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Fantasy मोहिनी

त्रिवेणी की नजरें मुझसे चार हुई तो वह स्तब्ध रह गया। शायद उसे अपनी नज़रों पर संदेह हो रहा था। वह आश्चर्य से मुझे ताकता रहा। फिर एक लड़की को अपने पहलू से हटाकर तेजी से उठा और मेरे निकट आकर हाथ बाँध कर बोला-

“मेरे बड़े भाग कुँवर साहब जो आपने मुझे याद रखा।”

लड़कियाँ अपना अस्त-व्यस्त लिबास संभालती हुई दूसरी कमरे में जा चुकी थीं। मैंने त्रिवेणी की आँखों में आँखें डालकर नफरत से जवाब दिया।

“त्रिवेणी! तुमने यह कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हें भूल जाऊँगा। तुमने तो मुझ पर बड़े अहसान किए हैं। आज तक मुझे तुम्हारा व्यवहार अच्छी तरह याद है। मुझे हैरत है कि तुम अभी तक ज़िन्दा हो। तुम्हें तो मर जाना चाहिए था। या अपने ढीठपन की वजह से ज़िन्दा ही हो तो तुम्हें फुटपाथ पर भीख माँगते नज़र आना चाहिये था।”

“पधारिये कुँवर साहब!” त्रिवेणी ने चापलूसी से कहा। “गुजरी हुई बातें भूल जाइए।”

“चापलूसी बन्द करो त्रिवेणी ? तुम खूब समझ रहे हो कि मैं किस इरादे से आया हूँ।” मैंने संयत स्वर में कहा। “पिछली बार मैं जरा जल्दी में था इसलिए तुम्हारे अहसानों का बदला नहीं चुका सका था। लेकिन आज मैं अगले पिछले सभी हिसाब करने के इरादे से आया हूँ।”

त्रिवेणी ने मेरे बिगड़े हुए तेवर को देखा तो हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। “कुँवर साहब। मुझे क्षमा कर दीजिये। मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ।”

“क्षमा कर दूँ और तुम्हें... ?” पहली बार मेरे होंठों पर व्यंग्य भरी मुस्कराहट उभरी। “पिछली बातें याद करो त्रिवेणी दास। तुमने भी कभी मुझे क्षमा करने की कोशिश की थी।”

जवाब में त्रिवेणी ने झुककर मेरे पैर पकड़ लिये और गिड़गिड़ा कर बोला- “कुँवर साहब ? मैं जानता हूँ कि मैंने आपके साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया। परन्तु पहले मेरी आँखों पर पर्दा पड़ा हुआ था। मैं अँधा हो गया था। मुझे क्षमा कर दीजिये कुँवर साहब।”

मैंने क्रोध से त्रिवेणी के सिर के बाल पकड़ लिये और उसे उठाकर खड़ा करते हुए नफरत से कहा।

“त्रिवेणी दास! तुमने मुझसे मोहिनी छीनकर मेरी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी थी। तुम अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि तुम्हारी इस हरकत से मुझे कितनी भारी हानि उठानी पड़ी। सुनो त्रिवेणी। मैं यहाँ वक्त ज़ाया करने नहीं आया हूँ। तुमने बहुत दिन आराम से गुजारे। आज से तुम्हारे बुरे दिनों का प्रारम्भ होता है। मैं तुम्हें अपाहिज करके सड़क पर भीख माँगने के लिये मजबूर कर दूँगा। आवारा कुत्तों की तरह गंदी नालियों में पड़े रहोगे और कोई व्यक्ति तुम पर तरस न खाएगा। मैं तुम्हें सिसक-सिसककर, तड़पा-तड़पा कर बड़ा घिनौना जीवन बिताने पर मजबूर कर दूँगा। इत्मीनान रखो, मैं तुम्हें जान से नहीं मारूँगा।”

त्रिवेणी सिर से पाँव तक इस तरह लरज रहा था। जैसे उसने कड़कड़ाती सर्दी में ठण्डे पानी से स्नान कर लिया हो। उसकी आँखों में मौत के साए काँप रहे थे। चेहरे की रंगत जर्द पड़ चुकी थी। वह मुझे रहम भरी दृष्टि से देखकर हकलाता हुआ बोला–

“कुँवर साहब! आपकी धर्म पत्नी पर जो कुछ बीती है उसने आपको व्याकुल कर दिया है, परन्तु अब आप मुझे अपना मित्र समझिए। शायद मैं आपके किसी काम आ जाऊँ। अगर आप मेरी सुने तो मैं आपको ऐसा उपाय बता सकता हूँ। जो पंडित हरि आनन्द को मठ से बाहर निकलने पर मजबूर कर देगा।”

“त्रिवेणी ?” हरि आनन्द का नाम सुनकर मैंने त्रिवेणी के बाल छोड़ दिए। और फिर उसे जहरीली नजरों से घूरता हुआ बोला।

“जल्दी बताओ। क्या तुम उस कमीने पंडित को मठ के बाहर निकालने में मेरी मदद कर सकते हो ?”
 
“हरि आनन्द महान शक्ति का स्वामी है कुँवर साहब! मैं उसका बाल भी बांका नहीं कर सकता, परन्तु मैं एक ऐसे धर्मात्मा को जनाता हूँ जो आपकी सहायता कर सकते हैं। अगर वह चाहें तो हरि आनन्द आपके चरणों में भी लौटने को तैयार हो सकता है। मुझे विश्वास है कि आप अवश्य सफल होंगे। मुझ पर विश्वास करें, एक बार आजमा कर देखें।”

“खुशामदी कुत्ते! जल्दी बता कि वह कौन है ? और मुझे कहाँ मिल सकता है ? याद रख, अगर तूने गलतबयानी से काम लिया तो अच्छा न होगा।”

मोहिनी बराबर मेरे सिर पर मौजूद थी। वह भी त्रिवेणी पर दृष्टि जमाए हुए थी। त्रिवेणी ने काँपते स्वर में कहा-

“मैं आपसे धोखा नहीं करूँगा कुँवर साहब! मैसूर की पहाड़ियों पर एक धर्मात्मा है। उनका शुभ नाम प्रेमलाल है। वह न जाने कितने वर्षों से ज्ञान ध्यान में मग्न हैं। उनकी शक्ति बजरंग बली की शक्ति के समान है। उसका कहा देवी-देवता भी नहीं टालते। अगर आपने उसका आशीर्वाद प्राप्त कर लिया तो हरि आनन्द मठ से बाहर निकलने पर मजबूर हो जाएगा। आप मोहिनी देवी से भी पूछ सकते हैं।”

“राज!” मोहिनी ने मेरे कानों में सरगोशी की। “त्रिवेणी बिलकुल सच कह रहा है। लेकिन प्रेमलाल तक तुम्हारा पहुँचना बहुत कठिन है। क्योंकि वह किसी व्यक्ति से मिलता नहीं है।”

“मैं हरि आनन्द के लिये बड़ा से बड़ा जोखिम उठा सकता हूँ।” मैंने दिल ही दिल में मोहिनी से कहा फिर त्रिवेणी को सम्बोधित करके पूछा- “डॉली की मौत का ज्ञान तुम्हें कैसे हुआ ?”

