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Fantasy नागिन के कारनामें (इच्छाधारी नागिन )

सुबह राज की जब आंख खुली तो उसे फिर उन्हीं ख्यालों ने आ घेरा। डॉली अपने किसी काम से गई हुई थी, इसलिए राज अकेला पड़ा-पड़ा तमाम हालात पर गौर करता रहा । दो-तीन घंटे लगातार सोच-विचार के बाद वो जिस नतीजे पर पहुंचा, वो यह था कि क्रिसमसस की रात उस लड़की रोजी ने उसे जानबुझकर बेहोश किया था। उसके बाद कुछ इस तरह की घटनाएं घटीं कि वो अपनी याददाश्त खो बैठा था। छः महीने तक वो किन हालात में, किन लोगों के साथ रहा और क्या करता रहा, इस बारे में उसे बिल्कुल कोई बात याद नहीं आ सकी।

उसके बाद शायद सड़क पर चलते हुए उसके साथ कार वाली दुर्घटना घट गई। लोगों ने लावारिस समझकर उसे हस्पताल में भर्ती करवा दिया। वहां संयोग से सिर पर चोट लगने की वजह से उसकी याददाश्त वापिस आ गई। इसके अलावा इन रहस्यमय घटनाओं से सम्बन्धित सवालों इसके बाद दो सवाल और उठ खड़े होते थे।

पहला यह कि ज्योति और जय वर्मा उसे कहां मिल गए थे? दूसरा यह कि वो लड़की रोजी कौन थी?

वो सवालों के जवाब ढूंढने लगा

'हो सकता है रोजी ज्योति के लिए काम कर रही हो और ज्योति ने ही उसे उसके जरिये बेहोश करावाया हो? लेकिन अगर ऐसा भी था तो उन्होंने मुझे जिन्दा क्यों छोड़ दिया? अगर मैं ज्योति और डाक्टर जय के चंगुल में फंस गया था तो उन्होंने मुझे कत्ल क्यों नहीं कर दिया?'

अब उसके जेहन में एक और सवाल ने सिर उभारा-'इन छ: महीनों में मैं बेहोश ही रहा होऊंगा? हो सकता है डॉक्टर जय मुझे कत्ल करने के बजाय मेरे जिस्म पर कोई खतरनाक प्रयोग कर रहा हो? उसी प्रयोग के दौरान उसने मुझे छ: महीने तक बेहोश रखा हो?'

दोपहर के वक्त डॉली आ गई। मनमोहक मुस्कुराहट के साथ उसने राज का अभिवादन किया और प्यार भरे लहजे में बोली

"कहिए राज जी, अब क्या हाल है?"

"हाल तो ठीक है।” राज ने जवाब दिया।

वो कुर्सी खींच कर राज के करीब ही बैठ गई। दवा का वक्त हो चुका था। उसने दवा पिलाई और बोली

"अभी-अभी डॉक्टर के पास मिसेज ज्योति का फोन आया था। वो आपका हाल पूछ रही थीं। जब डॉक्टर न बताया कि अब आप होश में है तो उसने कहा कि वो शाम के वक्त आपको देखने आएगी। उन्होंने यह भी कहा है कि अगर आपकी सेहत ज्यादा खराब न हो तो वह आपको अपनी कोठी पर ले जाना चाहती है।"

"बड़ी अजीब बात है डॉली।" राज ने डॉली का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, "मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि

आखिर यह माजरा क्या है?"

''मैं खुद आपकी बताई हुई घटनाएं सुनकर हैरान हूं।" डॉली ने कहा।

"लेकिन जो बातें अभी तुम्हें मालूम नहीं हैं, अगर तुम्हें बता दूं तो तुम्हारी हैरत दस गुना बढ़ जाएगी।

"कैसी बातें?" डॉली ने उत्सुकता से पूछा।

"बताने में मुझे कोई एतराज नहीं है।" राज बोला

"लेकिन शर्त यह है कि ये बातें सिर्फ तुम तक ही रहनी चाहिएं।"

"ओह उसकी फिक्र न कीजिए।" डॉली ने मुस्कराते हुए कहा, ''मैं पेट की हल्की नहीं हूं। खास तौर से आप की बातों तो हमेशा मेरे दिल में सुरक्षित रहेंगी।"

"क्यों, मेरे में ऐसी क्या खास बात है?"

जवाब में उसका चेहरा गुलाबी हो गया और उसने शरमा कर नजरें झुका लीं।

राज का दिल सीने में धड़कने लगा तेजी से। उसके सवाल का इससे खूबसूरत जवाब क्या हो सकता था? उसने प्यार से डॉली का हाथ सहलाते हुए कहा

"डॉली...."

डॉली ने पलकें उठाकर राज की तरफ देखा, दोनों एक दूसरे की निगाहों में खो गए। राज जो कुछ उससे कहना चाहता था, वो नजरों ने कह दिया था। उसका उपयुक्त जवाब उसे डॉली की नशीली आंखों से मिल गया।

फिर अचानक वो चौंक उठी और अपना हाथ राज के हाथों से खींचते हुए बोली

"वो घटनाए सुनाइए न....।"

"ओह...मैं तो बिल्कुल भूल गया था। दरअसल तुम्हारी इन काली-काली आंखों में इतना जादू भरा है कि इनमें खोकर अपनी सारी परेशानियां भूल जाता हूं.....।"

"अब इतनी तारीफ भी न कीजिए।" डॉली ने शरमाति हुए कहा, "वर्ना मैं बहक जाऊंगी। अब जरा काम की बात भी तो कर लीजिए।"

"घटनाएं तो इस तरह हैं......।" कह कर नीलण्ठ डॉली को पिछली घटनाओं से लेकर मिरू और फिर बम्बई की घटनाओं के बारे में विस्तार से बताने लगा।

"फिर.....फिर.....उसके बाद क्या हुआ?" डॉली ने पूछा, ''मेरा मतलब है, उएन दोनों के खुदखुशी कर लेने के बाद?'

"फिर.....!" राज ने गहरी सांस लेकर कहा, इतनी" भयानक आग में कोई जिन्दा नहीं रह सकता था। लेकिन मेरा दिल कह रहा था कि ज्योति और डॉक्टर जय का बाल भी बांका नहीं हुआ था। और इस बार भी मेरे दिल का सन्देह सही निकला, यानि वो दोनों एक बार फिर धोखा देकर साफ बच गए थे।"

"वो कैसे? डॉली ने हैरत से पूछा।

"वो ऐसे..... ।” राज ने विस्तार से बताते हुए कहा,

"कोठी में तेज आग लगने के एक हफ्ते बाद मैं अपना सन्देह दूर करने के लिए मैं उस जली हुई कोठी का मुआयना करने गय था और वहां पहुंच कर मुझे पता चला था कि मुझे जिस बात का सन्देह था, वही हुई थी। जय और ज्योति ने जिस कमरे में बन्द होकर आग लगाई थी, उस कमरे के नीचे एक सुरंग बनी हुई थी, जिसका दूसरा मुंह कोठी से दूर दो फाग के फासले पर था। वो एक गार में निकलती थी। जय ने हमें धोखा देने के लिए आग लगाई और खुद ज्योति को लेकर सुरंग के जरिये वहां से निकल गया। अब तुम खुद अन्दाजा लगा लो वो लोग मेरे दोस्त कैसे हो सकते है?"

"यह वाकई उपन्यास की घटनाएं मालूम होती हैं।"

डॉली ने हैरत से कहा, "लेकिन सवाल यह है कि आप छः महीने पहले यहां, कलकत्ता में क्या करने आए थे?"

"यह भी बताता हूं। दरअसल दिल्ली में एक डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता हैं जो सांपों और जहरों के माहिर हैं, उनसे मेरी गहरी दोस्ती है। हम दोनों जहरों पर प्रयोग करते रहे हैं। यह छःसात महीने पहले की बात है कि कलकत्ता पुलिस को एक आदमी की लाश मिली थी। जिसकी मौत बड़े अजीबोगरीब तरीके से हुई थी। मेरा ख्याल है तुमने भी उस अजीबो-गरीब मौत के बारे में अखबारों में पढ़ा होगा।"

"हां।” डॉली ने सिर हिलाकर स्वीकर किया "सात महीने पहले एक नाले के किनारे वो लाश पाई गई थी। उस पर इस तरह के निशान थे जैसे उसके पूरे जिस्म को रस्सियों से जकड़ा गया हो

और उसका खून चूसा गया हो। जब उसका पोस्टमार्टम हुआ था तो पता चला कि उसके खून में जहर के कण मौजूद थे।

"बिल्कुल ठीक।" राज बोला, "यही हुआ था और यहां के डॉक्टर उस रिपोर्ट से किसी खास नतीजे पर नहीं पहुंच पाए थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा थाकि आखिर उस आदमी को किस तरह कत्ल किया गया है। लाश पर रस्सियों के निशान

कैसे हैं और उसके खून में जहर मिल गया? इसलिए जब यहां के डाक्टर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाए तो उन्होंने एक सक्सपर्ट के तौर पर डॉक्टर नरेन्द्र को बुलवाया था।

लेकिन संयोग से उन दिनों डॉक्टर नरेन्द्र बहुत व्यस्त थे, इसलिए उन्होंने अपनी जगह मुझे भेज दिया था ताकि मैं यहां के डॉक्टरों के साथ मिलकर उस जहर का विश्लेषण कर सकूँ। यहां आकर मैं डॉक्टर जेम्स से मिला, जो डॉक्टरों की एक संस्था के अध्यक्ष हैं। तीन-चार दिन तक हम उस जहर के बारे में मालूम करने के लिए लाश पर नित नए प्रयोग करते रहे, लेकिन कुछ मालूम नहीं कर पाए।
 
