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Guest
धीरे धीरे घर का माहॉल ठीक होने लगा……फिर हमारे दो रूम रेंट पर चढ़ गये…..दोनो ही रूम एक फॅमिली ने रेंट पर लिए थे….उनके बच्चे अभी बहुत छोटे थे……इसीलिए एक दिन मेने अपने जेठ और जेठानी के घर जाने का प्लान बनाया. में सुबह किरायेदार की बीवी को ये बोल कर चली गयी कि, में किसी काम से जा रही हूँ…..वो प्राजक्ता का ध्यान रखे………
जब में अपनी जेठानी के घर पहुचि, तो वो मुझे देख कर बहुत खुश हुई, मानसी ने मुझे अंदर बुलाया और खातिरदारी की, उसके बाद में हमने थोड़ा इधर उधर की बातें की……
मानसी: और दीदी बताए कैसे आना हुआ……
में: दरअसल में इसलिए आई थी कि, में चाहती हूँ कि तुम प्राजक्ता के लिए भी कोई अच्छा सा रिश्ता ढूँढ दो…..उसकी शादी भी जल्द से जल्द करवानी है मुझे…..
मानसी: क्या हुआ दीदी कोई बात है क्या ?
में: नही ऐसे ही, दरअसल मेरी तबीयत भी आज कल ठीक नही रहती……सोचती हूँ कि आँखें बंद करने से पहले प्राजक्ता भी अपने घर चली जाए…..
मानसी: क्या हुआ दीदी आग लगे दुश्मनो को……अभी तो आप जवान हो….फिर ऐसी बात क्यों कर रही है……
में: मानसी प्लीज़ प्राजक्ता के लिए अच्छा सा रिश्ता ढूँढ लो…….प्राची को अपने ससुराल में खुश देखती हूँ तो दिल का बोझ हल्का हो जाता है…..
मानसी: में समझती हूँ दीदी…..इनको आने दो आज रात को ही बात करती हूँ…
में: ठीक है और सूनाओ बच्चे कैसे है…….
मानसी: ठीक है दीदी…….स्कूल गये है…….
दोफर को खाने के बाद में घर वापिस आ गयी…..जब में घर वापिस आई तो, प्राजक्ता घर पर नही थी……जब मेने किरायेदार से पूछा तो बोली, वो उसकी सहेली आई थी, उसके साथ मार्केट गयी है…….मुझे पता नही क्यों चिंता होने लगी थी……उस वाक़ए को ३ महीने गुजर गये थे……..उसके बाद से ना तो मेने अभिषेक की शकल देखी थी, और ना ही नाम सुना था……थोड़ी देर बाद प्राजक्ता भी आ गयी……दिन गुज़रते गये…..८
अप्रैल का महीना था……शाम के ४ बजे की बात है…..उस घटना को लगभग ६ महीने हो चुके थे…..में अपने घर में बैठी हुई सिलाई का काम कर रही थी……१० दिन पहले जो फॅमिली हमारे घर रहने आई थी.वो भी कमरा खाली कर जा चुके थे……..
कई जगह प्राजक्ता के रिश्ते की बात चली, पर बात नही बन पाई……उस दिन में बैठी कपड़े सिल रही थी….प्राजक्ता अपनी सहेली के घर में थी पड़ोस में तभी बाहर डोर बेल बजी…….मेने सोचा कि, प्राजक्ता आ गयी है…मेने जैसे ही बाहर जाकर गेट खोला तो, मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी…..सामने अभिषेक खड़ा था….उसको देखते ही मेरी रगो में खून का दौरा तेज हो गया …
में: तू तू क्या लेने आया है इधर……
अभिषेक कुछ नही बोला, और मेरी तरफ एक पॅकेट बढ़ा दिया……”क्या है ये” मेने गुस्से से उससे कहा…..”देखो लो…..तुम्हारे लिए बहुत ज़रूरी समान है इसमे” मेने उसके हाथ से वो पॅकेट नही लिया…..उसने एक बार मेरी तरफ देखा, फिर उसने वो पॅकेट गेट के अंदर नीचे फेंक दिया……फिर वो मुड़कर वापिस चला गया…..मुझे समझ में नही आया वो यहाँ क्या करने आया है….मेने गेट बंद किया, और पॅकेट को उठा कर खोला…….
