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Fantasy मोहिनी

“मैं हरि आनंद को चाहता हूँ, उसे मेरे हवाले कर दो। मैं फिर तुमसे कहता हूँ, बात अधिक न बढ़ाओ।”

“मैं उसे तेरे हवाले नहीं कर सकता। वह काली माई की शरण में है।”

“फिर तुम मुझे उसका पता बताओ, मैं स्वयं उससे मिल लूँगा।”

“मैं तुझे नरक का पता बता सकता हूँ पापी।” पुजारी ने कहा।

तुलसी आनंद के तेवर अचानक खराब हो गए। मोहिनी बाहर थी और मैं जानता था तुलसी आनंद की एक आवाज मेरी तिक्का-बोटी करा सकती थी। तुलसी आनंद केवल एक मंत्र में मुझे भस्म कर सकता था लेकिन वह किसी तंत्र-मंत्र के फेर में नहीं पड़ा। अब तुलसी आनंद किसी भी क्षण मेरे लिये खतरा बन सकता था। अचानक मुझे प्रेमलाल का ध्यान आया। मैंने दिल ही दिल में उनका नाम लेकर कहा–

“महाराज! इस समय मुझे आपकी महान शक्ति की अत्यधिक आवश्यकता है। तुलसी आनंद को काबू में करो। इससे कहो कि मुझे हरि आनंद का पता बता दे दे।”

उधर तुलसी आनंद क्रोध में पागल हो रहा था। उसकी लाल अंगार आँखों में मेरे लिये नफरत उमड़ रही थी। वह कुछ कहना चाहता था लेकिन न कह सका। अचानक उसके तेवर बदलने लगे। चेहरे पर उलझन के भाव पैदा हुए। उसने इस तरह बार-बार सिर झटका जैसे किसी बात से इनकार कर रहा हो। देर तक उसकी यही स्थिति रही। फिर वह बड़ी मद्धिम आवाज से रहस्यमय स्वर में बोला–

“तुमने मुझे विवश कर दिया है। आओ वह नीचे है। देवी के चरणों के नीचे तहखाने में। मेरे साथ आओ।”

एकाएक उसके इस तरह बदल जाने और नरम स्वर में बात करने पर मुझे आश्चर्य हुआ। मैं खामोशी से उसके साथ हो लिया। उसके चेहरे से मालूम होता था जैसे वह अनिच्छा से मेरे साथ चल रहा है। आँखें बोझिल, बोझिल कदम। धीरे-धीरे मालूम पड़ता जैसे वह सम्मोहन की सी स्थिति में है। उसके दिलो-दिमाग पर किसी और का राज है। यह रहस्यमय शक्ति निश्चय की प्रेमलाल की थी जो उसने मुझे माला के साथ दान की थी। अब मैं बरसों की कोशिश और कशमकश के बाद अपनी डॉली के हत्यारे के पास जा रहा था। मेरी क्या स्थिति होगी, कल्पना कीजिए। चेहरा सुर्ख हो गया था, बल्कि तमतमा रहा था। खून तेजी से रगों में दौड़ रहा था। हरि आनन्द का गन्दा अस्तित्व अब किसी भी क्षण मेरे हाथों से कुचला जाने वाला था।

रास्ते में मुझे बसन्ती दासी मिली। उसने तुलसी आनंद के साथ मुझे देखकर दाँतों में उंगली दबाई। मैं विजयदायी मुस्कान के साथ उसके बराबर से गुजर गया। तुलसी आनन्द मुझे मेहराबी दरवाजे के दूसरी ओर ले गया जहाँ काली की आदमकद मूर्ति खड़ी थी। मूर्ति के पुश्त में एक दरवाजा था। हम दोनों उस दरवाजे से अन्दर प्रविष्ट हो गए। यहाँ काली के अनेक रूपों की असंख्य छोटी-बड़ी मूर्तियाँ थीं जो कदाचित बेची जाती थी। तुलसी आनंद मूर्तियों के मध्य से गुजरता हुआ एक अलमारी के निकट रुका जो दीवार में धँसी थी। एक बार फिर तुलसी आनन्द कुछ संकुचित हुआ। धोती से चाबियों का गुच्छा निकाला। फिर उसने आलमारी का ताला खोलकर उसका एक पट अंदर धकेला तो मैं अचम्भित रह गया। बलखाती सीढ़ियाँ नीचे दूर तक चली गयी थीं। वह सीढ़ियाँ देखकर और अन्दर का निरीक्षण करते हुए मुझे यूँ आभास हुआ कि अगर मैं अंदर चला गया और तुलसी आनंद ने दरवाजा बंद कर दिया तो मैं वहाँ घुट-घुट मर जाऊँगा। हल्की रोशनी की किरणें नीचे से सीढ़ियों पर पड़ रही थी और पानी की शर-शर आवाज आ रही थी। तुलसी आनंद ने मुझे वहाँ तक पहुँचा कर उलझे हुए स्वर में कहा–

“हरि आनंद नीचे मौजूद है। परन्तु महाशय! इस पवित्र स्थान पर तुम कोई दंगा-फसाद नहीं करोगे, समझे ? देवी की शक्ति महान है, वह अपने पुजारियों को कष्ट देना सहन नहीं करेगी। जाओ, उसे यहाँ से निकाल कर ले जाओ।”

मैंने तुलसी आनंद के कटे वाक्य तौलने के लिये एक दृष्टि उसके सुते हुए चेहरे पर डाली। मुझे एहसास हो गया कि वह कोई शरारत नहीं करेगा। फिर मैं जीने से उतरने लगा। पीछे से दरवाजा बन्द होने की आवाज सुनाई दी तो मैं चौंका लेकिन कोई ध्यान दिये बिना आगे बढ़ गया। उस समय किसी चीज की परवाह किए बिना मैं आगे बढ़ता रहा। सीढ़ियाँ पार करके मैं नीचे पहुँचा तो वहाँ भी बहुत सी मूर्तियाँ पूजा-पाठ, तंत्र-मंत्र की सिद्धि का सामान, मुर्दों की खोपड़ियाँ और न जाने क्या-क्या अला-बला पड़ी थीं। परन्तु सम्पूर्ण वातावरण डरावना और रहस्यमय था।

परन्तु मैं तो न जाने किन-किन भयानक परिस्थितियों से गुजर चुका था। मेरे लिये वह चीजें भय का प्रतीक नहीं थी। कोई नया व्यक्ति होता तो सीढ़ियों पर ही उसके होश गायब हो गए होते। यहाँ दो बड़े कमरे थे। मैंने पहला कमरा देखा जो बिलकुल खाली था और वीरानी का दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। मैं दूसरे कमरे में प्रविष्ट हुआ तो आँखों में खून उतर आया। वहाँ हरि आनंद किसी जवान पुजारिन के साथ बातों में खोया था। दिल में तो आया कि अचानक उसके सिर पर चढ़ जाऊँ और नरखरा दबा दूँ या पीछे से छुरा घोंप दूँ। मगर मारने से पहले मैं उसे जलील करके दिल का गुब्बार निकालना चाहता था। मैं खामोशी से कमरे की एक दीवार से चिपक गया। मेरे सामने अनगिनत मूर्तियाँ थीं।

मैंने बड़े धैर्य से ठोस स्वर में कहा– “आखिरकार मैं आ ही गया।”

हरि आनंद यह सुनकर यूँ उछला जैसे किसी बिच्छु ने अन्धेरे में उसे डंक मार दिया हो। एक क्षण के लिये उसके चेहरे की रंगत जर्द पड़ गयी फिर संभलकर बोला– “कुँवर राज ठाकुर! त... तुम यहाँ ?”

“हाँ मैं! और गौर से देख लो, मेरे साथ मोहिनी भी नहीं है।”

“तुम क्या चाहते हो ?” उसने घबराहट में प्रश्न किया।

“खूब! तुम यह भी नहीं जानते भोले बादशाह। सुनो। मैं अपनी प्यारी मोहिनी को तुम्हारा खून पिलाना चाहता हूँ। उसे तुम्हारा खून पीने की बड़ी आरजू है।” मैंने व्यंग्य कसा।

“तुमने वचन भंग किया, मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ।”

“मैं तुमसे सफाई नहीं माँग रहा हूँ। डॉली मर चुकी है मगर उसकी आत्मा व्याकुल है। मैं उसे शांत करने के लिये यहाँ आया हूँ।”

“राज! मुझसे गलती हो गयी है। क्या तुम मुझे क्षमा नहीं कर सकते ? जो होना था, वह हो गया। मैं तुम्हारे बहुत काम आ सकता हूँ।”

“कमीने, बस कर!” मैंने अचानक गरजते हुए कहा। “अधिक बातें न बना। सावधान हो जा, आज तेरी मौत तेरे सिर पर खड़ी है। मैं तेरे खून से अपने हाथ रंगने आया हूँ। स्वयं को मेरे हवाले कर दे और मन्दिर से बाहर चल।”
 
हरि आनंद का चेहरा फक हो गया। उस पर मुर्दानी छाई हुई थी। मैं पहले दिल की भड़ास निकालना चाहता था। मैंने मुँह बनाकर कहा।

“बुजदिल, हरामजादे! तूने बड़ी कमीनगी का सबूत दिया है। अब सीधी तरह मेरे साथ चल।”

“मैं तुम्हारे साथ नहीं जा सकता। मैं देवी की शरण में हूँ।” हरि आनंद ने झिझकते-झिझकते कहा।