उस नाकामी की वजह से मैं एक्सीडेंट के दिन यानि क्रिसमस के दिन बहुत उदास था। डॉक्टर जेम्स ने मुझे उदास देखकर आग्रह किया कि मैं उनके साथ क्रिसमस की पार्टी में क्लब चलूं और कुछ दिल बहला सकूँ। उनके साथ मैं क्लब चला गया। उसके बाद जो कुछ हुआ, वो मैं तुम्हें बता ही चुका हूं।"

दास्ताने गम खत्म होने पर डॉली ने गहरी सांस ली और फिक्रमंद लहजे में बोली

"सारी बातें सुन कर तो वाकई मेरी आंखें खुल गई हैं। ये तो आलिफ लैला से भी ज्यादा हैरत वाली बातें हैं। इन सब बतों से तो यही लगता है कि तुम किसी गहरी साजिश का शिकार हो चुके हो।"

"मेरा भी यही ख्याल है।" राज ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा," लेकिन मेरी समझ में नहीं आता कि वो साजिश क्या

"तुम्हारी बातों से मैंने ये अन्दाजा लगाया है कि तुम्हारे कलकत्ता आने के बारे में ज्योति और डॉक्टर जय को पता चल गया होगा। जाहिर है कि वो तुमसे डरे हुए थे और तुम्हें रास्ते से हटाना चाहते होंगे। इसलिए उन्होंने क्रिसमस की रात उस लड़की रोजी के जरिये तुम्हें बेहोश करवा दिया और बाद में अपनी लेबॉटरी में ले जकार सर्जरी के जरिये या किसी दवा से तुम्हारी याददाश्त गुम करायी, ताकि तमाम पुरानी घटनाए तुम्हारी याददाश्त से मिट जाएं और तुम उन दोनों को भूल जाओ।"

"मैं भी सोच-विचार के बाद इसी नतीजे पर पहुंचा हूं। लेकिन ये फिर वही सवाल मेरे सामने है कि बीते छः महीने में मैं कहां था

और क्या करता रहा था?"

"हो सकता है वो तुमसे उस दौरान कुछ जुर्म करवाते रहे हों?" डॉली ने कहा।

"यह भी मुमकिन है।'' राज बोला, "जब मेरी याददाश्त बिल्कुल खत्म हो चुकी थी तो वो लोग मुझसे कुछ भी करवा सकते थे। यह भी हो सकता है वो लोग उस दौरान मुझ पर कुछ नए प्रयोग करते रहे हों?"

"फिर सवाल यह है कि याददाशत वापिस कैसे लौट आई डॉली ने पूछा।

"यह कोई खास बात नहीं है। आमतौर पर देखा गया है कि जिन लोगों की याददाश्त खो जाती है, फिर उन्हें कभी दोबारा सिर पर चोट लगती है तो याददाश्त वापिस भी आ जाती है।"

"इन हालात को देखते हुए तो सारी साजिश सामने आ जाती है।" डॉली ने सोचते हुए कहा।

"हां।" राज बोला-"बशर्ते कि हमारे सारे अनुमान सही साबित हों।"

"लेकिन इन अन्दाजों के अलावा कोई और बात दिमाग में आती भी तो नहीं, जिसे जेहन कबूल कर ले..... ।'

"तो अब क्या करना चाहिए?" राज ने फिक्रमंदी से कहा।

"इसके लिए एक तरकीब मेरी समझ में आई है।"

"क्या?" राज ने जल्दी से पूछा।

"अगर सारी घटनाए इसी तरह घटी हैं जैसे कि हमने सोचा है

यानि कि डॉक्टर जय किसी तहर तुम्हारा ब्रेनवाश करके तुमसे कोई गलत काम ले रहा है तो उसे अभी तक यह नहीं मालूम होगा कि तुम्हारी याददाश्त फिर से लौट आई है।"

"हां, यकीनन उसे नहीं मालूम होगा।' राज ने कबूल किया।

"बस तो, तुम अभी उस पर जाहिर न करो कि तुम्हारी याददाश्त वापिस आ चुकी है। जब डॉक्टर जय और ज्योति तुमसे मिलने आएं तो ऐसा जाहिर करना कि तुम्हें पिछली घटनाओं के बारे में कुछ भी याद नहीं। तब डॉक्टर जय तुम्हें अपनी कोठी पर ले जाएगा और तुम्हें अपने रास्ते से हमेशा के लिए हटाने की कोशिश करेगा।"

नीलगण्ठ हैरान रह गया कि एक नर्स भी इस तरह की बेहतरीन तरकीब सोच सकती है। जैसे वो कोई तजुर्बेकार जासूस हो। राज ने प्रशंसापूर्वक निगाहों से उसकी तरफ देखा और फिर उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया।

"डॉली, तुम्हारी तरकीब वाकई बहुत बढ़िया है। तमाम रहस्यों की तह तक पहुंचने के लिए इससे बढ़िया कोई तरकीब नहीं कि मैं डॉक्टर जय और ज्योति की निगाह में बेवकूफ बना रहूं और उनके साथ रहकर सारे हालात मालूम करने की कोशिश करता

"हां, मेरा मतलब भी यही था।" डॉली ने कहा-"बल्कि मैं तो तमाम घटनाओं को ध्यान में रखते हुए अब यहां तक कह सकती हूं कि सात महीने पहले होने वाली कत्ल की उस वारदात में भी डॉक्टर जय की ही हाथ रहा होगा।"

"हां। मैं भी यही सोच रहा हूं।"

"और अब!” उसने अपना हाथ राज के हाथों से खींचकर कहा-"तुम थोड़ा दूध पी लो तो बेहतर है। उसके बाद आराम के लिए सो जाना। आज तुमने बहुत ज्यादा बातें कर ली हैं, शेष फिर।"

उसने शोख नजरों से राज की तरफ देखा और दूध लेने के लिए तेजी से बाहर निकल गई।

शाम को पांच बजे डॉक्टर जय और ज्योति राज को देखने आए तो ज्योति को देखकर नलीकण्ठ हैरान था। वो पहले दिन की तरह इस वक्त भी बहुत मोहक और हसीन थी। राज के हिसाब से ज्योति की उम्र पैंतीस साल से कम नहीं थी। लेकिन वो बीस बाईस साल से ज्यादा किसी भी कोण से नजर नहीं आती थी। नशीली आंखों में वही जादू था, गोरा व सुडौल जिस्म जमाने की सर्द-गर्म हवाओं से बिल्कुल अछूता था। उसके मुकाबले डॉक्टर जय का चेहरा पहले से बहुत उतरा-उतरा था और माथे की सलवटें उसके अधेड़ होते जाने का एलान कर रही थीं। कनपटियों के बालों में चांदी जैसी सफेदी झलकने लगी थी।

कमरे में दाखिल होते ही डॉक्टर जय ने मुस्कराकर कहा

"हैलो राज, क्या हाल है?"

"अब तो ठीक हूं।" राज ने उसे खाली-खाली निगाहों से देखते हुए भाव रहहित आवाज में कहा।

"हमें तो बड़ी फिक्र हो गई थी।” ज्योति कुर्सी पर बैठते हुए बोली, "ऐक्सीडेंट की रात को जब तुम देर तक घर नहीं लौटे तो हमें बहुत फिक्र हो गई थी। शायद हमें एक्सीडेंट का पता भी न चलता, अगर जय का एक रोस्त बड़े संयोग से एक्सीडेंट के वक्त अपनी कार में मौजूद न होता और इन्हें फोन पर सूचना न देता।

जय ने ही तुम्हें स्पेशल वार्ड में दाखिल करावाया था।"

"थैक्स।” राज ने नर्म और शालीन लहजे में कहा।

"डॉक्टर का ख्याल है कि अब तुम ठीक हो।” डॉक्टर जय ने कहा-"इसलिए तुम्हें पसन्द हो तो कोठी में चले चलो.....।"

"मुझे तो कोई एतराज नहीं। लेकिन क्योंकि अभी मैं चलने-फिरने लायक नहीं हूं, इसलिए कोठी पर पहुंचने के बाद आपको ही कष्ट होगा।"

"नहीं-नहीं। हमारे कष्ट के बारे में सोचो भी मत।” ज्योति जल्दी से बोल उठी, "हम वहां तुम्हारे लिए एक नर्स का इन्तजाम कर लेंगे।"

"जैसे आपकी मर्जी।" राज ने खोए-खोए स्वर में कहा।

"ठीक है फिर। कल सुबह हम तुम्हें कोठी ले जाएंगे।" ज्योति बोली, "तुम्हारा कुत्ता टॉमी भी तुम्हारे बगैर उदास सा रहाता है। तुम्हारे यहां रहने से जैसे कोठी की रौनक ही खत्म हो गई है।
 
"मेरा कुत्ता टॉमी?" राज ने दिल में सोचा, मैं तो कुत्तों को पसन्द ही नहीं करता।' वो ज्योति के मुंह से टॉमी का जिक्र सुन मुस्कराने लगा।

"बहुत अच्छा, आप जाकर टॉमी को तसल्ली दीजिए और कहिए कि मैं कल सुबह वहां पहुंच जाऊंगा।" कुछ देर इधर-उधर की

बातें करने के बाद वो लोग चले गए। डॉली उन्हें विदा करने गई तो आधे घंटे बाद वो मुस्कराती हुई वापिस आकर बोली

"आप तो हमसे बचकर भागने की कोशिश करने लगे थे, लेकिन हमने भी ऐसा चक्कर चलाया कि हम हरदम आपके साथ रह सकेंगे।"

"वो कैसे?" राज ने डॉली की मोहिनी सूरत देखते हुए पूछा।

"उन्हें तुम्हारे लिए नर्स की जरूरत थी न? डाक्टर जय ने सर्जन वटर्जी से कहकर टेम्प्रेरी तौर पर तुम्हारे लिए मेरी सेवाएं प्राप्त कर ली हैं।"

"इसका मतलब, सुबह को तुम भी मेरे साथ जा रही हा?"

