50
सन्नी
लक्ष्मी आंटी ने अपनी लंबी टांगों के लुभावने दर्शन करते हुए किले की रानी का पद जीता तो हम दोनों एक साथ पहुंचने के कारण राजा न बनते हुए सिपहसालार बने। किले के विशाल दरवाजे के अंदर एक छोटा सा नया कमरा बना था जहां से हमें टिकट लेनी पड़ी। रानी साहिबा ने बड़े शान से हम तीनों की टिकट खरीदी और हम अंदर गए।
लक्ष्मी आंटी ने हम दोनों के हाथों में अपने हाथ डाले और हम सब किला देखने लगे। लोहगड़ देखने का सही मौसम सर्दी या बरसात का होता है उसमें भी हम गुरुवार की सुबह वहां पहुंचे थे। पूरा किला मानो अतीत की स्मृतियां केवल हमारे लिए दिखा रहा था। सुबह होटल से नाश्ता करके निकले थे इसलिए हम सुबह 6 बजे लोहगढ़ के नीचे पहुंचे थे। उपर चढ ने में और 1 घंटा लगा तो हम सब किले में 7 के थोड़ी देर बाद पहुंचे। सूरज अभी उगा था और किले की सरद हवाओं में सूरज की किरणों की गरमी एक सुखद अनुभव था। किले के चार बड़े दरवाजे पार कर अंदर घूमने लगे। धान के पुराने गोदाम के आगे एक दर्गा बना था और आगे कुछ कमरे थे जिसमें लोग रहा करते होंगे।
लक्ष्मी आंटी, "बाबू, आप को लगता है कि यहां लोग रहते थे?"
सन्नी, "हमारे घर अगर 300 साल बन्द रहें तो ऐसे ही दिखेंगे। जो चुराने लायक था वो अंग्रेज ले गए और जो बचा वो वक़्त खा गया।"
लक्ष्मी आंटी, "मैं आज इस किले की रानी हूं और आप दोनों मेरे सिपाही। याद है ना?"
हम दोनों ने अपने सर हिलाकर हां कहा।
लक्ष्मी आंटी, "मुझे भूक लगी है और आप दोनों अभी मेरे लिए इंतजाम करोगे।"
"लक्ष्मी आंटी! यहां पर कुछ खाने को नहीं मिलता। खाने को अब नीचे जाने के बाद मिलेगा। पानी पियोगी?"
लक्ष्मी आंटी ने मुंह फुलाकर कहा, "आप दोनों को तो कुछ समझ में नहीं आता।"
लक्ष्मी आंटी ने हमारे पीछे देखा और हमें खींच कर एक कमरे में ले गई। अंदर अंधेरा था और जमीन भी काफी मैली थी। लक्ष्मी आंटी ने हम दोनों को दरवाजे के बगल में खड़ा कर दिया और हमारे सामने घुटनों पर बैठ गई। लक्ष्मी आंटी ने अपनी उंगलियों से हमारे लौड़े पैंट के ऊपर से सहलाते हुए हमारी चैन खोली और हमारे लौड़े बाहर निकले। आगे क्या होगा यह जानकर हम दोनों चुप चाप खड़े हो गए।
लक्ष्मी आंटी ने अपनी उंगलियों को मुठ्ठी में मोड़ कर हमें हिलाने लगी और हम दोनों बड़ी मुश्किल से अपनी आहें दबाकर लक्ष्मी आंटी की मुठ मारने का मजा उठाने लगे। लक्ष्मी आंटी ने हमारे सुपाड़े को बारी बारी चूमकर उस गीला किया और उस पर आयी रस की पारदर्शी बूंद को चाट लिया। हम दोनों को उत्तेजना असेहनिय होने लगी थी कि लक्ष्मी आंटी अचानक उठकर बाहर भाग गई।
हम दोनों ने जैसे तैसे अपनी पैंट बन्द की और उसके पीछे भागने लगे। लक्ष्मी आंटी कुछ ही कदम दरवाजे के बाहर टिकिट बेचने वाले से टकराई थी और अब उसके पीछे छुप कर खड़ी थी। टिकट बेचने वाला हमारी ओर संदेह से देख रहा था।
"देखो साहब, यही है वो दो लोग जो मेरा पीछा कर रहे हैं। पकड़ो इन्हें!!", लक्ष्मी आंटी ने पीछे से कहा।
"लक्ष्मी आंटी! ये अच्छी बात नहीं! उस कमरे में हमें डराकर यहां हमारी शिकायत करना। चलो इन्हें सच बताओ!"
लक्ष्मी आंटी ने चिढ़ाते हुए कहा, "हां, मैंने आप दोनों को परेशान किया तो क्या? आप दोनों मेरा पीछा करते हुए बाहर आए हो!"
