेड़े जाने की उम्मीद नहीं थी इसलिए स्तुति को आया गुस्सा और उसने दरवाजे को पीटना शुरू कर दिया तथा "दिद्दा....दिद्दा....दिद्दा" कहते हुए स्तुति गुस्से से चिल्लाने लगी|

कुछ मिनट तो नेहा और आयुष ने स्तुति का चिल्लाना सहा मगर जब उनसे सहा नहीं गया तो नेहा ने दरवाजा खोला और स्तुति को घूरने लगी| अपनी दिद्दा द्वारा घूरे जाने से स्तुति डर गई और खदबद-खदबद अपनी दादी जी के पास दौड़ गई| अब चूँकि स्तुति ने आयुष और नेहा की पढ़ाई में व्यवधान डाला था इसलिए दोनों भाई-बहन स्तुति को पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़े|

बस फिर क्या था, स्तुति ने अपने दिद्दा और अइया को तंग करने के लिए ये हतकण्डा अपना लिया| जब भी आयुष और नेहा खेलने से मना करते तो स्तुति चिल्लाते हुए दरवाजा पीटती और फिर दोंनो को अपने पीछे दौड़ाती!

स्तुति की इस शरारत का हल निकालना जर्रूरी था इसलिए दोनों भाई-बहन ने गहन चिंतन किया और एक हल निकाल ही लिया| "जब तक इस पिद्दा को ये पता नहीं चलेगा की पढ़ाई होती क्या है, ये हमें पढ़ने नहीं देगी|" नेहा ने आयुष से कहा और दोनों भाई-बहन ने बड़ा ही कमाल का आईडिया ढूँढ निकाला|

रविवार का दिन था और स्तुति अपने अइया और दिद्दा को तंग करने जा ही रही थी की तभी आयुष और नेहा एक किताब ले कर खुद उसके पास आ गए| नेहा ने स्तुति को गोदी में बिठाया और आयुष ने किताब खोल कर स्तुति को दिखाई|

नेहा: तू हमें पढ़ने नहीं देती न, तो आज से हम तुझे पढ़ाएंगे!

ये कहते हुए नेहा ने आयुष की नर्सरी की किताब से ABCD स्तुति को पढ़ाना शुरू किया|

आयुष: स्तुति, बोलो A for apple!

आयुष जोश-जोश में बोला| इधर स्तुति ने किताब में apple यानी सेब का चित्र देखा और उसने सेब खाने के लिए अपना मुँह किताब में लगा दिया!

नेहा: ये खाना नहीं है पिद्दा! बोल A for apple!

नेहा ने स्तुति को रोकते हुए उसे सख्ती दिखाते हुए बोलने को कहा| लेकिन मेरी मासूम बिटिया को सेब खाना था इसलिए उसने सेब पकड़ने के लिए अपने दोनों हाथ आगे बढ़ा दिए|

आयुष: दीदी, स्तुति को सेब पसंद है इसलिए वो इस किताब को सेब समझ खाना चाहती है| हम ऐसा करते हैं की हम B for ball से शुरू करते हैं, स्तुति ball थोड़े ही खायेगी?

आयुष की युक्ति अच्छी थी इसलिए नेहा ने उसे आगे पन्ना पलटने को कहा|

नेहा: पिद्दा.बोल B for ball!

नेहा किसी टीचर की तरह कड़क आवाज़ में स्तुति से बोली| इधर जैसे ही स्तुति ने रंग-बिरंगी ball का चित्र देखा, वो ball को पकड़ने के लिए छटपटाने लगी|

आयुष: दीदी, ये तो ball खेलने को उतावली हो रही है, मैं आगे पन्ना पलटता हूँ!

आयुष हँसते हुए बोला और उसने किताब का अगला पन्ना पलटा|

नेहा: पिद्दा.बोल C for cat!

नेहा फिर टीचर की तरह सख्ती दिखाते हुए स्तुति से बोली| लेकिन स्तुति ने जैसे ही बिल्ली का चित्र देखा उसे हमारे द्वारा सिखाई हुई बिल्ली की आवाज़ याद आ गई;

स्तुति: मी..आ.ओ!

स्तुति ने किसी तरह बिल्ली की आवाज़ की नकल करने की कोशिश की! स्तुति की ये प्यारी सी कोशिश देख नेहा का गुस्सा काफूर हो गया और वो खिलखिलाकर हँसने लगी| इधर आयुष को फिर से स्तुति के मुख से बिल्ली की आवाज़ सुन्नी थी इसलिए उसने स्तुति को फिर से बोलने को उकसाया;

स्तुति: मी..आ.ओ!

स्तुति ने फिर बिल्ली की आवाज़ निकालने की कोशिश की, जिसपर आयुष ने जोर का ठहाका लगा कर हँसना शुरू कर दिया| जब स्तुति ने अपने दोनों भैया-दीदी को हँसते हुए देखा तो उसने भी हँसना शुरू कर दिया|

जब आयुष और नेहा का हँस-हँस के पेट दर्द हो गया तो दोनों ने स्तुति को आगे पढ़ाना चाहा मगर मेरी नटखट बिटिया अंग्रेजी वर्णमाला के तीन अक्षर पढ़ कर ऊब चुकी थी इसलिए उसने अपनी दिद्दा की गोदी से नीचे उतरने के लिए छटपटाना शुरू कर दिया|

नेहा: कहाँ जा रही है पिद्दा?! बाकी के अल्फाबेट्स (alphabets) कौन पढ़ेगा? चुप-चाप बैठ यहीं पर!

नेहा स्तुति को स्कूल की मास्टरनी की तरह हुक्म देते हुए बोली मगर मेरी चंचल बिटिया रानी नहीं मानी और उसने अपनी दादी जी को मदद के लिए पुकारना शुरू कर दिया|

स्तुति: दाई...दाई...दाई?!

स्तुति की पुकार सुन सास-पतुआ प्रकट हुईं| माँ ने स्तुति को गोदी लिया तो स्तुति ने फट से अपने दिद्दा और अइया की शिकायत अपनी दाई से कर दी|

नेहा: दादी जी, मैं और आयुष स्तुति को ABCD पढ़ा रहे थे मगर ये शैतान पढ़ ही नहीं रही!

जैसे ही नेहा ने स्तुति की शिकायत की वैसे ही आयुष ने आग में घी डालने का काम किया;

आयुष: हाँ जी दादी जी, आप डाँटो स्तुति को!

जिस तरह स्तुति अपने भैया-दीदी को उनकी दादी जी से प्यारभरी डाँट पड़वाती थी, वैसे ही आज आयुष अभी अपनी छोटी बहन को प्यारभरी डाँट पढ़वाना चाहता था| लेकिन माँ कुछ कहें उससे पहले ही संगीता बीच में बोल पड़ी;

संगीता: इस नानी से ठीक से दीदी-भैया नहीं बोला जाता और तुम दोनों इसे ABCD पढ़ा रहे हो?!

संगीता हँसते हुए बोली|

माँ: शूगी...बेटा...तू इतनी मस्ती करती है...तो थोड़ी पढ़ाई भी किया कर!

मेरी माँ जनती थी की पढ़ाई कितनी जर्रूरी होती है इसलिए वो स्तुति को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करना चाहती थीं मगर मेरी बिटिया को केवल पसंद थी मस्ती इसलिए वो अपना सर न में हिलाने लगी|

चूँकि सब बेचारी स्तुति के पीछे पढ़ाई को ले कर पड़ गए थे इसलिए मेरी बिटिया रानी अकेली पड़ गई थी| ठीक तभी मैं नहा कर निकला, मुझे देखते ही स्तुति मेरी गोदी में आ गई और मेरे कँधे पर सर रख एकदम से गुम-सुम हो गई| कहीं मैं स्तुति के गुम-सुम होने से पिघल न जाऊँ इसलिए नेहा ने फट से स्तुति की पढ़ाई न करने की शिकयत मुझसे करनी शुरू कर दी| नेहा की स्तुति के प्रति शिकायत शुरू होते ही स्तुति ने अपना सर न में हिलाना शुरू कर दिया और जब तक नेहा की शिकायत पूरी नहीं हुई तब तक मेरी बिटिया का सर न में हिलाना जारी रहा|

"अच्छा...बेटा...मेरा बेटू...मेरी बात तो सुनो?" मैंने किसी तरह स्तुति का सर न में हिलने से रुकवाया और उसे बहलाते हुए बोला; "बेटा, बस एक चम्मच पढ़ाई कर लेना! ठीक है?"

जब मैं स्तुति को खाना खिलाता था और स्तुति पेटभर खाने से मना करती तो मैं उसे बहलाने के लिए कहता की; "बेटा, बस एक चम्मच और खा लो!" मेरे इतना कहने से मेरी बिटिया फौरन एक चम्मच खा लेती थी| अपने उसी हतकंडे को अपनाते हुए आज जब मैंने स्तुति से कहा की उसे बस एक चम्मच पढ़ाई करनी है तो स्तुति को लगा की पढ़ाई करना मतलब एक चम्मच सेरेलक्स खाना इसलिए स्तुति ने ख़ुशी-ख़ुशी फौरन अपना सर हाँ में हिलाना शुरू कर दिया|

माँ ने जब स्तुति को यूँ एक चम्मच पढ़ाई करने के लिए हाँ में सर हिलाते देखा तो, माँ हँसते हुए मुझसे बोलीं; "तू मेरी शूगी को पढ़ाई करने को कह रहा है या रसमलाई खिलाने को?" मेरे स्तुति को एक चम्मच पढ़ाई करने की कही बात और माँ के पूछे सवाल पर सभी ने जोर से ठहाका लगाया| इधर स्तुति ने रस मलाई का नाम सुना तो उसने अपना सर ख़ुशी से दाएँ-बाएँ हिलाना शुरू कर दिया!

खैर, स्तुति का मन पढ़ाई में लगाने के लिए मैंने बड़ी जबरदस्त तरकीब निकाली थी| मैं स्तुति को गोदी में ले कर कंप्यूटर के आगे बैठ जाता और यूट्यूब (youtube) पर छोटे बच्चों की कविताओं वाली वीडियो चला देता| स्तुति का मन इन वीडियो में लग जाता और वो वीडियो देख-देख कर धीरे-धीरे कवितायें गुनगुनाने लगी| स्तुति को नई चीजें सीखना अच्छा लगता था मगर पहले उसके मन में रूचि जगानी पड़ती थी, स्तुति की ये रूचि किसी को देख कर ही पैदा होती थी और ये बात मैं अच्छे से जानता था|

एक दिन जब आयुष और नेहा ने स्तुति को इस तरह नर्सरी की कवितायें गुनगुनाते हुए देखा तो दोनों ने स्तुति को ABCD सिखाने का एक नायाब तरीका ढूँढ निकाला| मेरी अनुपस्थिति में दोनों बच्चे स्तुति को अपनी दादी जी की गोदी में बिठा देते और अपनी दादी जी को ABCD पढ़ाते| माँ जब "A for apple" बोलती तो स्तुति को इसमें बड़ा मज़ा आता और वो खिलखिलाने लगती| देखते ही देखते स्तुति ने ABCD को गाने के रूप में गुनगुना शुरू कर दिया, तो कुछ इस तरह से स्तुति का मन पढ़ाई में अभी से लग चूका था|

पढ़ाई में तो स्तुति की रूचि थी है मगर वो मस्ती करने से भी नहीं चूकती थी! स्तुति को अपनी दिद्दा और अइया को पढ़ाई करने के समय सताना अच्छा लगता था| स्तुति का दरवाजा पीटना, चिल्लाना जारी था जिससे दोनों बच्चों की पढ़ाई में व्यवधान पैदा हो जाता था| गुस्से में आ कर दोनों भाई-बहन स्तुति के पीछे दौड़ते और स्तुति सारे घर में अपने भैया-दीदी को अपने पीछे दौड़ाती|

एक दिन नेहा फर्श पर बैठ कर चार्ट पेपर पर अपना प्रोजेक्ट बना रही थी की तभी वहाँ स्तुति आ गई| नेहा वाटर कलर से पेंटिंग कर रही थी और स्तुति अस्चर्य में डूबी हुई, आँखें फाड़े अपनी दिद्दा को देख रही थी| "जा के आयुष के साथ खेल, मुझे काम करने दे!" नेहा ने स्तुति को झिड़क दिया क्योंकि नेहा को डर था की स्तुति उसके प्रोजेक्ट को खराब कर देगी!

स्तुति को आया गुस्सा और वो अपना निचला होंठ फुलाते हुए खदबद-खदबद जाने लगी, लेकिन गलती से स्तुति ने पानी का गिलास जिसमें नेहा अपने पेंटिंग ब्रश डूबा रही थी वो गिरा दिया! शुक्र है की पानी सीधा फर्श पर गिरा और नेहा का चार्ट पेपर खराब नहीं हुआ| "स्तुति की बच्ची! रुक वहीं!" नेहा, स्तुति को डाँट लगाते हुए गुस्से से चिल्लाई| दरअसल स्तुति को अपनी गलती का बोध नहीं था, वो तो कमरे से बाहर जा रही थी| खैर, अपनी दिद्दा की डाँट सुन स्तुति डर के मारे जहाँ थीं वहीं बैठ गई| "कान पकड़ अपने!" नेहा ने गुस्से से स्तुति को आदेश दिया| स्तुति बेचारी घबराई हुई थी इसलिए उसने डर के मारे वही किया जो उसकी दिद्दा ने कहा| स्तुति ने अपने कान पकड़े तो नेहा उसे फिर डाँटते हुए बोली; "सॉरी बोल! बोल सॉरी!"

अपनी दिद्दा का गुस्सा देख स्तुति ने डरके मारे सॉरी बोलना चाहा; "ओली (सॉरी)!"

"गलती करते हैं तो सॉरी बोलते हैं! यूँ पीठ दिखा कर भागते नहीं हैं! समझी? अब जा कर खेल आयुष के साथ|" नेहा ने स्तुति को डाँटते हुए कमरे से भगा दिया| बेचारी स्तुति रुनवासी हो कर चली गई, लेकिन उस दिन स्तुति ने सॉरी बोलने का सबक अच्छे से सीख लिया था|

नेहा का गुस्सा अपनी मम्मी जैसा था, वो स्तुति पर बहुत जल्दी गुस्सा हो जाती थी और डाँट लगा कर सबक सिखाती थी| वहीं आयुष ने मुझे स्तुति को हमेशा प्यार से बात समझाते हुए देखा था इसलिए वो अपनी छोटी बहन को डाँटने की बजाए उसे प्यार से समझाता था| ऐसा नहीं था की नेहा स्तुति से चिढ़ती थी या हमेशा नाराज़ रहती थी, नेहा को बस स्तुति की मस्तियाँ नहीं भाति थीं| उसे लगता था की जितनी मस्ती स्तुति करती है वो गलत बात है इसलिए वो स्तुति के प्रति थोड़ी सख्त थी|

एक दिन की बात है, मैं घर पर अपने बिज़नेस की रेजिस्ट्रेशन से जुडा काम कर रहा था, वहीं आयुष और नेहा अपनी पढ़ाई में लगे हुए थे| अब स्तुति को किसी के साथ तो खेलना था इसलिए वो सीधा अपने भैया-दीदी के पास पहुँची| हरबार की तरह नेहा ने खेलने से मना करते हुए स्तुति को भगा दिया इसलिए बेचारी स्तुति मेरे पास आ गई और मेरी टांगों से लिपट गई| स्तुति को अपनी टांगों से लिपटा देख मैंने अपना काम छोड़ अपनी बिटिया को गोदी में लेकर लाड किया तथा उसके गुम-सुम होने का कारण पुछा| सारी बात जान मैंने स्तुति को नीचे उतारा और उसे उसके खिलोने ले कर आने को कहा| जबतक स्तुति अपने खिलोने लाई तबतक मैंने अपना काम आधा निपटा लिया था|

स्तुति को नहीं पता था की वो कौन से खिलोने ले कर मेरे पास आये इसलिए मेरी भोली बिटिया अपनी खिलोनो से भरी हुई टोकरी मेरे पास खींच लाई| मैंने स्तुति को गोदी ले कर टेबल पर बिठाया और खिलौनों की टोकरी से स्तुति के छोटे-छोटे बर्तन निकाले| "कोई आपके साथ नहीं खेलता न, तो न सही! मैं आपके साथ खेलूँगा|" मेरी बात सुन स्तुति बहुत खुश हुई की कम से कम उसके पापा जी तो उसकी ख़ुशी का ख्याल रखते हुए उसके साथ खेल रहे हैं|

मैंने टेबल पर रखे कीबोर्ड (keyboard) को एक तरफ किया और स्तुति के सारे बर्तन सज़ा कर स्तुति की रसोई का निर्माण कर दिया| "बेटा, हम है न घर-घर खेलते हैं| मेरी बिटिया खाना बनाएगी और तबतक आपके पापा जी ऑफिस का काम कर के घर आएंगे|" मेरी बात सुन स्तुति खुश हो गई और फौरन अपने छोटे-छोटे बर्तनों को उठा कर खाना बनाने में लग गई| हमारा खेल असली लगे उसके लिए मैंने स्तुति के बर्तनों में थोड़े ड्राई फ्रूट्स डाल दिए; "बेटा, ये ड्राई फ्रूट्स ही हमारा खाना होंगें|" मैंने स्तुति को खेल समझाया तो स्तुति ख़ुशी से खिलखिलाने लगी| जबतक स्तुति ने खाना बनाया तबतक मेरा रेजिस्ट्रशन का काम पूरा हो चूका था और मैं पूरा ध्यान स्तुति पर लगा सकता था|

स्तुति अपनी मम्मी को खाना, चाय इत्यादि बनाते हुए गौर से देखती थी इसलिए आज स्तुति ने बिलकुल अपनी मम्मी की नकल करते हुए झूठ-मूठ का खाना बनाया| खेल-खेल में खाना बनाते हुए स्तुति से गलती से मेरा पेन स्टैंड (pen stand) गिर गया| स्तुति ने जब देखा की पेन स्टैंड गिरने से सारे पेन फ़ैल गए हैं तो स्तुति एकदम से घबरा गई| स्तुति को अपनी दीदी द्वारा डाँटना याद आ गई इसलिए स्तुति ने फौरन अपने कान पकड़ लिए और घबराते हुए बोली; "औली पपई!"

मुझे पेन स्टैंड गिरने से कोई फर्क नहीं पड़ा था मगर अपनी प्यारी-प्यारी बिटिया को कान पकड़े देख और स्तुति के मुख से सॉरी सुन मेरे दिल में प्यारी सी हूक उठी! मुझे बहुत ख़ुशी हुई की इतनी छोटी सी उम्र में मेरी नन्ही सी बिटिया को अपनी गलती समझ आने लगी है और उसने सॉरी बोलना भी सीख लिया है| खैर, मैंने स्तुति के दोनों हाथों से उसके कान छुड़वाये और उसके दोनों हाथों को चूमते हुए बोला; "कोई बात नहीं बेटू!" मेरे चेहरे पर मुस्कान देख स्तुति का चेहरा खिल गया और स्तुति ने आगे बढ़ कर मेरे गालों पर अपनी प्यारी-प्यारी पप्पी दी|

स्तुति ने ख़ुशी-ख़ुशी फिर से खाना बनाना शुरू किया| सबसे पहले मेरी लाड़ली बिटिया ने चाय बनाई और छोटी सी प्याली में परोस कर मुझे दी| चाय की प्याली इतनी छोटी थी की मैं उसे ठीक से पकड़ भी नहीं पा रहा था, लेकिन अपनी बिटिया का दिल रखने के लिए मैं झूठ-मूठ की चाय पीने और चाय स्वाद होने का नाटक करने लगा| तभी माँ और संगीता कमरे में आये और हम बाप-बेटी का खेल देख बोले; "अरे भई हमें भी चाय पिलाओ|" संगीता ने चाय माँगी तो स्तुति अपना निचला होंठ फुला कर अपनी मम्मी को अपनी नारजगी दिखाने लगी|

"तुम्हें काहे चाय पिलायें? जब मेरी बिटिया तुम्हारे पास आई थी की उसके साथ तनिक खेल लिहो तब खेलो रहा?" मैंने स्तुति का पक्ष लेते हुए संगीता को झूठ-मूठ का डाँटा| तभी माँ स्तुति से बोलीं; "मेरी शूगी मुझे चाय नहीं देगी?" माँ ने इतने प्यार से कहा की स्तुति ने मुस्कुराते हुए अपना चाय का कप माँ को दे दिया| अपनी पोती के इस प्यार पर माँ का दिल भर आया और उन्होंने स्तुति के सर को चूमते हुए आशीर्वाद दिया| माँ को जब चाय मिली तो संगीता ने जबरदस्ती अपनी नाक हम बाप-बेटी के खेल में घुसेड़ दी, साथ ही उसने माँ को भी इस खेल में खींच लिया| स्तुति को बनाना था खाना इसलिए वो हम सब से पूछ रही थी की हम क्या खाएंगे| हम माँ-बेटे ने तो यही कहा की जो स्तुति बनाएगी हम खाएंगे मगर संगीता ने अपनी खाने की लम्बी-चौड़ी लिस्ट नन्ही सी स्तुति को दे दी! "ये कोई होटल नहीं है जहाँ तुम्हारे पसंद का खाना बनेगा! जो सामने धरा है सो खाये लिहो!" मैंने संगीता को प्यारभरी डाँट लगाते हुए कहा| मेरी ये प्यारी सी डाँट सुन संगीता हँस पड़ी और हँसते हुए स्तुति से बोली; "सॉरी बेटा! आप जो बनाओगे मैं खा लूँगी!" अपनी मम्मी की बात सुन स्तुति ने अपने बर्तन अपने छोटे से खिलोने वाले चूल्हे पर चढ़ाये और अपनी मम्मी की नकल करते हुए खाना बनाने लगी|

इधर हम चारों का शोर सुन दोनों बच्चे (आयुष और नेहा) आ गए, जब दोनों ने हमें स्तुति के साथ खेलते हुए देखा तो उनका भी मन खेलने का किया| "हम भी खेलेंगे!" आयुष ख़ुशी से चहकता हुआ बोला लेकिन इस बार स्तुति नाराज़ हो गई और गुस्से में बोली; "no!" आज स्तुति का ये गुस्सा देख तो सभी थोड़ा डर गए थे!

"बेटा, आपकी एक छोटी सी...प्यारी सी बहन है| उस बेचारी के पास आप दोनों के सिवाए खेलने वाला कोई नहीं, ऐसे में अगर आप ही उसके साथ नहीं खेलोगे और उसे भगा दोगे तो उसे गुस्सा आएगा न?!" मैंने प्यार से आयुष और नेहा को समझाया तो दोनों को उनकी गलती का एहसास हुआ| "मुझे माफ़ कर दो स्तुति जी! आगे से मैं आपको नहीं डाटूँगी!" नेहा ने अपने दोनों कान पकड़ते हुए स्तुति से माफ़ी माँगी| जब नेहा ने स्तुति को "स्तुति जी" कहा तो मेरे, माँ और संगीता के चेहरे पर मुस्कान आ गई क्योंकि नेहा अपनी छोटी बहन को मनाने के लिए मक्खन लगा रही थी|

उधर स्तुति ने जब अपनी दीदी को माफ़ी माँगते देखा तो उसने ख़ुशी-ख़ुशी अपनी दीदी को माफ़ कर दिया तथा अपने खेल में शामिल कर लिया| स्तुति ने सबसे पहले अपने भैया-दीदी को एक छोटी प्लेट में झूठ-मूठ का खाना परोसा| बचे हम तीन (मैं, माँ और संगीता) तो हमें खाना परोसने के लिए स्तुति के पास थाली या प्लेट बची ही नहीं थी इसलिए स्तुति ने कढ़ाई और पतीले हमें दे दिए| उन बर्तनों में कुछ नहीं था लेकिन हम सब खा ऐसे रहे थे मानो सच में उन बर्तनों में खाना हो| आज एक छोटी सी बच्ची के साथ खेल-खेलते हुए हम बड़े भी बच्चे बन गए थे!

बहरहाल बच्चों का बचपना जारी था और दूसरी तरफ मेरी बिज़नेस की ट्रैन पटरी पर आ रही थी| बिज़नेस शुरू करने के लिए जितने भी जर्रूरी कागज़-पत्री बनवानी थी बनाई जा चुकी थी| अपने बिज़नेस के लिए मुझे एक छोटा सा ऑफिस चाहिए था तो वो मैंने अपने घर के पास किराए पर ले लिया| इसके अलावा जूतों का स्टॉक रखने के लिए एक स्टोर चाहिए था तो मैंने ये स्टोर अपने ही घर की छत पर बनवा लिया|

उधर मिश्रा अंकल जी की साइट का काम थोड़ा धीमा हो गया था क्योंकि संतोष को मिश्रा अंकल जी के गुस्सा होने का डर लग रहा था, नतीजन मुझे संतोष का मनोबल बढ़ाने के लिए उसके साथ काम में लगना पड़ा| मिश्रा अंकल जी ने हमें 2 ठेके और दे दिए जो की मैंने संतोष की जिम्मे लगा दिए|

ऐसे ही एक दिन सुबह-सुबह मैं मिश्रा अंकल जी की साइट पर काम शुरू करवा रहा था और संतोष उस समय माल लेने के लिए गया हुआ था| तभी अचानक वहाँ मिश्रा अंकल जी आ पहुँचे और मुझे अलग एक कोने में ले आये| "मुन्ना ई लिहो! तोहार खतिर हम कछु लायन है|" ये कहते हुए मिश्रा अंकल जी ने मुझे एक डिब्बा दिया| डिब्बा वज़न में बहुत भारी था और मैं इस वज़न को महसूस कर सोच में पड़ा था की इसमें आखिर है क्या? 'कहीं ये शावर पैनल (shower panel) तो नहीं? वही होगा!' मैं मन ही मन बोला| मैंने वो डिब्बा खोला तो उसके अंदर जो चीज़ थी उसे देख मेरी आँखें फटने की कगार तक बड़ी हो गई!


उस डिब्बे में Smith & Wesson Magnum Revolver थी!



उस चमचमाती रिवाल्वर को देख मेरे भीतर छुपा शैतान, जिसे संगीता ने अपने प्रेम से सुला दिया था वो एकदम से जाग गया! मेरे हृदय की गति एकदम से बढ़ गई, शरीर का सारा खून मेरे हाथों की ओर बहने लगा| दिमाग था की ससुरा बंद हो चूका था और मन था जो बावरा हो कर मुझे रिवॉल्वर उठाने को उकसा रहा था|

आजतक मैंने ये रिवॉल्वर बस कंप्यूटर गेम में चलाई थी, कंप्यूटर गेम में जब मैंने ये रिवॉल्वर चलाई तो इसकी आवाज़ सुनकर मुझे बहुत मज़ा आता था और आज मेरे पास मौका था असल में इस रिवॉल्वर की आवाज़ सुनने का!

परन्तु, मेरे भीतर अच्छाई अब भी मौजूद थी जिसने मेरा दामन अबतक थामा हुआ था और यही अच्छाई मुझे रिवॉल्वर उठाने नहीं दे रही थी! "नहीं अंकल जी, ये मैं नहीं ले सकता|" ये कहते हुए मैंने बड़े भारी मन से डिब्बा बंद कर अंकल जी को वापस दिया| लेकिन अंकल जी ने वो डिब्बा वापस नहीं लिया बल्कि मेरे कँधे पर हाथ रख बोले; "रख लिहा मानु बेटा! हम जानित है बंदूक तोहका बहुत भावत (पसंद) है| ऊ रतिया जब तोहरे हाथ मा हमार तमंचा रहा तो तोहार अलग ही रूप सामने आवा रहा| अइसन रूप जेह मा तू केहू से नाहीं डरात रहेओ, तोहार भीतर मौजूद ताक़त सामने आवि रही जेह का देखि के ऊ तीनों आदमियन की फाट रही!

फिर हमार पार्टी मा हमार मूर्ख दामादवा के भड़काए पर जइसन तू ताव में आये के हमार रिवॉल्वर उठाये के चलायो रहेओ ऊ दिन हम तोहार आँखियन में चिंगारी देखें रहन| तू आपन परिवार की रक्षा खतिर कछु भी कर गुजरिहो, एहि से हम तोहार और तोहार परिवार की रक्षा करे खतिर ई (रिवॉल्वर) तोहका तोहफा म देइत है|" जैसे ही मिश्रा अंकल जी ने 'परिवार की रक्षा' का जिक्र किया वैसे ही मेरे भीतर का शैतान मुझ पर हावी हो गया और मिश्रा अंकल जी की बात को सही ठहराते हुए मुझसे बोला; 'अंकल जी ठीक ही तो कह रहे हैं! अगर तेरे पास बंदूक होती तो चन्दर का किस्सा उसी दिन खत्म हो जाता जब वो संगीता की जान लेने के इरादे से तेरे घर में घुस आया था और आज पिताजी तेरे साथ रह रहे होते|' मन में जब ये विचार कौंधा तो मेरी अच्छाई हारने लगी| हाल ये था की मेरी रिवॉल्वर हाथ में लेने की इच्छा प्रबल हो चुकी थी|

लेकिन कुछ तो था जो की मुझे रोके हुए था...मेरा हाथ पकड़ कर मुझे बुराई की तरफ जाने से रोक रहा था| जिस प्रकार एक डूबता हुआ इंसान, खुद को बचाने के लिए पानी में हाथ-पैर मारता है, वही इस समय मेरी अच्छाई कर रही थी और मुझे रिवॉल्वर लेने से रोकने के लिए तर्क दे रही थी|

मैं: अंकल जी, मैं इसे (रिवॉल्वर को) संभाला नहीं पाऊँगा| मेरा गुस्सा बहुत तेज़ है और अपने गुस्से में बहते हुए मैं कुछ गलत कर बैठूँगा! ऊपर से अगर घर में किसी को इसके (रिवॉल्वर के) बारे में पता चल गया तो...

मैंने जानबूझ कर अपनी बात अधूरी छोड़ दी ताकि अंकल जी मेरी समस्या समझ सकें और अपना ये उपहार वापस ले लें!

मिश्रा अंकल जी: मुन्ना, हम तोहका तोहार पैदा भय से देखत आयन है| तोहार गुस्सा भले ही बहुत तेज़ है मगर तू आजतलक कउनो गलत काम नाहीं किहो है| तोहार सहन-सकती (सहन शक्ति), तोहार सूझ-बूझ औरन के मुक़ाबले बहुत नीक है, एहि से हमका पूर बिश्वास है की तू ई का (रिवॉल्वर का) कउनो गलत इस्तेमाल न करिहो|

अंकल जी का तर्क सुन मेरे भीतर का शैतान बोला; 'तू भले ही बहुत गुस्से वाला है मगर आजतक तूने कभी गुस्से में ऐसा कदम नहीं उठाता की तुझे बाद में पछताना पड़े|' अपने भीतर के शैतान का तर्क सुन मैं फिर रिवॉल्वर हाथ में लेने के लिए झुक रहा था लेकिन तभी मेरे भीतर की अच्छाई बोली; 'लेकिन तब तेरे पास रिवॉल्वर नहीं थी इसलिए तू गुस्से में कुछ गलत नहीं कर सकता था, परन्तु रिवॉल्वर पास होने पर तेरा क्या भरोसा?' अपने भीतर की अच्छाई के तर्क को सुन मैंने खुद को रिवॉल्वर उठाने की तरफ बढ़ने से रोका और अगला तर्क सोचने लगा|

इधर मिश्रा अंकल जी ने जब देखा की उनका तर्क सुन कर भी मेरा मन रिवॉल्वर लेने के लिए नहीं मान रहा तो वो मुझे उदहारण सहित समझाते हुए बोले;

मिश्रा अंकल जी: अच्छा मुन्ना एक ठो बात बतावा| तोहका गाडी चलाये का आवत रही? नहीं ना? काहे से की तोहरे लगे गाडी नाहीं रही, लेकिन जब तू गाडी खरीद लिहो तब तू चलाये का जानी गयो न?! अब तोहार गरम खून ठहरा लेकिन आजतलक कभौं तू गाडी फुल स्पीड मा भगायो है? आजतलक कउनो ट्रैफिक का नियम-कानून तोड्यो है? नाहीं ना? काहे से की तू अच्छी तरह जानत हो की जिम्मेदारी कौन चीज़ होवत है और तू आपन ई जिम्मेदारी से कभौं मुँह नाहीं मोडत हो| एहि खतिर हम कहित है की तू ई का (रिवॉल्वर को) अच्छे से सँभाली सकत हो!

अंकल जी के मुख से अपनी प्रशंसा में लिपटा हुआ तर्क सुन मेरे भीतर का शैतान बहुत खुश हुआ और अत्यधिक बल से मुझे अपनी ओर खींचने लगा| 'अंकल जी सही तो कह रहे हैं, तू कोई बिगड़ैल आदमी थोड़े ही है जो रिवॉल्वर हाथ में ले कर बेकाबू हो जायेगा|' ये कहते हुए मेरे भीतर के शैतान ने मुझे अपनी ओर जोर से खींचा| इधर मेरी अच्छाई मुझे अब भी कस कर पकड़े हुए थी तथा मुझे घर में ये बात खुलने का डर दिखा के डराने पर तुली थी| मिश्रा अंकल जी ने जब मेरा ये डर भाँपा तो वो एकदम से बोल पड़े;

मिश्रा अंकल जी: हम जानिथ है मुन्ना की तू एहि बात से घबड़ावत हो की अगर घरे मा तोहार ई रिवाल्वर संगीता बहु या तोहार माँ देख लिहिन तो घर माँ झगड़ा हुई जाई| तो हमार बात सुनो मुन्ना, घर वालन का ई सब बात नाहीं बतावा जात है, नाहीं तो सभाएं घबराये जावत हैं| अब हम ही का देख लिहो, का हम तोहार आंटी का आज तलक बतायं की हम तमंचा रखित है? नाहीं...काहे से की ऊ हमार जान खतिर घबराये लागि| अब तुहुँ बताओ, का तू आपन घरे मा काम-काज की टेंशन वाली बात बतावत हो?...नाहीं काहे से की आदमियन का काम होवत है पइसवा कमाए का, ना की घरे मा टेंशन बाटें का|

मिश्रा अंकल जी का तर्क सुन मेरे भीतर की बुराई फिर हिलोरे मारने लगी और मिश्रा अंकल जी के तर्क को सही बता उकसाने लगी| वहीं मेरे भीतर की अच्छाई ने मुझे बुराई की तरफ जाने से रोकने के लिए फट से एक नया तर्क प्रस्तुत कर दिया;

मैं: अंकल जी ये...बहुत महँगी है!

मैंने झिझकते हुए कहा तो अंकल जी मुस्कुराते हुए बोले;

मिश्रा अंकल जी: मुन्ना ई न कहो! देखो हम तोहका आपन बेटा मानित है और हमार प्यार का अइसन रुपया-पैसा मा न तौलो| तू नाहीं जानत हो लेकिन जब तू नानभरेक रहेओ तो तोहार पिताजी तोहका लेइ के साइट पर आवत रहे| तोहार पिताजी तो काम मा लगी जावत रहे लेकिन हम तोहका गोदी लेइ के खिलाइत रहन| ई तोहफा हम तोहार खतिर ख़ास करके इम्पोर्ट (import) करि के मँगवायन है| ई का नाहीं न कहो!

मिश्रा अंकल जी अपनी बात कहते हुए भावुक हो गए थे| दरअसल मिश्रा अंकल जी की केवल एक संतान थी और वो लड़की थी, जबकि मिश्रा अंकल जी की एक आस थी की उन्हें एक लड़का हो जो उनका सारा काम सँभाले| लेकिन उनके हालात ऐसे थे जिनकी वजह से उन्हें फिर कोई संतान नहीं हुई और उनका ये सपना टूट गया| मिश्रा अंकल जी अपनी बेटी के प्यार से खुश थे मगर जब वो मेरे पिताजी को मुझे लाड करते देखते तो उनकी ये अधूरी इच्छा टीस मारने लगती| ज्यों-ज्यों मैं बड़ा होता गया त्यों-त्यों मेरे अच्छे संस्कारों को देख मिश्रा अंकल जी के मन में मेरे प्रति झुकाव व प्रेम उतपन्न होता गया, तभी तो वो मुझे बुला-बुला कर काम दिया करते थे|

बहरहाल, मिश्रा अंकल जी की बातों से मेरे भीतर का शैतान मुझे जबरदस्ती भावुक कर रहा था| मेरा यूँ भावुक होना मेरे भीतर के शैतान के लिए अच्छा ही था क्योंकि अब मेरे पास ये रिवॉल्वर स्वीकारने की एक और वजह थी| लेकिन मेरे भीतर की अच्छाई मुझे अब भी रोके हुए थी और उसने खुद को हारने से बचाने के लिए एक आखरी तर्क पेश किया;

मैं: अंकल जी...मेरे पास लाइसेंस नहीं!

ये मेरे तर्कों के शस्त्रागार का आखरी शस्त्र था, इसके आगे मेरी अच्छाई के पास कोई भी तर्क नहीं था जिसे दे कर मैं मिश्रा अंकल जी का दिल तोड़े बिना रिवॉल्वर लेने से मना कर सकूँ| परन्तु, मिश्रा अंकल जी के पास मेरे इस तर्क का भी जवाब था;

मिश्रा अंकल जी: अरे ई कउनो दिक्कत की बात थोड़े ही है! एहि लागे चलो हमरे संगे, तोहार खतिर हम सारी कागज़-पत्री आजे बनवाईथ है|

ये कहते हुए अंकल जी मेरे साथ मेरी ही गाडी में अपने जानकार के पास चल दिए| मिश्रा अंकल जी की पहुँच इतनी ऊँची थी की कुछ ही घंटों में मिश्रा अंकल जी ने रिवॉल्वर के कागज़ात और मेरा हैंडगन लाइसेंस (handgun license) दोनों बनवा दिया|

लाइसेंस धारी होने से अब मुझे पुलिस की कोई चिंता नहीं थी, चिंता थी तो केवल इस रिवॉल्वर के माँ या संगीता के हाथ लगने की इसलिए मैं ये रिवॉल्वर घर में तो नहीं रख सकता था| बहुत सोच-विचार कर मैंने रिवॉल्वर गाडी में रखने का फैसला किया| गाडी में मेरी सीट के नीचे थोड़ी जगह थी और चूँकि मेरे अलावा मेरी गाडी कोई नहीं चलाता था इसलिए सीट को आगे-पीछे करने का सवाल ही नहीं था, मैंने अपनी रिवॉल्वर अपनी सीट के नीचे कपड़े में बाँध कर छुपा दी|

भले ही मेरे भीतर का शैतान जीत गया था मगर मेरे भीतर की अच्छाई मरी नहीं थी| मैंने रिवॉल्वर रख तो ली थी मगर उसे कभी इस्तेमाल न करने की कसम खा ली थी| लेकिन ये कसम कुछ सालों में ही टूटी, उस समय हालात क्या थे ये आपको आगे पता चलेगा!

बहरहाल, जैसा की मैंने बताया मेरे बिज़नेस की रेजिस्ट्रशन और कागज़ी कारवाही पूरी हो चुकी थी| इस बीच मैंने आगरा में जूतों की फैक्ट्री मालिकों से बात करनी शुरू कर दी थी| दिन भर मैं फ़ोन पर बिजी रहता था और मेरे फ़ोन के what's app पर दिनभर जूतों की तस्वीरें आती रहती थीं| जल्द ही मुझे इन फैक्ट्री मालिकों से मिलने के लिए आगरा के चक्कर लगाने पड़े| मैं तड़के सुबह निकलता था और रात 12 बजे तक लौटता| कई बार दिषु भी मेरे साथ आगरा गया और हमने किस फैक्ट्री से कितना माल लेना है ये तय किया|

अब चूँकि मेरा आगरा आना-जाना बढ़ गया था इसलिए आयुष और नेहा मेरे साथ आगरा घूमने जाना चाहते थे| मैं बच्चों को आगरा की गलियों-कूचों में धक्के नहीं खिलवाना चाहता था इसलिए मैं बच्चों को अपने साथ ले जाने से मना करता था, बदले में मैं बच्चों का मन-पसंद डोडा पेठा ला देता था| कुछ दिन तो दोनों बच्चे डोडा पेठा वाली रिश्वत ले कर मान गए, लेकिन एक दिन दोनों बच्चों ने मुझ पर ऐसा मोहपाश फेंका की मैं मोम की तरह पिघल गया|

शाम का समय था और मैं अपनी साइट से लौटा था, मुझे देखते ही सबसे पहले स्तुति मेरी गोदी में आने के लिए दौड़ी मगर दोनों भाई-बहन ने मिलकर स्तुति को उठा कर माँ की गोदी में छोड़ा और आ कर मुझसे कस कर लिपट गए| "आई लव यू पापा जी" कहते हुए मेरे दोनों बच्चे शोर मचाने लगे| फिर नेहा मेरा हाथ पकड़ कर मुझे सोफे तक लाई, उधर आयुष मेरे लिए पानी का गिलास भर कर लाया| जब तक मैं पानी पी रहा था तबतक आयुष ने मेरे पॉंव दबाने शुरू किये और नेहा ने मेरे दोनों हाथ दबाने शुरू किये| अपने दोनों बच्चों का ये प्यार देख मैं सोच रहा था की जर्रूर कुछ तो बात है, तभी आज मुझे इतना मक्खन लगाया जा रहा है|

उधर स्तुति जो अभी तक अपने दीदी-भैया को मेरी सेवा करते हुए देख रही थी, उसका भी मन किया की वो भी मेरी सेवा करे इसलिए वो अपनी दादी जी की गोदी से उतरने के लिए छटपटाने लगी| माँ ने स्तुति को अपनी गोदी से उतारा तो वो दौड़ती हुई मेरे पास आई और अपने बड़े भैया की देखा-देखि मेरे पाँव दबाने की कोशिश करने लगी; "नहीं बेटा" ये कहते हुए मैंने स्तुति को एकदम से गोदी उठा लिया और उसे लाड करते हुए बोला; "बेटा, छोटे बच्चे पाँव नहीं दबाते| छोटे बच्चे पापा जी को पारी (प्यारी) करते हैं|" मेरी बात सुनते ही स्तुति ने मेरे दोनों गालों पर अपनी प्यारी-प्यारी पप्पी देनी शुरू कर दी| एक के बाद एक मेरी बिटिया ने मेरे दोनों गाल अपनी पप्पी से गीले कर दिए|

उधर नेहा और आयुष आ कर मुझसे कस कर लिपट गए तथा स्तुति के साथ मिल कर मुझे पप्पी करने लगे| तो अब समा ऐसा था की मेरे तीनों बच्चों ने मुझे नीचे दबा रखा था और मेरे पूरे चेहरे को अपनी पप्पियों से गीला कर दिया था| मुझे बच्चों के इस प्यार करने के ढंग में बहुत मज़ा आ रहा था और मैं अपने तीनों बच्चों का उत्साह बढ़ाने में लगा था ताकि वो मुझे और प्यार करें|

"पापा जी, हमें भी आगरा घुमा लाओ न?!" नेहा एकदम से बोली| मेरा मन अपने तीनों बच्चों की पप्पियों पा कर इस कदर प्रसन्न था की मैं नेहा को मना करने का कोई तर्क सोच ही नहीं पाया| इतने में आयुष भी अपनी दीदी के साथ हो लिया; "पापा जी, हमने अभी तक ताजमहल नहीं देखा|" आयुष अपना निचला होंठ फुला कर बोला और मेरे सीने से लिपट गया| "पपई...पपई...आज..अहल (ताजमहल)" स्तुति अपनी टूटी-फूटी भाषा में बोली और फिर कस कर मेरी कमीज को अपनी मुठ्ठी में भर लिया, मानो वो मुझे तबतक कहीं जाने नहीं देगी जबतक मैं उसे ताजमहल न घुमा लाऊँ! मुझे हैरानी इस बात की थी की नेहा ने बड़ी चतुराई से अपने दोनों भाई-बहन को अपने प्लान में शामिल कर लिया था, यहाँ तक की स्तुति को ताजमहल शब्द बोलना तक सीखा दिया था!

मैं समझ गया था की ये सारी प्लांनिंग नेहा की है इसलिए मुझे मेरी बिटिया की इस होशियारी पर प्यार आ रहा था| मैं आज अपने ही तीनों बच्चों के प्यार द्वारा ठगा गया था और मुझे इसमें बहुत मज़ा आ रहा था| मैंने अपने तीनों बच्चों को अपनी बाहों में भर लिया और तीनों के सर बारी-बारी चूमते हुए बोला; "मेरे प्यारे-प्यारे बच्चों! आपके प्यार के आगे मैं ख़ुशी-ख़ुशी अपनी हार स्वीकारता हूँ! हम सब कल ही ताजमहल घूमने जाएंगे|" मैंने जब सबके ताजमहल जाने की बात कही तो तीनों बच्चों की किलकारी एक साथ घर में गूँजने लगी!

अगले दिन हम सभी ट्रैन से आगरा के लिए निकले, हम चेयर कार से सफर कर रहे थे और हमारी सीटें बिलकुल आमने सामने थीं| आयुष, संगीता और माँ एक तरफ बैठे तथा मैं, मेरी गोदी में स्तुति और नेहा उनके ठीक सामने बैठे| हमारी सीटों के बीच एक टेबल पहले से लगा हुआ था| स्तुति को बिठाने के लिए ये टेबल सबसे बढ़िया था इसलिए स्तुति शीशे के पास टेबल के ऊपर बैठ कर खिलखिलाने लगी| अब चूँकि टेबल लगा ही हुआ था तो आयुष ने कुछ खाने की माँग की तो मैंने सभी के लिए चिप्स और फ्रूटी ले ली| सफर बड़ा हँसी-ख़ुशी बीत रहा था की तभी मथुरा स्टेशन आया| माँ ने ट्रैन में बैठे-बैठे ही श्री कृष्ण जन्मभूमि को हाथ जोड़कर प्रणाम किया, वहीं माँ को देख हम सभी ने भी हाथ जोड़कर श्री कृष्ण जन्मभूमि को प्रणाम किया| गौर करने वाली बात ये थी की स्तुति भी पीछे नहीं रही, उसने भी हमारी देखा-देखि अपने छोटे-छोटे हाथ जोड़कर भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि को प्रणाम किया| एक छोटी सी बच्ची को यूँ भगवान जी को प्रणाम करते देख हमारे दिल में प्यारी सी गुदगुदी होने लगी|

खैर, पिछलीबार संगीता और मैं जब आगरा जा रहे थे तब संगीता ने मथुरा दर्शन करने की इच्छा प्रकट की थी, उस समय मैंने उसे ये कह कर मना कर दिया था की अगलीबार हम सब साथ आएंगे| चूँकि इस बार पूरा परिवार साथ था तो संगीता के मन में दर्शन करने का लालच जाग गया| संगीता ने चपलता दिखाते हुए दोनों बच्चों के मन में भगवान श्री कृष्ण जी की जन्मभूमि के दर्शन करने की लालसा जगा दी| संगीता जानती थी की अगर वो मथुरा दर्शन करने की इच्छा प्रकट करेगी तो मैं समय का अभाव का बहाना कर के मना कर दूँगा, लेकिन अपने बच्चों की इच्छा का मान मैं हर हाल में करूँगा|

आयुष और नेहा ने अपनी प्यारी सी इच्छा जाहिर की तो मैं उन्हें समझाते हुए बोला; "बेटा जी, मथुरा-वृन्दावन दर्शन करने में कम से कम 3 दिन चाहिए क्योंकि यहाँ पर श्री कृष्ण जी के बहुत सारे मंदिर हैं| अब आज पहले ही अपने अपने स्कूल की छुट्टी कर ली है, यदि दो दिन और आप स्कूल नहीं जाओगे तो टीचर डाँटेगी न?! इसलिए हम फिर कभी मथुरा आएंगे और 3-4 दिन रुक कर, आराम से सारे मंदिरों के दर्शन करेंगे|" दोनों बच्चों को मेरी बात समझ आई और उन्होंने अगलीबार आने की प्लानिंग अभी से करनी शुरू कर दी|

इधर ट्रैन के टेबल पर बैठे-बैठे, खिड़की से बाहर देखते-देखते मेरी गुड़िया रानी ऊब गई थी इसलिए वो अपनी टूटी-फूटी भाषा में बोली; "पपई...पपई..आ..आज...अहल..?' स्तुति की बात का तातपर्य था की आखिर ताजमहल कब आयेगा? स्तुति की बेसब्री समझते हुए नेहा ने मेरा फ़ोन लिया और स्तुति को ताजमहल की तस्वीर दिखाते हुए बोली; "ऐसा दिखता है ताजमहल!" नेहा को लगा था की ताजमहल की तस्वीर देख स्तुति को कुछ देर के लिए चैन मिलेगा मगर स्तुति ने जैसे ही फ़ोन में तस्वीर देखि उसने ताजमहल की तस्वीर को हाथ से छु कर देखा| मोबाइल की स्क्रीन को ताजमहल समझ स्पर्श करने पर स्तुति का मन खट्टा हो गया और वो मुँह बिगाड़ते हुए मेरे फ़ोन को देख ये समझने की कोशिश करने लगी की आखिर इस ताजमहल में ऐसी दिलचस्प बात है क्या?