“तो फिर मुझे यही तेरा काम तमाम करना होगा।” मैं खतरनाक इरादे से आगे बढ़ने लगा।

हरि आनंद भयभीत अन्दाज में पीछे की तरफ खिसक रहा था। पुजारिन भी काँप रही थी। वह वहाँ से भाग गयी परन्तु इससे पहले कि मैं हरि आनंद के निकट पहुँचता तहखाने की दीवारों की तरफ से एक भर्राई हुई मधुर नारी की आवाज गूँजी–

“कुँवर राज ठाकुर, रुक जा! यह मेरा पवित्र स्थान है। यहाँ खून खराबा नहीं होता। मेरे सेवक तुलसी आनंद ने भी तुमसे यही कहा था। शायद तुम भूल गए।”

“देवी! देवी, अपने सेवक की रक्षा कर।।” हरि आनंद बड़ी मूर्ति के चरण पकड़कर गिड़गिड़ाया। फिर दंडवत करने लगा।

मैंने मूर्ति की तरफ दृष्टि उठायी। पत्थर की मूर्ति की आँखें खून उबलती नजर आयी। बिल्कुल जिन्दा इन्सान की तरह। अचानक घण्टियाँ बजने लगी। और ऐसा शोर हुआ कि मेरा सिर चकरा गया। मैं एक क्षण के लिये स्तब्ध रह गया। मैंने स्वयं पर काबू पाने की कोशिश की तो ऐसा लगा जैसे सारी मूर्तियाँ हरकत में आ गयी हों। जैसे वह सब एक साथ बोलने लगी हों। परन्तु मैंने सिर झटककर यह विचार मस्तिष्क से निकालने चाहे। मैं आगे बढ़ा। हरि आनंद पहलू बचाकर निकल गया। उसी समय वह आवाज पुन: गूँजी–

“प्रेमलाल ने जो शक्ति तुम्हें दान की है, वह उसने मेरी सेवा करने के बाद प्राप्त की है। पार्वती मेरा ही दूसरा रूप है, इस कारण मैं तुम्हें क्षमा करती हूँ। परन्तु तुम तुरन्त इस स्थान से चले जाओ। अगर तुम यहाँ से नहीं गए तो तुम्हें ऐसा कष्ट दूँगी कि सारा जीवन व्याकुल रहोगे। जाओ, इस पवित्र स्थान से निकल जाओ।”

उस रहस्यमय आवाज ने मुझे जकड़ सा लिया। आश्चर्यचकित होकर मैं मूर्तियों की तरफ देख रहा था। उनमें से एक बड़ी मूर्ति की आँखों में चमक नजर आ रही थी। उसकी पुतलियों में हरकत हुई और उसके होंठ हिलने लगे। मैंने आँखें मल कर दोबारा देखा। हरि आनंद अब मूर्ति के सामने हाथ बाँधे खड़ा था। उसके होंठ तेजी से हिल रहे थे। मैंने इस तिलस्म की कोई परवाह न की। डॉली के हत्यारे को इतनी सरलता से क्षमा नहीं किया जा सकता था। उसे इस आलम में देखकर मेरी इन्तकाम की आग और भी भड़क उठी।

मैंने गरजदार आवाज में कहा– “हरी आनंद, कोई अन्तिम इच्छा प्रकट करनी हो तो कर ले! आज तुझे मेरे हाथों से कोई शक्ति नहीं बचा सकती। मैं तेरा खून पिये बगैर यहाँ से नहीं जाऊँगा।”

मैंने सोचा मुझे अब देर नहीं करनी चाहिए। हरि आनंद किसी सूरत में दोबारा मेरे हाथ नहीं आयेगा। हालाँकि दिल यह चाहता था कि मैं बहादुर लोगों की तरह से पराजित करूँ। किन्तु वह घिघिया रहा था और मूर्ति के आगे याचना कर रहा था। इस बार उसके सीने पर चढ़ जाने के इरादे से मैं आगे बढ़ा तो वही मधुर आवाज थरथराती हुई कमरे में गूँजी।

“कुँवर राज! रुक जाओ, रुक जाओ। मेरी आज्ञा है, तुम जहाँ हो वहीं खड़े रहो।”

मैंने जिस जालिम इन्सान को इतने दिनों तक जिंदा रहने दिया हो। अब उसे इन आवाजों के फरेब में आकर कैसे छोड़ सकता था। जब डॉली का चेहरा मेरी कल्पना में उभरा और उसकी खून से सनी लाश याद आयी तो मैं और उत्तेजित हो गया। मैंने उस रहस्यमय आवाज की कोई परवाह नहीं की। हरी आनंद की हालत में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। मैं फिर आगे बढ़ा किन्तु उस समय घण्टों की रहस्यमय आवाजें तेज हो गयीं। इतनी तेज की साधारण आदमी चकरा कर ही गिर जाए। मैंने जमीन पर मजबूती से कदम जमाए और लपककर हरि आनंद पर टूट पड़ने का इरादा कर रहा था कि उसी क्षण कमरे में रोशनी हुई और एक तरफ आग के शोले लपकते नजर आए। कमरे की तमाम दीवारों पर आग की लपटें थीं। मैं विवशतावश बीच में खड़ा हो गया। आग के इन शोलों में कोई तुरन्त निर्णय लेना कठिन था। मुझे मालूम था कि बाहर से दरवाजा बन्द है। कोई और रास्ता भी नहीं तो यह षड्यंत्र था। यह विचार आते ही मैंने समझ लिया कि मेरा अन्तिम समय आ गया है। मैं फिर उनके चक्कर में आ गया हूँ और इस बार आजादी मुश्किल है। इसलिए कि मोहिनी भी मौजूद नहीं है। रही प्रेमलाल की शक्ति तो काली के मन्दिर में उसकी औकात ही क्या है। मैंने यह सोचकर हरि आनंद पर छलांग लगा दी कि मरने से पहले उसका काम तमाम कर जाऊँ। वह पहलू बचाकर कमरे में इधर-उधर भागने लगा। मैंने आग के शोलों की परवाह न करते हुए एक बार फिर हरी आनंद को पकड़ना चाहा। वह चूहे-बिल्ली का खेल खेल रहा था। उस वक्त मेरे हाथ में उसकी धोती आ गयी। मैंने धोती का सिरा पकड़कर उसे अपनी तरफ खींचा। वह फिर भागने लगा तो मैंने उसे आग की तरफ धकेल दिया। मेरे लिये आश्चर्य की बात यह थी कि वह आग में झुलसने की बजाय साफ निकल आया। उसे कोई अवसर दिए बिना मैंने फिर एक कोशिश की। वह एक बड़ी मूर्ति की पुश्त में छिपने लगा। वहाँ भी आग लगी हुई थी। मैंने मूर्ति की साइड से उसे पकड़ने का इरादा किया लेकिन काली की वह मूर्ति जो बायीं ओर एक चबूतरे पर स्थापित थी, तेजी से मेरे ऊपर आ गिरी। मैंने बचने की कोशिश की लेकिन बच न सका।

मुझे अपने कन्धे पर एक जबरदस्त चोट का अहसास हुआ। मेरी नजरों के सामने अन्धेरा फैल गया और मैं त्योराकर जमीन पर गिर पड़ा। मेरी चेतना लुप्त होने लगी और मैं डूबने लगा। मुझे महसूस हुआ जैसे मेरी आत्मा मेरे शरीर से जुदा होना चाहती है। परन्तु सख्त जान कुँवर राज यह वार भी सह गया। जब मेरी आँख खुली तो अपने-आपको मृगछाला के बिस्तर पर लेटा पाया। यह जानने के लिये कि मैं कहाँ हूँ। मैंने पहले तो अधखुले नेत्रों से देखा। जब वहाँ कोई नजर नहीं आया तो पूरे नेत्र खोल दिए। अब मैं अपने आपको एक कुटिया में देख रहा था। तुरंत ही यह बात मेरी समझ में नहीं आ सकती थी कि मैं कहाँ हूँ। अगर कोई बात समझ में आती थी तो यह कि मैं उस मंदिर के तहखाने में नहीं हूँ और दूसरी बात यह समझ में आती थी कि मैं जिंदा हूँ। लेकिन बेहोशी के बाद मेरे साथ क्या हालात पेश आये, यह मैं नहीं जानता था।
 
मैं उठकर खड़ा हो गया। कुटी का दरवाजा खुला था। मैंने सीधे बाहर का रूख लिया। देखकर बड़ी हैरत हुई कि यह बियावान जंगल है जहाँ यह कुटिया बनी है। कौन मुझे यहाँ ले आया ? कौन यहाँ रहता होगा ? ऐसे कई प्रश्न मेरे मस्तिष्क में कुलबुला रहे थे। आनंद मठ आस-पास कहीं भी नजर नहीं आया था। मैंने इन सब प्रश्नों का उत्तर जानने के लिये कल्पना के झरोखे से मोहिनी को देखा तो मोहिनी भी मेरे सिर पर नहीं थी। मोहिनी ने मुझसे वायदा किया था कि मठ के बाहर वह मेरा इन्तजार करेगी। मुझे उस पर क्रोध आ रहा था। मुझे इन परिस्थितियों में छोड़कर यह खुद कहाँ गायब हो गयी। यह जंगल मेरे लिये अनजान था। बिना रास्ता जाने मैं कहीं भी नहीं आ जा सकता था। मुझे रह-रहकर माला का ख्याल सता रहा था। दिन चढ़ आया था पर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता था कि मैं चन्द घण्टे ही बेहोश रहा हूँ या चौबीस घण्टे से ऊपर का वक्त बीत चुका है। अभी मैं इन प्रश्नों का जवाब खोज ही रहा था कि मुझे एक साधु नजर आया जो गेरुए वस्त्र पहने था और लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ कुटिया की तरफ आ रहा था। मैं विस्मय की हालत में उसे देखता रहा। उसके चेहरे पर एक तेज था और वह एक शांत झील की मानिंद दिखायी पड़ता था। जब वह निकट आ गया तो मैंने उसे दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

“तो होश आ गया बालक ?” उसने पूछा।

“मैं कहाँ हूँ महाराज और आप कौन हैं ?”

