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Adultery गुज़ारिश पार्ट 2

पर मैं ये भूल गया था की अभी मेरी हालत ठीक नहीं है , ये तो शुक्र है की ताई ने वक्त पर थाम लिया मुझे वर्ना और चोट लग जानी थी .

“क्या कर रहा है तू, ” ताई ने मुझे डांटा और वापिस बेड पर ला पटका. ताई के तानो से ज्यादा मेरा ध्यान उस आदमी पर था , वो भागा क्यों. रात भर मैं ये ही सोचता रहा .

सुबह नर्स पट्टी बदलने आई तो मुझे मालूम हुआ की सर पर बारह टाँके आये थे और पसलियों को बहुत जायदा नुक्सान हुआ था , जिसकी भरपाई ना जाने कब तक होगी, होगी या नहीं होगी. मैं रीना का इंतज़ार करता रहा पर वो आई नहीं, शाम होने को आई थी , मीता भी नहीं आई. कुछ दिन ऐसे ही बीते , हालत में थोडा सुधार महसूस होने लगा था . इस बीच मैंने नोटिस किया की चाची मुझे देखने नहीं आई थी , सिर्फ ताई ही थी जो दिन रात मेरे पास रहती थी . मैं रीना के बारे में पूछता पर वो ये ही कहती की वो ठीक है , जल्दी ही आयेगी.

मैं बस बरसते सावन को देखता रहता था, मैंने सोचा तो था की इस बार का सावन अनोखा होगा, जिसमे मोहब्बत की बारिश होगी और भेगेंगे मैं और रीना . बेशक मेरी हालत ठीक नहीं थी पर अब मुझे कोफ़्त होने लगी थी इस हॉस्पिटल के कमरे से . और एक ऐसी ही रात, मैंने पाया की ताई गहरी नींद में पड़ी थी, पास की कुर्सी पर चाचा ऊंघ रहा था. मैं हौले से उठा और दोनों को चेक किया. मैंने टेबल से चाचा की गाड़ी की चाबी उठाई और धीरे धीरे कमरे से बाहर खिसक गया. भोर का समय नजदीक था पर बारिश घनघोर थी .

कमजोर कदमो से चलते हुए मैं खुद को बारिश से बचाते हुए मैं चाचा की गाड़ी तक आया और उसे उड़ा ले चला. मैं बस उस चेहरे का दीदार करना चाहता था जिसके बिना मैं कुछ नहीं था . भोर की पहली किरण और चमकती बरसात अपने आप में गजब ढा रही थी . मैंने गाड़ी रोकी , और सर पर हाथ रखते हुए , मनदिर की सीढिया चढ़ने लगा.

बाबा के आगे दिया जलाये , शांत बैठी थी वो. इतनी शांत की दिल किया ये वक्त थम जाये उसके और मेरे लिए. अम्रता प्रीतम ने कहा था की उसे देखा ऐसा जैसे कोई मजदुर के हाथ में उसकी रोज़ी रख दे. मेरा हाल भी कुछ वैसा ही था .

“कैसी है ,मेरी सरकार ” मैंने हौले से उसे पुकारा.

आहिस्ता से उसने अपनी आँखे खोली. नजरो से नजरे मिली. उसकी आँखों से जो आंसू टपके वो धरती पर नहीं सीधा मेरे कलेजे पर आकर गिरे.

“आ गया मैं ” मैंने उस से कहा.

वो मरजानी कुछ नहीं बोली, बस आकार चुपचाप मेरे सीने से लग गई. मेरे माथे पर चुम्बन अंकित किया उसने.

“बस कर, ये आंसू बड़े कीमती है इन्हें मुझ जैसे के लिए बर्बाद मत कर.” मैंने उस से कहा.

रीना- मेरा सब कुछ तुझसे है . तेरे बिना ये दिन कैसे बीते है मुझ पर मैं जानती हूँ या मेरा रब जानता है.

मैं- और मेरा क्या, कितना इंतज़ार किया था तेरा मैंने .

रीना- संध्या मामी ने मना किया था हॉस्पिटल आने को, बोली की तुझे उस हालत में देख नहीं पाउंगी. और मेरे दिल पर भी बोझ था

मैं-कैसा बोझ

रीना- सब मेरी गलती है , मैं वहां नहीं जाती तो ये सब होता ही नहीं

मैं- तेरी कोई गलती नहीं थी उसमे, तू मेरा मान है , मेरे होते किसकी मजाल जो आँख भी उठा सके मेरी सरकार की तरफ

रीना- तुझे कुछ हो जाता तो.

मैं- कुछ हुआ तो नहीं न . थोड़ी बहुत चोट है देर सबेर ठीक हो ही जानी है . और अब से तू अकेले कहीं नहीं आयेगी-जाएगी तेरी सुरक्षा की व्यवस्था मैं जल्दी ही करूँगा.

रीना- उस दिन के बाद से हमेशा कोई न कोई होता है मेरे साथ .

मैं- पर अभी तू अकेली ही थी न यहाँ पर

रीना- अभी नहीं हूँ अकेली.

मैंने देखा दिन निकल आया था बारिश थोड़ी मंद पड़ने लगी थी . मैंने रीना को साथ लिया और घर आ गए. चाची ने मुझे देखा और खूब गुस्सा किया, उसके अनुसार मुझे हॉस्पिटल से ऐसे ही नहीं आना चाहिए था . मैं सुनता रहा उसकी .

“चाची तुमने कभी बताया नहीं तुम दद्दा ठाकुर की बेटी हो ” मैंने कहा

चाची- हर कोई किसी न किसी की बेटी होती ही हैं ये कोई विशेष बात नहीं

मैं- मुझे तुमसे कुछ बात करनी है

चाची ने एक नजर रीना की तरफ डाली और बोली- अभी नहीं , तुम लोग बैठो, मैं मिलती हूँ बाद में .

उसका यूँ जाना मुझे ठीक नहीं लगा. मैं बिस्तर पर लेट गया . रीना मेरे पास बैठ गयी .

मैं- बोल कुछ ऐसे खामोश क्यों है.

रीना- आजकल ख़ामोशी से दोस्ती सी हो गई है मेरी .

मैं- कहा न तुझसे, उस बात का मलाल मत रख , तुझसे किसी ने कुछ कहा क्या

रीना- नहीं, पर लोगो की नजरे सवाल करती है मुझ से

मैं- लोगो को मैं देख लूँगा.

रीना- मुझे बस तुम्हारी फ़िक्र है .

मैं- और मुझे तेरी . प्यास सी लगी है थोडा पानी पिला जरा

रीना उठी और झुक कर मटके से पानी भरने लगी तभी मेरी नजर उसके गले पर पड़ी, और मैं हैरान रह गया . उसके गले में वो ही हीरे वाला थागा था . हीरे का रंग उसके गेहुंगे रंग में जैसे घुल सा गया था . लाल-काले डोरे में गूंथा हुआ हीरा रीना के गले में बड़ा प्यारा लग रहा था.

“पानी ” उसने कहा .

मैंने उसके हाथ से गिलास लिया और घूँट भरे.

रीना- ऐसे क्या देख रहा है .

मैं- ये डोरा अच्छा लग रहा है तुझ पर

रीना- तेरी निशानी, उस दिन बेहोश होने से पहले तूने ही तो इसे मेरे हाथ पर रखा था . रुक अभी उतार कर देती हूँ तुझे

मैं- नहीं रे, पहने रख जंच रहा है तुझ पर .

तभी रीना को किसी ने बाहर से आवाज दी और वो चली गयी . पर मेरे लिए सवाल छोड़ गयी. जिस डोरे को मैं नहीं पहन पाया. उसे बड़ी आसानी से अपने गले में सजा रखा था रीना ने, मेरी आँखों के सामने उस कागज़ पर लिखे शब्द घूम रहे थे जिस पर लिखा था , इसका बोझ उठाना बड़ा मुश्किल है .

पर जो मेरे लिए मुश्किल था वो रीना के लिए आसान कैसे . सोचते सोचते कुछ देर के लिए मेरी आँखे बंद हो गयी.
 
आँख खुली तो दोपहर बाद का समय था ,मैं कमरे से बाहर आया तो देखा की ताई और चाचा भी आ चुके थे , पर उन्होंने मुझे कुछ भी नहीं बोला. शायद चाची ने उन्हें मना किया हो. पर मुझे चैन नहीं था , उस हीरे की गुत्थी ने मुझे जैसे पागल कर दिया था चाची ने मेरी बात को पकड़ लिया और पूछा- क्या परेशानी है तुम्हे

मैं- तुमसे बात करनी है

चाची- मेरे पास तुम्हारे सावालो के जवाब नहीं है

मैं- तो ठीक है फिर, मैं अपने जवाब तलाश कर ही लूँगा.

चाची- ये तेरी जिद है न , तुझे ले डूबेगी एक दिन

मैं- क्या फर्क पड़ता है .तुम दद्दा ठाकुर की बेटी हो तुम छिपा सकती हो , तो मैं भी अपनी जिद संग रह लूँगा

चाची- पुरे गाँव को मालूम है मैं दद्दा ठाकुर की बेटी हूँ अब तुझे ही नहीं मालूम तो मेरा दोष नहीं. और अब ये बीती बात हुई मुझे रुद्रपुर छोड़े एक जमाना हुआ.

मैं- क्यों छोड़ा आपने रुद्रपुर

चाची- कभी कभी मुझे लगता है सारे चूतिये मेरी ही तक़दीर में है, मेरी शादी हुई थी तेरे चाचा से तो रुद्रपुर छोड़ना ही था मुझे .

मैं- मेरी दिलचस्पी उस राज में है की आखिर क्या वो बात थी जिसके कारन मेरे पिता ने वो काण्ड किया.