स्तुति के जीवन का बड़ा सीधा सा ऊसूल था, जिस चीज़ को आप खा नहीं सकते...उसे स्पर्श कर उसके साथ खेल नहीं सकते उस चीज़ का क्या फायदा? यही कारण है की मोबाइल में स्तुति को ताजमहल की तस्वीर देख कर ज़रा भी मज़ा नहीं आया इसलिए उसने बेमन से फ़ोन को दूर खिसका दिया और मेरी गोदी में आ कर मेरे कँधे पर सर रख कर उबासी लेने लगी| स्तुति की ये प्रतिक्रिया दिखाती थी की उसे अब ताजमहल देखने की ज़रा भी इच्छा नहीं है, वहीं हम स्तुति की इस प्रतिक्रिया को देख अपना हँसना नहीं रोक पा रहे थे|

खैर, हम आगरा पहुँचे और हम सब ने पहले स्टेशन पर पेट-पूजा की| पेट पूजा कर जब हम स्टेशन से बाहर निकले तो हमें ऑटो वालो ने घेर लिया, अब हमें कटवानी थी पर्ची इसलिए मैं सभी को न बोलते हुए गर्दन हिला रहा था| अब मुझे देख स्तुति ने भी अपनी गर्दन न में हिलानी शुरू कर दी और सभी ऑटो वालों को "no...no...no..." कहना शुरू कर दिया|

ऑटो की पर्ची कटवा, सवारी कर हम सबसे पहले आगरे का किला देखने पहुँचे| यहाँ पहुँचते ही संगीता को हमारी पिछली यात्रा की याद आ गई और उसके पेट में तितलियाँ उड़ने लगीं जिस कारण संगीता के चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान फैली हुई थी मगर वो अपने मन के विचार सबसे छुपाने में लगी थी| वहीं, मैं अपनी परिणीता के मन के भाव पढ़ और समझ चूका था इसलिए मैंने भी संगीता को एक प्यारभरा सरप्राइज देने की तैयारी कर ली|

आगरे के किले में घुमते हुए स्तुति बहुत उत्साहित थी और मेरी गोदी से उतरने को छटपटा रही थी, लेकिन मैं स्तुति को गोदी से उतारना नहीं चाहता था वरना स्तुति अपने सारे कपड़े गंदे कर लेती| अपनी बिटिया को बहलाने के लिए मैंने स्तुति को थोड़ा भावुक करने की सोची; "बेटू, आप पाने पापा जी की गोदी से उतर जाओगे तो मैं अकेला हो जाऊँगा! फिर मेरे साथ कौन घूमेगा?" मैंने थोड़ा उदास होने का अभिनय करते हुए कहा| मेरी बात सुनते ही स्तुति ने गोदी से उतरने की ज़िद्द छोड़ दी और मेरे गाल पर पप्पी करते हुए बोली; "पपई..आई..लव..यू!" अपनी प्यारी बिटिया के मुख से ये शब्द सुनते ही मेरा मन एकदम से खुशियों से भर उठा और मैंने स्तुति की ढेर सारी पप्पी ली|

उधर बच्चे अपनी दादी जी और अपनी मम्मी को ले कर एक टूर गाइड (tour guide) के पीछे चलते हुए सब देख रहे थे, वहीं हम बाप-बेटी की अलग ही घुम्मी हो रही थी| स्तुति जिस तरफ ऊँगली से इशारा करती मैं उसी तरफ स्तुति को ले कर चल पड़ता और स्तुति को उस चीज़ से जुडी बातें बताता, कुछ बातें स्तुति को अच्छी लगतीं तथा स्तुति खिलखिलाकर हँस पड़ती, बाकी बातें स्तुति की मतलब की नहीं होती और वो फौरन दूसरी तरफ ऊँगली से इशारा कर चलने को कहती|

आखिर हम किले के उस हिस्से में पहुँचे जहाँ से ताजमहल धुँधला दिख रहा था, आयुष और नेहा तो ये दृश्य देख कर कल्पना करने लगे थे की ताजमहल नज़दीक से कैसा दिखता होगा मगर स्तुति का मन उस धुँधले ताजमहल को देख कर ऊब चूका था इसलिए स्तुति ने फौरन मेरा ध्यान किले की दूसरी तरफ खींचा| "ओ नानी, यहाँ सब के साथ घूम, क्या तब से अपने पापा जी को इधर-उधर दौड़ा रही है?" माँ ने स्तुति के गाल खींचते हुए कहा, जिस पर स्तुति मसूड़े दिखा कर हँसने लगी|

आगरे के किले से निकल कर हमने ताजमहल के लिए सवारी की, इस पूरे रास्ते नेहा और आयुष की बातें चल रही थीं की आखिर ताजमहल कैसा दिखता होगा| मैं, माँ और संगीता तो बच्चों की बातें सुन कर मुस्कुरा रहे थे लेकिन स्तुति अपने बड़े भैया-दीदी की बातें बड़ी गौर से सुन रही थी| ऐसा लगता था मानो स्तुति अपने छोटे से मस्तिष्क में कल्पना कर रही हो की ताजमहल दिखता कैसा होगा?!

अंततः हम ताजमहल पहुँचे और टिकट खरीदकर कतार में लग गए, सिक्युरिटी चेक के समय स्तुति मेरी गोदी में थी और जब मेरी चेकिंग हो रही थी तो स्तुति बड़ी उत्सुकता से सब देख रही थी| स्तुति की उत्सुकता देखते हुए गार्ड साहब स्तुति से बोले; "बेटा, हम केवल आपके पापा की चेकिंग कर रहे हैं, बाकी आपकी चेकिंग नहीं होगी|" गार्ड साहब की बात सुन स्तुति खुश हो गई और हँसते हुए मुझसे लिपट गई|

सिक्युरिटी चेकिंग के बाद हम ताजमहल के गेट की तरफ बढ़ रहे थे लेकिन दोनों बच्चे अभी से ताजमहल देखने को अधीर हो रहे थे; "पापा जी, ताजमहल कहाँ है?" आयुष उदास होते हुए मुझसे पूछने लगा|

"पापा जी ने जेब में रखा हुआ है ताजमहल!" नेहा आयुष की पीठ पर थपकी मारते हुए बोली| "ये पूछ की ताजमहल कब दिखाई देगा?" नेहा ने आयुष का सवाल दुरुस्त करते हुए मुझसे पुछा|

"बेटा, अभी थोड़ा आगे चलकर एक बड़ा सा दरवाजा आएगा, वो दरवाजा पार कर के आपको ताजमहल दिखाई देगा|" मैंने दोनों बच्चों की जिज्ञासा शांत करते हुए कहा, अतः बच्चों की जिज्ञासा कुछ पल के लिए शांत हो गई थी|

माँ के कारण हम धीरे-धीरे चलते हुए पहुँचे सीढ़ियों के पास, यहाँ पहुँचते ही मैंने तीनों बच्चों से कहा; "बेटा, ये सीढ़ियां चढ़ने के बाद आपको ताजमहल नज़र आएगा मगर उसके लिए आप तीनों को अपनी आँखें बंद करनी होंगी और जब मैं कहूँ तभी खोलनी होगी|" मेरी बात सुन सबसे पहले स्तुति ने अपने दोनों हाथ अपनी आँखों पर रख बंद कर लिए| दरअसल, स्तुति को मेरे द्वारा सरप्राइज दिया जाना बहुत पसंद था इसलिए वो बहुत उत्सुक थी| वहीं आयुष और नेहा ने भी मेरी बात मानी और अपनी आँखें बंद कर ली| आँखें बंद होने से दोनों बच्चे सीढ़ी नहीं चढ़ सकते थे इसलिए संगीता ने आयुष को गोदी में उठा लिया, वहीं मैंने नेहा को अपनी पीठ पर लाद लिया, स्तुति तो पहले ही मेरी गोदी में अपने दोनों हाथों से आँख बंद किये हुए थी|

वहीं, माँ को मेरा बच्चों के साथ यूँ बच्चा बने देखना बहुत अच्छा लग रहा था इसलिए उनके चेहरे पर मुस्कान फैली हुई थी|

सीढ़ी चढ़ कर हम ऊपर आये और हमने बच्चों को एक लाइन में खड़ा कर दिया| "बेटा, अब आप सब अपनी आँखें खोलो|" मैंने तीनों बच्चों से आँखें खोलने को कहा तो सबसे पहले आँखें नेहा और आयुष ने खोलीं| आँखें खुलते ही बच्चों को अपनी आँखों के सामने संगेमरमर की विशालकाय ईमारत नज़र आई तो दोनों के मुख खुले के खुले रह गए! इधर स्तुति ने भी अपनी आँखें खोल लीं थीं, जब स्तुति ने इतनी विशालकाय सफ़ेद ईमारत देखि तो स्तुति ख़ुशी से चीख पड़ी; "पपई...पपई...आज...महल?" स्तुति ताजमहल की इशारा करते हुए हैरत भरी नज़रों से मुझे देखते हुए पूछने लगी|

"हाँ जी, बेटा जी...ये है आपका ताजमहल|" मैंने बड़े गर्व से कहा, मानो ये ताजमहल मेरी संपत्ति हो जिसे मैं स्तुति के नाम कर रहा हूँ! मेरी बात स्तुति को बहुत अच्छी लगी और स्तुति ने ताजमहल की सुंदरता का बखान अपनी बोली-भासा में करना शुरू कर दिया| ताजमहल की व्याख्या में स्तुति ने जो भी शब्द कहे वो सब अधिकतर खिलोने, कार्टून और खाने-पीने की चीजें जैसे की रस-मलाई से जुड़े थे|

खैर, हम बाप-बेटी अपनी बातों में व्यस्त थे और उधर सास-पतुआ अपनी बातों में व्यस्त थे| वहीं दूसरी तरफ आयुष और नेहा एकदम से खामोश खड़े थे| दोनों बच्चे सफ़ेद संगेमरमर की इस ईमारत को देख उसकी सुंदरता में खोये हुए थे| जब मैंने देखा की मेरे हमेशा चहकने वाले बच्चे एकदम से खामोश हैं तो मैं स्तुति को गोदी में लिए हुए आयुष और नेहा के सामने उकडून हो कर बैठा| मैंने देखा की मेरे दोनों बच्चों की आँखें अस्चर्य से फटी हुई हैं और मुँह हैरत के मारे खुला हुआ है! "क्या हुआ बेटा?" मैंने मुस्कुराते हुए अपने दोनों प्यारे बच्चों से सवाल पुछा तो आयुष-नेहा अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर आये|

"पापा जी, मैं सपना तो नहीं देख रही?" नेहा अस्चर्य से भरी हुई बोली, तो मैंने मुस्कुराते हुए नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए न में गर्दन हिलाई|

"पापा जी, हम...हम ताजमहल के पास जा सकते हैं न?" आयुष ने भोलेपन में सवाल पुछा| मेरे बेटे ने आज पहलीबार इतनी सुन्दर इमारत देखि थी इसलिए मेरा बेटा थोड़ा घबराया हुआ था तथा उसका मन ताजमहल को छू कर देखने का था| मैंने आयुष को अपने गले लगाया और उसके माथे को चूमते हुए बोला; "हाँ जी, बेटा जी!"

हम सभी चलते हुए ताजमहल की तरफ बढ़ रहे थे की रास्ते में मियूज़ियम पड़ा, माँ ने ताजमहल तो पहले भी देखा था मगर वो कभी मियूज़ियम नहीं गई थीं इसलिए हम सब ने मियूज़ियम में प्रवेश किया| पिछलीबार की तरह मियूज़ियम में मुमताज़ की तस्वीर लगी हुई थी, उस तस्वीर को देख संगीता के मन में फिर से सवाल कौंधा! आयुष और नेहा अपनी दादी जी का हाथ पकड़े आगे थे और मियूज़ियम में रखी चीजों के बारे में अपनी दादी जी को पढ़-पढ़ कर बताने में लगे थे| इधर मैं, मेरी गोदी में स्तुति और संगीता मुमताज़ की तस्वीर के पास खड़े थे, तभी संगीता ने स्तुति से सवाल पुछा; "बेटा, एक बात तो बता...मैं ज्यादा सुन्दर हूँ या मुमताज़?"

अपनी मम्मी का सवाल सुन स्तुति ने फौरन अपनी मम्मी की तरफ ऊँगली कर इशारा कर बता दिया की संगीता ज्यादा सुन्दर है| अब छोटे बच्चे झूठ थोड़े ही बोलेंगे ये सोच कर संगीता का दिल गदगद हो गया और वो अपनी सुंदरता पर गुमान करने लगी| जबकि असल बात ये थी की स्तुति ने अपनी मम्मी की तारीफ इसलिए की थी की कहीं उसे मम्मी से डाँट न पड़ जाए, अपनी बिटिया के मन की बता बस मैं जानता था इसलिए मेरे चेहरे पर एक शरारती मुस्कान थी|

अब संगीता को तो अपनी तारीफ सुनने का पहले ही बहुत शौक है इसलिए संगीता ने चुपचाप इशारे से नेहा को अपने पास बुलाया| नेहा के आते ही संगीता ने फिर वही सवाल दोहराया और नेहा ने भी अपनी छोटी बहन स्तुति की तरह अपनी मम्मी के डर के मारे संगीता को ही सबसे खूबसूरत कह दिया| इस समय संगीता का सर सातवे आसमान पर था और वो आँखों ही आँखों में मुझे इशारे कर के कह रही थी की; 'देखो, इस मुमताज़ से तो मैं ज्यादा सुन्दर हूँ! मेरे लिए क्या ख़ास बनवाओगे?' इधर मैं अपनी दोनों बिटिया के झूठ से परिचित था इसलिए मैं बस मुस्कुराये जा रहा था|

मुझे मुस्कुराते देख संगीता समझ गई की मैं उसका मज़ाक उड़ा रहा हूँ इसलिए उसने नेहा को माँ के पास भेज आयुष को चुपचाप इशारा कर बुलाया तथा उससे भी वही सवाल पुछा की मुमताज़ ज्यादा खूबसूरत है या मैं (संगीता)? अब एक तो आयुष को अपनी मम्मी की डाँट खाने की आदत थी और दूसरा वो जानता था की मेरे सामने उसकी मम्मी उसे कुछ नहीं कह सकती इसलिए आयुष को सूझी मस्ती| चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान लिए आयुष मुझे देखने लगा और मैंने भी आयुष को एक मूक इशारा कर दिया| मेरा इशारा पाते ही आयुष ने फट से मुमताज़ की तस्वीर की ओर इशारा किया और मुमताज़ को अपनी मम्मी से ज्यादा खूबसूरत कह दिया!

आयुष की बात सुन संगीता को आया प्यार भरा गुस्सा और वो प्यारभरे गुस्से से चिल्लाई; "आयुष के बच्चे" तथा आयुष को पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ पड़ी! अब आयुष को बचानी थी अपनी जान इसलिए वो मियूज़ियम से बाहर भाग गया|

अपने बड़े भैया और मम्मी को इस तरह दौड़ते देख स्तुति को बहुत मज़ा आया और स्तुति ने कुछ ज्यादा जोर से किलकारियाँ मारनी शुरू कर दी| वहीं जब माँ और नेहा, स्तुति की किलकारियाँ सुन मेरे पास आये तो मैंने उन्हें सारी बात बताई! इतने में संगीता आयुष का कान पकड़ कर उसे वापस ले आई और मुझ पर रासन-पानी ले कर चढ़ गई; "आप है न, बहुत मस्तीबाज़ी करते हो मेरे साथ! ऊपर से इस लड़के को अभी अपने रंग में रंग लिया है! घर चलो दोनों बाप-बेटे, आप दोनों की खटिया खड़ी करती हूँ!" संगीता का प्यारभरा गुस्सा देख स्तुति को बहुत मज़ा आ रहा था इसलिए वो बहुत हँस रही थी; "और तू भी सुन ले, ज्यादा मत हँस वरना तुझे बाथरूम में बंद कर दूँगी!" संगीता ने प्यार से स्तुति को धमकाया तो मेरी बिटिया रानी डरके मारे मेरे से लिपट गई! तब माँ ने बात सँभाली और संगीता की पीठ पर थपकी मारते हुए बोलीं; "मानु की देखा-देखि तुझ में भी बचपना भर गया है! चल अब...ताजमहल नज़दीक से देखते हैं|" माँ हँसते हुए बोलीं और हम सभी ताजमहल के चबूतरे पर आ पहुँचे|

ताजमहल को इतने नज़दीक से देख मेरे तीनों बच्चे मंत्र-मुग्ध हो गए थे, जहाँ एक तरफ आयुष के सवाल बचकाने थे वहीं दूसरी तरफ नेहा के सवाल सूझ-बूझ वाले और तथ्यों से जुड़े हुए थे| लेकिन सबसे मजेदार बातें तो स्तुति की थीं जो अपनी बोली-भासा में मुझसे पता नहीं क्या-क्या पूछ रही थी!

ताजमहल अंदर से घूम हम सब ताजमहल की दाईं तरफ आ कर बैठ गए| अब समय था संगीता को एक प्यारा सा सरप्राइज देने का| मैं तीनों बच्चों को साथ ले कर ताजमहल के पीछे आ गया जहाँ से हमें यमुना नदी बहती हुई नज़र आ रही थी, यहाँ मैंने अपने बच्चों को ज्ञान की कुछ बातें बताईं और नेहा-आयुष को उनकी मम्मी को बुलाने को भेजा| जैसे ही संगीता आई उसे मेरी आँखों में शैतानी नज़र आई, वो समझ गई की जर्रूर मेरे दिमाग में कुछ खुराफात चल रही है इसीलिए संगीता जिज्ञासु हो मुझे भोयें सिकोड़ कर देखने लगी!

"पिछली बार जब हम ताजमहल आये थे तो तुमने कुछ माँग की थी!" इतनी बात सुनते ही संगीता के गाल शर्म से लाल होने लगे क्योंकि उसे हमारा उस दिन का kiss याद आ गया था! "उस वक़्त तुम्हारी इच्छा मैंने आधे मन से पूरी की थी, आज कहो तो पूरे मन से तुम्हारी वो इच्छा पूरी कर दूँ?" मैंने संगीता से जैसे ही ये सवाल पुछा की संगीता के चेहरे पर खुशियों की फुलझड़ियाँ छूटने लगीं! संगीता ने आव देखा न ताव और सीधा हाँ में अपना सर हिला दिया|

उस समय स्तुति मेरी गोदी में पीछे बह रही यमुना नदी देखने में व्यस्त थी, तो मैंने इस मौके का फायदा उठाया और संगीता को अपने नज़दीक खींच उसके लबों से अपने लब भिड़ा दिए! हमें रसपान करते हुए कुछ सेकंड ही हुए थे की स्तुति ने पलट कर हमारी तरफ देखा| अपनी मम्मी के चेहरे को अपने इतने नज़दीक देख स्तुति समझी की वो मेरी पप्पी ले रही है इसलिए स्तुति को आया गुस्सा!

मेरी सारी पप्पी लेने का सारा ठेका स्तुति ने ले रखा था इसलिए स्तुति ने गुस्से से अपनी मम्मी के चेहरे को दूर धकेला और अपनी मम्मी पर गुस्से से चिल्लाई; "न..ई (नहीं)....मेले पपई!" स्तुति के कहने का मतलब था की ये मेरे पापा हैं और आप इनकी पप्पी नहीं ले सकते!

स्तुति द्वारा गुस्से किये जाने से संगीता को भी प्यारभरा गुस्सा आ गया और उसने स्तुति के गाल खींचते हुए कहा; "ओ लड़की! तुझे कहा था न की ये तेरे पापा बाद में और पहले मेरे पति हैं! और इनसे सबसे ज्यादा प्यार मैं करती हूँ....तेरे से भी ज्यादा प्यार!" अपनी मम्मी द्वारा यूँ गुस्सा किये जाने और अपनी मम्मी के मुझे ज्यादा प्यार करने की बात सुन मेरी बिटिया रानी को लगा की मेरे प्रति उसका प्यार कम और उसकी मम्मी का प्यार ज्यादा है| ये बात सुन स्तुति का नाज़ुक दिल टूट गया और स्तुति ने ज़ोर से रोना शुरू कर दिया!

अपनी बिटिया को यूँ रोते देख मैं एकदम से घबरा गया और मैंने स्तुति को लाड कर बहलाना शुरू कर दिया; "औ ले ले...मेरा बच्चा...नहीं-नहीं...रोते नहीं बेटा!" मेरे लाड करने पर भी जब स्तुति चुप न हुई तो मैंने स्तुति को खुश करने के लिए कहा; "बेटा, आपकी मम्मी मुझसे ज्यादा प्यार करतीं हैं तो क्या हुआ, मैं तो सबसे ज्यादा आपसे प्यार करता हूँ न? अब आप ही बताओ की जब मैं घर आता हूँ तो मैं सबसे पहले किसे बुलाता हूँ; आपको या आपकी मम्मी को?" मेरी बात सुन स्तुति का रोना कुछ कम हुआ था और मेरे अंत में पूछे सवाल के जवाब में स्तुति ने अपनी तरफ ऊँगली का इशारा कर जवाब भी दिया| "सबसे ज्यादा पप्पी मैं किसकी लेता हूँ? किसे गोदी ले कर लाड-प्यार करता हूँ?" मेरे पूछे सवाल के जवाब में स्तुति ने बड़े गर्व से अपनी तरफ इशारा करते हुए जवाब दिया| "फिर मैं आपसे ज्यादा प्यार करता हूँ न?" मेरे पूछे सवाल के जवाब में स्तुति ने फौरन हाँ में जवाब दिया और गुस्से से अपनी मम्मी को जीभ चिढ़ाई!

स्तुति से बात करते हुए मेरा सारा ध्यान स्तुति पर था इसलिए मैं जोश-जोश में कुछ ज्यादा ही बक गया! उधर संगीता ने जब सुना की मैं उसकी बजाए स्तुति से ज्यादा प्यार करता हूँ तो वो जल-भून कर राख हो गई और प्यारभरे गुस्से से मुझे घूरने लगी! जब मैंने संगीता का ये गुस्सा देखा तो मुझे एहसास हुआ की अपनी बिटिया को मनाने के चक्कर में मैंने अपनी परिणीता को नाराज़ कर दिया! मैं संगीता को मनाने की कोशिश करूँ, उसके पहले ही संगीता भुनभुनाती हुई माँ के पास लौट गई|

इधर मेरी प्यारी-प्यारी बिटिया रानी का रोना थम चूका था और अब स्तुति को मुझसे बातें करनी थी इसलिए स्तुति यमुना नदी की तरफ इशारा करते हुए मुझसे अपनी बोली-भाषा में सवाल पूछने लगी| करीब 5 मिनट बाद जब मैं माँ के पास लौटा तो मैंने पाया की संगीता ने माँ और बच्चों को स्तुति के मुझ पर अधिकार जमाने तथा रोने के बारे में सब बता दिया है, जिस कारण सभी के चेहरों पर शैतानी भरी मुस्कान तैर रही थी|

माँ ने मुझे अपने पास बैठने को कहा और फिर स्तुति को चिढ़ाने के लिए बोलीं; "बड़े साल हो गए मैंने मानु को लाड नहीं किया, आज तो मैं मानु को लाड करुँगी!" माँ की बात सुन मैं सोच में पड़ गया की आज आखरी माँ को अचानक मुझ पर इतना प्यार कैसे आ गया?! अभी मैं अपनी सोच में डूबा था की माँ मेरा मस्तक चूमने के लिए आगे बढ़ीं|

स्तुति मेरी गोदी में थी और जैसे ही उसने देखा की माँ मेरा मस्तक चूम रहीं हैं स्तुति ने थोड़ा प्यार से अपनी दादी जी को रोका और बोली; "no...no...no दाई! मेरे पपई हैं!" स्तुति की बात सुन माँ हँस पड़ीं और स्तुति के हाथ चूमते हुए बोलीं; "नानी! तेरा बाप बाद में, पहले मेरा बेटा है!" माँ ने बड़े प्यार से बात कही थी जिस पर स्तुति मुस्कुराने लगी|

फिर स्तुति की नज़र पड़ी अपने भैया और दिद्दा पर, अब स्तुति को उन्हें भी बताना था की मैं सिर्फ उसका पापा हूँ; " दिद्दा...अइया...मेले पपई हैं!" स्तुति मुझ पर अधिकार जमाते हुए बड़े गर्व से बोली| आयुष ने तो अपनी छोटी बहन की बात हँसी में उड़ा दी मगर संगीता को स्तुति को चिढ़ाना था इसलिए वो फट से बोली; "लाउड स्पीकर पर चिल्ला-चिल्ला कर सब को बता दे!" संगीता मुँह टेढ़ा करते हुए बोली, जिसपर स्तुति ने अपनी मम्मी को जीभ चिढ़ाई!
उधर स्तुति के मुझ पर अधिकार जमाने की बात सुन नेहा गुस्से से गर्म हो गई; "बड़ी आई मेरे पपई वाली! ये सिर्फ मेरे पापा जी हैं, तू सबसे बाद में पैदा हुई है!" नेहा चिढ़ते हुए बोली| मुझे लगा की अपनी दिद्दा का गुस्सा देख स्तुति रोयेगी मगर स्तुति ने फौरन अपनी दिद्दा को जीभ दिखा के चिढ़ाया और मेरे कंधे पर सर रख कर अपना चेहरा छुपा लिया| स्तुति के जीभ चिढ़ाने से नेहा को बड़ी जोर से मिर्ची लगी और वो स्तुति को मारने के लिए लपकी की तभी मैंने नेहा को एक पल के लिए शांत रहने को कहा| "बेटा, आप भैया के साथ खेलने जाओ!" ये कहते हुए मैंने स्तुति को ताजमहल के संगेमरमर के फर्श पर उतारा और आयुष को जिम्मेदारी देते हुए बोला; "आयुष बेटा, स्तुति का ध्यान रखना|" स्तुति को सफ़ेद और ठंण्डा पत्थर बहुत अच्छा लगा और वो सरपट दौड़ने लगी, वहीं आयुष भी एक अच्छा भाई होने के नाते स्तुति पर नज़र रखते हुए उसके पीछे दौड़ने लगा|

जब दोनों बच्चे चले गए तो मैंने नेहा को गोदी लिया और उसे समझाते हुए बोला; "बेटा, छोटे बच्चे मासूम होते हैं, उन्हें लगता है की सबकुछ उनका ही है और वो सबपर हक़ जमाते हैं| आप आयुष और स्तुति की बड़ी बहन हो, क्या आप जानते हो की बड़ी बहन माँ समान होती है?! इसलिए आपको यूँ गुस्सा नहीं करना चाहिए बल्कि प्यार से अपने छोटे भाई और छोटी बहन को समझाना चाहिए|" मेरी दी हुई ये सीख नेहा ने बड़े गौर से सुनी और उसका गुस्सा शांत होने लगा, जो बची-कुचि कसर थी वो मैंने नेहा के सर को चूमकर पूरी कर दी जिस कारण नेहा ख़ुशी से खिलखिलाने लगी|

"स्तुति, मैं भी खेलूँगी!" कहते हुए नेहा अपना गुस्सा थूक, स्तुति के पास दौड़ गई और तीनों बच्चे पकड़ा-पकड़ी का खेल-खेलने लगे|

नेहा के जाने के बाद मेरी माँ मेरे सर पर हाथ फेरते हुए बोलीं; "बेटा, मैंने बाप-बेटी का लाड-प्यार बहुत देखा है मगर जो प्यार...मोह...लगाव...अनोखा बंधन स्तुति और तेरे बीच है, वैसा प्यार मैंने आजतक नहीं देखा| कल जब तू घर पर नहीं था न, तब स्तुति अकेली अपने खिलोनो से खेलते हुए 'पपई...पपई' कहते हुए तेरा नाम रट रही थी| तेरे घर पर न होने पर स्तुति तुझे अपने गुड्डे-गुड़ियों में ढूँढती है और खूब खेलती है| कभी-कभी तेरी चप्पल या जूते पहनने की कोशिश करती है और उसका ये बालपन देख मेरे दिल को अजीब सा सुकून मिलता है| जब तुझे घर लौटने में देर हो जाती है तो स्तुति एकदम से घबरा जाती है और मेरी गोदी में आ कर पूछती है की तू घर कब आएगा? और आज देख, कैसे उसने हम सभी को परे धकेलते हुए साफ़ कर दिया की वो तुझसे सबसे ज्यादा प्यार करती है तथा उसके सिवा कोई भी तेरी पप्पी न तो ले सकता है न ही दे सकता है!" माँ की बात सुन मुझे ज्यादा हैरानी नहीं हुई क्योंकि मैं जानता था की स्तुति का मेरे प्रति प्रेम सबसे अधिक है| वो अपनी माँ के बिना रह सकती थी मगर मेरे बिना एक दिन भी नहीं रह सकती! परन्तु मुझे हैरानी ये जानकार हुई की मेरी लाड़ली बिटिया मेरी गैरमौजूदगी में मुझे अपने खिलौनों में ढूँढती है!

बहरहाल, ताजमहल से घूम कर हम पहुँचे आगरा की मशहूर सत्तो लाला की बेड़मी पूड़ी खाने| खाना शुरू करने से पहले मैंने सभी को आगाह करते हुए कहा; "आलू की सब्जी बहुत मिर्ची वाली है इसलिए जब मिर्ची लगे तो पानी नहीं गरमा-गर्म जलेबी खानी होगी|" आयुष को तो पहले ही मीठा बहुत पसंद था इसलिए सबसे पहले आयुष की गर्दन हाँ में हिली|

सब ने पहला निवाला खाया और सभी को थोड़ी-थोड़ी मिर्ची लगी तथा सभी ने जलेबी खाई| वहीं, स्तुति को मैंने केवल बेड़मी पूड़ी का एक छोटा सा निवाला खिलाया जो की स्तुति को स्वाद लगा, लेकिन जब स्तुति ने जलेबी खाई तो स्तुति ख़ुशी से अपना सर दाएँ-बाएँ हिलाने लगी!

शाम के 6 बज रहे थे और अब समय था स्टेशन जाने का इसलिए पंछी ब्रांड का डोडा पेठा ले कर हम स्टेशन पहुँचे| स्टेशन पहुँच कर पता लगा की ट्रैन लेट है इसलिए हम सभी वेटिंग हॉल में बैठ गए| संगीता अब भी मुझसे नाराज़ थी इसलिए मुझे संगीता को मनाना था, मैंने दोनों बच्चों को माँ के साथ बातों में व्यस्त किया तथा संगीता का हाथ चुपके से थाम वेटिंग हॉल से बाहर आ गया| "जान..." मैं आगे कुछ कहते उससे पहले ही संगीता प्यारभरे गुस्से से मुझ पर बरस पड़ी; "जा के लाड-प्यार करो अपनी बेटी को! उसके आगे मेरा क्या मोल?"

"जान...स्तुति की माँ हो तुम, यानी वो तुम्हारा अंश है| अब मैं तुमसे ज्यादा प्यार करूँ या तुम्हारे अंश से ज्यादा प्यार करूँ, बात तो एक ही हुई न?!" मैंने बड़े प्यार से संगीता के साथ तर्क किया जिससे संगीता सोच में पड़ गई| लकिन इससे पहले की संगीता मेरा तर्क समझे मैंने फौरन संगीता का ध्यान बँटा दिया; "अच्छा जान एक बात बताओ, जब पति का फ़र्ज़ होता है अपनी पत्नी की इच्छाएँ पूरी करना तो क्या पत्नी का फ़र्ज़ नहीं होता की वो अपने पति की सारी इच्छाएँ पूरी करे?" मेरे पूछे सवाल से संगीता अचम्भित हो गई की आखिर मेरी ऐसी कौन सी इच्छा है जो की उसने अभी तक पूरी नहीं की|

खैर, चूँकि मुझे मेरे सवाल का जवाब नहीं मिला था इसलिए मैंने अपना सवाल फिर से दोहराया, इस बार संगीता ने हाँ में सर हिलाया और मैंने अपनी इच्छा प्रकट की; "जान, जब हम सब मुन्नार ट्रैन से जा रहे थे न, तब मेरा मन था की चलती ट्रैन में वो...." इतना कह मैं शर्मा गया और खामोश हो गया| उधर संगीता ने जब मेरी आधी बात सुनी तो संगीता आँखें फाड़े मुझे देखने लगी! "उस बार न सही, इस बार तो..." इतना कह मैं शर्मा कर खामोश हो गया और संगीता की प्रतिक्रिया जानने को उत्सुक हो गया|

"चलती ट्रैन में? इतने सारे लोगों की मौजूदगी में?" संगीता अपने होठों पर हाथ रखे हुए हैरत से भर कर बोली| संगीता का सवाल सुन मैंने संगीता के साथ तर्क किया; " ताजमहल में हजारों लोगों की मौजूदगी में जब हम kiss कर रहे थे तब तो तुमने कुछ नहीं कहा? अरे हमारी वो kissi तो CCTV कैमरा में भी कैद हो गई होगी! जबकि ट्रैन में तो किसी को कुछ पता भी नहीं चलेगा!" जब संगीता को पता चला की हमारा ताजमहल वाला kiss CCTV कैमरा में कैद हो चूका है तो संगीता के गाल लाज के मारे लाल हो गए! अब चूँकि संगीता नरम पड़ रही थी तो मौके का फायदा उठा कर मुझे संगीता को ट्रैन में प्रेम-मिलाप के लिए मनाना था; "जान, मैंने सब कुछ सोच रखा है, तुम्हें बस थोड़ी सी हिम्मत दिखानी है|" ये कहते हुए मैंने संगीता को सारा प्लान सुनाया और अपनी ख़ुशी का वास्ता दे कर मना ही लिया|

ट्रैन आते-आते रात के 9 आज गए थे, ऊपर से ट्रैन चल भी बहुत धीमे रही थी क्योंकि उसे ट्रैक पूरी तरह क्लियर नहीं मिल रहा था| इधर स्तुति अपनी दादी जी की गोदी में सो चुकी थी वहीं दोनों बच्चे भी नींद के कारण ऊँघ रहे थे| जब माँ की आँख लग गई तो मैंने संगीता को इशारा किया और हम दोनों ट्रैन के बाथरूम में पहुँचे| रात के लगभग 11 बज गए थे और ज्यादातर मुसाफिर सो चुके थे| हिलती हुई ट्रैन के बाथरूम में जगह तो कम थी ही, ऊपर से हमारे ट्रैन के बाथरूम में घुसते ही ट्रैन ने एकदम से रफ़्तार पकड़ ली| ट्रैन इतनी तेज़ हिल रही थी की हम दोनों ठीक से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे, फिर किसी के द्वारा पकड़े जाने का डर था सो अलग! परन्तु इन सभी परेशानियों के बाद भी हमारा प्रेम-मिलाप का उत्साह कम नहीं हो रहा था बल्कि अब तो हमारे मन में अजब सा रोमांच पैदा हो गया था!

15-20 मिनट की फटाफट मेहनत कर हम बाथरूम से बाहर निकले और अपनी-अपनी जगह चुप-चाप बैठ गए| इस रोमांचकारी अनुभव से संगीता के चहरे पर ऐसी मुस्कान फैली थी की उसे देख कर मेरा मन फिर से प्रेम-मिलाप का बन गया था! मैंने कई बार संगीता को फिर से चलने का इशारा किया मगर संगीता मेरे इशारे को समझ ऐसी लजाई की उसने अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपा लिया!

रात एक बजे हम अब घर पहुँचे, सभी इतना थके थे की कपड़े बदलकर हम सब सो गए| अगली सुबह मेरे लिए बड़ी यादगार सुबह थी क्योंकि अगली सुबह मैंने अपनी प्यारी बिटिया का बड़ा ही मनमोहक रूप देखा|

रात को देर से आने के कारण माँ ने बच्चों के स्कूल की छुट्टी करवा दी, नतीजन दोनों बच्चे और मैं देर तक सोते रहे| अब स्तुति की नींद पूरी हो चुकी थी इसलिए वो जाग चुकी थी| माँ को जल्दी उठने की आदत है इसलिए वो भी समय के अनुसार जल्दी जाग गईं| संगीता को भी माँ के लिए चाय बनानी थी इसलिए वो भी जाग गई| चाय पी कर संगीता ने कपड़े तह लगा कर पलंग पर रखे ही थे की मेरी छोटी बिटिया मुझे ढूँढ़ते हुए आ गई| "पपई?" कहते हुए जब स्तुति ने मुझे पुकारा तो संगीता ने स्तुति को गोदी ले कर पलंग के बीचों-बीच बिठा दिया और बोली; "अब जी भर कर अपने पापा जी को तंग कर, नाक में दम कर दे इनकी! तब इन्हें समझ आएगा की तू कितनी शरारती है!" संगीता मेरी लाड़ली बेटी को मेरे खिलाफ उकसा कर चली गई मगर मेरी बिटिया मुझे तंग नहीं बल्कि मुझे प्यार करती थी| स्तुति ने मेरे दाहिने गाल पर अपनी सुबह की गुड मॉर्निंग वाली पप्पी दी और "पपई...पपई" कह मुझे जगाने लगी|

"बेटू...,मुझे नीनी आ रही है!" मैंने कुनमुनाते हुए कहा| मेरी बचकानी बात सुन स्तुति खिलखिला कर हँसने लगी| अगले ही पल मेरी बिटिया के भीतर का माँ का रूप सामने आया और स्तुति ने मेरे मस्तक को थपथपा कर मुझे सुलाना शुरू कर दिया| जब स्तुति सोती नहीं थी तब मैं उसे प्यार से थपथपा कर सुला दिया करता था, शायद आज वही प्यार मेरी बिटिया मुझे दिखा रही थी|

स्तुति के मेरा सर थपथपाने से मेरे चेहरे पर संतोषजनक मुस्कान फैली हुई थी और अब मुझे बड़ी प्यारी सी नींद आ रही थी| उधर लघभग दो मिनट मेरा सर थपथपाने के बाद स्तुति ऊब गई और उसने मेरे सिरहाने पड़ी अपनी गुड्डा-गुड़िया उठाली तथा उनके साथ खेलने लगी| गौर करने वाली बात ये थी की अपने गुड्डे-गुड़िया से खेलते हुए भी मेरी बिटिया के मुख से बस मेरा नाम निकल रहा था; "पपई...पपई...पपई...पपई...पपई!" स्तुति को अपना नाम रटता हुआ देख मुझे माँ की कही बात याद आई की मेरी गैरमौजूदगी में मेरी बिटिया मेरा नाम रट कर अपना मन बहलाती है! स्तुति को अपने गुड्डे पर इतना प्यार आ रहा था की उसने गुड्डे को मुझे समझ गुड्डे के गाल पर अपनी पप्पी शुरू कर दी! मैं ये मनमोहक दृश्य अपनी अधखुली आँखों से देख रहा था तथा मंद-मंद मुस्कुरा रहा था|

खैर, कुछ देर बाद मेरी बिटिया का चंचल मन गुड़िया-गुड्डे से खेल कर भर गया था इसलिए स्तुति ने खेलने के लिए कुछ और ढूँढने को अपनी गर्दन इधर-उधर घुमानी शुरू कर दी| मैंने सोचा की अब मेरी बिटिया कुछ नै शैतानी करेगी इसलिए मैंने सोचा की क्यों न मैं एक छोटी सी झपकी मार लूँ!

उधर पलंग पर स्तुति के खेलने लायक कुछ नहीं था, थे तो बस संगीता द्वारा तह लगा कर रखे हुए कपड़ों की एक मीनार| इस कपड़े की मीनार के सबसे ऊपर संगीता की साडी थी जो की स्तुति को कुछ ज्यादा ही पसंद थी| स्तुति ने साडी से खेलने के लिए उस साडी को खींच लिया तथा कपड़ों की मीनार गिरा कर फैला दी! अपनी पसंदीदा साडी से खेलने के चक्कर में स्तुति ने अपनी मम्मी की तह लगा कर रखी साडी खोल कर फैला दी तथा उस साडी को अपने पूरे शरीर से जैसे-तैसे लपेट लिया! "पपई? पपई?" कह स्तुति ने मुझे पुकारना शुरू किया तब मैंने अपनी आँख खोली|

जब मेरी आँखें खुलीं तो जो दृश्य मैंने देखा उसे देख मेरा दिल जैसे ठहर सा गया! मेरी लाड़ली बिटिया अपनी मम्मी की साडी लपेटे, सर पर घूँघट किये मुझे देख मुस्कुरा रही थी! अपनी बिटिया का ये रूप देख उस पल जैसे मेरा नाज़ुक सा दिल घबरा कर धड़कना ही भूल गया! 'मेरी बेटी इतनी बड़ी हो गई?' अपनी बिटिया को साडी लपेटे देख मुझे ऐसा लग रहा था मानो मेरी बिटिया शादी लायक बड़ी हो गई, यही कारण था की मेरे मन में ये सवाल कौंधा|

लेकिन फिर अगले ही पल मैंने अपनी बिटिया को मुस्कुराते हुए देखा और तब मुझे एहसास हुआ की; 'नहीं...अभी मेरी लाड़ली इतनी बड़ी नहीं हुई की मैं उसका कन्यादान कर दूँ!' मैंने रहत भरी साँस लेते हुए मन में सोचा|

दरअसल, अपनी बिटिया का ये रूप देखने के लिए मैं अभी तक मानसिक रूप से सज नहीं था| एक बाप को कन्यादान करते समय जो दुःख...जो भय होता है वो, एहसास मैंने इन कुछ पलों में ही कर लिया था, तभी तो मैं एकदम से डर गया था|

"मेलि प्याली प्याली बिटिया! मेलि लाडो रानी, इतनी जल्दी बड़े न होना, अभी आपकी शादी करने के लिए मैं मानसिक रूप से अक्षम हूँ!" मैंने उठ कर स्तुति को गोदी में उठाया तथा उसके सर पर से घूँघट हटाते हुए कहा| मेरे तुतला कर बोलने से मेरी बिटिया का दिल पिघल गया और वो शर्मा कर मेरे गले से लिपट कर कहकहे लगाने लगी|

स्तुति को बिस्तर पर खेलता हुआ छोड़ मैं तैयार होने लगा| इधर स्तुति ने फिर से अपनी मम्मी की साडी ओढ़ ली और दुल्हन बन कर अपने खिलोनो से खेलने लगी| इतने में माँ मुझे ढूँढ़ते हुए कमरे में आईं और स्तुति को यूँ साडी से घूँघट किये खेलता देख बोलीं; "अरे, ई के हुऐ! ई दुल्हिन कहाँ से आई?" माँ की बात सुन स्तुति ने अपनी दादी जी को देखा और खिलखिला कर हँसते हुऐ अपना घूँघट हटाया और अपनी दादी जी को देख बोली; "दाई....सू.गी" स्तुति ऐसे बोली मानो बता रही हो की दादी जी मुझे पहचानो, मैं आपकी शूगी हूँ!

ठीक तभी मैं बाथरूम से नहा कर निकला, मैंने दादी-पोती की बातें सुन ली थीं इसलिए मेरा मन प्रसन्नता से भरा हुआ था| पीछे से आई संगीता और उसने जब स्तुति को यूँ अपनी साडी लपेटे देखा तो उसे कल रात कही मेरी बात याद आई की स्तुति उसी का एक अंश है| एक पल के लिए संगीता के चेहरे पर मुस्कान आई लेकिन फिर अगले ही पल उसके चेहरे पर प्यारभरा गुस्सा अपनी तह लगा कर रखी हुई साडी के तहस-नहस होने पर उभर आया और वो स्तुति को प्यारभरे गुस्से से डाँटते हुए बोली; "शैतान लड़की! तूने तह लगा कर रखे सारे कपड़े तहस-नहस कर दिए!"

तब माँ अपनी पोती का बचाव करते हुऐ बोलीं; "माफ़ कर दे स्तुति को बहु!" जैसे ही माँ ने स्तुति के लिए संगीता से माफ़ी माँगी, वैसे ही स्तुति ने अपने कान पकड़े और अपनी मम्मी से बोली; "सोल्ली मम-मम!" माँ और अपनी बेटी का सॉरी सुन संगीता झट से पिघल गई और मुस्कुराने लगी| इधर माँ स्तुति को लाड करते हुऐ बोलीं; "चल बेटा, मैं तुझे अपनी एक चुन्नी देती हूँ| तू उसे साडी समझ कर लपेट लेना|" अपनी दादी जी की बात सुन स्तुति उत्साह से भर गई और दोनों दादी-पोती माँ के कमरे में चले गए| फिर तो माँ पर ऐसा बचपना सवार हुआ की उन्होंने अपनी चुन्नी स्तुति को साडी की तरह पहनाई और छोटा सा पल्लू उसके सर पर सजा दिया| यही नहीं, माँ ने तो अपनी पोती के माथे पर छोटी सी बिंदी भी लगाई, आँखों में काजल लगाया और हाथों में चूड़ी पहना कर एकदम भरतीय नारी की तरह सजा दिया|

सच कहूँ तो मेरी छोटी सी बिटिया साडी में बड़ी प्यारी लग रही थी, इतनी प्यारी की कहीं उसे मेरी ही नज़र न लग जाए इसलिए मैंने स्तुति को खुद काला टीका लगाया|

दिन प्यारभरे बीत रहे थे की एक ऐसा दिन आया जब मेरे बेटे का मासूम सा दिल टूट गया!

स्कूल से लौट आयुष एकदम से गुमसुम हो कर बैठा था| अपने पोते को गुमसुम देख माँ ने आयुष को बहला कर सारी बात जाननी चाही मगर आयुष कुछ नहीं बोला| आखिर माँ ने नेहा से आयुष के खमोश होने का कारण पुछा तो नेहा ने सारा सच कह दिया; "इसकी गर्लफ्रेंड बीच साल में स्कूल छोड़ रही है इसलिए ये तब से मुँह फुला कर बैठा है!" नेहा की बात सुन माँ ने आयुष को बहलाने की बहुत कोशिश की, खूब लाड-प्यार किया, उसे तरह-तरह के लालच दिये मगर आयुष गुमसुम ही रहा| हारकर माँ ने मुझे साइट पर फ़ोन किया और सारी बात बताई| मैं अपने बेटे के दिल की हालत समझता था इसलिए मैं सारा काम संतोष के जिम्मे लगा कर घर आ गया| रास्ते में मैंने फलक के पापा से बात की और उन्होंने मुझे बताया की उनका अचानक ट्रांसफर हो गया है इसलिए उन्हें यूँ अचानक फलक का स्कूल बीच साल में छुड़वा कर जाना पड़ रहा है| जब मैंने उन्हें बताया की फलक के जाने से आयुष गुमसुम हो गया है तो उन्हें आयुष के लिए बहुत बुरा लगा; "आयुष छोटा है और जल्दी बातों को दिल से लगा लेता है, मैं उसे समझाऊँगा|'" मैंने बात खत्म करते हुए कहा|

घर पहुँच मैंने सबसे पहले आयुष को पुकारा और अपनी बाहें खोलीं तो आयुष दौड़ कर मेरे गले लग गया| आयुष को गोदी लिए हुए मैंने छत पर आ गया और पानी की टंकी के ऊपर बैठ अपने बेटे को समझाने लगा;

"बेटा, मैं आपका दुःख महसूस कर सकता हूँ|" मैंने बात शुरू करते हुए आयुष से कहा| मेरी बात सुन आयुष आँखों में सवाल लिए मुझे देखने लगा की भला मैं कैसे उसका दुःख महसूस कर रहा हूँ| अपने बेटे के मन में उठे सवाल का जवाब देते हुए मैं बोला; "जब मैं नर्सरी में था तब मेरी भी गर्लफ्रेंड थी जिसके साथ मेरी गहरी दोस्ती थी| माँ ने आपको उसके बारे में बताया ही होगा?" आयुष मेरी गर्लफ्रेंड के बारे में जानता था इसलिए आयुष सर हाँ में हिलाने लगा| "जब हम दोनों पास हो कर फर्स्ट क्लास में आये तब उसके मम्मी-पापा ने उसका स्कूल बदल दिया| ये बात जब मुझे पता चली तो मैं भी आपकी तरह बहुत दुखी हुआ| दुखी और बुझे मन से मैं घर लौटा और आपकी ही तरह खामोश हो कर लेट गया| मेरी माँ यानी आपकी दादी जी ने मुझे बहुत लाड-प्यार किया मगर मैं ये सोच कर दुखी था की अगले दिन जब मैं स्कूल जाऊँगा तब मेरी गर्लफ्रेंड वहाँ नहीं होगी, ऐसे में मैं किसके साथ अपना टिफ़िन शेयर करूँगा? किस्से बात करूँगा? किसके साथ खेलूँगा?

मुझे यूँ उदास और गुमसुम देख आपके दादा जी और दादी जी बड़े दुखी थे| उन्होंने मुझे हँसाने-बुलाने की बहुत कोशिश की मगर मेरा मन किसी चीज़ में नहीं लग रहा था| दोपहर से शाम हुई और शाम से रात मगर मैं गुमसुम ही बैठा रहा| मैंने गौर किया तो पाया की मेरे कारण मेरे माँ-पिताजी उदास बैठे हैं और पूरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ है| उस पल मुझे बहुत बुरा लगा की मेरे कारण मेरे माँ-पिताजी, जो की मुझसे इस दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करते हैं..वो उदास बैठे हैं! मैंने खुद को सँभाला और सबसे पहले भगवान जी से माफ़ी माँगी और मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने को कहा| फिर मैंने अपनी माँ और पिताजी के पॉंव छू कर माफ़ी माँगी तथा उन्हें सारी बात बताई| मेरी सारी बात सुन माँ यानी आपकी दादी जी ने मुझे जो सीख दी वो मैं आज आपको देता हूँ;

बेटा, हमारी ज़िन्दगी में बहुत से लोग आते-जाते हैं, लेकिन लोगों के जाने का दुःख इस कदर नहीं मनाते की हम अपने परिवार को ही दुखी कर दें! अभी आपकी ज़िन्दगी में बहुत से दोस्तों ने आना है, कुछ दोस्त हमेशा के लिए आते हैं जैसे आपके दिषु चाचू, जो की सारी उम्र आपका साथ निभाते हैं तो कुछ दोस्त केवल दो पल के लिए आते हैं| यूँ किसी के आपके जीवन से चले जाने का शोक मनाना अच्छी बात नहीं|" हम बाप-बेटों के जीवन का ये हिस्से पूर्णतः एक जैसा था इसलिए आयुष जानता था की मैं जो भी कुछ कह रहा हूँ उसे मैंने खुद भोगा है, यही कारण है की आयुष मेरी बातें बड़ी गौर से सुन रहा था| वहीं माँ द्वारा मुझे दी हुई सीख आयुष को बहुत अच्छे समझ आ गई थी|

बहरहाल, आयुष के अचानक उदास हो जाने से, हमारा परिवार जो दुःख भोग रहा था उस दुःख से अब आयुष को परिचय करवाना जर्रूरी था; "बेटा, आपको पता है आज जब से आप स्कूल से आये हो आपके उदास हो जाने से हम सब पर क्या बीती है? आपकी दादी जी आपको हँसाने-बुलाने को इतनी कोशिश कर चुकी हैं की हार मान कर वो उदास बैठीं हैं! आपकी मम्मी जो आपकी हँसी-बोली सुन कर हमेशा खुश रहतीं थीं, उन्होंने दोपहर को खाना ही नहीं खाया! आपकी दीदी नेहा अपने कमरे में चुप-चाप लेटी हुई है! यहाँ तक की आपकी छोटी सी, प्यारी सी बहन स्तुति भी गुमसुम बैठी है! मुझे इस सब के बारे में आपकी दादी जी ने बताया और मैं अपना सब काम छोड़- छाड़ कर यहाँ सिर्फ आपके लिए भागा आया ताकि मैं अपने लाडले बेटे को हँसा-बुला सकूँ| क्या आपकी दोस्त फलक आपको हम सब से ज्यादा प्यारी है? क्या उसके स्कूल बदल लेने से आप इतना दुखी हो की आपको हम सबका दुःख नहीं दिख रहा?" मेरे पूछे प्रश्नों को सुन आयुष भावुक हो गया और उसकी आँखें भर आई| आयुष मेरे सीने से लिपट कर रोने लगा तथा रोते हुए बोला; "सॉरी...पापा जी....मुझे...माफ़...कर दीजिये!" इस समय आयुष को रोने देना जर्रूरी था ताकि उसके मन से उसकी दोस्त के स्कूल छोड़ने का सारा ग़म निकल जाए| मैंने आयुष को अपनी बाहों में कैद कर लिया और उसे जी भर कर रोने दिया|

करीब मिनट भर रोने के बाद आयुष चुप हुआ तो मैंने आयुष को लाड करना शुरू किया; "मेरा बहादुर बेटा, आई ऍम सो प्राउड ऑफ़ यू! आगे से आपको ज़िन्दगी में जब भी लगे की आप बहुत उदास हो तो एक बार अपने परिवार को देखना और सोचना की आपके हार मानने से, आपके उदास होने से आपके परिवार पर क्या बीतेगी? ये सवाल सोचते ही आपकी सारी उदासी, सारी परेशानियाँ हार जाएँगी!

