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Fantasy मोहिनी

मैंने अपनी दुःख भरी ज़िन्दगी समाप्त करने के लिये कई बार अपने-आपको खतरे में डाला। किन्तु यहाँ के जानवर भी जैसे प्रेमलाल की आज्ञा के पाबन्द थे। साँप मेरे सामने से गुजर जाते थे, पिस्सू मेरे जिस्म से खेलकर वापस हो जाते थे। कोई जोंक मुझसे नहीं चिपटती थी। मोहिनी मेरे लिये खुराक का प्रबन्ध करती रहती थी। केवल दो माह बाद मैं चलने-फिरने योग्य हो गया, लेकिन बेबसी अब भी मेरा भाग्य थी।

एक रोज तंग आकर मैंने मोहिनी से पूछा। “क्या प्रेमलाल मुझे कभी आज़ाद नहीं करेगा ?”

“राज! काश मैं तुम्हें इस बारें में कुछ बता सकती।” मोहिनी बेबसी से बोली। “हाँ, इतना कह सकती हूँ, अब तुम किसी मूर्खता का प्रदर्शन न करना। तुम देख चुके हो कि इस वादी में सिर्फ और सिर्फ प्रेमलाल का आदेश चलता है। राज, मैं इससे पहले कभी इतनी मजबूर नहीं हुई थी। मुझे क्षमा कर दो। मैं अगर उसकी आज्ञा मानने से इनकार कर देती तो वह मुझे पार्वती के आशीर्वाद से जलाकर राख कर देता। उसे पार्वती ने महान शक्तियाँ दान की हैं। उसने सांसारिक जीवन से किनारा करके देवताओं के दिलों में स्थान बनाया है। प्रेमलाल ने आज तक किसी को हानि नहीं पहुँचायी। उसने एक बड़ी तपस्या करके देवताओं के ज्ञान-ध्यान में मग्न करने के उपरान्त इस स्थान पर अपना आसन जमाया है। मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि वह कोई साधारण पंडित-पुजारी नहीं है। वह प्रेमलाल है।”

“मुझे उससे कोई शिकायत नहीं मोहिनी।” मैंने एक ठण्डी आह भर कर कहा। “मगर अब धर्मात्मा क्या चाहता है ?”

“देखते जाओ। जो कुछ हो रहा है फिलहाल वही तुम्हारे हक में उचित है।”

“उचित है ? तुम भी मेरी बेबसी का मज़ाक क्यों उड़ा रही हो ?”

“क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं रहा राज ? मुझ पर भरोसा रखो। समय का इंतजार करो। यह दिन भी गुजर जायेंगे। इस समय मैं इससे अधिक कुछ नहीं कह सकती। मैं भी तुम्हारी तरह बेबस हूँ।”

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चन्द महीने गुजर गए। आश्चर्य की बात है कि इस लम्बे समय में प्रेमलाल एक बार भी कुटिया से बाहर नहीं आया था। मोहिनी ने मुझे अंदर जाने से माने कर दिया था। कुलवन्त दिन में दो-तीन बार बाहर आती, परन्तु वह मुझसे बात नहीं करती थी। उसके चेहरे की गम्भीरता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। कदाचित प्रेमलाल ने कुलवन्त पर भी कुछ बंधन लगा दिये थे। वह मेरे पास गुजरते समय हसरत से मुझे देखती। फिर फुरफुरी सी आ जाती और वह खामोशी से अपने रास्ते पर बढ़ जाती। उसकी आँखों में एक तेज, एक पवित्रता पैदा हो रही थी। माला भी कई बार कुटी से बाहर निकलती थी परन्तु वह मेरी तरफ कोई ध्यान न देती थी जैसे मेरा कोई अस्तिव ही न हो। उसने मेरी बहुत कोशिशों के बावजूद भी मेरी तरफ ध्यान नहीं दिया।

जब मैं इस विचित्र कैद से बहुत परेशान होने लगता और मुझ पर जुनून सवार होने लगता तो मोहिनी मुझे होश में ले आती। प्रेमलाल आखिर क्या चाहता है ? मैं हर समय यही सोचता रहता लेकिन कोई बात मेरे पल्ले न पड़ती। माला और कुलवन्त दोनों और निखर गयी थीं। माला तो साक्षात कयामत हो गयी थी। इसके शाहकार हुस्न ने मुझे इस स्थिति में पहुँचा दिया था। उसके कुटी से बाहर आने पर मेरे दिल में एक कसक पैदा होती। मैं उसकी तरफ विनती भरी दृष्टि से देखता। एक दो बार मैंने उसे सम्बोधित करना चाहा, लेकिन मोहिनी ने मेरे होंठों को जैसे सिल दिया। मैं तिलमिला कर रह जाता। बात करने के लिये ज़ुबान तरस जाती।

इसी तरह दिन गुजर रहे थे। एक रोज सुबह जब मैं जागा तो न जाने क्यों मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे कुछ होने वाला है। उधर मोहिनी की जानी-पहचानी आवाज़ मेरे कानों में गूँजी।

“राज! तुम्हारी चिन्ताओं के दिन अब समाप्त होने वाले हैं।”

मैंने चौंककर मोहिनी की तरफ देखा। वह आज पहले की अपेक्षा कुछ बदली हुई नजर आ रही थी। उसकी खुशी से मुझ में कोई परिवर्तन नहीं आया बल्कि मुझे कुछ झल्लाहट सी हुई। मैं मोहिनी से कोई व्यंग्य भरी बात कहने लगा था कि कुटी के अंदर से माला की सिसकियाँ बुलन्द होनी शुरू हुई। मैं उस दिन के बदले हुए हालात सूंघकर तेजी से उठ खड़ा हुआ। मैंने मोहिनी से माला के रोने का कारण पूछा तो उसने कुटी की तरफ देखकर बुझे हुए स्वर में कहा–

“समय से पहले कोई बात न पूछो। मैं इस समय बेहद उदास हूँ कुछ देर सब्र करो।”

मैं मोहिनी की बात का अर्थ न समझ सका। कुछ ही देर में कुलवन्त कुटी से बाहर आयी और मुझे सम्बोधित करते बोली– “अन्दर चलो राज! महाराज तुम्हें बुला रहे हैं।”

यह क्यों और किस लिये का समय नहीं था। मैं तेजी से उठा और कुलवन्त के पीछे-पीछे कुटिया में प्रविष्ट हो गया। वहाँ की स्थिति बिल्कुल साफ मेरी आँखों के सामने थी। प्रेमलाल चटाई पर पड़ा था। उसके शरीर की हड्डियाँ और भी उभर आयी थीं। उसके चेहरे पर अब वह जलाल न था। प्रेमलाल ने काँपती पलकों की ओर से मुझे देखा और फिर मद्धिम सी आवाज में बोला।

“बालक, मेरे निकट आओ!”

