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Adultery गुज़ारिश पार्ट 2

“इधर से गुजर रहा था, पानी की हौदी देखि तो सोचा प्यास बुझाता चलू, ठंडी पवन चल रही थी दो घडी बैठ गया सुस्ताने को ” उसने कहा

मैं- पहले कभी देखा नहीं इस तरफ

आदमी- व्यापारी आदमी हूँ,एक गाँव से दुसरे गाँव घूमता फिरता रहता हूँ.

मैं- किस चीज़ का व्यापर करते हो तुम

आदमी- किसानी का काम है मेरा जमीने जोतता हूँ .

मुझे ये था की कहीं ये जब्बर का आदमी तो नहीं , क्योंकि आजकल अंजानो पर भरोसा करना उचित नहीं था खासकर इन हालातो में. मैं उस से खोद खोद कर पूछ रहा था .

“मैं भी कोशिश कर रहा हूँ इस जमीन को उपजाऊ बनाने की पर बंजर जमीन जिद पर अड़ गयी है . रोज़ मेहनत करता हूँ पर फायदा नहीं होता ” मैंने कहा

आदमी- जमीन बुजुर्गो सी होती है, उन्हें मानना पड़ता है .

मैं- तुम्हे तो बड़ा अनुभव रहा होगा किसानी का तुम देखो जरा

मेरे इशारे पर वो आदमी खड़ा हुआ और उस जगह जाकर खड़ा हो गया जहाँ पर मैंने खुदाई चालू की थी. मिटटी के ढेलो को उसने अपने हाथो में लिया और देखने लगा . कुछ देर बाद वो मेरे पास आ गया.

आदमी- काफी पुराणी पकड़ है मिटटी की. आसान नहीं है इसे उपजाऊ करना

मैं- ये तो मैं भी जानता हूँ नया बताओ कुछ .

आदमी- खूब भीगने को इस धरा को , उम्मीद का अंकुर जरुर फूटेगा. अच्छा मैं चलता हूँ देर हुई तो अपनी मंजिल पर नहीं पहुँच पाउँगा आपका आभार , आपका पानी पिया है , इश्वर की कृपा बनी रहे आप पर.

उसने मेरे सामने हाथ जोड़े और अपने रस्ते बढ़ गया . मैंने अपने कपडे उतारे और हौदी में कूद गया. बहती पवन संग नहाना बड़ा सुख दे रहा था . थोड़ी देर में मीता भी आ पहुंची.

मीता-वाह क्या बात है

मैं- बड़ा मजा आ रहा है इस मौसम में ठन्डे पानी का,

मीता- कहीं तबियत ख़राब ना हो जाये तेरी.

तबियत से मेरा ध्यान जख्म पर गया और मैं तुरंत पानी से बाहर निकल कर तौलिये से कच्चे टांको को साफ़ करने लगा.

मीता- क्या हुआ ये

मैंने उसे पूरी बात बताई

मीता- तुझे जिन्दगी से जरा भी प्यार नहीं है . हैं न

मैं- मैं क्या बताऊ तुझे क्या है मेरे हालत

मीता- सब को अपना दुःख कम ही लगता है .

मैं- चल बाबा माफ़ कर दे अब .

मीता- आजा फिर, आज मुर्गा बना कर लायी हूँ तेरे लिए

मैं- अरे गजब,

मीता- परोस दू

मैं- बैठते है थोड़ी देर. कितने दिन हुए बाते नहीं की हमने

मीता- हुन्म्म, कल परसों तो मिले ही थे हम लोग.

मैं- मेरा बस चले तो तुझे जाने ही ना दू. यही पर रख लू

मीता- ये मुमकिन नहीं तू भी जानता है

मैं- तू जाने तेरे सितारे जाने.

मैंने मीता के काँधे पर सर टिकाया और उसके हाथ को पकड़ लिया.

मैं- ये चाँद देख रही है न, तेरी मुलाकातों का गवाह है ये

मीता- कभी सोचा नहीं था तू मेरी जिन्दगी में आएगा. और ऐसे आएगा.

मैं- पर मैं हमेशा से चाहता था की कोई आये, कोई ऐसा जो मुझे, मुझसे ज्यादा समझे, कोई ऐसा आये जिसके साथ मैं दो कदम चल सकू. जब तू चूल्हे पर रोटी सेंकती है तो आग की तपिश में तुझे देखना मेरे लिए किसी कबूल हुई दुआ से कम नहीं है . तुझे दूर से आते हुए देखना ऐसा है जिसे की आसमान से गिरी बूँद को ताकती है ये धरती .

मीता- मैं इस तारीफ लायक नहीं

मैं- सच कहना कोई गुनाह तो नहीं .

मीता- सच उस झूठ से भी बड़ा रोचक और खतरनाक होता जिसे बार बार कहा गया हो

मैं- क्या तुझे मुझ पर यकीन नहीं

मीता- मुझे मेरे नसीब पर यकीन नहीं है, अब बाते कम कर आ खाना परोसती हूँ

मैं - तू भी आ साथ ही खाते है .

मीता ने एक ही थाली में खाना लगा दिया. चांदनी रात में हम दोनों एक दुसरे के साथ बस वक्त बिता ही नहीं रहे थे हम दोनों उस वक्त को जी रहे थे .

मैं- मेरी इच्छा है की मैं तुझे चुडिया ला दू

मीता- तेरी इच्छा है तू जाने

मैं- जल्दी ही घर बनाना शुरू करूँगा इधर, तू बता तुझे कैसा घर चाहिए.

मीता- तेरा घर तू जाने मुझसे क्या पूछता है

मैं- तेरे होने से ही तो घर , घर होगा मेरा. ,

मीता- मत कर ये सब , इन सपनो का कोई मिल नहीं मेरे दोस्त, जब ये सपने टूटते है तो फिर दर्द बड़ा होता है

मैं- जब तक तूने मुझे थामा हुआ है मुझे परवाह नहीं

मीता खामोश रही .

मैं- एक बात पुछू

मीता- हाँ

मैं- तेरे गाँव के शिवाले में उस पानी वाली रेत का क्या रहस्य है तू तो जानती ही होगी न

मीता-किस्सा है या कहानी है , लोग कहते है की एक प्यासे आदमी का श्राप है बरसो पहले वो बावड़ी हर आने जाने वाले की प्यास बुझाती थी , पर फिर उसका पानी छलावा हो गया . तुम हथेली भर के पियो और वो रेत हो जाता .

मैं- ये कोई किस्सा , कहानी नहीं सच है . और सच है तो इसकी कोई वजह भी रही होगी.

मीता- तुझे क्या दिलचस्पी है इन सब में

मैं- तेरे आने से पहले एक आदमी मिला था उसने कहा मुझसे की उसने मेरा पानी पिया है .

