• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

कामिनी की सु-सु और नितम्बों का विचार मन में आते ही दिल की धड़कन तेज होने लगती है और मन करता है आज रात को पढ़ाते समय ही उसे प्रेम का अगला सबक सिखा दूं। पर मधुर की मौजूदगी में यह सब कहाँ संभव हो पायेगा? तो क्या कल सुबह-सुबह मधुर के स्कूल जाते ही … अगला सबक … ??? यालाह … मेरा दिल तो अभी से धड़कने लगा है। लंड तो जैसे अड़ियल घोड़ा बनकर चुग्गे के लिए हिनहिनाने लगा है।

ओह … कल तो रविवार है? लग गए लौड़े!

एक बात तो हो सकती है आज रात को पढ़ाते समय भी लिंगपान तो करवाया ही जा सकता है। मधुर तो अन्दर कमरे में सोयी हुई रहेगी और कामिनी तो चुप-चाप यह लिंगपान वाला सवाल आसानी से हल कर लेगी। और फिर एक रात की ही तो बात है। अब देर करना ठीक नहीं है सोमवार को लिंग देव का दिन है। अब लिंग देव इतनी कृपा तो हम दोनों भक्तों पर कर ही देंगे।

भेनचोद यह किस्मत हमेशा हाथ में लौड़े लिए तैयार ही रहती है पर सोमवार लिंग देव इतनी कृपा तो हम दोनों भक्तों पर कर ही देंगे। सोमवार को सुबह-सुबह उसके साथ बाथरूम में नहाते हुए प्रेम का अगला सबक सिखाने का यह आईडिया बहुत ही कारगर और सुन्दरतम होगा।

शाम को घर जाते समय मैंने कामिनी के लिए बढ़िया क्वालिटी की इम्पोर्टेड चॉकलेट खरीदी और उसकी पसंद के आम और लीची फ्लेवर की फ्रूटी के 8-10 पाउच भी ले लिए थे।

आज कामिनी के बजाय मधुर ने दरवाजा खोला। मैंने इधर उधर नज़र दौड़ाई पर कामिनी कहीं नज़र नहीं आ रही थी।

अब कामिनी के बारे में सीधे मधुर से पूछना तो ठीक नहीं था तो मैंने बहाने से मधुर से कहा- मधुर आज तो कड़क चाय पीने का मन कर रहा है कामिनी को बोलो ना प्लीज … बना दे।

“मैं बना देती हूँ आप फ्रेश होकर आओ?”

“वो कामिनी नहीं है क्या?”

“कामिनी तो घर चली गई है।” मधुर ने बम विष्फोट कर दिया।

“क … क्यों?” मैंने हकला सा गया।

“अरे … ये निम्नवर्गीय लोगों की परेशानियां ख़त्म ही नहीं होती.”

“अब क्या हुआ?”

“होना क्या है वही रोज-रोज पैसे का रोना लगा रहता है.”

“म.. मैं समझा नहीं?” मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। क्या पता इनकी रोज-रोज पैसों की डिमांड से तंग आकर मधुर ने कामिनी को काम से ही ना हटा दिया हो। मैं तो देव चालीसा ही पढ़ने लगा। हे लिंग देव प्लीज अब लौड़े मत लगा देना।

“वो … अनार है ना?” मधुर ने कुछ सोचते हुए कहा।

मेरी झुंझलाहट बढ़ती जा रही थी। ये मधुर भी पूरी बात एक बार में कभी नहीं बताती।

“हाँ?”

“इन लोगों को सिवाय बच्चे पैदा करने के कोई काम ही नहीं है। उसके तीन बच्चे तो पहले से ही हैं अब वह फिर पेट से थी तो उसका गर्भपात हो गया।”

“ओह … बहुत बुरा हुआ.” मैंने कहा।

“अनार का पति कुछ कमाता-धमाता तो है नहीं, सारी आफत बेचारी गुलाबो की जान को पड़ी है। और उसे भी सब चीजों और परेशानियों के लिए बस यही घर दिखता है.”

“फिर?”

“वो गुलाबो का फ़ोन आया था कि कुछ पैसों की जरूरत है तो कामिनी के साथ थोड़े पैसे भेज दो।”

“हुम्म …” मैंने एक निश्वास छोड़ते हुए कहा।

“क्या करती पैसे देकर कामिनी को भी भेजना ही पड़ा। बड़ी मुश्किल से उसका पढ़ाई में मन लगा था अब 2-3 दिन वहाँ रहेगी तो सब भूल जायेगी।”

सारे मूड की ऐसी की तैसी हो गयी। लग गए लौड़े !!! मैं मुंह हाथ धोने बाथरूम में चला गया। पता नहीं कितने पापड़ अभी और बेलने पड़ेंगे।
 
मेरे प्रिय पाठको और पाठिकाओ! दुनिया में दो त्रासदियाँ (ट्रेजडी) होती हैं। एक हम जो चाहते हैं वह नहीं होता और दूसरे हम जो नहीं चाहते वह अनचाहा जरूर होता है। अब वक़्त और किस्मत के आगे किसका जोर है। मैं आपसे माफ़ी चाहता हूँ। कितना खूबसूरत प्लान बनाया था पर ये किस्मत भी बड़ी बेरहम होती है। कई बार हमारे लाख चाहने के बाद भी वह नहीं होता जो हम चाहते हैं।

पर आप निराश ना हों 2-3 दिनों की ही तो बात है उसके बाद जल्दी ही वह मरहला (इवेंट) आने वाला है जिसका मुझे ही नहीं आप सभी को भी बेसब्री से इंतज़ार है।

और फिर अगले 3-4 दिन तो कामिनी की याद में मुट्ठ मारते हुए ही बीते।

आज शाम को दफ्तर से जब मैं घर लौटा तो पता चला कामिनी पूरे चार दिनों के बाद आज दोपहर में आ गई है। मैं जब बाथरूम से हाथ मुंह धोकर हॉल में आया तब तक कामिनी ने चाय बना दी थी। मधुर मेरे पास ही बैठी हुई थी।

कामिनी ने दो कपों में चाय डाल दी तो हम दोनों चाय पीने लगे।

मेरा मन तो कर रहा था कामिनी भी हमारे साथ ही चाय पी ले पर मधुर के सामने मेरी और कामिनी की इतनी हिम्मत और जुर्रत कैसे हो सकती थी।

रात का खाना निपटाने के बाद हम लोग टीवी देख रहे थे। मधुर मेरी बगल में सोफे पर बैठी थी। कामिनी नीचे फर्श पर बैठी कभी-कभी कनखियों से मेरी ओर देख रही थी। मैंने ध्यान दिया उसके चेहरे की रंगत कुछ निखर सी गयी है और मुंहासे भी अब ठीक लगते हैं।

“अरे कामिनी?” मधुर ने उसे टोका।

“हओ” कामिनी ने चौंककर मधुर की ओर देखा।

“तुमने 3-4 दिन पटरानी की तरह बहुत मटरगश्ती कर ली अब थोड़ा ध्यान पढ़ाई पर दो।” मधुर ने झिड़की लगाते हुए कामिनी से कहा।

बेचारी कामिनी तो सकपका सी गई।

“प्रेम! इस महारानी ने 3-4 दिन बड़ा आराम कर लिया अब रात को इसकी थोड़ी देर रात तक क्लास लगाओ नहीं तो यह सब कुछ भूल जायेगी.” मधुर ने फतवा जारी करते हुए कहा।

“ओह … हाँ … ” अब अमरीशपुरी स्टाइल में मधुर के इस फतवे के आगे मैं भला क्या बोल सकता था।