हम लड़कों के ऊपर अपने परिवार की सारी जिम्मेदारी होती है, हमारे यूँ हार मानने से, उदास होने से हमारा परिवार टूटने लगता है इसलिए हालात कैसे भी हों कभी हार नहीं माननी, कभी यूँ उदास नहीं होना..बल्कि आ कर सीधा मुझसे या अपनी मम्मी से बात करनी है ताकि हम मिलकर समस्याओं का हल मिल कर निकाल सकें|" देखा जाए तो मेरी कही ये सब बातें आयुष जैसे छोटे बच्चे के लिए बहुत बड़ी थीं मगर मुझे ये देख कर ख़ुशी हुई की आयुष ने मेरी दी हुई ये सीख अपने मन में बसा ली और जीवन में आजतक कभी उदासी का मुँह नहीं देखा|

हम बाप-बेटे को छत पर आये हुए 1 घंटा होने को आया था इसलिए माँ, संगीता, स्तुति और नेहा छत पर आ पहुँचे| माँ ने जब हम बाप-बेटों को टंकी के ऊपर बैठे देखा तो माँ ने गुस्सा करते हुए हमें नीचे उतरने को कहा| नीचे उतर कर आयुष ने अपनी दादी जी तथा अपनी मम्मी के पाँव छू कर उनसे माफ़ी माँगी; "दादी जी.मम्मी.मुझे माफ़ कर दीजिये की मैंने ऐसे उदास हो कर आपको दुःख पहुँचाया| मैं वादा करता हूँ की आज के बाद मैं कभी उदास हो कर आप सभी को दुःख नहीं दूँगा|" एक छोटे से बच्चे के मुख से इतनी बड़ी बात सुन माँ और संगीता का दिल भर आया और दोनों ने मिलकर आयुष को लाड-प्यार किया|

उधर स्तुति अपने बड़े भैया को सबसे माफ़ी माँगते हुए बड़े प्यार से देख रही थी| जब आयुष को सब ने लाड-प्यार कर लिया तो स्तुति ने अपने भैया को पुकारा; "आइया...चो...को (चॉकलेट)" ये कहते हुए स्तुति ने अपने बड़े भैया आयुष को खुश करने के लिए अपनी आधी खाई हुई चॉकलेट दी| आयुष ने हँसते हुए स्तुति की आधी खाई हुई चॉकलेट ले ली और बोला; "स्तुति, बाकी की चॉकलेट कहाँ गई?" आयुष के पूछे सवाल के जवाब में स्तुति मसूड़े दिखा कर हँसने लगी और तब हमें पता चला की स्तुति आधी चॉक्लेट खुद खा गई!

"चॉकलेट तो ये पिद्दा आयुष के लिए लाई थी मगर सीढ़ी चढ़ते हुए इस शैतान को लालच आ गया और इस शैतानी की नानी ने आधी चॉकलेट खुद ही खा ली! " नेहा ने स्तुति की चुगली की जिसपर हम सभी ने जोरदार ठहाका लगाया!

[color=rgb(65,]जारी रहेगा भाग - 9 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]अंतिम अध्याय: प्रतिकाष्ठा[/color]
[color=rgb(51,]भाग - 9[/color]

[color=rgb(26,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

उधर स्तुति अपने बड़े भैया को सबसे माफ़ी माँगते हुए बड़े प्यार से देख रही थी| जब आयुष को सब ने लाड-प्यार कर लिया तो स्तुति ने अपने भैया को पुकारा; "आइया...चो...को (चॉकलेट)" ये कहते हुए स्तुति ने अपने बड़े भैया आयुष को खुश करने के लिए अपनी आधी खाई हुई चॉकलेट दी| आयुष ने हँसते हुए स्तुति की आधी खाई हुई चॉकलेट ले ली और बोला; "स्तुति, बाकी की चॉकलेट कहाँ गई?" आयुष के पूछे सवाल के जवाब में स्तुति मसूड़े दिखा कर हँसने लगी और तब हमें पता चला की स्तुति आधी चॉक्लेट खुद खा गई!

"चॉकलेट तो ये पिद्दा आयुष के लिए लाई थी मगर सीढ़ी चढ़ते हुए इस शैतान को लालच आ गया और इस शैतानी की नानी ने आधी चॉकलेट खुद ही खा ली! " नेहा ने स्तुति की चुगली की जिसपर हम सभी ने जोरदार ठहाका लगाया!

[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]


[color=rgb(255,]प्रतिकाष्ठा[/color]

समय का चक्र इतनी तेज़ी से घूमा की आयुष, नेहा और स्तुति कुछ ज्यादा जल्दी ही बड़े हो गए!

सबसे छोटी स्तुति न केवल मस्ती करने में आगे रहती थी बल्कि वो अब चुलबुली बन गई थी| स्तुति बिलकुल गोलू-मोलू थी और इतनी प्यारी की उसे देख हर कोई उस पर मोहित हो जाता| पूरा दिन स्तुति घर में फुदकती रहती और कुछ न कुछ रटती रहती| कभी अपने कार्टून का नाम तो, कभी कोई गाना गुनगुनाती रहती| कभी अपने खिलोनो के साथ खेलती तो कभी अपनी मम्मी के पीछे घूमती रहती| स्तुति के मन में इतनी जिज्ञासा भरी थी की वो सभी से सवाल पूछती रहती| स्तुति की इस जिज्ञासा से संगीता अक्सर चिढ जाती और स्तुति को बाहर भगा देती!

जब भी घर में कोई समारोह होता और काम बाँटा जाता तो स्तुति का हाथ सबसे पहले उठता| "हम करब" कहते हुए स्तुति कूदने लगती, वो बात अलग है की उसे काम कोई नहीं दिया जाता क्योंकि अक्सर स्तुति की मस्तियाँ काम बढ़ा दिया करती थीं| लेकिन स्तुति काम न मिलने पर उड़ा नहीं होती, बल्कि वो सबके काम पर नज़र रखने का काम करती| किसी से कोई गलती हुई नहीं की स्तुति किसी मास्टरनी की तरह गलती गिनाने लग जाती|

मस्ती के अलावा खाने-पीने के मामले में स्तुति हमेशा आगे रहती थी| भाईसाहब जब भी घर में कथा-भागवत बैठाते तो खाने में क्या बनेगा ये सवाल केवल स्तुति से पुछा जाता| फिर तो स्तुति बिलकुल अपनी मम्मी की तरह खाने की चीजें गिनाने लगती, जिसे देख सभी ज़ोर से ठहाका लगाने लगते|

जब स्तुति अपनी नानी जी के घर जाती तो वहाँ जा कर स्तुति के मस्ती भरे पँख निकल आते| कभी अपने चरण नाना जी की दूकान में बैठ कर उनकी दूकान की बिक्री बढ़ाने के लिए; "ले लो..ले लो.. तीन रुपये में दुइ ठो पान ले लो!" का नारा ज़ोर-ज़ोर से लगाती तो कभी अपनी नानी जी के पास बैठ कर उन्हें अंग्रेजी सिखाने लगती| एक दिन तो स्तुति की नानी जी ने मुझे फ़ोन घुमा कर उसकी शिकायत करनी शुरू कर दी; "ई मुन्नी हमका अंग्रेजी सिखावत है! अब तुहुँ बतावा हम का करि?!" लेकिन स्तुति ने हार मानना नहीं सीखा था इसलिए उसने अपनी नानी जी को "आई लव यू" बोलना सीखा दिया| फिर तो जब भी स्तुति अपनी नानी जी के घर जाती, उसकी नानी जी उसे रोज़ आई लव यू कह कर लाड-प्यार करतीं|

इधर, भाईसाहब अपनी छोटी सी भाँजी में अपनी बहन संगीता का बचपना देखते और स्तुति को खूब लाड-प्यार करते| जब भी स्तुति अपने बड़े मामा जी के पास होती तो भाईसाहब स्तुति को अपनी पीठ पर लादे हुए पूरे गॉंव में टहला लाते| आखिर जो प्यार भाईसाहब अपनी बहन संगीता को नहीं दे पाए वो प्यार अब स्तुति पर लुटाया जा रहा था|

वहीं भाभी जी यानी स्तुति की बड़ी मामी जी तो स्तुति को सबसे ज्यादा लाड करतीं| जब भी स्तुति घर आती तो उसे गोद में बिठा कर उसकी पसंद का खाना बनतीं| स्तुति अगर कुछ बाहर से खाने को माँगती तो भाभी जी तुरंत विराट या भाईसाहब को वो वो खाने की चीज़ लाने को दौड़ा देतीं| स्तुति भी अपनी बड़ी मामी जी को कम प्यार नहीं करती थी, हमेशा अपनी मामी जी की मदद करने के लिए स्तुति सबसे आगे होती|

जब स्तुति की उम्र स्कूल जाने की हुई तो और भी गजब हुआ| जहाँ बाकी बच्चे स्कूल के पहले दिन रोते हैं, स्तुति एकदम निडर थी बल्कि ये कहना उचित होगा की वो तो स्कूल जाने को अतिउत्साहित थी! स्कूल के पहले ही दिन स्तुति की क्लास के सारे बच्चे उसके दोस्त बन गए तथा अध्यापिकायें स्तुति के गोल-मटोल गाल खींचते नहीं थकती थीं| स्तुति के छुटपन में जो मैंने, नेहा और आयुष ने मिल कर स्तुति को ABCD तथा पोएम याद कराईं थीं उस कारण स्तुति का मन पढ़ाई में लग गया था, तभी तो स्तुति की सारी अध्यपिकाएँ उसकी तारीफ करते नहीं थकती थीं| जितना स्तुति मस्ती करने में आगे थी, उतना ही वो पढ़ाई करने में आगे थी| पढ़ाई के मामले में हमारे पूरे परिवार में स्तुति ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है और वो ये की आजतक स्तुति अपनी क्लास में फर्स्ट ही आई है!

चूँकि स्तुति बड़ी हो चुकी थी इसलिए उसने आयुष को अब 'बड़े भैया' कह कर बुलाना शुरू कर दिया था| वहीं अपनी छोटी बहन के मुख से ये प्यारभरे शब्द सुन कर आयुष का सीना गर्व से फूल कर कुप्पा हो जाता| दोनों भाई-बहन के बीच प्यार बहुत घनिष्ट था, दोनों एक साथ बैठ कर खाना खाते, एक साथ अपने स्कूल का होमवर्क करते| यदि स्तुति को पढ़ाई में कोई कठनाई होती तो आयुष स्तुति को पढ़ाने बैठ जाता और खाने-पीने के उदहारण दे कर समझाता, जिससे स्तुति को बहुत मज़ा आता| स्तुति की मस्तियों के कारण जब भी स्तुति को डाँट पड़ती तो आयुष फौरन उसे बचाने आ जाता और स्तुति के हिस्से की डाँट खुद खाता| स्तुति को अपने बड़े भैया की शय मिलती थी इसलिए स्तुति और भी अधिक मस्तियाँ करती|

वहीं, अपनी दिद्दा नेहा के साथ स्तुति का रिश्ता नोक-झोंक भरा था! स्तुति को अपनी दिद्दा को तंग करने में कुछ ज्यादा ही मज़ा आता था| नेहा के बाल खींचने की आदत जो स्तुति ने अपने छुटपन में सीखी थी वो आदत स्तुति में अब भी थी| जब भी नेहा पढ़ रही होती तो स्तुति दबे पॉंव पीछे से आती और अपनी दिद्दा की चोटी खींच कर भाग जाती! कभी-कभी स्तुति अपनी दिद्दा के कपड़े पहन कर देखती, अब नेहा के कपड़े स्तुति के लिए बहुत बड़े थे इसलिए कपड़े अधिकतर ज़मीन से लथेड़ जाते और मिटटी के कारण गंदे हो जाते| जब नेहा देखती की उसके कपड़ों पर मिटटी लगी है तो नेहा स्तुति को सबक सिखाने उसके पीछे दौड़ती मगर स्तुति इतनी फुर्तीली थी की वो अपनी दिद्दा को चकमा दे कर भाग जाती! यही नहीं कभी-कभी स्तुति अपनी दिद्दा की चप्पल पहन कर जाती और जहाँ-तहाँ फेंक आती, जिस पर नेहा बहुत गुस्सा होती और फिर स्तुति के पीछे भागती!

स्तुति की ये मस्तियाँ नेहा को न भातिं इसलिए नेहा अपना अलग बदला लेती| जब स्तुति सो रही होती तो उसके ऊपर पानी डालकर उसे उठा देती, जिससे स्तुति रोने लगती! स्तुति खेलती हुई नज़र आई नहीं की नेहा उसे पढ़ने के लिए डाँटने लगती, अतः डर के मारे स्तुति पढ़ने बैठ जाती| आयुष अपनी छोटी बहन के लिए जब टॉफ़ी या चॉकलेट लाता तो नेहा फट से सब चट कर जाती, अब स्तुति को आता गुस्सा इसलिए वो अपनी दिद्दा की शिकायत करने चल पड़ती, तब नेहा उसके कान पकड़ कर उसे कमरे में बंद कर देती और जबतक स्तुति का रोना शुरू नहीं होता तब तक दरवाजा बंद ही रखती| वो तो आयुष आ कर हाथ जोड़कर अपनी दीदी से स्तुति की मस्तियों की माफ़ी माँगता, तब जा कर नेहा दरवाजा खोलती!

ऐसा नहीं था की नेहा को स्तुति से कोई चिढ होती थी, या नेहा हमेशा ही स्तुति को डाँटती रहती थी| जब स्तुति का रिजल्ट आता तो स्तुति सबसे पहले दौड़ कर अपनी दिद्दा के पास आती और नेहा स्तुति का रिपोर्ट कार्ड देख उसके फर्स्ट आने पर स्तुति को खूब लाड-प्यार करती| स्तुति को कपड़े पहनने का सलीका नेहा ही सिखाती थी, यहाँ तक की स्तुति को जब अपनी चोटी बनवानी होती तो वो सीधा अपनी दिद्दा के पास दौड़ी आती| दरअसल, नेहा चाहती थी की स्तुति मस्ती कम और पढ़ाई ज्यादा करे, लेकिन जब स्तुति अधिक मस्ती करती तो नेहा उस पर खफा हो जाती!

खैर, स्तुति मस्तीखोर सही मगर उसकी ये मस्तियाँ केवल घर में होती थीं| जब कभी कोई मेहमान घर आया हो या कहीं बाहर जाना हो तो स्तुति बिलकुल मस्ती नहीं करती तथा अपने बड़े भैया के साथ रहती|

आयुष की बात करें तो, मैंने जो आयुष को थोड़ी-थोड़ी जिम्मेदारियाँ लेना सिखाया था उस वजह से आयुष एक आदर्श बेटे के रूप में उभर कर आया| घर का कोई भी काम हो, आयुष पूरी निष्ठा से पूरा करता और सारा हिसाब-किताब सीधा अपनी मम्मी को देता| संगीता ने भले ही आयुष को बहुत डाँटा हो मगर अब आयुष अपनी मम्मी का लाडला बन गया था|

आयुष को क्रिकेट खेलने का बहुत शौक था इसलिए एक समय ऐसा आया जब आयुष पढ़ाई की तरफ थोड़ा ढीला हो गया था, जिस कारण आयुष के पढ़ाई में कम नंबर आये, नतीजन आयुष को सबसे डाँट पड़ी| उस समय मैंने आयुष को प्यार से समझाया; "बेटा, मैं जानता हूँ की आपको क्रिकेट खेलना बहुत अच्छा लगता है और आप आगे चलकर क्रिकेटर बनना चाहते हो मगर बेटा क्रिकेट में स्कोप नहीं है! इस खेल में कम्पीटिशन इतना है की आप सबका मुक़ाबला नहीं कर पाओगे!

बेटा हम लड़कों पर बहुत जिम्मेदारियाँ होती हैं इसलिए कई बार अपने परिवार के लिए अपनी पसंद की चीजों का त्याग करना होता है| क्रिकेट खेलने से आप पैसे नहीं कमा पाओगे| केवल पढ़ाई ही है जो आपको बड़े हो कर पैसे कमाने में मदद करेगी|

आप क्रिकेट को बस अपने मनोरंजन के लिए खेलो और अपना ध्यान केवल पढ़ाई में लगाओ| आपको मैथमेटिक्स मुश्किल लगता है न, तो मैं आपकी मैथमेटिक्स की टूशन लगवा देता हूँ| अगर आपको टूशन में कुछ समझ न आये तो बताना, मैं आपकी क्लास टीचर से बात करूँगा|" मेरी बात थोड़ी कड़वी थी मगर आयुष को समझ आ गई थी| उस दिन से आयुष ने अपना मन पढ़ाई में लगा लिया| आयुष पढ़ाई में अव्वल तो नहीं आ पाता था मगर अपनी क्लास के टॉप 10 में अवश्य आता था, जिससे परिवार में अब किसी को आयुष से कोई शिकायत नहीं रहती थी|

जैसे-जैसे आयुष बड़ा होता गया, हम बाप-बेटे का रिश्ता दोस्ती के रिश्ते में बदल गया|

वहीं दूसरी तरफ, मेरी बिटिया नेहा में गज़ब का आत्मविश्वास पैदा हो गया था| जब से नेहा को फ़ोन मिला था, नेहा ने फेसबुक पर अपना अकाउंट बना अपने नए दोस्त बनाने शुरू किये| इन्हीं नए दोस्तों में से एक करुणा भी थी, करुणा ने नेहा का नंबर ले लिया और फिर दोनों what's app पर चैट करने लगे|

संगीता जब नेहा को अपने फ़ोन में घुसी देखती तो उसे बहुत गुस्सा आता और वो नेहा को डाँटने लगती| धीरे-धीरे संगीता को शक होने लगा की कहीं नेहा क्लास के लड़कों के साथ what's app पर ऐसी-वैसी बातें तो नहीं करती?! अब मुझे अपनी बेटी पर पूरा विश्वास था की वो ऐसा कोई काम नहीं करती मगर संगीता के शक का निवारण करना जर्रूरी था वरना फिर संगीता का मुँह बन जाता! संगीता के मन की तसल्ली के लिए मुझे अपनी ही बेटी के साथ छल करना था|

एक बार मुझे किसी को फ़ोन करना था तब मैंने नेहा से फ़ोन लिया था, उस समय नेहा ने मुझे अपने फ़ोन का पासवर्ड बताया था| मैंने वो पासवर्ड संगीता को बताया तथा नेहा को अपनी बातों में व्यस्त करते हुए छत पर ले आया| संगीता ने इस मौके का फायदा उठाया और नेहा का what's app खँगालने लगी| तभी संगीता को पता चला की नेहा करुणा से चाट करती है मगर दोनों की चैट में कुछ भी ख़ास नहीं निकला| नेहा की बातें अक्सर अपनी सहेलियों से होती और वो सब बातें पढ़ाई या हीरो-हेरोइन से जुडी होतीं| नेहा के फ़ोन में कुछ भी ऐसा-वैसा नहीं निकला था इसलिए संगीता ने चैन की साँस ली|

चूँकि अब संगीता को नेहा के फ़ोन का पासवर्ड पता था इसलिए अब नेहा का फ़ोन चोरी-छुपे संगीता द्वारा रोज़ ही चेक होता था|

चूँकि नेहा बड़ी हो रही थी तो उसे थोड़ी आजादी चाहिए थी| रविवार का दिन था और नेहा के दोस्तों ने मॉल जाने का प्लान बनाया था| नेहा ने जब अपनी मम्मी से इजाजत माँगी तो संगीता ने फौरन न कह दिया! अब देखा जाए तो, जाने को नेहा अपनी दादी जी के पास जा सकती थी मगर माँ के न कहने के आसार ज्यादा थे और एक बार माँ ने न कह दिया तो सब चौपट हो जाता! अतः जब मैं नहा कर आया तो नेहा मेरे पास अपनी आस की टोकरी ले कर आई और मॉल जाने की इजाजत माँगी| "ठीक है बेटा, लेकिन पहले मुझे सारी जानकारी सच-सच बताओ|" ये कहते हुए मैंने नेहा से मॉल जाने के बारे में सारी जानकारी ली तथा नेहा के दोस्तों के नंबर भी ले लिए| "ठीक है बेटा आप जा सकते हो| लेकिन वापसी में स्तुति और आयुष के लिए चॉकलेट ले के आना वरना दोनों रूठ जायेंगे!" मैंने नेहा को खर्चे के लिए कुछ पैसे देते हुए कहा|

मेरी हाँ सुन नेहा ख़ुशी से कूद पड़ी और फटाफट तैयार हुई| वहीं मैंने ये सुनिश्चित किया की नेहा ने अपने जिन दोस्तों के साथ जाने के बारे में मुझे बताया था वही लोग उसे लेने भी आये हैं| नेहा गई तो संगीता भुनभुनाती हुई मुझ पर चढ़ बैठी, साथ ही उसने माँ के दिल में भी मेरे खिलाफ आग लगा दी की मैं कैसे बच्चों को बेवजह सर पर चढ़ा रहा हूँ| अपनी बिटिया का शौक पूरा करने के लिए मुझे माँ और संगीता से पेट भरकर डाँट पड़ी!

नेहा तीन घंटे के लिए बोल कर गई थी मगर नेहा 2 घंटे बाद ही वापस आ गई, इसी वजह से नेहा को अपनी दादी जी से डाँट नहीं पड़ी| नेहा पढ़ाई में अव्वल आती थी, बिलकुल शरारती नहीं थी इस कर के माँ ने नेहा को थोड़ी छूट दे दी मगर माँ ने एक शर्त रखी; "अगर दोस्तों के साथ जाना है तो हमें सब बता कर जाना होगा और सिर्फ दिन में ही जाना होगा! किसी भी हाल में शाम 5 बजे से पहले घर वापस आना वरना ये बाहर घूमना बंद!" माँ की शर्त नेहा ने ख़ुशी-ख़ुशी मान ली और उस दिन से नेहा कभी-कभी अपने दोस्तों के साथ मॉल या पिक्चर जाने लगी|

एक बार नेहा की दोस्त का जन्मदिन था और वो पार्टी रात में एक रेस्टोरेंट में देना चाहती थी| अब माँ ने नेहा के लिए पहले ही समय की लक्ष्मण रेखा बाँध रखी थी जो किसी हाल में नहीं टूटने वाली थी इसलिए नेहा फ़रियाद ले कर सीधा मेरे पास आई| मैंने इस पार्टी के बारे में नेहा से जानकारी ली तो पता चला की इस पार्टी में लड़के भी होंगे! अब मुझे अपनी बेटी की सुरक्षा की चिंता थी मगर नेहा को पार्टी में जाने के लिए मना कर मैं नेहा का दिल नहीं तोडना चाहता था!

न चाहते हुए भी मैंने आधे मन से अपना सर हाँ में हिलाया| परन्तु मेरे दिमाग में एक योजना तैयार हो चुकी थी! इधर मेरी इजाजत पा कर नेहा ख़ुशी से उछल पड़ी और आ कर मेरे सीने से लग कर मुझे थैंक यू बोलने लगी| उधर संगीता मेरे हाँ कहने से गुस्से से तमतमा गई थी और मुझे खा जाने वाली नजरों से घूर रही थी! नेहा अपने पार्टी जाने की खुशखबरी सुनाने अपने दोस्त को फ़ोन करने भागी और संगीता मेरे ऊपर बरस पड़ी; "सर पर चढ़ा लो इसे, फिर जब ये आपके सर पर नाचेगी न तब मेरे पास मत आना!"

शाम को माँ ने पूजा में जाना था और उन्हें रात 10 बजे तक लौटना था इसलिए बड़ी मुश्किल से मैंने संगीता को माँ से ये बात राज़ रखने के लिए मना लिया था| 5 बजे माँ पूजा के लिए निकलीं और 6 बजे नेहा को लेने उसके दोस्त कैब कर के आये| नेहा के जाते ही मैंने संगीता को मस्का लगाना शुरू कर दिया| संगीता रसोई में खाना बना रही थी जब मैंने उसे पीछे से अपनी बाहों में जकड़ लिया और उसे मनाने के लिए तीन जादुई शब्द कहे, जिन्हें सुन संगीता का गुस्सा एक पल में फुर्र्र हो गया; "बियर पीने चलोगी!"

ये तीन जादुई शब्द संगीता के कानों में घुल गए और उसने चहकते हुए मुझे देखा और बिना कोई पल बर्बाद किये हाँ में अपनी गर्दन हिलाई| लेकिन फिर अगले ही पल संगीता का मुँह बन गया और वो सड़ा हुआ सा मुँह बना कर बोली; "इन दोनों शैतानों (आयुष और स्तुति) का क्या?" संगीता के मुँह बनाने पर मुझे हँसी आ गई और मैंने उसी के सामने दिषु को फ़ोन मिलाया; "भाई तेरी एक मदद चाहिए! कुछ देर के लिए तू आयुष और स्तुति को घुमा लायेगा?" मेरी इतनी बात सुनते ही दिषु एकदम से बोल पड़ा; "मतलब आज तुम दोनों का प्रोग्राम फिक्स हुआ है?!" दिषु की बात सुन मैं जोर से हँस पड़ा, वहीं संगीता जिसने स्पीकर पर सारी बात सुनी थी वो लाज से पानी-पानी हो गई!

"नहीं भाई, ऐसा नहीं है..." मैं आगे कुछ कहता उससे पहले ही दिषु मेरी बात काटते हुए बोला; "अबे रहने दे तू, सब जानता हूँ मैं! वैसे एक बात बता की तूने मुझे बच्चों की 'आया' समझा हुआ है? साले प्रोग्राम तू बनाये, बच्चे मैं खिलाऊँ?" दिषु प्यारभरी शिकायत करते हुए बोला| "भाई, आया को तो हम तनख्वा देते हैं, तुझे तो दारु की पार्टी मिलेगी! अब खुश?" जैसे ही मैंने दारु पार्टी का नाम लिया, दिषु की बाछें खिल गईं और वो फट से बोला; "मैं 10 मिनट में आ रहा हूँ, तू बच्चों को तैयार कर!" दिषु की बात सुन मेरी हँसी छूट गई और संगीता भी मुँह छुपाते हुए हँसने लगी!

दिषु को तो मैंने बुला लिया मगर आयुष और स्तुति को भी तो बाहर जाने के लिए मनाना था?! संगीता को तैयार होने के लिए बोल मैंने जैसे ही आयुष और स्तुति को बाहर घूमने जाने की बात कही तो स्तुति फट से मेरी गोदी में चढ़ गई और बोली; "पपई...आइस...क्रीम!" स्तुति चहकते हुए बोली|

"बेटा, आपके दिषु चाचू आ रहे हैं और वो है न आपको आइस क्रीम खिलाएंगे और फिल्म दिखाने ले जायेंगे|" दिषु के साथ घूमने जाने की बात सुन आयुष तो फट से तैयार हो गया मगर स्तुति ने मेरी कमीज अपनी मुठ्ठी में जकड़ ली और अपनी गर्दन न में हिलाने लगी की वो नहीं जायेगी! ""बेटा, आपके दिषु चाचू आपको कितना प्यार करते हैं, हमेशा आपके लिए चॉकलेट लाते हैं| आज उनका मन आपको घुमाने का है, उनको ऐसे मना करना अच्छी बात नहीं न?! वो आपको गाडी में घुमाने ले जायेंगे और ढेर सारी आइस क्रीम खिलाएंगे!" मेरी बात सुन स्तुति ने अपना निचला होंठ फुला कर मुझे अपने मोहपाश में जकड़ने का प्रयास किया| "मेरा, प्यारा बच्चा है न? प्लीज बेटा, थोड़ी देर के लिए चले जाओ न?!" मैंने स्तुति के मोहपाश के जवाब में अपना मोहपाश फेंका तो स्तुति ने मेरी बात मान ली| "जब आप वापस आओगे न तो मैं आपको खूब सारी कहानी सुनाऊँगा और रसमलाई भी खिलाऊँगा|" मेरी बात सुन स्तुति के दिल प्रसनत्ता से भर गया और वो ख़ुशी से खिलखिलाने लगी|

कुछ समय बाद, जब दिषु बच्चों को लेने आया तो वो मुझे आँख मारते हुए बुदबुदाया; "साढ़े आठ तक आऊँगा, तब तक अपना 'काम' निपटा लियो!" दिषु की बात सुन मैं हँस पड़ा और उसे बाद में सारी बात बताने का इशारा किया| इधर दिषु दोनों बच्चों को ले कर निकला और 10 मिनट बाद हम मियाँ-बीवी कैब कर निकले| पहली बार मेरे साथ बियर पीने के लालच के कारण आज संगीता ख़ुशी से फूली नहीं समा रही थी|

अब चूँकि हम एक महँगे रेस्टोरेंट में जा रहे थे और हमने सिर्फ बियर ही पीनी थी इसलिए मैंने संगीता को जीन्स और टी-शर्ट पहनने को कहा, संगीता ने मेरी बात मानी तथा एक गोल गले की टी-शर्ट पहनी, ये टी-शर्ट कुछ ज्याद तंग थी और संगीता बहुत ही कामुक लग रही थी!

बहरहाल मैं, संगीता को ले कर उसी रेस्टोरेंट पहुँचा जहाँ नेहा अपने दोस्तों के साथ आई थी| मेरी असली योजना थी की मैं साये की तरह अपनी बेटी के पीछे रहूँगा और उसके दोस्तों पर नज़र रखूँगा ताकि कहीं कोई लड़का मेरी बेटी को गलत रास्ते पर बहकाने की कोशिश न करे| संगीता मेरी इस योजना से फिलहाल अनजान थी, वो तो बस बियर पीने की बात से ही अतिउत्साहित थी|

नेहा जिस रेस्टोरेंट में पार्टी करने अपने दोस्तों के साथ आई थी, उस रेस्टोरेंट में मैं पहले भी आ चूका था और जानता था की यहाँ पर कौन सा टेबल मेरे लिए सही रहेगा| मैंने रेस्टोरेंट में सबसे पीछे की ओर का टेबल बुक किया, यहाँ से मैं नेहा और उसके दोस्तों पर नज़र रख सकता था लेकिन वो मुझे यहाँ नहीं देख सकते थे|

खैर, संगीता आज पहलीबार बियर पी रही थी इसलिए उसे अच्छी बियर पिलानी चाहिए थी इसलिए मैंने Lager beer मँगवाई| इस बियर की ख़ास बात ये थी की ये कड़वी नहीं थी बल्कि हलकी सी मीठी थी, साथ ही इसमें नशा बहुत कम था| वेटर ने बियर की दो कैन रखी तथा खाने के लिए चिकन लॉलीपॉप परोसा| बियर की कैन देख संगीता की आँखें छोटे बच्चों की तरह टिमटिमाने लगी| संगीता ने बियर की कैन उठाई मगर संगीता को कैन खोलना नहीं आता था इसलिए वो छोटे बच्चों की तरह मुँह बना कर मुझे देखने लगी| मैंने बियर की कैन खोल कर संगीता को दी तो संगीता की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा| फिर मैंने अपनी बियर की कैन खोली तथा संगीता की बियर की कैन से टकराई और बोला; "चियर्स!" संगीता ने भी मेरी देखा-देखि चियर्स कहा और हमने एक साथ बियर का पहला घूँट पीया|

"जानू.....उम्म्म्म....ये तो बहुत स्वाद है!" संगीता खुश होते हुए बोली| अपनी पत्नी के इस भोलेपन को देख मैं मुस्कुरा दिया और उसे चिकन लॉलीपॉप खाने को कहा| संगीता ने चिकन लॉलीपॉप पहले भी खाया था इसलिए उसे स्वाद में कुछ नयापन नहीं मिला, चिकन के मुक़ाबले बियर नई चीज़ थी और संगीता को इसमें खूब स्वाद आ रहा था|

एक तरफ संगीता अपनी बियर का स्वाद लेने में मस्त थी, तो दूसरी तरफ मेरी नज़रें मेरी बिटिया नेहा और उसके दोस्तों पर गड़ी थीं| बार-बार मेरे मन में एक डर उमड़ रहा था की कहीं कोई लड़का मेरी बिटिया को गलत तरीके से छूने की कोशिश तो नहीं करेगा? कहीं कोई मेरी बिटिया को धोके से नशे की कोई चीज़ खिला-पिला तो नहीं देगा? मेरे मन के ये ख्याल माँ के साथ CID और क्राइम पैट्रॉल देखने के कारण पैदा हुए थे!

वैसे देखा जाए तो एक बेटी का पिता होने के कारण मेरा यूँ अपनी बेटी के लिए चिंतित होना जायज बात थी|

खैर, कुछ ही देर में संगीता ने मुझे नेहा पर नज़र रखते हुए पकड़ लिया था| नेहा को देख संगीता सारी बात समझ गई और मुझसे रूठते हुए बोली; "अच्छा जी?! तो ये कारण है की जनाब के मन में अचानक मेरे लिए प्रेम जाग गया?! और मैं बेवकूफ सोच रही थी की मेरे पति देव सच में मुझे इतना प्यार करते हैं की मेरी ख़ुशी के लिए मुझे बियर पिलाने बाहर लाये हैं!" ये कहते हुए संगीता का मुँह टेढ़ा हो गया|

"तुम्हें क्या लगा की मुझे अपनी बेटी की चिंता नहीं? मैं यूँ ही उसे आज़ादी दिए जा रहा हूँ? मुझे अपनी बेटी पर पूरा भरोसा है की मेरी बिटिया कभी कोई गलत काम नहीं करेगी, कभी मुझसे झूठ नहीं बोलेगी मगर मैं उसके लड़के दोस्तों पर भरोसा नहीं करता इसीलिए मैंने यहाँ चुपचाप आ कर नेहा के लड़के दोस्तों पर नज़र रख रहा हूँ|

और तुम काहे नाराज़ हो रही हो?! तुम्हें आज अच्छी वाली बियर पीने को मिल गई न?! तुम बस मज़े से अपनी बियर का स्वाद लो!" मैं कभी नहीं चाहता था की नेहा के दोस्त लड़के बनें क्योंकि मैं आजकल के लड़कों की मानसिकता अच्छे से जानता हूँ लेकिन मेरे लिए नेहा को लड़के दोस्त बनाने से रोक पाना मुमकिन नहीं था|

बहरहाल, मेरी बात सुन संगीता मंद-मंद मुस्कुराने लगी क्योंकि उसे मेरे नेहा पर नज़र रखने की बात से ख़ुशी हो रही थी|

मैंने वेटर को बुलाया और उससे संगीता के मन की तसल्ली के लिए पुछा; "यार, यहाँ पर नाबालिग बच्चे हैं और आप सब को बियर सर्व (serve) कर रहे हो, बच्चे बियर नहीं आर्डर नहीं करते?" मैं जानता था की रेस्टोरेंट वाले कम उम्र के बच्चों को लिकर (liquor) सर्व नहीं करते मगर मैंने ये सवाल सिर्फ और सिर्फ संगीता के मन की तसल्ली के लिए पुछा था ताकि संगीता घर जा कर मुझसे ये कह कर न लडे की मैंने नेहा को ऐसे रेस्टोरेंट में जाने कैसे दिया जहाँ पर लिकर सर्व की जाती है|

"सर, हमारे यहाँ किसी भी अंदरऐज (underage) को लिकर सर्व नहीं की जाती! ऐसा करना दंडनीय अपराध है! अगर बच्चे बियर आदि माँगते भी हैं तो हम उन्हें साफ़ मना कर देते हैं|" वेटर की बात सुन संगीता के मन को तसल्ली हो गई थी और उसने इस बात को लेकर मुझसे कोई सवाल-जवाब नहीं किया|

संगीता ने दो कैन बियर पी और शुक्र है की उसे चढ़ी नहीं! वहीं नेहा के दोस्तों ने अपना बिल चूका दिया था तथा वो सब एक साथ निकल गए थे| संगीता ने बियर तो निपटा दी थी बस उसे अब चिकन साफ़ करना था, चिकन साफ़ करने में संगीता ने थोड़ा टाइम लिया जिस कारण हम 10 मिनट लेट हो गए!

बिल चूका कर मैंने फटाफट ऑटो किया; "भैया, थोड़ा जल्दी चलो!" मैंने ऑटो वाले को कहा और हम बड़ी मुश्किल से नेहा के घर पहुँचने से पहले घर पहुँचे| मुँह-हाथ धो, कपड़े बदल मैं घर से बाहर आ गया और कुछ दूरी पर खड़ा हो गया| इतने में दिषु आयुष और स्तुति को ले कर घर लौटा, दोनों बच्चे सीढ़ी चढ़ ऊपर गए तो मैंने दिषु को फ़ोन कर जहाँ मैं खड़ा था वहाँ बुलाया| हम दोनों दोस्त खड़े हो कर बात कर ही रहे थे की नेहा की कैब आ गई, नेहा कैब से उतरी तथा अपने दोस्तों को बाय (bye) कह ऊपर चली गई| इधर मैं दीषु के साथ उसकी गाडी में घूमने निकल गया| मेरा दिषु के साथ जाने का कारण ये था की मैंने पी कर अपने बच्चों के सामने न जाने की कसम खाई थी और मैं ये कसम तोडना नहीं चाहता था|

उधर घर पहुँच कर नेहा ने देखा की स्तुति मुँह फुलाये घूम रही है! स्तुति के गुस्सा होने का कारण ये था की नेहा उसे अपने साथ पार्टी करने नहीं ले गई थी| लेकिन जैसे ही नेहा ने स्तुति के लिए लाई हुई चॉकलेट अपनी जेब से निकाली, स्तुति अपना गुस्सा छोड़ कर चॉकलेट लेने दौड़ पड़ी| "दीदी, आपने स्तुति को चॉक्लेट क्यों दी? हम तो दिषु चाचू के साथ फिल्म और बाहर खाना खा कर लौटे हैं|" आयुष के मुख से सच सुन नेहा प्यारभरा गुस्सा ले कर नेहा के पीछे दौड़ पड़ी; "पिद्दा! ला वापस दे मेरी चॉकलेट!" नेहा ने झूठ-मूठ अपनी दी हुई चॉकलेट माँगी मगर स्तुति अपनी चॉकलेट को बचाने के लिए पूरे घर में दौड़ती रही!

बहरहाल, संगीता ने बच्चों की मस्ती रुकवाई और तीनों को जल्दी सोने के लिए डाँट लगाई| "मम-मम...पपई?" स्तुति को मेरे बिना नींद नहीं आती थी इसलिए उसने मेरे बारे में पुछा| स्तुति के मेरे बारे में पूछते ही आयुष और नेहा भी मेरे बारे में पूछने लगे|
"तुम्हारे पपई कुछ काम से अभी बाहर गए हैं, थोड़ी देर में आ जायेंगे| अब जल्दी से सो जाओ, सुबह स्कूल जाना है|" संगीता ने जैसे ही स्कूल जाने की बात कही नेहा और आयुष तो सोने के लिए तुरंत तैयार हो गए मगर स्तुति आँखों में सवाल लिए हुए अपनी मम्मी से बोली; "मम-मम...स्कूल? मेला तो स्कूल न..ई!" स्तुति के कहने का मतलब था की उसका तो सुबह कोई स्कूल नहीं इसलिए वो जाग कर मेरा इंतज़ार करेगी| स्तुति का ये तर्क सुन नेहा और आयुष खिलखिलाकर हँसने लगे, वहीं संगीता प्यारभरा गुस्सा लिए हुए स्तुति से बोली; "मेरी नानी! सो जा चुप-चाप, वरना लगाऊँगी तुझे एक!" संगीता का प्यारभरा गुस्सा देख तीनों बच्चे खिलखिलाकर हँसने लगे!

चूँकि मैंने बियर पी रखी थी और मैं बच्चों के सामने इस हालत में नहीं आना चाहता था इसीलिए संगीता बच्चों को जबरदस्ती सोने को कह रही थी| सुबह होने पर मैं नहा-धो कर पूजा कर तीनों बच्चों को गोदी ले कर प्यार करता|

मैं जान बूझ कर देर से घर लौटा, मेरे लौटने तक माँ घर आ चुकीं थीं| मैंने माँ से थोड़ी बातचीत की मगर मैंने उन्हें नेहा के पार्टी जाने के बारे में कुछ नहीं बताया| माँ तो आराम से सो गईं, लेकिन इधर मेरे कमरे में संगीता का मूड एकदम से रोमांटिक हो गया था| वो रात अपुन दो बजे तक रोमांस किया!

अगली सुबह नाहा-धो कर, पूजा कर मैं बच्चों को उठाने पहुँचा| "नेहा बेटा...आयुष बेटा...स्तुति बेटू!" जैसे ही मैंने तीनों बच्चों को पुकारा आयुष-नेहा तो नींद में कुनमुनाते रहे मगर मेरी आवाज़ सुन सबसे पहले स्तुति उठी और मुझे देख जोर से चिल्लाई; "पपई!!!" मैंने अपनी बाहें खोलीं तो स्तुति ने मेरी गोदी में आने के लिए छलाँग लगा दी| मेरी गोदी में आ कर स्तुति की कल अपने दिषु चाचू के साथ की गई मस्ती का विवरण शुरू हो गया| तभी माँ स्तुति का शोर सुन कर कमरे में आईं, अपनी दादी जी को देख स्तुति ने अपने तकिये के नीचे रखी हुई चॉकलेट निकाली और अपनी दादी जी को दिखाते हुए बोली; "दाई...दिद्दा!"

जब भी नेहा अपने दोस्तों के साथ कहीं घूमने जाती थी तो वापसी में नेहा हमेशा स्तुति के लिए चॉकलेट लाती और स्तुति बड़े गर्व से अपनी दिद्दा द्वारा लाई हुई चॉकलेट अपनी दाई को दिखाती| माँ ने जब स्तुति के हाथ में चॉकलेट देखि तो माँ समझ गईं की नेहा कल अपने दोस्तों के साथ बाहर गई थी, जिसके बारे में मैंने उन्हें अभी तक कुछ नहीं बताया था|

अनजाने में मेरी छोटी बिटिया ने अपनी दादी जी के दिल में प्रति गुस्सा जगा दिया था|

माँ गुस्से से मुझे घूर रहीं थीं और उनके इस प्रकार घूरने पर स्तुति घबरा कर मुझसे लिपट गई| "वाह बेटा वाह, बहुत छूट दे रखी है तूने बच्चों को! बच्चे कहाँ जाते हैं मुझे बताने की जर्रूरत नहीं समझी तूने?" माँ ने मुझे ताना मारते हुए डाँट लगाई| माँ की डाँट सुन मेरा सर शर्म से झुक गया| वहीं माँ की डाँट सुन आयुष और नेहा एकदम से उठ कर बैठ गए|

मैंने माँ को सारी बात बताई मगर मेरे और संगीता के चोरी-छुपे नेहा के पीछे जाने के बारे में कुछ नहीं बताया| सारी बात सुन माँ ने संगीता को भी डाँट लगाई मगर मैंने संगीता को बचाने के लिए सारा इलज़ाम अपने सर ले लिया| अब चूँकि मैं अकेला ही कसूरवार था इसलिए माँ ने मुझे ही अपने गुस्से का निशाना बनाया| माँ ने मुझे बहुत डाँटा और मैं सर झुकाये उनकी डाँट सुनता रहा| 10 मिनट बाद जब माँ का मुझे डाँटना हो गया तो उन्होंने दोनों बच्चों को सख्ती के साथ स्कूल के लिए तैयार होने को कहा| बच्चे डर के मारे फटाफट स्कूल के लिए तैयार हुए और माँ खुद बच्चों को स्कूल छोड़ने गईं| गौर करने वाली बात ये थी की दोनों बच्चे इतने डरे हुए थे की उनकी हिम्मत नहीं पड़ी की वो अपनी दादी जी से कोई बात कर सकें इसलिए दोनों बच्चे पूरे रास्ते सर झुकाये खामोश रहे|

जब माँ घर लौटीं तो मैंने कान पकड़ माँ से माफ़ी माँगी और उन्हें सारी बात समझाई| परन्तु मेरी माँ पुरानी विचार धारा की हैं और उनके अनुसार बच्चों को यूँ रात के समय दोस्तों के साथ बाहर जाने देने से बच्चे बिगड़ जाते हैं| हालाँकि मैंने माँ को बहुत समझाया की मैं हमेशा नेहा के साथ साये की तरह रहूँगा मगर माँ नहीं मानी और इसे मेरी आखरी गलती समझ माफ़ कर दिया|

स्तुति जो की अपनी दाई के गुस्से से घबराई हुई थी उसे माँ ने कुछ नहीं कहा, बल्कि स्तुति के मोह के कारण ही माँ का क्रोध शांत हुआ| दोपहर को जब दोनों बच्चे स्कूल से लौटे तो दोनों ने सीधा पानी दादी जी के पॉंव पकड़ लिए और रुनवासे हो कर माफ़ी माँगने लगे| माँ ने दोनों बच्चों को माफ़ केवल एक शर्त पर किया की बच्चे आगे से माँ से कोई बात नहीं छुपायेंगे| बच्चों के लिए उनकी दादी सर्वोपरि थीं इसलिए दोनों बच्चों ने अपनी दादी जी से वादा कर दिया|

अपनी दादी जी से माफ़ी ले कर नेहा मेरे पास आई और मुझसे माफ़ी माँगने लगी; "पापा जी, मुझे माफ़ कर दो, मेरे कारण आपको दादी जी से इतनी डाँट पड़ी|" नेहा बहुत भावुक हो गई थी इसलिए मैंने नेहा को अपने गले लगाया और बोला; "कोई बात नहीं बेटा जी| सभी मम्मियाँ अपने बच्चों को डाँटती हैं, लेकिन बच्चे अपनी मम्मी की डाँट का बुरा थोड़े ही लगाते हैं|" मैंने नेहा के सर को चूमते हुए कहा तथा उसे लाड कर बहलाने लगा|

उस दिन के बाद से नेहा जब भी अपने दोस्तों के साथ घूमने जाती तो केवल दिन में और किसी भी हाल में उसे शाम 5 बजे से पहले घर लौटना होता था| लेकिन फिर आगे चल कर नेहा के पढ़ाई में हमेशा अव्वल आने और जिम्मेदारी को देखते हुए माँ ने समय की ये लक्ष्मण रेखा और बढ़ा दी| अब नेहा को शाम 7 बजे तक घर आने का हुक्म मिल चूका था, जिससे नेहा बहुत खुश थी|

समय हँसी-ख़ुशी बीत रहा था... और फिर एक ऐसा भी दिन आया की मेरी लाड़ली बेटी नेहा इतनी बड़ी हो गई की मेरे कँधे तक आने लगी!
[color=rgb(97,]जारी रहेगा भाग - 10 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]अंतिम अध्याय: प्रतिकाष्ठा[/color]
[color=rgb(51,]भाग - 10[/color]

[color=rgb(26,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

उस दिन के बाद से नेहा जब भी अपने दोस्तों के साथ घूमने जाती तो केवल दिन में और किसी भी हाल में उसे शाम 5 बजे से पहले घर लौटना होता था| लेकिन फिर आगे चल कर नेहा के पढ़ाई में हमेशा अव्वल आने और जिम्मेदारी को देखते हुए माँ ने समय की ये लक्ष्मण रेखा और बढ़ा दी| अब नेहा को शाम 7 बजे तक घर आने का हुक्म मिल चूका था, जिससे नेहा बहुत खुश थी|

समय हँसी-ख़ुशी बीत रहा था... और फिर एक ऐसा भी दिन आया की मेरी लाड़ली बेटी नेहा इतनी बड़ी हो गई की मेरे कँधे तक आने लगी!

[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]

नेहा
अब बड़ी क्लास में आ गई थी, तो अब मैं नेहा को गोदी ले कर लाड नहीं करता था| नेहा को मेरा स्नेह केवल गले लग कर या उसके मस्तक पर पप्पी के रूप में मिलता जिससे नेहा बहुत खुश होती|

ज्यों-ज्यों नेहा बड़ी हो रही थी, त्यों-त्यों उसके व्यवहार में बदलाव आने लगा था| सब बात सर झुका कर मानने वाली मेरी बेटी नेहा अब थोड़ी बाग़ी हो गई थी| जब कभी नेहा होमवर्क खत्म कर अपने मोबाइल में घुसी होती तो संगीता उसे झिड़कते हुए कहती; "सारा दिन मोबाइल में घुसी रहती है, कभी पढ़ाई भी किया कर!" अपनी मम्मी के इस तंज के जवाब में नेहा फौरन पलट कर चिढ़ते हुए बोलती; "होमवर्क खत्म कर के अभी बैठी हूँ मोबाइल ले के!" इतना कह नेहा तमतमाती हुई दूसरे कमरे में चली जाती| नेहा के ऐसे जवाब देने पर संगीता को बहुत गुस्सा आता और कई बार दोनों माँ-बेटी में बहस बाज़ी भी होती जिसका खामियाज़ा मुझे भुगतना पड़ता!

घर आ कर मुझे ही माँ-बेटी के बीच का ये झगड़ा सुलझाना होता था मगर मैं इसमें अक्सर असफल साबित होता| "जान, नेहा अब छोटी बच्ची नहीं रही| उसे यूँ ज़रा-ज़रा सी बात पर झिड़कोगी, तंज कसोगी तो वो चिढ कर बोलेगी ही! तुम ऐसा करो की नेहा जब भी गलती करे तो बजाए उसे डाँटने के, तुम सारी शिकायत मुझे करो| मैं नेहा को आराम से समझाऊँगा और वो अपनी गलती सुधार लेगी|" मैंने संगीता को कई बार ये बात समझाई मगर संगीता मेरी कही इस बात को अपने अहंकार के आगे दरगुज़र करती| दरअसल नेहा किशोरावस्था में थी और इस उम्र में बच्चे थोड़ा बिगड़ जाते हैं, थोड़ा ढीठ हो जाते हैं| मैं ये बात समझता था मगर संगीता इस बात को नहीं समझना चाहती थी| उसके अनुसार नेहा बिगड़ती जा रही थी और इसका सारा ठीकरा संगीता हमेशा मेरे सर फोड़ती!

धीरे-धीरे नेहा संगीता के काबू से बाहर हो गई, संगीता के गुस्सा करने पर नेहा के कान पर जूँ न रेंगती! अब नेहा को सँभालने की कमान मुझे अपने हाथ में लेनी पड़ी| मैंने नेहा को प्यार से समझाना शुरू किया, उसे एहसास दिलाया की उसकी छोटी-छोटी गलतियों के कारण उसकी मम्मी चिढ जाती है इसलिए वो ये गलतियाँ न किया करे| मेरे इस समझाने का नेहा पर शुरू-शुरू में बहुत असर हुआ और कुछ समय के लिए घर में शान्ति कायम हो गई| लेकिन धीरे-धीरे नेहा मेरी भी अनसुनी करने लगी|

मैं भी एक पिता था और जनता था की बच्चे जब बिगड़ने लगते हैं तो उन्होंने सीधे रास्ते पर लाने के लिए थोड़ा सख्त होना ही पड़ता है इसलिए जब भी मुझे नेहा घंटो तक अपनी दोस्त से फ़ोन पर बात करते हुए दिखती तो मैं आँखें बड़ी कर आवाज़ में कठोरता ला कर नेहा से केवल इतना कहता; "नेहा!!" मेरी आवाज़ में कठोरता महसूस कर नेहा डर जाती और जल्दी फ़ोन रख अपनी पढ़ाई में लग जाती| नेहा को सुधारने के लिए मेरा केवल इतना सख्त होना ही काफी था और ये तरीका काम भी कर रहा था|

फिर वो समय आया जब नेहा अपनी उम्र के उस पड़ाव में आ गई थी जहाँ उसे अपने दोस्तों की अधिक जर्रूरत थी| दोस्तों के साथ घूमना-फिरना, गप्पें लड़ाना नेहा को अच्छा लगता था इसलिए नेहा का बाहर घूमने जाना अधिक बढ़ गया| संगीता ने नेहा के इस तरह रोज़ बाहर जाने का पुरज़ोर विरोध किया तो मुझे नेहा को फिर एक बार प्यार से समझाना पड़ा|

अपने पापा जी का मान रखते हुए नेहा ने फिलहाल के लिए मेरी बात मान ली| परन्तु एक बाग़ी होते हुए नेहा ने इस समस्या का एक तोड़ निकाल लिया| "पापा जी, मुझे मैथमेटिक्स और साइंस मुश्किल लग रही है| आप मेरी टूशन लगवा दीजिये!" नेहा ने अपनी पढ़ाई का वास्ता दे कर मुझसे मदद माँगी और मैंने एक अच्छा पिता होने के कारण अपनी बिटिया की समस्या का समाधान कर दिया| नेहा का टूशन घर से करीबन 10-15 मिनट की दूरी पर था, अब चूँकि नेहा बड़ी हो गई थी तो वो अकेले ही टूशन जा सकती थी| मैं बुद्धू पिता तब मैं अपनी बेटी की चालाकी नहीं पकड़ पाया जो की मेरी भूल साबित हुई|

नेहा रोज़ शाम को टूशन जाने लगी और हफ्ते में एक दिन वो टूशन से बंक मार अपने दोस्तों के साथ घूमने भी जाने लगी| उस समय तक नेहा पढ़ाई में अच्छी थी और देखा जाए तो उसे टूशन की इतनी जर्रूरत भी नहीं थी, यही कारण है की जब नेहा टूशन नहीं आती तो वहाँ का सुस्त टीचर नेहा को कुछ कहता ही नहीं!

धीरे-धीरे नेहा की संगत गलत दोस्तों के साथ बढ़ गई जिसका प्रभाव नेहा के जीवन पर पढ़ने लगा|

नेहा के फर्स्ट टर्म (first-term) का रिजल्ट आया और नेहा केवल मार्जिन से पास हुई| हेमशा अव्वल आने वाली लड़की जब मार्जिन से पास हुई तो टीचरों ने मुझसे नेहा पर अधिक ध्यान देने के लिए कहा| मैं भी नेहा के इतने कम नंबर देख कर हैरान तथा परेशान था की मेरी बेटी को आखिर हो क्या गया?

पैरेंट-टीचर मीटिंग (PTM) से निकल जब मैंने नेहा से इस बारे में सवाल पुछा तो नेहा सर झुकाये खामोश खड़ी रही| हारकर हम सब घर लौटे, माँ को जब नेहा के कम नंबर आने का पता चला तो माँ ने नेहा को अपने पास बिठाया और हम सभी को बाहर भेज दिया| माँ ने नेहा के कम नंबर आने पर उसे ज़रा भी नहीं डाँटा बल्कि माँ ने नेहा की हौसला अफ़ज़ाई की और उसे और भी अधिक मेहनत करने को प्रेरित किया| मेरी माँ को नम्बरों से कोई मतलब नहीं था, वो चाहतीं थीं की नेहा केवल पास हो जाए|

कुछ देर बाद माँ ने मुझे और संगीता को अपने पास बुलाया तथा हमें समझते हुए बोलीं; "बेटा, नेहा पास हो गई वही बहुत है| मैंने उसे समझाया है की वो आगे और मेहनत करे तथा अच्छे नम्बरों से पास हो जाए|" मैं माँ की बात समझता था मगर संगीता को नेहा के यूँ कम नंबर लाना खटक रहा था| संगीता माँ के आगे तो कुछ नहीं बोली मगर उसने बाद में नेहा की क्लास लगा दी|

बहरहाल, नेहा को सुधारपाना और सुधरना अब नामुमकिन था क्योंकि वो अब गलत रास्ते पर जा चुकी थी|

नेहा के मिड-टर्म (mid-term) की परीक्षाएँ आ गईं थीं और संगीता ने नेहा पर नकेल कस दी थी| जब भी नेहा मोबाइल हाथ में लिए दिखती तो संगीता चिढ कर पूरे घर में गुस्से से शोर मचा देती| कई बार नेहा कान में हेडफोन्स लगाए, गाना सुनते हुए अपने मैथमेटिक्स के सवाल हल कर रही होती, ये देख संगीता मेरे पास शिकायत करने आ जाती|

"मेरा बच्चा!!" ये कहते हुए मैं नेहा के कान से हेडफोन्स निकाल लेता और उसे समझाता; "बेटा, गाना सुनते हुए पढ़ाई नहीं की जाती| पढ़ाई के लिए एकाग्रता चाहिए होती है|" मेरी बात सुन नेहा फौरन बहाना करती; "पापा जी, मैं ये हेडफोन्स इसलिए लगाती हूँ ताकि घर में हो रहा शोर सुन मेरा ध्यान न भटक जाए|" नेहा का ये बहाना संगीता के आगे चल जाता था मगर मेरे आगे नहीं क्योंकि मैंने भी ये नुस्खा एक बार अपनाया था और मुझे इसका कोई लाभ नहीं हुआ...बल्कि नुक्सान ही हुआ था!

दरअसल, संगीता के बिछोह में मैं दर्द भरे गाने सुनते हुए ही पढता था नतीजन मेरे नंबर कम आये| जब मैंने ये बात नेहा को समझाई तो नेहा ने केवल मेरी बात सुनने का ड्रामा किया और मेरी बात को एक कान से सुन दूसरे कान से निकाल दिया| नेहा को लगा की मैं उसका ये ड्रामा मैं नहीं समझ रहा मगर मैंने उस दिन ये महसूस कर लिया था की मेरी बेटी नेहा ने झूठ बोलना और बहाने करना सीख लिया है| उसी दिन से मैंने नेहा पर और भी अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया|

नेहा की परीक्षाओं तक मैं चील की तरह नेहा के सर पर मंडराता रहा ताकि नेहा का ध्यान पढ़ाई पर से भंग न हो| नेहा जैसे ही पढ़ाई की राह भटकने लगती मैं थोड़ा सख्ती से "नेहा बेटा" कह टोकता और उसे पुनः पढ़ाई की राह पर ले आता| अब ज़ाहिर है की मेरे इस टोकने से नेहा चिढ़ने लगी थी और उसकी चिढ मैं महसूस भी कर पा रहा था इसलिए अपनी बेटी को खुश करने के लिए मैंने नेहा को लाड-प्यार करने की सोची मगर नेहा को अब मेरे लाड-प्यार की जर्रूरत ही नहीं थी! "पापा जी, मैं अब बड़ी हो गई हूँ!" नेहा ने मेरे लाड-प्यार को हँसी में उड़ाते हुए कहा| उस दिन मैं समझ गया की मेरी छोटी सी बेटी अब बहुत बड़ी हो गई है|

खैर, नेहा की परीक्षायें खत्म हुईं और अब हमें बेसब्री से उसके रिजल्ट का इंतज़ार था| इसी बीच संगीता को अपने मायके जाना था क्योंकि स्तुति की नानी जी की तबियत थोड़ा खराब थी| गाँव मैं भी जाना चाहता था परन्तु अपने काम और बच्चों के स्कूल के कारण मैं जा नहीं पाया| संगीता को गाँव ले जाने अनिल मुंबई से आया था मगर जाते-जाते संगीता तीनों बच्चों के कान खींचते हुए बोली; "मेरे जाने के बाद माँ को या अपने पपई को तंग किया न तो तीनों को घर से बाहर निकाल दूँगी|" संगीता की दी हुई ये तड़ी सुन स्तुति सबसे आगे आई और बोली; "मम्मी, आप चिंता मत करो|" स्तुति ने सबकी जिम्मेदारी ली और इतने गर्व से बोली की हम सभी हँस पड़े|

संगीता के गॉंव जाने के कुछ दिन बाद स्कूल ने बच्चों का रिजल्ट बच्चों को दे दिया| स्कूल में दरअसल, रिपेयर का काम हो रहा था जिस कारण इस बार पैरेंट-टीचर मीटिंग (PTM) नहीं रखी गई|

आयुष और स्तुति ने अपनी रिपोर्ट कार्ड हमें घर ला कर दिखा दी| स्तुति क्लास में प्रथम आई थी और आयुष क्लास में पांचवें पायदान पर आया था| माँ ने दोनों बच्चों को खूब लाड-प्यार कर आशीर्वाद दिया तथा इनाम के रूप में चॉक्लेट भी दी|

अब बारी आई नेहा की, जब मैंने नेहा से उसकी रिपोर्ट कार्ड माँगी तो नेहा ने साफ़ झूठ बोलते हुए कहा; "मेरी क्लास टीचर आज स्कूल नहीं आईं थीं इसलिए रिपोर्ट कार्ड नहीं मिला| वो कल आएँगी तो रिपोर्ट कार्ड भी कल ही मिलेगा|" मैं और माँ, नेहा पर अँधा विश्वास करते थे इसलिए हमने उसकी बात पर विश्वास कर लिया| "अरे मेरी बिटिया अच्छे नम्बरों से पास हो गई होगी! ये ले बेटा तू चॉक्लेट आज ही खा ले|" ये कहते हुए माँ ने नेहा को भी लाड-प्यार किया तथा उसे बिना रिपोर्ट-कार्ड देखे ही चॉकलेट दे दी|

मैंने और माँ ने नेहा के झूठ पर विश्वास कर लिया था इसलिए हम चिंता मुक्त थे| वहीं दूसरी तरफ आयुष जानता था की उसकी दीदी झूठ बोल रहीं हैं, क्योंकि आयुष ने नेहा की क्लास टीचर को स्कूल में देखा था इसलिए ये तो हो ही नहीं सकता की उन्होंने नेहा को रिपोर्ट कार्ड न दिया हो| अपने मन की तसल्ली करने के लिए आयुष ने चुपके से अपनी दीदी के स्कूल बैग की तलाशी ली और उसमें आयुष को नेहा की रिपोर्ट कार्ड मिली| आयुष अपनी दीदी का रिपोर्ट कार्ड ले कर सीधा मेरे पास आ गया|

नेहा की रिपोर्ट कार्ड देख मैं दंग रह गया, नेहा सारे सब्जेक्ट्स में फेल हुई थी! यही नहीं, नेहा की क्लास टीचर ने रिपोर्ट कार्ड में ये भी लिखा था की उसे मेरे द्वारा एक लेटर लिखत में चाहिए की नेहा आगे से पढ़ाई में अधिक ध्यान देगी!

नेहा की रिपोर्ट कार्ड देख कर मुझे यक़ीन नहीं हुआ की मेरी बेटी जिसे मैं इतना लाड करता हूँ वो मुझसे...अपने पापा जी से ही झूठ बोलने लगी! मेरा अंतर्मन ये मानने को तैयार नहीं था की तभी आयुष ने सच का एक और बम फोड़ दिया; "पापा जी, दीदी है न...बड़ी क्लास के एक लड़के के साथ घूमती हैं| कुछ दिन पहले दीदी घर से टूशन के लिए निकलीं मगर वो उस लड़के के साथ मोटरसाइकिल पर निकल गईं| मैंने जब दीदी से इसके बारे में पुछा तो दीदी ने कहा की आपको सब पता है लेकिन आज जब दीदी ने आपसे और दादी जी से झूठ बोला तो मैं समझ गया की उन्होंने मुझसे भी झूठ बोला है|" आयुष के मन में अपनी दीदी के प्रति कोई द्वेष की भावना नहीं थी, वो बस अपनी दीदी के झूठ बोलने के कारण दुखी था!

"बेटा, आगे से कोई भी बात हो, आप सीधा आ कर मुझे बताओगे| अभी आप अपनी दादी जी के पास जा कर बैठो और स्तुति को यहाँ आने मत देना, मैं तबतक आपकी दीदी से बात करता हूँ|" मैंने आयुष को प्यार से समझाते हुए भेज दिया| देखा जाए तो आयुष की इसमें कोई गलती नहीं थी, वो बेचारा तो अपनी दीदी की बात का विश्वास कर बैठा था| अब अगर नेहा के ही मन में अपने परिवार का विश्वास तोड़ने की हेरा-फेरी चल रही थी तो इसमें आयुष बेचारे का क्या दोष?!

बहरहाल, आयुष के कमरे से निकलते ही मैंने गुस्से से नेहा को आवाज़ लगाई; "नेहा!" आज एक बेटी ने अपने बाप के दिल को दुखाया था तो मेरा गुस्सा आना स्वाभाविक था| परन्तु ये गुस्सा नफरत भरा नहीं था, मेरा ये गुस्सा मेरी बेटी के झूठ बोलने...मुझे धोका देने के कारण आया था|

मेरी एक आवाज़ सुनते ही नेहा दौड़ी-दौड़ी कमरे में आई| कमरे में आते ही नेहा को मेरे हाथ में उसकी रिपोर्ट कार्ड दिखी, नेहा को समझते देर न लगी की उसका झूठ का भाँडा फूट चूका है!

आगे मेरी जो बातें नेहा से हुईं वो इतनी तीखी थीं की उन बातों ने मेरे दिल को तार-तार कर दिया था, आज भी मैं उन बातों के जख्म अपने दिल पर ले कर घूमता हूँ|

नोट: आजतक मैंने अपनी इस आपबीती में जो भी डायलॉग्स (dialogues) लिखे हैं, उनमें कुछ हूबहू वही थे और कुछ ऐसे थे जिन्हें मैंने थोड़ा-बहुत बदला ताकि आप सभी पाठकों की रूचि कहानी में बनी रहे| डायलॉग्स बदलने से मेरा मतलब झूठ लिखना नहीं, बल्कि डायलाग को अधिक रोचक बनाने से हैं| परन्तु अब जो मैं डायलॉग्स लिख रहा हूँ उनका एक-एक शब्द वही है जो उस दिन नेहा के मुख से निकला था|

मैं: नेहा, आपने मुझसे झूठ बोला? अपने पापा जी से? अपनी दादी जी से?

आवाज़ में सख्ती लिए मैंने नेहा को उसकी रिपोर्ट-कार्ड दिखाते हुए सवाल पुछा| अब नेहा के पास सिवाए माफ़ी माँगने का कोई रास्ता नहीं था इसलिए वो सर झुकाये बोली;

नेहा: सॉरी पापा जी!

आज जो मैं नेहा के भीतर बदलाव देख रहा था वो ये की नेहा की आवाज़ में ज़रा भी ग्लानि नहीं थी!
मैं: सॉरी? आपको लगता है की आपके सॉरी बोलने से सब ठीक हो जायेगा? आपको एहसास भी है की आपने आज अपने पापा जी का...अपनी दादी जी का भरोसा तोडा है!

ताज़्ज़ुब की बात थी की मेरी इतनी समझदार बेटी को मेरे मुख से इतनी बड़ी बात सुन कर भी कोई ग्लानि महसूस नहीं हो रही थी|

नेहा: सॉरी पापा जी!

नेहा थोड़ा डर गई थी मगर उसे ग्लानि अब भी महसूस नहीं हो रही थी| मेरे गुस्से के डर के कारण उसके मुख से सॉरी तो निकला मगर इस सॉरी के मेरे लिए कोई मायने नहीं थे|

मैं: आपकी दादी जी को आप पर कितना विश्वास है...भरोसा है की उनकी लाड़ली पोती जर्रूर पास हुई होगी और यहाँ आप तो सारे सब्जेक्ट्स में फेल हो! अरे हम तो आप पर अव्वल आने का दबाव भी नहीं डालते, हम तो बस इतना चाहते हैं की आप पास हो जाओ लेकिन आपसे इतनी मेहनत भी नहीं होती?

जब कोई बच्चा अपने जीवन में पहलीबार झूठ बोलता है और पकड़ा जाता है तो उसके चेहरे पर डर और ग्लानि होती है मगर यहाँ तो नेहा के चेहरे पर ऐसे कोई भाव ही नहीं थे! ऐसा लगता था मानो नेहा ढीठ हो गई हो!

नेहा: सॉरी...

नेहा के पास अपनी सफाई देने के लिए कुछ नहीं था इसलिए वो बस सॉरी की ही रट लगा रही थी| लेकिन इस बार मैंने नेहा की सॉरी को बीच में ही काट दिया;

मैं: कितनी सॉरी बोलोगे आप? रिपोर्ट कार्ड छुपाने के लिए सॉरी! सारे सब्जेक्ट्स में फेल होने के लिए सॉरी! या फिर टूशन बंक करके एक 'लड़के' के साथ घूमने जाने के लिए सॉरी?!

जैसे ही मैंने नेहा के टूशन बंक कर अपने बॉय-फ्रेंड के साथ जाने की बात कही नेहा के पॉंव तले ज़मीन खिसक गई! नेहा अपनी आँखें बड़ी कर हैरान-परेशान हो के मुझे देखने लगी की भला मुझे कैसे पता की वो टूशन का बहाना कर के अपने बॉय-फ्रेंड के साथ घूमने गई है!

इधर जब मैंने नेहा को हैरान देखा तो मुझे और अधिक गुस्सा आने लगा;

मैं: How dare you Neha? आपकी हिम्मत कैसे हुई मुझसे से झूठ बोलने की. मुझे धोखा देने की?!

मैंने गुस्से से नेहा को डाँटते हुए कहा| मेरा गुस्सा देख नेहा का सर फिर से झुक गया|

मैं: कौन है वो लड़का? और क्यों घूमते हो उसके साथ?

मैंने गुस्से से सवाल पुछा तो हड़बड़ाहट में नेहा के मुख से आखिर सच निकल ही आया;

नेहा: I.I like him!

जब नेहा के मुख से ये शब्द अनायास निकले तो नेहा को एहसास हुआ की मेरे गुस्से के डर के मारे उसने सच कह दिया है इसलिए नेहा अब जाके घबराने लगी!!

इधर मैंने नेहा के मुख से ये ये सब सुनने की उम्मीद नहीं की थी, मुझे तो लगा था की वो लड़का केवल नेहा का कोई दोस्त होगा तथा मैं नेहा को समझा-बुझा कर उसकी ये दोस्ती खत्म करवा दूँगा| परन्तु अपनी बेटी के मुख से सच सुन मेरा गुस्सा उबाले मारने लगा था!

मैं: What do you mean you like him? उस लड़के की वजह से आप हम से...अपने परिवार से झूठ बोलोगे?! हमें धोका दोगे? शर्म नहीं आ आती आपको?

जब मैंने नेहा से कहा की उसे शर्म नहीं आ रही तो नेहा मुझसे बहस करते हुए धीमी आवाज़ में बोली;

नेहा: आयुष की भी तो गर्लफ्रेंड थी...आपने उसे तो कुछ नहीं कहा!

आज ज़िन्दगी में पहलीबार नेहा मुझसे जुबान लड़ा रही थी और मैं इसके लिए मानसिक रूप से कतई तैयार नहीं था!

मैं: Shut up नेहा! आप अपने और अपने छोटे भाई के बीच तुलना कर रहे हो? आयुष तब नर्सरी क्लास में था और वो सब उसका बचपना था...और आयुष कभी आपकी तरह फेल नहीं हुआ...तब भी नहीं जब फलक ने अपना स्कूल बदल लिया! मैंने आयुष को समझा दिया था की उसे पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए और तब से आयुष केवल अपनी पढ़ाई पर ध्यान देता है|

मेरे क्रोध में दिए जवाब ने नेहा का मुँह बंद करा दिया था और नेहा पुनः सर झुकाये खामोश खड़ी हो गई थी|

कुछ पल के लिए कमरे में शान्ति फैल गई थी| और इन्हीं कुछ क्षणों में मेरे अंतर् मन ने बोलना शुरू किया| 'मैंने नेहा पर गुस्सा तो कर दिया मगर जिस उम्र के पड़ाव में नेहा है उस पड़ाव में हमारे मन में दूसरे व्यक्ति के प्रति आकर्षण जागता है और ये ही आकर्षण हमें भटका देता है|' मेरे मन ने मुझे ये बात सुझा कर शांत किया और मैंने नेहा को प्यार से समझाने का फैसला किया|

मैं: नेहा बेटा, आप इस समय उम्र के जिस पड़ाव में हो उसमें दूसरे व्यक्ति के प्रति आकर्षण पैदा होता है, ये एक बड़ी ही स्वाभाविक प्रक्रिया है| परन्तु आपका ध्यान इस वक़्त केवल पढ़ाई में होना चाहिए न की आपको इस फज़ूल के आकर्षण के कारण अपना समय बर्बाद करना चाहिए|

मैंने आवाज़ में थोड़ी हलीमी लाते हुए नेहा को समझाना शुरु किया मगर नेहा के मन में बगावती तेवर पनप चुके थे| मेरे पूरे वाक्य में 'आकर्षण' शब्द नेहा को बहुत चुभा और नेहा एकदम से तिलमिला गई;

नेहा: Its not attraction, its true love! I love him! हमारा ये प्यार उतना ही सच्चा है जितना आपका और मम्मी का प्यार है|

नेहा बड़े गर्व से बोली|

जिस गर्व से नेहा ने अपने प्यार को मेरे सामने रखा था उससे मेरा शांत हुआ गुस्सा पुनः धधक चूका था! ऊपर से नेहा ने अपने इस छोटे से प्यार की तुलना मेरे और संगीता के प्यार से की तो मैं भी गुस्से से तिलमिला गया और नेहा पर बरस पड़ा;

मैं: How dare you compare your attraction towards that guy to MY LOVE for your mother? Are you out of your mind? You have no idea what Love is?! The feeling you have for that boy is nothing but infatuation!

मैंने गुस्से में संगीता के लिए अपने प्रेम को सर्वोपरि बताया तथा नेहा के उस लड़के के प्रति आकर्षण को आसक्ति कहा था| ज़ाहिर था की मेरी बाग़ी बिटिया को क्रोध आना ही था;

नेहा: मैं इतनी बेवकूफ नहीं जो love और infatuation में फर्क न समझूँ! मैं 'अरमान' से और अरमान मुझसे बहुत प्यार करता है. सच्चा प्यार!

जिस धड़ल्ले से नेहा अपने प्यार का इज़हार मेरे सामने कर रही थी उसे सुन कर मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था की ये मेरी वही बिटिया है जो कभी मेरी गोदी में खेलती थी, जो मेरी हर बात मानती थी... वो बिटिया आज इतनी बड़ी हो गई की बिना डरे मेरे सामने अपने प्यार का बखान कर रही है!

खैर, अपनी बिटिया के इस क्रोध को देख मुझे भी क्रोध आने लगा था;

मैं: सच्चे प्यार के लिए कुर्बानी देनी होती है, ये आपको पता है? जब मुझे आपकी मम्मी से प्यार हुआ तो मैं उनके लिए अपनी पढ़ाई तक छोड़ने को तैयार था, ताकि मैं उन्हें और आपको ले कर नई दुनिया बसा सकूँ! क्या अरमान आपके बारहवीं में फेल होने पर एक साल ड्राप (drop) लेगा? एक साल वो सिर्फ आपके लिए नया कॉलेज ज्वाइन करने से अपने मम्मी-पापा को न कहेगा?

नेहा उम्र की कच्ची थी और उसे नहीं पता था की सच्चा प्यार कुर्बानी माँगता है, मैं नेहा को इस सच्चाई से बोध कराना चाहता था इसीलिए मैंने ये सवाल नेहा से पुछा था|

परन्तु, नेहा की जो उम्र थी उसमें बच्चों का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर होता है, उन्हें लगता है की इस दुनिया में हर चीज़ आसान होती है, यही कारण था की नेहा मुझसे जुबान लड़ाते हुए बिना कुछ सोचे-समझे बोली;

नेहा: हाँ जी! अरमान मेरे लिए एक साल तो क्या दस साल भी इंतज़ार करेगा! लेकिन मैं इतनी बेवकूफ नहीं जो अपने लिए उसका भविष्य बर्बाद करूँ, मैं जब बारहवीं में आऊँगी तो मेहनत कर के पास हो ही जाऊँगी!

नेहा अपने अतिआत्मविश्वास में बहते हुए बोली| अपनी बेटी के इस अतिआत्मविश्वास को देख मुझे अब गुस्सा नहीं आ रहा था, क्योंकि मैं समझ गया था की मेरी बेटी दुनियादारी नहीं सीखी है| मैं अब शांत हो कर नेहा को दुनियादारी सिखाना चाहता था, जैसे मैंने आयुष को थोड़ी बहुत दुनियादारी की सीख दी थी| परन्तु नेहा को मुझसे कोई सीख...कोई सबक नहीं सीखना था, उसे तो अब केवल मुझसे बहस करनी थी!

नेहा: एक टर्म (term) में मैं फेल क्या हो गई, अपने तो मुझे बिलकुल नकारा समझ लिया! टर्म में ही फेल हुई हूँ न, फाइनल एग्जाम में तो फेल नहीं हुई न?! फाइनल एग्जाम आएंगे तो मैं आपको पास हो कर दिखा दूँगी! फिर तो आप खुश हो जायेंगे न?! या फिर मुझ पर और बंदिश लगानी हैं आपको?

नेहा तैश में आ कर बोली| अब जब मैं नरम पड़ रहा था, मेरी बेटी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच रहा था| ज़ाहिर है अपनी बेटी को तैश में आते देख मेरा गुस्सा भी लौटेगा;

मैं: नेहा!!!

मैंने गुस्से से नेहा को चेताया मगर नेहा अब कहाँ मेरी सुनती, उस पर उसका गुरूर हावी हो चूका था!

नेहा: [color=rgb(255,]बस! आपने मुझे बहुत कण्ट्रोल कर लिया, अब नहीं! हरबार आप मुझे यूँ डाँट कर चुप करा देते थे, अब और नहीं! मैंने कुछ गलत नहीं किया की मैं आपकी डाँट सुनु! क्या हो गया अगर मैंने थोड़ी सी ज़िन्दगी अपनी मर्ज़ी से जी ली तो?! हाँ मैंने झूठ बोला की मैं टूशन जा रही हूँ और मैं अरमान के साथ घूमने गई, लेकिन अपने ये सोचा की मैंने ये झूठ आखिर बोला क्यों?...क्योंकि आपने मुझे ये झूठ बोलने पर मजबूर किया! अगर आपने मुझे अपने दोस्तों के साथ घूमने-फिरने की आज़ादी दी होती तो मुझे कभी झूठ बोलने की जर्रूरत ही नहीं होती!

पर आप मुझे आज़ादी क्यों दोगे?! आपको तो सबको अपने अँगूठे के नीचे दबा कर रखने में मज़ा जो आता है! आपके जीवन में ऐसा कौन है जिसके जीवन को आपने अपने काबू में करने की कोशिश नहीं की?! यहाँ तक की आपने तो करुणा आंटी के जीवन को भी कण्ट्रोल करने की कोशिश की, जब वो केरला में हॉस्टल में रहतीं थीं! वो तो उन्हें अपनी आज़ादी प्यारी थी इसलिए उन्होंने आपसे झूठ बोलकर अपनी ज़िन्दगी जीनी शुरू की, जिस कारण आपको इतनी मिर्ची लगी की अपने उनसे बातचीत करनी ही बंद कर दी!

मेरा छोटा भाई आयुष, आपने तो उसे तक अपनी ज़िन्दगी जीने नहीं दी| उस बेचारे को क्रिकेट खेलना पसंद था और एक बार उसके नंबर क्या कम आये...आपने तो उसका क्रिकेट खेलना तक छुड़वा दिया! वो बेचारा अपना मन मार कर जी रहा है, वो तो स्तुति अभी छोटी है और वो कुछ कर नहीं सकती, वरना आप तो उसकी ज़िन्दगी पर भी लगाम लगा दो!

परन्तु, मैं अपना मन मार कर नहीं जी सकती| बहुत जी ली मैंने अपनी ज़िन्दगी आपके हिसाब से, अब मैं अपनी ज़िन्दगी अपनी शर्तों पर जीऊँगी|[/color]

नेहा के भीतर जितना भी गुस्से का लावा भरा हुआ था वो आज मुझ पर फूट चूका था! अपने इस गुस्से में जलते हुए नेहा को ज़रा भी एहसास नहीं था की वो अपने बेकसूर पापा जी पर फज़ूल की तोहमदें लगा रही थी! मैंने कभी अपने बच्चों की ज़िन्दगी को कण्ट्रोल करने की कोशिश नहीं की थी, मैं तो बस अपने बच्चों को इस बेरहम ज़िन्दगी के थपेड़ों से बचाने की कोशिश कर रहा था|

बहरहाल, नेहा ने अपने गुस्से में करुणा का नाम लिया था और मैं समझ गया था की मेरी बिटिया को पथ भर्मित करने में करुणा का भी हाथ है|

मैं: बेटा, आप मुझे सरासर गलत समझ रहे हो! ऐसा बिलकुल नहीं है की मैं आपकी, आयुष या स्तुति की ज़िन्दगी को कण्ट्रोल कर रहा हूँ! आयुष को मैंने क्रिकेट खेलना छोड़ने को नहीं कहा, असल में आयुष बड़ा हो कर क्रिकेटर बनना चाहता था, तो मैंने आयुष को क्रिकेट की दुनिया की वास्तविकता से परिचय करवाया| क्रिकेट खेलने में कोई स्कोप नहीं क्योंकि इसमें कम्पटीशन इतना है की आयुष पीछड़ जाएगा और तब उसका जीवन बर्बाद हो जायेगा! मैंने आयुष को बस ये कहा की उसे मन लगा कर पढ़ना है और केवल टाइम-पास करने के लिए क्रिकेट खेलना है...और आप देखो आयुष मेरी बता कितने अच्छे से समझ गया है|

हाँ, मैंने आप पर बाहर आने-जाने की बंदिशें लगाई हैं क्योंकि ये दुनिया इतनी अच्छी नहीं है जितना आप समझते हो| आप टी.वी. पर देखते हो न की आये दिन कैसी-कैसी वारदातें होती हैं?! मैं बस अपनी बेटी को इन गंदी घटनाओं से बचाना चाहता हूँ, इसमें मेरा कोई निजी स्वार्थ नहीं है बेटा! I'm your father, its my job to protect you!

मैंने बड़ी नरमी से नेहा को बात समझानी चाही ताकि मेरी बेटी मेरे द्वारा लगाई गईं पाबंदियों को गलत न समझे मगर नेहा के दिल में मेरे प्रति जहर भर चूका था इसलिए आगे उसने ऐसी बात कही की क्षण भर में मेरा दिल टूट कर चकनाचूर हो गया!

नेहा: [color=rgb(255,]YOU DON'T HAVE TO WORRY ABOUT ME, CAUSE YOU'RE NOT MY REAL FATHER![/color]
[color=rgb(255,]और एक बात सुन लीजिये, मेरा जब मन होगा मैं अपने दोस्तों के साथ बाहर घूमने जाऊँगी, जब मेरा मन होगा मैं वापस आऊँगी| आप यही चाहते हो न की मैं क्लास में पास हो जाऊँ, तो वो मैं हो कर दिखा दूँगी| लेकिन इसके अलावा आप आज से मुझसे कोई उम्मीद मत रखना![/color]

इतना कह नेहा कमरे से बाहर चली गई और जाते-जाते कमरे का दरवाज़ा भड़ाम से बंद कर गई!

नेहा ने केवल कमरे का दरवाज़ा ही नहीं बंद किया था, उसने हम बाप-बेटी के रिश्ते पर भी अपने गुरूर रुपी दरवाज़ा हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दिया था!

[color=rgb(97,]जारी रहेगा भाग - 11 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]अंतिम अध्याय: प्रतिकाष्ठा[/color]
[color=rgb(51,]भाग - 11[/color]

[color=rgb(26,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

नेहा: [color=rgb(255,]YOU DON'T HAVE TO WORRY ABOUT ME, CAUSE YOU'RE NOT MY REAL FATHER![/color]
[color=rgb(255,]और एक बात सुन लीजिये, मेरा जब मन होगा मैं अपने दोस्तों के साथ बाहर घूमने जाऊँगी, जब मेरा मन होगा मैं वापस आऊँगी| आप यही चाहते हो न की मैं क्लास में पास हो जाऊँ, तो वो मैं हो कर दिखा दूँगी| लेकिन इसके अलावा आप आज से मुझसे कोई उम्मीद मत रखना![/color]

इतना कह नेहा कमरे से बाहर चली गई और जाते-जाते कमरे का दरवाज़ा भड़ाम से बंद कर गई!

नेहा ने केवल कमरे का दरवाज़ा ही नहीं बंद किया था, उसने हम बाप-बेटी के रिश्ते पर भी अपने गुरूर रुपी दरवाज़ा हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दिया था!

[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]

जब
कोई जीवन में पहलीबार पिता बनता है तो वो अनुभूति...वो एहसास...वो ख़ुशी ब्यान नहीं की जा सकती| ये खुशियाँ अकेली नहीं आतीं बल्कि अपने साथ पिता बनने पर बहुत सारी जिम्मेदारियाँ भी लातीं हैं|

मुझे आज भी याद है वो दिन जब नेहा ने पहलीबार मुझे "पापा" कहा था| वो क्षण...वो पल मेरे लिए इतना कीमती था की उसके लिए मैं कुछ भी कुर्बान कर दूँ| अपनी किशोरावस्था में ही मुझे एक पिता बनने का सुख मेरी बेटी नेहा ने दे कर मुझे सबसे खुशकिस्मत व्यक्ति बना दिया था| उस दिन के बाद से नेहा और मेरा एक अटूट रिश्ता बन गया था, ऐसा रिश्ता जिसके लिए हम बाप-बेटी सब कुछ त्यागने को तैयार थे| नेहा अपनी मम्मी को छोड़ कर मेरे साथ दिल्ली जाने को तैयार थी और मैं अपने माता-पिता को छोड़ कर संगीता तथा नेहा संग एक नया जीवन शुरू करने के लिए घर से भागने को तैयार था!

जब आयुष पैदा हुआ और मुझसे मिला, तब मुझे एक बार फिर पिता बनने का सुख मिला मगर आयुष से मेरा लगाव नेहा से लगाव के मुक़ाबले कम ही रहा| नेहा जानती थी की मेरा और आयुष का रिश्ता खून का है मगर फिर भी नेहा बड़े गर्व से कहती थी की मैं उससे ज्यादा प्यार करता हूँ.आयुष से भी ज्यादा|

फिर पैदा हुई स्तुति और उसे गोद में ले कर मुझे एक बार पुनः पिता बनने का सुख मिला| स्तुति के हमेशा मेरी गोदी में रहने से मेरा ध्यान स्तुति पर अधिक रहता था मगर प्यार तब भी मैं नेहा से अधिक करता था| एक साथ तीन बच्चों का पिता बनने का सौभाग्य मुझे मिला तो एक-आध बार नेहा को लगा की मेरा ध्यान उस पर से हट रहा है ये मैं उस पर कम ध्यान देता हूँ मगर जल्द ही मैंने तीनों बच्चों को समय देने का तालमेल बना ही लिया|

जब कभी स्तुति मुझ पर अपना हक़ जमाती तो, नेहा उसे फट से ये कह कर चुप करा देती की; "तेरे पपई से पहले मेरे पापा जी हैं!" नेहा बड़ी थी और वो जानती थी की उसका अपने पापा जी पर सबसे ज्यादा हक़ है| वहीं स्तुति अपनी दिद्दा से डरती थी इसलिए चुप हो जाती या रोने लगती थी|

इतना प्यार..इतना लगाव होने के बावजूद नेहा के मन में सौतेले होने का भाव आना नामुमकिन था| "तो आखिर मेरे प्यार में कहाँ कमी रह गई जो मेरी ही बिटिया मुझे अपना पिता नहीं मानती?" नेहा के कमरे से जाने के बाद मेरे हृदय में उथल-पुथल मची थी और इसी उथल-पुथल में मेरे टूटे हुए दिल से ये जज्बात आंसुओं के साथ फूटे!

दिल ने सवाल तो पूछ लिया था मगर तब मेरे पास इस सवाल का जवाब नहीं था| था तो बस एक 'खेद' की मैंने अपनी बिटिया की परवरिश में कोई कमी छोड़ दी, शायद मैं उसे वो प्यार...वो तवज्जो देने में नाकामयाब रहा जिस कारण मेरी बिटिया का मन इस कदर उखड़ गया की उसने मुझे अपने पिता के पद से उठा कर निचे ज़मीन पर पटक दिया!

गौर करने वाले बात ये है की नेहा के इस गैरजिम्मेदाराना व्यवहार के लिए उस समय मेरा टूटा हुआ दिल मुझे ही दोषी मान रहा था इसलिए मैं ग्लानि की खाई में जा गिरा था|

जबकि असल बात ये थी की ज्यों-ज्यों मेरी बिटिया ने उम्र की सीढ़ियाँ चढ़नी शुरू कीं, नेहा के जीवन में कुछ ने दोस्त आये...ऐसे दोस्त जिनके विचार स्व्छन्द थे! इन बच्चों को ऊँचा उड़ना पसंद था, अपनी मनमानी करना पसंद था, ये मनमौजी थे...और हठी भी! नेहा की जब इनसे दोस्ती हुई तो इन्होने अपने विचार नेहा से साझा किये और तब नेहा का मासूम मन अपने नए दोस्तों को यूँ स्वछंद देख मचलने लगा| अपने नए दोस्तों की देखा देखि, नेहा के मन भी ऊँचा उड़ने की ख्वाइशें जागीं| परन्तु एक पिता की अपनी बड़ी हो रही बेटी के लिए चिंता...उसके डर की जंजीरों ने नेहा के पैर जकड़ लिए! नेहा ने बतेह्री कोशिश की कि वो इस ज़ंज़ीर को तोड़ कर उड़ जाए, इसके लिए नेहा ने झूठ बोलना और अपने ही पापा जी के साथ छल करना शुरू किया| इन कोशिशों से नेहा को आज़ादी तो मिली मगर मेरे गुस्सा होने और डाँटने की नकेल अब भी नेहा की नाक में जकड़ी थी!

आखिर वो दिन आ ही गया जब झुंझलाहट में मेरी लाड़ली बिटिया...मेरी प्यारी चिड़िया ने अपने पापा जी द्वारा बनाये प्यारे से घोंसलें को लात मारकर पेड़ की डाली से गिरा दिया तथा वो खुले आसमान में हमेशा-हेमशा के लिए उन्मुक्त हो कर उड़ चली! मेरी नन्ही सी चिड़िया...जो आजतक मेरे आंगन में रहती थी, अपनी चिचिआहट से मेरे आंगन में खुशियाँ बिखेरती रहती थी, उसे अब मेरा ये आंगन अच्छा नहीं लगता था!

अपने इस टूटे हुए दिल के साथ इस अकेले इस बंद कमरे में रह कर मेरा दम घुटने लगा था| "माँ, मैं एक काम से बाहर जा रहा हूँ कुछ देर में आ जाऊँगा| आप सबका खाना मैंने आर्डर कर दिया है, मेरा इंतज़ार मत देखना|" इतना कह मैं माँ से नजरें चुराता हुआ निकल गया| माँ ने पीछे से आवाज़ दे कर मुझे पुछा भी की मैं कहाँ जा रहा हूँ मगर मैंने माँ की बात को सुन कर भी अनसुना कर दिया|

घर से कुछ दूरी पर एक पार्क था जहाँ इस समय बहुत कम लोग होते थे| उसी पार्क के कोने की बेंच पर मैं सर झुका कर बैठ गया और फिर से सोचने लगा की आखिर मेरी परवरिश में कहाँ कमी रह गई थी?! घर से कुछ दूरी पर एक पार्क था जहाँ इस समय बहुत कम लोग होते थे, उसी पार्क के कोने की बेंच पर मैं सर झुका कर बैठ गया और फिर से सोचने लगा की आखिर मेरी परवरिश में कहाँ कमी रह गई थी?! नेहा के पैदा होने से ले कर अब तक की सारी घटनाएँ मेरी आँखों के सामने किसी फिल्म की रील की तरह चलने लगीं| पहलीबार नेहा को गोदी लेने से ले कर उसके बड़े होने तक की सारी प्यारी यादें आज फिर से याद कर दिल को सुकून मिल रहा था|

मैंने अभी तक बस एक बार नेहा का दिल दुखाया था वो भी तब जब मैंने दशहरे की छुट्टियों में गॉंव आने का नेहा से वादा किया था| वो हालात क्या थे और क्यों मैं अपना ये वादा पूरा नहीं कर पाया, ये नेहा जानती थी और उसने मुझे इसके लिए माफ़ भी कर दिया था|

"तो फिर मेरी बिटिया के मन में, मेरे प्रति ज़हर घोला किसने?" आँखों में आँसूँ लिए मैं बुदबुदाया| जब आत्मा जल रही होती है तो इंसान अपने सवालों का खुद हल ढूँढता है! मैं भी इस वक़्त अपनी बेटी के कहे शब्दों से दर्द की आग में जल रहा था इसलिए मैंने भी अपने सवाल का जवाब सोचना शुरू कर दिया| नेहा ने अपने गुस्से में कही बातों में दो नामों का जिक्र किया था; "करुणा और अरमान! "तो इन्ही दोनों ने हम बाप-बेटी क रिशते में दरार पैदा की थी!" मुझे अपने सवाल का जवाब मिल चूका था इसलिए मैंने अपना अनुमान लगाना शुरू कर दिया की कैसे इन दोनों शक्सों ने मेरी बिटिया को बरगलाया होगा?! "जर्रूरअरमान ने अपने प्यार का झांसा दे कर मेरी बेटी को भटकाया होगा, तो करुणा ने आज़ादी के झूठे सपने दिखा कर नेहा को बरगलाया होगा!" उत्तर तो मिल गया परन्तु मेरा मन ये बात मानने को तैयार न था|

"पर नेहा कोई दूध पीती छोटी बच्ची नहीं जो ऐसे ही किसी की बातों में आ जाए?...नेहा के मुख से इतनी बड़ी बात निकलना मतलब की नेहा भी ये मानती है की मैं उस पर बेवजह बंदिश लगाए हूँ!" इतने सोच-विचार के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँच चूका था की मेरी बेटी के जीवन में मेरी अब कोई जगह नहीं रही! अब उसे मेरी...अपने पापा जी की कोई जर्रूरत नहीं! "ठीक है...अगर नेहा मुझे अपना पापा नहीं मानती तो न सही!" मेरे टूटे दिल ने अपनी बेटी को पुनः पाने की आस छोड़ दी थी इसलिए मैंने अपनी बेटी की इच्छा को मानने का फैसला किया|

मेरी ज़िन्दगी का एक बड़ा ही सीधा सा असूल है, यदि मेरी मौजूदगी किसी को पसंद नहीं तो मैं बिना कोई सफाई दिए उस व्यक्ति से दूरी बना लेता हूँ ताकि वह व्यक्ति अपने जीवन में खुश रहे| जब संगीता ने मुझे कहा था की मैं उसे भूल जाऊँ तो मैंने उससे भी दूरी बना ली थी| उसी तरह आज जब मेरी बेटी नेहा को अपने जीवन में मेरी दखलंदाज़ी पसंद नहीं और जब वो मुझे अपना पापा ही नहीं मानती तो मैं क्यों जबरदस्ती उसके जीवन में हस्तक्षेप करूँ?!

इंसान अपने गुस्से में फैसले तो कर लेता है मगर उन फैसलों पर अम्ल करना टेढ़ी खीर साबित होता है| कुछ यही हाल मेरा होना था...

फैसला कर के मैं घर आया तो माँ नाराज़ मिलीं, उनका कहना था की मैं उनकी अनसुनी कर के मस्तीबाज़ी करने चला गया| माँ का गुस्सा शांत करने के लिए मैंने झूठ बोल दिया की मैं दिषु से बिज़नेस की कुछ बात करने के लिए उसके घर गया था तथा मैं वहीं खाना खा कर आया हूँ|

फिर माँ को बच्चों (आयुष और स्तुति) संग उनके कमरे में लिटा कर मैं अपने कमरे में अकेला सोने आ गया| कमरे में अकेला था तो इस अकेलेपन में मेरे दिमाग में नेहा द्वारा कहे शब्द फिर से गूँजने लगे! "YOU'RE NOT MY REAL FATHER!" ये शूल से पैने शब्द बार-बार मेरे दिल को भेद रहे थे जिससे मेरे सीने में दर्द उठने लगा था|

कुछ देर दर्द में जलने के बाद किसी तरह मेरी अंतरात्मा ने मेरे मन से तर्क-वितर्क कर मुझे ये विश्वास दिला दिया की नेहा के मन में ऐसा विचार आने के लिए मैं या मेरी परवरिश जिम्मेदार नहीं है| परन्तु फिर अगले ही पल एक नया डर मेरे मन में घर कर गया; "कल को जब आयुष और स्तुति, नेहा की उम्र के होंगें तो वो भी मुझसे अपनी आज़ादी मांगेंगे?! वो भी मेरे प्यार को बंदिश का नाम देंगे और मुझे छोड़ देंगे?!" इस डर के पनपते ही मेरा घायल मन बोला; "नेहा को तो मैं खो ही चूका हूँ, कुछ सालों में आयुष और स्तुति को भी खो दूँगा!" इस नकारत्मक विचार ने मेरे भीतर बेस पिता के प्यार को मारना शुरू कर दिया| "क्या माँ-बाप अपने बच्चों को इसीलिए इतना प्यार देते हैं की बच्चे बड़े हो कर उनसे अपनी आज़ादी के लिए लड़ें और फिर गुस्से में आ कर अपने माँ-बाप को छोड़ दें?!" मन में पनपी ये नकरात्मकता प्रतिपल मुझ पर सवार होती जा रहे थी|

एक व्यक्ति जिसके पास कुछ समयतक सब कुछ था, एक माँ, प्यार करने वाली परिणीता, तीन बच्चे जिसे वो अपनी जान से ज्यादा चाहता था....उस व्यक्ति से 'समय' उसकी जान से प्यारे बच्चे एक-एक कर छीनता जा जा रहा था!

नेहा, आयुष और स्तुति में मेरी जान बस्ती थी और उनमें से एक को मैं आज़ादी के नाम पर पूरी तरह खो चूका था| बचे आयुष और स्तुति तो एक समय आता जब वो दोनों भी मुझसे अपनी आज़ादी की माँग करते हुए दूर हो जाते| इस अकेले रह जाने के एहसास के लिए मेरा नाज़ुक सा मन तैयार नहीं था! मेरे बच्चों के प्रति मेरा मोह अब हर पल मेरे गले में फंदे के समान कसता जा रहा था!

जब मैं ग्यारहवीं कक्षा में आया था तो मुझे एकाउंट्स (accounts) पढ़ने को मिली| एकाउंटेंसी (Accountancy) की किताब में एक प्रिंसिपल (Principle) था, Principle of Conservatism जिसमें लिखा था: 'Do not anticipate for profits but provide for all possible losses!' मैंने ये प्रिंसिपल ऐसा रटा था की मैंने इसे हमेशा के लिए अपने जीवन में उतार लिया था|

पिताजी के साथ काम करते हुए मैं भविष्य में होने वाले नुक्सान के लिए मैं पैसे पहले ही अलग कर लेता था| फिर जब करुणा से मेरी दोस्ती हुई तो मैं जानता था की एक न एक दिन आएगा जब शादी होने के बाद या फिर केरला जाने के बाद करुणा मेरे जीवन से चली जायेगी इसलिए मैंने उस दिन की तैयारी अभी से कर ली थी| आज फिर उस एकाउंटेंसी के प्रिंसिपल को याद कर मैंने एक फैसला किया था!

मैं फिर से अपना दिल नहीं तुड़वाना चाहता था क्योंकि अब मुझ में इतनी शक्ति नहीं बची थी की मैं फिर से एकबार खुद को समेट सकूँ! बेहतरी इसी में थी की मैं आयुष और स्तुति से भी धीरे-धीरे दूरी बनाता चलूँ ताकि कल को जब दोनों बच्चे बड़े हों और मुझसे अपनी आज़ादी के लिए लड़ें तो मुझे दुःख कम हो! दुखी मन से मैंने ये फैसला तो कर लिया मगर इस पर अम्ल करना नेहा से दूर रहने के फैसले से ज्यादा कठिन साबित होने वाला था!

अपने लिए इन कठोर फैसलों के कारण नकारात्मकता मुझ पर ऐसी सवार हुई थी की मैं अपने फैसलों के बारे में अत्यधिक सोचने लगा था जिसका सीधा प्रभाव मेरे स्वास्थ्य पर पड़ना शुरू हो गया था| आज शाम मैंने अपनी ब्लड प्रेशर लो दवाई नहीं ली थी इसलिए अत्यधिक सोचने से मेरी हालत खराब होने लगी थी| धीरे-धीरे मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ने लगा था और मेरी हालात धीरे-धीरे बाद से बदत्तर होने लगी थी| पसीने से मेरा पूरा बदन ऐसा भीग चूका था मानो किसी ने मेरे ऊपर बाल्टी भर पानी उड़ेल दिया हो! कपड़ों के साथ-साथ पलंग पर बिछी चादर तक भीग चुकी थी! मैं बिस्तर से उठना चाहता था ताकि डॉक्टर के पास जा सकूँ मगर मुझमें हिम्मत नहीं बची थी की मैं उठ सकूँ!

काफी देर तक मैं उठ कर बैठने के लिए हिम्मत जुटाता रहा परन्तु इसका कोई फायदा नहीं हुआ! मैं आवाज़ दे कर माँ को नहीं बुलाना चाहता था क्योंकि मेरी ये स्थिति देख मेरी माँ की तबियत खराब हो जाता और इस समय हम दोनों माँ-बेटों को सँभालने वाला कोई भी वयस्क यहाँ मौजूद नहीं था! यदि मैं उठ कर बैठ पता तो चार्जिंग पर लगे फ़ोन से दिषु को फ़ोन कर बुला सकता था परन्तु मेरा जिस्म मुझे हिलने नहीं दे रहा था|

काफी देर तक मेरा जिस्म बिमारी से लड़ने की कोशिश कर रहा था, लेकिन अब मेरा जिस्म जूझते-जूझते थक गया था! अब जब जिस्म ने लड़ने की ताक़त खो दी तो मैं बेहोश हो गया और जब होश आया तो आधा निकलने को था तथा मेरे सामने डॉक्टर सुनीता थीं! दरअसल, सुबह माँ मुझे उठाने आईं थीं परन्तु मेरे न उठने और मेरी बिगड़ी हुई हालत देख माँ ने फौरन डॉक्टर सुनीता को बुलाया| "मानु, दवाई क्यों नहीं खाई?" डॉक्टर सुनीता थोड़ा गुस्से से बोलीं| अब मैं कोई बहाना सोचता उससे पहले ही माँ गुस्से से मुझ पर बरस पड़ीं; "मैं थक गई हूँ तेरी लापरवाही से! तुझे समझ नहीं आता क्या? क्यों नहीं खाई तूने दवाई?" माँ का गुस्से से बरसना शुरू हो चूका था और अब मेरा खामोश रहना ही ठीक था| 5 मिनट बाद जब माँ का मन मुझे डाटने से भर गया तो उन्होंने अपनी चप्पल उठा ली और मुझे हड़काते हुए बोलीं; "सुधर जा!!! वरना इस चप्पल से तुझे सूत दूँगी!"माँ ने आजतक मुझे कभी फूल से भी नहीं मारा था ऐसे में वो मुझे क्या चप्पल से सूततीं, बस यही सोच कर मुझे माँ की इस खोखली धमकी पर आखिर हँसी आ ही गई और मुझे हँसते देख माँ का गुस्सा एकदम से शांत हो गया तथा उनके चेहरे पर भी प्यारी सी मुस्कान आ गई!

