• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Fantasy मोहिनी

मैं देर तक कलवन्त को इधर-उधर की बातों में बहलाता रहा। मैंने उसे अपने प्यार के ढांचे में ढाला परन्तु रह-रहकर एक ख्याल आता कि इस मोहब्बत का अंजाम बड़ा खतरनाक होगा। डॉली कलवन्त को कैसे बर्दाश्त करेगी और स्वयं कलवन्त डॉली को क्यों पसन्द करेगी ? मेरे ज़हन में कशमकश जारी थी। कलवन्त को दोबारा अपने करीब पाकर मेरे होशो-हवाश गुप्त हो गए थे। क्या मैं कलवन्त को सब कुछ बता दूँ ? इस तरह तो मैं इस सुंदरी से दूर हो जाऊँगा। मगर डॉली को मैं किसी कीमत पर दुःख नहीं देना चाहता था। अतः मैंने दिल पर पत्थर रखकर फैसला किया कि कलवन्त को सब कुछ बता दूँ और मैंने बातों-बातों में उससे यह कह दिया कि मेरी शादी हो गयी है लेकिन मेरे आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा कि कलवन्त ने बड़े सब्र से यह खबर सुन ली और विपरीत परिस्थिति में भी मेरे कदम छू लिये फिर कहने लगी–

“राज, मैं केवल इतना जानती हूँ कि मैं तुम्हारे करीब रहना चाहती हूँ। मुझे किसी बात की परवाह नहीं है। तुम सिर्फ इतना करो कि मुझे स्वयं से अलग न करो। मैं तुम्हारे कदमों में अपना सारा जीवन बिता दूँगी। मैं तुम्हारी पत्नी डॉली की सेवा करूँगी। एक दासी बनकर रहूँगी।”

कलवन्त ने कुछ देर पहले मुझे बचाने की खातिर अपनी जिंदगी दाँव पर लगा दी थी और अब मेरी बांदी तक बनने के लिये तैयार थी। मैंने इसी से उसके गहरे प्यार का अनुमान लगा दिया और मैं उसकी ओर खिंचने लगा। उसके गोरे-गोरे चेहरे पर उस समय भी सारे जहाँ की सुंदरता सिमट आई थी। मैंने उसे धीरे से उठाकर अपने सीने से लगा लिया और उसके होंठो पर अपने जलते हुए होंठ रख दिए। वह मेरे लिये समर्पित थी। मैंने उसे घास के नर्म बिस्तर पर लिटा दिया और अपनी बाँहों में लेकर वचन दिया कि मैं उसे अपने करीब ही रखूँगा।

मैं उसके रूप व यौवन में डूब गया था। मैं उसके जज्बातों से खेल रहा था। मैं उसकी साँसो से लड़ रहा था। उसी समय एकाएक मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी।

मुझे आश्चर्य हुआ। मेरा पिछला अनुभव बताता था कि जिस समय मोहिनी खून पीती है तो छः-सात घंटों से पहले नहीं लौटती । मैंने सिर पर नजर डाली तो सचमुच मोहिनी मौजूद थी। उसकी आँखों से शोले उबल रहे थे। चेहरा गजनाक सुर्ख हो रहा था। होंठो पर गाड़ा-गाड़ा ताजा खून जमा हुआ था।

मोहिनी को इस रूप में देखकर मेरा माथा ठनका। किसी अज्ञात खतरे के अहसास से मेरा दिल तेज-तेज धड़कने लगा। मैंने दिल ही दिल में संबोधित किया।

“क्या बात है मोहिनी ?” राजकुमार का खून पसन्द नहीं आया।

“राज, मेरे राज! मैं तुमसे बहुत शर्मिंदा हूँ।” मोहिनी ने भर्राई हुई आवाज में कहा। उसकी आँख से आँसू बहने लगे।

मैंने बेचैन होकर पूछा– “सब कुशल तो है ? तुम इस कदर परेशान क्यों हो ?”

“राज!” मोहिनी सिसक पड़ी, “इंसानी खून मेरे अस्तित्व का नशा है। मैं खून पीते समय दुनिया की तमाम बातों से बेखबर हो जाती हूँ। यही कारण है जो पंडित हरि आनंद अपना वार कर गया।”

मोहिनी के अंतिम शब्द किसी खतरनाक ज्वालामुखी की तरह मेरे सीने में फट गए। मैं कलवन्त को झटककर हड़बड़ाकर उठ बैठा। एक क्षण में हजारों प्रश्न मेरे दिमाग में घूम गए। मेरा दिल उलझने लगा। मैंने बौखलाकर पूछा–

“जल्दी बताओ मोहिनी, तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आ रही हैं ? हरि आनंद क्या कर गया ?”

“तुरन्त तुम घर पहुँचों राज। मैं इस कमीने पंडित को घेरने जा रही हूँ। डॉली से मुझे बहुत प्यार था आका।”

मोहिनी अपना वाक्य समाप्त करते ही मेरे सिर से उतर गयी।

डॉली का नाम सुनकर मेरा मस्तिष्क चकरा गया। मेरे ज़हन में आँधियाँ चल रही थी। मैं कलवन्त से कुछ कहे बिना दीवानों की तरह तूफानी रफ़्तार से घर की तरफ भागा। घर पहुँचकर मैं पागलों की तरह दौड़ता हुआ अपने शयनागर में पहुँचा। किन्तु दरवाजे पर एक झटके के साथ रुक गया।

डॉली की हालत देखकर मैं जड़ सा हो गया। मैं पत्थर की बेजान मूर्ति की तरह अपनी जगह साकित खड़ा डॉली को फ़टी-फ़टी दृष्टि से देख रहा था। मुझे अपनी दृष्टि पर संदेह हो रहा था। मेरा हृदय सीने में डूबता जा रहा रहा था।

डॉली एकटक नग्नावस्था में मुसहरी के निकट कालीन पर चित्त पड़ी थी। जिस्म के एकाएक हिस्से में छोटे-छोटे अनगिनत खंजर दस्ते तक पैबस्त नजर आ रहे थे। जिस्म खून से लहूलुहान था। उसकी पथराई हुई आँखें बड़े खौफनाक अंदाज में दरवाजे की तरफ जमी हुई थी जैसे अंतिम समय भी उसे मेरा इंतजार था और फिर बाँध टूटा। मैं पागलों की तरह चीख उठा।

“हरि आनंद...! डॉली की लाश की सौगन्ध, मैं तुझे ही नहीं, तेरे मठ को जलाकर खाक कर दूँगा। मैं सारी दुनिया के तांत्रिक को मौत के घाट उतार दूँगा। मैं मठों में खून की होली खेलूँगा। मैं इस दुनिया को आग लगा दूँगा।” और मैं पागलों की तरह चीखता रहा।

फिर बेहोश होकर डॉली की लाश पर गिर पड़ा।
 
हाँ, तो मैंने अपनी दास्तान वहाँ छोड़ी थी जहाँ मैंने डॉली को कालीन पर मृतावस्था में देखा था। उसके शरीर के एक-एक हिस्से पर बेशुमार छोटे-छोटे खंजर दस्ते पेवस्त थे। उसकी दृष्टि दरवाजे की तरफ उठी हुई थी। मौत के भयानक पीड़ादायक क्षणों में भी उसे मेरा इंतजार था और मैं भाग्यहीन उस समय पहुँचा जब वह दुनिया के तमाम रिश्तों से आज़ाद होकर सब को तड़पता छोड़कर चली गयी थी।

उसने उन तमाम मुसीबतों से छुटकारा पा लिया था जो मेरे साथ रहकर उस पर टूटने वाली थी। वह खत्म हो चुकी थी। उसे देखकर मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी आत्मा भी खिंच रही है। मैं भी ज़मीन में धँस रहा हूँ। मेरी दृष्टि डॉली की मृत्यु का वह हौलनाक मंजर देख रही थी जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। मैं स्तब्ध था। विश्वास नहीं होता था कि उस समय जो कुछ मेरे सामने है वह हकीकत है या मेरी नज़र का धोखा है या कोई तिलस्म है।

