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Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था। लगता है अब मंजिल बस दो कदम दूर रह गई है। सच कहूं तो इस समय मेरी हालत यह थी कि जैसे मुझे कैरूँ का खजाना ही मिलने जा रहा है और अब उत्तेजना और रोमांच में मुझे इस खजाने को कैसे संभालना है? कुछ सूझ ही नहीं रहा था। एक बात की मुझे और हैरानी हो रही थी? अभी तक मेरा पप्पू बिलकुल अटेंशन की मुद्रा में सलाम बजा रहा था पर अचानक वह कुछ ढीला सा पड़ गया था। कहीं आज भी उसकी मनसा धोखा देने की तो नहीं है?

हे लिंग देव! गच्छामी तव शरणम्!!!

थोड़ी देर में कामिनी दो कटोरियों में शहद और कच्चा दूध और एक प्लेट में गुलाब और नीम की पत्तियाँ डालकर ले आई।

“कामिनी बाथरूम में चलते हैं यहाँ सोफे पर शहद वगेरह गिर गया तो गंदा हो जाएगा और फिर मधुर तुम्हें डांटेगी.”

“हओ” कामिनी ने मरियल सी आवाज में कहा।

कामिनी अपनी मुंडी झुकाए मेरे पीछे पीछे ऐसे चल रही थी जैसे जिबह होने के समय कोई जानवर चलता है।

और फिर हम दोनों बेडरूम में बने बाथरूम में आ गए। मैंने बाथरूम की लाइट जला दी और पंखा और एग्जॉस्ट फैन भी चला दिया। कामिनी ने दोनों कटोरियाँ और प्लेट वाशिंग मशीन पर रख दी।

“कामिनी! देखो तुम मेरी प्यारी शिष्या हो। मैं यह सब केवल तुम्हारे हित के लिए ही कर रहा हूँ। मेरे मन में किंचित मात्र भी यह भावना नहीं है कि मैं तुम्हारा कोई नाजायज फायदा उठा रहा हूँ और ना ही मेरी मनसा और नियत में कोई खोट है। मैं तुम्हारे साथ कोई भी छल-कपट या फरेब जैसा कुछ नहीं कर रहा हूँ और ना ही कोई शोषण कर रहा हूँ। मैं जो भी कुछ कर रहा हूँ सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी बेहतरी और भलाई के लिए कर रहा हूँ। और हाँ… एक और बात है.”

“त्या?”

“देखो गुरु और डॉक्टर के सामने कोई शर्म नहीं की जाती। इस समय तुम मेरे लिए केवल एक मरीज हो और मेरा फ़र्ज़ है कि मैं अपनी प्रिय शिष्या की हर संभव सहायता करूँ ताकि तुम्हें इन मुंहासों से छुटकारा मिल जाए। अब तुम्हें भी अपने इस मर्ज़ (मुंहासों की बीमारी) के लिए कुछ त्याग और तपस्या तो करनी ही होगी। अपने भले के लिए और मर्ज़ को ठीक करने के लिए कई बार ना चाहते हुए भी शर्म छोड़कर कड़वी दवा पीनी पड़ती है। और तुम तो जानती हो कुछ पाने के लिए कुछ त्याग भी करना पड़ता है। तुम समझ रही हो ना?”

“हओ” कामिनी ने मिमियाते हुए कहा।

मैं कामिनी की मन:स्थिति अच्छी तरह समझ रहा था। इस समय वह एक दोराहे पर खड़ी थी। एक तरफ उसकी नारी सुलभ लज्जा एवं उसके संस्कार और दूसरी तरफ उसके चहरे के खराब हो जाने का भय। वह अंतिम फैसला लेने में कुछ हिचकिचा सी रही थी।

एक पल के लिए मेरे मन में यह ख्याल जरूर आया कि मैं कहीं इस मासूम का शोषण तो नहीं कर रहा? कहीं इसके साथ यह ज्यादाती तो नहीं है? पर दूसरे ही पल मेरा यह ख्याल जेहन से गायब हो गया। अब मेरा जाल इतना पुख्ता था कि अब किसी भी प्रकार से उसमें से निकल पाना कामिनी के मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था।

“कामिनी अगर अब भी तुम्हें लगता है कि यह तुमसे नहीं हो पायेगा तो कोई बात नहीं … तुम्हारी मर्ज़ी!” मैंने अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था अब वो चिर-प्रतीक्षित लम्हा आने वाला था जिसका इंतज़ार मैं पिछले एक महीने से कर रहा था।

“थीत है आप बताओ त्या तरना है?”

“कामिनी कुछ भी करने से पहले तुम्हें मुझे एक वचन देना होगा?”

“त्या?”

“तुम्हें अब शर्म बिलकुल नहीं करनी है और जैसा मैं कहूं तुम्हें करना है.”

“हओ… थीत है।”

“सबसे पहले तो तुम हाथ जोड़कर भगवान जी से या मातारानी से यह प्रार्थना करो कि इस दवाई से तुम्हारे मुंहासे जल्दी से जल्दी ख़त्म हो जाएँ।”

कामिनी ने मेरे कहे मुताबिक़ हाथ जोड़कर प्रार्थना की। मैंने भी हाथ जोड़कर प्रार्थना करने का सफल अभिनय किया। एक बात आपको बता दूं ज्यादातर हम भारतीय लोग धर्मभीरु होते हैं और किसी बात पर अगर धर्म या भगवान् का मुलम्मा (चासनी) चढ़ा दिया जाए तो सब कुछ आसानी से किया और करवाया जा सकता है।

प्यारे पाठको और पाठिकाओ! आपके दिलों की धड़कनें भी अब बढ़ गयी हैं ना? आप सोच रहे होंगे कि यार प्रेम क्यों अपना बेहूदा ज्ञान बखार कर हमारे लंडों और चूतों को तड़फा रहे हो? जाल में फंसी इस कबूतरी को अब हलाल कर दो। ठोक दो साली को।

चलो आपकी राय सिर माथे पर, आज मैं आपकी बात मान लेता हूँ…

“कामिनी मुझे भी थोड़ी शर्म तो आ रही है पर अपनी प्रिय शिष्या की परेशानी के लिए मुझे अपनी शर्म पर काबू करना ही होगा।” मेरे ऐसा कहने पर कामिनी ने मेरी ओर देखा।

उसकी साँसें बहुत तेज चल रही थी। इतने खुशनुमा मौसम में भी उसके माथे और कनपटी पर हल्की हल्की पसीने की बूँदें झलकने लगी थी।

“देखो, मैं अपना निक्कर उतारता हूँ। तुम्हें मेरे लिंग को पकड़कर बस थोड़ी देर हिलाना है और उसके बाद उसमें से वीर्य निकलने लगेगा। तुम्हें थोड़ी जल्दी करनी होगी, वीर्य नीचे नहीं गिरना चाहिए तुरंत कटोरी में डाल लेना। वीर्य ताज़ा हो तो जल्दी असर करता है। समझ रही हो ना?”