मीता ने हाथ में लिया रोटी का टुकड़ा वापिस थाली में रखा और बोली- हौदी में न जाने कितने आदमी, पशु पानी पीते है ये इत्तेफाक भी हो सकता है .

मैं- मुझे जो लगा तुझे बताया. पर मीता तू चाहे मुझसे छुपा पर मैं जानता हूँ तू और मैं एक ही सिक्के के दो पहलु है . मैं अपनी पीढ़ी के अतीत को तलाश कर रहा हूँ तू भी कुछ तलाश रही है .

मीता- तू मुझसे क्या जानना चाहता है

मैं- यही की तेरी मेरी कहानी का अंजाम क्या होगा

मीता- ये सवाल तो आगाज़ से पहले पूछना था .

मैं- मेरे दिल पर एक बोझ है मैं जोरावर और उन बाकि लडको के परिवारों के लिए कुछ करना चाहता हूँ, मेरी वजह से उन्होंने अपने बेटे खोये है . अगर मैं उनके लिए कुछ कर पाया तो .......

मीता- फालतू का बोझ है ये. उनको अपने कर्मो का फल मिला

मैं- पर उनके माँ बाप का क्या दोष

मीता- सब समय का चक्र है , नसीब में दुःख है तो भोगना पड़े. सुख है तो भी भोगना पड़े.

मैं- मेरे नसीब में क्या है

मीता- तू जानता है

मै- जानता ही तो नहीं

मीता- आज की रात मैं तेरे पास ही रुकुंगी, फिर मैं रक्षा बंधन के बाद ही आउंगी तुझसे मिलने

मैं- और इस दुरी की क्या वजह भला

मीता- बस ऐसे ही .

वो बर्तन धोने चली गयी मैं इधर उधर टहलने चला गया . मेरे वापिस आने तक मीता अपना काम निबटा चुकी थी .

“बिस्तर लगा ले और दो चादर रखना , आज की रात ठंडी होगी. मैं तब तक नहा कर आती हूँ ” उसने कहा

मैं- ठीक है

मैं बिस्तर लगाने लगा, सोचा की वो नहाकर आये इतने लेट जाता हूँ पर कमर टिकाई ही थी चारपाई से की मीता की चीख ने मेरे कानो के परदे सुन्न कर दिए..................................
 
मैं दौड़ कर मीता के पास गया और देखा की वो पानी की हौदी में खड़ी थी , पर हौदी में पानी की जगह रेत भरी हुई थी , और मीता के हाथ में एक छोटी हांडी थी जिस पर लाल कपडा बंधा हुआ था .

“रुक मैं मिटटी हटाता हूँ ” मैंने उस से कहा और कस्सी ले आया. पर ये रात आज न जाने हमें क्या क्या दिखाने वाली थी . जैसे ही मैं रेत को कस्सी में भर से बाहर फेंकता वो पानी बन जाती . न मुझे कुछ न मीता को सूझ रहा था , मैंने जैसे ही उसके हाथ से वो हांडी ली , हौदी की रेत पानी में बदल गयी . और मीता हौदी से बाहर आ गयी .

“क्या हो रहा है ये ” उखड़ी सांसो को दुरुर्स्त करते हुए उसने मुझसे पूछा .

मैं- तू ठीक है न

मीता- हाँ, जैसे ही मैंने हौदी में दुबकी लगाई मेरे हाथो से ये हांडी टकराई मैंने इसे ऊपर खींचा और पानी रेत बन गया .

दिमाग भन्ना गया था और कहने को कुछ नहीं था . पर फिर भी मैंने कहा.

“मीता ये जो कुछ भी हो रहा है , इसकी शुरुआत उस दिन से हुई जब मैं पहली बार शिवाले में गया था ,वहां के पानी का भी ऐसे ही रेत बनना ये सबूत है की इस जमीन और शिवाले का गहरा सम्बन्ध है और हमें हर हाल में ये मालूम करना होगा. ” मैंने कहा

मीता- सही कहा तुमने

मैं- बस एक बार इस उलझी डोर का किनारा मेरे हाथ में आ जाये. पर अगर ये घटना तेरे साथ हुई है तो तू भी इस डोर में उलझी है मीता ,चल खोल कर देखते है इस हांडी को .

मीता कुछ कहती उस से पहले मैंने हांडी का लाल कपडा खोल दिया.

“भक्क ” से हांडी से काला सा धुंआ निकला और हमने देखा की हांडी के अन्दर कुछ अस्थिया पड़ी थी, जिनकी हालत देख कर लगता था की वो बहुत ज्यादा ही पुरानी होंगी.

मीता- इसका क्या मतलब

मैं-कोई चाहता था की ये हमें मिले. एक मिनट वो आदमी , वो आदमी जो इधर था, वो आदमी जो इधर बैठा था शायद उसने ही ये माया रची हो. हमें तलाश करनी होगी उस आदमी की . वो हाथ लगा तो ये गुत्थी सुलझ जाएगी.

मीता- कहाँ तलाश करेंगे उसकी

मैं- यही, यही पर फिर आएगा वो . एक बार आया है तो बार बार आएगा हमें इंतजार करना होगा उसका.

मीता- मुझे लगता है की शिवाले में गहन तहकीकात करके देखे.

मैं- ये मुमकिन नहीं, मेरे रुद्रपुर जाते ही हंगामा हो जायेगा. और मैं कोई लफड़ा नहीं चाहता वहां पर

मीता- तू कहे तो रात को करे ये काम अस्थियो की हांडी अपशकुन है , मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा है

मैं- अपशकुन या फिर कुछ अधुरा

मीता- हम अभी के अभी शिवाले पर चलते है

मैं- अभी नहीं , मैं तेरे साथ वहां पर चलूँगा जरुर पर पहले मुझे एक जरुरी काम करना है . तू भी अब कपडे साफ़ कर ले, हौदी में फिर से पानी हो गया है, नहा ले .कब तक यूँ रेत में सनी रहेगी.

मीता नहाने लगी और मैं उस आदमी के बारे में सोचने लगा. और एक सवाल अब ये था की वो काली अस्थिया किसकी थी . उन्हें अब तक सुरक्षित रखने का क्या प्रयोजन था , और अगर वो सुरक्षित थी तो ऐसे हमें क्यों सौंपा गया .

मीता आकर चारपाई पर लेट गयी. मैं भी अपनी चारपाई पर लेट गया .

मैं- तेरे सितारे क्या कहते है

मीता- किस बारे में

मैं- हम दोनों के नसीब के बारे में

मीता- हम तीनो के बारे में क्यों नहीं पूछता तू , बात अब तेरी मेरी नहीं रही बात अब हम तीनो की है . इस उलझन को तू कैसे सुलझा पायेगा. क्या मालूम किसी दिन तू दोराहे पर खड़ा हो एक तरफ वो एक तरफ मैं हुई तो क्या करेगा तू . है कोई जवाब तेरे पास.

