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“मैं हरि आनंद को चाहता हूँ, उसे मेरे हवाले कर दो। मैं फिर तुमसे कहता हूँ, बात अधिक न बढ़ाओ।”
“मैं उसे तेरे हवाले नहीं कर सकता। वह काली माई की शरण में है।”
“फिर तुम मुझे उसका पता बताओ, मैं स्वयं उससे मिल लूँगा।”
“मैं तुझे नरक का पता बता सकता हूँ पापी।” पुजारी ने कहा।
तुलसी आनंद के तेवर अचानक खराब हो गए। मोहिनी बाहर थी और मैं जानता था तुलसी आनंद की एक आवाज मेरी तिक्का-बोटी करा सकती थी। तुलसी आनंद केवल एक मंत्र में मुझे भस्म कर सकता था लेकिन वह किसी तंत्र-मंत्र के फेर में नहीं पड़ा। अब तुलसी आनंद किसी भी क्षण मेरे लिये खतरा बन सकता था। अचानक मुझे प्रेमलाल का ध्यान आया। मैंने दिल ही दिल में उनका नाम लेकर कहा–
“महाराज! इस समय मुझे आपकी महान शक्ति की अत्यधिक आवश्यकता है। तुलसी आनंद को काबू में करो। इससे कहो कि मुझे हरि आनंद का पता बता दे दे।”
उधर तुलसी आनंद क्रोध में पागल हो रहा था। उसकी लाल अंगार आँखों में मेरे लिये नफरत उमड़ रही थी। वह कुछ कहना चाहता था लेकिन न कह सका। अचानक उसके तेवर बदलने लगे। चेहरे पर उलझन के भाव पैदा हुए। उसने इस तरह बार-बार सिर झटका जैसे किसी बात से इनकार कर रहा हो। देर तक उसकी यही स्थिति रही। फिर वह बड़ी मद्धिम आवाज से रहस्यमय स्वर में बोला–
“तुमने मुझे विवश कर दिया है। आओ वह नीचे है। देवी के चरणों के नीचे तहखाने में। मेरे साथ आओ।”
एकाएक उसके इस तरह बदल जाने और नरम स्वर में बात करने पर मुझे आश्चर्य हुआ। मैं खामोशी से उसके साथ हो लिया। उसके चेहरे से मालूम होता था जैसे वह अनिच्छा से मेरे साथ चल रहा है। आँखें बोझिल, बोझिल कदम। धीरे-धीरे मालूम पड़ता जैसे वह सम्मोहन की सी स्थिति में है। उसके दिलो-दिमाग पर किसी और का राज है। यह रहस्यमय शक्ति निश्चय की प्रेमलाल की थी जो उसने मुझे माला के साथ दान की थी। अब मैं बरसों की कोशिश और कशमकश के बाद अपनी डॉली के हत्यारे के पास जा रहा था। मेरी क्या स्थिति होगी, कल्पना कीजिए। चेहरा सुर्ख हो गया था, बल्कि तमतमा रहा था। खून तेजी से रगों में दौड़ रहा था। हरि आनन्द का गन्दा अस्तित्व अब किसी भी क्षण मेरे हाथों से कुचला जाने वाला था।
रास्ते में मुझे बसन्ती दासी मिली। उसने तुलसी आनंद के साथ मुझे देखकर दाँतों में उंगली दबाई। मैं विजयदायी मुस्कान के साथ उसके बराबर से गुजर गया। तुलसी आनन्द मुझे मेहराबी दरवाजे के दूसरी ओर ले गया जहाँ काली की आदमकद मूर्ति खड़ी थी। मूर्ति के पुश्त में एक दरवाजा था। हम दोनों उस दरवाजे से अन्दर प्रविष्ट हो गए। यहाँ काली के अनेक रूपों की असंख्य छोटी-बड़ी मूर्तियाँ थीं जो कदाचित बेची जाती थी। तुलसी आनंद मूर्तियों के मध्य से गुजरता हुआ एक अलमारी के निकट रुका जो दीवार में धँसी थी। एक बार फिर तुलसी आनन्द कुछ संकुचित हुआ। धोती से चाबियों का गुच्छा निकाला। फिर उसने आलमारी का ताला खोलकर उसका एक पट अंदर धकेला तो मैं अचम्भित रह गया। बलखाती सीढ़ियाँ नीचे दूर तक चली गयी थीं। वह सीढ़ियाँ देखकर और अन्दर का निरीक्षण करते हुए मुझे यूँ आभास हुआ कि अगर मैं अंदर चला गया और तुलसी आनंद ने दरवाजा बंद कर दिया तो मैं वहाँ घुट-घुट मर जाऊँगा। हल्की रोशनी की किरणें नीचे से सीढ़ियों पर पड़ रही थी और पानी की शर-शर आवाज आ रही थी। तुलसी आनंद ने मुझे वहाँ तक पहुँचा कर उलझे हुए स्वर में कहा–
“हरि आनंद नीचे मौजूद है। परन्तु महाशय! इस पवित्र स्थान पर तुम कोई दंगा-फसाद नहीं करोगे, समझे ? देवी की शक्ति महान है, वह अपने पुजारियों को कष्ट देना सहन नहीं करेगी। जाओ, उसे यहाँ से निकाल कर ले जाओ।”
मैंने तुलसी आनंद के कटे वाक्य तौलने के लिये एक दृष्टि उसके सुते हुए चेहरे पर डाली। मुझे एहसास हो गया कि वह कोई शरारत नहीं करेगा। फिर मैं जीने से उतरने लगा। पीछे से दरवाजा बन्द होने की आवाज सुनाई दी तो मैं चौंका लेकिन कोई ध्यान दिये बिना आगे बढ़ गया। उस समय किसी चीज की परवाह किए बिना मैं आगे बढ़ता रहा। सीढ़ियाँ पार करके मैं नीचे पहुँचा तो वहाँ भी बहुत सी मूर्तियाँ पूजा-पाठ, तंत्र-मंत्र की सिद्धि का सामान, मुर्दों की खोपड़ियाँ और न जाने क्या-क्या अला-बला पड़ी थीं। परन्तु सम्पूर्ण वातावरण डरावना और रहस्यमय था।
परन्तु मैं तो न जाने किन-किन भयानक परिस्थितियों से गुजर चुका था। मेरे लिये वह चीजें भय का प्रतीक नहीं थी। कोई नया व्यक्ति होता तो सीढ़ियों पर ही उसके होश गायब हो गए होते। यहाँ दो बड़े कमरे थे। मैंने पहला कमरा देखा जो बिलकुल खाली था और वीरानी का दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। मैं दूसरे कमरे में प्रविष्ट हुआ तो आँखों में खून उतर आया। वहाँ हरि आनंद किसी जवान पुजारिन के साथ बातों में खोया था। दिल में तो आया कि अचानक उसके सिर पर चढ़ जाऊँ और नरखरा दबा दूँ या पीछे से छुरा घोंप दूँ। मगर मारने से पहले मैं उसे जलील करके दिल का गुब्बार निकालना चाहता था। मैं खामोशी से कमरे की एक दीवार से चिपक गया। मेरे सामने अनगिनत मूर्तियाँ थीं।
मैंने बड़े धैर्य से ठोस स्वर में कहा– “आखिरकार मैं आ ही गया।”
हरि आनंद यह सुनकर यूँ उछला जैसे किसी बिच्छु ने अन्धेरे में उसे डंक मार दिया हो। एक क्षण के लिये उसके चेहरे की रंगत जर्द पड़ गयी फिर संभलकर बोला– “कुँवर राज ठाकुर! त... तुम यहाँ ?”