डॉक्टर सुनीता के जाने के बाद माँ ने नाश्ता बनाया और नाश्ता कर के मैं आराम कर रहा था जब माँ ने मुझे बताया की संगीता कुछ ही देर में फ्लाइट से दिल्ली पहुँच रही है! मेरे लिए माँ से बात छुपाना आसान था मगर संगीता से नहीं इसलिए मेरे दिमाग ने संगीता से क्या झूठ बोलना है ये सोचना शुरू कर दिया|

करीब डेढ़ घंटे बाद संगीता घर पहुँची और धड़-धडाते हुए सीधा मेरे पास कमरे में आई| संगीता के चेहरे से उसका डर साफ़ झलक रहा था और मैं उसे चिंतित नहीं करना चाहता था, अतः मैंने अपने चेहरे पर नक़ली मुस्कान चिपकाई और संगीता से झूठी दिल्लगी करते हुए बोला; "जान, तुम्हारे बिन दिल नहीं लग रहा था इसलिए सोचा की बीमार पड़ जाता हूँ ताकि मेरी बीमार होने की खबर पा कर तुम जल्दी घर लौट जाओ!" संगीता मेरी होशियारी जानती थी इसलिए वो भी झूठीं मुस्कान लिए हुए बोली; "सब जानती हूँ की कितना याद करते थे मुझे!" आगे हमारी बात हो पाती उससे पहले ही अनिल सूटकेस लिए हुए कमरे में आया| मुझे सबके साथ बातों में लगा संगीता कमरे से रफू-चक्कर हो गई!

असल में, नेहा द्वारा कहे जहरीले शब्द आयुष ने सुन लिए थे और जब मैं बीमार हुआ तो उसने अपनी मम्मी को फ़ोन कर सारी बात बता दी| सारी बात सुन संगीता गुस्से से तिलमिला गई थी इसलिए उसने फौरन दिल्ली आने की ज़िद्द पकड़ी और अनिल को साथ ले अपने मायके से एयरपोर्ट के लिए निकल पड़ी|

खैर, सब मेरे कमरे में बैठे थे और संगीता रसोई में जाने का बहाना कर बैठक में पहुँच गई| "नेहा!" संगीता ने गुस्से का कड़वा घूँट पीते हुए नेहा को आवाज़ लगाई| इधर नेहा नहीं जानती थी की उसकी मम्मी को सब सच पता है इसलिए नेहा बिना कुछ सोचे-समझे फौरन अपनी मम्मी के पास आ गई|

नेहा के आते ही संगीता ने आव देखा न ताव और खींच कर एक जोरदार थप्पड़ नेहा के बाएँ गाल पर धर दिया! "हरामज़ादी! अगर आज मेरे पति को आज कुछ हो जाता न, तो मैं तेरा टेटुआ दबा कर तेरी जान ले लेती!" संगीता गुस्से से तमतमाते हुए नेहा पर चीखी| शुक्र है की कमरे का दरवाजा बंद था और संगीता के गुस्सा होने के आवाज़ मेरे कमरे में सब तक नहीं आई|

"You're not my real father! यही कहा था न तूने?!....जब तू इनका खून ही नहीं है तो ये ख्याल तो देर-सवेर तेरे मन में आना ही था! आखिर तेरे जिस्म में खून तो एक गंदे आदमी (चन्दर) का ही है, तो उस गंदे खून ने अपना असर तो दिखाना ही था! जब तेरे बाप चन्दर ने इन्हें जान से मारने की कोशिश की थी, तो तू कहाँ पीछे रह सकती थी...तूने भी जानबूझ कर ऐसे शब्द कहे की 'स्तुति के पापा जी' की जान पर बन आई!

आज कान खोल कर मेरी एक बात सुन ले, अगर इस फसाद के बारे में स्तुति की दादी जी (यानी मेरी माँ) को कुछ भी पता चला...उनका दिल दुखा तो तेरे लिए मुझसे बुरा कोई न होगा!..... Now get lost!" संगीता का गुस्सा आज चरम पर था और अपनी मम्मी का ये रौद्र रूप देख का नेहा की डर के मारे घिघ्घी बँध गई थी! बचपन से ही नेहा अपनी मम्मी के रौद्र से डर्टी आई है इसलिए जैसे ही संगीता ने नेहा को जाने को कहा नेहा अपना बाएँ गाल सहलाते हुए डर के मारे अपने कमरे में घुस गई! अपनी मम्मी का ये रौद्र रूप देख नेहा ने ये मान लिया था की मैंने ही संगीता को उसके खिलाफ भड़काया है, अब उसे क्या पता की संगीता सब बात जानती है ये मुझे पता ही नहीं!

अभी तक नेहा मुझसे केवल ये सोच कर नफरत करती थी की मैंने उसे आज़ादी में खुल कर साँस नहीं लेने दी, उसके प्यार को दिखावा कहा परन्तु अब नेहा को मुझसे नफरत करने की एक और वजह मिल गई थी की मैंने उसकी मम्मी के मन में उसके प्रति ज़हर घोला है!

बहरहाल, अपना गुस्सा दबाकर संगीता रसोई में घुसी और खाना बनाने लगी| वहीं मेरे कमरे में मैं अनिल को उसकी नई जॉब से जुडी बातें पूछ कर बातों में लगाए हुए था ताकि कहीं वो मेरे अचानक बीमार पड़ने का कारण न पूछने लगे, अब मुझे क्या पता था की अनिल को सब बात संगीता ने बता रखी है!

कुछ पल बैठ कर माँ नहाने गईं तो अनिल ने स्तुति और आयुष को खेलने जाने के बहाने से बाहर छत पर भेज दिया| अब चूँकि बस हम जीजा-साला ही कमरे में अकेले थे इसलिए अनिल ने नेहा को आवाज़ लगा कर बुलाया| "जिन्हें तू इतना प्यार करती थी, जिनके ज़रा सा बीमार होने पर तू सारा घर सर पर उठा लिया करती थी, जिनके तुझ में प्राण बस्ते थे...उन्हीं को तूने कह दिया की वो तेरे असली पिता नहीं हैं?! तेरे असली पिता ने आजतक कौन सा तुझे लाड-प्यार किया है जो जीजू को तूने ऐसा कहा? और ये सब तूने किसके लिए किया?...एक लड़के और अपने उस 'so called' प्यार के लिए?!

सच्चा प्यार वो नहीं होता जिसके लिए आप अपने ही माता-पिता का दिल दुखाओ, बल्कि सच्चा प्यार वो होता है जिसके लिए तुम अपनी ख़ुशी की कुर्बानी दो! अभी भी वक़्त है, सुधर जा वरना...." अनिल मेरे ही सामने नेहा को गुस्से से धमका रहा था मगर इससे पहले की अनिल की बात पूरी हो मैंने उसे चुप करा दिया; "Enough अनिल! नेहा तुम्हारी भाँजी है और अपनी भाँजी को यूँ धमकाना माँ (मेरी सासु माँ) के संस्कार नहीं!" भले ही नेहा मुझसे अपना रिश्ता खत्म कर चुकी थी और मैं भी उससे दूरी बनाना चाहता था मगर मैं नेहा को किसी भी व्यक्ति द्वारा धमकाए जाते हुए नहीं देख सकता था!

खैर, मेरी बात सुन अनिल खामोश हो गया और मुझसे माफ़ी माँगने लगा; "सॉरी जीजू! आप जानते हो की जब भी कोई आपका दिल दुखाता है तो मेरा खून खौल जाता है!" अनिल का मेरे प्रति जो प्रेम तथा आदर-भाव था उससे मैं परिचित था इसलिए मैंने गर्दन हाँ में हिला कर उसकी माफ़ी को मंज़ूर किया| उधर नेहा सर झुकाये खड़ी थी, उसे अपने छोटे मामा जी के डाँटने-धमकाने से कोई फर्क ही नहीं पड़ा था! हाँ इतना जर्रूर था की नेहा ये मानने लगी थी की मैंने ही अनिल को उसके खिलाफ भड़काया है तथा नेहा के सामने में अनिल को केवल मेरा दिखावा है! ये एक और दोष था जो मेरे माथे में नेहा द्वारा लगाया जा चूका था!

खैर, इतने में संगीता कमरे में आई और नेहा का सर झुका हुआ देख सब समझ गई की जर्रूर अनिल ही नेहा को डाँट रहा होगा इसलिए संगीता ने भी नेहा को धमका दिया; "सुन ले महारानी, चुपचाप जा कर पढ़ाई कर और अगर इसबार तू एक भी सब्जेक्ट में फेल हुई तो तुझे गाँव तेरी नानी जी के पास पढ़ने भेज दूँगी! वहाँ जा कर तुझे पढ़ना है तो पढ़ वरना भाईसाहब तेरे लिए कोई लड़का ढूँढ कर तेरी शादी कर देंगे! फिर लड़ाते रहिओ अपने खसम से इश्क़!" नेहा जानती थी की उसकी मम्मी खोखली धमकी नहीं देती इसलिए नेहा सर झुकाये अपने कमरे में जा कर पढ़ने लगी!

संगीता की कही बात की कि वह नेहा कि पढ़ाई छुड़वा कर उसकी शादी कर देगी ये बात मुझे चुभी क्योंकि मैं चाहता था कि नेहा जितना पढ़ना चाहती है उतना पढ़े, ताकि नेहा का वो हाल न हो जो संगीता के साथ हुआ था| बेचारी (संगीता) की जबरदस्ती पढ़ाई छुड़वा कर ब्याह कि मेहँदी हाथों में थोप दी गई थी!

बहरहाल संगीता की धमकी से ये साफ़ था की संगीता को कल रात क्या महाभारत हुई उसके बारे में सबा पता चल गया है, परन्तु उसे ये सब बताया किसने ये बात मेरी समझ से परे थी?! संगीता मेरे चेहरे पर उमड़े सवाल को समझ गई थी इसीलिए उसने मेरे मन के प्रश्न का जवाब देते हुए कहा; "आयुष ने कल रात छुप कर आप दोनों की सारी बात सुन ली थी और उसी ने मुझे आज सुबह फ़ोन कर सब बताया| आपके बीमार होने और ये सारी बात पता चलते ही मैंने दिल्ली आने की ज़िद्द पकड़ी| जब भाईसाहब और माँ ने कारण पुछा तो मैंने नेहा की सारी कारस्तानी उन्हें बता दी| हम में से किसी को भी नेहा से ये उम्मीद नहीं थी की उसके मन में इतना मैल भरा हुआ है इसलिए घर में सभी उससे खफा हैं! माँ तो यहाँ तक कह रहीं थीं की नेहा का स्कूल छुड़वा दो और उसका ब्याह कर दो, वो तो भाईसाहब ने कहा की नेहा को सुधरने का एक मौका देते हैं, अगर नेहा नहीं सुधरी तो फिर उसकी पढ़ाई-लिखाई पर पैसा बर्बाद करने की कोई जर्रूरत नहीं!" मैं नहीं चाहता था की इस सब के बारे में किसी को भी पता चले क्योंकि फिर ये बात उड़ते-उड़ते मेरी माँ के कानों तक पहुँचती और मेरी माँ का दिल बहुत दुखता! फिर मेरी माँ यही कहतीं की जिस लड़की ने तेरे इतना प्यार देने पर तुझे ही अपना पापा मानने से इंकार कर दिया, वो लड़की मुझ बुढ़िया को क्या दादी मानेगी! ये बात माँ के दिल को तार-तार कर जाती, बस मुझे इसी की चिंता थी! "यार, तुम्हे ये बात सबको नहीं बतानी चाहिए थी! अगर माँ को ये बात पता चली तो..." मैं आगे अपनी बात पूरी करता उसके पहले ही संगीता मेरी बात काटते हुए बोली; "माँ को कुछ पता नहीं नचलेगा! मैं सब को कह कर आई हूँ की ये बात किसी भी हाल में माँ (मेरी) तक नहीं पहुँचनी चाहिए! यही नहीं, नेहा को भी मैंने तड़ी दे दी है की अगर ये बात कभी माँ को पता चली तो उसके लिए अच्छा नहीं होगा!" संगीता की बातें सुन मैंने इत्मीनान की साँस ली की कम से कम मेरी माँ का दिल तो नहीं दुखेगा!

बहरहाल मैंने अभी राहत की साँस ली ही थी की संगीता मुझ पर भड़क गई; "और आप जनाब! आप ने कल इस लड़की (नेहा) के धर क्यों नहीं दिया एक खींच कर!" संगीता के पूछे प्रश्न का जवाब मैंने मायूस होते हुए अपना सर न में हिला कर दिया; "जब प्यार करता 'था' तब तो कभी मारा नहीं तो अब जब बेटी ने रिश्ता ही खत्म कर दिया तो उस पर किस हक़ से हाथ उठाता?" मेरी कही इस बात से मेरा दर्द छलक रहा था और मेरा ये दर्द देख दोनों भाई-बहन को नेहा पर गुस्सा आ रहा था!

"कौन कहता है आपका नेहा पर कोई हक़ नहीं!" संगीता गुस्से से बोली, परन्तु मुझे अब इस विषय पर और बात नहीं करनी थी इसलिए मैं खामोश रह कर अपना सर न में हिलाता रहा| "ठीक है, इसे मैं सीधा करूँगी!" संगीता ने नेहा को सुधारने के लिए अपनी कमर कसते हुए कहा| परन्तु ये इतना आसान काम नहीं था जितना संगीता समझ रही थी!

"याद है मैंने तुम्हें एक बार आर्डर और केओस की थ्योरी (Order and Chaos की theory) समझाई थी?!... तुम जितना नेहा को अपने गुस्से से दबाओगी...उसके ऊपर रोक-टोक लगाओगी, नेहा का दिल उतना ही बगावत करेगा! फिर वो इतने झूठ बोलेगी की तुम पकड़ भी नहीं पाओगी इसलिए नेहा के साथ ठंडे दिमाग से सोच-विचार कर बात करो!" मैंने संगीता को चेताते हुए कहा| तब मुझे नहीं पता था की संगीता पहले ही नेहा के गाल पर धर चुकी है इसलिए मेरी दी गई ये चेतावनी संगीता के लिए बेकार है!

इधर मेरी कही बातों से साफ़ ज़ाहिर था की धीरे-धीरे मैं अब नेहा की ज़िन्दगी से दूर हो रहा हूँ और ये बात दोनों भाई-बहन को खटक रही थी! "क्यों जीजू, आप नेहा को सही रास्ते पर नहीं लाओगे?!" अनिल चिंतित हो कर मुझसे पूछने लगा| लेकिन मैं इस सवाल का जवाब नहीं देना चाहता था इसलिए मैंने सर न में हिला दिया और उठ कर बाथरूम चला गया| मेरा दिल किस कदर टूटा था ये संगीता और अनिल समझ चुके थे; " ये (मैं) अभी टूट चुके हैं इसलिए इन्हें सँभलने में कुछ समय लगेगा! तब तक मैं हूँ इस लड़की की लगाम कसने के लिए!" संगीता ठंडी आह भरते हुए अनिल को समझाने लगी|

रात को अनिल की ट्रैन थी इसलिए वो खाना खा कर मुंबई के लिए निकल गया| सोने के समय संगीता और मैं अकेले थे इसलिए संगीता मुझसे रूठते हुए बोली; "माँ से बात छुपाते हो वहाँ तक तो ठीक है क्योंकि एक बेटा कभी अपनी माँ का दिल नहीं दुखाना चाहता मगर मुझसे...जिससे आप इतना प्यार करते हो उसी से बातें छुपाओगे...झूठ बोलोगे की मुझे याद कर के अपनी तबियत बिगाड़ ली तो कैसे चलेगा?"

मुझे एहसास हुआ की मैंने संगीता से बात छुपा कर गलती की है इसलिए मैंने माफ़ी माँगते हुए कहा; "I'm sorry जान! मैं तुम्हें ये सब बता कर दुखी नहीं करना चाहता था|" मैंने माफ़ी तो माँग ली थी मगर मैं अब भी संगीता से अपने दिल का दर्द छुपा रहा था| संगीता का ध्यान भटकाने के लिए मैंने उसे थोड़ा रोमांटिक करने की सोची; "जान, तुम हमेशा शिकायत करती हो न की मैं तुम्हें टाइम नहीं देता...तो मैं सोच रहा था की हम दोनों अकेले कहीं टाइम बिताने चलते हैं|" मेरी एकदम से बात बदलने से संगीता के कान खड़े हो गए थे| वो समझ गई की मैं उसे रोमांटिक कर उसका ध्यान भटकाना चाहता हूँ इसलिए मेरी होशियारी पकड़ते हुए संगीता ने मेरे दोनों गालों पर अपने हाथ रखे और मेरी आँखों में झाँकते हुए बोली; "जानू, माना की मैं आप की बातों में जल्दी आ जाती हूँ और सबकुछ भूल कर एकदम से रोमांटिक हो जाती हूँ मगर मैं इतनी भी बुद्धू नहीं की आपकी होशियारी न समझूँ! अब मुझे बताने की कृपा करो की आखिर आज जनाब एकदम से मुझ पर इतने मेहरबान कैसे हो गए?" संगीता बड़े प्यार से बोली और उसके इस प्यारभरे अंदाज़ को देख मैं मुस्कुरा दिया;

मैं: वो क्या है न जान, हमारे बच्चे बड़े हो गए हैं तो अब उन्हें मेरे प्यार की जर्रूरत नहीं इसलिए मैंने सोचा की क्यों न अब अपना सारा समय मैं तुम्हें दूँ ताकि इतने साल जो मैंने तुम्हें अपने प्यार के लिए तड़पाया है उसकी कमी पूरी की जा सके|

मैंने अपनी तरफ से शब्दों को शहद में डूबा कर संगीता के सामने इस कदर परोसा था की संगीता रोमांटिक हो जाए मगर संगीता मेरे झाँसे में आने से रही!

संगीता: अच्छा जी??! बच्चे बड़े हो गए तो आप ऐसे बोल रहे हो मानो बच्चे शादी लायक हो गए हों?!

संगीता अपनी आँखें नचाते हुए मज़ाक करते हुए बोली|

मैं: शादी लायक बड़े नहीं हुए तो क्या, समझदार तो हो गए! अपना भला-बुरा तो समझने लगे!

ये कहते हुए मुझे कल रात अपना लिया फैसला याद आ गया: आयुष और स्तुति भी बड़े हो कर मुझसे अपनी आज़ादी मांगेंगे और मेरे रोक-टोक करने को गलत समझ मुझे छोड़ देंगे, ऐसे में मेरा अभी से अपने बच्चों से दूरी बना लेना ही उचित है ताकि मेरा दिल कम दुखे!

इधर संगीता मेरे भीतर के दर्द को पकड़ चुकी थी, वो जान गई थी की मैं आयुष और स्तुति को ले कर चिंतित हूँ इसलिए उसने मुझे सँभालते हुए कहा;

संगीता: जानू, नेहा की रगों में आपका खून नहीं है| उसकी रगों में जो चन्दर का गंदा खून बह रहा है ये सब उसी का असर है|

जब संगीता ने कहा की नेहा मेरा खून नहीं है तो मेरे दिल में टीस उठी और आँखों में आँसूँ आ गए!

मैं: नहीं जान! ऐसा मत कहो...she'll always be my first born!

ये कहते हुए मुझे वो दिन फिर से याद आ गया जब नेहा ने मुझे पहलीबार पापा कहा था!

संगीता: I know जानू! मैं जानती हूँ की आप नेहा से कितना प्यार करते हो और उसके गुस्से में कहे उन जहरीले शब्दों से आपको कितनी ठेस पहुँची है! लेकिन आपके दोनों बच्चे (आयुष और स्तुति) आपका खून हैं, वो आपके दिल को कभी ठेस नहीं पहुँचायेंगे! वो दोनों आपसे दिलो-जान से प्यार करते हैं, वो कभी आपको इस कदर आहत नहीं करेंगे!
संगीता ने मेरे आँसूँ पोंछते हुए मुझे समझाया| गौर करने वाली बात ये थी की संगीता को आयुष और स्तुति पर बहुत अभिमान था की वो कभी नेहा जैसा बर्ताव नहीं करेंगे, परन्तु मेरा जख्मी दिल मुझे अब किसी से मोह बढ़ाने नहीं दे रहा था;

मैं: जान, तुम्हारी तरह अतिआत्मविश्वास मैं भी नेहा पर करता था| परन्तु कल रात जो हुआ उससे मैं ये बात समझ चूका हूँ की ज़िन्दगी में कभी किसी पर इतना विश्वास मत करो की विश्वास टूटने पर तुम ही टूट जाओ!

जब बच्चे बड़े होते हैं तो उन्हें अपने माता-पिता का प्यार बंदिश जैसा लगने लगता है इसलिए अभी भी समय है संभल जाओ| अपनी उमीदों के धागे बच्चों से मत बाँधों वरना इन धागों के टूटने पर तुम भी मेरी टूट जाओगी|
मैं जितना प्यार से हो सके उतना प्यार से संगीता को ज़िन्दगी की असलियत से रूबरू करवा रहा था परन्तु संगीता मेरी बात को मानने से रही! उसने मेरी बात को हलक में लेते हुए कहा;

संगीता: अगर मैं टूट गई तो, आप हो न मुझे सँभालने के लिए, फिर मुझे किस बात की चिंता!

मैं: मैं हमेशा तो नहीं रहूँगा न?!

मैंने थोड़ा गंभीर होते हुए संगीता को समझाना चाहा मगर मेरी बात सुन संगीता एक दम से रुनवासी हो गई;

संगीता: ऐसा क्यों कहेत हो जी?! आपको कुछ हो गया न तो मैंने भी उसी पल मर जाना है!

ये कहते हुए संगीता रो पड़ी! जो शक़्स मुझे सँभालने की कोशिश कर रहा था वो ही हार जाएगा तो मेरे घर की ये गाडी कैसे चलेगी, ये सोच कर मने संगीता को अपने सीने से लगाया और उसे छोटे बच्चों की तरह लाड करते हुए बोला;

मैं: आजा मेरा छोटा बच्चा! बस...बस रोते नहीं!

संगीता को लाड करते हुए जब ये बोल मेरे मुख से निकले तो मुझे एहसास हुआ की मैं अपने छोटों बच्चों को इसी तरह लाड किया करता था! इस एहसास ने मुझे और भी दुखी कर दिया की अब मैं कभी अपने बच्चों को कभी इस तरह लाड नहीं कर पाऊँगा|

खैर, रात में हम दोनों मियाँ-बीवी इसी तरह एक दूसरे के पहलु में लिपटे हुए सो गए| अगली सुबह जब मैं उठा तो मुझे सबसे पहले नेहा दिखी और उसे देख मुझे याद आया की कैसे रोज़ सुबह मेरी नेहा बिटिया मुझे गुड मॉर्निंग वाली पप्पी दे कर उठाती थी| परन्तु आज नेहा के चेहरे पर कोई ख़ुशी नहीं थी, थी तो केवल मेरे प्रति उसके दिल में नफरत! इस नफरत को देख मेरा दिल अब घर में रहने का नहीं था इसलिए मैंने माँ से बात की कि क्यों न हम माँ-बेटे दो दिन के लिए वैष्णो देवी माँ के दर्शन करने चलें| घर में रह कर अपना खून जलाने से अच्छा था कि माँ के दर्शन कर मन शांत रखा जाए|

माँ वैष्णो देवी जाने के लिए तुरंत तैयार हो गईं, रह गई बच्चों और संगीता कि बात तो मैंने संगीता को अकेले में समझाते हुए कहा; "जान, मेरा मन इस समय बड़ा अशांत है, माँ के दर्शन करने जाऊँगा तो मन शांत होगा!" संगीता मेरे जज़्बात समझ गई और उसने मुझे जाने कि इज्जाजत दे दी|

माँ के संग वैष्णो माता कि ये यात्रा मेरे लिए बहुत यादगार रही क्योंकि इसबार पूरी यात्रा मैंने माँ का हाथ थाम कर की| मैं और माँ तब ही अलग हुए थे जब हम अर्धकुंवारी पहुँचे, वहाँ से माँ के लिए मैंने बैटरी वाली गाडी करवा दी और मैं पैदल चलते हुए भवन तक पहुँचा| मेरे बिना भवन पर पहुँच माँ का हाल बुरा था! वैसा ही हाल मेरा हुआ जब मैं भवन पहुँचा, मैं जब भवन पहुँचा तो मुझे माँ कहीं दिखीं ही नहीं| घबराहट के मारे मेरा दिल बड़ी जोर से धड़क रहा था की मेरी माँ कहाँ चली गईं?! थोड़ी सूझ-बूझ दिखते हुए मैंने अपना फ़ोन निकाला और एक फौजी को अपनी माँ की तस्वीर दिखा कर पूछने लगा की उसने मेरी माँ को देखा है?! अब फौजी के पास सिर्फ यही एक काम तो है नहीं इसलिए उसने न में सर हिला दिया|

चिंतित हो कर मैं भवन की तरफ बढ़ा तो देखा की मेरी माँ एक कोने में बेंच पर बैठीं हैं! मैं दौड़ता हुआ उनके पास पहुँचा और उन्हें बताया की उन्हें यहाँ न पाकर मैं कितना परेशान था!

बहरहाल हमने वैष्णो माता के दर्शन किये और इस पूरे दौरान मैं अपनी माँ का हाथ पकड़े रहा| माँ के दर्शन कर हम भैरों बाबा के दर्शन नंगे पाँव चल दिए| अब माँ को नंगे पाँव चलने की आदत थी परन्तु मुझे नहीं! अततः भैरों बाबा के दर्शन कर के नीचे भवन आते-आते मेरे दोनों पॉंव में दर्द होने लगा!

ऊपर भवन में ठहरने का कोई इंतज़ाम नहीं था इसलिए हमें नीचे उतरना था, परन्तु पहले हमें कुछ खाना था| मैंने और माँ ने फटाफट खाना -पीना किया और बैटरी वाली गाडी से नीचे अर्धकुंवारी आ पहुँचे| बारिश शुरू हो गई थी और माँ थोड़ी भीग गईं थीं| मैंने चिंतित हो कर माँ से पुछा की वो ठीक तो हैं, उन्हें ठंड तो नहीं लग रही? अब माँ मुझे चिंतित नहीं करना चाहतीं थीं इसलिए उन्होंने कह दिया की वो ठीक हैं| परन्तु मैंने अपनी माँ को ठंड से काँपते हुए देख लिया!

माँ के बीमार होने का सोच घबराहट के मारे मेरा बुरा हाल हो गया! मैंने फौरन तौलिये से माँ के गीले सर को पोछा और उन्हें सूखी शॉल लपेट दी| जब बारिश थम गई तो हम नीचे उतरने के लिए पुनः चल पड़े| बारिश हुई थी तो फर्श में फिसलने का डर था इसलिए मैं अपनी माँ का हाथ थामे था और जैसे छोटे बच्चे छोटे-छोटे कदम से चलते हैं, उसी तरह हम माँ-बेटे भी नीचे उतरने लगे|

जब हम बाण्ड गँगा पहुँचे तो वहाँ हमें बंदर मिले जो की बेचारे सो रहे थे| लेकिन तभी 3-4 बेवकूफ लड़के आये जो रात के 1 बजे जोर से चिल्ला रहे थे जिस कारण उन सो रहे बंदरों की नींद खुल गई| अब समस्या ये थी की मेरा पास था प्रसाद और एक अन्य थैला जिस पर उन बंदरों की नज़र थी| यदि मेरे और बंदरों के बीच छीना-झपटी शुरू हो जाती तो माँ को कौन सँभालता?

समय की नज़ाकत को समझ मैंने पास की दूकान से एक पिठ्ठू बैग खरीदने का फैसला किया| पिठ्ठू बैग में समान भर मैंने बैग पीठ पर लाद लिया तथा माँ का हाथ पकड़ चल पड़ा| वैष्णो माता की कृपा थी की मुझे कोई समस्या नहीं हुई और हम रात 2 बजे होटल लौटे तथा अगले दिन की ट्रैन पकड़ घर के लिए चल पड़े|

माँ के संग इस यात्रा ने मुझे दो बातें सिखाई थीं;

1. पहला, सब बच्चे अपने माँ-पिताजी से ज़िन्दगी जीने की आज़ादी की माँग करने के लिए नहीं लड़ते! कुछ बच्चे होते हैं जो अपने माता-पिता द्वारा लगाई बंदिशों को समझते हैं की ये बंदिशें केवल उन बच्चों की भलाई के लिए लगाई गईं हैं और उन बंदिशों के अनुसार जीना सीख लेते हैं| ऐसे बच्चे बड़े हो कर आज्ञाकारी होते हैं और अपने माता-पिता की सेवा करते हैं|

2. दूसरा, बच्चे कैसे भी हों, माता-पिता कभी उन्हें प्यार करना नहीं छोड़ते| माता-पिता का प्यार निस्वार्थ होता है, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता की उनका बच्चा बड़ा हो कर उनके साथ कैसा सलूक करेगा| उन्हें तो बस अपने बच्चों में अपना जीवन दिखता है|

इन दोनों सीखों में से पहली सीख तो मैं समझ गया था परन्तु दूसरी सीख मेरे गले नहीं उतर रही थी!

इधर घर पर मेरे और माँ के न होने पर कोहराम मच गया था| मैं और माँ अकेले वैष्णो माता के दर्शन के लिए गए थे इस वजह से स्तुति मुझसे नाराज़ हो गई थी! "पपई, मुझे क्यों नहीं ले कर गए?! मैं पपई से बात नहीं करुँगी!" स्तुति मुँह फुला कर मुझसे नाराज़ हो गई थी|

वहीं मेरे अकेले माँ के साथ जाने से आयुष समझ गया था की आखिर मैं क्यों सबको वैष्णो माता के दर्शन करने ले कर नहीं गया| अपने गुस्से में जलते हुए आयुष अपनी दीदी से झगड़ा करने आ पहुँचा;

आयुष: आपकी वजह से पापा जी अकेले दादी जी को वैष्णो देवी माता के दर्शन करने ले गए| आपकी वजह से स्तुति, पापा जी के घर पर न होने के कारण रोये जा रही है! न आप पापा जी से वो गंदे शब्द कहते और न ही हमारे घर में ये अशांति फैलती!

आयुष ने जब अपनी बड़ी दीदी पर आरोप लगाया तो नेहा तिलमिला गई और आयुष पर बरस पड़ी;

नेहा: शट अप (shut-up) आयुष! तुझे कुछ नहीं पता!

कोई और दिन होता तो आयुष अपनी दीदी के एक बार झिड़कने पर चुप हो जाता मगर आज आयुष अपनी दीदी से बहस करने के इरादे से आया था!

आयुष: मैं सब जानता हूँ दीदी! सब गलती आपकी है, आप ही ने सबसे झूठ बोला! आप परीक्षा में फेल हुए, आपने पापा जी का विश्वास तोडा! और आप ही ने पापा जी...जो की आपसे इतना प्यार करते हैं...मुझसे और स्तुति से भी ज्यादा उनका दिल दुखाया!

आयुष ने जब नेहा पर पुनः आरोप लगाए तो नेहा गुस्से से बोली;

नेहा: तो तू कान लगा कर सारी बातें सुनता है?

आयुष: हाँ जी! और आपकी जानकारी के लिए बता दूँ, मैंने ही पापा जी को आपके स्कूल बैग से रिपोर्ट कार्ड निकाल कर दी थी| मैंने ही पापा जी को बताया की आपका एक बॉयफ्रेंड है जिसके साथ आप घर में झूठ बोल कर जाते हो! और पापा जी के बीमार होने पर मैंने ही मम्मी को फ़ोन कर सब सच बताया था|

नेहा सोचे बैठी थी की उसके खिलाफ मैंने ही संगीता को भड़काया होगा मगर जब आयुष ने सब सच कहा तो नेहा आयुष को खा जाने वाले नज़रों से घूरने लगी;

नेहा: अच्छा...तो तू ही है वो विभीषण जिसने सारी आग लगाई है! सब को मेरे खिलाफ भड़का कर मुझे ही दोष दे रहा है की ये सब क्लेश मैंने किया है!

अपनी दीदी का गुस्सा देख खामोश हो जाने वाला आयुष आज अपना गुस्सा दिखाने वाला था!

आयुष: मैंने कोई आग नहीं लगाई और न ही मैंने किसी को आपके खिलाफ भड़काया है! झूठ आपने बोला, भरोसा आपने सबका तोडा और आप अपना दोष मेरे सर मढ़ रहे हो?!

आयुष बार-बार अपनी दीदी को झूठे होने और सबकी भावनाएं आहत करने का ताना दे रहा था इसलिए नेहा अपनी सफाई देने लगी;

नेहा: मैं सिर्फ अपने हक़ के लिए आवाज़ नहीं उठा रही थी, मैं तेरे और स्तुति के हक़ के लिए भी आवाज़ उठा रही थी! तुझे पता भी है की 'तेरे पापा जी' हमारी लाइफ को कितना कण्ट्रोल करते हैं? हमें कैसे रोक-टोक कर अपनी बंदिशों में कैद कर के रखते हैं?

उन्होंने तुझे गर्लफ्रेंड बनाने से रोका, मुझे बॉयफ्रेंड बनाने से रोका...कल को स्तुति बड़ी होगी तो उसे भी रोकेंगे! आखिर क्यों हम कोई गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड नहीं बना सकते? उन्होंने भी तो अपने स्कूल टाइम में गैर्लफ्रेंड बनाई थी न? फिर हमें क्यों रोकते हैं?!

हमें बड़े हो कर क्या बनना है ये हम तय करेंगे या वो (मैं)? लाइफ हमारी है तो इसके डिसिशन भी तो हमें लेने होंगे न? आखिर पूरी जिंदगी तो हमें काटनी है! तू जानता है न 'तेरे पापा जी' ने तेरा क्रिकेट खेलना जो की तुझे इतना पसंद है वो बंद करवा दिया! क्या तूने पुछा उनसे की आखिर क्यों तू क्रिकेट नहीं खेल सकता? क्यों तो क्रिकेट में अपना करियर (career) नहीं बना सकता?!

ये तो मैं हूँ तेरी बड़ी बहन जो तेरे और स्तुति के अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रही हूँ वरना 'तेरे पापा जी' ने तो हमारे सारे अरमानों को अपनी मर्जी के आगे कुचल देना था!

नेहा बार-बार आयुष से 'तेरे पापा जी' कह रही थी जो की दर्शाता था की किस हद्द तक नेहा ने मुझसे अपने सारे नाते तोड़ लिए हैं! नेहा की जिंदगी में अब मेरा कोई स्थान नहीं था, उसके लिए तो उसकी आज़ादी ही सब कुछ थी|

खैर, नेहा ने जब आयुष और स्तुति के अधिकारों के लिए लड़ने की बात कही तो आयुष गुस्से से तिलमिला गया क्योंकि उसके अनुसार उसकी नेहा दीदी की दी गई ये सफाई कतई जायज़ नहीं थी;

आयुष: किन अधिकारों की बात करते हो आप? मैंने या स्तुति ने पापा जी से आज तक अपना कोई अधिकार नहीं माँगा...

आयुष के गुस्से को देख नेहा हैरान थी और थोड़ा बहुत घबरा गई थी क्योंकि उसने आजतक आयुष को कभी इस तरह गुस्से में नहीं देखा था इसीलिए उसने आयुष की बात पूरी होने से पहले ही काट दी;

नेहा: तूम दोनों (आयुष और स्तुति) अभी छोटे हो...

लेकिन नेहा आगे कुछ कहती उससे पहले ही आयुष ने आज पहली बार अपनी दीदी की बात काटते हुए कहा;

आयुष: मैं और स्तुति छोटे हैं लेकिन फिर भी जानते हैं की पापा जी किन हालातों में हमें पढ़ा रहे हैं| लेकिन ये बात आपके...जो की हमसे उम्र में इतने बड़े हो, आपके समझ नहीं आती! आप जानते हो की पापा जी का नया बिज़नेस अभीतक ठीक से सेटल नहीं हो पाया है, लेकिन फिर भी उन्होंने हमारी जर्रूरतों के लिए कभी पैसे खर्चने से मना नहीं किया| इन हालातों में भी वो हमारी जर्रूरतें पूछने और पूरा करने से पीछे नहीं हटते|

रही बात मेरी गर्लफ्रेंड बनाने की, तो पापा जी ने मुझे इसके लिए कभी नहीं रोका या मना किया! उन्होंने बस मुझे ये समझाया की ज़िन्दगी में किसी के अचानक चले जाने से दुखी नहीं होना चाहिए क्योंकि आपके दुखी होने से आपका परिवार दुखी हो जाता है!

और जो आप मेरे क्रिकेट खेलने की बात कर रहे हो न, पापा जी ने मुझे क्रिकेट खेलने से कभी नहीं रोका| उन्होंने मुझे क्रिकेट की दुनिया के एक कड़वे सच से रूबरू करवाया जिसमें मेरी तरह अनेक बच्चे क्रिकेटर बनने का सपना ले कर आते हैं और कम्पीटिशन करते-करते हार जाते हैं! पापा जी ने मुझे ये समझाया की क्रिकेट को बस अपनी हॉबी बना कर रखो तथा मन लगा कर पढ़ाई करो ताकि बड़े हो कर अपनी पसंद की नौकरी या बिज़नेस करो|

'मेरे पापा जी' ने कभी हमारे ऊपर अपनी पसंद या मर्जी नहीं थोपी और न ही उन्होंने कभी आप के ऊपर अपनी मर्जी आजतक थोपी है! ये तो आपके जो नए दोस्त हैं, ये उनकी सांगत का ही असर है की आप इस कदर हवा में उड़ने लगे हो की आप इतने प्यार करने वाले पापा जी की बेकद्री कर रहे हो! वो पापा जी जो हमेशा कहते थे की; Neha is my first born!

आयुष ने नेहा को उन बातों से रूबरू करवाया जो हम बाप-बेटों के बीच हुई थी| गौर करने वाली बात है की जिस घृणा से नेहा ने मुझे आयुष का पापा कहा था, उतने ही गर्व से आयुष ने मुझे अपना पापा कहा था|

खैर, आयुष उम्र में नेहा से 4 साल और कुछ महीने छोटा था ऐसे में जब आयुष ने नेहा से कहा की वो हवा में उड़ने लगी है तो नेहा का खून खौल गया और उसने कस कर आयुष के गाल पर एक थप्पड़ धर दिया!

नेहा: बद्तमीज़! बड़ी बहन से कैसे बात करते हैं इसका सहूर नहीं है तुझे!

नेहा ने गरजते हुए आयुष को फटकार लगाई|

आयुष: तमीज़ और शिष्टाचार तो 'मेरे पापा जी' ने मुझे भली-भाँती सिखाये हैं मगर जब आप 'मेरे पापा जी' से बदतमीज़ी से बात कर सकते हो, उनके लाड-प्यार का अपमान कर सकते हो तो आप किस हक़ से मुझे तमीज और शिष्टाचार सीखा रहे हो?

आँखों में आँसूँ लिए आयुष ने फौरन पलट कर अपनी दीदी से ऐसा सवाल पुछा की नेहा का खून उबाले मारने लगा और उसने फिर से आयुष को थप्पड़ मारने को हाथ उठाया! परन्तु इस बार संगीता कमरे में आ गई और नेहा के गाल पर थप्पड़ मारते हुए बोली;

संगीता: बड़ी बहन हो कर अपने छोटे भाई पर हाथ उठाते तुझे शर्म नहीं आती!

नेहा: आप इसे (आयुष को) कुछ क्यों नहीं कहते? ये तब से मुझसे जुबान लड़ा रहा है!

नेहा ने अपना गाल सहलाते हुए अपनी सफाई दी|

संगीता: सब सुना मैंने! आखिर क्या गलत कहा आयुष ने? वो तू ही थी न जो 'आयुष के पापा जी' के ज़रा सा बीमार होने पर रासन-पानी ले कर मुझ पर चढ़ जाती थी! वो तू ही थी न, जिसने छोटी सी उम्र ये कह दिया था की मैं कभी शादी नहीं करुँगी, मैं ताउम्र अपने पापा जी की सेवा करुँगी! अब कहाँ गया तेरा वो प्यार? संगीता ने ताने मारते हुए नेहा से पुछा| अब देने को नेहा पलट कर जवाब दे सकती थी, परन्तु इस वक़्त संगीता का गुस्सा पूरे शबाब था और नेहा की ज़रा सी हिमाक़त पर संगीता उसे आज अच्छे से कूट देती! अपनी मम्मी की कुटाई से बचने के लिए नेहा ने चुप रहना ही ठीक समझा|

संगीता को नेहा से कोई जवाब सुनने की उम्मीद नहीं थी इसलिए वो आयुष को ले कर बैठक में आ गई| बैठक में स्तुति अपने दीदी-बड़े भैया और मम्मी की ऊँची आवाज़ सुन सहम गई थी इसलिए वो चुपचाप बैठी थी| जब आयुष बैठक में आया तो स्तुति को आयुष के गाल पर नेहा द्वारा मारे तमाचे के निशान दिखे, स्तुति समझ गई की नेहा ने ही आयुष को थप्पड़ मारा है इसलिए स्तुति अपने भैया के पास दौड़ी आई| अपनी टिमटिमाती हुई आँखों से स्तुति ने आयुष से पुछा की ये थप्पड़ उसे नेहा दीदी ने ही मारा है, जिसके जवाब में आयुष ने नकली मुस्कान के साथ स्तुति को अपने गले लगा लिया| "दिद्दा ने आपको मारा न...मैं दिद्दा से कट्टी कर रही हूँ!" स्तुति अपनी नेहा दिद्दा से नाराज़ होते हुए बोली|

आयुष ने अपनी मम्मी को बता दिया था की नेहा के ये बदले तेवर का एक कारण करुणा है इसलिए संगीता ने कुछ सोचा विचारा और फिर नेहा का फ़ोन ले कर करुणा को फ़ोन खनका दिया|

संगीता: हेल्लो करुणा?!

करुणा: हाँ...आप कौन बोल रे?

करुणा संगीता की आवाज़ पहचान नहीं पाई थी|

संगीता: मैं संगीता बोल रही हूँ, नेहा की मम्मी|

करुणा: ओह...हाँ संगीता जी, आप कैसे है?

करुणा की हिंदी अब भी टूटी-फूटी थी!

संगीता: मेरा हाल-चाल बहुत खराब है और ये सब आपकी वजह से है! आपने नेहा को ये बताया की आयुष के पापा आपके ऊपर कितनी रोक-टोक लगाते थे, लेकिन आपने नेहा को ये क्यों नहीं बताया की उन्होंने आपकी कितनी मदद की?! आपकी नौकरी लग जाए उसके लिए इन्होने कितने कष्ट उठाये, बिमारी की हालत में आपके डाक्यूमेंट्स बनवाये!

आपके नेहा को उसी के पापा जी के खिलाफ भड़काने का नतीजा भी जानते हो आप? नेहा ने अपने पापा जी से कहा की 'You're not my real father!' ये सुन कर इनका (मेरा) क्या हाल था इसका आपको अंदाजा भी है? उनकी (मेरी) तबियत इस कदर खराब हो गई की डॉक्टर को बुलाना पड़ा था!
संगीता गुस्से से भरी हुई थी और उसने अपना ये सारा गुस्सा करुणा के ऊपर निकाल दिया!
करुणा: संगीता जी, मैं नेहा को ऐसा कुछ नहीं बोला...

करुणा ने अपनी सफाई देनी चाही मगर संगीता इस वक़्त किसी की सफाई सुनने के लिए तैयार नहीं थी!

संगीता: अगर आपने उसे कुछ नहीं सिखाया पढ़ाया तो वो ऐसे ही आपका नाम ले रही थी?! अगर आप दोनों को इतनी ही आज़ादी पसंद है तो दोनों साथ रहो! आप आओ और ले जाओ इसे अपने साथ, अपने घर!

संगीता गुस्से में बोली और उसने फ़ोन काट दिया|

अगली सुबह जब मैं और माँ घर पहुँचे तो हमारा स्वागत बड़े जोर-शोर से हुआ! आयुष दौड़ता हुआ आया और मेरे पैर छू आशीर्वाद ले कर मुझसे लिपट गया| वहीं स्तुति अपना निचला होंठ फुलाये अपने प्यारभरे गुस्से से देख मुझे अपने गुस्से का बोध करा रही थी| फिर मुझे यानी अपने ही पपई को जलाने के लिए स्तुति अपनी दादी जी की गोदी में चढ़ गई और उनकी पप्पी ले कर पूछने लगी; "दाई, आप मुझे अपने साथ क्यों नहीं ले गए?" स्तुति का प्यारभरा गुस्सा देख माँ हँस पड़ीं और मुझे दोषी बनाते हुए बोलीं; "बेटा, तेरे पपई ने अचानक कहा की माँ, वैष्णो देवी चलते हैं, अब मैं क्या करती? हमेशा घूमने-घामने का प्लान तो तेरा पपई करता है, मैं बुढ़िया क्या कहती!" माँ ने जब सारा दोष मेरे सर डाला तो स्तुति अपने प्यारभरे गुस्से से मुझे देखते हुए बोली; "आपसे कट्टी पपई!"
मेरी बड़ी बेटी पहले ही मुझसे सारे रिश्ते तोड़ चुकी थी और अब तो मेरी छोटी बेटी भी मुझसे नाराज़ हो कर कट्टी कर चुकी थी! मैं अपना ये दर्द किसी को नहीं दिखाना चाहता था इसलिए मैंने झूठी हँसी का मुखौटा ओढ़ लिया और मुस्कुराते हुए सामान ले कर अपने कमरे में आ गया| मेरे पीछे संगीता ने स्तुति को प्यार से समझाया और स्तुति को मुझे खुश करने के लिए भेज दिया| सामान रख मैं कुर्सी पर बैठ कर ईमेल देख रहा था की तभी स्तुति मेरी दाईं तरफ आ कर खड़ी हो गई और बड़े प्यार से मुझे पुकारते हुए बोली; "पपई?!" स्तुति की बोली में ऐसी मिठास थी की मैंने तुरंत स्तुति की ओर देखा| स्तुति के चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान बिखरी हुई थी, जैसे ही हम बाप-बेटी की नजरें मिली स्तुति ने तुरंत अपने दोनों हाथ पाँख के समान खोल दिए| स्तुति इस समय इतनी मनमोहक दिख रही थी की मैं खुद को उसे गोदी लेने से रोक न पाया| मेरी गोदी में आते ही स्तुति ख़ुशी से खिलखिलाने लगी तथा मेरे सीने से लिपट गई|

"I love you पपई!" स्तुति के मुख से ये बोल स्वतः ही फूटे थे परन्तु इन शब्दों ने मेरे जल रहे दिल को ठंडक प्रदान की थी! दिल को थोड़ा सुकून तो मिला परन्तु मैंने प्रण किया था की मैं अब अपने बच्चों के मोह में बह कर खुद को फिर से चोटिल नहीं करूँगा इसलिए अपनी बिटिया के मुख से ये बोल सुन कर भी मैं चुप रहा! 'जब बच्चों ने बड़े हो कर अपनी आज़ादी माँग कर मुझे दुखी करना ही है तो मैं अभी से ही क्यों न उस दर्द के लिए त्तपर रहूँ!' मन में उमड़े इस विचार ने मुझे खामोश रहने पर मज़बूर कर दिया था|

आजतक जब भी स्तुति मुझे I love you कहती थी तो मैं हमेशा उसके सर को चूमते हुए उसे "I love you मेरा बच्चा" कह कर लाड किया करता था| परन्तु आज जब स्तुति ने मुझे I love you कहा तो मैं खामोश था, जाहिर है मेरी ये ख़ामोशी मेरी छोटी सी बिटिया के दिल को चुभ गई! स्तुति तुरंत मेरी गोदी से उतरी और मेरी शिकायत ले कर अपनी दादी जी के पास पहुँच गई| माँ ने जैसे ही सुना की मैंने उनकी लाड़ली पोती का दिल दुखाया है उन्होंने प्यारभरे गुस्से से मेरा नाम पुकारा| जब मैंने कमरे में प्रवेश किया तो देखा की स्तुति अपने हाथ सामने की ओर बाँधे, अपना निचला होंठ फुलाये और अपने प्यारे से गुस्से के कारण मुझे गुस्से से घूर रही थी!

"मानु के बच्चे...तू क्यों मेरी लाड़ली पोती को सताता है! चल अभी के अभी मेरी पोती को 5 बार आई लभ यू (I love you) बोल!" माँ के प्यारे से गुस्से को देख मुझे हँसी आ गई थी| अब समय था माँ के हुक्म की तामील करने की इसलिए मैं अपने दोनों घुटने तक कर बैठा और अपने कान पकड़ कर बोला; "I love you! I love you! I love you! I love you! I love you!" मेरे मुख से I love you सुनने की ख़ुशी स्तुति के चेहरे पर ऐसी आई की उसका प्यारा सा गुस्सा एकपल में काफूर हो गया! स्तुति दौड़ती हुई आई और मेरे सीने से लग कर पुनः ख़ुशी से खिलखिलाने लगी| स्तुति को देख कर ऐसा लगता था मानो उसने आज सब कुछ पा लिया हो, तभी तो स्तुति ख़ुशी से फूली नहीं समा रही थी|

इधर, स्तुति के गले लगने से मेरा कठोर मन पिघले लगा था| इस समय मेरे मन और दिल में जंग छिड़ गई थी! मन जानता था की बच्चों के बड़े होने पर मेरा दिल फिर टूटेगा और दिल था की भविष्य की परवाह किये बिना जी भरकर अपने बच्चों को लाड-प्यार करना चाहता था!

लेकिन मेरी छोटी बिटिया की आभा ऐसी थी की स्तुति के दिल की तपिश पा कर मेरा कठोर मन हारने लगा था| अपनी बिटिया को सीने से लगा कर लाड करने से मेरे टूटे हुए दिल को करार मिल रहा था| परन्तु अब भी कुछ था जो की हो कर भी नहीं था!
[color=rgb(97,]जारी रहेगा भाग - 12 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]अंतिम अध्याय: प्रतिकाष्ठा[/color]
[color=rgb(51,]भाग - 12[/color]

[color=rgb(26,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

स्तुति के गले लगने से मेरा कठोर मन पिघले लगा था| इस समय मेरे मन और दिल में जंग छिड़ गई थी! मन जानता था की बच्चों के बड़े होने पर मेरा दिल फिर टूटेगा और दिल था की भविष्य की परवाह किये बिना जी भरकर अपने बच्चों को लाड-प्यार करना चाहता था!