माला उसके सिर पर सिर रखे सिसक रही थी। मैंने फुर्ती से कदम आगे बढ़ाए और प्रेमलाल के निकट जाकर रुका।

“बैठ जाओ।”

मैं बैठ गया। और उसके होंठ फिर हिलने लगे। “मैंने जिस कारण तुम्हें रोका था। आज वह समय आ गया है। मैं आज तुमसे बहुत सी बातें करना चाहता हूँ।”

“महाराज!” मेरा दिल भर आया। “आप रहस्मय शक्तियों के स्वामी हो। मेरी क्या मजाल जो आपकी किसी बात से इनकार करूँ।”
 
मेरा उत्तर सुनकर प्रेमलाल की आँखों में सुर्खी आ गयी। किन्तु वह तुरन्त ही गायब हो गयी। मोहिनी ने मुझ संभलकर बात करने के लिये टहोका दिया। प्रेमलाल के होंठ मुस्कराने लगे। “बालक निराश न हो। मैं जानता हूँ तुम्हारा मन मेरी तरफ से मैला हो गया है परन्तु मैंने तुम्हें जो कष्ट दिया था वह ठीक था। तुम्हें मोहिनी देवी ने बताया होगा कि धरती के किसी मनुष्य को कभी मुझसे कोई शिकायत नहीं रही। मैं मनुष्यों से भाग कर यहाँ चला आया था और ज्ञान-ध्यान में अपना जीवन बिता देना चाहता था। परन्तु यह माला मेरी बच्ची मेरे मध्य आ गयी। इस मूरख ने जब मुझे देखा तो अपने जीवन की तमाम खुशियों से मुँह मोड़कर मेरे चरणों में अपनी जिंदगी बिताने की ठान ली। तुमने इसके शरीर को हाथ लगा कर मुझे दु:ख पहुँचाया था। यह एक देवी की तरह पवित्र नारी है। मेरे ऊपर इसका बड़ा बोझ है। यह आने को तो आ गयी परंतु जो मैं चाहता था वह न बन सकी। अपने मन का मैल दूर कर दो बालक। मैं आज तुम्हें कुछ दान करना चाहता हूँ।”

प्रेमलाल का बदला हुआ व्यवहार और नरम स्वर मेरे लिये आश्चर्यजनक था। वह मेरे प्रति स्नेह भरा व्यवहार कर रहा था। अब मेरा दिल अपने-आप ही उसकी तरफ खिंच रहा था।

“मैं जो कुछ कह रहा हूँ उसे ध्यान से सुनो बालक! मेरे पास समय बहुत कम है और तुम्हारे सामने यह जो माला खड़ी है, वह बहुत सुन्दर नारी है। यह कोई पुजारिन नहीं है। यह एक धनवान बाप की बेटी है। इसका बाप चार साल पहले अपनी एक विनती लेकर इसके साथ मेरे पास आया था। इस मूरख को यह जगह इतनी पसंद आयी कि यह फिर अपने बाप के साथ वापस नहीं गयी। मेरी सेवा की धुन में इसने अपना सब कुछ त्याग दिया। माला रानी पुजारिन बन गयी। मैं इसे एक सच्ची पुजारिन बनाना चाहता था, परंतु मेरी सेवा के सिवा इसे किसी चीज से दिलचस्पी नहीं थी। इसके माता-पिता ने इसे वापस ले जाने की बहुत कोशिश की परन्तु एक बार यहाँ आयी तो फिर कभी वापिस नहीं गयी।”

प्रेमलाल की जुबानी माला की यह दास्तान सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ लेकिन मैंने कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की। वह कहता रहा–

“मैंने इसे बेटी समान देखा और समझा है। मैं चाहता हूँ कि इसे मेरे बाद कोई कष्ट न हो। मेरी इच्छा है बालक कि तुम इसका हाथ थाम लो। मुझे विश्वास है यह तुम्हारे साथ बड़ी सुखी रहेगी और तुम्हें भी सुखी रखेगी। मेरे जाने के बाद इस पहाड़ी प्रदेश में इसका जी नहीं लगेगा।”

प्रेमलाल के इस प्रस्ताव पर मेरी आँखें आश्चर्य से फैल गयी। मैंने उसे इस तरह देखा जैसे उसकी बात का विश्वास न हो–जैसे अनजाने में अर्ध चेतनावस्था में उसके मुँह से यह बात निकल गयी हो।

“यह आप कह क्या रहे हैं महाराज ?”

“मैं ठीक कह रहा हूँ। माला के भाग्य में यही लिखा है।” प्रेमलाल ने बड़े विश्वास के साथ उत्तर दिया।

“मैं तो महाराज... बहुत बुरा आदमी हूँ। माला के लिये मुझसे अच्छा वर मिल सकता है। आपको मालूम है कि मेरा बीता कल कितना अंधकारमय और भयानक है। आप मेरे साथ...।”

“मुझे सब कुछ मालूम है। माला को तुमसे अच्छा वर मिल सकता है, परन्तु तूने इसके शरीर को हाथ लगा दिया है। अब वह तेरी है किसी और की नहीं हो सकती।” प्रेमलाल ने जैसे अन्तिम निर्णय सुना दिया।

“महाराज...!” मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं प्रेमलाल को क्या उत्तर दूँ ? प्रेमलाल ने अचानक एक विचित्र सी इच्छा जाहिर की थी। कुलवन्त सामने खड़ी थी। वह लड़की जिसने मेरी खातिर अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया था। घर-बार, माँ-बाप। वह मेरी मोहब्बत में कहाँ से कहाँ आ गयी थी। मैं उसे कैसे नजरअन्दाज कर देता। उसने मेरे लिये कितने दुःख झेले थे।

मेरी सोचो को देखते हुए प्रेमलाल ने कहा– “किस सोच में डूब गया बालक ? क्या माला रानी को स्वीकार करने में तुझे कोई आपत्ति है ?”

“महाराज...!” मैंने कनखियों से कुलवन्त की ओर देखते हुए कहा। “मैं आपका कैदी हूँ, आप अपनी महान शक्तियों द्वारा मुझे हर बात के लिये मजबूर कर सकते हैं।”

माला को प्राप्त करने का विचार मैं दिल में नहीं ला सकता था। यूँ तो वह खुद एक बहार थी। मैं सपने में भी नहीं सोच सकता था कि यह इतनी आसानी से मुझे प्राप्त हो जाएगी। पर कुलवन्त... कुलवंत भी कम सुन्दर न थी और कुलवंत को हरगिज अनदेखा नहीं कर सकता था।

“इस समय जो विचार तुझे सता रहा है उसे अपने दिमाग से उतार दे। कुलवन्त अब वह नहीं, जो पहले थी। जिसके मन में ज्ञान-ध्यान समा जाये उसे संसार की झूठी बातों का कोई मोह नहीं रहता। मनुष्य क्या चीज है, वह अच्छी तरह जान चुकी है। किन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं कि वह तुझे प्रेम नहीं करती। वह तुझे अब भी सच्चा प्रेम करती है। यह सारा जीवन तेरी पूजा करती रहेगी। परन्तु इस कुटिया में रहकर। पार्वती ने उसे पसन्द कर लिया है। वह यहाँ रहकर तप करेगी और बहुत बड़ी पुजारिन बनेगी। मैंने माला के बदले उसे तुझसे माँग लिया।”
 
मैंने कुलवन्त की तरफ दृष्टि उठायी। उसके चेहरे पर एक पवित्र चमक थी। वह एकदम शांत और गम्भीर थी। उसका मौन ही उसकी स्वीकृति थी। मैं उलझन भरी दृष्टि से उसे देखता रहा तो कुलवन्त को अपना मौन तोड़ना पड़ा।

“राज! मैं महाराज को वचन दे चुकी हूँ कि अपना शेष जीवन इसी कुटी में बिताऊँगी। मुझे यहाँ जो शांति मिली है, वह कहीं नसीब नहीं हुई। मैं तुमसे प्रेम करती हूँ, इस नाते तुमसे विनती करती हूँ कि महाराज की इच्छा का पालन करो और माला रानी का हाथ थाम लो। डॉली के बाद वैसे भी तुम्हें एक नारी की आवश्यकता है।”

यह कुलवन्त बोल रही है। मैं गूँगा सा देखता रहा। वह इस समय किसी देवी के रूप में नजर आ रही थी। वह देवी जिसकी आज्ञा का पालन करने के लिये इंसान का दिल स्वयं तैयार हो जाए। उसने मेरी सारी कठिनाइयाँ हल कर दी। मेरे पास वह वाक्य नहीं थे जो उसके इस बलिदान के लिये प्रयोग कर पाता। मेरा दिल चाहा कि आगे बढूँ और मुहब्बत के नाम पर कुर्बान होने वाली इस देवी के चरणों में नतमस्तक हो जाऊँ।