"अगर आप को कोई एतराज न हो तो-"

"तुम एतराज की बात कर रही हो, अगर मेरे बस में होता तो मैं हमेशा तुम्हें आंखों में बसाए रखता.....एक पल को भी निगाह से दूर न होने देता।"

"अच्छा जी!" उसने शोख लहजे में कहा।

"लेकिन यह समझ लेना डॉली कि हम लोग शेर की मांद में जा रहे हैं। भगवान जाने किस वक्त कौन सी मुसीबत में फंस जाएं। ऐसा न हो कि बाद में तुम्हें पछताना पड़े।"

“परवाह नहीं !“ डॉली जोशीले लहजे में बोली, “मैं डरपोक नहीं हूं कि मुसीबत देखकर डर जाऊं। तुम्हारे लिए मुझे तूफान से भी टकराना पड़े तो टकरा जाऊंगी।"

डॉली राज के पहलू में बैठी हुई थी। उसके प्यार भरे जोशीले शब्द सुनकर राज खुद पर काबू न रख सका और उसने अपने जख्मी हाथों से डॉली को पकड़ कर उसे अपनी सीने पर लिटा लिया और और उसके रसीलें होंठों पर अपने प्यासे होंठ चिपका दिए।

डॉली ने कोई प्रतिरोध प्रकट नहीं किया, बल्कि वो कसकर राज के सीने से चिपक गई। कुछ देर बाद ही वो दोनों इस दुनिया से दूर कहीं जन्नत में पहुंच गए। प्राईवेट रूम था, इसलिए किसी के वहां आने का सवाल ही पैदा नहीं होता था।

दूसरे दिन सुबह हस्पताल की एम्बुलेंस में राज को जय अपनी कोठी पर ले गया। कोठी के जिस कमरे में राज के ठहरने का इन्तेजाम किया गया था, वो ज्योति के कहे अनुसार राज का ही कमरा था। कमरे का सारा सामना राज के लिए नया था, सिवाय एक सूट के, जो उसने क्रिसमस की रात को पहन रखा था।

सूट के अलावा भी उसके नाप के बहुत से कपड़े वहां मौजूद सुनसान जगह पर अलग-थलग बनी हुई थी। कोठी के चारों तरफ एक खूबसूरत बगीचा था जिसे कंटीले लोहे के तारों से घेर लिया गया था।

कोठी में पहुंचने के बाद एक घंटे तक डॉक्टर जय और ज्योति राज को तसल्लियां देते रहे। जब वो चले गए तो एक नई मुसीबत राज के सिर पर आ सवार हुई, बिल्कुल अनापेक्षित मुसीबत, जिसके बारे में राज सोच भी नहीं सकता था।

उनके जाने के बाद रोजी बड़े जोर से कमरे में दाखिल हुई थी। कमरे में घुसते ही उसने अपना पर्स जोर से मेज पर फेंका था

और 'राज!' का नारा लगाकर तेजी से दौड़ती हुई राज के सीने से आकर चिपट गई थी।

उसका अन्दाजा बता रहा था कि वो राज के काफी करीब रही थी। राज सोच रहा था कि हो सकता है मैं उस दौर में इससे प्यार मोहब्बत करता रहा होऊ, जो दौर मुझे याद नहीं है।

अब उसके सामने बड़ा मुश्किल वक्त था। उसे नहीं मालूम था कि बेहोशी के जमाने में रोजी से उसके सम्बंध किस हद तक गहरा चुके थे, उसने रोजी से क्या-क्या बातें की होंगी। भगवान जाने यहां उसका नाम रोजी ही था या कुछ और?

बहरहाल, राज ने खुद पर काबू पाते हुए एक बीमार सी मुस्कराहट के साथ उसका स्वागत किया।

"ओह डियर...ओह डार्लिंग। क्या हो गया है तुम्हें ?" रोजी ने उसके चेहरे को अपने हाथों से थामते हुए उसकी आंखों में

आंखें डालकर पूछा, “बाई गॉड, मैं तो तुम्हारे बगैर तीन-चार दिन से अंगारों के बिस्तर पर लोट रही थी। पूरे चार दिन हो गए थे कि मैं बालरूम तक भी नहीं जा सकी थी। तुम नहीं थे तो मुझे कोई चीज अच्छी नहीं लगती थी, कहीं मजा नहीं आता था।"

"मैं भी तुम्हारे बगैर एक पल भी चैन नहीं पा सका था।"

"ओह डार्लिंग...ओह डियरेस्ट!" उसने नीलण्ठ के चेहरे पर अपने जवान और गर्म चुम्बनों की बारिश कर दी थी और राज ने घबराकर आंखें बंद कर ली थीं।

वो सोच रहा था कि उसे किस नाम से मुखातिब करे? उलझन यह थी कि अगर यहां रहते हुए रोजी का असल नाम कुछ और हुआ और उसने उसे रोजी कहकर पुकार लिया तो सारा भेद खुल जाएगा। क्योंकि मुमकिन है कि डॉक्टर जय ने उसे राज क निगरानी पर लगा रखा हो, ताकि वो राज की दिमागी हालत की रिपोर्ट डॉक्टर जय को देती रहे।

फिर अचानक राज के जेहन में एक तरकीब आ गई। डॉली किसी काम से कमरे से बाहर गई हुई थी। वो वापिस आई तो राज बोला

"यह मेरी नर्स है, डॉली! बड़ी अच्छी लड़की है।"

रोजी ने मुस्कराकर डॉली की तरफ देखा और शुद्ध अंग्रेजी में बोली

"डॉली जी, मेरा नाम रोजी है, मैं राज साहब की मंगेतर

और मंगतेर शब्द सुनकर राज बड़े जोर से चौंक उठा। वो तो खैर हुई कि उस वक्त रोजी पूरी तरह डॉली की तरफ आकृष्ट थी।

एक क्षण के लिए राज और डॉली ने एक-दूसरे की तरफ अर्थपूर्ण निगाहों से देखा, फिर डॉली ने फौरन रोजी की तरफ घूमकर कहा

"मेरी बधाई स्वीकार करें मिस रोजी, आपके मंगेतर मौत के मुंह से लौट आए हैं...।"

"नहीं! राज मर नहीं सकता था।“रोजी ने शोखी से राज की तरफ देखते हुए कहा, "मैं इसे मौत के मुंह से भी खींच लाती, क्योंकि यह मेरा है...सिर्फ मेरा!"

डॉली के चेहरे पर एक क्षण के लिए मायूसी झलकी, जिसे रोजी तो न महसूस कर सकी। लेकिन राज समझ गया कि वो ईर्ष्या की लहर थी।
 
थोड़ी देर बाद रोजी चली गई, हालांकि उसकी मौजूदगी से राज सख्त परेशान था। लेकिन उससे अहम जानकारी मिल गई। यह कि उसका नाम रोजी ही था। दूसरा यह कि राज की बेहोशी के दौरान उन दोनों में सम्बंध इतने ज्यादा बढ़ चुके थे कि उन दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया था। यहां तक कि शायद सगाई की रस्म तक पूरी हो चुकी थी।

लेकिन राज हैरान था कि उसके हस्पताल में रहने के दौरान रोजी उससे मिलने क्यों नहीं आई थी?

इसका मतलब राज यह समझा कि रोजी को उससे प्यार-व्यार कुछ नहीं था। वो उसकी निगरानी के लिए रखी गई थी। चौबीसों घंटे की निगरानी के लिए। शायद डॉक्टर जय हुक्म से वो राज से प्यार और शादी का खेल खेल रही थी।

वो चली गई तो डॉली धीरे-धीरे चलती हुई राज के करीब आ खड़ी हुई और दबी आवाज में बोली

"तुम्हारी मंगेतर तो बड़ी खूबसूरत है। मेरी बधाई स्वीकार करो।"

"हां। कम से कम तुमसे से तो खूबसूरत ही है।" राज ने धूर्तता से मुस्कराकर कहा, “जल्दी ही हमारी शादी होने वाली है। तुम शादी में जरूर आना।"

"जरूर।“ डॉली ने हंस कर कहा, “तुम्हारी शादी मेरे बगैर कैसे हो सकती है।"

“जाहिर है, दुल्हन के बगैर तो शादी होगी नहीं...।" राज ने उसका हाथ थामकर कहा । वो शरमाकर दोहरी हो गई।

एक हफ्ता अमन चैन से बीत गया। राज चलने-फिरने के काबिल हो चुका था, सिर का जख्म भी भर चुका था, सिर्फ टांगों में थोड़ी तकलीफ बाकी थी। डॉली की संगत में उसे वक्त गुजरने का अहसास नहीं हुआ था। अगर वो अकेला होता तो न जाने क्या होता!