लेकिन मेरी छोटी बिटिया की आभा ऐसी थी की स्तुति के दिल की तपिश पा कर मेरा कठोर मन हारने लगा था| अपनी बिटिया को सीने से लगा कर लाड करने से मेरे टूटे हुए दिल को करार मिल रहा था| परन्तु अब भी कुछ था जो की हो कर भी नहीं था!

[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]

मेरे
सीने से लिपटी मेरी छोटी सी गुड़िया ख़ुशी से फूली नहीं समा रही थी, वहीं मैं अपनी उधेड़-बुन में लगा था की अपने बच्चों को खुल कर प्यार करूँ या नहीं?!

आमतौर पर स्तुति के मेरे गले लगते ही मैं उसे खूब लाड-प्यार किया करता था, परन्तु आज जब मैं खामोश था तो मेरी छोटी सी बिटिया के नाज़ुक दिल में सवाल पैदा हो गया; "पपई, आप मुझे प्यारी नहीं करते?" स्तुति भावुक हो कर मुझसे पूछने लगी|

उस पल यदि मैं न में गर्दन हिलाता तो मेरी गुड़िया का दिल टूट जाता इसलिए अब मुझे अपने चेहरे पर नक़ली मुस्कान चिपकानी थी! "आ जा मेरा बच्चा!" ये कहते हुए मैंने स्तुति के सर को बार-बार चूमना शुरू कर दिया| अपने पपई के प्यार को पा कर स्तुति ख़ुशी से खिलाने लगी थी|

स्तुति को जब मैंने "मेरा बच्चा" कहा तो मुझे याद आया की नेहा को मेरे मुख से ये दो शब्द सुनना कितना पसंद था, इस बात को याद कर मेरा दिल भर आया और मैं अपने आँसुंओं को अपनी आँखों की दहलीज़ पर आने से रोकने लगा|

मुझे लगता है की उस पल स्तुति ने मेरे मन में खालीपन महसूस कर लिया था, क्योंकि अगले ही पल से मेरी बिटिया का छुटपन लौट आया था!

जब स्तुति पैदा हुई थी तब से ही हम बाप-बेटी के बीच एक अनोखा बंधन था, तभी तो स्तुति मेरे सिवाए किसी की गोदी में नहीं ठहरती थी| दो साल की उम्र तक स्तुति के लिए मेरी गोदी ही सब कुछ थी और आज इतने साल बाद मेरी बिटिया ने मेरी गोदी में फिर से कब्जा जमा लिया था| स्तुति फिर से 2 साल की गुड़िया बन कर मुझसे लाड-दुलार माँगने लगी थी|

जब मैं कंप्यूटर पर कुछ काम कर रहा होता तो स्तुति मेरे पास आ कर खड़ी हो जाती और "पपई" कह मुझे पुकारती| इस समय स्तुति के चेहरे पर ऐसी मासूमियत होती की मैं उसे गोदी लेने से खुद को रोक नहीं पाता था तथा मेरी गोदी में आते ही स्तुति फिर से खिलखिलाने लगती| अगर कभी स्तुति को गोदी लिए हुए मैं टाइपिंग करता तो स्तुति को ये बिलकुल पसंद नहीं आता इसलिए मेरा ध्यान अपने ऊपर खींचने के लिए स्तुति मुझसे तरह-तरह के सवाल पूछने लगती;

स्तुति: पपई आप क्या कर रहे हो?

मैं इसे स्तुति की जिज्ञासा समझता इसलिए मैं स्तुति को समझाने लगता;

मैं: बेटा, मैं ईमेल लिख रहा हूँ|

स्तुति: वो क्या होता है?

अब ये सवाल स्तुति को समझना मुश्किल था इसलिए मैं कोई उदहारण सोच उसे समझाने की कोशिश करने लगता था;

मैं: बेटा, ईमेल मतलब जब हम कंप्यूटर के जरिये किसी को चिठ्ठी लिखते हैं|

मुझे लगा था की मैंने अपनी बिटिया की जिज्ञासा शांत कर दी लेकिन फिर अगले ही पल स्तुति नया सवाल पूछ लेती;

स्तुति: कंप्यूटर पर चिट्ठी क्यों लिखते हैं?

जिसे मैं स्तुति की जिज्ञासा समझता था वो तो स्तुति की शरारत थी ताकि मेरा ध्यान उस पर केंद्रित रहे| खैर, स्तुति के इस सवाल का जवाब देना मेरे लिए मुश्किल था इसलिए मैं इस सवाल से बचने के लिए खामोश रहा| उधर स्तुति को उसके सवाल का जवाब नहीं मिला था इसलिए स्तुति ने नया सवाल पुछा;

स्तुति: पपई...मैं भी ईमेल लिखूँगी!

वैसे ये सवाल कम और माँग ज्यादा थी!

मैं: अच्छा ठीक है बेटा, ये लो!

मेरे मन में एक शरारत जाग गई| मैंने नई ईमेल खोल कर स्तुति को दी तथा उसके हाथ पकड़ कर टाइपिंग करवा कर ईमेल भेज दी|

दो मिनट बाद ही संगीता भुनभुनाती हुई कमरे में आई और मुझसे बोली; "ये ईमेल आपने भेजा है?" संगीता का सवाल सुन मैं अनजान बनने का नाटक करने लगा| मेरा अनजान बनने के नाटक से संगीता का गुस्सा प्यारभरे गुस्से में तब्दील हो गया! "तो आपके अकाउंट से किसने भेजी ये ईमेल?" संगीता ने प्यारभरे गुस्से से पुछा|

"स्तुति ने टाइप कर के भेजी है!" जैसे ही मैंने स्तुति का नाम लिया स्तुति अपने सारे दाँत दिखा कर हँसने लगी|

"नानी! तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझे ये लिख कर देने की कि आज से आप दादी जी के पास सोओगे?!" संगीता ने स्तुति के गोल-मटोल गाल खींचते हुए पुछा| अपनी मम्मी के पूछे सवाल पर स्तुति शर्मा गई और मुझसे लिपट कर छुपने लगी| स्तुति के कारण घर में हंसी-ख़ुशी का माहौल पुनः बनने लगा था इसलिए संगीता ने स्तुति के कूल्हों पर प्यार से थपकी मारी और रसोई में चली गई|

स्तुति के कारण मेरा जख्मी मन शांत हो रहा था इसलिए संगीता को लगा की मेरा जख्म अब भर रहा है, ऐसे में यदि नेहा मुझसे माफ़ी माँग ले तो यह मेरे जख्म पर मलहम के समान होगा तथा मेरा मन प्रसन्नता से भर जायेगा|

संगीता ने नेहा को अकेले में बुलाया और उसे मुझसे माफ़ी माँगने को कहा| अब नेहा के अनुसार उसने कुछ गलत नहीं किया था जिसके लिए उसे माफ़ी माँगनी पड़े, परन्तु वो जानती थी की अगर उसने अपनी मम्मी की बात नहीं मानी तो संगीता उसे सीधा गाँव डिपोर्ट (deport) कर देगी इसलिए मरते क्या न करते नेहा दिखावे के लिए मेरे पास माफ़ी माँगने आ गई|

खाना खा कर स्तुति सो चुकी थी और मैं इस मौके का लाभ उठाकर कंप्यूटर पर अपना काम करने में लगा था क्योंकि अगर मेरी बिटिया जाग जाती तो मुझे काम नहीं करने देती! उसी समय नेहा सर झुकाये हुए कमरे में आई और बड़ी ही रूखी आवाज़ में बोली; "I'm sorry!" नेहा ने सॉरी तो बोला मगर उसकी बोली-भाषा से साफ़ था की वो बस दिखावे के लिए सॉरी बोल रही है, न तो नेहा को अपने कहे के लिए कोई पछतावा है और न ही उसे कोई ग्लानि महसूस हो रही है! अब ऐसे सॉरी का क्या मोल जो आप दिल से नहीं बोल रहे इसलिए मैंने बिना नेहा की तरफ देखते हुए कहा; "Its ok!" इतना कह मैं मैं बिना नेहा की तरफ देखे उठ कर बाथरूम चला गया और मेरे जाने के बाद नेहा भी कमरे से चली गई|

मैं और नेहा इस बात से अनजान थे की हमारी ये छोटी सी गुफ्तगू संगीता ने बाहर छुप कर सुन ली है| संगीता उस समय इसलिए खामोश थी क्योंकि मेरा जख्म अब भी हरा था और ऐसे में मेरे लिए नेहा को माफ़ करना आसान न था| वहीं नेहा को और डाँटने का कोई फायदा नहीं था क्योंकि नेहा इस सी तक पक्की ढीठ हो चुकी थी! संगीता के जोर-जबरदस्ती करने से नेहा माफ़ी तो माँगती मगर उस माफ़ी का कोई मोल नहीं होता!

इधर कमरे के भीतर, नेहा की आवाज़ सुन स्तुति जाग गई थी, अपनी दीदी को सॉरी बोलते देख स्तुति को लगा की नेहा ने आयुष को थप्पड़ मारा उसके लिए नेहा सॉरी बोल रही है| "पपई, दिद्दा ने बड़े भैया को थप्पड़ क्यों मारा?" स्तुति उदास हो कर पूछने लगी| स्तुति का सवाल सुन मैं दंग रह गया! अब मुझे कुछ तो जवाब देना था इसलिए मैं बात गोल घुमाते हुए बोला; "बेटा, बड़े लोगों को कभी गुस्सा आ जाता है इसलिए..." मैंने अपनी बात अधूरी छोड़ते हुए स्तुति को लाड-प्यार कर सुला दिया| कुछ देर बाद संगीता ने मुझे सारी बात बताई और सारी बात सुन मुझे आयुष पर फक्र हो रहा था की मेरे द्वारा सिखाये सबक, मेरे द्वारा दी गई सीख तथा मेरे दिए संस्कारों पर मेरा बेटा चलने लगा था| वहीं मुझे पीड़ा इस बात की थी की नेहा ने खुद को मुझसे इस कदर काट लिया है की वो मुझे अब दिखावे के लिए भी "पापा जी" नहीं कहना चाहती!

बहरहाल, नेहा जितना मुझसे दूर हो चुकी थी उतना ही स्तुति और आयुष मेरे नज़दीक आ चुके थे| आयुष और मेरा रिश्ता दोस्ती का था इसलिए आयुष मुझसे मार्वल (Marvel) के सुपर हीरोज़ (super heroes) की बातें करता, हम बाप-बेटे घंटों तक इस मुद्दे पर बात करते थे!

एक बार तो आयुष मुझसे पूछने लगा की उसे ग्यारहवीं में कौन सा सब्जेक्ट लेना है?! "बेटा, आप अभी बहुत छोटी क्लास में हो| आपको ग्यारहवीं में आने में बहुत समय लगेगा, जब आप दसवीं में आओगे न तब हम सोचेंगे!" मैंने आयुष को प्यार से समझाया|

"पापा जी, मैं आपकी तरह कॉमर्स लूँगा!" आयुष खुश होते हुए बोला| अब स्तुति जो की हमारे पास बैठी हमारी बातें सुन रही थी वो भी उत्साह में बोल पड़ी; "मैं भी को...कोर्स (commerce) लूँगी!" स्तुति से कॉमर्स नहीं बोला जा रहा था मगर उसे कॉमर्स सब्जेक्ट लेना था!

मैंने स्तुति को अपनी गोदी में बिठाया और दोनों बच्चों को समझाते हुए बोला; "बेटा, अभी आप दोनों बहुत छोटे हो| जब आप बड़ी क्लास में आओगे तब आपको जो सब्जेक्ट अच्छा लगे वो लेना| मैं तो पढ़ाई में बस एक आम सा बच्चा था जिसके नंबर ठीक-ठाक आते थे इसलिए मैंने कॉमर्स सब्जेक्ट लिया| आप दोनों तो पढ़ाई में कितने अच्छे हो, तो अगर आपका मन करे तो साइंस लेना, फिर आप डॉक्टर या इंजीनियर बनना!" मैं बच्चों को उनका मन पसंद सब्जेक्ट चुनने की छूट दे रहा था मगर आयुष और स्तुति कॉमर्स लेने के लिए अड़े हुए थे! इतने में पीछे से संगीता की आवाज़ आई; "मेरे नाना-नानी...कॉमर्स बाद में लेना अभी खाना खाओ!"

जहाँ एक तरफ नेहा ने मेरा दिल दुखाया था तो दूसरी तरफ मेरी छोटी बिटिया स्तुति का छुटपन ऐसा था की मेरा कठोर मन उस प्यार में बहने लगा था| स्तुति को जैसे ही मैं घर में दिखता वो आ कर मेरी गोदी में चढ़ जाती| कभी मैं अगर अपना काम कर रहा हूँ तो स्तुति अपना निचला होंठ फुलाये मुझे आदेश देती; "पपई मुझे प्यारी करो!" स्तुति का ये प्यारा सा आदेश मानने को मैं विवश हो जाता और स्तुति को गोदी ले कर लाड-प्यार करता|

लेकिन कभी-कभी जब काम जर्रूरी होता तो मुझे स्तुति को प्यारी करने के लिए मना करना पड़ता, मेरे मना करते ही स्तुति अपनी दादी जी के पास दौड़ जाती और मेरी शिकायत लगा देती! फिर तो माँ मुझे प्यार से डाँटते हुए स्तुति को लाड करने का हुलम दे देती और मुझे मजबूरन माँ का हुक्म मानना पड़ता|

एक दिन आयुष ने स्तुति को बताया की मैं बहुत स्वाद खाना बनाता हूँ| बस इतना सुनना था की स्तुति मेरे पास दौड़ आई और अपना निचला होंठ फुला कर पूछने लगी की मैंने उसे कभी खाना बना कर क्यों नहीं खिलाया? "बेटा, तब आप बहुत छोटे थे और सिवाए दूध और सेरेलक्स के कुछ नहीं खाते-पीते थे| फिर जब आप बड़े हुए तो मैं काम में अधिक व्यस्त हो गया इसलिए मैंने खाना बनाने का काम छोड़ दिया|" मेरी सफाई सुन स्तुति अपनी फरमाइश करते हुए बोली; "मुझे आज आपके हाथ का खाना खाना है!" अब बिटिया का आदेश था तो मैं अपना काम छोड़ कर रसोई में घुस गया|

काफी सालों बाद रसोई में घुसा था तो हाथ धीरे चल रहे थे| तभी मेरे पीछे-पीछे स्तुति भी आ गई और बोली; "पपई मैं भी आपकी मदद करुँगी!" मैंने स्तुति को गोदी में उठा कर स्लैब पर बिठा दिया तथा उसे लस्सन छिलने का काम दे दिया| जब मैं खाना बनाने लगा तो स्तुति मुझे समान उठा-उठा कर देती| फिर जब रोटी बनाने की बारी आई तो स्तुति ने कहा की वो रोटी बनाएगी| स्तुति ने अपनी मम्मी को रोटी बनाते हुए देखा था इसलिए मुझे अपनी बिटिया को ज्यादा कुछ समझाना नहीं पड़ा| बाप की तरह बेटी ने भी रोटियाँ आड़ी-टेडी बनाईं पर मैंने रोटियाँ पूरी तरह सेंक दी|

जब खाना परोसा गया तो माँ रोटियों की दशा देख कर हँस पड़ीं और स्तुति के दोनों हाथ चूमते हुए बोलीं; "तू थोड़ी बड़ी हो जा बेटा, फिर मैं तुझे गोल रोटियाँ बनाना सीखा दूँगी|" अपनी दादी जी की बात सुन स्तुति बहुत खुश हुई, इतना खुश मानो उसे ऑस्कर अवार्ड मिला हो! अब चूँकि कई सालों बाद मैंने खाना बनाया था तो स्वाद माँ को अच्छा लगा था इसलिए माँ ने स्वाद खाने का श्रेय स्वयं ही स्तुति को देते हुए कहा; "मेरी शूगी ने खाने को छू लिया तो खाना इतना स्वाद बना है!" अपनी दादी जी की तारीफ से स्तुति इतना गदगद हो गई की वो एकदम से बोल पड़ी; "दाई, मैं रोज़ खाना बनाऊँगी!" स्तुति का जोश देख हम सभी हँस पड़े| इतने में मीठी जलन महसूस कर रही संगीता बीच में बोल पड़ी; "बड़ी आई रोज़ खाना बनाने वाली, पढ़ाई क्या मैं करुँगी?!" संगीता की बातों से उसकी जलन साफ़ महसूस हो रही थी और उसे यूँ जलता हुआ देख मेरी हँसी नहीं थम रही थी!

खाना खा कर आयुष अपनी दादी जी का हाथ पकड़ कर छत पर टहल रहा था| इधर बैठक में स्तुति मेरी पीठ पर चढ़ कर लाड कर रही थी की तभी नेहा ने स्तुति को पुकारा| स्तुति का अपनी दिद्दा पर गुस्सा अभी तक ठंडा नहीं हुआ था, आखिर नेहा ने स्तुति के बड़े भैया को थप्पड़ जो मारा था| "मैं आपसे कट्टी हूँ! आपने बड़े भैया को मारा! दिद्दा..फिददा..गिद्दा!!" स्तुति अपनी दीदी का नाम बिगाड़ते हुए गुस्से से बोली| अब चूँकि स्तुति मेरे पास थी इसलिए नेहा कुछ कह न पाई और अपने गुस्से का कड़वा घूँट पी कर चली गई|

"बेटा, अपनी बड़ी दीदी से ऐसे बात नहीं करते| आपकी दीदी से गलती हो गई, उन्हें माफ़ कर दो|" मैंने स्तुति को प्यार से समझाया तो स्तुति को उसकी गलती का एहसास हुआ| स्तुति अपने कान पकड़े हुए नेहा के कमरे के बाहर खड़ी हो गई और तुतलाते हुए बोली; "सोल्ली दिद्दा!" स्तुति इतनी प्यारी और गोल-मटोल है की उसे देख कर कोई उससे गुस्सा रह ही नहीं सकता इसलिए नेहा ने मुस्कुराते हुए उसे माफ़ कर दिया|

"खाना बनाया है तो बर्तन भी घस (धो)!" संगीता ने माँ के जरिये मुझे बर्तन धोने का काम कहलवाया| आज जो माँ ने मेरे खाने की तारीफ की थी उससे संगीता पूरी तरह जल-भून गई थी इसीलिए उसने ये काण्ड किया था| मैं बर्तन धोने लगा था की स्तुति मेरे पास आ गई और बोली; "पपई मैं भी बर्तन धोऊँगी|" अब सिंक एक था और उसमें दो लोग बर्तन नहीं धो सकते थे इसलिए मैंने एक तरकीब निकाली| स्तुति को स्लैब पर बिठा मैंने स्तुति को एक कपड़ा दिया| फिर मैंने बर्तन मांजने शुरू किये और स्तुति ने गीले बर्तनों को कपड़े से पोंछ कर रखना शुरू किया| गौर करने वाली बात है की हमारे घर में बर्तनों को माँज कर रखा जाता है, गीले बर्तनों को कपड़े से पोंछने का कोई चोंचला हमारे घर में नहीं होता| ये काम मैंने स्तुति को खुश रखने के लिए दिया था|

बर्तन धो कर स्तुति फुदकती हुई अपनी दादी जी के पास फिर से अपनी तारीफ़ सुनने पहुँची तथा बड़े गर्व से बताने लगी की आज उसने सारे बर्तन धोये हैं| "ओ लड़के! मैंने तुझे बर्तन धोने को कहा था और तूने मेरी शूगी से बर्तन धुलवाए!" माँ ने थोड़ा गुस्से से मुझे डाँट लगाते हुए कहा| अब मुझे डाँट पड़े और मेरी बिटिया खड़ी सुने, ऐसा तो हो नहीं सकता था! "दाई, बर्तन पपई ने धोये थे| मैं तो बर्तन को कपड़े से साफ़ कर रही थी!" स्तुति ने मेरे बचाव में सफाई दी| माँ अपनी पोती की सफाई सुन हँस पड़ीं और उसे अपने गले लगाते हुए बोली; "जानती हूँ बेटी, मैंने तुम दोनों को देख लिया था| मैं तो बस थोड़ा सा मज़ाक कर रही थी!" अपनी दादी जी की बात सुन स्तुति ने अपनी दादी जी के गाल खींचते हुए कहा; "दाई, आप मेरे साथ मस्ती करते हो?!" जिसके जवाब में माँ ने स्तुत के दोनों गाल चूम लिए और उसे लाड करने लगीं|

मेरी बिटिया के इस छुटपन के अलावा भी एक नया रूप निखर कर आया था और वो था एक माँ का रूप! जिस दिन संगीता पहलीबार वाइन पी कर भंड हुई थी उस दिन मेरी बिटिया का ये माँ वाला रूप पहलीबार बाहर आया था| आज इतने साल बाद मेरे साथ स्तुति का मोह इस कदर बढ़ गया था की उसे मेरी माँ की तरह ही मेरी फ़िक्र रहने लगी थी| मेरे खाने-पीने से ले कर मेरी दवाइयों तक का सारा ध्यान स्तुति रखती थी| यदि मैं घर से बाहर हूँ तो स्तुति मुझे फ़ोन कर के खाना खाने को कहती और दवाई लेना याद दिलाती| यदि मैं कभी गलती से उसकी बात को अनसुना कर दूँ तो मेरी बिटिया मुझे माँ की तरह डाँटती| मुझे आज भी स्तुति के डाँटते समय बोले हुए बोल याद हैं; "पपई, आपको अपनी हेल्थ की बिलकुल चिंता नहीं है न?! मैंने आपको फ़ोन कर के खाना खाने को कहा तो अपने क्यों खाना नहीं खाया? बिना खाना खाये दवाई कैसे असर करेगी? आप ऐसे ही मेरी बात नहीं मानोगे न तो मैं आपसे कट्टी कर लूँगी!" स्तुति के इस प्रकार डाँटने पर मैं मोहित हो जाता और अपने कान पकड़ कर उससे माफ़ी माँग लेता| मेरी माफ़ी सुन स्तुति मुझे आखरी वार्निंग (warning) देती और फिर माफ़ी के रूप में पप्पी दे कर मेरी गोदी में चढ़ जाती|

एक बार मेरे सर में दर्द हो रहा था तो माँ ने स्तुति को मेरे सर में तेल लगाना सिखाया| बस फिर क्या था, जब भी मेरे सर में दर्द होता स्तुति कुर्सी पर बैठ जाती और मैं ज़मीन पर बैठ जाता, फिर स्तुति अपनी छोटे-छोटे हाथों और उँगलियों से मेरे सर की मालिश करने लगती| स्तुति की नन्ही-नन्ही सी उँगलियाँ अपना जादू दिखातीं और मेरे सर दर्द ठीक हो जाता| जब कभी मुझे अधिक डॉ दर्द हो रहा होता तो स्तुति मेरे सर को तबला समझ कर बजाती, जिससे मेरे सर में हो रहे दर्द से आराम मिलता|

स्तुति को भी मेरे सर की मालिश करने में अजब सा मज़ा आता था| कई बार तो मेरे सर में दर्द न हो तब भी स्तुति तेल की शीशी ले कर मेरे पास आ जाती और कहती; "पपई, मैं आपके सर की मालिश कर दूँ?!"

अपनी बिटिया के इस मालिश का मेहताना तो देना बनता था| सर की मालिश करवाने के एवज में मुझे स्तुति को बचाना होता था! मेरी नटखट बिटिया अपनी शैतानियों से बाज़ नहीं आती थी| जब भी आयुष पढ़ रहा होता, स्तुति उसे तंग करने जा पहुँचती| चुपके से कभी आयुष का ज्योमेट्री बॉक्स (geometry box) तो कभी कोई किताब उठा कर स्तुति चुपचाप भाग जाती| जब आयुष को इसका एहसास होता तो वो स्तुति के पीछे दौड़ता और स्तुति "मुझे बचाओ पपई" कह कर मेरे पास दौड़ी आती, तब मुझे दोनों भाई-बहन के बीच सुलाह करानी पड़ती|

अपनी बिटिया के इस प्यार ने मेरे कठोर दिल को पिघला दिया था और मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था| "स्तुति का बचपना हमेशा के लिए नहीं रहेगा, कुछ सालों में वो भी बड़ी हो जायेगी और तब वो तुझसे इतना लाड-दुलार नहीं करेगी!" मेरे दिल से निकली इस आवाज़ ने मुझे सही रास्ता दिखाया और मुझे आयुष और स्तुति से दूर जाने नहीं दिया| हाँ इतना अवश्य था की मैंने भविष्य में अपने दोनों बच्चों के बगावत दिखाने को ले कर अभी से अपना मन कठोर कर लिया था|

वहीं दूसरी तरफ दोनों माँ-बेटी (नेहा और संगीता) के बीच जेलर (jailer) और कैदी जैसा बर्ताव शुरू हो गया था| चूँकि मेरा और नेहा का कोई रिश्ता नहीं रह गया था तो ज़ाहिर है कि हमारे बीच कोई बातचीत नहीं होती थी| मैं घर पर हूँ या नहीं उससे नेहा को कोई सरोकार नहीं था| उसी तरह नेहा क्या कर रही है, पढ़ रही है या अपने दोस्तों से चैट कर रही है उससे मुझे कोई सरोकार नहीं था| संगीता ये बात जानती थी इसलिए वो मुझसे नेहा को ले कर कोई सवाल-जवाब नहीं करती थी तथा नेहा के पीछे पड़ी रहती!

अब चूँकि मेरा दोनों माँ-बेटी के बीच कोई हस्तक्षेप नहीं था तो संगीता ने चील की तरह नेहा पर नजरें गड़ा ली थीं! संगीता के अनुसार उसने करुणा को डाँट कर नेहा की ज़िन्दगी से बाहर कर दिया है, परन्तु करुणा दिल्ली आने की फिराक में थी! अब बचा था अरमान, संगीता अरमान को भी नेहा की ज़िन्दगी से बाहर निकाल कर फेंकना चाहती थी मगर उसके लिए संगीता को अरमान से मिलना पड़ता जिससे संगीता डरती थी! आखिर थी तो संगीता औरत जात और उसे ऐसे हालातों का सामना कैसे करते हैं उसे ये नहीं आता था| अब देखा देखा जाए तो इस परिस्थिति का सामना मुझे करना था परन्तु मैं नेहा की ज़िन्दगी से बाहर निकल चूका था इसलिए मुझसे किसी भी तरह की मदद की उम्मीद करना संगीता के लिए बेकार था|

अंततः संगीता ने इस समस्या का हल अपने अनुसार निकालना शुरू किया| अरमान से मिलने के लिए नेहा को घर से निकलना होता इसलिए संगीता ने नेहा के अपने दोस्तों के साथ कहीं भी बाहर जाने पर पूरी तरह से पाबन्दी लगा दी! नेहा ने इसका पुरज़ोर विरोध किया मगर संगीता के गुस्से के आगे उसकी एक न चली! नेहा ने अपनी दादी जी से मदद माँगनी चाही तो संगीता ने अपनी चपलता दिखाते हुए माँ के आगे ये तर्क पेश कर दिया की; "माँ, ये लड़की अब पहले जैसी पढ़ाई में होशियार नहीं! हमें इस पर थोड़ी लगाम लगानी पड़ेगी, तभी ये संभलेगी वरना ये फिर से पढ़ाई के प्रति लापरवाह हो जाएगी! इसको घूमना ही है न तो हम सब हैं न इसे घुमाने के लिए| अब तो हम जहाँ भी घूमने जायेंगे, साथ जायेंगे!" संगीता की ये बात माँ को जचि और उन्होंने संगीता का साथ देते हुए नेहा को बहलाना शुरू कर दिया| नेहा इस समय खामोश थी क्योंकि वो अगर अपनी दादी जी से सच कह देती की उसे किसके साथ घूमने जाना है तो उसकी शामत थी!

खैर घूमने जाने न सही कम से कम नेहा टूशन के बहाने घर से निकल कर अरमान से मिलेगी ये सोच कर नेहा ने इत्मीनान कर लिया| परन्तु उसे नहीं पता था की उसकी मम्मी ने आगे क्या सोचा है?!

संगीता बड़ी सयानी थी, वो जानती थी की नेहा टूशन जाने के बहाने अरमान से मिलेगी इसलिए संगीता ने इसका भी एक तोड़ निकाला| नेहा के टूशन जाते समय संगीता उसके साथ जाती और उसे टूशन छोड़ कर सब्जी ले कर घर आती| फिर जब टूशन खत्म होता तो संगीता ही नेहा को टूशन से ले कर आती| संगीता के हमेशा अपनी बेटी नेहा के साथ साये की तरह रहने से नेहा चिढ़ने लगी थी| वहीं उसके दोस्तों ने इस बात को ले कर उसका मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया था| जब पानी सर से ऊपर चला गया तो नेहा चिढ़ते हुए अपनी मम्मी से बोली;

नेहा: क्या मम्मी, मैं कोई छोटी बच्ची हूँ जो आप मुझे टूशन छोड़ने और लेने आते हो?

संगीता: मुझे भी कोई शौक नहीं है तुझे टूशन छोड़ने आने-जाने का, लेकिन तेरे निकल आये हैं पर! यहाँ से झूठ बोल कर जाएगी की मैं टूशन जा रही हूँ और पहुँच जायेगी उस लड़के के साथ!

संगीता गुस्से से नेहा को झिड़कते हुए बोली| नेहा अपनी मम्मी की झिड़की सुन कर खामोश रही क्योंकि वो जानती थी की अगर उसने पलट कर कोई जवाब दिया तो उसकी मम्मी उसे कच्चा खा जाएगी!

इधर संगीता को लग रहा था की उसके नेहा के ऊपर इस तरह नज़र गड़ाए रखने से नेहा अरमान से नहीं मिलेगी तथा धीरे-धीरे दोनों दूर हो जायेंगे मगर वो ये भूल गई थी की अरमान नेहा के स्कूल में ही पढता है और संगीता इन दोनों को स्कूल में मिलने से रोक नहीं सकती थी!

अरमान नेहा से एक क्लास आगे था इसलिए दोनों का मिलना केवल लंच टाइम में ही होता था जब अरमान अपने दोस्तों के साथ नेहा की क्लास में आता| इसके अलावा कभी-कभार स्कूल में घुमते हुए दोनों की मुलाक़ात हो गई तो हो गई|

स्कूल में मिलने के अलावा, दोनों व्हाट्स अप्प (what's app) पर खूब बातें करते थे| नेहा ने चालाकी दिखाते हुए अरमान का नाम अपनी सहेली के नाम से फ़ोन में सेव (save) किया था| संगीता बेचारी भोली थी, नेहा के फ़ोन में एक लड़की का नाम पढ़ वो नेहा की व्हाट्स अप्प चैट नहीं पढ़ती जिससे नेहा पिटने से बच गई!

नेहा और अरमान को जो बातें करने का थोड़ा बहुत समय मिलता था उससे दोनों नखुश थे| अरमान ने कई बार नेहा से कहा की वो कोई बहाना कर के घर से निकल आये मगर संगीता नेहा को अपनी आँखों से ओझल होने ही नहीं देती! नेहा ने बहुत झूठ बोलने की कोशिश की कि आज उसके दोस्त का जन्मदुइन है, उसके दोस्त मॉल जा रहे हैं, या उसके दोस्त के घर पर पार्टी है मगर संगीता कहती कि वो नेहा के साथ जाएगी जिसपर नेहा भुनभुनाती हुई अपने कमरे में लौट जाती!

नेहा को कैसे भी करके इस समस्या का तोड़ निकालना था ताकि वो अरमान से आराम से मिल सके| नेहा जानती थी कि उसकी मम्मी कि सख्ती केवल और केवल इसलिए है कि नेहा पढ़ाई में ध्यान नहीं देती, यदि एक बार नेहा ने पढ़ाई में ध्यान दे अच्छे नंबर ला कर दिखा दिए तो संगीता की नेहा पर पकड़ ढीली हो जाएगी!

आखिर स्कूल में यूनिट टेस्ट (unit test) नज़दीक आ चुके थे और नेहा ने पढ़ाई में अच्छे नंबर लाने के लिए अपनी कमर कस ली थी| अपनी मम्मी की आँखों में धुल झोंकने के लिए नेहा ने घर में रहते हुए अपने फ़ोन पर चैटिंग करना एकदम से कम कर दिया| संगीता की चोरी, अपने दोस्तों से चैटिंग का काम नेहा रात में सबके सोने के बाद करती या फिर बाथरूम में घुस कर चुपचाप करती थी! जब नेहा का रिजल्ट आया तो पता चला की नेहा पहले की तरह क्लास में फर्स्ट तो नहीं आई मगर वो इस बार अच्छे नम्बरों से पास अवश्य हो गई थी| नेहा ने अपने यूनिट टेस्ट के सारे पेपर घर ला कर संगीता को चेक कराये| नेहा पढ़ाई में सुधर गई है ये देख कर संगीता को वापस नेहा पर भरोसा होने लगा|

नेहा के भीतर आये बदलावों को देख संगीता को बहुत ख़ुशी हो रही थी| संगीता ने सोचा की चूँकि अब नेहा सुधर गई है तो अब वक़्त है हम बाप-बेटी के बीच सुलाह कराने का ताकि घर में फिर से खुशियाँ गूँजने लगे|

जब से मेरे और नेहा के बीच गहमा-गहमी हुई थी तब से ले कर अब तक हम दोनों बाप-बेटी बिलकुल बात नहीं करते थे| माँ को इस बारे में कुछ पता न चले इसके लिए मैं माँ के सामने हमेशा ऐसी बातें छेड़ता जिसमें नेहा का जिक्र हो ही न| बाकी माँ की ख़ुशी के लिए हम बाप-बेटी एक दूसरे को देख नक़ली मुस्कान दे ही देते थे!

उधर दोनों भाई-बहन यानी आयुष और नेहा के बीच अब पहले जैसा प्यार नहीं था| अपनी दादी जी के सामने दोनों भाई-बहन खुश होने का नाटक करते थे ताकि माँ को शक न हो जाए, लेकिन माँ की पीठ पीछे दोनों भाई-बहन आपस में बिलकुल बात नहीं करते थे| आयुष को अपनी दीदी द्वारा मारे गए थप्पड़ के कारण गुस्सा नहीं था, उसे गुस्सा था तो इसलिए की नेहा मेरी इज्जत नहीं करती| वहीं नेहा को आयुष पर गुस्सा इसलिए था क्योंकि आयुष उससे जुबान लड़ना और ताने मारना सीख गया था| नेहा का मानना था की आयुष ने ही मुझे सच बता कर इस घर की शान्ति और उसकी जिंदगी में आग लगाई है|

बची स्तुति तो वो छोटी थी, ऊपर से निर्दोष भी इसलिए उससे न तो नेहा नाराज़ थी और न ही आयुष| स्तुति को अपने भैया-दीदी का प्यार मिल रहा था मगर अलग-अलग| आयुष और नेहा अब मिलकर स्तुति के साथ नहीं खेलते थे| लेकिन स्तुति इसकी कोई शिकायत नहीं करती थी|

बहरहाल एक नेक इरादा लिए संगीता मुझसे बात करने आई; "जानू, आपसे एक बात करनी थी|" संगीता ने बात शुरू करते हुए कहा और हम दोनों मियाँ-बीवी आलथी-पालथी मारे एक दूसरे की तरफ मुँह कर के बैठ गए|

संगीता: जानू, मैं जानती हूँ की नेहा ने आपका दिल बहुत दुखाया है| लेकिन ये सब उसने उस लड़के के चक्कर में पड़ कर कहा था वरना आप तो जानते ही हो की नेहा कभी सपने में ऐसी बात नहीं सोच सकती|

लेकिन अब नेहा सुधरती जा रही है| नेहा ने उस लड़के से बात करना बिलकुल बंद कर दिया है| अब वो बस पढ़ाई में अपना ध्यान देती है और इस बार यूनिट टेस्ट में उसके नंबर आये इस बात का सबूत है की नेहा फिर से पहले जैसी पढ़ाई में अव्वल आ सकती है| अतः मैं आज आपसे विनती करने आई हूँ की आप उसे माफ़ कर दीजिये और उसे पहले जैसे लाड-प्यार करो|

संगीता ने सँकुचाते हुए मुझसे विनती की| संगीता हमारे इस घर को टूटने से बचाना चाहती थी और मैं उसकी इस कोशिश की तारीफ करता हूँ|

मैं: जान, मैं समझ सकता हूँ की तुम चाहती हो की घर में सब कुछ पहले जैसा हो जाए मगर...

मेरे वाक्य में 'मगर' शब्द का ज़िक्र होते ही संगीता समझ गई की मैं नेहा को माफ़ करने के लिए मना करूँगा इसलिए वो मेरी बात काटते हुए बीच में बोल पड़ी;

संगीता: जानू, नेहा भटक गई थी, वो आपसे बहुत प्यार करती है और...

इससे पहले की संगीता कोई और तर्क दे कर मुझे नेहा को माफ़ करने के लिए कहती मैं उसकी बात काटते हुए बोला;

मैं: जान, जो नहीं जनता उसने क्या कर दिया वो नादान है, उसे क्षमा कर देना चाहिए मगर जो जनता है की उसने क्या किया और फिर भी प्रयाशित नहीं, उसे भगवान भी क्षमा नहीं करता!

मैंने इतनी बड़ी बात इसलिए कही थी क्योंकि मैंने अभी तक नेहा के चेहरे पर कोई ग्लानि भाव नहीं देखा था| नेहा का मानना था की उसने जो कहा वो सच कहा और यदि उसके सच कहने से किसी को तकलीफ हुई है तो इसके लिए वो जिम्मेदार नहीं!

खैर, मेरी बात सुन संगीता. एक माँ अपनी बेटी का बचाव करने लग पड़ी;

संगीता: नहीं जानू, ऐसा नहीं है| नेहा को शर्मिंदगी है...बस वो हमसे ये बात कह नहीं पा रही| आप कहोगे तो मैं उससे खुद बात करती हूँ| प्लीज उसे मेरे लिए माफ़ कर दो ताकि इस परिवार में फिर से हँसी-खुशियाँ लौट आयें|

संगीता भावुक होते हुए मेरे आगे हाथ जोड़ते हुए बोली| इस वक़्त संगीता किसी भी कीमत पर नेहा को मुझसे माफ़ी दिलवाना चाहती थी ताकि घर में सुख-शान्ति फिर से बस जाए|

मैं: जान...

ये कहते हुए मैंने संगीता के चेहरे को अपने दोनों हाथों में थामा और उसकी आँखों में देखते हुए बोला;

मैं: मैंने अभी जो तुमसे कहा उसपर ठंडे दिमाग से सोचो और प्लीज आज के बाद मुझसे इस बारे में कोई बात मत करना| तुम जानती हो मुझे तुम्हें किसी भी बात के लिए 'न' कहने में कितनी तकलीफ होती है|

इतना कह मैंने संगीता को अपने सीने से लगा लिया और अपनी बाहों को उसके जिस्म पर कस कर उसे कुछ कहने का मौका नहीं दिया|

नेहा ने जिस कदर मेरा दिल दुखाया था उसके लिए मैं नेहा को कभी माफ़ नहीं कर सकता था और ये बात मैंने संगीता को आज बड़े प्यार से समझा दी थी! संगीता ने मेरी बात का मान रखा और उसने आगे मुझसे इस विषय पर कभी कोई बात नहीं की|

मेरी बात की गहराई समझने में संगीता को थोड़ा समय लगा| जब नेहा को उसके किये का कोई पछतावा ही नहीं था, ऐसे में मेरा उसे माफ़ करने का कोई सवाल कैसे उठ सकता था?!

खैर, पढ़ाई में अच्छे नंबर आने से नेहा ने अपनी मम्मी के सामने अपनी छबि पुनः सुधार ली थी| संगीता को भी लगा की नेहा अब सुधर गई है इसलिए वो उसे समझाने बैठ गई; "बेटा, तूने वो बातें कह कर अपने पापा जी का बहुत दिल दुखाया है| तू जानती है न वो (मैं) तुझसे कितना प्यार करते हैं?! तेरी ख़ुशी के लिए उन्होंने क्या कुछ नहीं किया और तूने एक पल में उन्हें पराया कर दिया?! मैं जानती हूँ की मेरी बेटी ऐसी नहीं है, तुझे जर्रूर उस लड़के अरमान और करुणा ने बहका दिया होगा!

बेटा, देख तेरे पापा जी भले ही किसी से कुछ न कहते हों मगर वो तुझसे अब भी बहुत प्यार करते हैं| तेरे बिना उनके दिल में एक सूनापन है जिसे वो हम सब से छुपा रहे हैं| तू ज़रा ठंडे दिमाग से सोच-विचार कर और एक बार अपने पापा जी से माफ़ी माँग ले| तू उनकी पहली संतान है और तेरे एक बार माफ़ी मांगने से वो तुझे जर्रूर माफ़ कर देंगे| फिर देखना हमारे इस घर में खुशियाँ लौट कर आ जाएँगी|" संगीता ने आज जा कर मुझे नेहा का पापा कहा था, इससे पहले तो वो मुझे स्तुति या आयुष का पापा कह कर बुलाती थी| देखा जाए तो संगीता ने बड़ी उम्मीद लिए अपनी बेटी को समझाया था मगर नेहा ने अपनी मम्मी की बातों को एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल दिया| नेहा को ख़ुशी थी तो बस इस बात से की संगीता अब नरम पड़ने लगी है जिसका नेहा फायदा उठाना चाहती थी! "थोड़ा सा समय दो मम्मी, एक बार सब शांत हो जाए मैं बात करुँगी|" नेहा ने अपनी मम्मी को झूठी उम्मीद की किरण दिखा दी थी| वहीं इस झूठी आस के सहारे संगीता का छोटा सा दिल ख़ुशी से फूला नहीं समाया और उसने नेहा को आज जा कर अपने गले लगा कर उसे लाड-प्यार किया|

अब चूँकि संगीता पूरी तरह से नरम पड़ चुकी थी तो नेहा ने धीरे-धीरे अपनी पहले वाली आज़ादी हासिल कर ही ली| नेहा अब अकेले टूशन आती-जाती थी तथा मौका देख कर नेहा हफ्ते में एक-आध बार टूशन से बंक मार कर अरमान के साथ घूमने भी चली जाती|

धीरे-धीरे नेहा की हिम्मत बढ़ने लगी, रविवार के दिन छुट्टी होती थी इसलिए नेहा ने एक्स्ट्रा क्लास का बहाना कर अपने दोस्तों जिनमें अरमान और उसके दोस्त शामिल होते उनके साथ बाहर खाने-पीने भी निकल जाती|

फिर एक दिन आया जब नेहा ने कहा की उसे अपनी दोस्त के घर ग्रुप स्टडीज (group studies) के लिए जाना है| संगीता को शक हुआ तो उसने नेहा की दोस्त की माँ से बात की तथा उन्होंने पुष्टि की कि आज दोनों सहेलियों ने कोई प्रोजेक्ट बनाना है इसीलिए दोनों एक साथ पढ़ना चाहती हैं| संगीता को नेहा की दोस्त की मम्मी पर विश्वास हो गया और उसने नेहा को जाने कि इजाजत दे दी|

बस फिर क्या था उसी दिन से नेहा पर से संगीता की पकड़ छूटती गई जिसका एहसास संगीता को नहीं हुआ!

[color=rgb(97,]जारी रहेगा भाग - 13 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]अंतिम अध्याय: प्रतिकाष्ठा[/color]
[color=rgb(51,]भाग - 13[/color]

[color=rgb(26,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

फिर एक दिन आया जब नेहा ने कहा की उसे अपनी दोस्त के घर ग्रुप स्टडीज (group studies) के लिए जाना है| संगीता को शक हुआ तो उसने नेहा की दोस्त की माँ से बात की तथा उन्होंने पुष्टि की कि आज दोनों सहेलियों ने कोई प्रोजेक्ट बनाना है इसीलिए दोनों एक साथ पढ़ना चाहती हैं| संगीता को नेहा की दोस्त की मम्मी पर विश्वास हो गया और उसने नेहा को जाने कि इजाजत दे दी|

बस फिर क्या था उसी दिन से नेहा पर से संगीता की पकड़ छूटती गई जिसका एहसास संगीता को नहीं हुआ!

[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]

कहते
हैं की इंसान को सम्भलने के लिए एक ठोकर लगनी जर्रूरी होती है|

नेहा जो अपनी मम्मी के साथ छल- कपट कर मज़े के दिन काट रही थी, उन हसीन दिनों ने नेहा से एक भारी कीमत वसूली! नेहा को केवल ठोकर ही नहीं लगी, बल्कि वो मुँह के बल ऐसी गिरी की उसका सारा अभिमान टूट कर चकना चूर हो गया!

अपनी मम्मी को बेवकूफ बना कर नेहा अपनी ज़िन्दगी अपने अनुसार फिर से जीने लगी थी| हाँ इतना अवश्य था की अपनी इस मौज के लिए नेहा को पढ़ाई में अधिक मेहनत करनी पड़ रही थी| नेहा की इस की गई मेहनत से संगीता बहुत खुश थी, इतना खुश की उसने ये ध्यान ही नहीं दिया की उसने जो लगाम नेहा पर खींच कर रखी थी वो उसके हाथ से फिसलती जा रही है!

एक दिन स्कूल से आ कर नेहा ने अपनी मम्मी को अपने सरप्राइज क्लास टेस्ट के नंबर दिखाए जिनमें नेहा अव्वल आई थी, वो बात अलग है की नेहा चीटिंग कर के अव्वल आई थी! अपनी बेटी की धोखे से मिली उपलब्धि से संगीता गदगद हो गई और नेहा को लाड-प्यार करने लगी| "बेटा, जा कर ये नंबर अपने पापा जी को दिखा, फिर देखना वो कितने खुश होते हैं|" संगीता ने नेहा के सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा|

"ठीक है मम्मी|" नेहा ने संगीता का दिल रखने के लिए झूठ कह दिया| परन्तु मैं उस वक़्त घर पर था ही नहीं जो नेहा मुझे अपने नंबर दिखाती इसलिए नेहा बोली; "शाम को दिखा दूँगी मम्मी और लगे हाथ माफ़ी भी माँग लूँगी!!" नेहा के मुख से माफ़ी माँगने की बात सुन संगीता का दिल ख़ुशी से झूम उठा|

अब चूँकि संगीता इस कदर पिघल चुकी थी तो नेहा ने इस अवसर का फायदा उठाते हुए अपनी चाल चली; "मम्मी, आज शाम को न मुझे अपनी सहेली के घर जाना है| टीचर ने हमें एक प्रोजेक्ट बनाने को कहा है तो हम रात भर जाग कर प्रोजेक्ट बनाएंगे और कल संडे को दोपहर तक मैं वापस आ जाऊँगी|" अपनी बेटी की बात सुन संगीता ने बिना कुछ सोचे-समझे फौरन हाँ कर दी| अपनी मम्मी की हाँ सुन नेहा ख़ुशी के मारे कूद पड़ी और अपनी मम्मी के गले लग कर ख़ुशी से कूदते हुए "थैंक यू मम्मी! You're the best mummy!" बोल कर अपनी मम्मी को और मख्खन लगा दिया|

शाम 4 बजे, मेरे आने से पहले ही नेहा अच्छे से तैयार हो कर अपनी दोस्त के घर निकल गई| जब मैं घर आया तो संगीता ख़ुशी से झूमते हुए मेरे पास आई और मेरी गोदी में बैठते हुए इठला कर बोली; "आपकी बेटी सरप्राइज क्लास टेस्ट में फर्स्ट आई है|" मुझे लगा की संगीता मेरी सबसे छोटी बिटिया स्तुति की बात कर रही है इसलिए मैंने पहले तो संगीता के गाल पर धीरे से काटा और फिर उसे मुबारकबाद देते हुए बोला; "तुम्हें भी बहुत मुबारक हो, आखिर इतनी गुणवान बिटिया को पैदा तो तुमने किया| अब ज़रा मेरी छोटी बिटिया को बुलाओ ताकि उसे भी प्यारी कर के मुबारकबाद दूँ, फर्स्ट तो वही आई है|"

"फर्स्ट स्तुति नहीं नेहा आई है|" संगीता हँसते हुए बोली| अब मेरा मन नेहा के कारण पहले ही फट चूका था इसलिए नेहा का नाम सुन मेरा मुँह फीका पड़ने लगा| मैंने संगीता को अपनी गोदी से उठाया और बिना कुछ कहे मैं बाथरूम की ओर जाने लगा की तभी पीछे से संगीता बोली; "जानू..." इसके आगे संगीता कुछ कहती उससे पहले ही मैंने बाथरूम का दरवाज़ा बंद कर दिया| नेहा का जिक्र होते ही मेरा जख्म ताज़ा हो जाता था, ये जानते हुए भी संगीता ने आज फिर नेहा को लेकर मुझसे बात की थी| वैसे देखा जाए तो इसमें उस बेचारी की कोई गलती नहीं थी, आखिर थी तो संगीता एक माँ ही और उसकी ख्वाइश बस इतनी सी थी की परिवार में सब कुछ सामन्य हो जाये|

रात को खाना खाते समय संगीता एक बार फिर नेहा के सरप्राइज क्लास टेस्ट में फर्स्ट आने पर माँ से चर्चा कर रही थी| संगीता के अनुसार ये सरप्राइज क्लास टेस्ट 'टर्म एग्जाम' था तभी तो वो आज कुछ अधिक ही प्रसन्न थी! वहीं माँ को भी अपनी पोती पर बड़ा नाज़ हो रहा था की उनकी पोती अब पढ़ाई में फिर से अव्वल आने लगी है| "मानना पड़ेगा नेहा को, पढ़ाई में थोड़ी सी ढीली हुई थी लेकिन अब देखो फिर से पूरा ज़ोर लगा कर पढ़ती है| अब देखो आज फिर अपनी सहेली के घर पढ़ाई करने रुकी है!" माँ ने नेहा की तारीफ करते हुए कहा| मैं नेहा से इस कदर दूर हो गया था की मुझे माँ की बात सुन कर पता चला की नेहा तो घर में है ही नहीं!

अब नेहा की बड़ाई हो और स्तुति की कोई तारीफ न करे ऐसे कैसे हो सकता है?! "मेरी शूगी सबसे अच्छी है, हर साल क्लास में अव्वल आती है और मेरा नाम रोशन करती है|" माँ ने अपनी ही पोती को खुश करने के लिए उसकी तारीफ की तो स्तुति शर्मा कर गठरी बन गई! अब मुझे अपनी बिटिया को अधिक शर्माने से बचाना था इसलिए मैंने बात का मुख मोड़ दिया और नई बात शुरू कर दी|

खाना खाने के बाद हम सब बैठक में बैठे थे| संगीता ने गौर किया की मैं कुछ अधिक ही खामोश हूँ, उसे लगा की मैं शायद उसके द्वारा नेहा की तारीफ करने के कारण नखुश हूँ इसलिए उसने मुझे खुश करने के लिए स्तुति का सहारा लिया|

संगीता: स्तुति बेटा, एक बात तो बता की तू सबसे ज्यादा किसे प्यार करती है?