जैसे ही मेने पॅकेट खोला, तो उसमे से एक डीवीडी डिस्क निकल कर बाहर आ गयी….और उसमे एक स्लिप भी थी जिस पर लिखा हुआ था ये डीवीडी देखने के बाद तुम्हे मेरी ज़रूरत पड़ेगी…..और उसके नीचे उसका मोबाइल नंबर लिखा हुआ था……
मेने गेट लॉक किया, और अंदर आ गयी…..नज़ाने क्यों मेरा दिल बहुत घबरा रहा था….प्राजक्ता भी पड़ोस के घर में थी….मेने वो डीवीडी ली, और उसे डीवीडी प्लेयर में लगाया….थोड़ी देर बाद उसमे कुछ शुरू हुआ…..कॅमरा कुछ घूम सा रहा था……फिर किसी का हाथ कॅमरा के सामने आया, और कॅमरा एक जगह सेट हो गया……ये किसी रूम का नज़ारा था……
पर मुझे समझ में नही आ रहा था कि कहाँ का सीन था. थोड़ी देर बाद अभिषेक उसमे दिखाई दिया…वो बेड पर बैठा हुआ था……और वो किसी से बात कर रहा था. जो शायद कॅमरा के दूसरी तरफ था…..फिर वो शक्स सामने आया………जिसे देखते ही मेरी रूह तक काँप गयी…..वो प्राजक्ता थी…..प्राजक्ता अभिषेक के पास आकर बेड पर बैठ गयी…..में बड़ी हैरानी से ये सब देख रही थी….क्योंकि जिस रूम में वो क्लिप बनी थी वो हमारा नही था…….
फिर अभिषेक ने प्राजक्ता को पकड़ कर अपनी तरफ खेंचा, और उसके होंठो पर होंठ लगा दिए…..ये देखते ही मेरे पैरो की ज़मीन खिसक गयी…….प्राजक्ता कब उससे मिलने गयी……..मुझे याद भी नही था कि, कब वो इतनी देर तक घर से बाहर रही…मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था……प्राजक्ता भी अपने बाहें अभिषेक के गले में डाले हुए, उसका पूरा साथ दे रही थी……
मेरे आँखें टीवी पर इस कदर गढ़ गई थी कि, में अभिषेक की हर हरक़त को देखने की कोशिश कर रही थी………और मेरा दिल बैठा जा रहा था…..अभिषेक ने अपने हाथों को उसकी कमर से ऊपर लेजाते हुए, प्राजक्ता की स्तनों पर ले गया. जिसके कारण प्राजक्ता उससे और चिपक गयी……..वो प्राजक्ता के होंठो को चूस्ते हुए उसकी स्तनों को दबा रहा था…….और बार बार उसको अपनी तरफ खेंच रहा था….
फिर उसने प्राजक्ता की कमीज़ को दोनो तरफ से पकड़ कर ऊपर उठाना शुरू कर दिया…..और मुझे ये देख कर बहुत हैरानी हुई, ये सब करते हुए, प्राजक्ता भी उसका पूरा साथ दे रही थी….अगले ही पल उसने प्राजक्ता की कमीज़ को उसके बदन से अलग कर नीचे फेंक दिया……..प्राजक्ता की कमीज़ को नीचे फर्श पर देख कर मुझे ऐसा लगा कि हमारी इज़्ज़त नीचे फर्श पर पड़ी धूल चाट रही है….
फिर उसने उसकी स्तनों को ब्रा के ऊपर से पकड़ कर मसलना शुरू क्या..प्राजक्ता उसकी बाहों में छटपटाने लगी……..फिर अभिषेक ने एक हाथ नीचे लेजाते हुए, उसकी सलवार का नाडा खोल दिया……प्राजक्ता बेशर्मो की तरह उसकी गोद में बैठी हुई थी…..जब अभिषेक ने उसकी सलवार को नीचे सरकाना शुरू किया…उसने बड़ी बेशर्मी से अपनी नितंब को ऊपर उठा लिया……..और अभिषेक ने खेंचते हुए उसकी सलवार उसके पैरों से निकाल कर नीचे फेंक दी……
कॅमरा का फोकस सीधा उन पर था……मेरी अपनी बेटी उस हरामी की गोद में अधनंगी बैठी हुई थी…फिर अभिषेक ने पीछे से उसकी टाँगों को घुटनो से मोड़ कर फेला दिया……..और एक हाथ आगे लेजा कर उसकी पैंटी को एक साइड में कर दिया…..मेरी तो आँखें फटी की फटी रह गयी….पैंटी को साइड करके, उसने प्राजक्ता की योनि की फांकों को अपने हाथ की उंगलियों से खोला…उसका गुलाबी छेद में साफ साफ देख पा रही थी……..तभी टीवी पर ब्लॅक स्क्रीन आ गयी….