मेरी डॉली का खून कालीन से निकलकर ज़मीन पर जम गया था। मैं सहमी हुई दृष्टि से उस खून को देखने लगा और मैंने अपना हाथ उसमें रंगकर अपने गाल पर जोरदार तमाचे मारने शुरू कर दिये और पागलों की तरह चीखना शुरू कर दिया। इस तरह भी चैन न आया तो दीवार से अपना सिर फोड़ना शुरू कर दिया। मेरा माथा लहूलुहान हो गया।

उस डॉली के लिये मैंने कैसी-कैसी मुसीबतें मोल ली थी। कहाँ-कहाँ मारा-मारा न फिरा था। वह आयी तो उसने मेरी वीरान ज़िन्दगी में बहार बिखेर दी थी। अभी चन्द ही दिन हुए थे कि मैंने उसके स्वस्थ हो जाने के उपलक्ष्य में बड़ी धूमधाम से जश्न मनाया था फिर उसे अपने संग पाकर मैं अपना घिनौना अतीत भूल चुका था और डॉली के साथ नये सिरे से ज़िन्दगी गुजारने के सुनहरे सपने संजो रहा था लेकिन उसने मेरा साथ छोड़ दिया।

अब मुझे सारी दुनिया अँधेरी नज़र आ रही थी। मैं फिर तन्हा हो गया था। अब सब कुछ लुट चुका था।

मैं उसे पुकारता हुआ उसकी लाश पर गिर पड़ा और पागलों की तरह उससे लिपट गया। दिल फट जाने के लिये बेताब था। आँखों में आँसुओं का तूफ़ान उबल पड़ा। मैंने उसका सिर उठा कर अपनी रानों पर रख दिया और पागलों की तरह उससे बातें करने लगा। गुजरते समय के साथ-साथ मेरा पागलपन भी बढ़ता गया। मेरे घर में मौत जो हो गयी थी और मैं अपनी मौत पर रो रहा था।

मेरी माँ मर गयी थी। मेरी बहन मर गयी थी। मेरी बीवी मर गयी थी। मेरी जान डॉली खत्म हो गयी थी और इस तरह मैं खुद मर गया था। अब दुनिया में कौन था ?

“डॉली मेरी ज़िन्दगी! अब तुम्हारे बिना जीना कैसा ? मुझे तुम्हारे साथ मर जाना चाहिए। मैं तुम्हारे साथ ही चलता मेरी जान लेकिन मुझे कुछ दिन के लिये आज्ञा दे दो। ईश्वर की सौगंध, मैं यह खंजर तुम्हारे दुश्मनों पर उतारूँगा। मैं दुनिया के तमाम तांत्रिकों को मौत के घाट उतार डालूँगा। मैं उन तमाम मठों, धर्मस्थलों को जलकर ख़ाक कर दूँगा, जहाँ जादू के लिये पूजा होती है। मैं तुमसे वायदा करता हूँ। हरि आनन्द की मौत इतनी दर्दनाक होगी कि जमीन-आसमान काँप उठेंगे। मैं उसे बताऊँगा कि डॉली की ज़िन्दगी की क्या कीमत है और डॉली, यह चंद दिनों की दूरी है। मैं तुमसे आ मिलूँगा।”

अब मैं अपना हाल स्वयं क्या बताऊँ। क्या कह सकता हूँ। खुशियों के बारे में बताना तो आसान है। पर गमों का पहाड़ किस तरह मुँह से निकल सकता है। जब वह क्षण याद करता हूँ तो काँप उठता हूँ। जिस पर इस तरह का कोई गम पड़ा हो वही मेरे भीतर की टोह ले सकता है। मैं तो इतना बदनसीब था कि मेरे गम में आँसू बहाने वाला भी कोई न था। मैं किसी के गले लगकर अपने दिल का गुबार भी नहीं निकाल सकता था। दो-एक नौकर आये थे। मेरे गम में हाथ बँटाने और मुझे ढाँढस बँधाने की बजाय झाँककर भाग खड़े हुए। मुझे अपना होश ही कहाँ था। न जाने मैं डॉली से क्या-क्या वायदे कर रहा था।

शाम के धुंध फैलकर गहरे हो गए थे। कमरे में अँधेरा बढ़ चुका था। मेरी जिंदगी की सबसे काली रात मेरे सिर पर थी। अँधेरा बढ़ा तो मेरा दिल डूबने लगा। मैंने अपना सिर डॉली के सिर पर रख दिया। मैं उससे बातें कर रहा था कि अचानक कमरे का अँधेरा प्रकाश से भर गया।

मैं चौंका और पलटकर दरवाजे की तरफ देखा तो पुलिस के दस-बारह सिपाही बाकायदा राइफल ताने खड़े थे। सबसे आगे स्थानीय एस०पी० था जो अकेला सीना ताने खड़ा था और मुझे बेरहम नजरों से घूर रहा था।

मैंने डॉली का सिर धीरे से कालीन पर रख दिया और उठकर खड़ा हो गया। एक नजर मैंने अपने हाथ और शरीर पर डाली तो मुझे अहसास हुआ कि मेरे वस्त्र, हाथ और माथा खून से रंगे हुए हैं। एस०पी० ने मेरी स्थिति और लाश का निरीक्षण किया तो चौंककर बोला।

“ओह! आयी सी एक क़त्ल यहाँ भी हुआ है।”

मेरा मस्तिष्क पहले ही उलझा हुआ था। अब डॉली की मौत को दूसरा रंग दिये जाने के विचार से और उलझ गया। पुलिस की एकाएक आमद ने मेरे रहे-सहे होश भी गुम कर दिए। मोहिनी भी सिर पर मौजूद न थी। मैंने एस०पी० साहब को याचना भरी दृष्टि से देखा। वह मुझसे भली प्रकार परिचित था। लेकिन उसके तेवर खतरनाक थे।

वह भड़के हुए स्वर में बोला, “खूब मिस्टर राज! मैं तुम्हें एक शरीफ और प्रतिष्ठित व्यक्ति समझता था। तुम तो छुपे रुस्तम निकले। इस बार सही और अच्छी मुलाक़ात हुई।”

“मेहता साहब! यह किस राज का नाम ले रहे हो। राज तो मर गया। तुम्हारे सामने तो उसकी लाश है।” मैंने टूटे हुए स्वर में कहा।

“पेशेवर मुजरिम मालूम होते हो। अच्छी भाषा बोलनी आती है। अच्छा अब अधिक बातें न बनाओ। सीधी तरह मेरे साथ चलो।” मेहता के स्वर में गर्जना थी।

“कहाँ ले चलोगे प्यारे ?” मैंने व्यंग्य भरे स्वर में कहा– “अब मेरा क्या करोगे मेहता जी ?”