अपनी मम्मी का सवाल सुनते ही स्तुति ने बिना पल गवाए मेरी तरफ ऊँगली कर इशारा किया और कूदते हुए चिल्लाने लगी;

स्तुति: पपई!!! पपई!!! पपई!!!

माँ: हाँ भाई, सबसे ज्यादा प्यार तो ये लड़की मानु को ही करती है| हमारे साथ तो बस शैतानी करती है!

माँ ने ठंडी आह भरते हुए स्तुति की शिकायत मुझसे की| माँ की इस शिकायत का मान रखने के लिए मैंने स्तुति को समझाना चाहा;

मैं: बेटा, आप मुझसे प्यार करते हो न?..

मैं स्तुति को अपने प्यार का वास्ता दे कर समझना चाहता था मगर मेरी बात पूरी हो उसे पहले ही स्तुति उत्साह में बहते हुए मेरी बात काटते हुए बोली;

स्तुति: नहीं पपई...मैं आपको 'सुपर प्यारी' करती हूँ!

स्तुति की अपनी अलग ही शब्दावली यानी vocabulary थी, जिसमें स्तुति अपने मन पसंद ऐसे शब्द जोड़ती थी जो शब्द उसे भाते थे और जिनके मतलब बस वही जानती थी| अब मैं इस नए शब्द: 'सुपर प्यारी' से मैं अनजान था इसलिए चेहरे पर सवाल लिए मैंने स्तुति से इस शब्द का मतलब पुछा;

मैं: बेटा, सुपर प्यारी मतलब?

मेरा सवाल सुन स्तुति जोश में भरते हुए कूदने लगी और बोली;

स्तुति: पपई, सुपर प्यारी मतलब सबसे ज्यादा प्यारी!

अब देखा जाए तो ये शब्द इतना कठिन भी नहीं था समझने के लिए पर क्या करें साहब, हमें अपनी बिटिया से लाड भी तो पाना था!

खैर, स्तुति के मुख से ये शब्द सुन माँ और संगीता को मीठी जलन हुई जो की उनके चेहरे से साफ़ झलक रही थी| परन्तु मैंने फिर भी उनकी जलन की परवाह किये बिना स्तुति को समझाना शुरू किया;

मैं: बेटा, आप मुझसे सुपर प्यारी करते हो न तो शरारत थोड़ी कम किया करो|

जैसे ही मैंने कम शरारत करने को कहा स्तुति अपनी दो उँगलियों के इशारे से




मुझे समझाते हुए बोली;

स्तुति: पपई मैं 'चुन्नू भर' शरारत करूँ न?

अपनी बिटिया की मासूमियत को देख मेरा दिल पिघल गया और मैंने स्तुति को अपने गले लगा कर उसके सर को चूमना शुरू कर दिया|

वहीं माँ और संगीता, बाप-बेटी के इस प्यार को देख मीठी जलन महसूस करते हुए बोले;

माँ: देखा बहु, इसको (मुझे) तो सुपर प्यारी मिली हमें तो आधी या पौनी प्यारी भी नहीं मिलती!

संगीता: सही कहा माँ| इनके आगे हमारी क्या बिसात!

अपनी दादी जी और मम्मी को यूँ ठंडी आहें भरते देख मेरी बिटिया का दिल पिघल गया| नेहा अपनी दादी जी के पास पहुँची और उनके दोनों गालों पर पप्पी करते हुए बोली;

स्तुति: दाई, मैं है न पपई से थोड़ी सी कम प्यारी आपको करती हूँ!

मेरे मुक़ाबले थोड़ी कम प्यारी ही सही मगर माँ को अपनी पोती की प्यारी तो मिली ये सोच कर माँ ने स्तुति को गोदी ले कर दुलार करना शुरू कर दिया| अब रह गई बेचारी संगीता, वो बेचारी ठंडी आहें भरते हुए बोली;

संगीता: लो माँ, आपको भी प्यारी मिल गई, इनके मुक़ाबले थोड़ी कम ही सही| रह गई मैं, मुझे कोई प्यारी नहीं करता?!

संगीता ने अपनी अंतिम बात मेरी ओर देखते हुए कही| संगीता का मुझे उल्हना देने के तरीके से मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई और मैं मुँह छुपा कर हँसने लगा|

उधर अपनी मम्मी को खुश करने के लिए नेहा अपनी मम्मी के पास जा ही रही थी की उसकी नज़र पड़ी अपने बड़े भैया आयुष पर| स्तुति अपनी मम्मी के पास न जा कर अपने भैया के पास गई और आयुष के गाल पर पप्पी करते हुए बोली;

स्तुति: बड़े भैया, मैं है न दाई से थोड़ा कम प्यारी आपको करती हूँ|

आयुष को प्यार पाने के लिए कभी किसी से पर्तिस्पर्धा नहीं करनी पड़ती थी क्योंकि वो प्यार ढूँढ लिया करता था| आयुष इस समय इसलिए खुश था की उसकी छोटी बहन उससे कितना प्यार करती है|

वहीं बेचारी संगीता का नाम स्तुति की 'प्यारी करने की लिस्ट' में सबसे आखिर में था इसलिए संगीता को आया प्यारभरा गुस्सा!

संगीता: जिसने तुझे पैदा किया, जिसने तुझे दूध पिला कर इतना बड़ा किया उसी को तू सबसे कम प्यार करती है!

संगीता के इस प्यारभरे गुस्से को देख हम सभी की हँसी छूट गई तथा हम पेट पकड़ कर हँसने लगे!

सबको अपने ऊपर यूँ हँसते देख संगीता ने झूठ-मूठ का रोना शुरू कर दिया, तब माँ ने संगीता को लाड करते हुए अपने गले लगाया और बोलीं;

माँ: मेरी शूगी तेरे साथ शैतानी कर रही थी! अरे वो तो सबसे ज्यादा तुझे ही प्यार करती है!

माँ ने संगीता का दिल बहलाने के लिए प्यारा सा झूठ बोला| फिर माँ ने स्तुति को आँख मारते हुए संगीता को पप्पी करने का इशारा किया| मैंने माँ को अपनी पोती को गुप्-चुप इशारा करते पकड़ लिया था इसलिए मैं ठहाका लगा कर हँसने लगा| मेरी हँसी समझते हुए संगीता और भुनभुना गई और मुँह टेढ़ा करते हुए स्तुति से बोली;

संगीता: भाग जा यहाँ से! जा कर अपने पपई को पप्पी कर, मुझे प्यारी करने के लिए मेरी माँ हैं!

संगीता माँ के गले फिर से लग गई और स्तुति को जीभ चिढ़ाने लगी| बस फिर क्या था, दोनों माँ-बेटी एक दूसरे को जीभ चिढ़ाने लगीं और हम सभी इस दृश्य का आनंद ले कर हँसने लगे|

इधर हमारे घर में हँसी गूँज रही थी तो उधर नेहा अपने दोस्तों के साथ अंग्रेजी गाने पर झूम रही थी!

आगे बढ़ने से पहले अरमान और उसके बाप के बारे में आप सभी को थोड़ी जानकारी दे दूँ:

अरमान के बाप का नाम था अयान और इसके पास थी पुरखों की कमाई दौलत, अपनी इसी दौलत के दम पर अयान अपना हर काम निकलवा लेता था| जब सब काम पैसे से होता है तो इंसान में लड़ने की हिम्मत नहीं होती इसलिए अयान डरपोक प्रवित्ति का था! देहरादून में अयान के 3 होटल थे जिनसे उसे बहुत आमदनी होती थी| अपनी पुरखों की दौलत और होटल से कमाए पैसों को अयान दिल्ली में बिल्डरों के साथ लगा कर प्लाट खरीदता और घर बना कर बेचता था| इतने पैसे होने के बावजूद अयान का लालच खत्म नहीं होता था, नतीजन उसने दूसरे बिल्डरों के काम में टाँग अड़ाना शुरू कर दिया| नॉएडा में एक ज़मीन पर इसकी और मिश्रा अंकल दोनों की नजरें गड़ी हुई थीं, जिसको हासिल करने के लिए दोनों में खींचा-तानी जारी थी!

खैर, आज अरमान का जन्मदिन था और उसने अपने घर पर केवल अपने कुछ ख़ास दोस्तों के लिए पार्टी रखी थी| ज़ाहिर है की उसने इस पार्टी में नेहा को भी आमंत्रण दिया था, जिस कारण आज नेहा घर में सहेली के घर प्रोजेक्ट बनाने का झूठ बोल कर निकली थी!

नेहा के प्लान के अनुसार वो अपने बैग में एक जोड़ी कपड़े छुपा कर अपनी दोस्त के घर के लिए निकली| संगीता को अपनी बेटी पर विश्वास था इसलिए संगीता ने नेहा की दोस्त की मम्मी को फ़ोन कर ये पुष्टि की ही नहीं की क्या सच में दोनों सहेलियाँ आज रात जाग कर पढ़ाई करने वाली हैं?! अगर संगीता ने नेहा की दोस्त की मम्मी को फ़ोन कर दिया होता तो उसे पता चल जाता की नेहा पढ़ाई करने नहीं बल्कि अरमान की पार्टी में जा रही है!

बहरहाल, नेहा की ये सहेली अरमान के घर के पास रहती थी इसलिए नेहा ने आज रात पार्टी के बाद अपनी सहेली के घर रहने की प्लानिंग की थी| चूँकि अरमान का घर नज़दीक था इसलिए नेहा की सहेली की मम्मी ने पार्टी में जाने से मना नहीं किया|

इधर पार्टी में अरमान के 3 लड़के दोस्त थे और 2 लड़कियाँ थीं जो की उसी की क्लास में पढ़ती थीं| परन्तु इस पार्टी की मुख्य अतिथि थी नेहा जिसके आने से आज पार्टी में चार चाँद लग गए थे! आज चूँकि अरमान का जन्मदिन था तो नेहा ने बिना हमें बताये अपनी पिग्गीबैंक (piggy bank) से पैसे निकाले और उसने अरमान के लिए एक अच्छा सा गिफ्ट खरीदा था| पार्टी में पहुँच जैसे ही नेहा ने अरमान को उसका गिफ्ट दिया अरमान ने नेहा को kiss करना चाहा! लेकिन नेहा अभी इतनी नहीं गिरी थी की किसी लड़के को यूँ खुद को स्पर्श करने दे, अतः नेहा ने नकली मुस्कान के साथ अपनी गर्दन न में हिलाते हुए kiss के लिए मना कर दिया|

आज तक अरमान और नेहा जब भी मिले तो दोनों बस बातें करते थे तथा खाते-पीते थे| इसके अलावा नेहा ने न तो कभी अरमान से कोई तोहफा लिया और न ही नेहा ने अरमान को कभी खुद को स्पर्श करने दिया|

फिलहाल के लिए अरमान ने इस बात का बुरा नहीं लगाया और उसने नेहा का तार्रुफ़ अपने लड़के दोस्तों से करवाया| अरमान के सारे दोस्त अमीर थे और स्वभाव से कमीने थे, तभी वो तीनों नेहा को कुछ अधिक ही घूर रहे थे! वहीं नेहा ने जब उन तीनों को खुद को घूरते पाया तो नेहा उनकी नीयत में मौजूद खोट को समझ गई!

नेहा ने आजतक खुद को कभी ऐसे माहौल में नहीं पाया था जहाँ कोई उसे यूँ घूर कर देख रहा हो इसलिए नेहा को अजीब सी बेचैनी महसूस होने लगी थी| सबसे नजरें चुराते हुए नेहा अपनी दोस्त के पास लौटी और उसे सब बताया| "अरे तू लग ही इतनी सुन्दर रही है की कोई भी तुझे घूरेगा!" नेहा की दोस्त ने बात को हलके में लेते हुए कहा| यदि उस पल नेहा पार्टी छोड़ कर घर निकल जाती तो वो सब नहीं होता जिसने नेहा का सारा आत्मविश्वास एक पल में तोड़ कर चकनाचूर कर दिया!

"ये ले कोल्ड-ड्रिंक पी और चिल (chill) कर!" नेहा की दोस्त ने उसे एक कोल्ड-ड्रिंक का ग्लास दिया और दोनों सहेलियाँ कोल्ड-ड्रिंक पीने लगीं| इतने में अरमान दोनों के पास आया और नेहा का हाथ पकड़ कर उसे हॉल के बीचों बीच ले कर आ गया| फिर उसने अपने एक दोस्त को इशारा कर एक अंग्रेजी गाना बजाने को कहा| गाना फुल आवाज़ में बजने लगा तो अरमान ने नेहा को अपने साथ नाचने को कहा| नेहा को पहले ही उन लड़कों के कारण बेचैनी हो रही थी ऊपर से जब अरमान ने उसे अपने साथ नाचने को कहा तो नेहा शर्माते हुए मना करने लगी|

"Come on yaar, its my birthday!" अरमान ने नेहा को इमोशनल ब्लैकमेल करते हुए नाचने पर मजबूर कर दिया| गाना इतने ज़ोर से बज रहा था की नेहा कुछ पल के लिए सब भूल गई और खुल कर नाचने लगी| इस समय सभी की नजरें नेहा पर थी और सभी ताली बजा कर नेहा का उत्साह बढ़ा रहे थे| गाना खत्म होते ही सभी ने जोरदार तालियाँ बजा कर नेहा की बहुत तारीफ की जिससे नेहा का डर खत्म हो गया और वो पहले की तरह सामान्य हो गई|

केक काटा गया और सभी खाते-पीते हुए झूम-नाच रहे थे| अरमान के जो तीन दोस्त आये थे उनमें से दो ने तो अरमान की क्लास में पढ़ने वाली लड़कियाँ फँसा ली और चारों अलग-अलग कोने में चले गए! बचा एक दोस्त अपनी क़िस्मत नेहा की दोस्त के साथ आज़मा रहा था!

अब रह गए नेहा और अरमान तो अरमान नेहा को बातों में लगा कर उसे अपने कमरे में ले आया, जहाँ उसने बातों ही बातों में नेहा के साथ बदतमीज़ी करने की कोशिश की! अब नेहा कोई दूध पीती बच्ची नहीं थी जो अरमान की नीयत न समझे! नेहा ने अरमान को मना करते हुए कह दिया की ये सब ठीक नहीं है और वो इसके लिए राज़ी नहीं है मगर अरमान नेहा के साथ जोर-जबरदस्ती करने लग!

अरमान ने नेहा की कलाई पकड़ उसे अपनी तरफ खींचा और उसे जबरन kiss करने की कोशिश करने लगा| इस बार नेहा का खुद पर से काबू छूट गया, उसने पहले तो अरमान को परे धकेला और फिर खींच कर अरमान को थप्पड़ दे मारा तथा भागती हुई नीचे आ गई| नेहा अब इस पार्टी में रूक कर जोखम नहीं उठाना चाहती थी इसलिए वो पार्टी छोड़कर बाहर भागी| नेहा को भागते देख नेहा की दोस्त भी उसके पीछे उसे रोकने के लिए दौड़ी| नेहा इस वक़्त इतनी घबराई हुई थी की वो बिना रुके दौड़ती रही और सीधा अपनी सहेली के घर आ कर रुक हाँफते हुए साँस लेने के लिए जद्दोजहद करने लगी! इतने में पीछे से नेहा की सहेली भी दौड़ती हुई आई, जब दोनों सहेलियों की सांसें दुरुस्त हुईं तो नेहा की सहेली ने सारी बात पूछी| नेहा बेचारी इतनी घबराई हुई थी की उससे ठीक से बोला भी नहीं जा रहा था! फूट-फूट कर रट हुए नेहा ने अपनी सहेली को सारी बात बताई जिसे सुन नेहा की सहेली स्तबध थी!

"सुन तू शांत हो जा और ये बता भूल से भी मेरे घर न पता चले वरना तेरा तो जो होगा सो होगा, मेरी मम्मी मुझे पीट-पीट कर मेरी जान निकाल देगी और मेरा बाहर आना-जाना बंद कर देगी!" इस समय जब नेहा को अपनी सहेली की सबसे ज्यादा जर्रूरत थी, उसकी सहेली उसे सँभालने के बजाए अपनी मम्मी के डाँटने को ले कर घबरा रही थी!

नेहा का इस समय रो-रो कर बुरा हाल था| उसे अपनी सहेली के घर में रहते हुए भी डर लग रहा था की कहीं अरमान उसे ढूँढ़ते हुए यहाँ न आ पहुँचे और नेहा के साथ फिर से जबरदस्ती करने की कोशिश न करने लगे|

नेहा यहाँ. इस घर से से निकलना चाहती थी मगर वो अकेली तो घर जा नहीं सकती थी इसलिए उसे चाहिए थी मदद! अब नेहा संगीता को फ़ोन कर नहीं सकती थी क्योंकि संगीता के सवालों की बौछारों से नेहा के झूठ का भाँडा फूट जाता और फिर संगीता पहले तो नेहा की चप्पल से सुताई करती, उसके बाद नेहा को सीधा गाँव डिपोर्ट कर देती! एक केवल मैं था जो नेहा की मदद कर सकता था मगर मुझसे कुछ कहने की नेहा में हिम्मत नहीं थी!

कुछ देर सोचने के बाद नेहा को अपने अनिल मामा जी की याद आई| अनिल उन दिनों में अपनी कंपनी की तरफ से ट्रेनिंग लेने ग़ाज़ियाबाद आया हुआ था| रात के बारह बज रहे थे की नेहा ने अपने अनिल मामा जी को फ़ोन मिलाया मगर अनिल फ़ोन साइलेंट कर सो रहा था| नेहा का मन इस वक़्त बहुत डरा हुआ था इसलिए नेहा ने अपने अनिल मामा जी को फ़ोन करना जारी रखा|

सुबह के 5 बजे अनिल की नींद खुली ही थी की उसने अपने फ़ोन में नेहा की 50 मिस्ड कॉल देखि! इतनी मिस काल देख अनिल एकदम से घबरा गया और उसने नेहा को फ़ोन घुमा दिया| एक घंटी बजते ही नेहा ने फ़ोन उठा लिया और रोते हुए अनिल से बोली; "म...मामा...जी...मु...मुझे यहाँ से...ले जाइये...अभी!" नेहा को यूँ रोते हुए देख अनिल ने सारी बात जाननी चाही मगर नेहा इस समय कुछ बोलने की हालत में नहीं थी| "प...प्लीज मामा जी...मु...मुझे यहाँ से ले जाइये...मैं अभी...अपनी सहेली के घर हूँ! मैं आपको एड्रेस भेज रही हूँ! प्लीज जल्दी आइये...और घर पर फ़ोन मत करना! आप आ जाइये मैं सब बताती हूँ!" नेहा बिलख-बिलख कर रोते हुए बोली| नेहा की रोती हुई आवाज़ सुन अनिल बहुत घबरा गया था, उसे कुछ गलत घटित होने का भय सता रहा था इसलिए उसने नेहा के मना करने के बावजूद बिना कुछ सोचे-समझे संगीता को फ़ोन घुमा दिया तथा मौजूदा हालात से रूबरू करवाया| "तू तुरंत जा कर नेहा को घर ले कर आ!" संगीता खुसफुसाती हुए बोली ताकि कहीं मैं उसकी बात न सुन लूँ|

दरअसल, संगीता पहले सब बात खुद जानना चाहती थी और उसके लिए नेहा का घर आना जर्रूरी था| अगर संगीता मुझे ये आधी-अधूरी बात बता देती तो मैं घर सर पर उठा लेता और फिर मैं क्या करता इसी का संगीता को भय था!

उधर अनिल को नेहा की दोस्त के घर पहुँचने में पूरा एक घंटे का समय लगा और इस पूरे एक घंटे नेहा डरी-सहमी खिड़की पर नजरें जमाये बैठी रही| पूरी रात नेहा ने डर के मारे जागते हुए काटी थी, अब तो उसे तभी चैन मिलता जब वो अपने घर पहुँचती!

घंटे भर बाद अनिल की कैब जैसे ही नेहा की दोस्त के घर के आगे रुकी नेहा अपनी सहेली को बता कर अपनी जान लेकर उस घर से भागी और गाडी में बैठ कर ही साँस ली! पूरे रास्ते अनिल ने नेहा से बहुत पुछा की आखिर क्या हुआ है मगर नेहा कुछ न बोली बल्कि अपने मामा जी के गले लग कर फूट-फूट कर रोने लगी! इस समय अनिल ने बहुत कोशिश की कि वह नेहा को सँभाल सके मगर वो नेहा को सँभाल नहीं पाया!

इधर घर पर सुबह साढ़े पाँच बजे मैं उठ चूका था और फ्रेश हो कर माँ के साथ छत पर बैठा चाय पीते हुए बात कर रहा था| तभी स्तुति उठ कर अपनी आँख मलते-मलते मेरे पास पहुँची और अपने दोनों हाथ पँख की समान फैलाये बोली; "पपई...गोदी!"

स्तुति को इतनी जल्दी जागा हुआ देख माँ बोलीं; "शूगी बेटा, इतनी जल्दी क्यों उठ गई?! आज तो संडे है, आज तो आराम से सोती!!"

अपनी दादी जी की बात सुन स्तुति बड़े गर्व से बोली; "दाई, मेरे पपई कहते हैं;

'उठ जाग मुसाफिर भोर भई,

अब रेन कहाँ जो सोवत है?!

जो सोवत है, सो खोवत है,

जो जागत है, सो पावत है!' इसलिए मैं सो कर अपना टाइम बर्बाद नहीं करना चाहती| जल्दी जाग कर मैं जल्दी से अपना होमवर्क कर फिर मैं आराम से सारा दिन खेलूँगी|"

जब मैं छोटा था और पिताजी कभी सुबह-सुबह अच्छे मूड में होते थे तो मुझे उठाने के लिए वो मुझे लाड करते हुए ये गीत गुनगुनाते थे| मैंने भी एक दिन ऐसे ही प्यार से स्तुति को जगाने के लिए ये गीत गुनगुना दिया था, तब मुझे नहीं पता था की मेरी बिटिया ने इस गीत को संस्कार के रूप में हमेशा के लिए अपना लिया है!

वहीं एक छोटी सी बच्ची के मुख से ये प्यार गीत सुन मेरी माँ का प्यार छलक आया| माँ को इस समय दोहरी ख़ुशी हो रही थी, एक ये की कैसे मैंने अपने पिताजी के संस्कारों को अपने बच्चों में डाला है और दूसरा कैसे मेरी माँ की छोटी पोती हमारे घर के संस्कारों को अपना रही है| माँ ने स्तुति को गोदी में लिया और उसे लाड-प्यार करने लगीं तथा मैं संगीता को बुलाने के लिए घर के भीतर चल दिया|

जैसे ही मैंने घर के भीतर प्रवेश किया मुझे अनिल हमारे कमरे के दरवाजे पर खड़ा मिला| "अनिल?" मैंने पीछे से अनिल के कँधे पर हाथ रखते हुए पुछा| मेरी आवाज़ सुन अनिल एकदम से सकपका गया और सहमा हुआ सा मुझे देखने लगा| मैं अनिल से और कुछ पूछता उससे पहले ही मुझे कमरे के भीतर से नेहा के रोने की आवाज़ सुनाई दी! मैं कमरे के भीतर पहुँचा तो मैंने देखा की नेहा रोये जा रही है और संगीता उसे चुप करवाते हुए सारी बात जानने की कोशिश कर रही है!

मुझसे कभी नेहा का रोना बर्दाश्त नहीं होता था, लेकिन आज नेहा को यूँ रोता हुआ देख जैसे मैंने अपना मानसिक संतुलन खो दिया! नेहा को यूँ रोता हुआ देख मुझे उसके साथ कुछ गलत घटित होने का एहसास हो गया था| चूँकि नेहा मुझे कुछ बोलने की हालत में नहीं लग रही थी, संगीता को खुद कुछ नहीं पता था इसलिए मैंने कमरे में मौजूद चौथे शक़्स से सवाल पुछा; "Why's she (Neha) crying Anil?" मेरा गुस्से से भरा ये सवाल सुन अनिल और घबरा गया तथा डर के मारे न में अपनी गर्दन हिलाने लगा| उधर मेरी आवाज़ सुन नेहा ने मेरी तरफ देखा, उसकी आँखों रोने के कारण लाल हो चुकी थीं और चेहरे की हालत बिगड़ी जुई थी! देख कर ही पता चलता था की नेहा रात भर रोई है! नेहा की ये हालत देख मेरा खून खौल रहा था, मैं नेहा से खुद सब पूछना चाहता था मगर उस रात नेहा के कहे वो जहरीले शब्द मेरे सर में गूँज रहे थे और मुझे नेहा के नज़दीक जाने से रोक रहे थे|

मुझे गुस्से से जलते हुए देख आखिर अनिल हिम्मत करते हुए बोला और उसने मुझे तड़के सुबह नेहा के फ़ोन आने के बारे में बताया| नेहा रात अपनी दोस्त के घर रुकी थी और चूँकि अनिल ही नेहा को अभी घर ले कर आया था इसलिए जो भी कल रात को हुआ है वो सब नेहा की दोस्त को जर्रूर पता होगा| अब मुझे नेहा की दोस्त के घर का पता नहीं था, लेकिन अनिल को जर्रूर था! "चल मेरे साथ|" मैंने अनिल से कहा और मैं तेज़ी से बाहर के दरवाजे की तरफ चल पड़ा|

"जानू प्लीज...रुको! संगीता ने मुझे रोकना चाहा मगर मैंने उसे अनसुना कर दिया तथा फटाफट नीचे उतर गया| अनिल मेरे पीछे था इसलिए संगीता उसे समझाते हुए बोली; "बेटा, इनका (मेरा) ध्यान रखिओ...इनका दिमाग अभी बहुत गरम है! कहीं ये गुस्से में कुछ ऐसा-वैसा न कर दें!" संगीता ने अनिल को ये कह कर बेचारे को और डरा दिया था!

इधर मैंने गाडी घर के बाहर निकाल ली थी और मैं गुस्से से तमतमाया हुआ अनिल का इंतज़ार कर रहा था| जैसे ही अनिल नीचे आया मैंने गुस्से से उसे देखा, मैं कुछ कहने वाला हुआ ही था की मैंने खुद को रोक लिया| मेरी आँखों में गुस्सा देख कर अनिल की फट के चार हो चुकी थी इसलिए बेचारा फटाफट मुझे नेहा की दोस्त के घर तक का रास्ता बताने लगा|

नेहा की दोस्त के घर पहुँच मैंने दरवाजा खटखटाया तो दरवाजा एक आदमी ने खोला|

मैं: आप मिस्टर मनोहर सिंह हैं?

मैंने घर में घुसने से पहले नेमप्लेट पढ़ ली थी| मेरा सवाल सुन उस आदमी ने भोयें सिकोड़ कर मुझ पर शक करते हुए अपना सर हाँ में हिला दिया| अब सुबह-सवेरे कोई अनजान आपके घर के दरवाजे पर खड़ा हो कर आपसे आपका नाम पूछे तो शक तो होगा ही की आखिर माज़रा क्या है!

मैं: मेरा नाम मानु मौर्या है और मैं नेहा का पापा हूँ| कल शाम नेहा आपके घर आपकी बेटी के साथ अपने स्कूल का प्रोजेक्ट बनाने आई थी पर न जाने ऐसा क्या हुआ की उसने रोते हुए आज सुबह 5 बजे अपने छोटे मामा जी को फ़ोन कर तुरंत उसे लेने आने को कहा|

मेरी पूरी बात सुन मिस्टर सिंह बहुत घबरा गए और उन्होंने अपनी बीवी और बेटी को आवाज दी;

मिस्टर मनोहर सिंह: अंजना? पिंकी?!

मिस्टर मनोहर सिंह की आवाज़ सुन सबसे पहले उनकी पत्नी अंजना दौड़ी-दौड़ी आईं| मिस्टर मनोहर ने मुझे घर के अंदर बुलाया परन्तु मैं उनके घर के दरवाजे पर ही खड़ा रहा|

मिस्टर मनोहर सिंह: मिस्टर मानु, मैं ऑफिस के काम से बाहर गया था और अभी 10 मिनट पहले ही घर आया हूँ|

इतने में मिस्टर मनोहर सिंह की पत्नी अंजना वहाँ आ गईं| मिस्टर मनोहर सिंह ने अपनी पत्नी को सारी बात बताई, अपने पति की सारी बात सुन अंजना जी को बहुत बड़ा झटका लगा की नेहा इतनी सुबह बिना उन्हें कुछ बताये क्यों घर से चली गई?!

अंजना सिंह: नेहा यहाँ आई तो थी मगर अपने स्कूल का प्रोजेक्ट बनाने नहीं बल्कि अरमान के जन्मदिन की पार्टी में जाने के लिए! क्या नेहा ने आपको नहीं बताया की वो पार्टी में जा रही है?

ये बात मेरे लिए एक बम के समान थी जिसके फटने से मेरा दिमाग सन्न हो चूका था! नेहा घर से झूठ बोल कर पार्टी के लिए निकली थी, इस बात ने मुझे बहुत बड़ा झटका दिया था! मैं इस झटके से उबर ही रहा था की अंजना जी ने अपनी बेटी पिंकी को आवाज़ दे कर बुलाया|

मिस्टर मनोहर सिंह: पिंकी...सच-सच बता की कल रात को क्या हुआ था? क्यों नेहा बेटी रात भर रो रही थी और अचानक इतनी सुबह अपने मामा जी के साथ बिना तुम्हारी मम्मी को बताये हमारे घर से चली गई?!

मिस्टर मनोहर सिंह ने कड़क आवाज़ में अपनी बेटी से पुछा|

पिंकी: क..कुछ नहीं पापा!

पिंकी अपने पापा के गुस्से के कारण सकपका गई थी इसलिए उसने झूठ का सहारा लिया|

मैं: बेटा, प्लीज झूठ मत बोलो| मैं नेहा का पापा हूँ और उसे यूँ रोते हुए देख मुझ पर क्या बीत रही है इसका आपको ज़रा भी अंदाजा नहीं| जबसे नेहा आपके घर से लौटी है वो बस रोये जा रही है, हम कितना पूछते हैं मगर वो कुछ नहीं कहती|

मैंने पिंकी के सामने अपना स्वर नीचे करते हुए पुछा, परन्तु पिंकी सच कहने से घबरा रही थी!

मिस्टर मनोहर सिंह: बोल जल्दी वरना!!!!

मिस्टर मनोहर सिंह ने पिंकी को गुस्से से घूरते हुए देखा तो पिंकी ने सब सच उगल दिया;

पिंकी: वो...कल अरमान की पार्टी में...अरमान...नेहा को जबरदस्ती....की....kiss करने की कोशिश कर रहा था! नेहा ने 2 बार उसे मना भी किया और अरमान मान भी गया....लेकिन फिर पार्टी खत्म होने के बाद अरमान नेहा को ऊपर अपने कमरे में ले गया...ठीक मिनट भर बाद नेहा रोती हुई नीचे दौड़ती हुई आई और घर के बाहर भाग गई! मैं भी उसके पीछे भागी तो नेहा ने मुझे बताया की कमरे के अंदर अरमान ने उसे kiss करने की कोशिश की और नेहा ने गुस्से में आ कर अरमान को दूर धकेलते हुए चाँटा मार दिया!

पिंकी की जुबानी कल का वाक़्या सुन मेरे तो होश उड़ गए! अब मुझे चिंता हो रही थी की कहीं नेहा के साथ कुछ गलत तो नहीं हो गया क्योंकि बेचारी नेहा कल रात से किस मानसिक पीड़ा से लड़ रही थी इसका किसी को पता नहीं था|

मैं: अरमान ने नेहा के साथ कुछ गलत तो नहीं किया न?!

मैंने घबराते हुए पिंकी से अपना ये सवाल पुछा और मन ही मन पिंकी के 'न' कहने की कामना करने लगा|

पिंकी: नहीं अंकल...दोनों बस एक मिनट के लिए ऊपर गए थे और नेहा ने बताया की उस एक मिनट में अरमान ने उसके साथ सिवाए जबरदस्ती kiss करने के और कुछ नहीं किया!

मुझे पिंकी की बातों पर ज़रा भी यक़ीन नहीं हो रहा था क्योंकि मुझे लग रहा था की पिंकी बस खुद को अपने पापा जी के गुस्से से बचाने के लिए झूठ बोल रही है|

खैर, पिंकी की बातें सुन कर मेरा मन मुझे डराए जा रहा था की जर्रूर नेहा के साथ कुछ गलत हुआ है! मेरे मन में पनपे इस डर ने मेरे भीतर के शैतान को जगा दिया था और आज इस शैतान ने फिर एक शिकार करना था!

मैं: कहाँ रहता है अरमान?

मेरी आँखों में खून उतर आया था और मेरा ये गुस्सा देख पिंकी बहुत घबरा चुकी थी इसलिए डर के मारे पिंकी ने सुबकना शुरू कर दिया| जाहिर है की अब मैं उससे अरमान के घर का पता नहीं पूछ सकता था इसलिए मैंने पिंकी के मम्मी-पापा से अरमान के घर का पता पुछा तो

मिस्टर मनोहर सिंह ने मुझे अरमान के घर का रास्ता अच्छे से समझा दिया|

अरमान के घर का पता ले मैं तेजी से अपनी गाडी की तरफ चल पड़ा| वहीं मेरे पीछे मिस्टर मनोहर सिंह ने पिंकी के गाल पर खींच कर एक तमाचा धर दिया और गुस्से से चिल्लाते हुए बोले; "आज के बाद ये लड़की घर के बाहर कदम नहीं रखेगी वरना तुम्हारे लिए (अंजना जी) मुझसे बुरा कोई नहीं होगा|"

इधर गाडी में बैठ मैंने अपनी सीट के नीचे हाथ डाला और अपनी रिवॉल्वर निकाली तथा उसमें गोलियाँ भरने लगा| जैसे ही अनिल ने मेरे हाथ में रिवॉल्वर देखि उसकी सिट्टी-पिट्टी गुल हो गई! "जी...जीजू...ये?" जीजू घबराहट के मारे हकलाते हुए बोला|

मेरे ऊपर उस समय शैतान हावी हो चूका था इसलिए मैंने अनिल के पूछे सवाल का जवाब नहीं दिया और अरमान के घर की तरफ गाडी घुमा ली| अपनी गाड़ी अरमान के घर के गेट पर पार्क कर मैं गाडी से उतरा और रिवॉल्वर अपनी कमर में खोंस ली! इतने में अनिल भी मेरे साथ घर के अंदर चलने के लिए गाडी से उतरा| "अनिल, तू गाडी में बैठ!" मैंने बिना अनिल की तरफ देखे गुस्से से कहा और कोठी के भीतर प्रवेश किया मगर मेरे मना करने के बावजूद भी अनिल मेरे पीछे-पीछे आ गया|

जब मैंने दरवाजे पर लगी घंटी बजाई तब मुझे एहसास हुआ की अनिल भी मेरे पीछे खड़ा है| मैं अनिल को वापस जाने को कहता उससे पहले ही घर का दरवाज़ा घर के नौकर ने खोल दिया| नौकर को देख मैंने अनिल से कुछ कहने के बजाए नौकर से सीधा सवाल किया; "अरमान घर पर है?"

"हाँ...लेकिन बाबा सो रहे हैं| आप कौन हैं?" नौकर ने मुझसे सवाल पुछा|

"उसका बाप!" ये कहते हुए मैं नौकर को धक्का देते हुए सबसे पहले घर में घुसा और मेरे पीछे अनिल भी घुसा तथा घर का दरवाजा पुनः बंद कर दिया| मुझे यूँ जबरन घर में घुसता हुआ देख नौकर ने मुझे रोकना चाहा; "अरे...रे...कौन हो तुम? कहाँ घुसे जा रहे हो?" नौकर ने मेरे आगे आ कर मेरा रास्ता रोकते हुए सवाल पुछा|

मैंने नौकर का टेटुआ पकड़ा और गुस्से से दाँत पीसते हुए उससे पुछा; "एकदम चुप! वरना यहीं तेरा टेटुआ दबा कर जान ले लूँगा!" मैंने नौकर को धमकाया तो नौकर ने मुझ पर अपना ज़ोर आज़माते हुए मेरी पकड़ से अपनी गर्दन छुड़ा ली! लेकिन फिर अगले ही पल मैंने अपनी कमर में खोंसी हुई रिवॉल्वर निकाल ली और नौकर के ऊपर तानते हुए बोला; "अरमान का कमरा कहाँ है ये बता वरना यहीं ठोक दूँगा तुझे!" रिवॉल्वर देख नौकर की पतलून गीली हो गई और उसने ऊपर की तरफ इशारा कर दिया| "चल कमरा दिखा!" मैंने नौकर को हुक्म देते हुए कहा| डरा-सहमा सा नौकर आगे-आगे चल रहा था और उसके पीछे मैं बन्दूक ताने चल रहा था| पहली मंजिल पर पहुँच नौकर ने एक कमरे की तरफ इशारा करते हुए कहा; "ये..ये" आगे नौकर के कुछ कहने से पहले ही मैंने दरवाजे पर लात मारी और कमरे में धड़धड़ाते हुए घुस गया|

कमरे के भीतर अरमान अपने पलंग पर पेट के बल पसरा हुआ था| अरमान को देख मेरे भीतर का शैतान बाहर आ गया! सबसे पहले मैंने अपनी रिवॉल्वर अपनी कमर में खोंसी और सीधा अरमान की गुद्दी पकड़ी और उसे झटके से उठा कर पलट दिया! अपने ऊपर हुए इस अचानक हमले से अरमान सकपका कर उठा और दर्द से करहाते हुए पूछने लगा; "क...कौन है?"

"नेहा का पापा!" मैं गुस्से से झुंझलाते हुए बोला| अरमान अब पीठ के बल बिस्तर पर पड़ा था इसलिए मैंने कस कर एक झन्नाटेदार तमाचा उसके बाएँ गाल पर धर दिया! "भोस्डिके! मेरी बेटी को हाथ लगाएगा?! बहनचोद!!!" मैंने अरमान को गरियाते हुए उसके एक और थप्पड़ धर दिया!

"आ...अंकल...मैंने...कुछ नहीं किया!" जैसे ही अरमान ने सफाई देने के लिए अपना मुँह खोला, वैसे ही मैंने उसकी टी-शर्ट का कॉलर पकड़ उसे उठाकर खड़ा किया और एक जोरदार मुक्का उसके पेट में मारा|

"आह!!! माँ" कहते हुए अरमान अपना पेट पकड़ कर जोर से चिल्लाया| उसके चिल्लाने पर मुझे नेहा का रोना याद आ रहा था इसलिए मैंने एक घूसा अरमान के सीधे जबड़े पर धर दिया! "मादरचोद! कुत्ते, आज मैं तुझे नहीं छोड़ूँगा!" मैंने अरमान के दोनों कॉलर पकड़े और उसे कमरे के बाहर की ओर धक्का दे दिया| मेरे दिए धक्के के कारण अरमान लड़खड़ाता हुआ कमरे के बाहर जा गिरा| उसने उठ कर भागने की हिम्मत जुटाई मगर मैंने उसकी गुद्दी फिर पकड़ ली तथा उसे मुँह के बल दिवार से दे मारा! "आह! पापा!!" कहते हुए अरमान जोर से चिल्लाया|

इतने में मैंने अरमान की गुद्दी पकड़े हुए ही उसे सीढ़ियों की ओर धकेल दिया| मेरे दिए धक्के के कारण अरमान 1-2 सीढ़ी ही उतर पाया और बाकी की सीढ़ियों पर वो लड़खड़ाता हुआ गिर पड़ा| मैंने अरमान को उठने का कोई मौका नहीं दिया और उसे लात मारते-मारते नीचे ले आया| मुश्किल से 15 सीढ़ियाँ रही होंगी, लेकिन इन सीढ़ियों पर लुढ़कते-लुढ़कते अरमान की दर्द भरी चींखें निकलने लगीं थीं|

जैसे ही अरमान सबसे आखरी सीढ़ी यानी के फर्श पर मुँह के बल गिरा की तभी उसका बाप अपने बेटे की दर्द भरी चीखें सुन कर अपने कमरे से निकला| कमरे से निकलते ही अयान की पहली नज़र पड़ी अपने जमीन पर गिरे बेटे पर, फिर उसने मुझे देखा और गुस्से से मुझ पर लपकने ही वाला था की मैंने फुर्ती दिखाते हुए अपनी कमर में खोंसी हुई रिवॉल्वर बाहर निकाल कर उस पर तान दी! "जहाँ है वहीं खड़ा रह, तू एक कदम हिला और मैं गोली सीधा तेरे बेटे के भेजे में उतार दूँगा!" मेरी धमकी तथा मेरे हाथों में रिवॉल्वर देख अयान के पैर जम गए और वो जहाँ था वहीं खड़ा हो गया!

"तुम हो कौन? और मेरे बेटे को क्यों इस तरह पीट रहे हो?" अयान ने डर के मारे थरथराते हुए सवाल पुछा|

"नेहा का पापा!...कल मेरी बेटी तेरे लौंडे की पार्टी में आई थी और तेरे लौंडे ने मेरी बेटी के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की! मैं बस उसे उसी की सजा देने आया हूँ!" ये कहते मैंने कस कर एक लात अरमान के पेट पर मारी!

"आह!!!! पापा....बचाओ!" अरमान दर्द से चीखा और अपने पापा से मदद की गुहार करने लगा मगर उसके बाप की तो मेरे हाथ में रिवॉल्वर देख कर घिघि बँध गई थी!

"भोस्डिके!!! बहुत जवानी भरी है न तेरे जिस्म में, आज तेरी सारी जवानी निकालता हूँ!" ये कहते हुए मैंने अरमान के टट्टों पर जोर से लात मारी! "आह!!!!" मेरी लात टट्टों पर लगते ही अरमान के जिस्म में दर्द का ज्वालामुखी फूट पड़ा और वो दर्द से कराहने लगा|

अरमान को बस लात मारने से मेरे दिल को चैन नहीं मिल रहा था इसलिए मैंने अपनी रिवॉल्वर फिर से अपनी कमर में खोंसी और अरमान की टी-शर्ट का कालर पकड़ कर उसे उठाया| थोड़ी सी ही मार से अरमान दर्द से बिलबिला रहा था मगर अभी तो मुझे उसे और मारना था! मैंने अरमान का टेटुआ पकड़ा और उसकी आँखों में आँखें डाले उससे सवाल पुछा; "हरामज़ादे! तूने मेरी बेटी को बरगलाया...उसके मन में मेरे लिए...उसके बाप के लिए ज़हर घोला था न?" अरमान के टेंटुए पर मेरी पकड़ बहुत सख्त थी इसलिए अरमान अपने टेंटुए पर से मेरी पकड़ छुड़वाने की कोशिश करते हुए न में सर हिला कर मेरे सवाल का जवाब देने लगा!

"झूठ बोलता है बहनचोद!" ये बोलते हुए मैंने अरमान को इतनी जोर से धक्का दिया की वो पीठ के बल ज़मीन पर जा गिरा| चूँकि अरमान मेरी पकड़ से आज़ाद हो चूका था इसलिए उसने भागना चाहा मगर मैंने लपक कर उसकी टी-शर्ट पीछे से पकड़ ली और बड़ी जोर का झटका देकर उसे पीछे खींच कर फिर से ज़मीन पर गिरा दिया|

जैसे ही अरमान ज़मीन पर फिर से गिरा मैंने उसे फूटबाल समझ लातें मारनी शुरू कर दीं| मुझे कोई फर्क नहीं पद रहा था की मेरी लात उसे कहाँ लग रही थी, मुझे तो बस उसे मारने में सुकून मिल रहा था!

एक बाप आखिर कब तक अपने जिगर के टुकड़े को यूँ पीटते हुए देखता?! "बस करो!" अयान मुझे सामने की ओर से धकेलते हुए अपने बेटे से दूर करने की कोशिश करने लगा मगर मैंने अयान को एक झटके में दूर धकेल दिया और ज़मीन पर कराह रहे अरमान को फिर से लात मारने लगा| "सो...सॉरी अंकल...छ...छोड़ दो मुझे!" अरमान अपने हाथ जोड़कर मुझसे माफ़ी माँगने लगा|

"बहनचोद! मेरी बेटी भी कल तुझे मना कर रही थी न मगर तुझे सेक्स की आग लगी थी न!" ये कहते हुए मैंने अरमान के दोनों हाथों को अपनी लातों का निशाना बनाया| अरमान को इस समय बहुत दर्द हो रहा था और वो बस मुझसे बचना चाहता था लेकिन उसकी सारी कोशिशें विफल हो रही थीं|

वहीं अपने बेटे को बचाने के लिए अयान पुलिस को फ़ोन करने जा रहा था| जैसे ही मेरी नज़र अयान पर पड़ी मैंने अपनी कमर में खोंस रखी रिवॉल्वर बाहर निकाली और अरमान की तरफ मुँह की तरफ तान कर चला दी!


[color=rgb(255,]"धायें!!!"[/color]

गोली चलने की आवाज़ सुन अयान के प्राण सूख गए! उसे लगा की मैंने उसके लड़के को गोली मार दी इसलिए अयान दौड़ता हुआ मेरे पास आया| नज़दीक आ कर अयान ने देखा तो पाया की गोली अरमान के सर के पास फर्श में धँसी है! अपने बेटे को ज़िंदा देख अयान की जान में जान आई और उसने रोते हुए मेरे सामने अपने घुटने टेक दिए तथा अपने बेटे की जान की भीख माँगने लगा; "छोड़ दो मेरे बेटे को! उसने जो किया उसके लिए उसे माफ़ कर दो! मैं वादा करता हूँ आज के बाद वो तुम्हारी बेटी के आस-पास भी नहीं भटकेगा!"

"इस हराम के जने ने मेरी बेटी को छूने का पाप किया है इसलिए इसे ऐसे तो छोड़ूँगा नहीं!" ये कहते हुए मैंने रिवॉल्वर जेब में डाली और अरमान की टी-शर्ट का कॉलर पकड़ कर उसे उठाया|

रिवॉल्वर की आवाज़ और मेरे गुस्से से अरमान की फट के चार हो चुकी थी! वो जान गया था की वो दौड़ कर तो अपनी जान नहीं बचा सकता इसलिए उसने पुनः मेरे आगे अपने हाथ जोड़ दिए और रोते हुए मुझसे माफ़ी की भीख माँगते हुए गिड़गिड़ाने लगा; "माफ़ कर दीजिये अंकल! मैं आज से कभी नेहा के आस-पास नहीं जाऊँगा! उसके क्या मैं किसी लड़की के आस-पास नहीं जाऊँगा!"

अरमान को अपने आगे यूँ हाथ जोड़े देख मुझे उस पर ज़रा भी दया नहीं आई, आ रहा था तो केवल गुस्सा! मैंने अरमान का दायाँ हाथ कलाई पर से पकड़ लिया और उसे घूर कर देखते हुए बोला; "इसी हाथ से तूने मेरी बेटी को छुआ था न?!" इतना कह मैंने अरमान का हाथ एकदम से मोड़ कर उसकी पीठ से लगा दिया! मेरे अचानक हाथ मोड़ने से अरमान दर्द से करहाने लगा तथा अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगा|

"आज के बाद तू कभी किसी लड़की को इस हाथ से नहीं छू सकेगा!" ये कहते हुए मैंने एक ज़ोर का झटका दिया और 'कट' की आवाज़ के साथ अरमान के दाएँ हाथ की हड्डी कोहनी पर से तोड़ दी!


[color=rgb(255,]आअह!!!![/color]

जैसे ही मैंने झटका दिया अरमान दर्द से चीख पड़ा और ज़मीन पर गिर किसी मछली की तरह रोते-छटपटाते हुए अपने बाप से मदद माँगने लगा| अपने बेटे को यूँ दर्द से बिलबिलाते हुए देख अयान उसके पास दौड़ा और अपने बेटे को सँभालने लगा|

इधर मुझे ये सुनिश्चित करना था की अयान या अरमान अब कभी मेरे परिवार को कोई नुक्सान न पहुँचायें इसलिए मैंने अपनी रिवॉल्वर अयान के सर पर तान दी और उसे खुली चुनैती देते हुए बोला; "मेरी बात कान खोल कर सुन अयान! आज के बाद तू, तेरा बेटा या तेरा कोई भी आदमी मेरे परिवार के 50 किलोमीटर के रेडीएस (radius) में आया तो उसी वक़्त तुझे और तेरे लौंडे, दोनों को गोली मार दूँगा!

कल सुबह तू सबसे पहले अपने बेटे का नाम स्कूल से कटवाएगा| फिर यहाँ जो तूने बिल्डरों के साथ पार्टनरशिप में अपना पैसा डाला है उसे लपेटेगा और देहरादून की टिकट कटवा कर अपना सारा बोरिया-बिस्तर लपेट कर हमेशा-हमेशा के लिए दिल्ली छोड़ देगा! अगर तूने सपने में भी कभी देहरादून छोड़ने की बात सोची न तो मैं देहरादून आ कर तेरे तीनों होटलों को आग लगा दूँगा और तुझे और तेरे खानदान की इस आखरी निशानी (अरमान)...तेरी वंश बेल को काट कर टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा!" जब मैंने अयान और उसकी जन्मकुंडली खोली तो सभी को हैरानी हुई की मुझे अयान के बारे में इतना सब कैसे पता?!

दरअसल मैंने अयान को मिश्रा अंकल जी की पार्टी में एक बार देखा था| फिर कुछ वक़्त पहले ही मिश्रा अंकल जी ने बातों-बातों में मुझे बताया था की अयान उनके ठेकों में रोड़े अटका रहा है इसलिए वो भी उससे बिदके हुए थे!

"यही सोच रहा है न की मुझे ये सब कैसे पता? तो तेरी जानकारी के लिए बता दूँ, मैं मिश्रा अंकल जी के साथ काम करता हूँ| उन्होंने ही मुझे बताया की तू कैसे अपना पैसा पानी की तरह बहा कर उनके काम बिगाड़ रहा है|" जब मैंने मिश्रा अंकल जी का नाम लिया तो अयान की और भी फटी क्योंकि मिश्रा अंकल जी मुझसे भी ज्यादा टेढ़े थे!

अयान को धमकी देने के बाद मुझे लग रहा था की कहीं अयान मुझे हलके में तो नहीं ले रहा इसलिए अपनी तसल्ली के लिए मैंने अयान को और डराने के लिए उसे अपने इतिहास के बारे में भी थोड़ा बता दिया; "और एक बात सुन ले, मेरी धमकी को हलके में लेने की कोशिश मत करिओ! एक आदमी ने नेहा की मम्मी को नुक्सान पहुँचाने की सोची थी तो मैंने उस आदमी को ऊपर भेज दिया! सोच ले अगर तूने या तेरे इस लौंडे ने कुछ सोचा भी तो तुम्हें जान से मारने में मुझे मिनट नहीं लगेगा!" जब मैंने एक आदमी को मारने की बात कही तो अयान की पतलून गीली हो गई! उसने फौरन मेरे आगे अपने हाथ जोड़ दिए और गिड़गिड़ाते हुए बोला; "आप जैसा कह रहे हो, वैसा ही होगा! मैं कल के कल ही दिल्ली छोड़ दूँगा!"