चाची- तेरी क्या मज़बूरी थी जो तूने जोरावर को मारा, हर दिन कोई न कोई लड़की कहीं न कहीं तो छिड ही रही होती है न. हर कोई जिसे भी मौका मिलता है वो औरत को मसलने के लिए तैयार ही होता है न . इसमें कोई नयी बात नहीं है . और मेरी एक बात को अच्छे से समझ ले कुछ चीजे बस हो जाती है , उन पर किसी का जोर नहीं होता. और गड़े मुर्दे उखाड़ने से कुछ नहीं मिलता सिवाय सड़ांध के

मैं- तुम मेरे पिता के बारे में कुछ जानती थी न

चाची- सारी दुनिया जानती थी जेठ जी के बारे में

मैं- क्या उन्होंने तुमसे ऐसा कुछ कहा था जो तुम्हे ठीक नहीं लगा हो

चाची- हां,

मैं- क्या बताओ मुझे

चाची- यही की मेरा लड़का बड़ा होकर चुतिया बनेगा , तुम्हे इसका चुतियापा ठीक करना है .

मैंने गुस्से से घूरा चाची को .

चाची- और क्या कहूँ फिर , मान ले तुझे अगर मालूम भी हो गया की जेठ जी ने उन लोगो की हत्या क्यों की थी तो तू क्या कर लेगा, क्या तू उन परिवारों के दुखो पर मरहम लगा पायेगा. नहीं, न . बल्कि तूने तो और गहरी खाई खोद दी.

मैं- जोरावर ने रीना पर हाथ डाला था .

चाची- तो क्या दुनिया में एक ही रीना है , और किसी की बहन -बेटी भी रीना जैसी ही होंगी न उनके लिए. क्या मालूम जेठ जी ने भी रुद्रपुर में कोई ओछी हरकत की हो.

मैं- ये नहीं हो सकता

चाची- क्यों नहीं हो सकता, दुनिया भर के मर्दों के पायजामे की गांठे बड़ी कच्ची होती है , तराजू को बराबरी पर लाकर देख दुनिया को . ये दुनिया वैसी नहीं जैसी हम सोचते है .

मैं- मेरे पिता ऐसे नहीं हो सकते

चाची- क्यों नहीं हो सकते,

मैं- क्योंकि मैं कह रहा हूँ

चाची- और कौन है तू. मुझे हैरानी होती है किस घमंड में जी रहा है तू, तेरी खाल उतार लेनी थी दद्दा ठाकुर ने, अगर मैं वहां नहीं पहुँचती तो . बित्ते भर का छोकरा गाँव से पंगा लेगा. अरे देख खुद को , क्या औकात है तेरी , जब देखो अर्जुन का बेटा अर्जुन का बेटा. कोई महानता की बात नहीं है ये, वैसे भी लोग जो अपने बाप का नाम साथ लेकर जीते है कुछ खास कर नहीं पाते जिन्दगी में, तेरे चाचा को ही देख ले. तू मनीष है, मनीष बन कर जी .

चाची की बाते मुझे बड़ी गहरी चोट पहुंचा रही थी .

चाची- मैं तेरी दुश्मन नहीं हूँ, तू चाहे जो भी सोच मेरे बारे में, तुझे कठोरता से पालना मेरी जरुरत थी ताकि तू एक मजबूत इन्सान बने, तू हर उस चीज़ का मोल समझे जो तेरे पास है . बेशक तुझे जनम नहीं दिया पर मेरा खुदा जानता है मेरी ममता की असलियत, इसलिए तुझे बार बार कहती हूँ की गड़े मुर्दे मत उखाड़, आने वाले कल के उजाले को देख.

चाची ने अपना स्टैंड क्लियर कर दिया था . पर मेरे दिमाग में कुछ और ही चल रहा था . न जाने क्यों मेरा मन कह रहा था की चाची पर विशवास करना गलती होगी. ऐसे ही उधेड़बुन में थोडा वक्त और बीता, हर शाम, दोपहर मैं रीना के साथ होता. मेरी हालत में भी काफी सुधार था ज़ख्म भरने लगे थे बस पसलियों को छोड़कर.

इस बीच मीता एक बार भी नहीं आई थी मुझसे मिलने. या शायद उसने घर पर आना उचित नहीं समझा था . पर ऐसी ही तो थी वो अपनी मर्ज़ी की मालिक. हवा के झोंके सी . मैं बार बार रीना के गले में झूलते उस हीरे को देखता , जैसे वो मुझे चिढ़ा रहा हो. इस बीच मुझे उस जमीन का ध्यान आया जिस पर मैं फसल उगाना चाहता था . यही सोच कर मैं उस दोपहर को जमीन की तरफ निकल गया .

बारिस के कारण कीचड फैला हुआ था .गाड़ी से उतरने के बाद मैं आराम से चलते हुए जमीन पर पहुंचा, देखा की वहां पर एक कमरा और बनवा दिया गया था , शायद ये ताई का काम था . ठंडी हवा चल रही थी जिस से गीली मिटटी की खुशबु दूर दूर तक फैली हुई थी . मेरा दिल तो कर रहा था की अभी के अभी रुद्रपुर जाकर मीता से मिल लू. पर फिलहाल इस ख्याल को टाल देना ही ठीक था.घूमते घूमते मैं बावड़ी पर गया . जो पानी से लबालब भरी थी .
 
मैंने कपडे उतारे और बावड़ी में घुस गया. इतना शीतल अहसास मुझे बरसो बाद ही मिला हो शायद. मैंने दूर झाड़ियो के बीच से मीता को आते हुए देखा.हमेशा के जैसे बगल में झोला टाँके. उसने भी मुझे देख लिया था , चाल में आई तेजी ने बता दिया था मुझे. कुछ ही देर में वो बावड़ी पर थी.

मैं- कितने दिन हुए , तू आई नहीं मिलने.

मीता- अभी आई तो सही.

मैं- घर पर आ सकती थी न

मीता- वैसे ही नहीं आई

मैं- किसी ने कुछ कहा क्या तुझसे

मीता- नहीं तो , ऐसी बात होती तो मै यहाँ रोज थोड़ी न आती .

मैं- रोज़

मीता- यहाँ आकर ऐसा लगता है की जैसे तुझसे मिल लिया हो.थोड़ी बाते तेरी ताई से कर जाती हूँ . जी लगा रहता है.

मैं- कम से कम ताई ही बता देती मुझे.

मीता- मैंने ही मना किया था क्योंकि फिर तू रोज़ यहाँ आने की जिद करता, मैं चाहती थी की पहले तू ठीक हो जाये.

मैं- इतनी फ़िक्र किसलिए

मीता- दोस्ती की है, निभानी तो पड़ेगी न. और तू भी निकल पानी से , जखम अभी भरे नहीं है और हरकते देखो

मैं- तू भी आजा पानी में , पानी में आग लग जाएगी

मीता- कहीं और न लग जाए आग.

मैं- आजा न

मीता- फिर कभी , चाय बनाती हु आजा तब तक.

जब तक मैं पहुंचा मीता ने चूल्हा सिलगा लिया था . मैंने चारपाई बाहर निकाल ली

मैं- तू कहे तो इधर तार बंदी करवा दू.

मीता- खेत-खलिहान खुले ही ठीक लगते है , और फिर हमें भला किसका डर

मैं- बस सुरक्षा के लिए

मीता- जो होना है वो होकर ही रहेगा, नसीब में लिखे को कौन टाल सकता है , और फिर तू साथ है तो कोई फ़िक्र कैसे हो सकती है.

मैं- सो तो है

उसने चाय दी मुझे और बगल में आकर बैठ गयी.उसके बदन की खुशबु मुझे अच्छी लग रही थी .

मैं- मुझे लगता है की संध्या चाची कुछ न कुछ छिपा रही है मुझसे

मीता- क्या भला

मैंने मीता को अपने मन की बात बताई.

मीता- ठीक ही तो कहती है, गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा.

मैं- मीता मुझे तेरी मदद चाहिए. मैं जानता हूँ की तुझे खाली सितारे पढने ही नहीं आते, बल्कि और कुछ भी आता है . मेरी एक मुश्किल आसान कर दे

मीता- क्या

मैं- ऐसा क्या बोझ हो जिसे हम अंगूठी, चेन , पायजेब आदि में रख सके.

मीता- क्या बोला तू

मैंने अपने शब्द फिर से दोहराए.

मीता- बात समझ नही आई पर तूने कही है तो गहरी ही होगी.

मैं- क्या संध्या चाची की वजह से हमारे परिवारों में दुश्मनी हुई थी

मीता- नहीं रे, बल्कि शादी तो बड़ी धूमधाम से हुई थी ऐसा सुना मैंने .पर एक बात और सुनी थी मैंने

मैं- क्या. ..................................
 
“क्या सुना था तूने ” मैंने कहा

मीता- यही की संध्या इस शादी से खुश नहीं थी , शादी के बाद फिर कभी वो रुद्रपुर नहीं गई .

मेरे मन में वो ख्याल आया जब चाची चाचा से कह रही थी की तुमसे होता ही नहीं, शायद इसी बात से वो खुश नहीं थी

मीता- कहाँ खो गए.

मैं- कोई तो डोर है जिससे ये सब लोग बंधे है बस वो डोर मुझे दिखाई नहीं दे रही .

मीता- लगता है मेह फिर आएगा. मुझे चलना चाहिए, इस बार सावन बड़ा तेज बरस रहा है

मैं- ऐसे कैसे जाएगी. एक बारिश भी तेरे साथ देखि नही मैंने. ठहर जरा, बरसने दे इस घटा को .

