S
StoryPublisher
Guest
मैं देर तक कलवन्त को इधर-उधर की बातों में बहलाता रहा। मैंने उसे अपने प्यार के ढांचे में ढाला परन्तु रह-रहकर एक ख्याल आता कि इस मोहब्बत का अंजाम बड़ा खतरनाक होगा। डॉली कलवन्त को कैसे बर्दाश्त करेगी और स्वयं कलवन्त डॉली को क्यों पसन्द करेगी ? मेरे ज़हन में कशमकश जारी थी। कलवन्त को दोबारा अपने करीब पाकर मेरे होशो-हवाश गुप्त हो गए थे। क्या मैं कलवन्त को सब कुछ बता दूँ ? इस तरह तो मैं इस सुंदरी से दूर हो जाऊँगा। मगर डॉली को मैं किसी कीमत पर दुःख नहीं देना चाहता था। अतः मैंने दिल पर पत्थर रखकर फैसला किया कि कलवन्त को सब कुछ बता दूँ और मैंने बातों-बातों में उससे यह कह दिया कि मेरी शादी हो गयी है लेकिन मेरे आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा कि कलवन्त ने बड़े सब्र से यह खबर सुन ली और विपरीत परिस्थिति में भी मेरे कदम छू लिये फिर कहने लगी–
“राज, मैं केवल इतना जानती हूँ कि मैं तुम्हारे करीब रहना चाहती हूँ। मुझे किसी बात की परवाह नहीं है। तुम सिर्फ इतना करो कि मुझे स्वयं से अलग न करो। मैं तुम्हारे कदमों में अपना सारा जीवन बिता दूँगी। मैं तुम्हारी पत्नी डॉली की सेवा करूँगी। एक दासी बनकर रहूँगी।”
कलवन्त ने कुछ देर पहले मुझे बचाने की खातिर अपनी जिंदगी दाँव पर लगा दी थी और अब मेरी बांदी तक बनने के लिये तैयार थी। मैंने इसी से उसके गहरे प्यार का अनुमान लगा दिया और मैं उसकी ओर खिंचने लगा। उसके गोरे-गोरे चेहरे पर उस समय भी सारे जहाँ की सुंदरता सिमट आई थी। मैंने उसे धीरे से उठाकर अपने सीने से लगा लिया और उसके होंठो पर अपने जलते हुए होंठ रख दिए। वह मेरे लिये समर्पित थी। मैंने उसे घास के नर्म बिस्तर पर लिटा दिया और अपनी बाँहों में लेकर वचन दिया कि मैं उसे अपने करीब ही रखूँगा।
मैं उसके रूप व यौवन में डूब गया था। मैं उसके जज्बातों से खेल रहा था। मैं उसकी साँसो से लड़ रहा था। उसी समय एकाएक मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी।
मुझे आश्चर्य हुआ। मेरा पिछला अनुभव बताता था कि जिस समय मोहिनी खून पीती है तो छः-सात घंटों से पहले नहीं लौटती । मैंने सिर पर नजर डाली तो सचमुच मोहिनी मौजूद थी। उसकी आँखों से शोले उबल रहे थे। चेहरा गजनाक सुर्ख हो रहा था। होंठो पर गाड़ा-गाड़ा ताजा खून जमा हुआ था।
मोहिनी को इस रूप में देखकर मेरा माथा ठनका। किसी अज्ञात खतरे के अहसास से मेरा दिल तेज-तेज धड़कने लगा। मैंने दिल ही दिल में संबोधित किया।
“क्या बात है मोहिनी ?” राजकुमार का खून पसन्द नहीं आया।
“राज, मेरे राज! मैं तुमसे बहुत शर्मिंदा हूँ।” मोहिनी ने भर्राई हुई आवाज में कहा। उसकी आँख से आँसू बहने लगे।
मैंने बेचैन होकर पूछा– “सब कुशल तो है ? तुम इस कदर परेशान क्यों हो ?”