मधुर सोने के लिए बेडरूम में चली गई। कामिनी अपनी किताबें उठा कर ले आई। आज उसने कॉटन का टॉप और छोटे वाली निक्कर पहन रखी था। पतली पिंडलियों के ऊपर मांसल घुटने और गुदाज़ जांघें तो ऐसे लग रही थी जैसे चड्डी पहन के फूल खिला हो। चलते समय उसके गोल-गोल घूमते नितम्ब तो मेरे लंड को बेकाबू ही कर रहे थे।

पिछले 3-4 दिनों से मैं मुट्ठ मार-मार कर थक गया था। आज रात में अगर कामिनी वीर्यपान वाला सवाल हल कर दे तो कसम से मज़ा आ जाए।
 
कामिनी बेमन से अपनी किताबें टेबल पर रखकर दूसरे सोफे पर बैठ गई। उसके चेहरे पर अनमना सा भाव था।

मुझे लगता है उसे रोज-रोज की यह किताबी पढ़ाई अच्छी नहीं लग रही। वह इन सभी झंझटों और बन्धनों को छोड़ कर खुले आसमान में उड़ना चाहती है। अब तो उसे प्रेमग्रन्थ की पढ़ाई करने का मन करने लगा है।

“कामिनी क्या बात है आज तुम कुछ उदास सी लग रही हो?” मैंने पूछा।

“किच्च?” कामिनी मुंडी झुकाए बैठी रही।

“कामिनी तुम्हारे बिना तो इस घर में रौनक ही नहीं रही। पता है मैंने तुम्हें कितना याद किया?”

अब कामिनी ने मेरी ओर देखते हुए उलाहना सा दिया- आपने तो मुझे एतबाल भी फ़ोन नहीं तिया?

“वो.. वो … दरअसल ऑफिस में इतना काम रहता था कि सिर खुजाने का भी समय नहीं मिला यार।”

“यह सब तो बहाने हैं.”

“अच्छा कामिनी तुम्हारे मुंहासों का क्या हाल है?”

“अब तो ठीत लगते हैं।”

“दिखाओ तो?”

कामिनी मेरी बगल में आकर बैठ गई। मैंने पहले तो उसके दोनों गालों पर हाथ फिराया और फिर उसकी थोड़ी और होंठों पर। मेरे ऐसा करने से कामिनी के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई। और मेरा पप्पू तो बिगड़ैल बच्चे की तरह जोर-जोर से उछलने लगा था। मन कर रहा था उसके होंठों पर एक चुम्बन ही ले लूं पर अभी यह सब ठीक नहीं था। क्या पता मधुर अभी सोई नहीं हो और अचानक बाहर ना आ जाए।

“हम्म … !!! कामिनी मैंने बोला था ना?”

“क्या?”

“देखो वीर्यपान और उस दवा से यह मुंहासे कितनी जल्दी ठीक होने लगे हैं।”

“हओ … मैंने 3-4 दिन आपती बताई दवाई दिन में तीन-चाल बाल लगाईं तब जातल ये ठीक हुए हैं?”

“तुम्हें वो नुस्खा याद रहा?”

“हाँ मैंने उसे नोट तल लिया था और आपने जो दवा बनाई थी वह साथ ले गई थी।”

“गुड … कामिनी तुम बहुत ही समझदार हो। पर अभी भी ये पूरी तरह ठीक नहीं हुए लगते?”

“तो?”

“अभी वो दवा 10-15 दिन और लगानी पड़ेगी और साथ में वह उपचार भी लेना पड़ेगा नहीं तो दवा असर नहीं करेगी.” मैंने हंसते हुए कहा।

“हट!!! तित्ति बाल (कितनी बार) तो पी लिया?”

“अरे केवल दो बार ही तो पीया है। पता है इसकी कम से कम 7 खुराक जरूरी होती हैं?”

“हट …”

“तुम्हारी कसम मैं सच बोल रहा हूँ। अब अगर ये दुबारा हो गए तो फिर मुझे दोष मत देना कि मैंने पहले नहीं बताया?” मैंने गंभीर स्वर में कहा। पहले तो कामिनी इसे मज़ाक समझ रही थी पर अब उसे भी लगा कि मैं सच बोल रहा हूँ।

“कामिनी एक काम करते हैं.”

“क्या?”

“मुझे पता है तुम्हें ये पढ़ाई-लिखाई वाला काम थोड़ा झंझटिया (अरुचिकर) लगता है पर यह सब जरूरी भी है। आज पहले मैं थोड़ा अंग्रेजी के अगले 2-3 पाठ पढ़ा देता हूँ फिर हम थोड़ी देर बात करेंगे। कितने दिन हो गए बात किये हुए।”

“हओ” अब कामिनी के चेहरे पर थोड़ी सी मुस्कान सी आ गई थी।

“यह पढ़ाई-लिखाई है तो झमेला ही पर यह तुम्हारे अच्छे भविष्य के लिए है तो करना लाज़मी (आवश्यक) भी है।”

कामिनी ने एक बार फिर से हओ कहा और फिर मैंने उसे अंग्रेजी की किताब का एक पाठ और लैटर राइटिंग आदि सिखाया। अब तक रात के 10:30 बज गए थे। मैंने एक बार कमरे में चुपके से झाँक कर देखा कि मधुर सो गई या नहीं। मधुर के खर्राटे सुनकर लगा वह सो गई है। मैंने धीरे से कमरे के दरवाजे को बाहर से कुण्डी (सांकल) लगा दी। और फिर कामिनी के पास आ गया।

कामिनी तो जैसे मेरा इंतज़ार ही कर रही थी। मैंने झट से उसे बांहों में भर लिया और तड़ातड़ कई चुम्बन ले लिए।

‘ईईईईईईई … ’ कामिनी कुछ कसमसाई तो जरूर पर उसने ज्यादा विरोध नहीं किया।

“कामिनी पिछले 3-4 दिनों में मैंने तुम्हें बहुत मिस (याद) किया।”

“त्यों?” कामिनी ने हंसते हुए पूछा।

“सच में कामिनी तुम्हारे बिना इस घर में रौनक ही नहीं रही। और ऑफिस में भी किसी काम में मन नहीं लगा.”
 
मेरी बात सुनकर कामिनी कुछ बोली तो नहीं पर वह कुछ सोच जरूर रही थी।

“कामिनी, मुझे तुम्हारे मुंहासों की बड़ी फिक्र थी क्या पता ठीक हुए या नहीं?”

कामिनी मेरी बांहों में लिपटी मंद-मंद मुस्कुरा रही थी। वह तो बस आँखें बंद किये सुनहरे सपनों में ही जैसे खोई हुई थी।

मैं कभी उसकी पीठ और कभी उसके नितम्बों पर हाथ फिर रहा था और मेरा लंड तो घोड़े की तरह हिनहिनाने लगा था। मन कर रहा था गुरु क्यों देर कर रहे हो सोफे पर पटक कर साली का गेम बजा डालो।

“कामिनी क्या तुम्हें मेरी याद आई या नहीं सच बताना?”

“मुझे भी आपती बहुत याद आती थी पल क्या तलती वो अनाल दीदी बीमाल थी तो वहाँ लहना पड़ा।”

“अब कैसी है अनार?”