“बालक! मेरे जीवन का अन्तिम समय निकट आ गया है। प्रेमलाल ने मुझे सम्बोधित किया। “मैं माला रानी के साथ कन्यादान में तुम्हें कुछ नहीं दे सकता। मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैंने देवी-देवताओं के हजारों जाप किए हैं। पूरा जीवन इसी में गुजार दिया है। मैं तुम्हें माला रानी के सिवा कुछ और भी दान कर रहा हूँ। तुम्हारे पास मोहिनी की शक्ति है लेकिन मोहिनी आनी-जानी चीज है। मैं तुम्हें कुछ और शक्ति भी दान कर रहा हूँ।” प्रेमलाल ने इतना कहकर कुछ पढ़ना शुरू कर दिया।

उसने चटाई पर रखे हुए थैले से सफेद खड़िया मिट्टी जैसी कोई चीज निकाली और उस पर कोई जन्तर-मन्तर फूँका। फिर वह सफेद टिकिया मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा। “लो बालक, इसे खा लो! कन्यादान के साथ कोई ऐसा उपहार भी होना चाहिए था जो कोई बाप अपनी लड़की को देकर सुख महसूस कर सके। मैंने तुम्हें जो चीज दान की है वह पंडित-पुजारियों को वर्षों जाप करने पर भी नहीं मिलती। इसे खाने के बाद तुम्हारे शरीर में एक नई शक्ति पैदा होगी। तुम बलवान हो जाओगे और फिर बला तुम्हारे निकट आने का साहस न कर सकेंगी। तुम सच्चे मन से मेरा नाम लेकर जो चाहोगे, वह अवश्य पूरा होगा पर एक बात हमेशा ध्यान में रखना। अगर तुमने मेरी बेटी माला को दु:ख देने की कोशिश की तो मेरी आत्मा व्याकुल हो जाएगी और वह शक्ति तुमसे वापस ले लेगी जो मैं तुम्हें दान कर रहा हूँ।”

“महाराज, आपका हुक्म सर आँखों पर!” मैंने सफेद खड़िया मिट्टी जैसी वस्तु जल्दी से दाँतों तले दबाकर कण्ठ के नीचे उतार ली। उसका स्वाद बेहद कड़वा था।

“मुझ पर विश्वास रखिए महाराज मैं माला रानी को कभी कोई दु:ख नहीं दूँगा।” मेरी इस स्वीकृति से प्रेमलाल के मुर्दाने चेहरे पर एकदम से खुशी की लहर दौड़ पड़ी। उसने मेरा हाथ थामने के लिये अपना हाथ आगे बढ़ाया।

फिर माला का हाथ पकड़ कर मेरे हाथ में देता हुआ बोला– “भगवान् तुम दोनों को सुखी रखे। जो उसकी इच्छा थी, मैंने वही किया।”

मैंने कनखियों से माला को देखा। उसकी नजरें झुक गयी थीं। शर्म की सुर्खी ने उसका चेहरा अनार बना दिया था। वह छुई-मुई की तरह सिमट सी गयी थी। माला मुझे मिल सकती है। एक अल्हड़ लड़की। तराशा हुस्न। बहार का पहला फूल। उसके बदन की खुशबू मेरे मनोमस्तिष्क पर छा गयी और वह तमाम कष्ट भूल गया, जो प्रेमलाल ने मुझे दिए थे। मैं माला के साथ भविष्य की कल्पनाओं के घरौंदे बुन रहा था। एक हसीन जिन्दगी के सपने संजो रहा था कि तभी कुलवन्त की सिसकी सुनाई दी।

मैंने चौंककर देखा। कुलवन्त प्रेमलाल के अकड़े हुए जिस्म से लिपटी सिसक रही थी। माला को जब सच्चाई का आभास हुआ तो वह भी फूट पड़ी। प्रेमलाल को जुदा हुए चन्द लम्हे गुजरे थे कि उसका शरीर बुरी तरह अकड़ गया। कुटी अब शोकाकुल हो गयी थी। मैंने मोहिनी की तरफ दृष्टि डाली। प्रेमलाल की मौत ने उस रहस्यमय मोहिनी को भी शोकाकुल कर दिया था। और फिर एक सप्ताह तक मैं इसी पहाड़ी पर रहा। प्रेमलाल का क्रिया-कर्म मुझको ही करना पड़ा। कुलवन्त ने चिता की राख अपने बदन पर मल कर कुटी संभाल ली। वह हर समय चटाई पर बैठी न जाने क्या जाप करती रहती थी। उसकी यह हालत देख दिल बहुत कुढ़ता था, परन्तु उसे इससे बहुत खुशी थी और जैसे यही अब उसके जीवन का मिशन था।
 
मैंने चौंककर देखा। कुलवन्त प्रेमलाल के अकड़े हुए जिस्म से लिपटी सिसक रही थी। माला को जब सच्चाई का आभास हुआ तो वह भी फूट पड़ी। प्रेमलाल को जुदा हुए चन्द लम्हे गुजरे थे कि उसका शरीर बुरी तरह अकड़ गया। कुटी अब शोकाकुल हो गयी थी। मैंने मोहिनी की तरफ दृष्टि डाली। प्रेमलाल की मौत ने उस रहस्यमय मोहिनी को भी शोकाकुल कर दिया था। और फिर एक सप्ताह तक मैं इसी पहाड़ी पर रहा। प्रेमलाल का क्रिया-कर्म मुझको ही करना पड़ा। कुलवन्त ने चिता की राख अपने बदन पर मल कर कुटी संभाल ली। वह हर समय चटाई पर बैठी न जाने क्या जाप करती रहती थी। उसकी यह हालत देख दिल बहुत कुढ़ता था, परन्तु उसे इससे बहुत खुशी थी और जैसे यही अब उसके जीवन का मिशन था।

एक सप्ताह बाद जब मैं विदा होने लगा तो कुलवन्त ने गले लगाकर माला को भाव-भीनी विदाई दी। उसने मुझसे कहा–

“राज, तुम्हारा नया जीवन शुभ हो! मेरी मंगलकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं। माला डॉली की कमी दूर करेगी और हाँ, कभी-कभी मुझे भी याद कर लिया करना।”

मैंने उसके हाथ पकड़ लिये। मेरा दिल चाहता था कि आज बहुत रोऊँ और माला को छोड़कर कुलवंत को ले जाऊँ। वह कुछ ऐसे गमजदा अन्दाज में हमें विदा कर रही थी कि फौलाद भी नरम पड़ जाता। मैंने उसके मर-मरी हाथ को चुंबन दिया। विदाई के वह क्षण बड़े दर्दनाक थे। माला कुलवन्त की जुदाई के कारण उसकी याद में तड़प रही थी। किंतु हर बेटी एक दिन अपना घर छोड़ती ही है। उसे अपने पति के साथ नया घर-संसार बसाना होता है।

शहर लौटकर मैं उस होटल में गया जहाँ मेरा सामान और कैश था। मैनेजर इतनी अवधि गुजर जाने के बाद मुझे देखकर हक्का-बक्का रह गया। मेरे कपड़े तार-तार हो चुके थे। मैंने उससे अपना सामान माँगा तो वह आंय, बांय, शांय करने लगा। परिणामस्वरूप मुझे मोहिनी को संकेत करना पड़ा और उसी दिन शाम तक मैं उत्तम वस्त्रों सहित एक शानदार होटल में ठहरने योग्य हो गया था। माला को मूल्यवान साड़ियाँ और आभूषणों से लाद दिया।

मैंने उसका उर्वशी जोड़ा निकलवाया। जब उसने वह जोड़ा पहना तो उसे देखकर मैं आँखें पट-पटाने लगा। वह इतनी दिलकश और नाजुक लग रही थी कि सिर्फ देखने और बातें करने को जी चाहता था। अजीब बात यह थी कि लगातार तन्हाई और लम्बी प्रतीक्षा के बाद भी मेरा दिल यही कहता था कि अभी और प्रतीक्षा करो। अभी ठहरो, इस कली की बहार देखो। इस नवयौवना को पहले जी भर कर देख लो।

वह मेरी हैरानी देखकर पूछती– “यह तुम मुझे सामने बिठा कर क्या ताकते रहते हो ?”