मैं-मेरे पास कोई जवाब नहीं है

मीता- तो मत कर ये सवाल. मैं तेरी दोस्त हूँ दोस्त ही रहने दे. दोस्ती उम्र भर रहेगी, मोहब्बत हुई तो दिल का दर्द सहना मुश्किल होगा.

मैं- बड़ी सायानी है तू तो .

मीता- क्या करे साहिब, ये फ़साने बड़े अजीब है जिन्दगी के , इन अंधेरो में न जाने कब तुमसे मुलाकात हो गयी , होते ही गयी.कुछ मेरी तन्हाई कुछ तेरी दोनों को इतने पास ले आई की अब मुड़ना मुश्किल है , तू तेरे सितारों से सवाल करता है , मैं मेरे सितारों से जवाब मांगती हूँ . वैसे तू बता तो सही किसी दिन रीना और मुझमे से एक को चुनेगा तो तेरी पसंद क्या होगी.

मैं- मेरे लिए तुम दोनों ही एक सामान हो . मेरा हिस्सा हो और अपने हिस्से से पसंद - नापसंद नहीं होती. एक मेरे दिन का उजाला है एक मेरी रातो का जलता दिया मैं चाहूँगा वो दिन कभी न आये.

मीता- ये तो अपने नसीब से भागना हुआ . और भागने वालो को दुनिया कायर कहती है

मैं- तू ऐसा ही समझ ले मेरी सरकार.

मीता- ठीक है सो जा फिर , रात बहुत हुई

मैं- सो जाऊंगा, पहले जरा ठीक से देख तो लू इस चाँद को जो मेरे सामने है .

मीता- ये किताबी बाते. ये तेरी मेरी मुलाकाते हाँ पर इतना जरुर है जब तू साथ नहीं होता , तेरी याद साथ होती है .

मैं- फिलहाल तो हम दोनों साथ है .

मीता- किस्मत की बात है वैसे तेरी दुश्मनी जब्बर से बढती जा रही है तू सावधान रहना और मुझे समझ नहीं आता की तेरी उस से दुश्मनी क्यों है आखिर जब की वो ...

मैं- जब की क्या

मीता- जब की , जब की वो चौधरी अर्जुन सिंह का दोस्त हुआ करता था किसी ज़माने में

मीता की बात ने जैसे विस्फोट सा कर दिया था .

मैं- तू जानती है क्या कह रही है तू , जब्बर और मेरे पिता की दोस्ती हो ही नहीं सकती,

मीता- क्यों नहीं हो सकता , इस दुनिया में सब कुछ हो सकता है

मैं- अगर ऐसा था भी तो जब्बर ने मुझसे ये क्यों कहा था की बाप का बदला वो बेटे से लेगा.

मीता- दोस्ती जब टूटती है तो ऐसे घाव देती है जो जिन्दगी भर नहीं भर पाते. तुझे मालूम करना होगा की आखिर वो कौन सी वजह रही होगी. और फिर तूने ही तो बताया था की तेरा चाचा इतना सब होने के बाद भी जब्बर से दबता है तो तू सोच आखिर क्या वजह रही होगी. दिलेर सिंह के मरने के बाद भी जब्बर चुप है वर्ना तू सोच वो क्या नहीं कर सकता . तेरा चाचा और जब्बर एक ही थाली के चट्टे बट्टे है .

मीता की बात में दम था मुझे तस्दीक करनी चाहिए थी .

मैं- तेरी बात सही है मीता, और मैं इस बारे में विचार करूँगा पर कल सुबह होते ही सबसे पहले इस पुरे इलाके की तार बंदी करनी है मुझे, ताकि आज जो हुई, ऐसी हरकत फिर न हो पाए.

मीता- अगर कोई हमें नुकसान पहुँचाना चाहता है तो वो नुकसान करके रहेगा, तार क्या रोक पाएंगे उसे.

मैं- तो क्या करू. मैं किसी को खोना नहीं चाहता, मेरे किसी अपने को कुछ हुआ तो मैं सह नहीं पाऊंगा.

मीता - अब सो भी जा,

मीता सो गयी पर मेरी आँखों में नींद नहीं थी , लेटे लेटे मैंने सोच लिया था की इस बात को कैसे सुलझाना है मुझे और अगले दिन मैं सीधा सुनार के घर गया , क्योंकि सुनार ही वो चाबी था जो उस धागे के रहस्य को खोल सकता था , जब मैं सुनार के घर पहुंचा तो मैंने जो देखा ,,,,,,, .
 
जब मैं सुनार के घर पहुंचा तो मैंने देखा की वहां पर भीड़ जमा थी, जिसे चीरते हुए मैं आँगन पार करते हुए सुनार के कमरे में पहुंचा तो देखा की सुनार का शरीर पंखे वाले कड़े से लटका हुआ था .पूरा बदन अजीब तरह से काला पड़ गया था , जैसे की कोयला हो. मुझे उसकी मौत का दुःख नहीं था बल्कि हताशा इस बात की थी की इस कड़ी को भी तोड़ दिया गया था .

उसके बदन का एक हिस्सा खोल दिया गया था , और जब मैंने गौर से देखा तो पाया की हत्यारे ने उसके कलेजे को निकाल लिया था . मारने वाले की बड़ी दुश्मनी रही होगी सुनार से. माथा पीटते हुए मैं सुनार के घर से वापिस मुड गया . दिल में मलाल लिए की मैं उस धागे का राज़ उगलवा नहीं सका उस से.

घर जाकर देखा की ताई बड़ी गहरी सोच-विचार में डूबी थी . मैंउसके पास जाकर बैठ गया .

मैं- ताई, क्या सोच रही हो.

ताई- यही की कितनी बुरी तरह से लाला को मारा गया है

मैं- अच्छा ही हुआ साले ने गाँव का जीनाहराम किया हुआ था .

ताई- वो तो है पर गाँव में मौतों जा जैसे मौसम चल रहा है, हर दुसरे तीसरे दिन लाशे मिल रही है

मैं- पर वो लाशे गाँव वालो की नहीं है , लाला और जब्बर के आदमियों की लाशे है वो

ताई- यही बात तो मुझे खाए जा रही है .जब्बर पूरा जोर लगाये हुए है कातिल को पकड़ने के लिए , मुझे डर है कहीं खुनी खेल फिर से चालू न हो जाये

मैं- कैसा खुनी खेल

ताई- इस आग में न जाने कितने निर्दोष गाँव वाले पिस जायेंगे.

हम बात कर ही रहे थे की रीना आ गयी . ताई रसोई में चली गयी . रीना मेरे पास बैठ गयी .

मैं- कहाँ, गायब है तू आजकल ऐसा लगता है की तुझे देखे हुए ज़माने बीत गए.