टिकट बेचने वाले आदमी ने सब को डांटते हुए कहा कि हमें यहां कोई बचकाने खेल नहीं करने चाहिए और संभलकर रहना चाहिए। हमने हां कहा तो एक बार और डांट कर वह वापस अपनी जगह पर चला गया।
लक्ष्मी आंटी, "मैंने कहा था कि मैं इंसान को पहचानती हूं। अगर हम मस्ती करते पकड़े नहीं जाते तो ये हमारे पीछे पीछे आता रहता। चलो अब हमें कोई तंग नहीं करेगा।"
कभी कभी लक्ष्मी आंटी से डर लगता है।
सन्नी
लक्ष्मी आंटी ने अपनी लंबी टांगों के लुभावने दर्शन करते हुए किले की रानी का पद जीता तो हम दोनों एक साथ पहुंचने के कारण राजा न बनते हुए सिपहसालार बने। किले के विशाल दरवाजे के अंदर एक छोटा सा नया कमरा बना था जहां से हमें टिकट लेनी पड़ी। रानी साहिबा ने बड़े शान से हम तीनों की टिकट खरीदी और हम अंदर गए।
लक्ष्मी आंटी ने हम दोनों के हाथों में अपने हाथ डाले और हम सब किला देखने लगे। लोहगड़ देखने का सही मौसम सर्दी या बरसात का होता है उसमें भी हम गुरुवार की सुबह वहां पहुंचे थे। पूरा किला मानो अतीत की स्मृतियां केवल हमारे लिए दिखा रहा था। सुबह होटल से नाश्ता करके निकले थे इसलिए हम सुबह 6 बजे लोहगढ़ के नीचे पहुंचे थे। उपर चढ ने में और 1 घंटा लगा तो हम सब किले में 7 के थोड़ी देर बाद पहुंचे। सूरज अभी उगा था और किले की सरद हवाओं में सूरज की किरणों की गरमी एक सुखद अनुभव था। किले के चार बड़े दरवाजे पार कर अंदर घूमने लगे। धान के पुराने गोदाम के आगे एक दर्गा बना था और आगे कुछ कमरे थे जिसमें लोग रहा करते होंगे।
लक्ष्मी आंटी, "बाबू, आप को लगता है कि यहां लोग रहते थे?"
सन्नी, "हमारे घर अगर 300 साल बन्द रहें तो ऐसे ही दिखेंगे। जो चुराने लायक था वो अंग्रेज ले गए और जो बचा वो वक़्त खा गया।"
लक्ष्मी आंटी, "मैं आज इस किले की रानी हूं और आप दोनों मेरे सिपाही। याद है ना?"
हम दोनों ने अपने सर हिलाकर हां कहा।
लक्ष्मी आंटी, "मुझे भूक लगी है और आप दोनों अभी मेरे लिए इंतजाम करोगे।"
"लक्ष्मी आंटी! यहां पर कुछ खाने को नहीं मिलता। खाने को अब नीचे जाने के बाद मिलेगा। पानी पियोगी?"
लक्ष्मी आंटी ने मुंह फुलाकर कहा, "आप दोनों को तो कुछ समझ में नहीं आता।"
लक्ष्मी आंटी ने हमारे पीछे देखा और हमें खींच कर एक कमरे में ले गई। अंदर अंधेरा था और जमीन भी काफी मैली थी। लक्ष्मी आंटी ने हम दोनों को दरवाजे के बगल में खड़ा कर दिया और हमारे सामने घुटनों पर बैठ गई। लक्ष्मी आंटी ने अपनी उंगलियों से हमारे लौड़े पैंट के ऊपर से सहलाते हुए हमारी चैन खोली और हमारे लौड़े बाहर निकले। आगे क्या होगा यह जानकर हम दोनों चुप चाप खड़े हो गए।
लक्ष्मी आंटी ने अपनी उंगलियों को मुठ्ठी में मोड़ कर हमें हिलाने लगी और हम दोनों बड़ी मुश्किल से अपनी आहें दबाकर लक्ष्मी आंटी की मुठ मारने का मजा उठाने लगे। लक्ष्मी आंटी ने हमारे सुपाड़े को बारी बारी चूमकर उस गीला किया और उस पर आयी रस की पारदर्शी बूंद को चाट लिया। हम दोनों को उत्तेजना असेहनिय होने लगी थी कि लक्ष्मी आंटी अचानक उठकर बाहर भाग गई।
हम दोनों ने जैसे तैसे अपनी पैंट बन्द की और उसके पीछे भागने लगे। लक्ष्मी आंटी कुछ ही कदम दरवाजे के बाहर टिकिट बेचने वाले से टकराई थी और अब उसके पीछे छुप कर खड़ी थी। टिकट बेचने वाला हमारी ओर संदेह से देख रहा था।
"देखो साहब, यही है वो दो लोग जो मेरा पीछा कर रहे हैं। पकड़ो इन्हें!!", लक्ष्मी आंटी ने पीछे से कहा।
"लक्ष्मी आंटी! ये अच्छी बात नहीं! उस कमरे में हमें डराकर यहां हमारी शिकायत करना। चलो इन्हें सच बताओ!"
लक्ष्मी आंटी ने चिढ़ाते हुए कहा, "हां, मैंने आप दोनों को परेशान किया तो क्या? आप दोनों मेरा पीछा करते हुए बाहर आए हो!"
टिकट बेचने वाले आदमी ने सब को डांटते हुए कहा कि हमें यहां कोई बचकाने खेल नहीं करने चाहिए और संभलकर रहना चाहिए। हमने हां कहा तो एक बार और डांट कर वह वापस अपनी जगह पर चला गया।
लक्ष्मी आंटी, "मैंने कहा था कि मैं इंसान को पहचानती हूं। अगर हम मस्ती करते पकड़े नहीं जाते तो ये हमारे पीछे पीछे आता रहता। चलो अब हमें कोई तंग नहीं करेगा।"
कभी कभी लक्ष्मी आंटी से डर लगता है।