“अधिक बातें न बनाओ।” मेहता गरजदार आवाज़ में बोला। फिर उसने सिपाहियों को हुक्म दिया– “गिरफ्तार कर लो इसे, बहुत जुबान चलाता है।”

पलक झपकने की देर थी कि शस्त्रधारी सिपाहियों ने एकदम मुझे घेर लिया। एक सिपाही ने झपट कर मेरी कलाई पकड़ ली और हथकड़ी डाल दी। मैंने संघर्ष करना चाहा, किन्तु शीघ्र ही बेबस हो गया और मुझे अहसास हुआ कि मैं एक बड़े खतरे में घिर गया हूँ। एक क्षण में सारी बात मेरी समझ में आ गयी। मैंने मेहता को कहर भरी दृष्टि से घूरते हुए कहा।

“तुम इन्सान नहीं दरिन्दे हो। बस इतना तो ख्याल करो कि मेरी बीवी की लाश घर में मौजूद है। यह वक्त तुम पर भी आ सकता है। तुमने मुझे मेरा जुर्म बताये बिना गिरफ्तार किया है।”

“बकवास बंद करो।” मेहता गुर्राया– “तुमने राजकुमार की हत्या करके अपनी मौत को दावत दी है। डिप्टी कमीश्नर के वश में होता तो वह तुम्हें ज़िन्दा दफन कर देने का हुक्म दे देता।”

“मैं किसी राजकुमार को नहीं जानता।” मैंने नफरत से कहा। “तुम्हारे डिप्टी कमीश्नर को निश्चय ही कोई गलतफहमी हुई है।”

“कुलवन्त को जानते हो ?” एस०पी० होंठ काटता हुआ बोला। “उससे हमें बहुत कुछ मालूम हो गया है।”

“कुलवन्त से ? हाँ, मैं उसे जानता हूँ! मगर मैं अभी तक नहीं समझ सका कि तुम किस राजकुमार के क़त्ल की बात कर रहे हो ?”

“समझ जाओगे! अच्छी तरह समझ जाओगे।” मेहता के तेवर गजबनाक थे। “थर्ड डिग्री का प्रयोग तुम्हें बड़ी सरलता से जुबान खोलने पर विवश कर देगा। भलाई इसी में है कि तुम अपने संगीन जुर्म का इकबाल कर लो। कानून के पास तुम्हारे खिलाफ बहुत से प्रमाण मौजूद हैं। सबसे बड़ा प्रमाण कुलवन्त है, जिसे बरगला कर तुमने राजकुमार को रास्ते से हटाया है।”

“यह सब कुछ झूठ है। तुम मेरे खिलाफ यह बात कभी साबित नहीं कर सकते।” मैंने बड़े इत्मीनान से उत्तर दिया।

मेहता ने डॉली की लाश पर एक सरसरी दृष्टि डाली और कहा। “सिर्फ एक लड़की की खातिर तुमने दोहरे क़त्ल का जुर्म किया है। एक तरफ तुमने राजकुमार की हत्या की, फिर अपना रास्ता साफ़ करने की खातिर अपनी बीवी को रास्ते से हटा दिया। तुम्हारे इश्क के हम कायल हो गये।”

“जुबान को लगाम दो मेहता, वरना पछताना पड़ेगा। तुम मुझे नहीं जानते।” क्रोध से मेरे होंठ लरज रहे थे।
 
“मैं तो जान ही गया हूँ लेकिन अब तुम पुलिस और कानून को जान लोगे। सब कुछ तुम्हारी समझ में आ जाएगा।”

डॉली की हत्या का आरोप लगाकर मेहता ने मेरा खून खौला दिया। मैं उसे गालियाँ देने लगा। लेकिन इसका परिणाम मेरे लिये अच्छा नहीं निकला। मेहता का संकेत पाकर उसके सिपाहियों ने मुझे ठोकना-बजाना शुरू कर दिया। मेरे पास बचाव की कोई सूरत न थी। उनके लात-घूँसे, बन्दूक के कुंदे मुझ पर टूटते रहे और जब तक मुझे होश रहा मैं उसे जो मुँह में आता कहता रहा, धमकियाँ देता रहा।

चेहरे पर पानी की नमी महसूस करके मैं होश में आया तो उस वक्त मैं हवालात के सख्त पथरीले फर्श पर पड़ा था। मेहता और चार सिपाही मेरे इर्द-गिर्द थे। सुबह का उजाला देखकर मुझे अहसास हुआ कि सारी रात मैंने बेहोशी के आलम में गुजारी है। जिस्म का जोड़-जोड़ दुख रहा था और पीड़ा मुझे बेचैन कर रही थी।

आँख खुलते ही मुझे सबसे पहला विचार डॉली का आया। मैं दिल पकड़ कर रहा गया। मैंने एक सिसकारी मारी और हवालात में बुरी तरह रोने लगा। मुझे नहीं मालूम था कि मेरी डॉली की लाश का क्या बना। इन जालिमों ने उसके साथ क्या व्यवहार किया।

“क्यों दिमाग कुछ ठिकाने आया या और ठिकाने लगाने की जरूरत है ?” मेहता ने मुझे होश में देखकर चुभते स्वर में कहा।

“मेहता जी!” मैं भर्राई हुई आवाज़ में बोला। “क्या आप मुझे यह बतायेंगे कि मेरी पत्नी की लाश का क्या बना ?”

“बको मत!” मेहता गुर्राया। “सीधी तरह मेरे प्रश्नों का उत्तर दो । तुमने राजकुमार की हत्या क्यों की ?”

मैंने तुरन्त कोई उत्तर नहीं दिया। कल्पना की दुनिया में सिर पर नज़र डाली तो मोहिनी अभी तक न लौटी थी। मेहता ने मुझे खामोश पाया तो एक जोरदार ठोकर मेरी पसलियों पर मार दी।

“हरामजादे! तूने सुना नहीं कि मैं क्या पूछ रहा हूँ ? क्या तू सीधी तरह नहीं कबूलेगा कि तूने ही राजकुमार की हत्या की है ? मैं कहता हूँ मान ले वरना यहाँ बड़ों-बड़ों के दिमाग ठीक कर दिये जाते हैं।”

“मैं कसम खाकर कहता हूँ। राजकुमार को मैंने क़त्ल नहीं किया।” मैंने कराह कर उत्तर दिया।

“डॉली के बारे में तुझे क्या बकवास करनी है ? क्या उसे भी तूने अपनी गन्दी मोहिनी का शिकार नहीं बनाया ?” मेहता ने दाँत पीसकर ठंडे स्वर में प्रश्न किया। उसका स्वर बड़ा भद्दा था।

“डॉली मेरी पत्नी थी मेहता जी। भला कोई व्यक्ति स्वयं अपनी ज़िन्दगी को कैसे खत्म कर सकता है ?”

लेकिन मेहता को मुझ पर कोई तरस नहीं आया। एक और ठोकर मार कर बोला, “शायरी कर रहा है, कमीने! मेहता को उल्लू बनाने की कोशिश कर रहा है। मैंने बड़े-बड़े शूरमाओं की चमड़ी उधेड़ कर रख दी है। मेरे सामने तू क्या बेचता है!”

मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मेहता की बात का क्या उत्तर दूँ। डॉली की जुदाई का गम और अपनी बर्बादी ने मुझे निढाल कर दिया था। मोहिनी की अनुपस्थिति ने हालात और खराब कर दिए थे। यह कैसी विपत्ति आ पड़ी थी ?

मोहिनी ने मुझे और कुलवन्त को वारदात की जगह से हटते समय सुझाव दिया था कि राजकुमार की मौत के सम्बन्ध में पुलिस मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेगी। मोहिनी ने मुझसे यह भी कहा था कि राजकुमार की मौत के बाद उसकी जेब से एक ऐसा पत्र मिलेगा जिसमें स्वयं राजकुमार की हस्तलिपि में यह बात दर्ज होगी कि वह कुलवन्त की मोहब्बत के नाम पर आत्महत्या कर रहा है। ईश्वर जाने वह पत्र बरामद भी हुआ था या नहीं। मैंने जितना भी हालात पर गौर किया मुझे उतना ही मायूसी ने घेर लिया।
 
कुलवन्त ने पुलिस को क्या बयान दिया और पुलिस किन सबूतों के आधार पर मुझ तक पहुँच गयी। उसका मुझे कोई ज्ञान न था। इन सब बातों ने मेरे मस्तिष्क को नाकारा बना दिया था।

मेहता ने अपने प्रश्नों का उचित उत्तर न पाकर दो चार ठोकरें और जड़ दी। फिर गरजा।

“मैं आखिरी बार तुझसे कह रहा हूँ कि अपने जुर्म का इकबाल कर ले, वरना याद रख तुझ पर बहुत बुरा वक्त आने वाला है।”

“हाँ, मैंने राजकुमार का क़त्ल किया था! मैं अपने जुर्म का इकबाल करता हूँ।” मैंने न जाने किस वेदना से तड़पकर कह दिया।

“क़त्ल का कारण क्या था ?” मेहता की मुस्कराती हुई खौफनाक नज़र मुझ पर पड़ गयी।

“कुलवन्त उससे शादी के लिये तैयार नहीं थी।” यह कहते-कहते मेरा कण्ठ सूखने लगा। “उसने मुझसे कहा था कि मैं राजकुमार को रास्ते से हटा दूँ।”

“तू कुलवन्त को कब से जानता है ?”