. ज्योति और डॉक्टर जय दिन में कई-कई बार उसका हालचाल

पूछने आते थे। रोजी अपनी आदत के अनुसार तूफान बनकर आती थी और उथल-पुथल मचाकर चली जाती थी। डॉली चूंकि हर वक्त राज के साथ रहती थी, इसलिए रोजी को ज्यादा खुलकर खेलने का मौका नहीं मिल पाता था।

राज को सबसे ज्यादा फिक्र इस बात की थी किसी तरह

अपने पिछले महीने की गतिविधियों के बारे में जानकारी हासिल कर सके। क्योंकि राज को यकीन था कि उसे जिन्दा रखने के पीछे जरूर डॉक्टर जय की कोई गहरी चाल थी। वो राज को बेबस करके उससे अपनी शिकस्तों का भयानक बदला ले सके, जो मौत से भी ज्यादा खौफनाक हो । राज यह समझ रहा था ।

लेकिन वो इन्तकाम क्या था? कैसा था? यह राज की समझ में नहीं आ रहा था। रात को जब सब लोग सोने के लिए चले जाते थे तो डॉली और राज दबी आवाजों में हालात पर विचार करते थे, लेकिन अभी तक वो किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सके थे। राज चूंकि अभी ज्यादा मेहनत करने के काबिल नहीं हुआ था, इसलिए कोठी के अन्दर से जानकारियां हासिल करने का काम भी डॉली के जिम्मे ही था। उसे अभी तक कोई कामयाबी नहीं मिली थी, सिवा इसके कि उसने एक दिन ज्योति से जय को एक तहखाने का जिक्र करते सुना था।

डॉक्टर जय ने ज्योति से कहा था

"जब तक राज अपना काम सम्भालने के काबिल नहीं हो जाता, तब तक रोजी को कह दो कि वो तहखाने में जाकर पानी वगैरह दे दिया करे। उसे सावधान रहने के लिए जरूर कह देना।

"रोजी बड़ी लापरवाह सी लड़की है। जवाब में ज्योति ने कहा।

“कोई बात नहीं।“ डॉक्टर जय ने कहा था, "किसी न किसी को तो इस काम पर लगाना ही होगा। जाहिर है कि किसी नए आदमी पर विश्वास नहीं किया जा सकता।"

इतनी सी बात ही डॉली सुन पाई थी। डॉक्टर जय बातचीत बन्द करके दरवाजे की तरफ बढ़ा तो डॉली जल्दी से अगले दरवाजे में घुस कर छुप गई थी।

उस दिन रात को वो काफी देर तक इस बात पर सोचते रहे कि तहखाने में आखिर ऐसी क्या चीज थी जिसके बारे में डॉक्टर जय और ज्योति को इतनी फिक्न थी? उनकी बातचीत से राज को अन्दाजा हुआ था कि इससे पहले तहखाने की जिम्मेदारी उसी के सुपुर्द थी, जो स्वस्थ होने के बाद यकीनन उसे फिर से सम्भालनी पड़ेगी।

डॉली का ख्याल था कि तहखाने में वो चीज बन्द है और जिसे वो लागे रोजी के जरिये पानी वगैरह दिलवाना चाहते थे, वो यकीनन कोई खौफनाक दरिन्दा होगा। या हो सकता है कुछ नई किस्म के सांप वगैरहा हों या कोई छोटे जानवर हों।

लेकिन राज का ख्याल था कि शायद कोई बदनसीब इन्सान हो जिसे इन खूनी दरिन्दों ने कैद कर रखा हो और जिसे दाना पानी देकर जिन्दा रखना जरूरी हो।

बहरहाल, यह पहेली उस वक्त तक हल नहीं हो सकती थी, जब तक राज पूरी तरह स्वस्थ होकर अपनी तहखाने वाली ड्यूटी पर न लौट जाता ।

चलने-फिरने के काबिल हो जाने के बाद राज ने अपने कमरे की तलाशी ली। उसके इस कमरे में कपड़े रखने की एक

आलमारी थी, एक भारी मेज थी जिसमें कई दराजें थीं, चमड़े के दो सूटकेस थे जो कपड़ों की आलमारी के नीचे रखे हुए थे, एक बेड था, कुछ आराम कुर्सियां थीं, एक सोफा सेट भी लगा हुआ था। डॉली को राज के लिए बराबर वाला कमरा ठीक किया गया था, ताकि रात को अगर किसी वक्त राज को उसकी जरूरत महसूस हो तो वह आसानी से आवाज देकर उसे बुला सके।
 
उस रात, बारह बजे जब पूरी कोठी पर अन्धेरा और सन्नाटा छा गया तो राज और डॉली ने कमरे का दरवाजा अन्दर से बन्द करके तलाशी लेनी शुरू कर दी।

इस कमरे की हर चीज राज के लिए नई थी। सबसे पहले उन्होंने कपड़ों की अलमारी और सूटकेसों की तलाशी ली, लेकिन उनमें से उन्हें काम की कोई चीज नहीं मिल पाई। लेकिन राज को इतना जरूर पता चल गया कि पिछले खोए हुए छः महीनों में उसकी आदतों में भी काफी बदलाव आ चुका था, क्योंकि उसकी पसन्द के खिलाफ कई भड़कीले लिबास और फिजूल दिखावे की कई चीजें वहां मौजूद थीं।

जासूसी उपन्यासों का राज को कभी शौक नहीं रहा था, लेकिन अब उसके कमरे में जासूसी उपन्यासों से अलमारी भरी पड़ी थी। उसके प्रिय विषय, यानि जहरों या सांपों के बारे में एक किताब भी नहीं थी। जो सिगरेट वो पीता था, उसके बजाये एक दूसरे ब्राण्ड की सिगरेट पीता रहा था।

कपड़ों की आलमारी और सूटकेसों की तलाशी के बाद राज ने मेज की दराजें खोलनी शुरू की। ऊपर वाली दो-तीन दराजों में कई किस्म के कागजात बिखरे पड़े थे जिनमें से ज्यादातर बिल और कैशमीमो थे। लेकिन उसने चौथी दराज खोली तो

उसमें एक छोटी सी चमकदार पिस्टल रखी हुई थी।

डॉली पिस्टल देख कर उछल पड़ी और जल्दी से पिस्टल उठाकर उसे उलट-पुलट कर देखने लगी।

पिस्टल देखकर उसकी आंखों में चमक और चेहरे पर अजीब से उत्साह के भाव आ गए थे।

“ओह राज!" वो पिस्टल को इधर-उधर से देखते हुए बोली, “अपनी याददाश्त खो जाने के दौरान तुम इस पिस्टल से क्या करते हो?"

“मुझे क्या पता?" राज ने डॉली के चेहरे पर निगाहें जमाए-जमाए कहा, “अगर मुझे कुछ मालूम ही होता तो मुझे मौत के मुंह में आने की क्या जरूरत थी?"

डॉली ने सिर हिला कर पिस्टल दोबारा दराज में डाल दी। राज ने एक और दराज खोली तो उसमें से कुछ और अजीब चीजें मिलीं। उनमें से एक मोआ चाबियों का गुच्छा था। कुछ अजीब-अजीब से नाजुक औजार थे, पतले-चौड़े।

ये चीजें देखकर डॉली एक बार फिर अपनी कुर्सी पर उछल पड़ी

“ओह राज!" उसने जोश में राज का कंधा पकड़कर कहा, “ऐसा लगता है कि ये लोग तुमसे किसी किस्म का गलत काम लेते रहे हैं।"

“वो कैसे?" राज ने हैरत से पूछा।

“वो ऐसे कि ये छोटे-छोटे औजार ताले खोलने के काम आने वाले औजार हैं। इन औजारों और इन चाबियों की मदद से तुम मजबूत से मजबूत ताला मिनटों में खोल सकते हो।"

“जरूर ऐसा ही रहा होगा।" राज चिंतित लहजे में बोला, "लेकिन सवाल यह है कि अगर मैं छः महीने आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त रहा हूं तो वो आपराधिक गतिविधियां किस किस्म की थीं?"

"इसके सिवा क्या हो सकता है कि तुम अनजाने में डॉक्टर जय के इशारे पर चोरियां करते रहे हो। या फिर एक-दो कत्ल कभी कर डाले हों।"

कल का नाम सुनकर राज के जिस्म में कंपकपी की लहर दौड़ गई।

"नहीं-नहीं...भगवान के लिए ऐसा मत को।" वो जल्दी से बोला, "मैं किसी को कल नहीं कर सकता, चोरी नहीं करा सकता...मैं...मैं...।"

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फांसी का खौफनाक फंदा राज की आंखों के सामने घूम गया। डॉली उसकी बौखलाहट देखकर बोली

"हिम्मत से काम लो और आगे-आगे देखो, क्या होता है।"

"अब मैं समझ गया हूं डॉली कि क्यों डॉक्टर जय ने मुझे जिन्दा रखा है। वो एक खौफनाक इन्तकाम ले रहा है मुझसे, जो मौत से ज्यादा भयानक है।"

"क्या मतलब?" डॉली चौंकी।

“मतलब साफ है।" राज ने जवाब दिया, “अगर वो मुझे मार देता तो कहानी ही खत्म थी। लेकिन सिर्फ मुझे मारने से ज्योति और जय के इन्तकाम की आग नहीं बुझ सकती थी।"