मीता- तू ऐसा कैसे है

मैं- ऐसा कैसे

मीता- मतलब इतना सरल कैसे हो सकता है कोई

मैं- छोड़ न तू भी क्या, ये बता रुद्रपुर में क्या चल रहा है

मीता- शांत है , सन्नाटा पसरा है फिज़ाओ में और यही सन्नाटा सच कहूँ तो खाए जा रहा है , जैसे कह रहा हो की कोई तूफ़ान आने को है .

मैं- जानता हूँ , जो हुआ नहीं होना चाहिए था

मीता- उस लड़की को इतना चाहता है न तू

मैं - नहीं रे, बस दोस्त है वो मेरी बचपन से, जब कोई नहीं था मेरे साथ वो थी .

मीता- मुझसे झूठ बोल सकता है तू खुद से नहीं , इतना जूनून , कोई इस हद तक आ जाये की अपनी सांसो की परवाह भी नहीं करे, ये तो प्यारे बस इश्क में ही हो सकता है .

मैं- तूने ही तो कहा था मेरे हाथ की लकीरों में कुछ नहीं सिवाय बर्बादी के तो फिर मोहब्बत कैसे होगी.

मीता- मोहब्बत अपना रस्ता खुद तय कर लेती है . नियति ने तेरी तक़दीर में सुख का पन्ना भी लिखा होगा.

मैं- नियति ने मुझे तुझसे भी तो मिलाया है न

मीता- तेरे मेरे रिश्ते में एक शर्त है दोस्ती की . हमने एक रेखा खींची है

मैं- नियति अगर उस रेखा को नहीं माने तो

मीता- मुझे पाना ऐसा है जैसे की एक मुट्ठी रेत को हथेली पर रख कर फूंक मार देना. और अगर तेरी बात मान भी लू तो एक दिन आयेगा जब तुझे चुनाव करना होगा. तब क्या करेगा तू. मुझे तेरे और उस लड़की के रिश्ते से कोई परेशानी नहीं है क्योंकि तुझ पर पहला हक़ उसका है . और मैं बंधी हूँ अपनी हदों के दायरे में . पर मैं तुझसे इतना कहूँगी की आशिकी इम्तेहान लेती है , नंगे पैर तलवार पर चलने जैसा होता है मोहब्बत करना , पाँव के घाव सह सके तो करना मोहब्बत.

मैंने मीता का हाथ अपने हाथ में लिया और बोला- सब कुछ रब्ब के हाथ में छोड़ दिया है, उसके हाथ में डोरी है .

मीता- अब जाने दे मुझे .

मैं- मुझे शिवाले की कहानी जाननी है

मीता- तुझे पता है

मैं- तू बता

मीता- मुझे बस इतना पता है की शिवाले का मतलब मंदिर नहीं होता, शिवाले का मतलब होता है वो भूमि जहाँ शिव का धुना होता है ,

मीता ने बड़ी गहरी बात कही थी जिसे समझने में कुछ थोड़ी देर लगी.

मैं- इसका मतलब ,

मीता- हाँ उसका वही मतलब है . अब जाती हूँ मैं

मैं- चलता हूँ थोड़ी दूर तेरे संग

मीता- नहीं बिलकुल नहीं

मैं- बस थोडा सा दूर

मीता-ये जिद किस काम की

मैं उठ खड़ा हुआ और हम दोनों हौले हौले जमीन को पार करते हुए रुद्रपुर की तरफ चल दिए. उसकी पायजेब की झंकार, दूर कही कूकती कोयल की आवाज को ताल दे रही थी . माथे पर पड़ती हलकी बूंदे उसके सांवले चेहरे पर गजब लग रही थी .

“ऐसे क्या देख रहा है ” पूछा उसने

मैं- बस तुम्हे

मीता- इतनी भी सुन्दर नहीं मैं

मैं- मेरी नजर से देख कभी खुद को

मीता ने अपनी उंगलिया मेरी उंगलियों से अलग की और बोली- बस , यहाँ से आगे मैं अकेले जाउंगी.मैंने उसका हाथ छोड़ दिया. शाम को मैं गाँव में आया तो मालूम हुआ की सुनार वापिस गाँव में लौट आया है .बेशक मेरा उस से छत्तीस का आंकड़ा था पर , ये मेरी गरज थी तो मैं उसके घर चला गया उस से मिलने के लिए.

लाला की हालत कोई खास बढ़िया नहीं थी , उसका एक साइड का शरीर जैसे सूख गया था .मुझे देख कर उसकी आँखों में नफरत आ गयी पर वो कुछ नहीं बोला.

मैं- कैसे हो लाला , तबियत कैसी है तुम्हारी

लाला चुप रहा .

मैं- अब बोल भी दे लाला.क्या मालूम कब जिन्दगी की शाम हो जाये, आत्मा पर इतना बोझ लेकर तू कैसे जायेगा. वैसे भी मैंने हमला करवाया नहीं था तुझ पर.

लाला- तेरी औकात भी नहीं इतनी

मैं- जे बात लाला. देख, माना की अपनी दुश्मनी है पर हजार नालायक दोस्तों से एक सच्चा दुश्मन भला होता है , हैं न, तो हम आपस में सौदा कर सकते है

लाला- कैसा सौदा

मैं- मेरे कुछ सवाल है उनका जवाब दे, बदले मैं तुझे थोडा सोना दूंगा

लाला- क्या सवाल है तेरे

मैं- उस बक्से में ऐसा क्या था जिसकी हिफाजत तूने सोलह साल तक की.

लाला- तूने खोल कर देख तो लिया ही होगा न

मैं- उस धागे में ऐसी क्या खास बात है लाला

लाला- तू जा यहाँ से

मैं- मुझे बता दे लाला. तू कहे तो मैं अभी के अभी सारा सोना तुझे लाकर देता हूँ

लाला- माँ चुदाने गया सोना, भोसड़ी के तू अभी के अभी निकल जा यहाँ से और दुबारा दिखना मत मुझे. वर्ना तेरा ऐसा हाल करूँगा की तूने सोचा नहीं होगा.

मैं- लोडू लाला मेरे सब्र का इम्तिहान मत ले,मैं क्या कर सकता हूँ इसकी खबर तुझे हो तो गयी ही होगी .

कुछ तो ऐसा राज था लाला के सीने में दफ़न जो लाला मरने को तैयार था पर बताने को नहीं. मैं घर आया तो देखा की चाची अकेली थी घर पर.

“कुछ बना दू तुम्हारे लिए ” उसने पूछा मेरे से

मुझे थोडा अजीब सा लगा फिर मैंने मना किया. और चोबारे में चला गया कुछ देर बाद चाची भी वहां पर आ गयी .

“अबकी बार झड़ी अच्छी लगी है , पानी रुक ही नहीं रहा है ” उसने कहा

मैं- हाँ, ऐसा सावन मैंने देखा नहीं कभी पहले. मैं कुछ दिनों के लिए कही बाहर जाना चाहता हूँ

चाची- कहाँ

मैं- वो सोचा नहीं है पर यहाँ से दूर

चाची- अब क्या खुराफात आई मन में

मैं- इसमें क्या खुराफात होगी भला.

चाची- जैसे मैं तो जानती ही नहीं न तुझे,

मैं- काश तुम मुझे जान पाती.

चाची ने एक गहरी साँस ली और खिड़की के पार देखने लगी. उसकी पीठ मेरी तरफ थी, ब्लाउज से झांकती पीठ पर जो निशान था उसने मेरा ध्यान खींचा.

“ये तुम्हारी पीठ पर कैसा निशान है चाची ” मैंने कहा

“दर्द का रुसवाई का ” अचानक से उसके मुह से निकल गया .
 
“कैसा दर्द , कैसी रुसवाई चाची ” मैंने कहा

चाची ने मुड कर मुझे देखा और बोली- कुछ चीजो पर जमी धुल को हटाना नहीं चाहिए, हम सबकी जिन्दगी में कुछ पल ऐसे होते है जो निजी होते है , हमें उन लम्हों की कद्र करनी चाहिए. मैं तेरी सोच पर पहरा नहीं लगा सकती तू चाहे जो सोच सकता है मेरे और जेठ जी के बारे में और मुझे फर्क भी नहीं पड़ेगा. पर कुछ रिश्ते बस होते है उनका कोई नाम नहीं होता जैसे की तेरा और रीना का . दुनिया चाहे कुछ भी कहेगी पर तुम दोनों एक दुसरे के लिए जो हो वो हमेशा रहोगे.

मैं- अगर आप पिताजी से प्रेम करती थी तो फिर चाचा से शादी क्यों की

चाची- उफ़ तेरे ख्याल भी तेरे जैसे न लायक ही है. पर तेरे ख्याल अगर ऐसे है तो तू लाख कोशिश कर ले अर्जुन को कभी समझ नहीं पायेगा. वो एक दिया थे उन्हें समझने के लिए तुझे बाती बनना होगा.

मैं- इन निशानों के बारे में बता सकती हो तुम मुझे

चाची- ये घाव मुझे लगाव भी है इनसे और नाराजगी भी है इनसे.

मैं- तुम चाचा केसाथ खुश नहीं हो, मैंने सुना था आप दोनों की बातचीत

चाची- वो मेरा और उसका मसला है , तुम्हे जानने की जरुरत नहीं . ख़ुशी गमी बस हमारे नजरिये की बात है . खैर बाते बहुत हुई मुझे और भी काम है .

चाची मुझे छोड़ कर चली गयी . मैं खिड़की के पास खड़ा रहा . पर इतना तो मुझे मालूम हो ही गया की ताई और चाची गहरी जुडी थी मेरे पिता से. पर क्या राज़ थे इनके , क्या मेरे पिता का सम्बन्ध भी चुदाई वाला था इनसे, क्या ताई मुझसे इसलिए चुद गयी की वो मुझमे मेरे पिता का अक्स देखती हो. पर दोनों ने ही इस बात को नकारा था . अब मुझे बस ये ही मालूम करना था किसी भी हाल में.