“चलो, अन्दर चलो! धीरज रखो, तुम अपनों के बीच हो! यहाँ तुम्हारा कोई दुश्मन नहीं।”

वह रहस्यमय साधु मुझे कुटी में ले गया। उसके अन्दर कोई ऐसी शक्ति अवश्य थी जिस कारण मैं उससे आँखें न मिला सकता था और उसकी बातों से मालूम पड़ता था कि वह मुझे अच्छी तरह जानता है।

“उन्होंने तुम्हें जंगल में फेंक दिया था।” साधु ने बताया। “और मुझे तुम्हारी सहायता के लिये आना पड़ा। बालक, तुम इस समय चारों तरफ से विपत्तियों से घिरे हो। मैं चाहता हूँ कि तुम कुछ दिन इसी कुटी में आराम करो। फिर जब हालात सुधर जाएँगे तो मैं स्वयं तुम्हें जाने की आज्ञा दे दूँगा।”

“लेकिन महाराज मेरी पत्नी... मेरी माला।”

“माला इस समय पुलिस स्टेशन में है।”

“पुलिस स्टेशन में ?” मैं चौंक पड़ा। “मैं समझा नहीं।”

“अभी तुम कुछ नहीं समझोगे बालक कि तुमने किन लोगों से टक्कर ली है। आनंद मठ वाले केवल पुजारी या तांत्रिक ही नहीं हैं। उनकी पहुँच बहुत ऊँची है। यह समुदाय हम साधु-सन्तों के नाम पर एक कलंक बनता जा रहा है। लेकिन वे रहस्यमय शक्तियों के स्वामी हैं और इन शक्तियों बलबुते पर वे इस देश को पतन की ओर ले जा रहे हैं।”

“मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ महाराज! आप क्या कहना चाहते हैं ?”

“तो सुनो। अब वह वक्त आ गया है जब तुम्हें सब समझना और सुनना चाहिए। तुम बहुत से काम बड़ी शीघ्रता से करते हो। अपनी भावनाओं पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं रहता। यह तुम्हारे लिये बड़ा हानिकारक है। उन लोगों ने तुम्हारा कच्चा-चिट्ठा पुलिस को दे दिया है। शायद इसलिए कि उन्हें मालूम हो गया है कि तुम जिन्दा बच निकलोगे। तुम्हारी मौत सामने साधु प्रेमलाल की शक्ति दोबारा दीवार बनकर खड़ी हो गयी थी। उनका विचार होगा कि जंगल के दरिन्दे तुम्हें चाट जाएँगे और अगर तुम वहाँ से भी बच निकले तो पुलिस तुम्हें फाँसी के फंदे तक पहुँचा देगी। तुम्हारे एक जुर्म का सबूत तो पुलिस के पास है ही। तुम कश्मीर पुलिस को धोखा देकर हवालात से भागे थे। उसके अलावा बहुत सी घटनाएँ ऐसी रही हैं जिनसे तुम्हारा सम्बन्ध रहा है और पुलिस के रिकार्ड में तुम्हारा नाम पहले भी कई जगह लिखा गया है। तुम्हारे बारे में पूछताछ करने के लिये पुलिस माला तक पहुँची है। परन्तु माला की तुम चिंता न करो। तुम्हारी मोहिनी उसके साथ है। मोहिनी न भी हो तो प्रेमलाल की शक्ति उसके साथ होगी। चूँकि वह दोनों शक्तियाँ कुछ समय के लिये तुम्हारी सहायता न कर पातीं इसलिए मुझे आना पड़ा।”

“और आप कौन हैं महाराज ?” मैंने असमंजस में पूछा।

“समय आते ही तुम्हें मालूम हो जाएगा कि मैं कौन हूँ। बड़े भाग्यशाली व्यक्ति हो जो कदम-कदम पर मौत से बचते आ रहे हो और यूँ न समझो कि तुम्हारा हिसाब साफ हो गया। वह बहुत लम्बा है बालक। तुम्हारी मंजिल, तुम्हारा उद्देश्य अभी बहुत दूर है और जब तुम्हारा उद्देश्य पूरा हो जायेगा तो कोई पर्त तुम्हारे सामने न होगी। तुम हर चीज देख सकोगे।”
 
मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि यह साधु मुझे क्या समझाना चाहता है। मेरा उद्देश्य कौन सा है और मेरी मंजिल कहाँ है ? मैं तो एक ऐसा आदमी बनकर रह गया कि जिसका न कोई उद्देश्य था, न कोई मंजिल। मैं सोचने लगा कहीं यह साधु भी कोई फरेबी तो नहीं। क्या मालूम मैं कसी नये जाल में फँस गया हूँ।

“मुझ पर संदेह न करो बालक ?” साधु ने मुस्कराते हुए कहा– “मैं तुम्हारा मित्र हूँ। तुम्हारे और भी बहुत से मित्र हैं जिन्हें तुमने अब तक न तो देखा है, न समझा है और शायद कभी देख भी न सको। देखो बालक, हम साधु-संतों को सांसारिक बातों से कोई मतलब नहीं होता किन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं कि इस संसार में क्या हो रहा है, यह भी न देख सकें। और यह भी नहीं कि हमारा कोई कर्तव्य नहीं होता। हम जंगलों में रहकर भी अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। उसी तरह जैसे जब जब पाप बढ़ता है तो ईश्वर ने इस धरती पर स्वयं अवतार लेते हैं और ऋषि-मुनियों ने उन पापियों के संहार में अपने वन छोड़ दिए। वे सांसारिक जीवन में उतर आए। उन्होंने राजपाठ संभाला। उन्होंने सेना की रचना की, व्यूह रचाये और शूरवीरों का मार्गदर्शन किया। यह इसलिए होता है बालक कि ईश्वर ने इस ऋषि का निर्माण किया और जब-जब ऋषि का निर्माण किया और जब-जब ऋषि का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है तो लोग ईश्वर को भूल जाते हैं। उन्हें पाप का ही मार्ग उत्तम दिखायी पड़ता है। जब हमें उन्हें यह याद दिलाने के लिये कि ईश्वर है, प्रकृति मरी नहीं, सभ्यता जीवित है, मर्यादाएँ नष्ट नहीं हुई, कर्मक्षेत्र में आना पड़ता है। इस तरह हम पृथ्वी पर ईश्वर के सम्मान की, ईश्वर के नियमों की रक्षा करते हैं और यह सब कुछ तब तक चलता रहेगा जब तक पृथ्वी पर प्रलय नहीं आयेगी।”

“आपके विचार बहुत ऊँचे हैं महाराज।”

“बालक, तुम्हें भी इतना ऊँचा जाना है। तुम्हारी लड़ाई उन लोगों से है जो ढोंगी हैं जिनके कारण हम साधुओं का अस्तित्व खतरे में पड़ता जा रहा है। वे लोग ऐसी शक्तियाँ एकत्रित करना चाहते हैं जिनसे जमीन थर्रा सकती है और वे कोढ़ की तरह फैलते ही जा रहे हैं। आनंद मठ ही ढोंगियों का एक सम्प्रदाय है। ऐसे और भी सम्प्रदाय हैं परन्तु यह मण्डल सबसे अधिक शक्तिशाली है जिसकी राजनीति तक में हस्तक्षेप है और यह दबदबा बढ़ता ही जा रहा है। बहुत से नेता अपनी मनोकामना सिद्धि के लिये इन तांत्रिकों की सहायता लेते हैं और देखा जाये तो आज हर नेता अन्धविश्वासी हो गया है। वह एक-दूसरे के अनिष्ट के लिये जाप करवाता है। राजनीति में तंत्र का हस्तक्षेप घोर पाप समझा जाता है। परन्तु सिद्धांत या मानवता की तो इन्होंने चिता ही जला दी है। जो लोग कहते हैं कि वह देश के नेता हैं, झूठे हैं और बिकाऊ लोग हैं। कोई कहता है कि उसके साथ किसी ब्रह्मचारी की योग विद्या है तो कोई किसी कपूर की गोद में बैठा है। मगर ये तांत्रिक, ये साधु-सन्त, ये योगी किसी न किसी रूप में पीठ पीछे बैठे हैं। घात लगाए, अपनी झूठी मर्यादा को बनाए रखने के लिये। ये लोग साधु-सन्तों के नाम पर एक कलंक हैं। तुम्हें इन्हीं लोगों से लड़ना है। यह लड़ाई लम्बी भी हो सकती है। एक अकेले हरि आनंद को मार डालने से तुम्हारा उद्देश्य हल नहीं हो जाता। इस देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक सैकड़ों हरि आनंद हैं।”

“लेकिन ऐसा क्यों ? मुझे ही यह सब क्यों करना होगा ? और मैं अकेला इतने बड़े समाज से कैसे लड़ सकूँगा ?”

“इस धरती पर कृष्ण भी अकेले थे। उन्होंने किस तरह यह लड़ाईयाँ लड़ीं ?”