“आपकी कृपा है कुँवर साहब! पंडित पुजारियों की सेवा करके दो-चार गुर सीख लिये हैं। मोहिनी के आने से पहले थोड़ा बहुत आता-जाता तो था ही।”

“कुछ दिन और चैन की बंसी बजा लो त्रिवेणी! हरि आनन्द को ठिकाने लगाने के बाद तुमसे मिलूँगा।”

फिर मैं तेजी से पलट कर हवेली से बाहर निकल आया।

“अगर मेरा कहा सच निकले तो मुझे अवश्य क्षमा कर दीजिये कुँवर साहब!”

चलते समय त्रिवेणी की आवाज़ मेरे कानों से टकराई। किन्तु कोई उत्तर दिए बिना मैं चला आया।

मोहिनी किसी सोच में डूबी हुई थी। मैंने उसे छेड़ना उचित नहीं समझा। उधर मैं प्रेमलाल से मिलने का प्रोग्राम बना रहा था। होटल पहुँचकर मैंने सारी रात इसी पर गौर किया। मेरा दिल चाह रहा था कि उसी वक्त पूना से मैसूर के लिये रवाना हो जाऊँ। लेकिन मोहिनी की खामोशी देखकर मैंने बात दूसरे दिन पर टाल दी। मोहिनी हैरतअंगेज तौर पर खामोश सी थी।

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ramangarya wrote: ↑ 14 Jun 2021 23:16
Itni acchi kahani ko bich me mt choriye. Kripya ese kisi mikaam tk pahucha dijiye
 
मैं दूसरे ही दिन मैसूर के लिये रवाना हो गया। मैंने कोशिश की कि किसी तरह कुलवन्त रुक जाए लेकिन वह न मानी। मोहिनी ने भी उसे साथ ले जाने की सिफारिश की! आखिर मुझे शस्त्र फेंक देने पड़े।

इतना सब कुछ होने के बावजूद भी मुझे कुलवन्त से कोई मोहब्बत न थी लेकिन उसका तौर-तरीका चूँकि डॉली से मिलता-जुलता था इसलिए कभी-कभी गम्भीरता से मैं उसके बारे में सोचने लगता। फिर भी कुलवन्त की सेवा ने मुझे काफी प्रभावित किया।

मैसूर पहुँच कर मैंने पहाड़ी क्षेत्र का रुख किया। मैं दस रोज तक इधर-उधर ख़ाक छानता रहा। जिससे भी प्रेमलाल का पता पूछता वह अज्ञानता प्रकट करता। मोहिनी भी इस बीच अपने प्रयास करती रही। लेकिन उसकी रहस्यमय शक्तियाँ भी प्रेमलाल का पता मालूम करने में नाकाम रहीं।

मैं ग्यारहवें रोज दोपहर में एक जगह आराम करने के लिये रुक गया तो मोहिनी फिर मेरे सिर से उतर गयी। वह दो घंटे बाद वापिस लौटी तो उसके चेहरे पर सफलता के चिन्ह विराजमान थे। मेरी पूछताछ से पहले ही उसने कहा-

“राज! मेरे आका! मैंने मालूम कर लिया है कि प्रेमलाल कहाँ है ?”

“सच ?” मेरा दिल धड़कने लगा।

“हाँ राज! वह यहाँ से पूर्वी दिशा में दस कोस के फासले पर एक गार में बैठा देवताओं के जाप में मग्न है। हम कल तक वहाँ पहुँच जायेंगे।”

“तुम्हें यह सब मालूम करने में पहले क्या कठिनाई थी ?” मैंने पूछा।

“प्रेमलाल ने ऐसी रेखा खींच रखी है जिसके अन्दर की बात कोई नहीं जान सकता। यही कारण था जो आज तक मुझे असफलता मिलती रही। लेकिन आज संयोग से मुझे पहाड़ पर एक पुजारिन नजर आ गयी। मेरा माथा ठनका। मैंने उस पर अपनी शक्ति आजमाई तो उसने मुझे सब कुछ बता दिया। वह पुजारिन दो साल से प्रेमलाल की सेवा कर रही है। मुझे आश्चर्य है राज कि इतनी सुन्दर और जवान लड़की पहाड़ी के वीराने में भी खुश है।”

मैंने पुजारिन की खूबसूरती के बारे में कोई ध्यान नहीं दिया। कुछ देर आराम करने के बाद मैं उठा और पूरब की ओर चल पड़ा। कुलवन्त भी मेरे साथ थी। वह अब तक एक सच्ची दासी की तरह मेरी सेवा में मग्न रही थी। वह आश्चर्यजनक तौर पर बदल गयी थी। अब वह एक मॉडर्न लड़की न थी बल्कि बैरागिन बन गयी थी। मोहिनी के अनुमानुसार दूसरे रोज मैं उस क्षेत्र में पहुँच गया जहाँ प्रेमलाल किसी गार में बैठा जाप कर रहा था। पहाड़ी क्षेत्र का यह भू-भाग घने वृक्षों में छिपा हुआ था और ऐसी ढलान पर था कि साधारण इन्सान मुश्किल से ही उधर का रुख करते। यह बड़ी रहस्यमय जगह थी। प्रेमलाल ने सचमुच सोच-समझकर ही इस जगह का चुनाव किया था।

मैं वृक्षों के बीच से रास्ता बनाता हुआ आगे बढ़ रहा था कि मोहिनी ने कहा- “राज! तुम और कुलवन्त यहीं ठहरो। मैं कोशिश करती हूँ कि प्रेमलाल की सही स्थिति का पता लगा सकूँ।”

“क्या मतलब ?”

“देवी-देवताओं का जाप करते समय पुजारी दूसरे ही व्यक्तित्व में होते हैं। अगर प्रेमलाल इस समय उस स्थिति में हुआ तो फिर हमें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। जल्दबाजी से काम बिगड़ जाएगा।”

मोहिनी को गये हुए काफी देर हो गयी थी। जितनी देर होती जा रही थी, उतनी मेरी बेबसी बढ़ती जा रही थी। मैं एक वृक्ष से टेक लगाए बैठा मोहिनी की प्रतीक्षा कर रहा था। किसी झरने की आवाज़ उभर रही थी और थकान से भरा मेरा जिस्म चूर-चूर हो रहा था। पहाड़ी पर चढ़ने से साँस फूली हुई थी। मेरे मस्तिष्क में एक उपाय सूझा। अगर मैं स्नान कर लूँ तो थकान का अहसास खत्म हो जाएगा। आने वाले क्षणों से निपटने के लिये मेरा पूरी तरह तैयार होना जरूरी था। मैंने उठते हुए कुलवन्त से कहा-

“कुलवन्त! यहीं ठहरो। मैं ज़रा नहा कर आता हूँ।”
 
“यहाँ पानी कहाँ मिलेगा राज ?” कुलवन्त ने पूछा।

“मेरा ख्याल है कहीं करीब ही पहाड़ी झरना मौजूद है। क्या तुम पानी गिरने की आवाज़ नहीं सुन रही हो ?”