“मेरी उससे मुलाकात पूना में हुई थी।” मैंने भर्रायी हुई आवाज़ में उत्तर दिया।

“क्या यह सही है कि कुलवन्त के साथ तेरे अवैध सम्बन्ध हैं ?”

“सही है!” मैंने स्वीकार किया।

“हूँ...!” मेहता सीना तानकर सीधा हुआ। “तो मेरा अनुमान सही निकला। तूने कुलवन्त की खातिर पहले राजकुमार का क़त्ल किया फिर अपनी बीवी का।”

“यह गलत है।” मैं चीख पड़ा। “डॉली को मैंने नहीं बल्कि किसी और ने क़त्ल किया है।”

“फिर शुरू कर दी तूने बकवास।”

मेहता मेरी बात सुनकर आग-बबूला हो गया। उसने हर सम्भव कोशिश की कि मैं डॉली के क़त्ल का इल्जाम भी अपने सिर ले लूँ, किन्तु मेरे निरंतर मोहिनीर करने से वह खूँखार बन गया। वह हवालात में मौजूद सिपाहियों को सम्बोधित करके बोला।

“मारो इस हरामजादे को, उस वक्त तक मारते रहो जब तक कि यह जुर्म का इकरार नहीं कर लेता।”

मेहता ने सिपाहियों को आदेश देकर मुझ पर हिकारत भरी दृष्टि डाली फिर पैर पटकता हुआ हवालात से बाहर चला गया। उसके जाते ही हवालात में मौजूद चारों सिपाही मुझ पर पिल पड़े और उन्होंने बेदर्दी से मुझे मारना शुरू कर दिया। मैंने अपनी आँखें मींच लीं और अपना सिर टाँगों के बीच छिपा लिया । मुझमें जब तक बर्दाश्त करने की हिम्मत रही, बर्दाश्त करता रहा। मैं एक बार फिर चेतना शून्य हो गया था।

जब मैं होश में आया तो हवालात के बाहर गैलरी में रोशनी हो रही थी । मैंने खुद को हवालात के घुप्प अँधेरे में अकेला पाया। बाहर तीन शस्त्रधारी पहरेदार मौजूद थे। मेरे जिस्म का हर अंग दुख रहा था। मैंने उठने की कोशिश की तो कराह कर रह गया। भूख-प्यास ने मुझे वैसे ही बेहाल कर रखा था और मुझे साँस लेना भी दूभर हो रहा था।
 
जब मैं होश में आया तो हवालात के बाहर गैलरी में रोशनी हो रही थी । मैंने खुद को हवालात के घुप्प अँधेरे में अकेला पाया। बाहर तीन शस्त्रधारी पहरेदार मौजूद थे। मेरे जिस्म का हर अंग दुख रहा था। मैंने उठने की कोशिश की तो कराह कर रह गया। भूख-प्यास ने मुझे वैसे ही बेहाल कर रखा था और मुझे साँस लेना भी दूभर हो रहा था।

मैंने एक बार फिर उठने की कोशिश की परन्तु सहमकर वहीं ढेर हो गया। बाहर उपस्थित एक सिपाही दूसरे से कह रहा था।

“मेरा ख्याल है । यह अब कभी होश में नहीं आएगा।”

“साला मर जाएगा तो अच्छा है।” दूसरे ने नफरत से कहा। “मुझे इससे अधिक उस साली पर गुस्सा आता है। अगर मेरा बस चलता तो उस वैश्या को भी मार डालता।”

“एस०पी० साहब ने नौ बजे आने को कहा था।” तीसरा सिपाही दस्ती घड़ी देखता हुआ बोला। “ईश्वर से प्रार्थना करो कि यह इससे पहले ही मर जाए, वरना एस०पी० साहब इसकी हड्डियों तक का चूरमा बना डालेंगे।”

“डिप्टी कमिश्नर के अजीज का मामला है।” पहला बोला। “अगर यह मर गया तो एस०पी० साहब पर भी आफत आ जाएगी।”

तीनों सिपाही मेरे सम्बन्ध में बातें कर रहे थे। मैं खामोश पड़ा उनकी बातें सुनता रहा। फिर अचानक मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी हो। मैंने धड़कते दिल से सिर की ओर नज़र डाली तो मोहिनी सचमुच वहाँ उपस्थित थी।

मोहिनी के चेहरे पर गहरी संजीदगी थी और आँखों में क्रोध और असफलता के मिले-जुले भाव नज़र आते थे। वह बड़ी थकी-थकी उदास नज़र आ रही थी। किसी बेवा की तरह उजाड़-उजाड़ सी।

मैंने उसे गौर से देखा तो उसने नज़रें झुका लीं। मैंने काँपते हुए स्वर में उससे पूछा– “मोहिनी ? असफल लौटी हो ना ? वह हाथ नहीं आया ना ?”

“राज!” मोहिनी सिसक पड़ी।

“मुझे उत्तर क्यों नहीं देती मोहिनी ?” मैंने डूबते स्वर में कहा। “क्या वह कमीना पंडित तुम्हारे हाथ से भी बच निकलने में सफल हो गया ?”

“राज!” वह हिचकियाँ लेती हुई बोली। “डॉली की मौत का गम मुझे भी तुमसे कम नहीं है लेकिन...”

“मैं हरि आनन्द के बारे में पूछ रहा हूँ मोहिनी ?” मैंने धीरे से कहा। “मुझे बताओ कि तुम अब तक कहाँ गायब थीं और वह कमीना कहाँ है ? क्या तुम मेरी हालत नहीं देख रही हो। मैं अपनी डॉली के खून में लथपथ हूँ। देखो, मैं रंगा हुआ हूँ। मैं आज कितना अच्छा लग रहा हूँ। हाय, मुझे यह दिन भी देखना था।”

“ऐसी बातें न करो। मैं उसके पीछे लगी हुई थी राज! मेरे आका! लेकिन इससे पहले कि मैं उसे मौत के शिकंजे में दबोच सकती, वह अपने मठ में चला गया। मैं अभी तक उसके बाहर आने का इंतजार कर रही थी राज। मगर वह नहीं निकला।”

“तुमने उसके बाहर आने का इंतजार क्यों किया ? क्या तुम मठ में दाखिल होकर उस कमीने बदजात को टुकड़े-टुकड़े नहीं कर सकती थी ?”