“वे तो अवतार या फरिश्ते थे।”

“नहीं बालक, मनुष्य जब इस धरती पर जन्म लेता है तो वह सिर्फ मनुष्य होता है। उसके कर्म उसे फरिश्ता या ईश्वर का अवतार बनाते हैं। प्रत्येक मनुष्य स्वयं अपने में ईश्वर है। आत्मा ही परमात्मा है। आवश्यकता इस बात की होती है कि उसने किस उद्देश्य लिये अपने जीवन को समर्पित किया।”

“किन्तु मैंने तो बहुत से पाप किए और मैं स्वयं एक बड़ा अपराधी हूँ। मेरा जीवन उन लोगों की तरह तो हरगिज नहीं रहा।”

“तुमने वह कहावत तो सुनी होगी- लोहे को लोहा काटता है। जब तक मोहिनी तुम्हारे पास न थी, तुम एक सीधे-सादे आदमी थे। तब तक तुमने कोई अपराध नहीं किया था। कोई पाप नहीं किया था। जो कुछ तुमने बाद में किया, वह तुमने नहीं किया, उसकी जिम्मेदार मोहिनी है और मोहिनी ही ऐसी चीज है जो इन भेड़ियों से निपट सकती है। वह तुम्हें इस तरह खेल खिलाती रही कि तुम मजबूत से मजबूत बनते जाओ। एक कट्टर इंसान, एक निर्दयी, एक जालिम और जब तक तुम खुद यह सब नहीं बनते, आज के युग में उनका मुकाबला न कर पाते। समय के साथ-साथ हर चीज बदलती है बालक। यह मोहिनी का चुनाव था और उसने किसी गलत आदमी को हरगिज न चुना होगा।”

“और यह मोहिनी क्या चीज है महाराज ?”

“एक दिन तुम स्वयं समझ जाओगे और एक दिन तुम्हें मालूम हो जाएगा कि तुम कौन हो बालक। जब पार्वती ने काली का रूप धारण किया तो चारों तरफ हाहाकार मच गया। काली जिधर भी निकली खून की नदियाँ बह गयी और उस नरसंहार को रोकने के लिये स्वयं शिव को अपना आसन छोड़ना पड़ा। अन्यथा काली को कोई रोक न सकता था और यह तब तक न रूका जब तब कि काली का पैर शिव की छाती पर न पड़ा। काली एक रौद्र रूप है, काली की पूजा करने वाले काले जादूगर होते हैं। काली की शक्ति महान है। उसके पुजारियों से निपटना आसान काम नहीं है। लेकिन तुम्हें अपना सीना हर समय उसके लिये तैयार रखना है जहाँ तक मोहिनी की हद है। वहाँ तुम्हारा कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता और उसके बाद दूसरी अनेक रहस्यमय शक्तियाँ तुम्हारे साथ होंगी।”

“अगर यही मेरे जीवन का उद्देश्य है महाराज तो मैं अपना जीवन इसके प्रति समर्पित करता हूँ।”

“तो बालक तू यहाँ से कोलकाता नगरी से स्टेशन पर जाएगा। वहाँ से तुझे बनारस पहुँचना है। तुम्हारी माला वहीं तुम्हें मिल जाएगी। इसके बाद मोहिनी की बात मानना। तुम्हारा कुछ दिन के लिये कोलकाता से बाहर रहना आवश्यक है।” इतना कहकर साधु ने मरे मस्तक पर हाथ रखा और मुझे नींद सी आने लगी।

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जब मेरी आँख खुली तो मैं ट्रेन में यात्रा कर रहा था और प्रथम श्रेणी के एक केबिन की बर्थ पर लेटा हुआ था। मेरे लिये यह दूसरा आश्चर्य था। बनारस के रेलवे स्टेशन पर मुझे वह साधु फिर नजर आया जो मुझे प्रथम श्रेणी के वेटिंग रूम में ले गया। मैंने देखा वेटिंग रूम में माला मेरी प्रतीक्षा कर रही है। मैं दीवाना सा होकर माला से जा लिपटा। माला मेरे सीने से लगकर सिसकने लगी। फिर मुझे अचानक साधु महाराज का ध्यान आया। मैंने पलटकर देखा तो साधु महाराज वहाँ से गायब थे। माला को छोड़कर मैं वेटिंग रूम से बाहर आया परन्तु साधु कहीं नजर नहीं आया। वेटिंग रूम के दरवाजे पर एक चौकीदार स्टूल पर बैठा था।

“वह साधु महाराज कहाँ गए ?” मैंने उससे पूछा।

“कौन से साधु महाराज श्रीमान ?”

“वही, जो मेरे साथ आए थे।”

“आप तो अकेले ही थे श्रीमान। मैंने तो किसी साधु को नहीं देखा।”

मैं आश्चर्य से उसे घूरने लगा। मैंने उससे अधिक जिरह नहीं की और वापस माला के पास आ गया। माला अपनी दास्तान सुनाने लगी। पुलिस ने पुछताछ करने के बाद उसे छोड़ दिया था।

“लेकिन तुम बनारस कैसे आ गयी ?”

“मुझे खुद नहीं मालूम कि मैं यहाँ कैसे आ गयी।”

मैं उससे आगे कुछ पूछने ही वाला था कि मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी। उसके होंठों पर एक विलक्षण मुस्कराहट थी। उसने मेरे कान के समीप आकर सरगोशी की।

“माला को मैं यहाँ लायी हूँ राज।”

“और तुम मुझे छोड़कर कहाँ चली गयी थी ? मैंने दिल ही दिल में पूछा।”

“क्या साधु जगदेव ने तुम्हें कुछ नहीं बताया ?”

अब मैं निरुत्तर सा होकर रह गया। मोहिनी काफी थकी हुई जान पड़ती थी। उसने मुझसे कहा–

“यहाँ से हम लखनऊ जाएँगे। तुम्हें याद होगा लखनऊ में तुम्हारा परिवार रहा करता था, तुम्हारा घर था। तुम्हारे माता-पिता स्वर्गवासी हो गए पर वहाँ अब तुम्हारे चाचा रहते हैं। तुम्हारे चाचा दीनदयाल आजकल बड़े संकट में दिन गुजार रहे हैं। उनकी तीन लड़कियाँ हैं और शादी का बोझ तुम्हारे चाचा के सिर है। वहाँ जाकर उनकी सहायता करो। माला को बार-बार कहाँ-कहाँ अपने साथ ले जाते रहोगे।”

मुझे इस पर कोई हैरत नहीं हुई कि मोहिनी को यह सब कैसे मालूम। मोहिनी अब मेरे लिये नई नहीं थी और फिर मैं मोहिनी के कहने पर लखनऊ के लिये चल पड़ा।

लखनऊ मेरे लिये कोई नया शहर नहीं था। वह मेरा घर ही था। वहाँ चाचा का परिवार रह रहा था। उनकी तीन लड़कियाँ जवान हो रही थीं। बहुत देर तक तो वे लोग मुझे पहचान न पाए फिर जब पहचान गए तो खूब जोर-जोर से रोये। मैंने उन्हें तसल्ली दी। चाचा एक रिटायर्ड कर्मचारी थे। पेंशन पर पूरा परिवार चल रहा था। घर में दूसरा कोई कमाने वाला नहीं था। बड़े बुरे दिनों से गुजर रहे थे। ऊपर से जवान लड़कियों का बोझ सिर पर था।

माला परिवार में आकर बहुत खुश थी। तीनों लड़कियों के साथ घुल-मिल गयी थी। चाची उसकी बलाएँ लेती रहती थी। मेरे आते ही चाचा की आर्थिक स्थिति में तेजी से सुधार होने लगा। मुझे भला दौलत की क्या कमी थी। तीन महीने में ही बड़ी लड़की की शादी एक अच्छे घर में धूमधाम के साथ हो गयी। बाकी दो लड़कियों की मँगनी भी हो गयी। चाचा उनके हाथ पीले करके जल्दी से जल्दी कन्यादान के बोझ से हल्के हो जाना चाहते थे और बाकी दो लड़कियों की शादी भी चंद दिनों में हो गयी। छ: माह के भीतर ही उनका सारा बोझ उतर गया। घर की हालत भी पहले जैसी नहीं रही थी। वह पूरी तरह बदल गया था। और घर में आने के बाद मैं कुछ अर्से के लिये तो सब कुछ भूल सा गया था। मोहिनी कभी-कभी मेरे सिर से चली जाया करती थी और कभी-कभी तो दो-दो दिन तक गायब रहती थी। घर की हालत ठीक होते ही मैं फिर क्लबों में जाने लगा।

एक रात जबकि मैं सोता हुआ था मोहिनी सिर पर न थी। कदाचित कोई शिकार खेलने गयी थी। अचानक एक धमाका सा हुआ और मैं जाग गया। जागते ही मुझे अहसास हो गया कि मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी है। वह मेरे सिर पर खड़ी बेचैनी से चहलकदमी कर रही थी। उसकी दृष्टि दूर कहीं देख रही थी। न जाने कहाँ पर उसका चेहरा तमतमाया हुआ था।

“क्या बात है मोहिनी ?” मैंने उससे पूछा। “तुम कुछ परेशान लग रही हो ? तुमने मुझे जगाया है।”

“हाँ राज!” वह डूबती आवाज में बोली। “घर-गृहस्थी के चक्कर में न तुम्हें कुछ याद रहा और न ही मैंने तुम्हें छेड़ा। तुम मेरे आका मेरे महबूब हो। तुम क्या जानो कि मैं तुम्हें कितना चाहती हूँ। मैं तुम्हें मुसीबतों से दूर-दूर रखना चाहती थी। तुम्हारी हरी-भरी जिन्दगी देखकर मुझे कितनी खुशी होती थी। परन्तु मेरे मालिक अब ऐसा लगता है। हमारा साथ एक बार फिर छूटने वाला है।”