“मैं प्रकृति के इस हसीन शहकार का दीदार कर रहा हूँ।”

सोचता था कि उसके योग्य नहीं हूँ। मैंने बहुत सब्र किया पर कब तक ? सब्र के बन्धन आखिर टूट ही गए। दिल उसके रूप का बोझ सह न सका और उसका यौवन भरा अस्तित्व मुझ पर छाता चला गया।

मोहिनी की शोखियाँ भी वापिस आ गयी थीं। एक रोज जब माला स्नान कर रही थी तो उसने मुझसे कहा– “राज! तुम तो माला में ऐसे खो गए कि हमारी पुच्छ-गुच्छ भी गयी।”

मैंने मुस्कराकर उत्तर दिया– “तुम क्या मुझसे अलग चीज हो ? मैं तो समझता हूँ तुम मेरा अहसास हो। जब मैं महसूस करता हूँ तो तुम भी महसूस करती होगी।”

“यह तो टालने वाली बात हो गयी।” मोहिनी ने चंचल स्वर में कहा।

“मोहिनी, माला ने जिंदगी ही बदल दी है! सच मैंने ऐसा कभी महसूस नहीं किया था।” मैंने भावुकता से कहा।

“राज, माला के साथ-साथ प्रेमलाल ने जो शक्ति तुम्हें दान की है उसके मुकाबले में बड़े-बड़े बलवानों की शक्ति भी कुछ नहीं। अगर तुमने माला का हाथ थामने से इनकार कर दिया होता तो प्रेमलाल मरने से पहले तुम्हें जलाकर भस्म कर देता ? यह बात हमेशा ज़हन में रखना कि माला को कोई कष्ट न होने पाए। वरना हालात खराब हो सकते हैं।”

“माला को कौन अधर्मी दु:ख देगा ? तुम तो कभी-कभी पागलों जैसी बातें करने लगती हो। मैं तुमसे खुद कह रहा था कि माला को कोई कष्ट न होने पाए। माला तो बहार है और बहार की कौन इच्छा नहीं करता। मैं सोचता हूँ मैंने जिंदगी अब शुरू की है।”

“तुम डॉली को इतनी जल्दी भूल गए। यह मर्द भी बड़े हरजाई होते हैं। हर हसीन औरत के बारे में ऐसी बातें कहते हैं।”

“मोहिनी! डॉली का जिक्र तुमने बेवक्त छेड़ दिया।” डॉली का नाम सुनकर मैं त़ड़प गया और दिल मसोस कर बोला– “डॉली की बात और थी, माला की बात और है। तुमने अच्छा किया जो मुझे चेता दिया। अरी पगली, डॉली को कौन भूल सकता है! माला ने कुछ ऐसा जादू कर दिया है कि मैं स्वयं भूल गया हूँ। यह भी भूल गया कि मुझे अभी हरि आनन्द से बदला लेना है। मैं अपनी प्रतिज्ञा भूल गया था। हे ईश्वर, मैं कितना स्वार्थी हो गया था! मैंने प्रतिज्ञा पूरी करके डॉली से मिलने का वचन दिया था। चलो मोहिनी, सामान बाँधते हैं। सुहागरात मनाते हुए मैं मर क्यों नहीं गया। अब चलते हैं और उस कमीने तांत्रिक को ठिकाने लगाते हैं। मैं उसे कभी क्षमा नहीं करूँगा।”

मोहिनी मेरी गम्भीरता और झल्लाहट पर एक सर्द आह भरती हुई बोली–”राज! उचित है कि हरि आनन्द से पहले तुम अपने एक और शत्रु से मिल लो। वही त्रिवेणी दास। वह बड़ा मक्कार और फरेबी है। उसने तुम्हें प्रेमलाल का पता इसलिए दिया था कि तुम मुसीबत में गिरफ्तार हो जाओ और वह चैन की बंसी बजाता रहे। पहले तुम्हें उस कमीने से हिसाब चुकाना है। उसने तुम्हें धोखा दिया था।”

“तुमने मुझे उसी समय क्यों नहीं बता दिया था ?” मैं क्रोध से तिलमिलाता हुआ बोला। “मैं उसी दिन उस हरामजादे का टेंटुआ दबा देता।”

“मुझे इसका ख्याल उस समय आया था राज जब तुम माला से हाथापाई कर रहे थे। मैं तुम्हें परिस्थितियों से खबरदार करना चाहती थी लेकिन अवसर नहीं मिल सका। हालात अचानक हमारे विरूद्ध हो गए थे। लेकिन यह जो भी हुआ, अच्छा ही हुआ।”

माला के वहाँ आ जाने से बातों का सिलसिला समाप्त हो गया।

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उसी शाम पहली गाड़ी से मैं पूना के लिये रवाना हो गया। माला से इस संबंध में बात करना उचित नहीं था। पूना पहुँचकर मैं उसी होटल में ठहरा। जहाँ दो बार पहले भी आ चुका था। होटल वाले मेरी दरियादिली से वाकिफ थे। उन्होंने बड़े तपाक से मेरा स्वागत किया। माला को देखकर वे चौंके अवश्य परन्तु कोई पूछताछ नहीं की। माला को होटल में छोड़कर मैंने एक दोस्त से मिलने का बहाना किया और बाहर निकलते ही सीधे त्रिवेणी दास की हवेली का रूख किया। उस समय रात के नौ बजे होंगे जब मैं त्रिवेणी की हवेली पर पहुँचा। मोहिनी ने मेरे सिर से उतर कर हवेली के चौकीदार का ध्यान बँटा दिया था इसलिए मुझे अंदर प्रविष्ट होने में किसी प्रकार की रूकावट पेश नहीं आयी। मैं सीधा त्रिवेणी के शयनकक्ष में आ गया। दरवाजा अंदर से बंद था। मैंने चाबी वाले सुराख से अंदर झाँका तो मेरा खून खौल उठा। उसका वही अंदाज था। एक हसीन लड़की उसके पहलू में बैठी हुई थी और मेज गिलासों और बोतलों से भरी हुई थी। लड़की बेहयाई से त्रिवेणी के गले में बाहें डाले बातों में व्यस्त थी।

अपने इस बदतरीन दुश्मन के कारण मुझे डेढ़ साल मैसूर की पहाड़ियों में कष्ट सहने पड़े थे। मेरे बुरे दिनों का प्रारंभ भी इसी के कारण हुआ था। उसे ऐशो-आराम में देखकर मेरा दिमाग उलट गया। मैंने आव देखा न ताव, पूरी शक्ति से दरवाजे पर लात मारी।

“कौन बदतमीज है ?” त्रिवेणी की आवाज आयी।

“मैं हूँ तेरा बाप! कुँवर राज ठाकुर। दरवाजा खोलो!”

मेरी गरजदार आवाज सुनकर अवश्य ही त्रिवेणी की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी होगी। चंद क्षणों तक दूसरी तरफ से कोई उत्तर नहीं मिला। फिर दरवाजा खोल दिया गया। मैं लपक कर अंदर प्रविष्ट हुआ तो क्रोध के बजाय हँसी आ गयी। मेज पर रखी शराब और गिलासों की जगह इस समय कोई पुस्तक रखी हुई थी। लड़की निश्चय ही दूसरे कमरे में चली गयी होगी। त्रिवेणी ने मेरी आवाज सुनकर यह ढोंग रचा लिया था। अभी मैं कमरे का निरीक्षण कर ही रहा था कि त्रिवेणी सहमा हुआ सा मेरे पास आया और हाथ जोड़कर बोला–

“प्रणाम कुँवर साहब! आइए पधारिए।”

मैंने त्रिवेणी का चेहरा गौर से देखा। उसकी आँखों से आश्चर्य और बौखलाहट झलकती थी। चेहरा उसी समय पीला पड़ गया था जब उसने दरवाजे पर मेरी सूरत देखी थी। मैं दिल ही दिल में ताव खाता हुआ एक सोफे पर बैठ गया।

“सुनाओ त्रिवेणी दास जी। क्या हाल-चाल हैं तुम्हारे ?”