“हाँ मैं! और गौर से देख लो, मेरे साथ मोहिनी भी नहीं है।”
“तुम क्या चाहते हो ?” उसने घबराहट में प्रश्न किया।
“खूब! तुम यह भी नहीं जानते भोले बादशाह। सुनो। मैं अपनी प्यारी मोहिनी को तुम्हारा खून पिलाना चाहता हूँ। उसे तुम्हारा खून पीने की बड़ी आरजू है।” मैंने व्यंग्य कसा।
“तुमने वचन भंग किया, मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ।”
“मैं तुमसे सफाई नहीं माँग रहा हूँ। डॉली मर चुकी है मगर उसकी आत्मा व्याकुल है। मैं उसे शांत करने के लिये यहाँ आया हूँ।”
“राज! मुझसे गलती हो गयी है। क्या तुम मुझे क्षमा नहीं कर सकते ? जो होना था, वह हो गया। मैं तुम्हारे बहुत काम आ सकता हूँ।”
“कमीने, बस कर!” मैंने अचानक गरजते हुए कहा। “अधिक बातें न बना। सावधान हो जा, आज तेरी मौत तेरे सिर पर खड़ी है। मैं तेरे खून से अपने हाथ रंगने आया हूँ। स्वयं को मेरे हवाले कर दे और मन्दिर से बाहर चल।”
“मैं उसे तेरे हवाले नहीं कर सकता। वह काली माई की शरण में है।”
“फिर तुम मुझे उसका पता बताओ, मैं स्वयं उससे मिल लूँगा।”
“मैं तुझे नरक का पता बता सकता हूँ पापी।” पुजारी ने कहा।
तुलसी आनंद के तेवर अचानक खराब हो गए। मोहिनी बाहर थी और मैं जानता था तुलसी आनंद की एक आवाज मेरी तिक्का-बोटी करा सकती थी। तुलसी आनंद केवल एक मंत्र में मुझे भस्म कर सकता था लेकिन वह किसी तंत्र-मंत्र के फेर में नहीं पड़ा। अब तुलसी आनंद किसी भी क्षण मेरे लिये खतरा बन सकता था। अचानक मुझे प्रेमलाल का ध्यान आया। मैंने दिल ही दिल में उनका नाम लेकर कहा–
“महाराज! इस समय मुझे आपकी महान शक्ति की अत्यधिक आवश्यकता है। तुलसी आनंद को काबू में करो। इससे कहो कि मुझे हरि आनंद का पता बता दे दे।”
उधर तुलसी आनंद क्रोध में पागल हो रहा था। उसकी लाल अंगार आँखों में मेरे लिये नफरत उमड़ रही थी। वह कुछ कहना चाहता था लेकिन न कह सका। अचानक उसके तेवर बदलने लगे। चेहरे पर उलझन के भाव पैदा हुए। उसने इस तरह बार-बार सिर झटका जैसे किसी बात से इनकार कर रहा हो। देर तक उसकी यही स्थिति रही। फिर वह बड़ी मद्धिम आवाज से रहस्यमय स्वर में बोला–
“तुमने मुझे विवश कर दिया है। आओ वह नीचे है। देवी के चरणों के नीचे तहखाने में। मेरे साथ आओ।”
एकाएक उसके इस तरह बदल जाने और नरम स्वर में बात करने पर मुझे आश्चर्य हुआ। मैं खामोशी से उसके साथ हो लिया। उसके चेहरे से मालूम होता था जैसे वह अनिच्छा से मेरे साथ चल रहा है। आँखें बोझिल, बोझिल कदम। धीरे-धीरे मालूम पड़ता जैसे वह सम्मोहन की सी स्थिति में है। उसके दिलो-दिमाग पर किसी और का राज है। यह रहस्यमय शक्ति निश्चय की प्रेमलाल की थी जो उसने मुझे माला के साथ दान की थी। अब मैं बरसों की कोशिश और कशमकश के बाद अपनी डॉली के हत्यारे के पास जा रहा था। मेरी क्या स्थिति होगी, कल्पना कीजिए। चेहरा सुर्ख हो गया था, बल्कि तमतमा रहा था। खून तेजी से रगों में दौड़ रहा था। हरि आनन्द का गन्दा अस्तित्व अब किसी भी क्षण मेरे हाथों से कुचला जाने वाला था।