रीना- अच्छा जी, तो आजकल कातिल कहने लगे की क़त्ल भी हो जाओ और उफ़ भी न करो. मुझसे पूछते हो तुम, जबकि जानना मैं चाहती हूँ की ये दिन ये राते कहाँ बीत रही है तुम्हारी.

मैं- तेरे बिना कैसे दिन कैसी राते.

रीना- और मैं ही नहीं हूँ उन दिन उन रातो में

मैं- तेरी नाराजगी जायज है , जो सजा देना चाहे मंजूर है

रीना- वो दिन कभी ना आये की मुझे तुझे सजा देनी पड़े.

हम बात कर ही रहे थे की तभी ताई आई और बोली- मैं बाहर जा रही हूँ, तुम जब जाओ तो दरवाजे को बंद करते जाना .

हमने हाँ में सर हिलाया. ताई के जाते ही मैंने रीना को अपनी बाँहों में भर लिया

रीना- गुस्ताखिया ज्यादा हो गयी है तुम्हारी आजकल.

मैं- ये हक़ है मेरा

रीना ने मेरे गाल को चूमा और बोली- इस हक़ को पाने में जमीन असमान एक करना पड़ेगा तुम्हे .

मैं- तू साथ है तो क्या ये जमीन क्या ये आसमान.

रीना ने मेरे गालो को चूमा

मैं- बड़ा प्यार आ रहा है आज

रीना- ये मौसम की अंगड़ाई, ये मेरी दिल्ग्गी, ये रुत है प्यार करने की , सावन आया है अपने संग मोहब्बत लाया है पर मैं कहू तो क्या कहूँ , तुम्हे फुर्सत ही नहीं है , इस बार झुला भी नहीं डाला तूने मेरे लिए.

मैं-ये तो मुझे याद ही नहीं रहा , पर मैं आज ही झूला डाल दूंगा.

रीना- झूला भूल गया कोई बात नहीं, बस मुझे मत भुला देना.

मैं- ये सोचा भी कैसे तूने

रीना- कभी कभी मेरा दिल कहता है की कोई डोर तुझे मुझसे दूर खींच रही है

मैं- तो कहदे अपने दिल से ऐसी कोई डोर बनी ही नहीं .

रीना ने अपनी आँखे घुमाई और बोली- मुझे कुछ करने का मन होता है

मैं- कर डाल जो तुझे करना है

रीना- पूछ तो सही क्या करना चाहता है मेरा दिल .

मैं- बता फिर क्या चाहता है तेरा दिल

रीना- एक अजीब सी तलब लगी है मुझे. मेरा दिल मुझसे कहता है की रुद्रपुर के शिवाले चल.

मैं- हाँ, तो क्या दिक्कत है हो आना वहां पर

रीना- एक बार गयी थी , गाँव जल उठा था .

मैं- जलने दे

रीना- कुछ तो हुआ है मेरे वहां से आने के बाद. रातो को जाग जाती हूँ, ख्यालो में डूब जाती हूँ . और मेरे सपने

मैं- कैसे है तेरे सपने .

रीना- मेरे सपनो में मैं तुझे मारते हुए दिखती हूँ .

मैं- ये तो बढ़िया हैं न तूने घायल तो किया ही हुआ है क़त्ल भी कर दे तो क्या बात हो .

रीना- तू समझता क्यों नहीं .मुझे कुछ हो रहा है

मैं- कभी कभी होता है ऐसा, खैर तू बीते दिनों में किसी ऐसे लोगो से तो नहीं मिली न जो संदिग्ध हो या उनसे अपना उठाना बैठना हो . समझ रही है न तू मेरी बात .

रीना- ऐसा तो कुछ खास नहीं हुआ पर जब तू हॉस्पिटल में था तो एक आदमी रोज़ तुझे देखने आता था , मुझसे बात करता था और चला जाता था .

मैं- कौन आदमी , क्या कहता था वो

रीना- बस यही पूछता था की अब कैसा है मनीष. और चला जाता था .

मैं- बस इतना ही

रीना- एक मिनट, उसने मुझसे एक अजीब सी बात और कही थी

मैं- क्या , क्या बात

रीना- जब वो मुझे अंतिम बार मिला था तो उसने कहा था की शिवाला फिर से जाग गया है . नाहरवीर आ गए है , तू भी आना .

मैं- कौन नाहरवीर

रीना- मुझे क्या पता .

मैं- और क्या कहा उस आदमी ने

रीना- कुछ नहीं , जिस दिन तुझे होश आया उसके बाद वो दिखा नहीं मुझे.

मैने रीना को अपनी गोद से उतारा और पानी लाने को कहा. गले को तर करने के बाद मैंने उसको बताया की कैसे मुझे ये धागे मिले थे, ये हीरा मिला था और इनके मिलने से ये लाकेट बना जो उसके गले में पड़ा था .मैंने रीना को हर एक बात बताई सिवाय मीता के जिक्र के .

रीना- तो तुझे लगता है की इस लाकेट में कोई जादू, कोई शक्ति है .

मैं- हाँ मेरी जान

रीना- तो फिर तूने ये मुझे क्यों दिया.

मैं- इसने चुना है तुझे, मैंने इसे अपने गले में पहनने की बहुत कोशिश की पर इसने मेरा गला घोंटा, ये अपना नहीं रहा था मुझे, और उस रात रुद्रपुर में इसने तुझे पहचाना, अपनाया तुझे. पर क्यों, क्या रिश्ता है तेरा इससे ये सवाल मुझे खाए जा रहा है .

रीना- क्या इसी लाकेट की वजह से मुझे ये सपने आ रहे है , मैं इसे अभी उतार कर फेंक देती हु.

रीना ने लाकेट को पकड़ा और गले से बाहर करने की कोशिश की पर वो नाकाम रही .

मैं- क्या हुआ

रीना- बहुत भारी है , उठा नहीं पा रही मैं इसे.

मैं- पहने रह, तेरा कवच है ये एक तरह से .

रीना- पर क्यों .

मैं- इसी सवाल का जवाब मैं तलाश रहा हूँ. और मेरी बात सुन किसी भी हालत में तू रुद्रपुर अकेले मत जाना, मुझे लेकर चलना तू. और किसी भी अजनबी पर विश्वास मत करना कोई तुझे कुछ भी दे लेना नहीं .

रीना- मैं कुछ दिनों के लिए मेरे गाँव जा रही हु

मैं- उसमे क्या है जा

कुछ देर और हमने बाते की फिर वो चली गयी , मुझे उलझा कर . दोपहर हो गयी थी मैं भी ताई के घर से बाहर आया. सुनार के अंतिम संस्कार की तयारी हो रही थी , मैंने जब्बर को भी देखा वहां पर. जैसे ही सुनार को फूंकने के लिए ले गए . मौका देख कर मैं उसके घर में घुस गया . ये जो थोडा सा समय मिला था मैं सुनार के कमरे को अच्छी तरह से जांचना चाहता था.