मैं फिर ताई के घर चला गया तो देखा की ताऊ आज घर आया हुआ था. मैं उसके पास ही बैठ गया बाते करने लगा.

मैं- ताऊ मुझे तुमसे कुछ बात करनी है

ताऊ- हां

मैं-ताऊ, मुझे नहीं मालूम की ये सही समय है या नहीं पर मैं ये जानना चाहता हूँ की ऐसी कौन सी बात है जिसकी वजह से तुम ताई को हमेशा गाली बकते हो .

ताऊ- छोड़ न क्या उस का जिक्र करता है

मैं- ताऊ, आज तुम्हे बताना ही होगा.

ताऊ- उस कुलटा से ही जाकर पूछ लेना तू.

मैं- कहते की एक न एक दिन ऐसा आता है जब आदमी ओ अपने दिल के बोझ को हल्का कर लेना चाहिए, मैं तेरा बेटा हु . मेरे सामने अपना दिल खोल सकता है तू

ताऊ- मेरे दिल में कुछ नहीं

मैं- फिर भी

ताऊ- सुनना चाहता है तो सुन, ये हरामजादी ऐसी नागिन है जो किसी को भी डस जाये. ये किसी की नहीं हो सकती, अब मैं तुझसे क्या कहूँ पर इतना समझ ले घर बसाने लायक नहीं है ये.

मैं- इस बात का कोई सबूत है तुम्हारे पास या फिर किसी ने कान भरे है तुम्हारे.

ताऊ- मुझे सबूत की क्या जरुरत , मैंने तो खुद उसे ..........

ताऊ ने बात अधूरी छोड़ दी.

मैं- उसे क्या ताऊ

ताऊ- कुछ नहीं, कुछ नहीं तू जा बाहर खेल . मुझे वापिस शहर जाना है

मैं- ताऊ क्या तुमने ताई को मेरे पिता के साथ देखा था .

ताउ- मैंने कहा न तू जा यहां से

मैं- मुझे समझ आ गया वो मेरे पिता के साथ ही थी .

ताऊ- मैंने कहा न चला जा यहाँ से . अभी तू इतना बड़ा नहीं हुआ है जितना तू समझ रहा है .

मैं घर से बाहर आकर नीम के पेड़ के निचे बैठ गया और विचार करने लगा. मेरी बात सच होने की पूरी सम्भावना लग रही थी मुझे, ताई जब ठेकेदार से चुद सकती है , मुझसे चुद सकती है तो अर्जुन चौधरी से क्यों नहीं चुद सकती. क्या मेरे पिता अपनी भाभी और छोटे भाई की पत्नी को रगड़ रहे थे . क्या यही वो वजह थी की ताऊ ने उन्हें ताई के साथ देख लिया हो तो वो घर छोड़ गये.

पर यहाँ आकार मेरा अनुमान गड़बड़ा रहा था , घर छोड़ना जम नहीं रहा था . घर छोड़ने की वजह ये नहीं हो सकती . मैंने सोचा इस घर की औरते इतनी शातिर है तो मर्दों का कहना ही क्या होगा. इन सवालो के जवाब किसी के पास थे तो वो थे चौधरी अर्जुन सिंह और अब समय आ गया था मेरा उनसे मिलने का.

अगले दिन सुबह सुबह ही मैंने अपना बैग लिया और शहर के लिए बस पकड़ ली.शाम तक मैं उस भर्ती सेंटर पर पहुँच गया जिसका पता मुझे रीना की मामी ने लाकर दिया था . वहां जाकर मालूम हुआ की वहां पर नए फौजियों को कुछ समय के लिए ही रखते है फिर ट्रेनिंग के लिए भेज देते है . मैंने उस फौजी को अपनी व्यथा बताई तो उसका दिल पसीज गया वो मुझे अपने साथ बड़े अफसर के पास ले गया . मैंने अफसर को पूरी कहानी बताई.

अफसर- देखो बेटे, मैं तुम्हारे जज्बात समझता हूँ और जितना हो सके मैं तुम्हारी मदद करूँगा. मैं रिकॉर्ड की जांच करवाता हूँ . थोडा समय लगेगा पर तुम्हारा काम मैं आज ही करूँगा.

मैंने हाथ जोड़ कर उसका धन्यवाद किया.

करीब दो घंटे बाद अफसर ने मुझे बुलाया और बोला- अर्जुन सिंह नाम का बन्दा भर्ती तो यही से हुआ था पर उसकी ट्रेनिंग अलवर में हुई थी. तुम्हे वहां जाना होगा. मैं वहां के लिए एक ख़त लिख देता हूँ तुम्हे आसानी होगी .

अफसर ने मुझे एक चिट्ठी दी और बोला की वहां किसी को भी दिखा देना . मैंने तुरंत अलवर के लिए बस पकड़ी और अगली शाम पहुँच गया . वहां के आर्मी सेंटर पर जाकर मैंने चिट्ठी दिखाई और फिर जो मुझे मालूम हुआ मैं हैरान रह गया .............................
 
बोझिल कदमो से वापिस लौटते हुए मेरा एक एक कदम भारी हो रहा था. मेरा दिमाग भन्नाया हुआ था , अपने आप से जूझते हुए मैं नहर की पुलिया पर थोड़ी देर बैठ गया की तभी दिलेर सिंह आ गया . उसे देख कर मेरा माथा और ठनक गया .

“तुझे मेरे साथ थाणे चलना होगा ” उसने कहा

मैं- दिलेर सिंह मेरा दिमाग बहुत ज्यादा ख़राब है , मुझे तंग मत कर. गुस्से में मैं कुछ कह दूंगा तुझे

दिलेर- मैंने कहा न चुपचाप जीप में बैठ,

दिलेर ने मेरा कालर पकड़ लिया .

“लाला ने रपट लिखवाई है तेरे खिलाफ ” उसने गुर्राते हुए कहा .

मैं- देख दिलेर, मैं तुझसे फिर कहता हूँ मेरा दिमाग भन्नाया हुआ है . तू लौट जा ये गुस्ताखी तेरी मैं माफ़ करता हूँ

दिलेर- रपट है तेरे खिलाफ कार्यवाही करनी ही पड़ेगी. मैंने तुझसे कहा था न की मौका मिलते ही तेरी गर्दन पकड़ लूँगा.

मैं- मेरे सब्र का इम्तिहान मत ले ,

दिलेर- तू बैठ जीप में

जिस दिन से रुद्रपुर वाला काण्ड हुआ था मैं ऐसा वैसा कुछ नहीं करना चाहता था पर ये चूतिये जानबूझ कर पड़ी लकड़ी उठाने में लगे थे. मैंने दिलेर की गांड पर लात मारी और उसको उल्टा कर दिया जीप के बोनट पर .

“बहन के लंड, कब से कह रहा हूँ, बात को मत बढ़ा. मत बढ़ा. पर दरोगा की गांड में चुल मची हुई है .साले लंड पर रखता हु मैं तेरे जैसो को .देखना चाहता है मेरी दुश्मनी को तो देख..” मैंने उसको मारते हुए कहा.

“पुलिसवाले पर हाथ उठाता है, साले तू तो गया ” जब्बर ने मुझे धक्का देते हुए कहा और मेरी पसलियों पर वार किया. यही वो कमजोर जगह थी . मैं गिर पड़ा और जब संभला तो मैं थाने में था. हालत ख़राब थी .

“दिलेर सिंह, ये तूने ठीक नहीं किया. मेरा वादा है तुझसे , मेरे पैर पकड़ कर रहम की भीख मांगेगा तू ” मैंने कहा

दिलेर- अरे वो हवालदार, जरा और सुताई कर इस लौंडे की. पुलिस के डंडे का जोर दिखा इसे.

दो पुलिस वालो ने मुझ को पकड़ कर लिटाया और एक ने मेरे पैरो के तलवो पर डंडे मारना शुरू किया . हवालात में मेरी चीखे गूंजने लगी.

“पता नहीं जीजा क्यों घबराया हुआ है इस बित्ते भर के छोकरे से , जीजा को जब मालूम होगा की मैंने गांड तोड़ी है इसकी तो बड़ा खुश होगा वो ” दिलेर अपने आप से बोला.

मैं- जितना जोर दिखाना है दिखा ले भोसड़ी के. पर मेरी बात याद रखना मैं मारूंगा तीन गिनूंगा एक

दिलेर- हवालदार , इसकी चीखे पुरे थाणे में आणि चाहिए.

एक एक वार भारी पड़ रहा था मुझ पर . पर फिर मैं चीखा नहीं. अपनी भी जिद थी . और जिद दिलेर सिंह की भी थी . मुझे नहीं मालूम की उस समय क्या समय रहा होगा. रात कितनी बीती थी .जब सारे थाने में सन्नाटा पसरा हुआ था उस पायल की आवाज बड़ी जोर से गूंजी थी .

“थानेदार, मनीष को छोड़ दे ” आवाज में कुछ तल्खी सी थी .

दिलेर- ओह हो. ये बताने तू इतनी रात में चली आई अकेले. वैसे तू है छमिया.

“”तू बस इतना समझ ले ,अगर मैं खुद चल कर थाने आई हूँ तो कोई तो हूँ ही, मनीष को तुरंत छोड़ दे .” उसने कहा

दिलेर- छोड़ दूंगा. अभी छोड़ देता हूँ. पर तुझे मेरा एक काम करना होगा. आज की रात तू मेरे पास रुक जा . सुबह सुबह ही छोड़ दूंगा इसे. वैसे भी अकेले राते कटती नहीं है मुझसे .

“दिलेर सिंह, अपनी जुबान को लगाम दे हरामजादे.” मैंने गुस्से से कहा

दिलेर- साले. तू देख मैं क्या करता हूँ , इस छमिया की यही लेता हूँ तेरे सामने, तुझे भी मजा आयेगा.