“आपकी कृपा है कुँवर साहब।” त्रिवेणी ने हाथ जोड़कर कहा। बस गुजर रही है।”

“बहुत बदले-बदले नजर आ रहे हो त्रिवेणी जी। आज तो यह बेडरूम भी सूना पड़ा है। कोई तितली नजर नहीं आ रही है। पंछी कहाँ उड़ गए ?”

“राम-राम कुँवर साहब।” त्रिवेणी ने कानों पर हाथ लगा कर कहा। “सब कस बल निकल गये। अब तौबा कर ली है। बस भगवद् गीता और रामायण पढ़ता रहता हूँ।”

“राज!” मोहिनी ने मेरे कानों में सरगोशी की। “बराबर वाले कमरे में एक सुन्दर लड़की मौजूद है। तुम्हारी आवाज सुनकर इसने उसे छिपा दिया है।”

मैंने स्वीकृति में सिर को जुम्बिश दी। फिर त्रिवेणी से कहा– “मैं तुम्हारा शुक्रिया अदा करने आया था त्रिवेणी। तुमने प्रेमलाल का पता बताकर मुझ पर बड़ा अहसान किया है। उसने मेरी बड़ी मदद की।”

त्रिवेणी मेरी बात सुनकर चौंका। फिर खिसियानी हँसी हँसकर बोला– “कुँवर साहब ? आपकी सेवा करना अपना धर्म समझता हूँ! जो कुछ मेरे पास है सब आपका दिया हुआ है। यह बताइये कि आप क्या पियेंगे ? चाय, कॉफी या ठण्डा ?”

“मैं यहाँ कुछ और ही पीने के इरादे से आया हूँ।” मैंने व्यंग्य से कहा।

“अच्छा, अच्छा! मैं समझा!” त्रिवेणी भौंडे अंदाज में हँसने लगा।

“त्रिवेणी, तुम्हारा खून पिया जाये तो कैसा रहेगा ?” मैंने इत्मीनान से पूछा।

“खी... खी... खी... आपके लिये तो जान भी हाजिर है।” त्रिवेणी झेंपकर बोला।

“अच्छा छोड़ो! यह बताओ कि तुम अपने लिये कौन सी सजा पसंद करोगे ?”

“ज... जी, कुँवर साहब ?” त्रिवेणी कंपकंपा गया। “मैंने आपसे फरेब नहीं किया था कुँवर साहब। विश्वास कीजिए। मैं आपका मित्र हूँ।”

“कमीने! मेरी आँखों में धूल झोंकने की कोशिश करता है। मैं तुझे बताऊँगा कि मैं क्या हूँ।” मैं क्रोध में उठकर खड़ा हो गया। त्रिवेणी के बाल पकड़कर उसे झटका देते हुए मैंने कहा– “तू समझता था मुझे खतरों में फँसाकर तू आराम की जिन्दगी बसर करेगा और यहाँ तू अब भी मेरे जिन्दा होते हुए रंगरेलियाँ मना रहा है। मेरी आवाज सुनी तो अपनी बहन को दूसरे कमरे में छिपा दिया। सुन ले, ओ मक्कार पंडित! आज मैं यहाँ समय नष्ट करने नहीं आया हूँ।”

मेरे मस्तिष्क में प्रेमलाल की दी हुई तमाम यातनाएँ ताजा हो गयीं और मेरी मुठ्ठियाँ भिंच गयी।

“आज तेरी अय्याशी का आखिरी दिन है। मैं तुझे सड़कों पर भीख माँगने पर मजबूर करूँगा। तू एड़ियाँ रगड़-रगड़कर सड़कों पर मर जाएगा। वही तेरे लिये उचित जगह है।”

“कुँवर साहब, मुझे क्षमा कर दीजिए!” त्रिवेणी मेरे पाँव पकड़कर बाकायदा रोने लगा।

“पिछली बातें याद कर फरेबी।” मैंने घृणा भरी दृष्टि उस पर डालते हुए कहा। “कमबख्त, तूने भी कभी मेरे हाल पर तरस खाया था ? तूने मुझे बर्बाद करने में कौन सी कसर छोड़ी थी।”

“वह मेरी भूल थी कुँवर साहब।” त्रिवेणी ने मेरे कदमों में अपना सिर फोड़ना शुरू कर दिया। “अब मैं तौबा करता हूँ, मुझे क्षमा कर दीजिए!”

उसकी गिड़गिड़ाहट से मेरा गुस्सा और भड़क गया। त्रिवेणी के विरूद्ध मेरे मस्तिष्क में जो नफरत थी वह उसकी गिड़गिड़ाहट से कैसे दूर हो सकती थी। मैंने ठोकर मारकर त्रिवेणी को फर्श पर धकेला और उछलकर उसकी छाती पर सवार हो गया। त्रिवेणी ने सिर पर मौत मंडराते देखी तो तिलमिलाने लगा लेकिन मैं जैसे बहरा हो गया था। मैंने पहले पूरी शक्ति से दस-बारह थप्पड़ उसके मुँह पर मारे फिर उंगलियाँ उसकी आँख में गड़ाकर बाहर खींच लीं तो उसकी आँख हल्के से बाहर निकल आयीं। उसका चेहरा खून से तर हो गया। उसकी दर्दनाक चीखें दीवारें हिला रही थी। मुझे उस पर तब भी रहम नहीं आया। उसे फर्श पर तड़पता छोड़कर मैं तेजी से उठा। मुझ पर जुनून सवार था। मैंने आतिशदान के निकट रखी लोहे की वह छड़ उठायी जिससे आतिशदान की राख कुरेदी जाती है फिर पलटकर त्रिवेणी के निकट आया और दीवानों की तरह वह छड़ उसके घुटनों पर मारने लगा।
 
आखिर त्रिवेणी चेतना शून्य हो गया लेकिन छड़ उस समय तक उस पर बरसती रही जब तक उसके दोनों घुटने चूर-चूर नहीं हो गए। त्रिवेणी को खून से लथपथ छोड़कर मैंने छड़ को फेंका और वापसी के इरादे से पलटा।

मोहिनी ने सहमी हुई आवाज में कहा– “राज ? दूसरे कमरे में इन घटनाओं का एक गवाह मौजूद है। एक सुन्दर और तंदरूस्त लड़की। मैं बहुत दिनों से प्यासी हूँ मेरे मालिक।”

मोहिनी के इस अन्दाज का मतलब मुझे मालूम था। उस लड़की को मैं बिल्कुल भूल गया था जिसे त्रिवेणी ने मेरी आवाज सुनकर दूसरे कमरे में छिपा दिया था। मोहिनी के रोकने पर मुझे ख्याल आया कि वह मेरे लिये अकारण मुसीबत बन सकती है। सम्भव है उसने दूसरे कमरे में छिपकर मुझे देख भी लिया हो। मैंने बढ़कर दूसरे कमरे में कदम रखा तो वह लड़की सहमी हुई नजर आयी। कदाचित उसने सारी वारदात देख ली थी।

मोहिनी मेरे सिर पर एकदम खड़ी थी और होंठों पर जीभ घुमा रही थी। उसकी आँखों में खूनी प्यास थी और वह बेचैन होती जा रही थी। लड़की का सारा बदन पसीने से नहाया हुआ था और कपड़े बदन से चिपक गए थे। मुझे सामने देखकर वह घिघियाने लगी और काँपती हुई आवाज में बोली–

“भगवान के लिये मुझे मत मारो। मैं बेकसूर हूँ। मैं तुम्हारी हर इच्छा पूरी करने के लिये तैयार हूँ।”