“थीत है पल तमजोल बहुत हो गई है।”

अब मैंने कामिनी के नितम्बों और जाँघों पर हाथ फिराना चालू कर दिया था। कामिनी की साँसें तेज होने लगी थी। और मेरा पप्पू तो जैसे पिंजरे में बंद खतरनाक शेर की तरह दहाड़ ही रहा था।

कामिनी ने एक सीत्कार सी ली और उसने अपनी बाँहें मेरी कमर पर कस सी ली।

“कामिनी क्या तुम्हारा मन नहीं करता कि कोई सारी रात भर तुम्हें बांहों में भरकर प्रेम करे?”

“मुझे ऐसी बातों से शलम आती है?”

“इसमें शर्माने वाली क्या बात है? मैं तो केवल पूछ रहा हूँ?” अब तक मेरा हाथ उसकी सु-सु तक पहुँच गया था।

“आईईईई … ” कामिनी की मीठी सीत्कार सी निकल गई।

“कामिनी मेरी एक बात मानोगी?”

“हम … ?” कामिनी ने आँखें बंद किये हामी सी भरी।

“व … वो … एक बार अपनी सु-सु के द … दर्शन करवा दो ना प … प्लीज?” मैंने हकलाते हुए कहा।

मुझे लगा कामिनी मना कर देगी।

“हट!”

“प्लीज कामिनी अपने गुरूजी की एक बात तो मान लो प्लीज?” मैंने मिन्नत की।

“वो … दीदी तो पता चल गया तो आपतो और मेले तो जान से माल डालेगी.”

“अरे मधुर तो सोई हुई है उसे कहाँ पता चलेगा? प्लीज … कामिनी मान जाओ ना … मैं तो उसकी बस एक झलक देखना चाहता हूँ?”

“नहीं … मुझे शल्म आती है.” कहते हुए कामिनी ने अपनी जांघें जोर से भींच ली।

“वाह … जी और मुझे भी तो शर्म आयी थी पर मैंने भी दिखाया था ना?”

“नहीं … प्लीज … आज नहीं … बाद में … दिखा दूंगी?”

“बाद में कब?” मैंने कामिनी को चूमते हुए कहा।

“आप समझते नहीं … वो … वो … मैं तल दिखा दूंगी … प्लोमिज …”

मुझे थोड़ी निराशा सी हुई। पता नहीं कामिनी मधुर के होते डर रही थी या कोई और बात थी। मैं भी जबरदस्ती कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था। काश कल सुबह कामिनी नहाते समय अपनी सु-सु दिखाने के लिए राजी हो जाए तो कसम से मज़ा आ जाए। उसके साथ नहाते समय उसकी सु-सु को चूमने का उत्तम विचार मन में आते ही लंड महाराज ने तो पाजामे में कोहराम ही मचा दिया और उसने प्री कम के कई तुपके छोड़ दिए। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा।

“कामिनी! आई लव यू!” मैंने कामिनी का सिर अपने दोनों हाथों में पकड़ लिया और उसके होंठों पर एक चुम्बन ले लिया।

“कामिनी वो दवाई पीनी है क्या?” मैंने हंसते हुए पूछा।

“तोन सी?”

मैंने उसका हाथ पकड़ कर अपने खड़े लंड पर लगाते हुए कहा- इससे पूछ लो!

“हट!” कहते हुए कामिनी ने अपना हाथ झटके से खींच लिया।
 
“कामिनी पिछले 4-5 दिनों से यह बहुत उदास है।”

“त्यों? इसे क्या हुआ?” कामिनी ने आँखें तरेरते हुए पूछा।

“इस बेचारे की किसी को परवाह ही नहीं है.” कहकर मैंने आशा भरी नज़रों से कामिनी की ओर ताका।

कामिनी मेरा मतलब अच्छी तरह जानती थी।

“अगल दीदी जाग गई तो?”

“वो तो कब की सो चुकी है। तुम चिंता मत करो और मैंने बेडरूम की कुण्डी लगा दी है।”

“बेचाली दीदी आपको तितना सीधा समझती हैं ओल आप?” कामिनी ने हंसते हुए कहा और फिर पजामे के ऊपर से ही मेरे लंड को दबाना शुरू कर दिया।

“मेरी जान मैं तो यह सब तुम्हारे भले के लिए कर रहा हूँ.”

“मैं सब समझती हूँ … अब मैं इतनी भोली भी नहीं हूँ.” कामिनी ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा और फिर मेरे तातार लंड को पाजामे के ऊपर से ही मुठियाने लगी।

फिर कामिनी ने 4 दिनों के बाद लंड देव का एकबार फिर से अभिषेक करके प्रसाद ग्रहण कर लिया।

और फिर पूरी रात हम दोनों को ही उस हसीन सुबह का बेसब्री से इंतज़ार था.

अगले दिन सुबह जब मधुर स्कूल चली गई तो कामिनी नाज-ओ-अंदाज़ से चलती हुई हॉल में आ गई। उसने आँखें मटकाते हुए इशारों में पूछा- चाय या कॉफ़ी?

“कामिनी मैं तुम्हारे लिए लीची और मैंगो फ्रूटी के पाउच और इम्पोर्टेड चॉकलेट लाया था वो तुमने टेस्ट की या नहीं?”

“किच्च!! तहां रखी हैं?”

“अरे फ्रिज़ में ही तो रखी हैं. आज चाय-वाय छोड़ो दोनों फ्रूटी ही पीते हैं.”

“हओ” कहते हुए कामिनी रसोई में जाकर फ्रूटी और चॉकलेट ले आई।

कामिनी मेरे बगल में आकर बैठ गई। आज उसने गोल गले की टी-शर्ट और इलास्टिक लगी पतली पजामी पहन रखी थी। कमर में कसी पजामी में कैद नितम्ब तो आज कुछ ज्यादा ही नखरीले लग रहे थे और जांघें तो बस कहर ही बरपा रही थी। उसके कमसिन बदन से आती अनछुए कौमार्य और परफ्यूम की मिली जुली खुशबू तो मुझे मदहोश ही किए जा रही थी।

हम दोनों फ्रूटी पीने लगे। मेरी निगाहें तो कामिनी की जाँघों से हट ही नहीं रही थी। कामिनी ने इसे महसूस तो जरूर कर लिया पर बोली कुछ नहीं अलबत्ता उसने अपनी जांघें और जोर से भींच ली।

“कामिनी तुमने कल एक वादा किया था?”

“क्या?”

“भूल गई ना … वो … सु-सु दिखाने का?”

“ओह … वो … ?” कहते हुए कामिनी एक बार फिर शर्मा गई। उसने अपनी मुंडी नीचे झुका ली।

ईईइस्स्स्स …

मैंने कामिनी को अपनी बांहों में भींच लिया। कामिनी थोड़ा कसमसाई तो जरूर पर उसने कोई विरोध नहीं किया।

“कामिनी प्लीज … ”

“नहीं … मुझे … शल्म आ रही है।”

“आओ बैडरूम में चलते हैं.”

अब मैं खड़ा हो गया और मैंने उसे गोद में उठा लिया। इस हालत में फूलों जैसी नाजुक और कमसिन लड़कियों का भार वैसे भी ज्यादा नहीं लगता। कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर ली और अपनी बांहें मेरे गले में डाल दी।

मैं कामिनी को उठाये बैडरूम में आ गया। मैंने कामिनी को धीरे से पलग पर लेटा दिया। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था। कामिनी ने शर्माते हुए अपने दोनों हाथों से अपनी आँखें बंद कर ली। मेरा पप्पू तो बेकाबू ही होने लगा था। उसमें इतना तनाव आ गया था कि मुझे तो लगने लगा कहीं इसका सुपारा फट ही ना जाए।

“कामिनी? मेरी जान?” मैंने उसे बांहों में भरकर उसके लरजते होंठों पर एक चुम्बन लेते हुए कहा।

“हम” कामिनी ने आँखें बंद किये ही जवाब दिया। उसकी साँसें बहुत तेज़ चलने लगी थी। गालों पर जैसे लाली सी छा गई थी। रोमांच के कारण उसके शरीर के रोयें खड़े हो गए।

“आँखें खोलो मेरी जान?”