“क्या मतलब ? क्या कहना चाहती हो ?” मैं चौंककर उठ बैठा। माला मेरे बराबर में ही सो रही थी।

“राज, पासा फिर पलट गया है! हरि आनन्द ने काली के मन्दिर से बाहर आने की बजाय वहीं मण्डल में बैठकर मुझे प्राप्त करने का जाप शुरू कर दिया है। मठ के तमाम पुजारियों ने उसे इस बात के लिये मजबूर किया क्योंकि वे अच्छी तरह जान गए थे कि मेरे रहते वे तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। और अब वे तुमसे भयानक इन्तकाम लेना चाहते हैं।”

“नहीं मोहिनी, नहीं!” मैं बेचैन होकर बोला। “अब तुम्हारी जुदाई की कल्पना भी मेरे लिये असहनीय है। ऐसा नहीं हो सकता मोहिनी कि मैं भी घर-गृहस्थी के चक्कर में पड़कर सब भूला जा रहा था। तुमने उसकी खूब याद दिलायी।”

“सुनो राज, उसने यह जाप कल ही शुरू किया है! हमारे पास अभी काफी वक्त है। काली के मन्दिर में हरि आनन्द को छेड़ने का परिणाम तुम स्वयं देख चुके हो।” मोहिनी ने अपना होंठ चबाते हुए कहा। “अगर साधु जगदेव तुम्हारी सहायता के लिये तैयार हो जायें तो कुछ हो सकता है। लेकिन तुम उसे कहाँ तलाश करोगे ?”

और इससे पहले कि मैं मोहिनी को काई उत्तर देता माला ने सोते हुए बड़बड़ाना शुरू कर दिया।

“दूर रहो, दूर रहो! खबरदार मेरे करीब आने की कोशिश की तो। बाबा की आत्मा मेरी रक्षक है। तू भस्म हो जाएगा मूरख। मेरा कहा मान ले। दूर हट, बाबा महाराज...।
 
माला के चेहरे पर आतंक और भय के भाव गहरे होने लगे उसने सोते हुए कई बार बाबा, बाबा... महाराज, महाराज... चीखते हुए पुकारा। दूसरे ही क्षण उसके सिर के ऊपर हवा में लाल, पीले, नीले शोलों का टकराव शुरू हो गया और फिर माँस जलने की चिड़ांध उत्पन्न हुई तो शनै: शनै: उसकी निद्रा दूर होने लगी। शोलों के गायब होते ही माला रानी एक भयानक चीख के साथ जग गयी। उसकी गहरी सुर्ख आँखें उस स्थान को देख रही थीं जहाँ कुछ देर पहले शोले लपके थे। मोहिनी आश्चर्य भरी दृष्टि से माला को देखने लगी। मेरी स्थिति भी मोहिनी से कुछ अलग न थी यह भयानक दृश्य देखकर मेरे दिल की धड़कनें तेज होने लगीं। मोहिनी के वाक्य मेरे मस्तिष्क में अब भी उथल-पुथल मचाये हुए थे। माला भयभीत सी स्तब्धता की स्थिति में छत की तरफ देखती रही जैसे वहाँ उसे कुछ नजर आ रहा हो। फिर एकदम से मेरे सीने से यूँ चिपट गयी जैसे मेरा सीना बचाव का कोई बेहतरीन शरणस्थल हो।

मैंने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा। “तुम्हें क्या हो गया माला ? जरा आँखें खोलो, देखो तुम्हारे सामने मैं हूँ, तुम्हारा राज।”

“आ... आप!” वह मेरे सीने में समाती हुई गहरी साँस लेकर बोली। “ईश्वर ने मुझे आपसे दूर नहीं किया।”

“कैसी बातें कर रही हो तुम ? तुम इस समय बहुत भयभीत और आतंकित लग रही हो। सोते में तुम्हारी आवाज सुनकर मेरी आँख खुल गयी। न जाने तुम क्या कह रही हो। कदाचित तुमने कोई डरावना सपना देखा है।”

“सपना नहीं। वह सपना नहीं था, हकीकत थी।”

“कैसी हकीकत ? भूल जाओ कि तुमने क्या देखा है। सोने में अक्सर ऐसा हो जाता है।” मैंने अपने मन की हलचल को काबू में रखते हुए कहा।

“नहीं, नहीं!” माला ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें ऊपर उठाते हुए कहा। “अगर बाबा और महाराज ने मेरी सहायता न की होती तो आज माला रानी आप से हमेशा के लिये जुदा कर दी जाती।”

“फिर वही बातें।” मैंने सावधानी से उसका चेहरा उठाते हुए उसके आँसू पोंछकर कहा। “जब तक मैं जिन्दा हूँ तुम्हारी तरफ कोई दृष्टि उठाकर देखने का भी साहस नहीं कर सकता। तुम मेरी जिन्दगी हो। तुम्हारे बिना जिन्दगी की क्या औकात है।”

मेरी तसल्ली और प्यार भरी बातों ने किसी हद तक माला का भय दूर कर दिया। उसकी आँखों की वह सुर्खी भी छँट गयी थी जो जागते समय मौजूद थी। वह स्वयं पर काबू पा चुकी थी लेकिन मैं महसूस कर रहा था। कोई बात ऐसी अवश्य है जो उसे मानसिक तौर पर उलझाए हुए हैं। मेरी तरह मोहिनी भी उसे मायूसी और उदासी से देख रही थी। माल को मैंने खामोश कर दिया तो मोहिनी की तरफ प्रश्न भरी दृष्टि से देखा। वह पहले ही थकी हुई गुमसुम सी बैठी थी। मेरे मूक निवेदन पर उसने खामोशी तोड़ी और दिल पर नश्तर चलाने वाले स्वर में बोली–

“बहुत हिम्मत से सुनना राज! मैं नहीं चाहती थी कि इस अवसर पर तुम्हें और सदमों से दो-चार करूँ। मगर अब तुम्हारे लिये तमाम बातों का जानना जरूरी हो गया है।”

“कहो। तुम्हारी कमान में कौन सा तीर रह गया है। फेंक दो मेरी तरफ। मुझे बताओ कि मैं एक बेसहारा आदमी क्रोध प्रकट करने के सिवा और कर भी क्या सकता हूँ।”

“यह सब कुछ हरि आनन्द ने किया था।” मोहिनी ने धीमे स्वर में कहा।

हरि आनन्द का नाम सुनकर मेरे शरीर में आग सी लग गयी। “क्या वह कमीना डॉली की तरह माला को भी...।” इससे आगे मैं कुछ न कह सका।

“हाँ राज! अब वह तुम दोनों के लिये खतरनाक होता जा रहा है। वह अब बाहर आने के लिये बेताब है। उसे खत्म करना जरूरी है।”

“मुझे विवरण से बताओ मोहिनी ? क्या माला ने कोई सपना देखा था ? वह शोले कैसे थे जिन्हें हमने अपनी आँखों से देखा है ? उस कमीने को यह क्या सूझी आखिर, वह माला के पीछे क्यों पड़ गया ? मैंने एक साँस में बहुत से सवाल कर डाले।”

वह सपना नहीं सच्चाई थी। माला को भी इसका इल्म है। वह जानती है कि उस पर किसने वार किया था। हरि आनन्द माला को खत्म करके तुम्हारा मानसिक सन्तुलन छिन्न-भिन्न कर देना चाहता था। उसका ख्याल है कि जिस दिन माला खत्म होगी, उस दिन प्रेमलाल को दान की हुई शक्ति स्वयं ही समाप्त हो जाएगी। मुझे प्राप्त करने के लिये उसने जाप शुरू कर दिया है। जब मैं चली जाऊँगी और तुमसे प्रेमलाल की शक्ति छिन जाएगी तो तुम पर काबू पाने में उसे कोई कठिनाई नहीं होगी। उस पापी ने तुम्हें कष्ट देने के लिये सोते में अपने वीरों से खतरनाक हमला करने की कोशिश की थी। अगर प्रेमलाल और जगदेव ने ठीक समय पर उसकी पुकार न सुन ली होती और मैं यहाँ मौजूद न होती तो हरि आनन्द के वीर माला को मार डालते। जब मैंने देखा कि प्रेमलाल और जगदेव के वीर माला की सहायता के लिये आ गए है तो मैं खामोशी से यह लड़ाई देखती रही। अगर ऐसा न होता तो उन्हें खत्म करना मेरे लिये भी कठिन काम न था लेकिन मेरा समय पर उपस्थित रहना संयोग ही था।”
 
वह सपना नहीं सच्चाई थी। माला को भी इसका इल्म है। वह जानती है कि उस पर किसने वार किया था। हरि आनन्द माला को खत्म करके तुम्हारा मानसिक सन्तुलन छिन्न-भिन्न कर देना चाहता था। उसका ख्याल है कि जिस दिन माला खत्म होगी, उस दिन प्रेमलाल को दान की हुई शक्ति स्वयं ही समाप्त हो जाएगी। मुझे प्राप्त करने के लिये उसने जाप शुरू कर दिया है। जब मैं चली जाऊँगी और तुमसे प्रेमलाल की शक्ति छिन जाएगी तो तुम पर काबू पाने में उसे कोई कठिनाई नहीं होगी। उस पापी ने तुम्हें कष्ट देने के लिये सोते में अपने वीरों से खतरनाक हमला करने की कोशिश की थी। अगर प्रेमलाल और जगदेव ने ठीक समय पर उसकी पुकार न सुन ली होती और मैं यहाँ मौजूद न होती तो हरि आनन्द के वीर माला को मार डालते। जब मैंने देखा कि प्रेमलाल और जगदेव के वीर माला की सहायता के लिये आ गए है तो मैं खामोशी से यह लड़ाई देखती रही। अगर ऐसा न होता तो उन्हें खत्म करना मेरे लिये भी कठिन काम न था लेकिन मेरा समय पर उपस्थित रहना संयोग ही था।”

मोहिनी मुझे विवरण से बता रही थी और मेरा जिस्म इन्तकाम की आग से धधकने लगा था। मेरा शरीर काँपने लगा। माला ने अब मेरे शरीर का यह परिवर्तन महसूस किया तो वह मेरे सीने से हट गयी और कहने लगी।

“क्या मोहिनी आपके सिर पर मौजूद है ?”