“शादीशुदा हो ?” मैंने उसकी बात नजरअन्दाज करते हुए पूछा।

“नहीं! अलबत्ता मेरी मँगनी हो चुकी है। अगले माह मेरा विवाह होने वाला है!” लड़की ने गिड़गिड़ाकर उत्तर दिया। “भगवान के लिये मुझे मत मारो। मैं वचन देती हूँ कि तुम्हारा राज किसी पर जाहिर नहीं करूँगी।”

“इसकी बातों में न आना राज।” मोहिनी ने जल्दी कहा। “यह कोई साधारण चीज नहीं है। इसके संबंध यहाँ पुलिस ऑफिसरों से भी है। अगर इस समय तुमने इसे छोड़ दिया तो तुम खतरों से घिर जाओगे। फिर मेरे हलक में काँटे भी तो पड़े हैं। मैं मरी जा रही हूँ। राज, ओ मेरे प्यारे मेरे राजा, मेरे मालिक! देर न करो, मैं मरी जा रही हूँ। अपनी मोहिनी का तो ख्याल करो।”

मैं मोहिनी का सुझाव मानकर आगे बढ़ा तो लड़की कमरे में इधर-उधर भागने लगी। वह पागलों की तरह चीखने-चिल्लाने लगी। लेकिन वह जाती कहाँ। जल्दी से मैंने उसे कब्जा लिया। वह थर-थर काँपने लगी। उधर मोहिनी झूम रही थी।

“मार डालो इसे! मार डालो मेरे आका! मेरे लिये क्या चीज है, क्या गर्म खून है!”

एकाएक लड़की को न जाने क्या हुआ कि उसने अपने कपड़े फाड़ने शुरू कर दिए। कदाचित् इस तरह वह मेरा ध्यान अपने सुडौल शरीर की तरफ आकर्षित करना चाहती थी लेकिन उसके इस कार्य से मेरा क्रोध और भड़क उठा। उसकी चीख पुकार से दरवाजे पर खटखटाहट होने लगी। दरबान जोर-जोर से दरवाजा पीट रहा था। लड़की ने और जोर से चीखना शुरू कर दिया।

उसी क्षण मोहिनी ने मुझसे कहा– “राज! इसे ठोकर मारो, जल्दी! फिर तुम यहाँ से चले जाना। मैं दरबान के सिर पर जा रही हूँ। मैं सब सँभाल लूँगी।”

मैंने लड़की के गले में अपना शिकंजा कस दिया फिर उसे जोर से फर्श पर पटक दिया और एक जोरदार ठोकर से उसका मुँह खोल दिया।

मोहिनी किसी जहरीली छिपकली की तरह मेरे सिर से रेंग चुकी थी। मैंने लड़की पर एक नफरत भरी दृष्टि डाली फिर दरवाजे की तरफ बढ़ गया। मैं जानता था मोहिनी अब तक दरबान के सिर पर जा चुकी होगी। शेष काम वह अपने ढंग से पूरा कर लेगी। मैंने दरवाजा खोल दिया। दरबान ने मेरी तरफ नहीं देखा। वह सम्मोहन की सी मुद्रा में चलता हुआ दूसरे कमरे में जा पहुँचा। मैं जानता था अब त्रिवेणी की हवेली में मोहिनी क्या गुल खिलाने वाली है।

मैं दबे कदमों से बाहर निकल गया।

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अब उस किस्से को सुनाने की क्या जरूरत है कि अगले दिन त्रिवेणी के घर होने वाली इन खूनी घटनाओं के बारे में बड़ी दिलचस्प और हंगामे से भरी खबरें छपी। मैं कोई चार रोज और पूना में रहा। पूना में रहकर कुलवंत की याद आती रही। यूँ मेरी एक बार फिर पूना आने की इच्छा थी ताकि मैं त्रिवेणी को अपनी आँखों से भीख माँगता देख सकूँ और उसकी हथेली पर किसी दिन एक दस का नोट रख सकूँ। ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी तो हुआ था। मोहिनी को मैंने हिदायत कर दी थी कि वह त्रिवेणी की तमाम सम्पत्ति पर दृष्टि रखे और जब वह अस्पताल से वापिस आए तो उसके पास सिर छिपाने का कोई ठिकाना नहीं होना चाहिए।

यह इत्मीनान करने के बाद मैं कलकत्ते रवाना हो गया। कोलकाता यानी बंगाल वैसे भी जादू-टोने के लिये सारी दुनिया में मशहूर है। वहाँ इस तरह के कई मठ या मन्दिर हैं जहाँ तन्त्र साधना होती है। कुछ ऐसे छिपे हुए स्थल भी है जहाँ बलि दी जाती है। परंतु मेरा उद्देश्य आनंदमठ से था। यह कोलकाता के पूर्वी छोर पर ऐन एक पहाड़ी पर स्थापित था और एक घना जंगल इसके चारों तरफ आबाद था। ऊपर पहाड़ी पर वह मंदिर स्थापित था जहाँ यात्री लोग काली के दर्शन करने भी जाया करते थे। इस मठ की व्यवस्था एक मंडल के हाथों में थी और त्रिवेणी भी इसी मण्डल का सदस्य था। मठ में बड़े पुजारी भी रहते थे। माला को इस बात का ज्ञान नहीं था। रास्ते में जब मैंने उसे अपनी मंजिल बतायी तो वह उदासी से बोली–

“भगवान के लिये कलकत्ते की बजाय कहीं और चलो।”

“क्यों ?” मैंने उसे उदास देखकर पहलू में समेट लिया।

“बाबा ने शायद तुम्हें नहीं बताया था कि मेरे माँ-बाप और परिवार के लोग कलकत्ते में रहते हैं। अगर उन्होंने मुझे तुम्हारे साथ देख लिया तो बहुत बुरा होगा। मेरा सुख-चैन गारत हो जाएगा।” माला ने मेरे सीने पर सिर रखकर कहा।

“क्यों ? क्या मैं तुम्हें भगाकर लाया हूँ ? आखिर तुम मेरी धर्मपत्नी हो और तुम्हारी तरफ कोई आँख उठाकर देखने की भी हिम्मत नहीं कर सकता। मेरा नाम कुँवर राज ठाकुर है। तुम बेकार परेशान होती हो। तुम्हारे लिये तो जान पर खेल जाऊँगा।”

“तुम नहीं जानते राज, वह बड़े जालिम लोग हैं।”

माला मुझे बराबर समझाती रही कि मैं कलकत्ते का सफर न करूँ पर मैंने उसे समझा बुझाकर चुप करा दिया। अगर वह न मानती तो भी मैं किसी कीमत पर यह यात्रा रद्द न करता। बंगाल अब मेरी मंजिल थी। आखिरी मंजिल। जहाँ मुझे आनन्दमठ के पुजारियों से लड़ना था। जहाँ तंत्र-मंत्र का महाभारत छिड़ने वाला था। जहाँ मेरा दुश्मन हरि आनंद छिपा बैठा था।

मोहिनी, प्रेमलाल की दान की हुई माला, मुम्बई की कोठी, बेशुमार दौलत। इन सब चीजों का आनंद उठाने के लिये आवश्यक था कि मैं अपने सिर से बोझ उतार दूँ। अगर मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं करता तो मेरा जीवन बेमानी हो जाता और कदाचित यही मेरी जिंदगी की आखिरी जंग थी। मेरी जिंदगी में बहुत खूनखराबा हो चुका था परंतु इस खून में हरि आनंद का खून भी सम्मिलित होना आवश्यक था।