"हां, ठीक है। डॉली ने गहरी सांस ली, "और अब मेरी समझ में सारा मामला आ गया है। वो तुम्हें कल्ल के इलजाम में फांसी चढवा देने पर तुले हुए है। इस तरह उनके भयानक प्रतिशोध की आग बुझ जाएगी और उन पर तुम्हारे कत्ल का इलजाम भी नहीं लग सकेगा। आज मैं मान गई कि डॉक्टर जय और ज्योति जरूर कोई शैतानी आत्माए हैं। उनके दिमाग शैतानी दिमाग हैं।

वो बहुत हैरत भरी आपराधिक स्कीमें बनाते हैं।"

"फिर, अब क्या किया जाए?" राज फिक्रमंदी से बोला।

"फिलहाल तो...तुम दराजों की तलाशी पूरी करो। इसके बाद कुछ सोचेंगे।" डॉली ने कहा।

राज दूसरी दराजें खोलकर देखने लगा। बाकी तमाम दराजें करीबन खाली ही थीं। अलबत्ता उसने सबसे नीचे वाली दराज खोली तो उसमें एक नोटबुक पड़ी दिखाई दी उसे। उसने नोट बुक उठाकर खोली तो वह उसकी अपनी हैंडराइटिंग में लिखी हुई थी। राज हैरत से देखने लगा। वो समझ गया कि यह उसी की लिखी डायरी है। तारीखें देखने से पता चला कि तारीखें उन्हीं छः महीनों के दौरान की तारीखें थीं जब वो अपने होशो-हवास में नहीं था।

"डॉली अब सारा भेद खुल जाएगा। राज ने खुश होते हुए कहा।

डॉली उठकर उसके करीब पहुंच गई। “क्या चीज है यह?"

"लगता है, मैं अपनी याददाश्त खो जाने के दौरान हर रोज डायरी लिखता रहा हूं। इस तरह हमें पिछले छः महीने की तमाम घटनाओं का विवरण इसमें मिल सकता है।

"यह तो बड़ी काम की चीज मिल गई है...।" डॉली भी खुश हो गई।

"दराजों की तलाशी तो पूरी हो चुकी है, मेरे ख्याल में अब हमें आराम से बैठ कर डायरी पढ़नी चाहिए।"

डॉली कुर्सी खींच कर राज के बेड के करीब पहुंच गई।

राज ने इत्मीनान से बिस्तर पर लेटकर डायरी पढ़नी शुरू कर दी। डॉली उसके चेहरे पर अपनी खूबसूरत आंखें जमाकर बैठ गई।

पहली एंट्री एक्सीडेंट की रात, यानि पच्चीस दिसम्बर से दस दिन बाद की थी-4 जनवरी।

मैं कौन हूं, कुछ याद नहीं आता। इन कुछ शरीफ आदमियों की दया पर हूं, जिनमें से एक खुद का डॉक्टर जय कहता है। दो

औरतें भी हैं यहां, एक डॉक्टर जय की बीवी ज्योति है और दूसरी एक लड़की है, रोजी। यह खास तौर से मुझे पर मेहरबान है, काफी रंगीली लड़की है। डॉक्टर जय का कहना हैं कि मेरा नाम राज है। हो सकता है ऐसा ही हो।
 
5 जनवरी-डॉक्टर जय का खल है कि मेरी याददाश्त काफी कमजोर है इसलिए मुझे डायरी जरूर लिखनी चाहिए ताकि घटनाओं के माध्यम से मैं अपना फर्ज पहचान सकूँ। मुझे तो लगता है, मेरी याददाश्त बिल्कुल ही गायब हो चुकी है। मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, मुझे कुछ भी याद नहीं है।

अब तो मैं सिर्फ डॉक्टर जय का एक दोस्त हूं, या यह कहूं कि उसका कर्मचारी। उसके हुक्म के खिलाफ जाने की मेरी हिम्मत नहीं होती। क्या डॉक्टर जय हिप्नोटिज्म का माहिर है? क्या उसने मेरी याददाश्त जानबूझ कर गायब कर दी है? मैं उसके सामने नर्वस क्यों हो जाता हूँ?

6 जनवरी तहखाने में हर रोज पानी देने का काम मेरे जिम्मे लगा दिया गया है। दोनों मुझसे प्यार करती हैं। प्यार क्या होता है, मुझे कुछ नहीं मालूम । लड़की अच्छी है, मगर एकांत में बहुत परेशान करती है।

9 जनवरी- मेरे दिमाग में एक अजीब सा तूफान उठता रहता है। ऐसा लगता है जैसे बहुत से रंग इकट्ठे होकर चक्कर काट रहे हो...मैं कौन हूं? क्या मुझे कभी याद नहीं आएगा।

13 जनवरी-सांप...खौफनाक सांप। डॉक्टर जय उन खौफनाक सांपों का जहर निकालता है। फिर उनका क्या करता है, मुझे नहीं मालूम । आज उसने मुझे इंजेक्शन लगाना सिखाया है। जिस खरगोश को डॉक्टर जय ने मुझे इंजेक्शन लगवाया था, वो फौरन ही तड़प-तड़प कर मर गया था। भगवान जाने सुई में क्या बात थी। डॉक्टर जय कहता था कि मुझे इंजेक्शनों से बहुत काम करने हैं।

18 जनवरी-अजीब आदमी है। कमी इंजेक्शन लगाना सिखाता है

और कभी ताले खोलना। आज उसने कुछ अजीब-अजीब से औजार लाकर दिए हैं और ताले खोलना सिखाता रहा था।

21 जनवरी-तहखाना अच्छा खासा लम्बा-चौड़ा हॉल जैसा है...।

उसके बाद राज बाइस जनवरी की घटनाएं पढ़ने लगा तो डॉली ने रोक दिया, “यह एंट्री अधूरी ही रह गई।"

"हां। राज ने जवाब दिया, "इसी से तुम मेरी दिमागी हालत का अन्दाज लगा सकती हो। मैं एक-एक बात पर ज्यादा देर सोच नहीं सकता था। इसलिए पूरी डायरी में ही शायद ऐसी अनियमितता मिलेगी। ध्यान बंटा और बात दिमाग में से निकल गई।"

“मैं समझ नहीं हूं। तुम आगे पढ़ो।" डॉली ने उत्सुक लहजे में कहा। राज ने फिर पढ़ना शुरू कर दिया।

22 जनवरी-सांप ने डस लिया। ज्योति कह रही थी कि उस आदमी को सांप ने डस लिया है, वो मर गया ।पता नहीं कौन था वो! क्यों वो सांप के पास गया था? मुझे तो अब इन सांपों से डर लगने लगा है। अगर मुझे भी किसी सांप ने काट खाया तो क्या होगा?

25 जनवरी-आज पहला इम्तहान था। रात को डॉक्टर जय कार में बिठाकर मुझे न जाने कहां ले गया था और एक मकान की तरफ इशारा करके उसने कहा था कि मैं उसका ताला तोड़ दूं। मैंने एक मिनट से भी कम वक्त में वो मजबूत ताला खोल दिया था। डॉक्टर जय मुझे लेकर अन्दर गया। मकान खाली पड़ा था। एक कमरे में एक लोहे की अलमारी रखी थी। डॉक्टर जय ने मुझे हुक्म दिया था कि उस आलमारी का ताला खोल दूं। मैंने ताला खोल दिया था। डॉक्टर ने कुछ कागजात निकाले थे और हम वापिस आ गए थे।"

डायरी में क्योंकि बहुत सी अनावश्यक बातें भी विस्तार से लिखी गई थीं, इसलिए राज ने कहा

"क्या ख्याल है, अगर मैं अनावश्यक बातें छोड़ता जाऊं?"

"कोई हर्ज नहीं है।" डॉली ने कहा, “ताकि उन्हें देखते हुए हम कोई आगे का कदम उठा सकें।

राज ने सिर्फ वही बातें ऊंची आवाज में पढ़नी शुरू कर दी जो अहम हो सकती थीं।

7 फरवरी-तौबा...इस कमरे में तो सांपों का ढेर है। पिंजरा में बड़े-बड़े खौफनाक सांप बंद है। शीशियों में पड़े हैं। भगवान जान डॉक्टर जय इन सांपों का क्या करता है। मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा। कोई अदृश्य ताकत ही है जो मुझसे यह काम करवा रही है।
 
19 फरवरी-आज रोजी ने मुझे बताया कि जल्दी ही मेरी और उसकी सगाई होने वाली हैं। उसके बाद क्या होगा, मुझे नहीं मालूम । कहते हैं कि शादी होगी। मैं कौन हूं। डॉक्टर जय को मुझ पर इतना अधिकार क्यों है? क्यों? कुछ समझ में नहीं आता।

28 फरवरी-कल रात डॉक्टर जय के साथ मैं शहर गया था,

रात करीब एक बजे। एक मकान के दरवाजे पर पहुंच कर डॉक्टर ने मुझे बोतल में कोई चीज देकर कहा था कि मैं बोतल चीज मकान के दरवाजे पर छिड़क कर आग लगा दूं और वापिस कार में आकर बैठ जाऊं। मैंने हुकम पूरा किया । डॉक्टर जय हमेशा रात को ही मुझ बाहर ले जाता है।

11 मार्च-डॉक्टर जय मेरी तारीफ कर रहा था कि मैं ताले तोड़ने का मास्टर हो गया हूं। आज की रात को वो मुझे कार में बिठा कर ले गया था न जाने कहा। उसने एक बड़े खूबसूरत मकान का ताला मुझसे खुलवाया था। फिर मकान के अन्दर भी एक खास तिजोरी का ताला भी मुझसे खुलवाया गया था। तिजोरी में बहुत सा नकद रूपया था और ढेरों कीमती जेवर थे। डॉक्टर जय कहता था कि यह काम बहुत-बहुत अच्छा है। जरा सी मेहनत से ढेरों दौलत मिल जाती है, थोड़ी देर में।"