वहां पर मुझे ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिससे मैं कोई कड़ी जोड़ सकू . हताश मन से मैं वहां से निकल ही रहा था की तभी.................
 
मेरी नजर उस तस्वीर पर पड़ी जो किसी ज़माने में बड़ी जिंदादिल रही होगी. अर्जुन सिंह, सुनार और जब्बर एक दुसरे के कंधो पर हाथ रखे,हँसते -खिलखिलाते हुए . तस्वीर को देख कर मैं न जाने क्यों मुस्कुरा पड़ा. लोगो का कहना सच ही था की दोस्ती बड़ी गहरी थी इन तीनो की , और मेरे सवाल बड़े गहरे थे , क्योंकि मैं जानता था की जब इतनी गहरी दोस्ती नफरत में बदलती है तो उसकी वजह मामूली नहीं हो सकती .

जब मैं घर आया तो देखा की चाची आँगन में ही थी , मुझे देख कर वो मेरे पास आयी ,

चाची- कहाँ था तू

मैं- बस यही था .

चाची-एक बेहद गंभीर मुद्दे पर मुझे बात करनी है तुमसे

मैं- कहो जो कहना है

चाची- मुझे लगता है की तुझे अब रीना से मेल-जोल थोडा कम करना चाहिए

मैं ये सुनकर थोडा हैरान हो गया

चाची- अब तुम लोग बड़े हो रहे हो. मैं जानती हूँ तुम लोग बचपन से साथ रहे हो पर इसका मतलब ये नहीं की .

“क्या मतलब नहीं चाची ” मैंने चाची की बात काटते हुए कहा .

चाची- मतलब ये की मैं चाहती हूँ तुम रीना से दुरिया बनाओ

मैं- ये सोचा भी कैसे तुमने

चाची- मुझे हक़ है ये कहने का

मैं- किस हक़ से ये हक़ है तुमको

चाची- मेरी बात को समझने की कोशिश कर , मैं समझती हूँ की तेरी दोस्त है वो , पर कहीं ऐसा न हो की वो दोस्त से आगे बढ़ जाए.

मैं- साफ़ साफ क्यों नहीं कहती तुम

चाची- मुझे लगता है की तेरा और रीना का चक्कर चल रहा है , और मैं चाहती हूँ की तेरे मन में ऐसा कोई भी विचार है तो उसे मन से निकाल देना. रिश्तेदारों की अमानत है वो, हमने उसे बेटी का हक़ दिया है ,

मैं- मैं और रीना देख लेंगे

चाची- तुम नहीं देख पाओगे, तुम समझो इस बात को . मैं जानती हूँ तुम दोनों का रिश्ता दोस्ती से बहुत आगे बढ़ चूका है , मैं ही नहीं पुरे गाँव में चर्चा होने लगी है , रीना के लिए तुमने रुद्रपुर में जो किया . तब से गाँव वालो की जुबान थम ही नहीं रही है .

मैं- रीना की जगह कोई और होती तो भी मैं अड़ जाता उसकी आबरू के लिए और गाँव कुछ भी कहे मुझे फर्क नहीं पड़ता .

चाची- पर उस को पड़ेगा. एक लड़की के दामन पर दुनिया हज़ार इलाज्म लगा देती है

मैं- उसका मेरा साथ नहीं छूटेगा, इस रिश्ते को कैसे निभाना है हम दोनों ही सोचेंगे.

चाची- मैं जानती हूँ तुम दोनों प्रेम करने लगे हो. किसी से भी छिपी नहीं है ये बात, रीना की माँ उसे जल्दी ही साथ ले जाएगी, रुद्रपुर वाले काण्ड के बाद से उसका मन बुझा हुआ है

मैं- पहले मेरे हिस्से की हर एक ख़ुशी छीन ली गयी, मेरी हर हसरत को टूटते देखा है मैंने, जब जब मैं टूटता मुझे थामने वाली अगर कोई थी तो वो रीना, बचपन से आजतक जिसे देख कर मुझे हौंसला मिला वो थी रीना, और तुम कहती हो उस से दूर हो जाऊ, तुमने मोहब्बत की बात की है तो सुनो, जिस दिन उसने मुझसे कहा की मेरा हाथ थाम ले, अगर ये सारा जहाँ भी जोर लगा लेगा तो मैं रुकुंगा नहीं .

चाची- तो तू मेरी बात नहीं मानेगा.

मैं- मैं रीना का साथ नहीं छोडूंगा. मरते दम तक नहीं छोडूंगा.

चाची- ये प्रेम, मोहब्बते सब फ़िल्मी बाते है , ये गाँव समाज इनके कुछ नियम कायदे होते है जिनसे हम सब बंधे है .

मैं- हमने भी प्रीत की डोर बाँधी है , चाची

चाची- ठीक है फिर, तुझे तो जलना ही है , मेरी फ़िक्र उस मासूम के लिए है , तेरी ये जिद ही नाश करेगी

मैं- जिद होती तो छोड़ देता, मोहब्बत है थाम कर रखूँगा.

चाची- तू जाने और तेरा भाग्य जाने,

एक तो मेरा दिमाग सुनार की मौत की वजह से ख़राब था ऊपर से चाची ने रीना से दूर होने का कह कर उसे और ख़राब कर दिया था. इस बात पर मैंने बहुत विचार किया, जो बात मुझे परेशां कर रही थी वो ये की जब रीना को मीता के बारे में मालूम होता तो क्या होगा. बेशक मीता और मेरे रिश्ते को बस हम ही समझते थे, पर एक म्यान में दो तलवारे न पहले कभी रही थी ना आगे रहने वाली थी .

चाची ने ठीक ही कहा था इस आग में मेरे साथ रीना भी जलेगी. जीवन जैसा भी था जी रहे थे अगर उस दिन मैंने सुनार से वो सुनहरा बक्सा नहीं चुराया होता तो इस पहेली में मैं उलझा नहीं होता. दूसरा मेरी चिंता थी की रीना कहीं अकेले शिवाले में न चली जाए, कही कोई रुद्रपुर वाला उस से उलझ न जाये, उसे चोट न पहुंचा दे.

दिन ढलते ढलते हलकी हलकी बूंदा-बांदी हो गयी थी जिसने पवन को और सुहानी बना दिया था . उस रात मैंने निर्णय लिया की शिवाले चला जाए, क्योंकि इन सब घटनाओ की जड वही पर थी ये तो अब तय ही था .