कामिनी ने अपनी मुंडी झुकाए हुए सुस्त आवाज में ‘हओ’ कहा।

मैंने अपने बरमूडा (निक्कर) का नाड़ा खोल दिया। पप्पू महाराज जो अब तक सुस्त पड़ा था अब थोड़ा कसमसाने लगा है। अभी तो इसकी लम्बाई केवल 3-4 इंच ही लग रही है। पूर्ण उत्तेजित अवस्था में तो यह लगभग 7 इंच के आस पास हो जाता है। हे लिंग देव तेरा शुक्र है अभी इस पर अभी पूरा जलाल नहीं आया है वरना कामिनी इसे देख कर डर ही जाती और हो सकता है अपना इरादा ही बदल लेती।
 
कामिनी ने एक नज़र मेरे अर्ध उत्तेजित लंड पर डाली और फिर अपनी मुंडी झुका ली। अब मैंने अपने लंड को एक हाथ की मुट्ठी में पकड़ा और उसे थोड़ा हिलाते हुए ऊपर नीचे किया। पप्पू महाराज अब अपनी निद्रा से जागने लगे थे।

“कामिनी अब तुम इसे अपने हाथों में पकड़ कर इसी तरह थोड़ा हिलाओ।”

मेरे ऐसा कहने पर कामिनी ने थोड़ा डरते-डरते और झिझकते हुए मेरे लंड को अपने एक हाथ से छुआ।

“डरो नहीं … ठीक से पकड़कर हिलाओ।”

कामिनी अब नीचे उकड़ू होकर बैठ गई और उसने अपनी मुंडी झुकाए हुए धीरे-धीरे मेरे लिंग को अपनी अँगुलियों से पकड़ा और फिर मुट्ठी में लेकर थोड़ा सा हिलाने की कोशिश की। पप्पू महाराज ने अंगड़ाई सी लेनी शुरू कर दी। कामिनी की पतली, नाजुक और लम्बी अँगुलियों के बीच दबे पप्पू का आकार अब बढ़ने लगा था। आह … क्या नाज़ुक सा अहसास था।

“शाबश कामिनी! इसी तरह ऊपर नीचे करो … हाँ थोड़ा जल्दी जल्दी करो … रुको मत!”

कामिनी थोड़ा झिझक जरूर रही थी पर उसने मेरे पप्पू को अब पूरी तरह से अपनी मुट्ठी में पकड़ कर ऊपर नीचे करना चालू कर दिया। जिस प्रकार कामिनी इसे मुठिया रही थी मुझे लगा वह कतई अनाड़ी तो नहीं लगती। मेरा अनुभव कहता है उसने किसी का लंड भले ही ना पकड़ा हो पर इसने किसी को ऐसा करते देखा तो जरूर होगा।

पप्पू तो अब अपने पूरे जलाल पर आ गया था, बार-बार ठुमके लगा रहा था। एक-दो बार तो कामिनी के हाथ से फिसल गया तो कामिनी ने दोनों हाथों से उसे पकड़ लिया और फिर उसे हिलाने लगी।

मेरा मन तो कर रहा था हाथों का झंझट छोड़कर सीधा ही इसके मुखश्री में डाल दूं पर इस समय जल्दबाजी ठीक नहीं थी। चिड़िया अब पूरी तरह जाल में कैद है भाग कर कहाँ जायेगी। अंत: इसे मुंह में लेकर चूसना तो पड़ेगा ही वरना ऐसे हिलाने से तो इसकी मलाई इतना जल्दी नहीं निकलने वाली।

“वो तब नितलेगा?”

“थोड़ा समय तो लगेगा पर तुम जरा जल्दी-जल्दी और प्यार से हाथ चलाओ तो जल्दी ही निकल जाएगा।”

मैंने उसे दिलासा दिलाया। आज मेरे पप्पू का इम्तिहान था। मैंने आपको बताया था ना कि कल रात को कामिनी को पढ़ाने के चक्कर में देरी हो गयी थी तो नींद नहीं आ रही थी तो मैंने पप्पू महाराज की तेल मालिश करके सेवा की थी तो आज यह इतना जल्दी झड़ने वाला नहीं लगता।

“शाबाश कामिनी बहुत बढ़िया कर रही हो।”

“नितले तब बता देना प्लीज?”

“हाँ … हाँ … तुम चिंता मत करो मैं बता दूंगा तुम मुंह में … मेरा मतलब कटोरी में डाल लेना।”

कामिनी ने बोला तो कुछ नहीं पर उसकी लंड हिलाने की रफ़्तार जरूर बढ़ गई।

जब हमारी नई-नई शादी हुई थी तो माहवारी के दिनों में कई बार मधुर इसी प्रकार अपने हाथों से मेरे लंड को हिला-हिला कर इसका जूस निकाला करती थी। बाद में तो उसने चूसना शुरू कर दिया था और जिस प्रकार वह लंड चूसती है मुझे लगता है अगर इस विषय में कोई ऑफिशियल डिग्री होती तो मधुर को जरूर पीएचडी की डिग्री मिलती।

“कामिनी मेरी जान तुम बहुत अच्छा कर रही हो … आह … शाबाश … इसी तरह करती जाओ … गुरुकृपा से तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जायेंगे।”

कामिनी अब दुगने उत्साह के साथ लंड महाराज की सेवा करने लगी। वह अपने दोनों हाथ बदल-बदल कर लंड हिला रही थी और अब तो उसने उसकी चमड़ी को ऊपर नीचे करना भी शुरू कर दिया था। जब भी वह अपनी मुट्ठी को ऊपर करती तो सुपारा चमड़ी से ऐसे बंद हो जाता जैसे किसी दुल्हन ने शर्माकर घूँघट निकाल लिया हो। और फिर जब वह मुट्ठी को नीचे करती तो लाल रंग का सुपारा किसी लाल टमाटर की तरह खिल उठता।

कामिनी अब बड़े ध्यान से मेरे उफनते लंड और सुपारे को देखती जा रही थी। तनाव के कारण वह बहुत कठोर और लाल हो गया था। मेरी आँखें बंद थी और मैं हौले-हौले उसके सिर पर अपना हाथ फिरा रहा था। आज उसने पतली पजामी और हाफ बाजू का शर्ट पहना था। ऊपर के बटन खुले थे और उनमें से उसकी नारंगियाँ झाँक सी रही थी मानो कह रही हो हमें भूल गए क्या? कंगूरे तो तनकर भाले की नोक की तरह हो चले थे।

कामिनी को मेरा लंड मुठियाते हुए कोई 8-10 मिनट तो हो ही गए थे पर पप्पू महाराज अपनी अकड़ खोने को तैयार ही नहीं हो रहे थे। वो तो ऐसे अकड़ा था जैसे शादी में दुल्हा किसी नाजायज़ मांग को लेकर मुंह फुलाए हुए बैठा हो।

“ये तो नितल ही नहीं रहा?” कामिनी ने अपना हाथ रोकते हुए मेरी ओर देखा।

“ओहो … पता नहीं आज इसे क्या हो गया है? मधुर तो बहुत जल्दी इसका रस निकाल दिया करती है.”

“उनतो तो इसता अनुभव है।”

“कामिनी एक काम करो?”

“त्या?” कामिनी ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।

“वो थोड़ा सा नारियल का तेल इसके सुपारे पर लगा कर करो फिर निकल जाएगा?”

कामिनी ने हाथ बढ़ाकर तेल की शीशी पकड़ी और थोड़ा सा तेल निकाल कर मेरे लंड के सुपारे पर लगा दिया। और फिर से पप्पू महाराज की पूजा शुरू कर दी।

“कामिनी?”

“हम?”

“आज तो यह साला पप्पू लिंग देव बना है बेचारी इतनी खूबसूरत अक्षत यौवना कन्या इतनी देर से पूजा में लगी है और यह प्रसन्न होकर उसे प्रसाद ही नहीं दे रहा। इसे ज़रा भी दया नहीं आती.” कह कर मैं हंसने लगा।

“हट!”

कितनी देर बार कामिनी सामान्य हुई थी। लंड तो अब ठुमके पर ठुमके लगा रहा था। और सुपारे पर प्री कम की कुछ बूँदें चमकने लगी थी। कामिनी को लगा अब जरूर प्रसाद मिलने वाला है तो इसी आशा में उसने दुगने जोश के साथ पप्पू को उमेठना शुरू कर दिया।
 
कोई 5 मिनट तक कामिनी ने हाथ बदल-बदल कर पप्पू को हिलाया, मरोड़ा और उसकी गर्दन को कसकर मुट्ठी में भींचते हुए ऊपर नीचे किया पर हठी लिंग देव प्रसन्न नहीं हुए अलबत्ता उन्होंने तो रोद्र रूप धारण कर लिया और रंग ऐसा हो गया जैसे क्रोध में धधक रहा हो।

“ये तो नितल ही नहीं लहा? अजीब मुशीबत है?” कामिनी ने थक कर हाथ रोक दिए।

“कामिनी हो सकता है तुम्हें थोड़ा अजीब सा लगे?”

“क्या?”

“यार … वो पता नहीं तुम मुझे गलत ना समझ बैठो?”