“तू मेरी लेगा. तू हाथ लगा कर दिखा मुझे एक बार तुझे मलाल रहेगा की तूने जन्म भी क्यों लिया ” मीता ने शांत स्वर में कहा .

दिलेर- वाह भाई वाह, ऐसा तो बस फिल्मो में देखा था पर क्या मालूम था की इसी थाने में ये महफ़िल लगेगी. प्रेमी के सामने प्रेमिका की लेने में मजा ही आ जायेगा.

मुझे खुद की बेबसी पर गुस्सा आ रहा था पर वो मीता थी , मरजानी . जैसे ही दिलेर उसकी तरफ बढ़ा उसने उसके पैर में अडंगी डाली और दिलेर के गिरते ही उसने अपने झोले से एक कटार निकाल कर दिलेर के पैर में घोंप दी .

“आह ” चीखा वो . और मैंने पहली बार मीता की आंखो में कुछ अलग सा देखा. जैसे ही हवालदार मीता को पकड़ने उसकी तरफ भागा उसने पास में पड़ी कुर्सी उसके सर पर दे मारी और उसकी चमड़े की बेल्ट से उसकी खाल उधेड़ने लगी.

“मेरी लेगा तू , चल खड़ा हो हरामजादे ” मीता ने दिलेर को उठाया और कटार से उसकी बाह चीर दी. इसी आपा धापी में सिपाही जो मेरे साथ अन्दर था वो बाहर की तरफ भागा . और मैं उसके पीछे मैंने उसका सर सलाखों में दे मारा. वो वही ढेर हुआ . मैं चलते हुए दिलेर सिंह के पास गया .

“मैंने तुझसे कहा था न, आग से मत खेल .पर तेरी गांड में तो चुल मची थी . मैंने बार बार तुझसे कहा था , मत खेल मुझसे अब बुला ले तेरे जीजा को , वो साला भी देख लेगा तेरा क्या हाल होता है ” मैंने कहा

मीता- मनीष पीछे हट, इस को मैं दिखाउंगी की मुझसे बदतमीजी करने का क्या नतीजा होता है देख ले थानेदार , तेरा थाना है , तेरी सरकार, तू है और मैं हूँ और तेरी कही बात है .उठ आ जरा , दिखा तेरा जोर मुझे,

मीता ने एक लात दिलेर को मारी .

दिलेर- माफ़ कर दो मुझे, गलती हो गयी मुझसे

मीता- गलती सुधार दूंगी मैं . तेरी औकात ही क्या जो मेरे होते हुए तू मेरे अजीज को हाथ लगाये. जितने जख्म तूने इसे दिए है तेरी खाल उतार लुंगी मैं. गौर से देख मुझे , मेरी आँखों को देख . और समझ मेरा नाम मितलेश है . मितलेश ठकुराइन और ये नाम तुझे मरते दम तक याद रहेगा.

मीता ने दिलेर की वर्दी फाड़ी और टेबल पर पटक कर उसकी पीठ को काटने लगी कटार से. दिलेर सिंह की चीखे थाने में गूंजने लगी. इतनी नफासत ने कसाई भी बकरे को नहीं काटता जितनी सफाई से मीता उसकी पीठ को काटते हुए उसकी हड्डिया खींच रही थी .

मीता का ऐसा रूप देख कर एक पल को मेरी रूह भी कांप गयी .दिलेर की सांसे कब की थम गयी थी पर मीता का गुस्सा नहीं थमा था , उसका पूरा चेहरा खून से सना हुआ था . कोई कमजोर दिल का उसे ऐसे हाल में देख लेता तो बेहोश हो जाता.

“इसके जीजा के पास भेज देना इसे ” मीता ने हवालदार से कहा जिसने अपनी पेंट में मूता हुआ था . मीता ने मेरा हाथ पकड़ा और बाहर आई अचानक ही वो रुक गयी .

मैं- क्या हुआ

वो- रुक जरा .

मीता ने पुलिस जीप की टंकी उखाड़ ली और थाने में आग लगा दी.

“अब ठीक है ” उसने कहा और पास की टंकी पर हाथ मुह धोने लगी. उसके बाद हम दोनों हमारी जमीन पर आ गए.

मीता- हुलिया ठीक कर ले तेरा.किसी को पता नहीं चलना चाहिए तुझे और चोट लगी है ,

मैं- तुझे वहां नहीं आना चाहिए था . तू दुनिया की नजरो में आ जाएगी. मेरा तो जो होगा वो होगा पर अब मुझे तेरी चिंता भी लगी रहेगी.

मीता- किसकी मजाल जो मेरी तरफ आँख उठा कर देखे.

मैं- पर तुझे कैसे मालूम हुआ की मुझे दिलेर थाने ले गया है .

मीता- तुझे तो मालूम ही है की मेरा चाचा हॉस्पिटल में दाखिल है , मैं उसकी दवाई लेने जिस दूकान पर गयी थी वो थाने के पास ही है, वहीँ पर चाय की दूकान पर दो सिपाही बात कर रहे थे की थानेदार ऐसे ऐसे किसी को उठा कर लाया है और मैं समझ गयी .

मैं- पर तुझे मेरी मुसीबत अपने सर नहीं लेनी चाहिए थी .

मीता- दोस्ती की है तुझसे, निभानी तो पड़ेगी . चल अब थोड़ी देर आराम हो जाये.

मीता ने बिस्तर लगाया और कुछ देर के लिए हमने आँखे मूँद ली. सुबह चाय की चुस्कियो के साथ मैंने मीता को बताया की कैसे मैं फौज में मालूमात करने गया था और वहां से मुझे क्या जानकारी मिली. मेरी बात सुनकर मीता भी हैरान हो गयी .

मीता- अब क्या करेगा तू .

मैं- तू ही बता क्या करू.

मीता- समस्या अब गहरी हो गयी है.

मैं- हर रास्ता थोड़ी दूर जाकर बंद हो जाता है.

मीता- अभी मुझे जाना होगा. वापिस आउंगी तो हम कुछ अनुमान लगायेंगे

मीता के जाने के बाद मैं भी घर की तरफ चल दिया. पर रस्ते में ताई मिल गयी मुझे

ताई- मैं तुझे ही तलाश रही थी कहाँ था तू

मैं- बस यही था क्या हुआ

ताई ने फिर जो मुझे बताया मेरा दिमाग ही घूम गया
 
“चाचा ऐसा कैसे कर सकता है ” मैंने ताई से पूछा

ताई- मैं भला तुझसे झूठ क्यों बोलूंगी.

मैं- ये बात और किस किस को मालूम है

ताई- औरो का तो मुझे मालूम नहीं पर मुझे और तुझे तो मालूम है ही

मैं- रीना को पता चलेगा तो उसे कैसा लगेगा .

ताई - नहीं पता चलना चाहिए

मैं- ये जिन्दगी साली मुझे ऐसे जकड़ रही है जैसे सांप अपने शिकार को , रीना तो टूट ही जाएगी जब उसे मालूम होगा की उसकी मम्मी और चाचा के बीच नाजायज रिश्ता है .

ताई- और ये रिश्ता कोई नया नहीं है जिस तरह से उनकी बाते, हाव भाव थी मुझे लगता है इश्क पुराना है .

मैं- उनकी जिन्दगी है वो जैसे मर्जी जिए उनको अधिकार है बस रीना की जिन्दगी पर असर नहीं पड़ना चाहिए.

रोज़ एक नयी हकीकत से मेरा सामना होता था, पर मैं इतना जरुर जान गया था की इन्सान के लिए किसी रिश्ते की सबसे ज्यादा अहमियत अगर है तो वो है जिस्मो के रिश्ते की .

ताई- कहाँ खो गया तू

मैं- कही नहीं , बस थोड़ी देर सोना चाहता हूँ

घर आने के बाद मैं सो गया , जागा तो बदन में बुखार सा था और रात हो गयी थी . मैंने उठ कर एक दो गोली ली और घर से बाहर आया . रात भीगी हुई थी और मैं जल रहा था . मेरे दिमाग में बस एक ही बात घूम रही थी और उसका जवाब पाने के लिए मैंने वो करने का सोचा जो बहुत खतरनाक था .पर कभी कभी बड़ी कामयाबी के लिए बड़ा रिस्क लेना पड़ता है .

और वो बड़ा रिस्क था सुनार का अपहरण, क्योंकि वो उस धागे के रहस्य को जानता था . वो ही था जो मेरी उलझन सुलझा सकता था . लठ के जोर पर उसे उठाना न मुमकिन था . और चूँकि उसका इलाज चल रहा था इसलिए वो घर से बाहर निकलता नहीं था . कैसे किया जाये ये काम सोचते सोचते मैं चबूतरे पर लेट गया . मुझे दो बाते परेशां कर रही थी एक तो संध्या चाची की पीठ के वो निशान दूसरा उस धागे का मामूली नहीं होना.

जब्बर अभी तक शांत बैठा था , मुझसे हुए पंगे के बाद वो सुनार से नहीं मिला था और ना ही सुनार अपने घर से बाहर निकल रहा था .दो तीन दिन मैंने गुज़ार दिए योजना बनाने के लिए की कैसे सुनार को उठाया जाये पर बात बन नहीं रही थी . मुझे अब खुद पर गुस्सा आने लगा था .

उस दिन मैं मंदिर की सीढियों पर बैठा इसी उधेड़बुन में उलझा था की मैंने सुनार की बीवी को मंदिर में आते देखा. वो मुझे देख कर मुस्कुराई. मैं भी मुस्कुरा दिया.

“और कैसे हो ” उसने पूछा मुझसे.