हलकी सी ठंडी रात में , बूंदों संग लहराती हुई राहो पर चलते हुए मैं रुद्रपुर की तरफ चला जा रहा था , रस्ते में वो ग्यारह पीपल शान से खड़े थे . मैंने देखा उनके निचे एक एक करके पुरे ग्यारह दिए जा रहे थे, जो इन हवाओ में भी शांत थे. शिवाले की सीढ़ी पर मैंने सर को टिका कर नमन किया और अन्दर दाखिल हो गया. बरसाती रात में सब कुछ किसी आबनूस का स्याह था. चूँकि मैं यहाँ पर पहले आ चूका था इसलिए अंदाजे से मैं बस चले जा रहा था ,

मैंने बस यूँ ही उस बावड़ी में हाथ डाला और मेरे हाथ में रेत आई, आज वहां पर पानी नहीं था . मैं आगे बढ़ गया . मैं देवता के कक्ष की तरफ गया. तो देखा की वहां पर आग जल रही थी , कक्ष में इधर उधर राख बिखरी पड़ी थी . देवता की मूर्ति अब पानी के निचे नहीं थी बल्कि एक पुराने से पत्थर पर रखी थी .उस आग से ऐसी आवाज आ रही थी की जैसे कुछ भुना जा रहा हो . मैंने गौर से देखा तो ये , ये तो किसी का दिल था . जो आहिस्ता आहिस्ता से जल रहा था . मुझे एक मिनट में समझ आ गया की ये किसका दिल था , ये सुनार का दिल था क्योंकि उसकी लाश से इसी हिस्से को निकाला गया था .

डर क्या होता है मैंने उस दिन महसूस किया . ये तो शुक्र था की मैंने मूत नहीं दिया खौफ के मारे. मेरे सामने एक इन्सान का दिल जल रहा था पर सवाल वही था किसलिए. मैं उलटे पाँव वापिस मुड गया पर तभी इतना जोर का शोर हुआ की उस आवाज से मेरे कान के परदे जैसे फट ही गए थे , किसी ने बड़े जोर से घंटे को बजा दिया था . मेरे सिवा कोई और भी था वहां पर .

मैं उस आवाज की दिशा में दौड़ा और वहां जाकर देखा तो वहां पर जैसे दिन निकला हुआ था . क्या खूब नजारा था , हजारो दिए जैसे एक साथ जल रहे थे वहां पर , उस खाली मैदान में . पर मेरी दिलचस्पी उस शख्स में थी जो वहां पर खड़ी थी . और जब वो पलटी तो दियो की रौशनी में मैंने उसके चेहरे को देखा,,,,,,,,,,, और देखता ही रह गया.
 
मैं अकेला ही नहीं था मेरे साथ संध्या चाची भी थी इस जगह पर जो न जाने क्या कर रही थी . चाची ने अपने ब्लाउज को उतारा और मैंने दियो की रौशनी में हुस्न के उस गजब नज़ारे को देखा , जिसे कोई और देखता तो अब तक संध्या के उभारो को अपने हाथो में थाम चूका होता. पर उसे परवाह नहीं थी .

चाची ने धरती पर पड़े कोड़े को उठाया और अपनी पीठ पर जोर जोर से मारने लगी. उसके चेहरे की शिकन बता रही थी की दर्द तो बहुत हो रहा है उसे . पर वो खुद को मारती रही कोड़े से जब तक की उसकी पीठ पर बने घावो से रक्त की धारा नहीं बहने लगी. कोई और देखता तो उसे पागल समझ लेता पर मुझे तो उसका प्रयोजन देखना था इसलिए शांत रहा मैं.

चाची की पीठ से रिश्ता खून बूंदे बनकर धरती को भिगो रहा था . बहुत देर तक ऐसा ही चलता रहा , अपने होंठो से वो कुछ बुदबुदा रही थी पर एक समय के बाद चाची हताश होने लगी अचानक से मुझे लगा की धरती हिल रही हो . क्या ये कोई भूकंप था . क्योंकि मेरे पैरो को लडखडाते हुए महसूस किया मैंने. बस कुछ ही देर जैसे की धरती में दरार पड़ गयी हो .

पर बस कुछ पलो के लिए , फिर सब थम गया और मैंने देखा की जहाँ पर चाची खड़ी थी वहां पर ढेर सारा सोना-चांदी बिखर गया था . ये मेरे लिए किसी अचम्भे से कम नहीं था .

“ये लालच, ये प्रलोभन नहीं चाहिए मुझे , सुना तुमने नहीं चाहिए ये मुझे इसके लिए नहीं आती मैं यहाँ ” रुआंसी आवाज में चीख पड़ी चाची.

“मैं जानती हूँ तुम यही पर हो , और तुम मुझे यूँ नहीं बहला पाओगे, तुम्हे आना होगा , तुम्हे आना होगा क्योंकि संध्या बुला रही है तुम्हे, तुम्हारे वचन को निभाना होगा तुम्हे, समय आ गया है तुम्हे आना होगा. लौट कर आना होगा तुम्हे ” चाची चीखती रही . न जाने किसे बुला रही थी वो पर शायद उसकी सुनने वाला कोई नहीं था , मेरे सिवाय.

रुद्रपुर की ये धरती अपने में न जाने क्या समेटे हुई थी , इस जगह में कोई तो खास बात थी, कुछ अलोकिक, कुछ रहस्यमयी पर क्या इसका जवाब मुझे चाची से ही लेना था . चाची ने बिना अपने ज़ख्मो की परवाह किये ब्लाउज पहना और वापिस चल पड़ी. दिए बुझने लगे पर उसकी पायल की झंकार मुझे दिशा दिखाती रही .

“तुम्हे क्या लगता है तुम उसे रोक पाओगे, न तुम तब रोक पाए थे न तुम अब रोक पाओगे. मैं ले आउंगी उसे , उसे लेकर आउंगी मैं ” चाची ने देवता की मूर्ति को कहा

उसके जाने के बाद वहां पर गहरी ख़ामोशी ने पैर जमा लिए. अँधेरा जैसे खाए जा रहा था मुझे, कांपते हुए मैं भी अपने खेतो की तरफ चल दिया. डर इस कदर मुझ पर था की सन सन करती हवा भी दुश्मन लगने लगी थी . जब मैं अपने खेतो पर आ पहुंचा तो चैन मिला मुझे . वो रात बस आँखों आँखों में कट गयी. मुझे इंतज़ार था सुबह का .

भोर होते ही मैं सीधा घर पहुँच गया , चाची आँगन में झाड़ू निकाल रही थी . मुझे देख कर वो रसोई में चली गयी और चाय का कप ले आई.

मैं- तुमसे बेहद जरुरी बात करनी है मुझे.

चाची- चाची मुझे भी तुमसे कुछ कहना था , हलवाई के यहाँ जाकर कुछ मिठाइयाँ ले आना और ये मैंने पर्ची बनाई है बनिए से ये सामान ले आना.

मैं- आज मिठाई किसलिए क्या है आज.

चाची - आज रक्षा बंधन है , जैसा हमारे बीच तय हुआ था तुम मेरे साथ रुद्रपुर चलोगे.