“नहीं … बोलो … ।”

“वो … इसे अपने मुंह में लेकर … अगर थोड़ा सा चूस लो तो … मुंह की गर्मी से 2 मिनट में ही निकल जाएगा।”

मैंने कामिनी की ओर आशा भरी नज़रो से देखा। मुझे लगा कामिनी ‘हट’ बोलते हुए मना कर देगी।

“पल … वो तो शहद ते साथ मिलातर मुंहासों पर लगाना है ना?”

“हाँ वही तो कह रहा हूँ मुंह में लेने से बहुत जल्दी निकल जाएगा और जब निकलेगा तब मैं बता दूंगा तुम तुरंत उसे पास रखी कटोरी में डाल लेना.”

“हओ …” कामिनी को हर बात में हओ बोलने की आदत ने मेरा काम आसान कर दिया।

“एक और बात है?”

कामिनी ने मेरी ओर सवालिया निगाहों से देखा।

“इसे कटोरी में डालने की कोई हड़बड़ी या जल्दबाजी मत करना वरना यह नीचे गिर जाएगा तो किसी काम नहीं आएगा। अगर गलती से थोड़ा बहुत तुम्हारे मुंह में भी चला जाए तो उसे थूकना मत। क्योंकि यह तो एक तरह की दवाई है लगाने से ज्यादा पीने पर असर करती है। तुम समझ रही हो ना?”

कामिनी ने इस बार ‘हओ’ तो नहीं बोला पर सहमति में अपनी मुंडी जरूर हिला दी।

“कामिनी, अब एक काम करो?”

“क्या?”

“तुम थोड़ा शहद अपनी जीभ पर भी लगा लो और थोड़ा मुझे दो मैं इसपर लगा देता हूँ फिर तुम्हें और भी आसानी हो जायेगी।”

अब कामिनी कुछ सोचने लगी थी। मेरी उत्तेजना बहुत बढ़ गई थी। पप्पू महाराज जोर-जोर से उछल रहा था। जिस प्रकार कामिनी सोचती जा रही थी मुझे लगा ज्यादा देर की तो साला पप्पू इस बार भी चुनाव हार जाएगा। मेरा दिल इतनी जोर से धड़कने लगा था कि मुझे तो डर लगने लगा कहीं यह बीच रास्ते में ही शहीद ना हो जाए। पप्पू तो लोहे के सरिये की तरह कठोर हो गया था।

कामिनी ने एक चम्मच शहद अपने मुखश्री के हवाले किया और बाकी से मैंने अपने पप्पू का अभिषेक कर दिया।

कामिनी ने पप्पू को अपने एक हाथ में पकड़ लिया। पप्पू ने जोर का ठुमका लगाया तो कामिनी ने उसकी गर्दन कसकर पकड़ ली और फिर सुपारे की ओर पहले तो गौर से देखा। ओह्ह्ह … उसने इतने चिकने, मांसल और कठोर लण्ड के अधखुले सुपारे की चमड़ी ऊपर खींच कर उसे पूरा खोल दिया। गुलाबी सुर्ख सुपारा जिसके बीच में छोटा छेद और उस पर प्री कम की बूँद।

और फिर उसने अपनी जीभ उस पर लगा दी। एक गुनगुना सा लरजता गुलाबी अहसास मेरे सारे शरीर में दौड़ गया। कामिनी ने पहले तो मेरे सुपारे पर अपनी जीभ फिराई और फिर पूरे सुपारे हो मुंह में भर लिया। और फिर दोनों होंठों को बंद करते हुए उसे लॉलीपॉप की तरह बाहर निकाला।

प्यारे पाठको और पाठिकाओ! मेरी जिन्दगी का यह सबसे हसीन लम्हा था। मैं सच कहता हूँ मैंने लगभग अपनी सभी प्रेमिकाओं को अपना लिंगपान जरूर करवाया है पर जो आगाज (शुरुआत) कामिनी ने किया है मुझे लगता है उसका अंजाम बहुत ही अनूठा, रोमांचकारी, हसीन और अविस्मरणीय होने वाला है।
 
कामिनी ने दो-तीन बार सुपारे पर अपनी जीभ फिराई और फिर उसे अपने मुंह में लेकर अन्दर बाहर किया। फिर उसने चूसकी (लम्बी गोल आइस कैंडी) की तरह मेरे लंड को चुसना शुरू कर दिया। मैंने उसका सिर अपने हाथों में पकड़ लिया। जिस प्रकार वह मेरे लंड को चूस रही थी मुझे शक सा होने लगा कहीं इसने ऐसा अनुभव पहले तो किसी के साथ नहीं ले रखा है?

आप सभी तो बड़े गुणी और अनुभवी हैं। आप तो जानते ही हैं लंड चूसना भी एक कला है। होठों के बीच दबा कर जीभ से दुलारना या हौले से दांत गड़ाने में बड़ा मजा आता है। या वेक्यूम क्लीनर की तरह पूरा का पूरा लंड मुंह में लपेट गले की गहराई में उतार मलाईदार दूध चखने का अपना ही मज़ा है।

पहले जमाने में तो लड़कियां अपनी नव विवाहित सहेलियों या भाभियों से उनके अनुभव सुनकर ही यह सब सीखती थी पर आजकल तो पोर्न फ़िल्में देख कर सभी लड़कियां शादी से पहले ही इस कला में माहिर हो जाती हैं। अब यह मात्र एक संयोग है या कोई दीगर बात है साली इस तोतापरी ने यह कमाल और कला कहाँ से सीखी होगी पता नहीं।

कामिनी की चुस्कियों की लज्जत से मेरा लंड तो जैसे निहाल ही हो गया। मैंने उसका सिर अपने हाथों में पकड़ रखा था और मेरी कमर अपने आप थोड़ी-थोड़ी चलने लगी। इससे मेरा लंड आसानी से कामिनी में मुखश्री में अन्दर बाहर होने लगा था। इस मुख चोदन का अहसास और रोमांच के मारे मेरी सीत्कार सी निकलने लगी थी।

कामिनी ने अपना मुंह थोड़ा सा ऊपर करके मेरी ओर देखा था। शायद वह मेरी प्रतिक्रया देखना चाहती थी कि मुझे यह सब कितना अच्छा लग रहा है और वह ठीक से कर पा रही है या नहीं।

“कामिनी मेरी जान! बहुत अच्छा कर रही हो बस थोड़ी देर और ऐसे ही सुपारे पर अपनी जीभ घुमाओ और अन्दर बाहर करो तो निकल जाएगा। नीचे गोटियों को भी दबाओ तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा। आह … यू आर डूइंग ग्रेट!”

कामिनी अपनी प्रशंसा सुनकर अब इस क्रिया को और बेहतर करने की कोशिश करने लगी थी। पहले तो वह सुपारा ही अपने मुंह में ले रही थी अब तो उसने गले तक मेरा लंड लेना शुरू कर दिया था। धीरे धीरे वो मेरे लंड को इतनी तेज़ी से चूसने और चाटने लगी कि उसका चेहरा इस तरह से नशीला नज़र आने लगा जैसे उसने दारू पी रखी हो।

उसके पतले और मखमली होंठों का स्वाद चख कर तो मेरा लंड जैसे धन्य ही हो गया। मैं सच कहता हूँ लंड चुसाई में जो लज्जत है वह चूत और गांड में भी नहीं है। इस नैसर्गिक आनन्दमयी क्रिया का कोई विकल्प तो हो ही नहीं सकता। काश वक़्त रुक जाए और कामिनी इसी प्रकार मेरे लंड का चूषण और मर्दन करती रहे।

मेरे कंजूस पाठको और पाठिकाओ, आमीन तो बोल दो।

कामिनी अब कुछ ज्यादा ही जोश में आ गई थी। उसने मेरे लंड को पूरा जड़ तक अपने मुंह में लेने की कोशिश कि तो सुपरा उसके हल्क तक चला गया इससे उसे थोड़ी खांसी आने लगी और फिर उसने मेरा लंड अपने मुंह से बाहर निकाल दिया।