कुलवन्त ने एक क्षण सोचा, फिर बोली- “मुझे तो ऐसी कोई आवाज़ नहीं सुनाई देती।”

“आश्चर्य है! मुझे तो वह आवाज़ सुनाई दे रही है बल्कि किसी लड़की के भजन गाने की आवाज़ें भी सुनाई दे रही है। तुम यही ठहरो, मैं अभी देखकर आता हूँ।” मैंने कुलवन्त से कहा फिर वृक्षों के मध्य मार्ग बनाता आवाज की तरफ कदम उठाने लगा।

कुछ दूरी के बाद मैं एक खुली जगह पर पहुँच गया। आसपास नजर डाली तो झरना कहीं नजर न आया। अलबत्ता भजन और झरने की आवाज़ बढ़ गयी थी। मैं दोबारा आगे बढ़ने लगा। अभी मैं सौ कदम ही आगे बढ़ा था कि मुझे वृक्षों की आड़ में एक झरना नज़र आ गया। बड़ा दिलकश मंजर था। मैंने एक खूबसूरत प्राकृतिक दृश्य के साथ एक और जलवा देखा। वहाँ एक सुन्दर लड़की नहा रही थी। एकदम नग्नावस्था में उसे देखकर मेरा दिल हलक में आने लगा। वह मेरी कल्पना से भी परे की चीज थी। उसका बदन देखकर मैं सब कुछ भूल गया। मैं यह भी भूल गया कि मैं कुँवर राज हूँ और मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है और मैं एक उद्देश्य से यहाँ आया हूँ। यह खूबसूरत जिस्म, यह हरियाली, यह झरने और भजन की सुरीली आवाज़ें मेरी चेतना पर बिजली गिरा रही थीं। मैंने अपनी ज़िन्दगी में ऐसा हसीन नजारा पहले कभी नहीं देखा था। कोई सन्यासी भी होता तो डगमगाने लगता। मैं उसके बदन के जादू में खोया उसे देखता रहा और इसी बीच अचानक उसकी दृष्टि मुझ पर पड़ गयी।

उसने एक चीख मारकर हाथों से अपना शरीर छिपाना चाहा मगर दो हाथों की हथेलियाँ तो मुँह भी नहीं छिपा पातीं। फिर वह बैठ गयी। उसकी बेबसी देखकर मुझे आनन्द सा महसूस हुआ। मैंने उसे छेड़ने के लिये कहा-

“अरे! तुम तो घबरा गयी खूबसूरत लड़की। मैं तो सिर्फ तुम्हें देख रहा हूँ।”

“जाओ यहाँ से। तुम कौन हो ?” वह इस हालत में भाग नहीं सकती थी, न ही उठकर कपड़े पहन सकती थी। मुझे न जाने क्या हुआ कि मैं और आगे बढ़ गया।

वह चीख पड़ी। “दूर हटो यहाँ से! देखो, मेरी तरफ न आना!” फिर वह चीखने लगी। “महाराज... महाराज...!”

उसकी इस आतंक भरी मासूमियत से मुझ पर जुनून-सा सवार हो गया और मैंने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया और वह जोर से चीखने लगी। उसका चेहरा सुर्ख हो गया। वह तिलमिला कर बोली- “मेरे कपड़े उठा दो। नारी समझ कर बेबसी का फायदा उठा रहा है अधर्मी। अभी महाराज आ जायेंगे तो पता चल जाएगा।”

“महाराज क्या कर लेंगे ?” मैंने शोखी से कहा।

“वह तुझे भस्म कर देंगे।”

“मैं उनसे पूछूँगा कि इतनी सुन्दर नारी को जंगल में अकेला क्यों छोड़ रखा है। लोगों का धर्म तो खुद नष्ट हो जायेगा।”

“तू कौन है और कहाँ से आया है ?” उसने सहमे हुए स्वर में पूछा। “क्या तुझे नहीं मालूम कि यहाँ कोई नहीं आ सकता। यह महाराज प्रेमलाल का स्थान है।”

“मैं महाराज प्रेमलाल से ही मिलने आया हूँ।”

“वह किसी से नहीं मिलते। चला जा जा यहाँ से।”

“और अगर न जाऊँ तो। ?”

“तू अपनी मौत को खुद आवाज़ दे रहा है।”

“प्यारी लड़की! मुझे बताओ कि तुम कौन हो और यहाँ क्या करती हो ?”

“मैं एक पुजारिन हूँ पापी! देख, मुझ पर कोई जुल्म न करना! भगवान के लिये यहाँ से चला जा!”

पुजारिन, पुजारी और पण्डित। इन शब्दों से मुझे चिढ़ थी। मेरे हाथ में शक्ति आ गयी। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि यह मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी चूक थी। बात तो बहुत लम्बी हो गयी थी। मगर यहाँ उसको बयान करना उचित नहीं है। सारांश में यह बताना जरूरी है कि जब उस नारी की बेचैनी बढ़ती गयी तो उसने एक हाथ से एक पत्थर उठाकर मेरे सिर पर मारने की कोशिश की। मैं उससे केवल मजाक कर रहा था। पहले पत्थर का वार तो मैं बचा गया। मगर जब दूसरी बार पत्थर उठाने के लिये वह झुकी तो मैंने उसका हाथ मरोड़ दिया। वह दर्द से बिलबिला उठी। उसने अपना हाथ छुड़ाने के लिये जोर लगाना शुरू कर दिया। मैं पहले तो उसकी उपेक्षा करता रहा। मगर जब वह सीमा से आगे बढ़ गयी तो मैंने नरमी से कहा-

“मुझसे डरने की जरूरत नहीं सुन्दरी! क्या मैं तुम्हें कोई बुरा आदमी दिखायी देता हूँ ? सुनो, मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ लेकिन एक शर्त पर। तुम किसी तरह मुझे महाराज तक पहुँचा दो।” मैंने उसे छोड़ने के लिये एक बहाना तलाश किया।

“म... मैं तुम जैसे पापी और नीच आदमी को महाराज से नहीं मिला सकती। मुझे छोड़ दो।” फिर वह ‘महाराज, महाराज’ पुकारने लगी।
 