रास्ते में मुझे बसन्ती दासी मिली। उसने तुलसी आनंद के साथ मुझे देखकर दाँतों में उंगली दबाई। मैं विजयदायी मुस्कान के साथ उसके बराबर से गुजर गया। तुलसी आनन्द मुझे मेहराबी दरवाजे के दूसरी ओर ले गया जहाँ काली की आदमकद मूर्ति खड़ी थी। मूर्ति के पुश्त में एक दरवाजा था। हम दोनों उस दरवाजे से अन्दर प्रविष्ट हो गए। यहाँ काली के अनेक रूपों की असंख्य छोटी-बड़ी मूर्तियाँ थीं जो कदाचित बेची जाती थी। तुलसी आनंद मूर्तियों के मध्य से गुजरता हुआ एक अलमारी के निकट रुका जो दीवार में धँसी थी। एक बार फिर तुलसी आनन्द कुछ संकुचित हुआ। धोती से चाबियों का गुच्छा निकाला। फिर उसने आलमारी का ताला खोलकर उसका एक पट अंदर धकेला तो मैं अचम्भित रह गया। बलखाती सीढ़ियाँ नीचे दूर तक चली गयी थीं। वह सीढ़ियाँ देखकर और अन्दर का निरीक्षण करते हुए मुझे यूँ आभास हुआ कि अगर मैं अंदर चला गया और तुलसी आनंद ने दरवाजा बंद कर दिया तो मैं वहाँ घुट-घुट मर जाऊँगा। हल्की रोशनी की किरणें नीचे से सीढ़ियों पर पड़ रही थी और पानी की शर-शर आवाज आ रही थी। तुलसी आनंद ने मुझे वहाँ तक पहुँचा कर उलझे हुए स्वर में कहा–
“हरि आनंद नीचे मौजूद है। परन्तु महाशय! इस पवित्र स्थान पर तुम कोई दंगा-फसाद नहीं करोगे, समझे ? देवी की शक्ति महान है, वह अपने पुजारियों को कष्ट देना सहन नहीं करेगी। जाओ, उसे यहाँ से निकाल कर ले जाओ।”
मैंने तुलसी आनंद के कटे वाक्य तौलने के लिये एक दृष्टि उसके सुते हुए चेहरे पर डाली। मुझे एहसास हो गया कि वह कोई शरारत नहीं करेगा। फिर मैं जीने से उतरने लगा। पीछे से दरवाजा बन्द होने की आवाज सुनाई दी तो मैं चौंका लेकिन कोई ध्यान दिये बिना आगे बढ़ गया। उस समय किसी चीज की परवाह किए बिना मैं आगे बढ़ता रहा। सीढ़ियाँ पार करके मैं नीचे पहुँचा तो वहाँ भी बहुत सी मूर्तियाँ पूजा-पाठ, तंत्र-मंत्र की सिद्धि का सामान, मुर्दों की खोपड़ियाँ और न जाने क्या-क्या अला-बला पड़ी थीं। परन्तु सम्पूर्ण वातावरण डरावना और रहस्यमय था।
परन्तु मैं तो न जाने किन-किन भयानक परिस्थितियों से गुजर चुका था। मेरे लिये वह चीजें भय का प्रतीक नहीं थी। कोई नया व्यक्ति होता तो सीढ़ियों पर ही उसके होश गायब हो गए होते। यहाँ दो बड़े कमरे थे। मैंने पहला कमरा देखा जो बिलकुल खाली था और वीरानी का दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। मैं दूसरे कमरे में प्रविष्ट हुआ तो आँखों में खून उतर आया। वहाँ हरि आनंद किसी जवान पुजारिन के साथ बातों में खोया था। दिल में तो आया कि अचानक उसके सिर पर चढ़ जाऊँ और नरखरा दबा दूँ या पीछे से छुरा घोंप दूँ। मगर मारने से पहले मैं उसे जलील करके दिल का गुब्बार निकालना चाहता था। मैं खामोशी से कमरे की एक दीवार से चिपक गया। मेरे सामने अनगिनत मूर्तियाँ थीं।
मैंने बड़े धैर्य से ठोस स्वर में कहा– “आखिरकार मैं आ ही गया।”
हरि आनंद यह सुनकर यूँ उछला जैसे किसी बिच्छु ने अन्धेरे में उसे डंक मार दिया हो। एक क्षण के लिये उसके चेहरे की रंगत जर्द पड़ गयी फिर संभलकर बोला– “कुँवर राज ठाकुर! त... तुम यहाँ ?”
“हाँ मैं! और गौर से देख लो, मेरे साथ मोहिनी भी नहीं है।”
“तुम क्या चाहते हो ?” उसने घबराहट में प्रश्न किया।
“खूब! तुम यह भी नहीं जानते भोले बादशाह। सुनो। मैं अपनी प्यारी मोहिनी को तुम्हारा खून पिलाना चाहता हूँ। उसे तुम्हारा खून पीने की बड़ी आरजू है।” मैंने व्यंग्य कसा।
“तुमने वचन भंग किया, मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ।”
“मैं तुमसे सफाई नहीं माँग रहा हूँ। डॉली मर चुकी है मगर उसकी आत्मा व्याकुल है। मैं उसे शांत करने के लिये यहाँ आया हूँ।”
“राज! मुझसे गलती हो गयी है। क्या तुम मुझे क्षमा नहीं कर सकते ? जो होना था, वह हो गया। मैं तुम्हारे बहुत काम आ सकता हूँ।”
“कमीने, बस कर!” मैंने अचानक गरजते हुए कहा। “अधिक बातें न बना। सावधान हो जा, आज तेरी मौत तेरे सिर पर खड़ी है। मैं तेरे खून से अपने हाथ रंगने आया हूँ। स्वयं को मेरे हवाले कर दे और मन्दिर से बाहर चल।”