“मेला तो गला दुखने लग गया?” कामिनी ने अपना गला मसलते हुए कहा।

“कामिनी जल्दबाजी मत करो धीरे-धीरे जितना आसानी से अन्दर ले सको उतना ही लो। कामिनी तुम लाजवाब हो … बहुत अच्छा कर रही हो। बस निकलने ही वाला था कि तुमने बाहर निकाल दिया। अबकी बार निकल जाएगा शाबाश … इसी तरह कोशिश करो। मैं सच कहता हूँ इतना अच्छा तो मधुर भी नहीं करती।”

कामिनी ने अपनी तुलना मधुर से होती देख एकबार फिर से पप्पू को दुगने जोश के साथ चूसना चालू कर दिया। मुझे लगने लगा अब मैं ज्यादा तनाव सहन नहीं कर पाऊंगा और जल्दी ही झड़ जाउंगा। मेरा मन तो कर रहा था जोर-जोर से अपने लंड को उसके मुंह में अन्दर बाहर करूं पर मुझे डर था कहीं कामिनी बिदक ना जाए या उसे फिर से खांसी ना जाए। और अगर इस कारण उसे असुविधा हुई और उसने फिर आगे लंड चूसने से मना कर दिया तो आज लौड़े लगेंगे नहीं अलबत्ता झड़ जरूर जायंगे।
 
कामिनी अपनी लपलपाती जीभ से मेरे लंड को कभी चाटती कभी चूसती कभी पूरा अन्दर लेकर बाहर तक खींचती। इस लज्जत को शब्दों में बयान करना कहाँ संभव है।

मेरे शरीर में वीर्य स्खलन से पहले होने वाले रोमांच की एक लहर सी दौड़ने लगी। मुझे लगा अब वीर्य निकलने का आखिरी पायदान नजदीक आ गया है। मैंने कामिनी को कहा तो था कि जब निकलेगा मैं बता दूंगा और तुम इसका रस कटोरी में डाल लेना पर मैं अब इस लज्जत को इस प्रकार खोना नहीं चाहता था। मैं चाहता था कामिनी मेरे सारे वीर्य को पूरा निचोड़कर चूस ले और इसे अपने हल्क के रास्ते उदर (पेट) में उतार ले।

दोस्तो! प्रकृति बड़ी रहस्यमयी है। हर नर अपना वीर्य मादा की कोख में ही डालना चाहता है। और वीर्य स्खलन के समय उसका हर संभव प्रयास यही रहता है कि वीर्य का एक भी कतरा व्यर्थ ना जाए और किसी भी छेद के माध्यम सीधा उसके शरीर के अन्दर चला जाए अब वह छेद चाहे चूत का हो, गांड का हो या फिर मुंह का हो क्या फर्क पड़ता है। इसीलिए स्खलन के समय नर अपनी मादा को कसकर भींच लेता है और अपने लिंग को उसके गर्भाशय के अन्दर तक डालने का प्रयास करता है।

और मेरी प्रिय पाठिकाओ और पाठको! मैं भी तो आखिर एक इंसान ही तो हूँ मैं भला प्रकृति के नियमों के विरुद्ध के जा सकता था? मुझे लगा मेरा तोता अब उड़ने वाला है तो मैंने कामिनी का सिर अपने हाथों में कसकर पकड़ लिया और अपने लंड को उसके कंठ के आखिरी छोर तक ठेल दिया।

कामिनी के हल्क से गूं-गूं की आवाज निकलने लगी और थोड़ा कसमसाने लगी थी। मुझे लगा वह मेरे लंड को बाहर निकाल देगी और मैं प्रकृति के इस अनूठे आनन्द को भोगने से महरूम (वंचित) हो जाऊंगा। मैं कतई ऐसा नहीं होने देना चाहता था। मैंने उसका सिर अपने हाथों में और जोर से जकड़ लिया।

“कामिनी मेरी जान … प्लीज हिलो मत … प्लीज कामिनी आह … मेरी जान कामिनी … आह … मेरा निकलने वाला है … इसे बाहर मत निकलने देना … तुम्हें मेरी कसम … प्लीज … तुम इसे दवाई या लिंग देव का प्रसाद समझ कर पी जाओ … मेरी जान … आई लोव यू गौ …र.. र … रीईईईई … आईईईईइ …!!!

और फिर मेरे लंड ने पिचकारी मारनी शुरू कर दी। कामिनी ने अपने हाथों को मेरी कमर और जाँघों पर लगाकर मुझे थोड़ा धकलते हुए अपना सिर मेरी गिरफ्त से छुड़ाने की भरसक कोशिश की पर वह इसमें सफल नहीं हो पाई। और मेरा गाढ़ा और ताज़ा वीर्य उसके कंठ में समाता चला गया। अब उसके पास इसे पी जाने के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं बचा था। कामिनी गटा-गट सारा वीर्य पी गई।

मेरा लंड 5-6 पिचकारियाँ मारकर अब फूल और पिचक रहा था। मेरी साँसें बहुत तेज़ हो गयी थी। मुझे लगा कामिनी का को शायद सांस लेने में परेशानी हो रही है। उसके मुंह से अब भी गूं-गूं की आवाज निकल रही थी।

“कामिनी आज तुमने मेरी शिष्या होने का अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया। मैं तुम्हारा बहुत आभारी हूँ मेरी जान … तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद। कामिनी यू आर ग्रेट।”

मेरा लंड अब थोड़ा ढीला पड़ने लगा था और मेरी गिरफ्त भी ढीली हो गई थी। कामिनी ने इसका फ़ायदा उठाया और उसने मेरा लंड अपने मुंह से बाहर निकाल दिया। और अब वह खड़ी होकर जोर-जोर से खांसने लगी और तेज़-तेज सांस लेने लगी।

मुझे लगा कामिनी अब जरूर यह शिकायत करेगी कि मैंने जबरदस्ती अपना वीर्य उसके मुंह में निकाल दिया। इससे पहले कि वह संयत हो मैंने उसका सिर अपने हाथों में पकड़ कर उसके होंठों को चूमने लगा। एक शहद भरी मिठास और गुलाब की पंखुड़ियों जैसा अहसास के एकबार फिर से पुनरावृति होने लगी। फिर मैंने कई चुम्बन उसके होंठों गालों और माथे पर ले लिए।

फिर मैंने उसे अपने बाहुपाश में भरकर अपने सीने से लगा लिया। और धीरे-धीरे उसके सिर और पीठ पर हाथ फिराने लगा। उसके दूद्दू मेरे सीने से लगे थे और उसके दिल की धड़कन मैं साफ़ सुन सकता था। आह … उस दिन सुहाना के उरोज भी तो ऐसे ही मेरे सीने से लगे थे। दोनों में कितनी समानता है।

कामिनी कुछ बोलने का प्रयास कर रही थी पर इससे पहले कि वह कुछ बोले या शिकायत करे मैंने कहा- कामिनी, आज तुमने अपने गुरु की लाज रख ली। मैं तुम्हारा यह उपकार जीवन भर नहीं भूलूंगा। सच में कामिनी आज तुमने मुझे वह सुख दिया है जो एक पूर्ण समर्पिता प्रेयसी या शिष्या ही दे सकती है। इसके बदले तुम कभी मेरी जान भी मांगोगी तो मैं सहर्ष दे दूंगा।

अब बेचारी के पास तो बोलने के लिए कुछ बचा ही नहीं था। वह तो बस बुत बनी जोर-जोर से सांस लेती मेरे सीने से लगी बहुत कुछ सोचती ही रह गई। मैंने उसके सिर, कन्धों, पीठ और नितम्बों पर ऐसे हाथ फिराया जैसे मैं उसके इस ऐतिहासिक और साहसिक कार्य पर उसे सांत्वना और बधाई दे रहा हूँ।
 
मेरा मन तो आज उसके साथ नहाने का भी कर रहा था। मौक़ा भी था और दस्तूर भी था पर मैंने इसे अगले सोपान में शामिल करने के लिए छोड़ दिया।

“कामिनी … एक बार तुम्हारा फिर से धन्यवाद … अगर भगवान् ने चाहा तो इस दवा से बस दो दिनों में ही तुम्हारे सारे मुंहासे ठीक हो जायेंगे। मैं बाहर जा रहा हूँ पहले तुम फ्रेश हो लो, फिर मैं भी नहा लेता हूँ फिर दोनों तुम्हारी पसंद का नाश्ता करते हैं।”

आज तो बेचारी कामिनी ‘हओ’ बोलना भी भूल गई थी।

मैं अपना बरमूडा पहन कर बाहर आ गया।

अथ श्री लिंग दर्शन एव वीर्यपान सोपान इति !!!