मैं उसे छोड़ देता लेकिन मैं उसे कैसे छोड़ सकता था और क्यों छोड़ देता ? कौन इस दिलकश मंजर, तन्हाई और लड़की के बेपनाह हुस्न से प्रभावित न होता। वह एक खूबसूरत लड़की थी। मैंने चाहा कि उसे छोड़ दूँ। मुझे कुछ भय भी हुआ लेकिन मैंने उसके सुन्दर शरीर के अंगारों को आँखों में दहकने के लिये कुछ और देर रोक लिया। वह चीखती-चिल्लाती और फरियाद करती रहती। मैं कुछ और बेरहम हो गया। बल्कि उससे बाकायदा छेड़खानी शुरू कर दी। मैं कुछ और आगे बढ़ा, यहाँ तक कि उसने रोना शुरू कर दिया। मुझ पर उस समय शैतान सवार था। वह प्रेमलाल की पुजारिन थी और मेरे दिल में पुजारियों के प्रति जो नफरत बैठ गयी थी उसका ताज़ा शिकार वह लड़की थी। वह कुछ ऐसी ही लड़की थी कि उस पर सितम ढाने में आनन्द महसूस होता था।

अभी मैं छेड़खानी की आखिरी सीमा पर पहुँचा ही था कि एकदम भयभीत अंदाज में मोहिनी मेरे सामने आ गयी। उसके चेहरे का रंग फक हो रहा था। घबराये स्वर में उसने मुझे सम्बोधित किया- “राज! इस पुजारिन को छोड़ दो! तुम यह अच्छा नहीं कर रहे हो। होश में आओ।”

“यह बहुत घमण्डी लड़की है। मैं इसे छोड़ देता लेकिन अब मुश्किल है। घबराओ नहीं, मैं इसे मारूँगा नहीं! आखिर तुम क्यों इसकी तरफदारी कर रही हो।” मैंने दिल ही दिल में मोहिनी से पूछा।

“तुम इस समय जो कुछ कर रहे हो वह बहुत बुरा है। प्रेमलाल तक इसकी आवाज़ें पहुँच गयी हैं। वह अभी-अभी अपना जाप छोड़कर मण्डल से बाहर निकला है और पुजारी जब अपना जाप छोड़ देते हैं तो कहर बन जाते हैं। तुमने एक महान शक्ति वाले धर्मात्मा की पुजारिन पर हाथ डालकर जबरदस्त खतरा मोल ले लिया है। प्रेमलाल महान शक्तियों का स्वामी है। तुमने बना-बनाया खेल बिगाड़ दिया है। अगर तुम इस समय प्रेमलाल के चक्कर में फँस गये तो मैं भी बेबस हो जाऊँगी। सुनो राज, मैं क्या कह रही हूँ! मेरी बात समझने की कोशिश करो। यहाँ से भाग चलो।”

मोहिनी की बातें सुनकर मैंने पुजारिन का हाथ छोड़ दिया। मैंने अपनी भावनाओं पर तुरन्त काबू पाया। फिर उसे उसके हाल पर छोड़कर अभी वृक्षों के झुण्ड में पहुँचा ही था कि मोहिनी ने मुझसे कहा- “लो, वह आ रहा है!”

मैंने दृष्टि उठाकर देखा तो दंग रह गया। हड्डियों का एक पिंजर पहाड़ी की ढलान पर आ रहा था। उसके चेहरे पर माँस नाम मात्र का था। परन्तु चेहरे पर बला का तेज था। उसकी आँखों से शोले लपक रहे थे। वह मेरे समीप आ रहा था और बड़ी तेजी से लुढ़कता किसी खतरनाक जादूगर की तरह मेरे तरफ आ रहा था। मैंने मायूसी से मोहिनी की तरफ देखा तो वह अफ़सोस से हाथ मलकर बोली-

“अब कुछ नहीं हो सकता राज! तुम खतरे में पूरी तरह घिर चुके हो। प्रेमलाल तुम्हें कभी क्षमा नहीं करेगा। तुमने गुस्से में पागल होकर और भावनाओं में बहकर अपने लिये खुद तबाही का सामान जुटा लिया है। गौर से सुन लो कि प्रेमलाल के सामने मुझे भी बेबस होना पड़ेगा।”

मैंने मोहिनी की जुबान से बेबसी का शब्द सुना तो घबराकर रह गया। मैंने नज़रें उठाकर प्रेमलाल की ओर देखा जो भयानक अंदाज में मेरी तरफ बढ़ रहा था। मेरे पैर कँप-कँपाने लगे और कंठ सूखने लगा। मुझ पर आतंक छा गया। मैंने फरार हो जाना चाहा, परन्तु फरार होने के लिये भी कोई रास्ता न था। हड्डियों का वह पिंजर मेरे निकट आता जा रहा था। उसके चेहरे और आँखों में ऐसा सम्मोहन था कि मेरे कदम जैसे जमीन पर चिपक गये। आने वाले व्यक्ति की नज़रों में शोले लपक रहे थे। मैंने मोहिनी की तरफ देखा। वह मायूसी और भय के आलम में टकटकी लगाये प्रेमलाल की ओर देख रही थी। मैंने डूबती हुई आवाज़ में उसे सम्बोधित किया।

“मोहिनी! जल्दी से मेरे बचाव की कोई सूरत पैदा करो! मैं इस वीराने में मरना नहीं चाहता।”

“तुमने जल्दबाजी में सारा खेल चौपट कर दिया है।” मोहिनी ने हाथ झटकते हुए जवाब दिया। “तुम प्रेमलाल की शक्ति का अनुमान नहीं लगा सकते। इसे देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त है। पार्वती के सामने मेरी शक्ति क्या काम करेगी ?”

“फिर अब क्या होगा ?” मैंने घबराकर पूछा।

“अब क्या होगा ? अब वही होगा जो प्रेमलाल चाहता है। यह इसका क्षेत्र है।” मोहिनी बोली। “बस अपनी हालत संभाल लो। अगर तुमने साहस छोड़ दिया तो हालात बिगड़ जाएँगे। मेरी बात ग़ौर से सुनो। कोशिश करना कि तुम्हें प्रेमलाल के सामने क्रोध न आने पाए। बहुत संतुलित रहने की आवश्यकता है। इस बार तुमसे कोई गलती हो गयी तो बचाव का कोई रास्ता न होगा।”
 
प्रेमलाल मुझसे लगभग दस कदम के फासले पर रुक गया। उसके चेहरे पर नाम मात्र का माँस था। उस भयानक सूरत के इन्सान को अपने निकट खड़ा देखकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। उसने अपनी जलती निगाहें मेरे काँपते शरीर पर डाली। उसकी पुतलियाँ सिकुड़ गईं। वह चंद क्षण तक खड़ा रहा जैसे मेरे भीतर का सारा हाल जान रहा हो। उसी समय वह पुजारिन वृक्ष की ओट से बाहर निकली। प्रेमलाल को मेरे सामने देखकर क्षण भर के लिये थमी फिर दौड़कर उसके कदमों में लिपट गयी और मुँह बिसूरती हुई बोली-