13 मार्च-आज मैं रोजी के साथ बाजार गया था, रास्ते में न जाने क्यों रोजी घबरा गई थी। वो कहती थी कि पुलिस का कोई आदमी हमारा पीछा कर रहा है। भला कोई आदमी हमारा पीछा क्यों करेगा? मैंने रोजी से पूछा भी, कि कोई क्यों हमारा पीछा कर रहा है। लेकिन उसने कुछ नहीं बताया। अजीब लड़की है। अब तो मुझे भी रोजी खूबसूरत लगने लगी है।

29 मार्च-कल डॉक्टर जय के हुकम से मैंने एक सेठ श्याम सुन्दर को इंजेक्शन लगा दिया था और वो तड़प-तड़प कर मर गया था, बिल्कुल पहले इंजेक्शन वाले खरगोश की तरह। डॉक्टर ने कहा था, वो मर गया है। डॉक्टर जय मुझे भी तो इंजेक्शन लगाता है, फिर मैं क्यों नहीं मरा? अजीब पहेली है।

15 अप्रैल-डॉक्टर जय ने हुकम दिया है कि अब मैं शहर जाया करूं। रोजी कहती थी कि शहर में मेरे लिए खतरा है। मैंने क्या किया है? रोजी बहुत प्यारी लड़की है, मुझे बहुत प्यार करती है। हमारी सगाई हो चुकी है-ये कहते हैं कि जल्दी ही शादी भी हो जाएगी। रोजी के साथ मुझे एक खास किस्म का मजा मिलता है जो किसी दूसरे शख्स के साथ कभी नहीं मिलता। शायद इसी का नाम जिन्दगी है।

11 मई-दो दिन से मैं और रोजी बंगाल होटल में ठहरे हुए हैं। डॉक्टर जय और ज्योति कहीं बाहर गए हुए हैं, इसलिए उन्होंने इजाजत दे दी थी कि तीन दिन के लिए हम कहीं भी जा सकते हैं। मैं कहां जाता? रोजी मुझे इस होटल में ले आई, और मैं आ गया।

लेकिन अजीब बात है, जब से हम यहां आए हैं, एक शख्स हमें घूरता रहता है, हमेशा । रोजी ने मुझे बताया है कि वो पुलिस का आदमी है जो हमारी निगरानी कर रहा है। लेकिन क्यों? यह उसने नहीं बताया।

12 मई-अब हम दोबार कोठी में आ चुके हैं। चलते वक्त रोजी ने पुलिस वाले को ऐसा चकमा दिया था कि वो हमारा पीछा करना भूल गया था।

21 जून-अब मेरे शहर जाने पर बिल्कुल पाबन्दी लगा दी गई है। ज्योति कहती थी कि शहर जाने से मेरे गिरफ्तार हो जाने का खतरा है क्योंकि पुलिस मुझे पकड़ना चाहती है। लेकिन मुझे क्यों? पुलिस मुझे पकड़ भी लेती तो क्या कर लेगी? मैं जरूर जाऊंगा। यह रोजी भी साये की तरह हर वक्त मेरे साथ रहती है। आईन्दा मैं उसे भी साथ लेकर नहीं जाऊंगा, अगर इस बार भी किसी पुलिस वाले ने मेरा पीछा किया तो उसके पास जाकर उससे पूलूंगा कि वो मुझसे क्या चाहता है।

बस डायरी यहीं तक लिखी गई थी, आगे पन्ने खाली पड़े हुए थे। शायद राज उसी रात सबकी नजर बचाकर शहर चला गया था और एक्सीडेंट का शिकार हो गया था।

डॉली भी डायरी की घटनाएं सुनकर गहरी फिक्र में डूब गई थी। उन दोनों के अन्देशे और अन्दाजे बिल्कुल सही निकले थे। डायरी से साबित हो गया था कि डॉक्टर, राज से बहुत अजीक सा इन्तकाम ले रहा था। उन तमाम जुर्मों को करते हुए उसकी अंगुलियों के निशान हर जगह रह गए होंगे, जिनसे पुलिस आसानी से नीकण्ठ के खिलाफ तमाम जुर्म साबित कर सकती थी।

डॉक्टर जय की स्कीम शायद यह थी कि जब वो पूरी तरह पुलिस के सन्देह के घेरे में आ जाए तो डॉक्टर उसे गिरफ्तार करवा दे और राज अपने जुर्मों की सजा के तौर पर फांसी के फंदे पर लटका दिया जाए। इस तरह राज भी डॉक्टर जय और ज्योति के रास्ते से हमेशा के लिए हट जाता और उन दोनों का इन्तकाम भी पूरा हो जाता।

"क्या सोच रहे हो?" अचानक डॉली की आवाज ने राज को चौंका दिया।

"कुछ नहीं।" राज ने उदास सी मुस्कराहट के साथ कहा, "अब इस चक्क से कैसे निकलूंगा मैं?"

"डॉक्टर जय ने अपनी तरह से कोई ऐसा पहलू नहीं छोड़ा कि तुम अपने बचाव की कोई तरकीब कर सको।"

डॉली ने सोचते हुए कहा।

“वो बहुत शातिर मुजरिम है।" राज ने जवाब दिया,

“उस जैसा तेज दिमाग मुजरिम शायद पूरे भारतवर्ष में कोई न हो।"

"जवाब फिर वही है कि अब क्या किया जाए?" डॉली ने पूछा।

“मैं भी इसी सवाल पर ही सिर खपा रहा हूं।"

"दूसरी बात यह है कि आखिर उसने तुम्हारी याददाश्त कैसे खत्म कर रखी थी?

"मेरे ख्याल में यह काम उसने किसी सांप के जहर के जरिये किया होगा। तुम जरा सोचो, वो सांप के काटने से मर जाने वाले इन्सान को जिन्दा कर सकता है, तो क्या वो कोई ऐसा जहर नहीं तैयार कर सकता जो सीधा आदमी की याददाश्त पर असर करे?"

“डॉक्टर जय के बारे में इतना कुछ जान लेने के बाद अब मैं उसके बारे में कोई बात नामुमकिन नहीं समझती-लेकिन अभी भी एक बात मेरी समझ में नहीं आई कि तहखाने में ऐसी क्या चजी है जिसकी देखभाल तुम्हारे जिम्में थी?"
 
"तब तक क्या कहा जा सकता है, जब तक तहखाने में जाकर उसे देख न लिया जाए?"

"मेरा ख्याल है कि सबसे पहले हमें वो तहखाना ही तलाश करना चाहिए।“ डॉली ने सुझाव रखा।

"हां। और तहखाने के साथ ही हमें डॉक्टर जय की लेब्रॉटरी के राज भी मालूम करने चाहिएं।“ राज ने कहा।

"यह काम सिर्फ तुम ही कर सकते हो।“ डॉली ने कहा,

"क्योंकि खास बात है कि मैं तो सांपों से बहुत डरती हूं।"

"तो फिर कार्य-विधी क्या होनी चाहिए?"

"आज रात को ही अपना काम कर लेना चाहिए।" डॉली ने कहा-“थोड़ी देर में जब वो सब सो जाएं तो हमें चुपके-चुपके तहखाना तलाश करना चाहिए।"

“यह ठीक रहेगा। राज ने फौरन उसका सुझाव स्वीकार कर लिया, “बेहतर है कि हम लोग कुछ देर आराम कर लें और दो बजे के बाद ही अपना अभियान शुरू करें। लेकिन तुम अपने कमरे में जाओ, उससे पहले मैं तुमसे एक बात पूछना चाहता हूं।"

"क्या?" डॉली ने थोड़ी हैरानी के साथ पूछा।

"तुम्हारा क्या ख्याल है, इन हालात में पुलिस मुझे बेगुनाह मान लेगी?

"अभी तो इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।" डॉली ने जवाब दिया, “हां, अगर हम दोनों मिल-जुल कर कुछ ऐसे सबूत तलाश कर लें जिनसे डॉक्टर जय के अपराधों पर रोशनी डाली जा सके, तो फिर पुलिस को तुम्हें बेगुनाह मानना ही पड़ेगा।"

“अब क्या पता, ऐसे सबूत कहां मिल सकते हैं? कम से कम डॉक्टर जय से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि उसने अपने खिलाफ कोई सबूत पीछे छोड़ा हो।“ राज ने मायूसी से कहा।

"कहीं तो मिलेंगे ही।" डॉली ने कहा, “कोशिश करना हमारा फर्ज है, आगे प्रभु इच्छा!"