“मैं ऐसा नहीं कर सकती राज! ऐसा कर सकती तो यूँ वापिस न आती। मैं वह दीवार ढाने में असमर्थ थी।”

“तुम भी अपनी मजबूरी का प्रदर्शन कर रही हो। तुम्हारी वह रहस्मय शक्तियाँ कहाँ गयी जिन्हें कब्जे में लेने के लिये बहुत से लोग पागल हो जाते हैं।” मैंने व्यंग्य भरे स्वर में कहा। “देखो इस अवसर पर तुम भी नाकाम हो गयी।”

“राज, तुम ऐसी बातें क्यों कर रहे हो ?” मोहिनी ने हसरत से कहा। “तुम्हें मेरी ताकत का अंदाजा है लेकिन काली माई की पूजा गृह में घुसकर खून-खराबा करना मेरे बस की बात नहीं है। विश्वास करो, जिस दिन भी हरि आनन्द मठ की पूजा गृह से बाहर आ गया। वह उसकी ज़िन्दगी का आखिरी दिन होगा। मैं उससे डॉली की मौत का इतना भयानक बदला लूँगी कि धरती काँप उठेगी। मुझे भी डॉली से तुमसे कम प्रेम नहीं था।”

मोहिनी की बात सुनकर मेरी सहन शक्ति जवाब दे गयी। मैंने तेजी से कहा– “अब क्या सोचा है ? क्या मैं इसी तरह यहाँ पड़ा रहूँगा ? क्या अब तुमने मुझे हवालात से बाहर निकालने की शक्ति भी नहीं है ?”
 
“इसकी चिन्ता क्यों करते हो ? मैं आ गयी हूँ।” मोहिनी ने जल्दी से उत्तर दिया। “मेहता ने तुम्हें सिर्फ डिप्टी कमिश्नर के कहने पर हिरासत में लिया है, वरना उसे वह पत्र मिल गया था। जिसमें राजकुमार ने आत्महत्या की स्वीकृति लिखी थी। इन बदमाशों ने यह मालूम कर लिया है कि तुम कुलवन्त के साथ थे। कुलवन्त से जबरदस्ती उगलवा लिया है। वह इन पुलिस वालों के चक्कर में आ गयी और न जाने क्या-क्या उगलवा लिया है।”

“हरामजादों ने मुझे डॉली के अंतिम दर्शन भी नहीं करने दिए। न जाने इन्होंने उसकी लाश के साथ क्या बर्ताव किया।”

“तुम फिक्र न करो राज! मैं इस जुल्म के लिये मेहता और उसके लोगों को भी माफ नहीं करूँगी। डिप्टी कमिश्नर को भी अपने पद के नाजायज़ इस्तेमाल के लिये पछताना पड़ेगा। तुम अपने-आपको इतना छोटा मत समझो राज। जब तक मोहिनी तुम्हारे साथ है। यह लोग तुम्हारे सामने तुच्छ कीड़ों के समान हैं। इनकी बिसात ही क्या जो मेरे राज से मुकाबला कर सकें।”

“मुझे डॉली के बारे में बताओ, उसकी लाश का क्या बना ?”

“राज!” मोहिनी मद्धिम आवाज़ में बोली। “मेहता ने डॉली के पोस्टमार्टम के बाद उसको रस्म के मुताबिक यहीं दफना दिया है।”

“मेरे ईश्वर।” मैंने सिर के बाल नोच लिये । “मैं मर क्यों न गया ?”

अभी मैं डॉली की याद में आँसू बहा रहा था कि सन्तरियों की ऐड़ियाँ बज उठी। मैंने राहदरी में नज़र डाली। एस०पी० मेहता चमड़े की एक बैंत लिये हवालात के दरवाज़े की तरफ आ रहा था। मेहता ने सिर की जुम्बिश से सन्तरियों के सैल्यूट का जवाब दिया । फिर भारी गरजदार आवाज़ में इंचार्ज से पूछा।

“उस मरदूद को होश आ गया ?”

“पन्द्रह मिनट पहले मैंने राउंड लिया था। उस वक्त तक बेहोश ही था।” इंचार्ज ने झूठ बोलने की कोशिश की।

मेहता के इशारे पर हवालात का दरवाज़ा खोला गया और बाहर से बत्ती रौशन कर दी गयी। अँधेरे के बाद तेज रोशनी हुई तो मैंने जल्दी से आँखें बन्द कर लीं। भारी कदमों की आहटें मेरे निकट ठहर गयी। मोहिनी के आ जाने से मेरा भय खत्म हो गया था, इसलिए मैंने फौरन ही दोबारा आँखें खोल दीं।

एस०पी० ने मुझे होश में देखा तो नफरत से मुझे सम्बोधित किया। “अब क्या इरादे हैं तेरे ? क्या मुझे और सख्ती पर मजबूर करेगा ?”

“मिस्टर मेहता! तुम क्यों डिप्टी कमिश्नर के कहने पर अपना धर्म नष्ट कर रहे हो ? शहादतें वक्ती तौर पर छिपाई जा सकती हैं। पर कोई भी क़ानून इतना अँधा नहीं होता कि बिना सबूत के किसी को फाँसी पर लटका दे।”

मेहता चौंका। उसे इस बात की तो कतई उम्मीद नहीं थी कि मैं उसे इस तरह का उत्तर दूँगा।

“किसकी शहादत की बात कर रहा है तू ? मैं खूब जानता हूँ। तूने थर्ड डिग्री से बचने की खातिर बहकी-बहकी बातें शुरू कर दी हैं।”

“मैं उस पत्र की बात कर रहा हूँ मेहता जी, जो तुम्हें राजकुमार की जेब से मिला है।”

मैंने जल्दी में कह तो दिया किन्तु जल्दी ही बात सम्भालता हुआ बोला, “तुम्हारे मुखबिरों ने यकीनन मुझे मौका-ए-वारदात पर देखा होगा, लेकिन उन्होंने यह भी बताया होगा कि राजकुमार ने आत्महत्या की थी। उसने वह पत्र मेरे सामने ही लिखा था। लेकिन इससे पहले कि मैं उसे इस खतरनाक इरादे से रोक पाता वह रिवाल्वर चला चुका था। कुलवन्त भी इस बात की गवाह है।”

“शटअप!” मेहता हलक फाड़कर चीखा। उसके चेहरे पर एक क्षण के लिये उलझन उभरी फिर गायब हो गयी। वह गरज कर बोला, “तू बकवास कर रहा है। उसका कोई पत्र नहीं मिला।”

“अच्छा, तो डिप्टी कमीश्नर के रुतबे ने तुम्हें झूठ बोलने पर भी मजबूर कर दिया।”

“बकवास बंद कर नहीं तो चमड़ी उधेड़ डालूँगा।” इस बार हवालात के इंचार्ज ने मुझे एस०पी० पर मक्खन मारने के लिये धमकी दी।

ठीक उसी समय मोहिनी मेरे सिर से उतर गयी। एस०पी० निरंतर मुझे खा जाने वाली नजरों से घूर रहा था। देर तक वह कुछ सोचता रहा फिर सर्द आवाज़ में बोला।

“मैं तुझे खुली अदालत में पेश करने की बजाय किसी वीराने में ले जाकर खामोशी से मौत के घाट उतार सकता हूँ।”

“तुम ऐसा नहीं कर सकोगे मेहता! डिप्टी कमिश्नर तुम्हें इसकी आज्ञा नहीं देगा।” मैंने घृणा भरे स्वर में कहा। “मुझे फाँसी के फंदे तक ले जाने के लिये तुम्हें जबरदस्त झूठ का सहारा लेना पड़ेगा। तुम इसके लिये मजबूर हो। अगर सिर्फ मुझे मार डालना तुम्हारा उद्देश्य होता तो तुम इस समय हवालात में मौजूद होने की बजाय किसी क्लब में बैठे रंगरलियाँ मना रहे होते।”
 
“तो तू सीधी तरह नहीं मानेगा।” मेहता के हाथ काँपने लगे। वह किसी खूँखार दरिन्दे की तरह दहाड़ा। “मैं तुझे अब इस काबिल नहीं छोड़ूँगा कि तू अदालत के सामने अपनी गंदी जुबान खोल सके।”

मैं यह महसूस किए बिना न रह सका कि मेहता ने मुझे जो धमकी दी है, वह उसे पूरा किए बिना न रहेगा। उसका चेहरा क्रोध के कारण सुर्ख अंगारा हो रहा था। उसने इंचार्ज की तरफ देखा, फिर ठंडे स्वर में कहा–