मैं- सच कहूँ तो हालात ठीक नहीं है , ऊपर से तुम्हारे पति ने जीना मुश्किल किया हुआ है

काकी- उसमे नया क्या है, सारे गाँव की यही शिकायत है , एक तुम्हारी और सही

मैं- तुम समझाती क्यों नहीं उसे

काकी- जो खुद से बेगाने हो जाते है फिर वो ऐसे ही हो जाते है .तुम बताओ तुम्हारा क्या झगडा है उनसे

मैं- मेरे चाचा ने तुमको नहीं बताया क्या

काकी- भला वो क्यों बताने लगा मुझे

मैं- तो इतनी रात को शमशान के पार तुम क्या करने गयी थी उसके साथ

काकी के चेहरे के भाव बदल गए एकदम से

काकी- बड़े तेज हो तुम ,

मैं- क्या करे. सबके चेहरे पर नकाब है हम ही नंगे है बस , तो कब से चल रहा है ये चक्कर तुम्हारा

काकी- कोई चक्कर नहीं है बस एक डोर है जो हम दोनों को जोडती है

मैं- कितना आसान है न इन बातो को छिपाना

काकी- तेरी मर्जी है जो समझ,

मैं- लाला के सीने में ऐसा कौन सा राज दफ़न है ये बताओ मुझे

काकी- तुम्हे क्या लगता है

मैं- मुझे लगता है की लाला मुझसे कोई सौदा करना चाहता है

काकी- उसे खजाने की तलाश है ,

मैं- किस खजाने की तलाश है उसे

काकी- तुम इतने नादाँ भी नहीं

मैं- नादाँ तो तुम भी नहीं जो चाचा के साथ सेट हुई पड़ी हो .

काकी- तेरे चाचा से ही पूछ लेना तसल्ली से बता देगा वो

मैं- क्या वो तुमसे प्यार करता है

काकी- इस दुनिया में कोई किसी से प्यार नहीं करता, सब के अपने अपने मतलब होते है .

मैं- तुम्हारा और चाचा का क्या मतलब है फिर

काकी- उसका अहसान है मुझ पर

मैं- कैसा अहसान

काकी- बता दिया तो अहसान, अहसान कहाँ रहेगा फिर . पर मैं तुझसे इतना कहूँगी की तू इन सब से दूर रहना मेरे पति की जिन्दगी गुजर गयी उस चीज के पीछे भागते भागते जो कभी मिल नहीं सकती . तू भी मत भागना उसके पीछे

मैं- किसके पीछे

काकी- अंधेरो के

इतना कह कर वो ऊपर मंदिर में चली गयी. मैं सीढियों पर ही रह गया . मुझे कोई ऐसा चाहिए था जो चाचा की जासूसी कर सके. मेरे लिए चाचा की असलियत तलाश करना अब जरुरी था. सुनार की बीवी और रीना की माँ दोनों को फ़साये हुए था वो. जितना भोला वो दीखता था उतना था नहीं .

अँधेरा घिरने लगा था घर जाने की बजाय मैं खेतो की तरफ चला गया . चारपाई बिछाई और ठंडी हवा को महसूस करते हुए मैं लेट गया . मध्दम चलती पवन लहराते हुए पेड़ , क्या खूब नजारा था .

“आराम करने के बजाय तुझे अब मेहनत करने के बारे में सोचना चाहिए ” ये मीता थी जो अपना झोला खूँटी पर लटका रही थी .

मैं- कल से पक्का

मीता- ये सावन बड़ी जोर से बरस रहा है इस बार , किस्मत मेहरबान है तुझ पर , आगे तेरी मर्जी . मेहनत के पसीने से सींच दे इस धरा को , इसकी प्यास तेरा पसीना ही बुझाएगा.

मैं- जो हुकुम सरकार.

मीता- संध्या आजकल रुद्रपुर के बहुत चक्कर लगा रही है

मैं- किस से मिलती है वो

मीता- किसी से भी नहीं

मैं- किसी से भी नहीं

मीता- हाँ किसी से भी नहीं, घंटो बैठी रहती है , न जाने किसे ताकती है वो

मैं- पर वो तो कह रही थी की सोलह साल से वो रुद्रपुर नहीं गयी .

मीता- सच है ये भी पर आजकल वो बस शिवाले में बैठी रहती है

मैं- ये शिवाला न हुआ जी का जंजाल हो गया .

मीता- खाना खायेगा

मैं- भूख नहीं है

मीता- तेरी मर्जी , चल थोडा परे सरक .पैर दुःख रहे है मेरे जरा कमर सीढ़ी कर लू

मैं थोडा सा सरका . वो मेरे पास लेट गयी. आज से पहले वो मेरे इतना पास कभी नहीं आई थी . उसके बदन की खुसबू मेरे जिस्म में समाने लगी.

मैं- बता कुछ अपने बारे में

मीता- क्या बताऊ, तुझसे क्या छिपा है

मैं- मैं मीता के बारे में नहीं मितलेस ठकुराईन के बारे में जानना चाहता हूँ

मीता-मितलेस वो दास्ताँ है जिसे भुला दिया गया.
 
“तो दुनिया को याद दिलाते है एक भूली हुई कहानी को ” मैंने मीता के हाथ को अपने हाथ में लेते हुए कहा .

मीता- कोई जरुरत नहीं है, वैसे भी दुनिया को अंधेरो से ज्यादा उजाले अच्छे लगते है .

मैं- पर दुनिया कहाँ जानती है अंधेरो की कहानिया.

मीता- तू साथ है ये भला कम है मेरे लिए

मैं - पर तेरी आँखों का सूनापन विचलित करता है मुझे, तेरी वो हसरत जिसे सबसे छुपाया है तूने मैं जानना चाहता हूँ . मैं अपनी मीता को पहचानना चाहता हूँ

मीता- तेरी मीता तेरे सामने है कर ले जो तहकीकात करनी है

मैंने उसका हाथ अपने सीने पर रखा और बोला- काश कुछ ऐसा इंतजाम हो जाये, जुबान पे बस तेरा नाम हो जाये.

मीता- ये दोस्ती बस दोस्ती तक ही रहे तो ठीक है, इसे आशिकी में मत बदल. आशिकी इम्तिहान लेती है .

मैं- तू डरती है क्या दुनिया से , इन फसानो से

मीता- मैं खुद से डरती हूँ .

मैं- तू चाहे लाख इंकार कर पर तेरा मेरा मिलना तकदीरो में लिखा था .

मीता- तेरी तक़दीर में क्या लिखा है मैं बता चुकी हूँ तुझे

मैं- तो क्या तू भी छोड़ जाएगी मुझे

मीता- तू जाने तेरा भाग्य जाने.

उसने दूसरी तरफ करवट ली और सो गयी. मैंने उसके पेट पर हाथ रखा और आँखे बंद कर ली. अगले दिन सुबह से दोपहर तक मैंने जमीन समतल करने के लिए खूब काम किया. पसीने से लथपथ , थकन से चूर पर मुझे ये करना ही था क्योंकि मुझे यही रहना था इसे ही घर बनाना था . पसलियों का दर्द जब काबू से बाहर हो गया तो मैं पानी की होदी में उतर गया . थोडा सकून सा मिला मुझे. पर दिल में एक आग जल रही थी .

मैंने इतना तो समझ लिया था की चाची, ताई और चाचा इन तीनो में से मैं किसी पर भी भरोसा नहीं कर सकता था . ये तीनो ही गुरु घंटाल थे. चाचा दो औरतो को पटाये हुए था, ताई न जाने किन किन का लंड ले चुकी थी और चाची अपने आप में उलझी थी. क्या ये मुमकिन था की ये तीनो मुझे चारे की तरह इस्तेमाल कर रहे थे, कितनी आसानी से ताई ने अपनी चूत मरवा ली थी मुझसे, क्या वो किसी के इशारे पर कर रही थी ये सब.

कहीं न कहीं ये ख़ामोशी मुझसे कह रही थी की कोई तूफ़ान आने वाला है . मेरा कमजोर दिल घबरा रहा था. दिलेर को मारने के बाद भी जब्बर की ख़ामोशी मुझे बेचैन कर रही थी . सुनार भी बहन का लोडा घर से नहीं निकल रहा था . खेतो से निकल कर मैं सीधा बैंक में गया और लाकर को दुबारा खोला.

मुझे उम्मीद थी की गहनों की गहन जांच करनी चाहिए, क्या मालूम मुझसे कुछ छूट गया हो. कहीं न कहीं मुझे महसूस होता था की ये शिवाले के श्रृंगार का लूटा हुआ हिस्सा है . और अगर ये सच था तो अर्जुन सिंह को इस पाप के लिए सजा मिलनी ही चाहिए थी. मैं समझ नही पा रहा था की मुझे अपने बाप से नफरत है ये आदर . सब कुछ छान मारा पर कुछ नहीं मिला. हताशा से भरा हुआ मैं घर की तरफ लौटा.

मैंने देखा की एक चमचमाती गाडी,हमारे घर से निकली .उसमे एक लड़का बैठा था , मेरी ही उम्र का या फिर मुझसे थोडा बड़ा. हमारी नजरे आपस में मिली , उसने मुझे मैंने उसे देखा और फिर उसने गाडी आगे बढ़ा दी. दरवाजे पर खड़ी संध्या चाची उसे जाते हुए देखती रही जब तक की गाडी नजरो से ओझल नहीं हो गयी.

“कौन था वो ” मैंने चाची से पूछा

चाची- मेरा भतीजा पृथ्वी .

मैं- पहले कभी देखा नहीं उसे,

चाची- कुछ महीने पहले ही विलायत से आया है

मैं- तो सोलह साल बाद संध्या ने दुबारा से पीहर वालो से रिश्ता जोड़ ही लिया

चाची ने घूर कर देखा मुझे और बोली- उसकी बुआ हूँ मैं उसका हक़ है मुझसे मिलना .