आइए अब योनि दर्शन और चूषण सोपान शुरू करते हैं…

लोग सच कहते हैं भगवान जब देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। आज सुबह-सुबह कामिनी ने लिंगपान किया और ऑफिस जाते ही एक और खुशखबर मिली।

मैंने आपको बताया था ना कि मेरे प्रमोशन की बात चल रही थी। इस सम्बन्ध में मेल तो पहले ही आ गया था पर भोंसले ने अभी किसी को बताने को मना किया था तो मैंने अभी यह बात किसी को नहीं बताई थी।

आज मोर्निंग मीटिंग में भोंसले ने घोषणा कर दी कि उसका पुणे ट्रान्सफर हो गया है और अब उनकी जगह अभी भरतपुर ऑफिस का काम मि. प्रेम माथुर संभालेंगे।

उन्होंने मुझे प्रमोशन की बधाई देते हुए अच्छे भविष्य की कामना की।

उसके बाद सभी ने मुझे ओपचारिक तौर पर बधाई और शुभकामनाएं दी।

मैंने आपको ऑफिस में आये उस नताशा नामक नए विस्फोटक पदार्थ के बारे में भी बताया था ना? लगता है खुदा ने भी खूब मन लगाकर इस मुजसम्मे की नक्काशी की होगी। पतले गुलाबी होंठों पर लाल लिपस्टिक के बीच चमकती दंतावली देखकर तो लगता है इसका नाम नताशा की जगह चंद्रावल होना चाहिए था।

चुस्त पजामी और पतली कुर्ती में ऐसा लग रहा था जैसे उसकी जवानी का बोझ इन कपड़ों में कहाँ संभल पायेगा? वह तो फूटकर बाहर ही आ जाएगा। वह मीटिंग हॉल में मेरे बगल वाली कुर्सी पर बैठी थी। उसने इम्पोर्टेड परफ्यूम लगा रखा था पर उसके बदन से आने वाली खुशबू ने तो मेरे दिल और दिमाग को हवा हवाई ही कर दिया था। क्या मस्त गांड है साली की। मैं सच कहता हूँ अगर मैं भरतपुर का राजा होता तो इसको अपने महल में पटरानी ही बना देता।

सबसे पहले हाथ मिलाकर उसी ने मुझे बधाई दी थी। वाह … क्या नाजुक सी हथेली और कलाइयां हैं। लाल रंग की चूड़ियों से सजी कलाइयां अगर खनकाने और चटकाने का कभी अवसर मिल जाए तो भला फिर कोई मरने की जल्दी क्यों करे, जन्नत यहीं नसीब हो जाए।

काश! कभी इस 36-24-36 की परफेक्ट फिगर (संतुलित देहयष्टि) को पटरानी बनाकर (पट लिटाकर) सारी रात उसके ऊपर लेटने का मौक़ा मिल जाए तो खुदा कसम मज़ा ही आ जाए।

मीटिंग के बाद चाय नाश्ते का प्रबंध भी किया गया था।

बाद में भोंसले ने बताया कि मुझे अगले 2-3 दिन में चार्ज लेकर हेड ऑफिस कन्फर्म करना होगा। सितम्बर माह के अंत में मुझे बंगलुरु ट्रेनिंग पर जाने के समय कोई और व्यक्ति अस्थायी रूप से ज्वाइन करेगा।

साली यह जिन्दगी भी झांटों के जंगल की तरह उलझी ही रहेगी।

दिन में मैंने मधुर को यह खुशखबरी सुनाई। शाम को घर पर इसे सेलिब्रेट करने का जिम्मा अब मधुर के ऊपर था। वैसे मधुर ज्यादा तामझाम पसंद नहीं करती है। बाहर से तो किसी को बुलाना ही नहीं था। मैं, मधुर और कामिनी फकत तीन जीव थे।

जब मैं घर पहुंचा तो मधुर और कामिनी दोनों हाल में खड़ी मेरा ही इंतज़ार कर रही थी। मधुर ने वही लाल साड़ी पहन रखी थी जो आज सुबह हरियाली तीज उत्सव मनाने के लिए आश्रम जाते समय पहनी थी।

और बड़ी हैरानी की बात तो यह थी कि आज कामिनी ने भी मधुर जैसी ही लाल रंग की साड़ी और मैचिंग ब्लाउज पहन रखा था। आज कामिनी का जलाल तो जैसे सातवें आसमान पर था। पतली कमर में बंधी साड़ी के ऊपर उभरा हुआ सा पेडू और गोल नाभि … और गोल खरबूजे जैसे कसे हुए नितम्ब… उफ्फ्फ… क्या क़यामत लगती है।

मन करता है साली को अभी पटरानी ही बना दूं।

मैं हाथ मुंह धोकर बाहर आया तो हम तीनों हॉल के कोने में बने छोटे मंदिर के सामने खड़े हो गए और दीपक जलाकर भगवान से आशीर्वाद लिया। मधुर ने मुझे कुमकुम का टीका लगाया और फिर थोड़ी सी कुमकुम मेरे गालों पर भी लगा दी।

आज मधुर बड़ी खुश और चुलबुली सी हो रही थी। उसके बाद हम डाइनिंग टेबल के पास आ गए जहां मिठाइयाँ, केक और अन्य सामान रखा था। फिर मधुर ने मेरे गले से लगकर मुझे बधाई दी। मैंने भी उसके गालों पर एक चुम्बन लेकर उसे थैंक यू कहा। फिर मधुर ने भी मेरे होंठों पर चुम्बन लिया और फिर मेरे गालों को जोर से चिकौटी सी काटते हुए मसल दिया।
 
कामिनी यह सब देख रही थी। फिर कामिनी ने भी मुस्कुराते हुए मुझे बधाई दी- सल! आपतो प्लमोशन ती बहुत-बहुत बधाई।

“अरे … पागल लड़की?” मधुर ने बीच में ही उसे डांटते हुए कहा।

“क्या हुआ?” कामिनी ने डरते-डरते पूछा।

“बधाई कोई ऐसे दी जाती है?”

“तो?” कामिनी ने हैरानी से मधुर की ओर देखा।

“आज कितना ख़ुशी का दिन है गले लगकर बधाई दी जाती है।” कह कर मधुर ठहाका लगा कर हंस पड़ी।

मुझे बड़ी हैरानी हो रही थी मधुर आज तो बहुत ही मॉडर्न बनी हुई है। कामिनी तो बेचारी शर्मा ही गई।

“एक तो तुम्हें शर्म बहुत आती है?” मधुर ने एक झिड़की और लगाई तो कामिनी धीरे-धीरे मेरी ओर आई और फिर पास आकर अपनी मुंडी नीचे करके खड़ी हो गयी जैसे उसे अभी हलाल किया जाने वाला है।

“अरे … ठ … ठीक है … कोई बात नहीं …” मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था। भेनचोद ये क्या नया नाटक है? हे लिंग महादेव! कहीं लौड़े मत लगा देना प्लीज।

कामिनी अपनी मुंडी झुकाए कातर नज़रों से मधुर की ओर देखे जा रही थी।

“अरे?” मधुर ने फिर थोड़ा गुस्से से उसकी ओर देखा तो बेचारी कामिनी के पास अब मेरी ओर बढ़ने के सिवा और क्या चारा बचा था? बेचारी छुईमुई बनी थोड़ा सा मेरे और नजदीक आ गई।