“प्रमोद! अब जो हिदायत दी जा रही है, उसे तो पूरी करोगे। इस आदमी ने निश्चय ही और भी क़त्ल किए हैं। यह खतरनाक किस्म का कोई पेशेवर हत्यारा है। अगर हमने इसकी पूरी जड़ खोद डाली तो यकीनन हम बड़ी तरक्की के हकदार होंगे। इसकी बातचीत से पता चलता है कि यह कोई छोटी चीज नहीं है।”

“यस सर!” इंचार्ज घबराकर अटेंशन हो गया।

“इलेक्ट्रिक शॉक!” मेहता ने खौफनाक अन्दाज में कहा। “जब तक अपना मानसिक संतुलन न खो बैठे।”

इंचार्ज ने आज्ञाकारी सेवक की तरह सिर हिलाया लेकिन दूसरे ही क्षण उसकी नजरें बदल गईं और उसने मेहता को विचित्र सी दृष्टि से देखना शुरू कर दिया। “क्या आप मुझे इसके लिये लिखित आज्ञा देंगे।”

“नॉनसेन्स!” मेहता बिफरे स्वर में बोला। “क्या तुम जानते हो कि तुम किससे बात कर रहे हो ?”

“जानता हूँ सर! लेकिन लिखित आदेश के बिना मैं इतना खतरनाक कदम नहीं उठा सकूँगा।” प्रमोद ने बिल्कुल स्पष्ट और लापरवाही से उत्तर दिया । “आपकी लिखित अनुमति पर तो मैं इसकी धज्जियाँ भी उड़ाने के लिये तैयार हूँ।”

“गेट आउट!” एस०पी० इतनी जोर से चिल्लाया कि हवालात में मौजूद सिपाही बौखलाकर दो कदम पीछे हट गए। “मैं तुम्हें जूते मारकर नौकरी से डिसमिस कर दूँगा। तुम्हारी इतनी हिम्मत कैसे हुई ?”

“मेहता, होश में आओ।” हवालात का इंचार्ज अचानक आपे से बाहर हो गया। होल्स्टर से रिवाल्वर निकालकर उसका रुख मेहता की तरफ करके कहने लगा। “तुमने मेरे स्टाफ के सामने मेरा अपमान किया है। तुम्हें इन सब की उपस्थिति में मुझसे माफी माँगनी पड़ेगी। अभी इसी वक्त। वरना मुजरिम की बजाय मैं तुम्हारा जिस्म छलनी कर दूँगा। तुम मुझे नहीं जानते मेहता साहब।”

“ओ... यू सन ऑफ अ बिच।”

मेहता के हाथ में दबी बेंत लहराकर भरपूर शक्ति से प्रमोद के गाल पर पड़ी और ऐन उसी वक्त प्रमोद के रिवाल्वर से दो धमाके हुए। गोली सही निशाने पर न लग सकी। एस०पी० के हाथ और पाँव से खून निकला और वह मुँह के बल फर्श पर ढेर हो गया। यह सब इतनी जल्दी हुआ कि हवालात में उपस्थित सिपाहियों को कुछ सोचने-समझने का अवसर ही न मिला।

मुझे अनुमान था कि एस०पी० अभी मरा नहीं है, बल्कि सिर्फ बेहोश हो गया है। रिवाल्वर फेंककर प्रमोद ने सहमी हुई नज़रों से सिपाहियों को देखा फिर झुककर मेहता के जिस्म का मुआइना करने लगा। उसका चेहरा पसीने से सराबोर हो रहा था। रंगत भय और आतंक के कारण पीली हो गयी थीं। सिपाही दूर खड़े फटी-फटी नज़रों से इसे देख रहे थे। कुछ क्षण बाद एक सिपाही ने एकदम आगे बढ़कर प्रमोद ने कहा-

“मुझे खेद है श्रीमान कि मैं आपको गिरफ्तार कर रहा हूँ।”

“तुम... लेकिन... यह सब कैसे हो गया, यह मैंने क्या कर दिया ?”

“इसका उत्तर कानून देगा श्रीमान! फिलहाल आप खुद को हिरासत में समझें।” सिपाही ने उखड़ी हुई आवाज़ में उत्तर दिया। फिर अपने साथियों को सम्बोधित करके बोला, “तुम लोग ख्याल रखना, मैं डिप्टी कमिश्नर साहब को फोन करने जा रहा हूँ।”

सिपाही अभी बाहर की तरफ बढ़ा ही था कि जो कुछ हुआ उसने मुझे भी हैरत में डाल दिया। दरवाजे के निकट खड़े एक सिपाही ने अचानक राइफल सीधी की और उस सिपाही के सिर पर पूरी शक्ति से दे मारी जो फोन करने जा रहा था। सिपाही पलक झपकते ही लहराकर गिर पड़ा। उसके बाद सिपाहियों में भी आपस में ठन गयी। मैं अभी उलझन में ही था कि मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी।

“राज! जितनी जल्दी संभव हो, यहाँ से निकल चलो। इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा।”

मैं धीरे से उठा और छिपते-छिपाते बाहर की तरफ कदम उठाने लगा। मैं मोहिनी का यह करिश्मा पहले भी कई बार देख चुका था। मोहिनी के सिर पर आते ही दर्द और कमजोरी हैरतअंगेज तौर पर खत्म हो गयी थी।

खुली सड़क पर आते ही मैंने तेजी से अपनी कोठी की तरफ दौड़ना शुरू किया। रास्ते में मुझे कोई मुश्किल पेश नहीं आयी। रात की तारीकी ने मुझे अपने दामन में समेट रखा था। मोहिनी ने मुझसे कहा कि जितनी जल्दी सम्भव हो, मैं इस क्षेत्र से बाहर निकल जाऊँ क्योंकि मामला संभलते ही दोबारा गिरफ्तारी का खतरा पैदा हो सकता है।

मैंने जल्दी-जल्दी नकदी जेवरात, डॉली के कपड़े और कुछ जरूरी सामान बाँधा। बाहर आकर गैराज से गाड़ी निकाली और उसे तेज रफ्तार से पहाड़ी की ढलवा सड़क पर चलाने लगा।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
 
दिल्ली तक का सफर मैंने ट्रेन में तय किया। यहाँ पहुँचकर मैंने तय किया कि कलकत्ते की यात्रा करूँगा। अभी मैं कोलकाता के लिये गाड़ी बदलने की तैयारी कर ही रहा था कि मोहिनी बैचैनी से मेरे सिर पर चहलकदमी करने लगी।

“राज! कोलकाता किस लिये जा रहे हो ?” मोहिनी ने पूछा।

“अगर मेरा अनुमान गलत नहीं तो इन लोगों का मठ वहीं है। उस तक पहुँचने में मुझे कोई कठिनाई नहीं होगी।”

“तुम्हारा मतलब हरि आनन्द से है।”

“हाँ मोहिनी, तुम खूब समझती हो! जब तक वह शैतान जिंदा है, मेरी ज़िन्दगी बेमानी है। मैं उन तमाम मठों को जलाकर राख कर दूँगा। अब हरि आनन्द ही नहीं, इस पूरे टोले से मेरी दुश्मनी है।”

“वहाँ पहुँचने का सही रास्ता जानते हो राज ?”

“मोहिनी, तुम भी मुझ पर व्यंग्य कसने लगी! तुम्हारे होते मुझे यह सब जानने की जरूरत ही क्या है ?”