“बाबा! इस पापी ने अपने नापाक हाथ मेरे शरीर को लगाये हैं। अगर तुम न आते बाबा तो यह राक्षस मेरा धर्म नष्ट कर चुका होता। इसे ऐसा श्राप दो कि यह फिर कभी किसी लाचार नारी की ओर बुरी नज़र न डाल सके।”

प्रेमलाल ने बड़े प्यार से अपना हाथ पुजारिन के सिर पर रखा लेकिन उसकी सुर्ख नजरें मुझ पर ही गड़ी थी। शायद वह मेरे बारे में किसी उचित सजा के बारे में सोच रहा था। मोहिनी आने वाली परिस्थितियों से निपटने की कशमकश में दो-चार थी। उसकी मायूसी ने मेरी दहशत और भी बढ़ा दी। प्रेमलाल ने सिसकियाँ लेती पुजारिन के सिर पर हाथ फेरने के बाद उसे बाजू से पकड़कर उठा लिया और ऊपर की तरफ संकेत किया। पुजारिन मुझे घृणा से देखती हुई उसी दिशा में चली गयी। अचानक उसकी कड़कदार आवाज़ गूँजी । पिंजर होने के बावजूद भी उसकी आवाज़ में बादलों की सी गरज और बिजली सी चमक थी।

“पापी! माला ने जो कुछ कहा वह तूने सुना।”

उसकी आवाज़ से मुझे यूँ लगा जैसे इस क्षेत्र की हर चोटी, हर वृक्ष से यही आवाज़ गूँज रही हो। बहुत सी आत्मायें एक साथ गरज उठी हों। मैंने अपना कंठ तर करते हुए दया की भीख वाली दृष्टि से प्रेमलाल की ओर देखा। जुबान हिलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी।

“जानता है तूने किस लड़की पर हाथ डाला है।” प्रेमलाल गुर्राया।

“महाराज, मुझे क्षमा कर दो...!” मैंने काँपती आवाज़ में कहा।

“अगर मैं यहाँ न आ गया होता तो यह भूल एक पवित्र पुजारिन का जीवन नष्ट कर देती।”

“महाराज!” मैंने हाथ जोड़कर कहा। “मुझे क्षमा कर दो महाराज! चूँकि पुजारिन ने मुझे आपके चरणों तक ले जाने से मना किया था इसलिए मुझे क्रोध आ गया। मैं पागल हो गया था महाराज। मेरे मन में पाप नहीं था। मैं तो यूँ ही...।”

“तेरे मन में क्या था, मैं बताता हूँ।” प्रेमलाल ने खून उगलती नज़रें मुझ पर जमाते हुए कहा। “तेरे मन में पाप आ गया। मुझसे बातें न बना। तू जिस उद्देश्य से आया था उसे क्यों भूल गया। तू इतनी जल्दी अपनी पत्नी को भूल गया। पापी, तू तो अपनी पत्नी की मौत का बदला लेने में मेरी सहायता चाहता था। तू हरि आनन्द की मौत के लिये व्याकुल था जो काले जादूगरों के मठ में काली के मंदिर के अन्दर अपनी जान बचाये बैठा है। मेरे पास आने का सुझाव तुझे उस दुष्ट त्रिवेणी ने दिया था। परन्तु तू सब भूल गया। और बताऊँ तेरे मन में क्या है ?”

“सच है महाराज!” मैंने शीघ्रता से कहा। “मुझसे बड़ी भूल हो गयी। मैं इसलिए आपके चरणों तक आया था कि आपका आशीर्वाद प्राप्त कर सकूँ और हरि आनन्द को मौत के घाट उतार सकूँ। उस पापी ने मेरी डॉली को बड़ी बेदर्दी से मारा महाराज! जब तक मैं उसके खून से अपने हाथ नहीं रंग लूँगा, मुझे चैन नहीं आएगा।”

“बन्द कर अपनी ज़ुबान।” प्रेमलाल ने अपनी गरजदार आवाज़ में कहा। “पण्डित, पुजारियों के लिये ऐसे शब्द ज़ुबान से निकालते हुए तुझे शर्म नहीं आती। तूने हरि आनन्द को जो वचन दिया था। वह पूरा नहीं किया और तू अपनी पत्नी की मौत पर पागल हो रहा है। परन्तु तूने कभी यह भी सोचा कि खुद तेरे कारण कितने घर बर्बाद हुए हैं ? तूने कितने जीवन नष्ट किए हैं ? तूने अपना जीवन सुधारने के लिये कितने हँसते-मुस्कराते चेहरे कुम्हला दिए ? तूने देख लिया, तेरी शक्ति अब कितनी बेबस है। बड़ा घमण्ड था तुझे इस डेढ़ बालिस्त की सुन्दर देवी पर, इस छिपकली पर। हैं। बोल, अब कहाँ है तेरी मोहिनी ?”

मैंने कल्पना के झरोखे से मोहिनी को देखा तो वह मुझे बेचैन नज़र आयी। मैंने मुजरिमों की तरह प्रेमलाल के सामने सिर झुका दिया।

“माला का अपमान करके तूने मेरा अपमान किया है।” प्रेमलाल ने एक क्षण रुककर कहा। “तुझे इसकी सजा अवश्य मिलेगी । मैं तुझे ऐसा कष्ट दूँगा कि तू सारा जीवन याद रखेगा।”

मैं कोई उत्तर देने के लिये अपने में हिम्मत पैदा कर ही रहा था कि कुलवन्त मुझे तलाश करती हुई आ गयी। उसने बड़ी भयपूर्ण दृष्टि से यह दृश्य देखा। एक क्षण के लिये प्रेमलाल की दृष्टि कुलवन्त पर ठहरी तो मोहिनी ने मेरे कानों में सरगोशी की।

“राज! आगे बढ़कर प्रेमलाल के पैर थाम लो। हो सकता है वह तुम्हें क्षमा कर दे। यह व्यक्ति आम पण्डित पुजारियों से भिन्न है। असाधारण शक्तियों का मालिक होने के बावजूद बड़ा नेक है। शायद इसे तुम पर दया आ जाये।”
 
मैंने मोहिनी के सुझाव पर अमल किया और लपककर प्रेमलाल के पैर थाम लिये। जो बर्फ की तरह ठंडे हो रहे थे। मैंने गिड़गिड़ाकर उससे क्षमा माँगनी चाही लेकिन प्रेमलाल पाँव झटककर दो कदम पीछे हट गया और गरजता हुआ बोला–

“मूर्ख, यह विचार मन से निकाल दे कि मैं तुझे क्षमा कर दूँगा! तूने मेरी आत्मा को ठेस पहुँचाई है। तुझे इस पाप की सजा अवश्य मिलेगी। यह मोहिनी देवी तुझसे जो कुछ कह रही है। मैं सुन रहा हूँ। इससे कह दे कि यह बीच में न बोले।”