“ओह … बस … बस … ठीक है … ठीक है!” कहते हुए मैंने उसे अपनी बांहों में भरते हुए कहा।

मेरा एक हाथ उसके नितम्बों पर चला गया। आह … क्या गुदाज़ कसी हुई गोलाइयां हैं। मेरी अंगुलियाँ उसके दोनों नितम्बों की दरार में चली गयी। कामिनी तो चिंहुक सी उठी। शुक्र था मेरी पीठ मधुर की ओर थी और कामिनी मेरे सामने थी तो मधुर मेरी इस हरकत को शायद नहीं देख पाई। अब मैंने कामिनी के गालों पर एक चुम्बन लिया और उसे थैंक यू भी कहा।

बेचारी कामिनी तो मारे शर्म के लाजवंती ही बन गई।

“ये कामिनी भी एक नंबर की लाजो घसियारी ही है.” कह कर मधुर एक बार फिर हंस पड़ी।

“चलो आओ अब केक काटते हैं।”

फिर हम तीनों ने मिलकर केक काटा और एक दूसरे को भी खिलाया। यह बात जरूर गौर करने वाली थी कि मधुर ने मेरे गालों पर भी थोड़ा केक लगा दिया और फिर उसे चाट भी लिया।

मेरा दिल जोर से धड़का कहीं वह कामिनी को भी ऐसा करने के ना कह दे!

मेरे तो मज़े हो जायेंगे पर बेचारी कामिनी तो मारे शर्म के मर ही जायेगी।

पर भगवान् का शुक्र है कामिनी का मरना इस बार टल गया था।

मधुर ने मुझे अपने और कामिनी के बीच में करके बहुत सी सेल्फी भी ली और हैंडीकैम को एक जगह सेट करके इस उत्सव की पूरी विडियो भी बनाई। फिर हम सभी ने मिलकर नाश्ता किया। हालांकि मधुर के तो व्रत चल रहे थे तो उसने केवल एक रसगुल्ला ही खाया पर मैंने और कामिनी ने तो आज जी भर रसगुल्ले उड़ाये।

उसके बाद मधुर ने मेरे साथ गले में बाहें डाल कर सालसा डांस किया और फिर बद्रीनाथ की दुल्हनिया वाले गाने पर तो दोनों खूब ठुमके लगाए।

कामिनी अब जरा भी नहीं शर्मा रही थी। उसने पहले तो किसी गाने पर बेले डांस किया और बाद में एक राजस्थानी लोक गीत “म्हारे काजलीये री कोर … थानै नैणा मैं बसाल्यूं” जबरदस्त डांस किया। मधुर तो उसका डांस देखकर हैरान सी रह गई थी। मैं तो बस कामिनी की इस नागिन डांस पर बल खाती कमर के लटके झटके ही देखता रह गया। एक दो बार कामिनी के साथ डांस करते समय मेरा लंड उसके नितम्बों से भी टकरा गया था। कामिनी ने मेरे खड़े लंड को महसूस तो जरूर कर लिया था पर बोली कुछ नहीं।

और फिर यह धूम-धड़ाका रात 11 बजे तक चला। सच कहूं तो ऐसा उत्सव तो मधुर मेरे या अपने जन्म दिन पर भी कभी नहीं मनाया था।

और फिर अगले दिन सुबह…

आज शनिवार था। थोड़ी बारिश तो हो रही थी पर मधुर स्कूल चली गई थी और कामिनी रसोई में रात के जमा बर्तन साफ़ कर करने में लगी थी।

मैं रसोई में चला आया।

कामिनी ने आज वही पायजामा और कमीज पहन रखा था जो पहले दिन पहना था। मेरा मन तो आज फिर से उसे उसी प्रकार बांहों में दबोच लेने को कर रहा था पर बड़ी मुश्किल से मैंने अपने आप को तसल्ली देकर रोके रखा।

“गुड मोर्निंग … इंडिया!”

“गुड मोल्निंग सल … ”

“ओह … कामिनी! तुम तो बर्तनों में लगी हो तो चलो आज की चाय मैं बनाकर पिलाता हूँ।”

“अले … नहीं.. आप लहने दो … बस हो गया मैं बना दूँगी.” कामिनी ने मना करते हुए कहा।

“जानी … कभी हमारे हाथ की भी चाय पी लिया करो … हम भी बहुत कमाल की चाय बनाते हैं.” मैंने फिल्म स्टार राजकुमार की आवाज की नक़ल उतारते हुए कहा तो कामिनी हंस पड़ी।

और फिर मैंने चाय बनाई अलबत्ता मैं जानबूझ कर बीच-बीच में कामिनी से दूध, चाय पत्ती, अदरक आदि की मात्रा के बारे में जरूर पूछता रहा।
 
चाय थर्मोस में डाल कर मैंने कहा- अरे कामिनी!

“हओ?”

“थोड़ी सी फिटकरी मिल जायेगी क्या?”

“फिटतड़ी … ता क्या तरना है?” कुछ सोचते हुए कामिनी ने पूछा।

“अरे तुम लाओ तो सही?”

कामिनी ने फिटकरी ढूंड कर मुझे दे दी।

“इसे तवे पर रखकर भूनना है और फिर इसे पीस कर उस पाउडर में थोड़ा कच्चा दूध, हल्दी पाउडर, नीबू का रस और गुलाब जल मिलाकर लेप बनेगा।”

“अच्छा?” कामिनी ने कुछ सोचते हुए मेरे कहे मुताबिक सभी चीजें निकाल कर रसोई के प्लेटफोर्म पर रख दी।

मैंने पहले तो फिटकरी को भूनकर उसका चूर्ण बनाया और फिर एक प्लेट में ऊपर बताई सारी चीजें और चाय वाला थर्मोस कप आदि लेकर हम दोनों बाहर हॉल में आ गए।

“कामिनी उस अष्टावलेह में तो बड़ा झमेला था, आज वाला मिश्रण भी बहुत बढ़िया है.” मैंने उसे समझाते हुए कहा तो अब कामिनी के पास सिवाय ‘हओ’ बोलने के और क्या बचा था।

फिर मैंने एक कटोरी में पहले तो आधा चम्मच शहद डाला और फिर उचित मात्रा में अन्य चीजें डाल कर उनका लेप सा तैयार कर लिया।

कामिनी साथ वाले सोफे पर बैठी यह सब देख रही थी। मैंने उसे अपने पास आने को कहा तो वह बिना किसी ना-नुकर के मेरी बगल में आकर बैठ गई।

“कामिनी तुम्हें तो इन मुंहासों की कोई परवाह और चिंता ही नहीं है. पता है मैंने कल बड़ी मुस्किल से सारे दिन नेट पर इस दूसरे नुस्खे के बारे में पता किया है.”

कामिनी ने हओ के अंदाज़ में मुंडी हिलाई।

अब मैंने एक अंगुली पर थोड़ा सा लेप को लगाया और फिर कामिनी के चहरे पर हुई फुन्सियों पर लगाना शुरू कर दिया। बीच-बीच में मैं उसके गालों पर भी हाथ फिराता रहा। रेशम के नर्म फोहों और गुलाब की पंखुड़ियों की तरह नाजुक गाल देख कर मेरा मन तो उन्हें चूमने को करने लगा।

“कामिनी देखो एक ही दिन में ये मुंहासे थोड़े नर्म पड़ने लग गए हैं।”

“सच्ची?” कामिनी ने हैरानी से मेरी ओर देखा।

“और नहीं तो क्या? तुम अगर शर्माना छोड़ दो बस दो या तीन दिन में मेरी गारंटी है यह मुंहासे जड़ से ख़त्म हो जायेंगे.”

“अच्छा? इस लेप से?”

“हाँ यह लेप तो असर करेगा ही पर … वीर्यपान का असर तो पक्का ही होता है।”

“हट!” कामिनी एक बार फिर शर्मा गई। उसने अपनी मुंडी झुका ली थी।

“पता है तल मुझे तो उबताई सी आने लगी थी. मेला तो गला ही दुखने लगा था.” कामिनी का इतना लंबा चौड़ा उलाहना तो लाज़मी था। उसे सुनकर मैं हंसने लगा।

“अब दवाई है तो थोड़ी कड़वी और कष्टकारक तो होगी ही!”