“किच्च … मुझे शल्म आ रही है?”

“प्लीज अब शर्म छोड़ो ये … ये टी-शर्ट उतार दो ना प्लीज …”

मैंने उसके गालों को चूमते हुए उसे थोड़ा सा सहारा दिया और फिर उसे थोड़ा उठाते हुए अपने हाथ बढ़ाकर मैं उसकी गोल गले वाली टी-शर्ट को उतारने लगा।

कामिनी ने अपने हाथ ऊपर उठा दिए।

हे भगवान् … उसकी पतली कमर के ऊपर उभरा हुआ सा पेडू और उसके ऊपर गहरी नाभि … और उसके ऊपर दो कश्मीरी सेब जैसे उन्नत उरोज … उफ्फ्फ … क्या बला की खूबसूरती है … कंगूरे तो रोमांच के कारण भाले की नोक की तरह हो चले हैं। रोम विहीन गोरे रंग की कांख। अब पता नहीं उसने वैक्सिंग से बालों को हटाया है या कुदरती रूप से ही उसके बाल नहीं है।

हे लिंग देव! पतली कमर के नीचे जाँघों के बीच छुपे कामिनी के उस अनमोल खजाना भी इसी तरह रोम विहीन होगा। मुझे तो डर सा लगने लगा है … उसे देखकर क्या पता मैं उसकी ताब ही ना सह पाऊँ और कहीं उसकी तपिश से पिंघल ही ना जाऊं?
 
कामिनी फिर से लेट गई। मैंने उसके पेडू पर एक गहरा सा चुम्बन लिया और फिर अपनी जीभ को नुकीला करके उसकी नाभि पर फिराने लगा। कामिनी की एक मीठी सीत्कार सी निकल गई और उसे एक झुरझुरी सी आ गई।

“सल … क्या तल लहे हो?”

“कामिनी तुम बहुत खूबसूरत हो। मुझे जी भर कर तुम्हारे सौन्दर्य को देख लेने दो।”

कहते हुए मैंने कई चुम्बन उसके पेट और उरोजों पर भी ले लिए।

कामिनी ने कसकर अपनी जांघें भींच ली। उसकी साँसें तेज़ होने लगी थी।

अब मैंने उसकी पजामी का इलास्टिक पकड़ा और उसे धीरे धीरे नीचे करने लगा। कामिनी ने और जोर से अपनी जांघें भींच ली।

“सल … मुझे शल्म आ लही है … नहीं प्लीज … ”

“कामिनी आज मुझे मत रोको … मुझे तुम्हारे इस हुस्न की दौलत को जी भर कर दीदार कर लेने दो … प्लीज …”

जब पजामी थोड़ी नीचे सरकने लगी तो कामिनी ने अपने नितम्ब थोड़े से ऊपर उठा दिए … और मैंने उस पजामी को निकाल कर फेंक दिया। कामिनी ने झट से अपना एक हाथ अपनी सु-सु पर रख लिया।

“कामिनी! मेरी जान अब शर्मो हया का यह बंधन छोड़ो … कितने दिनों और मिन्नतों के बाद आज इस अनमोल खजाने के दर्शन हुए हैं … प्लीज …” कहते हुए मैंने उसका हाथ सु-सु पर से हटा दिया।

कामिनी ने ज्यादा विरोध नहीं किया।

मेरा दिल धक-धक करने लगा था। दोनों जाँघों के बीच गुलाबी रंग के मोटे-मोटे पपोटे वाली सु-सु का चीरा तो मुश्किल से ढाई-तीन इंच का रहा होगा। और उस दरार के दोनों ओर कटार की धार की तरह पतली तीखी गहरे जामुनी रंग की दो लकीरें आपस में ऐसे चिपकी थी जैसे दो सहेलियां गले मिल रही हों। गुलाबी रंग की पुष्ट जांघें जिन पर हलकी हलकी पतली नीले रंग की शिरायें।

रोम विहीन गंजी बुर को देखते ही मेरा पप्पू तो दहाड़ें ही मारने लगा। झांट तो छोड़ो उसकी सु-सु पर तो एक रोयाँ भी नहीं था। मैं सच कहता हूँ ऐसी बुर तो केवल सिमरन की ही थी।

फूल सी खिली हुई बुर का लम्बा और एकदम चकुंदर सा सुर्ख चीरा झिलमिला रहा था। फांकों के शीर्ष पर मटर के दाने जितनी गुलाबी रंग की मदनमणि ऐसे लग रही थी जैसे किसी बया की चोंच हो। और उसके दांये पपोटे पर एक काला तिल जैसा उसकी ठोडी पर है … उफ्फ्फ …

कामिनी का निर्वस्त्र शरीर मेरी आँखों के सामने पसरा पड़ा था। मुझे अपनी किस्मत पर यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह सब हकीकत है या मैं कोई सपना देख रहा हूँ।

हे भगवान् … मेरे जीवन मैं बहुत बार ऐसे मौके आये हैं जब मैंने अनछुई लड़कियों की बुर को देखा है पर यह मेरे जीवन का एक स्वर्णिम, हसीन और अनमोल नजारा था।

मेरा पप्पू तो बेकाबू सा होने लगा था। एक बार तो मन किया लोहा गर्म है हथोड़ा मार देता हूँ। कामिनी ज्यादा ना नुकर नहीं करेगी मान जायेगी।

पर मैं यह सब इतना जल्दी करने के मूड में नहीं था। मैं सच कहता हूँ अगर मैं कोई 18-20 साल का लौंडा लपाड़ा होता तो कभी का इसे ठोक-बजा देता पर मैं इस मिलन को एक यादगार बनाना चाहता था लिहाज़ा मैंने कोई जल्द बाज़ी नहीं की।

अब मैंने उसकी बुर पर अपना हाथ फिराना चालू कर दिया था। एक रेशमी सा अहसास मुझे रोमांच से भरता चला गया। कामिनी के शरीर में सिहरन सी दौड़ने लगी। उसका पूरा शरीर रोमांच से कांपने लगा था। अब मैंने अपने दोनों हाथों की चिमटी में उसके पपोटों को थोड़ा सा खोल दिया। हलकी सी पुट की आवाज के साथ रक्तिम चीरा खुल गया। गुलाब की पंखुड़ियों की मानिंद अंदरूनी होंठ (लीबिया-लघु भगोष्ट) कामरस में डूबे थे जैसे किसी तड़फती मछली ने पान की गिलोरी मुंह में दबा रखी हो।

फूली हुई तिकोने आकार की उसकी छोटी सी बुर जैसे गुलाब की कोई कली अभी अभी खिल कर फूल बनी है। मैं अपने आप को कैसे रोक पाता … मैंने अपने होंठ उसके रक्तिम चीरे पर लगा दिए।

ईईईईइ … कामिनी की एक हलकी सी रोमांच भरी चीख निकल गई।

मैंने पहले तो उसे सूंघा और फिर एक चुम्बन उस पर ले लिया। अनछुए कौमार्य की तीखी गंद मेरे स्नायु तंत्र को सराबोर करती चली गई।

