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रूबी- हाँ शायद।
राम- तो दोस्ती में तो मालेकिन या बीवीजी नहीं बुला सकते ना आपको।
रूबी- तो क्या बुलाओगे?
रामू- रूबी जी।
रूबी मुश्कुराते हुए- “ठीक है पर किसी के सामने नहीं। वरना परेशानी खड़ी हो सकती है.."
राम- हम समझते हैं बीवीजी।
दोनों ऐसी ही नार्मल बातें करते रहे। तभी दीवार की घड़ी की आवाज आई और रूबी ने देखा की रात के 12:00 बज गये हैं। बातों-बातों में पता ही नहीं चला की इतना टाइम भी हो गया है।
इधर राम धीरे-धीरे अपने मकसद की ओर बढ़ने लगा और रूबी से उसकी पर्सनल बातें करने लगा। उधर रूबी सोचती है की रामू खुद ही आगे बढ़ रहा है धीरे-धीरे। वो भी तो यही चाहती थी की रामू खुद ही आगे बढ़े।
रामू- बीवी जी ओहह... माफ करना रूबी जी एक बात पुडूं?
रूबी- हाँ।
राम- आपको अपने पति की याद नहीं आती क्या?
रूबी- क्यों पूछ रहे हो?
राम- वैसे ही। नहीं बताना तो आपकी मर्जी पर नाराज मत होना।
रूबी- नहीं होती नाराज बाबा। आती है याद।
रामू- तो आप क्या करते हो?
रूबी- क्या करते हो मतलब?
राम- मेरा मतलब आपका दिल नहीं करता की आपके साथ हों आपके पति।
रूबी- करता तो है, पर क्या कर सकते हैं?
रामू- एक बात बोलूँ?
रूबी- बोलो।
राम- आप बुरा मन जाओगे। रहने दो।
रूबी- नहीं मानती राम्। बताओ क्या बोलना है?
रामू- नहीं हमें डर है आप कहीं हमारी दोस्ती ना तोड़ दो।
रूबी- नहीं तोड़ती, पूछ लो।
राम- मेरी कसम खाकर बोलो आप नाराज नहीं होंगे और दोस्ती नहीं तोड़ोगे।
रूबी को राम की कसम खाने की बात अपनी शर्म का पर्दा हटाने पे मजबूर कर रही थी, पता नहीं क्या बोलना
था उसने। लेकिन कहा- "नहीं नाराज होती मैं..."
रामू- मेरी कसम खाओ पहले की आप दोस्ती नहीं तोड़ोगे और गुस्सा नहीं करोगे।
रूबी हार मानते हुए- "ठीक है तुम्हारी कसम... ।
रामू- “क्या हम दोनों एक हो सकते हैं?" और रामू ने सीधा ही पूछ लिया था।
रूबी कुछ नहीं बोलती और चुप रहती है।
राम- तो दोस्ती में तो मालेकिन या बीवीजी नहीं बुला सकते ना आपको।
रूबी- तो क्या बुलाओगे?
रामू- रूबी जी।
रूबी मुश्कुराते हुए- “ठीक है पर किसी के सामने नहीं। वरना परेशानी खड़ी हो सकती है.."
राम- हम समझते हैं बीवीजी।
दोनों ऐसी ही नार्मल बातें करते रहे। तभी दीवार की घड़ी की आवाज आई और रूबी ने देखा की रात के 12:00 बज गये हैं। बातों-बातों में पता ही नहीं चला की इतना टाइम भी हो गया है।
इधर राम धीरे-धीरे अपने मकसद की ओर बढ़ने लगा और रूबी से उसकी पर्सनल बातें करने लगा। उधर रूबी सोचती है की रामू खुद ही आगे बढ़ रहा है धीरे-धीरे। वो भी तो यही चाहती थी की रामू खुद ही आगे बढ़े।
रामू- बीवी जी ओहह... माफ करना रूबी जी एक बात पुडूं?
रूबी- हाँ।
राम- आपको अपने पति की याद नहीं आती क्या?
रूबी- क्यों पूछ रहे हो?
राम- वैसे ही। नहीं बताना तो आपकी मर्जी पर नाराज मत होना।
रूबी- नहीं होती नाराज बाबा। आती है याद।
रामू- तो आप क्या करते हो?
रूबी- क्या करते हो मतलब?
राम- मेरा मतलब आपका दिल नहीं करता की आपके साथ हों आपके पति।
रूबी- करता तो है, पर क्या कर सकते हैं?
रामू- एक बात बोलूँ?
रूबी- बोलो।
राम- आप बुरा मन जाओगे। रहने दो।
रूबी- नहीं मानती राम्। बताओ क्या बोलना है?
रामू- नहीं हमें डर है आप कहीं हमारी दोस्ती ना तोड़ दो।
रूबी- नहीं तोड़ती, पूछ लो।
राम- मेरी कसम खाकर बोलो आप नाराज नहीं होंगे और दोस्ती नहीं तोड़ोगे।
रूबी को राम की कसम खाने की बात अपनी शर्म का पर्दा हटाने पे मजबूर कर रही थी, पता नहीं क्या बोलना
था उसने। लेकिन कहा- "नहीं नाराज होती मैं..."
रामू- मेरी कसम खाओ पहले की आप दोस्ती नहीं तोड़ोगे और गुस्सा नहीं करोगे।
रूबी हार मानते हुए- "ठीक है तुम्हारी कसम... ।
रामू- “क्या हम दोनों एक हो सकते हैं?" और रामू ने सीधा ही पूछ लिया था।
रूबी कुछ नहीं बोलती और चुप रहती है।