“राज!” मोहिनी सिसक पड़ी, “इंसानी खून मेरे अस्तित्व का नशा है। मैं खून पीते समय दुनिया की तमाम बातों से बेखबर हो जाती हूँ। यही कारण है जो पंडित हरि आनंद अपना वार कर गया।”
मोहिनी के अंतिम शब्द किसी खतरनाक ज्वालामुखी की तरह मेरे सीने में फट गए। मैं कलवन्त को झटककर हड़बड़ाकर उठ बैठा। एक क्षण में हजारों प्रश्न मेरे दिमाग में घूम गए। मेरा दिल उलझने लगा। मैंने बौखलाकर पूछा–
“जल्दी बताओ मोहिनी, तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आ रही हैं ? हरि आनंद क्या कर गया ?”
“तुरन्त तुम घर पहुँचों राज। मैं इस कमीने पंडित को घेरने जा रही हूँ। डॉली से मुझे बहुत प्यार था आका।”
मोहिनी अपना वाक्य समाप्त करते ही मेरे सिर से उतर गयी।
डॉली का नाम सुनकर मेरा मस्तिष्क चकरा गया। मेरे ज़हन में आँधियाँ चल रही थी। मैं कलवन्त से कुछ कहे बिना दीवानों की तरह तूफानी रफ़्तार से घर की तरफ भागा। घर पहुँचकर मैं पागलों की तरह दौड़ता हुआ अपने शयनागर में पहुँचा। किन्तु दरवाजे पर एक झटके के साथ रुक गया।
डॉली की हालत देखकर मैं जड़ सा हो गया। मैं पत्थर की बेजान मूर्ति की तरह अपनी जगह साकित खड़ा डॉली को फ़टी-फ़टी दृष्टि से देख रहा था। मुझे अपनी दृष्टि पर संदेह हो रहा था। मेरा हृदय सीने में डूबता जा रहा रहा था।
डॉली एकटक नग्नावस्था में मुसहरी के निकट कालीन पर चित्त पड़ी थी। जिस्म के एकाएक हिस्से में छोटे-छोटे अनगिनत खंजर दस्ते तक पैबस्त नजर आ रहे थे। जिस्म खून से लहूलुहान था। उसकी पथराई हुई आँखें बड़े खौफनाक अंदाज में दरवाजे की तरफ जमी हुई थी जैसे अंतिम समय भी उसे मेरा इंतजार था और फिर बाँध टूटा। मैं पागलों की तरह चीख उठा।
“हरि आनंद...! डॉली की लाश की सौगन्ध, मैं तुझे ही नहीं, तेरे मठ को जलाकर खाक कर दूँगा। मैं सारी दुनिया के तांत्रिक को मौत के घाट उतार दूँगा। मैं मठों में खून की होली खेलूँगा। मैं इस दुनिया को आग लगा दूँगा।” और मैं पागलों की तरह चीखता रहा।
फिर बेहोश होकर डॉली की लाश पर गिर पड़ा।
“राज, मैं केवल इतना जानती हूँ कि मैं तुम्हारे करीब रहना चाहती हूँ। मुझे किसी बात की परवाह नहीं है। तुम सिर्फ इतना करो कि मुझे स्वयं से अलग न करो। मैं तुम्हारे कदमों में अपना सारा जीवन बिता दूँगी। मैं तुम्हारी पत्नी डॉली की सेवा करूँगी। एक दासी बनकर रहूँगी।”
कलवन्त ने कुछ देर पहले मुझे बचाने की खातिर अपनी जिंदगी दाँव पर लगा दी थी और अब मेरी बांदी तक बनने के लिये तैयार थी। मैंने इसी से उसके गहरे प्यार का अनुमान लगा दिया और मैं उसकी ओर खिंचने लगा। उसके गोरे-गोरे चेहरे पर उस समय भी सारे जहाँ की सुंदरता सिमट आई थी। मैंने उसे धीरे से उठाकर अपने सीने से लगा लिया और उसके होंठो पर अपने जलते हुए होंठ रख दिए। वह मेरे लिये समर्पित थी। मैंने उसे घास के नर्म बिस्तर पर लिटा दिया और अपनी बाँहों में लेकर वचन दिया कि मैं उसे अपने करीब ही रखूँगा।
मैं उसके रूप व यौवन में डूब गया था। मैं उसके जज्बातों से खेल रहा था। मैं उसकी साँसो से लड़ रहा था। उसी समय एकाएक मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी।
मुझे आश्चर्य हुआ। मेरा पिछला अनुभव बताता था कि जिस समय मोहिनी खून पीती है तो छः-सात घंटों से पहले नहीं लौटती । मैंने सिर पर नजर डाली तो सचमुच मोहिनी मौजूद थी। उसकी आँखों से शोले उबल रहे थे। चेहरा गजनाक सुर्ख हो रहा था। होंठो पर गाड़ा-गाड़ा ताजा खून जमा हुआ था।
मोहिनी को इस रूप में देखकर मेरा माथा ठनका। किसी अज्ञात खतरे के अहसास से मेरा दिल तेज-तेज धड़कने लगा। मैंने दिल ही दिल में संबोधित किया।
“क्या बात है मोहिनी ?” राजकुमार का खून पसन्द नहीं आया।
“राज, मेरे राज! मैं तुमसे बहुत शर्मिंदा हूँ।” मोहिनी ने भर्राई हुई आवाज में कहा। उसकी आँख से आँसू बहने लगे।
मैंने बेचैन होकर पूछा– “सब कुशल तो है ? तुम इस कदर परेशान क्यों हो ?”