इतना कहकर प्रेमलाल ने नेत्र मूँद लिये और उसके होंठ हिलने शुरू हुए। मैं उठकर खड़ा हो गया और भयभीत दृष्टि से उसे घूरने लगा। अब मुझे विश्वास हो गया कि मेरी कोई फरियाद नहीं सुनी जायेगी। कुँवर राज के भाग्य में सुख के दिन बहुत कम लिखे हैं। न जाने अभी और क्या-क्या देखना पड़ेगा। मोहिनी की बेबसी ने मेरा विवेक समाप्त कर दिया। मैंने अपने-आपको परिस्थितियों के सुपुर्द कर दिया। डॉली के बाद जिंदगी वैसे भी बेमानी थी। प्रेमलाल मुझे अधिक से अधिक मौत की सज़ा देगा। अब मैं इसके लिये भी तैयार हूँ। लेकिन उसने मुझे मौत की सजा नहीं दी।

अभी मेरा दिल आने वाले भयानक क्षणों की कल्पना से गरज रहा था कि अचानक ऐसा महसूस हुआ जैसे क्षण-प्रतिक्षण मेरे शरीर की शक्ति समाप्त होती जा रही हो। मैंने घबराकर भागने की कोशिश की। लेकिन मैं एक कदम भी आगे न बढ़ा सका। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे अनगिनत हाथों ने मेरे पाँव पकड़ लिये हो। फिर मुझे ऐसा लगा जैसे जिस्म में आग सी लग रही हो। मैं त्योराकर ढलुवा पहाड़ी पर गिरा और मछली की तरह तड़पने लगा। मैं ज़िन्दगी और मौत की इस दर्दनाक कशमकश में इतनी देर तक फँसा रहा कि सोचने समझने की शक्तियाँ बेकार हो गयी और मुझ पर बेहोशी छा गयी।

जब ज़हन पर से धुंध छटी तो मैंने स्वयं को एक दूसरे स्थान पर पाया। यह प्रेमलाल की कुटिया का फर्श था। कुटिया में प्रेमलाल के अलावा माला और कुलवन्त भी मौजूद थीं। मैं अपने हाथ-पाँव भी न हिला पा रहा था। जिस्म के हर हिस्से से टीस उभर रही थी। मैंने आँखों को जुम्बिश दी। तो सारा वातावरण चकराता हुआ महसूस हुआ। प्रेमलाल एक चटाई पर चित लेटा हुआ था और वह दोनों उसके पैर दबा रही थीं।

मैंने मोहिनी को देखना चाहा, परन्तु उस समय वह मेरे सिर पर मौजूद नहीं थी। आँसू भी खुश्क हो गये थे। मैं रो भी नहीं सकता था। बस भय से कुटिया की पथरीली दीवारें ताकता रहा। जरा सी देर में क्या हो गया था। आदमी जब इस तरह के हालात में फँसता है तो उसे अपना अतीत याद आ जाता है। अपने पाप याद आ जाते हैं; और सोचता है कि यह उसे किन पापों की सजा मिल रही है ? ऐसा ही मैं भी सोच रहा था तो मुझे यूँ लगा मेरा अतीत तो गुनाह का एक ऐसा दलदल है कि उसकी इतनी सज़ा भी पर्याप्त नहीं।

अभी मैं यह सोच ही रहा था कि प्रेमलाल का कठोर स्वर मेरे कानों से टकराया– “अब क्या सोच रहा है। बहुत देर बाद ख्याल आया है तुझे ?”

मैंने बड़ी कठिनाई से सिर को जुम्बिश देकर दृष्टि उठायी। तो प्रेमलाल को बैठा हुआ पाया। उसके पीछे कुलवन्त और माला मूर्तिवत खड़ी थीं। कुलवन्त की निगाहों में हसरत ही हसरत थी। किन्तु माला के चेहरे से घृणा टपकती थी। मेरी बेबसी पर प्रेमलाल ने ठण्डे स्वर में कहा-

“कहाँ गयी वह गन्दी छिपकली ? तेरी सहायता करने वाली। तू उसे आवाज़ क्यों नहीं देता ? तूने तो उसे प्राप्त करने के लिये बड़े पापड़ बेले थे। बड़ी मुसीबतें उठायी थीं। परन्तु प्रकृति का यह खेल तेरी समझ में नहीं आया कि उसने हर शक्ति से बड़ी शक्ति पैदा की है। अगर लोगों को एक समान शक्ति दान कर दी जाए। तो यह संसार नर्क बन जाये। जय भोलेनाथ! क्या लीला है तेरी!”

मैंने प्रेमलाल की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। मुझमें इतनी शक्ति ही कहाँ था कि ज़ुबान हिला पाता। लाचारी की हालत में प्रेमलाल की बातें सुनता रहा। मेरे हलक में काँटे पड़ गये थे। मैं बड़ा सख्त इन्सान था जो इस वेदना को सह रहा था और ज़िन्दा रह गया। कोई दूसरा होता तो कभी का मर खप गया होता।

“देख ले, तेरे शरीर की शक्ति का क्या हुआ! तू हरि आनन्द से इंतकाम लेने के सपने देख रहा था। कहाँ गयी वह तेरी शक्ति, तेरे वह खौफनाक इरादे ?” प्रेमलाल देर तक बड़बड़ाता रहा। वह एक बहुत बड़ा जोगी महान पण्डित और पुजारी था। उसके बावजूद बेहद सादी ज़िन्दगी गुजार रहा था। उसके अंदाज में सादगी और नरमी थी। उसमें वह घमण्ड नहीं था जो मैं इससे पहले दूसरे पुजारियों में देख चुका था। वह अपनी सुर्ख आँखें घुमाकर फिर कहने लगा–

“जिस शक्ति पर तुझे इतना घमण्ड था, उसे आज फिर खून की आवश्यकता है। अगर उसे किसी मनुष्य का खून न मिला तो उसका रहयस्मय अस्तित्व ख़ाक में मिल जाएगा। तू उसका प्रेमी है। वह तेरे पास स्वयं चल कर आयी थी; और तुम्हारा यह साथ जन्म-जन्मान्तर का है। तू इसी तरह मनुष्य योनि में भटकता रहेगा और इसी तरह गुनाह करता रहेगा। यह तुम्हें नहीं छोड़ेगी। आज तू इसे अपना खून भेंट दे दे। इसे चैन आ जायेगा। मैं तुझे आज्ञा देता हूँ उठकर बैठ जा।”

प्रेमलाल ने अंतिम वाक्य बड़े क्रोधित स्वर में कहा था। इधर मैं अपने हाथ-पैर को जुम्बिश तक न दे सकता था। लेकिन प्रेमलाल की आज्ञा का उल्लंघन की सजा मुझे मालूम थी। मैंने अपना मानसिक संतुलन और विवेक बनाये रखने की कोशिश की। मुझे हैरत थी कि मैं किस तरह उठ कर बैठ गया। यूँ जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने मुझे उठा कर बैठा दिया हो। प्रेमलाल के चेहरे पर अब भी वही भाव थे। मैं उसकी नज़रे नुकीले काँटों की तरह अपने शरीर पर चुभते हुए महसूस कर रहा था। उसी क्षण मुझे ऐसा लगा जैसे मेरा सिर भारी हो गया हो।
 