मैं- हक़ तो तुम्हारा भी है जो आजकल रोज ही रुद्रपुर के चक्कर लगये जा रहे है . मुझे समझ नहीं आता फिर ये झूठ का ड्रामा किसलिए करती हो.

चाची- कोई ड्रामा नहीं है

मैं- तो फिर ऐसी क्या वजह हो गयी जो अचानक से ही पीहर से इतनी मोहब्बत हो गयी तुम्हारी, क्या है उस शिवाले में और अब ये पृथ्वी जो पहले कभी नहीं आया अब अचानक से बुआ की याद आ गयी .

चाची- रक्षा बंधन आने वाला है वो चाहता है की मैं राखी बाँधने जाऊ

उफ़ ये रिश्ते नाते , ये बंधन मैं चाह कर भी चाची से इस मामले में कुछ नहीं कह सकता था ये बुआ और भतीजे के हक़ की बात थी. और कहने को तो ये धागा था पर इसकी कीमत बहुत बड़ी थी .

मैं- तुम्हे जाना चाहिए चाची,

चाची के होंठो पर एक फीकी मुस्कराहट आई और वो बोली- मैंने पृथ्वी को मना कर दिया है , मैं जीते जी उस घर में अपने पैर नहीं रखूंगी जिसे मैं ज़माने पहले छोड़ आई.

मैं- मेरी बुआ या बहन होती तो मुझे भी चाव होता इस दिन का . मेरी कलाई भी राखी से भरी होती.

मैंने अपनी कलाई देखते हुए कहा. दरसल ये वो पल था जिसमे भावनाए जोर तो मार रही थी पर उन्हें दबाये रखा था .

“मैं जानता हूँ तुम्हारे मन को. सोलह साल पहले न जाने क्या परिस्तिथिया रही होंगी जो तुमने ये निर्णय लिया पर मैं जानता हूँ अपनों की यादे जब आती है तो दिल पर क्या बीत ती है. मैंने तो बचपन में ही अपने माँ-बाप को खो दिया . तुम्हारा भतीजा आया है और फिर एक मामूली धागे की ही तो बात है न , कितनी तीज-त्यौहार, होली-दिवाली गयी मैंने दुनिया को देखा खुश होते हुए, काश मेरी माँ होती तो मैं भी ”

“मैं भी तेरी माँ ही ” चाची ने अपनी बात अधूरी छोड़ी और मुझे अपने सीने से लगा लिया. ना जाने क्यों मेरे आंशुओ से उसके आँचल को भिगो दिया. ये वो लम्हा था जिसमे मैं टूट गया था . मैंने कभी कहा नहीं था पर जिन्दगी के हर कदम पर मुझे माँ बाप की कितनी कमी महसूस होती थी बस मैं ही जानता था.

“कभी भी ये मत सोचना की तेरा कोई नहीं है , बल्कि तू तो खुशनसीब है तेरे पास तो दो दो माँ है ” ताई ने मेरे पास आते हुए कहा.

मैं चाची से अलग हुआ.

ताई- और हम सब को विश्वास है अर्जुन एक न एक दिन जरुर लौट आएगा.

ताई ने मेरे माथे को चूमा. सालो से सीने में दबे दर्द को मैंने आंसू बन कर बहने दिया.
 
दोपहर बाद खेत में जमीन को खोदते हुए मेरे दिमाग में बस ये ही चल रहा था की पृथ्वी का अचानक संध्या चाची से मिलने आना, केवल बुआ-भतीजे का स्नेह नहीं हो सकता. बरसों से टूटी हुई रिश्तेदारी को अचानक से दुबारा जोड़ने की कोशिश में स्वार्थ न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता. हो सकता था की ये बस मेरी कल्पना हो पर दिल गवाही नहीं दे रहा था.

कुदाल छोड़ कर मैंने जमीन का एक चक्कर लगाया और बावड़ी की तरफ जा निकला. मैंने बावड़ी की रहबरी पर पीठ लगाई और लेट गया. पसलियों में दर्द सा हो रहा था , सारे जख्म भर गए थे पर ये दर्द जा ही नहीं रहा था . मैंने एक नजर आसमान पर डाली, जिसमे काली घटाए लहरा रही थी . अच्छा ही था जो बारिश हो जाती. मुझे नहाने का भी मन था . मैंने शर्ट उतारी और बावड़ी में कूदने ही जा रहा था की ,

मैंने एक गाडी मेरी तरफ आते देखि तो मैं रुक गया. गाड़ी मेरे से थोड़ी दुरी पर रुक गयी और गाड़ी से उतरा जब्बर .

“ये साला इधर क्यों आया ” मैंने सोचा .

जब्बर मेरे पास आया .

मैं- मेरे दर पर कैसे

जब्बर- तुझे एक आखिरी बार समझाने आया हूँ की बुझे हुए तंदूर के शोलो को मत सुलगा वर्ना उसी तंदूर में भुना जायेगा तू.

मैं- ये फ़िल्मी डायलोग तेरे. मेरे कान पक गए है

जब्बर- मैं जानता हूँ दिलेर को तूने मारा है

मैं- तो फिर ये भी जानता होगा की क्यों मारा उसे

जब्बर- जानता हूँ, इसीलिए थाने के मामले को दबा दिया मैंने ताकि तुझे भी जला सकू. चाहू तो तुझे एक मिनट में मसल दू, पर नहीं तुझे तडपाना है , इतना की तू खुद भीख मांगे मौत की . उस रात चौपाल पर मैंने सब्र का घूँट इसलिए पी लिया की बरसो बाद एक काबिल दुश्मन मिला है , और दुश्मनी का मजा झटके में नहीं हलाल में है . तुझे झटके में मारने में वो मजा कहाँ , मैं तलाश कर रहा हूँ उसको जो थाने में तेरे साथ थी,

मैं- मैंने तुझसे कहा था दुश्मनी तेरे मेरे बीच है , पर अगर तेरी यही इच्छा है तो ये भी कर के देख ले तू. पर इतना याद रखना परिवार तो तेरा भी है , मेरे किसी भी चाहने वाले के एक खरोंच भी आई तो तेरे परिवार का ख्याल कर लेना तू पर मैं तुझे माफ़ कर सकता हूँ अगर तू मुझे ये बता दे की उस सुनहरे बक्से का क्या झोल है

जब्बर - तू बस इतना समझ ले वो किसी की अमानत है और वो अपने आप तलाश लेगी उसे.

मैं- उस धागे में ऐसा क्या खास है .

जब्बर- अगर तू पैर पकड़ कर गिदगिड़ाये , तो मैं शायद तुझे बता भी दू.

मैं- पैर तो तू मेरे पकड़ेगा, जिस दिन मैं अपनी जमीन छुड़ाने आऊंगा .

जब्बर- तेरी ये बेबाकी, ये गुस्ताखियाँ तेरी मौत बनेगी जब तू मरेगा तो तुझे आभास होगा की जिन्दगी का मोल क्या होता है .

मैं- मौत तो आनी जानी है ,

जब्बर- बस देखना है तेरी कब आएगी.

मैं- बता भी दे, कुछ तो बात है वर्ना सोलह साल तक तूने और सुनार ने चुतड लाल नहीं करवाए उस बक्से के पीछे . . चल एक सौदा करते है तू मुझे बता ये राज और मैं तुझे सोना दूंगा.

जब्बर- गांड में डाल ले अपने सोने को . अगर तू उस लड़की को मुझे सौंप दे तो मैं कुछ कहूँ इस बारे में

जब्बर की बात सुन कर मुझे गुस्सा आ गया - जुबान संभाल कर बोल जब्बर, खींच दी जायेगी ये जुबान.

जब्बर- सौदे की शर्त यही रहेगी, मुझे वो लड़की ला दे, मैं तुझे सब कुछ बता दूंगा.

मैं- वो लड़की मेरी सरपरस्ती में है जब्बर. तू भूलना मत इस बात को . इस वक्त तू मेरी जमीन पर खड़ा है और मैं इसे गन्दी नहीं करना चता वर्ना इस गुस्ताखी के लिए तेरा सर काट देता मैं.

जब्बर- मेरा वादा है तेरी इसी जमीन पर दिलेर की मौत का बदला लिया जायेगा.

मैं- इंतजार रहेगा उस दिन का

जब्बर ने सर हिलाया और अपनी जीप की तरफ चल पड़ा. मेरे आसपास एक बिसात बिछाई जा रही थी , एक साजिश रची जा रही थी कौन अपना था कौन पराया ये कहना मुश्किल था . पर जब्बर की धमकी से मैं थोडा विचलित हो गया था , रीना के साथ हुई घटना ने मुझे झकझोर दिया था. मीता की सुरक्षा के लिए मुझे कुछ न कुछ करना ही था . सोचते सोचते मैं घर आया तब तक बारिश शुरू हो गयी थी.

हल्का सा भीगते हुए मैं चोबारे में गया तो देखा की चाची खिड़की के पास कुर्सी डाले बैठी थी और उसके हाथ में वो सुनहरा बक्सा था . जिस पर वो उंगलिया फेर रही थी .

“ये मेरा है ” मैंने चाची से कहा

चाची- झूठ , ये तुम्हारा नहीं है ,

मैं- तुम इस पर अपना अधिकार नहीं जाता सकती , मुझे वापिस दो ये

चाची- मैंने कब कहा ये मेरा है , मैंने कहा की ये तुम्हारा नहीं है

मैं- तो बताओ किसका है ये

चाची-ये तो तुम्हे बताना चाहिए मुझे, इतना महंगा सोने का बक्सा तुम्हारे पास कहाँ से आया, क्या तुमने चोरी की है .