“हाँ!” मैंने उत्तर दिया।

“आप उससे कुछ बातें कर रहे थे क्या ?”

“हाँ, वह मुझे विवरण से बता रही थी।”

“तो मेरे सामने बातें कीजिए मुझे सब मालूम हो चुका है।”

मैंने वह सब बातें माला को सुना डालीं, जो मोहिनी ने मुझे बताई थी।

“आप परेशान मत होओ। मैं जगदेव महाराज से विनती करूँगी कि वह आपकी सहायता करें। मुझे विश्वास है वह मेरी बात नहीं टालेंगे।” माला ने मुझे दिलासा देने की कोशिश की।

“ऐसा न हुआ माला तो मैं बर्बाद हो जाऊँगा। मोहिनी की जुदाई के बाद मेरा दूसरा बाजू भी कट जाएगा। मैं एक बार देख चुका हूँ कि मोहिनी की जुदाई की मुसीबतें मुझ पर टूटी थीं। यकीन करो माला, मैं बिल्कुल अपाहिज हो जाऊँगा। मोहिनी को प्राप्त करने के बाद हरि आनन्द मुझसे जबरदस्त इन्तकाम लेगा और वह मेरी हालत इतनी बदतर बना सकता है कि तुम कल्पना भी नहीं कर सकती। मोहिनी को किसी तरह हरि आनन्द के कब्जे में नहीं जाना चाहिए। अगर हम बाबा प्रेमलाल की शक्ति और जगदेव महाराज की सहायता के बावजूद मोहिनी को नहीं रोक सकते तो फिर हरि आनन्द के पास मोहिनी के जाते ही हम किस तरह उसका मुकाबला कर सकेंगे ? वह और ज्यादा शैतान और जालिम हो जाएगा माला। मोहिनी मेरा और तुम्हारा सहारा है। मैं उसे बचाने के लिये अपनी जान पर खेल जाऊँगा।”

“आप मेरा ख्याल किए बगैर हर बात आसानी से कह देते हैं। मेरा जीवन आपके दम से है। आप में मैं हूँ तो आप मुझमें हैं। हम दोनों साथ ही मरेंगे।” माला ने भावात्मक स्वर में कहा।

“मगर हमें मरना नहीं चाहिए। हमें जिन्दा रहने के लिये अपनी तमाम कोशिशें करनी चाहिए।”

“हम जिन्दा रहेंगे। मैं बाबा और जगदेव महाराज से विनती करूँगी।”

वह लम्हे बड़े दर्दनाक थे। मोहिनी खामोशी से मेरे सिर पर बैठी मेरी और माला की बातें सुन रही थी। माला बार-बार मेरे सीने से लगकर अश्क बहाने लगती थी। मेरा ज़हन गूँगा था। कुँवर राज ठाकुर एक बार फिर खतरों से घिर गया था। अचानक मैंने निर्णायक स्वर में कहा–

“मैं कल ही कलकत्ते जाना चाहता हूँ। इस बात का अब फैसला हो जाना चाहिए कि जीत किसकी होगी। मेरी या आनन्द मठ की। इसकी मुझे परवाह नहीं है। अब हम में से एक जिन्दा रहेगा। मुझे जिंदगी का बहुत कम यकीन है, लेकिन इस भय से घर में दुबके रहने से बेहतर मर जाना है।”

माला मेरे इस जज्बाती फैसले पर स्तब्ध रह गयी। वह हिचकिया लेकर रोने लगी। आनंद मठ के काली मंदिर में बैठ किसी पुजारी से निपटना मेरे लिये असम्भव था। माला ने मुझे समझाया कि यह एक बचकाना फैसला है। लेकिन मैं अपनी जिद्द पर अड़ा रहा।

मैंने कहा– “मैं मोहिनी को किसी हालत में उसके कब्जे में नहीं जाने दूँगा।”

आखिर इस जिद्द पर अड़े रहने के कारण माला ने विनती की कि वह भी मेरे साथ चलेगी अगर मौत ही लिखी है तो दोनों साथ-साथ मरेंगे।

“तुम्हारा घर में रहना जरूरी है। चाचा को अकेला नहीं छोड़ा जा सकता। उन्हें तुम्हारी आवश्यकता पड़ेगी। मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण उन बेचारों पर मुसीबत टूट पड़े।”

मैं नहीं चाहता था कि माला इस खतरे में मेरे साथ जाए और न ही माला मुझे अकेले जाने देना चाहती थी। मैं उसे समझाता रहा कि वह जिद्द छोड़ दे। वह मेरे व्यवहार पर रोती हुई बोली–

“अगर आपकी यही जिद्द है तो मैं आपके फैसले के आगे सिर झुकाती हूँ। लेकिन मेरी एक बात मान लीजिए।” माला ने हसरत भरे अंदाज में प्रार्थना की- “आप सिर्फ एक हफ्ते के लिये अपनी रवानगी का विचार त्याग दीजिए। उसके बाद मैं आपसे किसी बात के लिये नहीं कहूँगी।”
 
“माला, तुम एक हफ्ते के लिये कह रही हो। मुझे एक-एक क्षण भारी लग रहा है। मैं हरि आनंद को एक पल की भी मोहलत देने के लिये तैयार नहीं हूँ। जब तक मैं उसे खत्म नहीं करूँगा। यहाँ वापिस नहीं आऊँगा। डॉली की तड़पती आत्मा मुझे विवश कर रही है। तुम मेरे रास्ते में रूकावट न बनो।”

“मेरी खातिर सिर्फ एक हफ्ते के लिये।”

माला ने सिसकते हुए मुझसे विनती की तो मैं उसकी बात न काट सका। वह मेरी जिंदगी की रोशनी थी। मुझे उसकी हसरत भरी नजरों पर रहम आ गया और मैंने तड़पकर उसे अपने आगोश में ले लिया।

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कहने को तो वह बात कह दी गयी। परन्तु मुझे जब फुर्सत मिली तो मैं सुकून से हरि आनन्द के विरूद्ध किला तैयार करने की योजना बनाने लगा। मैं सोच रहा था कि जब मैं मन्दिर में दाखिल होने जाऊँगा तो वहाँ मेरा उसी तरह स्वागत होगा जैसे पहले हुआ था। मोहिनी मेरे साथ तब अन्दर नहीं जा सकी थी। प्रेमलाल की शक्ति सिर्फ मेरे काम आ सकी कि मैं वहाँ से जिंदा बच निकलने में सफल हो गया। फिर कहीं ऐसा तो नहीं मैं आग के दरिया में जा रहा हूँ। अपने दीवानेपन में स्वयं अपनी मौत का सबब बन रहा हूँ। किन्तु अगर मैं यह असाधारण घटनाओं की प्रतीक्षा करता रहा तो दिन गुजरते जायेंगे और हरी आनन्द को खत्म करना मेरे लिये और भी असम्भव हो जाएगा। मुझे हर सूरत में कलकत्ते जाना होगा और एक बार फिर कोशिश करनी होगी। मुझे साधु जगदेव की बातें भी याद आ गयीं। मुझे कोई खतरा पेश आया तो वे मेरी सहायता अवश्य करेंगे। यह सोचकर कुछ हिम्मत बँधी और मैंने तय किया कि तमाम रूकावटों के बावजूद वहाँ जाऊँगा।

आखिर वह दिन आ गया जब मुझे कोलकाता के लिये रवाना होना था। हालाँकि मोहिनी मुझे बार-बार यहाँ जाने से रोकती रही थी। वह यही कहती रही कि मैं इन्तजार करूँ लेकिन मैंने उसे दुत्कार दिया क्योंकि वह इस मामले में मेरी कोई सहायता नहीं कर सकती थी। मोहिनी अक्सर मेरे सिर से उतर जाती और न जाने कहाँ चली जाया करती थी। मैं उससे कुछ पूछता तो वह गोल-मोल उत्तर दिया करती। किन्तु फिर वह दिन आया जब मुझे कलकत्ते के लिये रवाना होना था। सात रोज हो गए थे। सातवें रोज मैंने सुबह उठकर देखा तो माला एक कोने में मृगछाला पर बैठी मुँह ही मुँह में न जाने क्या पढ़ रही है। मुझे उसकी मासूमियत पर तरस आ गया। वह इतनी खूबसूरत लग रही थी कि मैं उसे देर तक देखता रहा। मैंने स्वयं से कहा–

“कुँवर राज ठाकुर! माला रानी को खूब जी भर कर देख लो। किस्मत का पासा फिर तुम्हारे विरूद्ध पड़ा है। न जाने उसे फिर दोबारा देखना नसीब हो या न हो।”