भयभीत मोहिनी अब मेरे सिर पर मौजूद थी लेकिन वह कुछ बदली हुई मोहिनी थी। उसका चेहरा पीला था और आँखें वीरान थीं। हम दोनों ने एक-दूसरे को बेबसी से देखा। उसी समय प्रेमलाल ने मोहिनी को सम्बोधित किया–

“देवी! अपने आका की सेवा करना और उसके संकेतों पर नाचना तेरा धर्म है। लेकिन तू इस समय पार्वती के एक सेवक के पास है। कोई पच्चीस वर्ष हुए मुझसे एक साधु ने तेरे बारे में कहा था कि मैं तुझे प्राप्त करने के लिये जाप करूँ। मैंने तुझे पाने के लिये कोई जाप नहीं किया क्योंकि तेरे अंदर हवस, स्वार्थ और मक्कारी है। तू तमाम मनुष्यों की नहीं। सिर्फ अपने मालिक की दोस्त है। मैं फिर पार्वती के आँगन में आ गया और इतनी भक्ति की कि आज तू मेरे सामने इस मनुष्य के सिर पर खड़ी है लेकिन इसके लिये कुछ नहीं कर सकती। मोहिनी मैं तुझे आदेश देता हूँ कि आज तू अपनी रस्मों को तोड़ और अपने मालिक का खून पी ले।”

“प्रेमलाल!” कुटिया में मोहिनी का सुरीला स्वर गूँजा। “तू पार्वती का सेवक है और मुझे मालूम है तूने बड़ी तपस्या की है। अगर पार्वती देवी... तेरे और मेरे बीच न होती तो तू मुझे इस प्रकार का कोई आदेश नहीं दे सकता था। मैं तुझ से विनती करती हूँ कि मैं कम से कम इस मनुष्य का खून नहीं पी सकती। मुझे मजबूर न कर।”

“इस इनकार की सजा तुझे मालूम है। तू पार्वती के सेवक का अपमान कर रही है । तू तो पार्वती के पाँव की खाक के बराबर भी नहीं मोहिनी।”

“प्रेमलाल! मुझे मजबूर न कर। मैं अपनी भूख कहीं और भी मिटा सकती हूँ। तू बड़ा दयालु है। मनुष्य से भूल चूक होती है, इतना कठोर न बन। दया कर।” मोहिनी की आवाज़ उभर रही थी।

“दया! तूने इस मनुष्य को दया नहीं सिखायी ?” प्रेमलाल गरजता हुआ बोला।

माला और कुलवन्त प्रेमलाल को किसी सुरीली आवाज़ से बातें करते देख रहीं थीं। मोहिनी उन्हें नजर नहीं आ रही थी। वह दोनों बुरी तरह सहमी हुई थीं। फिर मोहिनी गिड़गिड़ाहट पर उतर आयी। वह विनती कर रही थी। क्षमा माँग रही थी, मगर जब प्रेमलाल ने उसे जला कर ख़ाक कर देने की धमकी दी तो मोहिनी को मजबूरन प्रेमलाल की आज्ञा के आगे सिर झुका देना पड़ा।

प्रेमलाल के होंठों पर विजेताओं की सी मुस्कराहट फैल गयी। उसने पार्वती का नाम लेकर एक जयकार लगायी और दण्डवत करने लगा। ऐसा मालूम पड़ता था जैसे वह मुझे श्राप देने से अधिक मोहिनी को दंडित करना चाहता था। उसने मेरी तरफ शांति से देखा और कहा-

“तेरी मुक्ति इसी में है कि आज तू देवताओं के नाम पर अपने सिर का रक्त भेंट कर दे। यह पार्वती के एक सेवक की आज्ञा है। फिर यह बदजात मोहिनी तुझसे सदैव के लिये दूर हो जाएगी।”

प्रेमलाल का वाक्य पूरा होते ही मुझे जोर की उबकायी आयी और खून की कै शुरू हो गयी। मेरा कलेजा उलटने लगा। माला और कुलवन्त ने यह खूनी मंजर देखा तो दूसरी तरफ मुँह फेर लिये।

मेरी आँखों में अँधेरा फैलने लगा। खून था कि बराबर मुँह से जारी था। मैंने मोहिनी को देखा। वह गमजदा सी मेरे खून की एक-एक बूँद से अपने अस्तित्व को तर कर रही थी। प्रेमलाल ने उसे उसके स्वामी का खून पीने पर मजबूर कर दिया था। माला और कुलवन्त ने फिर अपनी भयभीत दृष्टि मेरे जर्द पड़ते शरीर पर डाली। माला की आँखें हैरत से फट गयीं थीं। खून मेरे मुँह से निकलता और कहीं गायब हो जाता।

मैंने मोहिनी को एक भयानक छिपकली के रूप में देखा जो मुँह खोले हुए थी और उसकी जुबान लपलपा रही थी। कुलवन्त अधिक देर तक इस भयानक दृश्य को बर्दाश्त न कर सकी। उसने आगे बढ़कर प्रेमलाल के चरण थाम लिये और गिड़गिड़ाकर बोली-

“महाराज! दया करो महाराज! तुम्हारी दासी तुम्हारे आगे हाथ जोड़कर विनती करती है। मुझे जो चाहे सजा दे दो। लेकिन अब इसे क्षमा कर दो।”

“लड़की! हट जा, हट जा!” प्रेमलाल के स्वर में किसी तूफ़ान की सी गरज थी। “जानती है तू किस पापी के लिये मुझसे दया माँग रही है।”

“महाराज! इसे क्षमा कर दो महाराज! इसके बदले तुम मुझे सजा दो। मैं अपना जीवन तक भेंट करने को तैयार हूँ महाराज! लेकिन मेरे लिये तुम इसे क्षमा कर दो।”

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कुलवन्त झोली फैलाकर प्रेमलाल से मेरी ज़िन्दगी की भीख माँगती रही लेकिन प्रेमलाल किसी चट्टान की तरह अपनी जगह अटल रहा। मोहिनी दृष्टि झुकाए मेरे कंठ से बहने वाले खून से अपना अस्तित्व तर करती रही। कुटिया में कुलवन्त की दर्दनाक फरियादें गूँज रही थी। वह बार-बार प्रेमलाल के पैर थामकर गिड़गिड़ाने लगती थी। उसका चेहरा गर्दन तक आँसुओं से तर हो चुका था और माला तस्वीर बनी खड़ी थी। कुलवन्त की आवाज़ों ने उसे भी दहला दिया। वह सहमी-सहमी सी आगे बढ़ी और प्रेमलाल के आगे घुटनों के बल झुकती हुई दासियों के से अंदाज में बोली।