जब में अपनी जेठानी के घर पहुचि, तो वो मुझे देख कर बहुत खुश हुई, मानसी ने मुझे अंदर बुलाया और खातिरदारी की, उसके बाद में हमने थोड़ा इधर उधर की बातें की……
मानसी: और दीदी बताए कैसे आना हुआ……
में: दरअसल में इसलिए आई थी कि, में चाहती हूँ कि तुम प्राजक्ता के लिए भी कोई अच्छा सा रिश्ता ढूँढ दो…..उसकी शादी भी जल्द से जल्द करवानी है मुझे…..
मानसी: क्या हुआ दीदी कोई बात है क्या ?
में: नही ऐसे ही, दरअसल मेरी तबीयत भी आज कल ठीक नही रहती……सोचती हूँ कि आँखें बंद करने से पहले प्राजक्ता भी अपने घर चली जाए…..
मानसी: क्या हुआ दीदी आग लगे दुश्मनो को……अभी तो आप जवान हो….फिर ऐसी बात क्यों कर रही है……
में: मानसी प्लीज़ प्राजक्ता के लिए अच्छा सा रिश्ता ढूँढ लो…….प्राची को अपने ससुराल में खुश देखती हूँ तो दिल का बोझ हल्का हो जाता है…..
मानसी: में समझती हूँ दीदी…..इनको आने दो आज रात को ही बात करती हूँ…
में: ठीक है और सूनाओ बच्चे कैसे है…….
मानसी: ठीक है दीदी…….स्कूल गये है…….
दोफर को खाने के बाद में घर वापिस आ गयी…..जब में घर वापिस आई तो, प्राजक्ता घर पर नही थी……जब मेने किरायेदार से पूछा तो बोली, वो उसकी सहेली आई थी, उसके साथ मार्केट गयी है…….मुझे पता नही क्यों चिंता होने लगी थी……उस वाक़ए को ३ महीने गुजर गये थे……..उसके बाद से ना तो मेने अभिषेक की शकल देखी थी, और ना ही नाम सुना था……थोड़ी देर बाद प्राजक्ता भी आ गयी……दिन गुज़रते गये…..८
अप्रैल का महीना था……शाम के ४ बजे की बात है…..उस घटना को लगभग ६ महीने हो चुके थे…..में अपने घर में बैठी हुई सिलाई का काम कर रही थी……१० दिन पहले जो फॅमिली हमारे घर रहने आई थी.वो भी कमरा खाली कर जा चुके थे……..
कई जगह प्राजक्ता के रिश्ते की बात चली, पर बात नही बन पाई……उस दिन में बैठी कपड़े सिल रही थी….प्राजक्ता अपनी सहेली के घर में थी पड़ोस में तभी बाहर डोर बेल बजी…….मेने सोचा कि, प्राजक्ता आ गयी है…मेने जैसे ही बाहर जाकर गेट खोला तो, मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी…..सामने अभिषेक खड़ा था….उसको देखते ही मेरी रगो में खून का दौरा तेज हो गया …
में: तू तू क्या लेने आया है इधर……
अभिषेक कुछ नही बोला, और मेरी तरफ एक पॅकेट बढ़ा दिया……”क्या है ये” मेने गुस्से से उससे कहा…..”देखो लो…..तुम्हारे लिए बहुत ज़रूरी समान है इसमे” मेने उसके हाथ से वो पॅकेट नही लिया…..उसने एक बार मेरी तरफ देखा, फिर उसने वो पॅकेट गेट के अंदर नीचे फेंक दिया……फिर वो मुड़कर वापिस चला गया…..मुझे समझ में नही आया वो यहाँ क्या करने आया है….मेने गेट बंद किया, और पॅकेट को उठा कर खोला…….