माला ने अपना जाप खत्म करके नजरें उठायीं। वह मृगछाला से उठकर मेरे निकट आयी और उसने बड़े प्यार भरे अन्दाज में मेरे गले में बाहें डाल दीं। उसने एक बार फिर दबे-दबे शब्दों में मुझे रोकना चाहा परन्तु अधिक विनती के लिये अब उसमें साहस नहीं था। मैं उसकी भीतरी कैफियत से वाकिफ था। उस का दिल रो रहा था। मगर होंठों पर मुस्कराहट थी। मैंने उसे समझाया तो उससे जब्त न हुआ। रो पड़ी। मेरे लिये दुआयें माँगने लगी। मुझ सफलता का यकीन दिलाती। मैं उससे जुदा होकर चाचा-चाची के पास गया। अपनी रवानगी के सम्बन्ध में उनका आश्चर्य बड़ी मुश्किल से दूर किया। चाचा से आज्ञा लेकर मैं बारी-बारी उन सब लोगों से मिला जो उस परिवार से जुड़े थे या जिनसे इस बीच मेरे गहरे सम्बन्ध हो गए थे। फिर माला के पास आया उसे चाचा-चाची का ख्याल रखने की ताकीद की। माला और सफरी सामान तैयार कर रही थी। माला से जुदाई के आखरी क्षण बहुत गमगीन थे। हम दोनों भावनाओं में बहते बातें करते, रोते-मुस्कराते रहे। फिर यह कहकर कि अगर हालात ने मुझे उड़ा दिया तो वह इसी चौखट पर जिन्दगी गुजारेगी। मैं उससे विदा हुआ।

माला ने रूँधी आवाज में कहा– “मैंने बाबा और जगदेव महाराज से प्रार्थना की है। मुझे विश्वास है कि वह आपकी सहायता करेंगे। बाबा ने अपने हाथ से मेरी माँग में सिंदूर भरा था। आप दिल छोटा क्यों करते हैं ?”

“नहीं, नहीं!” मैंने आँसू पोंछकर कहा। “माला, मुझे वचन दो कि मैं जब तक वापस न आऊँ तुम यहाँ का ख्याल रखोगी।”

“आपके चाचा मेरे पिता समान हैं। मैं वचन देती हूँ कि कोई मुसीबत आएगी तो पहले मुझ पर आएगी।”

मैंने इत्मीनान का साँस लिया। फिर माला से आज्ञा लेकर सामान उठाया और घर वालों से दोबारा मिलकर बाहर आ गया। मकान पर अन्तिम दृष्टि डाली और कदम आगे बढ़ाये। मैं जा रहा था लेकिन ऐसी मंजिल की तरफ जहाँ अंधेरा ही अंधेरा था। चलते समय कदम डगमगाये। उन लोगों को, अपने प्यारों को कहीं मैं आखरी बार तो नहीं देख रहा हूँ। मैं ठिठककर रुक गया। फिर कुछ सोचकर आगे बढ़ने लगा। मेरे पास और रास्ता भी क्या बचा था। कुछ नहीं। कुछ भी तो नहीं। मुझे डॉली और कुलवंत की बहुत याद आयी। कैसे-कैसे लोग बिछुड़ गए और कैसे-कैसे लोग अब बिछुड़ रहे हैं। माला की हसरत भरी नजरें अभी तक मेरे जिस्म से चुभी जा रही थी। दिल टुकड़े-टुकड़े हो रहा था। हरि आनन्द को यूँ छोड़ दिया जाता तो जिन्दगी की बाकी उम्मीदें भी घुट जाती। मैं अपने ख्यालों में इस कदर गुम था कि मुझे पता तक न चला कि कब स्टेशन आ गया। तांगे वाले ने मुझे सम्बोधित किया तो मैं चौंका। उसे किराया देकर मैं स्टेशन की सीमा में प्रविष्ट हो गया। गाड़ी की रवानगी से अभी बीस मीनट शेष थे। डिब्बे में मेरे सिवा कोई दूसरा यात्री नहीं था। डिब्बे में जाकर मैं सीट पर धड़ाम से गिर गया।

अचानक मुझे डिब्बे में किसी की उपस्थिति का आभास हुआ। यूँ जैसे कोई मुझे घूर रहा हो। मेरा अनुमान था कि वह कोई यात्री होगा। गाड़ी छुटने में मुश्किल से तीन मिनट रह गये थे। आने वाला टकटकी लगाए मुझे घूरने लगा। इससे मुझे सन्देह हुआ। मैंने ध्यान हटाना चाहा, लेकिन दूसरे ही क्षण वह व्यंग्यात्मक स्वर में बोला–

“लखनऊ से बड़ी जल्दी दिल उचाट हो गया है तुम्हारा ?”

“कौन हो तुम ?” मैंने डपटकर पूछा। “मैं तुम्हें नहीं जानता।”

“परन्तु मैं तुम्हें खूब जानता हूँ कुँवर राज ठाकुर। तुम्हारी तलाश में मुझे कहाँ-कहाँ की खाक नहीं छाननी पड़ी। पहले कलकत्ते, फिर सुराग लगा कि तुम लखनऊ में हो। अब मैं यहाँ तक आ पहुँचा हूँ। क्या तुम इतनी जल्दी अपने पुराने दोस्त को भूल गए ?” फिर वह कठोर स्वर में बोला। “अपना सामान उठाओ और गाड़ी से नीचे उतर आओ। थाने चलकर तुमसे इत्मीनान से बातें होंगी।”

“देखो महाशय! अपना रास्ता लो। मुझे तंग न करो। अगर तुम्हें मेरी तलाश थी तो तुम यह भी अवश्य जानते होगे कि मैं कौन हूँ और क्या कर सकता हूँ ? मुक्ति चाहते हो तो दुम दबाकर यहाँ से भाग जाओ। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हें सारी जिन्दगी पछताना पड़े।”

“सो तो अब भी पछता रहा हूँ। एस०पी० से साधारण इंस्पेक्टर बन गया। लेकिन अब मैं इन्स्पेक्टर से फिर एस०पी० बनना चाहता हूँ। तुम्हारी शोहरत पहले से काफी बढ़ गयी है। मुम्बई, पूना, कोलकाता और न जाने कहाँ-कहाँ तुम एक रहस्यमय व्यक्ति के रूप में जाने जाते हो। पुलिस रिकॉर्ड में तुम्हारे संबंध में बड़ी खतरनाक बातें लिखी हैं। क्या अब भी मुझे नहीं पहचाना। मैं एस०पी० मेहता, अब इन्स्पेक्टर मेहता हूँ।”
 
पल भर के लिये मैं स्तब्ध रह गया। अब मैं उसे पहचान रहा था। मोहिनी की मदद से कश्मीर में मैंने उसे चोट दी थी। परन्तु मेरे लिये हैरत की बात यह थी कि वह यहाँ कैसे आ गया ? क्या वह तभी से मेरी तलाश में भटक रहा है ? फिर जो कुछ हुआ वह मेरी कल्पना में भी न था। मैं मेहता से निपटने की सोच ही रहा था कि अचानक डिब्बे में शस्त्रधारी पुलिस का दस्ता घुस गया और मुझे जकड़ लिया गया। मुझे घसीटकर नीचे उतारा गया और धक्के मारकर स्टेशन से बाहर लाया गया। पुलिस की बन्द गाड़ी पहले से मौजूद थी। मेरी कोई सफाई कारगर नहीं हुई। मैंने अपना जुर्म पूछने की हिम्मत की तो उत्तर में मेरे गालों पर जोरदार तमाचे पड़ने लगे। फिर मुझे किसी जानवर की तरह गाड़ी के पिछले हिस्से में ठूँस दिया गया। चार शस्त्रधारी सिपाही मेरे साथ अन्दर आये। दरवाजा बन्द होते ही हिस्सा अन्धेरे में डूब गया। अब तक मेरा ख्याल था कि काश्मीर वाले मामले में मोहिनी मेरे तमाम सबूत नष्ट कर चुकी है और बाकी कुलवंत की गवाही से साफ हो गया है। परन्तु मेहता का इस तरह प्रकट हो जाना मेरे लिये अचम्भा था और मैं यह सोच नहीं पा रहा था कि वर्तमान समय में मुझे कौन से अपराध में गिरफ्तार किया जा रहा है। दूसरी बात जो मेरी समझ में नहीं आ रही थी वह यह थी कि पिछले दो दिन से मोहिनी कहाँ गायब हो गयी है। इस समय मुझे उसकी बड़ी सख्त जरूरत थी। मुझे यूँ लग रहा था जैसे मैं किसी भयानक दलदल में फँसता जा रहा हूँ।

गाड़ी मुझे थाना कम्पाउण्ड में ले आयी जहाँ से मुझे सीधा हवालात में पहुँचा दिया गया। उसके बाद मेहता मेरे सामने आया। उसके साथ चन्द सिपाही थे।

“कहिए कुँवर साहब, अब आपके साथ क्या सलूक किया जाये ?”

“मेहता, तुम बहुत पछताओगे। जो कुछ तुम कर रहे हो, वह तुम्हारे लिये अच्छा नहीं होगा। आखिर तुमने कौन से जुर्म में मुझे गिरफ्तार किया है ?”

“कौन से जुर्म में ?” वह कहकहा मारकर हँस पड़ा। “कुँवर साहब, कौन सा जुर्म ऐसा है जो तुमने नहीं किया ? एक हो तो मैं तुम्हें गिनाऊँ भी। अब तुम मुझे बताओगे कि कुलवंत को तुमने कहाँ छिपा रखा है ?”