“नहीं राज! मैं तुम पर व्यंग्य नहीं कस रही हूँ।”

“तो फिर क्या तुम मेरा साथ नहीं देना चाहती।”

मोहिनी तड़पकर बोली- “यह तुम क्यों बेरुखी की बातें करते हो। मैं जो कुछ सोचती हूँ या करती हूँ, तुम्हारी भलाई के लिये करती हूँ। और अभी भलाई इसी में है कि तुम उस तरफ का रुख न करो।”

“तुम्हारा मतलब मैं उस पापी को ज़िन्दा छोड़ दूँ ? मैंने जो वादा डॉली से किया है उससे मुकर जाऊँ ?”

“यह मैंने कब कहा ? तुम बस हरि आनन्द के बाहर आने का इंतजार करो। मैं पलक झपकते ही उसे जान लूँगी। मेरे लिये हज़ारों मील की दूरियाँ भी कोई महत्व नहीं रखती। नहीं राज, मैं तुम्हें इस वक्त वहाँ नहीं जाने दूँगी।”

“मोहिनी...!” मैं चीख पड़ा। “तुम मुझ पर हुक्म चलाने से बाज आओ। याद रखो, मैंने तुम्हें मंत्रों की शक्ति से प्राप्त किया है। अब मैं वह राज नहीं हूँ। तुम्हें वही करना पड़ेगा जो...।”

अचानक मुझे अपने सिर में भयानक पीड़ा महसूस हुई और मेरी आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा। मैं अपना वाक्य पूरा करने से पहले ही चेतना शून्य हो गया।

अपने गालों पर नमी का आभास पाते ही मुझे होश आने लगा। मैंने अपनी बोझिल आँखें खोल दीं और यह देखकर मेरे आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा कि कुलवन्त मेरे सिरहाने बैठी थी। उसका हसीन चेहरा कुम्हलाया हुआ था और पलकों पर आँसू थे।

“यह मैं कहाँ आ गया हूँ ?” मैंने हड़बड़ाकर अपने आस-पास का जायज़ा लिया। उस समय मैं किसी खूबसूरत कमरे में था। मस्तिष्क पर जोर देने से भी कुछ समझ में नहीं आया कि यह कमरा कहाँ है ? मैं आँखें झपकाता रहा। कुलवन्त ने यह हालत देखकर मेरी आँखों पर हाथ रख दिया।

“मैं कहाँ हूँ ? यह कौन सी जगह है ? तुम मेरे पास कब आयी ?” मैंने कुलवन्त से एक साथ अनेक प्रश्न किए।

“क्या मतलब ? क्या तुम्हें नहीं मालूम कि तुम कहाँ हो ?” कुलवन्त ने आश्चर्य से पूछा।

“हाँ, मैं दिल्ली में हूँ! मगर मैं इस जगह कैसे आ गया ? तुम यहाँ किस तरह आ गयी ? तुम्हें मेरा पता किस तरह मिला ?” मैंने उसे खाली-खाली नजरों से देखा।

“उफ़्फ...! सदमे ने तुम्हें किस हालत में पहुँचा दिया है। यह दिल्ली नहीं पूना है। मैंने बड़ी मुश्किलों से तुम्हें तलाश किया है। तुम्हें पाने के लिये पूरे एक साल न जाने कहाँ-कहाँ मुझे खाक छाननी पड़ी।”

कुलवन्त की आँखों से आँसू बह निकले। “मैंने अपना घर छोड़ दिया। अपने माँ-बाप, अपने समाज से बगावत कर दी और तुम्हारी दीवानी होकर भटकती रही एक साल।”

“एक साल ? यह तुम कह रही हो। क्या भूल गयी, अभी चन्द रोज पहले तो तुम कश्मीर में मिली थी। जहाँ मेरी डॉली मुझसे छीन ली गयी थी। मैं बर्बाद हो गया था। उसके बाद मैं वहाँ से भागकर दिल्ली चला आया। मेरा ख्याल है इस बात को एक हफ्ता भी नहीं हुआ। और अब तुम कहती हो मैं पूना में हूँ। एक साल से तुम मुझे खोज रही हो।”

“तुम्हारे दिमाग पर गहरा प्रभाव पड़ा है। तुम्हें आराम की जरूरत है। मुझे क्या मालूम था कि तुम यहाँ हो। मैं तो न जाने कहाँ-कहाँ भटक रही थी कि भगवान की कृपा से आज तुम मुझे मिल गए। मैं एक होटल से दूसरे होटल तुम्हें तलाश कर रही थी। जब तुम कहीं न मिले तो पूना चली आयी और कल रात तुम अचानक मुझे नज़र आ गए। रात से मैं यहीं हूँ। तुम्हारे जागने का इंतजार कर रही थी।” कुलवन्त ने प्यार भरी दृष्टि से मुझे देखा।

मेरी समझ में कुछ नहीं आया कि वह क्या कह रही है। मुझे तो इतना याद था कि जब मैं दिल्ली से कोलकाता जाने की तैयारी कर रहा था तभी मैं बेहोश हो गया था।
 
अचानक मुझे मोहिनी का ख्याल आया। मेरी इस रहस्यमय गुत्थी का उत्तर सिर्फ मोहिनी दे सकती थी। मैंने कल्पना के झरोखे से उस पर दृष्टि डाली तो वह सिर पर लेटी थी और छत की तरफ टकटकी लगाये देख रही थी जैसे मुझसे कटी हुई हो या मुझसे बात ही न करना चाहती हो।

मैंने मुँह से एक भी शब्द नहीं निकाला इसलिए कि कुलवन्त सामने बैठी थी। मगर मोहिनी मेरे दिल में छिपे प्रश्नों को ताड़ गयी। उसने अचानक करवट ली और उठ बैठी।

“मुझे क्षमा कर दो राज। मैंने एक अरसे के लिये तुम पर अधिकार जमा लिया था और तुम्हारी याददाश्त गँवा दी थी। अगर मैं ऐसा न करती तो मुझे संदेह था कि तुम अपना मानसिक संतुलन खो बैठते। अगर तुम कोलकाता चले गये होते तो तुम हरि आनन्द के मठ का रास्ता जरूर नापते। जहाँ पहुँचने के बाद मैं तुम्हारी कोई मदद न कर सकती और तुम ज़िन्दा न लौटते। हरि आनन्द ने तुम्हारे लिये वहाँ पूरा इंतजाम कर रखा था। वह जानता था तुम वहाँ जरूर पहुँचोगे।”

“क्या उस घटना को सचमुच एक साल बीत गया ?” मैंने मन ही मन मोहिनी से पूछा। “मेरी तो कुछ समझ में नहीं आया। जरा विवरण से बताओ।”

“हाँ, एक साल के करीब!” मोहिनी ने उत्तर दिया ।”जब मुझे यकीन हो गया कि तुम मठ के काली मन्दिर तक जरूर पहुँचोगे और अपना संतुलन गँवा बैठे हो और अब कोई ताकत तुम्हें तुम्हारे खतरनाक इरादे से नहीं रोक सकती तो मुझे एक ही सूरत नज़र आयी कि मैं तुम्हारे मस्तिष्क पर पूरी तरह अपना अधिकार जमा लूँ। वरना मठ की सीमा में एक बार पहुँचने के बाद तुम बचकर नहीं निकल सकते थे। उसके बाद मैं तुम्हें विभिन्न शहरों में ले गयी। मुम्बई, इलाहाबाद, पहाड़ों पर, खेल के मैदानों में, रेस में, क्लब में। तुम इस पूरे अरसे में बड़ी शानदार ज़िन्दगी बिताते रहे। मैंने तुम्हें हर तरह खुश रखा। रातों को जब तुम गहरी नींद में होते तो समय-समय पर मैं तुम्हारे सिर से जुदा हो जाती थी। मुझ निगोड़ी को अपने भोजन की व्यवस्था भी करनी होती थी। वरना प्यारे मैं तुम्हें एक पल के लिये भी नहीं छोड़ती। बहरहाल अब मुझे यकीन है कि तुम बुद्धि से काम लोगे। कुलवन्त तुम्हारी वजह से बहुत परेशान रही है। मैंने मुम्बई में इसे पागलों की तरह तुम्हें तलाश करते देखा था। पहले मैं तुम्हें उससे दूर-दूर रखती रही पर जब कुलवन्त के पागलपन में कोई कमी नहीं आयी तो मैं तुम्हें पूना ले आयी और उसे भी पूना आने पर मजबूर किया। और देखो अब वह तुम्हें पाकर खुश है।

“हनी, तुमने अच्छा नहीं किया! क्या तुम समझती हो कि वक्त मुझसे डॉली का गम छीन लेगा ? तुमने मुझे मार ही क्यों न दिया। ऐसी ज़िन्दगी से तो मौत बेहतर है। डॉली के बिना ज़िन्दगी कैसी, खुशियाँ कैसी ?”