“पता है तित्ता दर्द हुआ … मालूम?” कामिनी ने अपने गले पर हाथ फिराते हुए हुए कहा।

“सॉरी! जान पर तुम्हारे भले के लिए यह सब मुझे करना पड़ा था। पता है मुझे भी कितनी शर्म आई थी.”

और फिर हम दोनों हंसने लगे। माहौल अब खुशनुमा हो गया था।

“चलो गला तो थोड़ा दर्द किया होगा पर यह बताओ उसका स्वाद कैसा लगा?”

“थोड़ा खट्टा सा और लिजलिजा सा था.” कामिनी ने मुंह बनाते हुए कहा।

“कामिनी! अगर मुंहासे जल्दी ठीक करने हैं तो आज एक बार और कर लो!” मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था। मुझे लगता था कामिनी जरूर मना कर देगी।

“ना … बाबा ना … मुझे नहीं तरना … आप पूला गले ते अन्दल डाल देते हो मुझे तो फिल सांस ही नहीं आता.”

“अरे यार कल पहला दिन था ना? इसलिए थोड़ा ज्यादा अन्दर चला गया होगा पर आज मैं बिलकुल सावधानी रखूंगा? तुम्हारी कसम?”

कामिनी ने शर्मा कर अपनी आँखों पर हाथ रख लिए।

इस्स्स्स …

याल्लाह … सॉरी … हे लिंग महादेव तेरी ऊपर से भी जय हो और नीचे से भी। आज तो मैं ऑफिस जाने से पहले जरूर तुम्हारा जलाभिषेक भी करूंगा और सवा ग्यारह रुपये का प्रसाद भी चढ़ाउंगा।

अब मैंने कामिनी को अपनी बांहों में भींच लिया। कामिनी छुईमुई बनी मेरे सीने से लग गयी।

“कामिनी तुम बहुत खूबसूरत हो। और पता है भगवान यह खूबसूरती क्यों देता है?”

“किच्च” कामिनी ने आँखें बंद किये किये ही अपने चिर परिचित अंदाज़ में इससे अनभिज्ञता प्रकट कर दी।

“कामिनी! प्रकृति या भगवान ने इस कायनात (संसार) को कितना सुन्दर बनाया है और विशेष रूप से स्त्री जाति को तो भगवान ने सौन्दर्य की यह अनुपम देन प्रदान करने के पीछे एक बहुत बड़ा रहस्य है। इसके पीछे एक कारण तो यह है कि सभी इस सुन्दरता को देखकर अपने सारे दुःख और कष्टों भूल जाए और आनंदित होते रहें। यह भगवान की एक धरोहर की तरह है इसलिए हर सुन्दर लड़की और स्त्री का धर्म होता है कि प्रकृति की इस सुन्दरता को बनाए रखे और किसी भी अवस्था में इसे कोई हानि नहीं पहुंचे और कोशिश की जाए कि यह लम्बे समय तक इसी प्रकार बनी रहे।”

आज तो मैं श्री श्री 108 पूर्ण ब्रह्म प्रेमगुरु बना अपना प्रवचन दे रहा था। कामिनी ने बोला तो कुछ नहीं पर मुझे लगता है वह अपनी सुन्दरता को मुंहासों से बचाए रखने के लिए कल मेरे द्वारा किये गए प्रयोग पर और भी गंभीरता से विचार करने लगी थी।
 
“वो … चाय … ठंडी हो जायेगी?” कामिनी ने अस्फुट से शब्दों में कहा तो सही पर उसने मेरे बाहुपाश से हटने की बिलकुल भी कोशिश नहीं की थी। उसकी साँसें बहुत तेज़ चल रही थी और आँखें अभी भी बंद थी। मैं उसके सिर, पीठ, कमर और नितम्बों पर हाथ फिराता जा रहा था और साथ में प्रवचन भी देता जा रहा था।

दोस्तो! आप सोच रहे होंगे गुरु … ठोक दो साली को … क्यों बेचारी को तड़फा रहे हो … लौंडिया तुम्हारी बांहों में लिपटी तुम्हें चु … ग्गा (चूत.. गांड) देने के लिए तैयार बैठी है तुम्हें प्रवचन झाड़ने की लगी है। आप सही सोच रहे हैं। इस समय कामिनी अपना सर्वस्व लुटाने को तैयार है बस मेरे एक इशारे की देरी है वह झट से मेरा प्रणय निवेदन स्वीकार कर लेगी।

मेरे प्रिय पाठको और पाठिकाओ! मज़ा तो तब आये जब कामिनी खुद कहे कि ‘मेरे प्रियतम … आज मुझे अपनी पूर्ण समर्पिता बना लो!!’

हाँ दोस्तो! मैं भी उसी लम्हे का इंतज़ार कर रहा हूँ। बस थोड़ा सा इंतज़ार!

मैंने अपना प्रवचन जारी रखा- कामिनी! नारी सौन्दर्य भगवान या प्रकृति का ऐसा उपहार है जो हर किसी के भाग्य में नहीं होता। जड़ हो या चेतन भगवान ने हर जगह अपना सौन्दर्य बिखेरा है। इनमें से बहुत कम लोग भाग्यशाली होते हैं जिन्हें यह रूप और यौवन मिलता है इसलिए इसे सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी उसी पर आती है। भगवान ने तुम्हें इतना सुन्दर रूप और यौवन देकर तुम्हारे ऊपर कितना बड़ा उपकार किया है तुम समझ रही हो ना?

अब पता नहीं यह प्रवचन कामिनी के कितना पल्ले पड़ा पर उसने अपनी आँखें बंद किये-किये ही ‘हओ’ जरूर बोल दिया था।

मैंने कामिनी का सिर अपने दोनों हाथों में पकड़ लिया और हौले से अपने होंठों को उसके लरजते (कांपते) अधरों पर रख दिए।

आह … जैसे गुलाब की पंखुड़ियां शहद में डूबी हुई हों।

धीरे-धीरे मैंने उसके अधरों को चूमना और चूसना शुरू कर दिया। कामिनी ने कोई आनाकानी नहीं की। उसकी साँसें बहुत तेज होने लगी थी और अब तो उसने अपनी एक बांह को मेरी गर्दन के पीछे भी कर लिया था। उसकी एक जांघ मेरी जांघ से सट गयी थी। मेरा एक हाथ उसके नितम्बों से होता हुआ उसकी जाँघों के संधिस्थल की ओर सरकने लगा। योनि प्रदेश की गर्माहट पाकर मेरा पप्पू तो छलांगें ही लगाने लगा था।

मेरी अंगुलियाँ जैसे ही उसकी सु-सु को टटोलने की कोशिश करने लगी मुझे लगा कि कामिनी का शरीर कुछ अकड़ने सा लगा है।

“सल … मुझे तुच्छ हो लहा है … मेले तानों में सीटी सी बजने लगी है … सल … मेला शलील तलंगित सा हो लहा है … ओह … मा … म … मेला सु-सु … आह … लुको … ईईईईईइ …”

उसके शरीर ने दो-तीन झटके से खाए और फिर वह मेरी बांहों में झूल सी गयी।

हे भगवान … यह तो बहुत ही कच्ची गिरी निकली … लगता है आज एक बार फिर उसने ओर्गस्म (यौन उत्तेजना की चरम स्थिति) को पा लिया है।

कामिनी कुछ देर इसी तरह मेरी बांहों में लिपटी पड़ी रही। थोड़ी देर बाद वह कुछ संयत सी होकर सोफे पर बैठ गई। उसने अपनी मुंडी झुका रखी थी और अब वह अपनी नज़रें मुझ से नहीं मिला रही थी। शायद उसे लगा उसका सु-सु निकल गया होगा।

पर यह तो प्रकृति का वह सुन्दरतम उपहार और परम आनंदमयी क्रिया थी जिसे पाने और भोगने के लिए सारे जीव मात्र कामना करते हैं। इसी क्रिया से तो यह संसार-चक्र चल रहा है और यही तो इस संसार को अमृत्व (अमरता) प्रदान करता है। वरना प्रकृति इस क्रिया में इतना रोमांच और आनंद क्यों भरती।

मेरे कानों में भी सांय-सांय सी होने लगी थी। लंड तो जैसे बेकाबू होने लगा था। एक बार अगर यह चश्का लग गया तो अब वह नहीं मानने वाला।

“कामिनी मैं मानता हूँ तुम्हें थोड़ा कष्ट तो जरूर होगा पर मैं सच कहता हूँ अगर तुम दो-तीन दिन और इसी तरह वीर्यपान कर लो तो फिर यह लेप-वेप का झमेला भी नहीं रहेगा और मुंहासे भी जड़ से ख़त्म हो जायेंगे.”