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मुझे पूरा विश्वास था कि हरि आनंद अपने आपको मुझसे न बचा सकेगा। मेरे पास एक तो मोहिनी थी, दूसरी प्रेमलाल की दान की हुई शक्ति। किसी जमाने में त्रिवेणी ने मोहिनी को मुझसे छीन कर दर-ब-दर ठोकरें खाने पर मजबूर कर दिया था। अब हरि आनंद ने डॉली को छीन कर मेरे जीवन का चैन छीन लिया था। मोहिनी मुझे वापिस मिल गयी, खोई हुई दौलत भी। पर मेरी प्यारी डॉली की वापसी की कोई सूरत नहीं थी। वह ऐसी जगह पहुँच गयी थी जहाँ से कोई वापिस नहीं आता। त्रिवेणी से तो मैं निपट चुका था। अब हरि आनंद की बारी थी। कलकत्ते पहुँचते ही मैंने सबसे पहले आनंद मठ की जानकारी प्राप्त करनी शुरू कर दी।

आनंद मठ के सदस्य बड़े ही कट्टरपंथी थे। वे तंत्र पूजा करते थे और काली के भक्त थे। उनकी सीमा में मोहिनी कोई करतब न दिखा सकती थी। यूँ इस बात का भी खतरा था कि वे मुझे पहचानते होंगे। परंतु इतना अरसा बीत जाने के बाद कदाचित उन्हें याद भी न होगा और फिर उनमें से कौन ऐसा था जिसने मेरी सूरत देखी थी। मैंने वहाँ से आनंद मठ जाने के लिये तुरंत ही प्रस्थान किया। माला को अपने होटल में छोड़ दिया था।

मठ एक पहाड़ी पर था। यहाँ यात्रियों का आना-जाना लगा रहता था। रविवार और शनिवार को अधिक भीड़ रहती थी। जब मैं उसके समीप पहुँचा तो मोहिनी ने साथ छोड़ दिया–

“राज, मैं अंदर नहीं जा सकती! यहीं रुककर तुम्हारा इंतजार करूँगी। तुम हर कदम सावधानी से उठाना। बस किसी तरह उसे बाहर लाने में सफल हो जाओ। याद रखना अंदर खून-खराबा करने से उचित है कि तुम उसे किसी तरह बाहर ले आओ। काश, मैं तुम्हारे साथ चल सकती!”

“तुम इत्मीनान रखो मोहिनी। मेरे साथ प्रेमलाल की आत्मा है। मुझे उसका आशीर्वाद प्राप्त है। मेरा ख्याल है, मैं आसानी से उस तक पहुँच जाऊँगा।”

“नहीं, नहीं! तुम वहाँ मजबूर होगे। वह काली का मंदिर है और हरि आनंद काली का सेवक है।” मोहिनी ने बेचैनी से कहा।

जब मैं मठ के अंदर प्रविष्ट हुआ तो मोहिनी चुपचाप मेरे सिर से उतर गयी। मैं स्वयं को पूरी तरह तैयार करके आगे बढ़ने लगा। कुछ सीना ताने, नथुने फुलाए, जैसे कोई पहलवान अखाड़े में दाखिल हो। उस समय मेरे बदन पर एक धोती और कुर्ता था। मंदिर में आने जाने वाले पुजारी और पुजारिन मेरी तरफ कनखियों से देख रहे थे। मैंने किसी को कोई महत्व नहीं दिया। देता भी कैसे जबकि मेरे इरादे किसी बिगड़े हुए शेर के से थे। सीढ़ियाँ पार करके मैं अंदरूनी हिस्से में दाखिल हो गया जहाँ एक अहाता था। अहाते के बीच एक हरा-भरा बगीचा था। वहाँ पंडित, पुजारी और खूबसूरत पुजारिन बैठे बातें कर रहे थे। सामने एक मेहरावी दरवाजे के अंदर घण्टे बजने और भजन गाने की आवाजें आ रही थीं। मैं उस ओर बढ़ा जहाँ से भजन की आवाजें आ रही थीं। मेहरावी दरवाजे के सामने एक दिलकश दासी ने हाथ जोड़कर मुझे प्रणाम किया। वह नजरें नीची किए कतरा कर जाने लगी तो मैंने बिना हिचक हाथ बढ़ाकर उसकी कलाई थाम ली। वह सिटपिटा गयी परंतु मेरी आँखों की गंभीरता देखकर प्रश्नवाचक दृष्टि से मेरी ओर देखने लगी। मैंने उससे पूछा–

“मंदिर का बड़ा पुजारी इस समय कहाँ मिलेगा ?”

“तुलसी आनंद महाराज इस समय अपनी कुटिया में होंगे।” दासी ने दण्डवत करते हुए उत्तर दिया फिर मेरे अनुरोध पर बड़े पुजारी की कुटिया तक मार्ग दर्शन भी कर दिया जो अहाते के पूर्वी हिस्से में थी। कुटिया के अन्दर से ज्ञान ध्यान की आवाजें आ रही थीं। तुलसी आनंद उस समय दूसरे पंडित-पुजारियों को दरस दे रहा था। मैंने तत्काल उसे छेड़ना उचित नहीं समझा। दासी मुझे कुटिया के पास छोड़कर जाने लगी तो मैंने कुछ सोचकर दोबारा लगावट भरी दृष्टि से उसके हसीन सरापा का जायका लेते हुए कहा–

“सुन्दरी, तुमने मुझे अपना शुभ नाम नहीं बताया।”

“मेरा नाम बसन्ती है।” उसने मेरी आँखों की गर्मी को पिघलाते हुए, लजाते हुए कहा।

मेरा ज़हन उस समय केवल हरि आनंद पर उलझा हुआ था। मैंने दासी को और शर्माने के लिये विवश किया। “तुम्हारा नाम भी तुम्हारी तरह सुन्दर है।”

“क्यों बनाते हो महाराज!” दासी छुई-मुई की तरह अपने अस्तित्व में सिमटने लगी।

“बसन्ती, तुम यहाँ कब से हो ?” मैंने सरगोशी की।

“मुझे चार साल हो गए।” उसने दृष्टि झुकाकर उत्तर दिया।

“चार साल!” मैंने आश्चर्य प्रकट किया। “और तुम्हारा यहाँ दिल लग गया ?”

“हाँ!” उसने किसी कदर उदासी से कहा। “यहाँ मनुष्य शांत रहता है, चैन से रहता है।”

“खाक रहता है। तुम्हारी जगह यह मन्दिर नहीं, तुम्हें तो किसी महल में होना चाहिए।”

“मैं यहाँ बहुत ठीक हूँ। संसार बहुत बुरा है महाराज।”

मैं समझ गया कि वह दुखी है और यहाँ भी खुश नहीं है। मैंने उससे प्यार भरी बातें की तो वह मुझसे काफी प्रभावित हो गयी। अब अवसर था कि मैं उससे अपने मतलब की बात करूँ।

मैंने राजदारी से कहा। “ऐ बसन्ती सुनो, क्या तुम मेरा एक काम करोगी ?”

“कहो महाराज!” बसन्ती ने अपनी पलकें उठाकर दृष्टि मेरे चेहरे पर जमा दी।

“मुझे हरि आनन्द महाराज से मिलना है। एक पुजारी ने मुझे बताया था कि हरि आनन्द मुझे इस मन्दिर में मिल सकता है। क्या तुम हरी आनन्द को जानती हो ? मैं सिर्फ उससे मिलना चाहता हूँ।”

उत्तर में बसन्ती ने मुझे आश्चर्यचकित दृष्टि से देखा। मेरी बात सुनकर उसका चेहरा अचानक पीला पड़ गया। उसकी सारी शेखी एक पल में गायब हो गयी। उसने घबराए हुए अंदाज में अपने दाएँ-बाएँ देखा फिर भयभीत स्वर में बोली– “तुम्हारा नाम कुँवर राज ठाकुर तो नहीं ?”