मैं थोडा विचलित हो गया , एक पल को मुझे लगा की वो जानती है उसके बारे में

मैं- ये मुझे जंगल में पड़ा मिला था . मैं इसे यहाँ ले आया. तुम इसे वापिस वही रख दो जहाँ से इसे लिया था .

चाची कुछ कहती इस से पहले ही मेरे सीने के निचे मरोड़ शुरू हो गई . मैं दर्द से दोहरा हो गया . और बिस्तर पर गिर पड़ा.

चाची- क्या हुआ मनीष

मैं- दर्द, मेरी पसलिया फट रही है.

मैंने पसलियों पर हाथ रख लिया और दर्द को सहने की कोशिश करने लगा पर वो अचानक से इतना बढ़ गया था , की आँखों में आंसू निकलने लगे .

चाची-- मुझे देखने दे

चाची ने मेरी शर्ट के बटन खोले और मेरे जख्म को देखा जिसमे से खून रिसने लगा था .

चाची- टांका फट गया है, क्या किया था तुमने

मैं- कुछ नहीं किया आह्ह्ह्ह मैं मरा

चाची ने टेबल से रुई उठाई और जख्म पर रखते हुए बोली- दबा के रख इसे मैं वैध को बुला कर लाती हूँ .

चाची दौड़ पड़ी निचे को और मैं तड़पने लगा. ये जख्म अचानक से कैसे खुल गया था . इसी बीच मैं बिस्तर से निचे गिर पड़ा. मैं टेबल का सहारा लेकर उठ ही रहा था की खून से सने मेरे हाथ उस बक्से पर पड़े और वो जलने लगा. मुझे हैरत हुई पर मेरी हालत उस हैरत पर भारी पड़ रही थी .

“मनीष क्या हुआ तुझे ” मैंने देखा चीखते हुए रीना मेरे पास दौड़ते हुए आई और मुझे आगोश में भर लिया. मैं रीना की बाँहों में था और मेरे हाथ में वो जलता हुआ बक्सा जैसे ही मेरा हाथ रीना के बदन से टकराया धप्प की आवाज हुई और हम दोनों के बदन रेत से नहा गए.
 
“क्या था ये ” रीना ने अपने कपडे झाड़ते हुए कहा

मैं- जल्दी ही जान जाएगी तू

मैंने अपने जख्म पर रीना की चुन्नी को बाँध लिया पर दर्द बढ़ते ही जा रहा था. तभी चाची बैध को ले आई उसने तुरंत अपनी कार्यवाही की और जख्म को साफ़ करके सिल दिया.

“कच्चे जख्मो संग जोर आजमाइश नहीं करना चाहिए, ये तो शुक्र की अन्दर मवाद नहीं पड़ी वर्ना परेशानी की बात होती , और ये दवाई दे रहा हूँ दर्द से राहत मिलेगी. ” वैध ने कहा .

“ये रेत कैसे फैली यहाँ पर ” चाची ने कहा

मैं- बाद में बताता हूँ

चाची ने वैध को पैसे दिए और छोड़ने चली गयी . रह गए हम दोनों . रीना ने सारी रेत को परात में डाला और बाहर फेंक आई . मैंने थोडा पानी पिया और लेट गया . थोड़ी देर बाद वो भी आ गयी .

रीना- मैं जो पुछू सच सच बताना तू

मैं- तुझसे कभी कुछ छिपाया है क्या

रीना- ये क्या चक्कर है , ये रेत कैसे निकली उस बक्से से .

मैं- नहीं जानता पर मालूम कर लूँगा.

रीना-जब से मैं रुदृपुर के मेले से लौटी हूँ ऐसा लगता है की जैसे मैं मैं नहीं रही

मैं- तुझे सदमा लगा है , थोड़े दिन में असर कम हो जायेगा

रीना- वो बात नहीं है

मैं- तो क्या बात है .

रीना- मुझे हर पल ये डर रहता है की तुझे कुछ हो न जाये, जिन लोगो से तूने दुश्मनी ली है वो बहुत खतरनाक है तुझे कुछ हो गया तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाउंगी.

मैं- पगली, ऐसा क्यों सोचती है तू . जब तक तेरी दुआए मेरे साथ है इस दुनियाको जुती की नोक पर रखु मैं.

रीना- तुझे जब दर्द में तडपते देखती हूँ तो मेरा दिल रोता है

मैं- नादान है तेरा दिल .

बाते करते करते न जाने कब मुझ पर दवाई का असर हो गया और मैं नींद के आगोश में चला गया . पर जब आँख खुली तो मैंने देखा रीना कुर्सी पर बैठे बैठे ही सो रही थी . मैंने उसके गले में झूलते हुए हीरे को देखा जिसमे अब सुनहरा और चांदी का रंग आपस में घुल गया था . उत्सुकता के कारण मैंने उसे छूना चाहा और मुझे ऐसा तेज झटका लगा की मैंने किसी बिजली के नंगे तार को छू लिया हो.

आखिर ऐसी क्या बात थी जो ये रीना से इतना घुलमिल गया था . इसने मुझे नहीं स्वीकार किया था और उस मासूम के गले में शान से पड़ा था . ये बात मुझे बहुत खाए जा रही थी अन्दर ही अंदर. सुबह मैं चाची के साथ बैठा था ,चाची और मेरे बीच एक ख़ामोशी थी पर हम दोनों जानते थे की हमें एक दुसरे से क्या अपेक्षा थी .

चाची- प्रथ्वी चाहता है की मैं राखी बाँधने रुद्रपुर आऊ

मैं- ये तुम्हारा निजी मामला है बुआ-भतीजे को जो ठीक लगे वो करे.

चाची-मैं बरसों पहले उस बंधन को तोड़ चुकी

मैं- तो मुझसे क्यों पूछती हो. वैसे मेरी दिलचस्पी ये जानने में जरुर है की तुमने अपने पीहर से नाता क्यों तोडा .

चाची- अतीत में झाँकने का क्या फायदा

मैं- तो फिर भविष्य का हाथ थाम लो. तुम्हारे भतीजे से बुलाया है तो तुम्हे जाना चाहिए

चाची- तुम चलोगे मेरे साथ

मैं- तुम जानती हो मेरा वहां जाना माहौल में तल्खी पैदा कर देगा.

चाची- तल्खी तो मेरे साथ भी रहेगी

मैं- ठीक है मैं चलूँगा पर अगर तुम मुझे ये बताओगी की तुमने पीहर से नाता क्यों तोडा

चाची- ठीक है , पर वापसी में

मैं- मंजूर.

चाची- तो तुम्हारी तलाश कहाँ तक पहुंची

मैं- कहीं तक नहीं , पर मैं अपने पिता को जरुर तलाश कर लूँगा.

चाची- मुझे उम्मीद है

मैं- मुझे नहीं पता तुमसे ये बात कहनी चाहिए या नहीं पर मुझे लगता है की चाचा तुमको धोखा दे रहा है .

चाची- और तुम्हे ऐसा क्यों लगता है

मैं- बस ऐसे ही

चाची- तो फिर इस ख्याल को दिल से निकाल दो

मैं- तुम जानो . मैं चला बाहर

चाची- जख्म हरा है तुम्हारा, आराम करो

मैं- किसे परवाह है

मैं सीधा ताई के घर गया और जाकर उसे अपनी बाँहों में भर लिया

ताई- क्या बात है

मैं- बस तुम्हे प्यार करने का दिल कर रहा है

ताई- ये झूठी बातो से न बहला मुझे

मैं- मुझ पर शक कर रही हो

ताई- मैं देख रही हूँ आजकल मेरी तारफ ध्यान नहीं है तेरा.

मैं- ये बनावटी बाते क्यों करती हो हम दोनों जानते है इनका कोई मोल नहीं

मैंने ताई के चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया और ताई के गुलाबी होंठो को चूमने लगा. एक बेहतरीन किस के बाद मैंने ताई को छोड़ दिया.

मैं- मुझे एक बात खटक रही है की चाची के पीहर वाले इतनी सालो बाद उस पर मेहरबान क्यों हो रहे है

ताई- बात तो मुझे भी खटक रही है पर क्या कहूँ

मैं-आज लेने का मन है मेरा

ताई- जब तेरी हालत बिलकुल ठीक हो जाएगी तब करुँगी तेरी मनचाही

मैं- बस एक बार करने दो

ताई- नहीं, बिलकुल नहीं

मैं- ताई, एक बात पूछना चाहता हूँ सच बताएगी न

ताई- तुझसे कभी कुछ छुपाया है मैंने

मैं- ताऊ ने तुझे किसके साथ देखा था जो तुझसे इतना दूर हो गया .

ताई- हमारा वो मसला नहीं है

मैं- इतना नादाँ मैं भी नहीं जो समझ ना सकू , मैं कोशिश कर रहा हूँ की ताऊ तुझे फिर से अपनाले और तुम दोनों एक हो जाओ. मेरा थोडा तो साथ दे.

ताई- तो फिर हमें जैसे है वैसे ही रहने दे. गड़े मुर्दे उखड़े तो कुछ हासिल नहीं होगा सिवाय दुर्गन्ध के.

मैंने ताई पर ज्यादा जोर नहीं दिया . शाम ढले मैं अपनी जमीन की तरफ चल दिया. दिन में बारिश हुई थी तो अँधेरा थोडा जल्दी हो गया था . जब मैं वहां पहुंचा तो देखा की एक आदमी मेरी जमीन पर इधर उधर घूम रहा था फिर वो बैठ गया .

“कौन है वहां , क्या कर रहे हो तुम मेरी जमीन पर ” मैंने चिल्ला कर पूछा. जब से जब्बर के आदमी की लाश इधर मिली थी , तब से मैं अतिरिक्त सावधान हो गया था .

“कौन हो तुम और यहाँ क्या कर रहे हो ” मैंने उसके पास जाकर पूछा.
 
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