“सल … क्या तल लहे हो … छी … लुको … ” कामिनी पैर पटकने लगी थी।

मैं उसके दोनों टांगों के बीच आ गया और थोड़ा सा अधलेटा होकर मैंने अपनी जीभ को नुकीला किया और कामिनी की सु-सु के चीरे के बीच में फिराने लगा।

कामिनी का शरीर अकड़ने लगा और उसने मेरे सिर को जोर से पकड़ कर अलग करने की नाकाम सी कोशिश की। मैंने जीभ के 3-4 लिस्कारे लगाए तो कामिनी का पूरा शरीर ही रोमांच में डूबकर झटके से खाने लगा।

अब कामिनी ने मेरे सिर के बालों को अपने हाथों में पकड़ लिया। मैंने उसकी बुर को पूरा अपने मुंह में भर लिया और चूसने लगा।

“ईईईईईइ … सल … मैं मल जाऊंगी … सल … आह … मेला … सु सु … छ … छोड़ो … प्लीज …”

कामिनी बड़बड़ाने सी लगी थी। अब वह मुझे परे हटाने की कोशिश भी नहीं कर रही थी अलबत्ता उसने मेरे सिर को अपने हाथों से जोर से भींच लिया और अपने पैर उठाकर मेरे कन्धों पर रख दिए।

मैंने अपनी जीभ को ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर फिराना चालू रखा। बीच बीच में मैं उसे पूरा मुंह में भर कर चुस्की सी लगाने लगा था। अब मैंने एक हाथ बढ़ाकर उसके एक उरोज की घुंडी को अपनी चिमटी में पकड़ लिया और उसे हौले-हौले दबाने और मसलने लगा। दूसरे हाथ से उसके नितम्बों का जायजा लिया।

आह … रेशम से मुलायम गोल खरबूजे जैसे कसे हुए नितम्ब और उनके गहरी खाई में मेरी अंगुलियाँ फिरने लगी। शायद कामिनी ने कोई खुशबूदार क्रीम या तेल अपनी सु-सु और नितम्बों पर जरूर लगाया होगा। अब मेरी एक अंगुली उसकी महारानी (माफ़ करना इतने खूबसूरत और हसीना अंग को गांड जैसे लफ्ज से संबोधित कैसे किया जा सकता है) के छेद पर चली गई।

जैसे ही मैंने अपनी अंगुली उस छेद पर फिराई कामिनी जोर-जोर से उछलने लगी- सल … मुझे तुछ हो लहा है … सल … मेला सु-सु … आआअह्ह्ह … ईईईईईइ!

मैं जानता था इस समय वह रोमांच के उच्चतम शिखर पर पहुँच गई है और उसका ओर्गस्म (स्खलन) होने वाला है। और किसी भी पल उसका कामरस निकल सकता है। मैंने उसकी सु-सु को पूरा मुंह में भर लिया और जोर-जोर से चूसने लगा।
 
कामिनी के शरीर ने 3-4 झटके से खाए और फिर मीठी सीत्कारों के साथ उसकी सु-सु ने कामरस छोड़ दिया।

ईई ईईई ईईईइ …

कामिनी ने एक मीठी रोमांच भरी चींख के साथ अपना काम रस मेरे मुंह में उंडेल दिया।

कामिनी अब जोर-जोर से सांस लेने लगी थी और रोमांच के मारे उसका सारा बदन लरज रहा था। अब उसका शरीर थोड़ा ढीला पड़ने लगा था। उसने अपने पैर मेरी गर्दन से हटा कर सीधे कर लिए थे। उसके मुंह से मीठी सीत्कार सी निकलने लगी थी। पूर्ण संतुष्टि के बाद अब वह मेरे सिर पर अपना हाथ फिराने लगी थी।

मेरा लंड तो प्री-कम के तुपके छोड़-छोड़ कर बावला हुआ जा रहा था। अब धारा 357 हटाने का सही वक़्त आ गया था। मैंने अपने होंठ कामिनी की सु-सु से हटा लिए और अपनी टी-शर्ट निकाल कर फेंक दी।

अचानक कामिनी ने आँखें खोली और वह झट से उठी और फर्श पर खड़ी हो गई। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता कामिनी ने मुझे हल्का सा धक्का देकर मेरे बरमूडा (घुटनों तक का निक्कर) जोर से खींचा और मेरे पप्पू को पकड़ कर गप्प से अपने मुंह में भर लिया। वह फर्श पर उकडू होकर बैठ गयी और मैं अधलेटा सा बेड पर पड़ा ही रह गया।

“ग … कामिनी … ओह … रुको … प्लीज … ” मैंने हकलाते हुए से कहा।

कामिनी ने मेरे नितम्बों को कसकर पकड़ लिया और जोर-जोर से मेरे पप्पू को चूसने लगी। उसने इशारे से मुझे हिलाने का मना कर दिया।

एक बात तो आप भी जानते हैं किसी भी पुरुष के लिए अपना लिंग चुसवाना एक दिवास्वप्न की तरह होता है। विशेषकर 35-40 की उम्र के बाद तो पुरुष की तीव्रतम इच्छा होती है कि उसके पत्नी या साथी सम्भोग से पहले उसका लंड जरूर चूसे।

नर अपना वीर्य मादा की कोख में ही डालना पसन्द करता है। मेरा मन तो इस बार वीर्य को कामिनी के उदर में नहीं गर्भाशय में उंडेलने का था पर कामिनी ने मेरे लंड को इतना जोर से पकड़ रखा था और जल्दी-जल्दी चूस रही थी कि मैं असमंजस में ही पड़ा रहा गया कि इसकी सु-सु में लंड डालूँ या मुंह में ही निकल जाने दूं।

जिस तरह आज कामिनी मेरे पप्पू को चूस रही थी लगता है उसे लंड चूसने का बहुत बड़ा अनुभव हो गया है।

अब मैं धीरे-धीरे उठ कर खड़ा हो गया। मैंने उसका सिर अपने हाथों में पकड़ लिया और अपने लंड को उसके मुंह में आगे पीछे करने लगा। मेरा लंड अब पूरा उसके हलक तक जा रहा था।

“कामिनी मेरी जान अब चूसना बंद करो … आओ … तुम्हें प्रेम का अगला पाठ तुम्हें पढ़ा दूं … प्लीज कामिनी …”

कामिनी ने मेरी टांगों को कसकर भींच लिया और इशारे से ऊं-ऊं की आवाज के साथ मना कर दिया।

मेरे लिए विचित्र स्थिति थी एक तरफ लंड चुसाई का आनंद और दूसरी तरफ सु-सु का भोग करने की तमन्ना? मुझे लगने लगा कि मेरे लंड में भारीपन सा आने लगा है और मैं जल्दी ही मेरा वीर्यपात हो जाएगा।

मेरे दिमाग में कई प्रश्न खड़े हो गए थे। ऐसी स्थिति में अगर मैंने कामिनी को सम्भोग के लिए मनाया तो क्या पता वह राज़ी हो या ना हो? और अगर वह इसके लिए मान भी गई तो क्या पता इस दौरान मेरा वीर्य बाहर ही ना निकल जाए? मेरा तनाव अपने शिखर पर था और मुझे डर सा भी लगने लगा था कहीं अन्दर डालते ही मेरा पप्पू शहीद हो जाए तो?

मैं तो चाहता था कि कामिनी के साथ मेरा प्रथम मिलन एक यादगार बन जाए और मुझे ही नहीं कामिनी को भी मिलन के ये पल ता उम्र याद रहें और वह इन्हें याद करके भविष्य में भी रोमांचित होती रहे।

मैंने अपने हथियार डाल दिए। चलो कोई बात नहीं एकबार कामिनी को वीर्यपान करवा देता हूँ उसके बाद थोड़ी देर रुक कर धारा 357 हटाने का अगला सोपान पूर्ण कर लेते हैं। कामिनी कौन सी भागी जा रही है?