कहकर डॉली कुछ देर के लिए अपने कमरे में चली गई। राज सोचने लगा।

ठीक दो बजकर तीस मिनट पर राज और डॉली कमरे से बाहर निकले। चाबियों का गुच्छा और एक टार्च राज ने सावधानीवश अपने साथ ले ली थी। यह बड़ा खतरनाक

अभियान था। राज को डर था कि अगर किसी ने देख लिया तो मुसीबत हो जाएगी। डॉक्टर जय खबरदार हो जाएगा। वो समझ जाएगा कि राज की याददाश्त वापिस आ चुकी है। वो फौरन उसे पुलिस के हवाले करने की कोशिश करेगा। फिर उसे कोई सबूत नहीं मिल पाएगा। यह सब बातें राज के दिमाग में थीं।

वो सतर्कता से चलते हुए तहखाने की तलाश में जा रहे थे। डॉली का ख्याल था कि तहखाने के दरवाजे पर ताला लगा होगा, इसलिए उसे तलाश करना ज्यादा मुश्किल साबित होगा।

लेकिन एक घंटे की लगातार कोशिश के बाद पता चला कि डॉली का ख्याल गलत था। तलाशी के दौरान उन्हें ऐसे कई दरवाजे मिले थे कि जिन पर ताला लगा हुआ था और उनकी हालत से पता चलता था कि वो बहुत कम खोले जाते हैं। लेकिन इनमें से तहखाने का एक भी दरवाजा नहीं था।

एक दरवाजा, जो लम्बे कॉरीडोर के आखिर में सीढ़ियों की बगल में था, उसका ताला राज ने खोला तो उसे पता चला कि उसमें टूटा-फूटा फर्नीचर पड़ा हुआ था। एक और दरवाजा खोला गया तो उसमें लेब्रॉटरी में काम आने वाला कांच का सामान और दवाओं की शीशियां रखी हुई थीं। इसी तरह उन्होंने कई दरवाजे खोले लेकिन हर जगह उन्हें नाकामी ही हाथ लगी थी।

“आगे चलो।" डॉली ने राज के कान में सरगोशी करते हुए कहा।

राज आगे बढ़ा। कोठी में हॉल के पास रोजी का कमरा था। तहखाने की तलाश में नाकाम होकर जब वो दोबारा हॉल के पास पहुंचे तो राज ने डॉली से कहा

"तुम यहीं ठहरो, मैं जरा रोजी के कमरे में जाता हूं।"

"क्यों?" उसने राज की तरफ अजीब निगाहों से घूरते हुए पूछा।

“कम से कम उसके कमरे की तलाशी तो ले ही लूं...।"

"लेकिन...अगर वो जाग गई तो...।"

"कोई हर्ज नहीं। मैं कह दूंगा कि उसे मिलने ही आया हूं...।"

लेकिन डॉली ने तिरछी नजर से उसकी तरफ घूरकर देखा तो वो शरारत से बोला

"इसमें हैरान होने की क्या बात है? रोजी आखिर मेरी मंगेतर ही तो है। इसलिए कानून से भी हर वक्त उसके कमरे में जाने

का हक है।" वो अपनी हंसी न रोक सका।

“ज्यादा बातें न बनाओ-आगे बढ़ो।" डॉली ने कहा और राज आगे बढ़ गया।

वो वापस अपने-अपने कमरे में आ गए।

“अब क्या करें?" आराम से बेड पर बैठते हुए राज ने रटा-रटाया सवाल पूछा।

"कुछ नहीं।" डॉली ने जवाब दिया, “फिलहाल आराम से सो जाओ, कल नए सिरे से कोशिश करेंगे।"

"लेकिन मैं हैरान हूं कि तहखाना आखिर है कहां?"

“अगर यही मालूम होता तो इतनी परेशानियां क्यों उठाते?" डॉली ने जवाब दिया।

“अब तो सिर्फ एक ही रास्ता बाकी है।"

"क्या? कौन सा रास्ता?"

“यही कि अब रोजी से पूछा जाए कि तहखाने का दरवाजा कहां है।"

“उससे कैसे पूछोगे? जबकि उसे मालूम है कि तुम तहखाने का दरवाजा जानते हो।"

"यह बड़ी मामूली बात है।" राज मुस्कराया।

"वो कैसे?"

“कल मैं उससे कुछ प्यार मोहब्बत की बातें करने के बाद कहूंगा कि अब मेरी हालत बिल्कुल ठीक है, इसलिए मैं चाहता हूं कि थोड़ा बहुत अपना काम शुरू कर दूं। लेकिन चूंकि अभी मैं ज्यादा देर चल-फिर मेहनत नहीं कर सकता, इसलिए वो एक-दो दिन मेरी थोड़ी मदद कर दे, मेरे साथ रह कर ।'
 
कमरे के एक कोने में एक खूटी पर रबड़ का एक पाईप टंगा हुआ था, वहां नीचे पानी का नल था जिसका पाईप शायद ऊपर पानी के टैंक से जुड़ा हुआ था।

रोजी ने रबड़ के पाईप का सिरा पानी के नल से जोड़कर और पाईप का दूसरा सिरा हाथ में बेल पर पानी छिड़कना शुरू कर दिया। पाईप के सिरे पर जालीदार फब्बारा लगा हुआ था जिससे पानी फौहारों की शक्ल में बेल पर गिर रहा था।

थोड़ी देर में ही पूरी बेल पानी में भीग गई। कमरे का वो आधा हिस्सा ढलाब में था जिससे पूरे कमरे में पानी इका नहीं हुआ था। पानी बेल के नीचे ही जमा हो गया था।

इस काम से फारिग होकर रोजी ने पाईप निकाल कर दोबारा खूटी पर टांग दिया और नल के करीब ही लगा वॉल्व का चक्का घुमा दिया।

चक्का घुमाते ही ऐसी आवाजें आनी शुरू हो गईं जैसे तेज हवा बंद पाईप में सर्रा रही हो। थोड़ी देर बाद ही बेल के चारों तरफ आग फैलनी शुरू हो गई। राज सख्त हैरानी से देख रहा था कि यह क्या हो रहा है? लेकिन वो रोजी से कुछ पूछ भी नहीं सकता था।

कुछ ही मिनट में पूरी बेल आग में छुप गई और वो गहरी धुन्ध बाकी कमरे में भी फैनी शुरू हो गई। यह भाप हल्की गर्म थी।

कुछ देर बाद रोजी ने वो छोटा सा चक्का घुमा कर भाप निकलना रोक दी और सहारा देकर राज को बाहर ले आई।

बाहर आकर राज ने रोजी से पूछा

"मैं कितनी बार हैरान हो चुका हूं कि डॉक्टर साहब ने यहां भाप का सिस्टम कैसे बना रखा है?"

रोजी ने सिर को जरा सा हिला कर कहा-“इस कमरे की दीवार में एक छोटी सा स्टीम बॉयलर लगा कर उसे बिजली गर्म किया जाता है, उसमें भाप बनती है। बेल की तरफ दीवार में छोटे-छोटे सुराख हैं जो लोहे के पतले-पतले पाईपों के जरिये आने वाली भाप कमरे में पहुंचाते हैं। वो बॉयलर कन्ट्रोल घुमाते ही भाप को कमरे में आनी शुरू हो जाती है। कमरे की दीवारों पर चूंकि बेल की शाखाएं फैली हुई हैं, इसलिए वो सुराख नजर नहीं आते, ऐसा लगता है जैसे भाप बेल से ही निकल रही हो।"

"लेकिन यह बेल है कि चीज की?" उसने दूसरा सवाल किया।

रोजी ने एक बार घूर कर राज की तरफ देखा और बोली,

“मुझे खुद पता नहीं है...।“ वो बोली-“डॉक्टर जय कोई नया एक्सपेरीमेंट कर रहे हैं।"

उसके बाद उनमें कोई बात नहीं हुई, और रोजी राज को उसके कमरे में ले आई।

रात को जब राज ने डॉली को तहखाने वाली बातें बताई तो वह भी हैरान रह गई। वो दोनों बहुत देर तक उस बेल पर ही बहस करते रहे। आखिर में राज इसी नतीजे पर पहुंचा कि वो शायद कोई जहरीली बेल है, जिससे जय जहर प्राप्त करता होगा।

“अब क्या प्रोग्राम है?" उसने डॉली से पूछा।

"मेरे ख्याल में तो अब हमें डॉक्टर जय की लेक्रेटरी की तलाशी लेनी चाहिए।"

“बढ़िया सुझाव है।" राज ने जवाब दिया-'इस तरह मैं यह भी मालूम कर सकूँगा कि उसने मेरी याददाश्त गुम करने के लिए कौन सा जहर इस्तेमाल किया था। लेकिन इसमें भी एक उलझन है।"

"वो क्या?"

“मैं प्रयोग कैसे करके देखूगा?"

“डॉक्टर जय को लेब्रॉटरी में इतने जानवर मरे हुए हैं, उन पर प्रयोग करो।"

"लेकिन याददाश्त खो जाने का प्रयोग किसी जानवर पर करने से क्या होगा? ऐसी दवा या जहर का प्रयोग किसी आदमी पर ही किया जा सकता है।"

"तुम कोशिश करके देख लो। अगर जानवर पर प्रयोग का असर न हो तो मैं प्रस्तुत हूं। वो प्रयोग तुम मेरे ऊपर करके देख लेना।" डॉली ने सोचते हुए कहा।

"तुम...?" राज ने हैरत से कहा।

"हां।" उसने गम्भीरता से जवाब दिया, “तुम्हें अदालत में बेगुनाह साबित करने के लिए यह बहुत जरूरी है।"

"लेकिन जानती हो, इस तरह के प्रयोगों में जान का खतरा होता है?

"जानती हूं।" वो बोली, “तुम्हारी खातिर मैं कुछ भी कर सकती

"डॉली...।“ राज ने भावावेश में उसे खींचकर सीने से लगा लिया-"मैं तुम्हारा यह अहसान जिन्दगी भर नहीं भूल सकूँगा। लेकिन मैं तुम पर प्रयोग नहीं कर सकता।"

"तो फिर क्या करें हम?" उसने राज के सीने पर सिर रखकर कहा।

"मैं उन जानवरों पर ही प्रयोग शुरू करता हूं। हो सकता है कि कोई रास्ता दिखाई दे जाए। इसके अलावा एक और भी तरकीब मेरे जेहन में है।

"कौन सी?"