“राज!” मोहिनी सिसक पड़ी, “इंसानी खून मेरे अस्तित्व का नशा है। मैं खून पीते समय दुनिया की तमाम बातों से बेखबर हो जाती हूँ। यही कारण है जो पंडित हरि आनंद अपना वार कर गया।”
मोहिनी के अंतिम शब्द किसी खतरनाक ज्वालामुखी की तरह मेरे सीने में फट गए। मैं कलवन्त को झटककर हड़बड़ाकर उठ बैठा। एक क्षण में हजारों प्रश्न मेरे दिमाग में घूम गए। मेरा दिल उलझने लगा। मैंने बौखलाकर पूछा–
“जल्दी बताओ मोहिनी, तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आ रही हैं ? हरि आनंद क्या कर गया ?”
“तुरन्त तुम घर पहुँचों राज। मैं इस कमीने पंडित को घेरने जा रही हूँ। डॉली से मुझे बहुत प्यार था आका।”
मोहिनी अपना वाक्य समाप्त करते ही मेरे सिर से उतर गयी।
डॉली का नाम सुनकर मेरा मस्तिष्क चकरा गया। मेरे ज़हन में आँधियाँ चल रही थी। मैं कलवन्त से कुछ कहे बिना दीवानों की तरह तूफानी रफ़्तार से घर की तरफ भागा। घर पहुँचकर मैं पागलों की तरह दौड़ता हुआ अपने शयनागर में पहुँचा। किन्तु दरवाजे पर एक झटके के साथ रुक गया।
डॉली की हालत देखकर मैं जड़ सा हो गया। मैं पत्थर की बेजान मूर्ति की तरह अपनी जगह साकित खड़ा डॉली को फ़टी-फ़टी दृष्टि से देख रहा था। मुझे अपनी दृष्टि पर संदेह हो रहा था। मेरा हृदय सीने में डूबता जा रहा रहा था।
डॉली एकटक नग्नावस्था में मुसहरी के निकट कालीन पर चित्त पड़ी थी। जिस्म के एकाएक हिस्से में छोटे-छोटे अनगिनत खंजर दस्ते तक पैबस्त नजर आ रहे थे। जिस्म खून से लहूलुहान था। उसकी पथराई हुई आँखें बड़े खौफनाक अंदाज में दरवाजे की तरफ जमी हुई थी जैसे अंतिम समय भी उसे मेरा इंतजार था और फिर बाँध टूटा। मैं पागलों की तरह चीख उठा।
“हरि आनंद...! डॉली की लाश की सौगन्ध, मैं तुझे ही नहीं, तेरे मठ को जलाकर खाक कर दूँगा। मैं सारी दुनिया के तांत्रिक को मौत के घाट उतार दूँगा। मैं मठों में खून की होली खेलूँगा। मैं इस दुनिया को आग लगा दूँगा।” और मैं पागलों की तरह चीखता रहा।
फिर बेहोश होकर डॉली की लाश पर गिर पड़ा।