और पप्पू तो आधे घंटे बाद फिर से दहाड़ने लगेगा।

मैंने अपना लंड कामिनी के मुंह में अन्दर बाहर करना चालू कर दिया। आज तो कामिनी कमाल ही कर रही थी। शुरुवात में तो उसने 2-3 बार थोड़ा झिझकते और डरते हुए चूसा था पर आज तो जैसे उसकी झिझक और शर्म बिलकुल ख़त्म हो गई है। लंड को पूरा मुंह में लेकर धीरे धीरे चूसते हुए बाहर निकलना, कभी सुपारे को चूसना कभी दांतों से थोड़ा दबाना और फिर एक गहरी चुस्की लगाना और साथ-साथ नीचे गोटियों को पकड़कर सहलाने का अंदाज़ तो कमाल का था।

मैंने उसका मुख चोदन जारी रखा। अब मैं धीरे-धीरे अपने लंड को कामिनी के मुंह में अन्दर बाहर करने लगा और बीच-बीच में अपने कूल्हों को हिला-हिला कर हल्के धक्के भी लगाने लगा। मैंने उसके सिर पर हाथ फिरना चालू कर दिया और बीच-बीच में उसके होंठों पर अपनी अंगुलियाँ फिरा कर देख लेता था कि वह पूरा लंड मुंह में ले पा रही है या नहीं।

कामिनी ने आँखें बंद किये लंड चूसना जारी रखा।

“कामिनी मेरी जान … आह … बहुत खूबसूरत हो तुम … आह … बहुत अच्छे ढंग से चूस रही हो मेरी जान … हाँ … पूरा मुंह में लेकर चूसो प्लीज …”

कामिनी अब पूरे जोश में आ गयी और जोर जोर से लंड चूसने लगी। मुझे हैरानी हो रही थी आज कामिनी ने मुंह दुखाने का बिलकुल भी नहीं कहा।

और फिर 15-20 मिनट की इस लाजवाब चुसाई के बाद मुझे लगने लगा मेरा तोता अब उड़ने वाला है। मेरा लंड कुछ ज्यादा ही मोटा हो गया था और अब तो वह फूलने और पिचकने लगा था। मैंने कामिनी को इसके बारे में बताया तो कामिनी ने आँखों के इशारे से हामी भरी कि आने दो।

मैंने कामिनी का सिर अपने दोनों हाथों में कसकर भींच लिया और और कामिनी ने मेरे पप्पू को अपने मुंह की गहराई तक ले गयी और चूसने लगी। और फिर एक लम्बी हुंकार के साथ मेरे लंड ने पिचकारियाँ मारनी शुरू कर दी।

कामिनी तो उस अमृत को गटा-गट पीती चली गई जैसे कई बरसों की प्यासी हो। उसने एक भी कतरा बाहर नहीं जाने दिया और फिर लंड को चाटते हुए उसने नशीली आँखों से मेरी ओर देखा जैसे पूछ रही हो ‘कैसा लगा?’
 
मैंने उसे सहारा देकर खड़ा किया और उसके होंठों को चूमते हुए उसका धन्यवाद किया। कामिनी एक बार फिर से मेरे सीने से लग गई। मैंने उसके सिर, पीठ, कमर और नितम्बों पर हाथ फिरना चालू रखा। कामिनी आँखें बंद किये सुनहरे सपनों में खोयी लगती थी। वह धीरे धीरे मेरे सीने पर अपनी अंगुलियाँ फिराने लगी थी।

अचानक मोबाइल की घंटी बजी …

अथ श्री योनि भेदन सोपान प्रारम्भ!

भेनचोद यह किस्मत भी हाथ में लौड़े लिए हर समय तैयार ही रहती है। कामिनी इस समय रोमांच के उच्चतम स्तर पर पहुँच चुकी थी और बस मेरी एक पहल पर अपना सब कौमार्य मुझे सौम्प देने के लिए आतुर थी। मैं इस सोपान को आज ही सम्पूर्ण कर लेना चाहता था बस 10-15 मिनट की बात रह गयी थी।

पर ऐन वक़्त पर इस मोबाइल की घंटी से हम दोनों चौंक पड़े.

“ओह … दीदी ता फोन तो नहीं आ गया?” कामिनी मेरी बांहों से छिटक कर दूर हो गई और उसने झट से अपने कपड़े उठाए और स्टडी रूम में भाग गई।

मेरा दिल जोर-जोर से किसी अनहोनी की आशंका से धड़कने लगा था। इस समय किसका फोन हो सकता है? मैंने कांपते से हाथों से मोबाइल उठाकर देखा, यह तो ऑफिस से फ़ोन था।

जैसे ही मैंने हेलो कहा उधर से आवाज आई- प्रेम जी सर … मैं बहादुर बोल रहा हूँ अपने गोडाउन में आग लग गई है आप जल्दी आ जायें.

“ओह … कब … आग कैसे लग गई?”

“हो सकता है शोर्ट सर्किट के कारण लगी हो.”

“हाँ … हाँ मैं पहुँच रहा हूँ जल्दी … तुम फायर ब्रिगेड को फ़ोन करो.”

अचानक हुए इस घटनाक्रम से मैं एक बार तो किमकर्तव्यविमूढ़ सा बन कर रह गया। थोड़ी देर बाद कुछ संयत हुआ। मैंने दुबारा हेलो बोला तब तक फोन कट चुका था।

अब तुरंत ऑफिस जाने की मजबूरी थी। फिर पूरा दिन आग से हुए नुक्सान का अनुमान लगाने, हेड ऑफिस इन्फॉर्म करने, इन्शुरेन्स क्लेम, पुलिस रिपोर्ट जैसी मगजमारी में ही बीत गया।

खैर शाम को जब मैं घर लौटा तो मधुर को ऑफिस के उस घटनाक्रम के बारे में बताया। खाना निपटाने के बाद मधुर तो सोने चली गई और कामिनी अपनी किताबें लेकर मेरे पास आ बैठी।

मेरे दिमाग में तो आज सुबह की बातें ही घूम रही थी। कामिनी ने आज हाफ बाजू की शर्ट और पाजामा पहना था। कल कामिनी को कुछ होम वर्क दिया तो पहले तो उसे चेक किया बाद में उसे आगे के कुछ लेसन पढ़ाये।

मैंने गौर किया कामिनी आज कुछ चुप सी है; उसका ध्यान पढ़ाई में नहीं लग रहा है।

“कामिनी बस आज इतना ही पढ़ाई करेंगे आओ थोड़ी देर बात करते हैं.”

“हओ” कहते हुए कामिनी ने अपनी किताबें बंद कर दी। वह तो जैसे तैयार ही बैठी थी।

“कामिनी, आज तो पूरा दिन ही ऑफिस की मगजमारी में बीत गया।”

“ज्यादा नुत्सान (नुक्सान) तो नहीं हुआ?” कामिनी ने पूछा।

“नुक्सान तो बहुत भारी हुआ पर इन्शुरेन्स कंपनी से क्लेम मिल जाएगा। पर दूसरे नुक्सान का क्लेम पता नहीं कब मिलेगा?” मैंने हंसते हुए कहा।

“दूसरा तौन सा नुत्सान हुआ है?”