“मेरा ख्याल है कि मैं बम्बई से अपने दोस्त सतीश और दिल्ली से डॉक्टर गुप्ता को भी फोन करके कलकत्ता बुलवा लूं। वो दोनों हर काम में मेरी मदद करेंगे। मैं और डॉक्टर गुप्ता जय के जहरों पर अच्छी तरह प्रयोग कर सकेंगे।"

"जब तक वो लोग नहीं आते, तुम अकेले ही कोशिश करो।" डॉली ने कहा।

"हां, यह तो मैं आज ही शुरू कर दूंगा।" राज ने कहा।

“अच्छा, तो फिर आज रात के लिए क्या प्रोग्राम है?"

“आज रात हम लेब्रॉटरी में धावा बोलेंगे। एक बजे तक आराम कर लो।"

“ठीक है।" डॉली ने सिर हिलाया और सोने के लिए अपने कमरे में चली गई

एकांत में राज को ख्याल आया कि उसके इस तरह अचानक गायब हो जाने से डॉक्टर जेम्स ने क्या सोचा होगा?

क्या उसने डॉक्टर गुप्ता को फोन कर दिया होगा? अगर कर दिया था तो उसने राज की खबर क्यों नहीं ली? उसे तलाश करने की कोशिश क्यों नहीं की?

ठीक एक बजे डॉली तैयार होकर आई। दोनों लेब्राटरी की तरफ चल पड़े। कोठी में उनके अलावा सब लोग सो चुके थे। अन्धेरा और सन्नाटा छाया हुआ था। लेब्राटरी वाला हिस्सा बाकी कमरों से अलग थलग था। फिर भी राज ने लेब्रॉटरी में दाखिल होने के बाद खिड़कियों के काले पर्दे खींच दिए।

डॉली लेब्रॉटरी के बाहर खड़ी होकर पहरा देने लगी ताकि अगर कोई जाग जाए तो वह फौरन राज को खबरदार कर सके। राज ने लेब्रॉटरी की तलाशी लेनी शुरू कर दी।

एक घंटे के अन्दर-अन्दर राज ने पूरी लेब्रॉटरी की तलाशी ले डाली और तमाम जहरों को देख लिया। इनमें से कोई भी चीज ऐसी नहीं थी जो इन्सान को मारने के बजाय सिर्फ उसके दिमाग पर असर करे।
 
मायूस होकर वो वापिस आ गया। कमरे में लौटकर वो फिर विचार-विमर्श करने लगे। वो इस फैसले पर पहुंचे कि कोई न कोई ऐसी सुरक्षित जगह जरूर होगी जहां डॉक्टर जय अपने खास जहर और कीमती दवाए रखता होगा। लेकिन वो जगह कैसे तलाश की जाए? यह उसकी सबसे बड़ी उलझन थी।

“मेरे ख्याल में वो जगह जरूर डॉक्टर जय के कमरे में ही होगी।“ डॉली ने सोचते हुए कहा।

"लेकिन उसकी कमरे की तलाशी किस तरह ली जाए?" राज ने पूछा।

“वही तुम्हारी पुरानी तरकीब, जो तुमने मुझे बताई थी। यह उन्हें नींद की दवा खिलाकर।"

"तुम मुझे उस दवा का नाम लिख दो। मैं ले आऊंगी।"

“और उस दवा को रात के खाने में मिलाना भी तुम्हारी जिम्मेदारी है। राज ने कहा।

फिर डॉली ने राज को लिटाकर अच्छी तरह उसे चादर ओढ़ाई और सोने चली गई।

सुबह डॉली ज्योति से छुी लेकर शहर चली गई और तीन घंटे बाद वापिस लौटी। उस दिन राज फिर तेजी के साथ तहखाने में गया और उस अजीबोगरीब बेल को पानी देकर लौट आया।

शाम को राज ने प्रोग्राम के मुताबि पेट में सख्न दर्द का बहाना कर दिया और डॉली उसके लिए पानी गर्म करने किचेन में चली गई और आधे घंटे बाद खाने में बेहोशी की दवा मिलाकर वापस आ गई।

"क्यों, कोई कठिनाई तो नहीं हुई?" राज ने पूछा।

"नहीं।" डॉली ने मुस्करा कर कहा, “रसोइया किसी काम से बाहर गया था तो मैंने गोश्त में दवा मिला दी थी और उसे अच्छी तरह मिला दिया था।"

"इसका मतलब है हमें रात को गोश्त नहीं खाना चाहिए?"

"अगर उनके साथ बेहोश होकर लेटना हो तो जरूर खाईये।" डॉली हंस कर बोली। राज भी मुस्करा दिया।

"तुम्हारा दिमाग किसी माहिर जासूस की तरह काम कर रहा है डॉली। तुम खामखां नर्स की नौकरी कर रही हो-तुम्हें तो सी. आई. डी. में होना चाहिए।

"ठीक है, इस बखेड़े से निपट कर मैं सी.आई.डी. में अप्लाई करूंगी।"

रात को दस बजे तक वो तमाम लोग अपने-अपने कमरे में जाकर आराम से सो गए। यह नींद की दवाई राज की कई बार की आजमाई हुई थी।

ग्यारह बजे के करीब राज और डॉली ताले खोलने वाले औजारों और टार्च वगैरह से लैसे होकर अपने अभियान पर रवाना हो गए।

सबसे पहले उन्होंने डॉक्टर जय के कमरे की तलाशी ली, लेकिन वहां उन्हें काम की चीज न मिल सकी। यहां ऐसी कोई खुफिया अलमारी नहीं थी जहां डॉक्टर जय अपनी चीजें रख सके। उन्होंने कमरे के एक-एक हुक और कील को खींचकर, दबाकर और घुमाकर देखा, दीवारों को भी ठीक बजा कर देखा। लेकिन नाकाम ही रहे।

उसके बाद उन्होंने ज्योति के कमरे की भी तलाशी ली। उसके कमरे में पहुंचकर न जाने क्यों राज पर कंपकंपी सी छाने लगी। वो नाईट ड्रेस में पड़ी थी, उसके चेहरे के आकर्षण और यौवन में इतने बरस गुजर जाने के बावजूद रत्ती भर भी फर्क नहीं आया था। ऐसा लगता था उम्र के साथ-साथ उसका आकर्षण भी बढ़ता जा रहा हो।

ज्योति के कमरों में लगी तस्वीरों की जांच करते हुए उन्हें एक खुफिया तिजोरी मिल गई। थोड़ी सी कोशिश के बाद राज ने वो तिजोरी खोल ली। लेकिन उसमें पत्र के तीन-चार पुलिन्दों के सिवा उन्हें कुछ न मिल सका।

राज ने एक सरसरी निगाह उन पत्रं पर डाली तो उसे पता चला कि वो ज्योति के विभिन्न प्रेमियों के पत्र थे। जो निश्चित तौर पर ज्योति के भावी शिकार थे। या अब तक शिकार होकर दूसरी दुनिया में पहुंच चुके थे।

पत्रे को देखने के बाद राज ने उन्हें दोबारा तिजोरी में रखते हुए डॉली से कहा

“पता नहीं इन बकिस्मत आशिकों में से कितने अब तक मौत के मुंह में समा चुके होंगे...और कितने मौत की दुल्हन से मिलने वाले होंगे।"

“मुझे तो हैरत है कि तुम कभी ज्योति पर आशिक क्यों नहीं हुए?" डॉली ने शोखी से कहा।

"इसलिए, क्योंकि मुझे तुम पर जो आशिक होना था!" राज बोला और डॉली शरमाकर रह गई।

फिर अचानक राज को ख्याल आया कि तहखाने की सीढ़ियां उतरकर एक तंग सा रास्ता उसे दिखाई दिया था। वहां कुछ और कमरे भी होने चाहिए। वर्ना उस रास्ते का मतलब ही क्या था?

उसने यह सोचकर इसका जिक्र डॉली से किया तो डॉली बोली

"तो चलो, वो रास्ता भी देख लेते हैं।" वो दोनों तहखाने की तरफ चल पड़े।

जीने से उतरकर डॉली ने इच्छा प्रकट की कि पहले वो तहखाने वाली वो अजीबोगरीब बेल देखना चाहती है। राज उसे बड़े हॉल में ले गया। थोड़ी देर तक वो हैरत से बेल को देखती रही। एक-दो बार उसने धीरे-धीरे इस तरह सिर हिलाया जैसे उसकी समझ में कोई नई बात आ गई हो।

फिर वो बाहर वापिस आ गई। राज ने पूछा

“क्यों, कुछ समझ आया क्या?"

"नहीं। लेकिन कल मैं इस बेल पर एक प्रयोग करना चाहती

"किस प्रकार का प्रयोग?"

“यह मैं अभी नहीं बता सकती। कल ही बताऊंगी।"

राज खामोश रह गया।

वो दोनों बाहर आये और उन्होंने चारों तरफ की दीवारों में कोई गुप्त रास्ता तलाश करने की कोशिश करनी शुरू कर दी। लेकिन कोई ऐसी जगह उन्हें नजर नहीं आई जिस पर वो खुफिया दरवाजा होने का सन्देह कर सकते।
 
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