मैं उत्तर देते हुए झिझका। परन्तु मैंने साहस से उत्तर दिया– “मेरा नाम कुँवर राज ठाकुर ही है। क्यों ?” मैंने आश्चर्य से पूछा।

किन्तु बसन्ती पहले से भी अधिक सहमे स्वर में बोली– “तुरन्त भाग जाओ यहाँ से। किसी ने तुम्हें पहचान लिया तो तुम्हारे साथ-साथ मेरी भी शामत आएगी।”

“तुम चिन्ता न करो बसन्ती! मेरे होते हुए तुम्हारी ओर कोई नजर नहीं उठा सकता। यह मेरा वचन है।” मैंने बसन्ती को दिलासा देते हुए कहा।

मुझे यकीन हो चला था कि बसन्ती हरि आनन्द के बारे में बहुत कुछ जानती है और वह किसी बहाने से उसे बाहर ला सकती है।
 
“बसन्ती! तुम किसी तरह हरी आनन्द को बाहर ले आओ और अगर यह सम्भव न हो तो मुझे किसी तरह उसके पास पहुँचा दो। फिर मैं तुम्हारी हर आशा पूरी करूँगा। तुम शायद नहीं जानती कि मैं महान शक्ति का स्वामी हूँ। मोहिनी देवी भी मेरे पास है। मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा।”

बसन्ती किसी सहमी हुई हिरनी की तरह पलकें झपका-झपका कर मुझे देख रही थी। उसने कुछ कहने की खातिर अपने होंठ खोले फिर तेजी से पलटकर भागी और मेरी नजरों से ओझल हो गयी। उसका यूँ अचानक भाग जाना अकारण नहीं हो सकता था। गोया मठ में मेरे नाम की खासी धूम थी। अब मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि किससे संपर्क स्थापित करूँ। मैंने पलटकर इधर-उधर देखा। तुलसी आनंद की कुटिया के बाहर एक देव सरीखा पुजारी खड़ा मुझे संदिग्ध दृष्टि से देख रहा था। मुझे मोहिनी की चेतावनी याद आ गयी। उसने मुझे सावधान रहने की चेतावनी दी थी। बसन्ती का यूँ अचानक भाग जाना और इस पुजारी का संदिग्ध दृष्टि से मुझे घूरना निरर्थक नहीं हो सकता था। निश्चय ही मेरे बारे में उन्हें लगभग सारी जानकारी थी और वे मुझे पहचानते भी थे। यह एक अजीब बात थी। मैं यहाँ कभी नहीं आया था और वे मेरे बारे में निस्संदेह सब कुछ जानते थे और कदाचित उन्हें विश्वास था कि मैं यहाँ एक न एक दिन अवश्य आऊँगा।

यह बातें सोचकर मेरी आँखों में खून उतर आया। मुझे अनुमान हो गया था कि डॉली का निर्दयी कातिल हरि आनन्द मन्दिर के किसी ऐसे भाग में छिपा है जहाँ तक मेरी पहुँच आसानी से नहीं हो सकती। अब उसे मेरे आक्रमण से बचाने के लिये हर व्यक्ति तैयार था। इसका अर्थ यह था कि मेरा मुकाबला केवल हरि आनन्द से नहीं, पूरे आनन्द मठ से है और मैं भी खाली हाथ वापस लौटने वाला नहीं था तो फिर जो कुछ होना था, आज ही हो जाए। मैंने यह तय कर लिया था। मैं चाहता था कि वह सीधी तरह हरि आनन्द को मेरे हवाले कर दें। मैंने स्वयं को तैयार करके घूरने वाले पुजारी की आँखों में आँखें डाल दीं। वह मेरे निकट आया और शुष्क स्वर बोला–

“महाशय, तुम कोई नये पुजारी दिखायी देते हो! तुम्हारा शुभ नाम क्या है ?”

“क्यों, इस मठ में किसी नये पुजारी का आना बंद है ? मैंने तो सुना था कि दरबार सब के लिये खुला है। मुझे दिखायी देता है कि तुम इस समय कुछ व्याकुल भी हो। कारण ?”

“अधिक चतुर बनने की कोशिश मत करो। मैंने तुम्हारा नाम पूछा था।” पुजारी के माथे पर अनगिनत सलवटें पड़ गयी।

“जाओ अपना काम करो। मुझे तुमसे कोई मतलब नहीं। मैं हर पुजारी को छेड़ना नहीं चाहता।” मैंने कुछ बिगड़े स्वर में कहा।

“तुम मुझे चाल-ढाल से कोई पुजारी नहीं दिखायी देते।” पुजारी ने नफरत भरी दृष्टि से देखते हुए कहा। “काली के चरणों में तुम्हारा बहुरूप बनाकर आने साहस कैसे हुआ ? यहाँ केवल वही मनुष्य आ सकता है जिसके मन में कोई खोट न हो। तुम शायद गलत रास्ते पर आ गए हो। तुम्हें अपना नाम बताना ही पड़ेगा महाशय। तुम तुलसी आनंद की आँखों में धूल नहीं झोंक सकते।”

“ओह! तो तुम हो तुलसी आनंद। इस मठ के सबसे बड़े पुजारी।” मैंने साँस खींचकर लापरवाही से कहा। “आश्चर्य है, इतना बड़ा पुजारी मेरा नाम नहीं जान सका। तो तुलसी आनंद जी सुनो– मैं यहाँ जिस उद्देश्य से आया हूँ तुम उससे अच्छी तरह वाकिफ हो। मैं समय नष्ट नहीं करूँगा। मेरी जुबान से मेरा नाम सुनना ही चाहते हो तो सुनो। मेरा नाम कुँवर राज ठाकुर है। यहाँ मैं उस पापी और अधर्मी हरि आनंद की तलाश में आया हूँ जिसे तुम लोगों ने छिपा रखा है। बात बढ़ाने से कोई लाभ नहीं होगा। इतना ध्यान रखना कि अब कोई शक्ति इस कमीने हरि आनंद को मेरे हाथों से बचा नहीं सकती। तुम भी नहीं। हालाँकि तुम मुझे कुछ शक्ति वाले दिखायी देते हो। मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम सीधी तरह उसे मेरे हवाले कर दो।”

“मूरख!” तुलसी आनन्द ने गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए घृणा भरे स्वर में कहा। “इस मठ में काली का मंदिर है। यहाँ केवल देवी की शक्ति का राज है। इस पवित्र स्थान पर आकर तूने देवी का अपमान किया है। तूने घोर पाप किया है। चला जा यहाँ से, चला जा। अगर मन्दिर के दूसरे पुजारियों को तेरी खबर लग गयी तो तुझे भस्म कर देंगे।”

“तुलसी आनंद।” मैंने ठण्डे स्वर में कहा। “मुझे आश्चर्य है कि तुम इस बड़े मठ के महान पुजारी कैसे हो गए। तुम्हें तो यह भी नहीं मालूम कि मैं अकेला नहीं आया। मेरे साथ न जाने कितने योद्धा हैं और कितनी शक्ति है। अगर तुम्हें अपना जीवन प्यारा है तो सीधी तरह बता दो तुमने हरि आनंद को कहाँ छिपा रखा है ? इनकार किया तो तुम्हारा अंजाम भी अच्छा न होगा।”

“तू काली माई के मन्दिर में महान पुजारी तुलसी आनंद को धमकी दे रहा है। पापी। ठहर जा, मैं तुझे अभी मजा चखाता हूँ।” तुलसी ने काँपते हुए कहा।

“मैं हरि आनंद को चाहता हूँ, उसे मेरे हवाले कर दो। मैं फिर तुमसे कहता हूँ, बात अधिक न बढ़ाओ।”

“मैं उसे तेरे हवाले नहीं कर सकता। वह काली माई की शरण में है।”

“फिर तुम मुझे उसका पता बताओ, मैं स्वयं उससे मिल लूँगा।”

“मैं तुझे नरक का पता बता सकता हूँ पापी।” पुजारी ने कहा।
 
Vivanjoshi wrote: ↑ 04 Jul 2021 23:04
शानदार , अपडेट थोड़ा बड़ा दीजिये
 
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