“कुलवंत ? कौन कुलवंत ?”

“बहुत खूब, बहुत खुब! हरामजादे, तुझे अभी पुलिस की भाषा का ज्ञान अच्छी तरह याद नहीं हुआ। पुलिस की मार के सामने शैतान भी पनाह माँग जाता है। तू किस खेत की मूली है। तू बताएगा कि कुलवंत कहाँ है। अगर तूने उसका भी क़त्ल कर दिया है तो तू अपना जुर्म इकबाल करेगा। मैं यूँ ही तेरी तलाश में नहीं भटक रहा हूँ।”

उसके बाद मेहता ने पुलिस की छठी डिग्री से मेरा स्वागत किया। मेरी मरम्मत इस कदर की गयी कि पहले कभी इतनी मार न पड़ी थी। मुझे इलेक्ट्रिक शॉक तक दिए गए। लात-घूँसों और राइफल के कुन्दों की मार तो अलग बात थी। निरन्तर चौबीस घन्टों तक मुझे टार्चर किया जाता रहा। मैं बेहोश होता तो फिर से होश में लाया जाता। तब भी मेरे मुँह से कुछ न निकला। परन्तु मेरी सारी शेखी, सारी अकड़ धूल में मिल गयी थी। अब मुझे यूँ लग रहा था जैसे मोहिनी भी मेरे बचाव के लिये नहीं आयेगी। यूँ लग रहा था जैसे प्रेमलाल या साधु जगदेव महाराज एक धोखा थे। उन्होंने माला को मुझ पर थोपने के लिये यह ढोंग रचा था। मुझे कोई शक्ति दान नहीं दी गयी। मेरे साथ छल किया गया। यह सोच-सोचकर माला भी मुझसे दूर होती जा रही थी। इस स्थिति में मैं किसी को भी खबर नहीं दे सकता था। मेरे पास ऐसा कोई जरिया भी नहीं था जो अपने चाचा को सूचना भेजता और वे मेरी जमानत या पैरवी का इन्तजाम करते।

मेरा जोड़-जोड़ दर्द कर रहा था। अब मेरा दिल कर रहा था कि पुलिस वालों के हाथों पिटने के बजाय दीवार से सिर टकरा-टकरा कर जान दे दूँ। मैं एक कुर्सी से बँधा था और मेहता अपने सिपाहियों के साथ अब भी मेरे सामने खड़ा था। शायद वह मुझसे कुछ उगलवाने के लिये कोई तरकीब सोच रहा था।

“इस हरामजादे को इतना मारो कि इसका दम निकल जाए।” अचानक मेहता ने कहा। “मुझे इसकी परवाह नहीं अगर मर भी जाए तो। लेकिन जब तक यह मुँह न खोले इसे तोड़ते रहो। इसकी हड्डियों का सूरमा बना दो।।”

ठीक उसी समय मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी। मोहिनी के आते ही मेरी आँखों की रोशनी लौटने लगी। मेरे टूटे हुए जिस्म में जान पड़ने लगी। मोहिनी बहुत उदास, खोयी-खोयी और बेचैन सी नजर आ रही थी।

मैंने दिल ही दिल में कहा– “अब क्यों आयी हो मोहिनी ? मुझे मरने क्यों नहीं देती। अगर तुम मेरे लिये कुछ कर सकती हो तो अपने नुकीले पंजों से मुझे मार डालो। मुझे मार डालो मोहिनी। मैं अब जिन्दा नहीं रहना चाहता।”

“राज!” वह तड़पते स्वर में बोली। “मेरे मालिक, मेरे आका। मैं यूँ ही तुमसे जुदा नहीं हो गयी थी। देखो मैं इन लोगों से सुलटती हूँ।”

मोहिनी फुर्ती के साथ मेरे सिर से उतरकर रेंग गयी।

“तुमने सुना नहीं। मैंने क्या हुक्म दिया।” मेहता ने सिपाहियों से कहा। उसी समय एक सिपाही ने दूसरे के कान में फुसफुसाकर कुछ कहा और वही हुआ जो मैं सोच रहा था। सिपाहियों ने मेहता की आज्ञा मानने से इनकार कर दिया।

“जनाब! अगर वह मर गया तो हम सब फाँसी पर लटक जायेंगे।”

एक सिपाही ने कहा– “हम इसे अब और अधिक नहीं मार सकते

।”
 
मेरा अनुमान था कि मेहता वही मूर्खता करेगा। उन पर गरजेगा और फिर वे लोग आपस में ही लड़ पड़ेंगे। परन्तु ऐसा नहीं हुआ। मेहता ने बड़ी सूझबूझ से काम लिया। पहले वाली गलती नहीं दोहरायी। मेरी तरफ व्यंग्य भरी मुस्कान से देखा और पाँव पटकता हुआ बाहर निकल गया। सिपाही भी मुझे अकेला छोड़ हवालात का दरवाजा बन्द करके चलते बने। अब मैं अकेला था और मोहिनी मेरे सिर पर लौट आयी थी।

“तुम्हें मेरी बेबसी अच्छी लगती होगी मोहिनी।”

“ऐसी बातें न करो राज। तुम नहीं जानते मैं कितनी उलझनों में फँस गयी हूँ। मैं तुम्हारी तरह अपनी इस जिन्दगी से अजीज आ गयी हूँ। क्यों मुझे इतनी शक्ति दी गयी कि मैं अनगिनत करिश्मे दिखा सकूँ और क्यों मेरी उस शक्ति पर हद लगा दी गयी कि मैं उनसे बाहर अपाहिज हो जाती हूँ। तुम्हें मैं सारी बातें समझा नहीं सकती राज परन्तु जो लोग तुम्हारे दुश्मन हैं, न जाने वह कब क्या-क्या काँटे बोते रहते हैं। मैं उन्हीं काँटों में तुम्हारे लिये रास्ता बनाने में व्यस्त रहती हूँ। मैंने तुमसे कहा था कि अभी घर से न निकलना। मैं तुम्हें कलकत्ते जाने से रोकती रही हूँ, तो मैं यूँ ही नहीं रोकती। कोई बात होती है तभी कुछ कहती हूँ। तुम अपनी ज़िद पर अड़े रहे। वे लोग सिर्फ़ आनंदमठ तक सीमित नहीं है। और वे ही क्यों, देश के सभी पाखंडी पापी तांत्रिक अब जान गए हैं कि तुम उनके लिये मुसीबत बन रहे हो। वे सब एक साथ हैं और मैं अकेली तुम्हारे साथ हूँ। मैं स्वयं इतने खतरों से घिर गयी हूँ कि कुछ नहीं बता सकती। लेकिन राज, जब तुम भी दिल तोड़ने वाली बात करने लगते हो तो मुझे बड़ी चोट पहुँचती है। हम अच्छे-बुरे दिनों में साथ रहे हैं इसलिए हमें एक-दूसरे को एक जिस्म, दो जान समझना चाहिए। मैं तुम्हारी आत्मा हूँ राज।”

“ओह मोहिनी!” मैंने पश्चाताप भरे स्वर में कहा। “मैं सचमुच पागल हो गया हूँ। न जाने तुम्हें क्या-क्या कह जाता हूँ। अच्छा, अब देर किस बात की। फौरन उस कमीने इंस्पेक्टर के सिर पर जाओ और मेरी रिहाई का प्रबंध करो।”

“अभी लो आका!”

मोहिनी मेरे सिर से उतर गयी। कुछ देर बाद जब वह वापस लौटी तो उसके चेहरे पर गहरी चिन्ता देखकर मैं चौंक पड़ा।

“क्या हुआ मोहिनी ?”

“वह तुम्हारे संबंध में लम्बी-चौड़ी रिपोर्ट लिख रहा है। उसे तुम्हारे विरुद्ध चन्द सबूत भी मिल गए हैं। हालाँकि वह तुम पर क़त्ल का जुर्म साबित नहीं कर सकता परंतु कुछ महीने की सजा अवश्य करा सकता है।”

“लेकिन तुमने क्या किया ?”

“उसने मेरी बात मानने से इनकार कर दिया है राज।”

“क्या मतलब ? यह तुम क्या कह रही हो ? यह कैसे हो सकता है ?”

“मुझे स्वयं आश्चर्य है राज कि वह मेरे प्रभाव में क्यों नहीं आया। अब मेरे शक में कोई गुंजाइश नहीं कि ज़रूर कोई बड़ी ताकत इसमें घुस गयी है।”

“क्या वह ताकत प्रेमलाल और जगदेव की ताकत से बड़ी है ?”

“छोटी-मोटी शक्तियाँ मेरा रास्ता नहीं रोक सकती; और न इन पंडित-पुजारियों, तांत्रिकों की मेरे सामने बिसात है। वह कोई बहुत बड़ी शक्ति हो सकती है। हो सकता है उन लोगों ने ऐसी किसी शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त कर लिया हो।”

“क्या तुम भी नहीं जानती कि वह कौन सी शक्ति है ?”

“नहीं राज! अभी मैं कुछ नहीं जान सकती।”

मैं फिर निढाल हो गया। मोहिनी मेरे सिर पर गुमसुम सी बैठी रही। अब क्या हो सकता था। जब मोहिनी मेरे लिये कुछ नहीं कर सकती। प्रेमलाल और साधु जगदेव की शक्तियाँ नकारा हो गईं या मेरे साथ उनकी शक्तियाँ थी ही नहीं। तो सिवाय इसके मैं क्या कर सकता था कि अपने-आपको परिस्थिति के धारे में छोड़ दूँ।

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