अयान की फट के किताब बन चुकी थी इसलिए मैं बिना कुछ कहे घर के बाहर आ गया| घर के बाहर आते ही मैंने मिश्रा अंकल जी को फ़ोन खनका दिया; "अंकल जी प्रणाम! आपके काम में रुकावट डालने वाले अयान के लड़के ने मेरी बेटी नेहा को गलत तरीके से छूने की कोशिश की थी इसलिए मैंने अभी उसका हाथ तोड़ दिया है और मैंने बाप-बेटे दोनों को दिल्ली छोड़ने की धमकी भी दे दी है, आप ज़रा देख लेंगे?!" मेरी बात सुन मिश्रा अंकल जी का खून खौल गया और वो बोले; "तू हुआँ ठहरो मुन्ना, हम आभायें आईथ है! हमारी पोती की इज्जत खराब किये का ओकरी हिम्मत कैसे भई?!" मेरा मिश्रा अंकल जी को फ़ोन करने का मकसद बस इतना था की कल के कल ही अयान और उसका बेटा हमेशा-हमेशा के लिए इस शहर और नेहा की ज़िन्दगी से हमेशा-हमेशा के लिए गायब हो जाएँ| अब मैं तो अयान पर नजरें गड़ाए नहीं बैठ सकता था इसलिए इस काम के लिए मैंने मिश्रा अंकल जी की मदद ली थी!

"नहीं-नहीं अंकल जी, आपको यहाँ आने की तकलीफ उठाने की कोई जर्रूरत नहीं| अयान के लौंडे ने नेहा को छुआ भर था तो मैंने उसके लड़के का हाथ तोड़ दिया! आप बस किसी को भेज दीजिये ताकि कल के कल ही ये दिल्ली छोड़ कर देहरादून निकल जाएँ!" मैंने मिश्रा अंकल जी को यहाँ आने से रोका| "और एक बात थी अंकल जी, इस काण्ड के बारे में आपके सिवा किसी को कुछ नहीं पता, यहाँ तक की मेरी माँ को भी कुछ नहीं पता| तो कृपया ध्यान रखियेगा की बिटिया की इज्जत पर कोई धब्बा न लगे| आप तो जानते ही हैं की लोगों को छोटी सी बात को खींच-तान कर दूसरों को दुःख देने में कितना मज़ा आता है|" मिश्रा अंकल जी भी के बेटी के बाप थे और जानते थे की बिटिया की इज्जत कितनी प्यारी होती है इसलिए उन्होंने आजतक इस बात का जिक्र अपने घर तक में नहीं किया|

खैर, मेरी बात का मान रख मिश्रा अंकल जी अयान के घर तो नहीं आये मगर उन्होंने अयान को उसी वक़्त फ़ोन कर उसकी गांड फाड़ दी! "बहनचोद अयान! तुझे पता भी है तेरे बेटे ने क्या किया है? किसकी बेटी पर बुरी नज़र डाली है? वो जो लड़का अभी तेरे बेटे का हाथ तोड़कर गया है न, अगर आज उसकी बुद्धि घूम जाती न तो आज यहाँ तुम दोनों बाप-बेटों की लाश गिरा कर जाता और कोई उसकी झाँट उखाड़ न पाता! पता है, गाँव में एक बार किसी ने मानु और नेहा की मम्मी को मारने की कोशिश की थी, मानु ने उस आदमी के कट्टे से उसी को मौत के घाट उतार दिया| शुक्र मना की तुझे उसने खाली धमकी दी है!

खैर, अब मेरी बात कान खोल कर सुन, मानु मेरे बेटा जैसा है और उसने मुझे कहा है की मैं ये सुनिश्चित करूँ की कल के कल तू ये शहर छोड़ दे इसलिए तुझे प्यार से समझा रहा हूँ की कल शाम तक अगर तू ये घर खाली कर के दिल्ली से न भागा तो मानु की बात की लाज रखने के लिए मेरे आदमी को तुझे ठिकाने लगाना पड़ेगा!" मिश्रा अंकल जी ने मेरी धमकी में डर का तड़का लगा दिया था जिससे अयान के प्राण सूखने लगे थे! बस फिर क्या था, अगले दिन ही अयान अपना बोरिया-बिस्तर लपेट कर हमेशा-हमेशा के लिए दिल्ली छोड़ कर देहरादून भाग गया!

खैर, मिश्रा अंकल जी को फ़ोन कर मैं गाडी में बैठा और अपनी रिवॉल्वर खाली कर वापस अपनी सीट के नीचे छुपाने लगा| मुझे रिवॉल्वर खाली करते हुए अनिल बड़े गौर से देख रहा था, वो बेचारा अभी तक मुझसे इतना डरा हुआ था की उससे कुछ बोलते नहीं बन रहा था|

वहीं, अयान का हाथ तोड़कर मुझे अजब सी शान्ति मिली थी तथा मेरा गुस्सा पूरी तरह शांत हो चूका था| मैं अब पूरी तरह निश्चिंत था की अब मेरा परिवार पूरी तरह सुरक्षित है|

जब मैंने अनिल को डरा...घबराया हुआ देखा तो मैंने अनिल से शांत मन से बात शुरू की;

"अनिल, ध्यान रहे की अभी जो कुछ हुआ इसके बारे में किसी को पता नहीं लगना चाहिए|"

मैंने बड़े इत्मीनान से अनिल के साथ बात शुरू की थी इसलिए मुझे लगा की अनिल अब सामान्य हो जायेगा|

"जी जीजू!" परन्तु अनिल के भीतर डर अब भी बाकी था इसलिए उसने बड़े संक्षेप में जवाब दिया| अब एक सीधे-साधे आदमी के सामने अचानक कोई रिवॉल्वर निकाल कर चला दे तो आदमी डर ही जाता है| अनिल के इस डर को ध्यान में रखते हुए मैंने आगे उससे कोई बात नहीं की और हम दोनों जीजा-साले बिना एक दूसरे से कोई बात किये घर पहुँचे|

[color=rgb(97,]जारी रहेगा भाग - 14 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]अंतिम अध्याय: प्रतिकाष्ठा[/color]
[color=rgb(51,]भाग - 14[/color]

[color=rgb(26,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

अनिल के इस डर को ध्यान में रखते हुए मैंने आगे उससे कोई बात नहीं की और हम दोनों जीजा-साले बिना एक दूसरे से कोई बात किये घर पहुँचे|

[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]

अनिल
गाडी से उतर टहलते हुए किसी से फ़ोन पर बात कर रहा था इसलिए अनिल को नीचे छोड़ मैं अकेला ऊपर पहुँचा| ऊपर पहुँचते ही स्तुति मेरा इंतेज़ार करती हुई उदास मिली! स्तुति फट से मेरी गोदी में चढ़ी और कमरे की तरफ इशारा करते हुए बोली; "पपई...मम्मी ने मुझे डाँटा!" मैं जानता था की संगीता ने स्तुति को क्यों डाँटा इसलिए मैं स्तुति को ले कर नीचे आ गया और उसे बहलाने लगा|

मेरी गैरमौजूदगी में हुआ कुछ यूँ की: मेरे जाने के कुछ देर बाद स्तुति फुदकती हुई घर के भीतर आई| जब स्तुति ने देखा की उसकी दिद्दा रो रहीं हैं तो स्तुति के दिमाग में सवाल उतपन्न हो गए और स्तुति ने अपने ये सवाल अपनी मम्मी से पूछने शुरू कर दिए| अब संगीता पहले ही नेहा के रोने के कारण परेशान थी ऊपर से स्तुति के पूछे सवालों ने उसे चिड़चिड़ा कर दिया तथा संगीता ने स्तुति को डाँटते हुए भगा दिया|

"बेटा, आपकी मम्मी अभी थोड़ा टेंशन में हैं, ऐसे में उन्होंने गलती से आपको डाँट दिया| मैं उन्हें समझाऊँगा की वो आपको ऐसे न डाँटा करें और आप भी मम्मी की डाँट का बुरा मत लगाओ तथा अपनी मम्मी जी को माफ़ कर दो!" मैंने दुलार करते हुए स्तुति को समझाया| स्तुति मेरी बात कभी नहीं टालती थी इसलिए स्तुति ने मुस्कुराते हुए मेरी बात मान ली और अपनी मम्मी को माफ़ कर दिया|

मैं स्तुति को पास की दूकान तक ले गया और उसे एक चॉकलेट खरीद कर दी, सुबह-सुबह चॉकलेट पा कर स्तुति खुश हो गई थी! स्तुति को ले कर मैं घर पर लौटा और उसे छत पर माँ के पास खेलने के लिए भेज दिया| जैसे ही स्तुति बाहर छत पर गई की संगीता पीछे से आई और मेरा हाथ पकड़ मुझे ज़ोर से खींचते हुए बच्चों के कमरे में ले आई|

"बन्दूक कहाँ है?" संगीता गुस्से से अपने दाँत पीसते हुए मुझसे पूछने लगी| उस समय संगीता को गुस्सा ऐसा था मानो अगर मैंने उसे नहीं बताया की रिवॉल्वर कहाँ है तो संगीता मुझे कच्चा खा जायेगी! संगीता का ये सवाल सुनते ही मैं समझ गया की मेरे मना करने के बावजूद अनिल ने अपनी दीदी के सामने सारा सच बक दिया है! खैर, अब चूँकि पर्दा उठ ही चूका है तो संगीता से झूठ बोलने का कोई फायदा नहीं था!

"गाडी में!" मैंने भोयें सिकोड़ कर जवाब दिया| संगीता को लगा था की उसका गुस्सा देख मैं घबराऊँगा मगर मैंने उसके पूछे सवाल का जवाब बड़ी सरलता से दिया था जिस कारण संगीता का गुस्सा उबाले मारने लगा!

"गाडी में? इतनी खतरनाक 'चीज़' को आपने गाडी में रखा हुआ है?! अगर किसी के हाथ लग गई तो?" संगीता मुझ पर बरसते हुए बोली| अब देखा जाए तो संगीता की बात में दम तो था, मैंने रिवॉल्वर जैसी खतरनाक वस्तु अपनी गाडी में छुपा कर रखी हुई थी! लेकिन मेरी भी मजबूरी थी, मैं रिवॉल्वर घर पर रख नहीं सकता था क्योंकि घर पर रिवल्वर रखने से वो कब की माँ या संगीता के हाथ लग चुकी होती और मेरी ऐसी-तैसी हो गई होती!

खैर, मुझे खामोश देख संगीता दाँत पीसते हुए बोली; "मुझे...'वो' ला कर दो!" संगीता ने रिवॉल्वर के लिए 'वो' शब्द इस्तेमाल किया तो मुझे बहुत अजीब लगा इसलिए मैं भोयें सिकोड़ कर संगीता को घूरने लगा| "जाओ!!" संगीता ने मुझे जाने के लिए कहा| मैं फटाफट नीचे उतरा और छुपा कर रिवॉल्वर ऊपर ले आया|

जब मैंने संगीता को वो लकड़ी का डिब्बा दिखाया तो संगीता भोयें सिकोड़ कर डिब्बे को देखने लगी| दरअसल संगीता को उम्मीद थी की मैं उसे रिवॉल्वर ला कर दूँगा मगर मैं तो उसे एक लकड़ी का डिब्बा दे रहा था इसलिए संगीता का हैरान होना जायज था|

संगीता ने डिब्बा खोला तो रिवॉल्वर देख कर उसकी आँखें फटी की फटी रह गई! "ये...ये बंदूक..." संगीता से आगे कुछ कहा नहीं गया| असल में रिवॉल्वर देख कर संगीता बहुत घबरा गई थी और उससे कुछ बोलते नहीं बन रहा था|

संगीता को सामन्य करने के लिए मैंने माहौल को हल्का करने की सोची| "जान, ये बन्दूक नहीं रिवॉल्वर है|" मैंने मुस्कुराते हुए कहा मगर संगीता मुझे घूरने लगी! मेरा संगीता को सामान्य करने का प्लान मेरी ही.....|

"कहाँ से आई ये? कब खरीदी? और इतनी बड़ी बात मुझसे क्यों छुपाई?" संगीता ने गुस्से में अपने सवालों के सारे बाण्ड मुझ पर चला अपना तरकश खाली कर दिया| संगीता को सुनना था सच इसलिए मैंने उसे सब सच बता दिया|

"जान, मेरे पास इस रिवॉल्वर के सारे कागज हैं, यहाँ तक की मेरे पास इस रिवॉल्वर का लाइसेंस भी है| मैंने ये रिवॉल्वर सिर्फ अपने परिवार की रक्षा के लिए रखी थी और आज इसका इस्तेमाल भी सिर्फ अपने परिवार की रक्षा के लिए किया| आज से पहले मैंने इस रिवॉल्वर को कभी नहीं छुआ, कभी किसी पर इस्तेमाल नहीं किया|" मैंने अपनी सफाई संगीता के सामने एक प्लेट में परोस दी थी|

अब देखा जाए तो मैंने मिश्रा अंकल जी को इस रिवॉल्वर के लिए बहुत मना किया था मगर उन्होंने जबरदस्ती मुझे ये रिवॉल्वर तोहफे में दे दी थी| शुक्र है की संगीता को ये बात समझ आ गई और उसका गुस्सा शांत होने लगा|

"मैं मानता हूँ की मैंने तुम्हें इसके (रिवॉल्वर के) बारे में न बता कर पाप किया है मगर जान, मैंने तुम्हें सिर्फ और सिर्फ सिर्फ इसलिए नहीं बताया क्योंकि तुम ये बात जानकार परेशान हो जाती तथा इसे (रिवॉल्वर को) ले कर दिन-रात मेरी चिंता करती रहती| फिर अगर तुम गलती से भी इसका जिक्र माँ से कर देतीं तो जानती हो न माँ क्या बवाल खड़ा कर देतीं?! वो सीधा मिश्रा अंकल जी से लड़ पड़तीं और आज जब हमें उनकी जर्रूरत पड़ी तो कौन हमारी मदद के लिए आता?!" भले ही मैंने मिश्रा अंकल जी के साथ काम करना छोड़ दिया था मगर कभी-कभी हमारी बातें होती रहती थीं| मेरे जूतों के नए काम को ले कर अंकल जी मुझसे कभी-कभार बात करते थे, तो कभी-कभार उनके घर में कोई प्रसंग होता तो वो हमें खासकर बुलाते भी थे|

बहरहाल, मुझे लग रहा था की मैंने अपनी बातों से संगीता का गुस्सा शांत कर दिया है मगर संगीता का गुस्सा शांत होने का कारण कुछ और था!

"अब इसका (रिवॉल्वर का) निपटारा करो और आज के बाद मुझसे कोई बात छुपाई न तो देख लेना!" संगीता मुझे खोखली धमकी देते हुए बोली| संगीता के चेहरे पर मुस्कान की एक किरण चमकने लगी थी| मैंने संगीता की बात का मान रखते हुए कुछ सोचते हुए अपना सर हाँ में हिला दिया|

तब मुझे नहीं पता था की संगीता ने मुझे यूँ कुछ सोचते हुए पकड़ लिया है! उस समय तो संगीता शांत रही लेकिन बाद में उसने इस बात को ले कर मुझसे बात की|

गौर करने वाली बात ये थी की संगीता ने मेरे अरमान को पीटने और उसका हाथ तोड़ने को ले कर एक शब्द नहीं कहा था| उसे बस चिंता थी तो मेरे हाथ से रिवॉल्वर चलने की!

संगीता ने मुझे जितना 'डाँटना' था वो डाँट लिया था, अब हमें ये फैसला करना था की नेहा को कैसे सँभाला जाये इसलिए संगीता ने अनिल को आवाज़ लगा कर बच्चों के कमरे में बुलाया| जैसे ही अनिल आया वो अपने कान पकड़ कर मुझसे माफ़ी माँगने लगा; "मुझे माफ़ कर दो जीजू, मैंने आपके मना करने के बावजूद दीदी को सब सच बता दिया!" मैं अनिल से नाराज़ नहीं था क्योंकि मैं जानता था की संगीता अपनी कसम से बाँध कर सच उगलवा लेती है इसलिए मैंने मुस्कुराते हुए अनिल को माफ़ कर दिया|

"मेरे से बात छुपाता तो दो लगते इसके कान पर और ये सब सच उगल देता!" संगीता ने अनिल को अपना थप्पड़ दिखाते हुए फिर से डरा दिया, जिसका आनंद मैंने मुस्कुरा कर लिया! संगीता के इस छोटे से मज़ाक से मेरे चेहरे पर आखिर मुस्कान आ ही गई थी|

"जब नेहा सुबह रोती हुई आई तो उसके कपडे देख कर मैं सोच में पड़ गई थी क्योंकि ये वो कपड़े नहीं थे जिन्हें पहन कर नेहा कल शाम को निकली थी| मुझे शक हो गया था की जर्रूर नेहा किसी के साथ पार्टी में गई थी, वो तो जब अनिल ने बताया की असल में हुआ क्या तो मेरे पॉंव तले ज़मीन खिसक गई! बड़ी मुश्किल से मुझे नेहा पर विश्वास होने लगा था की मेरी बेटी सुधर गई है लेकिन इस लड़की ने तो मेरी ही पीठ में धोकेबाज़ी का छुरा घोंप दिया!

पहले मुझे कहा की मैं रेखा के घर जा कर प्रोजेक्ट बनाऊँगी और चली गई पिंकी के घर, मुझे रेखा और उसकी मम्मी पर भरोसा था इसीलिए तो मैंने रेखा की मम्मी को फ़ोन कर के कुछ नहीं पुछा| फिर ये लड़की पिंकी के घर जा कर पार्टी करने चली गई और वहाँ उसके साथ ये हादसा हुआ| न ये लड़की मुझसे झूठ बोलती, न ये सब होता!" संगीता गुस्से से आपना सर पीटते हुए बोली|

"जो होना था वो हो गया अब उसके बारे में सोच कर कुछ नहीं होगा| अभी समय है ठंडे दिमाग से नेहा को सँभालने का|" मैंने संगीता को शांत करना चाहा मगर संगीता को इस समय नेहा पर बहुत गुस्सा आ रहा था!

"रोते-रोते सो गई है न...उठने दो इस लड़की को! मैं इसे सीधा गॉंव भेज दूँगी! अब से ये वहाँ अपनी नानी के पास रह कर पढ़ेगी.नहीं तो इसका ब्याह कर के छुट्टी पाऊँगी मैं!" संगीता गुस्से से चिढ़ते हुए बोली| इस समय संगीता की बोली-भाषा से लगता था मानो उसके मन में अपनी ही बेटी के प्रति घृणा पैदा हो गई हो, ऐसी घृणा जो संगीता को उसकी ही बेटी से पीछा छुड़ाने को कह रही हो!

"Enough संगीता!" मैं गुस्से से संगीता पर चीखा| मुझे ये गुस्सा इसलिए नहीं आया क्योंकि मैं नेहा से प्यार करता था, बल्कि ये गुस्सा इसलिए आया था की एक माँ होने के बावजूद संगीता अपनी बेटी के दुःख-दर्द को नहीं समझ रही थी!

मेरा गुस्सा देख दोनों भाई-बहन सहम गए थे| अनिल ने तो पहले ही मेरा उग्र रूप देखा था इसलिए वो मुझे फिर से गुस्सा होते देख सबसे ज्यादा सहम गया था! वहीं संगीता का हाल ऐसा था जैसे वो कोई छोटी सी बच्ची हो जिसे मैंने डाँट दिया हो!

"मैंने तुम्हें पहले भी कहा था की नेहा के साथ सोच-समझकर ठंडे दिमाग से पेश आओ मगर तुमने मेरी एक न मानी और किसी थानेदार की तरह उसके पीछे पड़ गई! नेहा की ये उम्र किसी स्प्रिंग (spring) जैसी है, जितना उसे अपने गुस्से से दबाओगी उतना ही बगावत करते हुए नेहा इससे भी बड़ी गलती करते हुए छलाँग लगाएगी!

तुम शायद भूल रही हो की तुम एक माँ हो और एक माँ होते हुए तुम अपनी बेटी से इस तरह पीछा छुड़ाने की बात कर रही हो? जैसे शादी के लिए तुम्हारी पढ़ाई जबरदस्ती छुड़ाई गई, उसी तरह तुम भी अपनी बेटी की पढ़ाई छुड़ा रही हो?!" मेरी गुस्से में कही ये बात संगीता के दिल को छू गई और शर्म से उसका सर झुक गया!

अब चूँकि संगीता शांत हो चुकी थी तो मैंने उसे आराम से बात समझाना शुरू किया; "नेहा इस समय बहुत ही नाज़ुक दौर से गुज़र रही है, ऐसे में तुम्हें उसके साथ प्यार से पेश आना है, न की गुस्से से! नेहा को उसके जीवन की पहली और सबसे बड़ी ठोकर लगी है, इस समय तुम्हें उसे उठ कर खड़े होने में सहयता करनी है| अगर तुमने तेश में आकर उस पर फिर से पाबंदियों की लगाम लगाई तो नेहा फिर से बेलगाम हो जाएगी और फिर कभी तुम्हारे काबू में नहीं आएगी|

इस बार जो उसके साथ गलत हुआ उसके खिलाफ नेहा ने हिम्मत दिखा दी मगर अगली बार अगर ऐसा कुछ हुआ तो वो हिम्मत नहीं जुटा पायेगी और न ही घर आ कर कुछ कहेगी! बस उसी पल से तुम अपनी बेटी को हमेशा-हमेशा के लिए खो दोगी!" मेरी कही इस बात में संगीता को जो बात सबसे ज्यादा चुभी वो थी मेरा नेहा को संगीता की बेटी कहना! संगीता इस बता को ले कर कुछ कहना चाहती थी मगर मैंने उसे मौका ही नहीं दिया और अपनी बात आगे जारी रखी|

"जब नेहा उठे तो उसके साथ प्यार से पेश आओ, उससे छोटे बच्चों की तरह लाड-प्यार करो, उसकी पसंदीदा रसमलाई उसे खिलाओ और किसी भी हाल में कल रात क्या हुआ उसके बारे में एक शब्द मत पूछना!

जब तुम्हें लगे की नेहा अब सामन्य हो गई है, तब अकेले में उसके साथ बैठ कर उसके साथ अपना अनुभव साझा करो| तुम्हें कैसा लगा था जब तुम्हारे साथ ऐसा कुछ हुआ था, ताकि नेहा तुम्हें एक माँ नहीं बल्कि अपना दोस्त समझे और तभी प्यार से नेहा से पूछो की असल में उसके साथ कल रात क्या हुआ? कहीं नेहा की इज्जत पर तो कोई आँच नहीं आई?!" मेरे लिए सबसे जर्रूरी प्रश्न था की कहीं नेहा की इज्जत पर कोई आँच तो नहीं आई! यदि ऐसा हुआ होता तो मैं अरमान को मौत के घाट उतार देता!

बहरहाल, इस अंतिम प्रश्न का ज़िक्र करते ही मेरा क्रोध फिर से लौट आया था मगर मैंने किसी तरह अपने क्रोध को बाहर आने से रोका और अपनी बात को आगे जारी रखा; "अपना दुःख तुमसे साझा करते हुए नेहा रोयेगी और फिर से टूटने लगेगी! तब तुम्हें उसे एक माँ की तरह सहारा देना है और उसे समझना है की इस तरह हार नहीं माननी| किसी भी हाल में दब कर या झुक कर नहीं रहना| तुम्हें नेहा को उसका खोया हुआ आत्मिश्वास फिर से वापस दिलाना है ताकि नेहा भविष्य में खुद को सँभाल पाए और बुरे लोगों की संगत में पड़ कर फिर से न बिगड़ जाए!

यदि आवश्यकता हुई तो हम नेहा को काउंसलिंग (counseling) के लिए ले चलेंगे| कौन्सेलेर (counselor) नेहा से बात कर उसके डर को जानेगा और नेहा को अपने डर से लड़ना सिखाएगा|" नेहा मेरी गोदी में खेली थी इसलिए मुझसे ज्यादा नेहा की मनोदशा कोई नहीं समझ सकता था इसलिए मैंने संगीता को अच्छे से समझा दिया था की उसे नेहा को कैसे सँभालना है मगर संगीता ने अभी तक मेरी कही बातों के लिए हामी नहीं भरी थी! असल में संगीता बहुत गर्म दिमाग की है| उसके अनुसार बच्चे अगर गलती करते हैं तो उन्हें मार-पीट कर सीधा कर देना चाहिए| मेरा ये नरमी दिखाने वाला फर्मूला उसकी समझ से परे था इसलिए संगीता ने मेरे दिखाए रास्ते पर चलने के लिए हामी नहीं भरी थी!

"जीजू ठीक कह रहे हैं दीदी!" अनिल अपनी दीदी के आगे मिमियाते हुए बोला| अनिल कभी अपनी दीदी के आगे कुछ बोल नहीं पता था इसलिए बेचारा डरते हुए मेरी बात का समर्थन कर रहा था|

"नेहा को इस समय अपने पापा जी की... यानी आपकी जर्रूरत है क्योंकि आप उसे मुझसे ज्यादा समझते हो|" नेहा इस समय बहुत भावुक थी और यदि मैं उसके सामने जाता उसे प्यार से सँभालता तो हम बाप-बेटी के बीच पैदा हुई ये दूरियाँ समाप्त हो जातीं| यही सोच कर संगीता मुझे आगे कर रही थी मगर मेरा मन नेहा के प्रति फट चूका था, ऐसे में मेरा नेहा से दूर रहना ही सही था!

"नहीं!" मैंने संगीता की बात पूरी होते हुए एकदम से कहा| मैं नेहा के कारण किस दुःख में जल रहा हूँ ये मैं सब से छुपाना चाहता था इसीलिए मैं नेहा से जितना हो सके उतना दूर रहना चाहता था| मैं ये भूल गया था की अभी जो मैंने नेहा को संगीता की बेटी कहा उससे मेरे मन में बसा दुःख सबके सामने उजागर हो चूका है!

खैर, मैंने नेहा के पास जाने के लिए मैंने मना तो कर दिया मगर मुझे उसका कारण भी तो देना था; "नेहा के साथ जो हुआ वो एक लड़के ने किया...ऐसे में मेरा एक आदमी का उसके पास जाना उसे वो सब फिर से याद दिलाएगा और वो सँभालने के बजाए टूटने लगेगी|" कभी-कभी मैं बड़ी बेसर-पैर की बातें करता हूँ, जो की मुझे अपरिपक्व दिखाता है| वही इस समय हुआ, मेरी बात सुन दोनों भाई-बहन भोयें सिकोड़ कर मुझे देखने लगे थे क्योंकि पूरे परिवार में एक बस मैं था जिसमें नेहा को फिर से सँभालने तथा उसे फिर से हँसाने-बुलाने की क्षमता थी और मैं था की ऐसी ऊल-जुलूल बातें बोल कर इस स्थिति से बचना चाह रहा था|

अनिल भले ही मेरे दिल की हालत न समझ पाया हो मगर संगीता सब समझ गई थी| परिस्थिति को सामान्य करने के लिए मैंने दोनों भाई-बहन का ध्यान भटका दिया; "आप दोनों सुन लो, किसी भी हालत में नेहा को आज अरमान के घर में क्या हुआ ये सब पता नहीं चलना चाहिए वरना हो सकता है नेहा डर के मारे और सहम जाए!" मैंने दोनों भाई-बहन को आगाह करते हुए कहा|

आगे हमारी और बात होती उससे पहले ही माँ चाय पी कर अपनी पोती को ऊँगली पकड़ाए घर के भीतर आ गईं| माँ ने अनिल को इतनी सुबह अचानक देखा तो उन्हें अस्चर्य हुआ| वहीँ स्तुति फट से अपने छोटे मामा जी के पैर छू आशीर्वाद लेते हुए ख़ुशी से कूदने लगी!

कहीं माँ कुछ शक न करने लगें इसलिए मैंने बात बनाते हुए माँ से झूठ कहा; "अनिल अपनी ट्रेनिंग के लिए कल ग़ाज़ियाबाद पहुँचा था| अब आपकी बड़ी पोती नेहा का अपनी दोस्त के घर में मन नहीं लग रहा था इसलिए वो अपने छोटे मामा जी के साथ घर लौट आई|" मेरी बात सुन माँ ने अनिल से पुछा की अगर वो ग़ाज़ियाबाद आया था तो यहाँ हमारे घर क्यों नहीं रुका? तो मैं अनिल की ओर से जवाब देते हुए बोला; "इसके ठहरने का इंतज़ाम कंपनी ने एक बढ़िया होटल में किया हुआ है|" मेरे जवाब देने से माँ मुझे प्यार से डाँटते हुए बोलीं; "होटल और अपने घर में फर्क नहीं होता?! अरे वहाँ दूसरों के हाथों का खाना खायेगा, इससे अच्छा तो यहाँ अपनी दीदी के हाथ का बना स्वाद खाना खाता|"

"वो क्या है न माँ, बहन के घर का तो पानी भी नहीं पीते! है न अनिल?!" मैंने मज़ाक करते हुए कहा तो सभी लोग जोर से ठहाका लगा कर हँसने लगे| तभी माँ मेरो पीठ पर प्यारभरी थपकी मारते हुए बोलीं; "पगला कहीं का! वो सब बातें पुरानी हैं, अब इन दकियानूसी बातों से परिवार में रिश्ते खराब नहीं करते!" इतना कह माँ ने संगीता को अनिल के लिए मालपुआ बनाने को कहा|

अब चूँकि नेहा घर आ चुकी थी और अभी तक अपनी दादी जी से नहीं मिली थी इसलिए माँ ने मुझसे नेहा के बारे में पुछा; "नेहा कहाँ है? जब से आई है मुझसे तो मिली नहीं?!" माँ के सवाल का कुछ तो जवाब देना था इसलिए मैंने बात बनाते हुए माँ का ध्यान ही भटका दिया; "वो क्या है न माँ, आपकी पोती ने रात भर जाग कर अपना प्रोजेक्ट पूरा किया है इसलिए वो सीधा आ कर सो गई| आप छोडो ये सब बातें और जल्दी से तैयार हो जाओ, मैं और आप मंदिर जा रहे हैं|" जैसे ही मैंने मंदिर जाने की बात कही माँ का ध्यान भटक गया| माँ ने सबको एक साथ मंदिर जाने को कहा तो मैंने बात बनाते हुए कहा; "आयुष और नेहा सो रहे हैं...ऊपर से अनिल ने मालपुए भी खाने हैं तबतक हम दोनों माँ-बेटे मंदिर हो आते हैं|" मेरे दिए तर्क से माँ संतुष्ट थीं इसलिए वो नहाने जाने लगीं| आज नेहा के कारण मुझे सुबह-सुबह माँ से झूठ बोलना पड़ रहा था, लेकिन कर भी क्या सकते थे माँ को अगर सच पता चलता तो माँ बहुत घबरा जातीं|

इधर इतनी देर से मैंने जो स्तुति को नज़रअंदाज़ करने का पाप किया था उस कारण स्तुति की छोटी सी नाक पर प्यारा सा गुस्सा बैठा था! "और मैं?" ये कहते हुए स्तुति ने जेठा लाल की तरह अपने दोनों हाथ अपनी कमर पर रख लिए और प्यारभरे गुस्से से मुझे देखने लगी! स्तुति का ये गुस्सा देख कर मुझे डर नहीं हँसी आ रही थी, परन्तु मैं अपनी हँसी दबाये हुए था वरना स्तुति और गुस्सा हो जाती!

"तेरे बिना मैं कहीं जा सकती हूँ?!" माँ ने स्तुति को बहलाते हुए कहा तथा मुझे स्तुति से डाँट खाने से बचा लिया| स्तुति अपनी दादी जी की बात सुन खुश हो गई और उनके साथ तैयार होने चली गई|

मुझे आज जितना हो सके उतना माँ को घर से दूर रखना था इसलिए मैंने आज माँ और स्तुति को मंदिर घूमने में आधा दिन लगा दिया|

इधर घर पर संगीता ने अनिल को नाश्ता कराया तथा उसे काम पर भेजा| कुछ देर बाद आयुष उठा तो संगीता ने उसे बता दिया की मैं सब को ले कर मंदिर गया हूँ| "मुझे क्यों नहीं उठाया? मैं भी मंदिर चला जाता!" आयुष अपनी मम्मी से नाराज़ होते हुए बोला|

"मेरा लाल पढ़ते-पढ़ते थक गया था इसलिए मैंने सोचा की तू आराम कर ले| आज न सही कल हम सब मंदिर चलेंगे!" संगीता ने लाड-प्यार से आयुष को बहलाया और उसे नाश्ता करवा कर पढ़ने बिठा दिया| आयुष ने देख लिया था की नेहा सो रही है मगर उसने फिर भी कुछ नहीं कहा और अपनी पढ़ाई करने बैठ गया|

कुछ देर बाद संगीता नेहा को जगाने आई| आज पहलीबार संगीता ने नेहा के सर पर प्यार से हाथ फेरा और उसे लाड करते हुए जगाने लगी; "ओ मेरी लाडो! उठ जा बेटा!" अपनी मम्मी की प्यारभरी आवाज़ सुन नेहा की नींद टूट गई और वो एकदम से उठ बैठी| नेहा को अपनी मम्मी से ऐसे प्यार की उम्मीद नहीं थी, उसे तो लगा था की संगीता उसे चप्पल से सूतते हुए जगाएगी मगर यहाँ तो संगीता के भीतर ममता का सागर उमड़ आया था|

अपनी मम्मी के चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान देख नेहा को ग्लानि होने लगी की कैसे उसने अपनी ही मम्मी के साथ छल-कपट कर धोखा किया, परन्तु फिर भी उसकी मम्मी उसे इतना लाड-प्यार कर रही है! नेहा अपनी मम्मी से लिपट गई और ग्लानि के कारण फूट-फूट कर रोने लगी! "बस-बस मेरी बच्ची! अब रोना नहीं है!" संगीता ने नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए कहा| नेहा को नहाने जाने के लिए बोल संगीता ने नेहा का मन पसंद नाश्ता बनाया और दोनों माँ-बेटी ने एक साथ नाश्ता किया|

कल रात के हादसे के कारण नेहा अब भी डरी हुई थी और अपना डर अपनी मम्मी से छुपाने की कोशिश कर रही थी| मैंने संगीता को नेहा के साथ बात करने के लिए सब्र से काम लेने को कहा था मगर संगीता में सब्र की बहुत कमी थी!

इधर नेहा में सच कहने की ज़रा भी हिम्मत नहीं थी इसलिए संगीता ने ही पहल करते हुए बात शुरू की; "बेटा, मेरे पास आ|" ये कहते हुए संगीता ने नेहा को अपना सर उसकी गोदी में रखने को कहा| अपनी मम्मी का प्यार देख नेहा अपनी मम्मी की गोदी में सर रख कर लेट गई|

चाहे आप कितना डर हुए हो, चिंतित हो मगर माँ की गोदी में सर रखते ही मन एकदम से शांत हो जाता है और यही उस वक़्त हुआ| अपनी मम्मी की गोदी में सर रख कर लेटने से नेहा का डर कुछ पल के लिए फुर्र हो चूका था और अब जा कर नेहा के चेहरे पर जानी-पहचानी मुस्कान तैरने लगी थी|

"बेटा, तुझे एक बात बताऊँ?!" संगीता बड़े प्यार से नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए बोली तथ नेहा ने अपना सर हाँ में हिला दिया| "जब मेरी शादी हुई थी न उस रात मुझे तेरे पापा (चन्दर) के हाथों बहुत बड़ा धोका मिला था| उस रात मुझे पता चला था की तेरे पापा मुझसे नहीं किसी और से प्यार से करते हैं!" संगीता ने आज इतने सालों बाद चन्दर के साथ हुई शादी का ज़िक्र अपनी बड़ी बेटी से किया था| संगीता अपनी बेटी को अपने साथ हुए उस छल से रूबरू करवाना चाहती थी मगर उसे ये भी ध्यान रखना था की वो एक माँ-बेटी के पाक रिश्ते को कुछ गंदे शब्दों का इस्तेमाल कर गंदा न कर दे इसलिए संगीता जितना हो सके उठा शब्दों को तोड़-मोड़ कर कह रही थी|

खैर, जैसे ही संगीता ने अपनी बातों में 'तेरे पापा' शब्द कहा नेहा फौरन समझ गई की यहाँ चन्दर की बात हो रही है क्योंकि अब नेहा मुझे अपना पापा मानती ही नहीं थी!

"उस रात...उस पल मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने तेरे पापा को खुद से छूने को रोकना चाहा मगर मुझ में तेरी तरह हिम्मत नहीं थी| मैं बहुत कमजोर थी...लाचार थी और उन परिस्थितियों से लड़ने के लिए अक्षम थी! तेरे पापा ने उस रात मेरे साथ जबरदस्ती की और मेरी ज़िन्दगी हमेशा-हमेशा के लिए बर्बाद कर दी!

मैं उस रात एक पल के लिए नहीं सोई क्योंकि मैं अपने आने वाले समय के लिए चिंतित थी| उस घर में कोई नहीं था मेरी मदद करने के लिए, मेरा दुःख बाँटने के लिए...मुझे सँभालने के लिए! अगली सुबह मैंने तेरी बड़ी दादी जी (बड़की अम्मा) से सब सच कहा मगर उन्होंने भी मेरा साथ नहीं दिया, उन्होंने मुझे सब भूल जाने और शादी को निभाने को कहा!" संगीता ने बहुत कम शब्दों में नेहा को अपनी सुहागरात में हुए धोके तथा अपनी दशा के बारे में समझा दिया था| नेहा भी कोई छोटी बच्ची नहीं थी जो कम शब्दों में कही अपनी मम्मी की बातें न समझे, तभी तो नेहा ने अपनी मम्मी से ज्यादा सवाल-जवाब नहीं किया| नेहा ने बड़े गौर से अपनी मम्मी की बात सुनी तथा अपनी मम्मी के दुःख को महसूस करने लगी| उस पल को याद करते हुए संगीता बहुत भावुक हो गई थी इसलिए अपनी मम्मी को सहारा देने के लिए नेहा उठ बैठी और अपनी मम्मी के गले लग अपनी मम्मी को सांत्वना देने लगी| उस पल संगीता ने अपनी बेटी के प्यार को पहलीबार महसूस किया था| अब देखा जाए तो दोनों माँ-बेटी स्त्री थीं और आज एक दूसरे का दुःख महसूस कर पा रहीं थीं!

"लाचारी क्या होती है...मजबूरी क्या होती है ये मैंने उस दिन सीखा था! लेकिन तुझे पता है मैं ये सब कैसे सहती रही?... वो थे स्तुति के पापा जी (मैं)! उन्हें मैंने जब पहलीबार देखा था तो वो लगभग स्तुति के उम्र के थे और इतने प्यारे थे...इतने गोलू-मोलू थे की क्या बताऊँ! तूने आयुष को छुटपन में देखा था न, वो हूबहू अपने पापा जी (मेरे) जैसा दिखता था| तभी तो मैं हमेशा उसके गाल चूमते नहीं थकती थी और तू कहती थी की मम्मी आप आयुष का गाल खा जाओगे क्या?!" संगीता ने मुझे 'स्तुति के पापा' के नाम से इसलिए सम्बोधित किया क्योंकि यहाँ मेरे और चन्दर के बीच तुलना हो रही थी| कुदरती रूप (biologically) से तो चन्दर ही नेहा का असली पिता था और मैं आयुष तथा स्तुति का पिता था| खैर, जो कुछ पल पहले दोनों माँ-बेटी मायूस हो गई थीं वो अब आयुष के छुटपन को याद कर मुस्कुराने लगीं थीं|

"स्तुति के पापा जी, की उस मासूमियत ने मुझे मेरे डर से लड़ने की हिम्मत दी और मैंने फिर कभी तेरे पापा (चन्दर) को खुद को छूने नहीं दिया| उसने (चन्दर ने) मेरे साथ कई बार जबरदस्ती करने की कोशिश की मगर मैंने हार नहीं मानी और लड़ती रही| कभी दरवाजा बंद कर खुद को बचाती तो कभी उससे जुबान लड़ा कर बहस कर बच निकलती| धीरे-धीरे स्तुति के पापा जी के कारण मुझ में इतनी हिम्मत आ गई की मैं निडर हो कर तेरे पापा से लड़ने लगी थी|

उसी तरह तू...मेरी लाडो भी बहुत हिम्मतवाली है| तुझे भी परिस्थितियों से लड़ना आता है और मुझे फक्र है मेरी बेटी पर की वो किसी के आगे नहीं झुकती| बेटा, जब कभी भी तुझे डर लगे तो याद रखना की तेरी मम्मी (संगीता) ने कभी हार नहीं मानी और तू मेरी बेटी है इसलिए तू कभी हार नहीं मान सकती!" संगीता ने अपने साथ हुए अन्याय का उदहारण देते हुए नेहा के भीतर थोड़ी सी हिम्मत फूँक दी थी|

संगीता की दी हुई इस हिम्मत का असर नेहा पर दिखने लगा; "मम्मी...मुझे माफ़ कर दो! मैंने आपका विश्वास तोडा, आपको धोका दिया, आपसे कितनी बार झूठ बोला!" नेहा ने रोते हुए सच्चे दिल से अपनी मम्मी से माफ़ी माँगी| "मैं अपने स्कूल के गलत दोस्तों की संगत में पड़, उनके दिखाए आज़ादी के झूठे सपनों की दुनिया में इस कदर खो गई थी की मैं आपके दिए संस्कारों को भूल गई थी! मुझे अपनी आज़ादी चाहिए थी मगर इस आज़ादी की मुझे इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी ये मुझे नहीं पता था!

कल मैं आपसे प्रोजेक्ट बनाने का बहाना बना कर रेखा के घर न जा कर पिंकी के घर गई थी| कल अरमान की जन्मदिन की पार्टी थी और उसने मुझे ख़ास इन्वाइट (invite) किया था| चूँकि पिंकी अरमान के घर के पास रहती थी इसलिए पार्टी के बाद मैं आराम से उसके घर रूक सकती थी| अरमान की पार्टी में शुरू-शुरू में सब कुछ ठीक था| लेकिन फिर थोड़ी देर बाद अरमान ने मेरे साथ बदतमीज़ी करनी शुरू कर दी! मुझे गलत तरीके से छूने की कोशिश करने लगा मगर मैंने उसे खुद को छूने नहीं दिया! फिर वो मुझे अपना घर दिखने के बहाने ऊपर अपने कमरे में ले आया और वहाँ मुझे अकेला समझ कर उसने मुझे जबरदस्ती kiss करना चाहा! जब मैंने इसका विरोध किया तो उसने मेरे साथ जबरदस्ती शुरू कर दी मगर मैंने भी हार नहीं मानी और उसे जोर का धक्का दे उसके गाल पर जोरदार थप्पड़ मारकर मैं वहाँ से भाग निकली!

भागते-भागते मैं पिंकी के घर पहुँची और तब मुझे एहसास हुआ की मैं इस समय अकेली पिंकी के घर पर हूँ| यदि अरमान अपने दोस्तों के साथ घर में घुस आया और मेरे साथ कोई घिनौनी हरकत कर दी तो मैं क्या करुँगी? मेरे मन में उमड़े इस एक सवाल ने मुझे बहुत डराया| मुझे लगा की पिंकी मेरा साथ देगी क्योंकि मैं उसे अपना सच्चा दोस्त मानती थी मगर वो तो मुझे ही इस बात को दबाने तथा चुप रहने को कह रही थी ताकि कहीं उसकी मम्मी उसका घूमना-फिरना न बंद कर दे! उस वक़्त मुझे एहसास हो गया की मैंने पिंकी को अपना सबसे अच्छा दोस्त चुन कर अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती कर दी!" अपनी गलतियों को अपनाना आसान काम नहीं होता, अच्छे से अच्छा व्यक्ति अपनी गलतियों को याद कर टूट जाता है| कुछ वही हाल इस समय नेहा का था, अपना इक़बालिया जुर्म करते-करते नेहा फूट-फूट कर रोने लगी थी की तभी संगीता ने एक माँ का फ़र्ज़ निभाते हुए नेहा को सँभाला|

नेहा के नाज़ुक दिल को ये सोच कर थोड़ा सा चैन मिला था की उसने अपनी मम्मी से आज सम्पूर्ण सच कह दिया है मगर नेहा नहीं जानती थी की संगीता को इस घटना के बारे में पहले से ही सब कुछ पता है!

"बेटा, उस लड़के ने तेरे साथ कुछ गलत तो नहीं किया?" एक माँ को अपनी बेटी की इज्जत की चिंता थी इसलिए एक माँ का ये सवाल पूछना जायज था|

"नहीं मम्मी! मैंने अरमान को थप्पड़ मारा और मैं वहाँ से अपनी जान बचाने के लिए भाग निकली|" नेहा ने एकदम से जवाब दिया| नेहा की आँखों में सच्चाई थी और ये देख कर संगीता...एक माँ को इत्मीनान मिला था की उसकी बेटी का दामन पाक़-साफ़ है! संगीता ने गर्व से अपनी बेटी का मस्तक चूमा और उसे हिम्मत देते हुए बोली; "शाब्बाश मेरी बच्ची!" अपनी मम्मी से हिम्मत पा कर नेहा का नाज़ुक सा दिल खुश तो हुआ मगर उसके भीतर का डर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था| "वो (अरमान)...यहाँ...आया तो?" नेहा डरते हुए बोली| अरमान के हमारे घर में घुस आने की बात सोच कर ही नेहा डर से काँप गई थी और पुनः रोने लगी थी!

" तू इसकी बिलकुल चिंता मत कर बेटा! स्तुति के पापा और अनिल गए थे और सब बात सुलझा कर आये हैं|" संगीता ने नेहा को सांत्वना देते हुए कहा| चूँकि मैंने संगीता को पहले ही सख्त आदेश दे रखा था की वो मार-पीट की बात नेहा से छुपाये इसलिए संगीता ने गोल-मोल बात कर अपनी बेटी के बेचैन मन को शांत करने की कोशिश की थी|

अपनी मम्मी की बात सुन नेहा को एक ज़ोर का झटका लगा की उसकी मम्मी को पहले ही सब पता था फिर भी संगीता ने उसे कुछ नहीं कहा! इस झटके के फल स्वरूप एक बार फिर नेहा के मन में ग्लानि भरने लगी की उसने अपनी माँ के साथ हमेशा धोखा किया और वही माँ आज इस दुखद समय में अपनी बेटी के साथ खड़ी है| संगीता ने नेहा को दुबारा रोने नहीं दिया और उसके मस्तको को चूम नेहा के आँसूँ पोछ दिए|

इधर संगीता की कही इस बात ने नेहा के मन में दो ऐसे सवाल पैदा किये जिन्होंने नेहा के मन में मेरे प्रति और खटास भर दी;

1. अगर मैं और अनिल सब बात सुलझा कर आएं है तो इसका मतलब है की मुझे सबसे पहले पता चल गया था की कल रात क्या घटित हुआ है लेकिन सब जानकार भी आखिर क्यों मैंने नेहा को एक शब्द नहीं कहा? चूँकि मैं जो नेहा को सबसे ज्यादा प्यार करता हूँ (था), उसका एक आँसूँ देख मेरा खून खौल उठता था...तो आखिर क्यों मैं नेहा को चुप कराने...उसे सँभालने अब तक आगे नहीं आया?

2. और ये 'बात सुलझाने' का मतलब कहीं बैठ कर बात करना तो नहीं? एक बाप जिसकी बेटी की इज्जत के ऊपर दाग लगने वाला था वो बाप बजाए उस लड़के और उसके बाप पर गुस्सा करने के 'बात सुलझा' कर आया है?!

इन सवालों ने नेहा के मन में मेरे प्रति गुस्सा भर दिया, नतीजन नेहा मुझसे नफरत करने लगी| मेरी बेटी जो की इतनी समझदार थी, शांत मन से बातों को समझती थी, उसे अब मुझ पर रत्ती भर भरोसा नहीं था! बिना पूरी बात जाने उसकी नज़र में मैं उसका गुनेहगार बन चूका था!

संगीता ने जब नेहा को शांत पाया तो उसे लगा यही सही समय है नेहा को उसकी गलती का एहसास दिला कर मुझसे माफ़ी माँगने के लिए कहने का; " बेटा, स्तुति के पापा जी ने तुझे पहले ही समझा दिया था न की ये प्यार-व्यार नहीं बल्कि एक आकर्षण है जो की तेरी उम्र के बच्चों को अपनी गिरफ्त में ले लेता है| अगर तू तब उनकी बात समझ जाती तो आज तू इस कदर दुखी और परेशान न होती| खैर, अब भी वक़्त नहीं गुज़रा, अभी जब स्तुति के पापा जी मंदिर से लौटेंगे न तब तू उनके पॉंव छू कर माफ़ी माँग लियो| मुझे यक़ीन है की वो तुझे माफ़ कर देंगे और गले लगा कर पहले की तरह लाड-प्यार करेंगे|" नेहा को अपनी मम्मी की कही ये बात सुन कर कोफ़्त हो रही थी क्योंकि उसके अनुसार मुझे पहल करते हुए नेहा को सँभालने सबसे पहले आना चाहिए था न की नेहा को मुझसे माफ़ी माँगने आना चाहिए था|

उस पल तो नेहा कुछ न बोली क्योंकि इस समय एक बस संगीता थी जो उससे हमदर्दी रखती थी| अगर नेहा मेरे प्रति अपने मन की भड़ास अपनी मम्मी के सामने निकाल देती तो संगीता गुस्सा हो जाती तथा अपने गुस्से में नेहा से मुँह मोड़ लेती! नतीजन नेहा पूरी तरह से अकेली हो जाती और नेहा इस समय अकेला बिलकुल नहीं रहना चाहती थी!

संगीता खाना बनाने गई तो नेहा का बेचैन मन फिर एक बार मेरे खिलाफ सोचने लगा; "He (मैं) doesn't love me anymore! तभी तो मेरे साथ इतना सब कुछ हुआ लेकिन न तो 'पापा' मुझे लाड-प्यार करने आये और न ही उन्होंने उस अरमान को कुछ कहा! बल्कि वो तो दादी जी के साथ मंदिर चले गए ताकि उन्हें मेरा सामना ही न करना पड़े| वाह पापा वाह! आपने तो मुझे बिलकुल ही पराया कर दिया!" नेहा के मन में बैठी हुई नफरत बोली| गौर करने वाली बात ये थी की नेहा ने आज जा कर मुझे 'पापा' कहा था, जबकि नेहा मुझे हमेशा 'पापा जी' कहती थी| ये दर्शाता था की ठोकर लगने के बाद नेहा को मेरी कितनी जर्रूरत थी की उसने मुझे अपना पापा तो माना मगर संगीता की बात सुन नेहा के मन में पैदा हुई नफरत ने नेहा को मुझे मान-सम्मान देते हुए 'अपाप जी' कह पुनः अपना पिता मानने से रोक रखा था!

कई बार इंसान अपनी गलती मान कर अपनी गलती दुरुस्त करने के बजाए अपना गुस्सा उस आदमी पर निकालता है जो उसके गलत करने पर उसके साथ नहीं था! यही हाल इस समय नेहा का था, बजाए ग्लानि महसूस करने के वो तो मुझे ही कसूरवार मान रही थी!

[color=rgb(97,]जारी रहेगा भाग - 15 में...[/color]
 
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