जैसे ही मेने पॅकेट खोला, तो उसमे से एक डीवीडी डिस्क निकल कर बाहर आ गयी….और उसमे एक स्लिप भी थी जिस पर लिखा हुआ था ये डीवीडी देखने के बाद तुम्हे मेरी ज़रूरत पड़ेगी…..और उसके नीचे उसका मोबाइल नंबर लिखा हुआ था……
मेने गेट लॉक किया, और अंदर आ गयी…..नज़ाने क्यों मेरा दिल बहुत घबरा रहा था….प्राजक्ता भी पड़ोस के घर में थी….मेने वो डीवीडी ली, और उसे डीवीडी प्लेयर में लगाया….थोड़ी देर बाद उसमे कुछ शुरू हुआ…..कॅमरा कुछ घूम सा रहा था……फिर किसी का हाथ कॅमरा के सामने आया, और कॅमरा एक जगह सेट हो गया……ये किसी रूम का नज़ारा था……
पर मुझे समझ में नही आ रहा था कि कहाँ का सीन था. थोड़ी देर बाद अभिषेक उसमे दिखाई दिया…वो बेड पर बैठा हुआ था……और वो किसी से बात कर रहा था. जो शायद कॅमरा के दूसरी तरफ था…..फिर वो शक्स सामने आया………जिसे देखते ही मेरी रूह तक काँप गयी…..वो प्राजक्ता थी…..प्राजक्ता अभिषेक के पास आकर बेड पर बैठ गयी…..में बड़ी हैरानी से ये सब देख रही थी….क्योंकि जिस रूम में वो क्लिप बनी थी वो हमारा नही था…….
फिर अभिषेक ने प्राजक्ता को पकड़ कर अपनी तरफ खेंचा, और उसके होंठो पर होंठ लगा दिए…..ये देखते ही मेरे पैरो की ज़मीन खिसक गयी…….प्राजक्ता कब उससे मिलने गयी……..मुझे याद भी नही था कि, कब वो इतनी देर तक घर से बाहर रही…मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था……प्राजक्ता भी अपने बाहें अभिषेक के गले में डाले हुए, उसका पूरा साथ दे रही थी……
मेरे आँखें टीवी पर इस कदर गढ़ गई थी कि, में अभिषेक की हर हरक़त को देखने की कोशिश कर रही थी………और मेरा दिल बैठा जा रहा था…..अभिषेक ने अपने हाथों को उसकी कमर से ऊपर लेजाते हुए, प्राजक्ता की स्तनों पर ले गया. जिसके कारण प्राजक्ता उससे और चिपक गयी……..वो प्राजक्ता के होंठो को चूस्ते हुए उसकी स्तनों को दबा रहा था…….और बार बार उसको अपनी तरफ खेंच रहा था….
फिर उसने प्राजक्ता की कमीज़ को दोनो तरफ से पकड़ कर ऊपर उठाना शुरू कर दिया…..और मुझे ये देख कर बहुत हैरानी हुई, ये सब करते हुए, प्राजक्ता भी उसका पूरा साथ दे रही थी….अगले ही पल उसने प्राजक्ता की कमीज़ को उसके बदन से अलग कर नीचे फेंक दिया……..प्राजक्ता की कमीज़ को नीचे फर्श पर देख कर मुझे ऐसा लगा कि हमारी इज़्ज़त नीचे फर्श पर पड़ी धूल चाट रही है….
फिर उसने उसकी स्तनों को ब्रा के ऊपर से पकड़ कर मसलना शुरू क्या..प्राजक्ता उसकी बाहों में छटपटाने लगी……..फिर अभिषेक ने एक हाथ नीचे लेजाते हुए, उसकी सलवार का नाडा खोल दिया……प्राजक्ता बेशर्मो की तरह उसकी गोद में बैठी हुई थी…..जब अभिषेक ने उसकी सलवार को नीचे सरकाना शुरू किया…उसने बड़ी बेशर्मी से अपनी नितंब को ऊपर उठा लिया……..और अभिषेक ने खेंचते हुए उसकी सलवार उसके पैरों से निकाल कर नीचे फेंक दी……
कॅमरा का फोकस सीधा उन पर था……मेरी अपनी बेटी उस हरामी की गोद में अधनंगी बैठी हुई थी…फिर अभिषेक ने पीछे से उसकी टाँगों को घुटनो से मोड़ कर फेला दिया……..और एक हाथ आगे लेजा कर उसकी पैंटी को एक साइड में कर दिया…..मेरी तो आँखें फटी की फटी रह गयी….पैंटी को साइड करके, उसने प्राजक्ता की योनि की फांकों को अपने हाथ की उंगलियों से खोला…उसका गुलाबी छेद में साफ साफ देख पा रही थी……..तभी टीवी पर ब्लॅक स्क्रीन आ गयी….