“बाबा! अब इस मनुष्य को क्षमा कर दो। मुझे विश्वास है अब यह किसी स्त्री को बुरी दृष्टि से नहीं देखेगा।”

प्रेमलाल ने आश्चर्य से माला की तरफ देखा। फिर हाथ बुलन्द कर दिया। अचानक मेरी उबकाईयाँ बंद हो गयीं और मोहिनी ने मेरा खून पीना बंद कर दिया। उसके चेहरे पर पश्चताप था। वह दृष्टि झुकाए लगभग प्रेमलाल के दूसरे आदेश की प्रतीक्षा कर रही थी। मेरी स्थिति का अनुमान तो वही लोग लगा सकते हैं जिनके जिस्म से ढेर सारा खून इस तरह बह गया हो। चंद क्षण मौत का सन्नाटा छाया रहा फिर प्रेमलाल ने घृणा से मोहिनी की तरफ देखा, हाथ झटके और मोहिनी तेजी के साथ कुटी से बाहर निकल गयी। माला बड़े लाड़ से चटाई के निकट बैठ गयी। कुलवन्त की भीगी पलकों पर अब भी आँसुओं की बूँदे चमक रही थीं।

“पापी! मैं माला के कहने पर तुझे छोड़ देता हूँ। परन्तु अभी तेरे कष्ट का समय समाप्त नहीं हुआ। जब तक मेरी आज्ञा न हो, तू यहाँ से कहीं न जा सकेगा।”

मैंने धन्यवाद की दृष्टि से माला की तरफ देखा। कुछ कहना चाहा, किन्तु ज़ुबान लड़खड़ाकर रह गयी। इस समय मुझे माला एक फरिश्ता मालूम हो रही थी। प्रेमलाल के चेहरे पर झल्लाहट के आसार अब कुछ सामान्य होने लगे थे। वह उलझे हुए अंदाज़ में मुझसे कहने लगा।

“जा मेरी कुटी से बाहर निकल जा। परन्तु इतना ध्यान रखना कि तूने अगर मेरी आज्ञा के बिना भागने की कोशिश की तो अंजाम बुरा होगा।”

मैं कराहता और लड़खड़ाता हुआ उठा। मुझे बुरी तरह चक्कर आ रहे थे। एक ऐसे व्यक्ति के लिये उठकर चलना असम्भव सी बात है जिसका खून निचोड़ा जा चुका हो। मगर यह प्रेमलाल का आदेश था। मैं बड़ी कठिनाई से स्वयं को संभालता हुआ आगे बढ़ा और कुटी के बाहर निकलते ही त्यौराकर गिर पड़ा। ठीक उसी समय मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी।

“राज! मुझे खेद है। तुम्हारी यह हालत मुझसे नहीं देखी जाती लेकिन मेरे स्वामी। मैं इस क्षेत्र में बिल्कुल बेबस हूँ। तुम यह बातें नहीं समझोगे।”

मुझ में उत्तर देने का साहस न था। मैं खामोश सा पड़ा रहा। मोहिनी ने आगे कहा- “मुझे विश्वास था कि प्रेमलाल तुम्हें क्षमा कर देगा और मैं यह भी जानती हूँ कि भविष्य में क्या होने वाला है लेकिन बता नहीं सकती, क्योंकि अगर प्रेमलाल को पता चल गया तो वह मुझ पर बरस पड़ेगा। बस जरा हिम्मत से काम लो मेरे राज। तुमने यह बात तो सुनी होगी कि हर कष्ट के बाद राहत मिलती है।”

मेरा जी कहकहे लगाने को चाहा किन्तु उस समय मैं संकेतों के सिवा कुछ नहीं कर सकता था। मैंने संकेत से अपने कण्ठ की तरफ उँगली उठायी तो मोहिनी ने कसमसाकर कुटी की तरफ देखा।

“घबराओ नहीं राज । साहस से काम लो। मैं तुम्हारे खाने-पीने का प्रबन्ध करती हूँ।”

मैं अपनी बेबसी और कष्टों की कहानी कहाँ तक सुनाऊँ। अब भी उन यातनाओं की कल्पना करके मेरा कलेजा काँप जाता है। अगर मैं प्रेमलाल की उन सजाओं का वर्णन करने लगूँ जो मुझे दी गयी थीं। तो यह दास्तान बहुत लम्बी हो जाएगी और शायद कभी खत्म न हो। अतः मैं सारांश में ही बयान करता हूँ जो घटनाएँ महत्वपूर्ण है और जिनका मेरी बाद की ज़िन्दगी से सम्बन्ध है।

प्रेमलाल के उस हरे भरे पहाड़ी क्षेत्र में ग्यारह माह गुजर गये। मोहिनी मेरे साथ ही रही मगर सिर पर एक बोझ की तरह। वह इस अर्से में कई बार एक-एक रात के लिये मुझ से दूर हुई थी। माला की सिफारिश से मुझ पर सख्तियाँ तो कम कर दी गयी लेकिन मेरी बर्बादी के दिन समाप्त नहीं हुए थे। मैं दिन-रात कुटी के आस-पास भटकता रहता। यूँ तो मैं स्वतंत्र था लेकिन यह ऐसी आज़ादी थी कि मैं अपनी इच्छा से कहीं भी नहीं जा सकता था। मुझे इस हरी-भरी वादी में जबरदस्त घुटन महसूस होती थी। कोई मुझसे बातचीत करने वाला भी नहीं था। बस मोहिनी से ही अब कभी-कभी मायूसी की बातें हो जाती थीं। एक दो बार मैंने फरार होने की संभावनाओं पर भी गौर किया। लेकिन मोहिनी ने सख्ती से मना कर दिया। कई मौसम आये और गुजर गये। मेरे पास उन सुनसान पहाड़ियों पर दिन भर भटकने के सिवा कोई काम नहीं था। रात आती तो मैं प्रेमलाल की कुटी के बाहर एक कोने से पड़ा रहता। जंगली मच्छरों , साँपों और दूसरे जानवरों से मेरा याराना हो गया था। मैंने अपनी दुःख भरी ज़िन्दगी समाप्त करने के लिये कई बार अपने-आपको खतरे में डाला। किन्तु यहाँ के जानवर भी जैसे प्रेमलाल की आज्ञा के पाबन्द थे। साँप मेरे सामने से गुजर जाते थे, पिस्सू मेरे जिस्म से खेलकर वापस हो जाते थे। कोई जोंक मुझसे नहीं चिपटती थी। मोहिनी मेरे लिये खुराक का प्रबन्ध करती रहती थी। केवल दो माह बाद मैं चलने-फिरने योग्य हो गया, लेकिन बेबसी अब भी मेरा भाग्य थी।
 
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