मैं- वो सब बाद में मुझे अभी कुछ बात करनी है

चाची- क्या बात

मैं- कल रात के बारे में , कल रात मैंने तुम्हे देखा था शिवाले में.

चाची की आँखों ने घुरा मुझे और बोली- सपने में देखा होगा. मैं तो यही थी

मैं- ये सच-झूठ का खेल मेरे साथ मत खेलो चाची . हम दोनों जानते है की हम क्या किस बारे में बात कर रहे है .तुम झूठ बोल सकती हो पर तुम्हारी पीठ के जख्म नहीं , मुझे तुम्हारी पीठ देखने दो अभी दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा.

चाची- ठीक है जैसी तेरी मर्ज़ी

चाची ने अपनी पीठ मेरी तरह की और मुझे जैसे काठ मार गया. चाची की पीठ पर एक भी ताज़ा निशान नहीं था , अगर कुछ था तो चिकनी पीठ और वही पुराने निशाँ.

चाची-अगर तसल्ली हो गयी हो तो अब बनिए की दूकान पर जा

मैं- जाता हूँ पर तुम लाख कोशिश कर लो मैं उस वजह को ढूंढ ही लूँगा

चाची- मुझे पूरा विश्वास है तुम्हे कामयाबी जरुर मिलेगी.

मैं- सुनार के दिल की आहुति तुमने ही दी थी , शिवाले में . तो मैं मानता हूँ की इन तमाम हत्याओ में तुम्हारा ही हाथ है

चाची- विशुद्ध चूतिये हो तुम. अगर मुझे ये सब करना होता तो मैं कभी का कर चुकी होती, मुझे रोकने की शक्ति किस्मे है भला.

मैं- अगर ये बात है तो इस नकाब को हटा कर अपनी असलियत क्यों नहीं बता देती.

चाची- फिर तुम्हारी आजमाइश कैसे होगी. और जैसा तुमने कहा तुम तलाश कर लोग तो कर लो किसने रोका है तुम्हे. ये कहानी जिसे तुम अपनी समझते हो , तुम उसके बस एक किरदार हो . ये कहानी न पहले तुम्हारी थी न आज ना आगे होगी. भूलना मत दोपहर बाद तुम्हे मेरे साथ रुद्रपुर चलना है .

दोपहर बाद मैं चाची के साथ गाड़ी में बैठ कर रुद्रपुर जा रहा था . मेरी धड़कने बढ़ी हुई थी , मैं बार बार चाची की तरफ देख रहा था .

चाची- घबराने की जरुरत नहीं है , तुम्हे वहां कोई कुछ नहीं कहेगा.

मैं- वो बात नहीं है , मैं बस सोच रहा हूँ, की इतने सालो बाद आखिर तुम क्यों जा रही हो अपने पीहर.

चाची- टूटे बन्धनों के बावजूद मैं बंधी हूँ कुछ नातो से, इतने सालो बाद मेरे भतीजे ने मुझसे कुछ माँगा है , इतना तो हक़ बनता है उसका .

मैं-हक़ तो उन माँ बाप का भी रहा होगा जिनसे नाता तोड़ आई थी तुम,

चाची- वो तुम्हारी समम्स्या नहीं है

मैं- इतना तो समझता हूँ की तुम भतीजे की वजह से नहीं जा रही , तुम्हारा भी कुछ न कुछ स्वार्थ है

चाची- ये सारी दुनिया ही स्वार्थी है . अपने आप से पूछ कर देखो .

ऐसे ही बाते करते हुए हम लोग रुद्रपुर की हवेली पहुँच गए. संध्या के नाम से ही वहां पर हलचल मची हुई थी दद्दा ठाकुर की बेटी इतने साल बाद पीहर आई थी . सबने बड़े सलीके, आदरभाव से हमारा स्वागत किया, दद्दा ठाकुर और मेरी नजरे मिली पर उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं दर्शाया की हमारे बीच कड़वाहट, ताजा दुश्मनी है . चाची मुझे लोगो से रूबरू करवा रही थी, की तभी मैंने उसे देखा .....
 
मैंने उसे देखा, मैंने पृथ्वी को देखा सीढियों से उतर कर हमारी तरफ आते हुए. जैसी हवेली की चकाचौंध थी वैसा ही रुतबा पृथ्वी का था . उसने एक बार भी मेरी तरफ नहीं देखा, जैसे मेरी कोई अहमियत नहीं थी उसकी नजरो में . वो बस अपनी बुआ से लिपट गया . उसके पाँव छुए और राखी बंधवाई की रस्म पूरी की . मैं समझता इस रिश्ते की अहमियत को तो मैंने ये ख्याल दिल से निकाल दिया.

दद्दा ठाकुर का पूरा परिवार संध्या चाची के इर्दगिर्द था, पुराणी बाते याद की जा रही थी . सब लोगो को जैसे चाव चढ़ गया था और हो भी क्यों न इस घर की बेटी सोलह साल बाद जो घर आई थी . कुछ ही देर में हम लोगो के लिए खाना लगा दिया गया. हंसी मजाक करते हुए हम सब खाना खा रहे थे , मैंने दो चार निवाले लिए ही थे की

“जी भर कर खाना, मनीष , ऐसा लजीज खाना किस्मत वालो को ही खाने को मिलता है ” पृथ्वी ने अचानक से मुझ पर कटाक्ष किया. रोटी का अगला निवाला निगलना भारी हो गया मेरे लिए.

चाची- पृथ्वी, ये क्या बदतमीजी है

पृथ्वी- माफ़ करना बुआ, मुझे किसी ने बताया था की इसके खाने के लाले पड़े हुए थे , ये तुम्हारे टुकडो पर पलता है . मैं तो बस खाने की तारीफ कर रहा था .

चाची- ये मत भूलो की ये मेरा बेटा है , ये यहाँ आया है मेरे आग्रह पर , इसका निरादर मेरा अपमान है , पृथ्वी मैं तुम्हारी वजह से इस घर में आई की इतने बरसो बाद मेरे भतीजे ने मुझसे कुछ माँगा है , ये राखी जो तेरी कलाई पर मैंने बाँधी है इसका मोल बहुत बड़ा है . पर ये ओछी हरकत करके तूने मेरा दिल दुखाया है ,

पृथ्वी- ऐसा न कहो बुआ, मैं माफ़ी मांगता हु.

मैं- माफ़ी की जरुरत नहीं है , वैसे भी मुझे फर्क नहीं पड़ता और मैं बिलकुल नहीं चाहता की मेरी वजह से आज का दिन ख़राब हो . कोई बात नहीं चाची, और फिर बड़े लोग कुछ न कुछ तो कहते ही रहते है प्रजा के बारे में .