“सुबह-सुबह कितना बड़ा अनमोल खजाना मिलने वाला था … बहुत बड़ा नुक्सान हो गया।”

“हट … ” कामिनी ने शर्माते हुए कहा।

मैंने कामिनी को पकड़कर अपनी बांहों में भर लिया।

“कामिनी आओ उस अधूरे सबक को अभी पूरा कर लेते हैं.” इने उसके गालों पर चुम्बन लेते हुए कहा।

मैंने ध्यान दिया आज कामिनी ने कानों में सोने की पतली-पतली बालियाँ पहन रखी हैं। ऐसी बालियाँ तो मिक्की पहना करती थी।

“कामिनी ये कानों की बालियाँ कब ली?”

“वो तल पुत्रदा एकादशी थी ना तो दीदी ने मुझे ये बालियाँ दी हैं।”
 
“भाई वाह … और क्या-क्या दिया?”

मैं सोच रहा था कमाल है यह साली मक्खीचूस मधुमक्खी किसी को एक फटा कपड़ा नहीं देती कामिनी पर इतनी मेहरबान कैसे हो रही है? समझ से परे लगता है।

“ओल … एक नाइटी भी दी थी।”

“अच्छा? पहनकर दिखाओ ना प्लीज …”

“ना … अभी नहीं बाद में?”

“एक तो तुम आजकल मिन्नतें बहुत करवाती हो?”

“तल दिखा दूंगी … प्लोमिज”

“अच्छा उसका रंग कैसा है यह तो बता दो?”

“गुलाबी है।”

“हे भगवान्! तुम्हारे ऊपर गुलाबी रंग कितना खूबसूरत लगेगा मेरा दिल तो अभी से धड़कने लगा है.”

ईईईइ … स्स्सस्स्स्स … कामिनी शर्मा गई।

“आपतो एत बात बताऊँ?”

“हओ?” मेरा दिल धक्-धक् करने लगा।

“आप दीदी को तो नहीं बताओगे ना?”

“किच्च”

“वो दीदी ने मुझे बताया था कि उन्होंने अपनी सुहागलात तो ऐसी ही नाइटी पहनी थी.” कह कर कामिनी शर्मा कर गुलज़ार ही हो गई।

आईला …

साली यह मधुर मेरा ईमान तुड़वा कर ही दम लेगी। पता नहीं मधुर के मन में क्या चल रहा है। मेरा लंड तो पजामे में उछलने ही लगा था। मन कर रहा था कौन कल का इंतज़ार करे आज ही और अभी इसे पटक कर धारा 370 हटा देता हूँ।

मैंने कामिनी के नितम्बों पर हाथ फिराना चालू कर दिया। कामिनी की मीठी सीत्कार निकालने लगी थी।

“कामिनी और क्या बताया मधुर ने अपनी सुहागरात के बारे में?”

“आपतो सब पता है.”

“प्लीज बताओ ना?”

“दीदी ने बताया कि उस रात आपने उन्हें बहुत से गज़रे पहनाये थे?”

“कामिनी तुम्हें भी गज़रे बहुत पसंद हैं क्या?”

कामिनी आज ‘हओ’ बोलने के बजाय शरमाकर अपनी मुंडी नीचे कर ली।

मेरा हाथ अब उसकी सु-सु के पास पहुँच गया था। उसकी गर्मी और खुशबू पाकर मेरा पप्पू तो किलकारियां ही मारने लगा था। कामिनी ने कस कर अपनी जांघें भींच ली।

“वो नाइटी पहन कर दिखा दो ना? प्लीज?”

“मैंने बोला ना कल दिन में दिखा दूंगी?”

“पर कल तो सन्डे है … मधुर तो सारा दिन घर पर रहेगी?”

“अले … तल दीदी पूले दिन गुप्ताजी ते यहाँ जाने वाली हैं?”

“क्या मतलब?”

फिर कामिनी ने बताया कि पड़ोस वाले गुप्ताजी की लड़की नेहा की 3-4 दिन बाद शादी है तो कल दिन में तो मेहंदी और हल्द-हाथ का प्रोग्राम होगा और फिर रात को उनके यहाँ रतजगा का प्रोग्राम होगा। नेहा ने विशेषरूप से मधुर दीदी को को पूरे फंक्शन में और रात को भी अपने साथ रहने का बोला है।

हे लिंग देव! आज तो तेरी दिन में भी जय हो और रात में भी। मैंने कामिनी को एक बार फिर से अपनी बांहों में भींच लिया। मेरा हाथ उसकी सु-सु तक पहुँच गया था। जैसे ही मेरी अंगुलियाँ उसके पपोटों को टटोलने लगी कामिनी उछलकर खड़ी हो गयी और मुझे धक्का सा देते हुए बोली- अब आप सो जाओ … गुड नाईट!

और फिर वह स्टडी रूम में भाग गई।

कल का दिन और रात तो हमारे ख्वाबों की हसीन रात होने वाली है। इन पलों का हम दोनों को ही कितना बेसब्री से इंतज़ार था आप समझ सकते हैं। आज की रात पता नहीं कैसे बीतेगी?

और फिर वे प्रतीक्षित पल आ गए जिसका हम दोनों ही पिछले एक-डेढ़ महीने से इंतज़ार कर रहे थे।

आज दिन में मैंने कामिनी के लिए 10-15 मोगरे के गज़रे, इम्पोर्टेड चॉकलेट, एक सोने की अंगूठी और बढ़िया क्वालिटी का लेडीज पर्स और बहुत सा अल्लम-पल्लम ले लिया था।

मैं अपने इस मिलन को एक यादगार बनाना चाहता था। जिस प्रकार मधुर ने उसे अपनी सुहागरात के बारे में बताया था मुझे लगता है कामिनी इस मिलन के लिए बहुत उत्साहित है।

मुझे एक बात अब भी समझ नहीं आ रही मधुर ने कामिनी को अपने प्रथम मिलन के उन पलों को कामिनी के साथ क्यों सांझा किया होगा? मेरे प्रिय पाठको और पाठिकाओ अगर आप कुछ बता सकें तो मैं आप सभी का आभारी रहूँगा।

रात के कोई 10 बजे हैं। खाना वाना निपटाने के बाद मधुर तय प्रोग्राम के अनुसार गुप्ताजी के यहाँ आज होने वाले रतजगा में शामिल होने चली गई है। मैंने आज सुनहरे रंग का कुर्ता और पजामा पहना है और बढ़िया परफ्यूम बजी लगाया है।

मैं हाल में बैठा कामिनी का इंतज़ार कर रहा हूँ। कामिनी अपने कमरे में (स्टडी रूम) में कपड़े बदलने चली गई है। मैंने उसे मोगरे वाले गज़रे पहनने के लिए भी दे दिए हैं। कामिनी-प्रेम मिलन की प्रतीक्षा में मेरा दिल जोर जोर से धड़क रहा है। ऐसे समय में यह इंतज़ार के पल कितने लम्बे लगने लगते हैं।

अचानक स्टडी रूम का दरवाजा खुला और कामिनी अपनी मुंडी झुकाए धीरे-धीरे मेरी ओर आने लगी। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था। कामिनी ने गहरे गुलाबी रंग की वही नाइटी पहनी थी। पैरों में चांदी की पायल और कानों में वही सोने की बालियाँ। आज उसने बालों का जूड़ा बना रखा था और उसके ऊपर दो गज़रे भी लगा रखे थे। दोनों हाथों की कलाइयों, कोहनी के ऊपर दोनों बाजुओं पर भी गज़रे लगा रखे थे। एक गोल गज़रा उसने अपनी कमर पर भी बाँध लिया था। होंठों पर गहरे लाल रंग की लिपस्टिक आँखों में काजल और माथे पर एक छोटी सी बिंदी। मेहंदी लगे हाथों की कलाइयों में लाल और हरे रंग की चूड़ियाँ। जैसे दुष्यंत की शकुन्तला ने पुनर्जन्म ले लिया हो।