कामिनी ने अपने गले पर हाथ फिराते हुए कहा- आप गले ते अन्दल तत डाल देते हो तो बड़ी असुविधा होती है।

“ओह … सॉरी इस बार मैं कुछ नहीं करूंगा तुम जिस प्रकार करना चाहो करना … गुड बॉय प्रोमिस!”

कामिनी ने मेरी ओर देखा शायद वह बाथरूम में चलने का सोच रही थी।
 
“कामिनी आज तो कुछ गिरने या गंदा होने का डर तो है नहीं, यहीं सोफे पर ही आसानी से हो जाएगा।” बेचारी कामिनी जड़ बनी वही बैठी रही। मैंने हॉल का दरवाजा और खिड़की ठीक से बंद कर दी।

और फिर वापस सोफे पर आकर मैंने अपने पायजामे का नाड़ा खोल दिया.

कामिनी ने थोड़ा झिझकते हुए मेरे पप्पू को अपने नाज़ुक हाथों में पकड़ लिया। पप्पू ने बेकाबू होते हुए एक जोर का ठुमका सा लगाया तो कामिनी ने कसकर उसकी गर्दन पकड़ी और फिर उसे हिलाना चालू कर दिया।

मैंने पास रखी शहद की शीशी खोल कर कामिनी को पकड़ा दी। कामिनी ने थोड़ा शहद पप्पू के सुपारे पर लगाया और थोड़ा अपने मुख श्री में भी डाल लिया और फिर सुपारे को मुंह में भरकर चूसने लगी।

कामिनी भी सोफे पर बैठी तो बार-बार मेरा लंड उसके मुंह से फिसल रहा था तो अब वह नीचे फर्श पर उकड़ू होकर मेरे पैरों के बीच में आकर लंड को चूसने लगी। मेरी दोनों टांगों के बीच उसका ऊपर नीचे होता सिर ऐसे लग रहा था जैसे वह यस-नो बोल रहा हो।

मैंने उसके गालों, होंठों, सिर और पीठ पर हाथ फिराना चालू कर दिया। अब मेरा ध्यान उसके उरोजों पर चला गया। आज उसने कमीज और पायजामा पहना था। कमीज के आगे के दो बटन खुले थे। लंड चूसते हुए जब कामिनी अपने मुंह को ऊपर करती तो लगता जैसे दोनों कबूतर गुटर गूं कर रहे हैं। कंगूरे तो आज अकड़कर पेंसिल की नोक जैसे तीखे हो चले थे। मैंने हाथ बढ़ाकर उन्हें अपनी चिमटी में लेकर धीरे धीरे मसलना चालू कर दिया। कामिनी अब और भी ज्यादा जोश में आ गयी और मेरे लंड को किसी चुस्की (आइस कैंडी) की तरह चूसने लगी थी।

दोस्तो! इस लज्जत को शब्दों में बयान करना आसान नहीं है। इसे तो बस आँखें बंद करके महसूस ही किया जा सकता है। मैं अगर कोई बहुत बड़ा लेखक या कवि होता तो इस लज्जत का बहुत खूबसूरती के साथ वर्णन कर सकता था पर मैं लेखक कहाँ हूँ।

पर यह तो सच है कि कामिनी जिस प्रकार लंड चूस रही है उसका कोई जवाब ही नहीं है। मेरा लंड तो जैसे धन्य ही हो गया। पता नहीं यह सब उसने कहाँ से सीखा है? लगता है उसने जरूर किसी साईट पर यह सब तसल्ली से देखा और सीखा होगा।

कोई 10 मिनट तक कामिनी ने लंड चूसा होगा। फिर वह सांस लेने के लिए थोड़ी देर रुकी।

“कामिनी मेरी जान! यू आर ग्रेट ! तुम बहुत अच्छा चूसती हो।”

कामिनी अपनी प्रशंसा सुनकर मुस्कुराने लगी थी। आज उसने ना तो गला दुखने की बात की और ना ही वीर्य जल्दी नहीं निकलने की कोई शिकायत की। एकबार फिर से उसने थोड़ा शहद मेरे लिंगमुंड पर लगाया और थोड़ा शहद अपनी जीभ पर लगा कर फिर से चूसना चालू कर दिया।

अब वह अलग-अलग तरीकों से लंड चूसने लगी थी कभी-कभी मेरी प्रतिक्रया जानने के लिए मेरी ओर भी देखती और मेरे चेहरे पर आई मुस्कान देखकर वह इस क्रिया को और भी बेहतर ढंग से करने का प्रयाश करने लगी। कभी सुपारे को चाटना, कभी उसपर जीभ फिराना, कभी लंड को जड़ तक मुंह में लेकर चूसते हुए धीरे धीरे बाहर निकालना, कभी उसे दांतों से काटना और फिर दुलारना … कभी गोटियों को सहलाना … आह … कामिनी तो आज कमाल कर रही थी।

मैं आँखें बंद किये अपने भाग्य की सराहना करता रहा।

कामिनी की 8-10 मिनट की कड़ी मेहनत के बाद लिंग महादेव प्रसन्न हुए और फिर उन्होंने अपना अमृत कामिनी को भेंट कर दिया। कामिनी तो कब से इस अमृत की प्रतीक्षा कर रही थी। वह इस हलाहल को गटागट पीती चली गयी। उसने वीर्य रूपी प्रसाद का एक भी कतरा बाहर नहीं आने दिया।

जब मेरा लंड कुछ ढीला पड़ गया तो कामिनी ने उसे अपने मुंह से बाहर निकाल दिया। फिर उसे एक हाथ में पकड़कर उस पर हल्की सी चपत लगाकर हंसने लगी। साली ये जवान लड़कियां नखरे और अदाएं तो अपने आप सीख लेती हैं।

अब मैंने उसे अपनी बांहों में भरकर अपने पास फिर से सोफे पर बैठा लिया। फिर टेबल पर रखी मीठी इलायची और सुपारी की पुड़िया खोल कर आधी कामिनी के मुख श्री में डाल दी और बाकी अपने मुंह में डाल ली। कामिनी को अब उबकाई वाली समस्या भी नहीं होगी।

“कामिनी! मेरी जान तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद। कामिनी तुम सच में इस क्रिया को बहुत अच्छे से करती हो। मधुर भी कई बार करती तो है पर इतना सुन्दर ढंग से नहीं कर पाती।” मैंने उसके सिर पर हाथ फिराते हुए कहा।

अब बेचारी कामिनी क्या बोलती वह तो मेरे आगोश में सिमटी बहुत कुछ सोचती ही रह गई।

“वो … चाय नहीं पीनी क्या?”

“गोली मारो चाय को … आज तो तुम अपनी पसंद के पकोड़े बनाओ तब तक मैं नहा लेता हूँ।”

“हओ” कामिनी हंसते हुए रसोई में चली गई।

आज पूरे दिन बार-बार कामिनी का ही ख़याल आता रहा। एकबार तो सोचा कामिनी से फ़ोन पर ही बात कर लूं पर फिर मैंने अपना इरादा बदल लिया। अब मैं आगे के प्लान के बारे में सोच रहा था। कामिनी शारीरिक रूप से तो पहले ही चुग्गा देने लायक हो गयी है और अब तो वह मानसिक रूप से भी तैयार है।
 
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