मैंने होंठो पर मुस्कान लाते हुए कहा. मैंने माहौल को हल्का बनाने की कोशिश की तो थी पर मैं इतना जरुर समझगया था की ये पृथ्वी साला काइयां इन्सान है , इसके मन में मेरे प्रति कड़वाहट है . और हमको घंटा फर्क नहीं पड़ता था . मेरे लिए वो रोटी गले से नीचे उतारना बड़ा भारी हो गया था पर संध्या चाची की वजह से मैं चुप रहा .

खाने के बाद चाची अपनी माँ के पास चली गयी . पृथ्वी मेरे पास आया और बोला- आओ तुम्हे हवेली दिखाता हूँ

मैं बेमन से उसके साथ चला गया . वो मुझे ऊपर ले आया. संगमरमर की ये ईमारत अपने आप में एक कहानी थी , दद्दा ठाकुर की अमीरी हर कदम पर झलकती थी .

पृथ्वी- वैसे तुम्हे अचरज हो रहा होगा, ऐसे ठाठ बाट कभी देखे नहीं होंगे तुमने.

मैं- ये कोसिस बेकार है पृथ्वी, तेरी दौलत तेरे काम आएगी. मुझसे क्या मतलब इन सब बातो का

पृथ्वी- हाँ, तुमसे क्या मतलब . मैं बस तुम्हे तुम्हारा और मेरा फर्क दिखाना चाह रहा था , की मैं आसमान हु और तू जमीन

मैं- तो फिर इस फर्क को भी समझ ले, जमीन का मोल जान , ये फर्क अपने आप मालूम हो जायेगा तुझे, मैं नहीं जानता तेरी खुन्नस किस लिए है पर वो तेरी समस्या है

पृथ्वी- तूने मेले वाले दिन जो भी किया उसकी कीमत चुकानी होगी तुझे.

मैं- ओह, तो ये समस्या है तेरी.

पृथ्वी- जोरावर मेरा दोस्त था, तूने दद्दा ठाकुर पर वार किया ये गलती की तूने .

मैं- तो छोटे ठाकुर को बदला लेना है, अबे चूतिये, दोस्ती का बदला लेना चाहता है तू, उस दिन कहाँ गया था तू जब मैंने तेरे दोस्त जोरावर की गांड तोड़ी थी , देख मेरे हाथो को इन्ही हाथो से मैंने जोरावर की एक एक हड्डी तोड़ी थी , इन्ही उंगलियों से मैंने उसकी आँखे फोड़ी थी . कसम से मुझे बड़ा मजा आया था और तेरे दद्दा ठाकुर की तो किस्मत बढ़िया थी वर्ना आज उसकी फोटो भी इधर ही टंगी होती.

मेरी बात सुनकर पृथ्वी के चेहरे पर तिलमिलाहट आ गयी .

पृथ्वी- मुझे अफ़सोस है उस दिन का की मैं रुद्रपुर में नहीं था . वर्ना मर्द से टकराना किसे कहते है मैं अच्छे से समझा देता.

मै- जो मर्द होते है न वो अपने घर बुला कर मेहमानों की बेईजज्ती नहीं करते है , तुझे जोर आजमाइश का शौक है न , ठीक है , कर देता हूँ तेरी इच्छा पूरी . चुन ले तेरी मौत का दिन , जगह तेरी पसंद की होगी , समय तेरी पसंद का होगा. तू भी क्या याद करेगा किस दिलदार को दुश्मन बनाया है तूने . पर मैंने भी आदमी ही पढ़े है , मुझसे दुश्मनी का कारण दद्दा ठाकुर या फिर जोरावर नहीं है तेरे लिए .

पृथ्वी- तुझे मारूंगा मैं ये मेरा वादा है , पर तेरी मौत आसान नहीं होगी, मैं तुझे पल पल तडपाना चाहता हूँ मैं तेरा सब कुछ छीन लूँगा. तू मौत की भीख मांगेगा मुझसे .

मैं- मेरे पास है ही क्या जो तू छीन लेगा. ख़ुशी से , यारी से तू जान भी मांग लेता तो क्या मालूम मैं तेरा भला कर देता पर चलो ठीक है , तेरी दुश्मनी को भी सलाम

“अरे, तुम लोग यहाँ हो मैं तुम्हे सब कही देख आई ” चाची ने हमारी तरफ आते हुए कहा.

चाची- और क्या बाते हो रही है दोनों के बीच

मैं- पृथ्वी कह रहा है की हम दोनों की खूब जमने वाली है , तगड़ा याराना होगा .

मेरी बात सुन कर चाची के चेहरे पर शंका सी आई पर वो बोली- ये तो अच्छी बात है

पृथ्वी- हाँ बुआ , मनीष से बढ़िया दोस्त कौन मिलेगा मुझे.

मैं बस मुस्कुरा दिया.

चाची- तो अब चले , शाम ढल गयी है थोड़ी देर में रात हो जाएगी.

मैं- मुझे बाथरूम इस्तेमाल करना है

चाची- पृथ्वी इसे ले जाओ ,मैं निचे इंतज़ार कर रही हूँ

बाथरूम से फारिग होकर मैं निकला ही था की मेरी नजर सामने गलियारे में लगी उस आदमकद तस्वीर पर पड़ी, और मैं बस उसे देखता ही रह गया . सोने की फ्रेम जड़ी वो तस्वीर क्या गजब लग रही थी , जी किया बस उसे देखता ही रहूँ. पर मेरा सकूं पल भर था था. वापसी में सीढिया उतरते हुए मेरे पाँव भारी हो गए थे.

हम अपने गाँव की तरफ चल पड़े. गाडी जब हमारी जमीन के पास पहुंची तो मैंने चाची से कहा की मुझे यही पर उतार दो.

चाची- क्या हुआ तुम्हे.

मैं- सर थोडा भारी हो रहा है . खेतो पर रहूँगा थोड़ी देर.

चाची- पृथ्वी ने जो किया उसके लिए मैं शर्मिंदा हूँ

मैं- वो बात नहीं है चाची, मैं थोड़ी देर में घर आ जाऊंगा.

चाची के जाने के बाद मैं वही पर एक पेड़ के निचे कमर लगा कर बैठ गया और सोचने लगा. पर मेरे सोचने का कोई भी फायदा नहीं था . थोडा थोडा अँधेरा घिर आया था , पर हम जैसे बदनसीबो के लिए क्या उजाला क्या अँधेरा, पृथ्वी के मन में किस बात की नफरत थी ये जानना जरुरी था मेरे लिए. पेड़ो के झुरमुट से होते हुए मैं बावड़ी की तरफ चल रहा था की मैंने एक साए को रुद्रपुर की तरफ जाते देखा. और जब वो पास से गुजरा तो मैंने देखा ये ताई थी जो तेज तेज कदमो से रुद्रपुर की तरफ जा रही थी पर क्यों किसलिए क्या मकसद था ताई का उस तरफ जाने का वो भी इस समय.................
 
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