मैं तो उसे ऊपर से नीचे तक अपलक देखता ही रह गया। जैसे क़यामत अब 2 कदम दूर ही रह गई है।
 
कामिनी आँखें बंद किये मुंडी झुकाए मेरे पास आकर खड़ी हो गई। मैं धीरे से उठा और कामिनी को अपनी बांहों में ले लिया। और फिर एक हाथ नीचे करके उसे अपनी बांहों में उठा लिया। कामिनी ने अपना सिर मेरे सीने से लगा दिया। मैं उसे उठाये अपने बेड रूम में आ गया।

अब मैंने कामिनी को बेड पर बैठा दिया। मैं आज बाज़ार से सिन्दूर की एक डिब्बी और गज़रों के साथ दो फूलों की मालाएं भी लेकर आया था जो मैंने मधुर की नज़रों से बचा कर अपनी अलमारी में रख छोड़ी थी। मैं अब अलमारी से दोनों चीजें उठाकर ले आया।

“कामिनी! मेरी प्रियतमा आओ मैं तुम्हारी मांग भर कर तुम्हें सदा-सदा के लिए अपना बना लेता हूँ ताकि तुम्हें और मुझे दोनों को ही कहीं ऐसा ना लगे कि हम दोनों कोई अपराध या अनैतिक कार्य कर रहे हैं।”

वह उठकर नीचे फर्श पर खड़ी हो गई। लाज से सिमटी कामिनी के पास बोलने के लिए शायद शब्द ही कहाँ बचे थे। मैंने सिन्दूर से उसके पहले तो मांग भरी और और फिर फूलों की माला उसके गले में डाल दी और दूसरी माला मैंने कामिनी को पकड़ा दी।

कामिनी ने वह माला मेरे गले में डाल दी और फिर ने झुक कर मेरे पैरों को छू लिया।

अब मैंने अपनी जेब से वह सोने की अंगूठी निकाली और कामिनी के दायें हाथ की अनामिका में पहना दी। मैंने कामिनी के हाथ को अपने हाथ में लेकर उस पर एक चुम्बन ले लिया। कामिनी लाज से सिमट गई।

“कामिनी मेरी प्रियतमा! आज की रात हम दोनों के लिए सुनहरे सपनों की रात है। आओ हम दोनों इन सुनहरे ख़्वाबों को हकीकत में बदलकर जी भर कर भोग लें।”

कामिनी ने अपनी बांहें मेरे गले में डाल दी। हम दोनों बिस्तर पर आ गए।

मैंने अपनी जेब से वह सोने की अंगूठी निकाली और कामिनी के दायें हाथ की अनामिका में पहना दी। मैंने कामिनी के हाथ को अपने हाथ में लेकर उस पर एक चुम्बन ले लिया। कामिनी लाज से सिमट गई।

“कामिनी मेरी प्रियतमा! आज की रात हम दोनों के लिए सुनहरे सपनों की रात है। आओ हम दोनों इन सुनहरे ख़्वाबों को हकीकत में बदलकर जी भर कर भोग लें।”

कामिनी ने अपनी बांहें मेरे गले में डाल दी। हम दोनों बिस्तर पर आ गए।

मैंने उसके होंठों और गालों को चूम लिया। मैं धीरे-धीरे उसके बदन को सहलाने लगा। कामिनी की आँखों में सुनहरे सपनों के साथ लाल डोरे से तैरने लगे थे। उसकी साँसें तेज़ होने लगी थी और दिल की धड़कन सुनाई देने लगी थी।

“कामिनी प्लीज अब इन कपड़ों को उतार दो.”

“मुझे शल्म आती है पहले लाईट बंद करो.”

मैंने उठकर लाईट बंद कर दी और जीरो वाट का हल्का बल्ब जला दिया और फिर कामिनी के पास आ बैठा।

“कामिनी तुम बहुत खूबसूरत हो.” कहकर मैंने कामिनी को फिर से अपनी बांहों में भर लिया और फिर उसके लरजते अधरों पर अपने होंठ रख दिए।

गुलाब की पंखुड़ियों की तरह नर्म मुलायम होंठ शहद की तरह मीठे लग रहे थे।

मैंने एक हाथ से उसके उरोजों को मसलना और दबाना चालू कर दिया और उसके होंठों की फांकों को मुंह में लेकर चूसने लगा।

हम दोनों 5-6 मिनट तक इसी तरह एक दूसरे को चूमते रहे और फिर मैंने उसकी नाइटी की डोरी खींच दी।

कामिनी ने ज्यादा ना नुकुर नहीं की।

और फिर मैंने धीरे-धीरे उसके पेंटी भी उतार दी।

कामिनी का निर्वस्त्र शरीर मेरी आँखों के सामने पसरा था … उसकी खूबसूरती देखकर तो किसी की भी आँखें ही चौंधियाँ जायें।

मैंने भी अपने कपड़े उतार दिए और कामिनी को अपनी बांहों में भर लिया। मेरा लंड 90 डिग्री में जंग लड़ने को मुस्तैद किसी सिपाही की तरह खड़ा जैसे सलाम बजाने लगा था। अब मैंने अपने होंठ उसके अधरों से लगा दिए और फिर उसके पूरे बदन पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी।

उसके होंठ काँप से रहे थे और पूरा शरीर लरजने लगा था। कामिनी की अब मीठी सीत्कारें निकालने लगी थी।

मैंने उसके पेट और नाभि पर चुम्बन लिया और फिर हौले-हौले अपनी जीभ उसकी सु-सु तक ले गया।

कामिनी की रोमांच के मारे चीख सी निकल गई; उसने अपनी जांघें जोर से भींच ली।

मैंने अपने होंठ उसकी सु-सु के मोटे-मोटे पपोटों पर लगा दी। शायद कामिनी ने आज कोई खुशबू वाली क्रीम लगाईं होगी तभी तो उसके कौमार्य और उस क्रीम के मिलीजुली भीनी-भीनी खुशबू मेरे नथुनों में समा गई।

फिर मैंने कई चुम्बन उसकी जाँघों पर लिये और फिर नीचे घुटनों और पिंडलियों पर भी अपनी जीभ फिराने लगा। कामिनी तो रोमांच में डूबी इस प्रकार छटपटा रही रही जैसे कोई मछली बिना जल के तड़फ रही हो।

मेरे चुम्बन और गर्म साँसों का आभास पाते ही उसका सारा शरीर तरंगित सा होकर झनझना उठा था।

अब मैंने फिर से उसकी जाँघों को चूमते हुए जैसे ही अपनी जीभ उसकी सु-सु की फांकों पर लगाईं तो कामिनी की जांघें अपने आप खुलने सी लगी और उसका रति रस बहने लगा था।

“सल … मुझे तुछ हो लहा है … आह … मैं मल जाउंगी सल … तुच्छ करो … प्लीज … आह … आह … ईईईई ईईईई …”

अब मैं कामिनी के ऊपर आ गया और अँगुलियों से धीरे से उसके सु-सु को टटोला। सु-सु तो रतिरस से जैसे लबालब भरी थी। मैंने अपने एक अंगुली उसकी सु-सु के चीरे पर फिराई और फिर हौले से अपनी अंगुली थोड़ी अन्दर डालने की कोशिश की।
 
Back
Top