“वक्त के मरहम से हर ज़ख्म भर जाता है राज! सब्र करो और वक्त का इंतजार करो! उस वक्त तक इंतजार करो जब तक हरि आनन्द मठ से बाहर नहीं आ जाता।”

“तो क्या वह शैतान अब भी वहीं है ?”

“हाँ! और उसे यकीन है कि अगर उसने बाहर कदम निकाला तो उसकी ज़िन्दगी खतरे में पड़ जाएगी।”

“यह इंतजार कितना लम्बा होगा ?”

“कौन कह सकता है! फिर भी उसे किसी न किसी दिन तो जरूर बाहर आना है।”

“और उस वक्त तक मैं उसके इंतजार में दीवाना बना रहूँगा, क्यों ?”

“तुम कुलवन्त की तरफ देखो। मैं तुम्हारे साथ हूँ। एक बड़ी रहस्यमय शक्ति जिसे प्राप्त करने के लिये लोग कठिन तपस्या करते हैं और अपनी ज़िन्दगी तक दाँव पर लगा देते हैं।”

“मैं मानता हूँ कि तुम एक रहस्यमय शक्ति हो लेकिन इस मामले में तुमने क्या तीर मारा है ? तुम भी तो मायूसी की बातें कर रही हो।”

“मैं तुम्हें इसका उत्तर देना नहीं चाहती।”
 
मैं दिल ही दिल में मोहिनी से बातें कर रहा था और कुलवन्त मेरे निकट बैठी टकटकी बाँधे मुझे देखे जा रही थी। मुझे देर तक खामोश पाकर उसने दबी जुबान में कहा ।

“राज! जो कुछ तुम पर गुजरी है उसका मुझे भारी खेद है। भगवान की सौगंध खाकर कहती हूँ कि अगर डॉली जीवित होती तो मैं सारा जीवन उसके चरण धो-धोकर पीती परन्तु उसका अधिकार कभी न छीनती।”

“कुलवन्त! तुमसे मुझे कोई शिकायत नहीं है। लेकिन मेरी खातिर तुमने अपनी ज़िन्दगी बर्बाद करके अच्छा नहीं किया। मैं एक ज़िंदा लाश हूँ और तुम्हें एक ज़िंदा लाश से कुछ हासिल नहीं होगा। उचित होगा कि तुम अपने माँ-बाप के पास वापस चली जाओ।”

“ईश्वर के लिये ऐसा न कहो राज।” कुलवन्त एकदम से मुझसे लिपट गयी। तुम्हारे बिना मेरा जीवन बेकार है। मैं तुम्हारी दासी हूँ। मुझे चरणों में ही रहने दो राज। मैं इससे अधिक तुमसे कुछ नहीं माँगूँगी। तुम्हारे सीने में दिल है तो मुझे महसूस करो।”

कुलवन्त मेरे सीने पर सिर रखे रोती रही। मैंने उसे बहुत समझाया लेकिन वह किसी भी सूरत में मुझसे अलग होने के लिये तैयार न थी। मोहिनी खामोशी से सब कुछ सुन रही थी। कुलवन्त की हालत देखकर बोली-

“यह एक शरीफ और इज्जतदार लड़की है। इस गरीब को किस जुर्म की सज़ा दे रहे हो राज ?”

“तुम इसकी इतनी सिफारिश क्यों कर रही हो ?” मैंने चुभते हुए स्वर में कहा।

“इसलिए कि वह तुमसे प्यार करती है। मेरी तरह। डॉली की तरह। और यूँ भी अब तुम्हें किसी सहारे की जरूत है।”

“मेरा दिल अब किसी चीज में नहीं लगता मोहिनी।”

“कुलवन्त का जी भी तुम्हारे सिवा किसी में नहीं लगता।” मैंने कुलवन्त की तरफ देखा। उसकी कुर्बानियाँ देखकर मेरे दिल में उसके लिये बेअख्तियार प्यार का जज़्बा उमड़ आया। मैं उसके उलझे बालों में उँगलियों से कंघी करने लगा।

तीन दिन इसी तरह गुजर गये। होटल में पड़े-पड़े मेरा जी उक्ता गया था। मोहिनी हरि आनंद पर नज़र रखे हुए थी। मैं बहुत बेचैनी महसूस कर रहा था। जैसे मेरे सिर पर कोई बोझ मौजूद हो। चौथे रोज मैं मोहिनी से बातें कर रहा था कि अचानक मुझे त्रिवेणी याद आ गया। मैंने सोचा लगे हाथों उसका हिसाब भी साफ कर दूँ। एक दूसरी बात जो मेरे दिमाग में आयी वह यह कि त्रिवेणी भी उसी मण्डल का एक सदस्य रह चुका है जिसका कि हरि आनन्द है। अतः मैंने उसी शाम त्रिवेणी से मिलने का प्रोग्राम बना दिया।

कुलवन्त से मुझे अकेले बाहर जाने के लिये रोकने की बहुत कोशिश की। उसका संदेह था कि अभी मेरा मानसिक संतुलन दुरुस्त नहीं हुआ है। लेकिन मैं उसे समझा-बुझाकर होटल से बाहर आ गया। टैक्सी में बैठकर जब मैं त्रिवेणी की तरफ रवाना हुआ तो मोहिनी ने स्वयं ही कहा–

“त्रिवेणी आज कल ठाठ का जीवन व्यतीत कर रहा है, राज। उसने पूना के एक और पुजारी से गठजोड़ कर लिया है। कुछ मंतर-जंतर पहले ही जानता था। काम चला रहा है अपना।”

“हो सकता है त्रिवेणी के लिये यह शाम ज़िन्दगी की आखिरी शाम साबित हो।” मैंने सरसरी अंदाज में कहा। “मुझे याद है कि उसने मेरे साथ क्या व्यवहार किया था।”

“उसे जरूर सजा दो राज! वह बड़ा अय्याश व्यक्ति है। मुझसे अधिक उसे कौन जानेगा।”

टैक्सी जब त्रिवेणी के मकान के सामने पहुँचकर रुकी। तो मैं आश्चर्यचकित रह गया। क्योंकि जो हवेली मैंने मोहिनी के जरिये जलाकर राख कर दी थी । वह अब पहले से भी अधिक शानदार रूप में मेरे सामने खड़ी थी। फाटक पर खड़े दरबान को मोहिनी ने अपने अधिकार में ले लिया था इसलिए उसने मेरी तरफ देखा तक नहीं। हवेली का भीतरी नक्शा पहले जैसा ही था। मैं सीधा त्रिवेणी के शयनकक्ष की ओर चल पड़ा। अन्दर पहुँचा तो त्रिवेणी के पास दो-तीन सुन्दर लड़कियाँ बैठी नज़र आयी। मेरी रगों का खून तेज हो गया। जिस त्रिवेणी को मैं बदतर हालत में देखने का इच्छुक था, वह मेरे सामने बेहतरीन हालत में मौजूद था।
 
Back
Top